बहादुर शाह प्रथम — 1707–1712
औरंगज़ेब के बाद साम्राज्य को संभालने का प्रयास
3 मार्च 1707 को औरंगज़ेब की मृत्यु के साथ मुगल इतिहास का सबसे लंबा और सबसे थकाऊ शासन समाप्त हुआ। साम्राज्य मानचित्र पर अब भी विशाल था, शाही खजाने में अपार संसाधन मौजूद थे और मुगल बादशाह का नाम पूरे उपमहाद्वीप में राजनीतिक वैधता का सबसे बड़ा प्रतीक था। लेकिन भीतर से साम्राज्य गंभीर संकटों से घिर चुका था।
मराठा शक्ति समाप्त नहीं हुई थी।
राजपूत संबंध तनावपूर्ण थे।
पंजाब में सिख शक्ति संगठित हो रही थी।
जाट विद्रोह बार-बार उठ रहे थे।
दक्कन के युद्धों ने प्रशासन को थका दिया था।
मनसब और जागीर व्यवस्था दबाव में थी।
और सबसे महत्वपूर्ण—उत्तराधिकार का कोई निश्चित नियम अब भी नहीं था।
औरंगज़ेब की मृत्यु होते ही वही हुआ जिसकी आशंका थी। उसके पुत्र सिंहासन के लिए युद्ध में उतर आए।
इस गृहयुद्ध में विजयी होकर शहज़ादा मुअज्ज़म “बहादुर शाह” के नाम से सम्राट बना। उसकी आयु लगभग 63 वर्ष थी। वह अनुभवी प्रशासक था, और अपने पिता की तुलना में कुछ मामलों में अधिक समझौतावादी दृष्टि रखता था। लेकिन उसे ऐसा साम्राज्य मिला जिसकी समस्याएँ उसके पांच वर्ष के शासन से कहीं बड़ी थीं।
कैम्ब्रिज के मुगल इतिहास में 1707 के बाद की अवधि को केंद्रीय मुगल शक्ति के तीव्र विघटन की शुरुआत माना गया है। औरंगज़ेब की मृत्यु के तुरंत बाद उत्तराधिकार युद्ध शुरू हुआ और अगले लगभग तेरह वर्षों में साम्राज्य की केंद्रीकृत संरचना इतनी कमजोर हुई कि 1720 तक उसका पुराना स्वरूप पुनः स्थापित नहीं हो सका।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
बहादुर शाह प्रथम का मूल नाम मुहम्मद मुअज्ज़म था।
उसका जन्म 14 अक्टूबर 1643 को बुरहानपुर में हुआ।
वह औरंगज़ेब का पुत्र था।
उसकी माता नवाब बाई थीं।
शहज़ादा मुअज्ज़म को लंबे समय तक प्रशासन और सैनिक अभियानों का अनुभव मिला।
वह विभिन्न अवसरों पर आगरा, काबुल, पंजाब और अन्य क्षेत्रों से जुड़ी जिम्मेदारियों पर रहा।
औरंगज़ेब अपने पुत्रों पर आसानी से विश्वास नहीं करता था।
उसे अपने स्वयं के उत्तराधिकार युद्ध का अनुभव था, इसलिए वह जानता था कि शक्तिशाली पुत्र कभी भी सिंहासन के दावेदार बन सकते हैं।
मुअज्ज़म भी एक समय पिता के संदेह में आया और उसे निगरानी तथा राजनीतिक नियंत्रण का सामना करना पड़ा।
फिर भी शासन के अंतिम वर्षों में वह जीवित पुत्रों में सबसे वरिष्ठ और अनुभवी था।
औरंगज़ेब की मृत्यु और उत्तराधिकार युद्ध
1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के समय उसके तीन प्रमुख जीवित पुत्र थे—
मुअज्ज़म,
मुहम्मद आज़म,
और कामबख्श।
औरंगज़ेब ने अंतिम समय में साम्राज्य को पुत्रों के बीच किसी प्रकार बांटकर युद्ध रोकने की कोशिश की बताई जाती है, लेकिन मुगल राजनीतिक परंपरा में ऐसा विभाजन व्यावहारिक रूप से टिकने वाला नहीं था।
सम्राट की मृत्यु होते ही आज़म शाह ने दक्कन में स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया।
मुअज्ज़म उस समय उत्तर-पश्चिम में था।
उसे औरंगज़ेब की मृत्यु की सूचना मिली और वह तेजी से दक्षिण की ओर बढ़ा।
कैम्ब्रिज के विवरण के अनुसार मुअज्ज़म पहले से संभावित उत्तराधिकार युद्ध की तैयारी कर रहा था और उसने असाधारण गति से आगरा की दिशा में अभियान किया।
आगरा का खजाना
उत्तराधिकार युद्ध में आगरा अत्यंत महत्वपूर्ण था।
यह केवल राजनीतिक केंद्र नहीं था।
वहां शाही खजाना भी था।
मुअज्ज़म के पुत्र अज़ीम-उश-शान ने आगरा किले और खजाने पर अधिकार कर लिया।
आश्चर्यजनक रूप से औरंगज़ेब के लंबे दक्कनी युद्धों के बावजूद शाही खजाना पूरी तरह खाली नहीं था।
