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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–020 · अध्याय 10

करुणानिधि से एम.के. स्टालिन और उदयनिधि स्टालिन तक — द्रविड़ आंदोलन से तीन पीढ़ियों के राजनीतिक वंश तक

भारतीय राजनीतिक वंशों में करुणानिधि परिवार का मामला नेहरू–गांधी, मुलायम–अखिलेश और लालू–तेजस्वी परिवारों से कई अर्थों में अलग है। एम. करुणानिधि स्वयं किसी राजनीतिक परिवार से नहीं आए थे। उनकी शक्ति द्रविड़ आंदोलन, तमिल अस्मिता, सामाजिक न्याय की राजनीति, लेखन, रंगमंच, सिनेमा और असाधारण संगठनात्मक क्षमता से बनी थी। लेकिन लगभग आठ दशकों की इस यात्रा में एक आंदोलन-आधारित दल के शीर्ष पर एक ही परिवार की तीन पीढ़ियां स्थापित होती चली गईं—

एम. करुणानिधि → एम.के. स्टालिन → उदयनिधि स्टालिन।

और यह केवल सीधी पिता-पुत्र श्रृंखला नहीं है। परिवार की अन्य शाखाओं में एम.के. अलागिरी, कनिमोझी करुणानिधि और मारन परिवार भी राजनीति तथा मीडिया-सत्ता के महत्वपूर्ण हिस्से बने। इस परिवार की कहानी इसलिए और महत्वपूर्ण है क्योंकि द्रविड़ आंदोलन स्वयं जन्म-आधारित विशेषाधिकार, सामाजिक पदानुक्रम और ब्राह्मणवादी वर्चस्व के विरोध से विकसित हुआ था। प्रश्न स्वाभाविक है—

जिस आंदोलन ने जन्म से मिलने वाले विशेषाधिकार को चुनौती दी, उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी का नेतृत्व अंततः एक परिवार में क्यों केंद्रित होता गया?

लेकिन दूसरी ओर एम.के. स्टालिन का मामला सरल 'पिता के बाद पुत्र' वाला भी नहीं है। उन्होंने दशकों तक संगठन में काम किया, जेल गए, युवा विंग संभाला, विधायक बने, चेन्नई के मेयर बने, मंत्री और उपमुख्यमंत्री बने और करुणानिधि की मृत्यु के बाद विपक्ष का नेतृत्व करते हुए 2021 में पार्टी को सत्ता में वापस लाए। इसीलिए यहां भी हमारी मूल कसौटी रहेगी—

वंश से मिला अवसर और स्वयं अर्जित राजनीतिक पूंजी—दोनों को अलग-अलग मापा जाए।

10.1 पृष्ठभूमि — द्रविड़ राजनीति कहां से आई?

करुणानिधि परिवार को समझने के लिए पहले द्रविड़ आंदोलन को समझना आवश्यक है। बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में मद्रास प्रेसीडेंसी में गैर-ब्राह्मण राजनीतिक चेतना विकसित हुई। जस्टिस पार्टी ने प्रशासन और शिक्षा में ब्राह्मण प्रभुत्व के विरुद्ध प्रतिनिधित्व का प्रश्न उठाया। आगे ई.वी. रामासामी 'पेरियार' के आत्मसम्मान आंदोलन ने इसे अधिक व्यापक सामाजिक आंदोलन बनाया। इसके प्रमुख तत्व थे— जातिगत पदानुक्रम का विरोध, आत्मसम्मान, तर्कवाद, महिला अधिकार, सामाजिक न्याय, ब्राह्मणवादी सामाजिक संरचनाओं की आलोचना, और तमिल–द्रविड़ पहचान।

तमिलनाडु सरकार की राजनीतिक विज्ञान संबंधी आधिकारिक सामग्री भी राज्य की आधुनिक राजनीति के विकास में जस्टिस पार्टी, Self-Respect Movement, Dravida Kazhagam, DMK, अन्नादुरै, करुणानिधि और स्टालिन की इसी ऐतिहासिक श्रृंखला को दर्ज करती है। 10.2 पेरियार और द्रविड़ कषगम पेरियार ने जस्टिस पार्टी की राजनीतिक-सामाजिक धारा को आगे बढ़ाते हुए 1944 में द्रविड़ कषगम—DK के रूप में पुनर्गठित किया। लेकिन पेरियार मुख्यतः सामाजिक परिवर्तन को प्राथमिकता देते थे। सी.एन. अन्नादुरै और उनके सहयोगियों का एक वर्ग चुनावी लोकतंत्र में भाग लेना चाहता था। यहीं मतभेद पैदा हुआ। 1949 में अन्नादुरै के नेतृत्व में अलग संगठन बना—

द्रविड़ मुनेत्र कषगम—DMK।

इस समय करुणानिधि पहले से द्रविड़ आंदोलन के सक्रिय कार्यकर्ता थे। 10.3 करुणानिधि — किसी वंश से नहीं आए मुथुवेल करुणानिधि का जन्म 3 जून 1924 को तिरुक्कुवलाई में हुआ। उनके पास कोई स्थापित राजनीतिक पारिवारिक विरासत नहीं थी। किशोरावस्था से ही वे द्रविड़ आंदोलन से जुड़ गए। उन्होंने छात्र संगठनों, पत्र-पत्रिकाओं, नाटकों और सार्वजनिक लेखन का उपयोग राजनीतिक संदेश फैलाने के लिए किया। आगे उनका अखबार मुरासोली DMK की राजनीति का महत्वपूर्ण माध्यम बना। इसलिए इस परिवार के राजनीतिक इतिहास में पहला तथ्य बिल्कुल स्पष्ट होना चाहिए—

करुणानिधि वंशवाद की उपज नहीं थे; वे वंश के निर्माता थे।

10.4 सिनेमा — तमिल राजनीति का असाधारण हथियार तमिलनाडु की राजनीति में सिनेमा की भूमिका भारत के अन्य राज्यों से अलग रही है। करुणानिधि प्रतिभाशाली पटकथा और संवाद लेखक थे। उन्होंने तमिल फिल्मों में सामाजिक न्याय, जाति-विरोध, तर्कवाद और द्रविड़ विचारों को लोकप्रिय भाषा में प्रस्तुत किया। 1952 की फिल्म पराशक्ति इस संदर्भ में विशेष रूप से चर्चित रही। अभिनेता शिवाजी गणेशन की लोकप्रियता और करुणानिधि के तीखे संवादों ने द्रविड़ विचारों को व्यापक दर्शकों तक पहुंचाया। यहां राजनीति और लोकप्रिय संस्कृति का ऐसा गठबंधन बना जिसने आगे एम.जी. रामचंद्रन और जयललिता तक तमिल राजनीति को प्रभावित किया। दिलचस्प रूप से कई दशक बाद करुणानिधि के पौत्र उदयनिधि स्टालिन भी सिनेमा से राजनीति की ओर आए।

