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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–004 · स्वतंत्र भारत · अध्याय 06

भोजपुर और बोधगया भूमि संघर्ष

भूमि, जाति और खेतिहर मजदूरी से सशस्त्र क्रांतिकारी संघर्ष, गांधीवादी–समाजवादी सत्याग्रह और महिलाओं के स्वतंत्र भूमि-अधिकार तक

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskसंपादित विस्तृत शोध संस्करण · 27 अगस्त 2026

भोजपुर और बोधगया स्वतंत्र भारत के अधूरे भूमि सुधार से निकले दो निकट, पर भिन्न उत्तर थे। भोजपुर में भूमिहीन दलित खेतिहर मजदूरों का संघर्ष भूमि और मजदूरी के साथ सामाजिक सम्मान तथा जाति-सत्ता को चुनौती देने तक गया और उसके एक चरण ने सशस्त्र क्रांतिकारी रणनीति अपनाई। बोधगया में मठ की भूमि पर वास्तविक जोतने वालों ने छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के साथ सत्याग्रह, ग्राम समितियों और अहिंसक जन-संगठन का मार्ग लिया; यहां महिलाओं ने आंदोलन के भीतर ही स्वतंत्र भूमि-स्वामित्व का प्रश्न खड़ा किया। यह अध्ययन दोनों को एक-दूसरे का विकल्प घोषित करने के बजाय उनकी ऐतिहासिक परिस्थितियों, उपलब्धियों, हिंसा–अहिंसा, राज्य-प्रतिक्रिया और दीर्घकालीन विरासत का पृथक तथा तुलनात्मक मूल्यांकन करता है।

खंड 1

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

स्वतंत्रता के बाद बिहार की कृषि संरचना, जमींदारी उन्मूलन और अधूरे भूमि सुधार

भोजपुर और बोधगया के भूमि संघर्षों को केवल 1960 या 1970 के दशक में अचानक पैदा हुए किसान आंदोलनों के रूप में देखना ऐतिहासिक रूप से अधूरा होगा। उनकी जड़ें औपनिवेशिक काल की भूमि व्यवस्था, स्थायी बंदोबस्त, जमींदारी के अंतर्गत विकसित सामाजिक संबंधों और स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधारों के अधूरे क्रियान्वयन में थीं। स्वतंत्र भारत ने कानून बनाकर जमींदारी व्यवस्था समाप्त करने का प्रयास तो किया, लेकिन ग्रामीण बिहार में जमीन, सामाजिक प्रतिष्ठा और स्थानीय सत्ता का वास्तविक पुनर्वितरण बहुत सीमित रहा।

इसी विरोधाभास ने आगे चलकर मध्य बिहार में दो अलग-अलग प्रकार के भूमि आंदोलनों के लिए जमीन तैयार की। भोजपुर में संघर्ष का एक हिस्सा क्रांतिकारी कम्युनिस्ट और बाद में नक्सलवादी राजनीति से जुड़ा, जबकि बोधगया क्षेत्र में भूमि का प्रश्न जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति से निकले छात्र युवा संघर्ष वाहिनी जैसे संगठनों के माध्यम से अपेक्षाकृत अहिंसक जनसंघर्ष का आधार बना। दोनों की राजनीतिक भाषा और संघर्ष-पद्धति अलग थीं, लेकिन मूल प्रश्न एक था—जमीन पर वास्तविक अधिकार किसका हो: उसे जो कानूनी तौर पर मालिक कहलाता है या उसका जो उस जमीन पर अपना श्रम लगाता है?

औपनिवेशिक विरासत : स्थायी बंदोबस्त से मिली भूमि-संरचना

बिहार की स्वतंत्रता-उत्तर कृषि व्यवस्था को समझने के लिए 1793 के स्थायी बंदोबस्त तक लौटना आवश्यक है। बंगाल, बिहार और उड़ीसा के बड़े हिस्सों में ईस्ट इंडिया कंपनी ने राजस्व संग्रह के लिए जमींदारों को मध्यस्थ बनाया। धीरे-धीरे जमीन पर अधिकारों की एक अत्यंत जटिल श्रेणी विकसित हुई।

सबसे ऊपर औपनिवेशिक राज्य था। उसके नीचे जमींदार, फिर विभिन्न स्तरों के पट्टेदार और उप-पट्टेदार और सबसे नीचे वास्तविक किसान तथा भूमिहीन खेतिहर मजदूर थे। बिहार की कृषि व्यवस्था पर किए गए अध्ययनों में भी इस बहुस्तरीय संरचना का उल्लेख मिलता है—राज्य और वास्तविक उत्पादक किसान के बीच अनेक प्रकार के लगान-वसूलने वाले मध्यस्थ मौजूद थे।

इस व्यवस्था में कृषि उत्पादन का बड़ा हिस्सा वास्तविक किसान करता था, लेकिन भूमि पर निर्णायक नियंत्रण उसके पास नहीं था। जमींदार और बड़े भू-स्वामी लगान वसूलते थे और उनके नीचे काश्तकारों, बटाईदारों तथा खेतिहर मजदूरों की विभिन्न श्रेणियां मौजूद थीं।

इसलिए भूमि केवल उत्पादन का साधन नहीं रही। वह ग्रामीण समाज में राजनीतिक सत्ता, सामाजिक प्रतिष्ठा, जातिगत वर्चस्व और आर्थिक सुरक्षा का प्रमुख आधार बन गई।

यही संबंध स्वतंत्रता के बाद भी पूरी तरह नहीं टूटा।

स्वतंत्रता के समय बिहार की कृषि संरचना

1947 में बिहार मूलतः ग्रामीण और कृषि-प्रधान प्रदेश था। कृषि पर निर्भर आबादी के भीतर भी भूमि का वितरण अत्यंत असमान था। एक ओर बड़े भू-स्वामी थे, दूसरी ओर छोटे और सीमांत किसान, बटाईदार और बड़ी संख्या में भूमिहीन खेतिहर मजदूर।

सरकारी और प्रशासनिक अध्ययनों में स्वतंत्रता के समय बिहार की कृषि समस्या के प्रमुख तत्वों के रूप में भूमि के अत्यधिक असमान स्वामित्व, असुरक्षित काश्तकारी, छोटे तथा विखंडित जोत और भूमिहीन खेतिहर मजदूरों की विशाल आबादी का उल्लेख किया गया है। सामाजिक संरचना और भूमि-संबंधों के बीच भी गहरा संबंध था—बड़े भू-स्वामियों में अगड़ी जातियों का प्रभुत्व था, जबकि खेतिहर मजदूरों में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अत्यंत पिछड़े समुदायों की बड़ी उपस्थिति थी।

यहीं बिहार की भूमि समस्या की एक विशेषता सामने आती है।

यह केवल अमीर किसान बनाम गरीब किसान का संघर्ष नहीं था।

भूमि + जाति + मजदूरी + सामाजिक प्रतिष्ठा + राजनीतिक सत्ता

इसीलिए आगे चलकर भोजपुर का आंदोलन केवल जमीन की मांग तक सीमित नहीं रहा। उसमें मजदूरी, जातिगत अपमान और ग्रामीण सत्ता में दलितों तथा गरीबों की हिस्सेदारी के सवाल भी जुड़ गए।

जमींदारी उन्मूलन की राजनीतिक आवश्यकता

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ही कांग्रेस सहित विभिन्न राजनीतिक धाराओं में यह सहमति बन चुकी थी कि औपनिवेशिक जमींदारी व्यवस्था स्वतंत्र भारत में जारी नहीं रह सकती। किसान आंदोलनों ने भी इस प्रश्न को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में पहुंचाया था।

बिहार में स्वामी सहजानंद सरस्वती और किसान सभा की गतिविधियों ने जमींदारी-विरोधी चेतना को पहले ही व्यापक बनाया था। बकाश्त संघर्ष जैसे आंदोलनों ने दिखा दिया था कि जमीन का सवाल केवल राजस्व नीति का मामला नहीं बल्कि ग्रामीण सामाजिक न्याय का प्रश्न बन चुका है।

स्वतंत्रता के बाद इसलिए सबसे पहली बड़ी कृषि-सुधार परियोजनाओं में मध्यस्थों का उन्मूलन शामिल हुआ।

बिहार इस दिशा में कानून बनाने वाले शुरुआती राज्यों में था।

बिहार भूमि सुधार अधिनियम, 1950

इस प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण कदम था बिहार भूमि सुधार अधिनियम, 1950 (Bihar Land Reforms Act, 1950)।

इस कानून का मूल उद्देश्य जमींदारों और अन्य मध्यस्थ भू-अधिकारियों के अधिकार राज्य में निहित करना था। सर्वोच्च न्यायालय ने बाद में कानून के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा कि इसका सामान्य लक्ष्य जमींदारी और अन्य मध्यस्थ स्वामित्वों को समाप्त करना तथा रैयतों और अन्य वास्तविक कब्जेदारों को सरकार के साथ प्रत्यक्ष संबंध में लाना था।

सिद्धांततः यह बहुत बड़ा परिवर्तन था।

यदि यह परिवर्तन पूर्ण रूप से लागू होता और इसके साथ भूमि का वास्तविक पुनर्वितरण होता, तो बिहार की ग्रामीण संरचना में क्रांतिकारी परिवर्तन संभव था।

लेकिन जमींदारी उन्मूलन और भूमि के पुनर्वितरण में मूलभूत अंतर था।

पहला अपेक्षाकृत सफल हुआ; दूसरा बहुत अधूरा रहा।

जमींदारों की कानूनी चुनौती

जमींदारी उन्मूलन सहज प्रक्रिया नहीं थी। बड़े भू-स्वामियों ने भूमि सुधार कानूनों को अदालतों में चुनौती दी।

बिहार के महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह से संबंधित मुकदमा इस संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण बना। बिहार भूमि सुधार अधिनियम की संवैधानिक वैधता का प्रश्न अंततः सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा।

State of Bihar v. Maharajadhiraja Sir Kameshwar Singh मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय ने मई 1952 में निर्णय दिया। अदालत ने कानून के अधिकांश हिस्से को कायम रखा, हालांकि कुछ प्रावधानों को असंवैधानिक माना गया।

यह विवाद इतना महत्वपूर्ण था कि भूमि सुधार संबंधी कानूनों की संवैधानिक सुरक्षा स्वतंत्र भारत के शुरुआती संविधान संशोधनों के पीछे एक प्रमुख कारण बनी। संविधान के प्रथम संशोधन के बाद अनुच्छेद 31A और 31B तथा नौवीं अनुसूची ने भूमि सुधार कानूनों को अधिक मजबूत संवैधानिक संरक्षण प्रदान किया। बिहार भूमि सुधार अधिनियम भी इस संवैधानिक संघर्ष के केंद्र में था।

इस प्रकार बिहार का भूमि प्रश्न भारतीय संविधान के शुरुआती विकास से भी सीधे जुड़ गया।

कानून ने जमींदारी खत्म की, लेकिन क्या जमींदार वर्ग खत्म हुआ?

यहीं स्वतंत्रता के बाद बिहार के भूमि सुधारों का सबसे महत्वपूर्ण विरोधाभास दिखाई देता है।

कानूनी अर्थ में जमींदारी का अंत हुआ, लेकिन सामाजिक-आर्थिक अर्थ में पुराने भू-स्वामी वर्ग की शक्ति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।

जमींदारों से राजस्व वसूली के मध्यस्थ अधिकार छीन लिए गए, लेकिन बहुत से पुराने जमींदार अपने पास पर्याप्त निजी कृषि भूमि बनाए रखने में सफल रहे।

भूमि परिवार के विभिन्न सदस्यों के नाम दर्ज कराई जा सकती थी। बेनामी हस्तांतरण किए जा सकते थे। भूमि को विभिन्न श्रेणियों में दिखाया जा सकता था। वास्तविक बटाईदारों और काश्तकारों के अधिकार अभिलेखों में दर्ज नहीं होते थे।

प्रशासनिक अध्ययनों में भी उल्लेख मिलता है कि जमींदारी उन्मूलन के वास्तविक प्रभावी होने में वर्षों लगे और इस बीच बड़े भू-स्वामियों ने भूमि के बेनामी अथवा कृत्रिम हस्तांतरण किए।

इसका परिणाम यह हुआ कि जमींदारी व्यवस्था का कानूनी ढांचा टूट गया, लेकिन भूमि का संकेंद्रण अपेक्षित गति से नहीं टूटा।

जमींदारी उन्मूलन और भूमि वितरण में अंतर

इस अंतर को समझना भोजपुर और बोधगया संघर्ष की पृष्ठभूमि के लिए अत्यंत आवश्यक है।

किसान और राज्य के बीच मौजूद राजस्व-वसूली के मध्यस्थ को हटाना।

जमीन का ऐसा पुनर्वितरण जिससे वास्तविक कृषक और भूमिहीन खेतिहर मजदूर भूमि पर अधिकार प्राप्त कर सकें।

बिहार में पहला लक्ष्य काफी हद तक हासिल हुआ, लेकिन दूसरा बहुत सीमित रहा।

इसलिए पुराने जमींदार का कानूनी पद समाप्त होने के बावजूद वह कई गांवों में बड़ा भू-स्वामी बना रहा।

उसका आर्थिक प्रभाव भी बना रहा और उससे जुड़ा सामाजिक तथा राजनीतिक प्रभाव भी।

भूमि-सीमा कानून की आवश्यकता

जमींदारी उन्मूलन के बाद अगला तार्किक प्रश्न था—

एक व्यक्ति या परिवार अधिकतम कितनी कृषि भूमि रख सकता है?

यदि बड़े भू-स्वामियों को हजारों एकड़ भूमि रखने की अनुमति बनी रहती, तो केवल जमींदारी उन्मूलन से भूमिहीनता की समस्या समाप्त नहीं हो सकती थी।

इसीलिए कृषि भूमि पर अधिकतम सीमा निर्धारित करने की नीति सामने आई।

बिहार में पहला प्रमुख भूमि-सीमा कानून 1961 में आया और बाद में 1973 तथा 1976 में महत्वपूर्ण संशोधन हुए। नीति का उद्देश्य निर्धारित सीमा से अधिक भूमि को अधिशेष घोषित कर राज्य द्वारा अधिग्रहित करना और उसे भूमिहीनों के बीच बांटना था।

कागज पर यह नीति भूमि के पुनर्वितरण की दिशा में निर्णायक कदम थी।

व्यवहार में इसके सामने बड़ी बाधाएं थीं।

भूमि-सीमा कानूनों से बचने के रास्ते

कानून लागू होने की संभावना पहले से दिखाई देने लगी थी। बड़े भू-स्वामियों के पास राजनीतिक संपर्क, कानूनी संसाधन और स्थानीय प्रशासन पर प्रभाव था।

इसलिए भूमि को कई खातों में बांटना, रिश्तेदारों के नाम हस्तांतरित करना, बेनामी स्वामित्व, मुकदमेबाजी तथा अभिलेखों में हेरफेर जैसे रास्तों ने भूमि-सीमा कानूनों की प्रभावशीलता को कमजोर किया।

इस समस्या का एक और आयाम था—भूमि अभिलेख।

जिस समाज में वास्तविक काश्तकार का नाम राजस्व रिकॉर्ड में ही दर्ज न हो, वहां उसके अधिकार की कानूनी रक्षा कठिन थी।

यही समस्या बटाईदारों के साथ विशेष रूप से गंभीर थी।

बटाईदारों का अदृश्य संसार

बिहार के ग्रामीण समाज में बड़ी मात्रा में खेती ऐसे लोग करते थे जो जमीन के मालिक नहीं थे।

वे भू-स्वामी की जमीन पर खेती करते और उत्पादन का निर्धारित हिस्सा मालिक को देते थे। स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उनकी स्थिति और हिस्सेदारी अलग-अलग हो सकती थी।

काश्तकारी का असुरक्षित और अक्सर अनौपचारिक स्वरूप।

भू-स्वामी प्रायः बटाईदार के अधिकार को औपचारिक रूप से दर्ज कराने से बचता था, क्योंकि स्थायी या संरक्षित काश्तकारी अधिकार भविष्य में उसके स्वामित्व को चुनौती दे सकते थे।

इसलिए बटाईदार के सामने विचित्र स्थिति पैदा हुई।

वह वर्षों तक जमीन जोत सकता था, लेकिन सरकारी अभिलेख में उसका अस्तित्व नगण्य हो सकता था।

जमीन वह जोतता था, मालिक कोई दूसरा था और कानून के सामने उसका दावा कमजोर था।

भूमिहीन खेतिहर मजदूर : सबसे नीचे का वर्ग

भूमि व्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर खेतिहर मजदूर थे।

उनके पास स्वयं की पर्याप्त कृषि भूमि नहीं थी। जीवनयापन के लिए उन्हें बड़े या मध्यम किसानों की जमीन पर मजदूरी करनी पड़ती थी।

मध्य बिहार में इस आर्थिक संबंध का जातिगत आयाम अत्यंत महत्वपूर्ण था। भूमिहीन मजदूरों में दलित और अत्यंत पिछड़े समुदायों की संख्या बड़ी थी।

इसलिए खेतिहर मजदूरी केवल बाजार में श्रम बेचने का संबंध नहीं थी।

कई स्थानों पर भू-स्वामी ग्रामीण सत्ता का केंद्र भी था।

मजदूर के लिए उससे विवाद का अर्थ केवल रोजगार खोना नहीं बल्कि सामाजिक बहिष्कार, रास्ते या सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग में बाधा और कभी-कभी हिंसा का सामना करना भी हो सकता था।

इसी कारण आगे चलकर भोजपुर में मजदूरी बढ़ाने की मांग भी राजनीतिक विद्रोह का रूप लेने लगी।

भूमि और जाति का गठजोड़

बिहार के भूमि प्रश्न की विशिष्टता को समझने के लिए भूमि और जाति के संबंध को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

भूमि का असमान वितरण ऐतिहासिक रूप से जातिगत सामाजिक पदानुक्रम से जुड़ गया था। कई क्षेत्रों में बड़े भू-स्वामियों में अगड़ी जातियों का वर्चस्व था, जबकि भूमिहीन मजदूरों में दलित समुदायों का अनुपात अधिक था।

इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक अगड़ी जाति का व्यक्ति जमींदार था या प्रत्येक दलित भूमिहीन था। ऐसी सरल व्याख्या ऐतिहासिक वास्तविकता को विकृत करेगी।

मध्यवर्ती और पिछड़ी जातियों के भीतर भी समय के साथ समृद्ध कृषक वर्ग उभरे। दूसरी ओर अगड़ी जातियों के भीतर छोटे किसान भी मौजूद थे।

लेकिन व्यापक संरचना में भूमि और सामाजिक हैसियत का स्पष्ट संबंध था।

यही कारण है कि बिहार के बाद के किसान संघर्ष केवल आर्थिक वर्ग-संघर्ष नहीं रहे। उनमें जातिगत प्रतिष्ठा और सामाजिक समानता के प्रश्न भी प्रवेश करते गए।

भोजपुर : जहां भूमि का सवाल ‘इज्जत’ का सवाल बना

भोजपुर क्षेत्र में यह विरोधाभास विशेष रूप से तीखा हुआ।

पुराने शाहाबाद जिले—जिससे बाद में भोजपुर सहित अन्य जिले बने—में बड़ी संख्या में भूमिहीन और गरीब खेतिहर मजदूर थे। कृषि संबंधों के साथ जातिगत शक्ति-संबंध भी जुड़े हुए थे।

1960 और 1970 के दशकों तक नई राजनीतिक चेतना ने निम्न सामाजिक समूहों के बीच पुराने संबंधों को चुनौती देना शुरू कर दिया।

भोजपुर के आगामी संघर्ष की प्रकृति समझने के लिए यह तीसरा तत्व अत्यंत महत्वपूर्ण है।

यह संघर्ष आर्थिक शोषण के साथ-साथ ग्रामीण सामाजिक प्रभुत्व को चुनौती देने लगा।

बोधगया : मठ और विशाल भूमि-संपत्ति का प्रश्न

बोधगया क्षेत्र में भूमि समस्या का स्वरूप कुछ अलग था।

यहां बोधगया मठ और उसके महंत के नियंत्रण वाली विशाल भूमि-संपत्ति लंबे समय से विवाद का विषय रही। भूमि विभिन्न गांवों में फैली हुई थी और वास्तविक खेती बड़ी संख्या में गरीब किसान और खेतिहर मजदूर करते थे।

आगे चलकर यही सवाल उठा कि धार्मिक संस्था अथवा महंत के नियंत्रण में इतनी विशाल कृषि भूमि क्यों रहे, जबकि उसे जोतने वाले परिवार भूमिहीन या अत्यंत गरीब हों।

इसलिए बोधगया में संघर्ष का लक्ष्य केवल व्यक्तिगत जमींदार नहीं था।

वह धार्मिक-संस्थागत भू-स्वामित्व की संरचना को भी चुनौती देता था।

और इसी संघर्ष में आगे एक ऐसा प्रश्न उभरा जिसने इसे भारतीय भूमि आंदोलनों में विशिष्ट स्थान दिया—

वितरित होने वाली जमीन का अधिकार केवल परिवार के पुरुष मुखिया को मिले या महिलाओं को भी स्वतंत्र भू-अधिकार दिया जाए?

यह प्रश्न बाद के अध्याय में विस्तार से सामने आएगा।

भूदान का बिहार और भूमि-विहीनता का बिहार

बिहार के भूमि इतिहास में एक महत्वपूर्ण विरोधाभास और था।

यही वह प्रदेश था जहां 1951 में विनोबा भावे का भूदान आंदोलन तेजी से फैला। बड़े भू-स्वामियों से स्वेच्छा से जमीन लेकर भूमिहीनों को देने का विशाल नैतिक अभियान चला।

बिहार भूदान आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक बना।

लेकिन भूदान में घोषित जमीन और वास्तविक रूप से भूमिहीनों के कब्जे में आई उपयोगी जमीन के बीच अंतर रहा। कई दान विवादित, अनुपयोगी या कब्जे से संबंधित समस्याओं में फंसे रहे।

इसलिए बिहार में भूमि समस्या के समाधान के तीन मॉडल लगभग साथ-साथ दिखाई देते हैं—

भोजपुर और बोधगया तीसरे रास्ते के दो अलग रूप बने।

अधूरे भूमि सुधारों का राजनीतिक परिणाम

1950 के दशक में यह आशा थी कि राज्य द्वारा किए जा रहे भूमि सुधार ग्रामीण असमानता को धीरे-धीरे समाप्त कर देंगे।

लेकिन 1960 के दशक तक यह स्पष्ट होने लगा कि परिवर्तन अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंचा है।

जमींदारी उन्मूलन हुआ था, पर भूमिहीनता समाप्त नहीं हुई।

भूमि-सीमा कानून बने थे, पर बड़ी जोतों को विभाजित करने की प्रक्रिया धीमी और विवादग्रस्त थी।

काश्तकारी सुधारों की घोषणा हुई, लेकिन बहुत से बटाईदार असुरक्षित रहे।

अधिशेष भूमि का वितरण अपेक्षित स्तर तक नहीं हुआ।

और ग्रामीण सत्ता-संरचना में पुराने प्रभुत्व के अनेक रूप बने रहे।

बिहार सरकार से संबंधित अध्ययन भी भूमि सुधारों को मुख्यतः तीन क्षेत्रों—मध्यस्थों का उन्मूलन, भूमि-सीमा तथा काश्तकारी सुधार—में विभाजित करते हैं और स्वीकार करते हैं कि जमींदारी उन्मूलन का क्रियान्वयन धीमा रहा।

हरित क्रांति और मध्य बिहार

1960 के दशक में भारतीय कृषि नीति में हरित क्रांति का दौर शुरू हुआ। सिंचाई, उन्नत बीज, रासायनिक उर्वरक और कृषि तकनीक के माध्यम से उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया गया।

लेकिन नई कृषि तकनीक का लाभ उन किसानों को अधिक आसानी से मिल सकता था जिनके पास जमीन, पूंजी, सिंचाई और संस्थागत ऋण तक पहुंच थी।

भूमिहीन मजदूर के लिए समस्या अलग थी।

उसके पास नई तकनीक अपनाने के लिए जमीन ही नहीं थी।

इसलिए कृषि उत्पादन बढ़ाने की नीति अपने आप भूमि असमानता समाप्त नहीं कर सकती थी।

यहीं विकास नीति और भूमि सुधार के बीच अंतर स्पष्ट हुआ—

कृषि उत्पादन बढ़ना और कृषि संबंधों का न्यायपूर्ण होना एक ही बात नहीं है।

नक्सलबाड़ी की गूंज बिहार तक

1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले में नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह हुआ।

उसने भारतीय वामपंथ के भीतर एक मूल प्रश्न उठा दिया—

क्या संसदीय राजनीति और कानूनों के माध्यम से भूमि सुधार संभव है, या ग्रामीण सत्ता-संबंधों को बदलने के लिए क्रांतिकारी संघर्ष आवश्यक है?

बिहार की परिस्थितियां इस विचार के लिए उपजाऊ थीं।

और गरीब ग्रामीण समुदायों में यह अनुभव बढ़ रहा था कि कानून में दिए गए अधिकार जमीन पर स्वतः लागू नहीं होते।

इसी परिस्थिति में नक्सलबाड़ी से निकली क्रांतिकारी राजनीति भोजपुर पहुंची।

लेकिन भोजपुर ने नक्सलबाड़ी की केवल नकल नहीं की।

वहां वर्ग-संघर्ष बिहार की विशिष्ट जातिगत संरचना से जुड़ गया और उसने एक अलग सामाजिक चरित्र ग्रहण किया।

दूसरी दिशा : जयप्रकाश नारायण और संपूर्ण क्रांति

उसी बिहार में भूमि समस्या के समाधान की दूसरी राजनीतिक धारा भी विकसित हो रही थी।

जयप्रकाश नारायण गांधीवादी-सर्वोदयी विचारों और बाद में संपूर्ण क्रांति के आंदोलन से जुड़े। 1974 के बिहार आंदोलन से बड़ी संख्या में युवाओं का राजनीतिकरण हुआ।

इसी वातावरण से छात्र युवा संघर्ष वाहिनी निकली।

उसके कार्यकर्ताओं ने प्रश्न उठाया कि यदि संपूर्ण क्रांति का अर्थ केवल सरकार बदलना नहीं बल्कि समाज बदलना है, तो गांव में भूमि और सामाजिक सत्ता के संबंधों को बदले बिना क्रांति कैसे पूरी होगी?

यहीं से बोधगया भूमि संघर्ष की राजनीतिक पृष्ठभूमि तैयार हुई।

इस प्रकार बिहार में एक ही समस्या के दो अत्यंत भिन्न उत्तर सामने आने लगे।

भोजपुर और बोधगया : एक समस्या, दो राजनीतिक रास्ते

यही इस पूरे अध्ययन की केंद्रीय ऐतिहासिक धुरी है।

भोजपुर का रास्ता

भूमि और वर्ग संबंधों को बदलने के लिए क्रांतिकारी संघर्ष, जिसमें आगे सशस्त्र कार्रवाई भी शामिल हुई।

बोधगया का रास्ता

जन-संगठन, सत्याग्रह, भूमि पर सामूहिक दावा और व्यापक सामाजिक लामबंदी।

एक पर नक्सलबाड़ी और CPI(ML) की वैचारिक छाप थी।

दूसरे पर जयप्रकाश नारायण, गांधीवादी-सर्वोदयी परंपरा और संपूर्ण क्रांति की।

फिर भी दोनों एक ही बुनियादी विफलता से पैदा हुए—

स्वतंत्रता के बाद राज्य द्वारा किए गए भूमि सुधार ग्रामीण बिहार में जमीन और सत्ता का पर्याप्त लोकतंत्रीकरण नहीं कर सके।

यही वह ऐतिहासिक बिंदु है जहां भोजपुर और बोधगया एक-दूसरे से जुड़ते हैं।

समग्र मूल्यांकन

लेकिन जमींदारी उन्मूलन सामाजिक क्रांति में परिवर्तित नहीं हो सका।

इसलिए 1950 के दशक में जिस प्रश्न का समाधान विधानसभा और भूमि सुधार कानूनों से करने का प्रयास हुआ था, वही प्रश्न 1960 और 1970 के दशकों में फिर गांव की गलियों और खेतों में लौट आया।

खंड 2

मध्य बिहार का सामाजिक ढांचा

भोजपुर और बोधगया के भूमि संघर्षों को समझने के लिए मध्य बिहार के गांव को केवल कृषि उत्पादन की इकाई के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। बीसवीं सदी के मध्य तक यहां गांव एक ऐसी सामाजिक-सत्ता व्यवस्था भी था जिसमें भूमि का स्वामित्व, जातिगत हैसियत, मजदूरी संबंध, ऋण, स्थानीय प्रशासन, सामाजिक सम्मान और हिंसा की क्षमता परस्पर जुड़ी हुई थीं।

स्वतंत्रता और जमींदारी उन्मूलन ने इस संरचना के कानूनी आधार को बदला, लेकिन ग्रामीण समाज में सत्ता का वास्तविक पुनर्वितरण बहुत धीमा रहा। पुराने जमींदारों का औपचारिक दर्जा समाप्त होने के बावजूद अनेक बड़े भू-स्वामी पर्याप्त भूमि, संसाधन और स्थानीय प्रभाव बनाए रखने में सफल रहे। दूसरी ओर भूमिहीन खेतिहर मजदूर और गरीब किसान राजनीतिक लोकतंत्र के नागरिक तो बन गए, लेकिन गांव के दैनिक जीवन में बराबरी का अधिकार हासिल करने की प्रक्रिया कहीं अधिक कठिन थी।

इसी अंतर्विरोध से मध्य बिहार के भूमि संघर्षों की सामाजिक जमीन बनी।

‘मध्य बिहार’ से हमारा आशय क्या है?

भोजपुर और बोधगया संघर्षों के संदर्भ में ‘मध्य बिहार’ कोई पूरी तरह स्थिर प्रशासनिक इकाई नहीं है। विभिन्न कालखंडों में जिलों की सीमाएं बदलीं। इसलिए ऐतिहासिक अध्ययन में इसे एक व्यापक सामाजिक-कृषि क्षेत्र के रूप में समझना अधिक उपयोगी है।

भोजपुर का मुख्य संघर्ष पुराने शाहाबाद जिले के उस हिस्से में विकसित हुआ जो बाद में भोजपुर जिले और आसपास के प्रशासनिक क्षेत्रों में विभाजित हुआ। सहार, संदेश, पीरो और आसपास के गांव आगे चलकर राजनीतिक संघर्ष के महत्वपूर्ण क्षेत्र बने।

दूसरी ओर बोधगया आंदोलन गया जिले के बोधगया और आसपास के गांवों में केंद्रित था।

दोनों क्षेत्रों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं थीं। भू-स्वामित्व, जातिगत संरचना, कृषि व्यवस्था और राजनीतिक संगठनों में अंतर था। फिर भी कुछ साझा तत्व स्पष्ट थे—

भूमि का असमान वितरण, भूमिहीन मजदूरों की बड़ी आबादी, असुरक्षित काश्तकारी, जाति और वर्ग का अंतर्संबंध तथा स्थानीय स्तर पर भू-स्वामी वर्ग का प्रभाव।

इन्हीं समानताओं के कारण दोनों संघर्षों का तुलनात्मक अध्ययन सार्थक है।

जमीन : ग्रामीण सत्ता का केंद्रीय स्रोत

मध्य बिहार में जमीन केवल आय पैदा करने वाली संपत्ति नहीं थी।

वह तय करती थी कि गांव में किस परिवार के पास आर्थिक सुरक्षा होगी, किसके पास पशु और कृषि उपकरण होंगे, कौन दूसरों को रोजगार देगा, किसे ऋण उपलब्ध होगा और स्थानीय राजनीतिक निर्णयों में किसकी आवाज प्रभावी होगी।

इसीलिए भूमि का स्वामित्व कई दूसरी शक्तियों में परिवर्तित हो सकता था—

भूमि → उत्पादन → आय → ऋण देने की क्षमता → सामाजिक प्रतिष्ठा → राजनीतिक प्रभाव।

भूमिहीन व्यक्ति की स्थिति ठीक उलटी थी।

उसे जीविका के लिए उसी व्यक्ति के खेत में काम करना पड़ सकता था जिसके साथ उसका सामाजिक या आर्थिक विवाद हो। मजदूरी रोक दिए जाने का अर्थ उसके परिवार के सामने तत्काल खाद्य संकट हो सकता था।

इसलिए भूमि संबंध केवल आर्थिक अनुबंध नहीं थे।

भूमि और जाति : समान नहीं, लेकिन गहरे जुड़े हुए

मध्य बिहार की कृषि संरचना की चर्चा करते समय सबसे अधिक सावधानी जाति और वर्ग के संबंध को लेकर आवश्यक है।

यह कहना गलत होगा कि प्रत्येक ऊंची जाति का व्यक्ति बड़ा भू-स्वामी था और प्रत्येक दलित व्यक्ति भूमिहीन था। वास्तविक समाज इससे कहीं अधिक जटिल था।

फिर भी ऐतिहासिक रूप से भूमि के वितरण और जातिगत पदानुक्रम के बीच स्पष्ट संबंध दिखाई देता है।

भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और कायस्थ समुदायों के कुछ हिस्सों में बड़े तथा मध्यम भू-स्वामियों की महत्वपूर्ण उपस्थिति थी। दूसरी ओर दलित समुदायों—विशेषकर मुसहर, चमार/रविदास, दुसाध तथा अन्य स्थानीय अनुसूचित जाति समूहों—में भूमिहीन खेतिहर मजदूरों का अनुपात अधिक था।

लेकिन इसके बीच एक तीसरा सामाजिक क्षेत्र भी विकसित हो रहा था।

यादव, कुर्मी और कोइरी जैसी पिछड़ी कृषक जातियों के कुछ समूहों ने बीसवीं सदी के दौरान कृषि भूमि, शिक्षा और राजनीतिक संगठन के माध्यम से अपनी स्थिति मजबूत की।

इससे ग्रामीण सत्ता-संरचना और जटिल हो गई।

अब संघर्ष केवल पुराने जमींदार और भूमिहीन मजदूर के बीच नहीं था। कई इलाकों में नए समृद्ध और मध्य किसान भी महत्वपूर्ण ग्रामीण शक्ति बनने लगे।

त्रिस्तरीय कृषि समाज

विश्लेषण की सुविधा के लिए मध्य बिहार के ग्रामीण समाज को मोटे तौर पर तीन आर्थिक स्तरों में समझा जा सकता है।

बड़ा भू-स्वामी वर्ग

इसके पास अपेक्षाकृत बड़ी जोतें, कृषि संसाधन, सामाजिक प्रतिष्ठा और प्रशासनिक संपर्क होते थे।

छोटा और मध्यम कृषक वर्ग

यह स्वयं खेती करता था, लेकिन आवश्यकता के अनुसार मजदूर भी लगाता था। इसके भीतर भी भारी आर्थिक अंतर थे।

भूमिहीन और लगभग भूमिहीन खेतिहर मजदूर

इसके पास इतनी जमीन नहीं थी कि परिवार का जीवन उससे चल सके। इसलिए उसे मजदूरी, बटाई, मौसमी काम और अन्य श्रम पर निर्भर रहना पड़ता था।

लेकिन इन आर्थिक श्रेणियों पर जाति की परत चढ़ी हुई थी।

इसीलिए किसी गांव का वास्तविक सामाजिक ढांचा समझने के लिए केवल यह जानना पर्याप्त नहीं था कि किसके पास कितनी जमीन है। यह भी जानना पड़ता था कि उसका सामाजिक समुदाय कौन-सा है और स्थानीय सत्ता-संबंधों में उसका स्थान क्या है।

खेतिहर मजदूर : कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़

मध्य बिहार की कृषि में भूमिहीन खेतिहर मजदूरों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी।

रोपनी, कटनी, सिंचाई, पशुपालन, खेत तैयार करने और फसल ढोने जैसे अनेक काम उनके श्रम पर निर्भर थे।

लेकिन उत्पादन में केंद्रीय भूमिका होने के बावजूद उनका आर्थिक हिस्सा अत्यंत सीमित था।

मजदूरी नकद, अनाज अथवा दोनों रूपों में मिल सकती थी। रोजगार भी पूरे वर्ष सुनिश्चित नहीं रहता था।

कृषि कार्य मौसमी होने के कारण मजदूर परिवारों को वर्ष के कुछ महीनों में गंभीर आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था।

इस स्थिति ने उन्हें भू-स्वामी पर निर्भर बनाया।

यही निर्भरता आगे राजनीतिक संघर्ष का विषय बनी।

मजदूरी का सवाल इतना विस्फोटक क्यों बना?

आधुनिक औद्योगिक मजदूरी संबंधों में मजदूर और मालिक के बीच संबंध मुख्यतः कार्यस्थल तक सीमित माना जा सकता है। ग्रामीण बिहार में स्थिति अलग थी।

उसके पास स्थानीय प्रशासन तक पहुंच हो सकती थी।

कई बार गांव के सामाजिक संस्थानों पर भी उसका प्रभाव होता था।

इसलिए खेतिहर मजदूर जब अधिक मजदूरी मांगता था तो वह केवल कुछ अतिरिक्त पैसे या अनाज की मांग नहीं कर रहा होता था।

वह परंपरागत सामाजिक संबंध को चुनौती दे रहा होता था।

इसीलिए भोजपुर में आगे चलकर मजदूरी का संघर्ष राजनीतिक सत्ता के संघर्ष में बदल गया।

‘इज्जत’ : भोजपुर संघर्ष का सामाजिक आयाम

भोजपुर के आंदोलन को समझने के लिए ‘इज्जत’ या सामाजिक सम्मान की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण है।

कई अध्ययनों में भोजपुर के गरीब और दलित खेतिहर मजदूरों के संघर्ष को केवल भूमि अथवा मजदूरी के प्रश्न से अधिक व्यापक सामाजिक मुक्ति के संघर्ष के रूप में देखा गया है।

पुराने ग्रामीण पदानुक्रम में आर्थिक निर्भरता के साथ सामाजिक व्यवहार के भी नियम थे।

कौन किसके सामने कैसे बोलेगा, किस सामाजिक स्थान पर बैठेगा, किस रास्ते या सार्वजनिक संसाधन का किस तरह उपयोग करेगा—इन प्रश्नों में भी शक्ति संबंध दिखाई देते थे।

जब दलित खेतिहर मजदूरों ने इन संबंधों को चुनौती दी, तो संघर्ष का अर्थ बदल गया।

क्या गरीब खेतिहर मजदूर गांव में बराबर नागरिक की तरह व्यवहार कर सकता है?

यही कारण था कि भोजपुर में कई कार्यकर्ताओं के लिए आंदोलन का अर्थ जमीन से आगे जाकर मानवीय गरिमा की प्राप्ति भी था।

बेगार और श्रम-निर्भरता की विरासत

औपनिवेशिक और जमींदारी काल में बिहार के अनेक क्षेत्रों में बेगार और अर्ध-बाध्यकारी श्रम के विभिन्न रूप मौजूद रहे थे।

स्वतंत्रता के बाद इनके कानूनी और संस्थागत आधार कमजोर हुए, लेकिन सामाजिक निर्भरता तुरंत समाप्त नहीं हुई।

गरीब परिवार कभी ऋण, कभी परंपरागत संबंध और कभी रोजगार की अनिश्चितता के कारण शक्तिशाली भू-स्वामी परिवारों से बंधे रहते थे।

बोधगया क्षेत्र में भी भूमि संघर्ष ने ऐसे ही श्रम संबंधों को चुनौती दी। वहां गरीब कृषक और मजदूर केवल भूमि के वितरण की मांग नहीं कर रहे थे; वे उस व्यापक संरचना से मुक्ति चाहते थे जिसमें जमीन पर नियंत्रण के कारण महंत और उससे जुड़े प्रबंधकीय तंत्र को असाधारण शक्ति प्राप्त थी।

बटाईदार : मालिक और मजदूर के बीच

मध्य बिहार के कृषि समाज में बटाईदार की स्थिति विशेष थी।

वह खेतिहर मजदूर नहीं था क्योंकि वह जमीन को कुछ हद तक स्वतंत्र रूप से जोतता था।

उत्पादन का एक हिस्सा उसे भू-स्वामी को देना पड़ता था।

यदि उसकी काश्तकारी दर्ज नहीं थी, तो बेदखली का खतरा बना रहता था।

इसलिए बटाईदार के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नों में से एक था—

भूमि सुधार कानूनों का उद्देश्य ऐसे कृषकों की रक्षा करना था, लेकिन अनौपचारिक बटाई व्यवस्था ने कानून के प्रभाव को सीमित किया।

भू-स्वामी यदि आधिकारिक रूप से स्वीकार ही न करे कि कोई व्यक्ति उसका बटाईदार है, तो अधिकार साबित करना कठिन हो जाता था।

गैर-मजरुआ और सार्वजनिक भूमि

भूमि संघर्षों में एक और महत्वपूर्ण श्रेणी थी—ऐसी जमीन जो निजी भू-स्वामी की सामान्य रैयती जमीन से अलग कानूनी स्थिति रखती थी।

बिहार में गैर-मजरुआ आम, गैर-मजरुआ खास, सरकारी भूमि तथा गांव के साझा उपयोग की विभिन्न प्रकार की भूमि महत्वपूर्ण रही हैं।

इन जमीनों पर अधिकार और कब्जे को लेकर विवाद बार-बार सामने आए।

गरीब ग्रामीण समुदायों के लिए ऐसी जमीन आवास, पशु चराने, रास्ते, ईंधन और कभी खेती तक के लिए महत्वपूर्ण थी।

इसलिए भूमि आंदोलन केवल बड़े खेतों के पुनर्वितरण तक सीमित नहीं थे।

सार्वजनिक और सामुदायिक संसाधनों पर नियंत्रण भी ग्रामीण शक्ति का प्रश्न था।

भू-स्वामी की सत्ता कैसे काम करती थी?

यह समझना आवश्यक है कि ‘ग्रामीण सत्ता’ का अर्थ केवल हिंसा नहीं था।

भू-स्वामी की शक्ति कई स्तरों पर काम करती थी।

उसके पास स्थानीय अधिकारियों से संपर्क हो सकता था।

उसका परिवार पंचायत या स्थानीय राजनीति में प्रभावशाली हो सकता था।

विवाद की स्थिति में उसके पास वकील और अदालत तक पहुंचने के संसाधन अधिक होते थे।

इस प्रकार उसकी आर्थिक पूंजी सामाजिक और राजनीतिक पूंजी में बदल जाती थी।

भूमिहीन मजदूर के पास इन संसाधनों का अभाव था।

यही असमानता गांव में वास्तविक सत्ता का आधार थी।

पुलिस, थाना और गरीब किसान

ग्रामीण संघर्षों के इतिहास में थाना एक महत्वपूर्ण संस्था था।

कानून की दृष्टि से पुलिस सभी नागरिकों की सुरक्षा के लिए थी। लेकिन ग्रामीण गरीबों की धारणा अक्सर यह रही कि प्रशासनिक संस्थाओं तक शक्तिशाली भू-स्वामियों की पहुंच अधिक है।

भूमि विवाद, मजदूरी विवाद और हिंसक टकराव के मामलों में यह धारणा राजनीतिक महत्व ग्रहण करती गई।

जब गरीब समुदाय यह महसूस करने लगे कि औपचारिक न्याय व्यवस्था उनके लिए प्रभावी नहीं है, तो वैकल्पिक संगठन आकर्षक बनने लगे।

भोजपुर में क्रांतिकारी संगठनों ने इसी असंतोष का उपयोग किया।

उन्होंने स्वयं को ऐसे संगठन के रूप में प्रस्तुत किया जो गरीबों को स्थानीय शक्तिशाली वर्गों के सामने खड़ा कर सकता था।

पंचायत राज और सत्ता का लोकतंत्रीकरण

स्वतंत्र भारत में पंचायतों को स्थानीय लोकतंत्र का आधार बनाने की परिकल्पना की गई।

सैद्धांतिक रूप से सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार ने ग्रामीण गरीबों को राजनीतिक अधिकार दिए।

पहली बार भूमिहीन खेतिहर मजदूर और बड़े भू-स्वामी का मत संवैधानिक रूप से समान मूल्य रखता था।

लेकिन मतदान की समानता और सामाजिक शक्ति की समानता एक ही चीज नहीं थीं।

जिस व्यक्ति की आजीविका किसी भू-स्वामी पर निर्भर हो, उसके लिए राजनीतिक स्वतंत्रता का वास्तविक उपयोग हमेशा आसान नहीं था।

फिर भी चुनावी लोकतंत्र ने धीरे-धीरे पुराने सामाजिक संबंधों को कमजोर किया।

गरीब और पिछड़े समुदायों ने समझना शुरू किया कि संख्या भी राजनीतिक शक्ति हो सकती है।

यही परिवर्तन आगे बिहार की राजनीति में गहरे सामाजिक बदलाव का कारण बना।

पिछड़ी कृषक जातियों का उदय

बीसवीं सदी के दौरान बिहार के ग्रामीण समाज में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन पिछड़ी कृषक जातियों के राजनीतिक और आर्थिक उदय के रूप में सामने आया।

यादव, कुर्मी और कोइरी समुदायों के कुछ हिस्सों ने कृषि, संगठन और राजनीति में अपनी स्थिति मजबूत की।

त्रिवेणी संघ जैसे पूर्ववर्ती आंदोलनों ने भी सामाजिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न उठाया था।

स्वतंत्रता के बाद लोकतांत्रिक राजनीति ने इस प्रक्रिया को और गति दी।

इससे पुराने अगड़ी जाति प्रभुत्व को चुनौती मिली।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि भूमिहीन दलितों की समस्या स्वतः हल हो गई।

कई स्थानों पर पिछड़ी जातियों के भीतर से भी बड़े अथवा मध्यम किसान उभरे और उनके तथा दलित खेतिहर मजदूरों के बीच मजदूरी और भूमि संबंधी विवाद सामने आए।

इसलिए मध्य बिहार में वर्ग और जाति का समीकरण समय के साथ बदलता रहा।

वर्ग बनाम जाति की बहस

यहीं से भोजपुर आंदोलन के इतिहासलेखन की एक महत्वपूर्ण बहस शुरू होती है।

मार्क्सवादी विश्लेषण में मूल संघर्ष को अक्सर भू-स्वामी और खेतिहर मजदूर अर्थात वर्ग-संघर्ष के रूप में समझा गया।

दूसरी ओर सामाजिक इतिहासकारों और दलित अध्ययनों ने प्रश्न उठाया कि यदि जातिगत अपमान, सामाजिक बहिष्कार और सम्मान की मांग संघर्ष के केंद्र में थे तो इसे केवल आर्थिक वर्ग-संघर्ष कैसे कहा जा सकता है?

वास्तविकता दोनों के अंतर्संबंध में थी।

जो व्यक्ति भूमिहीन था, वही सामाजिक पदानुक्रम में नीचे भी था।

इसलिए आर्थिक शोषण और जातिगत उत्पीड़न एक-दूसरे को मजबूत करते थे।

इसी सूक्ष्म अंतर को ध्यान में रखना आवश्यक है।

दलित खेतिहर मजदूरों की नई चेतना

स्वतंत्रता के बाद शिक्षा, चुनावी राजनीति, संवैधानिक अधिकार और राजनीतिक संगठनों की गतिविधियों ने दलित समुदायों में नई सामाजिक चेतना पैदा की।

भारतीय संविधान ने अस्पृश्यता समाप्त की और समान नागरिकता का सिद्धांत स्थापित किया।

लेकिन गांव में यदि पुरानी सामाजिक प्रथाएं बनी रहें तो संविधान और दैनिक जीवन के बीच अंतर दिखाई देना स्वाभाविक था।

नई पीढ़ी के खेतिहर मजदूर पूछने लगे—

जब संविधान बराबरी देता है तो गांव में बराबरी क्यों नहीं?

जब न्यूनतम मजदूरी का कानून है तो मजदूरी मनमानी क्यों?

जब जमींदारी समाप्त हो चुकी है तो पुराने जमींदार जैसी सत्ता क्यों कायम है?

यही प्रश्न राजनीतिक संगठन की जमीन बने।

भोजपुर : आर्थिक संघर्ष से सामाजिक विद्रोह तक

भोजपुर में आंदोलन की शक्ति इसी कारण केवल भूमि कब्जे में नहीं थी।

गरीब और दलित मजदूरों का संगठित होना अपने आप में ग्रामीण सत्ता-संबंधों को बदलने वाला कदम था।

सामूहिक रूप से मजदूरी मांगना, अन्याय का प्रतिरोध करना और राजनीतिक बैठकों में भाग लेना पुराने संबंधों के विरुद्ध सार्वजनिक चुनौती थी।

भू-स्वामी वर्ग के लिए प्रश्न केवल कुछ जमीन या अतिरिक्त मजदूरी का नहीं था।

उसके सामने गांव में अपनी परंपरागत प्रभुत्वकारी स्थिति खोने का भय भी था।

इसलिए संघर्ष आर्थिक मांग से सामाजिक सत्ता की लड़ाई में बदल गया।

एकवारी और सहार : विस्फोटक सामाजिक भूगोल

भोजपुर संघर्ष में एकवारी गांव का विशेष महत्व है।

सहार क्षेत्र और उसके आसपास की सामाजिक परिस्थितियों में भूमि और जाति की असमानता तीखी थी। इसी इलाके से जगदीश महतो जैसे स्थानीय नेतृत्व का उदय हुआ।

नक्सलबाड़ी से प्रेरित क्रांतिकारी विचारों को यहां इसलिए सामाजिक आधार मिला क्योंकि वे पहले से मौजूद स्थानीय असंतोष से जुड़ गए।

यदि जमीन, मजदूरी और सम्मान का संकट नहीं होता, तो बाहर से आई कोई विचारधारा अकेले इतने गहरे आंदोलन को जन्म नहीं दे सकती थी।

यही कारण है कि भोजपुर को केवल ‘नक्सलवाद का विस्तार’ कहना पर्याप्त नहीं है।

यह स्थानीय सामाजिक संघर्ष और क्रांतिकारी विचारधारा का संयोजन था।

बोधगया का अलग सामाजिक भूगोल

यहां संघर्ष का एक प्रमुख केंद्र विशाल मठ-संपत्ति और उससे जुड़े कृषि संबंध थे।

महंत के नियंत्रण में बताई जाने वाली भूमि अनेक गांवों में फैली थी। वास्तविक खेती गरीब कृषक परिवार करते थे।

इसलिए यहां विरोध का प्रतीक व्यक्तिगत जातिगत भू-स्वामी के बजाय एक शक्तिशाली धार्मिक-संस्थागत भू-स्वामित्व भी बना।

लेकिन गरीब कृषकों की सामाजिक संरचना में जाति और लैंगिक असमानता दोनों मौजूद थीं।

यही कारण है कि बोधगया आंदोलन आगे केवल ‘मठ बनाम किसान’ नहीं रहा।

भूमि मिलने के बाद परिवार के भीतर उस पर अधिकार किसका होगा?

यहीं से महिलाओं के भूमि अधिकार का प्रश्न उभरा।

महिलाओं की स्थिति : श्रम उनका, जमीन किसकी?

ग्रामीण बिहार की कृषि अर्थव्यवस्था में महिलाओं का श्रम अत्यंत महत्वपूर्ण था।

रोपनी, निराई, कटाई, पशुपालन, अनाज प्रसंस्करण और घरेलू उत्पादन में महिलाओं की बड़ी भूमिका थी।

लेकिन भूमि के स्वामित्व में उनका हिस्सा बहुत कम था।

परिवार के पास थोड़ी जमीन होने पर भी उसका रिकॉर्ड सामान्यतः पुरुष सदस्य के नाम होता था।

इसलिए गरीब ग्रामीण महिला दो स्तरों पर असमानता का सामना कर सकती थी—

दूसरा, परिवार के भीतर लैंगिक असमानता।

बोधगया आंदोलन की ऐतिहासिक विशिष्टता इसी बिंदु पर सामने आएगी।

यदि आंदोलन हमने भी किया है और खेत में श्रम हम भी करते हैं, तो जमीन केवल पति के नाम क्यों मिले?

