तमिलनाडु किसान आंदोलन
तंजावुर की भूमि–मजदूरी और जाति-सत्ता से बिजली, कर्ज, कावेरी, किसान आय और राष्ट्रीय किसान राजनीति तक—1930–2026
तमिलनाडु का किसान आंदोलन किसी एक संगठन, नेता या घटना की कहानी नहीं, बल्कि कृषि समाज के बदलते प्रश्नों की लंबी यात्रा है। पूर्वी तंजावुर में भूमिहीन दलित खेतिहर मजदूर, पन्नैयाल और काश्तकार भूमि, मजदूरी और गरिमा के लिए संगठित हुए; पश्चिमी तमिलनाडु के सिंचित स्वामी-किसानों ने बिजली-दर, कर्ज और कृषि लागत पर नई राजनीति खड़ी की; कावेरी डेल्टा ने जल-संघवाद को किसान जीवन के प्रश्न में बदला; और इक्कीसवीं सदी में भूजल, सूखा, आय तथा ऋण ने संघर्ष का नया रूप बनाया। यह अध्ययन वर्ग, जाति, क्षेत्र, दलगत राजनीति और किसान के भीतर मौजूद सामाजिक भिन्नताओं को छिपाए बिना इस पूरी परंपरा का समेकित मूल्यांकन करता है।
ऐतिहासिक और कृषि पृष्ठभूमि
मद्रास प्रेसीडेंसी, रैयतवारी व्यवस्था, मिरासदारी, कावेरी डेल्टा और कृषि संरचना
तमिलनाडु के किसान आंदोलनों को समझने के लिए उनकी शुरुआत बीसवीं सदी के किसी किसान संगठन, कम्युनिस्ट आंदोलन या नारायणसामी नायडू से करना पर्याप्त नहीं होगा। जिस सामाजिक और आर्थिक जमीन पर ये आंदोलन खड़े हुए, उसका निर्माण कई शताब्दियों में हुआ था। भूमि पर अधिकार किसका था, खेती कौन करता था, लगान किसे मिलता था, सिंचाई के पानी पर किसका नियंत्रण था और कृषि उत्पादन में सबसे अधिक श्रम करने वाले समुदाय सामाजिक व्यवस्था में किस स्थान पर थे—इन प्रश्नों के उत्तर ही आगे के किसान संघर्षों की पृष्ठभूमि तैयार करते हैं।
तमिल क्षेत्र की विशेषता यह थी कि यहां कृषि संबंध केवल भूमि और लगान से निर्धारित नहीं होते थे। जाति, भूमि, श्रम और स्थानीय सत्ता एक-दूसरे से गहरे जुड़े हुए थे। विशेषकर कावेरी डेल्टा में अत्यंत उपजाऊ कृषि व्यवस्था के साथ भूमि स्वामित्व की असमानता, काश्तकारी, खेतिहर मजदूरी और सामाजिक पदानुक्रम की जटिल संरचना विकसित हुई। यही कारण है कि आगे चलकर तंजावुर का किसान आंदोलन केवल लगान घटाने का संघर्ष नहीं रहा; उसमें दलित खेतिहर मजदूरों की मुक्ति, मजदूरी, आवासीय भूमि और सामाजिक सम्मान के सवाल भी शामिल होते गए।
प्राचीन तमिल कृषि समाज की विरासत
तमिलनाडु में संगठित कृषि का इतिहास अत्यंत पुराना है। चोल काल में विशेषकर कावेरी नदी के मैदान में सिंचाई, धान उत्पादन, गांवों और मंदिरों पर आधारित एक विकसित ग्रामीण अर्थव्यवस्था मौजूद थी। नौवीं से तेरहवीं शताब्दी के अभिलेख तमिल क्षेत्र में भूमि के वर्गीकरण, सिंचाई, कराधान और ग्रामीण संस्थाओं की विस्तृत जानकारी देते हैं। आधुनिक इतिहासकारों ने भी कावेरी डेल्टा के कृषि इतिहास के पुनर्निर्माण में मंदिर अभिलेखों को महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत माना है।
कावेरी और उसकी शाखाओं ने तंजावुर क्षेत्र को दक्षिण भारत के सबसे समृद्ध कृषि क्षेत्रों में बदल दिया था। यहां नहरों, तालाबों और जल-वितरण की स्थानीय प्रणालियों के सहारे धान की खेती विकसित हुई।
इस व्यवस्था में मंदिर केवल धार्मिक संस्थाएं नहीं थे। अनेक मंदिरों के पास कृषि भूमि थी और वे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बड़े संस्थागत भू-स्वामियों की भूमिका निभाते थे। ब्राह्मदेय और अन्य प्रकार के भूमि-अनुदानों ने भी ग्रामीण समाज में अधिकारों की अलग-अलग श्रेणियां विकसित कीं।
इस प्रकार औपनिवेशिक शासन ने दक्षिण भारत में किसी समान और सरल किसान समाज को अपने नियंत्रण में नहीं लिया था। उसे भूमि पर अनेक स्तरों के दावे और अधिकार वाली जटिल व्यवस्था विरासत में मिली।
मद्रास प्रेसीडेंसी का निर्माण
अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ तक ईस्ट इंडिया कंपनी ने दक्षिण भारत के विशाल भूभाग पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। लगभग 1800 तक कंपनी के पास उस क्षेत्र का अधिकांश हिस्सा आ चुका था जो आगे चलकर मद्रास प्रेसीडेंसी बना। यह लगभग 1,40,000 वर्ग मील में फैला अत्यंत विविध प्रांत था।
मद्रास प्रेसीडेंसी आज के तमिलनाडु तक सीमित नहीं थी। अलग-अलग समय में इसमें वर्तमान तमिलनाडु के साथ आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक के बड़े हिस्से शामिल रहे।
इस विशाल क्षेत्र में कृषि की परिस्थितियां समान नहीं थीं। मोटे तौर पर तीन महत्वपूर्ण कृषि क्षेत्रों को अलग करके देखा जा सकता है—
पहला, कावेरी डेल्टा और मालाबार जैसे अत्यधिक कृषि-सघन क्षेत्र।
दूसरा, कृष्णा–गोदावरी के सिंचित डेल्टा।
तीसरा, मद्रास प्रेसीडेंसी का विशाल शुष्क क्षेत्र, जिसमें मोटे अनाज, कपास, तिलहन और पशुपालन महत्वपूर्ण थे। इतिहासकारों ने इन क्षेत्रों की कृषि और सामाजिक संरचनाओं में स्पष्ट अंतर दर्ज किया है।
तमिलनाडु के किसान आंदोलन को समझने के लिए यह भौगोलिक अंतर बहुत महत्वपूर्ण है। तंजावुर के धान उत्पादक खेतिहर मजदूर की समस्याएं कोयंबटूर के भू-स्वामी किसान की समस्याओं जैसी नहीं थीं।
यही अंतर आगे तमिलनाडु में दो अलग किसान राजनीतिक धाराओं को जन्म देने वाला था।
औपनिवेशिक शासन का मूल प्रश्न—लगान किससे लिया जाए?
ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए भूमि व्यवस्था केवल प्रशासन का प्रश्न नहीं थी। भारत में उसके राजस्व का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत भूमि से प्राप्त होने वाला लगान था।
कंपनी के सामने इसलिए मूल प्रश्न था—
भूमि का वास्तविक मालिक किसे माना जाए और सरकार अपना राजस्व किससे वसूल करे?
बंगाल में 1793 में स्थायी बंदोबस्त के माध्यम से जमींदारों को मध्यस्थ बनाकर राजस्व व्यवस्था स्थापित की गई थी। दक्षिण भारत में भी कुछ क्षेत्रों में जमींदारी मौजूद रही, लेकिन मद्रास प्रेसीडेंसी का बड़ा हिस्सा अंततः दूसरी व्यवस्था—रैयतवारी व्यवस्था—के अंतर्गत आया।
यह प्रयोग दक्षिण भारतीय कृषि इतिहास में निर्णायक साबित हुआ।
रैयतवारी व्यवस्था
रैयतवारी शब्द का आधार रैयत अर्थात कृषक था। इसके पीछे सिद्धांत यह था कि सरकार किसी जमींदार के बजाय सीधे वास्तविक कृषक से भूमि-राजस्व का संबंध स्थापित करेगी।
मद्रास में यह व्यवस्था मुख्यतः अलेक्जेंडर रीड और बाद में थॉमस मुनरो से जुड़ी हुई है। उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में इसे क्रमशः व्यापक रूप दिया गया।
बीच में जमींदार जैसा स्थायी राजस्व मध्यस्थ आवश्यक नहीं था।
सरकार भूमि का सर्वेक्षण करती, उसकी उत्पादक क्षमता का आकलन करती और उसके आधार पर राजस्व निर्धारित करती।
लेकिन व्यवहार में यह व्यवस्था कहीं अधिक जटिल थी।
रैयतवारी—किसान स्वामित्व या औपनिवेशिक राजस्व प्रणाली?
रैयतवारी व्यवस्था को कभी-कभी किसान स्वामित्व की व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन इसका सावधानीपूर्वक मूल्यांकन आवश्यक है।
किसान को भूमि पर अपेक्षाकृत मजबूत अधिकार मिल सकते थे, परंतु इन अधिकारों का अस्तित्व राजस्व भुगतान से जुड़ा हुआ था। राज्य की प्राथमिक दिलचस्पी किसान कल्याण नहीं बल्कि नियमित और अधिकतम संभव राजस्व प्राप्त करना थी।
धर्मा कुमार के मद्रास प्रेसीडेंसी संबंधी अध्ययन से स्पष्ट होता है कि औपनिवेशिक अधिकारियों के सामने भूमि पर कई प्रतिस्पर्धी दावे मौजूद थे—जमींदार, इनामदार, मिरासदार, स्थानीय राजस्व अधिकारी और वास्तविक कृषक सभी अलग-अलग प्रकार के परंपरागत अधिकार प्रस्तुत करते थे।
इसीलिए कागज पर दिखाई देने वाला सीधा संबंध—
सरकार → भू-अधिकारधारी → काश्तकार → उप-काश्तकार → खेतिहर मजदूर।
यानी रैयतवारी ने ग्रामीण समाज की वर्गीय और जातिगत असमानताओं को समाप्त नहीं किया।
भारी भूमि-राजस्व का दबाव
मद्रास की औपनिवेशिक कृषि व्यवस्था की एक बड़ी समस्या भूमि-राजस्व का बोझ था। दक्षिण भारतीय कृषि श्रम पर धर्मा कुमार के महत्वपूर्ण अध्ययन में मद्रास में रैयतवारी व्यवस्था के कठोर प्रयोग और अपेक्षाकृत ऊंचे राजस्व बोझ की ओर ध्यान दिलाया गया है।
राजस्व नकद में चुकाने की आवश्यकता ने भी किसान को बाजार से अधिक गहराई से जोड़ा।
लेकिन राजस्व की मांग बनी रह सकती थी।
ऐसी परिस्थितियों में किसान को साहूकार से कर्ज लेना पड़ता। इस प्रकार औपनिवेशिक राजस्व व्यवस्था ने कई क्षेत्रों में भूमि–राजस्व–बाजार–ऋण का ऐसा चक्र बनाया जिसमें कमजोर किसान की स्थिति लगातार असुरक्षित हो सकती थी।
मिरासदारी क्या थी?
तमिल कृषि समाज को समझने में मिरासदारी अत्यंत महत्वपूर्ण संस्था है।
'मिरास' का अर्थ मोटे तौर पर वंशानुगत अधिकार से था। मिरासदार ऐसे व्यक्ति या परिवार हो सकते थे जिनके पास गांव की भूमि अथवा उसके एक हिस्से पर परंपरागत और वंशानुगत अधिकार माने जाते थे।
लेकिन मिरासदार को आधुनिक अर्थ में केवल 'जमींदार' समझना गलत होगा।
उसके अधिकारों में भूमि पर दावा, राजस्व संबंधी अधिकार, गांव के संसाधनों तक पहुंच तथा स्थानीय सामाजिक प्रतिष्ठा जैसे तत्व अलग-अलग मात्रा में सम्मिलित हो सकते थे।
औपनिवेशिक अधिकारियों के सामने समस्या यह थी कि इन परंपरागत अधिकारों को ब्रिटिश संपत्ति कानून की स्पष्ट श्रेणियों में कैसे बदला जाए। तमिल क्षेत्रों में मिरासदार उन प्रमुख उच्चतर भू-अधिकारधारियों में थे जिनके दावों को ब्रिटिश प्रशासन को परिभाषित करना पड़ा।
मिरासदार और वास्तविक किसान के बीच अंतर
यहीं से तमिलनाडु के भविष्य के किसान संघर्ष का एक महत्वपूर्ण अंतर्विरोध सामने आता है।
जिसके नाम भूमि का अधिकार था, आवश्यक नहीं कि वही स्वयं खेत में श्रम करता हो।
भूमि मिरासदार या किसी बड़े भू-स्वामी के नियंत्रण में हो सकती थी, जबकि वास्तविक खेती काश्तकार, बटाईदार या खेतिहर मजदूर करते थे।
फलतः ग्रामीण समाज में कई परतें विकसित हुईं—
और कृषि से जुड़े परंपरागत सेवा समुदाय।
इन आर्थिक श्रेणियों के ऊपर जाति की संरचना भी काम करती थी।
यहीं तमिल कृषि समाज की विशेष जटिलता दिखाई देती है।
जाति और भूमि का गठजोड़
दक्षिण भारत में भूमि और जाति के संबंध पर धर्मा कुमार का अध्ययन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार उन्नीसवीं सदी के मद्रास प्रेसीडेंसी में कृषि श्रमिकों और भूमि संबंधों को जातिगत संरचना से अलग करके नहीं समझा जा सकता।
ऊंची अथवा प्रभुत्वशाली जातियों के समूह अनेक क्षेत्रों में भूमि और स्थानीय संस्थाओं पर प्रभाव रखते थे, जबकि सामाजिक पदानुक्रम के निचले हिस्से में स्थित समुदायों का बड़ा भाग खेतिहर श्रम पर निर्भर था।
इसलिए कृषि शोषण केवल आर्थिक नहीं रह जाता था।
वह सामाजिक नियंत्रण से भी जुड़ जाता था।
भूमिहीनता + जातिगत अधीनता + आर्थिक निर्भरता का संयोजन ग्रामीण सत्ता की अत्यंत मजबूत संरचना बना सकता था।
आगे चलकर तंजावुर के किसान आंदोलन में यही संबंध निर्णायक बनेगा।
पन्नैयाल व्यवस्था
तमिल कृषि इतिहास में पन्नैयाल व्यवस्था का विशेष महत्व है।
पन्नैयाल मोटे तौर पर ऐसे कृषि मजदूरों के लिए प्रयुक्त शब्द था जो किसी भू-स्वामी के खेत और घर से दीर्घकालीन श्रम संबंध में बंधे होते थे। विभिन्न क्षेत्रों और कालखंडों में इसकी प्रकृति अलग हो सकती थी, इसलिए इसे हर परिस्थिति में एक समान 'दासता' कहना ऐतिहासिक रूप से सावधानी मांगता है।
लेकिन अनेक मामलों में इसमें श्रमिक की स्वतंत्रता अत्यंत सीमित थी।
ऋण, जातिगत स्थिति, आवास, आजीविका और भू-स्वामी पर निर्भरता उसे मालिक से बांध सकती थी।
दक्षिण भारत में कृषि श्रम की ऐसी निर्भर प्रणालियां ब्रिटिश शासन से पहले भी मौजूद थीं; इसलिए यह कहना भी ठीक नहीं कि भूमिहीन कृषि श्रमिक वर्ग पूरी तरह औपनिवेशिक शासन ने पैदा किया। धर्मा कुमार ने इसी ऐतिहासिक निरंतरता की ओर ध्यान आकर्षित किया है।
औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था ने हालांकि इन संबंधों को नए भूमि कानून, नकदी राजस्व और बाजार के साथ जोड़ दिया।
कावेरी—तमिल कृषि सभ्यता की जीवनरेखा
तमिलनाडु के कृषि इतिहास में कावेरी का स्थान केंद्रीय है।
कावेरी पश्चिमी घाट से निकलकर दक्षिण भारत से गुजरती हुई तमिल क्षेत्र में प्रवेश करती है और तंजावुर क्षेत्र में पहुंचकर कई शाखाओं में विभाजित होती है। कावेरी और कोल्लिडम तथा उनसे निकली नहरों ने विशाल डेल्टा का निर्माण किया।
औपनिवेशिक स्रोतों में तंजावुर की उर्वरता इतनी प्रसिद्ध थी कि बाद में इसे दक्षिण भारत की अत्यंत समृद्ध कृषि पट्टियों में गिना जाने लगा। ब्रिटिश इंजीनियरों के हस्तक्षेप के बाद इसे कभी-कभी दक्षिण भारत की 'लोम्बार्डी' तक कहा गया।
यह मुख्यतः धान उत्पादन का क्षेत्र था।
इसीलिए कावेरी का पानी केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं था; वह ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सामाजिक सत्ता और राज्य के राजस्व का आधार था।
कल्लनई—प्राचीन सिंचाई विरासत
कावेरी डेल्टा की कृषि समृद्धि औपनिवेशिक शासन की देन नहीं थी। इसका आधार बहुत पुरानी सिंचाई प्रणाली थी।
कावेरी पर निर्मित कल्लनई अर्थात ग्रैंड एनीकट प्राचीन दक्षिण भारतीय जल प्रबंधन की सबसे महत्वपूर्ण संरचनाओं में से एक था।
इसके माध्यम से नदी के पानी को कृषि क्षेत्रों की ओर मोड़ने और नहरों में वितरित करने की व्यवस्था विकसित हुई।
ब्रिटिश शासन ने इस प्राचीन व्यवस्था को पाया, उसकी मरम्मत की और बाद में उसमें इंजीनियरिंग परिवर्तन किए। उन्नीसवीं शताब्दी में औपनिवेशिक प्रशासन ने पुराने सिंचाई कार्यों की मरम्मत और नए जल-नियंत्रण कार्यों में बढ़ती दिलचस्पी दिखाई।
लेकिन इसके पीछे मानवीय कल्याण के साथ एक स्पष्ट राजस्व तर्क भी था।
सिंचाई बढ़ेगी तो अधिक भूमि पर धान जैसी मूल्यवान फसल उगेगी और सरकार अधिक राजस्व वसूल सकेगी।
आर्थर कॉटन और कावेरी डेल्टा
उन्नीसवीं सदी में ब्रिटिश इंजीनियर आर्थर कॉटन ने कावेरी की सिंचाई प्रणाली में महत्वपूर्ण सुधार किए।
1830 के दशक से ब्रिटिश इंजीनियरिंग प्रशासन ने नदी के प्रवाह, गाद, जल-वितरण और एनीकट की संरचना पर अधिक व्यवस्थित हस्तक्षेप किया। कावेरी और कोल्लिडम के जल प्रवाह को नियंत्रित करने के प्रयासों ने तंजावुर डेल्टा की सिंचाई क्षमता को मजबूत किया।
इससे कृषि उत्पादन और राजस्व दोनों बढ़ाने की संभावनाएं पैदा हुईं।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण विरोधाभास था—
सिंचाई व्यवस्था का विकास अपने आप सामाजिक समानता पैदा नहीं करता।
डेल्टा समृद्ध हुआ, परंतु उस समृद्धि का वितरण समान नहीं था।
यही तथ्य आगे किसान आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण बना।
धान का कटोरा, लेकिन सभी किसान समृद्ध नहीं
तंजावुर को बाद में तमिल क्षेत्र का धान का कटोरा कहा जाने लगा।
लेकिन उपजाऊ भूमि और अच्छी सिंचाई का अर्थ यह नहीं था कि वहां रहने वाला प्रत्येक कृषक समृद्ध था।
ऐतिहासिक शोध से पता चलता है कि सिंचाई उपलब्ध होने के बावजूद उत्पादन क्षमता की अपनी सीमाएं थीं। उदाहरण के लिए 1902–03 में कावेरी से सिंचित लगभग 8.89 लाख एकड़ भूमि में केवल दस प्रतिशत से कुछ अधिक क्षेत्र पर दूसरी फसल ली जा रही थी। खाद की कमी जैसी समस्याएं भी उत्पादकता सीमित करती थीं।
इससे एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट होती है—
कावेरी डेल्टा को केवल 'अत्यंत समृद्ध कृषि क्षेत्र' कह देना पर्याप्त नहीं है।
उसके भीतर भूमि वितरण, उत्पादन तकनीक, सिंचाई, श्रम संबंध और सामाजिक असमानता सभी को देखना आवश्यक है।
सिंचित तमिलनाडु और शुष्क तमिलनाडु
तमिल कृषि इतिहास केवल कावेरी डेल्टा का इतिहास भी नहीं है।
मद्रास प्रेसीडेंसी के तमिल क्षेत्रों का बड़ा हिस्सा शुष्क कृषि पर निर्भर था। कोयंबटूर, सलेम, मदुरै, रामनाथपुरम तथा दूसरे इलाकों में वर्षा, कुओं, तालाबों और सीमित सिंचाई पर आधारित खेती की अलग परिस्थितियां थीं।
औपनिवेशिक काल में बाजार के विस्तार ने कुछ क्षेत्रों में व्यावसायिक खेती को प्रोत्साहित किया। रैयतवारी व्यवस्था के अंतर्गत भी समय के साथ कुछ समृद्ध कृषक समूह उभरे; कोयंबटूर जैसे क्षेत्रों में नकदी फसलों और बाद में औद्योगिक विकास से ग्रामीण पूंजी संचय की नई संभावनाएं बनीं।
यही सामाजिक समूह आगे बीसवीं सदी के उत्तरार्ध की किसान राजनीति में महत्वपूर्ण होंगे।
तमिल कृषि समाज के दो चेहरे
बीसवीं सदी में प्रवेश करते समय तमिल कृषि समाज के भीतर मोटे तौर पर दो अलग राजनीतिक संभावनाएं तैयार हो चुकी थीं।
पहली—भूमिहीन और खेतिहर मजदूर की राजनीति
विशेषकर तंजावुर डेल्टा में इसका केंद्र था—
आगे कम्युनिस्ट किसान संगठन इस क्षेत्र में मजबूत आधार बनाएंगे।
दूसरी—स्वामी किसान की राजनीति
कोयंबटूर और पश्चिमी तमिल क्षेत्र जैसे इलाकों में अपेक्षाकृत संपन्न कृषकों के लिए समस्याएं अलग थीं—
यही दूसरी धारा कई दशक बाद नारायणसामी नायडू जैसे नेताओं के किसान आंदोलन की सामाजिक जमीन बनेगी।
औपनिवेशिक कृषि अर्थव्यवस्था का अंतर्विरोध
मद्रास प्रेसीडेंसी में ब्रिटिश शासन ने भूमि का सर्वेक्षण किया, राजस्व प्रशासन को व्यवस्थित किया, सिंचाई में निवेश किया, बाजार का विस्तार किया और कृषि को औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था से अधिक मजबूती से जोड़ा।
लेकिन इन परिवर्तनों के साथ तीन बड़े अंतर्विरोध बने रहे।
पहला—उत्पादन और स्वामित्व का अंतर। जो खेत में सबसे अधिक श्रम करता था, उसके पास भूमि होना आवश्यक नहीं था।
दूसरा—भूमि और जाति का गठजोड़। आर्थिक निर्भरता को सामाजिक पदानुक्रम और मजबूत कर सकता था।
तीसरा—कृषि विकास और वितरण का अंतर। सिंचाई और बाजार से कुल उत्पादन बढ़ सकता था, लेकिन उसका लाभ सभी ग्रामीण वर्गों में समान रूप से नहीं बंटता था।
इन अंतर्विरोधों ने तमिलनाडु में किसान आंदोलन को विशिष्ट चरित्र दिया।
स्वतंत्रता के समय विरासत में मिली कृषि संरचना
1947 में भारत स्वतंत्र हुआ तो मद्रास राज्य को ऐसी कृषि व्यवस्था विरासत में मिली जिसमें एक तरफ आधुनिक राजस्व प्रशासन, सिंचाई नेटवर्क और बाजार आधारित कृषि मौजूद थी, तो दूसरी तरफ भूमि असमानता, काश्तकारी असुरक्षा, भूमिहीनता और जातिगत श्रम संबंध भी बने हुए थे।
इसलिए स्वतंत्रता के बाद प्रश्न केवल यह नहीं था कि—
अंग्रेजों की भूमि-राजस्व व्यवस्था समाप्त कैसे की जाए?
क्या खेत जोतने वाला उसका मालिक बनेगा?
खेतिहर मजदूर की मजदूरी कौन निर्धारित करेगा?
दलित खेतिहर मजदूर को आवासीय भूमि और सामाजिक स्वतंत्रता कैसे मिलेगी?
और सिंचाई, बिजली तथा कृषि बाजार का लाभ किस किसान तक पहुंचेगा?
यही प्रश्न स्वतंत्र तमिलनाडु के किसान आंदोलनों की आधारभूमि बने।
समेकित मूल्यांकन
तमिलनाडु के किसान आंदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को एक सूत्र में बांधें तो उसका विकास इस क्रम में दिखाई देता है—
प्राचीन सिंचित कृषि → परंपरागत भू-अधिकार → मिरासदारी → औपनिवेशिक रैयतवारी → नकदी राजस्व और बाजार → भूमि एवं जातिगत असमानता → भूमिहीन कृषि श्रम → काश्तकारी और मजदूरी संघर्ष → आधुनिक किसान राजनीति।
इस इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि तमिलनाडु में आगे चलकर 'किसान' एक समान सामाजिक वर्ग नहीं रहा।
तंजावुर का भूमिहीन दलित खेतिहर मजदूर भी कृषि आंदोलन का हिस्सा था और कोयंबटूर का सिंचित, पंपसेट चलाने वाला भू-स्वामी किसान भी।
बिजली, पानी, कर्ज, लागत और कृषि मूल्य।
इन्हीं दो धाराओं का संगम और कभी-कभी उनका अंतर्विरोध आधुनिक तमिलनाडु किसान राजनीति को भारत के दूसरे किसान आंदोलनों से अलग पहचान देता है।
तंजावुर की सामंती कृषि व्यवस्था
मिरासदार, बड़े भू-स्वामी, मंदिर–मठ भूमि, काश्तकार, पन्नैयाल और भूमिहीन खेतिहर मजदूर
तमिलनाडु के किसान आंदोलन के इतिहास में तंजावुर—वर्तमान तंजावुर, तिरुवारूर और नागपट्टिनम सहित पुराने कावेरी डेल्टा—का स्थान केंद्रीय है। कावेरी की अनेक शाखाओं और नहरों से सिंचित यह इलाका दक्षिण भारत के सबसे उपजाऊ धान उत्पादक क्षेत्रों में था। लेकिन कृषि समृद्धि के नीचे भूमि स्वामित्व, जाति और श्रम पर आधारित गहरी असमानता मौजूद थी। यही विरोधाभास आगे तंजावुर को तमिलनाडु के सबसे तीखे किसान और खेतिहर मजदूर संघर्षों की भूमि बनाने वाला था।
तंजावुर की व्यवस्था को केवल यूरोपीय अर्थ में 'सामंतवाद' कह देना पर्याप्त नहीं है। यहां मिरासी अधिकार, मंदिर और मठों की भूमि, बड़े निजी भू-स्वामी, काश्तकार, उप-काश्तकार तथा पन्नैयाल जैसे आश्रित खेतिहर मजदूर एक जटिल ग्रामीण संरचना बनाते थे। ब्रिटिश शासन ने इनमें से कई पुरानी संस्थाओं को समाप्त करने के बजाय उन्हें अपने राजस्व और संपत्ति कानूनों के अनुरूप पुनर्गठित किया। परिणामतः स्वतंत्रता के समय भी कावेरी डेल्टा में कृषि उत्पादन और भूमि-अधिकार के बीच भारी असमानता मौजूद थी।
कावेरी डेल्टा : समृद्धि और असमानता का भूगोल
कावेरी नदी तंजावुर पहुंचकर अनेक शाखाओं और नहरों में विभाजित होती है। सदियों में विकसित सिंचाई प्रणाली ने इस क्षेत्र को गहन धान कृषि के लिए अनुकूल बनाया। चोल काल से ही यहां नहरों, तालाबों और जल-नियंत्रण संरचनाओं का विशाल नेटवर्क विकसित था।
औपनिवेशिक काल में ब्रिटिश इंजीनियरों ने पुराने सिंचाई तंत्र में मरम्मत और विस्तार किया। इससे कृषि उत्पादन और भूमि-राजस्व की संभावनाएं बढ़ीं।
लेकिन सिंचाई से उत्पन्न संपन्नता समान रूप से वितरित नहीं हुई।
डेल्टा में एक तरफ बड़े भू-स्वामी और धार्मिक संस्थाएं पर्याप्त भूमि नियंत्रित करती थीं, दूसरी तरफ बड़ी संख्या में ऐसे परिवार थे जिनके पास बहुत कम या कोई कृषि भूमि नहीं थी। वे काश्तकारी अथवा खेतिहर मजदूरी पर निर्भर थे।
अत्यधिक उपजाऊ भूमि, लेकिन अत्यधिक असमान भूमि संबंध।
भूमि केवल आर्थिक संपत्ति नहीं, ग्रामीण सत्ता का आधार
तंजावुर में भूमि का अर्थ केवल कृषि उत्पादन नहीं था। भूमि से गांव की सामाजिक प्रतिष्ठा, राजनीतिक प्रभाव, श्रम पर नियंत्रण और कई मामलों में स्थानीय प्रशासनिक शक्ति भी जुड़ी हुई थी।
बड़े भू-स्वामी के पास भूमि होने का अर्थ था कि वह—
मजदूरी और काम की शर्तों पर प्रभाव डाल सकता था,
आवास के लिए जमीन उपलब्ध करा सकता था,
और स्थानीय सामाजिक संस्थाओं पर प्रभाव रख सकता था।
इसलिए भूमिहीन व्यक्ति केवल आर्थिक रूप से गरीब नहीं था। उसकी आजीविका और कभी-कभी आवास तक भू-स्वामी पर निर्भर हो सकता था।
यही निर्भरता किसान आंदोलन के लिए सबसे कठिन चुनौती बनी।
मिरासदारी की ऐतिहासिक संरचना
तंजावुर की भूमि व्यवस्था में मिरास एक महत्वपूर्ण अवधारणा थी। इसका अर्थ मोटे तौर पर किसी गांव अथवा भूमि पर वंशानुगत अधिकार से था।
मिरासदार आधुनिक अर्थ में हमेशा सीधे खेत जोतने वाला स्वामी नहीं होता था। उसके अधिकार ऐतिहासिक परंपरा, गांव की सदस्यता, भूमि-राजस्व तथा स्थानीय सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़े हो सकते थे।
औपनिवेशिक शासन ने जब दक्षिण भारत में भूमि अधिकारों को कानूनी रूप देने की कोशिश की तो उसे अनेक प्रकार के परंपरागत अधिकार मिले। इतिहासकार धर्मा कुमार ने दिखाया है कि मद्रास प्रेसीडेंसी में ब्रिटिश अधिकारियों को मिरासदारों, इनामदारों, काश्तकारों और वास्तविक कृषकों के प्रतिस्पर्धी दावों से जूझना पड़ा।
मिरासदारी का महत्व इसलिए था कि इससे ग्रामीण समाज में भूमि पर अधिकार रखने वाले परिवारों की स्थिति पीढ़ी-दर-पीढ़ी मजबूत हो सकती थी।
मिरासदार बनाम वास्तविक कृषक
मिरासदारी व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण अंतर्विरोध यह था कि भूमि पर उच्चतर अधिकार रखने वाला व्यक्ति और वास्तविक खेती करने वाला व्यक्ति अलग हो सकते थे।
एक भूमि-स्वामी अपनी भूमि किसी काश्तकार को दे सकता था।
काश्तकार स्वयं खेती कर सकता था अथवा कृषि मजदूर लगा सकता था।
कुछ परिस्थितियों में उसके नीचे उप-काश्तकार भी हो सकता था।
इस तरह कृषि उत्पादन की एक श्रृंखला बन सकती थी—
भू-अधिकारधारी → काश्तकार → उप-काश्तकार → खेतिहर मजदूर।
उत्पादन का सबसे कठिन शारीरिक श्रम अक्सर इस श्रृंखला के सबसे निचले हिस्से में मौजूद व्यक्ति करता था, जबकि भूमि पर सबसे मजबूत अधिकार ऊपर की श्रेणियों में केंद्रित हो सकते थे।
आगे के किसान आंदोलन का केंद्रीय प्रश्न इसी विरोधाभास से निकला—
जो जमीन जोतता है, जमीन पर अधिकार उसका क्यों नहीं?
बड़े भू-स्वामियों का उदय
तंजावुर में भूमि स्वामित्व केवल पुराने मिरासदारों तक सीमित नहीं था। औपनिवेशिक काल में खरीद-बिक्री, उत्तराधिकार, ऋण और बाजार के विस्तार से बड़े निजी भू-स्वामी भी विकसित हुए।
कुछ परिवारों के पास सैकड़ों और कहीं-कहीं हजारों एकड़ तक भूमि नियंत्रण के उदाहरण मिलते हैं। भूमि के संकेंद्रण की मात्रा पूरे जिले में समान नहीं थी, लेकिन पूर्वी तंजावुर में बड़े भू-स्वामित्व और व्यापक भूमिहीन कृषि श्रम का संयोजन विशेष रूप से महत्वपूर्ण था।
बड़े भू-स्वामी स्वयं हल चलाएं, यह आवश्यक नहीं था।
उनका कृषि उत्पादन काश्तकारों, स्थायी कृषि श्रमिकों और मौसमी मजदूरों पर निर्भर था।
इस प्रकार खेत में श्रम और भूमि के स्वामित्व के बीच दूरी बढ़ती गई।
मंदिरों की विशाल कृषि संपत्ति
तंजावुर की कृषि संरचना की एक विशिष्ट विशेषता मंदिरों की भूमि थी।
चोल और बाद के राजवंशों के काल से मंदिरों को राजाओं, स्थानीय शासकों, अधिकारियों और संपन्न व्यक्तियों द्वारा भूमि दान दी जाती रही। फलतः अनेक बड़े मंदिर महत्वपूर्ण संस्थागत भू-स्वामी बन गए।
मंदिर की भूमि से प्राप्त धान और अन्य आय का उपयोग—
लेकिन वास्तविक खेती काश्तकारों और कृषि श्रमिकों द्वारा की जाती थी।
इससे धार्मिक संस्था और कृषि अर्थव्यवस्था के बीच सीधा संबंध बन गया।
मठों की भूमि और तंजावुर का कृषि प्रश्न
मंदिरों के साथ-साथ कुछ मठ भी बड़े भू-स्वामी थे। विशेषकर कावेरी डेल्टा में शैव मठों सहित धार्मिक संस्थाओं के पास उल्लेखनीय कृषि संपत्ति थी।
इन जमीनों पर खेती प्रायः काश्तकार करते थे।
इसलिए बाद के भूमि सुधार आंदोलनों में धार्मिक संस्थाओं की भूमि भी विवाद का विषय बनी।
क्या धार्मिक संस्था के नाम पर मौजूद विशाल कृषि संपत्ति भूमि-सीमा कानून से बाहर रहे?
क्या उस जमीन को पीढ़ियों से जोतने वाले काश्तकार को अधिकार मिलना चाहिए?
क्या धार्मिक संस्था और निजी भू-स्वामी की कृषि भूमि के लिए अलग मानक होने चाहिए?
स्वतंत्रता के बाद तमिलनाडु में भूमि सुधार की राजनीति में ये प्रश्न बार-बार सामने आए।
काश्तकार : खेती उसकी, जमीन किसी और की
तंजावुर की कृषि व्यवस्था में काश्तकार महत्वपूर्ण मध्यवर्ती श्रेणी था।
वह भू-स्वामी से भूमि लेकर खेती करता और बदले में निश्चित किराया, उपज का हिस्सा अथवा अन्य निर्धारित भुगतान देता था।
काश्तकारी की शर्तें हर जगह समान नहीं थीं। कहीं नकद भुगतान था, कहीं अनाज में और कहीं फसल के हिस्से के रूप में।
काश्तकार की सबसे बड़ी समस्या थी असुरक्षित अधिकार।
यदि भू-स्वामी उसे हटा सकता था तो काश्तकार के पास अपनी स्थिति सुधारने की सीमित क्षमता थी।
अच्छी फसल होने पर भू-स्वामी अधिक हिस्सा मांग सकता था।
किसान यदि संगठन में शामिल हो जाए तो बेदखली का खतरा उत्पन्न हो सकता था।
इसीलिए आगे किसान आंदोलन में बेदखली से सुरक्षा प्रमुख मांग बनी।
बटाई और उपज के वितरण का संघर्ष
धान उत्पादक डेल्टा में उपज का वितरण लगातार विवाद का विषय था।
खेती में भूमि भू-स्वामी की हो सकती थी, लेकिन श्रम, पशु, बीज अथवा कृषि उपकरणों में किसका कितना योगदान था—इस आधार पर हिस्सेदारी अलग-अलग होती थी।
फसल तैयार होने के बाद असली सवाल आता था—
धान में कितना हिस्सा भू-स्वामी का और कितना वास्तविक कृषक का?
यदि माप-तौल पर भू-स्वामी का नियंत्रण हो तो वास्तविक कृषक कमजोर स्थिति में रहता था।
इसी कारण किसान संगठन केवल लगान की मात्रा ही नहीं बल्कि—
पन्नैयाल कौन थे?
तंजावुर की कृषि संरचना की सबसे उत्पीड़क संस्थाओं में पन्नैयाल व्यवस्था का उल्लेख आवश्यक है।
पन्नैयाल ऐसे कृषि श्रमिकों के लिए प्रयुक्त शब्द था जो किसी भू-स्वामी से दीर्घकालीन आश्रित श्रम संबंध में जुड़े रहते थे।
वे सामान्य स्वतंत्र दिहाड़ी मजदूर जैसे नहीं थे।
उनकी निर्भरता के कई स्रोत हो सकते थे—
कुछ पन्नैयाल परिवार पीढ़ियों तक एक ही भू-स्वामी अथवा परिवार से जुड़े रह सकते थे।
इसलिए इस व्यवस्था में आर्थिक निर्भरता कई बार अर्ध-बंधुआ श्रम जैसी स्थिति पैदा करती थी।
पन्नैयाल व्यवस्था में श्रम का नियंत्रण
पन्नैयाल का संबंध केवल खेत में निर्धारित घंटों की मजदूरी से नहीं था।
उसे कृषि चक्र के अनुसार अलग-अलग काम करने पड़ सकते थे—
महिलाओं का श्रम विशेष रूप से महत्वपूर्ण था। रोपाई, निराई, कटाई और कटाई के बाद के कई कार्यों में महिला श्रमिक बड़ी संख्या में शामिल थीं।
लेकिन मजदूरी और सामाजिक स्थिति में उन्हें पुरुषों की तुलना में अतिरिक्त असमानता झेलनी पड़ सकती थी।
इसलिए तंजावुर का कृषि प्रश्न आगे चलकर महिला खेतिहर मजदूर का प्रश्न भी बना।
मजदूरी नकद से अधिक अनाज में
धान प्रधान अर्थव्यवस्था में मजदूरी का बड़ा हिस्सा ऐतिहासिक रूप से अनाज में दिया जा सकता था।
इसका अर्थ था कि मजदूर का जीवन सीधे फसल और भू-स्वामी पर निर्भर था।
यदि मजदूरी का भुगतान अनाज में होता था तो विवाद केवल मजदूरी की राशि पर नहीं, बल्कि—
त्योहार अथवा विशेष अवसर पर क्या मिलेगा
और काम न मिलने की अवधि में परिवार कैसे चलेगा—
यही कारण है कि आगे तंजावुर के किसान और खेतिहर मजदूर आंदोलनों में धान की मात्रा बढ़ाने की मांग बार-बार दिखाई देती है।
भूमिहीन खेतिहर मजदूर
तंजावुर की कृषि संरचना का सबसे कमजोर हिस्सा भूमिहीन खेतिहर मजदूर था।
उसके पास खेती योग्य जमीन नहीं थी या इतनी कम थी कि परिवार का निर्वाह संभव न हो।
इसलिए उसकी आजीविका पूरी तरह कृषि मजदूरी पर निर्भर थी।
भूमिहीनता की समस्या केवल रोजगार तक सीमित नहीं थी।
कई मजदूर परिवार जिस जगह अपना घर बनाकर रहते थे, वह भूमि भी उनके स्वामित्व में नहीं होती थी।
यदि आवासीय जमीन भू-स्वामी की थी तो मजदूर की निर्भरता दोगुनी हो जाती थी—
रोजगार भी मालिक के पास और घर की जमीन भी मालिक की।
ऐसी परिस्थिति में मजदूर द्वारा हड़ताल करना या मालिक का विरोध करना केवल नौकरी खोने का जोखिम नहीं था; उसके सामने गांव से विस्थापन का खतरा भी खड़ा हो सकता था।
इसीलिए आगे तमिलनाडु में कृषि मजदूरों को घर की जमीन का अधिकार महत्वपूर्ण राजनीतिक मांग बनी।
जाति और खेतिहर मजदूरी
तंजावुर में भूमिहीनता और जाति का गहरा संबंध था।
दलित समुदायों—विशेषकर आदि द्रविड़ तथा स्थानीय अनुसूचित जाति समुदायों—का बड़ा हिस्सा खेतिहर मजदूरी पर निर्भर था।
इसका अर्थ था कि वर्गीय असमानता और जातिगत असमानता एक-दूसरे को मजबूत करती थीं।
भू-स्वामी केवल आर्थिक नियोक्ता नहीं था। गांव की जातिगत सत्ता में भी उसका प्रभाव हो सकता था।
दलित मजदूर के लिए इसलिए संघर्ष दो स्तरों पर था—
मजदूरी बढ़ाना महत्वपूर्ण था, लेकिन सार्वजनिक स्थानों तक पहुंच, सम्मान, स्वतंत्र आवागमन और जातिगत अपमान से मुक्ति भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी।
यही कारण है कि पूर्वी तंजावुर का आंदोलन बाद में भारत में वर्ग और जाति के अंतर्संबंध का महत्वपूर्ण उदाहरण बना।
दलित महिला खेतिहर मजदूर की स्थिति
इस व्यवस्था के सबसे निचले हिस्से में दलित महिला कृषि मजदूर की स्थिति थी।
वर्ग, क्योंकि वह भूमिहीन श्रमिक थी;
जाति, क्योंकि वह दलित समुदाय से आती थी;
और लिंग, क्योंकि ग्रामीण पितृसत्तात्मक व्यवस्था में महिला थी।
धान की रोपाई और निराई जैसे श्रम-सघन कार्यों में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। इसके बावजूद मजदूरी में लैंगिक अंतर तथा सामाजिक असुरक्षा बनी रहती थी।
आगे जब किसान सभा और खेतिहर मजदूर संगठन गांवों में पहुंचे तो महिलाओं की भागीदारी केवल सहायक नहीं रही। वे हड़ताल, प्रदर्शन और मजदूरी संघर्ष में सक्रिय हुईं।
भू-स्वामी का सामाजिक नियंत्रण
तंजावुर में बड़े भू-स्वामी की शक्ति को केवल उसके खेत के आकार से नहीं मापा जा सकता।
उसके पास स्थानीय स्तर पर कई प्रकार के प्रभाव हो सकते थे—
पुलिस और राजस्व अधिकारियों तक पहुंच,
इस कारण गरीब कृषक या मजदूर का व्यक्तिगत विरोध कठिन था।
किसी एक मजदूर ने अधिक मजदूरी मांगी तो उसे काम से हटाया जा सकता था।
लेकिन यदि पूरे गांव के मजदूर संगठित होकर एक साथ मांग करें तो शक्ति-संतुलन बदल सकता था।
यही कारण है कि संगठन तंजावुर के किसान आंदोलन का निर्णायक हथियार बना।
ग्रामीण ऋण और निर्भरता
भूमिहीन मजदूर और गरीब काश्तकार के लिए कृषि ऋण का प्रश्न भी महत्वपूर्ण था।
बीमारी, विवाह, मृत्यु, त्योहार अथवा बेरोजगारी के समय उसे अग्रिम अनाज या पैसा चाहिए होता था।
यदि यह सहायता भू-स्वामी से मिलती तो आर्थिक संबंध और मजबूत हो जाता।
कर्ज केवल आर्थिक देनदारी नहीं रह जाता; वह श्रम पर नियंत्रण का माध्यम भी बन सकता था।
भूमिहीनता → मजदूरी पर निर्भरता → कम आय → ऋण → भू-स्वामी पर और अधिक निर्भरता।
इसी चक्र को तोड़ना किसान संगठन के सामने बड़ी चुनौती थी।
ब्रिटिश शासन ने व्यवस्था समाप्त क्यों नहीं की?
रैयतवारी व्यवस्था के बावजूद तंजावुर में इतनी जटिल कृषि संरचना कैसे बनी रही?
कारण यह था कि औपनिवेशिक शासन की प्राथमिकता सामाजिक क्रांति नहीं बल्कि राजस्व और प्रशासनिक स्थिरता थी।
जब तक कृषि उत्पादन और राजस्व व्यवस्था चलती रही, सरकार के पास ग्रामीण सत्ता-संबंधों को आमूल बदलने की सीमित प्रेरणा थी।
औपनिवेशिक कानून ने कुछ मामलों में संपत्ति अधिकारों को अधिक स्पष्ट बनाया, लेकिन इसका लाभ अक्सर उन लोगों को अधिक मिला जो पहले से भूमि और संसाधनों पर मजबूत दावा रखते थे।
इसलिए ब्रिटिश शासन ने पुरानी व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त नहीं किया।
उसने कई परंपरागत असमानताओं को आधुनिक कानूनी संपत्ति संबंधों के साथ जोड़ दिया।
बीसवीं सदी के आरंभ में परिवर्तन
बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में तंजावुर का ग्रामीण समाज स्थिर नहीं था।
मद्रास प्रेसीडेंसी में सामाजिक न्याय और गैर-ब्राह्मण राजनीति ने परंपरागत सामाजिक पदानुक्रम को चुनौती दी।
इसके समानांतर मजदूर और किसान संगठन वर्गीय आधार पर ग्रामीण समाज में प्रवेश करने लगे।
यहीं से पुराने कृषि संबंधों पर राजनीतिक दबाव बढ़ना शुरू हुआ।
महामंदी और कृषि संकट
1929 के बाद विश्वव्यापी महामंदी ने भारतीय कृषि को भी प्रभावित किया। कृषि उत्पादों की कीमतों में गिरावट ने किसानों और काश्तकारों की आय पर दबाव बढ़ाया।
जिस कृषक को लगान, ऋण अथवा अन्य देनदारियां चुकानी थीं, उसके लिए कीमतों में गिरावट गंभीर समस्या थी।
भूमिहीन मजदूर के लिए संकट अलग था। यदि खेती से भू-स्वामी और काश्तकार की आय घटती तो मजदूरी और रोजगार पर दबाव पड़ता।
इस तरह कृषि संकट ने ग्रामीण समाज की विभिन्न श्रेणियों को प्रभावित किया, लेकिन सबसे कमजोर वर्ग पर उसका बोझ अधिक पड़ा।
किसान सभा के लिए तैयार होती जमीन
1930 और 1940 के दशकों तक तंजावुर में ऐसी परिस्थितियां बन चुकी थीं जिनमें संगठित किसान राजनीति तेजी से फैल सकती थी।
और बड़े भू-स्वामियों का सामाजिक प्रभाव।
लेकिन केवल असंतोष से आंदोलन पैदा नहीं होता।
उसे संगठन, नेतृत्व और राजनीतिक भाषा की आवश्यकता होती है।
यह भूमिका आगे किसान सभा और कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने निभाई।
तंजावुर में वर्ग संघर्ष और जाति प्रश्न का मिलन
भारत के अनेक किसान आंदोलनों में मुख्य प्रश्न भूमि-राजस्व या लगान था। तंजावुर में स्थिति इससे अधिक जटिल थी।
यहां संघर्ष के केंद्र में धीरे-धीरे तीन प्रश्न एक साथ आ गए—
फसल और मजदूरी में उचित हिस्सा किसका?
इसीलिए तंजावुर का किसान संघर्ष धीरे-धीरे केवल 'किसान बनाम भू-स्वामी' नहीं रहा।
वह दलित खेतिहर मजदूर बनाम भूमि–जाति–सत्ता के संयुक्त ढांचे का संघर्ष बन गया।
स्वतंत्रता के ठीक पहले की स्थिति
1940 के दशक तक पूर्वी तंजावुर में वर्गीय ध्रुवीकरण स्पष्ट होने लगा था।
एक ओर बड़े भू-स्वामी और संस्थागत भूमि स्वामी थे।
और सबसे नीचे विशाल भूमिहीन कृषि मजदूर वर्ग।
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान महंगाई और खाद्य संकट ने ग्रामीण तनाव और बढ़ाया। कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने इसी दौर में तंजावुर के गांवों में किसान और खेतिहर मजदूर संगठन का विस्तार किया।
अब मजदूर व्यक्तिगत रूप से मालिक से विनती करने के बजाय सामूहिक मांग रखने लगे।
यह ग्रामीण सत्ता-संबंधों में बहुत बड़ा परिवर्तन था।
स्वतंत्रता से समस्या स्वतः समाप्त नहीं हुई
1947 में औपनिवेशिक शासन समाप्त हुआ, लेकिन भूमि संबंध एक रात में नहीं बदले।
पन्नैयाल जैसी आश्रित श्रम प्रणालियों के अवशेष मौजूद रहे।
जातिगत असमानता भी स्वतंत्रता की घोषणा के साथ समाप्त नहीं हुई।
इसलिए तंजावुर में स्वतंत्रता का अर्थ राजनीतिक सत्ता का हस्तांतरण तो था, लेकिन ग्रामीण सामाजिक-आर्थिक सत्ता का तत्काल लोकतंत्रीकरण नहीं।
यहीं से स्वतंत्र भारत के पहले बड़े कृषि सुधार संघर्षों में से एक की शुरुआत होती है।
भूमि सुधार का प्रश्न क्यों अनिवार्य हुआ?
नई सरकार के सामने तीन परस्पर संबंधित समस्याएं थीं।
यदि खेत जोतने वाला किसान किसी भी समय बेदखल किया जा सकता था तो कृषि सुधार अधूरा था।
दूसरी थी पन्नैयाल और कृषि मजदूर की स्वतंत्रता।
यदि मजदूर ऋण, आवास और रोजगार के कारण भू-स्वामी से बंधा था तो कानूनी स्वतंत्रता का अर्थ सीमित था।
यदि बड़ी कृषि संपत्तियां कुछ व्यक्तियों और संस्थाओं के पास बनी रहतीं तो भूमिहीनता की समस्या बनी रहती।
यही तीन प्रश्न आगे तमिलनाडु के भूमि सुधार कानूनों और किसान संघर्षों के केंद्र में आए।
तंजावुर क्यों बना आंदोलन का केंद्र?
तमिलनाडु के विशाल भूभाग में तंजावुर ही किसान संघर्ष का इतना महत्वपूर्ण केंद्र क्यों बना?
उच्च कृषि उत्पादकता + सिंचाई + बड़े भू-स्वामित्व + व्यापक भूमिहीनता + जातिगत विभाजन + संगठित खेतिहर मजदूर।
शुष्क क्षेत्र में गरीब किसान का संघर्ष प्रकृति और बाजार दोनों से था।
लेकिन कावेरी डेल्टा में अलग विरोधाभास था—
खेत उपजाऊ था, फसल अच्छी हो सकती थी, फिर भी खेत में काम करने वाला मजदूर गरीब था।
इसलिए यहां गरीबी को केवल प्राकृतिक अभाव से समझाना कठिन था।
समेकित मूल्यांकन
काश्तकार कहेगा—मुझे बेदखली से बचाओ।
किसान संगठन का उदय
किसान सभा, कम्युनिस्ट आंदोलन, बी. श्रीनिवास राव, मणलूर मणियम्मै और तंजावुर में संगठित किसान–खेतिहर मजदूर राजनीति की शुरुआत
तंजावुर की कृषि व्यवस्था में शोषण और असमानता लंबे समय से मौजूद थे, लेकिन असंतोष और संगठित आंदोलन एक ही चीज नहीं हैं। किसी खेतिहर मजदूर का भू-स्वामी का आदेश मानने से इनकार कर देना, किसी काश्तकार का अधिक लगान का विरोध करना या किसी गांव में मजदूरों का सामूहिक रूप से अधिक धान मांगना प्रतिरोध की घटनाएं थीं; किंतु उन्हें स्थायी राजनीतिक शक्ति में बदलने के लिए संगठन, नेतृत्व, विचार और गांवों के बीच संपर्क आवश्यक था।
1930 और 1940 के दशकों में तंजावुर में यही परिवर्तन हुआ।
व्यक्तिगत प्रतिरोध सामूहिक संघर्ष में बदला। स्थानीय असंतोष किसान सभा से जुड़ा। मजदूरी का सवाल राजनीतिक सवाल बना। जातिगत अपमान के विरुद्ध प्रतिरोध वर्ग संघर्ष से जुड़ा। और भूमिहीन खेतिहर मजदूर पहली बार ग्रामीण राजनीति की स्वतंत्र शक्ति के रूप में सामने आने लगा।
इस परिवर्तन में अखिल भारतीय किसान सभा, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, बी. श्रीनिवास राव, मणलूर मणियम्मै, स्थानीय किसान कार्यकर्ताओं और स्वयं दलित पन्नैयालों तथा काश्तकारों की निर्णायक भूमिका थी।
पूर्वी तंजावुर में गरीब काश्तकारों और खेतिहर मजदूरों के बीच कम्युनिस्ट संगठन की प्रारंभिक गतिविधियां 1938 में कीलवेलूर और नागपट्टिनम में हुए सम्मेलनों तक पहुंचती हैं। इतिहासकार कैथलीन गफ के अनुसार आगे भी कम्युनिस्ट किसान आंदोलन की सबसे मजबूत पकड़ पुराने तंजावुर जिले के पूर्वी भाग में ही बनी रही।
1930 का दशक : असंतोष पहले से मौजूद था
किसान सभा के पहुंचने से पहले तंजावुर का खेतिहर समाज निष्क्रिय नहीं था।
भूमिहीन मजदूर और काश्तकार समय-समय पर—
और भू-स्वामियों की सामाजिक ज्यादतियों
1930 के दशक के अंतिम वर्षों तक पूर्वी तंजावुर में कृषि मजदूरों की सामूहिक बेचैनी स्पष्ट दिखाई देने लगी थी। एक अकादमिक अध्ययन के अनुसार मार्च 1939 में नन्निलम तालुक के कलियाकुडी गांव में एक बड़े भू-स्वामी के पन्नैयालों ने कम मजदूरी के विरोध में काम करने से इनकार किया और अधिक मजदूरी की मांग सरकार तक पहुंचाई। इसी समय मन्नारगुडी क्षेत्र में कृषि मजदूरों के संगठन बनाने के प्रारंभिक प्रयास भी हुए।
किसान सभा ने असंतोष पैदा नहीं किया; उसने पहले से मौजूद असंतोष को संगठन, दिशा और व्यापक राजनीतिक भाषा दी।
अखिल भारतीय किसान सभा और दक्षिण भारत
अप्रैल 1936 में लखनऊ में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना हुई। इसका उद्देश्य विभिन्न प्रांतों के किसान संघर्षों को अखिल भारतीय स्तर पर जोड़ना था।
उस समय भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर किसान प्रश्न तेजी से उभर रहा था।
लेकिन दक्षिण भारत, विशेषकर तंजावुर, में किसान संगठन के सामने एक अतिरिक्त चुनौती थी—
खेती करने वाली आबादी स्वयं कई वर्गों में बंटी हुई थी।
और बड़ी संख्या में भूमिहीन खेतिहर मजदूर तथा पन्नैयाल।
इसलिए तंजावुर में किसान सभा को केवल 'किसान मालिक' की संस्था बनाकर नहीं चलाया जा सकता था।
यदि उसे वास्तविक ग्रामीण शक्ति बनना था तो उसे भूमिहीन कृषि मजदूर तक पहुंचना ही था।
तमिल क्षेत्र में किसान सभा की पहली जमीन
अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना 1936 में हो गई थी, लेकिन तमिल क्षेत्र में उसका मजबूत सांगठनिक विस्तार कुछ वर्ष बाद हुआ।
पूर्वी तंजावुर इस विस्तार का मुख्य क्षेत्र बना।
1938 में कीलवेलूर और नागपट्टिनम में गरीब काश्तकारों तथा खेतिहर मजदूरों के बीच सम्मेलन और संगठनात्मक गतिविधियों का उल्लेख मिलता है। 1938–39 में मणलूर मणियम्मै ने भी दलित खेतिहर मजदूरों को संगठित करना शुरू कर दिया था।
इन प्रारंभिक गतिविधियों ने एक महत्वपूर्ण राजनीतिक बदलाव पैदा किया।
उसकी कम मजदूरी कोई व्यक्तिगत दुर्भाग्य नहीं है;
पन्नैयाल का बंधन प्राकृतिक व्यवस्था नहीं है;
काश्तकार की बेदखली केवल मालिक की निजी इच्छा नहीं हो सकती;
और जातिगत अपमान को सामाजिक परंपरा कहकर स्वीकार करना आवश्यक नहीं है।
यानी रोजमर्रा के अनुभवों को अधिकारों की भाषा मिली।
मणलूर मणियम्मै : असाधारण सामाजिक विद्रोह
तंजावुर के किसान आंदोलन की कहानी मणलूर मणियम्मै के बिना अधूरी है।
उनका महत्व केवल इसलिए नहीं है कि वे महिला किसान नेता थीं। उनकी राजनीतिक यात्रा स्वयं उस सामाजिक संरचना के विरुद्ध विद्रोह का प्रतीक थी जिसे किसान आंदोलन चुनौती दे रहा था।
भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के विवरण के अनुसार मणियम्मै का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका मूल नाम वालाम्बल था। कम आयु में विवाह हुआ, बाद में वे विधवा हुईं और राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ीं। गांधी से प्रभावित होकर उन्होंने कांग्रेस में काम किया और आगे प्रांतीय स्तर तक सक्रिय हुईं। बाद में वे कम्युनिस्ट आंदोलन में चली गईं और कृषि मजदूरों के संगठन में सक्रिय भूमिका निभाई।
उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि और राजनीतिक चुनाव के बीच विरोधाभास उल्लेखनीय था।
एक उच्च जाति के परिवार से आने वाली विधवा महिला का दलित खेतिहर मजदूरों के साथ बैठना, उनके घर जाना और भू-स्वामियों के विरुद्ध उन्हें संगठित करना उस समय की ग्रामीण सामाजिक व्यवस्था के लिए खुली चुनौती थी।
जाति के विरुद्ध मणियम्मै की राजनीति
मणियम्मै ने किसान आंदोलन को केवल आर्थिक मुद्दों तक सीमित नहीं रखा।
1938–39 के दौरान उन्होंने तंजावुर में दलित खेतिहर मजदूरों की बैठकें आयोजित कीं और उन्हें किसान समितियों में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। उपलब्ध विवरण बताते हैं कि उन्होंने भू-स्वामी सत्ता और औपनिवेशिक शासन दोनों के विरुद्ध संघर्ष को जोड़ा।
उनकी राजनीति में तीन बातें साथ-साथ थीं—
स्वराज, किसान अधिकार, और जातिगत मुक्ति।
यह उस समय अत्यंत महत्वपूर्ण परिवर्तन था।
यदि राष्ट्रीय स्वतंत्रता के बाद भी खेतिहर मजदूर गांव में अपमानित और बंधुआ बना रहे तो राजनीतिक स्वतंत्रता का अर्थ उसके लिए क्या होगा?
