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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–020 · अध्याय 11

शेख अब्दुल्ला से फारूक और उमर अब्दुल्ला तक — कश्मीर की राजनीति, स्वायत्तता का प्रश्न और तीन पीढ़ियों का अब्दुल्ला वंश

भारतीय राजनीतिक वंशों के अध्ययन में अब्दुल्ला परिवार का मामला सबसे जटिल उदाहरणों में से एक है। यहां परिवारवाद को केवल इस तथ्य से नहीं समझा जा सकता कि पिता के बाद पुत्र और फिर पौत्र राजनीति में आए। अब्दुल्ला परिवार का इतिहास जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय, अनुच्छेद 370, केंद्र–राज्य संबंध, कश्मीरी स्वायत्तता, पाकिस्तान के साथ संघर्ष, अलगाववाद, आतंकवाद, चुनावी लोकतंत्र और राज्य के संवैधानिक पुनर्गठन से गहराई से जुड़ा है। राजनीतिक उत्तराधिकार की मुख्य श्रृंखला स्पष्ट है—

शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ↓ फारूक अब्दुल्ला ↓ उमर अब्दुल्ला

तीनों जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे। शेख अब्दुल्ला ने आधुनिक कश्मीर की सबसे प्रभावशाली जन-राजनीतिक धारा खड़ी की। उनके पुत्र फारूक अब्दुल्ला को तैयार पार्टी और असाधारण राजनीतिक विरासत मिली। और फारूक के पुत्र उमर अब्दुल्ला को परिवार, पार्टी, निर्वाचन क्षेत्र और राष्ट्रीय पहचान—चारों प्रकार की राजनीतिक पूंजी विरासत में मिली। लेकिन इस वंश की कहानी सीधी नहीं है।

1953 में शेख अब्दुल्ला सत्ता से हटाए गए और गिरफ्तार हुए। 1984 में फारूक अब्दुल्ला की सरकार गिर गई। 1987 का विवादित चुनाव कश्मीर के आधुनिक इतिहास का निर्णायक विवाद बना। 1989–90 में आतंकवाद ने चुनावी राजनीति को लगभग ध्वस्त कर दिया। 2019 में अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधान निष्प्रभावी कर दिए गए और जम्मू-कश्मीर राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों में बांट दिया गया। 2024 में उमर अब्दुल्ला लोकसभा चुनाव हार गए—लेकिन कुछ महीने बाद विधानसभा चुनाव जीतकर फिर सरकार के मुखिया बने। और अगस्त 2026 तक एक और ऐतिहासिक परिवर्तन कायम है—

अब्दुल्ला परिवार जम्मू-कश्मीर की सत्ता में वापस है, लेकिन वह उस पुराने संवैधानिक जम्मू-कश्मीर राज्य का शासन नहीं कर रहा जिसके मुख्यमंत्री शेख और फारूक रहे थे। उमर अब्दुल्ला अब एक केंद्रशासित प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, और पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करना उनकी राजनीति का प्रमुख प्रश्न बना हुआ है। सुप्रीम कोर्ट के 2023 के अनुच्छेद 370 निर्णय और बाद की कार्यवाहियों में राज्य का दर्जा बहाल करने का प्रश्न भी दर्ज है। इसलिए अब्दुल्ला परिवार का अध्ययन वास्तव में तीन चीजों का संयुक्त अध्ययन है—

राजनीतिक वंश, कश्मीर की क्षेत्रीय राजनीति, और भारतीय संघवाद की बदलती प्रकृति।

15.1 अब्दुल्ला परिवार से पहले का जम्मू-कश्मीर

आधुनिक जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक संरचना समझने के लिए 1846 तक पीछे जाना आवश्यक है। अमृतसर की संधि के बाद महाराजा गुलाब सिंह के नेतृत्व में डोगरा राज्य स्थापित हुआ। इस रियासत में विभिन्न भौगोलिक और धार्मिक क्षेत्र शामिल थे— कश्मीर घाटी, जम्मू, लद्दाख, गिलगित-बाल्टिस्तान और अन्य सीमावर्ती क्षेत्र। शासन डोगरा राजवंश के हाथ में था। लेकिन कश्मीर घाटी की आबादी में मुसलमान भारी बहुमत में थे। यही सामाजिक–राजनीतिक असंतुलन आगे राजनीतिक आंदोलन की पृष्ठभूमि बना। 15.2 1931 — आधुनिक कश्मीर राजनीति का निर्णायक वर्ष 1931 को आधुनिक कश्मीर की संगठित राजनीतिक चेतना के महत्वपूर्ण मोड़ों में माना जाता है। महाराजा हरि सिंह के शासन के विरुद्ध असंतोष बढ़ा।

जुलाई 1931 की घटनाओं और गोलीबारी ने आंदोलन को व्यापक बनाया। धार्मिक भेदभाव, सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व, भूमि संबंध, शिक्षा और राजनीतिक अधिकार प्रमुख मुद्दे बने। इसी वातावरण से शेख मोहम्मद अब्दुल्ला का राजनीतिक उदय हुआ। 15.3 शेख मोहम्मद अब्दुल्ला — वंश के संस्थापक शेख मोहम्मद अब्दुल्ला का जन्म 5 दिसंबर 1905 को सौरा, श्रीनगर में हुआ। उनका परिवार कोई शासक राजनीतिक परिवार नहीं था। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। युवावस्था में वे कश्मीर में राजनीतिक और सामाजिक सुधार की गतिविधियों से जुड़े। उनकी लंबी कद-काठी और प्रभावशाली वक्तृत्व के कारण वे आगे—

'शेर-ए-कश्मीर'

के नाम से प्रसिद्ध हुए। हमारे वंशवाद अध्ययन की कसौटी पर महत्वपूर्ण बात यह है—

शेख अब्दुल्ला को राजनीतिक सत्ता विरासत में नहीं मिली थी।

उन्होंने अपनी राजनीतिक पूंजी स्वयं बनाई। इसलिए वे वंशवादी उत्तराधिकारी नहीं बल्कि वंश-निर्माता थे। 15.4 मुस्लिम कॉन्फ्रेंस की स्थापना 1932 में ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस का गठन हुआ। शेख अब्दुल्ला और चौधरी गुलाम अब्बास इसके प्रमुख नेताओं में थे। प्रारंभिक संगठन मुख्यतः मुस्लिम आबादी की राजनीतिक शिकायतों को अभिव्यक्त करता था। लेकिन शीघ्र ही शेख अब्दुल्ला की राजनीति में परिवर्तन आया। उनका विचार था कि महाराजा के विरुद्ध लोकतांत्रिक संघर्ष को केवल मुस्लिम राजनीति तक सीमित रखने के बजाय व्यापक कश्मीरी जनता से जोड़ना चाहिए। 15.5 मुस्लिम कॉन्फ्रेंस से नेशनल कॉन्फ्रेंस 1939 में संगठन का नाम बदलकर—

जम्मू एंड कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस

कर दिया गया। यह केवल नाम परिवर्तन नहीं था। यह राजनीति की दिशा में परिवर्तन था—

सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व से धर्मनिरपेक्ष क्षेत्रीय राष्ट्रवाद की ओर।

