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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–004 · अध्याय 13

वारली आंदोलन

1945 से 2026 तक—वेठ-बेगार और मजदूरी के संघर्ष से भूमि, जंगल, वनाधिकार और आदिवासी अस्मिता तक

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskसंपादित विस्तृत शोध संस्करण · 24 अगस्त 2026

वारली आंदोलन भारतीय किसान इतिहास, आदिवासी अधिकार और श्रम-मुक्ति की परस्पर जुड़ी यात्रा है। 1945 में महाराष्ट्र के ठाणे क्षेत्र में वेठ-बेगार और अत्यंत कम मजदूरी के विरुद्ध उठा यह संघर्ष खेत, जंगल, कर्ज, लैंगिक उत्पीड़न और ग्रामीण सत्ता के प्रश्नों तक फैला। शामराव और गोदावरी परुलेकर, किसान सभा तथा स्थानीय वारली कार्यकर्ताओं के संगठन ने इसे दीर्घकालीन आंदोलन बनाया। यह अध्ययन दमन और गोलीकांडों के साथ भूमि सुधार, वनभूमि सत्याग्रह, वन अधिकार कानून और समकालीन किसान–आदिवासी राजनीति तक उसकी विरासत की संतुलित पड़ताल करता है।

अध्याय 1

भूमिका — भारतीय किसान और आदिवासी आंदोलनों में वारली आंदोलन का स्थान

भारतीय किसान आंदोलनों का इतिहास केवल लगान घटाने, जमीन का स्वामित्व हासिल करने या जमींदारी व्यवस्था के विरोध का इतिहास नहीं है। देश के अनेक हिस्सों में किसान प्रश्न जाति, जनजातीय पहचान, जंगल पर अधिकार, मजदूरी, कर्ज, बेगार और सामाजिक सम्मान के प्रश्नों के साथ जुड़ा हुआ था। महाराष्ट्र का वारली आंदोलन इसी व्यापक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। 1940 के दशक में तत्कालीन बंबई प्रांत के ठाणे जिले में उभरा यह आंदोलन भारतीय किसान संघर्ष और आदिवासी प्रतिरोध—दोनों धाराओं के मिलन का उल्लेखनीय उदाहरण बना।

वारली आंदोलन की विशेषता यह थी कि इसमें संघर्ष करने वाला समुदाय केवल खेत जोतने वाला किसान नहीं था। वारली आदिवासी खेतिहर मजदूर भी थे, छोटे काश्तकार भी, जंगल और उससे मिलने वाले संसाधनों पर निर्भर श्रमिक भी और अनेक मामलों में कर्ज तथा परंपरागत बंधनों में फंसे हुए आश्रित श्रमिक भी थे। इस कारण उनके सामने केवल भूमि का प्रश्न नहीं था। कम मजदूरी, जबरन श्रम, कर्ज, साहूकारी, भू-स्वामियों की मनमानी और सामाजिक उत्पीड़न एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।

इसीलिए वारली आंदोलन को समझने के लिए उसे केवल 'किसान विद्रोह' या केवल 'आदिवासी विद्रोह' कहना पर्याप्त नहीं है। वह कृषि संबंधों को बदलने, श्रम की कीमत निर्धारित कराने, बेगार और बंधुआपन से मुक्ति पाने तथा आदिवासी समाज को संगठित राजनीतिक शक्ति में बदलने का आंदोलन था।

किसान आंदोलन और आदिवासी प्रतिरोध का संगम

औपनिवेशिक भारत में किसान आंदोलनों की एक लंबी परंपरा रही। नील विद्रोह, पाबना आंदोलन, दक्कन दंगे, चंपारण सत्याग्रह, खेड़ा सत्याग्रह, अवध किसान आंदोलन, एका आंदोलन और बारडोली सत्याग्रह जैसे संघर्षों में भूमि, लगान, कर्ज और औपनिवेशिक कृषि व्यवस्था प्रमुख प्रश्न रहे। लेकिन आदिवासी क्षेत्रों की परिस्थितियां कई मायनों में अलग थीं।

आदिवासी समुदायों के लिए जमीन केवल उत्पादन का साधन नहीं थी। जंगल, चरागाह, जलस्रोत और सामुदायिक संसाधन उनके सामाजिक तथा आर्थिक जीवन का हिस्सा थे। औपनिवेशिक वन कानूनों, निजी भू-स्वामित्व के विस्तार, साहूकारी और बाजार अर्थव्यवस्था के प्रवेश ने इन परंपरागत संबंधों को बदल दिया।

वारली क्षेत्र में इसका परिणाम यह हुआ कि आदिवासी आबादी का एक बड़ा हिस्सा भू-स्वामियों, साहूकारों, ठेकेदारों और प्रशासनिक संरचना के सामने अत्यंत कमजोर स्थिति में पहुंच गया। ऐतिहासिक अध्ययनों में उस समय के वारली समाज में वेठ या जबरन श्रम, अत्यंत कम मजदूरी, ऊंचे किराये, सूदखोरी और आर्थिकेतर दबाव की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है।

इस प्रकार वारली आंदोलन में दो ऐतिहासिक परंपराएं एक साथ दिखाई देती हैं—आदिवासी समुदाय का स्थानीय शोषण के विरुद्ध प्रतिरोध और संगठित किसान आंदोलन की आधुनिक राजनीतिक संरचना।

ठाणे : आंदोलन का भूगोल

आज वारली आंदोलन से जुड़े अनेक इलाके महाराष्ट्र के पालघर जिले में आते हैं, लेकिन आंदोलन के समय वे तत्कालीन ठाणे जिले का हिस्सा थे। दहानू, तलासरी, पालघर और उस समय के उमरगांव क्षेत्र आंदोलन के महत्वपूर्ण केंद्र बने। शोध साहित्य में 1945–47 के आंदोलन को मुख्यतः इन्हीं क्षेत्रों में फैले किसान सभा के नेतृत्व वाले वारली संघर्ष के रूप में दर्ज किया गया है।

यह भौगोलिक तथ्य महत्वपूर्ण है क्योंकि आज के प्रशासनिक नक्शे को अतीत पर लागू करने से भ्रम उत्पन्न हो सकता है। पालघर जिला बहुत बाद में ठाणे से अलग हुआ। इसलिए समकालीन दस्तावेजों और साहित्य में बार-बार 'ठाणे' या पुराने अंग्रेजी लेखन में 'Thana' का उल्लेख मिलता है।

1940 का दशक : आंदोलन के लिए बनी ऐतिहासिक परिस्थितियां

वारली आंदोलन अचानक पैदा नहीं हुआ था। उसकी पृष्ठभूमि कई दशकों में तैयार हुई थी। औपनिवेशिक शासन के दौरान भूमि और जंगल संबंधी व्यवस्थाओं में परिवर्तन, साहूकारी का विस्तार, कृषि श्रमिकों की निर्भरता और स्थानीय भू-स्वामियों की शक्ति ने असंतोष की जमीन तैयार की।

द्वितीय विश्वयुद्ध के वर्षों ने ग्रामीण भारत में आर्थिक दबाव और बढ़ा दिया। महंगाई और खाद्य संकट ने गरीब किसानों और मजदूरों की स्थिति अधिक कठिन कर दी। इसी समय राष्ट्रीय राजनीति भी निर्णायक परिवर्तन से गुजर रही थी। ब्रिटिश शासन के अंत की संभावना स्पष्ट होने लगी थी और देश के विभिन्न हिस्सों में किसान तथा मजदूर संगठन तेजी से सक्रिय हो रहे थे।

1940 के दशक का उत्तरार्ध भारतीय कृषि संघर्षों की दृष्टि से विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा। बंगाल में तेभागा, हैदराबाद राज्य में तेलंगाना और महाराष्ट्र में वारली जैसे आंदोलन लगभग इसी व्यापक राजनीतिक वातावरण में उभरे। इन आंदोलनों में स्थानीय परिस्थितियां अलग-अलग थीं, लेकिन भूमि, मजदूरी, सामंती अथवा अर्ध-सामंती संबंधों और ग्रामीण सत्ता-संरचना को चुनौती देने का तत्व समान था।

इसी कारण वारली आंदोलन को अलग-थलग स्थानीय घटना के बजाय स्वतंत्रता के ठीक पहले उभरी भारतीय किसान राजनीति की उग्र धारा के संदर्भ में देखना अधिक उपयोगी है। किसान सभा से जुड़े साहित्य में भी इसे द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद और स्वतंत्रता से पहले उभरे व्यापक किसान संघर्षों की श्रृंखला में रखा गया है।

महाराष्ट्र राज्य किसान सभा और संगठनात्मक मोड़

वारली आंदोलन के इतिहास में 1945 निर्णायक वर्ष था।

ठाणे जिले के टिटवाला में महाराष्ट्र किसान सभा का प्रांतीय संगठन खड़ा हुआ। उपलब्ध शोध के अनुसार जनवरी 1945 में आयोजित सम्मेलन में हजारों किसानों ने भाग लिया। शामराव परुलेकर महासचिव और गोदावरी परुलेकर संयुक्त सचिवों में शामिल थीं। इस सम्मेलन में ठाणे क्षेत्र के आदिवासी प्रतिनिधियों की भागीदारी भी हुई।

यह संगठनात्मक विकास इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे स्थानीय असंतोष को एक व्यापक किसान संगठन का ढांचा मिला।

अब आदिवासी किसान और मजदूर की समस्या केवल किसी एक भू-स्वामी के खिलाफ शिकायत नहीं रह गई। उसके पीछे सभा, कार्यकर्ता, बैठकें, सामूहिक मांगें और राजनीतिक विचार मौजूद होने लगे।

व्यक्तिगत असंतोष सामूहिक प्रतिरोध में बदलने लगा।

यही परिवर्तन वारली आंदोलन की ऐतिहासिक शक्ति का आधार बना।

गोदावरी और शामराव परुलेकर

वारली आंदोलन के इतिहास में गोदावरी परुलेकर और शामराव परुलेकर केंद्रीय व्यक्तित्व हैं। दोनों किसान सभा और कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़े थे तथा उन्होंने वारली समुदाय को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

लेकिन आंदोलन को केवल दो नेताओं की कहानी के रूप में प्रस्तुत करना भी इतिहास को अधूरा कर देगा।

आंदोलन की वास्तविक शक्ति उन हजारों आदिवासी पुरुषों और महिलाओं से आई जिन्होंने गांवों में संगठन खड़े किए, सभाओं में भाग लिया, काम रोकने और सामूहिक मांग रखने का जोखिम उठाया और दमन के बावजूद संगठन बनाए रखा। बाद के मौखिक इतिहास संबंधी अध्ययनों ने विशेष रूप से स्थानीय वारली कार्यकर्ताओं की भूमिका सामने लाने का प्रयास किया है।

इसलिए इस शोध में नेतृत्व के साथ-साथ स्थानीय आदिवासी नेतृत्व और सामान्य आंदोलनकारियों को भी पर्याप्त स्थान देना आवश्यक है।

मजदूरी से शुरू होकर व्यवस्था तक पहुंचता संघर्ष

वारली आंदोलन की शुरुआती महत्वपूर्ण मांगों में कृषि और विशेष रूप से घास काटने वाले श्रमिकों की मजदूरी का प्रश्न था। लेकिन आंदोलन शीघ्र ही इससे आगे बढ़ा।

किसान सभा की लामबंदी ने जिन प्रश्नों को उठाया उनमें शामिल थे—

• जबरन श्रम और वेठ-बेगार का अंत,

• बंधुआ श्रम जैसी व्यवस्थाओं से मुक्ति,

• कृषि मजदूरी में वृद्धि,

• घास काटने वाले श्रमिकों के लिए बेहतर भुगतान,

• भू-स्वामियों और साहूकारों के शोषण का प्रतिरोध,

• काश्त और जमीन से जुड़े अधिकार,

• जंगल और आजीविका के संसाधनों तक पहुंच,

अध्याय 2

वारली कौन थे? — समाज, संस्कृति, आजीविका और औपनिवेशिक काल का आदिवासी जीवन

वारली आंदोलन को समझने के लिए सबसे पहले उस समाज को समझना आवश्यक है जिसने 1940 के दशक में इस संघर्ष को जन्म दिया। यदि केवल 1945 के आंदोलन, किसान सभा और गोदावरी–शामराव परुलेकर के नेतृत्व से कहानी शुरू की जाए तो यह प्रश्न अनुत्तरित रह जाएगा कि आखिर हजारों वारली आदिवासी इतने व्यापक संघर्ष के लिए तैयार क्यों हुए।

उनकी राजनीतिक चेतना के पीछे एक लंबा सामाजिक और आर्थिक इतिहास था।

वारली पश्चिमी भारत का एक प्रमुख आदिवासी समुदाय है, जिसकी ऐतिहासिक बसावट महाराष्ट्र और गुजरात की सीमा से जुड़े पहाड़ी, वनवर्ती और तटीय क्षेत्रों में रही है। महाराष्ट्र में उनकी बड़ी आबादी पुराने ठाणे जिले तथा नासिक क्षेत्र में रही। आज पुराने ठाणे जिले के वारली बहुल अनेक इलाके पालघर जिले में आते हैं। गुजरात के वलसाड और डांग तथा दादरा और नगर हवेली क्षेत्र में भी वारली समुदाय की उपस्थिति रही है। महाराष्ट्र के आधिकारिक और संदर्भ स्रोत वारलियों को अनुसूचित जनजाति के रूप में दर्ज करते हैं।

उनका परंपरागत जीवन खेती, जंगल, पशुपालन और सामुदायिक श्रम के बीच विकसित हुआ था। इसलिए औपनिवेशिक शासन में जब जमीन, जंगल और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के संबंध बदले, तो वारली समाज पर उसका प्रभाव केवल आय में कमी तक सीमित नहीं रहा। उनके जीवन की पूरी संरचना प्रभावित हुई।

1. वारली नाम और समुदाय की पहचान

'वारली' अथवा 'वरली' नाम की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों और मानवशास्त्रियों में पूर्ण सहमति नहीं है। अलग-अलग व्युत्पत्तियां और स्थानीय परंपराएं प्रचलित रही हैं। इसलिए किसी एक व्याख्या को निश्चित ऐतिहासिक तथ्य मानना उचित नहीं होगा। मराठी विश्वकोश भी स्पष्ट करता है कि नाम की व्युत्पत्ति के संबंध में विद्वानों में मतैक्य नहीं है।

यह सावधानी महत्वपूर्ण है क्योंकि औपनिवेशिक काल में जनजातीय समुदायों को वर्गीकृत करते समय ब्रिटिश अधिकारियों और मानवशास्त्रियों ने कई बार स्थानीय सामाजिक पहचानों को अपनी प्रशासनिक श्रेणियों में बांध दिया था।

वारली स्वयं को केवल किसी प्रशासनिक 'ट्राइब' के रूप में नहीं देखते थे। उनकी सामुदायिक पहचान भूमि, पूर्वजों, देवी-देवताओं, विवाह-संबंधों, त्योहारों, प्रकृति और गांव की सामाजिक संरचना से निर्मित होती थी।

वारली भाषा की अपनी मौखिक परंपरा रही। केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय के प्रकाशन में भी उल्लेख है कि आधुनिक काल तक वारली समाज में लिखित शब्द की परंपरा सीमित थी और कला तथा मौखिक परंपराएं सांस्कृतिक ज्ञान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचाने के महत्वपूर्ण माध्यम थीं।

इसका एक महत्वपूर्ण परिणाम यह है कि वारली इतिहास के प्रारंभिक लिखित स्रोतों का बड़ा हिस्सा वारलियों द्वारा नहीं, बल्कि उनके बारे में बाहरी लोगों द्वारा लिखा गया है।

यही कारण है कि औपनिवेशिक अभिलेखों को पढ़ते समय अतिरिक्त सावधानी जरूरी है।

2. वारली भूगोल : सह्याद्रि, जंगल और समुद्र के बीच

वारली समाज के निर्माण में भूगोल की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका थी।

उनकी बड़ी आबादी सह्याद्रि की पश्चिमी ढलानों, पहाड़ी क्षेत्रों, जंगलों और अरब सागर की ओर उतरने वाले मैदानों के बीच रहती थी। वर्तमान पालघर क्षेत्र के दहानू, तलासरी, जव्हार, मोखाडा और विक्रमगढ़ जैसे इलाके वारली जीवन के महत्वपूर्ण केंद्र रहे हैं।

इस भूभाग को मोटे तौर पर तीन परस्पर जुड़े आर्थिक क्षेत्रों में समझा जा सकता है—

पहाड़ी और वन क्षेत्र, जहां जंगल से भोजन, ईंधन, लकड़ी, औषधियां तथा अन्य वन-उत्पाद प्राप्त होते थे;

कृषि क्षेत्र, जहां धान, नाचणी, वरी और दालों जैसी फसलें उगाई जाती थीं;

और तटीय तथा मैदानी क्षेत्र, जहां कृषि के साथ बागवानी, मजदूरी और दूसरे आर्थिक अवसर उपलब्ध थे।

महाराष्ट्र सरकार के भूजल सर्वेक्षण एवं विकास अभिकरण के विवरण में भी ठाणे क्षेत्र के पहाड़ी आदिवासी इलाकों में खेती के साथ ईंधन की लकड़ी, शहद, लाख और औषधीय वनस्पतियों के संग्रह को आजीविका का हिस्सा बताया गया है।

इसलिए वारली अर्थव्यवस्था को केवल 'कृषि अर्थव्यवस्था' कहना पर्याप्त नहीं होगा।

वह मूलतः कृषि–वन आधारित मिश्रित अर्थव्यवस्था थी।

3. गांव नहीं, 'पाड़ा' : बसावट की सामाजिक संरचना

वारली आबादी अक्सर बड़े केंद्रीकृत गांवों के बजाय छोटे-छोटे समूहों अथवा बस्तियों में रहती थी। इन्हें स्थानीय रूप से पाड़ा कहा जाता है।

एक पाड़े में सीमित संख्या में परिवार रहते और उनके बीच रिश्तेदारी, सामुदायिक श्रम तथा सांस्कृतिक संबंध मजबूत होते थे।

इस बसावट का राजनीतिक महत्व भी था।

आधुनिक राज्य के लिए बिखरी हुई छोटी आदिवासी बस्तियों तक प्रशासन, विद्यालय, न्यायालय, बाजार और संचार व्यवस्था पहुंचाना कठिन था। लेकिन स्थानीय भू-स्वामी, साहूकार, वन अधिकारी अथवा राजस्व कर्मचारी उस क्षेत्र में वारली परिवारों पर कहीं अधिक प्रत्यक्ष प्रभाव रखते थे।

इसका अर्थ यह हुआ कि वारली आदिवासी आधुनिक राज्य से दूर था, लेकिन स्थानीय सत्ता से मुक्त नहीं था।

यही विरोधाभास बाद में उसके शोषण का एक महत्वपूर्ण आधार बना।

4. कृषि : जीवन का केंद्रीय आधार

वारली समाज की अर्थव्यवस्था में खेती प्रमुख थी।

धान उनका महत्वपूर्ण खाद्यान्न था। इसके अतिरिक्त नाचणी, वरी, उड़द, तूर तथा सब्जियां भी उगाई जाती थीं। मराठी विश्वकोश के विवरण में कृषि को वारलियों का मुख्य व्यवसाय बताया गया है, लेकिन साथ ही यह भी दर्ज है कि बड़ी संख्या में वारलियों के पास अपनी पर्याप्त जमीन नहीं थी और उन्हें किराये अथवा अनुबंध पर खेती करनी पड़ती थी। खेत-मजदूरी, पशुपालन और जंगल से संबंधित काम भी आजीविका के महत्वपूर्ण साधन थे।

केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय भी वारलियों को छोटे स्तर के कृषक के रूप में वर्णित करता है जो धान, दाल और सब्जियां उगाते रहे हैं।

खेती मुख्यतः वर्षा पर निर्भर थी।

इसका सीधा अर्थ था कि खराब मानसून केवल उत्पादन घटने का प्रश्न नहीं था। वह भोजन, कर्ज और अगले कृषि चक्र—तीनों को संकट में डाल सकता था।

ऐसी अर्थव्यवस्था में कुछ महीनों की फसल खराब होने का अर्थ परिवार का साहूकार के पास पहुंचना हो सकता था।

और यही वह दरवाजा था जिससे कर्ज आर्थिक निर्भरता में और आर्थिक निर्भरता श्रम-बंधन में बदल सकती थी।

5. जंगल : बाजार नहीं, जीवन का विस्तार

वारली समाज और जंगल के संबंध को आधुनिक बाजार की भाषा में केवल 'वन-उत्पाद संग्रह' के रूप में नहीं समझा जा सकता।

जंगल उनके लिए भोजन का पूरक स्रोत था।

वह पशुओं के लिए संसाधन उपलब्ध कराता था।

वह औषधीय वनस्पतियां देता था।

घरों और कृषि के लिए आवश्यक सामग्री भी वहीं से मिलती थी।

और सबसे बढ़कर जंगल उनके धार्मिक और सांस्कृतिक संसार का हिस्सा था।

जनजातीय कार्य मंत्रालय के विवरण में वारली विश्वास प्रणाली और कला को सदियों से वनभूमि पर आधारित जीवन से जुड़ा बताया गया है।

इसीलिए औपनिवेशिक वन-व्यवस्था में परिवर्तन को केवल सरकारी वन-प्रबंधन का प्रशासनिक सुधार मानना गलत होगा।

जब राज्य जंगल पर अपना कानूनी नियंत्रण बढ़ाता है और किसी समुदाय के परंपरागत उपयोग को अनुमति, निषेध और दंड की श्रेणियों में बांटता है, तो उस समुदाय के जीवन की स्वायत्तता भी बदलती है।

वारली समाज के साथ भी यही हुआ।

6. जमीन पर अधिकार और उसका धीरे-धीरे क्षरण

वारली आंदोलन की जड़ों तक पहुंचने वाला सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न जमीन का है।

औपनिवेशिक प्रशासन ने भूमि सर्वेक्षण, राजस्व निर्धारण, लिखित रिकॉर्ड और निजी स्वामित्व की अधिक औपचारिक व्यवस्था विकसित की।

कागज पर यह व्यवस्था अधिक स्पष्ट दिखाई देती थी।

राजस्व रिकॉर्ड में नाम किसका है?

दस्तावेज किसके पास है?

अध्याय 3

ठाणे क्षेत्र की कृषि और भूमि व्यवस्था — जमीन, जंगल और आदिवासी किसान

वारली आंदोलन की आर्थिक जड़ों को समझने के लिए तत्कालीन ठाणे जिले की कृषि और भूमि व्यवस्था का अध्ययन अनिवार्य है। 1945 का संघर्ष केवल कम मजदूरी या किसी एक भू-स्वामी की ज्यादती के कारण नहीं फूटा था। उसके पीछे भूमि-अधिकार, वन संसाधनों पर नियंत्रण, साहूकारी, किरायेदारी, मजबूर श्रम और औपनिवेशिक राज्य की राजस्व व्यवस्था से निर्मित एक दीर्घकालीन कृषि संकट था।

बीसवीं शताब्दी के मध्य तक वारली समाज का बड़ा हिस्सा ऐसी स्थिति में पहुंच चुका था जहां वह जमीन पर काम तो करता था, लेकिन जमीन का स्वामी नहीं था; जंगल उसके जीवन का आधार था, लेकिन जंगल पर अधिकार राज्य का था; खेती उसकी आजीविका थी, लेकिन फसल का हिस्सा भू-स्वामी और साहूकार ले जाते थे; और श्रम उसका सबसे बड़ा संसाधन था, किंतु उस श्रम की कीमत भी वह स्वतंत्र रूप से निर्धारित नहीं कर सकता था।

इसलिए वारली आंदोलन की कहानी मूलतः जमीन, जंगल और श्रम पर अधिकार की कहानी है।

1. तत्कालीन ठाणे : एक असमान कृषि भूगोल

ब्रिटिश शासन के समय ठाणे जिला आज की प्रशासनिक सीमाओं से कहीं बड़ा था। वर्तमान पालघर जिले के दहानू, तलासरी, पालघर और आसपास के आदिवासी क्षेत्र उसी ठाणे जिले का हिस्सा थे। वारली आंदोलन का मुख्य विस्तार उमरगांव, दहानू और पालघर तालुकों में हुआ। किसान सभा से जुड़े बाद के शोध में इन्हीं क्षेत्रों को 1945–47 के वारली विद्रोह का मुख्य भूगोल बताया गया है।

इस इलाके का प्राकृतिक भूगोल समान नहीं था।

एक तरफ समुद्रतटीय उपजाऊ पट्टी थी, जहां कृषि और बागवानी अपेक्षाकृत लाभकारी हो सकती थी।

दूसरी तरफ पहाड़ी और वन क्षेत्र थे, जहां वारली सहित अनेक आदिवासी समुदाय निर्वाह कृषि, जंगल से प्राप्त संसाधनों और मौसमी मजदूरी पर निर्भर रहते थे।

इस भौगोलिक विषमता का सामाजिक परिणाम भी था।

समृद्ध कृषि भूमि और बाजार से जुड़े हिस्सों पर गैर-आदिवासी भू-स्वामियों, व्यापारियों और साहूकारों का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक बढ़ा, जबकि पहाड़ी और वनवर्ती क्षेत्रों में आदिवासी आबादी आर्थिक रूप से पिछड़ती गई।

इस प्रकार ठाणे का कृषि भूगोल धीरे-धीरे वर्गीय और जातीय-सामुदायिक भूगोल में भी बदल गया।

2. पारंपरिक कृषि : निर्वाह, जंगल और सामुदायिक संसाधन

औपनिवेशिक हस्तक्षेप से पहले वारली कृषि का स्वरूप आधुनिक वाणिज्यिक खेती जैसा नहीं था।

अर्थव्यवस्था मुख्यतः निर्वाह-आधारित थी। परिवार अपनी आवश्यकता के लिए धान, मोटे अनाज, दालें और अन्य स्थानीय फसलें उगाता था। खेती के साथ जंगल से फल, कंद, लकड़ी, चारा, शहद, औषधीय सामग्री और दूसरे संसाधन प्राप्त होते थे।

कृषि और वन अलग-अलग आर्थिक क्षेत्र नहीं थे।

वे एक ही जीविका-व्यवस्था के हिस्से थे।

इंद्रा मुंशी सलढाणा के ठाणे जिले की पारंपरिक कृषि पद्धतियों पर अध्ययन में दलही और राब जैसी खेती की प्रणालियों का उल्लेख मिलता है। अध्ययन 1818 में ब्रिटिश नियंत्रण से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक यह दिखाता है कि भूमि-राजस्व और वन नीतियों ने पारंपरिक कृषि-पारिस्थितिकी को प्रभावित किया।

इसलिए वारली किसान का भूमि से संबंध केवल खेत की सीमारेखा से निर्धारित नहीं होता था।

उसके जीवन की आर्थिक इकाई थी—

खेत + जंगल + चराई + जल + सामुदायिक संसाधन।

औपनिवेशिक शासन ने धीरे-धीरे इन तत्वों को अलग-अलग कानूनी श्रेणियों में बांटना शुरू किया।

यहीं से संकट पैदा हुआ।

3. 1818 के बाद औपनिवेशिक हस्तक्षेप

1818 में मराठा सत्ता के पतन के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस क्षेत्र पर प्रभावी प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित किया।

ब्रिटिश शासन का उद्देश्य केवल राजनीतिक नियंत्रण नहीं था। उसे नियमित राजस्व चाहिए था।

और कर देने वाले व्यक्ति की पहचान।

इस प्रक्रिया ने भूमि संबंधों में बुनियादी बदलाव किया।

ऐसी भूमि जिसका उपयोग स्थानीय समुदाय परंपरा और प्रथा के आधार पर करता आया था, अब सरकारी अभिलेखों, सर्वे नंबरों और राजस्व देनदारियों के माध्यम से परिभाषित होने लगी।

इस परिवर्तन में वह व्यक्ति अधिक मजबूत था जो—

राजस्व जमा कर सकता था,

और प्रशासन से संपर्क रखता था।

वारली कृषक प्रायः इनमें से किसी स्थिति में नहीं था।

यहीं से औपनिवेशिक राज्य और स्थानीय आदिवासी समाज के बीच दस्तावेजी असमानता विकसित हुई।

4. जमीन पर कब्जा और मालिकाना हक में अंतर

किसी परिवार का पीढ़ियों से जमीन पर खेती करना और कानून की दृष्टि में उस जमीन का मालिक होना दो अलग बातें बन गईं।

यही परिवर्तन आदिवासी भूमि-अधिकार के लिए अत्यंत घातक सिद्ध हुआ।

वारली कृषक किसी भूखंड को अपने पूर्वजों की जमीन मान सकता था, लेकिन औपनिवेशिक प्रशासन का प्रश्न था—

राजस्व रिकॉर्ड में नाम किसका है?

किसके पास दस्तावेज है?

कर्ज की लिखित रसीद किसके पास है?

इस नई व्यवस्था में मौखिक परंपरा की कानूनी शक्ति कम थी।

भूमि धीरे-धीरे ऐसी वस्तु में बदल रही थी जिसे खरीदा, बेचा, गिरवी रखा और ऋण के बदले हस्तांतरित किया जा सकता था।

इससे बाहरी व्यापारी, साहूकार और संपन्न कृषक आदिवासी क्षेत्र में जमीन हासिल करने की स्थिति में आए।

आधुनिक अध्ययनों में इस प्रक्रिया को वारलियों के स्वतंत्र कृषक से किरायेदार और कृषि मजदूर बनने की प्रमुख पृष्ठभूमि माना गया है।

5. भूमि-अधिकार का क्षरण कैसे हुआ?

भूमि खोने की प्रक्रिया हमेशा किसी खुले बलपूर्वक अधिग्रहण के रूप में नहीं होती थी।

अधिकतर यह छोटे-छोटे आर्थिक संकटों से शुरू होती थी।

परिवार के पास नकदी नहीं थी।

साहूकार से ऋण लिया गया।

अगली फसल भी पर्याप्त नहीं हुई।

और अंततः खेती करने वाला व्यक्ति अपनी ही जमीन पर काश्तकार या मजदूर बन सकता था।

यह प्रक्रिया पीढ़ियों में विकसित हुई।

यहीं से वारली क्षेत्र की कृषि संरचना में एक गहरा विरोधाभास पैदा हुआ—

भूमि पर मेहनत करने वाला आदिवासी था, लेकिन भूमि का कानूनी स्वामी कोई और हो सकता था।

6. साहूकार और भू-स्वामी का संयुक्त प्रभाव

औपनिवेशिक ग्रामीण अर्थव्यवस्था में 'भू-स्वामी' और 'साहूकार' हमेशा अलग-अलग व्यक्ति नहीं थे।

कई मामलों में वही व्यक्ति किसान को ऋण देता था, जमीन पर अधिकार रखता था, अनाज देता था और बदले में श्रम भी लेता था।

इस तरह उसके पास तीन प्रकार की शक्ति जमा हो सकती थी—

जमीन की शक्ति, पूंजी की शक्ति और श्रम पर नियंत्रण।

ठाणे के आदिवासी क्षेत्रों पर उपलब्ध शोध में भू-स्वामियों, साहूकारों, वन ठेकेदारों और सरकारी अधिकारियों को एक ऐसी संरचना के हिस्से के रूप में दिखाया गया है जिसने आदिवासी आबादी की निर्भरता को बनाए रखा।

इसीलिए वारली आंदोलन में 'सेठ-साहूकार' केवल ऋण देने वाला व्यक्ति नहीं था।

वह ग्रामीण सत्ता का प्रतीक था।

7. खावटी : भूख और कर्ज के बीच संबंध

वारली कृषक की सबसे बड़ी समस्याओं में एक थी कि अपनी खेती के बावजूद उसके पास पूरे वर्ष के लिए पर्याप्त अनाज नहीं रहता था।

विशेषकर वर्षा-आधारित खेती और छोटे भूखंड वाले परिवारों के लिए वर्ष का एक हिस्सा खाद्यान्न संकट का समय बन सकता था।

ऐसी स्थिति में भू-स्वामी अथवा साहूकार से अनाज अग्रिम लेना पड़ता था।

ठाणे क्षेत्र के कृषि संबंधों पर शोध में इस तरह के निर्वाह-अग्रिम को खावटी कहा गया है। किरायेदारों को अगले कृषि वर्ष में किराये के साथ पिछले वर्ष लिया गया अनाज भी लौटाना पड़ता था।

यह बहुत महत्वपूर्ण व्यवस्था थी।

क्योंकि इससे भू-स्वामी पर निर्भरता केवल जमीन तक सीमित नहीं रहती थी।

यही निर्भरता वेठ-बेगार को संभव बनाती थी।

अध्याय 4

औपनिवेशिक शासन, वन कानून और आदिवासी अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

वारली आंदोलन की पृष्ठभूमि में भूमि प्रश्न जितना महत्वपूर्ण था, उतना ही निर्णायक जंगल पर नियंत्रण का प्रश्न भी था। वारली समाज की पारंपरिक अर्थव्यवस्था खेत और जंगल को दो अलग-अलग क्षेत्रों के रूप में नहीं देखती थी। खेती, चराई, ईंधन, छोटे वन-उत्पाद, भोजन, औषधि, घर बनाने की सामग्री और सांस्कृतिक जीवन—इन सभी का आधार आसपास का प्राकृतिक परिवेश था।

औपनिवेशिक शासन ने इस संबंध को मूलतः बदल दिया।

ब्रिटिश सत्ता के लिए जंगल केवल स्थानीय समुदाय के जीवन का आधार नहीं था। वह राजस्व, लकड़ी, रेलवे, निर्माण, नौसेना और वाणिज्य के लिए उपयोगी प्राकृतिक संपदा भी था। इसलिए उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से जंगलों को व्यवस्थित रूप से सरकारी नियंत्रण में लेने की प्रक्रिया तेज हुई। यही वह ऐतिहासिक मोड़ था जिसने वारली जैसे आदिवासी समुदायों की परंपरागत आजीविका को धीरे-धीरे अधिकार से अनुमति और कई मामलों में अनुमति से अपराध की श्रेणी में धकेल दिया।

1. जंगल पर परंपरागत अधिकार की प्रकृति

औपनिवेशिक वन कानूनों से पहले वारली समुदाय की जंगल तक पहुंच आधुनिक निजी संपत्ति के सिद्धांत पर आधारित नहीं थी।

किसी जंगल की प्रत्येक भूमि का व्यक्तिगत मालिक होना आवश्यक नहीं था।

कई अधिकार सामुदायिक और प्रथागत थे।

गांव अथवा पाड़े के लोग निश्चित इलाकों से—

फल और कंद जुटाते थे,

औषधीय पौधे प्राप्त करते थे,

और आवश्यकता पड़ने पर कृषि के लिए वनभूमि का इस्तेमाल करते थे।

ये अधिकार हर जगह समान नहीं थे और उनकी स्थानीय सीमाएं होती थीं, लेकिन समुदाय उन्हें पीढ़ियों से चले आ रहे वैध उपयोग के रूप में देखता था।

औपनिवेशिक शासन ने इसी व्यवस्था पर सवाल उठाया।

जंगल का मालिक कौन है?

यह प्रश्न आधुनिक प्रशासन के लिए स्वाभाविक था, लेकिन आदिवासी समाज में इसका उत्तर अक्सर व्यक्तिगत स्वामित्व के रूप में उपलब्ध नहीं था।

यहीं से राज्य और समुदाय के बीच अवधारणात्मक टकराव शुरू हुआ।

2. ब्रिटिश शासन को जंगलों में रुचि क्यों बढ़ी?

ब्रिटिश शासन के शुरुआती चरण में जंगलों को हमेशा सुव्यवस्थित प्रशासनिक संपत्ति नहीं माना गया था। लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक परिस्थितियां बदलने लगीं।

रेलवे नेटवर्क के तेजी से विस्तार के लिए बड़ी मात्रा में लकड़ी चाहिए थी।

रेल की पटरियों के नीचे स्लीपरों की आवश्यकता थी।

जहाज निर्माण और सैन्य उपयोग में लकड़ी महत्वपूर्ण थी।

शहरीकरण और निर्माण भी बढ़ रहे थे।

इसके अलावा औपनिवेशिक प्रशासन प्राकृतिक संसाधनों से राजस्व प्राप्त करना चाहता था।

इसलिए जंगल एक स्थानीय सामुदायिक संसाधन से बढ़कर औपनिवेशिक आर्थिक संपत्ति बन गया।

यहीं से वैज्ञानिक वन प्रबंधन, वन विभाग और वन कानूनों का विकास हुआ।

3. वन विभाग और 'वैज्ञानिक वानिकी'

1864 में ब्रिटिश भारत में एक संगठित इंपीरियल फॉरेस्ट डिपार्टमेंट की स्थापना की गई। उसके पीछे यह विचार था कि जंगलों का उपयोग राज्य की दीर्घकालीन आर्थिक आवश्यकताओं के अनुसार किया जाना चाहिए।

इस प्रणाली को अक्सर 'वैज्ञानिक वानिकी' कहा गया।

इसके अंतर्गत जंगल का मूल्य मुख्यतः इस आधार पर मापा जाता था कि—

कौन-सी प्रजाति उपयोगी है,

कितनी लकड़ी निकाली जा सकती है,

जंगल का पुनर्जनन कैसे होगा,

और राज्य का नियंत्रण कैसे बना रहेगा।

आदिवासी समुदाय के लिए जंगल का मूल्य इससे कहीं व्यापक था।

वह भोजन और ईंधन का स्रोत था।

पूजा और संस्कृति का हिस्सा था।

अकाल और खराब फसल के समय सुरक्षा कवच था।

इस प्रकार वैज्ञानिक वानिकी और आदिवासी उपयोग के बीच मूलभूत अंतर था।

राज्य जंगल को प्रबंधनीय संसाधन मान रहा था।

आदिवासी उसे जीविका-पर्यावरण मानता था।

4. भारतीय वन अधिनियम 1865 : राज्य नियंत्रण की शुरुआत

1865 का भारतीय वन अधिनियम वन प्रशासन की शुरुआती कानूनी नींवों में से एक था।

इस कानून ने सरकार को ऐसे क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित करने की दिशा में अधिकार दिए जिन्हें वनभूमि माना गया।

हालांकि बाद के 1878 के कानून की तुलना में 1865 का अधिनियम अपेक्षाकृत सीमित था, लेकिन उसका महत्व इस बात में था कि उसने एक नई धारणा स्थापित की—

जंगल पर अंतिम अधिकार राज्य का हो सकता है।

यह वही सिद्धांत था जिसे बाद के कानूनों ने अधिक कठोर और व्यापक रूप दिया।

5. भारतीय वन अधिनियम 1878 : निर्णायक परिवर्तन

1878 का वन अधिनियम औपनिवेशिक वन नीति का निर्णायक मोड़ था।

इस कानून ने जंगलों को विभिन्न कानूनी श्रेणियों में व्यवस्थित करने और स्थानीय अधिकारों को सीमित करने की व्यवस्था मजबूत की।

इसके अंतर्गत व्यापक रूप से—

आरक्षित वन, संरक्षित वन, और ग्राम्य वन

जैसी श्रेणियों की अवधारणा विकसित हुई।

आरक्षित वन राज्य नियंत्रण की सबसे कठोर श्रेणी थी।

इसका अर्थ यह था कि किसी क्षेत्र में पहले से मौजूद स्थानीय उपयोग-अधिकारों को दर्ज, सीमित, परिवर्तित अथवा समाप्त किया जा सकता था।

यानी समुदाय जिस काम को सदियों से सामान्य अधिकार मानता था, अब उसे प्रमाणित करना पड़ सकता था।

और प्रमाण देने में विफल रहने पर वही कार्य अवैध ठहराया जा सकता था।

6. 'अधिकार' से 'विशेष अनुमति' तक

औपनिवेशिक वन नीति का सबसे गहरा प्रभाव कानूनी भाषा में दिखाई देता है।

पारंपरिक समाज में जंगल का उपयोग सामुदायिक अधिकार था।

औपनिवेशिक व्यवस्था में कई गतिविधियां राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त privilege, अर्थात विशेष सुविधा या अनुमति, के रूप में देखी जाने लगीं।

1927 के भारतीय वन अधिनियम में स्थानांतरित खेती की प्रथा को भी ऐसी गतिविधि के रूप में माना गया जिसे सरकार नियंत्रित, सीमित या समाप्त कर सकती थी। कानून के तहत राज्य को आरक्षित वन घोषित करने और वहां अनेक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने की व्यापक शक्ति मिली।

इस शब्दावली का बहुत बड़ा राजनीतिक अर्थ था।

यदि कोई चीज अधिकार है, तो राज्य को उसे छीनने का औचित्य सिद्ध करना पड़ता है।

यदि वही चीज सुविधा है, तो राज्य यह तय कर सकता है कि वह कब और किस शर्त पर दी जाएगी।

आदिवासी समुदाय के लिए यही परिवर्तन अत्यंत गंभीर था।

7. जंगल के सीमांकन का अर्थ

वन प्रशासन के लिए जंगल का सीमांकन एक तकनीकी प्रक्रिया थी।

अधिकारों के दावे मांगे गए।

वन निपटान अधिकारी ने दावों की जांच की।

और अंततः क्षेत्र आरक्षित वन घोषित किया जा सकता था।

1927 के वन अधिनियम में आरक्षित वन घोषित करने के लिए ऐसी औपचारिक प्रक्रिया निर्धारित की गई थी। एक बार आरक्षण पूरा हो जाने के बाद नए अधिकार केवल कानून में निर्धारित तरीके से ही प्राप्त हो सकते थे और अनेक गतिविधियां प्रतिबंधित हो जाती थीं।

लेकिन जमीन पर रहने वाले अशिक्षित अथवा अर्धशिक्षित आदिवासी के लिए यह प्रक्रिया बहुत कठिन थी।

उसे अपने उस अधिकार का प्रमाण देना था जिसे उसके पूर्वजों ने कभी लिखित दस्तावेज में दर्ज ही नहीं कराया था।

यही दस्तावेजी असमानता वन अधिकारों के क्षरण का बड़ा कारण बनी।

8. दावे कौन करता और कौन हारता?

सैद्धांतिक रूप से वन कानूनों में स्थानीय दावों की जांच की व्यवस्था थी।

व्यक्ति अथवा समुदाय यह दावा कर सकता था कि उसे—

या अन्य उपयोग का अधिकार है।

लेकिन व्यवहार में समस्या यह थी कि परंपरागत अधिकार लिखित रिकॉर्ड में नहीं होते थे।

वारली पाड़े का बुजुर्ग कह सकता था—

"हमारे लोग हमेशा से यहां से लकड़ी लेते आए हैं।"

लेकिन औपनिवेशिक प्रशासन पूछ सकता था—

"इसका दस्तावेज कहां है?"

9. आरक्षित वन का सामाजिक अर्थ

कुछ वन उत्पाद निकालना,

13. वन अधिकार और साहूकारी का संबंध

ईंधन मुफ्त मिलता था।

अध्याय 5

जमींदार, साहूकार और बड़े भू-स्वामी — ग्रामीण सत्ता और शोषण की संरचना

वारली आंदोलन को यदि केवल मजदूरी बढ़ाने या बेगार समाप्त कराने की लड़ाई के रूप में देखा जाए तो उसकी ऐतिहासिक गहराई समझ में नहीं आती। इस संघर्ष के पीछे ठाणे क्षेत्र की वह ग्रामीण सत्ता-संरचना थी जिसमें भू-स्वामी, साहूकार, वन ठेकेदार और स्थानीय प्रशासन एक-दूसरे से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए थे। वारली आदिवासी किसान और मजदूर इस संरचना के सबसे निचले स्तर पर खड़ा था।

उसके पास श्रम था, लेकिन श्रम की कीमत निर्धारित करने की शक्ति नहीं थी।

वह जमीन जोतता था, लेकिन जमीन अक्सर उसकी नहीं थी।

उसे भोजन चाहिए था, जिसके लिए उसे भू-स्वामी या साहूकार से अग्रिम लेना पड़ सकता था।

उसे विवाह, बीमारी या अकाल में कर्ज चाहिए था, जिससे उसकी निर्भरता और गहरी होती थी।

और यदि वह विरोध करता, तो सामने केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि स्थानीय सत्ता का पूरा ढांचा खड़ा हो सकता था।

इसलिए वारली आंदोलन का एक केंद्रीय प्रश्न था—ग्रामीण समाज में वास्तविक शक्ति किसके हाथ में थी?

1. क्या ठाणे में वास्तव में 'जमींदार' थे?

यहां शब्दावली की सावधानी आवश्यक है।

बंगाल अथवा उत्तर प्रदेश की तरह ठाणे क्षेत्र में हर जगह शास्त्रीय अर्थ वाला बड़ा जमींदारी ढांचा नहीं था। इसलिए वारली आंदोलन के संदर्भ में अंग्रेजी स्रोतों में प्रयुक्त भू-स्वामी शब्द का हिंदी में अर्थ केवल 'जमींदार' मान लेना कभी-कभी भ्रम पैदा कर सकता है।

यहां अधिक उपयुक्त श्रेणियां थीं—

बड़े भू-स्वामी, गैर-आदिवासी जमीन मालिक, साहूकार-भू-स्वामी, पट्टेदार और स्थानीय प्रभावशाली कृषक।

फिर भी समकालीन और बाद के आंदोलन साहित्य में 'भू-स्वामी' शब्द व्यापक रूप से मिलता है। अकादमिक शोध भी 1945–47 के वारली संघर्ष को स्थानीय landed interests और moneylenders के खिलाफ आंदोलन के रूप में वर्णित करता है। इतिहासकार लेस्ली कैलमन ने इन भू-स्वामी हितों और साहूकारों को उस क्षेत्र की प्रमुख स्थानीय शक्ति बताया है, जिनके नियंत्रण में वारली आदिवासी अत्यंत निर्भर स्थिति में थे।

इस अध्याय में इसलिए 'भू-स्वामी' को प्राथमिक शब्द और 'जमींदार' को व्यापक राजनीतिक अर्थ में समझना अधिक सटीक होगा।

2. जमीन का मालिक कौन, खेती कौन करता था?

वारली क्षेत्र का मूल विरोधाभास यही था।

जमीन का कानूनी स्वामी अक्सर गैर-आदिवासी भू-स्वामी होता था, जबकि वास्तविक खेती वारली परिवार करता था।

फसल की देखभाल करता था।

लेकिन बदले में उसे भूमि-स्वामी को किराया, फसल का हिस्सा या अन्य देनदारियां चुकानी पड़ सकती थीं।

Review of Agrarian Studies में उपलब्ध अध्ययन के अनुसार 1940 के दशक तक क्षेत्र के अधिकांश आदिवासी या तो किरायेदार कृषक बन चुके थे या कृषि मजदूर। वे किसी न किसी रूप में भू-स्वामियों और साहूकारों पर निर्भर थे।

यह संबंध केवल आर्थिक अनुबंध नहीं था।

उसमें शक्ति का गहरा असंतुलन था।

3. भू-स्वामी की शक्ति जमीन से क्यों बढ़ती थी?

यदि कोई व्यक्ति जमीन का मालिक है और दूसरा व्यक्ति उस जमीन पर निर्भर है, तो दोनों की सौदेबाजी शक्ति समान नहीं होगी।

वारली क्षेत्र में यह असमानता बहुत गहरी थी क्योंकि किसान के पास वैकल्पिक जमीन सीमित थी।

यदि भू-स्वामी उसे खेत से निकाल देता तो उसके सामने मजदूरी के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता।

यदि फसल खराब होती तो उसे अनाज उसी से लेना पड़ सकता था।

यदि विवाह या बीमारी के लिए धन चाहिए तो ऋण भी उसी वर्ग से लेना पड़ सकता था।

इस प्रकार भूमि स्वामित्व ने भू-स्वामी को केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और व्यक्तिगत नियंत्रण भी दिया।

इसी आधार पर वेठ-बेगार जैसी व्यवस्थाएं संभव हुईं।

4. किराया : केवल जमीन का भुगतान नहीं

किरायेदारी व्यवस्था में वारली कृषक को भू-स्वामी को किराया देना पड़ता था।

लेकिन समस्या केवल किराए की राशि नहीं थी।

कई मामलों में किरायेदार की देनदारियों में शामिल हो सकते थे—

और अन्य प्रथागत सेवाएं।

Review of Agrarian Studies के अनुसार आदिवासी किरायेदारों को ऊंचे किराये के अलावा पिछले वर्ष जीवन निर्वाह के लिए मिला अनाज अग्रिम—खावटी—भी लौटाना पड़ता था।

इसका अर्थ यह हुआ कि नया कृषि वर्ष शुरू होने से पहले ही भविष्य की फसल का एक हिस्सा गिरवी जैसा हो सकता था।

किसान खेती शुरू करता था, लेकिन उसकी फसल पर पहले से दावे मौजूद थे।

5. खावटी : भूख से नियंत्रण तक

खावटी की व्यवस्था को समझे बिना भू-स्वामी की वास्तविक शक्ति समझ में नहीं आती।

नई फसल आने में कई महीने बाकी हैं।

परिवार को भोजन चाहिए।

वह भू-स्वामी से अनाज लेता है।

लेकिन अगले वर्ष उसे यह अनाज वापस करना होगा।

यदि फसल फिर कमजोर हुई तो वह नया ऋण लेगा।

इससे एक चक्र बनता है—

भोजन की कमी → खावटी → कर्ज → फसल पर दावा → नया खाद्य संकट → नया कर्ज।

इस परिस्थिति में भू-स्वामी केवल खेत का मालिक नहीं रहता।

वह गरीब परिवार की खाद्य सुरक्षा पर भी नियंत्रण प्राप्त कर लेता है।

यही आर्थिक निर्भरता बाद में मुफ्त श्रम की मांग को अस्वीकार करना कठिन बनाती थी।

6. साहूकार : ग्रामीण अर्थव्यवस्था की दूसरी शक्ति

भूमि स्वामित्व के समानांतर साहूकारी वारली समाज के शोषण की दूसरी महत्वपूर्ण संरचना थी।

ग्रामीण गरीब परिवार को नियमित बैंक ऋण उपलब्ध नहीं था।

राजस्व अथवा किराया देने के लिए।

इसलिए साहूकार आवश्यक संस्था बन जाता था।

लेकिन आवश्यकता ही उसकी शक्ति का स्रोत थी।

ऋण की शर्तें साहूकार तय करता था।

ब्याज दर पर गरीब ऋणी की सौदेबाजी शक्ति लगभग नहीं थी।

और यदि ऋण नहीं चुकाया जा सके तो जमीन, फसल या श्रम दांव पर लग सकता था।

इसलिए साहूकारी केवल वित्तीय गतिविधि नहीं थी।

वह ग्रामीण सत्ता का साधन थी।

7. भू-स्वामी और साहूकार कभी-कभी एक ही शक्ति

इतिहास को समझने के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है कि भू-स्वामी और साहूकार को हमेशा अलग-अलग वर्ग न माना जाए।

एक बड़ा भूमि मालिक स्वयं ऋण भी दे सकता था।

एक साहूकार ऋण के बदले जमीन हासिल कर सकता था।

एक व्यापारी जमीन खरीदकर स्थानीय भू-स्वामी बन सकता था।

एक ही प्रभावशाली परिवार या सामाजिक समूह के हाथ में केंद्रित हो सकते थे।

यही कारण है कि वारली आंदोलन के स्रोतों में भू-स्वामियों और साहूकारों का उल्लेख अक्सर एक साथ मिलता है।

8. कर्ज जमीन कैसे छीन सकता था?

कर्ज लेने का अर्थ हमेशा जमीन खोना नहीं था।

लेकिन यदि ऋणी लगातार भुगतान न कर सके तो ऋण भूमि हस्तांतरण का साधन बन सकता था।

बाद के दशकों के ठाणे संबंधी अध्ययनों में ऐसे दस्तावेजी अनुबंधों का उल्लेख मिलता है जिनमें ऋण नहीं चुकाने पर भूमि साहूकार को देने की शर्त रहती थी। कई मामलों में सरकारी राजस्व अभिलेख में जमीन आदिवासी के नाम रह सकती थी, जबकि अलग दस्तावेज में साहूकार का वास्तविक दावा बन चुका होता था।

यह बाद की अवधि का विवरण है, लेकिन इससे ग्रामीण ऋण व्यवस्था की प्रकृति समझ में आती है।

भूमि-वंचना केवल खुले कब्जे से नहीं होती थी।

वह कर्ज के कानूनी दस्तावेज से भी हो सकती थी।

9. ब्याज : ऋण का वास्तविक बोझ

साहूकारी में सबसे गंभीर प्रश्न ब्याज था।

आधिकारिक बैंकिंग व्यवस्था से बाहर गरीब ऋणी के पास विकल्प कम थे।

इससे एक मूलभूत समस्या पैदा होती थी—

कर्ज लेने वाला मूलधन चुकाने से पहले ब्याज ही नहीं चुका पाता।

यानी ऋण का संबंध केवल रुपये से नहीं था।

10. विवाह और कर्ज : लग्नगाड़ी की शुरुआत

इसका अर्थ अत्यंत गंभीर था।

अध्याय 6

वेठ-बेगार और बंधुआ श्रम — वारली जीवन में जबरन श्रम की व्यवस्था

वारली आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण मांगों में यदि किसी एक को उसके सामाजिक अर्थ के कारण अलग करके देखा जाए, तो वह थी—वेठ-बेगार की समाप्ति। यह केवल मजदूरी का प्रश्न नहीं था। यह इस बुनियादी सवाल से जुड़ा था कि क्या कोई भू-स्वामी, साहूकार या स्थानीय प्रभावशाली व्यक्ति केवल आर्थिक निर्भरता के आधार पर किसी आदिवासी के श्रम और समय पर अधिकार जमा सकता है।

1940 के दशक तक तत्कालीन ठाणे जिले के अनेक वारली परिवारों की स्थिति ऐसी थी कि वे जमीन, भोजन, कर्ज और रोजगार के लिए स्थानीय भू-स्वामी तथा साहूकार पर निर्भर थे। इसी निर्भरता से जबरन श्रम की दो प्रमुख व्यवस्थाएं विकसित हुई थीं—वेठ-बेगार और लग्नगाड़ी। आधुनिक कृषि इतिहास के अध्ययनों में इन्हें ठाणे की ग्रामीण श्रम व्यवस्था के दो प्रमुख नियंत्रणकारी रूपों के रूप में दर्ज किया गया है।

वेठ-बेगार में किरायेदार अथवा निर्भर आदिवासी से बिना उचित मजदूरी के श्रम लिया जाता था। लग्नगाड़ी में विवाह के लिए लिया गया ऋण व्यक्ति और कभी-कभी उसके परिवार को लंबे समय तक भू-स्वामी की सेवा से बांध सकता था। इसीलिए वारली आंदोलन के लिए इन दोनों व्यवस्थाओं का अंत केवल आर्थिक सुधार नहीं, बल्कि व्यक्ति की स्वतंत्रता की पुनर्प्राप्ति था।

1. वेठ-बेगार क्या थी?

'वेठ', 'वेठी' अथवा 'वेठ-बेगार' का सामान्य अर्थ था ऐसा श्रम जो सामाजिक, आर्थिक अथवा प्रथागत दबाव में कराया जाए और जिसके बदले नगण्य या कोई वास्तविक मजदूरी न दी जाए।

ठाणे क्षेत्र के अध्ययन बताते हैं कि वेठ-बेगार विशेष रूप से किरायेदार आदिवासियों से भू-स्वामियों द्वारा लिया जाने वाला जबरन श्रम था। आदिवासी कृषक खेती के लिए जमीन और वर्ष के कई महीनों में जीविका के लिए अनाज तक भू-स्वामी पर निर्भर हो सकता था। इसी निर्भरता के कारण भू-स्वामी उससे अपनी इच्छा के अनुसार अतिरिक्त श्रम करा सकता था। कुछ वारली श्रमिकों को महीने में लगभग पंद्रह दिन तक ऐसे श्रम में लगना पड़ता था। भुगतान के रूप में कभी मात्र एक आना या एक समय के भोजन भर के लिए चावल मिलता था।

इसलिए वेठ को केवल 'कम मजदूरी' कहना सही नहीं होगा।

कम मजदूरी में श्रमिक के पास कम-से-कम सैद्धांतिक रूप से काम अस्वीकार करने की स्वतंत्रता होती है।

वेठ में समस्या ही यह थी कि काम से इनकार करने की स्वतंत्रता सीमित थी।

2. सरकारी जांच ने क्या पाया?

