तेलंगाना किसान संघर्ष
1946–1951—निजामशाही सामंतवाद, वेट्टी-बेगार, भूमि-अधिकार, ग्राम सत्ता, सशस्त्र प्रतिरोध और स्वतंत्र भारत में राजनीतिक संक्रमण
तेलंगाना किसान संघर्ष आधुनिक भारत के उन विरल आंदोलनों में है जो औपनिवेशिक सत्ता के अंतिम वर्षों, देशी रियासत की निरंकुश संरचना, स्वतंत्रता और नए भारतीय राज्य—चारों को एक ही ऐतिहासिक धुरी पर जोड़ता है। गरीब किसानों, खेतिहर मजदूरों, दलितों, आदिवासियों और महिलाओं की व्यापक भागीदारी ने इसे केवल निजाम-विरोधी राजनीतिक संघर्ष नहीं रहने दिया; भूमि, वेट्टी-बेगार, फसल, सामाजिक सम्मान और गांव की वास्तविक सत्ता उसके केंद्र में आ गए। यह अध्ययन निजामशाही ग्रामीण व्यवस्था से 1946 के विद्रोह, रजाकार हिंसा, ऑपरेशन पोलो, 1948 के बाद के संघर्ष, 1951 की वापसी और चुनावी राजनीति में उसकी विरासत तक पूरे घटनाक्रम को प्रमाण, बहस और स्रोत-सावधानी के साथ प्रस्तुत करता है।
भूमिका — भारतीय किसान आंदोलनों में तेलंगाना संघर्ष का स्थान
किसान प्रतिरोध की लंबी परंपरा में एक अलग अध्याय
भारत में औपनिवेशिक शासन के दौरान किसानों ने अनेक प्रकार के आंदोलन किए। नील विद्रोह में जबरन नील की खेती का प्रश्न प्रमुख था; पाबना में किरायेदारी और लगान का; दक्कन के दंगों में साहूकारी और ऋणग्रस्तता का; चंपारण में तिनकठिया का; खेड़ा में राजस्व का; बारडोली में बढ़े हुए भू-राजस्व का और तेभागा में फसल के बंटवारे का।
तेलंगाना में इनमें से कई समस्याएं एक साथ उपस्थित थीं—भूमि का संकेंद्रण, असुरक्षित किरायेदारी, अवैध वसूली, बेदखली, बेगार और स्थानीय सामंती प्रभुत्व।
यही कारण है कि तेलंगाना संघर्ष धीरे-धीरे सामान्य किसान आंदोलन की सीमाओं से आगे निकल गया। पी. सुंदरैया के विवरण में इसकी प्रारंभिक मांगें अत्यंत बुनियादी थीं—वेट्टी और अवैध वसूली समाप्त हो, किसानों को जमीन से बेदखल न किया जाए, नागरिक स्वतंत्रताएं मिलें और सामंती उत्पीड़न रोका जाए। बाद में यही आंदोलन भूमि और राजनीतिक मुक्ति के व्यापक संघर्ष में परिवर्तित हुआ।
यह केवल ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आंदोलन नहीं था
तेलंगाना संघर्ष की एक विशिष्टता यह थी कि उसका प्रत्यक्ष राजनीतिक क्षेत्र ब्रिटिश भारत का कोई प्रांत नहीं बल्कि हैदराबाद रियासत थी।
ब्रिटिश सर्वोच्चता के अंतर्गत होने के बावजूद हैदराबाद एक देशी रियासत थी और उसके शासक निजाम थे। इसलिए यहां किसान का सामना सीधे ब्रिटिश जिला प्रशासन से नहीं, बल्कि निजामशाही के अंतर्गत विकसित राजनीतिक-राजस्व व्यवस्था और स्थानीय भू-स्वामी शक्तियों से था।
इससे तेलंगाना आंदोलन का स्वरूप चंपारण, खेड़ा अथवा बारडोली से भिन्न हो गया।
1946 से 1951 — दो राजनीतिक व्यवस्थाओं के बीच फैला आंदोलन
तेलंगाना संघर्ष की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता उसका कालखंड है।
इसका निर्णायक किसान उभार 1946 में प्रारंभ हुआ। 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन हैदराबाद तत्काल भारतीय संघ में शामिल नहीं हुआ। सितंबर 1948 में भारतीय सैन्य कार्रवाई के बाद निजाम की स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता समाप्त हुई। इसके बावजूद कम्युनिस्ट नेतृत्व वाला सशस्त्र किसान संघर्ष समाप्त नहीं हुआ और 1951 तक जारी रहा। सुंदरैया स्वयं इसकी वापसी की तिथि अक्टूबर 1951 बताते हैं।
अतः यह आंदोलन तीन राजनीतिक अवस्थाओं से गुजरा—
पहली, ब्रिटिश सर्वोच्चता के अधीन निजामशाही;
दूसरी, अगस्त 1947 से सितंबर 1948 तक स्वतंत्र भारत के बाहर बने रहने का प्रयास करता हैदराबाद;
तीसरी, सितंबर 1948 के बाद भारतीय संघ के प्रशासन के अंतर्गत हैदराबाद।
इसी वजह से तेलंगाना संघर्ष आजादी से पहले और आजादी के बाद के किसान आंदोलनों के बीच एक स्वाभाविक ऐतिहासिक सेतु है।
आंदोलन का मूल प्रश्न — जमीन और ग्रामीण सत्ता
तेलंगाना संघर्ष में जमीन केवल आर्थिक संपत्ति नहीं थी। जमीन से सामाजिक प्रतिष्ठा, राजनीतिक शक्ति, उत्पादन पर नियंत्रण और गांव में व्यक्ति की स्वतंत्रता जुड़ी हुई थी।
जिसके पास बड़ी जमीन थी, उसके पास केवल कृषि आय नहीं थी। कई स्थानों पर उसका प्रभाव गांव के प्रशासन, ऋण, रोजगार और स्थानीय सामाजिक संबंधों तक फैला हुआ था।
इसीलिए किसान जब जमीन के सवाल पर खड़ा हुआ तो वह केवल खेत का एक टुकड़ा नहीं मांग रहा था; वह ग्रामीण सत्ता-संबंधों को चुनौती दे रहा था।
आगे चलकर आंदोलन का प्रसिद्ध सिद्धांत बना—जमीन उस व्यक्ति की हो जो उसे जोतता है।
भारतीय किसान इतिहास में महत्व
तेलंगाना संघर्ष इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने यह प्रदर्शित किया कि भूमि प्रश्न और ग्रामीण सामाजिक सत्ता का प्रश्न एक-दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते।
आंध्र महासभा और कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में आंदोलन ने वेट्टी, अवैध वसूली और बेदखली जैसे मुद्दों से शुरुआत की और अंततः व्यापक भूमि संघर्ष में प्रवेश किया। उपलब्ध इतिहासलेखन भी इसके इसी क्रमिक परिवर्तन को रेखांकित करता है।
इस प्रकार तेलंगाना को केवल “कम्युनिस्ट सशस्त्र विद्रोह” कहना जितना अधूरा है, उतना ही इसे केवल “निजाम विरोधी आंदोलन” कहना भी।
इसके केंद्र में किसान और भूमि संबंध थे।
हैदराबाद रियासत — निजामशाही की राजनीतिक और प्रशासनिक संरचना
भारत की सबसे बड़ी देशी रियासतों में एक
बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में हैदराबाद भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे महत्वपूर्ण देशी रियासतों में था। इसके अंतिम निजाम मीर उस्मान अली खान थे।
रियासत भाषाई और सांस्कृतिक दृष्टि से एकरूप नहीं थी। मोटे तौर पर इसके तीन बड़े क्षेत्र थे—
तेलंगाना — जहां तेलुगु भाषी आबादी प्रमुख थी;
मराठवाड़ा — जहां मराठी भाषी आबादी प्रमुख थी;
कर्नाटक क्षेत्र — जहां कन्नड़ भाषी आबादी प्रमुख थी।
इस विशाल बहुभाषी राज्य की राजनीतिक सत्ता हैदराबाद शहर में केंद्रित थी।
ब्रिटिश साम्राज्य और निजाम
हैदराबाद पूरी तरह स्वतंत्र संप्रभु राज्य नहीं था। वह ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य की “परमाउंटसी” अर्थात सर्वोच्चता के अधीन देशी रियासत था।
निजाम को आंतरिक शासन में व्यापक स्वायत्तता प्राप्त थी, लेकिन रक्षा और बाहरी संबंधों पर ब्रिटिश प्रभाव निर्णायक था।
इस व्यवस्था ने एक विचित्र राजनीतिक स्थिति पैदा की। ब्रिटिश भारत में उभर रहे संवैधानिक सुधारों और निर्वाचित संस्थाओं का प्रभाव हैदराबाद में उसी रूप में नहीं पहुंचा।
निरंकुश राजतंत्रीय ढांचा
हैदराबाद की शासन व्यवस्था लंबे समय तक मूलतः राजतंत्रीय और केंद्रीकृत रही। सर्वोच्च सत्ता निजाम के हाथों में थी।
लेकिन गांव तक पहुंचते-पहुंचते सत्ता की वास्तविक संरचना अधिक जटिल हो जाती थी।
केंद्र में निजाम और उसका प्रशासन था; नीचे राजस्व अधिकारी, जागीरदार और स्थानीय प्रभावशाली वर्ग थे; गांव स्तर पर पटेल, पटवारी और दूसरे पदाधिकारी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।
कई क्षेत्रों में प्रशासनिक और भू-स्वामी शक्ति इतनी निकट जुड़ी हुई थी कि किसान के लिए “सरकार” और “स्थानीय प्रभु” के बीच अंतर व्यवहार में धुंधला हो जाता था।
जागीर और दीवानी/खालसा क्षेत्र
हैदराबाद की भूमि व्यवस्था एक समान नहीं थी।
रियासत की भूमि का एक हिस्सा सीधे राज्य के राजस्व प्रशासन के अंतर्गत था, जिसे सामान्यतः दीवानी अथवा खालसा क्षेत्र कहा जाता था।
दूसरा बड़ा हिस्सा विभिन्न प्रकार की जागीरों में था।
जागीरदारों को किसी क्षेत्र से राजस्व प्राप्त करने और स्थानीय प्रशासन में व्यापक प्रभाव रखने के अधिकार मिल सकते थे। इनके अतिरिक्त संस्थान, पायगा तथा अन्य प्रकार की बड़ी संपत्तियां भी थीं।
इस बहुस्तरीय व्यवस्था के कारण किसान और राज्य के बीच कई मध्यस्थ खड़े हो गए।
देशमुख और देशपांडे
तेलंगाना के ग्रामीण इतिहास में देशमुख और देशपांडे अत्यंत महत्वपूर्ण शब्द हैं।
ऐतिहासिक रूप से ये राजस्व प्रशासन से संबंधित पद थे। समय के साथ कई परिवारों ने अपने प्रशासनिक प्रभाव, भूमि नियंत्रण और स्थानीय राजनीतिक शक्ति को विशाल निजी भू-संपत्ति में बदल लिया।
कुछ देशमुख बड़े भू-स्वामी बन गए और स्थानीय समाज में “दोरा”—अर्थात प्रभु या मालिक—के रूप में प्रभावशाली हुए।
यहां एक सावधानी आवश्यक है। हर देशमुख, पटेल या पटवारी को समान शक्ति वाला सामंत मानना ऐतिहासिक सरलीकरण होगा। अलग-अलग जिलों और गांवों में उनकी स्थिति अलग थी। लेकिन जिन इलाकों में तेलंगाना किसान संघर्ष सबसे तीव्र हुआ, वहां बड़े भू-स्वामी परिवारों की ग्रामीण सत्ता आंदोलन का केंद्रीय निशाना बनी।
पटेल-पटवारी व्यवस्था
गांव में पटेल और पटवारी प्रशासन की महत्वपूर्ण कड़ियां थे।
पटेल गांव के प्रशासन और राजस्व व्यवस्था से जुड़ा था, जबकि पटवारी भूमि और राजस्व अभिलेखों से संबंधित कार्य करता था।
जिस समाज में भूमि-अधिकार का प्रमाण सरकारी रिकॉर्ड पर निर्भर हो, वहां रिकॉर्ड नियंत्रित करने वाले पदाधिकारी की शक्ति बहुत अधिक हो सकती है।
किसान की समस्या यहीं गंभीर हो जाती थी।
यदि भू-स्वामी, राजस्व अधिकारी और स्थानीय प्रशासन परस्पर जुड़े हों, तो भूमि विवाद में कमजोर किसान के पास निष्पक्ष न्याय पाने के साधन सीमित हो जाते हैं।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व का अभाव
तेलंगाना के किसान की आर्थिक अधीनता को राजनीतिक अधिकारों की कमजोरी और गंभीर बनाती थी।
स्वतंत्र प्रेस, संगठन, सभा और राजनीतिक गतिविधियों पर प्रतिबंधों और नियंत्रण ने ग्रामीण असंतोष को लंबे समय तक संस्थागत राजनीतिक माध्यम नहीं दिया।
इसी पृष्ठभूमि में आंध्र महासभा जैसे संगठन आगे चलकर महत्वपूर्ण बने।
जब सामान्य लोकतांत्रिक राजनीति के रास्ते सीमित हों तो सांस्कृतिक-सामाजिक संगठन भी राजनीतिक असंतोष के मंच बन सकते हैं। तेलंगाना में यही हुआ।
तेलंगाना की कृषि और भूमि व्यवस्था
कृषि प्रधान समाज
बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध का तेलंगाना मुख्यतः कृषि प्रधान क्षेत्र था। विशाल ग्रामीण आबादी की आजीविका खेती, पशुपालन और कृषि से जुड़े श्रम पर निर्भर थी।
लेकिन कृषि उत्पादन में योगदान और भूमि स्वामित्व के बीच भारी असमानता थी।
एक ओर बड़े भू-स्वामी थे; दूसरी ओर छोटे किसान, किरायेदार, बटाईदार और खेतिहर मजदूरों की बड़ी आबादी थी।
यही असमानता आंदोलन की आर्थिक आधारभूमि बनी।
जमीन का संकेंद्रण
तेलंगाना किसान संघर्ष से संबंधित साहित्य में कुछ अत्यंत बड़े भू-स्वामी परिवारों का उल्लेख मिलता है। कई विवरण हजारों अथवा दसियों हजार एकड़ की संपत्तियों की चर्चा करते हैं।
ऐसे आंकड़ों को सावधानी से पढ़ना आवश्यक है, क्योंकि अलग-अलग स्रोत अलग संख्या देते हैं। इसलिए प्रत्येक लोकप्रिय आंकड़े को निर्विवाद तथ्य मानना उचित नहीं।
लेकिन व्यापक ऐतिहासिक निष्कर्ष स्पष्ट है—कुछ क्षेत्रों में भूमि का असाधारण संकेंद्रण था।
समकालीन आंदोलनकारी साहित्य और बाद के अध्ययनों दोनों में विशाल भू-संपत्तियों वाले देशमुखों और जमींदारों का उल्लेख मिलता है। तेलंगाना संघर्ष के मानक विवरण भी सामंती भूमि संबंध और बड़े भू-स्वामी प्रभुत्व को विद्रोह की मूल पृष्ठभूमि मानते हैं।
किसान की कई श्रेणियां
“किसान” कोई एक समान आर्थिक वर्ग नहीं था।
तेलंगाना के ग्रामीण समाज में मोटे तौर पर कई श्रेणियां दिखाई देती हैं—
भूमि रखने वाले संपन्न किसान;
परंपरागत सेवा जातियों से जुड़े ग्रामीण श्रमिक।
इन सभी के हित हमेशा समान नहीं थे।
लेकिन सामंती वसूली, असुरक्षित किरायेदारी, बेदखली और वेट्टी जैसे प्रश्नों ने विभिन्न ग्रामीण समूहों को एक साझा मंच पर आने का अवसर दिया।
किरायेदारी की असुरक्षा
जिस किसान के नाम जमीन नहीं थी लेकिन जो वर्षों से किसी खेत को जोत रहा था, उसकी सबसे बड़ी चिंता थी—बेदखली।
यदि भू-स्वामी किराया बढ़ा दे, फसल का बड़ा हिस्सा मांग ले अथवा जमीन वापस लेना चाहे तो कमजोर किरायेदार के पास सीमित विकल्प होते थे।
यही कारण था कि तेलंगाना आंदोलन की शुरुआती मांगों में बेदखली रोकना महत्वपूर्ण था।
सुंदरैया के विवरण में आंदोलन के प्रारंभिक मुद्दों में “नो इविक्शन”—किसानों को जमीन से न हटाया जाए—स्पष्ट रूप से शामिल था।
कृषि उत्पादन और अधिशेष पर नियंत्रण
किसान खेत जोतता था, लेकिन उत्पादन का पूरा लाभ उसके पास नहीं रहता था।
भू-स्वामी का किराया, विभिन्न देयताएं, साहूकार का कर्ज और स्थानीय वसूली उसके अधिशेष को कम करती थीं।
खराब फसल आने पर यह संकट और गंभीर हो जाता।
किसान अगली फसल के लिए कर्ज लेता और इस प्रकार ऋण तथा निर्भरता का चक्र बन सकता था।
इस आर्थिक संरचना में किसान का संघर्ष केवल “कर कम करो” तक सीमित नहीं रह सकता था। धीरे-धीरे प्रश्न उठना स्वाभाविक था—
जो व्यक्ति जमीन जोतता है, जमीन पर अधिकार उसका क्यों नहीं?
यही प्रश्न आगे चलकर तेलंगाना संघर्ष के क्रांतिकारी भूमि कार्यक्रम का आधार बना।
तेलंगाना की कृषि संरचना पूरे हैदराबाद राज्य में एक जैसी नहीं थी। खालसा या दीवानी क्षेत्र, जागीरें और सरफ-ए-खास भूमि अलग प्रशासनिक व्यवस्थाओं के अधीन थीं; फिर भी किसान तक पहुंचने से पहले राजस्व वसूली की कई परतें बन जाती थीं। देशमुख, देशपांडे, पटेल-पटवारी और स्थानीय प्रभुत्वशाली परिवार केवल लगान वसूली तक सीमित नहीं थे। ऋण, अनाज, चराई, वन-संसाधन, बेदखली और गांव के सामाजिक अनुशासन पर भी उनका प्रभाव था। इसलिए भूमि का सवाल कानूनी स्वामित्व से आगे उत्पादन, कब्जे और स्थानीय सत्ता का प्रश्न बन गया।
कृषि उत्पादन मानसून, तालाबों और सीमित सिंचाई पर निर्भर था। खराब फसल के वर्ष में भी लगान, अवैध वसूली और पुराने ऋण का दबाव बना रह सकता था। गरीब किसान तथा काश्तकार अक्सर अनाज या नकद उधार लेते और बदले में श्रम, फसल अथवा भूमि पर नियंत्रण खोते जाते थे। यही कारण है कि आंदोलन ने केवल कर घटाने की मांग नहीं की; उसने बेदखली रोकने, कब्जे की रक्षा, बंजर और अधिशेष भूमि के उपयोग तथा वास्तविक जोतने वाले के अधिकार को भी राजनीतिक कार्यक्रम में बदला।
वेट्टी, बेगार और ग्रामीण शोषण
वेट्टी क्या था?
तेलंगाना संघर्ष को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण शब्दों में से एक है—वेट्टी या वेट्टी चाकिरी।
सरल अर्थ में यह बिना पारिश्रमिक श्रम अथवा बेगार की व्यवस्था थी।
लेकिन व्यवहार में इसका स्वरूप केवल खेत में मुफ्त काम कराने तक सीमित नहीं था।
विभिन्न सेवा-समुदायों और गरीब परिवारों से भू-स्वामी अथवा प्रभावशाली अधिकारी अनेक प्रकार के काम बिना उचित मजदूरी के करा सकते थे।
इसमें कृषि कार्य, घरेलू सेवा, सामान ढोना, संदेश पहुंचाना, पशुओं से जुड़े काम और अन्य सेवाएं शामिल हो सकती थीं।
श्रम पर सामंती अधिकार
वेट्टी की सबसे गंभीर विशेषता यह थी कि यह श्रम बाजार का सामान्य संबंध नहीं था।
यदि कोई मजदूर स्वेच्छा से मजदूरी तय करके काम करता है तो वह आर्थिक लेन-देन है।
लेकिन वेट्टी में स्थानीय सत्ता संबंध के कारण व्यक्ति अथवा परिवार पर मुफ्त सेवा देने का दबाव होता था।
इसलिए इसका प्रश्न केवल मजदूरी का नहीं बल्कि मानवीय स्वतंत्रता और गरिमा का प्रश्न था।
तेलंगाना आंदोलन में वेट्टी-विरोध की व्यापक अपील का यही कारण था। सुंदरैया के आंदोलन-विवरण में भी वेट्टी समाप्त करना शुरुआती केंद्रीय मांगों में शामिल था।
अवैध वसूली
किसानों पर आधिकारिक राजस्व के अतिरिक्त स्थानीय स्तर पर विभिन्न प्रकार की वसूली का बोझ पड़ सकता था।
ऐसी वसूली अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूप लेती थी और प्रत्येक गांव में एक समान नहीं थी।
लेकिन किसान आंदोलन के दस्तावेज बार-बार illegal exactions, अर्थात वैधानिक देयता से बाहर की वसूली, का उल्लेख करते हैं।
यही वजह थी कि किसान संगठनों की शुरुआती मांगों में अवैध वसूली समाप्त करने का मुद्दा भी प्रमुख बना।
अनाज की जबरन वसूली और युद्धकालीन संकट
द्वितीय विश्वयुद्ध के वर्षों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डाला।
खाद्यान्न संग्रह और सरकारी लेवी की नीतियों के क्रियान्वयन में ग्रामीण क्षेत्रों में टकराव उत्पन्न हुए। स्थानीय अधिकारियों और किसानों के बीच अनाज वसूली को लेकर विवादों ने पहले से मौजूद असंतोष को और बढ़ाया।
युद्धकालीन महंगाई और खाद्य संकट ने गरीब परिवारों की स्थिति विशेष रूप से कठिन की।
ऐसे समय में यदि किसान को लगता था कि उसके परिवार की आवश्यकताओं से पहले राज्य, भू-स्वामी अथवा बाजार उसके उत्पादन पर दावा कर रहे हैं, तो असंतोष तीखा होना स्वाभाविक था।
ऋण और साहूकारी
कृषि अर्थव्यवस्था में साहूकार महत्वपूर्ण था क्योंकि किसान को बीज, घरेलू खर्च, विवाह, बीमारी अथवा खराब फसल के समय नकदी चाहिए होती थी।
औपचारिक ग्रामीण बैंकिंग के अभाव में किसान निजी ऋणदाता पर निर्भर रहता।
ऊंचे ब्याज और ऋण की शर्तें कई परिवारों को लंबे समय तक निर्भर बना सकती थीं।
कर्ज न चुका पाने की स्थिति में फसल, पशु अथवा जमीन तक संकट में पड़ सकती थी।
इस प्रकार भू-स्वामी प्रभुत्व, किरायेदारी और साहूकारी कई बार एक-दूसरे को मजबूत करते थे।
आर्थिक शोषण से सामाजिक अपमान तक
तेलंगाना के किसान आंदोलन की तीव्रता को केवल आर्थिक आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता।
वेट्टी का अर्थ था कि गरीब व्यक्ति को यह स्वीकार करना पड़े कि उसका श्रम किसी शक्तिशाली व्यक्ति के लिए मुफ्त उपलब्ध है।
अवैध वसूली का अर्थ था कि उसकी कमाई पर किसी और का मनमाना दावा हो सकता है।
बेदखली की धमकी का अर्थ था कि उसकी आजीविका असुरक्षित है।
और यदि स्थानीय प्रशासन भी शक्तिशाली वर्ग के साथ दिखाई दे तो न्याय पाने की उम्मीद कमजोर पड़ जाती थी।
इन सभी का संयुक्त परिणाम था—आर्थिक शोषण के साथ सामाजिक अपमान।
तेलंगाना संघर्ष में “मुक्ति” की धारणा इसलिए जमीन और भोजन से आगे जाकर सम्मान और स्वतंत्रता से जुड़ गई।
गरीब किसान, खेतिहर मजदूर, दलित और आदिवासी समाज
वर्ग और जाति का अंतर्संबंध
तेलंगाना के ग्रामीण समाज में आर्थिक वर्ग और सामाजिक जाति एक-दूसरे से पूरी तरह अलग नहीं थे।
भूमिहीन और गरीब ग्रामीण आबादी में अनेक दलित तथा पिछड़े समुदायों की बड़ी उपस्थिति थी। परंपरागत सेवा संबंधों के कारण कुछ समुदाय वेट्टी और सामाजिक अधीनता का विशेष बोझ उठाते थे।
इसलिए भूमि संघर्ष का एक सामाजिक आयाम भी था।
भूमिहीन मजदूर के लिए जमीन का प्रश्न केवल उत्पादन के साधन का प्रश्न नहीं था; वह सामाजिक स्वायत्तता का रास्ता भी हो सकता था।
दलित समुदाय और वेट्टी
वेट्टी व्यवस्था का सबसे भारी प्रभाव ग्रामीण समाज के कमजोर समुदायों पर पड़ता था।
परंपरागत जातिगत व्यवसाय और स्थानीय सत्ता-संबंध कई परिवारों को ऐसी स्थिति में रखते थे जहां उन्हें भू-स्वामी अथवा गांव के प्रभावशाली लोगों के लिए नियमित सेवाएं देनी पड़ती थीं।
इसलिए जब किसान संगठन ने कहा कि बिना मजदूरी काम नहीं किया जाएगा, तो यह घोषणा आर्थिक होने के साथ सामाजिक विद्रोह भी थी।
सदियों से सामान्य समझी जाने वाली व्यवस्था को पहली बार सामूहिक रूप से अस्वीकार किया जा रहा था।
गरीब किसान आंदोलन की रीढ़ क्यों बने?
बड़े भू-स्वामी के पास व्यवस्था बचाने का कारण था।
संपन्न किसान के पास खोने के लिए संपत्ति थी।
लेकिन गरीब किरायेदार, भूमिहीन मजदूर और छोटा किसान उस व्यवस्था में सबसे अधिक असुरक्षित थे।
इसलिए भूमि-वितरण, बेदखली रोकने और वेट्टी समाप्त करने जैसी मांगों का सबसे सीधा लाभ इन्हीं वर्गों को मिलता।
यही कारण है कि जैसे-जैसे आंदोलन उग्र हुआ, गरीब किसान और खेतिहर मजदूर उसका महत्वपूर्ण जनाधार बने।
महिलाओं की स्थिति
ग्रामीण शोषण का बोझ केवल पुरुष किसान पर नहीं पड़ता था।
गरीब परिवार की महिला खेत में श्रम करती, घरेलू काम करती और कई परिस्थितियों में सामंती सेवा संबंधों का भार भी उठाती थी।
तेलंगाना संघर्ष के आगे के चरण में महिलाओं ने असाधारण भूमिका निभाई। सुंदरैया की पुस्तक में महिलाओं की भूमिका पर स्वतंत्र अध्याय होना स्वयं इस भागीदारी के महत्व को दर्शाता है।
लेकिन महिलाओं की सक्रिय राजनीतिक भागीदारी अचानक नहीं पैदा हुई।
उसकी जमीन ग्रामीण जीवन के उसी अनुभव में थी जिसमें आर्थिक अभाव, श्रम और सामाजिक अधीनता एक-दूसरे से जुड़े थे।
आदिवासी समाज और भूमि
तेलंगाना क्षेत्र के आदिवासी समुदायों का प्रश्न कुछ मायनों में अलग था।
उनके लिए कृषि भूमि के साथ वन, चराई, पारंपरिक संसाधन और स्थानीय स्वायत्तता भी महत्वपूर्ण थे।
1946 के तेलंगाना किसान विद्रोह से पहले ही आदिवासी क्षेत्रों में राज्य और स्थानीय प्रभुत्व के विरुद्ध प्रतिरोध दिखाई दे चुका था। कोमाराम भीम का संघर्ष इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।
इसे सीधे 1946 के कम्युनिस्ट नेतृत्व वाले तेलंगाना किसान संघर्ष का हिस्सा मानना सही नहीं होगा; उसका अपना अलग संदर्भ था। लेकिन उसने क्षेत्र में भूमि, जंगल और स्थानीय अधिकारों को लेकर मौजूद गहरे असंतोष को उजागर किया।
इस प्रकार तेलंगाना के विद्रोही इतिहास में किसान और आदिवासी प्रतिरोध की धाराएं अलग होते हुए भी भूमि और अधिकार के प्रश्न पर कई जगह एक-दूसरे से जुड़ती दिखाई देती हैं।
मुस्लिम गरीब किसान भी इसी ग्रामीण संरचना का हिस्सा थे
तेलंगाना संघर्ष को केवल धार्मिक पहचान के आधार पर पढ़ना एक गंभीर ऐतिहासिक भूल होगी।
निजाम मुस्लिम था, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि संघर्ष “हिंदू किसान बनाम मुस्लिम शासन” भर था।
ग्रामीण समाज में गरीब और श्रमिक मुसलमान भी थे और आंदोलन के वर्गीय प्रश्नों से वे भी प्रभावित थे। इसी प्रकार भू-स्वामी अभिजात वर्ग को केवल एक धार्मिक समुदाय में सीमित नहीं किया जा सकता।
बाद के वर्षों में रजाकार प्रश्न और सांप्रदायिक हिंसा ने परिस्थितियों को अधिक जटिल अवश्य बनाया, लेकिन किसान संघर्ष की मूल सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि भूमि और सामंती संबंधों में थी।
आगे के अध्यायों में इस अंतर को बनाए रखना अत्यंत आवश्यक होगा, क्योंकि तेलंगाना संघर्ष के इतिहास को बाद की सांप्रदायिक राजनीति के चश्मे से देखने पर उसके किसान चरित्र की वास्तविकता विकृत हो सकती है।
# विद्रोह की जमीन तैयार हो चुकी थी
1940 के दशक के मध्य तक तेलंगाना के ग्रामीण क्षेत्र में कई स्तरों पर संकट जमा हो चुका था।
एक ओर निजामशाही की सीमित राजनीतिक व्यवस्था थी।
दूसरी ओर बड़े भू-स्वामियों और स्थानीय प्रभावशाली वर्गों की शक्ति थी।
तीसरी ओर असुरक्षित किरायेदारी और भूमि का असमान वितरण था।
चौथी ओर वेट्टी और अवैध वसूली जैसी व्यवस्थाएं थीं।
पांचवीं ओर साहूकारी, युद्धकालीन आर्थिक दबाव और खाद्यान्न संकट था।
और सबसे नीचे वह विशाल ग्रामीण समाज था जो अपनी मेहनत के बावजूद भूमि, आय और सामाजिक सम्मान के मामले में असुरक्षित था।
लेकिन शोषण अपने आप आंदोलन नहीं बन जाता।
किसी असंतोष को आंदोलन बनने के लिए संगठन, नेतृत्व, राजनीतिक भाषा और सामूहिक कार्रवाई की आवश्यकता होती है।
तेलंगाना में 1930 और 1940 के दशकों में यही अगला परिवर्तन हुआ।
एक सांस्कृतिक और सामाजिक मंच के रूप में विकसित हुई आंध्र महासभा धीरे-धीरे ग्रामीण जनता की शिकायतों का माध्यम बनी। कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने उसके भीतर और बाहर किसानों के बीच संगठन निर्माण शुरू किया। सुंदरैया के विवरण के अनुसार 1940–44 के दौरान कम्युनिस्ट कार्यकर्ता और आंध्र महासभा का वामपंथी हिस्सा किसानों के प्रश्नों पर अभियान चला रहे थे और निजाम सरकार के उन आदेशों को लागू कराने की मांग कर रहे थे जिनसे जनता को कुछ राहत मिल सकती थी।
गांवों में संगम बनने लगे।
किसान पहली बार अकेले भू-स्वामी के सामने खड़े होने के बजाय संगठन के सहारे खड़े होने लगे।
और फिर कुछ स्थानीय घटनाओं ने इस संगठित असंतोष को विस्फोटक दिशा दी।
पालकुर्थी में चाकली इलम्मा का भूमि संघर्ष इसका महत्वपूर्ण प्रतीक बना। इसके बाद कडवेंडी में 4 जुलाई 1946 को डोड्डी कोमारय्या की हत्या ने आंदोलन को निर्णायक मोड़ दिया। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के डिजिटल जिला रिपॉजिटरी में भी कोमारय्या को तेलंगाना किसान सशस्त्र संघर्ष का पहला शहीद बताया गया है।
लेकिन वह कहानी अगले खंड की है।
खंड 1 हमें यह समझाता है कि 4 जुलाई 1946 को चली गोली किसी शांत ग्रामीण समाज पर अचानक गिरी हुई बिजली नहीं थी। उसके पीछे दशकों से जमा भूमि-असमानता, वेट्टी, बेदखली, अवैध वसूली, सामाजिक अधीनता और राजनीतिक अधिकारहीनता की पूरी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि मौजूद थी।
इसी जमीन पर तेलंगाना का किसान प्रतिरोध पहले संगठित आंदोलन और अंततः भारतीय इतिहास के सबसे व्यापक सशस्त्र किसान संघर्षों में से एक में बदलने वाला था।
खंड 2 — राजनीतिक चेतना और संगठन (अध्याय 6–10)
अध्याय 6 : आंध्र महासभा का उदय और ग्रामीण समाज में राजनीतिक चेतना अध्याय 7 : कम्युनिस्ट पार्टी और तेलंगाना के किसानों का संगठन अध्याय 8 : संघर्ष से पहले के स्थानीय किसान प्रतिरोध अध्याय 9 : चाकली इलम्मा और भूमि-अधिकार का संघर्ष अध्याय 10 : डोड्डी कोमारय्या की हत्या और विद्रोह का निर्णायक मोड़
आंध्र महासभा का उदय और ग्रामीण समाज में राजनीतिक चेतना
भाषा और संस्कृति से शुरू हुआ संगठन
तेलंगाना किसान संघर्ष की राजनीतिक पृष्ठभूमि समझने के लिए आंध्र महासभा का इतिहास अत्यंत महत्वपूर्ण है।
हैदराबाद रियासत बहुभाषी थी। तेलुगु, मराठी, कन्नड़ और उर्दू भाषी समुदाय इसके विभिन्न क्षेत्रों में रहते थे। शासन और उच्च प्रशासन में उर्दू का विशेष स्थान था। तेलुगु भाषी समाज के शिक्षित वर्ग में अपनी भाषा, शिक्षा और सांस्कृतिक अधिकारों को लेकर असंतोष विकसित हुआ।
इसी वातावरण में तेलुगु भाषा और संस्कृति से जुड़े संगठनों का विकास हुआ।
1920 के दशक में आंध्र जन संघम जैसी संस्थाओं के माध्यम से तेलुगु भाषी बुद्धिजीवियों ने संगठन बनाना शुरू किया। आगे चलकर इसी धारा ने व्यापक स्वरूप ग्रहण किया और आंध्र महासभा तेलंगाना में सामाजिक-सांस्कृतिक तथा बाद में राजनीतिक जागरण का महत्वपूर्ण मंच बनी।
प्रारंभिक चरण में इसका चरित्र क्रांतिकारी किसान संगठन का नहीं था।
इसके कार्यक्रमों में मातृभाषा में शिक्षा, पुस्तकालयों का विस्तार, सामाजिक सुधार, शिक्षा का प्रसार और नागरिक-सांस्कृतिक अधिकार जैसे विषय प्रमुख थे।
लेकिन हैदराबाद जैसी सीमित राजनीतिक स्वतंत्रता वाली व्यवस्था में भाषा और शिक्षा की मांग भी धीरे-धीरे राजनीतिक अर्थ ग्रहण करने लगी।
पुस्तकालय आंदोलन और ग्रामीण जागरण
तेलंगाना में राजनीतिक चेतना फैलाने में पुस्तकालय आंदोलन का विशेष महत्व था।
पुस्तकालय केवल किताबें रखने की जगह नहीं रहे। वे पढ़ने, समाचार जानने, सार्वजनिक विषयों पर चर्चा करने और नई राजनीतिक अवधारणाओं से परिचित होने के केंद्र बने।
ग्रामीण और कस्बाई समाज में जब अखबार, पुस्तकें और राजनीतिक साहित्य पहुंचा तो दुनिया को देखने का दृष्टिकोण बदलने लगा।
किसान को पता चलने लगा कि उसका अनुभव केवल उसके गांव की समस्या नहीं है।
देश के दूसरे हिस्सों में किसान संगठन बन रहे थे।
राष्ट्रीय आंदोलन चल रहा था।
रूस की क्रांति और समाजवादी विचारधाराओं की चर्चा हो रही थी।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ब्रिटिश शासन को चुनौती दे रही थी।
और देश के कई हिस्सों में किसान लगान, बेदखली और जमींदारी के विरुद्ध संगठित हो रहे थे।
इस बौद्धिक वातावरण ने तेलंगाना के राजनीतिक परिवर्तन की जमीन तैयार की।
सामाजिक संगठन से राजनीतिक मंच
आंध्र महासभा के भीतर समय के साथ दो प्रवृत्तियां स्पष्ट होने लगीं।
एक धारा अपेक्षाकृत उदारवादी थी। वह निजाम सरकार के भीतर सुधार, शिक्षा और सांस्कृतिक अधिकारों की मांग करती थी।
दूसरी धारा अधिक उग्र सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन चाहती थी।
1930 के दशक के उत्तरार्ध और विशेषकर 1940 के दशक में वामपंथी तथा कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं का प्रभाव बढ़ने लगा।
उन्होंने महासभा का ध्यान भाषा और संस्कृति से आगे बढ़ाकर किसानों की रोजमर्रा की समस्याओं की ओर मोड़ा—
किरायेदारों को बेदखल मत करो।
लगान और दूसरी देनदारियों में राहत दो।
ग्रामीण जनता को संगठित होने का अधिकार दो।
इस परिवर्तन ने आंध्र महासभा को तेलंगाना के गांवों से जोड़ दिया।
भुवनगिरि सम्मेलन — निर्णायक मोड़
1944 का भुवनगिरि (भोंगीर) सम्मेलन आंध्र महासभा के इतिहास में महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है।
इस समय तक संगठन में वामपंथी प्रभाव काफी मजबूत हो चुका था। उदारवादी नेतृत्व और अधिक उग्र किसान-समर्थक धारा के बीच मतभेद खुलकर सामने आए।
अब महासभा के कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर किसान समस्याओं को संगठित रूप देने लगे।
यहां से “महासभा” ग्रामीण भाषा में धीरे-धीरे “संगम” के रूप में पहचानी जाने लगी।
संगम का सदस्य होना अब केवल किसी सांस्कृतिक संस्था की सदस्यता नहीं थी।
यह स्थानीय सत्ता को चुनौती देने वाली सामूहिक पहचान बनने लगी।
किसान को संगठन की शक्ति का अनुभव
संगम का सबसे बड़ा योगदान मनोवैज्ञानिक था।
पहले किसान का संघर्ष व्यक्तिगत होता था।
किसी देशमुख ने जमीन छीन ली तो किसान अकेला था।
किसी पटवारी ने रिकॉर्ड बदल दिया तो किसान अकेला था।
वेट्टी के लिए बुलाया गया तो गरीब परिवार अकेला था।
अवैध वसूली हुई तो विरोध करने वाला व्यक्ति अकेला था।
संगम ने इस समीकरण को बदल दिया।
अब किसी एक किसान का प्रश्न पूरे गांव के संगठन का प्रश्न बन सकता था।
यही परिवर्तन आगे के संघर्ष की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धियों में था।
कम्युनिस्ट पार्टी और तेलंगाना के किसानों का संगठन
कम्युनिस्ट विचारधारा तेलंगाना तक कैसे पहुंची?