10.5 अन्नादुरै — वास्तविक संस्थापक नेतृत्व

DMK को सीधे करुणानिधि परिवार की पार्टी मानकर उसका इतिहास शुरू करना गलत होगा। इसके संस्थापक नेता सी.एन. अन्नादुरै थे। अन्नादुरै ने द्रविड़ आंदोलन को चुनावी लोकतंत्र में स्थापित किया। हिंदी थोपे जाने के विरोध, तमिल पहचान, सामाजिक न्याय और कांग्रेस-विरोध ने DMK को मजबूत किया। 1967 के विधानसभा चुनाव में DMK ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। अन्नादुरै मुख्यमंत्री बने। यह तमिलनाडु की राजनीति का निर्णायक मोड़ था। इसके बाद आज तक कांग्रेस राज्य में अपने दम पर सत्ता में वापस नहीं आ सकी। 10.6 1969 — अन्नादुरै की मृत्यु और उत्तराधिकार फरवरी 1969 में अन्नादुरै का निधन हो गया। अब DMK में नेतृत्व का प्रश्न उठा।

महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उत्तराधिकार किसी पुत्र या रिश्तेदार को नहीं मिला। पार्टी के भीतर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा हुई। वी.आर. नेदुनचेझियन जैसे वरिष्ठ नेता मौजूद थे। लेकिन अंततः करुणानिधि नेतृत्व स्थापित करने में सफल हुए और मुख्यमंत्री बने। इसलिए करुणानिधि का मुख्यमंत्री पद भी वंशानुगत हस्तांतरण नहीं था। उन्होंने पार्टी के भीतर शक्ति-संघर्ष में नेतृत्व हासिल किया था। 10.7 करुणानिधि का संगठनात्मक नियंत्रण मुख्यमंत्री बनने के बाद करुणानिधि ने धीरे-धीरे DMK पर मजबूत संगठनात्मक नियंत्रण स्थापित किया। उनकी विशेषता थी— लेखन, भाषण, कैडर से संवाद, गठबंधन निर्माण, राजनीतिक रणनीति, और तमिल पहचान की भाषा पर पकड़। उन्होंने लगभग पांच दशकों तक DMK की केंद्रीय राजनीति को प्रभावित किया।

यहीं वह संरचना विकसित हुई जिसमें पार्टी और नेता की पहचान असाधारण रूप से जुड़ गई। और यही आगे पारिवारिक उत्तराधिकार के लिए जमीन बनी। 10.8 एमजीआर से संघर्ष एम.जी. रामचंद्रन—MGR—तमिल सिनेमा के अत्यंत लोकप्रिय अभिनेता और DMK के बड़े जननेता थे। अन्नादुरै की मृत्यु के बाद करुणानिधि और MGR दोनों पार्टी के शक्तिशाली चेहरे थे। 1972 में दोनों के बीच गंभीर मतभेद हुआ। MGR को DMK से निकाल दिया गया। उन्होंने अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम बनाई, जो आगे AIADMK बनी। यह विभाजन तमिलनाडु की राजनीति को स्थायी रूप से बदलने वाला था। अब राज्य की राजनीति मुख्यतः दो द्रविड़ दलों— DMK और AIADMK— के बीच प्रतिस्पर्धा में बदल गई।

10.9 परिवारवाद की आलोचना के शुरुआती संकेत

MGR और करुणानिधि के संघर्ष में भ्रष्टाचार और पार्टी संचालन के साथ परिवार के बढ़ते प्रभाव की आलोचना भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनी। हालांकि 1970 के दशक की स्थिति को बाद के विशाल करुणानिधि परिवार नेटवर्क के समान नहीं माना जा सकता। फिर भी यहीं से एक प्रश्न उठने लगा— क्या आंदोलन का संगठन धीरे-धीरे नेता-केंद्रित हो रहा है? और यदि नेता-केंद्रित है तो उसके बाद उत्तराधिकारी कौन होगा? 10.10 1976 — DMK सरकार की बर्खास्तगी आपातकाल के दौरान 1976 में करुणानिधि की DMK सरकार को केंद्र ने बर्खास्त कर दिया। DMK ने आपातकाल का विरोध किया था। केंद्र–राज्य संबंध और इंदिरा गांधी सरकार से संघर्ष करुणानिधि की राजनीतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।

इसी दौर में उनके पुत्र एम.के. स्टालिन की राजनीति भी निर्णायक रूप से आकार लेने लगी। 10.11 एम.के. स्टालिन — राजनीतिक परिवार में जन्म एम.के. स्टालिन का जन्म 1 मार्च 1953 को हुआ। उनका नाम सोवियत नेता जोसेफ स्टालिन के नाम पर रखा गया था। उनकी राजनीतिक परिस्थितियां पिता से बिल्कुल अलग थीं। करुणानिधि को कोई राजनीतिक विरासत नहीं मिली थी। स्टालिन के पास किशोरावस्था से ही— प्रभावशाली पिता, बड़ा राजनीतिक दल, संगठनात्मक नेटवर्क, और प्रसिद्ध पारिवारिक नाम मौजूद था। इस अर्थ में उनका प्रवेश स्पष्ट रूप से वंशवादी लाभ के वातावरण में हुआ। लेकिन उनकी आगे की यात्रा असामान्य रूप से लंबी रही। 10.12 स्टालिन का शुरुआती राजनीतिक प्रशिक्षण स्टालिन किशोरावस्था से DMK गतिविधियों से जुड़े।

उन्होंने युवा कार्यकर्ताओं के संगठन में काम किया। 1975–77 के आपातकाल के दौरान उन्हें MISA के तहत गिरफ्तार किया गया और जेल में रखा गया। उनकी राजनीतिक जीवनी में यह घटना महत्वपूर्ण है। यहां एक अंतर ध्यान देने योग्य है— उन्हें राजनीतिक पहचान परिवार से मिली थी, लेकिन उन्होंने वास्तविक राजनीतिक दमन और संगठनात्मक संघर्ष का अनुभव भी किया।

