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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–004 · अध्याय 12

अखिल भारतीय किसान सभा

1936 से 2026 तक—भूमि, लगान और जमींदारी-विरोध से MSP, कर्ज, कृषि संकट और संयुक्त किसान राजनीति तक

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskसंपादित विस्तृत शोध संस्करण · 24 अगस्त 2026

अखिल भारतीय किसान सभा ने भारतीय किसान राजनीति को स्थानीय शिकायतों और प्रांतीय संगठनों से उठाकर राष्ट्रीय मंच दिया। उसने भूमि, लगान, कर्ज, बेदखली और जमींदारी के प्रश्नों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ा; तेभागा और तेलंगाना जैसे संघर्षों में निर्णायक भूमिका निभाई; और स्वतंत्र भारत में भूमि सुधार, कृषि लागत, लाभकारी मूल्य, ऋण, वनाधिकार तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य की राजनीति तक अपनी उपस्थिति बनाए रखी। यह अध्ययन उसकी उपलब्धियों के साथ वैचारिक विभाजनों, संगठनात्मक सीमाओं और बदलती ग्रामीण वर्ग-संरचना की भी संतुलित पड़ताल करता है।

अध्याय 1

भूमिका — भारतीय किसान राजनीति में अखिल भारतीय किसान सभा का स्थान

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास केवल ब्रिटिश शासन और भारतीय राष्ट्रवाद के बीच राजनीतिक संघर्ष का इतिहास नहीं है। इसके भीतर भूमि, लगान, कर्ज, बेदखली, जमींदारी, बटाईदारी और खेतिहर मजदूरी से जुड़े ऐसे प्रश्न भी मौजूद थे, जिनसे भारत की विशाल ग्रामीण आबादी का दैनिक जीवन निर्धारित होता था। उन्नीसवीं सदी के नील विद्रोह, पाबना आंदोलन और दक्कन के किसान विद्रोह से लेकर बीसवीं सदी के चंपारण, खेड़ा, अवध, एका, बारडोली, बकाश्त, तेभागा और तेलंगाना जैसे संघर्ष इसी व्यापक ग्रामीण असंतोष की अलग-अलग अभिव्यक्तियां थे।

इन आंदोलनों ने औपनिवेशिक कृषि व्यवस्था को चुनौती दी, लेकिन लंबे समय तक इनमें से अधिकांश संघर्ष स्थानीय अथवा प्रांतीय स्तर तक सीमित रहे। कहीं नील की जबरन खेती प्रश्न था, कहीं लगान वृद्धि, कहीं ताल्लुकेदारों और जमींदारों का उत्पीड़न, कहीं बेदखली, कहीं बटाईदारों की फसल में हिस्सेदारी और कहीं भूमि पर वास्तविक किसान के अधिकार का प्रश्न।

1930 के दशक तक आते-आते एक बड़ा परिवर्तन दिखाई देने लगा। किसान नेताओं, समाजवादियों, वामपंथी कार्यकर्ताओं और राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर सक्रिय अनेक नेताओं को यह अनुभव होने लगा कि भारत के किसान प्रश्न को केवल अलग-अलग स्थानीय आंदोलनों के माध्यम से नहीं सुलझाया जा सकता। किसानों के लिए एक ऐसा अखिल भारतीय मंच आवश्यक था जो विभिन्न प्रांतों के कृषि संघर्षों को जोड़ सके और किसान की आर्थिक मांगों को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र तक पहुंचा सके।

इसी ऐतिहासिक आवश्यकता से अखिल भारतीय किसान सभा का उदय हुआ।

अप्रैल 1936 में लखनऊ में स्थापित अखिल भारतीय किसान सभा भारतीय किसान राजनीति के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ थी। पहली बार विभिन्न प्रांतों में सक्रिय किसान संगठनों और नेताओं को एक राष्ट्रीय मंच देने का संगठित प्रयास हुआ। स्वामी सहजानंद सरस्वती इसके प्रथम अध्यक्ष बने। एन. जी. रंगा सहित अनेक किसान नेता और बाद में समाजवादी तथा कम्युनिस्ट कार्यकर्ता इससे जुड़े। आने वाले वर्षों में किसान सभा केवल किसानों की आर्थिक शिकायतें उठाने वाला संगठन नहीं रही; उसने भूमि संबंधों, जमींदारी व्यवस्था, ग्रामीण सत्ता-संरचना और औपनिवेशिक शासन के चरित्र पर अधिक बुनियादी प्रश्न खड़े किए।

इस अर्थ में किसान सभा का इतिहास भारत में किसान के ‘प्रजा’ से ‘राजनीतिक नागरिक’ बनने की प्रक्रिया का भी इतिहास है।

स्थानीय विद्रोहों से अखिल भारतीय किसान राजनीति तक

भारत में किसान प्रतिरोध अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना से बहुत पहले शुरू हो चुका था। औपनिवेशिक शासन की भूमि-राजस्व नीतियों ने ग्रामीण भारत के पारंपरिक आर्थिक और सामाजिक संबंधों में गहरे परिवर्तन किए। स्थायी बंदोबस्त, रैयतवारी और महालवारी जैसी विभिन्न भू-राजस्व प्रणालियों के माध्यम से ब्रिटिश सरकार का प्रमुख उद्देश्य निश्चित और नियमित राजस्व प्राप्त करना था। लेकिन इन व्यवस्थाओं का प्रभाव केवल सरकारी आय तक सीमित नहीं रहा।

कई क्षेत्रों में जमींदार, ताल्लुकेदार, साहूकार और दूसरे मध्यस्थ ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर शक्तिशाली नियंत्रण स्थापित करने लगे। किसान को सरकारी लगान के अतिरिक्त अनेक प्रकार के स्थानीय कर, उपकर और अवैध वसूली का सामना करना पड़ता था। फसल खराब होने या बाजार में कीमत गिरने के बावजूद राजस्व और किराए की मांग बनी रहती थी। कर्ज न चुका पाने पर भूमि गिरवी रखना अथवा गंवा देना भी व्यापक समस्या थी।

इसी पृष्ठभूमि में उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में अनेक किसान संघर्ष हुए।

नील विद्रोह (1859–60) ने बंगाल में यूरोपीय नील उत्पादकों की जबरन खेती की व्यवस्था को चुनौती दी। पाबना आंदोलन (1870 के दशक) में बंगाल के किसानों ने जमींदारों की किराया-वृद्धि और अवैध वसूली के विरुद्ध संगठित प्रतिरोध किया। दक्कन दंगे (1875) ग्रामीण ऋणग्रस्तता और साहूकारी व्यवस्था के विरुद्ध असंतोष का विस्फोट थे।

बीसवीं सदी में महात्मा गांधी के नेतृत्व में चंपारण सत्याग्रह (1917) और खेड़ा सत्याग्रह (1918) ने किसान प्रश्न को राष्ट्रीय आंदोलन से अधिक प्रत्यक्ष रूप से जोड़ा। अवध किसान आंदोलन और एका आंदोलन ने उत्तर भारत में जमींदारी और ताल्लुकेदारी व्यवस्था की समस्याओं को सामने रखा। बारडोली सत्याग्रह ने संगठित किसान प्रतिरोध की शक्ति का एक और उदाहरण प्रस्तुत किया।

इन आंदोलनों की परिस्थितियां और मांगें अलग-अलग थीं, लेकिन इनके भीतर एक साझा प्रश्न धीरे-धीरे स्पष्ट हो रहा था—

भारत की कृषि व्यवस्था में उत्पादन करने वाले किसान की वास्तविक स्थिति क्या है और भूमि तथा कृषि उपज पर उसका अधिकार कितना है?

यही प्रश्न आगे चलकर अखिल भारतीय किसान सभा की राजनीति के केंद्र में आया।

1930 का दशक : किसान राजनीति के राष्ट्रीयकरण की पृष्ठभूमि

अखिल भारतीय किसान सभा का जन्म अचानक नहीं हुआ। इसके पीछे 1920 और 1930 के दशकों में हुए राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिवर्तनों की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

विशेष रूप से 1929 के बाद शुरू हुई विश्वव्यापी महामंदी ने भारतीय कृषि को गंभीर रूप से प्रभावित किया। अनेक कृषि उत्पादों की कीमतें गिर गईं। किसान की बाजार से होने वाली आमदनी कम हुई, लेकिन कई क्षेत्रों में लगान, कर्ज और अन्य देनदारियां उसी अनुपात में कम नहीं हुईं।

इससे किसान की आर्थिक स्थिति और कमजोर हुई।

एक तरफ कृषि उपज की कीमतें गिर रही थीं, दूसरी तरफ किसान को जमींदार, साहूकार और राजस्व व्यवस्था के दबाव का सामना करना पड़ रहा था। कई क्षेत्रों में बेदखली और भूमि-अधिकार के विवाद तेज हुए।

यही वह समय था जब भारत की राजनीति में भी महत्वपूर्ण वैचारिक परिवर्तन हो रहे थे।

राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर नई पीढ़ी समाजवाद, आर्थिक समानता और भूमि-सुधार जैसे प्रश्नों की ओर आकर्षित हो रही थी। जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस जैसे नेता सामाजिक और आर्थिक प्रश्नों को स्वतंत्रता आंदोलन के साथ जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दे रहे थे। कांग्रेस समाजवादी पार्टी के गठन ने भी राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर वामपंथी विचारों को संस्थागत मंच प्रदान किया।

दूसरी ओर भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन और विभिन्न प्रांतीय किसान संगठनों के कार्यकर्ता किसानों को वर्गीय आधार पर संगठित करने का प्रयास कर रहे थे।

इस प्रकार किसान प्रश्न अब केवल कृषि प्रशासन का विषय नहीं रह गया था। वह धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीति का प्रश्न बन रहा था।

बिहार प्रांतीय किसान सभा : राष्ट्रीय संगठन की महत्वपूर्ण पूर्वपीठिका

अखिल भारतीय किसान सभा के निर्माण में बिहार के किसान आंदोलन और स्वामी सहजानंद सरस्वती की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण थी।

1929 में स्थापित बिहार प्रांतीय किसान सभा ने किसानों की शिकायतों को संगठित राजनीतिक कार्यक्रम में बदलने का प्रयास किया। बिहार में जमींदारी व्यवस्था अत्यंत प्रभावशाली थी और किसान–जमींदार संबंधों से जुड़े अनेक विवाद मौजूद थे।

स्वामी सहजानंद सरस्वती प्रारंभ में धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों से जुड़े थे, लेकिन धीरे-धीरे उनका ध्यान किसान प्रश्न की ओर केंद्रित हुआ। ग्रामीण क्षेत्रों में काम करते हुए उन्होंने महसूस किया कि किसानों की समस्याएं केवल प्रशासनिक गड़बड़ी का परिणाम नहीं हैं, बल्कि भूमि-संबंधों की संरचना में गहराई से निहित हैं।

उनकी राजनीति धीरे-धीरे अधिक स्पष्ट जमींदारी-विरोधी स्वर ग्रहण करती गई।

बिहार किसान सभा के अनुभव ने यह दिखाया कि किसान को संगठित करने के लिए केवल चुनावी राजनीति पर्याप्त नहीं है। गांवों में स्वतंत्र संगठन, सम्मेलन, सभाएं और स्थानीय नेतृत्व विकसित करना आवश्यक है।

यही अनुभव आगे अखिल भारतीय किसान सभा के संगठनात्मक निर्माण में उपयोगी हुआ।

कांग्रेस और किसान : सहयोग भी, तनाव भी

अखिल भारतीय किसान सभा को समझने के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ उसके संबंधों को समझना आवश्यक है।

लेकिन किसान सभा के नेताओं के सामने एक अलग प्रश्न था।

लखनऊ, अप्रैल 1936 : एक ऐतिहासिक मोड़

• जमींदारी व्यवस्था का भविष्य क्या होगा?

अध्याय 2

किसान सभा से पहले भारत में किसान संगठन की परंपरा — अवध किसान सभा, बिहार प्रांतीय किसान सभा, आंध्र और अन्य क्षेत्रीय किसान संगठनों से अखिल भारतीय मंच की ओर

अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना अप्रैल 1936 में हुई, लेकिन भारतीय किसान राजनीति की संगठित परंपरा की शुरुआत 1936 से नहीं मानी जा सकती। इसके पीछे लगभग दो दशकों तक विकसित हुए प्रांतीय और स्थानीय किसान संगठनों, राष्ट्रीय आंदोलन के अनुभवों, कृषि संकटों और किसान नेतृत्व के निर्माण की लंबी प्रक्रिया थी। इससे भी पहले उन्नीसवीं सदी के किसान प्रतिरोधों ने ग्रामीण समाज को सामूहिक कार्रवाई की शक्ति का अनुभव करा दिया था।

इसलिए अखिल भारतीय किसान सभा को समझने के लिए उसके गठन से पहले की किसान राजनीति को दो अलग स्तरों पर देखना आवश्यक है।

पहला स्तर किसान प्रतिरोध का था—नील विद्रोह, पाबना आंदोलन, दक्कन दंगे और बाद के अनेक स्थानीय संघर्ष।

दूसरा स्तर स्थायी किसान संगठन बनाने का था—जहां किसान किसी एक घटना या शिकायत के कारण अस्थायी रूप से एकत्र होने के बजाय सभा, पंचायत, सम्मेलन, सदस्यता, नेतृत्व और घोषित मांगों वाले संगठनों में जुड़ने लगे।

बीसवीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक में यही दूसरा चरण तेजी से विकसित हुआ।

अवध किसान सभा, उत्तर प्रदेश किसान सभा, बिहार प्रांतीय किसान सभा, आंध्र के रैयत संगठनों और देश के दूसरे हिस्सों में उभरे किसान मंचों ने मिलकर वह राजनीतिक और संगठनात्मक आधार तैयार किया, जिस पर 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा का निर्माण संभव हुआ।

1. विद्रोह और संगठन के बीच अंतर

औपनिवेशिक भारत में किसान असंतोष नया नहीं था। ब्रिटिश शासन के आरंभिक दशकों से ही भूमि-राजस्व, जमींदारी, साहूकारी, जबरन खेती और वन संबंधी प्रतिबंधों के विरुद्ध ग्रामीण प्रतिरोध दिखाई देता है।

लेकिन किसी किसान विद्रोह और किसान संगठन के बीच महत्वपूर्ण अंतर था।

विद्रोह सामान्यतः किसी तात्कालिक संकट से पैदा होता था। किसान एकत्र होते, विरोध करते और संकट समाप्त होने अथवा सरकारी दमन के बाद आंदोलन कमजोर पड़ जाता।

संगठन की प्रकृति अलग थी।

किसानों की स्थायी सदस्यता, स्थानीय इकाइयां, नेतृत्व, नियमित बैठकें, सम्मेलन, मांगपत्र, प्रचार और विभिन्न गांवों तथा जिलों को जोड़ने वाली संरचना।

बीसवीं सदी में भारतीय किसान राजनीति इसी दिशा में बढ़ी।

इस परिवर्तन का अर्थ था कि किसान अब केवल किसी अत्याचार पर प्रतिक्रिया नहीं कर रहा था; वह अपने हितों को स्थायी राजनीतिक हित के रूप में परिभाषित करने लगा था।

2. उन्नीसवीं सदी के किसान संघर्षों की विरासत

अखिल भारतीय किसान सभा की प्रत्यक्ष संगठनात्मक जड़ें बीसवीं सदी में थीं, लेकिन उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि उन्नीसवीं सदी तक जाती है।

नील विद्रोह

1859–60 के बंगाल के नील विद्रोह ने दिखाया कि किसान सामूहिक रूप से किसी शोषणकारी कृषि व्यवस्था को चुनौती दे सकते हैं। किसानों ने नील की खेती से इनकार किया और यूरोपीय नील उत्पादकों के दबाव का विरोध किया।

पाबना आंदोलन

1870 के दशक में पूर्वी बंगाल के पाबना क्षेत्र में किसानों ने जमींदारों की मनमानी किराया-वृद्धि और अवैध वसूली के विरुद्ध संगठित प्रतिरोध किया।

इस आंदोलन की विशेषता यह थी कि किसानों ने कई स्थानों पर कानूनी और सामूहिक उपाय अपनाए। किसान संघ जैसी संरचनाओं का निर्माण हुआ।

यह किसान राजनीति के संगठनात्मक विकास की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत था।

दक्कन दंगे

1875 में महाराष्ट्र के दक्कन क्षेत्र में किसानों का असंतोष मुख्यतः ग्रामीण ऋणग्रस्तता और साहूकारों के विरुद्ध फूटा।

इन संघर्षों ने अलग-अलग रूपों में यह स्पष्ट किया कि भारतीय कृषि संकट केवल मौसम अथवा व्यक्तिगत गरीबी का परिणाम नहीं था। भूमि-राजस्व, ऋण, बाजार और भू-स्वामित्व की संस्थागत संरचनाएं किसान की स्थिति निर्धारित कर रही थीं।

# 3. बीसवीं सदी : किसान प्रश्न और राष्ट्रीय आंदोलन का मिलन

बीसवीं सदी के आरंभ तक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन मजबूत हो रहा था, लेकिन उसकी सामाजिक संरचना में शिक्षित मध्यवर्ग और शहरी नेतृत्व की प्रधानता थी।

महात्मा गांधी के भारत लौटने के बाद किसान प्रश्न राष्ट्रीय राजनीति से अधिक प्रत्यक्ष रूप से जुड़ने लगा।

चंपारण सत्याग्रह (1917) इसका महत्वपूर्ण उदाहरण था।

बिहार के चंपारण में नील की खेती से संबंधित तिनकठिया व्यवस्था और किसानों की शिकायतों ने गांधी को ग्रामीण भारत की वास्तविकताओं से जोड़ा।

इसके अगले वर्ष खेड़ा सत्याग्रह (1918) में खराब फसल के बावजूद भू-राजस्व वसूली के प्रश्न पर किसान आंदोलन हुआ।

इन आंदोलनों का महत्व केवल उनकी तात्कालिक उपलब्धियों में नहीं था।

उन्होंने राष्ट्रीय नेताओं को दिखाया कि भारतीय किसान को राजनीतिक रूप से सक्रिय किया जा सकता है।

लेकिन साथ ही एक नया प्रश्न पैदा हुआ—

क्या किसान केवल कांग्रेस के राष्ट्रीय आंदोलनों में भाग लेगा, या उसके अपने स्वतंत्र संगठन भी होंगे?

आने वाले दो दशकों में यही प्रश्न भारतीय किसान राजनीति का केंद्रीय विषय बन गया।

# 4. उत्तर प्रदेश किसान सभा : प्रारंभिक संगठित प्रयास

उत्तर भारत में किसान संगठन की महत्वपूर्ण शुरुआत संयुक्त प्रांत—वर्तमान उत्तर प्रदेश—में हुई।

1918 में उत्तर प्रदेश किसान सभा की स्थापना हुई। इसके निर्माण में गौरीशंकर मिश्र और इंद्र नारायण द्विवेदी जैसे नेताओं की भूमिका रही। मदन मोहन मालवीय जैसे वरिष्ठ राष्ट्रीय नेताओं का भी प्रारंभिक किसान संगठन प्रयासों से संबंध था।

इस संगठन ने किसानों की शिकायतों को राजनीतिक मंच प्रदान करने का प्रयास किया।

लेकिन संयुक्त प्रांत के विभिन्न क्षेत्रों की कृषि संरचना एक जैसी नहीं थी।

विशेष रूप से अवध में ताल्लुकेदारी व्यवस्था के कारण किसान प्रश्न अधिक तीखा था।

यहीं से अवध किसान राजनीति का शक्तिशाली चरण शुरू हुआ।

# 5. अवध की ताल्लुकेदारी व्यवस्था और किसान असंतोष

अवध में बड़े ताल्लुकेदारों का ग्रामीण समाज पर व्यापक नियंत्रण था।

किसानों को केवल निर्धारित किराया ही नहीं देना पड़ता था; अनेक स्थानों पर विभिन्न प्रकार के अतिरिक्त कर और अवैध वसूली भी होती थी।

बेदखली का भय गंभीर समस्या था।

कई किसानों के पास भूमि पर स्थायी अधिकार नहीं थे। यदि वे जमींदार अथवा ताल्लुकेदार की मांगों का विरोध करते तो उन्हें खेती से हटाए जाने का खतरा रहता।

इसके अतिरिक्त बेगार और अन्य सामाजिक दायित्व भी किसान असंतोष के कारण थे।

इस व्यवस्था के विरुद्ध ग्रामीण स्तर पर असंतोष बढ़ने लगा।

# 6. बाबा रामचंद्र और अवध किसान राजनीति

अवध किसान आंदोलन के सबसे प्रसिद्ध नेताओं में बाबा रामचंद्र का नाम आता है।

उन्होंने गांव-गांव घूमकर किसानों को संगठित किया और उनकी शिकायतों को व्यापक राजनीतिक मुद्दे में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उनकी संगठन शैली विशिष्ट थी।

धार्मिक प्रतीकों और रामायण के पाठ का उपयोग ग्रामीण किसानों के बीच संपर्क और एकता बनाने के लिए किया जाता था। इससे किसान संगठन ग्रामीण सांस्कृतिक परिवेश से जुड़ता था।

यह भारतीय किसान राजनीति की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी—

किसान संगठन हमेशा आधुनिक वर्गीय भाषा में ही विकसित नहीं हुए। कई क्षेत्रों में धार्मिक, जातीय और स्थानीय सांस्कृतिक प्रतीकों का उपयोग राजनीतिक संगठन के लिए किया गया।

बाबा रामचंद्र ने किसानों को ताल्लुकेदारों की मनमानी के विरुद्ध संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

# 7. अवध किसान सभा का निर्माण

1920 के आसपास अवध में किसान संगठन और अधिक व्यवस्थित रूप लेने लगा।

अवध किसान सभा ने प्रतापगढ़, रायबरेली, फैजाबाद, सुल्तानपुर और आसपास के क्षेत्रों में किसान आंदोलन को विस्तार दिया।

इसकी प्रमुख मांगों में शामिल थीं—

• बेदखली पर रोक,

• अवैध करों का अंत,

• अत्यधिक किराए में कमी,

• बेगार समाप्त करना,

• किसानों के किरायेदारी अधिकारों की सुरक्षा।

# 8. अवध आंदोलन और कांग्रेस

अवध की किसान पंचायतें,

अध्याय 3

स्वामी सहजानंद सरस्वती और बिहार किसान आंदोलन — 1929 की बिहार प्रांतीय किसान सभा से अखिल भारतीय किसान संगठन की जमीन तैयार होने तक

भारतीय किसान आंदोलन के इतिहास में स्वामी सहजानंद सरस्वती का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि वे 1936 में गठित अखिल भारतीय किसान सभा के प्रथम अध्यक्ष बने। उनका वास्तविक ऐतिहासिक महत्व उस लंबी प्रक्रिया में है, जिसमें बिहार के बिखरे हुए किसान असंतोष को पहले स्थानीय संगठन, फिर प्रांतीय आंदोलन और अंततः अखिल भारतीय किसान राजनीति की दिशा में ले जाया गया।

1920 के दशक की शुरुआत में कांग्रेस और गांधी से प्रभावित एक संन्यासी के रूप में राजनीति में प्रवेश करने वाले सहजानंद अगले डेढ़ दशक में ऐसे किसान नेता बन गए, जिन्होंने जमींदारी व्यवस्था को ही चुनौती देना शुरू कर दिया। इतिहासकार वाल्टर हाउजर के अध्ययन में भी यह परिवर्तन केंद्रीय है—सहजानंद सामाजिक-सुधार के क्षेत्र से राष्ट्रीय आंदोलन में आए, फिर काश्तकारों पर अत्यधिक लगान और जमींदारी वसूली के अनुभवों ने उन्हें बिहार प्रांतीय किसान सभा के निर्माण तक पहुंचाया।

बिहार किसान आंदोलन इसलिए भी विशेष था कि यहां किसान संगठन का प्रश्न महज अंग्रेज सरकार बनाम भारतीय किसान तक सीमित नहीं रहा। किसानों का सीधा संघर्ष अनेक मामलों में भारतीय जमींदारों से था और इनमें से कई जमींदार अथवा भू-स्वामी स्वयं राष्ट्रीय आंदोलन और कांग्रेस से जुड़े हुए थे।

यहीं किसान राजनीति का एक बुनियादी प्रश्न पैदा हुआ—

क्या राष्ट्रीय स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान किसान को अपने भारतीय जमींदार के विरुद्ध संघर्ष स्थगित कर देना चाहिए, या राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ भूमि और आर्थिक अधिकारों की लड़ाई भी चलनी चाहिए?

स्वामी सहजानंद ने अंततः दूसरे रास्ते को चुना।

यही निर्णय उन्हें भारतीय किसान राजनीति के सबसे प्रभावशाली और साथ ही सबसे विवादास्पद नेताओं में ले गया।

1. स्वामी सहजानंद : संन्यास से किसान राजनीति तक

स्वामी सहजानंद सरस्वती का जन्म 1889 में उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के देवा गांव में हुआ। उनका मूल नाम नवरंग राय था। किशोरावस्था में ही उन्होंने संन्यास ग्रहण किया और आगे चलकर दशनामी संन्यासी परंपरा से जुड़े।

उनके सार्वजनिक जीवन का प्रारंभ किसान आंदोलन से नहीं हुआ था।

प्रारंभिक वर्षों में वे धार्मिक, शैक्षिक और सामाजिक-सुधार संबंधी गतिविधियों तथा भूमिहार ब्राह्मण समुदाय के सामाजिक प्रश्नों से जुड़े रहे। इस कारण उनके राजनीतिक जीवन को केवल बाद की वर्गीय किसान राजनीति के आधार पर समझना अधूरा होगा।

सहजानंद की विचार-यात्रा क्रमिक थी।

पहले सामाजिक प्रतिष्ठा और जातीय सुधार का प्रश्न,

फिर राष्ट्रीय स्वतंत्रता,

और अंततः किसान तथा भूमि-अधिकार का प्रश्न—

इन तीन चरणों ने उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को बनाया।

वाल्टर हाउजर के अनुसार 5 दिसंबर 1920 को पटना में उनकी महात्मा गांधी से मुलाकात उनके राजनीतिक जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ बनी। इसके बाद वे कांग्रेस और राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय हुए।

# 2. गांधी से प्रभावित राष्ट्रीय कार्यकर्ता

असहयोग आंदोलन के समय सहजानंद गांधी की राजनीतिक शैली और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जन-संगठन से प्रभावित हुए।

यह दौर उनके लिए महत्वपूर्ण था क्योंकि पहली बार ग्रामीण जनता राष्ट्रीय राजनीति से व्यापक स्तर पर जुड़ रही थी।

किसान गांधी के आंदोलनों में भाग ले रहा था, विदेशी वस्त्र का बहिष्कार कर रहा था, कर तथा औपनिवेशिक शासन के प्रश्नों पर राजनीतिक भाषा सीख रहा था।

सहजानंद ने भी कांग्रेस के माध्यम से राजनीतिक सक्रियता का अनुभव प्राप्त किया।

लेकिन शीघ्र ही उन्हें यह महसूस होने लगा कि गांवों में किसान की समस्या केवल ब्रिटिश राज नहीं है।

उसका दैनिक जीवन अक्सर उस जमींदार, तहसीलदार, अमले और स्थानीय सत्ता से नियंत्रित होता था जिससे उसका प्रत्यक्ष सामना होता था।

यहीं से उनकी राजनीति में किसान प्रश्न की केंद्रीयता बढ़ने लगी।

# 3. बिहार की कृषि संरचना : किसान आंदोलन की जमीन

सहजानंद के किसान नेता बनने को समझने के लिए उस समय बिहार की भूमि व्यवस्था को समझना आवश्यक है।

बिहार के बड़े हिस्से में 1793 के स्थायी बंदोबस्त की विरासत मौजूद थी।

जमींदार सरकार को निर्धारित राजस्व देते थे और उनके अधीन बड़ी संख्या में रैयत तथा काश्तकार खेती करते थे।

लेकिन भूमि-संबंध केवल जमींदार और किसान की सीधी दो-स्तरीय संरचना नहीं थे।

कई क्षेत्रों में मध्यस्थ अधिकार, अलग-अलग श्रेणियों के काश्तकार, उपकाश्तकार और कृषि मजदूर मौजूद थे।

भूमि पर किसका कौन-सा अधिकार है, यह प्रश्न अक्सर अत्यंत जटिल हो जाता था।

किसान की शिकायतें अनेक प्रकार की थीं—

फसल या अन्य वस्तुओं के रूप में वसूली,

काश्तकारी अधिकारों को लेकर विवाद,

और जमींदारी अमले की मनमानी।

बिहार राज्य अभिलेखागार के स्वामी सहजानंद और किसान सभा से जुड़े डिजिटाइज्ड संग्रह में 1928 से आगे किसान बैठकों, लगान और कर-माफी, किसान सभा गतिविधियों, बकाश्त विवाद, किसान सत्याग्रह और जमींदारी उन्मूलन जैसे विषयों पर प्रशासनिक अभिलेख उपलब्ध हैं। इससे स्पष्ट होता है कि औपनिवेशिक प्रशासन किसान सभा को बढ़ती राजनीतिक शक्ति के रूप में देख रहा था।

# 4. बिहटा और किसान की वास्तविकता से सामना

सहजानंद के किसान आंदोलन की ओर निर्णायक परिवर्तन में पटना के निकट बिहटा क्षेत्र का विशेष महत्व माना जाता है।

1920 के दशक के उत्तरार्ध में यहां रहकर उन्होंने किसानों की भूमि और लगान संबंधी समस्याओं को निकट से देखा।

प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय की एक शोध सामग्री के अनुसार 1927 में बिहटा क्षेत्र के अनुभवों ने सहजानंद को किसानों और मजदूरों पर होने वाले जमींदारी दबाव की ओर गंभीरता से आकर्षित किया। इसके बाद 4 मार्च 1928 को पश्चिम पटना किसान सभा के निर्माण की दिशा में प्रयास हुआ।

यह चरण महत्वपूर्ण था।

सहजानंद अब ग्रामीण समस्या को दूर से देखने वाले राजनीतिक नेता नहीं थे।

वे किसान से सीधे सुन रहे थे—

कितना लगान लिया जा रहा है,

कौन-सी अतिरिक्त वसूली होती है,

किस आधार पर किसान को जमीन से हटाया जाता है,

और जमींदारी अमला गांव में किस प्रकार व्यवहार करता है।

यहीं से उनके भीतर यह धारणा मजबूत हुई कि किसान की राजनीतिक चेतना और स्वतंत्र संगठन के बिना उसकी स्थिति नहीं बदलेगी।

# 5. पश्चिम पटना किसान सभा : प्रयोगशाला

1928 की पश्चिम पटना किसान सभा को बिहार प्रांतीय किसान सभा की महत्वपूर्ण पूर्वपीठिका माना जा सकता है।

इस स्थानीय संगठन ने दो बातें सिद्ध कीं।

पहली—ग्रामीण किसानों को उनके विशिष्ट आर्थिक प्रश्नों पर संगठित किया जा सकता है।

दूसरी—किसान संगठन को कांग्रेस की सामान्य राजनीतिक गतिविधि से अलग अपना कार्यक्रम चाहिए।

यह कोई मामूली परिवर्तन नहीं था।

राष्ट्रीय आंदोलन में अक्सर किसान को ब्रिटिश शासन-विरोधी जनसमूह के रूप में संगठित किया जाता था।

किसान सभा कह रही थी कि किसान को अपनी भूमि, लगान और बेदखली से जुड़े प्रश्नों पर भी स्वतंत्र आवाज चाहिए।

स्थानीय स्तर के इस प्रयोग ने आगे प्रांतीय संगठन बनाने का आधार तैयार किया।

# 6. 1929 का काश्तकारी विधेयक और किसान नेताओं की चिंता

1929 में बिहार में किसान संगठन की आवश्यकता अचानक अधिक तीव्र हो गई।

काश्तकारी कानून में प्रस्तावित संशोधनों को लेकर किसान नेताओं को आशंका थी कि इससे जमींदारों की स्थिति मजबूत और काश्तकारों की स्थिति कमजोर हो सकती है।

मुजफ्फरपुर में रामदयालु सिंह, श्रीकृष्ण सिंह, यमुना कार्यी, गुरु सहाय लाल और अन्य नेताओं के बीच कृषि प्रश्नों पर चर्चा हुई।

विचार यह था कि विधान परिषद में जमींदारों के प्रभाव का मुकाबला केवल सदन के भीतर नहीं किया जा सकता।

अध्याय 4

1930 के दशक का कृषि संकट और किसान असंतोष — महामंदी, कृषि मूल्यों में गिरावट, लगान, कर्ज, बेदखली और जमींदारी व्यवस्था

1930 का दशक भारतीय किसान राजनीति के इतिहास में निर्णायक था। यही वह समय था जब पहले से मौजूद ग्रामीण गरीबी, भूमि-असमानता, कर्ज और जमींदारी शोषण पर विश्वव्यापी महामंदी का अतिरिक्त दबाव पड़ा। कृषि उपज की कीमतें तेजी से गिरीं, किसानों की नकद आय सिकुड़ी, लेकिन लगान, भूमि-राजस्व, सिंचाई शुल्क, पुराने कर्ज और ब्याज के दायित्व उसी अनुपात में कम नहीं हुए। परिणाम यह हुआ कि जिस रकम को किसान पहले अपनी उपज बेचकर किसी तरह चुका देता था, वही रकम अब उसके लिए असहनीय बोझ बन गई।

यही आर्थिक विरोधाभास 1930 के दशक के किसान असंतोष की कुंजी है।

किसान की समस्या यह नहीं थी कि वह कम उत्पादन कर रहा था। कई क्षेत्रों में समस्या यह थी कि उसके उत्पादन का बाजार मूल्य इतना गिर गया था कि अच्छी फसल भी पुराने आर्थिक दायित्वों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं थी।

बंगाल का जूट उत्पादक, संयुक्त प्रांत का गेहूं उत्पादक, पंजाब का किसान, बिहार का रैयत और दक्षिण भारत का वाणिज्यिक फसल उगाने वाला कृषक—सभी अलग-अलग कृषि व्यवस्थाओं में रहते थे, लेकिन उन्हें एक समान संकट ने प्रभावित किया।

कृषि कीमतें गिर रही थीं।

कर्ज की वास्तविक मार बढ़ रही थी।

भूमि पर नियंत्रण कमजोर हो रहा था।

और औपनिवेशिक कृषि व्यवस्था में किसान के पास संकट का बोझ दूसरों पर डालने की शक्ति बहुत कम थी।

इसीलिए महामंदी केवल एक आर्थिक घटना नहीं रही। उसने भारतीय ग्रामीण समाज में ऐसे राजनीतिक परिवर्तन पैदा किए जिन्होंने किसान सभाओं, जमींदारी-विरोधी आंदोलनों और अंततः अखिल भारतीय किसान सभा के उदय को गति दी।

1. 1929 की महामंदी और भारत

अक्टूबर 1929 में अमेरिकी शेयर बाजार के पतन को सामान्यतः विश्वव्यापी महामंदी की प्रतीकात्मक शुरुआत माना जाता है, लेकिन संकट शीघ्र ही अमेरिका तक सीमित नहीं रहा।

विश्व व्यापार सिकुड़ गया।

औद्योगिक उत्पादन कम हुआ।

बैंकों और ऋण संस्थाओं पर संकट आया।

कच्चे माल और कृषि उत्पादों की मांग घटी।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में वस्तुओं की कीमतें तेजी से नीचे आईं।

भारत उस समय ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा था और उसकी अर्थव्यवस्था विश्व बाजार से गहराई से जुड़ चुकी थी।

भारत से जूट, कपास, चाय, गेहूं, तिलहन और अन्य कृषि उत्पाद निर्यात होते थे। इसलिए विश्व बाजार की मांग कम होने का सीधा असर भारतीय कृषि पर पड़ा।

भारत के किसान का अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से संबंध भले उसे दिखाई न देता हो, लेकिन उसकी फसल का मूल्य कलकत्ता, बंबई, लंदन और दूसरे वैश्विक बाजारों के उतार-चढ़ाव से प्रभावित हो रहा था।

यानी बिहार या बंगाल के गांव का किसान किसी अमेरिकी बैंक या यूरोपीय औद्योगिक मंदी से बहुत दूर दिखाई देता था, लेकिन वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के भीतर दोनों जुड़े हुए थे।

# 2. सबसे गंभीर समस्या : कृषि मूल्यों में गिरावट

महामंदी का किसान पर सबसे तात्कालिक प्रभाव कृषि उपज की कीमतों में गिरावट के रूप में पड़ा।

भारत में खाद्यान्न और नकदी फसलों दोनों की कीमतें नीचे आईं।

जूट इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।

बंगाल के जूट उत्पादकों के लिए वैश्विक मांग में गिरावट विनाशकारी सिद्ध हुई। विद्यालयी इतिहास के मानक स्रोतों में भी उल्लेख है कि कच्चे जूट की कीमत 1920 के दशक के उत्तरार्ध से महामंदी के दौरान 60 प्रतिशत से अधिक गिर गई। किसानों ने अधिक उत्पादन करके आय बचाने की कोशिश की, लेकिन बाजार मूल्य और गिरने से उनकी समस्या बढ़ी।

यही दुविधा कई दूसरी फसलों में भी दिखाई दी।

यदि किसान कीमत गिरने के कारण अधिक उत्पादन करता, तो बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति कीमतों पर और दबाव डाल सकती थी।

यदि वह कम उत्पादन करता, तो नकद आय और कम हो जाती।

किसान दोनों ओर से फंस सकता था।

# 3. कीमतें घटीं, लेकिन देनदारियां क्यों नहीं घटीं?

महामंदी की सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक विशेषता यही थी कि किसान की आय और दायित्वों में असमान परिवर्तन हुआ।

मान लें कि किसान को सामान्य वर्ष में अपनी फसल बेचकर 100 रुपये मिलते थे और उसे 25 रुपये लगान, कर तथा ब्याज के रूप में देने होते थे।

यदि कृषि कीमतें इतनी गिर जाएं कि उसी उपज से उसे केवल 60 रुपये मिलें, लेकिन लगान और कर्ज की रकम लगभग 25 रुपये ही रहे, तो दायित्वों का वास्तविक बोझ बहुत बढ़ जाता है।

यही 1930 के दशक में हुआ।

लगान अक्सर पहले से निर्धारित था।

भूमि-राजस्व तुरंत बाजार कीमतों के साथ नहीं बदलता था।

पुराना कर्ज रुपये में ही चुकाना था।

सिंचाई अथवा अन्य शुल्क भी कई क्षेत्रों में देय थे।

इसलिए कृषि कीमतों में गिरावट ने किसानों पर वास्तविक कर और ऋण भार बढ़ा दिया।

यही कारण है कि किसान आंदोलनों में लगान और राजस्व घटाने की मांग इतनी शक्तिशाली बनी।

# 4. किसान के लिए ‘मूल्य गिरना’ हमेशा राहत क्यों नहीं था?

पहली नजर में कम कीमतें आम उपभोक्ता के लिए लाभकारी प्रतीत हो सकती हैं।

लेकिन कृषि उत्पाद बेचने वाला किसान स्वयं विक्रेता भी था।

उसकी नकद आय फसल से आती थी।

यदि गेहूं, चावल, जूट अथवा कपास का बाजार मूल्य गिरता है, तो उसे पहले जितनी नकदी पाने के लिए अधिक उपज बेचनी पड़ती है।

विशेषकर उन किसानों के लिए समस्या गंभीर थी जिन्हें नकद में—

और अन्य आवश्यक वस्तुएं खरीदनी पड़ती थीं।

इसलिए किसान की दृष्टि से मूल्य-पतन केवल ‘सस्ती वस्तुओं’ का दौर नहीं था।

यह उसकी आय के पतन का दौर था।

# 5. संयुक्त प्रांत : आर्थिक संकट की समकालीन गवाही

संयुक्त प्रांत—आज के उत्तर प्रदेश के बड़े हिस्से—से 1931 के दस्तावेज कृषि संकट की तीव्रता दिखाते हैं।

जवाहरलाल नेहरू द्वारा मार्च और अप्रैल 1931 में तैयार नोटों में स्पष्ट कहा गया कि संयुक्त प्रांत के अनेक किसान वास्तविक आर्थिक अक्षमता के कारण पूरा लगान और राजस्व चुकाने की स्थिति में नहीं थे।

एक समकालीन नोट में बताया गया कि प्रांतीय सहकारी विभाग के आकलन के अनुसार लगभग 60 से 80 प्रतिशत कृषक कर्ज में थे। नेहरू ने यह भी दर्ज किया कि 1928–30 के दौरान प्रांतीय सरकार को बड़ी मात्रा में भूमि-राजस्व माफ अथवा स्थगित करना पड़ा था, क्योंकि ग्रामीण आर्थिक स्थिति लगातार बिगड़ रही थी।

यह महत्वपूर्ण प्रमाण है।

किसान का कर न देना हमेशा राजनीतिक अवज्ञा नहीं था।

कई क्षेत्रों में वह सचमुच भुगतान करने में असमर्थ था।

यही आर्थिक संकट कभी-कभी राजनीतिक ‘नो-रेंट’ या ‘नो-रेवेन्यू’ आंदोलन का रूप ग्रहण करता था।

# 6. लगान का प्रश्न किसान आंदोलन के केंद्र में क्यों आया?

जमींदारी क्षेत्रों में किसान सरकार को सीधे भूमि-राजस्व देने के बजाय प्रायः जमींदार को लगान देता था।

इस व्यवस्था में कृषि बाजार का जोखिम किसान पर था।

बाजार मूल्य गिर जाए—

लेकिन लगान की मांग बनी रह सकती थी।

यही कारण था कि आर्थिक मंदी के समय लगान संबंधी व्यवस्था अत्यंत विस्फोटक हो गई।

किसान सभा की मांग केवल इतनी नहीं थी कि ‘दयालुता दिखाकर थोड़ा लगान कम कर दिया जाए।’

किसान नेता पूछने लगे—

यदि कृषि उपज का मूल्य आधा हो गया है तो पुराना लगान क्यों?

यदि किसान भूमि पर पीढ़ियों से खेती कर रहा है तो केवल बकाया लगान के कारण उसे बेदखल क्यों किया जाए?

अध्याय 5

कांग्रेस और किसान प्रश्न — राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर किसान राजनीति, स्वतंत्र किसान संगठन की आवश्यकता और कांग्रेस नेतृत्व के साथ उभरते मतभेद

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और किसान राजनीति का संबंध न तो केवल सहयोग का इतिहास है और न ही केवल संघर्ष का। दोनों के बीच संबंध लगातार बदलते रहे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध करोड़ों किसानों को राजनीतिक रूप से सक्रिय करने में असाधारण भूमिका निभाई। चंपारण, खेड़ा, असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा और बाद के राष्ट्रीय आंदोलनों ने गांवों तक राजनीति पहुंचाई। कांग्रेस ने लगान, भूमि-राजस्व, ग्रामीण ऋण और कृषि संकट जैसे प्रश्नों को राष्ट्रीय मंच पर भी उठाया।

इसके बावजूद 1930 के दशक में अलग किसान संगठनों की आवश्यकता तेजी से महसूस होने लगी।

यही विरोधाभास अखिल भारतीय किसान सभा के जन्म को समझने की कुंजी है।

किसानों की दृष्टि से कांग्रेस ब्रिटिश शासन को समाप्त करने की सबसे बड़ी राष्ट्रीय शक्ति थी, लेकिन किसान के दैनिक जीवन में शोषण केवल अंग्रेज अधिकारी के रूप में उपस्थित नहीं था। कई क्षेत्रों में उसका तत्काल संघर्ष भारतीय जमींदार, ताल्लुकेदार, साहूकार, बिचौलिया और स्थानीय प्रशासन से था।

और इनमें से अनेक प्रभावशाली भू-स्वामी स्वयं कांग्रेस के समर्थक थे।

फलतः एक बुनियादी प्रश्न खड़ा हुआ—

क्या स्वतंत्रता आंदोलन की एकता बनाए रखने के लिए किसान अपने वर्गीय और भूमि-संबंधी संघर्षों को स्थगित करे, या राष्ट्रीय स्वतंत्रता की लड़ाई के साथ-साथ भूमि, लगान और आर्थिक न्याय की लड़ाई भी चलाए?

यही प्रश्न कांग्रेस और किसान सभा के रिश्ते को धीरे-धीरे जटिल बनाता गया।

1. कांग्रेस की प्रारंभिक सामाजिक संरचना

1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के समय उसका नेतृत्व मुख्यतः शिक्षित मध्यवर्ग, वकीलों, पेशेवरों, व्यापारिक वर्गों और कुछ संपन्न भू-स्वामी समूहों के हाथ में था।

उस दौर में कांग्रेस की प्रमुख मांगें थीं—

भारतीयों की प्रशासन में अधिक भागीदारी,

विधान परिषदों का विस्तार,

सरकारी सेवाओं में समान अवसर,

कर नीतियों की आलोचना,

और औपनिवेशिक शासन में संवैधानिक सुधार।

ग्रामीण किसान कांग्रेस के प्रत्यक्ष संगठनात्मक आधार का केंद्र नहीं था।

हालांकि कांग्रेस के शुरुआती नेता भूमि-राजस्व और ग्रामीण गरीबी की आलोचना करते थे, लेकिन किसान को स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति के रूप में संगठित करने का कार्यक्रम अभी विकसित नहीं हुआ था।

बीसवीं सदी में यह स्थिति तेजी से बदली।

# 2. गांधी और किसान राजनीति का नया चरण

महात्मा गांधी के भारतीय राजनीति में सक्रिय होने के बाद कांग्रेस के सामाजिक आधार का असाधारण विस्तार हुआ।

चंपारण सत्याग्रह 1917,

खेड़ा सत्याग्रह 1918,

असहयोग आंदोलन 1920–22,

और बाद में सविनय अवज्ञा आंदोलन—

इन सभी ने किसानों को राष्ट्रीय राजनीति से जोड़ा।

गांधी की राजनीतिक शैली ग्रामीण समाज के लिए अधिक सुलभ थी।

धार्मिक और नैतिक प्रतीक—

इन माध्यमों ने राजनीति को शहरों की बैठकों से निकालकर गांव तक पहुंचाया।

लेकिन गांधी का किसान आंदोलन के प्रति दृष्टिकोण विशुद्ध वर्ग-संघर्ष का नहीं था।

वे किसान और जमींदार को स्वभावतः अपरिवर्तनीय शत्रु वर्गों के रूप में देखने के बजाय न्यायपूर्ण संबंध, नैतिक दबाव और अहिंसक संघर्ष के माध्यम से सुधार की संभावना तलाशते थे।

यहीं बाद की किसान सभा राजनीति से महत्वपूर्ण अंतर पैदा हुआ।

# 3. चंपारण : किसान प्रश्न राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश करता है

1917 का चंपारण सत्याग्रह भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और किसान प्रश्न के संबंध में ऐतिहासिक मोड़ था।

नील की तिनकठिया व्यवस्था और यूरोपीय बागान मालिकों के दबाव के विरुद्ध किसानों की शिकायतों को गांधी ने राष्ट्रीय महत्व दिया।

यहां संघर्ष मुख्यतः यूरोपीय नील उत्पादकों के विरुद्ध था।

इसलिए कांग्रेस अथवा राष्ट्रीय नेतृत्व को भारतीय भू-स्वामी वर्ग से व्यापक टकराव की समस्या उतनी तीव्रता से नहीं झेलनी पड़ी।

लेकिन चंपारण ने एक बड़ी बात सिद्ध कर दी—

ग्रामीण किसान के ठोस आर्थिक प्रश्न को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा जा सकता है।

यह अनुभव आगे किसान राजनीति के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हुआ।

# 4. खेड़ा : भूमि-राजस्व और किसान प्रतिरोध

1918 के खेड़ा सत्याग्रह में खराब फसल के बावजूद भूमि-राजस्व वसूली का प्रश्न केंद्र में था।

यहां संघर्ष सरकार से था।

किसान मांग कर रहे थे कि फसल की खराब स्थिति में राजस्व वसूली स्थगित की जाए।

वल्लभभाई पटेल सहित स्थानीय नेताओं ने गांधी के नेतृत्व में किसानों को संगठित किया।

खेड़ा ने दिखाया कि किसान की आर्थिक मांग और औपनिवेशिक शासन-विरोधी राजनीति एक-दूसरे को मजबूत कर सकती हैं।

लेकिन आगे किसान राजनीति ऐसी परिस्थितियों में प्रवेश करने वाली थी जहां संघर्ष केवल ब्रिटिश सरकार से नहीं बल्कि भारतीय जमींदार से भी था।

# 5. अवध किसान आंदोलन और पहली बड़ी कठिनाई

संयुक्त प्रांत के अवध क्षेत्र में ताल्लुकेदार और किसान के बीच संघर्ष ने कांग्रेस के सामने अधिक जटिल स्थिति पैदा की।

किसानों की शिकायतें थीं—

और ताल्लुकेदारी उत्पीड़न।

बाबा रामचंद्र जैसे नेताओं ने किसानों को संगठित किया।

जवाहरलाल नेहरू ने गांवों का दौरा किया और ग्रामीण गरीबी तथा किसान उत्पीड़न को निकट से देखा।

लेकिन कांग्रेस नेतृत्व के सामने समस्या थी—

ताल्लुकेदारों और संपन्न भू-स्वामियों का एक हिस्सा राष्ट्रीय आंदोलन से सहानुभूति रखता था।

यदि कांग्रेस किसान को पूर्ण जमींदार-विरोधी संघर्ष में उतार देती, तो उसका व्यापक राष्ट्रीय गठबंधन टूट सकता था।

यहीं कांग्रेस की राष्ट्रीय एकता की राजनीति और किसान की वर्गीय आर्थिक मांग के बीच पहला गंभीर विरोधाभास दिखाई दिया।

# 6. असहयोग आंदोलन और किसान अपेक्षाएं

1920–22 के असहयोग आंदोलन ने ग्रामीण जनता में असाधारण राजनीतिक ऊर्जा पैदा की।

किसान ने कांग्रेस और गांधी के संदेश को अपने स्थानीय अनुभव से जोड़ा।

कई स्थानों पर किसान के लिए ‘स्वराज’ का अर्थ था—

जमींदार की मनमानी का अंत,

और स्थानीय उत्पीड़न से मुक्ति।

लेकिन कांग्रेस नेतृत्व के लिए स्वराज का तत्काल अर्थ ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय राजनीतिक संघर्ष था।

दोनों अर्थ हमेशा एक जैसे नहीं थे।

यह अंतर आगे बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।

किसान राष्ट्रीय आंदोलन में अपनी स्थानीय आकांक्षाएं लेकर प्रवेश कर रहा था।

कांग्रेस उन आकांक्षाओं को नियंत्रित भी करना चाहती थी ताकि आंदोलन हिंसक न हो और राष्ट्रीय राजनीतिक लक्ष्य से न भटके।

# 7. कांग्रेस को किसान चाहिए था—लेकिन किस रूप में?

यह सवाल 1920 और 1930 के दशकों में बार-बार सामने आया।

कांग्रेस को ब्रिटिश शासन का सामना करने के लिए विशाल जनाधार चाहिए था।

और भारत की बहुसंख्यक जनता किसान थी।

इसलिए किसान के बिना कांग्रेस जन-आंदोलन नहीं बन सकती थी।

क्या किसान कांग्रेस का अनुशासित समर्थक रहेगा?

या वह अपनी स्वतंत्र मांगों और संगठन के साथ राजनीतिक शक्ति बनेगा?

पहला विकल्प कांग्रेस के लिए अपेक्षाकृत सरल था।

स्वतंत्र किसान संगठन कांग्रेस नेतृत्व पर भी दबाव डाल सकता था।

यही स्वतंत्र किसान सभा की आवश्यकता का राजनीतिक आधार बना।

# 8. कराची प्रस्ताव, 1931 : आर्थिक अधिकारों की दिशा

1931 के कराची अधिवेशन में कांग्रेस ने मौलिक अधिकारों और आर्थिक नीति संबंधी महत्वपूर्ण प्रस्ताव स्वीकार किए।

यह परिवर्तन महत्वपूर्ण था।

कांग्रेस अब केवल संवैधानिक स्वतंत्रता की मांग नहीं कर रही थी; वह आर्थिक न्याय के प्रश्नों को भी अपने कार्यक्रम में शामिल कर रही थी।

कृषि संबंधी दिशा में भूमि-राजस्व और किराए के बोझ में राहत तथा छोटे किसानों की सुरक्षा जैसे प्रश्न उभरने लगे।

यह कांग्रेस की किसान नीति में महत्वपूर्ण प्रगति थी।

लेकिन किसान नेताओं के सामने प्रश्न फिर भी बना रहा—

यह स्वीकारोक्ति महत्वपूर्ण थी।

स्वामी सहजानंद सरस्वती,

अध्याय 6

अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना — लखनऊ, 1936 : स्थापना सम्मेलन, परिस्थितियां, प्रमुख नेता, प्रारंभिक प्रस्ताव और संगठनात्मक स्वरूप

11 अप्रैल 1936 को लखनऊ में हुआ अखिल भारतीय किसान सम्मेलन भारतीय किसान राजनीति के इतिहास में निर्णायक मोड़ था। उस दिन पहली बार बिहार, संयुक्त प्रांत, आंध्र, बंगाल, पंजाब, मद्रास, महाराष्ट्र और दूसरे क्षेत्रों में विकसित किसान संगठन तथा वामपंथी-समाजवादी किसान कार्यकर्ता एक ऐसे राष्ट्रीय मंच में जुड़े जिसका घोषित उद्देश्य केवल किसानों की कुछ तत्काल शिकायतों को सरकार तक पहुंचाना नहीं, बल्कि किसानों को उनकी आर्थिक और राजनीतिक मांगों के लिए स्थायी रूप से संगठित करना था।

आरंभ में संगठन का नाम अखिल भारतीय किसान कांग्रेस — All India Kisan Congress रखा गया। बाद में इसका नाम अखिल भारतीय किसान सभा प्रचलित और औपचारिक हुआ। स्वामी सहजानंद सरस्वती इसके प्रथम अध्यक्ष और प्रोफेसर एन. जी. रंगा प्रथम महासचिव चुने गए। किसान सभा के स्वर्ण जयंती दस्तावेज भी पुष्टि करते हैं कि स्थापना सम्मेलन 11 अप्रैल 1936 को लखनऊ में हुआ था और प्रारंभिक नाम अखिल भारतीय किसान कांग्रेस था।

लेकिन 11 अप्रैल की घटना को केवल किसी संगठन की जन्मतिथि के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा।

इसके पीछे लगभग दो दशकों की किसान संगठन परंपरा, 1929 के बाद की विश्व महामंदी, कृषि कीमतों का पतन, बढ़ता ग्रामीण ऋण, जमींदारी और बेदखली के संघर्ष, कांग्रेस के भीतर समाजवादी धारा का विकास तथा विभिन्न प्रांतीय किसान सभाओं को राष्ट्रीय स्तर पर जोड़ने की आवश्यकता काम कर रही थी।

इस अर्थ में लखनऊ का सम्मेलन किसी आंदोलन की अचानक शुरुआत नहीं था।

वह स्थानीय और प्रांतीय किसान संघर्षों के राष्ट्रीयकरण की ऐतिहासिक परिणति था।

1. 1936 तक राष्ट्रीय किसान संगठन की आवश्यकता क्यों पैदा हुई?

1930 के दशक के मध्य तक भारतीय किसान आंदोलन एक विरोधाभासी स्थिति में पहुंच चुका था।

किसानों के संघर्ष अनेक प्रांतों में फैल चुके थे, लेकिन उनकी संगठनात्मक संरचना मुख्यतः स्थानीय अथवा प्रांतीय थी।

बिहार में बिहार प्रांतीय किसान सभा सक्रिय थी।

आंध्र में एन. जी. रंगा और दूसरे नेता किसान संगठन विकसित कर रहे थे।

संयुक्त प्रांत में किसान सभाओं की पुरानी परंपरा थी।

बंगाल में काश्तकारी और बटाईदारी से जुड़े प्रश्न उठ रहे थे।

पंजाब में ग्रामीण ऋण और भूमि संबंधी समस्याएं किसान राजनीति को प्रभावित कर रही थीं।

मालाबार और मद्रास में भी किरायेदारी, राजस्व और भू-स्वामित्व से जुड़े संघर्ष मौजूद थे।

इन सभी आंदोलनों की परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन किसान नेताओं ने धीरे-धीरे कुछ साझा प्रश्न पहचान लिए थे—

भूमि पर किसान का अधिकार,

लगान और भूमि-राजस्व,

जमींदारी और सामंती वसूली,

और कृषि मजदूरों की स्थिति।

जब किसान की समस्याओं में इतने व्यापक साझा तत्व हैं, तो संगठन केवल प्रांतीय क्यों रहे?