वारली क्षेत्र की स्थिति केवल बाद के कम्युनिस्ट या किसान सभा साहित्य से ज्ञात नहीं होती। औपनिवेशिक शासन की अपनी जांचों में भी गंभीर शोषण दर्ज हुआ।

1937 में बंबई में कांग्रेस सरकार आने के बाद आदिवासी पहाड़ी समुदायों की स्थिति की जांच के लिए डेविड सिमिंगटन को नियुक्त किया गया। उनकी 1939 की रिपोर्ट *Report on the Aboriginal Hill Tribes* ने ठाणे क्षेत्र की परिस्थितियों का गंभीर चित्र प्रस्तुत किया।

लेस्ली कैलमन के अकादमिक अध्ययन में सिमिंगटन रिपोर्ट के आधार पर बताया गया है कि ठाणे की बड़ी आदिवासी आबादी वेठ प्रणाली से पीड़ित थी और रिपोर्ट ने इसे ऐसी जबरन श्रम व्यवस्था माना जो दासता से बहुत कम अलग थी। रिपोर्ट में आदिवासियों की आर्थिक दयनीयता, साहूकारों द्वारा शोषण और हिंसक उत्पीड़न का भी उल्लेख था।

यह प्रमाण अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इससे स्पष्ट होता है कि वारली आंदोलन द्वारा उठाया गया जबरन श्रम का प्रश्न केवल राजनीतिक प्रचार नहीं था। औपनिवेशिक प्रशासन स्वयं समस्या की गंभीरता से परिचित था।

3. बेगार की आर्थिक जड़ : जमीन पर निर्भरता

प्रश्न उठता है कि कोई किसान मुफ्त या लगभग मुफ्त काम करने के लिए तैयार क्यों होगा?

उत्तर उसकी आर्थिक स्थिति में था।

यदि उसके पास स्वतंत्र और पर्याप्त जमीन होती, तो वह भू-स्वामी के आदेश को अस्वीकार कर सकता था।

खेती की जमीन भू-स्वामी की है,

भोजन के लिए अनाज उसी से उधार लेना पड़ता है,

अगले वर्ष भी उसी की जमीन पर खेती करनी है,

और पहले से ऋण बाकी है,

तो श्रमिक की स्वतंत्रता बहुत सीमित हो जाती है।

इसलिए वेठ-बेगार का मूल संबंध केवल श्रम से नहीं था।

भूमिहीनता + किरायेदारी + खाद्य असुरक्षा + कर्ज।

इसीलिए 1940 के दशक तक अनेक वारली किरायेदार और खेत-मजदूर व्यवहारतः भू-स्वामी तथा साहूकार से बंधे हुए थे।

4. खावटी और वेठ का संबंध

पिछले अध्यायों में खावटी का उल्लेख किया गया है—वर्ष के कठिन महीनों में भू-स्वामी अथवा साहूकार से लिया गया अनाज अग्रिम।

यह व्यवस्था वेठ को समझने के लिए निर्णायक है।

परिवार के पास भोजन समाप्त हो गया।

वह चावल या अनाज उधार लेता है।

नई फसल पर पहले से ऋण का दावा बन जाता है।

यदि किसान पूरा भुगतान नहीं कर पाता, तो आर्थिक निर्भरता बनी रहती है।

इसी परिस्थिति में भू-स्वामी कह सकता है—

उसके खेत में काम करो,

IGNOU के स्वतंत्रता-पूर्व किसान संघर्षों संबंधी अध्ययन में वारलियों के संदर्भ में स्पष्ट उल्लेख है कि कठिन समय में उन्हें खावटी लेनी पड़ती थी और ऋण न चुका पाने पर वेठ-बेगार करने के लिए बाध्य किया जाता था। परिणामतः किरायेदार और भूमिहीन मजदूर दोनों व्यावहारिक रूप से दीर्घकालीन आश्रित श्रमिक बन सकते थे।

5. वेठ कितने प्रकार के काम में ली जाती थी?

वेठ केवल खेत जोतने या फसल काटने तक सीमित नहीं थी।

भू-स्वामी की आवश्यकता के अनुसार श्रमिक से विभिन्न प्रकार के काम लिए जा सकते थे—

और अन्य निजी सेवाएं।

इससे स्पष्ट है कि भू-स्वामी किरायेदार के केवल कृषि श्रम पर दावा नहीं करता था।

वह उसके समय पर दावा करता था।

और गरीब परिवार के लिए समय ही उत्पादन की सबसे बड़ी पूंजी था।

जिस दिन वारली किसी भू-स्वामी के लिए मुफ्त काम करता, उस दिन वह—

अपनी छोटी जमीन पर काम नहीं कर सकता था,

दूसरे स्थान पर मजदूरी नहीं कर सकता था,

जंगल से संसाधन नहीं जुटा सकता था,

और परिवार के लिए उत्पादन नहीं कर सकता था।

इस अर्थ में वेठ दोहरा शोषण था—

एक, बिना उचित भुगतान के श्रम लेना; दो, श्रमिक को उसकी वैकल्पिक आय से वंचित करना।

6. क्या वेठ सचमुच 'परंपरा' थी?

ग्रामीण प्रभुत्व की व्यवस्थाएं अक्सर समय के साथ 'परंपरा' का रूप ले लेती हैं।

जो संबंध कभी आर्थिक दबाव से शुरू हुआ, बाद में सामाजिक अपेक्षा बन सकता है।

भू-स्वामी कह सकता था कि उसके किरायेदारों का कुछ काम करना सामान्य प्रथा है।

लेकिन किसी प्रथा के पुराने होने से वह स्वैच्छिक नहीं हो जाती।

यहां इतिहासकार को एक बुनियादी सवाल पूछना चाहिए—

क्या श्रमिक के पास इनकार करने की वास्तविक स्वतंत्रता थी?

यदि इनकार का अर्थ हो—

तो 'परंपरा' वास्तव में दबाव का रूप थी।

इसीलिए औपनिवेशिक जांच और बाद के अध्ययन इसे जबरन श्रम, यानी जबरन श्रम के रूप में वर्गीकृत करते हैं।

7. वेठ और दासता में अंतर

सिमिंगटन रिपोर्ट द्वारा वेठ को दासता से लगभग अप्रभेद्य बताए जाने को समझते समय सावधानी आवश्यक है।

वारली मजदूर कानूनी अर्थ में किसी दूसरे व्यक्ति की संपत्ति नहीं था।

उसे आधुनिक दास-प्रथा के समान खरीदा-बेचा जाना वेठ की सामान्य कानूनी संरचना नहीं थी।

लेकिन व्यवहार में उसके श्रम की स्वतंत्रता इतनी सीमित हो सकती थी कि स्थिति दासत्व-सदृश दिखाई देती थी।

इसलिए अधिक सटीक शब्द हैं—

अध्याय 7

कर्ज, सूद और भूमि से बेदखली — आर्थिक शोषण का चक्र

वारली आंदोलन की पृष्ठभूमि में कर्ज केवल आर्थिक कठिनाई का परिणाम नहीं था; वह ग्रामीण सत्ता और भूमि से बेदखली की पूरी प्रक्रिया का केंद्रीय साधन बन चुका था। गरीब आदिवासी किसान के लिए ऋण जीवन की आवश्यकता से पैदा होता था—बीज, अनाज, विवाह, बीमारी, कर, किराया या प्राकृतिक आपदा के समय सहायता के लिए। लेकिन जब ऋण औपचारिक बैंकिंग के बजाय स्थानीय साहूकार, भू-स्वामी या व्यापारी से लिया जाता था, तब उसकी शर्तें प्रायः ऋणी के पक्ष में नहीं होती थीं।

वारली क्षेत्र में यही ऋण धीरे-धीरे किसान की जमीन, फसल और श्रम पर नियंत्रण का माध्यम बन सकता था। यदि कर्ज नहीं चुकता, तो ब्याज जुड़ता; यदि ब्याज नहीं चुकता, तो नई देनदारी बनती; यदि देनदारी बढ़ती, तो जमीन गिरवी या हस्तांतरित हो सकती थी; और जमीन हाथ से निकलने पर वही किसान किरायेदार या मजदूर बन सकता था।

इसीलिए वारली अर्थव्यवस्था को समझने के लिए कर्ज को केवल वित्तीय संबंध नहीं, बल्कि भूमि-वंचना और श्रम-निर्भरता का सेतु मानना होगा।

1. कर्ज की शुरुआत कहां से होती थी?

गरीब किसान की आय मौसमी होती थी, लेकिन खर्च पूरे वर्ष चलता था।

फसल वर्ष में एक या दो बार आती थी, जबकि भोजन प्रतिदिन चाहिए।

बीज बोने के लिए पूंजी चाहिए।

हल, पशु और कृषि औजारों की मरम्मत चाहिए।

परिवार में विवाह हो तो अतिरिक्त खर्च।

किराया या राजस्व समय पर देना है।

यदि फसल खराब हो जाए, तो अगली फसल तक जीवित रहने के लिए भी ऋण लेना पड़ सकता था।

इसलिए ऋण कोई अपवाद नहीं था।

वह ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सामान्य हिस्सा था।

समस्या तब पैदा हुई जब ऋण की शर्तें अत्यधिक असमान थीं।

2. औपचारिक बैंकिंग से बाहर का किसान

बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में ग्रामीण आदिवासी किसान के पास आधुनिक बैंकिंग व्यवस्था तक बहुत सीमित पहुंच थी।

न पर्याप्त दस्तावेज,

न संपत्ति का स्पष्ट रिकॉर्ड,

न ऐसी आय जिसका बैंक आकलन कर सके।

इसलिए साहूकार उसके लिए केवल शोषक नहीं, बल्कि अक्सर एकमात्र उपलब्ध ऋणदाता भी था।

यहीं से संबंध का विरोधाभास पैदा होता है।

किसान उससे बचना चाहता है, लेकिन संकट में उसी के पास जाता है।

साहूकार की शक्ति इसी आवश्यकता से उत्पन्न होती है।

3. खावटी : भूख और ऋण का पहला चक्र

वारली क्षेत्र में खावटी का विशेष महत्व था।

जब परिवार के पास अनाज समाप्त हो जाता, तो भू-स्वामी या साहूकार से अनाज अग्रिम लिया जाता। यह ऋण नकद नहीं, खाद्यान्न में भी हो सकता था।

फसल आने पर उसे लौटाना होता।

लेकिन यदि नई फसल कमजोर रही तो पूरा भुगतान नहीं हो पाता।

तब ऋण अगले वर्ष में चला जाता।

इससे एक सरल परंतु खतरनाक चक्र बनता है—

खाद्य कमी → खावटी → फसल पर दावा → कम बचत → फिर खाद्य कमी → नया ऋण।

यही चक्र वारली परिवार को दीर्घकालीन निर्भरता में धकेल सकता था।

4. साहूकारी का हिसाब किसके हाथ में था?

ऋण-संबंध की सबसे बड़ी असमानताओं में एक थी लेखा-नियंत्रण।

ऋणी प्रायः अशिक्षित या अल्पशिक्षित था।

साहूकार हिसाब रखता था।

इन सभी प्रश्नों का लिखित रिकॉर्ड अक्सर ऋणदाता के पास होता था।

यानी ऋणी आर्थिक रूप से कमजोर होने के साथ-साथ सूचना की दृष्टि से भी कमजोर था।

यही स्थिति अत्यधिक ब्याज और दीर्घकालीन कर्ज को बढ़ावा देती थी।

5. सूद : कर्ज का सबसे भारी हिस्सा

यदि ब्याज बहुत अधिक हो, तो ऋण चुकाना लगभग असंभव हो सकता है।

ग्रामीण साहूकारी में कई बार ब्याज की दरें इतनी ऊंची होती थीं कि ऋणी लंबे समय तक केवल ब्याज चुकाता रहता और मूलधन जस का तस बना रहता।

कभी ब्याज नकद में नहीं, बल्कि अनाज, श्रम या फसल के हिस्से में वसूल किया जाता।

इससे वास्तविक प्रभावी ब्याज दर और अधिक हो सकती थी।

यहीं ऋण संबंध केवल वित्तीय नहीं रहता।

वह उत्पादन और श्रम पर दावा बन जाता है।

6. ब्याज पर ब्याज

यदि किसान निर्धारित समय पर भुगतान न कर सके, तो बकाया राशि नए ऋण में बदल सकती थी।

फिर उस कुल रकम पर नया ब्याज।

यह चक्र कई वर्षों तक चल सकता था।

यही कारण है कि कर्ज अक्सर किसान के लिए अस्थायी संकट नहीं, बल्कि स्थायी संरचनात्मक बोझ बन जाता था।

7. फसल गिरवी

ऋण की एक सामान्य व्यवस्था थी कि आने वाली फसल पहले से गिरवी जैसी हो जाए।

किसान बीज या अनाज उधार लेता।

बदले में तय करता कि कटाई के बाद फसल का हिस्सा साहूकार या भू-स्वामी को जाएगा।

यदि किसान को बाजार में स्वतंत्र रूप से फसल बेचने की अनुमति न हो, तो उसे कम कीमत पर भी भुगतान करना पड़ सकता था।

इससे बाजार का लाभ उत्पादक के बजाय ऋणदाता को मिल सकता था।

8. जमीन गिरवी

ऋण का अगला स्तर था जमीन गिरवी रखना।

पहले किसान अस्थायी रूप से जमीन के बदले ऋण लेता।

यदि ऋण चुका दिया गया तो जमीन वापस।

लेकिन यदि कर्ज बढ़ता गया तो गिरवी स्थायी नियंत्रण में बदल सकती थी।

यही वह बिंदु था जहां ऋण सीधे भूमि-वंचना से जुड़ता है।

9. कागज पर हस्ताक्षर और वास्तविकता

आदिवासी किसान के सामने दस्तावेजी व्यवस्था बड़ी चुनौती थी।

वह अंगूठा लगा सकता था, लेकिन शर्तें नहीं समझता था।

वह यह मान सकता था कि जमीन कुछ समय के लिए गिरवी है।

लेकिन दस्तावेज में स्थायी हस्तांतरण की शर्त हो सकती थी।

ऐसे मामलों में कानून औपचारिक रूप से सही दस्तावेज को मानता था, लेकिन सामाजिक शक्ति-संतुलन पूरी तरह असमान था।

इसलिए केवल यह कहना कि "जमीन कानूनी रूप से हस्तांतरित हुई" पर्याप्त नहीं है।

इतिहासकार को यह भी देखना चाहिए कि अनुबंध किस परिस्थिति में हुआ।

10. भूमि से बेदखली की प्रक्रिया

भूमि खोने की प्रक्रिया कई चरणों में चलती थी।

पांचवां—ऋण नहीं चुकने पर जमीन का वास्तविक नियंत्रण ऋणदाता के हाथ।

और छठा—पूर्व स्वामी अपनी ही जमीन पर किरायेदार या मजदूर।

इसलिए भूमि-वंचना हमेशा हिंसक कब्जे से नहीं होती थी।

वह ऋण के दस्तावेजी रास्ते से भी होती थी।

11. जमीन खोने का सामाजिक परिणाम

जमीन खोना केवल संपत्ति खोना नहीं था।

किसान की पूरी सामाजिक स्थिति बदल जाती थी।

स्वतंत्र किसान किरायेदार बन सकता था।

किरायेदार खेत-मजदूर बन सकता था।

मजदूर को नियमित आय के लिए भू-स्वामी पर निर्भर होना पड़ता।

यानी ऋण ने व्यक्ति की सामाजिक श्रेणी तक बदल दी।

12. भूमिहीनता और कम मजदूरी

जितने अधिक लोग जमीन से बेदखल हुए, उतने अधिक मजदूर उपलब्ध हुए।

इससे श्रम की आपूर्ति बढ़ी।

यदि रोजगार सीमित है और मजदूर बहुत अधिक, तो मजदूरी कम रखना आसान होता है।

इसलिए भूमि-वंचना और कम मजदूरी दो अलग समस्याएं नहीं थीं।

भूमिहीनता ने सस्ते श्रम का बाजार बनाया।

वारली आंदोलन में भूमि और मजदूरी दोनों प्रश्न इसलिए जुड़े हुए थे।

13. कर्ज और वेठ-बेगार का संबंध

कर्ज ने वेठ-बेगार को भी संभव बनाया।

ऋणी किसान भू-स्वामी के सामने कमजोर था।

यदि वह मुफ्त काम से मना करता तो कहा जा सकता था—

यदि उसके पास चुकाने के लिए नकदी नहीं, तो उसे श्रम देना पड़ सकता था।

यानी कर्ज श्रम-बंधन का कानूनी और सामाजिक औचित्य बन जाता था।

इसी से लग्नगाड़ी जैसी व्यवस्था विकसित होती थी।

14. विवाह ऋण

गरीब परिवार के लिए विवाह बड़ा खर्च था।

इसलिए विवाह का सामाजिक दायित्व आर्थिक दासता का प्रवेश-द्वार बन सकता था।

15. बीमारी और आकस्मिक खर्च

बीमारी आई तो काम बंद।

अध्याय 8

खेत-मजदूरी और मजदूरी का प्रश्न — संघर्ष की तात्कालिक आर्थिक पृष्ठभूमि

वारली आंदोलन की तत्काल आर्थिक पृष्ठभूमि को समझने के लिए मजदूरी के प्रश्न को केंद्र में रखना होगा। भूमि-वंचना, कर्ज, साहूकारी और वेठ-बेगार ने वारली आदिवासियों के एक बड़े हिस्से को कृषि और वन-आधारित मजदूरी पर निर्भर बना दिया था। परिणाम यह हुआ कि 1940 के दशक तक श्रम की कीमत केवल आर्थिक लेन-देन का विषय नहीं रही; वह सामाजिक शक्ति, निर्भरता और राजनीतिक प्रतिरोध का प्रश्न बन गई।

ठाणे क्षेत्र में वारली मजदूर खेती, घास कटाई, वन-उत्पाद, पशुपालन और मौसमी कृषि कार्यों में लगे थे। लेकिन मजदूरी इतनी कम थी कि वह स्वतंत्र जीवन का आधार नहीं बन सकती थी। यही कारण है कि 1945 के आंदोलन में मजदूरी-वृद्धि का प्रश्न सबसे पहले व्यापक सामूहिक संघर्ष में बदलता है।

1. खेत-मजदूरी क्यों निर्णायक बन गई?

जब तक वारली परिवार के पास अपनी पर्याप्त जमीन थी, वह कम-से-कम आंशिक रूप से स्वतंत्र कृषि पर निर्भर रह सकता था। लेकिन जमीन का क्षरण, किरायेदारी और कर्ज ने उसे मजदूरी की ओर धकेला।

अब उसकी आर्थिक स्थिति इस पर निर्भर थी कि—

कितने दिन काम मिलेगा,

किस दर पर मजदूरी मिलेगी,

मजदूरी नकद होगी या अनाज में,

और भुगतान समय पर होगा या नहीं।

यानी भूमि से वंचित किसान की पूरी आजीविका अब श्रम बाजार की शर्तों पर टिक गई।

2. कृषि मजदूरी की प्रकृति

कृषि मजदूरी वर्षभर स्थिर नहीं होती थी।

और अन्य मौसमी कामों में श्रम की मांग बदलती रहती थी।

मौसमी रोजगार का अर्थ था कि मजदूर को कुछ महीनों में काम अधिक और कुछ महीनों में बहुत कम मिलता।

इससे कुल वार्षिक आय अत्यंत अस्थिर रहती।

ऐसी स्थिति में दैनिक मजदूरी की छोटी-सी वृद्धि भी परिवार के लिए महत्वपूर्ण हो सकती थी।

3. नकद बनाम अनाज मजदूरी

वारली श्रमिकों को कई मामलों में नगद के बजाय अनाज में भुगतान मिलता था।

यह व्यवस्था अपने आप में शोषणकारी नहीं थी, क्योंकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अनाज मजदूरी सामान्य हो सकती थी।

समस्या तब पैदा होती थी जब—

अनाज की मात्रा बहुत कम हो,

या मजदूरी बाजार मूल्य से बहुत नीचे हो।

यदि श्रमिक को दिनभर के काम के बदले केवल भोजन भर का अनाज मिले, तो वह वास्तविक मजदूरी नहीं, जीवित रहने भर की क्षतिपूर्ति बन जाती थी।

4. वेठ और मजदूरी के बीच अंतर

वारली आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में एक यह थी कि उसने वेठ और मजदूरी के बीच स्पष्ट रेखा खींची।

पहले भू-स्वामी कह सकता था—

यह काम तुम्हारा दायित्व है।

यदि काम है, तो उसका मूल्य है।

यानी श्रम को परंपरागत सेवा से हटाकर आर्थिक अनुबंध में बदलना आंदोलन का बुनियादी कदम था।

5. मजदूरी कम क्यों रखी जा सकती थी?

कम मजदूरी का एक प्रमुख कारण था श्रमिक की कमजोर सौदेबाजी शक्ति।

भूमिहीन मजदूरों की संख्या अधिक थी।

कर्ज और किरायेदारी ने श्रमिक को भू-स्वामी से बांध रखा था।

यदि एक मजदूर अधिक मजदूरी मांगे, तो दूसरा उपलब्ध हो सकता था।

इसलिए व्यक्तिगत प्रतिरोध लगभग प्रभावहीन था।

यहीं संगठन का महत्व पैदा हुआ।

6. घास कटाई का प्रश्न

1945 के वारली संघर्ष में घास काटने वाले मजदूरों की मजदूरी प्रमुख मुद्दा बनी।

घास स्थानीय बाजार में वाणिज्यिक महत्व रखती थी।

उसकी कटाई श्रम-प्रधान काम था।

वारली मजदूर बड़ी संख्या में इस काम में लगे थे।

लेकिन उन्हें जो मजदूरी मिलती थी, वह भू-स्वामी या ठेकेदार की कमाई की तुलना में अत्यंत कम थी।

यहीं से मजदूरी विवाद आंदोलन का प्रारंभिक व्यावहारिक केंद्र बना।

7. घास की कीमत और श्रम की कीमत

घास बाजार में बिकती थी।

यानी उसका वाणिज्यिक मूल्य स्पष्ट था।

लेकिन उसे काटने वाले श्रमिक का मूल्य क्यों नहीं?

वारली आंदोलन ने इसी असमानता को राजनीतिक प्रश्न बनाया।

यदि उत्पादन का मूल्य बढ़े, लेकिन मजदूरी न बढ़े, तो लाभ ऊपर और श्रम-लागत नीचे रहती है।

यह वर्गीय असमानता आंदोलन की राजनीतिक भाषा का आधार बनी।

8. सामूहिक मजदूरी निर्धारण

व्यक्तिगत मजदूर का वेतन मालिक तय करता है।

संगठित मजदूर मजदूरी पर बातचीत कर सकता है।

यही परिवर्तन किसान सभा ने किया।

अब मजदूरी को व्यक्तिगत सौदे के बजाय सामूहिक दर में बदलने की कोशिश हुई।

कई गांव एक साथ तय करें कि न्यूनतम दर से नीचे काम नहीं करेंगे।

यह ग्रामीण श्रम बाजार में अत्यंत बड़ा परिवर्तन था।

9. हड़ताल की रणनीति

मजदूरी बढ़ाने का सबसे प्रभावी साधन था काम रोकना।

यदि घास तैयार है और समय पर नहीं काटी गई तो मालिक को आर्थिक नुकसान होगा।

इससे पहली बार श्रमिक के पास दबाव का साधन आया।

यानी संगठन ने श्रम की उस शक्ति को पहचान लिया जो पहले बिखरी हुई थी।

काम करने की शक्ति जितनी महत्वपूर्ण थी, काम न करने की सामूहिक शक्ति उससे कम नहीं।

10. मजदूरी और कर्ज का संबंध

कम मजदूरी का परिणाम था अपर्याप्त आय।

अपर्याप्त आय का परिणाम नया कर्ज।

इसलिए मजदूरी-वृद्धि केवल तत्काल आय का सवाल नहीं थी।

वह साहूकारी से मुक्ति का साधन भी थी।

यदि मजदूर इतना कमा सके कि भोजन और आवश्यक खर्च पूरा हो जाए, तो खावटी और ऊंचे ब्याज वाले ऋण की आवश्यकता कम हो सकती थी।

इस प्रकार मजदूरी प्रश्न कर्ज-विरोधी संघर्ष से भी जुड़ा था।

11. मजदूरी और भूमि का संबंध

भूमिहीनता ने श्रम आपूर्ति बढ़ाई।

सस्ता श्रम भू-स्वामियों के लिए लाभकारी था।

इसलिए भूमि प्रश्न और मजदूरी प्रश्न परस्पर जुड़े थे।

जितने अधिक आदिवासी जमीन से वंचित हुए, उतने अधिक खेत-मजदूर बने।

इससे मजदूरी पर दबाव बढ़ा।

इसलिए भूमि-वापसी और मजदूरी-वृद्धि को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।

12. महिलाओं की मजदूरी

वारली महिलाओं की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण थी।

जंगल से संसाधन जुटाने,

लेकिन महिला श्रम का मूल्य अक्सर कम आंका जाता था।

इसलिए मजदूरी प्रश्न में लैंगिक आयाम भी मौजूद था।

जब महिलाओं ने आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की, तो वह केवल पारिवारिक समर्थन नहीं था; वह अपने श्रम के मूल्य का प्रश्न भी था।

13. पुरुष और महिला मजदूरी का अंतर

ग्रामीण श्रम बाजार में अक्सर पुरुषों और महिलाओं के काम को अलग मूल्य दिया जाता था।

कई बार समान अवधि के श्रम के बावजूद महिलाओं को कम भुगतान मिलता था।

वारली आंदोलन ने इस असमानता को पूरी तरह समाप्त नहीं किया, लेकिन महिलाओं की सक्रिय भागीदारी ने श्रम-अधिकार के प्रश्न को व्यापक बनाया।

14. मजदूरी और भोजन सुरक्षा

कम मजदूरी का सीधा असर भोजन पर पड़ता था।

यदि दैनिक आय इतनी कम है कि परिवार का अनाज नहीं खरीदा जा सके, तो मजदूर को फिर साहूकार या भू-स्वामी से ऋण लेना पड़ेगा।

इसलिए मजदूरी केवल नकद आय नहीं थी।

वह खाद्य सुरक्षा की पहली शर्त थी।

15. मजदूरी और सम्मान

मजदूरी का सामाजिक अर्थ भी था।

यदि श्रमिक बिना भुगतान काम करता है तो उसे आश्रित समझा जाता है।

यदि वही श्रमिक कहता है—

मेरे श्रम की कीमत है—

तो उसकी सामाजिक स्थिति बदलती है।

इसलिए मजदूरी मांगना आत्मसम्मान का भी दावा था।

16. युद्धकालीन महंगाई

द्वितीय विश्वयुद्ध के वर्षों में भारत में महंगाई तेजी से बढ़ी।

खाद्यान्न और आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़े।

मजदूरी यदि स्थिर रहे तो वास्तविक आय घटती है।

यानी मजदूर पहले जितनी मजदूरी में अब कम वस्तुएं खरीद सकता था।

यह 1940 के दशक में ग्रामीण असंतोष बढ़ने का एक महत्वपूर्ण कारण था।

17. महंगाई ने संकट क्यों तेज किया?

मान लें मजदूरी समान रही।

लेकिन चावल, कपड़ा और नमक महंगा हो गया।

तो वास्तविक मजदूरी स्वतः कम हो गई।

अध्याय 9

द्वितीय विश्वयुद्ध और ग्रामीण संकट — महंगाई, खाद्यान्न संकट और बढ़ता असंतोष

वारली आंदोलन 1945 में अचानक पैदा नहीं हुआ था। भूमि से बेदखली, साहूकारी, वेठ-बेगार, बंधुआ श्रम और अत्यंत कम मजदूरी ने उसके लिए दशकों से जमीन तैयार कर रखी थी। लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध (1939–1945) ने इस पुराने ग्रामीण संकट को असाधारण रूप से तीखा कर दिया। युद्धकालीन महंगाई, खाद्यान्न की कमी, बाजार में अस्थिरता और आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों ने गरीब आदिवासी परिवारों की वास्तविक आय को और कम कर दिया।

युद्ध का एक महत्वपूर्ण आर्थिक प्रभाव यह था कि नकद मजदूरी का वही आंकड़ा अब पहले जितना भोजन नहीं खरीद सकता था। इसलिए मजदूरी दर में कोई कटौती न होने पर भी मजदूर वास्तव में गरीब होता जा रहा था।

1943 तक खाद्यान्न संकट इतना गंभीर हो चुका था कि बंबई शहर में राशन व्यवस्था लागू करनी पड़ी। ब्रिटिश संसद में सितंबर 1943 में भारत के खाद्य संकट पर दिए गए आधिकारिक वक्तव्य में बंबई प्रेसीडेंसी के कुछ हिस्सों को उन क्षेत्रों में गिना गया जहां फसलें अस्थिर थीं और खाद्य संकट गंभीर चिंता का विषय था।

वारली क्षेत्र में पहले से मौजूद गरीबी के ऊपर यह युद्धकालीन दबाव पड़ा। परिणामतः 1945 तक मजदूरी और बेगार का प्रश्न केवल पुराने अन्याय का मुद्दा नहीं रहा; वह जीवित रहने का प्रश्न बन चुका था।

1. युद्ध शुरू हुआ, लेकिन वारली गांव उससे कैसे प्रभावित हुआ?

सितंबर 1939 में ब्रिटेन के जर्मनी के विरुद्ध युद्ध में उतरते ही भारत को भी बिना किसी भारतीय राजनीतिक सहमति के युद्धरत घोषित कर दिया गया।

युद्ध यूरोप में था, लेकिन उसकी आर्थिक कीमत भारतीय गांव तक पहुंची।

सैनिक आवश्यकताओं के लिए वस्तुओं की मांग बढ़ी।

परिवहन व्यवस्था पर युद्धकालीन दबाव पड़ा।

बाजार में वस्तुओं की उपलब्धता और कीमतें बदलीं।

खाद्यान्न की खरीद और वितरण पर सरकारी हस्तक्षेप बढ़ा।

इसलिए ठाणे का वारली किसान युद्ध के मोर्चे से हजारों किलोमीटर दूर रहते हुए भी उसकी आर्थिक मार से बचा नहीं था।

2. युद्धकालीन महंगाई

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारत में सामान्य मूल्य स्तर तेजी से बढ़ा। इसका सबसे अधिक असर उन वर्गों पर पड़ा जिनकी आय कीमतों के अनुपात में नहीं बढ़ी।

वारली खेत-मजदूर इसी श्रेणी में था।

यदि किसी मजदूर की मजदूरी स्थिर रही और चावल, नमक, कपड़ा तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ गईं, तो उसकी वास्तविक मजदूरी गिर गई।

इस अंतर को समझना जरूरी है।

नकद मजदूरी बताती है कि मजदूर को कितने रुपये या आने मिले।

वास्तविक मजदूरी बताती है कि उन रुपयों या आनों से वह कितना भोजन और सामान खरीद सकता है।

वारली संघर्ष के लिए दूसरी चीज अधिक महत्वपूर्ण थी।

3. कीमत बढ़ी, मजदूरी नहीं बढ़ी तो क्या हुआ?

मान लें किसी मजदूर को पहले एक दिन के काम के बदले इतनी मजदूरी मिलती थी जिससे परिवार के लिए निश्चित मात्रा में अनाज खरीदा जा सकता था।

यदि अनाज की कीमत दोगुनी हो गई और मजदूरी वही रही तो मजदूर की वास्तविक क्रय-शक्ति लगभग आधी हो सकती थी।

उसके सामने तीन विकल्प थे—

या अधिक मजदूरी मांगे।

गरीब परिवार पहले दो विकल्प लंबे समय से आजमा रहा था।

1945 में तीसरा विकल्प संगठित राजनीतिक मांग बन गया।

4. युद्धकालीन खाद्यान्न संकट

भारत की खाद्य स्थिति युद्ध के दौरान कई कारणों से बिगड़ी।

उत्पादन में क्षेत्रीय असमानता थी।

बर्मा से चावल की आपूर्ति का नुकसान हुआ।

युद्धकालीन परिवहन पर दबाव था।

प्रांतीय सरकारों की अलग-अलग नीतियों ने अंतर-प्रांतीय खाद्य व्यापार को प्रभावित किया।

जमाखोरी और बाजार में अनिश्चितता ने संकट बढ़ाया।

ब्रिटिश सरकार ने स्वयं सितंबर 1943 में भारत के खाद्य संकट के कारणों में खराब फसल, बर्मा से आयात की समाप्ति, किसानों द्वारा बाजार में अनाज रोकना, व्यापारी जमाखोरी, प्रांतीय हितों के टकराव और प्रशासनिक विफलताओं का उल्लेख किया था।

इसलिए खाद्य संकट का कोई एक कारण नहीं था।

यह युद्ध, उत्पादन, बाजार और प्रशासनिक नीतियों की संयुक्त समस्या थी।

5. बर्मा का पतन क्यों महत्वपूर्ण था?

युद्ध से पहले भारत के कुछ हिस्से बर्मा से आने वाले चावल पर निर्भर थे।

1942 में जापानी सेनाओं द्वारा बर्मा पर कब्जे के बाद यह आपूर्ति गंभीर रूप से प्रभावित हुई।

इसका असर पूरे भारतीय खाद्यान्न बाजार पर पड़ा।

भले ठाणे का कोई वारली परिवार सीधे बर्मा का चावल न खरीदता हो, लेकिन राष्ट्रीय और प्रांतीय बाजार में आपूर्ति घटने का असर कीमतों पर पड़ सकता था।

यही बाजार की श्रृंखला है—

एक क्षेत्र की आपूर्ति बाधित हुई,

दूसरे क्षेत्र में मांग बढ़ी,

और अंततः गरीब उपभोक्ता को महंगा भोजन मिला।

6. 1943 : भारतीय खाद्य संकट का निर्णायक वर्ष

1943 भारतीय इतिहास में बंगाल अकाल के कारण विशेष रूप से स्मरण किया जाता है। लेकिन खाद्य संकट केवल बंगाल तक सीमित नहीं था।

ब्रिटिश संसद में सितंबर 1943 के वक्तव्य में बंबई और मद्रास के कुछ क्षेत्रों, कोचीन, त्रावणकोर और सबसे गंभीर रूप से बंगाल को खाद्य संकट से प्रभावित बताया गया था।

बंबई शहर में स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मई 1943 में वहां राशन व्यवस्था लागू हो चुकी थी। समकालीन श्रम अभिलेख भी बंबई शहर में 2 मई 1943 से राशनिंग लागू होने का उल्लेख करते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि ठाणे के सभी ग्रामीण वारली परिवारों को उसी प्रकार राशन मिला।

बल्कि यही अंतर महत्वपूर्ण है—

शहर में नियंत्रित वितरण की व्यवस्था विकसित हो रही थी, जबकि दूरस्थ ग्रामीण और आदिवासी आबादी बाजार, स्थानीय उत्पादन और परंपरागत ऋण व्यवस्था पर अधिक निर्भर थी।

7. बंबई राशनिंग का ऐतिहासिक महत्व

बंबई की राशन व्यवस्था युद्धकालीन खाद्य प्रशासन के विकास में महत्वपूर्ण प्रयोग बनी।

ब्रिटिश संसद में अगस्त 1943 तक यह स्वीकार किया जा रहा था कि बंबई शहर में अनाज राशनिंग लागू है और इसे अन्य शहरी क्षेत्रों में विस्तारित किया जा रहा है।

बाद में स्वतंत्र भारत में जवाहरलाल नेहरू ने भी उल्लेख किया कि सरकारी खाद्यान्न खरीद और वितरण की संगठित व्यवस्था 1943 में बंबई की राशन प्रणाली से शुरू हुई और फिर देश के अन्य भागों तक विस्तारित हुई।

लेकिन ग्रामीण वारली अर्थव्यवस्था के लिए तत्काल समस्या यह थी कि ऐसी सुरक्षा प्रणाली की पहुंच सीमित थी।

8. शहर और गांव के अनुभव में अंतर

युद्धकालीन अर्थव्यवस्था का प्रभाव शहर और गांव पर समान नहीं था।

बंबई जैसे बड़े शहर में औद्योगिक मजदूरों और प्रशासनिक आवश्यकताओं के कारण खाद्यान्न वितरण को व्यवस्थित करना सरकार की प्राथमिकता थी।

ग्रामीण आदिवासी क्षेत्र में परिवार अक्सर निर्भर था—

भू-स्वामी से मिले अनाज पर,

साहूकार से लिए कर्ज पर,

और जंगल से मिलने वाले पूरक भोजन पर।

यदि इनमें से कई स्रोत एक साथ कमजोर पड़ जाएं तो संकट अधिक गंभीर हो जाता था।

9. वारली परिवार की खाद्य अर्थव्यवस्था

वारली परिवार का भोजन केवल बाजार से खरीदे गए अनाज पर निर्भर नहीं था।

उसकी खाद्य व्यवस्था में शामिल हो सकते थे—

मजदूरी में मिला अनाज,

जंगल से प्राप्त खाद्य सामग्री,

और संकट के समय खावटी।

युद्धकालीन महंगाई ने बाजार से खरीद महंगी की।

भूमि-वंचना ने अपनी फसल घटाई।

वन नियंत्रण ने पूरक स्रोतों पर दबाव डाला।

और कम मजदूरी ने खरीदने की क्षमता सीमित की।

यानी संकट कई दिशाओं से एक साथ आया।

10. खाद्यान्न की कमी और खावटी

लेकिन खावटी मुफ्त सहायता नहीं थी।

अध्याय 10

अखिल भारतीय किसान सभा और महाराष्ट्र किसान सभा का प्रवेश — वारली क्षेत्र में संगठन की शुरुआत

वारली आंदोलन का निर्णायक मोड़ तब आया जब ठाणे क्षेत्र का स्थानीय आदिवासी असंतोष संगठित किसान राजनीति से जुड़ गया। यह प्रक्रिया न तो एक दिन में हुई और न ही केवल किसी बाहरी राजनीतिक नेतृत्व के हस्तक्षेप से। वारली समाज में भूमि-वंचना, वेठ-बेगार, कम मजदूरी, कर्ज, साहूकारी और सामाजिक अपमान के कारण पहले से गहरा असंतोष मौजूद था। लेकिन उस असंतोष को व्यापक राजनीतिक रूप देने के लिए संगठन, साझा मांग, स्थानीय नेतृत्व, सभा, प्रचार और सामूहिक कार्रवाई की आवश्यकता थी।

यही भूमिका अखिल भारतीय किसान सभा और उसके प्रांतीय नेटवर्क—विशेष रूप से महाराष्ट्र किसान सभा—ने निभाई।

1940 के दशक के मध्य तक किसान सभा ने ठाणे के आदिवासी क्षेत्र में प्रवेश किया और स्थानीय शिकायतों को वर्गीय तथा राजनीतिक भाषा में परिभाषित करना शुरू किया। यही वह समय था जब वारली समाज ने पहली बार बड़े पैमाने पर यह अनुभव किया कि उसकी समस्याएं केवल किसी एक भू-स्वामी या साहूकार की मनमानी नहीं, बल्कि व्यापक ग्रामीण सत्ता-संरचना का हिस्सा हैं।

1. अखिल भारतीय किसान सभा की व्यापक पृष्ठभूमि

अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना 1936 में हुई थी। उसका उद्देश्य किसानों को औपनिवेशिक शासन, जमींदारी शोषण, ऊंचे लगान, साहूकारी और अन्य कृषि समस्याओं के विरुद्ध संगठित करना था।

1930 और 1940 के दशकों में किसान सभा ने कई प्रांतों में तेजी से विस्तार किया।

उसकी सक्रियता के महत्वपूर्ण क्षेत्र बने।

किसान सभा के भीतर समाजवादी, कम्युनिस्ट और अन्य वामपंथी धाराओं का प्रभाव बढ़ता गया। इससे उसका कार्यक्रम केवल लगान घटाने तक सीमित नहीं रहा; भूमि संबंधों, ग्रामीण वर्ग-सत्ता और खेत-मजदूरों के प्रश्न भी उसके एजेंडे में प्रमुख होते गए।

ठाणे के वारली क्षेत्र में यही व्यापक किसान राजनीति स्थानीय परिस्थितियों से जुड़ने वाली थी।

2. बंबई प्रेसीडेंसी और किसान संगठन

बंबई प्रेसीडेंसी का ग्रामीण समाज अत्यंत विविध था।

एक ओर गुजरात के समृद्ध पट्टीदार क्षेत्र थे।

दूसरी ओर दक्कन का कृषक क्षेत्र।

और तीसरी ओर ठाणे, नासिक तथा गुजरात सीमा से जुड़े आदिवासी इलाके।

किसान सभा के सामने चुनौती थी कि एक ही संगठन में इन अलग-अलग सामाजिक संरचनाओं को कैसे जोड़ा जाए।

वारली क्षेत्र में जमीन का प्रश्न था, लेकिन उससे भी अधिक तत्काल प्रश्न थे—

और सामाजिक उत्पीड़न।

इसलिए यहां किसान सभा को पारंपरिक 'किसान' की परिभाषा से आगे जाना पड़ा।

3. किसान से आगे खेत-मजदूर

वारली समाज की सामाजिक संरचना ने किसान सभा के कार्यक्रम को चुनौती दी।

कई वारली छोटे किसान थे।

कई भूमिहीन खेत-मजदूर।

और अनेक परिवार कृषि तथा मौसमी वन-मजदूरी दोनों करते थे।

इसलिए संगठन केवल भूमिधारी किसान पर आधारित नहीं हो सकता था।

उसे खेत-मजदूर और ऋण-निर्भर श्रमिक को भी शामिल करना था।

यही वारली क्षेत्र में किसान सभा की रणनीति की विशिष्टता बनी।

4. कम्युनिस्ट नेतृत्व की भूमिका

1940 के दशक तक कम्युनिस्ट पार्टी का किसान सभा पर प्रभाव बढ़ चुका था।

महाराष्ट्र में शामराव परुलेकर और गोदावरी परुलेकर इस प्रक्रिया के महत्वपूर्ण नेता बने।

उन्होंने ठाणे के आदिवासी क्षेत्रों में जाकर स्थानीय वारली समाज की वास्तविक स्थितियों का अध्ययन किया और वहां संगठन खड़ा करने की कोशिश की।

यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने केवल भाषण नहीं दिए।

उन्होंने स्थानीय समस्याओं को आंदोलन की भाषा में बदलने का प्रयास किया।

वेठ कैसे कराई जाती है?

कर्ज किस शर्त पर मिलता है?

कौन से गांव अधिक प्रभावित हैं?

किस क्षेत्र में असंतोष अधिक है?

इन प्रश्नों के आधार पर संगठनात्मक विस्तार हुआ।

5. शामराव परुलेकर

शामराव परुलेकर किसान और मजदूर राजनीति के अनुभवी कार्यकर्ता थे।

उन्होंने महाराष्ट्र में किसान सभा के संगठनात्मक निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1945 के टिटवाला सम्मेलन में वे महाराष्ट्र किसान सभा के महासचिव बने।

उनकी भूमिका केवल मंचीय नेतृत्व तक सीमित नहीं थी।

वे ठाणे जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर स्थानीय कार्यकर्ताओं से संपर्क करते और संगठन की रणनीति विकसित करते थे।

वारली आंदोलन में उनकी भूमिका आगे के अध्याय में और विस्तार से देखी जाएगी।

6. गोदावरी परुलेकर

गोदावरी परुलेकर वारली आंदोलन की सबसे प्रमुख सार्वजनिक नेताओं में से एक बनीं।

उन्होंने गांव-गांव जाकर वारली महिलाओं और पुरुषों से संवाद किया।

उनका महत्व इसलिए भी बढ़ा क्योंकि उन्होंने आदिवासी जीवन को भीतर से समझने और बाद में उसका विस्तृत वृत्तांत लिखने की कोशिश की।

लेकिन यहां यह ध्यान रखना चाहिए कि गोदावरी और शामराव का नेतृत्व तभी प्रभावी हुआ क्योंकि स्थानीय वारली समाज में आंदोलन की जमीन पहले से मौजूद थी।

उन्होंने असंतोष पैदा नहीं किया।

उन्होंने उसे संगठनात्मक रूप दिया।

7. टिटवाला सम्मेलन : जनवरी 1945

जनवरी 1945 का टिटवाला सम्मेलन वारली आंदोलन की संगठनात्मक यात्रा में निर्णायक बिंदु था।

इस सम्मेलन में हजारों किसानों ने भाग लिया और ठाणे जिले के आदिवासी प्रतिनिधियों की भी उपस्थिति रही।

यहीं वारली प्रतिनिधियों ने व्यापक किसान राजनीति का अनुभव किया।

उन्हें पहली बार यह दिखाई दिया कि दूसरे क्षेत्रों के किसान भी—

के खिलाफ संगठित हो रहे हैं।

इस सम्मेलन ने स्थानीय शिकायतों को बड़े राजनीतिक संदर्भ से जोड़ा।

8. सम्मेलन का मनोवैज्ञानिक प्रभाव

टिटवाला का महत्व केवल प्रस्तावों में नहीं था।

एक आदिवासी प्रतिनिधि जब हजारों किसानों को एक साथ देखता है, तो उसकी राजनीतिक कल्पना बदलती है।

हमारी समस्या अलग नहीं।

बड़े भू-स्वामी के खिलाफ सामूहिक प्रतिरोध संभव है।

यही मनोवैज्ञानिक परिवर्तन वारली आंदोलन में अत्यंत महत्वपूर्ण था।

9. स्थानीय प्रतिनिधियों की भूमिका

सम्मेलन से लौटे वारली प्रतिनिधियों ने गांवों में संदेश फैलाया।

यही संगठन का वास्तविक विस्तार था।

बाहरी नेता हर पाड़े में हर समय मौजूद नहीं हो सकते थे।

आंदोलन तभी टिक सकता था जब स्थानीय लोग स्वयं—

और निर्णय लागू कराएं।

इसलिए किसान सभा की सफलता का वास्तविक आधार स्थानीय वारली कार्यकर्ता थे।

10. गांव-दर-गांव संगठन

किसान सभा ने वारली क्षेत्र में गांव-दर-गांव संपर्क विकसित किया।

पाड़ों में बैठकें हुईं।

छोटी सभाओं से बड़े सम्मेलन तैयार हुए।

स्थानीय शिकायतें दर्ज की गईं।

मजदूरी और वेठ के मुद्दों पर सामूहिक राय बनाई गई।

यह पारंपरिक ग्रामीण शिकायत-प्रणाली से बिल्कुल अलग था।

अब व्यक्ति भू-स्वामी के सामने अकेला नहीं था।

उसकी शिकायत संगठन के माध्यम से सामूहिक प्रश्न बन सकती थी।

11. भाषा का प्रश्न

किसान सभा को एक बड़ी व्यावहारिक समस्या थी—भाषा।

राजनीतिक साहित्य प्रायः मराठी या अन्य विकसित लिखित भाषाओं में होता था।

वारली समाज का बड़ा हिस्सा अशिक्षित या कम शिक्षित था।

इसलिए आंदोलन का संदेश लिखित पुस्तिकाओं से अधिक—

के माध्यम से फैलाया गया।

यह आदिवासी समाज में राजनीतिक संचार का अधिक प्रभावी माध्यम था।

12. वर्गीय भाषा कैसे स्थानीय बनी?

कम्युनिस्ट राजनीति की भाषा थी—

लेकिन यदि इन शब्दों को अमूर्त रूप में प्रस्तुत किया जाता, तो उनका प्रभाव सीमित रहता।

वारली क्षेत्र में उन्हें ठोस अनुभव से जोड़ा गया—

भू-स्वामी मुफ्त काम क्यों लेता है?

मजदूरी इतनी कम क्यों है?

कर्ज खत्म क्यों नहीं होता?

यहां राजनीतिक सिद्धांत स्थानीय जीवन में अनुवादित हुआ।

13. लाल झंडे का प्रवेश

किसान सभा का लाल झंडा धीरे-धीरे वारली क्षेत्र में संगठन का प्रतीक बन गया।

उसका अर्थ केवल कम्युनिस्ट विचारधारा नहीं था।

स्थानीय वारली के लिए वह संकेत बन गया—

यहां हमारे लोग संगठित हैं।

यहां मजदूरी पर सामूहिक निर्णय होगा।

यहां भू-स्वामी का अकेला आदेश अंतिम नहीं है।

इस तरह प्रतीक राजनीतिक सुरक्षा का माध्यम बना।

18. स्थानीय नेतृत्व का उभार

भू-स्वामियों को जानते थे।

अध्याय 11

शामराव परुलेकर — राजनीतिक पृष्ठभूमि और किसान आंदोलन में भूमिका

वारली आंदोलन का इतिहास शामराव विष्णु परुलेकर के बिना अधूरा है। वे केवल एक कम्युनिस्ट नेता या किसान सभा के पदाधिकारी नहीं थे, बल्कि महाराष्ट्र में किसान, खेत-मजदूर और आदिवासी प्रश्नों को एक साझा राजनीतिक ढांचे में जोड़ने वाले शुरुआती संगठकों में शामिल थे। उनकी राजनीतिक यात्रा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि वह सीधे कम्युनिस्ट आंदोलन से शुरू नहीं हुई थी। उसमें सामाजिक सेवा, श्रमिक राजनीति, डॉ. भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व वाले सामाजिक संघर्षों से संपर्क, किसान आंदोलन, औपनिवेशिक-विरोध और अंततः कम्युनिस्ट राजनीति तक का क्रम दिखाई देता है।

शामराव परुलेकर का जन्म 5 अक्टूबर 1902 को हुआ। आगे चलकर वे बंबई विधानमंडल के सदस्य, मजदूर प्रतिनिधि, किसान नेता, लोकसभा सदस्य और भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के महत्वपूर्ण कार्यकर्ता बने। 1964 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन के बाद बनी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की पहली केंद्रीय समिति में भी उन्हें चुना गया। 3 अगस्त 1965 को मुंबई की आर्थर रोड जेल में हिरासत के दौरान 63 वर्ष की आयु में हृदयाघात से उनका निधन हुआ।

लेकिन वारली आंदोलन के लिए उनकी सबसे महत्वपूर्ण पहचान थी—महाराष्ट्र राज्य किसान सभा के संस्थापकों में से एक और ठाणे के आदिवासी किसानों को संगठित करने वाले प्रमुख नेता।

1. शुरुआती राजनीतिक जीवन : कम्युनिस्ट बनने से पहले

शामराव परुलेकर की राजनीतिक यात्रा को सीधे 1945 के वारली विद्रोह से शुरू करना गलत होगा। उससे पहले वे लगभग दो दशकों से सामाजिक और राजनीतिक कार्यों में सक्रिय थे।

वे 1928 से 1940 के बीच सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी से जुड़े रहे। यह संस्था गोपाल कृष्ण गोखले द्वारा स्थापित की गई थी और उसका उद्देश्य सार्वजनिक जीवन के लिए प्रशिक्षित सामाजिक कार्यकर्ताओं को तैयार करना था। इससे परुलेकर की शुरुआती राजनीति में सामाजिक सेवा, संगठन और सार्वजनिक प्रश्नों के अध्ययन की परंपरा दिखाई देती है। उनके लोकसभा संबंधी जीवन-वृत्त में सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी से उनके इस लंबे जुड़ाव का उल्लेख मिलता है।

यानी उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत केवल पार्टी राजनीति से नहीं, बल्कि सामाजिक प्रश्नों के व्यावहारिक अध्ययन से हुई थी।

2. श्रमिक आंदोलन की ओर

मुंबई और बंबई प्रेसीडेंसी उस समय भारत के सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्रों में थे। कपड़ा मिलें, बंदरगाह, रेलवे और औद्योगिक मजदूर राजनीति का बड़ा आधार बन रहे थे।

शामराव ने मजदूर प्रश्नों पर भी काम किया और 1938 में जिनेवा में आयोजित अंतरराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन में श्रमिक प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया। उनके आधिकारिक संसदीय जीवन-वृत्त में यह तथ्य दर्ज है।

इस अनुभव का आगे किसान राजनीति पर प्रभाव समझना महत्वपूर्ण है।

औद्योगिक श्रमिक आंदोलन में—

बाद में वारली क्षेत्र में इन्हीं सिद्धांतों को ग्रामीण श्रम संबंधों पर लागू करने का प्रयास हुआ।

3. डॉ. आंबेडकर के आंदोलनों से संपर्क

शामराव परुलेकर के राजनीतिक विकास का एक महत्वपूर्ण पक्ष डॉ. भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व वाले सामाजिक और किसान संघर्षों से उनका संबंध था।

महाराष्ट्र के कम्युनिस्ट आंदोलन के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार शामराव परुलेकर उन कम्युनिस्ट नेताओं में थे जिन्होंने डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व वाले आंदोलनों में भाग लिया। 1938 में डॉ. आंबेडकर और शामराव परुलेकर ने कोंकण की खोटी व्यवस्था के विरुद्ध मुंबई विधानमंडल तक विशाल किसान प्रदर्शन का नेतृत्व किया।

यह अनुभव अत्यंत महत्वपूर्ण था।

क्योंकि खोटी-विरोधी संघर्ष में भी मूल प्रश्न था—

भूमि पर किसका नियंत्रण है?

काश्तकार का अधिकार क्या है?

मध्यस्थ भू-स्वामी कितनी शक्ति रखे?