कैम्ब्रिज के अध्ययन के अनुसार आगरा में सोने और चांदी के रूप में लगभग 24 करोड़ रुपये मूल्य की संपत्ति मिली—जो उत्तराधिकार युद्ध में मुअज्ज़म को भारी वित्तीय लाभ देने वाली थी।
इससे एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है।
औरंगज़ेब के युद्धों ने साम्राज्य की नियमित वित्तीय व्यवस्था को गंभीर रूप से कमजोर किया था, लेकिन शाही संचित संपत्ति तत्काल समाप्त नहीं हुई थी।
समस्या केवल खजाने में धन की कमी नहीं थी।
समस्या थी—साम्राज्य के विशाल प्रशासन और सेना के लिए नियमित राजस्व जुटाने और उसे प्रभावी रूप से वितरित करने की।
जाजऊ का युद्ध
8 जून 1707 को आगरा के निकट जाजऊ के मैदान में मुअज्ज़म और आज़म शाह की सेनाएँ आमने-सामने हुईं।
यह निर्णायक उत्तराधिकार युद्ध था।
आज़म शाह और उसका पुत्र बिदर बख्त युद्ध में मारे गए।
मुअज्ज़म विजयी हुआ।
उसने “बहादुर शाह” की उपाधि धारण की।
उसे “शाह आलम प्रथम” भी कहा गया।
इसके साथ औरंगज़ेब के बाद मुगल सिंहासन पर उसका अधिकार स्थापित हो गया।
क्या उत्तराधिकार युद्ध समाप्त हो गया?
अभी नहीं।
कामबख्श दक्कन में स्वतंत्र शक्ति बनाए हुए था।
बहादुर शाह को पहले उत्तर भारत में अपनी स्थिति संभालनी थी और फिर दक्कन जाकर अपने दूसरे भाई का सामना करना था।
यानी सत्ता संभालते ही वृद्ध सम्राट को विशाल साम्राज्य में लगातार यात्रा और युद्ध करना पड़ा।
यही उसके पूरे शासन का स्वरूप बन गया।
बहादुर शाह किसी स्थिर राजधानी में बैठकर लंबी प्रशासनिक पुनर्रचना नहीं कर सका।
एक संकट से दूसरे संकट की ओर बढ़ना उसकी नियति बन गई।
औरंगज़ेब की नीति से कितना परिवर्तन?
बहादुर शाह को सामान्यतः अपने पिता की तुलना में कुछ अधिक उदार और समझौतावादी शासक माना जाता है।
उसने राजपूतों से समझौता करने की कोशिश की।
गुरु गोबिंद सिंह से उसके संबंध प्रारंभ में अपेक्षाकृत मैत्रीपूर्ण रहे।
उसने विभिन्न राजनीतिक समूहों को केवल सैन्य दमन से नियंत्रित करने के बजाय बातचीत और पद देकर साथ रखने की कोशिश की।
लेकिन यह समझना जरूरी है कि उसने औरंगज़ेब की पूरी शासन व्यवस्था को पलट नहीं दिया।
मुगल प्रशासन वही रहा।
मनसबदारी और जागीर व्यवस्था जारी रही।
इस्लामी राजसत्ता की मूल संरचना बनी रही।
और जहां उसे राजनीतिक प्रतिरोध मिला, वहां उसने सैन्य शक्ति का इस्तेमाल भी किया।
इसलिए उसे अकबर जैसी नई नीति बनाने वाला सम्राट नहीं, बल्कि संकटग्रस्त साम्राज्य को समझौते और बल—दोनों से संभालने की कोशिश करने वाला शासक कहना अधिक उचित है।
राजपूत प्रश्न
औरंगज़ेब के अंतिम वर्षों में मारवाड़ और मेवाड़ के साथ संबंध गंभीर रूप से बिगड़ गए थे।
महाराजा जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद मारवाड़ के उत्तराधिकार में औरंगज़ेब के हस्तक्षेप ने राठौड़ प्रतिरोध को जन्म दिया था।
दुर्गादास राठौड़ ने अजित सिंह के अधिकार की रक्षा के लिए लंबा संघर्ष किया।
औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद राजपूतों ने अवसर देखा।
मारवाड़ के अजित सिंह और आमेर के जय सिंह द्वितीय जैसे शासक अपनी स्वतंत्र स्थिति मजबूत करना चाहते थे।
बहादुर शाह ने प्रारंभ में उन्हें कठोरता से नियंत्रित करने का प्रयास किया।
लेकिन जल्द ही उसे समझ आया कि एक साथ राजपूत, सिख, मराठा और दक्कनी समस्याओं से लड़ना संभव नहीं है।
अजित सिंह और मारवाड़
महाराजा अजित सिंह ने जोधपुर पर अपना नियंत्रण मजबूत किया।
बहादुर शाह ने प्रारंभ में मारवाड़ पर दबाव डाला।
कुछ समय के लिए मुगल सेना ने क्षेत्र में हस्तक्षेप किया।
लेकिन अंततः राजनीतिक समझौता आवश्यक हुआ।
अजित सिंह को मान्यता और मनसब दिया गया।
यह औरंगज़ेब की तुलना में अधिक व्यावहारिक नीति थी।