1930 के दशक तक भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन देश के विभिन्न हिस्सों में मजदूरों और किसानों के बीच सक्रिय हो चुका था।
1936 में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना ने किसान प्रश्न को राष्ट्रीय स्तर पर संगठित वामपंथी राजनीति से जोड़ा।
आंध्र क्षेत्र में भी कम्युनिस्ट कार्यकर्ता सक्रिय हुए और उनका प्रभाव धीरे-धीरे हैदराबाद राज्य के तेलुगु भाषी तेलंगाना क्षेत्र तक पहुंचा।
कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने यहां पहले से मौजूद असंतोष को वर्गीय भाषा दी।
उन्होंने किसान से कहा कि उसकी समस्या केवल किसी “बुरे” देशमुख की समस्या नहीं है।
उसके पीछे भूमि और सत्ता की पूरी व्यवस्था है।
बड़े सिद्धांत से पहले छोटी मांगें
तेलंगाना में कम्युनिस्ट संगठन की सफलता का एक कारण यह था कि शुरुआत सीधे समाजवादी क्रांति के अमूर्त नारों से नहीं हुई।
कार्यकर्ताओं ने ग्रामीण जनता की तत्काल समस्याओं को उठाया।
किसान को उसकी जमीन से न निकाला जाए।
जबरन अनाज वसूली का विरोध हो।
किरायेदार के अधिकार सुरक्षित हों।
इन मांगों को किसान तुरंत समझ सकता था।
पी. सुंदरैया के विवरण में भी तेलंगाना आंदोलन के प्रारंभिक चरण में वेट्टी, अवैध वसूली और बेदखली के विरुद्ध अभियान प्रमुख दिखाई देता है।
यहीं संगठनात्मक रणनीति का महत्व था।
पहले उस अन्याय पर किसान को संगठित किया गया जिसका अनुभव वह स्वयं रोज करता था।
गांवों में संगम
आंध्र महासभा और कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने गांवों में स्थानीय समितियां बनानी शुरू कीं।
इन्हें सामान्यतः संगम कहा गया।
संगमों की वास्तविक शक्ति उनके स्थानीय चरित्र में थी।
बाहर से आया नेता भाषण देकर चला जाए तो आंदोलन स्थायी नहीं बनता। लेकिन यदि गांव के भीतर ही कार्यकर्ता तैयार हो जाएं तो संगठन रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन जाता है।
किसानों की शिकायतें सुन सकता था;
भू-स्वामी से सामूहिक बातचीत कर सकता था;
वेट्टी के बहिष्कार का निर्णय करा सकता था;
बेदखली का सामूहिक विरोध कर सकता था;
और आवश्यकता पड़ने पर आसपास के गांवों से समर्थन जुटा सकता था।
इस प्रकार संगम धीरे-धीरे गांव में सत्ता के वैकल्पिक केंद्र की तरह उभरने लगा।
“संगम” से भू-स्वामियों की बेचैनी
जिन गांवों में देशमुख अथवा बड़े भू-स्वामी की सत्ता लंबे समय से निर्विवाद थी, वहां किसान संगठन का बनना अपने आप में चुनौती था।
समस्या केवल यह नहीं थी कि किसान कुछ आर्थिक रियायत मांग रहा था।
समस्या यह थी कि अब किसान सामूहिक निर्णय लेने लगा था।
यदि गांव के लोग तय कर लें कि कोई वेट्टी नहीं करेगा, तो भू-स्वामी की पुरानी शक्ति कमजोर पड़ती थी।
यदि किसान तय करें कि किसी बेदखल परिवार को खेत से हटने नहीं देंगे, तो संपत्ति के साथ जुड़ी सामाजिक सत्ता को चुनौती मिलती थी।
इसीलिए कई स्थानों पर संगम और भू-स्वामी वर्ग के बीच संघर्ष तेजी से तीखा हुआ।
कार्यकर्ताओं का स्थानीय नेटवर्क
तेलंगाना संघर्ष केवल कुछ प्रसिद्ध नेताओं का आंदोलन नहीं था।
उसकी वास्तविक शक्ति हजारों स्थानीय कार्यकर्ताओं में थी।
राष्ट्रीय अथवा क्षेत्रीय नेतृत्व राजनीतिक दिशा दे सकता था, लेकिन गांव में संघर्ष चलाने के लिए ऐसे लोगों की आवश्यकता थी जो स्थानीय भाषा, जातिगत समीकरण, भूमि विवाद और भू-स्वामी की शक्ति को जानते हों।
रवि नारायण रेड्डी, बद्दम येल्ला रेड्डी और पी. सुंदरैया जैसे नेताओं के साथ बड़ी संख्या में स्थानीय आयोजकों ने आंदोलन का नेटवर्क बनाया।
यही नेटवर्क बाद में सशस्त्र संघर्ष के समय और महत्वपूर्ण हो गया।
संघर्ष से पहले के स्थानीय किसान प्रतिरोध
1946 अचानक नहीं आया
तेलंगाना विद्रोह की शुरुआत को यदि केवल जुलाई 1946 की एक घटना से जोड़ दिया जाए तो उसके विकास की पूरी प्रक्रिया छूट जाती है।
उससे पहले अनेक गांवों में स्थानीय संघर्ष चल रहे थे।
इनमें कहीं वेट्टी का विरोध था।
कहीं बेदखली का प्रतिरोध।
कहीं अनाज की जबरन वसूली के विरुद्ध आंदोलन।
कहीं भू-स्वामी और संगम के बीच टकराव।
ये छोटे संघर्ष धीरे-धीरे एक-दूसरे से जुड़ते गए।
वेट्टी से इनकार — सत्ता को सीधी चुनौती
कल्पना कीजिए कि किसी गांव में पीढ़ियों से कुछ परिवार भू-स्वामी के यहां मुफ्त काम करते आए हों।
फिर संगम की बैठक होती है और फैसला किया जाता है—
अब मुफ्त काम नहीं करेंगे।
ऊपर से देखने पर यह मजदूरी का विवाद लगता है।
लेकिन सामंती ग्रामीण व्यवस्था में यह एक राजनीतिक घोषणा थी।
इसका अर्थ था कि गरीब परिवार भू-स्वामी के अपने श्रम पर परंपरागत अधिकार को अस्वीकार कर रहा है।
ऐसे सामूहिक इनकार ने किसानों में आत्मविश्वास पैदा किया।
बेदखली के विरुद्ध सामूहिक प्रतिरोध
भूमि संघर्ष में अगला महत्वपूर्ण तरीका था—बेदखली रोकना।
यदि किसी किरायेदार अथवा गरीब किसान को जमीन से हटाया जाता, तो संगम उसके समर्थन में खड़ा हो सकता था।
यहीं से संघर्ष अधिक गंभीर हो जाता था।
क्योंकि वेट्टी समाप्त करने की मांग भू-स्वामी की सेवा संबंधी शक्ति को चुनौती देती थी, जबकि बेदखली रोकना सीधे उसके भूमि-अधिकार के प्रयोग को चुनौती देता था।
तेलंगाना आंदोलन धीरे-धीरे इसी सीमा को पार कर रहा था।
धर्म और जाति से ऊपर आर्थिक मुद्दे
किसान संगठन का एक महत्वपूर्ण प्रयास ग्रामीण गरीबों को साझा आर्थिक प्रश्नों पर संगठित करना था।
तेलंगाना के समाज में जातिगत विभाजन गहरे थे।
लेकिन वेट्टी, किरायेदारी, मजदूरी और भूमि के प्रश्न अलग-अलग समुदायों के गरीब लोगों को साझा संघर्ष में ला सकते थे।
इससे पारंपरिक सामाजिक नियंत्रण कमजोर होने लगा।
विशेष रूप से दलित और निम्न सामाजिक समूहों के लिए संगम में भागीदारी केवल आर्थिक अधिकार का प्रश्न नहीं थी; यह गांव की सार्वजनिक राजनीति में प्रवेश भी था।
आंदोलन का भूगोल
तेलंगाना संघर्ष पूरे हैदराबाद राज्य में समान तीव्रता से नहीं फैला।
उसका सबसे मजबूत क्षेत्र नलगोंडा था।
इन इलाकों में बड़े भू-स्वामियों, देशमुखों और किसान संगठनों के बीच टकराव अधिक तीव्र हुआ।
नलगोंडा आगे चलकर आंदोलन का केंद्रीय क्षेत्र बना।
इसी क्षेत्र में विसुनूर देशमुख से जुड़े संघर्ष और कडवेंडी की घटना ने इतिहास की दिशा बदल दी।
1946 से पहले के प्रतिरोधों को अलग-अलग घटनाओं की सूची मानना पर्याप्त नहीं है। गांवों में संगम बनने, याचिकाएं देने, वेट्टी से इनकार करने, अवैध वसूली रोकने और बेदखल किसान की फसल बचाने की कार्रवाइयों ने सामूहिक अनुशासन तैयार किया। इन संघर्षों से कार्यकर्ताओं को यह समझ मिली कि किसी एक देशमुख से विवाद तभी टिक सकता है जब आसपास के गांव सूचना, भोजन, सभा और कानूनी सहायता में सहयोग करें। बाद में यही नेटवर्क विद्रोह के तीव्र प्रसार का आधार बना।
स्थानीय प्रतिरोधों ने ग्रामीण सत्ता की वैधता पर भी प्रश्न उठाया। दोरा के आदेश को अनिवार्य मानने के बजाय किसान ने उसे चुनौती देने योग्य दावा समझना शुरू किया। महिला कार्यकर्ताओं, दलित सेवा-समुदायों और खेतिहर मजदूरों की भागीदारी ने प्रतिरोध का सामाजिक दायरा बढ़ाया। इसलिए चाकली इलम्मा और डोड्डी कोमारय्या से जुड़ी घटनाएं अचानक पैदा नहीं हुईं; वे कई वर्षों से बन रही उस राजनीतिक चेतना की परिणति थीं जिसमें गांव का साधारण किसान पहली बार सार्वजनिक रूप से कह रहा था कि भूमि, श्रम और सम्मान पर उसका भी अधिकार है।
चाकली इलम्मा और भूमि-अधिकार का संघर्ष
इतिहास में एक असाधारण ग्रामीण महिला
तेलंगाना किसान संघर्ष की सबसे प्रसिद्ध प्रतीकात्मक हस्तियों में एक हैं चाकली इलम्मा।
उन्हें कई स्थानों पर चकली ऐलम्मा अथवा चिट्याला इलम्मा भी लिखा जाता है।
उनका जन्म गरीब रजक/धोबी समुदाय में हुआ था। “चाकली” तेलुगु समाज में परंपरागत रूप से धोबी समुदाय के लिए प्रयुक्त सामाजिक पहचान थी।
इलम्मा की प्रसिद्धि किसी बड़े राजनीतिक पद से नहीं आई।
वह एक गरीब ग्रामीण महिला थीं।
लेकिन उनका भूमि संघर्ष तेलंगाना किसान आंदोलन में इस बात का प्रतीक बन गया कि सामंती सत्ता को चुनौती देने का अधिकार समाज के सबसे कमजोर समझे जाने वाले व्यक्ति को भी है।
पालकुर्थी का भूमि विवाद
इलम्मा का संघर्ष तत्कालीन जनगांव क्षेत्र के पालकुर्थी गांव से जुड़ा था।
वह जिस जमीन पर खेती कर रही थीं, उसे लेकर स्थानीय शक्तिशाली भू-स्वामी हितों से विवाद उत्पन्न हुआ।
इस संघर्ष के विवरणों में विभिन्न स्रोतों में कुछ तथ्यात्मक अंतर मिलते हैं—विशेष रूप से जमीन के स्वामित्व, किरायेदारी की कानूनी प्रकृति और संबंधित भू-स्वामियों की भूमिका के विवरण में।
लेकिन जिस बात पर व्यापक सहमति है वह यह कि इलम्मा ने उस जमीन से हटने से इनकार किया जिस पर उनका परिवार खेती कर रहा था और संगम उनके समर्थन में खड़ा हुआ।
यह साधारण भूमि विवाद नहीं रहा।
यह प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गया।
विसुनूर देशमुख का प्रभाव
इस प्रसंग में विसुनूर देशमुख रापाका रामचंद्र रेड्डी का नाम प्रमुखता से आता है।
वह क्षेत्र के सबसे शक्तिशाली भू-स्वामियों में गिने जाते थे और किसान आंदोलन के साहित्य में सामंती प्रभुत्व के प्रमुख प्रतीकों में से एक बन गए।
उनके परिवार और संगम कार्यकर्ताओं के बीच टकराव बढ़ता गया।
इलम्मा की खड़ी फसल पर नियंत्रण का प्रश्न विशेष रूप से महत्वपूर्ण बन गया।
यदि शक्तिशाली पक्ष फसल ले जाता तो संदेश स्पष्ट होता—
संगम किसान को बचा नहीं सकता।
यदि किसान अपनी फसल बचा लेता तो उलटा संदेश जाता—
देशमुख की शक्ति अजेय नहीं है।
फसल की रक्षा
संगम कार्यकर्ताओं ने इलम्मा की फसल की रक्षा और कटाई में सहयोग किया।
यही घटना आंदोलन की स्मृति में अत्यंत महत्वपूर्ण बन गई।
एक गरीब दलित-पिछड़े सेवा समुदाय की महिला का बड़े सामंती प्रतिष्ठान के सामने खड़ा होना उस समय की ग्रामीण सामाजिक व्यवस्था के लिए असाधारण चुनौती थी।
इलम्मा ने कोई लंबा राजनीतिक घोषणापत्र नहीं लिखा।
उनकी घोषणा उनके व्यवहार में थी—
जिस जमीन को हम जोतते हैं, उस पर हमारा दावा है; केवल शक्ति के आधार पर हमें हटाया नहीं जा सकता।
महिला, जाति और भूमि — तीन प्रश्नों का संगम
चाकली इलम्मा का महत्व इसलिए असाधारण है क्योंकि उनके संघर्ष में तीन स्तर एक साथ दिखाई देते हैं।
पहला — भूमि। कौन खेती करेगा और फसल किसकी होगी?
दूसरा — जाति और सामाजिक हैसियत। क्या निम्न सामाजिक स्थिति वाला परिवार स्थानीय प्रभुत्वशाली वर्ग को चुनौती दे सकता है?
तीसरा — महिला की भूमिका। क्या ग्रामीण महिला स्वयं भूमि-अधिकार की राजनीतिक लड़ाई का चेहरा बन सकती है?
इलम्मा के संघर्ष ने इन तीनों प्रश्नों का उत्तर व्यवहार में दिया।
किंवदंती और इतिहास में अंतर
समय के साथ चाकली इलम्मा तेलंगाना की लोक और राजनीतिक स्मृति में बड़ी प्रतीकात्मक हस्ती बन गईं।
ऐसे व्यक्तित्वों के साथ एक समस्या उत्पन्न होती है—लोकस्मृति कई बार वास्तविक घटनाओं में बाद की किंवदंतियां जोड़ देती है।
इसलिए इतिहास लिखते समय उनके साहस और महत्व को कम किए बिना विभिन्न स्रोतों के दावों को अलग करना आवश्यक है।
इलम्मा को तेलंगाना संघर्ष की “एकमात्र शुरुआत” मानना भी अतिशयोक्ति होगी।
उनसे पहले राजनीतिक संगठन और किसान प्रतिरोध मौजूद थे।
लेकिन उनका संघर्ष उस ऐतिहासिक क्षण का अत्यंत शक्तिशाली प्रतीक था जब गरीब किसान ने कहा—
डोड्डी कोमारय्या की हत्या और विद्रोह का निर्णायक मोड़
कडवेंडी — इतिहास बदलने वाला गांव
1946 की गर्मियों तक विसुनूर देशमुख और संगम के बीच तनाव बहुत बढ़ चुका था।
नलगोंडा जिले के तत्कालीन जनगांव क्षेत्र का कडवेंडी गांव इस संघर्ष का प्रमुख केंद्र बन गया।
देशमुख के विरुद्ध शिकायतें बढ़ रही थीं।
संगम का प्रभाव मजबूत हो रहा था।
दोनों पक्षों के बीच टकराव अब केवल याचिका और शिकायत तक सीमित नहीं था।
4 जुलाई 1946
4 जुलाई 1946 तेलंगाना किसान संघर्ष के इतिहास की निर्णायक तारीख है।
उस दिन कडवेंडी में किसानों और संगम कार्यकर्ताओं का जुलूस निकला।
तनावपूर्ण परिस्थितियों में देशमुख से जुड़े सशस्त्र लोगों की ओर से गोलीबारी हुई।
गोली लगने से डोड्डी कोमारय्या मारे गए।
कोमारय्या कोई राष्ट्रीय स्तर के प्रसिद्ध नेता नहीं थे।
वह स्थानीय किसान कार्यकर्ता थे।
लेकिन उनकी मृत्यु ने उन्हें तेलंगाना किसान संघर्ष का पहला प्रमुख शहीद बना दिया।
भारत सरकार की स्वतंत्रता-संग्राम संबंधी डिजिटल सामग्री में भी 4 जुलाई 1946 को कडवेंडी में उनकी मृत्यु को तेलंगाना किसान संघर्ष के महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में दर्ज किया गया है।
एक मौत ने इतना बड़ा परिवर्तन क्यों किया?
किसी आंदोलन में हिंसा की हर घटना व्यापक विद्रोह पैदा नहीं करती।
कोमारय्या की मृत्यु का प्रभाव इतना व्यापक इसलिए हुआ क्योंकि उसके पहले वर्षों की संगठनात्मक तैयारी मौजूद थी।
किसानों के साझा मुद्दे थे।
भू-स्वामियों के विरुद्ध असंतोष था।
इलम्मा जैसे संघर्षों ने आत्मविश्वास पैदा किया था।
इसलिए कोमारय्या की हत्या को किसी व्यक्तिगत विवाद के रूप में नहीं देखा गया।
इसे पूरे किसान संगठन पर हमला माना गया।
शोक से प्रतिरोध
कोमारय्या की मृत्यु के बाद गांवों में भारी आक्रोश फैला।
उनकी अंतिम यात्रा और स्मृति किसान लामबंदी का माध्यम बनी।
अब प्रश्न केवल वेट्टी या किसी खास जमीन का नहीं था।
क्या किसान संगठन बनाने के कारण मारे जाएंगे?
क्या देशमुख की निजी शक्ति गांव की सामूहिक इच्छा से ऊपर है?
क्या राज्य किसानों की रक्षा करेगा?
इन प्रश्नों ने आंदोलन को नई दिशा दी।
आंदोलन का तेजी से विस्तार
कडवेंडी की घटना के बाद आसपास के गांवों में संगमों का प्रभाव तेजी से बढ़ा।
किसानों ने देशमुखों और स्थानीय सामंती शक्तियों का अधिक संगठित प्रतिरोध शुरू किया।
अवैध वसूली का विरोध तेज हुआ।
बेदखली रोकने के प्रयास अधिक दृढ़ हुए।
कई स्थानों पर भू-स्वामियों और किसान संगठनों के बीच खुला टकराव होने लगा।
जो आंदोलन पहले सुधार और अधिकार की मांग कर रहा था, वह अब सत्ता-संबंध बदलने की ओर बढ़ने लगा।
कोमारय्या की शहादत और राजनीतिक प्रतीक
तेलंगाना संघर्ष की सामूहिक स्मृति में कोमारय्या की हत्या ने लगभग वही भूमिका निभाई जो कई बड़े जन आंदोलनों में किसी निर्णायक दमनकारी घटना की होती है।
उसने बिखरे असंतोष को एक साझा प्रतीक दिया।
अब गांवों में केवल यह नहीं कहा जा सकता था कि अमुक किसान की जमीन छीनी गई।
हमारे आंदोलन का आदमी मारा गया है।
इस “हम” का निर्माण ही किसान राजनीति की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।
क्या यहीं से सशस्त्र संघर्ष शुरू हो गया?
इस प्रश्न का उत्तर सावधानी से देना आवश्यक है।
4 जुलाई 1946 को ऐसा नहीं हुआ कि कम्युनिस्ट पार्टी ने अचानक पूरे तेलंगाना में औपचारिक युद्ध घोषित कर दिया।
आंदोलन का सशस्त्रीकरण एक प्रक्रिया थी।
किसानों और कार्यकर्ताओं ने अपनी रक्षा के लिए लाठियां और उपलब्ध हथियार रखने शुरू किए।
भू-स्वामी पक्ष के सशस्त्र लोगों और पुलिस से टकराव बढ़ा।
आगे चलकर स्वयंसेवी समूह अधिक संगठित हुए और अंततः गुरिल्ला दलम विकसित हुए।
इसलिए कोमारय्या की हत्या को सशस्त्र संघर्ष का तत्काल पूर्ण आरंभ कहने की बजाय उस दिशा में निर्णायक मोड़ कहना अधिक ऐतिहासिक रूप से सही है।
# सांस्कृतिक संगठन से किसान विद्रोह तक
खंड 2 की पूरी कहानी को यदि एक सूत्र में बांधा जाए तो वह है—
चेतना → संगठन → स्थानीय प्रतिरोध → सामूहिक आत्मविश्वास → खुला संघर्ष।
आंध्र महासभा ने वह सार्वजनिक मंच उपलब्ध कराया जहां भाषा, शिक्षा और सामाजिक सुधार के प्रश्न उठाए जा सकते थे।
कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने इस मंच को ग्रामीण आर्थिक समस्याओं से जोड़ा।
संगमों ने किसान को संगठन दिया।
वेट्टी और बेदखली के विरुद्ध स्थानीय संघर्षों ने उसे सामूहिक शक्ति का अनुभव कराया।
चाकली इलम्मा के भूमि संघर्ष ने दिखाया कि अत्यंत कमजोर सामाजिक पृष्ठभूमि का व्यक्ति भी बड़े भू-स्वामी को चुनौती दे सकता है।
और 4 जुलाई 1946 को डोड्डी कोमारय्या की हत्या ने आंदोलन को वह शहीद और प्रतीक दिया जिसके बाद पीछे लौटना कठिन हो गया।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है।
1946 तक तेलंगाना में जो कुछ हो रहा था वह अभी पूर्ण विकसित गुरिल्ला युद्ध नहीं था।
वह संगठित किसान प्रतिरोध से सशस्त्र प्रतिरोध की ओर बढ़ता आंदोलन था।
आने वाले महीनों में परिस्थितियां तेजी से बदलने वाली थीं।
किसानों के स्वयंसेवी दस्ते बनने वाले थे।
कुछ क्षेत्रों में भू-स्वामी गांव छोड़ने वाले थे।
भूमि पर कब्जे और पुनर्वितरण का प्रश्न सामने आने वाला था।
ग्राम समितियां वैकल्पिक सत्ता की भूमिका ग्रहण करने वाली थीं।
और आंदोलन नलगोंडा से निकलकर वारंगल तथा खम्मम के क्षेत्रों में फैलने वाला था।
कडवेंडी की गोली ने तेलंगाना के किसान आंदोलन की दिशा बदल दी थी। अब संघर्ष केवल अन्याय कम कराने का नहीं, ग्रामीण सत्ता को बदलने का बनने जा रहा था।
खंड 3 — विद्रोह का विस्तार (अध्याय 11–15)
अध्याय 11 : 1946 में तेलंगाना किसान विद्रोह का आरंभ — नलगोंडा, वारंगल और खम्मम सहित प्रमुख क्षेत्रों में आंदोलन का प्रसार
अध्याय 12 : किसान मांगों से सशस्त्र संघर्ष तक — सामान्य किसान प्रतिरोध के सशस्त्र स्वरूप ग्रहण करने की परिस्थितियां
अध्याय 13 : ग्राम समितियां और वैकल्पिक ग्रामीण सत्ता — संगम, ग्राम संगठन, स्थानीय प्रशासन और सामंती प्रभुत्व को चुनौती
अध्याय 14 : गुरिल्ला दल और संघर्ष की सैन्य संरचना — दलमों का निर्माण, संगठन, रणनीति और ग्रामीण समर्थन तंत्र
अध्याय 15 : भूमि कब्जा और भूमि-पुनर्वितरण — जमींदारों की भूमि, बेदखल किसानों की वापसी और भूमि-वितरण संबंधी विभिन्न ऐतिहासिक दावों की पड़ताल
1946 में तेलंगाना किसान विद्रोह का आरंभ
कोमारय्या की मृत्यु के बाद विस्फोट
डोड्डी कोमारय्या की मृत्यु के बाद कडवेंडी और आसपास के गांवों में भारी प्रतिक्रिया हुई। उनके अंतिम संस्कार और स्मृति सभाएं राजनीतिक लामबंदी के माध्यम बन गईं।
पी. सुंदरैया के विवरण के अनुसार किसानों ने आसपास के गांवों में जाकर घोषणा की कि संगम बन चुका है और अब वेट्टी, अवैध वसूली तथा बेदखली स्वीकार नहीं की जाएगी। जुलाई 1946 के अंत तक आंदोलन लगभग 300–400 गांवों तक फैल चुका था। बाद के शोध भी नलगोंडा, वारंगल और खम्मम को इसके शुरुआती विस्तार का प्रमुख क्षेत्र मानते हैं।
यह संख्या महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण आंदोलन का चरित्र था।
किसान अब केवल शिकायत दर्ज नहीं करा रहे थे।
वे गांव स्तर पर आदेशों की अवज्ञा कर रहे थे।
वे भू-स्वामी की सामाजिक सत्ता को अस्वीकार कर रहे थे।
और कई जगह संगम के सामूहिक निर्णय को स्थानीय प्रशासन के निर्देश से अधिक महत्व देने लगे थे।
नलगोंडा — विद्रोह का केंद्र
तेलंगाना विद्रोह का सबसे मजबूत आधार नलगोंडा बना।
यहां बड़े देशमुखों का प्रभाव मजबूत था।
वेट्टी और दूसरी सामंती प्रथाओं के विरुद्ध असंतोष मौजूद था।
और सबसे महत्वपूर्ण—आंध्र महासभा तथा कम्युनिस्ट पार्टी ने यहां पहले से संगठनात्मक नेटवर्क विकसित कर लिया था।
कडवेंडी, विसुनूर, जनगांव और सूर्यापेट से जुड़े क्षेत्रों में संघर्षों ने एक-दूसरे को प्रेरित किया।
किसी गांव में किसान वेट्टी रोकने में सफल होते तो उसकी खबर अगले गांव तक पहुंचती।
कहीं बेदखल किसान को जमीन वापस मिलती तो वह मिसाल बनती।
इस प्रकार आंदोलन का विस्तार केवल केंद्रीय नेतृत्व के आदेश से नहीं, बल्कि स्थानीय सफलताओं की खबरों के प्रसार से भी हुआ।
वारंगल और खम्मम की ओर विस्तार
नलगोंडा से संघर्ष वारंगल और खम्मम के क्षेत्रों तक बढ़ा।
इन जिलों में भी ग्रामीण असंतोष नया नहीं था। सुंदरैया लिखते हैं कि 1944 से ही खम्मम, वारंगल और अन्य क्षेत्रों में वेट्टी, बेदखली तथा सामंती वसूली के विरुद्ध संघर्ष चल रहे थे, हालांकि अनेक स्थानीय घटनाओं का व्यवस्थित अभिलेख उपलब्ध नहीं है।
1946 के बाद इन अलग-अलग प्रतिरोधों को व्यापक तेलंगाना आंदोलन की पहचान मिलने लगी।
किसान संगठनों ने गांव-स्तरीय समितियां बनाईं।
देशमुखों तथा उनके समर्थकों का सामाजिक बहिष्कार किया गया।
कई क्षेत्रों में किसानों ने मुफ्त श्रम देना बंद कर दिया।
किरायेदारों ने बेदखली के आदेश मानने से इनकार किया।
निजाम सरकार की प्रतिक्रिया
आंदोलन का विस्तार निजाम सरकार के लिए गंभीर चुनौती था।
1946 के उत्तरार्ध में आंध्र महासभा और कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं के विरुद्ध दमन बढ़ा। गिरफ्तारियां हुईं, गांवों में पुलिस अभियान चलाए गए और संगठनात्मक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया गया। शोध सामग्री में अक्टूबर 1946 के आसपास आंध्र महासभा पर प्रतिबंध तथा बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों का उल्लेख मिलता है।
दमन का उद्देश्य संगमों को तोड़ना था।
लेकिन कई क्षेत्रों में इसका उलटा परिणाम हुआ।
जब पुलिस भू-स्वामियों के साथ गांव पहुंची तो किसानों को यह धारणा मजबूत हुई कि स्थानीय संघर्ष केवल देशमुख के विरुद्ध नहीं, बल्कि पूरी शासन-व्यवस्था से है।
भू-स्वामियों का गांव छोड़ना
जहां संगम बहुत मजबूत हो गया, वहां कुछ बड़े भू-स्वामियों और स्थानीय अधिकारियों के लिए गांव में रहना कठिन होने लगा।
कई लोग कस्बों अथवा सुरक्षित स्थानों पर चले गए।
यह परिवर्तन अत्यंत महत्वपूर्ण था।
क्योंकि गांव में “दोरा” की अनुपस्थिति केवल व्यक्ति की अनुपस्थिति नहीं थी।
उसके साथ पुरानी सत्ता की एक परत हट गई।
कर अथवा अनाज संग्रह कौन करेगा?
गांव की सुरक्षा कौन करेगा?
भूमि विवाद पर निर्णय कौन करेगा?
यही शून्य बाद में ग्राम समितियों ने भरा।
किसान मांगों से सशस्त्र संघर्ष तक
प्रारंभ में हथियार आंदोलन का उद्देश्य नहीं थे
तेलंगाना संघर्ष को शुरुआत से ही योजनाबद्ध सशस्त्र क्रांति मानना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा।
1944–46 के शुरुआती संघर्ष मुख्यतः जन-संगठन और सामूहिक प्रतिरोध पर आधारित थे।
किसान को उसकी जोती हुई जमीन से न हटाया जाए।
जुलाई 1946 के बाद भी शुरुआती स्वयंसेवी समूहों के पास मुख्यतः लाठियां, पत्थर और पारंपरिक साधन थे। समकालीन आंदोलन-विवरण बताते हैं कि ये समूह पहले किसान जुलूसों और गांवों की रक्षा के लिए बने थे।
हिंसा का चक्र
लेकिन संघर्ष जैसे-जैसे बढ़ा, तीन तरह की सशस्त्र शक्ति किसानों के सामने आने लगी—
भू-स्वामियों के निजी हथियारबंद लोग;
निजाम की पुलिस और सैन्य बल;
किसान नेतृत्व के सामने प्रश्न था कि क्या बिना आत्मरक्षा के संगठन टिक पाएंगे।
यहीं से स्वयंसेवी समूहों ने अधिक संगठित रूप लेना शुरू किया।
कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार होने से बचाना;
रात में गांव की निगरानी;
पुलिस आने की सूचना देना;
भू-स्वामी के हथियारबंद लोगों को गांव में घुसने से रोकना।
धीरे-धीरे यही समूह अधिक नियमित लड़ाकू दस्तों में बदल गए।
1947 ने संघर्ष को नया राजनीतिक संदर्भ दिया
15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश शासन समाप्त हो गया, लेकिन हैदराबाद भारतीय संघ में शामिल नहीं हुआ।
निजाम स्वतंत्र हैदराबाद बनाए रखना चाहता था।
इससे तेलंगाना संघर्ष का चरित्र और जटिल हो गया।
अब किसान आंदोलन में दो धाराएं जुड़ गईं—
सामंतवाद विरोधी किसान संघर्ष, और
निजामशाही के विरुद्ध राजनीतिक संघर्ष।
कुछ समय के लिए कम्युनिस्टों और हैदराबाद स्टेट कांग्रेस के बीच निजाम-विरोधी साझा मोर्चे की स्थिति बनी, हालांकि राजनीतिक मतभेदों के कारण यह सहयोग टिक नहीं पाया।
रजाकारों का उदय
1947–48 में मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन और उसके अर्धसैनिक संगठन रजाकारों की गतिविधियां तेजी से बढ़ीं।
रजाकारों का घोषित उद्देश्य निजाम और स्वतंत्र हैदराबाद की रक्षा था।
ग्रामीण तेलंगाना में उनकी कार्रवाई किसान आंदोलन के लिए नई सशस्त्र चुनौती बन गई।
अनेक गांवों पर छापे पड़े।
संदिग्ध संगम कार्यकर्ताओं को पकड़ा गया।
लूट, हिंसा, हत्या और महिलाओं के अपहरण अथवा उत्पीड़न के आरोप भी समकालीन और बाद के अध्ययनों में दर्ज हैं। डी.एन. धनागरे के उद्धृत विश्लेषण में रजाकार अभियानों को विशेष रूप से तेलंगाना के विद्रोही गांवों को आतंकित करने से जोड़ा गया है।
यहीं सशस्त्र आत्मरक्षा आंदोलन की आवश्यकता से बढ़कर नियमित राजनीतिक-सैन्य रणनीति बनने लगी।
हथियार कहां से आए?
प्रारंभिक चरण में किसानों के हथियार अत्यंत साधारण थे—
और सीमित संख्या में बंदूकें।
बाद में पुलिस, रजाकारों और भू-स्वामी दस्तों से छीने गए हथियार आंदोलन के पास आए।
कुछ हथियार दूसरे स्रोतों से भी जुटाए गए।
लेकिन तेलंगाना के दलमों को आधुनिक अर्थ में बड़ी हथियारबंद सेना समझना गलत होगा।
उनकी सबसे बड़ी शक्ति हथियारों की संख्या नहीं, बल्कि गांवों की सामाजिक सहायता, सूचना और भूगोल की जानकारी थी।
फरवरी 1948 और गुरिल्ला दिशा
1948 तक कम्युनिस्ट आंदोलन की रणनीति अधिक स्पष्ट सशस्त्र दिशा ग्रहण कर चुकी थी।
सीपीआई की राष्ट्रीय राजनीति में भी इस समय क्रांतिकारी रणनीति और सशस्त्र संघर्ष को लेकर महत्वपूर्ण बहसें चल रही थीं।
तेलंगाना का अनुभव स्वयं इन बहसों का प्रभावशाली संदर्भ बना।
लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि स्थानीय संघर्ष का विकास केवल केंद्रीय पार्टी लाइन का परिणाम नहीं था।
गांवों में सशस्त्रीकरण पहले ही दमन और आत्मरक्षा की वास्तविक परिस्थितियों से शुरू हो चुका था।
ग्राम समितियां और वैकल्पिक ग्रामीण सत्ता
जब पुरानी सत्ता पीछे हटी
किसी विद्रोह की वास्तविक गहराई तब पता चलती है जब वह केवल सत्ता का विरोध नहीं करता, बल्कि उसके स्थान पर दूसरी व्यवस्था खड़ी करने लगता है।
तेलंगाना में कुछ क्षेत्रों में यही हुआ।
जहां देशमुख और सरकारी अधिकारी गांव छोड़ गए अथवा उनकी शक्ति समाप्त हो गई, वहां ग्राम समितियां या बाद के कम्युनिस्ट साहित्य की भाषा में ग्राम राज उभरे।
सुंदरैया का दावा था कि संघर्ष अपने चरम पर लगभग 3,000 गांवों तक फैला और इनमें कई जगह पंचायत-आधारित जन प्रशासन स्थापित हुआ। अन्य स्रोतों में संख्या 1,000 से 4,000 तक बताई गई है। इसलिए “कितने गांवों पर वास्तविक नियंत्रण था” इस प्रश्न पर एक निश्चित आंकड़ा देना उचित नहीं है। एक अकादमिक अध्ययन स्पष्ट करता है कि सुंदरैया लगभग 3,000, अन्य स्रोत 2,000 और कुछ समकालीन विरोधी स्रोत कम-से-कम 1,000 गांवों में विद्रोही प्रभाव स्वीकार करते हैं।
इस अंतर का कारण “नियंत्रण” की परिभाषा भी है।
कहीं पूरी वैकल्पिक सत्ता थी।
कहीं केवल संगम प्रभावी था।
कहीं दिन में सरकारी/रजाकार नियंत्रण और रात में गुरिल्ला प्रभाव रहता था।
इसलिए सभी गांवों को समान श्रेणी में रखना उचित नहीं।
ग्राम समितियों की संरचना
जहां आंदोलन स्थिर नियंत्रण स्थापित कर पाया, वहां समितियां स्थानीय प्रशासनिक कार्य करने लगीं।
इनका आकार और तरीका हर गांव में समान नहीं था।
लेकिन उनके प्रमुख कार्यों में शामिल थे—
भूमि विवादों का निपटारा;
किरायेदारी संबंधी फैसले;
अनाज और संसाधनों का प्रबंधन;
सामाजिक विवादों का समाधान;
और आंदोलन के लिए समर्थन जुटाना।
कुछ अध्ययनों में पांच से सात सदस्यों वाली समितियों और गांव की आम बैठकों से उनके चयन का उल्लेख मिलता है, हालांकि यह संरचना पूरे आंदोलन क्षेत्र में एक समान मानकीकृत नहीं थी।
जनता की अदालतें
ग्राम समितियों के साथ कुछ क्षेत्रों में पीपुल्स कोर्ट अथवा जनता की अदालतें भी बनीं।
उनका उद्देश्य स्थानीय विवादों को बिना पुराने सामंती न्याय तंत्र के सुलझाना था।
और आंदोलन विरोधी गतिविधियों तक के मामलों की सुनवाई की जाती थी।
इन अदालतों को आंदोलनकारी साहित्य न्याय के लोकतंत्रीकरण के रूप में प्रस्तुत करता है।
लेकिन इनके दूसरे पहलू को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
सशस्त्र विद्रोह की परिस्थिति में “जन न्याय” और राजनीतिक दंड के बीच सीमा कई बार धुंधली हो सकती थी। आंदोलन के विरोधियों, मुखबिरों अथवा कथित अत्याचारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई भी हुई।
इसलिए ग्राम न्याय व्यवस्था का मूल्यांकन केवल आदर्शीकृत चित्र के रूप में नहीं, बल्कि गृह-संघर्ष जैसी परिस्थितियों में विकसित वैकल्पिक सत्ता के रूप में करना चाहिए।
वेट्टी का अंत
ग्राम समितियों की सबसे लोकप्रिय कार्रवाइयों में वेट्टी समाप्त करना था।
यह ऐसा सुधार था जिसका गरीब ग्रामीण परिवार पर तत्काल प्रभाव पड़ता था।
अब भू-स्वामी या गांव का प्रभावशाली व्यक्ति मुफ्त श्रम की मांग नहीं कर सकता था।
इसी तरह कई क्षेत्रों में कृषि मजदूरी बढ़ाने के प्रयास हुए।
सुंदरैया के अनुसार जिन गांवों में आंदोलन ने स्थायी प्रभाव स्थापित किया वहां वेट्टी, अवैध वसूली और बेदखली को रोका गया तथा कृषि मजदूरों की मजदूरी में सुधार हुआ।
सामाजिक संबंधों में परिवर्तन
ग्राम राज का महत्व केवल प्रशासन में नहीं था।
इसने गांव के सामाजिक व्यवहार को भी प्रभावित किया।
जो गरीब किसान पहले “दोरा” के सामने सिर झुकाता था, वही अब ग्राम समिति में बैठकर निर्णय कर सकता था।
जो दलित परिवार मुफ्त सेवा करने को मजबूर था, वह अब वेट्टी से इनकार कर सकता था।
जो महिला गांव की औपचारिक राजनीति से बाहर थी, वह आंदोलन की सक्रिय समर्थक, संदेशवाहक अथवा कार्यकर्ता बन सकती थी।
इस परिवर्तन ने ग्रामीण सत्ता की पारंपरिक भाषा को चुनौती दी।
क्या ये सचमुच समानांतर सरकारें थीं?
इतिहासलेखन में इन्हें अक्सर “विलेज रिपब्लिक”, “ग्राम राज्यम” अथवा “समानांतर सरकार” कहा जाता है।
यह शब्द कुछ क्षेत्रों के लिए उचित है, लेकिन पूरे तेलंगाना पर लागू करना अतिशयोक्ति होगी।
अकादमिक अध्ययन बताते हैं कि नियंत्रण की तीव्रता क्षेत्र और समय के अनुसार बदलती थी। कुछ गांवों में कम्युनिस्ट दलमों ने अदालतें, स्थानीय प्रशासन और सामुदायिक परियोजनाएं तक चलायीं; दूसरी जगह उनका प्रभाव अस्थायी अथवा रात्रिकालीन था।
इसलिए अधिक सटीक निष्कर्ष है—
तेलंगाना के कुछ विस्तृत क्षेत्रों में राज्य की पुरानी ग्राम-स्तरीय सत्ता कमजोर हुई और उसकी जगह संगम-आधारित वैकल्पिक प्रशासन विकसित हुआ।
गुरिल्ला दल और संघर्ष की सैन्य संरचना
“दलम” क्या था?
तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष से जुड़ा एक प्रमुख शब्द है—दलम।
दलम का अर्थ था सशस्त्र अथवा अर्धसशस्त्र स्वयंसेवी दस्ता।
इनका विकास स्थानीय आत्मरक्षा समूहों से हुआ।
प्रारंभ में स्वयंसेवक किसान सभाओं की सुरक्षा करते और भू-स्वामियों के निजी दस्तों का मुकाबला करते थे।
दमन बढ़ने पर यही समूह अधिक संगठित गुरिल्ला इकाइयों में बदल गए।
दो स्तर की संरचना
आंदोलन में मोटे तौर पर दो प्रकार के सशस्त्र समूह विकसित हुए—
ग्राम दस्ते, जो अपने गांव अथवा आसपास के क्षेत्र की रक्षा करते थे;
मोबाइल अथवा क्षेत्रीय गुरिल्ला दल, जो एक से दूसरे क्षेत्र में जाकर अभियान चला सकते थे।
डी.एन. धनागरे के अध्ययन के आधार पर एक विवरण बताता है कि अप्रैल 1948 तक कम्युनिस्टों ने छह क्षेत्रीय दस्ते—प्रत्येक में लगभग बीस लड़ाके—और लगभग पचास ग्राम दस्ते संगठित कर लिए थे। बाद में इनकी संख्या और भागीदारी तेजी से बढ़ी।
ऐसे संख्यात्मक दावों को निश्चित सैन्य रिकॉर्ड की तरह नहीं पढ़ना चाहिए, क्योंकि संगठन भूमिगत था और अलग-अलग स्रोतों में आंकड़े अलग हैं।
फिर भी स्पष्ट है कि 1948 तक दलम आंदोलन का संस्थागत अंग बन चुके थे।
दलम में कौन शामिल होता था?
दलमों में मुख्यतः ग्रामीण युवकों, गरीब किसानों और खेतिहर मजदूरों की भागीदारी थी।
कुछ छात्र और राजनीतिक कार्यकर्ता भी इनमें शामिल हुए।
तेलंगाना सरकार की शैक्षिक सामग्री नल्ला नरसिम्हुलु जैसे आयोजकों की भूमिका का उल्लेख करती है और बताती है कि दस्तों में वेट्टी से पीड़ित ग्रामीणों की भर्ती भी हुई।
महिलाओं की भी सशस्त्र और असशस्त्र दोनों प्रकार की भूमिकाएं थीं, जिनकी विस्तृत चर्चा अगले खंड में होगी।
गुरिल्ला युद्ध की रणनीति
दलम नियमित सेना की तरह खुले मैदान में लड़ने के लिए नहीं बने थे।
पुलिस और रजाकार गतिविधियों की सूचना पहले प्राप्त करना;
आवश्यक होने पर घात लगाना;
गांव पर हमले के बाद तेजी से पीछे हटना;
और ग्रामीण समर्थन के सहारे छिपना।
तेलंगाना का ग्रामीण भूगोल—खेत, जंगल, पहाड़ियां और बस्तियों का नेटवर्क—गुरिल्ला कार्रवाई के लिए उपयोगी था।
सूचना नेटवर्क — आंदोलन का अदृश्य हथियार
किसी भी गुरिल्ला संघर्ष में स्थानीय सूचना हथियार से कम महत्वपूर्ण नहीं होती।
पुलिस के आने की सूचना देते;
घायल कार्यकर्ताओं को छिपाते;
इस प्रकार दलम और गांव का संबंध सैन्य इकाई और नागरिक आबादी का सामान्य संबंध नहीं था।
कई क्षेत्रों में दलम उसी किसान समाज से निकला था जिसकी रक्षा का दावा करता था।
लेकिन यही स्थिति गांवों को दमन का लक्ष्य भी बनाती थी।
अनुशासन और राजनीतिक नियंत्रण
कम्युनिस्ट नेतृत्व का प्रयास था कि दलम केवल स्वतंत्र हथियारबंद समूह न बन जाएं।
उन्हें राजनीतिक नेतृत्व के अधीन रखा जाए और उनकी कार्रवाई आंदोलन के कार्यक्रम से जुड़ी हो।
व्यवहार में यह अनुशासन हर जगह समान नहीं रहा।
लंबे सशस्त्र संघर्ष में स्थानीय प्रतिशोध, व्यक्तिगत दुश्मनी और वर्गीय हिंसा के मामले भी सामने आए।
यही कारण है कि तेलंगाना संघर्ष का संतुलित इतिहास केवल वीरगाथा या केवल हिंसा की कहानी नहीं हो सकता।
यह वास्तविक ग्रामीण गृह-संघर्ष था जिसमें संगठित आदर्शवाद, किसान मुक्ति, प्रतिशोध, राज्य दमन और राजनीतिक हिंसा—सभी मौजूद थे।
1948 तक विस्तार
अगस्त 1948 तक आंदोलन की सशस्त्र क्षमता काफी बढ़ चुकी थी। कुछ अध्ययनों में हजारों ग्रामीण स्वयंसेवकों और लगभग दो हजार मोबाइल गुरिल्लाओं का उल्लेख है, हालांकि इन आंकड़ों के स्रोत मुख्यतः आंदोलनकारी या बाद के पुनर्निर्माण हैं।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य संख्या नहीं, बल्कि यह है कि निजाम शासन के अंतिम महीनों तक तेलंगाना के कुछ हिस्सों में ऐसा सशस्त्र ग्रामीण नेटवर्क बन चुका था जिसे केवल सामान्य पुलिस कार्रवाई से समाप्त करना कठिन हो गया था।
भूमि कब्जा और भूमि-पुनर्वितरण
संघर्ष का निर्णायक प्रश्न
तेलंगाना आंदोलन की सबसे गहरी ऐतिहासिक विरासत जमीन के प्रश्न से जुड़ी है।
वेट्टी समाप्त करना महत्वपूर्ण था।
अवैध वसूली रोकना महत्वपूर्ण था।
लेकिन जब किसान ने यह प्रश्न उठाया कि जमीन आखिर किसकी होनी चाहिए, तब आंदोलन ने ग्रामीण संपत्ति संबंधों को सीधे चुनौती दी।
यही वह बिंदु था जहां सुधारवादी किसान आंदोलन और संरचनात्मक परिवर्तन के आंदोलन के बीच अंतर स्पष्ट होने लगा।
पहला चरण — छीनी गई जमीन वापस लेना
भूमि संघर्ष की शुरुआत हर जगह बड़े जमींदार की पूरी संपत्ति जब्त करने से नहीं हुई।
पहला लक्ष्य अक्सर उन किसानों को उनकी जमीन वापस दिलाना था जिनसे भूमि जबरन, धोखे, कर्ज अथवा प्रशासनिक प्रभाव के माध्यम से छीनी गई थी।
चाकली इलम्मा का संघर्ष इसी प्रक्रिया का प्रतीक था।
संगमों ने बेदखली का प्रतिरोध किया।
किरायेदारों को खेत से हटाए जाने पर सामूहिक कार्रवाई हुई।
और जिन इलाकों में आंदोलन मजबूत हुआ, वहां पहले से बेदखल किसानों ने भूमि पर दोबारा कब्जा किया।
“जमीन जोतने वाले की”
आगे चलकर आंदोलन ने अधिक व्यापक सिद्धांत अपनाया—
“दुन्नेवाडिदे भूमि” — जमीन उसी की जो उसे जोतता है।
यह केवल किरायेदारी संरक्षण से आगे की मांग थी।
इसका अर्थ था कि बड़े भू-स्वामी द्वारा अपने श्रम से न जोती जाने वाली विशाल जमीन पर गरीब किसान का दावा वैध माना जाए।
यही सिद्धांत तेलंगाना को आधुनिक भारत के सबसे उग्र भूमि आंदोलनों में स्थान देता है।
अधिशेष और बंजर भूमि
आंदोलन के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की जमीन पुनर्वितरण के दायरे में आई—
बड़े भू-स्वामियों की कथित अधिशेष भूमि;
पूर्व में किसानों से छीनी गई जमीन;
और कुछ किरायेदारी वाली भूमि।
जिन क्षेत्रों में ग्राम समितियों का मजबूत नियंत्रण था, वहां भूमि के साथ पशु और कृषि उपकरण तक गरीब परिवारों को उपलब्ध कराने के प्रयासों का उल्लेख मिलता है।
कितना भूमि-वितरण हुआ?