10.13 युवा विंग और संगठन

स्टालिन ने DMK युवा विंग को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे वर्षों तक पार्टी संगठन में काम करते रहे। यह तथ्य उनके मामले को कई अन्य राजनीतिक उत्तराधिकारियों से अलग करता है। वे सीधे मुख्यमंत्री या मंत्री नहीं बनाए गए। राजनीतिक उत्तराधिकार लगभग चार दशक की प्रक्रिया बना। इसलिए उनका मामला वंशवादी प्रवेश लेकिन लंबा राजनीतिक प्रशिक्षण कहलाना अधिक उचित होगा। 10.14 1984 — पहला विधानसभा चुनाव और पराजय स्टालिन ने 1984 में चेन्नई की Thousand Lights विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा। वे हार गए। 1989 में उसी क्षेत्र से जीतकर विधानसभा पहुंचे। यह भी हमारी मूल कसौटी को पुष्ट करता है—

पारिवारिक नाम टिकट दिला सकता है, चुनाव नहीं।

स्टालिन को भी चुनावी हार का सामना करना पड़ा और धीरे-धीरे अपना निर्वाचन आधार बनाना पड़ा। 10.15 चेन्नई के मेयर 1996 में स्टालिन चेन्नई के मेयर चुने गए। यह उनकी स्वतंत्र प्रशासनिक पहचान बनाने में महत्वपूर्ण पद था। उनके कार्यकाल में शहरी अवसंरचना और नगर प्रशासन को लेकर उनकी छवि विकसित हुई। यह चरण महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्हें मुख्यमंत्री पद पर सीधे नहीं बैठाया गया। स्थानीय निकाय प्रशासन से होकर वे आगे राज्य सरकार की उच्च जिम्मेदारियों तक पहुंचे। 10.16 मंत्री और उपमुख्यमंत्री 2006 में DMK सत्ता में लौटी और करुणानिधि मुख्यमंत्री बने। स्टालिन को स्थानीय प्रशासन मंत्री बनाया गया। 2009 में वे तमिलनाडु के उपमुख्यमंत्री बने। अब उत्तराधिकार लगभग स्पष्ट था।

लेकिन यहां तक पहुंचने में उन्होंने कई दशक राजनीति में बिताए थे। इसलिए उनके उत्थान में दो तत्व एक साथ मौजूद थे—

परिवार के कारण असाधारण राजनीतिक अवसर

और

लंबे समय में अर्जित संगठनात्मक तथा प्रशासनिक अनुभव।

10.17 लेकिन स्टालिन अकेले पुत्र नहीं थे करुणानिधि परिवार की उत्तराधिकार कहानी इसलिए जटिल है क्योंकि स्टालिन स्वाभाविक रूप से निर्विवाद उत्तराधिकारी नहीं थे। करुणानिधि के पुत्र एम.के. अलागिरी भी प्रभावशाली थे। विशेषकर दक्षिण तमिलनाडु में उनका मजबूत राजनीतिक नेटवर्क था। वे आगे केंद्रीय मंत्री भी बने। इसलिए परिवार के भीतर वास्तविक प्रश्न था—

करुणानिधि के बाद अलागिरी या स्टालिन?

10.18 अलागिरी बनाम स्टालिन अलागिरी का प्रभाव मदुरै और दक्षिणी तमिलनाडु में अधिक था। स्टालिन का संगठनात्मक आधार चेन्नई और पार्टी की औपचारिक संरचना में मजबूत था। समय के साथ दोनों भाइयों की प्रतिद्वंद्विता सार्वजनिक होती गई। यही राजनीतिक वंशों का एक महत्वपूर्ण पैटर्न है— पहली पीढ़ी सत्ता बनाती है। दूसरी पीढ़ी में उत्तराधिकार स्वयं परिवार के भीतर संघर्ष पैदा करता है। यह हमने यादव परिवार में अखिलेश–शिवपाल संघर्ष के अलग रूप में देखा था। 10.19 2014 — अलागिरी बाहर, स्टालिन का रास्ता साफ 2014 में अलागिरी को DMK से निष्कासित कर दिया गया। इसके बाद स्टालिन के सामने परिवार के भीतर सबसे बड़ी उत्तराधिकार चुनौती काफी हद तक समाप्त हो गई। अब वे करुणानिधि के स्पष्ट राजनीतिक उत्तराधिकारी थे।

लेकिन तब भी करुणानिधि जीवित थे और पार्टी के सर्वोच्च नेता बने रहे। स्टालिन को औपचारिक पूर्ण नियंत्रण के लिए 2018 तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। 10.20 कनिमोझी करुणानिधि करुणानिधि की पुत्री कनिमोझी करुणानिधि भी सक्रिय राजनीति में आईं। वे राज्यसभा सदस्य बनीं और बाद में लोकसभा पहुंचीं। साहित्य, पत्रकारिता और सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ी उनकी अलग सार्वजनिक पहचान भी रही। लेकिन उनका राजनीतिक प्रवेश परिवार की स्थापित सत्ता-संरचना से अलग करके नहीं देखा जा सकता। करुणानिधि की पुत्री होना उन्हें प्रारंभिक राजनीतिक दृश्यता और अवसर देने वाला महत्वपूर्ण कारक था। 10.21 मारन परिवार — विस्तारित राजनीतिक वंश करुणानिधि परिवार का प्रभाव केवल उनके पुत्र-पुत्रियों तक सीमित नहीं रहा।

उनके भांजे मुरासोली मारन DMK के प्रमुख नेता और केंद्रीय मंत्री रहे। उनके पुत्र दयानिधि मारन भी केंद्रीय मंत्री और सांसद बने। कलानिधि मारन मीडिया व्यवसाय में अत्यंत प्रभावशाली हुए। इससे करुणानिधि परिवार की संरचना केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रही। राजनीति, मीडिया और व्यवसाय के बीच संबंधों को लेकर व्यापक बहस हुई। यही करुणानिधि वंश को अन्य कई भारतीय राजनीतिक परिवारों से अधिक जटिल बनाता है। 10.22 मीडिया शक्ति और Sun Network कलानिधि मारन द्वारा स्थापित Sun Network दक्षिण भारत के सबसे प्रभावशाली मीडिया नेटवर्कों में विकसित हुआ। परिवार से जुड़ी राजनीतिक और मीडिया शक्ति के इस संयोजन ने आलोचकों के बीच हितों के टकराव और राजनीतिक प्रभाव को लेकर प्रश्न पैदा किए।

