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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–004 · अध्याय 14

तेभागा आंदोलन

1946–1947—बंगाल के बटाईदारों का दो-तिहाई उपज-अधिकार, ग्रामीण सत्ता को चुनौती और भूमि सुधार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskसंपादित विस्तृत शोध संस्करण · 25 अगस्त 2026

तेभागा आंदोलन आधुनिक भारतीय किसान इतिहास का वह निर्णायक संघर्ष था जिसमें बंगाल के बटाईदारों ने केवल अधिक उपज नहीं, बल्कि उत्पादन पर अपने श्रम-अधिकार और ग्रामीण सत्ता में सम्मान की मांग की। किसान सभा के नेतृत्व में उठी दो-तिहाई हिस्से की मांग ने जोतदार–बटाईदार संबंध, फसल रखने के अधिकार, महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी, आदिवासी और दलित किसानों की भूमिका तथा औपनिवेशिक शासन की सीमाओं को एक साथ उजागर किया। यह अध्ययन अकाल और युद्धकालीन संकट से आंदोलन के उभार, दमन, विभाजन, कानूनी प्रभाव और ऑपरेशन बर्गा तक उसकी दीर्घ विरासत की समेकित पड़ताल करता है।

खंड 1

पृष्ठभूमि और बंगाल की कृषि व्यवस्था

तेभागा आंदोलन को समझने के लिए 1946 से कहानी शुरू करना पर्याप्त नहीं है। इसकी जड़ें उस भूमि-व्यवस्था में थीं जिसे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने अठारहवीं शताब्दी के अंत में बंगाल में संस्थागत रूप दिया था। लगभग डेढ़ शताब्दी में इस व्यवस्था ने जमीन के मालिक, लगान वसूलने वाले मध्यस्थ और वास्तविक खेती करने वाले किसान के बीच ऐसी परतें खड़ी कर दीं कि खेत में श्रम करने वाला व्यक्ति अक्सर उपज का सबसे कमजोर दावेदार बन गया।

1946–47 में जब बंगाल के बटाईदार किसानों ने कहा कि फसल का आधा नहीं, दो-तिहाई हिस्सा हमारा होगा, तो यह केवल उपज के बंटवारे का विवाद नहीं था। इसके पीछे बड़ा प्रश्न था—खेती की वास्तविक लागत और श्रम किसान वहन करता है तो उपज पर पहला अधिकार किसका होना चाहिए?

इसी प्रश्न ने तेभागा को आधुनिक भारत के सबसे महत्वपूर्ण किसान आंदोलनों में स्थान दिया।

‘तेभागा’ का अर्थ

बांग्ला में ‘तेभागा’ का सामान्य अर्थ है—तीन भाग। आंदोलन के संदर्भ में इसका आशय था कि खेत की कुल उपज को तीन हिस्सों में माना जाए और उसमें से दो हिस्से वास्तविक खेती करने वाले बर्गादार या अधियार को तथा एक हिस्सा भूमि पर उच्चतर अधिकार रखने वाले जोतदार को मिले।

उस समय बंगाल के अनेक क्षेत्रों में बटाई की प्रचलित व्यवस्था में फसल आधी-आधी बांटी जाती थी। बर्गादार को विभिन्न क्षेत्रों में अधियार, भागचासी या बटाईदार जैसे नामों से जाना जाता था।

किसानों का तर्क सीधा था। जमीन भले किसी और के नियंत्रण में हो, लेकिन खेती का श्रम और उत्पादन से जुड़ा बड़ा व्यय वास्तविक कृषक करता है। इसलिए आधी फसल भूमि नियंत्रक को देना अन्यायपूर्ण है।

यही आर्थिक तर्क बाद में राजनीतिक नारे में बदल गया—

आधी नहीं, तेभागा चाहिए।

तेभागा केवल लगान घटाने का आंदोलन नहीं था

ऊपरी तौर पर आंदोलन की मांग बहुत सीमित दिखाई देती है। बर्गादार आधी उपज देने के बजाय एक-तिहाई देना चाहता था। लेकिन इस मांग में बंगाल की पूरी कृषि-सत्ता को चुनौती देने की क्षमता मौजूद थी।

सवाल केवल यह नहीं था कि—

किसको कितनी फसल मिलेगी?

फसल पर नियंत्रण किसका होगा?

परंपरा के अनुसार फसल काटने के बाद धान जोतदार के खलिहान में ले जाया जाता था और वहां उसका बंटवारा होता था। तेभागा आंदोलन ने इस व्यवस्था को चुनौती दी। किसान सभा के आंदोलन में यह महत्वपूर्ण निर्देश बना कि काटी गई फसल किसान अपने खलिहान में ले जाएगा और वहीं से जोतदार का हिस्सा दिया जाएगा। किसान सभा के विवरण में सितंबर 1946 के आह्वान के साथ दो-तिहाई हिस्से और फसल को किसान के अपने खलिहान में रखने की मांग स्पष्ट रूप से दर्ज है।

इस छोटे-से बदलाव का राजनीतिक अर्थ बहुत बड़ा था।

जिसके खलिहान में फसल थी, व्यवहारतः नियंत्रण भी उसी का था।

इसलिए तेभागा ने केवल फसल के अनुपात को नहीं, बल्कि ग्रामीण सत्ता के केंद्र को बदलने की कोशिश की।

भारतीय किसान आंदोलन में विशिष्ट स्थान

औपनिवेशिक भारत में तेभागा से पहले अनेक बड़े किसान संघर्ष हो चुके थे। नील विद्रोह ने यूरोपीय नील उत्पादकों की जबरदस्ती को चुनौती दी; पाबना आंदोलन ने जमींदारी अत्याचार और मनमाने लगान का विरोध किया; दक्कन विद्रोह महाजनी कर्ज के संकट से निकला; चंपारण में नील की जबरन खेती प्रश्न बना; खेड़ा में कर-माफी और बारडोली में बढ़े हुए भू-राजस्व के खिलाफ संघर्ष हुआ।

तेभागा इन आंदोलनों की परंपरा में होते हुए भी कई अर्थों में अलग था।

यहां संघर्ष मुख्यतः उस किसान का था जिसके पास खेती करने के लिए पर्याप्त अपनी जमीन नहीं थी और जो दूसरे के नियंत्रण वाली भूमि पर खेती करके फसल बांटता था। आंदोलन ने उत्पादन संबंधों के भीतर मौजूद असमानता को सीधे निशाना बनाया।

समाजशास्त्री डी. एन. धनागरे ने तेभागा को राजनीतिक रूप से संगठित कृषक समुदाय द्वारा किए गए सचेत विद्रोह के रूप में विशिष्ट महत्व दिया है। उनके अध्ययन का केंद्र भी आंदोलन की सामाजिक संरचना, वर्ग चरित्र, नेतृत्व और संगठन है।

इस दृष्टि से तेभागा राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा से जुड़ा हुआ भी था और उससे अलग भी।

उस समय प्रश्न केवल यह नहीं रह गया था कि—

भारत पर शासन कौन करेगा?

ग्रामीण बंगाल में प्रश्न यह भी उठ चुका था—

स्वतंत्र भारत में जमीन और कृषि उत्पादन के संबंध कैसे होंगे?

आंदोलन का समय भी महत्वपूर्ण था

तेभागा आंदोलन 1946–47 में उस समय उभरा जब ब्रिटिश शासन अपने अंतिम चरण में था। दूसरी ओर बंगाल भीषण राजनीतिक और सामाजिक संकट से गुजर रहा था।

1943 का अकाल कुछ ही वर्ष पीछे था। द्वितीय विश्वयुद्ध के आर्थिक प्रभावों ने ग्रामीण समाज को झकझोर दिया था। महंगाई, खाद्यान्न संकट और कर्ज ने गरीब किसानों की स्थिति खराब की थी। दूसरी तरफ 1946 में सांप्रदायिक तनाव तेजी से बढ़ रहा था और बंगाल के विभाजन की संभावना सामने आने लगी थी।

इसी वातावरण में सितंबर 1946 में बंगाल प्रांतीय किसान सभा ने तेभागा लागू कराने के लिए जन-संघर्ष का आह्वान किया। अखिल भारतीय किसान सभा के अपने ऐतिहासिक विवरण में भी इस आह्वान और फ्लाउड भूमि राजस्व आयोग की पूर्व सिफारिश के बीच सीधा संबंध बताया गया है।

अर्थात आंदोलन अचानक पैदा नहीं हुआ था। मांग पहले से विकसित हो चुकी थी; 1946 ने उसे व्यापक प्रत्यक्ष कार्रवाई में बदल दिया।

हिंदू और मुस्लिम कृषकों की भागीदारी

तेभागा की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि आंदोलन ऐसे समय उभरा जब बंगाल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से गुजर रहा था, फिर भी कई क्षेत्रों में हिंदू और मुस्लिम बटाईदार समान आर्थिक मांग पर साथ आए।

विश्वविद्यालयीय अध्ययन सामग्री भी उत्तर बंगाल में हिंदू और मुस्लिम बटाईदारों की संयुक्त भागीदारी तथा सरकारी दमन और जमींदारी प्रतिक्रिया के विरुद्ध उनके संघर्ष की ओर संकेत करती है।

इसका अर्थ यह नहीं कि तेभागा सांप्रदायिक राजनीति से पूरी तरह अप्रभावित रहा। 1946–47 का राजनीतिक वातावरण अंततः आंदोलन पर भी पड़ा। लेकिन उसका आरंभिक और मूल संगठनात्मक आधार कृषक हित और वर्गीय प्रश्न था।

यही बात उसे विभाजन-पूर्व बंगाल के इतिहास में विशेष बनाती है।

तेभागा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ 1793 का स्थायी बंदोबस्त था।

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्राप्त होने के बाद राजस्व संग्रह की ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता थी जिससे सरकार को नियमित और अनुमानित आय मिल सके। लंबे प्रयोगों के बाद गवर्नर जनरल लॉर्ड कॉर्नवालिस के शासन में स्थायी बंदोबस्त लागू किया गया।

इसके अंतर्गत जमींदारों से लिया जाने वाला भू-राजस्व स्थायी रूप से निर्धारित कर दिया गया।

औपनिवेशिक सरकार के लिए इसका आकर्षण स्पष्ट था—उसे राजस्व संग्रह के लिए गांव-गांव प्रत्यक्ष प्रशासन करने की आवश्यकता कम होती और एक ऐसा संपन्न भू-स्वामी वर्ग विकसित होता जिसका हित ब्रिटिश शासन की स्थिरता से जुड़ा रहता।

लेकिन इस व्यवस्था का ग्रामीण समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़ा।

जमीन और किसान के बीच मध्यस्थों की दीवार

स्थायी बंदोबस्त ने अनेक राजस्व मध्यस्थों को जमीन पर मजबूत स्वामित्व-सदृश अधिकार प्रदान किए, जबकि वास्तविक कृषक का स्थान अपेक्षाकृत कमजोर हुआ। तेभागा पर डी. एन. धनागरे के क्लासिक अध्ययन की उपलब्ध प्रतिलिपि भी स्थायी बंदोबस्त को बंगाल में नए कृषि-सामाजिक संबंधों की शुरुआत के रूप में रेखांकित करती है।

व्यवस्था धीरे-धीरे और जटिल हुई।

जमींदार के नीचे कई प्रकार के मध्यस्थ अधिकार विकसित हुए। कहीं पट्टनीदार, कहीं तालुकदार, कहीं जोतदार और उनके नीचे रैयत तथा बटाईदार।

इसलिए वास्तविक ग्रामीण संरचना को केवल—

के रूप में देखना अधूरा होगा।

तेभागा के समय कई इलाकों में वास्तविक टकराव का केंद्र जोतदार और बर्गादार थे।

स्थायी बंदोबस्त की अंतर्विरोधी विरासत

औपनिवेशिक प्रशासन को उम्मीद थी कि निश्चित राजस्व के कारण जमींदार कृषि सुधार में निवेश करेंगे। लेकिन व्यवहार में अनेक क्षेत्रों में कृषि अधिशेष का बड़ा हिस्सा लगान और मध्यस्थ अधिकारों की विभिन्न परतों के माध्यम से ऊपर जाता रहा।

कृषक के सामने दोहरी समस्या थी।

एक ओर उसे उत्पादन का जोखिम उठाना पड़ता था—बारिश खराब हुई, फसल नष्ट हुई या कीमत गिरी तो नुकसान खेती करने वाले का।

दूसरी ओर अच्छी फसल होने पर अधिशेष में उसका अधिकार सीमित था।

बटाईदार की स्थिति इससे भी अधिक असुरक्षित हो सकती थी क्योंकि जमीन पर उसका स्वामित्व नहीं था और खेती जारी रखने का अधिकार अक्सर स्थानीय शक्ति-संबंधों पर निर्भर था।

इस संरचना में जमीन केवल आर्थिक संपत्ति नहीं थी। वह सामाजिक प्रतिष्ठा, ऋण, राजनीतिक प्रभाव और ग्रामीण प्रशासन पर नियंत्रण का आधार भी थी।

1885 का बंगाल काश्तकारी अधिनियम

उन्नीसवीं शताब्दी में किसान असंतोष और भूमि-संबंधी विवादों ने औपनिवेशिक सरकार को काश्तकारी संबंधों में कुछ कानूनी हस्तक्षेप करने के लिए बाध्य किया। बंगाल काश्तकारी अधिनियम, 1885 इसी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण पड़ाव था।

इसने कुछ श्रेणियों के रैयतों के अधिकारों को कानूनी मान्यता दी और मनमानी बेदखली तथा लगान संबंधी प्रश्नों को विनियमित करने का प्रयास किया।

लेकिन ग्रामीण बंगाल की समस्या समाप्त नहीं हुई।

विशेष रूप से बर्गादार की स्थिति कमजोर बनी रही। बीसवीं शताब्दी तक भूमि पर अधिकारों की इतनी परतें बन चुकी थीं कि कानून में दर्ज श्रेणी और खेत पर वास्तविक शक्ति हमेशा एक जैसी नहीं थीं।

इसी अंतराल में जोतदार वर्ग अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया।

तेभागा आंदोलन को समझने में सबसे अधिक भ्रम पैदा करने वाले शब्दों में एक है—जोतदार।

लोकप्रिय विवरणों में कभी-कभी जमींदार और जोतदार को एक ही अर्थ में इस्तेमाल कर दिया जाता है, जबकि ऐतिहासिक रूप से दोनों हमेशा समान नहीं थे।

जमींदार औपनिवेशिक भू-राजस्व व्यवस्था के शीर्षस्थ अधिकारधारियों में थे। जोतदार प्रायः स्थानीय स्तर पर पर्याप्त कृषि भूमि या कृषि अधिकार नियंत्रित करने वाला ग्रामीण वर्ग था। क्षेत्र के अनुसार उसकी स्थिति बदल सकती थी।

विशेषकर उत्तर बंगाल में जोतदार ग्रामीण अर्थव्यवस्था की अत्यंत प्रभावशाली कड़ी बन गए थे।

जोतदार की आर्थिक शक्ति

जोतदार स्वयं सारी जमीन नहीं जोतता था।

उसके नियंत्रण में बड़ी जोत हो सकती थी जिसे छोटे किसानों अथवा भूमिहीन कृषकों को बटाई पर दिया जाता था। खेती करने वाला बर्गादार अपना श्रम लगाता और फसल का निश्चित हिस्सा जोतदार को देता।

इस प्रकार जोतदार को तीन प्रकार की शक्ति मिल सकती थी—

भूमि पर नियंत्रण, फसल में हिस्सा, और कृषक पर सामाजिक-आर्थिक प्रभाव।

यदि वही व्यक्ति किसान को धान या पैसा उधार भी देता था तो संबंध और असमान हो जाता था।

तब किसान केवल बटाईदार नहीं रहता; वह देनदार भी हो सकता था।

ग्रामीण सत्ता का स्थानीय केंद्र

जोतदार की शक्ति केवल जमीन के आकार से निर्धारित नहीं होती थी।

ग्रामीण बंगाल में आर्थिक प्रभुत्व सामाजिक प्रभाव में बदल सकता था। स्थानीय बाजार, कर्ज, रोजगार और प्रशासन से संपर्क जैसे साधनों ने संपन्न कृषक वर्ग को गरीब किसान की तुलना में बहुत मजबूत बनाया।

यही कारण है कि तेभागा संघर्ष केवल किसी दूर बैठे बड़े जमींदार के विरुद्ध नहीं था।

कई क्षेत्रों में संघर्ष गांव के भीतर था।

एक तरफ स्थानीय जोतदार।

दूसरी तरफ उसी की जमीन पर खेती करने वाला अधियार।

इससे तेभागा का संघर्ष अत्यंत प्रत्यक्ष हो गया। दोनों पक्ष एक-दूसरे को जानते थे और फसल कटते ही विवाद वास्तविक रूप ले लेता था।

सभी जोतदार एक जैसे नहीं थे

यह सावधानी आवश्यक है कि जोतदारों को एक बिल्कुल समरूप वर्ग न माना जाए। बंगाल के विभिन्न जिलों में ‘जोतदार’ शब्द का सामाजिक और आर्थिक अर्थ अलग-अलग हो सकता था।

कुछ बड़े भू-नियंत्रक थे, कुछ संपन्न कृषक और कुछ अपेक्षाकृत छोटे अधिकारधारी।

इसी प्रकार सभी बर्गादार भी समान आर्थिक स्थिति में नहीं थे।

इसलिए तेभागा को सरल रूप में केवल—

कह देना पर्याप्त नहीं है।

उसका अधिक सटीक वर्णन होगा—

भूमि पर उच्चतर नियंत्रण रखने वाले ग्रामीण वर्ग और वास्तविक बटाईदार कृषकों के बीच कृषि अधिशेष तथा उत्पादन पर अधिकार का संघर्ष।

तेभागा आंदोलन का वास्तविक नायक बर्गादार था।

बर्गादार वह कृषक था जो दूसरे के नियंत्रण वाली भूमि पर खेती करता और बदले में फसल का हिस्सा भूमि नियंत्रक को देता।

बंगाल के अलग-अलग क्षेत्रों में उसे बर्गादार, अधियार, भागचासी आदि कहा जाता था। ‘अधियार’ शब्द ही उस व्यवस्था की प्रकृति बताता है—फसल का आधा हिस्सा।

खेती कौन करता था?

व्यवस्था की असमानता समझने के लिए खेत की पूरी उत्पादन प्रक्रिया देखनी होगी।

जमीन तैयार करना, बीज बोना, निराई-गुड़ाई, सिंचाई जहां आवश्यक हो, फसल की रखवाली, कटाई और धान तैयार करने तक बड़ी मात्रा में मानवीय श्रम लगता था।

इस श्रम का मुख्य भार किसान परिवार उठाता था।

यही वह आधार था जिस पर किसान सभा ने तर्क विकसित किया कि यदि वास्तविक उत्पादन में बर्गादार का श्रम और निवेश प्रमुख है तो जोतदार को आधी उपज क्यों मिले?

फ्लाउड आयोग ने भी बर्गादारों के लिए दो-तिहाई हिस्से की सिफारिश की थी। यह तथ्य बाद में किसान सभा के लिए अत्यंत शक्तिशाली राजनीतिक हथियार बना—क्योंकि अब मांग को केवल क्रांतिकारी संगठन की मांग कहकर खारिज करना कठिन था; सरकारी आयोग भी उसके मूल तर्क को स्वीकार कर चुका था।

आधी फसल ही पूरा शोषण नहीं था

बर्गादार की समस्या केवल पचास प्रतिशत उपज देने तक सीमित नहीं थी।

विभिन्न अध्ययनों में अतिरिक्त देयों, कर्ज और अन्य स्थानीय प्रथाओं का उल्लेख मिलता है। युद्धकालीन महंगाई और 1943 के अकाल ने इस असुरक्षा को और बढ़ाया। जलपाईगुड़ी संबंधी एक अध्ययन फ्लाउड आयोग द्वारा आधी उपज की व्यवस्था के साथ अतिरिक्त अवैध वसूलियों की आलोचना किए जाने का उल्लेख करता है।

यदि किसान को बुआई से पहले धान उधार लेना पड़े, यदि ऋण पर अतिरिक्त भुगतान करना पड़े और फसल का आधा हिस्सा भी चला जाए, तो परिवार के पास अगली फसल तक जीवन चलाने के लिए बहुत कम बच सकता था।

यही कारण है कि फसल के अनुपात का सवाल सीधे जीविका और भूख से जुड़ा था।

असुरक्षित काश्तकारी

बर्गादार की दूसरी बड़ी समस्या थी—जमीन पर कमजोर अधिकार।

यदि उसका काश्तकारी संबंध पर्याप्त रूप से दर्ज न हो अथवा स्थानीय व्यवस्था में उसकी स्थिति कमजोर हो, तो जोतदार के साथ टकराव का अर्थ अगली खेती से वंचित होने का खतरा हो सकता था।

इसलिए तेभागा में फसल का हिस्सा और काश्तकारी सुरक्षा आपस में जुड़े प्रश्न थे।

किसान केवल यह नहीं चाहता था कि इस वर्ष उसे ज्यादा धान मिले।

वह चाहता था कि खेती करने वाले व्यक्ति की कृषक के रूप में कानूनी और सामाजिक स्थिति स्वीकार की जाए।

स्वतंत्रता के बाद पश्चिम बंगाल में बर्गादार अधिकारों और अंततः ऑपरेशन बर्गा तक पहुंचने वाली राजनीति की वैचारिक जड़ें यहीं खोजी जा सकती हैं।

अब मूल प्रश्न सामने आता है।

यदि दशकों से आधी फसल देने की व्यवस्था चल रही थी तो अचानक किसान ने दो-तिहाई की मांग क्यों की?

उत्तर केवल 1946 में नहीं मिलता।

तेभागा कई दशकों में विकसित हुए आर्थिक संकट, किसान संगठन और भूमि सुधार संबंधी बहस का परिणाम था।

पहला आधार — उत्पादन में किसान का योगदान

तेभागा का सबसे मजबूत आर्थिक तर्क उत्पादन लागत पर आधारित था।

बर्गादार का कहना था कि यदि जमीन के अलावा कृषि उत्पादन के प्रमुख साधन और श्रम वह उपलब्ध कराता है तो फसल को बराबर बांटना न्यायसंगत नहीं है।

दो-तिहाई वास्तविक कृषक का, एक-तिहाई भूमि नियंत्रक का।

बांग्लापीडिया के विवरण में भी आंदोलन के पीछे यही तर्क प्रमुख है कि श्रम और अन्य उत्पादन निवेश बर्गादार करता था, इसलिए आधा हिस्सा भूमि स्वामी को देना अनुचित माना गया।

दूसरा आधार — फ्लाउड आयोग की सिफारिश

तेभागा मांग को निर्णायक वैधता बंगाल भूमि राजस्व आयोग, जिसे सामान्यतः फ्लाउड आयोग कहा जाता है, की सिफारिश से मिली।

फजलुल हक की सरकार ने 1938 में भूमि राजस्व संबंधी समस्याओं की जांच के लिए आयोग नियुक्त किया था। आयोग ने 1940 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की और बर्गादारों की स्थिति में सुधार सहित दो-तिहाई हिस्से की दिशा में महत्वपूर्ण सिफारिश की। उत्तर बंगाल पर विश्वविद्यालयीय शोध भी आयोग की नियुक्ति, 1940 की रिपोर्ट और बर्गादारों के लिए तेभागा की सिफारिश को दर्ज करता है।

यह अत्यंत महत्वपूर्ण था।

अब किसान सभा कह सकती थी—

जिस व्यवस्था को स्वयं सरकारी आयोग अन्यायपूर्ण मान चुका है, उसे किसान क्यों स्वीकार करें?

लेकिन सिफारिशों को तत्काल प्रभावी रूप से लागू नहीं किया गया।

इससे असंतोष बढ़ता गया।

तीसरा आधार — किसान संगठन का विस्तार

1930 और 1940 के दशकों में किसान संगठन तेजी से मजबूत हुए। 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा के गठन ने विभिन्न प्रांतीय किसान संघर्षों को एक व्यापक राजनीतिक मंच दिया।

बंगाल में प्रांतीय किसान सभा ने बर्गादारों और गरीब किसानों के बीच संगठन खड़ा किया।

इससे बिखरी हुई व्यक्तिगत शिकायत सामूहिक मांग में बदलने लगी।

यही किसान आंदोलन के विकास में निर्णायक परिवर्तन था।

एक अकेला अधियार जोतदार से कहता कि वह आधी फसल नहीं देगा तो उसे बेदखली या दमन का सामना करना पड़ सकता था।

लेकिन यदि पूरा गांव कहे—

तो शक्ति-संतुलन बदल जाता है।

और यदि अनेक गांव तथा जिले यही कहने लगें तो व्यक्तिगत विवाद किसान आंदोलन बन जाता है।

चौथा आधार — युद्ध और अकाल का अनुभव

द्वितीय विश्वयुद्ध के वर्षों में बंगाल की अर्थव्यवस्था गंभीर दबाव में आई। खाद्यान्न बाजार में उथल-पुथल, महंगाई और 1943 के विनाशकारी अकाल ने ग्रामीण गरीबों को सबसे अधिक प्रभावित किया।

अकाल ने यह भी उजागर किया कि खाद्यान्न पैदा करने वाला किसान स्वयं भोजन की सुरक्षा से वंचित हो सकता है।

इस अनुभव का राजनीतिक प्रभाव गहरा था।

जब भूख का संकट गुजर चुका हो और किसान फिर नई फसल काट रहा हो, तब आधी फसल छोड़ देने का पुराना नियम पहले से अधिक असहनीय लग सकता था।

इसलिए 1946 की फसल केवल कृषि उत्पादन नहीं थी।

उसके पीछे 1943 की भूख की स्मृति भी खड़ी थी।

पांचवां आधार — फसल अपने खलिहान में

तेभागा आंदोलन का सबसे क्रांतिकारी व्यावहारिक पक्ष था—

धान पहले किसान के खलिहान में जाएगा।

पहले फसल जोतदार के खलिहान में पहुंचने के बाद बंटती थी। किसान सभा ने इस प्रक्रिया को उलटने का आह्वान किया।

इससे फसल का भौतिक नियंत्रण बर्गादार के हाथ में आता।

यहीं आर्थिक मांग प्रत्यक्ष राजनीतिक कार्रवाई में बदल गई।

किसान ने सरकार से केवल यह नहीं कहा—

उसने स्वयं खेत में जाकर व्यवस्था बदलने की कोशिश की।

खंड 2

आर्थिक संकट और आंदोलन की जमीन

तेभागा आंदोलन की संरचनात्मक पृष्ठभूमि बंगाल की जमींदारी और बटाईदारी व्यवस्था में थी, लेकिन केवल भूमि-संबंधों की असमानता यह नहीं समझाती कि व्यापक संघर्ष 1946 में ही क्यों फूटा। इसके लिए 1920 के दशक के अंत से 1940 के दशक के मध्य तक बंगाल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आए गहरे संकट को समझना आवश्यक है।

महामंदी ने कृषि कीमतों और ग्रामीण ऋण-संबंधों को झकझोरा। द्वितीय विश्वयुद्ध ने बाजार, परिवहन और खाद्यान्न आपूर्ति पर असाधारण दबाव डाला। 1943 के अकाल ने लाखों लोगों को मृत्यु, विस्थापन और संपत्ति-विहीनता की ओर धकेला। और इन सबके बीच एक सरकारी आयोग—फ्लाउड आयोग—ने बर्गादारों की शिकायतों में पर्याप्त आधार पाते हुए उपज में उनके हिस्से को बढ़ाने की सिफारिश कर दी।

इसलिए 1946 तक स्थिति यह थी कि किसान केवल यह नहीं मानता था कि व्यवस्था अन्यायपूर्ण है; उसके पास यह कहने का आधार भी था कि सरकार स्वयं इस अन्याय को पहचान चुकी है, फिर सुधार लागू क्यों नहीं किया गया?

यहीं आर्थिक संकट राजनीतिक संघर्ष में बदलने लगा।

1929 के बाद बदली हुई दुनिया

1929 में शुरू हुई विश्वव्यापी महामंदी को केवल औद्योगिक या वित्तीय संकट मानना गलत होगा। कृषि प्रधान औपनिवेशिक अर्थव्यवस्थाओं पर इसका प्रभाव अत्यंत गहरा पड़ा।

बंगाल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पहले ही बाजार से जुड़ चुकी थी। किसान केवल अपने परिवार के भोजन के लिए उत्पादन नहीं करता था। जूट जैसी नकदी फसलें अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़ी थीं और ग्रामीण परिवारों को लगान, ऋण तथा अन्य आवश्यकताओं के लिए नकद धन चाहिए था।

जब कृषि वस्तुओं की कीमतें गिरने लगीं तो किसान की आमदनी कम हुई, लेकिन उसके अनेक दायित्व उसी अनुपात में कम नहीं हुए।

उत्पादन किसान का, बाजार का जोखिम किसान का और कर्ज का बोझ भी किसान का।

बंगाल की कृषि अर्थव्यवस्था पर विस्तृत शोध यह दिखाता है कि 1920 से 1946 के बीच प्रति व्यक्ति कृषि उत्पादन में दीर्घकालीन गिरावट और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक कमजोरी 1943 के संकट की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण थी।

कीमत गिरने का अर्थ किसान के लिए क्या था?

यदि कोई किसान बाजार में अपनी फसल बेचकर दस रुपये प्राप्त करता था और बाद में उसी मात्रा की फसल के केवल छह रुपये मिलते थे, तो उसकी आय में भारी गिरावट आती थी।

लेकिन उसका पुराना कर्ज अपने आप छह रुपये का नहीं हो जाता।

यही महामंदी की सबसे विनाशकारी विशेषताओं में से एक थी।

फसल की कीमत गिरती थी, कर्ज का मूलधन नहीं।

इससे ऋण का वास्तविक बोझ बढ़ सकता था।

गरीब किसान और छोटे भू-स्वामी अपनी भूमि गिरवी रखने, फसल अग्रिम बेचने अथवा महाजन और संपन्न ग्रामीण वर्ग पर अधिक निर्भर होने के लिए मजबूर हो सकते थे।

कृषि इतिहास के व्यापक अध्ययनों में भूमि-अधिकारों के हस्तांतरण, ग्रामीण ऋण और बटाई पर बढ़ती निर्भरता को औपनिवेशिक पूर्वी भारत के महत्वपूर्ण संरचनात्मक परिवर्तनों में गिना गया है।

लेकिन पूरे बंगाल में प्रभाव एक जैसा नहीं था

यहां एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सावधानी आवश्यक है।

महामंदी का प्रभाव बंगाल के सभी हिस्सों और सभी कृषक वर्गों पर समान नहीं पड़ा। सुगत बोस के अध्ययन के अनुसार उत्तर बंगाल के जोतदार–अधियार संबंधों में संकट पूर्वी बंगाल की अत्यधिक मौद्रीकृत छोटे किसान वाली अर्थव्यवस्था की तुलना में अधिक धीरे विकसित हुआ। उत्तर बंगाल में निर्णायक तनाव विशेष रूप से 1939–40 के आसपास स्पष्ट होने लगा।

यह तथ्य महत्वपूर्ण है क्योंकि बाद में उत्तर बंगाल ही तेभागा आंदोलन के सबसे शक्तिशाली क्षेत्रों में से एक बना।

अर्थात महामंदी ने कोई तत्काल तेभागा विद्रोह पैदा नहीं किया। उसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमजोरियों को गहरा किया, और अगले दशक में युद्ध, महंगाई तथा अकाल ने उन्हीं कमजोरियों को विस्फोटक बना दिया।

1940 तक अधियार असंतोष

उत्तर बंगाल के दिनाजपुर क्षेत्र का उदाहरण विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

दिनाजपुर की एक बंदोबस्त रिपोर्ट में पहले अधियारों में वर्गीय असंतोष के स्पष्ट संकेत न होने की बात कही गई थी, लेकिन जनवरी–फरवरी 1940 में अटवारी, ठाकुरगांव तथा जलपाईगुड़ी से लगे क्षेत्रों में अधियार–जोतदार संघर्षों ने उस आकलन को गलत साबित करना शुरू कर दिया।

इसका अर्थ है कि 1946 का तेभागा शून्य से पैदा नहीं हुआ।

उससे कई वर्ष पहले बटाईदार किसान स्थानीय स्तर पर जोतदारों से टकराने लगे थे।

1946 में किसान सभा ने इन्हीं बिखरे हुए असंतोषों को एक साझा राजनीतिक कार्यक्रम में बदल दिया।

सितंबर 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने के बाद ब्रिटिश भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से युद्धकालीन आवश्यकताओं के अधीन होती चली गई।

बंगाल के लिए इसका महत्व और भी अधिक था।

दिसंबर 1941 के बाद जापान के युद्ध में प्रवेश और 1942 में बर्मा पर जापानी कब्जे ने बंगाल को युद्ध के अग्रिम क्षेत्र के निकट ला दिया।

बर्मा से चावल के आयात का रास्ता बाधित हुआ। सैन्य जरूरतों के लिए परिवहन, खाद्यान्न और अन्य संसाधनों पर दबाव बढ़ा। युद्धकालीन खरीद और बाजार की अनिश्चितता ने कीमतों को ऊपर धकेला।

ग्रामीण गरीब के लिए समस्या यह थी कि उसकी मजदूरी या आय उसी गति से नहीं बढ़ी जिस गति से भोजन की कीमत बढ़ सकती थी।

युद्धकालीन महंगाई

युद्ध के दौरान सरकारी व्यय में भारी वृद्धि हुई और अर्थव्यवस्था में मुद्रा का विस्तार हुआ। दूसरी ओर उपभोक्ता वस्तुओं की उपलब्धता सीमित थी।

इसका स्वाभाविक परिणाम महंगाई था।

संपन्न व्यापारी या अनाज रखने की क्षमता वाला कृषक बढ़ती कीमतों से लाभ उठा सकता था, लेकिन खेतिहर मजदूर, छोटा किसान या बर्गादार जिसके पास बाजार में बेचने के लिए पर्याप्त अधिशेष नहीं था, महंगाई का शिकार बना।

इस प्रकार युद्धकालीन बाजार ने ग्रामीण समाज के भीतर वर्गीय अंतर को और तीखा किया।

बर्मा का पतन और चावल

बंगाल की खाद्यान्न अर्थव्यवस्था में बर्मा से आने वाले चावल की भूमिका थी। जापानी कब्जे के बाद यह आपूर्ति बंद हुई।

लेकिन आधुनिक अकाल इतिहासलेखन इस बात पर सावधान करता है कि केवल बर्मा से आयात बंद होने को 1943 के अकाल का पर्याप्त कारण नहीं माना जा सकता।

अकाल के कारणों पर लंबी अकादमिक बहस हुई है। अमर्त्य सेन ने विशेष रूप से खाद्यान्न की कुल उपलब्धता की तुलना में लोगों की भोजन खरीदने की क्षमता—अर्थात अधिकार और क्रय-क्षमता के विफल होने—पर जोर दिया। बाद के अध्ययनों ने उत्पादन, बाजार, कीमतों, युद्धकालीन नीति और दीर्घकालीन कृषि संकट को भी इस व्यापक व्याख्या में जोड़ा है। मुफखरुल इस्लाम का अध्ययन भी इस बात का समर्थन करता है कि अकाल को केवल कुल खाद्यान्न उपलब्धता में साधारण गिरावट से समझना पर्याप्त नहीं है।

इसलिए एक सरल समीकरण—

बर्मा का चावल बंद हुआ = अकाल पड़ा

ऐतिहासिक रूप से अपर्याप्त है।

‘डिनायल’ नीतियां

जापानी आक्रमण की आशंका में ब्रिटिश प्रशासन ने बंगाल के तटीय क्षेत्रों में ऐसी नीतियां अपनाईं जिनका उद्देश्य संभावित आक्रमणकारी सेना को स्थानीय संसाधनों का उपयोग करने से रोकना था।

इनमें नौकाओं और चावल से संबंधित ‘डिनायल’ उपाय विशेष रूप से चर्चित रहे हैं।

नौकाएं बंगाल के नदीप्रधान क्षेत्रों में केवल परिवहन साधन नहीं थीं; वे भोजन, व्यापार और आजीविका की जीवनरेखा थीं। परिवहन व्यवस्था में व्यवधान का असर बाजार और ग्रामीण जीवन दोनों पर पड़ा।

इसलिए युद्ध ने केवल कीमतें नहीं बढ़ाईं।

उसने ग्रामीण वितरण और जीवन-निर्वाह की सामान्य व्यवस्था को भी अस्थिर किया।

बीसवीं शताब्दी की सबसे बड़ी भारतीय त्रासदियों में एक

1943 का बंगाल अकाल आधुनिक दक्षिण एशियाई इतिहास की सबसे भयावह मानवीय त्रासदियों में गिना जाता है।

मृतकों की सटीक संख्या पर इतिहासकारों में मतभेद है। विभिन्न अनुमानों में आंकड़े अलग हैं। इसलिए किसी एक संख्या को निर्विवाद सत्य मानना उचित नहीं होगा। आधुनिक शोध में लगभग 30 लाख मृत्यु का अनुमान व्यापक रूप से उद्धृत होता है।

लेकिन केवल मृत्यु संख्या इस त्रासदी का पूरा अर्थ नहीं बताती।

अकाल ने ग्रामीण बंगाल की सामाजिक संरचना को भी तोड़ा।

लोगों ने पशु, आभूषण, औजार और भूमि अधिकार बेचे। परिवार गांव छोड़कर भोजन की तलाश में शहरों की ओर गए। कलकत्ता की सड़कों पर भूखे और विस्थापित ग्रामीणों की उपस्थिति उस संकट की सबसे भयावह छवियों में बदल गई।

अकाल पर आधुनिक शोध इसे केवल भोजन की कमी नहीं बल्कि व्यापक सामाजिक विघटन के रूप में देखता है।

सबसे पहले कौन टूटा?

अकाल समाज के सभी वर्गों को समान रूप से नहीं मारता।

जिसके पास जमीन, अनाज का भंडार, नकद बचत या ऐसी संपत्ति थी जिसे बेचकर भोजन खरीदा जा सकता था, उसकी जीवित रहने की क्षमता अधिक थी।

खेतिहर मजदूर, मछुआरे, कारीगर, गरीब किसान, बर्गादार और अन्य कमजोर ग्रामीण समुदाय

तेजी से संकट में फंस सकते थे।

यही वह बिंदु है जहां अकाल और तेभागा के बीच संबंध दिखाई देता है।

1943 ने गरीब कृषक को यह अनुभव कराया कि खाद्यान्न पैदा करना और खाद्य-सुरक्षित होना एक ही बात नहीं है।

संपत्ति बेचकर जीवित रहने की कोशिश

अकाल के प्रारंभिक चरण में ग्रामीण परिवार उपलब्ध संपत्ति का उपयोग करते हैं—संग्रहित अनाज, पशु, आभूषण या अन्य वस्तुएं। लेकिन संकट लंबा चलने पर ये सुरक्षा साधन समाप्त होने लगते हैं। अकालग्रस्त बंगाल के कृषकों पर शोध इसी क्रमिक संपत्ति-विहीनता और जीवित रहने की रणनीतियों की जांच करता है।

इसका दीर्घकालीन प्रभाव अत्यंत महत्वपूर्ण था।

अकाल समाप्त होने के बाद भी किसान पहले जैसी आर्थिक स्थिति में नहीं लौटता।

यदि पशु बिक चुका है, जमीन गिरवी है, कर्ज बढ़ गया है और परिवार की श्रमशक्ति कमजोर हुई है तो अगली फसल के समय उसकी सौदेबाजी की शक्ति पहले से कम होती है।

इसलिए 1943 का संकट 1944 में समाप्त नहीं हो गया।

उसकी आर्थिक विरासत 1946 के तेभागा संघर्ष में मौजूद थी।

अकाल ‘प्राकृतिक’ था या ‘मानव-निर्मित’?

इस प्रश्न पर व्यापक इतिहासलेखन है।

प्राकृतिक कारकों, 1942 के चक्रवात, फसल रोग और उत्पादन संबंधी समस्याओं की भूमिका को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। लेकिन युद्धकालीन नीति, बाजार में मूल्य-वृद्धि, वितरण विफलता, प्रशासनिक प्रतिक्रिया और क्रय-क्षमता के पतन की भूमिका भी निर्णायक थी।

इसी कारण आज अकाल को केवल प्राकृतिक आपदा के रूप में समझना स्वीकार्य नहीं है।

इतिहासकारों के बीच कारणों के सापेक्ष महत्व पर मतभेद हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि राजनीतिक अर्थव्यवस्था और प्रशासनिक निर्णयों ने संकट को आकार दिया।

1943 के बाद बंगाल का गरीब किसान केवल भूख की स्मृति लेकर खेत में वापस नहीं गया।

वह कई मामलों में अधिक कर्जदार, कम संपन्न और सामाजिक रूप से अधिक असुरक्षित होकर लौटा।

इसीलिए अकाल को तेभागा आंदोलन की पृष्ठभूमि से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

खाद्यान्न बाजार पर अविश्वास

युद्धकालीन वर्षों में तेजी से बढ़ती कीमतों और खाद्यान्न संकट ने ग्रामीण गरीबों में व्यापारी, महाजन और अनाज रखने वाले संपन्न वर्ग के प्रति गहरा असंतोष पैदा किया।

जमाखोरी और मुनाफाखोरी उस समय सार्वजनिक राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बनीं।

यहां सावधानी जरूरी है—अकाल को केवल ‘जमाखोरों की साजिश’ कह देना भी उतना ही सरलीकरण होगा जितना उसे केवल प्राकृतिक फसल-विफलता कहना।

समस्या बहुस्तरीय थी।

लेकिन किसान की रोजमर्रा की अनुभूति बहुत सीधी थी—

धान मौजूद है, लेकिन गरीब के पास उसे खरीदने की शक्ति नहीं है।

महाजनी कर्ज और बर्गादार

बर्गादार अक्सर खेती शुरू करने से पहले ही आर्थिक निर्भरता में फंस सकता था।

उसे बीज, भोजन या दूसरी जरूरतों के लिए अग्रिम लेना पड़ता। कई जगह जोतदार ही ऋणदाता भी था।

इससे उत्पादन संबंध और ऋण संबंध एक-दूसरे में मिल जाते थे।

उत्तर बंगाल के अध्ययन बताते हैं कि जोतदार अधियारों को अनाज का ऋण देते थे और उसके साथ श्रम तथा निर्भरता के संबंध विकसित होते थे। महामंदी के बाद कुछ क्षेत्रों में ऋण देने के तौर-तरीकों में भी बदलाव आया।

इसका अर्थ यह था कि बर्गादार केवल जमीन के लिए जोतदार पर निर्भर नहीं था।

कई मामलों में उसका भोजन, ऋण और अगली खेती भी उसी शक्ति-संबंध में बंधी थी।

तेभागा से पहले छोटे संघर्ष

तेभागा की बड़ी लड़ाई से पहले किसान सभा ने विभिन्न स्थानीय आर्थिक मुद्दों पर आंदोलन किए।

इन संघर्षों का महत्व केवल तत्काल राहत में नहीं था। उन्होंने किसान को सामूहिक संगठन की शक्ति का अनुभव कराया।

किसान सभा के अपने ऐतिहासिक विवरण में एक महत्वपूर्ण संघर्ष का उल्लेख मिलता है जिसमें अधियारों के अनाज ऋण पर ब्याज को 25 प्रतिशत तक सीमित करने तथा बीज के अग्रिम को ब्याज-मुक्त रखने पर त्रिपक्षीय समझौता हुआ। इस संघर्ष में हजारों किसान स्वयंसेवकों की भागीदारी ने बाद के तेभागा संघर्ष का मनोबल बढ़ाया।

यानी तेभागा का संगठन अचानक 1946 में गांवों में नहीं पहुंचा था।

उससे पहले किसान संघर्ष की प्रयोगशाला तैयार हो चुकी थी।

आयोग क्यों बना?

1930 के दशक तक बंगाल की भूमि व्यवस्था की समस्याएं इतनी स्पष्ट हो चुकी थीं कि व्यापक जांच की आवश्यकता महसूस हुई।

1938 में बंगाल सरकार ने बंगाल भूमि राजस्व आयोग नियुक्त किया। इसके अध्यक्ष सर फ्रांसिस फ्लाउड थे, इसलिए यह सामान्यतः फ्लाउड आयोग के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

आयोग ने बंगाल की जमींदारी व्यवस्था, कृषि संबंधों और ग्रामीण कृषकों की स्थिति का अध्ययन किया।

उसकी रिपोर्ट 1940 में सामने आई।

तेभागा आंदोलन के इतिहास में यह रिपोर्ट एक निर्णायक दस्तावेज बनी।

बर्गादार प्रश्न

बर्गादार की मूल समस्या यह थी कि वह उत्पादन प्रक्रिया का केंद्रीय व्यक्ति होने के बावजूद भूमि पर कमजोर अधिकार रखता था और उपज का बड़ा हिस्सा देना पड़ता था।

आयोग ने इस समस्या को स्वीकार किया।

उसकी सबसे प्रसिद्ध सिफारिशों में बर्गादार के लिए उपज का दो-तिहाई हिस्सा रखने की व्यवस्था शामिल थी, विशेषकर उस परिस्थिति में जहां उत्पादन संबंधी साधनों और श्रम का प्रमुख भार बर्गादार वहन करता था।

यही बाद के ‘तेभागा’ का औपचारिक आधार बना।

किसान सभा ने बाद में इस तथ्य का अत्यंत प्रभावी उपयोग किया कि उसकी मांग कोई मनमानी नई मांग नहीं थी—सरकार द्वारा गठित आयोग भी बर्गादार के हिस्से में सुधार की आवश्यकता स्वीकार कर चुका था।

फ्लाउड आयोग का व्यापक महत्व

फ्लाउड आयोग को केवल ‘दो-तिहाई फसल’ की सिफारिश तक सीमित करना उचित नहीं होगा।

उसका व्यापक महत्व बंगाल की स्थायी बंदोबस्त आधारित भूमि-संरचना की समीक्षा में था।

औपनिवेशिक भूमि व्यवस्था में कई स्तरों के मध्यस्थ विकसित हो चुके थे। किसान और राज्य के बीच इन परतों ने कृषि सुधार और न्यायसंगत वितरण दोनों को जटिल बना दिया था।

इसलिए आयोग की बहस भूमि संबंधों के व्यापक पुनर्गठन से जुड़ी थी।

तेभागा आंदोलन ने उसी व्यापक सुधार कार्यक्रम के एक अत्यंत ठोस हिस्से को पकड़ लिया—

यदि पूरी व्यवस्था अभी नहीं बदल रही, तो कम-से-कम फसल का न्यायपूर्ण हिस्सा तत्काल दिया जाए।

यहीं तेभागा आंदोलन की राजनीतिक पृष्ठभूमि का सबसे महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने आता है।

यदि सरकारी आयोग ने 1940 में बर्गादार की शिकायत को स्वीकार कर लिया था, तो 1946 में किसानों को आंदोलन क्यों करना पड़ा?

सिफारिश और कानून एक चीज नहीं होते।

और कानून तथा उसका खेत में वास्तविक क्रियान्वयन भी एक चीज नहीं होते।

भूमि सुधार का राजनीतिक प्रतिरोध

भूमि संबंध केवल आर्थिक प्रश्न नहीं थे।

वे राजनीतिक शक्ति से जुड़े थे।

जमींदार, जोतदार और अन्य संपन्न ग्रामीण वर्ग स्थानीय समाज में प्रभाव रखते थे। किसी भी सुधार से यदि उनके कृषि अधिशेष या भूमि नियंत्रण में कमी आती तो उसका विरोध स्वाभाविक था।

इसलिए आयोग की रिपोर्ट को लागू करना प्रशासनिक निर्णय भर नहीं था।

उसका अर्थ ग्रामीण सत्ता-संतुलन बदलना था।

फिर युद्ध आ गया

फ्लाउड आयोग की रिपोर्ट 1940 में आई और उसी समय विश्वयुद्ध ब्रिटिश भारतीय शासन की प्राथमिकताओं पर हावी हो चुका था।

ब्रिटिश प्रशासन के सामने रक्षा, सैन्य आपूर्ति, जापानी विस्तार और युद्धकालीन अर्थव्यवस्था जैसे प्रश्न प्रमुख हो गए।

भूमि सुधार पीछे चला गया।

इसके बाद 1943 का अकाल आया।

इस प्रकार जिस समय बंगाल को गहरे कृषि सुधार की आवश्यकता थी, वही समय युद्ध और खाद्यान्न संकट से घिर गया।

किसान के लिए इसका अर्थ

सरकारी प्रक्रिया की दृष्टि से कहा जा सकता था कि परिस्थितियां असाधारण थीं और व्यापक भूमि सुधार जटिल था।

लेकिन किसान इसे दूसरी तरह देखता था।

उसके लिए तथ्य इतने थे—

उसने दो-तिहाई हिस्से की मांग को उचित आधार दिया।

लेकिन खेत में व्यवस्था नहीं बदली।

यही स्थिति किसान सभा के लिए अत्यंत प्रभावी राजनीतिक संदेश बनी।

1940 से 1946 के बीच छह वर्ष बीत गए।

इस दौरान बंगाल ने युद्ध देखा।

ग्रामीण संपत्ति का विघटन देखा।

किसान संगठन का विस्तार देखा।

और बर्गादार ने पाया कि उसकी पुरानी समस्या जस की तस है।

इसलिए 1946 में किसान सभा के सामने प्रश्न यह नहीं था कि सरकार से एक और आयोग मांगा जाए।

अब उसका निष्कर्ष था—

जिस सुधार को न्यायोचित माना जा चुका है, उसे किसान स्वयं लागू कराएगा।

सितंबर 1946 में बंगाल प्रांतीय किसान परिषद ने आगामी कटाई के मौसम में तेभागा संघर्ष शुरू करने का निर्णय लिया। किसान सभा के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार बड़े हिस्से में बर्गादार पहले ही संघर्ष के आह्वान की प्रतीक्षा कर रहे थे और नवंबर की फसल के साथ आंदोलन शुरू करने की तैयारी की गई।

1946 की कटाई आते-आते नारा इसलिए केवल—

व्यावहारिक निर्देश था—

धान अपने खलिहान में ले जाओ।

यहीं याचिका प्रत्यक्ष कार्रवाई में बदल गई।

तेभागा आंदोलन की आर्थिक पृष्ठभूमि को एक क्रम में देखें तो तस्वीर स्पष्ट होती है।

महामंदी ने कृषि आय और ऋण संबंधों को कमजोर किया।

ग्रामीण ऋण और भूमि पर निर्भरता ने गरीब कृषक की सौदेबाजी शक्ति घटाई।

अधियार–जोतदार तनाव 1939–40 तक कई क्षेत्रों में खुलकर दिखाई देने लगा।

फ्लाउड आयोग ने बर्गादार की शिकायत को वैधता प्रदान की और दो-तिहाई हिस्से की दिशा में सुधार की सिफारिश की।

द्वितीय विश्वयुद्ध ने महंगाई, आपूर्ति और परिवहन संकट बढ़ाया।

1943 के अकाल ने ग्रामीण गरीब की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा तोड़ दी।

भूमि सुधार लागू नहीं हुआ।

किसान सभा का संगठन गांवों में मजबूत हुआ।

और अंततः 1946 में किसान ने निर्णय किया—

अब फसल के बंटवारे की व्यवस्था खेत में ही बदली जाएगी।

तेभागा आंदोलन को केवल कम्युनिस्ट पार्टी या किसान सभा द्वारा 1946 में दिए गए राजनीतिक आह्वान का परिणाम मानना अधूरा होगा।

उसके पीछे लगभग दो दशकों का आर्थिक संकट था।

और फिर आया 1943 का अकाल।

खंड 3

किसान सभा और आंदोलन की वैचारिक तैयारी

तेभागा आंदोलन का आर्थिक और सामाजिक आधार बंगाल के गांवों में पहले से मौजूद था, लेकिन केवल असंतोष अपने आप बड़े किसान आंदोलन में नहीं बदलता। उसके लिए संगठन, साझा मांग, राजनीतिक भाषा, स्थानीय नेतृत्व और ऐसी कार्यपद्धति की आवश्यकता थी जो हजारों बिखरे हुए बर्गादारों को यह विश्वास दिला सके कि वे अकेले नहीं हैं।

1946 में यही भूमिका मुख्य रूप से बंगाल प्रांतीय किसान सभा ने निभाई। उसके पीछे अखिल भारतीय किसान सभा का व्यापक नेटवर्क और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं की महत्वपूर्ण संगठनात्मक शक्ति थी। लेकिन तेभागा को केवल ऊपर से कम्युनिस्ट नेतृत्व द्वारा किसानों पर थोपा गया आंदोलन मानना भी ऐतिहासिक वास्तविकता को सरल बना देना होगा। बर्गादारों की मांग, स्थानीय संघर्ष और ग्रामीण असंतोष कई वर्षों से विकसित हो रहे थे। किसान सभा ने उन्हें राजनीतिक भाषा, सांगठनिक ढांचा और समन्वित कार्यक्रम दिया।

तेभागा की वास्तविक शक्ति इसी मेल में थी—

नीचे से उठता कृषक असंतोष और ऊपर से मिलने वाला संगठित राजनीतिक नेतृत्व।

किसान प्रश्न को अलग राजनीतिक मंच मिलने की प्रक्रिया

बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक तक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन व्यापक हो चुका था, लेकिन ग्रामीण भारत में यह सवाल लगातार उठ रहा था कि स्वतंत्रता की लड़ाई में किसानों की विशिष्ट आर्थिक समस्याओं—लगान, जमींदारी, कर्ज, बेदखली और बटाई—को कितना स्थान मिलेगा।

कांग्रेस के भीतर समाजवादी और वामपंथी धाराएं अधिक स्पष्ट होती गईं। इसी समय बिहार, आंध्र, उत्तर प्रदेश तथा अन्य क्षेत्रों में अलग किसान संगठनों का विकास हुआ।

अप्रैल 1936 में लखनऊ में अखिल भारतीय किसान सभा के गठन ने इस प्रक्रिया को राष्ट्रीय ढांचा प्रदान किया। स्वामी सहजानंद सरस्वती इसके पहले अध्यक्ष बने। संगठन में कांग्रेस समाजवादी, कम्युनिस्ट और अन्य वामपंथी किसान नेता शामिल थे। उसके घोषित उद्देश्य में किसानों तथा अन्य शोषित वर्गों को आर्थिक शोषण से मुक्त करना महत्वपूर्ण स्थान रखता था।

इसी व्यापक किसान आंदोलन के भीतर बंगाल में प्रांतीय संगठन विकसित हुआ।

उपलब्ध इतिहासलेखन के अनुसार बंगाल किसान सभा अप्रैल 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा की प्रांतीय इकाई के रूप में गठित हुई।

उसके लिए बंगाल की जमीन पहले से तैयार थी।

यहां नील विद्रोह, पाबना आंदोलन और बीसवीं शताब्दी के अनेक स्थानीय कृषक संघर्षों की पुरानी परंपरा मौजूद थी। लेकिन अब किसान राजनीति को अधिक स्पष्ट वर्गीय कार्यक्रम मिलने लगा।

सदस्यता का तेज विस्तार

बंगाल किसान सभा के प्रभाव के विस्तार को उसकी सदस्य संख्या से भी समझा जा सकता है, यद्यपि संगठन द्वारा दर्ज सदस्यता आंकड़ों को हमेशा वास्तविक सक्रिय सदस्यता के बराबर नहीं माना जाना चाहिए।

डी. एन. धनागरे द्वारा उद्धृत आंकड़ों के अनुसार बंगाल किसान सभा की सदस्यता लगभग—

1937 में 11,080, 1938–39 में 50,000, और 1944 में 1,77,629

इन आंकड़ों का सबसे महत्वपूर्ण संदेश संख्या नहीं बल्कि प्रवृत्ति है।

कुछ ही वर्षों में किसान सभा सीमित राजनीतिक कार्यकर्ताओं के संगठन से निकलकर बंगाल के ग्रामीण क्षेत्रों में उल्लेखनीय जनाधार वाला संगठन बन चुकी थी।

यही संगठनात्मक विस्तार 1946 में तेभागा के आह्वान को तेजी से फैलाने की क्षमता देता है।

किसान सभा किन मुद्दों पर काम कर रही थी?