मणियम्मै की गतिविधियां इसी अंतर्विरोध की ओर संकेत करती थीं।
परंपरागत महिला भूमिका को चुनौती
मणियम्मै का निजी जीवन भी राजनीतिक प्रतिरोध का माध्यम बन गया।
सरकारी जीवनी संबंधी विवरण और आंदोलन की स्मृतियों के अनुसार उन्होंने परंपरागत स्त्री वेशभूषा और विधवा जीवन से जुड़े कई सामाजिक मानकों को चुनौती दी। वे गांव-गांव अकेले घूमतीं, किसान बैठकों में जातीं और हमले की आशंका के बावजूद संगठन का काम करती थीं। संस्कृति मंत्रालय के विवरण में उल्लेख है कि किसान संघर्ष के दौरान उन पर गंभीर हमला भी हुआ था।
कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास में यह भी दर्ज है कि उन्होंने आत्मरक्षा के लिए मार्शल आर्ट सीखी थी।
इसलिए मणियम्मै की भूमिका को केवल 'महिला कार्यकर्ता' के खाते में डाल देना उनके महत्व को कम करना होगा।
को चुनौती देने वाली कार्यकर्ता बन गई थीं।
कांग्रेस से कम्युनिस्ट आंदोलन की ओर
मणियम्मै की राजनीतिक यात्रा राष्ट्रीय आंदोलन और किसान आंदोलन के बदलते संबंधों को भी सामने लाती है।
उन्होंने शुरुआत कांग्रेस से की थी। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें लगा कि ग्रामीण सामाजिक संबंधों में केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग पर्याप्त नहीं है।
भूमि और श्रम के प्रश्न पर अधिक उग्र सामाजिक परिवर्तन की आवश्यकता थी।
इसके बाद वे कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़ीं।
भारत सरकार के उपलब्ध विवरण में भी कहा गया है कि उन्होंने कांग्रेस छोड़कर पूर्णकालिक कम्युनिस्ट कार्यकर्ता के रूप में काम किया तथा बी. श्रीनिवास राव और मनाली कंदसामी जैसे नेताओं से राजनीतिक प्रशिक्षण पाया।
यह परिवर्तन केवल व्यक्तिगत दल-बदल नहीं था।
यह उस दौर के भारतीय किसान आंदोलन की व्यापक वैचारिक बहस का हिस्सा था—
राष्ट्रीय स्वतंत्रता पर्याप्त है या सामाजिक–आर्थिक क्रांति भी आवश्यक है?
बी. श्रीनिवास राव का तंजावुर आगमन
तंजावुर के किसान आंदोलन को व्यापक और स्थायी संगठन देने में बी. श्रीनिवास राव की भूमिका निर्णायक रही।
उनका जन्म दक्षिण कन्नड़ क्षेत्र में हुआ था और वे पहले कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी तथा बाद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े। मद्रास क्षेत्र में मजदूर और राजनीतिक संगठन का अनुभव प्राप्त करने के बाद उन्हें तंजावुर भेजा गया।
1943 में कम्युनिस्ट पार्टी के प्रांतीय नेतृत्व ने उन्हें तंजावुर के किसानों और खेतिहर मजदूरों को संगठित करने का कार्य सौंपा। उस समय वे तमिल बोल सकते थे, लेकिन पढ़ने-लिखने में सहज नहीं थे। इसके बावजूद उन्होंने गांव-गांव घूमकर संगठन खड़ा किया।
उनकी कार्यशैली का सबसे महत्वपूर्ण पहलू था—
वे दलित खेतिहर मजदूरों के घर जाते, उनके साथ भोजन करते और सीधे उनकी परिस्थितियां समझते थे।
उस समय यह मात्र राजनीतिक संपर्क नहीं था।
जातिगत विभाजन वाले ग्रामीण समाज में इसका अपना प्रतीकात्मक महत्व था।
श्रीनिवास राव की राजनीति : भय तोड़ना
तंजावुर में किसान संगठन की पहली आवश्यकता किसी लिखित घोषणापत्र से भी पहले थी—
दलित मजदूर सामाजिक प्रतिशोध से डरता था।
मजदूरी मांगने वाला रोजगार खोने से डरता था।
किसान सभा ने इस भय को सामूहिक शक्ति से बदलने की कोशिश की।
श्रीनिवास राव ने मजदूरों को यह समझाया कि भू-स्वामी भी उनके जैसा मनुष्य है और हिंसक या अपमानजनक व्यवहार को प्राकृतिक सामाजिक अधिकार नहीं माना जा सकता। आंदोलन के अभिलेखों में उनके भाषणों का सार यही मिलता है कि यदि किसी मजदूर पर हमला हो तो पूरा गांव उसके साथ खड़ा हो और किसान सभा की एकता ही उसकी सुरक्षा बने।
इस संदेश ने ग्रामीण सत्ता के मनोवैज्ञानिक आधार पर चोट की।
तेनपराई : निर्णायक संगठनात्मक मोड़
पूर्वी तंजावुर के तेनपराई गांव का किसान आंदोलन के इतिहास में विशेष महत्व है।
यहां भूमि पहले रेट्टै रायार परिवार के नियंत्रण में थी और 1939 में उत्तिरापति मठ को हस्तांतरित हुई। उपलब्ध आंदोलन इतिहास के अनुसार मठ प्रबंधन ने काश्तकारों से ऐसे बंधपत्र स्वीकार कराने की कोशिश की जिनका उन्होंने विरोध किया। विरोध करने वाले किसानों को दबाने के लिए बाहरी लोगों के इस्तेमाल के आरोप भी सामने आए।
इसी संघर्ष की पृष्ठभूमि में किसान सभा सक्रिय हुई।
1943 में तेनपराई में तमिलनाडु की किसान सभा की पहली संगठित इकाई स्थापित की गई। बी. श्रीनिवास राव के साथ स्थानीय कार्यकर्ता अमृतलिंगम, वेंकटेशा सोलगर, रामानुजम और अन्य नेताओं ने इसमें भूमिका निभाई।
तेनपराई केवल एक संगठन की शाखा नहीं थी।
गांव की स्थानीय शिकायत → किसान समिति → सामूहिक मांग → व्यापक क्षेत्रीय संगठन।
किसान सभा की गांव समिति कैसे काम करती थी?
किसान सभा की असली शक्ति जिला मुख्यालय या बड़े नेताओं में नहीं बल्कि गांव समितियों में थी।
गांव में कार्यकर्ता पहले स्थानीय समस्याओं की पहचान करते।
किस काश्तकार से अनुचित हिस्सा मांगा जा रहा है?
इसके बाद समस्या को व्यक्ति का निजी मामला न रहने देकर सामूहिक मुद्दे में बदला जाता।
और आवश्यकता पड़ने पर सामूहिक प्रतिरोध आयोजित किया जाता।
इस संगठनात्मक पद्धति ने ग्रामीण गरीब को पहली बार ऐसा मंच दिया जो भू-स्वामी के सामने उसकी व्यक्तिगत निर्बलता को सामूहिक शक्ति में बदल सकता था।
लाल झंडे का ग्रामीण अर्थ
पूर्वी तंजावुर के गांवों में किसान सभा का लाल झंडा केवल कम्युनिस्ट विचारधारा का प्रतीक नहीं था।
अनेक गरीब खेतिहर परिवारों के लिए उसका व्यावहारिक अर्थ था—
यदि मजदूर किसान सभा का सदस्य है तो उस पर हमला केवल किसी एक मजदूर पर हमला नहीं माना जाएगा।
इसीलिए किसान सभा की शाखाएं और लाल झंडे भू-स्वामी सत्ता के लिए चुनौती बन गए।
वे गांव में एक वैकल्पिक सामूहिक शक्ति की घोषणा थे।
काश्तकार और मजदूर—दो अलग वर्ग, एक संगठन
तंजावुर आंदोलन की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि किसान सभा को दो अलग सामाजिक समूहों को संगठित करना था।
दूसरे थे पन्नैयाल और भूमिहीन खेतिहर मजदूर।
काश्तकार कभी-कभी स्वयं भी मजदूर रख सकता था।
इसलिए दोनों वर्गों के हितों में तनाव की संभावना मौजूद थी।
फिर भी बड़े भू-स्वामियों की सत्ता के विरुद्ध किसान सभा ने उन्हें व्यापक मोर्चे में जोड़ने का प्रयास किया।
बाद के आंदोलन के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने इसी बात को पूर्वी तंजावुर संघर्ष की विशिष्टता माना कि उसमें दलित पन्नैयालों और मुख्यतः पिछड़ी जातियों से आने वाले छोटे काश्तकारों—दो अलग वर्गों—की मांगें एक साथ उठाई गईं।
दलित खेतिहर मजदूर बने आंदोलन की रीढ़
तमिलनाडु के कई अन्य क्षेत्रों की तुलना में पूर्वी तंजावुर में कम्युनिस्ट आंदोलन का आधार भूमिहीन अथवा लगभग भूमिहीन कृषि श्रमिकों के बीच अधिक मजबूत हुआ।
कैथलीन गफ के अध्ययन में इस बात की ओर ध्यान दिलाया गया है कि आंदोलन उन क्षेत्रों में विशेष रूप से मजबूत रहा जहां भूमिहीन या लगभग भूमिहीन कृषि श्रमिक आबादी बड़ी और जाति तथा वर्ग की दृष्टि से अपेक्षाकृत संगठित थी।
इसका अर्थ यह था कि तंजावुर में किसान आंदोलन धीरे-धीरे पारंपरिक अर्थ में 'किसान मालिकों' का आंदोलन नहीं रहा।
उसकी सामाजिक रीढ़ खेतिहर मजदूर बनने लगे।
यही आगे कीझवेनमणि तक पहुंचने वाले आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता बनेगी।
छुआछूत के खिलाफ संघर्ष क्यों किसान प्रश्न बना?
यदि खेतिहर मजदूर दलित है और उसे गांव में सार्वजनिक स्थानों, सामाजिक व्यवहार और मनुष्य की बराबरी तक से वंचित किया जाता है तो केवल मजदूरी बढ़ाने से उसकी मुक्ति संभव नहीं होती।
इसीलिए किसान सभा ने तंजावुर में मजदूरी और काश्तकारी के साथ छुआछूत के विरुद्ध संघर्ष भी उठाया।
बी. श्रीनिवास राव के नेतृत्व में किसान सभा ने मजदूरी वृद्धि, काश्तकार सुरक्षा और अस्पृश्यता विरोध को एक ही ग्रामीण आंदोलन का हिस्सा बनाया।
यह रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण था।
जातिगत सम्मान कोई अलग सामाजिक सुधार कार्यक्रम नहीं; खेतिहर मजदूर के वर्गीय अधिकार का हिस्सा है।
खेतिहर मजदूरों के साथ भोजन—राजनीतिक कृत्य
आज किसी राजनीतिक कार्यकर्ता का मजदूर के घर भोजन करना सामान्य प्रतीकात्मक घटना लग सकती है। 1940 के दशक के जाति-विभाजित तंजावुर में इसका अलग अर्थ था।
जब श्रीनिवास राव दलित मजदूर परिवारों के बीच रहते और उनके साथ भोजन करते थे तो वे व्यवहार में उस सामाजिक दूरी को अस्वीकार कर रहे थे जिस पर गांव की जातिगत सत्ता टिकी थी।
इसी तरह मणियम्मै का दलित मजदूरों के बीच संगठन करना उनके अपने सामाजिक समुदाय की रूढ़ियों के विरुद्ध था।
इस प्रकार आंदोलन ने किसानों को केवल भाषणों से नहीं बल्कि नेताओं के व्यवहार से भी नया सामाजिक संदेश दिया—
संगठन के भीतर जातिगत ऊंच-नीच स्वीकार नहीं होगी।
व्यवहार में यह आदर्श हर जगह पूरी तरह लागू हुआ हो, ऐसा मान लेना उचित नहीं होगा; फिर भी आंदोलन की राजनीतिक दिशा के रूप में यह महत्वपूर्ण परिवर्तन था।
स्थानीय नेतृत्व का निर्माण
किसी बाहरी नेता के सहारे स्थायी किसान आंदोलन नहीं चल सकता था।
श्रीनिवास राव की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक स्थानीय नेतृत्व तैयार करना था।
तेनपराई और आसपास के क्षेत्रों में अमृतलिंगम, रामानुजम, वेंकटेशा सोलगर, मनाली कंदसामी और आगे कलप्पाल कुप्पुसामी जैसे अनेक स्थानीय कार्यकर्ता सामने आए। संगठन का विस्तार होने के साथ गांवों में ऐसे कार्यकर्ता तैयार हुए जो स्थानीय भाषा, जाति संबंध, भू-स्वामी नेटवर्क और मजदूर परिवारों की वास्तविक परिस्थितियों को जानते थे।
अब वह किसी एक नेता की यात्रा पर निर्भर नहीं था।
गांव का मजदूर स्वयं संगठनकर्ता बनने लगा।
आंदोलन का पूर्वी तंजावुर में असमान विस्तार
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि किसान सभा पूरे तंजावुर जिले में समान रूप से मजबूत नहीं हुई।
कैथलीन गफ के ऐतिहासिक अध्ययन के अनुसार कम्युनिस्ट आंदोलन मुख्यतः पुराने डेल्टा के पूर्वी हिस्से में मजबूत रहा।
नन्निलम और उत्तरी मन्नारगुडी भी मजबूत क्षेत्र थे।
सीरकाली, मायावरम तथा तिरुत्तुरैपुंडी के कुछ क्षेत्रों में भी प्रभाव बढ़ा।
इसके विपरीत पश्चिमी डेल्टा तथा कुछ शुष्क क्षेत्रों में आंदोलन अपेक्षाकृत कमजोर रहा।
जहां बड़े भू-स्वामित्व और भूमिहीन कृषि श्रमिकों का संकेंद्रण अधिक था, वहां वर्गीय संघर्ष की जमीन अधिक अनुकूल थी।
द्वितीय विश्वयुद्ध और बदलती कृषि अर्थव्यवस्था
1940 के दशक के किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि में द्वितीय विश्वयुद्ध भी महत्वपूर्ण था।
युद्ध ने खाद्यान्न बाजार को अस्थिर किया।
बर्मा से चावल की आपूर्ति बाधित होने के बाद दक्षिण भारत में तंजावुर के धान का महत्व बढ़ा। एक ऐतिहासिक अध्ययन के अनुसार युद्धकाल में कावेरी डेल्टा की कृषि अर्थव्यवस्था में मांग और कीमतों की परिस्थितियां बदलीं और उसी समय संगठित किसान संघर्ष को नई जमीन मिली।
धान की कीमत बढ़ने से भू-स्वामी की आय बढ़ सकती थी।
लेकिन खेतिहर मजदूर की मजदूरी उसी अनुपात में बढ़ना आवश्यक नहीं था।
जब फसल की कीमत बढ़ रही है तो उसका हिस्सा क्यों नहीं बढ़ता?
यहीं आर्थिक परिस्थितियां संगठन की मांगों को और धार देती हैं।
मजदूरी को सामूहिक सौदेबाजी का प्रश्न बनाना
किसान सभा से पहले मजदूर की मजदूरी प्रायः व्यक्तिगत संबंध के आधार पर तय होती थी।
मजदूरी पूरे गांव के मजदूर मिलकर तय करेंगे।
इससे भू-स्वामी का एक मजदूर को दूसरे के विरुद्ध इस्तेमाल करना कठिन होने लगा।
यदि पूरा गांव एक निश्चित मात्रा से कम धान पर काम न करने का निर्णय करे तो मजदूरों की सौदेबाजी शक्ति अचानक बढ़ जाती थी।
आगे यही सामूहिक मजदूरी संघर्ष तंजावुर के किसान आंदोलन का सबसे शक्तिशाली हथियार बनने वाला था।
पन्नैयाल से 'मजदूर' बनने की प्रक्रिया
किसान सभा की सबसे गहरी उपलब्धि केवल मजदूरी बढ़वाना नहीं थी।
उसने पन्नैयाल की स्वयं के बारे में धारणा बदलने की कोशिश की।
तुम श्रमिक हो और तुम्हारे अधिकार हैं।
मालिक का अनुशासन सामाजिक परंपरा है।
पन्नैयाल का स्वयं को 'मालिक का आदमी' न समझकर 'कृषि मजदूर' समझना सामाजिक चेतना का बड़ा परिवर्तन था।
मणियम्मै और महिला भागीदारी
मणियम्मै की सक्रियता ने महिला खेतिहर मजदूरों को भी एक राजनीतिक उदाहरण दिया।
धान की कृषि में महिलाओं का श्रम केंद्रीय था, लेकिन किसान संगठन में नेतृत्व परंपरागत रूप से पुरुषों के हाथ में रहने की संभावना अधिक थी।
उनकी मौजूदगी ने यह स्पष्ट किया कि कृषि संघर्ष केवल 'किसान पुरुष' की राजनीति नहीं है।
आगे तंजावुर के संघर्षों में खेतिहर महिलाओं की व्यापक भागीदारी इसी सामाजिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण आयाम बनी।
मणियम्मै की मृत्यु : सावधानी से समझने योग्य प्रसंग
मणियम्मै की मृत्यु 1953 में हुई। उनकी मृत्यु की परिस्थितियों को लेकर आंदोलन की स्मृति और उपलब्ध विवरणों में अलग-अलग कथन मिलते हैं।
किसान सभा बनाम पुराने ग्रामीण संबंध
और आवश्यकता हुई तो आसपास के गांवों को भी बुलाएंगे।
1940–50 के दशक का तंजावुर किसान संघर्ष
पन्नैयाल मुक्ति, मजदूरी आंदोलन, काश्तकारी अधिकार, हड़तालें, भू-स्वामियों से टकराव और सरकारी दमन
1940 और 1950 के दशकों का तंजावुर किसान संघर्ष तमिलनाडु के कृषि इतिहास का निर्णायक मोड़ था। पिछले चरण में किसान सभा ने गांवों में संगठन खड़ा किया था; अब वही संगठन प्रत्यक्ष संघर्ष में उतरने लगा। सवाल केवल मजदूरी बढ़ाने या किसी एक काश्तकार को बेदखली से बचाने का नहीं रहा। संघर्ष धीरे-धीरे उस पूरी कृषि संरचना को चुनौती देने लगा जिसमें बड़े भू-स्वामी, मिरासदार और धार्मिक संस्थाएं जमीन पर नियंत्रण रखते थे, जबकि वास्तविक खेती काश्तकारों, पन्नैयालों और भूमिहीन खेतिहर मजदूरों के श्रम पर निर्भर थी।
इस दौर की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि दो अलग लेकिन परस्पर जुड़े संघर्ष समानांतर चले।
एक था पन्नैयाल और खेतिहर मजदूर का संघर्ष—बंधुआपन, कम मजदूरी और सामाजिक अपमान से मुक्ति के लिए।
दूसरा था काश्तकार का संघर्ष—बेदखली से सुरक्षा, अधिक न्यायपूर्ण किराया और फसल में बेहतर हिस्सेदारी के लिए।
किसान सभा और कम्युनिस्ट आंदोलन ने इन दोनों धाराओं को एक मंच पर जोड़ने की कोशिश की। पूर्वी तंजावुर के एक वरिष्ठ किसान नेता जी. वीरैयन ने बाद में याद किया कि 1950 तक आंदोलन की मुख्य मांग कृषि बंधुआपन के विरुद्ध थी, लेकिन साथ-साथ अत्यधिक किराया देने वाले और कभी भी बेदखल किए जा सकने वाले छोटे काश्तकारों की मांगें भी उठाई जाती थीं।
युद्धकालीन अर्थव्यवस्था और संघर्ष की नई जमीन
द्वितीय विश्वयुद्ध के वर्षों ने तंजावुर की कृषि अर्थव्यवस्था में गहरा तनाव पैदा किया। चावल की मांग और कीमतें बढ़ीं, लेकिन खेतिहर मजदूरों की मजदूरी उसी अनुपात में नहीं बढ़ी।
इससे ग्रामीण समाज में एक सरल लेकिन विस्फोटक प्रश्न पैदा हुआ—
जब धान महंगा हो रहा है, तो खेत में काम करने वाले मजदूर का हिस्सा क्यों नहीं बढ़ रहा?
किसान सभा ने इस आर्थिक असंतोष को संगठित मांग में बदला।
अब मजदूरी किसी एक पन्नैयाल और उसके मालिक के बीच निजी सौदा नहीं रही।
गांवों में सामूहिक निर्णय होने लगे कि न्यूनतम मजदूरी कितनी होगी, कटाई पर कितना धान मिलेगा और किस शर्त पर मजदूर काम करेंगे।
यहीं से मजदूरी संघर्ष का राजनीतिक रूप स्पष्ट होने लगा।
1943 के बाद किसान सभा का विस्तार
1943 से बी. श्रीनिवास राव के नेतृत्व में किसान सभा ने पूर्वी तंजावुर में संगठन को तेजी से फैलाया।
तेनपराई जैसे गांव आंदोलन के शुरुआती केंद्र बने।
जल्द ही नागपट्टिनम, नन्निलम, मन्नारगुडी, तिरुवारूर, मायावरम और तिरुत्तुरैपुंडी के विभिन्न हिस्सों में संगठन की उपस्थिति बढ़ने लगी।
पहले गांव में स्थानीय समस्या पहचानो,
और संघर्ष को आसपास के गांवों से जोड़ो।
इससे खेतिहर मजदूरों को पहली बार यह अनुभव हुआ कि मालिक के विरुद्ध अकेले खड़े होने के बजाय संगठित प्रतिरोध संभव है।
पन्नैयाल मुक्ति आंदोलन
पूर्वी तंजावुर में किसान संघर्ष का सबसे गहरा पक्ष था पन्नैयाल व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन।
पन्नैयाल केवल मौसमी मजदूर नहीं था। कई मामलों में उसका पूरा परिवार भू-स्वामी से जुड़ा रहता था।
और कभी-कभी घर की जगह भी मालिक पर निर्भर हो सकती थी।
इसीलिए किसान आंदोलन में “मजदूरी बढ़ाओ” से अधिक मूलभूत मांग थी—
पन्नैयाल को मालिक का बंधुआ व्यक्ति नहीं, स्वतंत्र मजदूर माना जाए।
जी. वीरैयन के संस्मरण में इस दौर की प्राथमिक मांग को कृषि बंधुआपन के विरुद्ध संघर्ष के रूप में रेखांकित किया गया है।
“मालिक का आदमी” से स्वतंत्र श्रमिक तक
पन्नैयाल मुक्ति की वास्तविक क्रांतिकारी शक्ति कानूनी भाषा में नहीं बल्कि सामाजिक व्यवहार में थी।
पुरानी व्यवस्था में भू-स्वामी कह सकता था—
इस परिवर्तन का अर्थ था कि श्रमिक को मालिक बदलने, बेहतर मजदूरी मांगने और अन्य मजदूरों के साथ संगठन बनाने का अधिकार होना चाहिए।
यह भू-स्वामियों के लिए केवल आर्थिक चुनौती नहीं थी।
उनकी परंपरागत ग्रामीण सत्ता का एक आधार ही टूट रहा था।
मजदूरी संघर्ष क्यों तीखा हुआ?
के लिए बड़ी संख्या में खेतिहर मजदूर चाहिए थे।
इसलिए कटाई के समय मजदूर यदि संगठित होकर काम रोक दें तो भू-स्वामी पर तुरंत दबाव बनता था।
धान समय पर न कटे तो पूरी फसल खतरे में पड़ सकती थी।
किसान सभा ने इसी आर्थिक कमजोरी को मजदूर की ताकत में बदला।
हड़ताल अब खेतिहर मजदूर का सबसे प्रभावशाली हथियार बनी।
मजदूरी धान में—विवाद भी धान में
पूर्वी तंजावुर में मजदूरी अक्सर धान में दी जाती थी।
इसलिए मजदूरी संघर्ष का प्रश्न रुपये-पैसे की बजाय अनाज की मात्रा पर केंद्रित रहता।
और काम के प्रकार के अनुसार बेहतर भुगतान।
इन मांगों के कारण भू-स्वामियों और मजदूरों के बीच कटाई के समय बार-बार तनाव उत्पन्न होता था।
किसान सभा का प्रयास था कि अलग-अलग गांवों की मजदूरी में भारी अंतर कम किया जाए और पूरे क्षेत्र में सामूहिक मानक स्थापित हों।
काश्तकारों का अलग संकट
भूमिहीन मजदूर के साथ छोटे काश्तकार भी संघर्ष में सक्रिय थे।
वे जमीन जोतते थे लेकिन उसके मालिक नहीं थे।
भू-स्वामी उनसे अधिक किराया मांग सकता था।
और सबसे गंभीर—उन्हें जमीन से बेदखल कर सकता था।
काश्तकार को सुरक्षा मिले और बिना उचित कारण उसे हटाया न जा सके।
यह संघर्ष बाद में तंजावुर के विशेष काश्तकारी कानून की आधारभूमि बना।
बेदखली भू-स्वामी का सबसे बड़ा हथियार
किसान सभा में शामिल हुए काश्तकारों पर दबाव बनाने का सबसे प्रभावी तरीका था—
या भू-स्वामी की शर्तों का विरोध किया,
तो जमीन किसी दूसरे व्यक्ति को दी जा सकती थी।
इसलिए किसान सभा ने बेदखली को व्यक्तिगत मामला न मानकर सामूहिक राजनीतिक सवाल बनाया।
किसी एक काश्तकार को हटाने का प्रयास पूरे गांव के आंदोलन का विषय बनाया जा सकता था।
यहीं से काश्तकारी सुरक्षा की मांग मजबूत हुई।
मजदूर और काश्तकार की संयुक्त शक्ति
1940 के दशक में किसान सभा की सबसे महत्वपूर्ण रणनीति थी—
काश्तकार और खेतिहर मजदूर को एक मंच पर रखना।
भू-स्वामी के विरुद्ध दोनों के हित कई मामलों में समान थे।
दोनों बेदखली और भू-स्वामी के मनमाने व्यवहार का विरोध करते थे।
काश्तकार यदि स्वयं मजदूर रखता था तो मजदूरी बढ़ना उसकी लागत बढ़ाता।
इस अंतर्विरोध को किसान सभा कुछ समय तक व्यापक भू-स्वामी विरोधी संघर्ष के भीतर नियंत्रित कर पाई।
1947—राजनीतिक स्वतंत्रता, लेकिन ग्रामीण प्रश्न कायम
15 अगस्त 1947 के बाद किसान आंदोलन के सामने नया राजनीतिक वातावरण बना।
स्वतंत्र भारत में भी पुरानी पन्नैयाल व्यवस्था क्यों जारी रहे?
यदि नागरिक समान हैं तो खेतिहर मजदूर मालिक का बंधुआ व्यक्ति क्यों बने?
यदि भारत लोकतंत्र बनने जा रहा है तो काश्तकार को भू-स्वामी की मनमर्जी से बेदखल क्यों किया जा सके?
इसलिए स्वतंत्रता ने किसान आंदोलन को शांत नहीं किया।
1947–48 में आंदोलन का विस्तार
स्वतंत्रता के तुरंत बाद पूर्वी तंजावुर में मजदूरी और काश्तकारी के सवालों पर व्यापक संघर्ष हुए।
1947–48 में खेतिहर मजदूर अधिक मजदूरी और काश्तकार फसल में बेहतर हिस्सा मांगने लगे।
नागपट्टिनम, नन्निलम और मन्नारगुडी जैसे क्षेत्रों में आंदोलन विशेष रूप से मजबूत था।
कई स्थानों पर किसान सभा ने भू-स्वामियों से सामूहिक समझौते कराने की कोशिश की।
यह दौर आंदोलन के स्थानीय से क्षेत्रीय शक्ति बनने का समय था।
1948 का मायावरम समझौता
पूर्वी तंजावुर के किसान संघर्ष के इतिहास में 1948 का मायावरम समझौता महत्वपूर्ण पड़ाव था।
बाद के पन्नैयाल संरक्षण कानून में भी उस समझौते में स्वीकार की गई मजदूरी वृद्धि का उल्लेख संदर्भ के रूप में किया गया। किसान आंदोलन के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार 1952 के कानून ने 1948 के मायावरम समझौते में तय कृषि सेवकों की बढ़ी मजदूरी लागू करने का प्रावधान किया।
इसका महत्व यह था कि मजदूरी पहली बार केवल स्थानीय मालिक–मजदूर संबंध का प्रश्न नहीं रही।
सरकार और प्रशासन को स्वीकार करना पड़ा कि कृषि श्रम संबंध सार्वजनिक नीति का विषय हैं।
1948 की हड़तालें
1948 में कटाई के मौसम के दौरान पूर्वी तंजावुर में बड़े संघर्ष हुए।
कई गांवों में मजदूरों ने एक साथ काम रोक दिया।
आंदोलन का उद्देश्य केवल तत्काल मजदूरी वृद्धि नहीं था बल्कि यह स्थापित करना था कि भविष्य में मजदूरी भू-स्वामी की एकतरफा घोषणा से तय नहीं होगी।
किसान सभा की सफलता का कारण था कि उसके पास अब गांव-स्तरीय नेटवर्क मौजूद था।
एक गांव की हड़ताल दूसरे गांव से समर्थन प्राप्त कर सकती थी।
इससे आंदोलन का क्षेत्रीय चरित्र स्पष्ट हुआ।
किसान आंदोलन और कम्युनिस्ट पार्टी पर दमन
1948 के बाद भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन पर देशव्यापी सरकारी कार्रवाई तेज हुई।
कई स्थानों पर कम्युनिस्ट कार्यकर्ता भूमिगत हुए।
1949 से 1951 के बीच किसान कार्यकर्ताओं को खुले राजनीतिक संगठन की जगह वैकल्पिक स्थानीय संगठनों और गुप्त नेटवर्क के सहारे काम करना पड़ा। जी. वीरैयन ने याद किया कि इस अवधि में पार्टी भूमिगत थी और उन्होंने अपने गांव में “ग्राम उन्नति संघ” जैसे खुले मंच का इस्तेमाल किया।
लेकिन दमन से किसान आंदोलन समाप्त नहीं हुआ।
उसकी जड़ें गांवों में पहले ही फैल चुकी थीं।
पुलिस कार्रवाई और ग्रामीण दमन
किसान आंदोलन के तेज होने के साथ राज्य की प्रतिक्रिया भी कठोर हुई।
भू-स्वामी संगठन भी किसान सभा की गतिविधियों का प्रतिरोध कर रहे थे।
आंदोलन की स्मृतियों में पुलिस और भू-स्वामी शक्ति के बीच निकटता के आरोप बार-बार दिखाई देते हैं।
हालांकि हर संघर्ष को केवल राज्य बनाम किसान के सरल ढांचे में नहीं रखा जा सकता, लेकिन यह स्पष्ट है कि सरकार की प्राथमिक चिंता अक्सर कानून-व्यवस्था और कृषि उत्पादन बनाए रखना थी।
भू-स्वामियों की नई रणनीति
जब पन्नैयाल संगठित होकर अधिक मजदूरी मांगने लगे तो कई भू-स्वामियों ने पुरानी स्थायी श्रम व्यवस्था से बाहर निकलने की कोशिश की।
दूसरे जिलों या गांवों से मजदूर बुलाना।
1952 के संकट के दौरान भी भू-स्वामियों द्वारा रामनाथपुरम तथा अन्य बाहरी क्षेत्रों से श्रमिक लाकर स्वयं खेती कराने की कोशिश का उल्लेख मद्रास उच्च न्यायालय के एक निर्णय में मिलता है।
यह आने वाले दशकों में खेतिहर मजदूर आंदोलन का स्थायी प्रश्न बनने वाला था—
भूमिहीन मजदूर की सबसे बड़ी कमजोरी—घर भी मालिक का
कई पन्नैयाल और भूमिहीन मजदूर भू-स्वामी की जमीन पर बने घरों में रहते थे।
इस कारण हड़ताल का जोखिम केवल नौकरी खोना नहीं था।
काम नहीं करोगे तो यहां रह भी नहीं सकते।
यही कारण है कि किसान आंदोलन आगे मजदूरी से आवासीय अधिकार तक पहुंचा।
भूमिहीन खेतिहर मजदूर को स्वतंत्र बनाने के लिए केवल पन्नैयाल संबंध तोड़ना पर्याप्त नहीं था।
उसे घर की जमीन पर सुरक्षा भी चाहिए थी।
1950 तक आंदोलन का केंद्रीय मुद्दा
1950 तक पूर्वी तंजावुर में आंदोलन की मुख्य मांग स्पष्ट थी—
इसके साथ छोटे काश्तकारों की मांग थी—
जी. वीरैयन के अनुसार इस दौर में आंदोलन की विशिष्टता यही थी कि दलित पन्नैयाल और मुख्यतः पिछड़ी जातियों के छोटे काश्तकार एक साझा मंच पर लाए गए।
यह राजनीतिक रूप से असाधारण गठबंधन था।
हिंसा और प्रतिहिंसा का बढ़ता चक्र
1950 के दशक के आरंभ तक तंजावुर का कृषि विवाद इतना तीखा हो गया कि कई क्षेत्रों में हिंसक घटनाएं होने लगीं।
भू-स्वामियों और किसान संगठनों के बीच टकराव,
मद्रास उच्च न्यायालय ने 1953 के एक निर्णय में उस समय की स्थिति का वर्णन करते हुए कहा कि जिले भर में संबंध इतने तनावपूर्ण हो गए थे कि बेदखली, कृषि मजदूरों की बर्खास्तगी और व्यापक अशांति ने सरकार को तत्काल हस्तक्षेप के लिए मजबूर किया।
यह विवरण महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सरकारी कानून की वास्तविक पृष्ठभूमि स्पष्ट करता है।
सरकार ने जांच क्यों कराई?
जैसे-जैसे विवाद बढ़ा, मद्रास सरकार के लिए इसे केवल पुलिस से नियंत्रित करना कठिन होने लगा।
यदि मजदूर और काश्तकार लगातार आंदोलन करें और भू-स्वामी खेती रोक दें अथवा बाहरी श्रमिक लाएं तो धान उत्पादन प्रभावित हो सकता था।
तंजावुर राज्य की खाद्य आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र था।
इसलिए सरकार को सामाजिक शांति और कृषि उत्पादन दोनों बचाने थे।
इसी पृष्ठभूमि में कृषि संबंधों की जांच और समाधान के लिए सरकारी हस्तक्षेप बढ़ा।
सुब्रमण्यम समिति/रिपोर्ट
सरकार द्वारा नियुक्त जांच व्यवस्था ने तंजावुर के कृषि संबंधों का अध्ययन किया और सुधार के सुझाव दिए।
बाद में न्यायालयी अभिलेखों में इसे सुब्रमण्यम रिपोर्ट के रूप में संदर्भित किया गया।
काश्तकार और कृषि मजदूर चाहते थे कि रिपोर्ट की सिफारिशें तुरंत लागू हों।
मद्रास उच्च न्यायालय के अनुसार इसी टकराव ने 1952 के संकट को तीखा किया—काश्तकार रिपोर्ट लागू कराने के लिए आंदोलन कर रहे थे, जबकि भू-स्वामियों ने उन्हें हटाकर बाहरी श्रमिकों से स्वयं खेती कराने का प्रयास किया।
1952 का निर्णायक संकट
1952 तक पूर्वी तंजावुर में संघर्ष उस स्तर पर पहुंच गया जहां सरकार को लगा कि सामान्य कानून पर्याप्त नहीं है।
भू-स्वामी काश्तकारों को निकाल रहे थे।
पन्नैयालों को काम से हटाया जा रहा था।
कृषि मजदूर और काश्तकार आंदोलन कर रहे थे।
धान उत्पादन प्रभावित होने की आशंका पैदा हुई।
इसीलिए सरकार ने विशेष अध्यादेश लाने का निर्णय किया।
23 अगस्त 1952 का अध्यादेश
23 अगस्त 1952 को मद्रास सरकार ने Tanjore Tenants and Pannaiyal Protection Ordinance No. IV of 1952 जारी किया।
इस अध्यादेश की प्रस्तावना स्वयं स्वीकार करती थी कि—
भू-स्वामियों और काश्तकारों तथा मजदूरों के संबंध तनावपूर्ण हो गए थे,
और कृषि उत्पादन प्रभावित होने का खतरा था।
यह स्वीकारोक्ति अपने आप में महत्वपूर्ण थी।
राज्य पहली बार मान रहा था कि तंजावुर का संकट केवल कानून-व्यवस्था का नहीं बल्कि कृषि संबंधों का संरचनात्मक संकट है।
अध्यादेश से कानून तक
1952 में प्रारंभिक अध्यादेश में संशोधन हुए और अंततः उसे मद्रास विधानमंडल ने Tanjore Tenants and Pannaiyals Protection Act, 1952—Madras Act XIV of 1952 में बदल दिया।
कानून 21 दिसंबर 1952 को लागू हुआ। बाद के मद्रास उच्च न्यायालय के निर्णय में इस तिथि और कानून के प्रभाव का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
यह स्वतंत्र भारत में तंजावुर के किसान संघर्ष की पहली बड़ी विधायी जीतों में से एक था।
कानून ने किन तीन पक्षों को मान्यता दी?
कानून की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी कि उसने कृषि संबंध में तीन अलग पक्षों को कानूनी रूप से पहचाना—
मद्रास उच्च न्यायालय ने 1953 में कानून की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि यह इन तीन वर्गों के अधिकारों को विनियमित करता था।
यह प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण था।
पन्नैयाल अब केवल भू-स्वामी के निजी घरेलू–कृषि संबंध का हिस्सा नहीं था।
राज्य ने उसे स्वतंत्र कानूनी श्रेणी के रूप में मान्यता दी।
काश्तकारों को बेदखली से सुरक्षा
कानून का केंद्रीय उद्देश्य काश्तकार को मनमानी बेदखली से बचाना था।
जिन काश्तकारों को हटाया गया था, वे पुनः कब्जा पाने के लिए आवेदन कर सकते थे।
1955 के एक मद्रास उच्च न्यायालय मामले में ऐसे काश्तकारों के आवेदनों का उल्लेख है जिन्हें कानून के तहत उनकी भूमि पर वापस बहाल करने का आदेश दिया गया था।
यह भू-स्वामी के एक पुराने हथियार पर प्रत्यक्ष कानूनी सीमा थी।
अब संगठन में शामिल होने का अर्थ यह नहीं था कि मालिक बिना किसी प्रक्रिया के तुरंत जमीन छीन सके।
पन्नैयाल को हटाने पर मुआवजा
कानून ने पन्नैयाल की स्थिति में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन किया।
किसान आंदोलन के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार यदि भू-स्वामी किसी पन्नैयाल को अपनी सेवा से हटाना चाहता था तो उसे 150 रुपये या छह महीने की मजदूरी—जो अधिक हो—मुआवजे के रूप में देना था। उस समय 150 रुपये लगभग साढ़े बारह बोरी धान की कीमत के बराबर बताए गए हैं।
पन्नैयाल को बिना किसी आर्थिक सुरक्षा के कभी भी बाहर नहीं किया जा सकता।
यह मालिक के पूर्ण नियंत्रण पर गंभीर प्रहार था।
1948 की मजदूरी वृद्धि की कानूनी स्वीकृति
1952 के संरक्षण कानून ने 1948 के मायावरम समझौते में तय मजदूरी वृद्धि को लागू करने का आधार भी दिया।
इससे एक महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित हुआ—
संगठित मजदूर संघर्ष से प्राप्त समझौता राज्य की कानूनी व्यवस्था का हिस्सा बन सकता है।
इसने किसान सभा के समर्थकों में यह धारणा मजबूत की कि वर्षों का संघर्ष व्यर्थ नहीं गया।
भू-स्वामियों ने कानून को अदालत में चुनौती दी
स्वाभाविक रूप से भू-स्वामी इस कानून से संतुष्ट नहीं थे।
तंजावुर के कई मिरासदार और भूमि मालिक मद्रास उच्च न्यायालय पहुंचे और कानून तथा उसके तहत जारी आदेशों को चुनौती दी।
1953 के Santhanakrishna Odayar v. Vaithilingam मामले में न्यायालय के सामने यही प्रश्न था कि तंजावुर काश्तकार एवं पन्नैयाल संरक्षण कानून संवैधानिक रूप से वैध है या नहीं।
इससे स्पष्ट है कि किसान संघर्ष अब खेत और गांव से निकलकर अदालत और संवैधानिक कानून के क्षेत्र में पहुंच चुका था।
संघर्ष से कानून तक—क्यों महत्वपूर्ण?
1952 का कानून ऊपर से दिया गया कल्याणकारी सुधार मात्र नहीं था।
उसके पीछे लगभग एक दशक का किसान संघर्ष था—
इसीलिए पूर्वी तंजावुर के किसान संगठन ने इसे अपनी बड़ी उपलब्धि माना।
किसान आंदोलन के विवरण में कहा गया है कि इस अध्यादेश का पूर्वी तंजावुर के कृषि संबंधों पर गहरा प्रभाव पड़ा और इसे किसान संघर्षों के दबाव से प्राप्त जीत के रूप में देखा गया।
मन्नारगुडी का 1953 किसान सम्मेलन
कानून के बाद किसान सभा का मनोबल बढ़ा।
1953 में किसान सभा का पांचवां राज्य सम्मेलन मन्नारगुडी में आयोजित हुआ।
आंदोलन के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार सम्मेलन की समापन रैली में एक लाख से अधिक लोगों ने भाग लिया।
यदि इस संख्या को संगठनात्मक स्रोत की रिपोर्ट के रूप में सावधानी से पढ़ें, तब भी एक बात स्पष्ट है—
पूर्वी तंजावुर का किसान आंदोलन अब किसी छोटे स्थानीय संघर्ष तक सीमित नहीं रह गया था।
वह तमिल प्रदेश की व्यापक राजनीतिक शक्ति बन चुका था।
क्या 1952 के कानून ने पन्नैयाल व्यवस्था समाप्त कर दी?
कानून निर्णायक था, लेकिन उसने एक झटके में सारी समस्याएं समाप्त नहीं कीं।
स्थायी पन्नैयाल रखने के बजाय वे अस्थायी मजदूर रख सकते थे।
स्थानीय संगठित मजदूर को काम न देकर बाहर से श्रमिक बुला सकते थे।
यानी पुराने बंधुआ संबंध कमजोर हुए, लेकिन भूमिहीनता समाप्त नहीं हुई।
कानूनी उपलब्धियां और भूमि सुधार
1952 तंजावुर काश्तकार–पन्नैयाल संरक्षण कानून, काश्तकारी सुरक्षा, भूमि-सीमा कानून, अधिशेष भूमि और कृषि मजदूरों के आवासीय भूमि अधिकार
तंजावुर का किसान आंदोलन केवल हड़तालों, धरनों और भू-स्वामियों से टकराव तक सीमित नहीं रहा। उसकी सबसे स्थायी उपलब्धियों में से एक यह थी कि उसने कृषि संबंधों को राज्य के कानून का विषय बना दिया। जो प्रश्न पहले भू-स्वामी और किसान के निजी संबंध माने जाते थे—किसे जमीन पर रहने दिया जाए, किसे बेदखल किया जाए, कितना किराया लिया जाए, पन्नैयाल को कब हटाया जाए, खेतिहर मजदूर को कितनी मजदूरी मिले और जिस जमीन पर उसका घर है उसका मालिक कौन होगा—वे धीरे-धीरे विधानमंडल और राजस्व न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में आए।
इस परिवर्तन को समझने के लिए एक तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है। तमिलनाडु का भूमि सुधार किसी एक कानून या एक सरकार का परिणाम नहीं था। यह लगभग दो दशकों में विकसित हुई कानूनी श्रृंखला थी—
1952 तंजावुर काश्तकार–पन्नैयाल संरक्षण → 1955 काश्तकार संरक्षण → 1956 उचित किराया → 1961 भूमि-सीमा और सार्वजनिक न्यास भूमि विनियमन → 1969 काश्तकारी अधिकार अभिलेख और कृषि मजदूर उचित मजदूरी → 1971 कुडियिरुप्पु अर्थात आवासीय भूमि पर स्वामित्व।
तमिलनाडु सरकार आज भी इन्हीं प्रमुख कानूनों को राज्य की कृषि काश्तकारी व्यवस्था की आधारभूत विधियों के रूप में सूचीबद्ध करती है।
आंदोलन से कानून तक का संक्रमण
1940 के दशक के संघर्ष ने तंजावुर प्रशासन के सामने एक ऐसी स्थिति खड़ी कर दी थी जिसमें केवल पुलिस कार्रवाई पर्याप्त नहीं थी।
भूमिहीन मजदूर पन्नैयाल संबंधों को चुनौती दे रहे थे।
मजदूरी को लेकर कटाई के समय हड़तालें हो रही थीं।
और यह सब उस क्षेत्र में हो रहा था जो मद्रास राज्य के खाद्यान्न उत्पादन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था।
इसलिए राज्य को पहली बार यह स्वीकार करना पड़ा कि समस्या व्यक्तिगत विवादों की नहीं बल्कि कृषि संबंधों की संरचना की है।
यहीं से तंजावुर किसान संघर्ष कानून में बदलना शुरू हुआ।
1952 : तंजावुर काश्तकार और पन्नैयाल संरक्षण
1952 में लाया गया Tanjore Tenants and Pannaiyals Protection Act इस प्रक्रिया का पहला निर्णायक पड़ाव था।
इसका महत्व केवल इसलिए नहीं था कि उसने तत्कालीन कृषि संकट को नियंत्रित किया।
उसने पहली बार एक कानूनी ढांचे में तीन पक्षों को स्पष्ट पहचान दी—
इससे पहले पन्नैयाल का संबंध प्रायः निजी मालिक–मजदूर संबंध के रूप में देखा जा सकता था।
अब राज्य ने स्वीकार किया कि यह संबंध सार्वजनिक नीति का विषय है।
यह पन्नैयाल मुक्ति आंदोलन की महत्वपूर्ण कानूनी उपलब्धि थी।
बेदखली पर नियंत्रण
1952 के कानून का केंद्रीय उद्देश्य काश्तकारों को मनमानी बेदखली से सुरक्षा देना था।
भू-स्वामी के लिए अब केवल यह कहना पर्याप्त नहीं था कि—
“यह जमीन मेरी है, इसलिए मैं जिसे चाहूं निकाल सकता हूं।”
कानून ने काश्तकार के कब्जे और खेती को स्वतंत्र कानूनी महत्व देना शुरू किया।
यह विचार आगे 1955 के राज्यव्यापी कानून में और मजबूत हुआ।
भूमि स्वामित्व की आधुनिक अवधारणा में यह महत्वपूर्ण परिवर्तन था।
स्वामित्व पूर्ण और निरंकुश अधिकार नहीं रहा; वास्तविक खेती करने वाले व्यक्ति के भी संरक्षित अधिकार हो सकते थे।
पन्नैयाल की कानूनी पहचान
कानून ने पन्नैयाल को हटाने की प्रक्रिया पर भी नियंत्रण लगाया।
इसका ऐतिहासिक महत्व मजदूरी से कहीं अधिक था।
पन्नैयाल अब केवल मालिक की इच्छा पर निर्भर श्रमिक नहीं माना गया।
राज्य ने मान्यता दी कि दीर्घकालीन कृषि श्रम संबंध में मजदूर के भी अधिकार हैं।
इससे ग्रामीण सामाजिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित हुआ—
भू-स्वामी जमीन का मालिक हो सकता है, लेकिन खेतिहर मजदूर के श्रम और जीवन पर उसका पूर्ण स्वामित्व नहीं है।
यही सिद्धांत आगे स्वतंत्र कृषि मजदूर की अवधारणा को मजबूत करता है।
1955 : तमिलनाडु काश्तकार संरक्षण अधिनियम
तंजावुर के अनुभव को बाद में व्यापक मद्रास राज्य तक फैलाया गया।
Madras Cultivating Tenants Protection Act, 1955, जिसे बाद में तमिलनाडु काश्तकार संरक्षण अधिनियम कहा गया, राज्य की काश्तकारी व्यवस्था का अत्यंत महत्वपूर्ण कानून बना।
तमिलनाडु सरकार के अनुसार यह कानून सामान्यतः काश्तकार को उसकी जोत से बेदखल किए जाने से बचाता है। कुछ निर्धारित परिस्थितियों में ही बेदखली संभव है, जैसे—
भूमि को गैर-कृषि प्रयोजन में उपयोग करना,
या जानबूझकर भूमि-मालिक के अधिकार से इनकार करना।
अब बेदखली नियम नहीं, अपवाद बनने लगी।
“काश्तकार” किसे माना गया?
1955 के कानून की परिभाषा भी महत्वपूर्ण थी।
काश्तकार वह व्यक्ति माना गया जो किसी दूसरे की भूमि पर अपने या अपने परिवार के शारीरिक श्रम से खेती करता है।
और काश्त समाप्त होने के बाद भी कब्जे में बने वास्तविक कृषक
यह परिभाषा एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सिद्धांत को कानूनी स्वरूप देती थी—
कानून केवल कागजी स्वामित्व नहीं, वास्तविक खेती को भी महत्व देगा।
काश्तकारी सुरक्षा का ग्रामीण प्रभाव
काश्तकारी सुरक्षा ने गांव में शक्ति-संतुलन बदल दिया।
“मेरी शर्तें स्वीकार नहीं करोगे तो अगले वर्ष जमीन किसी और को दे दूंगा।”
इससे किसान संगठन में शामिल होने की लागत कम हुई।
काश्तकार को कम किराया मांगने, अनुचित वसूली का विरोध करने और राजनीतिक संगठन से जुड़ने के लिए अधिक सुरक्षा मिली।
कानूनी सुरक्षा पूर्ण नहीं थी, लेकिन ग्रामीण राजनीति में उसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव महत्वपूर्ण था।
राजस्व न्यायालयों का महत्व
इन कानूनों को लागू करने के लिए सामान्य दीवानी अदालतों के अलावा राजस्व न्यायालयों की व्यवस्था विकसित हुई।
तमिलनाडु सरकार के वर्तमान भूमि सुधार प्रशासन के अनुसार विशेष उप-कलेक्टरों के अधीन राजस्व न्यायालय काश्तकारी विवादों का निपटारा करते हैं। आज भी कडलूर, मयिलाडुतुरै, तिरुवारूर, तंजावुर, तिरुचिरापल्ली सहित विभिन्न केंद्रों में ऐसे राजस्व न्यायालय कार्यरत हैं।
यह व्यवस्था बताती है कि किसान आंदोलन से निकले प्रश्न अस्थायी राजनीतिक मुद्दे नहीं रहे।
वे राज्य की स्थायी प्रशासनिक संरचना का हिस्सा बन गए।
1956 : उचित किराया कानून
काश्तकार को बेदखली से बचाना पर्याप्त नहीं था।
यदि भू-स्वामी उससे इतनी अधिक उपज ले ले कि खेती करना ही अलाभकारी हो जाए तो काश्तकारी सुरक्षा अर्थहीन हो सकती थी।
1956 में Tamil Nadu Cultivating Tenants (Payment of Fair Rent) Act लाया गया।
तमिलनाडु सरकार के वर्तमान विवरण के अनुसार इस कानून में उचित किराया सकल उपज का 25 प्रतिशत निर्धारित किया गया, जबकि भूमि-राजस्व और भूमि से जुड़े सरकारी दायित्व भूमि-मालिक वहन करता है तथा खेती की लागत काश्तकार वहन करता है। किराया नकद या उपज के रूप में दिया जा सकता है।
किराया तय करना क्यों क्रांतिकारी प्रश्न था?
परंपरागत कृषि संबंध में भू-स्वामी और काश्तकार की सौदेबाजी शक्ति समान नहीं थी।
लेकिन जब राज्य कहता है कि अधिकतम उचित किराया निर्धारित नियम से तय होगा, तो भूमि-मालिक के निजी अधिकार पर कानूनी सीमा लगती है।
इसका अर्थ भूमि का स्वामित्व छीनना नहीं था।
भूमि स्वामित्व सामाजिक दायित्व से मुक्त पूर्ण अधिकार नहीं है।
मंदिर और मठ भूमि का प्रश्न
तंजावुर में भूमि सुधार की एक बड़ी जटिलता थी—
धार्मिक और सार्वजनिक न्यासों की भूमि।
कावेरी डेल्टा में मंदिरों, मठों और धार्मिक संस्थाओं के पास महत्वपूर्ण कृषि भूमि थी।
इसलिए यदि भूमि सुधार केवल निजी व्यक्तियों पर लागू होता और संस्थागत भू-स्वामित्व को छोड़ देता तो सुधार का बड़ा हिस्सा निष्प्रभावी हो सकता था।
इसी समस्या से निपटने के लिए 1961 में Tamil Nadu Public Trusts (Regulation of Administration of Agricultural Lands) Act लागू किया गया।
तमिलनाडु सरकार इसे राज्य के प्रमुख काश्तकारी और भूमि सुधार कानूनों में गिनती है।
यह विशेष रूप से तंजावुर जैसे क्षेत्र में महत्वपूर्ण था।
1961 : भूमि-सीमा कानून
तमिलनाडु के भूमि सुधार कार्यक्रम का अगला बड़ा चरण था—
Tamil Nadu Land Reforms (Fixation of Ceiling on Land) Act, 1961।
इस कानून का मूल सिद्धांत था कि कोई व्यक्ति अथवा परिवार निर्धारित सीमा से अधिक कृषि भूमि अपने नियंत्रण में नहीं रख सकता।
सीमा से ऊपर की भूमि को सरकार अधिशेष घोषित कर सकती थी।
कानून ने भूमि के विभिन्न प्रकारों—सिंचित, उद्यान और शुष्क भूमि—के बीच तुल्यता की व्यवस्था भी बनाई और भूमि के प्रकार के आधार पर गणना की गई। इसका उद्देश्य यह था कि कोई व्यक्ति केवल कम उत्पादक शुष्क भूमि और अत्यधिक उत्पादक सिंचित भूमि को समान एकड़ मानकर सीमा से बच न सके।
यहीं किसान आंदोलन पहली बार सीधे भूमि पुनर्वितरण के प्रश्न तक पहुंचता है।
भूमि-सीमा कानून का मूल तर्क
भूमि-सीमा कानून के पीछे विचार सरल था—
यदि हजारों खेतिहर परिवार भूमिहीन हैं और कुछ लोगों के पास बहुत अधिक कृषि भूमि है तो केवल मजदूरी सुधार पर्याप्त नहीं होगा।
इसलिए राज्य को निर्धारित सीमा से ऊपर की भूमि अपने कब्जे में लेकर भूमिहीनों को देना चाहिए।
यह भारत के स्वतंत्रता बाद के भूमि सुधार कार्यक्रम का केंद्रीय सिद्धांत था।
लेकिन कानून बनाना और वास्तविक जमीन वितरित करना दो अलग चीजें थीं।
मानक एकड़ और भूमि की गुणवत्ता
भूमि-सीमा के लिए केवल वास्तविक एकड़ देखना पर्याप्त नहीं था।
एक एकड़ सिंचित कावेरी डेल्टा भूमि की उत्पादकता कई एकड़ शुष्क भूमि से अधिक हो सकती थी।
इसलिए कानून में भूमि की गुणवत्ता और सिंचाई क्षमता को ध्यान में रखने वाली गणना विकसित हुई।
इसी कारण भूमि सुधार के दस्तावेजों में “मानक एकड़” जैसी अवधारणा महत्वपूर्ण बनी।
सिंचित भूमि, उद्यान भूमि और शुष्क भूमि को अलग-अलग उत्पादक क्षमता के अनुसार समायोजित किया जाता था।
यह तकनीकी व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि तंजावुर जैसे अत्यधिक उत्पादक डेल्टा में साधारण एकड़ सीमा आसानी से भ्रामक हो सकती थी।
प्रारंभिक भूमि-सीमा की कमजोरी
1961 का भूमि-सीमा कानून अपने समय के लिए महत्वपूर्ण था, लेकिन किसान संगठनों ने जल्द ही कहा कि इसकी सीमा बहुत उदार है।
भूमि का परिवार के सदस्यों में हस्तांतरण,
और विभिन्न श्रेणियों में भूमि दिखाने
के माध्यम से वास्तविक बड़े स्वामित्व को बचाया जा सकता था।
इसलिए वाम दलों और किसान संगठनों की मांग थी कि भूमि-सीमा और कम की जाए।
तमिलनाडु के भूमि सुधार का अगला चरण इसी दबाव से प्रभावित हुआ।
1970 में सीमा घटाने का प्रयास
द्रमुक शासन के दौरान भूमि-सीमा को अधिक कठोर किया गया।
तमिलनाडु में भूमि सुधार संशोधनों द्वारा सामान्य सीमा को पहले की अपेक्षा नीचे लाने का प्रयास किया गया और 1970 के दशक में 15 मानक एकड़ का स्तर भूमि सुधार राजनीति का महत्वपूर्ण मानक बना।
इस परिवर्तन का उद्देश्य था कि अधिक भूमि अधिशेष के रूप में उपलब्ध हो सके।
सरकार वास्तव में कितनी भूमि अपने कब्जे में ले पाई?
और उसमें से कितनी भूमिहीन परिवारों तक पहुंची?