यहां सावधानी जरूरी है। व्यावसायिक सफलता को केवल राजनीतिक रिश्तेदारी का परिणाम मान लेना प्रमाण के बिना उचित नहीं होगा। लेकिन राजनीतिक परिवार + मीडिया स्वामित्व लोकतांत्रिक शक्ति-संरचना के अध्ययन का वैध विषय है। 10.23 परिवार के भीतर मीडिया संघर्ष करुणानिधि परिवार के भीतर उत्तराधिकार विवाद मीडिया तक भी पहुंचा। 2007 में Dinakaran में प्रकाशित एक सर्वेक्षण, जिसमें स्टालिन को करुणानिधि के संभावित उत्तराधिकारी के रूप में अधिक समर्थन दिखाया गया था, अलागिरी समर्थकों के आक्रोश का कारण बना। मदुरै में अखबार के कार्यालय पर हिंसक हमला हुआ और कर्मचारियों की मौत हुई। यह घटना परिवार, मीडिया और राजनीतिक उत्तराधिकार के खतरनाक अंतर्संबंध का उदाहरण बनी।

इसे केवल पारिवारिक झगड़ा कहना घटना की गंभीरता को कम करेगा। 10.24 2G स्पेक्ट्रम विवाद UPA शासन के दौरान दूरसंचार स्पेक्ट्रम आवंटन को लेकर 2G विवाद राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा मुद्दा बना। तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा DMK नेता थे। कनिमोझी भी जांच और मुकदमे में आरोपी बनीं। Kalaignar TV से जुड़े वित्तीय लेनदेन जांच का हिस्सा बने। मामले ने कांग्रेस–DMK गठबंधन और करुणानिधि परिवार की राजनीतिक छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया। लेकिन यहां न्यायिक परिणाम दर्ज करना अनिवार्य है। 10.25 2G मामले का न्यायिक परिणाम — आरोप और निष्कर्ष अलग रखें

21 दिसंबर 2017 को विशेष CBI अदालत ने 2G मामले में ए. राजा, कनिमोझी और अन्य आरोपियों को बरी कर दिया। उसी दिन संबंधित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में भी अदालत ने कहा कि अनुसूचित अपराध वाले मूल मामले में सभी आरोपी बरी हो चुके हैं, इसलिए कथित 'proceeds of crime' का आधार नहीं बचा और सभी आरोपी बरी किए गए। लेकिन मामला वहीं समाप्त नहीं हुआ। CBI ने बरी किए जाने के निर्णय को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी। मार्च 2024 में दिल्ली हाई कोर्ट ने CBI की अपील की अनुमति देते हुए कहा कि रिकॉर्ड में ऐसे पहलू हैं जिनकी अपीलीय स्तर पर विस्तृत जांच आवश्यक है। इसलिए शोध में सही स्थिति यह होगी—

2017 में विशेष अदालत ने आरोपियों को बरी किया; उस बरी किए जाने के खिलाफ अपीलीय न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ी।

इसे न 'दोष सिद्ध' लिखना उचित है, न अपील लंबित होने की स्थिति में विवाद को केवल राजनीतिक कल्पना बताना। 10.26 2011 — DMK सत्ता से बाहर 2011 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में DMK को भारी पराजय मिली और जयललिता के नेतृत्व में AIADMK सत्ता में लौटी। 2G विवाद, परिवारवाद और शासन-विरोधी भावना चुनावी विमर्श के महत्वपूर्ण हिस्से थे। इस हार ने स्टालिन के लिए चुनौती बढ़ा दी। यदि उन्हें अगला नेता बनना था तो केवल पिता का उत्तराधिकारी होना पर्याप्त नहीं था। उन्हें पार्टी को पुनर्जीवित करना था। 10.27 2016 — सत्ता के करीब, लेकिन बाहर 2016 के विधानसभा चुनाव में DMK ने प्रदर्शन सुधारा, लेकिन AIADMK ने सत्ता बरकरार रखी। स्टालिन विपक्ष के नेता बने।

अब वे तमिलनाडु की राजनीति में औपचारिक रूप से मुख्य विपक्षी चेहरा थे। यह उनके राजनीतिक विकास में निर्णायक चरण था। उन्होंने राज्यव्यापी जनसंपर्क अभियान चलाए और स्वयं को करुणानिधि से अलग नई पीढ़ी के प्रशासक के रूप में प्रस्तुत किया। 10.28 2018 — करुणानिधि का निधन 7 अगस्त 2018 को करुणानिधि का निधन हुआ। वे 94 वर्ष के थे। इसके साथ तमिलनाडु की राजनीति के लगभग सात दशक लंबे युग का अंत हुआ। अब पहली बार DMK को करुणानिधि के बिना चलना था। स्टालिन पार्टी अध्यक्ष बने। यही उनकी वास्तविक परीक्षा थी। अब किसी चुनावी सफलता का श्रेय सीधे पिता के नेतृत्व को नहीं दिया जा सकता था। 10.29 स्टालिन ने विरासत संभाली या स्वयं नेतृत्व सिद्ध किया? इस प्रश्न का उत्तर 2019 और 2021 के चुनावों में मिलने लगा।

2019 के लोकसभा चुनाव में DMK नेतृत्व वाले गठबंधन ने तमिलनाडु में शानदार प्रदर्शन किया। फिर 2021 विधानसभा चुनाव आया। स्टालिन पहली बार करुणानिधि के बिना विधानसभा चुनाव में पार्टी के निर्विवाद मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार थे। DMK गठबंधन जीता।

एम.के. स्टालिन मुख्यमंत्री बने।

यह उनके राजनीतिक मूल्यांकन का निर्णायक बिंदु है। मुख्यमंत्री का रास्ता उन्हें परिवार ने आसान किया था। लेकिन पिता की मृत्यु के बाद पार्टी को सत्ता में वापस लाने का चुनाव उन्होंने अपने नेतृत्व में जीता। 10.30 वंशवादी प्रवेश से अर्जित नेतृत्व तक स्टालिन की यात्रा इसलिए भारतीय राजनीतिक वंशों में विशेष स्थान रखती है। उन्हें प्रसिद्ध नाम मिला। पार्टी मिली। पिता का संरक्षण मिला। संगठन में अवसर मिले। लेकिन मुख्यमंत्री बनने से पहले उन्होंने लगभग चार दशकों तक सक्रिय राजनीति की। चुनाव हारा। चुनाव जीता। मेयर रहा। मंत्री रहा। उपमुख्यमंत्री रहा। विपक्ष का नेता रहा। पार्टी अध्यक्ष बना। और फिर मुख्यमंत्री बना। इसलिए उन्हें केवल वंशवादी नियुक्ति कहना पर्याप्त विश्लेषण नहीं होगा।

सटीक निष्कर्ष है—

Inherited Entry + Prolonged Political Apprenticeship + Earned Electoral Leadership.