यह प्रश्न भारतीय भूमि सुधार विमर्श को परिवार से निकालकर व्यक्ति के अधिकार तक ले गया।

ऋण और साहूकारी

भूमिहीन और छोटे किसान की निर्भरता का एक और स्रोत ऋण था।

बीज, खाद, बीमारी, विवाह, मृत्यु या खाद्यान्न संकट के समय परिवार को तत्काल नकदी की आवश्यकता होती थी।

औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था की पहुंच सीमित होने पर स्थानीय साहूकार, व्यापारी या भू-स्वामी से ऋण लेना पड़ सकता था।

इससे आर्थिक निर्भरता और मजबूत होती थी।

ऋण केवल वित्तीय संबंध नहीं रहता था।

वह श्रम और सामाजिक संबंधों को भी प्रभावित कर सकता था।

इसलिए भूमि सुधार के साथ ग्रामीण ऋण व्यवस्था में सुधार भी आवश्यक था।

भूमि विवाद और न्याय की लंबी प्रक्रिया

भूमि-सुधार कानून बनने के बावजूद भूमि विवाद अदालतों और प्रशासनिक कार्यालयों में वर्षों तक चल सकते थे।

ऐसे प्रश्नों का समाधान अभिलेख और प्रशासन पर निर्भर था।

संसाधन-संपन्न भू-स्वामी लंबी मुकदमेबाजी झेल सकता था।

भूमिहीन किसान के लिए ऐसा करना कठिन था।

इस असमान न्यायिक क्षमता ने भी आंदोलनकारी राजनीति को बढ़ावा दिया।

राज्य और गांव के बीच मध्यस्थ सत्ता

लोकतांत्रिक राज्य गांव तक सीधे नहीं पहुंचता।

राजस्व कर्मचारी, अंचल कार्यालय, पुलिस थाना, पंचायत, स्थानीय नेता और राजनीतिक दल।

जिस सामाजिक वर्ग की इन संस्थाओं तक अधिक पहुंच होती है, उसे प्रशासनिक लाभ मिलने की संभावना भी अधिक होती है।

इसीलिए भूमि संघर्ष अक्सर केवल किसान और भू-स्वामी के बीच नहीं रहता।

के त्रिकोणीय संघर्ष में बदल सकता है।

भोजपुर और बोधगया दोनों में यह प्रक्रिया दिखाई देगी, हालांकि दोनों स्थानों पर उसका स्वरूप अलग था।

लोकतंत्र ने विद्रोह को रोका नहीं—नई भाषा दी

यह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक विरोधाभास है।

भारत में स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्र स्थापित हुआ। चुनाव हुए। संविधान ने समानता और अधिकार दिए।

इसे लोकतंत्र की विफलता मात्र कहना उचित नहीं होगा।

वास्तव में लोकतंत्र ने वंचित समुदायों को नई अपेक्षाएं और अधिकारों की नई भाषा भी दी।

खंड 3

भोजपुर में संघर्ष की जमीन

एकवारी, सहार और आसपास का क्षेत्र

भोजपुर के किसान–मजदूर संघर्ष को समझने के लिए केवल नक्सलबाड़ी, CPI(ML) या क्रांतिकारी राजनीति की राष्ट्रीय पृष्ठभूमि पर्याप्त नहीं है। यह जानना अधिक आवश्यक है कि भोजपुर की स्थानीय धरती में ऐसा क्या था जिसने एक बाहरी वैचारिक प्रेरणा को स्थायी सामाजिक संघर्ष में बदल दिया।

एकवारी, सहार और आसपास के गांव इस प्रश्न का उत्तर देते हैं। यहां भूमि का असमान वितरण, खेतिहर मजदूरी की निम्न दरें, जातिगत पदानुक्रम, सामाजिक अपमान, श्रम पर निर्भरता और प्रशासनिक शक्ति-संतुलन ऐसे ढंग से एक-दूसरे से जुड़े थे कि छोटी-सी आर्थिक मांग भी व्यापक सामाजिक संघर्ष का रूप ले सकती थी।

यही कारण है कि भोजपुर का आंदोलन केवल नक्सलबाड़ी की प्रतिकृति नहीं बना। उसने अपनी अलग भाषा, अपना सामाजिक आधार और अपनी विशिष्ट ऐतिहासिक दिशा विकसित की।

पुराना शाहाबाद : भोजपुर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भोजपुर क्षेत्र पुराने शाहाबाद जिले का हिस्सा था। यह इलाका गंगा और सोन नदियों के प्रभाव वाले उपजाऊ मैदानों में स्थित था और कृषि इसकी आर्थिक संरचना का केंद्र थी।

उपजाऊ मिट्टी होने के बावजूद कृषि संसाधनों का वितरण समान नहीं था। बड़े और मध्यम भू-स्वामियों के मुकाबले बहुत बड़ी ग्रामीण आबादी छोटे किसान, बटाईदार और खेतिहर मजदूरों के रूप में जीवन बिताती थी।

यहीं से वह विरोधाभास पैदा होता है जो आगे संघर्ष की मूल भूमि बना—

कृषि उत्पादन की क्षमता अधिक थी, लेकिन उसका सामाजिक वितरण अत्यंत असमान था।

भोजपुर नाम से पहले शाहाबाद

आज जिस क्षेत्र को भोजपुर के रूप में जाना जाता है, उसके संघर्षों की शुरुआत उस समय हुई जब प्रशासनिक संरचना अलग थी। इसलिए ऐतिहासिक स्रोतों में ‘शाहाबाद’, ‘सहार’, ‘एकवारी’ और बाद के ‘भोजपुर’ के संदर्भ एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं।

इस प्रशासनिक परिवर्तन को ध्यान में रखना आवश्यक है, क्योंकि आंदोलन की आरंभिक घटनाओं को आज के जिला नक्शे पर पढ़ने से कभी-कभी भ्रम पैदा हो सकता है।

सहार और एकवारी का क्षेत्र बाद में भोजपुर आंदोलन का प्रतीक बना, लेकिन उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि पुराने शाहाबाद की कृषि संरचना में ही विकसित हुई थी।

एकवारी : एक गांव से अधिक

एकवारी को भोजपुर आंदोलन का एक प्रमुख प्रारंभिक केंद्र माना जाता है।

लेकिन इसका महत्व केवल इसलिए नहीं है कि वहां कुछ महत्वपूर्ण नेता या घटनाएं सामने आईं। एकवारी उस व्यापक ग्रामीण संरचना का प्रतिनिधि गांव बन गया जिसमें जाति, भूमि और मजदूरी का संबंध अत्यंत तीखा था।

ऐसे गांवों में सामाजिक जीवन कई स्तरों में विभाजित था।

एक ओर अपेक्षाकृत संपन्न भू-स्वामी परिवार थे।

और सबसे नीचे बड़ी संख्या में भूमिहीन या लगभग भूमिहीन खेतिहर मजदूर।

इन आर्थिक श्रेणियों का जातिगत चरित्र भी था, इसलिए आर्थिक संघर्ष तुरंत सामाजिक अर्थ ग्रहण कर लेता था।

खेतिहर मजदूरों की स्थिति

भोजपुर के गरीब ग्रामीण परिवारों की सबसे बड़ी समस्या भूमि-विहीनता थी।

यदि परिवार के पास इतनी जमीन ही न हो जिससे उसकी सालभर की जरूरतें पूरी हो सकें, तो उसे खेतिहर मजदूरी पर निर्भर रहना पड़ता था।

रोपनी, कटनी और अन्य कृषि कार्यों के समय मजदूरों की आवश्यकता बढ़ती, लेकिन वर्ष के शेष हिस्से में काम की कमी हो सकती थी।

इसका अर्थ था कि मजदूर आर्थिक रूप से असुरक्षित रहता था।

यदि वह स्थानीय भू-स्वामी से टकराव लेता, तो उसका रोजगार भी खतरे में पड़ सकता था।

यही आर्थिक निर्भरता सामाजिक अनुशासन का साधन बन सकती थी।

मजदूरी का प्रश्न

भोजपुर में आंदोलन की प्रारंभिक राजनीति में मजदूरी का प्रश्न महत्वपूर्ण था।

खेतिहर मजदूरों की मांग केवल मजदूरी बढ़ाने की नहीं थी। वे यह भी चाहते थे कि मजदूरी का निर्धारण मनमाने तरीके से न हो।

जब मजदूर सामूहिक रूप से बेहतर मजदूरी की मांग करते थे तो इससे स्थानीय भू-स्वामियों को दोहरी चुनौती मिलती थी।

उन्हें श्रम लागत बढ़ने का खतरा दिखाई देता था।

मजदूर पहली बार सामूहिक राजनीतिक शक्ति के रूप में सामने आ रहे थे।

इसलिए मजदूरी विवाद अक्सर सामाजिक टकराव में बदल जाते थे।

जातिगत पदानुक्रम और सामाजिक दूरी

मध्य बिहार की तरह भोजपुर में भी भूमि और जाति का संबंध गहरा था।

बड़े भू-स्वामियों में कुछ अगड़ी जातियों की मजबूत उपस्थिति थी, जबकि दलित समुदायों के भीतर भूमिहीन खेतिहर मजदूरों की संख्या अधिक थी।

सभी ऊंची जाति के लोग समृद्ध नहीं थे और सभी निम्न जाति के लोग भूमिहीन नहीं थे।

फिर भी व्यापक ग्रामीण सत्ता संरचना में जाति का प्रभाव स्पष्ट था।

भूमि स्वामित्व से सामाजिक प्रतिष्ठा जुड़ी थी और सामाजिक प्रतिष्ठा से स्थानीय निर्णय शक्ति।

इसीलिए वर्ग संघर्ष कई बार जातिगत संघर्ष जैसा दिखाई देने लगा।

‘मालिक’ और ‘मजदूर’ के संबंध

भोजपुर की ग्रामीण भाषा में ‘मालिक’ शब्द केवल खेत के मालिक के लिए नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक पद को भी व्यक्त कर सकता था।

जिसके पास जमीन थी, वही अक्सर मजदूरी देता था।

वही स्थानीय प्रशासन तक पहुंच रख सकता था।

और वही विवाद की स्थिति में सामाजिक दबाव डाल सकता था।

इस प्रकार भू-स्वामी और मजदूर का संबंध केवल आर्थिक लेन-देन नहीं था।

यह संरचनात्मक निर्भरता का संबंध था।

अपमान और प्रतिरोध

भोजपुर के आंदोलन का एक केंद्रीय तत्व सामाजिक सम्मान था।

दलित और गरीब मजदूर केवल आर्थिक शोषण से असंतुष्ट नहीं थे। वे उस व्यवहार को भी चुनौती देने लगे जिसमें उनसे निम्न सामाजिक स्थान स्वीकार करने की अपेक्षा की जाती थी।

‘मजदूरी बढ़ाओ’ धीरे-धीरे ‘हम बराबर हैं’ में बदलती है।

और ‘हम बराबर हैं’ का अर्थ ग्रामीण सत्ता-संबंधों के लिए अधिक चुनौतीपूर्ण था।

क्योंकि यह आर्थिक व्यवस्था के साथ सामाजिक पदानुक्रम पर भी प्रहार करता था।

एकवारी की विशेषता

एकवारी की पहचान आगे चलकर इसलिए महत्वपूर्ण बनी क्योंकि यहां स्थानीय असंतोष और क्रांतिकारी राजनीति का मेल हुआ।

यहां के संघर्ष को केवल इस आधार पर नहीं समझा जा सकता कि नक्सलबाड़ी का प्रभाव बिहार तक पहुंचा।

असल प्रश्न यह है कि स्थानीय ग्रामीण समाज उस प्रभाव को ग्रहण करने के लिए पहले से तैयार क्यों था।

और स्थानीय न्याय व्यवस्था से असंतोष।

नक्सलबाड़ी ने इन समस्याओं को एक वैचारिक भाषा दी।

सहार : संघर्ष का विस्तृत क्षेत्र

सहार प्रखंड भोजपुर आंदोलन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना।

यह क्षेत्र केवल एक गांव तक सीमित संघर्ष का विस्तार नहीं था, बल्कि कई गांवों में समान प्रकार की सामाजिक–आर्थिक स्थितियों का क्षेत्र था।

जब मजदूर और गरीब किसान एक गांव में संगठित होते और उनकी खबर आसपास पहुंचती, तो उससे दूसरे गांवों में भी राजनीतिक चेतना फैलती।

इस प्रकार आंदोलन ने गांव-दर-गांव नेटवर्क का रूप लेना शुरू किया।

स्थानीय नेता क्यों निर्णायक बने

किसी भी ग्रामीण आंदोलन में बाहरी विचारधारा तभी प्रभावी होती है जब उसे स्थानीय भाषा में समझाने और स्थानीय संघर्षों से जोड़ने वाले नेता मौजूद हों।

भोजपुर में यह भूमिका आगे चलकर जगदीश महतो, रामनरेश राम और अन्य स्थानीय कार्यकर्ताओं ने निभाई।

वे केवल राजनीतिक सिद्धांत समझाने वाले कार्यकर्ता नहीं थे।

उनकी विश्वसनीयता इस बात से बनी कि वे स्थानीय अपमान, मजदूरी विवाद और भूमि संबंधों को प्रत्यक्ष अनुभव के स्तर पर समझते थे।

यहीं से आंदोलन को सामाजिक जड़ें मिलीं।

जगदीश महतो की पृष्ठभूमि

जगदीश महतो भोजपुर आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक चेहरों में गिने जाते हैं।

उनका महत्व केवल इस बात में नहीं था कि वे क्रांतिकारी राजनीति से जुड़े। वे स्थानीय समाज के भीतर से आए थे और सामाजिक असमानता को प्रत्यक्ष रूप से देखते थे।

उनकी राजनीतिक भूमिका ने आगे चलकर एकवारी को व्यापक पहचान दी।

उनके माध्यम से नक्सलबाड़ी से प्रेरित विचार और स्थानीय संघर्ष एक-दूसरे से जुड़े।

इस बिंदु पर भोजपुर की राजनीति बदलने लगी।

रामनरेश राम और राजनीतिक संगठन

रामनरेश राम भी भोजपुर क्षेत्र के महत्वपूर्ण वामपंथी नेताओं में थे।

उनकी भूमिका आगे भोजपुर की क्रांतिकारी तथा किसान राजनीति में दीर्घकालिक रही।

वे उन नेताओं में थे जिन्होंने गरीब किसानों और खेतिहर मजदूरों को संगठित करने का काम किया और बाद के दशकों में आंदोलन को चुनावी तथा जनसंगठन की दिशा से भी जोड़ा।

इसलिए भोजपुर आंदोलन की कहानी केवल एक उग्र विस्फोट नहीं है।

यह लंबी राजनीतिक संगठन-प्रक्रिया की कहानी भी है।

रामेश्वर अहीर और ग्रामीण नेतृत्व

भोजपुर के प्रारंभिक संघर्ष में रामेश्वर अहीर जैसे स्थानीय कार्यकर्ताओं का भी उल्लेख मिलता है।

यह महत्वपूर्ण है क्योंकि आंदोलन का नेतृत्व सामाजिक रूप से एकरूप नहीं था।

विभिन्न जाति और वर्ग पृष्ठभूमियों से आने वाले कार्यकर्ताओं की भागीदारी ने आंदोलन को केवल किसी एक जाति के विद्रोह में बदलने से रोका।

यही कारण है कि उसकी भाषा वर्ग संघर्ष की थी, भले ही उसका सामाजिक आधार जातिगत संरचना से गहराई से प्रभावित था।

नक्सलबाड़ी की खबर भोजपुर क्यों पहुंची?

1967 का नक्सलबाड़ी विद्रोह राष्ट्रीय स्तर पर वामपंथी राजनीति में बड़ी घटना थी।

लेकिन बिहार जैसे राज्यों में उसकी खबर केवल समाचार नहीं थी।

यदि भूमि सुधार कानून काम नहीं कर रहे, तो गरीब किसान क्या करे?

भोजपुर के कार्यकर्ताओं ने नक्सलबाड़ी में एक ऐसा मॉडल देखा जिसमें गरीब किसान और खेतिहर मजदूर सीधे भू-स्वामी सत्ता को चुनौती दे रहे थे।

यह संदेश उन क्षेत्रों में विशेष रूप से प्रभावी था जहां स्थानीय संघर्ष पहले से मौजूद थे।

चारु मजूमदार की वैचारिक छाप

नक्सलबाड़ी के बाद चारु मजूमदार की राजनीतिक रेखा भारतीय क्रांतिकारी वाम की एक महत्वपूर्ण धारा बनी।

उनका जोर संसदीय राजनीति से बाहर निकलकर ग्रामीण क्रांति और सशस्त्र संघर्ष पर था।

भोजपुर के कुछ कार्यकर्ताओं ने इस विचारधारा को अपनाया।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर सामने आया।

भोजपुर की वास्तविक परिस्थितियों ने सिद्धांत को बदल दिया।

यहां भूमि प्रश्न जातिगत सम्मान और मजदूरी संघर्ष से जुड़ा था।

इसलिए आंदोलन की प्रकृति स्थानीय सामाजिक वास्तविकता के अनुसार विकसित हुई।

‘वर्ग शत्रु’ की अवधारणा

क्रांतिकारी राजनीति में बड़े भू-स्वामियों को ‘वर्ग शत्रु’ के रूप में देखने की अवधारणा महत्वपूर्ण थी।

लेकिन गांव में वास्तविकता अधिक जटिल थी।

कौन केवल सामाजिक रूप से प्रभावशाली है?

इन प्रश्नों का स्थानीय स्तर पर उत्तर हमेशा सरल नहीं था।

आगे चलकर यही मुद्दा भोजपुर आंदोलन की रणनीति और आलोचना दोनों का विषय बना।

संघर्ष का पहला सामाजिक आधार

भोजपुर आंदोलन का प्रारंभिक आधार मुख्यतः गरीब किसान और भूमिहीन खेतिहर मजदूर बने।

विशेष रूप से दलित समुदायों के भीतर आंदोलन का प्रभाव बढ़ा।

यह स्वाभाविक था क्योंकि सबसे तीखा शोषण और सामाजिक अपमान वही समुदाय झेल रहे थे।

यह सामूहिकता ही राजनीतिक परिवर्तन का पहला चरण थी।

महिलाओं की भागीदारी

भोजपुर संघर्ष के प्रारंभिक इतिहास में महिलाओं की भूमिका अक्सर पुरुष नेतृत्व की तुलना में कम दर्ज हुई है।

लेकिन खेतिहर मजदूर परिवारों की महिलाएं कृषि श्रम और घरेलू अर्थव्यवस्था दोनों की केंद्रीय हिस्सेदार थीं।

जब परिवार संघर्ष में उतरता था, तो महिलाएं भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित होती थीं।

आगे चलकर महिलाओं की भागीदारी आंदोलन के सामाजिक आधार को और विस्तृत करती है।

भोजपुर की तुलना में बोधगया में महिला भूमि अधिकार का प्रश्न अधिक स्पष्ट राजनीतिक रूप लेगा।

राजनीतिक दलों की सीमाएं

1960 के दशक तक बिहार में वामपंथी दल सक्रिय थे।

लेकिन क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं का तर्क था कि संसदीय वाम भूमि और सामाजिक संबंधों को पर्याप्त तेजी से नहीं बदल रहा।

यहीं से वामपंथ के भीतर विभाजन तीखा हुआ।

एक धारा चुनाव और जनसंगठन के माध्यम से परिवर्तन चाहती थी।

दूसरी धारा सशस्त्र क्रांति की ओर बढ़ रही थी।

भोजपुर इस वैचारिक संघर्ष का प्रयोगक्षेत्र बना।

पुलिस और प्रशासन के प्रति अविश्वास

भूमि और मजदूरी विवादों में गरीब किसानों का प्रशासन पर भरोसा सीमित था।

यदि मजदूरों को लगता कि स्थानीय थाना या राजस्व तंत्र शक्तिशाली भू-स्वामियों के प्रभाव में है, तो वे राज्य की संस्थाओं से न्याय की अपेक्षा कम करने लगते।

यहीं क्रांतिकारी संगठन यह दावा करते थे कि गरीबों को अपना न्याय स्वयं संगठित करना होगा।

यह विचार आगे चलकर समानांतर सत्ता संरचनाओं और हिंसक संघर्ष की ओर बढ़ता है।

सामूहिकता का निर्माण

आंदोलन की पहली वास्तविक शक्ति हथियार नहीं बल्कि संगठन था।

जब मजदूर अलग-अलग मांग करते थे, तो उन्हें आसानी से दबाया जा सकता था।

जब वही मांग सामूहिक हो गई, तो सत्ता संतुलन बदलने लगा।

मजदूरी विवाद, बहिष्कार, सामूहिक सभा और विरोध प्रदर्शन धीरे-धीरे राजनीतिक संगठन के साधन बने।

इसलिए भोजपुर आंदोलन को केवल हिंसा के इतिहास के रूप में पढ़ना एक बड़ी भूल होगी।

गांव के भीतर दो सत्ता

जैसे-जैसे गरीब मजदूर संगठित हुए, गांव के भीतर सत्ता के दो स्रोत बनने लगे।

भू-स्वामी और उससे जुड़ा सामाजिक ढांचा।

संगठित मजदूर और क्रांतिकारी कार्यकर्ता।

जब ये दोनों शक्ति केंद्र एक ही गांव में मौजूद हों तो संघर्ष लगभग अपरिहार्य हो जाता है।

भोजपुर में यही प्रक्रिया तेजी से बढ़ी।

सामाजिक बहिष्कार से राजनीतिक प्रतिरोध तक

ग्रामीण शक्ति का एक पुराना हथियार सामाजिक बहिष्कार था।

मजदूरी न देना, खेत में काम न देना, ऋण रोक देना या सामाजिक दबाव बनाना गरीब परिवारों को अनुशासित करने के तरीके हो सकते थे।

संगठित आंदोलन ने इसका जवाब सामूहिक प्रतिरोध से दिया।

यदि एक मजदूर को काम नहीं दिया गया, तो पूरे समूह के विरोध की संभावना बढ़ी।

इससे पुराने नियंत्रण के साधन कमजोर होने लगे।

संघर्ष की हिंसक दिशा

भोजपुर में सामाजिक तनाव धीरे-धीरे हिंसक रूप लेने लगा।

क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं ने चुने हुए भू-स्वामियों और विरोधियों के खिलाफ हमले किए।

दूसरी ओर भू-स्वामी समूहों और राज्य की ओर से भी प्रतिरोध और दमन हुआ।

इस हिंसक चक्र ने आंदोलन की राजनीति को कठोर बनाया।

यहीं से भोजपुर की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर एक उग्र नक्सलवादी क्षेत्र के रूप में बनने लगी।

क्या यह केवल भूमि संघर्ष था?

भोजपुर आंदोलन भूमि से शुरू जरूर हुआ, लेकिन उसकी मांगें जल्दी ही व्यापक हो गईं।

इसलिए भोजपुर संघर्ष को केवल जमीन के बंटवारे की लड़ाई कह देना अधूरा होगा।

क्या यह केवल जाति संघर्ष था?

जाति की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी, लेकिन आंदोलन की भाषा वर्ग आधारित थी और उसका उद्देश्य ग्रामीण आर्थिक संबंधों को बदलना भी था।

कई संघर्षों में जाति और वर्ग एक-दूसरे पर चढ़े हुए थे।

यह न तो केवल वर्ग संघर्ष था, न केवल जाति संघर्ष।

एकवारी का प्रतीकात्मक महत्व

यह उस गांव का प्रतीक था जहां गरीब खेतिहर मजदूरों ने पहली बार स्थानीय सत्ता को खुली चुनौती दी।

इसका प्रभाव आसपास के गांवों पर पड़ा।

राजनीतिक कार्यकर्ता यहां से अनुभव लेकर दूसरे क्षेत्रों में गए।

इस तरह एकवारी एक स्थानीय घटना से आंदोलनकारी स्मृति का हिस्सा बन गया।

सहार का राजनीतिक महत्व

सहार क्षेत्र ने आंदोलन को गांव से इलाके में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

एक गांव का संघर्ष आसानी से अलग किया जा सकता था।

लेकिन जब कई गांवों में समान संगठन उभरने लगे, तो यह प्रशासनिक और राजनीतिक चुनौती बन गया।

यहीं से भोजपुर आंदोलन क्षेत्रीय पहचान ग्रहण करता है।

स्थानीय संघर्ष से नक्सलवादी आंदोलन तक

भोजपुर की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रक्रिया यही थी—

स्थानीय सामाजिक असंतोष → मजदूरी और सम्मान का संघर्ष → राजनीतिक संगठन → नक्सलबाड़ी से वैचारिक जुड़ाव → क्रांतिकारी आंदोलन।

ऐसा नहीं था कि पहले नक्सलवादी आंदोलन आया और उसने कृत्रिम रूप से संघर्ष पैदा कर दिया।

वास्तविकता यह थी कि स्थानीय संघर्ष पहले से मौजूद थे।

क्रांतिकारी राजनीति ने उन्हें नई दिशा दी।

समग्र मूल्यांकन

भोजपुर में संघर्ष की जमीन को समझने के लिए एकवारी और सहार को केवल घटनास्थल के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है।

वे उस ग्रामीण संरचना के प्रतिनिधि क्षेत्र थे जिसमें आर्थिक असमानता और सामाजिक पदानुक्रम एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए थे।

भूमिहीन खेतिहर मजदूर केवल गरीब नहीं था।

इसलिए जब गरीब मजदूर संगठित हुआ, तो उसने एक साथ कई संबंधों को चुनौती दी।

यही कारण है कि संघर्ष इतना तीव्र हुआ।

नक्सलबाड़ी ने भोजपुर को वैचारिक प्रेरणा दी, लेकिन भोजपुर की क्रांति की असली जमीन एकवारी और सहार के खेतों, मजदूरी संबंधों और सामाजिक अपमान में थी।

इसी स्थानीय वास्तविकता ने भोजपुर को भारतीय नक्सलवादी आंदोलन के सबसे विशिष्ट और दीर्घजीवी क्षेत्रों में बदल दिया।

खंड 4 — भोजपुर आंदोलन का उदय : जगदीश महतो, रामनरेश राम, रामेश्वर अहीर और प्रारंभिक संगठन

इसमें स्थानीय नेतृत्व का उदय, नक्सलबाड़ी से वैचारिक संपर्क, प्रारंभिक किसान–मजदूर संगठन, CPI(ML) की भूमिका, संघर्ष की रणनीति और एकवारी–सहार क्षेत्र में आंदोलन के संस्थागत रूप लेने की प्रक्रिया का विस्तार से अध्ययन किया जाएगा।

खंड 4

भोजपुर आंदोलन का उदय

जगदीश महतो, रामनरेश राम, रामेश्वर अहीर और प्रारंभिक संगठन

भोजपुर आंदोलन का इतिहास केवल किसी राजनीतिक दल के बिहार में प्रवेश की कहानी नहीं है। उसकी वास्तविक शुरुआत उस समय हुई जब स्थानीय सामाजिक असंतोष को स्थानीय नेतृत्व मिला और उस नेतृत्व को नक्सलबाड़ी के बाद उभरी क्रांतिकारी विचारधारा की भाषा मिली।

एकवारी और सहार के गांवों में भूमि, मजदूरी, जातिगत अपमान और स्थानीय सत्ता को लेकर तनाव पहले से मौजूद था। नक्सलबाड़ी ने इन समस्याओं को पैदा नहीं किया; उसने उनके समाधान के एक नए—और अत्यंत उग्र—राजनीतिक रास्ते की कल्पना उपलब्ध कराई।

इस प्रक्रिया में जगदीश महतो, रामनरेश राम और रामेश्वर अहीर तीन अलग सामाजिक और राजनीतिक अनुभवों से निकले ऐसे व्यक्तित्व बने जिन्होंने भोजपुर के असंतोष को संगठित प्रतिरोध में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उपलब्ध अध्ययनों में एकवारी को बिहार के प्रारंभिक नक्सलवादी आंदोलन का केंद्र और जगदीश महतो को उसके प्रमुख स्थानीय संस्थापकों में गिना गया है।

आंदोलन किसी खाली राजनीतिक जमीन पर नहीं आया

1960 के दशक के उत्तरार्ध में एकवारी और आसपास के गांव पहले से तनावग्रस्त थे।

भूमि और उत्पादन संबंध असमान थे। दलित तथा गरीब खेतिहर मजदूरों में सामाजिक अपमान को लेकर असंतोष था। मजदूरी और काम की शर्तों पर विवाद थे। स्थानीय राजनीति में भी जातिगत शक्ति-संतुलन स्पष्ट दिखाई देता था।

इसलिए भोजपुर में क्रांतिकारी आंदोलन का उदय समझने के लिए यह कहना पर्याप्त नहीं कि नक्सलबाड़ी के कुछ कार्यकर्ता यहां पहुंचे और आंदोलन शुरू हो गया।

स्थानीय असंतोष → स्थानीय राजनीतिक संगठन → चुनावी संघर्ष → नक्सलबाड़ी से वैचारिक प्रेरणा → भूमिगत संगठन → सशस्त्र कार्रवाइयां।

रामनरेश राम : उग्र दौर से पहले की राजनीतिक जमीन

भोजपुर आंदोलन के इतिहास में रामनरेश राम का महत्व इसलिए विशेष है क्योंकि वे नक्सलवादी दौर शुरू होने से पहले ही स्थानीय किसान और वाम राजनीति में सक्रिय थे।

उनके अपने संस्मरण के अनुसार वे 1965 में एकवारी ग्रामसभा के मुखिया चुने गए थे। उन्होंने बाद में याद किया कि गांव में भूमिहार आबादी प्रभावशाली थी, हालांकि दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय संयुक्त रूप से संख्या में अधिक थे। उनके अनुसार स्थानीय सत्ता केवल बड़ी जमीन से नहीं बल्कि जातिगत सामाजिक वर्चस्व से भी संचालित होती थी।

यह विवरण महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे पार्टी-नेता के बाद के संस्मरण के रूप में पढ़ना चाहिए, न कि निष्पक्ष प्रशासनिक रिपोर्ट के रूप में।

फिर भी यह एकवारी की राजनीति का एक मूल विरोधाभास दिखाता है—

संख्या में बहुसंख्यक होने और सत्ता में प्रभावी होने के बीच बड़ा अंतर था।

इसी अंतर को लोकतांत्रिक चुनाव धीरे-धीरे चुनौती देने लगे थे।

1967 का विधानसभा चुनाव : राजनीतिक निर्णायक मोड़

1967 का बिहार विधानसभा चुनाव भोजपुर के आगामी आंदोलन की राजनीतिक मनोभूमि समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

रामनरेश राम चुनाव मैदान में थे और जगदीश महतो उनके चुनाव अभियान से जुड़े थे। रामनरेश राम के संस्मरण में जगदीश महतो को उनका चुनाव एजेंट बताया गया है। उनका आरोप था कि मतदान के दौरान प्रभावशाली स्थानीय समूहों ने बूथ पर कब्जे और मतदाताओं को रोकने की कोशिश की।

बाद के विवरणों के अनुसार जगदीश महतो ने मतदान में हस्तक्षेप का विरोध किया और उन पर हमला हुआ। इस घटना को उनके राजनीतिक उग्रकरण के महत्वपूर्ण मोड़ों में गिना जाता है।

इस प्रसंग की अलग-अलग स्रोतों में कुछ विवरण भिन्न मिलते हैं, लेकिन व्यापक तथ्य महत्वपूर्ण है—

भोजपुर के उभरते गरीब और निम्न सामाजिक समूहों के लिए चुनाव केवल सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं था; वह गांव के पुराने सत्ता-संतुलन को चुनौती देने का अवसर बन रहा था।

जगदीश महतो : ‘मास्टर साहब’ से क्रांतिकारी कार्यकर्ता तक

जगदीश महतो को स्थानीय रूप से ‘जगदीश मास्टर’ या ‘मास्टर साहब’ के नाम से भी याद किया गया।

वे शिक्षित पृष्ठभूमि से आते थे। इस कारण गरीब ग्रामीण समुदाय और क्रांतिकारी विचारधारा के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु बने।

उनका महत्व केवल इसलिए नहीं था कि उन्होंने हथियारबंद संघर्ष का समर्थन किया।

उनकी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका शायद इससे पहले की थी—

सामाजिक अन्याय को राजनीतिक रूप से परिभाषित करना।

जातिगत अपमान को उन्होंने व्यक्तिगत दुर्भाग्य के रूप में नहीं बल्कि संरचनात्मक उत्पीड़न के रूप में देखने की कोशिश की।

कम मजदूरी को किसी एक मालिक की कठोरता नहीं बल्कि वर्ग-संबंध के रूप में प्रस्तुत किया।

और गरीबों की कमजोरी का उत्तर सामूहिक संगठन में खोजा।

इसी कारण जगदीश महतो की लोकप्रियता केवल राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में नहीं बल्कि स्थानीय सामाजिक विद्रोह के प्रतीक के रूप में विकसित हुई।

क्या केवल 1967 की पिटाई से जगदीश महतो क्रांतिकारी बने?

इतिहास को किसी एक घटना से समझना आकर्षक होता है, लेकिन प्रायः भ्रामक भी।

बाद के कई विवरणों में 1967 के चुनाव में जगदीश महतो पर हुए हमले को उनके उग्रवादी बनने का निर्णायक कारण बताया गया है।

लेकिन इसे अकेला कारण मानना ठीक नहीं होगा।

1967 की घटना ने संभवतः पहले से विकसित हो रही राजनीतिक चेतना को तीखा किया।

इसे कारण से अधिक उत्प्रेरक कहना अधिक उचित है।

नक्सलबाड़ी की गूंज

इसी समय उत्तर बंगाल में नक्सलबाड़ी विद्रोह हो चुका था।

1967 में वहां गरीब किसानों और आदिवासियों के भूमि संघर्ष ने भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर बड़ी वैचारिक दरार पैदा कर दी।

चारु मजूमदार और उनके सहयोगियों ने तर्क दिया कि भारत में संसदीय रास्ते से क्रांति संभव नहीं और ग्रामीण सशस्त्र संघर्ष को आगे बढ़ाना होगा।

भोजपुर के युवा कार्यकर्ताओं को इसमें अपने अनुभवों का राजनीतिक उत्तर दिखाई दिया।

यदि चुनाव में भी गरीब स्वतंत्र रूप से मतदान न कर सके,

यदि भूमि कानून के बाद भी जमीन का वितरण न हो,

यदि मजदूर की शिकायत पर व्यवस्था प्रभावी न्याय न दे,

तो क्या संसदीय प्रक्रिया पर्याप्त है?

यह प्रश्न भोजपुर के उग्रकरण की वैचारिक धुरी बन गया।

चारु मजूमदार और भोजपुर

बाद के स्रोत जगदीश महतो और चारु मजूमदार के संपर्क का उल्लेख करते हैं। कुछ विवरणों के अनुसार मजूमदार ने बिहार के कार्यकर्ताओं से संपर्क किया और भोजपुर के उभरते क्रांतिकारी समूह पर उनकी राजनीतिक रेखा का प्रभाव पड़ा।

यह प्रभाव विशेष रूप से तीन विचारों में दिखाई देता है—

ग्रामीण क्षेत्र को क्रांति का प्रमुख मैदान मानना,

गरीब किसानों और खेतिहर मजदूरों को मुख्य सामाजिक शक्ति मानना,

‘वर्ग-शत्रुओं’ के विरुद्ध प्रत्यक्ष कार्रवाई को क्रांतिकारी संघर्ष का साधन मानना।

लेकिन आगे यही तीसरा तत्व सबसे अधिक विवादास्पद होने वाला था।

CPI(ML) का गठन और भोजपुर

अखिल भारतीय स्तर पर नक्सलबाड़ी के बाद क्रांतिकारी कम्युनिस्ट धाराएं संगठित हुईं और 1969 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी)—CPI(ML)—की स्थापना हुई।

भोजपुर के स्थानीय क्रांतिकारी धीरे-धीरे इस व्यापक राजनीतिक प्रवाह से जुड़े।

लेकिन यहां संगठन की प्रक्रिया ऊपर से नीचे नहीं थी।

इसके बाद राष्ट्रीय क्रांतिकारी संगठन से संबंध मजबूत हुए।

इसीलिए भोजपुर की क्रांतिकारी राजनीति की सामाजिक जड़ें अपेक्षाकृत गहरी बनी रहीं।

प्रारंभिक संगठन : पार्टी शाखा से पहले सामाजिक समूह

आंदोलन के शुरुआती चरण में गांवों में औपचारिक पार्टी कार्यालयों से अधिक महत्व छोटे विश्वास-समूहों का था।

जगदीश महतो और उनके साथियों ने ऐसे युवाओं और गरीब किसानों को जोड़ना शुरू किया जो स्थानीय अन्याय से असंतुष्ट थे।

अध्ययन बताते हैं कि स्थानीय कार्यकर्ताओं की भर्ती विशेष रूप से सामाजिक रूप से वंचित जातियों से हुई और यही नए कार्यकर्ता आंदोलन के विस्तार में निर्णायक बने।

व्यक्तिगत संपर्क → विश्वास → छोटी बैठक → सामूहिक प्रतिरोध → राजनीतिक समूह।

इसके बाद ही औपचारिक क्रांतिकारी संगठन मजबूत हुआ।

रामेश्वर अहीर : संघर्ष में एक अलग प्रकार का नेतृत्व

रामेश्वर अहीर भोजपुर आंदोलन के प्रारंभिक नेतृत्व का एक विशिष्ट पात्र थे।

उनकी पृष्ठभूमि जगदीश महतो जैसी शिक्षित नहीं थी। उपलब्ध विवरणों में उनका जीवन कानून से टकराव और कारावास के अनुभव से जुड़ा बताया गया है। बाद में वे जगदीश महतो के साथ क्रांतिकारी आंदोलन में शामिल हुए।

उनकी भूमिका यह दिखाती है कि आंदोलन विभिन्न प्रकार के स्थानीय अनुभवों को समेट रहा था।

एक तरफ शिक्षक और राजनीतिक कार्यकर्ता जगदीश महतो थे।

दूसरी तरफ पहले से स्थानीय हिंसक सत्ता-संबंधों का अनुभव रखने वाले रामेश्वर अहीर।

और तीसरी ओर स्थापित वाम राजनीतिक परंपरा से आए रामनरेश राम।

इन तीन धाराओं का मेल भोजपुर के आंदोलन को विशेष रूप देता है।

जगदीश–रामेश्वर साझेदारी

बाद के वर्णनों में जगदीश महतो और रामेश्वर अहीर की साझेदारी को भोजपुर के उग्र संगठन का निर्णायक मोड़ माना गया।

जगदीश महतो के पास वैचारिक तथा संगठनात्मक क्षमता थी।

रामेश्वर अहीर के पास ग्रामीण शक्ति-संबंधों और प्रत्यक्ष टकराव का अनुभव था।

इस साझेदारी ने आंदोलन को विचार से प्रतिरोध की ओर तेजी से धकेला।

यहीं से भूमिगत ढांचे, छोटे सशस्त्र समूह और चुने हुए लक्ष्यों के विरुद्ध कार्रवाई की रणनीति विकसित होने लगी।

रामनरेश राम का अलग महत्व

रामनरेश राम को केवल जगदीश महतो और रामेश्वर अहीर के साथ प्रारंभिक त्रयी का हिस्सा मानना पर्याप्त नहीं होगा।

उनका ऐतिहासिक महत्व अधिक दीर्घकालिक था।

भोजपुर की प्रारंभिक उग्र राजनीति के बाद CPI(ML) की विभिन्न धाराओं में जब रणनीतिक पुनर्विचार हुआ, तो रामनरेश राम उन नेताओं में रहे जिन्होंने किसान आंदोलन, जनसंगठन और बाद में संसदीय राजनीति को भी महत्व दिया।

इस कारण वे भोजपुर आंदोलन के दो युगों को जोड़ते हैं—

जनसंगठन तथा चुनावी हस्तक्षेप का बाद का दौर।

दलित और पिछड़े युवाओं का राजनीतिकरण

भोजपुर आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक शुरुआती चरण में ही दिखाई देती है।

उसने गांव के उन युवाओं को राजनीतिक कार्यकर्ता बनाया जिन्हें स्थानीय सत्ता-संरचना में लगभग कोई स्थान नहीं था।

दलित और गरीब पिछड़े समुदायों के युवक अब केवल खेतिहर मजदूर नहीं रहे।

राजनीतिक साहित्य पढ़ते और सुनते थे।

ग्रामीण विवादों में हस्तक्षेप करते थे।

और धीरे-धीरे हथियारबंद दस्तों का हिस्सा भी बनने लगे।

यह परिवर्तन ग्रामीण सत्ता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था।

क्या आंदोलन जातिगत संगठन था?

उसका मुख्य सामाजिक आधार निश्चित रूप से दलित और गरीब पिछड़े समुदायों में मजबूत हुआ।

लेकिन उसके नेता आंदोलन को जातिगत मुक्ति के बजाय वर्ग संघर्ष की भाषा में प्रस्तुत करते थे।

गरीब किसान और खेतिहर मजदूर बनाम सामंती भू-स्वामी

फिर भी व्यवहार में जाति को अलग करना संभव नहीं था।

जिस ग्रामीण ढांचे में संपत्ति और सामाजिक पदानुक्रम जाति से जुड़े हों, वहां वर्ग संघर्ष जातिगत आयाम ग्रहण करेगा ही।

भोजपुर इसी अंतर्विरोध का प्रमुख उदाहरण है।

‘हरिजनिस्तान’ अभियान और सामाजिक विद्रोह

जगदीश महतो से जुड़े शुरुआती राजनीतिक अभियानों में दलितों की सामाजिक मुक्ति का प्रश्न भी दिखाई देता है।

कुछ स्रोत 1969–70 के आसपास आरा में ‘हरिजनिस्तान’ की मांग से जुड़े एक बड़े मशाल-जुलूस का उल्लेख करते हैं, जिसमें जगदीश महतो और अन्य स्थानीय कार्यकर्ता सक्रिय थे।

इसे बाद की CPI(ML) राजनीति की औपचारिक नीति नहीं समझना चाहिए।

इसका महत्व यह दिखाने में है कि भोजपुर का उग्रवाद शुरुआत से ही केवल भूमि की मात्रा के सवाल से नहीं बल्कि दलित सामाजिक स्वाभिमान से भी जुड़ा था।

अस्पृश्यता और सामाजिक व्यवहार के विरुद्ध अभियान

जगदीश महतो और उनके साथियों से जुड़े विवरणों में आसपास के गांवों में अस्पृश्यता और सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध अभियान चलाने का भी उल्लेख मिलता है।

यदि आंदोलन केवल भूमि-वितरण का कार्यक्रम होता तो उसका स्वरूप आर्थिक रहता।

लेकिन जैसे ही उसने सामाजिक व्यवहार को चुनौती दी, वह गांव की पूरी पदानुक्रमित संरचना से टकराने लगा।

आर्थिक बहिष्कार और प्रतिरोध

प्रारंभिक संगठन ने गरीबों को सामूहिक रूप से आर्थिक दबाव का विरोध करना सिखाया।

ऋण वसूली, मजदूरी, फसल और दूसरे स्थानीय विवाद संगठन के मुद्दे बने।

23 फरवरी 1971 की जिस घटना को भोजपुर में प्रारंभिक ‘वर्ग-शत्रु विनाश’ कार्रवाई माना जाता है, उसके पीछे भी स्थानीय ऋण और सामाजिक विवादों की पृष्ठभूमि बताई जाती है। एक शोध-सारांश के अनुसार शिवपूजन सिंह, जो एक प्रभावशाली कृषक के प्रबंधक के रूप में वर्णित हैं, की हत्या इसी बढ़ते टकराव के संदर्भ में हुई।

यहीं आंदोलन ने निर्णायक रूप से नया चरण ग्रहण किया।

23 फरवरी 1971 : हिंसक चरण की शुरुआत

उपलब्ध स्रोतों के अनुसार 23 फरवरी 1971 को एकवारी क्षेत्र में शिवपूजन सिंह की हत्या हुई। इसे भोजपुर में नक्सलवादी समूह द्वारा की गई प्रारंभिक लक्षित हत्या अथवा ‘विनाश कार्रवाई’ के रूप में दर्ज किया जाता है।

इस घटना का महत्व केवल एक व्यक्ति की हत्या में नहीं था।

या आर्थिक बहिष्कार तक सीमित नहीं था।

उसने हिंसक दंड को राजनीतिक साधन के रूप में स्वीकार करना शुरू कर दिया।

यहीं से भोजपुर आंदोलन के इतिहास का सबसे विवादास्पद अध्याय आरंभ होता है।

‘वर्ग-शत्रु विनाश’ की रणनीति

CPI(ML) की प्रारंभिक क्रांतिकारी रेखा में ‘वर्ग-शत्रुओं के विनाश’ को ग्रामीण क्रांति को तीखा करने का साधन माना गया।

तर्क यह था कि गांव में सामंती आतंक का प्रतीक बने कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों को समाप्त करने से गरीब किसानों का भय टूटेगा।

भोजपुर के कार्यकर्ताओं ने भी इस रणनीति का उपयोग किया।

कुछ घटनाओं के बाद दलित बस्तियों में यह संदेश फैलने लगा कि शक्तिशाली भू-स्वामी भी दंड से परे नहीं हैं। उपलब्ध विवरणों के अनुसार 1971–73 के बीच कई प्रभावशाली भू-स्वामियों अथवा उनके सहयोगियों पर घातक हमले हुए।

यही रणनीति बाद में भारी विवाद का कारण बनी।

भय टूटने का मनोवैज्ञानिक प्रभाव

क्रांतिकारी हिंसा का समर्थन किए बिना भी उसके सामाजिक प्रभाव को समझना आवश्यक है।

पुराने ग्रामीण ढांचे में गरीब मजदूर के मन में शक्तिशाली भू-स्वामी के प्रति भय सामाजिक नियंत्रण का बड़ा साधन था।

जब आंदोलन ने यह प्रदर्शित किया कि उस सत्ता को प्रत्यक्ष चुनौती दी जा सकती है, तो मनोवैज्ञानिक बदलाव हुआ।

गरीबों के बीच संगठन की प्रतिष्ठा बढ़ी।

लेकिन इसके साथ ही प्रतिहिंसा, पुलिस कार्रवाई और निजी हथियारबंद प्रतिक्रिया का खतरा भी बढ़ गया।

यानी भय केवल एक दिशा में नहीं टूटा—

गांव का ध्रुवीकरण

1971 के आसपास एकवारी और आसपास के गांवों में सामाजिक ध्रुवीकरण तीखा हुआ।

एक ओर गरीब किसान, दलित खेतिहर मजदूर और क्रांतिकारी कार्यकर्ता संगठित हो रहे थे।

दूसरी ओर भू-स्वामी वर्ग स्वयं को निशाना बनते देख प्रतिरोध की तैयारी करने लगा।

सूचना देने वालों, स्थानीय समर्थकों और संदिग्ध कार्यकर्ताओं पर दबाव बढ़ा।

एकवारी का गांव धीरे-धीरे दो प्रतिस्पर्धी राजनीतिक संसारों में विभाजित होने लगा।

संगठन का भूमिगत होना

हिंसक कार्रवाइयों के बाद खुले राजनीतिक संगठन की गुंजाइश कम हो गई।

महत्वपूर्ण कार्यकर्ता भूमिगत होने लगे।

जिस आंदोलन की शुरुआत सामाजिक संगठन से हुई थी, वह अब गुरिल्ला संगठन की ओर बढ़ रहा था।

गरीब परिवार संगठन का आधार कैसे बने?

भूमिगत आंदोलन केवल हथियारबंद दस्तों से नहीं चल सकता।

और पुलिस गतिविधियों पर निगरानी चाहिए।

ये सब ग्रामीण समर्थकों से मिलता था।

यही कारण है कि भोजपुर आंदोलन की ताकत केवल उसके हथियारों में नहीं थी।

उसकी असली शक्ति गरीब बस्तियों में बने सामाजिक नेटवर्क थे।

महिलाओं का अदृश्य योगदान

इन नेटवर्कों में महिलाओं की भूमिका विशेष थी।

वे भूमिगत कार्यकर्ताओं को भोजन दे सकती थीं।

पुलिस की गतिविधियों की खबर पहुंचा सकती थीं।

घायल कार्यकर्ताओं को छिपाने में सहयोग कर सकती थीं।

और पुरुष सदस्यों की गिरफ्तारी अथवा भूमिगत होने के बाद परिवार को संभालती थीं।

लेकिन आंदोलन के शुरुआती लिखित इतिहास में यह भूमिका बहुत कम दर्ज हुई।

यह भारतीय किसान आंदोलनों के इतिहासलेखन की व्यापक समस्या भी है—

संगठन के औपचारिक नेता पुरुष दिखाई देते हैं, जबकि उसके सामाजिक आधार को टिकाए रखने वाले श्रम में महिलाएं व्यापक रूप से मौजूद रहती हैं।

संगठन और हथियार का संबंध

भोजपुर में प्रारंभिक हथियार अत्याधुनिक सैन्य हथियार नहीं थे।

ग्रामीण समाज में उपलब्ध पारंपरिक हथियार और बाद में छीने या प्राप्त किए गए आग्नेयास्त्र संघर्ष का हिस्सा बने।

क्रांतिकारी रणनीति में हथियार को केवल सुरक्षा का साधन नहीं बल्कि सत्ता के प्रतीक के रूप में भी देखा गया।

भू-स्वामी के सशस्त्र आदमी और पुलिस यदि शक्ति का प्रतिनिधित्व करते थे, तो क्रांतिकारी दस्ते अपना हथियार गरीबों की वैकल्पिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करते थे।

यही सोच संघर्ष को लगातार सैन्यीकृत करती गई।

‘नक्सली’ शब्द का स्थानीय अर्थ

राष्ट्रीय स्तर पर ‘नक्सली’ शब्द एक राजनीतिक पहचान बन चुका था।

लेकिन भोजपुर के गांवों में प्रारंभिक दौर में इसका स्थानीय अर्थ अलग रूप ले सकता था।

कई गरीब समर्थकों के लिए इसका आशय किसी जटिल मार्क्सवादी-लेनिनवादी सिद्धांत से अधिक सरल था—

वह व्यक्ति जो मालिक के अन्याय का प्रतिरोध करता है।

यही कारण है कि आंदोलन की सामाजिक लोकप्रियता उसकी वैचारिक समझ से अधिक व्यापक हो सकती थी।

हर समर्थक माओवादी सिद्धांत नहीं पढ़ता था।

लेकिन वह मजदूरी, सम्मान और स्थानीय न्याय की भाषा समझता था।

विचारधारा और स्थानीय वास्तविकता का अंतर

यहीं भोजपुर आंदोलन के भीतर आगे आने वाला बड़ा अंतर्विरोध दिखाई देता है।

राष्ट्रीय नेतृत्व क्रांति को वर्ग-संघर्ष और माओत्से तुंग की रणनीति के सिद्धांत में समझ रहा था।

स्थानीय गरीब मजदूर इसे अपने जीवन के ठोस अनुभव में देख रहा था—

दलित महिला के साथ अत्याचार होने पर न्याय मिलेगा या नहीं?

मालिक अपमान करेगा तो जवाब कौन देगा?

इस अंतर ने बाद में पार्टी रणनीति पर गंभीर बहस पैदा की।

जगदीश महतो की भूमिका का ऐतिहासिक मूल्यांकन

जगदीश महतो को न तो केवल ‘नक्सली नेता’ कहकर समझा जा सकता है और न केवल सामाजिक सुधारक के रूप में।

उनकी राजनीति में दोनों चरण जुड़े हुए थे।

पहले सामाजिक असमानता के विरुद्ध संगठन।

उनकी ऐतिहासिक भूमिका का मूल्यांकन भी इन्हीं तीन स्तरों पर होना चाहिए।

उन्होंने गरीबों और दलितों को संगठित राजनीतिक शक्ति में बदलने में योगदान दिया।

साथ ही जिस हिंसक रणनीति से वे जुड़े, उसने आंदोलन को ऐसे चक्र में प्रवेश कराया जिसमें राजनीतिक हत्या और प्रतिहिंसा लगातार बढ़ती गई।

दोनों पहलुओं को साथ देखना आवश्यक है।

रामेश्वर अहीर : प्रतिरोध और हिंसा का संगम

रामेश्वर अहीर की भूमिका भी ऐसी ही जटिलता रखती है।

वे उस ग्रामीण संसार से आए थे जहां निजी हिंसा पहले से सामाजिक शक्ति का साधन थी।

क्रांतिकारी राजनीति ने उस हिंसक क्षमता को वर्ग-संघर्ष के राजनीतिक उद्देश्य से जोड़ दिया।

लेकिन यही प्रक्रिया एक गंभीर प्रश्न भी पैदा करती है—

कब सामाजिक प्रतिरोध राजनीतिक न्याय से हटकर प्रतिशोध में बदलने लगता है?

भोजपुर आंदोलन के अगले चरण में यह सवाल और तीखा होगा।

रामनरेश राम : दीर्घकालिक विरासत

तीनों प्रारंभिक नेताओं में रामनरेश राम की राजनीतिक यात्रा सबसे लंबी सिद्ध हुई।

भोजपुर आंदोलन की बाद की धारा ने जब केवल भूमिगत सशस्त्र कार्रवाई से हटकर व्यापक किसान संगठन, मजदूरी आंदोलन और चुनावी राजनीति की ओर भी कदम बढ़ाया, तो उनके अनुभव की विशेष भूमिका रही।

इसीलिए भोजपुर की कहानी केवल 1970 के दशक में समाप्त नहीं होती।

वह आगे CPI(ML) Liberation की जनसंगठन और संसदीय राजनीति तक जाती है।

क्या भोजपुर आंदोलन CPI(ML) ने बनाया?

इस प्रश्न का उत्तर सावधानी से देना होगा।

प्रारंभिक संगठन की सबसे बड़ी उपलब्धि

ग्रामीण गरीबों का राजनीतिक आत्मविश्वास।

खंड 5

नक्सलबाड़ी से भोजपुर तक

CPI(ML), चारु मजूमदार और क्रांतिकारी राजनीति

भोजपुर आंदोलन की वैचारिक जड़ों को समझने के लिए 1967 के नक्सलबाड़ी विद्रोह से शुरू करना आवश्यक है। लेकिन यहां एक सावधानी जरूरी है। भोजपुर नक्सलबाड़ी की नकल नहीं था और न ही CPI(ML) की केंद्रीय रणनीति वहां यांत्रिक रूप से लागू हुई। वास्तव में भोजपुर का महत्व इसी बात में है कि उसने नक्सलबाड़ी से निकली क्रांतिकारी राजनीति को मध्य बिहार की भूमि, मजदूरी, जाति और सामाजिक सम्मान की परिस्थितियों में नया रूप दिया।

नक्सलबाड़ी ने प्रश्न उठाया था—क्या भारत में भूमि-सुधार और किसान मुक्ति का रास्ता संसदीय लोकतंत्र से निकलेगा या सशस्त्र ग्रामीण क्रांति से? चारु मजूमदार और उनके समर्थकों ने दूसरे रास्ते को चुना। 1969 में CPI(ML) का गठन उसी विचारधारा का संगठित रूप था। लेकिन कुछ ही वर्षों में पार्टी गंभीर संकट, दमन और विभाजन का शिकार हुई। ठीक उसी समय भोजपुर का आंदोलन उभरा और उसने भारतीय नक्सलवादी आंदोलन को एक नया सामाजिक आधार दिया। CPI(ML) की बाद की अपनी इतिहास-व्याख्या भी भोजपुर के संघर्ष को तेलंगाना और नक्सलबाड़ी के बाद केंद्रीय बिहार के किसान संघर्षों की एक महत्वपूर्ण नई अवस्था मानती है।

1964 का कम्युनिस्ट विभाजन : पृष्ठभूमि

नक्सलबाड़ी की कहानी 1967 से अचानक शुरू नहीं हुई।

भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन में 1950 और 1960 के दशकों से ही इस प्रश्न पर गहरा मतभेद था कि भारत में क्रांति का रास्ता क्या होगा।

एक धारा संसदीय लोकतंत्र, चुनाव, ट्रेड यूनियन और जनसंघर्ष के संयुक्त रास्ते पर जोर देती थी।

दूसरी धारा मानती थी कि भारतीय राज्य मूलतः बुर्जुआ–भूस्वामी सत्ता का प्रतिनिधित्व करता है और उसे संसदीय तरीके से मूलतः बदला नहीं जा सकता।

1964 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का विभाजन हुआ और CPI(M) अस्तित्व में आई।

लेकिन विभाजन के बाद भी CPI(M) के भीतर क्रांतिकारी और संसदीय रणनीति को लेकर संघर्ष समाप्त नहीं हुआ।

चारु मजूमदार इसी आंतरिक संघर्ष की सबसे उग्र आवाज बने।

चारु मजूमदार कौन थे?

चारु मजूमदार पश्चिम बंगाल के कम्युनिस्ट आंदोलन के पुराने कार्यकर्ता थे और तेभागा आंदोलन से भी जुड़े रहे थे।

उनके राजनीतिक अनुभव का बड़ा हिस्सा उत्तर बंगाल के किसान आंदोलनों से बना।

1965 से 1967 के बीच उन्होंने लेखों और आंतरिक दस्तावेजों की एक श्रृंखला लिखी जो बाद में ‘ऐतिहासिक आठ दस्तावेज’ के रूप में प्रसिद्ध हुई।

CPI(ML) की बाद की आधिकारिक इतिहास-व्याख्या भी इन आठ दस्तावेजों को CPI(M) के भीतर क्रांतिकारी धारा के वैचारिक संघर्ष का केंद्रीय आधार मानती है।

इन दस्तावेजों में केवल संगठनात्मक बदलाव की बात नहीं थी।

वे भारतीय क्रांति की पूरी रणनीति पर सवाल उठा रहे थे।

‘ऐतिहासिक आठ दस्तावेज’ : मुख्य वैचारिक सूत्र

चारु मजूमदार के आठ दस्तावेजों का केंद्रीय आग्रह था कि भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन को संसदीय और चुनावी राजनीति से हटकर ग्रामीण क्रांति की दिशा में जाना चाहिए।

उनकी सोच पर चीन की क्रांति और माओत्से तुंग की रणनीति का गहरा प्रभाव था।

मुख्य विचारों को सरल रूप में इस तरह समझा जा सकता है—

भारत अर्ध-सामंती और अर्ध-औपनिवेशिक संरचना वाला समाज है।

भारतीय क्रांति का मुख्य आधार ग्रामीण गरीब किसान होंगे।

ग्रामीण क्षेत्रों में क्रांतिकारी आधार-क्षेत्र बनाए जाने चाहिए।

राज्य-सत्ता को चुनाव से नहीं बल्कि दीर्घकालिक जनयुद्ध से चुनौती दी जानी चाहिए।

संसदीय राजनीति गरीब किसानों को क्रांतिकारी संघर्ष से विचलित करती है।

सशस्त्र संघर्ष राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने का निर्णायक साधन है।

यही विचार बाद में नक्सलबाड़ी के विद्रोह से जुड़कर अखिल भारतीय नक्सलवादी आंदोलन का वैचारिक आधार बने।

चीन की क्रांति का प्रभाव

चारु मजूमदार की रणनीति को समझने के लिए माओ की चीनी क्रांति का प्रभाव अत्यंत महत्वपूर्ण है।

चीन में कम्युनिस्टों ने शहरों पर सीधे कब्जे के बजाय ग्रामीण क्षेत्रों में आधार बनाए।

ग्रामीण क्षेत्रों से धीरे-धीरे राज्य सत्ता को चुनौती दी।

चारु मजूमदार का मानना था कि भारत जैसे विशाल कृषि-प्रधान देश में भी इसी प्रकार का रास्ता अपनाया जा सकता है।

यही कारण है कि क्रांतिकारी धारा ने किसान प्रश्न को भारतीय क्रांति के केंद्र में रखा।

लेकिन बाद में एक मूल समस्या सामने आई—

क्या चीन की सामाजिक संरचना और भारत की जाति-आधारित ग्रामीण संरचना वास्तव में एक जैसी थी?

भोजपुर का अनुभव इस सवाल का व्यावहारिक उत्तर देने वाला था।

मार्च 1967 : नक्सलबाड़ी में विद्रोह

1967 में पश्चिम बंगाल में संयुक्त मोर्चा सरकार बनी, जिसमें CPI(M) भी शामिल थी।

इसी दौरान दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी क्षेत्र में गरीब किसानों और आदिवासियों का भूमि आंदोलन उग्र हो गया।

मार्च 1967 में किसानों ने भूमि और फसल पर कब्जे की कार्रवाइयां शुरू कीं। कुछ ही महीनों में किसान समितियां बनने लगीं और स्थानीय जमींदारों–जोतदारों की सत्ता को सीधी चुनौती दी गई।

नक्सलबाड़ी ने भारतीय वामपंथ के भीतर छिपा वैचारिक संघर्ष खुला कर दिया।

अब प्रश्न केवल पार्टी की आंतरिक बहस नहीं रह गया था।

नक्सलबाड़ी पर पुलिस कार्रवाई

मई 1967 में पुलिस और किसानों के बीच टकराव हुआ और पुलिस गोलीबारी में महिलाओं तथा बच्चों सहित ग्रामीण मारे गए।

इसके बाद नक्सलबाड़ी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया।

क्रांतिकारी धारा ने इसे ‘भारतीय क्रांति की शुरुआत’ के रूप में देखा।

चीनी कम्युनिस्ट प्रचार ने नक्सलबाड़ी को भारत में क्रांतिकारी किसान विद्रोह के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया।

इससे आंदोलन को एक ऐसी वैचारिक प्रतिष्ठा मिली जो उसकी वास्तविक भौगोलिक सीमा से बहुत बड़ी थी।

CPI(M) से निर्णायक टूट

नक्सलबाड़ी ने CPI(M) के भीतर की दरार को निर्णायक बना दिया।

पार्टी नेतृत्व ने सशस्त्र किसान विद्रोह की रणनीति को स्वीकार नहीं किया।

क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं ने नेतृत्व पर संसदीय अवसरवाद का आरोप लगाया।

इसके बाद विभिन्न राज्यों के क्रांतिकारी कम्युनिस्ट CPI(M) से अलग होने लगे।

नवंबर 1967 में कई राज्यों के क्रांतिकारी समूहों ने समन्वय की दिशा में कदम बढ़ाया और आगे चलकर All India Coordination Committee of Communist Revolutionaries—AICCCR बनी। CPI(ML) के ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार मई 1968 में इस समन्वय संरचना को औपचारिक रूप दिया गया।

AICCCR : नई पार्टी की प्रयोगशाला

AICCCR का उद्देश्य भारत भर में फैले क्रांतिकारी कम्युनिस्ट समूहों को एक मंच पर लाना था।

क्या तुरंत नई कम्युनिस्ट पार्टी बनाई जाए?

क्या चुनावों का पूर्ण बहिष्कार किया जाए?

क्या व्यक्तिगत भू-स्वामियों की हत्या को क्रांतिकारी रणनीति माना जाए?

क्या चीन की रणनीति को भारतीय परिस्थितियों में सीधे लागू किया जा सकता है?

इन प्रश्नों पर सहमति पूर्ण नहीं थी।

कुछ महत्वपूर्ण क्रांतिकारी समूह AICCCR से बाहर रहे या बाद में अलग हुए।

यानी नक्सलवादी आंदोलन जन्म से ही एकरूप नहीं था।

22 अप्रैल 1969 : CPI(ML) का गठन

AICCCR ने फरवरी 1969 में नई कम्युनिस्ट पार्टी बनाने का निर्णय किया।

22 अप्रैल 1969, लेनिन की जन्मशती के दिन, Communist Party of India (Marxist-Leninist)—CPI(ML)—की स्थापना की गई। चारु मजूमदार केंद्रीय संगठन समिति के सचिव बने। पार्टी गठन की सार्वजनिक घोषणा 1 मई 1969 को कोलकाता में कानू सान्याल ने की।

मई 1970 में पार्टी का पहला कांग्रेस अधिवेशन हुआ और चारु मजूमदार महासचिव चुने गए।

अब नक्सलबाड़ी केवल विद्रोह का नाम नहीं था।

वह एक संगठित अखिल भारतीय क्रांतिकारी परियोजना बन चुका था।

CPI(ML) का क्रांतिकारी कार्यक्रम

प्रारंभिक CPI(ML) ने भारतीय राज्य को मूलतः बुर्जुआ–भूस्वामी राज्य के रूप में देखा।

पार्टी ने संसदीय चुनावों को क्रांतिकारी संघर्ष से विचलन माना।

इसलिए चुनाव बहिष्कार उसकी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।

जनसंगठन पर संशय

यहीं प्रारंभिक CPI(ML) की एक बड़ी रणनीतिक समस्या सामने आती है।

किसान सभा, मजदूर संगठन और अन्य खुले जनसंगठन लंबे समय तक भारतीय कम्युनिस्ट राजनीति के महत्वपूर्ण साधन रहे थे।

लेकिन चारु मजूमदार की धारा में धीरे-धीरे यह धारणा मजबूत हुई कि पारंपरिक जनसंगठन क्रांतिकारी ऊर्जा को सुधारवादी मांगों में बांध सकते हैं।

CPI(ML) की बाद की आत्मालोचनात्मक इतिहास-व्याख्या स्वीकार करती है कि इस दौर में चुनावों के बहिष्कार और किसान गुरिल्ला युद्ध पर जोर के कारण रोजमर्रा के जनसंगठन और आर्थिक संघर्ष पीछे चले गए।

यह स्वीकारोक्ति महत्वपूर्ण है, क्योंकि भोजपुर में आगे आंदोलन को टिकाए रखने के लिए ठीक इन्हीं जनसंघर्षों की आवश्यकता पड़ी।

‘वर्ग-शत्रु विनाश’ क्या था?