तेभागा की मांग सामने आने से पहले किसान सभा ग्रामीण जीवन के अनेक प्रश्नों पर सक्रिय थी।

लगान और बटाई का बोझ, कर्ज और अनाज पर ब्याज, बेदखली का विरोध, जमींदारी शोषण, अवैध वसूली, और कृषि श्रमिक तथा गरीब किसान के अधिकार।

इन संघर्षों का बड़ा महत्व यह था कि संगठन किसान के रोजमर्रा के अनुभव से जुड़ रहा था।

किसान सभा गांव में केवल राजनीतिक भाषण देने नहीं जाती थी। वह ऐसे सवाल उठाती थी जिनका संबंध सीधे धान, जमीन, कर्ज और परिवार की जीविका से था।

इससे संगठनात्मक विश्वास पैदा हुआ।

तेभागा को केवल बंगाल की स्थानीय घटना मानना उचित नहीं होगा। वह 1930 और 1940 के दशकों में भारत में तेजी से उभर रही व्यापक किसान राजनीति का हिस्सा था।

अखिल भारतीय किसान सभा ने पहली बार विभिन्न प्रांतों के किसान संघर्षों को एक साझा राष्ट्रीय मंच दिया।

उसके गठन के समय संगठन में केवल कम्युनिस्ट नहीं थे। कांग्रेस समाजवादी, वामपंथी कांग्रेसी, स्वतंत्र किसान नेता और अन्य धाराएं भी मौजूद थीं। बाद के वर्षों में कम्युनिस्ट प्रभाव बढ़ता गया, लेकिन संगठन की उत्पत्ति व्यापक वामपंथी किसान गठबंधन में हुई थी।

स्वतंत्रता के प्रश्न के साथ कृषि क्रांति का प्रश्न

किसान सभा की राजनीति ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता और ग्रामीण आर्थिक मुक्ति के बीच सीधा संबंध स्थापित किया।

उसका तर्क था कि केवल विदेशी शासन समाप्त होने से किसान की मुक्ति सुनिश्चित नहीं होगी यदि—

जमींदारी बनी रहे, कर्ज का शिकंजा बना रहे, किसान बेदखल होता रहे, और वास्तविक खेती करने वाले के पास भूमि या उपज पर पर्याप्त अधिकार न हो।

यहीं किसान सभा का कार्यक्रम मुख्यधारा की राष्ट्रवादी राजनीति से कई बार अधिक कट्टर दिखाई देता था।

उसकी राजनीति का लक्ष्य केवल—

ग्रामीण शोषण की व्यवस्था भी बदलो।

तेभागा इसी सोच की सबसे ठोस अभिव्यक्तियों में से एक बना।

अखिल भारतीय सम्मेलनों का प्रभाव

किसान सभा के राष्ट्रीय सम्मेलनों ने बंगाल के कार्यकर्ताओं को अन्य प्रांतों के किसान आंदोलनों से जोड़ा।

विशेष रूप से 5 से 9 अप्रैल 1945 को मैमनसिंह जिले के नेत्रकोना में आयोजित अखिल भारतीय किसान सभा का नौवां सम्मेलन महत्वपूर्ण था। संगठन के अभिलेखों के अनुसार इसमें 16 प्रांतों से 642 प्रतिनिधि आए और संगठन ने 8 लाख से अधिक सदस्यता का दावा किया। मुजफ्फर अहमद अध्यक्ष तथा बंकिम मुखर्जी महासचिव चुने गए।

नेत्रकोना का सम्मेलन उस समय हुआ जब युद्धकालीन आर्थिक संकट और बंगाल अकाल का असर ग्रामीण समाज पर गहरा था।

अखिल भारतीय किसान सभा के बाद के ऐतिहासिक विवरण में भी नेत्रकोना सम्मेलन को उस राजनीतिक वातावरण से जोड़ा गया है जिसमें आगे चलकर बंगाल का तेभागा और तेलंगाना का किसान संघर्ष उभरा।

इसलिए 1946 का आंदोलन अचानक लिया गया एक प्रांतीय फैसला नहीं था।

उससे पहले किसान प्रश्न राष्ट्रीय वामपंथी राजनीति के केंद्र में आ चुका था।

तेभागा आंदोलन के इतिहास में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की भूमिका केंद्रीय थी।

1940 के दशक तक बंगाल किसान सभा पर कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं का प्रभाव बहुत मजबूत हो चुका था। गांवों में संगठन निर्माण, प्रचार, प्रशिक्षण और आंदोलन की रणनीति तैयार करने में पार्टी कार्यकर्ताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

विश्वविद्यालयीय अध्ययन भी तेभागा को कम्युनिस्ट नेतृत्व वाली बंगाल किसान सभा द्वारा तैयार किए गए आंदोलन के रूप में वर्णित करते हैं।

लेकिन इस संबंध को सही ऐतिहासिक अनुपात में समझना आवश्यक है।

क्या तेभागा ‘कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा पैदा किया गया’ आंदोलन था?

इस प्रश्न का उत्तर न तो पूरी तरह ‘हां’ है, न पूरी तरह ‘नहीं’।

कम्युनिस्ट पार्टी और किसान सभा ने आंदोलन को संगठित किया।

लेकिन जिस आर्थिक असंतोष पर आंदोलन खड़ा था, उसे पार्टी ने पैदा नहीं किया था।

आधी उपज दे रहे थे, अतिरिक्त देयों से परेशान थे, कर्ज में थे, बेदखली के खतरे में थे और कई क्षेत्रों में जोतदारों से स्थानीय संघर्ष कर चुके थे।

अर्थात कम्युनिस्ट कार्यकर्ता गांव में जाकर कोई काल्पनिक समस्या नहीं बता रहे थे।

वे पहले से मौजूद अनुभव को एक राजनीतिक व्याख्या दे रहे थे।

वर्ग की भाषा

कम्युनिस्ट आंदोलन का महत्वपूर्ण योगदान यह था कि उसने किसान के व्यक्तिगत विवाद को व्यापक वर्गीय संबंध के रूप में प्रस्तुत किया।

एक बर्गादार की समस्या केवल उसके जोतदार से झगड़ा नहीं थी।

किसान सभा ने उसे समझाया कि उसी प्रकार की स्थिति हजारों दूसरे बर्गादारों की भी है।

“मेरा जोतदार मेरा हिस्सा नहीं देता”

से राजनीतिक विचार आगे बढ़ा—

“बर्गादारों की व्यवस्था ही अन्यायपूर्ण है।”

यह परिवर्तन आंदोलन के निर्माण में निर्णायक था।

लेकिन पार्टी की रणनीति में उतार-चढ़ाव भी रहे

कम्युनिस्ट पार्टी की भूमिका का विश्लेषण करते समय उसकी युद्धकालीन नीति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

द्वितीय विश्वयुद्ध के शुरुआती चरण में पार्टी ने युद्ध का विरोध किया था। लेकिन जून 1941 में नाजी जर्मनी द्वारा सोवियत संघ पर आक्रमण के बाद अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट राजनीति की दिशा बदली और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने युद्ध को फासीवाद के विरुद्ध ‘पीपुल्स वार’ के रूप में समर्थन देना शुरू किया।

इसका किसान राजनीति पर भी प्रभाव पड़ा।

तेभागा की मांग 1940 में सामने आ चुकी थी, लेकिन अगले कुछ वर्षों में व्यापक प्रत्यक्ष संघर्ष नहीं छेड़ा गया।

तेभागा की वैचारिक तैयारी की सही समयरेखा के लिए जून 1940 का पांजिया सम्मेलन अत्यंत महत्वपूर्ण है।

फ्लाउड आयोग की रिपोर्ट आने के बाद जेसोर जिले के पांजिया में बंगाल किसान सभा का चौथा प्रांतीय सम्मेलन हुआ।

उपलब्ध शोध के अनुसार 9 जून 1940 को पांजिया सम्मेलन में पहली बार किसान सभा ने स्पष्ट रूप से बर्गादारों के लिए दो-तिहाई फसल की मांग अपनाई। इससे पहले फ्लाउड आयोग को दिए गए अपने ज्ञापन में सभा ने बर्गादार के लिए कुल फसल के दस-सोलहवें हिस्से की मांग की थी, जो दो-तिहाई से कुछ कम था।

यह तथ्य महत्वपूर्ण है।

इससे पता चलता है कि किसान सभा का तेभागा कार्यक्रम भी क्रमिक विकास का परिणाम था।

मांग सीधे पूर्ण रूप से तैयार होकर नहीं आई थी।

1940 में ही आंदोलन क्यों नहीं हुआ?

पांजिया में मांग स्वीकार कर लेने और 1946 में व्यापक आंदोलन शुरू होने के बीच लगभग छह वर्ष का अंतर था।

युद्ध इसका प्रमुख कारण था, लेकिन राजनीतिक रणनीति भी महत्वपूर्ण थी।

इतिहासकार ताज-उल-इस्लाम हाशमी ने ध्यान दिलाया है कि 1943 के नलिताबाड़ी सम्मेलन में तेभागा मांग दोहराए जाने के बावजूद 1944 के फूलबाड़ी और 1945 के हाटगोविंदपुर सम्मेलनों में व्यापक तेभागा संघर्ष शुरू करने का निर्णायक कदम नहीं लिया गया। उस अवधि में कम्युनिस्ट प्रभाव वाली किसान सभा ने ‘अधिक अन्न उपजाओ’ और फासीवाद-विरोधी अभियान पर अधिक जोर दिया।

यह तेभागा इतिहास का महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर छूट जाने वाला पक्ष है।

इससे यह भी स्पष्ट होता है कि आंदोलन केवल पार्टी नेतृत्व की इच्छा से नहीं चला।

कई स्थानीय क्षेत्रों में किसान असंतोष केंद्रीय नेतृत्व से आगे बढ़ रहा था।

तेभागा आंदोलन की ताकत केवल उसके नारे में नहीं थी।

उसकी वास्तविक शक्ति उसका संगठनात्मक नेटवर्क था।

जब सितंबर 1946 में आंदोलन का आह्वान हुआ तो किसान सभा को संदेश फैलाने के लिए बिल्कुल शून्य से ढांचा नहीं बनाना पड़ा।

कई जिलों में पहले से संगठन मौजूद था।

स्थानीय समितियां थीं।

कार्यकर्ता गांव जानते थे।

किसान परिवारों से संपर्क था।

और छोटे संघर्षों का अनुभव भी था।

किसान समिति

गांव या क्षेत्रीय स्तर पर किसान सभा की स्थानीय इकाइयां आंदोलन की प्राथमिक संस्था बनीं।

उनके माध्यम से यह तय किया जा सकता था कि—

कौन से बर्गादार आंदोलन में शामिल होंगे, किस खेत की फसल कब कटेगी, धान कहां रखा जाएगा, जोतदार का दबाव आए तो क्या किया जाएगा, पुलिस आए तो गांव को कैसे खबर दी जाएगी।

इस प्रकार आंदोलन केवल सभा और भाषण नहीं था।

वह कटाई के मौसम के लिए संगठित ग्रामीण अभियान था।

किसान स्वयंसेवक

सितंबर 1946 के बाद किसान स्वयंसेवकों की भर्ती विशेष महत्व रखती थी।

अखिल भारतीय किसान सभा के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार आंदोलन शुरू होने से पहले स्वयंसेवकों की भर्ती और जोतदारों तथा पुलिस से संभावित टकराव की तैयारी की गई।

इन स्वयंसेवकों का उद्देश्य नियमित सैन्य संगठन बनाना नहीं था।

उनकी भूमिका आंदोलनकारी अनुशासन, सूचना और सामूहिक उपस्थिति सुनिश्चित करना थी।

फसल कटने का समय अत्यंत संवेदनशील था।

यदि एक बर्गादार अकेला धान अपने खलिहान में ले जाता, तो उसके खिलाफ तत्काल कार्रवाई हो सकती थी।

यदि सैकड़ों किसान एक साथ ऐसा करें तो प्रशासनिक और सामाजिक समीकरण बदल जाता था।

शहरों से गांवों की ओर कार्यकर्ता

तेभागा में शहरी कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं, छात्रों और युवाओं ने भी ग्रामीण संगठन में भाग लिया।

विश्वविद्यालयीय अध्ययन सामग्री इस बात का उल्लेख करती है कि कम्युनिस्ट कार्यकर्ता और सहानुभूति रखने वाले शहरी युवा बर्गादारों को संगठित करने के लिए आंदोलन में उतरे।

यह बंगाल की तत्कालीन राजनीतिक संस्कृति की एक विशेषता थी।

कलकत्ता और अन्य शहरी केंद्रों में सक्रिय वामपंथी बुद्धिजीवी और छात्र ग्रामीण प्रश्न को अपना राजनीतिक विषय मान रहे थे।

इससे शहर और गांव के बीच संगठनात्मक संपर्क बना।

स्थानीय नेतृत्व अधिक निर्णायक क्यों था?

फिर भी आंदोलन केवल कलकत्ता से निर्देश देकर नहीं चलाया जा सकता था।

बंगाल के अलग-अलग क्षेत्रों में भूमि-संबंध, जातीय संरचना, धार्मिक संरचना और जोतदार–बर्गादार संबंध अलग थे।

इसलिए स्थानीय नेता निर्णायक थे।

किस गांव में कौन प्रभावशाली जोतदार है, कौन किसान संघर्ष के लिए तैयार है, किस परिवार पर कर्ज है, किस क्षेत्र में पुलिस का दबाव अधिक है।

यही स्थानीय ज्ञान व्यापक आंदोलन को वास्तविक धरातल देता था।

तेभागा आंदोलन को हजारों किसानों तक पहुंचाने के लिए लंबे आर्थिक सिद्धांत से अधिक प्रभावशाली था एक सीधा निर्देश—

धान अपने खलिहान में रखो।

बांग्ला आंदोलन की लोकप्रिय भाषा में इसका भाव था—

‘निज खलाने धान तोलो।’

अर्थात काटी गई फसल जोतदार के खलिहान में नहीं, बर्गादार के अपने खलिहान में जाएगी।

यह मांग इतनी महत्वपूर्ण क्यों थी?

पुरानी बटाई व्यवस्था में धान प्रायः जोतदार के खलिहान में पहुंचता था।

वहीं उसकी मड़ाई और बंटवारा हो सकता था।

जिसके पास अनाज का भौतिक नियंत्रण है, उसे मात्रा और हिस्से के निर्धारण में भी स्वाभाविक बढ़त मिलती है।

तेभागा ने इस व्यवस्था को उलट दिया।

अब किसान सभा कह रही थी—

पहले पूरी फसल किसान के नियंत्रण में आएगी।

फिर उसमें से जोतदार को उसका एक-तिहाई हिस्सा दिया जाएगा।

अखिल भारतीय किसान सभा के अपने अभिलेख में सितंबर 1946 के आह्वान को दो मांगों के साथ दर्ज किया गया है—बर्गादार को दो-तिहाई हिस्सा और धान को जोतदार या जमींदार के बजाय किसान के अपने कटाई-स्थल या खलिहान में रखना।

मांग से भी अधिक—सत्ता का प्रश्न

यहां आंदोलन की राजनीतिक गहराई दिखाई देती है।

मान लीजिए सरकार कहती—

बर्गादार को दो-तिहाई दिया जाए।

यदि धान अभी भी जोतदार के खलिहान में जाता है तो वास्तविक नियंत्रण उसी के पास रहता।

लेकिन यदि धान किसान के खलिहान में है तो शक्ति-संतुलन बदलता है।

अब प्रश्न यह नहीं रहता—

जोतदार किसान को कितना देगा?

किसान जोतदार को कितना देगा?

यही तेभागा के सबसे क्रांतिकारी व्यावहारिक परिवर्तनों में था।

एक ही क्रिया ने ग्रामीण सत्ता का व्याकरण बदल दिया।

नारा और राजनीतिक संचार

किसान आंदोलनों में सफल नारे जटिल आर्थिक प्रश्न को सरल भाषा में बदलते हैं।

‘तेभागा चाहिए’ ने उपज के अनुपात को स्पष्ट किया।

‘अपने खलिहान में धान रखो’ ने कार्यवाही बता दी।

किसान को लंबा घोषणापत्र पढ़ने की जरूरत नहीं थी।

फसल काटो, अपने यहां रखो, दो हिस्से अपने पास रखो और एक हिस्सा जमीन नियंत्रक को दो।

आंदोलन के तेजी से फैलने में इस स्पष्टता की बड़ी भूमिका थी।

तेभागा की मांग 1940 से किसान सभा के कार्यक्रम में थी।

फिर निर्णायक मोड़ सितंबर 1946 में आया।

बंगाल उस समय असाधारण राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रहा था।

अगस्त 1946 में कलकत्ता में भीषण सांप्रदायिक हिंसा हो चुकी थी।

भारत के विभाजन का प्रश्न राजनीति के केंद्र में था।

ब्रिटिश सत्ता के अंत की प्रक्रिया तेज हो रही थी।

इसी समय बंगाल प्रांतीय किसान सभा ने निर्णय लिया कि आगामी फसल के मौसम में फ्लाउड आयोग की तेभागा सिफारिश को आंदोलन द्वारा लागू कराया जाएगा।

समय का चुनाव

आंदोलन को कटाई के मौसम से जोड़ना रणनीतिक निर्णय था।

बटाई का विवाद सिद्धांततः पूरे वर्ष मौजूद रहता था।

लेकिन उसका वास्तविक अर्थ तब सामने आता था जब धान कटकर तैयार हो।

उस क्षण प्रश्न तत्काल बन जाता—

कितना हिस्सा कौन रखेगा?

इसीलिए नवंबर की फसल से पहले संगठनात्मक तैयारी शुरू की गई।

किसान सभा की अपील

बर्गादार अपने खेत की फसल काटेंगे।

धान जोतदार के खलिहान में नहीं ले जाएंगे।

अपने खलिहान में रखेंगे।

दो-तिहाई हिस्सा अपने पास रखेंगे।

जोतदार को एक-तिहाई देंगे।

यह सामान्य याचिका नहीं थी।

किसान सभा सरकार से यह नहीं कह रही थी कि पहले कानून बनाइए और फिर किसान उसका लाभ लें।

फ्लाउड आयोग ने जिस सिद्धांत को न्यायसंगत माना है, उसे खेत में अभी लागू करो।

यहीं तेभागा सुधार की मांग से प्रत्यक्ष कार्रवाई के आंदोलन में बदल गया।

सितंबर 1946 का समय इसलिए भी असाधारण था क्योंकि बंगाल में हिंदू–मुस्लिम तनाव बेहद तीव्र हो चुका था।

इसके बावजूद तेभागा के कई प्रमुख क्षेत्रों में गरीब हिंदू और मुस्लिम बर्गादार साझा आर्थिक मांग के आधार पर साथ आए। शैक्षिक अध्ययन विशेष रूप से उत्तर बंगाल में हिंदू और मुस्लिम बटाईदारों के संयुक्त संघर्ष का उल्लेख करते हैं।

यह उपलब्धि महत्वपूर्ण थी।

लेकिन इसे बढ़ा-चढ़ाकर यह दावा नहीं करना चाहिए कि तेभागा ने सांप्रदायिकता समाप्त कर दी।

आगामी विभाजन और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ने अंततः आंदोलन के विस्तार और एकता दोनों को प्रभावित किया।

इस तनाव को तेभागा की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक चुनौतियों में गिना जाना चाहिए—

क्या आर्थिक वर्गीय एकता धार्मिक राजनीतिक पहचान पर भारी पड़ सकती थी?

कुछ गांवों में इसका उत्तर हां था।

पूरे बंगाल के स्तर पर उत्तर कहीं अधिक जटिल था।

तेभागा इतिहासलेखन में एक महत्वपूर्ण बहस यह रही है कि आंदोलन को किस हद तक किसान सभा और कम्युनिस्ट पार्टी ने ‘निर्देशित’ किया और किस हद तक वह स्वयं ग्रामीण कृषकों की पहल था।

कुछ अध्ययनों ने किसान सभा नेतृत्व और बर्गादारों के बीच सामाजिक दूरी की ओर ध्यान दिलाया है। कई प्रमुख आयोजक स्वयं बर्गादार नहीं थे।

दूसरी ओर इतिहासकारों ने यह तर्क भी दिया कि केवल नेताओं की सामाजिक पृष्ठभूमि देखकर आंदोलन को बाहरी प्रेरणा का परिणाम मानना सही नहीं है। सरकारी अधिकारियों की समकालीन रिपोर्टों से भी कई क्षेत्रों में वास्तविक ग्रामीण दबाव और जोतदारों को एक-तिहाई हिस्सा स्वीकार करने के लिए मजबूर किए जाने की जानकारी मिलती है। उत्तर बंगाल विश्वविद्यालय से उपलब्ध अध्ययन इस इतिहासलेखन विवाद को स्पष्ट रूप से दर्ज करता है।

सबसे संतुलित निष्कर्ष यह है—

किसान सभा ने आंदोलन बनाया नहीं, लेकिन उसने किसान असंतोष को एक व्यापक आंदोलन में बदलने की आवश्यक संगठनात्मक संरचना प्रदान की।

1946 तक आंदोलन की राजनीति को चार स्तरों में समझा जा सकता है।

पहला — आर्थिक न्याय

जो खेती करता है और उत्पादन में श्रम तथा साधन लगाता है, उसे उपज का बड़ा हिस्सा मिलना चाहिए।

खंड 4

आंदोलन का आरंभ और विस्तार

तेभागा आंदोलन की मांग 1940 से किसान सभा के कार्यक्रम में मौजूद थी, लेकिन उसका वास्तविक जन-विस्फोट 1946 की धान कटाई के साथ हुआ। सितंबर में बंगाल प्रांतीय किसान सभा ने बर्गादारों से दो-तिहाई उपज अपने पास रखने और फसल को जोतदार के बजाय अपने खलिहान में ले जाने का आह्वान किया। नवंबर-दिसंबर आते-आते यह नारा खेत में प्रत्यक्ष कार्रवाई में बदल गया।

आंदोलन की शुरुआत और उसके विस्तार को केवल यह कहकर नहीं समझा जा सकता कि किसान सभा ने आदेश दिया और किसान उठ खड़े हुए। अलग-अलग क्षेत्रों में आंदोलन की तीव्रता वहां की भूमि-संरचना, किसान सभा के पुराने संगठन, जोतदार–बर्गादार संबंधों, आदिवासी तथा गरीब कृषक आबादी की उपस्थिति और स्थानीय नेतृत्व की ताकत पर निर्भर थी।

इसीलिए पूरे बंगाल में तेभागा समान तीव्रता से नहीं फैला।

इसके सबसे मजबूत केंद्र उत्तर बंगाल के दिनाजपुर, जलपाईगुड़ी और रंगपुर बने। दक्षिण में 24 परगना, विशेषकर सुंदरबन और काकद्वीप क्षेत्र, प्रमुख केंद्र बना। इसके अतिरिक्त जेसोर, खुलना, मिदनापुर, मालदा, मयमनसिंह तथा अन्य जिलों में भी महत्वपूर्ण संघर्ष हुए। उपलब्ध अध्ययनों में आम तौर पर आंदोलन के 19 जिलों तक फैलने का उल्लेख मिलता है, लेकिन भागीदारी और गांवों की संख्या संबंधी आंकड़ों में पर्याप्त अंतर है।

सितंबर का निर्णय, नवंबर-दिसंबर की कार्रवाई

सितंबर 1946 में बंगाल प्रांतीय किसान सभा ने फ्लाउड आयोग की सिफारिश को व्यवहार में लागू कराने का फैसला किया। मांग दो स्तरों पर थी—

आधी नहीं, दो-तिहाई उपज किसान की।

धान जोतदार के खलिहान में नहीं, किसान के अपने खलिहान में जाएगा।

लेकिन किसी प्रस्ताव को जनांदोलन बनने के लिए उस क्षण की आवश्यकता होती है जब रोजमर्रा का आर्थिक व्यवहार सीधे चुनौती दिया जा सके।

धान की कटाई ने वही क्षण उपलब्ध कराया।

1946 की शरद और शीत ऋतु में जैसे-जैसे फसल पकने लगी, किसान सभा ने गांवों में बैठकें, जुलूस और प्रचार अभियान तेज किए। उत्तर बंगाल पर उपलब्ध विश्वविद्यालयीय अध्ययन के अनुसार नवंबर में ग्रामीण क्षेत्रों में समूह-चर्चाएं और सभाएं आयोजित हुईं तथा ‘तेभागा चाई’ और ‘निज खलाने धान तोलो’ जैसे नारे फैलाए गए। नवंबर के अंत और दिसंबर के आरंभ में किसानों ने फसल काटकर अपने खलिहानों में ले जाना शुरू किया।

यह एक निर्णायक परिवर्तन था।

पहले विवाद उपज बांटने के समय उत्पन्न होता था।

अब किसान सभा ने व्यवस्था की पूरी प्रक्रिया ही बदल दी।

शुरुआत कहां से हुई?

आंदोलन की प्रारंभिक प्रत्यक्ष कार्रवाई के बारे में इतिहासकारों के विवरणों में मामूली अंतर मिलता है, लेकिन अधिकांश अध्ययनों में उत्तर-पश्चिम दिनाजपुर के अटवारी क्षेत्र को प्रथम प्रमुख केंद्रों में रखा गया है।

डी. एन. धनागरे के अध्ययन पर आधारित विवरण के अनुसार अटवारी में बर्गादार स्वयंसेवकों ने धान काटकर परंपरागत रूप से जोतदार के खलिहान में ले जाने के बजाय अपने खलिहानों में पहुंचाया। पुलिस के हस्तक्षेप के बाद संघर्ष हुआ। थोड़े ही समय में यह आंदोलन ठाकुरगांव उपखंड और फिर दिनाजपुर के दूसरे क्षेत्रों में फैल गया।

उत्तर बंगाल विश्वविद्यालय के अध्ययन में भी पहली प्रमुख घटनाएं अटवारी और बालियाडांगी थानों में बताई गई हैं। वहां से आंदोलन धीरे-धीरे आसपास के क्षेत्रों में फैला।

इसलिए दिसंबर 1946 तक उत्तर बंगाल किसान असंतोष का वास्तविक ‘तूफानी क्षेत्र’ बन चुका था।

आंदोलन इतनी तेजी से क्यों फैला?

पहला कारण था—कटाई का मौसम।

बर्गादारों के सामने सभी गांवों में एक ही समय लगभग समान प्रश्न था—

धान किसके खलिहान में जाएगा?

दूसरा कारण था—किसान सभा का पहले से मौजूद नेटवर्क।

तीसरा कारण था—पहले गांव की सफलता का आसपास के गांवों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव।

यदि किसी गांव में किसान बिना तत्काल दमन के फसल अपने खलिहान में ले जाने में सफल हो गए, तो आसपास के बर्गादारों को लगा कि पुरानी व्यवस्था अपरिवर्तनीय नहीं है।

इसीलिए कई क्षेत्रों में आंदोलन निर्देश से अधिक अनुकरण और सामूहिक आत्मविश्वास के माध्यम से फैला।

संघर्ष की सामान्य पद्धति

अलग-अलग जिलों में स्थानीय परिस्थितियां भिन्न थीं, लेकिन एक सामान्य ढांचा दिखाई देता है।

किसान स्वयंसेवक खेत पर पहुंचते।

धान की सामूहिक कटाई होती।

फसल बर्गादार के खलिहान में लाई जाती।

जोतदार को एक-तिहाई हिस्सा लेने के लिए कहा जाता।

यदि वह विरोध करता तो किसान सभा की स्थानीय समिति हस्तक्षेप करती।

यदि पुलिस आती तो गांवों में चेतावनी पहुंचाई जाती।

कहीं महिलाओं ने रास्ते रोके।

कहीं किसान स्वयंसेवक पुलिस और जोतदार के लठैतों के सामने खड़े हुए।

यहीं से आर्थिक आंदोलन पुलिस और औपनिवेशिक शासन के साथ राजनीतिक टकराव में बदलने लगा।

तेभागा आंदोलन का सबसे प्रसिद्ध और तीव्र क्षेत्र दिनाजपुर था।

उस समय का दिनाजपुर वर्तमान भारत और बांग्लादेश के बीच विभाजित नहीं हुआ था। विभाजन से पहले यह एक विशाल जिला था जिसमें ठाकुरगांव, बालुरघाट और अन्य विस्तृत कृषक क्षेत्र शामिल थे।

यहां जोतदार–अधियार संबंध लंबे समय से मजबूत थे। किसान सभा भी वर्षों से सक्रिय थी।

इसलिए जब 1946 में तेभागा का आह्वान हुआ, दिनाजपुर ने सबसे तीव्र प्रतिक्रिया दी।

ठाकुरगांव — आरंभिक तूफानी केंद्र

अटवारी और बालियाडांगी में शुरू हुई कार्रवाइयों ने ठाकुरगांव उपखंड को आंदोलन के सबसे सक्रिय इलाकों में बदल दिया।

शोध से पता चलता है कि आंदोलन बाद में रानीशंकोइल, बीरगंज, ठाकुरगांव, बोचागंज, पीरगंज और अन्य थानों तक फैल गया। कुछ क्षेत्रों में स्थानीय नेतृत्व ही इतना मजबूत था कि बाहर के नेताओं की सीमित भूमिका के बावजूद आंदोलन तेजी से बढ़ा।

यह तथ्य तेभागा के चरित्र पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालता है।

आंदोलन की दिशा प्रांतीय नेतृत्व से आई थी, लेकिन अनेक गांवों में उसे वास्तविक शक्ति स्थानीय गरीब किसान और ग्रामीण आयोजक दे रहे थे।

गांवों को क्षेत्रों में बांटना

दिनाजपुर में किसान सभा और कम्युनिस्ट नेतृत्व ने आंदोलन को व्यवस्थित करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में जिम्मेदारियां बांटीं।

शोध साहित्य में ठाकुरगांव, सेताबगंज, चिरिरबंदर, इटाहार, फूलबाड़ी और पतीराम जैसे क्षेत्रों को अलग संगठनात्मक क्षेत्रों के रूप में चलाए जाने का उल्लेख है।

यह बताता है कि आंदोलन केवल स्वतःस्फूर्त नहीं था।

उसके भीतर संगठन और स्थानीय पहल दोनों मौजूद थे।

चिरिरबंदर की गोलीबारी

दिनाजपुर में पुलिस और किसानों के बीच संघर्ष शीघ्र ही हिंसक होने लगा।

चिरिरबंदर क्षेत्र में जनवरी 1947 में पुलिस गोलीबारी में किसान आंदोलनकारियों की मृत्यु हुई। विभिन्न विवरणों में नामों की वर्तनी और घटनाक्रम में मामूली अंतर मिलता है, लेकिन इस गोलीबारी ने आंदोलन को कमजोर करने के बजाय कई क्षेत्रों में और उग्र बनाया। उत्तर बंगाल से संबंधित अध्ययनों में इसका उल्लेख आंदोलन के महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में मिलता है।

दिनाजपुर का खानपुर आंदोलन की स्मृति में विशेष स्थान रखता है।

20 फरवरी 1947 को पुलिस तेभागा कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करने खानपुर पहुंची। ग्रामीणों ने प्रतिरोध किया और गिरफ्तार किसानों को छुड़ाने का प्रयास किया।

दक्षिण दिनाजपुर जिला प्रशासन के आधिकारिक इतिहास के अनुसार पुलिस ने भीड़ पर गोली चलाई और 21 किसान मारे गए। प्रशासनिक विवरण यह भी बताता है कि मृतकों में हिंदू, मुस्लिम और अनुसूचित जनजातीय समुदायों के लोग शामिल थे। आज वहां आंदोलन की स्मृति में स्मारक है।

खानपुर केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं था कि वहां बड़ी संख्या में किसान मारे गए।

उसका प्रतीकात्मक महत्व और बड़ा था।

1946–47 के सांप्रदायिक तनाव के बीच एक ही गोलीबारी में विभिन्न धार्मिक और सामाजिक समुदायों के बर्गादारों का मारा जाना तेभागा के साझे कृषक चरित्र का शक्तिशाली प्रमाण बन गया।

दिनाजपुर इतना मजबूत क्यों था?

इसके पीछे कई कारण थे।

पहला—यहां बर्गादारी व्यापक थी।

दूसरा—किसान सभा का पुराना आधार मौजूद था।

तीसरा—आदिवासी और गरीब कृषक समुदायों की बड़ी भागीदारी थी।

चौथा—जोतदार–अधियार तनाव नया नहीं था।

पांचवां—स्थानीय नेतृत्व विकसित हो चुका था।

इसलिए तेभागा की अपील वहां केवल राजनीतिक नारा नहीं रही; वह पहले से मौजूद संघर्ष के लिए एक स्पष्ट कार्यक्रम बन गई।

दिनाजपुर से लगे रंगपुर में भी तेभागा तेजी से फैला।

भौगोलिक निकटता अत्यंत महत्वपूर्ण थी। उत्तर बंगाल के कृषि क्षेत्र प्रशासनिक सीमाओं से अलग-अलग जिलों में विभाजित थे, लेकिन किसान संबंध, हाट-बाजार, जातीय समुदाय और संगठनात्मक संपर्क सीमाओं के आर-पार चलते थे।

इसलिए दिनाजपुर में शुरू हुई सफलता और किसान सभा की सक्रियता का प्रभाव रंगपुर पर तुरंत पड़ा।

डोमार और सीमावर्ती क्षेत्र

उत्तर बंगाल के पुराने अधियार आंदोलनों में ही रंगपुर का डोमार क्षेत्र जुड़ चुका था। 1939–40 के संघर्षों में जलपाईगुड़ी, दिनाजपुर और रंगपुर के सीमावर्ती क्षेत्रों के अधियारों ने अपने खलिहान में फसल रखने की मांग पर कार्रवाई की थी।

इससे स्पष्ट है कि 1946 की कार्रवाई से छह-सात वर्ष पहले ही यहां तेभागा जैसी मांगों का व्यावहारिक पूर्वाभ्यास हो चुका था।

1946–47 में व्यापक प्रसार

तेभागा अभियान शुरू होने के बाद रंगपुर को उन प्रमुख जिलों में गिना गया जहां आंदोलन अत्यधिक तीव्र था। बांग्लापीडिया दिनाजपुर, रंगपुर, जलपाईगुड़ी, खुलना, मयमनसिंह, जेसोर और 24 परगना को आंदोलन के सबसे मजबूत जिलों में रखता है।

रंगपुर में भी किसान सभा का आधार गरीब और मध्यम कृषकों, बर्गादारों तथा स्थानीय कृषक समुदायों में था।

धान का प्रश्न यहां भी उसी रूप में उठा—

फसल पहले किसान के नियंत्रण में होगी।

धार्मिक विभाजन के पार किसान पहचान

रंगपुर और उत्तर बंगाल के अन्य जिलों में आंदोलन की एक महत्वपूर्ण विशेषता हिंदू और मुस्लिम बर्गादारों की संयुक्त भागीदारी थी।

यह उस समय विशेष रूप से उल्लेखनीय था क्योंकि बंगाल की प्रांतीय राजनीति तेजी से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की तरफ जा रही थी।

तेभागा ने कम-से-कम कई ग्रामीण क्षेत्रों में यह दिखाया कि भूमि और फसल का प्रश्न धार्मिक पहचान से अलग साझा हित पैदा कर सकता है।

हालांकि आगे चलकर विभाजन की राजनीति ने इस वर्गीय एकता की सीमाएं भी उजागर कीं।

जलपाईगुड़ी की कृषि संरचना और सामाजिक संरचना दोनों विशेष थीं।

यहां राजबंशी किसान, आदिवासी समुदाय, बंगाली कृषक और चाय बागानों से जुड़ी प्रवासी आबादी का मिश्रित समाज था। इसके अलावा बड़े जोतदारों का प्रभाव भी मजबूत था।

इसलिए तेभागा यहां केवल भूमि-संघर्ष नहीं रहा; उसमें जातीय और सामाजिक संरचना की जटिलताएं भी शामिल हुईं।

1939–40 की विरासत

जलपाईगुड़ी में तेभागा की जमीन कई वर्ष पहले तैयार हो चुकी थी।

बोदा, देवीगंज और पचागढ़ क्षेत्रों में अधियार अपने धान को स्वयं के खलिहान में रखने की मांग को लेकर 1939–40 में ही संघर्ष कर चुके थे।

प्रशासन ने समझौता कराने का प्रयास किया, जिसमें अवैध वसूली और ऋण संबंधी कुछ राहत पर सहमति हुई, लेकिन फसल जोतदार के खलिहान में रखने का आदेश दिया गया।

अधियारों ने इसे स्वीकार नहीं किया।

यानी ‘अपने खलिहान में धान’ का प्रश्न 1946 में अचानक पैदा नहीं हुआ था।

1946 में पुनः उभार

उपलब्ध विश्वविद्यालयीय शोध के अनुसार जलपाईगुड़ी में तेभागा लागू किए जाने की शुरुआती रिपोर्ट नवंबर 1946 के अंत में पचागढ़ क्षेत्र से आई।

देवीगंज के सुंदरदिघी इलाके में सफलता ने आसपास के किसानों का मनोबल बढ़ाया और आंदोलन तेजी से देवीगंज, बोदा, कोतवाली और राजगंज क्षेत्रों में फैल गया।

फसल किसान के खलिहान में रखी गई और जोतदार से कहा गया कि वह अपना एक-तिहाई हिस्सा वहां से ले जाए। कई मामलों में किसान एकता इतनी मजबूत थी कि जोतदार और पुलिस तत्काल हस्तक्षेप नहीं कर सके।

राजबंशी और आदिवासी भागीदारी

जलपाईगुड़ी में राजबंशी तथा आदिवासी कृषकों की भूमिका महत्वपूर्ण थी।

शोध बताते हैं कि जातीय निष्ठा कभी-कभी संघर्ष को जटिल बनाती थी क्योंकि कुछ राजबंशी स्वयं बड़े जोतदार भी थे, लेकिन गरीब राजबंशी और आदिवासी अधियारों ने आंदोलन में उल्लेखनीय भागीदारी की।

महिलाओं की भागीदारी भी यहां विशेष रूप से मजबूत हुई।

इसका विस्तृत अध्ययन अगले महिला-केंद्रित खंड में होगा, लेकिन इतना स्पष्ट है कि जलपाईगुड़ी में किसान महिलाओं ने पहरे, प्रतिरोध, जुलूस और पुलिस के सामने सामूहिक कार्रवाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जनवरी 1947 में प्रस्तावित बर्गादार विधेयक की खबर फैलने के बाद आंदोलन के कुछ क्षेत्रों में नई ऊर्जा आई।

उत्तर बंगाल के विश्वविद्यालयीय अध्ययन के अनुसार ऐसे इलाकों में भी किसान सक्रिय हो गए जहां पहले किसान सभा का मजबूत संगठन नहीं था। कई जगह किसान जोतदारों के खलिहानों में रखे पुराने धान पर दावा करने लगे और अपना हिस्सा वापस ले जाने का प्रयास किया।

इसे कुछ स्रोतों में ‘खलिहान भांगा आंदोलन’ अथवा खलिहान तोड़ो चरण कहा गया है।

यह आंदोलन की प्रकृति में महत्वपूर्ण बदलाव था।

पहले किसान नई फसल अपने खलिहान में ले जा रहे थे।

अब कुछ क्षेत्रों में वे जोतदार के कब्जे में जा चुकी उपज से भी अपने अधिकार का हिस्सा वापस लेने लगे।

इसी चरण में पुलिस दमन अधिक कठोर हुआ।

डुआर्स में देर से उभार

जनवरी के अंत से अप्रैल 1947 के बीच उदलाबाड़ी, डामडिम, माल, चालसा और बड़ादिघी जैसे डुआर्स क्षेत्रों में भी तेभागा संबंधी कृषि आंदोलन भड़का।

शोधकर्ताओं ने ध्यान दिलाया है कि कुछ आदिवासी कृषक समूहों ने बिना स्पष्ट केंद्रीय निर्देश के आंदोलन को अपनाया। इससे तेभागा के भीतर स्थानीय स्वायत्तता का तत्व दिखाई देता है।

यही कारण है कि आंदोलन को पूरी तरह किसी केंद्रीकृत राजनीतिक आदेश से संचालित अभियान मानना पर्याप्त नहीं है।

उत्तर बंगाल तेभागा का प्रारंभिक ‘तूफानी केंद्र’ था, लेकिन दक्षिण बंगाल में 24 परगना, विशेषकर काकद्वीप और सुंदरबन क्षेत्र, आंदोलन का दूसरा बड़ा आधार बना।

यहां भूमि-संबंध उत्तर बंगाल से कुछ अलग थे, लेकिन गरीब बर्गादारों, भूमिहीन कृषकों और बड़े भू-अधिकारियों के बीच असमानता तीव्र थी।

काकद्वीप का महत्व

तेभागा पर कई अध्ययनों में काकद्वीप को दक्षिण बंगाल के सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में गिना जाता है। उत्तर बंगाल से बाहर मिदनापुर और 24 परगना में आंदोलन ने विशेष गहराई हासिल की।

सुंदरबन की भौगोलिक परिस्थितियां भी आंदोलन को विशिष्ट बनाती थीं।

नदी, द्वीप, दलदली भूमि और दूरस्थ गांव प्रशासन की तत्काल पहुंच को कठिन बनाते थे।

इससे स्थानीय किसान समितियों और स्वयंसेवी संगठन को अधिक स्थान मिला।

कंसारी हलदर और स्थानीय नेतृत्व

24 परगना में कंसारी हलदर जैसे किसान नेताओं ने आंदोलन को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यहां किसान सभा का आंदोलन सिर्फ फसल का हिस्सा बढ़ाने तक सीमित नहीं रहा। भूमि, कर्ज और ग्रामीण अधिकारों के प्रश्न उससे जुड़े।

कुछ क्षेत्रों में आंदोलन इतना मजबूत हुआ कि स्थानीय किसान समितियां दैनिक विवादों और गांव के प्रश्नों में भी हस्तक्षेप करने लगीं।

यही वह परिस्थिति थी जिसमें ‘तेभागा इलाका’ की धारणा विकसित हुई।

महिलाओं की बड़ी भूमिका

सुंदरबन से लेकर जेसोर तक ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी आंदोलन की उल्लेखनीय विशेषता बनी।

महिलाओं ने फसल काटने, पहरा देने, पुलिस की सूचना पहुंचाने और गिरफ्तारी का विरोध करने में भाग लिया। कई क्षेत्रों में ‘नारी वाहिनी’ जैसे स्थानीय महिला प्रतिरोध समूह बने।

यह विषय इतना महत्वपूर्ण है कि आगे इसे स्वतंत्र खंड में विस्तार से लिया जाएगा।

तेभागा उत्तर बंगाल तथा 24 परगना तक सीमित नहीं रहा।

उसके अनेक महत्वपूर्ण क्षेत्र पूरे अविभाजित बंगाल में फैले थे।

मिदनापुर

मिदनापुर पहले से राजनीतिक सक्रियता का क्षेत्र था।

यहां राष्ट्रीय आंदोलन, स्थानीय किसान संघर्ष और वामपंथी संगठन का आधार मौजूद था।

तेभागा विशेष रूप से महिषादल, सुताहाटा और नंदीग्राम जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय हुआ। समकालीन वामपंथी इतिहासलेखन तथा बाद के अध्ययनों में इन क्षेत्रों को आंदोलन के प्रमुख केंद्रों में गिना गया है।

बांग्लापीडिया के अनुसार मिदनापुर उन जिलों में था जहां तेभागा अधिकार कई क्षेत्रों में व्यापक रूप से स्थापित किए गए।

यहां आंदोलन ने पश्चिम बंगाल की बाद की भूमि राजनीति पर भी प्रभाव छोड़ा।

जेसोर

जेसोर तेभागा की वैचारिक यात्रा में भी महत्वपूर्ण था क्योंकि 1940 का पांजिया सम्मेलन यहीं आयोजित हुआ था।

1946–47 में जिले के कई हिस्सों में बर्गादार सक्रिय हुए।

जेसोर के नरैल उपखंड का उल्लेख विशेष रूप से मिलता है और वहां महिलाओं की सक्रियता भी महत्वपूर्ण थी।

कई क्षेत्रों में आंदोलन इतना प्रभावी हुआ कि जोतदारों को समझौते करने पड़े। बांग्लापीडिया जेसोर को उन जिलों में रखता है जहां आंदोलन को उल्लेखनीय सफलता मिली।

खुलना

खुलना भी उन जिलों में था जहां तेभागा तीव्र रूप से फैला।

दक्षिण बंगाल के नदीप्रधान कृषि क्षेत्रों में बटाईदार संबंध और भूमि पर मध्यस्थ नियंत्रण व्यापक थे।

यहां भी किसान सभा ने फसल के दो-तिहाई हिस्से तथा बर्गादार के खलिहान में धान रखने के कार्यक्रम पर किसानों को संगठित किया।

उपलब्ध समेकित स्रोत खुलना को आंदोलन के प्रमुख तीव्र जिलों में शामिल करते हैं।

मयमनसिंह

पूर्वी बंगाल के मयमनसिंह में भी किसान आंदोलन पहले से मजबूत था।

यहां तेभागा के साथ-साथ अन्य कृषक प्रश्न भी मौजूद थे। कुछ क्षेत्रों में ‘टोंक’ जैसी लगान प्रणालियों के खिलाफ आंदोलन चल रहा था।

तेभागा ने विशेष रूप से किशोरगंज और अन्य क्षेत्रों में गहराई प्राप्त की।

पूर्वी बंगाल की राजनीति की विशेषता यह थी कि यहां किसान संघर्ष को मुस्लिम लीग, कम्युनिस्ट और अन्य शक्तियां अपने-अपने राजनीतिक ढांचे में प्रस्तुत कर रही थीं।

इससे आंदोलन और अधिक जटिल हो गया।

मालदा

मालदा उत्तर बंगाल के आंदोलन से सीधे जुड़ा था।

गाजोल, हबीबपुर, बामनगोला और बारिंद क्षेत्र में गरीब और आदिवासी कृषकों की उल्लेखनीय भागीदारी हुई।

उत्तर बंगाल विश्वविद्यालय के शोध में बारिंद के संथाल तथा राजबंशी बर्गादारों को आंदोलन के अत्यंत सक्रिय समूहों में बताया गया है।

मालदा और उससे लगे नाचोल क्षेत्र की यह परंपरा बाद में पूर्वी पाकिस्तान के नाचोल किसान विद्रोह में भी दिखाई दी।

तेभागा आंदोलन का आकार बताने वाले आंकड़े बहुत प्रभावशाली हैं, लेकिन इन्हें सावधानी से इस्तेमाल करना चाहिए।

19 जिलों का आंकड़ा

सबसे व्यापक रूप से स्वीकार किया जाने वाला दावा है कि आंदोलन अविभाजित बंगाल के 19 जिलों तक पहुंचा।

बांग्लापीडिया और कई अकादमिक विवरण इस आंकड़े को स्वीकार करते हैं।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सभी 19 जिलों में आंदोलन समान रूप से तीव्र था।

सबसे मजबूत क्षेत्र थे—

दिनाजपुर, रंगपुर, जलपाईगुड़ी, जेसोर, खुलना, मयमनसिंह, 24 परगना,

जबकि मिदनापुर, मालदा और कुछ अन्य जिलों में विशेष क्षेत्रीय केंद्र विकसित हुए।

क्या 60 लाख किसान शामिल हुए?

कई लोकप्रिय तथा शैक्षणिक विवरणों में तेभागा में लगभग 60 लाख किसानों की भागीदारी का दावा मिलता है। इग्नू की अध्ययन सामग्री भी 19 जिलों में लगभग छह मिलियन कृषकों के आंदोलन से जुड़ने का उल्लेख करती है।

लेकिन इस संख्या को ‘सक्रिय आंदोलनकारियों की निश्चित गणना’ नहीं माना जाना चाहिए।

क्या आंदोलन समर्थक परिवार भी?

दूसरा चरण — जनवरी से अप्रैल 1947

अन्य आदिवासी समुदाय थे।

खंड 5

संघर्ष का स्वरूप

तेभागा आंदोलन को केवल “दो-तिहाई फसल की मांग” कह देने से उसका वास्तविक चरित्र सामने नहीं आता। यह मांग खेत में तभी अर्थपूर्ण बनती थी जब किसान पुरानी व्यवस्था को व्यवहार में तोड़ता—फसल काटता, उसे अपने खलिहान में ले जाता, जोतदार को केवल एक-तिहाई हिस्सा देने की घोषणा करता और यदि पुलिस अथवा लठैत उसे रोकते तो सामूहिक प्रतिरोध करता।

इसीलिए 1946–47 का तेभागा संघर्ष याचिका, सत्याग्रह और प्रत्यक्ष आर्थिक कार्रवाई के बीच कहीं स्थित था। इसमें बड़े पैमाने पर सभाएं, जुलूस, लाल झंडे, स्वयंसेवक दल और सामूहिक कटाई हुई; कई स्थानों पर किसान लाठियों, धनुष-बाण और परंपरागत कृषि औजारों के साथ प्रतिरोध में उतरे; दूसरी ओर पुलिस ने गिरफ्तारियां, लाठीचार्ज और गोलीबारी की।

इसलिए तेभागा को न तो शुद्ध अहिंसक आंदोलन कहा जा सकता है और न तेलंगाना की तरह संगठित सशस्त्र विद्रोह। उसका सबसे सटीक वर्णन होगा—

एक व्यापक, संगठित और उग्र किसान जनांदोलन, जिसमें प्रत्यक्ष आर्थिक अवज्ञा केंद्रीय थी और हिंसक टकराव मुख्यतः पुलिस तथा ग्रामीण प्रभुत्वशाली वर्ग के प्रतिरोध के दौरान विकसित हुए।

तेभागा आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण युद्धक्षेत्र कोई सरकारी कार्यालय नहीं था।

धान का खेत और खलिहान।

बर्गादारी व्यवस्था में किसान भूमि पर खेती करता था, लेकिन कटाई के बाद फसल प्रायः जोतदार के खलिहान में पहुंचती थी। वहां से उसका बंटवारा होता था।

इस व्यवस्था में जोतदार को स्वाभाविक बढ़त मिलती थी।

उसके पास फसल का भौतिक नियंत्रण था।

मात्रा का निर्धारण उसके प्रभाव में हो सकता था।

पुराने कर्ज या अन्य देयों की कटौती भी वहीं संभव थी।

तेभागा ने इसी बिंदु पर प्रहार किया।

“निज खलाने धान तोलो”

किसान सभा का निर्देश था—

धान अपने खलिहान में ले जाओ।

अखिल भारतीय किसान सभा के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार सितंबर 1946 के आह्वान में किसानों को दो-तिहाई हिस्सा रखने के साथ-साथ धान को जोतदार या जमींदार के स्थान पर अपने खलिहान में रखने के लिए कहा गया था। आंदोलन से पहले स्वयंसेवकों की भर्ती भी की गई क्योंकि जोतदारों और पुलिस के साथ टकराव की आशंका स्पष्ट थी।

इस कार्रवाई का महत्व बहुत गहरा था।

पुरानी व्यवस्था में प्रश्न होता था—

जोतदार किसान को कितना देगा?

नई व्यवस्था में प्रश्न बन गया—

किसान जोतदार को कितना देगा?

यानी केवल प्रतिशत नहीं बदला।

उपज पर प्रारंभिक कब्जे का अधिकार बदल रहा था।

सामूहिक कटाई क्यों आवश्यक थी?

यदि कोई अकेला बर्गादार जोतदार की इच्छा के विरुद्ध फसल अपने घर ले जाता तो उसे आसानी से दबाया जा सकता था।

इसलिए किसान सभा ने सामूहिक कार्रवाई पर जोर दिया।

कई स्थानों पर किसान स्वयंसेवकों के समूह खेतों में पहुंचते।

फसल सामूहिक रूप से काटी जाती।

धान बर्गादार के खलिहान अथवा सामूहिक स्थान पर रखा जाता।

इसके बाद जोतदार से कहा जाता—

अपना एक-तिहाई हिस्सा यहां से ले जाइए।

उत्तर बंगाल के एक विस्तृत अध्ययन में पचागढ़ और आसपास के क्षेत्रों में यही पद्धति दर्ज है। वहां फसल सामूहिक रूप से काटकर अधियार के घर अथवा सामूहिक स्थान पर रखी जाती थी और जोतदार को अपना एक-तिहाई लेने के लिए बुलाया जाता था।

इससे आंदोलन का अनुशासन भी स्पष्ट होता है।

आरंभिक तेभागा कार्यक्रम का उद्देश्य सामान्यतः पूरी फसल जब्त करना नहीं था।

किसान जोतदार का हिस्सा पूरी तरह समाप्त करने के बजाय उसे आधी से घटाकर एक-तिहाई करना चाहता था।

जैसे-जैसे दमन बढ़ा, आंदोलन की भाषा भी अधिक उग्र हुई।

उत्तर बंगाल के आंदोलन में दर्ज प्रमुख नारों में थे—

“आधी नहीं, तेभागा चाहिए”

“अपने खलिहान में धान उठाओ”

“जान देंगे, धान नहीं देंगे।”

ऐसे नारों के साथ किसान मार्च, हाट अभियान, जनसभाएं और गांव-गांव जुलूस आयोजित किए गए।

यह परिवर्तन महत्वपूर्ण है।

पहले तेभागा मुख्यतः हिस्सेदारी की मांग था।

जिस उपज को मैंने पैदा किया है, उसे बलपूर्वक ले जाने नहीं दूंगा।

यहीं आर्थिक प्रतिरोध सामाजिक टकराव में बदलता है।

तेभागा आंदोलन की सबसे रोचक और विवादित विशेषताओं में एक है—

किसान समितियों की भूमिका।

कई गांवों में ये समितियां केवल प्रचार या सदस्यता संगठन नहीं रहीं। जैसे-जैसे आंदोलन मजबूत हुआ, वे कृषि संबंधी निर्णयों और स्थानीय विवादों में हस्तक्षेप करने लगीं।

कुछ अध्ययन इन्हें लगभग ग्रामीण समानांतर सत्ता के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

इग्नू की किसान आंदोलनों संबंधी सामग्री में कहा गया है कि कुछ क्षेत्रों में किसान समितियां गांवों में प्रभावशाली शक्ति बन गईं और स्थानीय प्रशासन जैसे कार्य भी करने लगीं।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है।

क्या तेभागा ने समानांतर सरकारें स्थापित की थीं?

कुछ वामपंथी विवरणों में किसान समितियों की सत्ता को बहुत व्यापक रूप में प्रस्तुत किया गया है।

दूसरी ओर समाजशास्त्रीय अध्ययन इस दावे को सीमित करते हैं। एक अन्य विश्वविद्यालयीय अध्ययन स्पष्ट रूप से कहता है कि बर्गादारों का प्राथमिक उद्देश्य दो-तिहाई उपज अपने पास रखना था; वे सामान्यतः जमीन जब्त करने अथवा संगठित समानांतर सरकार स्थापित करने की दिशा में नहीं गए।

इसलिए बेहतर निष्कर्ष यह है—

कुछ मजबूत तेभागा क्षेत्रों में किसान समितियों ने सीमित समानांतर ग्रामीण अधिकार का प्रयोग किया, लेकिन पूरे आंदोलन को संगठित वैकल्पिक सरकार निर्माण का प्रयास नहीं कहा जा सकता।

यह तेलंगाना से उसका महत्वपूर्ण अंतर था।

किसान समिति क्या करती थी?