10.31 और अब उदयनिधि स्टालिन स्टालिन के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही परिवार की तीसरी पीढ़ी का प्रश्न और स्पष्ट हो गया। उनके पुत्र उदयनिधि स्टालिन पहले तमिल फिल्म उद्योग में अभिनेता और निर्माता के रूप में सक्रिय थे। धीरे-धीरे वे DMK की राजनीति में आए। यहां कहानी फिर बदलती है। स्टालिन को मुख्यमंत्री बनने में दशकों लगे थे। उदयनिधि का राजनीतिक उत्थान उससे कहीं अधिक तेज हुआ। 10.32 युवा विंग की कमान 2019 में उदयनिधि स्टालिन को DMK युवा विंग का सचिव बनाया गया। यह वही संगठनात्मक पद था जिसने दशकों पहले उनके पिता स्टालिन को पार्टी में स्वतंत्र आधार विकसित करने में मदद की थी। इस नियुक्ति का प्रतीकात्मक अर्थ स्पष्ट था।

एक ही परिवार की तीसरी पीढ़ी अब उसी संगठनात्मक रास्ते पर रखी जा रही थी। आलोचकों ने इसे योजनाबद्ध उत्तराधिकार बताया। DMK का तर्क रहा कि उदयनिधि पहले से पार्टी प्रचार और कार्यकर्ता गतिविधियों में सक्रिय थे। 10.33 2021 — पहला विधानसभा चुनाव 2021 में उदयनिधि स्टालिन ने चेन्नई की चेपॉक–तिरुवल्लिकेणी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीते। यह DMK का मजबूत क्षेत्र माना जाता है और करुणानिधि स्वयं भी चेपॉक का प्रतिनिधित्व कर चुके थे। इसलिए यहां भी हमारी electoral inheritance की कसौटी लागू होती है। कानूनी रूप से सीट मतदाताओं की है। लेकिन उम्मीदवार चयन और राजनीतिक भूगोल में पारिवारिक निरंतरता स्पष्ट दिखाई देती है। 10.34 2022 — मंत्री

दिसंबर 2022 में उदयनिधि स्टालिन को तमिलनाडु सरकार में मंत्री बनाया गया। उन्हें युवा कल्याण और खेल विकास सहित जिम्मेदारियां दी गईं। पहली बार विधायक बनने के लगभग डेढ़ वर्ष बाद उनका मंत्रिमंडल में प्रवेश हो गया। यह पिता एम.के. स्टालिन की तुलना में बहुत तेज राजनीतिक पदोन्नति थी। वंशवाद की कसौटी पर यह महत्वपूर्ण अंतर है। 10.35 2024 — उपमुख्यमंत्री 28 सितंबर 2024 को तमिलनाडु सरकार ने उदयनिधि स्टालिन को उपमुख्यमंत्री नियुक्त करने की आधिकारिक अधिसूचना जारी की। तमिलनाडु सरकार के राजपत्र में स्पष्ट रूप से दर्ज है कि युवा कल्याण एवं खेल विकास मंत्री उदयनिधि स्टालिन को Deputy Chief Minister नियुक्त किया गया।

2025 के सरकारी दस्तावेजों में भी वे आधिकारिक रूप से Deputy Chief Minister के रूप में दर्ज हैं। इस प्रकार केवल लगभग पांच वर्षों में उनकी यात्रा हुई—

2019 — युवा विंग सचिव 2021 — विधायक 2022 — मंत्री 2024 — उपमुख्यमंत्री।

यही वह तथ्य है जो तीसरी पीढ़ी के वंशवाद पर सबसे गंभीर प्रश्न उठाता है। 10.36 स्टालिन और उदयनिधि में मूल अंतर दोनों पिता-पुत्र हैं। दोनों को पारिवारिक राजनीतिक पूंजी मिली। लेकिन राजनीतिक प्रशिक्षण की अवधि में बड़ा अंतर है। एम.के. स्टालिन को दशकों तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। उदयनिधि स्टालिन कुछ वर्षों में उपमुख्यमंत्री बन गए। इसलिए यदि स्टालिन के मामले में वंशवादी प्रवेश के बाद लंबे अर्जित राजनीतिक अनुभव का तर्क मजबूत है, तो उदयनिधि के मामले में अभी वह तर्क उसी स्तर पर उपलब्ध नहीं है। उनकी वास्तविक स्वतंत्र राजनीतिक क्षमता का परीक्षण भविष्य के चुनावों और नेतृत्व परिस्थितियों में होगा। 10.37 सनातन धर्म विवाद

सितंबर 2023 में उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म के संबंध में एक भाषण दिया, जिस पर देशव्यापी विवाद हुआ। उन्होंने सामाजिक असमानता और जातिगत भेदभाव के संदर्भ में सनातन की आलोचना करते हुए उसके उन्मूलन की बात कही। भाजपा और अनेक हिंदू संगठनों ने बयान को हिंदू धर्म और सनातन पर आक्रमण बताया। उदयनिधि ने अपने बयान को सामाजिक न्याय और द्रविड़ वैचारिक परंपरा से जोड़ा। यह विवाद उनके राष्ट्रीय राजनीतिक परिचय का बड़ा कारण बना। इस घटना को केवल पारिवारिक उत्तराधिकार से नहीं बल्कि द्रविड़ वैचारिक राजनीति की तीसरी पीढ़ी में पुनर्व्याख्या के रूप में भी पढ़ा जाना चाहिए। 10.38 क्या उदयनिधि चौथी पीढ़ी की जमीन तैयार करते हैं? अभी इस प्रश्न पर निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।

हमारे शोध में केवल पारिवारिक संबंध के आधार पर भविष्य के राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित नहीं किए जाएंगे। लेकिन तीन पीढ़ियों की वर्तमान श्रृंखला स्पष्ट है—

