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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–020 · अध्याय 12

शरद पवार से अजित पवार और सुप्रिया सुले तक — महाराष्ट्र में विरासत, उत्तराधिकार और एक परिवार की दो राजनीतिक धाराएं

भारतीय राजनीतिक वंशों में पवार परिवार का अध्ययन असाधारण है। अधिकांश राजनीतिक परिवारों में पहली पीढ़ी सत्ता और संगठन खड़ा करती है, दूसरी पीढ़ी उसका उत्तराधिकार संभालती है और तीसरी पीढ़ी आगे बढ़ती है। पवार परिवार में कहानी इस सीधी रेखा पर नहीं चली। यहां संस्थापक नेता शरद पवार हैं, लेकिन उनके बाद राजनीतिक विरासत दो दिशाओं में बंटी—

शरद पवार ↓ पुत्री सुप्रिया सुले

और दूसरी ओर—

शरद पवार ↓ भतीजे अजित पवार।

फिर 2023 में यही राजनीतिक परिवार दो प्रतिद्वंद्वी पार्टियों में विभाजित हो गया। 2024 में बारामती में परिवार बनाम परिवार की दो ऐतिहासिक चुनावी लड़ाइयां हुईं। और जब यह संघर्ष स्थायी राजनीतिक पुनर्संरचना में बदलता दिखाई दे रहा था, 28 जनवरी 2026 को अजित पवार की विमान दुर्घटना में अचानक मृत्यु हो गई। महाराष्ट्र सरकार ने तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया। इसके बाद एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ। मई 2026 के बारामती विधानसभा उपचुनाव में अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार NCP उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित हुईं। निर्वाचन आयोग के अनुसार उन्हें 2,18,969 वोट—97.81 प्रतिशत—मिले।

अर्थात अगस्त 2026 तक पवार परिवार की राजनीति केवल शरद–अजित–सुप्रिया की कहानी नहीं रही। इसमें सुनेत्रा पवार और अगली पीढ़ी के रोहित पवार तथा युगेंद्र पवार भी महत्वपूर्ण हो चुके हैं। इसलिए इस अध्याय का मूल प्रश्न है—

क्या पवार परिवार में राजनीतिक विरासत किसी एक उत्तराधिकारी को मिली, या शरद पवार द्वारा निर्मित राजनीतिक साम्राज्य अलग-अलग पारिवारिक शाखाओं में विभाजित हो गया?

12.1 पृष्ठभूमि — महाराष्ट्र की वह राजनीति जिसने शरद पवार को बनाया

शरद पवार को समझे बिना महाराष्ट्र की राजनीति के सहकारी ढांचे को समझना कठिन है। स्वतंत्रता के बाद महाराष्ट्र में कांग्रेस का राजनीतिक प्रभुत्व केवल विधानसभा या लोकसभा तक सीमित नहीं था। ग्रामीण सत्ता की महत्वपूर्ण संस्थाएं थीं— सहकारी चीनी मिलें, जिला सहकारी बैंक, दुग्ध संघ, कृषि मंडियां, शैक्षणिक संस्थाएं, स्थानीय निकाय और पंचायत व्यवस्था। पश्चिमी महाराष्ट्र में विशेष रूप से सहकारिता राजनीतिक शक्ति का महत्वपूर्ण स्रोत बनी। शरद पवार इसी राजनीतिक वातावरण से निकले। 12.2 शरद पवार — वंश के उत्तराधिकारी नहीं, निर्माता शरद गोविंदराव पवार का जन्म 12 दिसंबर 1940 को बारामती में हुआ।

उनका परिवार सामाजिक और सार्वजनिक गतिविधियों से जुड़ा था, लेकिन उन्हें किसी मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री या स्थापित राष्ट्रीय राजनीतिक परिवार की तैयार विरासत नहीं मिली थी। इसलिए करुणानिधि, शेख अब्दुल्ला, मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव की तरह शरद पवार भी हमारे अध्ययन में वंश-निर्माता की श्रेणी में आते हैं। उनकी राजनीतिक शक्ति स्वयं अर्जित थी। आगे यही शक्ति परिवार की अगली पीढ़ियों के लिए राजनीतिक पूंजी बनी। 12.3 यशवंतराव चव्हाण का प्रभाव शरद पवार की प्रारंभिक राजनीति पर महाराष्ट्र के पहले मुख्यमंत्री और बाद के केंद्रीय नेता यशवंतराव चव्हाण का महत्वपूर्ण प्रभाव था। पवार कांग्रेस की युवा राजनीति में सक्रिय हुए।

1967 में वे पहली बार बारामती से महाराष्ट्र विधानसभा के लिए चुने गए। यह वह दौर था जब कांग्रेस महाराष्ट्र की केंद्रीय राजनीतिक शक्ति थी। लेकिन पवार जल्दी ही केवल सामान्य विधायक नहीं रहे। उनमें संगठन, सत्ता-संतुलन और गठबंधन बनाने की असाधारण क्षमता दिखाई देने लगी। 12.4 1978 — 38 वर्ष की उम्र में मुख्यमंत्री 1978 महाराष्ट्र की राजनीति का निर्णायक वर्ष था। कांग्रेस विभाजित थी। शरद पवार ने कांग्रेस से अलग होकर Progressive Democratic Front की सरकार बनाई। वे केवल 38 वर्ष की उम्र में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने। यह उपलब्धि उन्हें किसी पिता या परिवार ने नहीं दिलाई थी। यह उनका अपना राजनीतिक विद्रोह और सत्ता-समीकरण था। यहीं से उनकी छवि बनी—