यहीं तेलंगाना संघर्ष के इतिहास का सबसे विवादित आंकड़ा सामने आता है।
कम्युनिस्ट आंदोलन के प्रमुख नेता पी. सुंदरैया ने दावा किया कि संघर्ष लगभग 3,000 गांवों तक फैला और करीब 10 लाख एकड़ भूमि गरीब किसानों में बांटी गई। उनकी पुस्तक के व्यापक रूप से उद्धृत संस्करण में यही दावा मिलता है।
हालांकि बाद के कुछ लेखों और शोधों में इसे “10 लाख हेक्टेयर” भी लिख दिया गया है। यह संभवतः इकाई-संबंधी पुनरुत्पादन या उद्धरण की समस्या है; इसलिए दोनों को समान तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। एक विश्वविद्यालय शोध में 10 लाख हेक्टेयर का दावा सुंदरैया के नाम से उद्धृत किया गया है, जबकि सुंदरैया की प्रकाशित पुस्तक के Cambridge संस्करण में one million acres लिखा है।
इसलिए इस शोध में 10 लाख एकड़ को आंदोलनकारी नेतृत्व का प्रमुख दावा माना जाना अधिक सुरक्षित है।
सरकारी आंकड़ा बहुत छोटा क्यों?
दूसरी ओर सरकारी और गैर-कम्युनिस्ट स्रोत बहुत कम संख्या देते हैं।
Journal of Asian Studies में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार कम्युनिस्ट पार्टी ने दस लाख एकड़ से अधिक भूमि के पुनर्वितरण का दावा किया, जबकि सरकारी स्रोतों ने केवल लगभग 12,600 एकड़ भूमि के हाथ बदलने की बात स्वीकार की।
इसे केवल यह कहकर समाप्त नहीं किया जा सकता कि एक पक्ष सत्य और दूसरा असत्य है।
इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं—
अस्थायी कब्जे और स्थायी स्वामित्व में अंतर;
भूमिगत आंदोलन के पास औपचारिक अभिलेखों की कमी;
बाद में भू-स्वामियों द्वारा जमीन वापस हासिल कर लेना;
सरकारी रिकॉर्ड में विद्रोही कब्जे को वैध हस्तांतरण न मानना;
इसलिए वेबसाइट के इस शोध में उचित भाषा होगी—
कम्युनिस्ट नेतृत्व ने लगभग दस लाख एकड़ भूमि के पुनर्वितरण का दावा किया; सरकारी स्रोत इससे कहीं कम भूमि के वास्तविक हस्तांतरण को स्वीकार करते हैं। सटीक कुल मात्रा पर इतिहासकारों में सहमति नहीं है।
भूमि-सीमा के प्रयोग
कुछ आंदोलनकारी विवरणों में बड़े भू-स्वामियों की जमीन पर सीमा निर्धारित करने के प्रयोगों का उल्लेख है।
अलग-अलग समय पर भूमि सीमा से संबंधित नीति बदलती भी रही।
यह बताता है कि आंदोलन केवल स्वतःस्फूर्त कब्जों तक सीमित नहीं रहना चाहता था; नेतृत्व भूमि-पुनर्वितरण के लिए राजनीतिक मानदंड विकसित करने की कोशिश कर रहा था।
लेकिन इन्हें स्वतंत्र भारत के बाद बने औपचारिक भूमि-सीलिंग कानूनों जैसा व्यवस्थित कानूनी तंत्र समझना गलत होगा।
ये विद्रोही सत्ता की परिस्थितियों में बने राजनीतिक नियम थे।
किसे जमीन मिली?
मुख्य लाभार्थियों में गरीब किसान, भूमिहीन खेतिहर मजदूर और बेदखल किरायेदार शामिल थे।
लेकिन आंदोलन की सामाजिक संरचना जटिल थी।
मध्यम और कभी-कभी संपन्न किसान भी आंदोलन में शामिल थे।
इसलिए भूमि प्रश्न पर सभी किसान समूहों के हित समान नहीं थे।
जब संघर्ष केवल वेट्टी खत्म करने तक था तो व्यापक किसान एकता आसान थी।
जैसे ही बड़े भू-स्वामियों की भूमि पुनर्वितरण का प्रश्न आया, वर्गीय अंतर अधिक स्पष्ट हो गए।
यही बाद में आंदोलन के भीतर रणनीतिक बहसों का कारण बना।
क्या जमीन स्थायी रूप से किसानों के पास रही?
1948 में भारतीय सेना की कार्रवाई और बाद में कम्युनिस्ट गुरिल्लाओं के विरुद्ध सरकारी अभियान के बाद कई भू-स्वामी गांवों में लौटे।
कुछ मामलों ने बाद के भूमि सुधार और किरायेदारी विवादों को प्रभावित किया।
इसलिए आंदोलन द्वारा वितरित भूमि और स्वतंत्र भारत में किसानों के स्थायी कानूनी स्वामित्व को एक ही बात समझना गलत होगा।
फिर भी आंदोलन का प्रभाव गहरा था।
किसान ने पहली बार व्यापक स्तर पर केवल यह नहीं कहा कि किराया कम होना चाहिए।
भूमि स्वामित्व की संरचना बदलनी चाहिए।
# 1946 से 1948 : आंदोलन ने अपना स्वरूप बदल लिया था
तेलंगाना संघर्ष के इस चरण को पांच क्रमिक परिवर्तनों में समझा जा सकता है।
पहला परिवर्तन — विरोध से अवज्ञा तक। किसानों ने केवल वेट्टी और अवैध वसूली की शिकायत नहीं की, उन्हें मानने से इनकार किया।
दूसरा परिवर्तन — संगठन से सत्ता तक। संगम केवल आंदोलन की शाखा न रहकर कई गांवों में निर्णय लेने वाली संस्था बनने लगा।
तीसरा परिवर्तन — आत्मरक्षा से गुरिल्ला युद्ध तक। स्वयंसेवी दस्ते पुलिस, निजी हथियारबंद समूहों और रजाकारों के दबाव में संगठित दलमों में बदल गए।
चौथा परिवर्तन — बेदखली रोकने से भूमि-पुनर्वितरण तक। पहले किसान अपनी जमीन बचाना चाहता था; बाद में बड़े भू-स्वामी की अतिरिक्त जमीन पर गरीबों के अधिकार का प्रश्न उठने लगा।
पांचवां परिवर्तन — किसान संघर्ष से राजनीतिक सत्ता-संघर्ष तक। 1947 के बाद निजाम द्वारा हैदराबाद को भारतीय संघ से बाहर रखने की कोशिश ने किसान संघर्ष को व्यापक निजाम-विरोधी राजनीति से जोड़ दिया।
इसीलिए 1946–48 तेलंगाना आंदोलन का निर्णायक निर्माणकाल था।
लेकिन इसके सामने अब उससे भी बड़ा संकट आने वाला था।
1947 के बाद रजाकार आंदोलन तेजी से बढ़ा। ग्रामीण तेलंगाना में किसान संगठनों, हिंदू ग्रामीण आबादी, निजाम-विरोधी राजनीतिक कार्यकर्ताओं और अन्य विरोधियों पर हिंसा की घटनाएं बढ़ीं। दूसरी ओर कम्युनिस्ट दलमों ने भी सशस्त्र कार्रवाई तेज की।
सितंबर 1948 तक हैदराबाद एक ऐसे बिंदु पर पहुंच चुका था जहां किसान विद्रोह, निजाम की स्वतंत्रता की नीति, रजाकारों का उभार, भारतीय संघ का दबाव और सांप्रदायिक तनाव एक-दूसरे में उलझ गए थे।
लेकिन उससे पहले यह समझना आवश्यक है कि इस संघर्ष को जमीन पर वास्तव में कौन चला रहा था।
दलित समुदायों को इससे क्या मिला?
आदिवासी समाज की भूमिका क्या रही?
यही हमारे अगले खंड का विषय है।
महिलाओं की असाधारण भूमिका
तेलंगाना संघर्ष की सबसे बड़ी सामाजिक विशेषताओं में एक
भारतीय किसान आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी इससे पहले भी दिखाई देती है। बारडोली, तेभागा तथा दूसरे आंदोलनों में महिलाएं बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरी थीं। लेकिन तेलंगाना में उनकी भूमिका कई कदम आगे चली गई।
यहां महिलाएं केवल सभाओं और जुलूसों में शामिल नहीं हुईं।
किसान संगठनों में काम किया;
पुलिस और रजाकारों का प्रतिरोध किया;
कार्यकर्ताओं को आश्रय दिया;
गुरिल्ला दस्तों के लिए संपर्क तंत्र बनाया;
कुछ महिलाएं स्वयं दलमों में गईं;
और कई इलाकों में गांवों की प्रत्यक्ष रक्षा में भाग लिया।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के तेलंगाना आंदोलन अभिलेख में भी पुरुषों, महिलाओं और बच्चों तक के गुरिल्ला प्रतिरोध में संगठित होने का उल्लेख मिलता है।
महिलाएं आंदोलन में क्यों उतरीं?
महिलाओं की भागीदारी को केवल पुरुष किसान के संघर्ष में “परिवार का सहयोग” मानना पर्याप्त नहीं है।
ग्रामीण गरीब महिला सामंती व्यवस्था को अपने स्तर पर अनुभव करती थी।
वह खेत में श्रम करती थी।
गरीबी और खाद्यान्न संकट का सबसे प्रत्यक्ष बोझ उठाती थी।
कई सेवा-जातियों से जुड़ी महिलाओं पर वेट्टी जैसी प्रथाओं का प्रभाव पड़ता था।
और सामंती सत्ता में स्त्री की देह और सम्मान पर भी प्रभुत्व का खतरा मौजूद था।
इसलिए सामंतवाद-विरोध महिला के लिए केवल आर्थिक संघर्ष नहीं था।
यह व्यक्तिगत सुरक्षा और मानवीय गरिमा का प्रश्न भी बन सकता था।
वेट्टी और महिलाओं का श्रम
वेट्टी केवल पुरुषों से खेत में मुफ्त मजदूरी कराने तक सीमित नहीं था।
तेलंगाना के ग्रामीण सामाजिक ढांचे में विभिन्न जातिगत पेशों से जुड़े परिवारों को भू-स्वामियों और स्थानीय अधिकारियों के लिए वस्तुएं तथा सेवाएं मुफ्त या अत्यंत मामूली भुगतान पर उपलब्ध करानी पड़ सकती थीं। वेट्टी पर हुए अध्ययनों में इसे आर्थिक शोषण से अधिक—मानवीय गरिमा और आत्मसम्मान को कुचलने वाली सामाजिक व्यवस्था—बताया गया है।
इसमें पूरे परिवार का श्रम प्रभावित होता था।
महिलाएं घरेलू सेवा, कृषि श्रम, भोजन तैयार करने और दूसरी सेवाओं के रूप में इस व्यवस्था का भार उठा सकती थीं।
तो घर की महिला के लिए भी इसका सीधा अर्थ था।
चाकली इलम्मा — महिला प्रतिरोध का पहला बड़ा प्रतीक
चाकली इलम्मा का उल्लेख पिछले खंड में भूमि संघर्ष के संदर्भ में किया जा चुका है।
लेकिन महिलाओं के इतिहास में उनका महत्व इससे भी बड़ा है।
एक गरीब, निम्न सामाजिक हैसियत वाली ग्रामीण महिला का शक्तिशाली भू-स्वामी तंत्र के सामने जमीन और फसल के अधिकार के लिए खड़ा होना अपने समय के सामाजिक पदानुक्रम को कई स्तरों पर चुनौती देता था।
वह न तो प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवार से थीं और न किसी उच्च सामाजिक वर्ग से।
यही कारण है कि बाद की तेलंगाना स्मृति में इलम्मा केवल भूमि संघर्ष की नायिका नहीं रहीं—वे सामाजिक प्रतिरोध का प्रतीक बन गईं।
उनकी ऐतिहासिक भूमिका का महत्व इस तथ्य से कम नहीं होता कि बाद की लोकस्मृति में उनके जीवन से जुड़ी कुछ घटनाएं किंवदंती का रूप भी ले चुकी हैं।
मल्लू स्वराज्यम
तेलंगाना संघर्ष में महिलाओं की भूमिका की चर्चा मल्लू स्वराज्यम के बिना अधूरी है।
बहुत कम उम्र में उन्होंने किसान आंदोलन से जुड़कर राजनीतिक गतिविधि शुरू की और बाद में सशस्त्र संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभाई।
मल्लू स्वराज्यम गांवों में महिलाओं को संगठित करती थीं, किसान सभाओं में बोलती थीं और आगे चलकर गुरिल्ला जीवन का हिस्सा बनीं।
उनकी स्मृतियां विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं क्योंकि उनमें आंदोलन को केवल नेताओं की रणनीति के रूप में नहीं बल्कि ग्रामीण महिलाओं के दैनिक अनुभव के रूप में देखा जा सकता है।
बाद में तेलंगाना संघर्ष में भाग लेने वाली महिलाओं के मौखिक इतिहास संग्रह किए गए। 1980 के दशक में स्त्री शक्ति संगठन द्वारा आंदोलन की महिला प्रतिभागियों के साक्षात्कारों पर आधारित तेलुगु कृति “मनकु तेलियनि मन चरित्र”—अर्थात “हमारा वह इतिहास जिसे हम नहीं जानते”—प्रकाशित हुई। इसमें मल्लू स्वराज्यम सहित अनेक प्रतिभागियों की स्मृतियां दर्ज की गईं।
यह स्रोत इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आधिकारिक और राजनीतिक इतिहास में महिलाओं की जिन गतिविधियों का सीमित उल्लेख मिलता है, मौखिक इतिहास उन्हें केंद्र में लाता है।
आरुटला कमलादेवी
तेलंगाना आंदोलन में आरुटला कमलादेवी भी प्रमुख महिला कार्यकर्ताओं में थीं।
अपने पति आरुटला रामचंद्र रेड्डी के साथ उन्होंने आंध्र महासभा और किसान संगठन में सक्रिय भागीदारी की।
महिलाओं को गांवों में संगठित करने, सामंती व्यवस्था के विरुद्ध राजनीतिक चेतना फैलाने और आंदोलन को समर्थन देने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि तेलंगाना आंदोलन की कई महिला कार्यकर्ता बाद में संसदीय राजनीति और सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय रहीं।
इससे पता चलता है कि आंदोलन ने केवल तत्काल विद्रोह नहीं पैदा किया; उसने महिला राजनीतिक नेतृत्व की एक नई पीढ़ी भी तैयार की।
हथियार केवल बंदूक नहीं था
महिलाओं की प्रतिरोध तकनीक को केवल यह देखकर नहीं मापा जा सकता कि कितनी महिलाएं बंदूक लेकर दलम में थीं।
कई ग्रामीण महिलाओं के पास बंदूक नहीं थी।
लेकिन उन्होंने स्थानीय उपलब्ध वस्तुओं को हथियार में बदला।
तेलंगाना संघर्ष की प्रतिभागी स्मृतियों में—
तक के प्रयोग के वर्णन मिलते हैं।
कुछ विवरण बताते हैं कि महिलाओं ने पुलिस दलों को घेरकर गिरफ्तार कार्यकर्ताओं को छुड़ाया और गांव में आने वाले सशस्त्र दस्तों का सामूहिक प्रतिरोध किया।
ऐसे विवरणों में मौखिक स्मृति और राजनीतिक स्मरण का तत्व मौजूद है, इसलिए प्रत्येक घटना को स्वतंत्र स्रोत से सत्यापित करना हमेशा संभव नहीं है। फिर भी व्यापक निष्कर्ष स्पष्ट है—महिलाएं संघर्ष में निष्क्रिय दर्शक नहीं थीं।
संदेश और खुफिया नेटवर्क
गुरिल्ला आंदोलन में सूचना अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
कई जगह महिलाओं पर पुलिस और रजाकारों का संदेह पुरुष कार्यकर्ताओं की तुलना में कम हो सकता था।
इसका उपयोग आंदोलन ने संदेश पहुंचाने में किया।
दलम की स्थिति की खबर पहुंचातीं;
पुलिस गतिविधि की सूचना देतीं;
घायल कार्यकर्ता को छिपातीं;
और भूमिगत कैडरों के लिए संपर्क बनातीं।
युद्ध के इतिहास में इन गतिविधियों को अक्सर “सहायक भूमिका” कह दिया जाता है।
लेकिन गुरिल्ला युद्ध में इन्हीं सहायता तंत्रों पर लड़ाकू इकाइयों का अस्तित्व निर्भर होता है।
इसलिए इन्हें गौण मानना गलत होगा।
महिलाओं के लिए आंदोलन के भीतर अपना संघर्ष
यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है।
क्या सामंती व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष करने वाला आंदोलन अपने आप महिलाओं को समानता दे देता है?
तेलंगाना की महिला कार्यकर्ताओं को बाहरी सामंतवाद के साथ अपने परिवारों और संगठनों के भीतर मौजूद पितृसत्तात्मक धारणाओं से भी जूझना पड़ा।
कई परिवार महिलाओं के रात में बाहर रहने, पुरुष कार्यकर्ताओं के साथ राजनीतिक काम करने अथवा दलम में जाने का विरोध करते थे।
इसलिए महिला की राजनीतिक भागीदारी स्वयं सामाजिक परंपरा के विरुद्ध विद्रोह थी।
विवाह और व्यक्तिगत संबंध
आंदोलन ने कुछ क्षेत्रों में विवाह संबंधों से जुड़े प्रश्न भी उठाए।
महिलाओं ने जबरन विवाह, पति की हिंसा और वैवाहिक अन्याय के मामलों में ग्राम समितियों अथवा संगठन की सहायता मांगी।
यह परिवर्तन उल्लेखनीय था।
एक किसान आंदोलन जो शुरू हुआ था—
वह धीरे-धीरे निजी और पारिवारिक सत्ता संबंधों तक पहुंचने लगा।
यही किसी गहरे सामाजिक आंदोलन की पहचान है।
यौन हिंसा और दमन
तेलंगाना संघर्ष में महिलाओं ने एक भयानक कीमत भी चुकाई।
पुलिस, रजाकार और बाद के सैन्य अभियानों के दौरान महिलाओं के विरुद्ध उत्पीड़न और यौन हिंसा की अनेक शिकायतें आंदोलनकारी संस्मरणों और ऐतिहासिक अध्ययनों में मिलती हैं।
ऐसे मामलों में संख्या बताना कठिन है, क्योंकि समकालीन अभिलेख अधूरे हैं और राजनीतिक स्रोतों में अतिशयोक्ति अथवा दबाव दोनों की संभावना रहती है।
दलित और खेतिहर मजदूर
किसान आंदोलन का सबसे गरीब आधार
तेलंगाना की ग्रामीण आबादी में खेतिहर मजदूरों की संख्या बहुत बड़ी थी।
1951–52 की पहली Agricultural Labour Enquiry के आधार पर डी.एन. धनागरे बताते हैं कि तत्कालीन हैदराबाद राज्य की ग्रामीण आबादी का लगभग 42 प्रतिशत कृषि मजदूरी से जुड़ा था—इनमें जमीन रखने वाले और पूरी तरह भूमिहीन दोनों शामिल थे। यह आंदोलन के बाद का सर्वेक्षण है, इसलिए इसे सीधे 1946 की स्थिति का आंकड़ा नहीं माना जा सकता, लेकिन यह क्षेत्र की ग्रामीण संरचना में कृषि मजदूरों के भारी महत्व को स्पष्ट करता है।
ये मजदूर भी एक समान समूह नहीं थे।
अल्पभूमि वाले गरीब किसान,
और अनेक जातीय-सामाजिक समूह शामिल थे।
जाति और वर्ग की दोहरी अधीनता
दलितों की स्थिति विशेष रूप से जटिल थी।
उनके सामने केवल जमीन और मजदूरी का आर्थिक प्रश्न नहीं था।
सामाजिक अस्पृश्यता और जातिगत अधीनता भी थी।
यागती चिन्ना राव के अध्ययन में दक्षिण भारत की कम्युनिस्ट किसान लामबंदी के संदर्भ में स्पष्ट किया गया है कि दलित समुदाय आर्थिक रूप से भूमि-विहीनता और सामाजिक रूप से अस्पृश्यता—दोनों प्रकार की वंचना झेल रहे थे। कम्युनिस्टों द्वारा कृषि मजदूरों को संगठित करना महत्वपूर्ण उपलब्धि थी, लेकिन जाति के प्रश्न को पर्याप्त स्वतंत्रता से न उठाना उसकी सीमा भी रहा।
यह टिप्पणी तेलंगाना को समझने में भी महत्वपूर्ण है।
क्योंकि वर्ग मुक्ति और जाति मुक्ति पूरी तरह एक ही चीज नहीं हैं।
वेट्टी का सबसे अधिक बोझ
वेट्टी समाज के गरीब और निम्न सामाजिक समूहों पर सबसे अधिक प्रभाव डालती थी।
कई जातियां परंपरागत रूप से गांव में विशिष्ट सेवाएं देती थीं—
स्थानीय सामंती व्यवस्था में इन सेवाओं का उचित भुगतान न होना या उन्हें मजबूरी बनाना सामाजिक अपमान का प्रमुख रूप था।
इसलिए वेट्टी समाप्त करने की संगम की घोषणा गरीब और दलित ग्रामीणों के लिए सबसे प्रत्यक्ष क्रांतिकारी परिवर्तन थी।
“अब मुफ्त काम नहीं करेंगे”
यह वाक्य जितना साधारण लगता है, उतना था नहीं।
यदि किसी परिवार की पीढ़ियां भू-स्वामी के लिए मुफ्त श्रम करती रही हों और पहली बार पूरा समुदाय कहे—
काम करेंगे तो मजदूरी लेंगे,
तो इससे आर्थिक संबंध के साथ सामाजिक दर्जा भी बदलता है।
अब व्यक्ति “सेवक” से “मजदूर” बनता है।
लेकिन वह अपने श्रम का मालिक होने का दावा करता है।
यह फर्क तेलंगाना संघर्ष के सामाजिक अर्थ को समझने में महत्वपूर्ण है।
मजदूरी का संघर्ष
तेलंगाना के ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरी बेहद कम थी।
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान खाद्य कीमतें मजदूरी से तेज बढ़ीं, जिससे भूमिहीन श्रमिकों की स्थिति और खराब हुई। मौसमी बेरोजगारी और काम के लिए तीखी प्रतिस्पर्धा मजदूरी को नीचे बनाए रखती थी।
आंदोलन के मजबूत क्षेत्रों में ग्राम समितियों ने मजदूरी बढ़ाने का प्रयास किया।
सुंदरैया का दावा है कि कृषि मजदूरों के लिए उचित मजदूरी लागू की गई और गरीब परिवारों की खाद्य स्थिति में सुधार हुआ। यह आंदोलन के एक प्रमुख नेता का प्रत्यक्ष राजनीतिक विवरण है, इसलिए इसे स्वतंत्र सरकारी आंकड़े की तरह नहीं बल्कि आंदोलनकारी स्रोत के दावे के रूप में पढ़ना चाहिए।
फिर भी मजदूरी का प्रश्न संघर्ष के कार्यक्रम का वास्तविक हिस्सा था।
जमीन का वितरण — भूमिहीन के लिए सबसे बड़ा सवाल
किरायेदार किसान के लिए मुख्य मांग थी—
जिस जमीन को वह जोत रहा है उससे उसे हटाया न जाए।
लेकिन भूमिहीन खेतिहर मजदूर के लिए यह पर्याप्त नहीं था।
वह चाहता था कि उसे जमीन मिले।
इस अंतर ने आंदोलन के भीतर वर्गीय तनाव भी पैदा किया।
जैसे-जैसे भूमि-वितरण की मांग आगे बढ़ी, गरीब किसान और खेतिहर मजदूर बड़े भू-स्वामियों के अलावा अपेक्षाकृत संपन्न किसानों की भूमि पर भी दावा करने लग सकते थे।
भारत सरकार के वी.वी. गिरि राष्ट्रीय श्रम संस्थान द्वारा प्रकाशित कृषि श्रम अध्ययन में यही संकेत मिलता है कि आंदोलन में मध्यवर्गीय किसान, किरायेदार, बटाईदार और भूमिहीन मजदूरों का व्यापक गठबंधन था, लेकिन संघर्ष तीखा होने पर भूमिहीन मजदूरों और संपन्न किसान हितों के बीच तनाव भी बढ़ा।
दलित भागीदारी का अर्थ
दलित किसान अथवा मजदूर के लिए संगम में बैठना स्वयं सामाजिक परिवर्तन था।
जिस व्यक्ति को गांव की पारंपरिक सार्वजनिक व्यवस्था में बराबरी का स्थान नहीं मिलता था, वह आंदोलन में—
या ग्राम समिति का सहभागी बन सकता था।
यह भागीदारी सामाजिक सम्मान का नया अनुभव थी।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आंदोलन ने जातिगत भेदभाव समाप्त कर दिया।
सामाजिक संरचनाएं इतनी आसानी से नहीं बदलतीं।
तेलंगाना आंदोलन की एक महत्वपूर्ण सीमा
कम्युनिस्ट रणनीति का मुख्य विश्लेषण वर्ग के आधार पर था—
इससे गरीब दलित आबादी को आर्थिक संगठन का बड़ा मंच मिला।
लेकिन जातिगत भेदभाव की अपनी स्वतंत्र संरचना थी।
यदि दलित को जमीन मिल जाए, तब भी सामाजिक भेदभाव अपने आप समाप्त नहीं होता।
बाद के दलित इतिहासकारों की यही आलोचना है कि कम्युनिस्ट आंदोलनों ने जाति को कई बार वर्गीय संबंधों का उप-उत्पाद समझने की प्रवृत्ति दिखाई।
इसलिए तेलंगाना संघर्ष का संतुलित मूल्यांकन दो बातें एक साथ स्वीकार करेगा—
पहली, दलित और भूमिहीन कृषि मजदूरों को संगठित करना तथा वेट्टी जैसी प्रथाओं के विरुद्ध उन्हें सामूहिक शक्ति देना ऐतिहासिक उपलब्धि थी।
दूसरी, आंदोलन सामाजिक जाति-व्यवस्था के पूर्ण उन्मूलन तक नहीं पहुंचा।
आदिवासी समुदाय और भूमि का प्रश्न
तेलंगाना संघर्ष का एक कम चर्चित पक्ष
तेलंगाना विद्रोह की लोकप्रिय कथा मुख्यतः नलगोंडा, वारंगल और किसान-देशमुख संघर्ष पर केंद्रित रहती है।
लेकिन 1948 के बाद आंदोलन का भूगोल बदलने लगा।
भारतीय सेना द्वारा हैदराबाद पर नियंत्रण और कम्युनिस्टों के विरुद्ध अभियान के बाद मैदानों में गुरिल्लाओं के लिए टिकना कठिन हुआ।
आधुनिक शोध बताता है कि भारतीय सेना की कार्रवाई से मैदानी क्षेत्रों में कम्युनिस्ट दस्तों को भारी नुकसान हुआ, जिसके बाद उन्होंने वन क्षेत्रों में आधार बनाने शुरू किए। आदिवासी समर्थकों और जंगल के भूगोल ने गुरिल्ला युद्ध को नई जीवनरेखा दी।
आदिवासी प्रश्न केवल 1948 से शुरू नहीं हुआ
लेकिन यह समझना गलत होगा कि कम्युनिस्टों के जंगल में आने से ही आदिवासी भूमि प्रश्न पैदा हुआ।
आदिवासी समुदाय पहले से भूमि-वंचना, जंगल पर नियंत्रण और बाहरी आबादी के प्रवेश की समस्याओं का सामना कर रहे थे।
तेलंगाना और उससे जुड़े गोदावरी क्षेत्र में गैर-आदिवासी कृषक समुदायों, साहूकारों और दूसरे बाहरी समूहों द्वारा आदिवासी भूमि पर कब्जे की प्रक्रिया लंबे समय तक चली।
आधुनिक भद्राचलम अनुसूचित क्षेत्र पर शोध दिखाता है कि आदिवासी भूमि-वंचना की एक बड़ी प्रक्रिया कृषि उपनिवेशीकरण थी—बाहर से आए प्रभावशाली कृषक समुदायों ने भूमि हासिल की और कुछ मूल निवासी आदिवासी भूमिहीन मजदूर बनते गए।
यह प्रक्रिया अलग-अलग समय में अलग रूपों में चली, लेकिन इससे आदिवासी संघर्षों की ऐतिहासिक जमीन समझी जा सकती है।
जंगल केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं
सामान्य किसान के लिए भूमि मुख्यतः खेत हो सकती थी।
आदिवासी समाज के लिए भूमि का अर्थ अधिक व्यापक था—
इसलिए निजी कृषि भूमि का कानूनी स्वामित्व ही उनके अधिकार का पूरा प्रश्न नहीं था।
राज्य द्वारा वन नियंत्रण अथवा बाहरी लोगों द्वारा जमीन हासिल करना उनकी पूरी जीवन-पद्धति को प्रभावित कर सकता था।
यही कारण है कि आदिवासी भूमि संघर्ष को केवल किसान किरायेदारी के मॉडल में नहीं समेटा जा सकता।
कोमाराम भीम की विरासत
तेलंगाना किसान संघर्ष से कुछ वर्ष पहले आदिलाबाद क्षेत्र में कोमाराम भीम के नेतृत्व में गोंड आदिवासियों का प्रतिरोध हुआ था।
उनका संघर्ष वन, भूमि और निजामशाही प्रशासन से जुड़े अधिकारों के प्रश्न पर था।
कोमाराम भीम 1940 में मारे गए—अर्थात 1946 के तेलंगाना किसान विद्रोह से पहले।
इसलिए उन्हें बाद के कम्युनिस्ट सशस्त्र संघर्ष का नेता कहना गलत होगा।
लेकिन उनके विद्रोह से यह साफ था कि तेलंगाना क्षेत्र के आदिवासी समाज में भी राज्य, जंगल और जमीन को लेकर गहरा तनाव मौजूद था।
इसलिए तेलंगाना के व्यापक किसान इतिहास में कोमाराम भीम की धारा और 1946–51 के संघर्ष को अलग लेकिन परस्पर संबद्ध भूमि-अधिकार परंपराओं के रूप में देखना अधिक उचित है।
1948 के बाद जंगलों की ओर दलम
सितंबर 1948 के बाद भारतीय सैन्य और प्रशासनिक कार्रवाई ने कम्युनिस्ट आंदोलन की स्थिति बदल दी।
निजाम और रजाकार अब मुख्य प्रतिद्वंद्वी नहीं रहे।
नई भारतीय सरकार ने कम्युनिस्ट गुरिल्लाओं के विरुद्ध अभियान शुरू किया।
मैदानी गांवों में सैनिक दबाव बढ़ा।
आदिवासी गांवों ने कई जगह उन्हें—
आधुनिक संवैधानिक इतिहास के अध्ययन में भी उल्लेख मिलता है कि आदिवासी समर्थन के कारण वन क्षेत्रों में कम्युनिस्टों को भारतीय सुरक्षा बलों के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध जारी रखने में मदद मिली।
क्या आदिवासी केवल गुरिल्लाओं के सहायक थे?
यदि उन्हें केवल “दलम को जंगल में छिपाने वाला समुदाय” बताया जाए तो उनके अपने राजनीतिक प्रश्न गायब हो जाते हैं।
आदिवासी किसानों के लिए संघर्ष का अर्थ था—
बाहरी साहूकारों और भू-स्वामियों से मुक्ति;
जंगल संसाधनों का अधिकार;
इसलिए कम्युनिस्ट आंदोलन और आदिवासी हितों का संबंध वहीं मजबूत हुआ जहां आंदोलन ने इन समस्याओं को अपने कार्यक्रम से जोड़ा।
वर्ग और आदिवासी पहचान के बीच अंतर
यहां भी दलित प्रश्न जैसा एक वैचारिक अंतर दिखाई देता है।
कम्युनिस्ट आंदोलन आदिवासी किसान को मुख्यतः शोषित किसान अथवा गरीब कृषक के वर्गीय ढांचे में देखता था।
लेकिन आदिवासी प्रश्न केवल वर्ग का प्रश्न नहीं था।
आधुनिक शोध यही दिखाता है कि आदिवासी स्वायत्तता की मांग भूमि-वंचना और अपने संसाधनों पर नियंत्रण दोनों से जुड़ी रही है।
अतः तेलंगाना संघर्ष ने आदिवासी किसान को राजनीतिक और भूमि संघर्ष का मंच अवश्य दिया, लेकिन आदिवासी प्रश्न उससे भी व्यापक था।
मध्यम किसान, गरीब किसान और ग्रामीण वर्ग-संबंध
“किसान” वास्तव में कौन था?
तेलंगाना आंदोलन को समझने की सबसे आम कठिनाई “किसान” शब्द है।
यदि हम सभी खेत से जुड़े लोगों को किसान कह दें तो आंदोलन के भीतर मौजूद हितों के अंतर दिखाई नहीं देंगे।
ग्रामीण समाज में मोटे तौर पर कई स्तर थे—
बड़े भू-स्वामी और देशमुख;
इन सबका सामंतवाद से संबंध समान नहीं था।
बड़े भू-स्वामी
आंदोलन का सबसे स्पष्ट निशाना विशाल भू-संपत्ति और स्थानीय राजनीतिक प्रभुत्व रखने वाले देशमुख और अन्य बड़े भू-स्वामी बने।
उनके आर्थिक हित वेट्टी, किराया, भूमि स्वामित्व और स्थानीय सत्ता से जुड़े थे।
इसलिए भूमि पुनर्वितरण और वेट्टी समाप्त होने से उन्हें सीधा नुकसान होता था।
उनकी सत्ता केवल खेत तक सीमित नहीं थी।
वे सामाजिक प्रतिष्ठा, प्रशासनिक प्रभाव और कभी-कभी निजी हथियारबंद लोगों के कारण गांव की शक्ति-संरचना के शीर्ष पर थे।
समृद्ध किसान
इसके नीचे संपन्न किसान थे।
वे स्वयं खेती से जुड़े हो सकते थे लेकिन उनके पास तुलनात्मक रूप से अधिक जमीन, पशु और संसाधन थे।
आंदोलन के शुरुआती चरण में उनका हित भी बड़े सामंती भू-स्वामी के विरुद्ध हो सकता था।
यदि देशमुख अत्यधिक वसूली करता था तो समृद्ध किसान भी उसका विरोध कर सकता था।
लेकिन जैसे ही भूमि की अधिकतम सीमा और संपन्न किसानों की जमीन के वितरण का प्रश्न उठता, गठबंधन में तनाव पैदा होता।
यही किसान आंदोलन की क्लासिक समस्या थी।
मध्यम किसान
मध्यम किसान आंदोलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था।
वह अपने परिवार के श्रम से खेती करता था।
वह देशमुख और राज्य की वसूली से प्रभावित था।
लेकिन वह पूरी तरह भूमिहीन नहीं था।
इसलिए उसे दो आशंकाएं थीं—
एक ओर सामंती भू-स्वामी से शोषण;
दूसरी ओर अत्यधिक उग्र भूमि कार्यक्रम से अपनी जमीन खोने का भय।
कम्युनिस्ट रणनीति के सामने चुनौती थी कि मध्यम किसान को अलग किए बिना गरीब किसान के भूमि कार्यक्रम को आगे बढ़ाया जाए।
गरीब किसान
गरीब किसान के पास बहुत थोड़ी जमीन होती थी अथवा वह किराये की जमीन जोतता था।
उसका परिवार स्वयं खेत में काम करता था।
फसल खराब हुई तो कर्ज लेना पड़ता था।
वेट्टी और दूसरी देनदारियां उसके लिए अधिक भारी थीं।
यह वर्ग आंदोलन का मजबूत आधार बना क्योंकि उसके पास व्यवस्था बदलने से मिलने वाला लाभ अधिक था।
इन सभी से उसे सीधा फायदा होता।
भूमिहीन मजदूर
आर्थिक सीढ़ी के सबसे नीचे भूमिहीन खेतिहर मजदूर था।
उसे जमीन पर स्वामित्व नहीं था।
उसकी आय मजदूरी पर निर्भर थी।
मौसमी बेरोजगारी और श्रमिकों की अधिक उपलब्धता मजदूरी कम रखती थी।
उसके लिए आंदोलन की तीन सबसे महत्वपूर्ण मांगें थीं—
इसलिए जैसे-जैसे आंदोलन भूमि क्रांति की ओर गया, उसकी सबसे उग्र सामाजिक शक्ति गरीब किसान और कृषि मजदूर बने।
आंदोलन की सफलता का रहस्य — व्यापक गठबंधन
तेलंगाना संघर्ष यदि केवल भूमिहीन मजदूरों तक सीमित रहता तो संभवतः इतना व्यापक नहीं होता।
उसकी शक्ति इस बात में थी कि उसने एक समय तक—
सभी को बड़े भू-स्वामी और निजामशाही ग्रामीण व्यवस्था के विरुद्ध एक मंच पर ला दिया।
वी.वी. गिरि राष्ट्रीय श्रम संस्थान की कृषि श्रम संबंधी ऐतिहासिक समीक्षा भी इसे विभिन्न ग्रामीण वर्गों के संयुक्त मोर्चे के रूप में देखती है।
लेकिन यही गठबंधन आंदोलन की सीमा भी था
हर व्यापक गठबंधन के भीतर अंतर्विरोध होते हैं।
तो लगभग सभी किसान सहमत हो सकते हैं।
देशमुख की अवैध वसूली बंद करो,
तो भी व्यापक समर्थन संभव है।
किरायेदार को बेदखल मत करो,
एक निश्चित सीमा से अधिक जमीन गरीबों में बांटो,
क्या केवल विशाल देशमुख की जमीन ली जाएगी?
भूमि-विहीन मजदूर और संपन्न किसान का उत्तर अलग हो सकता था।
वर्ग संघर्ष गांव के भीतर भी था
तेलंगाना आंदोलन का सरल चित्र यह होता है—
एक तरफ किसान, दूसरी तरफ जमींदार।
लेकिन वास्तविकता अधिक जटिल थी।
कई गांवों में संघर्ष परिवारों, जातियों और आर्थिक वर्गों के भीतर तक जाता था।
एक भाई आंदोलन में हो सकता था और दूसरा भू-स्वामी का समर्थक।
एक जाति का गरीब सदस्य संगम में हो सकता था और उसी जाति का समृद्ध व्यक्ति उसके विरुद्ध।
इसलिए इसे केवल जातीय या धार्मिक संघर्ष कहना गलत है।
मुख्य विभाजन बहुत हद तक ग्रामीण सत्ता और संसाधनों पर नियंत्रण को लेकर था।
नेतृत्व की सामाजिक पृष्ठभूमि
एक और दिलचस्प अंतर्विरोध था।
आंदोलन गरीब किसान और खेतिहर मजदूरों की मुक्ति की बात करता था, लेकिन कम्युनिस्ट नेतृत्व के अनेक महत्वपूर्ण लोग स्वयं अपेक्षाकृत संपन्न कृषक अथवा प्रभावशाली रeddy और Kamma सामाजिक पृष्ठभूमि से आए थे।
कृषि श्रम पर सरकारी संस्थान की ऐतिहासिक समीक्षा भी इस तथ्य का उल्लेख करती है।
यह अपने आप आंदोलन की विश्वसनीयता को समाप्त नहीं करता।
इतिहास में क्रांतिकारी नेतृत्व अक्सर उस वर्ग से ही नहीं आता जिसके लिए वह संघर्ष करता है।
लेकिन इससे रणनीतिक तनाव समझने में मदद मिलती है।
भूमिहीन मजदूर कितनी दूर तक भूमि क्रांति चाहता था और संपन्न कृषक पृष्ठभूमि वाला नेतृत्व कितनी दूर तक जाना चाहता था—यह प्रश्न समय-समय पर सामने आया।
किसान एकता की सीमा
1946–48 में बड़े सामंती विरोधी संघर्ष ने इन अंतर्विरोधों को काफी हद तक दबाए रखा।
लेकिन बाद के वर्षों में परिस्थितियां बदलने पर वे अधिक स्पष्ट हुए।
विशेषकर सितंबर 1948 के बाद जब निजाम और रजाकार सत्ता का अंत हो गया, तब प्रश्न उठने लगा—
अब लड़ाई किसके विरुद्ध है?
यदि निजाम नहीं रहा और भारत सरकार आ गई, तो क्या सशस्त्र संघर्ष जारी रखा जाए?
यदि जारी रखा जाए तो भूमि कार्यक्रम कितना उग्र हो?
क्या मध्यम और संपन्न किसान साथ रहेंगे?
