श्रीकाकुलम किसान–आदिवासी आंदोलन
गिरिजन संगम और भूमि-अधिकार से 1967–70 के सशस्त्र विद्रोह, राज्य-दमन, कानून, स्मृति और दीर्घकालीन राजनीतिक विरासत तक
श्रीकाकुलम को केवल नक्सलबाड़ी का आंध्र संस्करण कहना उसके लंबे स्थानीय इतिहास को छोटा करना होगा। यहां सवरा, जटापू और अन्य आदिवासी किसानों ने पहले भूमि-वियोजन, साहूकारी, बेगार, कम मजदूरी और प्रशासनिक उपेक्षा के विरुद्ध गिरिजन संगम के माध्यम से जन-संघर्ष खड़ा किया। 1967 के बाद यही संघर्ष उग्र वैचारिक और सशस्त्र चरण में गया। यह अध्ययन सामाजिक कारण, संगठन, नेतृत्व, महिलाओं की भूमिका, हिंसा, राज्य-दमन, भूमि कानून, उपलब्धि, विफलता और स्मृति—सभी को अलग प्रमाण-स्तरों और संतुलित दृष्टि से पढ़ता है।
ऐतिहासिक, भौगोलिक और आदिवासी पृष्ठभूमि
भूमिका — स्वतंत्र भारत के किसान आंदोलनों में श्रीकाकुलम का स्थान
स्वतंत्र भारत के किसान और आदिवासी आंदोलनों के इतिहास में श्रीकाकुलम आंदोलन एक महत्वपूर्ण संक्रमण-बिंदु है। इसकी विशेषता यह है कि इसे किसी एक राजनीतिक श्रेणी में रखकर पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। यह भूमि और आजीविका के लिए आदिवासी किसानों का संघर्ष था; कम्युनिस्ट किसान राजनीति का विस्तार था; 1967 के बाद नक्सलबाड़ी से प्रभावित क्रांतिकारी आंदोलन था; और 1968 के बाद इसके एक चरण ने संगठित सशस्त्र विद्रोह का स्वरूप ग्रहण किया।
इसी बहुस्तरीय चरित्र के कारण श्रीकाकुलम को केवल “नक्सलवादी आंदोलन” कहना उतना ही अधूरा है जितना इसे केवल स्थानीय भूमि-विवाद मान लेना।
नक्सलबाड़ी से पहले शुरू हो चुकी थी कहानी
श्रीकाकुलम आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक विशेषता यह है कि उसकी शुरुआत 1967 के नक्सलबाड़ी विद्रोह से नहीं हुई थी। उत्तरी आंध्र प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में भूमि-वियोजन, साहूकारी, कम मजदूरी, कर्ज और स्थानीय प्रभुत्वशाली वर्गों के विरुद्ध असंतोष पहले से मौजूद था। 1950 के दशक के उत्तरार्ध और 1960 के दशक में कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने इन प्रश्नों के आधार पर आदिवासियों को संगठित करना शुरू कर दिया था।
वेंपाटापु सत्यनारायण और आदिभटला कैलासम जैसे शिक्षक और कम्युनिस्ट कार्यकर्ता इस प्रक्रिया में केंद्रीय भूमिका में आए। उनके साथ स्थानीय आदिवासी नेतृत्व भी विकसित हुआ। धीरे-धीरे गिरिजन संगठनों ने मजदूरी, ऋण, भूमि और वन-अधिकार जैसे मुद्दों पर सामूहिक कार्रवाई शुरू की।
इसलिए श्रीकाकुलम की ऐतिहासिक यात्रा को मोटे तौर पर तीन चरणों में समझा जा सकता है।
पहला चरण स्थानीय आदिवासी सामाजिक-आर्थिक संघर्ष और संगठन निर्माण का था।
दूसरे चरण में संघर्ष ने भूमि-वापसी, मजदूरी और साहूकारी-विरोधी जनआंदोलन का रूप लिया।
तीसरा चरण 1967 के बाद शुरू हुआ, जब नक्सलबाड़ी और क्रांतिकारी कम्युनिस्ट राजनीति के प्रभाव में आंदोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सशस्त्र संघर्ष की ओर बढ़ गया।
तेलंगाना और नक्सलबाड़ी के बीच
भारतीय कम्युनिस्ट किसान आंदोलनों के इतिहास में श्रीकाकुलम का स्थान समझने के लिए तेलंगाना और नक्सलबाड़ी दोनों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
1946–51 का तेलंगाना सशस्त्र किसान संघर्ष सामंती भूमि-संबंधों और निजाम शासन के विरुद्ध विशाल ग्रामीण विद्रोह था। इसमें लाखों किसानों और खेतिहर मजदूरों की भागीदारी थी और अनेक गांवों में वैकल्पिक ग्रामीण सत्ता जैसी व्यवस्थाएं विकसित हुईं।
1967 का नक्सलबाड़ी विद्रोह अपेक्षाकृत छोटे भूभाग और कम अवधि का था, लेकिन उसका वैचारिक प्रभाव असाधारण रूप से बड़ा हुआ। उसने भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर यह प्रश्न खड़ा किया कि संसदीय लोकतंत्र के रास्ते परिवर्तन किया जाए या माओवादी पद्धति से सशस्त्र क्रांति की जाए।
श्रीकाकुलम इन दोनों अनुभवों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी बन गया। यहां तेलंगाना जैसी लंबी स्थानीय संगठनात्मक तैयारी के कुछ तत्व दिखाई देते हैं, जबकि 1967 के बाद इसकी रणनीति पर नक्सलबाड़ी और चारु मजूमदार की विचारधारा का गहरा प्रभाव पड़ा।
किसान आंदोलन और आदिवासी आंदोलन का संगम
श्रीकाकुलम की दूसरी विशिष्टता उसका सामाजिक आधार था। आंदोलन का केंद्र मुख्यतः आदिवासी किसान थे। विशेष रूप से सवरा और जटापू समुदायों ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनके लिए भूमि केवल उत्पादन का साधन नहीं थी। जंगल, पहाड़, जलस्रोत और जमीन मिलकर उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक दुनिया बनाते थे। इसलिए भूमि-वियोजन का अर्थ केवल आर्थिक संपत्ति खोना नहीं, बल्कि सामाजिक स्वायत्तता और आजीविका के आधार का कमजोर होना भी था।
यही कारण है कि श्रीकाकुलम में वर्ग और जनजातीय पहचान एक-दूसरे से जुड़ गए। किसान के रूप में उनका संघर्ष जमीन और मजदूरी के लिए था; आदिवासी समुदाय के रूप में संघर्ष बाहरी साहूकारों, व्यापारियों, भू-स्वामियों और प्रशासनिक व्यवस्था से भी था।
इतिहास का केंद्रीय प्रश्न
श्रीकाकुलम के अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि एक लंबे समय से चल रहा स्थानीय जनसंघर्ष कुछ वर्षों में सशस्त्र क्रांति की रणनीति तक कैसे पहुंचा?
