औरंगज़ेब — 1658–1707
साम्राज्य का चरम विस्तार, धार्मिक कठोरता और दीर्घ पतन की नींव
1658 में औरंगज़ेब आलमगीर ने अपने पिता शाहजहाँ को सत्ता से अलग कर मुगल सिंहासन पर अधिकार किया। उसका शासन लगभग आधी शताब्दी चला और 1707 में उसकी मृत्यु तक मुगल साम्राज्य भौगोलिक दृष्टि से अपने सबसे बड़े विस्तार पर पहुँच गया। लेकिन यही काल साम्राज्य की गहरी संरचनात्मक कमजोरियों, धार्मिक तनावों, राजपूत संबंधों में खिंचाव, सिख प्रतिरोध, मराठा संघर्ष, दक्कन के अंतहीन युद्धों और वित्तीय संकट का भी काल बना।
औरंगज़ेब का ऐतिहासिक मूल्यांकन अत्यंत विवादास्पद रहा है। एक पक्ष उसे कठोर, धार्मिक रूप से रूढ़िवादी और हिंदू धार्मिक संस्थानों पर आघात करने वाला शासक मानता है। दूसरा पक्ष उसके प्रशासनिक कौशल, विशाल साम्राज्य, हिंदू मनसबदारों की निरंतर उपस्थिति और कुछ मंदिरों व धार्मिक संस्थानों को दिए गए संरक्षण के उदाहरणों की ओर ध्यान दिलाता है। सही ऐतिहासिक पद्धति इन दोनों प्रकार के प्रमाणों को साथ रखती है। यह निर्विवाद है कि उसने जजिया फिर लगाया, कुछ प्रमुख मंदिरों को ध्वस्त करने के आदेश दिए और शासन को अकबर की तुलना में अधिक स्पष्ट सुन्नी इस्लामी दिशा दी। साथ ही यह भी तथ्य है कि उसका शासन केवल धार्मिक आदेशों पर नहीं चलता था; राजस्व, सामरिक नियंत्रण, विद्रोह, स्थानीय राजनीति और साम्राज्यवादी हित अनेक निर्णयों के पीछे साथ-साथ काम करते थे।
उसकी सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि जिस सम्राट ने साम्राज्य का नक्शा सबसे अधिक बढ़ाया, उसी के लंबे युद्धों ने केंद्रीय सत्ता की आर्थिक और प्रशासनिक शक्ति को सबसे अधिक थका दिया। कैम्ब्रिज के मुगल इतिहास के अध्ययन में औरंगज़ेब के दक्कनी युद्धों को एक ऐसी अंतहीन प्रक्रिया के रूप में वर्णित किया गया है जिसमें सार्वजनिक व्यवस्था और शाही शक्ति लगातार गिरती चली गई।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
औरंगज़ेब का जन्म 3 नवंबर 1618 को दाहोद में हुआ। उसका पूरा नाम मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगज़ेब था।
वह शाहजहाँ और मुमताज महल का पुत्र था।
उसके भाइयों में दारा शिकोह, शाह शुजा और मुराद बख्श प्रमुख थे।
बहनों में जहांआरा और रोशनआरा मुगल राजनीति में अत्यंत प्रभावशाली थीं।
औरंगज़ेब को कम उम्र से ही सैन्य और प्रशासनिक दायित्व मिले। उसने गुजरात, दक्कन और अन्य क्षेत्रों में सूबेदारी की। उसे दक्कन की राजनीति, राजस्व, युद्ध और स्थानीय शक्तियों का प्रत्यक्ष अनुभव मिला।
इसी दौरान उसके व्यक्तित्व की दो विशेषताएँ स्पष्ट हो गईं—
गहरी व्यक्तिगत धार्मिकता,
और सत्ता के मामलों में अत्यंत व्यावहारिक तथा कठोर राजनीतिक दृष्टि।
दारा शिकोह से मूल अंतर
शाहजहाँ के पुत्रों में दारा शिकोह और औरंगज़ेब सबसे अधिक चर्चा में रहे।
दारा शिकोह सूफी विचार, उपनिषद और हिंदू दर्शन में गहरी रुचि रखता था।
औरंगज़ेब अधिक परंपरागत सुन्नी इस्लामी दृष्टि का अनुयायी था।
लेकिन 1657–1659 का उत्तराधिकार युद्ध केवल धार्मिक संघर्ष नहीं था।
वह सिंहासन का युद्ध था।
औरंगज़ेब के पक्ष में हिंदू राजपूत और अन्य गैर-मुस्लिम सरदार भी थे, जबकि दारा के पक्ष में मुस्लिम सेनापति भी थे।
इसलिए युद्ध को केवल “कट्टर मुसलमान बनाम उदारवादी” संघर्ष कहना अधूरा है।
धार्मिक विचारों का अंतर वास्तविक था, लेकिन सत्ता की प्रतिस्पर्धा उसका मुख्य राजनीतिक आधार थी।
1657 : शाहजहाँ की बीमारी
सितंबर 1657 में शाहजहाँ गंभीर रूप से बीमार पड़ा।
दारा शिकोह उसके निकट था और दरबार में प्रभावी उत्तराधिकारी जैसा व्यवहार कर रहा था।
अन्य भाइयों को आशंका हुई कि दारा सत्ता पर पूर्ण अधिकार कर लेगा।
शाह शुजा ने बंगाल में बादशाहत का दावा किया।
मुराद ने गुजरात में स्वयं को सम्राट घोषित किया।
औरंगज़ेब ने मुराद से अस्थायी गठबंधन किया।
वह जानता था कि पहले दारा को हराना जरूरी है।
धर्मत का युद्ध
15 अप्रैल 1658 को धर्मत में औरंगज़ेब-मुराद की सेना का सामना महाराजा जसवंत सिंह की नेतृत्व वाली शाही सेना से हुआ।
जसवंत सिंह दारा और शाहजहाँ की ओर से युद्ध कर रहे थे।
औरंगज़ेब की सेना ने विजय प्राप्त की।
इस युद्ध ने उत्तर की ओर उसका रास्ता खोल दिया।
सामूगढ़ का युद्ध
29 मई 1658 को आगरा के निकट सामूगढ़ में दारा और औरंगज़ेब-मुराद की सेनाएँ आमने-सामने हुईं।
दारा की सेना संख्या में बड़ी थी, लेकिन औरंगज़ेब अधिक अनुभवी सेनानायक था।
दारा पराजित हुआ।
वह पश्चिम और उत्तर-पश्चिम की ओर भाग गया।
औरंगज़ेब ने आगरा की ओर बढ़कर निर्णायक राजनीतिक नियंत्रण स्थापित किया।