यहीं किसान गठबंधन और कम्युनिस्ट रणनीति दोनों की परीक्षा हुई।
# तेलंगाना ने गांव के सबसे नीचे खड़े व्यक्ति को राजनीति में ला दिया
इस खंड का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष केवल यह नहीं है कि महिलाओं, दलितों, आदिवासियों और कृषि मजदूरों ने तेलंगाना संघर्ष में भाग लिया।
उससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि आंदोलन ने गांव की राजनीति में भाग लेने की पात्रता ही बदल दी।
पुरानी व्यवस्था में शक्ति का केंद्र था—
आंदोलन ने इसके सामने नई शक्ति रखी—
भूमिहीन व्यक्ति के पास जमीन नहीं थी, लेकिन संगम था।
गरीब महिला के पास सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं थी, लेकिन संगठन में भूमिका थी।
दलित मजदूर भू-स्वामी के सामने कमजोर था, लेकिन सामूहिक रूप से वेट्टी से इनकार कर सकता था।
आदिवासी के पास आधुनिक कानूनी स्वामित्व दस्तावेज न हो सकते थे, लेकिन समुदाय भूमि और जंगल पर अपना अधिकार मांग सकता था।
यही तेलंगाना संघर्ष की सामाजिक क्रांतिकारिता थी।
लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी स्वीकार करना होगा।
आंदोलन ने जाति समाप्त नहीं की।
पितृसत्ता समाप्त नहीं की।
भूमिहीनता पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
आदिवासी भूमि-वंचना आगे भी जारी रही।
और आंदोलन के भीतर वर्गीय अंतर्विरोध भी समाप्त नहीं हुए।
इसलिए तेलंगाना को किसी पूर्ण सामाजिक क्रांति की रोमांटिक कथा के रूप में देखना उतना ही गलत होगा जितना उसे केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मान लेना।
यह एक ऐसे ग्रामीण समाज का व्यापक विद्रोह था जिसमें विभिन्न वर्ग और समुदाय साझा दुश्मन के विरुद्ध साथ आए, लेकिन अपनी-अपनी आकांक्षाओं के साथ।
इन विविध सामाजिक शक्तियों को राजनीतिक दिशा किसने दी?
पी. सुंदरैया की क्या भूमिका थी?
रवि नारायण रेड्डी और बद्दम येल्ला रेड्डी कौन थे?
स्थानीय नेतृत्व और कम्युनिस्ट पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के बीच संबंध कैसे थे?
इस प्रश्न का उत्तर नेतृत्व और विचारधारा के अध्ययन में मिलेगा।
तेलंगाना संघर्ष के प्रमुख नेता और कार्यकर्ता
नेतृत्व का पिरामिड नहीं, नेटवर्क
तेलंगाना आंदोलन में महात्मा गांधी या स्वामी सहजानंद जैसा कोई एक निर्विवाद केंद्रीय जननेता नहीं था जिसकी पहचान पूरे आंदोलन से एकाकार हो गई हो।
इसके बजाय नेतृत्व एक नेटवर्क के रूप में विकसित हुआ।
पी. सुंदरैया राजनीतिक और रणनीतिक स्तर पर सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों में थे।
रवि नारायण रेड्डी ग्रामीण किसान संगठन के प्रमुख चेहरों में थे।
बद्दम येल्ला रेड्डी ने आंध्र महासभा और कम्युनिस्ट संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मखदूम मोहिउद्दीन ने हैदराबाद राज्य में वामपंथी राजनीति को बौद्धिक और सांस्कृतिक स्वर दिया।
आरुटला रामचंद्र रेड्डी, आरुटला कमलादेवी, भीमरेड्डी नरसिम्हा रेड्डी, मल्लू स्वराज्यम और अनेक अन्य नेताओं ने अलग-अलग क्षेत्रों में संगठन खड़ा किया।
और इस पूरी संरचना के नीचे हजारों ऐसे ग्राम कार्यकर्ता थे जिनके बिना सशस्त्र संघर्ष संभव ही नहीं था।
पी. सुंदरैया — रणनीतिक मस्तिष्क
पुचालपल्ली सुंदरैया तेलंगाना संघर्ष के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक और वैचारिक नेताओं में गिने जाते हैं।
उनका जन्म 1913 में आंध्र क्षेत्र के एक कृषक परिवार में हुआ था। प्रारंभ में वे राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े और बाद में कम्युनिस्ट राजनीति की ओर आए।
वे भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के संस्थापक पीढ़ी के प्रमुख नेताओं में थे और आगे चलकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के प्रथम महासचिव बने।
तेलंगाना संघर्ष में उनकी भूमिका केवल बाहरी पर्यवेक्षक की नहीं थी।
उन्होंने संगठन निर्माण, गुरिल्ला रणनीति, राजनीतिक लाइन और भूमिगत नेटवर्क से जुड़े कार्यों में प्रत्यक्ष भागीदारी की। उनकी पुस्तक *Telengana People's Struggle and Its Lessons* आज भी संघर्ष के सबसे महत्वपूर्ण प्रथम-पक्षीय स्रोतों में मानी जाती है। Cambridge के विवरण में उन्हें इस संघर्ष के प्रमुख नेतृत्वकर्ता और पुस्तक को गुरिल्ला दस्तों, संचार नेटवर्क तथा राजनीतिक निर्णय-प्रक्रिया का महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष विवरण बताया गया है।
सुंदरैया का महत्व
सुंदरैया की सबसे बड़ी विशेषता थी कि वे संघर्ष को केवल स्थानीय किसान विद्रोह के रूप में नहीं देखते थे।
उनके लिए तेलंगाना भारतीय समाज के सामंती ढांचे और व्यापक क्रांतिकारी परिवर्तन के बीच जुड़ा हुआ था।
लेकिन उनकी बाद की पुस्तक आत्ममुग्ध विजय-कथा भर नहीं है।
उसमें रणनीतिक गलतियों, संगठनात्मक कमजोरियों और संघर्ष की वापसी तक पर चर्चा है। अपने उपसंहार में वे स्वयं प्रश्न उठाते हैं कि संघर्ष के दौरान अपनाई गई रणनीतियां कितनी सही थीं और भविष्य के क्रांतिकारी आंदोलन को उससे क्या सीखना चाहिए।
यह आत्मालोचनात्मक तत्व उनकी पुस्तक को महत्वपूर्ण बनाता है, हालांकि वह फिर भी एक पक्षधर कम्युनिस्ट स्रोत है।
रवि नारायण रेड्डी — ग्रामीण किसान राजनीति का जनचेहरा
रवि नारायण रेड्डी तेलंगाना में आंध्र महासभा और किसान आंदोलन के सबसे लोकप्रिय नेताओं में थे।
उनका महत्व इस बात में था कि वे कम्युनिस्ट विचारधारा और ग्रामीण जनता के बीच सेतु बने।
वे गांवों में संगठन निर्माण, किसान सभाओं और भूमि प्रश्न पर सक्रिय रहे तथा आंदोलन को बड़े भू-स्वामियों के विरुद्ध व्यापक सामाजिक समर्थन दिलाने में योगदान दिया।
उनकी राजनीतिक शैली सुंदरैया की तुलना में अधिक प्रत्यक्ष जन-संगठन से जुड़ी मानी जाती है।
रवि नारायण रेड्डी का बाद का राजनीतिक जीवन भी महत्वपूर्ण रहा। सशस्त्र संघर्ष समाप्त होने के बाद वे संसदीय राजनीति में आए और 1952 के प्रथम आम चुनाव में लोकसभा पहुंचे। यह परिवर्तन स्वयं तेलंगाना आंदोलन के विकास को दर्शाता है—सशस्त्र संघर्ष का एक बड़ा नेता कुछ ही वर्षों में संसदीय लोकतंत्र के भीतर जनप्रतिनिधि बन गया।
यह विरोधाभास नहीं बल्कि 1951 के बाद भारतीय कम्युनिस्ट राजनीति में आए बड़े रणनीतिक परिवर्तन का प्रतीक था।
बद्दम येल्ला रेड्डी
बद्दम येल्ला रेड्डी तेलंगाना के कम्युनिस्ट किसान नेतृत्व के दूसरे महत्वपूर्ण नाम थे।
उन्होंने आंध्र महासभा के वामपंथी परिवर्तन और ग्रामीण किसान संगठन में सक्रिय भूमिका निभाई।
जब महासभा सांस्कृतिक मंच से किसान अधिकारों के आंदोलन में बदल रही थी, तब येल्ला रेड्डी जैसे कार्यकर्ताओं ने इस परिवर्तन को गांवों तक पहुंचाया।
उनकी भूमिका विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि आंदोलन को केवल शीर्ष वैचारिक नेतृत्व नहीं, बल्कि निरंतर संगठनात्मक काम करने वाले क्षेत्रीय नेताओं की जरूरत थी।
मखदूम मोहिउद्दीन — कविता से क्रांति तक
तेलंगाना संघर्ष की कहानी में मखदूम मोहिउद्दीन एक अलग प्रकार के व्यक्तित्व थे।
वे प्रसिद्ध उर्दू कवि, अध्यापक, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता और कम्युनिस्ट नेता थे।
उनकी उपस्थिति इस धारणा को भी चुनौती देती है कि तेलंगाना आंदोलन किसी धार्मिक समुदाय के विरुद्ध था।
मखदूम स्वयं मुस्लिम थे और निजामशाही तथा सामंती व्यवस्था के कटु आलोचक थे।
उनकी राजनीति वर्गीय और लोकतांत्रिक परिवर्तन की थी।
हैदराबाद में श्रमिक आंदोलन, ट्रेड यूनियनों और कम्युनिस्ट संगठन को मजबूत करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनकी कविता और राजनीतिक सक्रियता ने हैदराबाद में क्रांतिकारी संस्कृति को जन्म देने में योगदान दिया।
इस अर्थ में तेलंगाना संघर्ष केवल गांवों का किसान विद्रोह नहीं था; उसे हैदराबाद शहर की मजदूर और बौद्धिक राजनीति से भी समर्थन मिला।
आरुटला रामचंद्र रेड्डी और आरुटला कमलादेवी
आरुटला रामचंद्र रेड्डी और उनकी पत्नी आरुटला कमलादेवी आंदोलन के ऐसे दंपती थे जिन्होंने सामाजिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर काम किया।
रामचंद्र रेड्डी ने ग्रामीण किसान संगठन और भूमिगत संघर्ष में भूमिका निभाई।
कमलादेवी ने विशेष रूप से महिला संगठन और ग्रामीण राजनीतिक जागरण में योगदान दिया।
उनकी सक्रियता हमें यह बताती है कि तेलंगाना संघर्ष में परिवार के भीतर भी राजनीतिक परिवर्तन हो रहा था।
महिला केवल पुरुष कार्यकर्ता की सहयोगी नहीं, स्वतंत्र राजनीतिक कार्यकर्ता बन रही थी।
भीमरेड्डी नरसिम्हा रेड्डी
भीमरेड्डी नरसिम्हा रेड्डी तेलंगाना के सशस्त्र संघर्ष और किसान संगठन से जुड़े महत्वपूर्ण नेताओं में थे।
वे गुरिल्ला प्रतिरोध, भूमिगत संगठन और ग्रामीण क्षेत्र में कम्युनिस्ट नेटवर्क से जुड़े।
उनकी भूमिका उन क्षेत्रीय नेताओं का प्रतिनिधित्व करती है जो शीर्ष पार्टी नेतृत्व और स्थानीय दलमों के बीच संपर्क का काम करते थे।
यही मध्यवर्ती नेतृत्व पूरे आंदोलन की नसों जैसा था।
यदि वह टूटता तो केंद्रीय निर्देश गांव तक नहीं पहुंच सकता था और गांव का वास्तविक अनुभव ऊपर नहीं जा सकता था।
मल्लू स्वराज्यम
मल्लू स्वराज्यम का उल्लेख महिलाओं की भूमिका वाले पिछले खंड में हो चुका है, लेकिन नेतृत्व के स्तर पर भी उनका महत्व है।
उन्होंने बहुत कम उम्र में आंदोलन से जुड़कर ग्रामीण महिलाओं को संगठित किया और बाद में गुरिल्ला प्रतिरोध में भाग लिया।
उनका जीवन तेलंगाना संघर्ष की उस पीढ़ी का उदाहरण है जिसने भूमिगत राजनीति से संसदीय राजनीति तक लंबी यात्रा की।
ऐसे नेताओं का बाद का सार्वजनिक जीवन महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे संघर्ष की राजनीतिक विरासत का पता चलता है।
स्थानीय नेता — असली रीढ़
किसी भी इतिहास में बड़े नाम याद रहते हैं, लेकिन तेलंगाना में वास्तविक आंदोलन जिला, तालुका और गांव स्तर पर चल रहा था।
भूमि विवाद दर्ज करने वाला कार्यकर्ता,
और पुलिस की गतिविधियों पर नजर रखने वाला ग्रामीण—
ये सभी आंदोलन के नेता थे।
पी. सुंदरैया के विवरणों में गुरिल्ला कार्रवाई और स्थानीय संगठन की अत्यंत विस्तृत जानकारी मिलती है। एक घटना में नलगोंडा के अनेक जिला नेता और एक प्रांतीय समिति सदस्य एक गांव के बाहर बैठक के लिए एकत्र थे; सेना से घिर जाने पर उन्होंने दस्तों में विभाजित होकर पीछे हटने की योजना बनाई। ऐसे विवरण दिखाते हैं कि आंदोलन का नेतृत्व बहुस्तरीय और सैन्य-संगठनात्मक दोनों था।
नेतृत्व की एक कमजोरी
यह भी ध्यान देने योग्य है कि शीर्ष नेतृत्व और गांव के वास्तविक अनुभव के बीच हमेशा पूर्ण तालमेल नहीं था।
केंद्रीय कम्युनिस्ट नेतृत्व की राजनीतिक लाइन बदलती रही।
यदि पार्टी कहती कि संघर्ष वापस लिया जाए, तो किसान पूछ सकता था—
कम्युनिस्ट विचारधारा और किसान प्रश्न
सामंतवाद-विरोध से शुरुआत
तेलंगाना आंदोलन के शुरुआती वर्षों की विचारधारा को बाद के सशस्त्र चरण के आधार पर पीछे से पढ़ना उचित नहीं होगा।
1940–44 के दौरान कम्युनिस्ट और आंध्र महासभा का वामपंथी हिस्सा तत्कालीन जनसमस्याओं पर आंदोलन कर रहा था।
निजाम द्वारा जारी कुछ ऐसे फरमान जिन्हें किसानों के लिए लाभकारी माना गया था, उन्हें लागू कराने की मांग की गई।
भूमि से बेदखली रोकने, वेट्टी समाप्त करने और अवैध वसूली के विरोध पर ध्यान दिया गया। सुंदरैया के अपने विवरण में यही क्रम स्पष्ट दिखाई देता है।
इसका अर्थ है कि आंदोलन ने एकदम “राज्य सत्ता कब्जाने” के नारे से शुरुआत नहीं की।
उसकी जड़ तत्काल कृषि प्रश्न में थी।
वर्ग संघर्ष की अवधारणा
कम्युनिस्ट विचारधारा ने इन समस्याओं को एक व्यापक ढांचा दिया।
किसान से कहा गया कि भू-स्वामी का उत्पीड़न केवल व्यक्तिगत दुर्व्यवहार नहीं है।
यह वर्ग संबंध का परिणाम है।
यदि थोड़े लोग विशाल भूमि नियंत्रित करते हैं और बहुसंख्यक लोग उनके लिए काम करते हैं, तो समस्या व्यवस्था में है।
इससे राजनीतिक भाषा बदल गई।
“सामंती भूमि संबंध बदलो”
“जमीन जोतने वाले की”
भूमि प्रश्न में कम्युनिस्ट विचारधारा का सबसे शक्तिशाली नारा था—
जमीन उस किसान की हो जो उसे जोतता है।
यह सिद्धांत किरायेदारी सुधार से आगे जाता था।
किरायेदारी सुधार कह सकता है—
कम्युनिस्ट भूमि कार्यक्रम कहता था—
जिस व्यक्ति का श्रम उत्पादन करता है, भूमि पर मूल अधिकार भी उसी का होना चाहिए।
इसी तर्क ने तेलंगाना में भूमि कब्जे और पुनर्वितरण को वैचारिक वैधता दी।
सुंदरैया ने बाद में आंदोलन को प्रारंभिक राहत की मांगों से विकसित होकर “भूमि और मुक्ति” के सशस्त्र संघर्ष के रूप में वर्णित किया। उनके अनुसार आंदोलन का प्रभाव लगभग 3,000 गांवों तक गया और ग्राम-राज समितियां स्थापित हुईं—हालांकि जैसा पिछले खंड में बताया गया, ये आंदोलनकारी नेतृत्व के अपने दावे हैं और आंकड़ों पर स्वतंत्र सहमति नहीं है।
रूसी क्रांति का प्रभाव
भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन पर 1917 की रूसी क्रांति का गहरा प्रभाव था।
रूस का अनुभव यह दिखाता प्रतीत होता था कि मजदूर और किसान पुराने सामंती तथा पूंजीवादी शासन को उखाड़ सकते हैं।
इससे भारतीय कम्युनिस्टों में विश्वास पैदा हुआ कि औपनिवेशिक मुक्ति केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
सामाजिक और आर्थिक क्रांति भी आवश्यक है।
भारत में विशाल किसान आबादी, जाति व्यवस्था, देशी रियासतें, औपनिवेशिक शासन और विकसित हो रहा राष्ट्रीय आंदोलन—सब मिलकर परिस्थिति को अधिक जटिल बनाते थे।
तेलंगाना इस वैचारिक प्रश्न की प्रयोगशाला बन गया।
चीन की क्रांति और किसान गुरिल्ला युद्ध
1940 के दशक के उत्तरार्ध में चीनी कम्युनिस्ट क्रांति की सफलता भारतीय कम्युनिस्टों के लिए अत्यंत प्रभावशाली घटना थी।
माओत्से तुंग की रणनीति में ग्रामीण आधार क्षेत्र, किसान समर्थन और गुरिल्ला युद्ध केंद्रीय थे।
तेलंगाना का अनुभव इसके साथ कुछ समानताएं रखता था—
और राज्य सेना के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध।
लेकिन दोनों को समान मान लेना गलत है।
तेलंगाना एक क्षेत्रीय आंदोलन था जिसकी परिस्थितियां हैदराबाद रियासत की विशिष्ट सामाजिक संरचना से निकली थीं।
फिर भी 1948–50 के दौरान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में चीनी क्रांति और ग्रामीण गुरिल्ला रणनीति को लेकर आकर्षण बढ़ा। 1950 में पार्टी के भीतर माओवादी प्रेरणा वाली क्रांतिकारी रणनीति अपनाए जाने का उल्लेख समकालीन अध्ययनों में मिलता है।
राष्ट्रीय स्वतंत्रता का प्रश्न
1947 ने कम्युनिस्ट विचारधारा के सामने कठिन प्रश्न खड़ा कर दिया।
ब्रिटिश शासन समाप्त हो गया।
लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर इस स्वतंत्रता के चरित्र को लेकर बहस थी।
क्या 15 अगस्त 1947 वास्तविक राष्ट्रीय स्वतंत्रता थी?
या सत्ता ब्रिटिश साम्राज्यवाद से भारतीय बुर्जुआ वर्ग को हस्तांतरित हुई थी और क्रांति अभी अधूरी थी?
इस प्रश्न का सीधा असर तेलंगाना पर पड़ा।
यदि भारत वास्तव में स्वतंत्र लोकतांत्रिक राष्ट्र था, तो 1948 में हैदराबाद के विलय के बाद हथियार उठाए रखना कैसे उचित ठहराया जाए?
लेकिन यदि नई भारतीय सरकार भी बड़े भू-स्वामियों और पूंजीपति वर्ग का राज्य थी, तो सशस्त्र किसान संघर्ष जारी रखना कम्युनिस्ट तर्क में वैध हो सकता था।
यही आंदोलन का सबसे बड़ा वैचारिक मोड़ था।
बी.टी. रणदिवे लाइन
1948 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर बी.टी. रणदिवे के नेतृत्व में अधिक उग्र क्रांतिकारी लाइन प्रभावी हुई।
इस रणनीति में यह मान्यता प्रमुख थी कि भारत गंभीर क्रांतिकारी संकट से गुजर रहा है और व्यापक जनविद्रोह तथा मजदूर आंदोलनों से राज्य सत्ता को चुनौती दी जा सकती है।
तेलंगाना पहले से सशस्त्र संघर्ष में था, इसलिए नई केंद्रीय लाइन का उस पर प्रभाव पड़ा।
तेलंगाना मुख्यतः किसान गुरिल्ला संघर्ष था।
रणदिवे लाइन शहरी मजदूर विद्रोह को भी बहुत महत्व देती थी।
देश के अन्य हिस्सों में पार्टी अपेक्षित क्रांतिकारी उभार पैदा नहीं कर सकी।
नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं।
और पार्टी गंभीर संकट में चली गई।
“आंध्र थीसिस” और वैकल्पिक दृष्टि
कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर आंध्र के नेताओं ने ग्रामीण किसान संघर्ष के अनुभव को अधिक केंद्रीय महत्व दिया।
उनका तर्क था कि भारतीय क्रांति का रास्ता तेलंगाना जैसे ग्रामीण संघर्षों से अधिक सीख सकता है।
इस सोच पर चीनी क्रांति का प्रभाव स्पष्ट था।
भारत में विशाल किसान आबादी होने के कारण लंबा किसान गुरिल्ला संघर्ष अधिक उपयुक्त मार्ग हो सकता है—यह विचार पार्टी में उभरा।
लेकिन भारत की राजनीतिक परिस्थितियां 1949 के चीन जैसी नहीं थीं।
भारतीय संविधान बन रहा था।
चुनाव की तैयारी हो रही थी।
कांग्रेस का व्यापक जनाधार था।
इसलिए पूरे देश में तेलंगाना मॉडल को लागू करना कठिन था।
विचारधारा और जमीन की वास्तविकता
तेलंगाना में कम्युनिस्ट विचारधारा का सबसे प्रभावी पहलू यही था कि उसने अमूर्त सिद्धांत को ग्रामीण जीवन की ठोस समस्या से जोड़ा।
“वर्ग संघर्ष” किसान के लिए बहुत सैद्धांतिक शब्द हो सकता था।
लेकिन जब वही बात इस रूप में कही गई—
जिस जमीन को जोतते हो उस पर अधिकार मांगो—
तो विचारधारा जनजीवन में उतर गई।
यही तेलंगाना में कम्युनिस्टों की बड़ी राजनीतिक सफलता थी।
विचारधारा की सीमा
लेकिन विचारधारा आंदोलन पर बोझ भी बन सकती है।
जब वास्तविक स्थिति बदल जाए और सिद्धांत पुरानी रणनीति को जारी रखने का दबाव डाले, तब संघर्ष जनता के हित से दूर जा सकता है।
सितंबर 1948 के बाद यही प्रश्न उठा।
निजाम की सत्ता समाप्त हो चुकी थी।
रजाकार संगठन पराजित हो चुका था।
लेकिन भारतीय सेना ने किसानों द्वारा कब्जाई भूमि पुराने भू-स्वामियों को वापस दिलाने के प्रयास शुरू किए और कम्युनिस्टों पर व्यापक दमन हुआ। आधुनिक शोध भी बताता है कि ऑपरेशन पोलो के बाद भारतीय सेना और प्रशासन के अभियान में कम्युनिस्ट दस्तों को भारी नुकसान हुआ, हजारों लोग गिरफ्तार हुए और कई दस्ते जंगलों में चले गए।
इस परिस्थिति में संघर्ष जारी रखने के पक्ष में वास्तविक भूमि-अधिकार का आधार भी था।
लेकिन साथ ही पूरे भारतीय राज्य को तत्काल क्रांतिकारी युद्ध से उखाड़ फेंकने की धारणा अधिक विवादास्पद होती गई।
यहीं से तेलंगाना किसान की जमीन और कम्युनिस्ट पार्टी की अखिल भारतीय क्रांति—दोनों प्रश्न कभी-कभी एक-दूसरे से अलग दिखाई देने लगे।
स्थानीय किसान विद्रोह या व्यापक क्रांतिकारी आंदोलन?
इतिहास का सबसे कठिन प्रश्न
तेलंगाना संघर्ष आखिर था क्या?
सामंती उत्पीड़न के विरुद्ध किसान विद्रोह था?
निजाम विरोधी लोकतांत्रिक आंदोलन था?
कम्युनिस्ट सशस्त्र क्रांति थी?
भारतीय राज्य के विरुद्ध विद्रोह था?
या इन सभी का अलग-अलग चरणों में संयोजन?
उसका चरित्र समय के साथ बदलता रहा।
इसीलिए किसी एक लेबल से पूरे 1946–51 के संघर्ष को समझना गलत होगा।
पहला चरण — किसान प्रतिरोध
1944 से जुलाई 1946 तक आंदोलन का सबसे स्पष्ट चरित्र कृषि और सामाजिक मांगों का था।
किसानों के नागरिक अधिकार सुरक्षित करो।
इस चरण में इसे सामंतवाद-विरोधी किसान आंदोलन कहना सबसे उचित है।
सुंदरैया का विवरण भी बताता है कि पार्टी और आंध्र महासभा ने 1940–44 के दौरान इन्हीं बुनियादी मुद्दों पर प्रचार और संगठन किया।
दूसरा चरण — सशस्त्र सामंतवाद-विरोध
जुलाई 1946 के बाद दमन और स्थानीय हिंसा के कारण संघर्ष सशस्त्र होता गया।
अब किसान संगठनों ने भू-स्वामियों के निजी दस्तों और पुलिस का मुकाबला किया।
इस चरण में संघर्ष का चरित्र अधिक स्पष्ट किसान सशस्त्र विद्रोह का था।
तीसरा चरण — निजाम-विरोधी मुक्ति संघर्ष
15 अगस्त 1947 के बाद हैदराबाद का भारत में विलय न होना राजनीतिक परिस्थिति बदल देता है।
अब निजाम और रजाकारों के विरुद्ध संघर्ष केवल सामंती भूमि प्रश्न नहीं रहा।
उसमें लोकतांत्रिक अधिकार और हैदराबाद के भविष्य का प्रश्न भी जुड़ गया।
कम्युनिस्ट नेतृत्व ने इसे सामंतवाद और निजामशाही दोनों के विरुद्ध “मुक्ति संघर्ष” के रूप में प्रस्तुत किया।
सुंदरैया के एक अध्याय में 15 अगस्त 1947 से 13 सितंबर 1948 के चरण को भूमि वितरण और “पीपुल्स रूल” की स्थापना से जोड़ा गया है।
चौथा चरण — भारतीय राज्य के विरुद्ध गुरिल्ला संघर्ष
13 सितंबर 1948 को ऑपरेशन पोलो शुरू हुआ और कुछ दिनों में निजाम की सैन्य प्रतिरोध क्षमता समाप्त हो गई।
यहीं आंदोलन की ऐतिहासिक प्रकृति फिर बदल गई।
अब किसान दलमों का प्रतिद्वंद्वी निजाम की सेना और रजाकार नहीं बल्कि स्वतंत्र भारत की सेना और प्रशासन था।
सुंदरैया स्वयं लिखते हैं कि भारतीय सेना के हस्तक्षेप के बाद किसान गुरिल्लाओं ने उन जमीनों की रक्षा के लिए प्रतिरोध जारी रखा जो उन्होंने पहले भू-स्वामियों से हासिल की थीं।
लेकिन भारत सरकार की दृष्टि में यह अब स्वतंत्र भारतीय राज्य के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह था।
यहीं इतिहास की व्याख्याएं तीखी तरह से विभाजित होती हैं।
कम्युनिस्ट व्याख्या
कम्युनिस्ट इतिहासलेखन तेलंगाना को प्रायः एक महान किसान सशस्त्र मुक्ति संघर्ष मानता है।
इस दृष्टि में उसकी उपलब्धियां थीं—
बड़े भू-स्वामियों की सत्ता का पतन;
महिलाओं और गरीबों की राजनीतिक भागीदारी;
और सामंती व्यवस्था को ऐतिहासिक चुनौती।
सुंदरैया के अपने विवरण में संघर्ष लगभग 3,000 गांवों तक फैलने, दस लाख एकड़ भूमि वितरण और ग्राम-राज समितियों की स्थापना का दावा करता है।
लेकिन यह स्रोत स्वयं आंदोलन के प्रमुख नेता का है।
इसलिए इसकी तथ्यात्मक उपयोगिता बहुत बड़ी होने के बावजूद उसकी राजनीतिक पक्षधरता को ध्यान में रखना जरूरी है।
सरकारी दृष्टि
हैदराबाद और बाद में भारत सरकार के प्रशासनिक अभिलेखों ने अक्सर आंदोलन को कानून-व्यवस्था, कम्युनिस्ट हिंसा और सशस्त्र विद्रोह की समस्या के रूप में देखा।
राज्य अधिकारियों पर हमला,
रेल-सड़क संचार में बाधा,
राज्य के विरुद्ध अपराध थे।
यह दृष्टि उस सामाजिक शोषण को कम करके देख सकती थी जिसने आंदोलन पैदा किया था।
लेकिन कम्युनिस्ट स्रोतों की तरह सरकारी स्रोत भी राजनीतिक हितों से मुक्त नहीं थे।
राष्ट्रवादी दृष्टि
राष्ट्रवादी इतिहासलेखन की स्थिति कुछ अधिक जटिल रही।
निजाम और रजाकारों के विरुद्ध संघर्ष को कई राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने लोकतांत्रिक और राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया के हिस्से के रूप में स्वीकार किया।
लेकिन सितंबर 1948 के बाद भारतीय सेना के विरुद्ध कम्युनिस्ट संघर्ष को उन्होंने अधिक आलोचनात्मक दृष्टि से देखा।
इस दृष्टिकोण में तर्क था कि निजामशाही समाप्त होने और हैदराबाद के भारत में आने के बाद हथियारबंद संघर्ष का औचित्य समाप्त हो जाना चाहिए था।
कम्युनिस्ट नेतृत्व का उत्तर था कि निजाम भले चला गया, लेकिन जिन भू-स्वामियों के विरुद्ध किसान लड़े थे उन्हें नई राज्य-व्यवस्था संरक्षण दे रही थी और किसानों द्वारा हासिल जमीन वापस ली जा रही थी।
आधुनिक सामाजिक इतिहास की दृष्टि
आधुनिक शोध अक्सर दोनों ध्रुवों से दूरी बनाकर आंदोलन को अधिक जटिल सामाजिक प्रक्रिया के रूप में देखता है।
इस दृष्टिकोण में तेलंगाना को न तो केवल “कम्युनिस्ट आतंक” और न ही केवल “जनक्रांति की वीरगाथा” माना जाता है।
इसके बजाय प्रश्न पूछे जाते हैं—
किन किसान वर्गों ने भाग लिया?
जाति और वर्ग का संबंध क्या था?
महिलाओं का अनुभव क्या था?
ग्रामीण सत्ता कैसे बदली?
आंदोलन की हिंसा का चरित्र क्या था?
किस क्षेत्र में वास्तव में ग्राम राज स्थापित हुआ?
कितनी भूमि स्थायी रूप से पुनर्वितरित हुई?
और 1948 के बाद संघर्ष जारी रखने के सामाजिक तथा वैचारिक कारण क्या थे?
आधुनिक शोध यह भी पुष्टि करता है कि ऑपरेशन पोलो के बाद भारतीय राज्य की कार्रवाई ने कम्युनिस्ट संगठनों पर व्यापक दबाव डाला; मैदानों में दस्ते टूटे और अनेक गुरिल्ला वन क्षेत्रों में चले गए, जहां आदिवासी समर्थन से संघर्ष कुछ समय और जारी रहा।
क्या यह क्रांति थी?
“क्रांति” शब्द का अर्थ यदि राज्य सत्ता का पूर्ण परिवर्तन है, तो तेलंगाना सफल क्रांति नहीं था।
निजाम की सत्ता भारतीय सेना ने समाप्त की, कम्युनिस्ट गुरिल्लाओं ने नहीं।
भारतीय राज्य पर कम्युनिस्टों का नियंत्रण नहीं हुआ।
1951 में सशस्त्र संघर्ष वापस लेना पड़ा।
लेकिन यदि क्रांति को सामाजिक संबंधों में गहरे परिवर्तन के प्रयास के रूप में देखें, तो तेलंगाना में निस्संदेह क्रांतिकारी तत्व थे।
और गरीब ग्रामीणों ने पहली बार शासन में भागीदारी का अनुभव किया।
इस अर्थ में आंदोलन अधूरी ग्रामीण सामाजिक क्रांति का रूप रखता था।
क्या यह स्वतःस्फूर्त किसान विद्रोह था?
तेलंगाना में वास्तविक किसान असंतोष बहुत पुराना था।
वेट्टी और भूमि समस्याएं कम्युनिस्टों ने पैदा नहीं की थीं।
लेकिन इन शिकायतों को आपस में जोड़ना, संगम बनाना, राजनीतिक कार्यक्रम तैयार करना और बाद में दलमों की संरचना विकसित करना संगठित नेतृत्व का परिणाम था।
इसलिए सही निष्कर्ष होगा—
विद्रोह की सामाजिक ऊर्जा किसानों से आई; उसे दीर्घकालीन राजनीतिक और सैन्य दिशा कम्युनिस्ट संगठन ने दी।
इन दोनों को अलग नहीं किया जा सकता।
क्या कम्युनिस्टों ने आंदोलन को “हाइजैक” किया?
यह शब्द भी अत्यधिक सरलीकृत है।
यदि कोई बाहरी संगठन पहले से चल रहे आंदोलन को अपनी विचारधारा में बदल दे तो “हाइजैक” की धारणा लागू हो सकती है।
लेकिन तेलंगाना में कम्युनिस्ट कार्यकर्ता वर्षों से गांवों में मौजूद थे।
उन्होंने 1940–44 से ही वेट्टी, अवैध वसूली और बेदखली के प्रश्नों पर काम किया था।
अतः वे संघर्ष के बाहर से अचानक आए लोग नहीं थे।
फिर भी यह भी सत्य है कि जैसे-जैसे पार्टी की अखिल भारतीय रणनीति बदली, स्थानीय किसान संघर्ष पर उसके प्रभाव पड़े।
इसलिए किसान पहल और पार्टी निर्देशन के बीच संबंध लगातार बदलता रहा।
आंदोलन की सबसे बड़ी विचारधारात्मक उपलब्धि
तेलंगाना ने भूमि प्रश्न को राजनीति के केंद्र में ला दिया।
उसने यह स्थापित किया कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी अधूरी रह सकती है यदि गांव के आर्थिक और सामाजिक संबंध पुराने ही बने रहें।
यह प्रश्न स्वतंत्र भारत के सामने भी आया।
1947 में राष्ट्रीय ध्वज बदल गया।
लेकिन क्या गांव में भू-स्वामी और भूमिहीन किसान का संबंध भी बदल गया?
तेलंगाना संघर्ष का वैचारिक उत्तर था—
राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सामाजिक और आर्थिक मुक्ति भी आवश्यक है।
यही उसकी सबसे स्थायी विरासतों में एक है।
# नेतृत्व ने आंदोलन बनाया, लेकिन आंदोलन ने भी नेतृत्व बदल दिया
निजाम सरकार की प्रतिक्रिया और पुलिस दमन
किसान आंदोलन कब राज्य के लिए खतरा बन गया?
तेलंगाना में निजाम सरकार और किसान संगठनों के बीच तनाव 1946 में अचानक पैदा नहीं हुआ था।
1940–44 के दौरान आंध्र महासभा और कम्युनिस्ट कार्यकर्ता वेट्टी, अवैध वसूली, किसानों की बेदखली और नागरिक अधिकारों के प्रश्न उठा रहे थे। पी. सुंदरैया के प्रत्यक्ष विवरण के अनुसार उस समय आंदोलन का एक बड़ा हिस्सा निजाम द्वारा जारी उन आदेशों को लागू कराने पर केंद्रित था जिनसे किसानों को कुछ राहत मिल सकती थी, लेकिन जिनके क्रियान्वयन में स्थानीय भू-स्वामी और अधिकारी बाधा डालते थे।
जब तक आंदोलन ज्ञापन, सभा और याचिका तक सीमित था, सरकार के लिए उसे नियंत्रित करना अपेक्षाकृत आसान था।
लेकिन जैसे ही गांवों में संगम मजबूत हुए और किसानों ने सामूहिक रूप से—
वेट्टी करने से इनकार किया,
अवैध वसूली देने से मना किया,
और देशमुखों के आदेशों की अवज्ञा की,
तब प्रश्न केवल प्रशासनिक सुधार का नहीं रहा।
यह राज्य-सत्ता का प्रश्न बन गया।
कडवेंडी के बाद दमन
4 जुलाई 1946 को डोड्डी कोमारय्या की हत्या ने आंदोलन को व्यापक जनउभार में बदल दिया।
निजाम सरकार की प्रतिक्रिया अधिक कठोर हुई।
पुलिस ने गांवों में प्रवेश करना शुरू किया।
कम्युनिस्ट और आंध्र महासभा कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया।
सभाओं और राजनीतिक गतिविधियों पर नियंत्रण बढ़ा।
आंदोलन के प्रमुख कार्यकर्ता भूमिगत होने लगे।
दमन का उद्देश्य केवल कुछ नेताओं को पकड़ना नहीं था।
सरकार को संगमों की पूरी संगठनात्मक संरचना तोड़नी थी।
प्रतिबंध और भूमिगत संगठन
1946 के उत्तरार्ध में कम्युनिस्ट पार्टी और उससे जुड़े ग्रामीण संगठनों पर सरकारी दबाव बहुत बढ़ गया।
सुंदरैया के विवरण के अनुसार 1947 के शुरुआती महीनों में कम्युनिस्ट पार्टी और आंध्र महासभा को निजाम सरकार के भारी दमन के बाद अपने बिखरे संगठन को दोबारा खड़ा करना पड़ा।
यह तथ्य आंदोलन के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
संगठन को भूमिगत जाने पर मजबूर करना।
लेकिन परिणाम यह हुआ कि आंदोलन की संरचना भी बदल गई।
खुले राजनीतिक कार्यकर्ता अब गुप्त संपर्क नेटवर्क का हिस्सा बनने लगे।
गांवों में पहरे स्थापित हुए।
पुलिस की गतिविधियों की सूचना देने के लिए संदेश-व्यवस्था बनी।
और धीरे-धीरे आत्मरक्षा दस्ते विकसित हुए।
अर्थात दमन ने सशस्त्रीकरण की प्रक्रिया को भी तेज किया।
पुलिस और स्थानीय भू-स्वामी
तेलंगाना के किसान आंदोलन में राज्य और स्थानीय भू-स्वामी शक्ति के संबंध को समझना आवश्यक है।
देशमुख और बड़े भू-स्वामी औपचारिक रूप से निजाम सरकार नहीं थे।
लेकिन कई क्षेत्रों में उनका स्थानीय प्रशासन पर प्रभाव बहुत मजबूत था।
इसलिए जब किसी भूमि विवाद में पुलिस भू-स्वामी के पक्ष में खड़ी दिखाई देती थी तो किसान के लिए दोनों शक्तियां एक ही व्यवस्था का हिस्सा प्रतीत होती थीं।
यही वह अनुभव था जिसने आंदोलन की भाषा को बदल दिया।
“निजामशाही-सामंती व्यवस्था”
के विरुद्ध कहा जाने लगा।
पुलिस छापे
गांवों पर छापे दमन की महत्वपूर्ण तकनीक बने।
संगम नेताओं को गिरफ्तार करना;
हथियार और संगठनात्मक दस्तावेज खोजना;
दलम सदस्यों के बारे में जानकारी हासिल करना;
आंदोलन को भोजन और आश्रय देने वाले ग्रामीणों पर दबाव डालना।
गुरिल्ला आंदोलन की सबसे बड़ी शक्ति उसका ग्रामीण नेटवर्क था।
इसलिए सरकारी दमन में केवल हथियारबंद कार्यकर्ता ही निशाना नहीं बनते थे।
जिस गांव पर दलम को आश्रय देने का संदेह होता, पूरी आबादी दबाव में आ सकती थी।
गिरफ्तारी और पूछताछ
भूमिगत नेटवर्क का पता लगाने के लिए गिरफ्तार कार्यकर्ताओं से जानकारी प्राप्त करना प्रशासन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था।
आंदोलनकारी स्रोत पुलिस यातना, मारपीट और कठोर पूछताछ के अनेक विवरण देते हैं।
इन स्रोतों को सावधानी से पढ़ना आवश्यक है क्योंकि वे संघर्ष के एक पक्ष के प्रत्यक्ष राजनीतिक दस्तावेज हैं।
लेकिन इस बात पर व्यापक सहमति है कि तेलंगाना में दमन व्यापक था और कम्युनिस्ट कैडर को बड़े पैमाने पर भूमिगत होना पड़ा।
राज्य दमन और आंदोलन की प्रतिक्रिया
कई गांवों में पुलिस के जाने के बाद संगम फिर सक्रिय हो जाता।
किसान पुलिस की गतिविधियों की सूचना पहले ही दलम तक पहुंचा देते।
कई बार पुलिस पहुंचने से पहले कार्यकर्ता गांव छोड़ चुके होते।
इससे प्रशासन और कठोर हुआ।
और यही दमन–प्रतिरोध का चक्र धीरे-धीरे सामान्य राजनीतिक संघर्ष को अर्धसैनिक संघर्ष में बदलता गया।
15 अगस्त 1947 — पर संकट समाप्त नहीं हुआ
भारत की स्वतंत्रता से तेलंगाना की समस्या हल नहीं हुई।
हैदराबाद भारतीय संघ का हिस्सा तत्काल नहीं बना।
निजाम ने स्वतंत्र स्थिति बनाए रखने की कोशिश की।
इससे किसान आंदोलन को नया राजनीतिक अवसर भी मिला।
सुंदरैया के अनुसार कम्युनिस्टों और आंध्र महासभा ने कुछ समय के लिए हैदराबाद स्टेट कांग्रेस के साथ निजाम के विरुद्ध साझा कार्रवाइयां कीं। राष्ट्रीय और लाल झंडों के साथ संयुक्त प्रदर्शन तक हुए।
लेकिन इसी समय निजाम समर्थक राजनीति भी अधिक सशस्त्र रूप ग्रहण कर रही थी।
यह रजाकारों के तीव्र विस्तार का समय था।
मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन और रजाकार
मजलिस की शुरुआत और बाद का परिवर्तन
मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन का विकास हैदराबाद राज्य की मुस्लिम राजनीति के भीतर हुआ था। उसके प्रारंभिक इतिहास को केवल बाद के रजाकार उग्रवाद के आधार पर पढ़ना उचित नहीं होगा।
बहादुर यार जंग के नेतृत्व के दौर में मजलिस ने हैदराबाद के मुस्लिम समाज की राजनीतिक-सांस्कृतिक एकता और निजामशाही के भीतर उसके स्थान को लेकर राजनीति विकसित की। आधुनिक शोध बताता है कि 1944 में बहादुर यार जंग की मृत्यु के बाद संगठन के भीतर दिशा को लेकर परिवर्तन आया और कासिम रिजवी के उदय के साथ उसका चरित्र अधिक कठोर हुआ।
दिसंबर 1946 में कासिम रिजवी मजलिस का अध्यक्ष बना। न्यायिक अभिलेख और आधुनिक शोध दोनों इस तिथि की पुष्टि करते हैं।
कासिम रिजवी
कासिम रिजवी पेशे से वकील था और उसने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की थी।
उसकी राजनीति का केंद्रीय उद्देश्य निजाम के अधीन हैदराबाद की स्वतंत्र राजनीतिक स्थिति बचाना था।
जैसे-जैसे ब्रिटिश सत्ता हस्तांतरण निकट आया, रिजवी और मजलिस के कठोरपंथी नेतृत्व ने यह तर्क दिया कि हैदराबाद को भारतीय संघ में विलय नहीं करना चाहिए।
1947 के बाद रिजवी की राजनीतिक शक्ति तेजी से बढ़ी।
कुछ समकालीन और बाद के विश्लेषणों में यह तक कहा गया है कि 1947–48 में मजलिस और रजाकार निजाम सरकार पर असाधारण प्रभाव रखने लगे थे।
रजाकार शब्द और संगठन
“रजाकार” का मूल अर्थ स्वयंसेवक है।
मजलिस के पास पहले से स्वयंसेवी संगठन मौजूद था। आधुनिक इतिहासकार बताते हैं कि ऐसी स्वयंसेवी इकाइयां 1930 के दशक के अंत से मौजूद थीं, लेकिन 1947 में उनका उद्देश्य और स्वरूप तेजी से बदल गया। अब उन्हें नियमित सैन्य प्रशिक्षण, हथियार और एक अधिक स्पष्ट अर्धसैनिक भूमिका दी गई।
1930 के दशक का स्वयंसेवी संगठन और 1947–48 का राजनीतिक-सैन्य रजाकार आंदोलन एक ही स्तर की चीज नहीं थे।
कासिम रिजवी के दौर में इसका विस्तार और सैन्यकरण अभूतपूर्व हुआ।
रजाकार क्यों बने?