यही अखिल भारतीय किसान सभा की आवश्यकता का मूल तर्क था।

# 2. महामंदी ने राष्ट्रीय संगठन की जरूरत तेज कर दी

1929 के बाद की विश्वव्यापी महामंदी ने भारतीय कृषि की पहले से मौजूद समस्याओं को असाधारण रूप से तीखा कर दिया।

कृषि उत्पादों की कीमतें नीचे गईं।

किसानों की नकद आय कम हुई।

लगान और राजस्व का बोझ पूरी तरह बाजार कीमतों के अनुरूप कम नहीं हुआ।

कई क्षेत्रों में किसान जमीन गिरवी रखने या बेचने के लिए मजबूर हुए।

बिहार में यह प्रक्रिया बकाश्त भूमि संघर्षों की पृष्ठभूमि बनी।

बंगाल में जूट और ग्रामीण ऋण संकट बढ़ा।

संयुक्त प्रांत में लगान और राजस्व भुगतान की क्षमता गंभीर समस्या बनी।

पंजाब में कृषि बाजार और पुराने कर्ज का दबाव बढ़ा।

किसान सभा के बाद के दस्तावेज स्वयं मानते हैं कि बीसवीं सदी के तीसरे दशक और महामंदी से उत्पन्न परिस्थितियों ने अलग-अलग किसान संगठनों को राष्ट्रीय मंच में जोड़ने की आवश्यकता पैदा की।

इसलिए अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना के पीछे विचारधारा जितनी महत्वपूर्ण थी, उतनी ही महत्वपूर्ण किसान की वास्तविक आर्थिक दुर्दशा थी।

# 3. कांग्रेस का विस्तार और किसान की नई राजनीतिक चेतना

महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों ने किसानों को राष्ट्रीय राजनीति का सक्रिय भाग बनाया था।

लेकिन इससे एक नया प्रश्न पैदा हुआ।

किसान राष्ट्रीय आंदोलन में कांग्रेस का समर्थक था, लेकिन उसकी अपनी सामाजिक और आर्थिक मांगें थीं।

इन प्रश्नों का समाधान केवल अंग्रेजों के भारत छोड़ने की प्रतीक्षा नहीं कर सकता था।

कांग्रेस के भीतर ही अनेक नेताओं ने महसूस किया कि किसान को स्वतंत्र संगठन चाहिए।

यही कारण है कि अखिल भारतीय किसान सभा का जन्म कांग्रेस से पूर्ण विच्छेद करके नहीं हुआ।

वास्तव में उसके संस्थापकों का बड़ा हिस्सा राष्ट्रीय आंदोलन और कांग्रेस की वामपंथी धाराओं से निकला था।

# 4. कांग्रेस समाजवादी पार्टी की भूमिका

1934 में कांग्रेस समाजवादी पार्टी की स्थापना किसान सभा के निर्माण में महत्वपूर्ण राजनीतिक कड़ी बनी।

और अन्य समाजवादी कार्यकर्ता कांग्रेस को किसान-मजदूर आधारित अधिक समाजवादी दिशा में ले जाना चाहते थे।

किसान संगठनों के बीच राष्ट्रीय समन्वय स्थापित करना उनके लिए स्वाभाविक लक्ष्य था।

अखिल भारतीय किसान सभा के ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि जनवरी 1936 में किसान प्रश्न पर सक्रिय नेताओं की बैठक में विभिन्न प्रांतों के किसान संगठनों का अखिल भारतीय सम्मेलन बुलाने का निर्णय हुआ। एक आधिकारिक विवरण 16 जनवरी 1936 की बैठक का उल्लेख करता है; स्वर्ण जयंती के दूसरे दस्तावेज में जनवरी 1936 में मेरठ में आयोजन समिति बनने की बात कही गई है। दोनों विवरण इस बात पर सहमत हैं कि अप्रैल 1936 के लखनऊ सम्मेलन से पहले जनवरी में राष्ट्रीय आयोजन की प्रक्रिया औपचारिक रूप ले चुकी थी।

# 5. कमलादेवी चट्टोपाध्याय की महत्वपूर्ण भूमिका

किसान सभा की स्थापना की कहानी में अक्सर पुरुष नेताओं—सहजानंद, रंगा, जयप्रकाश नारायण और लोहिया—का उल्लेख अधिक होता है, लेकिन प्रारंभिक संगठन-प्रक्रिया में कमलादेवी चट्टोपाध्याय की भूमिका भी उल्लेखनीय थी।

किसान सभा के अपने इतिहास के अनुसार विभिन्न किसान संगठनों को एक मंच पर लाने की दिशा में हुई एक महत्वपूर्ण बैठक की अध्यक्षता कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने की और जयप्रकाश नारायण तथा एन. जी. रंगा को संयुक्त संयोजक के रूप में राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करने की जिम्मेदारी दी गई।

यह तथ्य किसान सभा के इतिहास में दो कारणों से महत्वपूर्ण है।

पहला, संगठन का निर्माण किसी एक प्रांत अथवा व्यक्ति की पहल नहीं था।

दूसरा, स्वतंत्रता आंदोलन की महिला नेतृत्व परंपरा किसान संगठन के निर्माण में भी मौजूद थी।

# 6. लखनऊ ही क्यों चुना गया?

अप्रैल 1936 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन भी लखनऊ में आयोजित हो रहा था।

किसान नेताओं ने उसी समय राष्ट्रीय किसान सम्मेलन बुलाने का निर्णय किया।

यह चुनाव आकस्मिक नहीं था।

देश के विभिन्न हिस्सों से कांग्रेस और वामपंथी नेता पहले ही लखनऊ आने वाले थे।

राष्ट्रीय प्रेस का ध्यान वहां केंद्रित था।

किसान आंदोलन और राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के बीच संबंध प्रदर्शित करने का भी यह अवसर था।

किसान सभा के स्वर्ण जयंती साहित्य ने बाद में स्पष्ट किया कि लखनऊ सम्मेलन को कांग्रेस अधिवेशन के साथ आयोजित करने का उद्देश्य किसान आंदोलन को राष्ट्रीय आंदोलन का अंग बताते हुए भी उसकी स्वतंत्र वर्गीय संगठनात्मक पहचान बनाए रखना था।

यानी स्थापना के क्षण से ही दो बातें साथ थीं—

राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ाव और किसान संगठन की स्वायत्तता।

यही आगे कांग्रेस–किसान सभा संबंधों की केंद्रीय विशेषता बनी।

# 7. 11 अप्रैल 1936 : स्थापना सम्मेलन

व्यापक लक्ष्य

राष्ट्रीय स्वतंत्रता।

अध्याय 7

स्वामी सहजानंद सरस्वती — अखिल भारतीय किसान सभा के प्रथम अध्यक्ष, उनका नेतृत्व, किसान की अवधारणा, जमींदारी-विरोध और संगठन की प्रारंभिक वैचारिक दिशा

अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना के बाद उसका पहला और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न था—यह संगठन किसानों को किस दिशा में ले जाएगा? संगठन बन जाना एक बात थी; उसकी वैचारिक दिशा, सामाजिक आधार और संघर्ष की भाषा तय करना दूसरी। इस चरण में स्वामी सहजानंद सरस्वती की भूमिका निर्णायक थी।

11 अप्रैल 1936 को लखनऊ में बने अखिल भारतीय किसान संगठन के प्रथम अध्यक्ष के रूप में उनका चयन केवल औपचारिक नेतृत्व परिवर्तन नहीं था। पिछले अध्याय में देखा गया कि वे बिहार प्रांतीय किसान सभा के अनुभव, जमींदारी-विरोध, गांव स्तर के संगठन और स्वतंत्र किसान राजनीति की स्पष्ट धारणा लेकर राष्ट्रीय मंच पर पहुंचे थे। संगठन के प्रथम अध्यक्ष और एन. जी. रंगा के प्रथम महासचिव बनने की तथ्यात्मक स्थिति पिछले अध्याय में भी स्थापित की गई है।

सहजानंद ने किसान सभा को ऐसी दिशा देने में भूमिका निभाई जिसमें किसान को केवल राहत मांगने वाले गरीब कृषक के रूप में नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने वाले उत्पादक वर्ग के रूप में देखा गया। लखनऊ सम्मेलन के मूल उद्देश्य में किसानों, मजदूरों और अन्य शोषित वर्गों को आर्थिक शोषण से मुक्ति और राजनीतिक-आर्थिक शक्ति दिलाने की बात कही गई थी।

यहीं से सहजानंद के नेतृत्व का वास्तविक महत्व समझ में आता है।

उनके सामने प्रश्न केवल यह नहीं था कि लगान कितना हो।

वे धीरे-धीरे पूछ रहे थे—

भूमि और उत्पादन के बीच जो व्यक्ति वास्तविक श्रम करता है, सत्ता उसके हाथ क्यों न हो?

यही प्रश्न अखिल भारतीय किसान सभा को सामान्य कृषक हित-संस्था से अधिक व्यापक सामाजिक आंदोलन बनाने वाला था।

1. सहजानंद की वैचारिक यात्रा को स्थिर विचारधारा मानना गलत होगा

स्वामी सहजानंद की राजनीति को समझने में सबसे बड़ी भूल यह हो सकती है कि उनके अंतिम जमींदारी-विरोधी विचारों को उनके पूरे जीवन पर पीछे से लागू कर दिया जाए।

उनकी विचार-यात्रा क्रमिक थी।

वे प्रारंभ से मार्क्सवादी किसान नेता नहीं थे।

वे प्रारंभ से जमींदारी उन्मूलन के क्रांतिकारी समर्थक भी नहीं थे।

उनका सार्वजनिक जीवन धार्मिक और सामाजिक सुधार से शुरू हुआ।

फिर वे गांधी और कांग्रेस के प्रभाव में राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े।

उसके बाद बिहार के ग्रामीण समाज और जमींदार–रैयत संबंधों से निकट संपर्क ने उनकी राजनीति को किसान प्रश्न की ओर मोड़ा।

और अंततः किसान संघर्षों के अनुभव ने उन्हें अधिक तीखे जमींदारी-विरोध और वर्गीय राजनीति की ओर पहुंचाया।

वाल्टर हाउजर के विस्तृत अध्ययन का पूरा ढांचा भी इसी परिवर्तन को रेखांकित करता है—भूमि व्यवस्था, जमींदार–किसान संबंध, किसान सभा का निर्माण, संगठन की विचारधारा और कांग्रेस के साथ संघर्ष।

इसलिए सहजानंद का महत्व केवल उनके अंतिम विचारों में नहीं, बल्कि उन विचारों तक पहुंचने की प्रक्रिया में है।

# 2. सामाजिक सुधारक से राष्ट्रीयतावादी

सहजानंद सरस्वती का प्रारंभिक सार्वजनिक जीवन भूमिहार ब्राह्मण समुदाय के सामाजिक-सांस्कृतिक प्रश्नों से जुड़ा था।

उस चरण में उनकी चिंता मुख्यतः जातीय प्रतिष्ठा, शिक्षा और धार्मिक-सामाजिक अधिकारों से संबंधित थी।

लेकिन राष्ट्रीय आंदोलन में प्रवेश ने उनके दृष्टिकोण का विस्तार किया।

गांधी और कांग्रेस से संबंध ने उन्हें यह समझने का अवसर दिया कि सामाजिक परिवर्तन को औपनिवेशिक सत्ता के प्रश्न से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

असहयोग आंदोलन के दौरान ग्रामीण जनता की बड़ी भागीदारी ने भी उन्हें गांव और किसान की राजनीतिक शक्ति से परिचित कराया।

फिर भी इस समय वे किसान को अलग वर्गीय संगठन के रूप में देखने तक नहीं पहुंचे थे।

उनकी राजनीति अभी राष्ट्रवादी जन-संगठन के दायरे में थी।

# 3. किसान प्रश्न ने उनकी राजनीति क्यों बदल दी?

बिहार में किसानों से प्रत्यक्ष संपर्क निर्णायक सिद्ध हुआ।

किसान उनके पास धार्मिक प्रश्न लेकर नहीं आ रहा था।

अमला परेशान करता है।

जबरन वसूली हो रही है।

बकाया बढ़ता जा रहा है।

यानी किसान की समस्या का केंद्र भूमि और ग्रामीण सत्ता थी।

सहजानंद ने धीरे-धीरे यह अनुभव किया कि ग्रामीण गरीबी को केवल सदाचार, चरखा, शराबबंदी या नैतिक सुधार से नहीं समझा जा सकता।

यदि किसान की आर्थिक स्थिति भूमि संबंधों द्वारा निर्धारित होती है तो भूमि व्यवस्था को राजनीतिक प्रश्न बनाना ही होगा।

यहीं से उनके सामाजिक सुधारक व्यक्तित्व का रूपांतरण किसान नेता में हुआ।

# 4. प्रारंभिक दौर : वर्ग-संघर्ष नहीं, वर्ग-सामंजस्य

यह तथ्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है कि बिहार प्रांतीय किसान सभा के आरंभिक चरण में सहजानंद तत्काल जमींदार और किसान के अपरिहार्य वर्ग-युद्ध की बात नहीं कर रहे थे।

कुछ शोधों के अनुसार प्रारंभिक बिहार किसान सभा की सोच में जमींदार और रैयत के बीच संघर्ष को नियंत्रित करने और समझौते द्वारा किसान की शिकायत कम करने की संभावना मौजूद थी। नेताजी सुभाष मुक्त विश्वविद्यालय की इतिहास सामग्री भी दर्ज करती है कि सहजानंद ने स्वयं प्रारंभिक बिहार प्रांतीय किसान सभा को वर्गीय शांति बनाए रखते हुए जमींदार–किसान विवाद कम करने के प्रयास के रूप में देखा था; 1933 के बाद समाजवादी प्रभाव और संघर्ष के अनुभवों से उसकी मांगें अधिक उग्र हुईं।

यह तथ्य उनके बाद के परिवर्तन को और महत्वपूर्ण बनाता है।

सहजानंद जन्मजात वर्ग-संघर्षवादी नहीं थे।

जमींदारी व्यवस्था के व्यावहारिक अनुभव ने उन्हें जमींदारी-विरोधी बनाया।

# 5. सुधार से उन्मूलन तक की यात्रा

यह सहजानंद की किसान राजनीति का सबसे बड़ा वैचारिक परिवर्तन था।

प्रारंभिक प्रश्न था—

जमींदार की मनमानी कैसे रोकी जाए?

काश्तकार के अधिकार कानून से कैसे सुरक्षित हों?

लगान कितना होना चाहिए?

क्या जमींदारी संस्था का अस्तित्व ही आवश्यक है?

1935 तक बिहार प्रांतीय किसान सभा के भीतर जमींदारी उन्मूलन की मांग स्पष्ट होने लगी थी। किसान सभा के अपने प्रकाशित इतिहास में सहजानंद के नेतृत्व में 1935 में जमींदारी व्यवस्था समाप्त करने संबंधी प्रस्ताव का उल्लेख मिलता है।

यानी अखिल भारतीय किसान सभा बनने से पहले ही सहजानंद सुधारवादी भूमि नीति से आगे बढ़ चुके थे।

# 6. सहजानंद की दृष्टि में जमींदारी समस्या क्या थी?

उनके लिए जमींदारी का प्रश्न धीरे-धीरे किसी एक ‘क्रूर जमींदार’ की समस्या से आगे बढ़ा।

यदि कोई जमींदार उदार भी हो, तब भी व्यवस्था में एक बुनियादी प्रश्न बचता था—

कृषि उत्पादन किसान करता है।

जोखिम किसान उठाता है।

लेकिन भूमि पर निर्णायक कानूनी-सामाजिक अधिकार एक ऐसे स्वामी के पास हो सकता है जो स्वयं खेती नहीं करता।

यानी वास्तविक कृषक और भूमि के बीच एक मध्यस्थ वर्ग मौजूद था।

सहजानंद की राजनीति इसी संरचना पर प्रहार करने लगी।

यही कारण है कि आगे वे केवल ‘अच्छी जमींदारी’ की मांग पर नहीं रुके।

उनका लक्ष्य संस्था समाप्त करने की दिशा में गया।

# 7. ‘बिना मुआवजे’ जमींदारी उन्मूलन की दिशा

1930 के दशक के उत्तरार्ध तक सहजानंद का जमींदारी-विरोध अत्यंत स्पष्ट हो चुका था।

बिहार राज्य अभिलेखागार में 1939 के दस्तावेजों में उनके उस पर्चे का उल्लेख मिलता है जिसमें बिना मुआवजे के जमींदारी उन्मूलन पर उनका प्रतिपादन था।

यह कोई मामूली नीति-अंतर नहीं था।

जमींदारी समाप्त करने पर भी प्रश्न बचता था—

जमींदारों को मुआवजा मिले या नहीं?

यदि विशाल सार्वजनिक धन देकर जमींदारी खरीदी जाती, तो सहजानंद की दृष्टि में उसका बोझ अंततः जनता पर आ सकता था।

उनका उग्र पक्ष कह रहा था—

# 8. सहजानंद के लिए ‘किसान’ कौन था?

यह शब्द महत्वपूर्ण था—

अध्याय 8

एन. जी. रंगा और राष्ट्रीय किसान संगठन का निर्माण — आंध्र की रैयत राजनीति, किसान शिक्षा, अखिल भारतीय किसान सभा में भूमिका और सहजानंद–रंगा नेतृत्व की प्रारंभिक साझेदारी

अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना का इतिहास यदि केवल स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व से समझने की कोशिश की जाए तो चित्र अधूरा रहेगा। राष्ट्रीय किसान संगठन के निर्माण में दक्षिण भारत, विशेष रूप से आंध्र की किसान राजनीति से आए प्रोफेसर एन. जी. रंगा की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण थी। लखनऊ में 11 अप्रैल 1936 को गठित अखिल भारतीय किसान संगठन में स्वामी सहजानंद प्रथम अध्यक्ष और रंगा प्रथम महासचिव बने थे। किसान सभा के बाद के आधिकारिक अभिलेख यह भी दर्ज करते हैं कि रंगा 1936 के फैजपुर सम्मेलन में अध्यक्ष और 1938 के कोमिल्ला सम्मेलन में फिर महासचिव चुने गए।

सहजानंद और रंगा दो अलग कृषि संसारों से आए थे।

सहजानंद की राजनीतिक प्रयोगशाला बिहार थी—जमींदारी, रैयत, बकाश्त, लगान और जमींदार–किसान संघर्ष।

रंगा का अनुभव आंध्र और तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी की विविध कृषि परिस्थितियों से जुड़ा था—रैयतवारी व्यवस्था, जमींदारी क्षेत्र, भूमि-राजस्व, सिंचाई, कृषि ऋण और बाजार।

लेकिन दोनों एक निर्णायक निष्कर्ष पर पहुंचे थे—

भारत के किसान को अपने हितों के लिए स्वतंत्र, स्थायी और अखिल भारतीय संगठन चाहिए।

यही साझा निष्कर्ष 1936 में दोनों को अखिल भारतीय किसान सभा के नेतृत्व में साथ लाया।

1. एन. जी. रंगा का महत्व केवल संगठनात्मक नहीं था

रंगा की विशेषता यह थी कि वे केवल आंदोलनकारी किसान नेता नहीं थे।

वे कृषि और ग्रामीण समाज का अध्ययन करने वाले चिंतक भी थे।

उनके लिए किसान आंदोलन का प्रश्न केवल यह नहीं था कि किसी गांव में कर अथवा लगान कितना है।

वे व्यापक प्रश्नों पर विचार करते थे—

भारतीय किसान की आर्थिक संरचना क्या है?

छोटे कृषक की विशिष्ट समस्या क्या है?

कृषि बाजार उसे कैसे प्रभावित करता है?

ग्रामीण ऋण का स्वरूप क्या है?

किसान को राजनीतिक शिक्षा कैसे दी जाए?

किसान को किसी दूसरे राजनीतिक वर्ग का अनुयायी बनने के बजाय स्वयं संगठित शक्ति कैसे बनाया जाए?

इसी कारण उनकी भूमिका राष्ट्रीय किसान आंदोलन में विशिष्ट बनी।

# 2. आंध्र की कृषि परिस्थितियां

रंगा की राजनीति को समझने के लिए आंध्र की कृषि संरचना को समझना आवश्यक है।

तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी के तेलुगु भाषी क्षेत्रों में भूमि व्यवस्था एक समान नहीं थी।

कुछ क्षेत्रों में रैयतवारी व्यवस्था थी।

कुछ बड़े जमींदारी क्षेत्रों में किसान भू-स्वामी मध्यस्थों के अधीन थे।

डेल्टा क्षेत्रों में सिंचित और अपेक्षाकृत व्यावसायिक कृषि विकसित हुई थी।

दूसरी ओर सूखे और कम सिंचित क्षेत्रों में कृषि जोखिम अधिक था।

इसलिए आंध्र किसान की समस्याएं कई स्तरों पर थीं—

यही विविधता रंगा की किसान राजनीति को बिहार के सीधे जमींदारी-विरोध से कुछ अलग प्रारंभिक आधार देती है।

# 3. रैयतवारी व्यवस्था का अर्थ

रैयतवारी व्यवस्था में किसान अथवा रैयत का संबंध अपेक्षाकृत सीधे सरकार से माना जाता था।

इससे पहली दृष्टि में यह लग सकता है कि जमींदारी क्षेत्रों की तुलना में रैयतवारी कृषक अधिक स्वतंत्र था।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि वह कृषि संकट से मुक्त था।

उसे भूमि-राजस्व देना था।

फसल खराब होने का जोखिम उसी का था।

कर्ज लेना पड़ सकता था।

सिंचाई और बाजार की समस्या बनी रहती थी।

और यदि कृषि कीमतें गिरतीं तो उसकी भुगतान क्षमता प्रभावित होती।

इसलिए आंध्र का किसान आंदोलन केवल ‘जमींदार बनाम किसान’ की राजनीति नहीं हो सकता था।

उसे औपनिवेशिक राज्य की राजस्व और कृषि नीति को भी चुनौती देनी थी।

# 4. जमींदारी आंध्र भी मौजूद था

रैयतवारी अनुभव के साथ आंध्र में शक्तिशाली जमींदारी क्षेत्रों की उपस्थिति भी थी।

इससे किसान राजनीति को भूमि संबंधों के दोनों प्रकार के अनुभव मिले।

एक तरफ किसान सीधे सरकार की राजस्व मांग से संघर्ष कर रहा था।

दूसरी तरफ जमींदार के अधीन कृषक किराया और काश्तकारी अधिकार की समस्या उठा सकता था।

यही कारण है कि आंध्र किसान राजनीति राष्ट्रीय किसान संगठन के लिए उपयोगी प्रयोगशाला बनी।

यह दिखाती थी कि किसान संगठन का कार्यक्रम केवल जमींदारी उन्मूलन तक सीमित नहीं हो सकता।

राष्ट्रीय कार्यक्रम में—

सभी को स्थान देना होगा।

आंध्र की कृषि के कई क्षेत्र बाजार से जुड़े हुए थे।

किसान केवल परिवार के उपभोग के लिए नहीं बल्कि बिक्री के लिए भी उत्पादन करता था।

इसलिए उसकी आर्थिक स्थिति फसल की बाजार कीमत पर निर्भर थी।

1929 के बाद की महामंदी ने यह संबंध और स्पष्ट कर दिया।

यदि बाजार मूल्य गिरता है लेकिन भूमि-राजस्व और ऋण बना रहता है तो रैयतवारी किसान भी गहरे संकट में पड़ सकता है।

इस अनुभव ने रंगा को किसान प्रश्न को केवल भू-स्वामित्व की समस्या नहीं बल्कि कृषि अर्थव्यवस्था की व्यापक समस्या के रूप में देखने की जमीन दी।

# 6. शिक्षा और अध्ययन की भूमिका

रंगा की किसान राजनीति में अध्ययन का विशेष महत्व था।

उनका विश्वास था कि किसान आंदोलन केवल भावनात्मक नारों पर नहीं चल सकता।

किसान नेता को समझना चाहिए—

भूमि व्यवस्था कैसे काम करती है,

राजस्व कैसे तय होता है,

फसल की लागत क्या है,

कृषि व्यापार कौन नियंत्रित करता है,

और सरकार की कृषि नीति किसान को कैसे प्रभावित करती है।

इस कारण वे किसान कार्यकर्ताओं की राजनीतिक और आर्थिक शिक्षा पर जोर देते थे।

यही तत्व उन्हें उस दौर के अनेक पारंपरिक किसान नेताओं से अलग करता है।

# 7. ‘किसान शिक्षा’ का वास्तविक अर्थ

किसान शिक्षा से आशय केवल साक्षरता नहीं था।

रंगा की दृष्टि में किसान को यह समझना चाहिए कि उसकी गरीबी व्यक्तिगत असफलता नहीं हो सकती।

यदि हजारों किसान समान परिस्थिति में हैं तो समस्या संरचनात्मक है।

कानून उसके बारे में क्या कहता है,

राजस्व व्यवस्था कैसी है,

किसान संगठन क्यों आवश्यक है,

सरकार से मांग कैसे रखी जाए,

और सामूहिक कार्रवाई का अर्थ क्या है।

इस प्रकार किसान शिक्षा वास्तव में राजनीतिक नागरिकता का प्रशिक्षण थी।

# 8. गांव का किसान एक राजनीतिक कार्यकर्ता

यह दृष्टि अखिल भारतीय किसान सभा की संगठनात्मक कल्पना से गहराई से जुड़ी।

किसान केवल रैली में भाग लेने वाला व्यक्ति नहीं।

वह संगठन का सदस्य हो।

और अपने गांव में संगठन का विस्तार करे।

पिछले अध्याय में अखिल भारतीय किसान सभा की इसी गांव से जिला, प्रांत और राष्ट्रीय स्तर तक की संरचना का विवरण सामने आया था।

रंगा की किसान शिक्षा की अवधारणा इस संगठनात्मक मॉडल को व्यवहारिक आधार देती थी।

# 9. किसान के स्वतंत्र संगठन की धारणा

रंगा उन नेताओं में थे जिन्होंने किसान को केवल कांग्रेस का ग्रामीण समर्थक मानने से इनकार किया।

वे स्वयं राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े थे।

लेकिन उनका तर्क था कि किसान के विशिष्ट आर्थिक हित हैं।

इसलिए उसे अपनी संस्था चाहिए।

किसान सभा के 1979 के ऐतिहासिक पुनरावलोकन में रंगा और सहजानंद को उन गैर-दलीय किसान नेताओं में रखा गया है जिन्होंने कांग्रेस समाजवादियों और कम्युनिस्टों के साथ मिलकर स्वतंत्र किसान संगठनों की स्थापना की दिशा में पहल की।

यानी रंगा की किसान राजनीति का मूल सिद्धांत था—

राष्ट्रीय आंदोलन से सहयोग, लेकिन किसान संगठन की स्वतंत्रता।

# 10. किसान को राजनीतिक दल का केवल वोट बैंक न बनाना

यद्यपि उस समय सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार नहीं था, लेकिन चुनावी राजनीति का विस्तार हो रहा था।

आपकी भूमि नीति क्या है?

कर्ज राहत कैसे मिलेगी?

अध्याय 9

इंदुलाल याज्ञिक, कार्यानंद शर्मा और अन्य प्रमुख नेता — अखिल भारतीय किसान सभा के क्षेत्रीय नेतृत्व, संगठन विस्तार और किसान संघर्षों में योगदान

अखिल भारतीय किसान सभा का इतिहास केवल स्वामी सहजानंद सरस्वती और एन. जी. रंगा के नेतृत्व से पूरा नहीं होता। किसी भी राष्ट्रीय किसान संगठन की वास्तविक शक्ति उसके उन क्षेत्रीय नेताओं से आती है जो गांव, जिला और प्रांत स्तर पर किसानों के साथ प्रत्यक्ष संपर्क बनाए रखते हैं, स्थानीय संघर्षों को पहचानते हैं, उन्हें संगठित करते हैं और राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाते हैं।

1936 के बाद अखिल भारतीय किसान सभा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी—राष्ट्रीय संगठन को वास्तविक जनाधार में बदलना।

इसके लिए ऐसे नेताओं की आवश्यकता थी जो अलग-अलग कृषि क्षेत्रों की विशिष्ट समस्याओं को समझते हों। गुजरात में किसान का प्रश्न अलग था, बिहार में अलग, बंगाल में अलग, पंजाब में अलग, आंध्र में अलग। एक ही राष्ट्रीय नारा पर्याप्त नहीं था।

इसीलिए इंदुलाल याज्ञिक, कार्यानंद शर्मा, यदुनंदन शर्मा, सोहन सिंह जोश, बंकिम मुखर्जी, ई. एम. एस. नंबूदरीपाद और अनेक अन्य नेता किसान सभा के विस्तार में महत्वपूर्ण बने।

इन नेताओं का महत्व केवल इतना नहीं था कि वे अखिल भारतीय समिति में थे।

उनकी वास्तविक भूमिका थी—

राष्ट्रीय किसान राजनीति को स्थानीय संघर्षों की भाषा देना।

1. राष्ट्रीय संगठन की वास्तविक परीक्षा

लखनऊ में संगठन बनाना ऐतिहासिक घटना थी, लेकिन उसका अस्तित्व तभी सार्थक था जब गांवों में किसान स्वयं को उससे जोड़ते।

क्या किसान सदस्य बनेगा?

क्या स्थानीय समिति बनेगी?

क्या नेतृत्व गांव से उभरेगा?

क्या राष्ट्रीय कार्यक्रम स्थानीय मुद्दों में बदलेगा?

यदि ये सब न होते तो किसान सभा केवल शीर्ष नेताओं की संस्था बनकर रह जाती।

यहीं क्षेत्रीय नेतृत्व की भूमिका शुरू होती है।

# 2. इंदुलाल याज्ञिक : गुजरात की किसान राजनीति से राष्ट्रीय मंच तक

इंदुलाल याज्ञिक का नाम भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन, गुजरात की क्षेत्रीय राजनीति और किसान आंदोलनों—तीनों से जुड़ा है।

वे प्रारंभिक राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े थे और बाद में किसान राजनीति की ओर अधिक स्पष्ट रूप से सक्रिय हुए।

उनकी भूमिका अखिल भारतीय किसान सभा के प्रारंभिक नेतृत्व में महत्वपूर्ण थी।

गुजरात की किसान राजनीति को समझने के लिए खेड़ा और बारडोली की परंपरा को ध्यान में रखना आवश्यक है।

यहां किसान पहले ही सामूहिक कर-विरोध और सत्याग्रह का अनुभव प्राप्त कर चुका था।

याज्ञिक इसी राजनीतिक वातावरण से निकले।

# 3. गुजरात की विशेषता

गुजरात में किसान संघर्ष की मुख्य धारा कई क्षेत्रों में भूमि-राजस्व के प्रश्न से जुड़ी थी।

खेड़ा सत्याग्रह 1918 और बारडोली सत्याग्रह 1928 ने यह सिद्ध कर दिया था कि अनुशासित किसान संगठन औपनिवेशिक प्रशासन को चुनौती दे सकता है।

लेकिन 1930 के दशक में किसान राजनीति का नया प्रश्न था—

क्या इन सफल सत्याग्रहों को स्थायी वर्गीय किसान संगठन में बदला जाए?

यहीं याज्ञिक जैसे नेताओं की भूमिका सामने आई।

# 4. याज्ञिक और किसान सभा की राष्ट्रीय राजनीति

इंदुलाल याज्ञिक प्रारंभिक अखिल भारतीय किसान सभा की बहुधारात्मक संरचना का प्रतिनिधित्व करते थे।

वे न तो केवल किसी एक प्रांतीय कृषि प्रश्न तक सीमित थे और न ही केवल चुनावी राजनीति तक।

उनकी उपस्थिति यह दिखाती है कि किसान सभा राष्ट्रवादी और वामपंथी किसान नेतृत्व के बीच पुल बन रही थी।

गुजरात की किसान संघर्ष परंपरा को राष्ट्रीय किसान संगठन से जोड़ने में उनका योगदान महत्वपूर्ण था।

# 5. किसान आंदोलन और क्षेत्रीय पहचान

इंदुलाल याज्ञिक की बाद की राजनीति गुजरात की भाषायी और क्षेत्रीय पहचान से भी जुड़ी, लेकिन किसान सभा के प्रारंभिक चरण में उनका महत्व यह था कि वे राष्ट्रीय किसान राजनीति को पश्चिम भारत के कृषक समाज तक ले जाने वाले प्रमुख नेताओं में थे।

इससे किसान सभा केवल बिहार, बंगाल और संयुक्त प्रांत तक सीमित नहीं रही।

यह अखिल भारतीय चरित्र का आवश्यक विस्तार था।

# 6. कार्यानंद शर्मा : बिहार के संघर्षशील किसान नेता

यदि स्वामी सहजानंद बिहार किसान आंदोलन के शीर्ष प्रतीक थे, तो कार्यानंद शर्मा उन क्षेत्रीय नेताओं में थे जिन्होंने गांव और जिला स्तर पर आंदोलन को वास्तविक शक्ति दी।

उनका मुख्य कार्यक्षेत्र मुंगेर और बिहार के दूसरे हिस्से थे।

वे जमींदारी-विरोधी संघर्षों, बकाश्त प्रश्न और किसान संगठन से गहराई से जुड़े।

कार्यानंद शर्मा की विशेषता यह थी कि वे केवल वक्ता या सिद्धांतकार नहीं थे।

वे प्रत्यक्ष संघर्ष के नेता थे।

# 7. बकाश्त संघर्ष में भूमिका

बिहार के बकाश्त संघर्षों में किसान भूमि पर अपने पुराने कब्जे और खेती के अधिकार का दावा कर रहे थे।

जमींदार भूमि को अपने प्रत्यक्ष नियंत्रण में लेना चाहते थे।

ऐसे संघर्षों में राष्ट्रीय नेतृत्व पर्याप्त नहीं था।

गांवों में किसान को संगठित करने के लिए स्थानीय नेता चाहिए थे।

कार्यानंद शर्मा ने इसी भूमिका को निभाया।

उन्होंने बकाश्त भूमि को किसान अधिकार का प्रश्न बनाया।

इससे स्थानीय भूमि विवाद किसान सभा की बड़ी राजनीति से जुड़ गया।

# 8. कार्यानंद शर्मा की संगठन शैली

उनकी राजनीति में तीन तत्व प्रमुख थे—

गांव स्तर की संगठनात्मक उपस्थिति,

और किसान सभा के व्यापक कार्यक्रम से स्थानीय मुद्दे को जोड़ना।

यह मॉडल अखिल भारतीय किसान सभा के विस्तार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था।

एक संगठन तभी राष्ट्रीय बन सकता है जब उसके स्थानीय नेता राष्ट्रीय नारे को स्थानीय अनुभव में बदलें।

कार्यानंद शर्मा यही करते थे।

# 9. यदुनंदन शर्मा : गया क्षेत्र का किसान संगठन

बिहार किसान आंदोलन में यदुनंदन शर्मा का नाम भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

वे गया क्षेत्र में किसान संगठन से जुड़े और जमींदारी-विरोधी आंदोलनों के प्रमुख नेताओं में उभरे।

गया क्षेत्र में भूमि, लगान और जमींदारी संबंधी संघर्ष तीखे थे।

यदुनंदन शर्मा ने इन स्थानीय संघर्षों को किसान सभा से जोड़ा।

इससे बिहार प्रांतीय किसान सभा और अखिल भारतीय किसान सभा दोनों का ग्रामीण आधार मजबूत हुआ।

# 10. स्थानीय नेतृत्व क्यों आवश्यक था?

किसान राष्ट्रीय अध्यक्ष को जानता हो या न जानता हो, वह अपने गांव और जिले के नेता को जानता है।

उसे वही व्यक्ति समझा सकता है—

किस दस्तावेज पर हस्ताक्षर न करो,

किस लगान का विरोध करो,

किस गिरफ्तारी पर प्रदर्शन करना है।

इसलिए किसान आंदोलन में स्थानीय नेतृत्व का महत्व किसी राष्ट्रीय नेता से कम नहीं।

अखिल भारतीय किसान सभा का वास्तविक विस्तार ऐसे ही नेताओं से हुआ।

# 11. बिहार का नेतृत्व नेटवर्क

बिहार में किसान सभा की ताकत एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं रही।

स्वामी सहजानंद शीर्ष नेतृत्व में थे।

किसान संघर्षों को विस्तृत कर रहे थे।

यही नेतृत्व नेटवर्क बिहार को राष्ट्रीय किसान राजनीति का सबसे सक्रिय केंद्र बनाता है।

# 12. राहुल सांकृत्यायन : बौद्धिक और आंदोलनकारी सेतु

राहुल सांकृत्यायन भारतीय बौद्धिक इतिहास के महान व्यक्तित्वों में थे।

वे लेखक, यात्री, इतिहास और दर्शन के अध्येता थे।

लेकिन किसान आंदोलन में उनका योगदान भी महत्वपूर्ण था।

वे बिहार किसान सभा से जुड़े और ग्रामीण संघर्षों में सक्रिय रहे।

उनकी भूमिका विशेष थी क्योंकि वे बौद्धिक विचार और जमीनी आंदोलन के बीच सेतु थे।

# 13. राहुल की वैचारिक भूमिका

राहुल सांकृत्यायन मार्क्सवादी विचारों से प्रभावित थे।

उन्होंने किसान प्रश्न को व्यापक वर्गीय और ऐतिहासिक संदर्भ में समझा।

इससे किसान सभा की वैचारिक बहसों को बौद्धिक गहराई मिली।

लेकिन उनकी भूमिका केवल लेखन तक सीमित नहीं थी।

वे प्रत्यक्ष किसान आंदोलनों में भी शामिल हुए।

कम्युनिस्ट कार्यकर्ता,

अध्याय 10

किसान सभा और समाजवादी–कम्युनिस्ट धाराएं — कांग्रेस समाजवादी पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन और अखिल भारतीय किसान सभा की बदलती वैचारिक संरचना

अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना 1936 में किसी एक विचारधारा या राजनीतिक दल की परियोजना के रूप में नहीं हुई थी। उसके प्रारंभिक नेतृत्व में कांग्रेस समाजवादी, कम्युनिस्ट, वामपंथी कांग्रेसजन, स्वतंत्र किसान नेता और विभिन्न प्रांतीय किसान संगठनों के कार्यकर्ता एक साथ उपस्थित थे। यही बहुधारात्मकता उसकी शुरुआती शक्ति थी। संगठन के प्रारंभिक ढांचे में विभिन्न वैचारिक धाराओं की भागीदारी स्पष्ट रूप से दर्ज थी।

लेकिन यही व्यापकता आगे अखिल भारतीय किसान सभा की सबसे बड़ी वैचारिक चुनौती बनी।

किसान सभा का मूल प्रश्न था—

किसान किसके नेतृत्व में संगठित होगा, उसकी राजनीति का अंतिम लक्ष्य क्या होगा और राष्ट्रीय स्वतंत्रता तथा वर्ग-संघर्ष के बीच प्राथमिकता किसे दी जाएगी?

कांग्रेस समाजवादी पार्टी किसान सभा को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर उभर रही समाजवादी राजनीति का जनाधार बनाना चाहती थी।

भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन किसान सभा को ग्रामीण वर्ग-संघर्ष और साम्राज्यवाद-विरोध की संगठित शक्ति के रूप में देखता था।

स्वामी सहजानंद सरस्वती जैसे स्वतंत्र किसान नेता संगठन को किसी दल के अधीन रखने के पक्ष में नहीं थे।

एन. जी. रंगा व्यापक कृषक संगठन और स्वतंत्र किसान हितों पर बल देते थे।

1936 से 1940 के दशक के बीच इन्हीं प्रवृत्तियों के बीच संतुलन लगातार बदलता गया।

इसलिए अखिल भारतीय किसान सभा का इतिहास केवल किसान संघर्ष का इतिहास नहीं है; वह भारतीय वामपंथ के निर्माण, सहयोग, प्रतिस्पर्धा और विभाजन का भी इतिहास है।

1. 1930 के दशक में वामपंथ क्यों मजबूत हुआ?

1929 की विश्व महामंदी ने केवल भारतीय कृषि संकट को नहीं बढ़ाया; उसने पूरी दुनिया में आर्थिक व्यवस्था के बारे में नई बहस पैदा की।

ने पूंजीवादी व्यवस्था की आलोचना को मजबूत किया।

इसी समय सोवियत संघ समाजवादी आर्थिक प्रयोग के रूप में दुनिया के वामपंथी युवाओं के लिए आकर्षण का केंद्र था।

भारत में भी युवा राष्ट्रवादी केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से संतुष्ट नहीं थे।

स्वतंत्र भारत की अर्थव्यवस्था कैसी होगी?

मजदूर के अधिकार क्या होंगे?

जमींदारी का भविष्य क्या होगा?

यही वैचारिक वातावरण कांग्रेस समाजवादी पार्टी और कम्युनिस्ट किसान राजनीति के विकास की जमीन बना।

# 2. राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर नई पीढ़ी

1920 के दशक तक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में गांधी का प्रभाव सर्वोच्च था।

लेकिन 1930 के दशक में एक नई पीढ़ी उभर रही थी जो समाजवाद, वर्गीय असमानता और आर्थिक पुनर्गठन के प्रश्नों को अधिक गंभीरता से उठा रही थी।

और अनेक युवा कार्यकर्ता अलग-अलग रूपों में समाजवादी विचारों से प्रभावित थे।

इनमें वैचारिक एकरूपता नहीं थी।

लेकिन साझा धारणा थी—

राजनीतिक स्वाधीनता को सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन से जोड़ना होगा।

किसान सभा इसी व्यापक वामपंथी उभार की ग्रामीण अभिव्यक्ति बनी।

# 3. कांग्रेस समाजवादी पार्टी का जन्म

1934 में कांग्रेस समाजवादी पार्टी की स्थापना हुई।

इसका उद्देश्य कांग्रेस से अलग नई पार्टी बनाना तत्काल नहीं था।

समाजवादी नेता कांग्रेस के भीतर रहकर उसे अधिक स्पष्ट समाजवादी दिशा देना चाहते थे।

उनका विश्वास था कि कांग्रेस की वास्तविक जनशक्ति किसान और मजदूर हैं।

इसलिए यदि कांग्रेस स्वतंत्रता आंदोलन को सामाजिक क्रांति से जोड़ना चाहती है तो उसे किसान और मजदूर संगठन मजबूत करने होंगे।

किसान सभा के निर्माण में कांग्रेस समाजवादी पार्टी की भूमिका इसी दृष्टिकोण से निकली।

# 4. जयप्रकाश नारायण की भूमिका

जयप्रकाश नारायण इस दौर के सबसे प्रमुख समाजवादी नेताओं में थे।

उन्होंने किसान संगठन को राष्ट्रीय समाजवादी राजनीति से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अखिल भारतीय किसान सम्मेलन की तैयारी में एन. जी. रंगा के साथ उनका संयुक्त संयोजक बनना इसी प्रक्रिया का हिस्सा था।

इससे स्पष्ट है कि अखिल भारतीय किसान सभा का जन्म किसी बाहरी कम्युनिस्ट हस्तक्षेप से नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर सक्रिय समाजवादी और किसान नेताओं की संयुक्त प्रक्रिया से हुआ।

# 5. आचार्य नरेंद्र देव और किसान प्रश्न

आचार्य नरेंद्र देव भारतीय समाजवादी विचारधारा के प्रमुख बौद्धिक नेताओं में थे।

उनकी दृष्टि में राष्ट्रीय स्वतंत्रता और सामाजिक क्रांति को अलग नहीं किया जा सकता था।

वे किसानों और मजदूरों के संगठन को लोकतांत्रिक समाजवादी परिवर्तन का आधार मानते थे।

उनकी सोच कांग्रेस समाजवादियों के किसान सभा में सक्रिय होने की वैचारिक पृष्ठभूमि बनाती थी।

# 6. राममनोहर लोहिया और किसान राजनीति

राममनोहर लोहिया भी किसान सभा के शुरुआती निर्माण से जुड़े कांग्रेस समाजवादी नेताओं में थे।

उनका आगे का राजनीतिक विकास स्वतंत्र समाजवादी दिशा में हुआ, लेकिन 1930 के दशक में वे उस व्यापक वामपंथी गठबंधन का हिस्सा थे जो किसान और मजदूर को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में लाना चाहता था।

किसान सभा के प्रारंभिक चरण में इस समाजवादी सहभागिता ने संगठन को कांग्रेस से जुड़ा भी रखा और उससे स्वतंत्रता की दिशा भी दी।

# 7. कांग्रेस समाजवादियों की रणनीति

समाजवादी नेताओं के सामने एक कठिन संतुलन था।

वे कांग्रेस छोड़ना नहीं चाहते थे।

लेकिन कांग्रेस को केवल राष्ट्रीय बुर्जुआ अथवा संपन्न वर्गों के प्रभाव में भी नहीं रहने देना चाहते थे।

कांग्रेस के भीतर रहो,

किसान और मजदूर को अलग जन-संगठनों में संगठित करो,

और इस संगठित जनशक्ति के माध्यम से कांग्रेस की दिशा को वामपंथ की ओर मोड़ो।

अखिल भारतीय किसान सभा इस रणनीति के लिए आदर्श मंच थी।

# 8. कम्युनिस्ट आंदोलन की स्थिति

1930 के दशक में भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन स्वयं जटिल परिस्थितियों से गुजर रहा था।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी औपनिवेशिक शासन के संदेह और दमन का सामना कर रही थी।

कम्युनिस्ट संगठन पूर्ण वैधानिक स्वतंत्रता में काम नहीं कर सकता था।

इसलिए मजदूर यूनियनों, किसान सभाओं और कांग्रेस समाजवादी मंचों में काम करना कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण रणनीति बना।

किसान सभा ने उन्हें ग्रामीण भारत में प्रवेश का व्यापक अवसर दिया।

# 9. कम्युनिस्टों के लिए किसान क्यों केंद्रीय था?

मार्क्सवादी दृष्टिकोण में भारतीय समाज को केवल अंग्रेज शासक बनाम भारतीय जनता के रूप में नहीं देखा जाता था।

ग्रामीण भारत में भी वर्गीय विभाजन मौजूद थे—

कम्युनिस्टों का तर्क था कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता के साथ इन वर्गीय संबंधों को भी बदलना होगा।

इसलिए किसान सभा उनके लिए केवल चुनावी सहयोगी संस्था नहीं थी।

वह संभावित ग्रामीण वर्ग-संघर्ष का संगठनात्मक आधार थी।

# 10. कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं की ताकत

किसान सभा में कम्युनिस्ट प्रभाव बढ़ने के पीछे केवल विचारधारा नहीं थी।

उसका एक व्यावहारिक कारण भी था—

कम्युनिस्ट कार्यकर्ता संगठन निर्माण में अत्यंत सक्रिय थे।

वे गांवों में जाते थे।

स्थानीय समितियां बनाते थे।

किसान सम्मेलन आयोजित करते थे।

हड़ताल और सत्याग्रह की तैयारी करते थे।

गिरफ्तारी और दमन का सामना करते थे।

इस अनुशासित संगठनात्मक सक्रियता ने किसान सभा में उनका प्रभाव बढ़ाया।

# 11. कांग्रेस समाजवादी और कम्युनिस्ट : प्रारंभिक सहयोग

1936 के आसपास दोनों धाराओं के बीच व्यापक सहयोग संभव था।

क्योंकि साझा लक्ष्य थे—

और कांग्रेस को अधिक वाम दिशा देना।

इस समय कम्युनिस्ट कई स्थानों पर कांग्रेस समाजवादी पार्टी के भीतर अथवा उसके साथ काम कर रहे थे।

इसलिए किसान सभा आरंभ में संयुक्त वामपंथी मंच जैसी दिखाई देती है।

# 12. स्वतंत्र किसान नेताओं की तीसरी धारा

लेकिन किसान सभा में केवल समाजवादी और कम्युनिस्ट नहीं थे।

स्वामी सहजानंद सरस्वती,

जैसे नेता स्वयं किसान आंदोलन के अनुभव से आए थे।

यही तीसरी धारा किसान सभा की वास्तविक स्वायत्तता का आधार थी।

अध्याय 11

किसान सभा का घोषणापत्र और प्रमुख मांगें — जमींदारी उन्मूलन, लगान और भूमि-राजस्व में कमी, कर्ज मुक्ति, बेदखली पर रोक, काश्तकारी अधिकार और किसान-मजदूर कार्यक्रम

अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना का वास्तविक महत्व केवल इस बात में नहीं था कि 1936 में किसानों का एक अखिल भारतीय संगठन बन गया। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह था कि इस संगठन ने भारत के अलग-अलग हिस्सों में बिखरी कृषि समस्याओं को पहली बार एक राष्ट्रीय किसान कार्यक्रम में बदलने का प्रयास किया।

बिहार में किसान बकाश्त और जमींदारी से जूझ रहा था।

बंगाल में काश्तकारी और बटाईदारी का प्रश्न था।

संयुक्त प्रांत में लगान और बेदखली महत्वपूर्ण थे।

पंजाब में ग्रामीण ऋण बड़ी समस्या था।

आंध्र और मद्रास के अनेक क्षेत्रों में भूमि-राजस्व, सिंचाई और कृषक अधिकार प्रश्न थे।

यदि अखिल भारतीय किसान सभा वास्तव में राष्ट्रीय संगठन बनना चाहती थी, तो उसे ऐसा कार्यक्रम चाहिए था जिसमें इन सभी क्षेत्रों का किसान अपने संघर्ष की प्रतिध्वनि सुन सके।

इसी आवश्यकता ने किसान सभा के घोषणापत्र और मांगों को जन्म दिया।

इन मांगों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनमें दो स्तर एक साथ दिखाई देते हैं—

तात्कालिक राहत और कृषि व्यवस्था का संरचनात्मक परिवर्तन।

एक तरफ लगान कम करने, कर्ज में राहत देने और बेदखली रोकने की मांग थी।

दूसरी तरफ जमींदारी उन्मूलन और वास्तविक कृषक के भूमि-अधिकार का प्रश्न था।

इसलिए किसान सभा का कार्यक्रम केवल यह नहीं पूछता था कि किसान पर बोझ कितना कम किया जाए।

वह धीरे-धीरे यह भी पूछने लगा—

भारत की भूमि व्यवस्था का आधार ही क्या होना चाहिए?

1. स्थापना के उद्देश्य और विस्तृत घोषणापत्र में अंतर

किसान सभा के कार्यक्रम का अध्ययन करते समय कालक्रम की सावधानी आवश्यक है।

11 अप्रैल 1936 के लखनऊ स्थापना सम्मेलन ने संगठन का व्यापक लक्ष्य तय किया था—किसानों को तत्काल आर्थिक और राजनीतिक मांगों पर संगठित करना तथा किसानों, मजदूरों और अन्य शोषित वर्गों को आर्थिक शोषण से मुक्ति और राजनीतिक-आर्थिक शक्ति की दिशा में ले जाना। पिछले अध्याय में इस मूल उद्देश्य का उल्लेख किया जा चुका है।

लेकिन उसी स्थापना दिवस पर बाद के सभी विस्तृत कृषि प्रस्ताव अंतिम रूप में स्वीकार कर लिए गए थे—ऐसा मानना उचित नहीं होगा।

1936 के दौरान किसान सभा ने अपने कार्यक्रम को अधिक स्पष्ट किया।

और दूसरे प्रश्न क्रमशः अधिक ठोस मांगों में बदलते गए।

इसलिए स्थापना प्रस्ताव और विस्तृत किसान कार्यक्रम को एक सतत प्रक्रिया के दो चरणों के रूप में देखना चाहिए।

# 2. किसान घोषणापत्र की आवश्यकता क्यों थी?

किसान सभा के सामने पहला प्रश्न था—

किसान को संगठन में शामिल होने के लिए क्या बताया जाए?

केवल यह कहना पर्याप्त नहीं था कि ‘किसान एक हो।’

उसे जानना था कि संगठन उसकी जिंदगी में क्या बदलना चाहता है।

इसलिए घोषणापत्र संगठन और किसान के बीच एक राजनीतिक अनुबंध की तरह था।

उसमें किसान देख सकता था—

मेरी जमीन का प्रश्न यहां है।

यानी किसान सभा का राष्ट्रीय कार्यक्रम तभी सार्थक था जब वह गांव के वास्तविक जीवन में उतर सके।

# 3. कार्यक्रम की केंद्रीय धुरी : भूमि प्रश्न

किसान सभा की राजनीति के केंद्र में धीरे-धीरे भूमि आ गई।

भूमि इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि उसी से किसान की—

और गांव की राजनीतिक स्थिति—

इसलिए भूमि संबंध सुधारने का अर्थ केवल आर्थिक नीति बदलना नहीं था।

यह ग्रामीण सत्ता-संबंध बदलना था।

यहीं किसान सभा सामान्य कृषक राहत संस्था से अधिक व्यापक सामाजिक आंदोलन में बदलती है।

# 4. जमींदारी उन्मूलन : सबसे निर्णायक मांग

किसान सभा की मांगों में सबसे दूरगामी थी—

जमींदारी व्यवस्था का उन्मूलन।

यह मांग एक दिन में विकसित नहीं हुई।

प्रारंभिक किसान राजनीति में अक्सर लक्ष्य होता था—

जमींदार न्यायपूर्ण व्यवहार करे।

लेकिन किसान सभा के अधिक उग्र नेतृत्व ने धीरे-धीरे कहा—

समस्या किसी जमींदार के अच्छे या बुरे होने की नहीं है।

समस्या संस्था की है।

# 5. जमींदारी को संरचनात्मक समस्या क्यों माना गया?

किसान सभा के तर्क को सरल रूप में समझें।

किसान जमीन जोतता है।

किसान प्राकृतिक जोखिम उठाता है।

लेकिन भूमि पर स्वामित्व अथवा मध्यस्थ अधिकार ऐसे भू-स्वामी के पास हो सकता है जो स्वयं खेती नहीं करता।

फिर उत्पाद का एक हिस्सा लगान के रूप में उसके पास जाता है।

किसान सभा के उग्र नेतृत्व के लिए यह संबंध स्वयं प्रश्न के घेरे में था।

# 6. ‘जोतने वाले का अधिकार’ की दिशा

किसान सभा के भूमि कार्यक्रम का व्यापक सिद्धांत यह था कि वास्तविक कृषक का भूमि पर सुरक्षित और मजबूत अधिकार होना चाहिए।

आगे विभिन्न किसान आंदोलनों ने इसे अलग-अलग नारों में व्यक्त किया।

बिहार में प्रश्न था—

बकाश्त भूमि किसान को वापस मिले।

बटाईदार का फसल और जमीन पर अधिकार मजबूत हो।

सामंती भूमि नियंत्रण टूटे।

इस पूरी राजनीति के पीछे एक साझा प्रश्न था—

जमीन पर प्राथमिक दावा किसका—कागजी मालिक का या वास्तविक उत्पादक का?

# 7. क्या किसान सभा तत्काल निजी संपत्ति समाप्त करना चाहती थी?

पूरे संगठन को एक ही उत्तर में बांधना उचित नहीं होगा।

किसान सभा के भीतर विभिन्न वैचारिक धाराएं मौजूद थीं।

स्वामी सहजानंद जमींदारी उन्मूलन की अधिक उग्र दिशा में थे।

कम्युनिस्ट नेतृत्व भूमि संबंधों को वर्गीय दृष्टि से पुनर्गठित करना चाहता था।

एन. जी. रंगा जैसे नेता स्वतंत्र छोटे कृषक स्वामित्व को महत्वपूर्ण मानते थे।

इसलिए जमींदारी-विरोध पर व्यापक सहमति होने का अर्थ यह नहीं कि जमींदारी के बाद की अंतिम कृषि संरचना पर सभी सहमत थे।

# 8. मुआवजे का प्रश्न

जमींदारी उन्मूलन की मांग के साथ अगला प्रश्न था—

जमींदार को मुआवजा दिया जाए या नहीं?

किसान सभा के उग्र नेतृत्व में बिना मुआवजे जमींदारी समाप्त करने की मांग मजबूत हुई।

स्वामी सहजानंद इस दिशा के प्रमुख समर्थक बने।

यदि जमींदारी किसान के लंबे शोषण पर आधारित संस्था है, तो उसी संस्था को समाप्त करने के लिए जनता से धन लेकर भू-स्वामियों को मुआवजा क्यों दिया जाए?

यह प्रश्न स्वतंत्रता के बाद भी भूमि-सुधार की बहस में लौटने वाला था।

# 9. लगान में भारी कमी

किसान के लिए सबसे तत्काल मांगों में से एक थी—

यह विशेष रूप से महामंदी के बाद आवश्यक दिखाई देता था।

कृषि कीमतें गिर चुकी थीं।

किसान की नकद आय कम हुई थी।

लेकिन कई जगह लगान उसी अनुपात में नहीं घटा।

किसान सभा का तर्क था—

यदि कृषि से आय गिरती है तो लगान किसान की वास्तविक भुगतान क्षमता के अनुसार कम होना चाहिए।

यह मांग गरीब किसान के लिए तत्काल जीवन-मरण का प्रश्न थी।

# 10. भूमि-राजस्व में कमी

जमींदारी क्षेत्रों में लगान प्रमुख था।

रैयतवारी क्षेत्रों में सीधे सरकार को भूमि-राजस्व देना महत्वपूर्ण था।

इसलिए अखिल भारतीय किसान संगठन केवल लगान का विरोध करके राष्ट्रीय नहीं बन सकता था।

उसे भूमि-राजस्व भी उठाना था।

और दूसरे रैयतवारी क्षेत्रों—

का किसान सीधे जुड़ सकता था।

यहीं किसान सभा की राष्ट्रीय मांग-रचना की समझ दिखाई देती है।

# 11. लगान और राजस्व में अंतर महत्वपूर्ण था

दोनों शब्दों को एक मान लेना उचित नहीं।

लगान अक्सर कृषक द्वारा भू-स्वामी या जमींदार को दिए जाने वाले किराए से संबंधित था।

भूमि-राजस्व सरकार की मांग से।

जमींदारी व्यवस्था में दोनों के बीच जमींदार मध्यस्थ हो सकता था।

रैयतवारी में सरकार किसान से अधिक सीधे राजस्व ले सकती थी।

अध्याय 12

लाल झंडा और किसान सभा की राजनीतिक पहचान — प्रतीक, नारे, किसान-मजदूर एकता और वर्ग-आधारित राजनीति का विकास

अखिल भारतीय किसान सभा के इतिहास में लाल झंडे को केवल संगठन के दृश्य प्रतीक के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। उसका महत्व इससे कहीं अधिक था। लाल झंडे के माध्यम से किसान सभा यह घोषित कर रही थी कि भारतीय किसान राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा होते हुए भी अपनी स्वतंत्र सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पहचान रखता है।

यही कारण है कि झंडे का प्रश्न किसान सभा के शुरुआती वर्षों में गंभीर वैचारिक बहस बना।

क्या किसान सभा केवल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तिरंगे के नीचे काम करे?

क्या उसका स्वतंत्र झंडा होना चाहिए?