शाहजहाँ की नजरबंदी
औरंगज़ेब ने आगरा किले का नियंत्रण अपने हाथ में लिया।
शाहजहाँ बीमारी से उबर चुका था, लेकिन अब उसकी सेना और प्रशासन पर अधिकार नहीं रहा।
उसे आगरा किले में शाही आवास के भीतर नजरबंद कर दिया गया।
वह 1666 में मृत्यु तक वहीं रहा।
उसकी पुत्री जहांआरा उसके साथ रही।
यह घटना मुगल राजवंशीय राजनीति की सबसे कठोर विडंबनाओं में थी—सम्राट का पुत्र स्वयं पिता की सत्ता समाप्त कर चुका था।
मुराद का अंत
मुराद ने दारा के विरुद्ध औरंगज़ेब का साथ दिया था।
लेकिन विजय के बाद वह स्वयं सिंहासन का दावेदार था।
औरंगज़ेब ने उसे गिरफ्तार करा दिया।
बाद में पुराने हत्या मामले में मुकदमा चलाकर उसे मृत्युदंड दिया गया।
इस प्रकार सहयोगी राजकुमार भी सत्ता सुरक्षित होते ही प्रतिद्वंद्वी में बदल गया।
शुजा का अंत
शाह शुजा ने बंगाल से सिंहासन का दावा किया।
1659 में खाजवा के युद्ध में औरंगज़ेब की सेना ने उसे पराजित किया।
शुजा पूर्व की ओर भागा और अंततः अराकान पहुँचा।
वह वहाँ रहस्यमय और हिंसक परिस्थितियों में समाप्त हुआ।
दारा शिकोह की गिरफ्तारी और हत्या
दारा ने पराजय के बाद पंजाब, सिंध और गुजरात में समर्थन जुटाने की कोशिश की।
अंततः उसे पकड़ लिया गया।
उसे दिल्ली लाकर अपमानजनक रूप से सार्वजनिक रूप से घुमाया गया।
उसके खिलाफ विद्रोह और धार्मिक विचलन से संबंधित आरोप लगाए गए।
1659 में उसकी हत्या कर दी गई।
औरंगज़ेब के सिंहासन के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी का अंत हो गया।
राज्यारोहण
औरंगज़ेब ने 1658 में सत्ता ग्रहण की, लेकिन उत्तराधिकार संघर्ष पूरी तरह समाप्त होने के बाद उसने अधिक औपचारिक राज्याभिषेक भी कराया।
उसने “आलमगीर” की उपाधि धारण की—अर्थात विश्व को अपने अधीन करने वाला।
वह लगभग 49 वर्ष शासन करने वाला था।
मुगल इतिहास में केवल अकबर का शासन ही उसके करीब लंबा था।
शासन की प्रारंभिक दिशा
शासन के प्रारंभिक वर्षों में औरंगज़ेब ने प्रशासनिक व्यवस्था को बड़े पैमाने पर अकबर-जहांगीर-शाहजहाँ से प्राप्त स्वरूप में जारी रखा।
मनसबदारी बनी रही।
जागीर व्यवस्था बनी रही।
हिंदू अधिकारी उच्च पदों पर बने रहे।
राजपूत साम्राज्य की सेना में महत्वपूर्ण थे।
भूमि-राजस्व प्रणाली जारी रही।
इसलिए 1658 में कोई अचानक पूर्ण प्रशासनिक क्रांति नहीं हुई।
परिवर्तन धीरे-धीरे धार्मिक नीति, दरबारी संस्कृति और विभिन्न समुदायों के साथ राज्य के संबंधों में अधिक स्पष्ट हुआ।
व्यक्तिगत धार्मिकता
औरंगज़ेब अत्यंत धार्मिक व्यक्ति था।
वह नियमित नमाज, रोज़ा और इस्लामी आचरण पर जोर देता था।
उसने कुरान की प्रतिलिपियाँ स्वयं लिखने और टोपी सिलने की बात अपने निजी जीवन की सादगी से जोड़कर प्रस्तुत की।
हालांकि एक विशाल साम्राज्य का सम्राट होने के कारण उसका वास्तविक दरबार और प्रशासन निश्चित रूप से अत्यंत विस्तृत था।
उसकी निजी सादगी और साम्राज्य की विशाल राजस्व व्यवस्था को अलग-अलग समझना चाहिए।
दरबार में परिवर्तन
औरंगज़ेब ने शाहजहाँ काल के कुछ अत्यधिक शाही समारोहों को सीमित किया।
उसने कुछ दरबारी प्रथाओं को इस्लामी दृष्टि से अनुचित मानकर समाप्त या कम किया।
संगीत के शाही संरक्षण में भी कमी आई।
लोकप्रिय कथा है कि संगीतकारों ने “संगीत की अर्थी” निकालकर विरोध किया और औरंगज़ेब ने उसे गहरा दफनाने को कहा।
इस कथा के ऐतिहासिक स्वरूप पर संदेह है।
संगीत पूरी तरह भारत या मुगल अभिजात समाज से गायब नहीं हुआ। दरबारी संरक्षण का स्वरूप बदला और अनेक कलाकार क्षेत्रीय दरबारों की ओर चले गए।
फतावा-ए-आलमगीरी
औरंगज़ेब के आदेश पर इस्लामी कानून का विशाल संकलन तैयार कराया गया जिसे “फतावा-ए-आलमगीरी” या “फतावा-ए-हिंदिया” कहा जाता है।
विभिन्न विद्वानों ने हनफी इस्लामी विधि के आधार पर इसे तैयार किया।
इसका उद्देश्य न्यायिक और धार्मिक मामलों के लिए व्यवस्थित संदर्भ उपलब्ध कराना था।
यह उसकी शासन-दृष्टि में इस्लामी विधि के बढ़ते महत्व का स्पष्ट प्रमाण है।
जजिया की पुनर्स्थापना
1679 में औरंगज़ेब ने जजिया कर फिर लागू किया।
अकबर ने 1564 में इसे समाप्त कर दिया था।
जहांगीर और शाहजहाँ ने भी इसे व्यापक रूप से पुनः लागू नहीं किया था।
इसलिए औरंगज़ेब का निर्णय राजनीतिक और धार्मिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण था।
जजिया गैर-मुस्लिम प्रजा पर विशेष कर था।
इसे फिर लागू करने से हिंदू समाज के विभिन्न वर्गों में असंतोष हुआ।
दिल्ली में विरोध के उल्लेख भी मिलते हैं।
यह कदम अकबर की सुलह-ए-कुल आधारित समावेशी दिशा से स्पष्ट विचलन का प्रतीक बन गया।
क्या सभी हिंदुओं पर समान रूप से जजिया लगा?