यानी वारली आंदोलन से पहले ही परुलेकर ग्रामीण भूमि-संबंधों और किसान शोषण की समस्या से व्यावहारिक रूप से जुड़ चुके थे।

4. खोटी-विरोधी संघर्ष से वारली संघर्ष तक

कोंकण की खोटी व्यवस्था और ठाणे की वारली कृषि संरचना समान नहीं थीं।

लेकिन दोनों में एक साझा तत्व था—

जमीन पर श्रम करने वाला व्यक्ति और जमीन की वास्तविक सत्ता रखने वाला व्यक्ति अलग-अलग हो सकते थे।

खोटी-विरोधी आंदोलन ने शामराव को यह समझ दी कि किसान प्रश्न केवल राजस्व घटाने से हल नहीं होता।

ग्रामीण सत्ता की संरचना को चुनौती देना आवश्यक है।

इसी अनुभव का परिपक्व रूप बाद में वारली क्षेत्र में दिखाई देता है।

5. कम्युनिस्ट राजनीति की ओर संक्रमण

1930 के दशक में भारत में समाजवादी और कम्युनिस्ट विचारों का प्रभाव बढ़ रहा था।

औद्योगिक मजदूर आंदोलन,

और सोवियत संघ के प्रभाव

ने युवा राजनीतिक कार्यकर्ताओं को वाम राजनीति की ओर आकर्षित किया।

शामराव भी धीरे-धीरे कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़े।

यह परिवर्तन केवल वैचारिक नहीं था।

उनके लिए किसान और मजदूर प्रश्नों को व्यक्तिगत सुधार के बजाय संरचनात्मक शोषण से जोड़ने का आधार अब अधिक स्पष्ट हो गया।

ये सभी एक-दूसरे से जुड़े प्रश्न माने जाने लगे।

6. अखिल भारतीय किसान सभा ने नई दिशा दी

1936 में अखिल भारतीय किसान सभा बनने के बाद किसान आंदोलन को राष्ट्रीय संगठनात्मक ढांचा मिला।

महाराष्ट्र में भी किसान सभा का विस्तार आवश्यक था।

CPI(M) के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार अखिल भारतीय किसान सभा ने शामराव परुलेकर को महाराष्ट्र में किसान संगठन खड़ा करने के लिए आयोजक की जिम्मेदारी दी।

यही जिम्मेदारी आगे उनके जीवन की केंद्रीय राजनीतिक दिशा बन गई।

अब उनका कार्य किसी एक क्षेत्र में आंदोलन करना नहीं, बल्कि महाराष्ट्र में स्थायी किसान संगठन खड़ा करना था।

7. द्वितीय विश्वयुद्ध और ब्रिटिश विरोध

द्वितीय विश्वयुद्ध ने भारतीय कम्युनिस्ट राजनीति को जटिल दौर से गुजारा।

युद्ध के शुरुआती चरण में ब्रिटिश युद्ध नीति के विरुद्ध अभियान चलाने के कारण शामराव और गोदावरी परुलेकर को जेल जाना पड़ा। CPI(M) के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार वे लगभग दो वर्ष की ब्रिटिश जेल अवधि के बाद 1942 में रिहा हुए।

रिहाई के बाद दोनों ने किसान सभा के संगठनात्मक काम को अधिक सक्रिय रूप से आगे बढ़ाया।

यही वह चरण है जहां उनकी राजनीति शहर और औद्योगिक मजदूरों से हटकर ग्रामीण महाराष्ट्र की ओर अधिक निर्णायक रूप से मुड़ती है।

8. 1943–44 : ठाणे में किसान सभा का आधार

1943–44 में शामराव और गोदावरी ने ठाणे जिले के कल्याण, मुरबाड और शाहापुर तालुकों में किसान सभा का संगठन विकसित करना शुरू किया।

यह तथ्य वारली आंदोलन की समयरेखा समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

वे सीधे दहानू और तलासरी में जाकर अचानक विद्रोह शुरू नहीं कर रहे थे।

पहले ठाणे जिले के अन्य कृषक क्षेत्रों में संगठनात्मक आधार बनाया गया।

कार्यकर्ताओं की पहचान हुई।

किसान सभा का नेटवर्क बनाया गया।

और फिर यह संगठन आदिवासी क्षेत्रों तक पहुंचा।

यानी वारली आंदोलन के पीछे पूर्व तैयारी मौजूद थी।

9. महाराष्ट्र राज्य किसान सभा की स्थापना

महाराष्ट्र किसान राजनीति के इतिहास में जनवरी 1945 निर्णायक है।

टिटवाला में आयोजित प्रथम राज्य किसान सम्मेलन में महाराष्ट्र राज्य किसान सभा की स्थापना हुई। उपलब्ध स्रोतों में सम्मेलन की तारीख को लेकर कुछ विवरणों में मामूली अंतर मिलता है, लेकिन किसान सभा और CPI(M) के विस्तृत इतिहास में 12 जनवरी 1945 को स्थापना सम्मेलन की तारीख बताया गया है।

शामराव परुलेकर महासचिव,

और गोदावरी परुलेकर संयुक्त सचिवों में चुनी गईं। किसान सभा के एक अन्य ऐतिहासिक प्रकाशन में भी यही पद-संरचना दर्ज है।

शामराव की महासचिव के रूप में नियुक्ति बताती है कि वे केवल वारली क्षेत्र के स्थानीय कार्यकर्ता नहीं थे।

वे महाराष्ट्र स्तर के किसान संगठन के केंद्रीय आयोजक थे।

10. सम्मेलन की तैयारी : संगठन का पैमाना

टिटवाला सम्मेलन के लिए बड़े पैमाने पर प्रचार अभियान चलाया गया।

16. शामराव का संगठनात्मक तरीका

स्थानीय नेतृत्व तैयार करना,

अध्याय 12

गोदावरी परुलेकर — वारली आंदोलन के नेतृत्व का निर्माण

वारली आंदोलन के इतिहास में गोदावरी परुलेकर का नाम केवल एक नेता के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में दर्ज है जिसने आदिवासी समाज के बीच रहकर उसके अनुभव, शोषण और प्रतिरोध को व्यापक किसान राजनीति से जोड़ा। उनका जीवन सामाजिक सेवा, स्वतंत्रता आंदोलन, मजदूर राजनीति, कम्युनिस्ट संगठन, किसान सभा और आदिवासी संघर्ष—इन सभी धाराओं का संगम था। इसी कारण वारली आंदोलन में उनकी भूमिका केवल भाषण देने वाली बाहरी नेता की नहीं, बल्कि मैदानी संगठनकर्ता, राजनीतिक शिक्षिका, लेखिका और आदिवासी अधिकारों की दीर्घकालीन पैरोकार की थी।

गोदावरी परुलेकर का जन्म 14 अगस्त 1907 को पुणे में एक शिक्षित और संपन्न परिवार में हुआ। वे उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाली अपने समय की अग्रणी महिलाओं में थीं और महाराष्ट्र की पहली महिला विधि स्नातकों में गिनी जाती हैं। बाद में वे सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी से जुड़ीं, स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हुईं, कम्युनिस्ट आंदोलन में आईं और अंततः वारली आदिवासी संघर्ष से उनका जीवन गहराई से जुड़ गया।

1. सामाजिक सुविधा से संघर्ष के जीवन की ओर

गोदावरी का जन्म ऐसी सामाजिक पृष्ठभूमि में हुआ जहां शिक्षा, कानून और सार्वजनिक जीवन तक पहुंच उपलब्ध थी। उनके पिता लक्ष्मणराव गोखले प्रतिष्ठित वकील थे और उनका परिवार सार्वजनिक जीवन से जुड़ा था। इस कारण गोदावरी को वह शिक्षा मिली जो उस समय अधिकांश भारतीय महिलाओं को उपलब्ध नहीं थी। उन्होंने अर्थशास्त्र और राजनीति का अध्ययन किया और बाद में कानून की पढ़ाई की।

इस पृष्ठभूमि का महत्व इसलिए है कि आगे उन्होंने अपनी सामाजिक सुविधा को त्यागकर उन समुदायों के बीच काम करना चुना जो शिक्षा, संपत्ति और प्रशासनिक पहुंच से लगभग वंचित थे।

यानी उनकी राजनीतिक यात्रा सामाजिक विशेषाधिकार से सामाजिक संघर्ष की ओर गई।

2. स्वतंत्रता आंदोलन और प्रारंभिक सक्रियता

भारत सरकार के स्वतंत्रता सेनानी संबंधी विवरण के अनुसार गोदावरी छात्र जीवन से ही ब्रिटिश शासन-विरोधी गतिविधियों में सक्रिय थीं और 1932 में व्यक्तिगत सत्याग्रह के लिए उन्हें दंडित किया गया। इसके बाद वे मुंबई आईं और सामाजिक कार्य में सक्रिय हुईं।

यह चरण महत्वपूर्ण था क्योंकि यहां उनका राजनीतिक व्यक्तित्व केवल बौद्धिक स्तर पर नहीं बन रहा था।

औपनिवेशिक राज्य की दमनात्मक शक्ति देखी।

और सामाजिक आंदोलन के व्यावहारिक पक्ष से जुड़ीं।

3. सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी

गोदावरी परुलेकर सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी से जुड़ीं और उसके जीवन-सदस्य के रूप में स्वीकार की जाने वाली पहली महिला बनीं। यह संस्था गोपाल कृष्ण गोखले की सुधारवादी सार्वजनिक सेवा परंपरा से जुड़ी थी।

इस संस्था ने उन्हें सामाजिक कार्य का अनुशासन दिया—

और सामाजिक समस्याओं को प्रत्यक्ष रूप से समझना।

लेकिन समय के साथ गोदावरी और शामराव परुलेकर को लगा कि सामाजिक सेवा भर से भूमि, मजदूरी और वर्गीय शोषण जैसी समस्याएं नहीं सुलझेंगी।

यहीं से उनके राजनीतिक विचारों में बड़ा बदलाव आया।

4. सुधारवाद से मार्क्सवाद की ओर

गोदावरी और शामराव की राजनीतिक यात्रा का एक निर्णायक पहलू था सुधारवादी सामाजिक सेवा से कम्युनिस्ट राजनीति की ओर उनका संक्रमण।

अशोक धवले के विस्तृत राजनीतिक जीवन-वृत्त में इस परिवर्तन को उनकी वैचारिक यात्रा का केंद्रीय तत्व माना गया है। द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले तक वे श्रमिक और किसान प्रश्नों को अधिक संरचनात्मक दृष्टि से देखने लगी थीं।

उनका निष्कर्ष था कि गरीबी केवल व्यक्तिगत दुर्भाग्य नहीं।

भूमिहीनता केवल आकस्मिक घटना नहीं।

और कम मजदूरी केवल किसी मालिक की निजी कंजूसी नहीं।

इन सबके पीछे सत्ता और उत्पादन संबंधों की संरचना थी।

यही दृष्टि आगे वारली आंदोलन में स्पष्ट दिखाई देती है।

5. मजदूर राजनीति का अनुभव

कम्युनिस्ट राजनीति से जुड़ने के बाद गोदावरी ने शहरी मजदूर आंदोलनों में भाग लिया।

इस अनुभव ने उन्हें सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति समझाई।

हड़ताल क्या करती है?

संगठन क्यों जरूरी है?

मजदूरी व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक प्रश्न कैसे बनती है?

इन प्रश्नों का अनुभव उन्हें शहरी मजदूर राजनीति से मिला।

बाद में जब वे ठाणे के वारली क्षेत्र में पहुंचीं तो यही संगठनात्मक सिद्धांत ग्रामीण श्रम संबंधों पर लागू हुए।

6. 1940–42 की कैद

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश युद्ध नीति के विरुद्ध कम्युनिस्ट गतिविधियों के कारण गोदावरी को 1940 से 1942 तक जेल में रहना पड़ा। उनके जीवन-वृत्त में इस अवधि का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।

जेल से निकलने के बाद उनकी राजनीति और अधिक स्पष्ट रूप से किसान संगठन की ओर मुड़ी।

अब उनका लक्ष्य केवल औपनिवेशिक शासन का विरोध नहीं था।

वे ग्रामीण भारत की उस सामाजिक व्यवस्था को भी चुनौती देना चाहती थीं जिसमें गरीब किसान और मजदूर स्वतंत्र नहीं थे।

7. अखिल भारतीय किसान सभा और महाराष्ट्र की ओर

रिहाई के बाद गोदावरी परुलेकर किसान राजनीति से अधिक सक्रिय रूप से जुड़ीं।

उन्होंने अखिल भारतीय किसान सभा के साथ काम किया और महाराष्ट्र राज्य किसान सभा की स्थापना में प्रमुख भूमिका निभाई। 12 जनवरी 1945 के टिटवाला सम्मेलन में महाराष्ट्र किसान सभा की स्थापना हुई; शामराव परुलेकर महासचिव और गोदावरी संयुक्त सचिव चुनी गईं। सम्मेलन में 7,000 से अधिक किसानों की भागीदारी और उमरगांव के आदिवासी प्रतिनिधियों की उपस्थिति दर्ज है।

इससे गोदावरी पहली बार वारली समाज के उस व्यापक राजनीतिक प्रश्न से सीधे जुड़ीं जो आगे उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य बनने वाला था।

8. टिटवाला में वारली प्रतिनिधियों से संपर्क

टिटवाला सम्मेलन के दौरान वारली प्रतिनिधियों ने अपने जीवन की स्थितियां सामने रखीं—

भू-स्वामी का अत्याचार।

गोदावरी के लिए यह केवल रिपोर्ट सुनने का अनुभव नहीं था।

उन्होंने इस समस्या को प्रत्यक्ष रूप से समझने का निर्णय लिया।

यहीं से शहर और राजनीतिक मंच से उनकी यात्रा पाड़ों, जंगलों और आदिवासी गांवों की ओर मुड़ी।

9. वारली क्षेत्र में प्रवेश

1945 में गोदावरी और शामराव परुलेकर वारली क्षेत्रों में अधिक सक्रिय हुए।

तलासरी, दहानू और पुराने उमरगांव क्षेत्र में उन्होंने स्थानीय आदिवासी कार्यकर्ताओं के साथ गांव-दर-गांव संपर्क विकसित किया।

यहीं गोदावरी की भूमिका अलग दिखाई देती है।

वह केवल राजनीतिक भाषण नहीं देती थीं।

कर्ज किससे लेते हैं,

वेठ कैसे कराई जाती है,

महिलाओं की स्थिति क्या है,

और भू-स्वामी से इनकार करना इतना कठिन क्यों है।

उनकी बाद की पुस्तक इसी निकट संपर्क का परिणाम थी।

10. रहने की परिस्थितियों ने दृष्टि कैसे बदली?

गोदावरी परुलेकर का वारली समाज से संपर्क केवल बैठकों तक सीमित नहीं रहा।

उन्होंने अपने संस्मरण में गरीबी, भोजन की कमी, घरों की दशा और ग्रामीण उत्पीड़न का प्रत्यक्ष वर्णन किया।

इससे उनके राजनीतिक दृष्टिकोण में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है—

अब आदिवासी उनके लिए केवल 'गरीब किसान' नहीं था।

वह विशिष्ट सांस्कृतिक समाज था जिसकी गरीबी भूमि, जंगल, श्रम और सामाजिक अपमान से निर्मित हुई थी।

यही समझ उन्हें किसान नेता से आदिवासी किसान नेता में बदलती है।

11. स्थानीय भाषा और संवाद

किसी बाहरी नेता के लिए सबसे बड़ी बाधाओं में एक भाषा और सांस्कृतिक दूरी थी।

वारली समाज मुख्यतः मौखिक परंपरा वाला था।

इसलिए राजनीतिक प्रचार पुस्तिकाओं से नहीं हो सकता था।

गोदावरी ने बैठकों, व्यक्तिगत बातचीत, स्थानीय कार्यकर्ताओं और सरल भाषा का सहारा लिया।

वर्ग संघर्ष का अमूर्त सिद्धांत गांव में इस तरह अनूदित हुआ—

तुम मुफ्त काम क्यों करते हो?

तुम्हारी मजदूरी इतनी कम क्यों?

कर्ज खत्म क्यों नहीं होता?

तुम्हारी जमीन किसके नाम चली गई?

यानी विचारधारा को जीवन के अनुभव की भाषा दी गई।

12. महिलाओं तक पहुंच

जंगल से संसाधन लाती थीं।

अध्याय 13

1945 में आंदोलन का उदय — तलासरी, दहानू और आसपास के क्षेत्रों में लामबंदी

वारली आंदोलन के इतिहास में 1945 निर्णायक वर्ष था। इससे पहले ठाणे जिले के वारली आदिवासियों के बीच भूमि-वंचना, साहूकारी, कर्ज, वेठ-बेगार, कम मजदूरी और भू-स्वामियों के सामाजिक प्रभुत्व के विरुद्ध असंतोष मौजूद था। अखिल भारतीय किसान सभा और महाराष्ट्र किसान सभा के कार्यकर्ताओं के प्रवेश ने इस असंतोष को संगठनात्मक आधार दिया। लेकिन 1945 में पहली बार यह प्रक्रिया गांवों और पाड़ों से निकलकर एक व्यापक आदिवासी किसान-मजदूर आंदोलन के रूप में दिखाई देने लगी।

इस आंदोलन का प्रमुख भूगोल तत्कालीन ठाणे जिले के दहानू, तलासरी और तत्कालीन उमरगांव क्षेत्र से जुड़ा था। आज की प्रशासनिक सीमाओं को सीधे 1945 पर आरोपित करना उचित नहीं होगा, क्योंकि बाद के दशकों में जिले और तालुका सीमाएं बदलीं। इसलिए आंदोलन का भूगोल समझते समय तत्कालीन प्रशासनिक संरचना को ध्यान में रखना आवश्यक है।

1945 की घटनाओं को मोटे तौर पर तीन चरणों में समझा जा सकता है—पहले किसान सभा का संगठनात्मक प्रवेश और वेठ-विरोध; फिर मजदूरी और घास-कटाई के प्रश्न पर सामूहिक हड़ताल; और अंततः अक्टूबर 1945 में तलवाड़ा के आसपास पुलिस गोलीबारी के बाद संघर्ष का अधिक तीखा राजनीतिक रूप।

1. 1945 से पहले विस्फोट की जमीन तैयार थी

वारली आंदोलन को केवल किसान सभा द्वारा शुरू कराया गया आंदोलन मानना ऐतिहासिक रूप से अधूरा होगा।

वारली समाज दशकों से ऐसी ग्रामीण संरचना में रह रहा था जिसमें कई परिवार—

भू-स्वामियों पर निर्भर,

और अत्यंत कम मजदूरी पर काम करने वाले

द्वितीय विश्वयुद्ध की महंगाई ने उनकी वास्तविक आय को और कम कर दिया।

इसलिए 1945 में किसान सभा के पास पहुंचने से पहले ही सामाजिक विस्फोट की सामग्री मौजूद थी।

संगठन ने उसमें राजनीतिक दिशा जोड़ी।

2. 1945 क्यों निर्णायक बना?

किसी भी आंदोलन के इतिहास में केवल शिकायतों का होना पर्याप्त नहीं होता।

जरूरी है कि लोग यह विश्वास करने लगें कि—

दूसरे गांव भी उसी समस्या से जूझ रहे हैं,

सामूहिक इनकार संभव है,

और प्रतिरोध करने वाले व्यक्ति को समुदाय का समर्थन मिलेगा।

1945 में यही परिवर्तन हुआ।

व्यक्तिगत असंतोष सामूहिक विश्वास में बदलने लगा।

3. जनवरी 1945 : टिटवाला किसान सम्मेलन

इस परिवर्तन का महत्वपूर्ण आरंभ जनवरी 1945 के टिटवाला किसान सम्मेलन से हुआ।

महाराष्ट्र किसान सभा के संगठनात्मक इतिहास में 12 जनवरी 1945 को टिटवाला में प्रथम प्रांतीय सम्मेलन और महाराष्ट्र राज्य किसान सभा की स्थापना का उल्लेख मिलता है। शामराव परुलेकर महासचिव बने और गोदावरी परुलेकर संयुक्त सचिवों में शामिल थीं।

इस सम्मेलन में हजारों किसानों और कृषि मजदूरों ने भाग लिया। ठाणे जिले के आदिवासी प्रतिनिधि भी पहुंचे।

यह वारली आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण था क्योंकि यहां स्थानीय आदिवासी शिकायत पहली बार व्यापक संगठित किसान मंच से जुड़ी।

4. टिटवाला से लौटने वाले वारली

सम्मेलन में भाग लेने वाले वारली प्रतिनिधियों के लिए यह अनुभव सामान्य सभा से कहीं अधिक था।

उन्होंने देखा कि दूसरे जिलों के किसान भी—

और ग्रामीण शोषण के प्रश्न उठा रहे हैं।

इससे एक महत्वपूर्ण मानसिक परिवर्तन संभव हुआ।

भू-स्वामी से संघर्ष अब किसी एक परिवार की निजी लड़ाई नहीं रहा।

उसे व्यापक किसान संघर्ष का हिस्सा समझा जाने लगा।

5. संगठन अब गांवों की ओर गया

टिटवाला के बाद किसान सभा का काम सम्मेलन तक सीमित नहीं रहा।

ठाणे के आदिवासी क्षेत्रों में संपर्क बढ़ाया गया।

स्थानीय कार्यकर्ता गांवों और पाड़ों तक पहुंचे।

छोटी-छोटी बैठकें हुईं।

कितनी मजदूरी मिलती है?

कितनी वेठ करनी पड़ती है?

भू-स्वामी के लिए कौन-कौन से मुफ्त काम करने पड़ते हैं?

इस प्रक्रिया ने बिखरी हुई शिकायतों को एक साझा राजनीतिक सूची में बदल दिया।

# तलासरी और दहानू : आंदोलन का केंद्रीय भूगोल

6. तलासरी का महत्व

तलासरी क्षेत्र में वारली आबादी का बड़ा हिस्सा था और भू-स्वामियों तथा आदिवासी श्रमिकों के बीच निर्भरता के संबंध गहरे थे।

यहां गांव अक्सर छोटे-छोटे पाड़ों में फैले हुए थे।

पहली नजर में यह भौगोलिक बिखराव राजनीतिक संगठन के लिए कठिनाई लगता है।

लेकिन वारली समाज के पारिवारिक और सामुदायिक संपर्कों ने इसे एक नेटवर्क में बदल दिया।

एक पाड़े की खबर दूसरे तक पहुंचती थी।

एक गांव में वेठ से इनकार दूसरे गांव के लिए उदाहरण बन सकता था।

यही प्रक्रिया आंदोलन के प्रसार में महत्वपूर्ण बनी।

7. दहानू की आर्थिक संरचना

दहानू क्षेत्र कृषि, घास और वन-आधारित अर्थव्यवस्था से जुड़ा था।

यहां वारली केवल कृषक नहीं थे।

वन क्षेत्रों में श्रम करते थे।

कुछ के पास छोटी जोतें थीं।

इसलिए आंदोलन के लिए भूमि और मजदूरी दोनों प्रश्न एक साथ मौजूद थे।

दहानू की यही मिश्रित कृषि-श्रम संरचना आगे हड़तालों के लिए महत्वपूर्ण बनी।

8. तत्कालीन उमरगांव क्षेत्र

वारली आंदोलन का भूगोल आज के महाराष्ट्र तक सीमित समझना भी ठीक नहीं होगा।

तत्कालीन उमरगांव क्षेत्र भी आंदोलन के प्रारंभिक संगठन से जुड़ा था। बाद के राज्य पुनर्गठन और प्रशासनिक परिवर्तनों के कारण इसका एक हिस्सा वर्तमान गुजरात में है।

यही कारण है कि 1945 के स्रोतों में जिन स्थानों को ठाणे जिले के राजनीतिक संदर्भ में देखा जाता है, उनकी वर्तमान प्रशासनिक स्थिति अलग मिल सकती है।

इतिहास लिखते समय यह सावधानी आवश्यक है।

# ज़री : खुले आंदोलन की शुरुआत

9. 23 मई 1945 की ज़री सभा

वारली आंदोलन की निर्णायक घटनाओं में 23 मई 1945 की ज़री सभा का विशेष स्थान है।

किसान सभा से जुड़े ऐतिहासिक विवरणों में यहां लगभग पांच हजार आदिवासियों की भागीदारी का उल्लेख मिलता है।

इस सम्मेलन ने आंदोलन को स्थानीय बैठकों के चरण से निकालकर सार्वजनिक जनसंघर्ष के चरण में पहुंचाया।

वेठ और बंधुआ श्रम की व्यवस्था को चुनौती देना।

यहीं से आंदोलन की दिशा अधिक स्पष्ट हुई।

10. वेठ-विरोध सबसे पहले क्यों?

भूमि का प्रश्न सबसे बड़ा था, लेकिन सबसे कठिन भी।

किसकी जमीन किसके नाम?

कानूनी स्वामित्व किसका है?

इन प्रश्नों का समाधान तत्काल संभव नहीं था।

इसके विपरीत वेठ का प्रश्न सीधा था।

काम किया है तो मजदूरी चाहिए।

यही सरलता उसकी राजनीतिक शक्ति बनी।

11. 'अब मुफ्त काम नहीं'

वेठ-विरोधी आंदोलन का सार इसी वाक्य में था।

यह मांग सुनने में छोटी लग सकती है, लेकिन ग्रामीण सत्ता-संबंध में यह क्रांतिकारी परिवर्तन था।

भू-स्वामी का दावा था कि कुछ सेवाएं आदिवासी आश्रित की परंपरागत जिम्मेदारी हैं।

श्रम कोई परंपरागत देन नहीं; उसका मूल्य है।

इस एक सिद्धांत ने पुरानी सामाजिक व्यवस्था को चुनौती दी।

12. व्यक्तिगत इनकार संभव क्यों नहीं था?

मान लें किसी एक वारली परिवार ने भू-स्वामी से कहा कि वह मुफ्त काम नहीं करेगा।

काम से हटाया जा सकता था,

कर्ज वापस मांगकर दबाया जा सकता था,

जमीन से निकाला जा सकता था,

या सामाजिक दबाव डाला जा सकता था।

इसलिए व्यक्तिगत विद्रोह जोखिमपूर्ण था।

लेकिन यदि पूरे गांव ने एक साथ कहा—

तो शक्ति-संतुलन बदलने लगता था।

यही संगठन का महत्व था।

13. पाड़ा बना राजनीतिक इकाई

वारली समाज का पाड़ा केवल निवास-स्थान नहीं रहा।

वह राजनीतिक बैठक का केंद्र बनने लगा।

किस दर से नीचे मजदूरी नहीं करेंगे?

यदि किसी परिवार पर दबाव पड़ा तो बाकी क्या करेंगे?

यह परिवर्तन अत्यंत महत्वपूर्ण था।

परंपरागत सामुदायिक संरचना आधुनिक राजनीतिक संगठन का आधार बन रही थी।

14. लाल झंडे का प्रसार

किसान सभा का लाल झंडा इन गांवों में तेजी से पहचाना जाने लगा।

शुरुआत में यह बाहरी राजनीतिक संगठन का प्रतीक था।

धीरे-धीरे स्थानीय अर्थ बदलने लगा।

लाल झंडा उस स्थान का संकेत था जहां—

अध्याय 14

वेठ-बेगार के विरुद्ध विद्रोह — “मुफ्त श्रम नहीं” की सामूहिक घोषणा

वारली आंदोलन के इतिहास में वेठ-बेगार के विरुद्ध संघर्ष वह निर्णायक मोड़ था जहां आदिवासी समाज ने पहली बार संगठित होकर ग्रामीण सत्ता की जड़ पर हमला किया। भूमि, कर्ज और मजदूरी के प्रश्न महत्वपूर्ण थे, लेकिन वेठ-बेगार उस सामाजिक व्यवस्था का सबसे प्रत्यक्ष प्रतीक थी जिसमें वारली आदिवासी का श्रम उसके अपने नियंत्रण में नहीं था।

जब वारली किसानों और मजदूरों ने सामूहिक रूप से यह कहना शुरू किया कि “मुफ्त श्रम नहीं करेंगे”, तो यह केवल एक आर्थिक मांग नहीं थी। यह घोषणा थी कि भू-स्वामी का अधिकार जमीन तक सीमित है, मनुष्य के शरीर और श्रम तक नहीं।

इसीलिए वेठ-विरोध वारली आंदोलन का सबसे गहरा सामाजिक विद्रोह बना।

1. वेठ के खिलाफ विद्रोह इतना विस्फोटक क्यों था?

वेठ-बेगार लंबे समय से ग्रामीण जीवन का हिस्सा बन चुकी थी। भू-स्वामी या स्थानीय प्रभावशाली व्यक्ति आश्रित वारली परिवार से कृषि और गैर-कृषि दोनों प्रकार का श्रम ले सकता था।

समस्या केवल यह नहीं थी कि मजदूरी नहीं मिलती थी।

समस्या यह थी कि श्रमिक के पास मना करने की वास्तविक स्वतंत्रता नहीं थी।

यदि वह इंकार करता तो उसके सामने कई जोखिम थे—

किरायेदारी समाप्त हो सकती थी,

खावटी बंद हो सकती थी,

पुराना कर्ज मांगा जा सकता था,

भविष्य का रोजगार बंद हो सकता था,

या उसे सामाजिक और शारीरिक दबाव का सामना करना पड़ सकता था।

इसलिए वेठ का विरोध भू-स्वामी की पूरी सत्ता-संरचना को चुनौती देता था।

2. पहले शिकायत, फिर सामूहिक अस्वीकृति

वारली परिवार वेठ से असंतुष्ट पहले भी थे।

लेकिन व्यक्तिगत शिकायत और संगठित विद्रोह अलग चीजें हैं।

1945 में किसान सभा ने इस अंतर को समाप्त किया।

अब सवाल यह नहीं था कि किसी एक परिवार से कितने दिन मुफ्त काम लिया गया।

क्या कोई वारली मुफ्त काम करेगा ही क्यों?

यही राजनीतिक पुनर्परिभाषा निर्णायक थी।

3. “यह परंपरा है” — सत्ता का तर्क

ग्रामीण प्रभुत्व अक्सर स्वयं को परंपरा के रूप में प्रस्तुत करता है।

भू-स्वामी कह सकता था कि किरायेदारों द्वारा कुछ सेवाएं देना पुरानी प्रथा है।

लेकिन किसान सभा ने प्रश्न उठाया—

यदि यह परंपरा है तो क्या श्रमिक ने इसे स्वेच्छा से स्वीकार किया है?

यदि इनकार करने पर उसकी जमीन, भोजन और सुरक्षा खतरे में पड़ती है तो यह परंपरा नहीं, दबाव है।

यहीं वेठ की वैधता पहली बार सार्वजनिक रूप से टूटने लगी।

4. वेठ का सामाजिक अर्थ

वेठ केवल मुफ्त श्रम नहीं थी।

वह ग्रामीण पदानुक्रम का दैनिक प्रदर्शन थी।

कौन मजदूरी मांगे बिना सेवा देगा?

इन प्रश्नों का उत्तर पहले से तय था।

इसलिए वेठ-विरोध ने केवल आर्थिक संबंध नहीं बदला।

उसने सामाजिक पदानुक्रम को चुनौती दी।

5. ज़री की सभा और वेठ-विरोध

23 मई 1945 की ज़री सभा के बाद वेठ-विरोध अधिक संगठित रूप में फैलने लगा।

किसान सभा के नेतृत्व ने स्पष्ट संदेश दिया—

मुफ्त श्रम स्वीकार्य नहीं।

जो काम होगा उसकी मजदूरी होगी।

और यदि भू-स्वामी दबाव डाले तो अकेले नहीं, सामूहिक रूप से विरोध किया जाएगा।

इस घोषणा ने आदिवासी गांवों में एक नया मनोवैज्ञानिक वातावरण बनाया।

6. सामूहिक इनकार की रणनीति

वेठ समाप्त कराने की सबसे प्रभावी रणनीति थी—

यदि केवल एक मजदूर काम से मना करता तो उसे बदल दिया जा सकता था।

लेकिन यदि पूरा पाड़ा तय करे कि कोई मुफ्त काम नहीं करेगा, तो भू-स्वामी के पास विकल्प सीमित हो जाते थे।

यही कारण था कि किसान सभा गांवों में सामूहिक प्रतिज्ञा पर जोर देती थी।

7. “सब मना करेंगे” — सुरक्षा का नया आधार

वारली आंदोलन का शुरुआती संगठनात्मक कौशल इसी में था।

लोगों से केवल यह नहीं कहा गया—

उन्हें यह विश्वास दिलाया गया—

इस अंतर ने भय कम किया।

व्यक्ति जानता था कि यदि उस पर दबाव पड़ा तो वह अकेला नहीं छोड़ा जाएगा।

यही सामूहिक सुरक्षा आंदोलन की शक्ति बनी।

8. पाड़ा-आधारित संगठन

वारली पाड़ों की सामाजिक संरचना इस रणनीति के लिए उपयोगी रही।

लोग रिश्तेदारी, पड़ोस और सामुदायिक जीवन से जुड़े थे।

इसलिए एक सामूहिक निर्णय को लागू करना अपेक्षाकृत संभव था।

किसी व्यक्ति के गुप्त रूप से भू-स्वामी के लिए काम करने जाने पर भी समुदाय को जल्दी पता चल सकता था।

यानी आंदोलन का अनुशासन केवल पार्टी संरचना से नहीं, स्थानीय सामाजिक नेटवर्क से भी आता था।

9. वेठ से मजदूरी की ओर

वेठ-विरोध का स्वाभाविक अगला कदम था—

यदि काम मुफ्त नहीं होगा तो उसकी मजदूरी क्या होगी?

यहीं आंदोलन की आर्थिक दिशा और स्पष्ट हुई।

इस परिवर्तन का अर्थ था कि वारली आदिवासी अब आश्रित श्रमिक से स्वतंत्र मजदूर बनने की कोशिश कर रहा था।

10. भू-स्वामी की आर्थिक हानि

वेठ समाप्त होने का सीधा आर्थिक अर्थ था—

भू-स्वामी को अब उस काम के लिए भुगतान करना पड़ेगा जो पहले लगभग मुफ्त मिलता था।

इसलिए यह संघर्ष केवल सामाजिक सम्मान का प्रश्न नहीं था।

उसका स्पष्ट आर्थिक प्रभाव था।

यही कारण है कि भू-स्वामी वर्ग ने इसका कड़ा विरोध किया।

11. वेठ और उत्पादन लागत

पहले मुफ्त या नगण्य भुगतान पर मिलती थी, तो वेठ खत्म होने के बाद उत्पादन और घरेलू व्यवस्था की लागत बढ़ती।

इसलिए आंदोलन ने भू-स्वामियों की आय पर वास्तविक असर डाला।

यही उसकी शक्ति भी थी।

12. जबरन श्रम से “किराए के श्रम” तक

आर्थिक इतिहास की दृष्टि से यह परिवर्तन महत्वपूर्ण है।

वेठ एक अर्ध-सामंती या अर्ध-बंधुआ संबंध का रूप थी।

मजदूरी संबंध कम-से-कम सिद्धांततः स्वतंत्र अनुबंध पर आधारित होता है।

इसलिए वेठ का अंत केवल भुगतान बढ़ाने का प्रश्न नहीं था।

वह ग्रामीण उत्पादन संबंधों के आधुनिकीकरण का भी संकेत था।

13. ऋण और वेठ का संबंध

लेकिन वेठ समाप्त करना आसान नहीं था क्योंकि उसका आधार कर्ज था।

यदि वारली परिवार भू-स्वामी का ऋणी है, तो भू-स्वामी श्रम की मांग को ऋण से जोड़ सकता था।

इसलिए आंदोलन को यह तर्क भी देना पड़ा कि—

कर्ज का अर्थ मुफ्त श्रम नहीं।

यह विचार वारली आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक शिक्षाओं में से एक था।

14. खावटी और निर्भरता

खाद्यान्न संकट के महीनों में खावटी लेने वाले परिवार विशेष रूप से कमजोर थे।

यदि वे मुफ्त श्रम से मना करें तो अगली बार अनाज न मिलने का भय था।

इसलिए वेठ-विरोध तभी टिक सकता था जब गांवों में परस्पर सहयोग बढ़े।

आंदोलन की सामूहिकता इस आर्थिक कमजोरी की भरपाई करने का प्रयास थी।

15. महिलाओं की भूमिका

वारली महिलाओं के लिए वेठ-विरोध का महत्व विशेष था।

यदि परिवार भू-स्वामी पर निर्भर था तो महिला भी कई प्रकार के श्रम में खिंच सकती थी।

इसलिए “मुफ्त श्रम नहीं” का अर्थ केवल पुरुष मजदूर की स्वतंत्रता नहीं था।

वह महिला श्रम पर भी नियंत्रण समाप्त करने की दिशा में कदम था।

16. घरेलू श्रम और अदृश्य बेगार

वेठ का एक हिस्सा ऐसा भी था जो औपचारिक कृषि मजदूरी में दर्ज नहीं होता।

ऐसे कामों को ‘छोटी सेवा’ मानकर नजरअंदाज किया जा सकता था।

लेकिन गरीब परिवार के लिए प्रत्येक श्रम-दिवस महत्वपूर्ण था।

इसलिए आंदोलन ने श्रम के पूरे मूल्य को राजनीतिक विषय बनाया।

17. सामाजिक अपमान का अंत

वेठ-विरोध का सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक परिणाम था—

पहले वारली को बुलाया जा सकता था।

यह छोटा संवाद ग्रामीण शक्ति-संबंध को बदल देता है।

निर्भरता की जगह सौदेबाजी।

यही बदलाव आंदोलन की आत्मा था।

18. लाल झंडे के नीचे सामूहिक निर्णय

किसान सभा की सभाओं में लाल झंडा वेठ-विरोधी एकता का प्रतीक बनने लगा।

उसका व्यावहारिक अर्थ था—

यदि किसी वारली पर मुफ्त काम का दबाव है, तो उसका प्रश्न व्यक्तिगत नहीं रहेगा।

अध्याय 15

मजदूरी बढ़ाने की लड़ाई — घास काटने और कृषि मजदूरों का संघर्ष

वारली आंदोलन का वह चरण, जिसने 1945 में संघर्ष को सबसे व्यापक और प्रत्यक्ष आर्थिक रूप दिया, था—घास काटने और कृषि मजदूरों की मजदूरी बढ़ाने का आंदोलन। वेठ-बेगार के विरोध ने यह सिद्धांत स्थापित कर दिया था कि श्रम मुफ्त नहीं होगा। अब अगला प्रश्न था—यदि श्रम का मूल्य है, तो उसकी उचित कीमत क्या होगी?

यहीं से संघर्ष सामाजिक दासता के विरोध से आगे बढ़कर ग्रामीण श्रम बाजार की शर्तें बदलने की लड़ाई बन गया।

तत्कालीन ठाणे जिले के दहानू, तलासरी, उमरगांव और आसपास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में वारली आदिवासी भूमि-विहीन या अल्पभूमिधारी थे। वे अपनी छोटी खेती से परिवार का पूरा निर्वाह नहीं कर सकते थे और वर्ष के अलग-अलग मौसमों में बड़े भू-स्वामियों, व्यापारियों और वन-ठेकेदारों के लिए मजदूरी करते थे। घास काटना ऐसा ही महत्वपूर्ण मौसमी रोजगार था।

लेकिन इस रोजगार में शक्ति-संतुलन पूरी तरह मालिकों के पक्ष में था। मजदूरी दर प्रायः वे तय करते थे और बिखरे हुए वारली मजदूरों के पास अलग-अलग होकर बेहतर भुगतान हासिल करने की बहुत कम क्षमता थी।

1945 में किसान सभा ने इसी समीकरण को बदलने की कोशिश की।

1. वेठ समाप्त होने के बाद अगला सवाल

वेठ-बेगार विरोध की सफलता ने एक नई परिस्थिति पैदा की।

पहले भू-स्वामी कह सकता था—

काम करो, क्योंकि यह तुम्हारा दायित्व है।

अब वारली मजदूर कह रहा था—

काम करूंगा, लेकिन मजदूरी पर।

यानी प्रश्न अब केवल—

किस दर पर काम करेंगे?

यही संक्रमण वारली आंदोलन के आर्थिक इतिहास में निर्णायक है।

2. घास काटना इतना महत्वपूर्ण क्यों था?

ठाणे के तटीय और आसपास के क्षेत्रों में घास केवल स्थानीय पशुओं के चारे के लिए उपयोग होने वाली वस्तु नहीं थी।

वह बाजार में बिकती थी।

उसका वाणिज्यिक मूल्य था।

घास की कटाई समयबद्ध कार्य था। यदि उचित समय पर कटाई न हो तो मालिक को आर्थिक नुकसान हो सकता था।

यानी उत्पादन पूरी तरह श्रम पर निर्भर था।

इसी वजह से घास काटने वाले मजदूरों के पास एक ऐसी सामूहिक शक्ति थी जिसे पहले उन्होंने शायद पूर्ण रूप से इस्तेमाल नहीं किया था—

3. घास की कीमत और मजदूर की कीमत

वारली आंदोलन ने एक बुनियादी आर्थिक असमानता को सामने रखा।

घास बाजार में बिकती थी।

उससे जमीन मालिक और व्यापारी को आय होती थी।

लेकिन घास काटने वाले मजदूर को अत्यंत कम मजदूरी मिलती थी।

यदि उत्पाद का बाजार मूल्य है, तो श्रम का न्यायसंगत मूल्य क्यों नहीं?

यही प्रश्न आंदोलन की आर्थिक राजनीति के केंद्र में आया।

4. मजदूरी की पुरानी व्यवस्था

आंदोलन से पहले मजदूरी सामान्यतः व्यक्तिगत सौदे पर निर्भर थी।

यदि उसने अधिक मांगा, तो दूसरा मजदूर उपलब्ध हो सकता था।

भूमिहीनता और गरीबी के कारण मजदूरों की संख्या पर्याप्त थी।

इससे मालिकों की सौदेबाजी शक्ति अधिक थी।

वारली आंदोलन ने इस व्यवस्था को चुनौती दी।

5. व्यक्तिगत सौदे से सामूहिक दर तक

किसान सभा की रणनीति थी—

मजदूरी एक-एक मजदूर तय नहीं करेगा।

पूरे क्षेत्र के श्रमिक मिलकर एक न्यूनतम दर तय करेंगे।

उससे कम पर कोई काम नहीं करेगा।

यह परिवर्तन अत्यंत महत्वपूर्ण था।

एक मालिक बनाम एक मजदूर नहीं,

भू-स्वामी वर्ग बनाम संगठित श्रमिक समुदाय।

यही आधुनिक सामूहिक सौदेबाजी का मूल तत्व है।

6. मजदूरी बढ़ाने की मांग केवल पैसे की मांग नहीं थी

यदि मजदूरी कुछ आने या रुपये बढ़ती, तो यह तत्काल लाभ था।

लेकिन आंदोलन की मांग का वास्तविक महत्व इससे अधिक था।

अब वारली मजदूर कह रहा था—

मेरी मजदूरी मेरे बिना तय नहीं हो सकती।

यह ग्रामीण शक्ति-संबंध में मूल परिवर्तन था।

मजदूर अब केवल आदेश ग्रहण करने वाला व्यक्ति नहीं था।

वह सौदेबाजी करने वाली राजनीतिक शक्ति बन रहा था।

7. कम मजदूरी के पीछे भूमि-विहीनता

वारली मजदूरी इतनी कम क्यों रह सकती थी?

इसके पीछे भूमि प्रश्न था।

जब बड़ी संख्या में लोग अपनी पर्याप्त जमीन खोकर मजदूरी पर निर्भर हो जाएं, तो श्रम बाजार में मजदूर अधिक उपलब्ध होते हैं।

इससे मालिक कम दर पर काम करा सकता है।

भूमिहीनता → अधिक मजदूर → कमजोर सौदेबाजी → कम मजदूरी।

इसलिए मजदूरी संघर्ष भूमि प्रश्न से अलग नहीं था।

8. युद्धकालीन महंगाई ने संकट बढ़ाया

द्वितीय विश्वयुद्ध के वर्षों में आवश्यक वस्तुओं की कीमतें तेजी से बढ़ी थीं।

यदि मजदूरी पुरानी दर पर रहे और चावल, कपड़ा, नमक तथा अन्य वस्तुएं महंगी हो जाएं, तो मजदूर की वास्तविक आय गिर जाती है।

इसलिए 1945 तक पुरानी मजदूरी और अधिक असहनीय हो चुकी थी।

मजदूरी बढ़ाने की मांग केवल राजनीतिक प्रचार नहीं थी।

वह महंगाई से पैदा हुई वास्तविक आर्थिक आवश्यकता थी।

9. वास्तविक मजदूरी का प्रश्न

मान लें मजदूर को पहले इतनी मजदूरी मिलती थी कि उससे दो दिन का अनाज खरीदा जा सके।

यदि महंगाई के कारण उसी मजदूरी में अब केवल एक दिन का अनाज मिले, तो मजदूरी कागज पर वही है लेकिन वास्तविक आय आधी हो गई।

यही वारली मजदूर की समस्या थी।

इसलिए आंदोलन का लक्ष्य केवल नकद दर बढ़ाना नहीं, जीवन निर्वाह योग्य मजदूरी हासिल करना था।

10. हड़ताल : सबसे प्रभावी हथियार

मजदूरी बढ़ाने के लिए मजदूरों के पास सबसे बड़ा हथियार था—

घास काटने का मौसम सीमित था।

यदि मजदूरों ने काम रोक दिया तो मालिक को नुकसान होने लगा।

इससे पहली बार गरीब वारली मजदूर उत्पादन प्रक्रिया में अपनी वास्तविक शक्ति पहचान रहा था।

उसके पास जमीन नहीं थी।

लेकिन उसके बिना उत्पादन संभव भी नहीं था।

11. हड़ताल का सामूहिक अनुशासन

हड़ताल की सफलता केवल घोषणा से नहीं होती।

सबसे कठिन प्रश्न होता है—

क्या सभी मजदूर टिकेंगे?

गरीब परिवार कुछ दिन बिना मजदूरी रह सकता है?

यदि एक मालिक अधिक पैसे देकर कुछ मजदूर तोड़ ले तो?

यदि कर्जदार परिवार पर साहूकार दबाव डाले तो?

इसलिए किसान सभा को केवल नारा नहीं, संगठनात्मक अनुशासन बनाना पड़ा।

12. हड़ताल तोड़ने की चुनौती

मालिक वर्ग की स्वाभाविक रणनीति हो सकती थी—

दूसरे गांवों से मजदूर बुलाना,

कुछ लोगों को अधिक भुगतान देना,

स्थानीय कार्यकर्ताओं पर दबाव डालना,

कर्ज की वसूली तेज करना,

या पुलिस की सहायता लेना।

इसलिए किसान सभा ने गांव-दर-गांव समन्वय पर जोर दिया।

यदि आंदोलन केवल एक गांव में रहता, तो उसे आसानी से तोड़ा जा सकता था।

क्षेत्रीय विस्तार उसकी सुरक्षा था।

13. तलासरी–दहानू क्षेत्र का सामूहिककरण

आंदोलन का विस्तार इसलिए महत्वपूर्ण था कि श्रम बाजार स्वयं क्षेत्रीय था।

यदि दहानू के मजदूर हड़ताल करें लेकिन पास के गांव के लोग काम पर चले जाएं, तो मालिक का नुकसान सीमित रहेगा।

इसलिए किसान सभा ने मजदूरी के प्रश्न को कई गांवों में एक साथ उठाया।

यहीं पाड़ा नेटवर्क और किसान सभा का संगठन एक-दूसरे के पूरक बने।

14. मजदूरों की सामूहिक दर

1945 के संघर्षों के विवरणों में यह स्पष्ट है कि किसान सभा ने घास काटने वाले मजदूरों के लिए पुरानी मजदूरी की तुलना में काफी अधिक दर की मांग उठाई।

विभिन्न स्रोत अलग-अलग कार्य, अवधि और दरों का उल्लेख करते हैं, इसलिए किसी एक रकम को पूरे क्षेत्र की स्थायी सार्वभौमिक मजदूरी मानना उचित नहीं होगा।

ऐतिहासिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि—

पहली बार मजदूरी मालिक द्वारा अकेले तय नहीं की जा रही थी।

दर सामूहिक संघर्ष का विषय बन चुकी थी।

15. कृषि मजदूरों तक प्रभाव

घास कटाई की सफलता का प्रभाव केवल उसी काम तक सीमित नहीं रह सकता था।

धान रोपाई की मजदूरी कितनी?

कटाई की मजदूरी कितनी?

अध्याय 16

लाल झंडा और आदिवासी लामबंदी — संगठन, सभाएं और गांवों का नेटवर्क

वारली आंदोलन की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक थी कि उसने बिखरे हुए पाड़ों और गांवों को एक राजनीतिक नेटवर्क में बदल दिया। तलासरी, दहानू और आसपास के क्षेत्रों में वारली आबादी छोटे-छोटे समूहों में रहती थी। यह सामाजिक संरचना पहली दृष्टि में संगठन के लिए कठिन लग सकती थी, लेकिन 1945 के आंदोलन ने इसे अपनी ताकत में बदल दिया।

किसान सभा का लाल झंडा इसी प्रक्रिया का सबसे प्रभावशाली प्रतीक बना। वह केवल एक पार्टी का ध्वज नहीं रहा। धीरे-धीरे उसका अर्थ स्थानीय स्तर पर बदलने लगा—सभा, सामूहिक निर्णय, मजदूरी की मांग, वेठ-विरोध, भू-स्वामी से प्रतिरोध और संगठनात्मक सुरक्षा।

इसलिए लाल झंडे की कहानी केवल राजनीतिक प्रतीक की कहानी नहीं है। यह उस प्रक्रिया की कहानी है जिसमें वारली समाज ने पहली बार गांव-दर-गांव अपने अलग-अलग अनुभवों को एक साझा आंदोलन में जोड़ा।

1. बिखरी आबादी, साझा समस्या

वारली समाज छोटे पाड़ों में फैला हुआ था।

कहीं रिश्तेदारी से जुड़े समूह।

कहीं जंगल और खेतों के बीच दूर-दूर बसे गांव।

ऐसी आबादी में बड़े राजनीतिक आंदोलन का निर्माण आसान नहीं था।

लेकिन आर्थिक समस्याएं समान थीं—

यानी भूगोल बिखरा था, लेकिन अनुभव साझा था।

यही संगठन की पहली जमीन थी।

2. पाड़ा क्यों महत्वपूर्ण था?

वारली पाड़ा केवल आवासीय इकाई नहीं था।

वह सामाजिक संपर्क का केंद्र था।

परिवार एक-दूसरे को जानते थे।

रिश्तेदारी मजबूत थी।

लोग एक-दूसरे के संकट में सहयोग करते थे।

इसीलिए किसान सभा को संगठन की शुरुआत शून्य से नहीं करनी पड़ी।

उसे मौजूदा सामुदायिक ढांचे को राजनीतिक दिशा देनी थी।

3. लाल झंडे का प्रवेश

जब किसान सभा के कार्यकर्ता गांवों में पहुंचे, तो लाल झंडा नया प्रतीक था।

शुरुआत में उसका अर्थ राजनीतिक रूप से स्पष्ट था—

लेकिन स्थानीय स्तर पर उसका अर्थ अधिक व्यावहारिक हो गया।

वहां लोग जानने लगे कि संगठन सक्रिय है।

यही प्रतीकात्मक उपस्थिति आंदोलन के विस्तार में महत्वपूर्ण बनी।

4. प्रतीक की शक्ति

राजनीतिक आंदोलन केवल भाषण से नहीं चलते।

लाल झंडे ने वही पहचान दी।

यदि कोई वारली मजदूर दूर से झंडा देखता, तो उसे पता चलता—

यह हमारा सभा-स्थान है।

यहां मजदूरी की बात होगी।

यहां वेठ का विरोध होगा।

यहां अकेले नहीं खड़ा होना पड़ेगा।

इस तरह झंडा विश्वास का संकेत बन गया।

5. लाल झंडा और भय का टूटना

ग्रामीण सत्ता का सबसे बड़ा हथियार भय था।

भू-स्वामी आर्थिक रूप से शक्तिशाली था।

साहूकार कर्ज नियंत्रित करता था।

प्रशासन उसकी तुलना में अधिक सुलभ था।

अकेला वारली कमजोर था।

लाल झंडे का अर्थ था—

यही मनोवैज्ञानिक अर्थ अत्यंत महत्वपूर्ण था।

6. सभा : नई राजनीतिक संस्कृति

आंदोलन से पहले वारली समाज में पारंपरिक सामुदायिक बैठकों की अपनी परंपरा थी।

किसान सभा ने उसमें आधुनिक राजनीतिक सभा जोड़ी।

अब बैठक में चर्चा होती—

किस गांव में कितनी मजदूरी?

कौन हड़ताल में शामिल होगा?

इससे सामूहिक निर्णय की नई संस्कृति विकसित हुई।

7. छोटी बैठक से बड़ी सभा तक

संगठनात्मक प्रक्रिया धीरे-धीरे बढ़ी।

और अंततः हजारों लोगों की सभा।

यही क्रम 1945 के वारली आंदोलन की सफलता समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

बड़ी सभा अचानक नहीं बनती।

उसके पीछे सैकड़ों छोटी बैठकों का काम होता है।

8. संदेश कैसे फैलता था?

उस समय आधुनिक संचार माध्यम उपलब्ध नहीं थे।

न रेडियो की व्यापक पहुंच।

इसलिए संगठन मौखिक नेटवर्क पर निर्भर था।

पैदल कार्यकर्ताओं से,

और सभा में आए प्रतिनिधियों से।

यह धीमा लग सकता है, लेकिन स्थानीय समाज में अत्यंत प्रभावी था।

9. हाट बना सूचना केंद्र

साप्ताहिक हाट आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण था।

विभिन्न गांवों के लोग वहां मिलते थे।

यही जगह राजनीतिक सूचना के प्रसार का माध्यम बनी।

इस प्रकार आर्थिक बाजार राजनीतिक संचार के केंद्र में बदल गया।

10. स्थानीय कार्यकर्ता सबसे महत्वपूर्ण

आंदोलन का वास्तविक विस्तार बाहरी नेताओं से नहीं, स्थानीय कार्यकर्ताओं से हुआ।

किस परिवार पर कितना कर्ज है,

कौन भू-स्वामी से डरा हुआ है,

किसे संगठन की जरूरत है,

और कौन भरोसेमंद कार्यकर्ता बन सकता है।

यही स्थानीय ज्ञान आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत था।

11. गांवों के बीच समन्वय

हड़ताल तभी प्रभावी थी जब आसपास के गांव भी साथ रहें।

यदि एक गांव काम बंद करे और दूसरा गांव मजदूर भेज दे, तो मालिक की समस्या समाप्त हो जाती।

इसलिए आंदोलन को गांव-दर-गांव समन्वय बनाना पड़ा।

यही नेटवर्क मजदूरी संघर्ष की सफलता के लिए अनिवार्य था।

12. सामूहिक निर्णय का अनुशासन

संगठन का अर्थ केवल समर्थन नहीं।

यदि तय हुआ कि एक निश्चित मजदूरी से कम पर काम नहीं होगा, तो सभी को पालन करना होगा।

यदि वेठ का विरोध है, तो कोई गुप्त रूप से काम करने न जाए।

यानी राजनीतिक एकता को व्यवहार में लागू करना सबसे कठिन काम था।

13. झंडा और अनुशासन

लाल झंडा इस अनुशासन का भी प्रतीक बना।

वह केवल पहचान नहीं, सामूहिक प्रतिबद्धता का संकेत था।

उसके नीचे किया गया निर्णय व्यक्तिगत नहीं रहता।

वह सामूहिक निर्णय बनता।

यही राजनीतिक संगठन की शुरुआत थी।

14. महिलाएं संदेश-वाहक भी थीं

वारली महिलाओं की भूमिका केवल सभा में बैठने तक सीमित नहीं थी।

वे पाड़ों के बीच संपर्क बनाए रखने, सूचना पहुंचाने और परिवारों को आंदोलन में बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण थीं।

यही कारण है कि महिलाओं की भागीदारी आंदोलन के स्थायित्व में निर्णायक बनी।

15. परिवार आधारित लामबंदी

कई मजदूर आंदोलनों में कार्यस्थल केंद्र होता है।

वारली आंदोलन की विशेषता यह थी कि गांव और परिवार स्वयं आंदोलन के केंद्र बने।

यदि पति हड़ताल पर है, लेकिन परिवार उसके विरुद्ध है, तो हड़ताल टिकना कठिन है।

इसलिए पूरे परिवार का समर्थन जरूरी था।

यही आंदोलन को सामाजिक गहराई देता है।

16. लाल झंडा और महिलाएं

गोदावरी परुलेकर की सक्रियता ने वारली महिलाओं को लाल झंडे के नीचे संगठित होने का अवसर दिया।

यह प्रतीक पुरुष राजनीतिक संगठन तक सीमित नहीं रहा।

महिलाएं भी उसे अपनी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा से जोड़ने लगीं।

यही आंदोलन की बड़ी उपलब्धियों में एक थी।

17. स्थानीय नेतृत्व का उभार

जैसे-जैसे संगठन बढ़ा, नए स्थानीय नेता सामने आए।

वे बड़े राष्ट्रीय नेता नहीं थे।

लेकिन अपने क्षेत्र में प्रभावी थे।

भू-स्वामियों से बात करते।

और पुलिस कार्रवाई की खबर फैलाते।

इसी स्तर के नेता आंदोलन की रीढ़ थे।

18. नेतृत्व का विकेंद्रीकरण

यदि पूरा आंदोलन केवल गोदावरी और शामराव परुलेकर पर निर्भर होता, तो गिरफ्तारी या दमन से वह टूट सकता था।

स्थानीय नेतृत्व ने इस कमजोरी को कम किया।

यानी संगठन ने धीरे-धीरे विकेंद्रीकृत संरचना विकसित की।

यह बड़े जनांदोलन की टिकाऊ शक्ति है।

19. मौखिक इतिहास क्यों जरूरी है?