प्रारंभिक CPI(ML) की सबसे विवादास्पद रणनीति थी—

‘Annihilation of Class Enemies’

अर्थात ऐसे व्यक्तियों को लक्षित करना जिन्हें गांव में सामंती उत्पीड़न और वर्ग-सत्ता का प्रतिनिधि माना जाता था।

तर्क यह था कि गांव के सबसे भयभीत करने वाले भू-स्वामी या उत्पीड़क व्यक्ति को समाप्त करने से गरीब किसान का भय टूटेगा।

इससे क्रांतिकारी शक्ति का मनोवैज्ञानिक प्रभाव बढ़ेगा।

लेकिन इस रणनीति में एक बड़ी समस्या निहित थी—

सामाजिक संरचना के परिवर्तन और व्यक्तिगत हत्या के बीच फर्क धीरे-धीरे धुंधला हो सकता था।

हत्या और क्रांति का संबंध

चारु मजूमदार के शुरुआती लेखन में क्रांति का केंद्र सशस्त्र किसान संघर्ष था।

लेकिन आंदोलन के उग्र चरण में ‘विनाश अभियान’ कई क्षेत्रों में पार्टी की पहचान बन गया।

यदि एक जमींदार मारा जाए लेकिन भूमि संबंध न बदलें तो क्या क्रांति हुई?

यदि गरीब किसान जनसंगठन में शामिल होने के बजाय केवल छोटे गुरिल्ला दस्तों का समर्थक बन जाए तो क्या सामूहिक राजनीतिक शक्ति विकसित होगी?

यदि गलत व्यक्ति ‘वर्ग-शत्रु’ घोषित हो जाए तो क्या होगा?

ये सवाल बाद में CPI(ML) की विभिन्न धाराओं के बीच भारी संघर्ष का कारण बने।

नक्सलबाड़ी का विस्तार

1967–71 के बीच नक्सलबाड़ी से प्रेरित आंदोलन विभिन्न राज्यों में फैलने लगा।

पश्चिम बंगाल के देबरा–गोपीबल्लभपुर,

और अन्य क्षेत्रों में क्रांतिकारी किसान गतिविधियां उभरीं। CPI(ML) के अपने इतिहास में इन्हें शुरुआती गुरिल्ला क्षेत्रों के रूप में दर्ज किया गया है।

इनमें श्रीकाकुलम आंदोलन विशेष रूप से महत्वपूर्ण बना।

लेकिन अधिकांश क्षेत्रों में राज्य-दमन अत्यंत तीव्र था।

बिहार में प्रारंभिक नक्सलवादी प्रयोग : मुशहरी

भोजपुर से पहले बिहार में नक्सलबाड़ी प्रेरित आंदोलन का महत्वपूर्ण केंद्र मुजफ्फरपुर जिले का मुशहरी क्षेत्र था।

यहां गरीब किसानों और मजदूरों के बीच संगठन किया गया।

लेकिन मुशहरी आंदोलन लंबे समय तक स्थिर आधार नहीं बना सका।

यह अनुभव महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट हुआ कि केवल राजनीतिक प्रचार या कुछ गुरिल्ला कार्रवाइयां पर्याप्त नहीं हैं।

दीर्घकालिक आंदोलन के लिए स्थानीय सामाजिक संरचना के भीतर गहरी जड़ें चाहिए।

भोजपुर में यही तत्व अधिक मजबूत निकला।

बिहार में पार्टी मौजूद थी, लेकिन आंदोलन क्यों नहीं बढ़ा?

CPI(ML) के बाद के एक आंतरिक ऐतिहासिक विवरण में एक महत्वपूर्ण स्वीकारोक्ति मिलती है।

बिहार में CPI(M) के कई कार्यकर्ता नक्सलबाड़ी की दिशा में आए थे, लेकिन शुरुआती दौर में आंदोलन प्रचार से आगे नहीं बढ़ पाया।

भोजपुर की स्थिति तब बदली जब स्थानीय सामाजिक परिस्थितियों से पैदा हुआ नया नेतृत्व सामने आया और उसने जनता की वास्तविक शिकायतों को राजनीतिक रूप दिया।

यही भोजपुर को समझने का केंद्रीय सूत्र है।

भोजपुर ने नक्सलबाड़ी को कैसे बदला?

नक्सलबाड़ी में भूमि कब्जा और आदिवासी-किसान विद्रोह केंद्रीय था।

भोजपुर में इन प्रश्नों के साथ कुछ नए तत्व जुड़े—

CPI(ML) की बाद की सामग्री भी स्वीकार करती है कि भोजपुर के संघर्षों में भूमि और मजदूरी के साथ मानवीय गरिमा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व अत्यंत निर्णायक प्रश्न बने।

इसलिए भोजपुर ने नक्सलबाड़ी की वर्ग-भाषा को बिहार के जाति-संरचित ग्रामीण समाज से जोड़ा।

1967 का चुनाव और भोजपुर की अलग दिशा

एकवारी में 1967 के विधानसभा चुनाव से जुड़ा संघर्ष इस फर्क को समझने में विशेष रूप से उपयोगी है।

गरीब और दलित मतदाताओं के राजनीतिक अधिकार की चुनौती स्थानीय भू-स्वामी शक्ति से टकराई।

CPI(ML) Liberation के बाद के विवरण में भी भोजपुर में पार्टी के उदय की पृष्ठभूमि में 1967 के इसी चुनाव और गरीब समुदायों के मतदान अधिकार के संघर्ष को महत्वपूर्ण माना गया है।

यानी भोजपुर में क्रांति का प्रश्न केवल खेत पर कब्जे से नहीं जुड़ा।

मतदान केंद्र भी वर्ग और जाति संघर्ष का मैदान था।

यह नक्सलबाड़ी की मूल कहानी से महत्वपूर्ण अंतर था।

जगदीश महतो और नक्सलबाड़ी की वैचारिक भाषा

जगदीश महतो जैसे स्थानीय कार्यकर्ताओं को नक्सलबाड़ी में एक ऐसी वैचारिक संरचना मिली जिससे वे अपने आसपास के सामाजिक संघर्ष की व्याख्या कर सकते थे।

भूमि विवाद अब केवल स्थानीय झगड़ा नहीं था।

जातिगत अपमान सामंती सत्ता का सामाजिक रूप था।

और प्रशासन की पक्षधरता राज्य के वर्ग चरित्र का प्रमाण समझी जाने लगी।

इस तरह नक्सलबाड़ी ने स्थानीय असंतोष को क्रांतिकारी सिद्धांत में रूपांतरित किया।

लेकिन भोजपुर ने सिद्धांत को भी बदला

जैसे नक्सलबाड़ी ने भोजपुर को प्रभावित किया, वैसे भोजपुर के अनुभव ने CPI(ML) की रणनीति पर भी प्रभाव डाला।

भोजपुर में साफ दिखने लगा कि गरीब किसान केवल एक गुरिल्ला कार्रवाई से संगठित नहीं होता।

गांव में स्थायी राजनीतिक ढांचा चाहिए।

इसी अनुभव से बाद की CPI(ML) धाराओं में जनसंगठन और सशस्त्र संघर्ष के संबंध पर पुनर्विचार शुरू हुआ।

चारु मजूमदार की रणनीति की सीमाएं

चारु मजूमदार की राजनीति की ऐतिहासिक भूमिका को दो स्तरों पर देखना चाहिए।

उन्होंने भारतीय वामपंथ को भूमि और गरीब किसान के प्रश्न पर तीखा वैचारिक झटका दिया।

उन्होंने यह सवाल खड़ा किया कि भूमि सुधार के अधूरे क्रियान्वयन और ग्रामीण शोषण को केवल चुनावी राजनीति से कैसे समाप्त किया जाएगा।

त्वरित क्रांतिकारी परिस्थिति का अनुमान,

और व्यक्तिगत ‘वर्ग-शत्रु विनाश’ पर बढ़ता जोर—

इन सबने आंदोलन को व्यापक जनराजनीति से अलग करने का खतरा पैदा किया।

CPI(ML) Liberation की अपनी बाद की इतिहास-व्याख्या भी स्वीकार करती है कि शुरुआती दौर भारतीय समाज की जटिलताओं के लिए पर्याप्त और समग्र समाधान नहीं दे सका और आंदोलन को गंभीर धक्का लगा।

राज्य-दमन का प्रश्न

केवल रणनीतिक गलतियां ही CPI(ML) की कमजोरी का कारण नहीं थीं।

और भूमिगत नेटवर्कों पर लगातार हमला—

इनसे पार्टी का संगठन तेजी से कमजोर हुआ।

पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में 1970–72 तक आंदोलन को भारी क्षति पहुंची।

इसलिए पार्टी के संकट की व्याख्या केवल ‘वामपंथी दुस्साहसवाद’ से करना भी अधूरा होगा।

1970 का पार्टी कांग्रेस

मई 1970 में कोलकाता में CPI(ML) का पहला कांग्रेस अधिवेशन हुआ।

चारु मजूमदार महासचिव बने और 21 सदस्यीय केंद्रीय समिति गठित हुई।

यह समय पार्टी के आत्मविश्वास का चरम था।

नेतृत्व मान रहा था कि भारतीय क्रांति का नया युग शुरू हो चुका है।

लेकिन इसके केवल दो वर्ष बाद संगठन लगभग विघटन की स्थिति में पहुंच गया।

इतिहास में इतनी तीव्र चढ़ाई और गिरावट बहुत कम राजनीतिक संगठनों में दिखाई देती है।

शहरी छात्र उग्रवाद

नक्सलबाड़ी का प्रभाव केवल ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा।

विशेषकर कोलकाता में बड़ी संख्या में छात्र और युवा क्रांतिकारी राजनीति की ओर आकर्षित हुए।

विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में उग्र छात्र आंदोलन हुआ।

पुराने राष्ट्रीय प्रतीकों और संस्थाओं की आलोचना की गई।

कुछ स्थानों पर मूर्तियां तोड़ी गईं और राजनीतिक हिंसा बढ़ी।

इसने आंदोलन को राष्ट्रीय ध्यान तो दिया, लेकिन किसान क्रांति के मूल एजेंडे से शहरी उग्रवाद का संबंध हमेशा स्पष्ट नहीं रहा।

यह भी पार्टी के भीतर आलोचना का विषय बना।

पुलिस और राजनीतिक हिंसा का चक्र

पश्चिम बंगाल में नक्सलवादी हिंसा और पुलिस प्रतिरोध दोनों बढ़े।

इस हिंसक चक्र में संगठन के अनुभवी कार्यकर्ता तेजी से समाप्त होते गए।

सशस्त्र संघर्ष के लिए आवश्यक दीर्घकालिक संगठनात्मक संरचना विकसित होने से पहले ही पार्टी व्यापक दमन से घिर गई।

1971–72 : CPI(ML) का संकट

1971 और 1972 तक पार्टी के भीतर भी मतभेद तेजी से बढ़ रहे थे।

कुछ नेता ‘वर्ग-शत्रु विनाश’ की नीति के आलोचक हुए।

कुछ ने जनसंगठन के महत्व पर जोर दिया।

कुछ धड़े चारु मजूमदार की लाइन के साथ रहे।

यही वह समय था जब विडंबना से भोजपुर में स्थानीय आंदोलन मजबूत हो रहा था।

चारु मजूमदार की गिरफ्तारी और मृत्यु

जुलाई 1972 में चारु मजूमदार गिरफ्तार किए गए।

कुछ ही दिनों बाद 28 जुलाई 1972 को कोलकाता पुलिस की हिरासत में उनकी मृत्यु हो गई।

उनकी मृत्यु ने पार्टी को नेतृत्वहीन और बिखरी हुई स्थिति में छोड़ दिया।

CPI(ML) की केंद्रीय संरचना लगभग निष्क्रिय हो गई। पार्टी के बाद के विवरण स्वयं स्वीकार करते हैं कि 1972 के मध्य तक केंद्रीय नेतृत्व लगभग समाप्त हो चुका था और संगठन व्यापक विखंडन में था।

लेकिन भारतीय नक्सलवादी आंदोलन समाप्त नहीं हुआ।

जब बंगाल कमजोर पड़ा, भोजपुर क्यों बचा?

बंगाल में पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व टूट रहा था।

दूसरे प्रारंभिक गुरिल्ला क्षेत्र भी कमजोर पड़ चुके थे।

लेकिन भोजपुर में स्थानीय गरीब किसानों और खेतिहर मजदूरों की वास्तविक शिकायतें बनी हुई थीं।

यहां आंदोलन केवल केंद्रीय पार्टी निर्देश पर नहीं टिका था।

CPI(ML) के एक बाद के दस्तावेज ने भी स्वीकार किया कि बिहार में आंदोलन की तस्वीर तभी बदली जब स्थानीय कृषि-सामाजिक परिस्थितियों से निकला नया नेतृत्व सामने आया।

भोजपुर : ‘केंद्र’ से ‘परिधि’ नहीं, परिधि से नया केंद्र

सामान्यतः राजनीतिक आंदोलन में केंद्रीय नेतृत्व राज्यों को निर्देश देता है।

भोजपुर में लगभग उलटी प्रक्रिया हुई।

लेकिन एकवारी, सहार और आसपास के गांवों में स्थानीय कार्यकर्ता लड़ रहे थे।

यह स्थानीय संघर्ष धीरे-धीरे पार्टी की पुनर्गठन प्रक्रिया का आधार बन गया।

इस अर्थ में भोजपुर केवल नक्सलबाड़ी से प्रेरित क्षेत्र नहीं रहा।

वह आगे CPI(ML) की एक महत्वपूर्ण धारा के पुनर्जन्म का आधार बना।

जौहर, विनोद मिश्र और नई दिशा

चारु मजूमदार की मृत्यु के बाद पार्टी की कई धाराएं बनीं।

इनमें एक धारा में सुब्रत दत्त—जो ‘जौहर’ नाम से जाने गए—विनोद मिश्र और स्वदेश भट्टाचार्य महत्वपूर्ण हुए।

28 जुलाई 1974 को एक नई केंद्रीय समिति गठित की गई जिसमें जौहर महासचिव बने और विनोद मिश्र तथा स्वदेश भट्टाचार्य सदस्य थे। इस पुनर्गठित केंद्र को बिहार के उस राज्य संगठन का समर्थन प्राप्त था जो भोजपुर और पटना के किसान संघर्षों में सक्रिय था।

अब भोजपुर आंदोलन और पार्टी पुनर्गठन एक-दूसरे से जुड़ गए।

भोजपुर की जमीन पर पार्टी का पुनर्निर्माण

जौहर के नेतृत्व में पुनर्गठित CPI(ML) ने भोजपुर के संघर्ष को आगे बढ़ाने का प्रयास किया।

साथ ही किसान संघर्षों को भूमि और फसल के प्रश्न से जोड़ने की कोशिश की गई।

पार्टी के बाद के विवरणों के अनुसार इस दौर में क्रांतिकारी समितियों और ग्रामीण जनभागीदारी को गुरिल्ला कार्रवाई से जोड़ने की कोशिश हुई।

हालांकि पुराने रणनीतिक प्रभाव अभी भी मजबूत थे।

1975 : भोजपुर में जौहर की मृत्यु

29 नवंबर 1975 को सहार के बाबूबांध क्षेत्र में पुलिस कार्रवाई के दौरान जौहर मारे गए। CPI(ML) के अपने विवरण के अनुसार वे भोजपुर में संगठन और किसान संघर्ष को मजबूत करने के दौरान पुलिस घेराबंदी में मारे गए।

इसके बाद विनोद मिश्र ने नेतृत्व संभाला।

यह परिवर्तन आगे महत्वपूर्ण साबित हुआ क्योंकि पार्टी ने धीरे-धीरे अपनी रणनीति की समीक्षा शुरू की।

आत्मालोचना की शुरुआत

1970 के दशक के मध्य में CPI(ML) के एक हिस्से ने यह स्वीकार करना शुरू किया कि केवल सशस्त्र दस्तों के भरोसे व्यापक किसान क्रांति नहीं बनाई जा सकती।

फिर से रणनीतिक विचार का हिस्सा बनने लगे।

यह नक्सलबाड़ी की मूल राजनीति से बड़ा रणनीतिक परिवर्तन था।

भोजपुर और श्रीकाकुलम में अंतर

लेकिन दोनों का सामाजिक आधार अलग था।

खंड 6

भूमि, मजदूरी और ‘इज्जत’ का प्रश्न

भोजपुर के संघर्ष को केवल भूमि-वितरण या नक्सलवादी हिंसा की कहानी के रूप में पढ़ना उसकी सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक विशेषता को खो देना होगा। यहां गरीब और भूमिहीन खेतिहर मजदूरों की लड़ाई खेत की मेड़ से कहीं आगे गई। उसने मजदूरी की दर, काम की शर्तों, जातिगत अपमान, महिलाओं की गरिमा, मतदान-अधिकार और गांव में बराबरी से जीने के अधिकार को एक-दूसरे से जोड़ दिया।

इसीलिए भोजपुर के आंदोलन में एक शब्द बार-बार सामने आता है—

‘इज्जत’

भूमिहीन दलित मजदूर के लिए ‘इज्जत’ अमूर्त सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं थी। उसका व्यावहारिक अर्थ था—बिना अपमान के मजदूरी करना, अपनी मजदूरी मांग सकना, सार्वजनिक स्थानों का उपयोग करना, राजनीतिक चुनाव में स्वतंत्र रूप से मतदान करना, महिलाओं को भू-स्वामी की यौन-सत्ता से सुरक्षित रखना और गांव के शक्तिशाली व्यक्ति के सामने स्वयं को जन्म से निम्न मानने से इनकार करना।

बेला भाटिया के मध्य बिहार के नक्सलवादी आंदोलन पर विस्तृत अध्ययन में भी आंदोलन का मुख्य सामाजिक आधार भूमिहीन मजदूरों और गरीब किसानों—जिनमें बड़ी संख्या दलितों की थी—को बताया गया है। उनका अध्ययन यह भी रेखांकित करता है कि आंदोलन ने मजदूरी और भूमि से आगे बढ़कर ग्रामीण गरीबों में असाधारण राजनीतिक चेतना पैदा की।

यहीं भोजपुर का वर्ग-संघर्ष सामाजिक मुक्ति के आंदोलन में बदलता दिखाई देता है।

भूमि का प्रश्न महत्वपूर्ण था—लेकिन वही सब कुछ नहीं था

किसान आंदोलनों की सामान्य व्याख्या में यह मान लेने की प्रवृत्ति रहती है कि गरीब किसान की सबसे बड़ी मांग जमीन होती है।

भोजपुर में जमीन निस्संदेह केंद्रीय प्रश्न था।

भूमिहीन परिवार के लिए थोड़ी-सी कृषि भूमि भी—

लेकिन भोजपुर के संघर्ष ने जल्दी दिखा दिया कि यदि किसी दलित परिवार को कुछ जमीन मिल भी जाए, लेकिन गांव में उसके साथ जातिगत अपमान और सामाजिक भेदभाव जारी रहे, तो उसकी मुक्ति अधूरी रहेगी।

इसलिए संघर्ष का सूत्र धीरे-धीरे बदल गया—

भूमि + मजदूरी + सामाजिक सम्मान + राजनीतिक अधिकार।

भूमिहीनता का अर्थ केवल गरीबी नहीं था

भूमिहीन मजदूर की आर्थिक स्थिति अत्यंत असुरक्षित थी।

उसके पास इतनी जमीन नहीं थी जिससे परिवार का वर्षभर का अनाज पैदा हो सके।

इसलिए उसे गांव के बड़े और मध्यम किसानों के खेतों पर काम करना पड़ता था।

जिस व्यक्ति के यहां वह मजदूरी करता था, वही कई बार उसे अनाज उधार देता था।

और उसी का गांव के प्रशासन तथा स्थानीय राजनीति में प्रभाव भी हो सकता था।

आर्थिक निर्भरता सामाजिक अधीनता को मजबूत करती थी।

इस संबंध को तोड़े बिना केवल मजदूरी में थोड़ी वृद्धि सामाजिक सत्ता को पूरी तरह नहीं बदल सकती थी।

जाति और वर्ग का अंतर्संबंध

भोजपुर में वर्ग और जाति का संबंध जटिल था।

हर भूमिहार या राजपूत बड़ा भू-स्वामी नहीं था।

और पिछड़ी जातियों में भी समय के साथ संपन्न किसान उभरे।

फिर भी ग्रामीण सत्ता की व्यापक संरचना में बड़े भू-स्वामियों और ऊंची जातिगत हैसियत के बीच महत्वपूर्ण संबंध था, जबकि भूमिहीन खेतिहर मजदूरों में दलित समुदायों की बड़ी उपस्थिति थी।

बेला भाटिया के अध्ययन में भी मध्य बिहार के नक्सलवादी आधार के बारे में यही महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है—इसके अधिकांश सक्रिय गरीब ग्रामीण भूमिहीन मजदूर या गरीब किसान थे और उनमें दलितों की बड़ी संख्या थी।

इसलिए आर्थिक संघर्ष सामाजिक रूप से जाति-संघर्ष जैसा दिखाई देना स्वाभाविक था।

लेकिन भोजपुर केवल ‘ऊंची जाति बनाम दलित’ नहीं था

इतिहास को जातियों के दो स्थिर शिविरों में बांटना भी गलत होगा।

ग्रामीण बिहार में समय के साथ आर्थिक संरचना बदल रही थी।

कुछ पिछड़ी कृषक जातियों—विशेषकर यादव, कुर्मी और कोइरी समुदायों—के भीतर संपन्न कृषक समूह उभर रहे थे।

दूसरी ओर कुछ अगड़ी जाति परिवार छोटे और गरीब किसान भी थे।

इसलिए जैसे-जैसे आंदोलन फैला, विरोध का वर्गीय मानचित्र भी बदलता गया।

कुछ क्षेत्रों में दलित मजदूरों के आर्थिक विवाद पिछड़ी जातियों के संपन्न किसानों से भी हुए।

यही कारण है कि भोजपुर की राजनीति को समझने के लिए जाति और वर्ग दोनों को साथ पढ़ना आवश्यक है।

मजदूरी संघर्ष क्यों निर्णायक था?

भूमिहीन खेतिहर मजदूर की प्रत्यक्ष दैनिक समस्या जमीन से भी अधिक तत्काल मजदूरी थी।

और काम के बदले पर्याप्त मजदूरी चाहिए थी।

यदि मजदूरी इतनी कम हो कि परिवार का न्यूनतम जीवन भी न चले, तो जमीन के दीर्घकालिक पुनर्वितरण की प्रतीक्षा उसके लिए पर्याप्त राजनीतिक उत्तर नहीं हो सकती थी।

इसीलिए भोजपुर में मजदूरी बढ़ाने की मांग आंदोलन के महत्वपूर्ण आधारों में शामिल हुई।

बेला भाटिया ने भी संघर्ष क्षेत्रों में मजदूरी संबंधों में बदलाव और मजदूरों में न्यूनतम मजदूरी के अधिकार के प्रति बढ़ी चेतना को आंदोलन की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना है।

मजदूरी मांगना भी विद्रोह कैसे बन गया?

आधुनिक अर्थव्यवस्था में मजदूरी पर बातचीत सामान्य आर्थिक प्रक्रिया है।

लेकिन पुराने ग्रामीण भोजपुर में खेतिहर मजदूर द्वारा सामूहिक रूप से मजदूरी बढ़ाने की मांग केवल आर्थिक प्रश्न नहीं थी।

अब मजदूर अपनी श्रम-शक्ति की कीमत स्वयं तय करने की प्रक्रिया में भाग लेना चाहता है।

यह पुराने संरक्षक–आश्रित संबंध के लिए चुनौती थी।

जिस संबंध में ‘मालिक’ मजदूरी तय करता था, उसमें मजदूर की सामूहिक सौदेबाजी गांव की सत्ता-संरचना बदलने की शुरुआत थी।

इसलिए कुछ पैसे या अतिरिक्त अनाज का विवाद भी बड़े सामाजिक संघर्ष में बदल सकता था।

सामूहिक मजदूरी बहिष्कार

संगठन की शक्ति का सबसे प्रभावी रूप सामूहिक कार्रवाई थी।

एक मजदूर काम करने से इनकार करे तो भू-स्वामी दूसरे मजदूर को बुला सकता था।

लेकिन यदि पूरी दलित बस्ती या आसपास के कई गांवों के मजदूर एक निश्चित मजदूरी से कम पर काम न करने का निर्णय लें तो स्थिति बदल जाती थी।

अब श्रम की आपूर्ति स्वयं मजदूरों की राजनीतिक शक्ति बन जाती थी।

यहीं से हड़ताल, काम का बहिष्कार और सामूहिक सौदेबाजी ग्रामीण संघर्ष के हथियार बने।

भू-स्वामी का जवाब : आर्थिक नाकेबंदी

इसका उत्तर कई बार आर्थिक बहिष्कार के रूप में आया।

गरीब परिवारों को झुकाने के साधन बन सकते थे।

बेला भाटिया के अध्ययन में ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहां संघर्ष के बाद भू-स्वामियों ने मजदूरों को रोजगार न देकर आर्थिक नाकेबंदी का प्रयास किया और पड़ोसी गांवों के मजदूरों ने प्रभावित परिवारों के समर्थन में भोजन तथा श्रम-बहिष्कार से एकजुटता दिखाई।

एक गांव का मजदूरी संघर्ष अब अंतर-ग्रामीण वर्गीय एकजुटता में बदल रहा था।

‘इज्जत’ की लड़ाई कहां से पैदा हुई?

भोजपुर के संघर्ष पर लिखने वाले अनेक शोधकर्ताओं ने केवल आर्थिक शोषण से अधिक गहरे प्रश्न की ओर ध्यान दिलाया है—

दलित खेतिहर मजदूर पुराने सामाजिक ढांचे में केवल गरीब व्यक्ति नहीं था।

उससे कई बार ऐसी सामाजिक अधीनता स्वीकार करने की अपेक्षा की जाती थी जो जन्म आधारित जातिगत पदानुक्रम से आती थी।

किस सार्वजनिक संसाधन का उपयोग किया जाए,

ऐसे रोजमर्रा के व्यवहार भी सत्ता का संकेत बन सकते थे।

यही कारण है कि भोजपुर में ‘इज्जत’ की मांग अत्यंत विस्फोटक राजनीतिक अर्थ ग्रहण कर गई।

सम्मान का अर्थ ‘बराबर मनुष्य’ होना था

‘इज्जत’ को आधुनिक व्यक्तिगत आत्मसम्मान के अर्थ में ही नहीं समझना चाहिए।

मैं मजदूर हूं, लेकिन तुम्हारा सेवक नहीं।

मैं गरीब हूं, लेकिन जन्म से नीचा नहीं।

मैं तुम्हारे खेत में काम करता हूं, लेकिन मेरी पत्नी या बेटी पर तुम्हारा अधिकार नहीं।

मैं गांव में रहता हूं, इसलिए सार्वजनिक संसाधनों पर मेरा भी अधिकार है।

मेरा वोट उतना ही मूल्यवान है जितना तुम्हारा।

यह मानसिक परिवर्तन किसी भूमि हस्तांतरण से भी अधिक व्यापक सामाजिक प्रभाव डाल सकता था।

सामाजिक व्यवहार पर संघर्ष

आंदोलन ने अनेक गांवों में रोजमर्रा के सामाजिक व्यवहार को राजनीतिक प्रश्न बनाया।

दलितों को अपमानजनक संबोधनों से पुकारना,

और उन्हें सार्वजनिक जीवन में निम्न स्थान स्वीकार कराने जैसी प्रवृत्तियां चुनौती के घेरे में आईं।

यहां संघर्ष की प्रकृति स्पष्ट होती है।

पुरानी व्यवस्था गरीब को केवल कम मजदूरी नहीं देती थी।

वह उससे अपने निम्न सामाजिक स्थान को स्वीकार करवाना भी चाहती थी।

भय तोड़ना क्यों आवश्यक था?

किसी भी प्रभुत्वशाली सामाजिक व्यवस्था की शक्ति केवल हथियारों या संपत्ति पर नहीं टिकती।

वह इस विश्वास पर भी टिकती है कि कमजोर व्यक्ति प्रतिरोध नहीं कर सकता।

भोजपुर आंदोलन की आरंभिक सफलता इसी मनोवैज्ञानिक स्तर पर हुई।

गरीब मजदूरों को पहली बार लगा कि वे सामूहिक रूप से स्थानीय प्रभावशाली व्यक्ति का विरोध कर सकते हैं।

बेला भाटिया इसे ग्रामीण श्रमिकों में पैदा हुई अभूतपूर्व राजनीतिक चेतना के रूप में रेखांकित करती हैं।

यही ‘भय टूटना’ आगे आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत बना।

लेकिन भय तोड़ने के साधन पर विवाद

यहीं आंदोलन का सबसे गंभीर नैतिक और राजनीतिक विवाद भी उपस्थित होता है।

यदि भय संगठन, सामूहिक हड़ताल और जनप्रतिरोध से टूटता है तो गरीबों की राजनीतिक क्षमता बढ़ती है।

लेकिन यदि भय मुख्यतः लक्षित हत्या से टूटता है, तो दूसरी तरह का आतंक भी पैदा हो सकता है।

प्रारंभिक CPI(ML) ने कई स्थानों पर ‘वर्ग-शत्रु विनाश’ को इस भय को तोड़ने का साधन माना।

लेकिन बाद में स्वयं आंदोलन के भीतर यह सवाल उठा—

इज्जत का अधिकार जनशक्ति से आएगा या बंदूक के भय से?

यह आगे CPI(ML) की रणनीतिक पुनर्समीक्षा का केंद्रीय प्रश्न बनने वाला था।

दलित महिलाओं का प्रश्न

भोजपुर की सामाजिक संरचना में दलित महिला कई स्तरों पर कमजोर स्थिति में थी।

और महिला होने के कारण पितृसत्तात्मक समाज की अतिरिक्त असमानता झेलती थी।

इसलिए उसके अनुभव को केवल वर्गीय शोषण में समेटना पर्याप्त नहीं है।

उसके सामने मजदूरी का प्रश्न भी था और यौन सुरक्षा तथा गरिमा का प्रश्न भी।

यौन उत्पीड़न और भू-स्वामी सत्ता

मध्य बिहार के ग्रामीण समाज पर किए गए अध्ययनों में दलित खेतिहर मजदूर महिलाओं के यौन शोषण की शिकायतों को बार-बार दर्ज किया गया है।

बेला भाटिया के अध्ययन में भी आर्थिक शोषण के साथ महिलाओं पर यौन उत्पीड़न को ग्रामीण दलितों की असुरक्षा का हिस्सा बताया गया है।

इस संबंध में बाद के कुछ विवरण अत्यंत भयावह प्रथाओं का उल्लेख करते हैं, लेकिन प्रत्येक स्थानीय कथा को पूरे भोजपुर पर सामान्यीकृत करना सावधानी के बिना उचित नहीं होगा।

इतिहास के लिए जो तथ्य अधिक सुरक्षित रूप से स्थापित होता है वह यह है कि—

दलित महिला के शरीर पर प्रभुत्व को भी ग्रामीण सत्ता के एक रूप के रूप में अनुभव किया जाता था।

इसलिए महिला की गरिमा का प्रश्न वर्ग-संघर्ष के भीतर प्रवेश करता गया।

महिलाओं की सुरक्षा आंदोलन की वैधता का स्रोत

जब कोई संगठन केवल अधिक मजदूरी नहीं बल्कि महिलाओं पर यौन अत्याचार का विरोध भी करता है, तो गरीब समुदाय के भीतर उसकी राजनीतिक वैधता बढ़ती है।

ग्रामीण परिवार के लिए यह प्रत्यक्ष अनुभव था।

संगठन अब केवल दूर की क्रांति की बात नहीं कर रहा था।

वह परिवार की सामाजिक सुरक्षा के प्रश्न में हस्तक्षेप कर रहा था।

यही कारण है कि नक्सलवादी आंदोलन को कुछ दलित बस्तियों में वैचारिक सिद्धांत से अधिक तत्काल न्याय दिलाने वाली शक्ति के रूप में देखा गया।

राजनीतिक चेतना और मतदान का अधिकार

भोजपुर में ‘इज्जत’ का एक महत्वपूर्ण हिस्सा राजनीतिक सम्मान भी था।

स्वतंत्र भारत ने सभी वयस्क नागरिकों को समान मतदान अधिकार दिया था।

लेकिन यदि गांव का गरीब व्यक्ति स्थानीय दबाव के कारण स्वतंत्र रूप से वोट ही न डाल सके, तो संवैधानिक समानता अधूरी थी।

1967 के चुनाव से जुड़े एकवारी के संघर्ष की स्मृति इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है।

यहां गरीब समुदायों के मतदान-अधिकार की लड़ाई आगे के राजनीतिक उग्रकरण से जुड़ गई।

इसलिए भोजपुर में वोट डालना भी एक तरह से यह घोषणा था—

संविधान और गांव के बीच अंतर

इस संघर्ष का एक और गहरा विरोधाभास था।

लेकिन यदि गांव की वास्तविक जिंदगी में जातिगत अधीनता बनी रहे, तो वंचित समुदाय स्वाभाविक रूप से पूछेगा—

कागज पर मिली बराबरी खेत और गांव में क्यों नहीं दिखाई देती?

यही संविधान और सामाजिक वास्तविकता के बीच का अंतर राजनीतिक असंतोष का एक स्रोत बना।

न्यूनतम मजदूरी और वास्तविक मजदूरी

स्वतंत्र भारत ने कृषि मजदूरों सहित विभिन्न श्रमिक वर्गों के लिए न्यूनतम मजदूरी की व्यवस्था विकसित की।

लेकिन कानून बनना और गांव में उसका लागू होना दो अलग प्रक्रियाएं थीं।

गरीब खेतिहर मजदूरों को कई बार यह जानकारी भी नहीं होती थी कि सरकार ने न्यूनतम मजदूरी कितनी निर्धारित की है।

संगठन ने इस स्थिति को बदलने में भूमिका निभाई।

बेला भाटिया के अध्ययन में संघर्ष-क्षेत्रों के मजदूरों में पहले की तुलना में मजदूरी अधिकार के प्रति स्पष्ट जागरूकता दर्ज की गई है।

इसका अर्थ केवल आय में परिवर्तन नहीं था।

मजदूर पहली बार अपनी मजदूरी को अधिकार के रूप में देख रहा था, दया के रूप में नहीं।

अनाज और फसल पर संघर्ष

भोजपुर के आंदोलन में कई बार भू-स्वामियों या व्यापारियों के पास जमा अनाज को जब्त करने की कार्रवाइयां भी हुईं।

क्रांतिकारी समूह इन कार्रवाइयों को गरीबों के बीच अनाज वितरण और वर्ग-संघर्ष से जोड़ते थे।

लेकिन कानूनी दृष्टि से ऐसी कार्रवाई लूट और हिंसक संपत्ति-अधिग्रहण के दायरे में आती थी।

इस दोहरे दृष्टिकोण को इतिहास में स्पष्ट रखना आवश्यक है।

यह भूख के विरुद्ध ‘जन कार्रवाई’ थी।

यही टकराव पुलिस हस्तक्षेप का आधार बना।

चौरी का संघर्ष और मजदूरी की राजनीति

1973 में चौरी क्षेत्र में हुआ टकराव भोजपुर आंदोलन के सामाजिक स्वरूप को समझने का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

बेला भाटिया के अध्ययन में चौरी के घटनाक्रम के पीछे मजदूर संगठन, अनाज कब्जे और भू-स्वामियों के साथ बढ़ते तनाव का उल्लेख मिलता है। पुलिस हस्तक्षेप के बाद हिंसक टकराव हुआ और कई दलित ग्रामीण मारे गए। बाद में भू-स्वामी पक्ष की आर्थिक नाकेबंदी के जवाब में आसपास के मजदूरों ने प्रभावित परिवारों की सहायता और श्रम-बहिष्कार से एकजुटता दिखाई।

यहां सबसे महत्वपूर्ण तथ्य केवल हिंसा नहीं है।

एक गांव के दलित मजदूरों की लड़ाई दूसरे गांवों के मजदूरों की लड़ाई बन गई।

वर्गीय एकजुटता का विस्तार

यह आंदोलन की राजनीतिक परिपक्वता का संकेत था।

यदि आसपास के मजदूर केवल अपनी जाति या अपने गांव के प्रश्न तक सीमित रहें तो क्षेत्रीय आंदोलन नहीं बन सकता।

लेकिन जब वे दूसरे गांव में मजदूरी संघर्ष का समर्थन करने लगें, तो स्थानीय संघर्ष क्षेत्रीय वर्गीय एकजुटता का रूप लेने लगता है।

इस प्रक्रिया ने CPI(ML) को ग्रामीण सामाजिक आधार दिया।

और यही कारण था कि आंदोलन कुछ नेताओं की मृत्यु के बाद भी समाप्त नहीं हुआ।

‘मालिक’ शब्द की सत्ता को चुनौती

भाषा स्वयं सामाजिक संबंध का संकेत देती है।

जिस व्यक्ति के खेत में मजदूर काम करता था, उसे ‘मालिक’ कहना सामान्य था।

लेकिन राजनीतिक संगठन के बाद मजदूरों में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक था कि खेत का मालिक होना क्या मनुष्य का भी मालिक होना है?

यहीं सामंती संबंध का सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक विघटन हुआ।

जमीन का मालिक हो सकता है, मजदूर का नहीं।

यह सरल विचार सामाजिक रूप से क्रांतिकारी था।

बैठने, बोलने और रास्ते पर चलने का अधिकार

सामाजिक मुक्ति कई बार छोटी दिखने वाली दैनिक घटनाओं में दिखाई देती है।

शक्तिशाली व्यक्ति के सामने बराबरी से बैठना,

सार्वजनिक रास्ते का स्वतंत्र उपयोग करना—

इन व्यवहारों में परिवर्तन पुराने सामाजिक पदानुक्रम के कमजोर होने का संकेत था।

मध्य बिहार पर सामाजिक अध्ययन इस बात को रेखांकित करते हैं कि दलित प्रतिरोध केवल आर्थिक संसाधनों के लिए नहीं बल्कि सार्वजनिक और व्यक्तिगत गरिमा के लिए भी था। जॉर्ज कुन्नाथ ने बिहार में दलित संघर्षों को इसी ‘अनुपालन बनाम अवज्ञा’ के व्यापक संदर्भ में देखा है।

शिक्षा का महत्व

शिक्षा भी पुरानी सत्ता के लिए चुनौती बन सकती थी।

पढ़ा-लिखा खेतिहर मजदूर या उसका बच्चा—

यही कारण था कि सामाजिक उन्नति और राजनीतिक चेतना के बीच संबंध गहरा था।

जगदीश महतो जैसे शिक्षित स्थानीय कार्यकर्ता की भूमिका इसी कारण महत्वपूर्ण बनी।

उन्होंने राजनीतिक सिद्धांत को स्थानीय अनुभव की भाषा में बदलने में मदद की।

दलित पहचान और वर्ग पहचान

भोजपुर आंदोलन ने गरीब मजदूरों को मुख्यतः ‘सर्वहारा’, ‘गरीब किसान’ और ‘खेतिहर मजदूर’ की वर्गीय पहचान में संगठित करने की कोशिश की।

लेकिन कार्यकर्ता अपने जातिगत अनुभव को पीछे छोड़कर अचानक केवल वर्गीय व्यक्ति नहीं बन जाता।

उसका अपमान जाति के कारण भी होता था।

विवाह और सामाजिक संबंध जाति से संचालित होते थे।

इसलिए भोजपुर ने व्यवहार में दिखाया कि भारतीय ग्रामीण क्रांति का कोई सिद्धांत जाति को नजरअंदाज करके पूर्ण नहीं हो सकता।

क्या नक्सलवादी आंदोलन ने जाति मिटा दी?

आंदोलन ने जातिगत वर्चस्व को चुनौती दी, लेकिन उसने स्वयं गांव से जाति का अंत नहीं कर दिया।

संगठन के भीतर भी सामाजिक पूर्वाग्रह स्वतः समाप्त नहीं होते।

और जैसे-जैसे बिहार में कृषि-संबंध बदलते गए, विभिन्न जातियों के बीच नई आर्थिक प्रतिस्पर्धाएं पैदा हुईं।

इसलिए भोजपुर की उपलब्धि जाति-उन्मूलन नहीं थी।

जातिगत अधीनता को अपरिहार्य मानने से इनकार।

दलित आत्मविश्वास का निर्माण

भोजपुर आंदोलन का शायद सबसे स्थायी प्रभाव भूमि के वास्तविक वितरण से अधिक राजनीतिक आत्मविश्वास में दिखाई देता है।

ग्रामीण गरीबों ने संगठन चलाना सीखा।

पुलिस और प्रशासन से सवाल करना सीखा।

और स्थानीय सत्ता को चुनौती देने का अनुभव प्राप्त किया।

बेला भाटिया ने इसे संघर्ष-क्षेत्रों में पैदा हुई अभूतपूर्व राजनीतिक चेतना के रूप में दर्ज किया है।

यह बदलाव आगे चुनावी राजनीति तक जाएगा

यहां भोजपुर आंदोलन का एक बड़ा ऐतिहासिक विरोधाभास दिखाई देता है।

जिस राजनीतिक धारा ने शुरुआत में चुनाव बहिष्कार को क्रांतिकारी सिद्धांत बनाया था, उसी के सामाजिक आधार ने आगे चुनावी प्रतिनिधित्व को अपनी मुक्ति का एक साधन माना।

रामनरेश राम जैसे नेता बाद में विधानसभा पहुंचे।

CPI(ML) Liberation ने भी आगे संसदीय राजनीति में प्रवेश किया।

गरीब मजदूरों ने संघर्ष के दौरान सीखा था कि—

बंदूक सत्ता का एक रूप है, लेकिन वोट भी सत्ता का एक रूप है।

महिलाओं के संदर्भ में आंदोलन की सीमा

भोजपुर में महिलाओं की गरिमा का प्रश्न महत्वपूर्ण हुआ, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आंदोलन ने पितृसत्ता का पूर्ण समाधान प्रस्तुत कर दिया।

महिला को भू-स्वामी के यौन उत्पीड़न से बचाने की मांग और महिला की अपने परिवार के भीतर बराबरी—दो अलग प्रश्न हैं।

भोजपुर में पहला प्रश्न अधिक स्पष्ट रूप से उठा।

यहीं बोधगया आंदोलन आगे एक महत्वपूर्ण कदम उठाएगा।

भूमि मिलने पर उसका पट्टा महिला के नाम क्यों नहीं?

इस अर्थ में भोजपुर और बोधगया एक-दूसरे को पूरा करने वाले दो सामाजिक अनुभव बनते हैं।

हिंसा ने सामाजिक मुक्ति को मजबूत किया या सीमित?

भोजपुर की इतिहासलेखन संबंधी सबसे कठिन बहस यही है।

एक मत के अनुसार सशस्त्र प्रतिरोध ने गरीब मजदूरों का सदियों का भय तोड़ा। बिना प्रतिरोध की शक्ति के स्थानीय भू-स्वामी सामाजिक बराबरी स्वीकार नहीं करते।

दूसरा मत कहता है कि लक्षित हत्या और प्रतिशोध ने संघर्ष को लोकतांत्रिक जनसंगठन से दूर किया और निजी सेनाओं, पुलिस-दमन तथा नरसंहारों का दीर्घकालिक हिंसक चक्र पैदा किया।

खंड 7

सशस्त्र संघर्ष का दौर

भोजपुर आंदोलन का सबसे विवादास्पद और हिंसक चरण 1970 के दशक की शुरुआत में खुलकर सामने आया। इस दौर में आंदोलन केवल मजदूरी, सामाजिक सम्मान और राजनीतिक अधिकार की मांग तक सीमित नहीं रहा। उसने ग्रामीण सत्ता-संबंधों को प्रत्यक्ष रूप से बदलने के लिए भूमि कब्जा, फसल कब्जा, अनाज जब्ती, आर्थिक बहिष्कार और चुने हुए ‘वर्ग-शत्रुओं’ पर सशस्त्र कार्रवाई को अपनी रणनीति का हिस्सा बनाया।

यहीं से भोजपुर की राजनीति के दो चेहरे एक साथ दिखाई देते हैं।

एक तरफ भूमिहीन मजदूरों का संगठन, आत्मविश्वास और प्रतिरोध बढ़ा।

दूसरी तरफ राजनीतिक हिंसा का चक्र गहरा होता गया।

इसी द्वंद्व ने भोजपुर को भारतीय किसान आंदोलनों के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण, लेकिन गहरे विवादास्पद स्थान पर पहुंचाया।

सशस्त्र संघर्ष की ओर बढ़ने की प्रक्रिया

भोजपुर में हथियारबंद संघर्ष अचानक शुरू नहीं हुआ।

उससे पहले कई स्तर के संघर्ष हो चुके थे—

लेकिन जब क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं को लगा कि भू-स्वामी सत्ता केवल आर्थिक दबाव से नहीं टूटेगी, तब CPI(ML) की ‘वर्ग-शत्रु विनाश’ की रणनीति प्रभावी होने लगी।

इसका तर्क था कि गांव के सबसे दमनकारी और भयभीत करने वाले भू-स्वामियों या उनके एजेंटों को निशाना बनाकर गरीबों का भय तोड़ा जाए।

1971 : हिंसक चरण का निर्णायक आरंभ

1971 में एकवारी क्षेत्र में हुई लक्षित हत्या को भोजपुर के संगठित सशस्त्र चरण की शुरुआत माना जाता है।

इसके बाद क्रांतिकारी दस्तों ने ऐसे व्यक्तियों को निशाना बनाना शुरू किया जिन्हें वे स्थानीय दमन, ऋण-शोषण या भू-स्वामी वर्चस्व का प्रतिनिधि मानते थे।

इन कार्रवाइयों का उद्देश्य केवल प्रतिशोध नहीं बताया जाता था।

यदि गांव में भय का केंद्र टूटेगा, तभी गरीब खुलकर संगठित होंगे।

लेकिन यही तर्क आगे सबसे अधिक आलोचना का विषय बना।

‘वर्ग-शत्रु’ कौन था?

मार्क्सवादी सिद्धांत में वर्ग-शत्रु की पहचान उत्पादन संबंधों के आधार पर होनी चाहिए।

लेकिन गांव में वास्तविकता अधिक जटिल थी।

कौन केवल जातिगत रूप से प्रभावशाली है?

कौन वास्तव में अत्याचार में शामिल है?

और कौन व्यक्तिगत शत्रुता का शिकार बन सकता है?

यदि इन प्रश्नों का उत्तर राजनीतिक जांच के बजाय स्थानीय अफवाह या व्यक्तिगत बदले से निर्धारित होने लगे, तो ‘वर्ग संघर्ष’ निजी हिंसा में बदल सकता था।

भोजपुर में यही जोखिम लगातार बना रहा।

भूमि कब्जा : प्रतीक और वास्तविकता

भूमि कब्जा आंदोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।

भूमिहीन किसान और मजदूर ऐसी जमीन पर दावा करते थे जिसे वे—

कई जगह क्रांतिकारी संगठन ग्रामीण गरीबों को जमीन पर सामूहिक कब्जे के लिए प्रेरित करते थे।

इसका प्रतीकात्मक संदेश बहुत बड़ा था।

जमीन पर पहली बार गरीब व्यक्ति अपना दावा प्रत्यक्ष रूप से दर्ज कर रहा था।

लेकिन प्रशासनिक और कानूनी दृष्टि से ऐसे कब्जे अक्सर विवाद और टकराव पैदा करते थे।

फसल कब्जा

भूमि कब्जे से भी अधिक तत्काल संघर्ष फसल पर होता था।

कई मामलों में गरीब मजदूर या बटाईदार यह दावा करते थे कि उन्होंने खेत में श्रम किया है, इसलिए फसल पर उनका हिस्सा अधिक होना चाहिए।

क्रांतिकारी संगठन सामूहिक रूप से फसल काटने या कब्जा करने की कार्रवाई करते थे।

भू-स्वामी के लिए यह केवल आर्थिक नुकसान नहीं था।

यह संदेश था कि खेत पर उसका नियंत्रण अब निर्विवाद नहीं रहा।

अनाज जब्ती और पुनर्वितरण

क्रांतिकारी दस्तों ने कुछ क्षेत्रों में अनाज जब्त कर गरीबों में बांटने की कार्रवाइयां भी कीं।

समर्थकों ने इन्हें ‘जन-वितरण’ या भूख के विरुद्ध प्रतिरोध के रूप में देखा।

लेकिन राज्य और कानून की दृष्टि से यह हिंसक संपत्ति-अधिग्रहण था।

यहीं भोजपुर आंदोलन का नैतिक और कानूनी द्वंद्व स्पष्ट होता है।

एक ही घटना दो अलग राजनीतिक भाषाओं में पढ़ी जा सकती थी—

इतिहासकार का दायित्व इन दोनों दृष्टियों को स्पष्ट रखना है।

गुरिल्ला दस्तों का निर्माण

जैसे-जैसे खुले संघर्ष कठिन हुए, छोटे सशस्त्र दस्ते आंदोलन की केंद्रीय संगठनात्मक इकाई बनने लगे।

लेकिन दस्तों का बढ़ता महत्व एक नई समस्या भी पैदा करता था।

राजनीतिक आंदोलन का केंद्र जनता से हटकर प्रशिक्षित हथियारबंद समूहों में सिमटने का खतरा बढ़ा।

जनता और दस्ता : संबंध की कठिनाई

यदि गुरिल्ला दस्ता जनता की सामूहिक इच्छा से जुड़ा हो तो वह स्थानीय संघर्ष का साधन बन सकता है।

लेकिन यदि दस्ता स्वयं निर्णय लेने लगे तो वह जनता के ऊपर खड़ी शक्ति भी बन सकता है।

भोजपुर के आंदोलन में यह प्रश्न बार-बार सामने आया।

क्या हत्या का निर्णय गांव की सामूहिक राजनीतिक प्रक्रिया से होना चाहिए?

यदि संगठन गलत निर्णय ले तो जवाबदेही किसकी होगी?

यही प्रश्न आगे CPI(ML) की रणनीतिक पुनर्समीक्षा में महत्वपूर्ण बने।

भय का टूटना और भय का पैदा होना

सशस्त्र संघर्ष के समर्थक कहते थे कि लक्षित कार्रवाई ने गरीबों का सदियों पुराना भय तोड़ा।

कई गांवों में दलित मजदूर पहली बार भू-स्वामियों से खुलकर मोलभाव करने लगे।

गांवों में सामाजिक अविश्वास गहरा हुआ।

शक, सूचना और प्रतिशोध का वातावरण पैदा हुआ।

इसलिए एक तरह का भय टूटते-टूटते दूसरे तरह का भय पैदा हुआ।

चौरी का टकराव

1973 का चौरी क्षेत्र का संघर्ष भोजपुर के इस चरण का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

यहां मजदूरी और अनाज संबंधी विवादों के साथ पुलिस हस्तक्षेप और सशस्त्र टकराव जुड़ गया।

पुलिस कार्रवाई में कई गरीब ग्रामीण मारे गए।

इसके बाद भू-स्वामी पक्ष की ओर से आर्थिक नाकेबंदी जैसे कदम उठाए गए।

जवाब में आसपास के मजदूरों ने श्रम-बहिष्कार और सामूहिक सहायता से एकजुटता दिखाई।

यह घटना दिखाती है कि भोजपुर में सशस्त्र संघर्ष केवल दो व्यक्तियों के बीच हिंसा नहीं था।

वह तेजी से सामूहिक वर्ग-संघर्ष का रूप ले रहा था।

पुलिस-दमन का विस्तार

क्रांतिकारी हिंसा बढ़ी तो राज्य की प्रतिक्रिया भी कठोर हुई।

संदिग्ध कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया।

इस प्रक्रिया में वास्तविक कार्यकर्ताओं के साथ निर्दोष ग्रामीण भी प्रभावित हुए।

यहीं से राज्य-दमन भोजपुर की राजनीति का स्थायी तत्व बन गया।

क्या राज्य की कठोरता अपरिहार्य थी?

राज्य के दृष्टिकोण से सशस्त्र हत्या और संपत्ति कब्जे को कानून-व्यवस्था का गंभीर संकट माना गया।

लेकिन समस्या यह थी कि यदि पुलिस कार्रवाई सामूहिक दंड जैसी लगे, तो वह आंदोलन के सामाजिक आधार को और मजबूत कर सकती थी।

जब किसी पूरे दलित टोले को छापे, गिरफ्तारी या हिंसा का सामना करना पड़ता, तो ग्रामीणों के बीच यह धारणा बनती कि राज्य निष्पक्ष नहीं है।

इससे क्रांतिकारी संगठन का प्रचार अधिक प्रभावी होता।

यानी दमन कभी-कभी विद्रोह को कमजोर करने के बजाय उसे राजनीतिक औचित्य भी दे सकता था।

भू-स्वामी प्रतिक्रिया

क्रांतिकारी हिंसा के जवाब में भू-स्वामी समूह भी संगठित होने लगे।

कुछ इलाकों में निजी सशस्त्र समूह बने।

इसका दीर्घकालिक परिणाम अत्यंत गंभीर था।

मध्य बिहार में आगे चलकर निजी सेनाओं की परंपरा विकसित हुई, जिसने 1980 और 1990 के दशकों में अनेक नरसंहारों को जन्म दिया।

भोजपुर के 1970 के दशक के संघर्ष में इस प्रक्रिया के शुरुआती बीज दिखाई देते हैं।

निजी सेनाओं की सामाजिक पृष्ठभूमि

भू-स्वामी वर्ग के लिए क्रांतिकारी आंदोलन केवल आर्थिक खतरा नहीं था।

इसलिए निजी सुरक्षा धीरे-धीरे राजनीतिक संगठन में बदलने लगी।

बाद के दशकों में बिहार में विभिन्न जाति-आधारित निजी सेनाएं उभरीं।

भोजपुर की शुरुआती हिंसा ने उस सामाजिक सैन्यीकरण की जमीन तैयार की।

हिंसा और जाति का गठजोड़

जब वर्गीय संघर्ष जातिगत संरचना वाले समाज में हिंसक होता है, तो उसकी पहचान जल्दी ही जातिगत रूप लेने लगती है।

यदि अधिकांश भूमिहीन मजदूर दलित हों और कई बड़े भू-स्वामी किसी विशेष अगड़ी जाति से हों, तो वर्गीय हिंसा जातिगत हिंसा जैसी दिखाई दे सकती है।

क्रांतिकारी संगठन स्वयं को वर्गीय आंदोलन कहते रहे।

लेकिन सामाजिक वास्तविकता में हत्या और प्रतिहिंसा जातिगत ध्रुवीकरण भी पैदा करती रही।

आंदोलन का नैतिक औचित्य

समर्थकों के लिए सशस्त्र संघर्ष का औचित्य इस तर्क में था—

इसलिए गरीबों को आत्मरक्षा और प्रतिरोध का अधिकार है।

यह तर्क सामाजिक अनुभव से पूरी तरह असंबद्ध नहीं था।

लेकिन समस्या तब पैदा हुई जब आत्मरक्षा और राजनीतिक हत्या के बीच सीमा धुंधली होने लगी।

आत्मरक्षा बनाम ‘विनाश’

आत्मरक्षा का अर्थ है तत्काल खतरे से स्वयं को बचाना।

‘वर्ग-शत्रु विनाश’ का अर्थ था किसी व्यक्ति को राजनीतिक रूप से चुनकर समाप्त करना।

भोजपुर में कई बार क्रांतिकारी भाषण में इन दोनों को एक-दूसरे के निकट रख दिया गया।

यही राजनीतिक और नैतिक विवाद का मूल था।

यदि कोई व्यक्ति तत्काल हमला नहीं कर रहा, फिर भी उसे ‘वर्ग-शत्रु’ मानकर मारा जाए, तो वह आत्मरक्षा नहीं बल्कि राजनीतिक हत्या है।

क्या इससे जमीन का वितरण हुआ?

यही सबसे महत्वपूर्ण व्यावहारिक प्रश्न है।

यदि सशस्त्र संघर्ष का उद्देश्य कृषि संबंध बदलना था, तो परिणाम क्या रहा?

कुछ क्षेत्रों में गरीबों की bargaining power बढ़ी।

लेकिन व्यापक संरचनात्मक भूमि-वितरण सीमित रहा।

यानी हिंसा से स्थानीय शक्ति-संतुलन बदला, लेकिन समग्र भूमि सुधार नहीं हुआ।

मजदूरी पर प्रभाव

इसके विपरीत मजदूरी के क्षेत्र में आंदोलन का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट था।

जहां संगठन मजबूत हुआ, वहां खेतिहर मजदूर सामूहिक रूप से कम मजदूरी पर काम करने से इनकार कर सके।

यह दिखाता है कि भोजपुर की सबसे ठोस उपलब्धियां शायद भूमि कब्जे से अधिक सामूहिक श्रम-संगठन में थीं।

यही बाद में CPI(ML) के भीतर जनसंगठन की आवश्यकता के तर्क को मजबूत करता है।

क्या लक्षित हत्या ने जनसंगठन को कमजोर किया?

यह बहस बाद में पार्टी के भीतर भी हुई।

यदि जनता केवल भूमिगत दस्ते से न्याय की अपेक्षा करने लगे, तो वह स्वयं संगठित नहीं होगी।

यदि कोई क्रांतिकारी दस्ता मजदूरी विवाद का समाधान हत्या से करता है, तो सामूहिक हड़ताल और पंचायत संघर्ष की क्षमता कमजोर पड़ सकती है।

इस दृष्टि से ‘वर्ग-शत्रु विनाश’ की रणनीति जनता को सक्रिय राजनीतिक शक्ति बनाने के बजाय कभी-कभी दर्शक बना सकती थी।

CPI(ML) की बाद की आत्मालोचना

CPI(ML) की कुछ बाद की धाराओं, विशेष रूप से Liberation, ने शुरुआती दौर की रणनीतिक गलतियों की समीक्षा की।

पार्टी के बाद के दस्तावेजों में यह स्वीकार किया गया कि खुले जनसंगठन और दैनिक आर्थिक संघर्षों की उपेक्षा गलत थी।

यही अनुभव आगे संगठन को मजदूरी, भूमि, छात्र, महिला और चुनावी आंदोलनों की ओर ले गया।

इस अर्थ में भोजपुर केवल सशस्त्र संघर्ष की प्रयोगशाला नहीं था।

वह उसकी आत्मालोचना की प्रयोगशाला भी बना।

हिंसा का स्थानीयकरण

प्रारंभिक चरण में आंदोलन वैचारिक रूप से अखिल भारतीय क्रांति की बात करता था।

लेकिन व्यवहार में हिंसा बहुत स्थानीय होती गई।

किस गांव में किस व्यक्ति से विवाद है?

ये प्रश्न राजनीतिक कार्रवाई तय करने लगे।

यहीं वैचारिक क्रांति और स्थानीय प्रतिशोध के बीच दूरी कम होती गई।

मुखबिर का प्रश्न

भूमिगत आंदोलन के लिए सूचना अत्यंत महत्वपूर्ण थी।

पुलिस को जानकारी देने वाले व्यक्तियों को संगठन गंभीर खतरे के रूप में देखता था।

इसलिए संदिग्ध मुखबिरों पर हिंसक कार्रवाई की गई।

किसी व्यक्ति को मुखबिर किस आधार पर माना जाए?

क्या व्यक्तिगत शत्रुता आरोप में बदल सकती थी?