क्या हिंसक चरण स्थानीय परिस्थितियों का स्वाभाविक परिणाम था? क्या नक्सलबाड़ी के बाद बाहर से आई क्रांतिकारी विचारधारा ने आंदोलन की दिशा बदल दी? क्या व्यापक गिरिजन संगठन की शक्ति सशस्त्र गुरिल्ला रणनीति अपनाने के बाद कमजोर हुई? और अंततः—राज्य ने आंदोलन को सैन्य रूप से दबा दिया, फिर भी क्या उसके भूमि और आदिवासी अधिकार संबंधी प्रश्न समाप्त हो गए?
आगे के अध्याय इन्हीं प्रश्नों की जांच करेंगे।
श्रीकाकुलम का भूगोल और ‘एजेंसी क्षेत्र’
किसी भी किसान आंदोलन को समझने के लिए उसका भूगोल महत्वपूर्ण होता है, लेकिन श्रीकाकुलम के मामले में भूगोल स्वयं आंदोलन की संरचना का हिस्सा था।
आज का श्रीकाकुलम जिला और 1960 के दशक का श्रीकाकुलम जिला समान प्रशासनिक इकाइयां नहीं हैं। 1979 में विजयनगरम जिला बनने से पहले वर्तमान विजयनगरम और पार्वतीपुरम क्षेत्र के बड़े हिस्से तत्कालीन श्रीकाकुलम जिले में थे। बाद में प्रशासनिक सीमाएं कई बार बदलीं। इसलिए ऐतिहासिक श्रीकाकुलम आंदोलन का अध्ययन वर्तमान श्रीकाकुलम जिले की सीमाओं के आधार पर करना भ्रामक होगा।
पूर्वी घाट की पहाड़ियां
संघर्ष का प्रमुख क्षेत्र पूर्वी घाट के पहाड़ी और वनाच्छादित हिस्सों में था। यहां गांव छोटे और बिखरे हुए थे। परिवहन और संचार के साधन सीमित थे। अनेक बस्तियां मैदानी प्रशासनिक केंद्रों से काफी दूर थीं।
यह भूगोल आदिवासी समुदायों की अपेक्षाकृत स्वायत्त सामाजिक संरचना के विकास में सहायक रहा था, लेकिन औपनिवेशिक और बाद में आधुनिक प्रशासन के विस्तार के साथ यही क्षेत्र वन, राजस्व और भूमि नियंत्रण की नई व्यवस्थाओं से प्रभावित हुआ।
पार्वतीपुरम और पालकोंडा क्षेत्र
श्रीकाकुलम आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र पार्वतीपुरम एजेंसी क्षेत्र बना। पालकोंडा और आसपास के आदिवासी इलाके भी आंदोलन की सामाजिक और संगठनात्मक दुनिया से जुड़े थे।
यहां पहाड़ी आदिवासी बस्तियों और मैदानी बाजारों के बीच गहरा आर्थिक संबंध था। आदिवासी किसान जंगल और कृषि से उत्पाद प्राप्त करते थे, जबकि साहूकार और व्यापारी ऋण, व्यापार और बाजार व्यवस्था के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में प्रवेश करते गए।
यही संबंध धीरे-धीरे असमान शक्ति-संबंध में बदल सकता था। किसान को बीज, अनाज या नकद ऋण चाहिए तो साहूकार आवश्यक था; फसल बेचनी हो तो व्यापारी की भूमिका थी; जमीन का रिकॉर्ड प्रशासन के हाथ में था। इस तरह बाजार, ऋण और प्रशासन के बीच आदिवासी किसान की निर्भरता बढ़ती गई।
‘एजेंसी’ का अर्थ
औपनिवेशिक प्रशासन ने कई आदिवासी और पहाड़ी क्षेत्रों के लिए सामान्य मैदानी प्रशासन से अलग व्यवस्थाएं विकसित की थीं। इन्हें प्रायः एजेंसी क्षेत्र कहा जाता था। इसका आधार यह धारणा थी कि आदिवासी क्षेत्रों की सामाजिक परिस्थितियां सामान्य जिलों से अलग हैं और उनके लिए विशेष प्रशासन आवश्यक है।
लेकिन विशेष प्रशासन होने का अर्थ यह नहीं था कि आदिवासी भूमि हमेशा सुरक्षित रही। बाजार और साहूकारी संबंधों के विस्तार के साथ बाहरी लोगों का प्रवेश जारी रहा।
स्वतंत्रता के बाद संविधान की पांचवीं अनुसूची ने अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के हितों की रक्षा के लिए विशेष व्यवस्था प्रदान की। फिर भी जमीन के वास्तविक स्वामित्व, ऋण और प्रशासनिक क्रियान्वयन के स्तर पर समस्याएं बनी रहीं।
भूगोल और गुरिल्ला संघर्ष
1968 के बाद जब आंदोलन ने सशस्त्र रूप ग्रहण किया, यही पहाड़ी भूगोल नई भूमिका में सामने आया।
घने जंगल, पहाड़ी रास्ते, बिखरे गांव और सीमित सड़कें छोटे गुरिल्ला दस्तों को आवाजाही और छिपने की सुविधा देती थीं। स्थानीय आदिवासी समुदाय भूगोल से भली-भांति परिचित थे, जबकि बाहर से आने वाले पुलिस बलों के लिए वही क्षेत्र कठिन था।
इसलिए श्रीकाकुलम का भूगोल आंदोलन की सामाजिक उत्पत्ति और बाद की सैन्य रणनीति, दोनों को समझने की कुंजी है।
सवरा, जटापू और अन्य आदिवासी समुदाय
श्रीकाकुलम आंदोलन का वास्तविक सामाजिक आधार समझे बिना उसके राजनीतिक इतिहास को समझना संभव नहीं है। आंदोलन की शक्ति उन पहाड़ी गांवों से निकली जहां सवरा, जटापू तथा अन्य आदिवासी समुदाय रहते थे।
सवरा समुदाय
सवरा (सौरा/साओरा) भारत के प्राचीन आदिवासी समुदायों में गिने जाते हैं। उनकी आबादी आंध्र प्रदेश और ओडिशा के सीमावर्ती पूर्वी घाट क्षेत्र में फैली हुई है।