चौधरी गुलाम अब्बास और अन्य नेता इस दिशा से सहमत नहीं थे और मुस्लिम कॉन्फ्रेंस बाद में अलग राजनीतिक धारा के रूप में पुनर्जीवित हुई। इस विभाजन का प्रभाव 1947 तक दिखाई दिया। 15.6 जवाहरलाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला शेख अब्दुल्ला और जवाहरलाल नेहरू के संबंध आधुनिक कश्मीर इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संबंधों में हैं। दोनों में कई समानताएं थीं— धर्मनिरपेक्ष राजनीति, सामंती शासन का विरोध, आधुनिकतावाद, और मुस्लिम लीग की द्विराष्ट्र अवधारणा के प्रति असहमति। नेहरू स्वयं कश्मीरी पंडित परिवार से थे। शेख अब्दुल्ला के साथ उनका व्यक्तिगत और राजनीतिक संबंध 1947 में जम्मू-कश्मीर के भविष्य के प्रश्न पर अत्यंत महत्वपूर्ण बना। लेकिन यही संबंध 1953 में गंभीर टकराव में बदल गया।

15.7 1944 — 'नया कश्मीर' नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 1944 में प्रसिद्ध 'नया कश्मीर' कार्यक्रम प्रस्तुत किया। इसमें— लोकतांत्रिक संविधान, भूमि सुधार, महिला अधिकार, शिक्षा, श्रमिक अधिकार, और सामाजिक–आर्थिक पुनर्गठन की व्यापक कल्पना थी। यह दस्तावेज नेशनल कॉन्फ्रेंस की वैचारिक पहचान समझने का अत्यंत महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत है। पार्टी केवल महाराजा-विरोधी आंदोलन नहीं रहना चाहती थी। वह एक आधुनिक कल्याणकारी कश्मीर की परिकल्पना प्रस्तुत कर रही थी। 15.8 1946 — 'कश्मीर छोड़ो' आंदोलन 1946 में शेख अब्दुल्ला ने महाराजा हरि सिंह के विरुद्ध Quit Kashmir—कश्मीर छोड़ो आंदोलन शुरू किया। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

जवाहरलाल नेहरू ने उनके समर्थन में कश्मीर जाने का प्रयास किया और उन्हें भी रोका गया। इस घटनाक्रम ने शेख–नेहरू संबंध को और मजबूत किया। लेकिन इसने महाराजा और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच दूरी भी अत्यधिक बढ़ा दी। 15.9 1947 — विभाजन और महाराजा की दुविधा ब्रिटिश भारत के विभाजन के समय रियासतों को भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का विकल्प मिला। महाराजा हरि सिंह तत्काल किसी एक देश में शामिल नहीं हुए। उनकी इच्छा कुछ समय तक स्वतंत्र स्थिति बनाए रखने की थी। लेकिन अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान की दिशा से कबायली आक्रमण ने परिस्थिति बदल दी। आक्रमणकारी श्रीनगर की ओर बढ़े। महाराजा ने भारत से सैन्य सहायता मांगी। 15.10 विलय-पत्र

26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ Instrument of Accession—विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए। भारत ने सैन्य सहायता भेजी। यहीं से जम्मू-कश्मीर औपचारिक रूप से भारत में शामिल हुआ। लेकिन युद्ध जारी रहा। भारत यह मामला संयुक्त राष्ट्र तक भी ले गया। कश्मीर प्रश्न अंतरराष्ट्रीय विवाद बन गया। इस पूरे घटनाक्रम में शेख अब्दुल्ला भारत के साथ संबंध के समर्थक प्रमुख कश्मीरी नेता के रूप में उभरे। 15.11 शेख अब्दुल्ला सत्ता में महाराजा ने शेख अब्दुल्ला को प्रशासन में केंद्रीय भूमिका दी। मार्च 1948 में वे जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री बने। ध्यान रहे— उस समय जम्मू-कश्मीर सरकार के प्रमुख का पद 'मुख्यमंत्री' नहीं बल्कि Prime Minister कहलाता था।

राज्य प्रमुख को बाद में सदर-ए-रियासत कहा गया। ये विशिष्ट व्यवस्थाएं जम्मू-कश्मीर की विशेष संवैधानिक स्थिति का हिस्सा थीं। 15.12 अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान में जम्मू-कश्मीर के लिए विशेष संवैधानिक व्यवस्था अनुच्छेद 370 में रखी गई। यह व्यवस्था मूलतः अस्थायी प्रावधानों वाले भाग XXI में थी। जम्मू-कश्मीर पर भारतीय संविधान के प्रावधानों का लागू होना अन्य राज्यों से अलग प्रक्रिया के तहत होता था। राज्य का अपना संविधान भी बना। इसी संवैधानिक ढांचे को लेकर अगले सात दशकों तक भारत की राजनीति में विवाद चलता रहा।

सुप्रीम कोर्ट ने 2023 के अपने विस्तृत निर्णय में अनुच्छेद 370 की संवैधानिक उत्पत्ति, राष्ट्रपति आदेशों और जम्मू-कश्मीर के भारत के साथ संवैधानिक संबंध का व्यापक परीक्षण किया। 15.13 भूमि सुधार — शेख अब्दुल्ला की बड़ी विरासत शेख अब्दुल्ला सरकार की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक–आर्थिक नीतियों में बड़े भूमि सुधार थे। Big Landed Estates Abolition Act, 1950 के माध्यम से बड़े जमींदारों की भूमि सीमा निर्धारित की गई और भूमि के पुनर्वितरण की प्रक्रिया चली। 'Land to the tiller' नीति ने कश्मीर के ग्रामीण समाज की संरचना बदलने में बड़ी भूमिका निभाई। यह शेख अब्दुल्ला की लोकप्रियता का महत्वपूर्ण आधार बना। उनकी विरासत को केवल अनुच्छेद 370 से जोड़ना इसलिए अधूरा है। 15.14 1952 दिल्ली समझौता

नेहरू और शेख अब्दुल्ला के बीच 1952 में दिल्ली समझौता हुआ। इसमें भारत और जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक संबंधों के विभिन्न पहलुओं पर सहमति बनाई गई। लेकिन इसी समय शेख अब्दुल्ला की राजनीतिक भाषा और कश्मीर के अंतिम संवैधानिक संबंध को लेकर दिल्ली में संदेह बढ़ने लगा। दो पुराने सहयोगियों के बीच विश्वास तेजी से टूट रहा था। 15.15 1953 — सबसे बड़ा मोड़ अगस्त 1953 में शेख अब्दुल्ला को जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री पद से हटा दिया गया। उन्हें गिरफ्तार किया गया। उनके स्थान पर बख्शी गुलाम मोहम्मद सत्ता में आए। यह घटना कश्मीर के आधुनिक राजनीतिक इतिहास में अत्यंत विवादास्पद है। शेख समर्थक इसे दिल्ली द्वारा लोकतांत्रिक हस्तक्षेप मानते रहे।

दूसरी व्याख्या शेख की बदलती राजनीतिक भाषा और भारत के साथ संबंध को लेकर उत्पन्न गंभीर संवैधानिक-सुरक्षा चिंताओं पर जोर देती है। यहीं से दिल्ली और कश्मीर की मुख्यधारा राजनीति के बीच अविश्वास की एक लंबी परंपरा शुरू हुई। 15.16 कश्मीर कॉन्सपिरेसी केस शेख अब्दुल्ला लंबे समय तक हिरासत और कानूनी कार्रवाइयों में उलझे रहे। उनसे जुड़े नेताओं के खिलाफ Kashmir Conspiracy Case चला। इस दौरान उनकी राजनीति में आत्मनिर्णय और जनमत-संग्रह का प्रश्न अधिक प्रमुख हुआ। उनके समर्थकों ने Plebiscite Front के माध्यम से इस राजनीतिक मांग को आगे बढ़ाया। यह शेख की राजनीतिक यात्रा का दूसरा चरण था— पहले भारत के साथ विलय के समर्थक प्रमुख नेता,