यही भूमि सुधार की सफलता का वास्तविक पैमाना था।
भूमि-सीमा कानून से बचने की रणनीतियां
भारत के दूसरे राज्यों की तरह तमिलनाडु में भी बड़े भू-स्वामियों ने भूमि-सीमा कानूनों से बचने के विभिन्न रास्ते खोजे।
काल्पनिक अथवा विवादास्पद हस्तांतरण किए गए,
धार्मिक या सार्वजनिक न्यासों के अंतर्गत दिखाई गई,
भिन्न श्रेणी की जमीन के रूप में दर्ज की गई,
भूमि सुधार का प्रशासनिक और न्यायिक चरण दशकों तक खिंच सकता था।
तमिलनाडु सरकार की वर्तमान व्यवस्था में भूमि-सीमा और काश्तकारी मामलों के लिए अलग न्यायिक तथा राजस्व ढांचा आज भी कार्यरत है।
अधिशेष भूमि—सिद्धांत और वास्तविकता
फिर उसे भूमिहीन कृषकों और गरीब ग्रामीण परिवारों में बांटा जाए।
इसलिए तमिलनाडु में भूमि सुधार की उपलब्धि मिश्रित रही।
भूमि-सीमा कानून ने बड़े स्वामित्व पर वैधानिक सीमा जरूर स्थापित की, लेकिन उसने ग्रामीण भूमिहीनता को समाप्त नहीं किया।
भूमिहीनता क्यों बनी रही?
इस प्रश्न का उत्तर किसान आंदोलन के आगे के इतिहास के लिए महत्वपूर्ण है।
मान लें कि कुछ अधिशेष भूमि बांट भी दी गई।
फिर भी कृषि मजदूर परिवारों की संख्या इतनी बड़ी थी कि प्रत्येक को पर्याप्त खेती योग्य भूमि देना संभव नहीं हुआ।
परिवारों की पीढ़ियां बढ़ रही थीं और छोटे खेत विभाजित होते जा रहे थे।
कुछ वितरित जमीन कृषि के लिए कम उपयोगी हो सकती थी।
इसलिए भूमि सुधार के बाद भी तमिलनाडु में विशाल कृषि मजदूर वर्ग बना रहा।
बंधुआ पन्नैयाल से स्वतंत्र लेकिन भूमिहीन मजदूर तक।
1969 : काश्तकारी अधिकारों का रिकॉर्ड
काश्तकार संरक्षण कानून की एक व्यावहारिक कमजोरी थी—
यदि काश्तकार साबित ही न कर पाए कि वह वास्तव में उस जमीन को जोत रहा था तो कानूनी सुरक्षा कैसे मिलेगी?
इसी समस्या से निपटने के लिए 1969 में Tamil Nadu Agricultural Lands (Record of Tenancy Rights) Act लाया गया।
इस कानून का उद्देश्य वास्तविक काश्तकारों का आधिकारिक रिकॉर्ड तैयार करना था।
तमिलनाडु सरकार के अनुसार तहसीलदार इस कानून के अंतर्गत रिकॉर्ड अधिकारी हैं और उन्हें आवश्यकता होने पर स्वयं संज्ञान लेकर काश्तकार का नाम दर्ज करने की शक्ति भी है।
यह प्रशासनिक सुधार बहुत महत्वपूर्ण था।
“रिकॉर्ड में नाम” क्यों इतना महत्वपूर्ण?
ग्रामीण भारत में जमीन का अधिकार केवल खेत पर वास्तविक कब्जे से तय नहीं होता।
यदि काश्तकार दशकों से जमीन जोत रहा हो लेकिन रिकॉर्ड में उसका नाम न हो, तो विवाद के समय उसकी स्थिति कमजोर हो सकती है।
वास्तविक काश्तकार का नाम सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज करो।
यह कागजी कार्यवाही लग सकती है, लेकिन ग्रामीण सत्ता में इसका बहुत बड़ा अर्थ था।
1968 कीझवेनमणि और कानून की अगली दिशा
भूमि सुधार और काश्तकारी कानून बन चुके थे, लेकिन खेतिहर मजदूर का मजदूरी संघर्ष समाप्त नहीं हुआ।
25 दिसंबर 1968 को कीझवेनमणि में मजदूरी संघर्ष की पृष्ठभूमि में 44 दलित खेतिहर मजदूरों और उनके परिवारों के सदस्यों को जिंदा जलाए जाने की घटना ने पूरे तमिलनाडु को झकझोर दिया।
इस घटना ने राज्य के सामने फिर वही मूल प्रश्न खड़ा कर दिया—
यदि कृषि मजदूर को कानूनन स्वतंत्र नागरिक माना गया है, तो उसकी मजदूरी कौन सुनिश्चित करेगा?
यदि संगठित मजदूरी मांगने पर इतनी क्रूर हिंसा हो सकती है, तो केवल सामान्य श्रम कानून पर्याप्त हैं या कृषि मजदूर के लिए विशेष कानून चाहिए?
इसके अगले ही वर्ष राज्य ने कृषि मजदूरी के प्रश्न पर विशिष्ट कानून बनाया।
1969 : कृषि मजदूर उचित मजदूरी अधिनियम
Tamil Nadu Agricultural Labourer Fair Wages Act, 1969 कृषि मजदूरों के इतिहास में महत्वपूर्ण पड़ाव था।
यह कानून 5 अगस्त 1969 से तत्कालीन तंजावुर जिले के अनुसूची में निर्दिष्ट तालुकों में लागू माना गया और बाद में अन्य क्षेत्रों तक विस्तारित करने की व्यवस्था की गई।
कानून का मूल सिद्धांत अत्यंत स्पष्ट था—
हर भूमि-मालिक कृषि मजदूर को उचित मजदूरी देगा।
यदि वह निर्धारित मजदूरी से कम भुगतान करे या भुगतान से इनकार करे तो मजदूर संबंधित अधिकारी के समक्ष दावा कर सकता था।
यह तंजावुर के दशकों पुराने संघर्ष की विधायी परिणति थी।
मजदूरी अब मालिक की इच्छा नहीं
इस कानून का राजनीतिक अर्थ बहुत बड़ा था।
1940 के दशक की स्थिति में मजदूर पूछता था—
सरकार द्वारा निर्धारित उचित मजदूरी से कम देना कानून का उल्लंघन हो सकता है।
अर्थात मजदूरी के तीन चरण दिखाई देते हैं—
व्यक्तिगत सौदा → सामूहिक संघर्ष → कानूनी अधिकार।
तमिलनाडु के किसान–मजदूर आंदोलन की उपलब्धियों को समझने के लिए यह परिवर्तन अत्यंत महत्वपूर्ण है।
फिर भी समस्या—घर की जमीन किसकी?
लेकिन खेतिहर मजदूर का परिवार जिस जगह रहता था, वह जमीन अभी भी भू-स्वामी की हो सकती थी।
यही कृषि मजदूर की अंतिम बड़ी निर्भरताओं में से एक थी।
लेकिन जिस जमीन पर तुम्हारा घर है, वह मेरी है।
इसलिए किसान आंदोलन का अगला ऐतिहासिक कदम था—
“कुडियिरुप्पु” का अर्थ
तमिल ग्रामीण संदर्भ में कुडियिरुप्पु का अर्थ मोटे तौर पर वह घर-स्थल या आवासीय परिसर था जहां कृषक अथवा कृषि मजदूर का परिवार रहता था।
कई खेतिहर मजदूर पीढ़ियों से ऐसे घरों में रहते थे लेकिन जमीन उनके नाम नहीं थी।
यह भू-स्वामी के नियंत्रण का शक्तिशाली साधन था।
यदि मजदूर आंदोलन करे तो उसे रोजगार के साथ घर से भी निकालने का भय दिखाया जा सकता था।
इसलिए आवासीय भूमि अधिकार केवल मकान का प्रश्न नहीं था।
यह आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक नागरिकता का प्रश्न था।
1971 : कुडियिरुप्पु स्वामित्व कानून
इस समस्या को संबोधित करने के लिए Tamil Nadu Occupants of Kudiyiruppu (Conferment of Ownership) Act, 1971 लागू किया गया।
तमिलनाडु सरकार के अनुसार यह कानून उन कृषकों और कृषि मजदूरों को उनके कुडियिरुप्पु अर्थात घर-स्थल पर स्वामित्व प्रदान करता है जो 19 जून 1971 को वहां किरायेदार अथवा लाइसेंसधारी के रूप में निवास कर रहे थे। ऐसी भूमि उन पर सभी भारों से मुक्त पूर्ण स्वामित्व के रूप में निहित हो सकती थी।
यह कानून तंजावुर किसान आंदोलन की सबसे गहरी सामाजिक उपलब्धियों में से एक माना जा सकता है।
घर की जमीन—भूमि सुधार का अलग मॉडल
भारत में भूमि सुधार पर चर्चा अक्सर केवल खेती योग्य जमीन के पुनर्वितरण तक सीमित रहती है।
लेकिन तमिलनाडु का अनुभव दिखाता है कि भूमिहीन मजदूर के लिए घर की जमीन भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो सकती है।
यदि परिवार को अपना स्वतंत्र आवासीय भूखंड मिल जाए तो—
अगली पीढ़ी को स्थायी निवास मिलता है,
और गांव में नागरिक स्वतंत्रता बढ़ती है।
इसलिए कुडियिरुप्पु कानून को केवल आवास नीति नहीं बल्कि कृषि सुधार का हिस्सा समझना चाहिए।
भूमि से सामाजिक सम्मान तक
तंजावुर में घर की जमीन का अधिकार जाति प्रश्न से भी जुड़ा हुआ था।
दलित खेतिहर मजदूरों की बस्तियां अक्सर भू-स्वामियों की भूमि पर थीं।
इसका अर्थ था कि सामाजिक स्वतंत्रता भी आर्थिक निर्भरता से सीमित हो सकती थी।
कुडियिरुप्पु स्वामित्व ने इस संबंध को कमजोर किया।
अब खेतिहर मजदूर पहली बार कह सकता था—
यह केवल मेरा घर नहीं; जमीन भी मेरी है।
यह ग्रामीण सामाजिक संबंध में गहरा मनोवैज्ञानिक परिवर्तन था।
मंदिर–मठ और सार्वजनिक न्यास भूमि की चुनौती
तंजावुर भूमि सुधार के सामने धार्मिक संस्थागत स्वामित्व लगातार जटिल प्रश्न बना रहा।
मंदिर और मठ ऐतिहासिक रूप से बड़े कृषि भू-स्वामी रहे थे।
उनकी भूमि पर हजारों काश्तकार खेती करते थे।
इसीलिए सार्वजनिक न्यास कृषि भूमि को अलग कानून से विनियमित किया गया।
दलित खेतिहर मजदूर और जाति–वर्ग संघर्ष
अस्पृश्यता, सामाजिक अपमान, मजदूरी, भूमि-वंचना, किसान सभा और पूर्वी तंजावुर में दलित चेतना का उभार
पूर्वी तंजावुर का किसान आंदोलन भारतीय कृषि इतिहास में इसलिए विशिष्ट है क्योंकि यहां वर्ग और जाति एक-दूसरे से अलग प्रश्न नहीं थे। भूमिहीन खेतिहर मजदूर का आर्थिक शोषण अक्सर उसकी जातिगत स्थिति से जुड़ा हुआ था। जिस समुदाय के पास जमीन नहीं थी, वही गांव की सामाजिक संरचना में सबसे नीचे हो सकता था; जिस परिवार को मजदूरी के लिए बड़े भू-स्वामी पर निर्भर रहना पड़ता था, वही अस्पृश्यता, सामाजिक दूरी और अपमानजनक व्यवहार का भी सामना कर सकता था।
इसीलिए पूर्वी तंजावुर का संघर्ष केवल “मजदूरी बढ़ाओ” या “जमीन दो” तक सीमित नहीं रहा। उसका वास्तविक अर्थ था—
काम का उचित मूल्य, बंधुआपन से मुक्ति, भूमि और घर पर सुरक्षा, जातिगत अपमान से छुटकारा, संगठन बनाने का अधिकार और मनुष्य के रूप में बराबरी।
1930 के दशक के अंतिम वर्षों से किसान सभा और आगे कृषि मजदूर संगठनों ने इन्हीं प्रश्नों को एक-दूसरे से जोड़ा। उपलब्ध ऐतिहासिक अध्ययनों के अनुसार पूर्वी तंजावुर में कम्युनिस्ट आंदोलन वहां विशेष रूप से मजबूत हुआ जहां भूमिहीन या लगभग भूमिहीन खेतिहर मजदूरों की संख्या अधिक थी और जाति तथा वर्ग का संयोग अपेक्षाकृत स्पष्ट था।
दलित खेतिहर मजदूरों की सामाजिक स्थिति
पुराने तंजावुर जिले के पूर्वी भाग में बड़ी संख्या में दलित परिवारों के पास खेती योग्य भूमि नहीं थी। वे खेतिहर मजदूरी और पन्नैयाल श्रम पर निर्भर थे।
उनकी स्थिति केवल आर्थिक निर्धनता की नहीं थी।
कई गांवों में सामाजिक व्यवस्था उन्हें अलग बस्तियों में रहने, सार्वजनिक जीवन में नीचे स्थान स्वीकार करने और प्रभुत्वशाली जातियों के सामने अधीन व्यवहार करने के लिए बाध्य करती थी।
यानी खेत में उनका श्रम आवश्यक था, लेकिन गांव की सामाजिक प्रतिष्ठा में उनका स्थान सबसे नीचे रखा जाता था।
यही तंजावुर के कृषि समाज का सबसे बड़ा विरोधाभास था—
धान उत्पादन का आधार जिनके श्रम पर था, भूमि और सामाजिक सत्ता पर उनका अधिकार सबसे कम था।
पन्नैयाल और जाति
पन्नैयाल व्यवस्था का जातिगत स्वरूप विशेष रूप से महत्वपूर्ण था।
पूर्वी तंजावुर के कई क्षेत्रों में स्थायी खेत सेवकों का बड़ा हिस्सा दलित समुदायों से आता था। Review of Agrarian Studies में प्रकाशित आंदोलन के इतिहास में ऐसे गांवों का विवरण मिलता है जहां स्थायी farm servants केवल दलित थे, जबकि अन्य जातियों के भूमिहीन मजदूर भी खेत, पशुपालन और परिवहन जैसे कार्य करते थे।
इससे स्पष्ट होता है कि कृषि श्रम की अलग-अलग श्रेणियां भी जातिगत पदानुक्रम से प्रभावित थीं।
सबसे आश्रित श्रम संबंध अक्सर उन्हीं समुदायों पर केंद्रित थे जिनकी सामाजिक स्थिति पहले से सबसे कमजोर थी।
आर्थिक निर्भरता और सामाजिक नियंत्रण
दलित खेतिहर मजदूर की निर्भरता कई स्तरों पर हो सकती थी।
इसका अर्थ था कि भू-स्वामी केवल रोजगारदाता नहीं था।
उसका प्रभाव मजदूर के जीवन के अनेक हिस्सों पर हो सकता था।
यदि मजदूर मजदूरी बढ़ाने की मांग करे तो काम बंद हो सकता था।
यदि संगठन में शामिल हो तो उसे घर की जगह से हटाने का खतरा हो सकता था।
यदि सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती दे तो पूरे परिवार पर दबाव पड़ सकता था।
इसलिए आर्थिक निर्भरता जातिगत नियंत्रण को मजबूत करती थी।
श्रम की अमानवीय परिस्थितियां
बी. श्रीनिवास राव से संबंधित किसान आंदोलन के विवरणों में पूर्वी तंजावुर के खेत सेवकों की अत्यंत कठिन परिस्थितियों का वर्णन मिलता है।
एक गांव के संदर्भ में दर्ज है कि खेत सेवकों को सुबह लगभग चार बजे जगाया जाता था और वे सूर्यास्त तक काम करते थे। उन्हें अत्यल्प मात्रा में धान मिलता था और कार्यस्थल पर साधारण भोजन दिया जाता था। अनुपस्थित रहने पर मारपीट और अपमानजनक दंड तक की शिकायतें दर्ज थीं।
इन विवरणों को हर गांव पर समान रूप से लागू नहीं करना चाहिए, लेकिन वे उस आश्रित श्रम संरचना की प्रकृति बताते हैं जिसके विरुद्ध आंदोलन उभरा।
यह केवल कम मजदूरी का प्रश्न नहीं था।
यह श्रमिक के शरीर पर मालिक के अनुशासन के अधिकार का प्रश्न था।
अस्पृश्यता और आर्थिक शोषण का संबंध
अस्पृश्यता को यदि केवल धार्मिक या सांस्कृतिक प्रथा के रूप में देखा जाए तो तंजावुर का वास्तविक इतिहास अधूरा रह जाएगा।
जातिगत अधीनता भू-स्वामी की आर्थिक शक्ति को मजबूत कर सकती थी।
यदि मजदूर को बचपन से यह सिखाया गया हो कि वह सामाजिक रूप से निम्न है, तो उसके लिए मालिक से बराबरी की भाषा में मजदूरी मांगना भी कठिन हो सकता था।
इसलिए किसान आंदोलन ने केवल आर्थिक मांग नहीं उठाई।
मजदूर मालिक का अधीन जातिगत सेवक नहीं है; वह अधिकारों वाला श्रमिक है।
यह विचार सामाजिक व्यवस्था के लिए गहरी चुनौती था।
किसान सभा ने जाति प्रश्न को क्यों उठाया?
कम्युनिस्ट किसान आंदोलन का मूल जोर वर्ग संबंधों पर था, लेकिन पूर्वी तंजावुर की परिस्थितियों ने स्पष्ट किया कि वर्ग संघर्ष को जातिगत उत्पीड़न से अलग नहीं रखा जा सकता।
को भी संगठन के कार्यक्रम का हिस्सा बनाया।
यह महत्वपूर्ण था क्योंकि दलित मजदूर को संगठन में तभी वास्तविक बराबरी मिल सकती थी जब संगठन स्वयं जातिगत भेदभाव को चुनौती दे।
मणलूर मणियम्मै और सामाजिक विद्रोह
1938–39 में मणलूर मणियम्मै ने तंजावुर में दलित खेत सेवकों को संगठित करने के प्रयास किए।
एक ब्राह्मण विधवा का दलित कृषि मजदूरों के बीच जाकर बैठक करना और उन्हें भू-स्वामी सत्ता के विरुद्ध संगठित होने को कहना उस समय की सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध खुला विद्रोह था। किसान आंदोलन के इतिहास में उल्लेख मिलता है कि उन्होंने उन्हें किसान समितियों में शामिल होने और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने को कहा।
इस घटना का प्रतीकात्मक अर्थ बहुत बड़ा था।
राजनीतिक संगठन में जाति की ऊंच-नीच स्वीकार नहीं होगी।
साथ बैठना और साथ खाना भी राजनीति थी
पूर्वी तंजावुर के जातिगत वातावरण में किसान नेता का दलित मजदूर के घर जाना, उसके साथ बैठना और भोजन करना साधारण व्यवहार नहीं था।
यह गांव की स्थापित सामाजिक सीमाओं का उल्लंघन था।
बी. श्रीनिवास राव की कार्यशैली में दलित मजदूर परिवारों के बीच रहना और उनके साथ निकट सामाजिक संपर्क बनाना महत्वपूर्ण माना गया है।
दूसरा—संगठन ने व्यवहार में दिखाया कि उसकी बराबरी की भाषा केवल भाषण नहीं है।
“डर” जातिगत सत्ता का महत्वपूर्ण साधन था
भू-स्वामी व्यवस्था केवल धन पर नहीं टिकती थी।
दलित परिवार सामाजिक प्रतिशोध से डरता था।
किसान सभा का पहला राजनीतिक कार्य इसलिए कई स्थानों पर मजदूरी की मात्रा तय करने से पहले भय तोड़ना था।
यदि एक मजदूर को पीटा जाए और पूरा गांव उसके समर्थन में खड़ा हो जाए तो मालिक और मजदूर के बीच शक्ति-संतुलन बदलने लगता है।
यहीं संगठन जातिगत अधीनता को राजनीतिक प्रतिरोध में बदलता है।
सामूहिकता ने सामाजिक मनोविज्ञान बदला
लेकिन यदि बीस, पचास या सौ मजदूर एक साथ कहें कि—
और किसी परिवार को जबरन नहीं हटने देंगे—
तो वही मजदूर एक नई सामाजिक शक्ति बन जाता है।
यहीं पूर्वी तंजावुर के आंदोलन का मनोवैज्ञानिक परिवर्तन था।
“मैं कृषि मजदूर हूं और संगठन का सदस्य हूं।”
यह बदलाव आर्थिक संघर्ष जितना ही महत्वपूर्ण था।
भूमि-वंचना जातिगत असमानता का आधार
दलित खेतिहर मजदूर की सबसे बड़ी संरचनात्मक कमजोरी थी—
यदि जमीन नहीं है तो जीविका के लिए मजदूरी करनी ही होगी।
यदि मजदूरी के विकल्प सीमित हैं तो गांव के बड़े भू-स्वामी पर निर्भरता बनी रहेगी।
इसलिए जातिगत मुक्ति और भूमि प्रश्न आपस में जुड़े।
केवल छुआछूत विरोधी कानून बन जाने से मजदूर पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हो सकता था यदि उसकी आजीविका उसी व्यक्ति पर निर्भर हो जो गांव की सामाजिक सत्ता नियंत्रित करता है।
यही कारण है कि किसान आंदोलन धीरे-धीरे मजदूरी से भूमि सुधार तक पहुंचा।
घर की भूमि भी दूसरे की
कई कृषि मजदूर परिवार भू-स्वामी द्वारा दी गई छोटी जमीन पर झोपड़ी बनाकर रहते थे। आंदोलन संबंधी अध्ययनों में दलित और अन्य भूमिहीन कृषि श्रमिकों को भू-स्वामियों द्वारा छोटे आवासीय भूखंड दिए जाने का उल्लेख मिलता है।
यह व्यवस्था ऊपर से सुविधा लग सकती थी, लेकिन इसका राजनीतिक अर्थ गहरा था।
मजदूर अगर मालिक से टकराए तो प्रश्न केवल रोजगार का नहीं—
इसीलिए आगे कुडियिरुप्पु अर्थात आवासीय भूमि के स्वामित्व की मांग खेतिहर मजदूर मुक्ति का अनिवार्य हिस्सा बनी।
मजदूरी संघर्ष और जातिगत प्रतिष्ठा
मजदूरी बढ़ाने की मांग आर्थिक लग सकती है, लेकिन पूर्वी तंजावुर में इसका सामाजिक अर्थ भी था।
सदियों से अधीन समझे गए मजदूर का यह कहना—
“मेरे श्रम की कीमत मैं भी तय करूंगा”
इसीलिए मजदूरी आंदोलन को भू-स्वामी कभी-कभी मात्र आर्थिक मांग के रूप में नहीं देखते थे।
जिन लोगों से वे आज्ञाकारिता की अपेक्षा करते थे, वे अब सामूहिक सौदेबाजी कर रहे थे।
इससे वर्ग संघर्ष में जातिगत प्रतिष्ठा का तत्व जुड़ गया।
किसान सभा के भीतर दलितों की भूमिका
पूर्वी तंजावुर आंदोलन को केवल उच्च या मध्यवर्गीय कम्युनिस्ट नेताओं द्वारा दलितों के लिए चलाया गया आंदोलन समझना गलत होगा।
संगठन के फैलने के साथ स्वयं खेतिहर मजदूर—
Review of Agrarian Studies में प्रकाशित किसान आंदोलन के संस्मरण स्पष्ट करते हैं कि दलित पन्नैयाल इस आंदोलन की एक स्वतंत्र और निर्णायक सामाजिक शक्ति थे। जी. वीरैयन के अनुसार आंदोलन की विशिष्टता यही थी कि दलित बंधुआ खेत सेवकों और मुख्यतः पिछड़ी जातियों के छोटे काश्तकारों को एक साझा मंच पर लाया गया।
यह प्रतिनिधित्व के प्रश्न में महत्वपूर्ण परिवर्तन था।
दलित मजदूर अब केवल “पीड़ित” नहीं रहा।
काश्तकार और दलित मजदूर का गठबंधन
पूर्वी तंजावुर में किसान आंदोलन की प्रारंभिक शक्ति दो वर्गों के गठबंधन से बनी—
तथा मुख्यतः पिछड़ी जातियों के छोटे काश्तकार।
दोनों बड़े भू-स्वामी से संघर्ष कर रहे थे।
लेकिन दोनों की मांगें एक जैसी नहीं थीं।
इन दोनों को साथ रखना किसान सभा की बड़ी राजनीतिक उपलब्धि थी।
लेकिन वर्गीय गठबंधन की अपनी सीमा थी
यह गठबंधन हमेशा स्थायी नहीं रह सकता था।
यदि छोटा काश्तकार स्वयं खेतिहर मजदूर नियुक्त करता है तो मजदूरी बढ़ने से उसकी लागत बढ़ती है।
अर्थात जो व्यक्ति भू-स्वामी के सामने शोषित काश्तकार है, वह मजदूर के सामने नियोक्ता भी हो सकता है।
यही कारण है कि 1952 के पन्नैयाल संरक्षण कानून के बाद वर्गीय अंतर अधिक स्पष्ट होने लगा।
आंदोलन के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार मजदूरी वृद्धि और नियमित रोजगार जैसे प्रश्नों पर काश्तकार तथा खेतिहर मजदूरों की एकता तनाव में आने लगी। इसी पृष्ठभूमि में 1956 में अलग कृषि मजदूर संगठन बनाने का निर्णय हुआ।
1956 : स्वतंत्र कृषि मजदूर संगठन
तिरुवारूर में 1956 के कृषि मजदूर सम्मेलन से अलग तमिलनाडु कृषि मजदूर संघ बनाने की दिशा स्पष्ट हुई।
इस संगठनात्मक विभाजन का अर्थ किसान आंदोलन की कमजोरी मात्र नहीं था।
यह ग्रामीण वर्ग संरचना की वास्तविकता की स्वीकृति भी था।
भूमिधारी किसान और भूमिहीन मजदूर दोनों “कृषि समाज” के हिस्से हैं, लेकिन उनके आर्थिक हित समान नहीं हैं।
इससे दलित खेतिहर मजदूर की स्वतंत्र राजनीतिक आवाज और स्पष्ट हुई।
1956–60 : स्थानीय रोजगार की लड़ाई
पन्नैयाल संबंध कमजोर होने के बाद भू-स्वामियों ने नई रणनीति अपनाई।
स्थानीय संगठित मजदूर अधिक मजदूरी मांगते थे, इसलिए बाहर के गांवों से मजदूर लाए जाने लगे।
इसके जवाब में कृषि मजदूर आंदोलन ने तीन प्रमुख मांगें उठाईं—
स्थानीय मजदूर को काम, जिले भर में समान मजदूरी, और मजदूरी में वृद्धि।
यह संघर्ष दिखाता है कि कानूनी स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं थी।
मजदूर के लिए वास्तविक स्वतंत्रता तभी संभव थी जब उसके पास रोजी का साधन भी हो।
दलित चेतना केवल मजदूरी से नहीं बनी
पूर्वी तंजावुर में दलित राजनीतिक चेतना का विकास कई अनुभवों से हुआ।
वह मालिक के खिलाफ शिकायत कर सकता है।
वह दूसरे गांव के मजदूर के समर्थन में खड़ा हो सकता है।
और वह जातिगत अपमान को नियति मानने के लिए बाध्य नहीं है।
यही प्रक्रियाएं मिलकर वर्ग चेतना के साथ दलित आत्मसम्मान को मजबूत करती हैं।
संविधान और गांव की वास्तविकता
1950 में संविधान लागू होने के बाद अस्पृश्यता को अनुच्छेद 17 के तहत समाप्त घोषित किया गया।
लेकिन कानून और गांव की वास्तविकता के बीच दूरी थी।
ग्रामीण सामाजिक संरचना कई स्थानों पर अभी भी कहती थी—
यहीं किसान और दलित आंदोलन को नया नैतिक आधार मिला।
अब वह केवल परंपरा के खिलाफ नहीं बल्कि संवैधानिक समानता के पक्ष में भी संघर्ष कर सकता था।
राजनीतिक स्वतंत्रता से सामाजिक नागरिकता तक
पूर्वी तंजावुर के दलित मजदूर के लिए स्वतंत्रता का अर्थ केवल ब्रिटिश शासन की समाप्ति नहीं था।
उसकी वास्तविक स्वतंत्रता का पैमाना था—
क्या उसकी मजदूरी तय करने में उसकी आवाज है?
क्या उसे सार्वजनिक सम्मान मिलता है?
क्या पुलिस और प्रशासन उसकी शिकायत सुनते हैं?
इसलिए तंजावुर का आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता की अवधारणा को गांव के सामाजिक जीवन तक ले गया।
उसने राजनीतिक स्वतंत्रता को सामाजिक नागरिकता में बदलने की मांग की।
महिलाओं की दोहरी–तिहरी अधीनता
दलित महिला खेतिहर मजदूर की स्थिति और जटिल थी।
और पितृसत्तात्मक समाज में महिला थी।
धान रोपाई, निराई और कटाई में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
लेकिन मजदूरी कम हो सकती थी और सामाजिक असुरक्षा अधिक।
इसलिए किसान और कृषि मजदूर आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी का अर्थ केवल आर्थिक आंदोलन में शामिल होना नहीं था।
वह ग्रामीण सार्वजनिक जीवन में महिला उपस्थिति और नेतृत्व का विस्तार भी था।
महिलाएं आंदोलन की दर्शक नहीं थीं
पूर्वी तंजावुर की कृषि राजनीति में महिलाओं को केवल पुरुष मजदूरों की पत्नी या परिवार के रूप में देखना गलत होगा।
मजदूरी संघर्ष सीधे उनके श्रम से जुड़ा था।
यदि धान में मजदूरी बढ़ती थी तो परिवार की खाद्य सुरक्षा सुधरती थी।
यदि आवासीय जमीन मिलती थी तो महिला और बच्चों की सुरक्षा बढ़ती थी।
यदि भू-स्वामी की सामाजिक सत्ता कमजोर होती थी तो परिवार की स्वतंत्रता बढ़ती थी।
इसलिए महिलाओं ने आंदोलन में सक्रिय भाग लिया।
आगे कीझवेनमणि में मारे गए 44 लोगों में बड़ी संख्या महिलाओं और बच्चों की होना भी दिखाता है कि यह संघर्ष पूरे खेतिहर परिवार का संघर्ष बन चुका था।
सामाजिक सम्मान—आंदोलन की अनलिखी मांग
किसान आंदोलन के घोषणापत्रों में मजदूरी और भूमि जैसी मांगें स्पष्ट दिखाई देती हैं।
लेकिन उसके भीतर एक और मांग लगातार मौजूद थी—
दलित मजदूर केवल अधिक धान नहीं मांग रहा था।
मेरे घर और परिवार पर मनमाना अधिकार मत जताओ।
इसीलिए तंजावुर संघर्ष को केवल आर्थिक वर्ग संघर्ष मानना अधूरा होगा।
1960 के दशक में कृषि परिवर्तन
1960 के दशक में कावेरी डेल्टा की कृषि तकनीक और उत्पादन संबंध बदलने लगे।
ने उत्पादन बढ़ाने की संभावनाएं पैदा कीं।
लेकिन अधिक उत्पादन का अर्थ मजदूर के हिस्से में स्वतः वृद्धि नहीं था।
अगर प्रति एकड़ उत्पादन और बाजार मूल्य बढ़ रहा है, तो कृषि मजदूर की मजदूरी क्यों नहीं बढ़े?
इसने वर्गीय संघर्ष को और तीखा किया।
हरित क्रांति और सामाजिक सत्ता
हरित क्रांति को केवल तकनीकी परिवर्तन मानना उचित नहीं होगा।
नई कृषि तकनीक से जिसे लाभ हुआ, उसकी आर्थिक शक्ति बढ़ सकती थी।
दूसरी ओर खेतिहर मजदूर अधिक मजदूरी मांगने लगा।
इससे उत्पादन बढ़ने के साथ वितरण पर संघर्ष भी बढ़ा।
कई विद्वानों ने तमिलनाडु सहित दक्षिण भारतीय ग्रामीण हिंसा का विश्लेषण करते समय यही चेतावनी दी है कि तकनीकी परिवर्तन को पुराने जाति–भूमि संबंधों से अलग नहीं देखा जा सकता।
1967 : सत्ता परिवर्तन और मजदूरों की उम्मीद
1967 में तमिलनाडु में द्रमुक सत्ता में आई और सी. एन. अन्नादुरै मुख्यमंत्री बने।
किसान और कृषि मजदूर संगठनों को आशा थी कि नई सरकार ग्रामीण गरीबों के प्रति अधिक सहानुभूतिपूर्ण होगी।
जी. वीरैयन के संस्मरण के अनुसार किसान सभा लंबे समय से भू-स्वामियों, सरकार और किसान संगठन की त्रिपक्षीय बैठक की मांग कर रही थी। सरकार द्वारा बैठक में देरी के बीच 5 अक्टूबर 1967 को पून्थाझमकुडी में पुलिस गोलीबारी में कार्यकर्ता पक्किरी की मृत्यु हुई; इसके बाद 8 अक्टूबर को त्रिपक्षीय बैठक बुलाई गई।
यह घटना बताती है कि सरकार बदलने से वर्ग संघर्ष समाप्त नहीं हुआ।
त्रिपक्षीय समझौते और उनका विरोध
सरकार, भू-स्वामी और किसान संगठन के बीच मजदूरी समझौते कराने की कोशिश हुई।
जी. वीरैयन के अनुसार तंजावुर के मिरासदारों ने घोषित मजदूरी संरचना का विरोध किया और किसान सभा ने इसके क्रियान्वयन के लिए संघर्ष तेज किया।
यहीं मजदूरी प्रश्न राजनीतिक शक्ति परीक्षण बन गया।
टकराव अब सीधे राज्य की वैधता तक पहुंच रहा था।
दलित मजदूर का संगठन भू-स्वामी के लिए इतना खतरनाक क्यों था?
राजनीतिक दलों को हस्तक्षेप के लिए मजबूर कर सकता था।
लेकिन दलित मजदूर का संगठन एक और स्तर पर चुनौती था।
वह गांव में परंपरागत सामाजिक पदानुक्रम को भी बदल रहा था।
श्रम की कीमत पर भी और सामाजिक सत्ता पर भी।
वर्गीय संघर्ष कब जातिगत हिंसा बनता है?
पूर्वी तंजावुर का अनुभव दिखाता है कि वर्ग और जाति को कृत्रिम रूप से अलग करना कठिन है।
मजदूरी विवाद आर्थिक प्रश्न हो सकता है।
लेकिन यदि मजदूर मुख्यतः दलित हैं और भू-स्वामी किसी प्रभुत्वशाली जाति से आते हैं, तो आर्थिक संघर्ष जातिगत शक्ति संतुलन को भी चुनौती देता है।
ऐसी परिस्थिति में प्रतिशोध केवल हड़ताल तोड़ने तक सीमित नहीं रह सकता।
वह दलित समुदाय को सामूहिक रूप से “सबक सिखाने” के प्रयास में बदल सकता है।
यही प्रक्रिया आगे कीझवेनमणि में अपनी भयावहतम परिणति तक पहुंची।
1968 : संघर्ष का निर्णायक वर्ष
1968 में पूर्वी तंजावुर में मजदूरी वृद्धि को लेकर तनाव लगातार बढ़ रहा था।
किसान सभा और कृषि मजदूर संगठन अधिक मजदूरी लागू कराने के लिए आंदोलन कर रहे थे।
आंदोलन के इतिहास के अनुसार भू-स्वामी समर्थित हथियारबंद समूहों और मजदूरों के बीच संघर्ष बढ़ता गया।
यह सामान्य औद्योगिक मजदूरी विवाद नहीं था।
खेतिहर मजदूर अपने गांव में रहते थे।
भू-स्वामी भी उसी सामाजिक क्षेत्र में प्रभाव रखता था।
इसलिए हड़ताल समाप्त होने के बाद भी संघर्ष समाप्त नहीं होता था।
कीझवेनमणि नरसंहार, 25 दिसंबर 1968
मजदूरी विवाद की पृष्ठभूमि, घटनाक्रम, 44 दलितों की हत्या, भू-स्वामी प्रतिरोध, पुलिस–सरकार की भूमिका, मुकदमे और भारतीय किसान–दलित इतिहास पर प्रभाव
25 दिसंबर 1968 की रात तमिलनाडु के तत्कालीन तंजावुर जिले के एक छोटे से गांव कीझवेनमणि में 44 दलित खेतिहर मजदूर और उनके परिवारजन आग में जला दिए गए। मृतकों में बड़ी संख्या महिलाओं और बच्चों की थी। घटना की तात्कालिक पृष्ठभूमि कृषि मजदूरों की अधिक मजदूरी की मांग और उसके विरुद्ध बड़े भू-स्वामियों का प्रतिरोध था। लेकिन इसे केवल कुछ अतिरिक्त माप धान के लिए हुआ विवाद कहना इतिहास को बहुत छोटा कर देना होगा।
कीझवेनमणि उस लंबे संघर्ष का हिंसक विस्फोट था जिसमें एक तरफ सदियों से भूमि, श्रम और स्थानीय सामाजिक सत्ता पर प्रभाव रखने वाले भू-स्वामी थे और दूसरी तरफ भूमिहीन दलित खेतिहर मजदूर, जिन्होंने किसान और कृषि मजदूर संगठनों के माध्यम से अपने श्रम की कीमत और सामाजिक बराबरी मांगना शुरू कर दिया था।
इसीलिए कीझवेनमणि को समझने के लिए तीन प्रश्न एक साथ देखने होंगे—
मजदूरी का वर्ग संघर्ष, दलितों पर जातिगत वर्चस्व, और ग्रामीण सत्ता पर राजनीतिक नियंत्रण।
आधुनिक शोध भी इस घटना को केवल वर्ग संघर्ष अथवा केवल जातिगत हिंसा की श्रेणी में बंद करने से सावधान करता है। राजनीति, जाति और वर्ग यहां इतनी गहराई से जुड़े थे कि उन्हें अलग करना कठिन है।
कीझवेनमणि कहां था?
कीझवेनमणि तत्कालीन तंजावुर जिले के नागपट्टिनम क्षेत्र में स्थित एक छोटा ग्रामीण इलाका था। आज यह क्षेत्र तमिलनाडु के नागपट्टिनम जिले में आता है।
और बड़ी भूमिहीन कृषि मजदूर आबादी वाला क्षेत्र।
तंजावुर तमिलनाडु का “धान का कटोरा” माना जाता था, लेकिन इसी समृद्ध कृषि क्षेत्र में भूमिहीनता बहुत अधिक थी।
एक महत्वपूर्ण समकालीन अध्ययन के अनुसार 1960 के दशक में तंजावुर राज्य के धान उत्पादन का लगभग एक-तिहाई पैदा करता था, जबकि जिले के लगभग 41 प्रतिशत ग्रामीण कृषि श्रमिक भूमिहीन थे। खेती करने वाले परिवारों के शीर्ष छोटे हिस्से के पास भूमि का अनुपातहीन बड़ा हिस्सा था।
यही सामाजिक संरचना संघर्ष की मूल जमीन थी।
जिनके श्रम से धान पैदा होता था, जमीन उनकी नहीं थी
कीझवेनमणि के दलित खेतिहर मजदूर भूमि के मालिक नहीं थे।
उनका अस्तित्व कृषि उत्पादन के लिए अनिवार्य था।
लेकिन उनका अपना आर्थिक आधार अत्यंत कमजोर था।
उत्पादन उनके श्रम से, भूमि का नियंत्रण किसी और के पास।
यही वर्गीय अंतर्विरोध किसान आंदोलन का आधार बना।
लेकिन विवाद केवल वर्ग का नहीं था
इन खेतिहर मजदूरों की बड़ी संख्या दलित समुदायों से थी।
जो लोग आर्थिक संरचना के सबसे निचले हिस्से में थे, वही सामाजिक पदानुक्रम में भी नीचे रखे गए थे।
इसका अर्थ था कि भू-स्वामी और मजदूर के बीच संबंध केवल मालिक–श्रमिक का नहीं था।
उसके पीछे जातिगत प्रतिष्ठा और सामाजिक अधीनता का इतिहास भी था।
यही कारण है कि मजदूरी मांगने वाला दलित मजदूर केवल अधिक पैसा या धान नहीं मांग रहा था।
मैं तुम्हारे सामने अधीन व्यक्ति नहीं, बराबरी का श्रमिक हूं।
1960 के दशक में पुरानी व्यवस्था क्यों हिलने लगी?
1950 और 1960 के दशकों में तंजावुर का ग्रामीण समाज तेजी से बदल रहा था।
कम्युनिस्ट आंदोलन गांवों में स्थापित हो चुका था।
दलित मजदूर पहले की तुलना में अधिक संगठित थे।
और कृषि उत्पादन में तकनीकी बदलाव भी शुरू हो चुके थे।
इन परिवर्तनों के कारण भू-स्वामियों की पुरानी सत्ता चुनौती में पड़ रही थी।
पहले मजदूर व्यक्तिगत रूप से मालिक के सामने जाता था।
अब पूरी यूनियन उसके सामने खड़ी हो सकती थी।
कृषि मजदूर यूनियनों का विस्तार
1967–68 तक तंजावुर के अनेक हिस्सों में कृषि मजदूर यूनियनें सक्रिय हो चुकी थीं।
किसान सभा और विशेष रूप से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से संबद्ध कृषि मजदूर संगठनों का पूर्वी डेल्टा में प्रभाव था।
मजदूर अपने गांवों में लाल झंडे लगाते,
मजदूरी सामूहिक रूप से तय करने का प्रयास करते
और कटाई के समय संगठित कार्रवाई करते।
भू-स्वामियों के लिए यह परिवर्तन आर्थिक और राजनीतिक दोनों था।
मजदूरी विवाद की असली प्रकृति
कीझवेनमणि संघर्ष के केंद्र में मजदूरी बढ़ाने की मांग थी।
धान की कटाई और कृषि कार्य के बदले मजदूरों को अनाज में भुगतान मिलता था। कृषि उत्पादन और कीमतों में बदलाव के बीच मजदूर अधिक हिस्सा चाहते थे।
अलग-अलग स्रोत मजदूरी वृद्धि की मात्रा को अलग ढंग से व्यक्त करते हैं, इसलिए किसी एक संख्या को बिना संदर्भ सार्वभौमिक मानना उचित नहीं होगा।
महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि मजदूरों ने मौजूदा भुगतान से अधिक मजदूरी की सामूहिक मांग उठाई और यह मांग पूरे इलाके में संगठित कृषि मजदूर आंदोलन का हिस्सा थी।
अर्थात झगड़ा किसी एक मजदूर की तनख्वाह का नहीं था।
मजदूरी कौन तय करेगा—भू-स्वामी या संगठित श्रमिक?
भू-स्वामियों का संगठित जवाब
मजदूरों के संगठन के जवाब में बड़े भू-स्वामियों ने भी अपने हितों की रक्षा के लिए संगठन बनाया।
1966 के आसपास Paddy Producers Association—धान उत्पादक संघ सक्रिय हुआ। इसके प्रमुख चेहरों में बड़े भू-स्वामी गोपालकृष्ण नायडू का नाम सामने आता है।
इस संगठन का उद्देश्य केवल कृषि उत्पादन का समन्वय नहीं था।
मजदूरी संघर्ष के संदर्भ में यह संगठित मजदूर आंदोलन के सामने भू-स्वामी पक्ष की सामूहिक शक्ति बन गया।
जब स्थानीय मजदूर अधिक मजदूरी मांगते, तो भू-स्वामी बाहर से मजदूर लाकर काम कराने की कोशिश कर सकते थे।
बाहरी मजदूर—हड़ताल तोड़ने का हथियार
स्थानीय मजदूरों का कहना था कि बाहर के मजदूरों का इस्तेमाल उनकी सामूहिक सौदेबाजी और हड़ताल को तोड़ने के लिए किया जा रहा है।
इसलिए वे बाहर से लाए मजदूरों को खेतों में काम करने से रोकने की कोशिश करते।
यदि भू-स्वामी आसानी से दूसरे मजदूर ला सके तो स्थानीय यूनियन की पूरी शक्ति समाप्त हो सकती थी।
संघर्ष के पीछे राजनीतिक ध्रुवीकरण
1960 के दशक तक यह संघर्ष राजनीतिक दलों से भी जुड़ चुका था।
कृषि मजदूरों के बड़े हिस्से पर वामपंथी संगठनों का प्रभाव था।
दूसरी ओर भू-स्वामियों का अपना स्थानीय राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव था।
इसलिए खेत का मजदूरी विवाद चुनावी और दलगत राजनीति से अलग नहीं रहा।
1967 में तमिलनाडु में कांग्रेस की लंबी सत्ता समाप्त हुई और द्रमुक सरकार बनी।
नई सरकार से ग्रामीण गरीबों को बड़ी उम्मीदें थीं।
लेकिन स्थानीय सत्ता-संबंध रातों-रात नहीं बदले।
अन्नादुरै सरकार और बढ़ता तनाव
1967 में सी. एन. अन्नादुरै मुख्यमंत्री बने।
कृषि मजदूरों को उम्मीद थी कि सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाली नई सरकार उनकी मांगों के प्रति अधिक संवेदनशील होगी।
लेकिन पूर्वी तंजावुर में मजदूरी संघर्ष जारी रहा।
भू-स्वामियों और मजदूरों के बीच समझौता कराने के लिए प्रशासनिक स्तर पर हस्तक्षेप हुआ।
लेकिन मजदूरी समझौतों का वास्तविक क्रियान्वयन कठिन रहा।
समझौते हुए, संघर्ष नहीं रुका
सरकार की मध्यस्थता से मजदूरी को लेकर समझौते हुए, लेकिन मजदूर संगठनों का आरोप था कि कई बड़े भू-स्वामी उन्हें लागू नहीं कर रहे थे।
अब मजदूर केवल अपनी निजी मांग नहीं रख रहा था।
जिस समझौते को प्रशासन ने स्वीकार किया, उसे लागू करो।
इसलिए भू-स्वामी का इनकार राज्य की मध्यस्थता को भी चुनौती देता था।
1968 में टकराव और तीखा हुआ
1968 के दौरान पूर्वी तंजावुर में कृषि मजदूरों और भू-स्वामियों के बीच तनाव लगातार बढ़ा।
भू-स्वामियों ने बाहरी मजदूरों का इस्तेमाल किया।
दोनों पक्षों के बीच हिंसक झड़पें भी हुईं।
कीझवेनमणि हत्याकांड से पहले के सप्ताहों में भी हिंसा हुई और कृषि मजदूर संगठन से जुड़े लोगों की हत्या की घटनाएं दर्ज की गईं।
इसलिए 25 दिसंबर की घटना शून्य से उत्पन्न नहीं हुई।
उससे पहले हिंसा का चक्र शुरू हो चुका था।
नवंबर 1968 की चेतावनियां
घटना के पुनर्निर्माण पर किए गए अकादमिक शोध में स्थानीय मजदूरों की स्मृतियों के आधार पर दावा किया गया है कि नवंबर 1968 की एक भू-स्वामी बैठक में कीझवेनमणि के मजदूरों को गंभीर परिणाम भुगतने और गांव जलाए जाने जैसी धमकी दी गई थी।
इसी शोध में यह भी दर्ज है कि कृषि मजदूर संगठन के तंजावुर जिला नेतृत्व ने मुख्यमंत्री अन्नादुरै को पत्र लिखकर सुरक्षा मांगी थी। लेखक के अनुसार पत्र की प्राप्ति की सरकारी पुष्टि नरसंहार के बाद पहुंची।
इन बातों को आंदोलन और शोध में दर्ज चेतावनियों के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उचित है; इन्हें बिना शर्त आधिकारिक रूप से सिद्ध सरकारी निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।
25 दिसंबर 1968—क्रिसमस की रात
25 दिसंबर 1968 की शाम कीझवेनमणि में तनाव चरम पर पहुंच गया।
उस दिन भी स्थानीय और बाहरी मजदूरों तथा दोनों पक्षों से जुड़े लोगों के बीच विवाद हुआ।
ऐतिहासिक पुनर्निर्माणों के अनुसार एक स्थानीय चाय-दुकान संचालक को भू-स्वामी पक्ष से जुड़े लोगों द्वारा पकड़कर ले जाने की घटना हुई। मजदूरों ने उसका विरोध किया और उसे मुक्त कराया।
इसी दौरान संघर्ष में भू-स्वामी पक्ष से जुड़े एक व्यक्ति की मृत्यु हुई।
इसके बाद घटनाएं बहुत तेजी से भयावह हिंसा में बदल गईं।
रात का हमला
प्रत्यक्षदर्शी और बाद के ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि रात लगभग 10 बजे हथियारबंद लोगों ने दलित मजदूरों की बस्ती को घेर लिया।
मजदूरों और उनके परिवारों ने भागकर जान बचाने की कोशिश की।
लेकिन महिलाओं, बच्चों और वृद्धों का एक समूह एक छोटी झोपड़ी में शरण लेने पहुंचा।
यही झोपड़ी कुछ ही समय में सामूहिक मृत्यु का स्थान बन गई।
44 लोग आग में मारे गए
उस छोटी झोपड़ी में शरण लेने वाले 44 दलित लोग आग में मारे गए।
मृतकों में महिलाओं और बच्चों की संख्या अत्यधिक थी।
विभिन्न स्रोत आयु और लैंगिक विभाजन में थोड़ा अंतर देते हैं, लेकिन यह निर्विवाद है कि मृतकों का अधिकांश हिस्सा ऐसे लोग थे जो प्रत्यक्ष सशस्त्र संघर्ष में शामिल नहीं थे—विशेषकर महिलाएं और बच्चे। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान इंदौर की स्मृति परियोजना भी 44 दलित मृतकों और महिलाओं–बच्चों की अत्यधिक संख्या दर्ज करती है।
इस तथ्य ने घटना को सामान्य ग्रामीण संघर्ष से अलग कर दिया।
महिलाएं और बच्चे ही इतनी बड़ी संख्या में क्यों मारे गए?
इस प्रश्न का उत्तर घटना की प्रकृति बताता है।
सशस्त्र हमला शुरू होने पर अपेक्षाकृत सक्षम पुरुष भाग सकते थे या प्रतिरोध करने की कोशिश कर सकते थे।
और दूसरे असुरक्षित लोग सुरक्षा के लिए एक जगह इकट्ठे हुए।
उन्हें लगा कि झोपड़ी बचने का स्थान होगी।
इसलिए कीझवेनमणि में मारे गए लोग केवल “हड़ताली मजदूर” नहीं थे।
उनमें खेतिहर मजदूरों के परिवार शामिल थे।
यानी हिंसा ने पूरे समुदाय को निशाना बनाया।
हमला किसने किया?
इस प्रश्न पर भाषा बहुत सावधानी की मांग करती है।
तत्कालीन अभियोजन ने गोपालकृष्ण नायडू सहित कई बड़े भू-स्वामियों और उनके सहयोगियों पर हमले में शामिल होने के आरोप लगाए।
नागपट्टिनम सत्र न्यायालय में कुछ अभियुक्त दोषी ठहराए गए।
लेकिन बाद में मद्रास उच्च न्यायालय ने इन दोषसिद्धियों को पलट दिया।
इसलिए कानूनी दृष्टि से उन व्यक्तियों को अंतिम रूप से दोषी घोषित करना उचित नहीं है जिन्हें उच्च न्यायालय ने बरी किया।
लेकिन ऐतिहासिक और सामाजिक साहित्य में घटना व्यापक रूप से भू-स्वामी पक्ष द्वारा दलित कृषि मजदूरों पर किए गए सामूहिक हमले के रूप में दर्ज है।
पुलिस की भूमिका—सबसे विवादास्पद प्रश्न
कीझवेनमणि के इतिहास में पुलिस की भूमिका पर गंभीर प्रश्न उठे।
आंदोलन और प्रत्यक्षदर्शी-आधारित विवरणों में आरोप है कि इलाके में लंबे समय से तनाव और हमले की आशंका की सूचना होने के बावजूद पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध नहीं कराई गई।
कुछ विवरण हमलावरों द्वारा पुलिस वाहनों अथवा उनके समान वाहनों के इस्तेमाल जैसे दावे भी करते हैं।
लेकिन इस प्रकार के प्रत्येक विवरण को प्रमाणित न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
इतिहासकार के लिए अधिक ठोस प्रश्न यह है—
जब संघर्ष पहले से ज्ञात था, मजदूर संगठनों ने सुरक्षा की मांग की थी और हिंसक घटनाएं हो चुकी थीं, तब प्रशासन इतनी बड़ी हत्या रोक क्यों नहीं सका?
यही राज्य की जवाबदेही का केंद्रीय प्रश्न है।
पुलिस कब पहुंची?
घटना के समय पुलिस प्रतिक्रिया की गति भी आलोचना का विषय बनी।
विभिन्न स्मृति और राजनीतिक स्रोतों में आरोप लगाया गया कि पुलिस पर्याप्त तेजी से गांव तक नहीं पहुंची और हमले को रोकने में विफल रही।
सभी समय-संबंधी विवरण स्रोतों में समान नहीं हैं।
इसलिए सुरक्षित ऐतिहासिक निष्कर्ष है—
राज्य तंत्र नरसंहार रोकने में विफल रहा और इस विफलता ने बाद में सरकार तथा पुलिस की भूमिका पर गंभीर प्रश्न खड़े किए।
यह आलोचना स्वयं घटना की राजनीतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी।
अन्नादुरै सरकार की प्रतिक्रिया
नरसंहार ने द्रमुक सरकार को गंभीर संकट में डाल दिया।
मुख्यमंत्री सी. एन. अन्नादुरै ने घटना पर दुख व्यक्त किया और सरकारी कार्रवाई का आश्वासन दिया।
सरकार ने वरिष्ठ मंत्रियों को क्षेत्र में भेजा। समकालीन और बाद के विवरणों में एम. करुणानिधि तथा विधि मंत्री एस. माधवन के घटनास्थल पहुंचने का उल्लेख मिलता है।
लेकिन राजनीतिक विपक्ष और वाम संगठनों का प्रश्न था—
जब संघर्ष पहले से चल रहा था तो हत्या से पहले प्रभावी हस्तक्षेप क्यों नहीं हुआ?
द्रमुक के लिए असुविधाजनक परीक्षा
1967 की द्रमुक विजय सामाजिक न्याय और पुराने प्रभुत्व के विरुद्ध राजनीति के रूप में देखी गई थी।
लेकिन कीझवेनमणि ने नई सरकार के सामने कठिन प्रश्न रखा—
क्या राजनीतिक सत्ता परिवर्तन गांव के भूमि–जाति संबंध भी बदल सकता है?
द्रमुक सरकार राज्य की सत्ता में थी।
लेकिन गांव की आर्थिक सत्ता अभी भी बड़े भू-स्वामियों और स्थानीय प्रभावशाली समूहों के पास हो सकती थी।
यहीं सामाजिक न्याय की चुनावी राजनीति और ग्रामीण संपत्ति संबंधों की वास्तविकता के बीच अंतर सामने आया।
पेरियार की प्रतिक्रिया और विवाद
कीझवेनमणि के बाद तमिल राजनीति के विभिन्न वैचारिक समूहों की प्रतिक्रियाएं भी इतिहासलेखन का विषय बनीं।
वाम आंदोलन ने घटना को वर्ग और जातिगत शोषण के विरुद्ध संघर्ष से जोड़ा।
दलित लेखन ने आगे इसे जातिगत सामूहिक हिंसा की निर्णायक घटना के रूप में पुनर्स्मरण किया।
द्रविड़ आंदोलन की प्रतिक्रिया को लेकर बाद में आलोचनात्मक बहस भी हुई—विशेषकर इस बात पर कि वर्गीय कृषि संघर्ष और दलित उत्पीड़न को किस तरह समझा गया।
इस बहस का महत्व इसलिए है क्योंकि कीझवेनमणि ने तमिलनाडु की तीन बड़ी राजनीतिक धाराओं—
द्रविड़ राजनीति, वाम राजनीति, और स्वतंत्र दलित राजनीति
के बीच संबंधों की सीमाओं को उजागर किया।
मुकदमा शुरू हुआ
हत्याकांड के बाद बड़ी संख्या में आरोपियों के विरुद्ध आपराधिक मामले दर्ज किए गए।
मामला नागपट्टिनम स्थित पूर्वी तंजावुर सत्र न्यायालय तक पहुंचा।
अभियोजन ने हिंसा, आगजनी, हत्या के प्रयास तथा हथियारों से संबंधित विभिन्न अपराधों में आरोप लगाए।
न्यायालयी रिकॉर्ड से पुष्टि होती है कि बाद की अपील में शामिल अभियुक्तों में से छह को सत्र न्यायालय ने दंगा, आगजनी, हत्या के प्रयास और अन्य अपराधों में दस वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी थी।
समानांतर हिंसा के मुकदमे
कीझवेनमणि के घटनाक्रम से जुड़े संघर्ष में केवल एक पक्ष की मृत्यु नहीं हुई थी।
घटना से पहले और उसी शाम हुए टकरावों में भू-स्वामी पक्ष से जुड़े व्यक्तियों की हत्या के मामले भी दर्ज हुए।
बाद में अलग-अलग आपराधिक मामलों में मजदूर पक्ष और भू-स्वामी पक्ष से जुड़े अभियुक्तों पर मुकदमे चले।
अकादमिक पुनर्निर्माण में यह महत्वपूर्ण अंतर सामने आता है कि मजदूरों से संबंधित कुछ दोषसिद्धियां बनी रहीं, जबकि नरसंहार से जुड़े भू-स्वामी अभियुक्तों की दोषसिद्धियां उच्च न्यायालय में टिक नहीं सकीं।
यही तथ्य न्याय की असमानता की राजनीतिक स्मृति में अत्यंत महत्वपूर्ण बना।
मद्रास उच्च न्यायालय में मामला
सत्र न्यायालय के फैसले के विरुद्ध अपील मद्रास उच्च न्यायालय पहुंची।
उच्च न्यायालय ने अंततः नरसंहार मामले में दोषी ठहराए गए भू-स्वामी अभियुक्तों की दोषसिद्धियां पलट दीं और उन्हें बरी कर दिया।
1976 के एक बाद के मद्रास उच्च न्यायालय आदेश में स्वयं दर्ज है कि सत्र न्यायालय से दस वर्ष की सजा पाए छह अभियुक्तों की अपील स्वीकार कर ली गई थी और राज्य की ओर से अन्य आरोपियों की बरी किए जाने के विरुद्ध दायर अपील खारिज कर दी गई थी।
यह कानूनी परिणाम नरसंहार की स्मृति में एक दूसरा आघात बन गया।
उच्च न्यायालय के तर्क पर विवाद
कीझवेनमणि इतिहास के सबसे चर्चित हिस्सों में से एक उच्च न्यायालय की साक्ष्य संबंधी व्याख्या है।
अकादमिक लेखन में प्रकाशित फैसले के अंश के अनुसार न्यायालय ने इस तथ्य पर संदेह व्यक्त किया कि संपन्न मिरासदार स्वयं घटनास्थल जाकर प्रत्यक्ष हिंसा करेंगे; न्यायालय को यह अधिक संभव लगा कि ऐसे व्यक्ति स्वयं पीछे रहकर नौकरों को भेज सकते थे। अंततः उपलब्ध साक्ष्य से अभियुक्तों की पहचान पर्याप्त रूप से सिद्ध नहीं मानी गई।
इस तर्क की बाद में दलित और वाम इतिहासलेखन में तीखी आलोचना हुई।
क्या आरोपी का संपन्न होना उसके स्वयं अपराध में शामिल न होने का अनुमान पैदा कर सकता है?