बहादुर शाह राजपूतों को पूरी तरह नष्ट करने के बजाय उन्हें फिर मुगल मनसबदारी व्यवस्था में जोड़ना चाहता था।
आमेर का प्रश्न
आमेर में भी उत्तराधिकार और मुगल हस्तक्षेप से तनाव था।
सवाई जय सिंह द्वितीय अपनी स्थिति मजबूत कर रहे थे।
बहादुर शाह ने एक समय आमेर की राजनीति में हस्तक्षेप किया, लेकिन व्यापक राजपूत प्रतिरोध के कारण अंततः समझौता करना पड़ा।
राजपूतों को फिर सम्मानजनक पद और मान्यता देना आवश्यक हुआ।
लेकिन अकबर के समय की तरह विश्वासपूर्ण दीर्घकालीन राजनीतिक साझेदारी तुरंत पुनः स्थापित नहीं हुई।
औरंगज़ेब के अंतिम दशकों की दरार बहुत गहरी थी।
गुरु गोबिंद सिंह से संबंध
बहादुर शाह के शासन का सबसे रोचक प्रारंभिक प्रसंग गुरु गोबिंद सिंह के साथ उसके संबंध हैं।
गुरु गोबिंद सिंह और औरंगज़ेब के बीच अंतिम वर्षों में पत्राचार हुआ था।
गुरु ने प्रसिद्ध “जफरनामा” में औरंगज़ेब और उसके अधिकारियों की नीतियों पर कठोर सवाल उठाए थे।
औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद बहादुर शाह के उत्तराधिकार संघर्ष के दौरान गुरु गोबिंद सिंह और नए सम्राट के बीच संपर्क हुआ।
1707 में दोनों की आगरा क्षेत्र में मुलाकात हुई।
गुरु गोबिंद सिंह कुछ समय तक बहादुर शाह के शाही शिविर के साथ रहे।
सिख स्रोतों में प्रारंभिक संबंध अपेक्षाकृत सम्मानपूर्ण बताए गए हैं।
गुरु गोबिंद सिंह की अपेक्षा
गुरु गोबिंद सिंह की प्रमुख शिकायतों में पंजाब के मुगल अधिकारियों का व्यवहार शामिल था।
विशेषकर सरहिंद के वजीर खान की भूमिका अत्यंत विवादास्पद थी।
गुरु के छोटे पुत्र जोरावर सिंह और फतेह सिंह की मृत्यु सरहिंद की सत्ता से जुड़ी थी।
गुरु चाहते थे कि इस अन्याय पर कार्रवाई हो।
बहादुर शाह ने तत्काल निर्णायक कदम नहीं उठाया।
राजनीतिक परिस्थितियों ने भी उसके निर्णयों को प्रभावित किया।
कुछ समय बाद दोनों के रास्ते अलग हो गए।
नांदेड़ और गुरु गोबिंद सिंह की मृत्यु
बहादुर शाह दक्कन की ओर बढ़ा और गुरु गोबिंद सिंह भी कुछ समय दक्षिण गए।
1708 में नांदेड़ में गुरु गोबिंद सिंह पर हमला हुआ।
घावों के कारण उनकी मृत्यु हो गई।
उनकी मृत्यु से पहले माधोदास बैरागी को दीक्षा देकर “बंदा सिंह बहादुर” के रूप में पंजाब भेजने की सिख परंपरा अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यहीं से मुगल-सिख संघर्ष का एक नया और अधिक व्यापक सैन्य चरण प्रारंभ हुआ।
बंदा सिंह बहादुर का उदय
1709 से बंदा सिंह बहादुर के नेतृत्व में सिख शक्ति पंजाब में तेजी से उभरी।
उन्होंने स्थानीय मुगल अधिकारियों और उन जमींदारी संरचनाओं को निशाना बनाया जिन्हें सिख समुदाय के उत्पीड़न से जोड़ा जाता था।
समानांतर रूप से ग्रामीण किसानों और निम्न सामाजिक समूहों का समर्थन भी उन्हें मिला।
इस आंदोलन ने केवल धार्मिक विद्रोह का रूप नहीं रखा।
उसमें सामाजिक और राजनीतिक विद्रोह के तत्व भी थे।
समाना की विजय
1709 में बंदा सिंह बहादुर ने समाना पर अधिकार किया।
समाना मुगल प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण केंद्र था।
इसके बाद सिख सेना ने एक के बाद एक क्षेत्रों पर आक्रमण किया।
सढौरा और अन्य स्थानों पर भी मुगल सत्ता को चुनौती मिली।
पंजाब में यह अब स्थानीय अशांति नहीं रही थी।
यह गंभीर क्षेत्रीय विद्रोह बन चुका था।
1710 : सरहिंद का पतन
1710 में बंदा सिंह बहादुर की सेना ने सरहिंद की ओर अभियान किया।
चप्पड़ चिड़ी के युद्ध में सिख सेना ने वजीर खान की सेना को पराजित किया।
वजीर खान मारा गया।
सरहिंद पर सिखों का अधिकार हो गया।
यह मुगल प्रतिष्ठा के लिए बहुत बड़ा आघात था।
सरहिंद दिल्ली और लाहौर के बीच महत्वपूर्ण प्रशासनिक केंद्र था।
अब बहादुर शाह को स्वयं पंजाब की ओर जाना पड़ा।