फिर दिल्ली से टकराव और जनमत-संग्रह की मांग से जुड़ी राजनीति। 15.17 नेहरू–शेख संबंध का विरोधाभास अब्दुल्ला परिवार के इतिहास का यह महत्वपूर्ण पाठ है। जवाहरलाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला कभी अत्यंत निकट सहयोगी थे। लेकिन 1953 के बाद वही संबंध अविश्वास में बदल गया। इससे कश्मीर राजनीति का एक स्थायी पैटर्न विकसित हुआ—

दिल्ली के साथ सहयोग और दिल्ली के विरुद्ध स्वायत्तता—दोनों के बीच संतुलन।

आगे फारूक और उमर अब्दुल्ला की राजनीति में भी यही द्वंद्व दिखाई देता है। 15.18 1975 — इंदिरा–शेख समझौता दो दशकों से अधिक राजनीतिक संघर्ष के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और शेख अब्दुल्ला के बीच समझौता हुआ। इसे सामान्यतः 1975 Indira–Sheikh Accord कहा जाता है। शेख अब्दुल्ला ने भारतीय संवैधानिक व्यवस्था के भीतर सत्ता में लौटना स्वीकार किया। वे फिर जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बने। यह अत्यंत बड़ा राजनीतिक परिवर्तन था। जनमत-संग्रह की राजनीति से वे पुनः भारतीय चुनावी-संवैधानिक व्यवस्था में लौट आए। 15.19 आलोचना भी हुई शेख के समर्थकों ने इसे व्यावहारिक राजनीतिक समझौता माना। आलोचकों ने प्रश्न उठाया—

यदि अंततः भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में ही लौटना था तो 1953 से 1975 के बीच के संघर्ष का परिणाम क्या रहा? दूसरी ओर शेख समर्थकों का तर्क था कि उस संघर्ष ने कश्मीर की विशिष्ट राजनीतिक पहचान को जीवित रखा। यह विवाद आज भी इतिहासलेखन का हिस्सा है। 15.20 1977 — शेख की सबसे बड़ी चुनावी वैधता 1977 का जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव अत्यंत महत्वपूर्ण था। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। इन चुनावों को जम्मू-कश्मीर के अपेक्षाकृत स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों में गिना जाता है। इससे शेख अब्दुल्ला को एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक वैधता मिली। अब वे केवल ऐतिहासिक आंदोलनकारी नेता नहीं थे। वे मतपेटी के माध्यम से सत्ता में लौटे नेता थे। 15.21 अब वंशवाद शुरू होता है

शेख अब्दुल्ला की अपनी राजनीतिक यात्रा मुख्यतः अर्जित थी। लेकिन उनके अंतिम वर्षों में उत्तराधिकार का प्रश्न उठने लगा। उनके पुत्र—

डॉ. फारूक अब्दुल्ला

राजनीति में आगे आए। यहीं से नेशनल कॉन्फ्रेंस में परिवार-केंद्रित उत्तराधिकार स्पष्ट दिखाई देता है। 15.22 फारूक अब्दुल्ला — डॉक्टर से उत्तराधिकारी फारूक अब्दुल्ला का जन्म 21 अक्टूबर 1937 को हुआ। उन्होंने चिकित्सा शिक्षा प्राप्त की। उनकी शुरुआती पहचान पूर्णकालिक आंदोलनकारी राजनेता की नहीं थी। लेकिन वे शेख अब्दुल्ला के पुत्र थे। यही उनकी सबसे बड़ी प्रारंभिक राजनीतिक पूंजी थी। 1980 में वे लोकसभा पहुंचे। और शीघ्र ही पार्टी नेतृत्व में उनका स्थान मजबूत हो गया। 15.23 1982 — पिता से पुत्र 8 सितंबर 1982 को शेख अब्दुल्ला का निधन हुआ। इसके बाद फारूक अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने। यही नेशनल कॉन्फ्रेंस के इतिहास का स्पष्ट वंशवादी हस्तांतरण था—

शेख अब्दुल्ला → फारूक अब्दुल्ला।

फारूक ने कोई नया राजनीतिक आंदोलन खड़ा करके शीर्ष नेतृत्व प्राप्त नहीं किया था। उन्हें पिता की पार्टी, नाम, संगठन, भावनात्मक विरासत और सत्ता मिली। इसलिए उनके राजनीतिक प्रवेश को वंशवादी कहना तथ्यात्मक रूप से उचित है। 15.24 1983 चुनाव — फारूक की पहली बड़ी परीक्षा लेकिन उत्तराधिकार प्राप्त करना और उसे चुनाव में वैध बनाना अलग बातें हैं। 1983 विधानसभा चुनाव फारूक की पहली बड़ी परीक्षा थी। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने उनके नेतृत्व में बहुमत प्राप्त किया। इससे फारूक ने यह साबित किया कि वे केवल नियुक्त उत्तराधिकारी नहीं हैं। मतदाताओं ने भी उनके नेतृत्व को स्वीकार किया। यहीं inherited legitimacy ने electoral legitimacy प्राप्त की। 15.25 इंदिरा गांधी बनाम फारूक

1983 चुनाव में कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच तीखा संघर्ष हुआ। फारूक ने क्षेत्रीय स्वायत्तता और गैर-कांग्रेसी राजनीति की दिशा पकड़ी। वे विपक्षी दलों के साथ भी सक्रिय हुए। इससे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और फारूक के संबंध खराब हुए। अगले वर्ष कश्मीर राजनीति में एक बड़ा सत्ता परिवर्तन हुआ। 15.26 गुलाम मोहम्मद शाह — परिवार के भीतर विद्रोह शेख अब्दुल्ला की बेटी खालिदा शाह के पति गुलाम मोहम्मद शाह ने फारूक के विरुद्ध विद्रोह किया। नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायकों का एक समूह उनके साथ चला गया। कांग्रेस ने उन्हें समर्थन दिया। 1984 में फारूक अब्दुल्ला सरकार गिर गई। गुलाम मोहम्मद शाह मुख्यमंत्री बने। यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है—

अब्दुल्ला परिवार के भीतर सत्ता संघर्ष केवल पिता-पुत्र की सीधी रेखा नहीं था।

शेख की बेटी की शाखा ने भी पुत्र फारूक को चुनौती दी।

15.27 1986 — फारूक और कांग्रेस का समझौता राजनीतिक समीकरण फिर बदले। फारूक अब्दुल्ला और राजीव गांधी के बीच समझौता हुआ। नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस ने गठबंधन किया। फारूक फिर मुख्यमंत्री बने। लेकिन इसी गठबंधन ने 1987 के विधानसभा चुनाव की पृष्ठभूमि तैयार की। 15.28 1987 चुनाव — आधुनिक कश्मीर इतिहास का निर्णायक विवाद 1987 विधानसभा चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस–कांग्रेस गठबंधन के सामने Muslim United Front—MUF था। चुनाव में NC–Congress गठबंधन ने बड़ी जीत हासिल की। लेकिन चुनावी धांधली के गंभीर आरोप लगे। कई विद्वानों, पत्रकारों और कश्मीर अध्येताओं ने 1987 चुनाव को बाद के उग्रवाद की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण कारक माना है। लेकिन यहां सावधानी जरूरी है।