सर्वोच्च न्यायालय तक कानूनी लड़ाई
राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय द्वारा अभियुक्तों को बरी किए जाने के बाद सर्वोच्च न्यायालय जाने का प्रयास किया।
1976 के मद्रास उच्च न्यायालय रिकॉर्ड में दर्ज है कि प्रमाणपत्र देने की मांग उच्च न्यायालय ने ठुकराई, लेकिन तमिलनाडु सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से विशेष अनुमति मांगी और वह मंजूर हुई; सर्वोच्च न्यायालय ने संबंधित अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए गैर-जमानती वारंट जारी करने का निर्देश भी दिया था।
बाद की ऐतिहासिक साहित्य में अंततः बरी होने की स्थिति कायम रहने का उल्लेख मिलता है।
इसलिए कीझवेनमणि की न्यायिक विरासत का केंद्रीय तथ्य यह है—
44 लोगों की मृत्यु हुई, लेकिन उस सामूहिक हत्या के लिए किसी भू-स्वामी अभियुक्त की अंतिम दोषसिद्धि कायम नहीं रह सकी।
न्यायिक परिणाम का सामाजिक प्रभाव
दलित खेतिहर मजदूरों के लिए इस परिणाम का संदेश विनाशकारी था।
पहले उनके परिवार के 44 सदस्य मारे गए।
फिर जिन प्रभावशाली व्यक्तियों को निचली अदालत ने दोषी माना था, उनकी दोषसिद्धि भी टिक नहीं पाई।
हरित क्रांति और तमिलनाडु की बदलती खेती
नई धान किस्में, सिंचाई, पंपसेट, बिजली, उर्वरक, मशीनीकरण, बढ़ती कृषि लागत और नए स्वामी किसान वर्ग का उदय
1960 के दशक के मध्य से तमिलनाडु की कृषि में ऐसा परिवर्तन शुरू हुआ जिसने केवल खेत की उत्पादकता नहीं बदली, बल्कि किसान राजनीति की भाषा भी बदल दी। अब तक पूर्वी तंजावुर के संघर्ष का केंद्रीय प्रश्न था—भूमि किसकी है, काश्तकार को बेदखल किया जा सकता है या नहीं, पन्नैयाल स्वतंत्र मजदूर बनेगा या नहीं और खेतिहर श्रमिक को कितनी मजदूरी मिलेगी। लेकिन नई कृषि तकनीक के प्रसार के साथ एक दूसरा प्रश्न तेजी से महत्वपूर्ण होने लगा—
नई धान किस्मों को केवल बीज से अधिक चाहिए था। उन्हें नियंत्रित सिंचाई, अधिक उर्वरक, कीटनाशक, ऋण, बिजली, पंपसेट और समय पर कृषि कार्य की आवश्यकता थी। परिणामतः किसान का संबंध केवल भूमि से नहीं, बल्कि राज्य, बिजली बोर्ड, बैंक, सहकारी संस्था, उर्वरक बाजार, कृषि अनुसंधान संस्थान और समर्थन मूल्य जैसी व्यवस्थाओं से भी गहरा होने लगा।
यहीं से तमिलनाडु की किसान राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन आया।
पुरानी राजनीति का एक महत्वपूर्ण स्वर था—
“खेती की लागत घटाओ और उपज का उचित मूल्य दो।”
इस परिवर्तन ने आगे नारायणसामी नायडू के नेतृत्व में उस किसान आंदोलन को जन्म दिया जो तमिलनाडु की राजनीति को 1970 और 1980 के दशकों में बार-बार चुनौती देगा।
हरित क्रांति का अर्थ क्या था?
हरित क्रांति को केवल “अधिक उपज देने वाले बीज” के रूप में समझना अधूरा है।
वास्तव में यह कृषि तकनीकों का एक पैकेज था—
नई किस्म तभी अधिक उत्पादन देती थी जब किसान अन्य आवश्यक निवेश भी करे।
इसलिए हरित क्रांति का वास्तविक सूत्र था—
बीज + पानी + उर्वरक + पूंजी + तकनीक।
इनमें से कोई एक तत्व कमजोर हो जाए तो उत्पादन क्षमता घट सकती थी।
तमिलनाडु हरित क्रांति के लिए क्यों महत्वपूर्ण था?
भारत की हरित क्रांति की चर्चा में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश सबसे अधिक सामने आते हैं, लेकिन दक्षिण भारत में तमिलनाडु भी नए कृषि प्रयोगों का महत्वपूर्ण केंद्र था।
विशेषकर धान अनुसंधान में तमिल क्षेत्र की लंबी संस्थागत परंपरा थी।
और अन्य कृषि अनुसंधान केंद्रों में धान की नई किस्मों पर काम चल रहा था।
तमिलनाडु की सिंचित कृषि और विकसित कृषि अनुसंधान प्रणाली ने नई तकनीक अपनाने के लिए मजबूत आधार दिया।
तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय से जुड़े अध्ययनों के अनुसार 1960 के दशक के उत्तरार्ध में आधुनिक उच्च उपज वाली किस्मों के आगमन ने राज्य में धान उत्पादन और उत्पादकता को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाया।
हरित क्रांति से पहले भी तमिलनाडु में धान अनुसंधान
यह धारणा गलत होगी कि तमिलनाडु में आधुनिक धान अनुसंधान अचानक 1966 में शुरू हुआ।
राज्य में उससे दशकों पहले चयन और संकरण के माध्यम से स्थानीय किस्मों को सुधारने का काम चल रहा था।
आदुतुरै की ADT श्रृंखला और कोयंबटूर की CO श्रृंखला इसी कृषि अनुसंधान परंपरा का हिस्सा थीं।
इसलिए हरित क्रांति एकदम बाहरी तकनीक का आरोपण नहीं थी।
यह पहले से मौजूद भारतीय कृषि अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विकसित बौनी उच्च उपज वाली किस्मों के मेल का परिणाम थी।
ADT-27 और तमिलनाडु में पहला बड़ा बदलाव
तमिलनाडु के धान इतिहास में ADT-27 का विशेष स्थान है।
यह किस्म 1964 के आसपास आदुतुरै से सामने आई और कम अवधि में पकने के कारण किसानों के बीच लोकप्रिय हुई। कृषि अनुसंधान से जुड़े विवरण इसे तमिलनाडु में हरित क्रांति के प्रारंभिक अग्रदूतों में गिनते हैं।
कम अवधि की फसल का महत्व बहुत बड़ा था।
यदि धान जल्दी तैयार हो जाए तो किसान—
और अगली फसल के लिए खेत जल्दी खाली कर सकता था।
यानी बीज ने केवल प्रति एकड़ उपज नहीं बदली।
ताइचुंग नेटिव-1 और बौनी धान क्रांति
1964 में भारत में ताइवान की Taichung Native-1—TN-1 जैसी बौनी धान किस्मों का प्रवेश हुआ।
इन पौधों की ऊंचाई पारंपरिक धान की तुलना में कम थी और वे अधिक उर्वरक का उपयोग कर सकती थीं बिना आसानी से गिरने के।
मद्रास एग्रीकल्चरल जर्नल के अनुसार TN-1 ने भारत में धान प्रजनन की धारणा को बदल दिया और 1965 से कोयंबटूर में स्थानीय लोकप्रिय किस्मों के साथ इस नई पौध संरचना को मिलाने के कार्यक्रम शुरू हुए।
यह तकनीकी परिवर्तन हरित क्रांति की बुनियाद था।
IR-8—“चमत्कारी धान”
1966 में फिलीपींस स्थित अंतरराष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान से विकसित IR-8 भारत पहुंचा।
इसे उस समय “मिरेकल राइस” अर्थात चमत्कारी धान तक कहा गया।
और उपयुक्त परिस्थितियों में पारंपरिक किस्मों से अधिक उत्पादन।
तमिलनाडु के कृषि विभाग के विवरण में IR-8 और बाद की IR-20 जैसी किस्मों को 1960 के दशक की हरित क्रांति से जुड़ी उच्च उपज वाली प्रमुख धान किस्मों के रूप में दर्ज किया गया है।
IR-20 और नई किस्मों का विस्तार
IR-8 के बाद IR-20 सहित कई किस्में आईं।
तमिलनाडु के धान अनुसंधान संस्थानों ने भी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार नई किस्में विकसित कीं।
जैसी किस्मों ने नई कृषि तकनीक के प्रसार में भूमिका निभाई।
1970 के बाद स्थानीय जलवायु, कीट, रोग और उपभोक्ता पसंद के अनुरूप किस्मों पर अधिक ध्यान दिया गया।
इस प्रकार तमिलनाडु ने केवल विदेशी बीज नहीं अपनाए।
उसने उन्हें अपनी कृषि अनुसंधान व्यवस्था में समाहित किया।
नई किस्म और पुरानी किस्म में मूल अंतर
पारंपरिक धान किस्में अक्सर लंबी होती थीं।
उनमें अधिक नाइट्रोजन उर्वरक डालने से पौधा बहुत बढ़ सकता था और फसल गिर सकती थी।
वे अधिक उर्वरक का उपयोग कर सकती थीं,
और ऊर्जा का अधिक हिस्सा दाने के उत्पादन में जाता था।
यही कारण है कि उच्च उपज वाली किस्मों ने उर्वरक की मांग भी बढ़ाई।
इस प्रकार बीज और उर्वरक एक-दूसरे के पूरक बने।
बीज क्रांति वास्तव में पानी की क्रांति भी थी
नई किस्मों की सफलता के लिए समय पर सिंचाई आवश्यक थी।
किसान केवल मानसून पर निर्भर रहकर उच्च उपज वाली खेती का पूरा लाभ नहीं ले सकता था।
इसलिए हरित क्रांति ने सिंचाई के महत्व को और बढ़ा दिया।
तमिलनाडु में सिंचाई के तीन प्रमुख स्रोत थे—
कावेरी डेल्टा नहर सिंचाई पर अधिक निर्भर था।
पश्चिमी और उत्तरी तमिलनाडु में कुएं और बाद में बिजली से चलने वाले पंपसेट निर्णायक बने।
यहीं क्षेत्रीय किसान राजनीति में बड़ा अंतर पैदा हुआ।
कावेरी डेल्टा की अलग स्थिति
तंजावुर और आसपास के क्षेत्रों में कावेरी तथा उसकी शाखाओं पर आधारित सिंचाई पहले से मौजूद थी।
उच्च उपज वाली किस्मों ने इस क्षेत्र की उत्पादक क्षमता और बढ़ाई।
लेकिन साथ ही मजदूरी संघर्ष भी तेज हुआ क्योंकि अधिक सघन खेती के लिए समय पर श्रम की आवश्यकता थी।
यही वह सामाजिक संदर्भ था जिसमें 1968 का कीझवेनमणि संघर्ष घटित हुआ।
पश्चिमी तमिलनाडु की कृषि संरचना अलग थी
कोयंबटूर और पश्चिमी तमिलनाडु में स्थिति अलग थी।
यहां कावेरी डेल्टा जैसी व्यापक नहर व्यवस्था नहीं थी।
किसानों के लिए कुएं अधिक महत्वपूर्ण थे।
यदि कुएं से पानी निकालना है तो आवश्यक था—
और तेजी से बढ़ते दौर में बिजली का मोटर पंप।
इसीलिए पश्चिमी तमिलनाडु के किसान के लिए बिजली कृषि उत्पादन का केंद्रीय इनपुट बन गई।
यहीं से आगे बिजली दर किसान आंदोलन का विस्फोटक मुद्दा बनने वाली थी।
पंपसेट ने खेती कैसे बदल दी?
विद्युत पंपसेट से किसान को प्राकृतिक वर्षा से कुछ हद तक स्वतंत्रता मिली।
कुएं से अधिक तेजी से पानी निकाल सकता था,
फसल को निर्धारित समय पर सिंचाई दे सकता था,
और कुछ क्षेत्रों में ऐसी फसलें भी उगा सकता था जिन्हें अधिक पानी चाहिए।
वह किसान की फसल रणनीति बदलने वाला उपकरण था।
बिजली और सिंचाई का नया संबंध
एक बार जब किसान ने पंपसेट लगा लिया, तब खेती की सफलता बिजली आपूर्ति पर निर्भर होने लगी।
इस प्रकार विद्युत बोर्ड सीधे किसान की कृषि लागत का निर्णायक बन गया।
यहीं किसान और राज्य का नया टकराव पैदा हुआ।
उत्तर आर्कोट का उदाहरण
हरित क्रांति के प्रभाव को उत्तर आर्कोट के आंकड़ों से स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है।
एक विस्तृत कृषि अध्ययन के अनुसार 1965–66 से 1983–84 के बीच इस क्षेत्र में सिंचाई कुओं की संख्या लगभग 1.79 लाख से बढ़कर 3.01 लाख हो गई। इसी अवधि में बिजली और तेल से चलने वाले यंत्रीकृत कुओं की संख्या लगभग दोगुनी हुई और 1980 के दशक के प्रारंभ तक आधे से अधिक कुएं यंत्रीकृत हो चुके थे।
यह बदलाव दिखाता है कि हरित क्रांति वास्तव में भूमिगत जल और ऊर्जा पर बढ़ती निर्भरता की क्रांति भी थी।
धान की उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि
उत्तर आर्कोट के अध्ययन में 1961–62 से 1984–85 के बीच धान उत्पादकता में लगभग तीन प्रतिशत वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई।
1960 के दशक के मध्य और 1970 के दशक के अंत की सामान्य वर्षा वाले वर्षों की तुलना में धान की औसत उपज में लगभग 50 प्रतिशत की छलांग दिखाई गई, जबकि धान के कुल क्षेत्र में बहुत बड़ा विस्तार नहीं हुआ।
यानी उत्पादन बढ़ाने का मुख्य साधन नई भूमि खेती में लाना नहीं था।
उच्च उपज किस्मों का तेज प्रसार
उत्तर आर्कोट में 1966–67 में धान क्षेत्र का केवल लगभग 3.4 प्रतिशत हिस्सा उच्च उपज वाली किस्मों के अंतर्गत था।
और 1980 के दशक के आरंभ तक 90 प्रतिशत के आसपास पहुंच गया।
यह बहुत तेजी से हुआ तकनीकी परिवर्तन था।
एक पीढ़ी के भीतर किसान का बीज, उर्वरक, पानी और उत्पादन चक्र बदल गया।
उर्वरक की मांग में विस्फोट
नई किस्मों के साथ रासायनिक उर्वरक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा।
उत्तर आर्कोट के उदाहरण में 1965–66 से 1984–85 के बीच रासायनिक उर्वरकों का उपयोग करीब छह गुना बढ़ा—लगभग 5,177 मीट्रिक टन पोषक तत्वों से बढ़कर 30,024 मीट्रिक टन तक।
नाइट्रोजन उर्वरक का उपयोग विशेष रूप से बढ़ा।
नई किस्म अपने आप अधिक उपज नहीं देती थी।
किसान अब बाजार से अधिक जुड़ा
पारंपरिक कृषि में किसान का एक बड़ा हिस्सा बीज स्वयं बचा सकता था।
हरित क्रांति के बाद किसान को अधिक मात्रा में बाहर से खरीदना पड़ा—
खेती के लिए पहले पैसा लगाना आवश्यक हो गया।
यहां से कृषि ऋण का महत्व बढ़ा
यदि खेती की लागत पहले से अधिक है तो किसान को फसल बोने से पहले पूंजी चाहिए।
इसलिए सहकारी बैंक और संस्थागत कृषि ऋण का महत्व बढ़ा।
जो किसान अपनी बचत से पूरा निवेश नहीं कर सकता था वह ऋण लेने लगा।
फसल विफल होने पर किसान कर्ज में फंस सकता था।
हरित क्रांति ने जोखिम समाप्त नहीं किया—उसका स्वरूप बदला
नई खेती में उसके साथ दूसरे जोखिम जुड़ गए—
अर्थात किसान अधिक उत्पादन कर सकता था—
लेकिन अब उसने फसल में अधिक नकद पैसा भी लगा रखा था।
इसलिए विफल फसल का आर्थिक नुकसान पहले से अधिक हो सकता था।
कृषि लागत नया राजनीतिक शब्द क्यों बना?
जब किसान बीज, उर्वरक, बिजली और मशीन पर पैसा खर्च करता है तो उसे अपनी फसल का मूल्य इस लागत से जोड़कर दिखाई देने लगता है।
अगर बिजली महंगी हुई तो मेरी लागत बढ़ी।
लेकिन अगर धान, कपास या गन्ने का मूल्य उसी अनुपात में नहीं बढ़ा तो—
यहीं आगे किसान आंदोलन की केंद्रीय अवधारणा बनी—
“उत्पादन लागत के आधार पर उचित मूल्य।”
मशीनीकरण की शुरुआत
हरित क्रांति के साथ कृषि में मशीनों का उपयोग भी बढ़ा।
प्रारंभिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण मशीन थी—
और दूसरे कृषि उपकरणों का उपयोग बढ़ा।
कावेरी डेल्टा में मशीनीकरण का संबंध मजदूर संघर्ष से भी था।
जहां मजदूर संगठन मजबूत था और मजदूरी बढ़ रही थी, वहां भू-स्वामियों तथा बड़े किसानों को श्रम-बचत तकनीक आकर्षक लग सकती थी।
क्या मशीनीकरण मजदूर-विरोधी था?
लेकिन उसी के साथ कुछ प्रकार के श्रम की मांग कम हो सकती थी।
इसलिए खेतिहर मजदूर की दृष्टि से प्रश्न था—
तमिलनाडु की कृषि राजनीति में इसलिए तकनीक और रोजगार के बीच तनाव लंबे समय तक बना रहा।
हरित क्रांति का लाभ किस किसान को अधिक मिला?
नई तकनीक सबके लिए उपलब्ध होने का अर्थ यह नहीं था कि सभी किसान उसे समान रूप से अपना सके।
थी, वह नई तकनीक जल्दी अपना सकता था।
छोटे वर्षा-निर्भर किसान के लिए यह कठिन था।
इसलिए हरित क्रांति ने कृषि उत्पादन बढ़ाया, लेकिन लाभ का वितरण समान नहीं था।
सिंचाई वाले किसान को सबसे बड़ा शुरुआती लाभ
नई उच्च उपज वाली किस्मों के लिए पानी आवश्यक था।
इसलिए जिन किसानों के पास नियंत्रित सिंचाई थी, उन्हें शुरुआती लाभ अधिक मिला।
कुओं वाले पश्चिमी तमिलनाडु के किसान,
और पंपसेट लगाने की आर्थिक क्षमता वाले किसान
नया स्वामी किसान कौन था?
यह पुराने अर्थ में विशाल जमींदार आवश्यक नहीं था।
वह स्वयं खेती करने वाला किसान हो सकता था।
कुछ एकड़ से लेकर मध्यम आकार की भूमि,
वह स्वयं भी खेत में काम कर सकता था और मजदूर भी रख सकता था।
यानी उसका सामाजिक चरित्र पुराने absentee landlord अर्थात अनुपस्थित बड़े भू-स्वामी से अलग था।
पश्चिमी तमिलनाडु इस नए वर्ग का महत्वपूर्ण केंद्र
कोयंबटूर और पश्चिमी तमिलनाडु में व्यावसायिक खेती की मजबूत परंपरा पहले से थी।
और अन्य बाजारोन्मुख फसलों के साथ सिंचाई का विस्तार हुआ।
यहां किसान सीधे बाजार, बिजली और कृषि इनपुट की कीमतों से प्रभावित होता था।
यही सामाजिक वर्ग आगे नारायणसामी नायडू की किसान राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण जमीन बना।
यह किसान पूर्वी तंजावुर के मजदूर से कैसे अलग था?
दोनों कृषि अर्थव्यवस्था का हिस्सा थे।
पूर्वी तंजावुर का भूमिहीन मजदूर पूछता था—
पश्चिमी तमिलनाडु का स्वामी किसान पूछता था—
मजदूरी सहित मेरी कुल लागत कितनी होगी?
खेतिहर मजदूर बिजली शुल्क की चिंता सीधे नहीं करता।
मजदूर फसल मूल्य गिरने से अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होता है।
बाजार में फसल बेचने वाला किसान सीधे प्रभावित होता है।
यही अंतर किसान राजनीति के अगले चरण की कुंजी है।
बिजली कृषि की “राजनीतिक वस्तु” बनी
तमिलनाडु में कृषि पंपसेटों पर बिजली शुल्क 1950 के दशक के अंत से वसूला जा रहा था।
मद्रास उच्च न्यायालय में बाद में दर्ज आधिकारिक शुल्क तालिका के अनुसार कृषि पंपसेट बिजली दर—
और फरवरी 1972 में शुरुआती 100 इकाइयों के लिए 12 पैसे तथा आगे 11 पैसे प्रति यूनिट निर्धारित हुई।
संख्याएं आज बहुत छोटी दिखाई देती हैं।
लेकिन किसान के लिए प्रश्न संख्या का नहीं था।
राज्य खेती के अनिवार्य इनपुट की कीमत लगातार क्यों बढ़ा रहा है?
बिजली शुल्क किसान आंदोलन का आदर्श मुद्दा क्यों बना?
पहली—यह लगभग हर पंपसेट किसान को प्रभावित करता था।
दूसरी—इसका निर्णय सरकार या बिजली बोर्ड करता था।
चौथी—इसके विरुद्ध एक साझा मांग बनाई जा सकती थी।
इसलिए अलग-अलग फसलें उगाने वाले किसान भी बिजली प्रश्न पर एकजुट हो सकते थे।
बिजली ने किसान और राज्य का सीधा संबंध बनाया
पुरानी कृषि राजनीति में किसान का प्रमुख विरोधी स्थानीय भू-स्वामी हो सकता था।
नई कृषि राजनीति में विरोध का केंद्र कई बार राज्य बन गया।
1970 का बिजली शुल्क विवाद
1970 के आसपास बिजली दर में वृद्धि ने पश्चिमी तमिलनाडु में किसान असंतोष को तेज किया।
किसान आंदोलन के एक मानक अध्ययन के अनुसार 1967 में किसान संगठन की मांगें अपेक्षाकृत सीमित थीं, लेकिन 1970 में बिजली शुल्क वृद्धि आंदोलन का बड़ा प्रेरक बनी। किसानों ने भुगतान रोकने और कनेक्शन काटने का प्रतिरोध करने की रणनीति अपनाई।
यहीं से तमिलनाडु में आधुनिक स्वामी किसान आंदोलन ने व्यापक रूप लेना शुरू किया।
“बिल नहीं देंगे”—नई प्रकार की किसान अवज्ञा
यदि हजारों किसान एक साथ बिजली बिल न दें तो सरकार के सामने कठिन समस्या पैदा होती है।
क्या हजारों पंपसेटों के कनेक्शन काटे जाएं?
यदि बिजली काट दी गई तो फसल नष्ट हो सकती है।
यदि फसल नष्ट हुई तो उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी।
किसान संगठन ने इस निर्भरता को राजनीतिक हथियार बनाया।
यह खेतिहर मजदूर की हड़ताल से अलग लेकिन संरचनात्मक रूप से समान रणनीति थी।
नारायणसामी नायडू की जमीन तैयार हो चुकी थी
1960 के दशक के मध्य तक कोयंबटूर क्षेत्र में किसान संगठन बनने लगे।
नारायणसामी नायडू ने 1966 में उत्तरी कोयंबटूर के किसानों को संगठित करना शुरू किया। अगले वर्ष यह जिला स्तर पर विस्तृत हुआ और 1970 के दशक के शुरुआती वर्षों में राज्यव्यापी किसान शक्ति बनने की दिशा में बढ़ा।
यह संयोग नहीं था कि आंदोलन पश्चिमी तमिलनाडु से उठा।
किसान के जीवन में तेजी से महत्वपूर्ण हो रहे थे।
किसान की नई मांग—केवल सस्ती बिजली नहीं
बिजली आंदोलन जल्द ही व्यापक आर्थिक मांगों में बदल गया।
उत्पादन लागत के आधार पर फसल मूल्य तय करो,
किसान आंदोलनों के अध्ययन में तमिलनाडु एग्रीकल्चरिस्ट्स एसोसिएशन की 1972–73 की मांगों में यही व्यापक कृषि आर्थिक कार्यक्रम दिखाई देता है।
यानी यह केवल “बिजली बिल आंदोलन” नहीं रहा।
यह कृषि अर्थव्यवस्था की शर्तों पर किसान का राजनीतिक दावा बन गया।
कृषि मूल्य की राजनीति का उदय
हरित क्रांति से पहले आत्मनिर्भर या अर्ध-बाजार कृषि में कीमत का प्रश्न सीमित हो सकता था।
तो बिक्री मूल्य उसकी आर्थिक स्थिति का निर्णायक हो जाता है।
यदि बाजार मूल्य लागत से नीचे चला जाए तो अधिक उत्पादन भी किसान को संकट से नहीं बचा सकता।
इसलिए किसान संगठन का नया सूत्र बना—
यह मांग आगे पूरे भारत के किसान आंदोलनों में केंद्रीय होगी।
कृषि उत्पादन बढ़ा, लेकिन लाभ का प्रश्न बचा
हरित क्रांति का सबसे बड़ा सकारात्मक परिणाम था—
तमिलनाडु विशेषकर सिंचित धान कृषि में उल्लेखनीय उपलब्धि प्राप्त करने लगा। कृषि शोध के दीर्घकालीन आकलन बताते हैं कि आधुनिक किस्मों के विस्तार से राज्य के धान उत्पादन और उत्पादकता में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई।
लेकिन किसान राजनीति ने दूसरा प्रश्न उठाया—
अधिक उत्पादन का लाभ किसे मिल रहा है?
यहीं हरित क्रांति का आर्थिक विवाद शुरू होता है।
उत्पादन बढ़ने से किसान हमेशा अमीर क्यों नहीं होता?
मान लें पुराने दौर में किसान प्रति एकड़ 20 इकाई उत्पादन करता था और उसकी लागत 10 थी।
नई तकनीक से वह 35 इकाई पैदा करता है।
यदि बाजार मूल्य गिर जाए तो अधिक उत्पादन के बावजूद उसकी वास्तविक आय बहुत नहीं बढ़ सकती।
यही कारण है कि उत्पादन और आय को समान मानना गलत है।
हरित क्रांति ने उत्पादन बढ़ाया, लेकिन किसान आंदोलन आय का सवाल उठाने लगा।
छोटे किसान के लिए दोहरी स्थिति
नई तकनीक छोटे किसान के लिए अवसर भी थी और जोखिम भी।
अर्थात हरित क्रांति ने छोटी जोत को समाप्त नहीं किया।
नारायणसामी नायडू का उदय
कोयंबटूर के किसान संगठन से तमिलनाडु एग्रीकल्चरिस्ट्स एसोसिएशन तक; व्यक्तित्व, सामाजिक आधार, संगठनात्मक रणनीति और नई किसान राजनीति का जन्म
1960 के दशक के उत्तरार्ध तक तमिलनाडु की कृषि राजनीति बदल चुकी थी। पूर्वी तंजावुर में भूमिहीन खेतिहर मजदूर, पन्नैयाल और काश्तकार भूमि, मजदूरी और सामाजिक सम्मान के प्रश्नों पर संघर्ष कर चुके थे। दूसरी ओर पश्चिमी तमिलनाडु में सिंचाई, कुएं, विद्युत पंपसेट, उर्वरक, ऋण और बाजारोन्मुख खेती के विस्तार ने एक नए प्रकार के किसान को जन्म दिया था—ऐसा किसान जो स्वयं भूमि पर खेती करता था, बाजार के लिए उत्पादन करता था और जिसकी आय अब सरकारी बिजली दर, कृषि ऋण, इनपुट लागत और फसल मूल्य से सीधे प्रभावित होती थी।
इसी सामाजिक परिवर्तन से सी. नारायणसामी नायडू का नेतृत्व उभरा।
उनका किसान आंदोलन पुराने भू-स्वामी-विरोधी किसान आंदोलनों की सीधी पुनरावृत्ति नहीं था। उसकी राजनीति का केंद्र था—
कृषि उत्पादन की लागत, बिजली शुल्क, ऋण, सिंचाई, फसल मूल्य और राज्य की कृषि नीति।
यानी किसान अब केवल गांव के भू-स्वामी से नहीं, बल्कि आधुनिक राज्य की आर्थिक नीतियों से टकराने लगा था।
पश्चिमी तमिलनाडु—नई किसान राजनीति की जन्मभूमि
नारायणसामी नायडू का उदय समझने के लिए कोयंबटूर और पश्चिमी तमिलनाडु की कृषि अर्थव्यवस्था को समझना आवश्यक है।
यह क्षेत्र कावेरी डेल्टा से अलग था।
कपास, मूंगफली, गन्ना, नारियल और अन्य वाणिज्यिक फसलों का महत्व था।
ऐसे किसान के लिए बिजली केवल घरेलू सुविधा नहीं थी।
इसलिए बिजली की दर में छोटी वृद्धि भी किसान की लागत पर सीधा असर डालती थी।
यही मुद्दा आगे नारायणसामी नायडू के आंदोलन को विस्फोटक शक्ति देगा।
नारायणसामी नायडू का सामाजिक आधार
नारायणसामी नायडू की राजनीति का प्रमुख आधार भूमिहीन खेतिहर मजदूर नहीं था।
और ऐसे किसानों की जो बाजार में बेचने योग्य अधिशेष पैदा करते थे।
यह वर्ग पुरानी जमींदारी अभिजातता से अलग था।
इनमें से अनेक किसान स्वयं खेती करते थे।
वे श्रम भी करते थे और मजदूर भी रख सकते थे।
खेती आर्थिक रूप से लाभकारी कैसे रहे?
क्या यह “अमीर किसान आंदोलन” था?
नारायणसामी नायडू के आंदोलन को कई विद्वानों ने “नए किसान आंदोलन” और कुछ ने “समृद्ध किसान आंदोलन” की श्रेणी में रखा।
था, वह बिल्कुल भूमिहीन ग्रामीण गरीब नहीं था।
लेकिन पूरे आंदोलन को केवल धनी किसानों का आंदोलन कहना भी सरलीकरण होगा।
इसमें ऐसे छोटे और मध्यम किसान भी शामिल थे जिनकी जमीन सीमित थी लेकिन खेती की लागत तेजी से बढ़ रही थी।
बाजारोन्मुख स्वामी कृषकों का व्यापक आंदोलन।
नारायणसामी नायडू का व्यक्तित्व
नारायणसामी नायडू का व्यक्तित्व किसान नेतृत्व की पारंपरिक छवि से मेल खाता था।
वे मंचीय बौद्धिक नेता कम और प्रत्यक्ष आंदोलनकारी नेता अधिक थे।
यही कारण था कि उनका प्रभाव पश्चिमी तमिलनाडु के ग्रामीण समाज में तेजी से फैला।
उनकी ताकत विचारधारात्मक ग्रंथ नहीं बल्कि संगठनात्मक गतिशीलता थी।
1966 : संगठनात्मक शुरुआत
उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार नारायणसामी नायडू ने 1966 में उत्तरी कोयंबटूर क्षेत्र में किसानों को संगठित करना शुरू किया।
अगले कुछ वर्षों में यह स्थानीय संगठन जिला स्तर की शक्ति बनने लगा।
1967 के आसपास किसान संगठन ने बिजली और कृषि संबंधी मांगों को सार्वजनिक रूप से उठाना शुरू किया।
यही आरंभिक नेटवर्क आगे तमिलनाडु एग्रीकल्चरिस्ट्स एसोसिएशन के रूप में विकसित हुआ।
किसान को राजनीतिक दलों की शाखा के रूप में नहीं, बल्कि स्वतंत्र आर्थिक हित समूह के रूप में संगठित करो।
किसान को “उत्पादक” के रूप में पहचान देना
नारायणसामी नायडू की राजनीति का एक महत्वपूर्ण वैचारिक परिवर्तन था—
किसान को केवल “ग्रामीण व्यक्ति” के रूप में नहीं, बल्कि उत्पादक के रूप में देखना।
फिर उसकी उपज का मूल्य ऐसा क्यों हो कि उसकी लागत भी न निकले?
यह तर्क आगे पूरे भारत के नए किसान आंदोलनों का केंद्रीय विचार बनेगा।
पहली बड़ी साझा शिकायत—बिजली
पश्चिमी तमिलनाडु में किसान संगठन के लिए बिजली सबसे उपयोगी सामूहिक मुद्दा बनी।
यदि उसका पंपसेट बिजली से चलता था तो बिजली दर उसे प्रभावित करती थी।
इसलिए बिजली ने अलग-अलग फसल उत्पादकों को एक मंच पर जोड़ा।
बिजली शुल्क क्यों राजनीतिक मुद्दा बना?
बिजली किसी विलासिता के लिए नहीं ली जा रही।
यदि सरकार बिजली महंगी करती है तो वह सीधे कृषि उत्पादन की लागत बढ़ाती है।
और यदि सरकार उसी समय कृषि उपज का मूल्य नियंत्रित रखती है तो किसान दोनों तरफ से दबाव में आता है।
इसलिए बिजली दर आंदोलन वास्तव में कृषि लागत आंदोलन था।
1970 : पहली बड़ी टक्कर
1970 में बिजली शुल्क बढ़ाने के खिलाफ किसान आंदोलन ने व्यापक रूप लिया।
आंदोलन इतना व्यापक हुआ कि सरकार को पीछे हटकर कुछ रियायतें देनी पड़ीं।
यही नारायणसामी नायडू के नेतृत्व की पहली बड़ी राजनीतिक सफलता बनी।
जीत ने संगठन को गति दी
किसी आंदोलन की शुरुआती जीत अक्सर संगठन विस्तार का सबसे बड़ा साधन बनती है।
1970 के संघर्ष के बाद किसानों को लगा कि बिजली दर जैसी सरकारी नीति अपरिवर्तनीय नहीं है।
और नारायणसामी नायडू का नाम पश्चिमी तमिलनाडु के बाहर भी पहचाना जाने लगा।
संगठन का राज्यव्यापी विस्तार
स्थानीय संगठन धीरे-धीरे व्यापक तमिलनाडु एग्रीकल्चरिस्ट्स एसोसिएशन की दिशा में विकसित हुआ।
किसानों की आर्थिक मांगों को जिला सीमा से निकालकर राज्यव्यापी कार्यक्रम बनाना।
यानी यदि कोयंबटूर में बिजली बढ़ी है तो उसे केवल कोयंबटूर की समस्या न माना जाए।
पूरे राज्य के पंपसेट किसान को बताया जाए—
इसी रणनीति ने आंदोलन को क्षेत्रीय किसान संगठन से राज्यस्तरीय शक्ति बनाया।
राजनीतिक दलों से दूरी
नारायणसामी नायडू की किसान राजनीति की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी कि वह स्वयं को किसी एक राजनीतिक दल का अधीन संगठन बनाकर नहीं रखना चाहती थी।
विभिन्न राजनीतिक विचारों के किसान संगठन में आ सकते थे।
सत्ता में जो भी दल हो, किसान संगठन उसके खिलाफ आंदोलन कर सकता था।
इसलिए द्रमुक हो या बाद में अन्नाद्रमुक—
नायडू किसान मांगों को सरकार के सामने स्वतंत्र रूप से रखते रहे।
पुरानी किसान सभा से अंतर
पूर्वी तंजावुर की किसान सभा वामपंथी विचारधारा और कम्युनिस्ट पार्टी से गहराई से जुड़ी थी।
नारायणसामी नायडू का आंदोलन अलग प्रकार का था।
कृषि हित, न कि व्यापक समाजवादी क्रांति।
वह भूमि के सामूहिक स्वामित्व या वर्ग उन्मूलन की राजनीति से नहीं चल रहा था।
खेती करने वाले स्वामी किसान को लाभकारी आर्थिक परिस्थितियां मिलें।
इसीलिए इसे भारत के “नए किसान आंदोलनों” की प्रारंभिक धाराओं में देखा जाता है।
किसान और सरकार के बीच सीधी सौदेबाजी
नायडू की रणनीति में सरकार को लक्ष्य बनाना केंद्रीय था।
क्योंकि किसान की समस्याओं के कई स्रोत अब सरकारी नीति थे—
पुराने आंदोलन में किसान भू-स्वामी के खेत पर हड़ताल करता था।
बैलगाड़ी बनी आंदोलन का राजनीतिक प्रतीक
तमिलनाडु किसान आंदोलनों में बैलगाड़ियों का उपयोग केवल परिवहन साधन नहीं था।
हजारों बैलगाड़ियों का एक साथ सड़कों पर निकलना—
ग्रामीण शक्ति का दृश्य प्रदर्शन था।
किसान अपने कृषि जीवन के प्रतीकों के साथ राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश करता था।
ग्रामीण उत्पादक अब अपनी मांग लेकर सत्ता के दरवाजे तक आया है।
आगे 1972 और 1978 के संघर्षों में यह दृश्य अत्यंत प्रभावशाली बनेगा।
सड़क अवरोध क्यों प्रभावी था?
किसान आंदोलन की कठिनाई होती है कि कृषि उत्पादन बिखरा हुआ है।
कारखाने के मजदूर की तरह किसान सभी एक स्थान पर नहीं काम करते।
इसलिए उसे अपनी सामूहिक शक्ति दिखाने के लिए अलग रणनीति चाहिए।
यदि हजारों किसान ट्रैक्टर, बैलगाड़ी और लोगों के साथ मुख्य सड़कें रोक दें तो प्रशासनिक और आर्थिक गतिविधि प्रभावित होती है।
इससे सरकार पर तुरंत वार्ता का दबाव बनता है।
बिल न देना—आर्थिक असहयोग
नारायणसामी नायडू के आंदोलन की दूसरी महत्वपूर्ण रणनीति थी—
यह गांधीवादी असहयोग की आर्थिक शैली से मिलता-जुलता लेकिन कृषि परिस्थितियों के अनुरूप तरीका था।
यदि शुल्क अनुचित है तो किसान सामूहिक रूप से भुगतान नहीं करेगा।
एक किसान ऐसा करे तो उसका कनेक्शन काटा जा सकता है।
हजारों किसान करें तो प्रशासनिक संकट पैदा होता है।
बिजली कनेक्शन काटने का प्रतिरोध
जब बिजली बोर्ड बकाया वसूली या कनेक्शन काटने की कोशिश करता तो किसान संगठन गांव में सामूहिक प्रतिरोध कर सकता था।
इससे विवाद प्रशासन बनाम व्यक्ति न रहकर—
यहीं से आंदोलन की तीव्रता बढ़ती थी।
बिजली अधिकारी और पुलिस ग्रामीण प्रतिरोध का सामना करते।
कई बार इससे हिंसक टकराव की स्थितियां बनतीं।
मांगों का विस्तार
बिजली से शुरू हुआ आंदोलन जल्दी ही बड़े कृषि आर्थिक कार्यक्रम में बदल गया।
किसान संगठन की मांगों में शामिल होने लगे—
यानी संगठन केवल एक मुद्दे की संस्था नहीं रहा।
वह कृषि अर्थव्यवस्था की समग्र लॉबी बन रहा था।
ऋण प्रश्न इतना महत्वपूर्ण क्यों था?
हरित क्रांति ने किसान की नकद जरूरत बढ़ा दी थी।
उसे फसल से पहले पैसा लगाना पड़ता था।
लेकिन उसकी आय फसल बेचने के बाद आती थी।
यहीं ऋण राहत आगे किसान आंदोलनों की स्थायी मांग बनती है।
फसल मूल्य—आंदोलन का दीर्घकालीन प्रश्न
नायडू के आंदोलन का व्यापक आर्थिक तर्क था—
कृषि की कीमत केवल उपभोक्ता को सस्ता भोजन देने के आधार पर तय नहीं हो सकती।
यदि किसान की लागत बढ़ रही है तो उपज का मूल्य भी बढ़ना चाहिए।
यह प्रश्न विशेष रूप से बाजारोन्मुख किसानों के लिए महत्वपूर्ण था।
किसान संगठन अब मांग करने लगे कि मूल्य निर्धारण में—
“उत्पादन लागत + लाभ” का विचार
यही वह चरण था जब किसान राजनीति में यह विचार मजबूत हुआ कि कृषि मूल्य में केवल लागत वापस मिलना पर्याप्त नहीं।
क्योंकि किसान केवल जीविका के लिए नहीं बल्कि आर्थिक उत्पादन कर रहा है।
यह विचार आगे महाराष्ट्र के शरद जोशी और उत्तर भारत के महेंद्र सिंह टिकैत के आंदोलनों में भी अलग रूपों में दिखाई देगा।
नारायणसामी नायडू इस नई राजनीतिक भाषा के प्रारंभिक दक्षिण भारतीय प्रतिनिधियों में थे।
आंदोलन की संगठनात्मक शैली
नायडू की शक्ति विशाल स्थायी नौकरशाही नहीं थी।
संगठन गांव और स्थानीय नेटवर्क पर आधारित था।
किसान वाहन और बैलगाड़ियों से निकलते,
और कुछ ही समय में बड़ी ग्रामीण भीड़ तैयार हो सकती थी।
यह विकेंद्रित गतिशीलता आंदोलन को राज्य के लिए कठिन प्रतिद्वंद्वी बनाती थी।
जाति का प्रश्न और नया किसान आंदोलन
पश्चिमी तमिलनाडु की स्वामी किसान राजनीति जाति से मुक्त नहीं थी।
भूमि स्वामित्व और प्रभुत्वशाली कृषि जातियों के बीच संबंध मौजूद थे।
लेकिन नायडू की राजनीतिक भाषा मुख्यतः जाति के बजाय किसान आर्थिक हित की थी।
यह पूर्वी तंजावुर के दलित कृषि मजदूर आंदोलन से बड़ा अंतर था।
वहां जाति और वर्ग दोनों खुले राजनीतिक प्रश्न थे।
नायडू आंदोलन ने विभिन्न कृषक समुदायों को “किसान” की साझा पहचान के तहत जोड़ने की कोशिश की।
यही उसकी शक्ति भी थी और सीमा भी
“हम सब किसान हैं” का नारा व्यापक एकता पैदा कर सकता था।
लेकिन गांव में सभी कृषि हित समान नहीं थे।
स्वामी किसान अधिक मजदूरी का विरोध कर सकता था।
भूमिहीन मजदूर को बिजली सब्सिडी से सीमित प्रत्यक्ष लाभ मिलता था।
यानी किसान की एकता के नीचे वर्गीय अंतर बने रहे।
यही नायडू आंदोलन की एक संरचनात्मक सीमा थी।
राज्य में द्रमुक और किसान आंदोलन
1967 के बाद द्रमुक सरकार ने तमिलनाडु की राजनीति बदल दी थी।
लेकिन किसान आर्थिक प्रश्नों पर नायडू सरकार से टकराने को तैयार थे।
किसान संगठन ने सामाजिक न्याय की विचारधारा और कृषि आर्थिक नीति को अलग-अलग कसौटियों पर परखा।
सरकार चाहे किसी भी सामाजिक आधार से आई हो,
क्या उसकी कृषि नीति किसान के पक्ष में है?
1972 : दूसरा बड़ा संघर्ष
फरवरी 1972 में कृषि बिजली शुल्क में फिर वृद्धि हुई।
यह नायडू आंदोलन के लिए निर्णायक क्षण बना।
अब किसान संगठनों ने व्यापक प्रतिरोध का आह्वान किया।
बिजली शुल्क वापस लेने की मांग की गई।
यह आंदोलन 1970 की तुलना में अधिक व्यापक और टकरावपूर्ण था।
पुलिस से टकराव
1972 के आंदोलन में कई स्थानों पर प्रशासन और किसानों के बीच टकराव हुआ।
सड़कों और राजमार्गों पर अवरोध लगाए गए।
पुलिस ने उन्हें हटाने का प्रयास किया।
लाठीचार्ज और गोलीबारी की घटनाएं हुईं।
किसानों की मृत्यु ने आंदोलन को और तीखा किया।
यहीं नारायणसामी नायडू केवल संगठनकर्ता नहीं बल्कि राज्यव्यापी किसान प्रतिरोध के प्रतीक बन गए।
किसान मृत्यु का राजनीतिक प्रभाव
जब किसी आर्थिक मांग पर आंदोलन कर रहे किसान पुलिस गोलीबारी में मारे जाते हैं तो आंदोलन की प्रकृति बदल जाती है।
अब प्रश्न केवल शुल्क की दर नहीं रहता।
यह वही मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जो किसान आंदोलनों को लंबी ऐतिहासिक स्मृति देती है।
नायडू ने किसान मौतों को संगठनात्मक एकता और राज्य के खिलाफ नैतिक दबाव के रूप में इस्तेमाल किया।
आंदोलन का भूगोल फैलता गया
कोयंबटूर से शुरू हुआ आंदोलन धीरे-धीरे—
और राज्य के दूसरे क्षेत्रों तक पहुंचने लगा।
हर क्षेत्र की समस्या बिल्कुल समान नहीं थी।
इससे नारायणसामी नायडू की नेतृत्व क्षमता क्षेत्रीय सीमा से बाहर निकली।
संगठन की भाषा सरल क्यों थी?
नायडू का आंदोलन जटिल कृषि अर्थशास्त्र को साधारण नारे में बदल देता था।
लेकिन किसान को अर्थशास्त्र का लंबा सिद्धांत समझाने की आवश्यकता नहीं थी।
यही एक अच्छे जन आंदोलन की शक्ति होती है—
जटिल आर्थिक संकट को स्पष्ट राजनीतिक मांग में बदलना।
सरकार को क्यों झुकना पड़ता था?
किसान आंदोलन तीन प्रकार का दबाव बनाता था।
सड़कों और प्रशासन पर प्रत्यक्ष दबाव।
ग्रामीण उत्पादन प्रभावित होने का खतरा।
तमिलनाडु में ग्रामीण मतदाता विशाल संख्या में थे।
इसलिए कोई भी सरकार लंबे समय तक व्यापक किसान असंतोष की अनदेखी नहीं कर सकती थी।
नायडू ने इस राजनीतिक गणित को प्रभावी ढंग से समझा।
चुनावी दल क्यों सतर्क थे?
किसान संगठन स्वयं राजनीतिक दल न होकर भी चुनावी प्रभाव रखता था।
यदि वह किसी सरकार के खिलाफ व्यापक असंतोष पैदा कर दे तो सत्तारूढ़ दल ग्रामीण सीटों पर नुकसान झेल सकता था।
इसीलिए सरकारें दोहरी रणनीति अपनातीं—
यह पैटर्न आगे तमिलनाडु किसान आंदोलनों में बार-बार दिखाई देगा।
1970 के दशक का व्यापक राष्ट्रीय संदर्भ
नारायणसामी नायडू का उदय केवल तमिलनाडु की घटना नहीं था।
भारत के अलग-अलग हिस्सों में हरित क्रांति के बाद नया स्वामी किसान राजनीतिक रूप से सक्रिय होने लगा।
महाराष्ट्र में बाद में शेतकरी संगठन,
इसी व्यापक सामाजिक परिवर्तन की अलग-अलग अभिव्यक्तियां बने।
कृषि और शहरी–औद्योगिक अर्थव्यवस्था के बीच आय का संबंध कैसा हो?
नारायणसामी नायडू की राष्ट्रीय दृष्टि
नायडू धीरे-धीरे यह समझने लगे कि बिजली शुल्क तमिलनाडु का प्रश्न हो सकता है, लेकिन कृषि मूल्य, ऋण और किसान आय राष्ट्रीय प्रश्न हैं।
इसलिए उनका प्रयास तमिलनाडु के बाहर किसान संगठनों से संपर्क बढ़ाने का भी रहा।
आगे वे राष्ट्रीय स्तर पर किसान संगठनों को एक मंच पर लाने की कोशिशों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
इससे उनका स्थान केवल तमिल किसान नेता का नहीं रहा।
वे स्वतंत्र भारत की नई किसान राजनीति के राष्ट्रीय नेताओं में गिने जाने लगे।
“किसान बनाम शहर” का विमर्श
नए किसान आंदोलनों में एक और विचार उभरा—
ग्रामीण उत्पादक और शहरी उपभोक्ता के बीच आर्थिक असमानता।
सरकार खाद्यान्न सस्ता रखना चाहती है ताकि शहरों में महंगाई नियंत्रित रहे।
लेकिन इसका बोझ किसान पर क्यों पड़े?
यदि औद्योगिक वस्तुओं के दाम बाजार के अनुसार बढ़ सकते हैं तो कृषि उत्पाद की कीमत कृत्रिम रूप से कम क्यों रखी जाए?
यहीं ग्रामीण बनाम शहरी आर्थिक नीति का विमर्श उभरा।
यह वाम किसान राजनीति से अलग क्यों था?
वाम किसान आंदोलन का विश्लेषण प्रायः था—
कृषि क्षेत्र बनाम राज्य-नियंत्रित आर्थिक व्यवस्था।
इसमें किसान स्वयं भूमि स्वामी हो सकता था।
इसलिए मुख्य विरोधी स्थानीय जमींदार नहीं बल्कि—
यह भारतीय किसान राजनीति में बड़ा वैचारिक बदलाव था।
मजदूर प्रश्न आंदोलन में पीछे क्यों गया?
नायडू आंदोलन का केंद्रीय आधार स्वामी किसान था।
इसलिए कृषि मजदूर की मजदूरी उसके कार्यक्रम का केंद्रीय प्रश्न नहीं बन सकी।
वास्तव में अधिक मजदूरी स्वामी किसान की लागत बढ़ाती थी।
यहीं नए किसान आंदोलन की सामाजिक सीमा सामने आती है।
जो किसान सरकार के सामने उत्पादक है,
वही खेतिहर मजदूर के सामने नियोक्ता हो सकता है।
इसलिए “किसान एकता” हमेशा पूर्ण सामाजिक एकता नहीं थी।
फिर भी छोटे किसान क्यों जुड़े?
बड़ी जोत वाले किसान पर प्रति एकड़ लागत का प्रभाव और छोटा किसान पर प्रभाव अलग हो सकता था, लेकिन समस्या साझा थी।
कई छोटे किसान तो अधिक संकटग्रस्त थे क्योंकि उनके पास खराब फसल सहने की आर्थिक क्षमता कम थी।
इसलिए आंदोलन का सामाजिक आधार केवल बड़े कृषकों तक सीमित नहीं रहा।
नारायणसामी नायडू की संगठनात्मक प्रतिभा
विभिन्न आर्थिक शिकायतों को एक साझा किसान पहचान में बदलना।
वे किसान को कहते थे कि तुम्हारी समस्याएं व्यक्तिगत नहीं हैं।
बिजली बिल बढ़ा है तो पूरे समुदाय का प्रश्न है।
कर्ज वसूली हो रही है तो सामूहिक प्रतिरोध करो।
फसल मूल्य कम है तो राज्यव्यापी मांग उठाओ।
इससे किसान का निजी आर्थिक संकट राजनीतिक प्रश्न बनता था।
यही आधुनिक किसान आंदोलन की बुनियादी संगठनात्मक तकनीक है।
आंदोलन में प्रतीक और सम्मान
नायडू किसान को केवल राहत का याचक नहीं बनाना चाहते थे।
आंदोलन की भाषा में किसान राष्ट्र का उत्पादक था।
मेरे उत्पादन का उचित मूल्य मेरा अधिकार है।
यह सम्मान-आधारित किसान भाषा आगे भारत के कई किसान संगठनों में केंद्रीय बनी।
बिजली मुफ्त करने की राजनीति की दूरस्थ पृष्ठभूमि
तमिलनाडु की बाद की कृषि राजनीति में मुफ्त बिजली अत्यंत महत्वपूर्ण नीति बनी।
उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि समझने के लिए नारायणसामी नायडू के बिजली आंदोलनों को देखना जरूरी है।
अगले दशकों में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा इस दिशा तक पहुंची कि—
कृषि पंपसेट के लिए बिजली शुल्क लिया ही जाए या नहीं?
यानी जो मुद्दा पहले आंदोलन की मांग था, आगे चुनावी कल्याण नीति का आधार बना।
आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या थी?
शुरुआती वर्षों में तत्काल रियायतें महत्वपूर्ण थीं।
लेकिन नारायणसामी नायडू की दीर्घकालीन उपलब्धि उससे बड़ी थी।
उन्होंने तमिलनाडु की राजनीति में यह स्थापित किया कि—
स्वामी किसान एक स्वतंत्र संगठित राजनीतिक वर्ग है।
अब सरकार किसान नीति बनाते समय केवल बड़े भू-स्वामियों, सहकारी संस्थाओं या कृषि विभाग से बात करके नहीं चल सकती थी।
सड़क पर उतरने वाला किसान संगठन भी शक्ति केंद्र था।
उनकी राजनीति की प्रमुख सीमाएं
नायडू के आंदोलन का संतुलित मूल्यांकन उसकी सीमाओं के बिना अधूरा है।
भूमिहीन कृषि मजदूर उसकी केंद्रीय चिंता नहीं थे।
सस्ती बिजली और अधिक भूजल दोहन के पर्यावरणीय परिणाम उस दौर की राजनीति में प्रमुख नहीं थे।
1970 के दशक के किसान आंदोलन
बिजली दरों के विरुद्ध संघर्ष, कर्ज और वसूली का प्रश्न, कृषि लागत, फसल मूल्य, सड़क अवरोध, बैलगाड़ी मार्च और नारायणसामी नायडू के नेतृत्व में राज्यव्यापी लामबंदी
1970 का दशक तमिलनाडु के किसान आंदोलन के इतिहास में वह समय था जब पश्चिमी तमिलनाडु से शुरू हुआ स्वामी किसान आंदोलन स्थानीय शिकायत से निकलकर राज्यव्यापी राजनीतिक शक्ति बन गया। इसकी शुरुआत बिजली शुल्क के प्रश्न से हुई, लेकिन कुछ ही वर्षों में किसान संगठन बिजली, कृषि ऋण, कर्ज-वसूली, उर्वरक, सिंचाई, कृषि कर, उत्पादन लागत और फसल मूल्य को एक-दूसरे से जोड़ने लगा।
इस आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि उसने खेती की समस्या की नई व्याख्या प्रस्तुत की। किसान अब यह नहीं कह रहा था कि उसकी कठिनाई केवल सूखे या खराब फसल के कारण है। उसका तर्क था कि आधुनिक खेती की पूरी आर्थिक संरचना ऐसी बन रही है जिसमें उत्पादन का जोखिम किसान उठाता है, जबकि उसके अनेक खर्च और आय की शर्तें सरकार तथा बाजार निर्धारित करते हैं।
इसी दशक में तमिलनाडु ने ऐसे दृश्य देखे जिनकी उस समय भारतीय किसान राजनीति में कम मिसाल थी—
हजारों बैलगाड़ियां शहरों में, बिजली बिल देने से सामूहिक इनकार, कनेक्शन काटने आए अधिकारियों का प्रतिरोध, सड़क और राजमार्ग अवरोध, दूध–सब्जी की शहरों में आपूर्ति रोकना, हजारों गिरफ्तारियां, पुलिस गोलीबारी और किसान मौतें।
यही संघर्ष नारायणसामी नायडू को तमिलनाडु के सबसे प्रभावशाली किसान नेताओं में ले आया और आगे भारत के “नए किसान आंदोलनों” के लिए एक प्रारंभिक नमूना बना। समकालीन किसान आंदोलनों के अध्ययन भी तमिलनाडु को उन शुरुआती राज्यों में रखते हैं जहां 1970 के दशक में स्वतंत्र स्वामी कृषकों की नई आंदोलनकारी राजनीति स्पष्ट रूप से सामने आई।
1970 के दशक की शुरुआत तक क्या बदल चुका था?