मुख्यधारा इतिहास में ऐसे स्थानीय कार्यकर्ताओं के नाम अक्सर नहीं मिलते।

आधुनिक मौखिक इतिहास इस कमी को भरता है।

अर्चना प्रसाद जैसे शोधकर्ताओं ने वारली आंदोलन के अनुभवी स्थानीय कार्यकर्ताओं की स्मृतियों के माध्यम से इस नेटवर्क को समझने की कोशिश की है।

यही दृष्टिकोण आंदोलन को केवल बड़े नेताओं की कहानी बनने से बचाता है।

20. लाल झंडा और सामुदायिक स्वाभिमान

धीरे-धीरे झंडा केवल संगठन नहीं, सम्मान का प्रतीक बन गया।

हमारी भी राजनीतिक पहचान है।

हम निर्णय ले सकते हैं।

हमारी मजदूरी पर हमारी राय होगी।

यानी लाल झंडे ने वारली समाज की आत्म-छवि बदलने में मदद की।

21. संगठन और अफवाह

बड़े आंदोलनों में सूचना के साथ अफवाह भी फैलती है।

किसी गांव में पुलिस आ रही है।

किसी नेता को गिरफ्तार किया गया।

किसी भू-स्वामी ने हमला कराया।

यदि सत्यापन न हो तो भय और भ्रम फैल सकता है।

यह आंदोलन की संगठनात्मक परिपक्वता की कसौटी थी।

अध्याय 17

महिलाओं की भागीदारी — श्रम, सामाजिक उत्पीड़न और प्रतिरोध

वारली आंदोलन को केवल पुरुष किसानों, खेत-मजदूरों और किसान सभा के नेताओं का संघर्ष मानना उसके सामाजिक चरित्र को अधूरा कर देता है। 1945–47 के उभार में वारली महिलाओं की भागीदारी आंदोलन की महत्वपूर्ण शक्तियों में थी। वे सभाओं और जुलूसों में उपस्थित थीं, हड़ताल और वेठ-विरोध में सहभागी थीं और गांवों के संगठनात्मक नेटवर्क को बनाए रखने में भी भूमिका निभाती थीं।

लेकिन महिलाओं की भागीदारी को समझने के लिए केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं कि वे आंदोलन में कितनी संख्या में आईं। अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है—वे आंदोलन में क्यों आईं?

इसका उत्तर वारली ग्रामीण अर्थव्यवस्था की संरचना में मिलता है।

वारली महिला खेत में मजदूर थी, जंगल और आसपास के प्राकृतिक संसाधनों से परिवार की आवश्यकताएं जुटाती थी, घास काटती थी, घरेलू श्रम करती थी और परिवार की खाद्य सुरक्षा का बड़ा हिस्सा संभालती थी। गरीबी, कर्ज, वेठ-बेगार और कम मजदूरी इसलिए केवल पुरुष किसान की समस्याएं नहीं थीं। उनका बोझ महिलाओं पर भी सीधे पड़ता था।

इसके अतिरिक्त ग्रामीण प्रभुत्व में लैंगिक उत्पीड़न का आयाम भी था। आंदोलनकारी स्रोतों, विशेषकर गोदावरी परुलेकर के लेखन में, भू-स्वामियों और अन्य प्रभुत्वशाली तत्वों द्वारा आदिवासी महिलाओं के साथ यौन शोषण और अपमान के आरोपों का उल्लेख मिलता है। इन विवरणों को स्रोत की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए पढ़ना चाहिए, लेकिन इतना स्पष्ट है कि वारली महिला के लिए आंदोलन आर्थिक मुक्ति के साथ गरिमा और सामाजिक सुरक्षा का प्रश्न भी था।

1. वारली अर्थव्यवस्था में महिला श्रम

वारली परिवार की अर्थव्यवस्था पुरुष कमाने वाले और घर संभालने वाली महिला के आधुनिक शहरी विभाजन पर आधारित नहीं थी।

महिलाएं प्रत्यक्ष उत्पादक श्रम करती थीं।

वे कृषि कार्य में भाग लेती थीं।

धान की रोपाई और कटाई जैसे काम करती थीं।

ईंधन और वन-उपज जुटाती थीं।

पशुओं से संबंधित काम करती थीं।

इसके अतिरिक्त भोजन तैयार करना, पानी लाना, बच्चों की देखभाल और घरेलू कार्य भी उन्हीं पर थे।

अर्थात महिला के पास उत्पादक और घरेलू श्रम का दोहरा बोझ था।

2. गरीबी का महिला चेहरा

किसी गरीब कृषक परिवार में खाद्यान्न कम होने का प्रभाव सभी सदस्यों पर पड़ता है, लेकिन परिवार के भोजन प्रबंधन का दायित्व प्रायः महिला पर होता है।

कहां से उधार लिया जाए?

बच्चों को क्या खिलाया जाए?

अगली मजदूरी तक घर कैसे चले?

इन समस्याओं से महिला प्रतिदिन जूझती थी।

इसलिए द्वितीय विश्वयुद्ध के वर्षों की महंगाई और खाद्य संकट ने वारली महिलाओं को विशेष रूप से प्रभावित किया।

# वेठ-बेगार और महिला

3. वेठ केवल पुरुष श्रम की समस्या नहीं थी

वेठ-बेगार की चर्चा करते समय अक्सर खेत में काम करने वाले पुरुष मजदूर की छवि सामने आती है।

लेकिन आश्रित परिवार से मांगी जाने वाली सेवाएं केवल पुरुष तक सीमित नहीं थीं।

परिवार की महिलाएं भी कृषि और अन्य श्रम में लगाई जा सकती थीं।

इसलिए जब आंदोलन ने कहा—

तो इसका सीधा अर्थ महिला श्रम से भी था।

4. महिला श्रम की अदृश्यता

महिलाओं के कई कामों को औपचारिक मजदूरी कार्य माना ही नहीं जाता था।

यदि कोई महिला भू-स्वामी के घर या खेत से जुड़ा छोटा काम करती है तो उसे पारिवारिक ‘सेवा’ मान लिया जाता।

यही अदृश्यता शोषण को मजबूत करती थी।

वारली आंदोलन ने श्रम को राजनीतिक प्रश्न बनाकर इस अदृश्यता को कुछ हद तक चुनौती दी।

5. वेठ से इनकार का महिला अर्थ

यदि किसी परिवार को मुफ्त काम से मुक्ति मिलती है तो महिला के पास अपने परिवार और स्वयं के लिए अधिक समय बचता है।

यदि उसके श्रम का भुगतान होता है तो परिवार की नकद या वस्तुगत आय बढ़ती है।

इसलिए वेठ-विरोध महिला के लिए केवल वैचारिक स्वतंत्रता नहीं था।

उसका सीधा आर्थिक मूल्य था।

# घास-कटाई और महिला मजदूर

6. मजदूरी आंदोलन में प्रत्यक्ष हिस्सेदारी

घास काटने के काम में वारली महिलाओं की महत्वपूर्ण भागीदारी थी।

इसी कारण 1945 का घास-मजदूरी संघर्ष महिला जीवन से सीधे जुड़ा।

यदि घास काटने की मजदूरी बढ़ती है तो महिला स्वयं उसकी लाभार्थी थी।

इस तथ्य के कारण महिलाओं की आंदोलन में भागीदारी को पुरुषों के समर्थन के रूप में देखना गलत होगा।

वे स्वयं आर्थिक हितधारक थीं।

7. हड़ताल में महिला की भूमिका

कुछ समय तक मजदूरी नहीं।

गरीब परिवार के लिए यह कठिन निर्णय था।

इसलिए हड़ताल तभी टिक सकती थी जब परिवार उसकी कीमत स्वीकार करे।

महिलाओं की सहमति और सक्रिय भागीदारी यहां निर्णायक थी।

यदि घर में भोजन की समस्या बढ़े और महिला आंदोलन के खिलाफ हो जाए, तो पुरुष मजदूर के लिए हड़ताल जारी रखना कठिन होता।

इसलिए वारली हड़ताल वस्तुतः परिवार-आधारित सामूहिक संघर्ष भी थी।

8. महिला मजदूर और सामूहिक सौदेबाजी

पहले महिला मजदूर के पास व्यक्तिगत रूप से मजदूरी तय करने की बहुत कम शक्ति थी।

संगठन ने समीकरण बदला।

अब वह अकेली मजदूर नहीं थी।

उसके पीछे पूरा समूह था।

यदि तय किया गया कि एक निश्चित दर से नीचे कोई घास नहीं काटेगा, तो महिला मजदूर की सौदेबाजी शक्ति भी बढ़ती थी।

यह ग्रामीण श्रम संबंध में महत्वपूर्ण परिवर्तन था।

# सामाजिक उत्पीड़न का प्रश्न

9. आर्थिक निर्भरता और सामाजिक शक्ति

वारली समाज की गरीबी केवल आय की कमी नहीं थी।

इससे आश्रित परिवार की महिलाओं की स्थिति विशेष रूप से असुरक्षित हो सकती थी।

आर्थिक निर्भरता सामाजिक दबाव में बदल सकती थी।

10. यौन शोषण के विवरण

गोदावरी परुलेकर के वारली आंदोलन संबंधी लेखन में आदिवासी महिलाओं के यौन शोषण और भू-स्वामी प्रभुत्व के लैंगिक आयाम का गंभीर उल्लेख मिलता है।

बाद के वामपंथी इतिहासलेखन में भी इसे वारली सामाजिक व्यवस्था के शोषणकारी चरित्र के हिस्से के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

यहां स्रोत-समीक्षा जरूरी है।

आंदोलनकारी साहित्य का उद्देश्य शोषण को उजागर करना और संघर्ष के लिए समर्थन जुटाना भी था। इसलिए प्रत्येक घटना और उसके पैमाने के लिए स्वतंत्र अभिलेखीय प्रमाण आवश्यक है।

लेकिन महिलाओं की सामाजिक असुरक्षा को पूरी तरह नकारना भी उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुरूप नहीं होगा।

11. यौन हिंसा और सत्ता

यौन शोषण को केवल व्यक्तिगत अपराध के रूप में समझना पर्याप्त नहीं है।

उसी प्रभावशाली व्यक्ति पर निर्भर हो, वहां शिकायत करना अत्यंत कठिन होता है।

यानी आर्थिक और लैंगिक सत्ता एक-दूसरे को मजबूत कर सकती थीं।

वारली आंदोलन ने इसी भय की संरचना को कमजोर किया।

12. संगठन सुरक्षा क्यों बना?

यदि अकेली महिला शिकायत करे तो उसका परिवार दबाव में आ सकता था।

लेकिन यदि गांव का संगठन उसके साथ खड़ा हो, तो शक्ति-संतुलन बदलता है।

यही किसान सभा के स्थानीय नेटवर्क का एक सामाजिक प्रभाव था।

संगठन केवल मजदूरी दिलाने वाला मंच नहीं रहा।

वह कुछ मामलों में सामूहिक सुरक्षा का ढांचा भी बन गया।

# गोदावरी परुलेकर और महिलाओं का राजनीतिक प्रवेश

13. महिला नेतृत्व का महत्व

1940 के दशक के ग्रामीण महाराष्ट्र में किसी उच्च शिक्षित महिला राजनीतिक कार्यकर्ता का आदिवासी पाड़ों में जाकर रहना, महिलाओं से संवाद करना और उन्हें सभाओं में लाना स्वयं असामान्य था।

गोदावरी परुलेकर ने इस दूरी को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उनकी उपस्थिति से वारली महिलाओं के लिए आंदोलन केवल पुरुष नेताओं का बाहरी राजनीतिक अभियान नहीं रहा।

14. संवाद की अलग संभावना

महिला कार्यकर्ता होने के कारण गोदावरी उन अनुभवों तक पहुंच सकती थीं जिन्हें महिलाएं पुरुष नेताओं के सामने सहजता से न बतातीं।

अध्याय 18

तलवाड़ा गोलीकांड और पुलिस दमन — 1945 के संघर्ष का निर्णायक मोड़

वारली आंदोलन के इतिहास में तलवाड़ा गोलीकांड वह घटना थी जिसने मजदूरी, वेठ-बेगार और आदिवासी श्रम-अधिकार के संघर्ष को सीधे औपनिवेशिक राज्य से टकराव में बदल दिया। अक्टूबर 1945 तक दहानू, तलासरी, उमरगांव और आसपास के क्षेत्रों में किसान सभा के नेतृत्व में वारली आदिवासी संगठित हो चुके थे। वे वेठ-बेगार का विरोध कर रहे थे, घास-कटाई की मजदूरी बढ़ाने की मांग कर रहे थे और भू-स्वामियों की एकतरफा सत्ता को चुनौती दे रहे थे।

तनाव लगातार बढ़ रहा था।

घास-कटाई की हड़ताल का आर्थिक असर भू-स्वामियों पर पड़ रहा था। किसान सभा के संगठन ने मजदूरों को इतनी सामूहिक शक्ति दे दी थी कि कई स्थानों पर भू-स्वामी पुरानी मजदूरी पर श्रमिक हासिल नहीं कर पा रहे थे। Review of Agrarian Studies वारली आंदोलन की प्रमुख उपलब्धियों में वेठ-बेगार और लग्नगाड़ी की समाप्ति तथा घास और अन्य वन-आधारित कामों की मजदूरी निर्धारित कराने को शामिल करता है।

इसी संघर्ष के बीच 10–11 अक्टूबर 1945 को तलवाड़ा में पुलिस गोलीबारी हुई।

यहां एक महत्वपूर्ण स्रोतगत सावधानी आवश्यक है। किसान सभा और कम्युनिस्ट आंदोलन के स्रोत पांच वारलियों की मृत्यु बताते हैं, जबकि एक अकादमिक अध्ययन में उद्धृत तत्कालीन पुलिस संस्करण तीन मृतकों और लगभग सात घायलों की बात करता है। उसी अध्ययन में आंदोलनकारी पक्ष पांच मृतकों और बड़ी संख्या में घायलों का दावा करता है। इसलिए इस अध्याय में किसी एक संख्या को बिना टिप्पणी के अंतिम तथ्य की तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।

1. गोलीकांड की पृष्ठभूमि : मजदूरी संघर्ष से बढ़ता टकराव

तलवाड़ा की घटना को अचानक हुई पुलिस मुठभेड़ मानना गलत होगा।

उसके पीछे कई महीनों का संघर्ष था।

वेठ-बेगार से इनकार किया,

घास काटने की मजदूरी बढ़ाने की मांग की,

पुरानी मजदूरी पर काम बंद किया,

और गांव-दर-गांव संगठन विकसित किया।

यह सामूहिक कार्रवाई भू-स्वामी वर्ग के लिए आर्थिक चुनौती बन चुकी थी।

किसान सभा के स्रोत बताते हैं कि जिन भू-स्वामियों ने संगठन द्वारा मांगी गई न्यूनतम मजदूरी देने से इनकार किया, उन्हें पूरे क्षेत्र में वारली श्रमिक हासिल करने में कठिनाई हुई।

इसका अर्थ था कि पहली बार श्रम बाजार पर भू-स्वामियों की एकतरफा पकड़ टूट रही थी।

2. घास की हड़ताल क्यों इतनी गंभीर थी?

घास काटना मौसमी कार्य था।

कटाई समय पर न हो तो घास खराब हो सकती थी।

अर्थात मजदूरों के पास केवल नैतिक मांग नहीं, वास्तविक आर्थिक दबाव का साधन भी था।

भू-स्वामी के सामने विकल्प था—

या फसल/घास के खराब होने का जोखिम उठाएं।

इसीलिए घास-मजदूरी का संघर्ष अन्य शिकायतों की तुलना में अधिक तीखा हुआ।

3. हड़ताल की व्यापकता

किसान सभा के बाद के विवरणों में कहा गया है कि दहानू और उमरगांव क्षेत्र में हड़ताल इतनी व्यापक हो गई थी कि पुराने दर पर घास काटने के लिए मजदूर उपलब्ध नहीं हो रहे थे। कई जगह गाड़ियों के संचालन और दूसरे काम तक प्रभावित हुए।

ऐसे स्रोत स्वाभाविक रूप से आंदोलनकारी दृष्टि रखते हैं, इसलिए उनकी भाषा और दावों को स्वतंत्र स्रोतों के साथ पढ़ना चाहिए।

फिर भी यह स्पष्ट है कि संघर्ष स्थानीय मजदूरी विवाद की सीमा पार कर चुका था।

# 10 अक्टूबर 1945 : तलवाड़ा में जमावड़ा

4. वारली लोग तलवाड़ा क्यों पहुंचे?

यहीं स्रोतों में बड़ा विवाद सामने आता है।

किसान सभा का विवरण कहता है कि 10 अक्टूबर की सुबह क्षेत्र में एक झूठी सूचना फैलाई गई कि गोदावरी परुलेकर तलवाड़ा में सभा करने आ रही हैं और भू-स्वामी उन पर हमला करने वाले हैं। आदिवासियों से कथित रूप से लाठियां, हंसिए और अन्य उपलब्ध उपकरण लेकर वहां पहुंचने को कहा गया।

इस आंदोलनकारी विवरण के अनुसार सूचना किसान सभा की ओर से नहीं थी; गोदावरी उस समय कल्याण में अस्वस्थ थीं। वारली लोग लाल झंडे के नाम पर जारी संदेश को वास्तविक मानकर बड़ी संख्या में तलवाड़ा पहुंचे।

किसान सभा और CPI(M) की बाद की स्मृति में इसे भू-स्वामी पक्ष द्वारा रची गई साजिश बताया गया है।

यह आरोप आंदोलनकारी स्रोतों का है; इसके प्रत्येक तत्व की स्वतंत्र प्रशासनिक पुष्टि उपलब्ध स्रोतों से स्पष्ट नहीं होती। इसलिए इसे किसान सभा का संस्करण मानकर ही दर्ज करना उचित है।

5. कितने लोग इकट्ठा हुए?

यहां भी स्रोतों में बड़ा अंतर है।

कुछ बाद के वर्णनों में लगभग 30,000 वारलियों के एकत्र होने का दावा है।

वहीं कुछ लोकप्रिय विवरण लगभग 7,000 लोगों का आंकड़ा देते हैं।

इतने बड़े अंतर के कारण किसी एक संख्या को निश्चित मानना सुरक्षित नहीं है।

लेकिन निर्विवाद बात यह है कि तलवाड़ा में बहुत बड़ा आदिवासी जमावड़ा हुआ था और पुलिस-प्रशासन ने उसे गंभीर कानून-व्यवस्था की स्थिति के रूप में देखा।

6. क्या वारली हथियारबंद थे?

किसान सभा का अपना विवरण स्वीकार करता है कि कई लोग लाठियां, हंसिए, कुल्हाड़ियां आदि लेकर पहुंचे थे क्योंकि उन्हें कथित सूचना दी गई थी कि सभा पर हमला हो सकता है।

इस तथ्य को छिपाना उचित नहीं होगा।

लेकिन इससे यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि उनका उद्देश्य पुलिस या भू-स्वामियों पर हमला करना था।

यही घटना की केंद्रीय विवादित व्याख्या है—

आंदोलनकारी पक्ष कहता है कि जमावड़ा शांतिपूर्ण था और लोगों को झूठी सूचना देकर बुलाया गया।

पुलिस संस्करण कहता है कि कम्युनिस्ट प्रचार के कारण हजारों आदिवासी हिंसक हो गए, पत्थरबाजी और उपद्रव हुआ और पुलिस को गोली चलानी पड़ी। एक अकादमिक शोध में तत्कालीन पुलिस/सरकारी विवरण इसी रूप में उद्धृत किया गया है।

7. गोली कब चली?

किसान सभा के विस्तृत आंदोलनकारी वृत्तांत के अनुसार पुलिस 10 अक्टूबर की रात तलवाड़ा पहुंची और आधी रात के आसपास गोलीबारी शुरू हुई। यह कार्रवाई अंतराल के साथ 11 अक्टूबर की दोपहर तक चली। उस विवरण में कहा गया है कि पुलिस ने लगभग पंद्रह घंटे की अवधि में तीन बार गोली चलाई।

इसीलिए घटना को केवल “10 अक्टूबर की गोलीबारी” कहना सुविधाजनक है, लेकिन तकनीकी रूप से कार्रवाई 10 से 11 अक्टूबर 1945 तक फैली बताई जाती है।

8. आंदोलनकारी पक्ष का विवरण

शामराव परुलेकर से जुड़े किसान सभा के विवरण में कहा गया है कि सशस्त्र पुलिस वाहन से गोली चलाई गई और पहली गोलीबारी के बाद भी वारली भीड़ वहां बनी रही।

फिर पुलिस ने दोबारा और तीसरी बार गोली चलाई।

किसान सभा का दावा है कि कुल पांच वारली मारे गए और अनेक घायल हुए। घायलों में बारह वर्ष के एक बच्चे का भी उल्लेख किया जाता है।

इसी संख्या—पांच—को CPI(M) और AIKS की बाद की स्मृति में स्थापित किया गया और 10 अक्टूबर को शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता रहा।

9. पुलिस/सरकारी संस्करण

घटना का सरकारी वर्णन अलग था।

एक अकादमिक शोध में उद्धृत पुलिस विवरण के अनुसार कम्युनिस्ट प्रचार से आंदोलन हिंसक हो गया था, दंगे और डकैती जैसी घटनाएं हुईं और हजारों आदिवासियों ने पत्थर फेंके। इसी संस्करण में कहा गया कि स्थिति ने लगभग चौबीस घंटे के टकराव का रूप ले लिया और पुलिस को गोली चलानी पड़ी।

इस आधिकारिक दावे में तीन मृतकों और लगभग सात घायलों का उल्लेख है।

यानी मृतकों की संख्या पर भी तत्कालीन पक्षों में सहमति नहीं थी।

10. पांच या तीन?

किसान सभा/कम्युनिस्ट स्रोत—पांच मृतक।

अध्याय 19

दमन, गिरफ्तारियां और भूमिगत संगठन — 1945–46 में आंदोलन को जीवित रखने की रणनीति

तलवाड़ा गोलीकांड के बाद वारली आंदोलन के सामने सबसे बड़ा प्रश्न केवल यह नहीं था कि मजदूरी की लड़ाई कैसे जारी रखी जाए, बल्कि यह भी कि राज्य दमन, गिरफ्तारी, सभाओं पर रोक और नेतृत्व को क्षेत्र से बाहर करने की कार्रवाई के बीच संगठन को जीवित कैसे रखा जाए। अक्टूबर 1945 के बाद आंदोलन का चरित्र बदल गया। जो संघर्ष पहले खुले गांव-सम्मेलनों, हड़तालों और सामूहिक सभाओं पर निर्भर था, उसे अब अधिक सावधान, विकेंद्रीकृत और कई बार अर्ध-भूमिगत ढंग से काम करना पड़ा।

यहीं वारली आंदोलन की संगठनात्मक परिपक्वता की वास्तविक परीक्षा हुई।

यदि आंदोलन केवल गोदावरी और शामराव परुलेकर जैसे प्रमुख नेताओं की मौजूदगी पर निर्भर होता, तो externment और गिरफ्तारी के बाद वह बिखर सकता था। लेकिन 1945 तक गांवों और पाड़ों में जो स्थानीय नेटवर्क विकसित हो चुका था, उसने आंदोलन को दमन के बाद भी जीवित रखा।

इसलिए 1945–46 का काल वारली इतिहास में केवल दमन का अध्याय नहीं है। यह स्थानीय नेतृत्व, गुप्त संपर्क, सामुदायिक अनुशासन और विकेंद्रीकृत संगठन की परीक्षा का भी काल था।

1. तलवाड़ा के बाद प्रशासन की रणनीति

तलवाड़ा गोलीबारी के बाद औपनिवेशिक प्रशासन ने केवल पुलिस बल पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं समझा।

प्रमुख नेताओं को क्षेत्र से अलग करना,

स्थानीय कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करना,

और गांवों के बीच राजनीतिक संपर्क कमजोर करना।

आंदोलनकारी स्रोतों के अनुसार 13 अक्टूबर 1945 को पांच से अधिक लोगों के जमावड़े और सभाओं पर प्रतिबंध लगाया गया तथा शीघ्र ही शामराव और गोदावरी परुलेकर सहित प्रमुख कार्यकर्ताओं को दहानू और उमरगांव क्षेत्र से बाहर रहने के आदेश दिए गए।

इसका उद्देश्य स्पष्ट था—

नेतृत्व को जनता से काटो, संगठन स्वतः कमजोर होगा।

2. externment क्यों प्रभावी हथियार था?

किसी नेता को जेल भेजना प्रशासन की पुरानी रणनीति थी।

लेकिन किसी नेता को विशेष क्षेत्र में प्रवेश से रोकना अलग प्रकार का दमन था।

इससे नेता बाहर रह सकता था, लेकिन उस सामाजिक क्षेत्र से उसका प्रत्यक्ष संपर्क टूट जाता था जहां आंदोलन चल रहा है।

वारली आंदोलन के संदर्भ में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण था क्योंकि—

संचार साधन सीमित थे,

और संगठन का बड़ा हिस्सा प्रत्यक्ष संपर्क पर आधारित था।

इसलिए परुलेकरों को क्षेत्र से बाहर रखने का प्रयास वास्तव में आंदोलन की कमांड और संचार व्यवस्था पर हमला था।

3. लेकिन आंदोलन क्यों नहीं टूटा?

क्योंकि किसान सभा ने 1945 के शुरुआती महीनों में ही स्थानीय कार्यकर्ताओं का नेटवर्क खड़ा करना शुरू कर दिया था।

हर निर्णय मुंबई या प्रांतीय नेतृत्व से नहीं आता था।

गांवों में ऐसे लोग थे जो जानते थे—

किस गांव में हड़ताल चल रही है,

कौन मजदूर कमजोर पड़ सकता है,

किस परिवार पर भू-स्वामी का दबाव है,

और किस मार्ग से संदेश अगले पाड़े तक पहुंचाना है।

इस स्थानीय ढांचे ने आंदोलन को केंद्रीकृत नेतृत्व के बिना भी टिकने की क्षमता दी।

4. दमन ने संगठन का स्वरूप बदला

तलवाड़ा से पहले आंदोलन अधिक खुला था।

उसकी प्रमुख गतिविधियां थीं।

दमन के बाद जोखिम बढ़ गया।

इसलिए संगठन को अधिक छोटे समूहों और प्रत्यक्ष संपर्क पर निर्भर होना पड़ा।

यहीं आंदोलन का ढांचा—

खुली जनसभा से विकेंद्रीकृत गांव नेटवर्क

5. क्या इसे पूरी तरह ‘भूमिगत आंदोलन’ कहना सही होगा?

यहां शब्दावली की सावधानी आवश्यक है।

1945–46 का पूरा वारली आंदोलन किसी गुप्त क्रांतिकारी संगठन की तरह पूर्णतः underground नहीं हो गया था।

मजदूरी हड़तालें और सामूहिक कार्रवाई अभी भी सार्वजनिक थीं।

लेकिन प्रमुख कार्यकर्ता और संपर्क-व्यवस्था कई बार प्रशासन से बचकर काम करती थी।

इसलिए इसे अधिक सटीक रूप से—

अर्ध-भूमिगत या दमन-कालीन विकेंद्रीकृत संगठन

6. पुलिस की निगरानी

आंदोलन के प्रमुख गांवों पर प्रशासन की नजर बढ़ी।

कौन बाहर के कम्युनिस्ट कार्यकर्ता से मिल रहा है?

कौन लाल झंडा लेकर घूम रहा है?

कौन मजदूरों को हड़ताल के लिए संगठित कर रहा है?

ऐसे प्रश्न पुलिस निगरानी का हिस्सा बने।

इससे आंदोलनकारी संपर्क सामान्य राजनीतिक गतिविधि से सुरक्षा-संबंधी काम में बदल गया।

7. स्थानीय कार्यकर्ताओं का महत्व बढ़ा

प्रमुख नेताओं के बाहर किए जाने का एक अप्रत्याशित परिणाम यह हुआ कि स्थानीय वारली नेतृत्व की भूमिका और बढ़ गई।

लोगों को संगठित रखते,

और हड़ताल का अनुशासन बनाए रखते।

इससे आंदोलन अधिक स्थानीय हुआ।

यह संगठन की कमजोरी भी थी और ताकत भी।

कमजोरी इसलिए कि राजनीतिक दिशा के लिए अनुभवी नेतृत्व दूर था।

ताकत इसलिए कि आंदोलन अब पूरी तरह कुछ व्यक्तियों पर निर्भर नहीं था।

8. संदेश कैसे पहुंचता था?

उस समय संचार की आधुनिक सुविधाएं नहीं थीं।

इसलिए संदेश पहुंचाने के साधन थे—

विश्वसनीय संदेशवाहक,

और गांव से गांव जाने वाले मजदूर।

इस मौखिक नेटवर्क की एक बड़ी विशेषता थी—

इसे पूरी तरह रोकना प्रशासन के लिए कठिन था।

लिखित पर्चा पकड़ा जा सकता है।

लेकिन मौखिक सूचना रोकना मुश्किल है।

9. हाट फिर राजनीतिक केंद्र बना

साप्ताहिक बाजार दमन के समय और महत्वपूर्ण हो गए।

क्योंकि लोग स्वाभाविक रूप से वहां जाते थे।

इससे बिना औपचारिक सभा के भी सूचना का आदान-प्रदान संभव था।

कहां मजदूरी समझौता हुआ?

किस गांव में पुलिस पहुंची?

कहां अगला निर्णय लागू करना है?

इस तरह आर्थिक गतिविधि के भीतर राजनीतिक संचार छिपा रह सकता था।

10. जंगल का महत्व

वारली समाज का भूगोल दमन के समय संगठन को प्राकृतिक सुरक्षा भी देता था।

और स्थानीय रास्तों की जानकारी

आदिवासी कार्यकर्ताओं के पक्ष में थी।

प्रशासन के लिए जिस भूभाग में पहुंचना कठिन था, स्थानीय वारली के लिए वही परिचित जीवन-क्षेत्र था।

यही कारण है कि कुछ कार्यकर्ता पुलिस कार्रवाई के समय गांव छोड़कर वन क्षेत्रों में चले जाते थे।

11. जंगल केवल छिपने का स्थान नहीं

यहां एक महत्वपूर्ण बिंदु है।

जंगल पहले से वारली अर्थव्यवस्था और संस्कृति का हिस्सा था।

अब वह राजनीतिक संघर्ष में भी महत्वपूर्ण हो गया।

यानी एक ही भूगोल के तीन अर्थ थे—

और दमन के समय सुरक्षा।

इससे वारली आंदोलन का पर्यावरणीय और राजनीतिक इतिहास फिर एक-दूसरे से जुड़ता है।

12. गिरफ्तारी का उद्देश्य

गिरफ्तारी का लक्ष्य केवल अपराध रोकना नहीं था।

राजनीतिक आंदोलन में गिरफ्तारी का एक व्यापक उद्देश्य हो सकता है—

और संगठन की निरंतरता तोड़ना।

यदि गांव का सक्रिय व्यक्ति जेल चला जाए, तो उसके साथ कई संपर्क टूट सकते हैं।

इसलिए प्रशासन विशेष रूप से स्थानीय कार्यकर्ताओं को निशाना बनाता था।

13. कार्यकर्ताओं की पहचान कैसे होती थी?

आंदोलनकारी स्रोत आरोप लगाते हैं कि कई जगह स्थानीय भू-स्वामी पुलिस को बताते थे कि कौन प्रमुख किसान सभा कार्यकर्ता है।

ऐसे दावों को सावधानी से पढ़ना चाहिए क्योंकि वे आंदोलनकारी दृष्टिकोण से आते हैं।

लेकिन सामाजिक संरचना की दृष्टि से यह संभव था कि भू-स्वामी गांव के सक्रिय लोगों को प्रशासन की तुलना में कहीं बेहतर जानते हों।

इससे स्थानीय सत्ता और पुलिस कार्रवाई के बीच व्यावहारिक संबंध बन सकता था।

14. गिरफ्तारी और परिवार

किसी कार्यकर्ता की गिरफ्तारी केवल राजनीतिक घटना नहीं थी।

मजदूरी से वंचित हो सकता था,

कर्ज में पड़ सकता था,

और सामाजिक दबाव झेल सकता था।

इसलिए आंदोलन को गिरफ्तार कार्यकर्ताओं के परिवारों को सहारा देने की भी जरूरत थी।

यहीं सामुदायिक सहयोग का महत्व बढ़ा।

15. महिलाओं की भूमिका

दमन के समय महिलाओं की राजनीतिक भूमिका और महत्वपूर्ण हुई।

पुरुष कार्यकर्ता गिरफ्तार या छिपे हों तो—

और संगठन से संपर्क बनाए रखना

महिलाओं पर अधिक आ सकता था।

17. स्थानीय भोजन और सहायता नेटवर्क

जिस परिवार का पुरुष गिरफ्तार है—

अध्याय 20

1946 का वन-मजदूर संघर्ष — लकड़ी, ठेकेदार, लंबी हड़ताल और मजदूरी समझौता

1945 के वेठ-विरोध और घास-कटाई मजदूरी संघर्ष के बाद वारली आंदोलन 1946 में एक नए आर्थिक क्षेत्र में प्रवेश करता है—वन-मजदूरी। अब संघर्ष केवल भू-स्वामियों के खेतों और घास के मैदानों तक सीमित नहीं रहा। वारली मजदूरों ने जंगलों में पेड़ काटने, लकड़ी तैयार करने और उसे ठेकेदारों के लिए उतारने-ढोने जैसे कामों की मजदूरी बढ़ाने की मांग उठाई।

यह संघर्ष इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि उसने सिद्ध किया कि 1945 का वारली उभार कोई एक मौसमी हड़ताल नहीं था। पुलिस गोलीबारी, गिरफ्तारियों, नेताओं को क्षेत्र से बाहर किए जाने और प्रशासनिक दमन के बावजूद गांवों का संगठन जीवित था। वही नेटवर्क अब वन अर्थव्यवस्था के भीतर मजदूरी संबंध बदलने का प्रयास कर रहा था।

IGNOU के आधुनिक भारत संबंधी अध्ययन में स्पष्ट रूप से दर्ज है कि 1946 में वारलियों ने जंगल के ठेकेदारों के लिए पेड़ काटने और लकड़ी के लट्ठे उतारने के काम की मजदूरी बढ़ाने के लिए संघर्ष जारी रखा। 1946 की शरद ऋतु में उन्होंने महीनों तक वन-कार्य बंद रखा और अंततः महाराष्ट्र टिम्बर मर्चेंट्स एसोसिएशन को मजदूरी वृद्धि स्वीकार करनी पड़ी।

1. खेत-मजदूर से वन-मजदूर तक

वारली श्रमिक की आर्थिक पहचान एकरूप नहीं थी।

कभी घास काटने वाला श्रमिक,

कभी किरायेदार किसान,

और कभी जंगल में ठेकेदार के लिए काम करने वाला मजदूर

इसलिए वारली आंदोलन यदि केवल कृषि मजदूरी पर रुक जाता, तो उसकी आर्थिक पहुंच अधूरी रहती।

वन अर्थव्यवस्था में प्रवेश स्वाभाविक अगला चरण था।

2. जंगल पर अधिकार सीमित, लेकिन जंगल में मजदूरी आवश्यक

यह वारली इतिहास का एक गहरा विरोधाभास था।

औपनिवेशिक वन कानूनों ने जंगल पर आदिवासी समुदाय की परंपरागत पहुंच को सीमित किया था।

लेकिन वही जंगल अब रोजगार का स्रोत भी था।

वारली व्यक्ति पहले जंगल से अपनी आवश्यकता के लिए संसाधन प्राप्त करता था।

अब कई परिस्थितियों में उसे उसी जंगल में—

बनकर काम करना पड़ता था।

यानी सामुदायिक संसाधन का संबंध बाजार और ठेकेदारी में बदल चुका था।

3. वन ठेकेदार कौन थे?

वन-आधारित व्यापार में सरकार या संबंधित प्राधिकरण से ठेका लेने वाले व्यापारी या ठेकेदार लकड़ी और अन्य वन उत्पादों के वाणिज्यिक दोहन से जुड़े थे।

उन्हें बड़ी संख्या में मजदूर चाहिए थे—

लकड़ी साफ करने के लिए,

और बाजार या परिवहन केंद्र तक पहुंचाने के लिए।

वारली आदिवासी इस श्रम शक्ति का बड़ा स्रोत थे।

4. ठेकेदार की आर्थिक रुचि

ठेकेदार का लाभ कई चीजों पर निर्भर था—

वन उत्पाद का बाजार मूल्य,

इनमें मजदूरी कम रखने से सीधा लाभ बढ़ सकता था।

इसलिए मजदूर और ठेकेदार के हित स्वाभाविक रूप से समान नहीं थे।

मजदूर अधिक मजदूरी चाहता था।

ठेकेदार श्रम लागत कम रखना चाहता था।

यहीं संघर्ष की आर्थिक जड़ थी।

5. 1945 ने क्या सिखाया था?

वारली मजदूर अब बिल्कुल उसी स्थिति में नहीं था जिसमें वह आंदोलन से पहले था।

1945 के घास-कटाई संघर्ष ने उसे तीन बातें सिखा दी थीं—

सामूहिक दर तय की जा सकती है।

काम रोका जा सकता है।

और लंबी हड़ताल मालिक को समझौते के लिए मजबूर कर सकती है।

यही अनुभव 1946 के वन-मजदूर आंदोलन की सबसे बड़ी पूंजी था।

6. मजदूरी कितनी कम थी?

विभिन्न स्रोत अलग-अलग कामों और दरों का उल्लेख करते हैं।

एक ऐतिहासिक अध्ययन, जो परुलेकर और अन्य स्रोतों का उपयोग करता है, बताता है कि पेड़ काटने के लिए मजदूरी लगभग चार आने प्रतिदिन तक हो सकती थी, जबकि किसान सभा ने लगभग सवा रुपया प्रतिदिन की मांग की। घास काटने के अन्य कार्यों में भी मजदूरी अत्यंत कम थी और किसान सभा ने कई गुना अधिक दर की मांग उठाई।

इन आंकड़ों को पूरे क्षेत्र की सार्वभौमिक मजदूरी मानना उचित नहीं होगा।

काम, क्षेत्र और भुगतान पद्धति अलग हो सकती थी।

लेकिन वे पुराने और मांगे गए श्रम-मूल्य के बीच बड़ी खाई को स्पष्ट करते हैं।

7. चार आने से सवा रुपये तक की मांग का अर्थ

यदि किसी काम के लिए चार आने मिल रहे हों और मजदूर सवा रुपये की मांग करे, तो वह मामूली संशोधन नहीं है।

यह पुराने मजदूरी संबंध को मूल रूप से चुनौती है।

पुरानी दर केवल कम नहीं,

इससे ठेकेदारों के लिए समझौता कठिन और संघर्ष तीखा होना स्वाभाविक था।

8. 1946 तक संगठन अधिक अनुभवी था

अब किसान सभा के सामने 1945 जैसा शुरुआती संगठनात्मक चरण नहीं था।

गांवों में पहले से नेटवर्क था।

लाल झंडा पहचाना जाता था।

स्थानीय कार्यकर्ता मौजूद थे।

मजदूर हड़ताल का अर्थ समझ चुके थे।

इसलिए वन-मजदूर संघर्ष अपेक्षाकृत संगठित तरीके से शुरू किया जा सकता था।

9. लेकिन दमन भी अधिक था

दूसरी ओर परिस्थिति कठिन भी थी।

तलवाड़ा गोलीकांड हो चुका था।

प्रमुख नेता प्रतिबंध और निगरानी झेल चुके थे।

कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां हुई थीं।

इसलिए हर खुली सभा जोखिमपूर्ण थी।

1945 से अधिक अनुभवी भी था और अधिक दबाव में भी।

10. मजदूरों को एकजुट रखने की चुनौती

वन ठेकेदार अलग-अलग इलाकों में काम करा सकते थे।

यदि एक इलाके के मजदूर हड़ताल करें और दूसरे क्षेत्र से श्रमिक आ जाएं, तो हड़ताल टूट सकती थी।

इसलिए किसान सभा को केवल एक गांव नहीं, व्यापक क्षेत्र को साथ रखना था।

यहीं गांवों के नेटवर्क का महत्व सामने आया।

# गांव-दर-गांव संदेश

11. संदेश भेजने की अनोखी पद्धति

किसान सभा से जुड़े एक विस्तृत विवरण में 1946 की हड़ताल के दौरान गांवों में संदेश पहुंचाने की एक रोचक पद्धति का उल्लेख मिलता है।

एक डंडे के साथ ताड़ी के पत्ते बांधकर गांव से गांव भेजे जाते थे।

उसके पहुंचने का अर्थ था—

इस आंदोलनकारी स्रोत के अनुसार यह संदेश लगभग 200 गांवों तक फैला और यहां तक कि बैलगाड़ी चलाने वाले मजदूरों ने भी काम रोक दिया।

यह विवरण किसान सभा की राजनीतिक स्मृति से आता है, इसलिए इसे उसी रूप में पढ़ना चाहिए।

लेकिन यह वारली आंदोलन के मौखिक और प्रतीकात्मक संचार तंत्र की प्रकृति को बहुत अच्छी तरह दिखाता है।

12. लिखित आदेश की आवश्यकता नहीं

वारली समाज की सीमित साक्षरता कभी-कभी संगठनात्मक कमजोरी लग सकती थी।

लेकिन दमन के समय वही मौखिक और प्रतीकात्मक संचार उपयोगी हुआ।

किसी लिखित हड़ताल नोटिस की आवश्यकता नहीं।

एक पहचाना हुआ संकेत पर्याप्त था।

इससे संगठन प्रशासनिक निगरानी से कुछ हद तक बच सकता था।

13. संदेश का राजनीतिक अर्थ

डंडा और पत्ता केवल सूचना नहीं थे।

दूसरे गांव भी हड़ताल में हैं।

अर्थात कोई अकेला नहीं है।

यह मनोवैज्ञानिक आश्वासन लंबी हड़ताल के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था।

14. हड़ताल कब चरम पर पहुंची?

IGNOU का अध्ययन 1946 की शरद ऋतु को वन-मजदूर संघर्ष का प्रमुख चरण बताता है और कहता है कि वन-कार्य महीनों तक ठप रहा।

किसान सभा से जुड़े अधिक विस्तृत विवरण में लगभग एक महीने की निर्णायक हड़ताल और 10 नवंबर 1946 को समझौते का उल्लेख मिलता है।

दोनों विवरणों में विरोध आवश्यक नहीं है।

व्यापक आंदोलन कई महीनों तक चल सकता था जबकि निर्णायक पूर्ण कामबंदी लगभग एक महीने चली हो।

15. कितने गांव प्रभावित हुए?

किसान सभा की बाद की स्मृति लगभग 200 गांवों में हड़ताल फैलने का दावा करती है।

इस संख्या की स्वतंत्र समकालीन सरकारी पुष्टि उपलब्ध स्रोतों में स्पष्ट नहीं है।

इसलिए इसे निश्चित प्रशासनिक आंकड़ा नहीं, बल्कि आंदोलनकारी स्रोत का अनुमान मानना चाहिए।

फिर भी इतना स्पष्ट है कि वन-मजदूर संघर्ष किसी एक ठेके या गांव तक सीमित नहीं था।

उसका क्षेत्रीय चरित्र था।

24. हड़ताल कमजोर क्यों नहीं हुई?

# समझौते की प्रक्रिया

अध्याय 21

7 जनवरी 1947 की पालघर गोलीबारी — स्वतंत्रता से पहले वारली आंदोलन पर दूसरा बड़ा दमन

वारली आंदोलन के इतिहास में 7 जनवरी 1947 की पालघर तालुका पुलिस गोलीबारी अक्टूबर 1945 के तलवाड़ा गोलीकांड के बाद दूसरा बड़ा रक्तरंजित मोड़ थी। यह घटना ऐसे समय हुई जब भारत स्वतंत्रता की दहलीज पर था, बंबई प्रांत में कांग्रेस मंत्रालय सत्ता में आ चुका था और वारली आंदोलन 1945 की शुरुआती वेठ-बेगार विरोधी लामबंदी से आगे बढ़कर एक व्यापक किसान-मजदूर संघर्ष बन चुका था।

इस घटना का राजनीतिक महत्व इसलिए भी अलग था कि तलवाड़ा गोलीकांड ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन के दौर में हुआ था, जबकि जनवरी 1947 तक बंबई प्रांत में कांग्रेस का बी. जी. खेर मंत्रालय सत्ता में था। इस प्रकार वारली आंदोलन और राज्य सत्ता का संघर्ष अब केवल “ब्रिटिश सरकार बनाम भारतीय किसान” की सरल संरचना में नहीं समझा जा सकता।

उपलब्ध अकादमिक विवरणों के अनुसार 7 जनवरी 1947 को पालघर तालुका में पुलिस गोलीबारी में पांच किसान मारे गए। इसके बाद आंदोलन धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा, हालांकि जंगलों में चले गए अनेक कार्यकर्ताओं ने पुनर्गठन की कोशिश जारी रखी।

इस घटना तक पहुंचने की कहानी समझना इसलिए आवश्यक है क्योंकि गोलीबारी किसी अलग-थलग विवाद का परिणाम नहीं थी। उसके पीछे 1946 के उत्तरार्ध का व्यापक राजनीतिक दमन, वन-मजदूरों की सफल हड़ताल, कांग्रेस और कम्युनिस्टों की बढ़ती राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तथा गांवों में गहराता तनाव था।

1. नवंबर 1946 की जीत के बाद जनवरी 1947 में गोली क्यों चली?

पहली दृष्टि में यह विरोधाभासी लगता है।

1946 की वन-मजदूर हड़ताल मजदूरी समझौते के साथ समाप्त हो चुकी थी। वन ठेकेदारों और टिम्बर व्यापारियों को मजदूरी बढ़ाने पर सहमत होना पड़ा था।

फिर संघर्ष शांत क्यों नहीं हुआ?

क्योंकि मजदूरी विवाद का समाधान हो जाना राजनीतिक संघर्ष का समाधान नहीं था।

किसान सभा का प्रभाव बढ़ चुका था।

वारली गांव संगठित हो चुके थे।

स्थानीय भू-स्वामी वर्ग आंदोलन से भयभीत था।

और कांग्रेस सरकार कम्युनिस्ट प्रभाव को केवल श्रमिक मांगों के रूप में नहीं, बढ़ती राजनीतिक चुनौती के रूप में भी देखने लगी थी।

2. मजदूरी की जीत ने शक्ति-संतुलन बदला

1945 में वारलियों ने वेठ-बेगार को चुनौती दी।

फिर घास-कटाई की मजदूरी बढ़ाने के लिए संघर्ष किया।

1946 में वन-मजदूरों ने ठेकेदारों के विरुद्ध लंबी हड़ताल की।

हर सफलता से एक संदेश फैलता गया—

संगठन से परिणाम मिलता है।

यह वारली मजदूर के लिए उत्साहजनक था।

लेकिन पुराने ग्रामीण प्रभुत्व के लिए चिंताजनक।

3. सरकार की चिंता केवल मजदूरी नहीं थी

किसान सभा का प्रभाव बढ़ने का अर्थ था कि कांग्रेस के समानांतर एक दूसरा राजनीतिक संगठन आदिवासी क्षेत्रों में मजबूत हो रहा था।

गांवों में समितियां बना रहा था,

हड़ताल आयोजित कर रहा था,

मजदूरी तय करा रहा था,

और हजारों आदिवासियों को लाल झंडे के नीचे संगठित कर रहा था।

इसलिए वारली आंदोलन अब आर्थिक के साथ-साथ राजनीतिक शक्ति का प्रश्न बन चुका था।

# बंबई में कांग्रेस मंत्रालय

4. सत्ता बदल चुकी थी

1946 के प्रांतीय चुनावों के बाद बंबई प्रांत में कांग्रेस मंत्रालय पुनः सत्ता में आया और बी. जी. खेर मुख्यमंत्री—तत्कालीन शब्दावली में प्रीमियर—बने।

इसका अर्थ था कि पुलिस और प्रशासनिक कार्रवाई की राजनीतिक जिम्मेदारी अब भारतीय नेतृत्व वाले प्रांतीय मंत्रालय की भी थी।

यहीं वारली संघर्ष का इतिहास अधिक जटिल हो जाता है।

5. मोरारजी देसाई की भूमिका

बंबई सरकार में मोरारजी देसाई गृह विभाग से जुड़े महत्वपूर्ण मंत्री थे और वारली आंदोलन के विरुद्ध सरकार की नीति को लेकर कम्युनिस्ट साहित्य में उनकी तीखी आलोचना मिलती है।

किसान सभा और कम्युनिस्ट स्रोत कांग्रेस मंत्रालय की कार्रवाई को भू-स्वामी हितों की रक्षा और कम्युनिस्ट आंदोलन को कुचलने का प्रयास बताते हैं।

इस राजनीतिक आरोप को सरकारी तथ्य की तरह स्वीकार करना उचित नहीं होगा।

लेकिन यह निर्विवाद है कि 1946–47 में सरकार ने—

नेताओं को क्षेत्र से बाहर किया,

कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया,

और पुलिस बल का इस्तेमाल किया।

6. सैकड़ों गिरफ्तारियों के दावे

किसान सभा के एक विस्तृत आंदोलनकारी विवरण में लगभग 300 वारलियों को हिरासत में लेने और करीब 400 लोगों को कथित अपराधों में गिरफ्तार करने का दावा किया गया है। उसी स्रोत के अनुसार गिरफ्तारी से बचने के लिए अनेक वारली भूमिगत हो गए।

इन संख्याओं को सावधानी से पढ़ना आवश्यक है।

वे आंदोलनकारी स्रोत से आती हैं और उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड से प्रत्येक संख्या की स्वतंत्र पुष्टि यहां संभव नहीं है।

फिर भी दमन के बड़े पैमाने पर होने की पुष्टि अन्य शैक्षणिक विवरण भी करते हैं।

7. केवल नेताओं को हटाना पर्याप्त नहीं रहा

सरकार पहले ही प्रमुख किसान सभा नेताओं को क्षेत्र से बाहर करने का प्रयास कर चुकी थी।

लेकिन इससे गांवों का नेटवर्क पूरी तरह नहीं टूटा।

स्थानीय कार्यकर्ता सक्रिय रहे।

इसलिए प्रशासनिक कार्रवाई का अगला स्तर स्थानीय कैडर तक पहुंचा।

यही कारण था कि गिरफ्तारियां और हिरासत आंदोलन की रणनीति का केंद्रीय प्रश्न बन गईं।

# कांग्रेस और कम्युनिस्टों की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा

8. आदिवासी क्षेत्र अब राजनीतिक मैदान था

वारली क्षेत्र में किसान सभा के प्रभाव का एक अर्थ यह भी था कि कांग्रेस का आदिवासी समाज पर राजनीतिक प्रभाव चुनौती पा रहा था।

दोनों धाराओं के दृष्टिकोण में अंतर था।

कांग्रेस राष्ट्रीय स्वतंत्रता और संवैधानिक सत्ता-हस्तांतरण की ओर बढ़ रही थी।

कम्युनिस्ट किसान सभा ग्रामीण वर्ग-संघर्ष, मजदूरी और भूमि के प्रश्नों पर आंदोलन तेज कर रही थी।

इससे प्रतिस्पर्धा लगभग अपरिहार्य थी।

9. कांग्रेस का आदिवासी संपर्क अभियान

उपलब्ध समकालीन विवरणों से पता चलता है कि कांग्रेस नेतृत्व ने भी आदिवासी क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक पहुंच बढ़ाने की कोशिश की।

एक समकालीन रिपोर्ट में पालघर के निकट मासवान में प्रीमियर की अध्यक्षता में आदिवासी सम्मेलन का उल्लेख मिलता है, जिसमें दहानू तालुका से लगभग 300 वारली शामिल हुए थे।

यह विवरण महत्वपूर्ण है।

इससे पता चलता है कि राजनीतिक संघर्ष केवल पुलिस और किसान सभा के बीच नहीं था।

आदिवासी समर्थन के लिए राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी चल रही थी।

10. सम्मेलन में जाने वालों पर हमला

उसी समकालीन विवरण के अनुसार मासवान सम्मेलन में भाग लेने वाले एक वारली पुलिस-पाटिल के पिता पर बाद में हमला किया गया। रिपोर्ट इसे क्षेत्र में बढ़ती हिंसा की श्रृंखला से जोड़ती है।

यह तथ्य आंदोलन की एक महत्वपूर्ण जटिलता सामने लाता है।

वारली समाज स्वयं राजनीतिक रूप से पूरी तरह एकरूप नहीं था।

सभी वारली किसान सभा के साथ नहीं थे।

कुछ कांग्रेस के साथ थे।

कुछ सरकारी ढांचे से जुड़े थे।

यानी संघर्ष में आदिवासी समाज के भीतर राजनीतिक विभाजन भी विकसित हो रहा था।

11. भू-स्वामी समर्थकों द्वारा हमले के आरोप

समकालीन स्रोत में वारली गांव पर भू-स्वामी समर्थकों के जवाबी हमले को क्षेत्र में बड़े हमलों के पीछे एक कारण बताया गया है।

दूसरी ओर किसान सभा के स्रोत भू-स्वामी समर्थक गिरोहों पर वारलियों के खिलाफ हिंसा, मारपीट और आतंक फैलाने के गंभीर आरोप लगाते हैं।

इन आरोपों के प्रत्येक विवरण की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।

लेकिन इतना स्पष्ट है कि 1946 के अंत तक संघर्ष शांतिपूर्ण मजदूरी वार्ता की सीमा से बहुत आगे जा चुका था।

12. किसान सभा समर्थकों पर हिंसा के आरोप

सरकारी और कांग्रेस समर्थक विवरणों में कम्युनिस्ट समर्थक वारली समूहों पर भी हमले करने के आरोप थे।

एक समकालीन विवरण पुलिस पार्टी पर हुए गंभीर हमले का उल्लेख करता है।

यह तथ्य महत्वपूर्ण है।

13. आंदोलन का चरित्र क्यों बदल रहा था?

इसके पीछे कई कारण थे—

स्थानीय भू-स्वामी संघर्ष,

और संगठन के भूमिगत होने की प्रक्रिया।

अध्याय 22

स्वतंत्रता और वारली आंदोलन — 1947 के बाद जमीन, जंगल और किसान सभा की नई लड़ाई

15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हो गया, लेकिन वारली आंदोलन का इतिहास वहीं समाप्त नहीं हुआ। बल्कि स्वतंत्रता ने उसके सामने एक अधिक कठिन प्रश्न खड़ा किया—अब जब शासन विदेशी नहीं रहा, तो जमीन, जंगल, मजदूरी और आदिवासी अधिकारों के लिए संघर्ष किस रूप में चलेगा?