परंपरागत सवरा अर्थव्यवस्था का आधार पहाड़ी खेती, वन संसाधन, छोटे पैमाने पर कृषि और स्थानीय विनिमय रहा। अनेक क्षेत्रों में खेती की प्रकृति मैदानी स्थायी कृषि से अलग थी।
जंगल उनके लिए केवल लकड़ी का स्रोत नहीं था। खाद्य पदार्थ, फल, पत्तियां, औषधीय सामग्री और अन्य वन उत्पाद आजीविका के महत्वपूर्ण घटक थे।
इसलिए जब वन पर सरकारी नियंत्रण बढ़ा या भूमि पर बाहरी दावेदारी बढ़ी तो उसका असर सीधे जीवन-व्यवस्था पर पड़ा।
जटापू समुदाय
जटापू समुदाय भी उत्तरी आंध्र के आदिवासी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सामाजिक समूह था। अनेक जटापू परिवार अपेक्षाकृत स्थायी कृषि से जुड़े थे और मैदानी बाजार तथा प्रशासन से उनका संपर्क कई अन्य पहाड़ी समूहों की तुलना में अधिक था।
इसी सामाजिक परिस्थिति ने उन्हें भूमि-संबंधी विवादों से सीधे जोड़ा।
जमीन चली जाना केवल खेत खोना नहीं था। उसके साथ परिवार की आर्थिक स्वतंत्रता भी समाप्त हो सकती थी और पूर्व स्वामी को उसी जमीन पर मजदूर या आश्रित किसान बनना पड़ सकता था।
यही परिस्थिति भूमि-वापसी की मांग को अत्यंत शक्तिशाली राजनीतिक मुद्दा बनाती थी।
समुदाय से वर्ग तक
कम्युनिस्ट संगठनकर्ताओं ने आदिवासी समस्याओं को केवल जनजातीय कल्याण का प्रश्न न मानकर वर्गीय शोषण से जोड़ना शुरू किया।
साहूकार को केवल बाहरी व्यक्ति नहीं बल्कि शोषक आर्थिक वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत किया गया। जमीन गंवा चुका आदिवासी केवल जनजातीय अधिकारों से वंचित व्यक्ति नहीं, बल्कि गरीब किसान था।
इससे अलग-अलग गांवों और समुदायों की शिकायतों को एक साझा राजनीतिक भाषा मिली—जमीन, मजदूरी, ऋण और शोषण की भाषा।
लेकिन आदिवासी पहचान समाप्त नहीं हुई
यह भी महत्वपूर्ण है कि वर्गीय राजनीति स्वीकार करने के बाद आदिवासी पहचान समाप्त नहीं हो गई। श्रीकाकुलम आंदोलन में दोनों एक-दूसरे के भीतर काम करते रहे।
आदिवासी किसान का अनुभव मैदानी भूमिहीन मजदूर से अलग था, क्योंकि उसका संघर्ष जंगल, परंपरागत संसाधनों और बाहरी आबादी द्वारा भूमि-वियोजन से भी जुड़ा था।
इसीलिए आधुनिक इतिहासलेखन श्रीकाकुलम को केवल वर्ग संघर्ष के रूप में पढ़ने की सीमा की ओर संकेत करता है। आदिवासी समुदायों की अपनी राजनीतिक सक्रियता और स्थानीय आकांक्षाओं को भी समान महत्व देना आवश्यक है।
औपनिवेशिक शासन, जंगल और आदिवासी भूमि
श्रीकाकुलम आंदोलन की तत्काल पृष्ठभूमि स्वतंत्र भारत में बनी, लेकिन उसकी संरचनात्मक जड़ें औपनिवेशिक काल तक जाती हैं।
ब्रिटिश शासन के विस्तार से पहले पहाड़ी समुदायों का जमीन और जंगल से संबंध प्रायः स्थानीय प्रथाओं और सामुदायिक परंपराओं द्वारा निर्धारित होता था। औपनिवेशिक राज्य ने भूमि, जंगल और राजस्व को अधिक औपचारिक प्रशासनिक श्रेणियों में बांटना शुरू किया।
जंगल का राज्य-नियंत्रण
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ब्रिटिश भारत में वन कानूनों के विकास के साथ जंगलों पर राज्य का दावा मजबूत हुआ। जिन संसाधनों का स्थानीय समुदाय पीढ़ियों से उपयोग करते थे, उन पर कानूनी प्रतिबंध संभव हो गए।
यह परिवर्तन पूरे भारत के आदिवासी क्षेत्रों में तनाव का कारण बना। श्रीकाकुलम और आसपास का पूर्वी घाट क्षेत्र भी इस व्यापक परिवर्तन से अछूता नहीं रहा।
आदिवासी दृष्टि में जंगल जीवन-क्षेत्र था; औपनिवेशिक राज्य की दृष्टि में वह राजस्व, लकड़ी और प्रशासनिक नियंत्रण का संसाधन भी था।
दोनों अवधारणाओं के बीच टकराव स्वाभाविक था।
मुद्रा और बाजार का प्रवेश
आदिवासी अर्थव्यवस्था जैसे-जैसे बाजार से जुड़ी, नकदी की आवश्यकता बढ़ी। कर, वस्तुओं की खरीद और कृषि आवश्यकताओं के लिए नकद ऋण की जरूरत पड़ सकती थी।
ऋण चुका न पाने पर भूमि गिरवी रखने या अन्य संपत्ति गंवाने की संभावना पैदा होती थी। जहां आदिवासी समाज में लिखित दस्तावेजों की परंपरा सीमित थी, वहां औपचारिक कानूनी और राजस्व व्यवस्था बाहरी व्यापारी या साहूकार को अतिरिक्त लाभ दे सकती थी।
जमीन का बदलता अर्थ
परंपरागत व्यवस्था में जमीन का अधिकार कई बार समुदाय और उपयोग से जुड़ा था। औपनिवेशिक राजस्व प्रणाली में जमीन एक ऐसी संपत्ति बनती गई जिसे मापा, दर्ज और कानूनी रूप से हस्तांतरित किया जा सकता था।
जो समुदाय लिखित भूमि-अभिलेख, अदालत, ऋण अनुबंध और राजस्व प्रक्रिया से कम परिचित थे, वे अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति में आ गए।