तमिलनाडु की कृषि अर्थव्यवस्था अब 1940 के दशक जैसी नहीं थी।
बिजली से चलने वाले पंपसेट फैल रहे थे।
रासायनिक उर्वरक का इस्तेमाल बढ़ रहा था।
किसान बाजार में अधिक उत्पादन बेच रहा था।
इसका अर्थ था कि किसान को फसल बोने से पहले पहले की तुलना में अधिक पैसा खर्च करना पड़ता था।
इसलिए किसान की आय और लागत के बीच संबंध राजनीतिक प्रश्न बन गया।
नई किसान राजनीति का मूल आर्थिक समीकरण
आधुनिक खेती का किसान मोटे तौर पर इस समीकरण में फंस गया था—
बीज + उर्वरक + मजदूरी + सिंचाई + बिजली + ऋण का ब्याज + मशीन = उत्पादन लागत।
फिर फसल तैयार होने पर किसान के सामने दूसरा पक्ष था—
बाजार मूल्य या सरकारी मूल्य = कृषि आय।
यदि लागत तेजी से बढ़ती जाए और फसल मूल्य उसी अनुपात में न बढ़े तो किसान के लिए अधिक उत्पादन भी पर्याप्त नहीं होता।
यही 1970 के दशक की किसान राजनीति का केंद्रीय आर्थिक तर्क बना।
बिजली ने आंदोलन को साझा मुद्दा दिया
पश्चिमी तमिलनाडु में कुओं और पंपसेटों के विस्तार के कारण बिजली किसान के लिए अनिवार्य कृषि इनपुट बन चुकी थी।
मैं बिजली मनोरंजन या विलासिता के लिए नहीं ले रहा।
इसलिए बिजली शुल्क बढ़ाना सीधे उत्पादन लागत बढ़ाना है।
यही सरल तर्क हजारों किसानों को एक मंच पर लाने में अत्यंत प्रभावी सिद्ध हुआ।
बिजली दरों के आंकड़ों में सावधानी
बिजली शुल्क से संबंधित अलग-अलग राजनीतिक और पत्रकारिता स्रोत 1970 की वृद्धि को अक्सर 8 पैसे से 10 पैसे प्रति यूनिट बताते हैं और आंदोलन के बाद इसे एक पैसा कम किए जाने का उल्लेख करते हैं।
लेकिन बाद के मद्रास उच्च न्यायालय के आधिकारिक शुल्क-इतिहास में 1 जनवरी 1970 से कृषि पंपसेट की दर 9 पैसे प्रति यूनिट दर्ज है। इससे स्पष्ट है कि प्रस्तावित वृद्धि, आंदोलन और अंततः लागू दर के बीच अंतर था।
इसलिए ऐतिहासिक रूप से सबसे सुरक्षित निष्कर्ष है—
1970 में बिजली दर बढ़ाने की सरकारी कोशिश ने व्यापक किसान आंदोलन पैदा किया और आंदोलन के दबाव में अंतिम प्रभावी दर में रियायत दी गई।
1970 : नारायणसामी नायडू की पहली बड़ी परीक्षा
1970 में बिजली शुल्क वृद्धि के विरोध में नारायणसामी नायडू के नेतृत्व वाले किसान संगठन ने बड़े पैमाने पर आंदोलन शुरू किया।
आंदोलन की रणनीति केवल ज्ञापन देने की नहीं थी।
और कनेक्शन काटने की कोशिश का सामूहिक विरोध करेंगे।
यहीं से किसान और तमिलनाडु बिजली बोर्ड के बीच प्रत्यक्ष टकराव शुरू हुआ।
बिजली बिल न देना—सामूहिक आर्थिक असहयोग
एक किसान बिजली बिल न दे तो बिजली बोर्ड आसानी से कार्रवाई कर सकता था।
हजारों किसान एक साथ भुगतान रोक दें तो स्थिति अलग हो जाती है।
प्रशासन को हजारों कनेक्शन काटने पड़ेंगे।
और यदि पंपसेट बंद होते हैं तो सिंचाई और कृषि उत्पादन प्रभावित होगा।
नारायणसामी नायडू के संगठन ने इस प्रशासनिक कमजोरी को पहचाना।
इसलिए बिल न देना किसान आंदोलन की प्रभावी रणनीति बनी।
कनेक्शन काटने पर सामूहिक प्रतिरोध
बकाया बिल की वसूली और बिजली काटने के लिए कर्मचारी गांव पहुंचते तो कई स्थानों पर किसानों ने संगठित प्रतिरोध किया।
बिजली बोर्ड बनाम व्यक्तिगत उपभोक्ता।
1970 में कोयंबटूर क्षेत्र में कनेक्शन काटने के प्रयासों के प्रतिरोध में आंदोलन तेज हुआ और लगभग 3,000 किसानों की गिरफ्तारी का उल्लेख मिलता है।
बैलगाड़ी आंदोलन—ग्रामीण शक्ति शहर में
1970 के आंदोलन की सबसे प्रभावशाली रणनीतियों में बैलगाड़ियों का विशाल प्रदर्शन शामिल था।
9 मई 1970 को कोयंबटूर में हजारों किसान बैलगाड़ियों और ट्रैक्टरों के साथ निकले। तमिल स्रोतों में इस आंदोलन को आगे प्रसिद्ध “कट्टा वंडी पोराट्टम”, अर्थात बैलगाड़ी आंदोलन, की प्रारंभिक बड़ी अभिव्यक्ति के रूप में याद किया जाता है।
ग्रामीण किसान अपने पारंपरिक कृषि वाहन के साथ शहर की राजनीतिक जगह पर कब्जा कर रहा था।
बैलगाड़ी ही क्यों?
बैलगाड़ी के प्रयोग में व्यावहारिक और प्रतीकात्मक दोनों अर्थ थे।
एक बैलगाड़ी सड़क पर काफी जगह घेरती है।
हजारों बैलगाड़ियां शहर की यातायात व्यवस्था रोक सकती हैं।
यह किसान की अपनी दुनिया का साधन था।
इसलिए बैलगाड़ी के साथ प्रदर्शन का संदेश था—
गांव स्वयं शहर के दरवाजे पर आया है।
1970 में पुलिस दमन और किसान मौतें
आंदोलन के बढ़ने के साथ पुलिस और किसानों के बीच गंभीर टकराव हुए।
तमिल राजनीतिक और पत्रकारिता स्रोत 1970 के आंदोलन में पुलिस गोलीबारी से तीन किसानों की मृत्यु का उल्लेख करते हैं।
अब विवाद केवल प्रति यूनिट बिजली शुल्क नहीं रहा।
किसान मौतों ने उसमें राज्य दमन और राजनीतिक न्याय का प्रश्न जोड़ दिया।
सरकार को रियायत देनी पड़ी
आंदोलन और किसान मौतों के बाद द्रमुक सरकार पर दबाव बढ़ा।
बिजली शुल्क में एक पैसे प्रति यूनिट की कमी की गई और किसान ऋण की वसूली भी अस्थायी रूप से स्थगित किए जाने का उल्लेख मिलता है।
यह किसान संगठन के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण जीत थी।
सरकारी आर्थिक नीति आंदोलन से बदली जा सकती है।
बिजली से कर्ज तक
1970 की रियायत में ऋण वसूली स्थगित करने का प्रश्न जुड़ना बहुत महत्वपूर्ण था।
इससे किसान आंदोलन का दायरा साफ दिखाई देता है।
किसान की समस्या केवल बिजली नहीं थी।
आधुनिक कृषि के लिए उसने कर्ज लिया था।
अगर फसल खराब हो जाए या लागत बढ़ जाए तो वही कर्ज संकट बनता था।
इसलिए किसान संगठन का अगला प्राकृतिक प्रश्न था—
कृषि ऋण—सुविधा भी, संकट भी
हरित क्रांति के लिए संस्थागत कृषि ऋण आवश्यक था।
लेकिन फसल विफल होने पर ऋण का स्वरूप बदल जाता।
जो पैसा विकास के लिए लिया गया था वह किसान की संपत्ति की कुर्की का कारण बन सकता था।
यहीं ऋण नीति किसान आंदोलन का स्थायी प्रश्न बनी।
कर्ज-वसूली पर आंदोलन का तर्क
ऐसी स्थिति में कठोर वसूली अन्यायपूर्ण है।
यही मांग आगे भारतीय किसान राजनीति में कर्ज माफी तक विकसित होने वाली थी।
1972 : सरकार ने बिजली दर फिर बढ़ाई
1970 के समझौते से विवाद समाप्त नहीं हुआ।
1 फरवरी 1972 से कृषि पंपसेटों के लिए नई दर लागू हुई।
मद्रास उच्च न्यायालय में दर्ज आधिकारिक शुल्क तालिका के अनुसार—
पहली 100 इकाइयों पर 12 पैसे प्रति यूनिट,
और उसके बाद की खपत पर 11 पैसे प्रति यूनिट
किसानों ने इसे 1970 के संघर्ष से मिली रियायत वापस लेने जैसा माना।
1972 में 12-सूत्री मांगपत्र
मार्च 1972 में किसान नेताओं ने सरकार के सामने 12 मांगें रखीं और उन्हें पूरा करने के लिए समय-सीमा निर्धारित की।
इन मांगों का केंद्रीय उद्देश्य केवल बिजली शुल्क वापस लेना नहीं था।
और किसान आर्थिक सुरक्षा के प्रश्न अब एक व्यापक कार्यक्रम में जुड़ चुके थे। तमिल आंदोलन-स्मृतियों में 15 अप्रैल तक मांगें पूरी करने का अल्टीमेटम दिए जाने का उल्लेख मिलता है।
यह दिखाता है कि आंदोलन अब स्थायी संगठित दबाव समूह बन चुका था।
मई 1972 : प्रत्यक्ष आंदोलन
9 मई 1972 से किसान आंदोलन ने फिर प्रत्यक्ष अवरोध और गिरफ्तारियां देने की रणनीति अपनाई।
किसानों ने सरकारी संस्थानों के सामने प्रदर्शन किए।
नेताओं और बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं को जेल भेजा गया।
लेकिन इस बार संगठन ने सरकार पर दबाव बनाने के लिए एक और शक्तिशाली हथियार तैयार किया—
दूध और सब्जी रोकने की रणनीति
2 से 4 जून 1972 के बीच किसान आंदोलन ने शहरों में दूध और सब्जियों की आपूर्ति रोकने का आह्वान किया।
यह रणनीति राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
यदि शहर मेरी आर्थिक समस्या नहीं समझता, तो उसे यह समझना होगा कि उसकी रोजमर्रा की खाद्य आपूर्ति गांव के उत्पादक पर निर्भर है।
यह प्रतिरोध कृषि और शहरी अर्थव्यवस्था के परस्पर संबंध को प्रत्यक्ष रूप से सामने लाया।
“उत्पादक की शक्ति” का प्रदर्शन
फैक्टरी मजदूर कारखाना बंद कर सकता है।
किसान की उत्पादन इकाई हजारों गांवों में फैली होती है।
इसलिए उसकी सामूहिक शक्ति दिखाना कठिन होता है।
या दूसरी कृषि वस्तुओं की आपूर्ति रोकना किसान का औद्योगिक हड़ताल जैसा हथियार बन सकता था।
तमिलनाडु किसान आंदोलन ने 1972 में इस संभावना का प्रयोग किया।
7 जून 1972 : बैलगाड़ियों से कोयंबटूर ठप
जून 1972 का बैलगाड़ी आंदोलन तमिलनाडु किसान इतिहास के सबसे नाटकीय प्रदर्शनों में से एक बना।
किसानों ने हजारों बैलगाड़ियां कोयंबटूर की प्रमुख सड़कों, बस अड्डों, रेलवे स्टेशन और जिला कलेक्टर कार्यालय के आसपास खड़ी कर दीं।
समकालीन स्मृतियों के अनुसार शहर लगभग ठप हो गया और जिला कलेक्टर को अपने कार्यालय तक पैदल पहुंचना पड़ा।
बैलगाड़ी अब आंदोलन का स्थायी राजनीतिक प्रतीक बन चुकी थी।
नायडू की गिरफ्तारी का उलटा असर
प्रशासन ने आंदोलन को रोकने के लिए नारायणसामी नायडू को गिरफ्तार किया।
सरकार का अनुमान था कि नेता हटेगा तो भीड़ बिखर जाएगी।
दूसरे किसान नेताओं ने आंदोलन जारी रखा और बैलगाड़ी अवरोध फैल गया।
अंततः नायडू को रिहा करना पड़ा और उन्होंने कलेक्टर कार्यालय के सामने एकत्र किसानों को संबोधित किया।
यह घटना दिखाती है कि तब तक आंदोलन एक व्यक्ति पर निर्भर संगठन से आगे बढ़ चुका था।
सड़क अवरोध एक स्थायी रणनीति बना
1972 के अनुभव के बाद सड़क अवरोध किसान आंदोलन की मान्यता प्राप्त रणनीति बन गया।
यदि गांव में धरना हो तो राज्य उसे अनदेखा कर सकता है।
यदि राज्य या राष्ट्रीय राजमार्ग ठप हो जाए—
इसलिए किसान ने अपनी भौगोलिक बिखराव की कमजोरी को सड़क नियंत्रण की ताकत में बदल दिया।
आंदोलन और कानून-व्यवस्था का टकराव
यहीं राज्य और किसान संगठन की दृष्टि अलग हो जाती थी।
हमारी मांग सुनी नहीं जा रही, इसलिए रास्ता रोक रहे हैं।
सार्वजनिक यातायात और कानून-व्यवस्था बनाए रखना हमारी जिम्मेदारी है।
दोनों पक्ष पीछे हटने को तैयार न हों तो संघर्ष हिंसक हो सकता है।
जुलाई 1972 : राज्यव्यापी बंद
किसान संगठनों ने जुलाई 1972 में राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया।
तमिलनाडु सरकार की एक बाद की आधिकारिक पत्रिका के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार 5 जुलाई 1972 को पुलिस गोलीबारी की अलग-अलग घटनाओं में एक ही दिन 14 किसान मारे गए—
तथा सत्तूर, अलगापुरी और मानामदुरै क्षेत्र में एक-एक।
यह 1970 के दशक के तमिल किसान आंदोलन का सबसे रक्तरंजित दिनों में से एक था।
मृतकों की संख्या पर स्रोतों में अंतर
तमिलनाडु सरकार से जुड़े उपर्युक्त स्रोत में 5 जुलाई की अलग-अलग गोलीबारियों में 14 मौतें दर्ज हैं।
कुछ बाद की पत्रकारिता और आंदोलन-स्मृतियां 1972 के व्यापक आंदोलन में 15 किसान मौतों का उल्लेख करती हैं।
इसलिए अध्याय में सबसे सटीक रूप यही होगा—
5 जुलाई 1972 की राज्यव्यापी कार्रवाई में आधिकारिक बाद के विवरण के अनुसार 14 किसान मारे गए; व्यापक 1972 आंदोलन के लिए कुछ स्रोत कुल संख्या 15 बताते हैं।
इतनी बड़ी संख्या में गोलीबारी क्यों हुई?
आंदोलन अब केवल एक शहर तक सीमित नहीं था।
सरकार ने इसे कानून-व्यवस्था की व्यापक चुनौती के रूप में देखा।
पुलिस द्वारा गोलीबारी के अनेक स्थल यह बताते हैं कि आंदोलन की भौगोलिक पहुंच कितनी बढ़ चुकी थी।
एक जिला आंदोलन अब वास्तव में तमिलनाडु किसान आंदोलन बन गया था।
किसान मौतों ने राजनीतिक संतुलन बदल दिया
गोलीबारी का तात्कालिक उद्देश्य आंदोलन को नियंत्रित करना था।
लेकिन बड़े पैमाने पर मौतों ने सरकार के सामने नैतिक संकट पैदा कर दिया।
बिजली की दर में कुछ पैसे की वृद्धि के विरोध में किसानों पर गोलियां क्यों चलीं?
इसने आंदोलन को ग्रामीण समाज में भावनात्मक शक्ति दी।
मृत किसानों को आंदोलन की स्मृति में शहीद के रूप में देखा जाने लगा।
सरकार को वार्ता करनी पड़ी
जुलाई 1972 में नारायणसामी नायडू के नेतृत्व में सरकार और किसान प्रतिनिधियों के बीच कई दिनों तक वार्ता चली।
तमिल स्रोत 13 से 16 जुलाई तक बातचीत और 19 जुलाई 1972 को समझौते का उल्लेख करते हैं।
इसके तहत बिजली दर में प्रति यूनिट एक पैसे की कमी तथा गिरफ्तार किसानों की रिहाई जैसी रियायतें दी गईं।
यह किसान संगठन की दूसरी बड़ी राजनीतिक जीत थी।
आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि—सरकार से बराबरी की बातचीत
इस समझौते का महत्व केवल एक पैसा कम होने में नहीं था।
असल उपलब्धि यह थी कि राज्य सरकार को नारायणसामी नायडू और किसान संगठन को ऐसे पक्ष के रूप में स्वीकार करना पड़ा जिसके साथ कृषि नीति पर बातचीत करनी होगी।
यानी किसान संगठन अब केवल विरोधी भीड़ नहीं था।
वह नीति-सौदेबाजी की संस्था बन चुका था।
1973 तक राज्यव्यापी संगठन
नायडू ने 1966 में उत्तरी कोयंबटूर में जिस किसान नेटवर्क की शुरुआत की थी, वह 1967 तक जिला संगठन और लगभग 1973 तक राज्यव्यापी शक्ति बन चुका था।
यह सात वर्षों का उल्लेखनीय संगठनात्मक विस्तार था।
इस सफलता के पीछे तीन मुख्य कारण थे—
और सरकारी रियायत हासिल करने की क्षमता।
बिजली के बाद आंदोलन क्यों समाप्त नहीं हुआ?
क्योंकि बिजली शुल्क मूल संकट का केवल एक हिस्सा था।
इसलिए संगठन एक मांग पूरी होने के बाद भंग नहीं हुआ।
1970 का दशक और महंगाई
1970 के दशक में भारत ने व्यापक महंगाई और तेल संकट का सामना किया।
आधुनिक कृषि बाजार से जितनी अधिक जुड़ी थी, इन लागतों से उतनी अधिक प्रभावित होती थी।
इसलिए किसान की शिकायत केवल राज्य सरकार से नहीं थी।
वह व्यापक आर्थिक नीति से जुड़ने लगी।
फसल मूल्य आंदोलन का केंद्रीय प्रश्न बना
यदि बिजली दर घट भी जाए लेकिन किसान की फसल उचित मूल्य पर न बिके तो संकट बना रहता।
इसलिए किसान संगठन की मांगों में लाभकारी मूल्य का प्रश्न लगातार मजबूत हुआ।
यह नई किसान राजनीति का बुनियादी सिद्धांत था—
कृषि उपज का मूल्य ऐसा हो कि किसान को—
यह आगे पूरे भारत के किसान आंदोलनों का केंद्रीय प्रश्न बनने वाला था।
किसान और उपभोक्ता के बीच नीति-द्वंद्व
शहरी और गरीब उपभोक्ता सस्ता खाद्यान्न चाहता है।
सरकार दोनों को संतुलित करना चाहती है।
यदि फसल मूल्य बढ़ाया जाए तो खाद्य महंगाई बढ़ सकती है।
यदि मूल्य दबाया जाए तो किसान की आय घट सकती है।
यहीं कृषि मूल्य नीति का स्थायी द्वंद्व पैदा होता है।
नायडू का आंदोलन इसमें साफ तौर पर उत्पादक किसान की तरफ खड़ा था।
कृषि और उद्योग के बीच “विनिमय की शर्तें”
नई किसान राजनीति का तर्क धीरे-धीरे व्यापक हुआ—
किसान औद्योगिक वस्तुएं बाजार मूल्य पर खरीदता है।
लेकिन कृषि उपज को सस्ता रखने के लिए सरकार हस्तक्षेप करती है।
क्या कृषि से शहर और उद्योग की ओर आय का हस्तांतरण हो रहा है?
यही प्रश्न आगे “कृषि बनाम उद्योग” और “भारत बनाम इंडिया” जैसी राजनीतिक शब्दावलियों के अलग-अलग रूपों तक जाएगा।
आंदोलन ने चुनावी राजनीति को प्रभावित करना शुरू किया
नारायणसामी नायडू स्वयं किसी बड़े राजनीतिक दल के अधीन नहीं थे।
किसान संगठन सत्ता में मौजूद दल का विरोध कर सकता था।
1970 और 1972 में लक्ष्य द्रमुक सरकार थी।
लेकिन सत्ता बदलने के बाद वही आंदोलन अन्नाद्रमुक सरकार से भी टकराएगा।
हम स्थायी विपक्ष नहीं; किसान हितों के आधार पर सत्ता का मूल्यांकन करेंगे।
1976–77 : बिजली शुल्क फिर ऊंचा
मद्रास उच्च न्यायालय में संरक्षित आधिकारिक शुल्क तालिका बताती है कि 1970 के दशक के मध्य तक कृषि पंपसेट बिजली शुल्क फिर बढ़ गया था।
1 अप्रैल 1976 से दर 16 पैसे प्रति यूनिट के साथ निश्चित शुल्क लागू था।
1 जुलाई 1977 से छोटे किसानों के लिए 14 पैसे और बड़े किसानों के लिए 16 पैसे की विभेदित दर दर्ज है।
यह व्यवस्था स्वयं बताती है कि किसान आंदोलन के दबाव में सरकार अब छोटे और बड़े किसान के बीच अंतर करने की नीति पर विचार कर रही थी।
छोटे और बड़े किसान को अलग दर—नई नीति
लेकिन किसान संगठन की दृष्टि से प्रश्न था—
क्या कृषि बिजली पर लगातार शुल्क बढ़ाया जाना उचित है?
इसी कारण 1977–78 में आंदोलन फिर तेज हुआ।
1977 में राजनीतिक सत्ता बदल गई
1977 में तमिलनाडु में एम. जी. रामचंद्रन के नेतृत्व में अन्नाद्रमुक सरकार बनी।
नई सरकार को व्यापक ग्रामीण समर्थन मिला था।
लेकिन किसान संगठन की स्वतंत्रता की पहली परीक्षा जल्दी आने वाली थी।
नारायणसामी नायडू ने यह संकेत नहीं दिया कि सत्ता परिवर्तन के कारण आंदोलन स्थगित हो जाएगा।
1977–78 : फिर बिजली प्रश्न
1977–78 में बिजली शुल्क, मीटर किराया और पंपसेट पर लगने वाले निश्चित शुल्क को लेकर किसानों में फिर असंतोष बढ़ा।
बाद के ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि बढ़े हुए बिजली शुल्क और अन्य चार्जों के विरोध में आंदोलन ने फिर सड़क अवरोध और तीव्र प्रतिरोध का रूप लिया।
एम.जी. रामचंद्रन की अन्नाद्रमुक सरकार थी।
इससे आंदोलन की स्वतंत्रता सिद्ध हुई
यह राजनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण था।
इससे नायडू की राजनीति का दावा मजबूत हुआ—
1978–80 का निर्णायक किसान संघर्ष
एम.जी. रामचंद्रन सरकार से टकराव, बिजली शुल्क, कर्ज-वसूली, राज्यव्यापी बंद, सड़क संघर्ष, पुलिस गोलीबारी, किसान मौतें और आंदोलन का राजनीतिक प्रभाव
1978 से 1980 के बीच तमिलनाडु का किसान आंदोलन अपने सबसे उग्र और राजनीतिक रूप से जटिल चरणों में से एक से गुजरा। 1970 और 1972 में द्रमुक सरकार के विरुद्ध बिजली शुल्क पर बड़े संघर्ष कर चुके नारायणसामी नायडू और उनके किसान संगठन के सामने अब नई सरकार थी। जून 1977 में एम. जी. रामचंद्रन के नेतृत्व में अन्नाद्रमुक सत्ता में आई थी। एमजीआर की राजनीतिक छवि गरीबों, मजदूरों और ग्रामीण जनता के संरक्षक की थी, इसलिए किसान संगठन को प्रारंभिक उम्मीद थी कि नई सरकार उनकी मांगों के प्रति अधिक अनुकूल होगी।
लेकिन शीघ्र ही स्थिति उलटी दिशा में चली गई।
पर सरकार और किसान संगठन के बीच मतभेद इतने बढ़े कि अप्रैल 1978 में तमिलनाडु ने व्यापक सड़क अवरोध, गिरफ्तारी, पुलिस गोलीबारी और बड़ी संख्या में किसान मौतें देखीं।
एक वर्ष बाद 1979 में वैगैकुलम में किसान–पुलिस संघर्ष और पांच लोगों की मृत्यु ने संकट फिर भड़का दिया। 1980 तक विवाद किसान कर्ज और राज्य की वसूली नीति के प्रश्न पर और तेज हो गया। दिसंबर 1980 में नारायणसामी नायडू के विरुद्ध राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के इस्तेमाल तक स्थिति पहुंची।
इसलिए 1978–80 को तमिलनाडु किसान इतिहास में केवल एक आंदोलन नहीं, बल्कि किसान संगठन और आधुनिक कल्याणकारी राज्य के बीच शक्ति-परीक्षण के रूप में देखना चाहिए।
एमजीआर सत्ता में आए—किसानों की उम्मीदें
1977 के विधानसभा चुनावों में अन्नाद्रमुक ने सत्ता प्राप्त की और एम. जी. रामचंद्रन मुख्यमंत्री बने।
ऐसी परिस्थितियों में किसान संगठनों को उम्मीद थी कि पिछली सरकार से चल रहे कृषि बिजली, ऋण और मूल्य संबंधी विवादों का समाधान अपेक्षाकृत आसानी से होगा।
लेकिन नया टकराव बहुत जल्दी सामने आ गया।
समस्या सरकार बदलने से नहीं बदली थी
लेकिन आधुनिक किसान की आर्थिक संरचना वही थी।
यदि इनकी लागत बढ़ती तो किसान के लिए यह महत्वहीन था कि सत्ता में द्रमुक है या अन्नाद्रमुक।
नारायणसामी नायडू के आंदोलन की स्वतंत्रता यहीं सिद्ध हुई।
उन्होंने नई सरकार से भी वही प्रश्न पूछे जो पिछली सरकार से पूछे थे।
बिजली शुल्क फिर विवाद के केंद्र में
1970 के दशक के मध्य में कृषि बिजली की कीमत बढ़ चुकी थी।
आधिकारिक वित्तीय अध्ययनों के अनुसार कृषि बिजली शुल्क 1970 के दशक के उत्तरार्ध में छोटे और बड़े किसानों के लिए अलग-अलग दरों में रखा गया और 1979 में यह लगभग 13.84 पैसे प्रति इकाई छोटे किसानों तथा 15.84 पैसे बड़े किसानों के लिए था।
यह तथ्य दिखाता है कि सरकार किसान वर्ग के भीतर भी अंतर कर रही थी।
लेकिन किसान संगठन का मूल तर्क था कि कृषि बिजली स्वयं अत्यधिक महंगी नहीं होनी चाहिए।
बिजली अकेली समस्या नहीं रही
1978 तक नारायणसामी नायडू का किसान संगठन बिजली के साथ अन्य मुद्दों को भी जोड़ चुका था।
इसलिए किसी एक शुल्क को कम कर देने से कृषि संकट समाप्त नहीं होगा।
यहां आंदोलन एक व्यापक कृषि आर्थिक कार्यक्रम में बदल चुका था।
मार्च 1978 : सरकार और किसान आमने-सामने
1978 के शुरुआती महीनों में सरकार ने किसानों की समस्याओं पर बातचीत के लिए उच्चस्तरीय प्रयास किए।
किसान संगठन चाहता था कि उसकी मांगें स्वीकार की जाएं और विशेष रूप से ऋण-वसूली तथा बिजली शुल्क में राहत दी जाए।
बाद के ऐतिहासिक अध्ययनों के अनुसार मार्च 1978 में किसान प्रतिनिधियों ने सरकार की उच्चस्तरीय समिति की बैठक से असहमति जताते हुए बाहर निकलने का रास्ता चुना।
यहीं से समझौते की जगह आंदोलन ने ली।
नौ-सूत्री मांगपत्र
अप्रैल 1978 की शुरुआत में नारायणसामी नायडू के संगठन ने व्यापक नौ-सूत्री मांगपत्र के आधार पर आंदोलन तेज किया।
इसमें कृषि ऋण और बिजली सहित किसानों की प्रमुख आर्थिक समस्याएं शामिल थीं।
एक आधुनिक अकादमिक अध्ययन भी दर्ज करता है कि 1978 में नायडू ने बिजली बिल, सहकारी ऋण और भूमि कर का भुगतान न करने का आह्वान करते हुए नौ-सूत्री कार्यक्रम के आधार पर राज्यव्यापी आंदोलन चलाया।
यह सामान्य धरना नहीं था
यहां किसान आंदोलन की प्रकृति समझना महत्वपूर्ण है।
यदि किसान केवल राजधानी में ज्ञापन देता तो सरकार उसे कुछ समय टाल सकती थी।
लेकिन नारायणसामी नायडू की रणनीति थी—
राज्य की आर्थिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर सीधा दबाव।
इसलिए सरकार ने इसे केवल मांगपत्र नहीं बल्कि प्रशासनिक चुनौती के रूप में देखना शुरू किया।
किसान का तर्क क्या था?
जब खेती घाटे में है तो सरकार वसूली कैसे कर सकती है?
यदि फसल की कीमत उत्पादन लागत नहीं निकालती तो किसान बिजली बिल और कर्ज कहां से चुकाए?
इसलिए कर्ज न चुकाना किसान की दृष्टि में आर्थिक असमर्थता और राजनीतिक प्रतिरोध दोनों था।
सरकार के लिए यदि बड़े पैमाने पर भुगतान रोक दिया जाए तो—
एमजीआर का दृष्टिकोण
एमजीआर सरकार को लगता था कि किसानों की कुछ मांगें वैध हैं, लेकिन आंदोलन की रणनीति अस्वीकार्य है।
सरकार के लिए कानून-व्यवस्था का प्रश्न थीं।
एमजीआर और नारायणसामी नायडू के बीच संघर्ष इसलिए केवल आर्थिक नीति का नहीं रहा।
लोकतांत्रिक आंदोलन की सीमा कहां समाप्त होती है और राज्य की दमनकारी शक्ति कहां शुरू होती है?
अप्रैल 1978 : आंदोलन पूरे राज्य में फैला
अप्रैल 1978 में किसान बड़े पैमाने पर सड़कों पर उतर आए।
कुछ स्थानों पर आंदोलन हिंसक भी हुआ।
सरकार ने पुलिस बल का व्यापक इस्तेमाल किया।
इस कार्रवाई में कई स्थानों पर पुलिस गोलीबारी हुई।
यहीं 1978 का आंदोलन तमिलनाडु किसान इतिहास के सबसे रक्तरंजित चरणों में शामिल हो गया।
अप्रैल 1978 की मौतों की संख्या—स्रोतों में अंतर
इस विषय पर एक ही संख्या को निर्विवाद तथ्य मानना उचित नहीं होगा।
एमजीआर के तत्कालीन पुलिस प्रमुख के. मोहनदास की पुस्तक से उद्धृत विवरण के अनुसार अप्रैल 1978 के किसान आंदोलन में पुलिस गोलीबारी से 14 लोगों की मृत्यु हुई।
दूसरे विवरण कुछ विशिष्ट गोलीबारियों या अलग समयावधियों के लिए कम संख्या बताते हैं।
अप्रैल 1978 के राज्यव्यापी किसान आंदोलन में पुलिस गोलीबारियों और संघर्षों में अनेक किसान मारे गए; के. मोहनदास से उद्धृत विवरण कुल संख्या 14 बताता है।
पुलिस गोलीबारी क्यों निर्णायक बनी?
बिजली और ऋण का आर्थिक आंदोलन किसान मौतों के बाद नैतिक और राजनीतिक संघर्ष बन गया।
क्या बिजली और कर्ज राहत मांगने पर किसानों पर गोली चलेगी?
क्या आंदोलन के नाम पर हिंसा और प्रशासन को ठप होने दिया जाए?
इस प्रकार दोनों पक्षों की भाषा बदल गई।
किसान आंदोलन में हिंसा का प्रश्न
संतुलित इतिहास के लिए यह स्वीकार करना भी आवश्यक है कि आंदोलन हर जगह पूरी तरह अहिंसक नहीं रहा।
पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच हिंसक संघर्ष
जैसी घटनाएं विभिन्न स्रोतों में दर्ज हैं।
1977–78 के चरण के बारे में बाद के विवरणों में सड़क अवरोध तथा कुछ पुलों को क्षति पहुंचाए जाने तक का उल्लेख मिलता है।
इससे राज्य की कठोर कार्रवाई स्वतः उचित सिद्ध नहीं होती।
लेकिन यह तथ्य आंदोलन की प्रकृति को समझने के लिए आवश्यक है।
हजारों गिरफ्तारियां
सरकार ने आंदोलन को नियंत्रित करने के लिए बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों का सहारा लिया।
एक आधुनिक अध्ययन 1978 के आंदोलन में लगभग 6,000 किसानों की गिरफ्तारी का उल्लेख करता है।
आंकड़े अलग-अलग स्रोतों में कुछ भिन्न हो सकते हैं, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि गिरफ्तारी की संख्या बहुत बड़ी थी।
यह किसान संगठन की राज्यव्यापी पहुंच का भी प्रमाण था।
नायडू की गिरफ्तारी
नारायणसामी नायडू स्वयं भी सरकारी कार्रवाई के निशाने पर आए।
सरकार का मानना था कि उनके भाषण और आह्वान आंदोलन को उग्र बना रहे हैं।
नायडू की गिरफ्तारी का उद्देश्य नेतृत्व को अलग करके आंदोलन नियंत्रित करना था।
लेकिन पिछले अनुभव की तरह इससे संगठन स्वतः समाप्त नहीं हुआ।
अब तमिलनाडु एग्रीकल्चरिस्ट्स एसोसिएशन के पास व्यापक स्थानीय नेतृत्व मौजूद था।
सरकार और किसान के बीच विश्वास टूटने लगा
1978 के संघर्ष का दीर्घकालीन नुकसान था—
सरकार बातचीत तभी करती है जब सड़क पर बड़ा दबाव हो।
किसान संगठन बातचीत की बजाय प्रशासन को चुनौती देने की रणनीति अपनाता है।
इसके बाद आने वाले प्रत्येक विवाद में दोनों पक्ष पिछले संघर्ष की स्मृति साथ लेकर बैठे।
यही कारण है कि अगली टक्कर जल्दी और अधिक तीखी हुई।
एमजीआर के सामने राजनीतिक विरोधाभास
एमजीआर की सार्वजनिक छवि गरीब समर्थक थी।
लेकिन अब उसी सरकार पर किसानों के विरुद्ध कठोर पुलिस कार्रवाई का आरोप लग रहा था।
यह उनके लिए विशेष रूप से असुविधाजनक था।
उनकी फिल्मों और राजनीति में ग्रामीण गरीब तथा सामान्य नागरिक की रक्षा करने वाले नायक की छवि अत्यंत मजबूत थी।
किसान गोलीबारी इस छवि से टकराती थी।
इसीलिए सरकार के लिए केवल दमन पर्याप्त राजनीतिक उत्तर नहीं था।
आंदोलन के बाद राहत की दिशा
1978–79 के संघर्षों के बाद एमजीआर सरकार ने कृषि राहत के कई कदमों पर विचार किया।
बिजली दरों में छोटे किसानों को अलग राहत,
कर्ज-वसूली के प्रश्न पर पुनर्विचार,
और कृषि क्षेत्र के लिए अन्य रियायतें
यह सरकार की राजनीतिक मजबूरी भी थी और किसान संकट की वास्तविकता की स्वीकारोक्ति भी।
1979 : संकट खत्म नहीं हुआ
1978 की भारी हिंसा के बाद भी किसान आंदोलन शांत नहीं हुआ।
1979 में एक अलग लेकिन महत्वपूर्ण संघर्ष उभरा—
यह केवल बिजली शुल्क का विवाद नहीं था।
यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाता है कि तमिलनाडु की किसान राजनीति बिजली से आगे जल संसाधन तक पहुंच रही थी।
वैगैकुलम का विवाद क्या था?
वैगैकुलम और आसपास के किसान सरकारी पेयजल योजना के अंतर्गत कुओं की खुदाई का विरोध कर रहे थे।
उनकी आशंका थी कि नए सरकारी कुओं से बड़ी मात्रा में पानी निकाला गया तो—
यह आधुनिक तमिलनाडु किसान राजनीति के सबसे प्रारंभिक भूजल संघर्षों में से एक माना जा सकता है।
एमजीआर के तत्कालीन पुलिस प्रमुख के संस्मरण पर आधारित विवरण भी यही कारण दर्ज करता है।
विकास बनाम किसान—एक नया टकराव
दोनों सार्वजनिक हित का दावा कर रहे थे।
भूमिगत जल पर प्राथमिक अधिकार किसका है?
आने वाले दशकों में तमिलनाडु में यह प्रश्न और गंभीर होने वाला था।
अप्रैल 1979 : वैगैकुलम पुलिस गोलीबारी
किसानों और प्रशासन का संघर्ष इतना बढ़ा कि पुलिस गोलीबारी हुई।
के. मोहनदास के विवरण के अनुसार वैगैकुलम की गोलीबारी में पांच लोग मारे गए, जिनमें दो किसान महिलाएं भी थीं।
यह घटना 1978 के घाव भरने से पहले हुई।
किसान संगठन और सरकार के बीच नया विस्फोट।
वैगैकुलम की महिलाओं की मृत्यु का महत्व
किसान आंदोलन को अक्सर पुरुष स्वामी किसान की राजनीति माना जाता है।
लेकिन वैगैकुलम में महिलाओं की मौत यह दिखाती है कि कृषि और जल का प्रश्न पूरे ग्रामीण परिवार से जुड़ा था।
इसलिए आंदोलन में महिलाएं भी प्रत्यक्ष भागीदार थीं।
पहले जांच, या पहले गोली?
वैगैकुलम के बाद सरकार ने इस प्रश्न की जांच का आश्वासन दिया कि प्रस्तावित कुओं से वास्तव में भूजल पर विपरीत असर पड़ेगा या नहीं।
सरकार की आलोचना करने वालों का प्रश्न था—
यदि जांच आवश्यक थी तो वह गोलीबारी से पहले क्यों नहीं हुई?
के. मोहनदास के बाद प्रकाशित विवरण में भी इसी क्रम की आलोचना की गई है।
यह विकास प्रशासन की एक महत्वपूर्ण विफलता की ओर संकेत करता है—
तकनीकी विवाद को समय रहते विश्वसनीय संवाद से हल न करना।
23 अप्रैल 1979 : राज्यव्यापी बंद
वैगैकुलम गोलीबारी के विरोध में नारायणसामी नायडू के नेतृत्व वाले किसान संगठन ने 23 अप्रैल 1979 को राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया।
एमजीआर के पुलिस प्रमुख के संस्मरण के अनुसार सरकार ने इसे कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती माना और बड़े स्तर पर तैयारी की।
और किसानों पर पुलिस दमन के खिलाफ प्रतिरोध।
23 अप्रैल को हिंसा
राज्यव्यापी बंद पूरी तरह शांतिपूर्ण नहीं रहा।
अलग-अलग स्थानों पर हिंसक घटनाएं हुईं।
के. मोहनदास के विवरण में कोयंबटूर क्षेत्र में पुलिस कार्रवाई के बाद दो किसानों की हत्या और एक पुलिस उपनिरीक्षक की हत्या जैसी घटनाओं का उल्लेख है।
राज्यसभा में जनवरी 1980 की बहस में भी अन्नाद्रमुक के एक सदस्य ने तिरुनेलवेली जिले में किसान संगठन से जुड़े हिंसक आंदोलनकारियों द्वारा एक उपनिरीक्षक की हत्या का उल्लेख किया। यह सत्तारूढ़ पक्ष का संसदीय दावा था और उसे उसी रूप में पढ़ना चाहिए।
किसान आंदोलन के लिए हिंसा का संकट
पुलिस की गोलीबारी ने किसान संगठन को नैतिक समर्थन दिलाया।
लेकिन पुलिसकर्मियों या दूसरे नागरिकों की हत्या जैसी घटनाएं आंदोलन की नैतिक स्थिति को कमजोर भी करती थीं।
सरकार इन्हीं घटनाओं का उपयोग कठोर कार्रवाई को उचित ठहराने के लिए कर सकती थी।
इसलिए नायडू के सामने भी कठिन सवाल था—
किसान आक्रोश को इतनी बड़ी संख्या में संगठित करते हुए उसे हिंसा से कैसे नियंत्रित किया जाए?
24–25 अप्रैल 1979 : एमजीआर–किसान वार्ता
बंद के तुरंत बाद सरकार और किसान नेतृत्व के बीच बातचीत हुई।
एक आधुनिक अकादमिक अध्ययन के अनुसार एमजीआर सरकार और किसान प्रतिनिधियों के बीच 24 और 25 अप्रैल 1979 को वार्ता हुई। इसी दौरान नारायणसामी नायडू को सीने में दर्द की शिकायत हुई और उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा।
यह वार्ता बताती है कि दमन के बावजूद सरकार किसान संगठन की शक्ति की अनदेखी नहीं कर सकती थी।
एमजीआर ने रणनीति बदली
1978–79 के अनुभव के बाद एमजीआर के सामने स्पष्ट हो गया कि केवल पुलिस कार्रवाई से किसान संकट हल नहीं होगा।
और किसानों को पर्याप्त आर्थिक राहत देना।
यहीं से बड़ी कृषि राहत योजना सामने आई।
22 मई 1979 : राहत पैकेज
एक अकादमिक अध्ययन के अनुसार 22 मई 1979 को एमजीआर सरकार ने लगभग 16 लाख किसानों के लिए 25 राहत उपायों का एक पैकेज घोषित किया, जिसकी उस समय अनुमानित लागत लगभग 40 करोड़ रुपये बताई गई।
इसमें कृषि ऋण से राहत सहित विभिन्न उपाय शामिल थे।
यह किसान आंदोलन की राजनीतिक ताकत का स्पष्ट प्रमाण था।
जिस सरकार ने कुछ सप्ताह पहले पुलिस बल का प्रयोग किया था, वही अब बड़े वित्तीय राहत कार्यक्रम की घोषणा कर रही थी।
छोटे किसानों के ऋण में राहत
अध्ययन के अनुसार एमजीआर सरकार ने छोटे किसानों के कुछ अल्पकालीन ऋणों को माफ करने, शुष्क भूमि के लिए भूमि-राजस्व छूट सीमा बढ़ाने और गैर-नकदी फसलों के संदर्भ में कृषि आयकर से राहत जैसे कदम उठाए।
अर्थात सरकार किसान आंदोलन की सभी मांगें स्वीकार नहीं कर रही थी।
लेकिन यह स्वीकार कर रही थी कि किसान ऋण और कर का बोझ वास्तविक राजनीतिक समस्या है।
नायडू संतुष्ट क्यों नहीं हुए?
किसान संगठन की मांग सरकारी राहत से कहीं अधिक व्यापक थी।
अकादमिक अध्ययन के अनुसार नारायणसामी नायडू लगभग 302 करोड़ रुपये के समस्त किसान ऋण की माफी की मांग तक पहुंच गए थे।
एमजीआर का मानना था कि इतनी व्यापक मांग वित्तीय रूप से अव्यावहारिक है।
यहीं दोनों की राजनीति का मूल अंतर सामने आया।
कर्ज माफी की राजनीति का प्रारंभिक रूप
आज कृषि ऋण माफी भारतीय चुनावी राजनीति का परिचित विषय है।
लेकिन 1970 के दशक के तमिलनाडु आंदोलन में इसके विकसित रूप को देखना महत्वपूर्ण है।
किसान संगठन ने पहली बार इतने बड़े पैमाने पर यह तर्क रखा—
यदि कृषि संकट संरचनात्मक है तो केवल ऋण की किश्त आगे बढ़ाना पर्याप्त नहीं।
कर्ज का एक हिस्सा या पूरा कर्ज समाप्त करना पड़ सकता है।
यही विचार आगे विभिन्न राज्यों और राष्ट्रीय राजनीति में बार-बार सामने आया।
एमजीआर को नायडू पर संदेह होने लगा
लगातार आंदोलन के बाद एमजीआर और उनकी सरकार को लगा कि किसान संगठन केवल आर्थिक मांगों तक सीमित नहीं है।
सरकार के भीतर यह धारणा विकसित हुई कि कुछ बड़े भू-स्वामी और राजनीतिक विरोधी किसान असंतोष का इस्तेमाल सरकार को अस्थिर करने के लिए कर रहे हैं।
एक अकादमिक अध्ययन में एमजीआर की यही धारणा दर्ज है कि नारायणसामी नायडू गरीब किसानों को कानून-व्यवस्था संकट में धकेल रहे हैं और बड़े भू-स्वामी आंदोलन को हवा दे रहे हैं।
यह सरकार का दृष्टिकोण था; इसे किसान आंदोलन पर सिद्ध तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।
किसान संगठन का जवाब
आंदोलन किसी विपक्षी दल की कठपुतली नहीं है।
यदि द्रमुक सरकार गलत करेगी तो उसका विरोध होगा।
यदि अन्नाद्रमुक सरकार गलत करेगी तो उसका भी।
यही स्वतंत्र किसान राजनीति उनकी राजनीतिक पहचान थी।
लेकिन बड़े आंदोलनों के दौरान विपक्षी दलों का समर्थन मिलना स्वाभाविक था।
इससे सरकार को आंदोलन के पीछे राजनीतिक षड्यंत्र देखने का अवसर मिलता था।
किसान आंदोलन राष्ट्रीय संसद में
1978–80 के तमिल किसान आंदोलन की तीव्रता का प्रमाण यह है कि उसके प्रश्न संसद तक पहुंचे।
जनवरी 1980 की राज्यसभा बहस में एक सदस्य ने कहा कि तमिलनाडु के किसान लगभग एक वर्ष से मुख्यतः कर्ज राहत के लिए आंदोलन कर रहे हैं और राज्य द्वारा कठोर उपाय तथा आपराधिक मुकदमे इस्तेमाल किए जा रहे हैं। उन्होंने बीज, उर्वरक, कीटनाशक और डीजल पर सब्सिडी तथा राष्ट्रीय ऋण राहत नीति की मांग भी रखी।
अब तमिलनाडु का किसान संकट केवल राज्य का आंतरिक प्रश्न नहीं रहा था।
केंद्र और राज्य दोनों पर दबाव
किसान आंदोलन धीरे-धीरे समझ रहा था कि कई समस्याओं का समाधान केवल चेन्नई में नहीं है।
इसलिए नारायणसामी नायडू का आंदोलन राष्ट्रीय किसान मंच की दिशा में बढ़ा।
यहीं तमिलनाडु के संघर्ष का संबंध बाद के अखिल भारतीय किसान समन्वय प्रयासों से जुड़ता है।
जनवरी 1980 लोकसभा चुनाव
1980 के लोकसभा चुनाव में तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा बदलाव हुआ।
इंदिरा गांधी की कांग्रेस और द्रमुक गठबंधन ने राज्य में भारी सफलता हासिल की और अन्नाद्रमुक–जनता गठबंधन को बड़ा झटका लगा।
और सरकार के खिलाफ विभिन्न वर्गों का असंतोष।
किसान संघर्ष इनमें से एक राजनीतिक दबाव था, लेकिन उसे अकेला कारण कहना उचित नहीं होगा।
फरवरी 1980 में एमजीआर सरकार की बर्खास्तगी
इंदिरा गांधी के केंद्र में लौटने के बाद फरवरी 1980 में कई विपक्ष-शासित राज्यों की सरकारों को बर्खास्त किया गया।
तमिलनाडु की एमजीआर सरकार भी उनमें शामिल थी।
यह केंद्र द्वारा अनेक विपक्षी राज्य सरकारों को एक साथ हटाने की व्यापक राजनीतिक कार्रवाई का हिस्सा था।
मई 1980 : एमजीआर की शानदार वापसी
किसान आंदोलन एमजीआर के लिए गंभीर चुनौती था,
करुणानिधि बनाम एमजीआर
द्रमुक और अन्नाद्रमुक की किसान नीति की तुलनात्मक समीक्षा; बिजली शुल्क, मुफ्त बिजली की दिशा, कर्ज राहत, सिंचाई, भूमि सुधार, पुलिस दमन और ग्रामीण चुनावी राजनीति
तमिलनाडु के किसान इतिहास को यदि केवल आंदोलनों की श्रृंखला के रूप में देखा जाए तो एक महत्वपूर्ण पक्ष अधूरा रह जाता है—इन आंदोलनों के दबाव में राज्य की दो प्रमुख द्रविड़ राजनीतिक धाराओं ने कृषि नीति को किस तरह बदला?
1967 के बाद तमिलनाडु की राजनीति मुख्यतः दो द्रविड़ दलों के बीच घूमती रही—द्रमुक और आगे उससे निकली अन्नाद्रमुक। एम. करुणानिधि और एम. जी. रामचंद्रन दोनों ने स्वयं को सामाजिक न्याय और गरीबों के हित से जोड़ा, लेकिन किसान प्रश्न पर उनके शासन की प्राथमिकताएं बिल्कुल समान नहीं थीं।
करुणानिधि के दौर की सबसे महत्वपूर्ण कृषि विरासत थी—
भूमि-संबंधों और कृषि मजदूर अधिकारों में कानूनी हस्तक्षेप।
एमजीआर के दौर में केंद्र अधिक स्पष्ट रूप से स्थानांतरित हुआ—
कृषि लागत, बिजली, ऋण राहत और छोटे किसानों के लिए प्रत्यक्ष आर्थिक रियायतों की ओर।
करुणानिधि सरकार ने किसान आंदोलनों पर पुलिस बल का इस्तेमाल किया।
एमजीआर सरकार ने भी किया—और कई मामलों में अधिक कठोर रूप में।
एमजीआर ने छोटे किसानों के लिए मुफ्त कृषि बिजली की दिशा खोली।
लेकिन सभी कृषि कनेक्शनों के लिए सार्वभौमिक मुफ्त बिजली 1990 में करुणानिधि की द्रमुक सरकार के समय लागू हुई। मद्रास उच्च न्यायालय में संरक्षित आधिकारिक शुल्क इतिहास के अनुसार 15 सितंबर 1984 से छोटे किसानों को मुफ्त बिजली मिली, जबकि बड़े किसानों पर निश्चित प्रति अश्वशक्ति शुल्क जारी रहा; 1 अगस्त 1990 से सभी कृषि कनेक्शनों के लिए मुफ्त आपूर्ति की व्यवस्था की गई।
इसलिए तमिलनाडु की कृषि नीति को “एक दल किसान-समर्थक, दूसरा किसान-विरोधी” जैसे सरल समीकरण में रखना इतिहास को विकृत करेगा।
तुलना की शुरुआत 1967 से क्यों?
1967 तमिलनाडु की राजनीति का निर्णायक वर्ष था।
कांग्रेस की लंबी सत्ता समाप्त हुई और सी. एन. अन्नादुरै के नेतृत्व में द्रमुक सरकार बनी।
1969 में अन्नादुरै के निधन के बाद एम. करुणानिधि मुख्यमंत्री बने।
उनके सामने कृषि क्षेत्र की विरासत थी—
और पश्चिमी तमिलनाडु में उभरता बिजली–पंपसेट किसान।
यानी द्रमुक सरकार को एक साथ दो अलग कृषि प्रश्नों से निपटना था।
करुणानिधि की पहली कृषि चुनौती—भूमिहीन मजदूर
करुणानिधि सरकार के शुरुआती वर्षों में पूर्वी तंजावुर का प्रश्न अभी जीवित था।
कृषि मजदूर अधिक मजदूरी मांग रहे थे।
और 1968 की कीझवेनमणि घटना ने यह स्पष्ट कर दिया था कि केवल सामान्य श्रम कानून पर्याप्त नहीं हैं।
इसी पृष्ठभूमि में कृषि मजदूर के लिए विशेष कानूनी हस्तक्षेप आगे बढ़ा।
1969 का कृषि मजदूर उचित मजदूरी कानून
Tamil Nadu Agricultural Labourer Fair Wages Act, 1969 करुणानिधि सरकार की सबसे महत्वपूर्ण कृषि-श्रम नीतियों में था।
कृषि मजदूर को निर्धारित उचित मजदूरी से कम भुगतान नहीं किया जा सकता।
कानून में विभिन्न कृषि कार्यों के लिए मजदूरी संरचना निर्धारित की गई थी।
तंजावुर में वर्षों से मजदूर जिस अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे थे, उसे राज्य कानून का संरक्षण मिला।
कीझवेनमणि का दबाव
यह कानून सीधे केवल एक घटना की प्रतिक्रिया नहीं था; कृषि मजदूरी आंदोलन उससे पहले से चल रहा था।
लेकिन 25 दिसंबर 1968 की कीझवेनमणि त्रासदी ने प्रश्न को तत्काल और नैतिक रूप से अत्यंत गंभीर बना दिया।
44 दलित खेतिहर मजदूर और उनके परिवारजन मारे गए थे।
सरकार के सामने इसलिए केवल कानून-व्यवस्था नहीं बल्कि कृषि मजदूरी और ग्रामीण सत्ता का प्रश्न था।
1969 का कानून इस लंबे संघर्ष की महत्वपूर्ण विधायी प्रतिक्रिया समझा जाना चाहिए।
भूमि सुधार—करुणानिधि की सबसे बड़ी संरचनात्मक पहल
करुणानिधि सरकार की कृषि नीति का सबसे महत्वपूर्ण संरचनात्मक कदम था—
1961 के मूल भूमि सुधार कानून में व्यक्ति अथवा पांच सदस्य तक के परिवार के लिए सामान्य सीमा 30 मानक एकड़ थी।
1970 में द्रमुक सरकार ने Tamil Nadu Land Reforms (Reduction of Ceiling on Land) Act, 1970 के माध्यम से इसे 15 मानक एकड़ कर दिया। कानून के उद्देश्य और कारणों में स्पष्ट रूप से कहा गया कि 30 मानक एकड़ की सीमा के बावजूद भूमि स्वामित्व में असमानता और संकेंद्रण बना हुआ था, इसलिए सीमा कम करना आवश्यक है।
यह तमिलनाडु भूमि सुधार के इतिहास का बड़ा मोड़ था।
30 से 15 मानक एकड़—इसका अर्थ
यदि पहले परिवार 30 मानक एकड़ रख सकता था और अब केवल 15—
तो सिद्धांततः अधिक भूमि सरकार को अधिशेष के रूप में मिल सकती थी।
भूमि पर निजी अधिकार सामाजिक सीमा के अधीन है।
द्रमुक की सामाजिक न्याय राजनीति का कृषि क्षेत्र में सबसे स्पष्ट रूप यही था।
क्या भूमि सुधार सफल हुआ?
लेकिन वह इतनी व्यापक मात्रा में नहीं हुआ कि भूमिहीनता समाप्त हो जाए।
इसलिए करुणानिधि की भूमि नीति को महत्वपूर्ण लेकिन अधूरी संरचनात्मक सुधार प्रक्रिया कहना अधिक उचित है।
करुणानिधि और मंदिर–मठ भूमि
तमिलनाडु में कृषि सुधार की कठिनाई यह थी कि बड़े भू-स्वामित्व का एक हिस्सा धार्मिक और सार्वजनिक संस्थाओं से जुड़ा था।
1972 के संशोधनों ने सार्वजनिक और निजी न्यासों तथा धार्मिक संस्थाओं की भूमि को भूमि-सीमा व्यवस्था में अधिक स्पष्ट रूप से विनियमित किया। मूल भूमि सुधार कानून में संशोधन कर सार्वजनिक न्यास, निजी न्यास और धार्मिक संस्थाओं के लिए पृथक सीमाएं तथा परिभाषाएं जोड़ी गईं।
यह तंजावुर जैसे क्षेत्र में विशेष रूप से महत्वपूर्ण था।
1971 का कुडियिरुप्पु अधिकार—द्रमुक की सामाजिक कृषि नीति
करुणानिधि शासन की दूसरी ऐतिहासिक उपलब्धि थी—
कृषि मजदूरों और गरीब कृषकों को उनके आवासीय भूखंड पर स्वामित्व देने की दिशा।
जिस खेतिहर मजदूर का घर भू-स्वामी की जमीन पर था, उसकी स्वतंत्रता अधूरी थी।
यदि वह मजदूरी के लिए संघर्ष करे तो उसे घर से हटाने की धमकी दी जा सकती थी।
कुडियिरुप्पु कानून ने इस निर्भरता को कमजोर किया।
इसलिए द्रमुक की शुरुआती कृषि नीति का चरित्र केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं था।
उसमें ग्रामीण सामाजिक सत्ता बदलने का तत्व भी था।
तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय और आधुनिक कृषि
करुणानिधि सरकार के समय 1971 में तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय को स्वतंत्र विश्वविद्यालय का स्वरूप मिला।
यह हरित क्रांति के संदर्भ में महत्वपूर्ण था।
इससे द्रमुक की कृषि नीति के दो पक्ष दिखाई देते हैं—
भूमि सुधार भी, और आधुनिक कृषि विज्ञान भी।
लेकिन करुणानिधि सरकार और किसान टकराव भी हुआ
यह समझना गलत होगा कि करुणानिधि का शासन किसान आंदोलन के प्रति केवल सहानुभूतिपूर्ण था।
1970 और 1972 में नारायणसामी नायडू के नेतृत्व में बिजली शुल्क के विरोध में बड़े आंदोलन हुए।
पुलिस कार्रवाई और गोलीबारी में किसानों की जान गई।
इसलिए द्रमुक सरकार का इतिहास भी सुधार और दमन दोनों का इतिहास है।
द्रमुक सरकार बिजली शुल्क क्यों बढ़ाती रही?
कारण सरकार और किसान की आर्थिक दृष्टि में अंतर था।
सरकार मानती थी कि बिजली पूरी तरह मुफ्त आर्थिक वस्तु नहीं हो सकती।
बिजली कृषि उत्पादन का आवश्यक इनपुट है और उसकी बढ़ती दर किसान आय को समाप्त कर देगी।
करुणानिधि का किसान मॉडल
1970 के शुरुआती दशक की द्रमुक कृषि नीति को मोटे तौर पर इस प्रकार समझा जा सकता है—
भूमि सुधार + खेतिहर मजदूर अधिकार + कृषि आधुनिकीकरण + सीमित इनपुट सब्सिडी।
यह अभी व्यापक मुफ्त बिजली मॉडल नहीं था।
सरकार भूमि संबंध बदलना चाहती थी लेकिन बिजली बोर्ड की वित्तीय व्यवस्था भी बनाए रखना चाहती थी।
यही कारण है कि नारायणसामी नायडू का आंदोलन द्रमुक सरकार से टकराया।
1977 : एमजीआर का प्रवेश
1977 में एम. जी. रामचंद्रन सत्ता में आए।
उनकी राजनीति करुणानिधि की तुलना में अधिक प्रत्यक्ष जनकल्याणकारी और व्यक्तित्व-केंद्रित थी।
एमजीआर ने गरीबों के लिए प्रत्यक्ष लाभ और राज्य-समर्थित कल्याण को अपनी राजनीति का महत्वपूर्ण आधार बनाया।
कृषि क्षेत्र में भी यह दृष्टि दिखाई दी।
लेकिन किसान आंदोलन के साथ उनका संबंध शुरुआत से सहज नहीं रहा।
एमजीआर और कृषि बिजली
एमजीआर शासन में बिजली नीति धीरे-धीरे अधिक रियायती हुई।
मद्रास उच्च न्यायालय में संरक्षित आधिकारिक शुल्क इतिहास के अनुसार 1 जून 1978 से कृषि बिजली की दर छोटे किसानों के लिए 12 पैसे प्रति यूनिट और बड़े किसानों के लिए 14 पैसे प्रति यूनिट थी, साथ में कुछ निश्चित शुल्क भी था।
अर्थात सरकार ने किसान वर्ग के भीतर भेद बनाया—
यह नीति आगे मुफ्त बिजली की दिशा का आधार बनी।
लेकिन 1978 में ही बड़ा किसान संघर्ष
एक ओर एमजीआर सरकार छोटे किसान को कम बिजली दर दे रही थी।
दूसरी ओर नारायणसामी नायडू का संगठन बिजली, ऋण और भूमि कर पर आंदोलन कर रहा था।
अप्रैल 1978 में टकराव इतना बढ़ा कि हजारों किसान गिरफ्तार हुए और पुलिस गोलीबारियों में अनेक मौतें हुईं।
इसलिए एमजीआर का किसान रिकॉर्ड भी केवल “राहत” का इतिहास नहीं है।
एमजीआर की नीति—वर्गीकरण
एमजीआर सरकार का एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण था—
छोटे किसान और बड़े किसान को एक समान न मानना।
यह नायडू आंदोलन की व्यापक “किसान” पहचान से कुछ अलग था।
छोटे किसान को अधिक सब्सिडी मिलनी चाहिए।
बड़े भूमिधारी को अधिक भुगतान करना चाहिए।
इससे राज्य अपनी कल्याणकारी नीति को लक्षित करना चाहता था।
नायडू क्यों असहमत थे?