यह कहना कि आतंकवाद केवल 1987 चुनाव के कारण शुरू हुआ, अतिसरलीकरण होगा।

पाकिस्तान की नीति, अफगान जिहाद के बाद का क्षेत्रीय वातावरण, हथियार और प्रशिक्षण, स्थानीय राजनीतिक असंतोष, चुनावी अविश्वास और अलगाववादी विचारधारा— सभी कारक महत्वपूर्ण थे। 15.29 1989–90 — व्यवस्था का टूटना 1989 से जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद तेजी से बढ़ा। हत्या, अपहरण, सुरक्षा बलों पर हमले, राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या और भय का वातावरण बढ़ा। 1990 में फारूक अब्दुल्ला ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया। राज्य में राज्यपाल शासन लागू हुआ। इसी दौर में कश्मीरी पंडित समुदाय का बड़े पैमाने पर घाटी से विस्थापन हुआ। नेशनल कॉन्फ्रेंस की चुनावी राजनीति लगभग ठहर गई। 15.30 फारूक पर इतिहास का प्रश्न फारूक अब्दुल्ला के मूल्यांकन में सबसे कठिन प्रश्नों में एक है—

क्या 1980 के दशक की मुख्यधारा राजनीतिक व्यवस्था कश्मीर में बढ़ते असंतोष को पहचानने और संभालने में विफल रही? आलोचक विशेष रूप से— 1987 चुनाव, कांग्रेस–NC गठबंधन, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, और राजनीतिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाते हैं। फारूक समर्थक पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा परिस्थितियों को निर्णायक कारक मानते हैं। संतुलित इतिहासलेखन दोनों को दर्ज करता है। 15.31 1996 — चुनावी राजनीति की वापसी लगभग छह वर्षों के राज्यपाल/राष्ट्रपति शासन के बाद 1996 में विधानसभा चुनाव हुए। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने भारी बहुमत प्राप्त किया। फारूक अब्दुल्ला फिर मुख्यमंत्री बने। यह उनकी राजनीतिक वापसी थी। अब उनका प्रमुख एजेंडा था—

Autonomy—स्वायत्तता।

15.32 स्वायत्तता प्रस्ताव फारूक सरकार ने जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता की समीक्षा के लिए समिति बनाई। 2000 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने Autonomy Resolution पारित किया। इसमें राज्य की 1953 से पहले की संवैधानिक स्थिति के बड़े हिस्से की बहाली की मांग थी। केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया। यह महत्वपूर्ण विरोधाभास था— फारूक की पार्टी राज्य में अधिक स्वायत्तता मांग रही थी, लेकिन उसी समय उनका पुत्र केंद्र की NDA सरकार में मंत्री था। 15.33 तीसरी पीढ़ी — उमर अब्दुल्ला फारूक के पुत्र उमर अब्दुल्ला का जन्म 10 मार्च 1970 को हुआ। 1998 में वे लोकसभा के लिए चुने गए। उस समय वे देश के सबसे युवा सांसदों में थे।

आगे अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में उन्हें केंद्रीय मंत्री बनाया गया। यह तीसरी पीढ़ी का स्पष्ट प्रवेश था—

शेख → फारूक → उमर।

15.34 उमर को क्या विरासत में मिला? उमर को मिला— नेशनल कॉन्फ्रेंस का संगठन, अब्दुल्ला नाम, शेख अब्दुल्ला की ऐतिहासिक स्मृति, फारूक की राष्ट्रीय राजनीतिक पहुंच, सुरक्षित राजनीतिक नेटवर्क, और दिल्ली तथा श्रीनगर दोनों में पहचान। इसलिए उनका प्रारंभिक राजनीतिक प्रवेश स्पष्ट रूप से वंशवादी था। यदि वे फारूक अब्दुल्ला के पुत्र नहीं होते तो इतनी कम उम्र में राष्ट्रीय राजनीति के शीर्ष स्तर तक पहुंचना अत्यंत कठिन होता। 15.35 2002 — पिता से पुत्र को पार्टी 2002 में फारूक अब्दुल्ला ने नेशनल कॉन्फ्रेंस का नेतृत्व उमर को सौंप दिया। यह दूसरा स्पष्ट पारिवारिक हस्तांतरण था— लेकिन उसी वर्ष विधानसभा चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस सत्ता से बाहर हो गई। उमर स्वयं गांदरबल से चुनाव हार गए।

यह महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक संदेश था—

वंश पार्टी का नेतृत्व दे सकता है; मतदाता जीत की गारंटी नहीं देता।

15.36 2008 चुनाव और उमर की वापसी 2008 के विधानसभा चुनाव के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस सबसे बड़ी पार्टी बनी। उसने कांग्रेस के साथ सरकार बनाई। जनवरी 2009 में उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने। वे उस समय जम्मू-कश्मीर के सबसे युवा मुख्यमंत्रियों में थे। अब तीन पीढ़ियां राज्य के शीर्ष पद तक पहुंच चुकी थीं—

शेख अब्दुल्ला, फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला।

भारतीय राजनीति में यह अत्यंत दुर्लभ उदाहरण है। 15.37 2010 की अशांति उमर सरकार का सबसे कठिन दौर 2010 में आया। सुरक्षा बलों की कार्रवाई और मौतों के बाद घाटी में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए। पत्थरबाजी, कर्फ्यू, प्रदर्शन, सुरक्षा बलों की कार्रवाई और नागरिक मौतों ने सरकार को गंभीर संकट में डाल दिया। युवा मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत किए गए उमर की प्रशासनिक क्षमता पर सवाल उठे। यह उनके राजनीतिक जीवन की पहली बड़ी शासन-परीक्षा थी। 15.38 AFSPA और सुरक्षा नीति उमर ने अपने कार्यकाल में कुछ शांत क्षेत्रों से Armed Forces (Special Powers) Act—AFSPA हटाने की मांग भी उठाई। लेकिन सुरक्षा प्रतिष्ठान और केंद्र में इसे लेकर अलग दृष्टिकोण था।

इससे फिर वही पुराना अब्दुल्ला द्वंद्व सामने आया— दिल्ली के साथ सरकार चलाना, लेकिन कश्मीर में अधिक राजनीतिक और सुरक्षा स्वायत्तता की मांग करना। 15.39 2014 — सत्ता से बाहर 2014 विधानसभा चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस को भारी नुकसान हुआ। PDP सबसे बड़ी पार्टी बनी और भाजपा ने जम्मू क्षेत्र में मजबूत प्रदर्शन किया। आगे PDP–BJP गठबंधन सरकार बनी। उमर विपक्ष में चले गए। यह अब्दुल्ला परिवार के लिए महत्वपूर्ण झटका था। कश्मीर की क्षेत्रीय राजनीति अब केवल NC-केंद्रित नहीं रही थी। PDP एक गंभीर प्रतिद्वंद्वी बन चुकी थी। 15.40 2019 — वह घटना जिसने पूरी राजनीति बदल दी 5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति में ऐतिहासिक परिवर्तन किया।

अनुच्छेद 370 के तहत लागू विशेष व्यवस्था को राष्ट्रपति आदेशों और संसद की कार्रवाई के माध्यम से निष्प्रभावी किया गया। साथ ही Jammu and Kashmir Reorganisation Act, 2019 के जरिए राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों में विभाजित किया गया—

जम्मू-कश्मीर

और

लद्दाख।

सुप्रीम कोर्ट के 2023 निर्णय में इन राष्ट्रपति आदेशों और पुनर्गठन की संवैधानिक पृष्ठभूमि का विस्तृत परीक्षण दर्ज है। 15.41 अब्दुल्ला परिवार की हिरासत 5 अगस्त 2019 के आसपास फारूक और उमर अब्दुल्ला सहित अनेक मुख्यधारा कश्मीरी नेताओं को हिरासत में लिया गया। उमर पर बाद में Public Safety Act भी लगाया गया। फारूक पर भी PSA के तहत कार्रवाई हुई। केंद्र का तर्क सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता पर आधारित था। आलोचकों ने निर्वाचित मुख्यधारा नेताओं की लंबी हिरासत को लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रश्न से जोड़ा। यह अब्दुल्ला परिवार और केंद्र के संबंधों का एक और ऐतिहासिक निम्न बिंदु था। 15.42 एक विडंबना यहां इतिहास लगभग वृत्त पूरा करता दिखाई देता है। 1953 में—