1945–47 के वारली विद्रोह ने वेठ-बेगार और लग्नगाड़ी जैसी प्रथाओं को निर्णायक चुनौती दी, घास और वन-मजदूरी की दरों पर सामूहिक सौदेबाजी स्थापित की और ठाणे के आदिवासी क्षेत्र में किसान सभा का मजबूत संगठनात्मक आधार बनाया। लेकिन जमीन का वितरण, काश्तकारी सुरक्षा, वनभूमि पर अधिकार, साहूकारी और भूमिहीनता जैसी मूल समस्याएं बनी रहीं। इसीलिए स्वतंत्रता के बाद वारली राजनीति का केंद्र धीरे-धीरे “मुफ्त श्रम नहीं” से “जमीन जोते वह जमीन का मालिक हो” की ओर बढ़ा। Review of Agrarian Studies वारली विद्रोह को ठाणे के कृषि इतिहास का निर्णायक watershed मानता है और बताता है कि 1940 से 1960 के दशकों तक किसान सभा के आंदोलनों की दो मुख्य धुरी जमीन और अधिक मजदूरी रहीं।

यह परिवर्तन भारतीय स्वतंत्रता की सीमाओं को भी उजागर करता है। राजनीतिक सत्ता बदल गई थी, लेकिन ग्रामीण उत्पादन संबंध स्वतः नहीं बदले थे।

1. स्वतंत्रता मिली, लेकिन वारली किसान की स्थिति क्या थी?

1947 में एक सामान्य वारली परिवार की आर्थिक स्थिति देखें।

कई परिवारों के पास अपनी पर्याप्त जमीन नहीं थी।

वनभूमि पर उनके परंपरागत अधिकार कानूनी रूप से कमजोर थे।

साहूकार पर निर्भरता बनी थी।

और कृषि आय इतनी कम थी कि वर्ष के कठिन महीनों में ऋण लेना पड़ता था।

अर्थात राष्ट्रीय स्वतंत्रता ने तुरंत यह स्थिति पैदा नहीं की कि वारली किसान अपनी जमीन, जंगल और आजीविका पर स्वतंत्र नियंत्रण हासिल कर ले।

यही आंदोलन की निरंतरता का मूल कारण था।

2. 1945–47 की उपलब्धियां छोटी नहीं थीं

यह भी गलत होगा कि स्वतंत्रता के समय वारली आंदोलन को पूरी तरह असफल माना जाए।

उसने ठोस उपलब्धियां हासिल की थीं।

वेठ-बेगार की पुरानी व्यवस्था को तोड़ा गया।

लग्नगाड़ी जैसी बंधुआ सेवा पर निर्णायक प्रहार हुआ।

घास और वन-आधारित मजदूरी के लिए दरें निर्धारित कराई गईं।

भू-स्वामी की सामाजिक निरंकुशता कमजोर हुई।

और सबसे महत्वपूर्ण—आदिवासी समाज में संगठन तथा अधिकार चेतना पैदा हुई। Review of Agrarian Studies इन्हीं उपलब्धियों को विद्रोह की प्रमुख विरासत मानता है।

लेकिन आंदोलन ने अभी मुख्यतः श्रम संबंध बदले थे।

भूमि संबंधों का परिवर्तन अधूरा था।

# पहला बड़ा प्रश्न : जमीन

3. “जिसने जमीन जोती, मालिक कौन?”

वारली किसान आंदोलन का अगला स्वाभाविक प्रश्न था—

यदि वास्तविक खेती आदिवासी किरायेदार करता है, तो जमीन का मालिक भू-स्वामी क्यों?

यहीं से किसान सभा का प्रसिद्ध नारा मजबूत हुआ—

“कसेल त्याची जमीन” — जो जोते, जमीन उसकी।

यह केवल राजनीतिक नारा नहीं था।

उसके पीछे दशकों की भूमि-वंचना का अनुभव था।

4. स्वतंत्र किसान से किरायेदार तक

औपनिवेशिक काल में अनेक आदिवासी परिवारों की जमीन गैर-आदिवासी भू-स्वामियों और साहूकारों के हाथ चली गई थी।

परिणामतः वास्तविक खेती करने वाला वारली अक्सर कानूनी स्वामी नहीं रहा।

इसलिए स्वतंत्रता के बाद पहला भूमि-सुधार प्रश्न था—

किरायेदार को सुरक्षा और अंततः स्वामित्व मिले।

यह प्रश्न केवल ठाणे का नहीं था; पश्चिमी भारत के व्यापक कृषि सुधारों में भी यह केंद्रीय बन गया।

# 1948 का बंबई काश्तकारी और कृषि भूमि अधिनियम

5. स्वतंत्र भारत की पहली बड़ी प्रतिक्रिया

स्वतंत्रता के तुरंत बाद बंबई सरकार ने Bombay काश्तकारी and Agricultural Lands Act, 1948 लागू किया।

आधुनिक शोध वारली विद्रोह और ग्रामीण किरायेदारी संकट को इस कानून की पृष्ठभूमि के महत्वपूर्ण कारकों में गिनता है। विद्रोह ने शोषणकारी काश्तकारी relations को राजनीतिक प्रश्न बनाया और सरकार के सामने ग्रामीण सुधार की आवश्यकता तीखी कर दी।

इस कानून का उद्देश्य था—

किरायेदारों को कुछ सुरक्षा,

और कृषि संबंधों को कानूनी ढांचे में लाना।

6. ‘Protected Tenant’ की अवधारणा

1948 के कानून की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक थी संरक्षित किरायेदार की श्रेणी।

ऐसे कृषक जिन्होंने निश्चित अवधि तक जमीन पर वास्तविक खेती की थी, उन्हें किरायेदारी अधिकार का कानूनी संरक्षण मिल सकता था।

इस व्यवस्था का बड़ा महत्व था।

पहले भू-स्वामी किसी वारली परिवार को निकाल सकता था और वह अपने लंबे काश्त इतिहास के बावजूद कमजोर स्थिति में होता।

अब कानून ने कम-से-कम सिद्धांततः काश्त की निरंतरता को अधिकार का आधार बनाना शुरू किया।

7. कानून और गांव की वास्तविकता

लेकिन कानून बनते ही स्थिति नहीं बदली।

भू-स्वामी अब भी स्थानीय स्तर पर शक्तिशाली थे।

किसान सभा के बाद के अध्ययनों में दर्ज है कि अनेक स्थानों पर किरायेदारों को शारीरिक रूप से बेदखल किया गया और उनके नाम भूमि अभिलेखों से हटाने की कोशिश हुई। जिन किरायेदारों को बेदखली से बचाया जा सका, उन्हें किराये में कुछ राहत मिली, लेकिन भूमि संबंधों का पूर्ण परिवर्तन नहीं हुआ।

अर्थात कानून और उसके क्रियान्वयन के बीच बड़ा अंतर था।

# किसान सभा की नई भूमिका

8. आंदोलन अब कानून के क्रियान्वयन की लड़ाई भी था

औपनिवेशिक काल में किसान सभा मुख्यतः भू-स्वामी और प्रशासन को चुनौती दे रही थी।

अब एक नया क्षेत्र खुला—

सरकार द्वारा बनाए गए कानून को वास्तव में लागू कराना।

यह संघर्ष पहले से अलग था।

अब किसान सभा कह सकती थी—

कानून स्वयं किरायेदार की रक्षा करता है।

तो अधिकारी उसका नाम भूमि रिकॉर्ड में क्यों नहीं दर्ज कर रहे?

भू-स्वामी उसे क्यों निकाल रहा है?

इससे आंदोलन सड़क और कानून—दोनों क्षेत्रों में चला।

9. भूमि अभिलेख राजनीतिक हथियार बने

पहले भूमि रिकॉर्ड वारली आदिवासी के लिए लगभग दुर्गम प्रशासनिक दस्तावेज थे।

अब वही रिकॉर्ड अधिकार का आधार बनने लगे।

किसका नाम सातबारा में है?

किसे tenant के रूप में दर्ज किया गया?

कौन वास्तव में जमीन जोतता है?

ये प्रशासनिक प्रश्न सीधे राजनीतिक प्रश्न बन गए।

किसान सभा की भूमिका अब लोगों को भूमि अभिलेख और कानून का उपयोग सिखाने तक भी फैलने लगी।

10. बेदखली रोकना

1950 के दशक में किसान सभा के महत्वपूर्ण अभियानों में एक था—

किरायेदारों की जबरन बेदखली रोकना।

यदि भू-स्वामी किसान को निकालकर स्वयं काश्त दिखा दे, तो tenant protection कमजोर हो सकती थी।

इसलिए संगठनात्मक निगरानी जरूरी थी।

यहां 1945 में बने गांव नेटवर्क ने फिर काम किया।

एक परिवार की बेदखली अब उसकी निजी समस्या नहीं रहती थी।

# “जमीन जोते वह मालिक”

11. 1950 के दशक में नारा अधिक स्पष्ट हुआ

किसान सभा की भूमि राजनीति धीरे-धीरे स्वामित्व के प्रश्न तक पहुंची।

1955 में अखिल भारतीय किसान सभा का 13वां राष्ट्रीय सम्मेलन दहानू में आयोजित हुआ। इसके लिए बड़ी संख्या में आदिवासियों को संगठित किया गया और मुख्य नारों में था—

“कसेल त्याची जमीन” — जमीन जोते वह जमीन का मालिक।

“अब हमें जमीन के मालिक बनना है।”

Review of Agrarian Studies इस सम्मेलन को ठाणे के आदिवासी भूमि संघर्ष के महत्वपूर्ण चरण के रूप में दर्ज करता है।

यह उल्लेखनीय है कि वही दहानू, जो दस वर्ष पहले घास-मजदूरी और पुलिस टकराव का केंद्र था, अब राष्ट्रीय किसान सम्मेलन का स्थल बन चुका था।

12. आंदोलन के भूगोल की राजनीतिक निरंतरता

यह केवल प्रतीकात्मक संयोग नहीं था।

1945 में जिन गांवों में लाल झंडे का नेटवर्क बना था, वही संगठनात्मक आधार 1950 के दशक में भूमि अधिकार के लिए इस्तेमाल हुआ।

यानी वारली विद्रोह का वास्तविक दीर्घकालीन प्रभाव दिखाई दे रहा था।

वह समाप्त नहीं हुआ था।

15. किसान सभा ने कानून को जमीन पर कैसे लागू कराया?

किरायेदारों को दर्ज करो,

अध्याय 23

1948–57 के भूमि सुधार और वारली किसान — संरक्षित किरायेदारी, ‘जमीन जोते उसकी’ और 1 अप्रैल 1957 का टिलर्स डे

वारली आंदोलन की स्वतंत्रता-पूर्व उपलब्धियों में वेठ-बेगार का प्रतिरोध, मजदूरी वृद्धि और ग्रामीण सत्ता को चुनौती प्रमुख थी। लेकिन स्वतंत्रता के बाद उसका सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न बन गया—जमीन का अधिकार। यह स्वाभाविक भी था। यदि कोई आदिवासी परिवार वर्षों से जमीन जोत रहा है, किराया चुका रहा है और उसी खेत पर उसका जीवन निर्भर है, तो क्या वह केवल किरायेदार बना रहेगा, या उसे उस भूमि पर स्थायी अधिकार और अंततः स्वामित्व मिलेगा?

इसी प्रश्न ने 1948 से 1957 के बीच बंबई राज्य की भूमि-सुधार राजनीति को आकार दिया। Bombay काश्तकारी and Agricultural Lands Act, 1948 ने कृषि भूमि पर भू-स्वामी–किरायेदार संबंधों को विनियमित करने की कानूनी आधारशिला रखी। बाद के संशोधनों ने इस व्यवस्था को और आगे बढ़ाया और अंततः 1 अप्रैल 1957 को ‘Tillers’ Day’ घोषित कर पात्र किरायेदारों को उस भूमि का वैधानिक खरीदार मानने की व्यवस्था की, जिसे वे स्वयं जोत रहे थे।

वारली क्षेत्र में यह केवल कानूनी सुधार नहीं था। यह 1945 से उठती उस मांग का संस्थागत रूप था जिसे किसान सभा ने सरल शब्दों में व्यक्त किया था—

“कसेल त्याची जमीन” — जो जमीन जोते, जमीन उसकी।

1. स्वतंत्रता के बाद भूमि प्रश्न सबसे बड़ा क्यों बना?

वारली आंदोलन की शुरुआती मांगें थीं—

इन संघर्षों में महत्वपूर्ण सफलताएं मिलीं।

लेकिन एक बुनियादी कमजोरी बनी रही।

वारली किसान जिस खेत पर काम करता था, उसका कानूनी मालिक अक्सर कोई और था।

इसलिए वह मजदूरी बढ़वा लेने के बाद भी आर्थिक रूप से असुरक्षित था।

भू-स्वामी किरायेदारी खत्म करे तो?

नाम भूमि रिकॉर्ड से हटवा दे तो?

इसलिए श्रम-मुक्ति के बाद संघर्ष का अगला तार्किक चरण था—

# 1948 का बंबई काश्तकारी और कृषि भूमि अधिनियम

2. कानून क्यों लाया गया?

1948 के कानून की प्रस्तावना स्वयं बताती है कि उसका उद्देश्य कृषि भूमि के भू-स्वामी और किरायेदार संबंधों को बदलना, कृषकों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति सुधारना और कृषि भूमि के हस्तांतरण को नियंत्रित करना था।

यह महत्वपूर्ण परिवर्तन था।

औपनिवेशिक कृषि व्यवस्था मुख्यतः राजस्व और संपत्ति संबंधों पर केंद्रित थी।

अब स्वतंत्र भारत की नई नीति में प्रश्न था—

वास्तविक कृषक की सुरक्षा।

3. वारली आंदोलन का इसमें कितना प्रभाव था?

यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि 1948 का पूरा कानून केवल वारली विद्रोह के कारण बना।

इसके पीछे व्यापक कारण थे—

बंबई प्रांत के किसान संघर्ष,

राष्ट्रीय भूमि-सुधार बहस,

कांग्रेस का कृषि कार्यक्रम,

किरायेदारों की असुरक्षा,

और स्वतंत्रता के बाद सामाजिक सुधार का दबाव।

लेकिन ठाणे का वारली आंदोलन इस व्यापक दबाव का महत्वपूर्ण हिस्सा था।

Review of Agrarian Studies बताता है कि स्वतंत्रता के बाद किसान सभा के संघर्षों का केंद्र 1948 के काश्तकारी कानून को प्रभावी ढंग से लागू कराना था—विशेष रूप से बेदखली रोकना, अत्यधिक किराया रोकना, किरायेदारों का पंजीकरण कराना और उन्हें स्वामित्व के दावे तक पहुंचाना।

# संरक्षित किरायेदार

4. ‘Protected Tenant’ क्यों महत्वपूर्ण था?

1948 के कानून में protected tenant, यानी संरक्षित किरायेदार, की कानूनी श्रेणी विकसित हुई। वर्तमान कानून में भी धारा 4A संरक्षित किरायेदारों का उल्लेख करती है।

इस अवधारणा का महत्व बहुत बड़ा था।

अब लंबे समय से जमीन जोतने वाला व्यक्ति केवल भू-स्वामी की इच्छा पर निर्भर नहीं रहता।

उसे कानून कुछ अधिकार देता है।

किरायेदारी अब केवल निजी अनुबंध नहीं, कानूनी अधिकार का विषय बन रही थी।

5. बेदखली पर नियंत्रण

यदि भू-स्वामी जब चाहे किरायेदार को निकाल सके तो protected काश्तकारी का अर्थ नहीं रह जाता।

इसलिए कानून ने किरायेदारी समाप्त करने और कब्जा वापस लेने पर प्रक्रियात्मक सीमाएं लगाईं।

भारत कोड में वर्तमान कानून की धाराएं 14, 24, 25, 29 और 31 किरायेदारी समाप्ति, कब्जे और किरायेदार की सुरक्षा से संबंधित विस्तृत व्यवस्था दिखाती हैं।

वारली किसान के लिए इसका व्यावहारिक अर्थ था—

भू-स्वामी की इच्छा अब अंतिम नहीं थी।

6. किराये पर भी नियंत्रण

कानून केवल बेदखली नहीं रोकता था।

उसने किराये को भी विनियमित किया।

भारत कोड में धारा 8, 9 और 9A किराये की अधिकतम–न्यूनतम दर तथा किरायेदार द्वारा देय राशि से संबंधित हैं।

यह वारली क्षेत्र के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण था क्योंकि किराया और खावटी जैसी देनदारियां गरीब किसान को भू-स्वामी पर निर्भर रखती थीं।

# लेकिन कानून लागू हुआ या नहीं?

7. सबसे बड़ी समस्या : कागज और खेत के बीच दूरी

कानून बनने से अधिकार अपने आप गांव तक नहीं पहुंचता।

यही 1948 के बाद वारली किसान की सबसे बड़ी समस्या थी।

Review of Agrarian Studies के अनुसार अनेक भू-स्वामियों ने किरायेदारों को शारीरिक रूप से बेदखल करना जारी रखा और भूमि रिकॉर्ड से उनके नाम हटाने की कोशिश की। जो किसान बेदखली से बच गए, उन्हें किराये में कुछ राहत मिली और धीरे-धीरे नकद किराये की ओर परिवर्तन हुआ।

यानी कानून की लड़ाई अब प्रशासनिक क्रियान्वयन की लड़ाई बन गई।

8. नाम रिकॉर्ड में होना इतना महत्वपूर्ण क्यों था?

यदि कानून किरायेदार को अधिकार देता है, तो सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण क्या होगा?

यदि किसी वारली किसान का नाम tenant के रूप में दर्ज नहीं है, तो बाद में यह सिद्ध करना कठिन हो सकता है कि वह वास्तविक काश्तकार था।

इसलिए किसान सभा का नया कार्य बना—

रिकॉर्ड की जांच करो।

यानी आंदोलन अब केवल हड़ताल नहीं, दस्तावेजी राजनीति भी बन गया।

9. गांव की राजनीति से तहसील कार्यालय तक

1945 में किसान सभा का संघर्ष खेत और पाड़े में था।

1950 के दशक में उसका एक मोर्चा प्रशासनिक कार्यालय भी बन गया।

ये सभी किसान राजनीति के नए शब्द बन गए।

इस बदलाव ने आंदोलन को अधिक संस्थागत बनाया।

# भूमि सुधार की सीमाएं

10. सभी वारली protected tenant नहीं थे

यह बिंदु अत्यंत महत्वपूर्ण है।

जो वारली पहले ही भूमि से बेदखल होकर खेत-मजदूर बन चुका था, वह काश्तकारी law का लाभ उसी तरह नहीं ले सकता था जैसे दर्ज किरायेदार।

इसलिए भूमि सुधार का लाभ असमान था।

मालिक बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता था।

अब भी जमीन से बाहर था।

यही बाद में वनभूमि और सरकारी परती भूमि पर संघर्ष का कारण बना।

# 1955 : दहानू में अखिल भारतीय किसान सभा सम्मेलन

11. वारली क्षेत्र राष्ट्रीय किसान राजनीति का केंद्र बना

19–22 मई 1955 को अखिल भारतीय किसान सभा का 13वां राष्ट्रीय सम्मेलन दहानू में हुआ।

यह अपने आप में ऐतिहासिक था।

दस वर्ष पहले यही क्षेत्र वेठ, घास-मजदूरी और पुलिस गोलीबारी के कारण चर्चा में था।

अब वही स्थान राष्ट्रीय किसान संगठन के सम्मेलन की मेजबानी कर रहा था।

Review of Agrarian Studies के अनुसार सम्मेलन की तैयारी के लिए वारली पाड़ों में व्यापक लामबंदी हुई और नारे दिए गए—

“कसेल त्याची जमीन” — जो जोते, जमीन उसकी।

“अब हमें जमीन का मालिक बनना है।”

12. यह नारा इतना शक्तिशाली क्यों था?

क्योंकि उसमें जटिल भूमि-सुधार कानून का सार था।

वारली किसान को धारा, उपधारा और कानूनी भाषा याद रखने की आवश्यकता नहीं थी।

खेती हम करते हैं, तो स्वामित्व भी हमारा होना चाहिए।

यही सरलता नारे को राजनीतिक शक्ति देती थी।

13. किरायेदारी से स्वामित्व तक

1948 का कानून मुख्यतः किरायेदार की सुरक्षा और संबंधों के नियमन की दिशा में था।

लेकिन किसान सभा की मांग इससे आगे थी—

किरायेदार को स्थायी मालिक बनाओ।

इससे भूमि सुधार का लक्ष्य बदलता है—

भू-स्वामी के नियंत्रण को सीमित करना से किरायेदार को स्वामित्व देना।

यही परिवर्तन 1957 में निर्णायक रूप लेता है।

14. भूमि का प्रश्न राजनीतिक सत्ता से जुड़ता है

पहला नारा भूमि सुधार का था।

अध्याय 24

वनभूमि पर अधिकार की लड़ाई — ‘अतिक्रमण’ से वैधानिक कब्जे तक, 1950–60 के दशक के संघर्ष

वारली आंदोलन का स्वतंत्रता-पश्चात इतिहास जमीन के प्रश्न से आगे बढ़कर बहुत जल्दी वनभूमि के अधिकार के प्रश्न से जुड़ गया। 1948–57 के भूमि सुधारों ने अनेक किरायेदारों को सुरक्षा और कुछ मामलों में स्वामित्व दिया, लेकिन बड़ी संख्या में आदिवासी परिवार ऐसे थे जिनके पास निजी कृषि भूमि नहीं थी, या जिनकी खेती का आधार सरकारी अथवा वनभूमि थी। उनके लिए भूमि सुधार का अगला मोर्चा स्वाभाविक रूप से जंगल बना।

यहीं एक गंभीर कानूनी और नैतिक टकराव सामने आया।

सरकार की भाषा में ऐसी जमीन पर खेती “अतिक्रमण” थी।

आदिवासी किसान की दृष्टि में वह उसकी वास्तविक काश्त और आजीविका थी।

यही अंतर 1950 और 1960 के दशकों के वारली भूमि संघर्ष की केंद्रीय धुरी बना। किसान सभा की मांग थी कि जिस वनभूमि को आदिवासी किसान वास्तव में जोत रहा है, उसे महज अवैध कब्जेदार न माना जाए; जमीन का अधिकार उसी वास्तविक काश्तकार को दिया जाए। 1950 के दशक के उत्तरार्ध से किसान सभा ने ठाणे जिले में इसी मांग पर व्यापक अभियान चलाए।

1. 1957 के बाद वनभूमि इतनी महत्वपूर्ण क्यों हो गई?

1 अप्रैल 1957 के टिलर्स डे ने काश्तकारी land पर पात्र किरायेदारों के लिए स्वामित्व का रास्ता खोला।

जो वारली किरायेदार ही नहीं था, उसका क्या?

जो पहले ही भूमिहीन मजदूर बन चुका था?

जिसका परिवार जंगल के किनारे किसी भूखंड पर वर्षों से खेती करता था, लेकिन भूमि रिकॉर्ड में उसका नाम नहीं था?

ऐसे परिवारों के सामने निजी खेत के स्वामित्व का रास्ता बंद था।

उन्हें जीविका के लिए नई कृषि भूमि चाहिए थी।

उनके आसपास उपलब्ध सबसे बड़ा भूमि-संसाधन था—

वनभूमि और सरकारी परती भूमि।

इसलिए काश्तकारी reform की सीमा ने वनभूमि आंदोलन की आवश्यकता पैदा की।

2. औपनिवेशिक इतिहास फिर सामने आया

वनभूमि विवाद की जड़ें स्वतंत्र भारत में पैदा नहीं हुई थीं।

औपनिवेशिक शासन ने जंगलों को सर्वेक्षण, आरक्षण और वन कानूनों के माध्यम से सरकारी संपत्ति की कानूनी श्रेणी में रखा था।

कई आदिवासी समुदाय जिन क्षेत्रों को पीढ़ियों से—

के लिए इस्तेमाल करते थे, वे सरकारी रिकॉर्ड में forest land बन गए।

इसलिए स्वतंत्रता के बाद प्रशासन को विरासत में ऐसी व्यवस्था मिली जिसमें कागज पर जमीन सरकार की थी, जबकि जमीन पर वास्तविक उपयोग किसी आदिवासी परिवार का हो सकता था।

Review of Agrarian Studies के अनुसार ठाणे के बाद के वनभूमि संघर्ष की जड़ें इसी औपनिवेशिक प्रक्रिया में थीं, जिसने आदिवासियों को उन वन क्षेत्रों से बेदखल किया जिन्हें वे पीढ़ियों से जोतते आए थे।

# ‘अतिक्रमण’ शब्द की समस्या

3. प्रशासन के लिए अतिक्रमण क्या था?

यदि भूमि सरकारी या वन विभाग के नाम दर्ज है और कोई व्यक्ति बिना विधिवत पट्टे के वहां खेती करे, तो प्रशासनिक भाषा में वह unauthorized occupation अथवा encroachment हो सकता था।

कानूनी दृष्टि से यह तर्क सीधा था।

लेकिन सामाजिक इतिहास इतना सरल नहीं था।

4. वारली किसान की दृष्टि

आदिवासी किसान पूछ सकता था—

यदि मेरे पिता और दादा इसी जमीन पर खेती करते थे,

यदि हमने जंगल साफ कर खेत बनाया,

यदि हमारी पूरी आजीविका इसी जमीन पर है,

तो मैं अचानक अतिक्रमणकारी कैसे हो गया?

यानी टकराव केवल संपत्ति का नहीं था।

वह कानूनी स्मृति और सामुदायिक स्मृति के बीच संघर्ष था।

5. ‘अतिक्रमण’ को उद्धरण चिह्नों में क्यों लिखना चाहिए?

वारली इतिहास लिखते समय कई आधुनिक शोधकर्ता encroachment शब्द को उद्धरण चिह्नों में रखते हैं।

वह प्रशासनिक श्रेणी है, निष्पक्ष ऐतिहासिक निष्कर्ष नहीं।

जिस भूखंड को वन विभाग ‘अतिक्रमित’ कहता था, उसी पर किसान वर्षों से वास्तविक खेती कर रहा हो सकता था।

इसलिए अधिक सटीक लेखन होगा—

सरकारी रिकॉर्ड में ‘अतिक्रमण’ कही गई खेती।

इससे दोनों पक्षों की अवधारणा स्पष्ट रहती है।

# किसान सभा की नई भूमि-राजनीति

6. 1950 के दशक के उत्तरार्ध में नई मांग

Review of Agrarian Studies के अनुसार 1950 के दशक के अंत से किसान सभा ने ठाणे में दो स्पष्ट मांगें उठाईं—

वनभूमि के वास्तविक काश्तकार को स्वामित्व दिया जाए,

और कब्जे में ली गई वनभूमि को नियमित किया जाए।

महाराष्ट्र में इसका राजनीतिक सूत्र था—

“अतिक्रमित वन प्लॉट कसणाऱ्या शेतकऱ्याच्या नावे करा”

जिस किसान ने वनभूमि जोती है, उस भूखंड को उसी के नाम करो।

7. ‘जमीन जोते उसकी’ का नया रूप

1955–57 में नारा था—

निजी काश्तकारी land के संदर्भ में इसका अर्थ था—

जो किरायेदार जोतता है, वह मालिक बने।

वनभूमि के संदर्भ में वही सिद्धांत विस्तृत हुआ—

यदि वास्तविक खेती आदिवासी करता है, तो सरकारी रिकॉर्ड की श्रेणी के कारण उसका श्रम और कब्जा निरर्थक क्यों हो?

यानी किसान सभा ने निजी भू-स्वामी के खिलाफ विकसित सिद्धांत को अब राज्य-स्वामित्व वाली भूमि पर लागू करना शुरू किया।

8. इससे संघर्ष अधिक जटिल हो गया

निजी भू-स्वामी से संघर्ष में सामने व्यक्ति या परिवार था।

वनभूमि के प्रश्न में सामने था—

इसलिए आंदोलन अब केवल वर्गीय भूमि विवाद नहीं रहा।

वह सार्वजनिक भूमि नीति का प्रश्न बन गया।

# जमीन की वास्तविक आवश्यकता

9. आदिवासी वनभूमि पर क्यों गए?

इसे केवल कानून तोड़ने की प्रवृत्ति से नहीं समझा जा सकता।

भूमिहीन परिवार को भोजन चाहिए।

खेत-मजदूरी मौसमी है।

छोटी मजदूरी से पूरे वर्ष का निर्वाह कठिन।

ऐसी परिस्थिति में यदि आसपास सरकारी परती या जंगल की ऐसी जमीन दिखाई दे जिसे खेती योग्य बनाया जा सकता है, तो उसे जोतना जीविका की रणनीति बन सकता है।

Review of Agrarian Studies बाद के चरणों का विश्लेषण करते हुए इसे मूलतः जीवित रहने की आर्थिक आवश्यकता से जोड़ता है।

10. भूमि केवल संपत्ति नहीं थी

आदिवासी परिवार के लिए वनभूमि का छोटा भूखंड कई चीजें एक साथ दे सकता था—

मजदूरी पर निर्भरता में कमी,

और साहूकार से कुछ दूरी।

इसलिए एक छोटा कृषि प्लॉट भी सामाजिक स्वतंत्रता का साधन था।

# 1960 का महत्वपूर्ण मोड़

11. आंदोलन का पहला महत्वपूर्ण सरकारी परिणाम

लगातार किसान सभा आंदोलनों के बाद 1960 में सरकार ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया।

Review of Agrarian Studies में Ambasta के अध्ययन के आधार पर दर्ज है कि 1955 से 1959 के बीच हुए कुछ वनभूमि ‘अतिक्रमणों’ को नियमित करने का सरकारी निर्णय 1960 में आया।

यह अत्यंत महत्वपूर्ण था।

क्योंकि पहली बार राज्य ने स्वीकार किया कि हर unauthorized cultivation को केवल बेदखली से नहीं निपटाया जाएगा।

कुछ मामलों में कब्जे को वैधानिक मान्यता दी जा सकती है।

12. इसका अर्थ क्या था?

सरकार ने यह सिद्धांत स्वीकार करना शुरू किया कि—

यदि भूमि पर वास्तविक खेती हो रही है,

यदि किसान की आजीविका उससे जुड़ी है,

और यदि निर्धारित अवधि के भीतर कब्जे का प्रमाण हो,

तो उसे नियमित किया जा सकता है।

यह ‘अतिक्रमणकारी’ की स्थिति से मान्यता प्राप्त काश्तकार बनने की दिशा में बड़ा बदलाव था।

13. क्या 1955–59 के सभी कब्जे स्वतः वैध हो गए?

यहां सावधानी जरूरी है।

Review of Agrarian Studies सरकारी निर्णय का सार देता है कि 1955–59 के बीच के encroachments नियमित किए जाने थे। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर दावेदार को बिना जांच मालिकाना पट्टा मिल गया।

व्यवहार में आवश्यक थे—

प्रशासनिक सर्वेक्षण,

और अन्य कानूनी शर्तें।

इसलिए 1960 का निर्णय नीतिगत स्वीकृति था, जमीन पर अंतिम समाधान नहीं।

14. ‘कट-ऑफ डेट’ का जन्म

वनभूमि नियमितीकरण की पूरी बाद की राजनीति में एक शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया—

किस तारीख से पहले जमीन पर खेती करने वाला पात्र होगा?

15. आदिवासी साबित कैसे करे कि वह 1958 से खेती कर रहा है?

यहीं समस्या फिर दस्तावेजी बनती है।

अध्याय 25

1971–74 का वनभूमि आंदोलन — सत्याग्रह, पांच हजार से अधिक गिरफ्तारियां और वन-प्लॉट के अधिकार की निर्णायक लड़ाई

वारली आंदोलन का 1971–74 का चरण स्वतंत्रता-पश्चात आदिवासी भूमि संघर्षों में सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में से एक है। 1945 में संघर्ष वेठ-बेगार और मजदूरी से शुरू हुआ था; 1950 के दशक में किरायेदारी और “जमीन जोते उसकी” की मांग सामने आई; 1960 के दशक तक वनभूमि के वास्तविक काश्तकार को अधिकार देने का प्रश्न उठ चुका था। लेकिन 1971–74 में यही वनभूमि प्रश्न व्यापक जनसत्याग्रह, जेल भरो, सरकारी कार्यालयों पर मोर्चों और हजारों गिरफ्तारियों वाले आंदोलन में बदल गया।

यह संघर्ष केवल जमीन के कुछ भूखंडों का विवाद नहीं था।

जिस आदिवासी परिवार की आजीविका उस जमीन की खेती पर निर्भर है, उसे राज्य ‘अतिक्रमणकारी’ मानेगा या वास्तविक काश्तकार?

Review of Agrarian Studies के विस्तृत अध्ययन के अनुसार ठाणे जिले में वन-प्लॉट के अधिकार का संघर्ष 1960 के दशक के उत्तरार्ध से तेज हुआ और 1971–74 में अपने चरम पर पहुंचा। अगस्त 1971 में लगभग एक महीने तक सत्याग्रह चला और पूरे जिले में 5,000 से अधिक आदिवासी गिरफ्तार किए गए।

1. 1960 के निर्णय के बाद भी नया आंदोलन क्यों आवश्यक हुआ?

1960 में सरकार ने 1955 से 1959 के बीच हुए कुछ वनभूमि कब्जों को नियमित करने का निर्णय किया था।

पहली दृष्टि में लगता है कि इससे समस्या समाप्त हो जानी चाहिए थी।

कई परिवार पात्रता से बाहर रह गए।

कई के पास पुराने कब्जे का दस्तावेज नहीं था।

कई भूखंड वन विभाग के नियंत्रण में बने रहे।

नए भूमिहीन परिवारों को जमीन चाहिए थी।

और प्रशासनिक रिकॉर्ड तथा वास्तविक काश्त के बीच अंतर बना रहा।

इसलिए 1960 का नियमितीकरण समाधान से अधिक एक सीमित राहत साबित हुआ।

2. भूमि सुधार की सीमा अब पूरी तरह स्पष्ट थी

1957 के टिलर्स डे से सबसे अधिक लाभ उन किसानों को मिल सकता था जो निजी कृषि भूमि के tenant थे।

लेकिन बड़ी संख्या में वारली और अन्य आदिवासी—

पहले से भूमिहीन खेत-मजदूर,

वनभूमि पर वास्तविक काश्तकार,

या सरकारी भूमि पर जीविका के लिए खेती करने वाले परिवार

उनके लिए काश्तकारी reform पर्याप्त नहीं था।

इसलिए 1970 के दशक में भूमि-सुधार का सवाल निजी भू-स्वामी से निकलकर सीधे सरकारी और वनभूमि पर आ गया।

3. वनभूमि पर खेती आवश्यकता क्यों थी?

यह प्रश्न आंदोलन की प्रकृति समझने के लिए निर्णायक है।

भूमिहीन आदिवासी परिवार को भोजन चाहिए।

बाजार और साहूकार पर निर्भरता अधिक है।

ऐसे में कुछ वनभूमि साफ करके अनाज उगाना परिवार के लिए जीवित रहने का साधन बन सकता था।

Review of Agrarian Studies ने उपलब्ध अध्ययनों के आधार पर 1970 के दशक के इन कब्जों को economic necessity and basic struggle for survival से जोड़ा है। आदिवासी सरकारी वनभूमि, चरागाह, निजी भू-स्वामी तथा कुछ सार्वजनिक ट्रस्टों की खाली भूमि तक पर खेती करने लगे थे।

इसलिए हर कब्जे को केवल जमीन हथियाने की कार्रवाई के रूप में देखना ऐतिहासिक रूप से अधूरा होगा।

4. दूसरी तरफ आदिवासी जमीन भी हाथ से निकल रही थी

इसी काल में एक दूसरी प्रक्रिया भी चल रही थी।

कुछ आदिवासी परिवार अपनी पहले से मौजूद जमीन गैर-आदिवासियों के हाथ खो रहे थे।

अनौपचारिक हस्तांतरण,

और ग्रामीण शक्ति-संबंध

इसके कारण हो सकते थे।

इसका परिणाम विचित्र था—

एक तरफ आदिवासी की अपनी जमीन बाहर जा रही थी।

दूसरी तरफ वह जीविका के लिए सरकारी या वनभूमि पर खेती कर रहा था।

यानी वन ‘अतिक्रमण’ की समस्या भूमि-वंचना की व्यापक प्रक्रिया से भी जुड़ी थी।

# किसान सभा की नई लामबंदी

5. आंदोलन का केंद्रीय नारा

किसान सभा की मांग पहले से स्पष्ट थी—

वनभूमि के वास्तविक काश्तकार को अधिकार दो।

अब यह मांग बड़े जनांदोलन में बदल गई।

रणनीति में शामिल थे—

सरकारी कार्यालयों का घेराव,

और जिस वन-प्लॉट पर आदिवासी फसल खड़ी कर चुका हो, उसे नष्ट किए जाने से सामूहिक प्रतिरोध।

यानी आंदोलन प्रत्यक्ष खेती और कानूनी मान्यता—दोनों को जोड़ रहा था।

6. किसान सभा का पुराना नेटवर्क क्यों निर्णायक था?

1971 का आंदोलन शून्य से शुरू नहीं हुआ।

1945 से तलासरी, दहानू और आसपास के क्षेत्रों में किसान सभा का नेटवर्क मौजूद था।

1950 के दशक में काश्तकारी reform।

1960 के दशक में वनभूमि।

स्थानीय नेतृत्व और पाड़ा-स्तरीय संपर्क पहले से विकसित थे।

इसलिए हजारों लोगों को एक मुद्दे पर लामबंद करने की संगठनात्मक क्षमता उपलब्ध थी।

यही वारली आंदोलन की दीर्घकालीन संस्थागत विरासत थी।

# अगस्त 1971 : सत्याग्रह

7. महीने भर का अभियान

अगस्त 1971 में वन-प्लॉट के प्रश्न पर निर्णायक सत्याग्रह शुरू हुआ।

Review of Agrarian Studies के अनुसार किसान सभा के कार्यकर्ताओं के जत्थे लगभग एक महीने तक कब्जे वाली वनभूमि पर सत्याग्रह करते रहे।

रणनीति का राजनीतिक अर्थ स्पष्ट था।

आदिवासी छिपकर खेती नहीं कर रहा था।

वह सार्वजनिक रूप से कह रहा था—

हां, मैं यह जमीन जोतता हूं; मुझे गिरफ्तार करना है तो करो, लेकिन मेरा अधिकार स्वीकार करो।

8. पांच हजार से अधिक गिरफ्तारियां

इस आंदोलन की व्यापकता का सबसे स्पष्ट संकेत गिरफ्तारी का आंकड़ा है।

उसी अध्ययन के अनुसार अगस्त 1971 के सत्याग्रह के दौरान ठाणे जिले में 5,000 से अधिक आदिवासी गिरफ्तार किए गए।

यह संख्या महत्वपूर्ण है।

यह दिखाती है कि वनभूमि प्रश्न किसी सीमित स्थानीय विवाद तक नहीं था।

हजारों परिवार सीधे इससे जुड़े थे।

9. गिरफ्तारी आंदोलन का उद्देश्य क्यों बनी?

सामान्य व्यक्ति पुलिस गिरफ्तारी से बचना चाहता है।

सत्याग्रह में गिरफ्तारी स्वयं राजनीतिक साधन बनती है।

यदि कुछ लोग गिरफ्तार हों—

यदि हजारों लोग गिरफ्तारी दें—

जेल और प्रशासन पर बोझ बढ़ता है,

मुद्दा सार्वजनिक होता है,

और सरकार पर बातचीत का दबाव बढ़ता है।

यह गांधीवादी आंदोलन पद्धति का एक ऐसा रूप था जिसे वाम किसान संगठन ने भूमि संघर्ष में इस्तेमाल किया।

10. वारली आंदोलन और सत्याग्रह का रोचक संगम

वारली आंदोलन कम्युनिस्ट किसान सभा से जुड़ा था।

लेकिन उसकी रणनीति केवल क्रांतिकारी या हिंसक नहीं थी।

passive resistance, satyagraha और jail bharo

जैसी जनांदोलन पद्धतियों का प्रयोग किया।

यह महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे वारली संघर्ष को केवल ‘उग्र वाम आंदोलन’ के रूप में चित्रित करना गलत साबित होता है।

उसकी रणनीतियां परिस्थिति के अनुसार बदलती थीं।

# वन विभाग बनाम खड़ी फसल

11. संघर्ष का सबसे संवेदनशील प्रश्न

आंदोलन में सबसे तीखी स्थिति तब पैदा होती थी जब आदिवासी किसान वनभूमि पर फसल बो चुका हो और वन विभाग उसे नष्ट करने पहुंचे।

भूमि अवैध कब्जे में है।

किसान के लिए इसका अर्थ था—

पूरे परिवार का भोजन नष्ट कर दो।

यहीं प्रशासनिक कार्रवाई जीविका पर सीधा हमला लगती थी।

12. फसल नष्ट करने के प्रयास

Review of Agrarian Studies में दर्ज है कि सरकारी अधिकारियों ने कुछ स्थानों पर आदिवासियों के वन-प्लॉट और खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचाने या खेती रोकने की कार्रवाई की। किसान सभा और CPI(M) के कार्यकर्ताओं ने ऐसी कार्रवाइयों का विरोध किया और अधिकारियों को फसल नष्ट करने से रोकने का प्रयास किया।

यही संघर्ष 1971–74 की राजनीति का केंद्र था।

यह अमूर्त भूमि रिकॉर्ड का विवाद नहीं रहा।

13. फसल को बचाना इतना शक्तिशाली मुद्दा क्यों था?

क्योंकि एक आदिवासी परिवार के लिए फसल का अर्थ था—

कर्ज चुकाने की क्षमता,

और अगले कुछ महीनों का जीवन।

इसलिए फसल नष्ट करने के विरुद्ध प्रतिरोध पर तुरंत सामुदायिक समर्थन बन सकता था।

भूमि अधिकार की जटिल कानूनी भाषा यहां सरल हो गई—

जिस खेत में हमारी फसल खड़ी है, उसे मत उजाड़ो।

# 43,000 एकड़ का दावा

14. आंदोलन की बड़ी उपलब्धि

यह बहुत बड़ा आंकड़ा है।

इसलिए अधिक सुरक्षित कथन होगा—

अध्याय 26

आपातकाल और वारली आदिवासी — 1975–77 में वनभूमि से बेदखली, किसान सभा पर दमन और भूमिगत प्रतिरोध

1975–77 का आपातकाल वारली आंदोलन के इतिहास में एक अलग प्रकार का संकट लेकर आया। 1971–74 के वनभूमि संघर्ष ने हजारों आदिवासियों को संगठित किया था, पांच हजार से अधिक गिरफ्तारियां हुई थीं, वन-प्लॉटों के अधिकार और नियमितीकरण का प्रश्न महाराष्ट्र सरकार तक पहुंच चुका था और किसान सभा ने जंगल, मजदूरी और भूमि के मुद्दों पर मजबूत संगठन खड़ा कर लिया था। लेकिन 25 जून 1975 को राष्ट्रीय आपातकाल लागू होने के बाद राज्य की प्रशासनिक और पुलिस शक्ति असाधारण रूप से बढ़ गई। ठाणे के आदिवासी क्षेत्रों में इसका उपयोग वनभूमि पर कब्जा रखने वाले परिवारों को हटाने, किसान सभा के कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करने और संगठन को दबाने के लिए हुआ। Review of Agrarian Studies इसे “systematic and brutal oppression” का दौर बताता है और स्पष्ट करता है कि वन विभाग, पुलिस और आपातकालीन शक्तियों की आड़ में बड़े पैमाने पर बेदखली अभियान चलाए गए।

यह अध्याय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां वारली आंदोलन को पहली बार केवल भू-स्वामी या वन विभाग के सामान्य प्रशासन से नहीं, बल्कि नागरिक स्वतंत्रताओं के निलंबन वाले केंद्रीकृत आपातकालीन राज्य से जूझना पड़ा।

1. आपातकाल से ठीक पहले वारली आंदोलन कहां खड़ा था?

1974 तक वारली और अन्य आदिवासी समूहों ने वनभूमि अधिकार के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक बढ़त बनाई थी।

हजारों गिरफ्तारियां।

1972 में सरकारी नियमितीकरण प्रस्ताव।

1974 में वन-प्लॉट स्वामित्व के सामूहिक आवेदन।

और कई क्षेत्रों में भूमि वितरण की प्रक्रिया।

अर्थात आंदोलन पीछे नहीं हट रहा था।

वह प्रशासनिक ढांचे के भीतर वास्तविक अधिकार दर्ज कराने की ओर बढ़ रहा था।

यही कारण है कि आपातकाल का प्रभाव इतना गहरा पड़ा।

उसने एक ऐसे आंदोलन को रोका जो कानूनी मान्यता की दिशा में आगे बढ़ रहा था।

2. आपातकाल ने प्रशासन को क्या नई शक्ति दी?

राष्ट्रीय स्तर पर आपातकाल का अर्थ था—

नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक प्रतिबंध,

विरोधी राजनीतिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी,

सभा और प्रेस पर नियंत्रण,

और पुलिस तथा प्रशासन को अधिक कठोर कार्रवाई की गुंजाइश।

ठाणे के आदिवासी क्षेत्र में इसका स्थानीय अर्थ था—

किसान सभा की खुली राजनीतिक गतिविधि कठिन,

सार्वजनिक विरोध जोखिमपूर्ण,

और वन विभाग की बेदखली कार्रवाइयों के खिलाफ प्रतिरोध कमजोर करने की कोशिश।

Review of Agrarian Studies स्पष्ट करता है कि आपातकालीन नियमों और पुलिस समर्थन के सहारे वन विभाग ने सरकारी जमीन पर ‘अतिक्रमण’ माने गए आदिवासी कब्जों से large-scale and forcible evictions कीं।

# वनभूमि पर फिर हमला

3. जिस जमीन के लिए आंदोलन हुआ, उसी से बेदखली

यही आपातकाल का सबसे बड़ा विरोधाभास था।

1971–74 में हजारों लोगों ने गिरफ्तारी देकर कहा था—

इस जमीन पर हमारी खेती को मान्यता दो।

कुछ मामलों में सरकार नियमितीकरण की दिशा में बढ़ी भी थी।

लेकिन आपातकाल के दौरान वही वनभूमि फिर बेदखली का लक्ष्य बनी।

इसका अर्थ था कि पहले से अर्जित राजनीतिक उपलब्धियां भी सुरक्षित नहीं थीं।

4. वन विभाग की कार्रवाई

उपलब्ध शोध के अनुसार वन विभाग के अधिकारियों ने पुलिस की सहायता से ऐसे आदिवासी परिवारों को हटाया जिन्हें सरकारी भूमि का ‘अतिक्रमणकारी’ माना जाता था।

यहां फिर वही स्रोतगत सावधानी आवश्यक है—

सरकारी रिकॉर्ड में ‘encroachment’।

आदिवासी दृष्टि में वास्तविक खेती।

इसलिए आपातकालीन बेदखली को केवल “अवैध कब्जा हटाने” की प्रशासनिक कार्रवाई कह देना अधूरा होगा।

वह पहले से चल रहे भूमि-अधिकार संघर्ष का उलटा प्रहार भी था।

5. खड़ी फसल का प्रश्न फिर सामने आया

यदि परिवार वनभूमि पर खेती कर चुका है और प्रशासन उसे हटाता है, तो केवल जमीन नहीं जाती।

और अगले मौसम की आर्थिक सुरक्षा।

इसलिए वनभूमि बेदखली वारली परिवार के लिए सीधा खाद्य संकट पैदा कर सकती थी।

यही कारण था कि पहले भी खड़ी फसल बचाना आंदोलन की केंद्रीय रणनीति रहा था।

6. संगठन क्यों निशाने पर था?

सरकार के लिए व्यक्तिगत ‘अतिक्रमणकारी’ को हटाना अपेक्षाकृत आसान था।

समस्या तब पैदा होती थी जब पूरा गांव किसान सभा के साथ खड़ा हो जाए।

कानूनी दावा तैयार करती,

और प्रशासनिक कार्रवाई का सामूहिक प्रतिरोध करती थी।

इसलिए बेदखली प्रभावी करने के लिए संगठन को कमजोर करना आवश्यक था।

7. गिरफ्तारियां और भूमिगत होना

Review of Agrarian Studies के अनुसार आपातकाल के दौरान ठाणे में किसान सभा पर व्यापक दमन हुआ और उसके अनेक कार्यकर्ता या तो गिरफ्तार किए गए या भूमिगत चले गए।

यही आंदोलन के स्वरूप को बदलने वाला निर्णायक तथ्य था।

अब खुले गांव सम्मेलन और बड़ी सभाएं हमेशा संभव नहीं थीं।

संपर्क नेटवर्क को अधिक सावधानी से चलाना पड़ा।

8. क्या पूरा संगठन भूमिगत हो गया?

यह कहना अतिशयोक्ति होगी।

किसान सभा की सभी गतिविधियां गुप्त नहीं हो गई थीं।

कुछ कानूनी और मजदूरी संबंधी अभियानों पर वह काम जारी रखती रही।

लेकिन प्रमुख कार्यकर्ताओं और राजनीतिक संपर्क का एक हिस्सा भूमिगत या अर्ध-भूमिगत परिस्थितियों में चला गया।

इसलिए सही शब्दावली होगी—

दमन के बीच सीमित खुला काम + भूमिगत राजनीतिक संपर्क।

# गांव नेटवर्क की दूसरी बड़ी परीक्षा

9. 1945 की स्मृति फिर उपयोगी हुई

वारली आंदोलन इससे पहले भी दमन झेल चुका था।

तब स्थानीय पाड़ा नेटवर्क ने आंदोलन को टिकाया था।

1975–77 में वही ऐतिहासिक अनुभव फिर उपयोगी हुआ।

स्थानीय नेतृत्व इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि शीर्ष नेतृत्व की गिरफ्तारी पूरे संगठन को निष्क्रिय नहीं कर सकती थी।

10. मौखिक संपर्क

आपातकाल में लिखित सामग्री और खुली राजनीतिक गतिविधि अधिक जोखिमपूर्ण थी।

ऐसे में पुराने ग्रामीण संचार माध्यम—

विश्वसनीय कार्यकर्ता,

वारली आंदोलन की मौखिक संगठन परंपरा इस दौर में उसकी ताकत बनी।

11. महिलाओं की भूमिका

जब पुरुष कार्यकर्ता गिरफ्तार या भूमिगत हों, तो परिवार और संगठन के बीच संपर्क बनाए रखने में महिलाओं की भूमिका बढ़ सकती थी।

भोजन पहुंचा सकती थीं,

परिवार संभाल सकती थीं,

और आंदोलनकारी नेटवर्क को सामाजिक सुरक्षा दे सकती थीं।

हालांकि प्रत्येक भूमिगत नेटवर्क का विस्तृत अभिलेख उपलब्ध नहीं है, वारली आंदोलन की लंबी महिला भागीदारी को देखते हुए इस सामाजिक भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

# आपातकाल के बीच भी मजदूरी का संघर्ष

12. केवल बचाव नहीं, अधिकार लागू कराने का प्रयास

यह बहुत महत्वपूर्ण तथ्य है कि किसान सभा आपातकाल में केवल गिरफ्तारी से बचने तक सीमित नहीं हुई।

Review of Agrarian Studies बताता है कि उसने इसी दौर में Minimum Wage Act और बंधुआ श्रम Abolition Act जैसे कानूनों को लागू कराने के लिए काम जारी रखा।

अर्थात दमन के बीच भी संगठन आर्थिक अधिकारों पर सक्रिय रहा।

13. 1974 का न्यूनतम मजदूरी कानून

1975 में किसान सभा ने महाराष्ट्र सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम कृषि मजदूरी लागू कराने के लिए आंदोलन किया।

उपलब्ध अध्ययन के अनुसार उस समय व्यवहार में मजदूरी लगभग—

मौसम में 2 रुपये प्रतिदिन,

और ऑफ-सीजन में 1 रुपया प्रतिदिन

जबकि सरकारी न्यूनतम दर 3 रुपये प्रतिदिन निर्धारित की गई थी।

यह अंतर बहुत बड़ा था।

कानून और वास्तविक मजदूरी के बीच फिर वही दूरी दिखाई दी जो भूमि अधिकार में दिखी थी।

14. तलासरी, दहानू और वाडा में सफलता

Review of Agrarian Studies के अनुसार किसान सभा ने तलासरी, दहानू और वाडा तालुकों में इस बढ़ी हुई न्यूनतम मजदूरी को लागू कराने में सफलता हासिल की।

यह उपलब्धि विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

क्योंकि यह आपातकाल के दमनकारी वातावरण में हुई।

अर्थात संगठन पूरी तरह निष्क्रिय नहीं हुआ था।

15. 1945 से 1975 तक मजदूरी की लंबी रेखा

यहां वारली आंदोलन की निरंतरता अद्भुत रूप से दिखाई देती है।

घास काटने की मजदूरी।

कानूनी न्यूनतम मजदूरी का क्रियान्वयन।

तीस वर्षों में मुद्दा बदलता है—

अध्याय 27

1978–79 का वनभूमि नियमितीकरण संघर्ष — कट-ऑफ तारीख, बेदखल किसानों की वापसी और सरकार से नया टकराव

1975–77 के आपातकाल ने वारली और अन्य आदिवासी काश्तकारों के वनभूमि अधिकार पर गंभीर चोट की थी। अनेक परिवारों को उन भूखंडों से हटाया गया जिन्हें वे वर्षों से जोत रहे थे, किसान सभा के कार्यकर्ताओं पर दमन हुआ और संगठन का एक हिस्सा भूमिगत काम करने को मजबूर हुआ। मार्च 1977 में आपातकाल समाप्त होने के बाद दबा हुआ भूमि प्रश्न फिर तेजी से उभरा। अब संघर्ष का केंद्र केवल यह नहीं था कि वनभूमि नियमित की जाए, बल्कि यह भी था कि किस तारीख को कब्जे का प्रमाण माना जाए और आपातकाल में बेदखल किए गए पुराने काश्तकारों के साथ क्या किया जाए।

इसी संदर्भ में महाराष्ट्र सरकार ने 27 दिसंबर 1978 को एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया। महाराष्ट्र वन प्रशासन से जुड़े आधिकारिक संकलनों के अनुसार इस आदेश में 31 मार्च 1978 को विद्यमान वनभूमि कब्जों को निर्धारित शर्तों के अधीन नियमित करने का निर्णय था। पात्रता में पिछड़े वर्ग से होना, आय की सीमा, कब्जे वाले क्षेत्र से निकट निवास और भूमिहीन अथवा सीमित भूमि-स्वामित्व जैसी शर्तें शामिल थीं।

पहली दृष्टि में यह आदिवासी आंदोलन की बड़ी सफलता लगती है। लेकिन यहीं एक गंभीर समस्या पैदा हुई—जिन लोगों को आपातकाल के दौरान सरकारी कार्रवाई से पहले ही जमीन से बेदखल कर दिया गया था, वे 31 मार्च 1978 को भौतिक कब्जे में कैसे दिखाई देते?

यही 1978–79 के संघर्ष का केंद्र बन गया।

1. आपातकाल खत्म, लेकिन उसका भूमि प्रभाव कायम

1977 में लोकतांत्रिक राजनीति वापस आ गई, लेकिन वनभूमि पर आपातकाल के दौरान हुई बेदखलियों को स्वतः निरस्त नहीं किया गया।

कई आदिवासी परिवारों के लिए स्थिति यह थी—

वे वर्षों से जमीन जोतते थे,

फिर वन विभाग या पुलिस ने उन्हें हटाया,

और अब सरकार नए नियमितीकरण नियम बना रही थी।

यदि पात्रता केवल किसी विशेष तारीख को भौतिक कब्जे पर आधारित हो, तो सबसे अधिक नुकसान उसी व्यक्ति को होता जो सरकारी दमन का शिकार हुआ था।

यही किसान संगठनों ने अन्यायपूर्ण माना। Review of Agrarian Studies स्पष्ट रूप से बताता है कि 1978 का आदेश ऐसे अनेक लोगों को बाहर छोड़ देता था जिन्हें आपातकाल से पहले या उसके दौरान बेदखल किया जा चुका था।

2. 31 मार्च 1978 क्यों चुनी गई?