इस प्रकार भूमिगत राजनीति में जवाबदेही का प्रश्न और गंभीर हुआ।

ग्रामीण न्याय की वैकल्पिक संरचना

कुछ क्षेत्रों में क्रांतिकारी संगठन स्थानीय विवादों का समाधान करने लगे।

समर्थकों के लिए यह तेज और सुलभ न्याय था।

लेकिन लोकतांत्रिक दृष्टि से यह गंभीर प्रश्न पैदा करता था—

क्या एक गैर-राज्य सशस्त्र संगठन को न्याय देने का अधिकार है?

यह प्रश्न आज भी नक्सलवादी क्षेत्रों की राजनीति में प्रासंगिक है।

गरीबों के बीच लोकप्रियता क्यों बनी?

इतनी हिंसा के बावजूद आंदोलन कुछ गरीब समुदायों में लोकप्रिय क्यों रहा?

यानी ग्रामीण गरीब आंदोलन का मूल्यांकन वैचारिक सिद्धांत से नहीं बल्कि अपने दैनिक अनुभव से करते थे।

यदि संगठन ने उसे तत्काल राहत दी, तो उसकी वैधता बढ़ी।

भय और न्याय का मिश्रण

यही आंदोलन का सबसे जटिल सामाजिक पक्ष था।

कई गांवों में संगठन को गरीब न्याय की शक्ति मानते थे।

उसी समय उसके विरोधी उसे भय की शक्ति मानते थे।

किसी आंदोलन का एक सामाजिक समूह के लिए मुक्ति का साधन होना और दूसरे के लिए भय का स्रोत होना परस्पर विरोधी नहीं।

भोजपुर की राजनीति इसी द्वंद्व से बनी।

1972 के बाद नया संकट

चारु मजूमदार की मृत्यु और CPI(ML) की केंद्रीय संरचना के टूटने के बाद भोजपुर का आंदोलन एक कठिन स्थिति में था।

और पार्टी कई धाराओं में बंट रही थी।

यही समय था जब भोजपुर के स्थानीय अनुभव को नई रणनीति में बदलने की आवश्यकता महसूस हुई।

1974 का पुनर्गठन

1974 में CPI(ML) की एक नई केंद्रीय समिति गठित हुई जिसमें जौहर और विनोद मिश्र की भूमिका महत्वपूर्ण थी।

इस धारा ने भोजपुर के संघर्ष को अपनी मुख्य आधारभूमि बनाया।

अब लक्ष्य केवल लक्षित हत्या नहीं, बल्कि संगठित ग्रामीण शक्ति बनाना था।

पुरानी ‘विनाश’ रणनीति और नई जनसंगठन-उन्मुख राजनीति के बीच।

आपातकाल और भूमिगत संघर्ष

1975 में राष्ट्रीय आपातकाल लागू हुआ।

इससे राजनीतिक दमन की संरचना और कठोर हुई।

भोजपुर के भूमिगत कार्यकर्ताओं के लिए परिस्थितियां और कठिन हुईं।

जौहर की 1975 में पुलिस कार्रवाई में मृत्यु ने संगठन को बड़ा झटका दिया।

इसके बाद विनोद मिश्र नेतृत्व में आए।

यहीं से पार्टी धीरे-धीरे अधिक दीर्घकालिक राजनीतिक रणनीति की ओर बढ़ने लगी।

सशस्त्र संघर्ष की उपलब्धियां

संतुलित मूल्यांकन के लिए यह देखना होगा कि इस दौर ने क्या बदला।

भूमि और फसल संबंधों को चुनौती मिली।

ग्रामीण गरीबों में राजनीतिक चेतना बढ़ी।

जातिगत अपमान के खिलाफ प्रतिरोध मजबूत हुआ।

इन उपलब्धियों को नजरअंदाज करना इतिहास को एकतरफा बनाना होगा।

सशस्त्र संघर्ष की सीमाएं

निर्दोष ग्रामीण भी हिंसा की चपेट में आए।

जनसंगठन और गुरिल्ला दस्तों के बीच संतुलन बिगड़ा।

स्थानीय प्रतिशोध वर्ग-राजनीति में प्रवेश करने लगा।

और राज्य के लिए आंदोलन को केवल ‘कानून-व्यवस्था समस्या’ के रूप में प्रस्तुत करना आसान हो गया।

क्या हिंसा अपरिहार्य थी?

ग्रामीण सत्ता इतनी कठोर थी कि बिना सशस्त्र प्रतिरोध के गरीबों का भय नहीं टूटता।

मजदूरी और सामाजिक सम्मान की वास्तविक उपलब्धियां सामूहिक संगठन से आईं, न कि व्यक्तिगत हत्या से।

हथियार ने मनोवैज्ञानिक शक्ति दी, लेकिन दीर्घकालिक परिवर्तन जनसंगठन ने किया।

शायद भोजपुर का अनुभव तीसरे निष्कर्ष के सबसे निकट जाता है।

भूमि कब्जा बनाम भूमि सुधार

भूमि कब्जा राजनीतिक कार्रवाई हो सकती है।

लेकिन स्थायी भूमि सुधार के लिए आवश्यक है—

क्रांतिकारी संगठन इन संस्थागत जरूरतों का स्थायी विकल्प नहीं बन सकता।

यही कारण है कि भोजपुर की भूमि क्रांति व्यापक और स्थायी पुनर्वितरण में नहीं बदल सकी।

आंदोलन और राज्य की समानांतर विफलता

भोजपुर की त्रासदी केवल आंदोलन की गलतियों में नहीं थी।

राज्य भी भूमि सुधार, मजदूरी कानून, जातिगत न्याय और निष्पक्ष पुलिस व्यवस्था देने में असफल रहा।

यदि राज्य ने इन मुद्दों पर प्रभावी हस्तक्षेप किया होता, तो सशस्त्र संगठनों की सामाजिक वैधता कम हो सकती थी।

इसलिए हिंसा के इतिहास में दो समानांतर प्रश्न पूछने होंगे—

क्रांतिकारी संगठन ने क्या गलत किया?

राज्य ने वह कौन-सा न्याय नहीं दिया जिसने इस राजनीति को जगह दी?

हिंसा की विरासत

1970 के दशक का यह हिंसक दौर बाद के बिहार को गहराई से प्रभावित करता है।

1980 और 1990 के दशकों में मध्य बिहार में—

अरवल, बथानी टोला, लक्ष्मणपुर बाथे, सेनारी और अन्य घटनाएं उसी व्यापक हिंसक सामाजिक इतिहास से जुड़ती हैं।

भोजपुर के शुरुआती सशस्त्र संघर्ष ने उस लंबे संघर्ष-चक्र की शुरुआत की जिसे समाप्त होने में दशकों लगे।

फिर भी भोजपुर केवल रक्तरंजित कथा नहीं है

इस दौर को केवल मौतों और हथियारों की सूची में बदलना भी गलत होगा।

गरीब खेतिहर मजदूर सामूहिक हड़ताल करना सीख रहे थे।

दलित महिलाएं सामाजिक सुरक्षा की मांग कर रही थीं।

मतदान की स्वतंत्रता राजनीतिक प्रश्न बन रही थी।

भूमि और फसल पर गरीब अपना दावा दर्ज कर रहे थे।

और गांव की पुरानी सत्ता पहली बार खुले तौर पर चुनौती झेल रही थी।

यानी हिंसा के भीतर भी सामाजिक लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया चल रही थी।

समग्र मूल्यांकन : बंदूक ने सत्ता-संतुलन बदला, लेकिन समाज नहीं बदल सकी

भोजपुर के सशस्त्र संघर्ष का सबसे संतुलित निष्कर्ष शायद यही है।

बंदूक ने गरीबों को यह विश्वास दिया कि भू-स्वामी अजेय नहीं है।

उसने राज्य और समाज को भूमि, मजदूरी और जातिगत अन्याय के प्रश्नों को नजरअंदाज न करने पर मजबूर किया।

लेकिन बंदूक अकेले स्थायी सामाजिक परिवर्तन नहीं कर सकी।

वह जमीन का कानूनी पुनर्वितरण नहीं कर सकी।

वह प्रशासन का लोकतंत्रीकरण नहीं कर सकी।

और जब राजनीतिक हिंसा स्वयं लक्ष्य बनने लगी, तो उसने आंदोलन के व्यापक जनाधार को भी नुकसान पहुंचाया।

इसलिए भोजपुर का इतिहास एक बड़ी शिक्षा देता है—

सशस्त्र प्रतिरोध सत्ता-संतुलन को झटका दे सकता है; स्थायी सामाजिक परिवर्तन के लिए संगठन, कानून, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संस्थागत सुधार भी आवश्यक हैं।

यही अनुभव आगे CPI(ML) की राजनीति को बदलने वाला था।

संगठन अब धीरे-धीरे उस प्रश्न की ओर बढ़ने लगा—

क्या क्रांति का मतलब केवल बंदूक है, या जनता को स्थायी राजनीतिक शक्ति में बदलना अधिक महत्वपूर्ण है?

इसी प्रश्न से भोजपुर आंदोलन का अगला चरण जन्म लेता है।

खंड 8 — राज्य-दमन और भू-स्वामियों की प्रतिक्रिया : पुलिस कार्रवाई, निजी सेनाएं और हिंसा का चक्र

इसमें पुलिस छापों, मुठभेड़ों, गिरफ्तारियों, ग्रामीण दमन, भू-स्वामी सशस्त्रीकरण, निजी सेनाओं के शुरुआती रूप, जाति और वर्ग के सैन्यीकरण तथा विद्रोही हिंसा–राज्य हिंसा–निजी हिंसा के त्रिकोण का विस्तार से अध्ययन किया जाएगा।

खंड 8

राज्य-दमन और भू-स्वामियों की प्रतिक्रिया

भोजपुर आंदोलन के इतिहास में 1970 का दशक उस बिंदु का प्रतिनिधित्व करता है जहां ग्रामीण वर्ग-संघर्ष तीन समानांतर शक्तियों के टकराव में बदलने लगा—

नक्सलवादी संगठन, राज्य की पुलिस–सुरक्षा मशीनरी और भू-स्वामियों की निजी सशस्त्र शक्ति।

इसी त्रिकोण ने मध्य बिहार की राजनीति को अगले कई दशकों तक हिंसा से प्रभावित किया।

लेकिन इतिहास की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है। 1970 के दशक के भोजपुर में मौजूद भू-स्वामी प्रतिरोध और स्थानीय हथियारबंद समूहों को सीधे 1994 में बनी रणवीर सेना के समान नहीं माना जा सकता। 1970 के दशक में निजी हथियारबंद प्रतिरोध की प्रक्रिया विकसित हो रही थी; 1980 के दशक में विभिन्न जाति-आधारित सेनाएं अधिक संगठित रूप में सामने आईं और 1994 के बाद रणवीर सेना ने इसे सबसे हिंसक और व्यवस्थित स्वरूप दिया। जॉर्ज कुन्नाथ के अध्ययन में भी अधिकांश प्रमुख जाति-आधारित सेनाओं का उभार 1980 के दशक से बताया गया है।

इस कालक्रम को स्पष्ट रखना आवश्यक है।

राज्य के सामने नया प्रकार का संकट

भोजपुर आंदोलन के शुरुआती चरण में राज्य इसे स्थानीय भूमि और मजदूरी विवाद की तरह देख सकता था।

राज्य इसे सशस्त्र विद्रोह और कानून-व्यवस्था की चुनौती के रूप में देखने लगा।

यहीं से पुलिस की भूमिका भी मध्यस्थ से बदलकर प्रत्यक्ष संघर्षकारी शक्ति जैसी दिखाई देने लगी।

1971–72 : नक्सलवाद पर व्यापक कार्रवाई

नक्सलबाड़ी के बाद पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, बिहार और अन्य राज्यों में नक्सलवादी गतिविधियों पर व्यापक दमन शुरू हो चुका था।

1971–72 तक कई प्रमुख नक्सलवादी केंद्र कमजोर पड़ गए।

बिहार में भी पुलिस और अर्धसैनिक कार्रवाइयों ने शुरुआती संगठन को भारी क्षति पहुंचाई। एक बाद के अध्ययन में मुजफ्फरपुर, भोजपुर, पटना और पूर्णिया जैसे क्षेत्रों में प्रारंभिक नक्सलवादी गतिविधियों को 1971–72 तक पुलिस और अर्धसैनिक अभियानों से गंभीर रूप से दबा दिए जाने का उल्लेख है।

लेकिन भोजपुर की विशेषता यह रही कि आंदोलन कुछ वर्षों बाद फिर गहरे सामाजिक आधार के साथ उभरा।

भोजपुर में पुलिस अभियान का विस्तार

जैसे-जैसे सहार, संदेश, पीरो और आसपास के क्षेत्रों में आंदोलन मजबूत हुआ, पुलिस की मौजूदगी बढ़ी।

पुलिस की रणनीति में कई तत्व शामिल थे—

1975 तक आंदोलन काफी बड़े क्षेत्र में फैल चुका था। एक अध्ययन में तत्कालीन पुलिस अधीक्षक की जुलाई 1975 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया कि नक्सलवादी प्रभाव भोजपुर के लगभग 150 गांवों तक फैला माना जा रहा था; सहार, संदेश, पीरो और तरारी सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में थे। उसी पुलिस आकलन में जिले के भूमिहीन दलित किसानों के बहुत बड़े हिस्से को आंदोलन का समर्थक या कार्यकर्ता बताया गया था।

यह आंकड़ा पुलिस का आकलन था, इसलिए इसे स्वतंत्र जनगणना की तरह नहीं पढ़ना चाहिए। फिर भी यह आंदोलन के विस्तार का संकेत देता है।

पुलिस की समस्या : विद्रोही कौन और समर्थक कौन?

भूमिगत आंदोलन से निपटने में प्रशासन की सबसे कठिन समस्या थी—

सशस्त्र कार्यकर्ता और सामान्य ग्रामीण समर्थक में अंतर कैसे किया जाए?

गुरिल्ला दस्ता गांव में स्थायी वर्दी में नहीं रहता था।

इसलिए पुलिस की नजर में पूरा सामाजिक नेटवर्क संदिग्ध बन सकता था।

यहीं से सामूहिक दमन का जोखिम पैदा हुआ।

छापों का ग्रामीण जीवन पर प्रभाव

पुलिस छापे केवल राजनीतिक कार्यकर्ता की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहते थे।

बेला भाटिया के मध्य बिहार संबंधी अध्ययन में बाद के दशकों तक पुलिस कार्रवाई के ऐसे रूप दर्ज हैं—

ये विवरण पूरे पुलिस तंत्र के हर अधिकारी पर लागू नहीं किए जा सकते, लेकिन संघर्ष क्षेत्रों में राज्य-दमन की अनुभूति को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

यदि सामान्य ग्रामीण को भी पुलिस कार्रवाई झेलनी पड़े, तो प्रशासन और विद्रोही के बीच उसकी राजनीतिक स्थिति बदल सकती थी।

दमन से आंदोलन समाप्त क्यों नहीं हुआ?

सामान्यतः माना जा सकता है कि कठोर पुलिस कार्रवाई से विद्रोह कमजोर होगा।

भोजपुर में परिणाम हमेशा ऐसा नहीं हुआ।

यदि पुलिस किसी वास्तविक सशस्त्र कार्यकर्ता को गिरफ्तार करती तो संगठन कमजोर हो सकता था।

लेकिन यदि किसी दलित बस्ती के अनेक लोगों को केवल सहानुभूति के आधार पर प्रताड़ना का अनुभव होता, तो आंदोलन का राजनीतिक प्रचार मजबूत हो सकता था।

यदि गरीब ग्रामीण को पुलिस व्यवहार भी वैसा ही दिखाई दे, तो यह संदेश अधिक विश्वसनीय लगने लगता था।

पुलिस चौकियां और वर्गीय पक्षधरता की धारणा

मध्य बिहार में पुलिस शिविरों के स्थान को लेकर भी विवाद रहा।

बेला भाटिया ने अपने क्षेत्रीय अध्ययन में पाया कि कई गांवों में पुलिस शिविर प्रभावशाली ऊंची जाति के भू-स्वामियों की संपत्ति पर स्थित थे और उनके संसाधनों का उपयोग करते थे। इससे गरीब ग्रामीणों में पुलिस और भू-स्वामी के बीच निकटता की धारणा पैदा होती थी।

एक अन्य अध्ययन भी मध्य बिहार में ऐसी तैनाती का वर्णन करता है जिसमें पुलिस बलों का ठहराव शक्तिशाली भू-स्वामियों की पक्की इमारतों में होने से यह संदेश जाता था कि सुरक्षा व्यवस्था मुख्यतः संपन्न ग्रामीण समूहों की रक्षा के लिए है।

राज्य की निष्पक्षता केवल वास्तविक निष्पक्षता पर नहीं, उसकी सार्वजनिक छवि पर भी निर्भर करती है।

भोजपुर में यह छवि गंभीर संकट में पड़ गई।

पुलिस–भू-स्वामी ‘गठजोड़’ : आरोप और वास्तविकता

नक्सलवादी संगठनों ने लगातार आरोप लगाया कि पुलिस और भू-स्वामी मिलकर गरीबों के आंदोलन को दबा रहे हैं।

CPI(ML) के अपने दस्तावेज इस संबंध को खुलकर ‘राज्य–भू-स्वामी गठजोड़’ के रूप में चित्रित करते हैं।

चूंकि ये पार्टी-स्रोत हैं, उन्हें आंदोलन के पक्ष की राजनीतिक व्याख्या के रूप में पढ़ना चाहिए।

लेकिन स्वतंत्र अध्ययनों में भी कुछ मामलों में पुलिस और निजी सेनाओं के बीच निकटता, संरक्षण या निष्क्रियता के आरोप दर्ज हुए हैं।

इसलिए इस संबंध को न तो केवल नक्सलवादी प्रचार मानकर खारिज किया जा सकता है और न प्रत्येक पुलिस कार्रवाई को स्वतः भू-स्वामी षड्यंत्र माना जा सकता है।

क्षेत्र और काल के आधार पर वास्तविकता बदलती रही।

‘मुठभेड़’ का प्रश्न

नक्सलवादी संघर्ष के इतिहास में सबसे विवादास्पद मुद्दों में एक रहा है—

राज्य का दावा होता था कि सशस्त्र नक्सलवादियों के साथ गोलीबारी में लोग मारे गए।

दूसरी ओर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और आंदोलनकारी संगठनों ने अनेक मामलों में आरोप लगाया कि हिरासत में लिए गए व्यक्तियों को मारकर मुठभेड़ घोषित किया गया।

बेला भाटिया ने मध्य बिहार में ऐसे कथित ‘फर्जी मुठभेड़ों’ की शिकायतों को राज्य-दमन के महत्वपूर्ण रूप के रूप में दर्ज किया है।

प्रत्येक घटना का स्वतंत्र परीक्षण आवश्यक है।

सभी मुठभेड़ फर्जी थीं—ऐसा कहना भी गलत होगा।

सभी वास्तविक थीं—यह मानना भी इतिहासकार के लिए अनुचित होगा।

नेतृत्व पर पुलिस कार्रवाई

भोजपुर आंदोलन के प्रारंभिक नेतृत्व को पुलिस कार्रवाई से भारी नुकसान हुआ।

जगदीश महतो और अन्य प्रारंभिक कार्यकर्ता हिंसक संघर्ष में मारे गए या संगठन से बाहर हुए।

1975 में जौहर भी पुलिस कार्रवाई में मारे गए।

1976 तक आंदोलन पर पुलिस दबाव और भू-स्वामियों के संगठित प्रतिरोध का गंभीर प्रभाव पड़ा। अध्ययन बताते हैं कि इस समय तक आंदोलन के प्रथम पंक्ति के बहुत से नेता मारे जा चुके थे या जेलों में थे, जिससे नेतृत्व का स्वरूप बदल गया।

यानी राज्य-दमन ने आंदोलन समाप्त नहीं किया, लेकिन उसकी नेतृत्व संरचना बदल दी।

दमन ने नई पीढ़ी का नेतृत्व पैदा किया

पुराने नेता समाप्त हुए तो स्थानीय दलित और गरीब किसान समुदायों के भीतर से नए कार्यकर्ता सामने आए।

इससे आंदोलन का नेतृत्व अधिक स्थानीय और सामाजिक रूप से व्यापक हुआ।

संगठन को केवल बाहर से आए वैचारिक कार्यकर्ताओं पर निर्भर रहना संभव नहीं रहा।

यह भोजपुर के दीर्घजीवी होने का एक कारण बना।

भू-स्वामी प्रतिक्रिया क्यों सशस्त्र हुई?

भू-स्वामियों के दृष्टिकोण से स्थिति तेजी से बदल रही थी।

उनकी जमीन पर कब्जे की कोशिश हो रही थी।

मजदूर सामूहिक रूप से बढ़ी मजदूरी मांग रहे थे।

कुछ भू-स्वामियों और उनके प्रतिनिधियों की हत्या हो रही थी।

इस परिस्थिति में भू-स्वामियों का एक हिस्सा स्वयं को केवल सामाजिक परिवर्तन का विरोधी नहीं बल्कि प्रत्यक्ष भौतिक खतरे में महसूस करने लगा।

यहीं निजी हथियारबंद प्रतिरोध की सामाजिक जमीन बनी।

हथियार पहले भी गांव में मौजूद थे

बिहार का ग्रामीण समाज हथियारों से पूरी तरह अपरिचित नहीं था।

संपन्न परिवारों के पास वैध लाइसेंसी बंदूकें हो सकती थीं।

भूमि विवादों और स्थानीय अपराध में अवैध हथियार भी मौजूद थे।

नक्सलवादी संघर्ष ने इन हथियारों को नई राजनीतिक भूमिका दी।

अब हथियार केवल निजी सुरक्षा या प्रतिष्ठा का साधन नहीं रहे।

वे वर्ग और जातिगत शक्ति-संतुलन के उपकरण बनते गए।

निजी सशस्त्र समूह : आरंभिक अवस्था

1970 के दशक में भू-स्वामी प्रतिरोध कई जगह स्थानीय स्तर पर विकसित हुआ।

कुछ समूह गांव या इलाके की रक्षा के नाम पर हथियारबंद हुए।

कुछ ने नक्सलवादी समर्थकों को निशाना बनाया।

लेकिन इस दौर को बाद की व्यवस्थित ‘सेना’ संस्कृति से अलग समझना चाहिए।

1980 के दशक में कई जाति-आधारित निजी सेनाएं स्पष्ट नाम और संगठन के साथ उभरीं।

जॉर्ज कुन्नाथ के अध्ययन में भूमिसेना को कुर्मी, लोरिक सेना को यादव, गंगा सेना को राजपूत और अन्य सेनाओं को अलग सामाजिक आधारों से जुड़ा बताया गया है।

यह दिखाता है कि निजी सेना की राजनीति केवल अगड़ी जातियों तक सीमित नहीं रही।

जहां भी संपन्न कृषक हितों को नक्सलवादी मजदूर संगठन से चुनौती मिली, वहां हथियारबंद प्रतिक्रिया संभव हुई।

वर्ग-संघर्ष कब जाति-सैन्यीकरण में बदल गया?

यह मध्य बिहार के इतिहास की निर्णायक प्रक्रिया थी।

और बड़े या मध्यम भू-स्वामी किसी विशेष जाति से आते हैं।

यदि मजदूरी संघर्ष हिंसक हो जाए, तो दोनों पक्ष अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए जातीय नेटवर्क का उपयोग करने लग सकते हैं।

फिर वर्ग संघर्ष की पहचान बदल जाती है।

आर्थिक हित → जातिगत लामबंदी → सशस्त्र संगठन।

मध्य बिहार में यही प्रक्रिया अनेक रूपों में दिखाई दी।

जाति निजी सेना के लिए इतनी उपयोगी क्यों थी?

गोपनीय सशस्त्र संगठन बनाने के लिए विश्वास आवश्यक होता है।

जाति पहले से मौजूद सामाजिक नेटवर्क उपलब्ध कराती थी—

इसलिए भू-स्वामी वर्ग के लिए हथियारबंद समूह संगठित करने में जातिगत नेटवर्क उपयोगी साबित हुए।

इसी प्रक्रिया ने आर्थिक संघर्ष को और अधिक सामुदायिक बना दिया।

वर्ग हमेशा जाति के समान नहीं था

हर भूमिहार भू-स्वामी सेना का सदस्य नहीं था।

हर यादव या कुर्मी संपन्न किसान नहीं था।

कई गांवों में जाति के भीतर भी वर्गीय विभाजन मौजूद थे।

लेकिन जब हिंसा सामूहिक पहचान पर आधारित होने लगे, तो व्यक्तिगत वर्गीय अंतर पीछे छूट सकते हैं।

यही निजी सेनाओं की राजनीति का सबसे खतरनाक पहलू था।

पुलिस और निजी सेना के बीच संबंध

निजी सेनाएं कानूनी राज्य बल नहीं थीं।

लेकिन कुछ क्षेत्रों में पुलिस और इन समूहों के बीच सहयोग, संरक्षण या निष्क्रियता के आरोप सामने आए।

बेला भाटिया के अध्ययन में राज्य तंत्र और भू-स्वामी सेनाओं के बीच ऐसे संबंधों का उल्लेख है।

1996 के बथानी टोला नरसंहार पर Economic and Political Weekly में प्रकाशित अध्ययन ने भी ‘राज्य, वर्ग और सेना’ के संबंध का प्रश्न उठाया।

ये बाद के उदाहरण हैं, लेकिन वे उस दीर्घकालिक संरचना को दिखाते हैं जिसकी प्रारंभिक नींव 1970–80 के दशकों में बन चुकी थी।

राज्य निजी हथियारों को क्यों सहन करता रहा?

नक्सलवादी संगठन स्थानीय सामाजिक नेटवर्क के कारण पकड़ से बाहर रह सकते थे।

भू-स्वामी सरकार के लिए सूचना-स्रोत भी हो सकते थे।

लेकिन ऐसी व्यावहारिक निर्भरता के गंभीर राजनीतिक परिणाम होते हैं।

राज्य यदि किसी सामाजिक वर्ग की निजी शक्ति पर निर्भर दिखे, तो वह गरीब नागरिक के लिए निष्पक्ष राज्य नहीं रह जाता।

1980 के दशक में निर्णायक विस्तार

1970 के भोजपुर में शुरू हुई यह प्रक्रिया 1980 के दशक में अधिक संगठित रूप ग्रहण करती है।

नक्सलवादी संगठनों ने किसान-मजदूर मोर्चे बनाए।

इसके जवाब में विभिन्न क्षेत्रों में जाति-आधारित भू-स्वामी सेनाएं बनीं।

CPI(ML) के 1987 के राजनीतिक–संगठनात्मक प्रतिवेदन में भी सरकार पर पुलिस अभियानों के साथ भू-स्वामियों के हथियारबंद गिरोहों को सहायता देने का आरोप लगाया गया है।

पार्टी-स्रोत होने के बावजूद यह इस बात का प्रमाण है कि निजी सेनाएं तब तक संघर्ष की प्रमुख राजनीतिक वास्तविकता बन चुकी थीं।

सरकार द्वारा हथियार लाइसेंस

1980 के दशक में राज्य की नीति स्वयं भी विवाद के केंद्र में आई।

कुछ अध्ययनों के अनुसार 1986 में बिंदेश्वरी दुबे सरकार के दौरान नक्सलवाद से मुकाबले के संदर्भ में भू-स्वामियों को बड़ी संख्या में हथियार लाइसेंस दिए गए। बाद में इन वैध और अवैध हथियारों का कुछ हिस्सा निजी सेनाओं द्वारा इस्तेमाल होने के आरोप सामने आए।

राज्य सुरक्षा का एकाधिकार अपने पास रखेगा या निजी नागरिकों को राजनीतिक संघर्ष में हथियारबंद होने देगा?

अरवल : राज्य हिंसा पर राष्ट्रीय बहस

1986 का अरवल पुलिस गोलीकांड मध्य बिहार के संघर्ष में महत्वपूर्ण मोड़ था।

वह भोजपुर जिले की घटना नहीं थी, लेकिन उसी व्यापक मध्य बिहार किसान आंदोलन और राज्य-दमन के संदर्भ में हुई।

पुलिस गोलीबारी में बड़ी संख्या में लोग मारे गए।

घटना ने पूरे देश में बहस पैदा की कि नक्सलवाद-विरोध के नाम पर राज्य किस सीमा तक बल प्रयोग कर सकता है।

आंदोलनकारी साहित्य में अरवल को राज्य-दमन का प्रतीक माना गया। बाद की नक्सलवादी सामग्री भी इसे 1986 के बाद राज्य कार्रवाई के अधिक संगठित दौर का महत्वपूर्ण बिंदु बताती है।

यह संघर्ष अब केवल गांव की जमीन का प्रश्न नहीं रह गया था।

वह नागरिक अधिकारों का प्रश्न भी बन रहा था।

नक्सलवादी हिंसा भी तेज हुई

राज्य और निजी सेनाओं की हिंसा का उल्लेख करते समय नक्सलवादी हिंसा को कम करके नहीं देखा जा सकता।

कुछ क्षेत्रों में सामूहिक हिंसा भी हुई।

यानी मध्य बिहार का रक्तचक्र एकतरफा नहीं था।

हर हिंसा अगले प्रतिशोध का औचित्य बनने लगी।

प्रतिशोध का तर्क

इस हिंसा की सबसे खतरनाक विशेषता थी—

हर पक्ष अपनी हिंसा को पिछली हिंसा का उत्तर बताता था।

इस तरह हिंसा के लिए कोई आरंभिक बिंदु तय करना कठिन हो गया।

और प्रतिशोध स्वयं राजनीतिक संरचना बन गया।

आम ग्रामीण सबसे अधिक प्रभावित हुआ

इस संघर्ष का सबसे बड़ा भार अक्सर उस सामान्य ग्रामीण ने उठाया जो पूर्णकालिक नक्सलवादी भी नहीं था और निजी सेना का सदस्य भी नहीं।

नक्सलवादी उसे पुलिस मुखबिर मान सकते थे।

पुलिस उसे नक्सली समर्थक मान सकती थी।

भू-स्वामी सेना उसे मजदूर संगठन का कार्यकर्ता मान सकती थी।

उसकी जाति उसके राजनीतिक झुकाव के बारे में अनुमान का आधार बन सकती थी।

यानी तटस्थ रहने की जगह लगातार कम होती गई।

महिलाओं पर हिंसा

ग्रामीण हिंसा का एक विशेष रूप महिलाओं के विरुद्ध दिखाई देता है।

पुलिस छापों में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार के आरोप थे।

निजी सेनाओं के बाद के नरसंहारों में महिलाओं और बच्चों को भी निशाना बनाया गया।

नक्सलवादी संघर्ष में भी महिलाओं को भूमिगत जीवन, गिरफ्तारी और पुलिस कार्रवाई का जोखिम उठाना पड़ा।

एक हालिया अध्ययन भोजपुर में महिलाओं द्वारा पुलिस और भू-स्वामियों की घेराबंदी का प्रतिरोध करने के उदाहरण दर्ज करता है।

इससे स्पष्ट होता है कि हिंसा का अनुभव केवल पुरुष कार्यकर्ताओं की कहानी नहीं था।

विकास और दमन की दोहरी नीति

राज्य ने केवल पुलिस कार्रवाई पर निर्भर रहने का प्रयास नहीं किया।

समय-समय पर विकास योजनाओं और प्रशासनिक सुधारों को भी नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों से जोड़ने की कोशिश हुई।

विद्रोह के सामाजिक आधार को कमजोर करने के साधन माने गए।

बेला भाटिया ने राज्य की प्रतिक्रिया में विशेष विकास योजनाओं का उल्लेख किया, हालांकि उनके अनुसार कई योजनाएं कागज पर अधिक और जमीन पर कम दिखाई देती थीं।

यह वही समस्या थी जिससे आंदोलन मूलतः पैदा हुआ था—

केवल पुलिस समाधान क्यों विफल रहा?

यदि संघर्ष की जड़ केवल कुछ हथियारबंद व्यक्तियों में होती तो उनकी गिरफ्तारी से समस्या समाप्त हो सकती थी।

इसलिए केवल पुलिस अभियान सामाजिक आधार समाप्त नहीं कर सकता था।

एक कार्यकर्ता गिरफ्तार होता तो दूसरा पैदा हो सकता था।

राज्य ने जब तक मूल प्रश्नों का समाधान नहीं किया, आंदोलन की पुनरुत्पत्ति संभव रही।

भू-स्वामी सेनाएं भी समाधान क्यों नहीं बनीं?

निजी सेनाओं का घोषित उद्देश्य नक्सलवाद से रक्षा था।

लेकिन व्यवहार में उनका अस्तित्व समस्या को और कठिन बनाता गया।

उसकी मजदूरी मांग का जवाब निजी बंदूक से मिलेगा,

तो वह और अधिक नक्सलवादी संगठन की ओर जा सकता है।

यानी निजी सेना जिस आंदोलन को समाप्त करना चाहती थी, वह कभी-कभी उसी आंदोलन के सामाजिक औचित्य को मजबूत करती थी।

रणवीर सेना से पहले की लंबी पृष्ठभूमि

यहां कालक्रम फिर स्पष्ट करना आवश्यक है।

रणवीर सेना 1970 के दशक के भोजपुर आंदोलन की मूल निजी सेना नहीं थी।

उसकी स्थापना 1994 में भोजपुर के बेलाउर क्षेत्र में हुई और वह मुख्यतः भूमिहार भू-स्वामी हितों से जुड़ी निजी सेना के रूप में सामने आई।

इससे पहले मध्य बिहार में कई अन्य जाति-आधारित सेनाएं और स्थानीय भू-स्वामी सशस्त्र समूह मौजूद थे।

इसलिए रणवीर सेना को समझना हो तो उसकी जड़ें 1970 के दशक की हिंसक ग्रामीण राजनीति में तलाशनी चाहिए, लेकिन दोनों को एक कालखंड मान लेना गलत होगा।

रणवीर सेना का उदय : हिंसा का नया चरण

1990 के दशक तक मध्य बिहार का सामाजिक–राजनीतिक वातावरण बदल चुका था।

CPI(ML) Liberation और अन्य वाम संगठनों की किसान-मजदूर राजनीति अधिक व्यापक हो चुकी थी।

दलित और पिछड़े समुदाय राजनीतिक रूप से अधिक मुखर थे।

1994 में रणवीर सेना का उदय इसी परिवर्तित वातावरण में हुआ।

बाद में उसने अनेक सामूहिक नरसंहार किए और मध्य बिहार की हिंसा का सबसे कुख्यात भू-स्वामी सैन्य संगठन बन गई। जॉर्ज कुन्नाथ का अध्ययन 1994 से 2000 के बीच इसके द्वारा 26 नरसंहारों और 247 लोगों की हत्या का उल्लेख करता है।

यह 1970 के दशक में शुरू हुए सैन्यीकरण का चरम था।

बथानी टोला : भोजपुर की रक्तरंजित विरासत

1996 का बथानी टोला नरसंहार भोजपुर की इस लंबी हिंसक प्रक्रिया का प्रतीक बना।

रणवीर सेना के हमले में दलित और मुस्लिम गरीब परिवारों के लोग, जिनमें महिलाएं और बच्चे शामिल थे, मारे गए।

Economic and Political Weekly में प्रकाशित समकालीन विश्लेषण ने इस घटना को वंचित समूहों के संघर्ष के विरुद्ध निजी सेना की हिंसा और राज्य–वर्ग संबंध के व्यापक संदर्भ में देखा।

बेला भाटिया ने भी इस घटना के समय आसपास पुलिस शिविर होने के बावजूद हमला जारी रहने की ओर ध्यान दिलाया।

इससे राज्य की भूमिका पर फिर गंभीर सवाल उठे।

हिंसा का जातिगत सामान्यीकरण

जैसे-जैसे नरसंहार बढ़े, सार्वजनिक भाषा भी बदलती गई।

इससे मूल आर्थिक संघर्ष पीछे छूटने लगा।

भूमि और मजदूरी का प्रश्न जातीय युद्ध जैसा दिखाई देने लगा।

यही निजी सेनाओं की राजनीति की एक बड़ी सफलता और लोकतांत्रिक किसान राजनीति की बड़ी विफलता थी।

क्या निजी सेना केवल ऊंची जातियों की घटना थी?

यह धारणा ऐतिहासिक रूप से अपूर्ण है।

1980 के दशक में विभिन्न कृषक जातियों ने अपने-अपने हथियारबंद संगठन बनाए।

और दूसरे क्षेत्रों में अन्य संगठन सामने आए।

भूमि और कृषि श्रम पर नियंत्रण की रक्षा।

खंड 9

भोजपुर आंदोलन का परिवर्तन

भोजपुर आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पक्ष केवल उसका सशस्त्र चरण नहीं था, बल्कि उस सशस्त्र राजनीति का बाद में स्वयं बदलना भी था। 1970 के दशक की शुरुआत में जिस आंदोलन ने चुनाव बहिष्कार, भूमिगत पार्टी ढांचे और ‘वर्ग-शत्रु विनाश’ को क्रांतिकारी रणनीति का हिस्सा बनाया था, वही धारा अगले दो दशकों में किसान–मजदूर जनसंगठन, खुले राजनीतिक मंच, चुनावी भागीदारी और विधानसभा तक पहुंची।

यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ। न ही इसका अर्थ यह था कि क्रांतिकारी विचारधारा पूरी तरह छोड़ दी गई। वास्तव में CPI(ML) की उस धारा ने, जो आगे CPI(ML) Liberation के रूप में विकसित हुई, यह निष्कर्ष निकालना शुरू किया कि गरीब किसानों और खेतिहर मजदूरों की स्थायी शक्ति केवल भूमिगत हथियारबंद दस्तों से नहीं बन सकती। उसके लिए खुले संगठन, दैनिक आर्थिक संघर्ष, सामाजिक आंदोलनों, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और चुनावी संस्थाओं में हस्तक्षेप भी आवश्यक हैं।

भोजपुर इस रणनीतिक परिवर्तन की सबसे महत्वपूर्ण प्रयोगभूमि बना।

1972 के बाद का संकट : पार्टी बची या आंदोलन?

28 जुलाई 1972 को चारु मजूमदार की हिरासत में मृत्यु के बाद प्रारंभिक CPI(ML) की केंद्रीय संरचना तेजी से टूट गई।

विभिन्न नेताओं ने अलग-अलग राजनीतिक लाइन अपनाई।

कुछ धड़े सशस्त्र संघर्ष की पुरानी रणनीति पर कायम रहे।

कुछ ने चारु मजूमदार की नीतियों की आलोचना शुरू की।

कुछ ने खुले जनसंगठनों और आर्थिक संघर्षों की ओर लौटने की आवश्यकता महसूस की।

क्या पार्टी समाप्त हो जाएगी, या स्थानीय किसान संघर्षों के आधार पर उसे फिर बनाया जा सकता है?

भोजपुर ने दूसरे विकल्प की संभावना दिखाई।

भोजपुर क्यों बचा?

भोजपुर में संगठन इसलिए पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ क्योंकि वहां आंदोलन केवल केंद्रीय पार्टी आदेश पर निर्भर नहीं था।

और कई वर्षों में विकसित व्यक्तिगत–संगठनात्मक संबंध।

रामनरेश राम के बाद के संस्मरणों में भी दावा किया गया कि 1972–74 के पार्टी-विखंडन के दौर में भोजपुर संगठन अपेक्षाकृत एकजुट बना रहा और स्थानीय नेतृत्व ने उसे टूटने से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

चूंकि यह CPI(ML) का अपना स्रोत है, इसे पार्टी की आत्मव्याख्या के रूप में पढ़ना चाहिए। फिर भी भोजपुर के दीर्घकालिक संगठनात्मक अस्तित्व से इसका मूल निष्कर्ष पुष्ट होता है।

1974 : पार्टी पुनर्गठन

1974 में CPI(ML) की एक धारा ने केंद्रीय नेतृत्व को पुनर्गठित करने का प्रयास किया।

सुब्रत दत्त ‘जौहर’ इस पुनर्गठन के प्रमुख नेता बने और विनोद मिश्र तथा अन्य कार्यकर्ताओं ने संगठनात्मक पुनर्निर्माण में भूमिका निभाई।

भोजपुर इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण आधार क्षेत्र बना।

यह केवल इसलिए नहीं कि वहां सशस्त्र कार्यकर्ता सक्रिय थे।

अधिक महत्वपूर्ण था कि वहां गांवों में वास्तविक किसान–मजदूर संगठन मौजूद था।

इसी अनुभव ने धीरे-धीरे पार्टी को यह सोचने पर मजबूर किया कि गुरिल्ला दस्ता जनता का विकल्प नहीं हो सकता।

‘विनाश’ की राजनीति पर पुनर्विचार

चारु मजूमदार के दौर की ‘वर्ग-शत्रु विनाश’ लाइन ने पार्टी को त्वरित क्रांतिकारी कार्रवाई की दिशा में धकेला था।

लेकिन भोजपुर के अनुभव ने इसकी सीमा दिखाई।

यदि किसी उत्पीड़क भू-स्वामी की हत्या हो जाए, तो संभव है कि कुछ समय के लिए उसका भय टूटे।

और गरीब परिवारों को संगठित रखना होगा।

इन प्रश्नों का उत्तर केवल हथियार नहीं दे सकता था।

इसलिए आंदोलन में राजनीतिक संगठन का महत्व फिर बढ़ने लगा।

जनता को दर्शक नहीं, सहभागी बनाना

सशस्त्र दस्ता यदि गरीब किसान की ओर से सारी कार्रवाई करे तो किसान स्वयं राजनीतिक शक्ति नहीं बनता।

यही शुरुआती रणनीति की एक प्रमुख समस्या थी।

और राजनीतिक निर्णय सामूहिक संगठन से निकलें।

यह आंदोलन की प्रकृति में बड़ा परिवर्तन था।

भूमिगत स्थिति फिर भी समाप्त नहीं हुई

रणनीतिक पुनर्विचार का अर्थ यह नहीं था कि 1970 के दशक के मध्य में पार्टी अचानक कानूनी हो गई।

गिरफ्तारी और मुठभेड़ का खतरा मौजूद था।

इसलिए एक मिश्रित संरचना विकसित हुई—

आगे यही CPI(ML) Liberation की विशेष राजनीतिक पद्धति बनने वाली थी।

जौहर का दौर

जौहर के नेतृत्व में पार्टी ने भोजपुर के किसान संघर्षों से गहरा संबंध बनाए रखने की कोशिश की।

लेकिन नवंबर 1975 में बाबूबांध क्षेत्र में पुलिस कार्रवाई के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।

यह संगठन के लिए एक और बड़ा झटका था।

इसके बाद विनोद मिश्र केंद्रीय नेतृत्व में प्रमुख हुए।

यहीं से CPI(ML) की इस धारा की राजनीति में धीरे-धीरे नया चरण शुरू हुआ।

विनोद मिश्र : निरंतरता और परिवर्तन

विनोद मिश्र ने प्रारंभिक CPI(ML) की क्रांतिकारी विरासत को पूरी तरह अस्वीकार नहीं किया।

लेकिन उनके नेतृत्व में पार्टी ने इस प्रश्न पर अधिक गंभीरता से विचार किया कि क्रांतिकारी आंदोलन व्यापक जनता तक कैसे पहुंचे।

बाद के विश्लेषण CPI(ML) Liberation को अन्य नक्सलवादी धाराओं से इसी बिंदु पर अलग करते हैं—इसने 1970 के दशक के उत्तरार्ध से जनसंगठन पर जोर बढ़ाया और 1980 के दशक में Indian People’s Front जैसे खुले मंच विकसित किए।

1977 और आपातकाल का अंत

राजनीतिक बंदियों की रिहाई और लोकतांत्रिक वातावरण की बहाली ने वाम उग्रवादी संगठनों के सामने नया प्रश्न रखा—

क्या बदली हुई राजनीतिक परिस्थिति में भी चुनाव और खुले जनसंगठन को पूरी तरह खारिज किया जाना चाहिए?

CPI(ML) Liberation की ओर विकसित हो रही धारा ने धीरे-धीरे उत्तर दिया—

लोकतांत्रिक अवसरों का उपयोग किया जा सकता है।

चुनाव बहिष्कार पर पुनर्विचार

प्रारंभिक CPI(ML) के लिए चुनाव बहिष्कार लगभग वैचारिक सिद्धांत था।

संसद और विधानसभा को बुर्जुआ संस्थाएं माना गया।

लेकिन भोजपुर में गरीबों का अनुभव अलग था।

1967 से ही मतदान-अधिकार स्वयं सामाजिक संघर्ष का प्रश्न बन चुका था।

यदि भू-स्वामी मुझे वोट डालने से रोकता है, तो मेरा वोट महत्वहीन कैसे है?

यह वास्तविक अनुभव चुनाव बहिष्कार की पुरानी धारणा से टकराता था।

इसलिए भोजपुर ने पार्टी को एक महत्वपूर्ण सबक दिया—

गरीब के लिए मतपत्र भी सत्ता का साधन हो सकता है।

चुनाव और क्रांति के बीच नया संबंध

नई रणनीति का अर्थ संसदीय सुधारवाद स्वीकार करना नहीं बताया गया।

पार्टी ने तर्क दिया कि चुनाव का उपयोग जनता के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए किया जा सकता है।

यह सिद्धांत आगे रामनरेश राम की राजनीति में बहुत स्पष्ट दिखाई देगा।

तीसरी पार्टी कांग्रेस और नई दिशा

1982 में CPI(ML) की इस धारा की तीसरी पार्टी कांग्रेस आयोजित हुई।

रामनरेश राम केंद्रीय समिति में चुने गए और आगे बिहार में संगठनात्मक जिम्मेदारियां संभालीं। CPI(ML) के अपने इतिहास के अनुसार 1980 के दशक में उन्होंने बिहार में किसान संघर्ष के नए उभार के नेतृत्व में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यह वह दौर था जब आंदोलन की पहचान बदल रही थी।

अब केवल भूमिगत क्रांतिकारी पार्टी नहीं—

बल्कि खुले किसान, मजदूर और जनआंदोलन भी सामने आने लगे।

1980 का दशक : किसान संघर्ष का दूसरा उभार

मध्य बिहार में 1980 के दशक के दौरान भूमि और मजदूरी संघर्ष फिर तीखे हुए।

लेकिन इस बार संगठनात्मक रूप 1970 के दशक से अलग था।

इससे आंदोलन का सामाजिक विस्तार हुआ।

खुले किसान संगठन क्यों जरूरी थे?

हजारों लोग बिना भूमिगत हुए भाग ले सकते थे।

मजदूरी और भूमि जैसी तत्काल मांगों पर बड़ी लामबंदी संभव थी।

पुलिस-दमन के खिलाफ सार्वजनिक अभियान चल सकता था।

मीडिया और नागरिक अधिकार संगठनों तक बात पहुंचाई जा सकती थी।

राजनीतिक कार्यकर्ता केवल गुरिल्ला दस्ता सदस्य नहीं बल्कि सार्वजनिक नेता बन सकता था।

यही परिवर्तन आगे आंदोलन की दीर्घायु का आधार बना।

किसान आंदोलन और दैनिक मांगों की वापसी

अब पार्टी ने धीरे-धीरे स्वीकार किया कि ‘छोटी’ आर्थिक मांगें वास्तव में छोटी नहीं हैं।

ये सभी ग्रामीण सत्ता-संबंध से जुड़े प्रश्न थे।

इसलिए दैनिक संघर्ष को क्रांति से विचलन नहीं बल्कि राजनीतिक चेतना का माध्यम माना जाने लगा।

यह प्रारंभिक CPI(ML) लाइन से महत्वपूर्ण बदलाव था।

दलित गरिमा का प्रश्न कायम रहा

रणनीति बदलने के बावजूद भोजपुर आंदोलन की सामाजिक आत्मा नहीं बदली।

दलित खेतिहर मजदूरों के लिए भूमि और मजदूरी के साथ—

इसी कारण नई जनराजनीति पुराने सामाजिक आधार से जुड़ी रही।

पार्टी केवल संगठनात्मक रूप बदल रही थी; वह उस सामाजिक असंतोष को नहीं छोड़ रही थी जिसने भोजपुर आंदोलन को जन्म दिया था।

इंडियन पीपुल्स फ्रंट की आवश्यकता

1980 के दशक तक पार्टी के सामने एक समस्या थी।

यदि CPI(ML) स्वयं भूमिगत या अर्ध-गोपनीय संरचना में बनी रहती है, तो व्यापक लोकतांत्रिक राजनीति में हस्तक्षेप कैसे किया जाए?

Indian People’s Front — IPF

1982 के आसपास विकसित यह खुला राजनीतिक मंच विभिन्न जनआंदोलनों, वामपंथी कार्यकर्ताओं और लोकतांत्रिक शक्तियों को साथ लाने के लिए इस्तेमाल किया गया।

अध्ययन CPI(ML) Liberation की 1980–90 के दशक की राजनीतिक वृद्धि में IPF को महत्वपूर्ण खुला मंच मानते हैं।

IPF केवल चुनावी पार्टी नहीं था

Indian People’s Front का उद्देश्य केवल चुनाव लड़ना नहीं था।

जैसे मुद्दों पर सार्वजनिक अभियान किए।

इससे CPI(ML) की राजनीति पहली बार बड़ी संख्या में ऐसे लोगों तक पहुंची जो भूमिगत क्रांतिकारी संगठन के सदस्य नहीं हो सकते थे।

‘दम बांधो, काम दो’ जैसी लामबंदी

1990 में IPF की दिल्ली में बड़ी ‘दम बांधो, काम दो’ रैली हुई, जिसमें रामनरेश राम ने CPI(ML) प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया। बाद में वे IPF के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बने।

इस प्रकार का अभियान दिखाता है कि आंदोलन की भाषा कितनी बदल चुकी थी।

काम, मजदूरी, जनअधिकार और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व।

भूमिगत पार्टी और खुला फ्रंट : दोहरी संरचना

कुछ समय तक CPI(ML) ने एक विशेष दोहरी व्यवस्था बनाए रखी।

पार्टी स्वयं पूरी तरह खुले रूप में नहीं थी।

लेकिन IPF सार्वजनिक राजनीतिक मंच था।

इस व्यवस्था ने संगठन को दो लाभ दिए—

लोकतांत्रिक जनराजनीति में खुला हस्तक्षेप संभव हुआ।

लेकिन यह व्यवस्था स्थायी नहीं रह सकती थी।

अंततः पार्टी को स्वयं खुले राजनीतिक जीवन में आना था।

1990 : मुख्यतः खुले संगठन की ओर

रामनरेश राम के संस्मरण में 1990 की पार्टी बैठक को वह मोड़ बताया गया है जब संगठन ने स्वयं को मुख्यतः खुले राजनीतिक ढांचे में लाने का निर्णय किया।

यह भोजपुर आंदोलन के इतिहास में प्रतीकात्मक रूप से बहुत महत्वपूर्ण था।

लगभग दो दशकों पहले जिन नेताओं की सुरक्षा रात के अंधेरे, गुप्त बैठकों और भूमिगत आश्रयों पर निर्भर थी, वही धारा अब सार्वजनिक सभा और चुनावी प्रचार को अपनी राजनीति का हिस्सा बना रही थी।

क्या यह ‘क्रांति से विश्वासघात’ था?

CPI(ML) की अन्य धाराओं ने इस परिवर्तन की आलोचना की।

कुछ नक्सलवादी संगठनों का तर्क था कि संसदीय राजनीति में प्रवेश अंततः क्रांतिकारी उद्देश्य को कमजोर करेगा।

उनके लिए चुनाव बहिष्कार अभी भी राज्य सत्ता के चरित्र को अस्वीकार करने का आवश्यक प्रतीक था।

जनता जहां लड़ती है, क्रांतिकारी संगठन को वहां उपस्थित होना चाहिए।

यदि गरीब किसान पंचायत, चुनाव और विधानसभा को संघर्ष का क्षेत्र मानता है, तो उसे छोड़ देना राजनीतिक आत्म-अलगाव होगा।

यही बहस भारतीय नक्सलवादी आंदोलन की बड़ी विभाजन रेखाओं में से एक बनी।

चुनावी राजनीति की ओर व्यावहारिक कदम

IPF के माध्यम से चुनावी हस्तक्षेप बढ़ा।

बिहार में कई क्षेत्रों में उम्मीदवार खड़े किए गए।

इन चुनावों में भूमि, मजदूरी और दलित अधिकार के संघर्ष से जुड़े कार्यकर्ताओं को सार्वजनिक नेतृत्व मिला।

जनसभा में भाषण देने वाला किसान नेता

आंदोलन की सार्वजनिक पहचान बनने लगा।

गरीबों का वोट बैंक नहीं, राजनीतिक आधार

संसदीय राजनीति में प्रवेश का खतरा यह था कि भूमिहीन मजदूर केवल चुनावी वोट-बैंक में बदल जाएं।

CPI(ML) Liberation ने कम-से-कम अपने घोषित सिद्धांत में यह दावा किया कि चुनावी प्रतिनिधित्व को जनसंघर्ष से अलग नहीं होना चाहिए।

रामनरेश राम की बाद की राजनीतिक छवि इसी मॉडल पर बनी—

लेकिन साथ ही किसान आंदोलनों में सक्रिय नेता।

पार्टी-स्रोत उन्हें इस मॉडल के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं कि संसदीय मंच को सड़क और खेत के संघर्ष से जोड़ा जा सकता है।

रामनरेश राम की ऐतिहासिक भूमिका

रामनरेश राम इस परिवर्तन के सबसे उपयुक्त प्रतीक थे।

उनकी राजनीतिक यात्रा लगभग पूरे भोजपुर आंदोलन को समेटती है—

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से राजनीतिक शुरुआत,

नक्सलबाड़ी के बाद उग्र क्रांतिकारी राजनीति,

इसलिए उनका जीवन भोजपुर की राजनीतिक यात्रा का जीवंत कालक्रम है।

1995 : एक प्रतीकात्मक चुनाव

1995 में CPI(ML) ने अपने नाम से चुनाव में उतरने का निर्णय किया।

रामनरेश राम सहार विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवार बने।

पार्टी के अपने विवरण के अनुसार उन्होंने यह चुनाव जीतकर बिहार विधानसभा में प्रवेश किया और पार्टी विधायक दल का नेतृत्व किया।

यह घटना भोजपुर आंदोलन के इतिहास में असाधारण प्रतीकात्मक महत्व रखती है।

जिस क्षेत्र से 1967 के चुनाव में बूथ कब्जे और गरीबों के मतदान अधिकार को लेकर संघर्ष की कहानी शुरू हुई थी, उसी क्षेत्र से लगभग तीन दशक बाद क्रांतिकारी किसान आंदोलन का नेता चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचा।

बंदूक से मतपत्र तक—लेकिन सीधी रेखा नहीं

इसे यह नहीं समझना चाहिए कि 1970 में आंदोलन हिंसक था और 1995 में पूरी तरह अहिंसक हो गया।

मध्य बिहार में नक्सलवादी और निजी सेनाओं की हिंसा 1990 के दशक तक जारी रही।

CPI(ML) की अन्य सशस्त्र धाराएं भी सक्रिय थीं।

इसलिए बदलाव सीधी रेखा में नहीं हुआ।

बल्कि दो समानांतर प्रक्रियाएं चलीं—

एक ओर मुख्यधारा में लोकतांत्रिक प्रवेश,

दूसरी ओर ग्रामीण हिंसा का निरंतर चक्र।

1990 का सामाजिक न्याय और भोजपुर

1990 के दशक में बिहार की राजनीति स्वयं भी बदल रही थी।

पिछड़ी जातियों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व तेजी से बढ़ा।

लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में ‘सामाजिक न्याय’ की नई राजनीति सामने आई।

इससे पुराना अगड़ी जाति राजनीतिक प्रभुत्व कमजोर हुआ।

लेकिन दलित खेतिहर मजदूरों का प्रश्न पूरी तरह हल नहीं हुआ।

जातिगत प्रतिनिधित्व और वर्गीय आर्थिक न्याय एक ही चीज नहीं थे।

यहीं CPI(ML) ने तर्क दिया कि केवल सत्ता में पिछड़ी जाति नेतृत्व आने से भूमिहीन मजदूर का भूमि और मजदूरी प्रश्न समाप्त नहीं होता।

सामाजिक न्याय बनाम वर्गीय न्याय

यह बिहार राजनीति की एक महत्वपूर्ण बहस बनी।

यदि पिछड़ी जातियों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ता है तो यह लोकतंत्रीकरण है।

लेकिन यदि किसी पिछड़ी कृषक जाति का संपन्न किसान दलित मजदूर को कम मजदूरी देता है, तो वर्ग-संघर्ष समाप्त नहीं होता।

इसलिए भोजपुर की राजनीति ने जाति-प्रतिनिधित्व और भूमि-संबंध के बीच अंतर बनाए रखा।

यही कारण है कि CPI(ML) का आधार केवल पुराने अगड़ी जाति जमींदारों के विरोध पर निर्भर नहीं रहा।

निजी सेनाओं के दौर में लोकतांत्रिक राजनीति

1990 के दशक में चुनावी राजनीति अपनाने के बावजूद CPI(ML) के समर्थकों को ग्रामीण हिंसा का सामना करना पड़ा।

पार्टी-स्रोत रामनरेश राम की 1995 की चुनावी सफलता और उसके बाद भू-स्वामी प्रतिक्रिया के बीच सीधा संबंध बताते हैं, हालांकि इस दावे को पार्टी की राजनीतिक व्याख्या के रूप में ही पढ़ना चाहिए।

स्वतंत्र रूप से इतना स्पष्ट है कि 1990 के दशक में भोजपुर में चुनावी लोकतंत्रीकरण और निजी सैन्यीकरण समानांतर रूप से चल रहे थे।

विधानसभा का उपयोग

रामनरेश राम और CPI(ML) विधायकों ने विधानसभा में—

इससे संघर्ष का एक हिस्सा राज्य की वैधानिक संस्थाओं के भीतर पहुंचा।

अब वही प्रश्न, जो पहले खेत की सभा या भूमिगत बैठक में उठते थे, विधानसभा में भी उठने लगे।

यह परिवर्तन अपने आप में ग्रामीण लोकतंत्रीकरण का संकेत था।

पंचायत राजनीति का बढ़ता महत्व

संसदीय राजनीति के साथ पंचायत भी महत्वपूर्ण हुई।

स्थानीय निकायों में गरीब और दलित समुदायों की भागीदारी ने गांव की शक्ति-संरचना पर प्रत्यक्ष प्रभाव डाला।

बाद में संवैधानिक आरक्षण ने दलितों और महिलाओं को स्थानीय प्रतिनिधित्व के नए अवसर दिए।

भोजपुर आंदोलन के लिए यह नई राजनीतिक भूमि थी।

अब गांव की सत्ता बदलने का साधन केवल भूमि कब्जा नहीं—

महिला संगठनों का विस्तार

खुले जनसंगठन की रणनीति ने महिलाओं की भागीदारी के लिए भी अधिक स्थान बनाया।

भूमिगत सशस्त्र संगठन में महिलाओं की भूमिका अक्सर सहायक या सीमित रूप में दिखाई देती थी।

इससे आंदोलन की सामाजिक भाषा और व्यापक हुई।

छात्र और युवा संगठन

भोजपुर और बिहार में क्रांतिकारी राजनीति केवल खेतिहर मजदूरों तक सीमित नहीं रही।

छात्र और युवाओं के खुले संगठन विकसित हुए।

बाद में AISA और Revolutionary Youth Association जैसी संस्थाएं CPI(ML) Liberation के व्यापक जनसंगठन ढांचे का हिस्सा बनीं।

इससे आंदोलन विश्वविद्यालय, कस्बे और गांव के बीच नया संबंध बना सका।

भोजपुर की एक पीढ़ी खेत से राजनीति में आई थी।

नई पीढ़ी कॉलेज से ग्रामीण आंदोलन में प्रवेश कर सकती थी।

ट्रेड यूनियन राजनीति

इसी परिवर्तन का एक दूसरा विस्तार मजदूर राजनीति में हुआ।

औद्योगिक और असंगठित मजदूर क्षेत्रों में ट्रेड यूनियन संगठन बनाए गए।

इससे CPI(ML) Liberation की राजनीति केवल कृषि क्रांति तक सीमित नहीं रही।

को एक व्यापक राजनीतिक गठबंधन में जोड़ने की कोशिश की।

एक अध्ययन इसी प्रक्रिया को Liberation धारा द्वारा ट्रेड यूनियन, किसान, महिला और छात्र संगठनों के विकास से जोड़ता है।

संगठनात्मक परिवर्तन का वैचारिक अर्थ

इस बदलाव को केवल चुनावी अवसरवाद कह देना अधूरा होगा।

पार्टी की नई सोच में एक महत्वपूर्ण वैचारिक परिवर्तन था—

राज्य और समाज के बीच अनेक संघर्ष-स्थल हैं।

केवल राज्य सत्ता पर अंतिम कब्जा ही राजनीति नहीं।

मजदूरी कानून लागू करवाना भी संघर्ष है।

भूमिहीन को पट्टा दिलाना भी संघर्ष है।

पुलिस अत्याचार का विरोध भी संघर्ष है।

विधानसभा में प्रश्न उठाना भी संघर्ष है।

यानी क्रांति की कल्पना अधिक बहुस्तरीय होने लगी।

क्या सशस्त्र संघर्ष पूरी तरह छोड़ दिया गया?