यदि स्वतंत्र झंडा हो तो वह राष्ट्रीय आंदोलन से अलगाव का संकेत तो नहीं होगा?

और यदि वह लाल हो तो क्या किसान सभा को कम्युनिस्ट संगठन समझ लिया जाएगा?

इन प्रश्नों का उत्तर किसान सभा ने एक विशिष्ट राजनीतिक सूत्र में खोजा—

तिरंगा राष्ट्रीय स्वतंत्रता का ध्वज है; लाल झंडा किसान और मजदूर के स्वतंत्र वर्गीय संगठन का प्रतीक है।

इस निर्णय के पीछे केवल रंग और प्रतीक का प्रश्न नहीं था। किसान सभा के अपने ऐतिहासिक विवरण में स्पष्ट कहा गया है कि झंडे और नाम का विवाद उसकी स्वतंत्र राजनीति, रणनीति और वर्गीय पहचान से जुड़ा था। किसान सभा के अनुसार लाल झंडे का औपचारिक स्वीकार 1937 में हुआ और अक्टूबर 1937 की कलकत्ता केंद्रीय किसान समिति की बैठक ने हंसिया और हथौड़े वाले लाल झंडे को संगठन की पहचान के रूप में स्थापित किया।

इस तरह किसान सभा का लाल झंडा भारतीय किसान राजनीति में एक बड़े परिवर्तन का प्रतीक था—

किसान अब केवल राष्ट्रीय आंदोलन की जनशक्ति नहीं था।

वह अपनी राजनीतिक चेतना वाला संगठित वर्ग बनने की दिशा में बढ़ रहा था।

1. 1936 में किसान सभा बनी, लेकिन झंडे की कहानी तुरंत पूरी नहीं हुई

11 अप्रैल 1936 को लखनऊ में राष्ट्रीय किसान संगठन बना। प्रारंभिक नाम अखिल भारतीय किसान कांग्रेस था। स्वामी सहजानंद सरस्वती प्रथम अध्यक्ष और एन. जी. रंगा प्रथम महासचिव बने।

लेकिन संगठन का स्वतंत्र नाम, प्रतीक और झंडा अगले चरण में अधिक स्पष्ट हुए।

इसलिए यह कहना सावधानीपूर्ण होगा कि 11 अप्रैल 1936 के स्थापना क्षण में ही आज के स्वरूप वाला आधिकारिक लाल झंडा पूरी तरह अंतिम रूप में स्वीकार हो गया था।

किसान सभा के स्वयं के इतिहास के अनुसार लाल झंडा पहले से किसान आंदोलनों में इस्तेमाल हो रहा था, पर जुलाई 1937 की नियामतपुर बैठक में उसे AIKS का झंडा स्वीकार करने की दिशा स्पष्ट हुई और अक्टूबर 1937 की कलकत्ता बैठक ने हंसिया-हथौड़े सहित लाल झंडे को संगठन की औपचारिक पहचान बनाया।

यह कालक्रम महत्वपूर्ण है।

# 2. किसान सभा ने अलग झंडे की आवश्यकता क्यों महसूस की?

किसान सभा के अधिकांश प्रारंभिक नेता भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े थे।

वे तिरंगे के विरोधी नहीं थे।

इसके विपरीत किसान सभा का अपना ऐतिहासिक विवरण बताता है कि उसके सम्मेलनों में तिरंगा फहराने और उसका सम्मान करने की परंपरा को स्वीकार किया गया।

फिर अलग झंडे की आवश्यकता क्यों?

क्योंकि संगठन के सामने एक मूल प्रश्न था—

यदि किसान का स्वतंत्र संगठन है तो उसकी स्वतंत्र पहचान क्या होगी?

कांग्रेस पूरे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने का दावा करती थी।

किसान सभा विशेष रूप से किसानों, खेतिहर मजदूरों और ग्रामीण श्रमजीवी समाज को संगठित करना चाहती थी।

इसलिए किसान सभा का अलग झंडा उसकी संगठनात्मक स्वायत्तता का दृश्य रूप बन गया।

# 3. राष्ट्रीय पहचान और वर्गीय पहचान साथ-साथ

किसान सभा ने दो पहचान को परस्पर विरोधी मानने से इनकार किया।

एक व्यक्ति भारतीय भी हो सकता है और किसान भी।

एक किसान राष्ट्रीय स्वतंत्रता चाहता है और साथ ही भूमि-अधिकार भी।

वह अंग्रेज शासन के विरुद्ध लड़ सकता है और भारतीय जमींदार से भी।

तिरंगा राष्ट्र की स्वतंत्रता का प्रतीक।

लाल झंडा किसान-मजदूर की सामाजिक-आर्थिक मुक्ति का प्रतीक।

यह दोहरी पहचान किसान सभा की शुरुआती राजनीतिक कल्पना का केंद्र थी। पहले अध्यायों में भी यह स्थापित किया गया है कि संगठन राष्ट्रीय आंदोलन से सहयोग चाहता था, पर अपनी स्वतंत्र किसान पहचान बनाए रखना चाहता था।

# 4. लाल रंग का अर्थ

लाल रंग की राजनीतिक परंपरा किसान सभा से बहुत पुरानी थी।

दुनिया के मजदूर और समाजवादी आंदोलनों में लाल झंडा संघर्ष, श्रम, बलिदान और वर्गीय एकता का प्रतीक बन चुका था।

भारतीय किसान सभा के नेताओं ने इसे भारतीय कृषक संदर्भ से जोड़ा।

किसान सभा से जुड़ी बाद की स्मृतियों में स्वामी सहजानंद के नाम से यह विचार उद्धृत किया गया कि लाल रंग किसान और मजदूर के रक्त तथा संघर्ष का प्रतीक है।

लेकिन लाल झंडे का अर्थ केवल बलिदान नहीं था।

अंतरराष्ट्रीय किसान-मजदूर एकता।

# 5. हंसिया और हथौड़ा क्यों?

किसान सभा के झंडे में हंसिया और हथौड़ा रखे गए।

औद्योगिक मजदूर का औजार।

दोनों का एक साथ होना संगठन की सामाजिक कल्पना को व्यक्त करता था।

किसान और मजदूर मिलकर समाज के उत्पादक वर्ग हैं।

किसान सभा के आधिकारिक इतिहास में भी झंडे पर किसान का हंसिया और मजदूर का हथौड़ा रखने के निर्णय को किसान-मजदूर एकता और वर्गीय राजनीति से जोड़ा गया है।

# 6. क्या हंसिया-हथौड़ा अपनाना कम्युनिस्ट पार्टी में विलय था?

यह ऐतिहासिक सावधानी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

1936–37 में अखिल भारतीय किसान सभा के नेतृत्व में—

स्वामी सहजानंद सरस्वती,

स्वतंत्र किसान नेता,

इनमें से कई कम्युनिस्ट नहीं थे।

किसान सभा स्वयं अपने इतिहास में रेखांकित करती है कि लाल झंडे को स्वीकार करने वाले कई प्रमुख प्रारंभिक अध्यक्ष और नेता कम्युनिस्ट नहीं थे।

इसलिए लाल झंडे को देखकर 1936–37 की किसान सभा को सीधे कम्युनिस्ट पार्टी की किसान शाखा घोषित करना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा।

# 7. फिर कम्युनिस्ट प्रभाव से संबंध क्या था?

कम्युनिस्ट आंदोलन और लाल झंडे का गहरा ऐतिहासिक संबंध था।

किसान सभा में कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं का प्रभाव भी बढ़ रहा था।

इसलिए लाल झंडे की वर्गीय भाषा कम्युनिस्ट राजनीति के अनुकूल थी।

लेकिन कारण और परिणाम को उलटना उचित नहीं।

किसान सभा ने लाल झंडा केवल इसलिए नहीं अपनाया कि कम्युनिस्टों ने उसे थोप दिया।

किसान सभा स्वयं किसान को एक वर्गीय राजनीतिक शक्ति के रूप में पहचान देने की दिशा में बढ़ रही थी।

लाल झंडा कम्युनिस्ट प्रभाव का संकेत अवश्य था, लेकिन केवल उसी का परिणाम नहीं।

# 8. किसान सभा की स्थापना घोषणा में ही वर्गीय बीज मौजूद था

1936 के मूल किसान आंदोलन के उद्देश्य में कहा गया था कि लक्ष्य किसानों, मजदूरों और अन्य शोषित वर्गों को आर्थिक शोषण से मुक्त करना और उन्हें आर्थिक तथा राजनीतिक शक्ति दिलाना है।

यानी लाल झंडा आने से पहले ही संगठन की मूल भाषा में—

जैसी अवधारणाएं मौजूद थीं।

इसलिए 1937 का लाल झंडा संगठन की पहले से विकसित वैचारिक दिशा का दृश्य रूप था।

# 9. ‘किसान’ को वर्ग के रूप में देखना

किसान सभा के लिए सबसे बड़ा वैचारिक परिवर्तन यही था।

औपनिवेशिक प्रशासन किसान को देख सकता था—

काश्तकार के रूप में।

किरायेदार के रूप में।

वह एक राजनीतिक और आर्थिक वर्ग भी है।

उसके शोषण के संरचनात्मक कारण हैं।

वह सामूहिक रूप से संगठित हो सकता है।

क्या ये सभी एक वर्ग हैं?

अध्याय 13

फैजपुर कांग्रेस, 1936 और किसान प्रश्न — कांग्रेस का ग्रामीण अधिवेशन, कृषि कार्यक्रम, किसान सभा का दबाव और किसान मांगों का राष्ट्रीय राजनीतिक एजेंडे में प्रवेश

दिसंबर 1936 का फैजपुर कांग्रेस अधिवेशन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में कई कारणों से विशेष था। यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का पहला अधिवेशन था जो किसी बड़े शहर के बजाय ग्रामीण परिवेश में आयोजित हुआ। महाराष्ट्र के फैजपुर गांव में अधिवेशन करने का निर्णय स्वयं एक राजनीतिक संदेश था—कांग्रेस अपने को किसान भारत के अधिक निकट दिखाना चाहती थी।

उस समय जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष थे। उनके अध्यक्षीय भाषण में किसान प्रश्न को भारत की सबसे विशाल और तत्काल समस्याओं में रखा गया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत मूलतः किसानों का देश है और भूमि व्यवस्था में बुनियादी परिवर्तन किए बिना कृषि संकट का समाधान संभव नहीं। उन्होंने कृषक और राज्य के बीच मध्यस्थों को हटाने तथा आगे सहकारी या सामूहिक कृषि की दिशा तक का उल्लेख किया।

लेकिन फैजपुर का महत्व केवल नेहरू के भाषण में नहीं था।

उसके पीछे 1936 के दौरान तेजी से विकसित हुई किसान राजनीति थी।

अप्रैल में लखनऊ में अखिल भारतीय किसान संगठन स्थापित हो चुका था।

प्रांतीय किसान सभाएं सक्रिय थीं।

कांग्रेस समाजवादी किसान-मजदूर प्रश्न को राष्ट्रीय राजनीति में आगे ला रहे थे।

कम्युनिस्ट कार्यकर्ता ग्रामीण क्षेत्रों में संगठन बढ़ा रहे थे।

और कृषि संकट के कारण किसान कांग्रेस से केवल स्वतंत्रता का वादा नहीं, बल्कि भूमि, लगान, कर्ज और बेदखली के प्रश्नों पर स्पष्ट कार्यक्रम मांग रहा था।

इसीलिए फैजपुर कांग्रेस को किसान सभा और कांग्रेस के संबंधों की निर्णायक कड़ी के रूप में देखना चाहिए।

यह वह क्षण था जब किसान प्रश्न कांग्रेस की परिधि से उठकर उसके राष्ट्रीय राजनीतिक एजेंडे के केंद्र में आया।

1. फैजपुर से पहले : लखनऊ ने प्रक्रिया शुरू की थी

फैजपुर कृषि कार्यक्रम अचानक नहीं आया।

अप्रैल 1936 के लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में ही कृषि समस्या पर अधिक व्यवस्थित कार्यक्रम तैयार करने की आवश्यकता स्वीकार की गई थी।

जवाहरलाल नेहरू ने अपने लखनऊ अध्यक्षीय भाषण में कहा था कि कांग्रेस स्वयं पूरी तरह किसान संगठन नहीं बन सकती और उसे किसान तथा मजदूर संघों के निर्माण को प्रोत्साहित करना चाहिए। उन्होंने भूमि और ग्रामीण गरीबी को भारत की प्रमुख समस्या बताया।

लखनऊ कांग्रेस ने प्रांतीय कांग्रेस समितियों से अपने-अपने क्षेत्रों की कृषि समस्याओं पर प्रस्ताव भेजने को कहा।

एक अखिल भारतीय कृषि कार्यक्रम तैयार करना।

यानी फैजपुर तक पहुंचने से पहले कांग्रेस ने स्वीकार कर लिया था कि किसान प्रश्न को केवल सामान्य राष्ट्रवादी घोषणाओं से नहीं संभाला जा सकता।

# 2. उसी लखनऊ में किसान सभा का जन्म

लखनऊ की ऐतिहासिक विशेषता यह थी कि एक ही समय दो समानांतर प्रक्रियाएं चल रही थीं।

एक तरफ कांग्रेस कृषि कार्यक्रम बनाने की तैयारी कर रही थी।

दूसरी तरफ किसान नेता अपना स्वतंत्र अखिल भारतीय संगठन बना रहे थे।

11 अप्रैल 1936 को अखिल भारतीय किसान कांग्रेस—आगे अखिल भारतीय किसान सभा—का गठन हुआ।

इससे किसान प्रश्न पर कांग्रेस पर दबाव बढ़ा।

अब किसान की ओर से केवल असंगठित शिकायत नहीं आ रही थी।

एक राष्ट्रीय किसान संगठन मौजूद था।

यही फैजपुर की राजनीति की नई पृष्ठभूमि थी।

# 3. कांग्रेस के सामने किसान सभा का नया दबाव

कांग्रेस किसान के महत्व से पहले भी परिचित थी।

सब उसके इतिहास का हिस्सा थे।

लेकिन 1936 में स्थिति अलग थी।

अब किसान कांग्रेस के राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेने के साथ अपना स्वतंत्र संगठन भी बना रहा था।

इससे कांग्रेस नेतृत्व के सामने प्रश्न था—

यदि किसान सभा अपनी कृषि नीति बनाएगी, तो कांग्रेस की कृषि नीति क्या होगी?

इस संगठनात्मक प्रतिस्पर्धा ने कांग्रेस को किसान मांगों पर अधिक स्पष्ट होने के लिए प्रेरित किया।

# 4. क्या किसान सभा ने कांग्रेस का कृषि कार्यक्रम लिखवाया?

ऐसा दावा अतिशयोक्ति होगा।

कांग्रेस के भीतर भूमि प्रश्न पर लंबे समय से विचार चल रहा था।

कराची प्रस्तावों में आर्थिक प्रश्न आ चुके थे।

नेहरू स्वयं भूमि व्यवस्था में गहरे परिवर्तन के समर्थक थे।

कांग्रेस समाजवादी पार्टी किसान-मजदूर कार्यक्रम आगे बढ़ा रही थी।

इसलिए फैजपुर कृषि कार्यक्रम को केवल किसान सभा के दबाव का परिणाम कहना उचित नहीं।

अधिक संतुलित निष्कर्ष है—

किसान सभा के उदय ने कांग्रेस के भीतर पहले से मौजूद किसान-समर्थक और समाजवादी दबाव को अधिक तीखा और तात्कालिक बनाया।

# 5. अगस्त 1936 का कांग्रेस चुनाव घोषणापत्र

फैजपुर से पहले अगस्त 1936 में कांग्रेस ने आगामी प्रांतीय चुनावों के लिए अपना घोषणापत्र जारी किया।

इसमें कृषि संकट को गंभीर राष्ट्रीय समस्या माना गया।

कांग्रेस ने कहा कि भूमि व्यवस्था, भूमि-राजस्व और किराए में सुधार आवश्यक है तथा छोटे किसानों को तत्काल राहत देने के लिए लगान और राजस्व में पर्याप्त कमी की जानी चाहिए। अलाभकारी छोटी जोतों को ऐसी देनदारियों से मुक्त करने की दिशा भी रखी गई।

यह उल्लेखनीय परिवर्तन था।

कांग्रेस अब केवल स्वराज नहीं मांग रही थी।

वह चुनाव में किसान से कह रही थी—

हम आपके लगान और राजस्व का प्रश्न भी उठाएंगे।

# 6. कर्ज को राष्ट्रीय चुनावी मुद्दा बनाना

1936 के कांग्रेस चुनाव घोषणापत्र में ग्रामीण ऋण को भी तत्काल समाधान योग्य प्रश्न माना गया।

ऋण भुगतान पर अस्थायी रोक,

और राज्य द्वारा सस्ते ऋण—

की दिशा का समर्थन किया।

यह किसान सभा की मांगों से स्पष्ट समानता रखता था।

ग्रामीण ऋण अब किसान और साहूकार के बीच निजी मामला नहीं रहा।

वह राष्ट्रीय सार्वजनिक नीति का प्रश्न बन चुका था।

# 7. किसान सभा के लिए यह राजनीतिक सफलता क्यों थी?

किसान सभा का एक प्रमुख उद्देश्य यही था—

किसान की स्थानीय समस्या को राष्ट्रीय राजनीति का प्रश्न बनाना।

1936 के अंत तक कांग्रेस के चुनाव घोषणापत्र में—

जैसे मुद्दे प्रमुखता से आ चुके थे।

इसका अर्थ यह नहीं कि किसान सभा ने अपनी सभी मांगें मनवा लीं।

लेकिन उसने राजनीतिक विमर्श की दिशा बदलने में योगदान दिया।

अब राष्ट्रीय पार्टी कृषि प्रश्न की अनदेखी नहीं कर सकती थी।

# 8. नेहरू का जुलाई 1936 का हस्तक्षेप

जुलाई 1936 में नेहरू ने भारतीय कृषि समस्या पर लिखा कि भारत की समस्याओं में शायद कोई भी प्रश्न भूमि और किसान से अधिक महत्वपूर्ण तथा तत्काल नहीं है।

उन्होंने कांग्रेस द्वारा कृषि समस्या का व्यवस्थित अध्ययन और अखिल भारतीय कृषि कार्यक्रम तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

यह दिखाता है कि फैजपुर से महीनों पहले नेहरू किसान प्रश्न को कांग्रेस की नीति-निर्माण प्रक्रिया के केंद्र में लाने का प्रयास कर रहे थे।

# 9. अध्ययन पहले, कार्यक्रम बाद में

नेहरू का आग्रह था कि कृषि कार्यक्रम भावनात्मक नारे पर नहीं बल्कि वास्तविक परिस्थितियों के अध्ययन पर आधारित हो।

भारत की कृषि व्यवस्था इतनी विविध थी कि—

सभी के लिए एक सरल सूत्र पर्याप्त नहीं था।

यहां कांग्रेस और किसान सभा दोनों समान चुनौती का सामना कर रहे थे।

राष्ट्रीय कार्यक्रम बनाना था—

लेकिन क्षेत्रीय विविधता को मिटाए बिना।

# 10. अक्टूबर 1936 : नेहरू ने स्वतंत्र किसान संगठन की आवश्यकता स्वीकार की

अक्टूबर 1936 में किसान संगठन से जुड़े एक पत्र के उत्तर में नेहरू ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

यह वक्तव्य फैजपुर की पृष्ठभूमि को समझने की कुंजी है।

कांग्रेस और किसान सभा उस समय अनिवार्य रूप से शत्रु नहीं थे।

# 11. फिर फैजपुर ही क्यों ऐतिहासिक बना?

सहयोगपूर्ण प्रतिस्पर्धा।

अध्याय 14

1937 के प्रांतीय चुनाव और कांग्रेस सरकारें — किसान सभा की अपेक्षाएं, कृषि सुधारों के वादे, कांग्रेस मंत्रिमंडलों की नीतियां और बढ़ता किसान–कांग्रेस तनाव

1937 के प्रांतीय चुनाव भारतीय किसान राजनीति के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ थे। पहली बार अनेक प्रांतों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस केवल औपनिवेशिक शासन का विरोध करने वाली आंदोलनकारी शक्ति नहीं रही; वह सरकार चलाने की स्थिति में पहुंची। इससे किसान और कांग्रेस के संबंध की प्रकृति भी बदल गई।

1936 तक किसान कांग्रेस से मांग कर सकता था—

अंग्रेज सरकार पर दबाव डालो।

कर्ज में राहत दिलाओ।

लेकिन 1937 के बाद कई प्रांतों में वही प्रश्न बदल गया—

अब सरकार आपकी है; आप स्वयं क्या करेंगे?

यहीं किसान राजनीति की परीक्षा शुरू हुई।

फैजपुर कांग्रेस ने कृषि राहत के अनेक वादे किए थे। कांग्रेस के चुनाव घोषणापत्र में भूमि-राजस्व और किराए में कमी, ग्रामीण ऋण राहत और छोटे किसानों की सुरक्षा की दिशा घोषित की गई थी। कांग्रेस ने चुनावों में भारी समर्थन प्राप्त किया। बाद में मद्रास, संयुक्त प्रांत, बिहार, मध्य प्रांत, बंबई, उड़ीसा और अन्य प्रांतों में उसके मंत्रिमंडल बने।

किसानों को आशा थी कि लंबे समय से जिन मांगों के लिए वे आंदोलन करते आए हैं, अब उन पर तेजी से कार्रवाई होगी।

लेकिन शासन आंदोलन से अलग था।

औपनिवेशिक संविधान की सीमाएं थीं।

गवर्नरों के विशेष अधिकार थे।

कई प्रांतों में विधान परिषदों पर जमींदार, पूंजीपति और साहूकार वर्ग का प्रभाव था।

राजस्व व्यवस्था जटिल थी।

और कांग्रेस स्वयं बहुवर्गीय संगठन थी।

इन्हीं परिस्थितियों में कृषि सुधार हुए भी, लेकिन किसान सभा को वे अक्सर अपर्याप्त और धीमे लगे।

इसलिए 1937–39 का काल कांग्रेस और किसान सभा के संबंधों में सबसे महत्वपूर्ण संक्रमण था—

सहयोग से आलोचना, और आलोचना से कई क्षेत्रों में खुला राजनीतिक तनाव।

1. भारत शासन अधिनियम 1935 और नई राजनीतिक व्यवस्था

1937 के चुनाव भारत शासन अधिनियम, 1935 के अंतर्गत हुए।

इस अधिनियम ने प्रांतीय स्वायत्तता की व्यवस्था की।

इसका अर्थ था कि प्रांतों में निर्वाचित मंत्रिमंडल शिक्षा, कृषि, स्थानीय प्रशासन और अनेक अन्य क्षेत्रों में शासन कर सकते थे।

लेकिन यह पूर्ण स्वराज नहीं था।

ब्रिटिश गवर्नर के पास विशेष अधिकार बने रहे।

केंद्र ब्रिटिश नियंत्रण में था।

रक्षा, विदेश नीति और प्रमुख वित्तीय शक्तियां भारतीय निर्वाचित नेतृत्व के हाथ में नहीं थीं।

फिर भी पहले की तुलना में प्रांतीय सरकारों के पास पर्याप्त अधिकार थे कि वे—

में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप कर सकें।

इसीलिए किसान सभा ने 1937 के चुनावों को अत्यंत गंभीरता से लिया।

# 2. चुनाव से पहले किसान की अपेक्षाएं इतनी ऊंची क्यों थीं?

1930 के दशक का किसान पहले ही गहरे संकट से गुजर चुका था।

महामंदी ने कृषि कीमतें गिरा दी थीं।

लगान और राजस्व का बोझ बना रहा।

भूमि से बेदखली और गिरवी की समस्या बढ़ी।

बंगाल में किरायेदारी।

संयुक्त प्रांत में जमींदार–काश्तकार संघर्ष।

इन परिस्थितियों में कांग्रेस ने 1936 में किसान राहत की नीति घोषित की।

फैजपुर ने अपेक्षा और बढ़ा दी।

इसलिए 1937 के चुनाव केवल सरकार चुनने का सामान्य अवसर नहीं थे।

किसान के लिए वे इस प्रश्न पर जनमत जैसे थे—

क्या राष्ट्रीय आंदोलन की पार्टी सत्ता में आकर कृषि व्यवस्था बदलेगी?

# 3. कांग्रेस के चुनावी वादे

अगस्त 1936 के कांग्रेस चुनाव घोषणापत्र में कृषि संकट को प्रमुख स्थान दिया गया था।

कांग्रेस ने स्वीकार किया कि किसान गरीबी और ऋण के भारी बोझ से दबा है।

भूमि-राजस्व और किराए में पर्याप्त कमी,

छोटी अलाभकारी जोतों को राहत,

ग्रामीण कर्ज समस्या से निपटने

की दिशा घोषित की थी।

इसलिए किसान सभा के पास बाद में कांग्रेस सरकारों से जवाब मांगने के लिए लिखित राजनीतिक आधार था।

यह केवल मौखिक चुनावी प्रचार नहीं था।

कृषि राहत कांग्रेस के आधिकारिक कार्यक्रम का हिस्सा बन चुकी थी।

# 4. फैजपुर की दस कृषि दिशाएं अब शासन की कसौटी थीं

पिछले अध्याय में देखा गया कि फैजपुर कांग्रेस ने जिन प्रमुख दिशाओं को स्वीकार किया उनमें—

किराया और भूमि-राजस्व पुनर्निर्धारण,

कृषि आय पर प्रगतिशील कर,

सिंचाई शुल्क में कमी,

बेगार और सामंती उपकरों का अंत,

कृषि मजदूरों के लिए जीवन-निर्वाह मजदूरी

और किसान संघों की मान्यता—

शामिल थीं। जुलाई 1937 में नेहरू ने इन्हीं बिंदुओं को प्रांतीय कांग्रेस नेताओं को याद दिलाया।

इसलिए कांग्रेस मंत्रिमंडलों से किसान की अपेक्षा स्वाभाविक थी।

# 5. चुनाव परिणाम और कांग्रेस की शक्ति

1937 के चुनावों में कांग्रेस ने कई प्रांतों में प्रभावशाली सफलता प्राप्त की।

बाद में उसने सात प्रांतों में मंत्रिमंडल बनाए और थोड़े समय बाद असम में भी कांग्रेस मंत्रालय बना।

इस राजनीतिक परिवर्तन का मनोवैज्ञानिक प्रभाव बहुत बड़ा था।

कल तक जो नेता अंग्रेज सरकार के विरुद्ध जेल जाते थे, अब वही मंत्री थे।

किसान के लिए यह स्थिति अभूतपूर्व थी।

अब प्रशासन हमारा है।

लेकिन वास्तविकता इतनी सरल नहीं थी।

# 6. कांग्रेस ने तुरंत मंत्रिमंडल क्यों नहीं बनाए?

चुनाव के बाद कांग्रेस ने तुरंत सत्ता ग्रहण नहीं की।

गवर्नर अपने विशेष अधिकारों का उपयोग किस सीमा तक करेंगे?

कांग्रेस नहीं चाहती थी कि निर्वाचित मंत्रियों के ऊपर ब्रिटिश गवर्नर वास्तविक सत्ता बनाए रखें।

कुछ महीनों की राजनीतिक बातचीत और आश्वासनों के बाद जुलाई 1937 से कांग्रेस मंत्रिमंडलों का गठन हुआ।

इस देरी ने भी स्पष्ट कर दिया कि प्रांतीय स्वायत्तता पूर्ण उत्तरदायी शासन नहीं थी।

# 7. नेहरू की चेतावनी : सरकार बनना ही सफलता नहीं

नेहरू स्वयं कांग्रेस मंत्रिमंडलों को लेकर सावधान थे।

उनका विचार था कि सत्ता में प्रवेश कांग्रेस के जन-आंदोलन चरित्र को कमजोर नहीं करना चाहिए।

जून 1937 में उन्होंने लिखा कि कृषि कार्यक्रम केवल कागज पर पर्याप्त नहीं; उसे गांव तक पहुंचाना और ठोस प्रस्तावों में बदलना आवश्यक है। उन्होंने यह भी माना कि मौजूदा परिस्थितियों में पूरे कृषि कार्यक्रम को लागू करना संभव न हो सकता है, लेकिन कांग्रेस को विस्तृत तैयारी करनी चाहिए।

यह वक्तव्य महत्वपूर्ण है।

कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को पहले से पता था कि किसान अपेक्षा और सरकारी क्षमता में अंतर पैदा हो सकता है।

# 8. 16 जुलाई 1937 : तत्काल राहत की मांग

मंत्रिमंडल बनने के तुरंत बाद नेहरू ने प्रांतीय कांग्रेस नेताओं को लिखा कि भूमि और ग्रामीण ऋण का प्रश्न तत्काल उठाया जाए।

उन्होंने कहा कि व्यापक कृषि कानून बनने में समय लगेगा, लेकिन किसान को तत्काल राहत देना जरूरी है।

संभावित कदमों में उन्होंने—

किराया और ऋण बकाया के मुकदमों पर अस्थायी रोक,

किराया और राजस्व में कमी,

और कृषि आय पर प्रगतिशील कर—

इससे स्पष्ट है कि कांग्रेस नेतृत्व किसान असंतोष के खतरे को समझ रहा था।

# 9. किसान सभा की अपेक्षा इससे भी आगे थी

किसान सभा के लिए तत्काल राहत महत्वपूर्ण थी।

लेकिन उसका उग्र हिस्सा अब जमींदारी के मूल प्रश्न तक पहुंच चुका था।

या किरायेदारी सुधार—

उसे पर्याप्त नहीं लग सकते थे।

जमींदारी कब खत्म होगी?

यहीं कांग्रेस और किसान सभा के बीच वास्तविक नीति-अंतर उभरने लगा।

# 10. संयुक्त प्रांत : कृषि प्रश्न सबसे बड़ा

संयुक्त प्रांत में कांग्रेस सरकार के सामने जमींदारी और किरायेदारी प्रमुख प्रश्न थे।

यह अत्यंत महत्वपूर्ण प्रमाण है।

कांग्रेस के भीतर जमींदारी उन्मूलन पर विचार मौजूद था।

लेकिन इसे तत्काल आधिकारिक अखिल भारतीय नीति मानना गलत होगा।

# 11. नेहरू का सितंबर 1937 का महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण

# 12. संयुक्त प्रांत किरायेदारी सुधार

अध्याय 15

बिहार के बकाश्त संघर्ष और किसान सभा — भूमि-वापसी, जमींदार–किसान टकराव, सत्याग्रह, दमन और स्वामी सहजानंद के नेतृत्व में किसान राजनीति का उग्र चरण

1930 के दशक के उत्तरार्ध में बिहार का बकाश्त संघर्ष अखिल भारतीय किसान सभा की राजनीति के लिए निर्णायक परीक्षा था। यहां किसान सभा को पहली बार बड़े पैमाने पर यह साबित करना था कि जमींदारी-विरोध, बेदखली पर रोक और किसान के भूमि-अधिकार की उसकी घोषणाएं केवल सम्मेलन के प्रस्ताव नहीं हैं, बल्कि उन्हें जमीन पर संघर्ष में बदला जा सकता है।

बकाश्त प्रश्न की जड़ भूमि के उस जटिल संबंध में थी जिसमें कुछ जमीन जमींदार के प्रत्यक्ष नियंत्रण में दर्ज होती थी, लेकिन व्यवहार में उस पर किसान खेती करते थे। आर्थिक संकट, लगान बकाया और कानूनी प्रक्रियाओं के माध्यम से अनेक रैयती जमीनों को भी जमींदारों ने अपने नियंत्रण में लेकर बकाश्त घोषित करने का प्रयास किया। 1930 के दशक में जैसे-जैसे सरकार किरायेदारों को अधिक अधिकार देने पर विचार करने लगी, कई जमींदारों के बीच ऐसी भूमि को अपने प्रत्यक्ष स्वामित्व में सुरक्षित करने की प्रवृत्ति बढ़ी। लता सिंह के विस्तृत अध्ययन में 1936 के बाद बिहार किसान सभा की राजनीति के उग्र होने का प्रमुख कारण यही बकाश्त विवाद बताया गया है।

बिहार राज्य अभिलेखागार की चयनित सूची भी इस संघर्ष की गंभीरता की पुष्टि करती है। 1939 के लिए अलग-अलग फाइलें “बकाश्त समस्या की प्रकृति”, मुंगेर के बरहिया टाल में किसान सत्याग्रह, दरभंगा राज के पंडौल क्षेत्र में पुलिस व्यवहार, देओकुली में किसान सत्याग्रह और किसान प्रदर्शनों पर उपलब्ध हैं। इससे स्पष्ट है कि बकाश्त कोई सीमित स्थानीय विवाद नहीं रह गया था; वह औपनिवेशिक प्रशासन के लिए प्रांतीय राजनीतिक समस्या बन चुका था।

इस संघर्ष ने किसान सभा के चरित्र को बदल दिया।

जमीन पर वास्तविक अधिकार किसका है?

और यही प्रश्न किसान सभा को सुधारवादी कृषक संगठन से अधिक उग्र भूमि आंदोलन की ओर ले गया।

1. ‘बकाश्त’ का अर्थ क्या था?

‘बकाश्त’ सामान्यतः ऐसी भूमि के लिए प्रयुक्त शब्द था जिसे जमींदार अपने प्रत्यक्ष नियंत्रण या खेती के लिए रखता था।

लेकिन व्यवहार में स्थिति इतनी सरल नहीं थी।

बिहार की भूमि व्यवस्था में—

और विभिन्न प्रकार के कब्जाधिकार—

एक-दूसरे से जुड़े जटिल कानूनी प्रश्न थे।

लता सिंह के अध्ययन के अनुसार बकाश्त भूमि पर जमींदार प्रत्यक्ष नियंत्रण का दावा करते थे, लेकिन कुछ परिस्थितियों में किसान उस पर कब्जाधिकार अथवा काश्तकारी अधिकार का दावा कर सकते थे। व्यवहार में बकाश्त और जिरात को अक्सर जमींदार की भूमि माना जाता था।

यही कानूनी अस्पष्टता आगे संघर्ष का स्रोत बनी।

# 2. रैयती जमीन बकाश्त में कैसे बदलती थी?

महामंदी के बाद किसान की नकद आय गिर गई।

यदि किसान लगान नहीं चुका सका तो जमींदार कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से उसकी भूमि पर नियंत्रण प्राप्त कर सकता था।

कई मामलों में ऐसी जमीन बकाश्त के रूप में दर्ज कर दी जाती।

फिर किसान, जो पहले स्थायी या अपेक्षाकृत सुरक्षित रैयत था, जमीन से बाहर हो सकता था।

कुछ स्थानों पर वही जमीन बाद में अधिक किराए पर अस्थायी काश्तकार को दी जा सकती थी। इस प्रक्रिया को किसान सभा ने जमींदारी सत्ता द्वारा भूमि अधिकार हड़पने के रूप में प्रस्तुत किया।

इसलिए बकाश्त केवल भूमि वर्गीकरण नहीं था।

वह किसान के लिए भूमि खोने की प्रक्रिया बन गया।

# 3. महामंदी ने बकाश्त संकट क्यों बढ़ाया?

1929 के बाद कृषि कीमतों में गिरावट ने किसान की भुगतान क्षमता कमजोर की।

पुराना लगान बना रहा।

जब किसान बकाया में फंसता तो जमींदार के पास भूमि पर दावा मजबूत करने के कानूनी साधन थे।

इसलिए आर्थिक संकट भूमि संकट में बदल गया।

बकाश्त आंदोलन की पृष्ठभूमि को महामंदी से अलग करके समझना संभव नहीं।

फसल मूल्य में गिरावट → नकद आय में कमी → लगान बकाया → भूमि पर जमींदार का दावा → बेदखली → बकाश्त संघर्ष।

# 4. सरकार के प्रस्तावित किरायेदारी सुधार ने जमींदारों की चिंता क्यों बढ़ाई?

1930 के दशक में बिहार में किरायेदारों को अधिक सुरक्षा देने की मांग तेजी से बढ़ रही थी।

किसान सभा भी काश्तकारी अधिकार मजबूत करने के लिए दबाव डाल रही थी।

यदि लंबे समय से किसी जमीन पर खेती कर रहा किसान आगे वैधानिक अधिकार प्राप्त कर लेता, तो जमींदार का प्रत्यक्ष नियंत्रण कमजोर हो सकता था।

इसलिए शोध में संकेत मिलता है कि कुछ जमींदारों ने संभावित किरायेदारी सुधारों से पहले भूमि को बकाश्त अथवा जिरात के रूप में अपने नियंत्रण में सुरक्षित करने की कोशिश तेज की।

इससे किसान और जमींदार के बीच संघर्ष और तीखा हुआ।

# 5. बकाश्त किसान की स्थिति कितनी असुरक्षित थी?

बकाश्त पर खेती करने वाले किसान की स्थिति कई मामलों में रैयती किसान से कमजोर हो सकती थी।

यदि उसे स्थायी काश्तकारी अधिकार प्राप्त नहीं था तो—

उसे हटाया जा सकता था,

किराया बढ़ाया जा सकता था,

और उसकी खेती का अधिकार जमींदार की इच्छा पर निर्भर हो सकता था।

इग्नू की आधुनिक भारत इतिहास सामग्री बताती है कि बकाश्त भूमि पर खेती करने वाले किसानों की कानूनी स्थिति कमजोर थी और 1930 के दशक के उत्तरार्ध में बेदखली में तेजी आई; इसी के विरुद्ध किसान सभा ने 1937–39 में संघर्ष चलाया।

# 6. बकाश्त आंदोलन की शुरुआत कब मानें?

बकाश्त विवाद पहले से मौजूद थे, लेकिन बिहार प्रांतीय किसान सभा ने 1936 से इन्हें अधिक संगठित राजनीतिक आंदोलन का रूप देना शुरू किया।

लता सिंह के अध्ययन में 1936 के बाद किसान सभा के आंदोलन का दूसरा, अधिक उग्र चरण बकाश्त संघर्ष से जोड़ा गया है।

1937 में कांग्रेस सरकार बनने के बाद किसान अपेक्षाएं बढ़ीं और 1937–39 में आंदोलन कई जिलों में तीव्र हुआ।

इसलिए शोध की दृष्टि से इसे इस प्रकार समझना अधिक उचित है—

1936 — संगठित बकाश्त आंदोलन का उभार। 1937–39 — उसका उग्र और व्यापक चरण।

# 7. कांग्रेस सरकार ने किसान अपेक्षाएं क्यों बढ़ाईं?

1937 में बिहार में कांग्रेस मंत्रिमंडल बनने पर किसान सभा और किसान दोनों को उम्मीद थी कि अब जमींदारी अत्याचार पर रोक लगेगी।

कांग्रेस ने चुनाव से पहले कृषि सुधार का वादा किया था।

फैजपुर में किसान राहत का कार्यक्रम स्वीकार किया गया था।

कई किसान सभा नेता कांग्रेस से जुड़े थे।

अब बकाश्त जमीन वापस पाने के लिए सरकार उसके पक्ष में खड़ी होगी।

लेकिन ऐसा सरल समाधान सामने नहीं आया।

यहीं कांग्रेस और किसान सभा के संबंधों में तनाव तेजी से बढ़ा।

# 8. किसान सभा ने संघर्ष को क्यों तेज किया?

किसान सभा का तर्क था—

कांग्रेस सरकार बनने का अर्थ यह नहीं कि किसान आंदोलन स्थगित कर दिया जाए।

यदि जमींदार भूमि वापस नहीं करते तो किसान को स्वयं संगठित होकर दावा करना होगा।

इग्नू के किसान आंदोलन संबंधी अध्ययन में स्पष्ट कहा गया है कि कांग्रेस मंत्रालय बनने के बाद किसान सभा ने इसे बकाश्त प्रश्न को निर्णायक रूप से उठाने का अवसर माना और बेदखली के विरुद्ध आंदोलन चलाया।

यही किसान सभा की स्वतंत्र संगठनात्मक राजनीति की व्यवहारिक परीक्षा थी।

# 9. स्वामी सहजानंद की भूमिका

स्वामी सहजानंद सरस्वती बकाश्त आंदोलन के सबसे प्रमुख वैचारिक और राजनीतिक नेताओं में थे।

उनके लिए बकाश्त संघर्ष ने इस निष्कर्ष को मजबूत किया कि—

पुराने कानूनी दस्तावेज?

अध्याय 16

बंगाल किसान सभा और तेभागा की जमीन — बर्गादार, जोतदार, फसल-बंटवारा, किसान सभा का संगठन और 1946–47 के तेभागा आंदोलन की तैयारी

बंगाल का तेभागा आंदोलन 1946–47 में अचानक भड़की किसी आकस्मिक किसान बगावत का परिणाम नहीं था। उसके पीछे लगभग एक दशक की संगठित किसान राजनीति, बंगाल की जटिल भू-व्यवस्था, बर्गादारों की असुरक्षित स्थिति, जोतदारों की ग्रामीण शक्ति, महामंदी के प्रभाव, द्वितीय विश्वयुद्ध और 1943 के विनाशकारी बंगाल अकाल का संचयी दबाव था। अखिल भारतीय किसान सभा के अपने ऐतिहासिक विवरण भी तेभागा को युद्धकालीन ग्रामीण संकट और पहले से विकसित किसान संगठन की परिणति मानते हैं।

तेभागा का शाब्दिक अर्थ था—तीन भाग। आंदोलन की केंद्रीय मांग थी कि बटाई पर खेती करने वाले बर्गादार या अधियार को फसल का दो-तिहाई हिस्सा मिले और भूमि नियंत्रक जोतदार को केवल एक-तिहाई। इससे पहले अनेक क्षेत्रों में प्रचलित व्यवस्था के अनुसार फसल लगभग आधी-आधी बांटी जाती थी, जबकि खेती का बड़ा हिस्सा—श्रम, देखभाल और कई बार उत्पादन लागत—बर्गादार वहन करता था।

लेकिन तेभागा की मांग केवल फसल के अनुपात का प्रश्न नहीं थी। उसके भीतर एक अधिक गहरा सवाल छिपा था—

जो व्यक्ति भूमि पर वास्तविक खेती करता है, कृषि उत्पादन पर उसका अधिकार कितना होना चाहिए?

यही प्रश्न बंगाल किसान सभा को सामान्य किराया-सुधार आंदोलन से गरीब किसान, बटाईदार और कृषि मजदूर की अधिक स्पष्ट वर्गीय राजनीति की ओर ले गया।

1. बंगाल की भूमि व्यवस्था की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

1793 के स्थायी बंदोबस्त ने बंगाल में जमींदारों को औपनिवेशिक राजस्व व्यवस्था का महत्वपूर्ण मध्यस्थ बनाया। समय के साथ जमींदार और वास्तविक कृषक के बीच कई स्तरों के भू-अधिकार विकसित हुए।

इन स्तरों में शामिल हो सकते थे—

तालुकेदार अथवा दूसरे मध्यस्थ,

इसलिए बंगाल में भूमि संबंधों को केवल ‘जमींदार बनाम किसान’ की दो श्रेणियों में समझना पर्याप्त नहीं है।

विशेष रूप से उत्तर बंगाल के कई क्षेत्रों में जोतदार ग्रामीण सत्ता का अत्यंत महत्वपूर्ण पात्र बन गया।

‘जोतदार’ शब्द का अर्थ क्षेत्र और समय के अनुसार बदल सकता था, इसलिए उसे सीधे ‘जमींदार’ का पर्याय मानना उचित नहीं।

कई क्षेत्रों में जोतदार बड़े अथवा समृद्ध रैयत थे जिनके पास अपेक्षाकृत बड़ी जोत होती थी।

वे स्वयं खेती का कुछ हिस्सा करा सकते थे।

भूमि दूसरे कृषकों को बटाई पर दे सकते थे।

साहूकारी भी कर सकते थे।

स्थानीय व्यापार अथवा अनाज बाजार से जुड़े हो सकते थे।

और गांव की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभा सकते थे।

इस तरह जोतदार कानूनी रूप से शीर्ष जमींदार न होते हुए भी वास्तविक ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अत्यंत शक्तिशाली हो सकता था।

# 3. जमींदार और जोतदार में अंतर

बंगाल की किसान राजनीति समझने में यह अंतर आवश्यक है।

जमींदार औपनिवेशिक भू-राजस्व व्यवस्था में बड़े भू-अधिकार और राजस्व दायित्व वाला शीर्ष मध्यस्थ हो सकता था।

जोतदार कई मामलों में उसके नीचे स्थित समृद्ध कृषक अथवा भू-अधिकारधारी था।

लेकिन गांव में बर्गादार का तत्काल आर्थिक संबंध अक्सर सीधे जोतदार से होता था।

इसलिए तेभागा आंदोलन में मुख्य टकराव कई क्षेत्रों में—

बर्गादार बनाम जोतदार

के रूप में दिखाई दिया।

यही वजह है कि आंदोलन को केवल जमींदारी-विरोध कहना उसकी वास्तविक सामाजिक संरचना को अधूरा कर देगा।

# 4. बर्गादार या अधियार कौन था?

बर्गादार वह कृषक था जो किसी दूसरे व्यक्ति की भूमि पर खेती करता और उत्पाद का निश्चित हिस्सा भूमि नियंत्रक को देता था।

बंगाल में ऐसे किसान को कई जगह—

जैसे नामों से जाना जाता था।

‘अधियार’ शब्द स्वयं आधे हिस्से की व्यवस्था की ओर संकेत करता है।

किसान सभा के विवरण के अनुसार बर्गादार भूमि जोतता था और फसल का लगभग आधा हिस्सा जोतदार को देता था।

# 5. आधी फसल की व्यवस्था

आम बंटाई व्यवस्था में फसल का आधा हिस्सा जोतदार और आधा बर्गादार को मिलता था।

पहली दृष्टि में यह बराबर बंटवारा लग सकता है।

लेकिन किसान सभा का तर्क था कि वास्तविक लागत और श्रम का भार बराबर नहीं था।

परिवार का श्रम लगाता,

कई मामलों में बीज और अन्य खर्च उठाता।

फिर भी आधी फसल छोड़नी पड़ती।

इसलिए 50:50 व्यवस्था को किसान सभा ने न्यायपूर्ण साझेदारी नहीं बल्कि असमान आर्थिक संबंध माना।

# 6. केवल आधी फसल देना ही समस्या नहीं थी

बर्गादार पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव भी हो सकता था।

वह जोतदार या महाजन से—

या अन्य जरूरतों के लिए ऋण—

फसल का माप और भंडारण जोतदार के नियंत्रण में हो सकता था।

इससे बर्गादार का वास्तविक हिस्सा घोषित आधे से भी कम हो सकता था।

IGNOU की सामग्री भी जोतदार और महाजन की संयुक्त ग्रामीण शक्ति तथा बर्गादार की निर्भरता को रेखांकित करती है।

# 7. कर्ज और बटाई का गठजोड़

यदि जोतदार ही भूमि देता है,

वही अनाज उधार देता है,

वही फसल का हिस्सा लेता है,

और कई बार वही बाजार से जुड़ा है—

तो बर्गादार केवल किरायेदार नहीं रहता।

वह आर्थिक निर्भरता के पूरे जाल में फंस सकता है।

यानी किसान सभा के लिए तेभागा का प्रश्न केवल भूमि किराए का नहीं था।

वह ग्रामीण सत्ता के कई स्रोतों को चुनौती देता था।

# 8. बर्गादार का भूमि-अधिकार कमजोर था

बर्गादार की सबसे बड़ी कमजोरी थी—

भूमि पर स्थायी सुरक्षा का अभाव।

जोतदार उसे अगले मौसम में भूमि न देने का निर्णय ले सकता था।

इससे वह अपने अधिकार के लिए खुलकर संघर्ष करने में भय महसूस कर सकता था।

IGNOU के अध्ययन में बर्गादार की काश्तकारी स्थिति को अस्थायी और असुरक्षित बताया गया है।

इसलिए तेभागा आंदोलन में केवल फसल हिस्सा नहीं—

भी अंतर्निहित प्रश्न था।

# 9. जोतदार की ग्रामीण सत्ता

जोतदार की शक्ति केवल भूमि से नहीं आती थी।

गांव की सामाजिक प्रतिष्ठा,

और कभी स्थानीय राजनीतिक नेटवर्क—

से भी जुड़ा हो सकता था।

इसलिए बर्गादार के लिए संघर्ष केवल आर्थिक सौदेबाजी नहीं था।

वह गांव के स्थापित शक्ति-संतुलन को चुनौती था।

# 10. बंगाल किसान सभा का जन्म

1936 में अखिल भारतीय किसान सभा के गठन के साथ विभिन्न प्रांतों में किसान संगठन का नया विस्तार शुरू हुआ।

बंगाल में भी प्रांतीय किसान सभा ने—

के प्रश्नों को संगठित करना शुरू किया।

यही संगठन आगे तेभागा आंदोलन का नेतृत्व करने वाला था।

किसान सभा की राष्ट्रीय नीति पहले से ही लगान, कर्ज, बेदखली और किसान-मजदूर संगठन को प्राथमिकता दे रही थी।

# 11. बंगाल में कम्युनिस्ट प्रभाव

बंगाल प्रांतीय किसान सभा में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े कार्यकर्ताओं का प्रभाव अपेक्षाकृत मजबूत हुआ।

इसका महत्वपूर्ण परिणाम था—

किसान संगठन का सामाजिक आधार अधिक स्पष्ट रूप से गरीब किसान और बटाईदार की ओर जाना।

IGNOU के विश्लेषण के अनुसार 1940 के दशक तक किसान सभा का संगठन गरीब किसानों, अस्थायी किरायेदारों, बटाईदारों और भूमिहीन कृषि मजदूरों में अधिक सक्रिय हो चुका था।

इसी सामाजिक आधार से तेभागा संभव हुआ।

# 12. क्या बंगाल किसान सभा शुरू से केवल बर्गादार संगठन थी?

प्रारंभिक किसान राजनीति में मध्यम किसान और अन्य कृषक समूह भी शामिल थे।

किसान सभा को व्यापक ग्रामीण आधार चाहिए था।

लेकिन जैसे-जैसे संघर्ष भूमि और फसल हिस्सेदारी के प्रश्न पर केंद्रित हुआ, बर्गादार संगठन का केंद्रीय सामाजिक आधार बनता गया।

इस परिवर्तन को किसान सभा की बढ़ती वर्गीय दिशा के संदर्भ में समझना चाहिए।

# 13. महामंदी और बंगाल का किसान

भूमि का हस्तांतरण हुआ।

बंगाल तेभागा

राष्ट्रीय विचारधारा,

अध्याय 17

तेभागा आंदोलन, 1946–47 — ‘तेभागा चाहिए’ से खेतों पर प्रत्यक्ष संघर्ष तक, दिनाजपुर–जलपाईगुड़ी–रंगपुर के प्रमुख केंद्र, महिलाओं की भूमिका, पुलिस दमन, उपलब्धियां और सीमाएं

1946–47 का तेभागा आंदोलन औपनिवेशिक भारत के सबसे व्यापक और संगठित बटाईदार आंदोलनों में था। बंगाल के बर्गादारों या अधियारों ने मांग उठाई कि जिस भूमि पर वे खेती करते हैं, उसकी उपज का आधा हिस्सा देने की पुरानी व्यवस्था समाप्त हो और फसल के तीन भागों में से दो भाग वास्तविक कृषक को तथा केवल एक भाग भूमि नियंत्रक को मिले। इसी दो-तिहाई हिस्से की मांग से आंदोलन को ‘तेभागा’ नाम मिला।

लेकिन तेभागा केवल हिस्सेदारी की गणना नहीं था।

उसने एक साथ कई पुरानी व्यवस्थाओं को चुनौती दी—

फसल किसके खलिहान में जाएगी?

फसल की माप कौन करेगा?

बटाईदार के ऊपर ऋण और अतिरिक्त कटौतियां कौन तय करेगा?

भूमि पर खेती जारी रखने का अधिकार किसके हाथ होगा?

जिस व्यक्ति का श्रम कृषि उत्पादन का आधार है, क्या वह केवल भूमि-मालिक की कृपा पर निर्भर रहेगा?