नहीं।
मध्यकालीन कर व्यवस्था में आय, सामाजिक स्थिति और कुछ छूटों के आधार पर अंतर था।
महिलाएँ, बच्चे, कुछ निर्धन वर्ग और कुछ अन्य श्रेणियाँ छूट पा सकती थीं।
फिर भी राजनीतिक अर्थ स्पष्ट था—
राज्य ने धार्मिक पहचान के आधार पर कर का भेद फिर स्थापित किया।
यही कारण है कि इसका प्रतीकात्मक प्रभाव इसकी राजस्व आय से कहीं बड़ा था।
मंदिर नीति : सबसे विवादास्पद प्रश्न
औरंगज़ेब से जुड़ा सबसे विवादास्पद विषय मंदिर-विध्वंस है।
इस पर दो प्रकार की अतियाँ दिखाई देती हैं।
एक धारणा यह है कि उसने पूरे भारत में व्यवस्थित रूप से हर मंदिर को नष्ट करने का अभियान चलाया।
दूसरी धारणा इसे लगभग पूरी तरह नकार देती है।
दोनों सरलीकरण हैं।
ऐतिहासिक प्रमाण बताते हैं कि उसके शासन में कुछ महत्वपूर्ण हिंदू मंदिरों को ध्वस्त करने के स्पष्ट आदेश दिए गए और कुछ मामलों में उनकी जगह मस्जिदें बनीं।
साथ ही कई मंदिर और धार्मिक संस्थान यथावत रहे और कुछ को भूमि-अनुदान या प्रशासनिक संरक्षण मिलता रहा।
इतिहासकारों के बीच मंदिर-विध्वंस की संख्या, मकसद और नीति की व्यापकता पर बहस है; दक्षिण एशिया के मध्यकालीन मंदिर-विध्वंस संबंधी शोध में भी निश्चित प्रमाणित मामलों और बाद की अतिरंजित संख्याओं में भेद करने पर जोर दिया गया है।
1669 का आदेश
1669 में औरंगज़ेब ने कुछ ऐसे शिक्षण और धार्मिक संस्थानों के विरुद्ध कार्रवाई का आदेश दिया जिन्हें मुगल प्रशासन गैर-इस्लामी धार्मिक शिक्षा के केंद्र के रूप में देख रहा था।
इसके बाद कुछ महत्वपूर्ण मंदिरों के ध्वंस की घटनाएँ सामने आती हैं।
यह धार्मिक नीति में कठोरता का महत्वपूर्ण मोड़ था।
काशी विश्वनाथ
वाराणसी का विश्वनाथ मंदिर औरंगज़ेब के शासन में ध्वस्त किया गया।
उस स्थल पर ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण हुआ।
यह उसके शासन के मंदिर-विध्वंस के सबसे स्पष्ट और ऐतिहासिक रूप से स्थापित उदाहरणों में है।
इसके पीछे धार्मिक विचार, स्थानीय राजनीति और शाही नियंत्रण के आयामों पर इतिहासकार चर्चा करते रहे हैं, लेकिन विध्वंस का तथ्य विवादास्पद नहीं है।
मथुरा का केशवदेव मंदिर
1670 में मथुरा के प्रसिद्ध केशवदेव मंदिर को ध्वस्त करने का आदेश दिया गया।
मथुरा का नाम शाही अभिलेखों में कुछ समय के लिए “इस्लामाबाद” लिखे जाने के उल्लेख भी मिलते हैं।
यह घटना भी औरंगज़ेब की धार्मिक कठोरता के स्पष्ट उदाहरणों में है।
मंदिरों को संरक्षण के प्रमाण
इसी शासनकाल में कुछ हिंदू मंदिरों, मठों, ब्राह्मणों और धार्मिक संस्थाओं को भूमि-अनुदान या पुराने अधिकारों की पुष्टि के उदाहरण भी मिलते हैं।
यह विरोधाभास वास्तव में मध्यकालीन साम्राज्यवादी नीति की प्रकृति को दर्शाता है।
राज्य किसी विद्रोही या प्रतीकात्मक रूप से विरोधी राजनीतिक केंद्र से जुड़े मंदिर को दंडित कर सकता था और किसी दूसरे धार्मिक संस्थान के अधिकार की पुष्टि भी कर सकता था।
इससे मंदिर-विध्वंस के धार्मिक पहलू समाप्त नहीं हो जाते।
बल्कि यह बताता है कि धार्मिक और राजनीतिक कारण कई बार एक-दूसरे से जुड़े होते थे।
मंदिर-विध्वंस का मूल्यांकन
अकबर और औरंगज़ेब की नीति में वास्तविक अंतर था।
अकबर ने जजिया समाप्त किया, धार्मिक संवाद बढ़ाया और हिंदू अभिजात वर्ग को राजनीतिक साझेदारी में व्यापक रूप से जोड़ा।
औरंगज़ेब ने जजिया फिर लगाया और कुछ प्रमुख हिंदू धार्मिक संस्थानों के खिलाफ स्पष्ट दमनात्मक कार्रवाई की।
इस परिवर्तन को नकारना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा।
साथ ही पूरे 49 वर्ष के शासन को केवल मंदिर-विध्वंस तक सीमित करना भी प्रशासन, युद्ध, अर्थव्यवस्था और साम्राज्य-विस्तार की अन्य वास्तविकताओं को अदृश्य कर देगा।
राजपूत संबंध : प्रारंभिक निरंतरता
औरंगज़ेब के शासन के प्रारंभ में प्रमुख राजपूत सरदार उच्च पदों पर बने रहे।
मिर्जा राजा जय सिंह आमेर,
महाराजा जसवंत सिंह मारवाड़,
और अन्य राजपूत साम्राज्य के प्रमुख सेनापति थे।
जय सिंह को शिवाजी के विरुद्ध अभियान की जिम्मेदारी दी गई।
जसवंत सिंह ने भी विभिन्न मुगल अभियानों में सेवा की।
इससे स्पष्ट है कि प्रारंभिक औरंगज़ेब शासन में अकबर की राजपूत प्रशासनिक विरासत तत्काल समाप्त नहीं हुई थी।
मारवाड़ संकट
1678 में महाराजा जसवंत सिंह की मृत्यु हुई।
उनकी मृत्यु के समय स्पष्ट वयस्क उत्तराधिकारी नहीं था।
बाद में उनके परिवार में अजित सिंह का जन्म हुआ।
औरंगज़ेब ने मारवाड़ के उत्तराधिकार और प्रशासन में हस्तक्षेप किया।
राठौड़ सरदार इसे अपनी राजनीतिक स्वायत्तता पर आघात मानते थे।
दुर्गादास राठौड़ ने अजित सिंह और राजपरिवार की रक्षा में प्रमुख भूमिका निभाई।
इससे लंबा राजपूत विद्रोह शुरू हुआ।
मेवाड़ भी संघर्ष में
मारवाड़ के प्रश्न पर मेवाड़ ने भी राठौड़ों का समर्थन किया।
महाराणा राज सिंह और मुगल सत्ता में तनाव बढ़ा।
इससे अकबर काल में सावधानी से विकसित मुगल-राजपूत राजनीतिक साझेदारी को गंभीर झटका लगा।
सभी राजपूत मुगलों के विरोध में नहीं गए, लेकिन साम्राज्य का एक महत्वपूर्ण स्तंभ कमजोर हुआ।
राजपूत संबंधों में यह दरार औरंगज़ेब की राजनीति की महत्वपूर्ण विफलताओं में गिनी जाती है।
जाट विद्रोह
औरंगज़ेब के शासन में आगरा-मथुरा क्षेत्र में जाट विद्रोह हुए।
1669 के आसपास गोकुला के नेतृत्व में विद्रोह महत्वपूर्ण था।
मुगल सेना ने इसे कठोरता से दबाया।
बाद में राजा राम और चूड़ामन जैसे नेताओं के समय जाट शक्ति फिर बढ़ी।
18वीं शताब्दी में यही जाट शक्ति भरतपुर जैसे महत्वपूर्ण राज्य के रूप में उभरने वाली थी।
इसलिए जाट विद्रोह केवल स्थानीय अशांति नहीं, केंद्रीय मुगल सत्ता से निकलती क्षेत्रीय शक्ति का प्रारंभिक संकेत था।
सतनामी विद्रोह
1672 में नारनौल क्षेत्र में सतनामियों का विद्रोह हुआ।
एक स्थानीय विवाद ने बड़े संघर्ष का रूप ले लिया।
सतनामी समुदाय के लोगों ने मुगल प्रशासन का प्रतिरोध किया।
अंततः शाही सेना ने विद्रोह दबा दिया।
यह घटना दिखाती है कि साम्राज्य को केवल राजाओं और बड़े सरदारों से ही नहीं, स्थानीय धार्मिक-सामाजिक समूहों से भी चुनौती मिल रही थी।
सिखों के साथ संबंध
मुगल-सिख तनाव जहांगीर के समय गुरु अर्जन देव की मृत्यु से ही गंभीर हो चुका था।
शाहजहाँ काल में भी गुरु हरगोबिंद और मुगल सत्ता के बीच संघर्ष हुए।
औरंगज़ेब काल में यह संबंध और निर्णायक मोड़ पर पहुँचा।
गुरु तेग बहादुर
नौवें सिख गुरु तेग बहादुर ने पंजाब और उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक यात्राएँ कीं।
सिख परंपरा के अनुसार कश्मीरी पंडित धार्मिक दबाव की शिकायत लेकर उनके पास आए।
गुरु तेग बहादुर ने धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए मुगल सत्ता का सामना करने का निर्णय लिया।
1675 में उन्हें गिरफ्तार किया गया और दिल्ली लाया गया।