शेख अब्दुल्ला को सत्ता से हटाकर हिरासत में लिया गया था।

2019 में—

उनके पुत्र और पौत्र दोनों हिरासत में थे।

लेकिन दोनों घटनाओं का संवैधानिक और राजनीतिक संदर्भ अलग था। इसलिए इन्हें समान घटना कहना गलत होगा। फिर भी अब्दुल्ला परिवार की राजनीतिक स्मृति में 'दिल्ली बनाम कश्मीर नेतृत्व' की कथा को इससे नया बल मिला। 15.43 गुपकार घोषणा अनुच्छेद 370 हटाए जाने से पहले और बाद में कश्मीर के विभिन्न मुख्यधारा दलों ने जम्मू-कश्मीर की विशेष संवैधानिक स्थिति की रक्षा/बहाली के लिए सहयोग की कोशिश की। आगे People's Alliance for Gupkar Declaration—PAGD बना। इसमें नेशनल कॉन्फ्रेंस और PDP सहित कई दल शामिल हुए। फारूक अब्दुल्ला इसके प्रमुख चेहरों में रहे। इससे पहली बार NC और PDP जैसे प्रतिद्वंद्वी एक साझा संवैधानिक मुद्दे पर साथ आए। 15.44 सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370

2019 की संवैधानिक कार्रवाइयों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। 11 दिसंबर 2023 को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने निर्णय दिया। न्यायालय ने अनुच्छेद 370 को अस्थायी प्रावधान माना और राष्ट्रपति द्वारा उसे निष्प्रभावी करने की संवैधानिक प्रक्रिया के मूल परिणाम को बरकरार रखा। न्यायालय ने चुनाव कराने के निर्देश भी दिए और केंद्र की ओर से जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल करने संबंधी आश्वासन को दर्ज किया। यह नेशनल कॉन्फ्रेंस की उस राजनीतिक मांग के लिए बड़ा न्यायिक झटका था जिसमें 5 अगस्त 2019 की संवैधानिक स्थिति को पलटने की अपेक्षा थी। 15.45 अब राजनीतिक लड़ाई का केंद्र बदला सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद व्यावहारिक राजनीति में प्राथमिकताएं बदलीं।

अनुच्छेद 370 की तत्काल न्यायिक बहाली का रास्ता बंद हो गया। अब प्रमुख मुद्दे बने—

राज्य का दर्जा, निर्वाचित सरकार के अधिकार, भूमि और रोजगार सुरक्षा, स्थानीय राजनीतिक प्रतिनिधित्व।

यहीं से उमर अब्दुल्ला की राजनीति का नया चरण शुरू हुआ। 15.46 2024 लोकसभा चुनाव — उमर की बड़ी पराजय 2024 लोकसभा चुनाव में उमर अब्दुल्ला बारामूला से उम्मीदवार बने। उनके सामने जेल में बंद स्वतंत्र उम्मीदवार अब्दुल राशिद शेख—इंजीनियर राशिद थे। परिणाम चौंकाने वाला रहा। उमर चुनाव हार गए। यह एक महत्वपूर्ण संकेत था कि अब्दुल्ला नाम कश्मीर घाटी में स्वतः विजय की गारंटी नहीं है। 2024 में जम्मू-कश्मीर की पांच लोकसभा सीटों पर मतदान हुआ; निर्वाचन आयोग के आधिकारिक चुनावी आंकड़े राज्य/केंद्रशासित प्रदेश की चुनावी भागीदारी और परिणामों को दर्ज करते हैं। 15.47 वंशवाद की सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक सीमा उमर की हार इस शोध के लिए विशेष महत्व रखती है। उनके पास— तीन पीढ़ियों का नाम,

स्थापित पार्टी, पूर्व मुख्यमंत्री का दर्जा, राष्ट्रीय पहचान, और संगठन सब था। फिर भी मतदाता ने उन्हें हरा दिया। यह भारतीय राजनीतिक वंशों के अध्ययन का मूल सिद्धांत है—

वंशवाद प्रवेश और अवसर को प्रभावित करता है; परिणाम पर उसका पूर्ण नियंत्रण नहीं होता।

15.48 कुछ महीने बाद तस्वीर पलट गई सितंबर–अक्टूबर 2024 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव हुए। ये 2014 के बाद पहले विधानसभा चुनाव थे। और 2019 के संवैधानिक पुनर्गठन के बाद भी पहले। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने कांग्रेस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा। परिणाम नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। पार्टी सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरी और गठबंधन सरकार बनाने की स्थिति में आया। 15.49 उमर ने दो सीटों से चुनाव लड़ा लोकसभा हार के कुछ महीने बाद उमर अब्दुल्ला ने विधानसभा चुनाव में—

बडगाम

गांदरबल

से चुनाव लड़ा। वे दोनों सीटों से जीत गए। यह उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक वापसी थी। लोकसभा चुनाव में पराजित नेता कुछ ही महीनों बाद दो विधानसभा क्षेत्रों से विजयी होकर सरकार के शीर्ष पद तक पहुंच गया। राजनीतिक वंशवाद का अध्ययन करते समय यह विरोधाभास महत्वपूर्ण है। 15.50 अक्टूबर 2024 — उमर फिर मुख्यमंत्री 16 अक्टूबर 2024 को उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। लेकिन यह 2009 वाला मुख्यमंत्री पद नहीं था। तब वे पूर्ण राज्य जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री थे। अब वे केंद्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बने। यानी पद का नाम वही था— लेकिन संवैधानिक शक्ति-संरचना बदल चुकी थी। 15.51 मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल

केंद्रशासित प्रदेश बनने के बाद जम्मू-कश्मीर में निर्वाचित सरकार और उपराज्यपाल के अधिकारों का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया। पुलिस, लोक व्यवस्था और कुछ प्रशासनिक क्षेत्रों में केंद्र/उपराज्यपाल की भूमिका अधिक है। इसलिए उमर सरकार के सामने चुनौती केवल भाजपा या विपक्ष नहीं है। एक मूल प्रश्न है—

निर्वाचित मुख्यमंत्री की वास्तविक प्रशासनिक सीमा क्या है?

यही आने वाले वर्षों में जम्मू-कश्मीर के संघीय संबंधों की प्रमुख परीक्षा है। 15.52 राज्य का दर्जा — अब्दुल्ला राजनीति का नया केंद्रीय मुद्दा उमर सरकार ने पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने को प्राथमिक मांग बनाया। अक्टूबर 2024 में जम्मू-कश्मीर मंत्रिमंडल ने राज्य का दर्जा बहाल करने का प्रस्ताव पारित किया—बाद की सुप्रीम कोर्ट कार्यवाही में भी 18 अक्टूबर 2024 के इस प्रस्ताव का उल्लेख हुआ है। 2025 में राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग फिर सुप्रीम कोर्ट के सामने आई। केंद्र की ओर से यह भी कहा गया कि जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से हो चुके हैं और निर्वाचित सरकार कार्यरत है। अगस्त 2026 तक राज्य का दर्जा बहाल करने का प्रश्न राजनीतिक रूप से जीवित है।

15.53 अनुच्छेद 370 बनाम राज्य का दर्जा इन दोनों मुद्दों में अंतर आवश्यक है। अनुच्छेद 370 का प्रश्न जम्मू-कश्मीर की विशेष संवैधानिक स्थिति से जुड़ा था। Statehood—राज्य का दर्जा अलग प्रश्न है। सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में अनुच्छेद 370 पर केंद्र की कार्रवाई के परिणाम को बरकरार रखा। लेकिन राज्य का दर्जा बहाल करने का प्रश्न समाप्त नहीं हुआ। इसीलिए नेशनल कॉन्फ्रेंस की व्यावहारिक राजनीति अब राज्य का दर्जा बहाल कराने पर अधिक केंद्रित दिखाई देती है। 15.54 तीन पीढ़ियों में एक आश्चर्यजनक निरंतरता शेख, फारूक और उमर— तीनों की राजनीति में अलग-अलग रूप में एक ही केंद्रीय तनाव दिखाई देता है—

दिल्ली के साथ संबंध कैसे रखे जाएं?