संरक्षण के प्रयास और उनकी सीमा
औपनिवेशिक सरकार ने समय के साथ यह महसूस किया कि आदिवासी भूमि का तेजी से गैर-आदिवासियों के हाथ जाना राजनीतिक असंतोष पैदा कर सकता है। इसलिए विभिन्न एजेंसी क्षेत्रों में भूमि हस्तांतरण और साहूकारी पर नियंत्रण के विशेष प्रावधान विकसित किए गए।
लेकिन संरक्षण और प्रशासनिक नियंत्रण अक्सर साथ-साथ चले।
राज्य एक ओर आदिवासी को बाहरी शोषण से बचाने का दावा करता था और दूसरी ओर जंगल तथा भूमि पर अपने अधिकार का विस्तार करता था।
यही विरोधाभास स्वतंत्र भारत को विरासत में मिला।
स्वतंत्रता के बाद भी क्यों नहीं बदली आदिवासी किसान की स्थिति?
15 अगस्त 1947 ने राजनीतिक सत्ता की संरचना बदल दी, लेकिन श्रीकाकुलम के पहाड़ी गांवों में सामाजिक-आर्थिक संबंध रातोंरात नहीं बदले।
स्वतंत्र भारत ने संविधान, भूमि सुधार, अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण और कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से औपनिवेशिक व्यवस्था से अलग रास्ता अपनाने का प्रयास किया। फिर भी कानून और ग्रामीण वास्तविकता के बीच बड़ा अंतर बना रहा।
संविधान और पांचवीं अनुसूची
भारतीय संविधान ने अनुसूचित जनजातियों की विशिष्ट परिस्थितियों को स्वीकार किया। अनुच्छेद 244 और पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन तथा आदिवासी हितों की सुरक्षा के विशेष प्रावधान बनाए गए।
सैद्धांतिक रूप से यह बड़ा परिवर्तन था।
अब राज्य का घोषित उद्देश्य आदिवासी भूमि और हितों की रक्षा करना था, न कि केवल क्षेत्र पर प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित करना।
लेकिन वास्तविक समस्या क्रियान्वयन की थी।
भूमि सुधार की सीमाएं
स्वतंत्रता के बाद विभिन्न राज्यों में जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार कानून लागू हुए। आंध्र क्षेत्र भी इस प्रक्रिया का हिस्सा था।
लेकिन आदिवासी इलाकों की समस्या सामान्य जमींदारी प्रश्न से कुछ अलग थी। यहां प्रमुख प्रश्न कई बार यह था कि आदिवासी की जमीन गैर-आदिवासी साहूकार, व्यापारी या प्रभावशाली किसान के पास कैसे चली गई और उसे वापस कैसे दिलाया जाए।
सिर्फ जमींदारी समाप्त कर देने से यह समस्या स्वतः हल नहीं होती थी।
1959 का महत्वपूर्ण भूमि-विनियमन
इसी संदर्भ में Andhra Pradesh अनुसूचित क्षेत्र भूमि हस्तांतरण Regulation, 1959 महत्वपूर्ण था। इसका उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि हस्तांतरण को नियंत्रित कर आदिवासी भूमि की रक्षा करना था।
बाद में 1970 में इसे और कठोर किया गया।
लेकिन 1960 के दशक के श्रीकाकुलम संघर्ष का महत्वपूर्ण प्रश्न यही था कि यदि कानूनी संरक्षण उपलब्ध था तो जमीन का विवाद इतना विस्फोटक क्यों बना रहा?
उत्तर कानून और क्रियान्वयन के अंतर में मिलता है।
भूमि रिकॉर्ड अस्पष्ट हो सकते थे। पुराने हस्तांतरणों को चुनौती देना कठिन था। मुकदमे लंबे चलते थे। प्रशासनिक तंत्र दूर था। स्थानीय स्तर पर आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव रखने वाले लोगों के सामने गरीब आदिवासी परिवार की स्थिति कमजोर थी।
साहूकारी का जाल
गरीब किसान को खराब फसल, विवाह, बीमारी, बीज या भोजन के लिए कर्ज लेना पड़ता था। औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था की पहुंच सीमित होने के कारण स्थानीय साहूकार महत्वपूर्ण हो जाता था।
ऊंची ब्याज दर और लगातार बढ़ते ऋण के कारण आर्थिक निर्भरता पीढ़ियों तक चल सकती थी।
इसीलिए बाद के गिरिजन आंदोलन ने केवल जमीन नहीं मांगी। उसने कर्ज, ब्याज, मजदूरी और साहूकारी को भी राजनीतिक प्रश्न बनाया।
विकास की धीमी पहुंच
स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों में सरकार ने आदिवासी विकास कार्यक्रम शुरू किए, लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, सिंचाई और संस्थागत ऋण जैसी सुविधाओं का विस्तार धीमा था।
जब राज्य की विकासकारी उपस्थिति कमजोर हो और उसकी पुलिस, वन तथा राजस्व मशीनरी अधिक दिखाई दे, तो स्थानीय समुदाय राज्य को कल्याणकारी संस्था की तुलना में नियंत्रणकारी शक्ति के रूप में अधिक अनुभव कर सकता है।
श्रीकाकुलम में यही अंतर्विरोध महत्वपूर्ण बना।
कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं को क्यों मिला आधार?