सत्ता के समीकरणों को असाधारण तेजी से पढ़ने वाला राजनेता।

यह छवि आगे लगभग पांच दशकों तक उनके साथ रही। 12.5 इंदिरा गांधी से अलगाव और कांग्रेस में वापसी शरद पवार का राजनीतिक सफर सीधा नहीं था। वे कांग्रेस से अलग हुए। अपना राजनीतिक संगठन बनाया। फिर कांग्रेस में लौटे। 1980 और 1990 के दशकों तक वे महाराष्ट्र और राष्ट्रीय राजनीति दोनों के महत्वपूर्ण नेता बन चुके थे। वे कई बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे। केंद्र में रक्षा मंत्री बने। और प्रधानमंत्री पद के संभावित दावेदारों में भी उनका नाम लिया जाता रहा। 12.6 1991 — प्रधानमंत्री पद की राजनीति राजीव गांधी की हत्या के बाद 1991 में कांग्रेस के नेतृत्व का प्रश्न उठा। पी.वी. नरसिंह राव अंततः प्रधानमंत्री बने। लेकिन शरद पवार भी उस दौर के महत्वपूर्ण दावेदारों में थे।

यह प्रसंग महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा महाराष्ट्र तक सीमित नहीं थी। वे स्वयं को राष्ट्रीय नेतृत्व की क्षमता वाला नेता मानते थे। लेकिन कांग्रेस की केंद्रीय राजनीति में वे सर्वोच्च पद तक नहीं पहुंच सके। 12.7 1999 — सोनिया गांधी का विदेशी मूल और कांग्रेस से विद्रोह 1999 में कांग्रेस के भीतर सोनिया गांधी के विदेशी मूल का प्रश्न उठा। शरद पवार, पी.ए. संगमा और तारिक अनवर ने इस मुद्दे पर कांग्रेस नेतृत्व को चुनौती दी। तीनों को कांग्रेस से बाहर कर दिया गया। इसके बाद जून 1999 में नई पार्टी बनी—

Nationalist Congress Party — NCP।

यहीं से पवार परिवार के भविष्य की संस्थागत जमीन तैयार हुई। अब शरद पवार केवल बड़े नेता नहीं थे। वे अपनी पार्टी के संस्थापक और सर्वोच्च नेता थे। 12.8 NCP और कांग्रेस — विरोध से गठबंधन तक विडंबना यह थी कि सोनिया गांधी के नेतृत्व के प्रश्न पर कांग्रेस छोड़कर बनी NCP ने कुछ ही समय बाद महाराष्ट्र में कांग्रेस के साथ गठबंधन किया। 1999 के विधानसभा चुनाव के बाद दोनों ने मिलकर सरकार बनाई। यह गठबंधन महाराष्ट्र में लगभग पंद्रह वर्ष तक सत्ता में रहा। राष्ट्रीय स्तर पर भी NCP आगे UPA का हिस्सा बनी। शरद पवार केंद्र में कृषि मंत्री बने। इससे उनकी पार्टी को राज्य और केंद्र दोनों में सत्ता का हिस्सा मिला। 12.9 बारामती — निर्वाचन क्षेत्र से राजनीतिक संस्थान तक

पवार परिवार के अध्ययन में बारामती केवल एक लोकसभा या विधानसभा क्षेत्र नहीं है। यह परिवार की राजनीतिक शक्ति का भौगोलिक केंद्र है। शरद पवार ने यहां लंबा राजनीतिक आधार बनाया। सहकारी संस्थाएं, कृषि, शिक्षा, उद्योग, स्थानीय निकाय और राजनीतिक संगठन—इन सबके बीच बारामती का विकास हुआ। समर्थक इसे विकास का मॉडल बताते हैं। आलोचक इसे पवार परिवार के व्यापक संस्थागत प्रभाव का उदाहरण मानते हैं। दोनों व्याख्याओं में कुछ तथ्य मौजूद हैं। 12.10 अजित पवार — परिवार की दूसरी राजनीतिक धुरी अजित अनंतराव पवार शरद पवार के बड़े भाई अनंतराव पवार के पुत्र थे। उनका जन्म 22 जुलाई 1959 को हुआ। उनकी राजनीति की शुरुआत ऐसे समय हुई जब उनके चाचा महाराष्ट्र के सबसे शक्तिशाली नेताओं में थे।

इसलिए अजित पवार का राजनीतिक प्रवेश शरद पवार की विरासत से अलग करके नहीं देखा जा सकता। लेकिन आगे उन्होंने पश्चिमी महाराष्ट्र और विशेष रूप से बारामती में अपना स्वतंत्र संगठनात्मक नेटवर्क भी बनाया। 12.11 सहकारिता से राजनीति अजित पवार का प्रारंभिक राजनीतिक प्रशिक्षण सहकारी संस्थाओं और स्थानीय राजनीति से जुड़ा था। यह महाराष्ट्र के लिए महत्वपूर्ण मॉडल है। राजनीतिक नेतृत्व केवल विधानसभा से नहीं बनता। सहकारी बैंक, चीनी मिल, जिला परिषद, कृषि संस्थान और स्थानीय नेटवर्क राजनीतिक शक्ति की नर्सरी रहे हैं। अजित पवार ने इसी ढांचे में अपनी पकड़ विकसित की। 12.12 लोकसभा से विधानसभा 1991 में अजित पवार बारामती से लोकसभा पहुंचे।

लेकिन जब शरद पवार केंद्र की राजनीति से महाराष्ट्र लौटे, अजित ने सीट छोड़ी। इसके बाद उनका मुख्य राजनीतिक क्षेत्र महाराष्ट्र विधानसभा बन गया। बारामती विधानसभा क्षेत्र धीरे-धीरे उनका मजबूत गढ़ बन गया। वे लगातार चुनाव जीतते रहे। इस प्रकार परिवार के भीतर एक अनौपचारिक राजनीतिक विभाजन विकसित हुआ—

शरद पवार — राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय रणनीतिक नेतृत्व।

अजित पवार — महाराष्ट्र संगठन और बारामती क्षेत्र में मजबूत संचालन।

12.13 अजित पवार का प्रशासनिक उदय अजित पवार महाराष्ट्र सरकार में विभिन्न विभागों के मंत्री बने। सिंचाई/जल संसाधन, वित्त और योजना जैसे महत्वपूर्ण विभाग उनके पास रहे। वे कई बार उपमुख्यमंत्री बने। धीरे-धीरे यह धारणा मजबूत हुई कि यदि शरद पवार के बाद NCP की सत्ता किसी अनुभवी संगठनात्मक नेता के पास जाएगी तो अजित प्रमुख दावेदार होंगे। लेकिन इसी दौरान एक दूसरा उत्तराधिकार भी आकार ले रहा था। 12.14 सुप्रिया सुले — पुत्री का प्रवेश शरद पवार की पुत्री सुप्रिया सुले ने अपेक्षाकृत बाद में सक्रिय चुनावी राजनीति में प्रवेश किया। 2006 में वे राज्यसभा पहुंचीं। 2009 में उन्होंने बारामती लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।

इसके बाद बारामती लोकसभा सीट उनकी मुख्य राजनीतिक पहचान बनी। यहीं परिवार में उत्तराधिकार का नया प्रश्न खड़ा हुआ—

पार्टी किसकी? अजित की या सुप्रिया की?