उनके साथियों को भी क्रूरतापूर्वक मृत्युदंड दिया गया।
अंततः गुरु तेग बहादुर का दिल्ली में सिर काट दिया गया। आधुनिक संदर्भ भी 1675 में मुगल सत्ता द्वारा उनके मृत्युदंड की पुष्टि करते हैं; सिख परंपरा इसे धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के महान बलिदान के रूप में स्मरण करती है।
गुरु तेग बहादुर की शहादत का प्रभाव
इस घटना का प्रभाव अत्यंत दूरगामी था।
सिख समुदाय में मुगल सत्ता के प्रति अविश्वास और प्रतिरोध बढ़ा।
गुरु तेग बहादुर के पुत्र गुरु गोबिंद सिंह दसवें गुरु बने।
1699 में उन्होंने खालसा की स्थापना की।
खालसा ने सिख पहचान को धार्मिक-सैनिक अनुशासन में नया स्वरूप दिया।
आगे 18वीं शताब्दी में सिख शक्ति मुगल साम्राज्य के विघटन के बाद पंजाब की प्रमुख राजनीतिक शक्तियों में से एक बनी।
गुरु गोबिंद सिंह और औरंगज़ेब
गुरु गोबिंद सिंह के समय पहाड़ी राजाओं और मुगल अधिकारियों से अनेक संघर्ष हुए।
आनंदपुर साहिब लंबे समय तक संघर्ष का केंद्र रहा।
1704–1705 के आसपास आनंदपुर से निकलने, चमकौर के युद्ध और गुरु के पुत्रों की मृत्यु से जुड़े प्रसंग सिख इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
गुरु गोबिंद सिंह ने औरंगज़ेब को प्रसिद्ध “जफरनामा” लिखा।
इस पत्र में उन्होंने मुगल अधिकारियों द्वारा शपथ भंग और विश्वासघात पर कठोर नैतिक प्रश्न उठाए।
औरंगज़ेब की मृत्यु से पहले दोनों की प्रत्यक्ष मुलाकात नहीं हो सकी।
शिवाजी का उदय
औरंगज़ेब के शासन का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रतिरोध मराठा शक्ति थी।
छत्रपति शिवाजी महाराज का उदय शाहजहाँ के अंतिम वर्षों से शुरू हो चुका था, लेकिन औरंगज़ेब के समय वह मुगल साम्राज्य की गंभीर चुनौती बन गया।
शिवाजी ने पश्चिमी दक्कन के पर्वतीय भूगोल, किलों और तीव्र घुड़सवार युद्ध-पद्धति का उपयोग कर स्वतंत्र शक्ति खड़ी की।
उनका संघर्ष बीजापुर से भी था और मुगलों से भी।
शाइस्ता खान और पुणे
औरंगज़ेब ने अपने मामा शाइस्ता खान को शिवाजी के विरुद्ध भेजा।
मुगल सेना ने पुणे सहित कई क्षेत्रों पर दबाव बनाया।
लेकिन 1663 में शिवाजी ने पुणे में शाइस्ता खान के शिविर/निवास पर साहसिक रात्रि आक्रमण किया।
शाइस्ता खान घायल हुआ और उसके हाथ की उंगलियाँ कट गईं।
यह मुगल प्रतिष्ठा के लिए बड़ा आघात था।
उसे बाद में बंगाल भेज दिया गया।
1664 : सूरत पर शिवाजी का आक्रमण
1664 में शिवाजी ने सूरत पर आक्रमण किया।
सूरत मुगल साम्राज्य के सबसे समृद्ध व्यापारिक नगरों में था।
यहां भारतीय और विदेशी व्यापारी सक्रिय थे।
शिवाजी की सेना ने शहर के संपन्न हिस्सों से बड़ी मात्रा में धन प्राप्त किया।
यह घटना औरंगज़ेब के लिए आर्थिक और प्रतिष्ठात्मक चुनौती थी।
राजा जय सिंह का अभियान
1665 में औरंगज़ेब ने आमेर के मिर्जा राजा जय सिंह को शिवाजी के विरुद्ध भेजा।
जय सिंह ने सैन्य और कूटनीतिक दोनों तरीके अपनाए।
पुरंदर किले पर दबाव बढ़ाया गया।
अंततः शिवाजी और जय सिंह के बीच पुरंदर की संधि हुई।
शिवाजी ने कई किले मुगलों को देने और कुछ राजनीतिक शर्तें स्वीकार करने पर सहमति दी।
इसके बाद उन्हें आगरा जाने के लिए तैयार किया गया।
1666 : शिवाजी का आगरा आगमन
शिवाजी 1666 में अपने पुत्र संभाजी के साथ औरंगज़ेब के दरबार में आगरा पहुँचे।
दरबार में उन्हें जिस स्थान पर खड़ा किया गया, उससे वे नाराज हुए।
इसके बाद उन्हें नियंत्रित निगरानी में रखा गया।
कुछ समय बाद शिवाजी और संभाजी वहां से निकलने में सफल हुए।
इस घटना का विवरण विभिन्न स्रोतों में अलग-अलग रूप में मिलता है, लेकिन यह स्पष्ट है कि औरंगज़ेब की शिवाजी को नियंत्रित करने की योजना असफल रही।
शिवाजी की पुनर्स्थापना
आगरा से निकलने के बाद शिवाजी ने अपनी शक्ति फिर संगठित की।
1670 के बाद उन्होंने मुगलों से कई किले वापस लिए।
सूरत पर दूसरी बार आक्रमण किया।
मराठा सत्ता का विस्तार बढ़ा।
1674 में रायगढ़ में उनका राज्याभिषेक हुआ।
उन्होंने स्वतंत्र हिंदू राजसत्ता के रूप में अपनी स्थिति औपचारिक की।
उनकी राजनीतिक अवधारणा “हिंदवी स्वराज्य” की परंपरा से जुड़ी मानी जाती है।
शिवाजी की मृत्यु
1680 में शिवाजी की मृत्यु हुई।
औरंगज़ेब ने शायद इसे मराठा चुनौती के अंत का अवसर माना।
लेकिन हुआ इसका उलटा।
शिवाजी के बाद उत्तराधिकार संघर्ष अवश्य हुआ, पर मराठा शक्ति समाप्त नहीं हुई।
संभाजी
शिवाजी के बाद संभाजी प्रमुख शासक बने।
उन्होंने मुगलों, पुर्तगालियों और अन्य शक्तियों से संघर्ष जारी रखा।
औरंगज़ेब स्वयं दक्कन में उतर चुका था।
1689 में संभाजी और उनके सहयोगी कवि कलश को मुगल सेना ने पकड़ लिया।
उन पर राजद्रोह और अन्य आरोप लगाए गए।
उन्हें अत्यंत क्रूरतापूर्वक मृत्युदंड दिया गया।
संभाजी की हत्या से मराठा प्रतिरोध समाप्त होने के बजाय और अधिक कठोर हो गया।
राजाराम और जिन्जी
संभाजी की मृत्यु के बाद शिवाजी के दूसरे पुत्र राजाराम को नेतृत्व मिला।
वे दक्षिण में जिन्जी के दुर्ग चले गए।
मुगल सेना ने जिन्जी की लंबी घेराबंदी की।
लेकिन इसी दौरान महाराष्ट्र में मराठा सेनापति अलग-अलग मोर्चों पर मुगल क्षेत्रों पर हमला करते रहे।
कैम्ब्रिज के अध्ययन के अनुसार संभाजी की मृत्यु के बाद मराठा राज्य नष्ट नहीं हुआ; राजाराम और मराठा अधिकारियों ने तेजी से छापामार अभियान तेज किए और मुगल अधिकारी अपने जिलों की रक्षा और राजस्व संग्रह में गंभीर कठिनाइयों से जूझने लगे।
ताराबाई
1700 में राजाराम की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी महारानी ताराबाई ने मराठा प्रतिरोध का नेतृत्व संभाला।
उन्होंने अपने अल्पायु पुत्र शिवाजी द्वितीय के नाम पर शासन किया।
ताराबाई ने मुगल सत्ता के खिलाफ अत्यंत प्रभावशाली सैन्य नेतृत्व दिया।
मराठा सेनाएँ कई दिशाओं से मुगल क्षेत्रों पर आक्रमण करती रहीं।
औरंगज़ेब किले जीतता था।
मराठे उन्हें फिर वापस ले लेते थे।
इस चक्र ने मुगल सेना को थका दिया।
बीजापुर पर विजय
दक्कन में मराठों के साथ-साथ बीजापुर की आदिलशाही और गोलकुंडा की कुतुबशाही स्वतंत्र मुस्लिम सल्तनतें थीं।
औरंगज़ेब ने इन्हें समाप्त करने का निर्णय लिया।
1686 में लंबी घेराबंदी के बाद बीजापुर मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया।
आदिलशाही सत्ता समाप्त हो गई।
यह भौगोलिक दृष्टि से बड़ी सफलता थी।
लेकिन नए प्रदेशों के प्रशासन का भार भी मुगल राज्य पर आया।
गोलकुंडा पर विजय
1687 में औरंगज़ेब ने गोलकुंडा पर आक्रमण किया।
यह कुतुबशाही राज्य का केंद्र था।
गोलकुंडा हीरे के व्यापार और दक्कनी अर्थव्यवस्था के कारण अत्यंत संपन्न था।
लंबी घेराबंदी के बाद किला मुगल नियंत्रण में आया।
कुतुबशाही सत्ता समाप्त हो गई।
इसके साथ मुगल साम्राज्य का दक्कन में क्षेत्रीय विस्तार अभूतपूर्व स्तर पर पहुँच गया।
क्या दक्कन जीत लिया गया?