रजाकार राजनीति के पीछे कई उद्देश्य थे।
निजाम की सत्ता की रक्षा।
हैदराबाद को भारतीय संघ में विलय से रोकना।
राज्य के भीतर निजाम-विरोधी राजनीतिक आंदोलनों को दबाना।
ग्रामीण तेलंगाना में बढ़ रहे कम्युनिस्ट किसान आंदोलन का मुकाबला।
एक आधुनिक अध्ययन यह भी दिखाता है कि रजाकारों का उभार उस व्यापक हिंसक वातावरण के भीतर हुआ जिसमें हैदराबाद स्टेट कांग्रेस, आर्य समाज से जुड़े समूह, सीमा-पार राजनीतिक शिविर और तेलंगाना के कम्युनिस्ट—all अपने-अपने तरीके से सक्रिय थे। इसलिए रजाकारों की उत्पत्ति को शून्य में हुई एकतरफा प्रक्रिया के रूप में नहीं देखना चाहिए।
लेकिन इससे उनके द्वारा की गई हिंसा का महत्व कम नहीं होता।
रजाकार और निजाम सरकार का संबंध
एक महत्वपूर्ण प्रश्न है—
क्या रजाकार निजाम की नियमित सेना थे?
वे औपचारिक रूप से निजाम की नियमित सेना नहीं थे।
वे मजलिस से जुड़े अर्धसैनिक स्वयंसेवी संगठन थे।
लेकिन राजनीतिक संकट के दौरान उन्होंने राज्य की पुलिस और प्रशासन के साथ कई जगह मिलकर काम किया। तेलंगाना सरकार की शैक्षिक सामग्री बताती है कि उन्होंने किसान संगमों और कम्युनिस्ट लड़ाकों से संघर्ष किया तथा बड़े भू-स्वामियों और “दोराओं” का समर्थन प्राप्त किया।
एक 1950 के न्यायिक निर्णय में भी रजाकार संगठन के तीव्र सैन्यीकरण, हथियार प्रशिक्षण और मजलिस नेतृत्व के अधीन निजी सशस्त्र संस्था की तरह विकसित होने का विवरण मिलता है।
भू-स्वामियों के लिए रजाकार क्यों उपयोगी थे?
किसान संघर्ष से बड़े भू-स्वामियों की स्थानीय सत्ता कमजोर हो रही थी।
कई देशमुख गांव छोड़ चुके थे।
उनकी जमीन पर किसान कब्जा कर रहे थे।
ऐसी स्थिति में रजाकार उनके लिए केवल निजाम समर्थक राजनीतिक शक्ति नहीं थे।
वे संगमों के विरुद्ध सैन्य सहारा भी बन सकते थे।
इस प्रकार ग्रामीण तेलंगाना में एक गठबंधन विकसित हुआ—
निजाम समर्थक राजनीतिक सत्ता + स्थानीय भू-स्वामी हित + रजाकार सशस्त्र शक्ति।
हालांकि हर स्थान की वास्तविकता समान नहीं थी और इसे पूरे राज्य के लिए यांत्रिक सूत्र नहीं माना जाना चाहिए।
रजाकारों का विस्तार
1947–48 में रजाकारों की संख्या को लेकर अत्यधिक भिन्न दावे मिलते हैं।
समकालीन राजनीतिक स्रोतों में उनकी संख्या लाखों तक बताई गई।
अन्य स्रोत इससे बहुत कम संख्या देते हैं।
समस्या यह है कि कुछ आंकड़े औपचारिक हथियारबंद सदस्यों की संख्या बताते हैं, जबकि कुछ व्यापक स्वयंसेवी नेटवर्क को शामिल करते हैं।
इसलिए किसी एक बहुत बड़ी संख्या को निर्विवाद तथ्य की तरह लिखना उचित नहीं होगा।
अधिक सुरक्षित निष्कर्ष है—
1947–48 में रजाकार संगठन ने तेज गति से विस्तार किया और हैदराबाद राज्य के राजनीतिक तथा सुरक्षा संकट में एक बड़ी अर्धसैनिक शक्ति बन गया।
क्या रजाकारों का निशाना केवल हिंदू थे?
यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है।
रजाकार हिंसा के अनेक पीड़ित हिंदू ग्रामीण थे और सांप्रदायिक हिंसा का तत्व वास्तविक था।
लेकिन रजाकारों को केवल “हिंदुओं के विरुद्ध मुस्लिम सेना” कहना ऐतिहासिक वास्तविकता को अधूरा कर देता है।
तेलंगाना सरकार की पाठ्य सामग्री स्पष्ट रूप से बताती है कि रजाकारों ने पहले उन मुस्लिम बुद्धिजीवियों पर भी हमला किया जो लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था चाहते थे। बाद में उन्होंने किसान संगमों, कम्युनिस्टों और भारत में विलय के समर्थकों पर भी हमले किए।
आधुनिक शोध भी दिखाता है कि निशाना वे व्यक्ति और संगठन बन सकते थे जिन्हें निजाम की स्वतंत्रता की परियोजना का विरोधी माना जाता था।
इसलिए सही निष्कर्ष होगा—
रजाकार राजनीति में सांप्रदायिक विचारधारा महत्वपूर्ण थी, लेकिन उनकी हिंसा का लक्ष्य केवल धार्मिक पहचान से निर्धारित नहीं होता था; राजनीतिक विरोध और ग्रामीण वर्ग-संघर्ष भी निर्णायक थे।
मुस्लिम विरोध की भी परंपरा
हैदराबाद के सभी मुसलमान मजलिस या रजाकार समर्थक नहीं थे।
कम्युनिस्ट आंदोलन में मुस्लिम किसान, मजदूर और बुद्धिजीवी सक्रिय थे।
मखदूम मोहिउद्दीन इसका प्रमुख उदाहरण हैं।
हैदराबाद में ऐसे मुस्लिम बुद्धिजीवी भी मौजूद थे जो निजामशाही के निरंकुश चरित्र और रजाकार राजनीति का विरोध करते थे।
आधुनिक इतिहासलेखन ने इसी कारण “सभी मुसलमान रजाकार थे” जैसी स्मृति को चुनौती दी है। Afsar Mohammad की 2023 की पुस्तक में एक पूरा अध्याय ही “All Muslims Are Not the Razakars” के प्रश्न पर केंद्रित है।
इस अंतर को बनाए रखना ऐतिहासिक रूप से अनिवार्य है।
किसान–रजाकार संघर्ष और ग्रामीण हिंसा
दो सशस्त्र शक्तियों का आमना-सामना
1947–48 तक ग्रामीण तेलंगाना में दो अलग-अलग प्रकार की सशस्त्र शक्ति तेजी से विकसित हो चुकी थीं।
कम्युनिस्ट नेतृत्व वाले किसान दलम।
रजाकार दस्ते और उनके साथ काम करने वाले निजाम राज्य के सुरक्षा बल।
इनका संघर्ष केवल राजनीतिक घोषणा-पत्रों में नहीं था।
गांव वास्तविक युद्धक्षेत्र बनने लगे।
सुंदरैया के विवरण में 15 अगस्त 1947 से सितंबर 1948 के चरण को निजाम और रजाकारों के विरुद्ध संगठित सशस्त्र प्रतिरोध का काल बताया गया है। इसी दौरान कम्युनिस्टों ने हैदराबाद स्टेट कांग्रेस के साथ भी कुछ साझा निजाम-विरोधी कार्रवाइयों में भाग लिया।
रजाकार छापे
रजाकार दस्ते उन गांवों को निशाना बनाते थे जहां—
कम्युनिस्ट कार्यकर्ता सक्रिय थे;
या भारत में विलय समर्थक गतिविधि चल रही थी।
तेलंगाना सरकार की शैक्षिक सामग्री के अनुसार रजाकारों ने गांव जलाए, महिलाओं को बंधक बनाया और आतंक उत्पन्न करने के लिए हिंसा का प्रयोग किया।
इन कार्रवाइयों का उद्देश्य केवल किसी व्यक्ति को दंडित करना नहीं था।
संदेश पूरे गांव को दिया जाता था—
कम्युनिस्ट अथवा विलय समर्थक राजनीति का साथ देने की कीमत चुकानी पड़ेगी।
किसान दलमों की प्रतिक्रिया
दलमों ने रजाकारों का मुकाबला गुरिल्ला तरीके से किया।
उनकी रणनीतियों में शामिल था—
रजाकारों के आने की पहले सूचना लेना;
गांव के प्रवेश मार्गों पर निगरानी;
छोटे रजाकार केंद्रों पर धावा;
और हमले के बाद जंगल अथवा पड़ोसी गांवों में हट जाना।
इस लड़ाई में ग्रामीण आबादी स्वयं सैन्य संसाधन बन गई।
महिला संदेश पहुंचाती थी।
बच्चे तक कभी-कभी निगरानी का काम करते थे।
गांव का चरवाहा दूर से आने वाले दस्ते को पहचान सकता था।
इसलिए रजाकारों के लिए “दलम” और “उसका समर्थक गांव” कई बार अलग-अलग लक्ष्य नहीं थे।
दिन में रजाकार, रात में कम्युनिस्ट
हैदराबाद संकट की विडंबनापूर्ण स्थिति का प्रसिद्ध वर्णन वी.पी. मेनन ने किया था—कुछ गांवों की स्थिति ऐसी थी कि वे दिन में रजाकारों और रात में कम्युनिस्टों के प्रभाव में होते थे।
आधुनिक अकादमिक अध्ययन इस विवरण को उद्धृत करते हुए बताता है कि 1948 के चरम पर नलगोंडा और वारंगल के एक हजार से अधिक गांवों में कम्युनिस्ट प्रभाव या नियंत्रण था; आंदोलनकारी स्रोत इससे अधिक संख्या बताते हैं।
इससे ग्रामीण जीवन की वास्तविक स्थिति समझी जा सकती है।
किसी किसान के लिए यह कोई सरल दो-पक्षीय राजनीतिक चुनाव नहीं था।
गलत पक्ष का समर्थक समझे जाने पर उसे किसी भी ओर से दंड मिल सकता था।
हिंसा केवल एक तरफ से नहीं हुई
रजाकार हिंसा का दस्तावेजीकरण व्यापक है।
लेकिन संतुलित इतिहास में यह भी दर्ज होना चाहिए कि कम्युनिस्ट दलमों ने भी हिंसक कार्रवाइयां कीं।
भू-स्वामियों के हथियार छीने;
पुलिस और प्रशासनिक संरचनाओं पर आक्रमण किए;
कथित मुखबिरों और आंदोलन-विरोधियों को दंड दिया;
और कुछ मामलों में हत्या भी की।
इसी प्रकार हैदराबाद स्टेट कांग्रेस से जुड़े सशस्त्र समूह भी सीमा क्षेत्रों में हिंसक कार्रवाइयों में शामिल थे। एक अकादमिक अध्ययन में स्टेट कांग्रेस के अपने दावों के आधार पर पुलिस चौकियों, रजाकार केंद्रों और सरकारी प्रतिष्ठानों पर बड़ी संख्या में हमलों का उल्लेख मिलता है।
इसलिए 1947–48 का हैदराबाद केवल “सरकार बनाम शांतिपूर्ण विरोध” की स्थिति नहीं रहा था।
राज्य अनेक सशस्त्र राजनीतिक धाराओं के बीच हिंसक संघर्ष में प्रवेश कर चुका था।
क्या यह सांप्रदायिक गृहयुद्ध था?
तेलंगाना क्षेत्र के संदर्भ में ऐसा कहना अत्यधिक सरलीकरण होगा।
सांप्रदायिक तनाव मौजूद था।
रजाकारों की विचारधारा में निजामशाही के साथ मुस्लिम राजनीतिक प्रभुत्व की रक्षा का तत्व था।
कुछ हिंसा स्पष्ट रूप से धार्मिक समुदायों को निशाना बनाकर हुई।
लेकिन किसान आंदोलन की मूल रेखा वर्गीय थी।
कम्युनिस्ट संगठन में हिंदू और मुस्लिम दोनों शामिल थे।
रजाकारों ने मुस्लिम लोकतांत्रिक विरोधियों पर भी हमला किया।
भू-स्वामियों और किसानों के संघर्ष में धर्म के अतिरिक्त भूमि और ग्रामीण सत्ता का प्रश्न केंद्रीय था।
इसलिए तेलंगाना संघर्ष में सांप्रदायिकता को नकारना गलत होगा, लेकिन पूरे किसान संघर्ष को सांप्रदायिक संघर्ष में बदल देना उससे भी बड़ी त्रुटि होगी।
धार्मिक पहचान और वर्गीय पहचान का टकराव
रजाकार नेतृत्व का प्रयास था कि निजामशाही को मुस्लिम राजनीतिक सुरक्षा से जोड़ा जाए।
कम्युनिस्ट नेतृत्व इसके विपरीत मुस्लिम गरीब किसानों और कारीगरों को वर्गीय आधार पर संगठित करना चाहता था।
सुंदरैया बाद में दावा करते हैं कि बड़ी संख्या में मुस्लिम ग्रामीण गरीब किसान आंदोलन के साथ आए, यद्यपि शहरी मुस्लिम समाज के महत्वपूर्ण हिस्से निजाम और रजाकारों के समर्थक रहे।
चूंकि यह आंदोलन के नेता का अपना दावा है, इसे सावधानी से पढ़ा जाना चाहिए।
लेकिन मखदूम मोहिउद्दीन और अन्य मुस्लिम कम्युनिस्टों की सक्रियता स्वयं यह सिद्ध करती है कि राजनीतिक विभाजन धार्मिक समुदायों की सीमाओं से पूरी तरह निर्धारित नहीं था।
महिलाओं पर हिंसा
गांवों पर छापों का सबसे त्रासद पहलू महिलाओं के विरुद्ध हिंसा थी।
रजाकारों पर महिलाओं को बंधक बनाने और उत्पीड़न के आरोप दर्ज हैं। तेलंगाना सरकार की आधिकारिक शैक्षिक सामग्री भी महिलाओं को बंधक बनाकर भय उत्पन्न करने का उल्लेख करती है।
लेकिन बाद में सितंबर 1948 की भारतीय सैन्य कार्रवाई और उसके बाद हुए सांप्रदायिक प्रतिशोध में भी महिलाओं सहित नागरिक आबादी हिंसा की शिकार हुई।
इसलिए हैदराबाद के हिंसक इतिहास में पीड़ित समुदाय समय और स्थान के साथ बदलते हैं।
इसी कारण इतिहास को किसी एक समुदाय की स्थायी “अपराधी” अथवा “पीड़ित” पहचान में बांधना उचित नहीं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर
लगातार संघर्ष से गांवों की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई।
लोग रात में गांव छोड़कर छिपते।
पशु और अनाज लूटे जा सकते थे।
बाजार तक पहुंच कठिन होती।
सड़क और परिवहन असुरक्षित होते।
जहां सुबह सरकारी अथवा रजाकार दस्ता आ सकता था और रात में दलम, वहां साधारण किसान के लिए खेती और जीवन दोनों असुरक्षित हो जाते थे।
यही सशस्त्र संघर्ष की मानवीय कीमत थी।
हिंसा के आंकड़ों की समस्या
तेलंगाना और पूरे हैदराबाद संकट में मृतकों तथा अत्याचारों की संख्या को लेकर स्रोतों में भारी अंतर है।
और बाद के राजनीतिक लेखक—
इनमें प्रचार-युद्ध भी शामिल था।
इसलिए बिना स्रोत और संदर्भ के बड़ी संख्या देना उचित नहीं।
विशेषकर 1948 की “पुलिस एक्शन” के बाद की सांप्रदायिक हिंसा को 1946–48 के किसान–रजाकार संघर्ष के मृतकों के साथ मिला देना गंभीर तथ्यात्मक गलती होगी।
इन दोनों चरणों को अलग रखना होगा।
हैदराबाद स्टेट कांग्रेस और तीसरी राजनीतिक शक्ति
तेलंगाना की कहानी केवल कम्युनिस्ट बनाम रजाकार नहीं थी।
हैदराबाद स्टेट कांग्रेस भी निजाम के विरुद्ध सक्रिय थी।
1947 के बाद उसने भारत में विलय और जिम्मेदार सरकार के लिए संघर्ष तेज किया।
सीमा क्षेत्रों में उसके शिविर और स्वयंसेवी संगठन बने।
कुछ जगह कम्युनिस्टों और कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने साझा निजाम-विरोधी कार्रवाइयां कीं। सुंदरैया राष्ट्रीय और लाल झंडों के संयुक्त प्रदर्शनों का उल्लेख करते हैं।
लेकिन दोनों के अंतिम लक्ष्य अलग थे।
कांग्रेस का प्राथमिक उद्देश्य था—
हैदराबाद का भारतीय संघ में विलय और जिम्मेदार लोकतांत्रिक शासन।
कम्युनिस्टों के लिए प्रश्न इससे आगे था—
भूमि संबंध बदलने और सामंती शक्ति समाप्त करने का।
यही अंतर सितंबर 1948 के बाद निर्णायक बन गया।
# निजाम और रजाकार विरोध से भारतीय हस्तक्षेप तक
1948 के मध्य तक हैदराबाद संकट कई स्तरों पर एक साथ बढ़ चुका था।
निजाम भारतीय संघ में विलय स्वीकार नहीं कर रहा था।
कासिम रिजवी और रजाकारों का राजनीतिक प्रभाव बढ़ चुका था।
तेलंगाना में कम्युनिस्ट किसान संघर्ष व्यापक ग्रामीण क्षेत्रों में फैल चुका था।
हैदराबाद स्टेट कांग्रेस विलय के लिए आंदोलन कर रही थी।
सीमा क्षेत्रों में हिंसा बढ़ रही थी।
15 अगस्त 1947 के बाद भी हैदराबाद स्वतंत्र क्यों रहा?
ब्रिटिश भारत और देशी रियासतें
1947 से पहले भारतीय उपमहाद्वीप दो प्रकार के राजनीतिक क्षेत्रों में बंटा था।
एक था सीधे ब्रिटिश शासन वाला भारत।
दूसरा था लगभग 560 से अधिक देशी रियासतों का क्षेत्र, जहां स्थानीय राजाओं और नवाबों का शासन था लेकिन ब्रिटिश क्राउन की सर्वोच्चता मान्य थी।
15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश परमाउंटसी समाप्त होने के बाद रियासतों की पुरानी संवैधानिक स्थिति खत्म हो गई।
भारत सरकार की नीति थी कि ये रियासतें भौगोलिक और व्यावहारिक आधार पर भारत अथवा पाकिस्तान में शामिल हों।
अधिकांश रियासतों ने ऐसा कर लिया।
लेकिन कुछ मामलों ने गंभीर संकट पैदा किया—
इनमें हैदराबाद सबसे बड़ा और भौगोलिक दृष्टि से सबसे असामान्य मामला था।
हैदराबाद की विशिष्टता
हैदराबाद विशाल रियासत थी और चारों ओर से भारतीय क्षेत्र से घिरी थी।
उसके पास समुद्र तक स्वतंत्र पहुंच नहीं थी।
रेल, डाक, संचार, व्यापार और परिवहन का बड़ा हिस्सा आसपास के भारतीय क्षेत्रों से जुड़ा था।
इसके बावजूद निजाम स्वतंत्र स्थिति चाहता था।
निजाम का तर्क था कि ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त होने के बाद हैदराबाद का ब्रिटिश भारत से पुराना संवैधानिक संबंध भी समाप्त हो गया है और उसे स्वतंत्र रहने का अधिकार मिलना चाहिए।
भारत सरकार इस व्याख्या से सहमत नहीं थी।
नेहरू ने सितंबर 1948 में कहा कि भौगोलिक और आर्थिक परिस्थितियों के कारण हैदराबाद को भारतीय संघ से अलग स्वतंत्र राज्य के रूप में स्वीकार करना भारत की सुरक्षा और राजनीतिक स्थिरता के लिए संभव नहीं था।
पाकिस्तान में शामिल होने का प्रश्न
हैदराबाद की स्थिति जूनागढ़ या कश्मीर से भिन्न थी क्योंकि उसकी कोई सीमा पाकिस्तान से नहीं मिलती थी।
निजाम ने औपचारिक रूप से पाकिस्तान में विलय नहीं किया।
उसकी प्राथमिक रणनीति स्वतंत्र हैदराबाद की थी।
हालांकि भारत सरकार को हैदराबाद और पाकिस्तान के बीच राजनीतिक, वित्तीय तथा सैन्य संपर्कों को लेकर गंभीर संदेह था।
1948 में भारत की ओर से हथियारों की तस्करी तथा बाहरी सहायता के आरोप भी लगाए गए। नेहरू ने 7 सितंबर 1948 के वक्तव्य में विदेश से हथियार और गोला-बारूद हैदराबाद पहुंचाए जाने का आरोप लगाया था।
इन आरोपों के प्रत्येक पहलू पर इतिहासकारों में बहस है, इसलिए इन्हें भारत सरकार की तत्कालीन स्थिति के रूप में पढ़ना चाहिए।
स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट
लंबी बातचीत के बाद भारत और हैदराबाद के बीच 29 नवंबर 1947 को स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट हुआ।
इस समझौते का मूल उद्देश्य तत्काल अंतिम विलय का निर्णय किए बिना मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्थाओं को कुछ समय तक जारी रखना था।
रक्षा, विदेश संबंध और संचार से संबंधित वे व्यवस्थाएं जो ब्रिटिश क्राउन और निजाम के बीच लागू थीं, उपयुक्त रूप से भारत और हैदराबाद के बीच जारी रखी जानी थीं। ब्रिटिश संसदीय अभिलेख में भी समझौते की इस व्यवस्था का उल्लेख मिलता है।
समझौते की अवधि एक वर्ष थी।
भारत सरकार को उम्मीद थी कि इस दौरान स्थायी समाधान निकल आएगा।
नेहरू ने बाद में संसद में कहा कि भारत को आशा थी कि स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट के बाद शीघ्र ही हैदराबाद में उत्तरदायी सरकार और भारत से विलय का समझौता हो जाएगा।
समझौते की अलग-अलग व्याख्या
भारत के लिए स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट अंतरिम व्यवस्था था।
निजाम के लिए यह स्वतंत्र स्थिति बनाए रखने के लिए समय हासिल करने का साधन भी था।
इसी मूल राजनीतिक अंतर के कारण दोनों पक्षों के संबंध जल्दी खराब होने लगे।
भारत सरकार ने आरोप लगाया कि हैदराबाद ने समझौते की भावना का पालन नहीं किया।
हैदराबाद सरकार ने आरोप लगाया कि भारत आर्थिक और राजनीतिक दबाव डाल रहा है।
इस बीच सीमा क्षेत्रों में हिंसा और आवाजाही संबंधी विवाद बढ़ते गए।
जनमत का प्रश्न
एक महत्वपूर्ण प्रश्न था—
हैदराबाद का भविष्य कौन तय करे?
भारत सरकार सार्वजनिक रूप से उत्तरदायी सरकार का समर्थन कर रही थी।
नेहरू ने सितंबर 1948 में कहा कि भारत सरकार स्वतंत्र परिस्थितियों में जनता की राय जानने तक के लिए तैयार थी, लेकिन उसका दावा था कि रजाकार आतंक के वातावरण में स्वतंत्र जनमत संभव नहीं था।
1948 की बातचीत में जनमत-संग्रह के विकल्प पर भी चर्चा हुई। एक सरकारी पुलिस-इतिहास अध्ययन के अनुसार निजाम ने सिद्धांततः इस विचार पर सहमति दिखाई, लेकिन हैदराबाद की स्वतंत्र स्थिति सुरक्षित रखने की मांग के कारण जून 1948 तक बातचीत विफल हो गई।
हैदराबाद स्टेट कांग्रेस
हैदराबाद के भीतर एक बड़ा राजनीतिक वर्ग निजाम की निरंकुश सत्ता के विरुद्ध था।
हैदराबाद स्टेट कांग्रेस जिम्मेदार सरकार और भारत में विलय की मांग कर रही थी।
उसके आंदोलन पर पहले प्रतिबंध था।
1947 के बाद उसने आंदोलन तेज किया।
इससे यह स्पष्ट होता है कि संकट केवल “भारत बनाम निजाम” का नहीं था।
हैदराबाद की अपनी जनता के भीतर भी राज्य के भविष्य को लेकर गहरा राजनीतिक संघर्ष था।
कम्युनिस्टों की स्थिति
कम्युनिस्टों के लिए प्रश्न कुछ अलग था।
वे निजामशाही के विरोधी थे।
रजाकारों के भी विरोधी थे।
लेकिन उनका उद्देश्य केवल भारत में विलय नहीं था।
उनके लिए किसान भूमि-अधिकार और सामंती व्यवस्था का अंत केंद्रीय प्रश्न था।
इसलिए कुछ समय के लिए स्टेट कांग्रेस और कम्युनिस्टों के निजाम-विरोधी उद्देश्य मिल सकते थे, लेकिन अंतिम राजनीतिक कार्यक्रम अलग था।
यही अंतर 1948 के बाद निर्णायक हो गया।
कासिम रिजवी और समझौते की राजनीति
1947–48 में मजलिस और कासिम रिजवी का प्रभाव बढ़ने से समझौते की संभावनाएं और कमजोर हुईं।
भारत सरकार का आरोप था कि निजाम सरकार पर ऐसे तत्व हावी हो गए थे जो किसी भी विलय या समझौते को स्वीकार नहीं करना चाहते।
नेहरू ने सितंबर 1948 में संविधान सभा में आरोप लगाया कि “irresponsible persons” के नेतृत्व वाली शक्तियां हैदराबाद सरकार को नियंत्रित करने लगी थीं और राज्य में निजी सेनाओं का विस्तार हो रहा था।
यह स्पष्ट रूप से रजाकार नेतृत्व की ओर संकेत था।
सरदार पटेल की दृष्टि
उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल रियासतों के एकीकरण में प्रमुख भूमिका निभा रहे थे।
उनकी दृष्टि में हैदराबाद का स्वतंत्र बने रहना भारतीय संघ के बीच एक अस्थिर राजनीतिक द्वीप छोड़ने जैसा था।
पटेल की नीति अपेक्षाकृत कठोर थी, लेकिन यह कहना भी सरलीकरण होगा कि नेहरू केवल बातचीत और पटेल केवल सैन्य कार्रवाई चाहते थे।
1948 तक दोनों इस निष्कर्ष की ओर बढ़ चुके थे कि यदि समझौता न हुआ और हिंसा जारी रही तो बल प्रयोग संभव हो सकता है।
आखिरी कोशिशें
1948 की पहली छमाही में भी बातचीत जारी रही।
गवर्नर-जनरल लॉर्ड माउंटबेटन समझौते का रास्ता निकालने की कोशिश करते रहे।
लेकिन जून 1948 में उनके भारत छोड़ने तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया।
रजाकार गतिविधियां बढ़ीं।
कम्युनिस्ट किसान विद्रोह जारी था।
और भारत सरकार के धैर्य की सीमा समाप्त होने लगी।
9 सितंबर 1948 को भारत सरकार ने सैन्य हस्तक्षेप का निर्णय लिया और 10 सितंबर को हैदराबाद को अंतिम मांग भेजी गई। नेहरू अभिलेख के अनुसार मांगों में रजाकार संगठन को तत्काल भंग करना तथा व्यवस्था बहाल करने के लिए भारतीय सैनिकों को सिकंदराबाद में प्रवेश की अनुमति देना शामिल था।
अब सैन्य कार्रवाई लगभग तय थी।
ऑपरेशन पोलो और हैदराबाद का भारतीय संघ में विलय
“पुलिस एक्शन” क्यों कहा गया?
हैदराबाद के विरुद्ध भारतीय सैन्य कार्रवाई का कोड नाम था—
भारत सरकार ने आधिकारिक राजनीतिक भाषा में इसे “Police Action” कहा।
इस शब्द का उद्देश्य यह संकेत देना था कि भारत इसे दो स्वतंत्र देशों के बीच युद्ध नहीं मानता था।
भारत सरकार हैदराबाद को भारतीय संघ के भीतर की राजनीतिक-सुरक्षा समस्या मानती थी।
लेकिन वास्तविकता में इसमें भारतीय सेना की अनेक इकाइयों ने नियमित सैन्य अभियान चलाया।
इसलिए सैन्य इतिहास की दृष्टि से यह स्पष्ट रूप से संगठित सैन्य ऑपरेशन था।
13 सितंबर 1948
13 सितंबर 1948 को भारतीय सेना ने हैदराबाद राज्य में प्रवेश किया।
अभियान कई दिशाओं से चलाया गया।
भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के आधिकारिक सैन्य इतिहास और राष्ट्रीय अभिलेखों पर आधारित संस्कृति मंत्रालय की सामग्री इसे पांच दिन का अभियान बताती है जिसमें भारतीय सेना विभिन्न दिशाओं से हैदराबाद में दाखिल हुई।
मुख्य सैन्य कमान मेजर जनरल जे.एन. चौधरी के हाथ में थी।
भारतीय सेना का उद्देश्य था—
हैदराबाद की नियमित सैन्य प्रतिरोध क्षमता तोड़ना;
रजाकार सशस्त्र शक्ति को निष्प्रभावी करना;
और राज्य पर राजनीतिक नियंत्रण स्थापित करना।
सैन्य असमानता
हैदराबाद की सेना भारतीय सेना की तुलना में बहुत छोटी और कमजोर थी।
रजाकारों की संख्या भले बड़ी बताई जाती हो, लेकिन वे अधिकांशतः नियमित प्रशिक्षित सेना नहीं थे।
उनकी सैन्य क्षमता भारतीय बख्तरबंद, तोपखाना और संगठित सैन्य इकाइयों के सामने सीमित थी।
इसीलिए युद्ध लंबा नहीं चला।
विभिन्न मोर्चों पर प्रतिरोध हुआ, लेकिन हैदराबाद सेना भारत की प्रगति रोक नहीं सकी।
पांच दिन का अभियान
अभियान 13 सितंबर से 17 सितंबर तक निर्णायक रूप से चला।
सरकारी अध्ययन के अनुसार भारतीय सेना पांच दिशाओं से आगे बढ़ी और हैदराबाद की नियमित सेना तथा रजाकारों का प्रतिरोध कुछ ही दिनों में टूट गया।
17 सितंबर तक भारतीय सैन्य स्तंभ राजधानी के निकट पहुंच चुके थे।
हैदराबाद के प्रधानमंत्री मीर लायक अली और उनकी सरकार ने इस्तीफा दिया।
निजाम ने युद्धविराम का आदेश दिया।
जनरल एल-एद्रूस का आत्मसमर्पण
हैदराबाद सेना के कमांडर मेजर जनरल सैयद अहमद एल-एद्रूस ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण किया।
संस्कृति मंत्रालय के आधिकारिक विवरण में भी उनके औपचारिक आत्मसमर्पण का उल्लेख है।
इससे हैदराबाद की सैन्य प्रतिरोध क्षमता समाप्त हो गई।
17 सितंबर 1948 को युद्धविराम व्यावहारिक रूप से लागू हो गया और इसके बाद भारतीय नियंत्रण स्थापित हो गया।
कुछ सरकारी विवरण एकीकरण को 18 सितंबर से प्रभावी रूप में दर्ज करते हैं।
इसलिए तारीखों को समझने का सबसे सुरक्षित तरीका है—
13 सितंबर — सैन्य अभियान शुरू।
17 सितंबर — निजाम ने युद्धविराम स्वीकार किया।
18 सितंबर के बाद — भारतीय सैन्य प्रशासन का प्रभावी नियंत्रण स्थापित।
निजाम का क्या हुआ?
ऑपरेशन पोलो के बाद निजाम को तत्काल अपदस्थ नहीं किया गया।
यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है।
मीर उस्मान अली खान राज्य के औपचारिक प्रमुख बने रहे, लेकिन वास्तविक राजनीतिक और प्रशासनिक सत्ता भारतीय सरकार और सैन्य प्रशासन के हाथों में चली गई।
बाद में संवैधानिक व्यवस्था विकसित होने पर निजाम को हैदराबाद राज्य का राजप्रमुख बनाया गया।
इस प्रकार भारतीय एकीकरण में यहां पूर्ण राजवंशीय उन्मूलन की बजाय नियंत्रित संक्रमण अपनाया गया।
सैन्य शासन
ऑपरेशन पोलो के बाद मेजर जनरल जे.एन. चौधरी को सैन्य गवर्नर बनाया गया।
भारतीय सैन्य प्रशासन को तीन बड़ी चुनौतियां मिलीं—
कानून-व्यवस्था बहाल करना;
रजाकार संगठन को समाप्त करना;
और कम्युनिस्ट सशस्त्र किसान आंदोलन से निपटना।
पहली दो कार्रवाइयों का किसान आंदोलन ने स्वागत किया हो सकता था।
तीसरी ने सीधे टकराव पैदा कर दिया।
रजाकार संगठन का अंत
ऑपरेशन पोलो के बाद रजाकार संगठन टूट गया।
कासिम रिजवी गिरफ्तार किया गया।
मजलिस पर प्रतिबंध लगाया गया।
निजाम की स्वतंत्र हैदराबाद परियोजना समाप्त हो गई।
यदि तेलंगाना संघर्ष केवल रजाकार-विरोधी आंदोलन होता, तो यहां उसकी समाप्ति हो जानी चाहिए थी।
लेकिन उसका मूल प्रश्न भूमि था।
और वही समस्या अब सामने आई।
देशमुखों की वापसी
कई क्षेत्रों में किसान संगमों ने जिन भू-स्वामियों को गांवों से बाहर कर दिया था, वे ऑपरेशन पोलो के बाद वापस आने लगे।
कई किसान उन जमीनों पर कब्जा कर चुके थे जिन्हें वे अपना अधिकार मानते थे।
नई भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था के सामने प्रश्न था—
क्या इन कब्जों को मान्यता दी जाए?
या पुराने विधिक स्वामित्व को बहाल किया जाए?
यहीं भारतीय राज्य और कम्युनिस्ट किसान आंदोलन का टकराव शुरू हुआ।
पी. सुंदरैया के विवरण के अनुसार कम्युनिस्टों को पहले से आशंका थी कि भारतीय सेना निजाम और रजाकारों के बाद किसानों की समानांतर सत्ता और भूमि कब्जों को भी समाप्त करेगी।
स्वतंत्र भारत बनाम किसान गुरिल्ला
ऑपरेशन पोलो के बाद आंदोलन का वैचारिक संकट गहरा था।
अब सामने विदेशी औपनिवेशिक शक्ति नहीं थी।
निजाम की स्वतंत्र सत्ता नहीं थी।
सामने भारत की निर्वाचित राजनीति की ओर बढ़ता नया राज्य था।
लेकिन किसान के लिए स्थिति इतनी सरल नहीं थी।
जिस किसान ने वर्षों के संघर्ष में जमीन हासिल की थी, वह उसे वापस देने को तैयार नहीं था।
कम्युनिस्ट नेतृत्व ने इस प्रश्न को आधार बनाकर सशस्त्र संघर्ष जारी रखा।
यहीं से तेलंगाना किसान संघर्ष का स्वतंत्र भारत वाला दूसरा चरण शुरू हुआ।
सुंदरलाल समिति और हैदराबाद की हिंसा
ऑपरेशन पोलो के साथ कहानी समाप्त नहीं हुई
हैदराबाद के एकीकरण की लोकप्रिय कथा अक्सर 17 सितंबर 1948 पर समाप्त हो जाती है—
निजाम ने आत्मसमर्पण किया;
हैदराबाद भारत में शामिल हो गया।
लेकिन इतिहास यहीं समाप्त नहीं होता।
सैन्य कार्रवाई के दौरान और विशेष रूप से उसके बाद हैदराबाद राज्य के कुछ क्षेत्रों में गंभीर सांप्रदायिक हिंसा हुई।
इस हिंसा में बड़ी संख्या में मुस्लिम नागरिक मारे गए।
और जबरन कब्जे के आरोप सामने आए।
भारत सरकार ने इसकी जांच के लिए एक प्रतिनिधिमंडल भेजा।
इसे सामान्यतः सुंदरलाल समिति अथवा पंडित सुंदरलाल मिशन कहा जाता है।
समिति कौन थी?
भारत सरकार ने पंडित सुंदरलाल के नेतृत्व में एक सद्भावना प्रतिनिधिमंडल हैदराबाद भेजा।
इसके प्रमुख सदस्यों में—
और मौलाना अब्दुल्ला मिसरी
रिपोर्ट के उपलब्ध पाठ के अनुसार प्रतिनिधिमंडल 29 नवंबर से 21 दिसंबर 1948 तक हैदराबाद में रहा।
उसने राज्य के 16 जिलों में से 9 का दौरा किया।
और 23 महत्वपूर्ण गांव प्रत्यक्ष रूप से देखे।
इसके अतिरिक्त 109 दूसरे गांवों से जुड़े 500 से अधिक लोगों के साक्षात्कार लिए गए।
यह व्यापक मैदानी जांच थी।
रिपोर्ट लंबे समय तक सार्वजनिक क्यों नहीं रही?
सुंदरलाल रिपोर्ट तत्काल व्यापक रूप से प्रकाशित नहीं की गई।
लंबे समय तक वह सीमित अभिलेखीय पहुंच में रही।
इस कारण हैदराबाद एकीकरण के सार्वजनिक इतिहास में इस रिपोर्ट की चर्चा अपेक्षाकृत कम हुई।
बाद के दशकों में शोधकर्ताओं ने इसे पुनः सामने लाया और अब यह 1948 की हिंसा को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत है।
लेकिन इसे भी अंतिम और पूर्ण सत्य नहीं मानना चाहिए।
समिति ने पूरे हैदराबाद राज्य के हर गांव का सर्वेक्षण नहीं किया था।
उसने चुने हुए जिलों और स्थलों के आधार पर अनुमान लगाए।
हिंसा कब और कहां हुई?