यही कारण है कि आंदोलन जल्दी ही ‘आधी फसल बनाम दो-तिहाई’ से आगे बढ़कर ग्रामीण सत्ता-संबंधों के प्रश्न में बदल गया।

1. आंदोलन की ऐतिहासिक स्थिति

तेभागा आंदोलन 1946 के अंतिम महीनों में शुरू हुआ और 1947 की शुरुआत में अपने चरम पर पहुंचा।

बंगाल के कम-से-कम 19 जिलों में इसका प्रभाव दर्ज किया गया है। सबसे तीखे संघर्ष—

इसका संगठनात्मक नेतृत्व मुख्यतः बंगाल प्रांतीय किसान सभा और उससे जुड़े कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने किया, लेकिन आंदोलन की वास्तविक शक्ति गांवों से आई।

# 2. ‘तेभागा चाहिए’ का वास्तविक अर्थ

आंदोलन की मांग को सरल रूप में समझें।

आधी फसल बर्गादार की, आधी जोतदार की।

दो-तिहाई बर्गादार का, एक-तिहाई जोतदार का।

बर्गादारों का तर्क था कि—

भूमि जोतने का श्रम वे करते हैं,

फसल की देखभाल वे करते हैं,

परिवार का श्रम उनका लगता है,

और उत्पादन लागत का बड़ा हिस्सा भी अक्सर उन्हीं पर पड़ता है।

इसलिए केवल भूमि देने वाले को आधी फसल देना न्यायसंगत नहीं।

# 3. दूसरी निर्णायक मांग : ‘धान अपने खलिहान में’

तेभागा आंदोलन का दूसरा नारा हिस्सेदारी जितना ही महत्वपूर्ण था—

धान जोतदार के खलिहान में नहीं, बर्गादार के अपने खलिहान में जाएगा।

पुरानी व्यवस्था में बर्गादार फसल काटकर भूमि नियंत्रक के खलिहान में ले जाता था।

अन्य दावे जोड़े जा सकते थे।

तेभागा आंदोलन ने कहा—

पहले फसल वास्तविक उत्पादक के कब्जे में आएगी।

यानी संघर्ष का केंद्र केवल मात्रा नहीं बल्कि उत्पादन पर नियंत्रण था।

# 4. खेत से खलिहान तक सत्ता

यह बदलाव देखने में छोटा था, लेकिन राजनीतिक अर्थ बहुत बड़ा था।

पहले व्यवस्था कहती थी—

इसलिए फसल पहले उसके नियंत्रण में जाएगी।

फसल मैंने पैदा की है,

इसलिए वह पहले मेरे खलिहान में जाएगी।

इसलिए खलिहान का प्रश्न वास्तव में गांव में सत्ता का प्रश्न था।

# 5. आंदोलन का आह्वान

1946 की खरीफ/अमन फसल के समय बंगाल प्रांतीय किसान सभा ने बर्गादारों से कहा—

फसल अपने खमार में लाओ।

दो-तिहाई हिस्सा अपने पास रखो।

इसने वर्षों से चल रही मांग को सीधे जमीन पर लागू करने की रणनीति में बदल दिया।

किसान अब सरकार से कानून की प्रतीक्षा करने के बजाय स्वयं तेभागा लागू करने लगा।

# 6. यह प्रत्यक्ष कार्रवाई क्यों बनी?

क्योंकि किसान सभा का तर्क था—

भूमि राजस्व आयोग ने भी बर्गादार की स्थिति में सुधार और दो-तिहाई हिस्से की दिशा का समर्थन किया था।

लेकिन वर्षों बाद भी वैधानिक समाधान लागू नहीं हुआ।

इसलिए किसान आंदोलन ने कहा—

अब अधिकार व्यवहार में लागू करो।

यहीं तेभागा याचिका से प्रत्यक्ष कार्रवाई में बदल गया।

# 7. दिनाजपुर : आंदोलन का सबसे शक्तिशाली केंद्र

दिनाजपुर तेभागा आंदोलन का प्रमुख केंद्र बना।

यहां राजबंशी बर्गादार, गरीब किसान और कुछ क्षेत्रों में संथाल कृषि मजदूर बड़ी संख्या में संघर्ष में आए। उत्तर बंगाल के अध्ययन बताते हैं कि किसानों ने धान के ढेर अपने खमारों में ले जाना शुरू किया और पुलिस से गंभीर टकराव हुए।

आंदोलन जिले के अनेक थाना क्षेत्रों में फैला।

दिनाजपुर की घटनाएं तेभागा की सबसे प्रसिद्ध स्मृतियों में शामिल हुईं।

# 8. अटवारी : आरंभिक संघर्ष केंद्र

तेभागा के आरंभिक प्रमुख केंद्रों में अटवारी का नाम आता है।

किसान सभा कार्यकर्ताओं ने बर्गादारों को स्वयं धान काटने और अपने खलिहान में ले जाने के लिए संगठित किया।

पुलिस हस्तक्षेप हुआ।

महिलाओं ने भी पुलिस कार्रवाई का विरोध किया।

यहीं से आंदोलन दिनाजपुर के अनेक हिस्सों में तेजी से फैलता गया।

# 9. चिरिरबंदर की पुलिस गोलीबारी

जनवरी 1947 में दिनाजपुर के चिरिरबंदर क्षेत्र में पुलिस और किसानों का गंभीर टकराव हुआ।

उत्तर बंगाल संबंधी अध्ययन में 4 जनवरी 1947 की पुलिस गोलीबारी में समीरुद्दीन और शिवराम माझी की मृत्यु का उल्लेख मिलता है। एक मुस्लिम कृषक और एक आदिवासी किसान की संयुक्त शहादत बाद में आंदोलन की वर्गीय एकता के प्रतीक के रूप में भी याद की गई।

यह घटना दिखाती है कि संघर्ष अब केवल आर्थिक बातचीत नहीं रह गया था।

# 10. खानपुर : सबसे भीषण टकरावों में एक

फरवरी 1947 में दिनाजपुर के खानपुर क्षेत्र में तेभागा आंदोलन और पुलिस के बीच बड़ा टकराव हुआ।

एक अध्ययन 20 फरवरी 1947 की घटना में पुलिस फायरिंग और कम-से-कम 22 किसानों की मृत्यु का उल्लेख करता है।

किसान सभा की स्मृति में खानपुर तेभागा आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण शहीद स्थलों में माना गया।

लेकिन मृतकों की सटीक संख्या अलग स्रोतों में जांचने योग्य विषय है; इसलिए इसे स्थानीय प्राथमिक अभिलेखों से भी मिलाना उचित होगा।

# 11. खानपुर में महिलाओं की अग्रिम भूमिका

खानपुर संघर्ष में यशोदा रानी सरकार जैसे महिला नेतृत्व का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने ग्रामीण महिलाओं और किसान स्वयंसेवकों को पुलिस गिरफ्तारी के विरोध में संगठित किया।

यह घटना तेभागा की विशिष्टता बताती है—

महिलाएं पीछे से समर्थन देने वाली शक्ति नहीं थीं।

वे सीधे संघर्ष की अग्रिम पंक्ति में थीं।

# 12. जलपाईगुड़ी : आदिवासी और कृषक एकता

जलपाईगुड़ी में तेभागा अत्यंत प्रभावशाली रहा।

संथाल और उरांव जैसे आदिवासी कृषक समूह भी आंदोलन में जुड़े और बर्गादारों ने फसल अपने खलिहानों में ले जाने की परंपरा लागू करनी शुरू की।

कई क्षेत्रों में जोतदारों को अपने पारंपरिक नियंत्रण के कमजोर होने का भय हुआ।

यहां आंदोलन केवल हिस्सेदारी का विवाद नहीं रहा—

ग्रामीण सत्ता के पुराने ढांचे को प्रत्यक्ष चुनौती मिली।

# 13. जलपाईगुड़ी में किसान सभा की पूर्व तैयारी

जलपाईगुड़ी में आंदोलन के तेज होने के पीछे पहले से मौजूद किसान संगठन महत्वपूर्ण था।

स्थानीय कम्युनिस्ट और किसान सभा कार्यकर्ताओं ने—

स्वयंसेवक प्रशिक्षण,

और क्षेत्रवार संगठन—

इसलिए आंदोलन का विस्फोट स्वतःस्फूर्त होने के साथ-साथ संगठित भी था।

# 14. आंदोलन के प्रमुख नारे

उत्तर बंगाल के अध्ययनों में कई प्रमुख नारों का उल्लेख मिलता है—

“आधी नहीं, तेभागा चाहिए।”

“धान अपने खलिहान में उठाओ।”

“जान देंगे, धान नहीं देंगे।”

“पतित जमीन पर कब्जा करो।”

इन नारों ने जटिल कृषि कार्यक्रम को सीधे ग्रामीण भाषा में बदल दिया।

यही जन आंदोलन की राजनीतिक दक्षता थी।

# 15. ‘एक भाई, एक रुपया, एक लाठी’

किसान एकता के लिए ‘एक भाई, एक रुपया, एक लाठी’ जैसी सामूहिक लामबंदी की भाषा भी इस्तेमाल हुई।

हर परिवार आंदोलन में व्यक्ति दे।

और सामूहिक रक्षा के लिए तैयार रहे।

अध्याय 18

तेलंगाना किसान संघर्ष और अखिल भारतीय किसान सभा — निजामशाही, जागीरदारी–देशमुख व्यवस्था, वेट्टी/बेगार, आंध्र महासभा, कम्युनिस्ट नेतृत्व और 1946–51 के सशस्त्र किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि

1946–51 का तेलंगाना किसान संघर्ष औपनिवेशिक भारत के किसान आंदोलनों में एक विशिष्ट स्थान रखता है। बिहार के बकाश्त संघर्ष में किसान भूमि-वापसी के लिए लड़ रहा था, बंगाल के तेभागा आंदोलन में बर्गादार फसल के दो-तिहाई हिस्से और उत्पादन पर नियंत्रण का दावा कर रहा था, जबकि तेलंगाना में संघर्ष धीरे-धीरे इससे भी आगे चला गया—यह भूमि, बेगार, अवैध वसूली, ग्रामीण सामंती सत्ता, निजामशाही के दमन और अंततः राजनीतिक नियंत्रण के प्रश्नों को एक साथ चुनौती देने वाला आंदोलन बन गया।

तेलंगाना संघर्ष की शुरुआत को सीधे 1946 की बंदूक और गुरिल्ला कार्रवाई से जोड़ देना इसलिए इतिहास को अधूरा कर देगा। उसके पीछे दशकों से विकसित एक विशिष्ट सामाजिक व्यवस्था थी। तत्कालीन हैदराबाद रियासत में विशाल जागीरें थीं, शक्तिशाली देशमुख और दूसरे ग्रामीण मध्यस्थ थे, किसानों से अनेक प्रकार की अवैध वसूली होती थी, और वेट्टी अर्थात बिना मजदूरी के जबरन श्रम की प्रथा ग्रामीण अधीनता का प्रतीक थी। IGNOU के अध्ययन में आंदोलन को निजाम, जागीरदारों और स्थानीय प्रभुओं के विरुद्ध भोजन और स्वतंत्रता—दोनों की मांग से विकसित किसान संघर्ष के रूप में वर्णित किया गया है।

1940 के दशक में आंध्र महासभा और कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने इन्हीं शिकायतों को गांव-स्तरीय संगठनों में बदलना शुरू किया। पी. सुंदरैया के विवरण के अनुसार 1940–44 के दौरान कम्युनिस्ट और आंध्र महासभा का वाम पक्ष किसानों को सरकारी आदेश लागू कराने, बेगार रोकने, अवैध वसूली और बेदखली का विरोध करने के लिए संगठित कर रहा था; 1944 के बाद आंदोलन अधिक संघर्षशील रूप लेता गया।

यहीं अखिल भारतीय किसान सभा के इतिहास से तेलंगाना का संबंध भी महत्वपूर्ण हो जाता है। तेलंगाना का प्रत्यक्ष ग्रामीण संगठन मुख्यतः आंध्र महासभा और कम्युनिस्ट पार्टी के माध्यम से विकसित हुआ, इसलिए उसे साधारण रूप से “AIKS की स्थानीय शाखा” कहना ऐतिहासिक रूप से ठीक नहीं होगा। लेकिन वही कम्युनिस्ट किसान नेतृत्व अखिल भारतीय किसान सभा में सक्रिय था, और AIKS ने बाद में तेलंगाना संघर्ष को अपने किसान आंदोलन की सबसे बड़ी ऐतिहासिक लड़ाइयों में गिना। उसके 22वें सम्मेलन के आधिकारिक ऐतिहासिक विवरण में तेलंगाना संघर्ष को भूमि-वापसी, बेगार उन्मूलन, उचित किराए, कृषि मजदूरी और गरीब किसानों में भूमि वितरण के कार्यक्रम से विकसित व्यापक किसान विद्रोह के रूप में दर्ज किया गया है।

इसलिए तेलंगाना का इतिहास तीन स्तरों पर पढ़ना चाहिए—

निजामशाही और सामंती कृषि व्यवस्था।

आंध्र महासभा और कम्युनिस्ट किसान संगठन का विकास।

1946 से शुरू हुआ सशस्त्र ग्रामीण संघर्ष।

1. हैदराबाद रियासत : ब्रिटिश भारत के भीतर एक विशाल देशी राज्य

स्वतंत्रता से पहले हैदराबाद भारत की सबसे बड़ी देशी रियासत थी।

इसमें तीन प्रमुख भाषायी क्षेत्र थे—

तेलुगु भाषी तेलंगाना,

मराठी भाषी मराठवाड़ा,

और कन्नड़ भाषी क्षेत्र।

तेलंगाना क्षेत्र रियासत के लगभग आधे भूभाग का प्रतिनिधित्व करता था। निजाम रियासत का शासक था और ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन आंतरिक स्वायत्तता रखता था।

इसलिए तेलंगाना किसान की राजनीतिक परिस्थिति बंगाल या बिहार से अलग थी।

बिहार का किसान सीधे ब्रिटिश भारतीय प्रांत की जमींदारी व्यवस्था में था।

तेलंगाना का किसान एक देशी रियासत में—

और स्थानीय भू-स्वामी—

की बहुस्तरीय सत्ता का सामना करता था।

# 2. संघर्ष को हिंदू बनाम मुस्लिम कहना गलत क्यों होगा?

हैदराबाद का निजाम मुस्लिम था और रियासत की बहुसंख्यक आबादी हिंदू थी।

बाद के चरण में मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन और रजाकारों की भूमिका भी महत्वपूर्ण बनी।

फिर भी पूरे तेलंगाना किसान संघर्ष को सांप्रदायिक संघर्ष के रूप में पढ़ना गलत होगा।

उसका मूल सामाजिक आधार था—

किसान बनाम बड़े भू-स्वामी,

कृषि मजदूर बनाम सामंती प्रभु,

और ग्रामीण जनता बनाम निरंकुश राज्य।

जमींदार और देशमुख केवल एक धर्म से नहीं आते थे और आंदोलन के कम्युनिस्ट तथा किसान नेतृत्व में भी विविध धार्मिक समुदायों के लोग थे। मखदूम मोहिउद्दीन जैसे मुस्लिम कम्युनिस्ट नेता आंदोलन के प्रमुख चेहरों में रहे। AIKS के अपने इतिहास में संघर्ष का कार्यक्रम भूमि, बेगार, किराया, मजदूरी और ऋण पर केंद्रित बताया गया है।

इसलिए सांप्रदायिक तत्व मौजूद थे, लेकिन आंदोलन का मूल चरित्र कृषि-सामाजिक और राजनीतिक था।

# 3. हैदराबाद की भूमि व्यवस्था

हैदराबाद राज्य की भूमि व्यवस्था broadly तीन प्रमुख श्रेणियों में समझी जाती है—

दीवानी या खालसा भूमि जागीर भूमि सरफ-ए-खास भूमि

अलग स्रोत प्रतिशत में कुछ अंतर दे सकते हैं, लेकिन सामान्य संरचना स्पष्ट है—लगभग 60 प्रतिशत भूमि दीवानी व्यवस्था में और लगभग 40 प्रतिशत क्षेत्र जागीर तथा निजाम की निजी संपत्ति संबंधी व्यवस्थाओं में था।

इन श्रेणियों को समझे बिना किसान संघर्ष की सामाजिक संरचना समझ में नहीं आती।

# 4. दीवानी या खालसा भूमि

दीवानी भूमि सीधे राज्य की राजस्व व्यवस्था के अंतर्गत थी।

यह मानना गलत होगा कि यहां किसान इसलिए स्वतंत्र था क्योंकि बीच में जागीरदार नहीं था।

व्यवहार में स्थानीय राजस्व अधिकारी और बड़े ग्रामीण भू-स्वामी अत्यंत शक्तिशाली हो सकते थे।

इसी व्यवस्था में देशमुख और देशपांडे जैसे पुराने राजस्व अधिकारी समय के साथ विशाल भूमि पर नियंत्रण स्थापित करने लगे। IGNOU के अध्ययन में उल्लेख है कि इन अधिकारियों ने हजारों एकड़ भूमि अपने नियंत्रण में लेकर अनेक वास्तविक कृषकों को असुरक्षित किरायेदार बना दिया।

जागीर भूमि निजाम द्वारा कुलीनों, सैन्य अधिकारियों और अन्य समर्थकों को प्रदान की जाती थी।

जागीरदार कई क्षेत्रों में केवल भू-स्वामी नहीं था।

उसके पास राजस्व वसूली,

और कई मामलों में पुलिस तथा न्यायिक अधिकार तक हो सकते थे।

एक अकादमिक अध्ययन जागीर क्षेत्रों को ऐसी सत्ता संरचना के रूप में वर्णित करता है जिसमें जागीरदार और उसके अधिकारी किसानों से अनेक अवैध कर और जबरन श्रम वसूल सकते थे।

इसलिए जागीर कई जगह लगभग—

राज्य के भीतर छोटा राज्य

जैसी ग्रामीण सत्ता बन सकती थी।

सरफ-ए-खास ऐसी भूमि थी जिसकी आय निजाम और शाही परिवार के निजी व्यय से जुड़ी थी।

इन क्षेत्रों में भी किसान पूर्ण स्वतंत्र कृषक नहीं था।

वह भूमि-राजस्व और स्थानीय प्रशासनिक संरचना से बंधा था।

तेलंगाना संघर्ष के लिए इसका महत्व यह था कि भूमि-सत्ता का बड़ा हिस्सा सीधे निजामशाही और उसके संरक्षित अभिजात वर्ग से जुड़ा हुआ था।

इसलिए किसान आंदोलन को जल्दी ही स्थानीय जमींदार-विरोध से आगे राज्य-विरोधी राजनीतिक अर्थ मिलने लगा।

‘देशमुख’ मूलतः राजस्व और प्रशासनिक पद से जुड़ा शब्द था।

लेकिन हैदराबाद में कई देशमुख समय के साथ बड़े भूमि नियंत्रक बन गए।

और ग्रामीण प्रभुत्व—

का उपयोग करके विशाल संपत्तियां जमा कीं।

IGNOU की सामग्री उन्हें ऐसे स्थानीय शक्तिशाली राजस्व अधिकारियों के रूप में प्रस्तुत करती है जिन्होंने बड़ी मात्रा में भूमि अपने अधिकार में कर ली और किसानों को असुरक्षित किरायेदार बनाया।

तेलंगाना आंदोलन में ‘देशमुख’ इसलिए केवल सरकारी पद का नाम नहीं रहा।

वह ग्रामीण सामंती प्रभुत्व का राजनीतिक प्रतीक बन गया।

# 8. ‘दोरा’ : गांव की सत्ता का प्रतीक

तेलंगाना के ग्रामीण समाज में शक्तिशाली भू-स्वामियों और स्थानीय प्रभुओं के लिए ‘दोरा’ शब्द व्यापक रूप से इस्तेमाल होता था।

दोरा का अर्थ केवल जमीन का मालिक नहीं।

राजस्व अधिकारी से संबंध,

और कभी निजी सशस्त्र लोग—

इसलिए तेलंगाना किसान आंदोलन के लोकप्रिय इतिहास में संघर्ष को अक्सर—

के रूप में याद किया गया।

# 9. भूमि का विशाल संकेंद्रण

इस संकेंद्रण का परिणाम था—

भूमिहीन मजदूरों की बड़ी संख्या,

असुरक्षित किरायेदार,

और नागरिक स्वतंत्रता—

अध्याय 19

तेलंगाना सशस्त्र किसान संघर्ष, 1946–51 — डोड्डी कोमारैया की हत्या से गुरिल्ला दलों, ग्राम राज, भूमि-वितरण, रजाकार दमन, ऑपरेशन पोलो और भारतीय सेना के बाद भी जारी संघर्ष तक

तेलंगाना का 1946–51 का सशस्त्र किसान संघर्ष भारतीय किसान राजनीति के इतिहास में एक असाधारण मोड़ था। अखिल भारतीय किसान सभा और उससे जुड़ी कम्युनिस्ट किसान राजनीति ने देश के अनेक हिस्सों में लगान, कर्ज, बेदखली, जमींदारी और बटाई के विरुद्ध संघर्ष किए थे, लेकिन तेलंगाना में किसान आंदोलन ने एक ऐसा रूप ग्रहण किया जिसमें भूमि-संघर्ष, सामंती सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध, गुरिल्ला संगठन, वैकल्पिक ग्राम सत्ता और अंततः राज्य की सैन्य शक्ति से टकराव एक-दूसरे से जुड़ गए।

इस संघर्ष को समझने के लिए एक बुनियादी भेद अत्यंत आवश्यक है। 1946 से सितंबर 1948 तक आंदोलन मुख्यतः निजामशाही, देशमुख-जागीरदार सत्ता, पुलिस और बाद में रजाकारों के विरुद्ध था। लेकिन सितंबर 1948 में भारतीय सेना के ‘ऑपरेशन पोलो’ के बाद हैदराबाद भारतीय संघ के नियंत्रण में आ गया। इसके बाद भी कम्युनिस्ट नेतृत्व ने सशस्त्र संघर्ष जारी रखा और 1948–51 में संघर्ष का लक्ष्य और राजनीतिक संदर्भ बदल गया। अब गुरिल्ला दल भारतीय राज्य की सेना और पुलिस से भी लड़ रहे थे।

इसीलिए तेलंगाना को एक अखंड, अपरिवर्तित ‘1946–51 विद्रोह’ की तरह पढ़ना ऐतिहासिक रूप से अपर्याप्त है।

1. 4 जुलाई 1946 : वह गोली जिसने संघर्ष की दिशा बदल दी

तेलंगाना के सशस्त्र संघर्ष का प्रतीकात्मक आरंभ सामान्यतः 4 जुलाई 1946 से माना जाता है।

नलगोंडा जिले के जनगांव तालुका के कडिवेंडी गांव में विसुनूर के शक्तिशाली देशमुख के विरुद्ध किसानों का संघर्ष चल रहा था। देशमुख के हथियारबंद लोगों ने प्रदर्शनकारी किसानों पर गोली चलाई।

आंध्र महासभा से जुड़े किसान कार्यकर्ता डोड्डी कोमारैया मारे गए।

IGNOU के स्वतंत्रता-पूर्व इतिहास संबंधी अध्ययन के अनुसार 1946 के आरंभ से किसानों और जमींदारों के लोगों के बीच झड़पें हो रही थीं, लेकिन कोमारैया की हत्या ने व्यापक सशस्त्र किसान प्रतिरोध के लिए संकेत का काम किया।

कोमारैया की मृत्यु इसलिए ऐतिहासिक मोड़ बनी क्योंकि उसने गांवों में यह धारणा मजबूत की कि सामूहिक संगठन के साथ आत्मरक्षा की व्यवस्था भी आवश्यक है।

# 2. एक स्थानीय हत्या से व्यापक किसान विद्रोह तक

कोमारैया की हत्या के बाद संघर्ष केवल कडिवेंडी तक सीमित नहीं रहा।

देशमुखों के विरुद्ध पहले से मौजूद—

जैसे प्रश्न अब राजनीतिक रूप से जुड़ने लगे।

नलगोंडा में आंदोलन विशेष रूप से तेजी से फैला।

आंध्र महासभा और कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने गांवों में सभाएं कीं और किसान संगठन मजबूत किए।

इस तरह एक स्थानीय भूमि विवाद ने पूरे क्षेत्र की सामंती कृषि संरचना को चुनौती देना शुरू किया।

# 3. आंदोलन पहले से तैयार जमीन पर खड़ा था

यह मानना गलत होगा कि कोमारैया की हत्या से अचानक तेलंगाना विद्रोह पैदा हो गया।

1940–44 से कम्युनिस्ट और आंध्र महासभा के वाम कार्यकर्ता किसानों को संगठित कर रहे थे। शुरुआत में वे निजाम सरकार के उन आदेशों को लागू कराने की मांग करते थे जो किसानों को कुछ राहत देते थे, लेकिन स्थानीय भू-स्वामी और अधिकारी उनका पालन नहीं करते थे।

1944 के बाद संघर्ष अधिक आक्रामक हुआ।

इसलिए 4 जुलाई 1946 ने पहले से संगठित किसान असंतोष को सशस्त्र दिशा दी।

# 4. पहला चरण : किसान आत्मरक्षा

शुरुआती किसान प्रतिरोध को तत्काल आधुनिक गुरिल्ला युद्ध समझना गलत होगा।

अनेक ग्रामीणों के पास बंदूकें नहीं थीं।

एक महत्वपूर्ण अकादमिक अध्ययन के अनुसार आरंभिक संघर्षों में किसानों ने—

जैसे साधनों तक का इस्तेमाल किया।

इससे आंदोलन का प्रारंभिक चरित्र समझ आता है।

यह पहले ग्रामीण सामूहिक आत्मरक्षा था।

आंध्र महासभा के ‘संगम’ मजबूत होने के साथ गांवों में स्वयंसेवक तैयार किए गए।

जमींदार के हथियारबंद लोगों पर नजर,

किसान नेताओं की सुरक्षा,

भूमि पर किसान कब्जे की रक्षा।

यही स्वयंसेवी संरचना आगे चलकर अधिक संगठित सशस्त्र दलों का आधार बनी।

तेलंगाना संघर्ष में सशस्त्र गुरिल्ला दस्तों के लिए दलम शब्द प्रसिद्ध हुआ।

ये अपेक्षाकृत छोटे, गतिशील सशस्त्र समूह थे।

उनका उद्देश्य बड़ी सेना की तरह आमने-सामने युद्ध करना नहीं था।

हथियार प्राप्त करना,

पुलिस और जमींदारों के सशस्त्र समूहों से बचते हुए कार्रवाई—

1947 के बाद इन दलों का महत्व तेजी से बढ़ा।

# 7. गांव और गुरिल्ला का संबंध

गुरिल्ला केवल जंगल में रहने वाला लड़ाका नहीं था।

उसकी वास्तविक शक्ति गांव था।

इसलिए तेलंगाना गुरिल्ला संघर्ष को केवल सैन्य इतिहास की तरह नहीं पढ़ा जा सकता।

वह संगठित ग्रामीण समाज पर आधारित राजनीतिक युद्ध था।

# 8. निजाम सरकार का दमन

किसान संघर्ष बढ़ने के साथ निजाम सरकार ने कम्युनिस्ट पार्टी और आंध्र महासभा के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की।

उन्हें गैर-कानूनी घोषित किया गया और किसान आंदोलन के खिलाफ सैन्य कार्रवाई बढ़ी।

1946 के उत्तरार्ध और 1947 के आरंभ में गिरफ्तारी, यातना और सैन्य अभियान के कारण आंदोलन को गंभीर झटका लगा। IGNOU के अनुसार 1947 के आरंभ तक ऐसा लगने लगा था कि सरकार ने विद्रोह पर नियंत्रण पा लिया है।

लेकिन यह स्थिति स्थायी नहीं रही।

# 9. 1947 में आंदोलन का पुनरुत्थान

1947 के मध्य में संघर्ष फिर तेजी से बढ़ा।

अब भारत की स्वतंत्रता निकट थी।

लेकिन हैदराबाद का प्रश्न अनसुलझा था।

निजाम भारतीय संघ में विलय के लिए तैयार नहीं था।

इससे किसान संघर्ष को नया राजनीतिक संदर्भ मिला।

अब सामंती-विरोध और निजामशाही-विरोध एक-दूसरे के और निकट आ गए।

# 10. 15 अगस्त 1947 : भारत स्वतंत्र, हैदराबाद अलग

15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश शासन समाप्त हो गया।

लेकिन निजाम उस समय भारतीय संघ में शामिल नहीं हुआ।

इसका अर्थ था कि तेलंगाना के किसान जिस निरंकुश सत्ता से लड़ रहे थे, वह स्वतंत्र भारत के जन्म के बाद भी बनी रही।

कम्युनिस्ट नेतृत्व ने इस परिस्थिति को निजामशाही के विरुद्ध व्यापक जन-संघर्ष बढ़ाने के अवसर के रूप में देखा।

# 11. किसान संघर्ष अब राजनीतिक मुक्ति का आंदोलन

1946 तक मुख्य मांगें थीं—

1947 में इनमें अधिक स्पष्ट राजनीतिक मांग जुड़ गई—

इस तरह कृषि संघर्ष राजनीतिक सत्ता के प्रश्न तक पहुंचा।

# 12. भूमि-वितरण का चरण

15 अगस्त 1947 से सितंबर 1948 के बीच संघर्ष के सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तनों में से एक था—

भूमि पर प्रत्यक्ष किसान कब्जा और पुनर्वितरण।

पी. सुंदरैया के सहभागी विवरण के अनुसार जमींदारों की अतिरिक्त और परती भूमि गरीब किसानों में बांटी गई और कई क्षेत्रों में पशु तथा कृषि उपकरण भी वितरित किए गए।

अब किसान केवल भूमि सुधार की मांग नहीं कर रहा था।

वह भूमि संबंध बदलने का प्रयास स्वयं कर रहा था।

# 13. कितनी भूमि बांटी गई?

यहां स्रोत-सावधानी बहुत आवश्यक है।

कम्युनिस्ट आंदोलन के सबसे प्रसिद्ध दावे के अनुसार लगभग दस लाख एकड़ भूमि गरीब किसानों में बांटी गई। सुंदरैया भी लगभग दस लाख एकड़ का दावा करते हैं।

लेकिन स्वतंत्र अकादमिक अध्ययन बताता है कि इस आंकड़े पर बड़ा विवाद है। कम्युनिस्ट स्रोत दस लाख एकड़ से अधिक बताते हैं, जबकि कुछ सरकारी स्रोत केवल लगभग 12,600 एकड़ भूमि के वास्तविक हस्तांतरण का दावा करते थे।

इसलिए वेबसाइट पर सबसे सुरक्षित प्रस्तुति होगी—

कम्युनिस्ट नेतृत्व ने लगभग दस लाख एकड़ भूमि के पुनर्वितरण का दावा किया, लेकिन सरकारी आंकड़े इससे बहुत कम थे; वास्तविक मात्रा इतिहासलेखन में विवादित है।

# 14. संख्या में इतना बड़ा अंतर क्यों?

‘भूमि वितरण’ की परिभाषा सभी स्रोतों में समान नहीं थी।

क्या इसमें शामिल हो—

अध्याय 20

अखिल भारतीय किसान सभा और द्वितीय विश्वयुद्ध, 1939–45

युद्ध पर कांग्रेस, कम्युनिस्ट और किसान सभा की बदलती नीतियां; 1941 में सोवियत संघ पर जर्मन आक्रमण के बाद ‘जनयुद्ध’ की लाइन, भारत छोड़ो आंदोलन और किसान सभा के भीतर वैचारिक विभाजन

अखिल भारतीय किसान सभा के इतिहास में 1939 से 1945 का दौर सबसे जटिल वैचारिक और संगठनात्मक कालखंडों में से एक था। 1936 में जिस किसान सभा ने जमींदारी उन्मूलन, कर्ज-मुक्ति, लगान में कमी और काश्तकारी अधिकारों के आधार पर तेजी से किसानों को संगठित किया था, द्वितीय विश्वयुद्ध ने उसके सामने ऐसा प्रश्न खड़ा कर दिया जिसका सीधा संबंध खेती से नहीं, बल्कि विश्व राजनीति और भारतीय स्वतंत्रता की रणनीति से था।

सितंबर 1939 में युद्ध शुरू हुआ तो किसान सभा की प्रमुख धाराओं के लिए यह ब्रिटिश साम्राज्यवाद का युद्ध था। लेकिन 22 जून 1941 को नाजी जर्मनी द्वारा सोवियत संघ पर आक्रमण के बाद भारतीय कम्युनिस्टों का आकलन बदलने लगा। दिसंबर 1941 तक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने युद्ध को फासीवाद-विरोधी ‘जनयुद्ध’ के रूप में देखने की नीति अपना ली। किसान सभा में कम्युनिस्ट प्रभाव मजबूत होने के कारण यह परिवर्तन उसके भीतर भी पहुंचा।

इसके परिणाम दूरगामी थे। 1942 में जब कांग्रेस ने ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन शुरू किया, कम्युनिस्ट नेतृत्व उस आंदोलन में शामिल नहीं हुआ। किसान सभा की आधिकारिक दिशा भी उससे अलग रही। लेकिन किसान सभा के अनेक स्थानीय कार्यकर्ता और किसान कांग्रेस के विद्रोह से अलग नहीं रहे। इसी विरोधाभास ने उस व्यापक किसान गठबंधन को तोड़ दिया जिसमें कम्युनिस्ट, समाजवादी, कांग्रेस-समर्थक राष्ट्रवादी और स्वतंत्र किसान नेता 1930 के दशक में साथ आए थे।

युद्ध ने इस प्रकार किसान सभा को केवल राजनीतिक परीक्षा में नहीं डाला—उसने उसकी वैचारिक संरचना ही बदल दी।

1. सितंबर 1939 : विश्वयुद्ध और भारतीय राजनीति

1 सितंबर 1939 को जर्मनी ने पोलैंड पर आक्रमण किया। 3 सितंबर को ब्रिटेन और फ्रांस ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।

भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने भारतीय राजनीतिक नेतृत्व की सहमति लिए बिना भारत को भी युद्धरत घोषित कर दिया।

यहीं भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का मूल प्रश्न खड़ा हुआ—

जिस भारत को स्वयं स्वतंत्रता नहीं मिली है, क्या ब्रिटेन उसे लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर युद्ध में झोंक सकता है?

कांग्रेस ने इसका विरोध किया।

कम्युनिस्टों ने भी प्रारंभ में युद्ध को साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच संघर्ष माना।

किसान सभा की दिशा भी युद्ध-विरोधी रही।

2. किसान के लिए युद्ध का अर्थ

यूरोप का युद्ध भारतीय किसान से हजारों किलोमीटर दूर था, लेकिन उसके आर्थिक परिणाम गांव तक पहुंचे।

युद्धकालीन अर्थव्यवस्था ने—

आवश्यक वस्तुओं की कमी,

जैसी समस्याएं पैदा कीं।

इसलिए किसान सभा के लिए युद्ध केवल विदेश नीति का प्रश्न नहीं था।

युद्ध की आर्थिक कीमत कौन चुकाएगा?

3. कांग्रेस मंत्रिमंडलों का इस्तीफा

1937 के चुनावों के बाद कई प्रांतों में कांग्रेस सरकारें बनी थीं।

युद्ध और संवैधानिक प्रश्न पर ब्रिटिश सरकार से समझौता न होने के कारण अक्टूबर–नवंबर 1939 में कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने इस्तीफा दे दिया।

इससे राजनीतिक परिस्थिति बदल गई।

1937–39 में किसान सभा और कांग्रेस सरकारों के बीच भूमि, लगान, बेदखली तथा जमींदारी सुधारों को लेकर जो तनाव था, अब वह ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध व्यापक संघर्ष की संभावना से जुड़ गया।

# 4. युद्ध के प्रारंभ में किसान सभा : स्पष्ट साम्राज्यवाद-विरोध

1939–40 में किसान सभा की प्रमुख धाराओं में यह धारणा प्रभावी थी कि युद्ध ब्रिटिश साम्राज्यवाद का युद्ध है।

भारत को इसमें सहयोग नहीं करना चाहिए।

बल्कि ब्रिटेन की युद्धकालीन कमजोरी का उपयोग भारतीय स्वतंत्रता के संघर्ष को तेज करने के लिए किया जाना चाहिए।

यही दिशा किसान सभा के 1940 के पलासा सम्मेलन में बहुत स्पष्ट दिखाई देती है।

# 5. पलासा सम्मेलन, 1940

अखिल भारतीय किसान सभा का पांचवां सम्मेलन पलासा में 1940 में आयोजित हुआ।

उस समय किसान सभा की राजनीतिक दिशा अधिक उग्र साम्राज्यवाद-विरोधी थी।

1942 के बिहटा सम्मेलन में इंदुलाल याज्ञिक ने पीछे मुड़कर स्वीकार किया कि पलासा के समय किसान सभा युद्ध को बड़ी साम्राज्यवादी शक्तियों के संघर्ष के रूप में देख रही थी और उसने राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष पर ध्यान केंद्रित किया था।

यह महत्वपूर्ण प्रमाण है, क्योंकि यह किसान सभा के अपने सम्मेलन दस्तावेज से मिलता है।

# 6. ‘न समझौता’ की राजनीति

युद्ध के शुरुआती दौर में किसान सभा के उग्र नेतृत्व की धारणा थी कि ब्रिटिश साम्राज्य की कमजोरी भारत के लिए राजनीतिक अवसर है।

इसलिए समझौते के बजाय—

साम्राज्यवाद-विरोधी लामबंदी—

को बढ़ाया जाना चाहिए।

स्वामी सहजानंद सरस्वती इस उग्र राष्ट्रवादी-किसान दिशा के प्रमुख नेताओं में थे।

# 7. स्वामी सहजानंद की स्थिति

सहजानंद का राजनीतिक विकास केवल भूमि प्रश्न तक सीमित नहीं रहा था।

1930 के दशक के उत्तरार्ध तक वे कांग्रेस नेतृत्व की समझौतावादी प्रवृत्तियों से अत्यंत असंतुष्ट हो चुके थे।

उनके लिए किसान मुक्ति और राष्ट्रीय मुक्ति अलग प्रश्न नहीं थे।

इसलिए युद्धकाल में उनका आग्रह था कि ब्रिटेन की कठिनाई भारत की स्वतंत्रता प्राप्त करने का अवसर है।

यह दृष्टि आगे कम्युनिस्ट ‘जनयुद्ध’ नीति से टकराने वाली थी।

युद्ध शुरू होने के बाद औपनिवेशिक सरकार ने वामपंथी और किसान नेताओं पर कार्रवाई तेज की।

रक्षा-भारत नियमों तथा अन्य युद्धकालीन प्रावधानों का इस्तेमाल किया गया।

किसान सभा के अपने बाद के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार 1939–40 में प्रमुख किसान कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और पुलिस दमन ने संगठन के सामान्य कामकाज को गंभीर रूप से प्रभावित किया।

इस समय कम्युनिस्ट स्वयं भी औपनिवेशिक दमन के निशाने पर थे।

# 9. इसलिए एक महत्वपूर्ण भ्रम से बचना चाहिए

1942 की कम्युनिस्ट नीति देखकर 1939–41 को भी उसी दृष्टि से नहीं पढ़ा जाना चाहिए।

1939–41 में CPI ब्रिटिश युद्ध प्रयास की समर्थक नहीं थी।

वह युद्ध को साम्राज्यवादी मानती थी।

उसके कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया।

उसका संगठन प्रतिबंधित था।

इसलिए कम्युनिस्ट नीति में 1941–42 में वास्तविक और महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ था।

# 10. 22 जून 1941 : विश्व राजनीति बदल गई

22 जून 1941 को हिटलर ने सोवियत संघ पर आक्रमण कर दिया।

ऑपरेशन बारबारोसा ने विश्वयुद्ध की राजनीतिक संरचना बदल दी।

अब ब्रिटेन और सोवियत संघ एक ही सैन्य गठबंधन में थे।

कम्युनिस्ट आंदोलन के सामने असाधारण वैचारिक प्रश्न खड़ा हुआ।

जिस ब्रिटेन को वह साम्राज्यवादी शत्रु कह रहा था, वही अब सोवियत संघ के साथ हिटलर से लड़ रहा था।

# 11. कम्युनिस्टों का प्रश्न

भारतीय कम्युनिस्टों के सामने दो लक्ष्य थे—

और फासीवाद की पराजय।

यदि ब्रिटिश युद्ध प्रयास को कमजोर किया जाए तो क्या उससे हिटलर को लाभ होगा?

यदि ब्रिटेन का समर्थन किया जाए तो क्या भारतीय साम्राज्यवाद-विरोध कमजोर होगा?

इसी विरोधाभास से ‘जनयुद्ध’ की नीति निकली।

# 12. साम्राज्यवादी युद्ध से ‘जनयुद्ध’ तक

दिसंबर 1941 तक CPI ने युद्ध के बारे में अपनी नीति बदल दी।

हिटलर का फासीवाद मानवता, लोकतंत्र और सोवियत समाजवाद के लिए मुख्य खतरा है।

इसलिए धुरी शक्तियों—

युद्ध अब केवल साम्राज्यवादी शक्तियों के बाजार और उपनिवेशों की लड़ाई नहीं रहा।

यह फासीवाद-विरोधी People's War—‘जनयुद्ध’ भी है।

# 13. लेकिन क्या इसका अर्थ ब्रिटिश शासन का समर्थन था?

यह प्रश्न महत्वपूर्ण है।

कम्युनिस्ट आधिकारिक तर्क यह नहीं था कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद अब अच्छा हो गया है।

फासीवाद तत्काल बड़ा खतरा है।

भारत को स्वतंत्र किया जाए।

राष्ट्रीय सरकार बने।

और स्वतंत्र भारतीय जनता फासीवाद के विरुद्ध युद्ध करे।

यानी आदर्श सूत्र था—

राष्ट्रीय स्वतंत्रता + राष्ट्रीय सरकार + फासीवाद-विरोधी युद्ध।

यहीं विभाजन स्पष्ट होने लगा।

अध्याय 21

अखिल भारतीय किसान सभा और भारत छोड़ो आंदोलन, 1942

केंद्रीय नेतृत्व की दूरी बनाम स्थानीय किसान भागीदारी, कम्युनिस्ट ‘जनयुद्ध’ नीति, समाजवादी–राष्ट्रवादी विरोध, संगठनात्मक टूट और किसान सभा की राष्ट्रीय छवि पर प्रभाव

1942 का भारत छोड़ो आंदोलन अखिल भारतीय किसान सभा के इतिहास में सबसे कठिन और विवादास्पद राजनीतिक मोड़ों में से एक था। इससे पहले किसान सभा ब्रिटिश साम्राज्यवाद-विरोध, जमींदारी-विरोध, कर्ज-मुक्ति, लगान में कमी, बेदखली पर रोक और किसान अधिकारों की मांगों के साथ राष्ट्रीय आंदोलन की एक सक्रिय शक्ति के रूप में विकसित हो चुकी थी। 1936 में उसके गठन के समय कांग्रेस समाजवादी, कम्युनिस्ट, उग्र राष्ट्रवादी और स्वतंत्र किसान नेता एक ही मंच पर काम कर रहे थे। लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध, सोवियत संघ पर नाजी जर्मनी के आक्रमण और फिर कम्युनिस्ट पार्टी की ‘जनयुद्ध’ नीति ने इस साझा मंच को गहरे संकट में डाल दिया।

भारत छोड़ो आंदोलन ने उस संकट को निर्णायक बना दिया।

8 अगस्त 1942 को कांग्रेस ने ब्रिटिश शासन की तत्काल समाप्ति की मांग की और गांधी ने ‘करो या मरो’ का आह्वान किया। अगले ही दिन कांग्रेस के लगभग पूरे केंद्रीय नेतृत्व को गिरफ्तार कर लिया गया। देश के अनेक हिस्सों में आंदोलन स्वतःस्फूर्त विद्रोह में बदल गया। ग्रामीण भारत, विशेष रूप से बिहार, संयुक्त प्रांत, बंगाल, महाराष्ट्र और उड़ीसा के कई क्षेत्रों में किसानों ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रेल और तार व्यवस्था पर हमले हुए, पुलिस थानों और सरकारी कार्यालयों को निशाना बनाया गया और कुछ क्षेत्रों में समानांतर सत्ता संरचनाएं तक उभरीं। मिदनापुर जैसे क्षेत्रों पर आधुनिक शोध भी दिखाता है कि 1942 का आंदोलन केवल शहरी राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि स्थानीय सामाजिक और ग्रामीण लामबंदी का विशाल विस्फोट था।

इसी समय अखिल भारतीय किसान सभा का केंद्रीय नेतृत्व एक अलग राजनीतिक दिशा पर था।

फरवरी 1942 तक किसान सभा की केंद्रीय नीति स्पष्ट रूप से फासीवाद-विरोधी ‘जनयुद्ध’, राष्ट्रीय सरकार और राष्ट्रीय रक्षा की दिशा में जा चुकी थी। उसके 1943–44 के संगठनात्मक दस्तावेज बताते हैं कि उसने कांग्रेस नेताओं की रिहाई की मांग की, लेकिन साथ ही तोड़फोड़ रोकने और युद्धकालीन खाद्य संकट से निपटने के लिए किसान संगठन को सक्रिय करने का आह्वान किया।

यहीं विरोधाभास पैदा हुआ—

किसान सभा का केंद्रीय नेतृत्व भारत छोड़ो आंदोलन से अलग था, लेकिन किसान सभा से जुड़े अनेक स्थानीय किसान और कार्यकर्ता स्वयं उस विद्रोह से अलग नहीं रहे।

इसलिए 1942 में AIKS की भूमिका को केवल “भारत छोड़ो का विरोध” अथवा “भारत छोड़ो में भागीदारी”—किसी एक वाक्य में नहीं समेटा जा सकता। सही इतिहास इन दोनों स्तरों को अलग-अलग पढ़ता है।

1. अगस्त 1942 से पहले किसान सभा कहां खड़ी थी?

भारत छोड़ो आंदोलन को समझने के लिए फरवरी–मई 1942 के किसान सभा निर्णयों को याद करना आवश्यक है।

सोवियत संघ पर जर्मन आक्रमण के बाद कम्युनिस्ट नेतृत्व का युद्ध संबंधी दृष्टिकोण बदल चुका था। अब फासीवाद की पराजय को अंतरराष्ट्रीय श्रमिक और किसान आंदोलन के लिए आवश्यक माना जा रहा था।

लेकिन AIKS का औपचारिक तर्क यह नहीं था कि भारत बिना शर्त ब्रिटिश सरकार का समर्थन करे।

राष्ट्रीय सरकार बने,

भारतीय जनता को वास्तविक सत्ता मिले,

और उसी आधार पर फासीवाद-विरोधी युद्ध को भारतीय जनता का ‘जनयुद्ध’ बनाया जाए।

किसान सभा के 1944 के आधिकारिक विवरण में फरवरी 1942 की नीति स्पष्ट रूप से इसी रूप में दर्ज है—भारत में युद्ध तभी वास्तविक जनयुद्ध बन सकता है जब राष्ट्रीय सरकार और जनता की स्वैच्छिक भागीदारी हो।

2. फरवरी 1942 : नागपुर प्रस्ताव

13 फरवरी 1942 को नागपुर में अखिल भारतीय किसान सभा ने फासीवाद के विरुद्ध मित्र शक्तियों के संघर्ष का समर्थन करने वाला प्रस्ताव स्वीकार किया।

जवाहरलाल नेहरू के समकालीन लेखन में इसका उल्लेख मिलता है। वे बताते हैं कि किसान सभा ने किसानों से मित्र राष्ट्रों के पक्ष में फासीवाद के विनाश के संघर्ष में खड़े होने की अपील की, जबकि संयुक्त प्रांत के कुछ कांग्रेस सदस्यों ने इस नीति का विरोध किया।

यही वह क्षण था जब किसान सभा के भीतर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्राथमिकताओं का विवाद खुला।

3. बिहटा सम्मेलन, मई 1942

मई 1942 का बिहटा सम्मेलन इस वैचारिक परिवर्तन का दूसरा महत्वपूर्ण चरण था।

किसान सभा ने वहां तीन सूत्रों पर जोर दिया—

राष्ट्रीय एकता। राष्ट्रीय सरकार। राष्ट्रीय रक्षा।

AIKS के बाद के आधिकारिक इतिहास में बिहटा सम्मेलन को युद्धकालीन जटिल परिस्थिति के बीच इसी सकारात्मक कार्यक्रम से जोड़ा गया है।

यानी अगस्त 1942 से कुछ महीने पहले ही किसान सभा का केंद्रीय नेतृत्व स्पष्ट कर चुका था कि उसकी तत्काल रणनीति ब्रिटिश शासन के विरुद्ध पूर्ण विद्रोह की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सरकार के माध्यम से फासीवाद-विरोधी राष्ट्रीय रक्षा की थी।

# 4. कांग्रेस की दिशा बिल्कुल अलग क्यों हुई?

क्रिप्स मिशन की विफलता ने कांग्रेस नेतृत्व के भीतर यह धारणा मजबूत कर दी कि ब्रिटिश सरकार युद्ध के बाद भी वास्तविक सत्ता हस्तांतरण की स्पष्ट गारंटी नहीं देना चाहती।

गांधी का निष्कर्ष था—

भारत में ब्रिटिश उपस्थिति ही जापानी आक्रमण को आकर्षित कर रही है।

ब्रिटिश भारत छोड़ें।

भारत अपने भविष्य का निर्णय स्वयं करे।

इसी पृष्ठभूमि में जुलाई 1942 में कांग्रेस कार्यसमिति और अगस्त में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने भारत छोड़ो प्रस्ताव स्वीकार किया।

8 अगस्त 1942 को बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में गांधी का प्रसिद्ध आह्वान था—

लेकिन इस आंदोलन का स्वभाव पिछले राष्ट्रीय आंदोलनों से अलग होने वाला था।

अगली सुबह ही शीर्ष नेतृत्व गिरफ्तार कर लिया गया।

इसलिए केंद्र से नियंत्रित अनुशासित सत्याग्रह का मॉडल टूट गया।

स्थानीय जनता को स्वयं निर्णय लेना पड़ा कि संघर्ष कैसे चलेगा।

इसीलिए 1942 का आंदोलन अनेक स्थानों पर अपेक्षा से अधिक उग्र हुआ। आधुनिक अध्ययन मिदनापुर जैसे क्षेत्रों में इसे स्थानीय लामबंदी और लगभग विद्रोही प्रतिरोध के रूप में देखते हैं।

# 6. ग्रामीण भारत क्यों विस्फोटित हुआ?

किसान पहले ही युद्धकालीन आर्थिक संकट से परेशान था।

कपड़े और आवश्यक वस्तुओं की कमी।

स्थानीय प्रशासन का दबाव।

और वर्षों से लंबित कृषि शिकायतें।

इसलिए कांग्रेस नेताओं की गिरफ्तारी ने उस असंतोष को एक राष्ट्रीय राजनीतिक दिशा दे दी।

# 7. किसान सभा के अपने इतिहास में भी 1942 का ग्रामीण विस्फोट स्वीकार

यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य है।

AIKS का बाद का आधिकारिक इतिहास स्वयं स्वीकार करता है कि कांग्रेस द्वारा शुरू किए गए 1942 के संघर्ष के दौरान किसानों में जमा विस्फोटक असंतोष बहुत बड़े रूप में सामने आया।

उसका आलोचनात्मक निष्कर्ष यह था कि यह असंतोष कृषि क्रांति के स्पष्ट कार्यक्रम से नहीं जुड़ सका।

यह वक्तव्य महत्वपूर्ण है।

किसान सभा की कम्युनिस्ट स्मृति भारत छोड़ो के ग्रामीण चरित्र को नकारती नहीं।

वह उसकी दिशा की आलोचना करती है।

# 8. किसान सभा का केंद्रीय नेतृत्व क्या कह रहा था?

1942 के बाद AIKS की केंद्रीय लाइन के मुख्य तत्व थे—

कांग्रेस नेताओं को रिहा करो।

राष्ट्रीय सरकार बनाओ।

फासीवाद को पराजित करो।

खाद्य संकट से निपटो।

कांग्रेस और मुस्लिम लीग की एकता बनाओ।

AIKS के आठवें सम्मेलन के रिपोर्ट दस्तावेज में इन बातों को स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया है।

# 9. ‘तोड़फोड़ रोको’ इतना विवादास्पद क्यों था?

भारत छोड़ो आंदोलन में कई स्थानों पर—

पुलिस स्टेशन और सरकारी कार्यालयों पर हमले हुए,

संचार व्यवस्था बाधित की गई।

कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व जेल में था, इसलिए इन कार्रवाइयों को नियंत्रित करना संभव नहीं था।

कम्युनिस्ट और किसान सभा नेतृत्व का तर्क था—

इसलिए उसका विरोध किया जाना चाहिए।

अध्याय 22

युद्धोत्तर किसान सभा, 1945–47

विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद संगठन का पुनरुत्थान, सदस्यता विस्तार, जमींदारी उन्मूलन की तीव्र मांग, नौसेना विद्रोह और मजदूर–किसान एकता, तेभागा–तेलंगाना के साथ स्वतंत्रता और विभाजन की दहलीज पर AIKS

द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति और भारतीय स्वतंत्रता के बीच के लगभग दो वर्ष—1945 से अगस्त 1947—अखिल भारतीय किसान सभा के इतिहास में असाधारण राजनीतिक उभार का काल थे। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उसकी केंद्रीय कम्युनिस्ट-प्रभावित नीति ने उसे कांग्रेस और राष्ट्रवादी वाम की कई धाराओं से दूर कर दिया था। संगठन के भीतर विभाजन हुआ, स्वामी सहजानंद सरस्वती, एन. जी. रंगा और दूसरे गैर-कम्युनिस्ट किसान नेताओं से संबंध कमजोर पड़े, और उसकी राष्ट्रीय छवि विवादों में घिर गई।

लेकिन युद्ध समाप्त होने तक दूसरी प्रक्रिया भी चल चुकी थी।

AIKS ने बंगाल, आंध्र, पंजाब, बिहार और अन्य क्षेत्रों में संगठन का विस्तार किया था। 1944 में उसकी दर्ज सदस्यता 5,53,427 थी; 1943 में यह 2,85,550 थी। यानी एक वर्ष में सदस्यता लगभग दोगुनी हुई। बंगाल में सदस्यता 83,160 से बढ़कर 1,77,629, आंध्र में 55,560 से 1,01,502, पंजाब में 56,004 से 1,00,608 और बिहार में 27,168 से 69,309 हो गई थी। ये AIKS के अपने समकालीन संगठनात्मक आंकड़े हैं।

1945 के नेत्रकोना सम्मेलन तक संगठन ने और बड़ी वृद्धि का दावा किया। नौवें अखिल भारतीय सम्मेलन में 16 प्रांतों के 8,29,686 सदस्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले 642 प्रतिनिधियों के भाग लेने का संगठनात्मक विवरण मिलता है। मुजफ्फर अहमद अध्यक्ष और बंकिम मुखर्जी महासचिव चुने गए।

इसलिए 1945 की किसान सभा को केवल 1942 में राष्ट्रीय आंदोलन से अलग हुई कमजोर संस्था के रूप में देखना गलत होगा।

वह राजनीतिक रूप से विवादित थी, लेकिन संगठनात्मक रूप से पहले से बड़ी थी।

और युद्ध समाप्त होते ही उसके सामने फिर वही केंद्रीय प्रश्न लौट आया जिस पर उसका जन्म हुआ था—

युद्धकालीन ‘जनयुद्ध’ की बहस पीछे हटने लगी।

भूमि वास्तविक कृषक को,

और ग्रामीण वर्ग-सत्ता—

फिर किसान राजनीति के केंद्र में आ गए।

यही परिस्थिति 1946–47 में बंगाल के तेभागा और हैदराबाद के तेलंगाना संघर्ष को जन्म देने वाली थी।

1. 1945 : युद्ध का अंत, लेकिन गांव का संकट जारी

मई 1945 में नाजी जर्मनी पराजित हुआ और अगस्त में जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया।

द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हो गया।

इससे कम्युनिस्ट ‘जनयुद्ध’ नीति का तत्काल अंतरराष्ट्रीय संदर्भ भी समाप्त हुआ।

लेकिन भारतीय किसान की समस्याएं समाप्त नहीं हुई थीं।

युद्ध ने पीछे छोड़ा था—

कपड़े और आवश्यक वस्तुओं की कमी,

और ग्रामीण संपत्ति का बढ़ता असमान वितरण।

बंगाल 1943 के अकाल से अभी उबर नहीं पाया था।

कई क्षेत्रों में गरीब किसानों ने युद्धकाल में भूमि खोई थी।

इसलिए युद्ध की समाप्ति ने शांति नहीं, बल्कि दबी हुई ग्रामीण मांगों के विस्फोट का अवसर पैदा किया।

# 2. राजनीतिक वातावरण भी बदल चुका था

भारत छोड़ो आंदोलन के प्रमुख कांग्रेस नेता जेलों से निकलने लगे।

INA मुकदमों ने जनभावना को भड़का दिया।

ब्रिटिश शासन की वैधता तेजी से गिर रही थी।

मजदूर हड़तालें बढ़ीं।

फरवरी 1946 में नौसेना विद्रोह हुआ।

इसी वर्ष तेभागा और तेलंगाना जैसे किसान संघर्ष उभरे।

अर्थात 1945–46 केवल संवैधानिक बातचीत का समय नहीं था।

नीचे समाज में एक साथ—

सैनिक, मजदूर, किसान और छात्र असंतोष

# 3. AIKS के लिए अवसर

युद्धकाल में संगठन के पास गांवों में जो नेटवर्क बना था, वह अब खुली कृषि राजनीति में लगाया जा सकता था।

AIKS की राजनीतिक दिशा फिर अधिक प्रत्यक्ष रूप से केंद्रित हुई—

बाद के AIKS इतिहास में स्वयं युद्धोत्तर काल को तेभागा, तेलंगाना, वारली, उत्तर मालाबार, त्रिपुरा, बिहार बकाश्त और दूसरे बड़े किसान संघर्षों का काल बताया गया है।

# 4. 1945 का नेत्रकोना सम्मेलन

AIKS का नौवां सम्मेलन अप्रैल 1945 में बंगाल के मयमनसिंह जिले के नेत्रकोना में आयोजित हुआ—यह स्थान अब बांग्लादेश में है।

संगठनात्मक विवरण के अनुसार सम्मेलन में—

105 अखिल भारतीय किसान परिषद सदस्य,

और बंगाल के बाहर से 68 आगंतुक—

वे 16 प्रांतों में दर्ज 8,29,686 सदस्यों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।

यह संख्या युद्ध के अंतिम वर्ष तक किसान सभा के विस्तार की महत्वपूर्ण सूचक है।

# 5. सदस्यता के आंकड़ों को कैसे पढ़ें?

8.29 लाख का आंकड़ा AIKS का अपना संगठनात्मक दावा है।

ऐसे आंकड़े हमेशा सावधानी से पढ़ने चाहिए।

वार्षिक शुल्क देने वाला सदस्य,

सक्रिय गांव कार्यकर्ता,

सभा में कभी भाग लेने वाला समर्थक—

तीनों समान नहीं होते।

इसलिए सदस्यता संख्या को सक्रिय कैडर संख्या नहीं माना जा सकता।

फिर भी 1943 के 2.85 लाख और 1944 के 5.53 लाख से 1945 के 8 लाख से अधिक प्रतिनिधित्व तक की दिशा संगठन के तेजी से फैलाव की पुष्टि करती है।

# 6. विस्तार कहां सबसे अधिक था?

1944 के प्रांतीय आंकड़ों में सबसे बड़ी सदस्यता थी—

इन चार क्षेत्रों की आगे की राजनीति को देखें तो संबंध स्पष्ट दिखाई देता है।

किरायेदारी और नहर/किसान संघर्ष।

बकाश्त और जमींदारी-विरोध।

यानी संगठनात्मक विस्तार और आंदोलनकारी क्षेत्रों के बीच मजबूत संबंध था।

# 7. नेत्रकोना का राजनीतिक अर्थ

यह केवल सदस्यता सम्मेलन नहीं था।

उसने एक तथ्य स्पष्ट किया—

1942 के विवाद के बावजूद AIKS समाप्त नहीं हुई।

वह अब अधिक स्पष्ट कम्युनिस्ट प्रभाव वाला संगठन थी।

इससे उसे नुकसान भी हुआ था—

पुराने व्यापक किसान नेतृत्व का एक हिस्सा उससे दूर हो गया था।

लेकिन इसका दूसरा परिणाम यह था कि उसका कार्यक्रम अधिक स्पष्ट वर्गीय रूप ले रहा था।

# 8. सहजानंद और नेत्रकोना विवाद

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि AIKS के पुराने नेतृत्व में सम्मेलन की वैधता और कम्युनिस्ट प्रभुत्व को लेकर गंभीर विवाद था।

बिहार किसान राजनीति पर उपलब्ध अध्ययन में उल्लेख है कि बिहार प्रांतीय किसान सभा के एक हिस्से ने नेत्रकोना सम्मेलन में भाग लेने से इनकार किया और उसे कम्युनिस्ट प्रभुत्व वाला माना। सम्मेलन नेतृत्व ने इसका प्रतिवाद किया और कहा कि अधिकांश प्रांतीय किसान सभाओं में कम्युनिस्ट बहुमत होने के बावजूद AIKS केवल कम्युनिस्ट पार्टी का संगठन नहीं है।

यह विवाद युद्धोत्तर पुनरुत्थान की सीमा भी दिखाता है।

लेकिन उसकी पुरानी एकता टूट चुकी थी।

# 9. वैकल्पिक किसान संगठन की कोशिश

इसी पृष्ठभूमि में गैर-कम्युनिस्ट किसान नेताओं ने अलग किसान संगठन बनाने के प्रयास किए।

उपलब्ध अध्ययन में जुलाई 1945 में बंबई में हिंद किसान सभा के गठन और पुरुषोत्तम दास टंडन, सहजानंद, रंगा तथा याज्ञिक से उसके संबंध का उल्लेख मिलता है।

इससे स्पष्ट है कि युद्धोत्तर भारत में ‘किसान सभा’ अब एक ही संगठनात्मक परंपरा नहीं रह गई थी।

किसान राजनीति का विखंडन शुरू हो चुका था।

# 10. फिर भी मुख्य AIKS क्यों बढ़ी?

क्योंकि उसके पास ऐसे क्षेत्रों में मजबूत कैडर था जहां किसान की तत्काल समस्या तीखी थी।

किसान के लिए सवाल यह नहीं था—

दिल्ली में कौन-सा संगठन वैधानिक उत्तराधिकारी है?

मेरी जमीन कौन बचाएगा?

मेरा हिस्सा कौन बढ़ाएगा?

जमींदार के खिलाफ कौन खड़ा होगा?

जहां AIKS इस प्रश्न का उत्तर दे रही थी, वहां उसका प्रभाव बना रहा या बढ़ा।

# 11. जमींदारी उन्मूलन : फिर केंद्रीय नारा

AIKS के मूल 1936 कार्यक्रम में जमींदारी उन्मूलन और भूमि वास्तविक कृषक को देने की मांग पहले से थी।

1945–47 में यही पुराना नारा नए ऐतिहासिक अर्थ के साथ लौटता है।

अब स्वतंत्रता सामने थी।

अंग्रेज जाएगा, लेकिन जमींदार का क्या होगा?