12.15 दो अलग राजनीतिक प्रोफाइल अजित और सुप्रिया की राजनीतिक शैली अलग रही। अजित पवार की छवि महाराष्ट्र की सत्ता, प्रशासन, विधायकों और स्थानीय संगठन पर मजबूत पकड़ वाले नेता की बनी। सुप्रिया सुले की पहचान संसद, राष्ट्रीय राजनीति, संवाद और अपेक्षाकृत संयमित सार्वजनिक शैली से बनी। इसलिए परिवार के भीतर उत्तराधिकार केवल रिश्तेदारी का संघर्ष नहीं था। यह दो प्रकार की राजनीतिक पूंजी का संघर्ष भी था—

Organisational Power बनाम Parliamentary-Political Legitimacy।

12.16 क्या शरद पवार ने उत्तराधिकारी तय किया था? यही NCP की सबसे बड़ी समस्या बनी। शरद पवार ने लंबे समय तक किसी एक व्यक्ति को स्पष्ट राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया। अजित पवार के पास संगठन और विधायकों में प्रभाव था। सुप्रिया सुले के पास शरद पवार का निकट राजनीतिक विश्वास और राष्ट्रीय पहचान थी। यह अस्पष्टता आगे 2023 के विभाजन की पृष्ठभूमि बनी। वंशवादी दलों में अक्सर उत्तराधिकारी तय करना ही सबसे बड़ा संस्थागत संकट बन जाता है। 12.17 रोहित पवार — तीसरी पारिवारिक धारा पवार परिवार में केवल अजित और सुप्रिया ही नहीं हैं। रोहित पवार, शरद पवार के बड़े भाई अप्पासाहेब पवार के पौत्र, अगली पीढ़ी के महत्वपूर्ण राजनीतिक चेहरे बने। वे कर्जत-जामखेड से विधायक बने।

युवा नेतृत्व, संगठन और चुनावी राजनीति में उनकी सक्रियता ने उन्हें शरद पवार की राजनीतिक धारा के संभावित भविष्य के नेताओं में शामिल किया। 2024 के विधानसभा चुनाव में भी वे कर्जत-जामखेड से निर्वाचित हुए। NCP (SP) के विजयी उम्मीदवारों की सूची में उनका नाम दर्ज है। इससे उत्तराधिकार का समीकरण और जटिल हुआ। 12.18 सिंचाई विवाद अजित पवार के राजनीतिक जीवन का एक प्रमुख विवाद महाराष्ट्र की सिंचाई परियोजनाओं से जुड़ा रहा। विपक्ष ने परियोजनाओं की लागत वृद्धि, स्वीकृतियों और कथित अनियमितताओं पर आरोप लगाए। अजित पवार ने आरोपों से इनकार किया। मामलों की विभिन्न एजेंसियों द्वारा जांच और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप लंबे समय तक चलते रहे। शोध में यहां विशेष सावधानी आवश्यक है—

राजनीतिक आरोप, जांच, प्राथमिकी, आरोपपत्र और न्यायिक दोषसिद्धि अलग-अलग अवस्थाएं हैं।

इन सबको एक ही अर्थ में नहीं लिखा जाना चाहिए। 12.19 2012 — अजित पवार का इस्तीफा सिंचाई विवाद के बीच सितंबर 2012 में अजित पवार ने उपमुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया। बाद में वे सरकार में वापस आए। इस प्रकरण ने उनकी छवि पर प्रभाव डाला, लेकिन उनकी संगठनात्मक शक्ति समाप्त नहीं हुई। यही अजित पवार की राजनीति की महत्वपूर्ण विशेषता थी— विवादों के बावजूद वे पार्टी विधायकों और स्थानीय नेटवर्क में प्रभाव बनाए रखते थे। 12.20 2014 के बाद बदली महाराष्ट्र राजनीति 2014 में भाजपा महाराष्ट्र की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बनकर उभरी। कांग्रेस–NCP गठबंधन सत्ता से बाहर हो गया। शरद पवार और अजित पवार दोनों को नए राजनीतिक वातावरण में अपनी रणनीति बदलनी पड़ी।

अब महाराष्ट्र में कांग्रेस बनाम NCP की पुरानी प्रतिस्पर्धा से अधिक महत्वपूर्ण हो गई— भाजपा, शिवसेना, कांग्रेस, और NCP की बहुकोणीय राजनीति। यही आगे 2019 के अभूतपूर्व सत्ता-संघर्ष का आधार बनी। 12.21 2019 — महाराष्ट्र का असाधारण चुनावी संकट 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और शिवसेना ने गठबंधन में चुनाव लड़ा। परिणाम आने के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर दोनों दलों में विवाद हो गया। उद्धव ठाकरे की शिवसेना भाजपा से अलग हो गई। शिवसेना, कांग्रेस और NCP के बीच नई सरकार बनाने की बातचीत शुरू हुई। और तभी महाराष्ट्र की राजनीति में एक ऐसा घटनाक्रम हुआ जिसने अजित पवार और शरद पवार के रिश्ते पर पहली बार गंभीर सार्वजनिक प्रश्न खड़ा कर दिया। 12.22 23 नवंबर 2019 — सुबह-सुबह सरकार