किसान संगठन का तर्क था कि आधुनिक कृषि की लागत सभी स्वामी किसानों पर दबाव डाल रही है।
यदि सरकार बिजली को कृषि उत्पादन का सार्वजनिक समर्थन मानती है तो उसे किसानों में अधिक विभाजन नहीं करना चाहिए।
यहीं सरकार की लक्षित सब्सिडी और किसान संगठन की व्यापक कृषि राहत के बीच अंतर उभरता है।
1979 का एमजीआर राहत पैकेज
किसान आंदोलनों और वैगैकुलम संघर्ष के बाद एमजीआर सरकार ने मई 1979 में बड़ा कृषि राहत पैकेज घोषित किया।
एक आधुनिक अध्ययन के अनुसार इसमें 16 लाख किसानों के लिए 25 उपाय, लगभग 40 करोड़ रुपये के पैकेज के रूप में घोषित किए गए। इसमें छोटे किसानों के अल्पकालीन ऋण राहत सहित कई कदम थे।
यह दिखाता है कि एमजीआर आंदोलन को केवल पुलिस से नियंत्रित करने की रणनीति पर निर्भर नहीं रहे।
ऋण राहत में एमजीआर का मॉडल
एमजीआर का दृष्टिकोण व्यापक सार्वभौमिक कर्ज माफी के बजाय लक्षित राहत का था।
और गैर-नकदी फसलों पर कृषि आयकर राहत
जैसे कदम उठाए गए। उपलब्ध अध्ययन इन रियायतों का कुल वित्तीय प्रभाव लगभग 60 करोड़ रुपये तक बताता है।
यह करुणानिधि के भूमि सुधार मॉडल से अलग प्रकार की कृषि राजनीति थी।
एमजीआर
लेकिन दोनों को बिल्कुल अलग खानों में नहीं बांटना चाहिए।
एमजीआर के शासन में भी कृषि विकास योजनाएं चलीं।
करुणानिधि की सरकार ने भी किसान लागत पर रियायत दी।
1978–79 का बजट और एमजीआर की उत्पादन नीति
तमिलनाडु सरकार के 1978–79 के बजट में कृषि क्षेत्र के लिए लगभग 15.57 करोड़ रुपये का योजना व्यय प्रस्तावित था।
इसी बजट में धान की खुले बाजार में सरकारी खरीद के लिए मोटे धान पर 90 रुपये प्रति क्विंटल और मध्यम किस्म के लिए 95 रुपये प्रति क्विंटल प्रोत्साहन मूल्य का उल्लेख है।
इससे स्पष्ट है कि एमजीआर कृषि नीति केवल बिजली सब्सिडी तक सीमित नहीं थी।
सिंचाई—दोनों सरकारों की साझा आवश्यकता
तमिलनाडु में कोई भी सरकार सिंचाई की अनदेखी नहीं कर सकती थी।
राज्य की कृषि दो अलग जल प्रणालियों पर निर्भर थी—
द्रमुक और अन्नाद्रमुक दोनों ने सिंचाई परियोजनाओं और ग्रामीण विद्युतीकरण को आगे बढ़ाया।
नहर क्षेत्र का किसान सरकार से पानी छोड़ने की मांग करता था।
कावेरी प्रश्न की बढ़ती राजनीतिक केंद्रीयता
1970 के दशक से कावेरी जल विवाद तमिलनाडु की कृषि राजनीति में अधिक महत्वपूर्ण बनने लगा।
कर्नाटक द्वारा ऊपरी कावेरी क्षेत्र में सिंचाई विस्तार को तमिलनाडु के डेल्टा किसान चिंता से देख रहे थे।
यह प्रश्न आगे दोनों द्रविड़ दलों के लिए केवल कृषि नहीं बल्कि राज्य अधिकार और तमिल पहचान का विषय बन गया।
करुणानिधि और एमजीआर दोनों सरकारों को केंद्र तथा पड़ोसी राज्य से बातचीत करनी पड़ी।
इसलिए सिंचाई राजनीति में दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा से अधिक राज्य स्तर की साझा स्थिति भी विकसित हुई।
भूमि सुधार पर एमजीआर की तुलना में करुणानिधि अधिक आक्रामक
भूमि-संबंधों के क्षेत्र में दोनों की तुलना करें तो करुणानिधि की शुरुआती द्रमुक सरकार अधिक संरचनात्मक हस्तक्षेप करती दिखाई देती है।
1970 का कानून 30 मानक एकड़ की सीमा घटाकर 15 मानक एकड़ करता है।
एमजीआर के शासन का केंद्रीय किसान एजेंडा भूमि पुनर्वितरण नहीं था।
उनके दौर में ग्रामीण नीति का भार अधिक था—
यह तमिलनाडु की बदलती कृषि संरचना को भी दर्शाता है।
ऐसा बदलाव क्यों आया?
क्योंकि 1970 के दशक के अंत तक किसान राजनीति का सामाजिक आधार बदल चुका था।
लेकिन स्वामी कृषक वर्ग के लिए तत्काल समस्या थी—
जिस किसान के पास पहले ही जमीन थी, वह भूमि-सीमा कानून से अधिक चिंतित नहीं था।
एमजीआर की कृषि राजनीति इसी नए किसान वर्ग के दबाव के समय विकसित हुई।
किसान आंदोलनों पर पुलिस दमन—द्रमुक
द्रमुक सरकार के दौरान 1970 और विशेष रूप से 1972 में किसान आंदोलनों पर गंभीर पुलिस कार्रवाई हुई।
सड़क अवरोध हटाने और आंदोलन नियंत्रित करने के लिए गोलीबारी हुई।
1972 की कई गोलीबारियों में बड़ी संख्या में किसान मारे गए।
इसलिए यह दावा सही नहीं होगा कि द्रमुक किसान संघर्षों के प्रति स्वभावतः अहिंसक या नरम थी।
जब राज्य की प्रशासनिक शक्ति चुनौती में आई तो उसने कठोर कार्रवाई की।
किसान आंदोलनों पर पुलिस दमन—एमजीआर
एमजीआर शासन में 1978, 1979 और 1980 के किसान संघर्षों में भी पुलिस बल का व्यापक इस्तेमाल हुआ।
1979 के वैगैकुलम संघर्ष में पांच लोग मारे गए।
1980 के अंत में नारायणसामी नायडू को निवारक नजरबंदी तक का सामना करना पड़ा।
इसलिए पुलिस दमन की दृष्टि से दोनों सरकारों के बीच पूर्ण नैतिक विभाजन संभव नहीं।
किस सरकार का दमन अधिक कठोर था?
सीधी संख्यात्मक तुलना सावधानी मांगती है क्योंकि अलग-अलग घटनाओं के स्रोत अलग हैं।
फिर भी 1978–80 में एमजीआर सरकार और किसान संगठन के बीच टकराव की आवृत्ति और तीव्रता बहुत अधिक थी।
द्रमुक शासन में 1970 और 1972 बड़ी टक्कर के वर्ष थे।
इसलिए राजनीतिक स्मृति में एमजीआर–नायडू संघर्ष अधिक लंबा और व्यक्तिगत टकराव जैसा दिखाई देता है।
लेकिन एमजीआर की ग्रामीण लोकप्रियता क्यों नहीं टूटी?
यह किसान राजनीति समझने का महत्वपूर्ण प्रश्न है।
यदि किसानों पर गोली चली तो एमजीआर फिर चुनाव क्यों जीते?
कारण यह है कि “किसान” एक समान मतदाता नहीं है।
गरीब परिवारों के लिए सरकारी योजनाएं
एमजीआर इन व्यापक ग्रामीण समूहों में अत्यंत लोकप्रिय बने रहे।
एमजीआर का कल्याणकारी मॉडल
एमजीआर की राजनीतिक शक्ति केवल कृषि नीति से नहीं आई।
इसलिए कोई छोटा किसान बिजली शुल्क से नाराज हो सकता था लेकिन उसका परिवार किसी दूसरी सरकारी योजना से लाभान्वित हो सकता था।
मतदान का निर्णय इन सभी अनुभवों का परिणाम होता है।
करुणानिधि का मॉडल—सामाजिक न्याय और संस्थागत सुधार
के माध्यम से आगे बढ़ाने का प्रयास किया।
इसलिए उनका किसान मॉडल अधिक कानून और संरचनात्मक परिवर्तन पर आधारित दिखाई देता है।
एमजीआर का मॉडल अधिक प्रत्यक्ष कल्याण और राहत वाला था।
यह अंतर बाद में तमिलनाडु की राजनीति की पहचान बना
द्रमुक और अन्नाद्रमुक दोनों आगे कल्याणकारी राजनीति अपनाएंगे।
लेकिन शुरुआती ऐतिहासिक अंतर महत्वपूर्ण था।
जनता को प्रत्यक्ष लाभ देने का दावा।
कृषि क्षेत्र में यही रूप दिखाई देता है—
भूमि अधिकार बनाम कृषि सब्सिडी के अलग जोर के रूप में।
आगे दोनों दल एक-दूसरे की सफल नीतियां भी अपनाने लगेंगे।
1984 : एमजीआर ने मुफ्त बिजली की दिशा में बड़ा कदम उठाया
मद्रास उच्च न्यायालय में दर्ज विद्युत दर इतिहास के अनुसार 15 सितंबर 1984 से छोटे किसानों के लिए कृषि बिजली पर कोई शुल्क नहीं लिया गया, जबकि बड़े किसानों से वार्षिक प्रति अश्वशक्ति निश्चित शुल्क लिया जाता रहा।
यह एमजीआर सरकार की किसान नीति में ऐतिहासिक मोड़ था।
1970 में किसान एक पैसे की कमी के लिए गोली झेल रहे थे।
1984 में छोटे किसान के लिए शुल्क शून्य तक पहुंच गया।
मुफ्त बिजली किसान आंदोलन की जीत थी या एमजीआर की योजना?
इसे केवल एमजीआर की व्यक्तिगत उदारता कहना गलत होगा।
1970 से लगातार किसान बिजली दर पर आंदोलन कर रहे थे।
इस दबाव ने कृषि बिजली को चुनावी रूप से अत्यंत संवेदनशील मुद्दा बना दिया।
एमजीआर सरकार ने उसी राजनीतिक वास्तविकता का नीतिगत उत्तर दिया।
सरकारी नीति भी थी और आंदोलन की दीर्घकालीन उपलब्धि भी।
लेकिन मुफ्त बिजली केवल छोटे किसानों के लिए थी
1984 में सार्वभौमिक मुफ्त कृषि बिजली नहीं आई थी।
बड़े किसान — 75 रुपये प्रति अश्वशक्ति प्रति वर्ष।
इससे एमजीआर की लक्षित कल्याण नीति फिर दिखाई देती है।
1989 में करुणानिधि फिर सत्ता में
1989 में द्रमुक सत्ता में लौटी और करुणानिधि फिर मुख्यमंत्री बने।
अब तक कृषि बिजली तमिल राजनीति का बड़ा चुनावी मुद्दा बन चुकी थी।
छोटे किसानों को मुफ्त बिजली मिल रही थी।
नारायणसामी नायडू 1984 में निधन कर चुके थे, लेकिन उनकी बिजली राजनीति जीवित थी।
द्रमुक ने इसी अधूरे प्रश्न को उठाया।
करुणानिधि ने मुफ्त बिजली सार्वभौमिक की
आधिकारिक न्यायिक रिकॉर्ड अत्यंत स्पष्ट है।
1 अगस्त 1990 से सभी कृषि कनेक्शनों के लिए बिजली निःशुल्क कर दी गई।
17 नवंबर 1990 के सरकारी आदेश के बाद विद्युत शुल्क कानून में कृषि श्रेणी के लिए स्पष्ट रूप से “No charge” दर्ज किया गया और छोटे तथा बड़े किसान की अलग श्रेणी समाप्त कर दी गई।
इसलिए सार्वभौमिक कृषि मुफ्त बिजली का श्रेय तथ्यात्मक रूप से 1989–91 की करुणानिधि सरकार को जाता है।
मुफ्त बिजली पर एक महत्वपूर्ण तथ्य-संशोधन
तमिलनाडु की राजनीतिक बहस में अक्सर दो दावे सुनाई देते हैं—
“एमजीआर ने किसानों को मुफ्त बिजली दी।”
“करुणानिधि ने किसानों को मुफ्त बिजली दी।”
1984 — एमजीआर सरकार : छोटे किसानों को मुफ्त बिजली।
1990 — करुणानिधि सरकार : सभी कृषि कनेक्शनों को मुफ्त बिजली।
द्रमुक ने सार्वभौमिक क्यों किया?
इसके पीछे सामाजिक और चुनावी दोनों तर्क थे।
यदि छोटे किसान को मुफ्त बिजली मिलती है और मध्यम या बड़ा किसान भुगतान करता है तो संगठनात्मक किसान राजनीति इस विभाजन का विरोध कर सकती है।
कृषि बिजली तब तक ग्रामीण चुनावी मुद्दा बन चुकी थी।
द्रमुक अन्नाद्रमुक की ग्रामीण कल्याण राजनीति को पीछे छोड़ना चाहती थी।
इसलिए सार्वभौमिक मुफ्त बिजली एक कृषि नीति होने के साथ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की नीति भी थी।
किसान आंदोलन ने दोनों दलों को एक दिशा में धकेला
यह सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्षों में से एक है।
1970 में द्रमुक सरकार बिजली शुल्क कम करने के दबाव में आई।
1984 में एमजीआर सरकार छोटे किसानों तक मुफ्त बिजली ले गई।
तमिलनाडु से राष्ट्रीय किसान राजनीति तक
नारायणसामी नायडू, अखिल भारतीय किसान समन्वय, शेतकरी संगठन, कर्नाटक राज्य रैयत संघ और 1980 के दशक के ‘नए किसान आंदोलनों’ में तमिलनाडु की भूमिका
1980 के दशक में भारतीय किसान राजनीति ने एक नया रूप लिया। महाराष्ट्र में शरद जोशी का शेतकरी संगठन, कर्नाटक में एम. डी. नंजुंडस्वामी के नेतृत्व वाला कर्नाटक राज्य रैयत संघ, उत्तर भारत में आगे भारतीय किसान यूनियन और गुजरात सहित दूसरे राज्यों के किसान संगठन ऐसी मांगों के साथ सामने आए जो पुराने जमींदारी-विरोधी किसान आंदोलनों से अलग थीं।
इन आंदोलनों का केंद्रीय प्रश्न अब मुख्यतः यह नहीं था कि—
खेती करने वाले किसान को उसकी उपज का लाभकारी मूल्य कैसे मिले? बिजली, उर्वरक और डीजल की लागत कितनी हो? कर्ज का बोझ कैसे घटे? और औद्योगिक वस्तुओं तथा कृषि उपज के बीच विनिमय की शर्तें किसान के पक्ष में कैसे बदलें?
इस परिवर्तन की कहानी में तमिलनाडु की भूमिका अक्सर राष्ट्रीय इतिहास में अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है। लेकिन उपलब्ध अध्ययनों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भारत के नए किसान आंदोलन की शुरुआती लहर 1970 के दशक में तमिलनाडु में महसूस हुई, जहां नारायणसामी नायडू के नेतृत्व में किसान संगठन ने लाभकारी मूल्य, बिजली और कृषि लागत जैसे प्रश्नों पर बड़े सड़क आंदोलनों का प्रयोग किया।
इस अर्थ में तमिलनाडु केवल राष्ट्रीय किसान आंदोलन का एक क्षेत्रीय अध्याय नहीं था।
“पुराना” और “नया” किसान आंदोलन—अंतर क्या था?
भारतीय कृषि इतिहास में पुराने किसान आंदोलनों के प्रमुख प्रश्न थे—
और अन्य आंदोलनों में भूमि संबंध केंद्रीय थे।
लेकिन हरित क्रांति के बाद एक नया स्वामी किसान वर्ग अधिक स्पष्ट हुआ।
वह जमीन का मालिक भी था और स्वयं उत्पादन भी करता था।
सरकार और बाजार कृषि के साथ न्यायपूर्ण आर्थिक व्यवहार कर रहे हैं या नहीं?
यहीं से “नए किसान आंदोलन” की अवधारणा विकसित हुई।
नए किसान आंदोलन का सामाजिक आधार
नए किसान आंदोलनों का प्रमुख सामाजिक आधार प्रायः था—
मध्यम और अपेक्षाकृत संपन्न स्वामी किसान,
INFLIBNET के अध्ययन में समकालीन ग्रामीण आंदोलनों के दो मोटे आधार बताए गए हैं—एक गरीब खेतिहर मजदूर और सीमांत कृषक; दूसरा अधिक स्वतंत्र तथा बाजार में उल्लेखनीय अधिशेष बेचने वाला स्वामी किसान। तमिलनाडु एग्रीकल्चरिस्ट्स एसोसिएशन को दूसरी श्रेणी के प्रमुख संगठनों में रखा गया है।
यही सामाजिक अंतर पुराने और नए किसान आंदोलनों को समझने की कुंजी है।
तमिलनाडु इस परिवर्तन में पहले क्यों आया?
पश्चिमी तमिलनाडु में 1960 के दशक तक—
इसलिए किसान जल्दी ही उस समस्या का सामना करने लगा जो बाद में पूरे भारत के किसानों की बड़ी समस्या बनी—
उत्पादन लागत बढ़ रही है, लेकिन कृषि आय उसी अनुपात में नहीं बढ़ रही।
नारायणसामी नायडू ने इस आर्थिक असंतोष को राजनीतिक आंदोलन में बदला।
तमिलनाडु का प्रारंभिक प्रयोग
1970 और 1972 के संघर्षों में तमिल किसानों ने कई ऐसी रणनीतियां अपनाईं जो अगले दशक में दूसरे राज्यों में प्रसिद्ध हुईं—
शहरों में दूध–सब्जी की आपूर्ति रोकना,
इसलिए तमिलनाडु का किसान आंदोलन केवल कालक्रम में पहले नहीं था।
उसने आंदोलन की पद्धति भी विकसित की।
“लाभकारी मूल्य” की राजनीति
नए किसान आंदोलनों को जोड़ने वाली सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा थी—
फसल का मूल्य केवल उपभोक्ता की जरूरत से तय नहीं हो सकता।
यही विचार तमिलनाडु में नारायणसामी नायडू और बाद में महाराष्ट्र में शरद जोशी की किसान राजनीति को जोड़ता है।
सब्सिडी और मूल्य—दो रास्ते
लेकिन नए किसान आंदोलन के भीतर भी महत्वपूर्ण वैचारिक अंतर था।
नारायणसामी नायडू के तमिलनाडु आंदोलन में जोर था—
उनकी दृष्टि में किसान को केवल सरकारी रियायतों पर निर्भर बनाने की बजाय कृषि और उद्योग के बीच मूल्य संबंध सुधारना अधिक महत्वपूर्ण था।
यहीं राष्ट्रीय किसान समन्वय की पहली वैचारिक कठिनाई सामने आती है।
नारायणसामी नायडू की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा
तमिलनाडु में विशाल आंदोलन खड़ा करने के बाद नायडू ने जल्दी समझ लिया कि किसान के कई प्रश्न केवल राज्य सरकार से हल नहीं हो सकते।
इसलिए उन्हें विभिन्न राज्यों के किसान संगठनों को जोड़ने की आवश्यकता दिखाई दी।
शरद जोशी पर प्रकाशित जीवनी-सामग्री में भी स्वीकार किया गया है कि अखिल भारतीय किसान मंच बनाने के शुरुआती प्रयासों का श्रेय नारायणसामी नायडू को जाता है और वे लगभग 1970 से ही ऐसी एकता के बारे में सोच रहे थे।
दिसंबर 1980 : हैदराबाद का प्रयास
राष्ट्रीय संगठन निर्माण में एक महत्वपूर्ण घटना दिसंबर 1980 की है।
शरद जोशी संबंधी विस्तृत जीवनी के अनुसार नारायणसामी नायडू ने 14 दिसंबर 1980 को हैदराबाद में विभिन्न राज्यों के किसान संगठनों की बैठक बुलाई।
उस स्रोत के अनुसार वहां अखिल भारतीय किसान यूनियन नामक मंच बनाने का निर्णय हुआ और नारायणसामी नायडू उसके सर्वसम्मत अध्यक्ष चुने गए। संगठन को दलगत राजनीति से स्वतंत्र रखने का सिद्धांत भी स्वीकार किया गया।
इसे नायडू के राष्ट्रीय किसान नेतृत्व की सबसे महत्वपूर्ण पहलों में गिना जाना चाहिए।
राष्ट्रीय संगठन बनाना इतना कठिन क्यों था?
तमिल किसान और पंजाब का किसान दोनों कृषि से जुड़े थे।
बिजली और पंपसेट पर निर्भर हो सकता था।
इसलिए “किसान एकता” का नारा सरल था, लेकिन साझा राष्ट्रीय कार्यक्रम बनाना कठिन।
भाषा और क्षेत्र की बाधा
राष्ट्रीय किसान संगठन के सामने भाषा का प्रश्न भी था।
तमिल, कन्नड़, मराठी, पंजाबी, हिंदी और अन्य भाषाओं के किसान नेता एक मंच पर आ रहे थे।
शरद जोशी की जीवनी में राष्ट्रीय किसान समन्वय की कठिनाइयों में भाषा, क्षेत्रीय राजनीति, अंतरराज्यीय विवाद और आर्थिक विकास के अलग-अलग स्तरों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है।
किसान संगठन इसलिए केवल आर्थिक मुद्दों के आधार पर स्वतः राष्ट्रीय नहीं बन सकते थे।
उन्हें भारतीय संघीय विविधता भी संभालनी थी।
सबसे बड़ा विरोधाभास—राज्यों के किसान स्वयं एक-दूसरे से लड़ रहे थे
राष्ट्रीय किसान एकता की सबसे बड़ी परीक्षा पानी थी।
सतलुज तथा नदी जल प्रश्नों पर विवादग्रस्त।
शरद जोशी की जीवनी भी इस विरोधाभास को राष्ट्रीय किसान मंच बनाने की प्रमुख कठिनाइयों में गिनती है।
यानी किसान दिल्ली में एक साथ लाभकारी मूल्य मांग सकते थे—
लेकिन अपने राज्यों में नदी जल को लेकर एक-दूसरे के सामने खड़े हो सकते थे।
राष्ट्रीय किसान एकता का मूल साझा आधार क्या बना?
इन अंतर्विरोधों के बावजूद कुछ मांगें लगभग पूरे देश के बाजारोन्मुख किसानों को जोड़ सकती थीं—
लाभकारी कृषि मूल्य, कर्ज राहत, सस्ती बिजली, डीजल और उर्वरक की उपलब्धता, कर का कम बोझ, और कृषि के लिए बेहतर व्यापारिक शर्तें।
दिसंबर 1980 में विभिन्न किसान संगठनों के एक केंद्रीय समन्वय प्रस्ताव में बढ़ती इनपुट कीमतों, कृषि उपज को लाभकारी मूल्य न मिलने, ग्रामीण कर्ज, बिजली शुल्क और डीजल जैसी समस्याओं को साझा मांगों के रूप में रखा गया था।
यह उस समय उभरती राष्ट्रीय किसान भाषा का प्रमाण है।
दिसंबर 1980 : समानांतर किसान समन्वय प्रयास
यहां एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सावधानी आवश्यक है।
1980 में केवल नारायणसामी नायडू ही राष्ट्रीय किसान एकता बनाने की कोशिश नहीं कर रहे थे।
अखिल भारतीय किसान सभा सहित पुराने किसान संगठन भी व्यापक किसान समन्वय की दिशा में काम कर रहे थे।
16 दिसंबर 1980 को दिल्ली में विभिन्न किसान प्रतिनिधियों की बैठक में Central Kisan Coordination Committee बनाने का प्रस्ताव स्वीकार किया गया। इसमें लाभकारी मूल्य, कर्ज राहत, बिजली, डीजल और अन्य मांगें शामिल थीं।
इसलिए “राष्ट्रीय किसान समन्वय” एक ही संगठन या नेता की रचना नहीं था।
1980 के आसपास अनेक समानांतर धाराएं एक-दूसरे को प्रभावित कर रही थीं।
पुरानी किसान सभा बनाम नए किसान संगठन
अखिल भारतीय किसान सभा जैसे वाम किसान संगठन भूमि सुधार, गरीब किसान और खेतिहर मजदूर की राजनीति से जुड़े थे।
नए किसान संगठन स्वयं कृषि उत्पादक को एक साझा वर्ग के रूप में प्रस्तुत कर रहे थे।
AIKS के अपने दस्तावेजों में 1980 के नए किसान उभार को स्वीकार किया गया, लेकिन उसके कुछ नेतृत्व को बड़े भू-स्वामी और समृद्ध किसान हितों की ओर झुका हुआ भी बताया गया।
इससे भारतीय किसान राजनीति में पुराना प्रश्न फिर सामने आया—
क्या भूमिहीन मजदूर भी “किसान” है?
हां; कृषि मजदूर और गरीब किसान किसान आंदोलन के केंद्रीय हिस्से हैं।
नए स्वामी किसान आंदोलन का व्यावहारिक आधार अलग था।
उसके प्रमुख सदस्य जमीन वाले कृषक थे।
इसलिए खेतिहर मजदूर का मुद्दा अक्सर पीछे चला गया।
यही नई किसान राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण वर्गीय आलोचना बनी।
शेतकरी संगठन का उदय
महाराष्ट्र में शरद जोशी के नेतृत्व में शेतकरी संगठन 1979–80 के आसपास प्रभावशाली शक्ति के रूप में उभरा।
उसका शुरुआती बड़ा आंदोलन प्याज उत्पादकों के मूल्य से जुड़ा था।
और दूसरे कृषि उत्पादों के लिए लाभकारी मूल्य की मांग उठाई।
INFLIBNET के अध्ययन में 1979 में शेतकरी संगठन के “बड़े धमाके” के साथ सामने आने और प्याज मूल्य आंदोलन से उसकी पहचान बनने का उल्लेख है।
शरद जोशी और नारायणसामी नायडू—समानताएं
दोनों की राजनीति में कई समानताएं थीं।
दलगत राजनीति से स्वतंत्र किसान संगठन चाहते थे,
सरकार पर प्रत्यक्ष आर्थिक दबाव डालते थे,
और कृषि को एक स्वतंत्र आर्थिक क्षेत्र के रूप में देखते थे।
हम भी उत्पादक हैं और हमारी उपज की कीमत न्यायपूर्ण होनी चाहिए।
लेकिन दोनों में महत्वपूर्ण अंतर भी थे
नारायणसामी नायडू का आंदोलन अधिक जोर देता था—
राष्ट्रीय किसान संगठन बनाने की कठिनाइयों का वर्णन करने वाली शरद जोशी की जीवनी भी बताती है कि वे एक-बिंदु कार्यक्रम के रूप में लाभकारी मूल्य पर अधिक जोर देते थे, जबकि अनेक अन्य नेता डीजल, बिजली, ट्रैक्टर, उर्वरक और कीटनाशक जैसी इनपुट सब्सिडी को प्राथमिकता देते थे।
यह अंतर आगे किसान राजनीति में बहुत महत्वपूर्ण हुआ।
“भारत बनाम इंडिया”
शरद जोशी ने आगे किसान आर्थिक असंतोष को एक व्यापक वैचारिक सूत्र दिया—
शहरी, औद्योगिक, नौकरशाही और नीति-निर्धारक अर्थव्यवस्था।
उनका तर्क था कि आर्थिक नीति कृषि से सस्ता उत्पादन लेकर शहर और उद्योग को लाभ पहुंचाती है।
यह अवधारणा तमिलनाडु के किसान आंदोलन के अनुभव से पूर्णतः अलग नहीं थी।
नायडू पहले ही व्यावहारिक आंदोलन में कह चुके थे—
किसान की बिजली महंगी और उसकी उपज सस्ती नहीं रह सकती।
तमिलनाडु ने सिद्धांत से पहले व्यवहार दिया
इसी कारण तमिलनाडु की ऐतिहासिक भूमिका महत्वपूर्ण है।
शरद जोशी ने कृषि–औद्योगिक असमानता को अधिक स्पष्ट आर्थिक सिद्धांत में बदला।
उसी असंतोष का व्यवहारिक रूप दिखा चुके थे।
इसलिए नए किसान आंदोलन का इतिहास केवल महाराष्ट्र से शुरू करना अधूरा होगा।
कर्नाटक राज्य रैयत संघ का उदय
कर्नाटक में 1980 के दशक की शुरुआत में कर्नाटक राज्य रैयत संघ—KRRS एक शक्तिशाली किसान संगठन के रूप में उभरा।
इसके प्रमुख नेताओं में एम. डी. नंजुंडस्वामी बाद में राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध हुए।
कर्नाटक में आंदोलन की शुरुआती जमीन बनी—
सरकारी अध्ययन में 1980 के दशक के प्रारंभिक मालप्रभा संघर्ष, नवलगुंद की हिंसा और सहकारी ऋण-वसूली के विरोध को KRRS के उभार की महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि के रूप में दर्ज किया गया है।
तमिलनाडु और कर्नाटक किसान आंदोलन की समानताएं
दोनों राज्यों में किसान आंदोलन का आधार कृषि आधुनिकीकरण से निकला था।
सिंचाई शुल्क, बेहतरमेंट लेवी और ऋण।
दोनों में किसान राज्य से कह रहा था—
कृषि उत्पादन पर ऐसी लागत मत डालो जिससे किसान की आय समाप्त हो जाए।
दोनों ने सड़क आंदोलन और सामूहिक अवज्ञा का सहारा लिया।
लेकिन कावेरी उन्हें अलग भी करती थी
यहीं राष्ट्रीय किसान एकता का गहरा विरोधाभास सामने आया।
तमिल किसान कावेरी का अधिक पानी चाहता था।
केंद्र या राज्य सरकार के खिलाफ दोनों एक मंच पर आ सकते थे—
लेकिन नदी जल पर उनके हित टकराते थे।
इसलिए आर्थिक किसान एकता हमेशा क्षेत्रीय संसाधन राजनीति पर विजय नहीं पा सकी।
यह आगे राष्ट्रीय किसान संगठनों की स्थायी कमजोरी रही।
KRRS की राजनीति आगे अधिक व्यापक हुई
कर्नाटक राज्य रैयत संघ केवल बिजली या कर्ज के प्रश्न पर नहीं रुका।
नंजुंडस्वामी के नेतृत्व में उसने आगे—
आधुनिक कृषि आंदोलनों पर शोध KRRS को उन संगठनों में रखता है जिन्होंने आगे बहुराष्ट्रीय बीज और प्रसंस्कृत खाद्य कंपनियों के भारत प्रवेश का विरोध किया।
इससे नए किसान आंदोलन की राजनीति 1990 के दशक में वैश्वीकरण-विरोधी दिशा तक पहुंची।
तमिल आंदोलन का जोर इतना वैचारिक क्यों नहीं हुआ?
नारायणसामी नायडू की राजनीति अधिक व्यावहारिक और मांग-आधारित थी।
उन्होंने कृषि संकट की विस्तृत विचारधारात्मक व्याख्या की बजाय प्रत्यक्ष किसान संगठन को प्राथमिकता दी।
शरद जोशी और नंजुंडस्वामी के आंदोलनों ने बाद में अधिक विकसित वैचारिक ढांचा तैयार किया।
फिर भी उनके लिए तमिलनाडु का अनुभव यह प्रमाण था कि स्वतंत्र किसान संगठन राज्य को झुका सकता है।
भारतीय किसान यूनियन की अलग धारा
उत्तर भारत में भारतीय किसान यूनियन की जड़ें पंजाब और उत्तर भारतीय किसान संगठनों में पहले से थीं।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि BKU सीधे तमिलनाडु आंदोलन से पैदा हुई।
लेकिन 1980 के दशक में BKU, शेतकरी संगठन, तमिलनाडु एग्रीकल्चरिस्ट्स एसोसिएशन और KRRS के बीच सहयोग और गठबंधन विकसित हुए। आधुनिक अकादमिक अध्ययन भी BKU के इन संगठनों के साथ राष्ट्रीय स्तर के गठजोड़ की पुष्टि करता है।
इसलिए संबंध उत्पत्ति का नहीं, समन्वय का था।
1980–82 : अखिल भारतीय किसान यूनियन और विभाजन
राष्ट्रीय किसान संगठन बनाने का प्रयास आसान नहीं रहा।
दिसंबर 1980 के आसपास बने अखिल भारतीय किसान मंच में आगे नेतृत्व और संगठन संबंधी मतभेद हुए।
उपलब्ध विवरण 1982 में एक अल्पकालिक विभाजन का उल्लेख करते हैं—
दूसरी भूपिंदर सिंह मान से। बाद में शरद जोशी ने संघीय संरचना के तहत विभिन्न राज्य संगठनों को साथ लाने का प्रयास किया।
यह राष्ट्रीय किसान संगठन की मूल समस्या को दिखाता है—
राज्य संगठन अपनी स्वायत्तता छोड़ना नहीं चाहते थे।
एक केंद्रीकृत संगठन क्यों नहीं बन सका?
क्योंकि महाराष्ट्र का आंदोलन महाराष्ट्र के राजनीतिक संदर्भ में बना था।
यदि सबको एक केंद्रीकृत संगठन में रखा जाए तो—
राज्य संगठन कितनी स्वायत्तता रखेंगे?
इन प्रश्नों ने अखिल भारतीय किसान एकता को लगातार चुनौती दी।
शरद जोशी का समाधान—समन्वय, विलय नहीं
आगे शरद जोशी ने एक राष्ट्रीय केंद्रीकृत संगठन बनाने के बजाय विभिन्न स्वतंत्र किसान संगठनों के बीच समन्वय समिति की दिशा अपनाई।
30–31 अक्टूबर 1982 को वर्धा में 14 राज्यों के किसान नेताओं की बैठक हुई।
जीवनी स्रोत के अनुसार वहां Interstate Coordination Committee बनाई गई, जिसे आगे विस्तृत करके Kisan Coordination Committee—KCC बनाया गया।
लेकिन राष्ट्रीय मुद्दों पर साथ काम करें।
किसान समन्वय समिति का महत्व
KCC ने यह स्वीकार किया कि भारत की किसान राजनीति संघीय होगी।
लेकिन कुछ प्रश्नों पर साझा आंदोलन हो—
यही ढांचा आगे राष्ट्रीय किसान गठबंधनों का परिचित तरीका बना।
तमिलनाडु की भूमिका प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों
राष्ट्रीय आंदोलन में तमिलनाडु का योगदान दो प्रकार का था।
प्रत्यक्ष
नारायणसामी नायडू ने राष्ट्रीय किसान मंच बनाने की प्रारंभिक पहल की और दिसंबर 1980 के हैदराबाद सम्मेलन से इसे संस्थागत रूप देने का प्रयास किया।
अप्रत्यक्ष
और आर्थिक मांगों पर सरकार को झुकाना
“नया किसान” किसे कहा गया?
नए किसान आंदोलनों की राजनीतिक भाषा में किसान स्वयं को—
इसलिए मैं भी मूल्य निर्धारण में न्याय मांगूंगा।
सभी में अलग शैली के बावजूद यह तत्व दिखाई देता है।
किसान संगठन दलों से दूरी क्यों चाहते थे?
पुराने किसान संगठन अक्सर राजनीतिक दलों से जुड़े थे।
हम किसान हित के आधार पर सरकार का समर्थन या विरोध करेंगे।
तमिलनाडु में नायडू ने द्रमुक और अन्नाद्रमुक दोनों से संघर्ष कर इस सिद्धांत को व्यवहार में दिखाया।
यही उनके आंदोलन की राष्ट्रीय आकर्षण शक्ति का एक कारण था।
लेकिन “गैर-दलीय” का अर्थ “गैर-राजनीतिक” नहीं
इन किसान संगठनों ने स्वयं को राजनीतिक दलों से स्वतंत्र कहा।
और चुनावी सरकारों पर दबाव डालते थे।
इसलिए इन्हें non-party political movements—गैर-दलीय राजनीतिक आंदोलन कहना अधिक उचित है।
चुनाव लड़ने का प्रश्न
सड़क आंदोलन की सफलता के बाद हर किसान संगठन के सामने प्रश्न आया—
नारायणसामी नायडू ने 1982 में पंचायत चुनावों में उतरने की घोषणा की और कहा कि यदि दूसरे “चालक” शासन ठीक नहीं चला रहे तो किसानों को स्वयं राजनीतिक वाहन चलाना चाहिए।
लेकिन किसान संगठन को चुनावी दल में बदलना कठिन सिद्ध हुआ।
यह समस्या महाराष्ट्र और कर्नाटक के आंदोलनों के सामने भी अलग-अलग रूप में आई।
आंदोलन की शक्ति वोट में क्यों नहीं बदलती?
क्योंकि किसान की आर्थिक पहचान के साथ दूसरी पहचानें भी होती हैं—
बिजली आंदोलन में किसान नायडू के साथ हो सकता है।
विधानसभा चुनाव में वह द्रमुक या अन्नाद्रमुक को वोट दे सकता है।
इसलिए किसान आंदोलन की सौदेबाजी शक्ति उसकी चुनावी शक्ति से अधिक हो सकती है।
नए किसान आंदोलनों की वर्गीय आलोचना
इन आंदोलनों की सबसे गंभीर आलोचना यह रही कि उनके नेतृत्व और सामाजिक आधार में ग्रामीण प्रभुत्वशाली कृषक समुदायों की भूमिका बहुत बड़ी थी।
आधुनिक शोध नए किसान आंदोलनों के नेतृत्व को कई क्षेत्रों में पुरुष, बाजारोन्मुख और प्रभुत्वशाली कृषि जातियों से जोड़ता है—उत्तर प्रदेश में जाट, महाराष्ट्र में मराठा, कर्नाटक में लिंगायत और वोक्कालिगा तथा तमिलनाडु में गौंडर जैसे समूह प्रमुख उदाहरण बताए गए हैं।
क्या ये आंदोलन वास्तव में पूरे ग्रामीण समाज का प्रतिनिधित्व करते थे?
खेतिहर मजदूर का हित कहां था?
स्वामी किसान अधिक फसल मूल्य चाहता है।
भूमिहीन उपभोक्ता महंगे खाद्यान्न से प्रभावित हो सकता है।
इसलिए “किसान हित” हमेशा “सभी ग्रामीण गरीबों के हित” के समान नहीं होता।
यही नए किसान आंदोलनों की सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक सीमा थी।
तमिलनाडु इस विरोधाभास का सबसे अच्छा उदाहरण
तमिलनाडु के इतिहास में दोनों प्रकार के आंदोलन साफ दिखाई देते हैं।
पश्चिमी तमिलनाडु
इसलिए तमिलनाडु स्वयं यह साबित करता है कि “किसान आंदोलन” कोई एक वर्गीय श्रेणी नहीं है।
महिला प्रश्न
नए किसान आंदोलनों की एक अन्य आलोचना यह थी कि नेतृत्व मुख्यतः पुरुष था।
कुछ किसान संगठनों—विशेषकर शेतकरी संगठन—ने बाद में महिला अधिकार और महिलाओं के भूमि स्वामित्व जैसे मुद्दे उठाए।
लेकिन शुरुआती नए किसान आंदोलन का सार्वजनिक चेहरा बड़े पैमाने पर पुरुष कृषक था।
तमिलनाडु का आंदोलन भी इस सीमा से मुक्त नहीं था।
राष्ट्रीय कृषि नीति की मांग
1980 के दशक में किसान संगठनों ने धीरे-धीरे यह समझ विकसित की कि राज्यवार आंदोलन पर्याप्त नहीं।
यदि कृषि मूल्य राष्ट्रीय स्तर पर तय होते हैं,
नए किसान आंदोलनों के इतिहास पर मानक अध्ययनों में राष्ट्रीय कृषि नीति के निर्माण के प्रश्न को इस दौर की महत्वपूर्ण बहसों में गिना गया है।
कीमत बनाम सब्सिडी की राष्ट्रीय बहस
राष्ट्रीय किसान मंचों पर एक बुनियादी बहस रही—
दूसरी दृष्टि
कृषि उत्पाद का इतना अच्छा मूल्य दो कि किसान को इतनी सब्सिडी मांगने की आवश्यकता ही न पड़े।
तमिलनाडु की रणनीतियों की राष्ट्रीय प्रतिध्वनि
इन आंदोलनों की स्थानीय परिस्थितियां अलग थीं।
कावेरी जल और तमिलनाडु किसान राजनीति
कर्नाटक–तमिलनाडु विवाद, कावेरी डेल्टा की निर्भरता, किसान आंदोलन, न्यायाधिकरण, सर्वोच्च न्यायालय, कावेरी प्रबंधन प्राधिकरण और जल-संघवाद की राजनीति
तमिलनाडु के किसान आंदोलन की कोई भी समग्र कथा कावेरी के बिना पूरी नहीं हो सकती। बिजली, कर्ज, मजदूरी, भूमि सुधार और फसल मूल्य जितने महत्वपूर्ण प्रश्न थे, कावेरी डेल्टा के किसान के लिए उनसे भी पहले एक मूलभूत सवाल था—
कावेरी डेल्टा की कृषि नदी के मौसमी प्रवाह, मेत्तूर बांध से पानी छोड़ने के समय और ऊपरी राज्यों में जल-संग्रह की स्थिति पर निर्भर रही है। इसी कारण कावेरी विवाद केवल दो राज्य सरकारों के बीच संवैधानिक या तकनीकी विवाद नहीं रहा। वह लाखों किसानों की बुवाई, फसल, कर्ज, आय और ग्रामीण जीवन से जुड़ा प्रश्न बन गया।
समस्या की जटिलता यह है कि कावेरी एक अंतरराज्यीय नदी है। उसका जलग्रहण क्षेत्र कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी तक फैला है। ऊपरी क्षेत्र में अधिक पानी रोकने का प्रभाव निचले डेल्टा पर पड़ सकता है। दूसरी तरफ ऊपरी राज्य का किसान भी सिंचाई विस्तार और पानी पर अपना वैध अधिकार मानता है।
इसीलिए कावेरी विवाद का केंद्रीय प्रश्न केवल यह नहीं है कि—
एक साझा और पानी की कमी वाली नदी को संघीय भारत में न्यायपूर्ण ढंग से कैसे बांटा जाए?
कावेरी डेल्टा तमिलनाडु के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों?
कावेरी और उसकी शाखाओं ने तंजावुर, तिरुवारूर, नागपट्टिनम और आसपास के क्षेत्रों को दक्षिण भारत के सबसे महत्वपूर्ण धान उत्पादक क्षेत्रों में बदल दिया।
इस क्षेत्र की कृषि लंबे समय से तीन प्रमुख धान मौसमों से जुड़ी रही—
इनमें समय पर पानी की उपलब्धता निर्णायक होती है।
यदि जून में मेत्तूर बांध से पानी समय पर छोड़ा जाए तो कुरुवै की बुवाई आसान होती है।
यदि पानी देर से आए तो किसान फसल बदल सकता है, बुवाई कम कर सकता है या खेती छोड़ सकता है।
यानी जल रिलीज की तारीख भी राजनीतिक घटना बन जाती है।
मेत्तूर बांध—कावेरी किसान राजनीति का केंद्रीय प्रतीक
तमिलनाडु में कावेरी जल को समझने के लिए मेत्तूर बांध का महत्व अत्यंत बड़ा है।
1934 में बने इस बांध से छोड़ा जाने वाला पानी डेल्टा की सिंचाई के लिए महत्वपूर्ण है।
सामान्य कृषि कैलेंडर में 12 जून को बांध खोलने की परंपरागत संदर्भ तिथि माना जाता रहा है।
लेकिन बांध तभी खोला जा सकता है जब पर्याप्त जल उपलब्ध हो।
इसलिए हर वर्ष जून आते ही किसान पूछता है—
यहीं जल विज्ञान राजनीतिक समाचार बन जाता है।
कुरुवै खेती और समय की राजनीति
कुरुवै अपेक्षाकृत छोटी अवधि की धान फसल है।
इसके लिए समय पर पानी बहुत महत्वपूर्ण है।
पानी देर से आए तो पूरा कृषि कैलेंडर प्रभावित हो सकता है।
तमिलनाडु सरकार के एक आधिकारिक बजट विवरण में उदाहरण के लिए अनुकूल मानसून के कारण मेत्तूर बांध निर्धारित समय से 19 दिन पहले खोले जाने और कावेरी डेल्टा में रिकॉर्ड 5.28 लाख एकड़ कुरुवै खेती होने का उल्लेख किया गया था।
इससे स्पष्ट है कि जल उपलब्धता और खेती के क्षेत्रफल के बीच सीधा संबंध है।
सांबा का महत्व
सांबा लंबी अवधि की महत्वपूर्ण धान फसल है।
यदि दक्षिण-पश्चिम मानसून कमजोर हो और कर्नाटक के जलाशयों से पर्याप्त पानी न मिले तो तमिलनाडु के डेल्टा किसान के सामने सांबा बचाना कठिन हो सकता है।
इसीलिए कावेरी विवाद केवल वार्षिक कुल जल मात्रा का प्रश्न नहीं है।
पानी कब मिलता है यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि कितना मिलता है।
विवाद की औपनिवेशिक पृष्ठभूमि
कावेरी जल विवाद स्वतंत्र भारत के बाद अचानक पैदा नहीं हुआ।
इसकी आधुनिक कानूनी पृष्ठभूमि ब्रिटिश काल तक जाती है।
तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी और मैसूर रियासत के बीच नदी जल उपयोग को लेकर समझौते हुए।
आगे की कावेरी राजनीति के प्रमुख संदर्भ बने।
1924 का समझौता लगभग पचास वर्षों के लिए महत्वपूर्ण व्यवस्था माना गया।
1974 के बाद उसके भविष्य और अर्थ को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच विवाद और तीखा हुआ।
तमिलनाडु का ऐतिहासिक दावा
तमिलनाडु का मूल तर्क रहा कि कावेरी डेल्टा में सदियों से विकसित सिंचाई और कृषि व्यवस्था नदी जल पर निर्भर है।
अर्थात नीचे की ओर स्थित राज्य के पास स्थापित सिंचाई उपयोग का ऐतिहासिक अधिकार है।
यदि ऊपरी राज्य नए बांध और सिंचाई परियोजनाएं बनाकर अधिक पानी रोकता है तो डेल्टा की पुरानी खेती प्रभावित हो सकती है।
Existing irrigation—स्थापित सिंचाई अधिकारों की रक्षा आवश्यक है।
कर्नाटक का तर्क
उसका कहना था कि पुराने समझौते औपनिवेशिक राजनीतिक असमानता की परिस्थितियों में बने थे और मैसूर की विकास संभावनाएं सीमित की गई थीं।
इसलिए वह ऐतिहासिक उपयोग को अनंतकाल तक अपरिवर्तनीय अधिकार मानने के विरुद्ध रहा।
यही जल-संघवाद का मूल द्वंद्व है
कावेरी विवाद में दो न्याय सिद्धांत टकराते हैं।
कर्नाटक
यही कारण है कि कावेरी का समाधान केवल राजनीतिक बातचीत से आसान नहीं हुआ।
अंततः विवाद न्यायाधिकरण और सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा।
1970 के दशक में विवाद क्यों तेज हुआ?
1974 के आसपास 1924 के समझौते की पचास वर्षीय अवधि पूरी होने का प्रश्न उठा।
इसी समय कर्नाटक में सिंचाई परियोजनाओं और जल-संग्रह क्षमता का विस्तार हो रहा था।
तमिलनाडु को चिंता थी कि ऊपरी कावेरी में अधिक जल रोकने से डेल्टा में प्रवाह कम होगा।
इसलिए 1970 के दशक से कावेरी तमिलनाडु की कृषि राजनीति में अधिक केंद्रीय विषय बनती गई।
किसान आंदोलन की नई दिशा
नारायणसामी नायडू का आंदोलन बिजली, कर्ज और कृषि लागत पर केंद्रित था।
लेकिन कावेरी डेल्टा किसान के लिए समस्या अलग थी।
यानी तमिलनाडु की किसान राजनीति में अब तीसरी बड़ी धारा स्पष्ट हुई—
पानी के प्रश्न ने दलगत अंतर कम किया
भूमि सुधार पर द्रमुक और अन्नाद्रमुक में अंतर हो सकता था।
बिजली सब्सिडी पर प्रतिस्पर्धा हो सकती थी।
लेकिन कावेरी के प्रश्न पर तमिलनाडु के लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दलों को राज्य के हिस्से के पक्ष में खड़ा होना पड़ता था।
किसान प्रश्न + तमिलनाडु राज्य अधिकार + संघीय राजनीति
केंद्र सरकार क्यों निर्णायक थी?
इसलिए तमिलनाडु सरकार स्वयं कर्नाटक को पानी छोड़ने का आदेश नहीं दे सकती।
संविधान और Inter-State River Water Disputes Act, 1956 के तहत केंद्र सरकार और अंतरराज्यीय जल विवाद तंत्र की भूमिका आवश्यक है।
तमिलनाडु लंबे समय तक मांग करता रहा कि विवाद को न्यायाधिकरण में भेजा जाए।
केंद्र की विभिन्न सरकारों ने इसे बातचीत से सुलझाने की कोशिश की, लेकिन समझौता नहीं हुआ।
1990 : कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण
आखिरकार भारत सरकार ने 2 जून 1990 को Cauvery Water Disputes Tribunal—कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया। जल शक्ति मंत्रालय के आधिकारिक विवरण में इसकी स्थापना इसी तारीख को दर्ज है।
अब विवाद केवल मुख्यमंत्रियों की वार्ता पर निर्भर नहीं रहा।
एक अर्ध-न्यायिक संस्था को वैज्ञानिक, ऐतिहासिक और कृषि आंकड़ों के आधार पर जल बंटवारा तय करना था।
अंतरिम राहत का प्रश्न
तमिलनाडु की चिंता थी कि अंतिम फैसला आने में वर्षों लग सकते हैं।
इसलिए उसने अंतरिम जल रिलीज व्यवस्था की मांग की।
1991 में न्यायाधिकरण ने अंतरिम आदेश दिया जिसके अंतर्गत कर्नाटक से तमिलनाडु की ओर निश्चित मात्रा में जल प्रवाह सुनिश्चित करने की व्यवस्था की गई।
इस आदेश के बाद कर्नाटक में तीव्र विरोध हुआ।
इससे कावेरी विवाद न्यायिक होने के साथ जन-आंदोलन और क्षेत्रीय पहचान का प्रश्न भी बन गया।
1991 की हिंसा ने क्या दिखाया?
कावेरी विवाद ने साबित किया कि नदी जल केवल कृषि नीति नहीं है।
वह भाषाई और क्षेत्रीय पहचान से भी जुड़ सकता है।
कर्नाटक में आदेश के विरोध के दौरान हिंसा हुई और तमिल समुदाय के लोगों पर हमले की घटनाएं दर्ज हुईं।
तमिलनाडु में भी तीखी राजनीतिक प्रतिक्रिया हुई।
इससे केंद्र के सामने एक नया संकट था—
जल विवाद को हल करना भी है और अंतरराज्यीय सामाजिक तनाव को नियंत्रित भी।
किसान दोनों राज्यों में पीड़ित था
राजनीतिक भाषा में तमिलनाडु बनाम कर्नाटक दिखाई देता है।
लेकिन कृषि स्तर पर स्थिति अधिक जटिल थी।
मेरी सदियों पुरानी डेल्टा खेती इस जल पर निर्भर है।
इसलिए वास्तविक संघर्ष दो गरीब किसानों का व्यक्तिगत संघर्ष नहीं था।
सीमित नदी जल के राज्यवार आवंटन का संघर्ष।
जल-वर्ष और वर्षा की अनिश्चितता
कावेरी विवाद की सबसे कठिन समस्या यह है कि नदी में हर वर्ष समान पानी नहीं आता।
अच्छे मानसून वाले वर्ष में विवाद कम तीखा हो सकता है।
क्या दोनों राज्य आनुपातिक कमी स्वीकार करें?
या पहले तमिलनाडु की स्थापित सिंचाई आवश्यकताओं को पूरा किया जाए?
यही distress-sharing—संकट में जल-साझेदारी का प्रश्न आज तक सबसे कठिन मुद्दों में से एक है।
न्यायाधिकरण को किन बातों का हिसाब करना था?
जल बंटवारा केवल नदी में कुल पानी देखकर नहीं किया जा सकता था।
सर्वोच्च न्यायालय ने बाद में स्पष्ट किया कि न्यायाधिकरण ने फसल पैटर्न, फसल अवधि, पानी की खपत, मिट्टी, वर्षा, डेल्टा की दक्षता और सूखे जैसी परिस्थितियों का विस्तृत अध्ययन किया था।
धान सबसे बड़ा विवाद क्यों बना?
धान अपेक्षाकृत अधिक पानी मांगने वाली फसल है।
तमिलनाडु का कावेरी डेल्टा ऐतिहासिक रूप से धान प्रधान रहा है।
इसलिए जल विवाद के साथ फसल पैटर्न का प्रश्न भी जुड़ गया।
न्यायाधिकरण के सामने विशेषज्ञों ने—
और कम पानी वाली फसलों को प्रोत्साहित करने
जैसे सुझावों पर भी विचार किया। सर्वोच्च न्यायालय के 2018 फैसले में इन सिफारिशों का उल्लेख है।
यानी समाधान केवल “और पानी दो” नहीं हो सकता।
2007 : न्यायाधिकरण का अंतिम फैसला
लगभग सत्रह वर्ष की प्रक्रिया के बाद न्यायाधिकरण ने 5 फरवरी 2007 को अपना अंतिम निर्णय दिया। जल शक्ति मंत्रालय इसकी पुष्टि करता है।
न्यायाधिकरण ने कुल उपलब्ध जल को विभिन्न राज्यों और जरूरतों के बीच बांटा।
उसने तमिलनाडु के लिए कुल 419 टीएमसी फुट का हिस्सा निर्धारित किया था।
लेकिन यह आंकड़ा सीधे कर्नाटक द्वारा सीमा पर छोड़े जाने वाले पानी के बराबर नहीं था, क्योंकि तमिलनाडु के अपने जलग्रहण क्षेत्र से मिलने वाला पानी भी उसके कुल हिस्से में शामिल था।
192 टीएमसी और 419 टीएमसी में अंतर
कावेरी विवाद की सार्वजनिक बहस में अक्सर दो संख्याएं सामने आती थीं—
419 टीएमसी न्यायाधिकरण द्वारा तमिलनाडु की कुल हिस्सेदारी थी।
192 टीएमसी वह मात्रा थी जिसे कर्नाटक को तमिलनाडु सीमा पर बिलिगुंडुलु में उपलब्ध कराने की व्यवस्था से जोड़ा गया।
इन दोनों को एक ही संख्या समझना गलत है।
यही जल राजनीति की तकनीकी जटिलता है।
फैसला आया, विवाद समाप्त क्यों नहीं हुआ?
क्योंकि कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल सभी निर्णय के कुछ हिस्सों से असंतुष्ट थे।
केंद्र सरकार ने अंतिम निर्णय को अधिसूचित करने में भी लंबा समय लिया।
तमिलनाडु लगातार मांग करता रहा कि निर्णय को वैधानिक रूप से लागू किया जाए।
इसलिए न्यायाधिकरण का फैसला भी अंतिम राजनीतिक समाधान नहीं बना।
2013 में अधिसूचना
लगातार कानूनी और राजनीतिक दबाव के बाद केंद्र सरकार ने 2007 के न्यायाधिकरण फैसले को 2013 में अधिसूचित किया।
इससे उसे वैधानिक क्रियान्वयन का अधिक स्पष्ट आधार मिला।
कौन सुनिश्चित करेगा कि जल वास्तव में निर्धारित तरीके से छोड़ा जाए?
यहीं कावेरी प्रबंधन बोर्ड/प्राधिकरण की मांग महत्वपूर्ण बनी।
किसान सड़क पर क्यों उतरते रहे?
क्योंकि कानूनी फैसला और खेत तक पहुंचने वाला पानी एक ही चीज नहीं हैं।
किसान के लिए न्यायालय का फैसला तभी उपयोगी है जब—
इसलिए हर सूखे वर्ष में डेल्टा किसान फिर आंदोलन करते—
2012–13 का संकट
2012 में कमजोर मानसून और जल रिलीज को लेकर विवाद फिर गंभीर हुआ।
सर्वोच्च न्यायालय और केंद्र के निर्देशों के बावजूद पानी छोड़ने के प्रश्न पर तनाव बना रहा।
तमिलनाडु के डेल्टा क्षेत्रों में किसान आंदोलन तेज हुए।
इस दौर में फसल विफलता और किसानों की मृत्यु/आत्महत्या के दावे भी सार्वजनिक बहस का हिस्सा बने।
यह दिखाता है कि अंतरराज्यीय जल विवाद सीधे ग्रामीण सामाजिक संकट में बदल सकता है।
2016 का बड़ा जल संकट
2016 में कावेरी विवाद फिर राष्ट्रीय संकट बना।
सर्वोच्च न्यायालय ने कर्नाटक से तमिलनाडु के लिए पानी छोड़ने के निर्देश दिए।
बेंगलुरु सहित कुछ क्षेत्रों में हिंसा हुई।
न्यायिक आदेश आवश्यक है, लेकिन अंतरराज्यीय राजनीतिक सहमति और सामाजिक स्वीकार्यता के बिना जल-साझेदारी लागू करना कठिन हो सकता है।
किसान राजनीति और भावनात्मक क्षेत्रवाद
कावेरी पर किसान की वास्तविक आर्थिक चिंता बहुत आसानी से क्षेत्रीय भावनात्मक राजनीति में बदल सकती है।
कर्नाटक का पानी पहले कर्नाटक के लिए।
जब इस तरह की भाषा मजबूत होती है तो वैज्ञानिक जल प्रबंधन पीछे चला जाता है।
यहीं किसान हित और क्षेत्रीय राष्ट्रवाद के बीच जटिल संबंध बनता है।
2018 : सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला
16 फरवरी 2018 को सर्वोच्च न्यायालय ने कावेरी जल विवाद पर महत्वपूर्ण अंतिम फैसला दिया।
न्यायालय ने न्यायाधिकरण के मूल आवंटन में संशोधन किया।
जल शक्ति मंत्रालय के आधिकारिक सारांश के अनुसार अंतिम संशोधित आवंटन इस प्रकार हुआ—
कर्नाटक — 284.75 टीएमसी तमिलनाडु — 404.25 टीएमसी केरल — 30 टीएमसी पुडुचेरी — 7 टीएमसी पर्यावरण संरक्षण — 10 टीएमसी समुद्र में अपरिहार्य प्रवाह — 4 टीएमसी।
तमिलनाडु की हिस्सेदारी क्यों घटी?