ऑपरेशन पोलो से पहले रजाकारों द्वारा हिंदू और राजनीतिक विरोधियों पर गंभीर हिंसा हुई थी।
ऑपरेशन के बाद सत्ता-संतुलन अचानक उलट गया।
निजाम की सुरक्षा व्यवस्था ध्वस्त हो गई।
कई क्षेत्रों में मुस्लिम ग्रामीण आबादी असुरक्षित हो गई।
कुछ स्थानों पर स्थानीय हिंदू समूहों ने प्रतिशोध लिया।
इसमें ऐसे मुस्लिम भी मारे गए जिनका रजाकारों से कोई संबंध नहीं था।
यही अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।
रजाकार अपराध और मुस्लिम नागरिक की धार्मिक पहचान एक ही चीज नहीं थी।
यदि इस भेद को मिटा दिया जाए तो प्रतिशोध सामूहिक दंड में बदल जाता है।
मृत्यु संख्या का विवाद
हैदराबाद हिंसा में कितने लोग मारे गए—इस प्रश्न पर लंबे समय से विवाद है।
सुंदरलाल प्रतिनिधिमंडल ने अपने दौरे और साक्षात्कारों के आधार पर बड़े पैमाने पर हत्याओं का अनुमान लगाया।
बाद के इतिहासलेखन में रिपोर्ट के आधार पर लगभग 27,000 से 40,000 मुस्लिम नागरिकों की मृत्यु का अनुमान व्यापक रूप से उद्धृत किया गया है।
कुछ लेख इससे अधिक संख्या भी बताते हैं, लेकिन उन अनुमानों की पद्धति और विश्वसनीयता समान नहीं है।
इसलिए वेबसाइट के शोध के लिए सुरक्षित और तथ्यपरक भाषा होगी—
सुंदरलाल समिति के आकलन से जुड़ा व्यापक रूप से उद्धृत अनुमान लगभग 27,000–40,000 मुस्लिम मृतकों का है; सटीक संख्या पर इतिहासकारों में सहमति नहीं है।
इसे “आधिकारिक अंतिम मृत्यु संख्या” नहीं कहा जाना चाहिए।
सेना की भूमिका
यह सबसे संवेदनशील प्रश्नों में है।
सुंदरलाल मिशन ने कुछ क्षेत्रों में भारतीय सेना के कुछ सदस्यों पर हिंसा रोकने में विफल रहने अथवा स्थानीय हिंसक समूहों के प्रति सहानुभूति दिखाने जैसे गंभीर आरोप दर्ज किए।
लेकिन पूरे भारतीय सैन्य अभियान को मुस्लिम-विरोधी नरसंहार की योजनाबद्ध सरकारी नीति कहना उपलब्ध साक्ष्यों से सिद्ध नहीं होता।
कई स्थानों पर भारतीय सैन्य अधिकारियों ने हिंसा रोकने और नागरिकों की रक्षा के प्रयास भी किए।
इसलिए एक संतुलित निष्कर्ष आवश्यक है—
ऑपरेशन पोलो की औपचारिक सैन्य नीति और उसके बाद जमीन पर हुई सांप्रदायिक प्रतिशोधात्मक हिंसा को एक ही चीज नहीं समझना चाहिए।
फिर भी जहां सैन्य अथवा प्रशासनिक अधिकारियों ने अपराध रोके नहीं या उनमें भागीदारी की, उसका ऐतिहासिक परीक्षण आवश्यक है।
पहले की रजाकार हिंसा को भूलना भी गलत
सुंदरलाल रिपोर्ट की चर्चा करते समय दूसरी दिशा का सरलीकरण भी नहीं होना चाहिए।
यदि केवल सितंबर 1948 के बाद मुस्लिम नागरिकों पर हुई हिंसा बताई जाए और उससे पहले रजाकारों द्वारा किए गए अत्याचारों को छिपा दिया जाए, तो इतिहास फिर अधूरा होगा।
1947–48 में रजाकार हिंसा,
हिंदू ग्रामीणों और राजनीतिक विरोधियों पर हमले,
ने प्रतिशोध के लिए अत्यंत विस्फोटक वातावरण तैयार किया था।
लेकिन इतिहास और न्याय का मूल सिद्धांत यही है—
एक पक्ष के अपराध दूसरे पक्ष के निर्दोष नागरिकों की हत्या को वैध नहीं बनाते।
इसलिए दोनों अध्याय एक साथ दर्ज होने चाहिए।
किसान संघर्ष और सांप्रदायिक हिंसा में अंतर
यहां तेलंगाना किसान आंदोलन के लिए एक विशेष सावधानी आवश्यक है।
रजाकारों और किसान दलमों की लड़ाई का बड़ा हिस्सा वर्गीय और राजनीतिक था।
ऑपरेशन पोलो के बाद मुस्लिम नागरिकों के विरुद्ध हुई सांप्रदायिक हिंसा अलग ऐतिहासिक प्रक्रिया थी।
दोनों एक ही समय और भौगोलिक क्षेत्र में होने के कारण एक-दूसरे से जुड़े अवश्य थे, लेकिन उन्हें एक ही घटना कहना गलत होगा।
कम्युनिस्ट आंदोलन में मुस्लिम कार्यकर्ता भी थे।
किसान संघर्ष का लक्ष्य सामान्य मुस्लिम आबादी नहीं था।
इसके उलट कई कम्युनिस्ट कार्यकर्ता सांप्रदायिक प्रतिशोध के विरोध में थे।
इसलिए तेलंगाना किसान आंदोलन को 1948 की हिंदू–मुस्लिम हिंसा में विलीन नहीं किया जाना चाहिए।
मराठवाड़ा और दूसरे क्षेत्र
1948 की सांप्रदायिक हिंसा का भूगोल भी तेलंगाना किसान संघर्ष से पूरी तरह मेल नहीं खाता।
हिंसा हैदराबाद राज्य के विभिन्न हिस्सों में हुई और कुछ सबसे गंभीर घटनाएं मराठवाड़ा तथा अन्य जिलों से जुड़ी बताई जाती हैं।
इसलिए यदि पूरे हैदराबाद राज्य की सांप्रदायिक हिंसा को सीधे “तेलंगाना किसान संघर्ष की हिंसा” कहा जाए तो यह तथ्यात्मक भूल होगी।
दोनों का अध्ययन अलग श्रेणियों में होना चाहिए।
इतिहास में स्मृति का संघर्ष
17 सितंबर की स्मृति आज भी अलग-अलग राजनीतिक शब्दों में व्यक्त होती है—
और कुछ समुदायों की स्मृति में हिंसा तथा त्रासदी।
इन शब्दों के पीछे अलग ऐतिहासिक अनुभव हैं।
जिस किसान ने रजाकार आतंक झेला, उसके लिए भारतीय सेना का प्रवेश मुक्ति जैसा हो सकता था।
जिस मुस्लिम परिवार ने ऑपरेशन के बाद अपने निर्दोष सदस्यों को प्रतिशोधात्मक हिंसा में खोया, उसके लिए वही काल त्रासदी था।
जिस राष्ट्रवादी कार्यकर्ता ने निजाम की निरंकुश सत्ता के विरुद्ध संघर्ष किया, उसके लिए यह राष्ट्रीय एकीकरण था।
इतिहास का काम इनमें से किसी एक स्मृति को जबरन सब पर लागू करना नहीं, बल्कि सभी प्रमाणित अनुभवों को उनके संदर्भ में रखना है।
# सितंबर 1948 — अंत भी और शुरुआत भी
ऑपरेशन पोलो ने तीन चीजें निर्णायक रूप से समाप्त कर दीं—
निजाम का स्वतंत्र हैदराबाद का राजनीतिक विकल्प;
रजाकारों की संगठित सशस्त्र शक्ति;
हैदराबाद का भारतीय संघ से बाहर रहने का प्रश्न।
लेकिन तेलंगाना किसान संघर्ष समाप्त नहीं हुआ।
यही उसके इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण विडंबना है।
1946 में किसान देशमुख से लड़ रहा था।
1947 में वह निजामशाही और रजाकारों से भी लड़ने लगा।
सितंबर 1948 के बाद उसका सामना उसी भारतीय राज्य से होने लगा जिसके हाथों निजाम और रजाकारों की सत्ता समाप्त हुई थी।
क्योंकि किसान संघर्ष का मूल प्रश्न केवल यह नहीं था कि हैदराबाद पर कौन शासन करेगा।
यदि पुराना देशमुख वापस आए और किसान से वह जमीन छीन ले जिसे संघर्ष में हासिल किया गया था, तो राजनीतिक ध्वज बदल जाने भर से गरीब किसान की क्रांति पूरी नहीं होती।
यही तर्क कम्युनिस्ट नेतृत्व ने दिया।
निजाम के बाद संघर्ष समाप्त क्यों नहीं हुआ?
राजनीतिक सत्ता बदली, भूमि प्रश्न नहीं
ऑपरेशन पोलो ने हैदराबाद की शीर्ष राजनीतिक सत्ता बदल दी, लेकिन गांवों में भूमि संबंध अपने आप नहीं बदले।
कई क्षेत्रों में बड़े भू-स्वामी और देशमुख, जो किसान संघर्ष के दौरान गांव छोड़कर भाग गए थे, भारतीय सेना और प्रशासन की उपस्थिति के बाद लौटने लगे।
वे अपनी पुरानी जमीन और संपत्ति वापस चाहते थे।
किसानों की दृष्टि में समस्या स्पष्ट थी।
जिस भूमि पर गरीब किसान ने संघर्ष के दौरान कब्जा किया था, उसे वह अपनी क्रांतिकारी उपलब्धि मानता था।
यदि वह जमीन वापस देशमुख को दे दी जाती, तो उसके लिए स्वतंत्रता का अर्थ क्या रह जाता?
यही सवाल आंदोलन को जिंदा रखता था।
भूमि कब्जों की रक्षा
कम्युनिस्ट नेतृत्व ने सितंबर 1948 के बाद संघर्ष जारी रखने का मुख्य औचित्य भूमि की रक्षा में देखा।
पी. सुंदरैया के विवरण में बार-बार यह तर्क आता है कि किसान जिन जमीनों को सामंती भू-स्वामियों से हासिल कर चुके थे, उन्हें वापस नहीं किया जाना चाहिए। उनके अनुसार भारतीय सैन्य प्रशासन की कार्रवाइयों से यह आशंका वास्तविक हो गई कि पुरानी भू-स्वामी सत्ता बहाल की जाएगी।
यहीं किसान संघर्ष और नई राज्य व्यवस्था आमने-सामने आए।
ग्राम समितियों का प्रश्न
जिन गांवों में संगम या ग्राम समितियां स्थानीय प्रशासन की भूमिका निभा रही थीं, वहां भारतीय राज्य के प्रवेश ने सत्ता-संघर्ष पैदा किया।
भारत सरकार के लिए समानांतर न्याय, कर, सुरक्षा या भूमि-वितरण व्यवस्था स्वीकार्य नहीं हो सकती थी।
राज्य की दृष्टि में हथियारबंद ग्राम सत्ता कानून-व्यवस्था का उल्लंघन थी।
कम्युनिस्टों की दृष्टि में वह किसानों की लोकतांत्रिक उपलब्धि थी।
दोनों पक्षों की राजनीतिक भाषा अलग थी।
निजाम-विरोधी गठबंधन टूट गया
1947–48 में कम्युनिस्ट और हैदराबाद स्टेट कांग्रेस के कुछ साझा हित थे।
दोनों निजाम और रजाकारों का विरोध कर रहे थे।
ऑपरेशन पोलो के बाद यह साझा आधार समाप्त हो गया।
कांग्रेस नेतृत्व ने भारतीय एकीकरण को राजनीतिक समाधान माना।
कम्युनिस्टों ने इसे अधूरा समाधान कहा क्योंकि भूमि-संबंध नहीं बदले थे।
इस तरह निजाम-विरोधी एकता के स्थान पर राज्य बनाम कम्युनिस्ट संघर्ष आया।
किसान की दुविधा
सभी किसान कम्युनिस्ट सशस्त्र संघर्ष जारी रखने के पक्ष में नहीं थे।
कुछ किसानों के लिए रजाकारों का अंत ही सबसे बड़ी राहत थी।
कुछ मध्यम किसानों को नई भारतीय व्यवस्था से स्थिरता की उम्मीद थी।
कुछ गरीब किसान भूमि खोने के भय से संघर्ष जारी रखना चाहते थे।
इसलिए 1948 के बाद आंदोलन का सामाजिक आधार 1946–47 जितना व्यापक नहीं रहा।
यही उसका पहला बड़ा संकट था।
संघर्ष की वैधता का नया प्रश्न
1946 में कोई भी किसान यह कह सकता था कि वह सामंती उत्पीड़न के विरुद्ध लड़ रहा है।
1947 में वह निजामशाही और रजाकारों के विरुद्ध भी लड़ रहा था।
लेकिन 1948 के बाद उसे समझाना कठिन था कि स्वतंत्र भारत की सेना और प्रशासन से संघर्ष क्यों जारी रहे।
यही वैचारिक प्रश्न कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर भी उठा।
भूमि बचाने का संघर्ष स्थानीय स्तर पर बहुत वास्तविक था।
लेकिन क्या इससे पूरे भारतीय राज्य के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति का औचित्य सिद्ध होता था?
यहीं स्थानीय किसान प्रश्न और अखिल भारतीय कम्युनिस्ट रणनीति के बीच दूरी बढ़ने लगी।
भारतीय सेना और प्रशासन की कार्रवाई
ऑपरेशन पोलो के बाद नया अभियान
ऑपरेशन पोलो समाप्त होने के बाद भारतीय सैन्य प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बहाल करने का अभियान शुरू किया।
रजाकारों को निशाना बनाया गया।
लेकिन जल्द ही कम्युनिस्ट दलम और संगम भी सुरक्षा कार्रवाई के केंद्र में आ गए।
भारतीय प्रशासन की दृष्टि में समानांतर सत्ता और सशस्त्र गुरिल्ला नेटवर्क स्वतंत्र राज्य की संप्रभुता को चुनौती थे।
इसलिए कम्युनिस्टों के विरुद्ध व्यवस्थित सैन्य-पुलिस अभियान शुरू हुआ।
गिरफ्तारियां
1948–51 के दौरान हजारों कम्युनिस्ट कार्यकर्ता, समर्थक और संदिग्ध गिरफ्तार किए गए।
सटीक संख्या अलग-अलग स्रोतों में भिन्न है।
कम्युनिस्ट स्रोत गिरफ्तारियों और हिरासत की संख्या बहुत अधिक बताते हैं, जबकि सरकारी आंकड़े कई बार अलग हैं।
लेकिन व्यापक तथ्य स्पष्ट है—
आंदोलन का बड़ा हिस्सा भूमिगत हो गया।
नेताओं और कैडरों को छिपना पड़ा।
गांवों की तलाशी
गुरिल्लाओं की शक्ति गांवों के समर्थन में थी।
इसलिए सुरक्षा बलों ने ग्रामीण नेटवर्क तोड़ने पर जोर दिया।
गांवों में तलाशी अभियान चलाए गए।
संदिग्ध घरों की जांच हुई।
भोजन, हथियार और संगठनात्मक सामग्री खोजी गई।
गांववालों से दलमों के बारे में पूछताछ की गई।
यह रणनीति किसी भी गुरिल्ला संघर्ष में सामान्य है—
लड़ाकू दस्ते को सीधे पकड़ना कठिन हो तो उसके सामाजिक आधार को कमजोर करो।
सामूहिक दंड की शिकायतें
कम्युनिस्ट और ग्रामीण स्रोतों में ऐसे आरोप मिलते हैं कि कुछ गांवों को सामूहिक रूप से दंडित किया गया, पुरुषों को हिरासत में लिया गया और महिलाओं व ग्रामीणों के साथ कठोर व्यवहार हुआ।
इन आरोपों की क्षेत्रवार और घटना-वार विश्वसनीयता अलग-अलग है।
फिर भी यह स्पष्ट है कि ग्रामीण आबादी स्वयं संघर्ष की मानवीय कीमत चुका रही थी।
दलमों का जंगलों की ओर हटना
मैदानी क्षेत्रों में सुरक्षा दबाव बढ़ने के बाद कई दलम वन और आदिवासी क्षेत्रों की ओर हटे।
गोदावरी क्षेत्र, पहाड़ी और जंगल वाले इलाके गुरिल्ला गतिविधियों के नए आधार बने।
मैदानी गांवों में सेना की पहुंच आसान थी।
जंगलों में छोटी गुरिल्ला इकाइयां अधिक समय तक टिक सकती थीं।
आदिवासी समुदायों का स्थानीय भूगोल संबंधी ज्ञान यहां महत्वपूर्ण था।
गुरिल्ला युद्ध का नया चरण
1948 के बाद दलमों की रणनीति पहले से अधिक रक्षात्मक होती गई।
अब उद्देश्य बड़े पैमाने पर नए क्षेत्र कब्जाना नहीं, बल्कि संगठन बचाना था।
छोटे सुरक्षा दलों पर कार्रवाई,
ये अधिक महत्वपूर्ण बन गए।
आंदोलन की सैन्य स्थिति कमजोर हो रही थी, लेकिन पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी।
नेतृत्व पर दबाव
अनेक महत्वपूर्ण कम्युनिस्ट नेता भूमिगत थे।
पार्टी का संचार तंत्र बाधित था।
केंद्रीय और स्थानीय नेतृत्व के बीच संपर्क कठिन हुआ।
इससे रणनीतिक निर्णयों में भ्रम पैदा हुआ।
कहीं स्थानीय दलम संघर्ष जारी रखते रहे जबकि पार्टी के भीतर नीति बदलने की चर्चा चल रही थी।
यही भूमिगत आंदोलन की बड़ी समस्या थी।
किसान समर्थन का क्षरण
लगातार संघर्ष का ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा।
कई किसान शांति चाहते थे।
यदि किसी आंदोलन का सामाजिक आधार थकने लगे, तो केवल विचारधारा के आधार पर गुरिल्ला युद्ध लंबे समय तक नहीं चल सकता।
1949–50 तक यही समस्या गंभीर होने लगी।
हिंसा का चक्र
सुरक्षा बलों की कार्रवाई के जवाब में दलमों ने पुलिस, मुखबिरों और आंदोलन विरोधियों पर हमला किया।
इससे राज्य की कार्रवाई और कठोर हुई।
ऐसे चक्र में राजनीतिक रेखा धुंधली होने लगती है।
किसान संघर्ष धीरे-धीरे जीवित रहने की लड़ाई बन सकता है।
यह तेलंगाना के दूसरे चरण की बड़ी त्रासदी थी।
कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर तेलंगाना पर बहस
संघर्ष केवल गांवों में नहीं, पार्टी के भीतर भी था
तेलंगाना 1948–51 के दौरान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सबसे बड़े रणनीतिक विवाद का केंद्र बन गया।
क्या भारत तत्काल क्रांतिकारी परिस्थिति में है?
क्या सशस्त्र संघर्ष जारी रखा जाए?
क्या तेलंगाना पूरे भारत के लिए मॉडल बन सकता है?
या लोकतांत्रिक राजनीति में भाग लेना चाहिए?
इन सवालों ने पार्टी को गहरे वैचारिक संकट में डाल दिया।
बी.टी. रणदिवे लाइन
1948 में बी.टी. रणदिवे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने।
उनके नेतृत्व में पार्टी ने अधिक उग्र क्रांतिकारी लाइन अपनाई।
मान्यता थी कि स्वतंत्रता अधूरी है और कांग्रेस नेतृत्व वाला नया भारतीय राज्य साम्राज्यवाद तथा भारतीय पूंजीपति वर्ग से समझौते पर आधारित है।
इसलिए मजदूर हड़तालों, जनविद्रोह और सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से सत्ता को चुनौती देने की रणनीति अपनाई गई।
लेकिन देश के अधिकांश हिस्सों में यह रणनीति अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकी।
पार्टी अलग-थलग पड़ने लगी।
तेलंगाना और रणदिवे लाइन का अंतर
दिलचस्प बात यह है कि तेलंगाना का संघर्ष रणदिवे की रणनीति से पहले शुरू हो चुका था।
उसकी जड़ वास्तविक किसान प्रश्न में थी।
इसलिए उसे केंद्रीय पार्टी की “आदेशित क्रांति” कहना गलत होगा।
लेकिन 1948 के बाद पार्टी की उग्र केंद्रीय लाइन ने संघर्ष को जारी रखने का वैचारिक आधार जरूर दिया।
आंध्र थीसिस
आंध्र के कम्युनिस्ट नेतृत्व ने एक अलग रणनीतिक दृष्टि विकसित की।
उनका अनुभव था कि ग्रामीण किसान गुरिल्ला संघर्ष भारतीय क्रांति का मुख्य रास्ता हो सकता है।
इस सोच को बाद में “आंध्र थीसिस” के नाम से जोड़ा गया।
इसमें चीनी क्रांति से प्रेरणा दिखाई देती थी।
विचार था कि ग्रामीण आधार क्षेत्रों से लंबा संघर्ष विकसित कर राज्य सत्ता को चुनौती दी जा सकती है।
चीन की 1949 की क्रांति
अक्टूबर 1949 में चीन में कम्युनिस्ट विजय ने भारतीय वामपंथ पर गहरा प्रभाव डाला।
तेलंगाना के अनुभव और चीनी मॉडल में कुछ समानताएं दिखाई दीं—
इससे पार्टी के भीतर उन लोगों को बल मिला जो ग्रामीण सशस्त्र संघर्ष को रणनीतिक मॉडल मानते थे।
लेकिन भारत की परिस्थितियां अलग थीं।
यहां 1950 में संविधान लागू हुआ।
सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार आधारित चुनावों की तैयारी हो रही थी।
कांग्रेस के पास विशाल जनाधार था।
राज्य संस्थाएं अपेक्षाकृत मजबूत थीं।
इसलिए चीनी मॉडल को यांत्रिक रूप से भारत में लागू करना कठिन था।
रणदिवे की विदाई
पार्टी के भीतर बढ़ती आलोचना के बाद बी.टी. रणदिवे को महासचिव पद से हटाया गया।
1950 में सी. राजेश्वर राव महासचिव बने।
उनका संबंध आंध्र और तेलंगाना अनुभव से अधिक निकट था।
इस परिवर्तन से यह संकेत मिला कि पार्टी तेलंगाना जैसे किसान संघर्ष को गंभीरता से देख रही है।
लेकिन समस्या हल नहीं हुई।
क्या तेलंगाना संघर्ष को पूरे देश में फैलाया जाए या स्वयं उसे समाप्त किया जाए?
सोवियत प्रभाव और रणनीतिक पुनर्विचार
भारतीय कम्युनिस्ट नेतृत्व ने अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन से भी मार्गदर्शन लिया।
मॉस्को में भारतीय नेताओं की बातचीत और सोवियत कम्युनिस्ट नेतृत्व की सलाह ने पार्टी की रणनीति पर प्रभाव डाला।
1951 तक यह समझ मजबूत हुई कि भारत की परिस्थितियां तत्काल सशस्त्र सत्ता-हस्तांतरण के लिए अनुकूल नहीं हैं।
इसके बजाय कानूनी और संसदीय राजनीतिक अवसरों का उपयोग किया जाना चाहिए।
नया पार्टी कार्यक्रम
1951 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने अपनी राजनीतिक रणनीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया।
अब चुनाव में भागीदारी और जनतांत्रिक राजनीतिक संघर्ष को स्वीकार किया गया।
इसका अर्थ यह नहीं था कि पार्टी ने भूमि क्रांति या समाजवाद का लक्ष्य छोड़ दिया।
सशस्त्र विद्रोह से संसदीय और जनसंगठनात्मक राजनीति की ओर संक्रमण शुरू हुआ।
तेलंगाना नेतृत्व का संकट
स्थानीय कार्यकर्ताओं के लिए यह परिवर्तन आसान नहीं था।
जो व्यक्ति वर्षों से भूमिगत था, उसके लिए अचानक कहना कि अब हथियार रखकर चुनाव लड़ेंगे—बहुत बड़ा मानसिक और राजनीतिक परिवर्तन था।
कुछ गुरिल्लाओं को डर था कि आत्मसमर्पण के बाद उन्हें गिरफ्तार या मार दिया जाएगा।
कुछ किसानों को डर था कि संघर्ष वापसी के बाद जमीन छिन जाएगी।
इसलिए केंद्रीय निर्णय को गांव तक लागू करना कठिन था।
क्या संघर्ष जारी रखना रणनीतिक भूल थी?
इतिहासकारों और कम्युनिस्ट नेताओं के बीच इस पर लंबे समय से बहस है।
एक दृष्टि कहती है कि सितंबर 1948 के बाद निजाम के पतन के साथ आंदोलन समाप्त कर देना चाहिए था।
दूसरी दृष्टि कहती है कि भूमि बचाने के लिए संघर्ष जारी रखना आवश्यक था।
तीसरी अधिक संतुलित व्याख्या यह है कि 1948 के बाद कुछ समय तक भूमि की रक्षा का वास्तविक सामाजिक आधार था, लेकिन पूरे भारतीय राज्य के विरुद्ध लंबा गुरिल्ला युद्ध बनाए रखने की रणनीति धीरे-धीरे अव्यावहारिक हो गई।
1951 में सशस्त्र संघर्ष की वापसी
वापसी का निर्णय अचानक नहीं था
1951 में संघर्ष समाप्त करने का निर्णय अचानक नहीं आया।
इसके पीछे कई वर्षों का अनुभव था।
गांवों में समर्थन कमजोर पड़ रहा था।
पार्टी की अखिल भारतीय रणनीति बदल रही थी।
चुनावी लोकतंत्र का रास्ता खुल रहा था।
और अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट नेतृत्व भी तत्काल सशस्त्र सत्ता-कब्जे की रणनीति को व्यवहारिक नहीं मान रहा था।
हथियार वापस लेने का प्रश्न
कम्युनिस्ट नेतृत्व के सामने सबसे कठिन कार्य था—
स्थानीय गुरिल्लाओं को कैसे समझाया जाए?
किसान को कैसे भरोसा दिलाया जाए कि वह राजनीतिक संघर्ष जारी रख सकता है?
भूमिगत कार्यकर्ताओं की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित हो?
कैदियों की रिहाई का प्रश्न कैसे उठाया जाए?
और भूमि-संबंधी उपलब्धियों को कैसे बचाया जाए?
यही कारण था कि वापसी केवल सैन्य आदेश नहीं थी।
यह राजनीतिक समझौते और संगठनात्मक पुनर्संरचना का प्रश्न था।
अक्टूबर 1951
तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष को औपचारिक रूप से अक्टूबर 1951 में वापस लेने की घोषणा की गई।
यही सामान्यतः आंदोलन के सशस्त्र चरण की समाप्ति मानी जाती है।
इस प्रकार 1946 से 1951 तक लगभग पांच वर्षों का किसान विद्रोह समाप्त हुआ।
लेकिन उसकी राजनीतिक यात्रा समाप्त नहीं हुई।
भूमिगत से चुनाव तक
1951–52 के आम चुनावों ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को नया रास्ता दिया।
कुछ जगह पार्टी पर प्रतिबंध और कानूनी कठिनाइयों के कारण कम्युनिस्टों ने पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट जैसे मंचों के माध्यम से चुनाव लड़ा।
तेलंगाना और हैदराबाद क्षेत्र में उन्हें उल्लेखनीय समर्थन मिला।
यह अत्यंत महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन था।
जो किसान क्षेत्र कुछ वर्ष पहले गुरिल्ला युद्ध का केंद्र था, वही अब मतपेटी के माध्यम से राजनीतिक शक्ति दिखा रहा था।
रवि नारायण रेड्डी की चुनावी सफलता
1952 के पहले आम चुनाव में रवि नारायण रेड्डी ने नलगोंडा लोकसभा क्षेत्र से भारी मतों से जीत दर्ज की।
उनकी जीत तेलंगाना संघर्ष की चुनावी विरासत का प्रतीक बनी।
कम्युनिस्टों का जनाधार केवल हथियारबंद दस्तों पर निर्भर नहीं था।
उनके पास वास्तविक ग्रामीण मतदाता समर्थन भी था।
क्या संघर्ष हार गया था?
यदि लक्ष्य तत्काल क्रांतिकारी सत्ता स्थापित करना था, तो संघर्ष असफल रहा।
कम्युनिस्ट शासन स्थापित नहीं हुआ।
लेकिन यदि आंदोलन के परिणाम व्यापक सामाजिक परिवर्तन में देखें, तो तस्वीर अलग है।
वेट्टी को वैध सामाजिक संस्था के रूप में फिर स्थापित करना लगभग असंभव हो गया।
बड़े भू-स्वामी प्रभुत्व को गहरी चोट लगी।
भूमि सुधार का प्रश्न राज्य की राजनीति के केंद्र में आया।
किरायेदार अधिकारों की मांग मजबूत हुई।
और गरीब किसान राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरा।
हथियार से मतपत्र तक
तेलंगाना संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन यही था—
1946 में किसान संगम बना रहा था।
1948 में वह हथियार लेकर गुरिल्ला संघर्ष कर रहा था।
1952 में वही सामाजिक आधार चुनाव में मतदान कर रहा था।
यह भारतीय लोकतंत्र और भारतीय वामपंथ दोनों की बड़ी ऐतिहासिक घटना थी।
भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए सबक
तेलंगाना ने भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन को कई गहरी सीख दीं।
किसान प्रश्न भारत की राजनीति में केंद्रीय है।
भूमि संघर्ष व्यापक जनाधार पैदा कर सकता है।
सशस्त्र संघर्ष को सामाजिक समर्थन और राजनीतिक परिस्थिति से अलग नहीं चलाया जा सकता।
भारत की संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को केवल “औपचारिक” मानकर नजरअंदाज करना राजनीतिक रूप से महंगा पड़ सकता है।
जनसंगठन और चुनावी राजनीति भी वर्ग संघर्ष के महत्वपूर्ण माध्यम हो सकते हैं।
किसान की दृष्टि से अंतिम प्रश्न
किसान के लिए सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं था कि पार्टी की कौन-सी थीसिस सही थी।
क्या देशमुख की पुरानी सत्ता लौटी?
क्या उसके बच्चों की स्थिति बदली?
इसी कसौटी पर तेलंगाना संघर्ष की वास्तविक उपलब्धियां और सीमाएं तय होंगी।
# 1951 : बंदूकें शांत हुईं, लेकिन संघर्ष की विरासत नहीं
तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष की समाप्ति भारतीय किसान राजनीति के एक युग का अंत थी।
लेकिन इसका प्रभाव स्वतंत्र भारत की राजनीति में लंबे समय तक रहा।
इसने तीन स्थायी प्रश्न छोड़ दिए—
ग्रामीण सत्ता किसके हाथ में?
और किसान अपने अधिकार के लिए कितनी दूर तक जा सकता है?
तेलंगाना ने भारतीय राज्य को भी संदेश दिया कि केवल राजनीतिक एकीकरण पर्याप्त नहीं है।
यदि गांवों में भूमि-संबंध, किरायेदारी, बेगार और सामाजिक अन्याय नहीं बदले, तो राजनीतिक स्थिरता कमजोर रह सकती है।
इसीलिए हैदराबाद राज्य में जागीरदारी उन्मूलन और किरायेदारी सुधार जैसे कदम आगे बढ़े।
लेकिन क्या इन सुधारों ने वास्तव में किसान की स्थिति बदल दी?
तेलंगाना आंदोलन में बांटी गई जमीन कितनी बची?
वेट्टी और सामंती संबंधों पर स्थायी असर क्या हुआ?
1952 के चुनावों में कम्युनिस्ट प्रभाव कितना था?
और क्या तेलंगाना ने नक्सलबाड़ी तथा बाद के वामपंथी किसान आंदोलनों को प्रेरित किया?
खंड 9 — परिणाम और दीर्घकालीन प्रभाव (अध्याय 33–37)
अध्याय 33 : तेलंगाना संघर्ष में भूमि का प्रश्न — वास्तविक उपलब्धि कितनी? भूमि वितरण के दावे, वास्तविक कब्जे, बाद में जमीन की वापसी और आंकड़ों का तुलनात्मक परीक्षण।
अध्याय 34 : वेट्टी और सामंती संबंधों पर प्रभाव बेगार, ग्रामीण सामाजिक सत्ता, मजदूरी और सम्मान की राजनीति में स्थायी परिवर्तन।
अध्याय 35 : स्वतंत्र भारत के भूमि सुधारों पर प्रभाव जागीरदारी उन्मूलन, किरायेदारी कानून, भूमि सुधार और हैदराबाद राज्य की नीतियों पर तेलंगाना संघर्ष का दबाव।
अध्याय 36 : चुनावी राजनीति में तेलंगाना संघर्ष की विरासत 1952 के चुनाव, पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट, रवि नारायण रेड्डी और कम्युनिस्ट जनाधार।
अध्याय 37 : बाद के किसान और वामपंथी आंदोलनों पर प्रभाव नक्सलबाड़ी, श्रीकाकुलम और अन्य किसान आंदोलनों के साथ समानताएं, प्रेरणा और महत्वपूर्ण अंतर।
तेलंगाना संघर्ष में भूमि का प्रश्न — वास्तविक उपलब्धि कितनी?
आंदोलन का केंद्रीय वादा
तेलंगाना संघर्ष के केंद्र में अंततः एक ही प्रश्न आकर खड़ा हुआ—
वेट्टी समाप्त करना गरीब किसान को तत्काल राहत देता था।
अवैध वसूली रोकना उसकी आय बचाता था।
लेकिन भूमि स्वामित्व बदलना ग्रामीण सत्ता की पूरी संरचना बदल सकता था।
इसीलिए आंदोलन धीरे-धीरे किरायेदार संरक्षण से आगे बढ़कर भूमि कब्जे और पुनर्वितरण की ओर गया।
दस लाख एकड़ का प्रसिद्ध दावा
तेलंगाना संघर्ष के संबंध में सबसे प्रसिद्ध आंकड़ा लगभग 10 लाख एकड़ भूमि के पुनर्वितरण का है।
पी. सुंदरैया और कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़े अनेक विवरणों में लगभग 10 लाख एकड़ भूमि गरीब किसानों में बांटे जाने का दावा किया गया।
जैसा पहले स्पष्ट किया जा चुका है, इस आंकड़े को सत्यापित सरकारी भूमि रजिस्टर की तरह नहीं पढ़ा जाना चाहिए।
विद्रोही परिस्थितियों में जमीन का “वितरण” कई रूप ले सकता था—
पूर्व में छीनी हुई जमीन किसान को वापस दिलाना;
भू-स्वामी द्वारा छोड़ी गई जमीन पर कब्जा;
परती या बंजर जमीन को खेती में देना;
किरायेदार को कब्जे में बनाए रखना;
या किसी भू-स्वामी की अतिरिक्त भूमि ग्राम समिति द्वारा गरीबों में बांटना।
इन सभी को एक ही श्रेणी में जोड़ने से आंकड़ा बड़ा हो सकता है।
सरकारी आंकड़े क्यों अलग थे?
सरकारी अभिलेखों में वैध भूमि हस्तांतरण की परिभाषा अलग थी।
यदि किसी किसान ने आंदोलन के दौरान किसी जमीन पर कब्जा किया लेकिन राजस्व रिकॉर्ड में स्वामित्व भू-स्वामी के नाम रहा, तो सरकारी आंकड़े उसे वैध पुनर्वितरण नहीं मानते थे।
यही कारण है कि कम्युनिस्ट और सरकारी अनुमानों के बीच बहुत बड़ा अंतर दिखाई देता है।
इसलिए इतिहासकारों के लिए सबसे सुरक्षित निष्कर्ष यह है—
तेलंगाना आंदोलन में व्यापक भूमि कब्जे और पुनर्वितरण हुए, लेकिन कुल कितनी भूमि स्थायी रूप से गरीब किसानों के स्वामित्व में गई—इसकी एक निर्विवाद संख्या उपलब्ध नहीं है।
कब्जा और स्वामित्व अलग चीजें
यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।
1947 या 1948 में किसी किसान ने जमीन पर कब्जा कर लिया हो, इसका अर्थ यह नहीं कि 1952 या 1960 में भी वह कानूनी रूप से उसी की रही।
ऑपरेशन पोलो के बाद पुराने भू-स्वामी लौटे।
राजस्व रिकॉर्ड दोबारा लागू हुए।
कई किसानों को भूमि से हटाया गया।
कुछ कब्जे मुकदमों में फंसे।
कुछ भूमि पर किसान टिके रहे।
और कुछ मामलों में बाद के किरायेदारी कानूनों ने उन्हें कानूनी सुरक्षा दे दी।
इसलिए आंदोलन द्वारा “बांटी गई जमीन” और स्थायी भूमि सुधार के परिणाम को अलग-अलग देखना आवश्यक है।
फिर भी भूमि संबंध पहले जैसे नहीं रहे
यहां आंदोलन की वास्तविक उपलब्धि सामने आती है।
सरकार पुराने भू-स्वामी संबंधों को पूरी तरह वैसे ही बहाल नहीं कर सकी जैसे 1946 से पहले थे।
क्योंकि किसान प्रश्न अब बड़े राजनीतिक संकट में बदल चुका था।
हैदराबाद राज्य के नए प्रशासन को भूमि-सुधार और किरायेदारी सुरक्षा की दिशा में कदम उठाने पड़े।
जागीरों का उन्मूलन
तेलंगाना में भूमि सुधार का पहला महत्वपूर्ण संरचनात्मक कदम था हैदराबाद (अोलिशन ऑफ जागीर्स) रेगुलेशन, 1949।
भारत की 1961 की भूमि-अवधि संबंधी आधिकारिक जनगणना समीक्षा के अनुसार पूर्व हैदराबाद राज्य की लगभग एक-तिहाई भूमि विभिन्न जागीरों में थी। जागीरों को 1949 में समाप्त किया गया और 15 अगस्त 1949 से उनका सरकारी अधिग्रहण प्रभावी हुआ। मुख्य किरायेदारों को कई मामलों में जमीन पर अधिभोग अधिकार मिले।
तेलंगाना सरकार की शैक्षिक सामग्री के अनुसार लगभग 995 जागीरदारों की मध्यस्थ स्थिति समाप्त हुई और जागीर क्षेत्रों को सीधे सरकारी राजस्व प्रशासन में लाया गया।
यह परिवर्तन केवल तेलंगाना विद्रोह के कारण नहीं हुआ था। पूरे भारत में स्वतंत्रता के बाद जमींदारी और मध्यस्थ भू-राजस्व व्यवस्थाओं को समाप्त करने का व्यापक कार्यक्रम चल रहा था।
लेकिन तेलंगाना के किसान संघर्ष ने हैदराबाद में इस सुधार को टालना अत्यंत कठिन बना दिया।
सरफ-ए-खास का अंत
निजाम की निजी भूमि-व्यवस्था सरफ-ए-खास भी 1949 में समाप्त कर दी गई और उसे दीवानी अर्थात सामान्य राज्य प्रशासन में मिला दिया गया। आधिकारिक भूमि-अवधि समीक्षा भी इसका उल्लेख करती है।
इस प्रकार निजामकालीन भूमि प्रशासन की दो महत्वपूर्ण संस्थाएं—जागीर और सरफ-ए-खास—स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों में समाप्त हो गईं।
हैदराबाद टेनेंसी एंड एग्रीकल्चरल लैंड्स एक्ट, 1950
भूमि सुधार का दूसरा बड़ा कदम था Hyderabad Tenancy and Agricultural Lands Act, 1950।
यह केवल प्रतीकात्मक कानून नहीं था।
इसने किरायेदारों की स्थिति को व्यवस्थित कानूनी सुरक्षा देने का प्रयास किया।
और संरक्षित किरायेदारों के अधिकार
जैसे मुद्दों को शामिल किया गया।
किसी भू-स्वामी को किरायेदार को मनमाने ढंग से हटाने के बजाय वैधानिक प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक हुआ।
तेलंगाना सरकार के शैक्षिक इतिहास में भी इसे संघर्ष के बाद किरायेदारों को सुरक्षा देने वाला महत्वपूर्ण कानून बताया गया है।
संरक्षित किरायेदारी
इस कानून का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव यह था कि लंबे समय से खेती कर रहे अनेक किरायेदारों को protected tenant का दर्जा प्राप्त करने का रास्ता मिला।
इससे ग्रामीण शक्ति-संतुलन बदला।
पहले किसान के लिए सबसे बड़ा भय था—
“दोरा जब चाहे जमीन से निकाल देगा।”
अब उसे कम-से-कम कानूनी सुरक्षा का दावा प्राप्त हुआ।
कानून का क्रियान्वयन असमान था और आगे के संशोधनों ने कई सीमाएं पैदा कीं, लेकिन किरायेदारी को विधिक अधिकार के प्रश्न में बदलना स्वयं बड़ा परिवर्तन था।
क्रांति से कानून तक
तेलंगाना की भूमि राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण रूपांतरण यहीं हुआ।
1946 में किसान खेत पर लाठी लेकर कब्जा बचा रहा था।
1950 में वही मुद्दा कानून की धाराओं में दर्ज हो रहा था।
इससे यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं कि सरकार ने कम्युनिस्ट कार्यक्रम स्वीकार कर लिया।
लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि संघर्ष का भूमि नीति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
तेलंगाना विद्रोह ने भूमि और किरायेदारी प्रश्न को ऐसी राजनीतिक तात्कालिकता दी जिसे नई सरकार अनदेखा नहीं कर सकती थी।
वेट्टी और सामंती संबंधों पर प्रभाव
वेट्टी का कानूनन अंत पहले हो चुका था
तेलंगाना के इतिहास में एक दिलचस्प विरोधाभास है।
वेट्टी जैसी जबरन श्रम व्यवस्था को समाप्त करने के कानूनी प्रयास विद्रोह से पहले भी किए गए थे।
तेलंगाना सरकार की शैक्षिक सामग्री बताती है कि 1927 में ही वेट्टी के विरुद्ध कानूनी प्रतिबंध लगाया गया था, लेकिन जमीन पर उसका प्रभाव सीमित रहा।
यह उदाहरण कानून और सामाजिक वास्तविकता के अंतर को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
कागज पर प्रतिबंध होना एक बात है।
ग्रामीण गरीब का देशमुख को “नहीं” कह पाना दूसरी।
आंदोलन ने कानून को सामाजिक वास्तविकता बनाया
जहां संगम मजबूत हुए, वहां वेट्टी को सामूहिक रूप से अस्वीकार किया गया।
इसलिए आंदोलन की वास्तविक उपलब्धि यह नहीं थी कि उसने पहली बार वेट्टी को “अवैध” घोषित किया।
उसने गरीब किसान को वेट्टी करने से सामूहिक रूप से इनकार करने की शक्ति दी।
तेलंगाना सरकार की शैक्षिक सामग्री भी स्वीकार करती है कि जिन क्षेत्रों में सशस्त्र किसान आंदोलन मजबूत था, वहां 1948 तक वेट्टी व्यवहारिक रूप से समाप्त कर दी गई।
“दोरा” की सत्ता पर चोट
तेलंगाना में सामंतवाद केवल कानूनी भू-स्वामित्व नहीं था।
वह सामाजिक व्यवहार भी था।
देशमुख अथवा बड़ा भू-स्वामी गांव का—
और कई बार स्थानीय न्याय का केंद्र—
आंदोलन ने इसी बहुआयामी सत्ता को तोड़ा।
जिस किसान ने संगम की बैठक में देशमुख का विरोध किया, उसने केवल आर्थिक व्यवस्था नहीं बदली।
उसने भय की संस्कृति को चुनौती दी।
सम्मान की राजनीति
तेलंगाना संघर्ष की सबसे कम मापी जाने वाली लेकिन सबसे स्थायी उपलब्धि सामाजिक सम्मान थी।
भूमिहीन व्यक्ति पहली बार संगम का पदाधिकारी हो सकता था।
दलित मजदूर वेट्टी से इनकार कर सकता था।
महिला राजनीतिक सभा में बोल सकती थी।
किरायेदार भू-स्वामी के सामने संगठन के साथ खड़ा हो सकता था।
इन परिवर्तनों को एकड़ या रुपये में नहीं मापा जा सकता।
लेकिन सामाजिक इतिहास में इनका महत्व भूमि हस्तांतरण जितना ही है।
मजदूरी संबंधों में परिवर्तन
वेट्टी के पतन के साथ श्रम को मजदूरी के संबंध में बदलने की प्रक्रिया तेज हुई।
यदि किसान मुफ्त श्रम करने से इनकार करता है, तो भू-स्वामी को काम के लिए भुगतान करना पड़ता है।
इससे कृषि श्रम बाजार में गरीब मजदूर की सौदेबाजी की क्षमता बढ़ती है।
यह परिवर्तन हर गांव में समान नहीं था और गरीबी समाप्त नहीं हुई।
लेकिन श्रम पर भू-स्वामी का पारंपरिक “अधिकार” नैतिक और राजनीतिक रूप से अवैध होने लगा।
सामाजिक नियंत्रण का पतन
आंदोलन से पहले गांव में भू-स्वामी का प्रभाव व्यक्ति के निजी जीवन तक पहुंच सकता था।
सभी पर स्थानीय शक्ति का असर हो सकता था।
ग्राम समितियों और संगमों ने पहली बार इस नियंत्रण के समानांतर सार्वजनिक मंच बनाया।
भले ही ये समितियां स्थायी न रहीं, उन्होंने ग्रामीण जनता को यह अनुभव दिया कि न्याय और प्रशासन केवल “दोरा” का विशेषाधिकार नहीं है।
जाति पर सीमित लेकिन वास्तविक प्रभाव
आंदोलन ने जाति व्यवस्था समाप्त नहीं की।
लेकिन जब दलित मजदूर और अन्य गरीब किसान एक ही संगम में राजनीतिक कार्रवाई करते हैं, तो जातिगत पदानुक्रम पर दबाव पड़ता है।
वेट्टी जैसी प्रथाएं अक्सर जातिगत सेवा संबंधों से जुड़ी थीं।
उनके कमजोर होने से सामाजिक दूरी की कुछ पुरानी संरचनाओं पर भी चोट पड़ी।
फिर भी आंदोलन की सीमा स्पष्ट थी—
भूमि और वर्ग संघर्ष को प्राथमिकता देने के कारण जातिगत भेदभाव की स्वतंत्र संरचना पर उतना व्यवस्थित कार्यक्रम विकसित नहीं हुआ जितना बाद की दलित राजनीति मांगने वाली थी।
पितृसत्ता पर प्रभाव
महिलाओं की सक्रिय भागीदारी ने ग्रामीण पितृसत्ता पर भी प्रश्न खड़े किए।
महिला का रात में राजनीतिक बैठक में जाना,
भूमि विवाद में दावा करना
या सार्वजनिक रूप से बोलना—
इनमें से प्रत्येक परंपरागत लैंगिक व्यवस्था को चुनौती था।
लेकिन आंदोलन समाप्त होने के बाद महिलाओं की बहुत-सी सार्वजनिक भूमिकाएं कम हुईं।
इसलिए महिला मुक्ति की उपलब्धि आंशिक रही।
क्या सामंतवाद समाप्त हो गया?