स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार समितियों की भूमिकाएं अलग थीं, लेकिन उनमें शामिल हो सकता था—

स्वयंसेवकों को बुलाना,

किसान–जोतदार विवाद में मध्यस्थता,

पुलिस की गतिविधियों पर नजर,

गिरफ्तार कार्यकर्ताओं की सहायता,

सभा और जुलूस आयोजित करना,

किसी गांव पर हमला होने पर पड़ोसी गांवों को सूचना भेजना।

कुछ इलाकों में स्थानीय किसान समिति की अनुमति के बिना पुराने ढंग से फसल ले जाना कठिन होता गया।

इससे गांव में जोतदार के परंपरागत प्रभाव को चुनौती मिली।

काकद्वीप का उदाहरण

24 परगना के काकद्वीप क्षेत्र में किसान समितियों का संगठन विशेष रूप से मजबूत हुआ।

अखिल भारतीय किसान सभा के विवरण में बुधाखाली, हरिपुर और अन्य केंद्रों पर किसान समितियों के गठन का उल्लेख है। वहां गरीब किसान और बर्गादार फसल जब्त कर अपने या पंचायत के खलिहानों में जमा करने लगे। कंसारी हलदर और अब्दुल रज्जाक खान जैसे नेता इस संघर्ष से जुड़े थे।

यहां संघर्ष केवल हिस्सेदारी तक सीमित नहीं रहा।

वनभूमि के पट्टेदारों, ‘लॉटदारों’, ‘चकदारों’ तथा उनके प्रबंधकों के विरुद्ध पुरानी शिकायतें भी तेभागा में मिल गईं।

इसलिए काकद्वीप का आंदोलन उत्तर बंगाल के सामान्य जोतदार–बर्गादार संघर्ष की तुलना में अधिक व्यापक ग्रामीण विद्रोह जैसा दिखाई देता है।

तेभागा की ताकत केवल खेत की कार्रवाई में नहीं थी।

उसने ग्रामीण राजनीतिक संस्कृति भी बदली।

कई क्षेत्रों में हजारों किसान गांवों से निकलकर जुलूसों में शामिल हुए।

और कभी-कभी धनुष-बाण जैसे परंपरागत हथियार होते थे।

अखिल भारतीय किसान सभा के अपने विवरण में दिनाजपुर में किसानों के बड़े जुलूसों, गांव-गांव मार्च और लाल झंडों के साथ लाठियां लेकर चलने को आंदोलन की प्रमुख जन-संगठन विधियों में गिना गया है।

लाल झंडे का अर्थ

तेभागा में लाल झंडा केवल कम्युनिस्ट पार्टी का प्रतीक नहीं था।

गांव के गरीब किसान के लिए वह स्थानीय स्तर पर किसान सभा की पहचान बन चुका था।

जहां लाल झंडा पहुंचता, वहां अक्सर संदेश स्पष्ट था—

बर्गादार अकेला नहीं है।

इस प्रतीकात्मकता ने आंदोलन की मनोवैज्ञानिक शक्ति बढ़ाई।

हाट भी आंदोलन का मंच बना

ग्रामीण बंगाल में साप्ताहिक हाट केवल खरीद-बिक्री का स्थल नहीं था।

वह सूचना और सामाजिक संपर्क का महत्वपूर्ण केंद्र था।

किसान सभा ने इसका इस्तेमाल प्रचार के लिए किया।

उत्तर बंगाल के स्रोतों में ‘हाट स्क्वाड’ का उल्लेख मिलता है—कार्यकर्ता बाजारों में जाकर तेभागा की मांग समझाते, पर्चे बांटते और किसानों को संगठित करते थे।

यह अत्यंत प्रभावी रणनीति थी।

एक गांव में सभा करने से केवल उस गांव तक संदेश पहुंचता।

हाट में प्रचार करने से कई गांवों के किसान एक साथ सुनते।

इस तरह आंदोलन प्रशासनिक संरचना से तेज गति से फैल सकता था।

टेलीफोन और आधुनिक संचार साधनों के बिना भी तेभागा गांवों में तेजी से सूचना फैलाता था।

इसके लिए परंपरागत साधन उपयोग में आए—

खानपुर में 20 फरवरी 1947 को पुलिस द्वारा किसानों को गिरफ्तार किए जाने की खबर गांव में फैलते ही महिलाओं ने ढोल, शंख और बर्तन बजाकर लोगों को सतर्क किया। आसपास के गांवों से किसान बड़ी संख्या में पहुंच गए।

यह केवल सांस्कृतिक घटना नहीं थी।

यह एक प्रकार का ग्रामीण आपात संचार तंत्र था।

तेभागा ने जिस आर्थिक हित को सीधी चुनौती दी थी, वह जोतदार वर्ग का था।

यदि बर्गादार आधी के बजाय केवल एक-तिहाई उपज देता, तो जोतदार की कृषि आय में भारी कमी आती।

इसके अतिरिक्त फसल उसके खलिहान से निकलकर किसान के नियंत्रण में चली जाती।

अर्थात नुकसान केवल आर्थिक नहीं था।

उसकी ग्रामीण प्रतिष्ठा और नियंत्रण भी कमजोर होते।

इसलिए विरोध तीखा होना स्वाभाविक था।

कानूनी शिकायत और पुलिस की सहायता

जोतदारों की प्रतिक्रिया हमेशा निजी हिंसा नहीं थी।

उनके पास प्रशासन तक पहुंच भी थी।

कई मामलों में उन्होंने किसानों पर फसल चोरी, अवैध कटाई अथवा बलपूर्वक कब्जे की शिकायत दर्ज कराई।

इग्नू की सामग्री के अनुसार खानपुर में भी भूमि नियंत्रक द्वारा बर्गादारों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराए जाने के बाद पुलिस गांव में पहुंची थी।

यहां औपनिवेशिक कानून और परंपरागत ग्रामीण व्यवस्था किसान के विरुद्ध एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई देते हैं।

किसान सभा जिस काम को ‘अपने अधिकार की फसल लेना’ कहती थी, जोतदार उसे ‘अवैध कब्जा’ बता सकता था।

लठैतों की भूमिका

ग्रामीण प्रभुत्वशाली वर्ग द्वारा निजी बल प्रयोग कोई नई बात नहीं थी।

जमींदारों और बड़े जोतदारों के पास स्थानीय समर्थक, नौकर या लठैत हो सकते थे।

तेभागा के दौरान ऐसे समूह किसानों को खेत से हटाने, फसल वापस लेने अथवा आंदोलनकारी गांवों पर दबाव डालने में इस्तेमाल हुए।

लेकिन जहां किसान सभा मजबूत थी, वहां व्यक्तिगत लठैत शक्ति के सामने सामूहिक किसान संख्या खड़ी हो गई।

यह शक्ति-संतुलन का महत्वपूर्ण परिवर्तन था।

सामाजिक दबाव भी हथियार था

हर संघर्ष लाठी से नहीं हुआ।

जोतदार का बड़ा हथियार था—

भूमि से बेदखली का भय।

यदि बर्गादार अगले मौसम में खेत ही न पाए तो आंदोलन में शामिल होना उसके पूरे परिवार के लिए जोखिम था।

इसके अलावा कर्ज और रोजगार पर निर्भरता भी जोतदार को प्रभाव देती थी।

इसलिए तेभागा में हिस्सा लेने वाला किसान केवल पुलिस गोली का जोखिम नहीं उठा रहा था।

वह अपनी अगली खेती और जीवन-निर्वाह को भी दांव पर लगा रहा था।

तेभागा की सबसे हिंसक घटनाएं प्रायः तब हुईं जब पुलिस आंदोलनकारी गांवों में पहुंची।

पुलिस का उद्देश्य सामान्यतः—

विवादित फसल की सुरक्षा या जब्ती,

और कानून-व्यवस्था बहाल करना

लेकिन किसान की दृष्टि से पुलिस उस पुरानी व्यवस्था को पुनः लागू करने आई थी जिसे उसने सामूहिक कार्रवाई से बदल दिया था।

इसलिए पुलिस प्रवेश ही कई बार संघर्ष का संकेत बन जाता था।

20 फरवरी 1947 की खानपुर घटना इस स्वरूप का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।

पुलिस कुछ बर्गादारों को गिरफ्तार करने गांव पहुंची।

खबर फैलते ही ढोल, शंख और बर्तनों से लोगों को बुलाया गया।

किसान आसपास के गांवों से पहुंचे।

उनके पास लाठियां, धनुष-बाण और कुल्हाड़ियां जैसे स्थानीय हथियार थे।

उन्होंने गिरफ्तार किसानों की रिहाई की मांग की।

इग्नू के अध्ययन के अनुसार पुलिस ने अंततः 119 राउंड गोलियां चलाईं और 22 बर्गादारों की मृत्यु हुई, जिनमें दो महिलाएं भी शामिल बताई गई हैं।

अन्य स्रोत मृतकों की संख्या 21 देते हैं। इस अंतर को ध्यान में रखते हुए शोधपूर्ण लेखन में 21–22 मृतकों अथवा “स्रोतों के अनुसार 21 या 22” लिखना अधिक सुरक्षित है।

यह घटना स्पष्ट करती है कि तेभागा की हिंसा किस तरह बढ़ती थी।

पहले किसान फसल पर अपना दावा करता है।

जोतदार शिकायत करता है।

पुलिस गिरफ्तारी करती है।

गांव सामूहिक रूप से पुलिस को रोकता है।

और फिर गोली चलती है।

पूर्वी बंगाल के मयमनसिंह जिले के सुसंग क्षेत्र में संघर्ष का स्वरूप कुछ स्थानों पर और अधिक उग्र हुआ।

यहां हाजोंग आदिवासी कृषक ‘टोंक’ जैसी उपज-लगान प्रणाली के विरुद्ध पहले से आंदोलित थे।

आधुनिक शोध के अनुसार जनवरी 1947 में सुसंग क्षेत्र में पोस्ट ऑफिस और पुलिस थानों पर हमलों की घटनाएं हुईं तथा कुछ हाजोंग कृषक धनुष-बाण और यहां तक कि आग्नेयास्त्रों के साथ घूम रहे थे। दिनाजपुर और जलपाईगुड़ी में भी आदिवासी कृषकों के सशस्त्र प्रतिरोध की घटनाएं दर्ज की गई हैं।

लेकिन यही अध्ययन महत्वपूर्ण निष्कर्ष भी देता है—

इन आदिवासी क्षेत्रों की उग्रता के बावजूद तेभागा व्यापक संगठित किसान युद्ध में परिवर्तित नहीं हुआ।

यह अंतर तेलंगाना से तुलना में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

तेभागा का संघर्ष केवल पुरुष किसानों का नहीं था।

कई क्षेत्रों में महिलाओं ने—

पुलिस आने की चेतावनी दी,

गिरफ्तारी रोकने का प्रयास किया,

और जुलूसों में भाग लिया।

कुछ जगह महिलाएं हंसिया और मिर्च पाउडर लेकर स्वयंसेवकों के साथ खड़ी थीं। काकद्वीप के संबंध में किसान सभा का ऐतिहासिक विवरण ऐसी महिलाओं का उल्लेख करता है जो तेज कृषि औजार और मिर्च पाउडर लेकर फसल कार्रवाई में भाग लेती थीं।

महिलाओं की यह भूमिका आंदोलन की सामाजिक गहराई का प्रमाण है।

इसे अगले खंड में विस्तार से लिया जाएगा।

तेभागा के बारे में सबसे कठिन प्रश्नों में से एक है—

क्या यह हिंसक आंदोलन था?

कुछ हिस्सों में हिंसक, लेकिन मूलतः संगठित सशस्त्र विद्रोह नहीं।

गांधीवादी सत्याग्रह नहीं

तेभागा को चंपारण, खेड़ा या बारडोली जैसे अनुशासित गांधीवादी सत्याग्रह की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

उसने कानूनी व्यवस्था की प्रतीक्षा नहीं की।

किसानों ने स्वयं फसल पर नया नियम लागू किया।

जोतदार के आदेश की अवज्ञा की।

कई स्थानों पर पुलिस के सामने लाठियों, धनुष-बाण और परंपरागत हथियारों के साथ खड़े हुए।

इस अर्थ में यह प्रत्यक्ष और उग्र वर्ग-संघर्ष था।

लेकिन तेलंगाना जैसा सशस्त्र संघर्ष भी नहीं

दूसरी ओर तेभागा में व्यापक गुरिल्ला सेना, दीर्घकालीन सशस्त्र क्षेत्रीय नियंत्रण अथवा बड़े पैमाने पर भूमि पुनर्वितरण की नीति विकसित नहीं हुई।

इग्नू की अध्ययन सामग्री स्वयं तेभागा और तेलंगाना के बीच यही अंतर दिखाती है। तेभागा का मूल विवाद फसल और बर्गादार हिस्सेदारी था, जबकि तेलंगाना बाद में व्यापक सशस्त्र विरोध और सामंती भूमि-सत्ता को उखाड़ने की दिशा में गया।

एक अन्य समाजशास्त्रीय अध्ययन भी स्पष्ट करता है कि तेभागा के अधिकांश बर्गादार जमीन जब्त करने या समानांतर सरकार बनाने के बजाय दो-तिहाई उपज के अधिकार पर केंद्रित रहे।

इसका एक ही उत्तर सभी स्थानों पर लागू नहीं किया जा सकता।

कई मामलों में किसानों ने परंपरागत व्यवस्था की अवज्ञा करते हुए फसल अपने कब्जे में ली।

कानूनी दृष्टि से इसे जोतदारों ने अवैध कार्रवाई बताया।

कुछ क्षेत्रों में किसानों ने जोतदारों के खलिहान तोड़े और धान वापस लिया।

कुछ स्थानों पर पुलिस अथवा प्रशासनिक प्रतिष्ठानों पर हमला भी हुआ।

दूसरी तरफ बड़ी संख्या में गंभीर हिंसक घटनाएं उस समय हुईं जब पुलिस गांव में गिरफ्तारी, फसल वापसी अथवा आंदोलन तोड़ने पहुंची।

इसलिए आंदोलन के हिंसक चरित्र का संतुलित मूल्यांकन यह होगा—

तेभागा में किसान प्रत्यक्ष अवज्ञा और आवश्यकतानुसार शारीरिक प्रतिरोध के लिए तैयार थे; राज्य की दमनकारी प्रतिक्रिया ने अनेक क्षेत्रों में संघर्ष को रक्तरंजित बनाया।

दिनाजपुर

यहां आंदोलन अत्यंत उग्र था।

किसान बड़े समूहों में लाठियों और परंपरागत हथियारों के साथ निकले।

खानपुर जैसी पुलिस गोलीबारियां हुईं।

जलपाईगुड़ी

सामूहिक कटाई और धान अपने खलिहान में रखने की कार्रवाई प्रमुख रही। स्वयंसेवक दल और किसान मार्च संगठित थे।

काकद्वीप

यहां गरीब किसानों और बर्गादारों का प्रतिरोध अधिक व्यापक ग्रामीण विद्रोह की दिशा लेता दिखाई दिया; महिलाओं और हथियारबंद ग्रामीण स्वयंसेवकों की भूमिका उल्लेखनीय थी।

मयमनसिंह–सुसंग

हाजोंग कृषकों के संघर्ष में पुलिस थानों और सरकारी संस्थानों पर हमले तक हुए, जिससे यह तेभागा के अधिक उग्र क्षेत्रों में गिना जाता है।

तेभागा की एक महत्वपूर्ण बात यह थी कि उसकी उग्रता के बावजूद उसका केंद्रीय आर्थिक कार्यक्रम अपेक्षाकृत सीमित और स्पष्ट रहा।

किसान सभा सामान्यतः यह नहीं कह रही थी—

जोतदार को कुछ मत दो।

दो हिस्से किसान के, एक हिस्सा जोतदार का।

इससे आंदोलन को व्यापक वैधता मिली।

यह पूरी संपत्ति जब्ती नहीं थी।

वह कृषि उपज के अनुपात को बदलने का संघर्ष था।

इसी कारण सरकारी फ्लाउड आयोग की पुरानी सिफारिश भी आंदोलन को नैतिक और राजनीतिक आधार देती रही।

1947 आते-आते बंगाल सरकार ने आंदोलन को नियंत्रित करने के लिए कड़ा दमन शुरू किया।

आंदोलनग्रस्त क्षेत्रों में सामान्य होते गए।

इग्नू के इतिहास अध्ययन में भी 1947 के कठोर सरकारी दमन को आंदोलन के क्षीण होने का प्रमुख कारण माना गया है।

लेकिन केवल दमन पर्याप्त कारण नहीं था।

सांप्रदायिक राजनीति और बंगाल विभाजन का बढ़ता संकट भी किसान एकता पर भारी पड़ने लगा।

यह प्रश्न बाद के खंडों में विस्तार से आएगा।

औपनिवेशिक प्रशासन की दृष्टि से कई कार्रवाइयां निश्चित रूप से कानून का उल्लंघन थीं।

लेकिन किसान सभा का राजनीतिक तर्क अलग था।

जिस सुधार की सिफारिश स्वयं सरकारी आयोग कर चुका है, उसे लागू न करना ही वास्तविक अन्याय है।

इसलिए किसानों ने अपनी कार्रवाई को चोरी या लूट नहीं, बल्कि स्वीकृत किंतु रोके गए अधिकार को लागू करना माना।

इस अंतर को समझे बिना तेभागा की राजनीतिक मनोविज्ञान समझना कठिन है।

तेभागा का सबसे गहरा प्रभाव शायद फसल की मात्रा से भी आगे था।

पुरानी व्यवस्था में बर्गादार का संबंध जोतदार से व्यक्तिगत आश्रय, कर्ज और निर्भरता का था।

तेभागा ने उसे सामूहिक पहचान दी—

मैं अकेला अधियार नहीं हूं।

“हमारा अधिकार दो-तिहाई है”

यही परिवर्तन ग्रामीण राजनीतिक चेतना का निर्माण था।

तेभागा आंदोलन का मूल संघर्ष धान पर नियंत्रण का था।

किसान ने पुरानी बटाई व्यवस्था को चुनौती देते हुए फसल अपने खलिहान में रखना शुरू किया और जोतदार को केवल एक-तिहाई देने की घोषणा की। किसान सभा ने स्वयंसेवक दल, जनसभाएं, हाट अभियान, गांव-गांव मार्च और लाल झंडों के माध्यम से इस कार्रवाई को संगठित किया।

इसलिए तेभागा को अहिंसक सत्याग्रह कहना गलत होगा।

उसे संगठित सशस्त्र क्रांति कहना भी उतना ही गलत होगा।

खंड 6

महिलाओं की असाधारण भूमिका

तेभागा आंदोलन की सबसे विशिष्ट विशेषताओं में एक थी ग्रामीण महिलाओं की असाधारण भागीदारी। भारतीय किसान आंदोलनों में महिलाएं पहले भी शामिल हुई थीं—चंपारण, खेड़ा, बारडोली और दूसरे संघर्षों में उनकी उपस्थिति दिखाई देती है—लेकिन तेभागा में अनेक स्थानों पर महिलाएं सहायक भूमिका से आगे बढ़कर फसल की रक्षा करने वाली स्वयंसेवक, संदेशवाहक, जुलूसकर्ता, पुलिस के सामने प्रतिरोधकर्ता और स्थानीय नेता बन गईं।

यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ था। 1943 के बंगाल अकाल के दौरान राहत, भोजन, रोजगार और आत्मरक्षा से जुड़े संगठनों में सक्रिय महिलाओं ने ग्रामीण बंगाल में पहले से संपर्क और संगठन तैयार किया था। विशेष रूप से महिला आत्मरक्षा समिति ने इस राजनीतिक जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मणिकुंतला सेन, रेणु चक्रवर्ती और रानी मित्र दासगुप्ता जैसी कार्यकर्ताओं ने अकाल के दौरान जिस महिला नेटवर्क का निर्माण किया था, वही 1946–47 में तेभागा के लिए उपयोगी आधार बना।

लेकिन महिलाओं की भागीदारी को केवल शहरी महिला कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं की देन कहना भी अधूरा होगा। जैसे-जैसे आंदोलन गांवों में गहरा हुआ, ग्रामीण महिलाओं ने अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहल विकसित की। अनेक स्थानों पर पुरुष कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी अथवा भूमिगत होने के बाद आंदोलन टिकाए रखने का भार उन्हीं पर आ गया।

इसलिए तेभागा की महिला कहानी दो धाराओं के मेल से बनी—

संगठित महिला राजनीतिक कार्यकर्ताओं की पहल

ग्रामीण किसान महिलाओं का स्वयं का प्रतिरोध।

फसल पुरुष की नहीं, पूरे परिवार की आजीविका थी

यदि तेभागा का प्रश्न केवल जमीन के कानूनी अधिकार का होता, तो शायद महिलाओं की भागीदारी इतनी व्यापक न होती।

लेकिन संघर्ष धान का था।

और धान का सीधा संबंध पूरे किसान परिवार के भोजन से था।

बर्गादार परिवार में पुरुष खेत जोतता और काटता हो सकता था, लेकिन कृषि उत्पादन की पूरी प्रक्रिया केवल पुरुष श्रम पर आधारित नहीं थी। महिलाएं बीज तैयार करने, निराई, कटाई के बाद फसल संभालने, धान सुखाने, कूटने, भंडारण करने और परिवार के भोजन की व्यवस्था में महत्वपूर्ण श्रम देती थीं।

इसलिए जब फसल का आधा हिस्सा जोतदार को जाता था तो नुकसान केवल पुरुष कृषक का नहीं होता था।

उसका सबसे सीधा असर पड़ता था—

यहीं तेभागा महिलाओं का अपना आर्थिक प्रश्न बन गया।

अकाल की स्मृति

1943 का बंगाल अकाल महिलाओं के लिए विशेष रूप से विनाशकारी था।

परिवार में भोजन की कमी, बच्चों की भूख, विस्थापन, महिलाओं की असुरक्षा और आजीविका के टूटने का भार उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से झेला।

अकाल के दौरान महिला आत्मरक्षा समिति और दूसरे राहत संगठनों ने महिलाओं को भोजन वितरण, राहत केंद्र, सामूहिक रसोई, रोजगार तथा अन्य गतिविधियों में संगठित किया।

यही अनुभव कुछ वर्षों बाद तेभागा में राजनीतिक पूंजी बना।

महिला कार्यकर्ताओं और ग्रामीण महिलाओं के बीच संबंध पहली बार 1946 में नहीं बने थे।

उनके बीच अकाल के दौरान ही संपर्क स्थापित हो चुका था।

शुरुआती भूमिका अपेक्षाकृत सहायक थी

आंदोलन के प्रारंभिक चरण में अधिकांश ग्रामीण महिलाओं को मुख्य निर्णयकारी संगठन में तुरंत स्थान नहीं मिला।

फसल काटने में सहायता करतीं,

कार्यकर्ताओं के लिए भोजन तैयार करतीं,

पुलिस की गतिविधियों पर नजर रखतीं,

बाहरी नेता को आश्रय देतीं,

और खतरे की सूचना देतीं।

लेकिन जैसे-जैसे पुलिस दमन बढ़ा, यह भूमिका बदलने लगी।

इतिहासकारों और प्रतिभागियों के संस्मरणों पर आधारित अध्ययनों के अनुसार कई इलाकों में महिलाओं ने स्वयं ‘नारी वाहिनी’ जैसे प्रतिरोध समूह गठित किए और रात में गांव तथा फसल की रक्षा करने लगीं।

तेभागा की एक व्यावहारिक समस्या यह थी कि प्रशासन सामान्यतः राजनीतिक रूप से पहचाने जाने वाले पुरुष किसान सभा कार्यकर्ताओं को पहले गिरफ्तार करता था।

इससे प्रशासन को उम्मीद होती थी कि स्थानीय संगठन टूट जाएगा।

लेकिन अनेक गांवों में इसका उलटा हुआ।

पुरुष नेता गिरफ्तार हुए या भूमिगत गए तो महिलाएं सामने आईं।

किस गांव से स्वयंसेवक बुलाने हैं,

किस रास्ते से पुलिस आ सकती है,

कौन कार्यकर्ता भूमिगत है,

और किन परिवारों को सहायता चाहिए।

इसलिए आंदोलन की सांगठनिक स्मृति केवल पार्टी कार्यालय में नहीं थी।

वह किसान परिवारों के भीतर भी मौजूद थी।

महिला आत्मरक्षा समिति का उदय

महिला आत्मरक्षा समिति का उदय द्वितीय विश्वयुद्ध और बंगाल अकाल की पृष्ठभूमि में हुआ। 1942 से इस संगठन ने महिलाओं के बीच राहत, आत्मरक्षा और सामाजिक संगठन का काम बढ़ाया।

मणिकुंतला सेन, रेणु चक्रवर्ती और रानी मित्र दासगुप्ता इसके प्रमुख सक्रिय चेहरों में थीं।

इस संगठन का महत्व केवल यह नहीं था कि उसने महिलाओं को किसी राजनीतिक दल की शाखा से जोड़ा।

उसने पहली बार बड़ी संख्या में महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से जोड़ा—

महिलाओं से घर-घर संपर्क करना,

और सामूहिक समस्या पर निर्णय लेना।

तेभागा के समय यह अनुभव बेहद उपयोगी सिद्ध हुआ।

महिलाओं को संगठित करने में नई समस्या सामने आई

महिला कार्यकर्ताओं ने जल्दी ही महसूस किया कि किसान महिलाओं को केवल वर्ग-संघर्ष के सामान्य नारे से स्थायी रूप से संगठित नहीं किया जा सकता।

उनकी अपनी समस्याएं थीं।

मणिकुंतला सेन और रेणु चक्रवर्ती जैसे कार्यकर्ताओं के अनुभवों पर आधारित अध्ययनों में तीन विशेष प्रश्न सामने आते हैं।

महिलाओं की बैठक ऐसे समय रखी जाए जब वे घरेलू काम से मुक्त हों।

यदि आंदोलन में महिलाओं की व्यापक भागीदारी चाहिए तो घरेलू श्रम का बोझ भी ध्यान में रखना होगा।

कई ग्रामीण महिलाएं घरेलू हिंसा, पति की शराबखोरी और अपनी कमाई पर नियंत्रण जैसे प्रश्न उठा रही थीं।

यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ था।

किसान आंदोलन खेत के सवाल से शुरू हुआ था।

लेकिन महिलाओं के प्रवेश ने प्रश्न उठा दिया—

यदि किसान को जोतदार के शोषण से मुक्त करना है, तो किसान परिवार के भीतर महिला पर होने वाले अत्याचार को नजरअंदाज कैसे किया जा सकता है?

पार्टी नेतृत्व की सीमा

यहीं कम्युनिस्ट आंदोलन की लैंगिक सीमाएं भी सामने आईं।

महिला कार्यकर्ता चाहती थीं कि आंदोलन में महिलाओं के स्वतंत्र प्रश्नों को भी शामिल किया जाए।

लेकिन पुरुष नेतृत्व का बड़ा हिस्सा यह मानता था कि तत्काल प्राथमिकता आर्थिक और वर्गीय संघर्ष है।

इसलिए पत्नी की पिटाई, शराब, महिला की कमाई पर पति का नियंत्रण और घरेलू असमानता जैसे प्रश्न आंदोलन के केंद्रीय कार्यक्रम में उतनी मजबूती से जगह नहीं बना पाए जितनी महिला कार्यकर्ता चाहती थीं।

यह तेभागा की उपलब्धि और सीमा—दोनों है।

उसने महिलाओं को राजनीतिक मंच दिया।

लेकिन उस मंच पर पितृसत्ता स्वयं पूर्ण राजनीतिक प्रश्न नहीं बन सकी।

जैसे-जैसे पुलिस दमन बढ़ा, कई जगह महिलाओं ने अपने स्वयं के प्रतिरोध समूह बनाए।

इन समूहों को सामान्यतः नारी वाहिनी कहा गया।

उनके पास आधुनिक हथियार नहीं थे।

जो कुछ घर और खेत में उपलब्ध था वही रक्षा का साधन बना—

और कभी मिर्च अथवा रेत।

तेभागा की महिला भागीदारी पर अध्ययन सुंदरबन से जेसोर और दिनाजपुर तक महिलाओं द्वारा ऐसे समूह बनाने का उल्लेख करते हैं।

यह संगठित गुरिल्ला सेना नहीं थी।

नारी वाहिनी का मुख्य काम था—

और सामूहिक प्रतिरोध में महिलाओं को जुटाना।

महिलाओं की एक महत्वपूर्ण भूमिका थी पुलिस या जोतदार के लोगों के आने की खबर फैलाना।

जैसे परंपरागत संकेतों का उपयोग होता था।

एक महिला ने खतरा देखा तो वह संकेत देती।

फिर आसपास के परिवार और गांव सक्रिय हो जाते।

इस तरह घरेलू वस्तुएं राजनीतिक संचार का साधन बन गईं।

तेभागा में यह व्यवस्था विशेष रूप से उपयोगी थी क्योंकि पुलिस अक्सर प्रमुख पुरुष कार्यकर्ताओं को अचानक गिरफ्तार करने का प्रयास करती थी।

तेभागा आंदोलन की महिलाओं की चर्चा में इला मित्र का नाम लगभग अनिवार्य रूप से आता है।

लेकिन यहां ऐतिहासिक समयरेखा स्पष्ट रखना जरूरी है।

इला मित्र का सबसे प्रसिद्ध किसान संघर्ष 1949–50 का नाचोल विद्रोह था।

अर्थात उन्हें सीधे 1946–47 के मूल तेभागा आंदोलन के उसी स्तर का क्षेत्रीय नेता बताना उचित नहीं होगा जिस अर्थ में विमला मांझी नंदीग्राम या दूसरे स्थानीय कार्यकर्ता अपने क्षेत्रों में थे।

इला मित्र का महत्व मुख्यतः तेभागा की पूर्वी बंगाल में जारी विरासत में है।

इला सेन से इला मित्र

इला सेन का जन्म 1925 में हुआ। उन्होंने कलकत्ता के बेथ्यून कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की और युवावस्था में ही वामपंथी राजनीति तथा महिला आंदोलन से जुड़ गईं।

उनका संबंध महिला आत्मरक्षा समिति से भी रहा।

1945 में उनका विवाह कम्युनिस्ट कार्यकर्ता रामेंद्र मित्र से हुआ और इसके बाद उनका संबंध राजशाही क्षेत्र के ग्रामीण समाज से गहरा हुआ।

नाचोल की कृषि संरचना

विभाजन के बाद नाचोल पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा बना।

यहां बड़ी संख्या में संथाल और अन्य गरीब कृषक जोतदारों के अधीन खेती करते थे।

तेभागा की मूल मांग यहां भी प्रासंगिक थी—

वास्तविक कृषक को दो-तिहाई उपज।

1949 के अंत और 1950 की शुरुआत में नाचोल क्षेत्र के किसानों ने जोतदारों को परंपरागत हिस्सेदारी देने से इनकार किया और दो-तिहाई की मांग को लागू करने का प्रयास किया।

बांग्लापीडिया नाचोल आंदोलन की स्पष्ट मांग के रूप में अधियारों को उपज का दो-तिहाई हिस्सा देने का उल्लेख करता है।

‘रानी मां’

इला मित्र ने संथाल और गरीब कृषकों के बीच व्यापक संगठन किया।

स्थानीय किसान उन्हें सम्मानपूर्वक ‘रानी मां’ कहने लगे।

उन्होंने गांव-गांव जाकर किसानों को संगठित किया और फ्लाउड आयोग की सिफारिशों के अनुरूप बटाई व्यवस्था बदलने के अभियान से जुड़ीं।

जनवरी 1950 में आंदोलन और राज्य के बीच गंभीर हिंसक टकराव हुआ।

इला मित्र गिरफ्तार हुईं और हिरासत में उन्हें गंभीर यातना दी गई। बाद में उन पर मुकदमा चला और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। बीमारी के कारण 1954 में उन्हें इलाज के लिए कलकत्ता जाने की अनुमति मिली।

इसलिए इला मित्र का स्थान तेभागा इतिहास में इस रूप में अधिक सटीक है—

वह 1946–47 के तेभागा आंदोलन से निकली भूमि-अधिकार राजनीति की पूर्वी बंगाल में सबसे प्रसिद्ध महिला उत्तराधिकारी थीं।

तेभागा का महिला इतिहास केवल एक या दो प्रसिद्ध नेताओं का इतिहास नहीं है।

वास्तव में इसके कई स्तर थे।

एक तरफ शहरी शिक्षित कम्युनिस्ट और महिला आंदोलन की कार्यकर्ता थीं।

दूसरी तरफ स्थानीय ग्रामीण महिलाएं थीं जिन्होंने आंदोलन के बीच नेतृत्व हासिल किया।

मणिकुंतला सेन

मणिकुंतला सेन बंगाल के वामपंथी महिला आंदोलन की महत्वपूर्ण नेता थीं।

अकाल के समय महिला आत्मरक्षा समिति के माध्यम से उन्होंने राहत और महिला संगठन का व्यापक कार्य किया।

तेभागा शुरू होने पर यही संपर्क ग्रामीण महिलाओं को किसान संघर्ष से जोड़ने में काम आया।

मणिकुंतला सेन की भूमिका का महत्व केवल संगठन बढ़ाने में नहीं था।

उन्होंने यह प्रश्न भी उठाया कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को टिकाऊ बनाना है तो उनकी घरेलू और लैंगिक समस्याओं को राजनीतिक प्रश्न के रूप में स्वीकार करना होगा।

रेणु चक्रवर्ती

रेणु चक्रवर्ती भी महिला आत्मरक्षा समिति के निर्माण और बंगाल के महिला आंदोलन से जुड़ी प्रमुख कार्यकर्ता थीं।

उन्होंने तेभागा के दौरान ग्रामीण महिलाओं को लामबंद करने में सक्रिय भूमिका निभाई।

बाद में वह भारतीय संसदीय राजनीति में भी प्रमुख वामपंथी महिला नेता बनीं और लोकसभा के लिए कई बार निर्वाचित हुईं। उनके राजनीतिक जीवन की जड़ें युद्ध, अकाल, महिला संगठन और किसान संघर्ष के इसी दौर में थीं।

रानी मित्र दासगुप्ता

रानी मित्र दासगुप्ता उन महिला कार्यकर्ताओं में थीं जिन्होंने अकाल के समय महिला आत्मरक्षा समिति में काम किया और फिर तेभागा के दौरान गांवों की महिलाओं को संगठित करने की कोशिश की।

उनका कार्य विशेष रूप से इस दृष्टि से महत्वपूर्ण था कि उन्होंने शिक्षित शहरी महिला आंदोलन और ग्रामीण कृषक महिलाओं के बीच सेतु का काम किया।

तेभागा के महिला नेतृत्व की चर्चा में विमला मांझी का स्थान विशेष है।

वह मिदनापुर की एक युवा विधवा थीं।

1943 के अकाल के दौरान उनका संपर्क मणिकुंतला सेन और महिला आत्मरक्षा समिति से हुआ। राहत कार्य करते हुए उन्होंने गांवों में महिलाओं के साथ प्रत्यक्ष संगठन का अनुभव प्राप्त किया।

तेभागा आंदोलन शुरू होने पर उन्हें नंदीग्राम क्षेत्र में महिलाओं को संगठित करने भेजा गया।

शुरुआत आसान नहीं थी।

ग्रामीण समाज में महिलाओं का खेत की सार्वजनिक राजनीतिक कार्रवाई में उतरना सामान्य नहीं था।

लेकिन विमला ने धीरे-धीरे उन्हें तैयार किया।

कृषि श्रम की लैंगिक सीमा तोड़ना

मिदनापुर के नंदीग्राम, सुताहाटा और महिषादल जैसे क्षेत्रों में कृषि कार्यों में पुरुषों और महिलाओं की भूमिकाएं काफी हद तक परंपरागत रूप से विभाजित थीं।

विमला ने महिलाओं को सीधे धान काटने और उसे बर्गादार के खलिहान में पहुंचाने के काम में उतारा।

इस अर्थ में तेभागा ने केवल भूमि-संबंध नहीं बदले।

उसने कुछ गांवों में यह धारणा भी तोड़ी कि खेत की निश्चित गतिविधियां केवल पुरुषों का काम हैं।

नेतृत्व संभालना

जब पुलिस ने कम्युनिस्ट पार्टी और किसान सभा के पुरुष नेताओं को गिरफ्तार करना शुरू किया तो विमला मांझी की जिम्मेदारी बढ़ गई।

महिलाओं की भागीदारी पर उपलब्ध अध्ययनों के अनुसार उन्होंने स्थानीय स्तर पर ऐसी कार्रवाइयों का नेतृत्व किया जिनमें जोतदारों के खलिहानों से जुड़े संघर्ष भी शामिल थे। बाद में पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया और वह लंबे समय तक जेल में रहीं।

उनका उदाहरण एक महत्वपूर्ण तथ्य सिद्ध करता है—

तेभागा ने कुछ ग्रामीण महिलाओं को सहभागी से नेता बना दिया।

तेभागा के इतिहास में अनेक ऐसी महिलाएं हैं जिनकी प्रसिद्धि बड़े राजनीतिक नेताओं जैसी नहीं हुई।

और अनेक ग्रामीण महिलाओं के उल्लेख मिलते हैं। उत्तर बंगाल के अध्ययनों में भंडानी और जयमनी जैसी महिलाओं की स्थानीय पुलिस प्रतिरोध और कृषक संगठन में भूमिका सामने आती है।

इससे एक बड़ी इतिहासलेखन समस्या सामने आती है।

पुरुष राजनीतिक नेतृत्व के नाम दस्तावेजों में आसानी से मिलते हैं।

लेकिन गांव की अनपढ़ या कम पढ़ी महिला, जिसने पुलिस के सामने खड़े होकर फसल बचाई, अक्सर आधिकारिक अभिलेख में केवल—

‘भीड़ की महिला सदस्य’

इसलिए तेभागा का महिला इतिहास बड़े पैमाने पर मौखिक इतिहास, संस्मरण और बाद के साक्षात्कारों पर निर्भर है।

तेभागा में महिला भागीदारी को केवल ‘बंगाली महिलाएं’ कहकर समेटना भी उचित नहीं है।

आंदोलन के प्रमुख क्षेत्रों में सामाजिक संरचना अत्यंत विविध थी।

उत्तर बंगाल में राजबंशी और आदिवासी कृषक बड़ी संख्या में थे।

दिनाजपुर, जलपाईगुड़ी और मालदा में संथाल तथा अन्य जनजातीय समुदाय सक्रिय थे।

राजबंशी महिलाएं

जलपाईगुड़ी और उत्तर बंगाल पर उपलब्ध अध्ययनों की एक उल्लेखनीय खोज है कि आंदोलन में शामिल महिलाओं का बड़ा हिस्सा राजबंशी समुदाय से था।

यह महत्वपूर्ण है क्योंकि तेभागा को केवल कम्युनिस्ट शहरी बुद्धिजीवियों और बंगाली कृषकों की कहानी मानने से यह सामाजिक वास्तविकता छूट जाती है।

राजबंशी महिलाओं के लिए आंदोलन भूमि, श्रम और परिवार की खाद्य-सुरक्षा तीनों से जुड़ा था।

आदिवासी महिलाओं की विशिष्ट स्थिति

आदिवासी कृषक समाज में महिलाओं की कृषि भागीदारी कई गैर-आदिवासी समुदायों की तुलना में अधिक प्रत्यक्ष थी।

इसलिए फसल पर संघर्ष उनका स्वतः आर्थिक प्रश्न था।

जब पुरुष किसान धनुष-बाण या लाठी लेकर पुलिस के सामने उतरे तो महिलाएं पीछे नहीं रहीं।

वे चेतावनी, भोजन, फसल सुरक्षा और प्रत्यक्ष प्रतिरोध में शामिल हुईं।

कुछ स्थानों पर महिलाओं की सक्रियता इसलिए भी निर्णायक हो गई क्योंकि पूरा कृषक परिवार ही आर्थिक उत्पादन इकाई था।

जाति और वर्ग का मेल

तेभागा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि सबसे गरीब और सामाजिक रूप से कमजोर कृषक समुदायों में उसकी अपील अधिक तीव्र हो सकती थी।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आंदोलन ने जाति और सामाजिक पदानुक्रम को समाप्त कर दिया।

बर्गादार परिवार से हो सकती थी,

दलित या आदिवासी समुदाय से हो सकती थी,

और महिला होने के कारण पितृसत्तात्मक नियंत्रण भी झेल सकती थी।

इसलिए उसका शोषण केवल एक स्तर पर नहीं था।

आधुनिक इतिहासलेखन इसी कारण तेभागा को केवल वर्ग संघर्ष की दृष्टि से पढ़ने के बजाय वर्ग, जाति, जनजातीय पहचान और लिंग के अंतर्संबंध से भी देखता है।

तेभागा का महिलाओं पर सबसे गहरा प्रभाव शायद इस प्रश्न में था कि—

गांव में राजनीति किसका क्षेत्र है?

परंपरागत ग्रामीण व्यवस्था में सार्वजनिक बैठक, जमीन का समझौता, पुलिस से बातचीत और राजनीतिक संगठन मुख्यतः पुरुषों के क्षेत्र माने जाते थे।

तेभागा ने इस सीमा को कई जगह तोड़ा।

घर राजनीति का हिस्सा बन गया

पुरुष कार्यकर्ता भूमिगत था तो उसे भोजन किसने दिया?

पुलिस आई तो सूचना किसने दी?

धान की रक्षा किसने की?

बैठक के लिए घर किसने उपलब्ध कराया?

इसका अर्थ था कि आंदोलन और घरेलू जीवन के बीच की दीवार टूटने लगी।

घर स्वयं राजनीतिक बुनियादी ढांचे का हिस्सा बन गया।

कृषि श्रम की नई पहचान

विमला मांझी के नंदीग्राम अभियान का उदाहरण बताता है कि तेभागा ने कुछ क्षेत्रों में महिलाओं को सीधे धान काटने जैसे कामों में उतारा जिन्हें स्थानीय सामाजिक परंपरा पुरुष कार्य मानती थी।

इसका तत्काल उद्देश्य आंदोलन था।

लेकिन उसका सामाजिक प्रभाव व्यापक था।

महिला ने केवल पति के आंदोलन का समर्थन नहीं किया।

फसल के उत्पादन और अधिकार में मेरी भी हिस्सेदारी है।

राजनीतिक बैठक में आने के बाद महिलाओं ने केवल जोतदार के शोषण की शिकायत नहीं की।

पति शराब क्यों पीता है?

पत्नी को मारना क्यों स्वीकार्य है?

महिला की अपनी कमाई पर उसका अधिकार क्यों नहीं?

महिलाओं के लिए बैठक का समय पुरुष क्यों तय करें?

यह अत्यंत महत्वपूर्ण परिवर्तन था।

वर्ग-संघर्ष ने महिला को बोलने का मंच दिया।

और महिला ने उसी मंच पर पितृसत्ता का प्रश्न भी उठा दिया।

यहां तेभागा की सीमा स्पष्ट होती है।

महिलाएं आंदोलन में बड़ी संख्या में थीं।

वे गिरफ्तारी झेल रही थीं।

पुलिस का सामना कर रही थीं।

लेकिन गांव की औपचारिक आंदोलन समितियों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व उनकी वास्तविक भागीदारी के अनुपात में नहीं था।

महिला सहभागिता पर शोध में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि महिलाएं सभाओं, जुलूसों और जोतदारों के पास जाने वाले प्रतिनिधिमंडलों में शामिल थीं, लेकिन आंदोलन संचालित करने वाली समितियों में उनका निर्वाचित या मनोनीत होना दुर्लभ था।

संघर्ष में महिलाएं अग्रिम पंक्ति में थीं, निर्णय की मेज पर अपेक्षाकृत कम।

यह विरोधाभास भारतीय किसान आंदोलनों में लंबे समय तक दिखाई देता रहा।

तेभागा का मुख्य उद्देश्य स्त्री-पुरुष समानता स्थापित करना नहीं था।

उसका केंद्रीय मुद्दा बर्गादार का आर्थिक अधिकार था।

इसलिए तेभागा को महिला मुक्ति आंदोलन कहना अतिशयोक्ति होगी।

लेकिन यह कहना उचित होगा कि—

कम्युनिस्ट पार्टी की रणनीति,

खंड 7

आदिवासी, दलित और गरीब किसान

तेभागा आंदोलन को लंबे समय तक मुख्यतः जोतदार बनाम बर्गादार के वर्ग-संघर्ष के रूप में समझाया गया। यह व्याख्या मूलतः सही है, क्योंकि आंदोलन की केंद्रीय मांग फसल के बंटवारे और बर्गादार अधिकार से जुड़ी थी। लेकिन यदि हम यह पूछें कि आंदोलन के सबसे सक्रिय किसान कौन थे, किन क्षेत्रों में उसने सबसे उग्र रूप लिया और किन समुदायों ने पुलिस दमन के बावजूद उसका साथ नहीं छोड़ा, तो तस्वीर अधिक जटिल हो जाती है।

उत्तर बंगाल के राजबंशी किसान, संथाल और अन्य आदिवासी कृषक, अनुसूचित जाति समुदायों के गरीब किसान, मुस्लिम बर्गादार तथा कृषि श्रमिक तेभागा की वास्तविक जनशक्ति का बड़ा हिस्सा थे। इग्नू की समाजशास्त्रीय अध्ययन सामग्री भी ऐसे किसान आंदोलनों में गरीब कृषकों, विशेषकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों को सामूहिक लामबंदी की प्रमुख शक्ति मानती है।

इसलिए तेभागा को केवल वर्ग से अथवा केवल जाति-जनजातीय पहचान से समझना पर्याप्त नहीं है।

उसकी वास्तविक सामाजिक संरचना उन दोनों के अंतर्संबंध में थी।

कई किसानों के लिए गरीबी, बर्गादारी, जातिगत निम्न स्थिति और आदिवासी पहचान अलग-अलग समस्याएं नहीं थीं। वे एक ही ग्रामीण सत्ता-संरचना में एक-दूसरे से जुड़ी हुई थीं।

उत्तर बंगाल और राजबंशी कृषक समाज

तेभागा आंदोलन का सबसे शक्तिशाली क्षेत्र उत्तर बंगाल था और उत्तर बंगाल की कृषि-सामाजिक संरचना में राजबंशी समुदाय का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान था।

जलपाईगुड़ी, दिनाजपुर, रंगपुर और आसपास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में राजबंशी परिवार खेती से जुड़े थे। उनमें छोटे भू-स्वामी भी थे, बर्गादार भी और कृषि श्रमिक भी।

इसलिए ‘राजबंशी’ शब्द स्वयं किसी एक आर्थिक वर्ग का पर्याय नहीं था।

यही तथ्य तेभागा को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

एक राजबंशी बड़ा या मध्यम जोतदार हो सकता था।

दूसरा राजबंशी उसी क्षेत्र में अधियार हो सकता था।

इसलिए संघर्ष कभी-कभी एक ही जातीय समुदाय के भीतर अलग-अलग आर्थिक वर्गों के बीच भी था।

राजबंशी बर्गादार आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में

उत्तर बंगाल के शोध में राजबंशी कृषकों को तेभागा की सबसे सक्रिय शक्तियों में गिना गया है। जलपाईगुड़ी पर हुए अध्ययन में राजबंशी, उरांव, संथाल और मुस्लिम कृषकों तथा विशेष रूप से उनकी महिलाओं की सक्रिय भागीदारी दर्ज है।

इस क्षेत्र में किसान सभा की मांग इसलिए आसानी से स्वीकार की जा सकी क्योंकि बर्गादार प्रश्न पहले से मौजूद था।

राजबंशी गरीब किसान के लिए तेभागा कोई अमूर्त मार्क्सवादी सिद्धांत नहीं था।

अपने परिवार के लिए अधिक धान,

जोतदार को कम हिस्सा,

और खेत पर अपनी स्थिति की अधिक सुरक्षा।

जातीय एकता और वर्ग विभाजन

तेभागा ने राजबंशी समाज में एक महत्वपूर्ण अंतर्विरोध उजागर किया।

क्या जातीय पहचान आर्थिक वर्ग-संघर्ष से ऊपर रहेगी?

जहां बड़े राजबंशी जोतदार और गरीब राजबंशी बर्गादार आमने-सामने आए, वहां किसान सभा ने वर्गीय पहचान को प्राथमिक बनाने की कोशिश की।

गरीब किसान से कहा गया कि उसका वास्तविक साझा हित उसी आर्थिक स्थिति वाले संथाल, मुस्लिम या दूसरे समुदाय के बर्गादार से है—सिर्फ उसी जाति के संपन्न जोतदार से नहीं।

यह राजनीतिक संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण था।

तेभागा ने ग्रामीण समाज को इस दृष्टि से देखने की कोशिश की—

कौन उत्पादन करता है और कौन अधिशेष नियंत्रित करता है?

लेकिन जातीय संबंध खत्म नहीं हुए

यह भी नहीं मानना चाहिए कि तेभागा ने राजबंशी समाज के जातीय संबंधों को समाप्त कर दिया।

स्थानीय रिश्तेदारी, सामाजिक प्रतिष्ठा और सामुदायिक नेतृत्व का प्रभाव बना रहा।

कई मध्यम किसान स्वयं कुछ भूमि बर्गादारों से जोतवाते थे। इसलिए वे किसान सभा में सक्रिय होने के बावजूद तेभागा की पूर्ण मांग से असहज हो सकते थे।

डी. एन. धनागरे के विश्लेषण में यही अंतर्विरोध महत्वपूर्ण है—मध्य किसान और छोटे जोतदार किसान सभा के नेटवर्क में मौजूद थे, लेकिन चूंकि उनमें से कुछ स्वयं बर्गादारों से खेती करवाते थे, इसलिए आंदोलन तीव्र होने पर उनका समर्थन कमजोर पड़ सकता था।

यही वर्ग और समुदाय के बीच वास्तविक तनाव था।

तेभागा के सबसे साहसी और उग्र प्रतिभागियों में संथाल और अन्य आदिवासी कृषक समुदाय शामिल थे।

विशेष रूप से दिनाजपुर, मालदा, जलपाईगुड़ी और बाद में नाचोल क्षेत्र में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।

आदिवासी कृषक तेभागा से क्यों जुड़े?

इसका पहला कारण आर्थिक था।

कई आदिवासी परिवार भूमि से क्रमशः वंचित होकर बर्गादार, छोटे किसान अथवा कृषि श्रमिक बन चुके थे।

वे उत्पादन करते थे लेकिन भूमि पर उनका स्थायी अधिकार कमजोर था।

दूसरा कारण ऋण और महाजनी निर्भरता थी।

तीसरा कारण सामाजिक हाशियाकरण था।

इस प्रकार बर्गादारी का आर्थिक शोषण उनके लिए भूमि-वंचना के लंबे अनुभव के साथ जुड़ जाता था।

दिनाजपुर में संथालों की भूमिका

डी. एन. धनागरे के अध्ययन में दिनाजपुर में राजबंशी और संथाल कृषकों की अत्यंत दृढ़ भागीदारी का उल्लेख मिलता है। उनके अनुसार कुछ क्षेत्रों में मुस्लिम किसानों को आंदोलन में शामिल करने के लिए किसान सभा को अतिरिक्त प्रयास करने पड़े, जबकि राजबंशी और संथाल कृषक अधिक तत्परता से संघर्ष में उतरे।

यह तथ्य तेभागा की स्थानीय विविधता दिखाता है।

पूरे बंगाल में धार्मिक अथवा जातीय समुदायों का व्यवहार समान नहीं था।

कहीं मुस्लिम और हिंदू बर्गादार एक साथ लड़े।

कहीं किसी विशिष्ट आदिवासी समुदाय ने आंदोलन का अग्रिम मोर्चा संभाला।

धनुष-बाण और परंपरागत प्रतिरोध

संथाल और दूसरे आदिवासी किसानों के पास आधुनिक हथियार नहीं थे।

लेकिन कई जगह उन्होंने अपने पारंपरिक साधनों—

के साथ पुलिस या जोतदारों के दबाव का सामना किया।

इससे आंदोलन के कुछ क्षेत्रों को विशेष रूप से उग्र स्वरूप मिला।

लेकिन इसे आधुनिक अर्थ में सैन्य संगठन नहीं मानना चाहिए।

ये प्रायः गांव और फसल की सामुदायिक रक्षा के साधन थे।

मालदा और उससे जुड़े बारिंद क्षेत्र में संथाल कृषकों की भूमिका विशेष महत्व रखती थी।

यह क्षेत्र कृषि की दृष्टि से अपेक्षाकृत कठिन था और यहां गरीब कृषकों तथा आदिवासी समुदायों की संख्या उल्लेखनीय थी।

तेभागा की मांग ने उनके सामने बहुत सीधा प्रश्न रखा—

यदि किसान खेती का पूरा श्रम करता है तो फसल का आधा हिस्सा क्यों छोड़े?

इसलिए दो-तिहाई हिस्सेदारी आर्थिक जीविका के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थी।

इसी सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि से बाद में राजशाही–नाचोल क्षेत्र का किसान संघर्ष भी निकला।

1947 में बंगाल विभाजित हो गया, लेकिन बर्गादारी का प्रश्न सीमा बनने से समाप्त नहीं हुआ।

पूर्वी पाकिस्तान के नाचोल में 1949–50 में संथाल और गरीब कृषकों ने फिर दो-तिहाई फसल की मांग पर संघर्ष किया।

इला मित्र इस आंदोलन की प्रसिद्ध नेता बनीं।

इसलिए नाचोल को तेभागा से अलग घटना के बजाय उसकी पूर्वी बंगाल में सामाजिक और वैचारिक निरंतरता के रूप में देखना अधिक उचित है।

कृषि संरचना की सबसे निचली परत

तेभागा आंदोलन के मूल सामाजिक आधार में वे कृषक थे जिनके पास या तो अपनी पर्याप्त भूमि नहीं थी अथवा बिल्कुल भूमि नहीं थी।

इनमें बड़ी संख्या सामाजिक रूप से कमजोर जातियों और समुदायों की थी।

इसलिए आर्थिक शोषण और सामाजिक असमानता अक्सर एक-दूसरे पर चढ़ी हुई थीं।

इग्नू की समाजशास्त्रीय सामग्री ऐसे किसान आंदोलनों का एक सामान्य गुण बताती है—नेतृत्व अक्सर शहरी बुद्धिजीवियों और अपेक्षाकृत उच्च सामाजिक समूहों से आया, जबकि आंदोलन की वास्तविक प्रेरक शक्ति गरीब किसान, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदाय थे।

तेभागा इस पैटर्न का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

भूमिहीन और बर्गादार एक ही नहीं थे

यह अंतर स्पष्ट रखना आवश्यक है।

हर बर्गादार भूमिहीन नहीं था और हर भूमिहीन व्यक्ति बर्गादार नहीं था।

कुछ बर्गादारों के पास छोटी अपनी जोत भी हो सकती थी और वे अतिरिक्त भूमि बटाई पर लेते थे।

दूसरी ओर पूर्ण भूमिहीन मजदूर मजदूरी पर खेत में काम करते थे लेकिन फसल में हिस्सेदारी का अनुबंध जरूरी नहीं था।

इसलिए तेभागा की केंद्रीय मांग सीधे बर्गादार से जुड़ी थी, कृषि मजदूर से नहीं।

यह आंदोलन की सामाजिक सीमा भी थी।

कृषि मजदूरों के लिए तेभागा का तात्कालिक लाभ उतना स्पष्ट नहीं था जितना बर्गादार के लिए।

यदि कोई व्यक्ति केवल दैनिक मजदूरी पर काम करता था तो दो-तिहाई फसल की मांग उसे सीधे हिस्सा नहीं दिलाती थी।

फिर भी कृषि मजदूर आंदोलन से जुड़ सकते थे क्योंकि—

वे गरीब कृषक समाज का हिस्सा थे,

जोतदारों की ग्रामीण सत्ता से प्रभावित थे,

उनके परिवारों के कुछ सदस्य बर्गादार हो सकते थे,

और जमीन तथा मजदूरी दोनों के प्रश्न एक-दूसरे से जुड़े थे।

इसलिए किसान सभा के सामने चुनौती थी कि बर्गादार की विशिष्ट मांग को व्यापक गरीब किसान राजनीति से कैसे जोड़ा जाए।

यही तेभागा की सीमा बनी

यदि आंदोलन केवल हिस्सेदारी के प्रश्न पर केंद्रित रहता, तो ऐसे किसान जिनकी स्थिति बर्गादार से अलग थी, उसका समर्थन लंबे समय तक बनाए रखने के लिए कम प्रेरित हो सकते थे।

उत्तर बंगाल के शोध में भी यह समस्या दिखाई देती है। कुछ क्षेत्रों में किसान सभा गरीब और मध्य किसानों के व्यापक समर्थन को स्थायी रूप से बनाए रखने में कठिनाई महसूस करती रही।

इसीलिए 1947 में कुछ कम्युनिस्ट नेताओं ने आंदोलन को आगे बढ़ाकर जमींदारी उन्मूलन जैसे अधिक व्यापक प्रश्न से जोड़ने की आवश्यकता महसूस की।

तेभागा के स्रोत मुख्यतः आर्थिक मुद्दों पर केंद्रित हैं, इसलिए दलित कृषकों के दैनिक सामाजिक भेदभाव का उतना व्यवस्थित दस्तावेजीकरण नहीं मिलता जितना फसल और पुलिस संघर्ष का मिलता है।

फिर भी यह मानना गलत होगा कि जातिगत स्थिति आंदोलन से अप्रासंगिक थी।

भूमिहीनता, कम मजदूरी, ऋण पर निर्भरता और निम्न सामाजिक प्रतिष्ठा कई क्षेत्रों में एक-दूसरे को मजबूत करती थीं।

यदि कोई व्यक्ति सामाजिक रूप से हाशिये के समुदाय से था और साथ ही जमीनहीन अथवा बर्गादार था, तो जोतदार से उसका संबंध केवल आर्थिक अनुबंध नहीं था।

वह सामाजिक शक्ति संबंध भी था।

इसीलिए तेभागा की उपलब्धि में ग्रामीण गरीब के आत्मसम्मान का प्रश्न भी शामिल था।

तेभागा इतिहासलेखन का सबसे महत्वपूर्ण आधुनिक प्रश्न है—

क्या किसान ने आंदोलन इसलिए किया क्योंकि वह बर्गादार था, या इसलिए क्योंकि वह राजबंशी, संथाल, दलित अथवा किसी दूसरे हाशिये के समुदाय से था?