CPI(ML) Liberation की यात्रा एक क्रमिक प्रक्रिया थी।

उसने प्रारंभिक वर्षों में हथियारबंद आत्मरक्षा और भूमिगत ढांचे के कुछ तत्व बनाए रखे।

लेकिन धीरे-धीरे खुले जनआंदोलन और संसदीय राजनीति उसकी प्रमुख पहचान बन गए।

यही उसे उन नक्सलवादी धाराओं से अलग करता है जिन्होंने आगे People’s War Group, MCC और अंततः CPI (Maoist) के माध्यम से दीर्घकालिक सशस्त्र संघर्ष को केंद्रीय रणनीति बनाए रखा।

इस विभाजन का इतिहास भारतीय नक्सलवादी आंदोलन की दिशा समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

भोजपुर और दंडकारण्य : दो अलग रास्ते

आगे भारतीय नक्सलवादी आंदोलन दो व्यापक राजनीतिक रास्तों में विभाजित दिखाई देता है।

भोजपुर से विकसित CPI(ML) Liberation का रास्ता—

PWG–MCC से विकसित और अंततः CPI (Maoist) तक पहुंचने वाला रास्ता—

दोनों स्वयं को नक्सलबाड़ी की विरासत से जोड़ते रहे।

लेकिन 1980 के बाद उनके रास्ते काफी अलग हो गए।

भोजपुर मॉडल की विशेषता

भोजपुर मॉडल का सबसे महत्वपूर्ण तत्व था—

स्थानीय वर्ग-संघर्ष को लोकतांत्रिक राजनीतिक संस्थाओं से जोड़ना।

गरीब मजदूर केवल क्रांतिकारी दस्ते का समर्थक नहीं रहना था।

यह वही परिवर्तन था जिसकी संभावना 1970 के दशक की प्रारंभिक रणनीति में लगभग नहीं थी।

क्या चुनाव से भूमि समस्या हल हुई?

संसदीय राजनीति में प्रवेश के बाद भी बिहार में भूमिहीनता समाप्त नहीं हुई।

सीलिंग से बची जमीन के प्रश्न उठते रहे।

आज तक बिहार में भूमि सुधार एक राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है। उदाहरण के लिए CPI(ML) ने 2025 के बिहार चुनाव घोषणापत्र में भी भूमिहीनों को आवासीय जमीन तथा बंद्योपाध्याय आयोग की भूमि-सुधार सिफारिशों को लागू करने की मांग रखी।

यह दिखाता है कि भोजपुर आंदोलन ने राजनीति बदल दी, लेकिन भूमि प्रश्न समाप्त नहीं किया।

सबसे बड़ी सफलता : राजनीतिक प्रतिनिधित्व

यदि भूमि का व्यापक पुनर्वितरण सीमित रहा, तो भोजपुर आंदोलन की दीर्घकालिक उपलब्धि कहां दिखाई देती है?

राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक आत्मविश्वास।

‘बुलेट बनाम बैलेट’ की सरल व्याख्या क्यों गलत है?

मतपत्र सीधे बंदूक का विकल्प नहीं बना।

खंड 10

बोधगया भूमि संघर्ष की पृष्ठभूमि

भोजपुर में भूमि, मजदूरी और जातिगत सम्मान का प्रश्न नक्सलबाड़ी से प्रेरित क्रांतिकारी राजनीति से जुड़कर सशस्त्र संघर्ष में बदल गया था। लगभग उसी कालखंड में बिहार के गया जिले में भूमि-संबंधों को चुनौती देने वाला एक दूसरा आंदोलन विकसित हुआ, जिसकी विचारधारा और संघर्ष-पद्धति भोजपुर से बहुत अलग थी।

बोधगया भूमि संघर्ष।

यहां संघर्ष का केंद्रीय प्रतिद्वंद्वी किसी एक गांव का बड़ा जमींदार नहीं, बल्कि बोधगया मठ था—एक प्राचीन शैव धार्मिक संस्था जिसके पास औपनिवेशिक और स्वतंत्रता-उत्तर काल में गया क्षेत्र में विशाल कृषि-संपत्ति और असाधारण सामाजिक प्रभाव बना रहा।

भूमिहीन किसान और खेतिहर मजदूर इन जमीनों को पीढ़ियों से जोतते थे, लेकिन उन पर स्वामित्व उनका नहीं था। कई जगह वे बटाईदार, खेतिहर मजदूर या ‘कामिया’ जैसे आश्रित श्रम संबंधों में काम करते थे। 1970 के दशक तक यह प्रश्न तीखा हो गया कि जमींदारी उन्मूलन और भूमि-सीमा कानून लागू होने के बावजूद एक धार्मिक संस्था के प्रभाव में हजारों एकड़ कृषि भूमि कैसे बनी रही।

1978 में छात्र युवा संघर्ष वाहिनी ने इसी प्रश्न को आंदोलन में बदल दिया।

“जो जमीन को बोए-जोतें, वह जमीन का मालिक हो।”

बोधगया संघर्ष की विशिष्टता यहीं से शुरू होती है।

बोधगया : विश्व धर्मस्थल के पीछे ग्रामीण समाज

आज बोधगया की पहचान विश्व के प्रमुख बौद्ध तीर्थस्थल के रूप में है।

महाबोधि मंदिर और बोधिवृक्ष दुनिया भर के बौद्धों के लिए पवित्र हैं।

लेकिन बीसवीं सदी के मध्य तक बोधगया केवल धार्मिक तीर्थ नहीं था।

उसके आसपास एक विशाल ग्रामीण कृषि समाज भी था।

और धार्मिक मठ के नियंत्रण वाली कृषि भूमि—

इसलिए बोधगया का इतिहास दो समानांतर संसारों में चलता है।

भूमि संघर्ष ने इन्हीं दोनों वास्तविकताओं के विरोधाभास को उजागर किया।

बोधगया मठ की ऐतिहासिक उत्पत्ति

यह एक शैव संन्यासी संस्था थी, जिसका नेतृत्व महंत करता था।

ऐतिहासिक दस्तावेज मठ की उत्पत्ति को मुगल काल तक ले जाते हैं। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में महंत ने महाबोधि मंदिर और आसपास की भूमि पर व्यापक नियंत्रण का दावा किया। औपनिवेशिक काल के बोधगया मंदिर विवाद संबंधी दस्तावेज भी मठ को शंकराचार्य की शैव परंपरा से संबंधित गिरि संन्यासियों की संस्था के रूप में दर्ज करते हैं।

समय के साथ मठ को विभिन्न शासकों, जमींदारों और संरक्षकों से भूमि मिली।

इससे धार्मिक संस्था धीरे-धीरे बड़े भू-स्वामी में बदल गई।

धार्मिक सत्ता से भू-सत्ता तक

मठ की शक्ति केवल धार्मिक प्रतिष्ठा से नहीं आती थी।

डेविड गेअरी के बोधगया मठ के संस्थागत इतिहास पर अध्ययन के अनुसार मठ मुगल और ब्रिटिश काल में व्यापक भूमि-संपत्ति वाला शक्तिशाली संस्थान बन गया था और महाबोधि मंदिर पर संरक्षकत्व के दावे के साथ आसपास के कृषि क्षेत्र पर भी उसका गहरा प्रभाव था।

इसलिए महंत केवल धार्मिक गुरु नहीं था।

वह एक प्रमुख ग्रामीण भू-सत्ता का प्रतिनिधि भी था।

महंत और जमींदारी

औपनिवेशिक कृषि व्यवस्था में मठ की स्थिति व्यवहार में बड़े जमींदार जैसी बन गई।

कृषकों से लगान या उत्पादन का हिस्सा लिया जाता था।

भूमि के प्रबंधन के लिए मध्यस्थ और कर्मचारी होते थे।

मठ की प्रशासनिक और सामाजिक प्रतिष्ठा इतनी अधिक थी कि आसपास के गरीब किसान के लिए महंत केवल भूमि-मालिक नहीं बल्कि एक दूरस्थ सत्ता का प्रतीक था।

डेविड गेअरी इस व्यवस्था को बोधगया के आसपास धार्मिक सत्ता और कृषि संबंधों के मेल के रूप में देखते हैं।

यही संयोजन बोधगया भूमि संघर्ष को सामान्य जमींदारी-विरोधी आंदोलन से अलग बनाता है।

महाबोधि मंदिर और भूमि-संपत्ति : दो अलग प्रश्न

यहां एक ऐतिहासिक अंतर स्पष्ट रखना आवश्यक है।

महाबोधि मंदिर के धार्मिक नियंत्रण को लेकर बौद्ध और हिंदू संस्थाओं के बीच लंबे समय तक विवाद रहा।

लेकिन 1970 के दशक का बोधगया भूमि आंदोलन मुख्यतः कृषि भूमि के सवाल पर केंद्रित था।

उसका मूल प्रश्न यह नहीं था कि महाबोधि मंदिर में पूजा का अधिकार किसके पास हो।

मठ के नियंत्रण में इतनी विशाल कृषि भूमि क्यों है और उसे वास्तव में जोतने वाले किसान भूमिहीन क्यों हैं?

धार्मिक विवाद और भूमि विवाद ऐतिहासिक रूप से जुड़े अवश्य थे, लेकिन दोनों को एक समझना गलत होगा।

स्वतंत्रता और जमींदारी उन्मूलन

स्वतंत्रता के बाद बिहार में जमींदारी उन्मूलन कानून लागू हुआ।

सिद्धांततः ऐसी व्यवस्था में मठ जैसे बड़े मध्यस्थ भू-स्वामियों की कृषि सत्ता भी सीमित होनी चाहिए थी।

लेकिन जमींदारी उन्मूलन के बाद भी बोधगया मठ की विशाल भूमि-संपत्ति का बड़ा हिस्सा विभिन्न कानूनी, संस्थागत और स्वामित्व व्यवस्थाओं में बना रहा।

गेअरी का अध्ययन इस स्थिति को “afterlife of zamindari”—जमींदारी समाप्त होने के बाद भी उसके सामाजिक–आर्थिक प्रभाव के बने रहने—के रूप में देखता है।

यही स्वतंत्रता-उत्तर भूमि सुधार की मूल विडंबना थी।

पर गांव के वास्तविक भूमि संबंध पूरी तरह नहीं बदले थे।

जमींदारी उन्मूलन क्यों पर्याप्त नहीं था?

राज्य और किसान के बीच लगान-वसूलने वाले मध्यस्थों को हटाना।

लेकिन इसका अर्थ स्वचालित रूप से यह नहीं था कि बड़े भू-स्वामियों की सारी कृषि भूमि भूमिहीनों में बांट दी जाएगी।

मठ के पास विभिन्न प्रकार की भूमि थी।

कुछ धार्मिक या ट्रस्ट संपत्ति के रूप में दिखाई जाती थी।

कुछ भूमि विभिन्न नामों या संस्थागत व्यवस्थाओं में दर्ज थी।

इसलिए कानून के बाद भी वास्तविक पुनर्वितरण जटिल रहा।

बोधगया संघर्ष इसी अंतर से पैदा हुआ—

मठ के पास कितनी भूमि थी?

बोधगया मठ की कुल भूमि के संबंध में अलग-अलग स्रोत अलग संख्याएं देते हैं।

यही कारण है कि किसी एक आंकड़े को अंतिम सत्य मानना उचित नहीं होगा।

समकालीन आंदोलनकारी और बाद के अध्ययनों में मठ की जमीन को सामान्यतः लगभग 9,500 से 12,000 एकड़ से अधिक के दायरे में बताया गया है।

बिना अग्रवाल के महिला भूमि-अधिकार संबंधी अध्ययन में बोधगया आंदोलन के संदर्भ में लगभग 9,575 एकड़ भूमि, 138 गांवों में फैली हुई बताई गई है।

दूसरी ओर जॉर्ज कुन्नाथ के अध्ययन में मठ की भूमि को 12,000 एकड़ से अधिक बताया गया है।

बोधगया मठ गया जिले का एक असाधारण रूप से बड़ा धार्मिक भू-स्वामी था, जिसकी संपत्ति हजारों एकड़ और अनेक गांवों में फैली हुई थी।

आंकड़ों में अंतर क्यों मिलता है?

भूमि-संपत्ति का अलग-अलग अनुमान कई कारणों से हो सकता है।

क्या केवल सीधे मठ के नाम दर्ज जमीन गिनी गई?

क्या ट्रस्टों के नाम दर्ज जमीन भी शामिल थी?

क्या पहले हस्तांतरित भूमि भी गिनी गई?

क्या केवल आंदोलन क्षेत्र की भूमि का हिसाब था?

इसीलिए 9,575, लगभग 10,000, 12,000 या उससे अधिक जैसे आंकड़े विभिन्न स्रोतों में दिखाई देते हैं।

वे आवश्यक रूप से एक-दूसरे को गलत सिद्ध नहीं करते।

वे अलग-अलग कानूनी और ऐतिहासिक श्रेणियां माप सकते हैं।

धार्मिक ट्रस्टों का प्रश्न

भूमि-सीमा कानून लागू होने के बाद मठ की भूमि को विभिन्न धार्मिक ट्रस्टों और देवताओं के नाम दर्ज करने का प्रश्न विवादास्पद बना।

एक बाद के कानूनी–ऐतिहासिक अध्ययन के अनुसार भूमि-सीमा कानून से पहले मठ की संपत्ति को 17 देवताओं से संबंधित अलग व्यवस्थाओं में दर्ज करने की कोशिश की गई थी।

आंदोलनकारियों ने आरोप लगाया कि ये व्यवस्थाएं भूमि-सीमा कानून से बचने का माध्यम थीं।

कुछ नागरिक अधिकार अध्ययनों ने भी दावा किया कि मठ के नाम से जुड़े कई ट्रस्ट वास्तविक स्वतंत्र संस्थाएं नहीं थे बल्कि भूमि बचाने के लिए बनाई गई संरचनाएं थीं। जॉर्ज कुन्नाथ के अध्ययन में वाहिनी के सर्वेक्षण का उल्लेख है जिसमें 18 में से 17 ट्रस्टों को वास्तविक स्वतंत्र संस्थाएं न मानने का दावा किया गया।

यह आंदोलन का दावा था; अंतिम कानूनी स्थिति अलग-अलग भूमि मामलों में न्यायालय और प्रशासन द्वारा तय हुई।

भूमि-सीमा कानून का सवाल

बिहार में 1961 का भूमि-सीमा कानून बड़े भू-स्वामियों द्वारा रखी जा सकने वाली कृषि भूमि पर सीमा निर्धारित करने के लिए था।

सैद्धांतिक रूप से निर्धारित सीमा से अधिक जमीन—

घोषित होकर सरकार द्वारा अधिग्रहित और भूमिहीनों में वितरित की जानी थी।

बोधगया मठ जैसे विशाल भू-स्वामी के संदर्भ में यह कानून अत्यंत महत्वपूर्ण था।

लेकिन जब भूमि अलग-अलग ट्रस्ट, देवताओं, व्यक्तियों या हस्तांतरणों में दिखाई जाए, तो सवाल पैदा होता था—

कानून की दृष्टि से वास्तविक भू-स्वामी कौन है?

यही विवाद दशकों तक मुकदमों में चलता रहा।

कानूनी विवाद कितने लंबे चले?

बोधगया भूमि विवाद केवल 1978 के आंदोलन तक सीमित नहीं रहा।

भूमि-सीमा मामलों में कानूनी विवाद दशकों बाद भी अदालतों तक पहुंचते रहे।

उदाहरण के लिए 2005 के Ram Sumari Devi v. State of Bihar मामले में पटना उच्च न्यायालय के सामने ऐसी भूमि का विवाद आया जिसे प्रशासन ने बोधगया मठ की कथित फर्जी/बेनामी संपत्ति मानते हुए भूमि-सीमा कार्यवाही में शामिल किया था। संबंधित भूमि-सीमा मामला 1981–82 से जुड़ा था।

यह तथ्य स्वयं बताता है कि बोधगया की भूमि समस्या कितनी जटिल और दीर्घकालिक थी।

जमीन कौन जोतता था?

विशाल कृषि संपत्ति का कानूनी मालिक मठ या उससे जुड़ी संस्था हो सकती थी, लेकिन वास्तविक खेती कौन करता था?

2021 में प्रकाशित बोधगया आंदोलन के अध्ययन में आंदोलन में भाग लेने वाले भुइयां दलितों के पूर्व इतिहास को कामिया अर्थात बंधुआ/आश्रित श्रम से जोड़कर देखा गया है।

यानी स्वामित्व और श्रम के बीच स्पष्ट दूरी थी।

‘कामिया’ व्यवस्था क्या थी?

‘कामिया’ बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में ऐसी श्रम-निर्भरता के लिए प्रयुक्त शब्द रहा जिसमें गरीब मजदूर किसी भू-स्वामी के साथ दीर्घकालिक ऋण, श्रम या आश्रय संबंध में बंध जाता था।

यह हर जगह औपचारिक दासता जैसी समान व्यवस्था नहीं थी।

लेकिन व्यवहार में मजदूर की स्वतंत्रता सीमित हो सकती थी।

बोधगया आंदोलन से संबंधित समकालीन और बाद के अध्ययनों में मठ की कृषि व्यवस्था में कामिया श्रम का उल्लेख बार-बार मिलता है।

कामिया और बंधुआ मजदूरी

आधुनिक कानूनी भाषा में प्रत्येक कामिया संबंध को स्वतः एक जैसा ‘बंधुआ श्रम’ कहना सावधानी के बिना उचित नहीं है।

इतने मजबूत थे कि मजदूर व्यावहारिक रूप से भू-स्वामी से मुक्त होकर काम नहीं कर पाता था।

यही कारण है कि बाद के सामाजिक अध्ययनों में इसे bondage अर्थात बंधन की व्यवस्था से जोड़ा गया।

बोधगया संघर्ष का उद्देश्य भूमि के साथ इस श्रम-निर्भरता को भी तोड़ना था।

बटाईदारों की स्थिति

मठ की सारी जमीन मजदूरी से नहीं जोती जाती थी।

वे जमीन जोतते और उत्पादन का हिस्सा मठ या उसके प्रतिनिधि को देते।

लेकिन काश्तकारी अधिकार तभी सुरक्षित हो सकते थे जब उसका कोई प्रमाण मौजूद हो।

बोधगया संघर्ष संबंधी अध्ययनों में एक महत्वपूर्ण शिकायत यह मिलती है कि बटाईदारों को उनकी उपज या भुगतान के बदले ऐसी रसीद नहीं दी जाती थी जिससे वे भविष्य में कानूनी काश्तकारी अधिकार साबित कर सकें।

रसीद का सवाल इतना महत्वपूर्ण क्यों था?

मान लीजिए कोई परिवार बीस वर्षों से एक जमीन जोत रहा है।

यह स्थायी बटाईदार नहीं, केवल मौसमी मजदूर है।

ऐसी स्थिति में किसान अपना अधिकार कैसे सिद्ध करे?

यही कारण है कि भूमि-सुधार कानूनों के बावजूद बिहार में बटाईदारों की सुरक्षा कमजोर रही।

बोधगया आंदोलन ने इस ‘कानूनी अदृश्यता’ को राजनीतिक प्रश्न बनाया।

मठ के मध्यस्थ

महंत स्वयं प्रत्येक खेत पर जाकर मजदूरी तय नहीं करता था।

विशाल संपत्ति के प्रबंधन के लिए कर्मचारियों और मध्यस्थों की आवश्यकता थी।

इनमें विभिन्न प्रकार के स्थानीय प्रबंधक, ठेकेदार या प्रभावशाली व्यक्ति शामिल हो सकते थे।

आंदोलनकारी स्रोतों में मठ के निजी प्रबंधकीय तंत्र और स्थानीय ‘कचहरियों’ का उल्लेख मिलता है, जिनके माध्यम से कृषि नियंत्रण संचालित होने का दावा किया गया।

इससे भूमिहीन किसान और महंत के बीच एक मध्यस्थ सत्ता विकसित होती थी।

ठीक वैसे ही जैसे पुरानी जमींदारी व्यवस्था में हुआ करता था।

धार्मिक वैधता और सामाजिक शक्ति

सामान्य जमींदार और धार्मिक महंत में एक महत्वपूर्ण अंतर था।

जमींदार की शक्ति मुख्यतः भूमि और प्रशासनिक प्रभाव से आती थी।

महंत की शक्ति में धार्मिक प्रतिष्ठा भी जुड़ी हुई थी।

ग्रामीण समाज में धार्मिक संस्था को चुनौती देना कई लोगों के लिए केवल भू-स्वामी का विरोध नहीं था।

यह स्थापित धार्मिक अधिकार को चुनौती देने जैसा भी महसूस हो सकता था।

इसलिए बोधगया संघर्ष में आंदोलनकारियों को यह स्पष्ट करना पड़ा कि वे धर्म के विरुद्ध नहीं—

अन्यायपूर्ण भूमि-संकेंद्रण के विरुद्ध

धर्म बनाम भूमि-सुधार नहीं

बोधगया आंदोलन को ‘धर्म-विरोधी’ संघर्ष के रूप में पढ़ना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा।

संघर्ष वाहिनी की मांग यह नहीं थी कि धार्मिक संस्था अस्तित्वहीन हो जाए।

धार्मिक प्रतिष्ठा किसी संस्था को भूमि-सीमा और सामाजिक न्याय के कानूनों से ऊपर नहीं रख सकती।

क्या धार्मिक संपत्ति होने के कारण कृषि भूमि भूमि-सुधार से मुक्त हो सकती है?

यही आंदोलन का संवैधानिक और सामाजिक न्याय संबंधी मूल प्रश्न था।

भूदान और बोधगया

बोधगया की भूमि राजनीति पर भूदान आंदोलन का भी प्रभाव पड़ा।

विनोबा भावे के भूदान आंदोलन में बिहार प्रमुख प्रदेश था।

भूमि-स्वामियों से स्वैच्छिक भूमि दान की अपील की गई।

बोधगया क्षेत्र में भी भूदान और भूमि-सुधार की विभिन्न पहलें हुईं।

लेकिन स्वैच्छिक दान से पूरी भूमि असमानता नहीं टूटी।

प्राकृतिक संसाधन और कृषि संबंधों पर हुए एक अध्ययन में गया क्षेत्र में विनोबा के भूदान, बाद में छात्र युवा संघर्ष वाहिनी और फिर नक्सलवादी आंदोलनों को भूमि सुधार के तीन अलग रास्तों के रूप में देखा गया है।

यानी बोधगया स्वयं स्वतंत्र भारत की लगभग पूरी भूमि-सुधार बहस की प्रयोगशाला बन गया था।

एक ही क्षेत्र में तीन रास्ते

बोधगया और गया क्षेत्र में भूमि समस्या के समाधान के तीन प्रमुख रास्ते देखे जा सकते हैं—

पहला — सरकारी भूमि सुधार

कानून बनाकर जमींदारी समाप्त करना और अधिशेष भूमि हासिल करना।

दूसरा — भूदान

भूमि-मालिक को नैतिक persuasion से जमीन दान करने के लिए तैयार करना।

तीसरा — जनसंघर्ष

भूमिहीन किसान स्वयं संगठित होकर जमीन पर अधिकार की मांग करे।

बोधगया संघर्ष तीसरे रास्ते की निर्णायक अभिव्यक्ति था।

नक्सलवाद से उसका अंतर

भोजपुर में भूमि और सामाजिक न्याय के संघर्ष का एक प्रमुख हिस्सा CPI(ML) की सशस्त्र क्रांतिकारी राजनीति से जुड़ा।

बोधगया में छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का वैचारिक आधार जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति और गांधीवादी–समाजवादी परिवर्तन था।

लेकिन आंदोलन का घोषित रास्ता व्यापक जनसंगठन और अहिंसक प्रतिरोध था।

यही दोनों आंदोलनों की सबसे महत्वपूर्ण तुलना बनने वाली है।

1974 का बिहार आंदोलन और नई पीढ़ी

बोधगया भूमि संघर्ष की राजनीतिक पृष्ठभूमि 1974 के बिहार छात्र आंदोलन में भी थी।

जयप्रकाश नारायण ने भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन को ‘संपूर्ण क्रांति’ की व्यापक अवधारणा से जोड़ा।

उनका तर्क था कि केवल सरकार बदलना पर्याप्त नहीं।

इसी आंदोलन से बड़ी संख्या में युवा कार्यकर्ता निकले।

अगर संपूर्ण क्रांति गांव की जमीन के संबंध नहीं बदलती, तो वह कितनी संपूर्ण है?

यहीं बोधगया भूमि संघर्ष की वैचारिक जमीन बनती है।

छात्र युवा संघर्ष वाहिनी

जयप्रकाश नारायण की प्रेरणा से 1970 के दशक के मध्य में छात्र युवा संघर्ष वाहिनी विकसित हुई।

यह पारंपरिक चुनावी राजनीतिक दल नहीं था।

इसका उद्देश्य युवाओं को सामाजिक परिवर्तन के प्रत्यक्ष कार्य में लगाना था।

इसमें पुरुषों के साथ महिलाओं की भी संगठन के विभिन्न स्तरों पर भागीदारी थी।

बिना अग्रवाल इसे गांधीवादी–समाजवादी युवा संगठन के रूप में वर्णित करती हैं, जिसकी सदस्यता युवाओं तक सीमित थी और जिसमें महिलाओं की संस्थागत उपस्थिति महत्वपूर्ण थी।

यही संगठन आगे बोधगया भूमि आंदोलन का प्रमुख आयोजक बना।

वाहिनी ने बोधगया क्यों चुना?

गया जिले में अनेक भूमि समस्याएं थीं।

लेकिन बोधगया मठ एक स्पष्ट और प्रतीकात्मक लक्ष्य प्रस्तुत करता था।

एक ओर हजारों एकड़ भूमि पर संस्थागत नियंत्रण।

फिर भी जमीन का वास्तविक पुनर्वितरण नहीं हुआ था।

भूमि जोतने वाले गरीब परिवार आंदोलन के लिए सामाजिक आधार उपलब्ध करा सकते थे।

इसलिए मठ के विरुद्ध संघर्ष भूमि-सुधार की विफलता का प्रत्यक्ष उदाहरण बन सकता था।

8 अप्रैल 1978 : आंदोलन का औपचारिक आरंभ

कृषि संघर्षों पर एम. एन. कर्ण के अध्ययन के अनुसार छात्र युवा संघर्ष वाहिनी ने 8 अप्रैल 1978 को बोधगया में राज्यस्तरीय रैली के साथ मठ की भूमि पर अवैध नियंत्रण के विरुद्ध संगठित संघर्ष शुरू करने का निर्णय किया।

यही तारीख बोधगया भूमि संघर्ष के औपचारिक आरंभ के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानी जा सकती है।

“जो जमीन को जोते-बोए, वही उसका मालिक हो।”

यह नारा पूरे भूमि-संघर्ष का सार बन गया।

आंदोलन का सामाजिक आधार

और बाद में बड़ी संख्या में महिलाएं—

भुइयां समुदाय की भागीदारी विशेष रूप से महत्वपूर्ण थी।

2021 के अध्ययन में भुइयां दलित प्रतिभागियों की स्मृतियों के आधार पर आंदोलन को केवल जमीन की लड़ाई नहीं बल्कि जातिगत अधीनता से नए सामाजिक व्यक्तित्व के निर्माण की प्रक्रिया के रूप में देखा गया है।

इस अर्थ में बोधगया और भोजपुर के सामाजिक आधार में महत्वपूर्ण समानता थी।

गांवों में संगठन

छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के कार्यकर्ता केवल शहर से भाषण देने नहीं आते थे।

कई कार्यकर्ता गांवों में रहकर गरीबों को संगठित करने लगे।

समकालीन India Today रिपोर्ट के अनुसार 1980 तक वाहिनी लगभग 62 गांवों में भूमिहीन मजदूरों को संगठित कर रही थी।

एक अन्य अध्ययन में गया जिले के लगभग 62 गांवों में कृषि श्रमिक वर्गों के संगठन का उल्लेख मिलता है।

इससे स्पष्ट है कि आंदोलन किसी एक गांव या प्रतीकात्मक धरने तक सीमित नहीं रहा।

मजदूर–किसान समिति

आंदोलन गांवों में मजदूर–किसान समिति जैसे संगठनात्मक ढांचे के माध्यम से चला।

इससे बाहरी छात्र कार्यकर्ता और स्थानीय कृषक समुदाय के बीच संबंध स्थापित हुआ।

यही बोधगया आंदोलन की सफलता का महत्वपूर्ण कारण था।

यदि वाहिनी केवल छात्रों का संगठन बनी रहती तो भूमि आंदोलन टिकाऊ नहीं होता।

वह तब मजबूत हुआ जब भूमिहीन स्वयं स्थानीय संगठन के सदस्य और नेता बने।

मजदूरी बहिष्कार और हड़ताल

शुरुआती रणनीतियों में मठ की जमीन पर काम करने से सामूहिक इनकार महत्वपूर्ण था।

जॉर्ज कुन्नाथ के अध्ययन के अनुसार 1979 तक आंदोलन ने गया जिले के कम-से-कम 40 गांवों में, मुख्यतः दलित मजदूरों को संगठित किया और मठ की जमीन पर काम न करने तथा दूसरे गांवों से मजदूर लाने का विरोध करने की रणनीति अपनाई।

यह रणनीति सशस्त्र कार्रवाई नहीं थी।

यह श्रम को सामूहिक शक्ति में बदलना था।

मठ की जमीन कौन जोतेगा?

यह प्रश्न आंदोलन का निर्णायक राजनीतिक हथियार बन गया।

यदि भूमिहीन मजदूर एकजुट होकर कह दें—

तो विशाल भू-संपत्ति का मालिक स्वयं खेती कैसे करेगा?

यानी भूमि का कानूनी स्वामित्व एक तरफ था,

लेकिन उत्पादन के लिए श्रम आवश्यक था।

आंदोलन ने इसी निर्भरता को उलट दिया।

मठ जमीन का मालिक था, लेकिन किसान के श्रम के बिना जमीन उत्पादन नहीं कर सकती थी।

श्रम से स्वामित्व की दलील

यहीं आंदोलन का नैतिक सिद्धांत उभरा—

यदि जमीन को पीढ़ियों से गरीब किसान जोतता है,

यह मार्क्सवादी ‘भूमि जोतने वाले की’ मांग से भी मेल खाता था, लेकिन वाहिनी का रास्ता गांधीवादी–समाजवादी जनसंघर्ष था।

यानी भोजपुर और बोधगया का लक्ष्य कहीं-कहीं समान दिखाई देता है—

अकाल और गरीबी की पृष्ठभूमि

बोधगया क्षेत्र में आंदोलन के समय ग्रामीण गरीबी भी गंभीर थी।

भूमिहीनता का प्रश्न इसलिए केवल सैद्धांतिक भूमि-सुधार नहीं था।

पुलिस और प्रशासनिक टकराव

मजदूरों और कार्यकर्ताओं पर दबाव पड़ा।

खंड 11

छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का प्रवेश

बोधगया भूमि संघर्ष को समझने के लिए केवल मठ की विशाल भू-संपत्ति या भूमिहीन किसानों की दशा देखना पर्याप्त नहीं है। यह भी समझना आवश्यक है कि 1970 के दशक के उत्तरार्ध में ऐसी कौन-सी राजनीतिक शक्ति थी जिसने इस असंतोष को संगठित जनसंघर्ष में बदला।

छात्र युवा संघर्ष वाहिनी ने।

संघर्ष वाहिनी की जड़ें 1974 के बिहार छात्र आंदोलन और जयप्रकाश नारायण की ‘संपूर्ण क्रांति’ की अवधारणा में थीं। आरंभ में छात्र आंदोलन महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, शिक्षा-व्यवस्था और सरकार की कार्यप्रणाली के विरुद्ध उठा था। लेकिन जयप्रकाश नारायण ने इसे केवल किसी सरकार को हटाने के आंदोलन तक सीमित नहीं रहने दिया। उन्होंने प्रश्न उठाया कि यदि शासन बदल भी जाए, लेकिन गांव में भूमि-संबंध, जातिगत असमानता, आर्थिक शोषण और सत्ता की केंद्रीकृत संरचना जस की तस रहे, तो उसे क्रांति कैसे कहा जा सकता है?

बोधगया इसी प्रश्न की प्रयोगभूमि बना।

1974 का बिहार : असंतोष की पृष्ठभूमि

1970 के दशक की शुरुआत में बिहार गंभीर आर्थिक और राजनीतिक संकट से गुजर रहा था।

शिक्षा-व्यवस्था से छात्र असंतुष्ट थे।

सरकारी भ्रष्टाचार के आरोप व्यापक थे।

प्रशासनिक अक्षमता और राजनीतिक अस्थिरता ने असंतोष को और बढ़ाया।

इसी वातावरण में छात्रों ने संगठित आंदोलन शुरू किया।

आरंभिक मांगें मुख्यतः शिक्षा, रोजगार और प्रशासनिक सुधार से संबंधित थीं।

लेकिन आंदोलन शीघ्र ही व्यापक राजनीतिक स्वरूप ग्रहण कर गया।

बिहार छात्र संघर्ष समिति

1974 में विभिन्न छात्र संगठनों और कार्यकर्ताओं ने मिलकर बिहार छात्र संघर्ष समिति का निर्माण किया।

इस समिति ने राज्य सरकार के विरुद्ध आंदोलन का नेतृत्व किया।

लेकिन आंदोलन को राष्ट्रीय पहचान तब मिली जब जयप्रकाश नारायण ने उसका नेतृत्व स्वीकार किया।

यहीं छात्र आंदोलन केवल विश्वविद्यालयों का आंदोलन नहीं रहा।

वह बिहार की राजनीति का केंद्रीय प्रश्न बन गया।

जयप्रकाश नारायण का पुनः सक्रिय राजनीति में प्रवेश

जयप्रकाश नारायण स्वतंत्रता आंदोलन और समाजवादी राजनीति के पुराने नेता थे।

स्वतंत्रता के बाद वे धीरे-धीरे सक्रिय दलगत राजनीति से दूर होकर विनोबा भावे के सर्वोदय और भूदान आंदोलन से जुड़ गए थे।

लेकिन 1974 के बिहार आंदोलन ने उन्हें फिर सार्वजनिक राजनीतिक संघर्ष के केंद्र में ला दिया।

छात्र नेताओं ने उनसे आंदोलन का मार्गदर्शन करने का आग्रह किया।

उन्होंने यह आग्रह स्वीकार किया, लेकिन एक शर्त के साथ—

आंदोलन केवल सरकार गिराने का अभियान नहीं होगा।

उसका लक्ष्य समाज का व्यापक परिवर्तन होना चाहिए।

यहीं से ‘संपूर्ण क्रांति’ की अवधारणा सामने आई।

‘संपूर्ण क्रांति’ का अर्थ

जयप्रकाश नारायण की ‘संपूर्ण क्रांति’ को केवल इंदिरा गांधी-विरोधी राजनीतिक आंदोलन समझना अधूरा होगा।

उनकी दृष्टि में परिवर्तन कई स्तरों पर होना चाहिए था—

अर्थात केवल सत्ता बदलना पर्याप्त नहीं।

सत्ता-संबंधों को बदलना भी आवश्यक है।

यह विचार आगे संघर्ष वाहिनी के कार्यकर्ताओं को गांवों की ओर ले गया।

सरकार बदलना बनाम समाज बदलना

1974 के आंदोलन में एक स्वाभाविक राजनीतिक प्रवृत्ति थी—

लेकिन जयप्रकाश नारायण बार-बार यह प्रश्न उठाते थे कि केवल मुख्यमंत्री या सरकार बदलने से भ्रष्टाचार, गरीबी और सामाजिक अन्याय समाप्त नहीं होंगे।

इसीलिए उनके आंदोलन की भाषा चुनावी सत्ता परिवर्तन से आगे गई।

और प्रशासन पर प्रभावशाली लोगों का नियंत्रण है—

तो केवल पटना में सरकार बदलने से संपूर्ण क्रांति नहीं हो सकती।

यही विचार बोधगया भूमि संघर्ष तक पहुंचता है।

युवाओं के सामने नया प्रश्न

1974 के आंदोलन में भाग लेने वाले हजारों युवाओं के सामने 1977 के बाद एक समस्या पैदा हुई।

जिस राजनीतिक सत्ता के खिलाफ आंदोलन चला था, वह बदल चुकी थी।

आंदोलन समाप्त हो जाए या सामाजिक परिवर्तन जारी रहे?

कुछ कार्यकर्ता चुनावी दलों में चले गए।

कुछ ने सरकारी या पेशेवर जीवन अपनाया।

लेकिन एक धारा ने तय किया कि संपूर्ण क्रांति का अर्थ केवल दिल्ली या पटना की सत्ता बदलना नहीं था।

छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का निर्माण

इसी विचार से छात्र युवा संघर्ष वाहिनी विकसित हुई।

इसका उद्देश्य चुनाव लड़कर सत्ता प्राप्त करना नहीं था।

यह युवाओं को सामाजिक परिवर्तन की प्रत्यक्ष प्रक्रिया से जोड़ने वाला संगठन था।

लेकिन वाहिनी केवल नैतिक उपदेश का संगठन नहीं बनना चाहती थी।

वह प्रत्यक्ष संघर्ष का संगठन बनना चाहती थी।

वाहिनी और पारंपरिक सर्वोदय में अंतर

भू-स्वामी से नैतिक अपील करके भूमि दान लेना।

संघर्ष वाहिनी की नई पीढ़ी ने महसूस किया कि यह रास्ता पर्याप्त नहीं है।

यदि भू-स्वामी स्वेच्छा से जमीन न दे तो क्या किया जाए?

यदि भूमि-सीमा कानून का उल्लंघन हो रहा हो तो क्या केवल प्रार्थना की जाए?

इसलिए वाहिनी ने सर्वोदय की अहिंसा को बनाए रखा, लेकिन उसमें संघर्ष और प्रत्यक्ष जनकार्रवाई जोड़ी।

गांधीवादी अहिंसा, लेकिन संघर्षशील

संघर्ष वाहिनी की राजनीति को ‘नरम’ या निष्क्रिय गांधीवाद मानना गलत होगा।

उसका रास्ता अहिंसक था, लेकिन उसमें—

इस अर्थ में यह गांधीवादी अहिंसा का अधिक संघर्षशील रूप था।

पार्टी नहीं, आंदोलन

संघर्ष वाहिनी ने स्वयं को पारंपरिक चुनावी दल की तरह संगठित नहीं किया।

इसका उद्देश्य सत्ता हासिल करना नहीं बल्कि समाज में परिवर्तन करना था।

यह दृष्टिकोण उसे CPI(ML) जैसी क्रांतिकारी पार्टी से भी अलग करता था।

CPI(ML) का अंतिम लक्ष्य राज्य सत्ता पर कब्जा था।

सत्ता का विकेंद्रीकरण और समाज की नीचे से पुनर्रचना।

यही अंतर बोधगया आंदोलन की रणनीति में दिखाई देता है।

गांवों की ओर प्रस्थान

1977 के बाद संघर्ष वाहिनी के कई कार्यकर्ताओं ने शहरी छात्र राजनीति से गांवों की ओर जाने का निर्णय किया।

संपूर्ण क्रांति की सबसे कठिन परीक्षा ग्रामीण भारत है।

यदि जमीन, जाति और श्रम संबंध नहीं बदलते, तो क्रांति अधूरी है।

इसलिए कई युवा कार्यकर्ता गांवों में रहने लगे।

उन्होंने किसानों और मजदूरों के साथ सीधे संबंध बनाए।

यही तरीका आगे बोधगया में अत्यंत प्रभावी साबित हुआ।

बाहर से आए कार्यकर्ता और स्थानीय समाज

किसी बाहरी छात्र संगठन के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है—

स्थानीय ग्रामीणों का विश्वास कैसे प्राप्त किया जाए?

शहर से आए कार्यकर्ता यदि केवल भाषण देकर लौट जाएं तो दीर्घकालिक संगठन नहीं बनता।

संघर्ष वाहिनी के कार्यकर्ताओं ने गांवों में रहकर—

और भूमि रिकॉर्ड तथा मठ की संपत्ति की जानकारी जुटाई।

यही प्रक्रिया आंदोलन को स्थानीय आधार देती है।

अध्ययन से आंदोलन तक

बोधगया में वाहिनी ने तुरंत आंदोलन शुरू नहीं किया।

पहले भूमि की स्थिति समझना आवश्यक था।

इस तरह राजनीतिक आंदोलन के पहले एक प्रकार का सामाजिक–भूमि सर्वेक्षण हुआ।

यह रणनीति भोजपुर के आरंभिक उग्रवादी मॉडल से अलग थी।

कानून को समझना

वाहिनी के कार्यकर्ताओं ने भूमि-सीमा कानून का अध्ययन किया।

तो सरकार कह सकती थी कि भूमि निजी संपत्ति है।

‘यह जमीन कानूनन भी सीमा से अधिक है’—

तो संघर्ष की राजनीतिक शक्ति बढ़ जाती थी।

इसलिए बोधगया आंदोलन का एक महत्वपूर्ण हथियार था—

संपूर्ण क्रांति और भूमि सुधार का संबंध

यहीं जयप्रकाश की अवधारणा व्यावहारिक रूप लेती है।

यदि आर्थिक सत्ता का केंद्रीकरण कुछ बड़े भू-स्वामियों में है, तो राजनीतिक लोकतंत्र अधूरा है।

यदि भूमिहीन व्यक्ति आर्थिक रूप से भू-स्वामी पर निर्भर है, तो उसका राजनीतिक मताधिकार भी पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हो सकता।

इसलिए भूमि-सुधार केवल कृषि नीति नहीं—

संघर्ष वाहिनी ने बोधगया में इसी संबंध को पकड़ा।

8 अप्रैल 1978 : निर्णायक शुरुआत

8 अप्रैल 1978 को बोधगया में आयोजित राज्यस्तरीय रैली आंदोलन का महत्वपूर्ण आरंभिक क्षण बनी।

यहीं मठ की भूमि के प्रश्न को व्यापक रूप से उठाया गया।

संघर्ष वाहिनी ने निर्णय किया कि भूमिहीन किसानों को संगठित कर मठ की अतिरिक्त और विवादित भूमि पर अधिकार के लिए संघर्ष किया जाएगा।

इस रैली ने आंदोलन को स्थानीय शिकायत से राज्यस्तरीय राजनीतिक मुद्दा बना दिया।

“जो जमीन को जोते-बोए, जमीन उसी की हो।”

इस नारे की शक्ति उसके सरल नैतिक तर्क में थी।

यह किसी जटिल वैचारिक पुस्तक की आवश्यकता नहीं छोड़ता था।

जो व्यक्ति वर्षों खेत जोतता है, उसे मालिकाना अधिकार क्यों न मिले?

यही नारा सामाजिक न्याय का केंद्रीय सूत्र बना।

मजदूर–किसान समितियों का निर्माण

आंदोलन को टिकाऊ बनाने के लिए गांवों में मजदूर–किसान समितियां बनाई गईं।

अब आंदोलन केवल संघर्ष वाहिनी का नहीं रहा।

स्थानीय किसान स्वयं संगठन की इकाई बने।

इससे संगठन गांव की सामाजिक संरचना में प्रवेश करता गया।

स्थानीय नेतृत्व का निर्माण

संघर्ष वाहिनी का लक्ष्य यह नहीं था कि हमेशा बाहरी छात्र ही आंदोलन का नेतृत्व करें।

यदि आंदोलन स्थायी बनना है तो स्थानीय नेतृत्व आवश्यक था।

इसीलिए दलित और भूमिहीन किसानों के बीच से स्थानीय कार्यकर्ता उभरे।

भुइयां समुदाय की भूमिका

बोधगया संघर्ष में भुइयां समुदाय की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण थी।

इनमें बड़ी संख्या भूमिहीन खेतिहर मजदूरों और कामिया श्रमिकों की थी।

उनके लिए भूमि-संघर्ष का अर्थ केवल आर्थिक संसाधन नहीं था।

यह पीढ़ीगत आश्रितता से बाहर निकलने का रास्ता था।

इसलिए जब उन्हें सामूहिक संगठन का अवसर मिला, आंदोलन तेजी से गहराया।

आंदोलन और जाति

संघर्ष वाहिनी की वैचारिक भाषा जाति-विरोधी और समाजवादी थी।

लेकिन गांव की वास्तविकता जाति से भरी हुई थी।

भूमिहीनों में दलित समुदायों की बड़ी संख्या थी।

इसलिए भूमि-संघर्ष अपने आप सामाजिक सम्मान के प्रश्न से जुड़ गया।

यहां भोजपुर और बोधगया में महत्वपूर्ण समानता दिखाई देती है।

कामिया व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष

बोधगया में कामिया श्रम-संबंध आंदोलन का महत्वपूर्ण प्रश्न बने।

यदि कोई परिवार पीढ़ियों से किसी मालिक के यहां आश्रित श्रमिक बना रहे, तो जमीन मिलने का अर्थ केवल संपत्ति प्राप्त करना नहीं है।

इसीलिए भूमि सुधार और बंधुआ/आश्रित श्रम-मुक्ति एक-दूसरे से जुड़े।

मजदूरी संघर्ष

भूमि आंदोलन के साथ मजदूरी भी महत्वपूर्ण थी।

सभी भूमिहीनों को तत्काल जमीन मिलने वाली नहीं थी।

इसलिए उनके दैनिक जीवन का प्रश्न मजदूरी बना रहता था।

संघर्ष वाहिनी ने मजदूरी और भूमि के प्रश्नों को अलग नहीं किया।

दोनों एक ही सामाजिक मुक्ति की प्रक्रिया का हिस्सा थे।

श्रम बहिष्कार

लेकिन जमीन को उत्पादक बनाने के लिए मजदूर चाहिए थे।

यदि भूमिहीन मजदूर सामूहिक रूप से मठ की भूमि पर काम करने से मना कर दें, तो यह बड़ा आर्थिक दबाव बन सकता था।

यही कारण था कि श्रम बहिष्कार आंदोलन की महत्वपूर्ण रणनीति बनी।

बाहर से मजदूर लाने का विरोध

यदि स्थानीय मजदूर काम बंद कर दें तो भू-स्वामी बाहर से मजदूर ला सकता है।

इसलिए संघर्ष केवल अपने गांव तक सीमित नहीं रह सकता था।

आसपास के गांवों के मजदूरों को भी समझाना पड़ता था कि वे आंदोलन तोड़ने के लिए काम न करें।

यही संगठनात्मक विस्तार बोधगया आंदोलन को क्षेत्रीय शक्ति बनाता है।

सत्याग्रह का नया अर्थ

गांधी के सत्याग्रह में नैतिक प्रतिरोध केंद्रीय था।

अन्यायपूर्ण भूमि व्यवस्था को अहिंसक प्रत्यक्ष कार्रवाई से चुनौती देना।

और प्रशासन को कानून लागू करने पर मजबूर करना—

इस तरह स्वतंत्रता आंदोलन की तकनीक भूमि सुधार में पुनः प्रयुक्त हुई।

नक्सलवाद से वैचारिक दूरी

बोधगया क्षेत्र उस बिहार में था जहां नक्सलवादी आंदोलन भी फैल रहा था।

इसलिए संघर्ष वाहिनी को लगातार यह स्पष्ट करना पड़ा कि उसका रास्ता अलग है।

लेकिन दोनों का सामाजिक आधार कई मामलों में समान था—

यहीं दोनों मॉडलों का ऐतिहासिक तुलना-बिंदु बनता है।

क्या दोनों में प्रतिस्पर्धा थी?

गरीब किसान के सामने प्रश्न हो सकता था—

वह जो बंदूक से भू-स्वामी का भय तोड़ता है?

या वह जो सामूहिक अहिंसक आंदोलन से कानून लागू कराने की बात करता है?

बिहार के भूमि संघर्षों में यह वैचारिक प्रतिस्पर्धा वास्तविक थी।

लेकिन कई ग्रामीणों के लिए चुनाव इतना सिद्धांतगत नहीं होता था।

वे उस संगठन का समर्थन कर सकते थे जो उनके तत्काल प्रश्न पर प्रभावी दिखाई दे।

संघर्ष वाहिनी और राज्य

संघर्ष वाहिनी ने राज्य को पूर्णतः शत्रु घोषित नहीं किया।

यह भोजपुर की प्रारंभिक CPI(ML) राजनीति से महत्वपूर्ण अंतर था।

इसलिए उसे वही कानून लागू करना चाहिए।

यह लोकतांत्रिक–संवैधानिक संघर्ष की दिशा थी।

लेकिन राज्य पर भरोसा भी सीमित था

यदि केवल आवेदन देने से जमीन मिल जाती तो आंदोलन की आवश्यकता नहीं थी।

वाहिनी समझती थी कि प्रशासन पर सामाजिक और राजनीतिक दबाव आवश्यक है।

जनदबाव + कानून + प्रशासनिक कार्रवाई।

यह पूरी तरह सरकारी सुधारवाद भी नहीं था और राज्य-विरोधी क्रांति भी नहीं।

यह बीच का संघर्षशील लोकतांत्रिक रास्ता था।

जयप्रकाश नारायण की नैतिक छाया

जयप्रकाश नारायण का नाम संघर्ष वाहिनी को नैतिक वैधता देता था।

1974 के आंदोलन के कारण वे राष्ट्रीय प्रतीक बन चुके थे।

उनकी ‘संपूर्ण क्रांति’ की भाषा ने कार्यकर्ताओं को यह कहने की शक्ति दी कि भूमि संघर्ष कोई स्थानीय हिंसक विद्रोह नहीं—

बल्कि व्यापक सामाजिक परिवर्तन का हिस्सा है।

इससे सरकार के लिए आंदोलन को केवल कानून-व्यवस्था समस्या कहकर खारिज करना कठिन हुआ।

‘संपूर्ण क्रांति’ की वास्तविक परीक्षा

वाहिनी के भीतर धीरे-धीरे यह धारणा बनी कि 1974 में दिए गए नारे की असली परीक्षा गांव में होगी।

यदि भूमिहीन किसान जमीन से वंचित रहे,

यदि महिला के पास संपत्ति का अधिकार न हो,

तो केवल लोकतांत्रिक चुनाव वापस आ जाना संपूर्ण क्रांति नहीं है।

बोधगया ने इस वैचारिक दावे को वास्तविक सामाजिक संघर्ष में बदल दिया।

पुरुष कार्यकर्ताओं की सोच में परिवर्तन

आंदोलन की शुरुआत में भूमि-संघर्ष को मुख्यतः वर्गीय समस्या के रूप में देखा गया।

लेकिन जैसे-जैसे महिलाओं की भागीदारी बढ़ी, संगठन के पुरुष कार्यकर्ताओं को भी प्रश्नों का सामना करना पड़ा।

यहीं संघर्ष वाहिनी की अपनी विचारधारा भी विकसित हुई।

महिलाओं की बढ़ती भागीदारी

महिलाएं केवल पुरुषों के साथ जुलूस में चलने नहीं आईं।

और स्थानीय समितियों में सक्रिय हुईं।

यही सहभागिता आगे महिला भूमि-अधिकार की स्वतंत्र मांग में बदली।

महिला प्रश्न आंदोलन के भीतर से निकला

यह महत्वपूर्ण है कि महिलाओं का भूमि-अधिकार किसी बाहरी महिला संगठन ने ऊपर से नहीं थोपा।

आंदोलन की व्यावहारिक प्रक्रिया ने यह प्रश्न पैदा किया।

जब महिलाओं ने बराबर जोखिम उठाया तो उन्होंने बराबर अधिकार मांगा।

सहभागिता ने अधिकार की चेतना पैदा की।

यह बोधगया की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक प्रक्रियाओं में से एक थी।

भूमि आंदोलन से पितृसत्ता पर प्रश्न

यदि जमीन केवल पति के नाम हो, तो परिवार गरीब से थोड़ा कम गरीब हो सकता है।

लेकिन महिला का संपत्ति-अधिकार नहीं बदलता।

सामंती भू-सत्ता टूटे और घर की पुरुष-सत्ता बनी रहे—

यहीं ‘संपूर्ण क्रांति’ की अवधारणा परिवार के भीतर प्रवेश करती है।

संगठन की लोकतांत्रिक परीक्षा

महिलाओं के प्रश्न ने संघर्ष वाहिनी की भी परीक्षा ली।

यदि संगठन वास्तव में समानता की बात करता है, तो उसे अपने भीतर भी महिलाओं की बात सुननी होगी।

इसलिए बोधगया केवल किसान–मठ संघर्ष नहीं रहा।

वह आंदोलन के भीतर लोकतंत्र की परीक्षा भी बना।

यही उसे कई दूसरे किसान आंदोलनों से अलग करता है।

युवा कार्यकर्ताओं का सामाजिक परिवर्तन

गांव में रहने से शहर के छात्र कार्यकर्ताओं की सोच भी बदली।

इस अनुभव ने ‘संपूर्ण क्रांति’ को अधिक ठोस अर्थ दिया।

वह भूमि रिकॉर्ड, मजदूरी और पट्टा जैसे कठिन प्रश्नों से जुड़ गई।

आंदोलन और शोध

संघर्ष वाहिनी की एक विशेषता थी कि उसने राजनीतिक संघर्ष के साथ तथ्य जुटाने पर भी जोर दिया।

इनकी जानकारी आंदोलन के लिए आवश्यक थी।

इससे बोधगया संघर्ष भावनात्मक विरोध के बजाय तथ्य-आधारित भूमि अभियान बन सका।

भूमि रिकॉर्ड स्वयं सत्ता का प्रश्न

किसके नाम जमीन दर्ज है—यह तकनीकी प्रश्न लगता है।

लेकिन बोधगया में यही सत्ता का केंद्र था।

यदि मठ कहता है कि जमीन अमुक ट्रस्ट की है,

और आंदोलन कहता है कि ट्रस्ट केवल कागजी है,

तो अंतिम निर्णय भूमि रिकॉर्ड और प्रशासन करेगा।

राजस्व दस्तावेज भी राजनीतिक हथियार हैं।

रैली से गांव तक

8 अप्रैल 1978 की रैली ने आंदोलन शुरू किया।

लेकिन वास्तविक संघर्ष गांवों में हुआ।

यदि रैली के बाद गांव में संगठन न बनता तो आंदोलन कुछ महीनों में समाप्त हो जाता।

मजदूर–किसान समितियों ने इसे टिकाऊ बनाया।

यह किसान आंदोलन का एक सार्वभौमिक सबक है—

सभा आंदोलन शुरू कर सकती है; संगठन उसे जीवित रखता है।

संघर्ष का विस्तार

आंदोलन धीरे-धीरे दर्जनों गांवों तक फैला।

इस विस्तार ने मठ और प्रशासन दोनों पर दबाव बढ़ाया।

अब यह किसी एक विवादित खेत का मामला नहीं था।

यह गया जिले की भूमि संरचना का प्रश्न बन रहा था।

और इसके पीछे जयप्रकाश आंदोलन से निकला युवा नेटवर्क था।

यही संयोजन बोधगया को राष्ट्रीय महत्व देता है।

प्रशासन के साथ टकराव

जब मजदूर मठ की जमीन पर काम रोकते या उस पर अधिकार का दावा करते, तो प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था का प्रश्न खड़ा होता।

कुछ जगह फसल काटने को लेकर टकराव हुआ।

इससे वाहिनी के अहिंसक सिद्धांत की परीक्षा हुई।

क्या पुलिस दमन के बाद भी आंदोलन हिंसा से बचेगा?

इस प्रश्न का उत्तर अधिकांशतः हां रहा, हालांकि तनाव अत्यंत तीखा था।

अहिंसा की राजनीतिक शक्ति

बोधगया में अहिंसा का एक रणनीतिक लाभ भी था।

यदि भूमिहीन किसान निहत्थे होकर भूमि-अधिकार की मांग कर रहे हों और पुलिस उन पर बल प्रयोग करे, तो नैतिक दबाव सरकार पर जाता है।

भोजपुर के सशस्त्र संघर्ष में राज्य आसानी से ‘आंतरिक सुरक्षा’ की भाषा इस्तेमाल कर सकता था।

बोधगया में वही भाषा उतनी सरल नहीं थी।

इससे आंदोलन को नागरिक समाज और मीडिया में अधिक व्यापक सहानुभूति मिल सकती थी।

क्या अहिंसा अपने आप सफल थी?

अहिंसा तभी प्रभावी हुई क्योंकि उसके पीछे संगठन था।

तभी नैतिक दबाव राजनीतिक दबाव बनता है।

संघर्ष वाहिनी की राजनीतिक सीमा

संघर्ष वाहिनी की अपनी सीमाएं भी थीं।

वह मजबूत स्थायी राजनीतिक दल नहीं बनी।

उसके कार्यकर्ताओं की संख्या सीमित थी।

जयप्रकाश नारायण की मृत्यु के बाद उसकी व्यापक वैचारिक छत्रछाया कमजोर हुई।

आंदोलन समाप्त होने के बाद स्थानीय संगठन को टिकाए रखना कठिन था।

और अलग-अलग कार्यकर्ता बाद में अलग राजनीतिक तथा सामाजिक धाराओं में चले गए।

इसलिए उसकी उपलब्धि महत्वपूर्ण थी, लेकिन संस्थागत निरंतरता सीमित रही।

फिर भी वाहिनी का ऐतिहासिक महत्व

संघर्ष वाहिनी ने एक महत्वपूर्ण प्रयोग किया—

जेपी आंदोलन की आदर्शवादी युवा ऊर्जा को ठोस ग्रामीण सामाजिक परिवर्तन से जोड़ा।

अक्सर छात्र आंदोलन सत्ता परिवर्तन तक सीमित रह जाते हैं।

बोधगया में छात्रों की एक धारा ने पूछा—

सत्ता बदल गई, अब समाज बदलने के लिए क्या करेंगे?