बंदा सिंह के शासनात्मक प्रयोग
बंदा सिंह बहादुर ने अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में भूमि व्यवस्था में परिवर्तन करने का प्रयास किया।
जमींदारों की शक्ति पर प्रहार और कृषकों को भूमि-अधिकार देने से जुड़ी परंपराएँ सिख इतिहास में विशेष महत्व रखती हैं।
उन्होंने अपने नाम से नहीं बल्कि गुरु नानक और गुरु गोबिंद सिंह की स्मृति से जुड़े सिक्के चलाए।
इससे विद्रोह ने केवल सैन्य संघर्ष के बजाय वैकल्पिक राजनीतिक सत्ता का स्वरूप लेना शुरू किया।
यही कारण था कि मुगल शासन इसे साधारण विद्रोह मानकर नहीं छोड़ सकता था।
बहादुर शाह का पंजाब अभियान
1710 में बहादुर शाह विशाल शाही सेना के साथ उत्तर की ओर बढ़ा।
मुगल सेना ने कई क्षेत्रों पर फिर अधिकार किया।
बंदा सिंह बहादुर पहाड़ी क्षेत्रों और किलों की ओर हटे।
लोहगढ़ उनका महत्वपूर्ण केंद्र था।
मुगल सेना ने लोहगढ़ पर दबाव बनाया।
लेकिन बंदा सिंह पकड़ में नहीं आए।
इस प्रकार बहादुर शाह कुछ क्षेत्र वापस लेने में सफल हुआ, लेकिन सिख विद्रोह समाप्त नहीं कर सका।
उसकी मृत्यु के बाद संघर्ष फिर तेज हुआ।
सिख नीति में परिवर्तन
बहादुर शाह और गुरु गोबिंद सिंह के प्रारंभिक सम्मानपूर्ण संबंधों और बाद में बंदा सिंह बहादुर के विरुद्ध कठोर सैन्य अभियान के बीच बड़ा परिवर्तन दिखाई देता है।
यह परिवर्तन बताता है कि मुगल राज्य की प्राथमिकता अंततः राजनीतिक नियंत्रण थी।
जब तक धार्मिक-सामुदायिक नेतृत्व साम्राज्य के भीतर समझौते की स्थिति में था, संवाद संभव था।
लेकिन जैसे ही स्वतंत्र क्षेत्रीय सत्ता का निर्माण शुरू हुआ, मुगल शासन सैन्य दमन की ओर गया।
यही पैटर्न अन्य क्षेत्रों में भी दिखाई देता है।
कामबख्श का विद्रोह
बहादुर शाह के छोटे भाई कामबख्श ने दक्कन में स्वतंत्र सत्ता स्थापित करने की कोशिश की।
वह हैदराबाद और बीजापुर क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा था।
बहादुर शाह यह जोखिम नहीं ले सकता था कि मुगल राजवंश का एक दूसरा केंद्र दक्षिण में स्वतंत्र बादशाहत बना ले।
इसलिए वह दक्कन की ओर गया।
1709 : कामबख्श से युद्ध
1709 में हैदराबाद के निकट बहादुर शाह और कामबख्श की सेनाओं के बीच संघर्ष हुआ।
कामबख्श पराजित हुआ और गंभीर रूप से घायल हुआ।
कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो गई।
इसके साथ औरंगज़ेब के पुत्रों के बीच उत्तराधिकार संघर्ष का अंतिम बड़ा अध्याय समाप्त हुआ।
बहादुर शाह अब निर्विवाद मुगल सम्राट था।
लेकिन विडंबना यह थी कि भाइयों से संघर्ष समाप्त होते-होते क्षेत्रीय शक्तियाँ और मजबूत हो चुकी थीं।
मराठा समस्या
औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मराठा राजनीति भी नए दौर में प्रवेश कर गई।
राजाराम की विधवा ताराबाई अपने पुत्र शिवाजी द्वितीय की ओर से मराठा प्रतिरोध चला रही थीं।
दूसरी ओर संभाजी का पुत्र शाहू वर्षों से मुगल बंदी था।
बहादुर शाह की सत्ता के प्रारंभिक समय में शाहू को रिहा किया गया।
यह निर्णय मराठा राजनीति पर अत्यंत दूरगामी प्रभाव डालने वाला था।
शाहू की रिहाई
शाहू के मुक्त होने से मराठा सत्ता में उत्तराधिकार संघर्ष खड़ा हो गया।
एक ओर ताराबाई थीं।
दूसरी ओर शाहू ने स्वयं को छत्रपति घोषित करने का दावा किया।
मुगल सत्ता के लिए यह विभाजन लाभकारी हो सकता था।
एक संगठित मराठा शक्ति के बजाय दो प्रतिद्वंद्वी गुट पैदा हो गए।
1707 के खेड़ के युद्ध के बाद शाहू की स्थिति मजबूत हुई।
लेकिन इसका एक अप्रत्याशित परिणाम भी हुआ—
शाहू के शासन में पेशवाओं का प्रभाव बढ़ा और आगे मराठा शक्ति कहीं अधिक संगठित होकर उत्तर भारत की ओर फैलने लगी।
मराठों से निर्णायक समाधान क्यों नहीं?