अक्सर दोनों कारण एक-दूसरे से जुड़े थे।

वर्गीय स्थिति केंद्रीय थी

तेभागा की मांग स्वयं वर्गीय थी।

दो-तिहाई फसल किसी धर्म या जाति विशेष के लिए नहीं मांगी जा रही थी।

जिस व्यक्ति की आर्थिक स्थिति बर्गादार की थी, वह आंदोलन का संभावित लाभार्थी था।

इसलिए उसका कार्यक्रम मूलतः—

उत्पादन संबंध पर आधारित था, पहचान पर नहीं।

डी. एन. धनागरे भी आंदोलन का मूल चरित्र बर्गादारों द्वारा जोतदारों को दिए जाने वाले हिस्से को आधे से एक-तिहाई तक घटाने के संघर्ष के रूप में परिभाषित करते हैं।

लेकिन वर्ग निर्वात में नहीं था

वास्तविक गांव में ‘बर्गादार’ कोई अमूर्त आर्थिक श्रेणी नहीं था।

परिवार और समुदाय था।

भूमि से जुड़ा ऐतिहासिक अनुभव था।

इसलिए उसकी राजनीतिक प्रतिक्रिया इन्हीं पहचानों के माध्यम से व्यक्त होती थी।

उदाहरण के लिए उत्तर बंगाल के जलपाईगुड़ी क्षेत्र में राजबंशी, उरांव, संथाल और मुस्लिम कृषक एक ही तेभागा कार्यक्रम में शामिल हुए।

इससे वर्गीय एकता की शक्ति दिखाई देती है।

लेकिन जहां धार्मिक या जातीय राजनीतिक ध्रुवीकरण अधिक मजबूत हुआ, वहां यही एकता कमजोर भी पड़ सकती थी।

तेभागा उस समय चल रहा था जब बंगाल की राजनीति हिंदू–मुस्लिम ध्रुवीकरण के चरम पर पहुंच रही थी।

कलकत्ता, नोआखाली और दूसरे क्षेत्रों की हिंसा ने ग्रामीण राजनीतिक वातावरण को भी प्रभावित किया।

फिर भी कई तेभागा क्षेत्रों में हिंदू और मुस्लिम बर्गादार साझा आर्थिक मांग पर साथ आए। इनफ्लिबनेट की अध्ययन सामग्री भी उत्तर बंगाल में हिंदू और मुस्लिम बटाईदारों के संयुक्त संघर्ष का उल्लेख करती है।

यह उल्लेखनीय सफलता थी।

लेकिन पूरे बंगाल के लिए एक समान निष्कर्ष निकालना गलत होगा।

दिनाजपुर पर धनागरे का अध्ययन बताता है कि कुछ क्षेत्रों में मुस्लिम बर्गादारों की प्रारंभिक भागीदारी उतनी मजबूत नहीं थी और किसान सभा को उन्हें जोड़ने के लिए विशेष प्रयास करने पड़े।

अर्थात वर्गीय एकता संभव थी, स्वतः नहीं।

उसे राजनीतिक रूप से निर्मित करना पड़ता था।

पूर्वी बंगाल में भूमि और सांप्रदायिक संरचना का संबंध और जटिल था।

कई क्षेत्रों में गरीब कृषक मुस्लिम थे जबकि जमींदार अथवा बड़े भू-अधिकारियों में उच्च जाति हिंदुओं की उपस्थिति महत्वपूर्ण थी।

इससे आर्थिक वर्ग-संघर्ष को धार्मिक भाषा में पुनर्परिभाषित करना आसान हो सकता था।

शैक्षणिक विवरण इस ओर संकेत करते हैं कि मुस्लिम लीग ने कुछ क्षेत्रों में जमींदार-विरोधी भावनाओं को अपनी सांप्रदायिक राजनीतिक भाषा में समाहित करने का प्रयास किया।

इसलिए 1946–47 में कम्युनिस्ट किसान राजनीति की बड़ी चुनौती थी—

भूमि-संघर्ष को वर्गीय बनाए रखना, जबकि पूरी प्रांतीय राजनीति धार्मिक राष्ट्रवाद की ओर जा रही थी।

संथाल, उरांव और अन्य आदिवासी कृषकों के लिए संघर्ष में एक अतिरिक्त तत्व था।

वे केवल गरीब किसान नहीं थे।

उनकी अपनी सामुदायिक पहचान, नेतृत्व और भूमि-संबंधी ऐतिहासिक स्मृति थी।

इसलिए कई क्षेत्रों में उनकी लामबंदी किसान सभा के निर्देश से आगे जा सकती थी।

जलपाईगुड़ी पर किए गए अध्ययन में गरीब स्थानीय बर्गादार नेताओं—जिनमें उरांव कार्यकर्ता भी थे—के उभरने का उल्लेख है। चाय बागान मजदूरों और रेल कर्मचारियों तक ने तेभागा मांग के समर्थन में प्रचार और पर्चा वितरण में सहयोग किया।

यह बताता है कि आंदोलन केवल पार्टी के ऊपर से नीचे आने वाले आदेश पर निर्भर नहीं था।

स्थानीय समुदाय उसे अपनी भाषा में अपना रहे थे।

हां—लेकिन पूरी कहानी नहीं

तेभागा का केंद्रीय आर्थिक अंतर्विरोध स्पष्ट था—

जोतदार बनाम बर्गादार।

जोतदार भूमि पर उच्चतर नियंत्रण रखता था।

बर्गादार कृषि श्रम और उत्पादन का बड़ा भार उठाता था।

फिर भी उपज आधी बांटी जाती थी।

इस अर्थ में आंदोलन स्पष्ट रूप से वर्गीय था।

इसीलिए किसान सभा और कम्युनिस्ट पार्टी ने इसे ग्रामीण वर्ग-संघर्ष के रूप में संगठित किया।

लेकिन ‘जोतदार बनाम बर्गादार’ भी हमेशा सरल नहीं था

जोतदार कोई एकरूप वर्ग नहीं था।

कुछ अत्यंत बड़े और संपन्न थे।

कुछ छोटे किसान स्वयं थोड़ी भूमि बर्गादार को देते थे।

इसी प्रकार बर्गादारों की आर्थिक स्थिति भी अलग-अलग थी।

कुछ पूर्णतः भूमिहीन थे।

कुछ के पास अपनी छोटी भूमि भी थी।

इसलिए ग्रामीण समाज में वर्ग-सीमाएं हमेशा बिल्कुल साफ नहीं थीं।

तेभागा की राजनीतिक सीमा समझने में मध्य किसान विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

वह बड़े जोतदार से असंतुष्ट हो सकता था।

किसान सभा का समर्थक हो सकता था।

लगान और जमींदारी विरोध में बर्गादार के साथ खड़ा हो सकता था।

लेकिन यदि उसकी अपनी दो-चार एकड़ भूमि भी किसी बर्गादार द्वारा जोती जा रही थी तो तेभागा उसके आर्थिक हित को भी प्रभावित करता था।

यहीं गठबंधन टूट सकता था।

धनागरे के विश्लेषण में इसी कारण मध्य किसान की भूमिका को दोहरी माना गया है। आंदोलन के कई स्थानीय कार्यकर्ता मध्य किसान पृष्ठभूमि से आए, लेकिन तेभागा का विस्तार उनके आर्थिक हित से भी टकरा सकता था।

तेभागा का एक और विरोधाभास था—

नेतृत्व और जनाधार की सामाजिक दूरी।

कई प्रमुख कम्युनिस्ट और किसान सभा नेता शिक्षित शहरी या भद्रलोक पृष्ठभूमि से थे।

लेकिन लड़ाई की अग्रिम पंक्ति में—

और ग्रामीण महिलाएं थीं।

इसीलिए इतिहासलेखन में प्रश्न उठता है—

क्या तेभागा किसानों का अपना आंदोलन था या शहरी कम्युनिस्टों द्वारा निर्देशित आंदोलन?

सबसे संतुलित उत्तर है—

विचार और संगठन में बाहरी तथा मध्यवर्गीय कार्यकर्ताओं की भूमिका महत्वपूर्ण थी; लेकिन आंदोलन की सामाजिक ऊर्जा और जोखिम गरीब कृषक समुदायों ने वहन किया।

तेभागा के फैलते ही बर्गादार और गरीब कृषकों से स्वयं नेता निकलने लगे।

जलपाईगुड़ी के अध्ययन में पतोआल घोष, जदुनाथ सिंह, बुधन जुलियस, फागुराम उरांव और जगन्नाथ उरांव जैसे स्थानीय गरीब किसान नेताओं का उल्लेख मिलता है।

यह परिवर्तन महत्वपूर्ण था।

जैसे-जैसे स्थानीय कृषक स्वयं नेतृत्व करने लगे, आंदोलन शहरी कार्यकर्ता पर कम निर्भर होने लगा।

यही किसी जनांदोलन के सामाजिक रूप से गहरा होने का संकेत है।

तेभागा की सबसे बड़ी सामाजिक उपलब्धियों में एक यह थी कि उसने कम-से-कम कुछ क्षेत्रों में किसानों को उनकी जातीय और धार्मिक सीमाओं के पार एक साझा आर्थिक पहचान दी।

एक साथ यह कह सकते थे—

आधी नहीं, तेभागा चाहिए।

लेकिन इस एकता को स्थायी सामाजिक क्रांति समझना गलत होगा।

आंदोलन समाप्त होने के बाद जाति, धर्म और जनजातीय पहचान फिर भी बनी रहीं।

तेभागा ने उन्हें समाप्त नहीं किया।

उसने केवल दिखाया कि एक ठोस आर्थिक संघर्ष उन्हें कुछ समय के लिए पार कर सकता है।

गरीब किसान के लिए तेभागा का अर्थ केवल अधिक धान मिलना नहीं था।

पुरानी व्यवस्था में वह जोतदार के सामने व्यक्तिगत आश्रित था।

तेभागा में वह संगठित कृषक बना।

पहले उसे फसल का हिस्सा प्राप्त करना था।

फसल मेरे खलिहान में है; आपका हिस्सा यहां से मिलेगा।

यह भाषा स्वयं सामाजिक प्रतिष्ठा का परिवर्तन थी।

विशेष रूप से उन समुदायों के लिए, जो सामाजिक और आर्थिक दोनों रूप से नीचे माने जाते थे, यह अनुभव अत्यंत शक्तिशाली था।

इस अर्थ में तेभागा ने ग्रामीण गरीब को केवल आर्थिक मांग नहीं दी—

उसने उसे राजनीतिक आत्मसम्मान दिया।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर फिर स्पष्ट करना आवश्यक है।

1946–47 के मुख्य तेभागा आंदोलन की केंद्रीय मांग जमीन के पूर्ण पुनर्वितरण की नहीं थी।

फसल अपने खलिहान में,

और बर्गादार की अधिक सुरक्षा

इसी कारण भूमिहीन कृषि मजदूर और पूर्ण भूमि-वंचित किसान की समस्या आंदोलन के कार्यक्रम में पूरी तरह हल नहीं होती थी।

यह उसकी सबसे महत्वपूर्ण सीमाओं में से एक थी।

उपज का बंटवारा कैसे हो?

तो तेभागा का स्पष्ट उत्तर था।

जिसके पास जमीन ही नहीं है उसे जमीन कैसे मिले?

तो 1946–47 का तेभागा कार्यक्रम उतना व्यापक उत्तर नहीं देता था।

यहीं स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधार और जमींदारी उन्मूलन का बड़ा प्रश्न सामने आता है।

उत्तर बंगाल के आधुनिक शोध में तेभागा को बाद के भूमि सुधारों और बर्गादार अधिकार की राजनीति का महत्वपूर्ण ऐतिहासिक आधार माना गया है।

यह निरंतरता विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि आंदोलन के तत्काल परिणाम सीमित रहे, लेकिन उसने यह धारणा स्थायी कर दी कि—

वास्तविक कृषक को दर्ज अधिकार चाहिए,

बर्गादार केवल अस्थायी श्रमिक नहीं है,

और राज्य को भूमि तथा उत्पादन संबंधों में हस्तक्षेप करना होगा।

यही विचार आगे चलकर पश्चिम बंगाल में भूमि सुधार और ऑपरेशन बर्गा तक पहुंचा।

तेभागा का इतिहास लिखते समय तीन सरलीकरणों से बचना चाहिए।

खंड 8

प्रमुख नेता और कार्यकर्ता

तेभागा आंदोलन के नेतृत्व को समझने में एक बुनियादी सावधानी आवश्यक है। इसे किसी एक नेता के नाम से जोड़ना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा। चंपारण के साथ गांधी या बारडोली के साथ वल्लभभाई पटेल जैसा कोई एक सर्वमान्य चेहरा तेभागा का नहीं था। यह बंगाल प्रांतीय किसान सभा के प्रांतीय नेतृत्व, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं, जिला और थाना स्तर के आयोजकों तथा हजारों स्थानीय बर्गादारों के सम्मिलित नेतृत्व में विकसित हुआ।

अखिल भारतीय किसान सभा का अपना ऐतिहासिक विवरण भी स्वीकार करता है कि आरंभिक नेतृत्व किसान सभा से आया, लेकिन बर्गादारों की प्रतिक्रिया इतनी व्यापक थी कि आंदोलन कुछ ही सप्ताह में संगठन की आरंभिक क्षमता से कहीं आगे निकल गया। दिनाजपुर के अटवारी में आरंभिक टकराव के बाद आंदोलन लगभग पूरे जिले में फैल गया और हजारों किसानों ने स्वयंसेवक के रूप में नाम दर्ज कराया।

यही तथ्य तेभागा के नेतृत्व की सबसे बड़ी विशेषता बताता है—

नेताओं ने आंदोलन को दिशा दी, लेकिन किसानों ने उसे आकार और विस्तार दिया।

इस खंड में इसलिए प्रसिद्ध नेताओं के साथ उन स्थानीय कार्यकर्ताओं को भी समान महत्व देना आवश्यक है जिनके बिना तेभागा संभव नहीं था।

तेभागा की लोकप्रिय सूचियों में कभी-कभी हरे कृष्ण कोनार को 1946–47 के प्रमुख नेताओं में रख दिया जाता है। लेकिन इस संबंध में सावधानी आवश्यक है।

कोनार बंगाल के अत्यंत महत्वपूर्ण कम्युनिस्ट किसान नेता थे और बाद के भूमि-सुधार आंदोलन में उनकी भूमिका असाधारण रही, किंतु उपलब्ध विश्वसनीय स्रोत उन्हें 1946–47 के मूल तेभागा अभियान के केंद्रीय क्षेत्रीय संचालकों—जैसे कंसारी हलदर या हाजी मोहम्मद दानेश—की तरह सामने नहीं रखते।

इसलिए उनका ऐतिहासिक महत्व मुख्यतः तेभागा की दीर्घकालीन राजनीतिक विरासत को भूमि सुधार में आगे बढ़ाने वाले नेता के रूप में समझना अधिक सही है।

बाद में पश्चिम बंगाल में भूमि सीमा से अधिक और बेनामी जमीन राज्य के अधीन लेने की कार्रवाई में कोनार की निर्णायक भूमिका रही। 1967 और 1969 की संयुक्त मोर्चा सरकारों में भूमि एवं भूमि राजस्व मंत्री के रूप में उन्होंने प्रशासन को सक्रिय भूमि सुधार की दिशा में धकेला। बाद के अध्ययनों में उन्हें पश्चिम बंगाल के भूमि सुधार की पहली बड़ी राजनीतिक अवस्था का केंद्रीय व्यक्तित्व माना गया है।

तेभागा से भूमि सुधार तक वैचारिक संबंध

कोनार स्वयं बाद के वर्षों में तेभागा को बंगाल के संगठित भूमि आंदोलनों के निर्णायक पड़ाव के रूप में देखते थे। उनके साक्षात्कार पर आधारित अध्ययन में तेभागा को बंगाल के संगठित भूमि संघर्ष की शुरुआती बड़ी अभिव्यक्ति बताते हुए उसके और स्वतंत्रता के बाद के भूमि सुधार आंदोलनों के बीच स्पष्ट ऐतिहासिक संबंध स्थापित किया गया है।

इसलिए हरे कृष्ण कोनार का स्थान इस तरह समझना चाहिए—

वह तेभागा की मूल लड़ाई के सबसे प्रमुख क्षेत्रीय सेनापति नहीं, बल्कि उसकी भूमि-सुधार राजनीति को स्वतंत्र भारत में संस्थागत रूप देने वाली अगली पीढ़ी के प्रमुख नेता थे।

यह अंतर महत्वपूर्ण है।

अन्यथा 1946–47 और 1960–70 के दशक की भूमि सुधार राजनीति आपस में मिल जाती है।

भवानी सेन तेभागा आंदोलन के प्रांतीय कम्युनिस्ट और किसान नेतृत्व के महत्वपूर्ण व्यक्तियों में थे।

उनकी भूमिका को केवल आंदोलन के प्रचारक के रूप में नहीं समझना चाहिए। आंदोलन समाप्त होने के बाद उसकी रणनीतिक कमजोरियों के विश्लेषण में भी उनका विशेष स्थान था।

अखिल भारतीय किसान सभा के ऐतिहासिक दस्तावेज में उल्लेख है कि बाद में सिकंदराराऊ में किसान सभा सम्मेलन के दौरान भवानी सेन ने तेभागा आंदोलन की विफलताओं और संकट पर विचार करते हुए यह स्वीकार किया कि नेतृत्व ने विभिन्न श्रेणियों के भू-अधिकारियों के बीच पर्याप्त अंतर नहीं किया और सबको लगभग समान शत्रु मानने की रणनीति से राजनीतिक कठिनाइयां पैदा हुईं।

यह आत्मालोचन आंदोलन की सामाजिक संरचना को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

सभी जोतदार एक जैसे नहीं थे

तेभागा का सामान्य नारा था—

लेकिन ग्रामीण समाज वास्तविकता में अधिक जटिल था।

एक बड़ा जोतदार सैकड़ों एकड़ अथवा व्यापक भूमि अधिकार नियंत्रित कर सकता था।

दूसरी ओर कोई मध्यम या छोटा किसान अपनी थोड़ी-सी अतिरिक्त जमीन भी बर्गादार से जोतवा सकता था।

यदि आंदोलन दोनों को बिल्कुल समान शोषक घोषित करता है तो संभावित सहयोगी मध्य किसान भी विरोधी खेमे में जा सकता है।

भवानी सेन के बाद के विश्लेषण का यही मूल महत्व था।

आंदोलन की व्यापकता बनाए रखने के लिए केवल बर्गादार को संगठित करना पर्याप्त नहीं था; गरीब और मध्य कृषकों का व्यापक गठबंधन भी आवश्यक था।

नेतृत्व की रणनीतिक सीमा

यह प्रसंग यह भी दिखाता है कि कम्युनिस्ट नेतृत्व आंदोलन को सर्वज्ञ और त्रुटिहीन ढंग से नहीं चला रहा था।

अलग-अलग जिलों की कृषि संरचना अलग थी।

और कई स्थानों पर स्थानीय आंदोलन किसान सभा के मूल कार्यक्रम से आगे निकल रहा था।

इसलिए प्रांतीय नेतृत्व को लगातार रणनीति बदलनी पड़ रही थी।

भवानी सेन का महत्व इसी कारण है—

उन्होंने केवल आंदोलन चलाने में योगदान नहीं दिया, बल्कि बाद में उसकी राजनीतिक सीमाओं को स्वीकार करने और उनका विश्लेषण करने का प्रयास भी किया।

तेभागा नेतृत्व पर चर्चा में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के तत्कालीन महासचिव पी. सी. जोशी को पूरी तरह छोड़ना भी उचित नहीं होगा।

वह प्रत्येक गांव या जिला संघर्ष के संचालक नहीं थे, लेकिन 1940 के दशक में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राजनीतिक दिशा उनके नेतृत्व में निर्धारित हो रही थी।

किसान सभा और बंगाल कम्युनिस्ट संगठन इसी व्यापक ढांचे में काम करते थे।

इसका अर्थ यह नहीं कि तेभागा पी. सी. जोशी की व्यक्तिगत योजना था।

वास्तव में किसान सभा के दस्तावेज स्वयं स्वीकार करते हैं कि बर्गादारों की स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया ने आंदोलन को प्रारंभिक संगठनात्मक योजना से बहुत आगे पहुंचा दिया था।

इसलिए केंद्रीय पार्टी नेतृत्व और खेत के वास्तविक संघर्ष के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है।

यदि तेभागा के वास्तविक क्षेत्रीय नेताओं की चर्चा की जाए तो कंसारी हलदर का नाम सबसे प्रमुख व्यक्तियों में आता है।

उनका कार्यक्षेत्र दक्षिण बंगाल का काकद्वीप और सुंदरबन क्षेत्र था।

यह क्षेत्र सामान्य बंगाली कृषि मैदान से अलग था। यहां जंगल साफ करके कृषि भूमि विकसित की गई थी और भूमि पर लॉटदार, चकदार, पट्टेदार, उनके नायब और अन्य मध्यस्थ अधिकारों की जटिल संरचना मौजूद थी।

किसान सभा के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार काकद्वीप के गरीब किसान और बर्गादार अत्यधिक शोषण की स्थिति में थे। तेभागा आंदोलन के दौरान कंसारी हलदर और अब्दुल रज्जाक खान जैसे नेताओं के नेतृत्व में उन्होंने लॉटदारों और चकदारों के विरुद्ध व्यापक संघर्ष किया।

काकद्वीप में संघर्ष का स्वरूप

काकद्वीप में तेभागा केवल आधी फसल को दो-तिहाई करने तक सीमित नहीं रहा।

यहां किसानों के सामने—

जंगल साफ करके बनाई गई जमीन पर नियंत्रण

जैसे प्रश्न भी मौजूद थे।

किसान समितियां बुधाखाली और हरिपुर जैसे केंद्रों में बनीं। किसान सामूहिक रूप से खेतों में उतरते, फसल काटते और उसे अपने अथवा पंचायत के खलिहान में रखते। किसान सभा के विवरण में पुरुषों के लाठी और तीर तथा महिलाओं के कृषि औजार और मिर्च पाउडर के साथ प्रतिरोध में उतरने का उल्लेख मिलता है।

काकद्वीप पर रवीन्द्रनाथ मंडल का विशेष अध्ययन भी इस क्षेत्र में लॉटदार–जोतदार संरचना, किसान संगठन और संघर्ष के विस्फोट को तेभागा की विशिष्ट दक्षिण बंगाल अभिव्यक्ति के रूप में देखता है।

कंसारी हलदर का नेतृत्व क्यों महत्वपूर्ण था?

हलदर का महत्व इसलिए था कि उन्होंने प्रांतीय नारे को स्थानीय सामाजिक संरचना के अनुरूप रूपांतरित किया।

काकद्वीप के किसान के लिए केवल यह कहना कि—

उसे स्थानीय लॉटदार, चकदार और नायब व्यवस्था से भी निपटना था।

इसलिए यहां तेभागा एक व्यापक ग्रामीण सत्ता-विरोधी अभियान बन गया।

कंसारी हलदर का नेतृत्व इस बात का उदाहरण है कि सफल जनांदोलन में स्थानीय नेता केंद्रीय राजनीतिक कार्यक्रम का स्थानीय अनुवाद करता है।

कंसारी हलदर के साथ अब्दुल रज्जाक खान का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

किसान सभा के अपने अभिलेख दोनों को काकद्वीप के आंदोलन के महत्वपूर्ण नेता के रूप में दर्ज करते हैं।

यह तथ्य तेभागा के एक और पहलू को सामने लाता है।

1946–47 के सांप्रदायिक तनाव के दौर में आंदोलन के कई क्षेत्रों में हिंदू और मुस्लिम नेता एक साझा किसान कार्यक्रम पर काम कर रहे थे।

काकद्वीप का नेतृत्व इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है।

इला मित्र का उल्लेख तेभागा से जुड़ी लोकप्रिय नेता सूचियों में अक्सर मिलता है, लेकिन उनकी भूमिका को ऐतिहासिक समयरेखा के भीतर सही स्थान पर रखना आवश्यक है।

1946–47 के मूल तेभागा आंदोलन में उनकी प्रसिद्ध भूमिका उतनी केंद्रीय नहीं थी जितनी 1949–50 के नाचोल विद्रोह में।

इसलिए उन्हें मूल तेभागा आंदोलन की बजाय उसकी पूर्वी बंगाल की उत्तरजीवी परंपरा का प्रमुख चेहरा कहना अधिक सटीक है।

नाचोल — सीमारेखा के पार वही भूमि प्रश्न

विभाजन के बाद नाचोल पूर्वी पाकिस्तान में चला गया।

लेकिन सीमा बदलने से बर्गादार की समस्या समाप्त नहीं हुई।

यहां विशेष रूप से संथाल और अन्य गरीब कृषक जोतदारों के अधीन खेती करते थे।

1949–50 में उन्होंने तेभागा सिद्धांत—अर्थात वास्तविक कृषक को दो-तिहाई फसल—को लागू कराने के लिए आंदोलन किया।

इला मित्र इस संघर्ष का प्रमुख चेहरा बनीं। उपलब्ध स्रोत नाचोल आंदोलन को तेभागा से निकली कृषक मांग की निरंतरता के रूप में देखते हैं।

स्थानीय नेतृत्व के साथ इला मित्र

नाचोल को केवल इला मित्र का आंदोलन मानना भी अधूरा होगा।

अनिमेष लाहिड़ी, अजहर शेख और वृंदावन साहा

जैसे स्थानीय कार्यकर्ता भी जुड़े थे। नाचोल संबंधी स्रोत इन्हें आंदोलन के महत्वपूर्ण संगठकों में गिनते हैं।

अर्थात यहां भी वही पैटर्न दिखता है—

एक प्रसिद्ध चेहरा इतिहास में याद रह जाता है,

लेकिन वास्तविक संगठन स्थानीय नेतृत्व के पूरे नेटवर्क पर निर्भर करता है।

तेभागा के मूल नेताओं की किसी भी गंभीर सूची में हाजी मोहम्मद दानेश का नाम अवश्य होना चाहिए।

वह दिनाजपुर के किसान आंदोलन के पुराने संगठक थे और 1930 के दशक से कृषक राजनीति से जुड़े हुए थे।

बांग्लापीडिया के अनुसार उन्होंने 1938 में कृषक समिति से जुड़कर उत्तर बंगाल में किसानों को संगठित करना शुरू किया। जमींदारी उन्मूलन और विभिन्न ग्रामीण वसूलियों के विरुद्ध आंदोलन के कारण उन्हें गिरफ्तार भी किया गया। उन्होंने 1942 के डोमार किसान सम्मेलन के आयोजन में भूमिका निभाई और बाद में उत्तरी बंगाल में तेभागा आंदोलन संगठित किया।

मुस्लिम किसानों तक पहुंच

दानेश का महत्व केवल जिला नेतृत्व तक सीमित नहीं था।

1946 के सांप्रदायिक वातावरण में मुस्लिम कृषकों को वर्गीय किसान राजनीति से जोड़ना कम्युनिस्ट नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण चुनौती थी।

हाजी दानेश स्वयं मुस्लिम किसान पृष्ठभूमि से आए थे और उत्तर बंगाल में मुस्लिम कृषकों के बीच प्रभाव रखते थे। उन्हें तेभागा के प्रमुख मुस्लिम नेताओं में गिना जाता है।

यह उनकी भूमिका को विशेष बनाता है।

वह किसान को यह राजनीतिक विकल्प दे रहे थे कि—

भूमि और फसल का हित धार्मिक पहचान से अलग साझा राजनीतिक आधार भी बन सकता है।

मुस्लिम लीग और तेभागा के बीच टकराव

हाजी दानेश का राजनीतिक जीवन उस दौर की जटिलता का अच्छा उदाहरण है।

वह 1945 में मुस्लिम लीग से जुड़े, लेकिन तेभागा नेतृत्व जारी रखने के कारण 1946 में उनसे अलग कर दिए गए और उसी वर्ष बंगाल सरकार ने उन्हें गिरफ्तार किया। बांग्लापीडिया उन्हें उत्तरी बंगाल में तेभागा आयोजित करने वाले प्रमुख नेताओं में स्पष्ट रूप से दर्ज करता है।

इस घटनाक्रम से पता चलता है कि किसान वर्गीय राजनीति और सांप्रदायिक चुनावी राजनीति के बीच तनाव केवल वैचारिक नहीं था।

वह नेताओं के व्यक्तिगत राजनीतिक जीवन में भी प्रत्यक्ष दिखाई देता था।

तेभागा के साथ जुड़ा एक और अत्यंत महत्वपूर्ण नाम है मणि सिंह।

उनका मुख्य क्षेत्र मयमनसिंह था और विशेष रूप से हाजोंग किसानों के ‘टोंक’ अथवा उपज-आधारित लगान के विरुद्ध संघर्ष में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी।

यह संघर्ष तकनीकी रूप से हर जगह सामान्य बर्गादारी तेभागा संघर्ष के समान नहीं था, लेकिन 1946 के अंत में वह व्यापक बंगाल किसान विद्रोह से गहराई से जुड़ गया।

अखिल भारतीय किसान सभा के अनुसार दिसंबर 1946 में हाजोंग किसानों के आंदोलन का नेतृत्व मणि सिंह ने किया। आंदोलन गारो पहाड़ियों के दक्षिण में लगभग 50 मील लंबे क्षेत्र तक फैल गया और किसानों ने फसल घर ले जाकर टोंक देने से इंकार किया। किसान सभा स्वयं इसे व्यापक तेभागा संघर्ष से जुड़ा आंदोलन बताती है।

मणि सिंह का उदाहरण हमें यह समझाता है कि ‘तेभागा आंदोलन’ को यांत्रिक रूप से केवल हर जगह एक जैसी दो-तिहाई मांग के रूप में नहीं देखना चाहिए।

कहीं समस्या बर्गादारी थी।

कहीं जंगल की पट्टेदारी।

कहीं जोतदार का कर्ज।

किसान सभा ने इन स्थानीय असंतोषों को एक बड़े बंगाल किसान आंदोलन से जोड़ा।

यही उसकी सांगठनिक क्षमता थी।

तेभागा का सबसे बड़ा इतिहासलेखन अन्याय यह होगा कि केवल दस-पंद्रह प्रसिद्ध नेताओं की सूची बनाकर आंदोलन समझ लिया जाए।

वास्तविक संघर्ष हजारों गांवों में चला।

हर गांव में कलकत्ता से कोई नेता उपस्थित नहीं था।

इसलिए हजारों स्थानीय किसान—

और खेत में संघर्ष करने वाले बर्गादार

आंदोलन के वास्तविक वाहक थे।

दिनाजपुर के स्थानीय कार्यकर्ता

दिनाजपुर तेभागा का सबसे तीव्र क्षेत्र था।

यहां समीरुद्दीन और शिवराम मांझी जैसे किसानों की शहादत आंदोलन की स्मृति में विशेष स्थान रखती है। विभिन्न ऐतिहासिक विवरण उन्हें चिरिरबंदर क्षेत्र में आंदोलन के शुरुआती शहीदों के रूप में दर्ज करते हैं। शिवराम मांझी आदिवासी हसदा समुदाय से थे, जबकि समीरुद्दीन मुस्लिम कृषक थे।

उनका महत्व केवल व्यक्तिगत बलिदान में नहीं था।

उनकी सामाजिक पहचान आंदोलन की उस एकता का प्रतीक थी जिसमें धार्मिक और जनजातीय सीमाओं के पार किसान एक साथ खड़े हुए।

उत्तर बंगाल के स्थानीय इतिहास पर नए अध्ययन ऐसे नेताओं को सामने लाते हैं जिनका राष्ट्रीय इतिहास में शायद ही नाम मिलता है।

चोपड़ा क्षेत्र में बाचा मुंशी तथा इस्लामपुर में विधुभूषण नाथ जैसे कार्यकर्ताओं ने स्थानीय किसानों को संगठित किया। अध्ययन के अनुसार बाचा मुंशी हाट-बाजारों में जाकर किसानों के बीच जागरूकता फैलाते थे और जमींदारों के अत्याचार के विरुद्ध लामबंदी करते थे।

यही छोटे आयोजक किसी बड़े आंदोलन की वास्तविक रीढ़ होते हैं।

रंगपुर क्षेत्र के बदरगंज में भी हाजी मोहम्मद दानेश के नेतृत्व के साथ स्थानीय स्तर पर दराजुद्दीन मंडल, जितेन दत्ता और छायेन उद्दीन जैसे कार्यकर्ताओं का उल्लेख मिलता है।

यह उदाहरण महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाता है कि आंदोलन का नेतृत्व विभिन्न धार्मिक समुदायों से आया।

प्रांतीय आंदोलन की भाषा वर्गीय थी और स्थानीय नेतृत्व उसी आधार पर विविध समुदायों को जोड़ रहा था।

काकद्वीप आंदोलन के अध्ययन में केवल कंसारी हलदर का ही नाम नहीं मिलता।

गजेन माली, माणिक हाजरा, जतिन माइती, बिजय मंडल और अन्य स्थानीय किसान कार्यकर्ता भी संघर्ष में उभरे। काकद्वीप पर विशेष अध्ययन इन ग्रामीण नेताओं, किसान समितियों और स्वयंसेवक संगठन की महत्वपूर्ण भूमिका दर्ज करता है।

यानी नेता पैदा भी आंदोलन ने किए।

वे पहले से प्रसिद्ध राजनीतिक व्यक्ति नहीं थे।

संघर्ष ने उन्हें गांव का नेता बनाया।

तेभागा में स्थानीय नेताओं को मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में समझा जा सकता है।

पहली श्रेणी — पुराने किसान सभा कार्यकर्ता

ये पहले से राजनीतिक रूप से प्रशिक्षित थे और गांवों में संगठन बना रहे थे।

दूसरी श्रेणी — आंदोलन के दौरान उभरे बर्गादार नेता

तेभागा शुरू होने के बाद उनकी क्षमता सामने आई।

वे स्थानीय किसानों का विश्वास रखते थे और प्रत्यक्ष कार्रवाई संचालित करने लगे।

तीसरी श्रेणी — सामुदायिक प्रभाव वाले व्यक्ति

इनमें धार्मिक, आदिवासी अथवा स्थानीय सामाजिक नेतृत्व रखने वाले लोग थे जिन्होंने अपने समुदाय को आंदोलन से जोड़ा।

इन तीनों के मेल से तेभागा तेजी से फैला।

पुरुष नेताओं की तुलना में महिलाओं के नाम आधिकारिक अभिलेखों में कम हैं।

फिर भी विमला मांझी जैसी कार्यकर्ता मिदनापुर–नंदीग्राम क्षेत्र में नेतृत्व स्तर तक पहुंचीं। महिला आत्मरक्षा समिति से जुड़ी मणिकुंतला सेन, रेणु चक्रवर्ती और रानी मित्र दासगुप्ता ने ग्रामीण महिलाओं का संगठन किया।

लेकिन आंदोलन की असली महिला शक्ति उन हजारों अज्ञात कृषक महिलाओं से आई जिन्होंने—

और पुरुष नेताओं के भूमिगत होने पर संगठन संभाला।

यही कारण है कि स्थानीय नेतृत्व का इतिहास केवल उपलब्ध नामों से पूरा नहीं होता।

यह तेभागा इतिहासलेखन का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।

एक व्याख्या

कम्युनिस्ट पार्टी और किसान सभा ने आंदोलन बनाया।

दूसरी व्याख्या

किसानों का असंतोष इतना गहरा था कि आंदोलन मुख्यतः स्वतःस्फूर्त था और पार्टी केवल उसके साथ चल रही थी।

वास्तविकता इन दोनों के बीच है।

किसान सभा के बिना क्या होता?

किसान सभा के बिना संभवतः अनेक स्थानीय बर्गादार संघर्ष होते।

वे पहले भी हो रहे थे।

इतने व्यापक स्तर पर उपलब्ध नहीं होते।

इसलिए किसान सभा ने बिखरे असंतोष को बंगाल-व्यापी आंदोलन बनाया।

किसानों के बिना क्या होता?

दूसरी ओर यदि ग्रामीण समाज में वास्तविक असंतोष नहीं होता तो कोई भी राजनीतिक संगठन इतने बड़े आंदोलन का निर्माण नहीं कर सकता था।

अखिल भारतीय किसान सभा का अपना इतिहास इस तथ्य को बहुत स्पष्टता से स्वीकार करता है—आरंभिक नेतृत्व किसान सभा से आया, लेकिन बर्गादारों का स्वतःस्फूर्त समर्थन इतना व्यापक था कि आंदोलन प्रारंभिक संगठनात्मक ढांचे से कहीं आगे निकल गया।

यह एक महत्वपूर्ण आत्मस्वीकृति है।

दिनाजपुर इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।

अटवारी में संघर्ष शुरू होने के कुछ ही सप्ताह में आंदोलन लगभग सभी थानों तक फैलने लगा।

हजारों किसान स्वयंसेवक बने।

गांव-गांव जुलूस निकले।

इस गति को कोई छोटा प्रांतीय संगठन पूरी तरह ऊपर से नियंत्रित नहीं कर सकता था।

इसीलिए तेभागा का वास्तविक सूत्र था—

संगठन + स्वतःस्फूर्तता।

यदि केवल संगठन होता और ग्रामीण असंतोष नहीं, तो आंदोलन सीमित रहता।

यदि केवल असंतोष होता और संगठन नहीं, तो वह स्थानीय विद्रोहों में बिखर सकता था।

दोनों मिलकर तेभागा बने।

पुलिस दमन बढ़ने पर किसान सभा और कम्युनिस्ट पार्टी के अनेक नेता भूमिगत हो गए।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उनका नियंत्रण पूरी तरह समाप्त हो गया।

किसान सभा के ऐतिहासिक दस्तावेज में उल्लेख है कि नेतृत्व का एक हिस्सा भूमिगत रहकर भी आंदोलन को दिशा देता रहा।

यह व्यवस्था दो स्तरों पर काम करती थी।

ऊपर राजनीतिक निर्देश।

नीचे स्थानीय किसान समिति।

यही कारण था कि प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी के बावजूद कई इलाकों में आंदोलन तुरंत समाप्त नहीं हुआ।

खंड 9

सरकार, पुलिस और जोतदारों की प्रतिक्रिया

तेभागा आंदोलन जब 1946 के अंत में खेत और खलिहान की प्रत्यक्ष लड़ाई बन गया, तब बंगाल सरकार के सामने समस्या केवल कृषि नीति की नहीं रह गई थी। जिन जिलों में बर्गादार संगठित थे, वहां उन्होंने उस व्यवस्था को व्यवहार में बदलना शुरू कर दिया था जिसे सरकार ने अभी कानून का रूप भी नहीं दिया था। धान जोतदार के खलिहान में जाने के बजाय किसान के खलिहान में पहुंच रहा था; किसान समितियां स्थानीय विवाद सुलझा रही थीं; कई जोतदार अपने गांव छोड़कर कस्बों में चले गए; और पुलिस कुछ क्षेत्रों में तत्काल प्रवेश करने से भी हिचक रही थी।

इस स्थिति ने मुख्यमंत्री हुसैन शहीद सुहरावर्दी की मुस्लिम लीग सरकार को एक विरोधाभासी नीति अपनाने पर मजबूर किया।

एक ओर सरकार जानती थी कि बर्गादारों की शिकायतों में आधार है। फ्लाउड आयोग पहले ही दो-तिहाई हिस्सेदारी की दिशा में सुधार की सिफारिश कर चुका था। आंदोलन के दबाव में जनवरी 1947 में सरकार ने बर्गादारों के पक्ष में अस्थायी कानून का मसौदा भी प्रकाशित किया।

दूसरी ओर वही सरकार गांवों में किसान प्रतिरोध को प्रशासनिक सत्ता की खुली अवज्ञा मान रही थी। परिणामतः विधायी आश्वासन और पुलिस दमन एक ही समय चलने लगे।

तेभागा के सरकारी इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यही है—

सरकार जिस मांग को कानून में स्वीकार करने की दिशा में बढ़ रही थी, उसी मांग को खेत में स्वयं लागू करने वाले किसानों पर पुलिस गोली चला रही थी।

1946 में बंगाल की राजनीतिक परिस्थिति

1946 में बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार थी और हुसैन शहीद सुहरावर्दी मुख्यमंत्री थे। यह साधारण प्रशासनिक समय नहीं था।

ब्रिटिश सत्ता के हस्तांतरण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी।

भारत के विभाजन का प्रश्न सामने था।

अगस्त 1946 का कलकत्ता सांप्रदायिक रक्तपात हो चुका था।

नोआखाली और बिहार की हिंसा ने हिंदू–मुस्लिम संबंधों को और तनावपूर्ण बना दिया था।

इसी समय ग्रामीण बंगाल में लाखों बर्गादार वर्गीय किसान आंदोलन में उतर रहे थे।

सरकार के सामने इसलिए दो अलग संकट एक साथ थे—

सांप्रदायिक व्यवस्था का संकट

मुस्लिम लीग की सामाजिक दुविधा

मुस्लिम लीग का बंगाल में बड़ा राजनीतिक आधार मुस्लिम कृषक समाज में था। पूर्वी बंगाल में बड़ी संख्या में गरीब और छोटे मुस्लिम कृषक थे।

यदि सरकार खुले तौर पर जोतदारों के पक्ष में जाती, तो उसके अपने ग्रामीण सामाजिक आधार में असंतोष पैदा हो सकता था।

लेकिन दूसरी ओर भूमि और कृषि हितों से जुड़े संपन्न वर्ग भी प्रांतीय राजनीति में प्रभावशाली थे।

इसलिए सरकार किसान मांग को पूरी तरह अस्वीकार भी नहीं कर सकती थी और किसान सभा के नेतृत्व में चल रहे प्रत्यक्ष आंदोलन को स्वीकार भी नहीं करना चाहती थी।

यहीं से उसकी नीति का द्वंद्व शुरू हुआ।

1946 के अंत में किसानों ने जैसे ही सामूहिक रूप से धान अपने खलिहानों में रखना शुरू किया, प्रशासनिक दृष्टि से सवाल यह बना कि फसल का वैध कब्जा किसके पास है।

जोतदार शिकायत करते कि किसान उनकी हिस्सेदारी वाली फसल अवैध रूप से ले गए हैं।

बर्गादार केवल फ्लाउड आयोग की सिफारिश लागू कर रहा है।

प्रशासन इस संघर्ष को भूमि सुधार के प्रश्न के बजाय कई स्थानों पर कानून-व्यवस्था और संपत्ति अधिकार के विवाद के रूप में देखने लगा।

यहीं पुलिस हस्तक्षेप का रास्ता खुला।

सुहरावर्दी सरकार की तेभागा नीति एकरेखीय नहीं थी।

उसे मोटे तौर पर तीन चरणों में समझा जा सकता है।

पहला चरण — नियंत्रण और पुलिस हस्तक्षेप

1946 के अंत और जनवरी 1947 की शुरुआत में प्रशासन ने बढ़ते किसान प्रतिरोध को रोकने के लिए पुलिस का इस्तेमाल किया।

दूसरा चरण — राजनीतिक रियायत

आंदोलन के तेजी से फैलने पर सरकार ने बर्गादारों के अधिकार संबंधी विधेयक प्रकाशित किया।

तीसरा चरण — पुनः कठोर दमन

विधेयक कानून नहीं बना और फरवरी–अप्रैल 1947 में कई क्षेत्रों में पुलिस दमन तथा गोलीबारी बढ़ गई।

इस प्रकार सरकार ने एक साथ सुधार का संकेत और दमन का प्रयोग किया।

आंदोलन के दबाव ने सुहरावर्दी सरकार को महत्वपूर्ण कदम उठाने के लिए बाध्य किया।

22 जनवरी 1947 को बंगाल सरकार ने *Bengal Bargadars Temporary Regulation Bill* का मसौदा *Calcutta Gazette* में प्रकाशित किया।

इसका उद्देश्य बर्गादारों की स्थिति को विनियमित करना और उपज में उनके हिस्से को बढ़ाने की दिशा में कानूनी व्यवस्था बनाना था। प्रस्तावित व्यवस्था तेभागा की केंद्रीय मांग—बर्गादार को दो-तिहाई हिस्सा—के बहुत निकट थी।

इस घोषणा का राजनीतिक प्रभाव विस्फोटक था।

किसान ने इसे इस रूप में पढ़ा—

सरकार ने हमारी मांग की वैधता मान ली।

यह सामान्य राजनीतिक अनुमान हो सकता था कि विधेयक प्रकाशित होते ही किसान आंदोलन शांत हो जाएगा।

अब उन गांवों के किसान भी आंदोलन में उतरने लगे जहां पहले संघर्ष कमजोर था।

बिपन चंद्र और सहयोगियों के मानक इतिहास में उल्लेख है कि विधेयक प्रकाशित होने के बाद किसान यह मानने लगे कि तेभागा की मांग को अब ‘गैरकानूनी’ नहीं कहा जा सकता। इसके बाद कई जगह किसानों ने जोतदारों के खलिहानों में पहले से रखे धान में भी अपने हिस्से का दावा करना शुरू किया।

यानी सरकारी घोषणा ने आंदोलन को एक प्रकार की राजनीतिक वैधता दे दी।

यही तेभागा इतिहास का महत्वपूर्ण प्रश्न है।

प्रस्ताव प्रकाशित हुआ, लेकिन वह तत्काल प्रभावी कानून नहीं बन सका।

इसके पीछे कई कारण थे—

बंगाल की अस्थिर राजनीतिक परिस्थिति,

विभाजन का बढ़ता संकट,

विधानमंडलीय और प्रशासनिक बाधाएं,

भूमि-हित रखने वाले वर्गों का दबाव,

और राज्य की प्राथमिकताओं का तेजी से सांप्रदायिक तथा संवैधानिक संकट की तरफ खिसकना।

बाद के विवरणों में जोतदार लॉबी और राजनीतिक उथल-पुथल दोनों को विधेयक के विफल होने के कारकों में गिना गया है।

इससे किसान के बीच विश्वास का संकट और गहरा हुआ।

लेकिन खेत में पुलिस पुरानी व्यवस्था लागू करा रही थी।

किसान सभा और विपक्ष ने पुलिस दमन के लिए सरकार को कठघरे में खड़ा किया।

दूसरी तरफ सुहरावर्दी ने विधानसभा में किसान आंदोलन के कुछ उग्र रूपों को कानूनहीनता और सरकारी अधिकार की अवज्ञा के रूप में प्रस्तुत किया।

दिनाजपुर पर प्रकाशित एक शोध में सुहरावर्दी का विधानसभा वक्तव्य उद्धृत है जिसमें उन्होंने थुमनिया की पुलिस गोलीबारी को आंदोलनकारियों द्वारा फैलाए जा रहे “lawlessness” और प्रशासनिक सत्ता की अवज्ञा की पृष्ठभूमि में रखा।

सरकार की दृष्टि स्पष्ट थी—

कृषि शिकायत वास्तविक हो सकती है,

लेकिन किसान स्वयं कानून लागू नहीं कर सकता।

किसान सभा का उत्तर उतना ही स्पष्ट था—

यदि सरकार छह वर्ष से मान्य सुधार लागू नहीं करेगी, तो किसान इंतजार क्यों करे?

तेभागा का सबसे सीधा आर्थिक प्रभाव जोतदार पर पड़ता था।

पुरानी व्यवस्था में उसे प्रायः आधी उपज मिलती थी।

तेभागा लागू होने पर उसका हिस्सा एक-तिहाई रह जाता।

यदि उत्पादन का उदाहरण लें—

कुल उपज = 30 मन धान।

पुरानी आधी व्यवस्था में जोतदार का हिस्सा = 15 मन।

हजारों एकड़ और अनेक बर्गादारों पर निर्भर बड़े जोतदार के लिए यह मामूली परिवर्तन नहीं था।

इसलिए उनका विरोध तीव्र था।

तेभागा से जोतदार की समस्या सिर्फ पांच मन धान कम मिलने की नहीं थी।

पुरानी व्यवस्था में फसल उसके खलिहान में आती थी।

वह स्थानीय ऋणदाता हो सकता था।

ग्रामीण विवादों में प्रभावशाली हो सकता था।

पुलिस और प्रशासन तक उसकी पहुंच अधिक हो सकती थी।

बर्गादार की अगली खेती भी उसके निर्णय पर निर्भर हो सकती थी।

धान मेरे खलिहान में आएगा और आपका हिस्सा आपको यहां से मिलेगा,

तो वह आर्थिक हिस्सेदारी के साथ जोतदार की सामाजिक श्रेष्ठता को भी चुनौती दे रहा था।

सभी जोतदारों ने एक जैसी प्रतिक्रिया नहीं दी।

कहीं वे गांव छोड़ गए।

कहीं पुलिस में शिकायत की गई।

कहीं निजी लठैत लगाए गए।

कहीं बर्गादार को अगली खेती से बेदखल करने की धमकी दी गई।

जलपाईगुड़ी संबंधी अध्ययन में बताया गया है कि नवंबर से फरवरी के प्रारंभ तक आंदोलन की एकता इतनी मजबूत थी कि कई जोतदार समझौते पर उतर आए और कुछ कस्बों की ओर चले गए। उपखंड अधिकारी की रिपोर्ट तक में जोतदारों के अपने घरों में दबाव में रहने का उल्लेख मिलता है।

यह आंदोलन की शक्ति का महत्वपूर्ण प्रमाण है।

जैसे-जैसे किसान सभा मजबूत हुई, जोतदारों के सामने निजी शक्ति पर्याप्त नहीं रही।

उन्होंने पुलिस और प्रशासन से सहायता मांगी।

यहीं निजी कृषि विवाद राज्य के बल-प्रयोग से जुड़ गया।

बिपन चंद्र के विवरण के अनुसार जनवरी 1947 में आंदोलन के नए विस्तार और किसानों द्वारा जोतदारों के खलिहानों से धान वापस ले जाने की कार्रवाइयों के बाद जोतदारों ने सरकार से हस्तक्षेप की मांग की और पुलिस दमन तेज हुआ।

यह आंदोलन के दूसरे चरण का निर्णायक परिवर्तन था।

कम्युनिस्ट और किसान सभा नेतृत्व ने यही आरोप लगाया।

ज्योति बसु ने बंगाल विधानसभा में सरकार पर जमींदारों और जोतदारों के हितों के सामने झुकने तथा बर्गादार विधेयक को विफल करने का आरोप लगाया। यह समकालीन राजनीतिक आरोप था, इसलिए इसे निष्पक्ष ऐतिहासिक तथ्य के बजाय विपक्षी दृष्टिकोण के रूप में पढ़ना चाहिए।

वास्तविकता कुछ अधिक जटिल थी।

सरकार ने बर्गादार विधेयक प्रकाशित करके किसान मांग को आंशिक स्वीकार्यता दी थी।

लेकिन जमीनी स्तर पर राज्य मशीनरी संपत्ति और पुराने कृषि संबंधों को बलपूर्वक बदलने की किसान कार्रवाई को स्वीकार नहीं कर रही थी।

यही विरोधाभास सरकार को व्यवहार में बार-बार जोतदार के पक्ष में खड़ा करता दिखाई देता था।

तेभागा पर राज्य की सबसे कठोर प्रतिक्रिया उत्तर बंगाल में दिखाई दी।

दिनाजपुर, जलपाईगुड़ी और रंगपुर विशेष रूप से प्रभावित हुए।

इसके अलावा 24 परगना, खुलना और मयमनसिंह जैसे क्षेत्रों में भी कठोर पुलिस कार्रवाइयां हुईं। समकालीन वामपंथी विवरण भी इन क्षेत्रों को दमन के मुख्य केंद्रों में रखते हैं।

दिनाजपुर के चिरिरबंदर में जनवरी 1947 की पुलिस गोलीबारी तेभागा के शुरुआती प्रमुख रक्तरंजित प्रसंगों में थी।

उत्तर बंगाल संबंधी अध्ययनों के अनुसार 4 जनवरी 1947 को पुलिस गोलीबारी में समीरुद्दीन और शिवराम मांझी मारे गए।

एक मुस्लिम गरीब कृषक और दूसरा आदिवासी किसान—

इन दोनों की मृत्यु बाद में तेभागा की वर्गीय तथा सामुदायिक एकता का प्रतीक बनी।

गोलीबारी से आंदोलन समाप्त नहीं हुआ।

बल्कि कई जगह उसने किसानों को और संगठित किया।

चिरिरबंदर तथा उत्तर बंगाल के कई दूसरे क्षेत्रों में महिला प्रतिरोध की घटनाएं भी सामने आईं।

अध्ययनों में भंडानी जैसी ग्रामीण महिलाओं द्वारा पुलिस का सामना करने और एक पुलिस अधिकारी की बंदूक तक छीन लेने का विवरण मिलता है।

जलपाईगुड़ी के खरिजा बेरुबाड़ी क्षेत्र में महिलाओं ने झाड़ू, हंसिया और बंटी जैसे घरेलू तथा कृषि उपकरण लेकर सशस्त्र पुलिस को पीछे हटने के लिए मजबूर किया।

ये घटनाएं बताती हैं कि पुलिस कार्रवाई केवल पार्टी कार्यकर्ता और पुलिस के बीच संघर्ष नहीं थी।

पूरे गांव कभी-कभी प्रतिरोध में उतर रहे थे।

जलपाईगुड़ी में फरवरी 1947 के अंत तक दमन व्यवस्थित प्रशासनिक अभियान में बदल चुका था।

एक शोध के अनुसार जिले के 11 पुलिस थाना क्षेत्रों—कोतवाली, पचागढ़, बोदा, देवीगंज, राजगंज, तेतुलिया, मैनागुड़ी, पाटग्राम, माल, मेटेली और नागराकाटा—में धारा 144 लागू की गई।

अप्रैल के अंत तक एक हजार से अधिक लोगों के विरुद्ध आपराधिक मुकदमे दर्ज किए गए; 200 से अधिक नेता, किसान और मजदूर जेल में थे तथा लगभग 250 अन्य नेताओं और कार्यकर्ताओं के विरुद्ध गिरफ्तारी वारंट जारी हुए।

ये आंकड़े केवल हिंसक गोलीबारियों पर ध्यान केंद्रित करने की सीमा बताते हैं।

तेभागा दमन का बड़ा हिस्सा था—

गिरफ्तारी, मुकदमा, वारंट और आंदोलनकारी क्षेत्र में पुलिस की स्थायी उपस्थिति।

तेभागा आंदोलन का सबसे प्रसिद्ध रक्तरंजित प्रसंग है—

20 फरवरी 1947 का खानपुर गोलीकांड।

खानपुर दिनाजपुर जिले के बालुरघाट क्षेत्र में था, जो आज पश्चिम बंगाल के दक्षिण दिनाजपुर जिले में आता है।

पुलिस गांव क्यों गई?