शेख ने नेहरू से सहयोग किया, फिर टकराए, फिर इंदिरा से समझौता किया। फारूक ने इंदिरा से टकराव किया, राजीव से समझौता किया और बाद में NDA के साथ भी राजनीतिक संबंध बनाए। उमर वाजपेयी सरकार में मंत्री रहे, बाद में भाजपा के सबसे मुखर आलोचकों में आए। अर्थात नेशनल कॉन्फ्रेंस की राजनीति कभी पूर्ण अलगाव और कभी पूर्ण केंद्रीय समर्पण की नहीं रही। वह लगातार autonomy–integration spectrum पर अपना स्थान खोजती रही। 15.55 भाजपा का दृष्टिकोण भाजपा ने लंबे समय तक अनुच्छेद 370 को भारतीय एकीकरण में बाधा माना। जनसंघ के समय से उसका नारा था—

एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान नहीं चलेंगे।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 1953 में जम्मू-कश्मीर में हिरासत के दौरान मृत्यु भाजपा/जनसंघ की राजनीतिक स्मृति में केंद्रीय स्थान रखती है। 2019 में मोदी सरकार ने वह संवैधानिक परिवर्तन किया जिसकी मांग जनसंघ–भाजपा दशकों से करती रही थी। इस दृष्टिकोण में अब्दुल्ला परिवार की स्वायत्तता राजनीति को भाजपा ने अक्सर विशेषाधिकारवादी और अलगाव को बढ़ाने वाली व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया। 15.56 नेशनल कॉन्फ्रेंस का उत्तर NC का तर्क मूलतः अलग है। उसके अनुसार जम्मू-कश्मीर की विशिष्ट संवैधानिक व्यवस्था— भारत से दूरी का साधन नहीं, बल्कि भारत के साथ हुए ऐतिहासिक संवैधानिक संबंध का हिस्सा थी। पार्टी का तर्क रहा कि संघीय स्वायत्तता और भारतीय संघ में सदस्यता परस्पर विरोधी नहीं हैं।

इसी वैचारिक अंतर ने जनसंघ/भाजपा और नेशनल कॉन्फ्रेंस को दशकों तक कश्मीर प्रश्न के दो विपरीत राजनीतिक ध्रुवों पर रखा। 15.57 परिवारवाद का आरोप अब्दुल्ला परिवार पर वंशवाद का आरोप अत्यंत मजबूत तथ्यात्मक आधार रखता है। पार्टी के ऐतिहासिक नेता—

शेख अब्दुल्ला।

उनके बाद—

फारूक अब्दुल्ला।

फिर—

उमर अब्दुल्ला।

तीनों सरकार के प्रमुख। तीनों पार्टी के केंद्रीय नेता। अर्थात लगभग एक सदी के NC इतिहास का बहुत बड़ा हिस्सा एक ही परिवार के नेतृत्व में रहा। इसे केवल संयोग कहना संभव नहीं। 15.58 लेकिन नेशनल कॉन्फ्रेंस केवल परिवार नहीं दूसरी ओर NC को केवल 'अब्दुल्ला परिवार की पार्टी' कहना भी इतिहास को छोटा करना होगा। पार्टी के पीछे— 1930 के दशक का राजनीतिक आंदोलन, नया कश्मीर कार्यक्रम, स्वायत्तता आंदोलन, क्षेत्रीय पहचान, और व्यापक कैडर नेटवर्क रहा है। उसके हजारों कार्यकर्ताओं और अनेक नेताओं का योगदान परिवार से बाहर का है। आतंकवाद के वर्षों में NC के बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और राजनीतिक प्रतिनिधि हिंसा का निशाना भी बने। इसलिए पार्टी की सामाजिक जड़ें परिवार से बड़ी हैं।

15.59 क्या शेख अब्दुल्ला वंशवादी नेता थे?

नहीं।

उन्होंने राजनीतिक विरासत प्राप्त नहीं की। उन्होंने राजनीतिक आंदोलन बनाया। उनकी वैधता अर्जित थी। लेकिन—

उन्होंने जिस राजनीतिक पूंजी का निर्माण किया, उसका उत्तराधिकार परिवार के भीतर हुआ।

इसलिए शेख स्वयं वंशवाद की उपज नहीं थे; वे अब्दुल्ला राजनीतिक वंश के संस्थापक थे। 15.60 फारूक का मूल्यांकन फारूक का प्रवेश स्पष्ट रूप से वंशवादी था। उन्हें पिता की मृत्यु के बाद सत्ता और पार्टी नेतृत्व मिला। लेकिन 1983 चुनाव जीतकर उन्होंने स्वतंत्र चुनावी वैधता प्राप्त की। 1996 में आतंकवाद के कठिन दौर के बाद चुनावी राजनीति की वापसी में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। इसलिए उनका सही वर्गीकरण होगा—

वंशवादी प्रवेश + बाद में अर्जित राजनीतिक वैधता।

15.61 उमर का मूल्यांकन उमर का प्रवेश और भी स्पष्ट वंशवादी था। दादा— पिता— पार्टी— नेशनल कॉन्फ्रेंस। कम उम्र में सांसद, केंद्रीय मंत्री, पार्टी अध्यक्ष, फिर मुख्यमंत्री। इसमें inherited political capital अत्यधिक था। लेकिन उनके राजनीतिक जीवन में पराजय भी कम नहीं रही— 2002 में गांदरबल हार, 2014 में सत्ता से बाहर, 2024 में बारामूला लोकसभा हार। फिर 2024 में दो विधानसभा सीटों से जीत और मुख्यमंत्री पद पर वापसी। इसलिए उमर भी अब केवल विरासत पर निर्भर नेता नहीं कहे जा सकते। 15.62 परिवारवाद की लोकतांत्रिक सीमा अब्दुल्ला परिवार का इतिहास एक दिलचस्प विरोधाभास दिखाता है। परिवार ने पार्टी नेतृत्व पर लगभग निरंतर नियंत्रण रखा। लेकिन मतदाता ने परिवार को बार-बार हराया भी। यानी—

पार्टी नेतृत्व पर परिवार का नियंत्रण मजबूत, मतदाता पर नियंत्रण सीमित।

यही लोकतांत्रिक वंशवाद और राजशाही में मूल अंतर है। वंश टिकट दिला सकता है। नेतृत्व दिला सकता है। संगठन दिला सकता है। लेकिन चुनावी विजय सुनिश्चित नहीं कर सकता। 15.63 प्रमुख पात्र इस पूरे इतिहास में प्रमुख व्यक्तित्व हैं— महाराजा हरि सिंह — 1947 के विलय-पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले शासक। शेख मोहम्मद अब्दुल्ला — आधुनिक NC राजनीति और अब्दुल्ला वंश के संस्थापक। बेगम अकबर जहां अब्दुल्ला — परिवार और NC की राजनीतिक परंपरा में महत्वपूर्ण व्यक्तित्व। जवाहरलाल नेहरू — शेख के सहयोगी और बाद में राजनीतिक टकराव के केंद्रीय पात्र। बख्शी गुलाम मोहम्मद — 1953 के बाद सत्ता संभालने वाले नेता। इंदिरा गांधी — 1975 समझौते की केंद्रीय नेता। फारूक अब्दुल्ला — दूसरी पीढ़ी।