न्यायाधिकरण ने तमिलनाडु को 419 टीएमसी दिया था।
सर्वोच्च न्यायालय ने इसे 14.75 टीएमसी घटाकर 404.25 टीएमसी किया।
उतनी ही मात्रा कर्नाटक की हिस्सेदारी में बढ़ी।
न्यायालय ने विशेष रूप से बेंगलुरु की पेयजल आवश्यकता और तमिलनाडु में उपलब्ध भूजल जैसे कारकों पर विचार किया।
यह तमिलनाडु के लिए राजनीतिक रूप से असुविधाजनक था, लेकिन फैसला समग्र आवंटन ढांचे को अधिक अंतिम वैधानिक स्वरूप देता था।
कर्नाटक को तमिलनाडु के लिए कितना पानी छोड़ना है?
2018 के संशोधन के बाद बिलिगुंडुलु सीमा बिंदु पर कर्नाटक द्वारा तमिलनाडु को उपलब्ध कराए जाने वाला वार्षिक जल लगभग 177.25 टीएमसी हो गया।
यह न्यायाधिकरण की पूर्व 192 टीएमसी सीमा-रिलीज व्यवस्था से 14.75 टीएमसी कम था।
तमिलनाडु की कुल 404.25 टीएमसी हिस्सेदारी में राज्य के अपने जलग्रहण क्षेत्र से मिलने वाला पानी भी शामिल है।
इसलिए फिर वही अंतर ध्यान रखना आवश्यक है—
कुल राज्य आवंटन ≠ केवल कर्नाटक से सीमा पर मिलने वाला पानी।
मासिक जल रिलीज क्यों आवश्यक है?
यदि कर्नाटक वर्ष के अंत में पूरा निर्धारित पानी एक साथ छोड़ दे तो तमिलनाडु किसान को उससे कोई लाभ नहीं होगा।
इसलिए कावेरी व्यवस्था में मासिक/मौसमी रिलीज कार्यक्रम महत्वपूर्ण है।
कर्नाटक के जलाशयों से पानी इस प्रकार नियंत्रित होना चाहिए कि तमिलनाडु की कृषि अवधि के अनुरूप बिलिगुंडुलु पर आवश्यक प्रवाह मिले।
यही कारण है कि केवल वार्षिक टीएमसी संख्या पर्याप्त नहीं।
कावेरी प्रबंधन प्राधिकरण क्यों जरूरी था?
न्यायाधिकरण और सर्वोच्च न्यायालय ने हिस्सेदारी तय कर दी।
लेकिन रोजमर्रा में प्रश्न उठते रहे—
तमिलनाडु को इस महीने कितना मिलना चाहिए?
इसीलिए एक स्थायी संस्थागत तंत्र आवश्यक था।
2018 : कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद केंद्र सरकार ने 2018 में Cauvery Water Management Authority—कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) की व्यवस्था स्थापित की।
18 मई 2018 के सर्वोच्च न्यायालय आदेश में प्राधिकरण की शक्तियां और कर्तव्य स्पष्ट किए गए।
और कर्नाटक से बिलिगुंडुलु पर तमिलनाडु की ओर नियत जल प्रवाह सुनिश्चित करना।
यह कावेरी विवाद के संस्थागत इतिहास का बहुत बड़ा मोड़ था।
कावेरी जल विनियमन समिति
प्राधिकरण के साथ एक Cauvery Water Regulation Committee भी कार्य करती है।
इसका उद्देश्य अधिक तकनीकी और नियमित निगरानी है—
और रिलीज संबंधी आंकड़ों की समीक्षा।
इससे विवाद को केवल राजनीतिक बयानबाजी से हटाकर डेटा-आधारित संचालन की दिशा देने की कोशिश की गई।
लेकिन राजनीतिक मतभेद पूरी तरह समाप्त नहीं हुए।
प्राधिकरण के अधिकार कितने व्यापक हैं?
सर्वोच्च न्यायालय के अनुमोदित ढांचे के अनुसार प्राधिकरण को न्यायाधिकरण के अंतिम निर्णय तथा सर्वोच्च न्यायालय के संशोधन को लागू कराने के लिए आवश्यक कदम उठाने की जिम्मेदारी दी गई।
और राज्यों को आवश्यक निर्देश दे सकता है।
लेकिन उसके पास अपना स्वतंत्र बांध नहीं है।
जलाशयों का भौतिक संचालन संबंधित राज्य ही करते हैं।
यहीं संस्थागत शक्ति की वास्तविक सीमा भी है।
डेटा ही नया राजनीतिक हथियार
कावेरी विवाद में अब सवाल केवल राजनीतिक भाषण का नहीं है।
बिलिगुंडुलु पर कितना प्रवाह दर्ज हुआ?
इसलिए जल मापन स्वयं राजनीतिक विवाद का हिस्सा बन गया।
डेटा पर विश्वास जल-संघवाद की सफलता के लिए आवश्यक है।
सूखा वर्ष सबसे कठिन परीक्षा
सामान्य वर्ष में निर्धारित जल आवंटन लागू करना अपेक्षाकृत आसान है।
लेकिन यदि कुल नदी प्रवाह ही बहुत कम हो—
यही वह प्रश्न है जिस पर तमिलनाडु लंबे समय से स्पष्ट distress-sharing formula—कमी की स्थिति में साझा कटौती का सूत्र चाहता रहा है।
कर्नाटक का तर्क रहता है कि अपने जलाशयों और घरेलू जरूरतों की वास्तविक स्थिति देखना आवश्यक है।
इसलिए सूखा कावेरी संस्थाओं की सबसे बड़ी परीक्षा है।
किसान के लिए संकट-साझेदारी का अर्थ
लेकिन किसान के लिए इसका अर्थ सीधा है।
यदि सामान्य वर्ष में 100 इकाई पानी मिलना था और नदी में केवल 60 उपलब्ध है—
तो क्या तमिलनाडु को भी 60 प्रतिशत मिलेगा?
या पहले कर्नाटक अपनी जरूरत पूरी करेगा?
यही मुद्दा हर गंभीर सूखे में राजनीतिक विस्फोट पैदा कर सकता है।
जल उपयोग दक्षता का प्रश्न
सर्वोच्च न्यायालय और न्यायाधिकरण दोनों ने फसल पैटर्न तथा पानी के अधिक दक्ष उपयोग पर विचार किया।
यह तमिलनाडु किसान राजनीति के लिए कठिन प्रश्न है।
उपलब्ध पानी का उपयोग अधिक दक्ष क्यों न हो?
क्या धान कम करना समाधान है?
आंशिक समाधान हो सकता है, पूर्ण नहीं।
फसल परिवर्तन केवल तकनीकी आदेश से संभव नहीं।
यदि किसान धान छोड़कर दूसरी फसल लगाए तो उसे चाहिए—
इसलिए जल संरक्षण नीति को कृषि आय नीति से जोड़ना होगा।
भूजल ने संकट कुछ कम किया, नया संकट पैदा किया
डेल्टा में कुछ किसान पंपसेट और भूजल से नहर की कमी पूरी करने लगे।
इससे नदी जल पर तत्काल निर्भरता कुछ कम हो सकती थी।
लेकिन अत्यधिक भूजल दोहन नई समस्या पैदा करता है—
सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 के निर्णय में तमिलनाडु के उपलब्ध भूजल को भी आवंटन संशोधन के एक कारक के रूप में माना।
यही तमिलनाडु की आलोचना का भी विषय बना।
डेल्टा में समुद्री जल प्रवेश
कावेरी डेल्टा समुद्र से जुड़ा क्षेत्र है।
यदि नदी में मीठे पानी का प्रवाह कम हो और भूजल अधिक निकाला जाए तो समुद्री खारापन अंदर की ओर बढ़ सकता है।
यह कृषि भूमि और भूजल दोनों को प्रभावित कर सकता है।
नदी का पर्यावरणीय प्रवाह आवश्यक है।
1990 के दशक से इक्कीसवीं सदी तक तमिलनाडु का किसान संकट
कर्ज, सूखा, भूजल, नदी-जोड़ मांग, किसान आत्महत्या, दिल्ली के प्रदर्शन, पी. अय्याकन्नु और नई किसान राजनीति
1990 के दशक के बाद तमिलनाडु का किसान संकट एक नए चरण में प्रवेश करता है। भूमि सुधार, पन्नैयाल मुक्ति, उचित मजदूरी, कृषि बिजली और कावेरी जल—ये पुराने प्रश्न समाप्त नहीं हुए, लेकिन उनके साथ ऐसी नई समस्याएं जुड़ गईं जिनका स्रोत कृषि के बढ़ते बाजारीकरण, जल संकट और वित्तीय जोखिम में था।
अब किसान की असुरक्षा चार दिशाओं से बनती थी—
जल की अनिश्चितता, कर्ज और बढ़ती लागत, फसल मूल्य का जोखिम, और जलवायु संबंधी संकट।
1990 में कृषि बिजली मुफ्त हो जाने के बावजूद खेती संकट-मुक्त नहीं हुई। किसान की लागत में बीज, उर्वरक, कीटनाशक, मजदूरी और मशीनों का खर्च बना रहा। भूजल पर निर्भरता बढ़ने से अनेक क्षेत्रों में कुएं गहरे होते गए। कावेरी जैसे अंतरराज्यीय जल विवाद बने रहे। वर्षा की विफलता ने कई बार पूरी फसल प्रणाली को संकट में डाल दिया।
इस नए दौर की किसान राजनीति का सबसे नाटकीय प्रतीक 2017 में पी. अय्याकन्नु के नेतृत्व में दिल्ली के जंतर-मंतर पर तमिलनाडु किसानों का आंदोलन बना। किसानों ने मानव खोपड़ियां लेकर प्रदर्शन किया, अपने सिर के आधे बाल और मूंछें मुंडाईं, चूहे और सांप मुंह में रखे और दूसरी असाधारण प्रदर्शन विधियां अपनाईं। उनका उद्देश्य था—
देश की राजधानी को तमिलनाडु के कृषि संकट की ओर देखने के लिए मजबूर करना।
1990 के बाद किसान संकट का स्वरूप क्यों बदला?
1980 के दशक तक तमिलनाडु किसान राजनीति की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक कृषि बिजली पर भारी सब्सिडी और अंततः मुफ्त बिजली थी।
लेकिन बिजली मुफ्त होने से खेती की सारी लागत समाप्त नहीं हुई।
इसलिए कृषि का संकट धीरे-धीरे इनपुट लागत बनाम कृषि आय के प्रश्न पर अधिक केंद्रित हुआ।
मुफ्त बिजली के बावजूद पानी मुफ्त नहीं
यह तमिलनाडु कृषि अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण विरोधाभास है।
लेकिन यदि कुएं में पानी ही नहीं है तो पंपसेट बेकार है।
पश्चिमी और उत्तरी तमिलनाडु के कई हिस्सों में भूजल कृषि का आधार बनता गया।
लेकिन लगातार पंपिंग से जलस्तर नीचे जाने लगा।
इससे किसान को और गहरा कुआं खोदना पड़ सकता था।
भूजल और पूंजी का नया चक्र
भूजल संकट ने किसान को एक नए आर्थिक चक्र में डाल दिया।
अर्थात मुफ्त बिजली का लाभ होने के बावजूद पानी निकालने की पूंजी लागत बढ़ सकती थी।
कई किसान परिवारों के लिए एक असफल बोरवेल भी बड़ी आर्थिक चोट बन सकता था।
पानी जमीन के नीचे भी असमान
और पानी अधिक तेजी से निकाल सकता है।
इससे भूजल एक सामुदायिक प्राकृतिक संसाधन होते हुए भी व्यवहार में निजी भूमि स्वामित्व और निवेश क्षमता से जुड़ जाता है।
यानी पानी की कमी ग्रामीण असमानता को और बढ़ा सकती है।
कावेरी डेल्टा का संकट अलग
डेल्टा किसान का मुख्य संकट भूजल से अलग था।
इनमें से एक भी गंभीर रूप से विफल हो जाए तो—
इसलिए तमिलनाडु में किसान संकट का एक ही मॉडल नहीं था।
1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण
1991 के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में उदारीकरण की प्रक्रिया तेज हुई।
कृषि भी धीरे-धीरे अधिक प्रतिस्पर्धी बाजार से जुड़ने लगी।
व्यावसायिक खेती का जोखिम
यदि किसान आत्म-उपभोग के लिए खेती करता है तो बाजार मूल्य की भूमिका सीमित होती है।
जैसी फसलें बाजार में बेचने के लिए उगाता है तो उसकी आय सीधे बाजार मूल्य पर निर्भर होती है।
इसलिए आधुनिक किसान का जोखिम केवल मौसम का नहीं, बाजार का भी है।
अधिक उत्पादन भी संकट बन सकता है
यह कृषि अर्थव्यवस्था का विचित्र विरोधाभास है।
विशेषकर शीघ्र खराब होने वाली फसलों में—
कीमत इतनी गिर सकती है कि किसान के लिए खेत से माल बाजार तक पहुंचाना भी लाभकारी न रहे।
इसलिए किसान आंदोलन का प्रश्न बदलता गया—
उत्पादन बढ़ाओ से उत्पादन का उचित मूल्य सुनिश्चित करो तक।
न्यूनतम समर्थन मूल्य और तमिलनाडु
धान जैसे खाद्यान्न के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य सुरक्षा का एक आधार बना।
लेकिन सभी फसलें प्रभावी सरकारी खरीद के अंतर्गत नहीं आतीं।
और जहां समर्थन मूल्य घोषित है, वहां भी वास्तविक किसान को वही मूल्य मिलना इस पर निर्भर करता है—
इसलिए तमिल किसान संगठन लगातार मांग करते रहे कि कृषि मूल्य केवल कागज पर घोषित नहीं बल्कि व्यवहार में उपलब्ध हो।
गन्ना किसान का अलग संकट
गन्ने में किसान की समस्या विशिष्ट है।
फसल तैयार होने के बाद उसे चीनी मिल से जोड़ना पड़ता है।
यदि मिल भुगतान देर से करे तो किसान के सामने नकदी संकट पैदा होता है।
उधर अगली फसल की तैयारी का समय आ जाता है।
इसलिए तमिलनाडु किसान राजनीति में गन्ना मूल्य और बकाया भुगतान भी महत्वपूर्ण विषय रहे।
यह दिखाता है कि इक्कीसवीं सदी का किसान आंदोलन अक्सर फसल-विशिष्ट भी हो जाता है।
नारियल और पश्चिमी तमिलनाडु
कोयंबटूर, पोलाची और पश्चिमी क्षेत्रों में नारियल महत्वपूर्ण व्यावसायिक फसल है।
आयातित खाद्य तेलों की प्रतिस्पर्धा।
इसलिए किसान संगठन अब केवल “किसान” की एक सामान्य मांग नहीं बल्कि विशिष्ट वस्तुओं के मूल्य और व्यापार नीति पर भी संघर्ष करने लगे।
कर्ज का बदलता स्वरूप
पुराने किसान आंदोलन में साहूकार प्रमुख ऋणदाता था।
आधुनिक कृषि में किसान को ऋण मिल सकता है—
संस्थागत ऋण का विस्तार सकारात्मक परिवर्तन था।
लेकिन इससे ऋण संकट समाप्त नहीं हुआ।
संस्थागत और निजी कर्ज में अंतर
यह अंतर किसान आंदोलन में बहुत महत्वपूर्ण है।
सरकार सहकारी या बैंक ऋण माफ कर सकती है।
लेकिन निजी साहूकार का कर्ज सरकारी ऋण माफी में शामिल नहीं होता।
इसलिए किसी किसान की वास्तविक देनदारी सरकारी रिकॉर्ड से अधिक हो सकती है।
यहीं व्यापक कृषि ऋण माफी की मांग की सीमा सामने आती है।
कर्ज माफी फिर बड़ा राजनीतिक प्रश्न
1970 के दशक में नारायणसामी नायडू व्यापक कर्ज राहत की मांग उठा चुके थे।
इक्कीसवीं सदी में वही प्रश्न वापस आया।
हर बार पूर्ण कर्ज माफी से बैंकिंग अनुशासन प्रभावित होगा।
यदि संकट प्राकृतिक और नीतिगत है तो पूरा बोझ अकेला किसान क्यों उठाए?
सहकारी ऋण और राज्य की भूमिका
तमिलनाडु की राजनीति में सहकारी कृषि ऋण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य सरकार उस पर अपेक्षाकृत अधिक प्रभाव रख सकती है।
इसलिए विभिन्न द्रमुक और अन्नाद्रमुक सरकारों ने समय-समय पर कृषि ऋण राहत और माफी को चुनावी व कल्याणकारी नीति बनाया।
इससे 1970 के दशक का आंदोलनकारी नारा—
धीरे-धीरे राज्य चुनावी नीति का स्थायी हिस्सा बन गया।
लेकिन बार-बार कर्ज क्यों लौटता है?
यदि कर्ज माफ होने के बाद किसान फिर ऋण में फंस जाए तो मूल समस्या खत्म नहीं हुई।
इसलिए स्थायी समाधान केवल कर्ज माफी नहीं हो सकता।
सूखा—तमिलनाडु की स्थायी कमजोरी
तमिलनाडु की वर्षा संरचना भारत के अधिकांश राज्यों से अलग है।
राज्य का बड़ा हिस्सा उत्तर-पूर्वी मानसून पर भी निर्भर है।
यदि दक्षिण-पश्चिम और उत्तर-पूर्व दोनों मानसून कमजोर पड़ें तो कृषि संकट बहुत गंभीर हो सकता है।
विशेषकर वर्षा-निर्भर क्षेत्रों में एक कमजोर मानसून सीधे—
2016–17 : असाधारण सूखा
2016–17 तमिलनाडु के आधुनिक कृषि इतिहास के सबसे कठिन सूखा वर्षों में से था।
कावेरी जल संकट और अत्यंत कमजोर उत्तर-पूर्वी मानसून ने कृषि को गंभीर नुकसान पहुंचाया।
जनवरी 2017 में तमिलनाडु सरकार ने पूरे राज्य को सूखाग्रस्त घोषित करने का निर्णय लिया और 33 प्रतिशत से अधिक फसल नुकसान वाले किसानों के लिए राहत उपाय घोषित किए।
कई क्षेत्रों में धान की बुवाई तक पूरी नहीं हो सकी।
सूखा और किसान मृत्यु
2016–17 के दौरान तमिलनाडु से बड़ी संख्या में किसानों की मृत्यु की खबरें आईं।
लेकिन इस विषय में तथ्यात्मक सावधानी अत्यंत जरूरी है।
मीडिया और किसान संगठनों ने अनेक मौतों को—
इसलिए “सभी मृतकों ने कर्ज के कारण आत्महत्या की” जैसा वाक्य प्रमाणित नहीं माना जाना चाहिए।
गंभीर सूखे और फसल विफलता के दौरान किसान मृत्यु और आत्महत्या का प्रश्न तमिलनाडु में बड़ा सार्वजनिक संकट बना।
किसान आत्महत्या को कैसे समझें?
आत्महत्या का एकल कारण निर्धारित करना कठिन है।
कृषि परिवार के तनाव में एक साथ हो सकते हैं—
इसलिए किसान आत्महत्या का गंभीर अध्ययन व्यक्ति-विशिष्ट कारणों और आधिकारिक आंकड़ों पर आधारित होना चाहिए।
राजनीतिक आंदोलन अक्सर इसे व्यापक कृषि संकट के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करता है।
2017 : तमिल किसान दिल्ली क्यों पहुंचे?
तमिलनाडु में आंदोलन करने के बजाय किसान दिल्ली गए क्योंकि उनकी कई मांगें केंद्र सरकार से जुड़ी थीं।
और केंद्र को पर्याप्त राहत देनी चाहिए।
14 मार्च 2017 को पी. अय्याकन्नु के नेतृत्व में किसानों का समूह दिल्ली के जंतर-मंतर पर बैठ गया। शुरुआती समूह को विभिन्न रिपोर्टें लगभग 80 से 150 किसानों के बीच बताती हैं।
पी. अय्याकन्नु कौन थे?
पी. अय्याकन्नु तमिलनाडु के किसान नेता थे और National South Indian Rivers Inter-Linking किसान Association से जुड़े प्रमुख चेहरे के रूप में सामने आए।
2017 के जंतर-मंतर प्रदर्शन ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।
संगठन के नाम में ही एजेंडा
अय्याकन्नु के संगठन का नाम महत्वपूर्ण है—
दक्षिण भारतीय नदियों को जोड़ने वाला किसान संगठन।
यह दिखाता है कि तमिलनाडु की नई किसान राजनीति में पानी केवल कावेरी विवाद तक सीमित नहीं था।
अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों का अतिरिक्त पानी सूखे क्षेत्रों तक पहुंचाया जाए।
इसलिए नदी-जोड़ योजना किसान आंदोलन की प्रमुख मांगों में शामिल हुई।
नदी-जोड़ की मांग क्यों लोकप्रिय हुई?
तमिल किसान हर कुछ वर्षों में देखते थे—
यदि अधिक पानी वाली नदी का “अतिरिक्त” पानी सूखे क्षेत्र में लाया जाए तो दोनों समस्याएं हल हो सकती हैं।
नदी-जोड़ की कल्पना इसलिए अत्यंत आकर्षक है।
विशेषकर सूखा प्रभावित किसान के लिए।
लेकिन तकनीकी और पर्यावरणीय स्तर पर यह बहुत अधिक जटिल है।
नदी में “अतिरिक्त पानी” निर्धारित करना कठिन
किसी नदी का समुद्र तक पहुंचने वाला पूरा पानी बर्बादी नहीं है।
और समुद्री खारेपन को रोकने के लिए मीठा पानी।
इसलिए “यह पानी बेकार समुद्र में जा रहा है” का नारा राजनीतिक रूप से आकर्षक लेकिन वैज्ञानिक रूप से अधूरा हो सकता है।
नदी-जोड़ योजना में यही सबसे बड़ी सावधानी आवश्यक है।
जंतर-मंतर पर खोपड़ियां
2017 के आंदोलन की सबसे पहचान योग्य तस्वीर थी—
मानव खोपड़ियों के साथ बैठे तमिल किसान।
प्रदर्शनकारियों का दावा था कि ये उन किसानों के अवशेष हैं जिनकी सूखा और कर्ज संकट की पृष्ठभूमि में मृत्यु या आत्महत्या हुई थी। कुछ प्रदर्शनकारियों ने कहा कि परिवारों की अनुमति से अवशेष लाए गए थे। स्वतंत्र रूप से प्रत्येक खोपड़ी की पहचान सत्यापित नहीं हुई थी, इसलिए इसे किसानों के दावे के रूप में ही लिखना अधिक उचित है।
यह प्रतीक राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान आकर्षित करने में अत्यंत प्रभावी रहा।
इतनी विचित्र प्रदर्शन विधियां क्यों?
सामान्य धरने और ज्ञापन पर कोई ध्यान नहीं देता।
इसलिए उन्होंने प्रदर्शन को लगातार अधिक नाटकीय बनाया।
मूंछ और सिर आधा मुंडाने का प्रतीक
प्रदर्शनकारियों ने सिर और मूंछ का आधा हिस्सा मुंडाकर सूखी/आधी बर्बाद खेती का प्रतीक प्रस्तुत किया।
यह पारंपरिक किसान प्रदर्शन की भाषा से बहुत अलग था।
अब आंदोलन मीडिया युग में visual politics—दृश्य राजनीति का प्रयोग कर रहा था।
चूहे और सांप मुंह में रखने का अर्थ
किसानों ने मृत चूहे और सांप मुंह में रखकर दावा किया कि यदि कृषि संकट जारी रहा तो उन्हें ऐसी स्थितियों में जीना पड़ेगा।
यह प्रतीकात्मक और जानबूझकर असुविधाजनक प्रदर्शन था।
यानी किसान आंदोलन ने मीडिया की एक कठोर वास्तविकता समझी—
सामान्य पीड़ा हमेशा समाचार नहीं बनती; असाधारण दृश्य बनता है।
मूत्र पीने का प्रदर्शन
अप्रैल 2017 में कुछ प्रदर्शनकारियों ने अपना मूत्र पीकर विरोध किया।
उनका संदेश था कि तमिलनाडु में किसान पानी के लिए तरस रहा है और केंद्र उनकी स्थिति पर ध्यान नहीं दे रहा।
उन्होंने इससे भी अधिक चरम प्रदर्शन की चेतावनी दी थी।
लेकिन राष्ट्रीय समाचार चक्र में इसने किसान संकट को प्रमुख स्थान दिलाया।
क्या इन प्रदर्शनों से किसान की गंभीरता कम हुई?
अत्यधिक नाटकीय प्रदर्शन वास्तविक कृषि नीति के मुद्दों को तमाशे में बदल सकता है।
अगर किसान सामान्य धरना देते तो शायद उन्हें उतनी राष्ट्रीय दृश्यता नहीं मिलती।
अय्याकन्नु ने मीडिया दृश्यता को आंदोलन का हथियार बना दिया।
उनकी प्रमुख मांगें क्या थीं?
2017 के प्रदर्शन में प्रमुख मांगें थीं—
तमिलनाडु के लिए पर्याप्त सूखा राहत,
तथा नदियों को जोड़ने की दिशा में पहल।
जुलाई 2017 में जंतर-मंतर लौटे प्रदर्शनकारियों की मांगों में ऋण माफी, संशोधित सूखा पैकेज, कावेरी प्रबंधन व्यवस्था और उत्पादों के उचित मूल्य का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
यानी आंदोलन केवल कर्ज माफी का नहीं था।
केंद्र से 40,000 करोड़ रुपये की राहत की मांग
तमिलनाडु सरकार ने गंभीर सूखे के बाद केंद्र से बड़ा राहत पैकेज मांगा था।
प्रदर्शनकारी किसान लगभग 40,000 करोड़ रुपये के सूखा राहत पैकेज की मांग को लेकर भी दिल्ली पहुंचे।
उन्हें केंद्र द्वारा उपलब्ध कराई गई लगभग 2,000 करोड़ रुपये की राहत अपर्याप्त लगी।
ऋण माफी—केंद्र या राज्य?
2017 के आंदोलन में एक संवैधानिक–वित्तीय प्रश्न भी सामने आया।
सहकारी बैंक राज्य के प्रभाव में हो सकते हैं।
लेकिन राष्ट्रीयकृत/वाणिज्यिक बैंक केंद्र और राष्ट्रीय बैंकिंग तंत्र से जुड़े हैं।
इसलिए राज्य सरकार केवल अपने स्तर पर सभी प्रकार के कृषि ऋण नहीं मिटा सकती।
राष्ट्रीयकृत बैंक ऋण पर केंद्र को हस्तक्षेप करना चाहिए।
उत्तर प्रदेश की ऋण माफी ने दबाव बढ़ाया
2017 में उत्तर प्रदेश की नई सरकार द्वारा किसानों के लिए बड़े ऋण माफी कार्यक्रम की घोषणा ने तमिलनाडु किसानों की मांग को और राजनीतिक धार दी।
यदि एक राज्य के किसानों के लिए कर्ज राहत संभव है तो गंभीर सूखे से जूझ रहे तमिल किसान के लिए क्यों नहीं?
इस प्रकार किसान नीति राज्यों के बीच तुलना और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का विषय बन गई।
मद्रास उच्च न्यायालय और ऋण माफी
अप्रैल 2017 में मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु में सहकारी कृषि ऋण माफी के दायरे को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय दिया, जिसे व्यापक रूप से किसानों के पक्ष में देखा गया।
लेकिन बाद में मामला सर्वोच्च न्यायालय तक गया।
यह दिखाता है कि किसान ऋण माफी केवल राजनीतिक घोषणा नहीं—
कानूनी और वित्तीय नीति का भी जटिल प्रश्न है।
क्या किसानों ने प्रधानमंत्री से मुलाकात की?
2017 के आंदोलन की सबसे बड़ी राजनीतिक शिकायतों में से एक थी कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सीधे मुलाकात चाहते थे।
किसानों के प्रतिनिधियों की विभिन्न केंद्रीय मंत्रियों और अधिकारियों से बातचीत हुई।
वित्त मंत्री अरुण जेटली से मुलाकात के बाद भी किसानों ने कहा कि वे ठोस समाधान चाहते हैं।
प्रधानमंत्री से प्रत्यक्ष संवाद का प्रश्न स्वयं आंदोलन का प्रतीक बन गया—
क्या राष्ट्रीय सत्ता किसान की बात सुन रही है?
आंदोलन का पहला चरण समाप्त कैसे हुआ?
लगभग चालीस दिनों के बाद अप्रैल 2017 में किसान आंदोलन का पहला चरण स्थगित किया गया।
उन्हें तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ई. के. पलानीस्वामी सहित राजनीतिक नेताओं से आश्वासन मिले कि उनकी मांगें केंद्र के सामने उठाई जाएंगी।
लेकिन किसानों ने चेतावनी दी कि समाधान न हुआ तो वे वापस आएंगे।
जुलाई 2017 में वापसी
जुलाई 2017 में लगभग सौ किसान फिर जंतर-मंतर पहुंचे।
इस बार वे फिर खोपड़ियां और हड्डियां लेकर आए, जिनके बारे में उनका दावा था कि वे संकट में मरे किसानों के अवशेष हैं।
इससे स्पष्ट हुआ कि मार्च–अप्रैल का प्रदर्शन केवल प्रतीकात्मक अभियान नहीं था।
आंदोलन लंबे संघर्ष में बदल चुका था।
दिल्ली आंदोलन का राष्ट्रीय प्रभाव
2017 के तमिल किसान आंदोलन ने राष्ट्रीय मीडिया में कृषि संकट की ऐसी तस्वीर प्रस्तुत की जो सामान्य सांख्यिकीय रिपोर्टों से संभव नहीं थी।
और जंतर-मंतर की गर्मी में बैठे वृद्ध कृषक।
इससे ग्रामीण संकट को शहरी दर्शक तक दृश्य रूप में पहुंचाया गया।
यह आधुनिक किसान राजनीति की बड़ी उपलब्धि थी।
लेकिन नीतिगत सफलता कितनी मिली?
कई राष्ट्रीय और राज्य नेता किसानों से मिले।
किसान संकट पर संसद और सार्वजनिक बहस बढ़ी।
लेकिन उनकी सभी प्रमुख मांगें तत्काल स्वीकार नहीं हुईं।
इसलिए 2017 का आंदोलन दृश्यता की बड़ी सफलता, लेकिन पूर्ण नीतिगत जीत नहीं था।
अय्याकन्नु की आंदोलन शैली
पी. अय्याकन्नु का नेतृत्व नारायणसामी नायडू से काफी अलग था।
हजारों किसानों को सड़क और बैलगाड़ियों से प्रशासन रोकना।
छोटी संख्या में किसानों के साथ ऐसा दृश्य पैदा करना जो राष्ट्रीय मीडिया को नजरअंदाज न करने दे।
mass blockade से media spectacle तक।
यह बदलाव क्यों आवश्यक हुआ?
इक्कीसवीं सदी की राजनीति में दृश्य संचार महत्वपूर्ण है।
इन सबमें आंदोलन का दृश्य संदेश अत्यंत प्रभावी हो सकता है।
इसलिए छोटी संख्या वाला समूह भी राष्ट्रीय प्रभाव पैदा कर सकता है।
अय्याकन्नु ने इस मीडिया संरचना को समझकर उसका प्रयोग किया।
नई किसान राजनीति में दिल्ली का महत्व
1970 के दशक में तमिल किसान का मुख्य लक्ष्य चेन्नई था।
यह बदलाव बताता है कि कृषि नीति कितनी राष्ट्रीय हो चुकी थी।
इसलिए दिल्ली किसान आंदोलन का स्वाभाविक मंच बनी।
जल संकट और राष्ट्रीय नदी-जोड़ परियोजना
तमिल किसान संगठनों ने लंबे समय से मांग की कि भारत की नदियों को आपस में जोड़कर जल-असमानता कम की जाए।
जहां बाढ़ आती है वहां का अतिरिक्त पानी सूखा क्षेत्रों तक पहुंचाया जाए।
इस मांग में कावेरी विवाद का अनुभव साफ दिखाई देता है।
यदि अंतरराज्यीय नदी पर निर्भरता राजनीतिक असुरक्षा पैदा करती है तो व्यापक राष्ट्रीय जल ग्रिड किसान को अधिक सुरक्षा दे सकता है—ऐसा आंदोलनकारियों का विश्वास रहा।
नदी-जोड़ परियोजना की वास्तविक कठिनाइयां
किस बेसिन में वास्तव में अधिशेष पानी है?
और जिस राज्य से पानी लिया जाएगा वह क्यों सहमत होगा?
इसलिए किसान की न्यायसंगत जल-सुरक्षा मांग और किसी विशेष नदी-जोड़ परियोजना की तकनीकी व्यवहार्यता को अलग-अलग परखना चाहिए।
भूजल और नदी-जोड़—एक ही समस्या के दो चेहरे
जब स्थानीय भूजल घटता है तो किसान बाहर से पानी चाहता है।
इसलिए नदी-जोड़ की मांग मजबूत होती है।
लेकिन यदि बाहरी पानी मिलने के बाद भी स्थानीय जल उपयोग अत्यधिक रहे तो दीर्घकालीन समस्या बनी रहेगी।
इसलिए तमिलनाडु की जल सुरक्षा के लिए आवश्यक है—
किसान बीमा का प्रश्न
आधुनिक खेती में जोखिम पूरी तरह किसान पर छोड़ना राजनीतिक रूप से कठिन होता गया।
फसल नष्ट हो तो किसान को कम-से-कम वित्तीय सुरक्षा मिले।
लेकिन व्यवहार में किसान शिकायत करता रहा—
इसीलिए 2017 सहित आधुनिक किसान आंदोलनों की मांगों में बीमा का प्रश्न भी शामिल रहा।
जलवायु परिवर्तन और किसान संकट
इक्कीसवीं सदी में एक नया तत्व और स्पष्ट हुआ—
तमिलनाडु के किसान के लिए संभावित असर हैं—
इससे कृषि जोखिम पुराने कृषि मॉडल की तुलना में अधिक जटिल हो सकता है।
तमिलनाडु किसान आंदोलन की उपलब्धियां, सीमाएं और दूसरे किसान आंदोलनों से तुलना
शेतकरी संगठन, भारतीय किसान यूनियन, कर्नाटक राज्य रैयत संघ; भूमि से बिजली, मजदूरी से MSP और क्षेत्रीय संघर्ष से राष्ट्रीय किसान राजनीति तक
तमिलनाडु का किसान आंदोलन किसी एक संगठन, एक नेता, एक वर्ग या एक मांग की कहानी नहीं है। उसका इतिहास कम-से-कम तीन बड़े चरणों से होकर गुजरता है।
पहला चरण था पूर्वी तंजावुर का खेतिहर मजदूर–काश्तकार संघर्ष, जिसमें पन्नैयाल मुक्ति, बेदखली से सुरक्षा, मजदूरी, जातिगत सम्मान और भूमि संबंध केंद्रीय थे।
दूसरा चरण था नारायणसामी नायडू के नेतृत्व में स्वामी किसान आंदोलन, जिसमें बिजली शुल्क, कृषि कर्ज, सिंचाई, उत्पादन लागत और लाभकारी मूल्य प्रमुख मुद्दे बने।
तीसरा चरण है इक्कीसवीं सदी की जल–आय–बाजार राजनीति, जिसमें कावेरी, भूजल, सूखा, फसल बीमा, ऋण माफी, समर्थन मूल्य, नदी-जोड़ और केंद्र सरकार की कृषि नीति तक प्रश्न फैल गए।
इसलिए तमिलनाडु की सबसे बड़ी ऐतिहासिक विशेषता यह है कि एक ही राज्य में भारतीय किसान आंदोलन का लगभग पूरा वैचारिक संक्रमण दिखाई देता है—
भूमि से लागत तक, मजदूरी से मूल्य तक, भू-स्वामी से राज्य तक, और गांव से दिल्ली तक।
आधुनिक किसान आंदोलनों के अध्ययन भी तमिलनाडु एग्रीकल्चरिस्ट्स एसोसिएशन को शेतकरी संगठन, भारतीय किसान यूनियन और कर्नाटक राज्य रैयत संघ के साथ भारत के प्रमुख “नए किसान आंदोलनों” में रखते हैं। कुछ शैक्षिक अध्ययनों में तो 1970 के दशक में इस नई किसान राजनीति की शुरुआती तरंग तमिलनाडु में दिखाई देने की बात स्पष्ट रूप से कही गई है।
पहली बड़ी उपलब्धि—किसान शब्द का विस्तार
तमिलनाडु के इतिहास ने “किसान” की संकीर्ण परिभाषा को चुनौती दी।
पूर्वी तंजावुर के किसान आंदोलन का सामाजिक आधार विशेष रूप से कृषि मजदूरों और गरीब काश्तकारों में मजबूत था। ऐतिहासिक अध्ययनों में तंजावुर को तमिलनाडु किसान आंदोलन के प्रमुख गढ़ों में गिना गया है और वहां भूमि-मालिक, कृषक तथा मजदूर की स्पष्ट वर्गीय संरचना दर्ज की गई है।
इसलिए तमिलनाडु हमें चेतावनी देता है—
“किसान हित” कहने से पहले यह पूछना आवश्यक है कि किस किसान का हित?
पन्नैयाल मुक्ति—सबसे बुनियादी सामाजिक परिवर्तन
तमिलनाडु किसान आंदोलन की शुरुआती उपलब्धियों में पन्नैयाल व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष का स्थान बहुत ऊंचा है।
इसने उस सामाजिक संबंध को चुनौती दी जिसमें खेतिहर मजदूर—
के माध्यम से भू-स्वामी से बंधा रह सकता था।
1940 के दशक में किसान संगठनों की मांगों में बंधुआ कृषि श्रम समाप्त करना और ग्रामीण ऋण के बोझ से मुक्ति महत्वपूर्ण मुद्दे थे। पूर्वी तंजावुर के कृषि मजदूर आंदोलन पर उपलब्ध अध्ययन 1944 के मांगपत्र में बंधुआ श्रम की समाप्ति और ऋण उन्मूलन जैसी मांगों को दर्ज करते हैं।
यह स्वतंत्र खेतिहर मजदूर पहचान के निर्माण की आधारशिला थी।
दूसरी उपलब्धि—मजदूरी को निजी सौदे से अधिकार बनाना
तंजावुर में किसान सभा और कृषि मजदूर संगठनों ने मजदूरी को भू-स्वामी की व्यक्तिगत इच्छा से निकालकर सामूहिक सौदेबाजी का प्रश्न बनाया।
और अंततः कृषि मजदूर के लिए कानूनी उचित मजदूरी व्यवस्था विकसित हुई।
पूर्वी तंजावुर में 1967 और 1968 के मजदूरी आंदोलनों के परिणामस्वरूप मन्नारगुडी और तिरुवारूर समझौतों का उल्लेख भी ऐतिहासिक अध्ययनों में मिलता है।
इस पूरी यात्रा का राजनीतिक अर्थ था—
श्रम की कीमत मालिक अकेला तय नहीं करेगा।
तीसरी उपलब्धि—काश्तकारी सुरक्षा
भूमि पर स्वामित्व न होने का अर्थ यह नहीं कि वास्तविक कृषक का कोई अधिकार नहीं।
तंजावुर आंदोलन ने इस सिद्धांत को राजनीतिक और कानूनी रूप दिया।
यह भारत के भूमि सुधार इतिहास का महत्वपूर्ण तत्व था।
इससे स्वामित्व और वास्तविक खेती के बीच अंतर को कानून ने मान्यता दी।
चौथी उपलब्धि—भूमि सुधार पर दबाव
तमिलनाडु में किसान संघर्षों ने भूमि के अत्यधिक संकेंद्रण को राजनीतिक रूप से अस्वीकार्य बनाया।
1961 का भूमि-सीमा कानून और 1970 में सीमा घटाकर 15 मानक एकड़ करने जैसे कदम इस व्यापक सामाजिक दबाव से अलग नहीं देखे जा सकते।
लेकिन तमिलनाडु का अनुभव एक दूसरा सत्य भी दिखाता है—
भूमि-सीमा कानून बनना और भूमिहीनता समाप्त होना अलग बातें हैं।
पांचवीं उपलब्धि—घर की जमीन को भी भूमि अधिकार मानना
कुडियिरुप्पु अर्थात खेतिहर मजदूर के आवासीय भूखंड पर अधिकार तमिलनाडु कृषि सुधार की विशिष्ट उपलब्धियों में है।
भूमिहीन मजदूर के लिए स्वतंत्रता केवल खेत की मजदूरी से नहीं आती।
यदि उसका घर भू-स्वामी की जमीन पर है तो आर्थिक और सामाजिक निर्भरता बनी रह सकती है।
छठी उपलब्धि—जाति और वर्ग को एक साथ राजनीतिक प्रश्न बनाना
पूर्वी तंजावुर की सबसे गहरी विरासत यही है।
भूमिहीन खेतिहर मजदूरों में दलित समुदायों की बड़ी उपस्थिति थी।
इसलिए मजदूरी की मांग जातिगत सम्मान से अलग नहीं थी।
कीझवेनमणि ने इस अंतर्संबंध को भयावह तरीके से उजागर किया।
तमिलनाडु का किसान इतिहास इसलिए केवल आर्थिक इतिहास नहीं—
यही इसे महाराष्ट्र या पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाद के स्वामी किसान आंदोलनों से महत्वपूर्ण रूप से अलग करता है।
सातवीं उपलब्धि—कृषि मजदूर का स्वतंत्र संगठन
तमिलनाडु आंदोलन ने जल्दी समझ लिया कि काश्तकार और भूमिहीन मजदूर के हित हमेशा एक नहीं होते।
एक छोटा काश्तकार स्वयं मजदूर रख सकता है।
वह भू-स्वामी के सामने शोषित हो सकता है और मजदूर के सामने नियोक्ता।
इसीलिए कृषि मजदूर संगठन का स्वतंत्र विकास महत्वपूर्ण हुआ।
यह भारतीय किसान राजनीति के लिए बड़ा सैद्धांतिक पाठ था—
ग्रामीण समाज को “किसान” की एक ही सामाजिक श्रेणी में समेटना पर्याप्त नहीं।
आठवीं उपलब्धि—स्वामी किसान की स्वतंत्र राजनीति
1970 के दशक में नारायणसामी नायडू ने किसान राजनीति को दूसरी दिशा दी।
स्वयं खेती करने वाला जमीनधारी किसान।
फसल का मूल्य लागत के अनुरूप क्यों नहीं?
यहां कृषि आंदोलन भूमि संबंध से आगे कृषि राजनीतिक अर्थशास्त्र तक पहुंच गया।
शैक्षिक साहित्य नारायणसामी नायडू के तमिलनाडु आंदोलन को 1970 के दशक में उभरते नए किसान आंदोलन की शुरुआती शक्तियों में गिनता है।
बिजली को कृषि अधिकार में बदलना
तमिलनाडु किसान आंदोलन की सबसे दृश्य नीतिगत विरासत कृषि बिजली है।
और अंततः सभी कृषि पंपसेटों के लिए मुफ्त बिजली।
इस प्रक्रिया ने बिजली को केवल सार्वजनिक सेवा नहीं रहने दिया।
भारत के दूसरे राज्यों में भी आगे कृषि बिजली दर किसान आंदोलनों का केंद्रीय मुद्दा बनी।
कर्ज राहत को मुख्यधारा में लाना
नारायणसामी नायडू के आंदोलनों ने ऋण-वसूली का प्रश्न बहुत पहले उठा दिया था।
बाद में यही मांग विभिन्न रूपों में—
आज भारतीय किसान राजनीति में कर्ज माफी सामान्य चुनावी शब्दावली है।
लेकिन तमिलनाडु का 1970–80 का आंदोलन इस राजनीति की शुरुआती प्रयोगशालाओं में था।
लाभकारी मूल्य की दिशा
तमिलनाडु आंदोलन का शुरुआती जोर बिजली और लागत पर अधिक था, लेकिन धीरे-धीरे उसने कृषि उत्पाद के बेहतर मूल्य का प्रश्न भी उठाया।
यहीं उसका संबंध महाराष्ट्र के शेतकरी संगठन से बनता है।
शरद जोशी ने इस विचार को अधिक स्पष्ट सैद्धांतिक भाषा दी—
किसान की फसल का मूल्य ऐसा होना चाहिए कि कृषि और शहरी–औद्योगिक अर्थव्यवस्था के बीच विनिमय किसान के विरुद्ध न रहे।
नए किसान आंदोलनों पर उपलब्ध अध्ययनों में शेतकरी संगठन, BKU, तमिलनाडु एग्रीकल्चरिस्ट्स एसोसिएशन और KRRS की मांगों में सूक्ष्म अंतर के बावजूद कृषि उत्पाद की बेहतर कीमत और इनपुट लागत जैसे साझा प्रश्न दर्ज हैं।
MSP तक की वैचारिक यात्रा
तमिलनाडु के 1970 के किसान शायद आज की भाषा में “MSP की कानूनी गारंटी” नहीं मांग रहे थे।
उत्पादन की लागत और बिक्री मूल्य के बीच न्यायपूर्ण संबंध।
आज MSP की बहस उसी दीर्घकालीन किसान आर्थिक राजनीति का विकसित रूप है।
नायडू का आंदोलन अधिक जोर इनपुट लागत और बिजली पर देता था,
शरद जोशी मुक्त और लाभकारी मूल्य पर,
BKU समर्थन मूल्य और विशेष रूप से गन्ने की कीमत पर,
जबकि वर्तमान किसान राजनीति कानूनी MSP गारंटी तक पहुंच चुकी है।
शेतकरी संगठन से तुलना—समान सामाजिक बदलाव
तमिलनाडु और महाराष्ट्र के नए किसान आंदोलनों की सामाजिक पृष्ठभूमि में समानता थी।
इसलिए दोनों किसान आंदोलनों ने पुराने भूमि सुधार प्रश्न से आगे जाकर कृषि अर्थव्यवस्था की शर्तों को राजनीतिक मुद्दा बनाया।
लेकिन नायडू और शरद जोशी की वैचारिक दिशा अलग
नारायणसामी नायडू की राजनीति का व्यावहारिक सूत्र था—
फसल का मूल्य बढ़ाओ और बाजार में किसान पर लगी पाबंदियां हटाओ।
इसलिए तमिलनाडु मॉडल तुलनात्मक रूप से—
शेतकरी संगठन ने आगे बाजार स्वतंत्रता और लाभकारी मूल्य को अधिक केंद्रीय बनाया। नए किसान आंदोलनों के अध्ययन शेतकरी संगठन को विशेष रूप से प्याज और अन्य वाणिज्यिक फसलों के लाभकारी मूल्य आंदोलन से जोड़ते हैं।
तमिलनाडु बनाम शेतकरी संगठन—राज्य की भूमिका पर फर्क
तमिलनाडु किसान राजनीति ने धीरे-धीरे राज्य से अधिक सहायता मांगी—
शरद जोशी की विचारधारा आगे इस दिशा में गई कि किसान को सरकारी नियंत्रण से अधिक बाजार स्वतंत्रता चाहिए।
इसलिए दोनों “नए किसान आंदोलन” होते हुए भी राज्य की भूमिका पर अलग निष्कर्षों तक पहुंचे।
भारतीय किसान यूनियन से समानता
महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में BKU ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वही शक्ति दिखाई जो तमिलनाडु में नारायणसामी नायडू पहले दिखा चुके थे—
BKU ने शेतकरी संगठन, तमिलनाडु एग्रीकल्चरिस्ट्स एसोसिएशन और KRRS जैसे संगठनों से सहयोग और गठबंधन विकसित किए।
लेकिन BKU की सामाजिक जमीन अलग
BKU का सबसे मजबूत आधार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गन्ना उत्पादक किसान क्षेत्रों में विकसित हुआ।
तमिलनाडु में पंपसेट बिजली और भूजल का महत्व अधिक था।
इसलिए दोनों के आंदोलनकारी रूप समान हो सकते थे—
BKU की सबसे बड़ी राजनीतिक शैली—महापंचायत
तमिलनाडु आंदोलन में बैलगाड़ी मार्च और सड़क अवरोध विशेष पहचान बने।
1988 का मेरठ घेराव इसका प्रसिद्ध उदाहरण है।
समकालीन अध्ययनों में BKU के बड़े ग्रामीण जनाधार और लंबे सामूहिक धरनों को उसकी विशिष्ट संगठनात्मक ताकत के रूप में दर्ज किया गया है।
तमिलनाडु ने BKU से पहले क्या दिखाया?
तक विशाल स्वामी किसान आंदोलन हो चुके थे।
BKU की सबसे प्रसिद्ध राष्ट्रीय शक्ति 1980 के दशक के मध्य और अंत में सामने आई।
इसलिए राष्ट्रीय किसान इतिहास में तमिलनाडु का महत्व यह है कि उसने उस आंदोलनकारी राजनीतिक शैली का एक प्रारंभिक रूप पहले ही विकसित कर लिया था जिसे उत्तर भारत में बाद में अधिक राष्ट्रीय मीडिया दृश्यता मिली।
कर्नाटक राज्य रैयत संघ से समानता
तमिलनाडु और कर्नाटक की नई किसान राजनीति में कई समानताएं थीं—
और राज्य की कृषि नीति के विरुद्ध प्रतिरोध।
KRRS भी नए किसान आंदोलनों के प्रमुख संगठनों में गिना जाता है और एम. डी. नंजुंडस्वामी उसके सबसे प्रमुख नेताओं में रहे।
दोनों राज्यों के किसान संगठनों ने व्यापक गैर-दलीय किसान पहचान बनाने का प्रयास किया।
लेकिन KRRS आगे एक अलग वैचारिक रास्ते पर गया
तमिलनाडु की मुख्य किसान राजनीति इतनी तीखी वैश्वीकरण-विरोधी विचारधारा की ओर समान रूप से नहीं गई।
यही दोनों की प्रमुख वैचारिक भिन्नता है।
कावेरी—तमिलनाडु और KRRS एकता की सीमा
विडंबना यह थी कि तमिल और कन्नड़ किसान राष्ट्रीय आर्थिक प्रश्नों पर साथ आ सकते थे।
लेकिन कावेरी जल पर उनके क्षेत्रीय हित विपरीत थे।
यहीं किसान वर्गीय एकता भारतीय संघवाद से टकराती है।
इसलिए राष्ट्रीय किसान संगठन बनाने की सीमा केवल नेतृत्व नहीं—
प्राकृतिक संसाधनों की भौगोलिक असमानता भी थी।
चार नए किसान आंदोलनों की तुलनात्मक तस्वीर
| पक्ष | तमिलनाडु किसान आंदोलन | शेतकरी संगठन | भारतीय किसान यूनियन | कर्नाटक राज्य रैयत संघ | |---|---|---|---|---| | प्रमुख प्रारंभिक नेता | नारायणसामी नायडू | शरद जोशी | महेंद्र सिंह टिकैत सहित विभिन्न क्षेत्रीय नेता | एम. डी. नंजुंडस्वामी | | मुख्य सामाजिक आधार | सिंचित/पंपसेट स्वामी किसान | बाजारोन्मुख वाणिज्यिक किसान | गन्ना व अन्य मध्यम स्वामी किसान | मध्यम व बाजारोन्मुख कृषक | | शुरुआती प्रमुख मुद्दा | बिजली शुल्क | लाभकारी फसल मूल्य | गन्ना मूल्य, बिजली, कर्ज | सिंचाई शुल्क, कर्ज, मूल्य | | विशिष्ट आंदोलन शैली | बैलगाड़ी मार्च, बिल बहिष्कार, सड़क अवरोध | रास्ता रोको, उत्पाद रोकना | महापंचायत, घेराव | बंद, प्रत्यक्ष कार्रवाई | | राज्य पर दृष्टि | राहत और सब्सिडी की मजबूत मांग | मूल्य न्याय और बाजार स्वतंत्रता पर अधिक जोर | राज्य से मूल्य/रियायत | राज्य-विरोध से आगे वैश्वीकरण-विरोध | | प्रमुख सीमा | खेतिहर मजदूर की सीमित केंद्रीयता | छोटे/भूमिहीन ग्रामीण की सीमित केंद्रीयता | जातीय-क्षेत्रीय सामाजिक आधार | वर्ग/जाति तथा क्षेत्रीय सीमाएं |
इन सबको एक ही विचारधारात्मक आंदोलन कहना उचित नहीं होगा।
तमिलनाडु की सबसे बड़ी विशिष्टता—दो किसान आंदोलन एक राज्य में
यह शायद तमिलनाडु की सबसे महत्वपूर्ण तुलनात्मक विशेषता है।
महाराष्ट्र का नया किसान आंदोलन मुख्यतः स्वामी किसान की राजनीति से पहचाना जाता है।
BKU भी मुख्यतः स्वामी किसान राजनीति से।
लेकिन तमिलनाडु के किसान इतिहास में उनसे पहले एक विशाल भूमिहीन कृषि मजदूर आंदोलन मौजूद था।
इसलिए यहां हम दो अलग ऐतिहासिक धारणाएं एक साथ देख सकते हैं—
किसान' आंदोलन — कृषि मूल्य और इनपुट संबंध।
यह अंतर तमिलनाडु को अध्ययन की दृष्टि से असाधारण बनाता है।
उपलब्धि—राज्य को कृषि समाज के भीतर हस्तक्षेप के लिए मजबूर करना
राज्य को भू-स्वामी और मजदूर के संबंध में हस्तक्षेप करना होगा।
राज्य को कृषि आर्थिक संबंधों में हस्तक्षेप करना होगा।
दोनों मिलकर बताते हैं कि किसान आंदोलन ने तमिलनाडु के कृषि कल्याणकारी राज्य को गढ़ा।
उपलब्धि—गैर-दलीय किसान दावेदारी
नारायणसामी नायडू ने द्रमुक और अन्नाद्रमुक दोनों सरकारों का विरोध किया।
उसकी निष्ठा स्थायी रूप से किसी दल से बंधी नहीं।
यह वही गैर-दलीय शैली है जो नए किसान आंदोलनों की प्रमुख पहचान बनी। अध्ययनों में BKU, शेतकरी संगठन, KRRS और तमिलनाडु एग्रीकल्चरिस्ट्स एसोसिएशन को इसी व्यापक स्वायत्त किसान राजनीति के अंतर्गत देखा गया है।
लेकिन गैर-दलीयता की सीमा
आंदोलन चुनावी राजनीति से पूरी तरह बाहर नहीं रह सकता।
तो राजनीतिक दलों से संबंध बनते हैं।
सरकार आरोप लगाती है कि आंदोलन राजनीतिक है।
सभी के सामने अलग-अलग रूपों में समस्या रही।
इसलिए “गैर-दलीय” का अर्थ “राजनीति से बाहर” नहीं था।
उपलब्धि—कृषि उत्पादक को सम्मान की नई भाषा
नए किसान आंदोलनों ने किसान को केवल अनुदान पाने वाला ग्रामीण गरीब नहीं माना।
इसलिए मेरे उत्पादन को न्यायपूर्ण आर्थिक मूल्य मिलना चाहिए।
नारायणसामी नायडू से लेकर टिकैत और जोशी तक यह तत्व अलग-अलग भाषा में दिखाई देता है।
सीमा—“किसान” के भीतर वर्ग विभाजन छिप गया
यही नई किसान राजनीति की सबसे गंभीर समस्या थी।
मान लें किसान अधिक फसल मूल्य मांगता है।
भूमिहीन खेतिहर मजदूर स्वयं खाद्यान्न खरीदता है।
उच्च कीमत उसका उपभोक्ता खर्च बढ़ा सकती है।
भूमिहीन मजदूर के पास बिजली पंपसेट ही नहीं।
इसलिए किसान राजनीति की हर मांग सभी ग्रामीण गरीबों की मांग नहीं है।
नए किसान आंदोलनों पर वर्गीय आलोचना इसी आधार पर हुई है।
तमिलनाडु इस आलोचना को स्वयं सिद्ध करता है
कीझवेनमणि की कहानी हमें याद दिलाती है—
खेतिहर मजदूर और भूमि-मालिक किसान के हित एक नहीं हो सकते।
इसलिए तमिलनाडु के दोनों इतिहासों को साथ पढ़ना नए किसान आंदोलन की सामाजिक सीमा समझने के लिए अत्यंत उपयोगी है।
सीमा—जाति गायब नहीं हुई
नए किसान आंदोलन अक्सर “किसान” की साझा आर्थिक पहचान पर जोर देते थे।
लेकिन ग्रामीण समाज जाति से मुक्त नहीं था।
जातिगत संरचना से प्रभावित रह सकते थे।
आधुनिक अध्ययनों में नए किसान आंदोलनों के सामाजिक आधार में मध्य और प्रभुत्वशाली कृषि जातियों की बड़ी भूमिका पर चर्चा की गई है।
तमिलनाडु में भी इस वर्गीय–जातिगत संबंध को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
उपलब्धि—छोटे किसान को राज्य नीति का केंद्र बनाना
तमिलनाडु की कृषि बिजली नीति में छोटे और बड़े किसान का अलग वर्गीकरण महत्वपूर्ण था।
हर भूमि-मालिक समान आर्थिक स्थिति में नहीं है।
आगे छोटे किसानों के लिए मुफ्त बिजली और कृषि राहत कार्यक्रमों ने इस पहचान को और मजबूत किया।
यानी किसान आंदोलन ने केवल किसान बनाम सरकार नहीं—
छोटा किसान बनाम बड़ा किसान का प्रश्न भी नीति में प्रवेश कराया।
सीमा—सब्सिडी की वितरणात्मक असमानता
फिर भी मुफ्त बिजली जैसी नीति का सबसे अधिक लाभ किसे मिलता है?