यहीं से अगले चरण की शुरुआत होती है।
कम्युनिस्ट कार्यकर्ता जब गांवों में पहुंचे तो उन्होंने कोई पूरी तरह नया असंतोष पैदा नहीं किया। भूमि, ऋण, मजदूरी और साहूकारी से जुड़ी शिकायतें पहले से मौजूद थीं।
उनका महत्वपूर्ण योगदान इन अलग-अलग शिकायतों को संगठित सामूहिक संघर्ष में बदलना था।
किसी किसान की जमीन चली गई थी—इसे व्यक्तिगत दुर्भाग्य के बजाय राजनीतिक प्रश्न बनाया गया।
किसी मजदूर को कम मजदूरी मिली—इसे व्यक्तिगत विवाद के बजाय सामूहिक मांग बनाया गया।
किसी साहूकार ने अत्यधिक ब्याज लिया—उसके सामने अकेले परिवार के बजाय संगठित गांव खड़ा होने लगा।
यही वह परिवर्तन था जिसने श्रीकाकुलम की पहाड़ियों में एक नए राजनीतिक आंदोलन की जमीन तैयार की।
खंड 1 का समेकित निष्कर्ष
श्रीकाकुलम आंदोलन की उत्पत्ति को समझने के लिए 1967 या 1968 से कहानी शुरू करना उचित नहीं होगा। उसकी जड़ें बहुत पहले तैयार हो चुकी थीं।
औपनिवेशिक शासन ने जंगल और भूमि पर औपचारिक राज्य नियंत्रण का विस्तार किया। बाजार और साहूकारी ने आदिवासी अर्थव्यवस्था में नए शक्ति-संबंध पैदा किए। भूमि-वियोजन ने अनेक परिवारों की आर्थिक स्वतंत्रता कमजोर की। स्वतंत्रता के बाद संविधान और विशेष भूमि-कानूनों ने सुरक्षा का नया ढांचा दिया, लेकिन उनके क्रियान्वयन में गंभीर समस्याएं बनी रहीं।
इन परिस्थितियों में सवरा, जटापू और दूसरे आदिवासी किसानों के बीच भूमि, मजदूरी, ऋण और जंगल के प्रश्न राजनीतिक विस्फोट की सामग्री बनते गए।
इसलिए श्रीकाकुलम का मूल संघर्ष बंदूक से शुरू नहीं हुआ था।
उसके आरंभ में जमीन थी, जंगल था, कर्ज था, मजदूरी थी और न्याय की मांग थी।
और यही अंतर आगे के पूरे श्रीकाकुलम आंदोलन को समझने की सबसे महत्वपूर्ण कुंजी है।
खंड 2 — भूमि, साहूकारी और शोषण की संरचना (अध्याय 6–10)
अध्याय 6: आदिवासी भूमि का गैर-आदिवासियों के हाथों जाना अध्याय 7: साहूकार, व्यापारी और जमींदार अध्याय 8: बेगार, मजदूरी और कृषि शोषण अध्याय 9: वन-अधिकार और राज्य अध्याय 10: कानून होने के बावजूद जमीन क्यों नहीं बची?
भूमि, साहूकारी और शोषण की संरचना
आदिवासी भूमि का गैर-आदिवासियों के हाथों जाना
श्रीकाकुलम के आदिवासी किसान संघर्ष का सबसे केंद्रीय प्रश्न भूमि-वियोजन था। आंदोलन की राजनीतिक भाषा बाद में क्रांतिकारी और सशस्त्र हुई, लेकिन उसकी जड़ उस अनुभव में थी जिसमें अनेक आदिवासी परिवार धीरे-धीरे अपनी जमीन पर नियंत्रण खोते गए।
भूमि का हस्तांतरण हमेशा खुले खरीद-बिक्री के रूप में नहीं होता था। कई बार यह ऋण, बंधक, फर्जी या अस्पष्ट कागजात, बेदखली, कब्जे, राजस्व अभिलेखों में परिवर्तन या स्थानीय प्रभाव के माध्यम से होता था। जिन समुदायों की भूमि-व्यवस्था लंबे समय तक प्रथागत अधिकारों पर आधारित रही थी, वे लिखित कानूनी व्यवस्था में अक्सर कमजोर पक्ष बन गए।
ऋण से जमीन तक
किसी आदिवासी किसान को बीज, भोजन, बीमारी, विवाह या खराब फसल के समय तत्काल नकदी की जरूरत पड़ती थी। बैंक और सहकारी संस्थाएं दूर थीं, इसलिए स्थानीय साहूकार से ऋण लेना सामान्य था। ऋण पर ब्याज कई बार इतना अधिक होता था कि मूलधन चुकाना कठिन हो जाता था।
ऐसी स्थिति में जमीन गिरवी रखी जाती थी। धीरे-धीरे अस्थायी बंधक स्थायी कब्जे में बदल सकता था।
यह प्रक्रिया केवल आर्थिक नहीं थी। एक बार जमीन चली गई तो परिवार को उसी जमीन पर मजदूर बनकर काम करना पड़ सकता था। इस तरह भूमिधर से भूमिहीन मजदूर बनने की प्रक्रिया सामाजिक प्रतिष्ठा और स्वायत्तता दोनों को कमजोर करती थी।
रिकॉर्ड और वास्तविक कब्जे का अंतर
आदिवासी क्षेत्रों में भूमि का एक बड़ा प्रश्न यह भी था कि कागज पर मालिक कौन है और वास्तविक खेती कौन कर रहा है। कई परिवार पीढ़ियों से जमीन पर खेती करते थे, लेकिन औपचारिक स्वामित्व रिकॉर्ड अस्पष्ट या अपूर्ण थे।
इस अंतर का लाभ प्रभावशाली गैर-आदिवासी तत्व उठा सकते थे। प्रशासनिक प्रणाली तक उनकी पहुंच अधिक थी, जबकि गरीब आदिवासी किसान के लिए तहसील, न्यायालय और राजस्व कार्यालय तक पहुंच ही एक बड़ी बाधा थी।
भूमि-वापसी क्यों बनी आंदोलन की धुरी
जब कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं और गिरिजन संगठनों ने गांव-स्तर पर संगठन शुरू किया, तो सबसे प्रभावी मुद्दा यही था—“जिसकी जमीन, उसे वापस मिले।”