सरकार को किसी न किसी प्रशासनिक तारीख की आवश्यकता थी।

किस कब्जे को पुराना और नियमितीकरण योग्य माना जाए,

और किसे नया ‘अतिक्रमण’ माना जाए?

इसीलिए 31 मार्च 1978 को एक कट-ऑफ तारीख की तरह इस्तेमाल किया गया।

लेकिन भूमि संघर्ष में कोई तारीख तटस्थ नहीं होती।

कौन मालिक बन सकता है,

कौन ‘अतिक्रमणकारी’ रहेगा,

और किसे बेदखल किया जाएगा।

3. 27 दिसंबर 1978 का सरकारी आदेश

महाराष्ट्र वन मैनुअल में दर्ज सरकारी आदेश के अनुसार 31 मार्च 1978 को मौजूद forest-land encroachments को कुछ शर्तों के अधीन नियमित किया जाना था।

मुख्य पात्रता शर्तें थीं—

कब्जाधारी पिछड़े वर्ग से हो,

उसकी वार्षिक आय 3,600 रुपये से अधिक न हो,

वह कब्जे वाले क्षेत्र से लगभग आठ किलोमीटर के भीतर रहता हो,

और वह भूमिहीन हो अथवा उसकी कुल भूमि लगभग दो हेक्टेयर से अधिक न हो।

यह नीति स्पष्ट रूप से गरीब और सामाजिक रूप से कमजोर काश्तकारों को लक्षित करती थी।

अर्थात सरकार पहली बार सभी कब्जों को एक ही श्रेणी में नहीं रख रही थी।

4. यह नीति सामाजिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण क्यों थी?

क्योंकि इसमें यह स्वीकार किया गया कि forest encroachment का हर मामला व्यावसायिक जमीन कब्जाने वाला अपराध नहीं है।

और आजीविका के लिए खेती करने वाले

इसलिए नियमितीकरण को सामाजिक नीति के साधन के रूप में देखा गया।

यह 1950–70 के दशकों के आदिवासी आंदोलन का स्पष्ट प्रभाव था।

# लेकिन आदेश में विस्फोटक समस्या छिपी थी

5. ‘Subsisting encroachment’ का अर्थ

1978 के आदेश की शुरुआती व्याख्या में जोर उस कब्जे पर था जो 31 मार्च 1978 को वास्तव में विद्यमान था। महाराष्ट्र वन प्रशासन के संकलित आदेश में यही भाषा दिखाई देती है।

यानी यदि किसान उस तारीख को जमीन पर था—

लेकिन यदि सरकार ने 1976 में उसे हटा दिया था?

6. राज्य की कार्रवाई से अधिकार खोने का विरोधाभास

एक वारली परिवार 1965 से जमीन जोत रहा है।

1976 में आपातकाल के दौरान बेदखल हुआ।

1978 में सरकार कहती है—

31 मार्च 1978 को जिसका कब्जा था, उसे नियमित करेंगे।

तो जो परिवार तेरह वर्ष से काश्त कर रहा था, वह बाहर।

और जो अपेक्षाकृत हाल में आया लेकिन मार्च 1978 तक जमीन पर बना रहा, वह पात्र हो सकता था।

किसान संगठनों ने इसी को अन्याय बताया।

# किसान सभा और संयुक्त किसान मोर्चा

7. केवल किसान सभा का आंदोलन नहीं

1978 के नियमितीकरण आदेश के खिलाफ विरोध व्यापक हुआ।

Review of Agrarian Studies के अनुसार किसान सभा सहित कई किसान संगठनों ने संयुक्त मोर्चा बनाया और आदेश की शर्तों में बदलाव की मांग की।

भूमि प्रश्न अब एक संगठन की राजनीतिक मांग से आगे जाकर व्यापक किसान-अदिवासी मुद्दा बन चुका था।

8. प्रमुख मांग क्या थी?

आंदोलनकारी संगठनों की मांग थी—

31 मार्च 1978 तक के वास्तविक पुराने कब्जों को व्यापक रूप से नियमित किया जाए,

बेदखल लोगों को केवल इसलिए बाहर न किया जाए कि उस दिन उनका भौतिक कब्जा नहीं था,

और बंजर वनभूमि की खेती के लिए ऋण जैसी सहायता भी दी जाए। Review of Agrarian Studies इस मांग के साथ अनिश्चितकालीन सत्याग्रह की चेतावनी का भी उल्लेख करता है।

यह केवल जमीन के कागज का सवाल नहीं था।

जमीन दो और उसे जोतने की क्षमता भी दो।

# क्रेडिट सुविधा क्यों जरूरी थी?

9. केवल पट्टा मिलने से खेती नहीं चलती

गरीब आदिवासी को जमीन मिल जाए, लेकिन—

तो स्वामित्व का वास्तविक लाभ सीमित रहेगा।

इसलिए संयुक्त किसान मांग में barren forest lands की खेती के लिए credit facilities को भी शामिल किया गया।

यह आंदोलन की परिपक्वता दिखाता है।

अब प्रश्न केवल भूमि वितरण का नहीं, उत्पादक भूमि-अधिकार का था।

# 1979 : सरकार फिर पीछे हटती है

10. भारी लामबंदी का प्रभाव

1978 के आदेश के खिलाफ व्यापक आदिवासी लामबंदी हुई।

इसके दबाव में 1979 में सरकार को पात्रता व्यवस्था संशोधित करनी पड़ी।

यहां एक महत्वपूर्ण स्रोतगत सुधार जरूरी है।

Review of Agrarian Studies इस परिवर्तन को इस प्रकार वर्णित करता है कि 31 मार्च 1978 की तारीख को पीछे खिसकाकर 1 अप्रैल 1972 किया गया।

महाराष्ट्र वन प्रशासन के आदेश-संकलन से अधिक तकनीकी तस्वीर मिलती है। 12 सितंबर 1979 के आदेश ने पात्रता का विस्तार उन कब्जों तक किया जो 1 अप्रैल 1972 से 31 मार्च 1978 के बीच किसी समय मौजूद थे, भले वे 31 मार्च 1978 को मौजूद न रहे हों।

यह अंतर महत्वपूर्ण है।

11. 1979 का संशोधन वास्तव में क्या सुधारता था?

अब केवल यह नहीं पूछा जाना था—

क्या आप 31 मार्च 1978 को जमीन पर थे?

बल्कि यह भी देखा जा सकता था—

क्या आपका कब्जा 1 अप्रैल 1972 से 31 मार्च 1978 के बीच किसी समय मौजूद था?

इससे आपातकाल के दौरान बेदखल हुए अनेक परिवारों के लिए दावा करने की संभावना खुली।

यह आंदोलन की महत्वपूर्ण जीत थी।

12. लेकिन समस्या फिर भी समाप्त नहीं हुई

क्योंकि ऐसे किसान भी थे जो—

जैसे वर्षों में जमीन जोतते रहे हों, लेकिन 1972 तक पहले ही बेदखल कर दिए गए हों।

अध्याय 28

1980 के दशक में वन कानून और वारली अधिकार — वन (संरक्षण) अधिनियम, नई कानूनी बाधाएं और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचता भूमि संघर्ष

1978–79 तक वारली और ठाणे के अन्य आदिवासी किसानों का वनभूमि संघर्ष एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच चुका था। महाराष्ट्र सरकार पुराने वनभूमि कब्जों के नियमितीकरण के सिद्धांत को स्वीकार कर चुकी थी; किसान संगठन कट-ऑफ तारीख को पीछे ले जाने और आपातकाल में बेदखल काश्तकारों के अधिकार बहाल करने के लिए दबाव बना रहे थे। तभी 1980 में केंद्र ने ऐसा कानून लागू किया जिसने वनभूमि प्रशासन की पूरी संवैधानिक और प्रशासनिक संरचना बदल दी—वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980।

यह अधिनियम 25 अक्टूबर 1980 से प्रभावी माना गया। इसका केंद्रीय सिद्धांत था कि राज्य सरकार अपनी ओर से आरक्षित वन को गैर-आरक्षित करने अथवा वनभूमि को गैर-वन उपयोग में देने का निर्णय नहीं कर सकती; इसके लिए केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति आवश्यक होगी।

वारली किसानों के लिए इसका एक अनपेक्षित परिणाम हुआ।

जिस वन-प्लॉट का नियमितीकरण पहले मुख्यतः महाराष्ट्र सरकार, राजस्व विभाग और वन विभाग के बीच प्रशासनिक मामला था, अब उसमें केंद्रीय मंजूरी का नया कानूनी स्तर जुड़ गया।

इसलिए 1980 का दशक वारली आंदोलन में एक विरोधाभासी काल है—

एक तरफ वन संरक्षण मजबूत हुआ;

दूसरी तरफ दशकों से लंबित आदिवासी भूमि-अधिकार को वैधानिक रूप देने की प्रक्रिया और कठिन हो गई।

1. वन (संरक्षण) अधिनियम क्यों लाया गया?

1970 के दशक तक भारत में वनभूमि का बड़े पैमाने पर अन्य उपयोगों में परिवर्तन चिंता का विषय बन चुका था।

राज्य सरकारें वनभूमि को—

और अन्य परियोजनाओं के लिए परिवर्तित कर सकती थीं।

केंद्र सरकार ने इस प्रक्रिया पर राष्ट्रीय स्तर का नियंत्रण आवश्यक माना।

इसी पृष्ठभूमि में 1980 का वन संरक्षण कानून आया।

इसका घोषित उद्देश्य था—

वनों का संरक्षण और उनसे संबंधित मामलों का विनियमन।

# धारा 2 : निर्णायक परिवर्तन

2. राज्य सरकार की शक्ति क्यों सीमित हुई?

इस कानून की सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था धारा 2 थी।

उसके अनुसार राज्य सरकार अथवा अन्य प्राधिकरण केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति के बिना ऐसा आदेश नहीं दे सकता था जिससे—

आरक्षित वन का आरक्षण समाप्त हो,

या वनभूमि गैर-वन प्रयोजन में इस्तेमाल की जाए।

यहीं वारली भूमि संघर्ष के लिए समस्या पैदा हुई।

3. वन-प्लॉट को किसान के नाम करना किस श्रेणी में आएगा?

यदि forest land को स्थायी कृषि उपयोग के लिए किसी व्यक्ति को दिया जाए, तो वन कानून की दृष्टि में वह केवल भूमि रिकॉर्ड सुधार नहीं रह जाता।

उसमें forest land का non-forest purpose के लिए उपयोग शामिल हो सकता था।

इसलिए 1980 के बाद राज्य सरकार के पुराने नियमितीकरण आदेशों को लागू करना पहले जितना सरल नहीं रहा।

# 1978–79 और 1980 के बीच टकराव

4. वारली किसान की समस्या

किसान 1968 से जमीन जोत रहा है।

1978 में महाराष्ट्र सरकार regularisation policy बनाती है।

1979 में पात्रता का विस्तार होता है।

लेकिन उसका व्यक्तिगत मामला अभी प्रशासन में लंबित है।

और अक्टूबर 1980 में नया केंद्रीय कानून लागू हो जाता है।

क्या महाराष्ट्र सरकार पुराने आदेश के आधार पर सीधे जमीन उसके नाम कर सकती है?

या केंद्र की अनुमति चाहिए?

यहीं से लंबित वनभूमि मामलों की कानूनी जटिलता बढ़ी।

5. आंदोलन का आरोप

आदिवासी संगठनों का मूल तर्क था—

हमने 1980 के बाद जंगल पर नया कब्जा नहीं किया।

हमारे दावे पुराने हैं।

कई कब्जे तो 1960 और 1970 के दशक से प्रमाणित हैं।

इसलिए उन्हें नए encroachment के समान न माना जाए।

यह अंतर आगे वनाधिकार राजनीति का अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत बना—

पुराना ऐतिहासिक कब्जा बनाम नया अतिक्रमण।

# संरक्षण बनाम ऐतिहासिक न्याय

6. कानून का उद्देश्य और उसका प्रभाव अलग हो सकते हैं

वन (संरक्षण) अधिनियम का प्राथमिक उद्देश्य आदिवासी अधिकारों को खत्म करना नहीं था।

उसका उद्देश्य वनभूमि के अनियंत्रित diversion को रोकना था।

लेकिन कानून का प्रभाव उन आदिवासी परिवारों पर भी पड़ा जिनकी दशकों पुरानी खेती को अभी औपचारिक मान्यता नहीं मिली थी।

इसलिए नीति का एक बड़ा विरोधाभास सामने आया—

वन बचाना आवश्यक था, लेकिन जंगल में ऐतिहासिक रूप से रहने वाले समुदायों के लंबित अधिकारों का क्या किया जाए?

7. वारली किसान और औद्योगिक परियोजना एक जैसे नहीं थे

आदिवासी आंदोलनों का महत्वपूर्ण तर्क यही था।

हजारों हेक्टेयर वनभूमि किसी बड़े औद्योगिक या विकास प्रकल्प के लिए मांगी जा सकती थी।

किसी आदिवासी परिवार का एक-दो एकड़ पुराना खेत भी तकनीकी रूप से forest diversion के प्रश्न में फंस सकता था।

दोनों को केवल “non-forest use” की एक श्रेणी में देखने से सामाजिक संदर्भ गायब हो जाता था।

# 1980 के दशक में संघर्ष का दूसरा चेहरा

8. केवल वनभूमि नहीं—आदिवासी की पुरानी निजी जमीन भी

1980 के दशक में किसान सभा ने एक और गंभीर प्रश्न उठाया—

आदिवासियों से गैर-आदिवासियों के हाथ गई जमीन वापस करो।

Review of Agrarian Studies के अनुसार इसी दशक से किसान सभा ने उन जमीनों की वापसी के लिए संघर्ष तेज किया जो विभिन्न तरीकों से आदिवासियों से भू-स्वामियों के हाथ चली गई थीं।

यह वारली आंदोलन के इतिहास का महत्वपूर्ण विस्तार था।

9. जमीन कैसे गई थी?

उपलब्ध अध्ययन कई तरीके बताते हैं।

गलत नाप-जोख

भूमि मापने में हेरफेर या गलत रिकॉर्ड।

कर्ज

ऋण के कारण जमीन पर दूसरे व्यक्ति का नियंत्रण।

जाली दस्तावेज

अदालती अथवा अन्य दस्तावेजों पर कथित रूप से जाली हस्ताक्षर।

ग्रामीण शक्ति-संबंध

गरीब आदिवासी का प्रभावशाली भू-स्वामी के सामने अपने अधिकार की रक्षा न कर पाना।

किसान सभा ने ऐसे मामलों में दस्तावेजों के पुनर्मूल्यांकन और जमीन वास्तविक आदिवासी मालिक को लौटाने की मांग की।

# एडवर्ड वार्था और भूमि वापसी संघर्ष

10. 1980 के बाद स्थानीय कार्रवाई

Review of Agrarian Studies में किसान सभा से जनवरी 1980 में जुड़े कार्यकर्ता Edward Vartha की मौखिक गवाही दर्ज है।

उनके अनुसार कुछ भू-स्वामियों ने आंदोलन के दबाव में आदिवासियों की जमीन स्वेच्छा से वापस कर दी।

लेकिन कुछ स्थानों पर किसान सभा के कार्यकर्ताओं ने आदिवासियों को जमीन पर प्रत्यक्ष पुनः कब्जा दिलाया।

यह 1945 के आंदोलन की रणनीति की याद दिलाता है—

कानूनी मांग के साथ प्रत्यक्ष सामूहिक कार्रवाई।

11. अब संघर्ष तीन प्रकार की जमीन पर था

1980 के दशक तक वारली भूमि राजनीति को तीन हिस्सों में समझना चाहिए।

पहला — वनभूमि जिस पर पुरानी आदिवासी खेती को नियमित कराना था।

दूसरा — सरकारी परती भूमि जिसे भूमिहीनों को देने की मांग थी।

तीसरा — आदिवासी की पुरानी निजी भूमि जो गैर-आदिवासियों के कब्जे में चली गई थी और जिसे वापस लेने का संघर्ष था।

इसलिए केवल “forest rights movement” कहना अब पर्याप्त नहीं है।

यह व्यापक आदिवासी भूमि-पुनर्प्राप्ति आंदोलन बन चुका था।

# 1980 के दशक का भूमि-कब्जा आंदोलन

12. सरकार की खाली जमीन पर फिर दावा

किसान सभा ने 1980 के दशक में ठाणे के विभिन्न क्षेत्रों में भूमिहीन आदिवासियों से कहा कि वे खाली पड़ी—

भूमियों पर खेती का दावा करें।

Review of Agrarian Studies के अनुसार मध्य 1980 के दशक में ठाणे के कुछ हिस्सों में fallow land पर कब्जे का अभियान चलाया गया।

13. कानून कठोर हुआ, लेकिन कब्जे बंद नहीं हुए

यही 1980 के दशक का बड़ा विरोधाभास है।

1980 का केंद्रीय कानून forest diversion कठिन बना चुका था।

फिर भी भूमिहीनता समाप्त नहीं हुई।

इसलिए वनभूमि पर नई खेती और कब्जे भी जारी रहे। Review of Agrarian Studies स्पष्ट रूप से कहता है कि ‘encroachments’ 1980 के दशक में भी जारी रहे।

कानून भूमि-वंचना के सामाजिक कारण को समाप्त नहीं कर पाया।

# 1987–88 : भूमि-कब्जा आंदोलन

14. संघर्ष फिर बड़े पैमाने पर

1987–88 में किसान सभा ने ठाणे जिले में नया land-grab movement शुरू किया।

अध्याय 29

1990 के दशक में वारली भूमि संघर्ष और न्यायपालिका — तानसा बेदखली, पुनर्वास, गोदावर्मन मामला और वन की नई कानूनी परिभाषा

1990 का दशक वारली और ठाणे के अन्य आदिवासी भूमि आंदोलनों के इतिहास में एक निर्णायक संक्रमण का दशक था। 1980 के दशक तक संघर्ष का मुख्य केंद्र था—वनभूमि पर पुराना कब्जा, सरकारी नियमितीकरण, भूमि-वापसी और भूमिहीनों को खाली जमीन दिलाना। 1990 के दशक में दो नए तत्व निर्णायक रूप से जुड़े।

पहला—तानसा क्षेत्र में बेदखल आदिवासियों का पुनर्वास और भूमि की वापसी।

दूसरा—भारतीय सर्वोच्च न्यायालय का ऐसा हस्तक्षेप जिसने “वन” की कानूनी परिभाषा को पूरे देश के लिए व्यापक बना दिया और वनभूमि के उपयोग पर न्यायिक निगरानी को अभूतपूर्व स्तर तक पहुंचा दिया।

यह परिवर्तन T. N. Godavarman Thirumulpad v. Union of India मामले में सर्वोच्च न्यायालय के 12 दिसंबर 1996 के आदेश से जुड़ा था। न्यायालय ने कहा कि वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 में प्रयुक्त “forest” शब्द को केवल अधिसूचित reserved या protected forests तक सीमित नहीं किया जा सकता; उसे उसके dictionary meaning के अनुसार समझा जाएगा। साथ ही सरकारी रिकॉर्ड में forest के रूप में दर्ज भूमि—स्वामित्व चाहे किसी का भी हो—वन (संरक्षण) अधिनियम के दायरे में आएगी।

वारली आंदोलन के लिए इसका गहरा अर्थ था। दशकों पुरानी एक समस्या अब और जटिल हो गई—

जिस जमीन को आदिवासी पीढ़ियों से खेत मानता था, यदि सरकारी रिकॉर्ड उसे “forest” कहता है, तो कानून की दृष्टि में उसका उपयोग बदलने के लिए केंद्रीय वन-कानून लागू होगा।

इस प्रकार 1990 के दशक में वारली भूमि संघर्ष केवल किसान बनाम प्रशासन नहीं रहा। अब उसमें सुप्रीम कोर्ट, पर्यावरण कानून और वन की न्यायिक परिभाषा भी निर्णायक पक्ष बन गए।

1. 1990 के दशक की शुरुआत : पुरानी जमीन की नई लड़ाई

1987–88 के भूमि-कब्जा आंदोलनों में किसान सभा ने ठाणे जिले के विभिन्न क्षेत्रों में खाली सरकारी, वन और अन्य भूमि पर भूमिहीनों को संगठित किया था। तानसा झील क्षेत्र के आसपास भी आदिवासी भूमि संघर्ष महत्वपूर्ण हुआ।

Review of Agrarian Studies के अनुसार 1987–88 के land-grab programme में तानसा क्षेत्र के आसपास 3,000 एकड़ से अधिक भूमि पर नियंत्रण स्थापित कर उसे भूमिहीन किसानों के बीच पुनर्वितरित करने का दावा किसान सभा के इतिहास में दर्ज है।

लेकिन भूमि पर नियंत्रण कायम रखना जमीन पर कब्जा करने जितना सरल नहीं था।

सरकारी भूमि रिकॉर्ड,

सभी इस क्षेत्र में मौजूद थे।

इसीलिए तानसा आगे फिर संघर्ष का केंद्र बना।

# तानसा : केवल जंगल नहीं, मुंबई का जल-संसाधन भी

2. तानसा क्षेत्र क्यों विशेष था?

तानसा झील मुंबई महानगर की जलापूर्ति से जुड़ा महत्वपूर्ण जलाशय क्षेत्र है।

इसलिए उसके आसपास की जमीन का प्रश्न सामान्य ग्रामीण वनभूमि विवाद से अधिक जटिल था।

यहां तीन हित एक साथ थे—

वन संरक्षण, शहरी जल सुरक्षा, और आदिवासी आजीविका।

वारली तथा अन्य स्थानीय आदिवासी परिवारों के लिए जमीन खेत और जीवन का आधार थी।

प्रशासन के लिए वही क्षेत्र वन और जलग्रहण का हिस्सा हो सकता था।

इसी टकराव ने तानसा भूमि विवाद को विशेष संवेदनशील बनाया।

3. बेदखली का प्रश्न

1980 के दशक के भूमि-कब्जा अभियानों के बाद तानसा क्षेत्र के कुछ आदिवासी परिवारों को जमीन से हटाया गया।

Review of Agrarian Studies के अनुसार 1991–92 में किसान सभा ने तानसा क्षेत्र से बेदखल आदिवासियों के पुनर्वास के लिए विशेष कार्यक्रम चलाया।

यह तथ्य महत्वपूर्ण है।

अब संघर्ष का उद्देश्य केवल नई जमीन हासिल करना नहीं था।

जिसे जमीन से निकाला गया, उसे वापस बसाओ।

# पुनर्वास और भूमि-अधिकार में अंतर

4. पुनर्वास का अर्थ केवल मकान नहीं

किसी आदिवासी किसान को दूसरे स्थान पर घर दे देना पूर्ण पुनर्वास नहीं हो सकता।

यदि उसकी आजीविका खेती से थी, तो उसे चाहिए—

इसलिए तानसा पुनर्वास आंदोलन में भूमि का प्रश्न केंद्रीय रहा।

वारली भूमि संघर्ष का पुराना सिद्धांत फिर सामने आया—

जीविका से काटकर पुनर्वास अधूरा है।

5. बेदखली के बाद वापसी क्यों कठिन थी?

एक बार वन विभाग या अन्य सरकारी संस्था जमीन खाली करा दे तो पुराना किसान कई स्तरों पर कमजोर हो जाता है।

राजस्व रिकॉर्ड में नाम संभवतः नहीं।

फिर उसे सिद्ध करना पड़ता है कि—

वह पहले जमीन जोतता था।

यानी 1978–79 की पुरानी समस्या फिर लौटती है—

# 1990 के दशक में भूमि संघर्ष का विस्तार

6. केवल तानसा नहीं

Review of Agrarian Studies के अनुसार 1980 के उत्तरार्ध और 1990 के दशक में किसान सभा ने ठाणे जिले में अलग-अलग प्रकार की भूमि पर अधिकार के संघर्ष चलाए।

और trust/inami अर्थात राजस्व-मुक्त भूमि।

अध्ययन में इस अवधि के संघर्षों के परिणामस्वरूप लगभग—

1,000 एकड़ निजी भूमि, 4,000 एकड़ सरकारी परती भूमि, और 3,500 एकड़ trust/inami भूमि

पर आदिवासी नियंत्रण स्थापित कराने का दावा दर्ज है।

इन संख्याओं को सरकारी अंतिम भूमि-रजिस्टर नहीं समझना चाहिए; ये आंदोलन के इतिहास में दर्ज अनुमान हैं।

7. यह वनभूमि आंदोलन से अलग क्यों था?

क्योंकि अब समस्या केवल जंगल की नहीं थी।

आदिवासी भूमिहीनता कई स्रोतों से पैदा हुई थी।

कहीं पुरानी निजी जमीन चली गई।

कहीं सरकारी जमीन खाली थी।

कहीं किसी ट्रस्ट या इनामी व्यवस्था के पास बड़ी भूमि थी।

इसलिए संगठन ने एक व्यापक सिद्धांत अपनाया—

भूमि किसके पास निष्क्रिय पड़ी है और भूमि से वंचित कौन है?

# 1990 के दशक का सबसे बड़ा परिवर्तन : न्यायपालिका

8. Forest Conservation Act के पंद्रह वर्ष बाद

1980 का वन (संरक्षण) अधिनियम पहले ही कह चुका था कि forest land का non-forest use केंद्र की पूर्व अनुमति के बिना नहीं हो सकता।

लेकिन व्यवहार में एक गंभीर प्रश्न बचा था—

Forest land आखिर कौन-सी भूमि है?

यदि कोई जमीन औपचारिक reserved forest घोषित नहीं की गई, तो क्या Forest Conservation Act लागू होगा?

राज्य सरकारों की अलग-अलग व्याख्याओं के कारण यह प्रश्न राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण बन गया।

# टी. एन. गोदावर्मन मामला

9. मामला कहां से शुरू हुआ?

T. N. Godavarman Thirumulpad द्वारा दायर याचिका मूलतः वन संरक्षण से जुड़ी थी और सर्वोच्च न्यायालय में Writ Petition (Civil) No. 202 of 1995 के रूप में आई।

लेकिन मामला जल्दी ही अपने मूल स्थानीय विवाद से आगे निकल गया।

न्यायालय ने केंद्र और सभी राज्य सरकारों को सुनना शुरू किया क्योंकि प्रश्न पूरे भारत के वन प्रशासन से संबंधित था। 12 दिसंबर 1996 के आदेश में सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं कहा कि मामला राष्ट्रीय वन नीति और देश भर के जंगलों के संरक्षण से जुड़ी व्यापक महत्ता रखता है।

यहीं से Godavarman litigation भारतीय पर्यावरण न्यायशास्त्र की सबसे महत्वपूर्ण सतत न्यायिक प्रक्रियाओं में से एक बन गई।

# 12 दिसंबर 1996 : ऐतिहासिक आदेश

10. सर्वोच्च न्यायालय ने “forest” का अर्थ बदल दिया?

तकनीकी रूप से न्यायालय ने नया वन कानून नहीं बनाया।

उसने वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 की व्यापक व्याख्या की।

“forest” शब्द को dictionary meaning के अनुसार समझा जाना चाहिए।

इसमें सभी वैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त वन शामिल होंगे—

या अन्य किसी नाम से वर्गीकृत।

लेकिन न्यायालय यहीं नहीं रुका।

11. “Forest land” की और व्यापक परिभाषा

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि Forest Conservation Act की धारा 2 में “forest land” केवल वैधानिक forest तक सीमित नहीं है।

इसमें वह हर क्षेत्र भी शामिल होगा जो सरकारी रिकॉर्ड में forest के रूप में दर्ज है, चाहे उस भूमि का स्वामित्व किसी का भी हो।

यह भारतीय भूमि कानून में अत्यंत प्रभावशाली परिवर्तन था।

12. खेत दिखाई देता है, रिकॉर्ड forest कहता है

यही सबसे बड़ी समस्या थी।

14. गैर-वन गतिविधियां रोकने का निर्देश

plywood/veneer उद्योग,

अध्याय 30

वन अधिकार कानून 2006 और वारली समाज — ‘ऐतिहासिक अन्याय’ की कानूनी स्वीकृति, व्यक्तिगत व सामुदायिक वन अधिकार और पुराने भूमि संघर्ष का नया चरण

वारली आंदोलन के लगभग छह दशक लंबे इतिहास में वन अधिकार अधिनियम, 2006 एक असाधारण मोड़ था। 1945 में संघर्ष वेठ-बेगार के खिलाफ था; 1950 और 1960 के दशकों में जमीन और किरायेदारी के अधिकार पर; 1970 और 1980 के दशकों में वनभूमि के नियमितीकरण, बेदखली और पुनर्वास पर; 1990 के दशक में वन संरक्षण कानून और न्यायिक नियंत्रण ने संघर्ष को और जटिल बना दिया। अंततः 2006 में भारतीय संसद ने एक ऐसा कानून बनाया जिसने पहली बार औपचारिक रूप से स्वीकार किया कि अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वनवासियों के वन-अधिकारों को लंबे समय तक दर्ज न किए जाने से ऐतिहासिक अन्याय हुआ था।

कानून का पूरा नाम है—Scheduled Tribes and Other Traditional Forest Dwellers (Recognition of Forest Rights) Act, 2006। इसे सामान्यतः वन अधिकार अधिनियम या FRA कहा जाता है। इसका उद्देश्य केवल पुराने ‘अतिक्रमणों’ को वैध करना नहीं था; इसने व्यक्तिगत खेती, निवास, लघु वन उपज, चराई, सामुदायिक उपयोग, विवादित भूमि, पुराने वन गांवों और सामुदायिक वन संसाधनों पर अधिकारों की एक विस्तृत वैधानिक संरचना बनाई।

वारली समाज के संदर्भ में इसका महत्व और भी गहरा था, क्योंकि जिन मुद्दों को यह कानून अधिकार के रूप में स्वीकार कर रहा था, उन पर वारली किसान दशकों से संघर्ष कर रहे थे।

1. ‘ऐतिहासिक अन्याय’ का अर्थ

FRA की सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक उपलब्धि यह थी कि उसने वनवासी समुदायों की समस्या को केवल अवैध कब्जे की समस्या के रूप में देखने से इनकार किया।

इस कानून की पृष्ठभूमि में स्वीकार किया गया कि औपनिवेशिक वन व्यवस्था और स्वतंत्रता के बाद उसके लंबे प्रशासनिक निरंतरता काल में अनेक वन-निवासी समुदायों के परंपरागत अधिकार ठीक से दर्ज नहीं किए गए।

यही वारली इतिहास का भी केंद्रीय अनुभव था।

जंगल से जीविका लेते हैं।

यहां हमारे पुरखे रहते थे।

लेकिन सरकारी रिकॉर्ड कहता था—

Unauthorized occupation.

FRA ने पहली बार इस अंतर को राष्ट्रीय कानून की भाषा में स्वीकार किया।

2. ‘Regularisation’ और ‘Recognition of Rights’ में अंतर

यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है।

1970 और 1980 के दशकों में राज्य सरकार का दृष्टिकोण अक्सर था—

कुछ पुराने कब्जे नियमित कर दो।

इसका अर्थ था कि कब्जा मूलतः अवैध था, लेकिन सरकार नीति के आधार पर उसे वैध कर रही है।

FRA ने दृष्टिकोण बदला।

क्या यह व्यक्ति या समुदाय पहले से मौजूद वन-अधिकार का धारक है?

Regularisation = सरकार का प्रशासनिक अनुग्रह।

Recognition = पहले से मौजूद अधिकार की वैधानिक पहचान।

वारली आंदोलन की दृष्टि से यह बहुत बड़ा वैचारिक परिवर्तन था।

3. कानून किन लोगों पर लागू हुआ?

FRA दो प्रमुख श्रेणियों को अधिकार देता है—

Forest Dwelling Scheduled Tribes, यानी वन-निवासी अनुसूचित जनजातियां,

Other Traditional Forest Dwellers, यानी अन्य परंपरागत वन निवासी।

अन्य परंपरागत वन निवासियों के लिए कानून में 13 दिसंबर 2005 से पहले कम-से-कम तीन पीढ़ियों—एक पीढ़ी को 25 वर्ष मानते हुए—वन में निवास और आजीविका निर्भरता की शर्त है।

वारली समुदाय अनुसूचित जनजाति होने के कारण उसके पात्र दावेदारों के लिए तीन पीढ़ियों वाली यही विशिष्ट शर्त लागू नहीं होती; लेकिन उन्हें अन्य वैधानिक पात्रता और संबंधित वनभूमि पर 13 दिसंबर 2005 से पहले के अधिकार/कब्जे को सिद्ध करना होता है।

4. 13 दिसंबर 2005 की तारीख क्यों महत्वपूर्ण है?

FRA में व्यक्तिगत वनभूमि संबंधी अधिकार उन मामलों तक सीमित हैं जहां संबंधित अनुसूचित जनजाति या परंपरागत वन निवासी 13 दिसंबर 2005 से पहले वनभूमि पर कब्जे/निवास की पात्र स्थिति में था। कानून की धारा 4 इस तारीख को स्पष्ट रूप से निर्धारित करती है।

यह एक नई राष्ट्रीय निर्धारित अंतिम तिथि थी।

वारली आंदोलन में cut-off तारीख का प्रश्न नया नहीं था।

यह दिखाता है कि भूमि-अधिकार और समय का संबंध वारली राजनीति में लगातार केंद्रीय रहा।

5. व्यक्तिगत वन अधिकार

FRA की धारा 3(1)(a) वन-निवासी अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों को उस वनभूमि पर रहने और आजीविका के लिए स्वयं खेती करने का अधिकार मान्यता देती है जिस पर उनका व्यक्तिगत या सामूहिक कब्जा है।

वारली परिवार के लिए यह वही प्रश्न था जिस पर दशकों तक संघर्ष हुआ—

जिस जमीन को मैं जोत रहा हूं, क्या उसे मेरे नाम मान्यता मिलेगी?

अब इस प्रश्न का उत्तर केवल राज्य सरकार की discretionary regularisation policy पर निर्भर नहीं था।

एक केंद्रीय संसदीय कानून उसके पीछे खड़ा था।

6. लेकिन जमीन की सीमा थी

कानून के तहत व्यक्तिगत खेती के लिए मान्यता केवल वास्तविक कब्जे वाले क्षेत्र तक सीमित है और अधिकतम सीमा चार हेक्टेयर है।

FRA भूमिहीन व्यक्ति को नई चार हेक्टेयर जमीन बांटने का सामान्य भूमि-वितरण कानून नहीं है।

यदि वास्तविक कब्जा एक हेक्टेयर है—

दावा एक हेक्टेयर का।

चार हेक्टेयर केवल अधिकतम सीमा है।

यही अंतर सार्वजनिक चर्चा में अक्सर भ्रम पैदा करता है।

7. अधिकार हस्तांतरणीय नहीं

FRA के तहत मान्यता प्राप्त अधिकार—

लेकिन बेचे या हस्तांतरित नहीं किए जा सकते।

विवाहित व्यक्ति के मामले में अधिकार पति और पत्नी के संयुक्त नाम से दर्ज किए जाने की व्यवस्था भी है।

वारली महिलाओं की दृष्टि से यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण सुधार था।

1945 की महिला आंदोलनकारी जहां मजदूरी और वेठ के संघर्ष में भाग ले रही थी, 2006 का कानून भूमि-अधिकार के दस्तावेज में महिला की संयुक्त वैधानिक मौजूदगी सुनिश्चित करने की दिशा में आगे बढ़ा।

8. बेदखली पर महत्वपूर्ण सुरक्षा

FRA की धारा 4(5) का सबसे महत्वपूर्ण संरक्षण है—

जब तक अधिकारों की पहचान और सत्यापन प्रक्रिया पूरी न हो, पात्र वन-निवासी को उसकी कब्जे वाली वनभूमि से बेदखल या हटाया नहीं जाना चाहिए।

वारली इतिहास की दृष्टि से इस प्रावधान का असाधारण महत्व है।

1975–77 के आपातकाल में बेदखली।

1978–79 में कट-ऑफ विवाद।

1990 के दशक में पुनर्वास संघर्ष।

इन सभी अनुभवों के बाद अब कानून स्वयं कह रहा था—

पहले दावा तय करो, फिर बेदखली का प्रश्न।

यह पुराने संघर्षों से निकली सबसे महत्वपूर्ण वैधानिक सुरक्षा में से एक थी।

# सामुदायिक वन अधिकार

9. FRA केवल व्यक्तिगत खेत का कानून नहीं

FRA को केवल “forest patta law” समझना बड़ी भूल होगी।

धारा 3 में व्यक्तिगत अधिकारों से कहीं अधिक व्यापक community rights भी हैं।

पारंपरिक मौसमी संसाधन,

और सामुदायिक वन संसाधन की रक्षा तथा प्रबंधन।

वारली समाज के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण था क्योंकि उसका जंगल से संबंध केवल खेती तक सीमित नहीं था।

10. लघु वन उपज पर अधिकार

धारा 3(1)(c) के तहत समुदायों को परंपरागत रूप से एकत्र की जाने वाली minor forest produce पर—

के अधिकार मान्यता प्राप्त हो सकते हैं।

यह आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

जंगल से मिलने वाली वस्तुएं—

अन्य गैर-काष्ठ वन उत्पाद—

आदिवासी परिवार की नकद और खाद्य अर्थव्यवस्था का हिस्सा हो सकती हैं।

इसलिए FRA जंगल को केवल जमीन के रूप में नहीं, जीविका संसाधन के रूप में देखता है।

11. चराई और जल संसाधन

कानून चराई और जलाशयों से संबंधित परंपरागत सामुदायिक उपयोगों को भी अधिकारों की श्रेणी में रखता है।

यह वारली ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण था।

एक-दूसरे से जुड़े होते हैं।

इसलिए केवल खेत का पट्टा पूरे वन संबंध को नहीं समझ सकता।

# Community Forest Resource — सबसे परिवर्तनकारी अधिकार

12. ग्राम समुदाय केवल उपयोगकर्ता नहीं, प्रबंधक भी

यह भारतीय वन शासन में बड़ा परिवर्तन था।

13. वारली आंदोलन के लिए इसका अर्थ

दशकों तक वारली संघर्ष का प्रश्न था—

अध्याय 31

2006 के बाद वन अधिकार कानून का क्रियान्वयन — वारली दावे, अस्वीकृतियां, ग्राम सभा, सुप्रीम कोर्ट की बेदखली बहस और पालघर–ठाणे का नया संघर्ष

वन अधिकार अधिनियम, 2006 ने वारली और अन्य वन-निवासी समुदायों के लिए एक ऐतिहासिक कानूनी अवसर पैदा किया, लेकिन कानून बन जाना और अधिकार मिल जाना एक ही बात नहीं थी। 2008 से आगे का वास्तविक संघर्ष इस बात पर केंद्रित हो गया कि दावे कैसे दाखिल हों, ग्राम सभा उन्हें कैसे सत्यापित करे, कौन-सा प्रमाण स्वीकार हो, कितनी भूमि मान्य की जाए, खारिज दावों की समीक्षा कैसे हो और दावा तय होने से पहले किसी परिवार को बेदखल किया जा सकता है या नहीं।

वारली आंदोलन के लंबे इतिहास में यह नया चरण था। पहले प्रश्न था—“जमीन हमारी क्यों नहीं?” अब प्रश्न था—“कानून हमारे पक्ष में है तो उसका सही क्रियान्वयन क्यों नहीं हो रहा?”

1. FRA लागू होने के बाद सबसे पहला परिवर्तन

2006 का कानून 2008 में नियमों के लागू होने के साथ जमीनी दावा-प्रक्रिया में बदलना शुरू हुआ। उसके तहत अधिकार निर्धारण ऊपर से नीचे नहीं, बल्कि ग्राम सभा से शुरू होना था।

यही इसकी सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत विशेषताओं में से एक थी।

ग्राम सभा को यह देखना था—

कौन वास्तविक दावेदार है,

कौन-सी भूमि उसके वास्तविक कब्जे में है,

कौन-से सामुदायिक संसाधन परंपरागत उपयोग में हैं,

और कौन-से प्रमाण दावे को समर्थन देते हैं।

वारली जैसे समुदायों के लिए, जिनका भूमि इतिहास अक्सर सरकारी कागज से अधिक सामुदायिक स्मृति और वास्तविक उपयोग में सुरक्षित रहा था, यह व्यवस्था अत्यंत महत्वपूर्ण थी।

2. ग्राम सभा केवल औपचारिक संस्था नहीं

वन अधिकार अधिनियम में ग्राम सभा की भूमिका सामान्य पंचायत बैठक जैसी नहीं है।

वह अधिकार पहचान प्रक्रिया की पहली वैधानिक संस्था है।

दावेदार आवेदन देता है।

Forest Rights Committee जांच में मदद करती है।

स्थानीय साक्ष्य देखे जाते हैं।

भूमि का सत्यापन होता है।

और ग्राम सभा प्रस्ताव पारित करती है।

इसके बाद मामला Sub-Divisional Level Committee और फिर District Level Committee तक जाता है।

यानी आदिवासी अधिकार तय करने की प्रक्रिया में गांव को विधिक प्रवेश मिला।

यह 1945 की वारली पाड़ा राजनीति से 2006 की संवैधानिक ग्राम-सभा राजनीति तक की एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक निरंतरता है।

# व्यक्तिगत वन अधिकार के दावे

3. सबसे अधिक दावे व्यक्तिगत भूमि के

FRA लागू होने के शुरुआती वर्षों में सबसे अधिक ध्यान Individual Forest Rights—IFR—पर गया।

वारली परिवार के लिए इसका अर्थ था—

जिस वनभूमि पर वह 13 दिसंबर 2005 से पहले से वास्तविक खेती कर रहा है, उसका दावा प्रस्तुत करना।

लेकिन व्यावहारिक समस्या तुरंत सामने आई—

किसी परिवार का वास्तविक कब्जा तीन एकड़ हो सकता था, लेकिन पुराने वन रिकॉर्ड में उसकी स्पष्ट सीमा नहीं।

यहीं सर्वेक्षण और स्थल सत्यापन निर्णायक बनते हैं।

4. दावा स्वीकृत, लेकिन क्षेत्र कम

FRA क्रियान्वयन के देशव्यापी अनुभव में यह एक महत्वपूर्ण विवाद बना कि कई मामलों में दावा पूरी तरह अस्वीकृत नहीं हुआ, लेकिन दावेदार द्वारा बताई गई वास्तविक काश्त से कम भूमि मान्य हुई।

इसका कारण हो सकता था—

GPS/स्थल सर्वेक्षण का अंतर,

दस्तावेजी प्रमाण की सीमाएं,

या अधिकारियों की अलग व्याख्या।

वारली किसान के लिए यह नया प्रकार का संघर्ष था।

पट्टा मिलेगा या नहीं?

पट्टा मिला तो पूरी वास्तविक जमीन का मिला या नहीं?

5. FRA ने कागज की बाधा कम की, लेकिन व्यवहार में?

2012 के संशोधित नियमों ने यह स्पष्ट किया कि केवल सरकारी भूमि दस्तावेज ही प्रमाण नहीं हैं।

गांव के बुजुर्गों के बयान,

वन अपराध/जुर्माना रिकॉर्ड,

जैसे अनेक प्रकार के प्रमाण स्वीकार हो सकते हैं।

लेकिन कानून का यह उदार प्रमाण सिद्धांत प्रशासन में हर जगह समान रूप से लागू हुआ या नहीं—यही विवाद बना।

6. आदिवासी के पास कागज क्यों नहीं?

यही प्रश्न बार-बार पूछना आवश्यक है।

यदि औपनिवेशिक और बाद के वन प्रशासन ने समुदाय का अधिकार कभी दर्ज ही नहीं किया, तो उसी समुदाय से अब आधुनिक title deed मांगना ऐतिहासिक रूप से विरोधाभासी होगा।

FRA इसी अन्याय को सुधारने के लिए बना था।

इसलिए प्रमाण को केवल सरकारी रिकॉर्ड तक सीमित करना कानून की मूल भावना के विपरीत हो सकता है।

7. अस्वीकृति सबसे बड़ा विवाद कैसे बनी?

वन अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन में बड़ी संख्या में claims reject हुए।

हर अस्वीकृति गलत नहीं थी।

कुछ दावे पात्रता पूरी नहीं करते होंगे।

कुछ 13 दिसंबर 2005 के बाद के कब्जे हो सकते हैं।

कुछ दावेदार संबंधित श्रेणी में नहीं आते।

लेकिन समस्या यह थी कि अनेक राज्यों से ऐसी शिकायतें सामने आईं कि दावे—

पर्याप्त सुनवाई के बिना,

स्पष्ट कारण बताए बिना,

या उपलब्ध साक्ष्यों का पूरा मूल्यांकन किए बिना

यही प्रश्न अंततः सर्वोच्च न्यायालय के सामने अत्यंत गंभीर रूप में आया।

# 2019 : सुप्रीम कोर्ट की बेदखली बहस

8. Wildlife First मामला

वन अधिकार अधिनियम की संवैधानिकता और उसके क्रियान्वयन से जुड़े मामलों में Wildlife First v. Ministry of Forest and Environment सर्वोच्च न्यायालय के सामने आया।

13 फरवरी 2019 के आदेश में न्यायालय ने राज्यों से अस्वीकृत FRA दावों की स्थिति मांगी और ऐसे मामलों में, जहां rejection final हो चुका था, बेदखली सुनिश्चित करने की दिशा में निर्देश दिए। कई राज्यों के लिए अदालत ने Chief Secretaries से पूछा कि rejected claimants को हटाया क्यों नहीं गया।

इस आदेश का देश भर के आदिवासी क्षेत्रों में बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा।

क्योंकि प्रश्न लाखों परिवारों की संभावित बेदखली का बन गया।

9. खारिज दावा = अवैध कब्जा?

यदि दावा सभी कानूनी प्रक्रियाओं के बाद न्यायसंगत रूप से खारिज हो चुका है, तो राज्य कह सकता है कि व्यक्ति के पास FRA अधिकार नहीं है।

लेकिन यदि rejection स्वयं त्रुटिपूर्ण है?

यदि claimant को निर्णय बताया ही नहीं गया?

यदि अपील का अवसर नहीं मिला?

यदि ग्राम सभा का प्रमाण अनदेखा हुआ?

तो केवल “rejected” शब्द के आधार पर बेदखली करना गंभीर अन्याय पैदा कर सकता है।

यही बात कुछ ही दिनों में सर्वोच्च न्यायालय के सामने उभरी।

# 28 फरवरी 2019 : बेदखली आदेश पर रोक

10. सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं पुनर्विचार क्यों किया?

28 फरवरी 2019 को सर्वोच्च न्यायालय ने 13 फरवरी के eviction निर्देश को hold पर रख दिया।

न्यायालय ने कहा कि राज्यों के हलफनामों से यह साफ नहीं है कि—

दावे किस प्रक्रिया से खारिज हुए,

किस अधिकारी ने rejection किया,

दावेदारों को आदेश दिए गए या नहीं,

उन्हें साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर मिला या नहीं,

और reasoned orders पारित हुए या नहीं।

अदालत ने राज्य सरकारों से विस्तृत हलफनामे मांगे और तब तक 13 फरवरी का eviction निर्देश रोक दिया।

यह अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ था।

11. अदालत की चिंता दोतरफा थी

28 फरवरी का आदेश केवल आदिवासी पक्ष की चिंता नहीं करता।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि Other Traditional Forest Dwellers की आड़ में—

या गैर-पात्र व्यक्ति

forest land पर कब्जा न बनाए रखें।

अर्थात अदालत की समस्या दोहरी थी—

वास्तविक अधिकारधारी बेदखल न हो।

अधिकार कानून का उपयोग वास्तविक अतिक्रमण को ढकने के लिए न हो।

यही FRA क्रियान्वयन का सबसे कठिन संतुलन है।

# प्रक्रिया के बिना बेदखली नहीं

12. 2019 के आदेश का व्यापक सिद्धांत

अदालत ने मूलतः यह प्रश्न उठाया—

यदि rejection के पीछे की प्रक्रिया ही स्पष्ट नहीं, तो बेदखली कैसे हो?

इससे FRA का एक महत्वपूर्ण procedural justice सिद्धांत मजबूत हुआ—

दावा खारिज करना मात्र प्रशासनिक tick-box exercise नहीं हो सकती।

आदेश में कारण होने चाहिए।

अपील की प्रक्रिया उपलब्ध होनी चाहिए।

15. पालघर–ठाणे में पुराने दावों की विशेषता

कई परिवारों के पीछे—

अध्याय 32

वारली आंदोलन की समकालीन विरासत — 2006 से 2026 तक किसान सभा, भूमि–वन अधिकार, मजदूरी, किसान लॉन्ग मार्च और महाराष्ट्र की आदिवासी राजनीति

वारली आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वह 1945–47 की ऐतिहासिक घटना बनकर समाप्त नहीं हुआ। उसके मूल प्रश्न—जमीन किसकी, जंगल पर अधिकार किसका, मजदूरी कितनी, राज्य द्वारा मान्यता कब और आदिवासी किसान की राजनीतिक आवाज कितनी प्रभावी—इक्कीसवीं सदी में भी अलग-अलग रूपों में मौजूद रहे। 2006 का वन अधिकार अधिनियम इन प्रश्नों का वैधानिक उत्तर देने की दिशा में बड़ा कदम था, लेकिन 2018, 2023 और यहां तक कि 2026 के किसान–आदिवासी मार्चों से स्पष्ट है कि कानून बनने के दो दशक बाद भी उसका क्रियान्वयन पूरी तरह निर्विवाद या पूर्ण नहीं हुआ है।

यही कारण है कि 2006–2026 का काल वारली आंदोलन की “उत्तरकथा” नहीं, बल्कि उसका समकालीन चरण है।

1945 में लाल झंडे के नीचे वेठ-बेगार के विरुद्ध संगठित वारली किसान और 2018 या 2026 में लाल झंडा लेकर सड़क पर उतरने वाला पालघर–नासिक का आदिवासी कृषक एक ही ऐतिहासिक परंपरा के अलग पड़ावों का प्रतिनिधित्व करता है।

लेकिन दोनों युगों में एक महत्वपूर्ण अंतर भी है।

1945 का वारली किसान कह रहा था—

2026 का आदिवासी किसान कह सकता है—

“अधिकार कानून में पहले से है; उसे लागू करो।”

1. 2006 के बाद संघर्ष समाप्त क्यों नहीं हुआ?

वन अधिकार अधिनियम ने ऐतिहासिक वन-अधिकारों की पहचान की कानूनी प्रक्रिया बनाई। व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकार, ग्राम सभा की भूमिका और दावा तय होने तक बेदखली से सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण प्रावधान इसमें मौजूद हैं।

लेकिन कानून को जमीन पर लागू करने के लिए कई प्रशासनिक प्रक्रियाएं आवश्यक थीं—

ग्राम सभा का सत्यापन,

उप-मंडलीय समिति की जांच,

जिला समिति का अंतिम निर्णय,

और अंततः अधिकार को राजस्व/भूमि रिकॉर्ड में दर्ज करना।

इनमें किसी भी स्तर की देरी पूरे अधिकार को अधूरा छोड़ सकती थी।

यही वजह है कि कानून आने के बाद आंदोलन का स्वरूप बदल गया—भूमि कब्जे की लड़ाई से अधिकार क्रियान्वयन की लड़ाई।

# पालघर : पुराने वारली आंदोलन का आधुनिक भूगोल

2. 2014 में नया जिला, इतिहास वही

1 अगस्त 2014 को पुराने ठाणे जिले से पालघर जिला बना। लेकिन प्रशासनिक सीमा बदलने से वारली आंदोलन का ऐतिहासिक भूगोल नहीं बदला।

यही वे क्षेत्र हैं जहां बीसवीं सदी के वारली तथा बाद के आदिवासी भूमि आंदोलनों की मजबूत परंपरा रही।

आज पालघर जिला प्रशासन स्वयं वन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत दहानू, तलासरी, वाडा, विक्रमगढ़, जवाहर, मोखाडा, पालघर और वसई जैसे तालुका-वार स्वीकृत वन-अधिकार दावों की सूचियां प्रकाशित करता है। जनवरी 2025 की जिला वेबसाइट पर Individual Forest Rights के साथ Approved Community Forest Rights की अलग सूची भी उपलब्ध है।

यह महत्वपूर्ण परिवर्तन है।

1940 के दशक में जो अधिकार अनौपचारिक आंदोलन की मांग था, आज वह सरकारी वेबसाइट पर दर्ज प्रशासनिक अधिकार-श्रेणी है।

3. फिर आंदोलन क्यों?

क्योंकि सूची में नाम आ जाना पूरी समस्या का समाधान नहीं।

प्रश्न बने रहते हैं—

दावा कितना स्वीकार हुआ?

भूमि की वास्तविक माप वही है या कम?

7/12 अथवा अन्य भूमि रिकॉर्ड में नाम चढ़ा या नहीं?

सामुदायिक वन अधिकार की सीमा सही तय हुई?

विकास योजनाएं उस अधिकारधारी तक पहुंच रही हैं?