करुणानिधि ↓ एम.के. स्टालिन ↓ उदयनिधि स्टालिन

और इसलिए DMK का भविष्य का नेतृत्व भारतीय राजनीतिक वंशवाद के अध्ययन में लगातार महत्वपूर्ण रहेगा। 10.39 DMK क्या परिवार की निजी पार्टी बन गई? कानूनी और संगठनात्मक रूप से नहीं। DMK एक पंजीकृत राजनीतिक दल है। उसका संगठन, महासचिव, कोषाध्यक्ष, जिला इकाइयां, कार्यकारिणी और व्यापक कैडर संरचना है। उसमें परिवार से बाहर हजारों पदाधिकारी और अनेक शक्तिशाली नेता हैं। इसलिए DMK को केवल 'करुणानिधि परिवार की पार्टी' कहना उसकी व्यापक सामाजिक-संगठनात्मक जड़ों की उपेक्षा होगी। लेकिन दूसरी ओर शीर्ष नेतृत्व की श्रृंखला को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता— करुणानिधि के बाद पुत्र अध्यक्ष। पुत्र मुख्यमंत्री। और अब मुख्यमंत्री का पुत्र उपमुख्यमंत्री।

यही औपचारिक संस्था और अनौपचारिक वंशवादी सत्ता के बीच अंतर है। 10.40 DMK का कैडर — परिवारवाद की सीमा DMK की सबसे बड़ी संस्थागत शक्ति उसका व्यापक कैडर नेटवर्क है। यह केवल चुनाव के समय सक्रिय होने वाला संगठन नहीं है। द्रविड़ आंदोलन की वैचारिक और सामाजिक जड़ें इसे परिवार से कहीं व्यापक बनाती हैं। इसीलिए करुणानिधि परिवार पार्टी पर प्रभावशाली नियंत्रण रखते हुए भी संगठन को केवल पारिवारिक नेटवर्क के आधार पर नहीं चला सकता। यही DMK और कई छोटे क्षेत्रीय पारिवारिक दलों में महत्वपूर्ण अंतर है। 10.41 द्रविड़ विचारधारा बनाम वंशवाद अब मूल वैचारिक विरोधाभास सामने आता है। द्रविड़ आंदोलन ने पूछा था— किसी व्यक्ति को जन्म के कारण विशेषाधिकार क्यों मिले? जाति जन्म से क्यों तय हो?

सामाजिक पद जन्म से क्यों मिले? फिर उसी परंपरा से निकली पार्टी में आलोचक पूछते हैं—

राजनीतिक नेतृत्व जन्म के कारण क्यों मिले?

यदि स्टालिन करुणानिधि के पुत्र न होते तो क्या उन्हें वही शुरुआती अवसर मिलते? यदि उदयनिधि स्टालिन के पुत्र न होते तो क्या पांच वर्षों में युवा विंग सचिव से उपमुख्यमंत्री तक पहुंचना संभव होता? इन प्रश्नों को टालकर DMK के वंशवाद का गंभीर अध्ययन नहीं किया जा सकता। 10.42 लेकिन दूसरा प्रश्न भी पूछना होगा यदि किसी नेता का पिता बड़ा राजनेता है तो क्या उसकी अपनी सारी उपलब्धियां स्वतः शून्य हो जाती हैं? नहीं। यही कारण है कि स्टालिन और उदयनिधि का मूल्यांकन एक जैसा नहीं किया जा सकता। स्टालिन ने दशकों तक संगठनात्मक, चुनावी और प्रशासनिक अनुभव अर्जित किया। करुणानिधि की मृत्यु के बाद पार्टी को टूटने से बचाया। 2019 में चुनावी सफलता हासिल की। 2021 में सत्ता में वापस लाए।

इसलिए उनका स्वतंत्र राजनीतिक रिकॉर्ड मौजूद है। उदयनिधि का स्वतंत्र रिकॉर्ड अभी तुलनात्मक रूप से छोटा है। 10.43 परिवार के भीतर महिलाओं की स्थिति करुणानिधि परिवार में कनिमोझी महत्वपूर्ण राजनीतिक नेता बनीं। लेकिन शीर्ष उत्तराधिकार मुख्यतः पुत्रों के बीच केंद्रित रहा— अलागिरी बनाम स्टालिन, और फिर स्टालिन से उदयनिधि। इससे राजनीतिक परिवारों में लैंगिक उत्तराधिकार का प्रश्न भी उठता है। महिलाएं राजनीति में आती हैं, सांसद और मंत्री बन सकती हैं, लेकिन परिवार के सर्वोच्च उत्तराधिकारी का चयन कितनी बार पुत्र के पक्ष में होता है? आगे पवार, ठाकरे और अन्य परिवारों में इस प्रश्न के अलग उत्तर दिखाई देंगे। 10.44 केंद्र की प्रतिक्रिया और गठबंधन राजनीति

करुणानिधि परिवार को केवल तमिलनाडु तक सीमित करके नहीं समझा जा सकता। DMK ने विभिन्न समयों पर राष्ट्रीय गठबंधनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह वी.पी. सिंह सरकार के दौर की राजनीति से लेकर NDA और बाद में UPA तक अलग-अलग राष्ट्रीय व्यवस्थाओं का हिस्सा रही। मुरासोली मारन, दयानिधि मारन, ए. राजा और अन्य DMK नेता केंद्रीय मंत्रिमंडलों में रहे। इससे करुणानिधि की क्षेत्रीय राजनीतिक शक्ति राष्ट्रीय सत्ता में bargaining power में बदलती रही। वंशवादी परिवारों के लिए गठबंधन युग ने एक नई संभावना खोली—

राज्य में परिवार-नियंत्रित दल और दिल्ली में राष्ट्रीय सत्ता में भागीदारी।

10.45 प्रमुख विवाद करुणानिधि परिवार से जुड़े राजनीतिक इतिहास में कई प्रकार के विवाद रहे हैं— परिवारवाद, अलागिरी–स्टालिन उत्तराधिकार संघर्ष, परिवार और मीडिया शक्ति के संबंध, 2G स्पेक्ट्रम मामला, कनिमोझी से जुड़े आरोप और बाद की बरी, उदयनिधि की तेज राजनीतिक पदोन्नति, और सनातन धर्म संबंधी बयान। इनमें प्रत्येक की प्रकृति अलग है। इसलिए राजनीतिक आरोप, प्रशासनिक निर्णय, आपराधिक अभियोजन और न्यायिक निष्कर्षों को एक श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा। विशेष रूप से 2G मामले में 2017 की बरी और उसके विरुद्ध आगे की अपीलीय प्रक्रिया दोनों दर्ज करना आवश्यक है। 10.46 प्रमुख पात्र इस राजनीतिक वंश के अध्ययन में मुख्य पात्र हैं— ई.वी. रामासामी पेरियार — द्रविड़ आंदोलन की वैचारिक पृष्ठभूमि।