# 12. स्वतंत्रता का सामाजिक अर्थ

बर्गादार का उपज पर अधिकार।

अध्याय 23

स्वतंत्रता और विभाजन के बाद अखिल भारतीय किसान सभा, 1947–51

जमींदारी उन्मूलन की नई राजनीति, स्वतंत्र भारतीय राज्य के प्रति रुख, तेलंगाना संघर्ष का दूसरा चरण, कम्युनिस्ट पार्टी की क्रांतिकारी लाइन और संसदीय किसान राजनीति की ओर संक्रमण

15 अगस्त 1947 ने अखिल भारतीय किसान सभा के सामने ऐसा प्रश्न खड़ा किया जो उसके 1936 में गठन के समय मौजूद ही नहीं था। तब उसका राजनीतिक संसार अपेक्षाकृत स्पष्ट था—ऊपर ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता, गांव में जमींदार और भू-स्वामी वर्ग, और इनके बीच भूमि, लगान, कर्ज, बेदखली तथा काश्तकारी अधिकारों के लिए संघर्ष करता किसान। स्वतंत्रता के बाद इस समीकरण का पहला हिस्सा बदल गया। ब्रिटिश शासन समाप्त हुआ और दिल्ली में भारतीय नेतृत्व की सरकार बनी।

लेकिन गांव नहीं बदला था।

जमींदारी समाप्त नहीं हुई थी। भूमिहीनता बनी हुई थी। बटाईदारों और काश्तकारों की असुरक्षा बनी थी। तेलंगाना में देशमुख और जागीरदार थे। बिहार में बकाश्त और किरायेदारी के पुराने विवाद थे। बंगाल में तेभागा की मांग पूरी तरह लागू नहीं हुई थी। कृषि मजदूर की मजदूरी और सामाजिक स्थिति में बुनियादी परिवर्तन नहीं आया था।

इसलिए स्वतंत्रता के बाद AIKS के सामने मूल प्रश्न था—

क्या अब भारतीय राज्य किसान आंदोलन का सहयोगी है, या किसान को उसी राज्य के विरुद्ध भी संघर्ष करना पड़ेगा?

1947 से 1951 के बीच इसका उत्तर लगातार बदलता रहा।

इन चार वर्षों में भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन ने पी. सी. जोशी की अपेक्षाकृत सहयोगी लोकतांत्रिक रणनीति से बी. टी. रणदिवे की क्रांतिकारी लाइन, वहां से फिर उसकी समीक्षा और अंततः 1951 के कार्यक्रम तथा संसदीय राजनीति की ओर संक्रमण किया। किसान सभा इस पूरे वैचारिक उतार-चढ़ाव से सीधे प्रभावित हुई।

और इन बहसों की सबसे बड़ी प्रयोगशाला थी—

1946 में निजाम और सामंती भू-स्वामियों के विरुद्ध शुरू हुआ किसान संघर्ष 1948 में हैदराबाद के भारतीय संघ में विलय के बाद समाप्त नहीं हुआ। अब संघर्ष का स्वरूप बदल गया। जिस भारतीय सेना के आगमन ने निजाम और रजाकार सत्ता समाप्त की, उसी नई राजनीतिक परिस्थिति में कम्युनिस्ट गुरिल्ला आंदोलन भारतीय राज्य की सैन्य और पुलिस शक्ति से टकराने लगा। पी. सुंदरैया के विवरण में भी सितंबर 1948 के भारतीय सैन्य हस्तक्षेप के बाद तीन वर्ष तक किसान गुरिल्ला प्रतिरोध जारी रहने की बात स्पष्ट रूप से आती है।

अक्टूबर 1951 में तेलंगाना संघर्ष वापस लिया गया।

और उसी मोड़ पर कम्युनिस्ट किसान राजनीति ने हथियारबंद क्रांति की तत्काल रणनीति से चुनाव, विधानसभा, संसद और वैधानिक जनसंगठन की ओर निर्णायक संक्रमण शुरू किया।

इसलिए 1947–51 AIKS के इतिहास का संक्रमणकाल ही नहीं, उसकी स्वतंत्र भारत वाली पहचान के निर्माण का काल था।

1. 15 अगस्त 1947 : लक्ष्य पूरा हुआ या संघर्ष का पहला चरण?

किसान सभा की राजनीति के लिए स्वतंत्रता का मूल्यांकन सरल नहीं था।

एक तरफ ब्रिटिश शासन का अंत ऐतिहासिक विजय थी। दूसरी तरफ किसान सभा वर्षों से कह रही थी कि केवल विदेशी शासन हटाना पर्याप्त नहीं है।

किसान की वास्तविक मुक्ति के लिए आवश्यक था—

भूमि वास्तविक जोतने वाले को,

किरायेदार की सुरक्षा,

कृषि मजदूर के अधिकार,

इनमें से अधिकांश प्रश्न 15 अगस्त 1947 को अनसुलझे थे।

इसलिए किसान सभा की राजनीति में बहुत जल्दी “राष्ट्रीय स्वतंत्रता बनाम सामाजिक-आर्थिक मुक्ति” का अंतर प्रमुख हो गया।

# 2. लेकिन नई भारतीय सरकार को ब्रिटिश सरकार के समान मानना भी गलत था

यह इतिहासलेखन की महत्वपूर्ण सावधानी है।

ब्रिटिश सरकार विदेशी औपनिवेशिक शासन थी।

1947 के बाद भारत की सरकार भारतीय राजनीतिक नेतृत्व द्वारा संचालित थी और शीघ्र ही सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार पर आधारित संसदीय लोकतंत्र बनने वाली थी।

इसलिए किसान सभा के सामने अब बिल्कुल नई स्थिति थी।

औपनिवेशिक राज्य को कैसे हटाएं?

लोकतांत्रिक भारतीय राज्य से कृषि संरचना कितनी तेजी से बदलवाई जाए, और यदि वह न बदले तो संघर्ष का स्वरूप क्या हो?

CPI के भीतर 1947–51 का अधिकांश वैचारिक संघर्ष इसी प्रश्न के उत्तर को लेकर था।

# 3. विभाजन ने किसान प्रश्न को और जटिल बनाया

भारत और पाकिस्तान के निर्माण के साथ पंजाब और बंगाल विभाजित हुए।

लाखों कृषक परिवार विस्थापित हुए।

जो किसान पीढ़ियों से एक गांव में जमीन जोत रहा था, वह रातोंरात शरणार्थी बन सकता था।

दूसरी ओर दूसरे समुदाय द्वारा छोड़ी गई कृषि भूमि पुनर्वास के लिए उपलब्ध हुई।

इससे भूमि का प्रश्न अब केवल—

# 4. AIKS का पुराना अखिल भारतीय भूगोल भी टूट गया

यह संगठनात्मक दृष्टि से बहुत बड़ा परिवर्तन था।

पूर्वी बंगाल के अनेक किसान सभा क्षेत्र—

अब पाकिस्तान में थे।

पंजाब भी विभाजित हुआ।

1936 में जिस संगठन की कल्पना पूरे ब्रिटिश भारत के किसानों के मंच के रूप में की गई थी, 1947 में उसका राजनीतिक भूगोल दो देशों में बंट गया।

इसलिए विभाजन केवल राष्ट्रीय त्रासदी नहीं था।

वह AIKS के संगठनात्मक इतिहास में भी एक वास्तविक विभाजक रेखा था।

# 5. स्वतंत्र भारत में सबसे बड़ा कृषि प्रश्न : जमींदारी

स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधार का पहला बड़ा राष्ट्रीय प्रश्न था—

मध्यस्थ भू-स्वामित्व और जमींदारी व्यवस्था का उन्मूलन।

और दूसरे क्षेत्रों में अलग-अलग भूमि व्यवस्थाएं थीं, लेकिन एक व्यापक राजनीतिक सहमति विकसित हो चुकी थी कि औपनिवेशिक काल की मध्यस्थ भू-स्वामी संरचना समाप्त करनी होगी।

यह किसान आंदोलन की बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि थी।

# 6. AIKS और कांग्रेस में अब लक्ष्य पर आंशिक सहमति

1930 के दशक में जमींदारी उन्मूलन AIKS का उग्र कार्यक्रम माना जाता था।

स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस सरकारें भी जमींदारी उन्मूलन की ओर बढ़ीं।

लेकिन इससे किसान सभा और सरकार का मतभेद समाप्त नहीं हुआ।

मुआवजा देकर या बिना मुआवजे?

भूमि की सीमा क्या होगी?

बटाईदार का अधिकार क्या होगा?

जमींदार कितनी निजी भूमि बचा सकता है?

# 7. कानून और जमीन की वास्तविकता

AIKS का तर्क था कि केवल जमींदारी का कानूनी नाम हटाना पर्याप्त नहीं।

यदि पूर्व जमींदार बड़ी मात्रा में भूमि अपने पास रखे,

यदि बटाईदार दर्ज न हो,

यदि भूमिहीन मजदूर को भूमि न मिले,

यदि बेनामी हस्तांतरण से भूमि सीमा बचाई जाए—

तो कृषि संरचना का वास्तविक लोकतंत्रीकरण नहीं होगा।

यही स्वतंत्र भारत में किसान सभा के भूमि आंदोलन की नई दिशा बनने वाली थी।

# 8. जमींदारी उन्मूलन : किसान सभा की वैचारिक विजय, लेकिन अधूरी

यहां संतुलित मूल्यांकन आवश्यक है।

जमींदारी उन्मूलन का श्रेय अकेले AIKS को नहीं दिया जा सकता।

कांग्रेस स्वयं भी भूमि सुधार के कार्यक्रम की ओर बढ़ चुकी थी।

जैसे आंदोलनों ने जमींदारी को राजनीतिक रूप से अस्थिर और नैतिक रूप से अस्वीकार्य बनाने में बड़ा योगदान दिया।

अर्थात किसान सभा कानून की अकेली निर्माता नहीं थी—

लेकिन कानून की ऐतिहासिक जमीन तैयार करने वाली महत्वपूर्ण शक्तियों में अवश्य थी।

# 9. 1947 में CPI की दिशा : पी. सी. जोशी चरण

स्वतंत्रता के आसपास भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव पी. सी. जोशी थे।

उनकी रणनीति भारतीय स्वतंत्रता की नई परिस्थिति को समझते हुए व्यापक लोकतांत्रिक और जनवादी गठबंधन की संभावनाओं पर अपेक्षाकृत अधिक जोर देती थी।

उनके आलोचकों को यह नीति कांग्रेस नेतृत्व के प्रति अत्यधिक नरम लगने लगी।

विशेष रूप से पार्टी के भीतर यह प्रश्न उठा—

क्या 15 अगस्त 1947 वास्तविक स्वतंत्रता है?

या ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने सत्ता का रूप मात्र बदला है?

# 10. यही बहस किसान सभा तक क्यों पहुंची?

क्योंकि AIKS पर CPI का प्रभाव निर्णायक हो चुका था।

नई सरकार के साथ लोकतांत्रिक सुधारों के लिए दबाव बनाओ,

क्रांतिकारी परिस्थिति मौजूद है।

अध्याय 24

स्वतंत्र भारत में अखिल भारतीय किसान सभा, 1952–64

प्रथम आम चुनाव के बाद संसदीय वाम राजनीति, भूमि-सुधार और भूदान के दौर में किसान सभा, केरल–आंध्र–बंगाल के संघर्ष, खाद्य और मूल्य प्रश्न तथा 1964 के कम्युनिस्ट विभाजन की ओर बढ़ता संगठनात्मक संकट

1952 से 1964 का काल अखिल भारतीय किसान सभा के इतिहास में किसी एक बड़े विद्रोह का दौर नहीं था। तेलंगाना जैसे सशस्त्र संघर्ष का चरम पीछे छूट चुका था और स्वतंत्र भारत ने संविधान, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, निर्वाचित विधानसभाओं तथा संसदीय व्यवस्था के माध्यम से एक नया राजनीतिक ढांचा स्थापित कर लिया था।

किसान सभा के सामने अब अधिक कठिन काम था।

औपनिवेशिक काल में नारा अपेक्षाकृत स्पष्ट था—

लेकिन स्वतंत्र भारत में जमींदारी उन्मूलन के कानून बनने लगे तो प्रश्न बदल गए—

कानून लागू कितना हुआ?

बेदखल किसान का क्या हुआ?

बटाईदार का नाम भूमि अभिलेख में है या नहीं?

अतिरिक्त जमीन किसे मिले?

परती सरकारी भूमि भूमिहीन को क्यों नहीं?

कृषि मजदूर की मजदूरी कौन तय करे?

किसान की फसल का उचित मूल्य क्या हो?

और खाद्यान्न महंगा हो तो उत्पादक किसान और उपभोक्ता मजदूर—दोनों के हितों का संतुलन कैसे बने?

इसी काल में एक दूसरा प्रश्न भी सामने आया।

विनोबा भावे का भूदान आंदोलन कह रहा था—

भू-स्वामी स्वेच्छा से जमीन दें।

AIKS की वर्गीय राजनीति कहती थी—

भूमि दान का नहीं, अधिकार का प्रश्न है।

और फिर 1957 में केरल ने तीसरा रास्ता दिखाया—

किसान संघर्ष और चुनावी राजनीति के मेल से बनी कम्युनिस्ट सरकार स्वयं भूमि-सुधार कानून ला सकती है।

इसलिए 1952–64 का काल AIKS को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यही वह समय है जब किसान सभा ने सशस्त्र क्रांति की तत्काल रणनीति से हटकर जनसंघर्ष + चुनाव + विधानमंडल + भूमि-कानून की संयुक्त राजनीति विकसित की।

लेकिन इसी अवधि के अंत तक भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर इतने गहरे वैचारिक मतभेद पैदा हो गए कि 1964 में CPI का विभाजन हुआ।

उस विभाजन से किसान सभा भी अछूती नहीं रह सकती थी।

1. 1952 : मतदाता बना भारतीय किसान

1951–52 के प्रथम आम चुनाव ने भारतीय किसान की राजनीतिक स्थिति मूलतः बदल दी।

औपनिवेशिक भारत का किसान—

अब वह इन सबके साथ मतदाता भी था।

सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार ने करोड़ों ग्रामीण भारतीयों को समान राजनीतिक अधिकार दिया।

AIKS के लिए इसका अर्थ बहुत बड़ा था।

जिस किसान को संगठन वर्षों से गांव की सभा में ला रहा था, अब वही किसान विधानसभा और संसद की संरचना तय कर सकता था।

# 2. किसान संघर्ष और संसदीय राजनीति का मेल

1951 के बाद कम्युनिस्ट राजनीति ने चुनावी भागीदारी स्वीकार की।

इससे AIKS की रणनीति में स्थायी परिवर्तन आया।

अब किसान संघर्ष के दो परस्पर जुड़े क्षेत्र थे—

खेत और गांव

भूमि कब्जा, बेदखली-विरोध, मजदूरी, लगान, सिंचाई, कर और मूल्य।

विधानसभा और संसद

भूमि कानून, किरायेदारी कानून, भूमि-सीमा, कृषि बजट और खाद्य नीति।

यही स्वतंत्र भारत में AIKS की दीर्घकालीन राजनीतिक कार्यपद्धति बनने लगी।

# 3. लेकिन 1952 में संगठन तुरंत सामान्य नहीं हुआ

1948–51 के दमन और भूमिगत गतिविधियों ने किसान सभा को भारी नुकसान पहुंचाया था।

AIKS की 1968 की संगठनात्मक रिपोर्ट पीछे मुड़कर स्वीकार करती है कि 1948 से 1952 के बीच सामान्य वैधानिक कामकाज गंभीर रूप से बाधित हुआ था और बंगाल में संगठन अवैध घोषित किया गया था। 1947 के सिकंदराबाद सम्मेलन के बाद अगला अखिल भारतीय सम्मेलन 1953 में केरल के कन्नूर में हो सका।

इसलिए 1952 केवल संसदीय मोड़ नहीं—

संगठन के पुनर्निर्माण का वर्ष भी था।

# 4. 1953 : कन्नूर सम्मेलन और वैधानिक वापसी

कन्नूर सम्मेलन का महत्व इसी संदर्भ में था।

तेलंगाना संघर्ष समाप्त हो चुका था।

कम्युनिस्ट पार्टी चुनावी राजनीति में प्रवेश कर चुकी थी।

किसान सभा को अब फिर खुले जनसंगठन के रूप में काम करना था।

गांव समितियों को पुनर्जीवित करना,

स्थानीय आर्थिक मांगों पर संघर्ष,

और राष्ट्रीय भूमि कार्यक्रम को नई परिस्थितियों के अनुसार ढालना।

# 5. पुराना नारा, नई परिस्थिति

AIKS ने अपनी मूल भूमि नीति नहीं छोड़ी।

लेकिन अब जमींदारी उन्मूलन की मांग का संदर्भ बदल चुका था।

केंद्र और राज्य सरकारें स्वयं भूमि सुधार की बात कर रही थीं।

इसलिए किसान सभा का प्रश्न था—

सरकारी भूमि सुधार कितना वास्तविक है?

AIKS के बाद के ऐतिहासिक मूल्यांकन में 1947–60 को भूमि और उग्र भूमि-सुधार संघर्ष का अलग चरण माना गया है—एक ओर राज्य सरकारों के जमींदारी उन्मूलन, किरायेदारी और भूमि-सीमा कानून; दूसरी ओर उन कानूनों को अधिक प्रभावी बनाने तथा वास्तविक कृषक के पक्ष में लागू कराने के किसान संघर्ष।

# 6. जमींदारी उन्मूलन के बाद भी भूमि असमानता क्यों बनी?

क्योंकि जमींदारी उन्मूलन और भूमि पुनर्वितरण समान चीजें नहीं थीं।

मध्यस्थ अधिकार समाप्त किए जा सकते थे—

लेकिन बड़ा भू-स्वामी अपनी निजी जोत बचा सकता था।

भूमि रिश्तेदारों के नाम की जा सकती थी।

काश्तकार को रिकॉर्ड में दर्ज न किया जाए तो वह अधिकार से वंचित रह सकता था।

भूमि-सीमा बहुत ऊंची रखी जाए तो भूमिहीन के लिए जमीन निकलती ही नहीं।

इसलिए AIKS की राजनीति धीरे-धीरे जमींदारी-विरोध से भूमि-सीमा और भूमि-वितरण की ओर बढ़ी।

# 7. ‘भूमि जोतने वाले की’ अब किस अर्थ में?

स्वतंत्र भारत में इसका अर्थ था—

काश्तकार को स्वामित्व,

भूमिहीन को अतिरिक्त अथवा सरकारी भूमि,

कृषि मजदूर को घर और जीविका के अधिकार।

इससे किसान सभा की भूमि नीति अधिक सूक्ष्म हुई।

# 8. भूदान आंदोलन का उदय

इसी दौर में विनोबा भावे के नेतृत्व में भूदान आंदोलन तेजी से फैला।

1951 में तेलंगाना के पोचमपल्ली से प्रारंभ हुई पहल का विचार था—

बड़े भू-स्वामी स्वेच्छा से अपनी भूमि का एक भाग भूमिहीनों को दें।

बाद में भूदान से ग्रामदान की धारणा विकसित हुई।

यह स्वतंत्र भारत में भूमि प्रश्न का एक वैकल्पिक नैतिक समाधान था।

# 9. भूदान की आकर्षण-शक्ति

भूदान का नैतिक संदेश अत्यंत शक्तिशाली था।

भूमि संघर्ष और हिंसा के बिना भी सामाजिक परिवर्तन हो सकता है।

भू-स्वामी स्वेच्छा से भूमि साझा करे।

गांव सहयोगी समुदाय बने।

गांधीवादी राजनीति के लिए यह भूमि-सुधार का अहिंसक रास्ता था।

# 10. AIKS की मूल असहमति

मार्क्सवादी किसान राजनीति के लिए समस्या थी—

भूमि का प्रश्न परोपकार का नहीं, संरचनात्मक अधिकार का है।

यदि भूमिहीन किसान का भूमि पर न्यायपूर्ण दावा है तो उसे भू-स्वामी की उदारता पर निर्भर क्यों होना चाहिए?

इसलिए किसान सभा का जोर था—

अतिरिक्त भूमि का अनिवार्य अधिग्रहण,

और भूमिहीनों में वितरण।

# 11. फिर भी भूदान को केवल असफल प्रयोग कहना गलत होगा

भूदान ने भूमि असमानता को राष्ट्रीय सार्वजनिक चर्चा में बनाए रखा।

विनोबा भावे गांव-गांव पहुंचे।

भू-स्वामियों से जमीन मांगी गई।

भूमिहीनता को नैतिक समस्या बनाया गया।

इसलिए AIKS और भूदान के साधन भिन्न थे—

लेकिन दोनों ने एक तथ्य स्वीकार किया—

भारत की स्वतंत्रता तब तक सामाजिक रूप से अधूरी है जब तक भूमि का प्रश्न अनसुलझा है।

# 12. 1954 का मोगा सम्मेलन

सितंबर 1954 में पंजाब के मोगा में AIKS का बारहवां सम्मेलन हुआ।

19 सितंबर को अखिल भारतीय किसान समिति की बैठक इंदुलाल याज्ञिक की अध्यक्षता में हुई। संगठनात्मक संरचना का विस्तार किया गया; पांच नई प्रांतीय इकाइयों और कर्नाटक की पांच जिला इकाइयों के जुड़ने का उल्लेख सम्मेलन दस्तावेज में मिलता है।

यह संकेत था कि 1948–52 के संकट के बाद AIKS फिर राष्ट्रीय संगठनात्मक विस्तार की कोशिश कर रही थी।

# 13. मोगा के सदस्यता आंकड़े

असुरक्षित किरायेदारी,

अध्याय 25

1964 के कम्युनिस्ट विभाजन और अखिल भारतीय किसान सभा

CPI और CPI(M) के अलग रास्ते, किसान सभा पर नियंत्रण का प्रश्न, संगठनात्मक विभाजन, बंगाल–केरल–आंध्र में नई शक्ति-संरचना और भारतीय किसान आंदोलन में दो कम्युनिस्ट किसान सभाओं का उदय

1964 भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास की निर्णायक विभाजक रेखा है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी)—CPI(M)—के गठन को केवल दो राजनीतिक दलों के अलग होने की घटना मानना पर्याप्त नहीं है। इसके साथ दशकों में निर्मित मजदूर, किसान, छात्र और अन्य जनसंगठनों के सामने भी प्रश्न खड़ा हो गया कि उनकी संगठनात्मक विरासत, नेतृत्व और राजनीतिक दिशा किसके साथ जाएगी।

अखिल भारतीय किसान सभा के लिए यह संकट विशेष रूप से गंभीर था।

1936 में स्थापित AIKS किसी एक कम्युनिस्ट धारा की किसान शाखा के रूप में पैदा नहीं हुई थी। उसके निर्माण में स्वामी सहजानंद सरस्वती, एन. जी. रंगा, इंदुलाल याज्ञिक, कांग्रेस समाजवादी, कम्युनिस्ट और दूसरे किसान नेता शामिल थे। लेकिन 1940 के दशक से उसमें कम्युनिस्ट प्रभाव बढ़ता गया और स्वतंत्रता के बाद वह व्यवहारतः भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन से गहराई से जुड़ा किसान संगठन बन गई।

इसलिए जब स्वयं कम्युनिस्ट पार्टी दो हिस्सों में बंटी, तो प्रश्न अपरिहार्य था—

अखिल भारतीय किसान सभा किसकी है?

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य-संशोधन आरंभ में ही आवश्यक है।

1964 में CPI के विभाजन के साथ AIKS उसी दिन औपचारिक रूप से दो अखिल भारतीय किसान सभाओं में नहीं बंटी। किसान संगठन के भीतर संघर्ष 1964 से तेज हुआ, समानांतर राज्य समितियां और नेतृत्व संरचनाएं बनीं, एकता के प्रयास भी हुए, लेकिन प्रतिद्वंद्वी अखिल भारतीय संरचना का निर्णायक संस्थागत रूप 1967–68 में स्पष्ट हुआ। CPI(M)-सम्बद्ध AIKS के 1968 मदुरै सम्मेलन के अपने दस्तावेज भी अक्टूबर 1967 को प्रतिद्वंद्वी अखिल भारतीय किसान सभा बनने का निर्णायक क्षण बताते हैं।

इसलिए 1964 को AIKS विभाजन की शुरुआत, और 1967–68 को उसके संस्थागत पूर्ण रूप के रूप में समझना अधिक सटीक है।

1. 1964 का संकट अचानक पैदा नहीं हुआ

इस विभाजन की जड़ें कम-से-कम 1950 के दशक के उत्तरार्ध तक जाती हैं।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में कई मूल प्रश्नों पर मतभेद बढ़ रहे थे—

कांग्रेस का वर्ग चरित्र क्या है?

नेहरू सरकार को प्रगतिशील राष्ट्रीय शक्ति माना जाए या बड़े पूंजीपति–भू-स्वामी वर्ग की सरकार?

भारत में समाजवादी परिवर्तन का रास्ता संसदीय हो सकता है या अधिक तीखे वर्ग संघर्ष की आवश्यकता है?

सोवियत संघ और चीन के बीच बढ़ते वैचारिक संघर्ष में भारतीय कम्युनिस्टों की स्थिति क्या हो?

भारतीय बुर्जुआ वर्ग के साथ किसी स्तर पर सहयोग संभव है या नहीं?

भूमि-सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए कांग्रेस सरकारों पर दबाव पर्याप्त है, या उनके विरुद्ध व्यापक वर्ग संघर्ष आवश्यक है?

इनमें से लगभग हर प्रश्न सीधे किसान सभा की रणनीति को प्रभावित करता था।

# 2. किसान प्रश्न इस वैचारिक संघर्ष के केंद्र में क्यों था?

क्योंकि 1950 के दशक का भारत अभी मुख्यतः ग्रामीण समाज था।

करोड़ों लोगों की आजीविका तय करते थे।

इसलिए भारत की क्रांति अथवा लोकतांत्रिक परिवर्तन की कोई भी कम्युनिस्ट रणनीति किसान को नजरअंदाज नहीं कर सकती थी।

सवाल केवल यह नहीं था कि किसान सभा कितने सदस्य बनाए।

किस किसान वर्ग को राजनीतिक नेतृत्व दिया जाए और किसके विरुद्ध संघर्ष किया जाए?

# 3. किसान एक समान वर्ग नहीं

स्वतंत्रता के बाद ग्रामीण भारत तेजी से बदल रहा था।

जमींदारी उन्मूलन के बाद भी गांवों में मौजूद थे—

इन सबके हित समान नहीं थे।

यहीं CPI की कृषि रणनीति में महत्वपूर्ण मतभेद उभरे।

# 4. कांग्रेस के प्रति नीति सबसे बड़ा भारतीय विवाद

एक धारा का मानना था कि स्वतंत्र भारत का राज्य औपनिवेशिक राज्य नहीं है और कांग्रेस के भीतर प्रगतिशील तथा प्रतिक्रियावादी दोनों प्रवृत्तियां मौजूद हैं।

जैसे प्रश्नों पर कांग्रेस के प्रगतिशील तत्वों के साथ सीमित सहयोग संभव हो सकता है।

दूसरी धारा को यह दृष्टिकोण वर्ग संघर्ष को कमजोर करने वाला दिखाई देता था।

उसके लिए कांग्रेस सरकार बड़े पूंजीपति और भू-स्वामी हितों से गहराई से जुड़ी थी।

# 5. यही मतभेद किसान सभा में कैसे उतरता था?

यदि कांग्रेस सरकार को सुधार योग्य माना जाए—

तो किसान सभा का जोर हो सकता था—

भूमि कानून बेहतर बनवाओ,

प्रगतिशील कानून का समर्थन करो,

दक्षिणपंथी शक्तियों के विरुद्ध व्यापक गठबंधन बनाओ।

यदि कांग्रेस सरकार को मूलतः भू-स्वामी–पूंजीपति व्यवस्था की संरक्षक माना जाए—

स्वतंत्र वर्ग संघर्ष,

गरीब किसान और कृषि मजदूर की लामबंदी,

और कांग्रेस सरकार से अधिक तीखा राजनीतिक टकराव।

इसलिए राष्ट्रीय राजनीतिक सिद्धांत गांव के संघर्ष की रणनीति बन रहा था।

# 6. केरल का अनुभव और विवाद

1957 में ई. एम. एस. नंबूदिरिपाद के नेतृत्व में कम्युनिस्ट सरकार बनने से संसदीय रास्ते की संभावना बहुत मजबूत दिखाई दी।

भूमि-सुधार कार्यक्रम आगे बढ़ा।

बेदखली रोकने की कार्रवाई हुई।

लेकिन 1959 में केंद्र सरकार ने उस सरकार को बर्खास्त कर दिया।

इस घटना से CPI के भीतर दो अलग सबक निकाले गए।

लोकतांत्रिक संसदीय संघर्ष को और व्यापक करना होगा।

यह प्रमाण है कि शासक वर्ग संसदीय व्यवस्था का उपयोग वाम सरकार को हटाने के लिए कर सकता है।

इस बहस का किसान सभा पर सीधा असर पड़ा।

# 7. अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन का विभाजन

इसी समय सोवियत संघ और चीन के बीच मतभेद खुलकर सामने आने लगे।

शांतिपूर्ण सहअस्तित्व,

राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष,

और संसदीय परिवर्तन की संभावना।

भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर पहले से मौजूद मतभेद इस अंतरराष्ट्रीय विवाद से और तीखे हुए।

लेकिन CPI के विभाजन को केवल “मॉस्को बनाम बीजिंग” कहना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा।

भारतीय परिस्थितियों से जुड़े वास्तविक विवाद उससे पहले मौजूद थे।

# 8. 1962 का भारत–चीन युद्ध : निर्णायक उत्प्रेरक

अक्टूबर–नवंबर 1962 के भारत–चीन युद्ध ने CPI के आंतरिक संकट को विस्फोटक बना दिया।

भारत सरकार के प्रति क्या रुख हो?

चीन की कार्रवाई का मूल्यांकन कैसे किया जाए?

राष्ट्रीय रक्षा और अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट एकता में प्राथमिकता किसे मिले?

इन प्रश्नों पर कम्युनिस्ट नेतृत्व विभाजित हुआ।

युद्ध के बाद अनेक कम्युनिस्ट और किसान सभा कार्यकर्ता गिरफ्तार किए गए।

AIKS की 1968 की महासचिव रिपोर्ट भी नवंबर 1962 की गिरफ्तारियों और किसान संगठन के सामान्य कामकाज पर उनके गंभीर प्रभाव का उल्लेख करती है।

# 9. AIKS का केंद्रीय ढांचा लगभग ठहर गया

1961 में त्रिशूर में AIKS का अठारहवां सम्मेलन हुआ था।

उसके बाद अगला अखिल भारतीय सम्मेलन सामान्य समय पर नहीं हो सका।

और फिर कम्युनिस्ट आंदोलन का आंतरिक संकट—

संगठन की केंद्रीय कार्यप्रणाली को बाधित करते रहे।

AIKS के अपने अभिलेखों के अनुसार अगला सम्मेलन जनवरी 1968 में मदुरै में हुआ।

यह लगभग सात वर्ष का अंतराल स्वयं संकट की गहराई दिखाता है।

# 10. जनवरी 1964 : केंद्रीय किसान परिषद की बैठक

1962 के बाद गिरफ्तार कई नेताओं की रिहाई होने पर केंद्रीय किसान परिषद की बैठक 18 जनवरी 1964 को हो सकी।

लेकिन तब तक किसान सभा के भीतर राजनीतिक अविश्वास बहुत बढ़ चुका था।

1968 की CPI(M)-सम्बद्ध AIKS रिपोर्ट आरोप लगाती है कि इस अवधि में प्रतिद्वंद्वी “विशेष सत्रों” और समानांतर समितियों की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी।

ध्यान रहे—यह बाद में एक पक्ष द्वारा लिखी गई रिपोर्ट है।

इसलिए इसकी भाषा को तटस्थ ऐतिहासिक निर्णय नहीं, पक्षीय संगठनात्मक स्रोत के रूप में पढ़ना चाहिए।

# 11. अप्रैल 1964 : CPI में खुला टूटाव

इसके बाद अलग कम्युनिस्ट धारा के निर्माण की प्रक्रिया तेज हुई।

अध्याय 26

नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह, 1967 और किसान सभा

भूमि-संघर्ष, बर्गादार–आदिवासी किसान, चारु मजूमदार–कानू सान्याल–जंगल संथाल, CPI(M) सरकार और पार्टी के भीतर टकराव, सशस्त्र कृषि क्रांति की बहस तथा AIKS और नक्सलवादी किसान राजनीति के अलग रास्ते

1967 का नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह भारतीय किसान राजनीति के इतिहास में एक छोटा लेकिन अत्यंत प्रभावशाली विस्फोट था। भौगोलिक रूप से यह पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के एक सीमित क्षेत्र—नक्सलबाड़ी, खोरीबाड़ी और फांसीदेवा—में केंद्रित था; समय की दृष्टि से भी इसका पहला चरण कुछ ही महीनों में दबा दिया गया। फिर भी इसने भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन, अखिल भारतीय किसान सभा, पश्चिम बंगाल की भूमि राजनीति और आगे पांच दशकों से अधिक चले माओवादी/नक्सलवादी आंदोलन की दिशा बदल दी।

इस आंदोलन को केवल इस वाक्य में समेट देना कि “1967 में नक्सलवाद शुरू हुआ” ऐतिहासिक रूप से अपर्याप्त है।

उसकी तत्काल जड़ें थीं—

भूमि का असमान स्वामित्व,

जोतदारों का प्रभुत्व,

असुरक्षित बर्गादारी,

आदिवासी किसानों की भूमि-विहीनता,

चाय बागानों के आसपास की श्रम व्यवस्था,

और भूमि-सुधार कानूनों तथा वास्तविक ग्रामीण सत्ता के बीच भारी अंतर।

आधुनिक शोध नक्सलबाड़ी की पृष्ठभूमि में विशेष रूप से जोतदार भूमि व्यवस्था, चाय बागान मजदूरों के शोषण और आदिवासी समुदायों के भूमि से वंचित होने को महत्वपूर्ण मानता है।

लेकिन 1967 की विशिष्टता केवल सामाजिक असंतोष में नहीं थी।

ऐसे असंतोष भारत के अनेक हिस्सों में थे।

नक्सलबाड़ी को अलग बनाता है उसका राजनीतिक क्षण।

1964 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी विभाजित हो चुकी थी और CPI(M) ने स्वयं को CPI की अपेक्षा अधिक संघर्षशील मार्क्सवादी धारा के रूप में स्थापित किया था। फरवरी–मार्च 1967 के चुनावों के बाद पश्चिम बंगाल में कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई और वाम तथा अन्य दलों की संयुक्त मोर्चा सरकार बनी। CPI(M) इस सरकार की सबसे बड़ी शक्तियों में थी; ज्योति बसु गृह मंत्री और हरे कृष्ण कोनार भूमि एवं भूमि-राजस्व मंत्री थे।

यानी पहली बार किसान आंदोलन के सामने विचित्र परिस्थिति थी—

भूमि पर कब्जे के लिए प्रेरित करने वाले अनेक कार्यकर्ता उसी पार्टी से थे जो अब राज्य सरकार का महत्वपूर्ण हिस्सा थी।

और नक्सलबाड़ी ने इसी विरोधाभास को विस्फोटित कर दिया।

1. नक्सलबाड़ी कहां था?

नक्सलबाड़ी दार्जिलिंग जिले के तराई क्षेत्र में स्थित था।

के बीच विकसित सामाजिक क्षेत्र था।

यह दार्जिलिंग पहाड़ी समाज से अलग कृषि भूगोल रखता था।

मुंडा और अन्य आदिवासी तथा ग्रामीण समुदायों की उपस्थिति महत्वपूर्ण थी।

2. आंदोलन का सामाजिक आधार

नक्सलबाड़ी विद्रोह का मुख्य आधार था—

और चाय बागान श्रमिकों का एक हिस्सा।

आधुनिक Cambridge अध्ययन आंदोलन की पृष्ठभूमि में आदिवासियों की भूमि-विहीनता और ग्रामीण निम्न वर्गों की अधीनता को केंद्रीय तत्व मानता है।

इसलिए नक्सलबाड़ी को केवल वैचारिक रूप से प्रेरित शहरी क्रांतिकारियों की परियोजना कहना गलत है।

भूमि असंतोष वास्तविक था।

बंगाल की ग्रामीण संरचना में जोतदार साधारण किसान से कहीं अधिक शक्तिशाली कृषक/भूमि नियंत्रक हो सकता था।

कई जोतदार बड़ी भूमि पर नियंत्रण रखते,

बर्गादारों से खेती करवाते,

स्थानीय प्रशासन और पुलिस से संबंध रखते,

और भूमि अभिलेखों पर प्रभाव डाल सकते थे।

तेभागा आंदोलन ने इसी जोतदार–बर्गादार संबंध को चुनौती दी थी।

1967 के नक्सलबाड़ी में वही संरचना दूसरे रूप में फिर सामने आई।

# 4. तेभागा से नक्सलबाड़ी तक ऐतिहासिक निरंतरता

1946–47 का तेभागा कहता था—

आधी फसल नहीं, दो-तिहाई चाहिए।

नक्सलबाड़ी के उग्र किसान नेताओं का सवाल उससे आगे था—

यदि भूमि पर वास्तविक नियंत्रण जोतदार का ही रहेगा, तो केवल फसल का हिस्सा बदलने से मुक्ति कितनी होगी?

इसलिए तेभागा और नक्सलबाड़ी के बीच ऐतिहासिक संबंध है—

लेकिन दोनों एक ही आंदोलन नहीं थे।

तेभागा बर्गादारी अधिकार का व्यापक जन आंदोलन था।

नक्सलबाड़ी तेजी से भूमि कब्जे और सशस्त्र कृषि क्रांति की दिशा में गया।

# 5. स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधार क्यों पर्याप्त नहीं लगे?

पश्चिम बंगाल में जमींदारी उन्मूलन और भूमि-सुधार कानून बने थे।

लेकिन कानून और गांव की वास्तविकता में अंतर था।

सीमा से अधिक भूमि छिपाना,

बर्गादार का नाम दर्ज न करना,

सरकारी निहित भूमि पर जोतदार का कब्जा।

CPI(M) की अपनी बाद की किसान-आंदोलन समीक्षा स्वीकार करती है कि 1967 में भी सरकारी रूप से निहित भूमि बड़ी मात्रा में जोतदारों के कब्जे में थी और किसानों को ऐसी भूमि स्वयं कब्जे में लेने के लिए संगठित किया जा रहा था।

# 6. हरे कृष्ण कोनार और भूमि राजनीति

हरे कृष्ण कोनार पश्चिम बंगाल के सबसे महत्वपूर्ण कम्युनिस्ट किसान नेताओं में थे।

1967 की संयुक्त मोर्चा सरकार में भूमि मंत्री बनने के बाद उन्होंने प्रशासनिक भूमि अभिलेखों और किसान आंदोलन को एक-दूसरे से जोड़ने की कोशिश की।

CPI(M) के अपने बाद के मूल्यांकन में स्पष्ट कहा गया कि किसानों को सरकारी निहित भूमि की सूची लेकर स्वयं कब्जा करने के लिए प्रेरित करना आंदोलन की महत्वपूर्ण पद्धति बनी।

यानी नक्सलबाड़ी का भूमि कब्जा किसी बिल्कुल अजनबी राजनीतिक वातावरण में पैदा नहीं हुआ।

# 7. लेकिन नक्सलबाड़ी नेतृत्व इससे आगे जाना चाहता था

और उनके सहयोगी केवल सरकारी निहित भूमि के कानूनी वितरण से संतुष्ट नहीं थे।

क्या वर्तमान राज्य संरचना के भीतर भूमि क्रांति संभव है?

उनका निष्कर्ष धीरे-धीरे नकारात्मक होता गया।

यहीं CPI(M) के मुख्य नेतृत्व और नक्सलबाड़ी की क्रांतिकारी धारा में मूल अंतर था।

# 8. चारु मजूमदार : वैचारिक केंद्र

चारु मजूमदार उत्तर बंगाल के पुराने कम्युनिस्ट कार्यकर्ता थे।

उन्होंने 1960 के दशक में कई लेख लिखे जिन्हें बाद में प्रसिद्ध “आठ दस्तावेज” के रूप में देखा गया।

भारतीय समाज में कृषि क्रांति,

माओत्से तुंग की ग्रामीण गुरिल्ला रणनीति,

सशस्त्र किसान शक्ति,

और संसदीय राजनीति के प्रति गहरी अस्वीकृति।

आधुनिक शोध नक्सलवादी आंदोलन की विशिष्ट वैचारिक पहचान को मजूमदार की माओवादी क्रांतिकारी रणनीति से जोड़ता है।

# 9. लेकिन चारु मजूमदार अकेले नक्सलबाड़ी नहीं थे

लोकप्रिय इतिहास कई बार नक्सलबाड़ी को लगभग चारु मजूमदार की व्यक्तिगत परियोजना बना देता है।

स्थानीय किसान संगठन में कानू सान्याल और विशेष रूप से आदिवासी नेता जंगल संथाल की प्रत्यक्ष भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी।

आंदोलन की वैचारिक दिशा और वास्तविक ग्रामीण लामबंदी को अलग-अलग समझना चाहिए।

कानू सान्याल लंबे समय से उत्तर बंगाल में किसान संगठन कर रहे थे।

उनकी भूमिका गांवों में—

बाद में वे स्वयं चारु मजूमदार की कुछ रणनीतियों, विशेषकर व्यक्तियों की ‘वर्ग-शत्रु’ के रूप में हत्या की नीति से अलग होते गए।

इसलिए नक्सलबाड़ी नेतृत्व को भी एकरूप नहीं समझना चाहिए।

जंगल संथाल आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण ग्रामीण नेताओं में थे।

उनका महत्व इसलिए विशेष है क्योंकि वे आंदोलन के आदिवासी किसान आधार से सीधे आते थे।

आधुनिक शोध नक्सलबाड़ी को चारु मजूमदार और कानू सान्याल के साथ जंगल संथाल के नेतृत्व से जोड़ता है।

यह नाम याद रखना आवश्यक है—

क्योंकि नक्सलबाड़ी का सामाजिक आधार आदिवासी किसान था, लेकिन उसकी बाद की बौद्धिक स्मृति में शहरी और उच्चवर्णीय क्रांतिकारी नेतृत्व कई बार अधिक प्रमुख हो गया।

# 12. नेतृत्व और सामाजिक आधार का विरोधाभास

नक्सलबाड़ी का बड़ा इतिहासलेखन प्रश्न यही है।

आंदोलन की मुख्य सामाजिक शक्ति—

लेकिन प्रमुख वैचारिक लेखन—

मुख्यतः शिक्षित मध्यवर्गीय कम्युनिस्ट नेताओं से।

Cambridge का आधुनिक अध्ययन इसी प्रतिनिधित्व-अंतर को नक्सलवाद की शुरुआती अंतर्विरोधों में गिनता है।

यह आगे पूरे माओवादी आंदोलन में बार-बार लौटने वाला प्रश्न है।

# 13. मार्च 1967 : भूमि कब्जे की शुरुआत

1967 के वसंत में नक्सलबाड़ी क्षेत्र में किसान समितियों ने भूमि पर प्रत्यक्ष कब्जा और फसल लेने की कार्रवाइयां तेज कीं।

भूमिहीनों में बांटना।

अध्याय 27

हरित क्रांति और अखिल भारतीय किसान सभा, 1965–80

नई कृषि तकनीक, सिंचाई–उर्वरक–ऋण, न्यूनतम समर्थन मूल्य, क्षेत्रीय और वर्गीय असमानता, छोटे–मध्यम–समृद्ध किसान की बदलती राजनीति तथा भूमि-संघर्ष से मूल्य और कृषि लागत की राजनीति की ओर संक्रमण

1965 से 1980 का दौर भारतीय किसान राजनीति में एक बुनियादी परिवर्तन का समय था। स्वतंत्रता के बाद पहले दो दशकों में किसान आंदोलन का केंद्रीय प्रश्न मुख्यतः भूमि था—जमींदारी समाप्त हो, बटाईदार सुरक्षित हो, अतिरिक्त जमीन भूमिहीन को मिले और बेदखली रुके। लेकिन 1960 के दशक के मध्य से भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में ऐसा तकनीकी और संस्थागत परिवर्तन शुरू हुआ जिसने किसान की समस्याओं और किसान संगठनों की भाषा—दोनों को बदल दिया।

उच्च उपज वाली किस्में,

और न्यूनतम समर्थन मूल्य—

अब खेती के नए ढांचे के अंग बनने लगे।

यही प्रक्रिया आगे हरित क्रांति के नाम से प्रसिद्ध हुई।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के इतिहास के अनुसार 1963–64 में नॉर्मन बोरलॉग की यात्रा के बाद अर्ध-बौनी गेहूं किस्मों के व्यापक परीक्षण हुए, 1964–65 में किसान खेतों पर प्रदर्शन और सिंचाई–कृषि तकनीक का मानकीकरण किया गया, और 1967–68 में गेहूं उत्पादन में निर्णायक उछाल दिखाई दिया। आगे कल्याण सोना, सोनालिका और अन्य उच्च उपज वाली किस्मों ने गेहूं उत्पादन का स्वरूप बदल दिया। चावल में IR-8 और बाद की भारतीय उच्च उपज किस्मों ने इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।

लेकिन तकनीकी सफलता अपने साथ सामाजिक समानता नहीं लाई।

नई तकनीक सबसे पहले उन्हीं क्षेत्रों में तेजी से फैल सकती थी जहां—

सुनिश्चित सिंचाई थी,

और किसान जोखिम उठाने की स्थिति में था।

इसलिए पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे सिंचित क्षेत्रों को शुरुआती लाभ अधिक मिला, जबकि वर्षा-निर्भर पूर्वी और मध्य भारत के विशाल हिस्से पीछे रहे। उसी गांव के भीतर भी बड़ी जोत वाला किसान नई तकनीक जल्दी अपना सकता था, जबकि छोटा और सीमांत किसान कर्ज और लागत के दबाव में फंस सकता था।

इसी सामाजिक अंतर ने अखिल भारतीय किसान सभा के सामने एक नया प्रश्न रखा—

क्या किसान राजनीति केवल जमीन के पुनर्वितरण तक सीमित रहे, या उसे लागत, ऋण, बिजली, सिंचाई और फसल के लाभकारी मूल्य की भी लड़ाई बनना होगा?

1970 के दशक के अंत तक AIKS का उत्तर स्पष्ट हो चुका था।

उसका पुराना नारा था—

किसान को लाभकारी मूल्य।

AIKS के सम्मेलन दस्तावेजों में अंततः इसे सूत्र के रूप में व्यक्त किया गया—

“भूमि जोतने वाले की, किसान को उचित मूल्य और देश को भोजन।” संगठन ने स्पष्ट कहा कि कृषि उत्पादन की लागत, किसान के श्रम और औद्योगिक वस्तुओं की कीमतों के मुकाबले कृषि उपज के दाम को उसकी नई रणनीति के केंद्र में रखना होगा।

इसलिए 1965–80 को AIKS के इतिहास में भूमि की राजनीति से कृषि अर्थव्यवस्था की राजनीति की ओर संक्रमण के रूप में समझना चाहिए।

1. हरित क्रांति की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?

1960 के दशक के मध्य में भारत गंभीर खाद्य संकट से गुजर रहा था।

1965–66 और 1966–67 में खराब मानसून ने कृषि उत्पादन को प्रभावित किया।

भारत बड़ी मात्रा में खाद्यान्न आयात पर निर्भर था।

अमेरिका से PL-480 के अंतर्गत गेहूं आयात की राजनीतिक संवेदनशीलता भी बढ़ रही थी।

राष्ट्रीय नीति का लक्ष्य था—

खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता।

इसलिए कृषि उत्पादन तेजी से बढ़ाने के लिए सरकार ने तकनीकी परिवर्तन को प्राथमिकता दी।

# 2. हरित क्रांति कोई एक बीज नहीं थी

हरित क्रांति को केवल “नया गेहूं बीज आया और उत्पादन बढ़ गया” समझना गलत होगा।

यह वास्तव में एक पूरा तकनीकी–संस्थागत पैकेज था—

ICAR स्वयं बाद में हरित क्रांति के मुख्य घटकों में उच्च उपज वाली उर्वरक-उत्तरदायी गेहूं–चावल किस्मों, गुणवत्ता वाले बीज, सिंचाई तथा बेहतर कृषि प्रबंधन को रखता है।

इसलिए सफलता केवल आनुवंशिकी की नहीं—

राज्य की कृषि नीति की भी थी।

# 3. गेहूं हरित क्रांति का शुरुआती केंद्र

उच्च उपज वाली अर्ध-बौनी गेहूं किस्में अधिक उर्वरक सह सकती थीं और पारंपरिक लंबी किस्मों की तुलना में गिरने की समस्या कम थी।

1960 के दशक के मध्य से इनका प्रसार हुआ।

और अन्य भारतीय किस्मों ने तेजी से विस्तार पाया।

ICAR के ऐतिहासिक विवरण में इसी तकनीकी परिवर्तन को भारतीय गेहूं उत्पादन के निर्णायक मोड़ से जोड़ा गया है।

# 4. चावल में परिवर्तन कुछ अलग था

चावल में IR-8 जैसी अर्ध-बौनी किस्मों ने उच्च उपज की नई संभावना खोली।

लेकिन धान की पारिस्थितिकी गेहूं से अधिक विविध थी।

हर क्षेत्र में एक ही किस्म सफल नहीं हो सकती थी।

इसलिए भारतीय वैज्ञानिकों ने अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए नई किस्में विकसित कीं।

ICAR के अनुसार IR-8 के बाद कई उच्च उपज वाली किस्मों ने भारतीय चावल उत्पादन को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

# 5. सिंचाई क्यों निर्णायक थी?

उच्च उपज वाला बीज तभी उच्च उत्पादन देता था जब उसे पर्याप्त पानी और पोषक तत्व मिलें।

हरित क्रांति के उतने ही महत्वपूर्ण तत्व थे जितना बीज।

जहां पानी सुनिश्चित था, किसान नई तकनीक का जोखिम उठा सकता था।

जहां खेती वर्षा पर निर्भर थी, जोखिम बहुत अधिक था।

यहीं हरित क्रांति की पहली बड़ी क्षेत्रीय असमानता पैदा हुई।

# 6. पंजाब और हरियाणा क्यों आगे निकले?

सड़क और मंडी नेटवर्क,

कृषि विस्तार सेवाएं,

और अपेक्षाकृत व्यावसायिक कृषक वर्ग—

इसलिए नई गेहूं तकनीक तेजी से फैल सकी।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी समान कृषि अवसंरचना ने परिवर्तन को गति दी।

यहीं से उत्तर-पश्चिम भारत खाद्यान्न अधिशेष क्षेत्र बनने लगा।

# 7. पूर्वी भारत क्यों पीछे रहा?

पूर्वी उत्तर प्रदेश,

और कई अन्य क्षेत्रों में समस्या अलग थी।

वर्षा पर निर्भरता अधिक।

ग्रामीण ऋण संरचना कमजोर।

बाढ़ और जलनिकासी की समस्याएं।

इसलिए तकनीकी पैकेज समान गति से नहीं फैला।

हरित क्रांति का प्रारंभिक भूगोल स्वयं राजनीतिक असमानता का प्रश्न बन गया।

# 8. AIKS की पहली आलोचना : तकनीक नहीं, असमान तकनीकी पहुंच

यह महत्वपूर्ण भेद है।

AIKS आधुनिक कृषि तकनीक की सिद्धांततः विरोधी नहीं थी।

सरकारी खरीद किस मंडी में?

AIKS के बाद के प्रस्ताव स्पष्ट रूप से कृषि अनुसंधान, सिंचाई, उर्वरक, मशीनरी और आधुनिक तकनीक के विस्तार की मांग करते हैं—लेकिन गरीब, छोटे और मध्यम किसानों को प्राथमिक सहायता के साथ।

इसलिए उसकी आलोचना हरित क्रांति बनाम पारंपरिक खेती की सरल बहस नहीं थी।

# 9. बड़ा किसान जल्दी क्यों लाभ उठा सकता था?

नई तकनीक में नकद निवेश अधिक था।

किसान को उत्पादन से पहले पैसा लगाना पड़ता था।

बड़ी जोत वाला किसान जोखिम और बाजार के उतार-चढ़ाव को अधिक आसानी से झेल सकता था।

छोटा किसान असफल फसल से कर्ज में डूब सकता था।

# 10. इसलिए हरित क्रांति ने वर्ग प्रश्न को नया रूप दिया

किसके पास कितनी जमीन?

किसके पास उत्पादन में निवेश करने की क्षमता कितनी है?

दो किसानों के पास समान पांच एकड़ जमीन हो सकती है।

दूसरा महाजन से कर्ज ले।

दोनों की आर्थिक शक्ति समान नहीं।

# 11. ‘धनी किसान’ एक बड़ी राजनीतिक श्रेणी बना

हरित क्रांति ने अनेक क्षेत्रों में ऐसा कृषक वर्ग मजबूत किया जो स्वयं खेत का मालिक और उत्पादक था लेकिन बाजार के लिए बड़े पैमाने पर उपज बेचता था।

यह पुराने जमींदार से अलग था।

उसकी आय का स्रोत मुख्यतः कृषि उत्पादन था।

भारतीय किसान राजनीति को अब इस समृद्ध/धनी किसान वर्ग से भी निपटना था।

# 12. AIKS के लिए रणनीतिक समस्या

क्या धनी किसान किसान आंदोलन का हिस्सा है?

दूसरी

हजारों गिरफ्तारियां—

अध्याय 28

1977 के बाद पश्चिम बंगाल में किसान सभा और भूमि सुधार

वाम मोर्चा सरकार, ऑपरेशन बर्गा, बर्गादार पंजीकरण, निहित भूमि का वितरण, पंचायत व्यवस्था, AIKS की ग्रामीण संगठनात्मक शक्ति, उपलब्धियां, वर्गीय बदलाव और भूमि सुधार की सीमाएं

1977 के बाद पश्चिम बंगाल का भूमि-सुधार कार्यक्रम स्वतंत्र भारत के कृषि इतिहास में सबसे अधिक चर्चित प्रयोगों में से एक है। इसकी विशेषता केवल यह नहीं थी कि राज्य सरकार ने भूमि-सुधार कानून लागू किए। पश्चिम बंगाल में भूमि संबंधी कानून 1950 के दशक से मौजूद थे। वास्तविक परिवर्तन यह था कि कानून, किसान संगठन, प्रशासन और निर्वाचित पंचायतों को एक साथ सक्रिय करने का प्रयास किया गया।

इस पूरे प्रयोग का सबसे प्रसिद्ध नाम बना—

इसके माध्यम से बर्गादारों—अर्थात दूसरे की जमीन पर हिस्से में फसल देकर खेती करने वाले बटाईदारों—को सरकारी भूमि अभिलेखों में दर्ज करने का अभियान चलाया गया, ताकि उन्हें मनमानी बेदखली से सुरक्षा और कानून द्वारा निर्धारित फसल हिस्से का अधिकार मिल सके।

लेकिन पश्चिम बंगाल का भूमि-सुधार केवल ऑपरेशन बर्गा नहीं था।

इसके दूसरे महत्वपूर्ण हिस्से थे—

भूमि-सीमा से अधिक तथा सरकार में निहित भूमि का अधिग्रहण और वितरण,

भूमिहीन तथा गरीब किसान को पट्टा,

तीन-स्तरीय पंचायत व्यवस्था,

भूमि-सुधार कार्यक्रम में किसान सभा की सक्रिय भागीदारी,

बर्गादार और गरीब किसान को संस्थागत ऋण तथा विकास योजनाओं से जोड़ना,

और ग्रामीण राजनीतिक सत्ता में पुराने भू-स्वामी प्रभुत्व को कमजोर करना।

विश्व बैंक के बाद के अध्ययन ने भी पश्चिम बंगाल के अनुभव को केवल भूमि सुधार नहीं, बल्कि भूमि-सुधार + लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण + स्थानीय विकास के संयुक्त प्रयोग के रूप में पढ़ा है।

यही कारण है कि 1977 के बाद पश्चिम बंगाल AIKS की राजनीति के लिए विशेष महत्व रखता है।

तेलंगाना में किसान सभा की व्यापक परंपरा सशस्त्र संघर्ष तक गई थी।

नक्सलबाड़ी ने भूमि क्रांति को फिर हथियार से जोड़ने की कोशिश की।

पश्चिम बंगाल में 1977 के बाद CPI(M)-सम्बद्ध किसान सभा ने तीसरा मॉडल प्रस्तुत किया—

किसान संगठन + चुनावी विजय + राज्य सरकार + भूमि कानून + पंचायत + जनदबाव।

इसी मॉडल की सफलताएं और सीमाएं इस अध्याय का विषय हैं।

1. 1977 से पहले भूमि-सुधार कानून मौजूद थे

यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है।

पश्चिम बंगाल में भूमि सुधार 1977 से शुरू नहीं हुए।

West Bengal Estate Acquisition Act, 1953 ने जमींदारी और मध्यस्थ भू-अधिकारों को समाप्त करने, भूमि-सीमा लागू करने तथा अतिरिक्त भूमि सरकार में निहित करने का ढांचा बनाया।

इसके बाद West Bengal Land Reforms Act, 1955 ने भूमि सुधार, भूमि वितरण, भूमि अभिलेख और बर्गादारों से संबंधित व्यवस्था को अधिक संगठित किया। पश्चिम बंगाल सरकार स्वयं इन दोनों कानूनों को राज्य के भूमि-सुधार ढांचे की आधारशिला मानती है।

इसलिए 1977 का प्रश्न था—

नया कानून बनाना नहीं, पुराने कानूनों को वास्तव में लागू करना।

# 2. कानून और गांव के बीच अंतर

कागज पर बर्गादार को अधिकार मिल सकते थे।

लेकिन यदि उसका नाम भूमि रिकॉर्ड में नहीं—

तो वह अपने अधिकार का प्रमाण कैसे देगा?

यदि जमीन मालिक कह दे—

यह मेरा मजदूर है, बर्गादार नहीं—

तो गरीब किसान प्रशासन में कैसे लड़ेगा?