गुलाम मोहम्मद शाह — परिवार के भीतर सबसे महत्वपूर्ण विद्रोही चुनौती। राजीव गांधी — 1986 फारूक समझौते के केंद्रीय पात्र। उमर अब्दुल्ला — तीसरी पीढ़ी। मुफ्ती मोहम्मद सईद और महबूबा मुफ्ती — NC के सामने उभरा दूसरा बड़ा कश्मीरी राजनीतिक परिवार। अटल बिहारी वाजपेयी — उमर की केंद्रीय मंत्री वाली अवधि और कश्मीर संवाद के महत्वपूर्ण प्रधानमंत्री। नरेंद्र मोदी और अमित शाह — 2019 के संवैधानिक पुनर्गठन के केंद्रीय राष्ट्रीय नेता। 15.64 प्रमुख दस्तावेज अब्दुल्ला वंश और कश्मीर राजनीति का गंभीर अध्ययन निम्न प्राथमिक दस्तावेजों के बिना अधूरा रहेगा— 1944 का नया कश्मीर घोषणापत्र, 1947 का Instrument of Accession, भारतीय संविधान का मूल अनुच्छेद 370,

1952 का दिल्ली समझौता, जम्मू-कश्मीर संविधान, 1953 की बर्खास्तगी और गिरफ्तारी संबंधी सरकारी अभिलेख, 1975 का इंदिरा–शेख समझौता, 1977, 1983, 1987 और 1996 के विधानसभा चुनाव परिणाम, 2000 का J&K Autonomy Resolution, राष्ट्रपति आदेश C.O. 272 और C.O. 273, Jammu and Kashmir Reorganisation Act, 2019, और 11 दिसंबर 2023 का सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ निर्णय। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में 2019 की संवैधानिक कार्रवाइयों, राष्ट्रपति शासन, अनुच्छेद 370 और पुनर्गठन के पूरे विवाद का विस्तृत आधिकारिक न्यायिक रिकॉर्ड मौजूद है। 2024 के चुनाव परिणामों के लिए निर्वाचन आयोग के आधिकारिक सांख्यिकीय अभिलेख प्राथमिक स्रोत हैं।

15.65 इतिहासलेखन — पहली व्याख्या : कश्मीरी लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद एक इतिहासलेखन शेख अब्दुल्ला को डोगरा राजशाही के विरुद्ध आधुनिक लोकतांत्रिक कश्मीरी राजनीति का निर्माता मानता है। इस दृष्टि में— नेशनल कॉन्फ्रेंस, नया कश्मीर, और 1977 चुनाव उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियां हैं। यह व्याख्या शेख को धार्मिक राष्ट्रवाद के बजाय धर्मनिरपेक्ष कश्मीरी क्षेत्रीय राष्ट्रवाद का प्रतिनिधि मानती है। 15.66 दूसरी व्याख्या : अवसरवाद और बदलते रुख आलोचनात्मक इतिहासलेखन शेख के बदलते राजनीतिक रुख पर प्रश्न उठाता है। भारत के साथ सहयोग, फिर जनमत-संग्रह की राजनीति, फिर 1975 में समझौता और सत्ता में वापसी— आलोचक इसे वैचारिक अस्थिरता अथवा राजनीतिक अवसरवाद के रूप में देखते हैं।

समर्थकों का उत्तर है कि शेख लगातार बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों में कश्मीर के लिए अधिकतम राजनीतिक स्वायत्तता खोज रहे थे। 15.67 तीसरी व्याख्या : दिल्ली का हस्तक्षेप कई अध्येता 1953, 1984 और 1987 जैसी घटनाओं को केंद्र द्वारा जम्मू-कश्मीर की लोकतांत्रिक संस्थाओं में हस्तक्षेप की व्यापक कहानी से जोड़ते हैं। इस दृष्टि में स्थानीय लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता कमजोर होने से अलगाव बढ़ा। लेकिन दूसरी ओर भारतीय राज्य का दृष्टिकोण राष्ट्रीय सुरक्षा, पाकिस्तान के हस्तक्षेप और अलगाववादी राजनीति को अधिक महत्व देता है। दोनों आयामों को साथ पढ़े बिना कश्मीर के इतिहास को समझना कठिन है। 15.68 चौथी व्याख्या : परिवार ने आंदोलन पर कब्जा कर लिया? वंशवाद के आलोचक मूल प्रश्न उठाते हैं—

1930 के दशक का आंदोलन हजारों लोगों का था। नेशनल कॉन्फ्रेंस सामूहिक संगठन था। फिर उसका शीर्ष नेतृत्व लगभग लगातार एक परिवार के पास क्यों रहा? शेख के बाद फारूक। फारूक के बाद उमर। इस दृष्टि से NC भारतीय क्षेत्रीय दलों में परिचित प्रक्रिया का उदाहरण है—

Mass Movement → Charismatic Leader → Family Control.

15.69 पांचवीं व्याख्या : परिवार ही संगठनात्मक ब्रांड बन गया दूसरी व्याख्या कहती है कि लंबे संघर्ष, आतंकवाद और राजनीतिक अस्थिरता के बीच अब्दुल्ला नाम स्वयं NC की पहचान बन गया। जिस प्रकार— DMK के साथ करुणानिधि–स्टालिन, शिवसेना के साथ ठाकरे, JMM के साथ सोरेन, RJD के साथ लालू परिवार, वैसे ही—

नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ अब्दुल्ला।

यह स्थिति लोकतांत्रिक संस्थागत कमजोरी का संकेत भी हो सकती है और मजबूत राजनीतिक ब्रांड का परिणाम भी। दोनों व्याख्याएं संभव हैं। 15.70 छठी व्याख्या : 2019 के बाद परिवार की राजनीति समाप्त हो जाएगी? अनुच्छेद 370 हटने के बाद कुछ राजनीतिक विश्लेषणों में यह अनुमान लगाया गया कि जम्मू-कश्मीर की पुरानी क्षेत्रीय राजनीतिक संरचना कमजोर हो जाएगी। लेकिन 2024 विधानसभा चुनाव ने दिखाया कि नेशनल कॉन्फ्रेंस का सामाजिक और चुनावी आधार समाप्त नहीं हुआ। उमर अब्दुल्ला फिर मुख्यमंत्री बने। इससे एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है—

संवैधानिक व्यवस्था बदल सकती है, लेकिन ऐतिहासिक राजनीतिक पहचान तुरंत समाप्त नहीं होती।

15.71 तीन पीढ़ियों की तुलना

| कसौटी | शेख अब्दुल्ला | फारूक अब्दुल्ला | उमर अब्दुल्ला | |---|---|---|---| | राजनीतिक परिवार में जन्म | नहीं | हां | हां | | तैयार पार्टी मिली | नहीं | हां | हां | | आंदोलन निर्माण | अत्यधिक | सीमित | नहीं | | पार्टी नेतृत्व | संस्थापक नेतृत्व | विरासत + चुनाव | विरासत + चुनाव | | सरकार प्रमुख | हां | हां | हां | | केंद्र में मंत्री | नहीं | हां | हां | | राजनीतिक पूंजी का स्रोत | अर्जित | विरासत + अर्जित | विरासत + अर्जित | | बड़ी राजनीतिक चुनौती | दिल्ली/संवैधानिक संबंध | आतंकवाद/केंद्र संबंध | 2019 के बाद नई संवैधानिक व्यवस्था | | वंशवादी लाभ | नहीं | अत्यधिक | अत्यधिक | | स्वतंत्र चुनावी वैधता | अत्यधिक | सिद्ध | सिद्ध, पर उतार-चढ़ाव सहित |