भूमि-वापसी की मांग ने आंदोलन को व्यापक सामाजिक समर्थन दिया, क्योंकि यह किसी अमूर्त विचारधारा से नहीं बल्कि रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी थी। किसान तुरंत समझता था कि संघर्ष किसके लिए है।
यही वह बिंदु था जहां निजी विवाद राजनीतिक संघर्ष में बदल गया।
साहूकार, व्यापारी और जमींदार
श्रीकाकुलम के आदिवासी क्षेत्र में शोषण की संरचना केवल भूमि स्वामित्व पर आधारित नहीं थी। साहूकार, व्यापारी, बड़े किसान और स्थानीय प्रभावशाली तत्व मिलकर एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था बनाते थे जिसमें गरीब आदिवासी किसान कई स्तरों पर निर्भर रहता था।
साहूकार की केंद्रीय भूमिका
साहूकार केवल ऋणदाता नहीं था। वह कई बार बीज देता था, नकद उपलब्ध कराता था, फसल खरीदता था और बदले में किसान की जमीन या भविष्य की उपज पर दावा कायम कर लेता था।
यदि ऋण और फसल की खरीद दोनों पर एक ही व्यक्ति का नियंत्रण हो, तो किसान के लिए स्वतंत्र सौदेबाजी लगभग समाप्त हो जाती थी।
यही कारण है कि साहूकारी-विरोध श्रीकाकुलम आंदोलन की महत्वपूर्ण मांग बना।
व्यापारिक शोषण
आदिवासी किसान बाजार तक सीधे नहीं पहुंच पाते थे। उत्पाद को गांव या निकटवर्ती मंडी में स्थानीय व्यापारी खरीदते थे। मूल्य निर्धारण में किसान की भूमिका सीमित थी।
वन-उत्पादों के मामले में यह समस्या और गंभीर हो सकती थी। खरीदार कम दाम देता था, जबकि बाजार में वही वस्तु अधिक मूल्य पर बेची जाती थी। इस अंतर का लाभ मध्यस्थों को मिलता था।
इस तरह आदिवासी अर्थव्यवस्था दोहरे शोषण से गुजरती थी—उत्पादन के समय ऋणदाता पर निर्भरता और बिक्री के समय व्यापारी पर निर्भरता।
‘जमींदार’ शब्द की स्थानीय प्रकृति
श्रीकाकुलम आंदोलन के साहित्य में कई बार ‘जमींदार’ या ‘भूस्वामी’ जैसे शब्द प्रयुक्त होते हैं, लेकिन इन्हें औपनिवेशिक बंगाल के बड़े जमींदार वर्ग के समान समझना गलत होगा।
स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली व्यक्ति बड़े भू-स्वामी, साहूकार, व्यापारी या राजनीतिक संरक्षण प्राप्त ग्रामीण अभिजात हो सकता था। उसका नियंत्रण कई स्रोतों से आता था—जमीन, ऋण, व्यापार, प्रशासन से संपर्क और सामाजिक प्रभुत्व।
शक्ति का जाल
यह पूरी व्यवस्था एक-दूसरे से जुड़ी थी।
कर्ज लेने वाला किसान फसल उसी व्यक्ति को बेच सकता था।
फसल कम दाम पर बेची गई तो ऋण और बढ़ सकता था।
ऋण नहीं चुकाया गया तो जमीन पर दावा हो सकता था।
जमीन चली गई तो वही किसान मजदूर बन सकता था।
यानी ऋण, बाजार, भूमि और श्रम एक ही शोषण चक्र के हिस्से थे।
बेगार, मजदूरी और कृषि शोषण
भूमि-वियोजन से जुड़ा अगला प्रश्न था—भूमि गंवाने के बाद किसान जीवित कैसे रहे?
और यहीं से श्रीकाकुलम का संघर्ष खेतिहर श्रम और ग्रामीण सामाजिक संबंधों से जुड़ता है।
कम मजदूरी और निर्भरता
भूमिहीन या अल्पभूमिधारी आदिवासी परिवार स्थानीय भूस्वामियों और संपन्न किसानों के खेतों पर मजदूरी करते थे। मजदूरी नकद, अनाज या दोनों में दी जा सकती थी।
समस्या यह थी कि मजदूरी दर अक्सर स्थानीय प्रभुत्वशाली वर्ग तय करता था। संगठित सौदेबाजी के अभाव में मजदूर के पास विकल्प कम थे।
बेगार और बिना भुगतान श्रम
कुछ क्षेत्रों में पारंपरिक या जबरन श्रम के रूप मौजूद थे जिन्हें स्थानीय रूप से अलग नामों से जाना जाता था। गरीब परिवारों से बिना उचित मजदूरी के काम लेना सामाजिक प्रभुत्व का हिस्सा था।
ऐसी प्रथाओं का असर केवल आर्थिक नहीं था। वे सामाजिक हीनता और अधीनता को भी बनाए रखती थीं।
यही कारण है कि गिरिजन संगठन ने मजदूरी को सम्मान और अधिकार के प्रश्न से जोड़ा।
मजदूरी संघर्ष का राजनीतिक महत्व
यदि आंदोलन केवल भूमि लौटाने तक सीमित रहता तो उसका सामाजिक आधार सीमित हो सकता था। लेकिन मजदूरी बढ़ाने की मांग ने भूमिहीन और गरीब किसानों को भी आंदोलन से जोड़ा।
यहीं से वर्गीय राजनीति अधिक स्पष्ट हुई।
जिन्हें जमीन नहीं मिल सकती थी, वे भी बेहतर मजदूरी, कम कर्ज और सम्मानजनक श्रम की मांग के कारण आंदोलन के साथ आए।
सामूहिक सौदेबाजी की शुरुआत
जब गांव के मजदूर सामूहिक रूप से तय करने लगे कि वे एक निश्चित दर से कम पर काम नहीं करेंगे, तो शक्ति-संतुलन बदलने लगा।
पहले मालिक और मजदूर का संबंध व्यक्तिगत था।
इस परिवर्तन ने स्थानीय प्रभुत्वशाली वर्ग को पहली बार वास्तविक चुनौती दी।