तो वर्षों अदालत कौन जाएगा?

यही कारण था कि 1977 से पहले भूमि कानूनों के बावजूद बड़ी संख्या में बर्गादार असुरक्षित थे।

विश्व बैंक के पश्चिम बंगाल भूमि-शासन अध्ययन के अनुसार 1978 तक भूमि रिकॉर्ड में छह लाख से कुछ अधिक बर्गादार ही दर्ज थे, जबकि वास्तविक संख्या इससे काफी अधिक मानी जाती थी।

# 3. 1977 का राजनीतिक परिवर्तन

1977 के विधानसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा स्पष्ट बहुमत से सत्ता में आया।

ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने।

CPI(M) वाम मोर्चे की प्रमुख शक्ति थी।

इससे किसान आंदोलन के लिए एक असाधारण परिस्थिति बनी।

जो राजनीतिक धारा दशकों से—

और ग्रामीण वर्ग-सत्ता में बदलाव—

की मांग करती रही थी, अब स्वयं राज्य सरकार चला रही थी।

इसलिए किसान सभा के लिए प्रश्न था—

क्या आंदोलन की मांग को प्रशासनिक कार्यक्रम में बदला जा सकता है?

# 4. नक्सलबाड़ी का सबक अभी ताजा था

1977 केवल चुनावी सत्ता परिवर्तन नहीं था।

दस वर्ष पहले नक्सलबाड़ी हुआ था।

उसने वाम नेतृत्व को दिखाया था कि भूमि कानूनों की धीमी क्रियान्विति गरीब किसान के भीतर तीखा असंतोष पैदा कर सकती है।

इसलिए भूमि सुधार को टालना राजनीतिक रूप से संभव नहीं था।

वाम मोर्चा सरकार को अपने ग्रामीण आधार के सामने जल्दी परिणाम देना था।

# 5. भूमि सुधार के दो मुख्य स्तंभ

पश्चिम बंगाल का कार्यक्रम मोटे तौर पर दो बड़े हिस्सों में था—

पहला — बर्गादार सुरक्षा

जो किसान दूसरे की जमीन बटाई पर जोतता है, उसका नाम भूमि रिकॉर्ड में दर्ज हो।

दूसरा — भूमि पुनर्वितरण

भूमि-सीमा से अधिक अथवा सरकार में निहित भूमि भूमिहीन तथा गरीब किसानों में बांटी जाए।

आगे पंचायत व्यवस्था ने इन दोनों को लागू करने में सहायता की।

बर्गादार वह कृषक था जो दूसरे व्यक्ति की भूमि जोतता और उपज का एक हिस्सा भू-स्वामी को देता था।

वह खेत मजदूर नहीं था।

वह खेती के उत्पादन जोखिम में भागीदार था।

लेकिन भूमि स्वामित्व उसका नहीं था।

इसलिए उसकी सबसे बड़ी कमजोरी थी—

यदि उसने अधिक हिस्सा मांगा—

जमीन मालिक अगले वर्ष उसे खेत से निकाल सकता था।

# 7. बर्गादार का नाम रिकॉर्ड में क्यों नहीं होता था?

कई भूमि मालिक बर्गादारी संबंध को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं करना चाहते थे।

एक बार बर्गादार सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हो जाए—

उसे कानूनी अधिकार मिलते।

मनमानी बेदखली कठिन होती।

फसल हिस्से का दावा मजबूत होता।

इसलिए अनौपचारिक बटाई भू-स्वामी के लिए अधिक सुविधाजनक थी।

# 8. ऑपरेशन बर्गा का मूल विचार

1978 में वाम मोर्चा सरकार ने एक विशेष अभियान शुरू किया—

पहले ऐसे क्षेत्रों की पहचान जहां बड़ी संख्या में अपंजीकृत बर्गादार हैं।

बर्गादारों को कानून समझाना।

और प्रशासनिक अधिकारियों को गांव तक भेजकर मौके पर पंजीकरण करना।

AIKS के 1982 के सम्मेलन दस्तावेज में यही प्रक्रिया स्पष्ट रूप से दर्ज है—स्थानीय बैठकों के कुछ ही दिनों बाद अधिकारियों को गांव भेजकर नाम रिकॉर्ड करने का कार्यक्रम।

# 9. यह सामान्य सरकारी सर्वेक्षण से अलग क्यों था?

सामान्य भूमि रिकॉर्ड प्रक्रिया में किसान को कार्यालय जाना पड़ता।

भूमि मालिक से विवाद करना पड़ता।

ऑपरेशन बर्गा ने प्रक्रिया उलट दी—

सरकार किसान के गांव पहुंची।

यह प्रशासनिक नवाचार था।

और किसान सभा ने किसान को यह विश्वास दिलाने का काम किया कि यदि वह अपना नाम बताएगा तो अकेला नहीं छोड़ा जाएगा।

# 10. रात्रि बैठकें और ग्रामीण राजनीति

ऑपरेशन बर्गा का एक प्रसिद्ध तरीका था—

गांवों में शाम अथवा रात की बैठकें।

क्योंकि खेत का किसान दिन में काम करता।

रात में वह सभा में आ सकता था।

और कई स्थानों पर खुले सरकारी कार्यालय की तुलना में सामूहिक बैठक में बोलना अधिक सुरक्षित था।

विश्व बैंक के अध्ययन में भी दर्ज है कि अनौपचारिक बैठकों के माध्यम से बर्गादारों का भय दूर करने की कोशिश हुई।

# 11. किसान सभा की प्रत्यक्ष भूमिका

CPI(M)-सम्बद्ध किसान सभा स्वयं दावा करती है कि उसने ऑपरेशन बर्गा की सफलता के लिए व्यापक संगठनात्मक अभियान चलाया।

उसके 1982 के महासचिव प्रतिवेदन में कहा गया है कि किसान सभा ने बर्गादारों के नाम दर्ज कराने, निहित भूमि के वितरण और भू-स्वामियों के विरोध के विरुद्ध जन लामबंदी तथा कानूनी सहायता में सक्रिय भूमिका निभाई।

यह संगठन का अपना स्रोत है—

इसलिए समय-सीमा बताना आवश्यक है।

अध्याय 29

1980 के दशक में अखिल भारतीय किसान सभा और नई किसान राजनीति

लाभकारी मूल्य, कृषि लागत, बिजली–सिंचाई–ऋण, शरद जोशी की शेतकरी संगठन, महेंद्र सिंह टिकैत की भारतीय किसान यूनियन, ‘नए किसान आंदोलनों’ का उदय और वर्ग-आधारित AIKS राजनीति के सामने नई चुनौती

1980 का दशक भारतीय किसान आंदोलन के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ था। स्वतंत्रता के पहले और उसके बाद के शुरुआती दशकों में किसान राजनीति की केंद्रीय शब्दावली थी—जमींदारी, लगान, बेदखली, काश्तकारी अधिकार, भूमि-वितरण और ‘जमीन जोतने वाले की’। लेकिन हरित क्रांति, बाजार के विस्तार और खेती के बढ़ते मौद्रीकरण ने किसान के सामने नए प्रश्न खड़े कर दिए।

अब किसान केवल यह नहीं पूछ रहा था—

वह यह भी पूछ रहा था—

मेरी फसल का मूल्य कौन तय करेगा?

डीजल कितना महंगा होगा?

बिजली की दर क्या होगी?

सिंचाई शुल्क कितना होगा?

खाद और बीज किस कीमत पर मिलेंगे?

बैंक ऋण किस ब्याज पर मिलेगा?

और यदि उत्पादन लागत बढ़ती जाती है, तो सरकार कृषि उपज का लाभकारी मूल्य क्यों नहीं सुनिश्चित करती?

यहीं से भारतीय किसान राजनीति में एक नई धारा उभरी, जिसे सामाजिक विज्ञान साहित्य में सामान्यतः “नए किसान आंदोलन” कहा गया।

महाराष्ट्र में शरद जोशी की शेतकरी संगठन, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व वाली भारतीय किसान यूनियन, कर्नाटक में राज्य रैयत संघ तथा विभिन्न राज्यों के दूसरे किसान संगठन इसके प्रमुख उदाहरण बने। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय की अध्ययन सामग्री भी नए किसान आंदोलनों का प्रमुख उभार 1980 के दशक से मानती है, हालांकि उसकी जड़ें 1970 के दशक की हरित क्रांति और किसान राजनीति में खोजती है।

इस परिवर्तन ने अखिल भारतीय किसान सभा के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी की।

AIKS किसान को मुख्यतः वर्गीय संरचना में समझती थी—

नई किसान राजनीति इसके विपरीत कई बार एक व्यापक पहचान सामने रख रही थी—

हम सभी उत्पादक किसान हैं और हमारा संघर्ष उस व्यवस्था से है जो हमारी उपज सस्ती खरीदती तथा कृषि इनपुट महंगे बेचती है।

यहीं दोनों धाराओं के बीच समानता भी थी और गहरा वैचारिक अंतर भी।

1. 1980 का दशक अचानक नहीं आया

नई किसान राजनीति को समझने के लिए 1960 और 1970 के दशक के कृषि परिवर्तन को याद रखना होगा।

हरित क्रांति ने खेती को अधिक निर्भर बनाया—

ट्यूबवेल और पंपसेट पर,

ट्रैक्टर और कृषि मशीनों पर,

पारंपरिक खेती में किसान अपनी बहुत-सी जरूरतें गांव अथवा खेत से पूरी करता था।

नई कृषि व्यवस्था में उसे पहले नकद खर्च करना पड़ता था।

कृषि लागत और बाजार मूल्य का प्रश्न किसान राजनीति के केंद्र में आना।

# 2. किसान बाजार से दो तरफ से जुड़ गया

किसान बाजार में केवल विक्रेता नहीं था।

यदि उसकी फसल का मूल्य स्थिर रहे लेकिन खरीदी जाने वाली वस्तुओं की कीमत बढ़ जाए—

उसकी वास्तविक आय घट सकती थी।

AIKS के 1979 और 1982 के सम्मेलन दस्तावेजों में इसी समस्या को कृषि और औद्योगिक वस्तुओं के बीच बिगड़ते मूल्य-संबंध के रूप में रेखांकित किया गया।

# 3. 1973 का तेल संकट और कृषि लागत

1970 के दशक के अंतरराष्ट्रीय तेल संकट का असर भारतीय कृषि पर भी पड़ा।

उर्वरक निर्माण की लागत प्रभावित हुई।

सिंचाई और मशीन आधारित खेती का खर्च बढ़ा।

AIKS के 23वें सम्मेलन ने विशेष रूप से कहा कि 1973 के तेल संकट के बाद कृषि इनपुट की कीमतों में तीव्र वृद्धि हुई, जबकि अनेक कृषि उत्पादों के मूल्य उस अनुपात में नहीं बढ़े।

इसलिए 1980 तक आते-आते “खेती लाभकारी नहीं रही” एक व्यापक राजनीतिक नारा बनने लगा।

# 4. AIKS ने मूल्य प्रश्न देर से नहीं उठाया था

यह कहना गलत होगा कि नई किसान संगठनों के आने के बाद ही AIKS को फसल मूल्य की समस्या समझ आई।

उसके पुराने कार्यक्रम में भी—

कृषि उपज का उचित मूल्य,

1978 के उसके राष्ट्रीय सम्मेलन ने कृषि मूल्य आयोग के पुनर्गठन, किसान संगठनों की भागीदारी, सरकारी खरीद के विस्तार, सस्ते ऋण, बिजली, सिंचाई, फसल बीमा और लाभकारी मूल्य की विस्तृत मांग रखी थी।

लेकिन अंतर प्राथमिकता का था।

AIKS के लिए भूमि संबंध अभी भी कृषि संरचना का मूल प्रश्न था।

नई किसान राजनीति ने कहा—

मुख्य प्रश्न अब बाजार है।

# 5. 1980 : किसान असंतोष का विस्फोट

1980 में देश के कई हिस्सों में कृषि मूल्यों को लेकर बड़े आंदोलन हुए।

AIKS के अपने समकालीन प्रतिवेदन ने इसे स्वतंत्रता के बाद किसान समाज में अभूतपूर्व उभारों में से एक बताया।

महाराष्ट्र में रास्ता रोको,

विभिन्न राज्यों में प्रदर्शन,

विधानसभाओं का घेराव—

किसान आंदोलन की नई भाषा बन रहे थे।

# 6. लाभकारी मूल्य का अर्थ क्या?

केवल न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करना पर्याप्त नहीं।

किसान आंदोलन का प्रश्न था—

परिवार के श्रम का मूल्य क्या?

और इन सबके बाद किसान के लिए उचित अधिशेष कितना?

यानी फसल मूल्य को केवल बाजार के तत्काल उतार-चढ़ाव पर नहीं छोड़ा जा सकता।

# 7. घोषित मूल्य और वास्तविक बाजार मूल्य

AIKS की एक बड़ी शिकायत थी कि सरकार समर्थन मूल्य घोषित करती है—

लेकिन पर्याप्त खरीद नहीं करती।

यदि गांव के पास सरकारी खरीद केंद्र नहीं,

किसान पर ऋण चुकाने का दबाव है—

तो वह फसल कटते ही बेचता है।

AIKS ने सरकारी एजेंसियों द्वारा पर्याप्त खरीद को लाभकारी मूल्य की आवश्यक शर्त माना।

# 8. गरीब किसान के लिए मूल्य क्यों अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है?

यहां AIKS नई किसान राजनीति से महत्वपूर्ण वैचारिक तर्क करती थी।

फसल मूल्य बढ़ने से सबसे अधिक लाभ बड़े किसान को होगा, क्योंकि उसके पास बाजार में बेचने के लिए अधिक अधिशेष है।

AIKS का उत्तर अधिक जटिल था।

भंडारण नहीं कर सकता,

कटाई के तुरंत बाद बेचता है,

और बाजार तक उसकी पहुंच कमजोर होती है।

इसलिए वह सबसे अधिक मजबूरी की बिक्री करता है।

अर्थात लाभकारी मूल्य की व्यवस्था उसके लिए भी आवश्यक है।

# 9. लेकिन यहीं वर्गीय अंतर भी था

एक किसान 100 क्विंटल गेहूं बेचता है।

तीसरा भूमिहीन मजदूर है और कुछ बेचता ही नहीं।

फसल मूल्य में समान प्रतिशत वृद्धि—

तीनों को समान लाभ नहीं देगी।

यही AIKS की वर्गीय राजनीति का मूल तर्क था।

“किसान” एक समान आर्थिक वर्ग नहीं है।

# 10. नई किसान राजनीति का उदय

इसके बावजूद 1980 के दशक में एक नई राजनीतिक भाषा तेजी से लोकप्रिय हुई—

उत्पादक बनाम उपभोक्ता-केन्द्रित राज्य,

भारत बनाम शहरी सत्ता-व्यवस्था।

इस भाषा को सबसे व्यवस्थित वैचारिक रूप देने वालों में शरद जोशी प्रमुख थे।

# 11. शरद जोशी कौन थे?

शरद जोशी पारंपरिक किसान नेता की छवि से अलग थे।

उनकी आर्थिक समझ और अंतरराष्ट्रीय अनुभव ने किसान समस्या की उनकी व्याख्या को अलग रूप दिया।

महाराष्ट्र लौटने के बाद उन्होंने स्वयं खेती का अनुभव लिया और धीरे-धीरे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि किसान की गरीबी का कारण केवल ग्रामीण भू-स्वामी या साहूकार नहीं—

राज्य की मूल्य और व्यापार नीति भी है।

उनकी शेतकरी संगठन 1970 के दशक के अंत में आकार लेने लगी और 1980 के आंदोलन ने उसे राष्ट्रीय पहचान दी।

शरद जोशी की किसान राजनीति महाराष्ट्र के व्यावसायिक कृषि क्षेत्रों में तेजी से फैली।

जैसी बाजार-निर्भर फसलों के उत्पादकों में।

इन किसानों का प्रश्न जमीन से उतना नहीं था जितना—

उपज के बाजार मूल्य से।

# 13. 1980 का प्याज आंदोलन

शेतकरी संगठन को राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि महाराष्ट्र के प्याज उत्पादक आंदोलन से मिली।

महेंद्र सिंह टिकैत

बहुराष्ट्रीय कंपनियां,

अध्याय 30

1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद अखिल भारतीय किसान सभा

नई आर्थिक नीति, कृषि सब्सिडी, उर्वरक–बिजली–ऋण, आयात–निर्यात नीति, डंकल प्रस्ताव, गैट और विश्व व्यापार संगठन, कृषि पर वैश्वीकरण का प्रभाव तथा AIKS के नवउदारवाद-विरोधी किसान आंदोलनों का विकास

1991 के आर्थिक संकट और उसके बाद अपनाई गई नई आर्थिक नीति ने भारतीय किसान राजनीति के सामने वैसा ही वैचारिक मोड़ पैदा किया जैसा 1960 के दशक में हरित क्रांति और 1980 के दशक में नई किसान राजनीति ने किया था। लेकिन इस बार परिवर्तन केवल खेती की तकनीक, कृषि लागत अथवा घरेलू मूल्य नीति तक सीमित नहीं था। भारत की कृषि व्यवस्था को तेजी से विश्व बाजार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियम, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, बौद्धिक संपदा अधिकार और वैश्विक वित्तीय संस्थाओं से जोड़ा जा रहा था।

किसान के सामने अब एक नया प्रश्न था—

यदि प्याज, कपास, नारियल, तेलहन, मसाले, दूध या गेहूं की घरेलू कीमत दुनिया के बाजार से जुड़ जाएगी, तो भारतीय किसान की सुरक्षा कौन करेगा?

1980 के दशक तक किसान आंदोलन सरकार से कह रहा था—

फसल का लाभकारी मूल्य दो।

1990 के दशक में उसके सामने इन प्रश्नों के साथ नई शब्दावली जुड़ गई—

उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण, गैट, डंकल प्रस्ताव, विश्व व्यापार संगठन, कृषि समझौता, पेटेंट, आयात शुल्क और बहुराष्ट्रीय कंपनियां।

अखिल भारतीय किसान सभा ने इस परिवर्तन को भारतीय कृषि नीति के सामान्य सुधार के रूप में नहीं देखा। उसके लिए 1991 के बाद की नीति उस विकास मॉडल में बुनियादी परिवर्तन थी जिसमें स्वतंत्रता के बाद राज्य से अपेक्षा की गई थी कि वह—

सिंचाई में निवेश करे,

उर्वरक पर सहायता दे,

किसान को संस्थागत ऋण दे,

खाद्यान्न आत्मनिर्भरता बनाए रखे,

और सार्वजनिक वितरण प्रणाली से उपभोक्ता की रक्षा करे।

AIKS का तर्क था कि नई आर्थिक नीति राज्य की इसी भूमिका को कमजोर कर कृषि को बाजार और निजी पूंजी के लिए अधिक खुला बना रही है।

उसके 1995 के 28वें अखिल भारतीय सम्मेलन ने नई आर्थिक और कृषि नीति के विरुद्ध अभियान को प्रमुख संगठनात्मक कार्य घोषित किया। सम्मेलन दस्तावेज में कृषि इनपुट की बढ़ती कीमत, सार्वजनिक निवेश में गिरावट, बिजली और पानी के शुल्क, उर्वरक सब्सिडी, कृषि ऋण, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और आयात–निर्यात उदारीकरण को एक ही व्यापक नीति परिवर्तन के हिस्से के रूप में देखा गया।

लेकिन इस अध्याय का संतुलित अध्ययन एक महत्वपूर्ण सावधानी की मांग करता है।

1991 के बाद भारतीय कृषि में आया हर संकट केवल उदारीकरण के कारण नहीं था।

राज्यवार कृषि नीतियां,

वैश्विक वस्तु कीमतें,

और ग्रामीण सामाजिक संरचना—

इसी प्रकार वैश्विक व्यापार ने केवल नुकसान ही नहीं पैदा किया। कुछ निर्यातोन्मुख कृषि उत्पादकों के लिए नए बाजार अवसर भी खुले।

इसलिए इतिहास का वास्तविक प्रश्न है—

1991 के बाद कृषि में अवसर और जोखिम कैसे पुनर्वितरित हुए, और AIKS ने उस परिवर्तन को किस प्रकार किसान आंदोलन के नए राजनीतिक एजेंडे में बदला?

1. 1991 : संकट केवल कृषि का नहीं था

1991 में भारत गंभीर भुगतान-संतुलन संकट से गुजर रहा था।

विदेशी मुद्रा भंडार अत्यंत कम स्तर पर पहुंच गया था।

केंद्र सरकार ने व्यापक आर्थिक सुधार शुरू किए—

औद्योगिक लाइसेंस व्यवस्था में कमी,

आयात नीति का उदारीकरण,

विदेशी निवेश के लिए अधिक खुलापन,

सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका की समीक्षा,

राजकोषीय घाटा नियंत्रित करने के प्रयास।

कृषि औपचारिक औद्योगिक लाइसेंस व्यवस्था का हिस्सा नहीं थी—

लेकिन समूची आर्थिक नीति में बदलाव का प्रभाव खेती पर पड़ना निश्चित था।

# 2. किसान पर प्रभाव किस रास्ते से आया?

नई आर्थिक नीति किसान के खेत में सीधे “1991” लिखकर नहीं पहुंची।

निर्यात प्रतिबंध से,

और निजी कंपनियों की बढ़ती भूमिका से।

इसलिए कृषि पर उदारीकरण का अध्ययन केवल WTO दस्तावेज पढ़कर नहीं किया जा सकता।

घरेलू राजकोषीय नीति भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी।

# 3. उर्वरक नीति : 1991 का पहला बड़ा झटका

1991 के आर्थिक संकट में उर्वरक सब्सिडी सरकार के लिए बड़ा राजकोषीय प्रश्न बनी।

भारत सरकार के उर्वरक विभाग का आधिकारिक इतिहास बताता है कि जुलाई 1991 में उर्वरकों की कीमत लगभग 40 प्रतिशत बढ़ाई गई। बाद में यूरिया की कीमत में वृद्धि का कुछ हिस्सा वापस लिया गया। 1992 में फॉस्फेटिक और पोटाशिक उर्वरकों—जैसे DAP, MOP और अनेक NPK मिश्रित उर्वरकों—को नियंत्रणमुक्त किया गया।

यह किसान राजनीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था।

हरित क्रांति ने किसान को उर्वरक पर निर्भर बनाया था।

अब उसी इनपुट की कीमत तेजी से बढ़ रही थी।

# 4. AIKS ने इसे क्यों गंभीर हमला माना?

क्योंकि उसकी दृष्टि में उर्वरक सब्सिडी कोई “अनुत्पादक मुफ्त सुविधा” नहीं थी।

वह कृषि उत्पादन की लागत नियंत्रित करने का उपकरण थी।

यदि MSP उसी अनुपात में न बढ़े—

उर्वरक कम डाल सकता है,

या खेती छोड़ सकता है।

इसीलिए 1995 के AIKS सम्मेलन ने उर्वरक, कीटनाशक और कृषि उपकरणों पर सब्सिडी जारी रखने को अपनी प्रमुख मांगों में रखा।

# 5. यूरिया और DAP के बीच असंतुलन

1992 के बाद यूरिया नियंत्रित मूल्य व्यवस्था में अपेक्षाकृत अधिक संरक्षित रहा जबकि फॉस्फेटिक और पोटाशिक उर्वरक नियंत्रणमुक्त हुए।

इससे किसानों की उर्वरक उपयोग संरचना प्रभावित हो सकती थी।

महंगा फॉस्फोरस और पोटाश।

आगे भारतीय कृषि में पोषक तत्व संतुलन स्वयं एक महत्वपूर्ण नीति प्रश्न बना।

यह दिखाता है कि सब्सिडी नीति केवल किसान आय नहीं—

मिट्टी और उत्पादन पद्धति को भी प्रभावित कर सकती है।

# 6. बिजली और सिंचाई

हरित क्रांति क्षेत्रों में किसान की दूसरी बड़ी लागत थी—

ट्यूबवेल सिंचाई बिजली अथवा डीजल पर निर्भर थी।

यदि बिजली शुल्क बढ़े—

खेती की प्रत्यक्ष लागत बढ़ती।

1995 के AIKS सम्मेलन ने बिजली और पानी के शुल्क में वृद्धि के विरुद्ध संघर्ष को अपने तत्काल कार्यक्रम में रखा तथा सिंचाई और बिजली में अधिक सार्वजनिक निवेश की मांग की।

इस मुद्दे पर AIKS और 1980 के दशक की BKU जैसी नई किसान राजनीति के बीच महत्वपूर्ण समानता थी।

# 7. लेकिन AIKS की भाषा अलग थी

किसान को सस्ती बिजली दो।

AIKS इसके साथ पूछती थी—

राज्य बिजली क्षेत्र से निवेश क्यों घटा रहा है?

निजी बिजली कंपनी कितनी कीमत मांगेगी?

छोटा किसान क्या वहन कर पाएगा?

इसलिए उसके लिए बिजली दर केवल तत्काल राहत का सवाल नहीं—

कृषि अवसंरचना के स्वामित्व और विकास मॉडल का प्रश्न भी था।

# 8. सार्वजनिक निवेश : AIKS की सबसे बड़ी चिंता

AIKS ने 1990 के दशक में बार-बार कहा कि कृषि विकास के लिए केवल मूल्य बढ़ाना पर्याप्त नहीं।

राज्य को निवेश करना होगा—

1995 के उसके दस्तावेज में सार्वजनिक कृषि निवेश में गिरावट को नई आर्थिक नीति की सबसे गंभीर समस्याओं में गिना गया।

यह उसकी शरद जोशी जैसी बाजार समर्थक किसान धाराओं से एक बड़ी वैचारिक दूरी थी।

# 9. अधिक मूल्य बनाम अधिक सार्वजनिक निवेश

नरसिंह राव सरकार की कृषि नीति को AIKS ने इस आधार पर आलोचना की कि अधिक कृषि मूल्य और निर्यात अवसरों से निजी कृषक निवेश बढ़ने की उम्मीद की जा रही थी।

किसान सभा का तर्क था—

यदि किसान के गांव में सिंचाई नहीं,

तो केवल कीमत का संकेत उसे उत्पादन विस्तार में सक्षम नहीं बनाता।

इसलिए उसकी वैकल्पिक कृषि नीति में सार्वजनिक निवेश केंद्रीय रहा।

# 10. बैंकिंग और ऋण : 1969 की दिशा से दूरी?

1969 के बैंक राष्ट्रीयकरण के बाद ग्रामीण शाखाओं और कृषि ऋण में विस्तार हुआ था।

1991 के बाद बैंकिंग क्षेत्र में भी सुधार शुरू हुए।

3. निर्यात प्रतिस्पर्धा

खाद्यान्न आत्मनिर्भरता,

अध्याय 31

कृषि संकट, किसान आत्महत्याएं और अखिल भारतीय किसान सभा, 1995–2010

विदर्भ–आंध्र–कर्नाटक सहित संकटग्रस्त क्षेत्र, ऋण और लागत, कपास व नकदी फसलें, WTO के बाद मूल्य अस्थिरता, संस्थागत ऋण, 2008 की कृषि ऋण माफी, स्वामीनाथन आयोग और AIKS की ‘लाभकारी मूल्य + ऋण मुक्ति’ राजनीति

1995 से 2010 के बीच भारतीय किसान राजनीति की भाषा में एक ऐसा शब्द स्थायी रूप से प्रवेश कर गया जो पहले के किसान आंदोलनों की केंद्रीय शब्दावली नहीं था—

भारत में किसानों द्वारा आत्महत्या की घटनाएं इससे पहले भी होती थीं, लेकिन 1990 के दशक के उत्तरार्ध से महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और कुछ अन्य राज्यों में इन घटनाओं की लगातार रिपोर्टिंग ने कृषि संकट को राष्ट्रीय राजनीतिक प्रश्न बना दिया। स्वतंत्र शोध में NCRB आंकड़ों के आधार पर 1997–2012 के दौरान 2,64,388 किसान आत्महत्याएं दर्ज की गईं; 1995–2010 के उपलब्ध NCRB-आधारित संकलन में संख्या लगभग 2,56,913 बैठती है। इन आंकड़ों को सावधानी से पढ़ना चाहिए क्योंकि NCRB की पेशागत श्रेणियां, राज्य पुलिस की रिपोर्टिंग और यह निर्धारित करने की प्रक्रिया कि किसे ‘farmer’ माना गया, स्वयं विवाद का विषय रही है।

इस काल ने अखिल भारतीय किसान सभा के सामने एक बेहद कठिन राजनीतिक प्रश्न रखा।

1980 के दशक में वह कह रही थी—

खेती को लाभकारी बनाओ।

1990 के दशक में उसने कहा—

वैश्वीकरण और सार्वजनिक निवेश में कमी से छोटे किसान को बचाओ।

लेकिन 2000 के दशक में समस्या उससे भी आगे बढ़ी—

किसान खेती करते हुए इतना आर्थिक और सामाजिक दबाव क्यों झेल रहा है कि हजारों परिवार चरम संकट में पहुंच रहे हैं?

यहीं AIKS की कृषि राजनीति में दो पुराने नारे एक-दूसरे से अधिक मजबूती से जुड़ गए—

लाभकारी मूल्य + ऋण मुक्ति।

और इनके साथ तीसरा तत्व जुड़ा—

सार्वजनिक निवेश और संस्थागत सुरक्षा।

इसलिए 1995–2010 का इतिहास केवल किसान आत्महत्याओं की संख्या का इतिहास नहीं है। यह भारतीय कृषि में बाजार जोखिम, नकद लागत, ऋण, असिंचित खेती, नकदी फसलों, मूल्य अस्थिरता, ग्रामीण बैंकिंग और राज्य की कृषि नीति के परस्पर संबंध का इतिहास है।

1. किसान आत्महत्या को एक-कारण वाली कहानी क्यों नहीं बनाया जा सकता?

सबसे पहले एक महत्वपूर्ण इतिहासलेखन सावधानी।

किसान आत्महत्या को केवल किसी एक कारण से जोड़ना उचित नहीं—

या केवल बाजार मूल्य।

स्वतंत्र कृषि शोध ने बार-बार इसे व्यापक agrarian distress—कृषि संकट के संदर्भ में पढ़ने पर जोर दिया है, जिसमें ऋण, उत्पादन जोखिम, मूल्य, भूमि आकार, सिंचाई, फसल विफलता और स्थानीय सामाजिक परिस्थितियां एक-दूसरे से जुड़ सकती हैं।

यही इस अध्याय की आधारभूत पद्धति होनी चाहिए।

# 2. आंकड़े भयावह थे

NCRB-आधारित स्वतंत्र अध्ययन के अनुसार—

किसान आत्महत्याएं दर्ज की गईं।

इन आंकड़ों से स्पष्ट है—

यह एक वर्ष की असाधारण घटना नहीं थी।

लगातार एक दशक से अधिक समय तक संख्या बहुत ऊंची बनी रही।

इस अवधि में 2004 का NCRB आंकड़ा 18,241 किसान आत्महत्याओं का था।

यह उस समय कुल आत्महत्याओं का लगभग 16 प्रतिशत था।

इसका अर्थ यह नहीं कि आत्महत्या का हर मामला कृषि नीति के कारण था।

लेकिन इतनी बड़ी पेशागत श्रेणी में लगातार उच्च संख्या कृषि संकट की गंभीरता को अनदेखा करना असंभव बनाती थी।

# 4. 1995–2010 : लगभग ढाई लाख से अधिक

उपलब्ध NCRB आंकड़ों के संकलन के अनुसार 1995 से 2010 तक देश में कुल लगभग 2,56,913 किसान आत्महत्याएं दर्ज हुईं।

यह आंकड़ा भारतीय किसान आंदोलन के लिए प्रतीकात्मक बन गया।

लेकिन वेबसाइट के शोध संस्करण में इसे इस तरह लिखना बेहतर होगा—

“NCRB की तत्कालीन पेशागत श्रेणी ‘farming/agriculture’ के आधार पर उपलब्ध संकलनों में…”

इससे यह भ्रम नहीं रहेगा कि यह किसी स्वतंत्र कृषि जनगणना द्वारा प्रमाणित संख्या है।

# 5. NCRB आंकड़ों की पहली सीमा : ‘किसान’ कौन?

यदि जमीन पति के नाम है—

खेत में बराबर काम करने वाली पत्नी को सरकारी रिकॉर्ड में किसान माना जाए या नहीं?

यदि किसान जमीन पट्टे पर लेकर खेती करता है—

उसकी पेशागत पहचान कैसे दर्ज होती है?

यदि व्यक्ति खेती और मजदूरी दोनों करता था?

यदि परिवार ने आत्महत्या का कारण कृषि संकट बताया लेकिन पुलिस ने दूसरी श्रेणी लिखी?

इन्हीं कारणों से आधिकारिक किसान आत्महत्या आंकड़ों की व्याख्या में सावधानी आवश्यक है।

# 6. महिला किसान की अदृश्यता

AIKS ने अपनी रिपोर्टों में विशेष रूप से आलोचना की कि भूमि सामान्यतः महिलाओं के नाम न होने के कारण किसान महिलाओं की आत्महत्याएं कृषि श्रेणी में दर्ज न होने की संभावना रहती है।

उसकी 2009 के आसपास की राष्ट्रीय रिपोर्ट में यही तर्क दिया गया कि आधिकारिक किसान आत्महत्या संख्या वास्तविक कृषि संकट को कम करके दिखा सकती है।

यह AIKS का संगठनात्मक मूल्यांकन है—

लेकिन महिला भूमि-अधिकार और किसान पहचान के इतिहास में इसका वास्तविक महत्व है।

# 7. संकट पूरे भारत में समान नहीं था

किसान आत्महत्याओं का क्षेत्रीय वितरण अत्यंत असमान था।

विशेष चिंता के राज्य बने—

मध्य प्रदेश/छत्तीसगढ़ के हिस्से।

1995–2010 के NCRB-आधारित संकलन में महाराष्ट्र लगभग 50,481, कर्नाटक लगभग 35,053 और आंध्र प्रदेश लगभग 31,120 दर्ज मामलों के साथ प्रमुख राज्यों में थे।

इसलिए संकट का अध्ययन राष्ट्रीय औसत से नहीं—

कृषि-क्षेत्रीय संरचना से करना चाहिए।

# 8. महाराष्ट्र : सबसे बड़ी संख्या

1995–2010 के संकलित NCRB आंकड़ों में महाराष्ट्र में लगभग 50 हजार से अधिक किसान आत्महत्याएं दर्ज हुईं—किसी भी राज्य से अधिक।

लेकिन महाराष्ट्र के भीतर भी स्थिति समान नहीं थी।

विशेष चर्चा का केंद्र बना—

विदर्भ का बड़ा हिस्सा—

छोटी और मध्यम जोत वाला,

और मौसम तथा बाजार दोनों जोखिमों के प्रति संवेदनशील था।

कपास किसान को उत्पादन के पहले नकद खर्च करना पड़ता—

फसल खराब हुई या बाजार भाव गिरा—

तो कर्ज चुकाना कठिन।

यही नकदी फसल–ऋण–मूल्य का त्रिकोण विदर्भ की कृषि राजनीति के केंद्र में आया।

# 10. केवल कपास से आत्महत्या समझना गलत

कपास संकट महत्वपूर्ण था—

लेकिन हर किसान आत्महत्या कपास किसान की नहीं थी।

न हर कपास किसान ऋण संकट में समान रूप से था।

न तकनीक अकेली निर्णायक थी।

कृषि संकट का वास्तविक विश्लेषण करना हो तो साथ देखना होगा—

इसीलिए “एक तकनीक = आत्महत्या” जैसे प्रत्यक्ष कारणात्मक दावे से बचना चाहिए।

# 11. आंध्र प्रदेश : ऋण संकट का दूसरा बड़ा क्षेत्र

2003 के NSS सर्वेक्षण ने दिखाया कि देश के किसान परिवारों में ऋणग्रस्तता का अनुपात सबसे अधिक आंध्र प्रदेश—82 प्रतिशत था।

राष्ट्रीय स्तर पर 48.6 प्रतिशत किसान परिवार ऋणग्रस्त पाए गए थे।

यह आंकड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण है।

क्योंकि यह आत्महत्या के पुलिस आंकड़े से अलग स्वतंत्र आर्थिक सर्वेक्षण था।

यानी कृषि ऋण संकट केवल राजनीतिक नारा नहीं था।

# 12. पूरे भारत में लगभग आधे किसान परिवार ऋणग्रस्त

NSS Report No. 498 के अनुसार 2003 में देश में लगभग 8.935 करोड़ किसान परिवार थे।

इनमें लगभग 4.342 करोड़—48.6 प्रतिशत—ऋणग्रस्त थे।

यह बताता है कि ऋण भारत की कृषि अर्थव्यवस्था का सामान्य हिस्सा बन चुका था।

लेकिन ऋणग्रस्तता = संकट नहीं।

और आय के अनुपात में कितना?

# 13. ऋण का अधिकांश हिस्सा कृषि से जुड़ा था

NSS के अनुसार किसान परिवारों के बकाया ऋण के प्रति 1,000 रुपये में लगभग 584 रुपये कृषि व्यवसाय की पूंजीगत अथवा चालू जरूरतों के लिए लिए गए ऋण थे।

इससे एक लोकप्रिय सरलीकरण टूटता है—

किसान केवल शादी-ब्याह के कारण कर्जदार नहीं था।

कृषि स्वयं ऋण मांग रही थी।

# 14. बैंक और महाजन दोनों मौजूद

लेकिन साहूकारों/मनीलेंडरों का हिस्सा भी लगभग 26 प्रतिशत था।

# 15. इसका किसान संकट से संबंध

महत्वपूर्ण परिवर्तन था—

अध्याय 32

2010–17 में अखिल भारतीय किसान सभा

भूमि अधिग्रहण संघर्ष, 2013 भूमि अधिग्रहण कानून, कॉरपोरेट परियोजनाओं के विरुद्ध किसान आंदोलन, स्वामीनाथन आयोग और MSP की राजनीति, 2014 के बाद भूमि अध्यादेश विरोध तथा मंदसौर से नए अखिल भारतीय किसान समन्वय की ओर बढ़ता आंदोलन

2010 से 2017 का समय अखिल भारतीय किसान सभा और व्यापक भारतीय किसान आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण संक्रमणकाल था। पिछले डेढ़ दशक में कृषि संकट, किसान आत्महत्याएं, ऋण और लागत राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ चुके थे। लेकिन इस अवधि में एक पुराना प्रश्न फिर नए रूप में लौट आया—

इस बार किसान केवल जमींदार के विरुद्ध जमीन के अधिकार के लिए नहीं लड़ रहा था। उसका संघर्ष उन राज्य सरकारों, विकास प्राधिकरणों, औद्योगिक परियोजनाओं, विशेष आर्थिक क्षेत्रों, खनन कंपनियों, राजमार्गों और अन्य परियोजनाओं से था जिनके लिए कृषि और आदिवासी भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा था।

इसलिए किसान राजनीति की शब्दावली में एक नई अभिव्यक्ति प्रमुख हुई—

कॉरपोरेट भूमि-अधिग्रहण।

और इसके साथ ही दो अलग किसान संकट एक-दूसरे से जुड़ गए।

मेरी फसल का लाभकारी मूल्य दो और कर्ज से मुक्त करो।

2017 तक यही तीन मुद्दे—भूमि, मूल्य और ऋण—भारत में नए अखिल भारतीय किसान समन्वय की आधारभूमि बनने वाले थे।

अखिल भारतीय किसान सभा ने भी इसी दौर में अपनी रणनीति को बड़े किसान गठबंधनों की दिशा में बदला। 2015 के भूमि अध्यादेश विरोध में उसने अनेक किसान, कृषि मजदूर, आदिवासी, दलित और जनांदोलन संगठनों के साथ भूमि अधिकार आंदोलन/Bhoomi Adhikar Andolan बनाने में भूमिका निभाई; और जून 2017 के मंदसौर किसान गोलीकांड के बाद वही अनुभव एक नए व्यापक किसान मंच—All India Kisan Sangharsh Coordination Committee (AIKSCC)—की दिशा में बढ़ा। AIKS के अपने बाद के दस्तावेज इस क्रम को भूमि-अधिग्रहण विरोधी एकता से किसान ऋणमुक्ति और लाभकारी मूल्य के राष्ट्रीय संयुक्त आंदोलन तक की यात्रा के रूप में दर्ज करते हैं।

लेकिन इस अध्याय का आरंभ 2014 या 2017 से नहीं—

2010 के जमीन संघर्षों से होना चाहिए।

1. 2010 में भूमि प्रश्न क्यों फिर राष्ट्रीय बन रहा था?

1991 के बाद भारत में—

विशेष आर्थिक क्षेत्र,

आवासीय और व्यावसायिक रियल एस्टेट—

के लिए भूमि की मांग तेजी से बढ़ी।

भूमि केवल कृषि उत्पादन का साधन नहीं रही।

औद्योगिक संपत्ति, शहरी रियल एस्टेट और अवसंरचना पूंजी

का आधार भी बन रही थी।

इससे कृषि भूमि का बाजार मूल्य बढ़ा।

लेकिन किसान का प्रश्न था—

इस मूल्य वृद्धि का लाभ किसे मिलेगा?

# 2. 1894 का औपनिवेशिक भूमि अधिग्रहण कानून अभी लागू था

2010 के आरंभ में भारत में भूमि अधिग्रहण का मूल केंद्रीय कानून अब भी Land Acquisition Act, 1894 था।

AIKS लंबे समय से इसकी आलोचना करती थी।

औपनिवेशिक शासन ने इसे भूमि तेजी और कम कीमत पर लेने के लिए बनाया था;

स्वतंत्र भारत में भी प्रशासन को भूमि अधिग्रहण की अत्यधिक शक्ति मिली हुई थी;

भूमि मालिक के अतिरिक्त उस जमीन पर निर्भर बटाईदार, कृषि मजदूर, मछुआरे और अन्य लोगों के आजीविका अधिकार पर्याप्त रूप से सुरक्षित नहीं थे।

AIKS के भूमि आयोग ने 1894 कानून को “quick, cheap and easy” acquisition के औपनिवेशिक ढांचे से जोड़ते हुए व्यापक लोकतांत्रिक संशोधन की मांग की थी।

# 3. भूमि का बाजार मूल्य बनाम किसान की आजीविका

भूमि अधिग्रहण में सबसे बड़ी समस्या केवल मुआवजा नहीं।

मान लीजिए किसान को जमीन का अच्छा मूल्य मिल गया।

कृषि मजदूर का रोजगार गया।

दूध, पशुपालन, चारा, गांव का साझा संसाधन प्रभावित।

इसलिए किसान संगठनों ने कहा—

भूमि की कीमत और आजीविका की कीमत एक ही चीज नहीं।

यही विचार बाद में 2013 कानून में पुनर्वास और पुनर्स्थापन को भूमि अधिग्रहण से जोड़ने का आधार बना।

# 4. Tappal, अलीगढ़ : 2010

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के टप्पल क्षेत्र में यमुना एक्सप्रेसवे परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसान संघर्ष 2010 में हिंसक टकराव तक पहुंचा।

AIKS की 33वीं सम्मेलन रिपोर्ट के अनुसार जिकरपुर में किसानों पर पुलिस गोलीबारी के बाद किसान सभा ने 23 जिलों में प्रदर्शन किए और मारे गए किसानों के परिवारों के लिए मुआवजे तथा 1894 के कानून को बदलने की मांग की। 22 अगस्त 2010 को AIKS के केंद्रीय और राज्य नेताओं का प्रतिनिधिमंडल टप्पल पहुंचा।

अब भूमि अधिग्रहण विरोध स्थानीय गांव से निकलकर राष्ट्रीय किसान संगठन का विषय बन रहा था।

# 5. ग्रेटर नोएडा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में तेजी से शहरीकरण के कारण किसानों की भूमि बड़े पैमाने पर विकास परियोजनाओं और रियल एस्टेट के लिए अधिग्रहित हो रही थी।

किसानों की शिकायतें थीं—

भूमि का कम अधिग्रहण मूल्य,

बाद में उसी जमीन की बहुत ऊंची व्यावसायिक कीमत,

और भूमि के उपयोग में बदलाव।

यदि “सार्वजनिक उद्देश्य” से अधिग्रहित जमीन अंततः निजी रियल एस्टेट में चली जाए तो सार्वजनिक उद्देश्य की सीमा क्या है?

# 6. भट्टा–पारसौल, 2011

ग्रेटर नोएडा क्षेत्र के भट्टा–पारसौल गांवों में 2011 में भूमि अधिग्रहण विवाद ने राष्ट्रीय राजनीतिक रूप लिया।

पुलिस और ग्रामीणों के बीच टकराव हुआ और मौतें हुईं।

AIKS के बाद के स्रोत इन संघर्षों को उन राष्ट्रीय भूमि आंदोलनों में रखते हैं जिनके दबाव ने अंततः 1894 कानून बदलने का राजनीतिक वातावरण बनाया।

भट्टा–पारसौल राष्ट्रीय प्रतीक इसलिए बना क्योंकि उसने दिखाया—

भूमि का प्रश्न केवल मुआवजा नहीं;

सहमति और राज्य की अधिग्रहण शक्ति भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।

# 7. भूमि पर किसान की सहमति क्यों केंद्रीय बनी?

यदि सरकार किसी निजी परियोजना के लिए भूमि ले—

क्या किसान की सहमति आवश्यक हो?

पुराने कानून में राज्य की शक्ति बहुत व्यापक थी।

किसान आंदोलनों ने कहा—

निजी लाभ के लिए राज्य किसान की जमीन जबरन क्यों ले?

यहीं prior informed consent—पूर्व-सूचित सहमति की मांग मजबूत हुई।

AIKS अपने भूमि संबंधी ज्ञापनों में लगातार लोकतांत्रिक और पारदर्शी प्रक्रिया की मांग कर रही थी।

# 8. कर्नाटक, ओडिशा और अन्य क्षेत्र

2010–12 के दौरान भूमि संघर्ष केवल उत्तर प्रदेश में नहीं थे।

AIKS की सम्मेलन रिपोर्ट में कर्नाटक में भूमि अधिग्रहण विरोध, बेल्लारी में बाइक रैली, तथा गडग में POSCO से संबंधित भूमि अधिग्रहण विरोध का उल्लेख है।

ओडिशा में उसकी राज्य इकाई ने—

से जुड़े विभिन्न भूमि संघर्षों में भागीदारी दर्ज की।

# 9. POSCO : भूमि और औद्योगिक विकास का बड़ा विवाद

ओडिशा की प्रस्तावित POSCO परियोजना भारत की सबसे बड़ी विदेशी औद्योगिक निवेश परियोजनाओं में गिनी जाती थी।

उससे जुड़े भूमि अधिग्रहण और वन अधिकार के प्रश्न ने राष्ट्रीय बहस खड़ी की।

AIKS ने परियोजना के विरोध में स्थानीय किसान और आदिवासी आंदोलनों का समर्थन किया।

# 10. भूमि संघर्ष और कॉरपोरेट प्रश्न

AIKS ने धीरे-धीरे भूमि अधिग्रहण को केवल “सरकार बनाम किसान” नहीं माना।

उसकी राजनीतिक व्याख्या थी—

राज्य सरकारें निजी कंपनियों और रियल एस्टेट हितों के लिए भूमि उपलब्ध कराने वाले मध्यस्थ की भूमिका निभा रही हैं।

उसके भूमि आयोग के दस्तावेज में स्पष्ट चिंता व्यक्त की गई कि कई राज्य सरकारें सरकारी और किसान भूमि बड़े निजी पूंजी समूहों को उपलब्ध करा रही थीं।

यह संगठन की मार्क्सवादी राजनीतिक व्याख्या थी।

इसे हर परियोजना पर स्वतः तथ्य नहीं माना जाना चाहिए—

लेकिन 2010 के दशक की किसान सभा राजनीति को समझने के लिए यह केंद्रीय है।

# 11. AIKS विकास का विरोध नहीं कर रही थी

यह तथ्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

उसके भूमि आयोग ने साफ कहा—

आर्थिक विकास में कुछ भूमि का गैर-कृषि उपयोग अपरिहार्य है।

विस्थापन-विरोधी जनांदोलन—

अध्याय 33

2017–19 में अखिल भारतीय किसान सभा का नया उभार

महाराष्ट्र किसान लॉन्ग मार्च 2018, नासिक से मुंबई तक पदयात्रा, वनाधिकार–ऋणमाफी–MSP की मांगें, AIKSCC किसान संसद और किसान मुक्ति मार्च, दिल्ली में राष्ट्रीय किसान एकता तथा 2019 के आम चुनाव से पहले कृषि संकट का राजनीतिक प्रभाव

2017 से 2019 का काल अखिल भारतीय किसान सभा के स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे उल्लेखनीय पुनरुत्थान कालों में गिना जा सकता है। यह वह समय था जब लगभग आठ दशक पुराना संगठन अपनी पारंपरिक वैचारिक और भौगोलिक सीमाओं से बाहर निकलकर फिर राष्ट्रीय किसान राजनीति के केंद्र में दिखाई देने लगा।

इस उभार के तीन दृश्य भारतीय किसान आंदोलन की सामूहिक स्मृति में विशेष रूप से दर्ज हुए—

नवंबर 2017 की दिल्ली किसान संसद, मार्च 2018 का नासिक–मुंबई किसान लॉन्ग मार्च और नवंबर 2018 का दिल्ली किसान मुक्ति मार्च।

इन तीनों के बीच एक गहरा संबंध था।

2017 की किसान संसद ने मांगों को राष्ट्रीय राजनीतिक कार्यक्रम दिया।

2018 के महाराष्ट्र लॉन्ग मार्च ने उन्हें जनांदोलन की असाधारण दृश्य शक्ति प्रदान की।

और नवंबर 2018 के किसान मुक्ति मार्च ने विभिन्न विचारधाराओं के लगभग 200 किसान संगठनों को राष्ट्रीय राजधानी में एक साझा मंच पर खड़ा कर दिया।

इस काल में किसान राजनीति के केंद्र में तीन शब्द आ चुके थे—

और महाराष्ट्र ने इनमें चौथा प्रश्न अत्यंत मजबूती से जोड़ दिया—

यही कारण है कि 2018 का किसान लॉन्ग मार्च केवल ऋणमाफी आंदोलन नहीं था। उसमें आदिवासी किसान, छोटे किसान, खेतिहर मजदूर और वनभूमि पर पीढ़ियों से खेती कर रहे समुदाय बड़ी संख्या में शामिल थे।

1. मंदसौर के बाद का भारत

पिछले अध्याय में हमने देखा कि 6 जून 2017 के मंदसौर किसान आंदोलन और पुलिस गोलीबारी के बाद किसान असंतोष ने राष्ट्रीय रूप ग्रहण किया।

महाराष्ट्र में किसान हड़ताल हो चुकी थी।

मध्य प्रदेश में आंदोलन उग्र हुआ था।

राजस्थान में किसान आंदोलन चल रहे थे।

तमिलनाडु के किसान दिल्ली तक पहुंच रहे थे।

उत्तर भारत में ऋण और MSP का सवाल लगातार उठ रहा था।

समस्या अब किसी एक फसल या राज्य की नहीं दिखाई दे रही थी।

विभिन्न कृषि क्षेत्रों के संकट अलग थे, लेकिन किसान संगठनों ने दो ऐसी मांगें खोज ली थीं जो उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर जोड़ सकती थीं—

उत्पादन लागत के ऊपर लाभकारी मूल्य।

# 2. AIKSCC : संगठन नहीं, किसान संगठनों का मंच

मंदसौर के बाद बनी All India Kisan Sangharsh Coordination Committee—AIKSCC को समझना इस पूरे अध्याय के लिए आवश्यक है।

यह स्वयं AIKS नहीं थी।

यह अनेक किसान संगठनों का समन्वय मंच था।

AIKS उसके महत्वपूर्ण घटकों में शामिल थी।

नवंबर 2017 तक किसान संसद में 184 से अधिक संगठनों के प्रतिनिधि भाग ले रहे थे। नवंबर 2018 तक किसान मुक्ति मार्च के समय गठबंधन को लगभग 200 किसान संगठनों का मंच बताया जा रहा था।

इसका ऐतिहासिक महत्व संख्या से अधिक था।

इसमें अलग-अलग राजनीतिक और वैचारिक परंपराओं के किसान संगठन शामिल थे।

# 3. एक झंडे के स्थान पर अनेक झंडे

1936 की अखिल भारतीय किसान सभा ने किसान आंदोलन को एक राष्ट्रीय संगठन के नीचे लाने की कोशिश की थी।

2017 का मॉडल अलग था।

क्षेत्रीय संगठनों के अपने झंडे—

एक ही जुलूस में दिखाई दे सकते थे।

नवंबर 2017 की किसान संसद के AIKS विवरण में स्वयं लाल, हरे, नीले, पीले और गुलाबी झंडों वाले किसान संगठनों का उल्लेख किया गया।

यह प्रतीकात्मक परिवर्तन बहुत महत्वपूर्ण था।

एकता का अर्थ संगठनात्मक विलय नहीं रहा।

# 4. किसान संसद : नवंबर 2017

20 और 21 नवंबर 2017 को दिल्ली में किसान मुक्ति संसद/Kisan Sansad आयोजित हुई।

देश के विभिन्न हिस्सों से किसान दिल्ली पहुंचे।

AIKS के विवरण के अनुसार 184 से अधिक किसान संगठनों ने इसमें प्रतिनिधित्व किया और रामलीला मैदान से संसद मार्ग तक विशाल जुलूस निकाला गया।

यह कोई संवैधानिक संसद नहीं थी।

यह आंदोलनकारी किसान संगठनों द्वारा आयोजित प्रतीकात्मक “किसान संसद” थी।

लेकिन इसके भीतर एक अत्यंत दिलचस्प राजनीतिक प्रयोग हुआ।

# 5. केवल नारे नहीं—कानून का मसौदा

AIKSCC ने तय किया कि यदि सरकार किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं कर रही—

तो किसान स्वयं बताएंगे कि कानून कैसा होना चाहिए।

दो विधायी प्रस्ताव सामने रखे गए।

The Farmers' Freedom from Indebtedness Bill, 2017.

कृषि उपज के लिए लाभकारी/गारंटीकृत मूल्य सुनिश्चित करने से संबंधित विधेयक।

“यह रहा हमारा प्रस्तावित कानून”

# 6. Farmers' Freedom from Debt Bill

ऋणमुक्ति संबंधी प्रस्तावित विधेयक का उद्देश्य केवल एक बार की ऋणमाफी नहीं था।

उसमें तत्काल राहत के साथ ऐसी व्यवस्था की परिकल्पना थी जिसमें संकटग्रस्त किसानों की ऋण समस्या के लिए संस्थागत तंत्र बनाया जाए।

AIKS द्वारा प्रकाशित विधेयक में किसानों की तत्काल ऋणमाफी के साथ indebtedness के कारण संकट में फंसे किसानों के लिए आयोग स्थापित करने का प्रस्ताव था।

यह महत्वपूर्ण वैचारिक बदलाव था।

# 7. कर्जमाफी बनाम कर्जमुक्ति

दोनों शब्द समान नहीं।

पुराना ऋण सरकार माफ कर दे।

ऐसी कृषि और ऋण व्यवस्था बने कि किसान बार-बार असहनीय कर्ज में न फंसे।

AIKSCC की राजनीतिक भाषा में दूसरा विचार अधिक व्यापक था।

क्योंकि 2008 की राष्ट्रीय ऋणमाफी के बाद भी 2017 में ऋण संकट वापस आ चुका था।

# 8. किसान क्यों फिर कर्जदार?

किसान संगठनों का तर्क था—

यदि खेती की आय लागत से लगातार कम रहे,

यदि फसल खराब होने पर पर्याप्त बीमा न मिले,

यदि संस्थागत ऋण पर्याप्त न हो,

यदि बाजार भाव गिर जाए,

तो ऋणमाफी के बाद किसान फिर कर्जदार होगा।

कर्ज का समाधान मूल्य नीति से जुड़ा है।

यहीं AIKSCC के दोनों प्रस्तावित कानून आपस में मिलते थे।

# 9. दूसरा प्रश्न : लाभकारी मूल्य

किसान संसद की दूसरी केंद्रीय मांग थी—

कृषि उत्पादन लागत के ऊपर 50 प्रतिशत मार्जिन वाला मूल्य।

AIKS के किसान संसद विवरण में इसे सीधे—

“crop prices 50 percent above cost of production”

AIKS की अपनी राजनीति में इसे आगे व्यापक लागत C2 + 50% से जोड़कर प्रस्तुत किया गया।

# 10. किसान संसद का ऐतिहासिक महत्व

किसान आंदोलन अब केवल सड़क पर प्रदर्शन नहीं कर रहा था।

कृषि संकट का समाधान विधायी होना चाहिए।

इससे आगे एक नई मांग निकली—

संसद का विशेष अधिवेशन बुलाओ।

कृषि संकट पर चर्चा करो।

और किसानों द्वारा प्रस्तावित ऋणमुक्ति तथा लाभकारी मूल्य संबंधी कानून पारित करो।

2018 के किसान मुक्ति मार्च तक यही राष्ट्रीय मांग बन गई।

# 11. इसी समय महाराष्ट्र में संकट पक रहा था

राष्ट्रीय स्तर पर AIKSCC बन रही थी।

लेकिन महाराष्ट्र में AIKS का अपना संगठनात्मक आंदोलन अलग दिशा में विकसित हो रहा था।

2017 में महाराष्ट्र सरकार ने लगभग ₹34,000 करोड़ की कृषि ऋणमाफी योजना घोषित की थी।

लेकिन किसान संगठनों की शिकायत थी—

परिवार संबंधी प्रावधानों

के कारण बड़ी संख्या में किसान पूर्ण लाभ नहीं ले पा रहे थे।

AIKS ने इसे अधूरी ऋणमाफी कहा।

# 12. महाराष्ट्र में दूसरा प्रश्न : वनाधिकार

महाराष्ट्र के किसान आंदोलन की विशिष्टता यहीं थी।

जैसे क्षेत्रों में बड़ी आदिवासी आबादी पीढ़ियों से वनभूमि पर खेती करती थी।

लेकिन कानूनी स्वामित्व का प्रश्न unresolved था।

Scheduled Tribes and Other Traditional Forest Dwellers (Recognition of Forest Rights) Act, 2006—Forest Rights Act ने व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों की मान्यता की व्यवस्था की थी।

कार्यान्वयन धीमा था।

# 13. जमीन जोत रहे थे, मालिक नहीं थे

लेकिन राजस्व रिकॉर्ड में जमीन उनके नाम नहीं।

नदी-जोड़ परियोजनाएं।

अध्याय 34

2020 के तीन कृषि कानून और अखिल भारतीय किसान सभा

कृषि उपज व्यापार एवं वाणिज्य कानून, मूल्य आश्वासन एवं कृषि सेवा समझौता कानून और आवश्यक वस्तु संशोधन; केंद्र सरकार का सुधार तर्क, किसान संगठनों की आशंकाएं, MSP–मंडी–कॉरपोरेट कृषि का विवाद, AIKS की प्रारंभिक प्रतिक्रिया और राष्ट्रीय किसान प्रतिरोध की तैयारी

2020 के तीन केंद्रीय कृषि कानून भारतीय किसान राजनीति के इतिहास में केवल तीन विधायी परिवर्तन नहीं थे। उन्होंने कृषि बाजार, राज्य की भूमिका, निजी व्यापार, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग, भंडारण, न्यूनतम समर्थन मूल्य और कृषि संघवाद पर दशकों से चल रही बहसों को एक साथ राष्ट्रीय राजनीतिक संघर्ष में बदल दिया।

इन कानूनों ने तत्काल तीन प्रश्न खड़े किए—

किसान अपनी उपज कहां और किसे बेचे?