15.72 अब्दुल्ला और सोरेन परिवार की तुलना दोनों में पहली पीढ़ी आंदोलन से निकली। शिबू सोरेन ने झारखंड आंदोलन से अपनी शक्ति बनाई। शेख अब्दुल्ला ने कश्मीर के राजशाही-विरोधी आंदोलन से। दोनों ने तैयार राजनीतिक साम्राज्य विरासत में नहीं पाया। लेकिन अगली पीढ़ी में—

शिबू → हेमंत

शेख → फारूक → उमर

के माध्यम से राजनीतिक पूंजी परिवार के भीतर चली गई। अंतर यह है कि अब्दुल्ला परिवार की तीन पीढ़ियां सरकार के शीर्ष तक पहुंच चुकी हैं। 15.73 अब्दुल्ला और नेहरू–गांधी परिवार दोनों वंशों का इतिहास असाधारण रूप से परस्पर जुड़ा है। नेहरू और शेख सहयोगी भी रहे और टकराए भी। इंदिरा और शेख ने 1975 समझौता किया। इंदिरा और फारूक के बीच टकराव हुआ। राजीव और फारूक ने समझौता किया। बाद में कांग्रेस और NC कई बार सहयोगी बने। अर्थात भारत के दो पुराने राजनीतिक वंशों का संबंध—

मित्रता → संघर्ष → समझौता → गठबंधन

के चक्र से गुजरा है। यह स्वतंत्र भारत की संघीय राजनीति का महत्वपूर्ण अध्याय है। 15.74 अब्दुल्ला और मुफ्ती — कश्मीर में दो राजनीतिक वंश कश्मीर की राजनीति में आगे दूसरा प्रमुख परिवार उभरा—

मुफ्ती मोहम्मद सईद → महबूबा मुफ्ती।

इससे कश्मीर घाटी में एक समय राजनीतिक प्रतिस्पर्धा लगभग दो परिवार-केंद्रित क्षेत्रीय दलों के बीच दिखाई देने लगी—

अब्दुल्ला परिवार — National Conference

बनाम

मुफ्ती परिवार — PDP।

यह तथ्य भी बताता है कि वंशवाद केवल किसी एक विचारधारा या पार्टी की समस्या नहीं है। यह भारतीय क्षेत्रीय राजनीति की व्यापक संरचनात्मक प्रवृत्ति है। 15.75 2026 में अब्दुल्ला परिवार कहां खड़ा है? आज स्थिति ऐतिहासिक रूप से विचित्र है। अब्दुल्ला परिवार फिर सत्ता में है। उमर मुख्यमंत्री हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस प्रमुख क्षेत्रीय राजनीतिक शक्ति है। अनुच्छेद 370 की पुरानी व्यवस्था नहीं है। जम्मू-कश्मीर का अपना पुराना संविधान प्रभावी नहीं है। राज्य अब केंद्रशासित प्रदेश है। लद्दाख अलग केंद्रशासित प्रदेश है। और निर्वाचित सरकार के अधिकार पुराने राज्य की तुलना में सीमित हैं।

इसलिए अब्दुल्ला परिवार सत्ता में लौटकर भी उसी राजनीतिक व्यवस्था में वापस नहीं लौटा जिसे उसने दशकों तक संचालित किया था। 15.76 अंतिम मूल्यांकन — क्या यह भारत के सबसे मजबूत राजनीतिक वंशों में है? निस्संदेह। लगभग नौ दशकों के राजनीतिक इतिहास में— 1930 के दशक में शेख, 1980 के दशक में फारूक, 1990 और 2000 के दशकों में फारूक–उमर, और 2020 के दशक में फिर उमर— एक ही परिवार ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के शीर्ष नेतृत्व पर असाधारण निरंतरता बनाए रखी। तीन पीढ़ियां सरकार के शीर्ष तक पहुंचीं। यह भारतीय राजनीति में वंशवादी निरंतरता का अत्यंत स्पष्ट उदाहरण है। 15.77 निष्कर्ष — आंदोलन से वंश तक, वंश से फिर चुनावी परीक्षा तक अब्दुल्ला परिवार की कहानी किसी राजघराने की कहानी नहीं है।

शेख अब्दुल्ला ने राजनीतिक सत्ता विरासत में नहीं पाई थी।

उन्होंने डोगरा राजशाही के दौर में राजनीति शुरू की। मुस्लिम कॉन्फ्रेंस बनाई। उसे नेशनल कॉन्फ्रेंस में बदला। 'नया कश्मीर' कार्यक्रम दिया। 1947 के संकट में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भूमि सुधार किए। नेहरू से टकराए। 1953 में सत्ता से हटे। लंबी हिरासत झेली। और 1975 में समझौते के बाद सत्ता में लौटे। उनकी राजनीतिक पूंजी मुख्यतः अर्जित थी। लेकिन उसके बाद कहानी बदल गई।

1982 में पुत्र फारूक सत्ता में आए।

फिर पार्टी नेतृत्व तीसरी पीढ़ी में गया।

उमर अब्दुल्ला सांसद बने, केंद्रीय मंत्री बने, पार्टी अध्यक्ष बने और मुख्यमंत्री बने।

यह वंशवाद का स्पष्ट ढांचा है। फिर भी अब्दुल्ला परिवार की कहानी यह भी बताती है कि वंशवादी लाभ राजनीतिक सफलता की गारंटी नहीं है। फारूक की सरकार गिरी। उमर चुनाव हारे। NC सत्ता से बाहर हुई। 2019 में उसकी पूरी संवैधानिक राजनीति को ऐतिहासिक झटका लगा। 2024 में उमर लोकसभा चुनाव भी हार गए। लेकिन कुछ महीने बाद उन्होंने दो विधानसभा सीटें जीतीं और मुख्यमंत्री बने।

परिवार ने नेतृत्व विरासत में दिया, लेकिन प्रत्येक पीढ़ी को अंततः मतदाता के सामने अपनी राजनीतिक वैधता फिर अर्जित करनी पड़ी।

और आज इस वंश के सामने सबसे बड़ा प्रश्न अनुच्छेद 370 से भी अधिक व्यावहारिक हो चुका है—

क्या जम्मू-कश्मीर को फिर पूर्ण राज्य का दर्जा मिलेगा, और यदि मिलता है तो दिल्ली–श्रीनगर संबंध का नया मॉडल क्या होगा?

2025 की सुप्रीम कोर्ट कार्यवाही तक केंद्र की ओर से राज्य का दर्जा बहाल करने संबंधी पूर्व आश्वासन और निर्वाचित सरकार के गठन दोनों को रिकॉर्ड किया जा चुका था। इसलिए अब्दुल्ला परिवार का इतिहास अभी समाप्त अध्याय नहीं है। यह भारतीय संघवाद की चलती हुई कहानी है। और वंशवाद के हमारे अध्ययन में इसका सबसे सटीक सूत्र होगा—

आंदोलन से अर्जित पहली पीढ़ी की राजनीतिक वैधता → परिवार में सत्ता का हस्तांतरण → तीन पीढ़ियों का पार्टी नियंत्रण → बार-बार चुनावी पराजय से परीक्षण → फिर मतदाता से पुनः वैधता अर्जित करने की प्रक्रिया।