पुराने भू-स्वामी परिवारों के अनेक सदस्य जमीन और आर्थिक प्रभाव बनाए रखने में सफल रहे।
जागीर समाप्त होने का अर्थ यह नहीं था कि सारी निजी बड़ी भूमि स्वतः गरीबों में बंट गई।
तेलंगाना सरकार के इतिहास में भी यह स्पष्ट किया गया है कि जमींदारों को मुआवजा मिला, भवन, पशुशालाएं और कृषि उपकरण उनके पास रहे तथा भूमि-सीमा के अभाव में बड़ी मात्रा में भूमि “खुदकाश्त” के नाम पर उनके नियंत्रण में बची रही।
सामंती राजनीतिक प्रभुत्व को निर्णायक चोट लगी, लेकिन आर्थिक असमानता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
स्वतंत्र भारत के भूमि सुधारों पर प्रभाव
भूमि सुधार राष्ट्रीय परियोजना भी था
तेलंगाना संघर्ष और भूमि सुधार के संबंध में एक सावधानी जरूरी है।
स्वतंत्र भारत में जमींदारी उन्मूलन केवल तेलंगाना के कारण नहीं हुआ।
और अन्य राज्यों में भी मध्यस्थ भूमि व्यवस्थाएं समाप्त की जा रही थीं।
यह राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के लंबे एजेंडे का हिस्सा था।
इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि हैदराबाद में सभी भूमि सुधार केवल कम्युनिस्ट विद्रोह के कारण हुए।
लेकिन दूसरी ओर तेलंगाना ने इस प्रश्न को कहीं अधिक विस्फोटक बना दिया।
सरकार के सामने व्यावहारिक चुनौती
1948 के बाद भारत सरकार के सामने विकल्प था—
या तो पुरानी ग्रामीण व्यवस्था बहाल करे और फिर व्यापक किसान विद्रोह का सामना करे,
या भूमि संरचना में सुधार करे।
वास्तविक नीति दोनों के बीच थी।
सरकार ने सशस्त्र कम्युनिस्ट सत्ता को समाप्त किया।
लेकिन साथ ही जागीरदारी समाप्त की और किरायेदार अधिकारों को कानून में शामिल किया।
यही स्वतंत्र भारत की भूमि नीति का सुधारवादी मार्ग था—
क्रांति नहीं, कानून द्वारा परिवर्तन।
जागीरदारी उन्मूलन की व्यापकता
1949 का जागीर उन्मूलन महत्वपूर्ण था क्योंकि आधिकारिक जनगणना अध्ययन के अनुसार जागीरें पूर्व हैदराबाद राज्य के लगभग एक-तिहाई क्षेत्र को प्रभावित करती थीं।
इस व्यवस्था के समाप्त होने से सरकार और वास्तविक कृषक के बीच राजस्व मध्यस्थता की बड़ी परत हट गई।
जागीरदार का राज्य से प्राप्त राजस्व-अधिकार समाप्त हुआ।
यह निजामकालीन राजनीतिक अर्थव्यवस्था की बड़ी संरचनात्मक समाप्ति थी।
किरायेदारों का रिकॉर्ड तैयार करना
1950 के किरायेदारी कानून के साथ नियम बनाए गए जिनमें कृषि किरायेदारी का प्राथमिक रिकॉर्ड तैयार करना, आपत्तियां सुनना, तहसील स्तर पर जांच और संरक्षित किरायेदारों के प्रमाणपत्र जैसे प्रावधान शामिल थे।
यह प्रशासनिक परिवर्तन अत्यंत महत्वपूर्ण था।
जिस किसान का अधिकार पहले केवल मौखिक परंपरा पर निर्भर था, उसे सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज कराने का अवसर मिला।
भूमि-अधिकार में कागज की शक्ति बहुत बड़ी होती है।
बेदखली पर नियंत्रण
किरायेदार को हटाने की प्रक्रिया अब पूरी तरह भू-स्वामी की इच्छा पर निर्भर नहीं रह सकती थी।
कानून ने तहसीलदार तथा अन्य राजस्व अधिकारियों को प्रक्रिया का हिस्सा बनाया। उपलब्ध विधिक पाठ में भी यह स्पष्ट है कि किसी भू-स्वामी द्वारा कब्जा वापस लेने के लिए नियत प्रशासनिक प्रक्रिया का पालन आवश्यक था।
यह बदलाव सीधे उस समस्या को संबोधित करता था जिसने तेलंगाना संघर्ष को उग्र बनाने में बड़ी भूमिका निभाई थी—
भूमि सीमा का अधूरा प्रश्न
यहीं भूमि सुधार की सबसे बड़ी सीमा थी।
जागीरदारी हटाना और किरायेदारी सुरक्षित करना एक बात थी।
भूमि के अधिकतम निजी स्वामित्व पर कठोर सीमा लगाकर अतिरिक्त जमीन भूमिहीनों में बांटना दूसरी।
स्वतंत्र भारत का प्रारंभिक सुधार इस दूसरे चरण में उतना दूर नहीं गया जितना कम्युनिस्ट किसान आंदोलन चाहता था।
तेलंगाना की सरकारी शैक्षिक सामग्री भी स्वीकार करती है कि भूमि-सुधार समिति ने भूमि स्वामित्व पर सीमा, अतिरिक्त भूमि लेने और किरायेदार सुरक्षा जैसे व्यापक सुझाव दिए थे, लेकिन केवल कुछ ही पूरी तरह लागू हुए।
मुआवजे का प्रश्न
सरकारी नीति ने भू-स्वामियों से अधिकार समाप्त करते समय मुआवजा दिया।
यह क्रांतिकारी भूमि जब्ती से बिल्कुल अलग मॉडल था।
कम्युनिस्ट दृष्टिकोण से यह सामंती वर्ग को आर्थिक संरक्षण था।
सरकार की दृष्टि से यह संपत्ति अधिकारों के कानूनी संक्रमण का आवश्यक हिस्सा था।
यह फर्क स्वतंत्र भारत के भूमि सुधार और तेलंगाना के क्रांतिकारी भूमि कार्यक्रम के बीच मूल वैचारिक अंतर दिखाता है।
इनाम भूमि
जागीरों के बाद इनाम भूमि का प्रश्न बचा रहा।
आधिकारिक भूमि-अवधि समीक्षा के अनुसार इनाम उन्मूलन से संबंधित कानून 1954 में बनाया गया और 1955 से अधिकांश संबंधित व्यवस्थाओं का उन्मूलन प्रभावी हुआ।
इससे पता चलता है कि निजामकालीन मध्यस्थ और विशेष भू-अधिकारों की समाप्ति एक घटना नहीं बल्कि कई वर्षों की प्रक्रिया थी।
तेलंगाना संघर्ष का नीति-स्तरीय प्रभाव
तेलंगाना ने स्वतंत्र भारत के नीति-निर्माताओं को तीन स्पष्ट संदेश दिए—
भूमि-सुधार टाला नहीं जा सकता;
किरायेदार को कानूनी सुरक्षा चाहिए;
और ग्रामीण सामाजिक व्यवस्था में राज्य की निष्पक्षता स्थापित किए बिना स्थिरता संभव नहीं।
यही उसके दीर्घकालीन संस्थागत प्रभाव का सबसे मजबूत प्रमाण है।
चुनावी राजनीति में तेलंगाना संघर्ष की विरासत
हथियार से मतपत्र तक पहली बड़ी परीक्षा
सशस्त्र संघर्ष अक्टूबर 1951 में वापस लिया गया।
इसके कुछ ही महीनों बाद भारत में पहला आम चुनाव हुआ।
यह तेलंगाना आंदोलन के लिए अद्भुत ऐतिहासिक परीक्षा थी।
यदि कम्युनिस्टों का ग्रामीण प्रभाव केवल भय और हथियार पर आधारित था, तो चुनाव में उनका समर्थन समाप्त हो जाना चाहिए था।
यदि वास्तविक जनाधार मौजूद था, तो मतपत्र में वह दिखाई देना चाहिए था।
1951–52 के चुनाव परिणामों ने दूसरा निष्कर्ष मजबूत किया।
पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट
कम्युनिस्ट पार्टी के सामने कानूनी और संगठनात्मक प्रतिबंधों के कारण हैदराबाद में उसके अनेक उम्मीदवार People's Democratic Front—PDF के नाम से चुनाव मैदान में उतरे।
PDF वामपंथी और कम्युनिस्ट प्रभाव वाला मंच था।
हैदराबाद राज्य विधानसभा के 1952 चुनाव में PDF ने महत्वपूर्ण प्रदर्शन किया।
उपलब्ध चुनाव परिणामों के अनुसार उसने 77 सीटों पर चुनाव लड़ा और 42 सीटें जीतीं, जबकि लगभग 20.76 प्रतिशत वोट हासिल किए। कांग्रेस ने 175 सदस्यीय विधानसभा में 93 सीटें जीतीं।
यह परिणाम अत्यंत महत्वपूर्ण था।
कुछ ही महीने पहले भूमिगत लड़ाई लड़ रहा राजनीतिक आंदोलन नई लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रमुख विपक्षी शक्ति के रूप में उभर गया।
तेलंगाना क्षेत्रों में प्रभाव और अधिक मजबूत
PDF का समर्थन पूरे हैदराबाद राज्य में समान नहीं था।
उसका सबसे मजबूत क्षेत्र वही तेलंगाना था जहां किसान संघर्ष तीव्र रहा था।
लोकसभा चुनाव के परिणाम इसे और स्पष्ट करते हैं।
नलगोंडा
नलगोंडा दो सदस्यीय लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र था।
यहां PDF के दोनों उम्मीदवार जीते—
रवि नारायण रेड्डी — 3,09,162 मत
सुकम अचालु — 2,82,117 मत
चुनाव आयोग के आधिकारिक 1951–52 चुनाव आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं।
रवि नारायण रेड्डी को उस निर्वाचन क्षेत्र में अपने निकटतम कांग्रेस उम्मीदवार से असाधारण रूप से अधिक वोट मिले।
इस परिणाम ने उन्हें स्वतंत्र भारत की प्रारंभिक संसदीय राजनीति के सबसे चर्चित विजेताओं में शामिल कर दिया।
वारंगल
वारंगल में PDF के पेंड्याला राघव राव ने 77,264 मत लेकर कांग्रेस के कालोजी नारायण राव को हराया।
खम्मम
खम्मम में PDF के टी.बी. विट्ठल राव ने 1,01,223 मत प्राप्त किए और बड़ी जीत दर्ज की।
करीमनगर
करीमनगर के दो सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र में PDF के बद्दम येल्ला रेड्डी भी विजयी हुए। उन्हें 1,97,234 मत मिले।
इस प्रकार जिन क्षेत्रों में किसान संघर्ष मजबूत रहा था, वहां वामपंथी राजनीतिक प्रभाव चुनाव में स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।
इसका ऐतिहासिक अर्थ
यह परिणाम तीन महत्वपूर्ण निष्कर्ष देता है।
पहला, तेलंगाना आंदोलन का ग्रामीण जनाधार वास्तविक था।
यदि समर्थन केवल गुरिल्ला दबाव से पैदा हुआ होता तो संघर्ष समाप्त होने के तुरंत बाद इतनी बड़ी चुनावी सफलता कठिन होती।
दूसरा, किसान समाज ने सशस्त्र संघर्ष से संसदीय राजनीति की ओर संक्रमण को स्वीकार किया।
तीसरा, भारतीय लोकतंत्र ने एक ऐसी राजनीतिक धारा को संस्थागत रास्ता दिया जो कुछ महीने पहले राज्य के विरुद्ध हथियारबंद संघर्ष कर रही थी।
यह स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की भी महत्वपूर्ण परीक्षा थी।
कांग्रेस भी कमजोर नहीं थी
यह भी याद रखना चाहिए कि पूरे हैदराबाद राज्य में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी रही।
उसने विधानसभा की 175 में से 93 सीटें जीतीं और लगभग 41.86 प्रतिशत मत प्राप्त किए।
इसलिए यह कहना गलत होगा कि तेलंगाना संघर्ष के बाद पूरे हैदराबाद पर कम्युनिस्ट राजनीतिक प्रभुत्व हो गया था।
तेलंगाना के विद्रोह-प्रभावित क्षेत्रों में कम्युनिस्ट और PDF प्रभाव अत्यंत मजबूत था, जबकि पूरे हैदराबाद राज्य में कांग्रेस मुख्य राजनीतिक शक्ति बनी रही।
लोकतांत्रिक राजनीति ने रणनीति बदल दी
1952 के परिणाम ने भारतीय कम्युनिस्ट नेतृत्व को दिखाया कि जनता की वास्तविक शक्ति केवल सशस्त्र विद्रोह में नहीं, मतपेटी में भी व्यक्त हो सकती है।
तेलंगाना का अनुभव आने वाले दशकों में भारतीय कम्युनिस्ट राजनीति के दो रास्तों के बीच बहस का आधार बना—
सशस्त्र क्रांतिकारी वामपंथ।
आगे चलकर यही विभाजन नक्सलबाड़ी के समय फिर सामने आया।
बाद के किसान और वामपंथी आंदोलनों पर प्रभाव
तेलंगाना की स्मृति समाप्त नहीं हुई
1951 में संघर्ष वापस ले लिया गया, लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन में तेलंगाना एक मिथक, मॉडल और चेतावनी—तीनों रूपों में जीवित रहा।
उसने दिखाया कि ग्रामीण भारत में—
एक व्यापक आंदोलन पैदा कर सकते हैं।
लेकिन उसने यह भी दिखाया कि मजबूत राज्य और बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के सामने सशस्त्र रणनीति की सीमाएं क्या हैं।
नक्सलबाड़ी से समानता
1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी में किसान विद्रोह हुआ।
वह भी भूमि, बटाईदार अधिकार और ग्रामीण वर्ग संघर्ष से जुड़ा था।
उसके नेतृत्व में चारु मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संथाल जैसे नेता सामने आए।
तेलंगाना और नक्सलबाड़ी में कुछ स्पष्ट समानताएं थीं—
बड़े भू-स्वामियों का विरोध;
गरीब किसान और आदिवासी भागीदारी;
और ग्राम-स्तरीय सत्ता को चुनौती।
इसी कारण तेलंगाना को कई बार नक्सलबाड़ी का ऐतिहासिक पूर्वज कहा जाता है।
लेकिन दोनों समान नहीं थे
तेलंगाना आंदोलन एक विशाल रियासत में सामंती संबंधों, निजामशाही और बाद में भारतीय राज्य—तीनों चरणों से गुजरा।
नक्सलबाड़ी स्वतंत्र भारत की स्थापित संवैधानिक व्यवस्था में हुआ।
तेलंगाना का नेतृत्व भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर था, जिसने बाद में संसदीय राजनीति स्वीकार कर ली।
नक्सलबाड़ी से निकली धारा ने इसी संसदीय कम्युनिस्ट राजनीति को संशोधनवादी मानकर अस्वीकार किया।
इसलिए नक्सलबाड़ी ने तेलंगाना से प्रेरणा ली, लेकिन तेलंगाना की 1951 वाली राजनीतिक वापसी को स्वीकार नहीं किया।
तेलंगाना की “गलती” पर नक्सली दृष्टि
उग्र वामपंथी विचारधारा में बाद में यह तर्क विकसित हुआ कि तेलंगाना संघर्ष को वापस लेना ऐतिहासिक भूल थी।
उनके अनुसार यदि किसान गुरिल्ला आंदोलन जारी रहता तो भारतीय क्रांति आगे बढ़ सकती थी।
इसके विपरीत CPI और बाद में CPI(M) की मुख्यधारा ने तेलंगाना से यह सीख निकाली कि परिस्थितियों का ठोस आकलन किए बिना सशस्त्र संघर्ष को अनिश्चित काल तक जारी नहीं रखा जा सकता।
यहीं तेलंगाना की विरासत पर वामपंथ के भीतर स्थायी विभाजन पैदा हुआ।
श्रीकाकुलम आंदोलन
1960 के दशक के उत्तरार्ध में आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम क्षेत्र में आदिवासी और किसान सशस्त्र आंदोलन विकसित हुआ।
इसमें नक्सलबाड़ी की प्रेरणा स्पष्ट थी, लेकिन आंध्र के क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं के लिए तेलंगाना की स्मृति भी बहुत निकट थी।
साहूकार और भू-स्वामी विरोध,
इनमें तेलंगाना के अनुभव की प्रतिध्वनि दिखाई देती है।
“ग्राम राज” की विरासत
तेलंगाना की ग्राम समितियों की स्मृति बाद के क्रांतिकारी वामपंथ में विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही।
विचार था कि राज्य सत्ता केवल राजधानी पर कब्जा करके नहीं, बल्कि गांव स्तर पर वैकल्पिक सत्ता स्थापित करके चुनौती दी जा सकती है।
यह विचार चीन की क्रांति से भी आया था, लेकिन भारत में उसका अपना ऐतिहासिक उदाहरण तेलंगाना था।
बाद के नक्सली आंदोलनों की “जनताना सरकार”, “क्रांतिकारी किसान समिति” अथवा दूसरे ग्राम-स्तरीय संस्थागत प्रयोगों में इस ऐतिहासिक परंपरा की दूर की प्रतिध्वनि देखी जा सकती है—हालांकि संगठनात्मक और ऐतिहासिक परिस्थितियां अलग हैं।
भारतीय किसान राजनीति पर दूसरा प्रभाव
तेलंगाना की विरासत केवल नक्सलवादी आंदोलन तक सीमित नहीं रही।
उसने गैर-सशस्त्र किसान राजनीति पर भी प्रभाव डाला।
ये मुद्दे स्वतंत्र भारत की विभिन्न किसान सभाओं के कार्यक्रम में बने रहे।
तेलंगाना ने दिखाया कि भूमि प्रश्न को लंबे समय तक दबाने की कीमत राज्य को गंभीर सामाजिक संघर्ष के रूप में चुकानी पड़ सकती है।
वामपंथी चुनावी राजनीति पर प्रभाव
तेलंगाना ने CPI को यह भी दिखाया कि किसान संगठन संसदीय शक्ति में बदला जा सकता है।
1952 की सफलता ने भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन को चुनावी राजनीति की संभावनाओं का प्रत्यक्ष उदाहरण दिया।
में वामपंथ की चुनावी राजनीति का सामाजिक आधार किसानों और कृषि मजदूरों के संगठनों से गहराई से जुड़ा रहा।
इस अर्थ में तेलंगाना की विरासत दो विपरीत राजनीतिक धाराओं में गई—
एक ओर संसदीय कम्युनिस्ट राजनीति,
दूसरी ओर नक्सली सशस्त्र राजनीति।
दोनों ने तेलंगाना को अपनी-अपनी तरह से पढ़ा।
भूमि सुधार की राष्ट्रीय चेतना
तेलंगाना जैसी घटनाओं ने कांग्रेस नेतृत्व वाली राज्य सरकारों को भी यह समझाया कि ग्रामीण सुधार केवल आदर्शवाद का विषय नहीं बल्कि राजनीतिक स्थिरता का प्रश्न है।
इन मुद्दों पर 1950 और 1960 के दशकों में लगातार कानून बनाए गए।
इन सुधारों की सफलता अलग-अलग राज्यों में अलग रही, लेकिन तेलंगाना ने भूमि-विस्फोट की संभावित राजनीतिक कीमत दिखा दी थी।
बाद के तेलंगाना राज्य आंदोलन से संबंध
1956 में भाषाई पुनर्गठन के बाद तेलंगाना क्षेत्र नवगठित आंध्र प्रदेश का हिस्सा बना।
आगे चलकर अलग तेलंगाना राज्य की मांग उठी।
1969 का तेलंगाना आंदोलन और बाद में 2000 के दशक का राज्य आंदोलन मुख्यतः क्षेत्रीय असमानता, रोजगार, जल, संसाधन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रश्नों पर केंद्रित था।
उसे सीधे 1946–51 के किसान सशस्त्र संघर्ष की निरंतरता कहना गलत होगा।
लेकिन तेलंगाना की राजनीतिक स्मृति में—
और क्षेत्रीय आत्मसम्मान—
की ऐतिहासिक परंपराएं बाद के आंदोलनों में प्रतीकात्मक रूप से उपस्थित रहीं।
2014 में तेलंगाना राज्य बनने के बाद चाकली इलम्मा, कोमाराम भीम और तेलंगाना किसान संघर्ष के अनेक पात्रों को राज्य की सार्वजनिक स्मृति में नए महत्व के साथ स्थापित किया गया।
# तेलंगाना संघर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या थी?
यदि केवल सैन्य परिणाम देखें तो विद्रोह हार गया।
यदि तत्काल भूमि कब्जा देखें तो उसका बड़ा हिस्सा स्थायी नहीं रहा।
यदि सामाजिक क्रांति की कसौटी लें तो जाति, पितृसत्ता और आर्थिक असमानता समाप्त नहीं हुई।
फिर भी तेलंगाना संघर्ष को विफल आंदोलन कहना इतिहास के साथ अन्याय होगा।
उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी—
उसने ग्रामीण सत्ता का प्रश्न बदल दिया।
1946 से पहले किसान से पूछा जाता था—
1951 के बाद राज्य को पूछना पड़ा—
यही परिवर्तन महत्वपूर्ण था।
किरायेदारों को कानूनी सुरक्षा मिली।
वेट्टी सामाजिक रूप से अस्वीकार्य हुई।
भूमि सुधार राजनीतिक एजेंडा बना।
और कुछ ही महीनों में भूमिगत कम्युनिस्ट आंदोलन चुनावी राजनीति की बड़ी शक्ति बन गया।
1952 के चुनाव में नलगोंडा, खम्मम, वारंगल और करीमनगर जैसे संघर्ष-प्रभावित क्षेत्रों में PDF की सफलताएं इस बात का प्रमाण थीं कि किसान विद्रोह के पीछे वास्तविक सामाजिक समर्थन मौजूद था। चुनाव आयोग के आधिकारिक आंकड़ों में नलगोंडा से रवि नारायण रेड्डी के 3,09,162 मत और सुकम अचालु के 2,82,117 मत, खम्मम में टी.बी. विट्ठल राव की जीत और वारंगल में पेंड्याला राघव राव की विजय दर्ज हैं।
तेलंगाना ने भारतीय वामपंथ को भी दो अलग रास्ते दिए।
जनता को संगठित करो, चुनाव लड़ो और संसदीय लोकतंत्र के भीतर भूमि तथा मजदूर अधिकारों के लिए संघर्ष करो।
तेलंगाना की अधूरी क्रांति को नक्सलबाड़ी और दूसरे सशस्त्र किसान संघर्षों के माध्यम से आगे बढ़ाओ।
यही कारण है कि तेलंगाना संघर्ष 1951 में समाप्त होकर भी भारतीय राजनीति में समाप्त नहीं हुआ।
अब इस शोध के अंतिम खंड में हमें आंदोलन की उपलब्धियों और सीमाओं का समेकित मूल्यांकन, उसके इतिहासलेखन, संस्कृति और लोकस्मृति, विस्तृत समयरेखा तथा प्राथमिक-द्वितीयक स्रोतों को व्यवस्थित करना है।
खंड 10 — मूल्यांकन, स्मृति, समयरेखा और स्रोत (अध्याय 38–45)
अध्याय 38 : तेलंगाना संघर्ष की उपलब्धियां — भूमि, वेट्टी, किसान संगठन, सामाजिक गरिमा और राजनीतिक चेतना का समेकित मूल्यांकन।
अध्याय 39 : तेलंगाना संघर्ष की सीमाएं और अंतर्विरोध — हिंसा, रणनीतिक भूलें, वर्गीय तनाव, जाति और महिला प्रश्न तथा 1948 के बाद संघर्ष जारी रखने की बहस।
अध्याय 40 : तेलंगाना संघर्ष का इतिहासलेखन — कम्युनिस्ट, राष्ट्रवादी, सरकारी, सामाजिक इतिहास और आधुनिक अकादमिक व्याख्याएं।
अध्याय 41 : लोकगीत, साहित्य, संस्कृति और जनस्मृति में तेलंगाना संघर्ष — आंदोलन के गीत, कविता, नाटक, संस्मरण और आधुनिक तेलंगाना की स्मृति-राजनीति।
तेलंगाना संघर्ष की उपलब्धियां
पहली उपलब्धि — किसान को प्रजा से राजनीतिक नागरिक बनाना
तेलंगाना संघर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल भूमि का वितरण नहीं थी।
उसने किसान की राजनीतिक स्थिति बदल दी।
पुरानी ग्रामीण व्यवस्था में गरीब किसान किसी देशमुख, जागीरदार, पटेल-पटवारी अथवा प्रभावशाली स्थानीय शक्ति के अधीन व्यक्ति था।
आंदोलन ने उसे संगम का सदस्य बनाया।
वेट्टी से इनकार कर सकता था,
बेदखली का विरोध कर सकता था,
और जमीन पर राजनीतिक अधिकार का दावा कर सकता था।
यह परिवर्तन किसी कानून से अधिक गहरा था।
वेट्टी पर निर्णायक चोट
वेट्टी अर्थात जबरन और अवैतनिक श्रम आंदोलन की शुरुआती केंद्रीय शिकायतों में था।
आंध्र महासभा और कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने 1940 के दशक के आरंभ से ही वेट्टी तथा अवैध वसूली के विरुद्ध अभियान चलाया था। सुंदरैया के विवरण में 1940–44 के दौरान इन्हीं प्रश्नों को किसान संगठन की शुरुआती आधारभूमि बताया गया है।
जहां संगम प्रभावी हुए वहां गरीब ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से मुफ्त श्रम करने से इनकार किया।
इसका महत्व केवल आर्थिक नहीं था।
वेट्टी का अंत किसान द्वारा यह घोषणा था कि—
यही सामंती संबंध की बुनियाद पर चोट थी।
बेदखली के विरुद्ध सुरक्षा
किरायेदार किसान के लिए सबसे बड़ा भय जमीन खो देना था।
आंदोलन ने बेदखली के मामलों को व्यक्ति की समस्या से सामूहिक समस्या बनाया।
किसी किसान को खेत से हटाया गया तो संगम हस्तक्षेप कर सकता था।
बाद में 1950 के हैदराबाद टेनेंसी एंड एग्रीकल्चरल लैंड्स एक्ट ने किरायेदारों को कानूनी संरक्षण देने की संरचना बनाई। यह अधिनियम 10 जून 1950 को लागू हुआ और किरायेदारी, बेदखली तथा संरक्षित किरायेदारों के अधिकारों को विधिक ढांचे में लाया।
अर्थात जो प्रश्न 1946 में गांव में संघर्ष से उठाया जा रहा था, वही कुछ वर्षों में कानून का प्रश्न बन चुका था।
जागीर व्यवस्था का पतन
स्वतंत्रता के बाद हैदराबाद की जागीर व्यवस्था समाप्त की गई।
1961 की आधिकारिक भूमि-अवधि समीक्षा के अनुसार पूर्व हैदराबाद राज्य की लगभग एक-तिहाई भूमि जागीरों में थी। जागीरों का सरकारी अधिग्रहण 15 अगस्त 1949 से लागू हुआ और जागीरदारों के प्रशासनिक-राजस्व अधिकार समाप्त कर दिए गए।
तेलंगाना संघर्ष अकेला इसका कारण नहीं था—स्वतंत्र भारत में पूरे देश में मध्यस्थ भूमि व्यवस्थाओं को हटाया जा रहा था।
लेकिन तेलंगाना के विद्रोह ने हैदराबाद में सुधार की राजनीतिक तात्कालिकता कई गुना बढ़ा दी।
भूमि प्रश्न को राष्ट्रीय बहस में लाना
आंदोलन ने केवल यह नहीं कहा कि किराया कम होना चाहिए।
उसने भूमि स्वामित्व के नैतिक आधार पर प्रश्न उठाया—
जो जमीन जोतता है, क्या अधिकार उसी का होना चाहिए?
यह भारतीय किसान राजनीति में निर्णायक प्रश्न था।
कम्युनिस्ट स्रोतों ने लगभग दस लाख एकड़ भूमि पुनर्वितरण का दावा किया। इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि कठिन है और विभिन्न स्रोत अलग अनुमान देते हैं; इसलिए इस संख्या को आंदोलनकारी नेतृत्व का दावा ही माना जाना चाहिए।
फिर भी व्यापक भूमि कब्जे और भूमि-वापसी की घटनाओं पर इतिहासकारों के बीच असहमति नहीं है। डी.एन. धनागरे तेलंगाना को गरीब किसान और भूमिहीन कृषि मजदूरों के व्यापक विद्रोह के रूप में देखते हैं और यह भी दर्ज करते हैं कि आंदोलन ने भूमि सुधारों की गति तथा किरायेदारों में अधिकार चेतना को प्रभावित किया।
बड़े भू-स्वामी प्रभुत्व का मनोवैज्ञानिक अंत
किसी सामाजिक व्यवस्था का अंत कानून से पहले लोगों के मन में होता है।
तेलंगाना में “दोरा” की सत्ता का भय टूटा।
देशमुख गांव छोड़ सकता है—
यह किसान ने पहली बार देखा।
उसकी फसल बचाई जा सकती है—
यह चाकली इलम्मा के संघर्ष ने दिखाया।
उसके सशस्त्र लोगों का मुकाबला किया जा सकता है—
यह कडवेंडी के बाद स्पष्ट हुआ।
और ग्राम समिति स्वयं निर्णय ले सकती है—
यह संघर्ष के नियंत्रित क्षेत्रों में अनुभव हुआ।
यही मनोवैज्ञानिक परिवर्तन वापस पूरी तरह उलटा नहीं जा सका।
ग्राम सत्ता का प्रयोग
संघर्ष के दौरान अनेक गांवों में वैकल्पिक ग्राम समितियां स्थापित हुईं।
कितने गांव पूर्ण नियंत्रण में थे, इस पर विवाद है। सुंदरैया लगभग 3,000 गांव बताते हैं और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का तेलंगाना आंदोलन अभिलेख भी लगभग 3,000 गांवों में समानांतर सरकारों की बात करता है।
लेकिन सभी गांवों में नियंत्रण समान नहीं था।
कहीं वास्तविक ग्राम प्रशासन था।
कहीं गुरिल्ला प्रभाव अस्थायी था।
इसलिए “3,000 स्वतंत्र गणराज्य” जैसी भाषा सावधानी से इस्तेमाल करनी चाहिए।
फिर भी यह निर्विवाद है कि ग्रामीण स्वशासन का बड़े स्तर पर प्रयोग हुआ।
महिलाओं का राजनीतिक प्रवेश
तेलंगाना आंदोलन की एक बड़ी सामाजिक उपलब्धि महिलाओं का असाधारण राजनीतिक प्रवेश था।
पुलिस और रजाकारों का प्रतिरोध किया,
और भूमि तथा सामाजिक न्याय के प्रश्न पर सार्वजनिक रूप से सामने आईं।
बाद में स्त्री शक्ति संगठन ने आंदोलन की महिला प्रतिभागियों के साक्षात्कारों के आधार पर *We Were Making History: Life Stories of Women in the Telangana People's Struggle* तैयार किया। इसमें 16 महिला प्रतिभागियों के जीवन वृत्तांत शामिल किए गए और आंदोलन को महिलाओं की दृष्टि से पुनर्निर्मित किया गया।
इससे तेलंगाना संघर्ष केवल किसान इतिहास नहीं, भारतीय महिला इतिहास का भी महत्वपूर्ण अध्याय बन गया।
दलित और भूमिहीन मजदूर का उभार
डी.एन. धनागरे के विश्लेषण में संघर्ष का मुख्य सामाजिक आधार गरीब किसान और भूमिहीन कृषि मजदूर थे।
वेट्टी के खिलाफ लड़ाई विशेष रूप से उन कमजोर जाति-समुदायों के लिए महत्वपूर्ण थी जिनसे परंपरागत सेवा और मुफ्त श्रम की अपेक्षा की जाती थी।
इसलिए आंदोलन ने ग्रामीण वर्ग व्यवस्था के साथ सामाजिक पदानुक्रम को भी चुनौती दी।
जाति समाप्त नहीं हुई, लेकिन दलित मजदूर की राजनीतिक भूमिका बदल गई।
हथियार से मतपत्र तक संक्रमण
तेलंगाना संघर्ष की एक और असाधारण उपलब्धि उसका 1951 के बाद लोकतांत्रिक राजनीति में संक्रमण था।
जो कम्युनिस्ट नेतृत्व कुछ ही महीने पहले भूमिगत था, वही 1951–52 के पहले आम चुनाव में चुनावी मैदान में आया।
निर्वाचन आयोग आज भी प्रथम आम चुनाव तथा 1951 हैदराबाद विधानसभा चुनाव के आधिकारिक सांख्यिकीय अभिलेख उपलब्ध कराता है।
यह परिवर्तन इस बात का प्रमाण था कि आंदोलन का सामाजिक आधार केवल हथियारबंद शक्ति पर नहीं टिका था।
तेलंगाना संघर्ष की सीमाएं और अंतर्विरोध
किसी ऐतिहासिक आंदोलन को गंभीरता से समझने का अर्थ केवल उसकी उपलब्धियां गिनाना नहीं है।
तेलंगाना की सीमाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
पहली सीमा — हिंसा
आंदोलन ने आत्मरक्षा के रूप में हथियार उठाए, लेकिन लंबे सशस्त्र संघर्ष में हिंसा केवल आत्मरक्षा तक सीमित नहीं रही।
कुछ मामलों में हत्या और कठोर दंड भी दिए गए।
राज्य और रजाकार हिंसा की तुलना में किसान पक्ष की हिंसा को छिपा देना उतना ही गलत होगा जितना किसान आंदोलन को केवल “कम्युनिस्ट आतंक” कहना।
“जन न्याय” की समस्या
ग्राम समितियों और जनता की अदालतों ने पुराने सामंती न्याय को चुनौती दी।
लेकिन जब न्याय देने वाली संस्था स्वयं राजनीतिक-सैन्य आंदोलन का हिस्सा हो, तो निष्पक्ष न्याय और राजनीतिक प्रतिशोध के बीच रेखा कमजोर पड़ सकती है।
यह सभी क्रांतिकारी वैकल्पिक सत्ता प्रणालियों की गंभीर समस्या होती है।
तेलंगाना भी इससे मुक्त नहीं था।
भूमि-वितरण के दावों की अनिश्चितता
आंदोलन की सबसे प्रसिद्ध उपलब्धि—विशाल भूमि वितरण—के आंकड़े विवादित हैं।
सुंदरैया का विवरण अत्यंत महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष स्रोत है, लेकिन वे स्वयं आंदोलन के प्रमुख नेता थे। उनकी पुस्तक के प्राक्कथन में वे स्वीकार करते हैं कि कई घटनाओं, कार्यकर्ताओं और मृतकों की संपूर्ण जानकारी उपलब्ध नहीं थी और आगे स्मृतियां जुटाए जाने की आवश्यकता थी।
इसलिए आंदोलन के अपने सांख्यिकीय दावों को अंतिम तथ्य नहीं माना जा सकता।
नेतृत्व और सामाजिक आधार का विरोधाभास
धनागरे ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है।
आंदोलन का मुख्य आधार गरीब किसान और भूमिहीन मजदूर थे, लेकिन उसके अनेक प्रमुख नेता अपेक्षाकृत संपन्न कृषक परिवारों, विशेषकर रेड्डी और कम्मा सामाजिक समूहों से आए थे।
इसका अर्थ यह नहीं कि नेतृत्व अविश्वसनीय था।
लेकिन इससे यह समझने में मदद मिलती है कि भूमि-सीमा कितनी दूर तक ले जानी है, मध्यम किसान को कैसे साथ रखना है और संपन्न कृषक की जमीन पर प्रश्न कब उठाना है—इन मुद्दों पर तनाव क्यों पैदा हुए।
जाति का अधूरा प्रश्न
कम्युनिस्ट विचारधारा की मुख्य विश्लेषणात्मक श्रेणी वर्ग थी।
इससे गरीब दलित कृषि मजदूरों का व्यापक संगठन संभव हुआ।
लेकिन जातिगत अपमान और अस्पृश्यता के स्वतंत्र प्रश्न को हमेशा उतनी स्पष्टता से नहीं लिया गया जितनी बाद का दलित इतिहास अपेक्षा करता है।
आधुनिक दलित इतिहासलेखन ने कम्युनिस्ट किसान राजनीति की इसी सीमा पर प्रश्न उठाए हैं।
तेलंगाना में भूमि-अधिकार प्राप्त होना महत्वपूर्ण था, लेकिन भूमि मिल जाने से जाति अपने आप समाप्त नहीं होती।
महिला समानता की सीमा
महिलाओं ने आंदोलन में असाधारण भूमिका निभाई, लेकिन आंदोलन के भीतर पितृसत्ता समाप्त नहीं हुई।
*We Were Making History* पर हुए अध्ययनों से पता चलता है कि महिला प्रतिभागियों ने पुरुष नेतृत्व के भीतर मौजूद लैंगिक पूर्वाग्रहों, सीमित सैन्य भूमिकाओं और घरेलू-पारिवारिक दबावों का भी अनुभव किया।
यानी आंदोलन ने महिलाओं के लिए राजनीतिक स्थान खोला, लेकिन पूर्ण लैंगिक समानता नहीं बनाई।
1948 के बाद संघर्ष जारी रखने का विवाद
तेलंगाना की सबसे बड़ी रणनीतिक बहस सितंबर 1948 के बाद की है।
निजाम की स्वतंत्र सत्ता समाप्त हो चुकी थी।
हैदराबाद भारत में आ चुका था।
हां। अब नया भारतीय लोकतांत्रिक राज्य सामने था और सशस्त्र संघर्ष का ऐतिहासिक आधार समाप्त हो चुका था।
दूसरा दृष्टिकोण कहता है—
नहीं। किसान की जमीन अभी सुरक्षित नहीं थी, भू-स्वामी लौट रहे थे और भारतीय सैन्य प्रशासन कम्युनिस्ट ग्राम सत्ता को तोड़ रहा था।
सुंदरैया स्वयं बाद में इस निर्णय को पूरे आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक प्रश्नों में रखते हैं। उनके 1973 के लेख का शीर्षक ही “Background to a Momentous Decision” था।
अखिल भारतीय क्रांति और स्थानीय किसान हित के बीच दूरी
1948 के बाद CPI की रणनीति अधिक उग्र हुई।
तेलंगाना के वास्तविक भूमि-संघर्ष को पूरे भारत में आसन्न क्रांति के प्रमाण की तरह देखने की प्रवृत्ति बनी।
लेकिन भारत की स्थितियां बदल चुकी थीं—
वयस्क मताधिकार लागू हो रहा था,
स्थानीय किसान अपनी जमीन बचाने के लिए लड़ सकता था; इससे यह जरूरी नहीं निकलता था कि पूरा भारत तत्काल सशस्त्र क्रांति के लिए तैयार था।
यहीं पार्टी रणनीति और ग्रामीण वास्तविकता में अंतर उभरा।
आंदोलन का क्षेत्रीय सीमितपन
तेलंगाना संघर्ष पूरे हैदराबाद राज्य में समान रूप से नहीं फैला।
नलगोंडा, वारंगल और खम्मम प्रमुख क्षेत्र रहे।
अन्य क्षेत्रों में उसका प्रभाव अलग था।
इसलिए पूरे हैदराबाद या पूरे तेलंगाना समाज को एक समान क्रांतिकारी क्षेत्र मानना गलत होगा।
सभी किसान एक समान नहीं थे
“किसान बनाम जमींदार” आंदोलन की उपयोगी राजनीतिक भाषा थी, लेकिन ग्रामीण वास्तविकता अधिक जटिल थी।
सभी के हित समान नहीं थे।
आंदोलन के प्रारंभिक सामंतवाद-विरोधी चरण में इनका गठबंधन मजबूत था।
भूमि क्रांति तीखी होने पर इनके बीच अंतर बढ़ने लगे।
सैन्य विजय न मिलना
अंततः आंदोलन राज्य सत्ता पर कब्जा नहीं कर सका।
1951 में गुरिल्ला संघर्ष वापस लेना पड़ा।
यदि कसौटी क्रांतिकारी सरकार की स्थापना थी, तो आंदोलन असफल रहा।
लेकिन यही वजह है कि उसकी उपलब्धियों को केवल सैन्य परिणाम से नहीं मापा जा सकता।
तेलंगाना संघर्ष का इतिहासलेखन
तेलंगाना का इतिहास स्वयं राजनीतिक संघर्ष का क्षेत्र रहा है।
अलग-अलग इतिहासकारों और राजनीतिक धाराओं ने अलग तेलंगाना देखा है।
कम्युनिस्ट इतिहासलेखन
तेलंगाना संघर्ष का सबसे व्यापक प्रत्यक्ष विवरण पी. सुंदरैया की पुस्तक:
P. Sundarayya — *Telangana People's Struggle and Its Lessons*
इसके विषयों की सूची ही इसकी व्यापकता दिखाती है—
हैदराबाद की सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि,
निजाम और रजाकारों के खिलाफ प्रतिरोध,
इस पुस्तक का सबसे बड़ा गुण है—
सबसे बड़ी सीमा भी यही है—
लेखक संघर्ष का प्रमुख नेता था।
इसलिए इसे प्राथमिक स्रोत और राजनीतिक व्याख्या—दोनों की तरह पढ़ना चाहिए।
रवि नारायण रेड्डी की स्मृतियां
रवि नारायण रेड्डी की *Heroic Telangana: Reminiscences and Experiences* आंदोलन की दूसरी महत्वपूर्ण अंदरूनी आवाज है।
इसमें ग्रामीण संगठन, आंध्र महासभा और नेतृत्व संबंधी जानकारी मिलती है। आधुनिक विश्वविद्यालय शोध भी इसे तेलंगाना संघर्ष के प्रमुख संस्मरणात्मक स्रोतों में उद्धृत करता है।
सुंदरैया और नारायण रेड्डी को साथ पढ़ने से पार्टी के शीर्ष रणनीतिक दृष्टिकोण और ग्रामीण नेतृत्व के अनुभव का तुलनात्मक चित्र बनता है।
डी.वी. राव की आलोचनात्मक कम्युनिस्ट व्याख्या
तेलंगाना की कम्युनिस्ट व्याख्या स्वयं एकरूप नहीं है।
डी.वी. राव ने तेलंगाना संघर्ष के अनुभव से भारतीय क्रांति की रणनीति पर अलग निष्कर्ष निकाले।
1949 में उन्होंने संघर्ष वापस लेने के पक्ष में उभर रही प्रवृत्तियों की आलोचना की और बाद में तेलंगाना को भारतीय क्रांतिकारी मार्ग के केंद्रीय अनुभव के रूप में प्रस्तुत किया।
इसलिए “कम्युनिस्ट इतिहासलेखन” के भीतर भी संघर्ष की वापसी, रणनीति और नेतृत्व को लेकर गंभीर मतभेद हैं।
डी.एन. धनागरे — समाजशास्त्रीय दृष्टि
डी.एन. धनागरे का 1974 का लेख “Social Origins of the Peasant Insurrection in Telangana (1946–51)” और उनकी पुस्तक *Peasant Movements in India, 1920–1950* तेलंगाना के अकादमिक अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
धनागरे आंदोलन को केवल पार्टी लाइन या नेताओं की कहानी के बजाय ग्रामीण वर्ग-संरचना के संदर्भ में समझते हैं।
विद्रोह में कौन से किसान वर्ग शामिल हुए?