कृषि बाजार में राज्य, मंडी और निजी कंपनी का संतुलन क्या हो?

यदि सरकारी मंडी और MSP व्यवस्था कानून में समाप्त नहीं की जा रही, तो किसान फिर इतने चिंतित क्यों थे?

इन्हीं प्रश्नों के उत्तर में 2020–21 का वह आंदोलन विकसित हुआ जिसने स्वतंत्र भारत में किसान संगठनों की अभूतपूर्व राष्ट्रीय एकता पैदा की।

अखिल भारतीय किसान सभा इस संघर्ष में प्रारंभिक चरण से सक्रिय थी। लेकिन उस आंदोलन को केवल AIKS का आंदोलन कहना उतना ही गलत होगा जितना उसे केवल पंजाब–हरियाणा के किसानों का आंदोलन कहना। जून 2020 के अध्यादेशों से शुरू विरोध आगे AIKSCC, अनेक स्वतंत्र पंजाब किसान संगठनों, भारतीय किसान यूनियनों, वाम किसान संगठनों और अंततः संयुक्त किसान मोर्चा जैसे व्यापक मंच में विकसित हुआ।

इस अध्याय का दायरा मुख्यतः उस बिंदु तक है जहां—

तीन कानून बने, उन पर वैचारिक और आर्थिक विवाद पैदा हुआ, AIKS और अन्य किसान संगठनों ने विरोध संगठित किया, और नवंबर 2020 के ‘दिल्ली चलो’ आंदोलन की जमीन तैयार हुई।

एक वर्ष लंबे दिल्ली सीमा आंदोलन और कानूनों की वापसी का विस्तृत अध्ययन अगले अध्याय में किया जाएगा।

# 1. तीन कानून अचानक शून्य से नहीं आए थे

2020 के कृषि सुधारों की जड़ें कई दशक पुरानी थीं।

भारत में कृषि बाजार मुख्यतः राज्यों के कृषि उपज विपणन समिति—APMC—कानूनों से संचालित होते रहे।

लेकिन समय के साथ आलोचनाएं बढ़ीं—

किसान के पास पर्याप्त खरीदार नहीं,

बिचौलियों का प्रभाव,

एक राज्य से दूसरे राज्य में व्यापार बाधाएं,

अपर्याप्त निजी निवेश,

और ग्रामीण बाजार ढांचे की कमजोरी।

PRS के अनुसार 2018–19 की संसदीय कृषि समिति ने भी पारदर्शी और सुलभ कृषि विपणन ढांचे की कमी को समस्या माना था और ग्रामीण हाटों के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की सिफारिश की थी।

अर्थात कृषि विपणन सुधार की आवश्यकता केवल 2020 की सरकार का दावा नहीं थी।

सुधार किस दिशा में और किस सुरक्षा ढांचे के साथ हो?

# 2. पहले भी APMC सुधार की कोशिशें हुई थीं

केंद्र सरकारें लंबे समय से राज्यों को मॉडल कृषि विपणन कानून अपनाने के लिए प्रेरित करती रही थीं।

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग,

इलेक्ट्रॉनिक व्यापार,

और किसानों के लिए अधिक खरीदार।

2017–18 में केंद्र ने मॉडल APMC और मॉडल कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कानून भी प्रस्तावित किए।

लेकिन राज्यों द्वारा इनका क्रियान्वयन असमान रहा।

2019 में मुख्यमंत्रियों की उच्चस्तरीय समिति भी कृषि विपणन सुधारों पर विचार कर रही थी।

2020 में केंद्र ने राज्यवार सुधार की धीमी प्रक्रिया के स्थान पर सीधे केंद्रीय कानून का रास्ता चुना।

यहीं संघीय विवाद भी जन्म लेने वाला था।

# 3. COVID-19 और कृषि अध्यादेश

मार्च 2020 में COVID-19 महामारी के कारण देशव्यापी लॉकडाउन लगा।

इसी असाधारण परिस्थिति में 5 जून 2020 को केंद्र ने तीन कृषि अध्यादेश जारी किए।

Farmers' Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Ordinance, 2020.

Farmers (Empowerment and Protection) Agreement on Price Assurance and Farm Services Ordinance, 2020.

Essential Commodities (Amendment) Ordinance, 2020.

PRS और PIB दोनों पुष्टि करते हैं कि तीनों अध्यादेश 5 जून 2020 को जारी हुए।

यही तारीख किसान आंदोलन की 2020 की कहानी का वास्तविक प्रारंभ है।

# 4. अध्यादेश का रास्ता ही विवाद का हिस्सा बना

सरकार के लिए तर्क था—

कृषि विपणन सुधार लंबे समय से लंबित हैं;

महामारी ने आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरियां भी उजागर की हैं;

इसलिए किसान को अधिक बाजार विकल्प देना आवश्यक है।

लेकिन किसान संगठनों ने पूछा—

इतना व्यापक कृषि परिवर्तन संसद की सामान्य विस्तृत प्रक्रिया और किसानों से पूर्व परामर्श के बजाय अध्यादेश से क्यों?

AIKS के बाद के आत्म-मूल्यांकन में 5 जून के अध्यादेशों को आंदोलन का प्रारंभिक बिंदु बताया गया और कहा गया कि लॉकडाउन के बीच ही संगठन ने इनके विरुद्ध अभियान शुरू किया।

# 5. पहला कानून : किसान उपज व्यापार और वाणिज्य

सितंबर में अध्यादेश की जगह बना पहला कानून था—

Farmers' Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Act, 2020.

इसे सामान्य राजनीतिक भाषा में—

इसका मूल उद्देश्य था—

राज्य APMC मंडियों की भौतिक सीमा के बाहर कृषि उपज के अंतरराज्यीय और राज्य के भीतर व्यापार को अधिक स्वतंत्र करना।

# 6. ‘Trade Area’ क्या था?

कानून ने एक नई अवधारणा दी—

trade area—व्यापार क्षेत्र।

इसमें शामिल हो सकते थे—

और अन्य उत्पादन अथवा संग्रह स्थल।

लेकिन राज्य APMC कानून से संचालित मंडी यार्ड की भौतिक सीमा इस नई ‘trade area’ परिभाषा से बाहर रखी गई थी।

यानी कानून ने APMC मंडी को औपचारिक रूप से समाप्त नहीं किया।

उसके समानांतर एक नया व्यापार क्षेत्र बनाया।

# 7. किसान के लिए सरकार का मूल तर्क

अब किसान मंडी तक सीमित नहीं।

इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म पर—

इससे खरीदार बढ़ेंगे।

प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।

और किसान को बेहतर मूल्य मिलेगा।

PIB ने इसे किसान के लिए “freedom of choice of sale” और प्रत्यक्ष विपणन की स्वतंत्रता के रूप में प्रस्तुत किया।

# 8. ‘One Nation, One Agriculture Market’ की अवधारणा

राजनीतिक प्रचार में कानून को अक्सर व्यापक राष्ट्रीय कृषि बाजार की दिशा में परिवर्तन बताया गया।

किसान एक जिले अथवा राज्य की मंडी सीमा से बंधा न रहे।

यदि हरियाणा का खरीदार राजस्थान के किसान को बेहतर कीमत दे—

यदि प्रोसेसर खेत से सीधे खरीदना चाहे—

आर्थिक सिद्धांत में अधिक खरीदार किसान की सौदेबाजी शक्ति बढ़ा सकते हैं।

लेकिन यही वह बिंदु था जहां किसान संगठनों का पहला प्रतिप्रश्न आया—

क्या कानून में खरीदार बढ़ जाने का अर्थ व्यवहार में प्रतिस्पर्धा बढ़ जाना निश्चित है?

# 9. PRS की भी यही सावधानी

PRS ने कानून का विश्लेषण करते हुए लिखा कि अध्यादेशों का उद्देश्य अधिक खरीदार उपलब्ध कराना था, लेकिन केवल deregulation—नियमन कम कर देना—अपने आप पर्याप्त नए खरीदार और बेहतर बाजार सुनिश्चित नहीं करता।

छोटे किसान की परिवहन क्षमता—

यह किसान संगठनों की चिंता को स्वतंत्र नीति-आधार देता है।

# 10. मंडी के बाहर कोई बाजार शुल्क नहीं

पहले कानून का सबसे विवादास्पद आर्थिक प्रावधान था—

नई trade area में राज्य सरकार या APMC—

market fee, cess या levy

इसी प्रावधान ने APMC के भविष्य को लेकर बड़ा विवाद पैदा किया।

# 11. किसान संगठनों का प्रश्न

एक व्यापारी APMC मंडी में खरीदता है।

उसे मंडी शुल्क और अन्य लागू शुल्क देने पड़ते हैं।

दूसरा व्यापारी मंडी की भौतिक सीमा से बाहर खरीदता है।

उसे वही APMC शुल्क नहीं देना।

तो व्यापार स्वाभाविक रूप से कहां जाएगा?

किसान संगठनों ने कहा—

कानून मंडियों को बंद नहीं करता, लेकिन मंडी के बाहर व्यापार को कर/शुल्क लाभ देकर उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर कर सकता है।

यही ‘मंडी समाप्त हो जाएगी’ आशंका का अधिक सटीक आर्थिक रूप था।

# 12. मंडी समाप्त करना कानून में लिखा था?

MSP आधारित गेहूं–धान खरीद,

अध्याय 35

2020–21 का ऐतिहासिक किसान आंदोलन और अखिल भारतीय किसान सभा

‘दिल्ली चलो’, सिंघु–टिकरी–गाजीपुर मोर्चे, संयुक्त किसान मोर्चा का निर्माण, केंद्र–किसान वार्ताएं, 26 जनवरी ट्रैक्टर परेड, लखीमपुर खीरी, आंदोलन में महिलाओं–मजदूरों–प्रवासी किसानों की भूमिका, MSP की कानूनी गारंटी, तीन कृषि कानूनों की वापसी और 378 दिन के आंदोलन का ऐतिहासिक मूल्यांकन

2020–21 का किसान आंदोलन स्वतंत्र भारत के सबसे लंबे, संगठित और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली जन आंदोलनों में से एक था। इसकी शुरुआत तीन कृषि कानूनों के विरोध से हुई, लेकिन कुछ ही महीनों में यह कृषि बाजार, MSP, सरकारी खरीद, कॉरपोरेट कृषि, संघवाद, लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार और किसान संगठनों की राष्ट्रीय एकता से जुड़ा व्यापक संघर्ष बन गया।

26 नवंबर 2020 को किसानों के ‘दिल्ली चलो’ अभियान ने इस संघर्ष को निर्णायक रूप दिया। पंजाब और हरियाणा से निकले हजारों किसान दिल्ली में प्रवेश करना चाहते थे। पुलिस अवरोध, बैरिकेड, पानी की बौछार और अन्य रोकों के कारण उनका बड़ा हिस्सा दिल्ली की सीमाओं पर ही टिक गया। वहीं से जन्मे तीन प्रमुख आंदोलन स्थल—

सिंघु, टिकरी, और गाजीपुर।

जो अस्थायी धरना-स्थल बनने थे, वे धीरे-धीरे लगभग एक वर्ष तक चलने वाले विशाल किसान शिविरों में बदल गए।

सरकार और किसान संगठनों के बीच कई दौर की वार्ता हुई। जनवरी 2021 तक सरकार कानूनों में संशोधन और अंततः उनके क्रियान्वयन को डेढ़ वर्ष तक स्थगित करने तक तैयार हुई; किसान संगठन कानूनों की पूर्ण वापसी पर अड़े रहे। 20 जनवरी की दसवीं वार्ता में सरकार ने कानूनों के क्रियान्वयन को एक से डेढ़ वर्ष तक रोकने का औपचारिक प्रस्ताव दिया था।

फिर 26 जनवरी की ट्रैक्टर परेड में हिंसा हुई।

गाजीपुर मोर्चा जनवरी के अंत में टूटने के कगार तक पहुंचा और फिर राकेश टिकैत के भावनात्मक आह्वान के बाद पुनर्जीवित हुआ।

अक्टूबर में लखीमपुर खीरी ने आंदोलन को नया आक्रोश दिया।

और अंततः 19 नवंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कानून वापस लेने की घोषणा कर दी। संसद ने नवंबर के अंत में निरसन विधेयक पारित किया और Farm Laws Repeal Act, 2021 30 नवंबर से प्रभावी हुआ।

लेकिन किसान उसी दिन घर नहीं लौटे।

कानूनों की वापसी मुख्य जीत है, लेकिन MSP, मुकदमों की वापसी, आंदोलन में मारे गए किसानों के परिवारों से जुड़े प्रश्न और बिजली विधेयक जैसे मुद्दे शेष हैं।

9 दिसंबर को केंद्र से लिखित आश्वासन मिलने के बाद संयुक्त किसान मोर्चा ने आंदोलन स्थगित करने की घोषणा की और 11 दिसंबर से किसानों की घर वापसी शुरू हुई।

यही इस अध्याय की केंद्रीय कथा है—

तीन कानूनों के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन कैसे किसान संगठनों की असाधारण राष्ट्रीय एकता में बदला, और कैसे एक निर्वाचित बहुमत वाली केंद्र सरकार को अपने स्वयं के कानून वापस लेने पड़े।

# 1. आंदोलन की जड़ें जून 2020 में थीं

जैसा पिछले अध्याय में देखा गया, तीन कृषि अध्यादेश 5 जून 2020 को आए थे।

उसके बाद पंजाब में विरोध सबसे तेजी से बढ़ा।

भारतीय किसान यूनियन की अलग-अलग धाराएं,

पंजाब के स्वतंत्र किसान संगठन,

और अन्य क्षेत्रीय किसान संगठन—

अपने-अपने स्तर पर आंदोलन कर रहे थे।

सितंबर में कानून संसद से पारित होने के बाद विरोध और तेज हो गया।

तीनों कानूनों की वापसी

# 2. पंजाब किसान आंदोलन की केंद्रीय भूमिका

2020 के किसान आंदोलन का पहला बड़ा सामाजिक केंद्र पंजाब था।

MSP आधारित गेहूं और धान खरीद पर अधिक निर्भरता,

आढ़ती–मंडी व्यवस्था,

किसान यूनियनों की घनी संगठनात्मक उपस्थिति,

और हरित क्रांति से निकली व्यावसायिक कृषि।

किसानों को आशंका थी—

यदि सरकारी खरीद और मंडियां कमजोर हुईं तो उनके मौजूदा कृषि सुरक्षा ढांचे का आधार बदल सकता है।

यही पंजाब को शुरुआती प्रतिरोध का सबसे मजबूत केंद्र बनाता है।

# 3. आंदोलन AIKS का नहीं, बहु-संगठनात्मक था

यह तथ्य पूरे अध्याय में ध्यान में रखना आवश्यक है।

अखिल भारतीय किसान सभा आंदोलन की महत्वपूर्ण शक्ति थी—

लेकिन उसका नेतृत्व अकेले AIKS के हाथ में नहीं था।

पंजाब में अनेक प्रभावशाली किसान संगठन स्वतंत्र थे।

हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में BKU की अलग-अलग धाराएं थीं।

दक्षिण और पश्चिम भारत के संगठनों की अपनी संरचना थी।

यही विविधता आगे संयुक्त किसान मोर्चा—SKM की ताकत बनी।

# 4. संयुक्त किसान मोर्चा क्यों आवश्यक हुआ?

यदि हर संगठन अलग आंदोलन करता—

केंद्र सरकार अलग-अलग समूहों से अलग समझौते कर सकती थी।

एक साझा मंच आवश्यक था जो—

सरकार से वार्ता करे,

राष्ट्रीय कार्यक्रम घोषित करे,

और विभिन्न संगठनों को एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा के बजाय सहयोग में रखे।

यही कार्य संयुक्त किसान मोर्चे ने किया।

# 5. SKM और AIKSCC में अंतर

यह भ्रम अक्सर होता है।

AIKSCC 2017 से मौजूद किसान संगठनों का राष्ट्रीय समन्वय मंच था।

SKM 2020 के कृषि कानून विरोध में बने उससे भी व्यापक संयुक्त मोर्चे का रूप था।

दोनों में कई संगठन समान हो सकते थे—

लेकिन दोनों एक ही संस्था नहीं।

AIKS दोनों में सक्रिय थी।

# 6. ‘दिल्ली चलो’ क्यों?

सितंबर–अक्टूबर तक किसान संगठनों का अनुभव था—

राज्य स्तर का आंदोलन केंद्र के कानून नहीं बदल सकता।

पंजाब सरकार विरोध कर सकती है—

लेकिन कानून संसद ने बनाया है।

इसलिए संघर्ष का राजनीतिक केंद्र केवल एक हो सकता था—

यहीं से नवंबर 2020 का आह्वान आया—

26 नवंबर को बड़ी संख्या में किसान पंजाब और हरियाणा से दिल्ली की ओर बढ़े।

यह वही दिन था जब केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने भी राष्ट्रीय आम हड़ताल का आह्वान किया था।

इससे किसान आंदोलन और मजदूर आंदोलन का प्रतीकात्मक मिलन हुआ।

AIKS ने बाद के अपने दस्तावेजों में किसान–मजदूर एकता को संघर्ष की बड़ी शक्ति माना।

# 8. रास्ते में अवरोध

हरियाणा और दिल्ली पुलिस ने किसानों को रोकने के लिए—

जैसे साधनों का उपयोग किया।

गृह मंत्रालय ने बाद में संसद में कहा कि किसानों के बड़े काफिले पुलिस अवरोधों को पार करने की कोशिश कर रहे थे और दिल्ली पुलिस को आंसू गैस, पानी की बौछार तथा सीमित बल प्रयोग करना पड़ा।

सरकार की यह आधिकारिक व्याख्या थी।

आंदोलनकारी पक्ष इसे किसानों को शांतिपूर्ण ढंग से राजधानी जाने से रोकने के रूप में देखता था।

# 9. दिल्ली में प्रवेश न मिला—तो सीमा ही आंदोलन स्थल बन गई

यहीं एक अप्रत्याशित राजनीतिक स्थिति बनी।

किसान दिल्ली के भीतर नियोजित प्रदर्शन स्थल तक नहीं पहुंचे।

लेकिन वे लौटे भी नहीं।

उन्होंने दिल्ली की सीमाओं पर डेरा डाल दिया।

सबसे प्रमुख स्थल बने—

कुछ अन्य छोटे स्थल भी बने।

# 10. सिंघु : आंदोलन का प्रमुख राजनीतिक केंद्र

पंजाब और हरियाणा से आए बड़ी संख्या में किसानों के कारण सिंघु सबसे बड़ा मोर्चा बना।

यहीं अनेक प्रमुख संयुक्त किसान मोर्चा बैठकें हुईं।

राष्ट्रीय कार्यक्रम।

सरकारी वार्ता पर निर्णय।

सिंघु एक प्रकार से आंदोलन की संयुक्त राजनीतिक राजधानी बन गया।

# 11. टिकरी : विशाल किसान शिविर

टिकरी सीमा पर भी बड़ी संख्या में पंजाब और हरियाणा के किसान रहे।

यहां किलोमीटरों तक ट्रैक्टर–ट्रॉलियां,

और किसान संगठन कैंप दिखाई देते थे।

महिला किसानों की बड़ी भागीदारी भी टिकरी की महत्वपूर्ण विशेषता थी।

# 12. गाजीपुर : पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रवेश द्वार

गाजीपुर मोर्चे की सामाजिक संरचना कुछ अलग थी।

यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए प्रमुख आंदोलन स्थल बना।

यहां भारतीय किसान यूनियन और राकेश टिकैत की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो गई।

जनवरी 2021 के बाद गाजीपुर आंदोलन के राष्ट्रीय प्रतीकों में से एक बन गया।

अध्याय 36

कृषि कानूनों की वापसी के बाद अखिल भारतीय किसान सभा और संयुक्त किसान मोर्चा, 2022–26

MSP की कानूनी गारंटी का अधूरा प्रश्न, केंद्र की MSP समिति, आंदोलन के मुकदमे और लिखित आश्वासन, लखीमपुर खीरी न्याय की मांग, बिजली विधेयक, SKM के भीतर मतभेद और पुनर्गठन, 2024 के नए किसान दिल्ली मार्च तथा 2026 तक किसान राजनीति की नई दिशा

2021 के अंत में तीन कृषि कानून वापस हो गए, दिल्ली की सीमाओं से किसान लौट गए और 378 दिन का ऐतिहासिक आंदोलन स्थगित हो गया। लेकिन किसान राजनीति समाप्त नहीं हुई। वास्तव में 2022 से एक नया चरण शुरू हुआ, जिसमें संघर्ष का केंद्र कानून-वापसी से हटकर उन अधूरे वादों और संरचनात्मक कृषि प्रश्नों पर आ गया जिन्हें 9 दिसंबर 2021 के सरकारी पत्र और आंदोलन की व्यापक मांगों में उठाया गया था।

सबसे बड़ा प्रश्न था—

MSP की कानूनी गारंटी।

आंदोलन के दौरान किसानों पर दर्ज मुकदमे,

मृत आंदोलनकारियों के परिवारों के लिए मुआवजा,

बिजली संशोधन विधेयक,

और किसान आंदोलन की राष्ट्रीय संगठनात्मक एकता।

2022 से 2026 के बीच किसान राजनीति में एक और बड़ा बदलाव हुआ। 2020–21 की एकता से निकला Samyukta Kisan Morcha—SKM बना रहा, लेकिन उसके भीतर और बाहर नई धाराएं विकसित हुईं। 2024 का चर्चित “दिल्ली चलो” अभियान मूल SKM ने नहीं, बल्कि Samyukta Kisan Morcha (Non-Political) और Kisan Mazdoor Morcha—KMM ने चलाया। मूल SKM, जिसमें AIKS प्रमुख घटक रहा, समान MSP और ऋण मुद्दों पर अपनी अलग राष्ट्रीय रणनीति, महापंचायतों और किसान–मजदूर संयुक्त कार्रवाइयों के साथ सक्रिय रहा। फरवरी 2024 में Indian Express ने स्पष्ट किया कि 2024 के दिल्ली मार्च में मूल SKM शामिल नहीं था और आंदोलन SKM (Non-Political) तथा KMM के नेतृत्व में था।

यही फर्क 2022–26 की किसान राजनीति को समझने की कुंजी है।

# 1. दिसंबर 2021 की जीत अधूरी क्यों थी?

तीन कृषि कानूनों का निरसन किसानों की सबसे बड़ी तत्काल मांग की पूर्ति थी।

लेकिन आंदोलन स्थगित करते समय SKM ने कहा था कि संघर्ष का व्यापक कार्यक्रम शेष है।

किसान संगठनों का दावा था कि केंद्र ने लिखित रूप में कई मामलों पर कार्रवाई का आश्वासन दिया—

आंदोलन के मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया,

मृत किसानों के परिवारों से जुड़े मुआवजा प्रश्न,

बिजली विधेयक पर किसान संगठनों से चर्चा,

और पराली संबंधी आपराधिक प्रावधानों से राहत।

इसलिए 2022 की किसान राजनीति का केंद्रीय प्रश्न बन गया—

सरकार अपने लिखित आश्वासनों पर कितना आगे बढ़ी?

# 2. सबसे बड़ा अधूरा प्रश्न : MSP

2020–21 के आंदोलन के अंतिम चरण में MSP केवल सहायक मांग नहीं रह गया था।

तीन कानून वापस होने के बाद वह सबसे बड़ी केंद्रीय मांग बन गया।

किसान संगठनों का तर्क था—

MSP घोषित होना पर्याप्त नहीं।

उसकी कानूनी गारंटी चाहिए।

क्योंकि यदि बाजार में व्यापारी MSP से नीचे खरीद सकता है और सरकार केवल सीमित मात्रा खरीदती है—

तो बड़ी संख्या में किसान घोषित MSP से लाभ नहीं ले पाते।

यहीं 2022–26 का पूरा संघर्ष केंद्रित हुआ।

# 3. सरकार की MSP व्यवस्था क्या थी?

केंद्र सरकार हर वर्ष 22 अनिवार्य फसलों का MSP घोषित करती रही।

सरकार का दावा था कि वह लागत पर कम-से-कम 50 प्रतिशत मार्जिन की नीति अपनाती है।

लेकिन किसान संगठनों और AIKS की आपत्ति वही पुरानी थी—

किस लागत पर 50 प्रतिशत?

AIKS और अनेक आंदोलनकारी संगठन C2 लागत के ऊपर 50 प्रतिशत की मांग करते रहे।

सरकार की नीति A2+FL आधारित लागत गणना से अधिक निकट रही।

इसलिए MSP पर राजनीतिक सहमति नहीं बनी।

# 4. MSP को कानूनी बनाने का मतलब क्या?

यह प्रश्न भी सरल नहीं।

“MSP गारंटी कानून” के कई संभावित मॉडल हो सकते हैं।

कोई निजी व्यापारी MSP से नीचे खरीद ही न सके।

सरकार सभी MSP फसलों की खरीद करे।

बाजार मूल्य MSP से कम हो तो अंतर सरकार किसान को दे।

Price Deficiency Payment जैसी प्रणाली।

किसान संगठनों में कानूनी गारंटी पर व्यापक सहमति थी—

लेकिन तकनीकी ढांचे पर सभी संगठन समान मॉडल नहीं प्रस्तुत करते थे।

# 5. सरकार ने समिति का वादा कब पूरा किया?

केंद्र ने 18 जुलाई 2022 को MSP और संबंधित कृषि प्रश्नों पर समिति गठित की।

इस समिति के अध्यक्ष बनाए गए पूर्व केंद्रीय कृषि सचिव संजय अग्रवाल।

Indian Express के अनुसार समिति में 26 सदस्य थे। उसके कार्यक्षेत्र में—

MSP प्रणाली को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाना,

कृषि विपणन मजबूत करना,

और Commission for Agricultural Costs and Prices—CACP—को अधिक वैज्ञानिक/स्वायत्त बनाने से जुड़े प्रश्न शामिल थे।

# 6. लेकिन समिति की सबसे बड़ी सीमा क्या थी?

उसके Terms of Reference में—

MSP की कानूनी गारंटी

स्पष्ट रूप से शामिल नहीं थी।

यह किसान आंदोलन की सबसे बड़ी शिकायत थी।

Indian Express ने फरवरी 2024 में साफ लिखा कि समिति का कार्यक्षेत्र MSP को “effective and transparent” बनाने तक था, कानूनी MSP गारंटी देना उसके औपचारिक mandate में नहीं था।

इसीलिए मूल SKM ने समिति को अपने दिसंबर 2021 आंदोलन-समझौते की भावना के अनुरूप नहीं माना।

# 7. SKM ने समिति में प्रतिनिधि क्यों नहीं भेजे?

सरकार ने समिति में SKM के लिए तीन स्थान छोड़े थे।

लेकिन SKM ने प्रतिनिधि नामित नहीं किए।

उसकी प्रमुख आपत्तियां थीं—

कानूनी MSP गारंटी समिति के कार्यक्षेत्र में नहीं,

समिति की संरचना में ऐसे सदस्य शामिल जिनकी कृषि कानूनों पर पहले से सरकारी पक्ष के निकटता मानी जाती थी,

और किसान आंदोलन की केंद्रीय मांग पर्याप्त स्पष्टता से शामिल नहीं।

Indian Express ने पुष्टि की कि SKM के लिए तीन सीटें निर्धारित थीं, लेकिन संगठन ने समिति में भाग नहीं लिया।

# 8. क्या समिति निष्क्रिय रही?

यह कहना गलत होगा कि समिति बनी और कुछ नहीं हुआ।

अगस्त 2025 में कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राज्यसभा में बताया कि MSP समिति ने तब तक कुल 45 बैठकें की थीं, जिनमें 39 उप-समिति अथवा उप-समूह बैठकें शामिल थीं। समिति MSP की पारदर्शिता, CACP की भूमिका, कृषि विपणन, प्राकृतिक खेती और फसल विविधीकरण पर काम कर रही थी।

लेकिन 2026 तक किसान संगठनों का केंद्रीय प्रश्न बना रहा—

कानूनी MSP पर निष्कर्ष कहां है?

# 9. समिति और किसान आंदोलन के बीच मूल अंतर

MSP प्रणाली कैसे बेहतर हो?

किसान संगठनों का प्रश्न—

MSP को कानूनी अधिकार कब बनाया जाए?

दोनों समान प्रश्न नहीं।

यही कारण है कि दर्जनों बैठकों के बावजूद आंदोलन का राजनीतिक असंतोष समाप्त नहीं हुआ।

# 10. MSP समिति का व्यापक कृषि एजेंडा

समिति के mandate में फसल विविधीकरण भी महत्वपूर्ण था।

विशेषकर पंजाब और हरियाणा में—

को देखते हुए सरकार चाहती थी कि किसान दूसरी फसलों की ओर जाएं।

यह कृषि पर्यावरण की दृष्टि से उचित नीति प्रश्न है।

लेकिन किसान पूछता है—

यदि मैं धान छोड़कर दाल या मक्का उगाऊं तो उसकी खरीद कौन करेगा?

यहीं diversification और guaranteed procurement का संबंध सामने आता है।

# 11. MSP की राजनीति केवल पंजाब की क्यों नहीं?

2020–21 आंदोलन में पंजाब–हरियाणा प्रमुख थे।

लेकिन कानूनी MSP का प्रश्न—

उगाने वाले अनेक राज्यों के किसानों से जुड़ सकता है।

AIKS का तर्क रहा कि MSP को केवल गेहूं–धान खरीद नीति तक सीमित नहीं रखा जा सकता।

यही उसे अखिल भारतीय कार्यक्रम बनाता है।

# 12. 2022 में आंदोलन की पहली सालगिरह

26 नवंबर 2022 को तीन कृषि कानून विरोध आंदोलन की दूसरी वर्षगांठ पर SKM ने विभिन्न राज्यों में किसान प्रदर्शन और राजभवन मार्च आयोजित किए।

MSP की कानूनी गारंटी,

MGNREGA/ग्रामीण रोजगार,

अध्याय 37

अखिल भारतीय किसान सभा की संगठनात्मक संरचना और वर्तमान स्वरूप

राष्ट्रीय नेतृत्व, राज्य किसान सभाएं, सदस्यता और जनाधार, CPI(M) से संबंध, AIKS तथा CPI से संबद्ध अखिल भारतीय किसान सभा के बीच अंतर, किसान–कृषि मजदूर संगठनों का संबंध और 1936 से 2026 तक संगठनात्मक परिवर्तन

अखिल भारतीय किसान सभा के लगभग नौ दशकों के इतिहास को समझते समय एक बुनियादी तथ्य अक्सर भ्रम पैदा करता है। 1936 में लखनऊ में स्थापित अखिल भारतीय किसान सभा एक ही संगठन थी, लेकिन कम्युनिस्ट आंदोलन के विभाजनों के बाद आज “All India Kisan Sabha” नाम से एक से अधिक संगठनात्मक धाराएं मौजूद हैं।

इनमें सबसे बड़ा और राष्ट्रीय किसान आंदोलनों में अत्यधिक सक्रिय संगठन वह AIKS है जो ऐतिहासिक रूप से CPI(M) की राजनीतिक धारा से जुड़ा है। इसकी आधिकारिक वेबसाइट पर अगस्त 2026 तक 35वें राष्ट्रीय सम्मेलन में निर्वाचित अध्यक्ष डॉ. अशोक धवले, महासचिव विजू कृष्णन और वित्त सचिव पी. कृष्णप्रसाद दर्ज हैं।

दूसरी ओर Communist Party of India—CPI से संबद्ध किसान संगठन भी इसी ऐतिहासिक नाम—अखिल भारतीय किसान सभा—का उपयोग करता है। उसके लंबे समय तक महासचिव रहे अतुल कुमार अंजान का मई 2024 में निधन हो गया। उपलब्ध वर्तमान विवरण CPI-संबद्ध संगठन के अध्यक्ष के रूप में राजन क्षीरसागर और महासचिव के रूप में आर. वेंकैया का नाम देते हैं।

इसलिए इस पूरे शोध में जब 1964 के बाद AIKS कहा जा रहा है, तो संगठनात्मक संदर्भ स्पष्ट करना आवश्यक है।

यही इस अध्याय का पहला उद्देश्य है।

1. 1936 की किसान सभा कैसी थी?

11 अप्रैल 1936 को लखनऊ में गठित अखिल भारतीय किसान सभा आधुनिक अर्थ में किसी एक कम्युनिस्ट पार्टी की “किसान शाखा” के रूप में पैदा नहीं हुई थी।

उसके भीतर अनेक राजनीतिक प्रवृत्तियां थीं—

कांग्रेस से जुड़े किसान नेता,

स्वतंत्र किसान कार्यकर्ता,

और विभिन्न प्रांतीय किसान सभाओं के नेता।

स्वामी सहजानंद सरस्वती इसके प्रथम अध्यक्ष बने।

ई.एम.एस. नंबूदरीपाद,

जैसे अलग-अलग पृष्ठभूमि के नेता किसान राजनीति के इस राष्ट्रीय मंच से जुड़े।

अर्थात 1936 की AIKS को सीधे आज की CPI(M)-संबद्ध AIKS मान लेना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा।

# 2. प्रारंभिक संगठन का मूल सिद्धांत

किसान सभा का उद्देश्य किसान को—

से ऊपर उठाकर उसके आर्थिक और वर्गीय हितों के आधार पर संगठित करना था।

प्रारंभिक मांगें थीं—

कृषि मजदूरों की सुरक्षा।

इसलिए किसान सभा की संगठनात्मक संरचना ऊपर से थोपी हुई राजनीतिक समिति के बजाय गांव से राष्ट्रीय स्तर तक किसान सदस्यता पर आधारित बनाने की कोशिश की गई।

यही सिद्धांत बाद के संविधान में संस्थागत रूप लेता गया।

# 3. संगठन की बुनियाद : गांव

AIKS की संगठनात्मक कल्पना का सबसे निचला स्तर गांव है।

आम तौर पर संरचना इस प्रकार समझी जा सकती है—

ग्राम इकाई → स्थानीय/ब्लॉक इकाई → जिला किसान सभा → राज्य किसान सभा → अखिल भारतीय किसान सभा।

राज्यों की प्रशासनिक परिस्थितियों के अनुसार बीच के स्तरों के नाम बदल सकते हैं।

लेकिन मूल सिद्धांत है—

संगठन नीचे से ऊपर बने।

AIKS स्वयं को केवल बड़े भूमिधर अथवा बाजार में अधिशेष बेचने वाले किसानों का संगठन नहीं मानती।

उसकी सामाजिक परिभाषा व्यापक है—

कुछ परिस्थितियों में ग्रामीण उत्पादक समुदाय।

लेकिन यहीं एक महत्वपूर्ण संगठनात्मक विभाजन आता है—

भूमिहीन कृषि मजदूरों के लिए अलग संगठन क्यों?

इस पर आगे विस्तार से आएंगे।

# 5. अखिल भारतीय सम्मेलन सर्वोच्च निकाय

AIKS संविधान के अनुसार उसका All India Conference—अखिल भारतीय सम्मेलन सर्वोच्च संगठनात्मक मंच है।

सम्मेलन में पिछली अवधि की गतिविधियों और संगठन पर महासचिव की रिपोर्ट,

राजनीतिक और कृषि प्रस्ताव,

नई अखिल भारतीय किसान परिषद,

केंद्रीय किसान समिति

और पदाधिकारियों के निर्वाचन की प्रक्रिया होती है।

अर्थात राष्ट्रीय सम्मेलन केवल सार्वजनिक रैली नहीं—

वह संगठन की सर्वोच्च निर्णयकारी सभा है।

# 6. अध्यक्ष का चुनाव

AIKS संविधान एक दिलचस्प प्रावधान करता है।

राष्ट्रीय अध्यक्ष को सम्मेलन के प्रतिनिधि सीधे सम्मेलन के समापन सत्र में चुनते हैं।

बाकी केंद्रीय संरचना में—

आदि का चुनाव संगठनात्मक परिषद की प्रक्रिया से होता है।

इससे अध्यक्ष को राष्ट्रीय सम्मेलन का प्रत्यक्ष जनादेश मिलता है।

# 7. All India Kisan Council क्या है?

राष्ट्रीय सम्मेलन All India Kisan Council—AIKC, अर्थात अखिल भारतीय किसान परिषद का चुनाव करता है।

इसे सम्मेलन के बीच की अवधि का व्यापक राष्ट्रीय प्रतिनिधि निकाय समझा जा सकता है।

इसमें विभिन्न राज्यों और संगठनात्मक क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व होता है।

AIKS संविधान के अनुसार प्रत्येक सम्मेलन में नई All India Kisan Council चुनी जाती है।

यह संगठन की राष्ट्रीय प्रतिनिधिक संरचना है।

# 8. Central Kisan Committee क्या है?

AIKC से अधिक संकुचित कार्यकारी निकाय है—

Central Kisan Committee—CKC।

AIKS संविधान के अनुसार AIKC केंद्रीय किसान समिति का चुनाव करती है और उसके पदाधिकारी वही होते हैं जो परिषद के पदाधिकारी होते हैं।

Conference = सर्वोच्च प्रतिनिधि सभा AIKC = व्यापक केंद्रीय परिषद CKC = केंद्रीय कार्यकारी नेतृत्व।

यह संरचना कम्युनिस्ट जनसंगठनों की सामान्य लोकतांत्रिक-केंद्रीकृत संगठनात्मक शैली से मेल खाती है।

# 9. 35वां राष्ट्रीय सम्मेलन

AIKS का 35वां अखिल भारतीय सम्मेलन 13–16 दिसंबर 2022 को केरल के त्रिशूर में हुआ।

यह इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि पिछला—34वां—सम्मेलन अक्टूबर 2017 में हिसार, हरियाणा में हुआ था।

कोविड महामारी और किसान आंदोलन वाले असाधारण वर्षों के कारण दोनों सम्मेलनों के बीच सामान्य से लंबा अंतर रहा।

यही 35वां सम्मेलन अगस्त 2026 तक वर्तमान राष्ट्रीय नेतृत्व का आधार है।

# 10. वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष : डॉ. अशोक धवले

35वें सम्मेलन में डॉ. अशोक धवले फिर राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए।

महाराष्ट्र से आने वाले धवले AIKS के आधुनिक इतिहास में विशेष रूप से—

महाराष्ट्र किसान लॉन्ग मार्च,

2020–21 किसान आंदोलन

उनका नेतृत्व AIKS की पुरानी वर्गीय किसान राजनीति और नए संयुक्त किसान आंदोलनों के बीच सेतु का काम करता है।

# 11. वर्तमान महासचिव : विजू कृष्णन

35वें सम्मेलन में विजू कृष्णन महासचिव निर्वाचित हुए।

इससे पहले लंबे समय तक महासचिव रहे हन्नान मोल्लाह उपाध्यक्ष बने।

विजू कृष्णन AIKS की अपेक्षाकृत नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं।

उनके दौर में संगठन विशेष रूप से—

जैसे मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय दिखाई देता है।

# 12. पी. कृष्णप्रसाद : वित्त सचिव

वर्तमान राष्ट्रीय वित्त सचिव पी. कृष्णप्रसाद हैं।

लेकिन उनकी भूमिका केवल संगठनात्मक वित्त तक सीमित नहीं।

वह राष्ट्रीय किसान आंदोलनों और SKM की गतिविधियों में AIKS के प्रमुख सार्वजनिक चेहरों में रहे हैं।

2026 में भी SKM के राष्ट्रीय कार्यक्रमों में उनकी भूमिका दिखाई देती है।

# 13. हन्नान मोल्लाह की भूमिका

हन्नान मोल्लाह AIKS के आधुनिक इतिहास के अत्यंत महत्वपूर्ण नेताओं में हैं।

वह लंबे समय तक महासचिव रहे।

2020–21 किसान आंदोलन के समय—

जब SKM राष्ट्रीय किसान आंदोलन का केंद्रीय मंच बना—

हन्नान मोल्लाह AIKS के प्रमुख प्रतिनिधियों में थे।

35वें सम्मेलन के बाद उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चुना गया।

इससे नेतृत्व परिवर्तन हुआ—

लेकिन संस्थागत निरंतरता बनी रही।

# 14. वर्तमान राष्ट्रीय उपाध्यक्ष

35वें सम्मेलन के बाद आधिकारिक नेतृत्व सूची में उपाध्यक्षों में शामिल हैं—

इस सूची से संगठन का क्षेत्रीय फैलाव भी दिखाई देता है।

35वें सम्मेलन में संयुक्त सचिवों में—

इस प्रकार नेतृत्व को केवल एक अध्यक्ष–महासचिव मॉडल में नहीं, बल्कि सामूहिक केंद्रीय नेतृत्व के रूप में बनाया गया है।

# 16. 35वें सम्मेलन की केंद्रीय संरचना कितनी बड़ी?

2022 त्रिशूर सम्मेलन ने—

149 सदस्यीय All India Kisan Council

77 सदस्यीय Central Kisan Committee

इसके साथ 21 पदाधिकारी चुने गए।

बल्कि राज्यों के प्रतिनिधित्व वाला बड़ा संघीय ढांचा है।

तेभागा आंदोलन की विरासत,

अध्याय 38

अखिल भारतीय किसान सभा की वैचारिक यात्रा, 1936–2026

औपनिवेशिक सामंतवाद और जमींदारी-विरोध से वर्ग-संघर्ष, भूमि सुधार, समाजवादी कृषि दृष्टि, हरित क्रांति की आलोचना, नवउदारवाद–WTO विरोध, MSP–ऋण मुक्ति और कॉरपोरेट कृषि के विरुद्ध आधुनिक किसान राजनीति तक

अखिल भारतीय किसान सभा की नौ दशक लंबी यात्रा केवल किसान आंदोलनों, सम्मेलनों और नेताओं का इतिहास नहीं है। यह इस बात का भी इतिहास है कि भारतीय कृषि को समझने की उसकी वैचारिक भाषा किस प्रकार बदलती गई।

1936 में किसान सभा जिस ग्रामीण भारत के सामने खड़ी थी, उसमें मुख्य प्रश्न थे—

2026 तक वही संगठन चर्चा कर रहा है—

MSP की कानूनी गारंटी,

मुक्त व्यापार समझौते,

विदेशी कृषि व्यवसाय,

और किसान–मजदूर एकता की।

यह परिवर्तन साधारण नहीं।

इसमें भारतीय कृषि की संरचना बदलने का पूरा इतिहास समाया है।

फिर भी कुछ केंद्रीय विचार 1936 से आज तक बने हुए हैं—

किसान को आर्थिक शोषण से मुक्त करना। जमीन पर मेहनतकश का अधिकार। ऋण और बाजार के सामने किसान की सुरक्षा। किसान–मजदूर एकता। और कृषि पर बड़ी आर्थिक शक्तियों के नियंत्रण का विरोध।

AIKS के वर्तमान संविधान में आज भी प्रमुख उद्देश्यों में जमींदारी का उन्मूलन और भूमि को कृषि मजदूरों व गरीब किसानों में बांटना, भारतीय एकाधिकारवादी पूंजी और विदेशी पूंजी के शोषण को समाप्त करना, सूदखोरी वाले ऋणों का अंत और ग्रामीण जनता के जीवन स्तर में सुधार शामिल हैं।

अर्थात विचारधारा बदली है—

लेकिन उसकी ऐतिहासिक केंद्रीय धुरी पूरी तरह नहीं बदली।

1. 1936 : किसान सभा की वैचारिक शुरुआत

अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना के समय उसकी पहली वैचारिक घोषणा अत्यंत महत्वाकांक्षी थी।

स्थापना काल के दस्तावेजों में किसान आंदोलन का उद्देश्य केवल लगान घटवाना नहीं बताया गया।

उसका उद्देश्य कहा गया—

किसानों और मजदूरों सहित शोषित वर्गों को आर्थिक शोषण से पूर्ण मुक्ति दिलाना और उत्पादक जनता के आर्थिक तथा राजनीतिक अधिकारों का विस्तार करना।

उसके मूल कार्यक्रम में—

भूमि वास्तविक जोतने वाले को,

भूमि राजस्व में कमी,

गरीब जोतों को कर से मुक्ति,

महाजनों पर नियंत्रण,

व्यावसायिक फसलों का उचित मूल्य,

और कृषि मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी—

जैसे प्रश्न शामिल थे।

इसलिए 1936 की किसान सभा केवल “किसान राहत संगठन” नहीं थी।

उसकी वैचारिक दृष्टि आरंभ से ही कृषि संरचना के परिवर्तन की थी।

# 2. पहला केंद्रीय सिद्धांत : जमींदारी-विरोध

स्थापना काल में किसान सभा की सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक पहचान थी—

जमींदारी व्यवस्था का उन्मूलन।

उसकी दृष्टि में औपनिवेशिक कृषि संकट केवल खराब प्रशासन से पैदा नहीं था।

समस्या स्वयं भूमि स्वामित्व की संरचना में थी।

भूमि पर मेहनत किसान करता था—

लेकिन आर्थिक अधिशेष जमींदार,

और औपनिवेशिक राज्य के बीच बंटता था।

इसलिए किसान सभा का निष्कर्ष था—

सिर्फ लगान कम करने से किसान मुक्त नहीं होगा।

भूमि संबंध बदलने होंगे।

# 3. ‘Land to the Tiller’—जमीन जोते उसकी

यह नारा AIKS की सबसे स्थायी वैचारिक पहचान बना।

भूमि स्वामित्व और वास्तविक उत्पादन के बीच संबंध होना चाहिए।

जो किसान जमीन पर श्रम करता है—

उसे स्थायी काश्तकारी और अंततः स्वामित्व का अधिकार मिले।

यह केवल आर्थिक मांग नहीं थी।

इससे ग्रामीण सत्ता संबंध बदलते।

जमींदार की राजनीतिक शक्ति कमजोर होती।

किसान की सामाजिक स्थिति मजबूत होती।

यही कारण है कि भूमि प्रश्न AIKS के लिए हमेशा—

सामाजिक न्याय + आर्थिक पुनर्वितरण + राजनीतिक शक्ति

तीनों का प्रश्न रहा।

# 4. किसान और राष्ट्रीय स्वतंत्रता

प्रारंभिक AIKS ने किसान संघर्ष को राष्ट्रीय आंदोलन से अलग नहीं माना।

लेकिन उसका तर्क कांग्रेस के मुख्यधारा नेतृत्व से अधिक वर्गीय था।

ब्रिटिश साम्राज्यवाद और भारतीय जमींदारी परस्पर जुड़े हैं।

इसलिए राष्ट्रीय स्वतंत्रता तभी ग्रामीण जनता के लिए सार्थक होगी जब—

राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ कृषि संबंधों का लोकतंत्रीकरण भी हो।

स्थापना संबंधी AIKS दस्तावेजों में राष्ट्रीय स्वतंत्रता और उत्पादक वर्गों की आर्थिक–राजनीतिक शक्ति को स्पष्ट रूप से जोड़ा गया था।

यहीं से कांग्रेस और किसान सभा के बीच भविष्य के मतभेद का बीज था।

# 5. कांग्रेस से पहला वैचारिक मतभेद

कांग्रेस का लक्ष्य था—

राष्ट्रीय आंदोलन के लिए अधिकतम सामाजिक एकता।

सबको ब्रिटिश शासन के विरुद्ध साथ रखना राजनीतिक रूप से उपयोगी था।

क्या राष्ट्रीय एकता के नाम पर किसान से कहा जाए कि वह जमींदार के विरुद्ध वर्गीय संघर्ष स्थगित कर दे?

उसका उत्तर धीरे-धीरे—

यहीं स्वतंत्र किसान संगठन की वैचारिक आवश्यकता पैदा हुई।

# 6. वर्ग-संघर्ष का प्रवेश

1930 के दशक के उत्तरार्ध में कम्युनिस्ट और समाजवादी प्रभाव बढ़ने के साथ किसान सभा ने किसान समाज को एकसमान समुदाय की तरह देखना बंद किया।

“किसान बनाम अंग्रेज”

इनके हित हमेशा समान नहीं।

यही किसान सभा के वर्गीय विश्लेषण की बुनियाद बनी।

# 7. लाल झंडे का वैचारिक अर्थ

AIKS द्वारा लाल झंडा स्वीकार करना केवल प्रतीक परिवर्तन नहीं था।

किसान संघर्ष को मजदूर आंदोलन और व्यापक वर्ग संघर्ष से जोड़ा जा रहा है।

स्वतंत्र आर्थिक उत्पादक भी है,

और शोषित मेहनतकश वर्गों का सहयोगी भी।

इसलिए आगे किसान–मजदूर एकता AIKS की स्थायी वैचारिक रेखा बनी।

# 8. किसान सभा में मार्क्सवादी प्रभाव

कम्युनिस्ट प्रभाव बढ़ने के बाद ग्रामीण प्रश्न को मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थव्यवस्था के भीतर पढ़ा जाने लगा।

उत्पादन संबंध किसके पक्ष में हैं?

कृषि ऋण किसे नियंत्रित करता है?

बाजार में किसान और व्यापारी की शक्ति में कितना अंतर है?

इसने किसान संघर्ष को केवल “गरीबी हटाने” के बजाय—

सत्ता और संपत्ति संबंध बदलने

की राजनीति बना दिया।

# 9. तेभागा : विचारधारा का प्रत्यक्ष रूप

1946–47 का तेभागा आंदोलन इस विचारधारा का व्यावहारिक उदाहरण था।

बंगाल का बर्गादार मांग कर रहा था—

फसल का दो-तिहाई हिस्सा उसे मिले।

अर्थात संघर्ष जमीन की कानूनी मिल्कियत से ही नहीं—

उत्पादन के अधिशेष के वितरण

AIKS के लिए यह दिखाता था कि वास्तविक किसान प्रश्न केवल भूमि का शीर्षक नहीं—

किसान अपने श्रम से पैदा उत्पाद में कितना हिस्सा रख पाता है—

# 10. तेलंगाना : भूमि और सत्ता का चरम प्रश्न

तेलंगाना संघर्ष में भूमि प्रश्न सामंती सत्ता और राज्य शक्ति के संघर्ष से जुड़ गया।

के विरुद्ध संघर्ष ने AIKS की वैचारिक धार को अधिक उग्र बनाया।

यहां किसान सभा की राजनीति सुधारवादी याचिका से आगे—

ग्रामीण सत्ता संरचना के प्रत्यक्ष परिवर्तन—

# 11. स्वतंत्रता के बाद पहला वैचारिक संकट

1947 में ब्रिटिश शासन समाप्त हुआ।

लेकिन किसान सभा के सामने सबसे कठिन प्रश्न आया—

अब उसका ऐतिहासिक प्रतिपक्ष कौन है?

औपनिवेशिक शासन खत्म।

ग्रामीण वर्ग असमानता—

इसलिए AIKS ने राजनीतिक स्वतंत्रता को कृषि क्रांति का विकल्प नहीं माना।

# 12. जमींदारी उन्मूलन : उपलब्धि या अधूरा परिवर्तन?

स्वतंत्र भारत ने अनेक राज्यों में जमींदारी उन्मूलन कानून बनाए।

AIKS ने इसे सामंती व्यवस्था पर महत्वपूर्ण प्रहार माना—

लेकिन पर्याप्त नहीं।

बिचौलिया जमींदारी खत्म हुई,

लेकिन भूमि का वास्तविक पुनर्वितरण सीमित रहा।

बड़े भू-स्वामित्व के नए रूप बने।

कई किरायेदार बेदखल हुए।

और ग्रामीण वर्ग संरचना में धनी किसान तथा पूंजीवादी कृषक का नया वर्ग उभरा।

1970–80 के AIKS दस्तावेजों ने स्वतंत्रता के बाद के भूमि सुधारों को इसी सीमित परिवर्तन के रूप में आलोचित किया।

# 13. ‘कृषि क्रांति’ की अवधारणा

AIKS की मार्क्सवादी धारा के लिए भूमि सुधार केवल कल्याणकारी नीति नहीं था।

वह agrarian revolution—कृषि क्रांति का हिस्सा था।

भूमि एकाधिकार का अंत,

कृषि मजदूर के अधिकार,

इस दृष्टि में कृषि विकास की पूर्वशर्त सामाजिक पुनर्वितरण थी।

# 14. समाजवादी कृषि दृष्टि

उसकी दीर्घकालीन दृष्टि थी—

# 15. सहकारिता का स्थान

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग,

अध्याय 39

अखिल भारतीय किसान सभा की उपलब्धियां, सीमाएं और अंतर्विरोध

भूमि सुधार और किसान अधिकारों में योगदान, तेभागा–तेलंगाना से किसान लॉन्ग मार्च और 2020–21 आंदोलन तक संगठनात्मक उपलब्धियां; पार्टी-निर्भरता, क्षेत्रीय असमानता, वर्गीय अंतर्विरोध, कृषि मजदूर–समृद्ध किसान संबंध, बदलते ग्रामीण समाज और 21वीं सदी में AIKS की प्रासंगिकता का संतुलित मूल्यांकन

अखिल भारतीय किसान सभा का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि उसने कितनी रैलियां कीं, कितने कानून बदलवाए या उसकी सदस्यता कितनी रही। लगभग नौ दशकों के इतिहास वाले किसी जनसंगठन की वास्तविक उपलब्धि और सीमा दोनों को समझने के लिए कम-से-कम चार स्तर देखने होंगे—

उसने किसान प्रश्न की राष्ट्रीय राजनीति को कैसे बदला; कितने ठोस अधिकार और नीतिगत परिवर्तन हासिल किए; अपनी संगठनात्मक शक्ति कितनी व्यापक और स्वतंत्र बनाई; और बदलते ग्रामीण समाज के अनुरूप स्वयं को कितना बदल पाया।

इन कसौटियों पर AIKS की तस्वीर मिश्रित है।

एक ओर उसकी ऐतिहासिक उपलब्धियां असाधारण हैं।

और 2020–21 के राष्ट्रीय किसान आंदोलन—

जैसे मुद्दों पर सात से अधिक दशकों तक निरंतर राजनीतिक हस्तक्षेप किया।

दूसरी ओर उसकी अपनी सम्मेलन रिपोर्टें बार-बार स्वीकार करती रही हैं—

संगठन कुछ राज्यों में अत्यधिक केंद्रित रहा,

हिंदी पट्टी के बड़े हिस्से में कमजोर रहा,

पूर्णकालिक कैडर की कमी रही,

और सदस्यता संख्या तथा वास्तविक सक्रिय संगठन के बीच अंतर मौजूद रहा। 1980 के दशक में भी उसकी रिपोर्ट स्वीकार करती थी कि पश्चिम बंगाल अकेले लगभग 75 प्रतिशत सदस्यता देता था और बंगाल–केरल मिलाकर लगभग 83 प्रतिशत; इसे संगठन ने स्वयं गंभीर असंतुलन बताया था।

2010 के दशक में भी समस्या पूरी तरह नहीं गई। 33वें सम्मेलन की रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम बंगाल, केरल, त्रिपुरा और तमिलनाडु मिलाकर लगभग 85 प्रतिशत सदस्यता देते थे। संगठन ने इसे “gross imbalance” मानते हुए दूसरे राज्यों में विस्तार की आवश्यकता स्वीकार की।

इसलिए AIKS का संतुलित इतिहास न महिमामंडन हो सकता है, न अवमूल्यन।

वह भारतीय किसान आंदोलन की एक केंद्रीय ऐतिहासिक धारा है—

लेकिन भारतीय किसान राजनीति की संपूर्णता नहीं।

1. पहली बड़ी उपलब्धि : किसान को स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित करना

1936 में AIKS की स्थापना का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह था कि उसने किसान को केवल राष्ट्रीय आंदोलन के अनुयायी के रूप में नहीं देखा।

किसान अपने आर्थिक और राजनीतिक हितों के लिए स्वतंत्र संगठन बनाए।

यह मामूली परिवर्तन नहीं था।

कांग्रेस के व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन में किसान शामिल था—

उसकी अपनी मांगें क्या हैं?

जमींदार की शक्ति क्या?

कृषि मजदूर की मजदूरी कितनी?