नक्शे पर—बहुत हद तक।
व्यवहार में—नहीं।
बीजापुर और गोलकुंडा जैसी स्थापित सल्तनतों का अंत कर दिया गया था।
लेकिन विशाल नए क्षेत्रों को नियंत्रित करना कठिन था।
पुरानी प्रशासनिक संरचनाएँ टूट गईं।
मराठा युद्ध जारी रहा।
राजस्व वसूली बाधित हुई।
स्थानीय सरदार पक्ष बदलते रहे।
इस प्रकार क्षेत्रीय विजय प्रशासनिक विजय में पूरी तरह नहीं बदल सकी।
औरंगज़ेब का दक्कन में उतरना
1681 के आसपास औरंगज़ेब स्वयं दक्कन चला गया।
इसके बाद उसने जीवन के अंतिम लगभग 26 वर्ष उत्तर भारत की राजधानी से दूर दक्षिण में बिताए।
यह निर्णय मुगल इतिहास के सबसे दूरगामी निर्णयों में था।
सम्राट का पूरा दरबार, विशाल सेना, अधिकारियों और संसाधनों का बड़ा हिस्सा दक्कन में खिंच गया।
उत्तर भारत में केंद्रीय राजनीतिक निगरानी कमजोर हुई।
अंतहीन युद्ध
औरंगज़ेब का दक्कनी युद्ध साधारण सीमा युद्ध नहीं रहा।
कई बार वह स्वयं एक-एक किले की घेराबंदी देखता था।
मुगल सेना किले पर कब्जा करती।
कुछ महीनों या वर्षों बाद मराठे उसे वापस ले लेते।
फिर मुगल सेना लौटती।
यह चक्र वर्षों तक चला।
जॉन एफ. रिचर्ड्स के मुगल साम्राज्य संबंधी अध्ययन में इसे ऐसी दीर्घ लड़ाई के रूप में देखा गया है जिसमें औरंगज़ेब वर्ष-दर-वर्ष दक्कन में रहा और साम्राज्य की सार्वजनिक व्यवस्था तथा राजनीतिक शक्ति पर दबाव बढ़ता गया।
मराठा युद्ध-पद्धति
मराठा सेनाएँ विशाल मुगल सेना से हर बार खुली निर्णायक लड़ाई नहीं लड़ती थीं।
वे गति पर निर्भर थीं।
घुड़सवार दस्ते तेजी से हमला करते।
मुगल आपूर्ति मार्ग काटते।
राजस्व केंद्रों पर आक्रमण करते।
फिर पहाड़ी क्षेत्रों में लौट जाते।
मुगल सेना का विशाल आकार उसकी ताकत भी था और कमजोरी भी।
उसे भोजन, चारा, वेतन और लंबी आपूर्ति व्यवस्था चाहिए थी।
मराठे इसी व्यवस्था को निशाना बनाते थे।
साम्राज्य का सबसे बड़ा विस्तार
औरंगज़ेब के समय मुगल साम्राज्य अपने सर्वाधिक भौगोलिक विस्तार पर पहुँचा।
उत्तर में कश्मीर से,
पश्चिम में अफगान सीमा तक,
पूर्व में बंगाल और असम की दिशा तक,
और दक्षिण में दक्कन के विशाल भाग तक मुगल प्रभाव था।
कुछ आधुनिक आकलन इसे लगभग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े हिस्से पर फैली सत्ता बताते हैं।
लेकिन केवल नक्शे का आकार राज्य की शक्ति का सही माप नहीं है।
इसी सबसे बड़े विस्तार के समय साम्राज्य की नियंत्रण क्षमता कमजोर हो रही थी।
असम और अहोम संघर्ष
औरंगज़ेब के शासन में मुगल सेना ने पूर्वोत्तर में अहोम राज्य के विरुद्ध अभियान किया।
मीर जुमला ने असम में प्रारंभिक सफलता प्राप्त की।
लेकिन भूगोल, वर्षा, बीमारी और लंबी आपूर्ति रेखाओं ने मुगल सेना को कठिनाई दी।
1671 के सरायघाट युद्ध में लाचित बरफुकन के नेतृत्व में अहोम सेना ने मुगलों को निर्णायक रूप से रोका।
ब्रह्मपुत्र क्षेत्र में मुगल विस्तार स्थायी नहीं हो पाया।
यह मुगल साम्राज्य की भौगोलिक सीमाओं का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
उत्तर-पश्चिमी मोर्चा
अफगान और पश्तून जनजातीय क्षेत्रों में भी औरंगज़ेब को विद्रोहों का सामना करना पड़ा।
1670 के दशक में यूसुफजई और अन्य पश्तून समूहों के विद्रोहों ने साम्राज्य को परेशान किया।
इन क्षेत्रों में युद्ध कठिन था।
पहाड़ी भूगोल और जनजातीय संरचना के कारण स्थायी नियंत्रण बनाए रखना महंगा पड़ता था।
इससे साम्राज्य को एक साथ कई सीमाओं पर सेना रखनी पड़ती थी।
आर्थिक व्यवस्था
औरंगज़ेब को अत्यंत समृद्ध साम्राज्य विरासत में मिला था।
भारत विश्व कपड़ा व्यापार का प्रमुख केंद्र बना रहा।
बंगाल अत्यंत समृद्ध था।
गुजरात और सूरत का व्यापार महत्वपूर्ण था।
यूरोपीय कंपनियाँ भारतीय वस्तुओं के बदले चांदी लाती थीं।
राजस्व का मुख्य आधार कृषि था।
लेकिन लंबे दक्कनी युद्धों ने सरकारी वित्त पर भारी दबाव डाला।
जागीर संकट
मुगल मनसबदारों को वेतन के बदले जागीर से राजस्व लेने का अधिकार मिलता था।
औरंगज़ेब के लंबे शासन में मनसबदारों की संख्या बढ़ती गई।
दक्कन की नई विजयों के बाद और अधिक अधिकारियों और सैनिकों को पुरस्कृत करना पड़ा।
लेकिन अच्छी आय देने वाली जागीरें सीमित थीं।
इससे “जागीर संकट” पैदा हुआ।
कागज पर अधिकारी को बड़ी आय की जागीर मिल सकती थी, लेकिन वास्तविक वसूली उससे कम होती।
अधिकारी अपनी आय बढ़ाने के लिए किसानों पर दबाव डाल सकता था।
इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था और ग्रामीण समाज में तनाव बढ़ा।
दक्कन युद्ध और वित्तीय संकट
दक्कन में लाखों सैनिकों और उनसे जुड़े विशाल तंत्र को लंबे समय तक बनाए रखना अत्यंत महंगा था।
घोड़े,
हाथी,
तोपखाना,
रसद,
वेतन,
किले,
सड़क,
और प्रशासन—
सब पर धन खर्च होता था।
हालिया आर्थिक इतिहास के अध्ययनों में भी औरंगज़ेब के दक्कनी अभियानों को मुगल खजाने और प्रशासन पर असाधारण दबाव डालने वाला कारक माना गया है।