बहादुर शाह मराठों के साथ एक स्थायी राजनीतिक समझौता नहीं कर सका।
चौथ और सरदेशमुखी जैसे कर-अधिकारों को लेकर विवाद बने रहे।
मराठा सरदार मुगल क्षेत्रों पर प्रभाव बढ़ाते रहे।
सम्राट को राजपूत और सिख मामलों में भी बार-बार उत्तर जाना पड़ता था।
इसलिए दक्कन में निर्णायक नीति लागू करना कठिन था।
औरंगज़ेब के 26 वर्ष के युद्ध के बाद भी मराठा प्रतिरोध जारी था।
बहादुर शाह के पास केवल पांच वर्ष थे।
मुगल साम्राज्य का वास्तविक संकट
बहादुर शाह के शासन का सबसे बड़ा संकट किसी एक विद्रोह का नहीं था।
समस्या यह थी कि साम्राज्य के अलग-अलग हिस्सों में एक साथ कई शक्तियाँ स्वायत्त हो रही थीं।
राजपूत अपने पुराने अधिकार वापस चाहते थे।
मराठे स्वतंत्र साम्राज्य बना रहे थे।
सिख पंजाब में सैन्य सत्ता खड़ी कर रहे थे।
जाट उत्तर भारत में संगठित हो रहे थे।
दक्कन में स्थानीय शक्ति-संतुलन बदल रहा था।
प्रांतीय अधिकारी केंद्र से अधिक स्वतंत्र होने लगे थे।
इसलिए सम्राट जहां एक संकट दबाता, दूसरा उठ खड़ा होता।
जाट शक्ति
औरंगज़ेब के समय जाट विद्रोह शुरू हो चुके थे।
बहादुर शाह के समय भी जाट प्रभाव बना रहा।
चूड़ामन जाट धीरे-धीरे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय नेता बन रहा था।
मथुरा, भरतपुर और आगरा के आसपास का क्षेत्र आगे जाट शक्ति के स्वतंत्र केंद्र में बदलने वाला था।
बहादुर शाह जाटों को स्थायी रूप से नियंत्रित नहीं कर सका।
18वीं शताब्दी में भरतपुर राज्य का उदय इस प्रक्रिया का परिणाम बना।
मनसबदारी और जागीर संकट
औरंगज़ेब के अंतिम दशकों में मनसबदारों की संख्या बहुत बढ़ गई थी।
उन्हें आय देने के लिए पर्याप्त लाभकारी जागीरें उपलब्ध कराना कठिन हो रहा था।
बहादुर शाह को सिंहासन प्राप्त करने के लिए बड़ी संख्या में अमीरों को पुरस्कार और उच्च पद देने पड़े।
इससे दबाव और बढ़ा।
उत्तराधिकार युद्धों में राजकुमार सरदारों को अपने पक्ष में करने के लिए मनसब और जागीरों का वादा करते थे।
विजय के बाद इन वादों को पूरा करना पड़ता था।
इससे राज्य की वित्तीय-प्रशासनिक प्रणाली पर अतिरिक्त बोझ पड़ा।
शाही खजाना और वास्तविक राजस्व संकट
जाजऊ की विजय के बाद बहादुर शाह को आगरा का विशाल संचित खजाना मिला था।
इसलिए उसके शासन को तत्काल “खाली खजाने” का युग कहना गलत होगा।
कैम्ब्रिज के स्रोत बताते हैं कि 1707 में शाही खजाने में भारी संपदा मौजूद थी।
लेकिन संचित खजाना और मजबूत राजस्व व्यवस्था एक बात नहीं हैं।
युद्ध,
अधिकारी,
मनसब,
जागीर,
सेना,
और लगातार अभियानों के लिए नियमित आय चाहिए।
यही तंत्र कमजोर हो रहा था।
साम्राज्य में सम्राट की लगातार यात्रा
बहादुर शाह का अधिकांश शासन यात्रा और युद्ध में गुजरा।
उत्तराधिकार युद्ध के बाद राजस्थान।
फिर दक्कन।
फिर पंजाब।
फिर सिख अभियान।
इस कारण वह दिल्ली में स्थायी दरबार बनाकर दीर्घकालीन प्रशासनिक सुधार नहीं कर सका।
कैम्ब्रिज के स्थापत्य इतिहास में भी उल्लेख है कि राजनीतिक अशांति के कारण उसके शासन में दिल्ली लंबे समय तक स्थायी शाही निवास नहीं बन सकी; 1712 के आसपास ही दिल्ली फिर स्पष्ट रूप से शाही निवास का केंद्र बनी।