यही वे सवाल हैं जिन्होंने FRA के लगभग बीस वर्ष बाद भी आदिवासी लामबंदी को जीवित रखा।

# 2015–16 : नए किसान आंदोलन की तैयारी

4. किसान सभा की वापसी नहीं—निरंतरता

All India Kisan Sabha ने महाराष्ट्र में 2015 से व्यापक किसान अभियान शुरू किया। संगठन के अपने विवरण के अनुसार अक्टूबर–नवंबर 2015 में राज्यभर में किसान अधिकार अभियान चलाया गया और दिसंबर 2015 में 15 जिलों के 29 तहसील केंद्रों में 50,000 से अधिक किसानों ने भूमि अधिकार, ऋणमाफी, लाभकारी मूल्य और सूखा राहत जैसे मुद्दे उठाए। मार्च 2016 में नासिक में एक विशाल रैली और दो दिन का धरना हुआ, जिसमें FRA के क्रियान्वयन, आदिवासी कुपोषण, मनरेगा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, स्वास्थ्य और शिक्षा के मुद्दे प्रमुख थे।

यह चरण समझना जरूरी है।

2018 का प्रसिद्ध किसान लॉन्ग मार्च अचानक पैदा नहीं हुआ।

उसके पीछे वर्षों का संगठन था।

यह वही संगठनात्मक सिद्धांत है जो 1945 में वारली आंदोलन में दिखाई देता है—

पहले गांव और तहसील स्तर पर नेटवर्क, फिर विशाल सार्वजनिक लामबंदी।

# 2018 का किसान लॉन्ग मार्च

5. नासिक से मुंबई : लाल झंडे की राष्ट्रीय वापसी

6 मार्च 2018 को नासिक से All India Kisan Sabha के नेतृत्व में किसानों का पैदल मार्च मुंबई की ओर शुरू हुआ।

AIKS के अनुसार प्रारंभ में लगभग 25,000 किसान थे और मुंबई पहुंचते-पहुंचते संख्या लगभग 50,000 हो गई। स्वतंत्र मीडिया रिपोर्टों ने अंतिम संख्या अलग-अलग—लगभग 30,000 से 40,000 या अधिक—बताई। इसलिए किसी एक संख्या को पूर्ण निश्चितता से नहीं लेना चाहिए। इतना निर्विवाद है कि यह हाल के दशकों की महाराष्ट्र की सबसे बड़ी किसान लामबंदियों में था।

मार्च लगभग 180 किलोमीटर का था।

सात दिनों का कठिन पैदल सफर।

लेकिन इसका सबसे महत्वपूर्ण पक्ष संख्या या दूरी नहीं था।

इस मार्च में बड़ी संख्या में आदिवासी किसान और महिलाएं थीं।

AIKS के अनुसार सबसे बड़ा समूह नासिक जिले से और उसके बाद ठाणे–पालघर से था।

6. यह केवल ऋणमाफी का मार्च नहीं था

2018 के आंदोलन को केवल किसान ऋणमाफी आंदोलन कहना गंभीर सरलीकरण होगा।

उसकी प्रमुख मांगों में शामिल थे—

स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें,

लेकिन साथ ही वन अधिकार अधिनियम का प्रभावी क्रियान्वयन और पीढ़ियों से वनभूमि जोत रहे आदिवासियों को जमीन का अधिकार।

Indian Express ने उस समय विशेष रूप से लिखा कि बड़ी संख्या में आदिवासी मार्चर ऋणमाफी नहीं, बल्कि वन अधिकार अधिनियम के तहत जमीन पर अपने अधिकार के क्रियान्वयन के लिए आए थे।

यही इसे वारली आंदोलन से सीधे जोड़ता है।

7. 1945 और 2018 के लाल झंडे

1945 में लाल झंडे के नीचे वारली मजदूर कहता था—

2018 में वही प्रतीकात्मक परंपरा कह रही थी—

वन अधिकार अधिनियम लागू करो।

पुरानी वनभूमि का अधिकार दर्ज करो।

दोनों में लगभग तीन-चौथाई सदी का अंतर था।

लेकिन संगठनात्मक प्रतीक वही था।

इस अर्थ में 2018 का लॉन्ग मार्च आधुनिक महाराष्ट्र में वारली–आदिवासी किसान राजनीति की ऐतिहासिक दृश्य वापसी था।

# महिलाओं की उल्लेखनीय उपस्थिति

8. आंदोलन का महिला चेहरा

2018 के लॉन्ग मार्च में हजारों आदिवासी महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से दिखाई दी।

PARI ने मार्च में चल रही आदिवासी महिला किसानों के अनुभव दर्ज किए—कई महिलाएं बिना पर्याप्त जूतों-चप्पलों के 180 किलोमीटर तक चलीं, कुछ अपने बच्चों और पोते-पोतियों के साथ थीं।

यह 1945 की वारली महिलाओं की राजनीतिक विरासत का आधुनिक विस्तार था।

वेठ का विरोध करती थी,

अब वही सामाजिक श्रेणी—

की व्यापक मांगों के साथ राज्य की राजधानी तक पहुंच रही थी।

# रात में मुंबई प्रवेश

9. छात्र परीक्षा और आंदोलन का अनुशासन

2018 के लॉन्ग मार्च की सबसे चर्चित घटनाओं में एक थी मुंबई में अंतिम चरण की पैदल यात्रा।

प्रदर्शनकारियों ने बोर्ड परीक्षाओं के विद्यार्थियों को यातायात बाधा से बचाने के लिए अंतिम लंबा हिस्सा रात में चलकर तय किया। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने ठाणे से मुंबई की ओर देर रात यात्रा की और सुबह आजाद मैदान पहुंचे।

इसने आंदोलन की सार्वजनिक छवि पर गहरा प्रभाव डाला।

किसान संघर्ष को केवल सड़क अवरोध और टकराव से जोड़ने वाली सामान्य धारणा के विपरीत यह अनुशासित जनसत्याग्रह जैसा दिखाई दिया।

अध्याय 33

वारली आंदोलन और भारतीय कम्युनिस्ट राजनीति — CPI, CPI(M), किसान सभा, वर्ग-संघर्ष और आदिवासी अस्मिता के बीच संबंध

वारली आंदोलन को भारतीय कम्युनिस्ट राजनीति से अलग करके समझना संभव नहीं है, लेकिन उसे केवल “कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा चलाया गया आंदोलन” मान लेना भी उतना ही अधूरा होगा। 1945–47 के संघर्ष में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, किसान सभा, शामराव परुलेकर और गोदावरी परुलेकर की संगठनात्मक भूमिका निर्णायक थी; साथ ही आंदोलन की सामाजिक ऊर्जा वारली आदिवासियों की अपनी वास्तविक परिस्थितियों—वेठ-बेगार, बंधुआ श्रम, अत्यंत कम मजदूरी, कर्ज, भूमि-वंचना और सामाजिक अपमान—से निकली थी।

इसलिए वारली आंदोलन की सबसे उपयुक्त व्याख्या है—

कम्युनिस्ट संगठन ने संघर्ष को राजनीतिक भाषा, संगठन और रणनीति दी; वारली समाज ने उसे अपनी वास्तविक पीड़ा, स्थानीय नेतृत्व और सामूहिक भागीदारी से जनांदोलन बनाया।

Review of Agrarian Studies इसे महाराष्ट्र के आदिवासी आंदोलनों के इतिहास में एक अलग चरण मानता है, क्योंकि कम्युनिस्ट पार्टी और किसान सभा ने भूमि, जंगल, मजदूरी और बेगार जैसे स्थानीय प्रश्नों को व्यापक सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन की राजनीति से जोड़ा।

1. कम्युनिस्टों से पहले क्या वारली प्रतिरोध नहीं था?

आदिवासी समाज निष्क्रिय नहीं था। औपनिवेशिक भारत में अनेक आदिवासी समुदायों ने बाहरी हस्तक्षेप, राजस्व व्यवस्था, वन नियंत्रण और स्थानीय प्रभुत्व के विरुद्ध प्रतिरोध किए।

लेकिन ठाणे के वारली क्षेत्र में 1940 के दशक से पहले संघर्ष मुख्यतः—

और स्थायी क्षेत्रीय संगठन से रहित

किसान सभा ने इस बिखराव को संगठनात्मक एकता में बदलने की कोशिश की। 12 जनवरी 1945 को ठाणे जिले के टिटवाला में महाराष्ट्र किसान सभा की स्थापना हुई। सम्मेलन में सात हजार से अधिक किसानों की भागीदारी का उल्लेख मिलता है; शामराव परुलेकर महासचिव और गोदावरी परुलेकर संयुक्त सचिव चुनी गईं। उमरगांव क्षेत्र के आदिवासी प्रतिनिधि भी इसमें उपस्थित थे।

यहीं से वारली प्रश्न स्थानीय शिकायत से प्रांतीय किसान राजनीति में प्रवेश करता है।

# कम्युनिस्ट राजनीति वारली क्षेत्र तक क्यों पहुंची?

2. वर्गीय शोषण की बहुत स्पष्ट संरचना

कम्युनिस्ट राजनीति के लिए वारली क्षेत्र की सामाजिक संरचना लगभग पाठ्यपुस्तकीय वर्गीय असमानता जैसी दिखाई देती थी।

और ग्रामीण प्रभुत्वशाली वर्ग।

भूमिहीन या अल्पभूमिधारी आदिवासी,

और अत्यंत कम मजदूरी पर निर्भर श्रमिक।

Leslie Calman के अध्ययन के अनुसार 1945–47 में कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा नेतृत्व किए गए आंदोलन का तत्काल लक्ष्य उचित मजदूरी, जबरन श्रम से मुक्ति और भू-स्वामी हिंसा का विरोध था; दीर्घकालीन राजनीतिक लक्ष्य कम्युनिस्ट पार्टी का सामाजिक आधार बढ़ाना और कांग्रेस के प्रभुत्व को चुनौती देना भी था।

दोनों स्तरों को साथ समझना आवश्यक है।

3. स्थानीय दुख और पार्टी रणनीति एक-दूसरे से मिले

वारली मजदूर को मार्क्सवाद की पूरी सैद्धांतिक संरचना समझने की आवश्यकता नहीं थी।

मुफ्त काम करना पड़ता है।

कर्ज से छुटकारा नहीं।

जमीन पर नियंत्रण नहीं।

किसान सभा ने इन अनुभवों को शब्द दिए—

यही राजनीतिक अनुवाद उसकी सबसे बड़ी भूमिका थी।

# वर्ग-संघर्ष की भाषा

4. भू-स्वामी बनाम किसान

कम्युनिस्ट व्याख्या में वारली संघर्ष मूलतः ग्रामीण वर्ग-संघर्ष था।

भू-स्वामी केवल एक खराब व्यक्ति नहीं।

वह एक आर्थिक संरचना का हिस्सा था।

साहूकार केवल लालची व्यक्ति नहीं।

वह ऋण-आधारित निर्भरता की व्यवस्था का हिस्सा था।

इससे संघर्ष व्यक्तिगत न्याय से आगे बढ़कर संरचनात्मक परिवर्तन की मांग बन गया।

5. वेठ-बेगार को वर्ग संबंध के रूप में देखना

यदि किसान सभा केवल कहती—

तो संघर्ष सुधारवादी सीमा में रहता।

कम्युनिस्ट दृष्टि कहती थी—

मुफ्त श्रम स्वयं गलत उत्पादन संबंध है।

इसे समाप्त करना होगा।

यानी समस्या व्यक्ति की नैतिकता नहीं, व्यवस्था थी।

यही विचार वारली विद्रोह को अधिक व्यापक बना गया।

6. मजदूरी भी वर्ग-संघर्ष बनी

मजदूरी की दर पहले व्यक्तिगत सौदा थी।

पूरे श्रमिक समुदाय की सामूहिक दर होगी।

यह आधुनिक ट्रेड यूनियन पद्धति थी।

इसलिए घास-कटाई और वन-मजदूरी आंदोलन को ग्रामीण श्रम बाजार में वर्गीय संगठन का प्रयोग माना जा सकता है।

# क्या सभी वारली कम्युनिस्ट बन गए?

यह महत्वपूर्ण अंतर बार-बार स्पष्ट किया जाना चाहिए।

लाल झंडे के नीचे आने वाला प्रत्येक वारली—

या पार्टी कार्यक्रम की विस्तृत समझ रखता हो—ऐसा कोई आधार नहीं।

कई लोगों के लिए कम्युनिस्ट राजनीति का व्यावहारिक अर्थ था—

और संगठनात्मक सुरक्षा।

यानी आंदोलन समर्थन और वैचारिक कम्युनिस्ट प्रतिबद्धता एक ही चीज नहीं थीं।

# लाल झंडे का स्थानीय अर्थ

7. पार्टी प्रतीक से सामुदायिक प्रतीक

कम्युनिस्ट नेतृत्व के लिए लाल झंडा अंतरराष्ट्रीय मजदूर और किसान आंदोलन का प्रतीक था।

वारली गांव में वह धीरे-धीरे कुछ और भी बन गया—

भू-स्वामी के सामने सुरक्षा,

और सामाजिक आत्मसम्मान।

इस प्रकार स्थानीय समाज ने पार्टी प्रतीक का अपना अर्थ निर्मित किया।

8. यही कारण है कि प्रतीक टिक गया

यदि लाल झंडा केवल बाहर से थोपा गया वैचारिक चिह्न होता, तो 1947 के बाद उसका प्रभाव तेजी से समाप्त हो सकता था।

लेकिन ठाणे–पालघर में वह दशकों तक किसान और आदिवासी आंदोलनों में बना रहा।

यह बताता है कि प्रतीक स्थानीय अनुभव से जुड़ चुका था।

# गोदावरी और शामराव परुलेकर : पार्टी और आंदोलन के बीच सेतु

9. बाहरी नेतृत्व का प्रश्न

दोनों नेता वारली समाज से उत्पन्न नहीं थे।

वे शिक्षित कम्युनिस्ट कार्यकर्ता थे।

इससे एक महत्वपूर्ण इतिहासलेखन प्रश्न उठता है—

क्या आंदोलन बाहरी नेतृत्व द्वारा संचालित था?

प्रारंभिक राजनीतिक और संगठनात्मक पहल में बाहरी नेतृत्व अत्यंत महत्वपूर्ण था।

लेकिन आंदोलन का विस्तार स्थानीय वारली सहभागिता के बिना असंभव था।

10. गोदावरी की भूमिका

गोदावरी परुलेकर ने वारली गांवों में जाकर सीधे संवाद किया, विशेषकर महिलाओं से संपर्क बनाया और भू-स्वामियों के खिलाफ खुली चुनौती की राजनीतिक शैली विकसित की।

Calman ने अपने अध्ययन में गोदावरी के साक्षात्कार का उल्लेख करते हुए लिखा कि उनकी खुली चुनौती ने आदिवासियों के भय को तोड़ने में मनोवैज्ञानिक भूमिका निभाई।

लेकिन गोदावरी के अपने संस्मरण को आंदोलन का एकमात्र निष्पक्ष स्रोत नहीं माना जा सकता।

Calman स्वयं चेताते हैं कि परुलेकरों के लेखन सहित विभिन्न स्रोत स्पष्ट राजनीतिक पक्ष रखते हैं।

# पार्टी की दीर्घकालीन राजनीतिक महत्वाकांक्षा

11. क्या कम्युनिस्टों ने वारली आंदोलन का उपयोग पार्टी विस्तार के लिए किया?

इस प्रश्न का उत्तर छिपाने की आवश्यकता नहीं।

हां—कम्युनिस्ट नेतृत्व सामाजिक आंदोलन के साथ पार्टी का आधार भी बढ़ाना चाहता था।

Leslie Calman इसे स्पष्ट रूप से आंदोलन का दीर्घकालीन लक्ष्य मानती हैं।

लेकिन इससे मजदूरी, वेठ और जमीन के प्रश्न कृत्रिम नहीं हो जाते।

राजनीतिक संगठन लगभग हमेशा—

और अपना सामाजिक प्रभाव बढ़ाने—

दोनों उद्देश्यों से काम करते हैं।

ऐतिहासिक प्रश्न यह है कि क्या संगठन ने वास्तविक समस्या पर लोगों को प्रभावी शक्ति दी।

वारली मामले में इसका उत्तर काफी हद तक हां है।

# कांग्रेस–कम्युनिस्ट प्रतिस्पर्धा

12. वारली आंदोलन राष्ट्रीय राजनीति का स्थानीय मैदान कैसे बना?

1945–47 भारत में सत्ता-हस्तांतरण का समय था।

कांग्रेस राष्ट्रीय राजनीति की प्रधान शक्ति थी।

कम्युनिस्ट पार्टी मजदूर और किसान क्षेत्रों में अपना स्वतंत्र सामाजिक आधार बढ़ाना चाहती थी।

ठाणे का वारली क्षेत्र इस प्रतिस्पर्धा का महत्वपूर्ण स्थल बन गया।

Calman का तर्क है कि वास्तविक विवाद केवल आदिवासी uplift का नहीं था, बल्कि यह भी था कि सामाजिक परिवर्तन कौन करेगा, किस प्रकार करेगा और उससे कौन-से दल तथा वर्ग मजबूत होंगे।

यह वारली आंदोलन को व्यापक राजनीतिक संदर्भ देता है।

13. कांग्रेस की समस्या

कांग्रेस के लिए स्थिति कठिन थी।

वह सामाजिक सुधार का दावा करती थी।

लेकिन अब कम्युनिस्ट किसान सभा कह रही थी—

हमने जहां संगठन किया, वहां वेठ बंद हुई।

आदिवासी हमारे साथ हैं।

इससे कांग्रेस के सामने राजनीतिक चुनौती थी—

यदि वह किसान सभा का समर्थन करती है तो कम्युनिस्ट मजबूत होते हैं।

यदि दमन करती है तो किसान-विरोधी दिखाई दे सकती है।

यह बहुत सरल निष्कर्ष होगा।

28. सरकार भी प्रश्न के दायरे में आई

गोदावरी–शामराव परुलेकर,

अध्याय 34

वारली आंदोलन और कांग्रेस — राष्ट्रीय आंदोलन, बी. जी. खेर सरकार, मोरारजी देसाई, आदिवासी कल्याण और कम्युनिस्ट चुनौती के बीच कांग्रेस की भूमिका

वारली आंदोलन और कांग्रेस का संबंध भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे जटिल स्थानीय राजनीतिक कहानियों में से एक है। इसे केवल “कांग्रेस बनाम कम्युनिस्ट” के रूप में समझना पर्याप्त नहीं होगा। कांग्रेस की भूमिका कई स्तरों पर थी—एक ओर वह औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय स्वतंत्रता की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति थी, दूसरी ओर बंबई प्रांत में सत्ता संभालने के बाद वही कांग्रेस सरकार ठाणे के वारली आंदोलन को कानून-व्यवस्था और कम्युनिस्ट विस्तार की चुनौती के रूप में देखने लगी। साथ ही कांग्रेस से जुड़े आदिवासी कल्याण संगठनों और कुछ नेताओं ने वारली समाज के सामाजिक उत्थान, शिक्षा और शोषण की समस्याओं पर काम भी किया। इसीलिए कांग्रेस की भूमिका में कल्याण, सुधार, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और दमन—चारों तत्व एक साथ दिखाई देते हैं।

लेस्ली कैलमन के क्लासिक अध्ययन का केंद्रीय निष्कर्ष भी यही है कि 1945–47 का वारली संघर्ष केवल आदिवासी उत्थान का प्रश्न नहीं था; यह इस बात का भी संघर्ष था कि सामाजिक परिवर्तन किसके नेतृत्व में होगा—कांग्रेस के सुधारवादी ढांचे में या कम्युनिस्ट किसान आंदोलन की वर्ग-संघर्ष आधारित राजनीति के माध्यम से।

1. कांग्रेस और वारली प्रश्न का संबंध 1945 से पहले का था

कांग्रेस ने वारली समस्या को पहली बार 1945 में नहीं देखा था।

1937 में प्रांतीय स्वायत्तता के बाद बंबई प्रांत में कांग्रेस सरकार बनी। उसी दौर में सरकार ने आदिवासी जीवन की स्थिति की जांच के लिए डी. साइमिंगटन से Report on the Aboriginal Hill Tribes तैयार कराया।

यह रिपोर्ट अत्यंत महत्वपूर्ण थी।

उसने आदिवासी समाज को—

साहूकारों से पीड़ित,

और वेठ-बेगार से बुरी तरह प्रभावित

ठाणे में वेठ व्यवस्था को उसने लगभग दासता जैसी परिस्थिति माना और मारपीट तथा महिलाओं के यौन उत्पीड़न के विवरण भी दर्ज किए।

इसलिए यह कहना गलत होगा कि कांग्रेस शासन वारली शोषण से पूरी तरह अनभिज्ञ था।

समस्या की सरकारी पहचान 1930 के दशक में ही हो चुकी थी।

2. बी. जी. खेर और आदिवासी कल्याण

बालासाहेब गंगाधर खेर बंबई प्रांत के प्रमुख कांग्रेस नेता थे और आदिवासी कल्याण में व्यक्तिगत रुचि रखते थे। आधुनिक शोध उन्हें ऐसे कांग्रेस नेता के रूप में दर्ज करता है जिन्होंने आदिवासी uplift के प्रश्न को गंभीरता से लिया।

यही तथ्य कांग्रेस की भूमिका को जटिल बनाता है।

खेर को केवल वारली आंदोलन दबाने वाले मुख्यमंत्री के रूप में चित्रित करना अधूरा होगा।

उनकी राजनीति में आदिवासी सुधार का एक वास्तविक पक्ष भी था।

लेकिन उनका दृष्टिकोण किसान सभा से अलग था।

कांग्रेस का मॉडल था—

और प्रशासनिक हस्तक्षेप।

और भू-स्वामी सत्ता को प्रत्यक्ष चुनौती।

यहीं दोनों धाराएं टकराईं।

# 1944 का मजदूरी संघर्ष : पहली कांग्रेस–कम्युनिस्ट पूर्वपीठिका

3. किसान सभा से पहले भी मजदूरी हड़ताल

आधुनिक शोध के अनुसार 1944 में वारली मजदूरों की एक मजदूरी हड़ताल K. J. Save नामक सरकारी कर्मचारी की प्रेरणा से हुई थी।

लेकिन यह आंदोलन लंबा नहीं चला।

बी. जी. खेर और Adivasi Seva Mandal ने हस्तक्षेप कर मजदूरों को काम पर लौटने के लिए समझाया।

यह घटना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

क्योंकि यहां कांग्रेस का आदिवासी दृष्टिकोण किसान सभा के आने से पहले ही दिखाई देता है—

लेकिन संघर्ष को नियंत्रित और शांतिपूर्ण सुधार की सीमा में रखो।

4. आदिवासी सेवा मंडल की भूमिका

Adivasi Seva Mandal राष्ट्रवादी झुकाव वाला आदिवासी कल्याण संगठन था।

उसका लक्ष्य आदिवासियों की शिक्षा और सामाजिक सुधार था।

लेकिन 1945–47 की राजनीतिक परिस्थितियों में वह कांग्रेस और राज्य के लिए एक वैकल्पिक आदिवासी मंच भी बन गया।

आधुनिक अध्ययन इसे उस दौर में क्षेत्र को शांत करने और कांग्रेस की आदिवासी पहुंच बनाए रखने वाले संगठन के रूप में देखता है।

यानी यहां welfare और politics एक-दूसरे से अलग नहीं थे।

# कांग्रेस का मॉडल बनाम किसान सभा का मॉडल

5. दो अलग सामाजिक परिवर्तन की अवधारणाएं

उसे शिक्षा, कल्याण और सुधार चाहिए।

वह केवल गरीब नहीं, शोषित है।

इसलिए समस्या केवल सहायता से हल नहीं होगी।

भू-स्वामी, साहूकार और श्रम संबंध बदलने होंगे।

6. ‘उत्थान’ बनाम ‘संघर्ष’

ऊपर से सामाजिक सुधार।

यह द्वंद्व 1945–47 की पूरी राजनीति को समझने की कुंजी है।

# 1945 : किसान सभा का प्रवेश और कांग्रेस की चुनौती

7. कम्युनिस्ट किसान संगठन तेजी से क्यों बढ़ा?

क्योंकि उसने वारली जीवन की तत्काल समस्याओं पर सीधी कार्रवाई की—

भू-स्वामी की हिंसा का विरोध।

लेस्ली कैलमन के अनुसार आंदोलन के तत्काल लक्ष्य वास्तव में fair wages, जबरन श्रम से मुक्ति और भू-स्वामी violence का विरोध थे। लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी का दीर्घकालीन उद्देश्य अपना संगठन विस्तार करना और कांग्रेस का प्रभुत्व चुनौती देना भी था।

कांग्रेस नेतृत्व इस राजनीतिक आयाम को स्पष्ट रूप से समझ रहा था।

8. कांग्रेस क्यों चिंतित हुई?

क्योंकि किसान सभा केवल शिकायत दर्ज नहीं कर रही थी।

गांवों में संगठन बना रही थी,

लाल झंडा फैला रही थी,

और कांग्रेस से स्वतंत्र राजनीतिक निष्ठा पैदा कर रही थी।

यानी प्रश्न केवल यह नहीं था—

आदिवासी मजदूरी कितनी पाएगा?

आदिवासी राजनीतिक रूप से किसके साथ जाएगा?

# 1946 के चुनाव और सत्ता परिवर्तन

9. अब कांग्रेस केवल आंदोलनकारी दल नहीं थी

1946 के चुनावों के बाद बंबई प्रांत में कांग्रेस सरकार सत्ता में आई।

बी. जी. खेर प्रीमियर बने।

मोरारजी देसाई गृह मंत्री।

अब कांग्रेस की भूमिका बदल चुकी थी।

राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन की पार्टी,

और प्रांतीय कानून-व्यवस्था की जिम्मेदार सरकार

इसी दोहरी भूमिका ने वारली संकट को और जटिल बनाया।

10. सत्ता में आने के बाद कांग्रेस की प्राथमिकता

सरकार को अब केवल आदिवासी शिकायत नहीं देखनी थी।

भू-स्वामी–मजदूर टकराव,

और कम्युनिस्ट संगठन का विस्तार।

1946 के उत्तरार्ध में बंबई सरकार की fortnightly reports में अन्य जिलों तक कम्युनिस्ट किसान रणनीतियों के फैलने की चिंता दर्ज होने का उल्लेख कैलमन करती हैं।

यानी सरकार को ठाणे कोई अलग स्थानीय घटना नहीं लग रहा था।

उसे आशंका थी कि यह मॉडल—

जैसे क्षेत्रों तक फैल सकता है।

# मोरारजी देसाई : गृह मंत्री की दृष्टि

11. मोरारजी की भूमिका क्यों केंद्रीय है?

बंबई सरकार में गृह विभाग कानून-व्यवस्था और पुलिस कार्रवाई का मुख्य केंद्र था।

इसलिए वारली आंदोलन के प्रति राज्य के कठोर रुख का सबसे प्रमुख राजनीतिक चेहरा मोरारजी देसाई बने।

आधुनिक शोध में उनके उस वक्तव्य का उल्लेख मिलता है जिसमें उन्होंने कम्युनिस्ट गतिविधियों को गंभीर खतरा बताते हुए कहा कि ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा देने वाली चीजें बर्दाश्त नहीं की जाएंगी।

यह उनके दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है—

वारली संकट केवल मजदूरी प्रश्न नहीं था।

वह कम्युनिस्ट राजनीतिक चुनौती भी था।

12. क्या मोरारजी आदिवासी विरोधी थे?

इतिहास को व्यक्तियों की नैतिक श्रेणियों में बांटना उचित नहीं।

मोरारजी देसाई राज्य की कानून-व्यवस्था और कांग्रेस सरकार की राजनीतिक स्थिरता के दृष्टिकोण से स्थिति देख रहे थे।

लेकिन यह भी तथ्य है कि इसी दृष्टिकोण के परिणामस्वरूप—

और सैन्य बल तक तैनात करने

इसलिए उनके प्रशासनिक तर्क को समझना और उसके दमनकारी प्रभाव की आलोचना करना—दोनों संभव हैं।

# 14 नवंबर 1946 : ठाणे में आपात स्थिति

13. संकट कितना गंभीर हो गया था?

आधुनिक शोध के अनुसार 14 नवंबर 1946 को बंबई सरकार ने ठाणे में आपात स्थिति घोषित की।

जनवरी 1947 तक दहानू क्षेत्र में Maratha Light Infantry की एक कंपनी भेजी गई।

यह कदम दिखाता है कि सरकार आंदोलन को साधारण ग्रामीण मजदूरी विवाद की तरह नहीं देख रही थी।

वह उसे गंभीर सुरक्षा संकट मान चुकी थी।

14. सेना भेजने का अर्थ

आदिवासी किसान संघर्ष में सेना का प्रवेश अत्यंत असाधारण कदम था।

प्रीमियर

forest regularisation,

अध्याय 35

वारली आंदोलन और अन्य आदिवासी-किसान आंदोलनों की तुलना — तेभागा, तेलंगाना, भील, संथाल और बाद के आदिवासी संघर्षों से समानताएं और भिन्नताएं

वारली आंदोलन को भारतीय किसान और आदिवासी आंदोलनों के व्यापक इतिहास में रखे बिना उसकी विशिष्टता पूरी तरह समझी नहीं जा सकती। 1940 के दशक में भारत के विभिन्न हिस्सों में ऐसे कई आंदोलन उभरे जिनमें भूमि, किरायेदारी, मजदूरी, वन-अधिकार, साहूकारी और स्थानीय प्रभुत्व के प्रश्न जुड़े हुए थे। वारली, तेभागा और तेलंगाना लगभग एक ही ऐतिहासिक कालखंड में उभरे, जबकि संथाल विद्रोह और भील आंदोलनों की जड़ें उन्नीसवीं सदी तक जाती हैं। इन सबमें आदिवासी अथवा कृषक समुदायों का शोषण-विरोध साझा तत्व था, लेकिन नेतृत्व, लक्ष्य, संगठन, हिंसा, राज्य से संबंध और परिणाम अलग-अलग थे।

वारली आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उसने आदिवासी पहचान, किसान-मजदूर वर्गीय राजनीति और दीर्घकालीन संगठन—तीनों को एक साथ जोड़ा। इसी कारण वह केवल विद्रोह नहीं रहा; भूमि, वन, मजदूरी और बाद में संवैधानिक अधिकारों की लगभग आठ दशक लंबी राजनीतिक परंपरा में बदल गया।

1. तुलना का आधार क्या होना चाहिए?

इन आंदोलनों की तुलना केवल इस प्रश्न पर नहीं होनी चाहिए कि कहां कितने लोग मारे गए या संघर्ष कितने वर्ष चला। अधिक उपयोगी तुलनात्मक आयाम हैं—

• सामाजिक आधार कौन था?

• मुख्य शोषक संरचना क्या थी?

• केंद्रीय मांग क्या थी?

• नेतृत्व स्थानीय था या बाहरी?

• राजनीतिक विचारधारा क्या थी?

• आंदोलन अहिंसक, उग्र या सशस्त्र था?

• राज्य की प्रतिक्रिया कैसी थी?

• और सबसे महत्वपूर्ण—क्या आंदोलन स्थायी संगठन या कानूनी परिवर्तन में बदल पाया?

इन्हीं मानकों पर वारली आंदोलन की ऐतिहासिक स्थिति अधिक स्पष्ट होती है।

2. लगभग एक ही ऐतिहासिक क्षण

वारली संघर्ष 1945–47 में अपने पहले बड़े चरण में था।

तेभागा आंदोलन 1946–47 में बंगाल में उभरा।

दोनों पर कम्युनिस्ट किसान राजनीति का गहरा प्रभाव था। आधुनिक शोध 1945–50 के प्रमुख कम्युनिस्ट-नेतृत्व वाले ग्रामीण संघर्षों में वारली, तेभागा और तेलंगाना को एक साथ रखता है।

यह समानता महत्वपूर्ण है।

भारत स्वतंत्र होने वाला था, लेकिन ग्रामीण समाज भूमि और उत्पादन संबंधों को लेकर विस्फोटक संघर्ष से गुजर रहा था।

3. तेभागा का मूल प्रश्न

तेभागा मुख्यतः बर्गादारों—sharecroppers—का आंदोलन था।

बंगाल में फसल का आधा हिस्सा जमींदार या जोतदार को देने की प्रथा के विरुद्ध बर्गादार मांग कर रहे थे कि जमींदार को केवल एक-तिहाई हिस्सा मिले और किसान दो-तिहाई अपने पास रखे।

तीन भागों में फसल विभाजन—

से आंदोलन का नाम आया।

Cambridge के अध्ययन के अनुसार इसका केंद्रीय लक्ष्य sharecroppers द्वारा जोतदारों को दिए जाने वाले हिस्से को आधे से एक-तिहाई तक कम कराना था।

4. वारली में प्रश्न अलग था

वारली आंदोलन की शुरुआत sharecropping ratio से नहीं हुई।

उसके मुख्य प्रश्न थे—

और भू-स्वामी प्रभुत्व।

अर्थात तेभागा का प्राथमिक प्रश्न था—

उत्पादित फसल में हिस्सा कितना?

वारली का प्रारंभिक प्रश्न था—

मेरे श्रम की स्वतंत्रता और कीमत क्या?

यही दोनों आंदोलनों का सबसे बड़ा आर्थिक अंतर था।

5. आदिवासी भागीदारी दोनों में

तेभागा को केवल गैर-आदिवासी बंगाली sharecroppers का आंदोलन मानना गलत होगा।

उत्तरी बंगाल और पूर्वी बंगाल के कुछ क्षेत्रों में संथाल, ओरांव और हाजोंग जैसे आदिवासी समूहों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। Cambridge अध्ययन बताता है कि जंगल साफ कर कृषि भूमि विकसित करने के बाद अनेक आदिवासी स्वयं बर्गादार बने और बाद में भूमि से बेदखली तथा किराये के शोषण का सामना किया।

इसलिए तेभागा भी कुछ क्षेत्रों में किसान और आदिवासी प्रश्न का संगम था।

6. संगठनात्मक समानता

और बड़े जनसमूहों की लामबंदी

लेकिन वारली क्षेत्र में किसान सभा ने जो दीर्घकालीन संस्था बनाई, वह स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक भूमि, जंगल और मजदूरी पर सक्रिय रही। Review of Agrarian Studies इसी निरंतरता को वारली संघर्ष की विशिष्ट उपलब्धि मानता है।

7. सबसे नजदीकी वैचारिक समानता, सबसे बड़ा रणनीतिक अंतर

वारली और तेलंगाना दोनों कम्युनिस्ट-नेतृत्व वाले ग्रामीण आंदोलनों थे।

और ग्रामीण वर्गीय असमानता

लेकिन यहीं समानता का अंत नहीं, बल्कि एक निर्णायक अंतर शुरू होता है।

तेलंगाना सशस्त्र किसान संघर्ष में विकसित हुआ; वारली आंदोलन का मुख्य चरित्र व्यापक जनसंगठन, हड़ताल और सत्याग्रह का रहा।

Cambridge के स्रोत तेलंगाना को 1946–51 का armed guerrilla struggle बताते हैं, जो निजाम और सामंती व्यवस्था के विरुद्ध शुरू हुआ तथा आगे भारतीय राज्य से भी सशस्त्र संघर्ष में गया।

8. तेलंगाना की सामाजिक संरचना

हैदराबाद रियासत में—

देशमुखों का प्रभुत्व,

इसलिए वर्गीय संघर्ष भूमि नियंत्रण के प्रश्न तक बहुत तेजी से पहुंचा।

आंदोलनकारियों ने कई क्षेत्रों में भू-स्वामी सत्ता को हटाकर ग्रामीण वैकल्पिक सत्ता और भूमि वितरण तक का प्रयास किया।

वारली क्षेत्र में ऐसा स्थायी समानांतर शासन विकसित नहीं हुआ।

9. हथियार का प्रश्न

तेलंगाना में guerrilla squads बने।

जंगलों का उपयोग सशस्त्र प्रतिरोध के लिए किया गया।

भारतीय सैन्य कार्रवाई के बाद भी कुछ दस्ते वन क्षेत्रों में जाकर संघर्ष जारी रखते रहे। Cambridge अध्ययन इसे कम्युनिस्ट-नेतृत्व वाले peasant movements का चरम चरण मानता है।

वारली आंदोलन में हिंसक टकराव और पुलिस पर हमलों के उदाहरण मौजूद हैं, लेकिन उसकी मुख्य रणनीति को सशस्त्र गुरिल्ला युद्ध कहना गलत होगा।

यह अंतर बुनियादी है।

10. राज्य सत्ता का लक्ष्य

तेलंगाना आंदोलन के कुछ चरणों में प्रश्न केवल मजदूरी या लगान सुधार का नहीं रह गया।

वह स्थानीय राजनीतिक सत्ता पर नियंत्रण और सामंती राज्य संरचना से सशस्त्र टकराव तक गया।

वारली आंदोलन का मुख्य लक्ष्य तत्कालीन चरण में—

और बाद में कानून का क्रियान्वयन—

यानी वारली की राजनीति अधिक सुधारात्मक-परिवर्तनकारी जनसंघर्ष, तेलंगाना की राजनीति एक चरण में सशस्त्र सत्ता-संघर्ष बन गई।

# वारली और संथाल हूल

11. एक सदी का अंतर

संथाल हूल 1855–56 में हुआ।

वारली आंदोलन 1945 में।

दोनों के बीच लगभग नब्बे वर्ष का अंतर है।

यह अंतर स्वयं भारत की आदिवासी राजनीति में परिवर्तन दिखाता है।

संथाल हूल औपनिवेशिक विस्तार और नए आर्थिक शोषण के विरुद्ध व्यापक आदिवासी विद्रोह था।

वारली आंदोलन आधुनिक राजनीतिक दल और किसान संगठन के ढांचे में चला।

12. संथाल विद्रोह का सामाजिक आधार

संथालों के सामने मुख्य समस्याएं थीं—

उनकी जमीन और जीवन-व्यवस्था पर बाहरी ‘दिकुओं’ का नियंत्रण बढ़ रहा था।

इसलिए संथाल प्रतिरोध में सामुदायिक पहचान और बाहरी शोषकों के विरुद्ध विद्रोह का तत्व अत्यंत मजबूत था।

वारली संघर्ष में भी साहूकार, भू-स्वामी और राज्य महत्वपूर्ण थे, लेकिन कम्युनिस्ट किसान सभा ने इसे वर्गीय राजनीति में संगठित किया।

13. नेतृत्व का अंतर

संथाल विद्रोह में सिद्धू, कान्हू, चांद और भैरव जैसे स्थानीय आदिवासी नेता केंद्रीय थे।

अर्थात नेतृत्व समुदाय के भीतर से आया।

वारली आंदोलन में गोदावरी और शामराव परुलेकर जैसे गैर-आदिवासी कम्युनिस्ट नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

यह दोनों आंदोलनों के संगठनात्मक चरित्र का बड़ा अंतर है।

14. राजनीतिक भाषा

संथालों की राजनीतिक भाषा—

इससे वारली आंदोलन आधुनिक अखिल भारतीय किसान राजनीति से अधिक सीधे जुड़ गया।

15. परिणाम

संथाल विद्रोह को सैन्य शक्ति से दबा दिया गया, लेकिन उसके बाद प्रशासनिक पुनर्गठन और संथाल परगना जैसी विशेष व्यवस्थाओं की दिशा बनी।

वारली संघर्ष ने भी प्रत्यक्ष शासन-परिवर्तन नहीं किया, लेकिन काश्तकारी reform, वनभूमि regularisation और आगे FRA तक के लंबे अधिकार विमर्श में योगदान देने वाली सामाजिक शक्ति बना।

दोनों में एक समान सूत्र है—

विद्रोह समाप्त हुआ, लेकिन राज्य को आदिवासी प्रशासन की पुरानी व्यवस्था बदलनी पड़ी।

# वारली और भील आंदोलन

16. ‘भील आंदोलन’ एक घटना नहीं

यहां सावधानी जरूरी है।

संथाल हूल की तरह “भील आंदोलन” किसी एक घटना का नाम नहीं है।

कुछ औपनिवेशिक शासन और राजस्व के विरुद्ध थे।

18. सांस्कृतिक नेतृत्व बनाम वर्गीय संगठन

धार्मिक-सामाजिक सुधार,

अध्याय 36

वारली आंदोलन की उपलब्धियां और सीमाएं — वेठ-बेगार की समाप्ति, मजदूरी, भूमि–वन अधिकार, राजनीतिक चेतना और अधूरे सामाजिक परिवर्तन का संतुलित मूल्यांकन

वारली आंदोलन की ऐतिहासिक उपलब्धियों का मूल्यांकन करते समय दो अतियों से बचना आवश्यक है। पहली—इसे पूर्ण क्रांति मान लेना जिसने वारली समाज की सभी समस्याएं हल कर दीं। दूसरी—इसे केवल 1945–47 का सीमित कम्युनिस्ट-नेतृत्व वाला विद्रोह मानकर उसके दीर्घकालीन प्रभाव को कम करके देखना। वास्तविकता इन दोनों के बीच है।

वारली आंदोलन ने ग्रामीण सत्ता-संबंधों को बदलने, जबरन श्रम को चुनौती देने, मजदूरी को सामूहिक सौदेबाजी का प्रश्न बनाने, आदिवासी किसान को राजनीतिक संगठन देने और भूमि–वन अधिकार को दशकों तक सार्वजनिक एजेंडे पर बनाए रखने में असाधारण सफलता प्राप्त की। लेकिन भूमिहीनता, गरीबी, असुरक्षित आजीविका, कर्ज, वन-अधिकार के अपूर्ण क्रियान्वयन और विकास की असमानता जैसी समस्याएं समाप्त नहीं हुईं।

इसलिए वारली आंदोलन को सबसे सही रूप में एक निर्णायक सामाजिक मुक्ति की शुरुआत, लेकिन अधूरी आर्थिक मुक्ति के रूप में समझा जा सकता है।

1. पहली और सबसे प्रत्यक्ष उपलब्धि — वेठ-बेगार का टूटना

वारली आंदोलन की तत्कालीन सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि जबरन श्रम की व्यवस्था पर प्रहार था।

1945 से पहले वारली परिवारों से भू-स्वामियों द्वारा बिना उचित मजदूरी विभिन्न प्रकार के काम कराने की व्यवस्था सामाजिक जीवन का हिस्सा बन चुकी थी। किसान सभा के आंदोलनकारी विवरण के अनुसार संगठित प्रतिरोध के बाद वेठ बहुत तेजी से टूटने लगी और कुछ ही सप्ताह में कई क्षेत्रों में जबरन श्रम व्यवहारतः समाप्त हो गया। यह दावा किसान सभा के अपने स्रोत से आता है, इसलिए उसकी भाषा को आंदोलनकारी स्रोत के रूप में पढ़ना चाहिए; लेकिन वेठ-विरोध की सफलता को बाद का पूरा इतिहास भी वारली आंदोलन की मूल उपलब्धियों में मानता है।

यह परिवर्तन केवल आर्थिक नहीं था।

भू-स्वामी वारली के शरीर और समय का मालिक नहीं है।

यही आंदोलन की पहली सामाजिक क्रांति थी।

2. वेठ समाप्त होने का मनोवैज्ञानिक प्रभाव

जबरन श्रम व्यवस्था केवल मुफ्त काम नहीं थी।

भू-स्वामी को मना करने का साहस न होना।

इसलिए जब सामूहिक रूप से वारलियों ने कहा—

“मुफ्त काम नहीं करेंगे”—

तो उन्होंने केवल एक आर्थिक प्रथा नहीं तोड़ी।

उन्होंने भय का सामाजिक अनुशासन तोड़ा।

यही कारण है कि वेठ-विरोध को आंदोलन की सबसे गहरी प्रारंभिक उपलब्धि माना जाना चाहिए।

3. मजदूरी को निजी सौदे से सामूहिक अधिकार बनाना

1945 से पहले मजदूरी की दर प्रायः भू-स्वामी अथवा ठेकेदार तय करता था।

वारली आंदोलन ने इसे बदलकर सामूहिक सौदेबाजी का विषय बनाया।

घास काटने वाले मजदूरों ने सामूहिक दर मांगी।

वन-मजदूरों ने ठेकेदारों के खिलाफ लंबी हड़ताल की।

1946 में पेड़ काटने और लकड़ी उतारने वाले मजदूरों का संघर्ष महाराष्ट्र टिम्बर मर्चेंट्स एसोसिएशन तक पहुंचा और समझौता हुआ। किसान सभा के पुराने स्रोत 10 नवंबर 1946 के समझौते और मजदूरों के पक्ष में बेहतर शर्तों का दावा करते हैं।

यह परिवर्तन महत्वपूर्ण था क्योंकि मजदूर पहली बार नियोक्ता के सामने व्यक्ति नहीं, संगठित श्रम शक्ति बनकर खड़ा हुआ।

4. मजदूरी संघर्ष स्थायी क्यों रहा?

यदि 1945 की जीत अंतिम होती तो आगे मजदूरी आंदोलन की आवश्यकता न पड़ती।

1950 के दशक से फिर मजदूरी विवाद।

1975 में न्यूनतम मजदूरी लागू कराने का संघर्ष।

और इक्कीसवीं सदी में मनरेगा मजदूरी तथा ग्रामीण रोजगार फिर राजनीतिक मुद्दे बने। 2018 के किसान लॉन्ग मार्च में भी MNREGA work and wages प्रमुख मांगों में शामिल थे।

इससे आंदोलन की उपलब्धि और सीमा दोनों स्पष्ट होती हैं।

उपलब्धि: मजदूरी को अधिकार बनाया।

सीमा: पर्याप्त मजदूरी स्थायी रूप से सुनिश्चित नहीं हुई।

# बंधुआ श्रम की समाप्ति

5. क्या 1945 के बाद बंधुआ संबंध खत्म हो गए?

पुरानी वेठ और लग्नगाड़ी जैसी व्यवस्थाएं निर्णायक रूप से कमजोर हुईं।

लेकिन गरीबी और ऋण के कारण श्रम-निर्भरता के नए रूप बने रहे।

इसलिए 1970 के दशक में भी बंधुआ मजदूरी उन्मूलन का प्रश्न उठाना पड़ा।

इसका अर्थ यह नहीं कि 1945 विफल था।

अधिक सटीक निष्कर्ष है—

पुरानी सामाजिक बंधुआ व्यवस्था टूटी, लेकिन उसकी आर्थिक जड़—गरीबी और ऋण—पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।

# भूमि-अधिकार : दूसरी बड़ी उपलब्धि

6. मजदूरी से जमीन तक

वारली आंदोलन की शक्ति केवल वेठ समाप्त करने तक सीमित रहती तो उसका महत्व बहुत कम होता।

लेकिन आंदोलन ने अगला प्रश्न उठाया—

जिस जमीन को किसान जोतता है, उसका अधिकार किसके पास होना चाहिए?

इसीसे “कसेल त्याची जमीन”—जो जोते जमीन उसकी—जैसे नारे मजबूत हुए।

1948 के काश्तकारी reform और आगे 1 अप्रैल 1957 के Tillers’ Day ने पात्र किरायेदारों को स्वामित्व की दिशा में कानूनी रास्ता दिया।

इन कानूनों को केवल वारली आंदोलन का परिणाम कहना अतिशयोक्ति होगा, लेकिन ठाणे के किसान संघर्ष ने किरायेदारी और भूमि-सुधार की राजनीतिक आवश्यकता को तीखा जरूर किया।

7. भूमि सुधार ने सामाजिक सत्ता बदली

किरायेदार जब मालिक बना तो केवल जमीन का कागज नहीं बदला।

भू-स्वामी की शक्ति घटी।

बेदखली का भय कम हुआ।

परिवार के पास उत्तराधिकार योग्य संपत्ति आई।

इसलिए भूमि सुधार वारली आंदोलन की सामाजिक मुक्ति का दूसरा बड़ा चरण था।

8. लेकिन कौन छूट गया?

यहीं भूमि सुधार की सबसे बड़ी सीमा सामने आई।

काश्तकारी reform उन लोगों के लिए उपयोगी था जो tenant थे।

जो पहले ही भूमिहीन खेत-मजदूर बन चुके थे—

उनके पास स्वामित्व में बदलने के लिए किरायेदारी भूमि ही नहीं थी।

इसलिए कुछ वारली मालिक किसान बने, लेकिन दूसरी बड़ी आबादी भूमिहीन श्रमिक बनी रही।

यही आगे वनभूमि संघर्ष की पृष्ठभूमि बनी।

# वनभूमि आंदोलन की ऐतिहासिक उपलब्धि

9. ‘अतिक्रमण’ को अधिकार के प्रश्न में बदलना

यह वारली आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक उपलब्धियों में से एक थी।

वनभूमि पर अवैध कब्जा।

कौन वर्षों से जमीन जोत रहा है?

किसकी जीविका इससे जुड़ी है?

इस प्रश्न ने वन प्रशासन की भाषा बदलने में योगदान दिया।

1960 के दशक से वन-प्लॉट regularisation, 1971 का सत्याग्रह, 1978–79 की कट-ऑफ लड़ाई और आगे वन अधिकार अधिनियम—सब उसी ऐतिहासिक विमर्श की अलग अवस्थाएं बने।

10. पांच हजार से अधिक गिरफ्तारियां क्या दर्शाती हैं?

1971 के वनभूमि सत्याग्रह में किसान सभा के स्रोत और बाद के अध्ययनों में पांच हजार से अधिक आदिवासियों की गिरफ्तारी का उल्लेख मिलता है।

संख्या का स्रोत आंदोलनकारी नेटवर्क से जुड़ा है, इसलिए इसे सटीक सरकारी जनगणना की तरह नहीं पढ़ना चाहिए।

लेकिन इसका महत्व स्पष्ट है—

वनभूमि प्रश्न व्यापक सामुदायिक मुद्दा बन चुका था।

आंदोलन अब केवल वेठ-विरोधी स्थानीय संघर्ष नहीं, भूमि और राज्य नीति की बड़ी लड़ाई था।

# वन अधिकार अधिनियम तक पहुंचने वाली विरासत

11. क्या FRA वारली आंदोलन की सीधी उपलब्धि था?

सीधा कारण–परिणाम स्थापित करना गलत होगा।

वन अधिकार अधिनियम, 2006 देशभर के दशकों लंबे आदिवासी और वनाधिकार आंदोलनों, नीति बहसों और सामाजिक दबाव का परिणाम था।

लेकिन वारली संघर्ष उन ऐतिहासिक आंदोलनों में अवश्य था जिसने बार-बार यह प्रश्न उठाया—

और दस्तावेजहीन अधिकार।

इस अर्थ में वह आधुनिक forest-rights politics की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पूर्वपीठिका था।

# राजनीतिक चेतना : सबसे टिकाऊ उपलब्धि

12. एक भयभीत श्रमिक से संगठित राजनीतिक नागरिक

शायद वारली आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि भूमि या मजदूरी की किसी एक संख्या में नहीं थी।

आदिवासी जिसने कभी भू-स्वामी के आदेश को सामाजिक नियति माना था, अब—

राजस्व अधिकारी से सवाल करता था,

वन अधिकार दावा दाखिल करता था,

और मुख्यमंत्री से लिखित समझौता मांगता था।

यह रूपांतरण बहुत गहरा है।

13. संगठन की निरंतरता

1945 का आंदोलन दमन के बाद समाप्त होकर केवल स्मृति बन सकता था।

किसान सभा का नेटवर्क दशकों तक बना रहा।

यही वारली आंदोलन को कई अन्य विद्रोहों से अलग करता है।

# स्थानीय नेतृत्व का निर्माण

28. क्या हर वनभूमि खेती में बदल सकती है?

ऐतिहासिक आजीविका अधिकार

अध्याय 37

वारली आंदोलन का इतिहासलेखन — गोदावरी परुलेकर से आधुनिक आदिवासी अध्ययन तक : मार्क्सवादी, राष्ट्रवादी, उपनिवेशोत्तर और मौखिक इतिहास की प्रमुख व्याख्याएं

वारली आंदोलन का इतिहास केवल घटनाओं का इतिहास नहीं है; वह उन घटनाओं को किसने, किस दृष्टिकोण से और किन स्रोतों के आधार पर लिखा, इसका भी इतिहास है। यही इतिहासलेखन का प्रश्न है। 1945–47 के संघर्ष के बारे में उपलब्ध स्रोतों में कम्युनिस्ट नेताओं की आत्मकथात्मक और आंदोलनकारी रचनाएं, कांग्रेस-समर्थक तथा अन्य समकालीन समाचार-पत्र, सरकारी अभिलेख, बाद के अकादमिक अध्ययन, भूमि–वन अधिकार पर शोध और हाल के मौखिक इतिहास—सभी शामिल हैं। इन स्रोतों के दृष्टिकोण एक-दूसरे से कई बार तीखे रूप से भिन्न हैं।

इसलिए वारली आंदोलन पर कोई भी गंभीर शोध तभी विश्वसनीय हो सकता है जब वह यह स्वीकार करे कि लगभग कोई प्रमुख स्रोत पूरी तरह निष्पक्ष नहीं है। लेस्ली कैलमन ने अपने महत्वपूर्ण अध्ययन में इसी समस्या की ओर स्पष्ट संकेत किया था। उन्होंने लिखा कि गोदावरी और शामराव परुलेकर की रचनाएं आंदोलन के प्रमुख कम्युनिस्ट नेताओं द्वारा लिखी गई थीं; *Bombay Chronicle* का कांग्रेस-पक्षीय झुकाव था; जबकि *Times of India* को उन्होंने उस समय उपलब्ध अपेक्षाकृत विस्तृत और संतुलित समाचार स्रोतों में माना।

यहीं से वारली इतिहासलेखन का मूल सिद्धांत निकलता है—

किसी एक स्रोत को पूरा इतिहास नहीं माना जा सकता।

1. इतिहासलेखन का पहला चरण — आंदोलनकारी स्मृति

वारली आंदोलन का सबसे प्रभावशाली प्रारंभिक इतिहास स्वयं उसके नेताओं ने लिखा।

इस धारा के केंद्र में हैं—

गोदावरी परुलेकर और शामराव परुलेकर।

इनकी रचनाओं ने कई दशकों तक वारली आंदोलन को समझने की मूल रूपरेखा निर्धारित की।

गोदावरी परुलेकर की प्रसिद्ध मराठी पुस्तक “जेव्हा माणूस जागा होतो”—जिसका आशय लगभग “जब मनुष्य जागता है” है—बाद में अंग्रेजी में *The Awakening of Man* तथा *Adivasis Revolt: The Story of Warli Peasants in Struggle* जैसी रूपांतरित/संबद्ध प्रकाशन परंपरा में प्रसिद्ध हुई। यह पुस्तक आंदोलन के अंदर से लिखा गया एक प्रभावशाली वृत्तांत है और बाद में उसे साहित्यिक मान्यता भी मिली। AIKS के आधुनिक प्रकाशन इसे वारली संघर्ष की आधारभूत स्मृति के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

# गोदावरी परुलेकर की व्याख्या

2. “मनुष्य के जागने” की कथा

गोदावरी परुलेकर का दृष्टिकोण मूलतः मुक्ति की कथा है।

उनकी केंद्रीय व्याख्या में वारली समाज पहले—

भू-स्वामी पर निर्भर,

और राजनीतिक रूप से असंगठित

किसान सभा के प्रवेश के बाद वह स्वयं अपनी शक्ति पहचानता है।

इसलिए आंदोलन केवल मजदूरी संघर्ष नहीं, मानवीय गरिमा का जागरण है।

यही पुस्तक के शीर्षक का सबसे गहरा अर्थ है।

3. मार्क्सवादी इतिहासलेखन का मूल ढांचा

परुलेकर की व्याख्या में सामाजिक संबंधों को वर्गीय संरचना में रखा गया।

औपनिवेशिक/राज्य सत्ता।

गरीब आदिवासी किसान और मजदूर।

अर्थात शोषण व्यक्तिगत दुर्व्यवहार नहीं बल्कि वर्गीय व्यवस्था है।

सभी उसी व्यापक ग्रामीण संरचना की अभिव्यक्तियां हैं।

यह दृष्टि आगे लगभग पूरे मार्क्सवादी वारली इतिहासलेखन का आधार बनी।

4. परुलेकर स्रोत की सबसे बड़ी ताकत

उनकी सबसे बड़ी ताकत है—

गोदावरी और शामराव आंदोलन के बाहरी पर्यवेक्षक नहीं थे।

वारली पाड़ों में गए,

मजदूरी संघर्ष आयोजित किए,

गिरफ्तारी और सरकारी कार्रवाई देखी,

और आंदोलन की रणनीति में सीधे शामिल थे।

इसलिए उनके विवरण में ऐसी सूक्ष्म स्थानीय जानकारियां मिलती हैं जो सरकारी रिपोर्ट में शायद नहीं मिलें।

5. उसकी सबसे बड़ी सीमा

ठीक यही उसकी सीमा भी है।

नेता अपने आंदोलन का इतिहास लिख रहा है।

किसान सभा की उपलब्धि अधिक दिखाई दे सकती है,

सरकार का दमन अधिक केंद्रीय,

और संगठन की रणनीतिक गलतियां कम दिखाई दे सकती हैं।

कैलमन ने इसी कारण परुलेकरों के लेखन को अत्यंत उपयोगी लेकिन राजनीतिक रूप से पक्षधर स्रोत माना।

इसलिए गोदावरी परुलेकर को न तो खारिज करना चाहिए, न उन्हें अंतिम शब्द मानना चाहिए।

# शामराव परुलेकर की रचनाएं

6. अधिक स्पष्ट वर्ग-संघर्ष का ढांचा

शामराव परुलेकर की *The Liberation Movement Among Varlis* और *The Struggle of 1946* जैसी रचनाएं बाद में ए. आर. देसाई संपादित *Peasant Struggles in India* में भी उद्धृत हुईं। कैलमन बताती हैं कि ये लेख मूलतः आंदोलन की समकालीन कम्युनिस्ट व्याख्या का हिस्सा थे और पहले की *Revolt of the Varlis* परंपरा से जुड़े थे।

उनकी भाषा गोदावरी की साहित्यिक–मानवीय भाषा की तुलना में अधिक संगठनात्मक और वर्गीय है।

राज्य किस वर्ग के पक्ष में खड़ा है?