किसान पर दबाव
युद्ध की लागत अंततः राजस्व तंत्र पर आती थी।
राजस्व तंत्र का आधार किसान था।
यदि जागीरदार को निर्धारित आय नहीं मिलती तो अधिक वसूली का दबाव बढ़ सकता था।
युद्धग्रस्त क्षेत्रों में फसल नष्ट होती।
सेनाएँ गांवों से राशन लेतीं।
मराठा छापे और मुगल जवाबी कार्रवाई दोनों स्थानीय समाज को प्रभावित करते।
इस प्रकार साम्राज्य का भौगोलिक विस्तार ग्रामीण स्तर पर हमेशा समृद्धि नहीं लाता था।
अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी
औरंगज़ेब के समय अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापार काफी बढ़ चुका था।
कंपनी बंगाल, सूरत, मद्रास और अन्य क्षेत्रों में सक्रिय थी।
1686–1690 के आसपास कंपनी ने मुगल सत्ता से टकराव की कोशिश की जिसे प्रायः “चाइल्ड का युद्ध” कहा जाता है।
मुगल प्रतिक्रिया के सामने अंग्रेज पीछे हटे और क्षमा मांगनी पड़ी।
यह महत्वपूर्ण तथ्य है—
17वीं शताब्दी के अंत तक भी अंग्रेजी कंपनी मुगल साम्राज्य को सैन्य रूप से चुनौती देने की स्थिति में नहीं थी।
लेकिन अगले पचास वर्षों में परिस्थिति तेजी से बदलने वाली थी।
यूरोपीय कंपनियों का विस्तार
अंग्रेजों के साथ डच और फ्रांसीसी व्यापारिक कंपनियाँ भी सक्रिय थीं।
औरंगज़ेब के समय उन्हें मुख्यतः व्यापारी शक्ति के रूप में देखा जाता था।
वे मुगल अधिकारियों से व्यापारिक अधिकार और कर छूट प्राप्त करने का प्रयास करती थीं।
उस समय शायद ही किसी मुगल अधिकारी को अनुमान रहा होगा कि आगे यही यूरोपीय कंपनियाँ भारतीय राजनीतिक संघर्षों का लाभ उठाकर सैन्य शक्ति बन जाएंगी।
औरंगज़ेब और कला
औरंगज़ेब ने अपने पूर्ववर्तियों की तरह चित्रकला और संगीत को व्यापक शाही संरक्षण नहीं दिया।
इससे शाही कार्यशाला का महत्व घटा।
लेकिन कला का अंत नहीं हुआ।
कलाकार राजस्थान, पंजाब, दक्कन और अन्य क्षेत्रीय दरबारों की ओर चले गए।
इससे राजस्थानी, पहाड़ी और अन्य चित्रकला परंपराओं के विकास में नई ऊर्जा आई।
एक अर्थ में केंद्रीय संरक्षण में कमी ने कला को क्षेत्रीय केंद्रों में फैलाया।
स्थापत्य
औरंगज़ेब शाहजहाँ की तरह विशाल निर्माण परियोजनाओं के लिए प्रसिद्ध नहीं है।
फिर भी उसके शासन में मस्जिदें और अन्य इमारतें बनीं।
लाहौर की बादशाही मस्जिद उसके शासनकाल में उसके पालक भाई मुजफ्फर हुसैन या शाही संरक्षण से जुड़े प्रशासनिक संदर्भ में बनी और मुगल स्थापत्य की महत्वपूर्ण इमारतों में है।
दिल्ली की मोती मस्जिद भी उसके काल से जुड़ी है।
औरंगाबाद में बीबी का मकबरा उसके पुत्र आजम शाह से जुड़ा निर्माण है और ताजमहल की स्थापत्य परंपरा का प्रभाव दिखाता है।
व्यक्तिगत सादगी और साम्राज्यवादी कठोरता
औरंगज़ेब के व्यक्तित्व का एक बड़ा विरोधाभास था।
निजी जीवन में वह सादगी, धर्म और अनुशासन का प्रदर्शन करता था।
लेकिन राजनीतिक जीवन में अत्यंत कठोर था।
भाई की हत्या,
पिता की नजरबंदी,
राजपूतों से युद्ध,
गुरु तेग बहादुर का मृत्युदंड,
मंदिर-विध्वंस,
संभाजी की क्रूर हत्या,
और दशकों तक चलता युद्ध—
ये सभी उसके शासन के वास्तविक हिस्से हैं।
व्यक्तिगत धार्मिकता राजनीतिक उदारता की गारंटी नहीं होती—उसका शासन इसका स्पष्ट उदाहरण है।
प्रशासनिक क्षमता
औरंगज़ेब अत्यंत मेहनती प्रशासक माना जाता है।
वह सरकारी कागजात पढ़ता,
आदेशों पर ध्यान देता,
अधिकारियों के पत्रों का उत्तर देता,
और वृद्धावस्था तक शासन के दैनिक मामलों में हस्तक्षेप करता रहा।
लेकिन यही केंद्रीकरण एक कमजोरी भी बना।
इतने विशाल साम्राज्य का प्रत्येक निर्णय सम्राट पर निर्भर नहीं रह सकता था।
लंबे समय तक दक्कन में रहने से उत्तर भारत के प्रांतों पर सम्राट की प्रत्यक्ष निगरानी कम हुई।
उत्तराधिकार की समस्या फिर अनसुलझी
औरंगज़ेब स्वयं खूनी उत्तराधिकार युद्ध से सत्ता में आया था।
लेकिन उसने भी कोई निश्चित उत्तराधिकार नियम स्थापित नहीं किया।
उसके पुत्रों—
मुअज्जम,
आजम,
और कामबख्श—
के बीच प्रतिस्पर्धा बनी रही।
वृद्ध सम्राट जानता था कि उसकी मृत्यु के बाद युद्ध होगा।
कुछ विवरणों में वह साम्राज्य का विभाजन सुझाने की कोशिश करता दिखाई देता है, लेकिन इससे संघर्ष नहीं रुका। कैम्ब्रिज के अध्ययन में भी उसकी मृत्यु के बाद उत्तराधिकार संकट और साम्राज्य के तीव्र राजनीतिक विघटन का वर्णन है।
अंतिम वर्ष
1700 के बाद औरंगज़ेब अस्सी वर्ष से अधिक आयु का हो चुका था।
फिर भी वह दक्कन में अभियान चला रहा था।
मराठा शक्ति समाप्त नहीं हुई थी।
इसके विपरीत वह फैल रही थी।
मुगल सेना थकी हुई थी।
राजस्व संकट बढ़ रहा था।
पुराने अनुभवी सरदार मर रहे थे।
नए मनसबदारों की मांग बढ़ रही थी।
सम्राट एक किले से दूसरे किले तक घूम रहा था।
यह उस शासक का अंतिम दृश्य था जिसने कभी लगभग पूरे उपमहाद्वीप को अपने नक्शे में रंग दिया था।
औरंगज़ेब के अंतिम पत्र
औरंगज़ेब से जुड़े कुछ अंतिम पत्र और कथन उसके जीवन के अंत की निराशा दिखाते हैं।