धार्मिक नीति
बहादुर शाह की धार्मिक नीति औरंगज़ेब की तुलना में अपेक्षाकृत नरम मानी जाती है।
उसने हिंदू राजाओं से समझौते किए।
गुरु गोबिंद सिंह से व्यक्तिगत संबंध स्थापित किए।
शिया और सुन्नी धार्मिक प्रश्नों को लेकर भी उसके अपने झुकाव की चर्चा मिलती है।
लेकिन उसने जजिया को स्पष्ट रूप से अकबर की तरह समाप्त कर एक नई वैचारिक नीति घोषित नहीं की।
इसलिए उसे धार्मिक नीति में निर्णायक परिवर्तनकारी सम्राट कहना उचित नहीं।
वह राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार अधिक व्यावहारिक था।
क्या उसने औरंगज़ेब की गलतियों को सुधार दिया?
पूरी तरह नहीं।
वह कुछ संबंध सुधारना चाहता था, लेकिन उसके पास समय और राजनीतिक स्थिरता दोनों की कमी थी।
राजपूतों से समझौते हुए, लेकिन पुराना विश्वास पूरी तरह वापस नहीं आया।
गुरु गोबिंद सिंह से संबंध बने, लेकिन बाद में सिखों से व्यापक युद्ध करना पड़ा।
मराठों में विभाजन का लाभ लेने की कोशिश हुई, लेकिन मराठा शक्ति समाप्त नहीं हुई।
इसलिए बहादुर शाह की नीति कई स्थानों पर “समस्या टालने” में सफल रही, “समस्या समाप्त करने” में नहीं।
बहादुर शाह का व्यक्तित्व
समकालीन और बाद के विवरण उसे पिता की तुलना में नरम और वृद्ध अनुभवशील शासक के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
वह औरंगज़ेब जैसी कठोर व्यक्तिगत केंद्रीयता नहीं रखता था।
लेकिन उसकी उदारता कई बार अनिर्णय जैसी भी दिखाई दी।
उसे विभिन्न विरोधी समूहों से समझौते करने पड़े।
इसी कारण कुछ इतिहासकार उसके शासन को “समझौते की राजनीति” का समय मानते हैं।
समस्या यह थी कि 18वीं शताब्दी की शुरुआत का मुगल संकट केवल व्यक्तित्व बदलने से हल होने वाला नहीं था।
राज्य की संरचना में ही संकट प्रवेश कर चुका था।
केंद्रीय सत्ता का क्षरण
बहादुर शाह के समय तक प्रांतीय अधिकारी समझने लगे थे कि दिल्ली की केंद्रीय शक्ति पहले जैसी नहीं रही।
बंगाल,
अवध,
दक्कन,
और अन्य प्रांतों में शक्तिशाली अधिकारी धीरे-धीरे अपने स्वतंत्र प्रशासनिक आधार बना रहे थे।
यह प्रक्रिया उसके शासन में पूरी तरह स्वतंत्र राज्यों में नहीं बदली, लेकिन दिशा स्पष्ट थी।
आगे कुछ ही दशकों में बंगाल, अवध और हैदराबाद लगभग स्वतंत्र उत्तराधिकारी राज्यों में बदल जाएंगे।
कैम्ब्रिज के अनुसार औरंगज़ेब के बाद मुगल सत्ता के कमजोर होते ही अवध, बंगाल और हैदराबाद जैसे उत्तराधिकारी राज्य और सिख, जाट तथा मराठा क्षेत्रीय शक्तियाँ क्रमशः उभरने लगीं।
वृद्ध सम्राट और बढ़ता संकट
बहादुर शाह जब सिंहासन पर बैठा तब युवा विजेता नहीं था।
वह 60 वर्ष से अधिक आयु का था।
उसे शासन के लगभग पूरे पांच वर्ष घोड़े और शिविर में बिताने पड़े।
राजस्थान से दक्कन,
दक्कन से पंजाब,
और पंजाब में सिख विद्रोह—
वह लगातार संकटों से घिरा रहा।
ऐसे में साम्राज्य को नए संस्थागत ढांचे में पुनर्गठित करने का अवसर नहीं मिला।
लाहौर में अंतिम समय
