पाकिस्तान, कूटनीति और विश्व प्रतिक्रिया
नियमित सेना की भूमिका, अंतरराष्ट्रीय अलगाव और नियंत्रण रेखा के सम्मान पर वैश्विक सहमति
करगिल युद्ध का परिणाम केवल ऊँचाइयों पर नहीं तय हुआ। भारत ने संघर्ष को अपने क्षेत्र तक सीमित रखकर और नियंत्रण रेखा न पार करके कूटनीतिक विश्वसनीयता अर्जित की, जबकि पाकिस्तान अपने ‘मुजाहिदीन’ दावे और नियमित सेना की वास्तविक भूमिका के बीच फँस गया।
सैन्य लाभ से राजनीतिक संकट तक
प्रारंभिक घुसपैठ ने पाकिस्तान को सामरिक आश्चर्य दिया, लेकिन ऊँचाइयों पर तैनात सैनिकों की आपूर्ति भारतीय तोपखाने और वायु शक्ति के सामने टिकाऊ नहीं रही। नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री की हताहत संख्या पर स्रोतों में बड़ा अंतर है; भारत ने अधिक अनुमान दिए, जबकि पाकिस्तान की प्रारंभिक आधिकारिक स्वीकारोक्ति कम रही। इसलिए किसी एक संख्या को निर्विवाद मानना उचित नहीं है।
युद्ध ने प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ के बीच निर्णय, जानकारी और उत्तरदायित्व पर विवाद को तीखा किया। अक्टूबर 1999 में मुशर्रफ के सैन्य तख्तापलट की पृष्ठभूमि में करगिल से पैदा अविश्वास एक महत्वपूर्ण तत्व बना, यद्यपि राजनीतिक संकट के अन्य कारण भी थे।
नियंत्रण रेखा न पार करने का निर्णय
भारत ने सैन्य कार्रवाई को नियंत्रण रेखा के अपने भाग से घुसपैठियों को हटाने तक सीमित रखा। इससे कुछ लक्ष्यों पर हमला कठिन हुआ और सैनिक लागत बढ़ी, किंतु अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का पक्ष स्पष्ट रहा—वह यथास्थिति बदलने नहीं, अपने क्षेत्र की पुनर्प्राप्ति के लिए लड़ रहा था।
नियमित ब्रीफिंग, कब्जे में मिले दस्तावेज, पाकिस्तानी सैनिकों की पहचान और मुशर्रफ–अजीज टेलीफोन वार्ता के सार्वजनिक होने से पाकिस्तान के आधिकारिक कथन की विश्वसनीयता कमजोर हुई। सूचना और कूटनीति का यह संयोजन सैन्य अभियान का महत्वपूर्ण सहायक बना।
अमेरिका, G-8, रूस, चीन और संयुक्त राष्ट्र
अमेरिका ने पाकिस्तान से नियंत्रण रेखा का सम्मान और घुसपैठियों की वापसी सुनिश्चित करने को कहा। 4 जुलाई 1999 को राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की वॉशिंगटन बैठक के बाद नियंत्रण रेखा की बहाली की दिशा स्पष्ट हुई। यह पाकिस्तान की अपेक्षित अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता से भिन्न परिणाम था।
G-8 के कोलोन वक्तव्य ने नियंत्रण रेखा के उल्लंघन पर चिंता जताई और उसके सम्मान पर बल दिया। रूस ने भारत की क्षेत्रीय अखंडता और द्विपक्षीय समाधान का समर्थन किया। चीन ने संयम, बातचीत और स्थिति न बिगाड़ने पर जोर दिया, पर पाकिस्तान के कब्जे को खुला समर्थन नहीं दिया।
संयुक्त राष्ट्र ने नया मध्यस्थतापूर्ण समाधान थोपने के बजाय दोनों देशों से संयम की अपेक्षा की; व्यापक विश्व मत शिमला समझौते और नियंत्रण रेखा के सम्मान की दिशा में रहा। अन्य देशों की प्रतिक्रियाओं में भी संघर्ष सीमित रखने और पाकिस्तानी वापसी की आवश्यकता प्रमुख थी।
वापसी, विजय की घोषणा और युद्ध का अंत
4 जुलाई की वॉशिंगटन बैठक, उसी समय टाइगर हिल की भारतीय सफलता और मैदान में बिगड़ती पाकिस्तानी स्थिति ने वापसी का रास्ता बनाया। 11 जुलाई को सैन्य महानिदेशकों के स्तर पर वापसी की प्रक्रिया पर सहमति हुई। भारतीय सेना ने दबाव बनाए रखते हुए खाली कराए जा रहे क्षेत्रों का सत्यापन किया।
14 जुलाई को प्रधानमंत्री वाजपेयी ने ऑपरेशन विजय की सफलता की घोषणा की, यद्यपि सैन्य सफाई और सत्यापन जारी रहा। 26 जुलाई को भारतीय सेना ने अभियान पूरा होने और घुसपैठियों की बेदखली की घोषणा की। इसलिए 14 और 26 जुलाई दोनों अलग संदर्भों में महत्वपूर्ण तिथियाँ हैं।
भारत की कूटनीतिक सफलता सैन्य संयम, साक्ष्य-आधारित सार्वजनिक संचार और नियंत्रण रेखा के सम्मान की नीति से बनी। पाकिस्तान की योजना इस धारणा पर टिकी थी कि विश्व समुदाय शीघ्र हस्तक्षेप कर कब्जे को सौदेबाजी में बदल देगा; हुआ उलटा—अंतरराष्ट्रीय दबाव उसके पीछे हटने का कारण बना।