23 नवंबर 2019 की सुबह देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री और अजित पवार ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली। यह राजनीतिक घटनाक्रम अत्यंत अप्रत्याशित था। राष्ट्रपति शासन हटाया गया और सुबह सरकार बन गई। अजित ने NCP विधायकों के समर्थन का दावा किया। लेकिन शरद पवार ने स्पष्ट किया कि यह NCP का निर्णय नहीं था। अब पहली बार चाचा और भतीजा सार्वजनिक रूप से अलग खड़े दिखाई दिए। 12.23 80 घंटे की सरकार फडणवीस–अजित सरकार बहुमत सिद्ध करने की स्थिति में नहीं रही। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद फ्लोर टेस्ट की स्थिति बनी। अजित पवार ने उपमुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया। देवेंद्र फडणवीस ने भी इस्तीफा दे दिया। सरकार लगभग 80 घंटे में गिर गई।

इसके बाद उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में शिवसेना–NCP–कांग्रेस की महाविकास आघाड़ी सरकार बनी। आश्चर्यजनक रूप से अजित पवार कुछ समय बाद फिर उपमुख्यमंत्री बने। यह शरद पवार की राजनीतिक शैली का भी उदाहरण था— विद्रोह के बाद भी परिवार और संगठन के भीतर वापसी का रास्ता खुला रहा। 12.24 2022 — शिवसेना टूटी, अगला नंबर NCP का जून 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना के बड़े समूह ने उद्धव ठाकरे के खिलाफ विद्रोह किया। महाविकास आघाड़ी सरकार गिर गई। एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री और देवेंद्र फडणवीस उपमुख्यमंत्री बने। इसके लगभग एक वर्ष बाद वही संकट NCP में आया। इस बार केंद्र में थे—

अजित पवार।

12.25 2 जुलाई 2023 — निर्णायक विद्रोह 2 जुलाई 2023 को अजित पवार अपने समर्थक विधायकों के साथ महाराष्ट्र की शिंदे–भाजपा सरकार में शामिल हो गए। उन्होंने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उनके साथ कई NCP नेताओं ने मंत्री पद की शपथ ली। अब 2019 की घटना अस्थायी विद्रोह नहीं रही। इस बार NCP वास्तविक रूप से टूट गई। 12.26 पार्टी किसकी? दोनों पक्षों ने दावा किया कि वास्तविक NCP वही हैं। एक ओर पार्टी संस्थापक शरद पवार थे। दूसरी ओर अजित पवार के पास विधायकों और संगठन के बड़े हिस्से का समर्थन था। मामला निर्वाचन आयोग पहुंचा। यह भारतीय वंशवाद के अध्ययन का असाधारण उदाहरण है—

संस्थापक नेता के सामने उसी परिवार का उत्तराधिकारी पार्टी के स्वामित्व का दावा कर रहा था।

12.27 निर्वाचन आयोग का 6 फरवरी 2024 का फैसला 6 फरवरी 2024 को निर्वाचन आयोग ने NCP विवाद पर अपना अंतिम आदेश दिया। आयोग ने अजित पवार के नेतृत्व वाले समूह को Nationalist Congress Party के रूप में मान्यता दी और मूल चुनाव चिह्न 'घड़ी' उसी समूह को मिला। निर्वाचन आयोग की आधिकारिक सूची में 6 फरवरी 2024 का अंतिम आदेश दर्ज है। शरद पवार के समूह को अलग नाम मिला—

Nationalist Congress Party – Sharadchandra Pawar।

सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद उसे 'Man Blowing Turha'—तुतारी बजाता व्यक्ति चुनाव चिह्न मिला। निर्वाचन आयोग के अप्रैल 2024 के आदेश में यह व्यवस्था स्पष्ट रूप से दर्ज है। 12.28 एक असाधारण विडंबना जिस व्यक्ति ने 1999 में NCP बनाई—

उसी शरद पवार के पास 2024 में पार्टी का मूल नाम और 'घड़ी' चिह्न नहीं रहा।

यह केवल कानूनी या चुनावी विवाद नहीं था। यह राजनीतिक वंशवाद की मूल समस्या का भी उदाहरण था। पार्टी संस्थापक की है? संगठन की? विधायकों की? मतदाताओं की? या उस समूह की जिसके पास संस्थागत बहुमत है? निर्वाचन आयोग का निर्णय चुनाव चिह्न कानून और संगठनात्मक/विधायी समर्थन की कसौटियों पर था; राजनीतिक विरासत का नैतिक प्रश्न उससे अलग रहा। 12.29 2024 — बारामती में परिवार बनाम परिवार लोकसभा चुनाव 2024 ने इस विभाजन को सीधे मतदाताओं के सामने रख दिया। बारामती में शरद पवार की पुत्री—

सुप्रिया सुले

के सामने अजित पवार की पत्नी—

सुनेत्रा पवार

उम्मीदवार बनीं। यह केवल NCP बनाम NCP (SP) चुनाव नहीं था। यह पवार परिवार की दो शाखाओं की सीधी राजनीतिक परीक्षा थी। 12.30 सुप्रिया सुले बनाम सुनेत्रा पवार सुप्रिया सुले ने चुनाव जीत लिया। उन्हें 7,32,312 वोट मिले। सुनेत्रा पवार को 5,73,979 वोट मिले। अंतर था—

1,58,333 वोट।

इस परिणाम ने तत्कालीन राजनीतिक धारणा को मजबूत किया कि बारामती के मतदाताओं ने लोकसभा स्तर पर शरद पवार–सुप्रिया धारा को प्राथमिकता दी। लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई। 12.31 पांच महीने बाद उलटा फैसला नवंबर 2024 में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव हुआ। इस बार बारामती विधानसभा सीट पर मुकाबला था—

अजित पवार बनाम युगेंद्र पवार।

युगेंद्र अजित पवार के छोटे भाई श्रीनिवास पवार के पुत्र हैं और उन्हें शरद पवार की NCP (SP) ने उम्मीदवार बनाया। अर्थात फिर—