1711–1712 में बहादुर शाह पंजाब की राजनीति और सिख विद्रोह से जुड़ी समस्याओं के कारण लाहौर क्षेत्र में था।
उसका स्वास्थ्य गिरने लगा।
27 फरवरी 1712 को लाहौर में उसकी मृत्यु हो गई।
उसकी आयु लगभग 68 वर्ष थी।
उसने केवल लगभग पांच वर्ष शासन किया।
मृत्यु के बाद फिर वही संकट
बहादुर शाह की मृत्यु होते ही उसके पुत्रों में उत्तराधिकार युद्ध छिड़ गया।
उसके चार प्रमुख पुत्र—
जहांदार शाह,
अज़ीम-उश-शान,
रफी-उश-शान,
और जहान शाह—
सिंहासन के लिए भिड़ गए।
यह युद्ध मुगल सत्ता के तेजी से पतन की अगली सीढ़ी बना।
बहादुर शाह अपने पिता औरंगज़ेब की तरह इस समस्या का समाधान नहीं कर पाया था।
एक बार फिर विशाल साम्राज्य की सेना अपने ही राजकुमारों के बीच लड़ रही थी।
1707–1712 : प्रमुख समयरेखा
3 मार्च 1707 — औरंगज़ेब की मृत्यु; उत्तराधिकार संघर्ष प्रारंभ।
1707 — आज़म शाह ने दक्कन में सिंहासन का दावा किया।
8 जून 1707 — जाजऊ का युद्ध; आज़म शाह पराजित और मारा गया; मुअज्ज़म की निर्णायक विजय।
1707 — मुअज्ज़म ने बहादुर शाह/शाह आलम प्रथम की उपाधि ग्रहण की।
1707 — गुरु गोबिंद सिंह और बहादुर शाह के बीच संपर्क तथा मुलाकात।
1707–1708 — राजस्थान में मारवाड़ और आमेर से संबंधित संघर्ष और समझौते।
1708 — गुरु गोबिंद सिंह की नांदेड़ में मृत्यु।
1708–1709 — बहादुर शाह का दक्कन अभियान।
1709 — कामबख्श पराजित; उसकी मृत्यु; औरंगज़ेब के पुत्रों के बीच सत्ता संघर्ष समाप्त।
1709 — बंदा सिंह बहादुर के नेतृत्व में पंजाब में सिख अभियान तेज।
1709 — समाना पर सिख विजय।
1710 — चप्पड़ चिड़ी का युद्ध; वजीर खान मारा गया; सरहिंद पर सिख अधिकार।
1710–1711 — बहादुर शाह का पंजाब अभियान; लोहगढ़ सहित सिख केंद्रों पर मुगल कार्रवाई।
1711 — सिख प्रतिरोध जारी; बंदा सिंह बहादुर गिरफ्त से बाहर।
27 फरवरी 1712 — लाहौर में बहादुर शाह की मृत्यु।
1712 — उसके पुत्रों के बीच नया उत्तराधिकार युद्ध।
बहादुर शाह की प्रमुख उपलब्धियाँ
उसने औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य को तुरंत टूटने से कुछ समय के लिए बचाया।
जाजऊ में उत्तराधिकार युद्ध जीतकर केंद्रीय सत्ता स्थापित की।
कामबख्श की स्वतंत्र दक्कनी सत्ता की कोशिश समाप्त की।
राजपूतों के साथ औरंगज़ेब काल के टकराव को कुछ हद तक समझौते की ओर ले गया।
गुरु गोबिंद सिंह के साथ प्रारंभिक संवाद स्थापित किया।
पंजाब में बंदा सिंह बहादुर की तेजी से बढ़ती शक्ति के विरुद्ध स्वयं अभियान चलाया।
विशाल साम्राज्य में बादशाह की प्रतिष्ठा कुछ समय तक बनाए रखी।
उसकी प्रमुख सीमाएँ
उसके पास केवल पांच वर्ष थे।
मराठा समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ।
राजपूत संबंध पूरी तरह सामान्य नहीं हुए।
बंदा सिंह बहादुर का विद्रोह समाप्त नहीं हुआ।
जाट शक्ति बढ़ती रही।
जागीर और मनसब संकट गहराता रहा।
प्रांतीय स्वायत्तता बढ़ती रही।
उत्तराधिकार का नियम फिर स्थापित नहीं हुआ।
और उसकी मृत्यु के तुरंत बाद साम्राज्य फिर गृहयुद्ध में उतर गया।
क्या बहादुर शाह पतन रोक सकता था?