इनमें वह अपने जीवन की अस्थिरता, अकेलेपन और सांसारिक उपलब्धियों की क्षणभंगुरता पर विचार करता दिखाई देता है।
हर उद्धरण की पाठ-परंपरा की अलग जांच आवश्यक है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि अंतिम वर्षों में उसे युद्धों की अंतहीनता और अपनी आयु का एहसास था।
मृत्यु
3 मार्च 1707 को औरंगज़ेब की अहमदनगर के निकट मृत्यु हुई।
वह लगभग 88 वर्ष का था।
उसने लगभग 49 वर्ष शासन किया।
उसकी इच्छा के अनुसार उसे अत्यंत साधारण कब्र में दफनाया गया।
उसकी कब्र खुल्दाबाद में सूफी संत शेख जैनुद्दीन शिराजी की दरगाह के निकट है।
यह शाहजहाँ के ताजमहल और हुमायूँ के विशाल मकबरे से बिल्कुल अलग है।
मृत्यु के तुरंत बाद गृहयुद्ध
औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद उसके पुत्र सिंहासन के लिए भिड़ गए।
मुअज्जम ने अंततः विजय प्राप्त की और बहादुर शाह प्रथम बना।
लेकिन 1707 के बाद मुगल साम्राज्य में वह स्थिरता फिर कभी वापस नहीं आई जो अकबर से औरंगज़ेब तक के लंबे काल में दिखाई देती थी।
सम्राट बने रहे।
दरबार चलता रहा।
मुगल नाम की प्रतिष्ठा भी बनी रही।
लेकिन केंद्रीय सत्ता लगातार कमजोर होती गई।
क्या औरंगज़ेब ने मुगल साम्राज्य नष्ट कर दिया?
यह प्रश्न सरल “हाँ” या “नहीं” में नहीं सुलझता।
मुगल पतन के कारण अनेक थे।
उत्तराधिकार युद्ध की पुरानी समस्या उससे पहले की थी।
जागीर व्यवस्था की संरचनात्मक कठिनाइयाँ शाहजहाँ काल में भी दिखाई दे रही थीं।
क्षेत्रीय शक्तियाँ लंबे समय से मौजूद थीं।
विशाल साम्राज्य के प्रशासन की प्राकृतिक सीमाएँ थीं।
यूरोपीय व्यापारिक शक्तियाँ भी धीरे-धीरे मजबूत हो रही थीं।
लेकिन औरंगज़ेब की नीतियों ने कुछ समस्याओं को निश्चित रूप से अधिक गंभीर बनाया।
राजपूत संबंधों में दरार,
जजिया की पुनर्स्थापना,
कुछ बड़े मंदिरों का ध्वंस,
सिखों के साथ बढ़ता टकराव,
मराठों को समाप्त करने के बजाय अंतहीन युद्ध,
और दक्कन में लगभग ढाई दशक तक सम्राट तथा विशाल सेना का फंसना—
इन सबने साम्राज्य की राजनीतिक और वित्तीय शक्ति को कमजोर किया।
मुगल पतन के कारणों पर आधुनिक शोध जटिलता पर जोर देता है, लेकिन दक्कन के सैन्य-राजकोषीय दबाव को केंद्रीय कारकों में गिना जाता है।
क्या उसका साम्राज्य उसकी मृत्यु के समय कमजोर था?
मानचित्र पर वह अत्यंत विशाल था।
लेकिन वास्तविक नियंत्रण के स्तर पर गंभीर समस्याएँ थीं।
मराठा विद्रोह जारी था।
राजपूत असंतोष पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था।
सिख सैन्य संगठन मजबूत हो रहा था।
जाट शक्ति बढ़ रही थी।
दक्कन में राजस्व व्यवस्था बाधित थी।
मनसब-जागीर संकट गहरा रहा था।
उत्तराधिकार युद्ध सामने था।
इसलिए 1707 में मुगल साम्राज्य एक साथ अपने सबसे बड़े भूगोल और अपनी सबसे गंभीर आंतरिक थकान की स्थिति में था।
औरंगज़ेब की धार्मिक नीति का समग्र आकलन
औरंगज़ेब को समझने के लिए तीन तथ्य एक साथ रखना जरूरी हैं।
पहला—
वह अकबर की तुलना में स्पष्ट रूप से अधिक रूढ़िवादी इस्लामी शासक था।
दूसरा—
उसने जजिया फिर लगाया और काशी, मथुरा सहित कुछ महत्वपूर्ण मंदिरों के ध्वंस की नीतियाँ अपनाईं।
तीसरा—
उसका विशाल प्रशासन हिंदुओं के बिना चल ही नहीं सकता था और हिंदू मनसबदार उसकी सेवा में बड़ी संख्या में बने रहे।
इन तथ्यों में कोई विरोध नहीं है।
एक साम्राज्य धार्मिक भेदभाव भी कर सकता है और उसी धार्मिक समुदाय के अभिजात वर्ग को प्रशासन में शामिल भी रख सकता है।
मध्यकालीन राज्य अक्सर इसी प्रकार की जटिलता में काम करते थे।
हिंदू मनसबदार
औरंगज़ेब के शासन में हिंदू मनसबदार गायब नहीं हुए।
कुछ अध्ययनों के अनुसार शासन के बाद के चरण में उनकी संख्या अनुपातिक रूप से कम होने के बजाय कई स्तरों पर महत्वपूर्ण बनी रही।
राजपूत,
मराठा,
कायस्थ,
और अन्य हिंदू अधिकारी प्रशासन में थे।
लेकिन अभिजात वर्ग की भागीदारी सामान्य हिंदू प्रजा पर धार्मिक नीतियों के प्रभाव को समाप्त नहीं करती।
इसी प्रकार जजिया या मंदिर-विध्वंस के तथ्य इस प्रशासनिक भागीदारी को झुठलाते नहीं।
दोनों एक ही शासन में संभव थे।
औरंगज़ेब और मराठा शक्ति : दीर्घ संघर्ष का परिणाम
उसने बीजापुर समाप्त किया।
गोलकुंडा समाप्त किया।
संभाजी को पकड़कर मार दिया।
राजाराम को जिन्जी तक धकेला।
दर्जनों किले जीते।
फिर भी मराठा शक्ति समाप्त नहीं हुई।
1707 के बाद वही मराठा शक्ति उत्तर भारत तक फैलने वाली थी।
18वीं शताब्दी के मध्य तक मराठा सेनाएँ दिल्ली की राजनीति में निर्णायक प्रभाव रखने लगीं।
इसलिए औरंगज़ेब की सबसे बड़ी सैन्य विडंबना यह रही—
उसने लगभग 26 वर्ष जिस शक्ति को कुचलने में लगाए, उसकी मृत्यु के बाद वही शक्ति मुगल साम्राज्य के अवशेषों पर सबसे तेजी से फैलने लगी।
1658–1707 : प्रमुख समयरेखा
1658 — धर्मत और सामूगढ़ में विजय; शाहजहाँ को सत्ता से हटाया; औरंगज़ेब सिंहासन पर।