पवार बनाम पवार।

इस बार परिणाम बिल्कुल उलटा रहा। 12.32 अजित पवार की विशाल जीत अजित पवार को बारामती विधानसभा चुनाव में 1,81,132 वोट मिले। युगेंद्र पवार को 80,233 वोट। अजित की जीत का अंतर था—

1,00,899 वोट।

यह परिणाम अत्यंत महत्वपूर्ण था। लोकसभा में बारामती ने सुप्रिया को चुना। विधानसभा में उसी राजनीतिक भूगोल ने अजित को भारी समर्थन दिया। मतदाता ने परिवार की दोनों शाखाओं के बीच भी अलग-अलग चुनावों में अलग निर्णय दिया। 12.33 2024 विधानसभा चुनाव — अजित पवार की बड़ी राजनीतिक वापसी 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में महायुति को भारी बहुमत मिला। अजित पवार की NCP ने भी अपेक्षाओं से बेहतर प्रदर्शन किया और 41 सीटें जीतीं। इसके विपरीत शरद पवार की NCP (SP) 86 सीटों पर चुनाव लड़कर केवल 10 सीटें जीत सकी। यह 2024 लोकसभा चुनाव की तस्वीर से काफी अलग था, जिसमें शरद पवार की पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन किया था। इससे एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आया—

लोकसभा और विधानसभा में पवार परिवार की दोनों धाराओं की चुनावी शक्ति अलग-अलग थी।

12.34 क्या अजित ने अपनी स्वतंत्र राजनीतिक वैधता सिद्ध कर दी? 2024 विधानसभा चुनाव के बाद इस प्रश्न का उत्तर काफी हद तक हां की ओर झुका। उनका प्रवेश वंशवादी था। उन्हें शरद पवार का नाम, संगठन और बारामती का नेटवर्क मिला। लेकिन 2023 में उन्होंने शरद से अलग होकर राजनीतिक जोखिम लिया। 2024 में अपने नेतृत्व वाली पार्टी को 41 विधानसभा सीटें दिलाईं। बारामती में स्वयं एक लाख से अधिक मतों से जीते। इसलिए उन्हें केवल 'शरद पवार के भतीजे' के रूप में परिभाषित करना उनके स्वतंत्र राजनीतिक आधार को नजरअंदाज करना होगा। 12.35 सुप्रिया सुले की स्वतंत्र वैधता यही कसौटी सुप्रिया पर भी लागू होती है। उनका प्रारंभिक प्रवेश स्पष्ट रूप से पारिवारिक राजनीतिक पूंजी से हुआ।

उन्हें राज्यसभा और फिर पवार परिवार की परंपरागत बारामती लोकसभा सीट मिली। लेकिन कई चुनाव जीतने और विशेष रूप से 2024 में परिवार के भीतर सीधी चुनौती का सामना करने के बाद उनकी अपनी चुनावी वैधता भी स्थापित हुई। सुनेत्रा पवार पर 1.58 लाख से अधिक मतों की जीत केवल पिता की विरासत से समझाना पर्याप्त नहीं होगा। 12.36 28 जनवरी 2026 — कहानी अचानक बदल गई 28 जनवरी 2026 की सुबह अजित पवार मुंबई से बारामती जा रहे थे। उनका चार्टर्ड Learjet 45 बारामती हवाई अड्डे पर उतरने की कोशिश के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। अजित पवार सहित विमान में सवार पांच लोगों की मृत्यु हो गई। उस समय वे महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री थे। यह केवल एक वरिष्ठ नेता की मृत्यु नहीं थी।

इसने NCP के भविष्य का पूरा उत्तराधिकार प्रश्न अचानक खोल दिया। क्योंकि अजित पवार स्वयं उस पार्टी के निर्विवाद केंद्रीय नेता बन चुके थे जिसे निर्वाचन आयोग ने मूल NCP के रूप में मान्यता दी थी। 12.37 अजित की मृत्यु के बाद नया उत्तराधिकार प्रश्न अब प्रश्न बदल गया— पहले पूछा जाता था:

शरद पवार के बाद कौन—अजित या सुप्रिया?

2026 के बाद प्रश्न हो गया:

अजित पवार की NCP का भविष्य किसके हाथ में जाएगा?

और क्या कभी दोनों NCP फिर साथ आएंगी? मई और जुलाई 2026 तक दोनों गुटों के विलय की अटकलें चलती रहीं, लेकिन जुलाई में शरद पवार ने सार्वजनिक रूप से विलय की संभावना को खारिज किया। अर्थात अगस्त 2026 तक दोनों राजनीतिक धाराएं अलग बनी हुई हैं। 12.38 सुनेत्रा पवार — राजनीति की नई केंद्रीय पात्र अजित पवार की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार की भूमिका अचानक अधिक महत्वपूर्ण हो गई। वे 2024 में सुप्रिया सुले के खिलाफ लोकसभा चुनाव हार चुकी थीं। लेकिन अजित की मृत्यु से बारामती विधानसभा सीट खाली हुई। मई 2026 के उपचुनाव में सुनेत्रा NCP उम्मीदवार बनीं। उन्होंने भारी जीत दर्ज की। निर्वाचन आयोग के अनुसार—

सुनेत्रा पवार — 2,18,969 वोट मत प्रतिशत — 97.81%।

इससे पवार परिवार की एक और शाखा अब प्रत्यक्ष निर्वाचित राजनीति के केंद्र में आ गई। 12.39 अब पवार परिवार का नक्शा 2026 तक पवार परिवार की राजनीतिक संरचना लगभग इस प्रकार दिखाई देती है— शरद पवार → सुप्रिया सुले → NCP (Sharadchandra Pawar) दूसरी धारा— अजित पवार → सुनेत्रा पवार → NCP और विस्तारित अगली पीढ़ी में—