यह अनुमान का प्रश्न है, लेकिन उपलब्ध परिस्थितियों से इतना कहा जा सकता है कि उसका कार्य अत्यंत कठिन था।
औरंगज़ेब ने उसे स्थिर अकबरी साम्राज्य नहीं छोड़ा था।
उसे एक ऐसा विशाल राज्य मिला था जो लगातार 26 वर्ष के दक्कनी युद्ध से थका था।
अनेक क्षेत्रीय शक्तियाँ स्वतंत्रता की ओर बढ़ चुकी थीं।
राजस्व और जागीर तंत्र तनाव में था।
सम्राट की आयु अधिक थी।
और शासन के पहले दिन से उसे युद्ध लड़ना पड़ा।
इसलिए केवल बहादुर शाह के व्यक्तिगत गुणों से इस पतन को रोकना संभव नहीं था।
फिर भी उसके पास एक दीर्घ शासनकाल होता तो राजपूतों और अन्य शक्तियों से समझौते के माध्यम से कुछ स्थिरता संभव हो सकती थी।
लेकिन इतिहास ने उसे वह समय नहीं दिया।
औरंगज़ेब और बहादुर शाह में अंतर
औरंगज़ेब की राजनीति अधिक केंद्रीकृत, सैन्य और धार्मिक रूप से कठोर थी।
बहादुर शाह अधिक समझौतावादी था।
औरंगज़ेब ने राजपूतों और मराठों को सैन्य रूप से दबाने की कोशिश की।
बहादुर शाह ने कई स्थानों पर बातचीत और पद देकर संबंध सुधारने की कोशिश की।
औरंगज़ेब लगभग आधी शताब्दी शासन करता रहा।
बहादुर शाह को केवल पांच वर्ष मिले।
औरंगज़ेब के शासन में सम्राट की व्यक्तिगत सत्ता अत्यंत मजबूत थी।
बहादुर शाह के समय बादशाह अब भी शक्तिशाली था, लेकिन केंद्रीय संरचना की पकड़ ढीली होने लगी थी।
ऐतिहासिक महत्व
बहादुर शाह प्रथम को अक्सर मुगल इतिहास में बहुत कम स्थान मिलता है।
वह औरंगज़ेब और 18वीं शताब्दी के कमजोर बादशाहों के बीच एक छोटा अध्याय दिखाई देता है।
लेकिन वास्तव में उसका शासन एक महत्वपूर्ण सीमा-रेखा है।
1707 से पहले मुगल साम्राज्य का प्रश्न था—
साम्राज्य कितना और फैल सकता है?
1707 के बाद प्रश्न बदल गया—
साम्राज्य को टूटने से कितने समय तक बचाया जा सकता है?
यही बदलाव बहादुर शाह के शासन की वास्तविक ऐतिहासिक महत्ता है।
निष्कर्ष
बहादुर शाह प्रथम को एक टूटते हुए साम्राज्य का पहला उत्तराधिकारी कहा जा सकता है।
उसने औरंगज़ेब से भारत के इतिहास का सबसे विशाल मुगल साम्राज्य प्राप्त किया, लेकिन वह साम्राज्य भीतर से गहरी थकान का शिकार था।
बहादुर शाह ने युद्ध के बजाय जहां संभव हुआ समझौते का रास्ता अपनाने की कोशिश की।
राजपूतों से संबंध सुधारने का प्रयास किया।
गुरु गोबिंद सिंह से संवाद किया।
मराठों के भीतर विभाजन का उपयोग किया।
कामबख्श की चुनौती समाप्त की।
बंदा सिंह बहादुर के विद्रोह को रोकने के लिए स्वयं पंजाब गया।
लेकिन हर सफलता अस्थायी साबित हुई।
राजपूत शक्ति बनी रही।
मराठे और मजबूत हुए।
सिख प्रतिरोध जारी रहा।
जाट उभरते रहे।
और प्रांतीय कुलीन धीरे-धीरे यह सीख रहे थे कि कमजोर होती दिल्ली से दूर रहकर भी शासन किया जा सकता है।
सबसे बड़ी समस्या फिर वही रही—
मुगल बादशाह ने उत्तराधिकार की स्थायी व्यवस्था नहीं बनाई।
1712 में बहादुर शाह की मृत्यु के साथ उसके पुत्र आपस में युद्ध करने लगे।
राज्य की सेना विदेशी शत्रु से लड़ने के बजाय फिर राजवंशीय गृहयुद्ध में फंस गई।
इसलिए उसके शासन का निष्कर्ष यह नहीं कि उसने मुगल पतन शुरू किया।
पतन की प्रक्रियाएँ उससे पहले शुरू हो चुकी थीं।
उसकी वास्तविक त्रासदी यह थी कि वह उन्हें रोक नहीं सका।
औरंगज़ेब की मृत्यु के समय मुगल साम्राज्य विशाल था लेकिन थका हुआ था।
बहादुर शाह की मृत्यु के समय वह अभी भी विशाल था—
लेकिन अब उसकी केंद्रीय सत्ता पर विश्वास भी कमजोर पड़ने लगा था।
यहीं से मुगल इतिहास का पतन कहीं अधिक तेजी से आगे बढ़ता है।
अगला चरण होगा—
जहांदार शाह — 1712–1713 : केवल ग्यारह महीनों का शासन, जुल्फिकार खान का प्रभाव और मुगल बादशाहत की तेजी से गिरती प्रतिष्ठा।