1659 — दारा शिकोह की हत्या; शुजा पराजित; उत्तराधिकार में औरंगज़ेब निर्णायक विजेता।
1663 — पुणे में शिवाजी का शाइस्ता खान पर साहसिक हमला।
1664 — शिवाजी द्वारा सूरत पर पहला बड़ा आक्रमण।
1665 — राजा जय सिंह और शिवाजी के बीच पुरंदर की संधि।
1666 — शिवाजी आगरा पहुँचे; नजरबंदी जैसी स्थिति और बाद में वहां से निकलने में सफलता।
1669 — धार्मिक संस्थानों के विरुद्ध महत्वपूर्ण शाही आदेश; इसी समय मथुरा क्षेत्र का जाट विद्रोह।
1669–1670 — काशी विश्वनाथ और केशवदेव जैसे प्रमुख मंदिरों के ध्वंस की घटनाएँ।
1672 — सतनामी विद्रोह।
1674 — रायगढ़ में शिवाजी का राज्याभिषेक।
1675 — गुरु तेग बहादुर का दिल्ली में मृत्युदंड।
1679 — जजिया की पुनर्स्थापना।
1679–1680 के बाद — मारवाड़-मेवाड़ के साथ गंभीर राजपूत संघर्ष।
1680 — शिवाजी की मृत्यु।
1681 के आसपास — औरंगज़ेब का दक्कन में दीर्घ प्रवास आरंभ।
1686 — बीजापुर की आदिलशाही समाप्त।
1687 — गोलकुंडा की कुतुबशाही समाप्त।
1689 — संभाजी पकड़े गए और मृत्युदंड दिया गया।
1689–1698 — जिन्जी और राजाराम के विरुद्ध दीर्घ मुगल अभियान।
1699 — गुरु गोबिंद सिंह द्वारा खालसा की स्थापना।
1700 — राजाराम की मृत्यु; ताराबाई के नेतृत्व में मराठा संघर्ष जारी।
1700–1707 — दक्कन में किलों और मराठों के विरुद्ध लगातार अभियान।
3 मार्च 1707 — औरंगज़ेब की अहमदनगर के निकट मृत्यु।
उसकी प्रमुख उपलब्धियाँ
मुगल साम्राज्य को सर्वाधिक भौगोलिक विस्तार तक पहुँचाया।
बीजापुर और गोलकुंडा की स्वतंत्र सल्तनतें समाप्त कीं।
लगभग आधी शताब्दी तक विशाल साम्राज्य पर व्यक्तिगत नियंत्रण बनाए रखा।
प्रशासनिक कार्य में असाधारण परिश्रम किया।
इस्लामी विधि का विशाल संकलन फतावा-ए-आलमगीरी तैयार कराया।
मुगल सैन्य शक्ति को दक्कन के सबसे दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुँचाया।
शासन के प्रारंभिक दशकों में केंद्रीय सत्ता अभी भी एशिया की सबसे शक्तिशाली राजसत्ताओं में थी।
उसकी प्रमुख राजनीतिक विफलताएँ
मराठा प्रतिरोध उसके जीवनकाल के बाद भी जारी रहा।
दक्कन युद्ध को निर्णायक समाधान तक नहीं पहुँचा सका।
राजपूत गठबंधन में गंभीर दरार पैदा हुई।
सिख समुदाय के साथ टकराव बढ़ा।
जाट और अन्य स्थानीय विद्रोह उभरे।
जजिया और मंदिर नीति ने धार्मिक दूरी बढ़ाई।
दक्कनी युद्धों ने साम्राज्य के वित्त पर असाधारण भार डाला।
जागीर संकट गहराया।
उत्तराधिकार का स्थायी समाधान नहीं बनाया।
और विशाल भूभाग जीतने के बावजूद उसके प्रशासनिक नियंत्रण को उतनी ही तेजी से मजबूत नहीं किया जा सका।
निष्कर्ष
औरंगज़ेब का शासन मुगल इतिहास का सबसे बड़ा विरोधाभास प्रस्तुत करता है।
1658 में उसने एक शक्तिशाली और समृद्ध साम्राज्य प्राप्त किया।
1707 तक उसने उसका क्षेत्र और भी बढ़ा दिया।
नक्शे पर मुगल साम्राज्य उससे पहले कभी इतना विशाल नहीं था।
लेकिन इस विस्तार की कीमत बहुत बड़ी थी।
राजपूत संबंध कमजोर पड़े।
सिख प्रतिरोध का नया चरण जन्मा।
जजिया की वापसी और कुछ प्रमुख मंदिरों के ध्वंस ने धार्मिक विभाजन को गहरा किया।
मराठा शक्ति को नष्ट करने के लिए किए गए युद्ध ने स्वयं मुगल सेना और खजाने को थका दिया।
बीजापुर और गोलकुंडा जीत लिए गए, लेकिन उनके विशाल क्षेत्रों को स्थायी रूप से नियंत्रित करना नई समस्या बन गया।
संभाजी मारे गए, फिर राजाराम खड़े हुए।
राजाराम गए, ताराबाई ने संघर्ष संभाल लिया।
एक किला जीता जाता, दूसरा हाथ से निकल जाता।
सम्राट बूढ़ा होता गया और युद्ध चलता रहा।
यहीं औरंगज़ेब के शासन का सबसे गंभीर ऐतिहासिक निष्कर्ष छिपा है—
उसने मुगल साम्राज्य का विस्तार उसकी प्रशासनिक क्षमता से आगे कर दिया।
अकबर ने जिन राजपूतों को साम्राज्य की शक्ति बनाया था, उनके एक हिस्से को औरंगज़ेब ने संघर्ष में धकेल दिया।
जहांगीर के समय से तनावग्रस्त सिख संबंध उसके शासन में शहादत और सैन्य संगठन के नए चरण में पहुँचे।
शिवाजी के नेतृत्व में सुदृढ़ हुई मराठा शक्ति ने औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद पूरे भारत की राजनीति को प्रभावित किया।
इसलिए औरंगज़ेब को केवल “अंतिम शक्तिशाली मुगल” कहना पर्याप्त नहीं।
वह एक शक्तिशाली सेनानायक, अत्यंत परिश्रमी प्रशासक और धार्मिक रूप से दृढ़ शासक था।
लेकिन साथ ही उसकी नीतियों और उसके अंतहीन युद्धों ने उस साम्राज्य की कई राजनीतिक साझेदारियों और आर्थिक आधारों को कमजोर किया जिन पर अकबर ने मुगल शक्ति खड़ी की थी।
1707 में उसकी मृत्यु के समय मुगल साम्राज्य का नक्शा विशाल था—
पर उसकी नींव थक चुकी थी।
और यही कारण है कि अगले अध्याय में, बहादुर शाह प्रथम — 1707–1712, से हम मुगल इतिहास के एक बिल्कुल नए चरण में प्रवेश करते हैं—
जहाँ बादशाह अब भी दिल्ली में है, लेकिन साम्राज्य की वास्तविक शक्ति धीरे-धीरे उसके हाथों से निकलने लगती है।