भोजपुर और बोधगया : दो क्रांतियों की भाषा

अब दोनों आंदोलनों की तुलना और स्पष्ट होती है।

भोजपुर कहता था—

राज्य और सामंती सत्ता को क्रांतिकारी संघर्ष से चुनौती दो।

बोधगया कहता था—

जनता को संगठित करो, कानून लागू करवाओ और अहिंसक प्रत्यक्ष संघर्ष से भूमि-सत्ता बदलो।

‘संपूर्ण क्रांति’ का सबसे ठोस रूप

जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति की अवधारणा अक्सर व्यापक और आदर्शवादी मानी जाती है।

बोधगया भूमि संघर्ष उसका एक अत्यंत ठोस उदाहरण बना।

और महिलाओं को संपत्ति का अधिकार देना।

इससे अमूर्त विचार जमीन की वास्तविक राजनीति बन गया।

सरकार बदलने से आगे

1977 में केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद कई लोगों के लिए जेपी आंदोलन का लक्ष्य पूरा हो गया था।

लेकिन संघर्ष वाहिनी के लिए यह केवल पहला चरण था।

क्या नई सरकार से भूमिहीन किसान का जीवन बदल गया?

यदि उत्तर नहीं था, तो आंदोलन जारी रहना चाहिए।

यहीं संघर्ष वाहिनी चुनावी सत्ता परिवर्तन से अलग सामाजिक आंदोलन बनी।

युवा आंदोलन से किसान आंदोलन

बोधगया ने संघर्ष वाहिनी की पहचान भी बदल दी।

जिस संगठन की शुरुआत छात्र और युवा आंदोलन से हुई थी, वह अब किसान और खेतिहर मजदूर संघर्ष का नेतृत्व कर रहा था।

बाहरी नेतृत्व से स्वायत्त ग्रामीण चेतना

यह किसी भी वास्तविक जनआंदोलन की पहचान है।

खंड 12

बोधगया भूमि आंदोलन का विस्तार

1978 में बोधगया भूमि संघर्ष की औपचारिक शुरुआत के बाद आंदोलन का वास्तविक परीक्षण गांवों में हुआ। किसी राज्यस्तरीय रैली से भूमि-संबंध नहीं बदलते। इसके लिए आवश्यक था कि भूमिहीन मजदूर, बटाईदार और गरीब किसान स्वयं संगठित हों, मठ की भूमि के वास्तविक उपयोग और स्वामित्व के प्रश्न को गांव-दर-गांव उठाएं और प्रशासन पर लगातार दबाव बनाए रखें।

यहीं से छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का अभियान एक छात्र-युवा पहल से बढ़कर वास्तविक ग्रामीण किसान आंदोलन बना।

संगठन + सत्याग्रह + श्रम बहिष्कार + भूमि पर प्रत्यक्ष दावा।

यानी आंदोलन न तो केवल कानूनी याचिका था, न केवल नैतिक अपील और न ही सशस्त्र विद्रोह। उसने अहिंसक जनसंघर्ष के माध्यम से भूमि-सत्ता को व्यावहारिक रूप से चुनौती देने की कोशिश की।

रैली के बाद सबसे कठिन प्रश्न

8 अप्रैल 1978 की रैली में मठ की भूमि के प्रश्न को सार्वजनिक रूप से उठाना अपेक्षाकृत आसान था।

किस गांव में किस प्रकार का श्रम संबंध है?

और किस भूमि पर वास्तविक कब्जे का आंदोलन शुरू किया जा सकता है?

इसलिए आंदोलन की अगली अवस्था नारे से अधिक स्थानीय सामाजिक और भूमि-सर्वेक्षण पर आधारित थी।

गांव-दर-गांव संगठन

छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के कार्यकर्ताओं ने बोधगया और आसपास के अनेक गांवों में काम शुरू किया।

समकालीन और बाद के अध्ययनों में आंदोलन के लगभग 40 से 60 से अधिक गांवों तक फैलने का उल्लेख मिलता है।

1980 की India Today रिपोर्ट के अनुसार वाहिनी लगभग 62 गांवों में भूमिहीन मजदूरों को संगठित कर रही थी। (indiatoday.in)

इस संख्या को स्थिर सीमा नहीं समझना चाहिए।

आंदोलन का प्रभाव समय और संघर्ष के चरण के अनुसार बदलता रहा।

लेकिन इतना स्पष्ट है कि यह किसी एक गांव का आंदोलन नहीं रहा।

मजदूर–किसान समितियां : आंदोलन की रीढ़

गांवों में मजदूर–किसान समितियां बनाई गईं।

इन समितियों ने आंदोलन को टिकाऊ स्थानीय ढांचा दिया।

इनका काम केवल प्रदर्शन के लिए लोगों को इकट्ठा करना नहीं था।

मठ से जुड़े प्रबंधकीय तंत्र का विवरण रखतीं,

और जरूरत पड़ने पर प्रभावित परिवारों की सहायता भी करतीं।

इस तरह राजनीतिक निर्णय गांव के भीतर पहुंचा।

स्थानीय किसान नेतृत्व का उदय

आंदोलन की सफलता के लिए यह आवश्यक था कि संघर्ष वाहिनी के बाहरी कार्यकर्ता स्थायी ‘नेता’ न बने रहें।

यदि हर निर्णय पटना या छात्र नेताओं से आए तो ग्रामीण समुदाय राजनीतिक रूप से निर्भर बना रहेगा।

इसलिए स्थानीय भूमिहीनों और बटाईदारों में से नेतृत्व उभरा।

आंदोलन गरीबों के लिए चलने से गरीबों द्वारा चलाए जाने की दिशा में बढ़ा।

यही किसी जनआंदोलन की वास्तविक परिपक्वता होती है।

भूमिहीन मजदूर आंदोलन का मूल आधार

आंदोलन का सबसे बड़ा सामाजिक आधार भूमिहीन खेतिहर मजदूर थे।

उनके पास जीवनयापन के लिए पर्याप्त भूमि नहीं थी।

वे मठ या अन्य भू-स्वामियों की जमीन पर मजदूरी करते थे।

इसलिए उनके लिए जमीन का प्रश्न सीधा आर्थिक प्रश्न था।

इसीलिए भूमिहीनों की भागीदारी आंदोलन की ऊर्जा बनी।

बटाईदारों का अलग प्रश्न

बटाईदार भूमिहीन मजदूर से अलग स्थिति में थे।

वे जमीन स्वयं जोतते थे और उत्पादन का एक हिस्सा मालिक को देते थे।

स्वामित्व नहीं और काश्तकारी की पूर्ण सुरक्षा भी नहीं।

यदि मठ या उसका प्रतिनिधि उन्हें किसी वर्ष खेत से हटा दे तो उनके पास कानूनी प्रमाण सीमित हो सकते थे।

आंदोलन ने बटाईदारों को भी अधिकार-संघर्ष में शामिल किया।

इससे आंदोलन का आधार केवल मजदूरी करने वाले परिवारों तक सीमित नहीं रहा।

काश्तकारी का प्रमाण

बोधगया संघर्ष में रसीद और भूमि अभिलेख का प्रश्न महत्वपूर्ण था।

यदि किसान वर्षों से फसल का हिस्सा दे रहा है, लेकिन उसे कोई आधिकारिक रसीद नहीं मिलती, तो भविष्य में वह यह कैसे सिद्ध करेगा कि वह वास्तविक काश्तकार था?

यही कारण है कि आंदोलन ने दस्तावेजी अधिकार को भी राजनीतिक मुद्दा बनाया।

भोजपुर के आरंभिक सशस्त्र चरण में भूमि-संबंधों पर सीधी शक्ति-चुनौती प्रमुख थी।

बोधगया में उसी प्रश्न के साथ राजस्व रिकॉर्ड और कानूनी मान्यता भी महत्वपूर्ण बने।

कामिया मजदूरों की भागीदारी

कुछ गांवों में भूमिहीन परिवार कामिया संबंधों में बंधे हुए थे।

ऐसे परिवारों के लिए संघर्ष दोहरा था—

पीढ़ीगत आश्रित श्रम संबंध से मुक्त होना।

कामिया यदि मालिक का खेत छोड़ दे तो उसके सामने रोजगार और जीविका का संकट खड़ा हो सकता था।

इसलिए सामूहिक संगठन अत्यंत आवश्यक था।

सामूहिकता ने निर्भरता को चुनौती दी

वह इस बात में भी थी कि अलग-अलग गरीब परिवार उस पर निर्भर थे।

संघर्ष वाहिनी ने इस निर्भरता को सामूहिकता में बदलने की कोशिश की।

यदि एक परिवार काम छोड़ता तो वह भूखा पड़ सकता था।

यदि पूरा गांव काम छोड़ दे तो समस्या मालिक की बन जाती है।

श्रम बहिष्कार

आंदोलन की सबसे प्रभावी रणनीतियों में से एक था—

लेकिन उसका प्रभाव सीधा कृषि उत्पादन पर पड़ता था।

इसलिए मजदूरों ने अपनी श्रम-शक्ति को राजनीतिक हथियार में बदल दिया।

जॉर्ज कुन्नाथ के अध्ययन में 1979 के आसपास मठ की भूमि पर काम न करने और बाहर से मजदूर लाने का विरोध करने की ऐसी कार्रवाइयों का उल्लेख मिलता है। (dokumen.pub)

बाहर से मजदूर लाने की कोशिश

हड़ताल का जवाब अक्सर बाहर से मजदूर बुलाकर दिया जा सकता था।

यदि ऐसा सफल हो जाए तो स्थानीय मजदूरों का सामूहिक दबाव टूट जाता।

इसलिए आंदोलन ने आसपास के गांवों तक संपर्क बढ़ाया।

दूसरे गांवों के मजदूरों से कहा गया—

यह गांव-दर-गांव वर्गीय एकजुटता का महत्वपूर्ण रूप था।

आंदोलन का क्षेत्रीय विस्तार

जब एक गांव का मजदूर दूसरे गांव की हड़ताल का सम्मान करता है, तो संघर्ष स्थानीय नहीं रह जाता।

यहीं बोधगया आंदोलन क्षेत्रीय किसान आंदोलन बनता है।

इसके लिए समितियों और कार्यकर्ताओं के बीच नियमित संपर्क आवश्यक था।

मठ की भू-संपत्ति बनाम दर्जनों गांवों के भूमिहीन

सत्याग्रह : केवल धरना नहीं

बोधगया आंदोलन में सत्याग्रह का अर्थ केवल शांतिपूर्वक बैठना नहीं था।

अहिंसा यहां निष्क्रियता नहीं बल्कि संगठित दबाव की पद्धति थी।

भूमि पर प्रवेश

भूमि पर प्रत्यक्ष प्रवेश आंदोलन की राजनीति का निर्णायक चरण था।

जब भूमिहीन किसान किसी विवादित खेत पर जाकर कहता है—

तो संघर्ष कागजी दावे से भौतिक वास्तविकता में बदल जाता है।

और यहीं आंदोलन की अहिंसक अनुशासन क्षमता की परीक्षा होती है।

जमीन स्वयं जोतने की रणनीति

1980 के आसपास आंदोलन ने ऐसे कदम उठाए जिसमें गरीब किसान मठ के नियंत्रण से भूमि निकालकर स्वयं खेती करने लगे या उसका प्रयास किया।

बिना अग्रवाल के अध्ययन में भूमि को वास्तविक रूप से जोतने वालों के नियंत्रण में लाने की दिशा को आंदोलन की महत्वपूर्ण अवस्था बताया गया है। (ccc.uchicago.edu)

अब आंदोलन केवल मांग नहीं कर रहा था।

वह वैकल्पिक भूमि-संबंध का प्रदर्शन कर रहा था।

फसल का प्रश्न

किसी विवादित भूमि पर खेती हो जाने के बाद अगला प्रश्न था—

श्रम हमारा, इसलिए फसल पर हमारा अधिकार।

फसल काटने का समय अक्सर कृषि आंदोलनों में निर्णायक टकराव का समय होता है।

फसल काटने की सामूहिक कार्रवाई

कुछ जगह किसानों ने सामूहिक रूप से फसल काटने का प्रयास किया।

ऐसी कार्रवाई में बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल होते।

इसका उद्देश्य केवल अनाज हासिल करना नहीं था।

यह मालिकाना दावे की सार्वजनिक घोषणा थी।

समकालीन पत्रकारिता में भी बोधगया मठ की भूमि पर उगी फसल में हिस्सेदारी मांगने वाले मजदूरों और पुलिस कार्रवाई का उल्लेख मिलता है। (indiatoday.in)

पुलिस की भूमिका

मठ कानूनी स्वामित्व का दावा करता था।

किसान वास्तविक श्रम और भूमि-सुधार का दावा करते थे।

ऐसे में पुलिस अक्सर मौजूदा कब्जे और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए भेजी जाती।

राज्य एक अन्यायपूर्ण भूमि-संबंध की रक्षा कर रहा है।

यहीं बोधगया में भी राज्य की निष्पक्षता पर प्रश्न उठे।

गिरफ्तारी आंदोलन का हिस्सा बनी

बोधगया आंदोलन की राजनीति में गिरफ्तारी को पराजय नहीं माना गया।

सत्याग्रही गिरफ्तारी देने के लिए तैयार रहते थे।

लेकिन अन्यायपूर्ण व्यवस्था को स्वीकार भी नहीं करेंगे।

यह गांधीवादी सत्याग्रह की परंपरा से सीधा संबंध रखता था।

जेल जाने से गरीब क्यों नहीं डरे?

भूमिहीन किसान के लिए गिरफ्तारी बहुत गंभीर बात थी।

फिर भी बड़ी संख्या में ग्रामीण सत्याग्रह में शामिल हुए।

इसका अर्थ था कि भूमि प्रश्न उनके लिए केवल आर्थिक मांग नहीं रह गया था।

वह आत्मसम्मान और अधिकार का प्रश्न बन चुका था।

महिलाओं की गिरफ्तारी

महिलाओं की भागीदारी ने आंदोलन की नैतिक शक्ति बढ़ाई।

वे धरनों, जुलूसों और भूमि सत्याग्रह में शामिल हुईं।

जब ग्रामीण महिला, जो पहले सार्वजनिक राजनीति से लगभग बाहर थी, पुलिस के सामने गिरफ्तारी देने लगे तो यह सामाजिक परिवर्तन का संकेत था।

यहीं से महिला नेतृत्व का स्वतंत्र आधार विकसित होने लगा।

घरेलू जिम्मेदारी और आंदोलन

महिला की भागीदारी पुरुष से अधिक कठिन थी।

इसलिए उसका आंदोलन में आना परिवार की पूरी सामाजिक संरचना बदलने वाला कदम था।

यह आगे भूमि के स्वतंत्र महिला अधिकार की मांग को जन्म देगा।

महिलाओं ने आंदोलन की भाषा बदली

महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के बाद प्रश्न हुआ—

यहीं वर्गीय संघर्ष लैंगिक संघर्ष से जुड़ गया।

यह परिवर्तन गांव समितियों के भीतर से ही पैदा हुआ।

इसलिए बोधगया की महिला राजनीति बाहरी जोड़ नहीं थी।

वह आंदोलन के विकास का स्वाभाविक परिणाम थी।

समितियों में महिलाएं

महिलाओं की उपस्थिति केवल जुलूस तक सीमित नहीं रही।

कुछ क्षेत्रों में उन्होंने स्थानीय बैठक और संगठनात्मक निर्णयों में भाग लिया।

यह महत्वपूर्ण था क्योंकि ग्रामीण राजनीतिक संस्थाएं परंपरागत रूप से पुरुष-प्रधान थीं।

महिला का समिति में बोलना स्वयं सामाजिक सत्ता में बदलाव था।

भूमिहीनता और घरेलू पितृसत्ता

गरीब महिला की स्थिति दोहरी निर्भरता से बनी थी।

महिला परिवार के पुरुष मुखिया पर निर्भर।

यदि केवल पहली निर्भरता टूटे तो महिला की पूर्ण मुक्ति नहीं होती।

इसलिए भूमि के महिला-स्वामित्व का प्रश्न आगे आंदोलन की वैचारिक सीमा को विस्तृत करता है।

सत्याग्रह और स्थानीय सामाजिक बहिष्कार

आंदोलन ने कई बार सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार का भी उपयोग किया।

तो सामुदायिक स्तर पर उसका विरोध हो सकता था।

यह भी अहिंसक सामाजिक दबाव का तरीका था।

लेकिन यहां भी सावधानी आवश्यक थी कि सामूहिक दबाव व्यक्तिगत उत्पीड़न में न बदले।

अहिंसक अनुशासन की चुनौती

हजारों गरीब परिवारों के बीच लंबे संघर्ष में अहिंसा बनाए रखना सरल नहीं होता।

संघर्ष वाहिनी ने गांधीवादी अनुशासन को बनाए रखने का प्रयास किया।

यही उसे आसपास सक्रिय नक्सलवादी राजनीति से अलग पहचान देता था।

नक्सलवाद की निकट उपस्थिति

बोधगया और गया जिला उस व्यापक मध्य बिहार क्षेत्र का हिस्सा थे जहां नक्सलवादी संगठन भी सक्रिय थे।

इसलिए भूमिहीन किसानों के सामने दो अलग राजनीतिक अनुभव मौजूद थे।

इस सामाजिक तुलना ने बोधगया आंदोलन को भारतीय किसान इतिहास में लगभग प्रयोगशाला जैसी स्थिति दी।

अहिंसा का एक व्यावहारिक लाभ

अहिंसक आंदोलन के कारण सरकार के लिए व्यापक सैन्य कार्रवाई को वैध ठहराना कठिन था।

यदि ग्रामीण निहत्थे भूमि पर बैठें और उन्हें बलपूर्वक हटाया जाए तो राजनीतिक सहानुभूति आंदोलन की ओर जा सकती थी।

इसलिए अहिंसा नैतिक होने के साथ रणनीतिक भी थी।

प्रशासन पर कानूनी दबाव

आंदोलनकारियों की महत्वपूर्ण मांग थी—

पहले तय कीजिए कि मठ कानूनन कितनी भूमि रख सकता है।

बेनामी या अवैध हस्तांतरण की जांच हो।

और फिर भूमिहीनों में वितरण किया जाए।

इस प्रकार आंदोलन का प्रत्यक्ष सत्याग्रह प्रशासनिक भूमि-सुधार प्रक्रिया से जुड़ा रहा।

जांच समितियों का महत्व

भूमि विवाद की जांच के लिए प्रशासनिक समितियां और राजस्व प्रक्रियाएं आगे बढ़ीं।

आंदोलनकारियों ने इसे अपनी सफलता माना कि सरकार को मठ की भूमि-संपत्ति की वैधता की जांच करनी पड़ी।

यह दिखाता है कि जनदबाव ने राज्य को तकनीकी भूमि-प्रश्न पर सक्रिय होने को मजबूर किया।

लेकिन जांच और वास्तविक जमीन वितरण के बीच लंबा अंतर रहा।

कागज से कब्जे तक

बिहार के भूमि सुधारों की सबसे बड़ी समस्या यही थी—

सरकारी आदेश और वास्तविक कब्जे के बीच दूरी।

इनमें से किसी चरण पर प्रक्रिया रुक सकती थी।

बोधगया आंदोलन ने इस पूरे प्रशासनिक अंतर को उजागर किया।

केवल पट्टा पर्याप्त नहीं

भूमि अधिकार का अर्थ केवल कागज नहीं।

यदि किसान को पट्टा मिल जाए लेकिन वह जमीन पर जा न सके तो अधिकार अधूरा है।

यदि कब्जा मिल जाए लेकिन सिंचाई न हो तो उत्पादन सीमित है।

यदि उत्पादन हो लेकिन ऋण और बाजार न हो तो आर्थिक स्वतंत्रता अधूरी है।

इसलिए बोधगया आंदोलन के बाद भूमि वितरण के वास्तविक प्रभाव का प्रश्न भी महत्वपूर्ण बना।

आंदोलन में सामूहिक सहायता

संघर्ष लंबा चले तो गरीब परिवार आर्थिक संकट में पड़ सकते हैं।

इसलिए संगठन को पारस्परिक सहायता की आवश्यकता होती है।

जेल गए कार्यकर्ताओं के परिवारों की सहायता—

आंदोलन को टिकाने के लिए महत्वपूर्ण थे।

ऐसी सामाजिक एकजुटता आंदोलन को केवल राजनीतिक संगठन से समुदाय में बदलती है।

बाहरी समर्थन

छात्र युवा संघर्ष वाहिनी की वजह से आंदोलन को ग्रामीण सीमा से बाहर भी समर्थन मिला।

और बाद में महिला अधिकार कार्यकर्ता—

इससे मठ और सरकार दोनों पर व्यापक सार्वजनिक दबाव बना।

मीडिया की भूमिका

समकालीन मीडिया रिपोर्टों ने आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया।

1980 की India Today रिपोर्ट में बोधगया के मजदूरों द्वारा मठ की कृषि संपत्ति से फसल में हिस्सेदारी की मांग और प्रशासन से टकराव का विवरण दिया गया। (indiatoday.in)

यह महत्वपूर्ण था क्योंकि अब विवाद स्थानीय महंत और ग्रामीणों के बीच बंद नहीं रहा।

वह राष्ट्रीय भूमि-सुधार बहस का हिस्सा बन गया।

आंदोलन की नैतिक भाषा

संघर्ष वाहिनी ने जानबूझकर भूमि की मांग को नैतिक भाषा में भी रखा।

क्या हजारों एकड़ कृषि भूमि किसी धार्मिक संस्था के प्रभाव में रहे जबकि उसे जोतने वाले गरीब भूमिहीन हों?

इस नैतिक प्रश्न ने आंदोलन की सार्वजनिक स्वीकार्यता बढ़ाई।

धार्मिक संस्था के विरुद्ध संघर्ष को धर्म-विरोधी कहे जाने से बचाने के लिए भी यह भाषा महत्वपूर्ण थी।

धर्म नहीं, संपत्ति संबंध लक्ष्य था

आंदोलन ने लगातार यह अंतर बनाए रखने की कोशिश की—

भूमि-संघर्ष का लक्ष्य धार्मिक आस्था नहीं बल्कि संपत्ति-संबंध था।

इससे संघर्ष को व्यापक सामाजिक समर्थन जुटाने में मदद मिली।

मठ की प्रतिक्रिया

मठ पक्ष ने स्वाभाविक रूप से अपनी भूमि पर कानूनी स्वामित्व का दावा किया।

उसकी दृष्टि से आंदोलनकारी अनधिकृत कब्जा कर रहे थे।

इसलिए मामला केवल नैतिक दावा बनाम अन्याय नहीं था।

यह प्रतिस्पर्धी कानूनी अधिकारों का भी विवाद था।

यही कारण है कि कई मामले प्रशासन और अदालतों तक पहुंचे।

कानूनी संघर्ष लंबा क्यों चला?

भूमि अनेक नामों और ट्रस्ट संरचनाओं में दर्ज थी।

कई किसानों के पास लिखित दस्तावेज नहीं थे।

भूमि-सीमा कानून की व्याख्या पर मतभेद थे।

इसलिए एक बड़े आंदोलन के बावजूद कानूनी समाधान जल्दी संभव नहीं हुआ।

भूमि राजनीति की यह तकनीकी जटिलता अक्सर जनआंदोलन की तुलना में कम दिखाई देती है, लेकिन परिणाम तय करने में अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

1980–81 : संघर्ष का निर्णायक चरण

1980 और 1981 के आसपास आंदोलन भूमि पर प्रत्यक्ष दावे, फसल संघर्ष और प्रशासनिक कार्रवाई के दबाव के कारण अधिक तीखा हुआ।

सरकार पर मठ की जमीन की जांच और अधिशेष भूमि की पहचान का दबाव बढ़ा।

इसी दौर से कुछ गांवों में भूमि के वास्तविक हस्तांतरण और वितरण की प्रक्रिया आगे बढ़ने लगी।

यह आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि थी।

लेकिन विजय तत्काल और पूर्ण नहीं थी।

जमीन का वितरण

विभिन्न अध्ययनों में आंदोलन के परिणामस्वरूप मठ से जुड़ी हजारों एकड़ भूमि के भूमिहीनों में वितरण का उल्लेख मिलता है, लेकिन अलग-अलग स्रोतों में वितरण की कुल मात्रा अलग मिलती है।

इसलिए एक ही अंतिम संख्या देने के बजाय यह कहना अधिक सुरक्षित है कि—

आंदोलन ने मठ की हजारों एकड़ भूमि को भूमि-सीमा और पुनर्वितरण प्रक्रिया के दायरे में लाने में निर्णायक भूमिका निभाई और बड़ी संख्या में भूमिहीन परिवारों को भूमि प्राप्त हुई।

ठीक आंकड़ों को अंतिम स्रोत-अध्याय में सरकारी अभिलेखों से अलग-अलग वर्गीकृत करना उचित होगा।

वितरण में महिलाओं का प्रश्न

जैसे ही वास्तविक भूमि वितरण की संभावना बढ़ी, महिलाओं का प्रश्न निर्णायक हो गया।

यदि पट्टा परिवार को मिलना है तो नाम किसका?

यहीं महिला कार्यकर्ताओं ने स्वतंत्र या संयुक्त अधिकार की मांग उठाई।

इसने आंदोलन को एक बिल्कुल नए स्तर पर पहुंचा दिया।

भूमिहीन परिवार के भीतर भी संपत्ति का न्यायपूर्ण वितरण कैसे हो?

महिलाओं ने पुरुष साथियों को चुनौती दी

यह संघर्ष बाहरी भू-स्वामी से कठिन था क्योंकि अब प्रतिद्वंद्वी आंदोलन का अपना सामाजिक ढांचा था।

कुछ पुरुष कार्यकर्ता जमीन पुरुष के नाम होने को सामान्य मान सकते थे।

अगर सामंती संपत्ति-संबंध अन्यायपूर्ण हैं तो पितृसत्तात्मक संपत्ति-संबंध न्यायपूर्ण कैसे हैं?

यही बोधगया आंदोलन की सबसे उल्लेखनीय वैचारिक छलांग थी।

गांव समिति से महिला चेतना तक

महिला भूमि-अधिकार का विचार अचानक नहीं आया।

इन सबने महिलाओं को अपने योगदान का राजनीतिक अर्थ समझाया।

इसलिए जमीन के नाम पर उनका सवाल आंदोलन के अनुभव से निकला।

बोधगया और भारतीय महिला आंदोलन

यही कारण है कि बोधगया भूमि संघर्ष बाद में भारतीय महिला आंदोलन के इतिहास में महत्वपूर्ण संदर्भ बना।

बिना अग्रवाल ने महिलाओं के स्वतंत्र भूमि-अधिकार की बहस में बोधगया को एक उल्लेखनीय उदाहरण माना है, जहां किसान महिलाओं ने यह प्रश्न प्रत्यक्ष राजनीतिक संघर्ष के भीतर उठाया कि किसान की परिभाषा केवल पुरुष क्यों हो। (ccc.uchicago.edu)

यह भारतीय कृषि नीति के लिए बहुत बड़ा वैचारिक प्रश्न था।

भूमि सुधार की पारंपरिक इकाई : परिवार

राज्य की भूमि नीति सामान्यतः ‘परिवार’ को इकाई मानती थी।

लेकिन परिवार को एक समान हित वाला समूह मान लेना पितृसत्ता को छिपा सकता है।

परिवार में भूमि पर वास्तविक नियंत्रण प्रायः पुरुष के पास होता है।

इसलिए बोधगया की महिलाओं ने भूमि सुधार को एक नई कसौटी दी—

भूमि किस परिवार को मिली यह पर्याप्त नहीं; परिवार के भीतर किसे अधिकार मिला यह भी देखना होगा।

आंदोलन की वास्तविक उपलब्धि क्या थी?

बोधगया आंदोलन की उपलब्धि कई स्तरों पर थी—

और राज्य को भूमि कानून लागू करने के लिए बाध्य करना।

इन सबका संयुक्त प्रभाव अधिक महत्वपूर्ण था।

सीमाएं भी स्पष्ट थीं

फिर भी आंदोलन पूर्ण समाधान नहीं था।

कुछ जमीन की गुणवत्ता खराब हो सकती थी।

महिलाओं को मिले अधिकार व्यवहार में हमेशा स्वतंत्र नियंत्रण में नहीं बदले।

और आंदोलन समाप्त होने के बाद संगठनात्मक शक्ति भी कई क्षेत्रों में कमजोर हुई।

इन सीमाओं को स्वीकार करना आवश्यक है।

अहिंसा ने क्या हासिल किया?

बोधगया का अनुभव दिखाता है कि अहिंसक आंदोलन भी वास्तविक संपत्ति-संबंध को चुनौती दे सकता है।

लेकिन सफलता केवल नैतिक अपील से नहीं मिली।

भोजपुर से दूसरा बड़ा अंतर

भोजपुर में हिंसक कार्रवाई ने भू-स्वामी के भय को तोड़ा।

बोधगया में सामूहिक श्रम बहिष्कार और सत्याग्रह ने मठ की आर्थिक शक्ति को चुनौती दी।

यह तुलना दोनों आंदोलनों की राजनीतिक प्रकृति का सार देती है।

फिर भी दोनों की गहरी समानता

दोनों जगह आर्थिक प्रश्न सामाजिक सम्मान से जुड़ा।

दोनों जगह राज्य की निष्पक्षता पर प्रश्न उठा।

दोनों जगह बाहरी राजनीतिक विचार स्थानीय सामाजिक अनुभव से बदले।

और दोनों में अंततः गरीब ग्रामीण नागरिकता का नया रूप सामने आया।

इसलिए दोनों अलग रास्तों के बावजूद एक ही व्यापक भूमि इतिहास का हिस्सा हैं।

भूमि-सत्याग्रह से सामाजिक परिवर्तन तक

हम अधिकारधारी किसान भी हो सकते हैं।

खंड 13

महिलाओं की निर्णायक भूमिका

आंदोलन में भागीदारी से स्वतंत्र भूमि-अधिकार की मांग तक

बोधगया भूमि संघर्ष को भारतीय किसान आंदोलनों के इतिहास में विशिष्ट बनाने वाला सबसे महत्वपूर्ण तत्व था—महिलाओं की सक्रिय भागीदारी और भूमि पर उनके स्वतंत्र अधिकार की मांग।

कई किसान आंदोलनों में महिलाएं भाग लेती रही थीं, लेकिन उनका योगदान अक्सर परिवार, समुदाय या किसान संगठन की सामूहिक पहचान में समा जाता था। बोधगया में ऐसा नहीं हुआ। यहां महिलाएं धीरे-धीरे आंदोलन की सहभागी से आगे बढ़कर स्वतंत्र अधिकार-धारी राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में सामने आईं।

उन्होंने केवल यह नहीं कहा कि भूमिहीन परिवार को जमीन मिलनी चाहिए। उन्होंने पूछा—

“यदि हमने भी खेत जोता, सत्याग्रह किया, पुलिस का सामना किया और जेल गईं, तो जमीन केवल पति के नाम क्यों?”

यहीं से बोधगया भूमि संघर्ष भारतीय महिला भूमि-अधिकार आंदोलन का भी ऐतिहासिक अध्याय बन गया।

ग्रामीण कृषि में महिलाओं का अदृश्य श्रम

ग्रामीण बिहार की कृषि अर्थव्यवस्था में महिलाओं का श्रम अत्यंत व्यापक था।

और परिवार की घरेलू अर्थव्यवस्था चलाती थीं।

लेकिन इस व्यापक श्रम के बावजूद जमीन पर स्वामित्व प्रायः पुरुषों के नाम रहता था।

श्रम महिलाओं का था, संपत्ति का अधिकार पुरुष का।

बोधगया आंदोलन ने इसी विरोधाभास को पहली बार बड़े पैमाने पर राजनीतिक प्रश्न बनाया।

‘किसान’ की पारंपरिक परिभाषा पर प्रश्न

भारतीय कृषि नीति और सामाजिक भाषा में ‘किसान’ शब्द लंबे समय तक प्रायः पुरुष के रूप में समझा जाता रहा।

महिला खेत में काम करती थी, लेकिन उसे ‘किसान की पत्नी’ कहा जाता था।

यदि जमीन पति के नाम हो, तो वह किसान माना जाता था।

यदि वही खेत पत्नी दिनभर जोते, तो उसका दर्जा प्रायः ‘सहायक’ का रहता था।

बोधगया की महिलाओं ने इस पर प्रश्न उठाया—

जो खेत में काम करती है, वह स्वयं किसान क्यों नहीं?

यह प्रश्न आगे भारतीय महिला आंदोलन और भूमि-अधिकार विमर्श में अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया।

आंदोलन में महिलाओं की प्रारंभिक भागीदारी

शुरुआत में महिलाएं परिवार और समुदाय के साथ आंदोलन में आईं।

यह भागीदारी धीरे-धीरे उनकी राजनीतिक चेतना को बदलने लगी।

2025 के एक अध्ययन में बोधगया आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी को उल्लेखनीय बताया गया है और कई क्षेत्रों में उनकी हिस्सेदारी लगभग 30 से 40 प्रतिशत तक आंकी गई है। (tandfonline.com)

यह कोई प्रतीकात्मक उपस्थिति नहीं थी।

महिलाएं आंदोलन की वास्तविक सामाजिक शक्ति थीं।

जोखिम में बराबरी, अधिकार में असमानता

यहीं महिलाओं ने एक बुनियादी अंतर्विरोध महसूस किया।

इस असमानता ने महिला कार्यकर्ताओं को आंदोलन के भीतर ही प्रश्न उठाने पर मजबूर किया।

यहीं से सहभागिता राजनीतिक अधिकार की मांग में बदलती है।

‘परिवार’ शब्द की पितृसत्तात्मक सीमा

भूमि सुधार की सरकारी भाषा में अक्सर कहा जाता था—

लेकिन व्यवहार में ‘परिवार’ का प्रतिनिधि सामान्यतः पुरुष मुखिया होता था।

परिवार की अवधारणा पितृसत्ता को छिपा सकती थी।

बोधगया की महिलाओं ने इसी संरचना को चुनौती दी।

स्वतंत्र पट्टे की मांग

महिलाओं ने कहा कि जमीन केवल पति के नाम न हो।

कुछ जगह संयुक्त अधिकार की मांग भी उठी—

इससे भूमि-सुधार की बहस परिवार से व्यक्ति तक पहुंची।

स्वतंत्र भूमि-अधिकार इतना महत्वपूर्ण क्यों था?

यदि महिला के पास अपनी जमीन हो तो उसके जीवन पर कई प्रभाव पड़ सकते हैं।

पति या परिवार पर निर्भरता कम हो सकती है।

घरेलू हिंसा की स्थिति में उसके पास जीवनयापन का साधन होता है।

बुढ़ापे में उसकी स्थिति मजबूत हो सकती है।

बच्चों के पालन-पोषण में उसका निर्णयात्मक स्थान बढ़ता है।

महिला की स्वतंत्रता का आधार बन सकती थी।

शराब और घरेलू हिंसा का प्रश्न

बोधगया आंदोलन में महिलाओं ने केवल बाहरी भू-स्वामी सत्ता का विरोध नहीं किया।

उन्होंने परिवार के भीतर पुरुष व्यवहार पर भी प्रश्न उठाया।

कुछ अध्ययनों में महिलाओं द्वारा शराब और घरेलू हिंसा को जमीन के स्वामित्व से जोड़ने का उल्लेख मिलता है। यदि जमीन केवल पति के नाम हो और वह शराब, ऋण या घरेलू हिंसा में परिवार को संकट में डाल दे, तो महिला के पास सुरक्षा का स्वतंत्र साधन नहीं रहता।

इसीलिए महिला स्वामित्व को परिवार की आर्थिक स्थिरता से भी जोड़ा गया।

पितृसत्ता और वर्ग-संघर्ष का टकराव

किसान आंदोलन अक्सर वर्गीय समानता की बात करता है।

लेकिन यदि किसान परिवार के भीतर पुरुष और महिला के अधिकार असमान हों तो वर्गीय समानता अधूरी रहती है।

यहीं बोधगया आंदोलन के भीतर एक कठिन प्रश्न उठा—

क्या केवल भू-स्वामी सत्ता तोड़ना पर्याप्त है?

अगर गरीब पुरुष भूमि का मालिक बन जाए और उसकी पत्नी फिर भी संपत्ति से वंचित रहे, तो क्या सामाजिक न्याय पूरा हुआ?

आंदोलन के पुरुष नेताओं की परीक्षा

यह मांग केवल सरकार या मठ के लिए चुनौती नहीं थी।

यह छात्र युवा संघर्ष वाहिनी और किसान समितियों के पुरुष नेताओं के लिए भी परीक्षा थी।

यदि संगठन समानता का दावा करता है, तो उसे महिलाओं की मांग स्वीकार करनी होगी।

इससे आंदोलन के भीतर लोकतंत्र गहरा हुआ।

यानी बोधगया ने बाहरी सत्ता के साथ-साथ अपने संगठन की भी परीक्षा ली।

भागीदारी से नेतृत्व तक

महिलाओं की भूमिका धीरे-धीरे बदलती गई।

पहले वे पुरुष परिवारजनों के साथ आंदोलन में आईं।

और अंततः भूमि-अधिकार की स्वतंत्र मांग सामने रखी।

सहभागिता → चेतना → सवाल → संगठन → अधिकार की मांग।

यही राजनीतिक सशक्तीकरण की वास्तविक प्रक्रिया है।

महिला नेतृत्व का स्थानीय चरित्र

बोधगया की महिला चेतना ऊपर से थोपे गए नारीवादी एजेंडे का परिणाम नहीं थी।

यह गांव की वास्तविक परिस्थितियों से निकली।

पति की आय पर निर्भरता क्या अर्थ रखती है।

और जमीन के बिना विधवा या परित्यक्ता होने की स्थिति कितनी कठिन हो सकती है।

इसलिए महिला भूमि-अधिकार का प्रश्न सीधे जीवन अनुभव से निकला।

भुइयां महिलाओं की भूमिका

बोधगया आंदोलन में भुइयां समुदाय की महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से उल्लेखनीय थी।

इनमें कई महिलाएं ऐसे परिवारों से थीं जिनका इतिहास कामिया या आश्रित श्रम से जुड़ा था।

बल्कि पीढ़ीगत अधीनता से बाहर निकलना।

2021 के अध्ययन में बोधगया आंदोलन को भुइयां महिलाओं और पुरुषों में नए दलित राजनीतिक व्यक्तित्व के निर्माण से जोड़ा गया है। (sciencedirect.com)

महिला और जातिगत अधीनता

दलित महिला की स्थिति में तीन स्तर की असमानता एक साथ काम कर सकती थी—

इसलिए भूमि-अधिकार उसके लिए तीनों स्तरों पर शक्ति प्रदान कर सकता था।

भू-स्वामी सत्ता और महिला की असुरक्षा

ग्रामीण बिहार के कई क्षेत्रों में गरीब महिलाओं ने भू-स्वामी या प्रभावशाली पुरुषों की यौन-सत्ता का भी अनुभव किया।

भोजपुर में यह प्रश्न अधिक स्पष्ट रूप से ‘इज्जत’ की राजनीति से जुड़ा था।

बोधगया में भूमि स्वामित्व महिला की इस निर्भरता को कमजोर करने का एक संरचनात्मक उपाय बन सकता था।

यदि महिला के परिवार के पास अपनी जमीन हो, तो उसे किसी बड़े मालिक के खेत पर हर हाल में निर्भर रहना कम पड़ सकता है।

इसलिए भूमि और लैंगिक गरिमा का संबंध गहरा था।

सत्याग्रह में महिलाओं की अग्रिम भूमिका

महिलाओं ने अनेक भूमि-सत्याग्रहों में अग्रिम पंक्ति में भाग लिया।

इसका व्यावहारिक और प्रतीकात्मक दोनों महत्व था।

राज्य के लिए आंदोलन को हिंसक समूह के रूप में प्रस्तुत करना कठिन हुआ।

ग्रामीण महिलाओं की शांतिपूर्ण लामबंदी आंदोलन की नैतिक शक्ति बढ़ाती थी।

पुलिस का सामना

महिलाओं की भागीदारी केवल सुरक्षित बैठकों तक सीमित नहीं थी।

उन्होंने पुलिस के सामने भी प्रतिरोध किया।

यह अनुभव उन्हें राजनीति के प्रत्यक्ष क्षेत्र में लाया।

जो महिला पहले राजस्व कार्यालय या पुलिस थाने तक जाने से डरती थी, वही अब सामूहिक रूप से प्रशासन से बात कर रही थी।

यह सामाजिक परिवर्तन का गहरा संकेत था।

जेल और राजनीतिक चेतना

गिरफ्तारी का अनुभव भी महिलाओं की राजनीतिक चेतना को बदलता है।

उनके जैसे अनेक परिवार संघर्ष में हैं।

जेल या हिरासत राजनीतिक अनुभव बन सकती है।

यह उन्हें घर की सीमाओं से बाहर व्यापक सामाजिक पहचान देती है।

इसलिए राजनीतिक दमन कभी-कभी अनजाने में आंदोलनकारियों की सामूहिक पहचान मजबूत कर देता है।

घरेलू काम और राजनीतिक भागीदारी

महिला के लिए आंदोलन में भागीदारी का अर्थ अतिरिक्त भार भी था।

और फिर बैठक, सत्याग्रह या रैली में जाना था।

इस ‘दोहरी’ या ‘तिहरी’ जिम्मेदारी को समझे बिना महिला आंदोलन की वास्तविक कीमत नहीं समझी जा सकती।

पुरुषों का घरेलू श्रम साझा करना

जहां महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी, वहां परिवार में काम के विभाजन पर भी प्रश्न उठा।

यदि महिला दिनभर आंदोलन में है तो घर का काम कौन करेगा?

यह सरल प्रश्न पितृसत्तात्मक व्यवस्था को चुनौती देता है।

हालांकि व्यापक स्तर पर घरेलू श्रम का बराबर बंटवारा नहीं हुआ, फिर भी आंदोलन ने इस असमानता को पहली बार सार्वजनिक बहस में लाया।

परिवार के भीतर सत्ता-संतुलन

भूमि महिला के नाम होने से पारिवारिक निर्णय पर उसका प्रभाव बढ़ सकता था।

इन निर्णयों में संपत्ति स्वामित्व महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इसलिए भूमि-अधिकार केवल खेत का प्रश्न नहीं—

परिवार की आंतरिक राजनीति का भी प्रश्न था।

विधवा महिलाओं का प्रश्न

पति की मृत्यु के बाद गरीब ग्रामीण महिला की स्थिति अत्यंत असुरक्षित हो सकती थी।

स्वतंत्र भूमि अधिकार उसे कानूनी और आर्थिक सुरक्षा देता।

बोधगया की महिला मांग का महत्व इस व्यापक संदर्भ में समझना चाहिए।

परित्यक्ता और अकेली महिलाओं का प्रश्न

हर महिला विवाहित और पति के साथ रहने वाली नहीं होती।

भूमि वितरण की ‘परिवार मुखिया’ व्यवस्था में आसानी से अदृश्य हो सकती थी।

महिला के स्वतंत्र अधिकार की मांग ने इन समूहों को भी वैचारिक रूप से जगह दी।

संयुक्त पट्टा बनाम स्वतंत्र पट्टा

महिला भूमि-अधिकार आंदोलन में एक महत्वपूर्ण बहस रही—

जमीन पति–पत्नी के संयुक्त नाम हो या महिला के स्वतंत्र नाम?

संयुक्त पट्टा परिवार में महिला की कानूनी स्थिति मजबूत कर सकता है।

लेकिन स्वतंत्र पट्टा उसे अधिक स्वायत्त संपत्ति अधिकार देता है।

बोधगया का महत्व यह है कि इस बहस को जमीन पर संघर्षरत गरीब महिलाओं ने वास्तविक राजनीतिक प्रश्न बनाया।

महिला को जमीन देना क्या परिवार तोड़ता है?

कुछ पारंपरिक तर्कों में कहा जा सकता था कि पति और पत्नी की अलग संपत्ति परिवार में विभाजन पैदा करेगी।

महिला कार्यकर्ताओं का तर्क इसके विपरीत था—

संपत्ति का समान अधिकार परिवार को अधिक न्यायपूर्ण बनाता है।

यदि केवल पुरुष के पास संपत्ति हो तो परिवार ‘एक’ दिखाई दे सकता है, लेकिन शक्ति समान नहीं होती।

इसलिए परिवार की एकता का उपयोग महिला अधिकार रोकने के लिए नहीं होना चाहिए।

सामाजिक प्रतिष्ठा में बदलाव

गांव में जमीन का मालिक होना प्रतिष्ठा से जुड़ा था।

यदि महिला के नाम जमीन है तो उसकी सामाजिक पहचान बदलती है।

उसका स्वतंत्र आर्थिक अस्तित्व बनता है।

सरकारी रिकॉर्ड में उसका नाम आता है।

बैंक, राजस्व कार्यालय और पंचायत में उसकी स्थिति बदल सकती है।

यह प्रतीकात्मक परिवर्तन भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भूमि रिकॉर्ड में महिला का नाम

राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होना एक तकनीकी प्रक्रिया लगता है।

लेकिन महिला अधिकार के लिए यह निर्णायक है।

यदि नाम नहीं है तो संपत्ति का दावा कमजोर हो सकता है।

इसीलिए बोधगया ने केवल जमीन पर वास्तविक कब्जा नहीं बल्कि कागजी स्वामित्व का प्रश्न भी उठाया।

यह बाद की महिला भूमि नीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था।

महिला किसान की कानूनी पहचान

भूमि के नाम से जुड़ने पर महिला को कृषि योजनाओं, ऋण और अन्य सरकारी लाभों तक पहुंच में भी मदद मिल सकती है।

हालांकि उस समय सभी योजनाएं आधुनिक रूप में उपलब्ध नहीं थीं, लेकिन सिद्धांत स्पष्ट था—

जिसके नाम जमीन नहीं, उसे किसान के रूप में राज्य पहचानता ही नहीं।

इसलिए महिला भूमि अधिकार राज्य से महिला किसान की पहचान का आधार बनता है।

बोधगया और भारतीय महिला आंदोलन

बोधगया संघर्ष का प्रभाव केवल गया जिले तक सीमित नहीं रहा।

महिला अधिकार शोधकर्ताओं और संगठनों ने इसे एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा।

बिना अग्रवाल ने दक्षिण एशिया में महिला भूमि अधिकार पर अपने प्रभावशाली कार्य में बोधगया संघर्ष का विशेष उल्लेख किया और यह प्रश्न उठाया कि महिलाओं को किसानों और भूमि-अधिकारियों के रूप में स्वतंत्र पहचान क्यों नहीं मिलती। (ccc.uchicago.edu)

यहीं बोधगया स्थानीय किसान आंदोलन से राष्ट्रीय नारीवादी संदर्भ बनता है।

भूमि और स्त्री मुक्ति का संबंध

महिला आंदोलन लंबे समय तक शिक्षा, विवाह, दहेज, हिंसा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर केंद्रित रहा।

यदि महिला शिक्षित हो लेकिन आर्थिक रूप से पूरी तरह निर्भर हो, तो उसकी स्वतंत्रता सीमित रहती है।

भूमि ग्रामीण समाज में सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति थी।

इसलिए महिला भूमि अधिकार स्त्री मुक्ति का संरचनात्मक प्रश्न बना।

श्रम पर अधिकार बनाम संपत्ति पर अधिकार

महिला के लिए केवल मजदूरी का अधिकार पर्याप्त नहीं।

यदि वह खेत में मजदूरी करती है तो उसे आय मिलती है।

लेकिन संपत्ति स्वामित्व स्थायी आर्थिक सुरक्षा देता है।

इसलिए बोधगया संघर्ष ने महिला श्रम-अधिकार को संपत्ति-अधिकार से जोड़ा।

आंदोलन में महिलाओं का स्वतःस्फूर्त संगठन

कई जगह महिलाएं अलग बैठकों में अपने प्रश्नों पर चर्चा करने लगीं।

यह स्वतंत्र राजनीतिक अभिव्यक्ति का संकेत था।

पुरुष-प्रधान बैठक में जो बात कहना कठिन हो सकती थी, महिला समूह में खुलकर सामने आती थी।

ऐसे प्रश्न वर्ग-संघर्ष के सामान्य मंच पर अक्सर पीछे रह जाते हैं।

क्या महिला प्रश्न ने आंदोलन को कमजोर किया?

किसी भी वर्गीय आंदोलन में यह तर्क उठ सकता है कि अंदरूनी लैंगिक विवाद मुख्य संघर्ष को कमजोर करेंगे।

महिलाओं की मांग ने आंदोलन को अधिक गहरा किया।

क्योंकि उसने सामाजिक न्याय की परिभाषा विस्तृत की।

आंदोलन कमजोर नहीं, अधिक लोकतांत्रिक हुआ।

बाहरी और अंदरूनी शोषण

बोधगया की महिला राजनीति ने दो अलग सत्ता-संबंध स्पष्ट किए।

यदि पहला संबंध अन्यायपूर्ण है तो उसे बदलना चाहिए।

और यदि दूसरा भी असमान है तो उसे भी।

इसीलिए यह आंदोलन ‘संपूर्ण क्रांति’ की अवधारणा के सबसे गहरे व्यावहारिक रूपों में से एक बनता है।

पुरुष सहयोगियों की भूमिका

यह भी कहना उचित नहीं होगा कि सभी पुरुष कार्यकर्ता महिला मांग के विरोधी थे।

संघर्ष वाहिनी के भीतर कई पुरुष कार्यकर्ताओं ने महिला भूमि-अधिकार का समर्थन किया।

और अंततः महिला के नाम भूमि देने की मांग आंदोलन के महत्वपूर्ण एजेंडे में शामिल हुई।

यह दिखाता है कि सामाजिक आंदोलन के भीतर वैचारिक परिवर्तन संभव है।

जमीन के वास्तविक वितरण में महिला अधिकार

बोधगया संघर्ष की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह रही कि भूमि वितरण की प्रक्रिया में महिलाओं के नाम पट्टे देने के उदाहरण सामने आए।

हालांकि सभी वितरित भूमि महिलाओं के स्वतंत्र नाम नहीं हुई और अलग-अलग स्रोत आंकड़ों में भिन्नता दिखाते हैं।

इसलिए इसे सार्वभौमिक सफलता के रूप में नहीं कहना चाहिए।

लेकिन सिद्धांत और व्यवहार दोनों स्तरों पर महिला स्वामित्व की मिसाल बनी।

यह उस समय के भारतीय भूमि सुधार के संदर्भ में असाधारण था।

क्या जमीन महिला के नियंत्रण में भी रही?

कागज पर जमीन महिला के नाम हो सकती है।

लेकिन क्या खेती का निर्णय वही करती है?

क्या पति जमीन बेच या गिरवी रख सकता है?

क्या राजस्व रिकॉर्ड में उसका नाम कायम रहता है?

क्या वह स्वयं बाजार या बैंक जाती है?

इन प्रश्नों पर बाद के अध्ययनों ने मिश्रित तस्वीर दिखाई।

कानूनी स्वामित्व आवश्यक है, लेकिन अकेला पर्याप्त नहीं।

प्रतीकात्मक और वास्तविक सशक्तीकरण

फिर भी महिला के नाम पट्टा प्रतीकात्मक मात्र नहीं था।

सरकारी रिकॉर्ड में पहली बार वह संपत्ति की स्वामी बनी।

और अगली पीढ़ी को यह संदेश मिला कि जमीन का अधिकार केवल पुरुष का प्राकृतिक अधिकार नहीं है।

महिला श्रम की पहचान

आंदोलन ने यह भी स्थापित किया कि कृषि उत्पादन में महिला की भूमिका ‘सहायक’ नहीं है।

यदि किसान की परिभाषा श्रम से तय होती है, तो महिला किसान है।

यदि किसान की परिभाषा जमीन से तय होती है, तो उसे जमीन में अधिकार मिलना चाहिए।

दोनों ही तर्क महिला अधिकार की ओर जाते हैं।

जाति, वर्ग और लिंग का त्रिकोण

बोधगया संघर्ष का आधुनिक सामाजिक इतिहास इसी कारण अत्यंत महत्वपूर्ण है।

यह दिखाता है कि शोषण एक ही स्तर पर नहीं चलता।

यदि आंदोलन केवल एक को बदले और बाकी को छोड़ दे तो सामाजिक मुक्ति अधूरी रहती है।

यह अंतर्दृष्टि आज intersectionality कहे जाने वाले विश्लेषण से भी मेल खाती है, भले ही उस समय आंदोलन ने यही शब्द इस्तेमाल न किया हो।

महिला प्रश्न ने ‘संपूर्ण क्रांति’ को वास्तविक अर्थ दिया

जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति में सामाजिक और नैतिक परिवर्तन दोनों की बात थी।

बोधगया की महिलाओं ने इसे और आगे बढ़ाया।

यदि क्रांति मठ की जमीन तक पहुंचती है, तो घर की सत्ता तक क्यों नहीं?

यदि बाहर सामंतवाद गलत है, तो अंदर पितृसत्ता पर प्रश्न क्यों नहीं?

यहीं संपूर्ण क्रांति परिवार की चौखट पार करती है।

बोधगया और भोजपुर की महिलाओं में अंतर

भोजपुर और बोधगया दोनों आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण थी।

भोजपुर में

महिलाओं की गरिमा, यौन सुरक्षा और संघर्ष में सहयोग प्रमुख प्रश्न रहे।

बोधगया में

महिलाएं आगे बढ़कर स्वतंत्र संपत्ति-अधिकार की मांग तक पहुंचीं।

यह अंतर दोनों आंदोलनों की राजनीतिक पद्धति और संगठनात्मक विकास को भी दर्शाता है।

भोजपुर का ‘इज्जत’ और बोधगया का ‘अधिकार’

भोजपुर में दलित महिला के प्रश्न को अक्सर ‘इज्जत’ की भाषा में देखा गया।

महिला की गरिमा सुरक्षित क्यों नहीं?

दोनों प्रश्न मिलकर ग्रामीण महिला मुक्ति की व्यापक तस्वीर बनाते हैं।

आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक आवाज

जिस महिला के पास अपनी संपत्ति हो, उसकी पंचायत और गांव में आवाज भी मजबूत हो सकती है।

वह परिवार के पुरुषों के माध्यम से ही सार्वजनिक दुनिया से जुड़ने को बाध्य नहीं रहती।

इसलिए भूमि स्वामित्व राजनीतिक भागीदारी का भी आधार बन सकता है।

यही बात आगे पंचायतों में महिलाओं के आरक्षण के साथ और महत्वपूर्ण हुई।

भूमि और आने वाली पीढ़ी

महिला के नाम जमीन होने से बेटियों के लिए भी संपत्ति की कल्पना बदल सकती है।

यह विचार कि कृषि भूमि केवल पुत्र का अधिकार है—

हालांकि उत्तराधिकार कानून और सामाजिक व्यवहार की अपनी जटिलताएं थीं, फिर भी बोधगया ने ग्रामीण समाज में इस प्रश्न को सार्वजनिक बनाया।

आंदोलन के बाद महिला संगठन

बोधगया आंदोलन से जुड़ी कई महिला कार्यकर्ता बाद में व्यापक सामाजिक और महिला आंदोलनों से जुड़ीं।

आंदोलन ने नेतृत्व और संगठन का अनुभव दिया।

लेकिन राजनीति सीख चुकी महिला फिर केवल निजी जीवन में सीमित नहीं रहती।

महिला आंदोलन की एक बड़ी सीख

बोधगया ने भारतीय महिला आंदोलन को यह सिखाया कि ग्रामीण महिला के लिए केवल कानूनी समानता पर्याप्त नहीं।

उसे उत्पादक संसाधनों पर अधिकार चाहिए।

पर अधिकार के बिना ग्रामीण स्त्री की आर्थिक स्वतंत्रता सीमित रहती है।

इसलिए भूमि अधिकार महिला सशक्तीकरण की केंद्रीय शर्तों में शामिल हुआ।

आंदोलन की सीमा : सभी महिलाएं समान नहीं थीं

यह भी समझना आवश्यक है कि ‘महिला’ एक समान वर्ग नहीं।

दलित भूमिहीन महिला की समस्या और संपन्न भू-स्वामी परिवार की महिला की समस्या अलग हो सकती है।

जाति और वर्ग महिला अनुभव को बदलते हैं।

बोधगया का आंदोलन मुख्यतः गरीब और दलित महिलाओं की भूमि-अधिकार राजनीति था।

इसलिए उसकी सामाजिक विशिष्टता इसी वर्गीय–जातिगत आधार में थी।

भूमि मिलने के बाद कृषि की कठिनाइयां

महिला को जमीन मिलना पहली उपलब्धि थी।

यदि इन संसाधनों पर पुरुष का नियंत्रण बना रहे तो महिला का जमीन पर वास्तविक नियंत्रण सीमित हो सकता है।

इसलिए आर्थिक सशक्तीकरण के लिए संपत्ति के साथ उत्पादन साधनों तक पहुंच भी जरूरी थी।

महिला स्वामित्व और सरकारी नीति

बोधगया जैसे संघर्षों ने धीरे-धीरे इस व्यापक नीति-विमर्श को प्रभावित किया कि सरकारी भूमि वितरण में महिलाओं का नाम शामिल होना चाहिए।

बाद के दशकों में संयुक्त पट्टे और महिला स्वामित्व की मांग कई राज्यों और विकास कार्यक्रमों में दिखाई देने लगी।

खंड 14

सरकार, मठ और आंदोलन के बीच संघर्ष

बोधगया भूमि संघर्ष की निर्णायक परीक्षा तब शुरू हुई जब आंदोलन ने केवल मठ की विशाल भूमि-संपत्ति पर सवाल उठाने के बजाय राज्य से मांग की कि वह अपने ही बनाए भूमि-सीमा कानूनों को लागू करे, मठ की वास्तविक संपत्ति की जांच करे, अतिरिक्त और अवैध रूप से नियंत्रित भूमि को अपने कब्जे में ले तथा भूमिहीनों को उसका वैधानिक अधिकार दे।

अब तीन पक्ष स्पष्ट रूप से आमने-सामने थे—

बोधगया मठ, जो अपनी भूमि और उससे जुड़े ट्रस्टों के कानूनी अधिकार का दावा करता था;

भूमिहीन किसान और छात्र युवा संघर्ष वाहिनी, जो जमीन को वास्तविक जोतने वालों में बांटने की मांग कर रहे थे;

बिहार सरकार, जिसके सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने तथा अपने ही भूमि-सुधार कानूनों को लागू करने की दोहरी जिम्मेदारी थी।

सबसे जटिल प्रश्न यह था कि आंदोलन की राजनीतिक मांग को प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया में कैसे बदला जाए।

आंदोलन का प्रश्न अब सरकार के सामने

1978 में संघर्ष शुरू हुआ तो मांग सरल दिखाई देती थी—

मठ की अतिरिक्त भूमि भूमिहीनों को दो।

लेकिन सरकार के लिए प्रश्न अधिक जटिल था।

कितनी अलग-अलग धार्मिक ट्रस्टों के नाम दर्ज है?