गरीब किसान और भूमिहीन मजदूर की भूमिका क्या थी?
नेतृत्व की सामाजिक पृष्ठभूमि क्या थी?
और संगठन ने असंतोष को विद्रोह में कैसे बदला?
इससे तेलंगाना इतिहासलेखन राजनीतिक संस्मरण से सामाजिक विज्ञान की ओर बढ़ा।
बैरी पावियर
Barry Pavier — *The Telangana Movement, 1944–51*, 1981, तेलंगाना पर प्रमुख स्वतंत्र अकादमिक पुस्तकों में है। पुस्तक Vikas द्वारा प्रकाशित हुई और समकालीन अकादमिक समीक्षाओं में इसकी विस्तार से चर्चा हुई।
पावियर आंदोलन को हैदराबाद की सामाजिक-आर्थिक संरचना, भूमि संबंधों और कम्युनिस्ट राजनीति के संदर्भ में रखते हैं।
उनके निष्कर्षों पर बाद के विद्वानों ने असहमति भी जताई; यही तेलंगाना इतिहासलेखन की जीवंत बहस का प्रमाण है।
औपनिवेशिक/राज्य एवं प्रशासनिक दृष्टि
हैदराबाद सरकार और बाद में भारत सरकार के दस्तावेज आंदोलन को सामान्यतः प्रशासनिक और सुरक्षा भाषा में दर्ज करते हैं—
इन स्रोतों का महत्व बहुत है क्योंकि इनमें—
जिला अधिकारियों की रिपोर्ट,
लेकिन राज्य के दस्तावेज भी निष्पक्ष दर्पण नहीं होते।
वे राज्य की दृष्टि से लिखे जाते हैं।
राष्ट्रवादी इतिहासलेखन
राष्ट्रवादी व्याख्या सामान्यतः निजामशाही और रजाकारों के विरुद्ध संघर्ष के लोकतांत्रिक पक्ष को स्वीकार करती है।
लेकिन सितंबर 1948 के बाद स्वतंत्र भारत की सेना के विरुद्ध कम्युनिस्ट संघर्ष को वह अक्सर अनुचित अथवा राजनीतिक भूल मानती है।
इस दृष्टिकोण की समस्या यह हो सकती है कि वह किसानों की भूमि-संबंधी शिकायतों को ऑपरेशन पोलो के बाद समाप्त मान ले।
महिला इतिहासलेखन
तेलंगाना के इतिहास को सबसे बड़ा विस्तार 1980 के दशक के महिला इतिहासलेखन ने दिया।
Stree Shakti Sanghatana — *We Were Making History* ने आंदोलन को महिलाओं की अपनी आवाज में प्रस्तुत किया।
पुस्तक की समीक्षा के अनुसार शोधकर्ताओं ने किसान महिलाओं, वन गांवों की महिलाओं, मध्यवर्गीय महिलाओं और भू-स्वामी परिवारों से आई प्रतिभागियों तक के साक्षात्कार लिए।
इसने इतिहासलेखन का प्रश्न बदल दिया।
“आंदोलन में महिलाओं ने क्या किया?”
“आंदोलन महिलाओं को कैसा दिखाई देता था?”
यह मौखिक इतिहास की बड़ी उपलब्धि थी।
दलित और जाति-केंद्रित इतिहासलेखन
बाद के अध्ययनों ने यह प्रश्न उठाया कि वर्गीय इतिहासलेखन ने जाति को कितना पर्याप्त स्थान दिया।
यागती चिन्ना राव जैसे इतिहासकारों का कार्य यह दिखाता है कि कम्युनिस्ट किसान राजनीति और दलित मुक्ति के संबंध को केवल आर्थिक वर्ग के आधार पर नहीं समझा जा सकता।
इससे तेलंगाना का इतिहास अधिक बहुस्तरीय हुआ।
समकालीन इतिहासलेखन का संतुलन
आज एक गंभीर तेलंगाना इतिहास तीन तरह के स्रोतों को साथ पढ़ता है—
आंदोलनकारी स्रोत — सुंदरैया, रवि नारायण रेड्डी, प्रतिभागियों की स्मृतियां;
राज्य स्रोत — हैदराबाद प्रशासन, भारत सरकार, सैन्य-पुलिस दस्तावेज;
स्वतंत्र अकादमिक स्रोत — धनागरे, पावियर तथा बाद के सामाजिक इतिहासकार।
इन्हीं के तुलनात्मक अध्ययन से अतिशयोक्ति और मौन—दोनों को पहचाना जा सकता है।
लोकगीत, साहित्य, संस्कृति और जनस्मृति में तेलंगाना संघर्ष
आंदोलन की भाषा केवल राजनीतिक भाषण नहीं थी
तेलंगाना का किसान समाज बड़े पैमाने पर मौखिक संस्कृति वाला समाज था।
इसलिए गीत, कथा, नाटक और लोक प्रदर्शन राजनीतिक संदेश फैलाने के अत्यंत प्रभावी साधन बने।
गीत एक राजनीतिक हथियार
मल्लू स्वराज्यम की स्मृतियों में ग्रामीण महिलाओं और दलित समुदायों द्वारा रात में काम करते हुए गीत गाने का उल्लेख मिलता है।
उन्होंने बाद में याद किया कि गांवों में संगठन करते समय गीत स्वयं राजनीतिक माध्यम बन गया था।
तेलुगु समाज की हरिकथा, सूफी पकीर गीत, बुर्रकथा और गोल्लासुद्दुलु जैसी परंपराओं का उपयोग राजनीतिक चेतना फैलाने में हुआ।
अशिक्षित अथवा कम पढ़े ग्रामीण समाज में गीत वह काम कर सकता था जो लिखित घोषणापत्र नहीं कर सकता था।
लोकगीतों में किसान की अपनी भाषा
राजनीतिक विचारधारा जब स्थानीय लोकभाषा में उतरती है तभी व्यापक जनसंस्कृति बनती है।
डोड्डी कोमारय्या की स्मृति
डोड्डी कोमारय्या की हत्या आंदोलन का प्रतीकात्मक क्षण बनी।
उनका नाम गीतों, स्मृति सभाओं और कम्युनिस्ट किसान परंपरा में शहीद के रूप में जीवित रहा।
यह केवल एक व्यक्ति की स्मृति नहीं थी।
उनके माध्यम से कडवेंडी की घटना पूरी किसान पीढ़ी की सामूहिक स्मृति बनी।
चाकली इलम्मा की स्मृति
चाकली इलम्मा बाद के तेलंगाना समाज में किसान, महिला और निम्न सामाजिक वर्ग के प्रतिरोध की संयुक्त प्रतीक बनीं।
उनकी ऐतिहासिक कथा में समय के साथ लोक-किंवदंती भी जुड़ी है।
इसलिए अकादमिक इतिहास को स्मृति और दस्तावेज के बीच अंतर बनाए रखना चाहिए।
लेकिन स्मृति का अपना ऐतिहासिक महत्व है।
किस समाज ने किस व्यक्ति को प्रतीक बनाया—यह स्वयं उस समाज के मूल्यों का संकेत है।
मखदूम मोहिउद्दीन
तेलंगाना संघर्ष की सांस्कृतिक विरासत में मखदूम मोहिउद्दीन का महत्व विशेष है।
उर्दू कविता, मजदूर आंदोलन और कम्युनिस्ट राजनीति को जोड़ने वाली उनकी उपस्थिति यह दिखाती है कि संघर्ष की सांस्कृतिक दुनिया केवल तेलुगु ग्रामीण समाज तक सीमित नहीं थी।
हैदराबाद शहर की उर्दू प्रगतिशील संस्कृति भी उसका हिस्सा थी।
प्रजा नाट्य मंडली
वामपंथी सांस्कृतिक आंदोलन ने नाटक, गीत और लोक कला को जन-राजनीति का माध्यम बनाया।
प्रजा नाट्य मंडली की परंपरा ने किसान और मजदूर आंदोलनों की कहानियों को मंच तक पहुंचाया।
तेलंगाना के बाद भी यह सांस्कृतिक राजनीति तेलुगु क्षेत्र में जीवित रही। समकालीन सांस्कृतिक अध्ययन प्रजा नाट्य मंडली और तेलंगाना के लोक-सांस्कृतिक रूपों के बीच इस संबंध को रेखांकित करते हैं।
आंदोलन और बाद की क्रांतिकारी संस्कृति
तेलंगाना की गीत परंपरा आगे चलकर आंध्र-तेलंगाना की क्रांतिकारी संस्कृति में पुनर्जीवित हुई।
गद्दर जैसे बाद के जनकवियों की सांस्कृतिक राजनीति सीधे 1946 की प्रतिलिपि नहीं थी, लेकिन किसान-मजदूर प्रतिरोध को लोकगीत में बदलने की ऐतिहासिक परंपरा का संबंध पुराने तेलंगाना संघर्ष से जोड़ा जाता रहा।
राज्य बनने के बाद स्मृति
2014 में अलग तेलंगाना राज्य बनने के बाद ऐतिहासिक तेलंगाना के प्रतीकों को नई सार्वजनिक दृश्यता मिली।
और किसान सशस्त्र संघर्ष—
क्षेत्रीय स्मृति के महत्वपूर्ण हिस्से बन गए।
लेकिन यहां भी सावधानी आवश्यक है।
कोमाराम भीम का आदिवासी आंदोलन तेलंगाना किसान सशस्त्र संघर्ष से पहले का और अलग ऐतिहासिक आंदोलन था।
उसे 1946–51 के कम्युनिस्ट संघर्ष में सीधे मिला देना गलत होगा।
17 सितंबर की विवादित स्मृति
हैदराबाद के भारतीय संघ में प्रवेश की 17 सितंबर की तारीख आज भी विभिन्न राजनीतिक शब्दों में याद की जाती है।
और 1948 के बाद की सांप्रदायिक हिंसा झेलने वाले परिवारों के लिए—
तेलंगाना संघर्ष के इतिहास को इन स्मृतियों में से किसी एक का प्रचारक नहीं बनना चाहिए।
तेलंगाना संघर्ष की विस्तृत समयरेखा
उन्नीसवीं सदी से 1920 का दशक — सामंती ग्रामीण संरचना
हैदराबाद राज्य में जागीर, सरफ-ए-खास और दीवानी भूमि व्यवस्थाएं विकसित होती हैं।
देशमुख, देशपांडे, पटेल-पटवारी और स्थानीय भू-स्वामी वर्ग कई क्षेत्रों में राजस्व तथा सामाजिक सत्ता पर गहरा प्रभाव रखते हैं।
किरायेदारी असुरक्षा, अवैध वसूली और वेट्टी ग्रामीण जीवन की महत्वपूर्ण समस्याएं बनती हैं।
1920 का दशक — तेलुगु सांस्कृतिक चेतना
तेलुगु भाषी शिक्षित समाज में भाषा और शिक्षा को लेकर संगठन बनते हैं।
आंध्र जन संघम और इसी धारा के अन्य मंच विकसित होते हैं।
पुस्तकालय आंदोलन राजनीतिक चेतना फैलाने का माध्यम बनता है।
1930 — आंध्र महासभा
आंध्र महासभा तेलुगु सामाजिक-सांस्कृतिक मंच के रूप में विकसित होती है।
धीरे-धीरे उसकी राजनीति शिक्षा और भाषा से आगे ग्रामीण समस्याओं की ओर बढ़ती है।
1930 का दशक — कम्युनिस्ट विचारों का प्रसार
आंध्र क्षेत्र में कम्युनिस्ट कार्यकर्ता सक्रिय होते हैं।
अखिल भारतीय स्तर पर 1936 में किसान सभा की स्थापना होती है।
हैदराबाद के तेलुगु क्षेत्र में वामपंथी विचारों का प्रभाव बढ़ता है।
1938 — हैदराबाद स्टेट कांग्रेस और राजनीतिक संघर्ष
हैदराबाद स्टेट कांग्रेस जिम्मेदार सरकार के लिए सक्रिय होती है।
निजाम सरकार राजनीतिक संगठनों और आंदोलनों पर नियंत्रण रखती है।
इसी समय छात्र और नागरिक आंदोलनों में भी नई राजनीतिक चेतना उभरती है।
1940 — हैदराबाद में संगठित कम्युनिस्ट गतिविधि
कम्युनिस्ट संगठन अधिक स्पष्ट रूप ग्रहण करता है।
ग्रामीण कार्यकर्ताओं का नेटवर्क विकसित होने लगता है।
1940–44 — किसान मुद्दों पर व्यवस्थित अभियान
सुंदरैया के अनुसार इस अवधि में आंध्र महासभा की वामपंथी धारा और कम्युनिस्ट कार्यकर्ता निजाम के जनहितकारी फरमानों को लागू कराने, वेट्टी और अवैध वसूली रोकने तथा किसानों को राहत दिलाने के लिए अभियान चलाते हैं।
1944 — भुवनगिरि सम्मेलन
आंध्र महासभा में वामपंथी प्रभाव निर्णायक रूप से बढ़ता है।
महासभा का किसान प्रश्नों की ओर परिवर्तन तेज होता है।
गांवों में “संगम” बढ़ने लगते हैं।
1944–45 — स्थानीय किसान संघर्ष
और युद्धकालीन अनाज लेवी के प्रश्नों पर गांव-स्तरीय संघर्ष बढ़ते हैं।
1945–46 — पालकुर्थी और चाकली इलम्मा
चाकली इलम्मा का भूमि और फसल विवाद किसान संगठन का बड़ा प्रतीक बनता है।
संगम भू-स्वामी प्रभाव के विरुद्ध उनकी खेती और फसल की रक्षा में खड़ा होता है।
4 जुलाई 1946 — डोड्डी कोमारय्या की हत्या
कडवेंडी में किसान जुलूस के दौरान गोलीबारी में डोड्डी कोमारय्या मारे जाते हैं।
उनकी मृत्यु तेलंगाना किसान आंदोलन के निर्णायक मोड़ों में बनती है।
जुलाई 1946 — सैकड़ों गांवों में विस्तार
सुंदरैया के विवरण में जुलाई के अंत तक लगभग 300–400 गांवों में आंदोलन फैलने की बात है।
वेट्टी रोकने, अवैध वसूली न देने और बेदखली का प्रतिरोध तेज होता है।
उत्तरार्ध 1946 — दमन और भूमिगत गतिविधियां
निजाम सरकार कम्युनिस्ट और आंध्र महासभा कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई बढ़ाती है।
पुलिस छापे और गिरफ्तारियों के कारण आंदोलन भूमिगत होने लगता है।
स्वयंसेवी रक्षा दस्तों का विकास होता है।
1947 — सशस्त्र स्वरूप तेज
भूमि कब्जे, ग्राम समितियां और दलम अधिक महत्वपूर्ण होने लगते हैं।
आंदोलन नलगोंडा से वारंगल, खम्मम तथा अन्य क्षेत्रों में विस्तार करता है।
15 अगस्त 1947 — भारत स्वतंत्र
ब्रिटिश शासन समाप्त होता है।
लेकिन निजाम हैदराबाद का भारत में तत्काल विलय स्वीकार नहीं करता।
तेलंगाना संघर्ष अब सामंती किसान प्रश्न के साथ निजामशाही के राजनीतिक भविष्य से भी जुड़ जाता है।
1947–48 — रजाकार शक्ति का विस्तार
कासिम रिजवी के नेतृत्व में रजाकार संगठन तेजी से बढ़ता है।
किसान संगमों, कम्युनिस्टों, भारत में विलय समर्थकों और अन्य राजनीतिक विरोधियों के साथ संघर्ष बढ़ता है।
29 नवंबर 1947 — स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट
भारत और हैदराबाद के बीच अस्थायी समझौता होता है।
लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकलता।
1948 — ग्राम सत्ता और गुरिल्ला विस्तार
आंदोलन अपने चरम की ओर बढ़ता है।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का अभिलेख लगभग 3,000 गांवों में समानांतर शासन के आंदोलनकारी दावे को दर्ज करता है।
13 सितंबर 1948 — ऑपरेशन पोलो
भारतीय सेना हैदराबाद राज्य में प्रवेश करती है।
17 सितंबर 1948 — निजाम युद्धविराम स्वीकार करता है
हैदराबाद की नियमित सैन्य प्रतिरोध क्षमता समाप्त होती है।
रजाकारों का संगठित प्रभुत्व टूट जाता है।
सितंबर 1948 के बाद — संघर्ष का दूसरा चरण
कम्युनिस्ट किसान गुरिल्लाओं और भारतीय सैन्य-प्रशासन के बीच संघर्ष शुरू होता है।
पुराने भू-स्वामियों की वापसी और किसान भूमि कब्जों का प्रश्न केंद्रीय बनता है।
धनागरे के अध्ययन में भारतीय सेना के तत्काल उद्देश्यों में कम्युनिस्ट प्रभाव वाले दक्षिण-पूर्वी जिलों में कार्रवाई का उल्लेख मिलता है।
1948–49 — दमन और जंगलों की ओर वापसी
गुरिल्ला दस्ते मैदानी क्षेत्रों में दबाव के कारण वन और आदिवासी क्षेत्रों की ओर जाते हैं।
गिरफ्तारियां और सुरक्षा अभियान बढ़ते हैं।
15 अगस्त 1949 — जागीरों का सरकारी अधिग्रहण
हैदराबाद जागीर उन्मूलन व्यवस्था प्रभावी होती है।
जागीरदारों के प्रशासनिक-राजस्व अधिकार समाप्त होते हैं।
1949 — CPI के भीतर रणनीतिक बहस
क्या तेलंगाना संघर्ष जारी रखा जाए अथवा वापस लिया जाए—इस पर गंभीर विवाद बढ़ता है।
डी.वी. राव जैसे नेता संघर्ष जारी रखने के पक्ष की क्रांतिकारी व्याख्या विकसित करते हैं।
1950 — भारत का संविधान
26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू होता है।
भारत औपचारिक गणराज्य बनता है।
सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार आधारित चुनावी व्यवस्था सशस्त्र संघर्ष के औचित्य पर नई बहस पैदा करती है।
10 जून 1950 — हैदराबाद टेनेंसी एंड एग्रीकल्चरल लैंड्स एक्ट
किरायेदार अधिकार और भूमि संबंध विधिक सुधार का हिस्सा बनते हैं।
1950–51 — CPI रणनीति का पुनर्मूल्यांकन
रणदिवे लाइन की आलोचना होती है।
पार्टी सशस्त्र क्रांति और वैधानिक जनराजनीति के बीच अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करती है।
1951 — संसदीय राजनीति की ओर मोड़
CPI नया कार्यक्रम अपनाती है और चुनाव में भाग लेने का रास्ता स्वीकार करती है।
अक्टूबर 1951 — सशस्त्र संघर्ष वापस
लगभग पांच वर्ष चला तेलंगाना सशस्त्र किसान संघर्ष समाप्त किया जाता है।
1951–52 — प्रथम आम चुनाव
तेलंगाना के संघर्ष-प्रभावित क्षेत्रों में कम्युनिस्ट/PDF उम्मीदवारों को महत्वपूर्ण समर्थन मिलता है।
इससे आंदोलन का सामाजिक जनाधार संसदीय रूप में सामने आता है।
तेलंगाना संघर्ष के प्रमुख प्राथमिक स्रोत और दस्तावेज
तेलंगाना पर गंभीर शोध के लिए प्राथमिक स्रोतों को राजनीतिक पक्ष के अनुसार वर्गीकृत करके पढ़ना चाहिए।
1. पी. सुंदरैया — *Telangana People's Struggle and Its Lessons*
सबसे महत्वपूर्ण आंदोलनकारी प्राथमिक स्रोत।
सभी पर प्रत्यक्ष विवरण है। इसके विस्तृत विषय सूची और संपूर्ण पाठ के डिजिटल संस्करण उपलब्ध हैं।
उपयोग करते समय सावधानी
सुंदरैया संघर्ष के नेता थे।
इसलिए उनका विवरण प्रत्यक्ष है, लेकिन तटस्थ नहीं।
उनके आंकड़े अन्य स्रोतों से मिलाने चाहिए।
2. रवि नारायण रेड्डी — *Heroic Telangana: Reminiscences and Experiences*
ग्रामीण किसान संगठन और आंध्र महासभा के नेतृत्व को समझने के लिए महत्वपूर्ण संस्मरण।
समकालीन विश्वविद्यालय शोध इसे आंदोलन की प्रमुख प्रथम-पक्षीय पुस्तकों में रखता है।
3. डी.वी. राव के दस्तावेज
डी.वी. राव के तेलंगाना संबंधी राजनीतिक दस्तावेज संघर्ष जारी रखने, भारतीय क्रांति के मार्ग और CPI नेतृत्व की रणनीति पर एक अलग कम्युनिस्ट दृष्टि देते हैं।
विशेष रूप से 1949 का संघर्ष वापसी-विरोधी दस्तावेज पार्टी के अंदर की बहस समझने में उपयोगी है।
4. आंध्र महासभा के सम्मेलन दस्तावेज
गांव-संगम संबंधी सामग्री
और किसान मांगों से जुड़े प्रचार-पत्र आंदोलन के राजनीतिक विकास को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
1944–46 किसान कार्यक्रम।
5. कम्युनिस्ट पार्टी दस्तावेज
1950–51 रणनीतिक दस्तावेज—
तेलंगाना को स्थानीय किसान आंदोलन से अखिल भारतीय कम्युनिस्ट रणनीति में बदलते देखने के लिए आवश्यक हैं।
6. निजाम सरकार के प्रशासनिक अभिलेख
भूमि और किरायेदारी अभिलेख—
ग्रामीण संरचना के अध्ययन में महत्वपूर्ण हैं।
इनसे आंदोलन से पहले की प्रशासनिक व्यवस्था की स्वतंत्र तस्वीर मिल सकती है।
7. Hyderabad State Revenue Department की वार्षिक रिपोर्टें
1940 के दशक की राजस्व प्रशासन रिपोर्टें—
समझने के लिए महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
आधुनिक शोध में 1945–46 और 1948 की प्रशासनिक रिपोर्टों का उपयोग किया गया है।
8. पुलिस और सैन्य अभिलेख
और 1948 के बाद की सुरक्षा कार्रवाइयों के दस्तावेज—
इन स्रोतों को राज्य की सुरक्षा दृष्टि के दस्तावेज के रूप में पढ़ना चाहिए।
9. ऑपरेशन पोलो से जुड़े भारत सरकार के दस्तावेज
जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल के पत्राचार—
हैदराबाद विलय और तेलंगाना के दूसरे चरण की राजनीतिक पृष्ठभूमि समझने में आवश्यक हैं।
10. पंडित सुंदरलाल समिति रिपोर्ट
ऑपरेशन पोलो के बाद सांप्रदायिक हिंसा के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण स्रोत।
इसे किसान आंदोलन की हिंसा के साथ सीधे नहीं मिलाना चाहिए।
यह अलग, लेकिन संबंधित हैदराबाद संकट का स्रोत है।
11. भूमि सुधार कानून
Hyderabad (Abolition of Jagirs) Regulation
Hyderabad Tenancy and Agricultural Lands Act, 1950
आंदोलन के बाद भूमि संबंधों में हुए संस्थागत बदलावों के प्राथमिक विधिक स्रोत हैं।
12. प्रथम चुनावों के निर्वाचन आयोग अभिलेख
1951–52 के लोकसभा और हैदराबाद विधानसभा चुनाव तेलंगाना संघर्ष की राजनीतिक विरासत को मापने का सबसे उपयोगी निष्पक्ष स्रोत हैं।
निर्वाचन आयोग के आधिकारिक सांख्यिकीय अभिलेख उपलब्ध हैं।
13. समकालीन समाचार-पत्र
हैदराबाद के उर्दू समाचार-पत्र,
कम्युनिस्ट और कांग्रेस प्रकाशन।
इनकी रिपोर्टिंग राजनीतिक पक्षधरता के अनुसार तुलना करके पढ़ी जानी चाहिए।
14. फोटो अभिलेख
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का तेलंगाना मूवमेंट आर्काइव विशेष रूप से उपयोगी है।
यह CPI के एक पार्टी फोटोग्राफर द्वारा खींची गई दुर्लभ तस्वीरों का संग्रह प्रस्तुत करता है, जिनमें गुरिल्ला जीवन, ग्रामीण संगठन और आंदोलन के विभिन्न पहलू दिखाई देते हैं।
ये दृश्य स्रोत लिखित इतिहास की पुष्टि और पुनर्पाठ—दोनों में मदद करते हैं।
15. महिला मौखिक इतिहास
*We Were Making History* तेलंगाना के प्राथमिक स्रोत संसार का अपरिहार्य हिस्सा होना चाहिए।
महिला प्रतिभागियों की आवाज आंदोलन की उन परतों को सामने लाती है जो पार्टी रिपोर्टों और सरकारी फाइलों में नहीं मिलतीं।
प्रमुख द्वितीयक स्रोत और संदर्भ ग्रंथ
तेलंगाना पर शोध करते समय किसी एक पुस्तक पर निर्भर रहना उचित नहीं।
सबसे उपयोगी अध्ययन निम्न प्रकार से पढ़े जाने चाहिए।
1. D. N. Dhanagare — *Peasant Movements in India, 1920–1950*
Oxford University Press द्वारा प्रकाशित यह भारतीय किसान आंदोलनों के अध्ययन की मानक पुस्तकों में है।
इसमें तेलंगाना को दूसरे किसान आंदोलनों के साथ तुलनात्मक सामाजिक संरचना और वर्गीय दृष्टि से देखा गया है।
उपयोगिता
और आंदोलन की सामाजिक उत्पत्ति।
2. D. N. Dhanagare — “Social Origins of the Peasant Insurrection in Telangana (1946–51)”
1974 का यह शोध-पत्र तेलंगाना की सामाजिक संरचना पर केंद्रित मानक अकादमिक लेख है।
यह विशेष रूप से वर्गीय आधार और नेतृत्व के सामाजिक चरित्र के लिए उपयोगी है।
3. Barry Pavier — *The Telangana Movement, 1944–51*
आंदोलन के सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक विकास पर प्रमुख स्वतंत्र अध्ययन। पुस्तक का अकादमिक समीक्षा रिकॉर्ड भी उपलब्ध है।
उपयोगिता
1944 से आंदोलन की तैयारी,
और आंदोलन की विफलता/सीमाओं पर बहस।
4. P. Sundarayya — *Telangana People's Struggle and Its Lessons*
तकनीकी रूप से प्राथमिक और द्वितीयक दोनों प्रकार का स्रोत।
यह संस्मरण भी है और संघर्ष की राजनीतिक व्याख्या भी।
इसलिए इसे हर अध्याय में उपयोग किया जा सकता है—लेकिन स्वतंत्र सत्यापन के साथ।
5. Stree Shakti Sanghatana — *We Were Making History*
तेलंगाना के महिला इतिहास की मानक कृति।
यह आंदोलन के इतिहास को “महान पुरुष नेताओं” की कथा से निकालकर ग्रामीण महिलाओं की स्मृति तक ले जाती है।
6. Ian Bedford
The Telengana Insurrection: A Study in the Causes and Development of a Communist Insurrection in Rural India, 1946–51
ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी का शोध-प्रबंध।
तेलंगाना के सामाजिक और राजनीतिक कारणों के अकादमिक अध्ययन में इसका बार-बार संदर्भ आता है। बाद के अध्ययनों की संदर्भ-सूचियां इसकी पुष्टि करती हैं।
7. Akhil Gupta
“Revolution in Telangana, 1946–1951”
तेलंगाना पर बाद के अकादमिक विमर्श में महत्वपूर्ण लेख।
यह आंदोलन के वर्गीय और क्रांतिकारी चरित्र के पुनर्मूल्यांकन के लिए उपयोगी है।
8. सामाजिक इतिहास और जाति अध्ययन
यागती चिन्ना राव जैसे इतिहासकारों के अध्ययन कम्युनिस्ट किसान राजनीति के भीतर जाति और दलित प्रश्न की सीमाओं को समझने में महत्वपूर्ण हैं।
9. भूमि सुधार संबंधी सरकारी अध्ययन
1961 Census of India की भूमि-अवधि रिपोर्ट पूर्व हैदराबाद की जागीर, सरफ-ए-खास, इनाम और बाद के भूमि सुधारों का उपयोगी आधिकारिक विवरण देती है।
आंदोलन के प्रभाव को कानूनी परिवर्तन से जोड़ने के लिए यह अत्यंत उपयोगी स्रोत है।
10. आधुनिक विश्वविद्यालय शोध
हैदराबाद विश्वविद्यालय के शोध-प्रबंधों में—
पर उपयोगी सामग्री उपलब्ध है। उदाहरण के लिए हाल के शोध में वेट्टी, ग्रामीण श्रमिक और तेलंगाना विद्रोह के संबंध पर विस्तृत सामग्री मिलती है।
11. सांस्कृतिक अध्ययन
तेलंगाना की लोक संस्कृति और वर्ग संघर्ष पर आधुनिक अध्ययन गीत, बुर्रकथा, प्रजा नाट्य मंडली और मल्लू स्वराज्यम की स्मृतियों को जोड़ते हैं।
ये आंदोलन को केवल सैन्य-राजनीतिक घटना से आगे सांस्कृतिक क्रांति के रूप में समझने में उपयोगी हैं।
द्वितीयक साहित्य का उपयोग करते समय लेखक की समयावधि और दृष्टिकोण स्पष्ट रखना चाहिए। सहभागी नेताओं के ग्रंथ संगठन के भीतर की बहस, भूमिगत जीवन और रणनीति का अमूल्य विवरण देते हैं, लेकिन उपलब्धियों के आंकड़ों में उनका पक्ष भी दिखाई दे सकता है। सरकारी इतिहास और सैन्य विवरण प्रशासनिक निर्णय तथा अभियान का कालक्रम देते हैं, पर ग्रामीण समाज की आवाज सीमित रहती है। सामाजिक इतिहासकार वर्ग, जाति, लिंग और स्थानीय स्मृति के प्रश्न सामने लाते हैं, जबकि राजनीतिक इतिहास कम्युनिस्ट पार्टी, निजाम और भारतीय संघ की रणनीतियों पर अधिक ध्यान देता है।
शोधार्थी के लिए उपयोगी पद्धति यह है कि किसी महत्वपूर्ण दावे को कम-से-कम दो अलग प्रकृति के स्रोतों से मिलाया जाए। भूमि-वितरण, नियंत्रित गांवों, मृतकों और गिरफ्तारियों की संख्या के लिए सहभागी विवरण को प्रशासनिक अभिलेख और आधुनिक अकादमिक अध्ययन के साथ पढ़ना चाहिए। महिलाओं, दलितों और आदिवासी समुदायों की भूमिका के लिए मौखिक इतिहास, जीवनी, लोकगीत और क्षेत्रीय भाषा के साहित्य को अनिवार्य पूरक मानना चाहिए। इसी बहु-स्रोत पद्धति से तेलंगाना को न तो केवल वीरगाथा बनाया जाता है, न केवल कानून-व्यवस्था की समस्या।
निष्कर्ष — तेलंगाना किसान संघर्ष को कैसे समझें?
तेलंगाना किसान संघर्ष भारतीय किसान इतिहास का असाधारण अध्याय इसलिए नहीं है कि उसमें बंदूकें चलीं।
भारत में सशस्त्र विद्रोह उससे पहले भी हुए थे और बाद में भी।
उसकी विशिष्टता इस बात में है कि उसने एक ही आंदोलन के भीतर भारतीय इतिहास के कई संक्रमणों को जोड़ दिया।
वह सामंतवाद के विरुद्ध किसान आंदोलन था।
वह निजामशाही के खिलाफ राजनीतिक विद्रोह था।
वह रजाकारों के विरुद्ध सशस्त्र प्रतिरोध था।
वह भूमि क्रांति का प्रयोग था।
वह ग्राम सत्ता की वैकल्पिक संरचना बनाने का प्रयास था।
और 1948 के बाद वह स्वतंत्र भारतीय राज्य तथा कम्युनिस्ट क्रांति की रणनीति के बीच संघर्ष भी बन गया।
इसकी शुरुआत भूमि से हुई
तेलंगाना की कहानी को विचारधारा से पहले किसान के खेत से शुरू करना चाहिए।
किसान के सामने समस्याएं थीं—
कम्युनिस्ट पार्टी ने इन समस्याओं का आविष्कार नहीं किया।
उसने उन्हें राजनीतिक भाषा और संगठन दिया।
संगठन ने असंतोष को आंदोलन बनाया
इनके बिना ग्रामीण असंतोष शायद स्थानीय विद्रोहों में बिखरा रहता।
यहीं किसान राजनीतिक वर्ग बना।
चाकली इलम्मा से कोमारय्या तक
चाकली इलम्मा का भूमि संघर्ष और 4 जुलाई 1946 को डोड्डी कोमारय्या की हत्या आंदोलन की सामूहिक चेतना के प्रतीक बने।
कोमारय्या की मृत्यु के बाद आंदोलन सैकड़ों गांवों में फैल गया।
यह घटना बताती है कि किसी शहादत का प्रभाव तभी बड़ा होता है जब उसके पीछे पहले से संगठनात्मक जमीन तैयार हो।
संघर्ष की क्रांतिकारी छलांग
वेट्टी से इनकार और बेदखली रोकना सुधारवादी मांगें थीं।
लेकिन भूमि पर कब्जा और पुनर्वितरण ग्रामीण संपत्ति संबंधों को चुनौती थी।
यहीं तेलंगाना किसान आंदोलन से सामाजिक क्रांति की ओर बढ़ा।
ग्राम समितियों और दलमों ने उस चुनौती को राजनीतिक-सैन्य रूप दिया।
महिलाओं और सबसे गरीब वर्गों की भूमिका
तेलंगाना की सबसे महत्वपूर्ण विरासतों में यह तथ्य है कि उसने ग्रामीण समाज के ऐसे लोगों को राजनीति में लाया जिन्हें परंपरागत सत्ता बाहर रखती थी।
आंदोलन के केवल समर्थक नहीं थे।
वे उसकी वास्तविक सामाजिक शक्ति बने।
*We Were Making History* जैसे मौखिक इतिहास इस तथ्य को उन आवाजों के माध्यम से दर्ज करते हैं जिन्हें पारंपरिक राजनीतिक इतिहास लगभग भूल गया था।
निजाम और रजाकारों का प्रश्न
तेलंगाना के किसान संघर्ष में निजामशाही और रजाकार हिंसा महत्वपूर्ण थीं, लेकिन आंदोलन को केवल धार्मिक संघर्ष में बदल देना गलत है।
मुस्लिम कम्युनिस्ट और लोकतांत्रिक कार्यकर्ता निजाम तथा रजाकार राजनीति के विरोध में थे।
मखदूम मोहिउद्दीन इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण हैं।
किसान संघर्ष का मूल प्रश्न भूमि और ग्रामीण सत्ता था।
1947–48 में उसमें सांप्रदायिक और राष्ट्रीय एकीकरण के प्रश्न जुड़ गए।
ऑपरेशन पोलो ने संघर्ष का अर्थ बदल दिया
सितंबर 1948 के बाद ऐतिहासिक परिस्थिति पूरी तरह बदल गई।
निजाम की स्वतंत्र सत्ता समाप्त हुई।
लेकिन किसान भूमि-संघर्ष जारी रहा।
यहीं से तेलंगाना के इतिहास का सबसे विवादास्पद चरण शुरू होता है।
क्या स्वतंत्र भारत के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष जारी रखना उचित था?
इसका कोई सरल उत्तर नहीं है।
किसान के लिए जमीन बचाना वास्तविक सवाल था।
लेकिन CPI द्वारा तेलंगाना को अखिल भारतीय क्रांति के मॉडल की तरह देखने में गंभीर रणनीतिक समस्याएं थीं।
स्वतंत्र भारत ने क्या सीखा?
स्वतंत्र भारतीय राज्य ने आंदोलन को सैन्य रूप से पराजित किया।
लेकिन उसने पुराने ग्रामीण ढांचे को जस का तस नहीं छोड़ा।
सरफ-ए-खास व्यवस्था समाप्त हुई।
किसान बेदखली पर कानूनी रोक बनी।
भूमि सुधार राजनीतिक एजेंडा बना। सरकारी भूमि-अवधि दस्तावेज इन संरचनात्मक परिवर्तनों की पुष्टि करते हैं।
यह तेलंगाना की सबसे बड़ी ऐतिहासिक विडंबना है—
राज्य ने विद्रोह को हराया, लेकिन विद्रोह द्वारा उठाए गए अनेक प्रश्नों को स्वीकार करना पड़ा।
क्या तेलंगाना सफल था?
उत्तर इस पर निर्भर करता है कि सफलता की कसौटी क्या है।
क्या कम्युनिस्ट क्रांतिकारी राज्य स्थापित हुआ?
क्या दस लाख एकड़ भूमि स्थायी रूप से गरीब किसानों के पास रही?
क्या जाति और पितृसत्ता समाप्त हुई?
क्या वेट्टी की सामाजिक वैधता टूटी?
क्या बड़े भू-स्वामी प्रभुत्व को ऐतिहासिक चोट लगी?
क्या भूमि सुधार का दबाव बढ़ा?
क्या किरायेदार अधिकार राजनीतिक और कानूनी प्रश्न बने?
क्या किसान राजनीतिक नागरिक बना?
क्या आंदोलन के बाद भी उसका जनाधार चुनाव में दिखाई दिया?
इसीलिए तेलंगाना को न पूर्ण विजय कहा जा सकता है, न साधारण पराजय।
नक्सलबाड़ी से संबंध
तेलंगाना ने भारतीय क्रांतिकारी वाम को किसान गुरिल्ला युद्ध का ऐतिहासिक उदाहरण दिया।
नक्सलबाड़ी और बाद की माओवादी राजनीति ने उसकी विरासत को अपनी तरह से पढ़ा।
लेकिन दोनों के बीच एक निर्णायक अंतर है।
तेलंगाना के मूल नेतृत्व का बड़ा हिस्सा 1951 के बाद संसदीय राजनीति में चला गया।
नक्सलबाड़ी से निकली धारा ने इसी संसदीय रास्ते को अस्वीकार किया।
इसलिए तेलंगाना एक ही समय में—
भारतीय संसदीय कम्युनिस्ट राजनीति
भारतीय सशस्त्र क्रांतिकारी वाम—
दोनों की ऐतिहासिक विरासत बन गया।
तेलंगाना और भारतीय लोकतंत्र
1951–52 का परिवर्तन इस पूरे संघर्ष का शायद सबसे उल्लेखनीय अंतिम अध्याय है।
कुछ महीने पहले तक गुरिल्ला लड़ाई चल रही थी।
और वही किसान सामाजिक आधार मतपत्र के माध्यम से सामने आया।
निर्वाचन आयोग के प्रथम आम चुनाव अभिलेख इस परिवर्तन की संस्थागत पृष्ठभूमि उपलब्ध कराते हैं।
यह केवल CPI का परिवर्तन नहीं था।
यह भारतीय लोकतंत्र की क्षमता का भी उदाहरण था कि वह सशस्त्र राजनीतिक विरोध को चुनावी प्रतिस्पर्धा में समाहित कर सकता है।
किसान आंदोलनों की हमारी श्रृंखला में तेलंगाना का स्थान
भारत के किसान आंदोलनों की स्वतंत्रता-पूर्व श्रृंखला में तेलंगाना को अंतिम अध्याय रखना ऐतिहासिक रूप से सार्थक है, क्योंकि यह वास्तव में दोनों युगों की सीमा पर खड़ा आंदोलन है।
उसकी जड़ें निजामशाही और ब्रिटिश परमाउंटसी के दौर में हैं।
उसका विस्फोट 1946 में हुआ।
भारत की स्वतंत्रता उसके बीच में आई।
हैदराबाद का विलय उसके दौरान हुआ।
और उसकी समाप्ति भारतीय गणराज्य तथा प्रथम आम चुनाव की दहलीज पर हुई।
इसलिए तेलंगाना केवल स्वतंत्रता-पूर्व किसान आंदोलन का अंत नहीं है।
वह स्वतंत्रता-पश्चात किसान राजनीति की शुरुआत की भूमिका भी है।
चंपारण ने दिखाया था कि किसान की शिकायत राष्ट्रीय राजनीति का प्रश्न बन सकती है।
खेड़ा और बारडोली ने संगठित सत्याग्रह की शक्ति दिखाई।
तेभागा ने बटाईदार का हिस्सा मांगा।
तेलंगाना ने प्रश्न और आगे बढ़ाया—
क्या जमीन और गांव की सत्ता स्वयं किसान के हाथ में जा सकती है?
यही उसका सबसे बड़ा और सबसे असुविधाजनक ऐतिहासिक प्रश्न है।
उसका उत्तर भारत ने क्रांति से नहीं, बल्कि धीरे-धीरे—
और ग्रामीण सामाजिक परिवर्तन—
के रास्ते देने की कोशिश की।
लेकिन भूमि, किरायेदारी, कृषि मजदूरी, किसान आय और ग्रामीण असमानता के प्रश्न समाप्त नहीं हुए।
इसीलिए 1951 पर तेलंगाना संघर्ष समाप्त होता है, पर भारत का किसान आंदोलन नहीं।
यहीं से हमारी शोध-श्रृंखला का अगला बड़ा अध्याय शुरू होता है—स्वतंत्र भारत के किसान आंदोलन।
तेलंगाना किसान संघर्ष की संक्षिप्त समयरेखा
तेलंगाना संघर्ष को केवल कम्युनिस्ट सशस्त्र विद्रोह, निजाम-विरोधी अभियान या भूमि-वितरण की कहानी मानना अधूरा होगा। इसकी सबसे गहरी उपलब्धि किसान को अधीन प्रजा से अधिकार मांगने वाले राजनीतिक नागरिक में बदलना, वेट्टी और दोरा की सामाजिक सत्ता को चुनौती देना तथा भूमि सुधार को टाले न जा सकने वाला प्रश्न बनाना थी। हिंसा, वर्गीय तनाव, असमान क्षेत्रीय नियंत्रण, विवादित संख्याएं और 1948 के बाद की रणनीतिक भूलें उसकी वास्तविक सीमाएं रहीं। फिर भी 1951–52 में मतपत्र की ओर संक्रमण ने दिखाया कि उसका सामाजिक आधार लोकतांत्रिक राजनीति में भी जीवित था। इसलिए यह स्वतंत्रता-पूर्व किसान आंदोलनों का समापन अध्याय होने के साथ स्वतंत्र भारत की कृषक और वामपंथी राजनीति की प्रस्तावना भी है।
प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक स्रोत
स्रोत-सावधानी: सरकारी तथा सैन्य अभिलेख संघर्ष को सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की दृष्टि से देखते हैं, सहभागी संस्मरण संगठन और उपलब्धियों पर बल देते हैं, जबकि बाद के सामाजिक इतिहास जाति, वर्ग, महिला और क्षेत्रीय अनुभव सामने लाते हैं। भूमि-वितरण, गांवों की संख्या, मृतकों, गिरफ्तारियों और हिंसा के आंकड़ों में स्रोत-अंतर होने पर इस अध्ययन ने निश्चित संख्या के बजाय स्रोत-सापेक्ष भाषा अपनाई है।