पुलिस किसान सभा से जुड़े कुछ स्थानीय नेताओं को गिरफ्तार करने खानपुर पहुंची।

किसानों को इसकी पूर्व सूचना मिल चुकी थी।

इसलिए रास्ते में अवरोध और खाइयां बनाई गईं तथा बड़ी संख्या में किसान एकत्र हो गए।

कुछ किसान लाठी, धनुष-बाण और अन्य स्थानीय हथियारों से लैस थे।

पुलिस वाहन को भी अवरोध का सामना करना पड़ा।

इसके बाद टकराव हुआ और पुलिस ने व्यापक गोलीबारी की। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की स्वतंत्रता-शहीद परियोजना में उपलब्ध समकालीन स्रोतों पर आधारित विवरण पुलिस द्वारा 121 राउंड चलाए जाने और 20 किसानों की मृत्यु का उल्लेख करता है।

यहां विशेष ऐतिहासिक सावधानी आवश्यक है।

खानपुर में मृतकों की संख्या अलग-अलग स्रोतों में अलग है।

भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा प्रकाशित *Dictionary of Martyrs* में बंगाल विधानसभा कार्यवाही, *The Statesman*, *Swadhinata* और अन्य स्रोतों के आधार पर 20 मृतक तथा 121 राउंड गोली चलने का उल्लेख है।

बिपन चंद्र और सहयोगियों के मानक इतिहास में भी 20 किसान मारे जाने की बात है।

उत्तर बंगाल पर कुछ अकादमिक अध्ययनों में संख्या 22 दी गई है।

कुछ स्थानीय स्मारकीय और प्रशासनिक विवरणों में 21 का आंकड़ा भी मिलता है।

इसलिए शोधपूर्ण प्रस्तुति में सबसे सुरक्षित रूप होगा—

“20 फरवरी 1947 को खानपुर में पुलिस गोलीबारी में कम-से-कम 20 किसान मारे गए; अलग-अलग स्रोत मृतकों की संख्या 20 से 22 के बीच बताते हैं।”

इससे स्रोतगत अंतर छिपता नहीं है।

खानपुर की घटना महिलाओं की भूमिका के कारण भी महत्वपूर्ण है।

भारत सरकार के *Dictionary of Martyrs* में यशोदारानी बर्मन/सरकार को इस गोलीबारी में मारी गई राजबंशी महिला आंदोलनकारी के रूप में दर्ज किया गया है।

अन्य अध्ययनों में उन्हें यशोदा रानी सरकार नाम से दर्ज किया गया है और महिलाओं की ‘नारी वाहिनी’ के साथ गिरफ्तार कार्यकर्ताओं की रिहाई की मांग करते हुए सामने आने का उल्लेख मिलता है।

नाम की वर्तनी और उपनाम में स्रोतगत अंतर के बावजूद यह स्पष्ट है कि खानपुर में महिला किसान भी अग्रिम पंक्ति में थीं।

इतने बड़े पैमाने पर गोलीबारी ने पूरे बंगाल में सरकार की आलोचना तेज कर दी।

किसान सभा और कम्युनिस्ट पार्टी ने इसे राज्य दमन का प्रतीक बनाया।

विधानसभा में भी सरकार की नीति पर तीखी आलोचना हुई।

लेकिन खानपुर का प्रभाव केवल राजनीतिक प्रचार तक सीमित नहीं था।

उसने किसान के सामने राज्य की शक्ति की सीमा भी स्पष्ट कर दी।

जोतदार से हजार किसान निपट सकते थे।

लेकिन आधुनिक हथियारों वाली पुलिस के सामने ग्रामीण परंपरागत हथियारों की सीमा सामने आ गई।

यह आंदोलन के इतिहास में निर्णायक मोड़ था।

खानपुर सबसे प्रसिद्ध घटना है, लेकिन तेभागा का दमन केवल वहीं नहीं हुआ।

दूसरे जिलों में भी कई गोलीबारियां हुईं।

थुमनिया — दिनाजपुर

खानपुर के आसपास के समय में थुमनिया गांव में भी पुलिस और किसानों का टकराव हुआ।

डी. एन. धनागरे से संबंधित विवरणों में यहां चार किसानों की गोली लगने से मृत्यु का उल्लेख मिलता है।

इसी घटना की पृष्ठभूमि में सुहरावर्दी ने विधानसभा में आंदोलनकारियों की ‘कानूनहीनता’ की आलोचना की थी।

दिनाजपुर के ठाकुरगांव में पुलिस गोलीबारी के विरुद्ध हजारों किसानों के प्रदर्शन पर भी गोली चलने का विवरण मिलता है।

कुछ ऐतिहासिक अध्ययनों में इसमें छह किसानों की मृत्यु बताई गई है।

यदि यह घटनाक्रम खानपुर और आसपास की अन्य गोलीबारियों के साथ पढ़ा जाए तो स्पष्ट होता है कि फरवरी 1947 में दिनाजपुर केवल एक आकस्मिक घटना का स्थल नहीं था।

वह व्यापक राज्य–किसान टकराव का क्षेत्र बन चुका था।

1 मार्च 1947 को जलपाईगुड़ी जिले के माल थाना क्षेत्र के नियोरामाझिलाई में किसान और चाय बागान मजदूर एक जोतदार के धान भंडार पर पहुंचे।

उनके पास लाठी, धनुष-बाण और भाले थे।

वहां पहले से सशस्त्र पुलिस मौजूद थी।

झड़प में किसानों ने कुछ पुलिस बंदूकें छीन लीं।

इसके बाद पुलिस ने गोली चलाई।

जलपाईगुड़ी के विस्तृत अध्ययन में पांच किसानों, जिनमें एक महिला शामिल थी, के मारे जाने का उल्लेख है।

यह घटना आंदोलन के बदलते स्वरूप का संकेत थी।

अब कुछ किसान केवल नई फसल बचाने की कार्रवाई नहीं कर रहे थे।

वे पहले से जोतदार के खलिहान में मौजूद धान पर भी अपना दावा कर रहे थे।

4 अप्रैल 1947 को मेटेली थाना क्षेत्र में मंगलबाड़ी हाट के पास महाबाड़ी में एक और बड़ी पुलिस गोलीबारी हुई।

विभिन्न अध्ययनों में मृतकों की संख्या में अंतर मिलता है। जलपाईगुड़ी संबंधी एक अध्ययन दस व्यक्तियों की सूची देता है, जबकि दूसरे विवरण नौ मृतकों का उल्लेख करते हैं। मृतकों में आदिवासी किसान, चाय बागान मजदूर और एक महिला शामिल बताए गए हैं।

इसलिए यहां भी कोई एक निश्चित संख्या बिना स्रोत-संदर्भ के देना उचित नहीं है।

तेभागा आंदोलन में कुल मौतों की संख्या पर भी सर्वमान्य आंकड़ा नहीं है।

कुछ वामपंथी संस्मरण और बाद के भूमि सुधार संबंधी विवरण 86 तक मौतों का आंकड़ा देते हैं।

लेकिन अलग-अलग जिलों की पुलिस रिपोर्ट, राजनीतिक दस्तावेज, स्मारकीय विवरण और बाद की स्मृतियां अलग आंकड़े देती हैं।

इसलिए पूरे आंदोलन के लिए कोई एक संख्या बिना विस्तृत अभिलेखीय सत्यापन के निश्चित रूप से लिखना जोखिमपूर्ण होगा।

हमारे अंतिम स्रोत खंड में इस प्रश्न को अलग तालिका में रखना अधिक उपयुक्त होगा—

घटना, तारीख, जिला, सरकारी संख्या, किसान सभा संख्या और आधुनिक शोध संख्या।

इससे वेबसाइट के शोध लेख में भ्रम नहीं रहेगा।

तेभागा उस असाधारण संक्रमणकाल में हुआ जब ब्रिटिश राज समाप्त होने वाला था, लेकिन पुलिस और जिला प्रशासन अभी औपनिवेशिक संस्थागत ढांचे के अंतर्गत कार्य कर रहे थे।

इसलिए पुलिस की भूमिका को केवल ‘ब्रिटिश बनाम भारतीय’ के सरल ढांचे में समझना कठिन है।

प्रांतीय मंत्रालय भारतीय नेताओं का था।

मुख्यमंत्री सुहरावर्दी भारतीय थे।

लेकिन जिला पुलिस, प्रशासनिक कानून और संपत्ति व्यवस्था औपनिवेशिक राज्य की निरंतरता में थे।

यही तेभागा की ऐतिहासिक विडंबना है—

ब्रिटिश राज अपने अंतिम महीनों में था, लेकिन गांव के बर्गादार के सामने औपनिवेशिक राज्य मशीनरी अब भी पूरी शक्ति के साथ मौजूद थी।

आरंभिक दमन — आंदोलन और फैला

किसान स्वयंसेवकों की संख्या बढ़ी।

खंड 10

कानून और राजनीति

तेभागा आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पक्ष यह था कि उसने एक स्थानीय कृषि विवाद को सीधे कानून, प्रांतीय सत्ता, दलगत राजनीति और सांप्रदायिक प्रश्न से जोड़ दिया। 1946 के अंत तक किसान केवल यह नहीं कह रहे थे कि उन्हें अधिक फसल चाहिए; वे यह भी पूछ रहे थे कि यदि सरकारी आयोग पहले ही दो-तिहाई हिस्सेदारी को उचित मान चुका है, तो उसे कानूनी अधिकार क्यों नहीं बनाया गया।

यहीं तेभागा औपनिवेशिक कृषि व्यवस्था के विरुद्ध एक व्यापक राजनीतिक चुनौती बन गया।

लेकिन राजनीति की परिस्थिति अत्यंत असाधारण थी। बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार थी। कांग्रेस ब्रिटिश सत्ता हस्तांतरण, संविधान सभा और विभाजन के प्रश्नों में उलझी थी। कम्युनिस्ट पार्टी किसान संघर्ष को वर्गीय राजनीति में बदलना चाहती थी। हिंदू–मुस्लिम तनाव तेजी से बढ़ रहा था। और इन्हीं परिस्थितियों में बंगाल सरकार ने जनवरी 1947 में बर्गादारों को कानूनी सुरक्षा देने का प्रस्ताव सामने रखा।

इसलिए तेभागा का राजनीतिक इतिहास केवल—

उसमें कम-से-कम चार समानांतर संघर्ष थे—

किसान बनाम जोतदार, किसान सभा बनाम राज्य, वर्गीय राजनीति बनाम सांप्रदायिक राजनीति, और भूमि सुधार बनाम संपन्न ग्रामीण हित।

फ्लाउड आयोग से विधेयक तक

बंगाल भूमि राजस्व आयोग—फ्लाउड आयोग—ने 1940 में बर्गादारों की स्थिति में सुधार की सिफारिश की थी। उसका मूल तर्क यह था कि जब बर्गादार खेती के साधन और श्रम का बड़ा हिस्सा वहन करता है, तो उसे फसल का दो-तिहाई हिस्सा मिलना चाहिए।

लेकिन छह वर्षों तक इस सिफारिश का वास्तविक कानूनी क्रियान्वयन नहीं हुआ।

फिर 1946 के अंत में तेभागा आंदोलन फूट पड़ा।

कुछ ही महीनों में स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि बंगाल की मुस्लिम लीग सरकार को विधायी हस्तक्षेप की घोषणा करनी पड़ी।

22 जनवरी 1947 को *Bengal Bargadars Temporary Regulation Bill* का मसौदा प्रकाशित किया गया। दिनाजपुर संबंधी अकादमिक शोध भी पुष्टि करता है कि भूमि राजस्व मंत्री फजलुर रहमान ने बर्गादारों को बेदखली से सुरक्षा और तेभागा देने की दिशा में विधेयक की घोषणा की और इसे 22 जनवरी 1947 को प्रकाशित किया गया।

क्या यह तेभागा की जीत थी?

यदि किसान आंदोलन न होता तो जिस सुधार पर 1940 से अमल नहीं हुआ था, उसके 1947 में अचानक राजनीतिक प्राथमिकता बनने की संभावना बहुत कम थी।

इस अर्थ में विधेयक किसान दबाव का प्रत्यक्ष परिणाम था।

लेकिन इसे पूर्ण विजय कहना जल्दबाजी होगी।

कानून का मसौदा प्रकाशित होना और खेत पर किसान को वास्तविक अधिकार मिलना दो अलग बातें थीं।

प्रस्तावित विधेयक का राजनीतिक महत्व

विधेयक की घोषणा ने तीन महत्वपूर्ण प्रभाव पैदा किए।

सरकार ने वस्तुतः स्वीकार किया कि बर्गादार की मांग में आधार है।

किसान सभा अब कह सकती थी कि जिस मांग के लिए किसान संघर्ष कर रहे हैं, उसे स्वयं सरकार भी सिद्धांततः मान चुकी है।

उन क्षेत्रों के किसान भी आंदोलन में आए जहां पहले तेभागा का संगठन कमजोर था।

जलपाईगुड़ी संबंधी शोध बताता है कि जनवरी 1947 में बर्गादार विधेयक के प्रकाशन ने आंदोलन को नया प्रोत्साहन दिया और ऐसे इलाकों के अधियार भी सक्रिय हुए जहां किसान सभा का पहले मजबूत आधार नहीं था।

अर्थात सरकार का सुधार प्रस्ताव तत्काल आंदोलन शांत करने के बजाय कई क्षेत्रों में उसकी वैधता का प्रमाण बन गया।

तेभागा आंदोलन की केंद्रीय राजनीतिक विडंबना यही थी—

कानून बनने की घोषणा हुई, लेकिन अधिकार लागू नहीं हुआ।

यहीं किसान और सरकार की राजनीतिक समझ में मूल अंतर था।

सरकार का दृष्टिकोण था—

विधेयक विधानसभा से पारित होगा।

प्रशासन उसे लागू करेगा।

किसान सभा का दृष्टिकोण था—

छह वर्ष से सिफारिश पड़ी है।

अब किसान इंतजार नहीं करेगा।

विधेयक कानून नहीं बन सका

1947 में प्रस्तावित दोनों प्रमुख भूमि सुधार प्रयास—बर्गादारों की हिस्सेदारी से संबंधित विधेयक और जमींदारी मध्यस्थ अधिकार समाप्त करने की दिशा वाला प्रस्ताव—मुस्लिम लीग सरकार के दौरान कानून नहीं बन सके। बाद के शोध में इसका कारण संपन्न भू-हितों का मजबूत विरोध और तेजी से बिगड़ती राजनीतिक परिस्थिति दोनों बताए गए हैं।

यह किसान राजनीति के लिए गंभीर झटका था।

सरकार ने आश्वासन दिया।

लेकिन कानूनी सुरक्षा नहीं आई।

किसान ने स्वयं कानून लागू करना शुरू किया

यहीं तेभागा का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक अर्थ सामने आता है।

आंदोलन वस्तुतः एक प्रकार का नीचे से भूमि सुधार बन गया।

हम अभी दो-तिहाई रखेंगे।

पुराने कानून और नए सामाजिक न्याय के दावे के बीच यही संघर्ष तेभागा का राजनीतिक केंद्र था।

विधेयक ने किसानों की अपेक्षा बढ़ा दी

सरकारी मसौदा प्रकाशित होने के बाद कई किसानों को लगा कि अब उनका दावा कानूनी रूप से भी उचित है।

जिन बर्गादारों ने पहले ही धान जोतदार के खलिहान में जमा कर दिया था, उन्होंने भी अपना अतिरिक्त हिस्सा वापस मांगना शुरू किया।

जलपाईगुड़ी के अध्ययन में यही परिवर्तन स्पष्ट दिखाई देता है। मसौदा प्रकाशित होने के बाद संघर्ष का नया चरण शुरू हुआ और किसानों ने पहले से जोतदार के खलिहान में रखे धान पर भी दावा किया।

यहीं कानून का प्रस्ताव स्वयं प्रत्यक्ष कार्रवाई को नई शक्ति देने लगा।

किसान की वास्तविक समस्या केवल फसल का प्रतिशत नहीं थी।

मान लीजिए किसी वर्ष उसे तेभागा मिल भी गया।

अगर अगले वर्ष जोतदार कह दे—

अब तुम्हें जमीन नहीं मिलेगी

इसलिए बर्गादारी की कानूनी पहचान, बेदखली से सुरक्षा और खेती जारी रखने का अधिकार उतना ही महत्वपूर्ण था जितना फसल का अनुपात।

यही प्रश्न स्वतंत्रता के बाद पश्चिम बंगाल की भूमि सुधार राजनीति में केंद्रीय बना।

बाद में 1950 का पश्चिम बंगाल बर्गादार अधिनियम बर्गादार को पहली बार अधिक स्पष्ट कानूनी दर्जा देने की दिशा में बढ़ा; इसके बाद 1953 का एस्टेट अधिग्रहण कानून और 1955 का भूमि सुधार अधिनियम आया।

अर्थात 1947 में जो प्रश्न अधूरा रह गया था, वह स्वतंत्र भारत की सरकारों के सामने वापस आया।

तेभागा आंदोलन में कांग्रेस की भूमिका को समझना अपेक्षाकृत कठिन है क्योंकि उस समय कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीतिक प्राथमिकताएं बहुत व्यापक थीं।

1946–47 में कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व—

ब्रिटिश सत्ता हस्तांतरण,

मुस्लिम लीग के साथ संबंध,

जैसे प्रश्नों से जूझ रहा था।

जुलाई 1946 के कांग्रेस विमर्श में भी राजनीतिक केंद्र सत्ता हस्तांतरण, संविधान निर्माण और मुस्लिम लीग के साथ संबंध था।

इसलिए बंगाल का बर्गादार प्रश्न अखिल भारतीय कांग्रेस राजनीति की केंद्रीय प्राथमिकता नहीं बन पाया।

क्या कांग्रेस तेभागा के विरोध में थी?

इसे सीधे ‘हां’ कहना भी गलत होगा।

कांग्रेस की व्यापक सामाजिक संरचना में किसान समर्थक समाजवादी और वामपंथी तत्व थे।

लेकिन कम्युनिस्ट नेतृत्व वाला तेभागा आंदोलन कांग्रेस का अपना आंदोलन नहीं था।

1940 के दशक तक अखिल भारतीय किसान सभा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक दूरी बढ़ चुकी थी।

तेभागा के समय बंगाल में मुख्य संगठनात्मक नेतृत्व कम्युनिस्ट किसान सभा के हाथ में था।

इसलिए कांग्रेस आंदोलन की प्रमुख संचालक नहीं बनी।

कांग्रेस की बड़ी राजनीतिक सीमा

कांग्रेस स्वयं जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार के प्रश्न को स्वतंत्रता आंदोलन के अंतिम दशकों में स्वीकार कर चुकी थी।

लेकिन 1946–47 के तत्कालीन बंगाल में वह ऐसा व्यापक संगठित बर्गादार आंदोलन खड़ा नहीं कर सकी जैसा कम्युनिस्ट किसान सभा ने किया।

इससे एक महत्वपूर्ण राजनीतिक अंतर सामने आया—

कांग्रेस का किसान कार्यक्रम मुख्यतः भविष्य के स्वतंत्र भारत की नीति से जुड़ रहा था; कम्युनिस्ट किसान सभा तत्काल खेत में संबंध बदलना चाहती थी।

तेभागा में यही फर्क दिखाई दिया।

स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस को वही प्रश्न हल करना पड़ा

विडंबना यह है कि 1947 में जो आंदोलन कांग्रेस के नेतृत्व में नहीं था, उसकी मांगों का बड़ा हिस्सा बाद में कांग्रेस सरकार को कानून के माध्यम से संबोधित करना पड़ा।

पश्चिम बंगाल में स्वतंत्रता के बाद क्रमशः बर्गादार कानून, जमींदारी मध्यस्थ अधिकार समाप्त करने की व्यवस्था और भूमि सुधार कानून आए।

इससे तेभागा की राजनीतिक सफलता का एक बड़ा संकेत मिलता है—

आंदोलन दब गया, लेकिन उसका प्रश्न राज्य की नीति से गायब नहीं हुआ।

बंगाल में मुस्लिम लीग की स्थिति कांग्रेस से बिल्कुल अलग थी।

और उसका बड़ा सामाजिक आधार ग्रामीण मुस्लिम समाज में था।

यही कारण है कि तेभागा उसके लिए सीधे राजनीतिक चुनौती था।

गरीब मुस्लिम किसान बनाम संपन्न मुस्लिम जोतदार

मुस्लिम लीग को एक एकरूप ‘मुस्लिम हित’ वाली पार्टी मानने से बंगाल की वास्तविकता समझ में नहीं आती।

एक तरफ गरीब मुस्लिम बर्गादार था।

दूसरी तरफ कुछ क्षेत्रों में संपन्न मुस्लिम जोतदार भी थे।

दोनों का आर्थिक हित समान नहीं था।

तेभागा ने इसी अंतर्विरोध को सार्वजनिक कर दिया।

पचागढ़ का उदाहरण

जलपाईगुड़ी संबंधी शोध में दर्ज है कि पचागढ़ क्षेत्र के कई बड़े जोतदार मुस्लिम थे और उन्होंने आंदोलन को कमजोर करने के लिए सांप्रदायिक भावनाओं का सहारा लेने की कोशिश की। वे बड़े पैमाने पर धन जुटाकर प्रशासन और मुस्लिम लीग सरकार पर पुलिस हस्तक्षेप के लिए दबाव डालते थे। यद्यपि वे बड़े सांप्रदायिक संघर्ष भड़काने में सफल नहीं हुए, लेकिन कुछ मुस्लिम कृषकों को आंदोलन से दूर रखने में आंशिक सफलता मिली।

यह प्रसंग अत्यंत महत्वपूर्ण है।

वह बताता है कि आर्थिक वर्ग-संघर्ष को धार्मिक पहचान के माध्यम से कमजोर करने का प्रयास वास्तविक था।

पूर्वी बंगाल में मुस्लिम लीग लंबे समय से कृषक प्रश्नों को अपने जनाधार से जोड़ने का प्रयास कर रही थी।

यह इसलिए भी संभव था क्योंकि कई इलाकों में गरीब कृषक मुस्लिम थे जबकि बड़े जमींदार वर्ग में हिंदू उच्च जातियों की उल्लेखनीय उपस्थिति थी।

इस परिस्थिति में जमींदार-विरोध को धार्मिक राजनीतिक भाषा में प्रस्तुत करना संभव था।

इनफ्लिबनेट का अध्ययन भी उल्लेख करता है कि पूर्वी बंगाल में मुस्लिम लीग ने कुछ किसान असंतोष को अपने राजनीतिक कार्यक्रम में समाहित किया और वहां भूमि संघर्ष का सांप्रदायिक पुनर्पाठ संभव हुआ।

लेकिन सरकार को तेभागा स्वीकार क्यों करना पड़ा?

यदि मुस्लिम लीग केवल जोतदार समर्थक होती, तो बर्गादार विधेयक लाने की आवश्यकता नहीं होती।

उसकी समस्या यही थी कि गरीब मुस्लिम किसान को पूर्णतः कम्युनिस्ट किसान सभा के हवाले करना राजनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकता था।

इसलिए सरकार को किसान मांग पर प्रतिक्रिया देनी पड़ी।

विधेयक इसी दुविधा का परिणाम था।

तेभागा आंदोलन का राजनीतिक नेतृत्व मुख्यतः भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और उससे जुड़े किसान सभा नेटवर्क के हाथ में था।

उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी—

स्थानीय बर्गादार शिकायत को प्रांतीय वर्ग-संघर्ष में बदलना।

लेकिन रणनीति विवादों से मुक्त नहीं थी।

पहली बड़ी उपलब्धि — स्पष्ट कार्यक्रम

कम्युनिस्ट नेतृत्व ने लंबी भूमि सुधार बहस को दो सरल नारों में बदल दिया—

धान अपने खलिहान में।

इसने आंदोलन को असाधारण संप्रेषणीयता दी।

किसान को न कानून पढ़ना था, न आर्थिक सिद्धांत।

वह जानता था कि करना क्या है।

दूसरी उपलब्धि — धर्म के पार संगठन

किसान सभा ने बर्गादार की आर्थिक पहचान को प्राथमिक बनाने की कोशिश की।

मुस्लिम बर्गादार और हिंदू बर्गादार का साझा विरोधी वह कृषि व्यवस्था है जो दोनों से आधी फसल लेती है।

उत्तर बंगाल के कई क्षेत्रों में यह रणनीति प्रभावी रही और हिंदू–मुस्लिम बर्गादारों ने संयुक्त रूप से संघर्ष किया।

तीसरी उपलब्धि — आंदोलन को जमीन पर लागू करना

कम्युनिस्ट नेतृत्व ने केवल ज्ञापन और प्रदर्शन तक आंदोलन सीमित नहीं रखा।

उसने प्रत्यक्ष आर्थिक कार्रवाई की रणनीति अपनाई।

यह तेभागा की सबसे बड़ी राजनीतिक विशेषता थी।

किसान स्वयं नई व्यवस्था लागू करने लगा।

तेभागा की मांग 1940 में किसान सभा स्वीकार कर चुकी थी।

फिर व्यापक संघर्ष 1946 में क्यों शुरू हुआ?

इस प्रश्न पर इतिहासलेखन में आलोचना हुई है।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की ‘पीपुल्स वार’ नीति के कारण ब्रिटिश युद्ध प्रयास के प्रति उसका रुख बदल गया था। इससे कई उग्र किसान आंदोलनों को तत्काल आगे बढ़ाने की रणनीति प्रभावित हुई।

इस कारण आलोचक कहते हैं कि किसान सभा ने तेभागा को छह वर्ष तक टाला।

यह आलोचना पूरी तरह निराधार नहीं है।

लेकिन दूसरी तरफ इस अवधि में संगठन निर्माण, अकाल राहत और स्थानीय कृषि संघर्ष भी चल रहे थे।

इसलिए इसे केवल ‘नेतृत्व ने आंदोलन रोक दिया’ के सरल निष्कर्ष में नहीं बदला जाना चाहिए।

आंदोलन तीव्र होने पर कई जगह छोटे और मध्यम कृषक भी उसके विरोध में चले गए क्योंकि वे स्वयं कुछ भूमि बटाई पर देते थे।

बाद में कम्युनिस्ट नेतृत्व ने स्वीकार किया कि बड़े भू-अधिकारियों और छोटे जोतदारों के बीच पर्याप्त राजनीतिक भेद नहीं किया गया।

यह सामाजिक गठबंधन की महत्वपूर्ण रणनीतिक कमजोरी थी।

तेभागा लागू होने के बाद अगला कदम क्या होता?

क्या किसान जमीन पर स्वामित्व मांगता?

क्या जमींदारी तत्काल समाप्त की जाती?

क्या कृषि मजदूरों की अलग मांग जोड़ी जाती?

क्या किसान समितियां वैकल्पिक स्थानीय सत्ता बनतीं?

इन प्रश्नों पर पूरे आंदोलन में एक समान स्पष्ट कार्यक्रम नहीं था।

यही कारण है कि विभिन्न क्षेत्रों में संघर्ष अलग-अलग दिशा में विकसित हुआ।

कम्युनिस्ट नेतृत्व ने धर्म की तुलना में वर्ग को प्राथमिक राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश की।

लेकिन 1946–47 में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण इतना तीव्र था कि केवल आर्थिक कार्यक्रम से उसे पूरी तरह रोकना संभव नहीं हुआ।

तेभागा की ताकत यह थी कि उसने कई गांवों में इस विभाजन का प्रतिरोध किया।

उसकी सीमा यह थी कि वह पूरे बंगाल की राजनीतिक दिशा बदल नहीं सका।

तेभागा आंदोलन को जिस राजनीतिक समय में समझना चाहिए, वह असाधारण था।

16 अगस्त 1946 के ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के बाद कलकत्ता में भीषण सांप्रदायिक हिंसा हुई।

इसके बाद नोआखाली और बिहार की हिंसा ने हिंदू–मुस्लिम संबंधों को और बिगाड़ दिया।

1947 में विभाजन का प्रश्न निर्णायक बन चुका था।

इसी बीच बंगाल के कई गांवों में हिंदू और मुस्लिम किसान लाल झंडे के नीचे साथ खड़े थे।

यह कैसे संभव हुआ?

क्योंकि बर्गादार की आर्थिक समस्या धर्म नहीं पूछती थी।

जोतदार को आधी फसल देने वाला मुस्लिम किसान और हिंदू किसान दोनों एक जैसी कठिनाई से गुजर सकते थे।

यदि दोनों के उत्पादन संबंध समान हैं, तो साझा आर्थिक मांग पैदा हो सकती है।

यही किसान सभा की वर्गीय राजनीति का आधार था।

साझा नारा

तेभागा का नारा धार्मिक नहीं था।

हिंदू किसान या मुस्लिम किसान।

यह शब्द स्वयं वर्गीय राजनीतिक पहचान पैदा करता था।

यही आंदोलन की एकता का आधार बना।

साझा शहादत

दिनाजपुर में समीरुद्दीन जैसे मुस्लिम किसान और शिवराम मांझी जैसे आदिवासी कृषक एक ही आंदोलन में मारे गए।

खानपुर में विभिन्न धार्मिक और सामाजिक समुदायों के किसान पुलिस गोलीबारी के शिकार हुए।

इससे किसान सभा को यह दिखाने का शक्तिशाली प्रतीक मिला कि राज्य और कृषि शोषण के सामने गरीब किसान का साझा हित धार्मिक पहचान से बड़ा हो सकता है।

इतिहास को रोमानी रूप देना उचित नहीं होगा।

कुछ क्षेत्रों में सांप्रदायिक प्रचार ने किसान आंदोलन को कमजोर किया।

पचागढ़ में संपन्न मुस्लिम जोतदारों द्वारा मुस्लिम किसानों को आंदोलन से अलग रखने की कोशिश इसका उदाहरण है।

पूर्वी बंगाल की सामाजिक संरचना में धार्मिक और वर्गीय विभाजन कई बार एक-दूसरे पर चढ़ जाते थे।

इसलिए वर्गीय एकता का निर्माण कठिन और असमान था।

इस प्रश्न का उत्तर दो स्तरों पर देना चाहिए।

गांव और आंदोलन के स्तर पर — कई जगह हां

तेभागा ने अनेक क्षेत्रों में यह प्रमाणित किया कि ठोस आर्थिक संघर्ष हिंदू और मुस्लिम किसानों को एक साथ ला सकता है।

इनफ्लिबनेट की शैक्षणिक सामग्री स्पष्ट रूप से दर्ज करती है कि उत्तर बंगाल में दोनों समुदायों के बर्गादार राज्य दमन और जमींदारी प्रतिक्रिया के विरुद्ध एक साथ लड़े।

इस अर्थ में तेभागा सांप्रदायिक राजनीति के लिए वास्तविक चुनौती था।

पूरे बंगाल की राजनीति के स्तर पर — नहीं

1947 में विभाजन की राजनीति अंततः कहीं अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुई।

सांप्रदायिक हिंसा, जनसंख्या की असुरक्षा, पाकिस्तान और भारत के प्रश्न तथा सत्ता हस्तांतरण की राजनीति ने भूमि संघर्ष को पीछे धकेल दिया।

इसी अध्ययन में यह निष्कर्ष भी मिलता है कि विभाजन के आसपास फैले सांप्रदायिक उन्माद ने आंदोलन की गति को कमजोर किया।

इसलिए तेभागा ने सांप्रदायिकता को चुनौती दी, लेकिन उसे पराजित नहीं कर सका।

तेभागा से इसका सरल उत्तर नहीं मिलता।

किसान ने धर्म से पहले अपना आर्थिक हित चुना।

सांप्रदायिक पहचान वर्गीय एकता से अधिक शक्तिशाली बनी।

और पूरे बंगाल के राजनीतिक स्तर पर—

1947 तक धर्म आधारित राष्ट्रवाद ने वर्गीय किसान राजनीति को पीछे छोड़ दिया।

यही तेभागा का एक सबसे बड़ा ऐतिहासिक विरोधाभास है।

1946–47 में बंगाल के गरीब किसान के सामने राजनीतिक रूप से दो प्रकार की अपील मौजूद थीं।

तुम किसान हो; तुम्हारा विरोधी शोषक भूमि-संबंध है।

तुम हिंदू हो या मुस्लिम; तुम्हारा राजनीतिक भविष्य धार्मिक समुदाय से जुड़ा है।

तेभागा पहली राजनीति का सबसे शक्तिशाली ग्रामीण प्रयोग था।

विभाजन दूसरी राजनीति की ऐतिहासिक विजय बन गया।

लेकिन कहानी वहीं समाप्त नहीं हुई।

क्योंकि 1947 के बाद भारत और पूर्वी पाकिस्तान—दोनों में भूमि का प्रश्न फिर सामने आया।

1947 का बर्गादार विधेयक कानून नहीं बन पाया।

इस दृष्टि से किसान की तत्काल राजनीतिक जीत अधूरी थी।

लेकिन उसके बाद की घटनाएं अधिक महत्वपूर्ण हैं।

पश्चिम बंगाल में स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस सरकार को बर्गादारों और भूमि सुधार पर कानून लाने पड़े।

1950 का बर्गादार कानून,

1953 का एस्टेट अधिग्रहण कानून,

और 1955 का भूमि सुधार अधिनियम

उसी लंबे संघर्ष की संस्थागत अगली कड़ियां बने।

इसलिए 1947 में विधेयक विफल हुआ, लेकिन बर्गादार अधिकार का सिद्धांत राजनीतिक रूप से स्थायी हो गया।

एक व्यापक ऐतिहासिक दृष्टि से तेभागा को इस रूप में भी पढ़ा जा सकता है।

भारत का संविधान अभी बना नहीं था।

भूमि सुधार के आधुनिक राज्य कानून अभी आए नहीं थे।

फिर भी गरीब किसान कह रहा था—

उत्पादन में श्रम करने वाले व्यक्ति का न्यायपूर्ण अधिकार होना चाहिए।

बेदखली मनमानी नहीं होनी चाहिए।

राज्य को भूमि-संबंधों में हस्तक्षेप करना चाहिए।

इस अर्थ में तेभागा स्वतंत्र भारत के आगामी सामाजिक-आर्थिक नागरिक अधिकार विमर्श का पूर्वाभास था।

तेभागा के समय तीनों प्रमुख राजनीतिक धाराओं की स्थिति अलग थी।

कांग्रेस

राष्ट्रीय स्वतंत्रता और सत्ता हस्तांतरण उसका केंद्रीय प्रश्न था। भूमि सुधार उसके भविष्य के कार्यक्रम में था, लेकिन तेभागा उसका प्रत्यक्ष संगठित आंदोलन नहीं बना।

मुस्लिम लीग

वह बंगाल में सत्ता में थी। गरीब मुस्लिम कृषक उसके जनाधार का हिस्सा थे, लेकिन संपन्न भू-हितों का भी राजनीतिक प्रभाव था। इसलिए उसने सुधार प्रस्ताव और पुलिस दमन दोनों का सहारा लिया।

कम्युनिस्ट पार्टी

यही तीन अलग राजनीतिक दृष्टियां 1946–47 के बंगाल को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

नहीं। कानून राज्य बनाएगा।

खंड 11

विभाजन और आंदोलन का विघटन

तेभागा आंदोलन का सबसे सक्रिय चरण 1946–47 था, लेकिन उसका अंत किसी एक दिन, आदेश या पुलिस कार्रवाई से नहीं हुआ। वह धीरे-धीरे कमजोर पड़ा—दमन, गिरफ्तारियां, कटाई के मौसम की समाप्ति, नेतृत्व की रणनीतिक कठिनाइयों, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और सबसे बढ़कर बंगाल के विभाजन के कारण।

1947 का विभाजन तेभागा के लिए केवल राजनीतिक घटना नहीं था। उसने आंदोलन के पूरे सामाजिक और भौगोलिक आधार को दो हिस्सों में काट दिया।

दिनाजपुर विभाजित हो गया।

जलपाईगुड़ी और पश्चिमी क्षेत्रों का एक हिस्सा भारत में रहा।

रंगपुर, राजशाही, जेसोर और खुलना जैसे बड़े आंदोलन क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान में चले गए।

किसान सभा और कम्युनिस्ट संगठन भी अब दो राज्यों और शीघ्र ही दो अलग देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं के अधीन हो गए।

इसीलिए तेभागा के इतिहास को 1947 पर समाप्त मानना गलत है। अधिक सही होगा कि—

1947 में एक अखिल-बंगाल किसान आंदोलन का एकीकृत चरण समाप्त हुआ और उसकी विरासत दो अलग राजनीतिक धाराओं में बंट गई—पश्चिम बंगाल में भूमि सुधार और पूर्वी पाकिस्तान में नए बर्गादार तथा आदिवासी किसान संघर्षों के रूप में।

आंदोलन अपने चरम पर था, लेकिन राजनीति कहीं और जा रही थी

1947 के शुरुआती महीनों में तेभागा के कई क्षेत्र अभी भी अत्यंत सक्रिय थे।

जनवरी में बर्गादार विधेयक प्रकाशित हुआ था।

फरवरी में खानपुर जैसी गोलीबारी हुई।

मार्च और अप्रैल में जलपाईगुड़ी तथा दूसरे क्षेत्रों में संघर्ष जारी थे।

लेकिन इसी समय अखिल भारतीय राजनीति तेजी से सत्ता हस्तांतरण और विभाजन के प्रश्न पर केंद्रित हो रही थी।

यह आंदोलन के लिए बहुत प्रतिकूल परिस्थिति थी।

भूमि का सवाल समाप्त नहीं हुआ था, लेकिन राजनीतिक प्राथमिकता बदल गई थी।

सांप्रदायिक प्रश्न ने वर्गीय प्रश्न को पीछे धकेला

1946 में कलकत्ता, नोआखाली और बिहार की हिंसा के बाद बंगाल में धार्मिक असुरक्षा अत्यंत गहरी हो चुकी थी।

कई गांवों में जहां कुछ महीने पहले प्रश्न था—

वहीं 1947 में प्रश्न बनने लगा—

यह इलाका भारत में रहेगा या पाकिस्तान में?

यह राजनीतिक बदलाव तेभागा के लिए निर्णायक था।

बांग्लापीडिया के किसान आंदोलनों संबंधी विश्लेषण में भी यह तर्क मिलता है कि मुस्लिम किसानों के बीच पाकिस्तान का प्रश्न धीरे-धीरे तेभागा जैसी वर्गीय मांगों पर भारी पड़ने लगा। कुछ किसान एक ही समय तेभागा और पाकिस्तान दोनों के नारे लगाते थे, लेकिन 1947 आते-आते व्यापक मुस्लिम कृषक राजनीति में पाकिस्तान अधिक प्रभावशाली मुद्दा बन गया।

वर्गीय पहचान की सीमा

किसान सभा का तर्क था—

गरीब हिंदू और गरीब मुस्लिम बर्गादार का आर्थिक हित समान है।

लेकिन 1947 में धार्मिक समुदायों को अपनी सामूहिक सुरक्षा, संभावित सीमा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और भविष्य के राष्ट्र के प्रश्न अधिक तात्कालिक दिखाई देने लगे।

इससे यह स्पष्ट हुआ कि आर्थिक वर्गीय पहचान अत्यंत शक्तिशाली हो सकती है, लेकिन वह हमेशा अन्य सामाजिक पहचानों को स्थायी रूप से समाप्त नहीं करती।

तेभागा ने सांप्रदायिक विभाजन को चुनौती दी थी।

विभाजन ने तेभागा की वर्गीय एकता की सीमा दिखा दी।

आंदोलन पहले ही लगातार पुलिस कार्रवाई झेल रहा था।

जोतदार नई रणनीतियां अपना रहे थे।

और प्रस्तावित बर्गादार कानून अभी वास्तविक अधिकार नहीं बना था।

इस स्थिति में विभाजन संबंधी अनिश्चितता ने आंदोलन का मनोबल और सांगठनिक क्षमता दोनों कमजोर किए।

बांग्लापीडिया का समेकित विवरण स्पष्ट रूप से कहता है कि बंगाल विभाजन और नई सरकारों से जुड़ी अपेक्षाओं ने तेभागा के मूल आंदोलन को स्थगित करने की दिशा में धकेला।

यह एक महत्वपूर्ण सुधार है।

1947 के बाद भी कई क्षेत्रों में बर्गादार प्रश्न जीवित रहा।

कुछ स्थानों पर किसानों ने पहले प्राप्त तेभागा अधिकार बनाए रखने का प्रयास किया।

कुछ क्षेत्रों में स्थानीय समझौते जारी रहे।

और पूर्वी बंगाल में 1948–50 के दौरान तेभागा की नई लहर दिखाई दी। बांग्लापीडिया भी पूर्वी बंगाल के जिलों में 1948–50 के बीच आंदोलन के पुनरुत्थान को दर्ज करता है।

इसलिए 1947 को अंत नहीं बल्कि रूपांतरण कहना अधिक सही होगा।

15 अगस्त 1947 और नई सीमा

भारत के विभाजन के साथ बंगाल भी दो हिस्सों में विभाजित हुआ—

पश्चिम बंगाल — भारत में

पूर्वी बंगाल — पाकिस्तान में, जिसे बाद में पूर्वी पाकिस्तान कहा गया।

इस सीमा ने तेभागा आंदोलन के भूगोल को सीधा काट दिया।

आंदोलन के प्रमुख केंद्र दो तरफ चले गए

तेभागा के कई प्रमुख क्षेत्र भारत में रहे—

जलपाईगुड़ी, पश्चिमी दिनाजपुर, मालदा का बड़ा हिस्सा, 24 परगना, मिदनापुर।

दूसरी ओर प्रमुख आंदोलन क्षेत्र पाकिस्तान में चले गए—

रंगपुर, पूर्वी दिनाजपुर का बड़ा हिस्सा, राजशाही, जेसोर, खुलना, मयमनसिंह।

इससे जो आंदोलन कुछ महीने पहले एक ही प्रांतीय किसान सभा के नेटवर्क के भीतर चल रहा था, अब दो अलग-अलग राज्यों में बंट गया।

दिनाजपुर तेभागा का सबसे शक्तिशाली जिला था।

विभाजन ने इसे भी काट दिया।

एक हिस्सा पश्चिम बंगाल में आया और शेष पूर्वी पाकिस्तान में चला गया।

इसका प्रतीकात्मक महत्व बहुत बड़ा है।

जिस जिले में किसान एक ही संगठन, एक ही नारे और एक ही आर्थिक संबंध के आधार पर संघर्ष कर रहे थे, उनके बीच अब अंतरराष्ट्रीय सीमा थी।

और अभिलेखीय निरंतरता

सभी को प्रभावित किया।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राजनीतिक संरचना भी विभाजन के बाद नई परिस्थितियों में ढलने लगी।

पूर्वी पाकिस्तान में कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं को एक ऐसे राज्य में काम करना था जहां शीघ्र ही वामपंथी गतिविधियों पर कठोर दमन शुरू हो गया।

1949–50 में कम्युनिस्ट संगठनों पर राज्य की कार्रवाई लगातार बढ़ी। राजशाही जेल के खापरा वार्ड में अप्रैल 1950 की पुलिस गोलीबारी, जिसमें सात कम्युनिस्ट बंदी मारे गए, उस व्यापक दमन का संकेत थी।

पश्चिम बंगाल में भी कम्युनिस्ट राजनीति आसान नहीं थी, लेकिन संस्थागत लोकतांत्रिक राजनीति, किसान संगठनों और बाद की चुनावी शक्ति के लिए अपेक्षाकृत अलग अवसर मौजूद थे।

इसलिए एक ही तेभागा विरासत ने दोनों तरफ अलग रूप लिया।

विभाजन के बाद पश्चिम बंगाल में लाखों शरणार्थी पहुंचे।

इसने भूमि, आवास, रोजगार और राज्य की भूमिका के प्रश्न को नई दिशा दी।

आधुनिक इतिहासलेखन यह भी दिखाता है कि पूर्वी बंगाल से आए विस्थापितों ने पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट राजनीति को सामाजिक मुख्यधारा में लाने में महत्वपूर्ण योगदान किया।

इसका तेभागा से अप्रत्यक्ष लेकिन महत्वपूर्ण संबंध था।

किसान आंदोलन ने पहले ही—

का राजनीतिक प्रश्न उठा दिया था।

विभाजन के बाद शरणार्थी राजनीति ने इसी प्रकार के अधिकार प्रश्नों को नए शहरी और ग्रामीण संदर्भ में आगे बढ़ाया।

1947 के बाद पश्चिम बंगाल में तेभागा की मुख्य विरासत तीन क्षेत्रों में दिखाई देती है—

बर्गादार कानून, जमींदारी उन्मूलन, और दीर्घकालीन वामपंथी किसान राजनीति।

तत्काल आंदोलन कमजोर, प्रश्न जीवित

विभाजन और दमन के बाद तेभागा का मूल जनउभार कमजोर पड़ा।

लेकिन जिन क्षेत्रों में किसानों ने दो-तिहाई हिस्सा हासिल कर लिया था, वहां पुरानी व्यवस्था पूरी तरह सहज रूप से वापस नहीं आई।

बांग्लापीडिया के अनुसार अनुमानतः लगभग 40 प्रतिशत बटाईदार किसानों ने किसी न किसी स्तर पर तेभागा अधिकार प्राप्त किया था और कई जगह अवैध वसूलियों में कमी आई।

यह संख्या स्वयं एक अनुमान है, लेकिन वह आंदोलन की आंशिक व्यावहारिक सफलता का संकेत देती है।

तेभागा के कानूनी प्रभाव का सबसे प्रत्यक्ष प्रारंभिक परिणाम था—

West Bengal Bargadars Act, 1950।

भारत सरकार के आधिकारिक इंडिया कोड के अनुसार यह अधिनियम 15 मार्च 1950 को लागू हुआ।

इस कानून ने बर्गादार और भूमि स्वामी के बीच उत्पादन विभाजन को कानूनी ढांचे में रखा।

अधिनियम में यह भी निर्धारित किया गया कि बीज कौन देता है, खेती की लागत में किसका कितना योगदान है और उसी के अनुसार उपज का विभाजन कैसे होगा।

यह 1946 के सरल ‘दो-तिहाई बनाम एक-तिहाई’ सूत्र की हूबहू प्रतिलिपि नहीं था।

लेकिन इसका ऐतिहासिक अर्थ बड़ा था—

बर्गादार अब कानून की दृष्टि से अदृश्य कृषक नहीं रहा।

1950 का कानून महत्वपूर्ण था, लेकिन उसने बर्गादार की असुरक्षा समाप्त नहीं की।

कानून में भूमि स्वामी को कुछ परिस्थितियों में बर्गादार की खेती समाप्त करने के अधिकार भी दिए गए थे।

इसके अलावा कानून की वास्तविक प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर थी कि—

प्रशासन शिकायत स्वीकार करे,

और जोतदार बेदखली का रास्ता न खोज पाए।

यहीं कानून और जमीन की वास्तविकता के बीच पुराना अंतर बना रहा।

इसके बाद West Bengal Estates Acquisition Act, 1953 आया।

पश्चिम बंगाल सरकार के भूमि विभाग के अनुसार इस कानून ने जमींदारी व्यवस्था समाप्त करने, भूमि पर सीमा निर्धारित करने, अतिरिक्त भूमि राज्य में निहित करने और भूमिहीनों के बीच वितरण की दिशा में आधार तैयार किया।

यह तेभागा की मूल मांग से एक कदम आगे था।

1946 में किसान कह रहा था—

उपज में हमारा हिस्सा बढ़ाओ।

भूमि के मध्यस्थ अधिकार ही क्यों बने रहें?

इसके बाद West Bengal Land Reforms Act, 1955 ने भूमि सुधार, बर्गादार और अतिरिक्त भूमि संबंधी व्यवस्था को अधिक व्यापक कानूनी ढांचे में रखा। आधिकारिक इंडिया कोड इस कानून को पश्चिम बंगाल भूमि सुधार अधिनियम, 1955 के रूप में दर्ज करता है।

बाद के संशोधनों में बर्गादार की अवैध बेदखली के विरुद्ध पुनर्स्थापन जैसे प्रावधान भी विकसित हुए।

यहीं तेभागा के तत्काल संघर्ष और स्वतंत्र भारत की भूमि सुधार नीति के बीच स्पष्ट ऐतिहासिक कड़ी बनती है।

कानून बन जाने से ग्रामीण शक्ति-संबंध तुरंत नहीं बदले।

बर्गादारों का पंजीकरण अधूरा रहा।

बेनामी भूमि बनी रही।

जोतदार और भू-स्वामी कानूनी छिद्रों का उपयोग कर सकते थे।

स्थानीय प्रशासन में संपन्न कृषक वर्ग का प्रभाव था।

इसीलिए तेभागा का अधूरा प्रश्न 1960 और 1970 के दशकों में फिर राजनीतिक एजेंडे के केंद्र में आया।

और अंततः 1978 के बाद ऑपरेशन बर्गा ने बर्गादारों के बड़े पैमाने पर पंजीकरण की दिशा में कदम उठाया।

इसकी विस्तृत चर्चा अगले खंड में होगी।

विभाजन के बाद यह उम्मीद की जा सकती थी कि मुस्लिम बहुसंख्यक पूर्वी पाकिस्तान में गरीब मुस्लिम किसानों को भूमि सुधार से तुरंत बड़ी राहत मिलेगी।

लेकिन सामाजिक-आर्थिक संरचना इतनी सरल नहीं थी।

जमींदारी और जोतदारी संबंध सीमा बदलने से तुरंत समाप्त नहीं हुए।

बर्गादार और आदिवासी कृषकों की समस्याएं बनी रहीं।

इसलिए तेभागा का प्रश्न फिर उठा।

1948–50 की नई लहर

बांग्लापीडिया के अनुसार पूर्वी बंगाल के कई जिलों में 1948 से 1950 के बीच तेभागा संघर्ष की नई लहर सामने आई।

लेकिन अब राजनीतिक परिस्थिति बदल चुकी थी।

1946 में आंदोलन ब्रिटिश भारतीय बंगाल की किसान राजनीति था।

1948 के बाद पाकिस्तान सरकार इसे कई बार कम्युनिस्ट और यहां तक कि भारतीय प्रभाव से जुड़ी सुरक्षा चुनौती के रूप में देखने लगी।

इससे आंदोलन के खिलाफ सरकारी दमन का स्वरूप और कठोर हो गया।

पूर्वी पाकिस्तान का अनुभव एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य सिद्ध करता है—

धार्मिक आधार पर नया राष्ट्र बनने से भूमि-संबंध स्वतः नहीं बदलते।

मुस्लिम बर्गादार और मुस्लिम जोतदार के आर्थिक हित एक समान नहीं थे।

इसी प्रकार संथाल और अन्य आदिवासी कृषकों की भूमि समस्या भी पाकिस्तान निर्माण से समाप्त नहीं हुई।

यही अंतर्विरोध नाचोल में सबसे तीव्र रूप में सामने आया।

पूर्वी बंगाल में भूमि सुधार का सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक कानून East Bengal State Acquisition and Tenancy Act, 1950 बना।

बांग्लापीडिया तेभागा और उसके बाद के किसान संघर्षों को इस कानून के निर्माण पर प्रभाव डालने वाले कारकों में रखता है।

इस कानून का मूल उद्देश्य जमींदारी मध्यस्थ संरचना को समाप्त करके राज्य और वास्तविक कृषक के बीच अधिक प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करना था।

इस प्रकार विभाजन के दोनों ओर राज्य अंततः उसी प्रश्न पर कानून बना रहे थे जिसे किसान 1946 में खेत में उठा चुका था।

नाचोल कहां था?

नाचोल तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के राजशाही जिले का क्षेत्र था, जो आज बांग्लादेश के चापाईनवाबगंज जिले में आता है।

यह क्षेत्र बड़ी संथाल कृषक आबादी के कारण विशेष महत्व रखता था।

कई संथाल किसान जोतदारों की भूमि पर बटाई या श्रम संबंधों के तहत खेती करते थे।

तेभागा की मांग यहां सीधी प्रासंगिकता रखती थी।

बांग्लापीडिया के अनुसार दिसंबर 1949 और 1950 के शुरुआती महीनों में नाचोल थाना क्षेत्र के कई गांवों—घासुरा, चांदीपुर, केंदुआ, रौतारा, जगदई, धरोल, श्यामपुरा और नापितपारा सहित—के किसानों ने जोतदारों को पुरानी व्यवस्था के अनुसार भुगतान करना बंद कर दिया।

अधियारों की प्रमुख मांग थी—

उन्हें फसल का दो-तिहाई हिस्सा मिले।

स्पष्ट है कि यह 1946 के तेभागा का ही मूल आर्थिक सूत्र था।

नाचोल अधिक उग्र क्यों हुआ?