क्या वे ट्रस्ट स्वतंत्र कानूनी संस्थाएं हैं?

क्या कुछ हस्तांतरण केवल भूमि-सीमा कानून से बचने के लिए किए गए?

किस भूमि पर वास्तविक किसान वर्षों से खेती कर रहे हैं?

और कितनी भूमि कानून के अंतर्गत अधिशेष घोषित की जा सकती है?

यहीं आंदोलन का नारा राजस्व प्रशासन की कठिन प्रक्रिया में प्रवेश करता है।

‘मठ की जमीन’ एक समान कानूनी श्रेणी नहीं थी

आंदोलनकारी भाषा में सामान्यतः कहा जाता था—

लेकिन प्रशासनिक दृष्टि से सारी जमीन एक ही प्रकार की नहीं थी।

कुछ विभिन्न व्यक्तियों के नाम हस्तांतरित।

कुछ के संबंध में बेनामी होने के आरोप।

यानी आंदोलन जिस विशाल भू-संपत्ति को एक राजनीतिक इकाई के रूप में देख रहा था, कानून उसे कई अलग-अलग संपत्तियों और अधिकारों में देखता था।

यही वजह थी कि संघर्ष इतना लंबा चला।

भूमि-सीमा कानून आंदोलन का सबसे बड़ा कानूनी हथियार

संघर्ष वाहिनी की रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष था कि उसने भूमि पर अधिकार की मांग को केवल नैतिक अपील नहीं बनाया।

बिहार में पहले से भूमि-सीमा कानून मौजूद था।

यदि मठ या उससे जुड़े संस्थानों के पास कानूनी सीमा से अधिक कृषि भूमि है तो सरकार का दायित्व है कि उसे अधिशेष घोषित करे।

हम सरकार से नया कानून नहीं मांग रहे; सरकार अपना पुराना कानून लागू करे।

इससे बोधगया संघर्ष को मजबूत संवैधानिक आधार मिला।

ट्रस्टों का विवाद

मठ की भूमि से जुड़े सबसे विवादास्पद प्रश्नों में धार्मिक ट्रस्टों की वैधता थी।

आंदोलनकारियों का आरोप था कि विभिन्न देवी-देवताओं या धार्मिक इकाइयों के नाम अलग-अलग ट्रस्ट बनाकर भूमि को कई स्वामित्व इकाइयों में दिखाया गया, जिससे भूमि-सीमा कानून की पकड़ कमजोर की जा सके।

वाहिनी कार्यकर्ताओं ने भूमि अभिलेखों का अध्ययन किया और दावा किया कि इनमें से अनेक ट्रस्ट स्वतंत्र वास्तविक संस्थाएं नहीं थे।

यहीं से ‘बेनामी’ या ‘कागजी’ स्वामित्व की बहस शुरू हुई।

इस मुद्दे का अंतिम फैसला राजनीतिक नारे से नहीं बल्कि राजस्व और न्यायिक प्रक्रिया से होना था।

आंदोलनकारी दावे और सरकारी निष्कर्ष अलग रखना आवश्यक

बोधगया भूमि संघर्ष पर लिखे गए साहित्य में कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है कि आंदोलनकारियों द्वारा ‘बेनामी’ कही गई पूरी जमीन स्वतः सरकारी रूप से बेनामी सिद्ध हो गई थी।

सही ऐतिहासिक पद्धति यह होगी कि तीन चीजें अलग रखी जाएं—

अलग-अलग भूखंडों में इन तीनों का परिणाम अलग हो सकता था।

यही कारण है कि बोधगया मठ संबंधी भूमि मुकदमे बाद के दशकों तक अदालतों में आते रहे।

जांच और सर्वेक्षण का दबाव

छात्र युवा संघर्ष वाहिनी की लगातार लामबंदी के कारण बिहार सरकार पर भूमि की वास्तविक स्थिति जांचने का दबाव बढ़ा।

गांवों में वास्तविक काश्तकारों की पहचान की,

और प्रशासन से अधिशेष भूमि घोषित करने की मांग की।

इस अर्थ में आंदोलन ने केवल सड़क पर दबाव नहीं बनाया।

उसने प्रशासन को भूमि-सर्वेक्षण और कानूनी जांच की दिशा में धकेला।

पुलिस और राजस्व प्रशासन की दो अलग भूमिकाएं

राज्य स्वयं एक समान इकाई के रूप में काम नहीं करता था।

एक ओर पुलिस का कार्य मौजूदा कानून-व्यवस्था और कब्जे की स्थिति बनाए रखना था।

दूसरी ओर राजस्व प्रशासन को यह तय करना था कि भूमि का वैध मालिक कौन है और कौन-सी जमीन अधिशेष है।

इससे विरोधाभासी दृश्य पैदा होते थे।

एक सरकारी विभाग किसान को विवादित जमीन से हटाता।

दूसरा विभाग उसी जमीन की भूमि-सीमा जांच कर सकता था।

इस कारण आंदोलनकारियों के लिए राज्य कभी दमनकारी और कभी संभावित भूमि-वितरक—दोनों रूपों में सामने आया।

मठ की जमीन पर प्रत्यक्ष कार्रवाई

जैसे-जैसे प्रशासनिक प्रक्रिया धीमी चली, आंदोलनकारियों ने जमीन पर प्रत्यक्ष कार्रवाई बढ़ाई।

भूमि विवाद केवल फाइल में नहीं है; गांव में वास्तविक सामाजिक संकट मौजूद है।

लेकिन ऐसी कार्रवाइयों ने पुलिस हस्तक्षेप की संभावना भी बढ़ाई।

8 अगस्त 1979 : संघर्ष की तीव्रता

बोधगया संघर्ष से संबंधित महिला आंदोलन के अध्ययन में 8 अगस्त 1979 को मठ समर्थक तत्वों द्वारा मजदूरों पर हमले का उल्लेख मिलता है। महिलाओं ने घायल मजदूरों की सहायता की और इस घटना के बाद आंदोलन में उनकी राजनीतिक सक्रियता और बढ़ी।

बोधगया आंदोलन अहिंसक था, लेकिन वह ऐसे सामाजिक वातावरण में चल रहा था जहां उसके विरोधियों की ओर से हिंसा का खतरा मौजूद था।

इसलिए अहिंसा का अर्थ संघर्ष-विहीन वातावरण नहीं था।

नवंबर 1980 : पुलिस कार्रवाई

महिला आंदोलन संबंधी स्रोत 5 नवंबर 1980 को भूमि संघर्ष के दौरान महिलाओं पर पुलिस बल प्रयोग का उल्लेख करते हैं। महिलाओं को लाठीचार्ज का सामना करना पड़ा, लेकिन इससे आंदोलन पीछे नहीं हटा।

यह घटना बोधगया संघर्ष की प्रकृति समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

यहां आंदोलनकारियों ने हथियार नहीं उठाए।

लेकिन राज्य ने विवादित भूमि पर मौजूदा कब्जा बनाए रखने के लिए बल प्रयोग किया।

यही वह क्षण था जब सत्याग्रह और प्रशासनिक शक्ति सीधे आमने-सामने आए।

पुलिस दमन और आंदोलन की नैतिक शक्ति

भोजपुर में पुलिस कार्रवाई को राज्य सशस्त्र विद्रोह से मुकाबले के रूप में प्रस्तुत कर सकता था।

यहां बड़ी संख्या में निहत्थे खेतिहर मजदूर और महिलाएं सत्याग्रह कर रहे थे।

यदि उन पर बल प्रयोग होता तो राजनीतिक प्रश्न उल्टा सरकार पर आता—

क्या भूमि-सीमा कानून लागू कराने की मांग करने वालों पर पुलिस चलाना उचित है?

गिरफ्तारी : राज्य का दमन या आंदोलन की रणनीति?

सत्याग्रह की राजनीति में गिरफ्तारी का अर्थ दोहरा था।

कानून-व्यवस्था बनाए रखने की कार्रवाई।

जब किसान गिरफ्तारी से नहीं डरता, तो राज्य के लिए केवल पुलिस कार्रवाई से आंदोलन समाप्त करना कठिन हो जाता है।

बोधगया की महिलाओं ने भी गिरफ्तारी और लाठीचार्ज का सामना किया।

यही अनुभव आगे उनके स्वतंत्र भूमि-अधिकार आंदोलन को और मजबूत करता है।

आंदोलन का लक्ष्य पुलिस से लड़ना नहीं था

यहां भोजपुर से मूल अंतर फिर स्पष्ट होता है।

बोधगया आंदोलन का लक्ष्य पुलिस या राज्य तंत्र का विनाश नहीं था।

राज्य को उसके अपने कानून लागू करने के लिए मजबूर करना।

इसलिए पुलिस के साथ टकराव के बावजूद सरकार के साथ बातचीत और प्रशासनिक प्रक्रिया के रास्ते खुले रहे।

यह बोधगया आंदोलन की सफलता की महत्वपूर्ण शर्त बनी।

1981 : निर्णायक प्रशासनिक मोड़

उपलब्ध अध्ययनों में 1981 को आंदोलन का महत्वपूर्ण मोड़ माना गया है।

एक आधुनिक अकादमिक अध्ययन के अनुसार बिहार सरकार ने 1981 में लगभग 1,000 एकड़ मठ-संबंधित भूमि की पहचान भूमिहीनों में वितरण के लिए की।

दूसरी ओर 1987 की समकालीन Manushi रिपोर्ट में आंदोलन के दबाव के बाद सरकार द्वारा 1981 में लगभग 1,500 एकड़ भूमि जब्त कर मजदूरों में पुनर्वितरण की प्रक्रिया शुरू करने का उल्लेख मिलता है।

इन अलग आंकड़ों से वही सावधानी आवश्यक हो जाती है—

पहचान की गई, जब्त की गई और वास्तव में वितरित जमीन एक ही संख्या नहीं हो सकती।

अक्टूबर 1981 : गांवों की पहचान

IGNOU के महिला आंदोलन संबंधी अध्ययन में कहा गया है कि अक्टूबर 1981 तक सरकार ने मठ के कथित अवैध कब्जे वाली भूमि की पहचान कर उसे भूमिहीनों में बांटने का निर्णय लिया। उसमें जिन गांवों का उल्लेख मिलता है उनमें—

पहली बार जनसंघर्ष प्रशासनिक पहचान और संभावित वितरण में बदल रहा था।

लेकिन ‘पहचान’ का अर्थ ‘मिल गई जमीन’ नहीं

भूमि की पहचान होने के बाद भी कई चरण बाकी रहते हैं—

किसी भी चरण पर मुकदमा या प्रशासनिक देरी हो सकती थी।

इसीलिए 1981 की सरकारी पहचान आंदोलन की जीत थी—

लाभार्थी कौन होगा?

तय कौन करेगा कि किसे कितनी जमीन मिले?

मजदूर–किसान समितियों ने पात्र परिवारों की सूची बनाने में भूमिका निभाई।

आम तौर पर प्राथमिकता उन परिवारों को दी जानी थी जिनका वास्तविक कृषि श्रम और भूमि-विहीनता स्पष्ट थी।

लेकिन यही प्रक्रिया आगे महिला अधिकार विवाद का कारण बनी।

पहला वितरण और पुरुष मुखिया

प्रारंभिक पात्रता दस्तावेजों में जमीन सामान्यतः पुरुष परिवार मुखिया और कुछ विधवाओं के नाम तैयार की गई।

यदि भूमिहीन खेतिहर मजदूर को जमीन मिलनी है तो हम भी भूमिहीन खेतिहर मजदूर हैं।

यहीं आंदोलन का भूमि-वितरण चरण महिला अधिकार आंदोलन में बदल गया।

18 मार्च 1981 : महिलाओं का स्पष्ट हस्तक्षेप

एक अध्ययन के अनुसार 18 मार्च 1981 की गांव-स्तरीय बैठक में महिला खेतिहर मजदूरों ने स्पष्ट रूप से स्वतंत्र भूमि-अधिकार का प्रश्न उठाया।

यह तारीख बोधगया संघर्ष में विशेष महत्व रखती है।

अब आंदोलन के सामने दो प्रश्न एक साथ थे—

मिलने वाली जमीन में महिलाओं का अधिकार कैसे सुनिश्चित हो?

संघर्ष वाहिनी की अपनी परीक्षा

महिला मांग आने पर संघर्ष वाहिनी के भीतर भी बहस हुई।

प्रारंभिक चरण में स्वयं मजदूर–किसान समिति द्वारा तैयार किए गए कई दस्तावेज पुरुषों के नाम थे।

महिलाओं ने आंदोलन के अपने संगठन की आलोचना की।

2025 का अध्ययन बताता है कि फरवरी 1982 में मेहसी में हुए संघर्ष वाहिनी के बिहार राज्य सम्मेलन तक यह आलोचना महत्वपूर्ण मुद्दा बन चुकी थी और अंततः संगठन की राज्य समिति ने महिलाओं के भूमि अधिकार की मांग स्वीकार की।

यह आंदोलन की आत्मसुधार क्षमता का महत्वपूर्ण उदाहरण था।

सरकार की सबसे बड़ी आपत्ति

महिलाओं की मांग के सामने स्थानीय प्रशासन का तर्क था—

भूमि परंपरागत रूप से परिवार के मुखिया को दी जाती है।

और परिवार का मुखिया सामान्यतः पुरुष माना जाता था।

यानी संघर्ष अब मठ के विरुद्ध भूमि-सीमा कानून से निकलकर सरकारी प्रशासन की पितृसत्तात्मक परंपरा से भी टकराने लगा।

भूमिहीन मजदूर की परिभाषा में स्त्री क्यों नहीं?

25 मार्च 1982 : महिला और अंचल अधिकारी की बहस

बोधगया आंदोलन के महिला अधिकार इतिहास में 25 मार्च 1982 की एक बहस प्रसिद्ध है।

बिजा गांव की एक महिला और अंचल अधिकारी के बीच संवाद में अधिकारी ने प्रश्न उठाया कि पुरुष हल चलाते हैं, इसलिए भूमि पुरुषों के नाम क्यों न हो।

महिला का उत्तर था कि कृषि में महिलाएं भी बोआई, रोपाई और कटाई करती हैं तथा वे भी नागरिक हैं और उन्हें भी वोट का समान अधिकार है।

इस संवाद का महत्व किसी एक अधिकारी से बहस में नहीं है।

यह पूरी सरकारी भूमि नीति को चुनौती देता था—

क्या किसान की पहचान केवल हल चलाने वाले पुरुष से होगी?

महिलाओं ने वितरण रोकने तक की चुनौती दी

अधिकारी की ओर से यह चेतावनी भी दी गई कि यदि महिलाएं पुरुषों के नाम भूमि लेने से इनकार करेंगी तो वितरण रोक दिया जाएगा।

महिलाओं ने जवाब दिया कि वे अपने अधिकार के बिना पट्टा स्वीकार नहीं करेंगी और आवश्यकता हुई तो पुरुषों के विरुद्ध भी संघर्ष जारी रखेंगी।

यह बोधगया आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण क्षणों में से एक था।

अब महिलाएं केवल सरकार से भूमि नहीं मांग रही थीं।

वे आंदोलन की सफलता की परिभाषा स्वयं तय कर रही थीं।

बिजा और कुशा : वास्तविक भूमि वितरण

1982 में बिजा और कुशा गांवों में जमीन वितरण शुरू हुआ।

आधुनिक अध्ययन के अनुसार इन गांवों में औसतन लगभग एक एकड़ प्रति लाभार्थी परिवार के स्तर पर वितरण हुआ और कुल लगभग 1,100 एकड़ भूमि वितरित हुई।

यह बोधगया संघर्ष की पहली बड़ी ठोस भूमि उपलब्धियों में थी।

लेकिन महिला अधिकार अभी बहुत सीमित था।

महिलाओं के नाम कितनी जमीन?

यहां भी स्रोतों में हल्का अंतर मिलता है।

एक अकादमिक अध्ययन लगभग 100 एकड़ जमीन महिलाओं के नाम होने का उल्लेख करता है।

1987 की Manushi रिपोर्ट बिजा और कुशा में लगभग 150 एकड़ जमीन महिलाओं के नाम दिए जाने की बात करती है।

इस अंतर का कारण अलग समय, गांव या रिकॉर्ड हो सकता है।

प्रारंभिक लगभग 1,100 एकड़ के वितरण में महिलाओं के स्वतंत्र नाम पर भूमि का हिस्सा सीमित—लगभग 100–150 एकड़ के स्तर पर—था।

लेकिन सिद्धांत की दृष्टि से यह असाधारण उपलब्धि थी।

संख्या छोटी, ऐतिहासिक प्रभाव बड़ा

यदि केवल प्रतिशत देखा जाए तो महिला स्वामित्व मामूली दिखाई देगा।

लेकिन बिहार की तत्कालीन प्रशासनिक परंपरा में गरीब विवाहित महिलाओं के स्वतंत्र नाम पर कृषि भूमि देना लगभग अभूतपूर्व था।

2021 के अध्ययन के अनुसार 1982 से 1987 के बीच गया जिले के तीन गांवों में महिलाओं को कानूनी रूप से भूमि का अधिकार मिलना दक्षिण एशियाई सामाजिक आंदोलनों के इतिहास की उल्लेखनीय घटनाओं में से था।

इसलिए इस उपलब्धि का महत्व एकड़ से अधिक संस्थागत मिसाल में था।

संयुक्त पट्टे की ओर बदलाव

महिलाओं की मांग और लगातार बहस के बाद प्रशासन को एक मध्य रास्ता स्वीकार करना पड़ा—

पति और पत्नी के संयुक्त नाम पर जमीन।

यह स्वतंत्र महिला स्वामित्व जितना दूरगामी नहीं था।

लेकिन केवल पुरुष मुखिया के नाम पट्टा देने की पुरानी परंपरा से बड़ा बदलाव था।

इसने महिला को संपत्ति की कानूनी सह-स्वामी बनाया।

1987 तक विस्तार

एक अध्ययन में 1987 तक लगभग 5,000 एकड़ भूमि के संयुक्त स्वामित्व के उभरते सिद्धांत के अंतर्गत पति–पत्नी के संयुक्त नाम पर वितरित किए जाने का उल्लेख मिलता है।

यह आंकड़ा आंदोलन की बाद की उपलब्धि को दर्शाता है।

लेकिन इसे प्रारंभिक 1981–82 के वितरण से अलग रखना चाहिए।

यहीं बोधगया भूमि संघर्ष के आंकड़ों में अक्सर भ्रम होता है।

लेबरा गांव : महिलाओं के नाम स्वतंत्र भूमि

दिसंबर 1987 में मोहनपुर प्रखंड के लेबरा गांव में लगभग 65 एकड़ भूमि महिलाओं के नाम दिए जाने का उल्लेख भी मिलता है।

यह दिखाता है कि महिला स्वामित्व का प्रयोग केवल बिजा और कुशा तक सीमित नहीं रहा।

हालांकि यह कभी पूरे भूमि वितरण की सामान्य व्यवस्था नहीं बन पाया।

8,000 एकड़ ‘नियंत्रण’ का दावा

1987 की Manushi रिपोर्ट ने यह भी लिखा कि बोधगया मठ की लगभग 12,000 एकड़ बताई गई भूमि में से करीब 8,000 एकड़ पर मजदूरों का नियंत्रण स्थापित हो चुका था।

लेकिन यहां शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है—

‘नियंत्रण’ और ‘वैधानिक स्वामित्व’ एक ही चीज नहीं।

किसान किसी भूमि पर खेती कर रहे हों, इसका अर्थ यह नहीं कि वह पूरी भूमि राजस्व अभिलेख में उनके नाम दर्ज भी हो चुकी थी।

इसलिए 8,000 एकड़ को ‘सरकार द्वारा बांटी गई जमीन’ कहना अनुचित होगा।

यही आंकड़ों का सबसे बड़ा भ्रम है

बोधगया संघर्ष पर उपलब्ध साहित्य में कई संख्याएं मिलती हैं—

और मठ की कुल भूमि के लिए 9,500 से 12,000 एकड़ से अधिक तक।

आंदोलनकारियों के वास्तविक नियंत्रण में आई जमीन।

वेबसाइट के अंतिम स्रोत-अध्याय में इन आंकड़ों की पृथक तालिका देना सबसे उचित रहेगा।

भूमि मिलने का अर्थ वास्तविक कब्जा भी था

कई मामलों में पुराने प्रबंधकीय या सामाजिक हित जमीन पर किसान के वास्तविक कब्जे का विरोध कर सकते थे।

इसलिए संघर्ष वाहिनी और गांव समितियों को यह सुनिश्चित करना पड़ा कि लाभार्थी केवल प्रमाणपत्र लेकर न लौटे—

यहीं आंदोलन की स्थानीय संगठन क्षमता महत्वपूर्ण थी।

प्रशासनिक मशीनरी में प्रतिरोध

भूमि-सुधार केवल शीर्ष सरकार के आदेश से लागू नहीं होता।

यदि प्रशासनिक स्तर पर पुराने सामाजिक पूर्वाग्रह बने हों तो कानून धीमा पड़ सकता है।

महिलाओं के नाम पट्टा देने पर अधिकारियों की आपत्तियां इसका स्पष्ट उदाहरण थीं।

यानी बोधगया की लड़ाई केवल कानून बदलने की नहीं—

मठ की सामाजिक प्रतिष्ठा का क्षरण

आंदोलन का असर केवल भूमि पर नहीं पड़ा।

Manushi की 1987 की रिपोर्ट में दावा किया गया कि आंदोलन के कारण मठ की सामाजिक प्रतिष्ठा कमजोर हुई और शेरघाटी, बाराचट्टी, बोधगया तथा मोहनपुर जैसे क्षेत्रों में उसके स्थानीय कार्यालयों का प्रभाव समाप्त या गंभीर रूप से कम हुआ।

इस दावे को आंदोलन-संबंधी समकालीन स्रोत के रूप में पढ़ना चाहिए।

फिर भी व्यापक ऐतिहासिक निष्कर्ष स्पष्ट है—

मठ की पुरानी ग्रामीण सर्वोच्चता निर्णायक रूप से कमजोर हुई।

सामाजिक सत्ता का टूटना भूमि वितरण से बड़ा था

यदि कोई भू-स्वामी कुछ जमीन खो दे लेकिन गांव में उसका सामाजिक आदेश बना रहे, तो परिवर्तन सीमित होता है।

बोधगया में आंदोलन ने दोनों को चुनौती दी—

गरीब किसान प्रशासन से सीधे बात करने लगे।

महिलाएं सार्वजनिक राजनीतिक जीवन में आईं।

इस प्रकार मठ की शक्ति का क्षरण केवल एकड़ में नहीं मापा जा सकता।

पुलिस और मठ का संबंध : आरोपों में सावधानी

आंदोलनकारी साहित्य ने कई बार पुलिस और मठ के प्रबंधकीय तंत्र पर आपसी सहयोग के आरोप लगाए।

पुलिस द्वारा फसल पर किसानों का दावा रोकना या जमीन से सत्याग्रहियों को हटाना ग्रामीणों को मठ की रक्षा जैसा दिखाई दे सकता था।

लेकिन प्रत्येक पुलिस कार्रवाई को प्रत्यक्ष मठ–पुलिस षड्यंत्र कहना स्रोत-साक्ष्य के बिना उचित नहीं होगा।

राज्य मौजूदा कानूनी कब्जे की रक्षा के नाम पर भी कार्रवाई कर सकता था।

इतिहास में दोनों स्तर अलग रखना आवश्यक है—

वार्ता क्यों संभव हुई?

बोधगया की अहिंसक रणनीति ने सरकार के साथ संवाद की गुंजाइश बनाए रखी।

संघर्ष वाहिनी राज्य को पूरी तरह वैधता-विहीन नहीं मानती थी।

संघर्ष और बातचीत एक-दूसरे के विरोधी नहीं थे।

आंदोलन की ‘दोहरी शक्ति’

बोधगया आंदोलन के पास दो प्रकार की शक्ति थी।

यदि केवल पहला होता तो सरकार इसे अवैध कब्जा कह सकती थी।

यदि केवल दूसरा होता तो मामला वर्षों फाइलों में पड़ा रहता।

दोनों के संयोजन ने आंदोलन को प्रभावी बनाया।

न्यायालय की भूमिका

भूमि विवाद के अनेक हिस्से बाद में न्यायालय तक पहुंचे।

इससे स्पष्ट हुआ कि जनआंदोलन प्रशासन को कार्रवाई के लिए मजबूर कर सकता है, लेकिन भूमि स्वामित्व के अंतिम विवाद न्यायिक समीक्षा से भी गुजर सकते हैं।

बोधगया से जुड़े भूमि-सीमा मामलों का वर्षों बाद अदालतों में दिखाई देना बताता है कि ग्रामीण संपत्ति संबंध कितने जटिल थे।

इसलिए आंदोलन की विजय का अर्थ सभी कानूनी विवादों का तत्काल अंत नहीं था।

भूमि सुधार की धीमी प्रकृति

बोधगया की उपलब्धि यह थी कि उसने प्रशासन की इस धीमी प्रक्रिया को राजनीतिक दबाव के भीतर रखा।

जमीन की गुणवत्ता

भूमि वितरण की सफलता केवल एकड़ से नहीं मापी जा सकती।

यदि गरीब परिवार को बहुत खराब या विवादित जमीन मिले तो कागजी भूमि-सुधार का आर्थिक लाभ सीमित हो सकता है।

इसलिए बाद के मूल्यांकन में जमीन की गुणवत्ता और उत्पादन क्षमता भी महत्वपूर्ण प्रश्न बनी।

खेती के लिए संसाधन

भूमि मिलने के बाद गरीब परिवार को चाहिए—

इसलिए भूमि वितरण सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत है—

महिला के नाम जमीन और वास्तविक नियंत्रण

महिलाओं के नाम पट्टा मिलना ऐतिहासिक उपलब्धि थी।

खंड 15

भोजपुर बनाम बोधगया

भोजपुर और बोधगया भूमि संघर्ष स्वतंत्र भारत के किसान इतिहास में एक असाधारण तुलनात्मक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। दोनों बिहार में हुए। दोनों की सामाजिक पृष्ठभूमि में भूमि का असमान वितरण, भूमिहीनता, जातिगत पदानुक्रम और गरीब खेतिहर मजदूरों की निर्भरता थी। दोनों में दलित और वंचित समुदायों की बड़ी भागीदारी रही। दोनों ने ग्रामीण सत्ता-संबंधों को चुनौती दी। दोनों ने भूमि-सुधार कानूनों के अधूरे क्रियान्वयन की सीमाएं उजागर कीं।

फिर भी दोनों ने बिल्कुल अलग रास्ते चुने।

भोजपुर ने नक्सलबाड़ी और CPI(ML) की प्रेरणा से सशस्त्र वर्ग-संघर्ष, गुरिल्ला कार्रवाइयों और ‘वर्ग-शत्रु विनाश’ की रणनीति अपनाई।

बोधगया ने जयप्रकाश नारायण की ‘संपूर्ण क्रांति’, गांधीवादी अहिंसा और छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के नेतृत्व में सत्याग्रह, श्रम बहिष्कार, गांव समितियों और प्रशासनिक दबाव का रास्ता अपनाया।

इसलिए दोनों आंदोलनों को साथ पढ़ना केवल बिहार का इतिहास नहीं, बल्कि यह समझने का अवसर है कि स्वतंत्र भारत में भूमि न्याय, सामाजिक मुक्ति और ग्रामीण सत्ता परिवर्तन के लिए हिंसक और अहिंसक राजनीति ने क्या-क्या हासिल किया और किस कीमत पर।

एक जैसी समस्या, अलग राजनीतिक उत्तर

दोनों आंदोलनों की मूल सामाजिक समस्या लगभग समान थी—

वास्तविक उत्पादक भूमिहीन या असुरक्षित था।

जाति ने आर्थिक असमानता को सामाजिक अधीनता से जोड़ रखा था।

और सरकारी भूमि सुधार अपेक्षित परिणाम नहीं दे सके थे।

यदि राज्य भूमि न्याय नहीं देता तो क्या उसे क्रांतिकारी संघर्ष से चुनौती दी जाए?

यदि कानून मौजूद है लेकिन लागू नहीं हो रहा, तो क्या अहिंसक जनदबाव से राज्य को लागू करने के लिए मजबूर किया जाए?

राज्य के प्रति दृष्टिकोण

प्रारंभिक CPI(ML) की दृष्टि में भारतीय राज्य मूलतः वर्ग-राज्य था।

उससे न्याय की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

अंततः उसे क्रांतिकारी संघर्ष से बदलना था।

संघर्ष वाहिनी राज्य को चुनौती देती थी, लेकिन उसे पूर्णतः अस्वीकार नहीं करती थी।

राज्य ने भूमि-सीमा कानून बनाया है; वही राज्य उसे लागू करे।

इसलिए बोधगया की राजनीति राज्य-विरोधी नहीं, राज्य-जवाबदेही की राजनीति थी।

संगठनात्मक ढांचा

भोजपुर में प्रारंभिक संगठन छोटे भूमिगत समूहों और गुरिल्ला दस्तों पर आधारित हुआ।

इस अंतर ने दोनों आंदोलनों की सामाजिक संरचना पर गहरा प्रभाव डाला।

नेतृत्व की प्रकृति

भोजपुर में जगदीश महतो, रामनरेश राम, रामेश्वर अहीर और बाद में जौहर तथा विनोद मिश्र जैसे नेताओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही।

इनमें कुछ स्थानीय सामाजिक संघर्ष से आए और कुछ व्यापक क्रांतिकारी कम्युनिस्ट संगठन से जुड़े थे।

बोधगया में नेतृत्व छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के युवा कार्यकर्ताओं और स्थानीय भूमिहीन किसान नेताओं के बीच विकसित हुआ।

यहां बाहरी युवा कार्यकर्ता और स्थानीय किसान के बीच साझेदारी अधिक खुली और सार्वजनिक थी।

भूमि का प्रश्न

भोजपुर में भूमि कब्जा संघर्ष का महत्वपूर्ण हिस्सा था।

लेकिन आंदोलन की ठोस उपलब्धियां केवल भूमि वितरण में नहीं थीं।

मजदूरी, दलित सम्मान और ग्रामीण सत्ता परिवर्तन ज्यादा स्थायी प्रभाव छोड़ गए।

बोधगया में भूमि सीधे आंदोलन की केंद्रीय वस्तु बनी।

इसलिए भूमि पुनर्वितरण के मामले में बोधगया का परिणाम अधिक प्रत्यक्ष दिखाई देता है।

मजदूरी का प्रश्न

भोजपुर में मजदूरी संघर्ष अत्यंत केंद्रीय था।

भूमिहीन खेतिहर मजदूर के लिए रोजमर्रा का प्रश्न था—

कई क्षेत्रों में आंदोलन ने मजदूरों की bargaining power बढ़ाई।

बोधगया में मजदूरी महत्वपूर्ण थी, लेकिन भूमि-अधिकार का प्रश्न अधिक केंद्रीय बना।

श्रम बहिष्कार का उपयोग मठ की आर्थिक शक्ति पर दबाव के लिए किया गया।

‘इज्जत’ बनाम ‘अधिकार’

भोजपुर की सामाजिक भाषा में ‘इज्जत’ केंद्रीय थी।

दलित मजदूर केवल जमीन नहीं चाहता था।

बोधगया में यह भाषा आगे जाकर ‘अधिकार’ में बदलती है।

दोनों की सामाजिक दिशा समान थी, लेकिन शब्दावली अलग।

जाति की भूमिका

भोजपुर में जाति और वर्ग का अंतर्संबंध बहुत तीखा था।

भूमिहीन मजदूरों में दलित समुदायों की बड़ी संख्या थी।

भू-स्वामी वर्ग में कई क्षेत्रों में अगड़ी जातियों की मजबूत उपस्थिति थी।

इसलिए वर्ग संघर्ष जल्दी जातिगत ध्रुवीकरण में बदल सकता था।

बोधगया में भी दलित भूमिहीन मुख्य आधार थे।

लेकिन संघर्ष का मुख्य प्रतीक किसी खास जाति का भू-स्वामी नहीं, मठ जैसा धार्मिक संस्थागत भू-स्वामी था।

इससे जातिगत ध्रुवीकरण अपेक्षाकृत कम प्रत्यक्ष रहा।

हिंसा का प्रश्न

भोजपुर में प्रारंभिक CPI(ML) ने सशस्त्र संघर्ष को वैध क्रांतिकारी साधन माना।

‘वर्ग-शत्रु विनाश’ के अंतर्गत लक्षित हत्याएं हुईं।

इसके जवाब में पुलिस-दमन और भू-स्वामी हिंसा बढ़ी।

बोधगया ने घोषित रूप से अहिंसक रास्ता अपनाया।

पुलिस बल प्रयोग और विरोधी हमलों के बावजूद आंदोलन ने व्यापक रूप से सशस्त्र प्रतिहिंसा नहीं अपनाई।

यही दोनों की सबसे स्पष्ट रणनीतिक विभाजन रेखा थी।

भय तोड़ने की दो तकनीकें

भू-स्वामी को दिखाना कि गरीब भी हथियार उठा सकता है।

भू-स्वामी को दिखाना कि बिना मजदूर के उसकी जमीन निष्प्रभावी हो सकती है।

बोधगया ने सामूहिकता से निर्भरता तोड़ी।

यही तुलना दोनों की राजनीति का गहरा सार प्रस्तुत करती है।

तत्काल प्रभाव किसका अधिक था?

सशस्त्र संघर्ष का मनोवैज्ञानिक प्रभाव तेज हो सकता है।

एक प्रभावशाली भू-स्वामी पर हमला पूरे इलाके में तत्काल संदेश पहुंचा सकता है।

लेकिन दीर्घकालिक संस्थागत परिणाम में बोधगया अधिक स्पष्ट दिखाई देता है—

राज्य-दमन की प्रकृति

भोजपुर में पुलिस कार्रवाई ‘सशस्त्र विद्रोह’ से मुकाबले की भाषा में हुई।

इससे मुठभेड़, छापे और कठोर सुरक्षा कार्रवाई को राज्य आसानी से वैध ठहरा सकता था।

बोधगया में निहत्थे सत्याग्रहियों पर बल प्रयोग सरकार के लिए अधिक राजनीतिक असुविधा पैदा करता था।

अहिंसा ने राज्य के नैतिक दावे पर दबाव बढ़ाया।

क्या अहिंसा ने पुलिस दमन रोक दिया?

लेकिन अंतर यह था कि आंदोलन की अहिंसक प्रकृति ने पुलिस दमन को सार्वजनिक और नैतिक प्रश्न बनाया।

भोजपुर में वही घटना अक्सर ‘उग्रवाद-विरोधी कार्रवाई’ के रूप में प्रस्तुत हो सकती थी।

निजी सेनाओं का प्रश्न

भोजपुर का हिंसक संघर्ष आगे चलकर ग्रामीण समाज के सैन्यीकरण में योगदान करता है।

भू-स्वामियों ने निजी हथियारबंद संगठन बनाए।

1980 और 1990 के दशकों में कई जाति-आधारित सेनाएं सामने आईं।

बोधगया में इस पैमाने का निजी सैन्यीकरण विकसित नहीं हुआ।

यही दोनों रणनीतियों के दीर्घकालिक सामाजिक परिणाम में महत्वपूर्ण अंतर है।

हिंसा–प्रतिहिंसा का चक्र

भोजपुर में एक हत्या अगली हत्या का औचित्य बन सकती थी।

बोधगया में संघर्ष तीखा था, लेकिन ऐसा दीर्घकालिक सशस्त्र प्रतिशोध चक्र विकसित नहीं हुआ।

यह अंतर मानवीय कीमत के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

जनसंगठन की भूमिका

दिलचस्प बात यह है कि भोजपुर आंदोलन स्वयं बाद में उसी दिशा में बढ़ा जिसे बोधगया ने शुरुआत से अपनाया था—

CPI(ML) Liberation ने बाद में जनसंगठन, किसान सभा और चुनावी राजनीति पर जोर बढ़ाया।

दीर्घकालिक आंदोलन अंततः जनता की खुली भागीदारी पर निर्भर करता है।

महिलाओं की भूमिका : बड़ा अंतर

भोजपुर में महिलाएं संघर्ष और सामाजिक सुरक्षा में महत्वपूर्ण थीं।

लेकिन उनकी स्वतंत्र संपत्ति मांग आंदोलन की केंद्रीय पहचान नहीं बनी।

बोधगया में महिलाओं ने आंदोलन की दिशा बदल दी।

उन्होंने पुरुष-प्रधान भूमि सुधार की अवधारणा को ही चुनौती दी।

इसलिए महिला भूमि-अधिकार के मामले में बोधगया कहीं अधिक संस्थागत उपलब्धि प्रस्तुत करता है।

भोजपुर की महिला राजनीति

भोजपुर में दलित महिला का प्रश्न मुख्यतः—

उसका भूमि स्वामित्व स्वतंत्र एजेंडा नहीं बना।

इससे भोजपुर की सामाजिक क्रांति की एक सीमा भी दिखाई देती है।

वर्ग और जाति पर प्रहार अधिक गहरा था; पितृसत्ता पर अपेक्षाकृत कम।

बोधगया की महिला राजनीति

परिवार को जमीन मिलती है तो परिवार में अधिकार किसका?

इस प्रश्न ने भूमि सुधार को लिंग-समानता से जोड़ दिया।

यह आंदोलन की सबसे बड़ी वैचारिक उपलब्धियों में से एक थी।

राजनीतिक प्रतिनिधित्व

भोजपुर की सबसे बड़ी दीर्घकालिक उपलब्धियों में एक थी—

गरीब खेतिहर मजदूर का राजनीतिक प्रतिनिधित्व।

रामनरेश राम जैसे नेता अंततः विधानसभा पहुंचे।

CPI(ML) Liberation चुनावी राजनीति में स्थापित हुई।

बोधगया आंदोलन ने ऐसा स्थायी चुनावी संगठन नहीं बनाया।

छात्र युवा संघर्ष वाहिनी मजबूत राजनीतिक दल में नहीं बदली।

यहां भोजपुर की संस्थागत दीर्घायु अधिक थी।

राजनीतिक दल बनाम सामाजिक आंदोलन

यही दोनों की संरचनात्मक भिन्नता थी।

भोजपुर आंदोलन अंततः एक राजनीतिक पार्टी संरचना से जुड़ा रहा।

इससे नेतृत्व, कैडर और राजनीतिक निरंतरता बनी।

बोधगया आंदोलन मुख्यतः सामाजिक आंदोलन रहा।

उसने भूमि संबंध बदले, लेकिन स्थायी राजनीतिक संगठनात्मक विरासत अपेक्षाकृत कमजोर रही।

इसलिए दोनों की उपलब्धियों की तुलना एक ही कसौटी से नहीं की जा सकती।

बोधगया का आंदोलन बाद में कमजोर क्यों हुआ?

जब मुख्य भूमि मांगों का एक हिस्सा पूरा होने लगा, आंदोलन की तात्कालिक ऊर्जा कम हुई।

संघर्ष वाहिनी स्वयं भी राष्ट्रीय स्तर पर स्थायी व्यापक संगठन नहीं बन पाई।

जयप्रकाश नारायण की मृत्यु के बाद वैचारिक केंद्र कमजोर हुआ।

स्थानीय कार्यकर्ता विभिन्न राजनीतिक धाराओं में गए।

यानी आंदोलन ने मुद्दा जीता, लेकिन स्थायी पार्टी नहीं बनाई।

भोजपुर क्यों बना रहा?

भोजपुर में भूमि प्रश्न पूरी तरह हल नहीं हुआ।

इसलिए संघर्ष की सामाजिक परिस्थितियां बनी रहीं।

इसके साथ CPI(ML) का संगठनात्मक ढांचा भी मौजूद था।

भूमि वितरण में कौन आगे?

यदि तुलना वास्तविक भूमि हस्तांतरण की हो तो बोधगया अधिक प्रत्यक्ष उपलब्धि दिखाता है।

भोजपुर में भूमि कब्जे हुए, लेकिन व्यापक वैधानिक पुनर्वितरण अपेक्षाकृत सीमित रहा।

इसलिए भूमि-सुधार की ठोस कसौटी पर बोधगया का मॉडल अधिक प्रभावी दिखाई देता है।

सामाजिक भय तोड़ने में कौन आगे?

दलित मजदूर का तत्काल सामाजिक भय और ग्रामीण सत्ता-संतुलन—

तो भोजपुर का सशस्त्र चरण अधिक तीव्र प्रभाव डालता दिखाई देता है।

दलितों का राजनीतिक आत्मविश्वास बढ़ा।

लेकिन इस उपलब्धि की मानवीय कीमत भी बहुत अधिक थी।

मानवीय कीमत

भोजपुर मॉडल का सबसे गंभीर नकारात्मक परिणाम था—

बोधगया में भी पुलिस दमन और हिंसा के प्रसंग थे, लेकिन वह लंबे सशस्त्र रक्तचक्र में नहीं बदला।

यदि सामाजिक परिवर्तन की सफलता में मानवीय लागत को शामिल किया जाए, तो यह तुलना अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

क्या अहिंसक मॉडल हमेशा बेहतर है?

राज्य में कुछ लोकतांत्रिक संवेदनशीलता हो,

यदि राज्य पूरी तरह हिंसक अधिनायकवादी हो या विरोध के सभी रास्ते बंद हों, तो परिस्थिति अलग हो सकती है।

इसलिए बोधगया की सफलता को हर परिस्थिति में लागू होने वाला सार्वभौमिक सूत्र नहीं बनाया जा सकता।

क्या हिंसा अपरिहार्य थी?

भोजपुर के समर्थकों का तर्क था कि वहां ग्रामीण सत्ता इतनी हिंसक और कठोर थी कि बिना हथियार के गरीब का भय नहीं टूटता।

लेकिन बोधगया का अनुभव एक प्रतिप्रश्न खड़ा करता है—

क्या संगठित श्रम बहिष्कार, गांव समितियां और बड़े पैमाने पर सत्याग्रह भी सत्ता-संतुलन बदल सकते थे?

इस प्रश्न का एकमात्र निश्चित उत्तर इतिहास नहीं देता, लेकिन तुलना अवश्य मजबूर करती है कि हिंसा को स्वचालित रूप से अपरिहार्य न माना जाए।

‘वर्ग-शत्रु विनाश’ बनाम संस्थागत सुधार

भोजपुर की प्रारंभिक रणनीति व्यक्ति को वर्ग-सत्ता के प्रतीक के रूप में लक्ष्य करती थी।

व्यक्ति की हत्या सत्ता संबंध बदल भी सकती है, नहीं भी।

लेकिन यदि भूमि रिकॉर्ड बदल जाए और स्वामित्व पुनर्वितरित हो, तो संस्थागत परिवर्तन अधिक स्पष्ट होता है।

व्यक्तिगत प्रतिशोध का जोखिम

सशस्त्र राजनीति में एक समस्या यह है कि स्थानीय व्यक्तिगत विवाद ‘वर्ग-शत्रु’ की भाषा में प्रवेश कर सकते हैं।

बोधगया की खुली गांव समितियों और कानूनी प्रक्रिया में भी गुटबाजी संभव थी, लेकिन निर्णय अधिक सार्वजनिक थे।

खुली राजनीति और सार्वजनिक निगरानी

भोजपुर के भूमिगत दस्तों के निर्णय स्वभावतः गोपनीय थे।

इससे जवाबदेही और सार्वजनिक आलोचना की संभावना कम थी।

यह दोनों मॉडल की लोकतांत्रिक गुणवत्ता में बड़ा अंतर है।

लेकिन खुले आंदोलन की भी सीमाएं

खुली राजनीति में नेता आसानी से गिरफ्तार किए जा सकते हैं।

आंदोलन पर प्रशासनिक दबाव बढ़ सकता है।

कार्यकर्ताओं की पहचान सबको पता होती है।

इसलिए बोधगया मॉडल भी जोखिम-मुक्त नहीं था।

उसकी सफलता संगठन की व्यापकता और नैतिक वैधता पर निर्भर थी।

लोकतंत्र का उपयोग

भोजपुर की प्रारंभिक CPI(ML) राजनीति ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को अस्वीकार किया।

बाद में उसी धारा ने चुनावी राजनीति अपनाई।

इसलिए बोधगया स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं के भीतर संघर्ष की संभावना का उदाहरण बना।

भोजपुर का रणनीतिक परिवर्तन क्या बताता है?

CPI(ML) Liberation का बाद में जनसंगठन और चुनावी राजनीति अपनाना स्वयं यह संकेत देता है कि शुरुआती रणनीति पर्याप्त नहीं थी।

यदि बंदूक ही पूरी क्रांति का साधन होती, तो जनसंगठन और चुनाव की ओर जाने की आवश्यकता क्यों पड़ती?

यह प्रश्न भोजपुर के इतिहास की आत्मालोचनात्मक विरासत है।

बोधगया का संगठनात्मक क्षय क्या बताता है?

दूसरी ओर बोधगया की दीर्घकालिक संगठनात्मक कमजोरी यह भी बताती है कि केवल मुद्दा-आधारित आंदोलन पर्याप्त नहीं।

स्थायी संस्था के बिना आंदोलन की उपलब्धियां धीरे-धीरे कमजोर हो सकती हैं।

कौन-सा मॉडल अधिक लोकतांत्रिक?

तो बोधगया का मॉडल अधिक लोकतांत्रिक दिखाई देता है।

भोजपुर का शुरुआती भूमिगत सशस्त्र मॉडल लोकतांत्रिक जवाबदेही के मामले में अधिक सीमित था।

लेकिन भोजपुर का बाद का जनसंगठन मॉडल इस दूरी को काफी कम करता है।

कौन-सा मॉडल अधिक क्रांतिकारी?

यह इस पर निर्भर करता है कि ‘क्रांति’ कैसे परिभाषित की जाए।

यदि क्रांति का अर्थ राज्य सत्ता को चुनौती देना है—

यदि क्रांति का अर्थ वास्तविक संपत्ति-संबंध बदलना और महिलाओं को भूमि स्वामित्व देना है—

बोधगया की उपलब्धि भी अत्यंत क्रांतिकारी कही जा सकती है।

यानी ‘क्रांतिकारी’ शब्द केवल हथियार से तय नहीं होना चाहिए।

सामाजिक क्रांति की दो परिभाषाएं

भोजपुर की भाषा में सामाजिक क्रांति—

बोधगया ने संपत्ति रिकॉर्ड बदलने की कोशिश की।

दोनों ने ग्रामीण व्यवस्था पर हमला किया—

महिलाएं निर्णायक कसौटी क्यों हैं?

महिला प्रश्न दोनों आंदोलनों का तुलनात्मक परीक्षण करने की सबसे उपयोगी कसौटी है।

भोजपुर में महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा महत्वपूर्ण हुई।

बोधगया में महिला ने संपत्ति पर सीधा अधिकार हासिल किया।

इससे पता चलता है कि किसी आंदोलन की सामाजिक गहराई केवल उसकी वर्गीय भाषा से नहीं, बल्कि यह देखने से मापी जानी चाहिए कि वह परिवार के भीतर सत्ता-संबंध तक पहुंचता है या नहीं।

दलित मुक्ति की तुलना

बोधगया ने दलित भूमिहीनों को भूमि स्वामित्व की दिशा में बढ़ाया।

दोनों ने दलित राजनीतिक व्यक्तित्व बनाया।

दोनों की विरासत परस्पर पूरक दिखाई देती है।

आर्थिक मुक्ति की तुलना

भूमि मिलने से गरीब परिवार को दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा मिल सकती है।

मजदूरी बढ़ने से तत्काल आय बढ़ती है।

भोजपुर का प्रभाव मजदूरी सौदेबाजी पर अधिक स्पष्ट था।

बोधगया का प्रभाव संपत्ति वितरण पर अधिक स्पष्ट।

इसलिए आर्थिक मुक्ति के दो अलग आयाम दोनों आंदोलनों में दिखाई देते हैं।

राजनीतिक नागरिकता की तुलना

भोजपुर में गरीब मजदूर अंततः मतदाता, पार्टी कार्यकर्ता और विधायक तक पहुंचा।

बोधगया में भूमिहीन किसान गांव समिति, सत्याग्रही और भूमि स्वामी बना।

दोनों ने ग्रामीण गरीब को राज्य से प्रत्यक्ष संबंध दिया।

दूसरे ने संपत्ति और अधिकार नागरिकता।

क्या दोनों मॉडल को जोड़ा जा सकता था?

भोजपुर जैसा मजबूत खेतिहर मजदूर संगठन,

बोधगया जैसी भूमि पुनर्वितरण की कानूनी सफलता,

लेकिन भोजपुर जैसी दीर्घकालिक राजनीतिक संगठन क्षमता?

तो शायद बिहार के भूमि सुधारों का अलग इतिहास बन सकता था।

लेकिन तुलना इससे बहुत महत्वपूर्ण होती है।

कौन-सा आंदोलन ‘जीता’?

ऐसी तुलना में किसी एक विजेता की घोषणा करना गलत होगा।

भोजपुर ने पूरा भूमि पुनर्वितरण नहीं किया, लेकिन ग्रामीण दलित राजनीति बदल दी।

बोधगया ने राज्य सत्ता नहीं बदली, लेकिन वास्तविक भूमि और महिला स्वामित्व में परिवर्तन किया।

बोधगया का आंदोलन संस्थागत रूप से कमजोर हुआ।

परिणाम को किस कसौटी से मापें?

यही कारण है कि सरल ‘हिंसा बनाम अहिंसा’ तुलना अपर्याप्त होगी।

भूमि वितरण

क्योंकि सरकारी रिकॉर्ड, पट्टा और वास्तविक भूमि हस्तांतरण के स्पष्ट उदाहरण हैं।

मजदूर शक्ति

क्योंकि खेतिहर मजदूरों की सामूहिक सौदेबाजी, मजदूरी और सामाजिक प्रतिरोध लंबे समय तक राजनीतिक शक्ति बने।

महिला संपत्ति अधिकार

महिलाओं के स्वतंत्र और संयुक्त पट्टे इसकी ऐतिहासिक उपलब्धि बने।

दीर्घकालिक पार्टी संगठन

CPI(ML) Liberation ने दशकों तक राजनीतिक उपस्थिति बनाए रखी और चुनावी प्रतिनिधित्व हासिल किया।

मानवीय लागत

भोजपुर का सशस्त्र संघर्ष आगे निजी सेनाओं और नरसंहारों वाले लंबे हिंसक चक्र में जुड़ गया।

यही तुलना का सबसे गंभीर नैतिक पक्ष है।

सामाजिक भय का टूटना

बोधगया ने सामूहिक सत्याग्रह से निर्भरता तोड़ी।

दोनों में गरीब का आत्मविश्वास बढ़ा।

राज्य को बदलने का तरीका

भोजपुर ने पहले राज्य को शत्रु माना, फिर उसकी संस्थाओं में प्रवेश किया।

बोधगया ने राज्य को विरोधी और संभावित सुधारकर्ता दोनों माना।

इससे एक व्यापक राजनीतिक निष्कर्ष निकलता है—

लोकतांत्रिक राज्य एक साथ दमनकारी और सुधारक्षम दोनों हो सकता है।

जनआंदोलन की रणनीति इसी जटिलता पर निर्भर करती है।

कानून की भूमिका

भोजपुर में प्रारंभिक क्रांतिकारी राजनीति कानून के पार जाने की कोशिश करती थी।

यही बोधगया की संस्थागत सफलता का एक बड़ा कारण था।

नैतिक वैधता

अहिंसक सत्याग्रह को व्यापक नैतिक समर्थन जुटाना आसान था।

सशस्त्र आंदोलन में उत्पीड़न के वास्तविक कारण होने के बावजूद लक्षित हत्या उसकी नैतिक वैधता को कमजोर कर सकती थी।

इसीलिए बोधगया को सामाजिक कार्यकर्ता, महिला समूह और नागरिक समाज से अपेक्षाकृत व्यापक समर्थन मिला।

लेकिन केवल नैतिकता नहीं, शक्ति भी

बोधगया को सफल बनाने वाला केवल ‘अच्छा नैतिक तर्क’ नहीं था।

तो शायद प्रशासन वर्षों निष्क्रिय रहता।

यानी अहिंसा की सफलता के पीछे भी संगठित शक्ति और आर्थिक दबाव था।

भोजपुर की सबसे बड़ी सीख

सामाजिक भय को चुनौती देना आवश्यक है।

गरीब को संगठन और राजनीतिक आत्मविश्वास चाहिए।

लेकिन व्यक्तिगत हत्या को स्थायी जनशक्ति का विकल्प बनाना अंततः गंभीर संकट पैदा कर सकता है।

बोधगया की सबसे बड़ी सीख

सत्याग्रह तभी प्रभावी है जब उसके पीछे—

दोनों की संयुक्त सीख

यदि दोनों संघर्षों की सर्वोत्तम विरासत को जोड़ा जाए तो किसान आंदोलन की एक व्यापक रणनीति सामने आती है—

जाति और लिंग की असमानता को पहचानना,

हिंसा को अंतिम या अपरिहार्य मानने से बचना।

यही दोनों आंदोलनों की संयुक्त ऐतिहासिक विरासत है।

भारतीय किसान इतिहास में उनका स्थान

भोजपुर और बोधगया दोनों यह दिखाते हैं कि स्वतंत्रता के बाद किसान संघर्ष केवल कृषि उत्पादन का प्रश्न नहीं रहे।

यही कारण है कि इन्हें केवल ‘नक्सलवाद’ या ‘भूमि सत्याग्रह’ की संकरी श्रेणी में रखना पर्याप्त नहीं।

दोनों स्वतंत्र भारत की ग्रामीण लोकतांत्रिक क्रांति के अलग-अलग प्रयोग थे।

समग्र मूल्यांकन : बंदूक और सत्याग्रह के बीच असली प्रश्न जनशक्ति का था

भोजपुर और बोधगया की तुलना का सबसे सरल निष्कर्ष यह कहना होगा कि एक हिंसक था और दूसरा अहिंसक।

भोजपुर की शक्ति बंदूक में नहीं, उसके पीछे संगठित दलित खेतिहर मजदूर में थी।

बोधगया की शक्ति अहिंसा में नहीं, उसके पीछे संगठित भूमिहीन गांव समितियों में थी।

जनशक्ति।

अंतर यह था कि उस जनशक्ति को किस राजनीतिक रूप में ढाला गया।

भोजपुर में प्रारंभिक चरण में वह गुरिल्ला और लक्षित हिंसा में बदल गई।

बोधगया में वह सत्याग्रह, कानून और भूमि वितरण में बदली।

दीर्घकालिक परिणामों को देखें तो एक महत्वपूर्ण पैटर्न सामने आता है—

भोजपुर ने सामाजिक भय और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को अधिक गहराई से बदला।

बोधगया ने भूमि स्वामित्व और महिला संपत्ति अधिकार में अधिक प्रत्यक्ष संस्थागत परिवर्तन किया।

बोधगया की संगठनात्मक दीर्घायु कम रही।

भोजपुर बताता है कि बिना संगठन गरीब का भय नहीं टूटता।

बोधगया बताता है कि बिना संस्थागत परिवर्तन संघर्ष की जीत स्थायी नहीं होती।

भूमि सुधार तभी वास्तविक सामाजिक सुधार बनता है जब जमीन, मजदूरी, जाति, महिला अधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व—सब एक साथ बदलें।

यही दोनों आंदोलनों की संयुक्त ऐतिहासिक विरासत है।

खंड 16 — उपलब्धियां, सीमाएं और दीर्घकालीन प्रभाव : भूमि सुधार, जाति-सत्ता, दलित चेतना, महिला अधिकार और बिहार की राजनीति

इसमें भोजपुर और बोधगया दोनों संघर्षों की समेकित उपलब्धियां, भूमि-वितरण की वास्तविक सीमा, मजदूरी और खेतिहर श्रम संबंधों में बदलाव, दलित राजनीतिक चेतना, निजी सेनाओं और हिंसा की विरासत, महिला भूमि-अधिकार, CPI(ML) की चुनावी राजनीति, बिहार के सामाजिक न्याय विमर्श तथा इन संघर्षों ने स्वतंत्र भारत की ग्रामीण राजनीति को स्थायी रूप से कितना बदला—इसका विस्तृत मूल्यांकन किया जाएगा।

खंड 16

उपलब्धियां, सीमाएं और दीर्घकालीन प्रभाव

भोजपुर और बोधगया भूमि संघर्षों का ऐतिहासिक मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि कितनी जमीन बांटी गई, कितने लोग आंदोलन में शामिल हुए या कितनी राजनीतिक हत्याएं हुईं। इन आंदोलनों का वास्तविक प्रभाव ग्रामीण बिहार की सत्ता-संरचना, दलित आत्मसम्मान, खेतिहर मजदूरी, महिलाओं के भूमि-अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और राज्य की भूमि-सुधार नीति पर पड़ा।

दोनों आंदोलनों ने यह स्पष्ट किया कि स्वतंत्रता के बाद कानून बन जाने भर से ग्रामीण सामाजिक संबंध नहीं बदलते। जमींदारी उन्मूलन के बावजूद भूमि का असमान वितरण बना रहा। भूमिहीन मजदूरों की निर्भरता कायम रही। जाति और भूमि का संबंध टूटा नहीं। और महिलाओं को किसान तथा संपत्ति-अधिकारिणी के रूप में पहचान लगभग अनुपस्थित रही।

भोजपुर और बोधगया ने इन्हीं अधूरी प्रक्रियाओं को अलग-अलग राजनीतिक रास्तों से चुनौती दी।

पहली उपलब्धि : भूमि प्रश्न को फिर राजनीतिक केंद्र में लाना

1950 के दशक में भूमि सुधार स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े राजनीतिक एजेंडों में था।

लेकिन समय के साथ यह प्रश्न प्रशासनिक फाइलों में सिमटने लगा।

भोजपुर और बोधगया ने भूमि के सवाल को फिर सार्वजनिक राजनीति के केंद्र में ला दिया।

जमींदारी खत्म होने के बाद भी खेतिहर मजदूर भूमिहीन क्यों है?

भूमि-सीमा कानून के बावजूद मठ जैसी संस्था हजारों एकड़ कृषि भूमि पर प्रभाव कैसे बनाए रख सकती है?