रोहित पवार

तथा

युगेंद्र पवार

जैसे चेहरे। इसलिए यह अब दो पीढ़ियों का नहीं बल्कि बहु-शाखीय राजनीतिक वंश बन चुका है। 12.40 रोहित पवार का महत्व रोहित पवार को विशेष रूप से ध्यान में रखना होगा। वे केवल पवार उपनाम वाले नेता नहीं हैं। उन्होंने विधानसभा चुनाव जीते हैं। कर्जत-जामखेड जैसे क्षेत्र में अपना राजनीतिक आधार बनाने की कोशिश की है। 2024 में वे कठिन मुकाबले में पुनः निर्वाचित हुए। इसलिए यदि भविष्य में NCP (SP) में पीढ़ीगत संक्रमण होता है तो सुप्रिया सुले के साथ रोहित पवार का नाम भी स्वाभाविक रूप से चर्चा में रहेगा। लेकिन अभी उन्हें पूर्वनिर्धारित उत्तराधिकारी घोषित करना शोध की दृष्टि से उचित नहीं होगा। 12.41 युगेंद्र पवार — चुनावी प्रवेश

युगेंद्र पवार का महत्व 2024 में बढ़ा जब शरद पवार की पार्टी ने उन्हें सीधे अजित पवार के विरुद्ध बारामती विधानसभा सीट से उतारा। वे चुनाव हार गए। लेकिन केवल उम्मीदवार चयन ही महत्वपूर्ण था। इससे पता चला कि शरद पवार की धारा परिवार की अगली पीढ़ी के दूसरे सदस्यों को भी सक्रिय राजनीति में ला रही है। यानी वंश अब केवल—

पिता → पुत्री

तक सीमित नहीं रहा। 12.42 क्या बारामती परिवार की राजनीतिक जागीर है? लोकतांत्रिक अर्थ में नहीं। कोई निर्वाचन क्षेत्र किसी परिवार की संपत्ति नहीं हो सकता। लेकिन राजनीतिक समाजशास्त्र के अर्थ में बारामती पवार परिवार का वंशगत निर्वाचन केंद्र अवश्य बन चुका है। शरद पवार, अजित पवार, सुप्रिया सुले, सुनेत्रा पवार, और युगेंद्र पवार— सभी की राजनीति किसी न किसी रूप में बारामती से जुड़ी रही। यही electoral inheritance का स्पष्ट उदाहरण है। 12.43 परिवारवाद की आलोचना पवार परिवार पर वंशवाद की आलोचना के मुख्य आधार हैं— परिवार के अनेक सदस्यों का राजनीति में प्रवेश, बारामती की सीटों पर पारिवारिक निरंतरता, सहकारी और स्थानीय संस्थाओं पर लंबे प्रभाव के आरोप,

सुप्रिया सुले का राष्ट्रीय राजनीति में तेज प्रवेश, अजित पवार का संगठनात्मक उत्थान, रोहित और युगेंद्र का आगे आना, और अब सुनेत्रा पवार का चुनावी राजनीति में स्थापित होना। इन तथ्यों के आधार पर पवार परिवार को भारतीय राजनीति के प्रमुख राजनीतिक वंशों में रखना उचित है। 12.44 लेकिन आलोचना की सीमा दूसरी ओर केवल पारिवारिक संबंध से सभी नेताओं की राजनीतिक क्षमता को शून्य नहीं माना जा सकता। अजित पवार दशकों तक चुनाव जीतते रहे। उन्होंने प्रशासनिक अनुभव अर्जित किया। 2024 में शरद पवार से अलग पार्टी लेकर चुनाव में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की। सुप्रिया सुले ने लगातार संसदीय चुनाव जीते। 2024 में परिवार के भीतर सीधे मुकाबले में बड़ी जीत हासिल की। रोहित पवार ने विधानसभा चुनाव जीते।

इसलिए पवार परिवार का अध्ययन वंशवादी अवसर + अर्जित राजनीतिक वैधता दोनों के आधार पर होना चाहिए। 12.45 भाजपा की भूमिका — प्रतिद्वंद्वी से सहयोगी तक पवार परिवार की कहानी में भाजपा की भूमिका भी दिलचस्प है। कभी भाजपा और NCP प्रमुख प्रतिद्वंद्वी थे। 2019 में अजित पवार ने देवेंद्र फडणवीस के साथ सरकार बनाने की कोशिश की। 2023 में वही अजित स्थायी रूप से भाजपा–शिवसेना सरकार में शामिल हो गए। 2024 में महायुति के हिस्से के रूप में चुनाव लड़ा। उनकी मृत्यु के समय वे भाजपा-नेतृत्व वाली महायुति सरकार के उपमुख्यमंत्री थे। इससे महाराष्ट्र की गठबंधन राजनीति का अत्यंत व्यावहारिक स्वरूप सामने आता है। 12.46 कांग्रेस की भूमिका NCP की उत्पत्ति कांग्रेस के विरोध से हुई।

लेकिन लगभग पूरे शुरुआती इतिहास में कांग्रेस उसकी सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी भी रही। 1999 से महाराष्ट्र सरकार, UPA शासन, महाविकास आघाड़ी, और बाद में INDIA गठबंधन— शरद पवार की राजनीति कांग्रेस के साथ सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों से बनी। सुप्रिया सुले की वर्तमान राजनीतिक धारा भी कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के साथ गठबंधन से जुड़ी रही है। इसलिए पवार वंश को केवल परिवार के भीतर देखकर नहीं समझा जा सकता; इसकी शक्ति गठबंधन-राजनीति से भी बनी। 12.47 प्रमुख विवाद पवार परिवार के राजनीतिक इतिहास से जुड़े प्रमुख विवादों में शामिल हैं— शरद पवार के बार-बार राजनीतिक गठबंधन बदलने पर आलोचना, सहकारी संस्थाओं में प्रभाव, अजित पवार से जुड़े सिंचाई परियोजना आरोप, 2019 की सुबह की फडणवीस–अजित सरकार,