1949–50 की परिस्थिति 1946 से अलग थी।

अब कम्युनिस्ट संगठन पर कठोर सरकारी दबाव था।

संथाल कृषकों में पुराने भूमि असंतोष भी मौजूद थे।

और प्रशासन इस आंदोलन को केवल कृषि विवाद नहीं बल्कि राजनीतिक विद्रोह की दृष्टि से देखने लगा।

इसके परिणामस्वरूप संघर्ष शीघ्र हिंसक हुआ।

बांग्लापीडिया के अनुसार विभिन्न स्थानों पर हिंसा हुई, पुलिसकर्मी मारे गए और कुछ जोतदारों के घर लूटे गए। इसके बाद पुलिस और भू-स्वामी वर्ग की कठोर प्रतिक्रिया ने संघर्ष को और उग्र बना दिया।

नाचोल किसान कार्रवाई समितियों के प्रमुख नेताओं में थे—

इला मित्र, अनिमेष लाहिड़ी, अजहर शेख, वृंदावन साहा

और अनेक स्थानीय किसान कार्यकर्ता।

यह तथ्य महत्वपूर्ण है।

नाचोल केवल इला मित्र का व्यक्तिगत विद्रोह नहीं था।

उसके पीछे स्थानीय संथाल और गरीब कृषकों का संगठित आंदोलन था।

नाचोल में 5 जनवरी 1950 को किसानों और पुलिस के बीच गंभीर संघर्ष हुआ।

इसके बाद पाकिस्तान सरकार ने क्षेत्र में बड़ा पुलिस बल भेजा।

इला मित्र पर बांग्लापीडिया के विवरण के अनुसार लगभग 2,000 सशस्त्र पुलिसकर्मी नाचोल भेजे गए। इसके बाद कई गांवों में दमन हुआ, घर जलाए गए और ग्रामीण मारे गए।

यह नाचोल संघर्ष का निर्णायक मोड़ था।

दमन का एक दीर्घकालीन परिणाम यह हुआ कि अनेक संथाल परिवार क्षेत्र छोड़कर भारत की तरफ चले गए।

नाचोल संबंधी बांग्लापीडिया विवरण बताता है कि पुलिस कार्रवाई और मुकदमों से बचने के लिए बड़ी संख्या में संथाल कृषकों ने गांव छोड़ दिए और भारत चले आए।

इस प्रकार विभाजन की सीमा, जिसने 1947 में तेभागा संगठन को काटा था, तीन वर्ष बाद किसान शरण के मार्ग में बदल गई।

नाचोल विद्रोह दमन से समाप्त हुआ, लेकिन उसके बाद भूमि कानून में परिवर्तन आया।

1950 के पूर्वी बंगाल राज्य अधिग्रहण एवं काश्तकारी कानून के अंतर्गत संथाल किसानों को भूमि संबंधी अधिक अधिकार मिले और नियमित कृषकों के समान निर्धारित दर पर नकद लगान देने की व्यवस्था की दिशा बनी।

अर्थात फिर वही पैटर्न दिखाई देता है—

लेकिन राज्य को भूमि-संबंध बदलने पड़े।

तेभागा की विभाजन-पश्चात विरासत की सबसे प्रसिद्ध व्यक्तिगत कहानी इला मित्र की है।

उनका नाचोल से संबंध केवल प्रतीकात्मक नहीं था।

उन्होंने स्थानीय कृषकों—विशेषकर संथाल किसानों—के संगठन में सक्रिय भूमिका निभाई और आंदोलन की प्रमुख नेताओं में शामिल हुईं।

गिरफ्तारी

5 जनवरी 1950 के संघर्ष और उसके बाद की पुलिस कार्रवाई के दौरान इला मित्र गिरफ्तारी से बचने का प्रयास कर रही थीं।

लेकिन उन्हें पकड़ लिया गया।

बांग्लापीडिया के अनुसार गिरफ्तारी के बाद उन्हें 21 जनवरी 1950 को राजशाही केंद्रीय कारागार भेजा गया।

इला मित्र के साथ हिरासत में किए गए व्यवहार ने नाचोल आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय और उपमहाद्वीपीय स्तर पर प्रसिद्ध बना दिया।

उनके अपने बयान और बाद के ऐतिहासिक विवरणों में गंभीर शारीरिक तथा यौन यातना के आरोप सामने आए।

यह प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण है कि दमन केवल राजनीतिक संगठन को तोड़ने की कोशिश नहीं था।

महिला राजनीतिक नेता के विरुद्ध राज्य हिंसा में लैंगिक अपमान और यातना भी शामिल हो सकती थी।

शोधपूर्ण प्रस्तुति में इन विवरणों को सनसनीखेज रूप देने के बजाय मानवाधिकार और राज्य दमन के संदर्भ में रखा जाना चाहिए।

इला मित्र पर गंभीर राजनीतिक आरोप लगाए गए।

बांग्लापीडिया के अनुसार उन पर राजद्रोह संबंधी आरोप में मुकदमा चला और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

नाचोल के अन्य नेताओं को भी लंबी सजा मिली।

यह पाकिस्तान राज्य द्वारा किसान संघर्ष को साधारण आर्थिक विवाद के बजाय राजनीतिक सुरक्षा प्रश्न के रूप में देखने का संकेत था।

जेल में इला मित्र का स्वास्थ्य अत्यंत खराब हो गया।

1954 में पूर्वी बंगाल की संयुक्त मोर्चा सरकार ने उन्हें उपचार के लिए पैरोल पर कलकत्ता भेजने की अनुमति दी।

इसके बाद वह वापस पूर्वी पाकिस्तान नहीं लौटीं और पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट राजनीति में सक्रिय रहीं। बाद में वह कई बार पश्चिम बंगाल विधानसभा की सदस्य भी चुनी गईं।

इस प्रकार उनका जीवन स्वयं विभाजित बंगाल के किसान इतिहास को जोड़ता है—

1940 के दशक का बंगाल,

पूर्वी पाकिस्तान का नाचोल,

और स्वतंत्र भारत की पश्चिम बंगाल राजनीति।

उनकी भूमिका को ठीक ढंग से समझना जरूरी है।

इला मित्र को सीधे 1946 के मूल तेभागा आंदोलन की सबसे बड़ी केंद्रीय नेता कहना ऐतिहासिक सरलीकरण होगा।

इला मित्र तेभागा की पूर्वी बंगाल में विभाजन-पश्चात निरंतरता की सबसे प्रसिद्ध नेता थीं।

उनका नाचोल संघर्ष दिखाता है कि राजनीतिक सीमा खींचने से कृषि संरचना नहीं बदलती।

वही दो-तिहाई मांग नई राष्ट्रीय परिस्थिति में फिर उठी।

तेभागा पर विभाजन के प्रभाव को केवल संगठनात्मक विभाजन तक सीमित नहीं रखना चाहिए।

उसने कम-से-कम पांच स्तरों पर आंदोलन को प्रभावित किया।

पहला — भौगोलिक एकता

एक ही कृषि क्षेत्र दो देशों में बंट गया।

दूसरा — संगठनात्मक नेटवर्क

किसान सभा और कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं का संपर्क बाधित हुआ।

तीसरा — सांप्रदायिक वर्गीय एकता

हिंदू–मुस्लिम बर्गादारों की साझा पहचान पर राष्ट्रीय विभाजन हावी हुआ।

चौथा — राजनीतिक प्राथमिकता

भूमि के प्रश्न की जगह शरणार्थी, सीमा, नागरिकता और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे प्रश्न केंद्र में आ गए।

पांचवां — अलग राज्य नीति

भारत और पाकिस्तान ने भूमि सुधार के अलग-अलग कानूनी और राजनीतिक रास्ते अपनाए।

इसीलिए 1947 तेभागा के इतिहास का वास्तविक विभाजन-बिंदु है।

यह इस खंड का दूसरा महत्वपूर्ण निष्कर्ष है।

दोनों देशों में राज्य को भूमि संबंधों में हस्तक्षेप करना पड़ा।

West Bengal Bargadars Act, 1950, Estates Acquisition Act, 1953, और आगे Land Reforms Act, 1955 आए।

East Bengal State Acquisition and Tenancy Act, 1950

ने मध्यस्थ भू-अधिकारों और कृषक संबंधों में बड़ा परिवर्तन किया; बांग्लापीडिया तेभागा और उसके बाद के संघर्षों के प्रभाव को इस प्रक्रिया से जोड़ता है।

इस अर्थ में तेभागा की संस्थागत विरासत विभाजन के दोनों ओर दिखाई देती है।

नाचोल इसका प्रमाण है।

खंड 12

स्वतंत्र भारत में प्रभाव

तेभागा आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण दीर्घकालीन प्रभाव यह था कि उसने बर्गादार के प्रश्न को बंगाल की राजनीति में स्थायी बना दिया। 1946–47 में आंदोलन दब गया, विभाजन ने उसके भूगोल और संगठन को तोड़ दिया, और प्रस्तावित बर्गादार विधेयक कानून नहीं बन सका। फिर भी स्वतंत्र भारत की पश्चिम बंगाल सरकार भूमि-संबंधों को उसी रूप में बनाए नहीं रख सकी।

तेभागा ने तीन विचार स्थापित कर दिए थे—

पहला, बर्गादार केवल अस्थायी खेत-मजदूर नहीं है; उसका खेती से वास्तविक और संरक्षित संबंध है।

दूसरा, उपज में वास्तविक कृषक का हिस्सा कानून द्वारा सुरक्षित होना चाहिए।

तीसरा, भूमि पर मध्यस्थ और अर्ध-सामंती नियंत्रण को राज्य नीति का विषय बनाना पड़ेगा।

इसीलिए स्वतंत्र पश्चिम बंगाल का भूमि-सुधार इतिहास तेभागा से अलग नहीं पढ़ा जा सकता। 1950 के बर्गादार कानून से लेकर 1953 के जमींदारी उन्मूलन, 1955 के भूमि सुधार कानून, 1967–69 की संयुक्त मोर्चा सरकारों, और अंततः 1978 के ऑपरेशन बर्गा तक एक स्पष्ट ऐतिहासिक निरंतरता दिखाई देती है।

तेभागा तत्काल अपनी पूरी मांग लागू नहीं करा सका, लेकिन उसने भविष्य की राजनीति की दिशा बदल दी।

स्वतंत्रता के बाद पहला कानूनी उत्तर

स्वतंत्रता के बाद पश्चिम बंगाल सरकार के सामने बर्गादार प्रश्न को अनदेखा करना संभव नहीं था। इसका पहला प्रमुख कानूनी परिणाम था—

West Bengal Bargadars Act, 1950।

यह कानून 15 मार्च 1950 से प्रभावी हुआ। भारत सरकार के इंडिया कोड में यह अधिनियम आधिकारिक रूप से उपलब्ध है और उसका उद्देश्य बर्गादार तथा भूमि स्वामी के बीच उपज-विभाजन और संबंधित अधिकारों को कानूनी ढांचे में लाना था।

यह तेभागा की सीधी राजनीतिक विरासत थी।

कानून का मूल सिद्धांत

1950 के कानून में उपज का हिस्सा इस बात से जोड़ा गया कि बीज, पशु, औजार और अन्य उत्पादन साधन कौन उपलब्ध कराता है।

जहां बर्गादार प्रमुख कृषि लागत और श्रम वहन करता था, वहां उसके हिस्से को अधिक सुरक्षा दी गई।

यह तेभागा के मूल आर्थिक तर्क से जुड़ा था—

जो उत्पादन का बड़ा बोझ उठाता है, उसका हिस्सा भी बड़ा होना चाहिए।

लेकिन यह कानून 1946 के आंदोलन के सरल नारे—

दो हिस्से किसान के, एक हिस्सा भूमि नियंत्रक का

की यांत्रिक प्रतिलिपि नहीं था।

बर्गादार की कानूनी पहचान

इस कानून की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल प्रतिशत तय करना नहीं थी।

उसने बर्गादार को कानून की दृष्टि से एक अलग कृषक श्रेणी के रूप में स्वीकार किया।

यह परिवर्तन अत्यंत महत्वपूर्ण था।

तेभागा से पहले बर्गादार अक्सर ऐसा कृषक था जिसकी खेती पर वास्तविक निर्भरता बहुत अधिक थी लेकिन कानूनी स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर।

अब राज्य ने मान लिया कि—

उसके संबंध को दर्ज करना होगा,

उपज का बंटवारा विनियमित करना होगा,

और बेदखली जैसे प्रश्न को कानून के अंतर्गत लाना होगा।

यह अपने आप में तेभागा की बड़ी राजनीतिक सफलता थी।

यहीं स्वतंत्र भारत की भूमि सुधार राजनीति की सबसे बड़ी समस्या सामने आई।

कानून बनना एक बात था।

गांव में उसे लागू करना दूसरी।

बर्गादार के सामने कई व्यावहारिक कठिनाइयां थीं—

लिखित अनुबंध नहीं था,

स्थानीय अधिकारी भूमि स्वामी से प्रभावित हो सकता था,

बर्गादार शिकायत करने से डर सकता था,

और भूमि स्वामी अगले मौसम में उसे खेत न देने की धमकी दे सकता था।

इसलिए कानूनी अधिकार का बड़ा हिस्सा कागज पर रह सकता था।

1950 का बर्गादार कानून बर्गादारी संबंध को अलग से संबोधित करता था, लेकिन भूमि-सुधार का प्रश्न उससे कहीं व्यापक था।

इस दिशा में अगला महत्वपूर्ण पड़ाव था—

West Bengal Estates Acquisition Act, 1953

West Bengal Land Reforms Act, 1955।

1953 का कानून — मध्यस्थ संरचना पर प्रहार

पश्चिम बंगाल सरकार के भूमि एवं भूमि सुधार विभाग के आधिकारिक विवरण के अनुसार 1953 का एस्टेट अधिग्रहण कानून जमींदारी तथा अन्य मध्यस्थ भू-अधिकार समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था। इसका उद्देश्य बड़े मध्यस्थ अधिकारों को राज्य में निहित करना और भूमि पर अधिक प्रत्यक्ष कृषक संबंध स्थापित करना था।

यह तेभागा से अधिक व्यापक था।

1953 का कानून पूछ रहा था—

जमीन पर मध्यस्थ अधिकार बने ही क्यों रहें?

1955 का भूमि सुधार कानून

इसके बाद West Bengal Land Reforms Act, 1955 ने कृषि भूमि, बर्गादार, भूमि सीमा और अतिरिक्त भूमि संबंधी व्यवस्था को अधिक व्यापक विधायी ढांचे में रखा। इंडिया कोड में यह कानून आधिकारिक रूप से उपलब्ध है।

इससे भूमि सुधार के तीन बड़े लक्ष्य सामने आए—

बर्गादारों की सुरक्षा,

और अतिरिक्त भूमि के पुनर्वितरण की संभावना।

यह स्वतंत्र भारत में बंगाल की कृषि संरचना बदलने की मुख्य कानूनी नींव बनी।

तेभागा से यहां तक क्या बदला?

1946 में किसान स्वयं धान का हिस्सा बदल रहा था।

1955 तक राज्य कह रहा था कि—

सभी वैध सार्वजनिक नीति के विषय हैं।

यही तेभागा की ऐतिहासिक उपलब्धि थी।

उसने भूमि संबंध को ‘निजी मालिक और किसान का मामला’ बने रहने नहीं दिया।

यदि 1950, 1953 और 1955 में महत्वपूर्ण कानून आ चुके थे, तो फिर 1978 में ऑपरेशन बर्गा की आवश्यकता क्यों पड़ी?

यही प्रश्न स्वतंत्र भारत के भूमि सुधार की वास्तविक सीमा खोलता है।

पहली समस्या — बर्गादार का पंजीकरण नहीं

कई बर्गादारों का नाम आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज नहीं था।

कृषि संबंध प्रायः मौखिक थे।

इससे भूमि स्वामी बाद में कह सकता था—

वह बर्गादार नहीं, केवल मजदूर है।

वह इस वर्ष पहली बार खेत पर आया है।

यदि बर्गादार की स्थिति दर्ज ही नहीं है तो कानूनी सुरक्षा का उपयोग कठिन हो जाता है।

दूसरी समस्या — बेदखली

भूमि स्वामी के पास सबसे बड़ा हथियार था—

अगले मौसम में जमीन न देना।

यदि बर्गादार कानून लागू करवाने की कोशिश करे तो उसे चुपचाप हटा दिया जा सकता था।

इसलिए किसान के सामने दुविधा थी—

आज अधिकार मांगें और कल खेत खो दें,

या कम हिस्सा स्वीकार करके खेती जारी रखें।

यही सामाजिक शक्ति कानून को कमजोर करती थी।

तीसरी समस्या — प्रशासनिक निष्क्रियता

भूमि सुधार के लिए केवल कानून पर्याप्त नहीं होता।

स्थानीय तहसील, राजस्व अधिकारी, सर्वेक्षण, रिकॉर्ड और विवाद निपटान तंत्र सक्रिय होना चाहिए।

यदि प्रशासन भूमि स्वामी के प्रभाव में हो या मामले लंबित रखे तो बर्गादार का अधिकार व्यवहार में कमजोर पड़ सकता है।

यही कारण था कि पश्चिम बंगाल में भूमि सुधार की सफलता लंबे समय तक असमान रही।

चौथी समस्या — बेनामी और कृत्रिम विभाजन

भूमि सीमा से बचने के लिए अतिरिक्त जमीन रिश्तेदारों, आश्रितों अथवा अन्य नामों में दिखाने जैसी प्रवृत्तियां सामने आईं।

इसी प्रकार भूमि को छोटे हिस्सों में विभाजित दिखाकर सीमा कानून से बचने की कोशिश की जा सकती थी।

इससे राज्य के लिए वास्तविक अतिरिक्त भूमि पहचानना कठिन होता था।

पांचवीं समस्या — ग्रामीण शक्ति संबंध

कानून आधुनिक हो गया था।

लेकिन गांव की सामाजिक संरचना तुरंत आधुनिक नहीं हुई।

और सामाजिक प्रतिष्ठा

गरीब बर्गादार उससे केवल जमीन के लिए नहीं, जीवन के कई दूसरे हिस्सों में भी निर्भर हो सकता था।

इसलिए औपचारिक कानूनी समानता वास्तविक सामाजिक समानता में तुरंत नहीं बदलती।

1960 के दशक तक पश्चिम बंगाल की राजनीति में भूमि-सुधार प्रश्न पुनः तीखा हुआ।

1967 में पहली संयुक्त मोर्चा सरकार बनी।

इसमें वामपंथी दलों की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

यहीं हरे कृष्ण कोनार का महत्व सामने आता है।

हरे कृष्ण कोनार और भूमि सुधार

भूमि एवं भूमि राजस्व मंत्री के रूप में कोनार ने प्रशासन को अतिरिक्त और बेनामी भूमि की पहचान तथा कब्जे की दिशा में सक्रिय किया।

उनकी राजनीति स्पष्ट थी—

भूमि सुधार केवल कागजी कानून से नहीं होगा।

राज्य मशीनरी को गांव में जाकर उसे लागू करना होगा।

बाद के शोध में 1967 और 1969 की संयुक्त मोर्चा सरकारों के भूमि कार्यक्रम को पश्चिम बंगाल के भूमि सुधार इतिहास की निर्णायक पूर्वपीठिका माना गया है।

किसान संगठन को राज्य नीति से जोड़ना

संयुक्त मोर्चा काल में एक नया मॉडल दिखाई देता है।

1946 में किसान सभा राज्य के बाहर से दबाव बना रही थी।

1967 के बाद वही व्यापक वामपंथी किसान राजनीति आंशिक रूप से राज्य सत्ता में पहुंच चुकी थी।

क्या आंदोलन की मांग को प्रशासनिक नीति में बदला जा सकता है?

यहीं तेभागा की स्मृति राजनीतिक संसाधन बनी।

1960 के दशक के उत्तरार्ध में अतिरिक्त और बेनामी जमीन पर कब्जे के अनेक अभियान हुए।

इन कार्रवाइयों में किसान संगठनों ने प्रशासन पर दबाव बनाया कि कानून के तहत राज्य में निहित होने योग्य भूमि की पहचान की जाए और भूमिहीनों को दी जाए।

तेभागा की तुलना में यह नया चरण था।

1946 में संघर्ष मुख्यतः फसल पर था।

जमीन किसके कब्जे में होगी

1967 का नक्सलबाड़ी विद्रोह भी उत्तर बंगाल के उसी व्यापक भूमि-संघर्ष क्षेत्र में उभरा जहां तेभागा की पुरानी स्मृति मौजूद थी।

लेकिन दोनों आंदोलनों की रणनीति अलग थी।

तेभागा संगठित व्यापक बर्गादार आंदोलन था।

नक्सलबाड़ी ने सशस्त्र क्रांतिकारी रास्ता अपनाया।

फिर भी दोनों के पीछे साझा प्रश्न था—

ग्रामीण भूमि-सत्ता किसके हाथ में रहेगी?

इसलिए तेभागा और नक्सलबाड़ी को समान आंदोलन नहीं कहा जा सकता, लेकिन उन्हें पूरी तरह असंबद्ध भी नहीं माना जा सकता।

1977 में पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सरकार सत्ता में आई।

इसके बाद भूमि सुधार राज्य नीति की सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं में शामिल हुआ।

इस चरण में दो बड़े कार्यक्रम विशेष रूप से उल्लेखनीय थे—

अतिरिक्त भूमि का वितरण

बर्गादारों का व्यापक पंजीकरण।

दूसरे कार्यक्रम को ही प्रसिद्ध नाम मिला—

वाम मोर्चा के पास एक राजनीतिक लाभ था—

उसके पास गांवों में लंबे समय से सक्रिय किसान संगठनों का नेटवर्क था।

यानी प्रशासन और किसान संगठन के बीच वह दूरी कम थी जो पहले भूमि सुधार लागू करने में समस्या बनती थी।

पंचायत व्यवस्था भी इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी।

स्थानीय राजनीतिक संगठन बर्गादारों की पहचान और पंजीकरण में सक्रिय हुए।

यहीं राज्य नीति और जनसंगठन का मेल दिखाई देता है।

ऑपरेशन बर्गा क्या था?

1978 के आसपास पश्चिम बंगाल सरकार ने बर्गादारों के अधिकार लागू करने के लिए एक बड़े प्रशासनिक अभियान की शुरुआत की, जिसे ऑपरेशन बर्गा कहा गया।

इसका मुख्य उद्देश्य था—

बर्गादारों की पहचान,

उनका आधिकारिक पंजीकरण,

और उपज में वैधानिक हिस्से को लागू कराना।

यह नया कानून कम और पहले से मौजूद भूमि सुधार कानून को व्यवहार में लागू करने का अभियान अधिक था।

सबसे बड़ा लक्ष्य — नाम दर्ज कराना

तेभागा से ऑपरेशन बर्गा की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी यही थी।

1946 का किसान कह रहा था—

मैं वास्तविक कृषक हूं।

1978 का राज्य कह रहा था—

तुम्हारा नाम रिकॉर्ड में दर्ज होना चाहिए।

यह साधारण प्रशासनिक कार्रवाई दिखाई दे सकती है, लेकिन ग्रामीण शक्ति-संबंध में इसका महत्व बहुत बड़ा था।

एक बार व्यक्ति सरकारी रिकॉर्ड में बर्गादार दर्ज हो गया तो भूमि स्वामी के लिए उसे मनमाने ढंग से हटाना अधिक कठिन हो गया।

शिविर पद्धति

ऑपरेशन बर्गा में अधिकारियों को कार्यालय में किसान की प्रतीक्षा करने के बजाय गांवों में ले जाने की नीति अपनाई गई।

स्थानीय स्तर पर शिविर आयोजित किए गए।

बर्गादारों की पहचान की गई।

और पंजीकरण की प्रक्रिया तेज की गई।

इससे गरीब कृषक को राजस्व कार्यालय, दस्तावेज और कानूनी प्रक्रिया की जटिलता से कुछ हद तक राहत मिली।

पश्चिम बंगाल भूमि सुधार कानून के तहत बर्गादार के हिस्से को उत्पादन साधनों के योगदान से जोड़ा गया।

जहां भूमि स्वामी खेती की लागत में बहुत कम योगदान करता था, वहां बर्गादार को बड़ा हिस्सा मिलता था।

यह सीधे उस आर्थिक तर्क की याद दिलाता है जो फ्लाउड आयोग और तेभागा आंदोलन दोनों में मौजूद था—

कृषि उत्पादन में जो अधिक योगदान देता है, उपज में उसका अधिकार अधिक होना चाहिए।

ऑपरेशन बर्गा की संख्या पर विभिन्न समयों और स्रोतों में अलग आंकड़े मिलते हैं, क्योंकि पंजीकरण कई वर्षों तक चलता रहा।

सामान्यतः लगभग 15 लाख के आसपास बर्गादारों के पंजीकरण का आंकड़ा व्यापक रूप से उद्धृत किया जाता है।

इस संख्या को किसी एक वर्ष का अंतिम स्थिर आंकड़ा नहीं समझना चाहिए।

अधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ऑपरेशन बर्गा ने बर्गादार पंजीकरण को कुछ लाख से बढ़ाकर व्यापक राज्यव्यापी अभियान बना दिया।

लेकिन तेभागा और ऑपरेशन बर्गा के बीच गहरा ऐतिहासिक संबंध है।

उपज में बड़ा हिस्सा और बर्गादार की शक्ति।

ऑपरेशन बर्गा ने दिया—

बेदखली से अधिक सुरक्षा,

और उपज में वैधानिक हिस्से को लागू कराने की प्रशासनिक क्षमता।

लेकिन एक बुनियादी अंतर बना रहा—

तेभागा भूमि के स्वामित्व का पूर्ण हस्तांतरण नहीं मांग रहा था, और ऑपरेशन बर्गा ने भी सामान्यतः बर्गादार को जमीन का मालिक नहीं बनाया।

इसलिए इसे ‘भूमि किसान को दे दी गई’ कहना गलत होगा।

ऑपरेशन बर्गा की कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां थीं।

बर्गादार का कानूनी दर्जा मजबूत हुआ।

मनमानी बेदखली कठिन हुई।

कृषि उत्पादन में किसान की सुरक्षा बढ़ी।

किसान को भूमि सुधार प्रशासन तक पहुंच मिली।

ग्रामीण सत्ता में बड़े भू-अधिकारियों का एकाधिकार कमजोर हुआ।

और वाम मोर्चा को गरीब तथा मध्यम कृषकों के बीच विशाल राजनीतिक आधार मिला।

इसीलिए ऑपरेशन बर्गा केवल प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं था।

वह पश्चिम बंगाल की ग्रामीण राजनीतिक पुनर्रचना था।

ऑपरेशन बर्गा और पश्चिम बंगाल भूमि सुधार के समर्थकों का तर्क रहा कि अधिक सुरक्षित बर्गादार खेती में निवेश और मेहनत करने के लिए अधिक प्रेरित हुआ, जिससे कृषि उत्पादन बढ़ा।

1980 के दशक में पश्चिम बंगाल में कृषि विकास की उल्लेखनीय अवधि दर्ज हुई और कई अध्ययनों ने भूमि सुधार, सिंचाई, पंचायत तथा तकनीकी परिवर्तनों के संयुक्त प्रभाव की चर्चा की।

लेकिन यहां सावधानी आवश्यक है।

कृषि वृद्धि को अकेले ऑपरेशन बर्गा का परिणाम कहना विवादास्पद है।

छोटे किसानों की भूमिका,

और बाजार परिस्थितियां

इसलिए भूमि सुधार को कई कारकों में से एक महत्वपूर्ण कारक मानना अधिक संतुलित होगा।

तेभागा की तरह ऑपरेशन बर्गा भी पूर्ण कृषि क्रांति नहीं था।

पहली सीमा — स्वामित्व नहीं

बर्गादार को खेती की सुरक्षा मिली, जमीन का पूर्ण स्वामित्व नहीं।

दूसरी सीमा — सभी बर्गादार दर्ज नहीं हुए

कई संभावित बर्गादार पंजीकरण से बाहर रहे।

तीसरी सीमा — कृषि मजदूर का प्रश्न

भूमिहीन खेतिहर मजदूर के लिए बर्गादार पंजीकरण का सीधा लाभ नहीं था।

चौथी सीमा — अत्यंत छोटे खेत

पश्चिम बंगाल में भूमि का अत्यधिक विखंडन दीर्घकालीन कृषि उत्पादकता की समस्या बना रहा।

पांचवीं सीमा — अनौपचारिक पट्टेदारी के नए रूप

बाद के दशकों में कृषि किरायेदारी के नए और अनौपचारिक रूप विकसित हुए, जिन पर पुराने बर्गादारी कानून सीधे लागू करना कठिन था।

तेभागा और ऑपरेशन बर्गा के बीच लगभग तीन दशक का अंतर था।

लेकिन दोनों को जोड़ने वाली राजनीतिक रेखा स्पष्ट है।

पहला चरण — 1946–47

किसान स्वयं दो-तिहाई फसल लागू करने की कोशिश करता है।

मुख्य प्रश्न: उत्पादन पर अधिकार।

दूसरा चरण — 1950

राज्य बर्गादार को कानूनी श्रेणी के रूप में स्वीकार करता है।

मुख्य प्रश्न: हिस्सेदारी और बेदखली का नियमन।

तीसरा चरण — 1953–55

जमींदारी मध्यस्थ संरचना और भूमि सीमा पर कानून आते हैं।

मुख्य प्रश्न: भूमि व्यवस्था का पुनर्गठन।

चौथा चरण — 1967–69

संयुक्त मोर्चा सरकार भूमि सुधार प्रशासन को सक्रिय करने की कोशिश करती है।

मुख्य प्रश्न: कानून का क्रियान्वयन और अतिरिक्त भूमि।

पांचवां चरण — 1977–78 के बाद

वाम मोर्चा ऑपरेशन बर्गा शुरू करता है।

मुख्य प्रश्न: वास्तविक बर्गादार को सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज करके अधिकार लागू कराना।

इन सभी चरणों को जोड़ने वाली केंद्रीय अवधारणा थी—

जमीन का संबंध उस व्यक्ति से मान्यता प्राप्त करे जो वास्तव में खेती करता है।

तेभागा में यह विचार राजनीतिक नारे के रूप में था।

भूमि सुधार कानूनों में वही अवधारणा विधायी भाषा में आई।

ऑपरेशन बर्गा में वह प्रशासनिक रिकॉर्ड बन गई।

यही तेभागा की सबसे बड़ी संस्थागत विरासत है।

तेभागा की ऐतिहासिक यात्रा एक व्यापक भारतीय लोकतांत्रिक प्रक्रिया का उदाहरण भी है।

1946 में राज्य जिस किसान कार्रवाई को कानून-व्यवस्था की समस्या मान रहा था, कुछ वर्षों बाद वही राज्य बर्गादार अधिकार का कानून बना रहा था।

और तीन दशकों बाद सरकारी अधिकारी गांवों में जाकर उन्हीं बर्गादारों का नाम रिकॉर्ड कर रहे थे।

यह सामाजिक आंदोलनों की शक्ति का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

हर आंदोलन तत्काल जीतता नहीं।

कई आंदोलन पहले राजनीतिक भाषा बदलते हैं।

1946 का आंदोलन केवल प्रतिशत की मांग नहीं कर रहा था।

उसकी वास्तविक चिंता थी—

बर्गादार की सुरक्षा।

यदि किसान हर वर्ष बेदखली के भय में रहे तो दो-तिहाई हिस्से का अधिकार स्थायी नहीं हो सकता।

ऑपरेशन बर्गा ने इसी सुरक्षा को व्यवहार में मजबूत किया।

इस दृष्टि से उसे तेभागा के अधूरे कार्यक्रम की एक संस्थागत पूर्ति माना जा सकता है।

क्योंकि भूमिहीन मजदूर, पूर्ण स्वामित्व, ग्रामीण असमानता और कृषि आय जैसे अनेक प्रश्न बाकी रहे।

भूमि सुधार का राजनीतिक प्रभाव अत्यंत गहरा था।

वाम मोर्चा ने ग्रामीण गरीब और छोटे कृषकों के बीच लंबे समय तक स्थिर समर्थन बनाया।

ने गांव के पुराने सत्ता-संतुलन को बदला।

इससे पश्चिम बंगाल में वामपंथी शासन की लंबी राजनीतिक स्थिरता समझने में सहायता मिलती है।

भूमि सुधार केवल आर्थिक कार्यक्रम नहीं था।

वह राजनीतिक गठबंधन निर्माण भी था।

इसका निश्चित प्रत्युत्तर इतिहास में संभव नहीं है, लेकिन इतना कहा जा सकता है कि तेभागा ने बंगाल के ग्रामीण क्षेत्रों में वामपंथी राजनीति को असाधारण सामाजिक पहचान दी।

गांवों में संगठन बनाया,

स्थानीय नेता पैदा किए,

किसान को वर्गीय भाषा दी,

और भूमि सुधार को राजनीतिक प्राथमिकता बनाया।

1947 के बाद यह सामाजिक पूंजी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।

आगे के दशकों में इसी विरासत पर वामपंथ ने ग्रामीण संगठन विकसित किया।

इस अर्थ में तेभागा पश्चिम बंगाल के बाद के राजनीतिक इतिहास का एक संस्थापक किसान क्षण था।

तेभागा का प्रभाव केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं था।

स्वतंत्र भारत में भूमि सुधार की राष्ट्रीय बहस में तीन प्रश्न केंद्रीय बने—

तेभागा इनमें विशेष रूप से दूसरे प्रश्न—काश्तकार और बर्गादार सुरक्षा—का सबसे शक्तिशाली ऐतिहासिक उदाहरण था।

उसने दिखाया कि केवल स्वामित्व के शीर्ष स्तर पर जमींदारी समाप्त करना पर्याप्त नहीं है।

यदि वास्तविक खेत जोतने वाले व्यक्ति का दर्जा सुरक्षित नहीं है तो ग्रामीण असमानता जारी रह सकती है।

तेभागा की दीर्घकालीन विरासत का एक विरोधाभास है।

1946 में किसान ने राज्य की अनुमति के बिना धान अपने खलिहान में रखा।

1978 में उसी किसान की अगली पीढ़ी राज्य अधिकारी के सामने अपना नाम बर्गादार रजिस्टर में दर्ज करा रही थी।

दोनों अलग दिखाई देते हैं।

लेकिन ऐतिहासिक रूप से दूसरा पहले के बिना समझ में नहीं आता।

अब केवल कानून नहीं था।

वह एक वास्तविक ऐतिहासिक प्रक्रिया है—

खंड 13

दूसरे किसान आंदोलनों से संबंध

तेभागा आंदोलन को अलग-थलग घटना के रूप में देखने से उसकी वास्तविक ऐतिहासिक महत्ता कम हो जाती है। वह भारतीय किसान संघर्षों की एक लंबी परंपरा का हिस्सा था—पाबना के रैयत आंदोलनों से लेकर बिहार के बकाश्त संघर्ष, महाराष्ट्र के वारली आंदोलन और हैदराबाद राज्य के तेलंगाना सशस्त्र विद्रोह तक।

इन आंदोलनों में समानता थी कि सभी ने किसी न किसी रूप में ग्रामीण सत्ता-संबंध को चुनौती दी। लेकिन उनकी मांगें, सामाजिक आधार, राजनीतिक नेतृत्व और संघर्ष की पद्धति अलग थीं।

मनमाना लगान मत बढ़ाओ।

बेदखल किसान को जमीन वापस दो।

बंधुआ श्रम और बेगार समाप्त करो।

उपज का दो-तिहाई हिस्सा वास्तविक कृषक को दो।

और कहीं आंदोलन इस बिंदु तक पहुंच गया कि किसान ने कहा—

जमीन स्वयं किसान के नियंत्रण में आएगी।

इसी क्रम में तेभागा का विशिष्ट स्थान समझ में आता है। वह बंगाल की पुरानी काश्तकारी राजनीति और स्वतंत्रता के अंतिम वर्षों की अधिक उग्र भूमि राजनीति के बीच एक सेतु था।

तेभागा और तेलंगाना लगभग एक ही ऐतिहासिक काल में उभरे और दोनों पर कम्युनिस्ट नेतृत्व तथा किसान संगठनों का गहरा प्रभाव था। अखिल भारतीय किसान सभा भी अपने इतिहास में तेभागा और तेलंगाना को द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के महान किसान संघर्षों की एक ही व्यापक धारा में रखती है।

फिर भी दोनों की प्रकृति में निर्णायक अंतर था।

समानता — ग्रामीण शोषण के विरुद्ध संघर्ष

तेभागा में केंद्रीय अंतर्विरोध था—

जोतदार बनाम बर्गादार।

तेलंगाना में मुख्य टकराव था—

देशमुख, जागीरदार और बड़े भू-स्वामी बनाम गरीब किसान तथा कृषि मजदूर।

दोनों क्षेत्रों में किसान केवल ब्रिटिश अथवा निजाम की राजनीतिक सत्ता से असंतुष्ट नहीं था। उसका तत्काल अनुभव स्थानीय ग्रामीण प्रभुत्व से था।

तेलंगाना में किसानों पर भारी लगान, अवैध वसूलियां और वेट्टी, अर्थात जबरन बेगार, का बोझ था। जेएनयू के अभिलेखीय विवरण में भी द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान करों और वेट्टी के बढ़ते बोझ को आंदोलन की पृष्ठभूमि का मुख्य तत्व बताया गया है।

तेभागा में यही भूमिका आधी उपज, कर्ज और बर्गादार की असुरक्षा ने निभाई।

समानता — कम्युनिस्ट संगठन

तेभागा का नेतृत्व बंगाल प्रांतीय किसान सभा और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ा था।

तेलंगाना में कम्युनिस्ट पार्टी तथा आंध्र महासभा की महत्वपूर्ण भूमिका थी। किसान सभा के अपने इतिहास के अनुसार आंदोलन ने भूमि वापसी, बेगार समाप्ति, न्यायपूर्ण लगान, कृषि मजदूरी और ऋण पर अत्यधिक ब्याज जैसे प्रश्नों को एक साझा कार्यक्रम में जोड़ा।

इसलिए दोनों आंदोलनों ने गरीब किसान को एक व्यापक वर्गीय राजनीतिक पहचान दी।

तेभागा की मूल मांग थी—

बर्गादार को दो-तिहाई उपज।

वह सामान्यतः जोतदार का अस्तित्व तत्काल समाप्त करने या पूरी जमीन जब्त करने का कार्यक्रम लेकर नहीं चला।

तेलंगाना इससे आगे गया।

वह कई क्षेत्रों में—

जबरन छीनी गई भूमि वापस लेने,

सरकारी और बड़े भू-स्वामियों की भूमि गरीब किसानों में बांटने,

और स्थानीय सामंती सत्ता को हटाने

की दिशा में बढ़ा। किसान सभा के विवरण में भूमि पुनर्वितरण तथा गरीब और भूमिहीन किसानों को जमीन देने को तेलंगाना कार्यक्रम का स्पष्ट हिस्सा बताया गया है।

इसलिए इसे इस तरह समझा जा सकता है—

तेभागा ने कृषि अधिशेष के वितरण को चुनौती दी।

तेलंगाना ने कृषि अधिशेष के साथ भूमि स्वामित्व और राजनीतिक सत्ता को भी चुनौती दी।

किसानों ने लाठी, धनुष-बाण और कृषि औजारों से पुलिस तथा जोतदारों का प्रतिरोध किया।

लेकिन उसने कोई व्यापक स्थायी गुरिल्ला सेना विकसित नहीं की।

तेलंगाना में स्थिति बिल्कुल अलग हुई।

जेएनयू के विवरण के अनुसार किसान और ग्रामीण समाज के सदस्य सशस्त्र गुरिल्ला दलों में संगठित हुए और लगभग 3,000 गांवों में समानांतर शासन संरचनाएं स्थापित हुईं।

अखिल भारतीय किसान सभा के अपने इतिहास में भी आंदोलन को करीब 4,000 गांवों तक फैलने वाला सशस्त्र गुरिल्ला संघर्ष बताया गया है। संख्या में स्रोतगत अंतर स्वयं यह बताता है कि अनुमान भिन्न हैं, लेकिन संघर्ष का पैमाना तेभागा से कहीं अधिक सैन्यीकृत था।

तेभागा ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रांत में चल रहा था, जहां प्रांतीय मंत्रिमंडल भारतीय नेताओं का था।

तेलंगाना हैदराबाद की रियासत में निजाम के शासन के विरुद्ध शुरू हुआ।

1948 में भारतीय सेना की ‘पुलिस कार्रवाई’ के बाद निजाम शासन समाप्त हो गया, लेकिन कम्युनिस्ट गुरिल्ला संघर्ष नई भारतीय सत्ता के विरुद्ध भी जारी रहा। जेएनयू आंदोलन को 1948–51 के सशस्त्र किसान विद्रोह के रूप में प्रस्तुत करता है, जबकि अन्य स्रोत उसकी शुरुआत 1946 से मानते हैं।

यानी तेलंगाना ने एक ही संघर्ष में दो राजनीतिक व्यवस्थाओं का सामना किया—

निजाम राज्य और बाद में भारतीय संघ।

तेभागा का ऐसा संक्रमण नहीं हुआ।

तेभागा का केंद्रीय सामाजिक आधार बर्गादार था।

तेलंगाना में गरीब किसान, किरायेदार और कृषि मजदूर सभी व्यापक रूप से सक्रिय थे।

तेलंगाना सरकार की शैक्षिक सामग्री भी 1940 के दशक के आंदोलनों में बंगाल के बटाईदारों और तेलंगाना के वेट्टी से पीड़ित जातीय समूहों तथा कृषकों को समान ग्रामीण उभार के अलग सामाजिक आधारों के रूप में रखती है।

इसलिए तेलंगाना सामाजिक कार्यक्रम में तेभागा से अधिक व्यापक था।

दोनों आंदोलनों में महिलाओं की बड़ी भूमिका थी।

तेभागा में महिलाएं फसल रक्षा, नारी वाहिनी और पुलिस प्रतिरोध में उतरीं।

तेलंगाना में भी महिलाओं ने गुरिल्ला संगठनों, संदेश तंत्र और ग्रामीण प्रतिरोध में भाग लिया।

अंतर यह था कि तेलंगाना की सैन्यीकृत परिस्थिति के कारण महिला भागीदारी भी कई जगह सीधे सशस्त्र प्रतिरोध से जुड़ी।

दोनों आंदोलनों ने स्वतंत्र भारत की भूमि सुधार बहस को प्रभावित किया।

अखिल भारतीय किसान सभा स्वयं तेभागा और तेलंगाना जैसे संघर्षों को उस किसान दबाव का हिस्सा मानती है जिसने स्वतंत्र भारत की सरकारों को जमींदारी उन्मूलन, काश्तकारी कानून और भूमि सीमा संबंधी सुधारों की तरफ धकेला।

लेकिन दोनों की विरासत अलग रही।

तेभागा की सीधी संस्थागत विरासत—

बर्गादार अधिकार और ऑपरेशन बर्गा

भूमि पुनर्वितरण, सशस्त्र किसान राजनीति और बाद की क्रांतिकारी वाम परंपरा

तेभागा और महाराष्ट्र का वारली किसान संघर्ष लगभग एक ही ऐतिहासिक दौर में उभरे।

वारली आंदोलन का मुख्य उभार 1945 में ठाणे जिले में हुआ। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के विवरण के अनुसार उसका सामाजिक आधार वारली आदिवासी समुदाय था और संघर्ष का केंद्र बंधुआ श्रम, बेगार तथा अत्यंत कम कृषि मजदूरी जैसे प्रश्न थे।

यानी दोनों आंदोलनों में ग्रामीण शोषण था, लेकिन शोषण का स्वरूप अलग था।

तेभागा में किसान दूसरे की भूमि पर फसल हिस्सेदारी के आधार पर खेती कर रहा था।

वारली क्षेत्रों में अनेक आदिवासी कृषक और मजदूर—

और बेहद कम मजदूरी जैसी व्यवस्थाओं से पीड़ित थे। भारत सरकार का विवरण विशेष रूप से लग्नगाड़ी और वेठी को संघर्ष की केंद्रीय समस्याओं में रखता है।

इसलिए दोनों आंदोलनों के प्रश्नों को इस तरह अलग किया जा सकता है—

तेभागा — फसल किस अनुपात में बंटे?

वारली — श्रम स्वतंत्र होगा या सामंती-बेगार संबंध में बंधा रहेगा?

वारली आंदोलन में गोदावरी परुलेकर और शामराव परुलेकर जैसे कम्युनिस्ट किसान नेता अत्यंत महत्वपूर्ण थे। संस्कृति मंत्रालय भी दोनों के नेतृत्व को आंदोलन के विस्तार में प्रमुख मानता है।

तेभागा की तुलना में वारली संघर्ष का नेतृत्व कुछ विशिष्ट व्यक्तियों से अधिक स्पष्ट रूप से जुड़ा दिखाई देता है।

तेभागा का नेतृत्व अधिक बहुकेंद्रीय था।

वारली मूलतः आदिवासी किसान आंदोलन था।

तेभागा में आदिवासी समुदाय महत्वपूर्ण थे, लेकिन पूरा आंदोलन आदिवासी नहीं था।

इसलिए वारली में आदिवासी पहचान और वर्गीय शोषण लगभग एक-दूसरे पर चढ़े हुए थे, जबकि तेभागा में सामाजिक आधार अधिक विविध था।

यह दोनों आंदोलनों की उल्लेखनीय समानता है।

वारली संघर्ष में पुरुष और महिला दोनों खेत तथा घास काटने के श्रम में लगे थे, इसलिए मजदूरी और बेगार का प्रश्न महिलाओं का भी प्रत्यक्ष आर्थिक प्रश्न था। सरकारी विवरण आंदोलन में किशोरियों से वृद्ध महिलाओं तक की सक्रिय और उग्र भागीदारी दर्ज करता है।

तेभागा में भी किसान महिलाएं प्रतिरोध की अग्रिम पंक्ति तक पहुंचीं।

इस दृष्टि से दोनों आंदोलनों ने भारतीय किसान राजनीति में ग्रामीण महिलाओं की सार्वजनिक भूमिका का विस्तार किया।

वारली और तेभागा दोनों अखिल भारतीय किसान सभा तथा कम्युनिस्ट किसान राजनीति के व्यापक उभार से जुड़े थे। AIKS अपनी स्वर्ण जयंती की ऐतिहासिक समीक्षा में वारली और तेभागा दोनों को द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के प्रमुख किसान संघर्षों में शामिल करती है।

इसलिए दोनों को स्थानीय घटनाओं के रूप में नहीं बल्कि अखिल भारतीय किसान उभार की अलग क्षेत्रीय अभिव्यक्तियों के रूप में समझना अधिक उचित है।

बिहार का बकाश्त आंदोलन तेभागा से लगभग एक दशक पहले तीव्र हुआ।

1936–38 के आसपास बिहार में जमींदारों द्वारा उन काश्तकारों को जमीन से बेदखल करने के विरुद्ध व्यापक संघर्ष हुआ जिनकी भूमि को जमींदार ‘बकाश्त’—अर्थात अपने प्रत्यक्ष काश्त की भूमि—के रूप में दर्ज या कब्जे में ले रहे थे।

भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अनुसार बकाश्त आंदोलन का मूल प्रश्न उन किरायेदार किसानों की बेदखली था जो वर्षों से जमीन जोतते आए थे।

बकाश्त किसान कह रहा था—

जिस जमीन पर मैं काश्तकार था, उससे मुझे बेदखल मत करो; मेरा काश्तकारी अधिकार वापस दो।

तेभागा किसान कह रहा था—

मैं जमीन जोत रहा हूं; मुझे फसल का दो-तिहाई हिस्सा दो और धान मेरे खलिहान में आएगा।

बकाश्त = भूमि पर काश्तकारी कब्जे का प्रश्न।

तेभागा = बटाई में कृषक हिस्सेदारी का प्रश्न।

लेकिन दोनों की गहरी समानता थी—

वास्तविक खेती करने वाले व्यक्ति का अधिकार।

बकाश्त आंदोलन की पृष्ठभूमि में 1930 के दशक की महामंदी और कृषि कीमतों का पतन था। बिहार सरकार के अभिलेखीय संग्रह और संस्कृति मंत्रालय दोनों बताते हैं कि किसानों की भुगतान क्षमता गिरने पर जमींदारों ने बकाया के कारण भूमि पर कब्जा और बेदखली बढ़ाई।

तेभागा में भी महामंदी, युद्धकालीन महंगाई और अकाल ने किसान संकट को गहरा किया।

इसलिए दोनों आंदोलन कृषि संकट के अलग-अलग चरणों की उपज थे।

बकाश्त आंदोलन में बिहार प्रांतीय किसान सभा और स्वामी सहजानंद सरस्वती की केंद्रीय भूमिका थी।

बिहार सरकार के डिजिटल अभिलेख में 1939 तक बकाश्त प्रश्न, किसान सत्याग्रह और स्वामी सहजानंद से जुड़ी बड़ी संख्या में प्रशासनिक फाइलें दर्ज हैं।

संस्कृति मंत्रालय के अनुसार बिहार प्रांतीय किसान सभा 1929 से विकसित हुई और बाद में बकाश्त भूमि संघर्षों में उसका नेतृत्व निर्णायक बना।

यही संगठनात्मक अनुभव 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना की पृष्ठभूमि बना।

तेभागा उसी अखिल भारतीय संगठन की बंगाल शाखा द्वारा एक दशक बाद चलाया गया।

इसलिए बकाश्त और तेभागा के बीच सीधी संगठनात्मक वंशावली है।

भूमि पर पुनः कब्जे का प्रयास,

संस्कृति मंत्रालय के विवरण में बड़ी किसान लामबंदी, सार्वजनिक बैठकें और जमींदारों तथा औपनिवेशिक प्रशासन के विरुद्ध भूमि अधिकार की मांग को केंद्रीय बताया गया है।

तेभागा इससे अधिक प्रत्यक्ष रूप से फसल की कार्रवाई पर आधारित था।

किसान ने नई व्यवस्था तुरंत लागू करने की कोशिश की।

इस अर्थ में तेभागा किसान सभा राजनीति का अधिक उग्र विकसित रूप दिखाई देता है।

बिहार में बकाश्त ने जमींदारी उन्मूलन और काश्तकारी सुरक्षा की राजनीतिक जमीन तैयार की।

संस्कृति मंत्रालय स्वयं इसे बिहार में बाद के भूमि सुधारों की महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि मानता है।

तेभागा ने पश्चिम बंगाल में वही भूमिका बर्गादार अधिकार के प्रश्न पर निभाई।

अर्थात दोनों आंदोलनों की तत्काल जीत सीमित रही, लेकिन दोनों ने स्वतंत्र भारत की भूमि सुधार नीति को प्रभावित किया।

तेभागा को अखिल भारतीय किसान सभा से अलग समझना संभव नहीं है।

11 अप्रैल 1936 को लखनऊ में स्थापित अखिल भारतीय किसान सभा का घोषित लक्ष्य किसानों को आर्थिक शोषण से मुक्त करना और उनकी तत्काल आर्थिक मांगों के लिए व्यापक संगठन बनाना था। AIKS के अपने ऐतिहासिक प्रस्ताव इस उद्देश्य को स्पष्ट रूप से दर्ज करते हैं।

तेभागा इसी कार्यक्रम का एक परिपक्व क्षेत्रीय परिणाम था।

AIKS ने किसान आंदोलनों को कम-से-कम चार चीजें दीं।

राष्ट्रीय मंच

बिहार, बंगाल, महाराष्ट्र, आंध्र, पंजाब और दूसरे क्षेत्रों के किसान नेताओं को एक साझा नेटवर्क मिला।

साझा राजनीतिक भाषा

लगान, कर्ज, जमींदारी, बेगार और भूमि अधिकार को अलग स्थानीय समस्याओं के बजाय राष्ट्रीय कृषक प्रश्न के रूप में देखा जाने लगा।

संगठन

प्रांतीय किसान सभाओं ने गांव तक समितियां बनाईं।

वैचारिक दिशा

किसान को केवल राष्ट्रीय स्वतंत्रता का समर्थक नहीं बल्कि अपने स्वतंत्र आर्थिक अधिकारों वाला राजनीतिक वर्ग मानने की धारणा मजबूत हुई।

किसान सभा शुरू से केवल कम्युनिस्ट संगठन नहीं थी।

उसमें कांग्रेस समाजवादी और विभिन्न वामपंथी धाराएं थीं।

एनपीटीईएल की अध्ययन सामग्री के अनुसार 1941–43 के बाद कम्युनिस्ट प्रभाव तेजी से बढ़ा और 1944–45 तक AIKS पर CPI का नियंत्रण काफी मजबूत हो चुका था।

यही वह काल था जिसके तुरंत बाद—

जैसे अधिक उग्र संघर्ष सामने आए।

इसलिए संगठन की वैचारिक दिशा और संघर्ष की बढ़ती उग्रता में संबंध दिखाई देता है।

तेभागा ने यह प्रमाणित किया कि किसान सभा केवल सम्मेलन और घोषणापत्र की संस्था नहीं रह गई थी।

वह लाखों ग्रामीण किसानों को प्रत्यक्ष कृषि संघर्ष में उतार सकती थी।

AIKS अपने ऐतिहासिक विवरण में स्वयं तेभागा के साथ वारली, बकाश्त, तेलंगाना, त्रिपुरा और दूसरे संघर्षों को अपने संगठनात्मक विस्तार के निर्णायक उदाहरणों के रूप में रखती है।

इसलिए तेभागा किसान सभा के इतिहास में एक प्रकार की जन-संगठन परीक्षा था।

तेभागा की मांग पूरी तरह बंगाल-विशिष्ट थी।

हर भारतीय किसान बर्गादार नहीं था।

फिर भी उसका राजनीतिक अर्थ राष्ट्रीय था—

वास्तविक खेती करने वाले का अधिकार।

यही सिद्धांत बिहार के बकाश्त, महाराष्ट्र के वारली और तेलंगाना के भूमि संघर्ष से उसे जोड़ता था।

AIKS की सबसे बड़ी उपलब्धि यही थी कि उसने अलग-अलग स्थानीय मांगों को ‘किसान मुक्ति’ की व्यापक राजनीतिक भाषा दी।

तेभागा की जड़ें केवल 1930 के दशक की कम्युनिस्ट किसान राजनीति में नहीं थीं।

बंगाल के ग्रामीण समाज में जमींदारी और काश्तकारी संबंधों के विरुद्ध संघर्ष की परंपरा उन्नीसवीं शताब्दी से मौजूद थी।

इनमें पाबना किसान आंदोलन (1873–76) विशेष महत्व रखता है।

पाबना के रैयतों ने जमींदारों द्वारा—

और काश्तकारी अधिकार से वंचित करने

आंदोलन का बड़ा केंद्र यूसुफशाही परगना था।

किसानों ने कृषक संघ बनाए, सामूहिक रूप से मुकदमे लड़े और बढ़े हुए लगान का विरोध किया। लोकप्रिय इतिहास इसे अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण और कानूनी प्रतिरोध वाला आंदोलन मानता है।

पाबना का किसान औपनिवेशिक कानून के भीतर अपने काश्तकारी अधिकार की रक्षा चाहता था।

तेभागा का किसान पुरानी बटाई व्यवस्था को प्रत्यक्ष कार्रवाई से बदल रहा था।

लगभग सात दशकों में किसान राजनीति की भाषा बदल चुकी थी।

कानून के भीतर मेरे रैयती अधिकार बचाओ।

कानून देर कर रहा है तो हम स्वयं न्यायपूर्ण हिस्सा लागू करेंगे।

यह किसान प्रतिरोध की उग्रता में लंबी ऐतिहासिक वृद्धि का संकेत है।

दोनों आंदोलनों की मूल चिंता थी—

जमीन पर वास्तविक कृषक की सुरक्षा।

पाबना ने ब्रिटिश सरकार को काश्तकारी कानून पर पुनर्विचार के लिए बाध्य करने में भूमिका निभाई और आगे 1885 के बंगाल काश्तकारी कानून की व्यापक पृष्ठभूमि में ऐसे संघर्ष महत्वपूर्ण बने।

तेभागा ने इसी भूमि-कानूनी परंपरा को बर्गादार के स्तर तक पहुंचाया।

अर्थात बंगाल की किसान राजनीति की यात्रा मोटे तौर पर ऐसी दिखाई देती है—

जमींदार की मनमानी रोकना

यदि बंगाल की किसान राजनीति को और पीछे देखें तो नील विद्रोह भी इस श्रृंखला में आता है।

नील विद्रोह में कृषक ने कहा—

मैं जबरन नील नहीं उगाऊंगा।

मनमाना लगान नहीं दूंगा।

इन तीनों में विरोध का लक्ष्य अलग था, लेकिन एक राजनीतिक विकास साफ दिखाई देता है—

किसान धीरे-धीरे उत्पादन प्रक्रिया और भूमि संबंधों में अपनी निर्णयकारी भूमिका का दावा कर रहा था।

बंगाल के किसान संघर्ष की इस यात्रा में प्रतिरोध की पद्धति भी बदलती है।

पाबना में कानूनी मुकदमे और कृषक संघ महत्वपूर्ण थे।

बीसवीं शताब्दी में किसान सभा के उदय से—

और सामूहिक आर्थिक अवज्ञा

ज्यादा महत्वपूर्ण हुई।

तेभागा में यह प्रक्रिया चरम पर पहुंची—

किसान ने अपना नियम खेत में स्वयं लागू किया।

तेभागा की सबसे बड़ी विरासत किसी एक कानून या पार्टी तक सीमित नहीं है।

उसने भारतीय किसान राजनीति को कुछ स्थायी सिद्धांत दिए।

औपनिवेशिक भूमि व्यवस्था अक्सर शीर्ष भूमि स्वामी को कानूनी केंद्र में रखती थी।

तेभागा ने प्रश्न उलट दिया—

खेत वास्तव में कौन जोतता है?