वन-अधिकार और राज्य
श्रीकाकुलम के आदिवासी समाज के लिए जंगल केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं था, बल्कि जीवन-व्यवस्था का हिस्सा था। इसलिए वन पर सरकारी नियंत्रण का प्रश्न भी संघर्ष के सामाजिक आधार से गहराई से जुड़ा था।
जंगल से आजीविका
आदिवासी परिवार ईंधन, लकड़ी, फल, पत्तियां, जड़ी-बूटियां, चारा और अन्य वन-उत्पादों पर निर्भर थे। इन संसाधनों का उपयोग पीढ़ियों से स्थानीय प्रथाओं के आधार पर होता आया था।
जब आधुनिक वन प्रशासन ने इन गतिविधियों को अनुमति, प्रतिबंध और दंड की श्रेणियों में बांटना शुरू किया, तो पुराने प्रथागत अधिकारों और नए कानूनी नियंत्रण के बीच तनाव पैदा हुआ।
वन विभाग का अनुभव
आदिवासी समुदाय के लिए राज्य की उपस्थिति कई बार स्कूल और अस्पताल से कम, वन रक्षक और राजस्व कर्मचारी के रूप में अधिक दिखाई देती थी।
यदि किसी परिवार को जंगल से लकड़ी या अन्य उत्पाद लेने पर रोक मिले, जुर्माना लगे या खेती की जमीन वन क्षेत्र घोषित हो जाए, तो राज्य एक बाहरी नियंत्रणकारी शक्ति जैसा प्रतीत हो सकता था।
भूमि और वन का संयुक्त प्रश्न
आदिवासी भूमि-वियोजन और वन नियंत्रण अलग-अलग मुद्दे नहीं थे। पहाड़ी क्षेत्रों में जमीन, जंगल और आजीविका एक-दूसरे से जुड़े थे।
यदि खेती की जमीन कम हुई तो जंगल पर निर्भरता बढ़ सकती थी।
यदि जंगल पर नियंत्रण बढ़ा तो कृषि पर दबाव बढ़ सकता था।
इसलिए आंदोलन की सामाजिक जमीन केवल खेत की मेड़ पर नहीं, पूरे पारिस्थितिक जीवन-क्षेत्र में थी।
संघर्ष की राजनीतिक भाषा
कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने इन समस्याओं को स्थानीय अन्याय के बजाय राज्य और वर्ग-सत्ता से जोड़कर प्रस्तुत किया।
यहीं से वन-अधिकार का प्रश्न भूमि-संघर्ष की व्यापक राजनीति का हिस्सा बन गया।
कानून होने के बावजूद जमीन क्यों नहीं बची?
यह श्रीकाकुलम आंदोलन की पृष्ठभूमि का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
यदि अनुसूचित क्षेत्रों की भूमि की रक्षा के लिए कानूनी प्रावधान मौजूद थे, तो आदिवासी जमीन का हस्तांतरण कैसे जारी रहा?
समस्या कानून के अभाव से कम और उसके क्रियान्वयन, प्रशासनिक क्षमता और स्थानीय शक्ति-संबंधों से अधिक जुड़ी थी।
1959 का भूमि हस्तांतरण विनियमन
आंध्र प्रदेश में अनुसूचित क्षेत्रों के लिए अनुसूचित क्षेत्र भूमि हस्तांतरण Regulation, 1959 बनाया गया। इसका उद्देश्य आदिवासी क्षेत्रों में भूमि हस्तांतरण को नियंत्रित करना और गैर-आदिवासियों द्वारा जमीन हासिल करने की प्रक्रिया को रोकना था।
लेकिन किसी कानून की वास्तविक प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे लागू कौन करता है, रिकॉर्ड कितने स्पष्ट हैं और गरीब व्यक्ति न्याय तक कितनी आसानी से पहुंच सकता है।
पुरानी जमीनों का प्रश्न
कई विवाद ऐसे थे जिनमें जमीन का हस्तांतरण कानून लागू होने से पहले हुआ था।
ऐसे मामलों में स्वामित्व का इतिहास साबित करना कठिन था। पुराने रिकॉर्ड, मौखिक दावे और वास्तविक कब्जे के बीच विवाद होते थे।
यह जटिलता प्रशासनिक प्रक्रिया को लंबा बनाती थी।
प्रमाण का बोझ
गरीब आदिवासी किसान के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि वह साबित कैसे करे कि जमीन वास्तव में उसकी थी।
यदि उसके पास लिखित दस्तावेज नहीं हों और दूसरी ओर प्रभावशाली व्यक्ति के पास कागज मौजूद हों, तो कानूनी लड़ाई असमान हो जाती थी।
यही वह अंतर था जहां कानून और न्याय दो अलग चीजें दिखाई देने लगते थे।
प्रशासनिक दूरी
पर्वतीय और दुर्गम इलाकों में अधिकारी तक पहुंच स्वयं कठिन थी। सुनवाई में समय लगता था। भ्रष्टाचार, स्थानीय दबाव और राजनीतिक संपर्क जैसी समस्याएं भी प्रभाव डाल सकती थीं।
इसलिए कई परिवारों को लगा कि कानूनी रास्ता धीमा और निष्प्रभावी है।
यहीं से संगठनात्मक दबाव और प्रत्यक्ष कार्रवाई को वैधता मिलने लगी।
1970 का कठोर संशोधन
बाद में Regulation 1 of 1970 ने आदिवासी भूमि सुरक्षा व्यवस्था को अधिक कठोर किया। इसके पीछे व्यापक राजनीतिक और सामाजिक दबाव की भूमिका थी।
यह संशोधन इस तथ्य को भी रेखांकित करता है कि पूर्व की व्यवस्था पर्याप्त प्रभावी नहीं थी।
कानून बनाम सामाजिक शक्ति