सी.एन. अन्नादुरै — DMK संस्थापक और करुणानिधि के राजनीतिक पूर्ववर्ती। एम. करुणानिधि — परिवार की राजनीतिक शक्ति के वास्तविक निर्माता। एम.जी. रामचंद्रन — करुणानिधि के सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक प्रतिद्वंद्वी और AIADMK संस्थापक। एम.के. स्टालिन — दूसरी पीढ़ी और करुणानिधि के अंतिम राजनीतिक उत्तराधिकारी। एम.के. अलागिरी — उत्तराधिकार की वैकल्पिक पारिवारिक शाखा। कनिमोझी करुणानिधि — संसदीय राजनीति में परिवार की महत्वपूर्ण महिला नेता। मुरासोली मारन और दयानिधि मारन — विस्तारित राजनीतिक परिवार। कलानिधि मारन — मीडिया-व्यवसाय में परिवार से जुड़ा महत्वपूर्ण नाम। उदयनिधि स्टालिन — तीसरी पीढ़ी और वर्तमान उपमुख्यमंत्री।

10.47 प्रमुख दस्तावेज और प्राथमिक स्रोत इस राजनीतिक वंश के गंभीर अध्ययन के लिए केवल राजनीतिक जीवनियां पर्याप्त नहीं हैं। प्रमुख प्राथमिक स्रोतों में शामिल होने चाहिए— तमिलनाडु विधानसभा की कार्यवाहियां, भारत निर्वाचन आयोग की विधानसभा और लोकसभा चुनाव रिपोर्टें, DMK के संगठनात्मक दस्तावेज और घोषणापत्र, आपातकाल से जुड़े सरकारी अभिलेख, 1976 में DMK सरकार की बर्खास्तगी से संबंधित दस्तावेज, केंद्र में DMK मंत्रियों से संबंधित संसदीय रिकॉर्ड, 2G मामले के CBI और न्यायालयीन दस्तावेज, 2017 का विशेष अदालत का निर्णय, 2024 का दिल्ली हाई कोर्ट आदेश, और उदयनिधि स्टालिन की उपमुख्यमंत्री नियुक्ति का तमिलनाडु राजपत्र।

28 सितंबर 2024 की सरकारी अधिसूचना उदयनिधि को उपमुख्यमंत्री नियुक्त किए जाने का प्रत्यक्ष प्राथमिक स्रोत है। 10.48 इतिहासलेखन — पहली व्याख्या : द्रविड़ सामाजिक क्रांति एक इतिहासलेखन करुणानिधि और DMK को तमिलनाडु की सामाजिक क्रांति के वाहक के रूप में देखता है। इसके अनुसार द्रविड़ राजनीति ने— सामाजिक प्रतिनिधित्व बढ़ाया, पिछड़े वर्गों को सत्ता में स्थान दिया, भाषाई पहचान मजबूत की, कल्याणकारी राज्य को विस्तार दिया, और सामाजिक न्याय को राज्य की मुख्य राजनीतिक धारा बनाया। इस दृष्टि से करुणानिधि का महत्व परिवारवाद से कहीं बड़ा है। यह तथ्य स्वीकार करना आवश्यक है। 10.49 दूसरी व्याख्या : आंदोलन का परिवारकरण

दूसरा दृष्टिकोण कहता है कि जिस आंदोलन ने सामाजिक विशेषाधिकार का विरोध किया था, उसकी सबसे बड़ी पार्टी धीरे-धीरे एक परिवार के शीर्ष नियंत्रण में आ गई। इसके प्रमाण के रूप में आलोचक बताते हैं— पुत्रों का राजनीति में प्रवेश, पुत्री की संसदीय राजनीति, मारन परिवार, स्टालिन का अध्यक्ष बनना, और अब उदयनिधि का तेजी से उपमुख्यमंत्री पद तक पहुंचना। इस व्याख्या में DMK का इतिहास movement-to-dynasty transformation के रूप में पढ़ा जाता है। 10.50 तीसरी व्याख्या : परिवार + मजबूत संस्था तीसरी व्याख्या अधिक जटिल है। इसके अनुसार DMK न तो केवल वैचारिक आंदोलन रह गई है और न केवल पारिवारिक पार्टी बनी है। वास्तविकता दोनों के बीच है। पार्टी के शीर्ष पर परिवार का असाधारण प्रभाव है।

लेकिन नीचे व्यापक कैडर, सामाजिक आधार, वैचारिक पहचान और संगठनात्मक संरचना भी मौजूद है। यही कारण है कि करुणानिधि की मृत्यु के बाद पार्टी केवल परिवार के नाम से जीवित नहीं रही; उसने चुनावी सफलता भी प्राप्त की। यह मॉडल भारतीय वंशवाद को समझने के लिए विशेष रूप से उपयोगी है—

Dynastic Leadership within an Institutionalised Party.

10.51 तीन पीढ़ियों की तुलना | कसौटी | करुणानिधि | एम.के. स्टालिन | उदयनिधि स्टालिन | |---|---|---|---| | राजनीतिक परिवार में जन्म | नहीं | हां | हां | | शुरुआती अवसर में परिवार की भूमिका | नहीं | बहुत महत्वपूर्ण | अत्यधिक | | लंबा संगठनात्मक प्रशिक्षण | हां | हां | अभी सीमित | | चुनावी हार का अनुभव | हां | हां | अभी प्रमुख रूप से नहीं | | प्रशासनिक अनुभव | व्यापक | व्यापक | विकसित हो रहा | | पार्टी का शीर्ष नेतृत्व | लगभग पांच दशक | हां | अभी नहीं | | मुख्यमंत्री | पांच बार | हां | नहीं | | उपमुख्यमंत्री | — | रहे | वर्तमान | | स्वयं अर्जित जनाधार | अत्यधिक | महत्वपूर्ण | अभी परीक्षणाधीन | | वंशवादी लाभ | नहीं | उच्च | अत्यधिक उच्च |