# मार्क्सवादी इतिहासलेखन की बड़ी उपलब्धि

7. वारली को “आदिम जनजाति” नहीं, राजनीतिक किसान बनाना

औपनिवेशिक और शुरुआती मानवशास्त्रीय लेखन में आदिवासी समुदायों को अक्सर—

जैसी श्रेणियों में देखा जाता था।

मार्क्सवादी इतिहासलेखन ने यह दृष्टि बदल दी।

वारली अब केवल ethnographic curiosity नहीं था।

और वर्गीय संघर्ष का सक्रिय कर्ता

यह भारतीय आदिवासी इतिहासलेखन में अत्यंत महत्वपूर्ण बदलाव था।

8. लेकिन क्या इससे आदिवासी विशिष्टता दब गई?

यही मार्क्सवादी इतिहासलेखन की एक बड़ी आलोचना है।

यदि वारली को केवल “poor peasant” या “agricultural labourer” के रूप में पढ़ा जाए, तो उसकी—

और विशिष्ट आदिवासी ऐतिहासिक अनुभव

इसलिए बाद के आदिवासी अध्ययनों ने वर्ग विश्लेषण को उपयोगी माना, लेकिन उसे पर्याप्त नहीं माना।

# दूसरा इतिहासलेखन — राष्ट्रवादी और कांग्रेस दृष्टि

9. कांग्रेस की मूल कथा क्या थी?

राष्ट्रवादी–कांग्रेस दृष्टि वारली समस्या को पूरी तरह नकारती नहीं थी।

1939 की Symington Report स्वयं बंबई की कांग्रेस सरकार की पहल पर तैयार हुई थी और उसने वेठ, कर्ज तथा आदिवासी दयनीयता को गंभीर रूप से दर्ज किया। कैलमन के अध्ययन में यह रिपोर्ट महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत के रूप में सामने आती है।

लेकिन कांग्रेस की व्याख्या सामान्यतः यह थी—

आदिवासी समस्या वास्तविक है,

कम्युनिस्ट वर्ग-संघर्ष और तीव्र लामबंदी को वह कई बार समस्या के समाधान के बजाय कानून-व्यवस्था की नई समस्या मानती थी।

10. राष्ट्रवादी इतिहासलेखन की केंद्रीय अवधारणा — “उत्थान”

कांग्रेस-प्रेरित स्रोतों में आदिवासी को अक्सर uplift की आवश्यकता वाले समुदाय के रूप में देखा गया।

यह दृष्टि कम्युनिस्ट “मुक्ति” के विचार से अलग है।

कम्युनिस्ट भाषा

यही दो इतिहासलेखन धाराओं का बुनियादी अंतर है।

# Bombay Chronicle और राष्ट्रवादी मीडिया

11. स्रोत के रूप में सावधानी

कैलमन विशेष रूप से *Bombay Chronicle* को कांग्रेस-पक्षीय झुकाव वाला बताती हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि उसकी रिपोर्टें असत्य थीं।

और जिम्मेदारी तय करने का तरीका

राजनीतिक दृष्टिकोण से प्रभावित हो सकता था।

यही नियम कम्युनिस्ट समाचार-साहित्य पर भी लागू होता है।

# तीसरी धारा — सरकारी और प्रशासनिक इतिहास

12. सरकार आंदोलन को कैसे देखती थी?

सरकारी फाइलों की भाषा सामान्यतः होती थी—

और प्रशासनिक नियंत्रण।

Bombay Government की fortnightly political reports में 1946–47 के दौरान कम्युनिस्ट रणनीतियों के दूसरे जिलों में फैलने को लेकर चिंता दर्ज थी। कैलमन ने National Archives की Home-Political files का उपयोग कर दिखाया कि प्रशासन वारली आंदोलन को व्यापक कम्युनिस्ट विस्तार की संभावना के संदर्भ में देख रहा था।

यह स्रोत अत्यंत उपयोगी है क्योंकि इससे राज्य की आंतरिक चिंता दिखाई देती है।

13. सरकारी स्रोत की सीमा

सरकारी दस्तावेज यह बताते हैं—

प्रशासन क्या सोच रहा था।

वे हमेशा यह नहीं बताते—

गांव में वास्तव में क्या अनुभव किया जा रहा था।

पुलिस रिपोर्ट में व्यक्ति—

उसके गांव में वही व्यक्ति—

इसीलिए प्रशासनिक स्रोत को सामाजिक वास्तविकता का पूर्ण पर्याय नहीं माना जा सकता।

# चौथी धारा — स्वतंत्र अकादमिक पुनर्पाठ

14. लेस्ली कैलमन का निर्णायक हस्तक्षेप

वारली इतिहासलेखन में सबसे महत्वपूर्ण स्वतंत्र अकादमिक मोड़ों में से एक है Leslie J. Calman का 1987 का लेख, *Congress Confronts Communism: Thana District, 1945–47*।

कैलमन की मूल व्याख्या दो स्तरों पर काम करती है।

वारली मजदूरों की वास्तविक आर्थिक शिकायतें थीं—

जबरन श्रम से मुक्ति,

और भू-स्वामी violence।

15. कैलमन का सबसे प्रभावशाली निष्कर्ष

उसे कौन नेतृत्व देगा?

# कैलमन की स्रोत-पद्धति

17. कैलमन की सीमा

Congress versus Communism।

अध्याय 38

वारली आंदोलन की विस्तृत समयरेखा — औपनिवेशिक वन व्यवस्था और भूमि-वंचना से 1945 के विद्रोह, 1957 टिलर्स डे, 1971 वन सत्याग्रह, 2006 FRA और 2026 के किसान–आदिवासी आंदोलनों तक

वारली आंदोलन की समयरेखा किसी एक विद्रोह की कालक्रम सूची नहीं है। यह लगभग डेढ़ सदी में बदलती हुई उस सामाजिक प्रक्रिया की कहानी है जिसमें जंगल पर राज्य नियंत्रण, जमीन से बेदखली, वेठ-बेगार, कम मजदूरी, किसान सभा का संगठन, भूमि सुधार, वन-प्लॉट के अधिकार, वन संरक्षण कानून, न्यायपालिका और अंततः वन अधिकार अधिनियम एक-दूसरे से जुड़ते गए।

इस समयरेखा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यही है कि 1945 आरंभ नहीं, निर्णायक विस्फोट था; और 1947 अंत नहीं, अगले आठ दशकों के संघर्ष का आधार।

1860–70 के दशक — औपनिवेशिक वन प्रशासन का विस्तार

ब्रिटिश शासन में जंगल को स्थानीय समुदाय की साझा आजीविका के बजाय राजस्व, लकड़ी और प्रशासनिक नियंत्रण के संसाधन के रूप में देखने की प्रवृत्ति मजबूत हुई। वन कानूनों और सर्वेक्षणों ने ऐसी जमीनों को सरकारी नियंत्रण में लाना शुरू किया जिनसे आदिवासी समुदाय पीढ़ियों से जुड़े थे।

वारली समाज के लिए इसका दीर्घकालीन परिणाम था—

परंपरागत वन उपयोग पर प्रतिबंध,

वनभूमि की सरकारी श्रेणी,

और खेती तथा कानूनी स्वामित्व के बीच बढ़ती दूरी।

1878 — भारतीय वन अधिनियम

औपनिवेशिक वन नीति को अधिक केंद्रीकृत स्वरूप मिला। Reserved और Protected Forest जैसी श्रेणियों के विस्तार ने स्थानीय उपयोग अधिकारों को प्रशासनिक अनुमति के अधीन कर दिया।

यह आगे वारली इतिहास में बार-बार लौटने वाले प्रश्न की नींव थी—

जिस जमीन और जंगल का समुदाय वास्तविक उपयोग करता है, सरकारी कागज में उसका मालिक कौन है?

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध–बीसवीं सदी का प्रारंभ — भूमि-वंचना और ऋण

ठाणे के आदिवासी क्षेत्रों में गैर-आदिवासी भू-स्वामियों और साहूकारों की पकड़ बढ़ी। ऋण, दस्तावेजी कमजोरी और भूमि संबंधों में असमानता ने अनेक वारली परिवारों को—

यही सामाजिक संरचना आगे 1945 के विस्फोट का आधार बनी।

1927 — Indian Forest Act

Indian Forest Act, 1927 ने औपनिवेशिक वन शासन की कई व्यवस्थाओं को एक समेकित वैधानिक ढांचे में रखा। स्वतंत्रता के बाद भी इसकी बड़ी संरचनाएं जारी रहीं। आज पालघर प्रशासन की भूमि तथा वन संबंधी सूचनाओं में 1927 अधिनियम की धाराओं के अंतर्गत पुराने सरकारी आदेश और अधिसूचनाएं अब भी अभिलेखीय महत्व रखती हैं।

# 1930 का दशक : समस्या की सरकारी पहचान

1937 — बंबई में कांग्रेस मंत्रालय

प्रांतीय स्वायत्तता के बाद बंबई में कांग्रेस सरकार बनी। आदिवासी जीवन की खराब परिस्थितियां अब केवल मिशनरी या मानवशास्त्रीय रिपोर्ट का विषय नहीं रहीं; वे प्रांतीय नीति में प्रवेश करने लगीं।

1939 के आसपास — Symington Report

डी. साइमिंगटन की आदिवासी पहाड़ी समुदायों पर रिपोर्ट ने गरीबी, साहूकारी, वेठ और सामाजिक उत्पीड़न की गंभीरता को उजागर किया।

इसका ऐतिहासिक महत्व इसलिए है कि 1945 से पहले ही प्रशासन को पता था कि ठाणे के आदिवासी इलाकों में शोषण की संरचना गंभीर थी।

अर्थात वारली विद्रोह अचानक पैदा हुआ “बाहरी राजनीतिक उकसावा” भर नहीं था।

# 1944 : विद्रोह की पूर्वपीठिका

1944 — प्रारंभिक मजदूरी असंतोष

वारली मजदूरों के बीच मजदूरी और श्रम संबंधों को लेकर असंतोष पहले से मौजूद था। कुछ स्थानीय और सुधारवादी प्रयास हुए, लेकिन स्थायी व्यापक संगठन नहीं बन पाया।

यही वह रिक्ति थी जिसे अगले वर्ष किसान सभा भरने वाली थी।

# 1945 : निर्णायक वर्ष

12 जनवरी 1945 — टिटवाला किसान सम्मेलन

ठाणे जिले के टिटवाला में महाराष्ट्र किसान सभा के संगठनात्मक विकास का महत्वपूर्ण सम्मेलन हुआ। शामराव परुलेकर और गोदावरी परुलेकर नेतृत्व की अग्रिम पंक्ति में आए।

यहीं से आदिवासी प्रश्न एक व्यापक किसान संगठन से जुड़ा।

वसंत 1945 — किसान सभा का वारली क्षेत्र में प्रवेश

दहानू, तलासरी और आसपास के पाड़ों में बैठकों की शुरुआत हुई।

शुरुआती केंद्रीय प्रश्न थे—

और भू-स्वामी का सामाजिक आतंक।

1945 — “मुफ्त श्रम नहीं”

वारली मजदूरों ने सामूहिक रूप से वेठ-बेगार करने से इनकार करना शुरू किया।

यह आंदोलन का पहला निर्णायक सामाजिक मोड़ था।

पहली बार व्यक्तिगत इनकार सामूहिक संगठन के सहारे सुरक्षित हुआ।

1945 — घास काटने वाले मजदूरों का संघर्ष

घास काटने की मजदूरी बढ़ाने का अभियान आंदोलन को वेठ-विरोध से आगे आर्थिक सामूहिक सौदेबाजी की दिशा में ले गया।

सिर्फ मुफ्त श्रम खत्म नहीं,

भुगतान वाला श्रम भी उचित दर पर।

1945 — लाल झंडे का गांव नेटवर्क

किसान सभा ने गांवों, पाड़ों और स्थानीय कार्यकर्ताओं का नेटवर्क बनाया। लाल झंडा धीरे-धीरे केवल पार्टी प्रतीक नहीं रहा; वह संगठन और सुरक्षा का चिह्न बन गया।

1945 — महिलाओं की बढ़ती भागीदारी

वारली महिलाओं ने मजदूरी, वेठ और सामाजिक उत्पीड़न के प्रश्नों पर आंदोलन में सक्रिय स्थान बनाया।

यह संघर्ष की सामाजिक गहराई का संकेत था।

अक्टूबर 1945 — तलवाड़ा गोलीकांड

तलवाड़ा में पुलिस गोलीबारी वारली आंदोलन का पहला बड़ा रक्तरंजित मोड़ बनी। पांच वारलियों के मारे जाने का विवरण आंदोलन और बाद के अध्ययनों में प्रमुख रूप से दर्ज हुआ।

घटना ने आंदोलन को दबाने के बजाय उसकी राजनीतिक पहचान और गहरी कर दी।

# 1945–46 : दमन और पुनर्गठन

1945 के उत्तरार्ध–1946 — गिरफ्तारियां और नेतृत्व पर कार्रवाई

किसान सभा नेताओं को क्षेत्र से बाहर करने, कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करने और गांव नेटवर्क तोड़ने की कोशिश हुई।

लेकिन संगठन स्थानीय नेतृत्व के सहारे जारी रहा।

यहीं वारली आंदोलन ने पहली बार सिद्ध किया कि वह केवल कुछ बाहरी नेताओं पर निर्भर नहीं।

# 1946 : वन-मजदूरों का बड़ा संघर्ष

1946 — लकड़ी और वन-ठेकेदारों के मजदूरों की हड़ताल

पेड़ काटने, लकड़ी ढोने और जंगल में काम करने वाले मजदूरों ने बेहतर मजदूरी के लिए लंबा संघर्ष किया।

यह आंदोलन कृषि मजदूरी से आगे वन अर्थव्यवस्था तक फैल गया।

10 नवंबर 1946 के आसपास — टिम्बर व्यापारियों से समझौता

मजदूरों और टिम्बर व्यापारियों के बीच मजदूरी संबंधी समझौता हुआ।

इससे किसान सभा की संगठनात्मक विश्वसनीयता बढ़ी।

14 नवंबर 1946 — ठाणे क्षेत्र में आपात प्रशासनिक स्थिति

बंबई की कांग्रेस सरकार ने कम्युनिस्ट प्रभाव और कानून-व्यवस्था की स्थिति को गंभीर मानते हुए ठाणे में कठोर प्रशासनिक कदम उठाए।

अब कांग्रेस और किसान सभा की प्रतिस्पर्धा खुलकर राज्य बनाम आंदोलन के स्वरूप में दिखाई देने लगी।

# 1947 : स्वतंत्रता के पहले दूसरा बड़ा दमन

जनवरी 1947 — सैन्य उपस्थिति

दहानू क्षेत्र में Maratha Light Infantry की एक कंपनी तक तैनात किए जाने का उल्लेख आधुनिक शोध में मिलता है। इससे स्पष्ट है कि सरकार आंदोलन को स्थानीय मजदूरी विवाद से कहीं अधिक गंभीर राजनीतिक समस्या मान चुकी थी।

7 जनवरी 1947 — पालघर तालुका पुलिस गोलीबारी

पुलिस गोलीबारी में पांच किसानों के मारे जाने का विवरण मानक शैक्षणिक स्रोतों में मिलता है।

यह स्वतंत्रता से केवल सात महीने पहले की घटना थी।

इससे वारली आंदोलन ने एक कठिन प्रश्न उठा दिया—

भारतीय नेतृत्व वाली सरकार और औपनिवेशिक राज्य की ग्रामीण दमन नीति में कितना अंतर होगा?

प्रारंभिक 1947 — आंदोलन का पहला उभार कमजोर पड़ता है

लगातार दमन, गिरफ्तारियों और हिंसा के बाद 1945–47 वाला उग्र चरण कमजोर हुआ।

लेकिन किसान सभा समाप्त नहीं हुई।

यहीं “विद्रोह” से “स्थायी राजनीतिक परंपरा” की यात्रा शुरू होती है।

15 अगस्त 1947 — भारत स्वतंत्र

राजनीतिक सत्ता ब्रिटिश शासन से भारतीय राज्य को मिली।

लेकिन वारली समाज के लिए—

इसलिए स्वतंत्रता आंदोलन का अंत वारली किसान संघर्ष का अंत नहीं बना।

# 1948–57 : किरायेदार से मालिक तक

1948 — Bombay काश्तकारी and Agricultural Lands Act

बंबई राज्य ने किरायेदारों की सुरक्षा, किराये के नियमन और बेदखली पर नियंत्रण की दिशा में महत्वपूर्ण कानून बनाया।

वारली क्षेत्र में किसान सभा का अगला बड़ा संघर्ष कानून बनवाने से अधिक—

1948–50 का दशक — Protected काश्तकारी

किरायेदारों के नाम भूमि रिकॉर्ड में दर्ज कराने, बेदखली रोकने और काश्तकारी rights सुरक्षित करने के अभियान चले।

भूमि रिकॉर्ड अब किसान राजनीति का नया हथियार बना।

1955 — दहानू में अखिल भारतीय किसान सभा का 13वां सम्मेलन

दहानू राष्ट्रीय किसान राजनीति का केंद्र बना।

“कसेल त्याची जमीन” — जो जोते जमीन उसकी।

1945 का मजदूर अब भूमि स्वामित्व की मांग कर रहा था।

1956 — भूमि और सत्ता का संयुक्त नारा

“कसेल त्याची जमीन” के साथ “राबेल त्याचे राज्य” जैसी राजनीतिक भाषा ने भूमि-सुधार को सामाजिक सत्ता से जोड़ दिया।

1 अप्रैल 1957 — Tillers’ Day

वारली आंदोलन की भाषा में—

1974 — वन-प्लॉट मालिकाना दावों का अभियान

कानूनी स्वामित्व दावा

अध्याय 39

वारली आंदोलन के प्रमुख प्राथमिक स्रोत और दस्तावेज — औपनिवेशिक व बंबई सरकार के अभिलेख, पुलिस रिपोर्टें, साइमिंगटन रिपोर्ट, किसान सभा दस्तावेज, परुलेकर लेखन, समाचार-पत्र और वनभूमि संबंधी सरकारी आदेश

वारली आंदोलन का गंभीर इतिहास लिखने के लिए केवल बाद की पुस्तकों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसके बारे में राज्य, पुलिस, किसान सभा, कम्युनिस्ट नेतृत्व, कांग्रेस-समर्थक प्रेस, स्वतंत्र समाचार-पत्र और बाद के वन प्रशासन—सभी ने अलग-अलग प्रकार के दस्तावेज छोड़े हैं। इसलिए इसका स्रोत-संग्रह असाधारण रूप से समृद्ध भी है और जटिल भी।

इन स्रोतों का उपयोग करते समय एक मूल नियम आवश्यक है—

प्राथमिक स्रोत तथ्य का प्रमाण दे सकता है, लेकिन उसकी व्याख्या स्वयं स्रोत की राजनीतिक और प्रशासनिक स्थिति से प्रभावित हो सकती है।

सरकारी फाइल आंदोलन को “कानून-व्यवस्था” की समस्या कह सकती है।

किसान सभा दस्तावेज उसे “मुक्ति-संघर्ष” कहेंगे।

समाचार-पत्र कभी राज्य हिंसा पर, कभी कम्युनिस्ट उग्रता पर जोर देंगे।

इसलिए सर्वोत्तम पद्धति है—

एक ही घटना को कम-से-कम दो या तीन स्वतंत्र स्रोत-परंपराओं से मिलाना।

1. सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक सरकारी स्रोत — डी. साइमिंगटन रिपोर्ट

वारली समाज की 1945 से पहले की स्थिति समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेजों में एक है—

D. Symington, *Report on the Aboriginal Hill Tribes*, Government of Bombay, 1939।

लेस्ली कैलमन के अध्ययन में इसे 1937 की कांग्रेस सरकार द्वारा नियुक्त जांच का परिणाम बताया गया है। रिपोर्ट ने ठाणे के आदिवासियों की गरीबी, कुपोषण, साहूकारी और वेठ व्यवस्था को गंभीर रूप से दर्ज किया। कैलमन के अनुसार साइमिंगटन ने ठाणे में वेठ को ऐसी स्थिति माना जो दासता से बहुत अलग नहीं थी और मारपीट तथा महिलाओं के यौन उत्पीड़न जैसे विवरण भी दर्ज किए।

एक अन्य संदर्भ में रिपोर्ट का विस्तृत शीर्षक इस रूप में मिलता है—

Report on the Aboriginal and Hill Tribes of the Partially Excluded Areas in the Bombay Presidency, Central Government Press, Bombay, 1938।

यहां 1938/1939 का अंतर संस्करण अथवा प्रकाशन-संदर्भ से जुड़ा हो सकता है; शोध संस्करण में दोनों bibliographic forms दर्ज करना उचित होगा और मूल प्रति से अंतिम प्रकाशन-वर्ष सत्यापित करना चाहिए।

2. साइमिंगटन रिपोर्ट इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?

क्योंकि यह 1945 के आंदोलन से पहले की रिपोर्ट है।

इसलिए इसे बाद के कम्युनिस्ट आंदोलन की राजनीतिक भाषा से प्रभावित स्रोत नहीं कहा जा सकता।

यदि वही सरकारी जांच—

की पुष्टि करती है, तो इससे यह स्थापित होता है कि वारली आंदोलन की आर्थिक शिकायतें पूर्व-विद्यमान थीं।

अर्थात आंदोलन ने समस्याएं पैदा नहीं कीं—

उसने पहले से मौजूद समस्याओं को राजनीतिक रूप दिया।

# 3. Bombay Presidency के पुराने भूमि और राजस्व अभिलेख

वारली समाज की भूमि-वंचना समझने के लिए केवल 1940 के दशक की फाइलें पर्याप्त नहीं।

उपयोगी प्राथमिक स्रोतों में शामिल हैं—

Land Revenue Administration Reports of the Bombay Presidency, Proceedings of the Governor of Bombay, पुराने Census Reports, settlement records, survey maps, काश्तकारी registers, और district gazetteers।

एक पुराने सामाजिक-आर्थिक अध्ययन की स्रोत-सूची में *Land Revenue Administration Report of the Bombay Presidency*, 1921 Census, Symington Report और Annual Police Administration Reports जैसे अभिलेख स्पष्ट रूप से दर्ज हैं।

इनसे तीन महत्वपूर्ण चीजें समझी जा सकती हैं—

भूमि किस श्रेणी में थी,

और आदिवासी भूमि-स्वामित्व समय के साथ कैसे बदल रहा था।

# 4. ठाणे जिला गजेटियर

Bombay Presidency और बाद के महाराष्ट्र के District Gazetteers भी महत्वपूर्ण प्राथमिक-सदृश प्रशासनिक स्रोत हैं।

इनका उपयोग विशेष रूप से आंदोलन से पहले की संरचनात्मक पृष्ठभूमि के लिए करना चाहिए।

लेकिन गजेटियर राज्य की दृष्टि से लिखे गए हैं।

इसलिए वे स्थानीय वारली अनुभव का पूर्ण विकल्प नहीं।

# पुलिस और गृह विभाग के अभिलेख

5. Bombay Government Fortnightly Reports

1945–47 की राजनीतिक स्थिति समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक स्रोतों में हैं—

Provincial Fortnightly Reports।

लेस्ली कैलमन ने National Archives of India में स्थित Home-Political File Nos. 18/1–18/12, 1946 और 1947 का उपयोग किया। इन रिपोर्टों में ठाणे के साथ-साथ कोलाबा, कानरा, सूरत, अहमदनगर और सतारा तक “Thana-like tactics” फैलने की सरकारी चिंता दर्ज थी।

यह स्रोत इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सरकार के सार्वजनिक बयान से अलग उसकी आंतरिक राजनीतिक चिंता दिखाता है।

6. इन फाइलों से क्या पता चलता है?

सरकार केवल यह नहीं देख रही थी कि—

वह यह भी देख रही थी—

कम्युनिस्ट संगठन कहां फैल रहा है?

किस जिले में rent withholding की बात हुई?

कहां खेत से फसल उठाई गई?

कहां किसान सभा का प्रभाव बढ़ रहा है?

अर्थात वारली आंदोलन को बंबई सरकार एक संभावित प्रांतीय कम्युनिस्ट किसान रणनीति के केंद्र के रूप में देख रही थी।

# 7. Annual Police Administration Reports

Bombay Presidency के वार्षिक पुलिस प्रशासन प्रतिवेदन भी उपयोगी हैं।

का प्रशासनिक रिकॉर्ड मिल सकता है। पुराने शोध-स्रोतों की सूची में *Annual Police Administration Report of the Province of Bombay including Railways* का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।

लेकिन इन्हें सावधानी से पढ़ना चाहिए।

पुलिस के लिए किसान सभा कार्यकर्ता “agitator” हो सकता है।

वही व्यक्ति गांव के लिए नेता।

# 8. जिला मजिस्ट्रेट और कलेक्टर की फाइलें

1945–47 की घटनाओं के लिए सबसे मूल्यवान लेकिन अपेक्षाकृत कठिन स्रोत हो सकते हैं—

District Collector correspondence,

Magisterial reports,

police firing reports,

और casualty records।

7 जनवरी 1947 पालघर गोलीबारी,

और 1946–47 की सैन्य/पुलिस तैनाती

के लिए मूल जिला अभिलेख अत्यंत महत्वपूर्ण होंगे।

इन दस्तावेजों का व्यवस्थित पुनर्परीक्षण भविष्य के शोध की प्राथमिकता होना चाहिए।

# किसान सभा के प्राथमिक स्रोत

9. अखिल भारतीय किसान सभा के सम्मेलन दस्तावेज

AIKS के सम्मेलन प्रतिवेदन वारली आंदोलन की संगठनात्मक दिशा समझने के लिए अनिवार्य हैं।

और ठाणे क्षेत्र की रिपोर्टें।

AIKS की वेबसाइट पर आज भी अनेक ऐतिहासिक conference documents संरक्षित हैं। 1986 के Golden Jubilee session में वारली संघर्ष पर अलग प्रकाशन जारी किया गया था।

10. 1955 का दहानू सम्मेलन

अखिल भारतीय किसान सभा का 13वां राष्ट्रीय सम्मेलन दहानू में हुआ था।

उस सम्मेलन के मूल proceedings, resolutions और delegates' reports यदि उपलब्ध हों, तो वे 1945 के विद्रोह से 1950 के दशक की “जमीन जोते उसकी” राजनीति तक परिवर्तन समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत हैं।

विशेष रूप से खोजे जाने चाहिए—

भूमि सुधार प्रस्ताव,

आदिवासी प्रश्न पर resolution,

ठाणे संगठन की रिपोर्ट,

और परुलेकर नेतृत्व के वक्तव्य।

# 11. स्थानीय किसान सभा पत्रक और घोषणाएं

आंदोलन के दौरान प्रकाशित—

और गांव समितियों की अपीलें—

यदि अभिलेखागार या निजी संग्रह में मिलें तो वे अत्यंत मूल्यवान होंगे।

इनसे समझा जा सकता है—

आंदोलन गांव की भाषा में स्वयं को कैसे प्रस्तुत करता था?

ऐसे दस्तावेज औपचारिक पार्टी इतिहास से अधिक तत्कालीन राजनीतिक भाषा दिखाते हैं।

12. गोदावरी परुलेकर — सबसे महत्वपूर्ण participant source

गोदावरी परुलेकर का लेखन वारली आंदोलन का सबसे प्रसिद्ध प्रत्यक्ष आंदोलनकारी स्रोत है।

उनकी अंग्रेजी पुस्तक—

Adivasis Revolt: The Story of Warli Peasants in Struggle, National Book Agency, 1975—

1945–47 के आंदोलन पर एक प्रत्यक्ष प्रतिभागी का विस्तृत वृत्तांत है। Google Books इसे 188 पृष्ठ की पुस्तक के रूप में दर्ज करता है और इसके विषयों में जबरन श्रम, भू-स्वामी, moneylenders, grass-cutting, Dahanu, Talasari, Palghar और police repression जैसे शब्द प्रमुख हैं।

13. मराठी मूल — *जेव्हा माणूस जागा होतो*

गोदावरी परुलेकर की मराठी कृति—

जेव्हा माणूस जागा होतो

वारली आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक-राजनीतिक स्मृतियों में है।

# 14. *Revolt of the Warlis*

27. 1957 Tillers’ Day रिकॉर्ड

purchase proceedings,

अध्याय 40

वारली आंदोलन के प्रमुख द्वितीयक स्रोत और संदर्भ ग्रंथ — मानक पुस्तकें, अकादमिक शोध, शोध-प्रबंध, मौखिक इतिहास और उपयोगी डिजिटल अभिलेख

वारली आंदोलन पर द्वितीयक साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह एक ही अनुशासन तक सीमित नहीं है। इसे समझने के लिए किसान इतिहास, आदिवासी अध्ययन, महिला अध्ययन, पर्यावरण इतिहास, भूमि-अधिकार, कम्युनिस्ट राजनीति, सामाजिक मानवशास्त्र और मौखिक इतिहास—सभी की सामग्री उपयोगी है। यही कारण है कि एक संतुलित शोधकर्ता को केवल गोदावरी परुलेकर या किसान सभा के साहित्य पर निर्भर नहीं रहना चाहिए; उतना ही आवश्यक है स्वतंत्र अकादमिक शोध, आलोचनात्मक समाजशास्त्र, महिला-केंद्रित अध्ययन और समकालीन वनाधिकार साहित्य।

एक महत्वपूर्ण स्रोतगत भेद यहां शुरू में स्पष्ट कर देना चाहिए। गोदावरी और शामराव परुलेकर के मूल आंदोलनकारी लेखन प्राथमिक/प्रतिभागी स्रोत हैं, जबकि उन पर आधारित बाद के अध्ययन द्वितीयक स्रोत हैं। इसी तरह अर्चना प्रसाद की पुस्तक एक आधुनिक ऐतिहासिक व्याख्या है, लेकिन उसके भीतर संकलित मूल साक्षात्कार मौखिक प्राथमिक सामग्री की प्रकृति रखते हैं।

1. वारली आंदोलन के लिए सबसे आवश्यक अकादमिक लेख — Leslie J. Calman

वारली आंदोलन के स्वतंत्र अकादमिक अध्ययन में सबसे पहले जिस लेख को पढ़ना चाहिए वह है—

Leslie J. Calman, “Congress Confronts Communism: Thana District, 1945–47,” Modern Asian Studies, Vol. 21, No. 2, 1987, pp. 329–348.

यह लेख वारली आंदोलन के इतिहासलेखन में एक निर्णायक मोड़ है। कैलमन का तर्क है कि 1945–47 में कम्युनिस्ट पार्टी ने वारली आदिवासियों को उचित मजदूरी, जबरन श्रम से मुक्ति और भू-स्वामी violence के खिलाफ संगठित किया; साथ ही उसका दीर्घकालीन राजनीतिक उद्देश्य कांग्रेस के प्रभुत्व को चुनौती देना भी था।

इस लेख का महत्व तीन कारणों से है।

पहला—यह न तो किसान सभा का आधिकारिक इतिहास है, न कांग्रेस का।

दूसरा—लेखक सरकारी फाइलों, समाचार-पत्रों और परुलेकर साहित्य को एक-दूसरे से मिलाकर पढ़ती हैं।

तीसरा—यह आंदोलन को राष्ट्रीय स्वतंत्रता के अंतिम वर्षों की Congress–Communist political competition से जोड़ता है।

वारली आंदोलन के 1945–47 वाले मूल चरण के लिए इसे अनिवार्य पाठ माना जाना चाहिए।

2. Saqib Khan — स्वतंत्रता के बाद की सबसे उपयोगी निरंतरता

Saqib Khan, “The Kisan Sabha and Adivasi Struggles in Thane District after 1947,” Review of Agrarian Studies, Vol. 5, No. 1, 2015, pp. 112–136.

हमारे पिछले अध्यायों में 1950 के दशक से 2000 के दशक तक के अनेक तथ्यों के लिए यह लेख सबसे महत्वपूर्ण आधुनिक स्रोत रहा है।

खान का अध्ययन वारली विद्रोह को 1947 पर समाप्त नहीं करता। वह आगे देखता है—

1978–79 regularisation,

और स्थानीय चुनावी राजनीति।

लेख oral narratives और secondary literature दोनों पर आधारित है। लेखक 1945–47 के विद्रोह को ठाणे की कृषि राजनीति में “critical watershed” मानते हैं और दिखाते हैं कि किसान सभा ने बाद में भूमि, जंगल, पानी, मजदूरी और अन्य livelihood issues पर निरंतर संगठन बनाए रखा।

हमारे पूरे वारली डोसियर के स्वतंत्रता-पश्चात हिस्से के लिए यह सबसे उपयोगी एकल अकादमिक लेख है।

# 3. Ashok K. Upadhyaya — वारली समाज के “peasantisation” को समझने के लिए

दो महत्वपूर्ण लेख हैं—

Ashok K. Upadhyaya, “Peasantization of Adivasis in Thane District,” Economic and Political Weekly, Vol. 15, No. 52, 1980.

Ashok K. Upadhyaya, “Peasant Organisations in Thane District: A Critical Overview,” Economic and Political Weekly, Vol. 17, No. 5, 1982, pp. 163–168.

इन दोनों लेखों का महत्व अत्यंत बड़ा है।

ये प्रश्न पूछते हैं—

आदिवासी किसान कैसे बना?

भूमि और बाजार संबंधों ने पारंपरिक आदिवासी जीवन को कैसे बदला?

किसान संगठन सामाजिक परिवर्तन में कितने प्रभावी रहे?

और वर्गीय संगठन ने आदिवासी समाज पर क्या प्रभाव डाला?

यह साहित्य वारली आंदोलन को केवल नायक–नेता और गोलीकांड के इतिहास से निकालकर agrarian transformation के अध्ययन में रखता है।

# 4. Indra Munshi Saldanha — महिला दृष्टि का अनिवार्य स्रोत

वारली आंदोलन पर सबसे महत्वपूर्ण महिला-केंद्रित अध्ययन है—

Indra Munshi Saldanha, *Tribal Women in the Warli Revolt, 1945–1948: “Class” and “Gender” in the Left Perspective*, Research Centre for Women’s Studies, SNDT Women’s University, Bombay, Working Paper No. 4, 1986.

यह 108 पृष्ठ का अध्ययन है और वारली विद्रोह में महिलाओं की भूमिका तथा वामपंथी वर्गीय राजनीति के भीतर gender को केंद्र में रखता है।

इसका महत्व इसलिए असाधारण है क्योंकि मुख्यधारा वारली इतिहास अक्सर दो व्यक्तियों के आसपास केंद्रित हो जाता है—

लेकिन आंदोलन में हजारों साधारण वारली महिलाओं की भूमिका थी।

क्या वर्ग-संघर्ष की भाषा ने महिलाओं के विशेष अनुभव को पर्याप्त स्थान दिया?

यह प्रश्न पूरे मार्क्सवादी इतिहासलेखन की समीक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।

# 5. Archana Prasad — *Red Flag of the Warlis*

Archana Prasad, *Red Flag of the Warlis: History of an Ongoing Struggle*, LeftWord Books, 2017, 164 pages.

यह आधुनिक वारली इतिहासलेखन की सबसे उपयोगी पुस्तकों में से एक है।

इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता है—

LeftWord के अनुसार पुस्तक veteran और contemporary Kisan Sabha activists के साक्षात्कारों पर आधारित है और चार वर्षों के शोध में तैयार हुई। इसका उद्देश्य 1945 के बाद तलासरी और दहानू के संघर्षों को आगे तक देखना और उन स्थानीय कार्यकर्ताओं की आवाज रिकॉर्ड करना है जिन्हें मुख्यधारा इतिहास अक्सर नजरअंदाज करता है।

पुस्तक को तीन कारणों से पढ़ना चाहिए—

1945 के बाद का इतिहास,

स्थानीय कैडर का अनुभव,

और संघर्ष की पीढ़ीगत निरंतरता।

लेकिन इसकी राजनीतिक निकटता किसान सभा–वाम परंपरा से है, इसलिए इसे स्वतंत्र सरकारी/अकादमिक स्रोतों के साथ पढ़ना अधिक उचित होगा।

# 6. Godavari Parulekar की पुस्तक का स्थान

Godavari Parulekar, *Adivasis Revolt: The Story of Warli Peasants in Struggle*, National Book Agency, 1975, 188 pages.

तकनीकी रूप से इसे केवल secondary source कहना ठीक नहीं होगा।

यह participant memoir + movement history है।

Google Books इसे 1945–47 के ठाणे आदिवासी विद्रोह का उस व्यक्ति द्वारा लिखा वृत्तांत बताता है जो स्वयं Communist Party और आंदोलन से जुड़ी थीं।

इसलिए शोध में इसका उपयोग इस रूप में होना चाहिए—

“गोदावरी परुलेकर के प्रत्यक्ष आंदोलनकारी विवरण के अनुसार…”

“स्वतंत्र इतिहासकारों ने सिद्ध किया है…”

यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।

# 7. Bhoomi Sena — बाद के आदिवासी सत्ता-संघर्ष को समझने के लिए

Leslie Calman की bibliography में एक महत्वपूर्ण अध्ययन है—

G. V. S. de Silva, Niranjan Mehta, Anisur Rahman and Ponna Wignaraja, *Bhoomi Sena: A Struggle for People’s Power*, National Institute of Bank Management, Bombay, 1978 pre-publication draft.

यह सीधे 1945 के मूल वारली आंदोलन की पुस्तक नहीं है।

लेकिन ठाणे के आदिवासी क्षेत्र में बाद की भूमि राजनीति और वैकल्पिक संगठनात्मक प्रयोग समझने के लिए बहुत उपयोगी है।

इससे पता चलता है कि 1945 में उठे प्रश्न—

बाद में नए संगठनों में किस प्रकार विकसित हुए।

# 8. भूमि-अधिकार पर आधुनिक सामाजिक न्याय अध्ययन

Economic and Political Weekly में coastal Maharashtra के आदिवासी भूमि अधिकारों पर कई महत्वपूर्ण लेख प्रकाशित हुए।

“In Search of Justice: Tribal Communities and Land Rights in Coastal Maharashtra”, Economic and Political Weekly, 2000।

ऐसे अध्ययन वारली इतिहास की एक महत्वपूर्ण सीमा दूर करते हैं।

वे केवल आंदोलन की वीरता नहीं देखते, बल्कि पूछते हैं—

कानून बनने के बाद वास्तविक भूमि किसके पास गई?

कानूनी restitution कितना सफल रहा?

अध्याय 41

निष्कर्ष — वारली आंदोलन को कैसे समझें? 1945 से 2026 तक श्रम-मुक्ति, भूमि–वन अधिकार, किसान संगठन, आदिवासी अस्मिता, उपलब्धियां, सीमाएं और भारतीय किसान राजनीति पर दीर्घकालीन प्रभाव का समेकित मूल्यांकन

वारली आंदोलन को केवल 1945–47 के एक आदिवासी विद्रोह के रूप में देखना उसके वास्तविक ऐतिहासिक महत्व को बहुत छोटा कर देना होगा। उसका पहला विस्फोट 1945 में हुआ, लेकिन उसकी जड़ें औपनिवेशिक भूमि और वन व्यवस्था, साहूकारी, वेठ-बेगार, किरायेदारी और ग्रामीण सत्ता-संबंधों में बहुत पहले से थीं। उसी तरह 1947 में उसका पहला उग्र चरण दब जाने के बावजूद संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। उसने अपना स्वरूप बदला—मजदूरी आंदोलन से भूमि-सुधार, भूमि से वन-प्लॉट, वन-प्लॉट से नियमितीकरण, नियमितीकरण से वन-अधिकार कानून और अंततः कानून के क्रियान्वयन की समकालीन राजनीति तक।

इसीलिए वारली आंदोलन को समझने का सबसे उपयुक्त सूत्र है—

यह 1945 का विद्रोह नहीं, बल्कि 1945 से 2026 तक विकसित होती श्रम, भूमि, जंगल और राजनीतिक नागरिकता की एक दीर्घकालीन आदिवासी–किसान परंपरा है।

स्वतंत्र अकादमिक इतिहास भी इसके शुरुआती चरण को मजदूरी, जबरन श्रम और भू-स्वामी हिंसा से मुक्ति के वास्तविक संघर्ष के रूप में पहचानता है, हालांकि साथ ही कम्युनिस्ट संगठन और कांग्रेस के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी उसकी दिशा को प्रभावित कर रही थी।

1. वारली आंदोलन की शुरुआत कहां से माननी चाहिए?

यदि केवल राजनीतिक संगठन देखें तो 1945 निर्णायक वर्ष है।

लेकिन यदि सामाजिक कारण देखें तो शुरुआत उससे बहुत पहले होती है।

औपनिवेशिक शासन में भूमि अभिलेख, जंगल का सरकारीकरण, साहूकारी और गैर-आदिवासी भू-स्वामी नियंत्रण ने वारली समाज की पुरानी आजीविका संरचना को कमजोर किया। इसका परिणाम यह हुआ कि बीसवीं सदी के आरंभ तक बड़ी संख्या में वारली—

और वेठ करने वाले आश्रित

इसलिए 1945 को “आंदोलन का जन्म” कहने के बजाय दबी हुई सामाजिक समस्या का राजनीतिक विस्फोट कहना अधिक उचित है।

# 1945 का मूल प्रश्न : मनुष्य अपने श्रम का मालिक है या नहीं?

2. वेठ-बेगार आंदोलन की ऐतिहासिक गहराई

वारली आंदोलन का पहला बड़ा संघर्ष जमीन के स्वामित्व से भी पहले श्रम की स्वतंत्रता का था।

क्या भू-स्वामी किसी आदिवासी परिवार से बिना उचित मजदूरी काम करा सकता है?

क्या विवाह, ऋण अथवा परंपरा के नाम पर किसी व्यक्ति का श्रम बंधा रहेगा?

यहीं वारली आंदोलन का नैतिक आधार दिखाई देता है।

गरीबी किसी दूसरे व्यक्ति को मेरे श्रम पर मालिकाना अधिकार नहीं देती।

यही कारण है कि जबरन श्रम और बंधुआ श्रम के खिलाफ संघर्ष को वारली आंदोलन की सबसे बुनियादी उपलब्धि माना जाना चाहिए। स्वतंत्र अध्ययन भी 1945–47 के संघर्ष की तत्काल मांगों में उचित मजदूरी और जबरन श्रम से मुक्ति को केंद्रीय मानते हैं।

3. मजदूरी की लड़ाई ने क्या बदला?

वेठ समाप्त करने के बाद अगला प्रश्न था—

यदि श्रम खरीदा जाएगा तो उसकी कीमत कौन तय करेगा?

यहीं घास काटने वाले मजदूरों और वन-मजदूरों की हड़तालों का महत्व है।

पहले वारली व्यक्ति और भू-स्वामी के बीच संबंध असमान निजी संबंध था।

किसान सभा ने मजदूरी को सामूहिक अनुबंध में बदलने की कोशिश की।

व्यक्ति की जगह समूह आया।

अनुनय की जगह bargaining।

यही ग्रामीण श्रम बाजार में आधुनिक संगठनात्मक राजनीति की शुरुआत थी।

# 4. भय का टूटना शायद सबसे बड़ी प्रारंभिक उपलब्धि थी

गोदावरी परुलेकर की पूरी आंदोलनकारी कथा का भाव यही है कि वारली ने स्वयं को असहाय समझना छोड़ा।

इस परिवर्तन को मापना कठिन है।

लेकिन इसका प्रभाव भूमि या मजदूरी से कम नहीं।

जिस व्यक्ति के लिए भू-स्वामी का आदेश सामाजिक नियति था, वही व्यक्ति—

पुलिस का सामना करता है,

और सरकारी अधिकारी के सामने मांग रखता है।

यहीं से “प्रजा” धीरे-धीरे राजनीतिक नागरिक में बदलती है।

# किसान सभा की निर्णायक भूमिका

5. क्या आंदोलन किसान सभा ने पैदा किया?

आर्थिक और सामाजिक कारण पहले से मौजूद थे।

लेकिन किसान सभा ने तीन निर्णायक काम किए—

स्थानीय असंतोष को साझा मांग में बदला,

अलग-अलग गांवों को नेटवर्क में जोड़ा,

और आंदोलन को लंबी संगठनात्मक स्मृति दी।

यही वह फर्क है जो स्वतःस्फूर्त विद्रोह और दीर्घकालीन जनराजनीति के बीच होता है।

Saqib Khan का स्वतंत्रता-पश्चात अध्ययन विशेष रूप से दिखाता है कि 1945–47 का विद्रोह आगे भूमि, जंगल, पानी, मजदूरी और आजीविका के अनेक अभियानों की संगठनात्मक नींव बन गया।

6. परुलेकरों की भूमिका कितनी बड़ी थी?

शामराव और गोदावरी परुलेकर के बिना वारली आंदोलन का आधुनिक राजनीतिक स्वरूप कल्पना करना कठिन है।

वर्गीय राजनीतिक भाषा,

व्यापक किसान सभा नेटवर्क

और राज्य से संघर्ष की रणनीति

लेकिन इतिहास को केवल “परुलेकरों ने वारलियों को जगाया” कहना भी ठीक नहीं।

और गांव नेटवर्क चलाया—

वह वारली समाज स्वयं था।

इसलिए अधिक सटीक निष्कर्ष है—

नेतृत्व ने दिशा दी, लेकिन आंदोलन की शक्ति स्थानीय आदिवासी agency थी।

# वर्ग-संघर्ष और आदिवासी अस्मिता

7. वारली आंदोलन किसान आंदोलन था या आदिवासी आंदोलन?

और यही उसकी विशिष्टता है।

यदि उसे केवल आदिवासी आंदोलन कहें, तो मजदूरी, किरायेदारी और वर्ग संबंधों की शक्ति कम दिखाई देती है।

यदि केवल किसान वर्ग-संघर्ष कहें, तो जंगल, सांस्कृतिक भूगोल, सामुदायिक पहचान और ऐतिहासिक आदिवासी वंचना गायब हो जाती है।

वारली व्यक्ति एक साथ—

और राजनीतिक कार्यकर्ता

इसलिए उसकी राजनीति भी बहुस्तरीय थी।

8. कम्युनिस्ट राजनीति की बड़ी उपलब्धि

मार्क्सवादी किसान राजनीति ने वारली को “पिछड़ी जनजाति” की paternalistic श्रेणी से निकालकर संगठित सामाजिक actor के रूप में देखा।

सामाजिक संबंधों का परिणाम है।

यही दृष्टि परिवर्तनकारी थी।

9. लेकिन उसकी सीमा भी थी

वर्ग की सार्वभौमिक भाषा में कभी-कभी—

आदिवासी सांस्कृतिक पहचान,

और समुदाय की विशिष्ट संस्थाएं

इसीलिए बाद की राजनीति में FRA और PESA जैसे कानूनों ने केवल वर्ग नहीं, समुदाय-विशिष्ट अधिकार को भी महत्व दिया।

# कांग्रेस की भूमिका : विरोधाभासों से भरी

10. कांग्रेस को केवल दमनकारी कहना गलत होगा

1930 के दशक की कांग्रेस-प्रेरित जांचों ने स्वयं आदिवासी शोषण की गंभीरता पहचानी थी।

बी. जी. खेर के शासन में आदिवासी welfare की वास्तविक पहल थी।

स्वतंत्रता के बाद काश्तकारी reforms आए।

संवैधानिक रूप से अनुसूचित जनजातियों की सुरक्षा के ढांचे बने।

इसलिए कांग्रेस की भूमिका केवल पुलिस दमन तक सीमित नहीं थी।

11. लेकिन 1946–47 में राजनीति बदल गई

जैसे ही किसान सभा ने व्यापक आदिवासी आधार बनाना शुरू किया, सामाजिक सुधार का प्रश्न राजनीतिक सत्ता की प्रतिस्पर्धा से जुड़ गया।

खेर सरकार और गृह मंत्री मोरारजी देसाई आंदोलन को law-and-order और Communist expansion दोनों की दृष्टि से देखने लगे। नवंबर 1946 में ठाणे में आपात स्थिति और जनवरी 1947 में दहानू तक Maratha Light Infantry की तैनाती इसी कठोर प्रतिक्रिया के संकेत थे।

यहीं वारली आंदोलन स्वतंत्रता आंदोलन की बड़ी दुविधा सामने लाता है—

क्या राष्ट्रीय स्वतंत्रता के भीतर सामाजिक क्रांति के लिए कितना स्थान था?

# 12. कांग्रेस–कम्युनिस्ट संघर्ष की असली बहस

Leslie Calman की प्रसिद्ध व्याख्या इस प्रश्न को बहुत प्रभावी ढंग से पकड़ती है।

उनके अनुसार विवाद केवल “आदिवासी उत्थान” पर नहीं था।

कौन उसका नेतृत्व करेगा?

कौन-से वर्ग और कौन-सी पार्टी उससे मजबूत होंगे?

यह निष्कर्ष वारली आंदोलन को स्थानीय मजदूरी विवाद से उठाकर स्वतंत्रता के ठीक पहले भारत की सामाजिक दिशा की बड़ी बहस में रखता है।

# स्वतंत्रता के बाद : संघर्ष समाप्त नहीं, संस्थागत हुआ

13. राजनीतिक स्वतंत्रता बनाम सामाजिक स्वतंत्रता

15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ।

लेकिन वारली किसान की समस्याएं स्वतः समाप्त नहीं हुईं।

उसके सामने अभी भी था—

इसीलिए वारली आंदोलन का स्वतंत्रता-पश्चात इतिहास अत्यंत महत्वपूर्ण है।

यह बताता है कि राष्ट्रीय सत्ता परिवर्तन और ग्रामीण सामाजिक परिवर्तन अलग-अलग प्रक्रियाएं हो सकती हैं।

# 14. 1948–57 : “जो जोते जमीन उसकी”

घटना-क्रम

वारली आंदोलन की संक्षिप्त समयरेखा

उन्नीसवीं सदी · भूमि और जंगल पर औपनिवेशिक नियंत्रणवन कानून, लगान, साहूकारी और भू-स्वामियों की शक्ति ने वारली जीवन और आजीविका पर दबाव बढ़ाया।
1930–44 · किसान सभा का प्रवेशठाणे क्षेत्र में किसान संगठन, साम्यवादी कार्यकर्ताओं और स्थानीय आदिवासी नेतृत्व का संपर्क विकसित हुआ।
1945 · वेठ-बेगार और मजदूरी के विरुद्ध उभारतलासरी–दहानू क्षेत्र में वारली खेत-मजदूरों ने मुफ्त श्रम रोकने और मजदूरी बढ़ाने के लिए सामूहिक संघर्ष शुरू किया।
अक्टूबर 1945 · तलवाड़ा गोलीकांडपुलिस दमन और गोलीबारी ने आंदोलन को निर्णायक मोड़ दिया, पर संगठन भूमिगत रूप में भी सक्रिय रहा।
1946 · वन-मजदूर संघर्षलकड़ी और घास काटने वाले मजदूरों की लंबी हड़ताल ने ठेकेदार व्यवस्था और मजदूरी के प्रश्न को केंद्र में रखा।
7 जनवरी 1947 · पालघर गोलीबारीस्वतंत्रता से पहले आंदोलन पर दूसरा बड़ा दमन हुआ और कई कार्यकर्ता गिरफ्तार किए गए।
1948–57 · काश्तकारी सुधारसंरक्षित किरायेदारी और ‘जमीन जोते उसकी’ नीति ने भूमि-अधिकार की लड़ाई को नया कानूनी आधार दिया।
1 अप्रैल 1957 · जोतने वाले का भूमि-अधिकारमहाराष्ट्र के काश्तकारी कानूनों के अंतर्गत अनेक वास्तविक जोतदारों के स्वामित्व-दावे मजबूत हुए।
1971–74 · वनभूमि सत्याग्रहवनभूमि पर काबिज आदिवासी किसानों के अधिकार और बेदखली रोकने के लिए व्यापक गिरफ्तारी-आधारित आंदोलन चला।
1975–79 · आपातकाल, बेदखली और वापसीदमन के बाद वनभूमि नियमितीकरण तथा बेदखल किसानों की वापसी के लिए संघर्ष तेज हुआ।
1980–2005 · कानून और न्यायपालिका का नया दौरवन संरक्षण कानून, न्यायिक आदेश और पुनर्वास विवादों ने अधिकार संघर्ष को अधिक जटिल बनाया।
2006 · वन अधिकार अधिनियमऐतिहासिक अन्याय की कानूनी स्वीकृति के साथ व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों के दावे का नया चरण शुरू हुआ।
2018–26 · समकालीन किसान–आदिवासी लामबंदीमहाराष्ट्र किसान मार्च और भूमि–वन अधिकार अभियानों ने वारली संघर्ष की ऐतिहासिक मांगों को वर्तमान कृषि राजनीति से जोड़ा।
OCN ऐतिहासिक आकलन

वारली आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उसने आदिवासी खेत-मजदूर को भू-स्वामी, साहूकार, ठेकेदार और राज्य के सामने संगठित सामाजिक शक्ति बनाया। वेठ-बेगार के अंत, मजदूरी सुधार और भूमि पर अधिकार की दिशा में उसने प्रत्यक्ष परिवर्तन किए, जबकि महिलाओं की भागीदारी ने घरेलू और सामाजिक उत्पीड़न को भी राजनीतिक प्रश्न बनाया। उसकी सीमाएं—दमन, भूमि सुधारों का अधूरा क्रियान्वयन, वन प्रशासन की जटिलता और दलगत निर्भरता—स्पष्ट रहीं। फिर भी श्रम-मुक्ति से वनाधिकार तक उसकी दीर्घ यात्रा भारतीय किसान और आदिवासी आंदोलनों के साझा इतिहास की अनिवार्य कड़ी है।

शोधार्थियों के लिए

प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक स्रोत

अखिल भारतीय किसान सभावारली संघर्ष, महाराष्ट्र किसान आंदोलनों और समकालीन भूमि–वन अधिकार अभियानों से जुड़े संगठनात्मक दस्तावेज।स्रोत तक जाएँ ↗
अभिलेख पटल — राष्ट्रीय अभिलेखागारऔपनिवेशिक गृह विभाग, पुलिस, श्रम, वन और किसान आंदोलनों से जुड़े सूचीपत्र तथा अभिलेख।स्रोत तक जाएँ ↗
महाराष्ट्र राज्य गजेटियरठाणे–पालघर की भूमि व्यवस्था, जनजातीय समाज, कृषि, वन और प्रशासन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि।स्रोत तक जाएँ ↗
जनजातीय कार्य मंत्रालयवन अधिकार अधिनियम, नियम, क्रियान्वयन संबंधी सामग्री और आधिकारिक जनजातीय नीति दस्तावेज।स्रोत तक जाएँ ↗
गांधी विरासत पोर्टलराष्ट्रीय आंदोलन, बंबई प्रांत, किसान प्रश्न और 1940 के दशक की राजनीतिक पृष्ठभूमि से जुड़ी मूल सामग्री।स्रोत तक जाएँ ↗
ई-ज्ञानकोशकिसान–आदिवासी आंदोलन, भूमि सुधार, वन कानून और आधुनिक भारतीय सामाजिक इतिहास की मुक्त अध्ययन सामग्री।स्रोत तक जाएँ ↗

स्रोत-सावधानी: पुलिस और प्रशासनिक अभिलेख आंदोलन को कानून-व्यवस्था के नजरिए से देखते हैं, संगठनात्मक दस्तावेज संघर्ष और उपलब्धियों पर बल देते हैं, जबकि मौखिक इतिहास स्थानीय अनुभव और स्मृति को सामने लाता है। इसलिए तिथि, संख्या, गोलीबारी, गिरफ्तारी और भूमि-अधिकार संबंधी दावों को परस्पर स्रोत-मिलान के साथ पढ़ा गया है।