करगिल समीक्षा समिति और रक्षा सुधार
खुफिया समन्वय, सीमा निगरानी और उच्च रक्षा प्रबंधन में युद्ध के बाद हुए संस्थागत परिवर्तन
युद्ध समाप्त होते ही भारत ने केवल विजय का उत्सव नहीं मनाया; उसने आश्चर्य, खुफिया कमियों और रक्षा प्रबंधन की संरचना की सार्वजनिक समीक्षा कराई। के. सुब्रह्मण्यम की अध्यक्षता वाली करगिल समीक्षा समिति और उसके बाद मंत्रियों के समूह ने राष्ट्रीय सुरक्षा सुधारों का व्यापक एजेंडा रखा।
गठन, दायरा और प्रमुख निष्कर्ष
सरकार ने जुलाई 1999 में समिति गठित की। अध्यक्ष के. सुब्रह्मण्यम के साथ लेफ्टिनेंट जनरल के. के. हजारी, बी. जी. वर्गीज और सदस्य-सचिव सतीश चंद्र शामिल थे। समिति ने सौ से अधिक बैठकों, आधिकारिक दस्तावेजों और क्षेत्रीय यात्राओं के आधार पर रिपोर्ट तैयार की; फरवरी 2000 में इसे संसद में रखा गया।
समिति ने निष्कर्ष निकाला कि बड़े पैमाने की पाकिस्तानी सैन्य घुसपैठ ने सरकार, सेना और खुफिया संस्थाओं को आश्चर्यचकित किया। अलग-अलग संकेत उपलब्ध थे, लेकिन संग्रह, साझा करने और संयुक्त आकलन की व्यवस्था उन्हें प्रभावी चेतावनी में नहीं बदल सकी। उसने किसी एक व्यक्ति को दोषी ठहराने के बजाय प्रणालीगत समीक्षा पर बल दिया।
सूचना से संयुक्त आकलन तक
समिति ने मानव खुफिया, तकनीकी निगरानी, एजेंसियों के बीच समन्वय और सैन्य खुफिया क्षमताओं में कमियाँ दर्ज कीं। केवल सूचना एकत्र होना पर्याप्त नहीं; उसे भूगोल, शत्रु की क्षमता और बदलती मंशा से जोड़कर समय पर निर्णयकर्ताओं तक पहुँचाना आवश्यक है।
बाद के सुधारों में Defence Intelligence Agency, Multi Agency Centre और तकनीकी खुफिया क्षमताओं का विस्तार शामिल हुआ। उपग्रह, मानव रहित विमान, सेंसर, संचार-अवरोध और चित्र-विश्लेषण पर निवेश बढ़ा। संस्थागत ढाँचा मजबूत हुआ, हालांकि वास्तविक प्रभाव निरंतर अभ्यास और साझा संस्कृति पर निर्भर करता है।
वर्षभर निगरानी और जिम्मेदारी की स्पष्टता
उच्च हिमालयी क्षेत्रों में चौकियों, गश्त, हवाई निगरानी और रसद का पुनर्मूल्यांकन किया गया। लक्ष्य हर ऊँचाई का अंधाधुंध ‘सियाचिनीकरण’ नहीं, बल्कि जोखिम-आधारित निगरानी, महत्वपूर्ण अंतरालों का कवरेज और असामान्य गतिविधि पर शीघ्र प्रतिक्रिया था।
सीमा प्रबंधन पर मंत्रियों के समूह ने ‘एक सीमा, एक प्रमुख बल’ जैसी जिम्मेदारी-आधारित सोच को आगे बढ़ाया। सड़क, संचार, अग्रिम भंडार और वैकल्पिक मार्गों के विकास को सामरिक तैयारी का हिस्सा माना गया।
HQ IDS, DIA और CDS
2001 के बाद Headquarters Integrated Defence Staff और Defence Intelligence Agency की स्थापना ने संयुक्त योजना तथा सैन्य खुफिया के लिए नई संस्थागत व्यवस्था दी। अंडमान और निकोबार कमान पहली त्रि-सेवा थिएटर कमान बनी। रक्षा खरीद, आधुनिक उपकरण और विशेष गोला-बारूद की उपलब्धता पर भी नई प्राथमिकता बनी।
सरकार को एकल-बिंदु सैन्य सलाह की मूल आवश्यकता पर लंबी बहस के बाद 2019 में Chief of Defence Staff का पद और 2020 में Department of Military Affairs अस्तित्व में आए। इन्हें केवल करगिल का सीधा परिणाम कहना सरलता होगी, लेकिन करगिल ने संयुक्तता और शीर्ष रक्षा प्रबंधन की कमी को राष्ट्रीय एजेंडा अवश्य बनाया।
सुधार एक निरंतर प्रक्रिया
तकनीकी साधन और नई संस्थाएँ आवश्यक हैं, पर वे स्वतः समन्वय सुनिश्चित नहीं करतीं। साझा डेटाबेस, संयुक्त प्रशिक्षण, स्पष्ट कमान, आधुनिक खरीद, गोला-बारूद भंडार और राजनीतिक–सैन्य संवाद की नियमित समीक्षा आवश्यक रहती है।
करगिल की सबसे स्थायी सीख यह है कि शांति काल में धारणाएँ कठोर नहीं होने दी जानी चाहिए। शत्रु की क्षमता, मंशा और नई तकनीक के आधार पर खतरे का आकलन लगातार बदलना चाहिए; अन्यथा बिखरे संकेत फिर एक बार रणनीतिक आश्चर्य में बदल सकते हैं।
करगिल समीक्षा प्रक्रिया स्वतंत्र भारत में राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था की दुर्लभ सार्वजनिक आत्मसमीक्षा थी। उसके बाद अनेक संस्थाएँ बनीं, फिर भी सुधार को पूर्ण मान लेना उसी मानसिक जड़ता को जन्म दे सकता है जिसकी आलोचना रिपोर्ट ने की थी। संस्थागत संरचना, संयुक्त कार्य-संस्कृति और संसाधन—तीनों का निरंतर परीक्षण आवश्यक है।