यह तालिका तीन पीढ़ियों के बीच अंतर को सबसे स्पष्ट रूप में सामने रखती है। 10.52 दस कसौटियों पर करुणानिधि परिवार वंश संस्थापक: एम. करुणानिधि—स्वनिर्मित नेता। दूसरी पीढ़ी: स्टालिन, अलागिरी, कनिमोझी। विस्तारित परिवार: मारन शाखा। तीसरी पीढ़ी का मुख्य राजनीतिक चेहरा: उदयनिधि स्टालिन। प्रवेश लाभ: दूसरी और तीसरी पीढ़ी के लिए अत्यधिक। पार्टी नियंत्रण: करुणानिधि से स्टालिन तक स्पष्ट हस्तांतरण। सरकारी सत्ता: पिता मुख्यमंत्री, पुत्र मुख्यमंत्री, पौत्र उपमुख्यमंत्री। आंतरिक पारिवारिक प्रतिस्पर्धा: विशेष रूप से अलागिरी–स्टालिन संघर्ष। स्वतंत्र राजनीतिक पूंजी: स्टालिन ने पर्याप्त रूप से अर्जित की; उदयनिधि के मामले में प्रक्रिया जारी है।

संस्थागत शक्ति: परिवार के अतिरिक्त DMK का मजबूत कैडर और वैचारिक आधार। 10.53 नेहरू, यादव और करुणानिधि मॉडल में अंतर अब तक अध्ययन किए तीन बड़े वंशवादी मॉडल हमारे सामने हैं। नेहरू–गांधी परिवार में राष्ट्रीय पार्टी पहले से मौजूद थी; परिवार उस पर लंबे समय तक केंद्रीय प्रभाव रखता रहा। मुलायम और लालू ने अपनी राजनीतिक शक्ति स्वयं बनाई और बाद में परिवार उसमें शामिल हुआ। करुणानिधि ने स्वयं DMK स्थापित नहीं की थी—वह अन्नादुरै की बनाई पार्टी थी—लेकिन अन्नादुरै के बाद उन्होंने लगभग पांच दशकों में उस पर इतना प्रभाव स्थापित किया कि आगे नेतृत्व उनके परिवार में स्थानांतरित हो गया। इसलिए करुणानिधि मॉडल विशिष्ट है—

आंदोलन → संस्थागत पार्टी → करिश्माई नेता → परिवार-केंद्रित उत्तराधिकार।

10.54 सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न — क्या तीसरी पीढ़ी सबसे कठिन परीक्षा है? पहली पीढ़ी अक्सर संघर्ष से आती है। दूसरी पीढ़ी को विरासत मिलती है, लेकिन वह संस्थापक नेता के साथ लंबे समय तक राजनीति सीख सकती है। तीसरी पीढ़ी के सामने सबसे बड़ा जोखिम है—

Entitlement Politics — राजनीतिक अधिकार को जन्मसिद्ध मान लेने का आरोप।

उदयनिधि स्टालिन के मामले में यही प्रश्न केंद्रीय रहेगा। उनके दादा को सत्ता बनाने में दशकों लगे। उनके पिता को मुख्यमंत्री बनने में लगभग चार दशक लगे। उदयनिधि पांच वर्षों के भीतर पार्टी युवा विंग से उपमुख्यमंत्री पद तक पहुंच गए। उनकी सितंबर 2024 की नियुक्ति सरकारी राजपत्र में दर्ज है। इसलिए उनकी स्वतंत्र राजनीतिक वैधता का अंतिम निर्णय अभी इतिहास ने नहीं दिया है। 10.55 निष्कर्ष — सामाजिक विशेषाधिकार के विरोध से राजनीतिक उत्तराधिकार तक करुणानिधि परिवार भारतीय राजनीतिक वंशवाद का अत्यंत महत्वपूर्ण अध्ययन इसलिए है क्योंकि यहां सबसे गहरा वैचारिक विरोधाभास दिखाई देता है। करुणानिधि स्वयं वंशवादी नेता नहीं थे। उन्होंने किशोर कार्यकर्ता के रूप में शुरुआत की। लेखन किया। पत्र निकाला।

फिल्मों में संवाद लिखे। द्रविड़ आंदोलन को लोकप्रिय बनाया। चुनाव लड़े। अन्नादुरै के नेतृत्व में काम किया। अन्नादुरै की मृत्यु के बाद पार्टी के भीतर संघर्ष करके नेतृत्व प्राप्त किया। MGR जैसी असाधारण लोकप्रिय चुनौती का सामना किया। सत्ता गंवाई। फिर सत्ता में लौटे। और लगभग पांच दशकों तक तमिल राजनीति के केंद्रीय व्यक्तित्व बने रहे।

उनकी राजनीतिक पूंजी मुख्यतः अर्जित थी।

एम.के. स्टालिन की कहानी अलग है। उन्हें राजनीतिक प्रवेश और असाधारण दृश्यता पिता से मिली। लेकिन उन्होंने दशकों तक राजनीति में काम करके स्वतंत्र संगठनात्मक और चुनावी पूंजी अर्जित की। करुणानिधि की मृत्यु के बाद उन्होंने पार्टी संभाली और उसे सत्ता में वापस लाया। इसलिए स्टालिन को केवल वंशवादी लाभार्थी कहना अधूरा होगा। और फिर आती है तीसरी पीढ़ी।

उदयनिधि स्टालिन।

उनका उत्थान बहुत तेज है। 2019 में युवा विंग। 2021 में विधायक। 2022 में मंत्री। 2024 में उपमुख्यमंत्री। यहीं इस राजनीतिक वंश का सबसे बड़ा भविष्यगत प्रश्न खड़ा है—

क्या उदयनिधि भी अपने पिता की तरह विरासत में मिले अवसर को स्वतंत्र राजनीतिक वैधता में बदल पाएंगे, या DMK का नेतृत्व अब खुले रूप में पारिवारिक उत्तराधिकार की व्यवस्था बन जाएगा?

इसका अंतिम उत्तर अभी नहीं दिया जा सकता। इतिहास की निष्पक्षता यही मांगती है कि जहां प्रमाण समाप्त होते हैं, वहां निष्कर्ष भी रोक दिया जाए। लेकिन इतना निश्चित है कि करुणानिधि से स्टालिन और स्टालिन से उदयनिधि तक पहुंचते-पहुंचते DMK भारतीय राजनीति में तीन पीढ़ियों वाले सबसे स्पष्ट और संस्थागत राजनीतिक वंशों में से एक बन चुकी है। और दक्षिण भारत से अब हम फिर उत्तर भारत लौटेंगे—एक ऐसे परिवार की ओर जिसने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में राजशाही के अंत, जन आंदोलन, स्वायत्तता, केंद्र–राज्य संघर्ष, अनुच्छेद 370 और लोकतांत्रिक पुनर्स्थापना तक लगभग एक सदी की राजनीति देखी है।