इन प्रश्नों ने सरकार को भूमि सुधार की वास्तविक स्थिति पर जवाब देने के लिए मजबूर किया।

भूमि वितरण : उपलब्धि और सीमा

बोधगया संघर्ष की सबसे ठोस उपलब्धि वास्तविक भूमि पुनर्वितरण था।

कुछ भूमि अधिशेष अथवा विवादित नियंत्रण से निकालकर भूमिहीन परिवारों तक पहुंची।

अलग-अलग स्रोत प्रारंभिक वितरण, संयुक्त पट्टों और वास्तविक किसान नियंत्रण के लिए अलग-अलग आंकड़े देते हैं, इसलिए अंतिम कुल संख्या सावधानी से पढ़नी चाहिए।

बोधगया आंदोलन ने भूमि को वास्तविक गरीब कृषकों तक पहुंचाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।

भोजपुर में ऐसी व्यापक वैधानिक भूमि-वितरण उपलब्धि अपेक्षाकृत सीमित रही।

भोजपुर में भूमि से अधिक मजदूरी का प्रभाव

भोजपुर की सबसे ठोस आर्थिक उपलब्धि शायद भूमि से अधिक खेतिहर मजदूरी और श्रम-संबंधों में दिखाई देती है।

संगठित मजदूरों ने कम मजदूरी स्वीकार करने से इनकार किया।

कई क्षेत्रों में भू-स्वामियों को मजदूरी बढ़ानी पड़ी।

बेला भाटिया के मध्य बिहार संबंधी अध्ययन में भी नक्सलवादी प्रभाव वाले गांवों में खेतिहर मजदूरों के बीच मजदूरी अधिकार की अधिक चेतना और सामूहिक सौदेबाजी को महत्वपूर्ण परिवर्तन माना गया। (jstor.org)

यह परिवर्तन तत्काल जीवन पर सीधे असर डालता था।

‘मजदूरी’ का अधिकार बनाम ‘मालिक की कृपा’

भोजपुर आंदोलन से पहले खेतिहर मजदूरी कई जगह मालिक द्वारा तय संबंध की तरह देखी जाती थी।

आंदोलन ने मजदूरी को अधिकार और बातचीत के प्रश्न में बदला।

यह परिवर्तन ग्रामीण श्रम बाजार को अधिक राजनीतिक बनाता है।

जातिगत सत्ता पर प्रहार

भोजपुर की सबसे बड़ी सामाजिक उपलब्धि पुराने जातिगत वर्चस्व को चुनौती देना थी।

इसने ग्रामीण सत्ता-संरचना में स्थायी बदलाव पैदा किया।

पुराने सामाजिक व्यवहार पूरी तरह समाप्त नहीं हुए, लेकिन उन्हें निर्विरोध स्वीकार करने का दौर कमजोर पड़ा।

‘इज्जत’ की राजनीति की विरासत

भोजपुर में ‘इज्जत’ आर्थिक संघर्ष जितना ही महत्वपूर्ण शब्द बना।

इसने दिखाया कि दलित किसान-मजदूर की राजनीति केवल आय पर आधारित नहीं।

यही सामाजिक चेतना बाद के बिहार में दलित, महादलित और पिछड़े समुदायों की राजनीति के लिए व्यापक संदर्भ बनी।

हालांकि इन राजनीतिक धाराओं का सीधा कारण केवल भोजपुर नहीं था, लेकिन भोजपुर ने ग्रामीण निम्नवर्गीय आत्मसम्मान की राजनीति को बहुत पहले तीखा रूप दे दिया था।

दलित राजनीतिक चेतना

भोजपुर और बोधगया दोनों में दलित समुदाय केवल आंदोलन का ‘समर्थक वर्ग’ नहीं रहा।

इन प्रक्रियाओं ने नई राजनीतिक नागरिकता पैदा की।

2021 के बोधगया अध्ययन में भुइयां समुदाय की स्मृतियों में इसी आंदोलन को नए दलित राजनीतिक व्यक्तित्व और belonging के निर्माण से जोड़ा गया है। (sciencedirect.com)

यह संपत्ति से अधिक गहरा परिवर्तन था।

राजनीतिक भय का टूटना

किसी भी प्रभुत्व की बड़ी शक्ति भय होती है।

भोजपुर में सशस्त्र आंदोलन ने इस भय को बहुत तीखे तरीके से चुनौती दी।

बोधगया में गांव समितियों और सत्याग्रह ने वही काम दूसरी पद्धति से किया।

संगठन होने पर शक्तिशाली संस्था या भू-स्वामी को चुनौती दी जा सकती है।

यह राजनीतिक मनोविज्ञान की बड़ी उपलब्धि थी।

लेकिन भोजपुर की उपलब्धि की भारी कीमत

भोजपुर का सशस्त्र संघर्ष बहुत बड़ी मानवीय कीमत के साथ आया।

और मध्य बिहार लंबे समय तक हिंसा–प्रतिहिंसा के चक्र में फंसा रहा।

इसलिए भोजपुर की सामाजिक उपलब्धियों को उसकी हिंसक विरासत से अलग नहीं किया जा सकता।

निजी सेनाओं की दीर्घकालिक विरासत

1980 और 1990 के दशकों में बिहार में विभिन्न जाति-आधारित निजी सेनाओं का उभार हुआ।

भूमिसेना, लोरिक सेना, गंगा सेना और अंततः रणवीर सेना जैसे संगठन ग्रामीण वर्ग-संघर्ष के सैन्यीकरण का परिणाम थे। जॉर्ज कुन्नाथ ने इन सेनाओं को मध्य बिहार में बदलते वर्ग–जाति संबंधों की प्रतिक्रिया के रूप में विश्लेषित किया है। (tandfonline.com)

इस हिंसा ने कई बार भूमि और मजदूरी के मूल प्रश्न को जातिगत प्रतिशोध में बदल दिया।

यह भोजपुर विरासत का सबसे गंभीर नकारात्मक पक्ष था।

रणवीर सेना और हिंसा का चरम

1990 के दशक में रणवीर सेना का उदय इस दीर्घकालिक संघर्ष का हिंसक चरम था।

बथानी टोला और अन्य नरसंहारों ने दिखाया कि ग्रामीण सैन्यीकरण किस हद तक पहुंच चुका था।

यह कहना गलत होगा कि रणवीर सेना केवल 1970 के भोजपुर आंदोलन की सीधी उपज थी।

लेकिन वर्ग-संघर्ष, जातिगत ध्रुवीकरण और निजी हथियारबंद प्रतिक्रिया की जो संरचना पहले बनी थी, उसी विस्तृत ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में उसका विकास हुआ।

बोधगया में हिंसक सैन्यीकरण क्यों सीमित रहा?

बोधगया में भी पुलिस बल प्रयोग और विरोधी हिंसा हुई।

फिर भी वहां भोजपुर जैसा दीर्घकालिक निजी सेना–गुरिल्ला युद्ध नहीं विकसित हुआ।

इसका एक महत्वपूर्ण कारण आंदोलन की अहिंसक रणनीति थी।

इससे सामाजिक ध्रुवीकरण का सैन्य रूप अपेक्षाकृत सीमित रहा।

महिला भूमि-अधिकार : बोधगया की असाधारण उपलब्धि

बोधगया की सबसे विशिष्ट उपलब्धि महिलाओं के स्वतंत्र और संयुक्त भूमि-अधिकार की मांग थी।

भूमि सुधार केवल पुरुष किसान को अधिकार देकर पूरा नहीं होगा।

भूमि वितरण में महिला का नाम भी होना चाहिए।

बिना अग्रवाल ने बोधगया को दक्षिण एशिया में महिलाओं के भूमि-अधिकार की महत्वपूर्ण मिसालों में शामिल किया है। (ccc.uchicago.edu)

इसने भारतीय भूमि सुधार विमर्श की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण वैचारिक योगदान दिया।

‘महिला किसान’ की अवधारणा

बोधगया ने कृषि की पारंपरिक परिभाषा पर सवाल उठाया।

करती है तो वह स्वयं किसान क्यों नहीं?

महिला का जमीन पर नाम उसके श्रम को कानूनी पहचान देता है।

इसलिए बोधगया का प्रभाव केवल ऐतिहासिक नहीं, समकालीन कृषि नीति से भी जुड़ा है।

संयुक्त पट्टे की दीर्घकालिक नीति

बोधगया जैसे आंदोलनों ने महिला के नाम या पति–पत्नी के संयुक्त नाम भूमि देने की मांग को वैचारिक आधार दिया।

बाद के वर्षों में विभिन्न सरकारी भूमि वितरण और आवास कार्यक्रमों में संयुक्त नाम की नीति अधिक स्वीकार्य होती गई।

यह कहना उचित नहीं कि इसका एकमात्र कारण बोधगया था।

लेकिन उसने ऐसी नीति के लिए ऐतिहासिक सामाजिक मिसाल अवश्य प्रदान की।

महिला स्वामित्व की सीमा

कागज पर महिला के नाम जमीन होने का अर्थ हमेशा वास्तविक नियंत्रण नहीं।

पुरुष परिवार भूमि पर व्यवहारिक अधिकार बनाए रख सकता था।

उत्तराधिकार के बाद जमीन फिर पुरुष सदस्यों के नियंत्रण में जा सकती थी।

2021 के बोधगया अध्ययन ने इसी कारण भूमि स्वामित्व की सफलता को केवल कानूनी रिकॉर्ड से नहीं, बल्कि सामाजिक पहचान और चेतना में आए परिवर्तन से भी मापने का आग्रह किया। (sciencedirect.com)

पितृसत्ता को राजनीतिक प्रश्न बनाना

बोधगया की बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि पितृसत्ता समाप्त हो गई।

उसकी उपलब्धि यह थी कि पितृसत्ता को किसान आंदोलन के भीतर वैध राजनीतिक प्रश्न बनाया गया।

पहली बार भूमिहीन महिलाओं ने अपने ही गरीब परिवार के पुरुष मुखिया से संपत्ति अधिकार में बराबरी मांगी।

यह सामाजिक आंदोलन की आत्मालोचनात्मक क्षमता का उल्लेखनीय उदाहरण है।

भोजपुर की लैंगिक सीमा

भोजपुर में महिलाओं की गरिमा और यौन उत्पीड़न के विरुद्ध प्रतिरोध महत्वपूर्ण था।

लेकिन महिला का स्वतंत्र भूमि स्वामित्व आंदोलन की केंद्रीय राजनीतिक मांग नहीं बना।

इसलिए बोधगया की तुलना में भोजपुर का लैंगिक परिवर्तन सीमित रहा।

यह दर्शाता है कि वर्ग और जाति की क्रांतिकारी राजनीति स्वतः पितृसत्ता समाप्त नहीं करती।

उसके लिए स्वतंत्र राजनीतिक हस्तक्षेप आवश्यक है।

भूमि सुधार की प्रशासनिक सीख

बोधगया ने बिहार सरकार को एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक सबक दिया।

और लाभार्थी को वास्तविक कब्जा मिले।

इनमें से किसी एक चरण की विफलता पूरी भूमि-सुधार प्रक्रिया रोक सकती है।

भूमि अभिलेख : राजनीति का केंद्रीय प्रश्न

भोजपुर के उग्र संघर्ष ने शक्ति-संबंध पर हमला किया।

बोधगया ने दिखाया कि खतियान, खाता और पट्टा भी सत्ता के दस्तावेज हैं।

यह तय करता है कि अदालत और प्रशासन किसे मालिक मानेगा।

इसलिए भूमि रिकॉर्ड का आधुनिकीकरण सामाजिक न्याय का भी प्रश्न है।

यह समस्या बिहार में बाद के दशकों तक बनी रही।

भूमि-सुधार का अधूरापन

दोनों आंदोलनों की सबसे बड़ी सीमा यही थी—

उन्होंने बिहार की भूमिहीनता को समाप्त नहीं किया।

लेकिन छोटे और भूमिहीन किसानों का बड़ा वर्ग बना रहा।

यानी आंदोलन संरचनात्मक समस्या को बदलने में सफल हुए—

भूमि-सीमा कानूनों की सीमाएं

बड़े भू-स्वामियों ने भूमि-सीमा कानून से बचने के लिए—

इसलिए कानून की संभावित पुनर्वितरण क्षमता पूरी तरह उपयोग नहीं हुई।

बोधगया ने इस समस्या को उजागर किया, लेकिन पूरे बिहार में उसका समाधान नहीं कर सका।

बटाईदारी का अधूरा प्रश्न

भूमिहीनता के साथ बटाईदारों की असुरक्षा भी बनी रही।

बिहार में बटाई संबंध अक्सर अनौपचारिक रहे।

यदि काश्तकारी दर्ज न हो तो बटाईदार कानूनी अधिकार सिद्ध करने में कमजोर रहता है।

भोजपुर और बोधगया दोनों अनुभवों के बावजूद राज्यव्यापी सुरक्षित बटाई व्यवस्था विकसित नहीं हो सकी।

यह भूमि सुधार की बड़ी अधूरी परियोजना रही।

बंद्योपाध्याय आयोग और अधूरा भूमि एजेंडा

इक्कीसवीं सदी में भी बिहार सरकार को भूमि सुधार पर नए आयोग की आवश्यकता महसूस हुई।

डी. बंद्योपाध्याय की अध्यक्षता वाले बिहार भूमि सुधार आयोग ने बटाईदारों, भूमिहीनों और भूमि रिकॉर्ड सुधार से जुड़े महत्वपूर्ण सुझाव दिए।

1970 के दशक के संघर्षों के दशकों बाद भी मूल भूमि प्रश्न पूरी तरह हल नहीं हुआ था।

यानी भोजपुर और बोधगया समस्या के निर्णायक अध्याय थे—

CPI(ML) की राजनीतिक रूपांतरण विरासत

भोजपुर का एक बड़ा दीर्घकालिक प्रभाव CPI(ML) Liberation की राजनीति में दिखाई देता है।

इस परिवर्तन ने भारतीय नक्सलवादी आंदोलन के भीतर एक वैकल्पिक रास्ता प्रस्तुत किया।

नक्सलवाद के दो रास्ते

आगे नक्सलबाड़ी की विरासत दो बड़ी दिशाओं में दिखाई देती है।

CPI(ML) Liberation जैसी संसदीय और जनसंगठन आधारित राजनीति।

PWG, MCC और अंततः CPI (Maoist) की दीर्घकालिक सशस्त्र रणनीति।

भोजपुर का अनुभव पहली दिशा के विकास में केंद्रीय था।

यह भारतीय वाम उग्रवाद के इतिहास पर उसका राष्ट्रीय प्रभाव है।

रामनरेश राम की विरासत

रामनरेश राम इस राजनीतिक रूपांतरण के प्रतीक बने।

उनकी राजनीति ने यह मॉडल प्रस्तुत किया कि ग्रामीण गरीब का नेता सशस्त्र विद्रोह की दुनिया से निकलकर लोकतांत्रिक प्रतिनिधि भी बन सकता है।

यह भोजपुर की दीर्घकालिक संस्थागत उपलब्धि थी।

लोकतांत्रिक प्रक्रिया का विस्तार

भोजपुर का आंदोलन जिस दौर में शुरू हुआ, उस समय गरीब दलित का स्वतंत्र मतदान भी संघर्ष का मुद्दा था।

बाद के दशकों में वही समुदाय अधिक संगठित मतदाता बना।

इस परिवर्तन का श्रेय किसी एक संगठन को नहीं दिया जा सकता।

लेकिन वाम किसान आंदोलनों ने गरीब मतदाता को राजनीतिक शक्ति का अर्थ समझाने में भूमिका निभाई।

यह भारतीय लोकतंत्र की जड़ें गहरी करने वाली प्रक्रिया थी।

पंचायत और स्थानीय सत्ता

बाद के दशकों में पंचायत आरक्षण ने दलितों और महिलाओं को स्थानीय राजनीतिक प्रतिनिधित्व के नए अवसर दिए।

भोजपुर और बोधगया जैसे आंदोलनों ने इसके पहले ही गरीब ग्रामीणों में सार्वजनिक राजनीतिक भागीदारी का अनुभव पैदा कर दिया था।

इसलिए पंचायत लोकतंत्रीकरण को इन पुराने संघर्षों से पूरी तरह अलग नहीं देखा जा सकता।

उन्होंने वह सामाजिक मानसिकता तैयार की जिसमें स्थानीय सत्ता पर दावा वैध माना जाने लगा।

बिहार की ‘सामाजिक न्याय’ राजनीति से संबंध

1990 के दशक में बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति उभरी।

पिछड़ी जातियों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व तेजी से बढ़ा।

पुराने अगड़ी जाति प्रभुत्व को चुनौती मिली।

भोजपुर के संघर्ष ने इससे पहले ही ग्रामीण सत्ता की जातिगत प्रकृति पर प्रहार किया था।

भोजपुर का आधार वर्ग और दलित खेतिहर मजदूर की राजनीति में था।

1990 के दशक की सामाजिक न्याय राजनीति अधिक व्यापक पिछड़ा जाति प्रतिनिधित्व से जुड़ी।

फिर भी दोनों ने पुराने सामाजिक प्रभुत्व को कमजोर किया।

प्रतिनिधित्व और भूमि न्याय का अंतर

सामाजिक प्रतिनिधित्व बढ़ना जरूरी है।

लेकिन इससे भूमि वितरण स्वतः नहीं बदलता।

यदि पिछड़ी जाति का संपन्न किसान दलित मजदूर को कम मजदूरी देता है, तो वर्गीय संघर्ष कायम रहता है।

जातिगत लोकतंत्रीकरण और आर्थिक लोकतंत्रीकरण एक ही चीज नहीं।

बिहार की राजनीति में वाम की उपस्थिति

मध्य बिहार के भूमि संघर्षों ने वाम राजनीति को ग्रामीण सामाजिक आधार दिया।

CPI, CPI(M), CPI(ML) की विभिन्न धाराएं तथा किसान संगठनों ने भूमि, मजदूरी और सामाजिक न्याय के प्रश्न को चुनावी राजनीति में बनाए रखा।

भले ही वाम दल बिहार में राज्य सत्ता हासिल नहीं कर सके, उनकी उपस्थिति ने भूमि और मजदूर प्रश्नों को राजनीतिक विमर्श से पूरी तरह गायब नहीं होने दिया।

नक्सलवाद और राज्य नीति

भोजपुर के बाद राज्य ने यह समझा कि नक्सलवाद को केवल पुलिस कार्रवाई से समाप्त करना कठिन है।

यही ‘सुरक्षा + विकास’ रणनीति बाद में भारत के अन्य नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भी दिखाई देती है।

हालांकि उसके परिणामों और क्रियान्वयन पर अलग बहस है।

पुलिस सुधार की आवश्यकता

भोजपुर की हिंसा ने राज्य की निष्पक्ष पुलिस व्यवस्था की आवश्यकता भी उजागर की।

यदि गरीब नागरिक पुलिस को भू-स्वामी के साथ खड़ा देखे, तो राज्य की वैधता कमजोर होती है।

यदि भू-स्वामी पुलिस को नक्सलवादियों से सुरक्षा देने में विफल मानें, तो वे निजी सेना बना सकते हैं।

इसलिए निष्पक्ष और प्रभावी पुलिस दोनों पक्षों के सैन्यीकरण को रोकने की शर्त है।

निजी सेनाओं पर राज्य की विफलता

बिहार में निजी सेनाओं का लंबे समय तक बने रहना राज्य की गंभीर विफलता थी।

लोकतांत्रिक राज्य में हिंसा का वैध एकाधिकार सरकार के पास होना चाहिए।

जातिगत या भू-स्वामी सेना का अस्तित्व इस सिद्धांत को तोड़ता है।

भोजपुर की हिंसक विरासत का सबसे महत्वपूर्ण नीति-सबक यही है—

राज्य किसी भी सामाजिक वर्ग को निजी सैन्य शक्ति का विकल्प नहीं दे सकता।

नरसंहारों की स्मृति

बथानी टोला और बाद के मध्य बिहार के नरसंहार आज भी उस संघर्ष की दर्दनाक स्मृति हैं।

ये घटनाएं दिखाती हैं कि जब वर्ग और जाति की राजनीति हथियारबंद प्रतिशोध में बदलती है तो सबसे अधिक नुकसान—

इसलिए भूमि संघर्ष के मूल्यांकन में मानवीय सुरक्षा को केंद्रीय कसौटी बनाना आवश्यक है।

बोधगया की स्मृति अलग क्यों है?

यानी उसकी सार्वजनिक स्मृति हिंसा से कम और सामाजिक सुधार से अधिक जुड़ी।

यह आंदोलन की रणनीति और ऐतिहासिक छवि के बीच स्पष्ट संबंध दिखाता है।

सामाजिक आंदोलन की संस्थागत सीमा

लेकिन बोधगया का एक बड़ा नकारात्मक पक्ष था—

उसके पास भोजपुर जैसी स्थायी पार्टी-संरचना नहीं बनी।

संघर्ष की तात्कालिक उपलब्धि के बाद संगठनात्मक निरंतरता कमजोर हुई।

इससे भूमि वितरण के बाद के प्रश्नों—

यह किसी भी मुद्दा-आधारित सामाजिक आंदोलन की सामान्य कमजोरी हो सकती है।

आंदोलन के बाद का किसान

भूमि प्राप्त कर लेने के बाद भूमिहीन किसान की समस्या बदलती है।

भूमि संघर्ष से कृषि नीति की ओर संक्रमण।

बोधगया में यह संक्रमण पूरी तरह संस्थागत नहीं हो सका।

छोटी जोत की समस्या

भूमि पुनर्वितरण अक्सर छोटे भूखंड देता है।

लेकिन वह हर परिवार को पूर्ण आर्थिक आत्मनिर्भरता नहीं दे सकता।

यदि जोत बहुत छोटी हो तो परिवार को मजदूरी जारी रखनी पड़ सकती है।

इसलिए भूमि वितरण के साथ ग्रामीण रोजगार और गैर-कृषि आय भी आवश्यक हैं।

हरित क्रांति से बाहर रहे प्रश्न

हरित क्रांति ने उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया।

इस अर्थ में दोनों आंदोलन भारतीय कृषि विकास के वितरणात्मक पक्ष की आलोचना थे।

कृषि उत्पादन बढ़ना और कृषि न्याय स्थापित होना एक ही बात नहीं।

विकास बनाम वितरण की बहस

स्वतंत्र भारत की कृषि नीति में अक्सर उत्पादन, सिंचाई और तकनीक पर जोर रहा।

भूमि आंदोलन ने वितरण को केंद्र में रखा।

यदि भूमि असमान है तो नई तकनीक का लाभ भी असमान हो सकता है।

इसलिए भोजपुर और बोधगया की विरासत आज भी विकास नीति के लिए महत्वपूर्ण है—

किसे लाभ मिलता है, यह उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कितना उत्पादन बढ़ा।

सामाजिक आंदोलन और कानून का संबंध

बोधगया ने दिखाया कि कानून और आंदोलन विरोधी नहीं होते।

यह लोकतांत्रिक राजनीति का महत्वपूर्ण मॉडल है।

भोजपुर की बाद की राजनीति भी अंततः इसी दिशा में आई—

क्या हिंसक संघर्ष ने सुधार तेज किया?

भोजपुर की उग्रता ने राज्य और भू-स्वामियों को गरीबों की मांग गंभीरता से लेने पर मजबूर किया।

हिंसा ने सुधार के प्रश्न को सुरक्षा समस्या में बदल दिया और लंबे समय तक सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ाया।

इसलिए हिंसा के प्रभाव को केवल सकारात्मक या नकारात्मक नहीं कहा जा सकता।

बोधगया का तुलनात्मक सबक

बोधगया दिखाता है कि वही ग्रामीण सत्ता—

इसलिए भूमि न्याय के लिए हिंसा की अनिवार्यता का दावा ऐतिहासिक रूप से सावधानी मांगता है।

बोधगया कम-से-कम लोकतांत्रिक राज्य के भीतर एक वैकल्पिक रास्ता प्रस्तुत करता है।

दलित आंदोलन पर प्रभाव

भोजपुर ने दलित राजनीति को वर्ग-संघर्ष से जोड़ा।

बोधगया ने दलित राजनीति को भूमि स्वामित्व और महिला अधिकार से।

दोनों ने यह दिखाया कि दलित प्रश्न केवल सामाजिक भेदभाव का प्रश्न नहीं।

यह भारतीय दलित राजनीति की आर्थिक व्याख्या के लिए महत्वपूर्ण है।

दलित मध्यम वर्ग और ग्रामीण मजदूर का अंतर

बाद के दशकों में दलित राजनीति में शिक्षा और सरकारी रोजगार से उभरता मध्यम वर्ग महत्वपूर्ण हुआ।

लेकिन भोजपुर और बोधगया का अनुभव याद दिलाता है कि ग्रामीण भूमिहीन दलित की समस्या अलग है।

उसका केंद्रीय प्रश्न भूमि और मजदूरी बना रह सकता है।

इसलिए दलित प्रतिनिधित्व और ग्रामीण आर्थिक न्याय को अलग-अलग समझना आवश्यक है।

महिलाओं के लिए संपत्ति क्यों निर्णायक रही?

बोधगया की दीर्घकालिक सीख है कि ग्रामीण महिला के सशक्तीकरण में संपत्ति का महत्व अत्यधिक है।

लेकिन यदि महिला के पास उत्पादन संसाधन पर कोई अधिकार नहीं तो आर्थिक निर्भरता बनी रह सकती है।

इसीलिए भूमि अधिकार की मांग आज भी महिला सशक्तीकरण के केंद्र में है।

महिला का नाम और सामाजिक पहचान

किसी खेत के खतियान में महिला का नाम दर्ज होना प्रतीकात्मक परिवर्तन लगता है।

लेकिन यह राज्य के रिकॉर्ड में उसकी स्वतंत्र पहचान है।

बोधगया की यह छोटी-सी प्रशासनिक क्रांति सामाजिक दृष्टि से बहुत बड़ी थी।

आंदोलन ने इतिहासलेखन को भी बदला

भोजपुर के शुरुआती इतिहास मुख्यतः नक्सलवादी हिंसा और पार्टी राजनीति पर केंद्रित थे।

बाद के शोधों ने दलित मजदूर, महिला, जाति और रोजमर्रा के सामाजिक सम्मान पर अधिक ध्यान दिया।

बोधगया पर भी प्रारंभिक भूमि-वितरण अध्ययनों के बाद महिला अधिकार और दलित स्मृति पर नई शोध सामने आई।

इससे दोनों आंदोलनों की हमारी समझ अधिक सामाजिक और जटिल हुई।

सफलता को केवल एकड़ में न मापें

क्या स्थानीय राजनीति में उसकी आवाज बढ़ी?

इसी व्यापक कसौटी पर दोनों आंदोलनों का वास्तविक मूल्यांकन संभव है।

भोजपुर : अपूर्ण लेकिन गहरा परिवर्तन

भोजपुर की भूमि क्रांति पूरी नहीं हुई।

खंड 17

समेकित मूल्यांकन, विस्तृत समयरेखा और प्रमुख स्रोत

भोजपुर और बोधगया के भूमि संघर्ष स्वतंत्र भारत के ग्रामीण इतिहास की दो ऐसी धाराएं हैं जो एक ही मूल समस्या—भूमि और सत्ता की असमानता—से निकलीं, लेकिन उनके राजनीतिक रास्ते बिल्कुल अलग रहे। भोजपुर ने नक्सलबाड़ी और CPI(ML) से प्रेरित होकर सशस्त्र वर्ग-संघर्ष का रास्ता अपनाया; बोधगया ने जयप्रकाश नारायण की ‘संपूर्ण क्रांति’ की विरासत से निकली छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के नेतृत्व में अहिंसक सत्याग्रह, गांव समितियों, श्रम बहिष्कार और भूमि-कानूनों के क्रियान्वयन का रास्ता चुना।

दोनों की तुलना इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इनके माध्यम से स्वतंत्र भारत के भूमि प्रश्न से जुड़े लगभग सभी बड़े सवाल एक साथ सामने आते हैं—

जाति और भूमि का संबंध कितना गहरा था?

दलित खेतिहर मजदूर केवल अधिक मजदूरी चाहता था या सामाजिक बराबरी भी?

हिंसा क्या सत्ता-संबंध बदल सकती है?

अहिंसा क्या वास्तविक संपत्ति का पुनर्वितरण करा सकती है?

राज्य दमनकारी भी हो सकता है और सुधार लागू करने वाला भी—इन दोनों भूमिकाओं को कैसे समझें?

भूमि सुधार की इकाई ‘परिवार’ है या महिला और पुरुष दोनों स्वतंत्र अधिकारधारी नागरिक हैं?

इन्हीं प्रश्नों के आधार पर भोजपुर और बोधगया का अंतिम मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

स्वतंत्र भारत का अधूरा भूमि प्रश्न

दोनों संघर्षों की जड़ स्वतंत्रता से बहुत पहले की कृषि व्यवस्था में थी।

1793 के स्थायी बंदोबस्त ने बिहार में ऐसी भूमि-संरचना को संस्थागत रूप दिया जिसमें वास्तविक उत्पादक किसान और राज्य के बीच जमींदार तथा विभिन्न स्तरों के मध्यस्थ मौजूद थे।

स्वतंत्रता के बाद बिहार भूमि सुधार अधिनियम, 1950 द्वारा जमींदारी समाप्त करने का प्रयास हुआ।

यह महत्वपूर्ण ऐतिहासिक परिवर्तन था।

लेकिन जमींदारी उन्मूलन और भूमि पुनर्वितरण एक ही बात नहीं थे।

पुराने भू-स्वामी वर्ग का बड़ा हिस्सा पर्याप्त कृषि भूमि बचाने में सफल रहा।

परिवार के विभिन्न सदस्यों के नाम भूमि,

ने भूमि-सीमा कानूनों के प्रभाव को सीमित किया।

इसी अंतर से भोजपुर और बोधगया दोनों पैदा हुए।

लोकतंत्र आया, गांव की सत्ता तुरंत नहीं बदली

1947 के बाद भारतीय नागरिक राजनीतिक रूप से समान हुए।

भूमिहीन दलित मजदूर और बड़ा भू-स्वामी दोनों एक मत के अधिकारी थे।

लेकिन गांव में सत्ता केवल संविधान से संचालित नहीं होती थी।

ग्रामीण सत्ता का वास्तविक आधार बने रहे।

यहीं लोकतांत्रिक संविधान और ग्रामीण सामाजिक वास्तविकता के बीच बड़ा अंतर पैदा हुआ।

भोजपुर और बोधगया दोनों इस अंतर के विरुद्ध विद्रोह थे।

भोजपुर का केंद्रीय प्रश्न : जमीन से अधिक सामाजिक सत्ता

भोजपुर में आंदोलन को केवल भूमि कब्जे से समझना गलत होगा।

CPI(ML) की अपनी बाद की इतिहास-व्याख्या भी स्वीकार करती है कि भोजपुर के निर्णायक संघर्ष केवल भूमि और मजदूरी पर नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर भी हुए। 1967 के चुनावी संघर्ष और गरीबों के स्वतंत्र मतदान-अधिकार को पार्टी अपने भोजपुर इतिहास की केंद्रीय घटनाओं में रखती है।

यानी भोजपुर का खेतिहर मजदूर केवल आर्थिक संसाधन नहीं मांग रहा था।

एकवारी : स्थानीय असंतोष और नक्सलबाड़ी का मिलन

1967 में एकवारी और सहार क्षेत्र में पहले से भूमि, मजदूरी और जातिगत तनाव मौजूद था।

इसी वर्ष चुनाव के दौरान रामनरेश राम और उनके सहयोगी जगदीश महतो के साथ हुए टकराव ने स्थानीय राजनीतिक संघर्ष को तीखा किया। CPI(ML) के अपने ऐतिहासिक विवरण में जगदीश महतो को एकवारी के शिक्षक से क्रांतिकारी नेता बनने और रामनरेश राम के साथ भोजपुर में CPI(ML) की नींव रखने वाले प्रमुख व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

नक्सलबाड़ी ने स्थानीय असंतोष को वैचारिक भाषा दी।

लेकिन स्थानीय असंतोष न होता तो नक्सलबाड़ी की विचारधारा अकेले भोजपुर आंदोलन पैदा नहीं कर सकती थी।

1969 : CPI(ML) का गठन

22 अप्रैल 1969 को CPI(ML) की स्थापना हुई।

CPI(ML) स्वयं अपनी उत्पत्ति को मई 1967 के नक्सलबाड़ी विद्रोह से जोड़ती है और 22 अप्रैल 1969 को पार्टी स्थापना की तारीख मानती है।

भोजपुर के कार्यकर्ताओं ने इसी धारा से संपर्क स्थापित किया।

1970–71 : भोजपुर में संगठन का उग्रकरण

1970 के आसपास रामनरेश राम और दूसरे स्थानीय कार्यकर्ता CPI(ML) में शामिल हुए। पार्टी के अपने संस्मरण के अनुसार रामनरेश राम भूमिगत होकर भोजपुर के किसान संघर्षों के संगठन में सक्रिय हुए।

1971 से लक्षित हिंसा, भूमि और फसल कब्जे तथा गुरिल्ला कार्रवाइयों का दौर तेज हुआ।

यहीं भोजपुर आंदोलन एक स्थानीय किसान संघर्ष से राष्ट्रीय नक्सलवादी आंदोलन के प्रमुख केंद्र में बदलने लगा।

‘वर्ग-शत्रु विनाश’ : शक्ति और संकट

गांव में उत्पीड़क भू-स्वामी के भय को तोड़े बिना गरीब संगठित नहीं होंगे।

इस रणनीति का तत्काल मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा।

लेकिन उसकी गंभीर सीमाएं भी सामने आईं।

क्या राजनीतिक हत्या भूमि संबंध बदलती है?

क्या व्यक्तिगत प्रतिशोध वर्ग-संघर्ष में प्रवेश कर सकता है?

क्या गुरिल्ला दस्ता जनता की सामूहिक कार्रवाई का विकल्प बन सकता है?

बाद में CPI(ML) Liberation ने स्वयं पुराने दौर को आत्मालोचनात्मक ढंग से देखा। पार्टी के इतिहास में 1977 तक की लाइन को ‘वामपंथी दुस्साहसवादी’ बताते हुए माना गया कि वह व्यापक जनपहल विकसित नहीं कर सकी।

यह स्वीकारोक्ति भोजपुर के इतिहास को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

1972 : केंद्रीय CPI(ML) का संकट, भोजपुर का बने रहना

28 जुलाई 1972 को चारु मजूमदार की हिरासत में मृत्यु के बाद CPI(ML) तेजी से विखंडित हुई।

पश्चिम बंगाल और कई अन्य प्रारंभिक केंद्र कमजोर पड़े।

लेकिन भोजपुर का सामाजिक संघर्ष जारी रहा।

यह केवल केंद्रीय पार्टी निर्देश पर आधारित नहीं था।

स्थानीय दलित और गरीब खेतिहर मजदूरों की वास्तविक शिकायतें संगठन का आधार थीं।

भोजपुर ने धीरे-धीरे राष्ट्रीय CPI(ML) के टूटने के बाद उसके एक हिस्से के पुनर्गठन की आधारभूमि का रूप लिया।

1974–75 : पुनर्गठन और भोजपुर की केंद्रीय भूमिका

1974 में CPI(ML) की एक धारा का केंद्रीय पुनर्गठन हुआ।

1975 में उनकी भोजपुर में पुलिस कार्रवाई के दौरान मृत्यु हुई और विनोद मिश्र ने नेतृत्व संभाला। CPI(ML) के अपने इतिहास में इसी क्रम को उस संगठन के विकास की आधाररेखा माना गया है जिसे बाद में CPI(ML) Liberation कहा गया।

भोजपुर अब केवल संघर्ष क्षेत्र नहीं था।

वह पार्टी-पुनर्गठन का केंद्र बन चुका था।

हिंसा का त्रिकोण

1970 के दशक में भोजपुर की राजनीति तीन शक्तियों के संघर्ष में बदलने लगी—

यही संरचना आगे मध्य बिहार के सैन्यीकरण का आधार बनी।

1990 के दशक की रणवीर सेना को सीधे 1970 के भोजपुर संघर्ष में नहीं रखा जा सकता।

लेकिन निजी भू-स्वामी हथियारबंदी और जाति-आधारित राजनीतिक ध्रुवीकरण की लंबी प्रक्रिया की प्रारंभिक पृष्ठभूमि भोजपुर और मध्य बिहार के इन्हीं संघर्षों में बनी।

भोजपुर का सबसे स्थायी परिणाम : मजदूर का राजनीतिक व्यक्तित्व

भोजपुर में व्यापक भूमि पुनर्वितरण सीमित रहा।

लेकिन खेतिहर मजदूर की सामाजिक शक्ति बदली।

मजदूरी पर सामूहिक सौदेबाजी करने लगा,

यही आंदोलन का सबसे स्थायी सामाजिक परिणाम था।

भोजपुर ने दलित खेतिहर मजदूर को केवल ‘गरीब’ नहीं रहने दिया।

1978–79 : CPI(ML) की रणनीतिक आत्मालोचना

1978 में CPI(ML) की Liberation धारा ने ‘rectification’ अभियान शुरू किया।

पार्टी के आधिकारिक इतिहास के अनुसार इस अभियान ने शुद्ध सैन्य दृष्टिकोण का विरोध किया और किसान आंदोलन तथा किसान सभाओं के संगठन पर अधिक जोर दिया। 1979 में भोजपुर में विशेष पार्टी सम्मेलन ने खुले जनसंगठनों की गतिविधियों की दिशा को औपचारिक रूप दिया।

यही भोजपुर आंदोलन की दूसरी ऐतिहासिक अवस्था थी।

जनता की ओर से लड़ना या जनता को स्वयं राजनीतिक शक्ति बनाना?

पार्टी धीरे-धीरे दूसरे विकल्प की ओर बढ़ी।

जनसंगठन से चुनावी राजनीति तक

1980 के दशक में CPI(ML) Liberation ने किसान आंदोलन, जनसंगठन और खुले राजनीतिक मंचों का विस्तार किया।

Indian People’s Front इसका प्रमुख रूप बना।

अंततः पार्टी ने चुनावी राजनीति को भी संघर्ष का वैध क्षेत्र स्वीकार किया।

यानी जिस राजनीतिक धारा ने शुरुआत में चुनाव बहिष्कार को क्रांतिकारी सिद्धांत माना था, वही आगे मतपत्र को भी गरीबों की राजनीतिक शक्ति का साधन मानने लगी।

यह भारतीय नक्सलवादी इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक यात्राओं में एक थी।

1989 : आरा से संसदीय प्रतिनिधित्व

1989 में Indian People’s Front समर्थित रमेश्वर प्रसाद आरा से लोकसभा पहुंचे। CPI(ML) के अपने विवरण में इसे गरीब और दलित समुदायों के मतदान-अधिकार तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व की ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में देखा गया है।

1995 : रामनरेश राम और विधानसभा

रामनरेश राम बाद में सहार से विधायक बने और 1995 से 2010 तक CPI(ML) के विधायी नेतृत्व का प्रमुख चेहरा रहे। पार्टी के अपने दस्तावेज उन्हें भोजपुर की क्रांतिकारी किसान राजनीति और संसदीय प्रतिनिधित्व के बीच सेतु के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

इससे भोजपुर की यात्रा का एक महत्वपूर्ण चक्र पूरा होता है—

मतदान के अधिकार के संघर्ष से विधानसभा प्रतिनिधित्व तक।

अब बोधगया की ओर : वही भूमि संकट, अलग रास्ता

उसी बिहार में 1970 के दशक के उत्तरार्ध में बोधगया भूमि संघर्ष विकसित हुआ।

बोधगया मठ और उससे जुड़ी विशाल कृषि भूमि।

मठ की कुल भूमि के बारे में विभिन्न स्रोत अलग आंकड़े देते हैं, लेकिन IGNOU की अध्ययन सामग्री लगभग 9,575 एकड़ और 138 गांवों का उल्लेख करती है। वह कामिया मजदूरों, रसीद न मिलने और मठ की स्थानीय ‘कचहरी’ व्यवस्था का भी विवरण देती है।

आंदोलनकारी और बाद के कुछ स्रोत इससे अधिक भूमि का दावा करते हैं।

इसलिए कुल भूमि के आंकड़े को स्रोत-विशेष से जोड़कर ही पढ़ना चाहिए।

छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का प्रवेश

1974 के बिहार आंदोलन और जयप्रकाश नारायण की ‘संपूर्ण क्रांति’ से निकले युवाओं की एक धारा ने सवाल उठाया—

यदि सरकार बदल गई लेकिन गांव की भूमि व्यवस्था नहीं बदली तो संपूर्ण क्रांति कहां हुई?

यही प्रश्न छात्र युवा संघर्ष वाहिनी को बोधगया के गांवों तक लाया।

और प्रशासन को भूमि कानून लागू करने के लिए मजबूर करना।

1978–79 : संघर्ष का विस्तार

IGNOU की सामग्री नवंबर 1978 में महिलाओं द्वारा मठ की जमीन की मसूर की फसल काटने की पहली महत्वपूर्ण सामूहिक कार्रवाई का उल्लेख करती है। उसी स्रोत में 8 अगस्त 1979 को मठ से जुड़े हमलावरों द्वारा मजदूरों पर हमले और महिलाओं द्वारा घायल मजदूरों की सहायता का विवरण भी मिलता है।

यानी बोधगया में महिलाएं शुरुआत से केवल सहायक नहीं थीं।

वे प्रत्यक्ष राजनीतिक कार्यकर्ता थीं।

श्रम बहिष्कार : अहिंसक शक्ति का केंद्र

बोधगया के गरीब किसान और कामिया मठ की जमीन पर काम करना बंद कर सकते थे।

जमीन का मालिक स्वयं उत्पादन नहीं कर सकता यदि श्रमिक सामूहिक रूप से सहयोग न करें।

यही बोधगया का सबसे प्रभावी राजनीतिक हथियार बना—

पुलिस दमन के बावजूद अहिंसा

5 नवंबर 1980 के आंदोलन में महिलाओं पर पुलिस बल प्रयोग का उल्लेख IGNOU के अध्ययन में मिलता है।

फिर भी आंदोलन ने व्यापक रूप से सशस्त्र प्रतिशोध का रास्ता नहीं अपनाया।

यह बोधगया की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक विशेषताओं में से थी।

लेकिन राज्य के कानून को अस्वीकार नहीं किया गया।

1981 : भूमि-सुधार का संस्थागत चरण

अक्टूबर 1981 तक बिहार सरकार ने मठ द्वारा कथित रूप से अवैध रूप से नियंत्रित भूमि की पहचान कर कुछ गांवों में उसे भूमिहीनों को देने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई। IGNOU स्रोत कुशा, मुनेसरपुर, चकला, जयरामपुर, परसावा, गोसा पेसरा और कुरमावा जैसे गांवों का उल्लेख करता है।

Manushi की 1987 की समकालीन रिपोर्ट के अनुसार आंदोलन के दबाव में 1981 में सरकार ने लगभग 1,500 एकड़ जमीन जब्त कर पुनर्वितरण की प्रक्रिया शुरू की।

इन आंकड़ों को अंतिम सरकारी कुल वितरण संख्या नहीं समझना चाहिए।

बोधगया की निर्णायक वैचारिक छलांग : महिला की जमीन

बोधगया आंदोलन ने वह सवाल उठाया जिसे उस दौर के अधिकांश भूमि सुधार कार्यक्रम नजरअंदाज करते थे—

भूमिहीन परिवार को जमीन मिल जाए, लेकिन किसके नाम?

महिलाओं ने स्वतंत्र भूमि अधिकार की मांग की।

1987 की Manushi रिपोर्ट बताती है कि प्रशासन ने पहले पुरुष ‘परिवार मुखिया’ को जमीन देने की परंपरा पर जोर दिया, लेकिन महिलाओं ने स्वयं को भी भूमिहीन श्रमिक बताते हुए इसका विरोध किया। बाद में कुशा और बिजा में लगभग 150 एकड़ जमीन महिलाओं के नाम दिए जाने का उल्लेख मिलता है।

यह ग्रामीण पितृसत्ता को सीधे चुनौती थी।

दक्षिण एशियाई महिला इतिहास की एक ऐतिहासिक उपलब्धि

2021 के एक अकादमिक अध्ययन के अनुसार 1982 से 1987 के बीच गया के तीन गांवों में ग्रामीण महिलाओं को राज्य द्वारा पुनर्वितरित कृषि भूमि पर कानूनी अधिकार मिलना दक्षिण एशिया के सामाजिक आंदोलनों के इतिहास की एक अग्रणी उपलब्धि थी। यह अध्ययन बोधगया आंदोलन को महिला भूमि-अधिकार विमर्श की एक महत्वपूर्ण मिसाल मानता है।

इसीलिए बोधगया को केवल बिहार किसान आंदोलन के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं।

लेकिन महिला अधिकार भी पूर्ण नहीं था

बोधगया की उपलब्धियों पर बाद के नारीवादी अध्ययनों ने आलोचनात्मक प्रश्न भी उठाए।

क्या महिला के नाम पट्टा होने से खेती का निर्णय उसके हाथ आया?

क्या वह जमीन स्वतंत्र रूप से बेच सकती थी?

क्या उत्तराधिकार बेटियों तक पहुंचा?

Manushi की 1987 रिपोर्ट ने स्वयं स्वीकार किया कि महिलाओं के नाम जमीन होने के बावजूद फसल और जमीन पर उनका पूर्ण निर्णयात्मक नियंत्रण नहीं बना था।

2021 के अध्ययन ने भी बताया कि कुछ शुरुआती नारीवादी विश्लेषण इस बात से निराश हुए कि स्वामित्व का कानूनी परिवर्तन पितृसत्ता को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सका।

इसलिए बोधगया की उपलब्धि क्रांतिकारी थी—

फिर भी यह उपलब्धि छोटी क्यों नहीं थी?

क्योंकि उससे पहले कृषि भूमि के पुनर्वितरण में विवाहित गरीब महिला को स्वतंत्र भू-स्वामी मानना ही असामान्य था।

यही परिवर्तन आगे महिला भूमि-अधिकार की राष्ट्रीय बहस के लिए महत्वपूर्ण बना।

IGNOU की भूमि सुधार सामग्री भी बोधगया आंदोलन को इस उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करती है कि स्वतंत्र महिला भूमि-अधिकार आर्थिक सशक्तीकरण के साथ घरेलू सत्ता-संबंधों को भी बदल सकता है।

दलित खेतिहर मजदूर की राजनीतिक संगठन क्षमता

तो भोजपुर अत्यंत गहरा प्रभाव छोड़ता है।

महिला संपत्ति अधिकार

तो बोधगया की उपलब्धि अधिक महत्वपूर्ण है।

स्थायी राजनीतिक संगठन

तो भोजपुर से विकसित CPI(ML) Liberation कहीं अधिक दीर्घजीवी सिद्ध हुई।

मानवीय लागत

तो भोजपुर का हिंसक चक्र कहीं अधिक विनाशकारी रहा।

लोकतांत्रिक संस्थागत परिणाम

तो बोधगया ने पट्टा और महिला स्वामित्व दिया, जबकि भोजपुर की बाद की राजनीति ने विधानसभा और संसद तक प्रतिनिधित्व दिया।

यानी दोनों की सफलताएं अलग प्रकृति की थीं।

हिंसा के प्रश्न पर अंतिम निष्कर्ष

भोजपुर का सशस्त्र संघर्ष वास्तविक सामाजिक उत्पीड़न से पैदा हुआ।

इस तथ्य को नकारना इतिहास को विकृत करेगा।

लेकिन उत्पीड़न की वास्तविकता राजनीतिक हत्या को स्वतः न्यायसंगत नहीं बना देती।

CPI(ML) Liberation की अपनी बाद की आत्मालोचना भी स्वीकार करती है कि शुरुआती शुद्ध सैन्य दृष्टिकोण व्यापक जनपहल विकसित करने में विफल रहा और 1978 के बाद जनसंगठन को अधिक महत्व देना पड़ा।

इसलिए भोजपुर का सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक सबक शायद यही है—

हथियार भय तोड़ सकता है; स्थायी शक्ति संगठन बनाता है।

अहिंसा पर अंतिम निष्कर्ष

बोधगया यह सिद्ध नहीं करता कि अहिंसा हर परिस्थिति में स्वतः सफल होती है।

राज्य की दोहरी भूमिका

दोनों आंदोलनों से राज्य का एक जटिल स्वरूप सामने आता है।

पुलिस और सुरक्षा बल के रूप में दमनकारी दिखाई देता है।

और महिला को संपत्ति अधिकार प्रदान करता है।

इसलिए लोकतांत्रिक राज्य को केवल ‘शत्रु’ या केवल ‘कल्याणकारी’ कहकर नहीं समझा जा सकता।

जनसंघर्ष का उद्देश्य उसकी जवाबदेही बढ़ाना है।

जाति और वर्ग : अंतिम निष्कर्ष

भोजपुर ने साबित किया कि भारतीय गांव में वर्ग को जाति से अलग करके नहीं समझा जा सकता।

भूमिहीनता और दलित स्थिति अक्सर एक-दूसरे पर चढ़ी हुई थीं।

सभी ऊंची जाति लोग बड़े भू-स्वामी नहीं।

और समय के साथ पिछड़ी कृषक जातियों के भीतर भी संपन्न किसान वर्ग उभरे।

इसलिए बिहार की भूमि राजनीति का सही सूत्र है—

जाति + वर्ग + भूमि + राजनीतिक सत्ता।

इनमें से किसी एक को हटाने पर विश्लेषण अधूरा रह जाता है।

महिला को जोड़े बिना भूमि-सुधार अधूरा

बोधगया की सबसे स्थायी बौद्धिक विरासत यही है।

यदि भूमिहीन परिवार को जमीन मिली लेकिन जमीन केवल पुरुष के नाम—

इसलिए भूमि-सुधार की वास्तविक कसौटी होनी चाहिए—

महिला का उस पर कितना वास्तविक अधिकार बना।

लोकतंत्र की एक गहरी प्रक्रिया

भोजपुर और बोधगया दोनों में एक परिवर्तन समान था—

पहले वह भू-स्वामी पर आश्रित मजदूर था।

यह ग्रामीण लोकतंत्रीकरण इन आंदोलनों की सबसे बड़ी साझा उपलब्धि है।

क्या भूमि क्रांति पूरी हुई?

बिहार में भूमिहीनता समाप्त नहीं हुई।

महिलाओं का कृषि भूमि स्वामित्व अभी भी सीमित है।

इसलिए भोजपुर और बोधगया को ‘भूमि क्रांति की पूर्ण विजय’ कहना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा।

वे अधूरी भूमि क्रांति के निर्णायक पड़ाव थे।

1793

ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा स्थायी बंदोबस्त लागू। बंगाल–बिहार में जमींदारी और कृषि मध्यस्थों की दीर्घकालिक संरचना मजबूत।

1947

भारत स्वतंत्र। बिहार में भूमिहीनता, जमींदारी और असुरक्षित कृषि संबंध बड़ी समस्या बने रहते हैं।

1950

बिहार भूमि सुधार अधिनियम। जमींदारी उन्मूलन की प्रक्रिया प्रारंभ।

1950 का दशक

जमींदारी के औपचारिक अंत के बावजूद ग्रामीण भूमि-संकेंद्रण और भूमिहीनता बनी रहती है।

1961

बिहार में कृषि भूमि पर अधिकतम सीमा संबंधी प्रमुख कानून। आगे 1970 के दशक में महत्वपूर्ण संशोधन।

1964

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का विभाजन; CPI(M) का गठन।

1967

नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह। एकवारी क्षेत्र में विधानसभा चुनाव को लेकर रामनरेश राम और जगदीश महतो से जुड़ा संघर्ष; भोजपुर के राजनीतिक उग्रकरण का महत्वपूर्ण बिंदु। CPI(ML) के इतिहास में इसे गरीबों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की निर्णायक चुनौती माना गया है।

1970

रामनरेश राम और भोजपुर के अन्य कार्यकर्ताओं का CPI(ML) से औपचारिक जुड़ाव।

1971

भोजपुर में सशस्त्र कार्रवाई और ‘वर्ग-शत्रु विनाश’ के दौर का विस्तार।

1972

चारु मजूमदार की मृत्यु; केंद्रीय CPI(ML) का गंभीर विखंडन। भोजपुर में स्थानीय आंदोलन जारी।

1973–75

भोजपुर में पुलिस कार्रवाई, गुरिल्ला संघर्ष और किसान–मजदूर लामबंदी का विस्तार।

1974

CPI(ML) की एक धारा का पुनर्गठन; जौहर नेतृत्व में आते हैं।

नवंबर 1975

भोजपुर में पुलिस कार्रवाई के दौरान जौहर की मृत्यु; बाद में विनोद मिश्र नेतृत्व ग्रहण करते हैं।

फरवरी 1976

दूसरी पार्टी कांग्रेस; विनोद मिश्र महासचिव।

1977

आपातकाल समाप्त। CPI(ML) की रणनीति पर चुनाव, जनसंगठन और खुले राजनीतिक कार्य की बहस तेज।

1978

Liberation धारा में आत्मसुधार अभियान; शुद्ध सैन्य दृष्टिकोण की समीक्षा और किसान जनआंदोलन पर अधिक जोर।

इसी वर्ष बोधगया में छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का भूमि आंदोलन संगठित रूप लेने लगता है।

नवंबर 1978

IGNOU अध्ययन के अनुसार बोधगया में महिला मजदूरों द्वारा मठ की जमीन की मसूर फसल काटने की महत्वपूर्ण सामूहिक कार्रवाई।

1979

भोजपुर में विशेष CPI(ML) सम्मेलन द्वारा खुले जनसंगठन की दिशा को औपचारिक महत्व।

बोधगया संघर्ष गांव-दर-गांव फैलता है; महिला भागीदारी बढ़ती है।

8 अगस्त 1979

बोधगया आंदोलन में मठ समर्थक तत्वों द्वारा मजदूरों पर हमले का उल्लेख; महिलाओं की सक्रिय प्रतिक्रिया।

1979

IGNOU के एक अन्य अध्ययन में बोधगया की महिला कार्यकर्ताओं द्वारा भूमि पट्टों में पुरुष और महिला दोनों के नाम की मांग विकसित होने का उल्लेख।

1980

बोधगया आंदोलन दर्जनों गांवों में फैला। भूमि, फसल और श्रम बहिष्कार संघर्ष तेज।

5 नवंबर 1980

भूमि आंदोलन के दौरान महिलाओं पर पुलिस बल प्रयोग का उल्लेख।

अक्टूबर 1981

सरकार द्वारा मठ के कथित अवैध कब्जे वाली भूमि की पहचान और कुछ गांवों में वितरण की दिशा में निर्णय।

1981

Manushi के अनुसार लगभग 1,500 एकड़ भूमि सरकारी कार्रवाई के अंतर्गत पुनर्वितरण प्रक्रिया में लाई गई।

1980 का दशक

भोजपुर–मध्य बिहार में CPI(ML) की खुली किसान राजनीति, जनसंगठन और व्यापक लोकतांत्रिक लामबंदी का विस्तार।

घटना-क्रम

भोजपुर और बोधगया की संक्षिप्त समयरेखा

1950 · जमींदारी उन्मूलन का कानूनी आरंभबिहार भूमि सुधार कानून ने मध्यस्थ जमींदारी समाप्त करने का मार्ग बनाया, लेकिन भूमि-संकेंद्रण और बेनामी नियंत्रण बने रहे।
1960 का दशक · मध्य बिहार में भूमि–मजदूरी तनावभोजपुर में भूमिहीन दलित मजदूरों, बड़े भू-स्वामियों और जाति-आधारित ग्रामीण सत्ता के बीच संघर्ष तीखा हुआ।
1967–69 · नक्सलबाड़ी से वैचारिक प्रभावक्रांतिकारी कम्युनिस्ट राजनीति और CPI(ML) के गठन ने भोजपुर के उभरते नेतृत्व को नई रणनीतिक भाषा दी।
1971–72 · भोजपुर का सशस्त्र चरणएकवारी–सहार क्षेत्र में भूमि, मजदूरी और सम्मान के प्रश्न पर संघर्ष तथा राज्य-दमन तेज हुआ।
1974 · संपूर्ण क्रांति और युवा लामबंदीजयप्रकाश आंदोलन से निकली छात्र युवा संघर्ष वाहिनी ने सामाजिक परिवर्तन और भूमि प्रश्न को गांवों तक पहुंचाया।
1978 से · बोधगया मठ भूमि आंदोलनभूमिहीन मजदूरों और बटाईदारों ने मठ की विशाल भूमि, अधिशेष पहचान और वास्तविक जोतने वाले के अधिकार पर संघर्ष संगठित किया।
1980 का दशक · महिला भूमि-अधिकार का नया प्रश्नआंदोलनकारी महिलाओं ने वितरित भूमि केवल परिवार या पति के नहीं, महिला के स्वतंत्र नाम पर देने की मांग उठाई।
बाद के दशक · जन-संगठन और संसदीय संक्रमणभोजपुर की धारा ने जन-संगठन तथा चुनावी राजनीति में स्थान बनाया; बोधगया ने अहिंसक भूमि-सत्याग्रह और महिला अधिकार की विरासत छोड़ी।
OCN ऐतिहासिक आकलन

इन दोनों संघर्षों ने प्रमाणित किया कि जमींदारी उन्मूलन का कानून ग्रामीण सत्ता, जाति-आधारित वर्चस्व और भूमिहीनता को अपने-आप समाप्त नहीं करता। भोजपुर ने दलित खेतिहर मजदूर की मजदूरी और ‘इज्जत’ को भूमि प्रश्न से जोड़ा, लेकिन व्यक्तिगत हिंसा और प्रतिहिंसा के चक्र ने जन-संघर्ष की भारी मानवीय कीमत पैदा की। बोधगया ने अहिंसक संगठन, अधिशेष भूमि और वास्तविक जोतने वाले के अधिकार को आगे बढ़ाया तथा महिलाओं के नाम भूमि की मांग से भूमि सुधार की पितृसत्तात्मक सीमा उजागर की। दोनों की साझा विरासत है—भूमि का प्रश्न केवल स्वामित्व नहीं, बल्कि सामाजिक सत्ता, गरिमा, लैंगिक न्याय और लोकतांत्रिक भागीदारी का प्रश्न भी है।

शोधार्थियों के लिए

प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक स्रोत

बिहार राजस्व एवं भूमि सुधार विभागभूमि सुधार, भूमि-सीमा, अधिशेष भूमि और वितरण से संबंधित कानून व सरकारी सामग्री।स्रोत तक जाएँ ↗
बिहार विधानमंडलभूमि सुधार, ग्रामीण हिंसा, खेतिहर मजदूरी और मध्य बिहार पर बहसों के अभिलेख।स्रोत तक जाएँ ↗
संसदीय डिजिटल पुस्तकालयबिहार के भूमि प्रश्न, जातीय हिंसा और कृषि संबंधों पर संसदीय प्रश्न व बहसें।स्रोत तक जाएँ ↗
ई-ज्ञानकोशभूमि सुधार, किसान आंदोलन, नक्सलवादी राजनीति और ग्रामीण सामाजिक परिवर्तन की अध्ययन सामग्री।स्रोत तक जाएँ ↗
Economic and Political Weeklyभोजपुर, बोधगया, भूमि-संघर्ष, जाति और महिला अधिकार पर शोध लेख।स्रोत तक जाएँ ↗
राष्ट्रीय अभिलेखागार — अभिलेख पटलगृह, भूमि नीति, बिहार प्रशासन और सामाजिक आंदोलनों से जुड़े प्राथमिक अभिलेख।स्रोत तक जाएँ ↗

स्रोत-सावधानी: आंदोलनकारी स्मृतियों, सरकारी अभिलेखों और अकादमिक अध्ययनों में घटनाओं, भूमि-वितरण, हिंसा तथा जनाधार के आकलन पर मतभेद हैं। विवादित दावों को प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं मिलाया गया है।