AIKS के गोल्डन जुबिली दस्तावेज ने अपने स्थापना उद्देश्य को किसानों और मजदूरों को आर्थिक शोषण से मुक्त करने तथा उनकी राजनीतिक–आर्थिक शक्ति बढ़ाने के कार्यक्रम के रूप में पुनः दर्ज किया।

यहीं भारतीय किसान राजनीति की स्वतंत्र संस्थागत परंपरा मजबूत हुई।

# 2. ‘जमीन जोते उसकी’ को राष्ट्रीय विचार बनाना

AIKS की सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक–राजनीतिक उपलब्धियों में है—

Land to the Tiller—जमीन जोते उसकी।

आज यह विचार सामान्य भूमि सुधार सिद्धांत जैसा लग सकता है।

लेकिन औपनिवेशिक भारत में इसका अर्थ था—

जमींदार की आर्थिक और सामाजिक सत्ता को चुनौती।

किसान सभा ने tenancy को केवल दया अथवा संरक्षण का प्रश्न नहीं—

उत्पादक के अधिकार का प्रश्न बनाया।

1995 के AIKS सम्मेलन दस्तावेज ने स्वयं मूल्यांकन किया कि “Land to the tiller” का नारा धीरे-धीरे कांग्रेस सहित अनेक दलों द्वारा स्वीकार किया गया और AIKS ने वास्तविक भूमि सुधार को राष्ट्रीय राजनीतिक एजेंडे पर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यही उसकी बड़ी वैचारिक सफलता है—

जो मांग कभी उग्र मानी जाती थी, वह राष्ट्रीय नीति भाषा का हिस्सा बनी।

# 3. क्या जमींदारी उन्मूलन AIKS की उपलब्धि था?

कांग्रेस के भीतर कृषि सुधार की धारा,

प्रांतीय किसान संघर्ष,

औपनिवेशिक शासन के बाद बदलती राजनीतिक आवश्यकता—

लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि किसान आंदोलनों का कोई प्रभाव नहीं था।

AIKS के अपने ऐतिहासिक दस्तावेज तेभागा, तेलंगाना, बकाश्त, वारली और अन्य किसान संघर्षों को स्वतंत्रता के बाद सरकारों पर भूमि सुधार कानून बनाने के दबाव का महत्वपूर्ण कारण बताते हैं।

अधिक संतुलित निष्कर्ष होगा—

AIKS ने भूमि सुधार का दबाव पैदा करने वाली महत्वपूर्ण सामाजिक–राजनीतिक शक्तियों में प्रमुख भूमिका निभाई; लेकिन जमींदारी उन्मूलन अथवा भूमि सुधारों को केवल उसी की उपलब्धि मानना उचित नहीं।

# 4. तेभागा : बटाईदार अधिकार की ऐतिहासिक उपलब्धि

तेभागा आंदोलन ने AIKS की किसान राजनीति को पूरे देश में पहचाना।

बंगाल के बर्गादार का प्रश्न था—

फसल का कितना हिस्सा उसे मिले?

किसान सभा ने दो-तिहाई हिस्से की मांग उठाई।

यह आंदोलन अंततः अपने तत्काल व्यापक उद्देश्य को पूर्ण रूप से हासिल नहीं कर सका—

लेकिन उसने बंगाल में बर्गादार प्रश्न को ऐसी राजनीतिक शक्ति दी जिसे बाद की भूमि सुधार व्यवस्था नजरअंदाज नहीं कर सकती थी।

AIKS के ऐतिहासिक स्रोत तेभागा को युद्धोत्तर किसान उभार की निर्णायक घटनाओं में रखते हैं।

तेभागा की सबसे बड़ी उपलब्धि इसलिए केवल तत्काल फसल-बंटवारे में नहीं—

sharecropper को राजनीतिक नागरिक बनाने में थी।

# 5. तेलंगाना : सबसे व्यापक कृषि सत्ता चुनौती

तेलंगाना AIKS और कम्युनिस्ट किसान राजनीति का सबसे उग्र ऐतिहासिक अध्याय था।

के विरुद्ध संघर्ष ने हजारों गांवों में ग्रामीण सत्ता संबंधों को चुनौती दी।

AIKS के स्रोत आंदोलन के दौरान लगभग 3,000 गांवों तक ग्राम राज संरचनाओं और व्यापक भूमि वितरण का दावा करते हैं; पी. सुंदरैया के लेखन के आधार पर लगभग दस लाख एकड़ भूमि वितरण का संगठनात्मक दावा भी दिया जाता है।

इन आंकड़ों को AIKS/कम्युनिस्ट आंदोलन के स्रोत के रूप में पढ़ना चाहिए।

लेकिन तेलंगाना की बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि निर्विवाद है—

उसने स्वतंत्र भारत की सरकार को भूमि संबंधों के प्रश्न की गंभीरता दिखा दी।

# 6. तेलंगाना की सीमा

उसी संघर्ष ने AIKS की एक स्थायी दुविधा भी उजागर की—

सशस्त्र संघर्ष कितनी दूर तक?

भारतीय सेना के प्रवेश और स्वतंत्र भारतीय राज्य की स्थापना के बाद भी संघर्ष जारी रखने पर कम्युनिस्ट आंदोलन में तीखा मतभेद हुआ।

और अंततः आंदोलन वापसी—

ने दिखाया कि ग्रामीण क्रांतिकारी सत्ता का मॉडल पूरे देश में दोहराना संभव नहीं था।

AIKS को बाद में जनसंगठन और संसदीय राजनीति की ओर अधिक स्पष्ट संक्रमण करना पड़ा।

इसलिए तेलंगाना उपलब्धि भी है—

और रणनीतिक सीमा का पाठ भी।

# 7. स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधार में AIKS का योगदान

AIKS के लिए भूमि सुधार की अपनी नीति को व्यवहार में देखने के प्रमुख क्षेत्र बने।

उसकी 30वीं सम्मेलन रिपोर्ट का दावा था कि वास्तविक महत्वपूर्ण भूमि सुधार मुख्य रूप से इन्हीं वाम-शासित राज्यों में लागू हुए।

यह AIKS का राजनीतिक मूल्यांकन है और दूसरे राज्यों की भूमि सुधार उपलब्धियों को पूरी तरह नकारना उचित नहीं।

फिर भी पश्चिम बंगाल और केरल में व्यापक tenancy reform तथा भूमि सुधार की तुलनात्मक गहराई अकादमिक साहित्य में भी सामान्यतः स्वीकार की गई है।

यह AIKS की विचारधारा और शासन अनुभव के बीच महत्वपूर्ण संबंध था।

# 8. ऑपरेशन बर्गा : विचार से प्रशासन तक

पश्चिम बंगाल में बर्गादार पंजीकरण ने किसान सभा की पुरानी बटाईदार राजनीति को प्रशासनिक कार्यक्रम में बदला।

जिसका अधिकार आंदोलन में मांगा गया था—

अब रिकॉर्ड में दर्ज बर्गादार बन सकता था।

AIKS ने गांव स्तर पर—

में महत्वपूर्ण संगठनात्मक भूमिका निभाई।

यहीं उसकी एक बड़ी उपलब्धि थी—

आंदोलनात्मक मांग को राज्य नीति के क्रियान्वयन से जोड़ना।

# 9. लेकिन यही सत्ता-संबंध बाद में सीमा बना

जब वही राजनीतिक धारा सरकार में हो जिससे किसान संगठन निकट संबद्ध हो—

तो स्वतंत्रता का प्रश्न उठता है।

की दोहरी भूमिका में डाल दिया।

अध्याय 40

अखिल भारतीय किसान सभा की विस्तृत समयरेखा, 1929–2026

बिहार प्रांतीय किसान सभा और लखनऊ स्थापना से फैजपुर, तेभागा, तेलंगाना, कम्युनिस्ट विभाजन, नक्सलबाड़ी, ऑपरेशन बर्गा, उदारीकरण–WTO विरोध, किसान आत्महत्या संकट, भूमि अध्यादेश, महाराष्ट्र लॉन्ग मार्च, तीन कृषि कानून, 378 दिन के किसान आंदोलन, MSP संघर्ष और 2026 के नए राष्ट्रीय किसान आंदोलन तक वर्षवार क्रम

अखिल भारतीय किसान सभा का इतिहास केवल किसी एक संगठन के सम्मेलन, अध्यक्ष और महासचिवों की सूची नहीं है। इसकी समयरेखा आधुनिक भारत के कृषि संबंधों में हुए लगभग पूरे परिवर्तन को समेटती है—जमींदारी और लगान से लेकर भूमि सुधार, हरित क्रांति, कृषि लागत, वैश्वीकरण, किसान आत्महत्याओं, वनाधिकार, भूमि अधिग्रहण, MSP और कॉरपोरेट कृषि तक।

इस समयरेखा को पढ़ते समय एक तथ्य ध्यान में रखना आवश्यक है। 1936 के बाद प्रत्येक बड़ा किसान आंदोलन AIKS का आंदोलन नहीं था। नक्सलबाड़ी, भारतीय किसान यूनियन के आंदोलन, शेतकरी संगठन, पंजाब की विभिन्न किसान यूनियनों और 2024 के अलग किसान मार्चों की अपनी स्वतंत्र संगठनात्मक धाराएं थीं। जहां AIKS प्रत्यक्ष नेतृत्व में थी, वहां उसे स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया है; और जहां घटना व्यापक भारतीय किसान राजनीति के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, वहां उसे उसी रूप में रखा गया है।

AIKS के अपने अभिलेख बताते हैं कि 11 अप्रैल 1936 को लखनऊ में स्थापना सम्मेलन हुआ और स्वामी सहजानंद सरस्वती उसके संस्थापक अध्यक्ष बने। संगठन की डिजिटल लाइब्रेरी में 1942 से आगे के अनेक सम्मेलन दस्तावेज भी उपलब्ध हैं, जिससे इसकी संस्थागत समयरेखा का काफी बड़ा हिस्सा प्राथमिक स्रोतों से पुनर्निर्मित किया जा सकता है।

1929 : बिहार प्रांतीय किसान सभा — राष्ट्रीय संगठन की पहली मजबूत आधारशिला

नवंबर 1929 में स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में बिहार प्रांतीय किसान सभा — Bihar Provincial Kisan Sabha (BPKS) अस्तित्व में आई।

यह घटना AIKS की पूर्वपीठिका में निर्णायक थी।

बिहार में किसान प्रश्न मुख्यतः—

और जमींदारों के सामाजिक प्रभुत्व—

स्वामी सहजानंद ने धीरे-धीरे महसूस किया कि किसान को कांग्रेस की सामान्य राष्ट्रीय राजनीति के भीतर केवल समर्थक समूह के रूप में रखना पर्याप्त नहीं है; उसके आर्थिक हितों के लिए अलग संगठन आवश्यक है।

AIKS का अपना ऐतिहासिक विवरण भी 1929 की बिहार प्रांतीय किसान सभा को 1936 के अखिल भारतीय संगठन की प्रमुख संगठनात्मक पूर्वपीठिका मानता है।

# 1930–31 : आर्थिक मंदी और किसान प्रश्न का तीव्र होना

1929 की विश्वव्यापी महामंदी का प्रभाव भारतीय कृषि पर गहराने लगा।

कृषि वस्तुओं के दाम गिरे—

लेकिन लगान और पुराने कर्ज उसी अनुपात में नहीं घटे।

इससे वास्तविक किसान बोझ बढ़ा।

किसान के सामने समस्या थी—

उत्पाद सस्ता, कर्ज महंगा और लगान स्थिर।

यही आर्थिक संकट अगले कुछ वर्षों में किसान संगठनों के विस्तार की प्रमुख जमीन बना।

# 1932–34 : कांग्रेस आंदोलन की मंदी और स्वतंत्र किसान संगठन की बहस

सविनय अवज्ञा आंदोलन के उतार के बाद ग्रामीण राजनीतिक कार्यकर्ताओं में यह प्रश्न मजबूत हुआ—

क्या किसानों को कांग्रेस से अलग अपना आर्थिक संगठन चाहिए?

और अन्य क्षेत्रों में किसान संगठन बनने लगे।

कांग्रेस समाजवादी और कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने भी किसान प्रश्न पर सक्रिय हस्तक्षेप बढ़ाया।

# 1935 : प्रांतीय किसान संगठनों का विस्तार

आंध्र में एन. जी. रंगा तथा अन्य नेताओं की रैयत राजनीति,

उत्तर भारत के स्थानीय किसान संगठन,

पंजाब में कर्ज-विरोधी किसान लामबंदी—

धीरे-धीरे एक राष्ट्रीय किसान मंच की आवश्यकता पैदा कर रहे थे।

AIKS के बाद के सम्मेलन दस्तावेज भी 1930 के दशक के कृषि संकट और विभिन्न प्रांतों में स्वतंत्र किसान संगठनों के उदय को उसके जन्म की प्रत्यक्ष पृष्ठभूमि बताते हैं।

# जनवरी 1936 : मेरठ में अखिल भारतीय पहल

जनवरी 1936 में मेरठ में किसान संगठनों को अखिल भारतीय स्तर पर जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण बैठक हुई।

AIKS के स्वर्ण जयंती दस्तावेज के अनुसार जनवरी 1936 में एक organizing committee बनी और उसी प्रक्रिया ने अप्रैल के लखनऊ सम्मेलन का रास्ता तैयार किया।

यहां से क्षेत्रीय किसान राजनीति पहली बार व्यवस्थित अखिल भारतीय संगठन की ओर बढ़ी।

# 11 अप्रैल 1936 : लखनऊ — अखिल भारतीय किसान संगठन का जन्म

यह AIKS इतिहास की मूल तिथि है।

11 अप्रैल 1936, लखनऊ।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन के समानांतर किसान नेताओं का सम्मेलन हुआ।

स्वामी सहजानंद सरस्वती,

सहित विभिन्न धाराओं के नेता इसमें जुड़े।

स्वामी सहजानंद सरस्वती अध्यक्ष बने।

संगठन प्रारंभ में All India Kisan Congress नाम से अस्तित्व में आया; बाद में All India Kisan Sabha नाम स्थायी हुआ।

उसके उद्देश्य में किसानों को आर्थिक शोषण से मुक्ति और किसानों–मजदूरों की आर्थिक तथा राजनीतिक शक्ति के लिए संगठित करना केंद्रीय था।

# 1936 : किसान कार्यक्रम

स्थापना के साथ किसान सभा ने जिन प्रश्नों को राष्ट्रीय बनाया उनमें शामिल थे—

कृषि उत्पादों के मूल्य,

चरागाह और साझा भूमि,

तथा कृषि मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी।

यह उल्लेखनीय है कि कृषि मजदूरों के संगठन के कानूनी अधिकार का प्रश्न भी प्रारंभिक कार्यक्रम में था।

# दिसंबर 1936 : फैजपुर कांग्रेस

कांग्रेस का फैजपुर अधिवेशन ग्रामीण भारत में आयोजित हुआ।

किसान प्रश्न राष्ट्रीय आंदोलन के केंद्र के और निकट आया।

कांग्रेस के 1936 के चुनाव घोषणापत्र में—

लगान और भूमि राजस्व में राहत,

छोटी अलाभकारी जोतों को राहत,

सिंचाई दरों में कमी,

बेगार और सामंती वसूली समाप्त करना,

काश्तकारों को स्थायी अधिकार,

ग्रामीण ऋण बोझ कम करना—

जैसी बातें शामिल हुईं।

AIKS के दबाव और व्यापक किसान उभार ने कृषि प्रश्न को राष्ट्रीय राजनीति में अधिक स्पष्ट बनाया।

# 1937 : प्रांतीय चुनाव और नई परीक्षा

Government of India Act, 1935 के अंतर्गत प्रांतीय चुनाव हुए।

कई प्रांतों में कांग्रेस सरकारें बनीं।

अब किसान सभा के सामने नया प्रश्न था—

जिस कांग्रेस के साथ स्वतंत्रता संघर्ष में सहयोग है, उसकी सरकारों से किसान अधिकार कैसे हासिल किए जाएं?

यहीं से कांग्रेस और स्वतंत्र किसान राजनीति के बीच तनाव अधिक स्पष्ट होने लगा।

इसी दौर में All India Kisan Congress से All India Kisan Sabha नाम की स्वतंत्र पहचान मजबूत हुई। AIKS के इतिहास के अनुसार जुलाई 1937 में नाम बदलने का निर्णय हुआ।

# 1937–39 : बिहार में बकाश्त संघर्ष

बिहार में जमींदारों द्वारा बकाश्त घोषित की गई भूमि की वापसी का संघर्ष तेज हुआ।

जैसे कार्यक्रम चलाए।

स्वामी सहजानंद और कार्यानंद शर्मा जैसे नेता प्रमुख बने।

यह AIKS की प्रारंभिक उग्र भूमि राजनीति का महत्वपूर्ण चरण था।

# 1938 : किसान सभा का बढ़ता वर्गीय चरित्र

कम्युनिस्ट और कांग्रेस समाजवादी कार्यकर्ताओं का प्रभाव बढ़ा।

जमींदारी समाप्त करने की मांग अधिक स्पष्ट हुई।

लाल झंडा किसान सभा की राजनीतिक पहचान बनता गया।

किसान–मजदूर एकता उसकी विचारधारा का केंद्रीय तत्व बनी।

# 1939 : द्वितीय विश्वयुद्ध

सितंबर 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हुआ।

ब्रिटेन ने भारत को बिना भारतीय राजनीतिक सहमति के युद्ध में शामिल कर दिया।

कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने इस्तीफा दिया।

किसान सभा के सामने अब—

राष्ट्रीय स्वतंत्रता

के संबंध का प्रश्न खड़ा हुआ।

# 1940–41 : युद्धकालीन संकट

किसान सभा ने साम्राज्यवाद-विरोधी रुख बनाए रखा।

लेकिन जून 1941 में जर्मनी द्वारा सोवियत संघ पर हमला करने के बाद भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन की युद्ध संबंधी नीति बदलने लगी।

# 1942 : भारत छोड़ो आंदोलन और किसान सभा का बड़ा विभाजन

अगस्त 1942 में कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया।

CPI ने फासीवाद-विरोधी People's War — जनयुद्ध नीति के कारण आंदोलन का समर्थन नहीं किया।

AIKS में कम्युनिस्ट प्रभाव बढ़ चुका था।

परंतु किसान सभा के सभी सदस्य और स्थानीय इकाइयां इस नीति से सहमत नहीं थीं।

राष्ट्रवादी किसान नेताओं

के बीच गंभीर राजनीतिक दूरी पैदा हुई।

औद्योगिक परियोजनाओं,

अध्याय 41

अखिल भारतीय किसान सभा के प्रमुख प्राथमिक स्रोत और दस्तावेज

1936 के स्थापना प्रस्ताव और घोषणापत्र, किसान सभा सम्मेलन रिपोर्टें, स्वामी सहजानंद–एन. जी. रंगा के लेखन, तेभागा–तेलंगाना दस्तावेज, भूमि सुधार और ऑपरेशन बर्गा अभिलेख, AIKS के प्रस्ताव–पत्रिकाएं, किसान लॉन्ग मार्च दस्तावेज, AIKSCC–SKM घोषणाएं तथा 2020–21 किसान आंदोलन के मूल दस्तावेज

अखिल भारतीय किसान सभा का इतिहास लिखने में सबसे बड़ी सुविधा यह है कि यह केवल स्मृतियों और बाद के इतिहासकारों पर निर्भर संगठन नहीं है। इसके पास लगभग नौ दशकों में फैला हुआ ऐसा दस्तावेजी संसार है जिसमें स्थापना संबंधी प्रस्ताव, सम्मेलन रिपोर्टें, अध्यक्षीय भाषण, महासचिव रिपोर्ट, संगठनात्मक प्रतिवेदन, किसान पत्रिकाएं, आंदोलन घोषणाएं, व्यक्तिगत नेताओं का लेखन, सरकारी खुफिया और प्रशासनिक रिकॉर्ड, भूमि सुधार आदेश, किसान संगठनों के ज्ञापन तथा आधुनिक दौर में डिजिटल प्रेस विज्ञप्तियां तक शामिल हैं।

लेकिन इसी समृद्धि के साथ एक सावधानी भी आवश्यक है।

AIKS का अपना दस्तावेज संगठन की दृष्टि बताता है; वह अपने आप निष्पक्ष इतिहास नहीं बन जाता। इसी प्रकार औपनिवेशिक सरकार की पुलिस रिपोर्ट किसान आंदोलन को “lawlessness” अथवा “disturbance” कह सकती है; वह भी स्वतः तटस्थ दस्तावेज नहीं।

इसलिए AIKS का गंभीर इतिहास कम-से-कम तीन प्रकार के स्रोतों को साथ पढ़कर बनना चाहिए—

किसान संगठन क्या कह रहा था; सरकार उसे कैसे देख रही थी; और जमीन पर वास्तव में क्या हुआ।

इसी स्रोत-पद्धति के आधार पर नीचे प्रमुख प्राथमिक दस्तावेजों और अभिलेखों का व्यवस्थित मानचित्र प्रस्तुत है।

1. 1936 के स्थापना दस्तावेज सबसे महत्वपूर्ण क्यों?

AIKS को समझने का पहला स्रोत कोई बाद का इतिहासकार नहीं, बल्कि उसका मूल उद्देश्य और कार्यक्रम होना चाहिए।

1936 में लखनऊ में गठित अखिल भारतीय किसान संगठन ने अपने उद्देश्य को केवल तत्काल राहत तक सीमित नहीं रखा। बाद के आधिकारिक AIKS पुनर्मुद्रणों में स्थापना सम्मेलन के उद्देश्य को किसानों और मजदूरों सहित शोषित वर्गों को आर्थिक शोषण से मुक्ति और उनके आर्थिक–राजनीतिक अधिकारों के विस्तार से जोड़ा गया है।

इसी स्थापना सामग्री से हमें पता चलता है कि संगठन की प्रारंभिक दिशा में—

राष्ट्रीय स्वतंत्रता

एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।

इसलिए यदि किसी शोधकर्ता को यह जानना हो कि 1936 का AIKS वास्तव में क्या था, तो बाद की CPI या CPI(M) व्याख्या से पहले स्थापना प्रस्ताव पढ़ना चाहिए।

# 2. मूल स्थापना प्रस्ताव की बड़ी समस्या : प्रत्यक्ष मूल प्रति दुर्लभ

AIKS की वर्तमान डिजिटल लाइब्रेरी बताती है कि उसके पास 1936 से संबंधित सामग्री और बाद के सम्मेलन दस्तावेजों का बड़ा संग्रह है, लेकिन डिजिटल रूप से उपलब्ध सम्मेलन दस्तावेज मुख्यतः 1942 से आगे अधिक व्यवस्थित हैं; संगठन स्वयं स्वीकार करता है कि उसका काफी भौतिक संग्रह अभी पूर्ण रूप से डिजिटाइज नहीं हुआ है।

इसलिए 1936 के मूल स्थापना प्रस्ताव के लिए कई बार शोधकर्ता को—

बाद के AIKS सम्मेलन पुनर्मुद्रण,

स्वर्ण जयंती प्रकाशन,

समकालीन किसान साहित्य,

से पाठ पुनर्निर्मित करना पड़ता है।

यह स्रोत-पद्धति की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

यदि कोई दस्तावेज 1986 में 1936 के प्रस्ताव को पुनर्मुद्रित कर रहा है, तो वह उपयोगी प्राथमिक-स्रोत पुनरुत्पादन है—

लेकिन मूल 1936 छपी प्रति से एक स्तर दूर।

# 3. 1986 का Golden Jubilee Session — स्थापना काल पुनर्निर्माण का अत्यंत उपयोगी स्रोत

AIKS का 25वां सम्मेलन और स्वर्ण जयंती सत्र 1936 के इतिहास को समझने के लिए असाधारण स्रोत है।

इसमें संस्थापक सम्मेलन,

पुराने किसान संघर्ष,

सभी का संगठनात्मक पुनरावलोकन मिलता है।

इसका उपयोग दो तरह से किया जाना चाहिए—

पहला, 1936 के कार्यक्रम और संगठनात्मक आत्मस्मृति के स्रोत के रूप में।

दूसरा, 1986 में AIKS अपने पहले पचास वर्ष को कैसे देख रही थी—इस इतिहासलेखन के स्रोत के रूप में।

यह दूसरी बात उतनी ही महत्वपूर्ण है।

क्योंकि संगठन अपने अतीत का चयन कैसे करता है, इससे उसकी वर्तमान वैचारिक पहचान भी समझ आती है।

# 4. सम्मेलन दस्तावेज : AIKS इतिहास की रीढ़

AIKS की डिजिटल लाइब्रेरी में 1942 से 2022 तक अनेक राष्ट्रीय सम्मेलनों की सामग्री उपलब्ध है।

जैसे सम्मेलन दर्ज हैं।

इन सम्मेलन दस्तावेजों को AIKS इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण क्रमिक प्राथमिक स्रोत माना जा सकता है।

# 5. सम्मेलन में कौन-कौन से दस्तावेज मिलते हैं?

आम तौर पर AIKS सम्मेलन सामग्री में कई प्रकार के दस्तावेज होते हैं—

आर्थिक–कृषि विश्लेषण

भूमि, मूल्य, ऋण, WTO, किसान मजदूर आदि पर प्रस्ताव

राज्यवार संगठनात्मक स्थिति

2003 के 30वें सम्मेलन की सामग्री में उदाहरणतः महासचिव रिपोर्ट, अध्यक्षीय भाषण, credentials report, नौ प्रस्ताव, संविधान संशोधन और संगठनात्मक कार्यों का विवरण मिलता है।

इसलिए सम्मेलन दस्तावेज किसी एक भाषण से कहीं अधिक व्यापक स्रोत हैं।

# 6. सम्मेलन दस्तावेजों का उपयोग कैसे करें?

मान लीजिए प्रश्न है—

AIKS ने 1980 के दशक में भूमि के साथ MSP को कब और कैसे महत्वपूर्ण माना?

तो सबसे अच्छा स्रोत होगा उस दौर का सम्मेलन प्रस्ताव।

1991 के बाद AIKS ने उदारीकरण को कैसे पढ़ा?

तो 1990 के दशक के सम्मेलन दस्तावेज।

2017 में संगठन की सदस्यता और क्षेत्रीय शक्ति क्या थी?

तो 34वें सम्मेलन का credentials report।

यानी सम्मेलन दस्तावेज विषयवार भी पढ़े जा सकते हैं और कालक्रमिक रूप से भी।

# 7. 1944 विजयवाड़ा सम्मेलन : संगठनात्मक जनाधार का अद्भुत स्रोत

1944 के आठवें AIKS सम्मेलन की रिपोर्ट यह बताती है कि सम्मेलन के प्रचार के लिए 450 प्रचार दल लगभग 2,000 गांवों तक गए और खुले सत्र में लगभग एक लाख लोगों तथा दस हजार से अधिक महिलाओं की उपस्थिति का संगठनात्मक दावा किया गया।

यह हमें केवल सम्मेलन की संख्या नहीं बताता।

किसान सभा प्रचार कैसे करती थी,

गांवों तक कैसे पहुंचती थी,

महिलाओं को किस स्तर तक लामबंद करती थी,

और युद्धकाल में भी संगठनात्मक विस्तार कैसे कर रही थी।

इस प्रकार की संगठनात्मक रिपोर्टें ग्रामीण राजनीतिक mobilization के इतिहास के लिए अमूल्य हैं।

# 8. लेकिन AIKS की अपनी संख्या को कैसे पढ़ें?

यह नियम पूरे अध्याय में लागू होना चाहिए।

दस लाख एकड़ भूमि बांटी,

डेढ़ करोड़ सदस्य हैं—

तो वेबसाइट में लिखा जाना चाहिए—

“AIKS की रिपोर्ट के अनुसार…”

जब तक उस संख्या का स्वतंत्र स्रोत से मिलान न हो।

संगठनात्मक आंकड़ा झूठा होना आवश्यक नहीं—

लेकिन वह self-reported है।

इसी प्रकार सरकारी पुलिस रिपोर्ट भी स्वतः अंतिम सत्य नहीं।

# 9. अध्यक्षीय भाषणों का महत्व

अध्यक्षीय भाषण अक्सर उस समय की वैचारिक दिशा बताते हैं।

उदाहरणतः 1970 और 1980 के दशक के भाषणों में—

ग्रामीण वर्ग विभेदन,

पर संगठन की विचारधारा समझी जा सकती है।

बहुराष्ट्रीय कंपनियां,

2022 के 35वें सम्मेलन तक—

2020–21 किसान आंदोलन—

केंद्रीय हो चुके थे।

इसलिए अध्यक्षीय भाषण AIKS की वैचारिक समयरेखा बनाने का अच्छा प्राथमिक स्रोत है।

# 10. महासचिव रिपोर्ट : राजनीतिक भाषण से अधिक उपयोगी

यदि अध्यक्षीय भाषण वैचारिक दिशा देता है, तो महासचिव रिपोर्ट प्रायः अधिक उपयोगी संस्थागत दस्तावेज होती है।

पिछले सम्मेलन के बाद आंदोलन,

राज्यवार गतिविधियां,

अगली अवधि की रणनीति।

इसीलिए AIKS की वास्तविक शक्ति और कमजोरी समझने में महासचिव रिपोर्टों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

# 11. Credentials Reports : कम उपयोग किए जाने वाले लेकिन महत्वपूर्ण स्रोत

Credentials Report यह बताती है—

उनकी वर्गीय पृष्ठभूमि क्या?

दलित–आदिवासी–अन्य सामाजिक समूह कितने?

संगठन का क्षेत्रीय वितरण क्या?

इन दस्तावेजों से संगठन की घोषणाओं और वास्तविक प्रतिनिधि संरचना की तुलना की जा सकती है।

AIKS की क्षेत्रीय असमानता पर किए गए विश्लेषण के लिए ऐसे दस्तावेज विशेष रूप से उपयोगी हैं।

# 12. सदस्यता सूची और संगठनात्मक रिपोर्ट

AIKS के सम्मेलन दस्तावेज अलग-अलग काल में करोड़ों सदस्यता के दावे करते हैं।

अध्याय 42

प्रमुख द्वितीयक स्रोत और इतिहासलेखन

राष्ट्रवादी, मार्क्सवादी, किसान-अध्ययन, ग्रामीण सामाजिक इतिहास, प्रमुख इतिहासकार, मानक पुस्तकें, शोध-पत्र और उपयोगी डिजिटल अभिलेख

अखिल भारतीय किसान सभा का इतिहास केवल घटनाओं का इतिहास नहीं है; यह इतिहासलेखन की दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध क्षेत्र है। अलग-अलग इतिहासकारों ने किसान आंदोलनों को अलग प्रश्नों से देखा है। किसी ने उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन की सहायक शक्ति माना, किसी ने वर्ग-संघर्ष का रूप, किसी ने ग्रामीण सत्ता-संबंधों का विस्फोट, किसी ने किसान की स्वतंत्र राजनीतिक चेतना, और आधुनिक शोध ने जाति, लिंग, क्षेत्रीयता, बाजार, भूमि-अधिकार, राज्य और वैश्वीकरण को भी इसमें शामिल किया है।

इसी कारण AIKS पर शोध करते समय केवल “कौन-सी पुस्तक सबसे अच्छी है?” पूछना पर्याप्त नहीं। अधिक उपयोगी प्रश्न हैं—

लेखक किसान को किस दृष्टि से देखता है? उसका स्रोत-आधार क्या है? वह संगठन, वर्ग, राष्ट्रवाद या किसान चेतना में किसे प्राथमिकता देता है? और उसकी राजनीतिक/वैचारिक स्थिति विश्लेषण को कैसे प्रभावित करती है?

यही इस अध्याय का केंद्रीय उद्देश्य है।

1. AIKS के इतिहासलेखन की चार बड़ी धाराएं

अखिल भारतीय किसान सभा और भारतीय किसान आंदोलनों पर लिखे साहित्य को मोटे तौर पर चार व्यापक धाराओं में समझा जा सकता है—

राष्ट्रवादी इतिहासलेखन — किसान संघर्षों को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के व्यापक विकास के भीतर रखता है।

मार्क्सवादी इतिहासलेखन — भूमि संबंध, वर्ग-संघर्ष, जमींदार–किसान, गरीब–मध्यम–समृद्ध किसान, कृषि मजदूर और साम्राज्यवाद को केंद्रीय मानता है।

किसान-अध्ययन/Peasant Studies — किसान आंदोलन को अपनी स्वतंत्र सामाजिक संरचना, राजनीतिक व्यवहार और संगठनात्मक गतिशीलता के साथ पढ़ता है।

ग्रामीण सामाजिक और Subaltern इतिहास — किसान की अपनी चेतना, जाति, समुदाय, संस्कृति, स्थानीय सत्ता और राज्य के साथ संबंध को अधिक महत्व देता है।

इनके बीच कठोर दीवारें नहीं हैं।

कई महत्वपूर्ण इतिहासकार एक से अधिक धाराओं से प्रभावित हैं।

# 2. राष्ट्रवादी इतिहासलेखन : किसान राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा

राष्ट्रवादी इतिहासलेखन की प्रारंभिक प्रवृत्ति किसान आंदोलनों को मुख्यतः स्वतंत्रता संघर्ष के विकास से जोड़कर देखने की रही।

इस दृष्टि में महत्वपूर्ण प्रश्न हैं—

किसान कांग्रेस से कैसे जुड़ा?

गांधी ने किसान को राष्ट्रीय राजनीति में कैसे लाया?

ने राष्ट्रीय आंदोलन का जनाधार कैसे बढ़ाया?

इस धारा की ताकत यह है कि वह किसान आंदोलनों को भारत के राजनीतिक राष्ट्रीयकरण के संदर्भ में रखती है।

लेकिन इसकी सीमा भी स्पष्ट है—

ऐसे अध्ययन कई बार स्वतंत्र किसान संगठन, वर्गीय मांग, कांग्रेस से किसान नेतृत्व के मतभेद और AIKS जैसी स्वतंत्र संस्थाओं की स्वायत्तता को कम महत्व दे सकते हैं।

# 3. राष्ट्रवादी दृष्टि में गांधी बनाम AIKS का प्रश्न

गांधीवादी किसान आंदोलनों में सामान्यतः—

राष्ट्रीय आंदोलन से संबंध

AIKS ने बाद में पूछा—

क्या किसान को केवल कांग्रेस के राष्ट्रीय कार्यक्रम का अनुयायी रहना चाहिए?

यहीं राष्ट्रवादी और स्वतंत्र किसान संगठन की व्याख्या अलग होती है।

राष्ट्रवादी इतिहासकार अक्सर गांधीवादी किसान लामबंदी को राजनीतिक प्रशिक्षण का महत्वपूर्ण चरण मानते हैं।

मार्क्सवादी इतिहासकार पूछते हैं—

क्या उस लामबंदी ने ग्रामीण वर्ग-संबंधों को पर्याप्त रूप से चुनौती दी?

यह बहस चंपारण से लेकर फैजपुर और 1937 कांग्रेस सरकारों तक पूरे किसान इतिहास में चलती है।

# 4. बिपन चंद्र और राष्ट्रीय आंदोलन की व्यापक संरचना

बिपन चंद्र और उनके सहयोगियों की भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन पर लिखी पुस्तकों में किसान आंदोलनों को राष्ट्रीय राजनीतिक mobilization के महत्वपूर्ण घटक के रूप में स्थान मिलता है।

उनकी बड़ी विशेषता है—

औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था,

और जन आंदोलनों के संबंध को समेकित रूप से देखना।

लेकिन यदि शोध का मुख्य प्रश्न AIKS की आंतरिक वर्ग संरचना या प्रांतीय किसान सभा संगठन है, तो इस साहित्य को अधिक विशिष्ट किसान-अध्ययन के साथ पढ़ना आवश्यक है।

# 5. सुमित सरकार : राष्ट्रीय आंदोलन और जन राजनीति के बीच

सुमित सरकार की Modern India, 1885–1947 किसान आंदोलनों के लिए अत्यंत उपयोगी मानक पुस्तक है।

उनका काम केवल कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व नहीं देखता।

क्षेत्रीय जन आंदोलन,

1945–47 की लोकप्रिय लामबंदी—

पर भी पर्याप्त ध्यान देता है।

तेभागा, युद्धोत्तर जन संघर्ष और राष्ट्रीय नेतृत्व के संबंध को समझने के लिए उनका लेखन विशेष रूप से उपयोगी है। तेभागा संबंधी आधुनिक शोधों में भी उनके “Popular Movements and National Leadership, 1945–47” जैसे अध्ययन संदर्भित होते हैं।

सुमित सरकार को इसलिए राष्ट्रवादी और सामाजिक इतिहास के बीच सेतु की तरह पढ़ा जा सकता है।

# 6. मार्क्सवादी इतिहासलेखन की बुनियादी दृष्टि

AIKS को सबसे गहराई से समझने वाली प्रारंभिक धारा मार्क्सवादी रही है।

इसके केंद्रीय प्रश्न हैं—

जमींदार और tenant का संबंध क्या?

कृषि अधिशेष कौन लेता है?

साम्राज्यवाद और भारतीय भू-स्वामी वर्ग का संबंध क्या?

किसान संघर्ष reform है या agrarian revolution?

AIKS स्वयं लंबे समय तक मार्क्सवादी शब्दावली में काम करती रही, इसलिए इस धारा का साहित्य संगठन के आत्मबोध से भी जुड़ा है।

लेकिन यही निकटता संभावित पक्षपात भी पैदा करती है।

# 7. ए. आर. देसाई : किसान संघर्ष का व्यापक मार्क्सवादी संकलन

A. R. Desai द्वारा संपादित Peasant Struggles in India इस विषय की सबसे महत्वपूर्ण मानक पुस्तकों में से एक है।

Oxford University Press ने इसे 1979 में प्रकाशित किया। यह लगभग 772 पृष्ठ का विस्तृत संकलन है और इसमें भारत के औपनिवेशिक काल के tribal और peasant struggles पर अनेक महत्वपूर्ण लेख शामिल हैं। LBSNAA का पुस्तक विवरण इसे भारत के किसान और आदिवासी संघर्षों का व्यापक panorama बताता है और उल्लेख करता है कि इसमें कुछ दुर्लभ और archival महत्व की सामग्री भी संकलित है।

AIKS शोध के लिए यह पुस्तक विशेष रूप से उपयोगी है क्योंकि इसमें—

पर विविध अध्ययन एक ही जगह मिलते हैं।

# 8. A. R. Desai को कैसे पढ़ें?

किसान संघर्ष को अलग-अलग isolated घटना न मानकर भारतीय कृषि संरचना और वर्गीय संबंधों से जोड़ना।

मार्क्सवादी ढांचा कई बार घटनाओं को bourgeois, feudal, capitalist, revolutionary जैसी पूर्वनिर्धारित श्रेणियों में अधिक कठोरता से रख सकता है।

इसलिए उनकी पुस्तक को empirical detail के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानें—

लेकिन हर वैचारिक निष्कर्ष को स्वतंत्र तथ्य न मानें।

# 9. स्वतंत्रता के बाद के संघर्षों पर A. R. Desai

देसाई ने बाद में Agrarian Struggles in India after Independence भी संपादित की।

यह 1986 की पुस्तक स्वतंत्र भारत में भूमि सुधार, किसान संघर्ष और ग्रामीण असंतोष को केंद्र में रखती है। पुस्तक के विवरण के अनुसार इसमें 25 लेख हैं और औपनिवेशिक काल के बाद भी जारी agrarian conflicts को व्यापक राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में रखा गया है।

यह अध्याय 23 से आगे—यानी स्वतंत्रता के बाद AIKS की यात्रा—के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण स्रोत है।

# 10. डी. एन. धनागरे : Peasant Movements in India, 1920–1950

D. N. Dhanagare की Peasant Movements in India, 1920–1950 भारतीय किसान इतिहास की अनिवार्य पुस्तकों में है।

Oxford ने इसे 1983 में प्रकाशित किया। पुस्तक की विषय-सूची में agrarian structure, Moplah, Bardoli, peasant organizations, Kisan Sabha, Telangana और किसान वर्ग संरचना जैसे प्रश्न शामिल हैं।

इस पुस्तक की विशिष्टता है—

वह आंदोलन को केवल घटनाओं की chronology नहीं मानती।

किस सामाजिक संरचना से आंदोलन पैदा हुआ?

नेतृत्व किस वर्ग से आया?

किसान के अलग-अलग वर्गों ने कैसे प्रतिक्रिया दी?

# 11. धनागरे का महत्व AIKS के लिए

AIKS के अध्ययन में धनागरे की पुस्तक विशेष उपयोगी है क्योंकि वह—

गरीब–मध्यम–समृद्ध किसान,

को comparative framework में रखती है।

क्षेत्रीय किसान संगठन,

बर्गादार–जोतदार संबंध

अध्याय 43

निष्कर्ष — अखिल भारतीय किसान सभा को कैसे समझें?

1936 से 2026 तक उसकी ऐतिहासिक भूमिका, भूमि से MSP तक परिवर्तन, उपलब्धियां, सीमाएं और भारतीय किसान राजनीति पर दीर्घकालीन प्रभाव का संक्षिप्त समेकित मूल्यांकन

अखिल भारतीय किसान सभा को समझने का सबसे उचित तरीका उसे केवल एक कम्युनिस्ट किसान संगठन, केवल औपनिवेशिक विरोधी संस्था, केवल भूमि सुधार आंदोलन या केवल आधुनिक MSP राजनीति की पूर्वपीठिका मानना नहीं है। उसका लगभग नौ दशक लंबा इतिहास इन सभी चरणों को जोड़ता है।

1936 में लखनऊ में स्वामी सहजानंद सरस्वती की अध्यक्षता में जिस अखिल भारतीय किसान संगठन का निर्माण हुआ, उसकी तत्काल पृष्ठभूमि जमींदारी, लगान, कर्ज, बेदखली और औपनिवेशिक कृषि संरचना थी। किसान सभा ने किसान को कांग्रेस के राष्ट्रीय आंदोलन का केवल समर्थक समूह मानने के बजाय उसके अपने आर्थिक और राजनीतिक हितों के आधार पर संगठित करने का प्रयास किया। स्थापना काल का किसान घोषणापत्र जमींदारी उन्मूलन, ग्रामीण ऋण से राहत, काश्तकारी अधिकार और कृषि मजदूरों की सुरक्षा जैसे प्रश्नों को राष्ट्रीय राजनीति में ले आया।

यहीं AIKS की पहली और सबसे स्थायी ऐतिहासिक उपलब्धि थी—

उसने किसान प्रश्न को राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर एक स्वतंत्र राजनीतिक प्रश्न बना दिया।

भूमि से शुरू हुई राजनीति

AIKS की प्रारंभिक राजनीति के केंद्र में भूमि थी।

बिहार में बकाश्त संघर्ष,

तेलंगाना में देशमुख–जागीरदार विरोध,

वारली आदिवासी संघर्ष—

इन सभी में अलग परिस्थितियां थीं, लेकिन मूल प्रश्न समान था—

जमीन, उत्पादन और ग्रामीण सत्ता पर अधिकार किसका?

इस दौर में “जमीन जोते उसकी” केवल नारा नहीं था। वह ग्रामीण सामाजिक संरचना में परिवर्तन का कार्यक्रम था।

जमींदारी उन्मूलन स्वतंत्र भारत में व्यापक राजनीतिक लक्ष्य बना। इसका श्रेय अकेले किसान सभा को नहीं दिया जा सकता—कांग्रेस, समाजवादी, अन्य किसान संगठन और राज्य की बदलती परिस्थितियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण थीं। फिर भी यह निर्विवाद है कि AIKS और क्षेत्रीय किसान संघर्षों ने भूमि सुधार पर सार्वजनिक और राजनीतिक दबाव बढ़ाया।

तेभागा और तेलंगाना : किसान सभा की उग्रतम विरासत

1940 के दशक में किसान सभा की राजनीति केवल याचिका या सुधार मांगने तक सीमित नहीं रही।

तेभागा में बर्गादार ने पूछा—

फसल में वास्तविक उत्पादक का हिस्सा कितना?

तेलंगाना में प्रश्न और आगे गया—

ग्रामीण सत्ता किसके हाथ में होगी?

इन आंदोलनों ने AIKS की वर्गीय किसान राजनीति को उसकी सबसे तीखी अभिव्यक्ति दी।

लेकिन तेलंगाना ने उसकी सीमा भी दिखाई।

स्वतंत्र भारत में सशस्त्र संघर्ष को कितनी दूर तक जारी रखा जाए?

भारतीय राज्य के प्रति किसान आंदोलन का संबंध क्या हो?

1950 के दशक में AIKS का संसदीय जनसंघर्ष की दिशा में संक्रमण इसी अनुभव से जुड़ा था।

स्वतंत्रता के बाद : विद्रोह से भूमि सुधार तक

स्वतंत्रता के बाद AIKS को स्वयं को पुनर्परिभाषित करना पड़ा।

ब्रिटिश शासन समाप्त हो चुका था।

असुरक्षित किरायेदारी,

इसलिए संघर्ष का केंद्र औपनिवेशिक शासन से हटकर भूमि सुधार कानूनों और उनके क्रियान्वयन पर आया।

पश्चिम बंगाल में 1977 के बाद भूमि सुधार और ऑपरेशन बर्गा ने इस ऐतिहासिक यात्रा का सबसे संस्थागत रूप प्रस्तुत किया।

तेभागा के बर्गादार की मांग अब सरकारी रिकॉर्ड में tenancy protection के रूप में दिखाई देने लगी।

यह AIKS की बड़ी उपलब्धि थी—

आंदोलन के मुद्दे को प्रशासनिक नीति में बदलना।

लेकिन यही दौर उसके एक स्थायी अंतर्विरोध को भी सामने लाया।

यदि संबद्ध राजनीतिक दल स्वयं सरकार में हो, तो किसान संगठन सरकार के विरुद्ध कितनी स्वतंत्रता से संघर्ष करेगा?

यही सवाल आगे सिंगूर और नंदीग्राम के समय और तीखा हुआ।

1964 : एक संगठनात्मक इतिहास का विभाजन

AIKS के इतिहास को 1964 के बाद बिना सावधानी के नहीं पढ़ा जा सकता।

Communist Party of India के विभाजन के बाद किसान सभा भी दो प्रमुख कम्युनिस्ट धाराओं में विभाजित हुई—

CPI-संबद्ध किसान सभा

CPI(M)-संबद्ध किसान सभा।

दोनों ने ऐतिहासिक AIKS परंपरा पर दावा बनाए रखा।

इसलिए 1964 से पहले की अखिल भारतीय किसान सभा और आज की CPI(M)-संबद्ध AIKS को बिना अंतर के एक ही अविभाजित संस्था मानना इतिहासलेखन की दृष्टि से सही नहीं।

आधुनिक दौर में जिस AIKS की राष्ट्रीय किसान आंदोलनों में प्रमुख भूमिका दिखाई देती है, वह CPI(M) से निकट संबद्ध धारा है।

नक्सलबाड़ी : बाईं ओर से चुनौती

1967 के नक्सलबाड़ी विद्रोह ने AIKS से अलग दिशा प्रस्तुत की।

भूमि सुधार के लिए व्यापक जनसंगठन, चुनाव और संवैधानिक संघर्ष?

या तत्काल सशस्त्र कृषि क्रांति?

नक्सलवादी किसान राजनीति दूसरा रास्ता चुनती गई।

यहीं से उसकी दीर्घकालीन राजनीतिक पहचान स्पष्ट हुई—

वर्गीय किसान संघर्ष, लेकिन संगठित जनराजनीति और संसदीय लोकतंत्र के भीतर।

यह उसकी ताकत भी बनी और क्रांतिकारी वाम की दृष्टि से सीमा भी।

हरित क्रांति ने किसान राजनीति का प्रश्न बदल दिया

1960 और 1970 के दशकों के बाद भारतीय कृषि बदल चुकी थी।

AIKS की आलोचना तकनीक की नहीं, बल्कि उसके लाभ के असमान वितरण की थी।

लेकिन इससे किसान राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन अनिवार्य हो गया।

भूमि के साथ नया प्रश्न आया—

कृषि उत्पादन का मूल्य।

अब किसान केवल tenant नहीं था।

वह बाजार में बेचने वाला उत्पादक था।

1980 का दशक : भूमि से लाभकारी मूल्य की ओर

शरद जोशी की शेतकरी संगठन और महेंद्र सिंह टिकैत की भारतीय किसान यूनियन ने भारतीय किसान राजनीति का नया व्याकरण बनाया।

उनका केंद्रीय सवाल था—

उत्पादन लागत और फसल का भाव।

AIKS को स्वीकार करना पड़ा कि भूमि सुधार पर्याप्त नहीं।

किसान को लाभकारी मूल्य भी चाहिए।

यहीं से उसकी आधुनिक MSP राजनीति की बुनियाद मजबूत होती है।

फिर भी AIKS और “नए किसान आंदोलनों” में एक बुनियादी अंतर बना रहा।

नई किसान राजनीति अक्सर किसान को साझा उत्पादक वर्ग के रूप में देखती थी।

गांव के भीतर गरीब किसान, मध्यम किसान, समृद्ध किसान और कृषि मजदूर के हित पूरी तरह समान नहीं हैं।

यही वर्गीय दृष्टि उसकी विशिष्ट पहचान रही।

1991 : प्रतिपक्ष फिर बदल गया

आर्थिक उदारीकरण के बाद AIKS की किसान राजनीति में नए शब्द आए—

बहुराष्ट्रीय कंपनियां,

भारतीय छोटा किसान वैश्विक कृषि बाजार में किस स्थिति में होगा?

और घरेलू मूल्य सुरक्षा का क्या होगा?

यह उसके इतिहास का दूसरा बड़ा वैचारिक परिवर्तन था।

1936 में किसान सभा सामंती और औपनिवेशिक कृषि संरचना के विरुद्ध थी।

1990 के बाद वह बाजार उदारीकरण और वैश्विक कृषि प्रतिस्पर्धा की आलोचक बन गई।

किसान आत्महत्याओं ने संघर्ष को ‘आय सुरक्षा’ की राजनीति बनाया

1990 के दशक के मध्य से किसान आत्महत्याओं ने एक कठोर तथ्य सामने रखा—

भूमि मालिक होना किसान को आर्थिक सुरक्षा की गारंटी नहीं देता।

और अन्य संकटग्रस्त क्षेत्रों ने किसान राजनीति के केंद्र में ला दिया—

नकदी फसलों का जोखिम,

इस दौर में AIKS का पुराना कर्ज-मुक्ति कार्यक्रम फिर नई शक्ति के साथ लौट आया।

लेकिन अब उसके साथ नया सूत्र जुड़ा—

ऋण मुक्ति + लाभकारी मूल्य।

स्वामीनाथन आयोग से जुड़ी C2+50 प्रतिशत की मांग इसी आधुनिक चरण में संगठन की केंद्रीय पहचान बनी।

2015 : भूमि प्रश्न समाप्त नहीं हुआ था

यह भी महत्वपूर्ण है कि MSP और ऋण की राजनीति के बावजूद भूमि प्रश्न खत्म नहीं हुआ।

औद्योगिक परियोजनाएं,

2015 के भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के विरोध में AIKS ने व्यापक किसान–आदिवासी–मजदूर गठबंधन की रणनीति अपनाई।

यहीं आधुनिक AIKS के संगठनात्मक परिवर्तन का संकेत दिखने लगा।

“सभी किसानों को किसान सभा में लाओ”

अपना संगठन बनाए रखो और साझा मुद्दे पर दूसरे संगठनों के साथ मोर्चा बनाओ।

2018 : महाराष्ट्र किसान लॉन्ग मार्च का महत्व

2018 का नासिक–मुंबई लॉन्ग मार्च AIKS के आधुनिक पुनरुत्थान का प्रतीक बना।

उसकी विशेषता यह थी कि एक ही आंदोलन में—

इससे दो बातें साबित हुईं।

AIKS केवल पश्चिम बंगाल–केरल की पुरानी संगठनात्मक विरासत पर निर्भर नहीं।

वह नए क्षेत्र में संघर्ष से नया जनाधार बना सकती है।

आधुनिक किसान राजनीति केवल फसल मूल्य का प्रश्न नहीं।

वह भूमि + आय + सामाजिक सुरक्षा की संयुक्त राजनीति हो सकती है।

2020–21 : AIKS की सबसे महत्वपूर्ण आधुनिक रणनीतिक परीक्षा

राष्ट्रीय संगठनात्मक अनुभव,

घटना-क्रम

अखिल भारतीय किसान सभा की संक्षिप्त समयरेखा

1929 · बिहार प्रांतीय किसान सभास्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में बिहार के किसान प्रश्नों को संगठित प्रांतीय मंच मिला।
11 अप्रैल 1936 · लखनऊ में स्थापनाकांग्रेस अधिवेशन के समानांतर अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना हुई और स्वामी सहजानंद प्रथम अध्यक्ष बने।
1936 · किसान घोषणापत्रजमींदारी उन्मूलन, लगान में कमी, कर्ज मुक्ति, बेदखली पर रोक और काश्तकारी अधिकार राष्ट्रीय मांग बने।
1937–39 · प्रांतीय संघर्षकांग्रेस मंत्रिमंडलों के दौर में बिहार के बकाश्त संघर्ष और दूसरे क्षेत्रों के भूमि प्रश्नों पर किसान सभा का विस्तार हुआ।
1942 · भारत छोड़ो और वैचारिक मतभेदयुद्ध तथा भारत छोड़ो आंदोलन पर मतभेदों ने संगठन, कांग्रेस और कम्युनिस्ट नेतृत्व के संबंधों को बदला।
1946–51 · तेभागा और तेलंगानाबंगाल के बर्गादार संघर्ष और तेलंगाना के सशस्त्र किसान आंदोलन ने भूमि-संबंधों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में रखा।
1964 · कम्युनिस्ट विभाजनCPI और CPI(M) के अलग रास्तों के साथ किसान सभा भी संगठनात्मक रूप से विभाजित हुई।
1967 · नक्सलबाड़ीभूमि, आदिवासी किसान और सशस्त्र क्रांति की बहस ने किसान राजनीति के भीतर नई वैचारिक रेखाएं खींचीं।
1977–80 · भूमि सुधार और हरित क्रांतिपश्चिम बंगाल के ऑपरेशन बर्गा और नई कृषि अर्थव्यवस्था ने भूमि से मूल्य–लागत की राजनीति तक विस्तार किया।
1991–2016 · उदारीकरण और कृषि संकटऋण, लागत, आयात, भूमि अधिग्रहण, किसान आत्महत्या और सार्वजनिक निवेश संगठन के प्रमुख मुद्दे बने।
2018 · महाराष्ट्र किसान लॉन्ग मार्चनासिक से मुंबई तक मार्च ने भूमि-अधिकार, कर्ज और वनाधिकार के प्रश्नों को राष्ट्रीय ध्यान दिलाया।
2020–21 · तीन कृषि कानूनों के विरुद्ध आंदोलनसंयुक्त किसान मोर्चा के साथ किसान सभा ने दिल्ली सीमाओं के ऐतिहासिक आंदोलन में भाग लिया।
2022–26 · MSP और नई कृषि राजनीतिकानून-वापसी के बाद वैधानिक MSP, कर्ज मुक्ति, श्रम और संघीय कृषि नीति पर संघर्ष जारी रहा।
OCN ऐतिहासिक आकलन

अखिल भारतीय किसान सभा का महत्व केवल उसके संगठनात्मक विस्तार या किसी एक राजनीतिक धारा से नहीं मापा जा सकता। उसने भारतीय लोकतंत्र में किसान को स्वतंत्र राजनीतिक विषय बनाया, भूमि-संबंधों के परिवर्तन को राष्ट्रीय कार्यक्रम में स्थान दिलाया और कृषि नीति को सार्वजनिक जवाबदेही से जोड़ा। उसके भीतर दलगत विभाजन, क्षेत्रीय असमानता, छोटे–मध्यम किसान और खेतिहर मजदूर के अलग हित तथा संसदीय और प्रत्यक्ष संघर्ष के बीच तनाव बने रहे। फिर भी भूमि से MSP तक उसकी यात्रा आधुनिक भारतीय किसान राजनीति की वैचारिक और संगठनात्मक निरंतरता को समझने की अनिवार्य कुंजी है।

शोधार्थियों के लिए

प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक स्रोत

अखिल भारतीय किसान सभासंगठन के प्रस्ताव, घोषणाएं, अभियान और समकालीन गतिविधियों का आधिकारिक संदर्भ।स्रोत तक जाएँ ↗
अभिलेख पटल — राष्ट्रीय अभिलेखागारऔपनिवेशिक गृह, कृषि, किसान सभा और प्रांतीय आंदोलनों से जुड़े सूचीपत्र तथा डिजिटाइज्ड अभिलेख।स्रोत तक जाएँ ↗
नेहरू अभिलेखकांग्रेस, किसान प्रश्न, 1930–40 के दशक की राजनीति और स्वामी सहजानंद से संबंधित पत्र तथा वक्तव्य।स्रोत तक जाएँ ↗
गांधी विरासत पोर्टलकिसान राजनीति, कांग्रेस अधिवेशनों और प्रमुख कृषक संघर्षों से जुड़ी मूल सामग्री।स्रोत तक जाएँ ↗
ई-ज्ञानकोशआधुनिक भारत, किसान आंदोलनों, तेभागा, तेलंगाना और स्वतंत्रता-उत्तर कृषि राजनीति की मुक्त अध्ययन सामग्री।स्रोत तक जाएँ ↗
भारतीय संसद डिजिटल पुस्तकालयकृषि, भूमि सुधार, MSP, किसान संकट और संबंधित विधायी बहसों के आधिकारिक अभिलेख।स्रोत तक जाएँ ↗

स्रोत-सावधानी: संगठन के अपने दस्तावेज किसान संघर्षों और उपलब्धियों पर बल देते हैं, प्रशासनिक अभिलेख कानून-व्यवस्था तथा राजस्व के नजरिए से लिखे गए हैं और इतिहासलेखन वैचारिक परंपराओं के अनुसार अलग निष्कर्ष देता है। इसलिए संख्या, तिथि और संगठनात्मक दावों को परस्पर स्रोत-मिलान के साथ पढ़ा गया है।