भूमिहीन व्यक्ति को प्रत्यक्ष लाभ नहीं।
गहरा बोरवेल रखने वाला बड़ा किसान अधिक बिजली और पानी इस्तेमाल कर सकता है।
इसलिए सार्वभौमिक कृषि सब्सिडी सामाजिक रूप से हमेशा समान वितरण नहीं करती।
यह तमिलनाडु मॉडल की महत्वपूर्ण सीमा है।
सीमा—भूजल का पर्यावरणीय संकट
लेकिन मुफ्त बिजली ने भूजल पंपिंग की सीमांत लागत कम कर दी।
लंबे समय में इसका परिणाम हो सकता है—
इसलिए एक आंदोलनकारी जीत आगे पर्यावरणीय नीति समस्या बन सकती है।
तमिलनाडु किसान आंदोलन का यह अनुभव आज पूरे भारत के लिए महत्वपूर्ण है।
उपलब्धि—कावेरी को राष्ट्रीय संघीय प्रश्न बनाना
कावेरी डेल्टा किसान आंदोलन ने पानी को केवल क्षेत्रीय शिकायत न रहने दिया।
यह किसान राजनीति का विशिष्ट विस्तार था।
किसान अब स्थानीय तहसील या राज्य सचिवालय से आगे भारत की संघीय संरचना के भीतर अधिकार मांग रहा था।
सीमा—राज्य किसान एकता बनाम अंतरराज्यीय किसान संघर्ष
लेकिन यही राष्ट्रीय किसान राजनीति का विरोधाभास था।
कॉरपोरेट नियंत्रण पर साथ हो सकते हैं।
इसलिए साझा वर्ग पहचान संसाधन भूगोल को समाप्त नहीं करती।
यह राष्ट्रीय किसान गठबंधनों की स्थायी कमजोरी है।
उपलब्धि—आंदोलन की पद्धति में नवाचार
तमिलनाडु किसान आंदोलन ने समय के साथ अलग-अलग आंदोलनकारी तकनीक विकसित कीं।
यह परिवर्तन स्वयं भारतीय राजनीतिक संचार के विकास का इतिहास है।
सड़क से मीडिया तक
1970 के दशक का आंदोलन राज्य को शारीरिक रूप से बाधित करता था।
2017 का आंदोलन राष्ट्रीय ध्यान को बाधित करता था।
यह दिखाता है कि किसान आंदोलन अपने राजनीतिक वातावरण के अनुसार रणनीति बदल सकता है।
सीमा—दृश्यता और नीति परिणाम अलग-अलग
अय्याकन्नु आंदोलन को देशभर में दृश्यता मिली।
इसी तरह विशाल सड़क आंदोलन भी हमेशा स्थायी नीति समाधान नहीं देता।
इससे किसान आंदोलन का एक सामान्य पाठ मिलता है—
जन दबाव आवश्यक है, लेकिन संस्थागत नीति-निर्माण उसका विकल्प नहीं।
आंदोलन को अंततः मांग को कानून, बजट या प्रशासनिक व्यवस्था में बदलना पड़ता है।
शेतकरी संगठन की उपलब्धि—मूल्य प्रश्न को केंद्र में रखना
तमिलनाडु के अनुभव की तुलना में शेतकरी संगठन का विशिष्ट योगदान था—
कृषि आय के प्रश्न को फसल मूल्य और बाजार स्वतंत्रता से जोड़ना।
किसान की समस्या का उत्तर केवल सस्ती बिजली और कर्ज माफी नहीं।
यदि उपज का उचित मूल्य मिले तो किसान स्वयं आर्थिक रूप से सक्षम होगा।
यह विचार आज भी MSP और कृषि बाजार सुधार की बहस में मौजूद है।
लेकिन शेतकरी मॉडल की सीमा
बाजार स्वतंत्रता छोटे किसान को समान रूप से सुरक्षा देगी—यह सुनिश्चित नहीं।
बाजार मूल्य अत्यधिक अस्थिर हो सकता है।
इसलिए बाजार स्वतंत्रता के साथ जोखिम-सुरक्षा भी आवश्यक है।
तमिलनाडु का अनुभव इस सीमा को और स्पष्ट करता है।
BKU की उपलब्धि—ग्रामीण संख्या को राष्ट्रीय शक्ति बनाना
BKU ने दिखाया कि किसान की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संख्या और सामाजिक नेटवर्क है।
वह लाखों की महापंचायत और लंबे घेराव कर सकता है।
BKU की सीमा—सामाजिक आधार का संकुचन
यह तमिलनाडु के अनुभव से भी मेल खाता है।
इतिहासलेखन, विस्तृत समयरेखा और प्रमुख स्रोत
1930 के दशक से 2026 तक तमिलनाडु किसान आंदोलन; प्राथमिक दस्तावेज, सरकारी कानून, न्यायालयी फैसले, किसान संगठन अभिलेख और प्रमुख अकादमिक अध्ययन
तमिलनाडु के किसान आंदोलन का इतिहास लिखना अपेक्षाकृत कठिन काम है, क्योंकि यहां किसी एक आंदोलन की एकल रेखा नहीं मिलती। तंजावुर के पन्नैयाल और दलित खेतिहर मजदूर, कम्युनिस्ट किसान सभा, काश्तकार, भूमि-सुधार समर्थक राजनीति, पश्चिमी तमिलनाडु के पंपसेट और स्वामी किसान, नारायणसामी नायडू की बिजली–कर्ज राजनीति, कावेरी डेल्टा के जल आंदोलन और इक्कीसवीं सदी में पी. अय्याकन्नु जैसे नेताओं के दिल्ली प्रदर्शन—इन सभी को जोड़कर ही इसकी पूरी तस्वीर बनती है।
इसी कारण तमिलनाडु किसान आंदोलन का इतिहासलेखन मुख्यतः पांच अलग स्रोत-परंपराओं से विकसित हुआ है—
सरकारी और औपनिवेशिक अभिलेख, कम्युनिस्ट और किसान संगठन दस्तावेज, कानून तथा न्यायालयी फैसले, मैदानी समाजशास्त्रीय–मानवशास्त्रीय अध्ययन, और प्रतिभागियों की स्मृतियां तथा मौखिक इतिहास।
इनमें से कोई भी अकेले पर्याप्त नहीं है।
सरकारी दस्तावेज प्रशासन की दृष्टि देते हैं, लेकिन गरीब खेतिहर मजदूर की आवाज सीमित हो सकती है।
किसान संगठन का साहित्य आंदोलन की अंदरूनी दुनिया दिखाता है, लेकिन अपनी राजनीतिक भूमिका को अधिक सकारात्मक रूप में प्रस्तुत कर सकता है।
अदालत के फैसले अत्यंत मूल्यवान तथ्य देते हैं, लेकिन वे उन्हीं साक्ष्यों तक सीमित होते हैं जो मुकदमे में न्यायिक रूप से स्वीकार किए गए।
और मौखिक इतिहास पीड़ित समुदाय का अनुभव सामने लाता है, लेकिन स्मृति और दस्तावेजी प्रमाण के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है।
इसलिए तमिलनाडु किसान आंदोलन का विश्वसनीय इतिहास बहु-स्रोत पद्धति से ही लिखा जा सकता है।
इतिहासलेखन का पहला चरण—“मद्रास कृषि व्यवस्था” के रूप में अध्ययन
तमिल किसान इतिहास के शुरुआती अध्ययनों में किसान आंदोलन से अधिक चर्चा राजस्व और भूमि व्यवस्था की हुई।
इन दस्तावेजों का मूल उद्देश्य किसान की मुक्ति का इतिहास लिखना नहीं था।
लेकिन आज इन्हीं दस्तावेजों से हम जान सकते हैं कि किसान आंदोलन पैदा होने से पहले कृषि समाज की संरचना कैसी थी।
औपनिवेशिक अभिलेख क्यों महत्वपूर्ण हैं?
यदि हमें समझना है कि तंजावुर में मिरासदार इतने शक्तिशाली कैसे बने, तो केवल 1940 के दशक के किसान आंदोलन को देखना पर्याप्त नहीं।
कैथलीन गफ ने अपने महत्वपूर्ण अध्ययन में तंजावुर के ग्रामीण वर्ग संबंधों को कम-से-कम अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से औपनिवेशिक परिवर्तन के भीतर देखने की आवश्यकता बताई। उनके अनुसार 1951 तक काश्तकार और कृषि मजदूर अत्यंत निर्धन स्थिति में थे और इस परिस्थिति को उन्होंने लंबे औपनिवेशिक आर्थिक परिवर्तन से जोड़ा।
इसलिए औपनिवेशिक स्रोत केवल पृष्ठभूमि नहीं—
आंदोलन की सामाजिक जड़ों का स्रोत हैं।
जिला गजेटियर और सेटलमेंट रिपोर्ट
तमिलनाडु किसान इतिहास के लिए पुराने Madras Presidency District Gazetteers, तंजावुर जिला गजेटियर, भूमि बंदोबस्त रिपोर्ट और राजस्व सर्वेक्षण विशेष रूप से उपयोगी हैं।
किस इलाके में कितनी सिंचित भूमि थी,
भूमि स्वामित्व किस प्रकार विभाजित था,
और किन जाति–समुदायों की आर्थिक भूमिका क्या थी।
लेकिन इन दस्तावेजों को आलोचनात्मक दृष्टि से पढ़ना आवश्यक है।
प्रशासक जिस किसान को “शांत”, “अनुशासित” या “अशांत” कहता है—
उस शब्दावली के पीछे औपनिवेशिक सत्ता की दृष्टि हो सकती है।
1930 के दशक—किसान राजनीति के प्राथमिक स्रोत
1930 के दशक से किसान आंदोलन के लिए नए प्रकार के स्रोत मिलने लगते हैं।
कांग्रेस सोशलिस्ट और वामपंथी साहित्य,
और किसानों की सभाओं पर जिला प्रशासन की रिपोर्ट।
इन्हीं स्रोतों से पता चलता है कि कृषि असंतोष किस तरह संगठित राजनीतिक चेतना में बदल रहा था।
तमिलनाडु में 1930 के दशक के उत्तरार्ध और 1940 के दशक में किसान सभा का विस्तार केवल वर्गीय असंतोष का परिणाम नहीं था; उसके पीछे अखिल भारतीय किसान राजनीति, कम्युनिस्ट संगठन और स्थानीय कार्यकर्ताओं का संयुक्त प्रभाव था।
मणलूर मणियम्मै का इतिहास कैसे लिखा जाए?
मणलूर मणियम्मै जैसे स्थानीय नेताओं के मामले में कठिनाई है कि उनके बारे में राष्ट्रीय अभिलेख अपेक्षाकृत कम हैं।
उनकी ऐतिहासिक भूमिका समझने के लिए आवश्यक हैं—
ऐसे व्यक्तित्वों के मामले में केवल अंग्रेजी अकादमिक साहित्य पर निर्भर रहने से आंदोलन का स्थानीय सामाजिक पक्ष गायब हो सकता है।
यही कारण है कि तमिल भाषा के स्रोत इस इतिहास के लिए अपरिहार्य हैं।
बी. श्रीनिवास राव—संगठन और स्मृति के बीच
बी. श्रीनिवास राव पूर्वी तंजावुर किसान आंदोलन के केंद्रीय नेताओं में थे।
उनकी भूमिका समझने के लिए दो स्रोत-समूह विशेष रूप से उपयोगी हैं—
कम्युनिस्ट पार्टी और किसान सभा के दस्तावेज,
तथा बाद में आंदोलन में शामिल नेताओं और कार्यकर्ताओं की स्मृतियां।
लेकिन यहां इतिहासकार को सावधानी रखनी चाहिए।
किसी संगठन द्वारा अपने नेता का वर्णन स्वाभाविक रूप से प्रशंसात्मक हो सकता है।
किसान सभा साहित्य का महत्व
कम्युनिस्ट किसान आंदोलन का साहित्य हमें उस चीज तक पहुंच देता है जो सरकारी फाइल में कम मिलती है—
आंदोलनकारी किसान की अपनी राजनीतिक भाषा।
मांगपत्रों से पता चलता है कि किसान क्या चाहता था।
संगठन रिपोर्ट से पता चलता है कि कौन-से गांव सक्रिय थे।
सम्मेलन रिपोर्ट संगठन की सामाजिक पहुंच बताती है।
कार्यकर्ताओं की स्मृतियां बताती हैं कि गांव में संगठन वास्तव में कैसे बनाया जाता था।
लेकिन संगठनात्मक स्रोत का अपना पक्ष होता है।
इसलिए उससे प्राप्त संख्या—जैसे रैली में कितने लोग आए—को “संगठन के अनुसार” कहना अधिक उचित है।
1940 के दशक के लिए पुलिस और प्रशासनिक अभिलेख
आंदोलन तीखा होने पर पुलिस दस्तावेज अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
और सरकार किस समय आंदोलन को कानून-व्यवस्था का संकट समझने लगी।
लेकिन यही दस्तावेज सबसे अधिक आलोचनात्मक पठन मांगते हैं।
राज्य की फाइल अक्सर संगठनात्मक संघर्ष को “disturbance”, “crime” या “law and order” की भाषा में दर्ज करती है।
किसान की आर्थिक शिकायत उसी रिपोर्ट में गौण हो सकती है।
1948 का मायावरम समझौता
1948 का मायावरम समझौता पूर्वी तंजावुर के मजदूरी इतिहास का एक महत्वपूर्ण प्राथमिक दस्तावेज है।
इसके महत्व का प्रमाण यह है कि बाद के 1952 तंजावुर कानून और न्यायालयी व्याख्याओं में इससे विकसित मजदूरी एवं कृषि विवाद की पृष्ठभूमि दिखाई देती है।
17 अप्रैल 1953 के मद्रास उच्च न्यायालय के Santhanakrishna Odayar v. Vaithilingam फैसले ने स्पष्ट दर्ज किया कि मायावरम समझौते के बाद भूमि-मालिक, काश्तकार और पन्नैयाल संबंध लगातार तनावपूर्ण हुए और बाद में सुब्रमण्यम समिति की रिपोर्ट तथा व्यापक बेदखलियों के बाद सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा।
इसलिए यह न्यायिक फैसला स्वयं 1948–52 के संघर्ष का महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत बन जाता है।
सुब्रमण्यम समिति—1950–51 का अनिवार्य दस्तावेज
9 मार्च 1950 को मद्रास सरकार ने एम. वी. सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में भूमि सुधार संबंधी समिति गठित की।
मद्रास उच्च न्यायालय के 1953 के फैसले में इस समिति के गठन, उसकी सिफारिशों और 1 जुलाई 1951 को रिपोर्ट प्रकाशित होने का विस्तृत उल्लेख है। रिपोर्ट में किराया-विभाजन, काश्तकारी अवधि और बेदखली की शर्तों जैसे प्रश्नों पर सिफारिशें थीं।
लेकिन इसकी सिफारिशों ने स्वयं किसान और भू-स्वामी संघर्ष को तीखा कर दिया।
1952 तंजावुर पन्नैयाल संरक्षण कानून—केंद्रीय प्राथमिक स्रोत
भारत कोड पर राज्य के विधायी अभिलेख में 21 दिसंबर 1952 को Tanjore Pannaiyal Protection Act, 1952 दर्ज है।
इसके पीछे अगस्त 1952 के अध्यादेश थे।
कानून का सबसे महत्वपूर्ण इतिहास न्यायालयी फैसले से मिलता है।
Santhanakrishna Odayar मामले में अदालत ने लिखा कि तंजावुर में काश्तकारों की बेदखली, पन्नैयालों की बर्खास्तगी, बाहर से मजदूर लाना और हिंसक अशांति इतनी बढ़ गई थी कि अध्यादेश आवश्यक माना गया। उसी फैसले में कानून की तीन सामाजिक श्रेणियां—भूमि-मालिक, cultivating काश्तकार और pannaiyal—विस्तार से परिभाषित हैं।
यह फैसला इतिहासकार के लिए असाधारण मूल्य का स्रोत है।
न्यायालयी फैसला केवल कानून नहीं—समाज का दस्तावेज
1953 का फैसला हमें ऐसी बातें भी बताता है जो केवल अधिनियम के पाठ से नहीं मिलेंगी।
उदाहरण के लिए अदालत ने दर्ज किया कि—
तंजावुर कावेरी डेल्टा का अत्यंत समृद्ध धान क्षेत्र था;
पन्नैयाल कई मामलों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी विशिष्ट जोतों से जुड़े थे;
काश्तकार और मजदूरों को आसपास के जिलों की तुलना में कम प्रतिफल मिलने की शिकायत थी;
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद कीमतों ने तनाव बढ़ाया;
और 1951 के बाद बड़े पैमाने पर बेदखली हुई।
इसलिए न्यायिक अभिलेख को केवल “कानून की व्याख्या” मानना उसके इतिहास-स्रोत मूल्य को कम करेगा।
1955–56 की काश्तकारी कानून श्रृंखला
तमिलनाडु के आधिकारिक भूमि सुधार विभाग के अनुसार राज्य के आज भी महत्वपूर्ण काश्तकारी कानूनों में शामिल हैं—
Tamil Nadu Cultivating Tenants Protection Act, 1955 और Tamil Nadu Cultivating Tenants (Payment of Fair Rent) Act, 1956।
पहला मनमानी बेदखली से सुरक्षा देता है; दूसरा उचित किराया सकल उपज के 25 प्रतिशत के स्तर पर निर्धारित करता है।
इतिहासकार के लिए इन कानूनों को केवल विधायी उपलब्धि के रूप में नहीं, बल्कि किसान आंदोलन के दबाव और राज्य द्वारा पुराने भू-स्वामी अधिकारों पर लगाई गई सीमा के रूप में पढ़ना चाहिए।
1955 के न्यायालयी मामले
E. A. Balakrishna Iyer v. Singa Vanniar जैसे फैसले बताते हैं कि 1952 कानून के अंतर्गत बेदखल काश्तकारों ने अपनी जमीन पर पुनः कब्जा पाने के लिए अदालत और राजस्व न्यायालय का उपयोग किया। अक्टूबर 1955 का मद्रास उच्च न्यायालय फैसला ऐसे ही पुनर्स्थापन आवेदनों पर केंद्रित था।
इससे पता चलता है कि आंदोलन का अगला चरण केवल सड़क नहीं था।
किसान ने कानून को संघर्ष के औजार में बदलना शुरू कर दिया था।
1956 के बाद तंजावुर से पूरे राज्य तक
1952 का कानून तंजावुर की विशेष परिस्थिति से निकला था।
लेकिन आगे सामान्य तमिलनाडु काश्तकारी संरक्षण व्यवस्था राज्यव्यापी हुई।
1957 के Annamalai Ayee Chatram v. K. Ramabhadra Vandayar फैसले में तंजावुर के धार्मिक न्यास की कृषि भूमि और 1952 तथा 1956 की कानूनी व्यवस्थाओं का संबंध सामने आता है।
यह दस्तावेज विशेष रूप से मंदिर, चैत्रम और धार्मिक संस्थाओं की कृषि भूमि के इतिहास के लिए उपयोगी है।
भूमि सुधार के आधिकारिक अभिलेख
तमिलनाडु भूमि सुधार विभाग का वर्तमान अभिलेख स्पष्ट करता है कि 1961 भूमि-सीमा कानून का घोषित उद्देश्य कृषि भूमि के स्वामित्व में असमानता और संकेंद्रण कम करना तथा अधिशेष भूमि भूमिहीन गरीबों में वितरित करना था। मूल व्यवस्था में पांच सदस्य तक के परिवार के लिए 30 मानक एकड़ की सीमा रखी गई थी।
इसी विभाग के अनुसार सरकार द्वारा अधिग्रहित अधिशेष भूमि नियमों के तहत भूमिहीन गरीबों को अधिकतम तीन एकड़ शुष्क अथवा डेढ़ एकड़ सिंचित भूमि तक दी जा सकती थी।
यह स्रोत भूमि सुधार के घोषित उद्देश्य और प्रशासनिक संरचना समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
1970 भूमि-सीमा संशोधन
भारत कोड में 20 जून 1970 का Tamil Nadu Land Reforms (Reduction of Ceiling on Land) Act, 1970 दर्ज है।
यह वह संशोधन था जिसने सीमा को और कम किया।
इस स्रोत को द्रमुक की सामाजिक न्याय राजनीति, भूमि वितरण और बड़े कृषि स्वामित्व पर सीमा के संदर्भ में पढ़ना चाहिए।
लेकिन केवल कानून देखकर सुधार की वास्तविक सफलता तय नहीं की जा सकती।
और लाभार्थियों को वितरण का रिकॉर्ड।
1969 और 1971—कृषि मजदूर अधिकारों के मुख्य कानून
भारत कोड तथा तमिलनाडु भूमि सुधार विभाग के अभिलेख 1969–71 के तीन महत्वपूर्ण कानूनों की पुष्टि करते हैं—
Tamil Nadu Agricultural Lands (Record of Tenancy Rights) Act, 1969,
Tamil Nadu Agricultural Labourers Fair Wages Act, 1969,
Tamil Nadu Occupants of Kudiyiruppu (Conferment of Ownership) Act, 1971।
इन तीन कानूनों को साथ पढ़ना आवश्यक है।
कृषि मजदूर की मजदूरी कानूनी अधिकार है।
कुछ परिस्थितियों में कृषि मजदूर के घर की जमीन भी उसी की हो सकती है।
2026 में भी ये कानून जीवित क्यों हैं?
यह इतिहास को वर्तमान से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण तथ्य है।
तमिलनाडु सरकार की भूमि सुधार वेबसाइट जून 2026 तक इन कानूनों के अंतर्गत राजस्व न्यायालयों में चल रहे मामलों का विवरण प्रकाशित कर रही है।
राज्य में कडलूर, मयिलाडुतुरै, तिरुवारूर, तंजावुर, तिरुचिरापल्ली सहित दस राजस्व न्यायालय कार्यरत हैं और काश्तकारी, उचित किराया तथा tenancy-right रिकॉर्ड संबंधी मामले अब भी इनके समक्ष आते हैं।
1950–70 के दशक के किसान संघर्ष से निकली कानूनी संरचना 2026 में भी प्रशासनिक रूप से प्रासंगिक है।
कीझवेनमणि—इतिहासलेखन का निर्णायक मोड़
25 दिसंबर 1968 का कीझवेनमणि नरसंहार तमिल किसान इतिहास का शायद सबसे अधिक व्याख्यायित प्रकरण है।
इसकी तीन प्रमुख व्याख्याएं विकसित हुईं—
वर्ग संघर्ष, जातिगत अत्याचार, और जाति–वर्ग के संयुक्त संघर्ष की व्याख्या।
प्रारंभिक कम्युनिस्ट स्मृति में मजदूरी संघर्ष और भू-स्वामी प्रतिरोध पर जोर था।
यदि सभी 44 पीड़ित दलित थे तो जाति को गौण कैसे माना जा सकता है?
आधुनिक सामाजिक इतिहास इन दोनों को साथ पढ़ता है।
कीझवेनमणि के प्राथमिक स्रोत
इस घटना के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्रोत हैं—
पोस्टमार्टम तथा स्थानीय प्रशासनिक दस्तावेज,
और मिथिली शिवरामन जैसे कार्यकर्ताओं द्वारा तत्काल किया गया दस्तावेजीकरण।
इन सभी का पारस्परिक मिलान आवश्यक है।
किस व्यक्ति का अपराध संदेह से परे सिद्ध हुआ?
सामाजिक और आर्थिक परिस्थिति क्या थी जिसमें यह नरसंहार संभव हुआ?
न्यायिक बरी होना और ऐतिहासिक उत्तरदायित्व
कीझवेनमणि इतिहासलेखन में एक मूलभूत अंतर हमेशा बनाए रखना चाहिए।
यदि कोई आरोपी न्यायालय में बरी हुआ—
तो उसे कानूनी रूप से दोषी नहीं लिखा जा सकता।
लेकिन इससे यह तथ्य समाप्त नहीं होता कि—
घटना कृषि मजदूरी संघर्ष की पृष्ठभूमि में हुई,
और भू-स्वामी–मजदूर संबंध अत्यंत तनावपूर्ण थे।
इसलिए न्यायिक निष्कर्ष और सामाजिक ऐतिहासिक निष्कर्ष अलग स्तर पर काम करते हैं।
मिथिली शिवरामन—स्मृति को दस्तावेज बनाने वाली आवाज
कीझवेनमणि का इतिहास संभवतः बहुत अधिक सीमित रह जाता यदि मिथिली शिवरामन जैसे कार्यकर्ताओं ने तत्काल प्रत्यक्षदर्शी अनुभव, सामाजिक परिस्थिति और पीड़ितों की आवाज दर्ज न की होती।
उनका लेखन इतिहासकार को याद दिलाता है—
सरकारी रिकॉर्ड में जिनका नाम केवल “victim” या “labourer” है, उनके पास अपनी स्मृति और अनुभव भी होता है।
इसलिए सामाजिक इतिहास में participant documentation—प्रतिभागी दस्तावेजीकरण का अलग महत्व है।
लेकिन इसे भी स्वतंत्र प्रमाणों से मिलाकर पढ़ना चाहिए।
कैथलीन गफ—तंजावुर अध्ययन की केंद्रीय विद्वान
तमिल किसान इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण अकादमिक नामों में कैथलीन गफ का स्थान बहुत ऊंचा है।
उनकी Rural Society in Southeast India दो तंजावुर गांवों पर 1951–53 के मैदानी अध्ययन पर आधारित थी। उन्होंने वर्ग, जाति, उत्पादन संबंध, औपनिवेशिक परिवर्तन और ग्रामीण सत्ता को एक साथ समझने की कोशिश की। पुस्तक में तंजावुर जिला, कृषक वर्ग, गरीबी की औपनिवेशिक पृष्ठभूमि, गांव राजनीति और वर्ग संघर्ष पर स्वतंत्र अध्याय हैं।
यह पुस्तक तंजावुर की कृषि संरचना के अध्ययन की आधारभूत कृतियों में है।
गफ के अध्ययन का दूसरा चरण
कैथलीन गफ ने बाद में तंजावुर को फिर देखा और Rural Change in Southeast India: 1950s to 1980s प्रकाशित की।
इस पुस्तक की विषय-सूची स्वयं तमिल कृषि परिवर्तन की अद्भुत समयरेखा है—
इसलिए दोनों गफ पुस्तकों को साथ पढ़ना चाहिए—
दूसरी उसके अगले तीन दशकों का परिवर्तन।
गफ की व्याख्या की ताकत
गफ का सबसे बड़ा योगदान था कि उन्होंने गांव को अलग-थलग स्वायत्त संसार के रूप में नहीं देखा।
उनका तर्क था कि गांव के वर्ग संबंध—
यह दृष्टि तमिल किसान आंदोलन समझने के लिए अत्यंत उपयोगी है।
क्योंकि कीझवेनमणि केवल एक गांव की घटना नहीं थी।
हरित क्रांति केवल बीज परिवर्तन नहीं था।
और पन्नैयाल संबंध केवल निजी मालिक–मजदूर रिश्ता नहीं था।
लेकिन मार्क्सवादी इतिहासलेखन की सीमा
तंजावुर पर प्रारंभिक गंभीर अकादमिक अध्ययन और किसान संगठन साहित्य का बड़ा हिस्सा वर्गीय भाषा में लिखा गया।
इसने भूमि और श्रम संबंध बहुत अच्छे ढंग से समझाए।
लेकिन बाद के दलित इतिहासकारों और चिंतकों ने प्रश्न उठाया—
क्या जाति को केवल वर्ग संबंध का परिणाम मानना पर्याप्त है?
कीझवेनमणि जैसे मामलों ने साबित किया कि नहीं।
जाति स्वयं सत्ता, अपमान और हिंसा की स्वतंत्र संरचना भी है।
इसलिए आधुनिक अध्ययन में जाति + वर्ग दोनों आवश्यक हैं।
दलित इतिहासलेखन का योगदान
दलित इतिहासलेखन ने कीझवेनमणि और पूर्वी तंजावुर को नई दृष्टि से पढ़ा।
आर्थिक संगठन के बाद भी जातिगत हिंसा क्यों हुई?
क्या वर्गीय संगठन ने दलित पहचान और स्वतंत्र नेतृत्व को पर्याप्त जगह दी?
इन प्रश्नों ने पुराने किसान इतिहास की सीमाएं विस्तृत कीं।
महिला इतिहासलेखन की आवश्यकता
इन सबका इतिहास बताता है कि किसान आंदोलन पुरुष इतिहास नहीं है।
फिर भी अधिकांश आधिकारिक दस्तावेजों और किसान नेतृत्व कथाओं में पुरुष अधिक दिखाई देते हैं।
इसलिए महिला इतिहास के लिए जरूरी हैं—
हरित क्रांति का इतिहासलेखन
1960–80 की तमिल कृषि पर एक अलग साहित्य विकसित हुआ—
यह साहित्य किसान आंदोलन के इतिहास के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नारायणसामी नायडू को समझे बिना कृषि तकनीक देखना अधूरा है—
और कृषि तकनीक को समझे बिना नायडू आंदोलन समझना भी।
यानी तकनीकी कृषि इतिहास और राजनीतिक आंदोलन इतिहास को साथ पढ़ना होगा।
नारायणसामी नायडू के स्रोतों की समस्या
नायडू पर राष्ट्रीय स्तर का अकादमिक साहित्य अपेक्षाकृत बिखरा हुआ है।
Tamil Nadu Agriculturists Association के दस्तावेज,
यही कारण है कि नायडू राष्ट्रीय किसान इतिहास में अपनी वास्तविक भूमिका की तुलना में कम दिखाई देते हैं।
उनकी राजनीति का बड़ा हिस्सा तमिल भाषा के सार्वजनिक क्षेत्र में संरक्षित है।
बिजली शुल्क के लिए न्यायालयी स्रोत
तमिलनाडु कृषि बिजली इतिहास का सबसे उपयोगी स्रोत मद्रास उच्च न्यायालय का R.C. Diocese of Sivagangai v. Assistant Electrical Engineer फैसला है।
इसमें कई दशकों की कृषि विद्युत दर तालिका दर्ज है—
1978 में छोटे और बड़े किसानों के लिए अलग दर,
1984 में छोटे किसानों को मुफ्त बिजली,
1989–90 में बड़े किसानों के लिए प्रति अश्वशक्ति शुल्क,
और 1 अगस्त 1990 से सभी कृषि कनेक्शनों के लिए मुफ्त आपूर्ति।
2004 के Maheshwari Fish Seed Farm फैसले ने नवंबर 1990 की सरकारी अधिसूचना उद्धृत करते हुए पुष्टि की कि कृषि श्रेणी में छोटे और दूसरे किसानों का विभाजन समाप्त कर “No Charge” कर दिया गया था।
यह इतिहासलेखन में अत्यंत मजबूत प्राथमिक प्रमाण है।
2026 तक मुफ्त कृषि बिजली की निरंतरता
जनवरी 2026 के एक मद्रास उच्च न्यायालय मामले में याचिकाकर्ताओं ने पुराने कृषि पंपसेट की मुफ्त विद्युत सेवा बहाल कराने की मांग की। न्यायालयी रिकॉर्ड में परिवार द्वारा दशकों से सिंचाई के लिए कृषि कनेक्शन और बाद में मुफ्त बिजली योजना का लाभ लेने का वर्णन है।
विधानसभा और राज्य बजट—अत्यंत उपयोगी लेकिन कम उपयोग किए गए स्रोत
तमिलनाडु विधानसभा बहसें और वार्षिक बजट भाषण विशेष रूप से उपयोगी हैं।
निष्कर्ष — तमिलनाडु किसान आंदोलन को कैसे समझें?
1930 के दशक से 2026 तक भूमि, मजदूरी, जाति, बिजली, कर्ज, कावेरी, किसान आय और ग्रामीण सत्ता के परिवर्तन का समेकित ऐतिहासिक मूल्यांकन
तमिलनाडु के किसान आंदोलन को किसी एक विद्रोह, संगठन, नेता या मांग के नाम से परिभाषित नहीं किया जा सकता। लगभग नौ दशकों की इसकी यात्रा में आंदोलन का सामाजिक आधार, विरोधी, मांगें, संगठनात्मक शैली और राजनीति लगातार बदलती रही। फिर भी इसके भीतर एक गहरी निरंतरता दिखाई देती है—खेती और ग्रामीण जीवन पर नियंत्रण किसका होगा, उत्पादन से पैदा होने वाली आय और जोखिम का बंटवारा कैसे होगा और राज्य ग्रामीण समाज में किसके पक्ष में हस्तक्षेप करेगा?
1930 और 1940 के दशकों में पूर्वी तंजावुर का खेतिहर मजदूर अपने भू-स्वामी के सामने खड़ा था। उसके लिए प्रश्न था—
बंधन से मुक्ति, मजदूरी, जमीन और सम्मान।
1970 के दशक में पश्चिमी तमिलनाडु का पंपसेट वाला स्वामी किसान सरकार और बिजली बोर्ड के सामने खड़ा हुआ। उसके लिए प्रश्न था—
1990 के दशक के बाद कावेरी डेल्टा किसान संघीय व्यवस्था के सामने खड़ा हुआ। उसके लिए प्रश्न था—
और इक्कीसवीं सदी में किसान दिल्ली पहुंचा। अब उसकी मांगों में कर्ज, सूखा राहत, फसल मूल्य, बीमा, नदी-जोड़, कावेरी, न्यूनतम समर्थन मूल्य और आय सुरक्षा तक शामिल थे।
इसलिए तमिलनाडु किसान आंदोलन मूलतः भारतीय कृषि समाज के परिवर्तन का राजनीतिक इतिहास है।
आंदोलन नहीं—एक लंबी आंदोलन-परंपरा
तमिलनाडु के किसान इतिहास की सबसे पहली विशेषता यही है कि इसे एक आंदोलन कहना भी पूरी तरह सही नहीं।
यह कम-से-कम चार बड़ी आंदोलन धाराओं का संयुक्त इतिहास है—
पूर्वी तंजावुर का किसान–खेतिहर मजदूर आंदोलन,
नारायणसामी नायडू का स्वामी किसान आंदोलन,
इक्कीसवीं सदी का कर्ज–आय–जल संकट आधारित किसान आंदोलन।
लेकिन सभी एक साझा प्रश्न से जुड़े थे—
कृषि व्यवस्था में किसान या कृषि श्रमिक की सौदेबाजी शक्ति कितनी है?
पहला संघर्ष—जमीन पर अधिकार किसका?
औपनिवेशिक और पूर्व-औपनिवेशिक कृषि संबंधों से निकली तंजावुर व्यवस्था में जमीन, किराया, मिरासी अधिकार और श्रम पर नियंत्रण कुछ सामाजिक समूहों में केंद्रित था।
किसान आंदोलन ने इस व्यवस्था का पहला बुनियादी सिद्धांत चुनौती दिया—
जमीन का मालिक होने मात्र से मनुष्य पर मालिकाना अधिकार नहीं मिलता।
पन्नैयाल मनुष्य है, स्थायी सेवक नहीं।
यहीं तमिलनाडु किसान आंदोलन की नैतिक शुरुआत होती है।
पन्नैयाल मुक्ति का ऐतिहासिक अर्थ
पन्नैयाल व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष को केवल बंधुआ मजदूरी उन्मूलन की घटना मानना पर्याप्त नहीं।
यह वास्तव में ग्रामीण सत्ता संबंध का परिवर्तन था।
पहले मजदूर का संबंध भू-स्वामी से केवल रोजगार का नहीं हो सकता था।
संगठित किसान–मजदूर आंदोलन ने इसे बदलकर श्रम संबंध बनाया।
“मालिक का आदमी” → “अधिकार वाला कृषि मजदूर।”
यह अत्यंत गहरा सामाजिक परिवर्तन था।
जाति को हटाकर तंजावुर का इतिहास नहीं लिखा जा सकता
तमिलनाडु किसान आंदोलन का दूसरा केंद्रीय सत्य है—
वर्ग और जाति एक-दूसरे से गुंथे हुए थे।
पूर्वी तंजावुर के भूमिहीन मजदूरों में दलित समुदायों की बड़ी उपस्थिति थी।
इसलिए भूमि-वंचना केवल आर्थिक तथ्य नहीं थी।
सामाजिक पदानुक्रम भी उसके साथ जुड़ा था।
मजदूर अधिक मजदूरी मांगता तो वह आर्थिक व्यवस्था को चुनौती देता।
वही दलित मजदूर बराबरी की भाषा बोलता तो वह जातिगत व्यवस्था को भी चुनौती देता।
वर्ग संघर्ष और सामाजिक सम्मान का संघर्ष
किसान सभा की सबसे बड़ी उपलब्धि
कम्युनिस्ट किसान सभा की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि केवल हड़ताल कराना नहीं थी।
उसने ग्रामीण समाज में उन लोगों को राजनीतिक विषय बनाया जिन्हें पहले शासन और स्थानीय सत्ता अक्सर केवल श्रम शक्ति मानती थी।
राजनीतिक नागरिकता का यह विस्तार तमिलनाडु किसान आंदोलन की सबसे स्थायी विरासतों में है।
कानून संघर्ष के बाद आया
तमिलनाडु का इतिहास यह भी बताता है कि कानून अक्सर आंदोलन से पहले नहीं आया।
1952 का तंजावुर पन्नैयाल संरक्षण कानून,
इन्हें आंदोलन से अलग करके नहीं समझा जा सकता।
कानून ने संघर्ष को समाप्त नहीं किया—
लेकिन संघर्ष की उपलब्धियों को संस्थागत रूप दिया।
भूमि सुधार—महत्वपूर्ण, लेकिन अधूरा
तमिलनाडु ने भूमि-सीमा कानून बनाए और 1970 में सीमा को और कम किया।
अधिशेष भूमि के वितरण की व्यवस्था बनी।
धार्मिक और सार्वजनिक न्यास भूमि पर भी नियंत्रण का ढांचा विकसित हुआ।
लेकिन भूमि का व्यापक और पूर्ण पुनर्वितरण नहीं हुआ।
यही तमिलनाडु भूमि सुधार की दोहरी विरासत है—
कानूनी सिद्धांत मजबूत, सामाजिक परिणाम आंशिक।
इसलिए भूमि सुधार को न विफल घोषित करना उचित है, न पूर्ण क्रांति।
कीझवेनमणि—पूरे इतिहास का नैतिक केंद्र
25 दिसंबर 1968 का कीझवेनमणि नरसंहार तमिल किसान इतिहास में किसी सामान्य घटना की तरह नहीं रखा जा सकता।
44 दलित खेतिहर मजदूर और उनके परिवारजन मारे गए।
मजदूरी का संघर्ष जातिगत सत्ता को चुनौती दे सकता है,
संगठन ग्रामीण प्रभुत्व को अस्थिर कर सकता है,
और आर्थिक संघर्ष सामूहिक सामाजिक हिंसा में बदल सकता है।
कीझवेनमणि ने स्वतंत्र भारत से एक कठोर प्रश्न पूछा—
कानूनी समानता गांव की वास्तविक सत्ता तक कब पहुंचेगी?
यह प्रश्न आज भी ऐतिहासिक रूप से प्रासंगिक है।
कीझवेनमणि की दूसरी विरासत—न्याय का प्रश्न
नरसंहार के बाद न्यायिक प्रक्रिया ने भी किसान और दलित राजनीतिक स्मृति को प्रभावित किया।
लेकिन नरसंहार से जुड़ी अंतिम दोषसिद्धियां टिक नहीं सकीं।
इससे ग्रामीण गरीबों के भीतर यह प्रश्न पैदा हुआ—
क्या सामाजिक और आर्थिक शक्ति न्याय तक पहुंच को प्रभावित करती है?
वह भारतीय न्याय व्यवस्था पर विश्वास की परीक्षा भी है।
हरित क्रांति ने आंदोलन का सामाजिक आधार बदल दिया
1960 के दशक के बाद तमिलनाडु की खेती बदलने लगी।
अब किसान को अधिक उत्पादन का अवसर मिला।
लेकिन उसी के साथ खेती अधिक नकद लागत वाली गतिविधि बन गई।
इससे एक नया किसान वर्ग राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हुआ—
यही पुरानी और नई किसान राजनीति का निर्णायक अंतर
पुराने आंदोलन में किसान या मजदूर का मुख्य विरोधी कई बार भू-स्वामी था।
नई किसान राजनीति में विरोध का केंद्र बन गया—
गांव की सत्ता से कृषि राजनीतिक अर्थशास्त्र की ओर।
यह परिवर्तन केवल तमिलनाडु का नहीं था।
लेकिन तमिलनाडु उन राज्यों में था जहां यह बहुत जल्दी और स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।
नारायणसामी नायडू का ऐतिहासिक महत्व
नारायणसामी नायडू का महत्व इस बात में नहीं कि उन्होंने केवल बिजली शुल्क कम कराया।
स्वामी किसान को स्वतंत्र राजनीतिक वर्ग के रूप में संगठित करना।
किसी दल का ग्रामीण कार्यकर्ता मात्र नहीं,
और केवल कृषि विभाग का लाभार्थी भी नहीं है।
वह अपनी आर्थिक मांगों के आधार पर सरकार से सौदेबाजी करने वाली स्वतंत्र शक्ति बन सकता है।
आंदोलन की नई तकनीक
किसान बिखरा हुआ जरूर है, लेकिन संगठित होने पर वह अर्थव्यवस्था का प्रवाह रोक सकता है।
यह विचार आगे महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तर भारत के किसान आंदोलनों में विभिन्न रूपों में दिखाई दिया।
आंदोलन और हिंसा—एक कठिन विरासत
1970, 1972 और 1978–80 के संघर्षों में पुलिस गोलीबारी हुई।
दूसरी ओर कुछ आंदोलनों में हिंसक भीड़, सार्वजनिक संपत्ति की क्षति और पुलिसकर्मियों के विरुद्ध हिंसा के आरोप और घटनाएं भी दर्ज हुईं।
इसलिए तमिलनाडु किसान आंदोलन को केवल राज्य दमन बनाम शांतिपूर्ण किसान की सरल कहानी में नहीं बदला जा सकता।
लोकतांत्रिक राज्य को अत्यधिक पुलिस बल से बचना चाहिए।
लेकिन आंदोलन की नैतिक वैधता भी अहिंसक जनदबाव से अधिक टिकाऊ बनती है।
द्रमुक और अन्नाद्रमुक—किसानों ने दोनों को बदला
तमिलनाडु किसान आंदोलन की बड़ी उपलब्धि यह थी कि उसने राज्य की दोनों प्रमुख राजनीतिक धाराओं को कृषि प्रश्नों पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए मजबूर किया।
जैसे संरचनात्मक प्रश्नों पर महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किए।
फिर द्रमुक ने कृषि मुफ्त बिजली को सभी कनेक्शनों तक विस्तारित कर दिया।
यानी आंदोलन की मांग दलगत प्रतिस्पर्धा के माध्यम से सरकारी नीति में स्थायी हुई।
मुफ्त बिजली—महान उपलब्धि या महंगा समझौता?
किसान की दृष्टि से मुफ्त बिजली ने सिंचाई की नकद लागत घटाई।
छोटे किसान के लिए इसका लाभ विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकता था।
लेकिन दीर्घकाल में इसके परिणाम भी हुए—
इसलिए नीति की ऐतिहासिक उपलब्धि को पर्यावरणीय परिणाम से अलग नहीं किया जा सकता।
कृषि राहत और संसाधन स्थिरता को साथ डिजाइन करना आवश्यक है।
आंदोलन की सबसे बड़ी संरचनात्मक विडंबना
1940 का खेतिहर मजदूर अधिक मजदूरी चाहता था।
1970 का स्वामी किसान मजदूरी को उत्पादन लागत के रूप में देख सकता था।
कृषि समाज के सभी लोगों का हित एक नहीं।
यही “किसान एकता” की सबसे बड़ी सीमा है।
लेकिन उनकी मांगों के बीच तनाव हो सकता है।
इसलिए भविष्य की कृषि नीति में इन वर्गों को अलग-अलग पहचानना आवश्यक है।
तमिलनाडु और भारत के ‘नए किसान आंदोलन’
नारायणसामी नायडू की राजनीति ने तमिलनाडु को भारत के नए किसान आंदोलन की शुरुआती प्रयोगशालाओं में रखा।
उनकी मांगें पूरी तरह समान नहीं थीं।
कृषि उत्पादक और आधुनिक राज्य–बाजार का संबंध न्यायपूर्ण है या नहीं?
इसमें तमिलनाडु की कालक्रमिक प्राथमिकता महत्वपूर्ण है।
शरद जोशी से अंतर
नारायणसामी नायडू की राजनीति अधिक जोर देती थी—
शरद जोशी की राजनीति ने अधिक जोर दिया—
कृषि उपज के लाभकारी मूल्य और बाजार स्वतंत्रता पर।
भारत की कृषि नीति आज भी इन दोनों के बीच संतुलन खोजती है।
कर्नाटक राज्य रैयत संघ से अंतर
तमिलनाडु का मुख्य आंदोलन अधिक राज्य-विशिष्ट और व्यावहारिक रहा—
इससे कोई आंदोलन अधिक या कम महत्वपूर्ण नहीं होता।
यह कृषि समाज की अलग परिस्थितियों को दर्शाता है।
भारतीय किसान यूनियन से समानता
BKU और तमिल आंदोलन में एक बड़ी समानता थी—
मांग किसान हित के आधार पर रखी जाएगी।
लेकिन तमिलनाडु ने यह शैली 1970 के दशक में ही बड़े पैमाने पर विकसित कर ली थी।
राष्ट्रीय किसान समन्वय—नायडू की कम आंकी गई विरासत
नारायणसामी नायडू ने विभिन्न राज्यों के किसान संगठनों को जोड़ने का प्रयास किया।
एक स्थायी अखिल भारतीय केंद्रीकृत किसान संगठन बन नहीं पाया।
लेकिन राष्ट्रीय समन्वय का विचार आगे जीवित रहा।
यह विरासत बाद में किसान समन्वय समितियों, BKU गठबंधनों और आधुनिक संयुक्त किसान मंचों में दिखाई देती है।
नायडू का राष्ट्रीय इतिहास में अपेक्षाकृत कम उल्लेख उनकी वास्तविक ऐतिहासिक भूमिका को कम नहीं करता।
कावेरी—किसान राजनीति का नया युग
कावेरी ने तमिलनाडु किसान आंदोलन को एक नए स्तर पर पहुंचाया।
अब किसान का विरोधी केवल चेन्नई सरकार नहीं था।
इसने किसान आंदोलन को संघीय राजनीति का हिस्सा बना दिया।
पानी ने किसान एकता की सीमा भी दिखाई
तमिलनाडु और कर्नाटक के किसान लाभकारी मूल्य या कर्ज पर साथ हो सकते हैं।
लेकिन कावेरी पर दोनों के हित टकरा सकते हैं।
यह राष्ट्रीय किसान राजनीति की मूल समस्या है—
किसान वर्ग की आर्थिक समानता प्राकृतिक संसाधन की भौगोलिक असमानता को समाप्त नहीं करती।
यही कारण है कि भारत में किसान संगठन राष्ट्रीय गठबंधन बना सकते हैं—
लेकिन राज्य हित पूरी तरह समाप्त नहीं होते।
कावेरी विवाद की सबसे बड़ी उपलब्धि
इससे विवाद को एक संस्थागत ढांचा मिला।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर सूखे वर्ष में समस्या खत्म हो जाएगी।
जलवायु परिवर्तन इस इतिहास को नया अर्थ देता है
बीसवीं सदी का किसान आंदोलन अधिकार के लिए लड़ रहा था—
इक्कीसवीं सदी में प्रश्न और कठिन है—
यदि पानी कम होता जाए तो उपलब्ध पानी का उपयोग कैसे किया जाए?
इन सबने कृषि जल राजनीति को नया स्वरूप दिया है।
इसलिए भविष्य का किसान आंदोलन केवल अधिक जल मांगकर नहीं चल सकता।
उसे जल दक्षता की राजनीति भी करनी होगी।
मुफ्त बिजली और कावेरी का संयुक्त विरोधाभास
एक ओर किसान को मुफ्त पंप बिजली मिली।
एक ओर तमिलनाडु कर्नाटक से अधिक नदी जल चाहता है।
दूसरी ओर अपने उपलब्ध पानी का उपयोग भी अधिक दक्ष बनाना होगा।
इसलिए आधुनिक नीति का प्रश्न केवल अधिकार नहीं—
यह किसान आंदोलन के अगले चरण का महत्वपूर्ण वैचारिक बदलाव होना चाहिए।
1990 के बाद कर्ज क्यों वापस आया?
अगर मुफ्त बिजली मिल चुकी थी तो किसान संकट क्यों जारी रहा?
क्योंकि लागत का केवल एक हिस्सा समाप्त हुआ।
यदि फसल खराब हो या मूल्य गिर जाए तो किसान फिर ऋण में जाता है।
कर्ज माफी—आवश्यक राहत, लेकिन स्थायी समाधान नहीं
गंभीर सूखा और प्राकृतिक आपदा में कर्ज राहत न्यायसंगत हो सकती है।
लेकिन यदि हर कुछ वर्षों में व्यापक कर्ज माफी आवश्यक हो तो यह संकेत है कि कृषि आय संरचना में समस्या है।
किसान को ऐसा आय सुरक्षा ढांचा कैसे मिले कि सामान्य वर्ष में वह स्वयं ऋण चुका सके?
यहीं MSP, बाजार सुधार, बीमा और प्रत्यक्ष आय सहायता की बहस जुड़ती है।
2017 का अय्याकन्नु आंदोलन—एक नए मीडिया युग की राजनीति
पी. अय्याकन्नु के जंतर-मंतर आंदोलन ने किसान आंदोलन की भाषा बदल दी।
नारायणसामी नायडू हजारों बैलगाड़ियों से शहर रोकते थे।
अय्याकन्नु ने कुछ दर्जन किसानों के साथ राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान रोक लिया।
ये दृश्य किसान संकट को घर-घर ले गए।
लेकिन दृश्यता और विजय अलग हैं
2017 का आंदोलन मीडिया में अत्यंत सफल था।
लेकिन उसकी सभी मांगें पूरी नहीं हुईं।
यह लोकतांत्रिक आंदोलन का महत्वपूर्ण पाठ है—
ध्यान आकर्षित करना पहला चरण है; नीति बदलना दूसरा।
इसी कसौटी पर उसकी दीर्घकालीन सफलता मापी जाती है।
किसान आत्महत्या—राजनीतिक नारे से आगे
आधुनिक किसान संकट की चर्चा किसान आत्महत्या के बिना संभव नहीं।
लेकिन इस विषय पर अतिशयोक्ति सबसे अधिक नुकसान करती है।
हर आत्महत्या का अकेला कारण कर्ज नहीं।
कृषि संकट कारणों में से एक हो सकता है—
लेकिन विश्लेषण में आधिकारिक और केस-विशिष्ट प्रमाण आवश्यक हैं।
तमिलनाडु किसान इतिहास की विश्वसनीयता इसी सावधानी पर निर्भर करती है।
किसान संकट केवल उत्पादन संकट नहीं
आज किसान भरपूर उत्पादन करके भी संकट में हो सकता है।
तो अच्छी फसल भी आर्थिक संकट पैदा कर सकती है।
“किसान आय कितनी और कितनी स्थिर है?”
MSP की बहस इसी परिवर्तन का परिणाम
लाभकारी मूल्य का प्रश्न नारायणसामी नायडू के दौर में मौजूद था।
शरद जोशी ने उसे अधिक वैचारिक रूप दिया।
BKU ने विभिन्न फसलों के मूल्य पर बड़े आंदोलन किए।
आज यह MSP और उसकी कानूनी गारंटी की बहस तक पहुंच चुका है।
यानी आधुनिक MSP आंदोलन अचानक पैदा नहीं हुआ।
कृषि उत्पादन का न्यायपूर्ण मूल्य कौन तय करेगा?
लेकिन तमिलनाडु में MSP अकेला उत्तर नहीं
तमिलनाडु केवल धान उत्पादक राज्य नहीं है।
इन सभी के लिए पारंपरिक सरकारी खरीद मॉडल लागू करना सरल नहीं।
इसलिए राज्य को कृषि आय सुरक्षा के अधिक विविध साधनों की जरूरत है।
बाजार और किसान के बीच नई शक्ति असमानता
पुराने गांव में मजदूर का सामना बड़े भू-स्वामी से था।
आधुनिक बाजार में छोटे किसान का सामना हो सकता है—
इसलिए शक्ति असमानता समाप्त नहीं हुई—
यही भविष्य के किसान आंदोलन का महत्वपूर्ण प्रश्न है।
कॉरपोरेट विरोध का उत्तर क्या?
सिर्फ बड़ी कंपनी का विरोध पर्याप्त नहीं।
अर्थात किसान राजनीति को प्रतिरोध के साथ संस्था निर्माण भी करना होगा।
महिला किसान—अधूरी पहचान
इतिहास में महिलाएं लगातार मौजूद थीं।
लेकिन जमीन का स्वामित्व और “किसान” की कानूनी पहचान लंबे समय तक मुख्यतः पुरुष से जुड़ी रही।
भविष्य के किसान आंदोलन की समावेशिता का एक बड़ा पैमाना होगा—
महिला कृषक को स्वतंत्र किसान अधिकार कितना मिलता है?
दलित कृषि मजदूर—इतिहास का केंद्र, वर्तमान में भी प्रासंगिक
तमिलनाडु की नई किसान राजनीति कई बार स्वामी किसान पर केंद्रित हुई।
लेकिन राज्य का कृषि इतिहास याद दिलाता है—
भूमिहीन मजदूर को भूलकर किसान नीति अधूरी है।
यदि स्वामी किसान की आय बढ़ती है लेकिन मजदूर की मजदूरी और रोजगार असुरक्षित है—
इसलिए किसान आय और कृषि मजदूरी दोनों को साथ देखना होगा।
ग्रामीण सत्ता वास्तव में कितनी बदली?
और राजनीतिक दलों ने उस केंद्रीकृत नियंत्रण को कमजोर किया है।
यह तमिलनाडु के सामाजिक परिवर्तन की बड़ी उपलब्धि है।
लेकिन स्थानीय प्रभुत्व समाप्त नहीं हुआ
आज भी ग्रामीण सत्ता को प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए किसान आंदोलन की उपलब्धि यह नहीं कि पुरानी सामाजिक सत्ता पूरी तरह गायब हो गई।
यह अंतर ऐतिहासिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
लोकतंत्र ने आंदोलन को क्या दिया?
कावेरी पर सर्वोच्च न्यायालय तक लड़ सकता था।
यही स्वतंत्र भारत के लोकतंत्र की शक्ति है।
इसलिए किसान आंदोलन भारतीय लोकतंत्र की सफलता और तनाव दोनों का इतिहास है।
चुनावी राजनीति ने किसान मांगें सोख लीं
तमिलनाडु में किसान संगठन स्वयं स्थायी चुनावी दल नहीं बने।
लेकिन उनकी मांगें चुनावी राजनीति में समाहित होती गईं।
द्रमुक और अन्नाद्रमुक दोनों की प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बने।
यह किसान आंदोलन की एक विशिष्ट सफलता है—
संगठन सत्ता में न आए, मुद्दा सत्ता में आ गया।
लेकिन यही ‘सब्सिडी राजनीति’ की सीमा भी बनी
एक बार चुनावी प्रतिस्पर्धा में प्रत्यक्ष राहत प्रवेश करती है तो नीति का प्रश्न यह हो जाता है—
यह किसानों के लिए तत्काल लाभकारी हो सकता है।
इसलिए कृषि कल्याण को केवल चुनावी मुफ्त नीति में बदलना पर्याप्त नहीं।
किसान आंदोलन और सामाजिक न्याय की दो परंपराएं
तमिलनाडु का इतिहास दो अलग सामाजिक न्याय दृष्टियों को जोड़ता है।
संपत्ति और सामाजिक संबंधों में न्याय।
बाजार और राज्य के साथ आर्थिक संबंधों में न्याय।
आधुनिक कृषि नीति तभी सफल होगी जब दोनों को साथ रखे।
भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती—जल
तमिलनाडु के लिए इसलिए कृषि भविष्य का सबसे बड़ा प्रश्न है—
हर उपलब्ध इकाई पानी से अधिक आय कैसे निकले?
कावेरी से आगे स्थानीय जल
राजनीतिक बहस में कावेरी इतना बड़ा विषय है कि स्थानीय जल प्रबंधन पीछे छूट सकता है।
लेकिन तमिलनाडु की दीर्घकालीन सुरक्षा निर्भर करेगी—
इसलिए भविष्य की किसान राजनीति को केवल पड़ोसी राज्य से पानी मांगने वाली राजनीति नहीं रहना चाहिए।
फसल विविधीकरण की कठिन राजनीति
कम पानी वाली फसलों की सलाह देना आसान है।
किसान को धान से दूसरी फसल पर ले जाना कठिन।
यदि नीति केवल “पानी बचाओ” कहती है और आय सुरक्षा नहीं देती—
इसलिए जल नीति और बाजार नीति को जोड़ना अनिवार्य है।
कृषि को टिकाऊ बनाने का नया समीकरण
तमिलनाडु की लगभग नौ दशक की यात्रा के बाद कृषि नीति का नया समीकरण होना चाहिए—
• जल सुरक्षा
• भूमि और काश्तकारी सुरक्षा
• मजदूर न्याय
• बाजार पहुंच
• जोखिम बीमा
• पर्यावरणीय स्थिरता।
इनमें से केवल एक को चुनना पर्याप्त नहीं।
यही इस पूरे इतिहास का नीति-संबंधी सबसे बड़ा निष्कर्ष है।
तमिलनाडु किसान आंदोलन की दस प्रमुख उपलब्धियां
इस विशाल इतिहास को उपलब्धियों की दृष्टि से समेटें तो सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन रहे—
इन उपलब्धियों का संयुक्त प्रभाव अत्यंत व्यापक है।
लेकिन दस बड़ी अधूरी समस्याएं भी
1. भूमिहीनता समाप्त नहीं हुई। 2. जातिगत ग्रामीण असमानता पूरी तरह नहीं टूटी। 3. कृषि मजदूर और स्वामी किसान हितों का अंतर बना रहा। 4. किसान आय स्थिर नहीं हुई। 5. ऋण संकट बार-बार लौटा। 6. बाजार मूल्य अत्यधिक अस्थिर हैं। 7. भूजल संकट गंभीर हुआ। 8. कावेरी पर सूखे वर्षों की तनावपूर्ण राजनीति बनी रही। 9. महिला किसान की स्वतंत्र पहचान पर्याप्त नहीं। 10. कल्याणकारी सब्सिडी और पर्यावरणीय स्थिरता में संतुलन अधूरा है।
सबसे सफल दौर कौन-सा था?
यह प्रश्न इस बात पर निर्भर है कि कसौटी क्या है।
तमिलनाडु किसान आंदोलन की संक्षिप्त समयरेखा
तमिलनाडु की किसान राजनीति ने ग्रामीण दासता से श्रम-अधिकार, काश्तकारी सुरक्षा, बिजली सब्सिडी, जल-संघवाद और किसान आय तक मांगों का असाधारण विस्तार दिखाया। इसकी सबसे गहरी उपलब्धि पन्नैयाल और दलित खेतिहर मजदूर को अधिकारवान राजनीतिक व्यक्ति बनाने तथा कृषि नीति को राज्य की चुनावी राजनीति का स्थायी विषय बनाने में है। किंतु भूमिहीन मजदूर और स्वामी-किसान, डेल्टा और शुष्क क्षेत्र, जाति और वर्ग तथा नदी के ऊपरी और निचले राज्यों के हित हमेशा एक जैसे नहीं रहे। इसलिए इसकी विरासत किसी एक ‘किसान एकता’ में नहीं, बल्कि उन अलग सामाजिक समूहों की आवाज को नीति और लोकतंत्र में स्थान दिलाने की निरंतर क्षमता में है।
प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक स्रोत
स्रोत-सावधानी: संगठनों, सरकारी अभिलेखों, न्यायिक दस्तावेजों और अकादमिक अध्ययनों में घटनाओं, मृतकों, भागीदारी और नीतिगत उपलब्धियों के आकलन पर मतभेद हैं। विवादित दावों को स्वतंत्र सत्यापन के बिना अंतिम तथ्य नहीं माना गया है।