इससे वास्तविक कृषक भूमि नीति की केंद्रीय इकाई बना।

जमींदारी उन्मूलन पर्याप्त नहीं था।

यदि जमींदार चला जाए लेकिन बर्गादार असुरक्षित रहे तो शोषण के नए रूप बने रह सकते हैं।

तेभागा ने दिखाया कि भूमि सुधार में—

तीनों को देखना आवश्यक है।

तेभागा का सबसे मौलिक योगदान था—

कानून बनने की प्रतीक्षा किए बिना सामूहिक रूप से न्यायपूर्ण व्यवस्था लागू करने की रणनीति।

यह परंपरागत याचिका राजनीति से बड़ा परिवर्तन था।

गांव स्तर की किसान समिति और स्वयंसेवक दल ने ग्रामीण संगठन का ऐसा ढांचा दिया जिसे बाद के किसान आंदोलनों ने भी अपनाया।

तेलंगाना में यही संरचना अधिक सशस्त्र रूप में विकसित हुई।

पश्चिम बंगाल में बाद में किसान संगठन और पंचायत व्यवस्था के बीच संबंध ने भूमि सुधार लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1946–47 के सांप्रदायिक वातावरण में तेभागा ने कम-से-कम कुछ क्षेत्रों में यह दिखाया कि—

गरीब किसान एक साझा आर्थिक प्रश्न पर संगठित हो सकते हैं।

यह भारतीय किसान राजनीति के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक उदाहरण था।

तेभागा और वारली दोनों ने दिखाया कि किसान परिवार की महिला कोई निष्क्रिय आश्रित नहीं है।

वह कृषि श्रमिक भी है।

और राजनीतिक आंदोलनकारी भी।

यह बाद के ग्रामीण महिला आंदोलनों के लिए महत्वपूर्ण विरासत बनी।

बकाश्त, वारली, तेभागा और तेलंगाना सभी की मांगें अलग थीं।

लेकिन अखिल भारतीय किसान सभा ने उन्हें एक राष्ट्रीय कृषक राजनीति से जोड़ा। AIKS के ऐतिहासिक दस्तावेज इन्हें स्वयं अपनी व्यापक संगठनात्मक परंपरा की प्रमुख कड़ियों के रूप में रखता है।

यानी भविष्य के किसान आंदोलन के लिए एक मॉडल सामने आया—

खंड 14

उपलब्धियां और सीमाएं

तेभागा आंदोलन का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि 1946–47 में उसकी मांग पूरी तरह कानून बन पाई या नहीं। यदि सफलता का अर्थ यह रखा जाए कि बंगाल के हर बर्गादार को तत्काल दो-तिहाई फसल मिल गई, उसे स्थायी काश्तकारी सुरक्षा मिली और भूमि-संबंध पूरी तरह बदल गए, तो तेभागा अधूरा रहा। लेकिन यदि सफलता को व्यापक ऐतिहासिक अर्थ में देखा जाए—किसान की राजनीतिक चेतना, जोतदार की शक्ति को चुनौती, बर्गादार प्रश्न का विधायीकरण, अवैध वसूलियों में कमी, बाद के भूमि सुधार और बंगाल की ग्रामीण राजनीति में परिवर्तन—तो इसकी उपलब्धियां बहुत बड़ी थीं।

यही कारण है कि तेभागा के बारे में दो विपरीत कथन एक साथ सत्य हो सकते हैं—

वह तत्काल मांगों की दृष्टि से अधूरा आंदोलन था।

वह दीर्घकालीन ऐतिहासिक प्रभाव की दृष्टि से अत्यंत सफल आंदोलन था।

इसी द्वंद्व में तेभागा का वास्तविक मूल्यांकन निहित है।

पहली उपलब्धि — बर्गादार को राजनीतिक पहचान

तेभागा से पहले बंगाल की कृषि राजनीति में जमींदार, रैयत और भूमि-राजस्व संबंध अधिक प्रमुख थे। बर्गादार ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था, लेकिन उसकी कानूनी और राजनीतिक पहचान कमजोर थी।

तेभागा ने पहली बार बड़े पैमाने पर घोषणा की—

जो खेत वास्तव में जोतता है, वह केवल किसी भू-स्वामी का आश्रित नहीं है; कृषि उत्पादन में उसका स्वतंत्र अधिकार है।

यह विचार आंदोलन की सबसे स्थायी उपलब्धि बना।

दूसरी उपलब्धि — आधी फसल की प्रथा को वैचारिक चुनौती

तेभागा ने एक लंबे समय से चली आ रही परंपरा की वैधता ही बदल दी।

पहले आधी फसल देना ‘सामान्य व्यवस्था’ माना जाता था।

आंदोलन के बाद वही व्यवस्था प्रश्नों के घेरे में आ गई।

अब किसान पूछ रहा था—

यदि बीज, पशु, औजार और श्रम का बड़ा हिस्सा मेरा है तो उपज आधी क्यों बांटी जाए?

यही परिवर्तन महत्वपूर्ण था।

किसी आर्थिक व्यवस्था की राजनीतिक पराजय अक्सर उस समय शुरू होती है जब वह लोगों को स्वाभाविक लगना बंद हो जाती है।

तेभागा ने आधी हिस्सेदारी के साथ यही किया।

तीसरी उपलब्धि — फसल पर वास्तविक नियंत्रण

आंदोलन का दूसरा नारा—

केवल प्रतीकात्मक नहीं था।

इससे बर्गादार ने उत्पादन पर भौतिक नियंत्रण का दावा किया।

पुरानी व्यवस्था में फसल जोतदार के खलिहान में पहुंचती थी और वहां उसका बंटवारा होता था। तेभागा ने संबंध उलट दिया—

पहले फसल किसान के पास आएगी,

फिर जोतदार अपना हिस्सा लेगा।

इससे ग्रामीण सत्ता-संबंध पर प्रत्यक्ष प्रहार हुआ।

चौथी उपलब्धि — कुछ क्षेत्रों में वास्तविक तेभागा

यह कहना गलत होगा कि आंदोलन केवल नारा बनकर रह गया।

बांग्लापीडिया के समेकित ऐतिहासिक विवरण में अनुमान दिया गया है कि लगभग 40 प्रतिशत बटाईदार किसानों को संघर्ष के दौरान या उसके प्रभाव में भूमि नियंत्रकों ने तेभागा अधिकार स्वीकार कर दिया। इसी स्रोत में अवैध और अतिरिक्त वसूलियों—‘अबवाब’—के उन्मूलन या कमी को भी आंदोलन की उपलब्धि माना गया है।

इसे सावधानी से पढ़ना चाहिए।

यह 40 प्रतिशत कोई आधुनिक सांख्यिकीय सर्वेक्षण का निर्विवाद आंकड़ा नहीं है; यह ऐतिहासिक अनुमान है।

लेकिन इतना स्पष्ट है कि कई आंदोलनग्रस्त क्षेत्रों में किसान ने वास्तविक रूप से आधी से अधिक उपज अपने पास रखी और जोतदारों को समझौता करना पड़ा।

पांचवीं उपलब्धि — अवैध वसूलियों पर प्रहार

बर्गादार का शोषण केवल आधी फसल तक सीमित नहीं था।

अतिरिक्त देय, ऋण, ब्याज और विभिन्न स्थानीय वसूलियों से उसका वास्तविक हिस्सा और कम हो सकता था।

तेभागा संघर्ष ने इन अतिरिक्त वसूलियों को भी चुनौती दी।

बांग्लापीडिया और महिला भागीदारी पर हुए अकादमिक अध्ययन दोनों आंदोलन के परिणामस्वरूप ‘अबवाब’ जैसी अनुचित वसूलियों के कम या समाप्त होने का उल्लेख करते हैं।

इसलिए किसान का लाभ केवल तेभागा प्रतिशत में नहीं मापा जाना चाहिए।

तेभागा से पहले फ्लाउड आयोग की सिफारिश छह वर्षों से पड़ी थी।

कुछ महीनों में सरकार को बर्गादार विधेयक का मसौदा प्रकाशित करना पड़ा।

डी. एन. धनागरे के अध्ययन में भी यह स्पष्ट है कि किसानों की प्रत्यक्ष कार्रवाई इतनी प्रभावशाली थी कि बंगाल सरकार ने बर्गादारों को काश्तकारी सुरक्षा और दो-तिहाई हिस्से की दिशा में विधायी प्रस्ताव प्रकाशित किया। हालांकि वह विधेयक अंततः कानून नहीं बन सका।

यह राजनीतिक उपलब्धि मामूली नहीं थी।

किसान आंदोलन ने प्रशासनिक रिपोर्ट को विधायी एजेंडा बना दिया।

तेभागा स्वतंत्रता के अंतिम वर्षों के सबसे व्यापक कृषि आंदोलनों में था।

इग्नू की इतिहास सामग्री इसे युद्धोत्तर भारत के सबसे व्यापक कृषक आंदोलनों में गिनती है और लगभग 19 जिलों तथा 60 लाख किसानों तक उसके प्रभाव अथवा भागीदारी का अनुमान देती है।

जैसा पहले स्पष्ट किया गया है, छह मिलियन को सटीक सक्रिय आंदोलनकारी संख्या नहीं मानना चाहिए।

फिर भी आंदोलन का पैमाना असाधारण था।

तेभागा ने किसान को केवल आर्थिक शिकायतकर्ता से राजनीतिक व्यक्ति बनाया।

उसने किसान को यह अनुभव कराया कि—

जोतदार से व्यक्तिगत निवेदन एक रास्ता है,

लेकिन सामूहिक संगठन शक्ति का दूसरा स्तर है।

एक अकेला बर्गादार असुरक्षित था।

हजारों संगठित बर्गादार राज्य की नीति बदलवा सकते थे।

यही राजनीतिक चेतना बाद के दशकों में पश्चिम बंगाल की किसान राजनीति की आधारशिला बनी।

1946–47 में बंगाल सांप्रदायिक हिंसा के दौर में था।

इसी समय तेभागा के कई प्रमुख क्षेत्रों में हिंदू और मुस्लिम बर्गादारों ने साझा आर्थिक मांग पर संघर्ष किया। इनफ्लिबनेट का अध्ययन विशेष रूप से उत्तर बंगाल में दोनों समुदायों की संयुक्त भागीदारी और राज्य तथा जमींदारी प्रतिक्रिया के विरुद्ध उनके संघर्ष को दर्ज करता है।

तेभागा सांप्रदायिकता को समाप्त नहीं कर सका।

लेकिन उसने यह प्रमाणित अवश्य किया कि साझा आर्थिक हित धार्मिक विभाजन के विरुद्ध एक वास्तविक राजनीतिक आधार बना सकता है।

संथाल, उरांव, राजबंशी और दूसरे सामाजिक रूप से हाशिये के कृषक समुदायों की बड़ी भागीदारी ने आंदोलन को अलग सामाजिक गहराई दी।

कैम्ब्रिज के एक आधुनिक अध्ययन में दिनाजपुर और जलपाईगुड़ी में संथाल और उरांव कृषकों की व्यापक भागीदारी तथा मयमनसिंह के हाजोंग किसानों के उग्र संघर्ष का उल्लेख मिलता है।

इससे तेभागा केवल सामान्य कृषक आंदोलन नहीं रहा।

उसने भूमि-वंचना और सामाजिक हाशियाकरण के बीच संबंध भी उजागर किया।

तेभागा ने हजारों किसान महिलाओं को सार्वजनिक प्रतिरोध में उतारा।

उन्होंने फसल की रक्षा की,

पुलिस आने की सूचना दी,

गिरफ्तारियों का विरोध किया,

और पुरुष नेतृत्व के भूमिगत या गिरफ्तार होने पर स्थानीय संगठन संभाला।

यह आंदोलन की सामाजिक संरचना में गहरा बदलाव था।

किसान परिवार पहली बार बड़े पैमाने पर राजनीतिक परिवार बना।

तेभागा की सबसे बड़ी संस्थागत उपलब्धि तत्काल नहीं बल्कि बाद में दिखाई दी।

1950 का बर्गादार कानून,

1953 का एस्टेट अधिग्रहण कानून,

1955 का भूमि सुधार कानून,

और 1978 के बाद ऑपरेशन बर्गा

इसी लंबे बर्गादार अधिकार संघर्ष की अलग-अलग अवस्थाएं बने।

पूर्वी बंगाल में भी तेभागा और 1948–50 के बाद के संघर्षों ने 1950 के राज्य अधिग्रहण और काश्तकारी कानून की दिशा को प्रभावित किया। बांग्लापीडिया इस संबंध को स्पष्ट रूप से दर्ज करता है।

इसलिए तेभागा की राजनीतिक सफलता का सही पैमाना केवल फरवरी 1947 नहीं, बल्कि अगले तीन दशकों की भूमि नीति भी है।

इस प्रश्न का उत्तर है—

कुछ को मिली, सभी को नहीं।

और यही तेभागा की सफलता तथा सीमा का सबसे प्रत्यक्ष उदाहरण है।

आंदोलनग्रस्त मजबूत क्षेत्र

जहां किसान सभा का संगठन मजबूत था और बर्गादार सामूहिक रूप से फसल अपने खलिहान में ले गए, वहां जोतदार कई बार समझौते के लिए मजबूर हुए।

ऐसे क्षेत्रों में वास्तविक तेभागा लागू हुआ।

कुछ जोतदारों ने स्वयं एक-तिहाई हिस्सा स्वीकार किया।

कुछ गांवों में किसान समितियों ने व्यवस्था लागू कराई।

इसी आधार पर लगभग 40 प्रतिशत बर्गादारों द्वारा किसी स्तर पर तेभागा प्राप्त करने का ऐतिहासिक अनुमान मिलता है।

लेकिन यह स्थायी कानूनी अधिकार नहीं था

समस्या यह थी कि 1946–47 की सफलता अक्सर शक्ति-संतुलन पर आधारित थी, कानून पर नहीं।

यदि गांव में किसान संगठन मजबूत है तो तेभागा लागू।

यदि पुलिस आ जाए, नेतृत्व गिरफ्तार हो जाए या संगठन टूट जाए तो जोतदार पुरानी व्यवस्था वापस लाने का प्रयास कर सकता था।

इसलिए आंदोलन द्वारा प्राप्त अधिकार कई जगह अस्थायी थे।

यदि जनवरी 1947 का प्रस्तावित कानून प्रभावी हो गया होता तो किसान की उपलब्धि को कानूनी सुरक्षा मिल सकती थी।

धनागरे के अध्ययन में स्पष्ट है कि प्रस्तावित बर्गादार विधेयक बर्गादार को दो-तिहाई हिस्सा और कुछ काश्तकारी सुरक्षा देने की दिशा में था, किंतु वह विधायिका में प्रभावी कानून नहीं बन पाया।

यहीं आंदोलन की तत्काल जीत रुक गई।

यदि अनुमानतः 40 प्रतिशत बर्गादारों को कुछ स्तर पर तेभागा मिला, तो दो बातें एक साथ समझनी चाहिए।

एक ओर, यह बहुत बड़ी उपलब्धि है क्योंकि लाखों लोगों के जीवन से जुड़ी पुरानी प्रथा व्यवहार में बदली।

दूसरी ओर, इसका अर्थ यह भी है कि अनुमानतः बहुसंख्यक बर्गादारों तक तत्काल स्थायी तेभागा नहीं पहुंचा।

इसलिए वही आंकड़ा आंदोलन की सफलता और सीमा—दोनों का प्रमाण है।

तेभागा की सबसे बड़ी संरचनात्मक सीमा थी—

उसने सामान्यतः जमीन के स्वामित्व को नहीं बदला।

बर्गादार अधिक उपज चाहता था।

लेकिन खेत अभी भी दूसरे के नियंत्रण में था।

यह अंतर निर्णायक था।

हिस्सेदारी और स्वामित्व में अंतर

मान लें बर्गादार को दो-तिहाई फसल मिल गई।

यह उसकी आर्थिक स्थिति सुधारता है।

लेकिन यदि जमीन उसकी नहीं है तो वह अब भी अगले वर्ष खेती से बेदखल किया जा सकता है।

फसल पर अधिक अधिकार ≠ जमीन पर स्वामित्व।

तेभागा का मूल कार्यक्रम इस दूरी को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सका।

आंदोलन ने जमीन जब्त क्यों नहीं की?

तेभागा की रणनीति तेलंगाना से अलग थी।

उसका तत्काल लक्ष्य था—

फसल में न्यायपूर्ण हिस्सा,

वह व्यापक भूमि जब्ती और पुनर्वितरण के कार्यक्रम में सामान्यतः नहीं बदला।

धनागरे के विश्लेषण में भी तेभागा की विशिष्टता यही बताई गई है कि गरीब किसानों की उग्र कार्रवाई के बावजूद आंदोलन बड़े पैमाने पर व्यापक कृषक हिंसा या भूमि क्रांति में नहीं बदला।

दोनों तरह से देखा जा सकता है।

यदि तत्काल भूमि जब्ती का नारा दिया जाता तो शायद—

और संभावित सहयोगी वर्ग

आंदोलन से और तेजी से अलग हो जाते।

राज्य दमन भी कहीं अधिक कठोर हो सकता था।

इस दृष्टि से सीमित तेभागा मांग ने व्यापक गठबंधन संभव किया।

लेकिन दीर्घकाल में यही सीमा बर्गादार की मूल असुरक्षा को छोड़ गई।

भूमि स्वामित्व सीमित रहने का दूसरा परिणाम था कि पूर्ण भूमिहीन खेतिहर मजदूर की समस्या लगभग जस की तस रही।

यदि वह बर्गादार नहीं था तो दो-तिहाई हिस्सेदारी का अधिकार सीधे उस पर लागू नहीं होता।

इसलिए तेभागा के सबसे गरीब ग्रामीण समूहों में से कुछ को उसकी केंद्रीय मांग का प्रत्यक्ष लाभ कम मिला।

यह आंदोलन की महत्वपूर्ण सामाजिक सीमा थी।

तेभागा की राजनीतिक उपलब्धि उसकी तत्काल आर्थिक सफलता से कहीं व्यापक थी।

गांव-स्तरीय संगठन

किसान सभा ने गांव स्तर तक समितियां और स्वयंसेवक दल बनाए।

इससे राजनीतिक संगठन का स्थायी ढांचा खड़ा हुआ।

आंदोलन समाप्त होने के बाद भी कई क्षेत्रों में यह नेटवर्क समाप्त नहीं हुआ।

यही बाद की वामपंथी किसान राजनीति की सामाजिक पूंजी बना।

स्थानीय नेतृत्व का विकास

आंदोलन ने केवल प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेताओं पर निर्भरता नहीं रखी।

और छोटे कार्यकर्ताओं

में से नए नेता उभरे।

यह किसी भी आंदोलन की बड़ी उपलब्धि होती है—

आंदोलन स्वयं अपना नेतृत्व पैदा करे।

तेभागा ने गरीब किसान के सामने यह प्रश्न भी स्पष्ट किया कि भूमि संबंध केवल दो निजी व्यक्तियों का मामला नहीं हैं।

जोतदार ने पुलिस बुलवाई।

पुलिस ने गिरफ्तारियां कीं।

सरकार ने कानून का प्रस्ताव दिया।

अदालतों और प्रशासन का हस्तक्षेप हुआ।

अर्थात किसान ने देखा कि कृषि संबंध राज्य-सत्ता से जुड़े हुए हैं।

इस अनुभव ने ग्रामीण राजनीतिक चेतना को गहरा किया।

तेभागा ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और किसान सभा को बंगाल के ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक प्रतिष्ठा दी।

कम्युनिस्टों ने स्वयं को ऐसे राजनीतिक दल के रूप में प्रस्तुत किया जो किसान की फसल के प्रश्न पर सीधे संघर्ष कर रहा है।

यह सामाजिक स्मृति आगे पश्चिम बंगाल में वाम राजनीति की वृद्धि का एक आधार बनी।

लेकिन यह दावा करना अतिशयोक्ति होगा कि बाद का समूचा वाम राजनीतिक प्रभुत्व केवल तेभागा से पैदा हुआ।

शरणार्थी राजनीति, मजदूर आंदोलन, भूमि सुधार, पंचायत और अन्य अनेक कारक भी निर्णायक थे।

तेभागा अकेला नहीं था।

इसी दौर में तेलंगाना, वारली और दूसरे किसान संघर्ष चल रहे थे।

इन सबने मिलकर स्वतंत्र भारत के नेताओं को संकेत दिया—

भूमि सुधार को टाला नहीं जा सकता।

तेभागा ने विशेष रूप से काश्तकारी सुरक्षा और बर्गादार अधिकार को राष्ट्रीय भूमि सुधार विमर्श का हिस्सा बनाया।

तेभागा विशाल था, लेकिन पूरे बंगाल का समान आंदोलन नहीं था।

यह बात उसके मूल्यांकन में विशेष महत्व रखती है।

भौगोलिक असमानता

आंदोलन 19 जिलों तक पहुंचा, लेकिन हर जिले में समान तीव्रता नहीं थी।

और कुछ दूसरे क्षेत्रों में वह अत्यंत मजबूत था।

दूसरे जिलों में प्रभाव अधिक सीमित रहा।

इसलिए ‘19 जिलों का आंदोलन’ कहना सही है, लेकिन ‘19 जिलों में समान किसान सत्ता’ कहना गलत होगा।

बांग्लापीडिया स्पष्ट रूप से कहता है कि पूर्वी बंगाल जिलों में 1946–47 के मूल आंदोलन की सफलता सीमित रही और 1948–50 में वहां तेभागा की नई लहर उठी।

इसका कारण केवल संगठन की कमजोरी नहीं था।

सांप्रदायिक राजनीति,

पाकिस्तान का प्रश्न,

मुस्लिम लीग का ग्रामीण प्रभाव,

और बाद में नए पाकिस्तानी राज्य की राजनीति

सभी किसान बर्गादार नहीं थे

तेभागा का प्रत्यक्ष लाभार्थी बर्गादार था।

उनके हित पूरी तरह समान नहीं थे।

यही आंदोलन के सामाजिक गठबंधन की संरचनात्मक कमजोरी थी।

यदि कोई किसान स्वयं भूमि जोतता था और साथ में थोड़ी जमीन बर्गादार को देता था तो उसका हित दो दिशाओं में बंटा हुआ था।

जमींदार के विरुद्ध वह गरीब किसानों के साथ हो सकता था।

लेकिन दो-तिहाई हिस्सेदारी के प्रश्न पर उसका अपना आर्थिक नुकसान हो सकता था।

यदि किसान सभा उसे बड़े जोतदार के बराबर विरोधी मानती तो वह आंदोलन से अलग हो सकता था।

कम्युनिस्ट नेतृत्व ने बाद में इस रणनीतिक कमजोरी को स्वीकार भी किया।

तेभागा वर्गीय आंदोलन था, लेकिन जाति और जनजातीय पहचान समाप्त नहीं हुईं।

राजबंशी समाज के भीतर आर्थिक विभाजन था।

संथाल और दूसरे आदिवासी समुदायों के अपने भूमि-वंचना अनुभव थे।

दलित कृषकों के सामने आर्थिक और सामाजिक दोनों प्रकार की असमानता थी।

इसलिए एक सामान्य वर्गीय कार्यक्रम सभी स्थानीय सामाजिक प्रश्नों को पूरी तरह समाहित नहीं कर सका।

महिलाएं बड़ी संख्या में आंदोलन में थीं।

लेकिन नेतृत्वकारी किसान समितियों और औपचारिक राजनीतिक संस्थाओं में उनकी भागीदारी उतनी व्यापक नहीं थी।

इसलिए आंदोलन ने महिलाओं की सार्वजनिक राजनीतिक भूमिका को बढ़ाया, लेकिन संगठन की आंतरिक संरचना पूरी तरह लैंगिक समान नहीं हुई।

यह महत्वपूर्ण सामाजिक सीमा थी।

तेभागा समाप्त क्यों हुआ?

किसी एक कारण से नहीं।

यह कई दबावों का संयुक्त परिणाम था।

पहला — राज्य दमन

और नेताओं के भूमिगत होने

से आंदोलन की सांगठनिक क्षमता कमजोर हुई।

लेकिन केवल दमन पर्याप्त व्याख्या नहीं है।

तेभागा की सबसे शक्तिशाली प्रत्यक्ष कार्रवाई धान की कटाई से जुड़ी थी।

कटाई समाप्त हुई तो वही सामूहिक कार्रवाई निरंतर जारी रखना कठिन हो गया।

आंदोलन के पास फिर अगला व्यापक कार्यक्रम चाहिए था।

क्या जमीन का प्रश्न उठाया जाए?

क्या कानून की प्रतीक्षा की जाए?

क्या जमींदारी उन्मूलन की ओर बढ़ा जाए?

इन सवालों पर एक समान रणनीति विकसित नहीं हुई।

जनवरी 1947 के बर्गादार विधेयक ने आंदोलन को वैधता दी, लेकिन साथ ही कुछ किसानों को यह उम्मीद भी दी कि सरकार अब कानूनी समाधान दे सकती है।

इससे प्रत्यक्ष संघर्ष और विधायी प्रतीक्षा—दोनों प्रवृत्तियां एक साथ पैदा हुईं।

और जब विधेयक कानून नहीं बना तो बहुत देर हो चुकी थी; राजनीतिक परिस्थिति विभाजन की तरफ बढ़ चुकी थी।

इनफ्लिबनेट का अध्ययन आंदोलन के क्षय में विभाजन-पूर्व सांप्रदायिक उन्माद को विशेष कारक मानता है।

यह विशेष रूप से पूर्वी बंगाल में महत्वपूर्ण था।

वर्गीय सवाल धीरे-धीरे—

मुस्लिम राजनीतिक भविष्य

जैसे प्रश्नों के पीछे चला गया।

विभाजन ने आंदोलन का भूगोल ही काट दिया।

एक ही किसान सभा नेटवर्क के जिले दो देशों में चले गए।

सामुदायिक संबंध टूटे।

बांग्लापीडिया भी बंगाल विभाजन और नई सरकारों से जुड़ी अपेक्षाओं को मूल आंदोलन के स्थगन से जोड़ता है।

आंदोलन तेजी से फैला।

कई जगह वह नेतृत्व की आरंभिक योजना से आगे निकल गया।

स्थानीय किसान स्वयं कार्रवाई करने लगे।

लेकिन इतना व्यापक आंदोलन चलाने के लिए आवश्यक था—

विभिन्न कृषक वर्गों के लिए अलग रणनीति,

दमन के बाद वैकल्पिक कार्यक्रम,

सांप्रदायिक राजनीति की मजबूत काट,

और भूमिहीन मजदूर का स्पष्ट एजेंडा।

इन क्षेत्रों में नेतृत्व की सीमाएं सामने आईं।

कुछ क्षेत्र अत्यंत उग्र हुए।

मयमनसिंह के हाजोंग, दिनाजपुर के संथाल और जलपाईगुड़ी के आदिवासी किसान धनुष-बाण और कहीं-कहीं आग्नेयास्त्रों तक के साथ प्रतिरोध में उतरे। फिर भी आधुनिक कैम्ब्रिज अध्ययन का निष्कर्ष है कि इन उग्र जनजातीय क्षेत्रों की कार्रवाई व्यापक और दीर्घकालीन कृषक युद्ध में रूपांतरित नहीं हुई।

तेलंगाना से यही बड़ा अंतर था।

इसने तेभागा की हिंसा को सीमित रखा, लेकिन राज्य दमन का सामना करने की उसकी क्षमता भी सीमित रही।

अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न—

तेभागा सफल था या विफल?

उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि सफलता को कैसे मापा जाए।

तो परिणाम मिश्रित है।

कई किसानों को वास्तविक तेभागा मिला।

अवैध वसूलियां कम हुईं।

लेकिन सभी बर्गादारों को दो-तिहाई नहीं मिला।

और जो मिला वह हर जगह स्थायी नहीं था।

तो आंदोलन अधूरा रहा।

1947 का बर्गादार विधेयक कानून नहीं बन पाया।

बर्गादार को तत्काल पूरे बंगाल में कानूनी सुरक्षा नहीं मिली।

तात्कालिक विफलता या सीमित सफलता।

तो तेभागा सफल नहीं था।

भूमि स्वामित्व का व्यापक पुनर्वितरण नहीं हुआ।

जोतदार वर्ग तत्काल समाप्त नहीं हुआ।

भूमिहीन कृषि मजदूर को जमीन नहीं मिली।

तो आंदोलन अत्यंत सफल था।

लाखों किसान संगठित हुए।

बर्गादार एक स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बना।

महिलाएं और आदिवासी समुदाय बड़े पैमाने पर सार्वजनिक प्रतिरोध में आए।

किसान ने राज्य और भूमि-सत्ता का संबंध समझा।

बड़ी राजनीतिक सफलता।

तो तेभागा की सफलता और भी स्पष्ट है।

और बाद का ऑपरेशन बर्गा

खंड 15

संस्कृति, स्मृति और इतिहासलेखन

तेभागा आंदोलन केवल खेत, फसल और बर्गादारी का संघर्ष नहीं था। उसने बंगाल की सांस्कृतिक दुनिया पर भी गहरी छाप छोड़ी। किसान गीतों, जननाट्य, पोस्टरों, रेखाचित्रों, वुडकट, संस्मरणों और मौखिक कथाओं में तेभागा ने एक ऐसी स्मृति बनाई जिसमें भूख, किसान प्रतिरोध, पुलिस दमन, महिलाओं की भागीदारी और ग्रामीण वर्ग-संघर्ष एक साथ दर्ज हुए।

इस सांस्कृतिक विरासत का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि सरकारी अभिलेख और पुलिस रिपोर्ट किसी किसान विद्रोह को सामान्यतः ‘कानून-व्यवस्था’, ‘अवैध जमावड़ा’, ‘फसल लूट’ या ‘कम्युनिस्ट गतिविधि’ की भाषा में दर्ज करते हैं। दूसरी तरफ आंदोलन से जुड़े कलाकार और कार्यकर्ता उसी घटना को—

भूख, न्याय, श्रम, प्रतिरोध और किसान आत्मसम्मान

की भाषा में दर्ज कर रहे थे।

तेभागा की सांस्कृतिक स्मृति इसलिए इतिहास का केवल सजावटी परिशिष्ट नहीं है। वह स्वयं एक वैकल्पिक ऐतिहासिक अभिलेख है।

2024 में कोलकाता के पश्चिम बंगाल राज्य अभिलेखागार में आयोजित ‘आधी नाई, तेभागा चाई’ प्रदर्शनी ने इसी बात को रेखांकित किया। इसमें सरकारी निगरानी अभिलेखों को सोमनाथ होर और चित्तप्रसाद जैसे कलाकारों के दृश्य साक्ष्यों तथा किसान सभा और महिला आत्मरक्षा समिति के कार्यकर्ताओं की मौखिक स्मृतियों के साथ रखा गया। इस प्रकार एक ही आंदोलन को राज्य और आंदोलनकारी समाज की दो अलग दृष्टियों से पढ़ने का प्रयास किया गया।

किसान आंदोलन में संस्कृति कोई अतिरिक्त गतिविधि नहीं थी

तेभागा के समय ग्रामीण बंगाल में बड़ी आबादी निरक्षर अथवा सीमित रूप से शिक्षित थी। किसी आंदोलन को लाखों किसानों तक पहुंचाने के लिए केवल पर्चे और राजनीतिक प्रस्ताव पर्याप्त नहीं थे।

और सामूहिक गायन राजनीतिक संचार के शक्तिशाली साधन बने।

यही वह समय था जब भारतीय जननाट्य संघ—इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (IPTA)—बंगाल और दूसरे क्षेत्रों में कला को जनराजनीति से जोड़ रहा था। IPTA की सांस्कृतिक परंपरा द्वितीय विश्वयुद्ध, 1943 के बंगाल अकाल, मजदूर आंदोलन और किसान संघर्षों के बीच विकसित हुई। उसके कलाकारों ने अकाल और कृषक आंदोलनों पर गीत, नाटक और दृश्य सामग्री तैयार की।

तेभागा इसी सांस्कृतिक आंदोलन को ग्रामीण राजनीतिक जमीन प्रदान करता है।

तेभागा से जुड़ा सबसे प्रसिद्ध गीतों में एक है—

‘हे सामालो’ (Hei Samalo/Hey Samalo)।

इसके निर्माण से सलिल चौधरी, सुकांत भट्टाचार्य और IPTA से जुड़े सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं के नाम जुड़े हैं। इसका मूल राजनीतिक संदेश वही था जो तेभागा का था—

किसान अपनी पैदा की हुई फसल दूसरे के गोदाम में नहीं पहुंचाएगा।

रिव्यू ऑफ एग्रेरियन स्टडीज़ में सुमंगला दामोदरन ने ‘हे सामालो’ को तेभागा की मांग को सांगीतिक भाषा में अत्यंत प्रभावी ढंग से व्यक्त करने वाला गीत बताया है।

गीत की शक्ति इस बात में थी कि उसने आर्थिक सिद्धांत को श्रम के अनुभव में बदल दिया।

किसान को यह नहीं समझाना पड़ा कि कृषि अधिशेष का वर्गीय वितरण क्या होता है।

हम हल चलाते हैं, धान उगाते हैं और अब दूसरे के गोदाम में धान नहीं पहुंचाएंगे।

यही आंदोलन की पूरी राजनीति थी।

तेभागा से जुड़ा दूसरा महत्वपूर्ण गीत था—

‘आर कोतो काल’ — और कितने दिन?

IPTA और कृषि-सांस्कृतिक इतिहास के स्रोत बताते हैं कि यह गीत किसान कार्यकर्ता अहल्या की हत्या की स्मृति से जुड़ा था। अहल्या गर्भवती थीं और पुलिस कार्रवाई में मारी गईं। गीत ने उनकी मृत्यु को व्यक्तिगत त्रासदी से उठाकर किसान प्रतिरोध के प्रतीक में बदल दिया।

यहां किसान गीत का एक दूसरा कार्य सामने आता है।

‘हे सामालो’ आंदोलन का कार्यक्रम समझाता था।

‘आर कोतो काल’ आंदोलन का बलिदान याद रखता था।

एक संघर्ष के लिए दोनों आवश्यक होते हैं—

तेभागा के गीतों की सफलता का एक कारण यह था कि कई गीत स्थानीय ग्रामीण धुनों और भाषिक शैली से जुड़े थे।

आधुनिक शोध यह दिखाता है कि कम्युनिस्ट और IPTA कार्यकर्ता ग्रामीण बंगाल की लोकधुनों और बोलियों का उपयोग करते हुए ऐसे गीत रचते थे जिन्हें किसान अपने सांस्कृतिक अनुभव का हिस्सा मान सके।

यहीं एक इतिहासलेखन प्रश्न भी उठता है—

क्या ये वास्तविक ‘लोकगीत’ थे या राजनीतिक कार्यकर्ताओं द्वारा लोकशैली में रचे गए आंदोलन गीत?

दोनों परंपराएं मौजूद थीं।

कुछ गीत ग्रामीण समाज के भीतर से उभरे।

दूसरे शिक्षित राजनीतिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं ने रचे, लेकिन स्थानीय धुन और भाषा अपनाकर वे आंदोलन की लोक-संस्कृति का हिस्सा बन गए।

इसलिए ‘लोक’ और ‘राजनीतिक’ के बीच यहां कठोर सीमा नहीं थी।

IPTA ने अकाल और श्रमिक-किसान जीवन को मंच पर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1943 के बंगाल अकाल के बाद ‘भूखा बंगाल’ जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रम देशभर में ले जाए गए। गूगल आर्ट्स एंड कल्चर के IPTA अभिलेख में अकाल और किसान आंदोलनों से जुड़े गीत, नाटक और दृश्य दस्तावेजों को इस जन-सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा दिखाया गया है।

तेभागा के समय तक यह सांस्कृतिक नेटवर्क पर्याप्त विकसित था।

इसलिए किसान संघर्ष केवल राजनीतिक सभा में नहीं बल्कि—

के माध्यम से भी प्रचारित हुआ।

ग्रामीण किसान के लिए जोतदार और पुलिस दोनों शक्ति के प्रतीक थे।

सामूहिक गीत और जुलूस इस भय को तोड़ने का माध्यम बने।

जब सैकड़ों लोग एक साथ वही गीत गाते हैं तो व्यक्ति अपने निजी भय से बाहर आता है।

किसान आंदोलन के संदर्भ में सांस्कृतिक प्रदर्शन इसलिए केवल प्रचार नहीं होता।

वह सामूहिक साहस का निर्माण करता है।

तेभागा के गीतों ने यही काम किया।

तेभागा की सांस्कृतिक विरासत में दृश्य कला का विशेष महत्व है।

इस क्षेत्र में दो नाम अत्यंत महत्वपूर्ण हैं—

चित्तप्रसाद भट्टाचार्य

दोनों बंगाल अकाल, गरीबों की पीड़ा और किसान प्रतिरोध से गहरे प्रभावित कलाकार थे।

चित्तप्रसाद पहले ही 1943 के बंगाल अकाल के दौरान अपनी चित्रात्मक रिपोर्टिंग के कारण प्रसिद्ध हो चुके थे।

उनकी कला का उद्देश्य शुद्ध सौंदर्यात्मक चित्र निर्माण नहीं था।

वे अकाल, भूख और ग्रामीण गरीबी को राजनीतिक साक्ष्य की तरह दर्ज करते थे।

तेभागा के समय भी उनकी चित्रकला और राजनीतिक प्रकाशनों में योगदान किसान संघर्ष की दृश्य भाषा का हिस्सा बना।

2024 की ‘आधी नाई, तेभागा चाई’ प्रदर्शनी में चित्तप्रसाद की सामग्री को सोमनाथ होर के साथ विशेष रूप से इसलिए रखा गया क्योंकि दोनों कलाकारों ने अकाल और तेभागा जैसे जन-संघर्षों को आंदोलनकारी दृष्टि से दर्ज किया।

चित्तप्रसाद की कला की विशेषता यह थी कि उसमें कला और पत्रकारिता की सीमा धुंधली हो जाती है।

राजनीतिक प्रकाशन में उसे प्रकाशित करता है।

इसलिए उसकी कृति केवल चित्र नहीं—

दृश्य रिपोर्ट भी है।

तेभागा के इतिहास में ऐसी कला विशेष महत्व रखती है क्योंकि अनेक गरीब कृषक स्वयं लिखित संस्मरण छोड़कर नहीं गए।

उनके चेहरे, शरीर, भूख और प्रतिरोध कलाकार के माध्यम से इतिहास में दर्ज हुए।

सोमनाथ होर की भूमिका और भी विशिष्ट थी।

DAG के कलाकार परिचय के अनुसार 1921 में चटगांव में जन्मे होर 1943 के बंगाल अकाल और 1946 के तेभागा किसान विद्रोह से गहरे प्रभावित हुए। उनकी शुरुआती रेखाचित्र कम्युनिस्ट पार्टी के प्रकाशनों *जनयुद्ध* और *पीपुल्स वार* में प्रकाशित हुए।

लेकिन तेभागा के संदर्भ में उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान था—

राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय की पुस्तकालय सूची सोमनाथ होर की *Tebhaga* को उनके व्यक्तिगत डायरी और आंदोलन के दिनों के रेखाचित्रों का ऐसा सामाजिक दस्तावेज बताती है जिसमें एक प्रतिबद्ध कलाकार की नजर से किसान आंदोलन दर्ज हुआ।

इस दस्तावेज का महत्व असाधारण है।

होर ने केवल नेताओं के भाषण नहीं बनाए।

बच्चे के साथ बैठी महिलाएं,

और सामान्य ग्रामीण जीवन।

यानी उनका तेभागा केवल ‘क्रांति का पोस्टर’ नहीं है।

वह संघर्ष के बीच दैनिक जीवन है।

सरकारी फाइल में किसान एक संख्या होता है—

सोमनाथ होर के चित्र में वही किसान—

या सभा में बैठा व्यक्ति

यही दृश्य कला का इतिहासलेखन महत्व है।

वह संख्या को मानवीय अनुभव में बदलती है।

सोमनाथ होर की कला में 1943 का अकाल और 1946 का तेभागा अलग घटनाएं नहीं थे।

DAG भी स्पष्ट करता है कि अकाल और किसान विद्रोह ने उनकी कलात्मक दृष्टि पर स्थायी प्रभाव डाला और बाद की कृतियों में भी मानव पीड़ा, हिंसा और असुरक्षा के रूप बार-बार लौटते रहे।

यह तेभागा के इतिहास का महत्वपूर्ण सांस्कृतिक अर्थ है।

तेभागा में वही किसान बनता है—

सोमनाथ होर की कला इस परिवर्तन को दृश्य रूप देती है।

और उसे ऐसा मानना भी नहीं चाहिए।

चित्तप्रसाद और सोमनाथ होर दोनों वामपंथी राजनीतिक वातावरण से जुड़े थे।

वे आंदोलन के प्रति सहानुभूतिशील थे।

इसलिए उनके चित्र पुलिस रिपोर्ट की तरह ‘तटस्थ’ प्रशासनिक दस्तावेज होने का दावा नहीं करते।

लेकिन पुलिस रिपोर्ट भी तटस्थ नहीं होती।

वह राज्य की दृष्टि से घटना देखती है।

यही कारण है कि इतिहासकार को दोनों पढ़ने चाहिए—

राज्य की फाइल और कलाकार का स्केच।

2024 की कोलकाता प्रदर्शनी ने ठीक यही पद्धति अपनाई—राज्य के निगरानी दस्तावेजों को कलाकारों और आंदोलनकारियों के दृश्य तथा मौखिक साक्ष्य के सामने रखा गया।

तेभागा की स्मृति केवल इतिहास की पुस्तकों में नहीं रही।

में लगातार लौटती रही।

खानपुर, चिरिरबंदर और दूसरे गोलीकांडों की स्मृति स्थानीय किसान राजनीति में लंबे समय तक जीवित रही।

ऐसी स्मृतियां एक क्षेत्र को आंदोलन के नक्शे में स्थायी स्थान देती हैं।

सरकारी प्रशासन के लिए घटना की फाइल बंद हो सकती है।

लेकिन गांव के लिए वह—

“यहां हमारे किसान मारे गए थे”

की स्मृति बन जाती है।

इसी प्रकार महिला शहीदों की स्मृति आंदोलन की महिला भागीदारी का स्थायी प्रतीक बनी।

‘हे सामालो’ जैसे आंदोलन गीत केवल 1946–47 की वस्तु नहीं बने रहे।

रिव्यू ऑफ एग्रेरियन स्टडीज़ का अध्ययन उल्लेख करता है कि यह गीत बाद में भी कृषक और राजनीतिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लोकप्रिय बना रहा।

यानी एक खास फसल संघर्ष का गीत बाद के कृषि आंदोलनों की सामान्य राजनीतिक विरासत बन गया।

यह सांस्कृतिक स्मृति का विशिष्ट रूप है—

इतिहास गीत में संक्षिप्त होकर पीढ़ियों तक चलता है।

तेभागा की आधुनिक प्रदर्शनी और मौखिक इतिहास परियोजनाएं एक महत्वपूर्ण इतिहासलेखन प्रश्न उठाती हैं।

क्या सरकारी अभिलेख इतिहास का अंतिम सत्य हैं?

राज्य के अभिलेख हमें बताते हैं—

पुलिस क्या सोच रही थी,

प्रशासन किसे खतरा मान रहा था,

किसके खिलाफ वारंट था।

लेकिन किसान की स्मृति बताती है—

उसे क्यों लगा कि आंदोलन उचित है,

महिला ने पुलिस का सामना क्यों किया,

और आंदोलन के बाद उसका जीवन कैसे बदला।

इसलिए तेभागा जैसे जनांदोलन का इतिहास अभिलेख + कला + मौखिक स्मृति—तीनों को जोड़कर ही लिखा जा सकता है।

नवंबर 2024 में पश्चिम बंगाल राज्य अभिलेखागार में आयोजित ‘आधी नाई, तेभागा चाई’ प्रदर्शनी इस जीवित स्मृति का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

इसमें सोमनाथ होर और चित्तप्रसाद की कृतियां, सरकारी रिकॉर्ड, जब्त समाचार सामग्री तथा किसान सभा और महिला आत्मरक्षा समिति से जुड़े कार्यकर्ताओं की मौखिक गवाही एक साथ रखी गई।

यह बताता है कि लगभग आठ दशक बाद भी तेभागा केवल बंद अध्याय नहीं है।

नई पीढ़ी उसे फिर से पढ़ रही है—

और नए प्रश्न पूछ रही है।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के शुरुआती इतिहासलेखन का मुख्य ढांचा था—

इस ढांचे में स्थानीय वर्गीय किसान संघर्षों को अक्सर सीमित स्थान मिला।

तेभागा की समस्या यह थी कि वह कांग्रेस-नेतृत्व वाला आंदोलन नहीं था।

वह कम्युनिस्ट किसान सभा के नेतृत्व में चला।

और उसका केंद्रीय प्रश्न राष्ट्रीय स्वतंत्रता से अधिक—

परंपरागत राष्ट्रवादी इतिहास में किसान मुख्यतः राष्ट्रीय आंदोलन का प्रतिभागी दिखाई देता था।

वह कांग्रेस आंदोलन में शामिल होता है।

विदेशी सत्ता के विरुद्ध प्रदर्शन करता है।

लेकिन तेभागा का किसान अलग था।

ब्रिटिश जाएं—यह महत्वपूर्ण है।

लेकिन यह भी महत्वपूर्ण है कि—

मेरी फसल का हिस्सा क्या होगा?

इसलिए तेभागा राष्ट्रीय मुक्ति की कहानी में सामाजिक-आर्थिक प्रश्न जोड़ता है।

राष्ट्रवादी इतिहास की केंद्रीय उपलब्धि थी—

तेभागा का इतिहास पूछता है—

यदि भारत स्वतंत्र हो जाए लेकिन गरीब किसान वही बर्गादार बना रहे तो क्या उसकी मुक्ति पूरी हुई?

यही प्रश्न किसान इतिहास को राष्ट्रवादी इतिहास से आगे ले जाता है।

इस अर्थ में तेभागा स्वतंत्रता आंदोलन का विरोधी इतिहास नहीं है।

वह उसकी सामाजिक सीमा का विस्तार है।

तेभागा पर सबसे व्यवस्थित प्रारंभिक लेखन मार्क्सवादी और किसान आंदोलन से जुड़े इतिहासकारों तथा कार्यकर्ताओं की परंपरा से आया।

इस व्याख्या का केंद्र था—

जोतदार शोषक कृषि वर्ग।

बर्गादार उत्पादक कृषक वर्ग।

किसान सभा वर्गीय संगठन।

तेभागा ग्रामीण वर्ग-संघर्ष।

इस दृष्टि से आंदोलन का अर्थ अत्यंत स्पष्ट दिखाई देता था।

इस दृष्टिकोण ने पहली बार किसान को राष्ट्रीय राजनीति के ‘पीछे चलने वाले जनसमूह’ के बजाय स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति माना।

यह महत्वपूर्ण इतिहासलेखन परिवर्तन था।

मार्क्सवादी इतिहास ने पूछा—

राज्य किसके हित की रक्षा करता है?

यही प्रश्न तेभागा को समझने के लिए अत्यंत उपयोगी हैं।

डी. एन. धनागरे जैसे विद्वानों ने तेभागा का अध्ययन केवल पार्टी इतिहास के रूप में नहीं बल्कि कृषक सामाजिक संरचना के रूप में किया।

के बीच संबंध महत्वपूर्ण हैं।

इस दृष्टिकोण ने यह दिखाया कि ‘किसान’ कोई एक समान वर्ग नहीं था।

यहीं से पारंपरिक मार्क्सवादी सरलता पर आलोचना शुरू होती है।

बाद के इतिहासकारों ने ध्यान दिलाया कि वर्गीय व्याख्या कई महत्वपूर्ण अनुभवों को पीछे कर सकती है।

और किसान की अपनी भाषा।

भारत में इतिहासलेखन पर एक आधुनिक समीक्षा बताती है कि मार्क्सवादी इतिहासकारों ने लोकप्रिय और श्रमिक आंदोलनों को राष्ट्रवादी तथा कैंब्रिज इतिहासकारों की तुलना में अधिक महत्व दिया, लेकिन जाति, लिंग और उपेक्षित समूहों की सांस्कृतिक प्रक्रियाओं पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया।

यह आलोचना तेभागा पर विशेष रूप से लागू होती है।

मार्क्सवादी इतिहासलेखन के भीतर भी दो स्तर अलग करना आवश्यक है।

कम्युनिस्ट पार्टी ने क्या किया?

किसानों ने वास्तव में क्या किया?

दोनों हमेशा समान नहीं थे।

आंदोलन कई बार नेतृत्व की योजना से आगे बढ़ा।

स्थानीय समुदायों ने अपनी मांगें जोड़ीं।

महिलाओं ने ऐसे प्रश्न उठाए जो पार्टी कार्यक्रम में नहीं थे।

आदिवासी किसान स्थानीय भूमि अनुभव के आधार पर अधिक उग्र हुए।

इसलिए तेभागा का इतिहास केवल CPI की रणनीति पढ़कर पूरा नहीं होता।

1980 के दशक के बाद भारतीय इतिहासलेखन में सबाल्टर्न स्टडीज़ ने यह प्रश्न जोर से उठाया कि क्या इतिहास को केवल अभिजात राजनीतिक नेतृत्व की दृष्टि से लिखा जा सकता है।

रणजीत गुहा और दूसरे इतिहासकारों ने किसान विद्रोहों की अपनी राजनीतिक चेतना, भाषा और स्वायत्तता पर जोर दिया।

इस दृष्टि ने तेभागा जैसे आंदोलन को नए ढंग से पढ़ने का रास्ता खोला।

पुराना संगठनात्मक इतिहास पूछ सकता था—

किस तारीख को किसान सभा ने प्रस्ताव पारित किया?

सबाल्टर्न दृष्टि दूसरा प्रश्न पूछती है—

किसान ने उस निर्देश को कैसे समझा?

उसने अपनी स्थानीय शिकायत उसमें कैसे जोड़ी?

किस बिंदु पर आंदोलन नेतृत्व से आगे निकल गया?

उसके लिए लाल झंडे, फसल और खलिहान का अर्थ क्या था?

यहीं किसान इतिहास की एजेंसी सामने आती है।

रणजीत गुहा ने औपनिवेशिक विद्रोह संबंधी सरकारी अभिलेखों को समझने के लिए जिस ‘प्रोज ऑफ काउंटर-इंसर्जेंसी’ की अवधारणा विकसित की, वह तेभागा के स्रोतों को पढ़ने में भी उपयोगी है।

राज्य दस्तावेज किसान को अक्सर—

कम्युनिस्ट उकसावे का शिकार,

या कानून तोड़ने वाला

2024 की तेभागा प्रदर्शनी ने सरकारी निगरानी अभिलेखों को आंदोलनकारी कला और मौखिक गवाही के सामने रखकर इसी इतिहासलेखन समस्या को प्रत्यक्ष रूप से दिखाया।

लेकिन सबाल्टर्न इतिहासलेखन की स्वयं आलोचना हुई है।

यदि ‘किसान समुदाय’ को अत्यधिक स्वायत्त और एकरूप माना जाए तो उसके भीतर—

आदिवासी–गैर आदिवासी,

के विभाजन छूट सकते हैं।

भारतीय महिला इतिहासलेखन के विकास पर इग्नू की सामग्री बताती है कि प्रारंभिक सबाल्टर्न इतिहास ने औपनिवेशिक और राष्ट्रवादी अभिजात इतिहास को चुनौती दी, लेकिन महिलाओं और लिंग संबंधों को पर्याप्त रूप से शामिल नहीं किया; इसी कमी ने नारीवादी इतिहासलेखन को अलग हस्तक्षेप करने के लिए प्रेरित किया।

तेभागा इतिहासलेखन में सबसे बड़ा परिवर्तन महिला इतिहास और मौखिक इतिहास के प्रवेश से आया।

पुराने वर्णनों में महिलाएं अक्सर इस तरह दिखाई देती थीं—

‘महिलाओं ने साहस दिखाया।’

लेकिन नया प्रश्न था—

महिलाओं ने आंदोलन को स्वयं कैसे अनुभव किया?

पीटर कस्टर्स की *Women in the Tebhaga Uprising* उन शुरुआती कार्यों में थी जिसने तेभागा की महिला भागीदारी को स्वतंत्र ऐतिहासिक विषय बनाया।

1991 में डोलोरेस एफ. च्यू की समीक्षा ने कस्टर्स के अध्ययन को भारत में महिला इतिहास की उस नई दिशा का हिस्सा बताया जिसने यह प्रश्न उठाया कि क्रांतिकारी आंदोलन में महिलाओं की स्थिति आंदोलन के दौरान और उसके बाद कैसे बदलती है। समीक्षा यह भी स्पष्ट करती है कि पारंपरिक वाम और जन-आंदोलन इतिहासों में महिलाओं की भागीदारी या तो उपेक्षित थी या पुरुष-परिभाषित ‘वीरता’ के संदर्भ में प्रस्तुत की जाती थी।

यह इतिहासलेखन के लिए बड़ा बदलाव था।

तेभागा महिला इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण आधुनिक कार्यों में कविता पंजाबी की _Unclaimed Harvest: An मौखिक इतिहास of the Tebhaga Women's Movement_ है।

यह अध्ययन लिखित पार्टी अभिलेखों से आगे जाकर आंदोलन में शामिल महिलाओं की मौखिक स्मृतियों पर आधारित है।

पुस्तक का केंद्रीय तर्क है कि तेभागा में 50,000 से अधिक महिलाओं की भागीदारी का उल्लेख मिलता है, फिर भी आंदोलन के परंपरागत लिखित इतिहास में उन्होंने जो स्वतंत्र महिला आंदोलन खड़ा किया, उसे पर्याप्त स्थान नहीं मिला।

यहां ध्यान देना चाहिए कि 50,000 का आंकड़ा भी शोध-परंपरा में उद्धृत अनुमान है, कोई पूर्ण जनगणना नहीं।

लेकिन पुस्तक की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि संख्या नहीं—

मौखिक इतिहास की पद्धति ने उन महिलाओं से पूछा—

आंदोलन में तुम क्यों आईं?

पति का क्या रवैया था?

पुलिस से कैसे लड़ीं?

घर और आंदोलन एक साथ कैसे संभाला?

क्या आंदोलन ने घरेलू हिंसा बदली?

क्या बाद में तुम्हें राजनीतिक संगठन में स्थान मिला?