2023 का NCP विभाजन, पार्टी नाम और चुनाव चिह्न विवाद, परिवार के सदस्यों को चुनावी अवसर, और 2024 में परिवार के भीतर सीधे चुनावी मुकाबले। इन सभी में तथ्य और राजनीतिक आरोप अलग रखना आवश्यक है। 12.48 प्रमुख दस्तावेज पवार परिवार के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत हैं— महाराष्ट्र विधानसभा की कार्यवाहियां, लोकसभा और राज्यसभा अभिलेख, 1999 में NCP गठन से जुड़े दस्तावेज, NCP संविधान और संगठनात्मक रिकॉर्ड, महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों की निर्वाचन आयोग रिपोर्टें, बारामती लोकसभा चुनाव परिणाम, 2019 महाराष्ट्र सरकार गठन से जुड़े राज्यपाल और न्यायालयीन रिकॉर्ड, 2023 NCP विभाजन संबंधी दावे, 6 फरवरी 2024 का निर्वाचन आयोग का NCP विवाद संबंधी अंतिम आदेश,

19 मार्च 2024 का सुप्रीम कोर्ट अंतरिम आदेश, जिसमें NCP–Sharadchandra Pawar और 'Man Blowing Turha' चिह्न के उपयोग की व्यवस्था की गई, 2024 लोकसभा और विधानसभा चुनाव परिणाम, और 2026 बारामती उपचुनाव परिणाम। ये दस्तावेज राजनीतिक दावों और वास्तविक संस्थागत निर्णयों के बीच अंतर करने के लिए आवश्यक हैं। 12.49 इतिहासलेखन — पहली व्याख्या : महाराष्ट्र का व्यावहारिक सत्ता-शिल्पी एक दृष्टिकोण शरद पवार को स्वतंत्र भारत के सबसे कुशल क्षेत्रीय राजनीतिक रणनीतिकारों में रखता है। इसके अनुसार उनकी शक्ति थी— गठबंधन बनाने की क्षमता, विरोधियों से संवाद, सहकारी संस्थाओं का राजनीतिक उपयोग, कृषि राजनीति की समझ, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय सत्ता के बीच संतुलन, और संकट में नए राजनीतिक समीकरण खड़े करना।

इस व्याख्या में पवार परिवार का उदय शरद पवार की असाधारण व्यक्तिगत राजनीतिक क्षमता की विरासत है। 12.50 दूसरी व्याख्या : संस्थागत नेटवर्क का परिवारकरण आलोचनात्मक इतिहासलेखन दूसरी तस्वीर प्रस्तुत करता है। इसके अनुसार पश्चिमी महाराष्ट्र की सहकारी राजनीति, स्थानीय संस्थाओं और चुनावी क्षेत्रों में दशकों तक बने प्रभाव ने एक ऐसी राजनीतिक संरचना बनाई जिसमें परिवार के नए सदस्यों का प्रवेश अपेक्षाकृत आसान हो गया। अजित, सुप्रिया, रोहित, युगेंद्र, और सुनेत्रा— लगातार एक ही विस्तृत परिवार से नेताओं का उभरना इस तर्क को मजबूत करता है। यह political capital accumulation across generations का उदाहरण है। 12.51 तीसरी व्याख्या : वंश का विभाजन ही लोकतांत्रिक परीक्षण

2023–26 की घटनाएं तीसरी व्याख्या प्रस्तुत करती हैं। वंश स्वयं विभाजित हो गया। फिर मतदाताओं ने निर्णय किया। लोकसभा में सुप्रिया जीतीं। विधानसभा में अजित जीते। शरद की पार्टी ने लोकसभा में अच्छा प्रदर्शन किया। अजित की पार्टी ने विधानसभा में कहीं बेहतर प्रदर्शन किया। अजित की मृत्यु के बाद सुनेत्रा ने बारामती उपचुनाव जीता। अर्थात मतदाता परिवार को एक इकाई मानकर मतदान नहीं कर रहा था। वह परिवार की अलग-अलग शाखाओं का अलग मूल्यांकन कर रहा था। यह भारतीय वंशवाद के अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण निष्कर्ष है। 12.52 चौथी व्याख्या : पार्टी किसकी—संस्थापक की या बहुमत की? NCP विभाजन राजनीतिक दलों के लोकतांत्रिक स्वामित्व का बड़ा प्रश्न उठाता है। शरद पवार ने पार्टी बनाई।

लेकिन अजित पवार समूह ने संगठन और विधायक समर्थन का दावा किया। निर्वाचन आयोग ने अंततः अजित समूह को मूल NCP माना। इससे प्रश्न उठता है— क्या राजनीतिक दल संस्थापक की व्यक्तिगत संपत्ति है? उत्तर है—नहीं। लेकिन यदि पार्टी का नेतृत्व लगातार परिवार के भीतर घूमता रहे तो लोकतांत्रिक संस्थागतकरण भी कमजोर होता है। पवार प्रकरण दोनों समस्याओं को एक साथ सामने लाता है। 12.53 तीन मुख्य नेताओं की तुलना

| कसौटी | शरद पवार | अजित पवार | सुप्रिया सुले | |---|---|---|---| | राजनीतिक वंश में जन्म | नहीं | हां, विस्तारित परिवार | हां | | प्रारंभिक अवसर में परिवार का लाभ | सीमित/नहीं | अत्यधिक | अत्यधिक | | संगठनात्मक अनुभव | अत्यधिक | अत्यधिक | पर्याप्त | | प्रशासनिक अनुभव | अत्यधिक | अत्यधिक | सीमित | | संसदीय अनुभव | अत्यधिक | सीमित | अत्यधिक | | मुख्यमंत्री | चार कार्यकाल/अवधियां | नहीं | नहीं | | उपमुख्यमंत्री | नहीं | कई बार | नहीं | | स्वतंत्र चुनावी आधार | अत्यधिक | अत्यधिक | महत्वपूर्ण | | पार्टी निर्माण | संस्थापक | विभाजित NCP का नेतृत्व | NCP-SP की प्रमुख नेता | | वंशवादी लाभ | नहीं | उच्च | उच्च |

अजित पवार के संदर्भ में अंतिम राजनीतिक मूल्यांकन अब उनके पूरे जीवनकाल को देखकर किया जा सकता है; जनवरी 2026 में उनकी मृत्यु ने उनकी राजनीतिक यात्रा को अचानक समाप्त कर दिया। 12.54 पवार वंश की विशेषता — उत्तराधिकारी नहीं, प्रतिस्पर्धी उत्तराधिकारी नेहरू–गांधी परिवार में सामान्यतः एक समय में एक मुख्य राजनीतिक धारा रही। करुणानिधि परिवार में अलागिरी–स्टालिन संघर्ष हुआ, लेकिन अंततः स्टालिन स्पष्ट उत्तराधिकारी बने। अब्दुल्ला परिवार में शेख → फारूक → उमर की अपेक्षाकृत सीधी श्रृंखला बनी। पवार परिवार में ऐसा नहीं हुआ। यहां उत्तराधिकार दो शाखाओं में टूट गया। फिर दोनों ने अपनी-अपनी संस्थागत वैधता बनाई। इसलिए इसका मॉडल है—

Founder → Competing Heirs → Party Split → Electoral Validation.