ये प्रश्न पारंपरिक वर्गीय इतिहास में शायद ही पूछे गए थे।

यहीं तेभागा का अर्थ बदलता है।

महिला इतिहासकारों ने दिखाया कि किसान परिवार स्वयं समानता पर आधारित इकाई नहीं था।

इसलिए महिला के सामने दो सत्ता संबंध हो सकते हैं—

खंड 16

दस्तावेज, समयरेखा और संदर्भ

तेभागा आंदोलन की ऐतिहासिक व्याख्या करते समय सबसे बड़ी चुनौती घटनाओं की कमी नहीं बल्कि स्रोतों की असमानता है। सरकारी पुलिस फाइलें, बंगाल सरकार के भूमि-राजस्व दस्तावेज, किसान सभा की रिपोर्टें, कम्युनिस्ट पार्टी के प्रकाशन, समकालीन समाचार-पत्र, विधानसभा की कार्यवाही, आंदोलनकारियों के संस्मरण और दशकों बाद दर्ज मौखिक इतिहास—सभी उपलब्ध हैं, लेकिन सभी एक ही घटना को अलग भाषा में प्रस्तुत करते हैं।

पुलिस के लिए किसान ‘अवैध रूप से फसल ले जाने वाली भीड़’ हो सकता था। किसान सभा के लिए वही व्यक्ति ‘अपने वैध तेभागा अधिकार को लागू करने वाला बर्गादार’ था। भूमि विभाग का अधिकारी आंदोलन के विस्तार को थाना और जिले की भाषा में दर्ज करता था; किसान महिला की स्मृति उसी आंदोलन को भूख, पुलिस, बच्चों और गांव की एकता के अनुभव के रूप में याद करती थी।

इसीलिए तेभागा पर गंभीर शोध की बुनियादी पद्धति होनी चाहिए—

किसी बड़े दावे को संभव हो तो कम-से-कम दो स्वतंत्र प्रकार के स्रोतों से जांचना—सरकारी अभिलेख को आंदोलनकारी स्रोत से, समाचार-पत्र को जिला रिपोर्ट से और बाद की स्मृति को समकालीन दस्तावेज से मिलाना।

इस खंड का उद्देश्य केवल संदर्भ देना नहीं है, बल्कि यह स्पष्ट करना है कि तेभागा के बारे में हम जो जानते हैं, वह हमें कैसे पता है।

तेभागा 1946 में अचानक शुरू नहीं हुआ। उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि लगभग डेढ़ शताब्दी लंबी थी।

1793 — स्थायी बंदोबस्त

ईस्ट इंडिया कंपनी ने लॉर्ड कॉर्नवालिस के समय बंगाल में स्थायी बंदोबस्त लागू किया। भू-राजस्व जमींदारों के माध्यम से स्थायी रूप से निर्धारित किया गया। इसके बाद बंगाल की कृषि संरचना में जमींदार और वास्तविक कृषक के बीच अनेक मध्यस्थ अधिकार विकसित होते गए।

तेभागा की दूरस्थ संरचनात्मक जड़ यहीं थी—भूमि पर कानूनी नियंत्रण और भूमि पर वास्तविक श्रम का धीरे-धीरे अलग होना।

उन्नीसवीं शताब्दी — कृषक अधिकार का प्रश्न

नील विद्रोह और 1870 के दशक का पाबना किसान आंदोलन यह दिखाने लगे कि बंगाल का कृषक जमींदारी और उत्पादन संबंधों को निष्क्रिय रूप से स्वीकार नहीं कर रहा था।

पाबना ने विशेष रूप से मनमाने लगान और काश्तकारी सुरक्षा को राजनीतिक प्रश्न बनाया।

तेभागा तक पहुंचने वाली किसान राजनीति में यह एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक पड़ाव था।

1885 — बंगाल काश्तकारी अधिनियम

Bengal Tenancy Act, 1885 ने कुछ रैयतों के काश्तकारी अधिकारों को मान्यता दी, लेकिन बर्गादार की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर बनी रही।

बीसवीं शताब्दी तक यह स्पष्ट हो गया कि भूमि पर प्रत्यक्ष श्रम करने वाले सभी कृषक मौजूदा काश्तकारी कानून की सुरक्षा में समान रूप से नहीं आते।

1928 — बंगाल काश्तकारी कानून में संशोधन

1928 के संशोधन ने भी बर्गादार प्रश्न का पर्याप्त समाधान नहीं किया। बाद की भूमि-राजस्व बहसों में इसी कमी की आलोचना हुई।

इसी पृष्ठभूमि में बर्गादार को स्वतंत्र कानूनी श्रेणी के रूप में अधिक सुरक्षा देने की मांग तेज हुई।

1929–33 — महामंदी

विश्वव्यापी महामंदी ने बंगाल की कृषि अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया।

कृषि वस्तुओं की कीमतें गिरीं।

जूट जैसे बाजारोन्मुख उत्पादों पर निर्भर किसानों की आय प्रभावित हुई।

कर्ज का वास्तविक बोझ बढ़ा।

इस आर्थिक संकट ने ग्रामीण वर्ग संबंधों को और तनावपूर्ण बनाया।

1936 — अखिल भारतीय किसान सभा

अप्रैल 1936 में लखनऊ में अखिल भारतीय किसान सभा का गठन हुआ।

इसी समय बंगाल किसान सभा ने भी अधिक संगठित प्रांतीय स्वरूप ग्रहण किया।

किसान प्रश्न अब केवल अलग-अलग गांवों का आर्थिक विवाद नहीं रहा; वह प्रांतीय और राष्ट्रीय राजनीति का विषय बन रहा था।

1938 — बंगाल भूमि राजस्व आयोग

फजलुल हक सरकार ने सर फ्रांसिस फ्लाउड की अध्यक्षता में भूमि-राजस्व आयोग गठित किया।

यह आयोग आगे फ्लाउड आयोग कहलाया।

उसने बंगाल की भूमि संरचना, जमींदारी, रैयत और बर्गादार संबंधों की व्यापक समीक्षा की।

ब्रिटिश लाइब्रेरी के इंडिया ऑफिस रिकॉर्ड्स में आयोग की रिपोर्ट और उससे संबंधित पत्राचार अलग अभिलेखीय श्रृंखला में मौजूद हैं—IOR/L/E/9/572 में मई 1940 से फरवरी 1947 तक के दस्तावेज शामिल हैं।

21 मार्च 1940 — फ्लाउड आयोग की रिपोर्ट

आयोग ने 1940 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।

उसकी सबसे महत्वपूर्ण तेभागा-संबंधी सिफारिश थी कि बर्गादार से वसूल की जाने वाली उपज का हिस्सा आधे के बजाय एक-तिहाई हो; अर्थात बर्गादार के पास दो-तिहाई रहे। उत्तर बंगाल विश्वविद्यालय से उपलब्ध शोध भी फ्लाउड रिपोर्ट के संबंधित खंडों को इसी रूप में उद्धृत करता है।

यही भविष्य के आंदोलन को सरकारी आयोग की वैधता प्रदान करता है।

9 जून 1940 — पांजिया सम्मेलन

जेसोर जिले के पांजिया में बंगाल किसान सभा ने पहली बार स्पष्ट रूप से दो-तिहाई हिस्से को अपने कार्यक्रम में अपनाया।

इससे तेभागा केवल आयोग की सिफारिश नहीं रहा।

वह संगठित किसान मांग बन गया।

1939–40 — उत्तर बंगाल में अधियार संघर्ष

दिनाजपुर, जलपाईगुड़ी, रंगपुर सीमा क्षेत्र और अन्य स्थानों पर अधियारों ने फसल, ऋण और खलिहान नियंत्रण से जुड़े संघर्ष शुरू किए।

इसलिए 1946 की प्रत्यक्ष कार्रवाई की पृष्ठभूमि पहले से मौजूद थी।

1941–42 — युद्ध और राजनीतिक रणनीति

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की रणनीति में परिवर्तन आया।

1941 में सोवियत संघ पर जर्मन आक्रमण के बाद पार्टी ने फासीवाद-विरोधी युद्ध को समर्थन देना शुरू किया।

व्यापक तेभागा अभियान तत्काल नहीं छेड़ा गया, हालांकि किसान संगठन जारी रहा।

1943 — बंगाल अकाल

1943 के अकाल ने ग्रामीण बंगाल को सामाजिक और आर्थिक रूप से तोड़ दिया।

भूख, मृत्यु, विस्थापन, पशु और संपत्ति की बिक्री तथा कर्ज ने बर्गादार और खेतिहर गरीब की असुरक्षा गहरी की।

यहीं अकाल और तेभागा के बीच राजनीतिक संबंध बनता है—

धान पैदा करने वाला व्यक्ति स्वयं भूखा मर सकता था।

1943–45 — किसान और महिला संगठन का विस्तार

अकाल राहत, किसान समितियों और महिला आत्मरक्षा समिति के काम ने ग्रामीण संगठन का नेटवर्क मजबूत किया।

1945 तक किसान सभा बंगाल में पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक संगठन बन चुकी थी।

5–9 अप्रैल 1945 — नेत्रकोना सम्मेलन

मयमनसिंह जिले के नेत्रकोना में अखिल भारतीय किसान सभा का नौवां सम्मेलन हुआ।

युद्ध के अंत, अकाल के बाद का संकट और बढ़ती किसान राजनीति इस सम्मेलन की पृष्ठभूमि में थे।

यह तेभागा के व्यापक संगठनात्मक पूर्वाधार के रूप में महत्वपूर्ण था।

सितंबर 1946 — निर्णायक तेभागा आह्वान

बंगाल प्रांतीय किसान सभा ने आगामी धान कटाई में तेभागा लागू करने का निर्णय किया।

बर्गादार फसल का दो-तिहाई रखेगा।

धान जोतदार के बजाय बर्गादार के अपने खलिहान में जाएगा।

अखिल भारतीय किसान सभा के बाद के आधिकारिक ऐतिहासिक प्रकाशन में इसी निर्णय को आंदोलन की शुरुआत का निर्णायक बिंदु माना गया है।

नवंबर–दिसंबर 1946 — खेत में प्रत्यक्ष कार्रवाई

दिनाजपुर, जलपाईगुड़ी, रंगपुर, 24 परगना, जेसोर, खुलना, मिदनापुर और दूसरे जिलों में बर्गादारों ने धान अपने खलिहान में ले जाना शुरू किया।

तेभागा अब नारा नहीं, व्यावहारिक कृषि व्यवस्था बन रहा था।

4 जनवरी 1947 — चिरिरबंदर

दिनाजपुर के चिरिरबंदर में पुलिस गोलीबारी हुई और समीरुद्दीन तथा शिवराम मांझी जैसे किसानों की मृत्यु आंदोलन की प्रमुख शहादतों में दर्ज हुई।

इसके बाद उत्तर बंगाल में संघर्ष और तीव्र हुआ।

22 जनवरी 1947 — बर्गादार विधेयक

बंगाल सरकार ने *Bengal Bargadars Temporary Regulation Bill* का मसौदा *Calcutta Gazette, Extraordinary* में प्रकाशित किया।

समकालीन स्रोत-सूचियों में The Calcutta Gazette, Extraordinary, 22 January 1947 को तेभागा अध्ययन का प्रमुख प्राथमिक स्रोत माना गया है।

यह आंदोलन की बड़ी राजनीतिक उपलब्धि थी—सरकार ने बर्गादार प्रश्न को विधायी रूप से स्वीकार किया।

लेकिन विधेयक कानून नहीं बन पाया।

जनवरी–फरवरी 1947 — आंदोलन की दूसरी लहर

विधेयक के प्रकाशन ने किसानों में यह विश्वास बढ़ाया कि उनका दावा वैध है।

कई क्षेत्रों में उन किसानों ने भी जोतदारों के खलिहान में जमा पुरानी फसल से अपने हिस्से की मांग शुरू की जिन्होंने पहले नई फसल वहां पहुंचा दी थी।

इसी समय पुलिस दमन भी बढ़ा।

20 फरवरी 1947 — खानपुर

दिनाजपुर के खानपुर में पुलिस और किसानों का गंभीर टकराव हुआ।

यह तेभागा का सबसे प्रसिद्ध गोलीकांड बना।

मृतकों की संख्या पर स्रोतों में मतभेद है; इसलिए इसे निश्चित संख्या के बजाय स्रोतवार पढ़ना चाहिए। आगे इसी खंड में इस प्रश्न का विस्तृत परीक्षण किया गया है।

मार्च–अप्रैल 1947 — जलपाईगुड़ी और डुआर्स

नियोरामाझिलाई, महाबाड़ी–चालसा और दूसरे क्षेत्रों में पुलिस तथा किसानों के बीच रक्तरंजित संघर्ष हुए।

जिला प्रशासन ने धारा 144, गिरफ्तारी, मुकदमे और पुलिस तैनाती बढ़ाई।

मध्य 1947 — आंदोलन का क्षय

कटाई समाप्त हो चुकी थी।

सांप्रदायिक तनाव और बंगाल विभाजन का प्रश्न राष्ट्रीय राजनीति पर हावी था।

तेभागा का एकीकृत प्रांतीय उभार कमजोर होने लगा।

15 अगस्त 1947 — विभाजन

अविभाजित बंगाल भारत के पश्चिम बंगाल और पाकिस्तान के पूर्वी बंगाल में विभाजित हुआ।

तेभागा का भूगोल और संगठन भी बंट गया।

दिनाजपुर जैसे महत्वपूर्ण जिले तक विभाजित हो गए।

1948–50 — पूर्वी बंगाल में निरंतरता

पूर्वी पाकिस्तान में बर्गादार प्रश्न समाप्त नहीं हुआ।

विभिन्न क्षेत्रों में तेभागा-संबंधी संघर्ष जारी रहे और 1949–50 में नाचोल में संथाल तथा गरीब कृषकों का बड़ा विद्रोह उभरा।

14 नवंबर 1949 — पश्चिम बंगाल बर्गादार अध्यादेश

1950 के बर्गादार अधिनियम में यह स्पष्ट किया गया कि पहले लागू West Bengal Bargadars Ordinance, 1949 के अंतर्गत की गई कार्रवाइयां नए कानून के अंतर्गत जारी मानी जाएंगी और कानून की कुछ व्यवस्थाएं 14 नवंबर 1949 से प्रभावी स्थिति से जुड़ी थीं।

यह दिखाता है कि स्वतंत्र पश्चिम बंगाल में सरकार ने तेभागा प्रश्न पर विधायी कार्रवाई 1950 के औपचारिक अधिनियम से पहले ही शुरू कर दी थी।

जनवरी 1950 — नाचोल संघर्ष

पूर्वी पाकिस्तान के नाचोल में तेभागा की मूल मांग नई राजनीतिक परिस्थिति में फिर उभरी।

इला मित्र और स्थानीय नेताओं के नेतृत्व में किसान संघर्ष हुआ।

कठोर दमन, गिरफ्तारी और मुकदमों ने इसे तेभागा की विभाजन-पश्चात सबसे प्रसिद्ध विरासत बना दिया।

15 मार्च 1950 — पश्चिम बंगाल बर्गादार अधिनियम

West Bengal Bargadars Act, 1950 स्वतंत्र पश्चिम बंगाल में बर्गादार संबंध को कानूनी रूप से विनियमित करने वाला महत्वपूर्ण कानून बना।

उसके प्रामाणिक पाठ में उपज वितरण, विवाद निपटान और बर्गादार संबंध के लिए वैधानिक व्यवस्था मौजूद थी।

इस बिंदु तक आते-आते 1946 का विद्रोही नारा राज्य के कानून में प्रवेश कर चुका था।

तेभागा शोध के प्राथमिक स्रोतों को उनकी प्रकृति के अनुसार अलग करना आवश्यक है। सबसे उपयोगी प्राथमिक सामग्री निम्न श्रेणियों में आती है।

फ्लाउड आयोग की रिपोर्ट

Report of the Land Revenue Commission, Bengal, 1940

आम तौर पर इसे *Floud Commission Report* कहा जाता है।

यह कई खंडों में प्रकाशित हुई थी।

तेभागा के लिए इसका महत्व इसलिए सर्वोच्च है क्योंकि यही वह आधिकारिक सरकारी आयोग था जिसने बर्गादार से आधी के बजाय एक-तिहाई उपज लेने की दिशा में सुधार की सिफारिश की।

डी. एन. धनागरे द्वारा उपयोग की गई स्रोत-सूची में भी Government of Bengal की 1940 की इस छह-खंडीय रिपोर्ट को मूल स्रोत के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।

इसका उपयोग किस प्रश्न के लिए करें?

बर्गादार की कानूनी स्थिति क्या थी?

सरकार कृषि संरचना की समस्या को कैसे देखती थी?

दो-तिहाई की सिफारिश का वास्तविक शब्दांकन क्या था?

जमींदारी और मध्यस्थ अधिकारों पर आयोग का व्यापक दृष्टिकोण क्या था?

इन प्रश्नों के लिए फ्लाउड रिपोर्ट प्राथमिक और अनिवार्य स्रोत है।

फ्लाउड आयोग केवल प्रकाशित रिपोर्ट तक सीमित नहीं है।

ब्रिटिश लाइब्रेरी के इंडिया ऑफिस रिकॉर्ड्स में उससे संबंधित पत्राचार और प्रशासनिक सामग्री भी मौजूद है।

IOR/L/E/9/572 — Land Revenue Commission Bengal 1938: report by Sir Francis Floud, May 1940–February 1947

का अभिलेखीय उल्लेख मिलता है।

यह शोधकर्ता के लिए बहुत उपयोगी हो सकता है क्योंकि प्रकाशित रिपोर्ट हमें अंतिम निष्कर्ष देती है, जबकि प्रशासनिक पत्राचार यह बता सकता है कि सरकार के भीतर सिफारिशों को लेकर कैसी बहस थी।

तेभागा संबंधी सबसे महत्वपूर्ण अप्रकाशित अभिलेख पश्चिम बंगाल राज्य अभिलेखागार में तत्कालीन बंगाल सरकार के Land and Land Revenue Department और उसकी शाखाओं में मिलते हैं।

उत्तर बंगाल पर हुए शोध में उदाहरणस्वरूप यह अभिलेख उद्धृत है—

Land and Revenue Department, File No. 6M/47 — SDO Reports on Tebhaga Movement

इसी प्रकार मालदा के एसडीओ की रिपोर्ट का विशिष्ट ज्ञापन और पृष्ठ संख्या तक शोध में दी गई है।

Land Revenue Department, Land Revenue Branch, F. No. 6M-38/47 B

का उपयोग किया गया है।

ये फाइलें अत्यंत मूल्यवान हैं क्योंकि इनमें जिला और उपखंड अधिकारी सीधे आंदोलनग्रस्त क्षेत्रों से रिपोर्ट भेज रहे थे।

तेभागा केवल भूमि विभाग का विषय नहीं रहा।

जैसे ही आंदोलन पुलिस और कानून-व्यवस्था के प्रश्न से जुड़ा, Home Political Department की फाइलें महत्वपूर्ण हो गईं।

उत्तर बंगाल विश्वविद्यालय के शोध में उदाहरण के तौर पर—

GB Home Poll. Conf. File No. W/510 of 1940

GB Home Poll. Conf. File No. 134/41

जैसी West Bengal State Archives फाइलों का उपयोग किया गया है।

इनका महत्व विशेष रूप से यह समझने में है कि प्रशासन किसान सभा और कम्युनिस्ट संगठन को कैसे देखता था।

तेभागा से पहले की कृषि संरचना जानने के लिए आंदोलनकालीन पुलिस रिपोर्ट पर्याप्त नहीं।

इसके लिए जिला सेटलमेंट रिपोर्ट अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

डी. एन. धनागरे द्वारा उपयोग किए गए मूल स्रोतों में—

Final Report on the Survey and Settlement Operations in the District of Dinajpur, 1934–40

विशेष रूप से शामिल है।

ऐसी रिपोर्टें बताती हैं—

भूमि स्वामित्व की संरचना,

रैयत और अधियार संबंध,

स्थानीय भूमि शब्दावली,

और जिले की सामाजिक-आर्थिक संरचना।

तेभागा क्यों दिनाजपुर में इतना शक्तिशाली हुआ—इसका उत्तर केवल 1946 की पुलिस फाइल नहीं, ऐसी पूर्ववर्ती सेटलमेंट रिपोर्ट भी देती है।

The Calcutta Gazette, Extraordinary, 22 January 1947 तेभागा के कानूनी इतिहास का अनिवार्य प्राथमिक स्रोत है।

यहीं प्रस्तावित बर्गादार विधेयक प्रकाशित हुआ।

एक आधुनिक शोध लेख की विस्तृत स्रोत-सूची इसे सीधे प्राथमिक स्रोत के रूप में दर्ज करती है।

इस दस्तावेज का उपयोग विशेष रूप से यह जांचने के लिए होना चाहिए कि सरकार ने वास्तव में—

बर्गादार की परिभाषा,

के बारे में क्या प्रस्तावित किया था।

पुलिस गोलीबारी, बर्गादार विधेयक और सरकार की नीति को समझने के लिए Bengal Legislative Assembly Proceedings अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

खानपुर और दूसरे गोलीकांडों के बाद—

विपक्ष ने क्या आरोप लगाया?

ज्योति बसु और दूसरे विधायकों ने क्या प्रश्न उठाए?

सुहरावर्दी सरकार ने पुलिस कार्रवाई को किस प्रकार उचित ठहराया?

इन प्रश्नों का सबसे मजबूत स्रोत विधानसभा की मूल कार्यवाही है।

बाद के सरकारी शहीद-संग्रहों में भी विधानसभा कार्यवाही को आधार स्रोत के रूप में उपयोग किया गया है।

सरकारी अभिलेख तेभागा का केवल आधा इतिहास बताते हैं।

दूसरा आधा समझने के लिए किसान सभा के अपने दस्तावेज आवश्यक हैं।

आधुनिक शोध-सूची में—

Report of BPKS, 1945

Report of BPKS, 1946

Report of BPKS, February–March 1947

जैसे दस्तावेजों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।

ये दस्तावेज यह समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं कि संगठन—

अपनी सदस्यता कैसे देख रहा था,

किन जिलों को प्राथमिकता दे रहा था,

पुलिस दमन को कैसे दर्ज कर रहा था,

और आंदोलन की सफलता तथा विफलता का आंतरिक मूल्यांकन कैसे कर रहा था।

AIKS के सम्मेलन प्रस्ताव और बाद की ऐतिहासिक रिपोर्टें आंदोलन की संगठनात्मक विचारधारा समझने में उपयोगी हैं।

विशेष रूप से एम. अब्दुल्ला रसूल की Tebhaga Struggle of Bengal, जिसे 1986 की स्वर्ण जयंती श्रृंखला में प्रकाशित किया गया, संगठन का महत्वपूर्ण आंतरिक ऐतिहासिक स्रोत है। AIKS इसे अपनी XXV Conference Golden Jubilee Series के दूसरे खंड के रूप में उपलब्ध कराती है।

यह 1946–47 का समकालीन दस्तावेज नहीं है, इसलिए तकनीकी रूप से इसे बाद का संगठनात्मक संस्मरण/इतिहास माना जाना चाहिए।

फिर भी इसकी उपयोगिता बहुत है क्योंकि लेखक और संस्था आंदोलन की राजनीतिक परंपरा के भीतर से लिखते हैं।

जिस तरह पुलिस रिपोर्ट को अंतिम सत्य नहीं मानना चाहिए, किसान सभा की रिपोर्ट को भी नहीं।

उसमें स्वाभाविक रूप से—

किसान भागीदारी को अधिक व्यापक दिखाने,

शहादत को राजनीतिक प्रतीक बनाने,

पार्टी की भूमिका को प्रमुख बताने,

या रणनीतिक त्रुटियों को कम करने

की प्रवृत्ति हो सकती है।

लेकिन यही पक्षधरता उसे अनुपयोगी नहीं बनाती।

वह हमें बताती है कि आंदोलन स्वयं अपने को कैसे समझ रहा था।

तेभागा के तुरंत बाद प्रकाशित बंगाली पुस्तिकाएं और राजनीतिक साहित्य अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

आधुनिक शोध में उदाहरण के रूप में—

कृष्णबिनोद राय, _Krishaker Laraier Katha_ (1947)

1947 में प्रकाशित ऐसी सामग्री आंदोलन की लगभग समकालीन राजनीतिक स्मृति है।

इसे बाद के इतिहास की तुलना में विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि लेखक की स्मृति और तत्काल राजनीतिक वातावरण अभी ताजा था।

तेभागा को समझने के लिए कम्युनिस्ट प्रकाशन—

स्वाधीनता, जनयुद्ध, और अन्य पार्टी पत्र

आधुनिक शोध में *Swadhinata* के 6, 8 और 10 अप्रैल 1947 जैसे विशिष्ट अंक उद्धृत किए गए हैं।

इनके माध्यम से हम आंदोलन के तत्काल राजनीतिक प्रचार, पुलिस गोलीबारी की रिपोर्टिंग और किसान सभा की भाषा को समझ सकते हैं।

तेभागा पर सबसे अधिक विस्तृत दैनिक सूचना अक्सर पुलिस और जिला प्रशासन से मिलती है।

लेकिन यही स्रोत सबसे अधिक सावधानी भी मांगते हैं।

‘भीड़’ कौन थी?

पुलिस रिपोर्ट लिख सकती है—

‘एक हजार की भीड़ ने धान लूट लिया।’

किसान सभा लिख सकती है—

‘एक हजार बर्गादार अपना वैध हिस्सा वापस लेने पहुंचे।’

घटना संभवतः एक ही है।

शब्दावली अर्थ बदल देती है।

इसलिए शोधकर्ता को देखना चाहिए—

बर्गादार का पुराना संबंध क्या था?

फसल पहले कहां रखी गई थी?

जोतदार ने क्या दावा किया?

किसानों ने क्या कहा?

सरकारी खुफिया दस्तावेज अनेक जनांदोलनों को ‘agitators’ या ‘communist instigation’ की भाषा में दर्ज करते हैं।

ऐसी भाषा किसान की स्वतंत्र एजेंसी कम करके दिखा सकती है।

यदि हर कार्रवाई को बाहरी उकसावे का परिणाम कहा जाए तो यह प्रश्न छूट जाता है—

किसान ने उस आह्वान को स्वीकार ही क्यों किया?

यहीं सामाजिक और आर्थिक स्रोत आवश्यक हो जाते हैं।

गोलीबारी के बाद सरकारी और आंदोलनकारी आंकड़े अलग होना सामान्य है।

सरकार तत्काल प्रमाणित शव गिन सकती है।

किसान संगठन बाद में घायल होकर मरने वाले या लापता लोगों को भी जोड़ सकता है।

स्थानीय स्मृति किसी घटना को शहीद सूची में और व्यापक रूप दे सकती है।

इसलिए संख्या के स्रोत को हमेशा लिखना चाहिए।

FIR में किसान पर चोरी, दंगा, हमला या सरकारी काम में बाधा का आरोप हो सकता है।

लेकिन FIR इस बात का प्रमाण नहीं कि आरोपी अपराधी सिद्ध हुआ।

इतिहासकार को अलग करना चाहिए—

आरोप, गिरफ्तारी, अभियोजन और दोषसिद्धि।

यह भेद तेभागा जैसे प्रतिरोध आंदोलन में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इन सीमाओं के बावजूद सरकारी अभिलेख अमूल्य हैं।

और घटनाओं की क्रमबद्धता

जैसे विवरण अक्सर आंदोलनकारी स्मृति से अधिक व्यवस्थित रूप में देते हैं।

इसलिए उन्हें खारिज नहीं करना चाहिए—प्रतिपाठ करना चाहिए।

उन्होंने डायरी नहीं लिखी।

आत्मकथा प्रकाशित नहीं की।

पचास वर्ष बाद व्यक्ति—

खंड 17

निष्कर्ष — तेभागा आंदोलन को कैसे समझें?

तेभागा आंदोलन को भारतीय किसान इतिहास में केवल “आधी फसल के बदले दो-तिहाई फसल” की मांग के रूप में देखना उसके ऐतिहासिक महत्व को बहुत छोटा कर देना होगा। उसका वास्तविक अर्थ इससे कहीं व्यापक था। यह आंदोलन औपनिवेशिक भूमि व्यवस्था, ग्रामीण वर्ग संबंध, किसान संगठन, स्त्री भागीदारी, आदिवासी और सामाजिक रूप से हाशिये के कृषक समुदायों की सक्रियता, सांप्रदायिक तनाव, राज्य दमन और स्वतंत्र भारत के भूमि सुधार—इन सबको एक ही ऐतिहासिक बिंदु पर जोड़ता है।

तेभागा 1946–47 की एक आकस्मिक घटना नहीं था। उसकी जड़ें 1793 के स्थायी बंदोबस्त से विकसित उस ग्रामीण संरचना में थीं जिसमें भूमि पर उच्चतर अधिकार रखने वाले जमींदार, जोतदार और अन्य मध्यस्थ तथा वास्तविक खेत जोतने वाला कृषक अलग-अलग शक्ति-स्तरों पर स्थित थे। उन्नीसवीं शताब्दी के नील और पाबना जैसे किसान संघर्षों से लेकर बीसवीं शताब्दी में किसान सभा के उदय तक यह प्रश्न लगातार बना रहा कि जमीन पर कानूनी अधिकार और जमीन पर वास्तविक श्रम का संबंध क्या होना चाहिए।

तेभागा ने इस प्रश्न का सीधा उत्तर दिया—

जो किसान उत्पादन का मुख्य श्रम और व्यय वहन करता है, उपज पर उसका हिस्सा भी बड़ा होना चाहिए।

यही विचार बाद में आंदोलन की राजनीतिक भाषा बना—

और इससे भी अधिक निर्णायक नारा था—

धान अपने खलिहान में।

इन दो नारों में आंदोलन की पूरी आर्थिक और राजनीतिक संरचना समाहित थी।

तेभागा की पहली ऐतिहासिक परत बंगाल की भूमि व्यवस्था है।

स्थायी बंदोबस्त ने ब्रिटिश सरकार को निश्चित भू-राजस्व और जमींदार वर्ग को मजबूत अधिकार दिए। समय के साथ जमींदार और वास्तविक कृषक के बीच मध्यस्थ अधिकारों की जटिल श्रृंखला विकसित हुई। उत्तर बंगाल और अन्य क्षेत्रों में जोतदार स्थानीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सत्ता का शक्तिशाली अंग बन गए।

उनके नीचे बर्गादार या अधियार था।

परिवार का श्रम लगाता।

कई बार बीज तथा दूसरे साधनों का भी बड़ा हिस्सा उपलब्ध कराता।

लेकिन प्रचलित व्यवस्था में फसल का आधा हिस्सा भूमि नियंत्रक को जाता।

यहीं तेभागा का मूल आर्थिक अंतर्विरोध था।

उसने यह चुनौती दी कि केवल जमीन पर नियंत्रण ही उपज के आधे हिस्से का पर्याप्त नैतिक आधार क्यों माना जाए।

तेभागा को अक्सर जोतदार और बर्गादार के संघर्ष के रूप में परिभाषित किया जाता है। यह सही है, लेकिन अपूर्ण।

जोतदार स्वयं एक समान वर्ग नहीं थे।

कुछ विशाल भूमि नियंत्रक थे।

कुछ अपेक्षाकृत छोटे अधिकारधारी।

इसी प्रकार सभी बर्गादार पूर्ण भूमिहीन नहीं थे। कुछ के पास अपनी छोटी जोत भी हो सकती थी।

इसलिए तेभागा की ग्रामीण संरचना सरल द्वंद्व नहीं थी।

यही कारण है कि आंदोलन की राजनीतिक सफलता इस बात पर निर्भर थी कि किसान सभा गरीब बर्गादार, कृषि मजदूर, छोटा किसान और मध्य किसान—इन अलग सामाजिक समूहों को किस हद तक साथ रख सके।

यह उसकी शक्ति भी बनी और सीमा भी।

तेभागा का एक विशिष्ट पहलू यह था कि उसकी केंद्रीय मांग पूरी तरह किसी क्रांतिकारी संगठन की कल्पना नहीं थी।

बंगाल सरकार द्वारा गठित फ्लाउड आयोग ने 1940 में बर्गादारों की स्थिति में सुधार और उनकी हिस्सेदारी बढ़ाने की दिशा में सिफारिश की थी।

इससे किसान सभा को शक्तिशाली तर्क मिला—

जिसे सरकारी आयोग न्यायपूर्ण मान चुका है, उसे सरकार लागू क्यों नहीं करती?

यहीं तेभागा का संघर्ष केवल किसान बनाम जोतदार नहीं रहा।

वह राज्य से यह पूछने लगा—

यदि अन्याय स्वीकार किया जा चुका है तो सुधार रुका क्यों है?

यही प्रश्न छह वर्ष बाद आंदोलन में विस्फोट बनकर सामने आया।

तेभागा आंदोलन को 1943 के बंगाल अकाल से अलग नहीं समझा जा सकता।

अकाल ने गरीब ग्रामीण समाज को यह भयावह अनुभव कराया कि खाद्यान्न पैदा करने वाला व्यक्ति स्वयं भूख से मर सकता है।

लाखों मौतें, विस्थापन, संपत्ति की बिक्री, पशुओं का नुकसान, ऋण और परिवारों का टूटना—इन सबने कृषक समाज की आर्थिक सुरक्षा नष्ट कर दी।

इसलिए 1946 की धान की फसल केवल कृषि उत्पादन नहीं थी।

उसके पीछे अकाल की स्मृति थी।

एक किसान जिसने कुछ वर्ष पहले भूख देखी थी, उसके लिए आधी फसल छोड़ना पहले से अधिक असहनीय था।

अकाल के बाद खाद्य-अधिकार की राजनीतिक प्रतिक्रिया भी था।

गरीबी अपने आप राजनीतिक आंदोलन पैदा नहीं करती।

किसान के असंतोष को संगठन की आवश्यकता थी।

यहीं बंगाल प्रांतीय किसान सभा और अखिल भारतीय किसान सभा की केंद्रीय भूमिका आती है।

1930 और 1940 के दशकों में किसान सभा ने गांवों में संगठन बनाया।

कर्ज, लगान, अवैध वसूली, बेदखली और बर्गादारी से जुड़े स्थानीय संघर्षों के माध्यम से किसान को सामूहिक कार्रवाई का अनुभव मिला।

1940 के पांजिया सम्मेलन में तेभागा की मांग स्पष्ट कार्यक्रम बनी।

सितंबर 1946 में बंगाल किसान सभा ने उसे प्रत्यक्ष कार्रवाई में बदलने का निर्णय लिया।

अब किसान से कहा गया—

अपने खलिहान में रखो।

दो-तिहाई अपने पास रखो।

एक-तिहाई जोतदार को दो।

यहीं आंदोलन की सफलता का सबसे बड़ा संगठनात्मक रहस्य था—

जटिल भूमि सुधार को बेहद सरल कार्रवाई में बदल देना।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की भूमिका तेभागा में अत्यंत महत्वपूर्ण थी।

लेकिन दो अतियों से बचना आवश्यक है।

पहली अतिशयोक्ति होगी—

तेभागा कम्युनिस्ट पार्टी ने किसानों पर थोप दिया।

पार्टी की कोई विशेष भूमिका नहीं थी; सब स्वतःस्फूर्त था।

कम्युनिस्ट और किसान सभा कार्यकर्ताओं ने—

जिला नेटवर्क खड़ा किया,

स्वयंसेवक तैयार किए,

और फ्लाउड आयोग की सिफारिश को आंदोलन का वैधानिक तर्क बनाया।

लेकिन आंदोलन की वास्तविक ऊर्जा बर्गादारों के अपने अनुभव से आई।

किसान सभा के अपने बाद के दस्तावेजों में भी स्वीकार किया गया कि किसान प्रतिक्रिया इतनी व्यापक थी कि आंदोलन प्रारंभिक संगठनात्मक ढांचे से आगे निकल गया।

इसलिए तेभागा का अधिक सटीक सूत्र है—

संगठन ने दिशा दी, किसान असंतोष ने उसे जनशक्ति दी।

तेभागा की सबसे गहरी राजनीतिक कार्रवाई शायद 50 प्रतिशत से 66 प्रतिशत हिस्सेदारी का परिवर्तन नहीं थी।

फसल के नियंत्रण का स्थान बदलना।

पुरानी व्यवस्था में धान जोतदार के खलिहान में जाता था।

वहीं किसान अपना हिस्सा प्राप्त करता।

तेभागा में धान बर्गादार के खलिहान में गया।

अब जोतदार को अपना हिस्सा किसान से लेना था।

इसने सत्ता के संबंध को उलट दिया।

जोतदार किसान को कितना देगा?

किसान जोतदार को कितना देगा?

इसीलिए खलिहान तेभागा का वास्तविक राजनीतिक प्रतीक है।

तेभागा अविभाजित बंगाल के लगभग 19 जिलों तक पहुंचा।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर जिले में संघर्ष समान स्तर का था।

दिनाजपुर, रंगपुर, जलपाईगुड़ी, 24 परगना, जेसोर, खुलना और अन्य कुछ क्षेत्र अत्यंत सक्रिय थे।

कई अध्ययनों में लगभग 60 लाख कृषकों के आंदोलन से प्रभावित या जुड़े होने का अनुमान दिया जाता है, लेकिन इसे सटीक सक्रिय आंदोलनकारी संख्या नहीं माना जाना चाहिए।

तेभागा के इतिहास में यही सावधानी आवश्यक है—

उसके पैमाने को कम भी न किया जाए, अतिरंजित भी नहीं।

दिनाजपुर तेभागा का प्रतीकात्मक केंद्र बना।

अटवारी, बालियाडांगी, ठाकुरगांव, चिरिरबंदर और खानपुर जैसे क्षेत्रों में किसान प्रतिरोध तीव्र हुआ।

यहां राजबंशी, संथाल, मुस्लिम और दूसरे गरीब कृषक समुदाय बड़ी संख्या में सक्रिय हुए।

खानपुर का गोलीकांड आंदोलन की सबसे प्रसिद्ध शहादत बना।

मृतकों की संख्या पर स्रोत 20 से 22 के बीच भिन्न हैं; यही उदाहरण बताता है कि तेभागा के इतिहास में दावों को स्रोतवार लिखना क्यों आवश्यक है।

लेकिन संख्या से परे खानपुर की ऐतिहासिक अर्थवत्ता स्पष्ट है—

राज्य अब केवल दूर का औपनिवेशिक शासन नहीं था; वह सीधे किसान के खलिहान के सामने खड़ा था।

तेभागा को न गांधीवादी सत्याग्रह कहना सही है, न तेलंगाना जैसी संगठित सशस्त्र क्रांति।

उसकी मुख्य रणनीति थी—

प्रत्यक्ष आर्थिक अवज्ञा।

किसान सामूहिक रूप से फसल काटता।

धान अपने खलिहान में ले जाता।

जोतदार का हिस्सा घटाता।

पुलिस या लठैत रोकते तो प्रतिरोध करता।

कई स्थानों पर किसान लाठी, धनुष-बाण, दां, कुल्हाड़ी और कृषि औजारों के साथ खड़े हुए।

महिलाएं भी हंसिया, मिर्च पाउडर, झाड़ू या अन्य घरेलू साधनों से प्रतिरोध में उतरीं।

लेकिन व्यापक स्थायी गुरिल्ला सेना नहीं बनी।

यही तेलंगाना से निर्णायक अंतर है।

तेभागा की सबसे उल्लेखनीय सामाजिक उपलब्धियों में महिलाओं की भागीदारी है।

1943 के अकाल और महिला आत्मरक्षा समिति के काम ने ग्रामीण महिलाओं के बीच संगठन की जमीन तैयार की थी।

पुलिस आने की सूचना देतीं,

कार्यकर्ताओं को आश्रय देतीं,

गिरफ्तारी का विरोध करतीं,

और कई जगह नारी वाहिनी बनाकर प्रतिरोध करतीं।

विमला मांझी जैसी महिलाएं स्थानीय नेतृत्व तक पहुंचीं।

इला मित्र ने विभाजन के बाद नाचोल में तेभागा की विरासत को नए राजनीतिक संदर्भ में आगे बढ़ाया।

लेकिन आंदोलन की सीमा भी स्पष्ट थी—

महिलाओं की विशाल भागीदारी औपचारिक निर्णयकारी संस्थाओं में समान प्रतिनिधित्व में नहीं बदल सकी।

और घरेलू हिंसा, शराबखोरी तथा महिला की स्वतंत्र आय जैसे प्रश्न आंदोलन के केंद्रीय कार्यक्रम में पूरी तरह नहीं आए।

इसलिए तेभागा महिला राजनीतिक जागरण था—

लेकिन पूर्ण स्त्री-मुक्ति आंदोलन नहीं।

तेभागा का जनाधार सामाजिक रूप से विविध था।

अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय थे।

इसलिए इसे केवल ‘बंगाली किसान आंदोलन’ कहना भी पर्याप्त नहीं।

विशेष रूप से उत्तर बंगाल में आदिवासी और राजबंशी कृषकों की भूमिका आंदोलन को तीव्र शक्ति देती है।

लेकिन यहां भी एक सावधानी जरूरी है—

तेभागा मूलतः वर्गीय मांग पर आधारित था, पर वास्तविक किसान समाज जाति, धर्म और जनजातीय पहचान से मुक्त नहीं था।

आधुनिक इतिहासलेखन इसलिए इसे वर्ग + जाति + जनजातीय पहचान + लिंग के संयुक्त ढांचे में पढ़ता है।

उसकी केंद्रीय मांग उत्पादन संबंध से निर्धारित थी।

बर्गादार चाहे हिंदू हो, मुस्लिम हो या आदिवासी—यदि वह दूसरे की भूमि पर हिस्सेदारी के आधार पर खेती करता है तो उसकी आर्थिक समस्या समान हो सकती है।

लेकिन वर्गीय पहचान अपने आप सभी सामाजिक पहचानों को समाप्त नहीं करती।

तेभागा ने यह दोनों बातें साबित कीं—

वर्गीय एकता संभव है।

वर्गीय एकता स्थायी या स्वतःस्फूर्त नहीं होती।

इसे राजनीतिक रूप से बनाए रखना पड़ता है।

1946–47 बंगाल के इतिहास का अत्यंत सांप्रदायिक समय था।

कलकत्ता, नोआखाली और बिहार की हिंसा के बीच लाखों लोग धार्मिक पहचान के आधार पर असुरक्षित थे।

फिर भी कई तेभागा क्षेत्रों में हिंदू और मुस्लिम बर्गादार साझा आर्थिक मांग पर एक साथ लड़े।

यह आंदोलन की असाधारण उपलब्धि थी।

लेकिन वह पूरे बंगाल की राजनीति का रुख नहीं बदल सका।

1947 आते-आते पाकिस्तान, भारत, सुरक्षा और राष्ट्रीय सीमा का प्रश्न किसान वर्गीय राजनीति पर भारी पड़ा।

इसलिए तेभागा का अनुभव हमें यह नहीं बताता कि आर्थिक संघर्ष सांप्रदायिकता को स्वतः समाप्त कर देता है।

ठोस आर्थिक हित सांप्रदायिक विभाजन के विरुद्ध एक शक्तिशाली वैकल्पिक एकता पैदा कर सकते हैं, लेकिन उन्हें टिकाने के लिए व्यापक राजनीतिक शक्ति चाहिए।

सुहरावर्दी सरकार की नीति तेभागा इतिहास का महत्वपूर्ण विरोधाभास है।

वह गरीब मुस्लिम कृषक आधार को पूरी तरह कम्युनिस्ट किसान सभा के हवाले नहीं करना चाहती थी।

इसलिए उसने जनवरी 1947 में बर्गादार विधेयक का मसौदा प्रकाशित किया।

लेकिन वही सरकार पुलिस के माध्यम से किसान की प्रत्यक्ष कार्रवाई को दबा रही थी।

इसलिए उसका वास्तविक रुख था—

किसान मांग को सिद्धांततः स्वीकार करना, लेकिन किसान द्वारा स्वयं उसे लागू करने के अधिकार को अस्वीकार करना।

यहीं कानून और सामाजिक न्याय के बीच संघर्ष सामने आया।

तेभागा कांग्रेस का आंदोलन नहीं था।

1946–47 में कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व सत्ता हस्तांतरण, अंतरिम सरकार, संविधान सभा और विभाजन जैसे प्रश्नों पर केंद्रित था।

भूमि सुधार उसकी भविष्य की नीति का हिस्सा था, लेकिन बंगाल का तत्काल बर्गादार संघर्ष कम्युनिस्ट किसान सभा के नेतृत्व में चला।

विडंबना यह है कि स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस सरकार को उन्हीं मुद्दों पर कानून बनाना पड़ा—

इससे तेभागा की राजनीतिक शक्ति का प्रमाण मिलता है—

आंदोलन का नेतृत्व जिसने किया और मांग को कानून में जिसने बदला, दोनों हमेशा एक ही राजनीतिक शक्ति नहीं थीं।

कुछ क्षेत्रों में किसानों ने वास्तविक तेभागा लागू कराया।

बाद के समेकित विवरणों में अनुमान है कि लगभग 40 प्रतिशत बर्गादारों ने किसी स्तर पर तेभागा अधिकार हासिल किया।

अवैध वसूलियों में भी कमी आई।

सभी किसानों को दो-तिहाई नहीं मिला।

प्रस्तावित 1947 का विधेयक कानून नहीं बन सका।

बर्गादार की स्थायी सुरक्षा नहीं बनी।

जमीन का स्वामित्व नहीं बदला।

इसलिए तत्काल उपलब्धि—

तेभागा का प्रश्न उपज का था, जमीन के पूर्ण स्वामित्व का नहीं।

यही उसकी सबसे महत्वपूर्ण सीमा थी।

यदि बर्गादार को दो-तिहाई मिल भी जाए, लेकिन जमीन दूसरे के नियंत्रण में हो, तो उसका भविष्य असुरक्षित रह सकता है।

भूमि स्वामी अगली खेती से उसे हटा सकता था।

इसीलिए बाद के भूमि सुधार को तेभागा से आगे जाना पड़ा—

पूर्ण भूमिहीन खेतिहर मजदूर तेभागा की केंद्रीय मांग का प्रत्यक्ष लाभार्थी नहीं था।

यदि वह बर्गादार ही नहीं है तो फसल का दो-तिहाई हिस्सा उसके लिए समाधान नहीं।

इसलिए भारतीय किसान राजनीति को बाद में मजदूरी, भूमि वितरण और ग्रामीण रोजगार जैसे प्रश्न उठाने पड़े।

यहीं तेभागा की सीमा स्पष्ट होती है—

वह गरीब कृषक प्रश्न का महत्वपूर्ण उत्तर था, संपूर्ण ग्रामीण गरीबी का नहीं।

1947 ने तेभागा का भूगोल ही तोड़ दिया।

दिनाजपुर विभाजित हुआ।

रंगपुर, जेसोर, खुलना, राजशाही और मयमनसिंह पूर्वी पाकिस्तान में चले गए।

जलपाईगुड़ी, पश्चिमी दिनाजपुर, 24 परगना और मिदनापुर भारत में रहे।

एक ही किसान आंदोलन अचानक दो देशों की अलग राजनीतिक प्रणालियों के अधीन हो गया।

इससे संगठन, नेतृत्व, वर्गीय एकता और राजनीतिक प्राथमिकता सभी बदल गए।

इसलिए तेभागा का क्षय केवल पुलिस दमन की कहानी नहीं है।

दमन + विभाजन + सांप्रदायिक राजनीति + सामाजिक गठबंधन की सीमाएं + रणनीतिक अनिश्चितता

इन सबने मिलकर आंदोलन के एकीकृत चरण को समाप्त किया।

1947 की सीमा ने किसान संगठनों को बांट दिया, बर्गादारी की समस्या को नहीं।

पूर्वी पाकिस्तान में 1948–50 के संघर्ष और नाचोल विद्रोह इसका प्रमाण हैं।

वहां भी वही मूल प्रश्न उठा—

संथाल और गरीब किसान फिर संगठित हुए।

इला मित्र आंदोलन की सबसे प्रसिद्ध नेता बनीं।

लेकिन अंततः भूमि कानून में परिवर्तन हुआ।

यह तथ्य बहुत महत्वपूर्ण है—

राष्ट्र की सीमा बदलने से कृषि उत्पादन संबंध नहीं बदलते।

स्वतंत्र पश्चिम बंगाल में तेभागा की राजनीतिक मांग धीरे-धीरे संस्थागत रूप में आई।

1950 का बर्गादार कानून।

1953 का एस्टेट अधिग्रहण कानून।

1955 का भूमि सुधार अधिनियम।

1967–69 की संयुक्त मोर्चा सरकारों की भूमि सक्रियता।

और 1978 के बाद ऑपरेशन बर्गा।

यह सीधी और निर्विघ्न प्रक्रिया नहीं थी।

कानून बने लेकिन क्रियान्वयन कमजोर रहा।

बर्गादार दर्ज नहीं हुए।

स्थानीय शक्ति-संबंध बाधा बने।

इसीलिए तीन दशकों बाद प्रशासन को बड़े पैमाने पर पंजीकरण अभियान चलाना पड़ा।

तेभागा और ऑपरेशन बर्गा एक ही कार्यक्रम नहीं थे।

लेकिन दोनों के बीच स्पष्ट ऐतिहासिक संबंध है।

1946 में किसान कहता है—

मैं वास्तविक कृषक हूं; फसल में मेरा बड़ा हिस्सा है।

1978 के बाद राज्य कहता है—

वास्तविक बर्गादार का नाम रिकॉर्ड में दर्ज होना चाहिए और उसे बेदखली से सुरक्षा मिलेगी।

यही सामाजिक आंदोलन से राज्य नीति तक की यात्रा है।

इस अर्थ में ऑपरेशन बर्गा को तेभागा की संस्थागत उत्तराधिकारिता कहा जा सकता है।

भारतीय किसान इतिहास में तेभागा को दूसरे आंदोलनों के बीच रखने पर उसका विशिष्ट चरित्र और स्पष्ट होता है।

पाबना ने रैयती अधिकार और लगान का प्रश्न उठाया।

बकाश्त ने बेदखल किसान की भूमि-वापसी का।

वारली ने बेगार, बंधुआ श्रम और मजदूरी का।

तेभागा ने कृषि उपज और बर्गादार अधिकार का।

तेलंगाना ने संघर्ष को भूमि पुनर्वितरण और ग्रामीण सत्ता के व्यापक सशस्त्र प्रश्न तक पहुंचाया।

इस श्रृंखला में तेभागा—

सुधारवादी और क्रांतिकारी किसान राजनीति के बीच की एक निर्णायक कड़ी था।

वह कानून के भीतर याचिका तक सीमित नहीं रहा।

लेकिन तेलंगाना जैसी व्यापक सशस्त्र भूमि क्रांति भी नहीं बना।

यही उसकी विशिष्ट ऐतिहासिक स्थिति है।

किसी आंदोलन की सफलता केवल कानून में नहीं मापी जाती।

तेभागा बंगाल की सांस्कृतिक स्मृति में भी जीवित रहा।

‘हे सामालो’ जैसे गीत।

किसान शहादत की लोकस्मृति।

सोमनाथ होर की *Tebhaga Diary*।

महिला आंदोलनकारियों की मौखिक स्मृतियां।

इन स्रोतों ने उस अनुभव को सुरक्षित रखा जिसे सरकारी फाइलों में नहीं पाया जा सकता।

सरकारी दस्तावेज कहता है—

सोमनाथ होर का स्केच बताता है—

उस भीड़ का चेहरा कैसा था।

यही सांस्कृतिक इतिहास का महत्व है।

तेभागा का इतिहास स्वयं समय के साथ बदला है।

राष्ट्रवादी इतिहास

उसे स्वतंत्रता आंदोलन के व्यापक अंतिम चरण में रखता है, लेकिन कांग्रेस से बाहर के किसान संघर्ष को अपेक्षाकृत कम स्थान दे सकता है।

मार्क्सवादी इतिहास

जोतदार–बर्गादार वर्ग संबंध और कम्युनिस्ट संगठन को केंद्रीय बनाता है।

यह आर्थिक संरचना समझने में अत्यंत उपयोगी है।

किसान-अध्ययन

बताता है कि ‘किसान’ एक समान वर्ग नहीं था—बर्गादार, कृषि मजदूर, छोटा किसान और मध्य किसान के हित भिन्न हो सकते थे।

सबाल्टर्न इतिहास

किसान की अपनी राजनीतिक एजेंसी पर जोर देता है।

आंदोलन केवल नेताओं ने चलाया या किसान स्वयं भी राजनीतिक निर्णय ले रहा था?

महिला और मौखिक इतिहास

उनकी अपनी मांगें क्या थीं?

संघर्ष के दौरान और बाद में उनकी जिंदगी कैसे बदली?

इसी बहुस्तरीय इतिहासलेखन से आज तेभागा की अधिक पूर्ण तस्वीर बनती है।

कोई एक स्रोत आंदोलन का पूरा सत्य नहीं देता।

पुलिस फाइल आवश्यक है।

लेकिन पर्याप्त नहीं।

किसान सभा का दस्तावेज आवश्यक है।

लेकिन पर्याप्त नहीं।

समाचार-पत्र, लोकगीत, दृश्य कला, मौखिक इतिहास और महिला संस्मरण—सभी आवश्यक हैं।

इसीलिए तेभागा पर गंभीर शोध में यह पद्धति सबसे उचित है—

राज्य की फाइल को किसान की आवाज के सामने पढ़ना।

यहीं इतिहास राजनीतिक प्रचार से शोध में बदलता है।

एक संतुलित निष्कर्ष के लिए यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि तेभागा क्या नहीं था।

वह पूरे बंगाल की पूर्ण भूमि क्रांति नहीं था।

वह केवल कम्युनिस्ट पार्टी की ऊपर से संचालित साजिश नहीं था।

वह गांधीवादी सत्याग्रह नहीं था।

तात्कालिक रूप से आंशिक।

घटना-क्रम

तेभागा आंदोलन की संक्षिप्त समयरेखा

1793 · स्थायी बंदोबस्तऔपनिवेशिक भू-राजस्व व्यवस्था ने जमींदार, मध्यस्थ और वास्तविक जोतदार के बीच असमान संबंधों को संस्थागत आधार दिया।
1929 · बंगाल भूमि-राजस्व आयोगफ्लाउड आयोग की पृष्ठभूमि बनने से पहले कृषि संबंधों और बटाईदारों की असुरक्षा पर सरकारी विमर्श तेज हुआ।
1936 · अखिल भारतीय किसान सभासंगठित किसान राजनीति ने लगान, जमींदारी और बटाई के प्रश्नों को प्रांतीय सीमा से निकालकर राष्ट्रीय मंच दिया।
1940 · फ्लाउड आयोग की अनुशंसाआयोग ने बटाईदार को उपज का दो-तिहाई हिस्सा देने की दिशा में सुधार की आवश्यकता स्वीकार की।
1943 · बंगाल का अकालभुखमरी, बाजार-विफलता और ग्रामीण असमानता ने गरीब किसान तथा खेतिहर समाज के संकट को असाधारण रूप से गहरा किया।
सितंबर 1946 · तेभागा अभियान का आह्वानबंगाल प्रांतीय किसान सभा ने बटाईदारों से फसल अपने खलिहान में रखने और दो-तिहाई हिस्सा लेने का आह्वान किया।
1946 का अंत · आंदोलन का विस्तारदिनाजपुर, रंगपुर, जलपाईगुड़ी, चौबीस परगना, मेदिनीपुर और अन्य क्षेत्रों में संगठित फसल-अधिकार संघर्ष फैला।
जनवरी 1947 · दमन और प्रतिरोधपुलिस कार्रवाई, गिरफ्तारियों और गोलीबारी के बीच किसान समितियों तथा महिला कार्यकर्ताओं ने प्रतिरोध बनाए रखा।
फरवरी 1947 · बर्गादार विधेयक का प्रस्तावबंगाल सरकार ने बटाईदार अधिकारों पर विधेयक प्रस्तुत करने की घोषणा की, पर तत्काल स्थायी कानूनी समाधान नहीं हो सका।
अगस्त 1947 · विभाजनबंगाल के विभाजन, सांप्रदायिक तनाव और राजनीतिक पुनर्गठन ने आंदोलन की भौगोलिक तथा संगठनात्मक एकता तोड़ दी।
1950 · पश्चिम बंगाल बर्गादार कानूनबटाईदार संरक्षण को वैधानिक रूप देने का प्रयास हुआ, हालांकि क्रियान्वयन और पहचान की समस्याएं बनी रहीं।
1955 · भूमि सुधार कानूनपश्चिम बंगाल भूमि सुधार अधिनियम ने बर्गादार अधिकारों और भूमि-संबंधों के पुनर्गठन के लिए नया ढांचा दिया।
1978 से · ऑपरेशन बर्गाबटाईदार पंजीकरण और अधिकार-सुरक्षा के अभियान ने तेभागा की ऐतिहासिक मांगों को स्वतंत्र भारत की प्रशासनिक नीति से जोड़ा।
OCN ऐतिहासिक आकलन

तेभागा की तत्काल मांग पूरे बंगाल में स्थायी रूप से लागू नहीं हो सकी, पर उसने बटाईदार को ग्रामीण अर्थव्यवस्था के अदृश्य श्रमिक से अधिकार मांगने वाले राजनीतिक नागरिक में बदल दिया। महिलाओं, आदिवासी समुदायों, दलितों और गरीब किसानों की भागीदारी ने इसे केवल फसल-बंटवारे का विवाद नहीं रहने दिया। विभाजन, दमन और संगठनात्मक विघटन उसकी सीमाएं बने; फिर भी बाद के बर्गादार कानून, भूमि सुधार और ऑपरेशन बर्गा में इसकी मांगों की स्पष्ट ऐतिहासिक प्रतिध्वनि दिखाई देती है।

शोधार्थियों के लिए

प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक स्रोत

पश्चिम बंगाल राज्य अभिलेखागारबंगाल सरकार, पुलिस, राजस्व और कृषि विभाग के अभिलेख तथा तेभागा काल के प्रशासनिक दस्तावेज।स्रोत तक जाएँ ↗
राष्ट्रीय अभिलेखागार — अभिलेख पटलऔपनिवेशिक गृह, कृषि और राजनीतिक विभाग से संबंधित सूचीपत्र तथा डिजिटल अभिलेख।स्रोत तक जाएँ ↗
अखिल भारतीय किसान सभाकिसान सभा के इतिहास, प्रस्तावों, अभियानों और तेभागा से संबंधित संगठनात्मक सामग्री।स्रोत तक जाएँ ↗
भारत का राजपत्र और विधायी अभिलेखभूमि, किरायेदारी और बर्गादार अधिकारों से संबंधित विधायी तथा आधिकारिक सामग्री।स्रोत तक जाएँ ↗
ई-ज्ञानकोशआधुनिक भारत, किसान आंदोलनों, बंगाल की कृषि व्यवस्था और भूमि सुधार पर मुक्त अध्ययन सामग्री।स्रोत तक जाएँ ↗
भारतीय संस्कृति पोर्टलराष्ट्रीय आंदोलन, ग्रामीण समाज, अकाल और किसान प्रतिरोध से जुड़ी डिजिटल सांस्कृतिक सामग्री।स्रोत तक जाएँ ↗

स्रोत-सावधानी: औपनिवेशिक पुलिस और प्रशासनिक अभिलेख आंदोलन को कानून-व्यवस्था की दृष्टि से देखते हैं, किसान सभा के दस्तावेज संगठन और उपलब्धियों पर बल देते हैं, जबकि मौखिक इतिहास स्थानीय कार्यकर्ताओं तथा महिलाओं के अनुभव सामने लाता है। इसलिए संख्या, गोलीबारी, गिरफ्तारी, नेतृत्व और क्षेत्रीय विस्तार से जुड़े दावों को परस्पर स्रोत-मिलान के साथ पढ़ा गया है।