भारतीय राजनीतिक वंशों में यह अलग प्रकार का उदाहरण है। 12.55 अजित पवार की मृत्यु के बाद वंशवाद का नया चरण 2026 की घटना के बाद पवार परिवार के अध्ययन में एक नई परत जुड़ गई। यदि अजित के बाद उनकी पत्नी, पुत्र या परिवार का कोई अन्य सदस्य NCP नेतृत्व में प्रमुख स्थान प्राप्त करता है, तो यह उस शाखा में अलग वंशानुगत उत्तराधिकार का रूप ले सकता है। सुनेत्रा पवार का मई 2026 में बारामती से चुनाव जीतना इस प्रक्रिया का पहला महत्वपूर्ण संकेत है। लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि वे अजित की संपूर्ण राजनीतिक उत्तराधिकारी बन चुकी हैं।

निर्वाचित प्रतिनिधित्व और पार्टी के सर्वोच्च नेतृत्व में अंतर है।

हमारे अध्ययन में इस अंतर को बनाए रखना आवश्यक है। 12.56 अगस्त 2026 की स्थिति अगस्त 2026 तक तस्वीर यह है— शरद पवार अपनी अलग NCP (Sharadchandra Pawar) धारा के वरिष्ठतम नेता हैं। सुप्रिया सुले उस धारा का सबसे प्रमुख संसदीय चेहरा हैं। रोहित पवार विधानसभा राजनीति में महत्वपूर्ण युवा चेहरा हैं। दूसरी ओर मूल NCP अजित पवार की मृत्यु के बाद नेतृत्व-संक्रमण के दौर से गुजर रही है। सुनेत्रा पवार बारामती से विधायक बन चुकी हैं। दोनों NCP के विलय की अटकलें चलीं, लेकिन जुलाई 2026 में शरद पवार ने इसे स्पष्ट रूप से नकार दिया। इसलिए इस अध्याय को पुराने निष्कर्ष—“अजित बनाम सुप्रिया में विरासत किसे मिलेगी?”—पर समाप्त करना अब ऐतिहासिक रूप से गलत होगा। विरासत पहले ही विभाजित हो चुकी है।

12.57 निष्कर्ष — एक वंश, दो पार्टियां और कई उत्तराधिकारी पवार परिवार भारतीय वंशवादी राजनीति का अत्यंत शिक्षाप्रद उदाहरण है।

शरद पवार वंशवाद की उपज नहीं थे।

उन्होंने अपनी राजनीति स्वयं बनाई। 38 वर्ष की उम्र में मुख्यमंत्री बने। कांग्रेस छोड़ी। वापस गए। राष्ट्रीय राजनीति में पहुंचे। फिर कांग्रेस छोड़ी। NCP बनाई। महाराष्ट्र में व्यापक राजनीतिक नेटवर्क विकसित किया। उनकी राजनीतिक पूंजी अर्जित थी। लेकिन अगली पीढ़ी को उसी पूंजी का लाभ मिला। अजित पवार को बारामती, संगठन और पवार नाम मिला। लेकिन दशकों की राजनीति में उन्होंने स्वतंत्र प्रशासनिक और संगठनात्मक आधार बनाया। 2023 में शरद से अलग होना उनके जीवन का सबसे बड़ा राजनीतिक जोखिम था और 2024 के विधानसभा चुनाव ने दिखाया कि उनके पास अपनी स्वतंत्र चुनावी शक्ति भी थी।

सुप्रिया सुले को भी राजनीतिक प्रवेश का असाधारण लाभ मिला। लेकिन लगातार संसदीय चुनावों और विशेष रूप से 2024 के बारामती मुकाबले ने उनकी अपनी चुनावी वैधता स्थापित की। फिर अगली परत आई— रोहित पवार। युगेंद्र पवार। सुनेत्रा पवार। और जनवरी 2026 में अजित पवार की आकस्मिक मृत्यु ने पूरे उत्तराधिकार समीकरण को फिर बदल दिया। इसलिए पवार परिवार हमें भारतीय वंशवाद के बारे में एक महत्वपूर्ण बात सिखाता है—

राजनीतिक विरासत संपत्ति की तरह एक व्यक्ति को हस्तांतरित होना आवश्यक नहीं है। वह टूट सकती है, अलग-अलग शाखाओं में बंट सकती है और फिर प्रत्येक शाखा को मतदाताओं के सामने अपनी वैधता सिद्ध करनी पड़ सकती है।

बारामती इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। 2024 में उसी क्षेत्र ने लोकसभा में सुप्रिया सुले को चुना। कुछ महीने बाद विधानसभा में अजित पवार को एक लाख से अधिक मतों से जिताया। और 2026 में अजित की मृत्यु के बाद हुए उपचुनाव में सुनेत्रा पवार को भारी समर्थन मिला। इसलिए पवार परिवार को केवल 'परिवारवाद' कह देना पर्याप्त नहीं है। अधिक सटीक निष्कर्ष होगा—

यह वंशवादी राजनीतिक पूंजी, संस्थागत नेटवर्क, पारिवारिक प्रतिस्पर्धा, पार्टी विभाजन और बार-बार होने वाली चुनावी वैधता-परीक्षा—इन सभी का संयुक्त उदाहरण है।

और इसकी कहानी अभी समाप्त नहीं हुई है।