श्रीकाकुलम का अनुभव एक व्यापक ऐतिहासिक सत्य सामने लाता है—कानून तभी प्रभावी होता है जब उसे लागू करने की राजनीतिक इच्छा, प्रशासनिक क्षमता और सामाजिक संतुलन मौजूद हो।
यदि स्थानीय स्तर पर साहूकार, व्यापारी, भूस्वामी और प्रशासनिक प्रभाव एक ओर हों और गरीब आदिवासी किसान दूसरी ओर, तो केवल कानूनी प्रावधान बराबरी नहीं ला सकता।
यही स्थिति आंदोलन की जमीन बनाती गई।
खंड 2 का समेकित निष्कर्ष
श्रीकाकुलम आंदोलन की सामाजिक-आर्थिक संरचना को चार परस्पर जुड़े तत्वों में समझा जा सकता है—भूमि-वियोजन, साहूकारी, कम मजदूरी और वन पर नियंत्रण।
जमीन गई तो मजदूरी पर निर्भरता बढ़ी।
जंगल पर प्रतिबंध ने वैकल्पिक आजीविका सीमित की।
यही कारण है कि जब गिरिजन संगठन सक्रिय हुए तो उन्होंने केवल एक मांग नहीं उठाई। उन्होंने जमीन वापस करने, ब्याज घटाने, मजदूरी बढ़ाने, जबरन श्रम रोकने और स्थानीय प्रभुत्वशाली वर्ग की शक्ति को चुनौती देने की संयुक्त राजनीति विकसित की।
यहीं से श्रीकाकुलम का संघर्ष व्यक्तिगत शिकायतों से सामूहिक राजनीतिक आंदोलन में बदलने लगा।
और यही परिवर्तन हमें अगले खंड तक ले जाता है—जहां संगठन, नेतृत्व और राजनीतिक चेतना पहली बार व्यवस्थित रूप ग्रहण करती है।
खंड 3 — गिरिजन संगठन और संघर्ष की प्रारंभिक अवस्था (अध्याय 11–16)
अध्याय 11: कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं का आदिवासी क्षेत्रों में प्रवेश अध्याय 12: गिरिजन संगम का निर्माण अध्याय 13: स्थानीय आदिवासी नेतृत्व और पाल्ले रामुलु अध्याय 14: वेंपाटापु सत्यनारायण — शिक्षक से क्रांतिकारी नेता तक अध्याय 15: आदिभटला कैलासम — किसान संगठन से सशस्त्र संघर्ष तक अध्याय 16: सुब्बाराव पाणिग्रही और आंदोलन की सांस्कृतिक धारा
गिरिजन संगठन और संघर्ष की प्रारंभिक अवस्था
कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं का आदिवासी क्षेत्रों में प्रवेश
श्रीकाकुलम आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि 1967 के नक्सलबाड़ी विद्रोह से काफी पहले यहां संगठित किसान–आदिवासी राजनीति की जमीन तैयार हो चुकी थी। 1950 के दशक में कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं, विशेषकर कुछ शिक्षकों ने सवरा और जटापू आदिवासी क्षेत्रों में काम करना शुरू किया। प्रारंभिक मुद्दे किसी सशस्त्र क्रांति से नहीं, बल्कि कम मजदूरी, जबरन वसूली, बेगार, वन अधिकारियों की मनमानी, साहूकारी और भूमि-वियोजन से जुड़े थे।
यही तथ्य श्रीकाकुलम और नक्सलबाड़ी के संबंध को समझने में महत्वपूर्ण है। नक्सलबाड़ी ने बाद में आंदोलन की रणनीति और वैचारिक दिशा को गहराई से प्रभावित किया, लेकिन उसने श्रीकाकुलम में आदिवासी असंतोष पैदा नहीं किया था।
शिक्षक क्यों बने संगठनकर्ता?
आदिवासी इलाकों में काम करने वाले शिक्षकों की स्थिति विशिष्ट थी। वे स्थानीय गांवों के संपर्क में रहते थे, प्रशासनिक व्यवस्था को समझते थे और लिखित कानून तथा दस्तावेजों तक उनकी पहुंच सामान्य आदिवासी किसान की तुलना में अधिक थी।
वेंपाटापु सत्यनारायण, जिन्हें बाद में ‘सत्यम मास्टर’ के नाम से व्यापक पहचान मिली, इसी पृष्ठभूमि से निकले। उनके साथ आदिभटला कैलासम और अन्य कार्यकर्ताओं ने ग्रामीण समस्याओं को संगठित राजनीति से जोड़ना शुरू किया।
प्रारंभिक संगठनात्मक कार्य का स्वरूप अपेक्षाकृत सरल था। गांवों में बैठकें होती थीं, लोगों से उनकी शिकायतें पूछी जाती थीं, मजदूरी दरों पर चर्चा होती थी और साहूकारों या स्थानीय अधिकारियों की ज्यादतियों के विरुद्ध सामूहिक प्रतिरोध विकसित किया जाता था।
लेकिन इस साधारण दिखने वाली प्रक्रिया का गहरा राजनीतिक अर्थ था।
पहले कोई आदिवासी परिवार अकेले साहूकार से लड़ता था।
अब पूरा गांव उसके साथ खड़ा होने लगा।
अधिकारों की नई भाषा
कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने आदिवासी किसानों को यह समझाने की कोशिश की कि कम मजदूरी या जमीन छिनना केवल व्यक्तिगत दुर्भाग्य नहीं है। इसके पीछे आर्थिक और सामाजिक शक्ति-संबंध काम कर रहे हैं।
इस प्रकार स्थानीय शिकायतों को धीरे-धीरे वर्गीय भाषा मिली।
भूस्वामी और साहूकार को ‘शोषक वर्ग’ के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि गरीब किसान, खेतिहर मजदूर और आदिवासी एक साझा संघर्षशील समुदाय के रूप में संगठित किए गए।
आंदोलन का प्रारंभिक चरित्र
इस चरण में संघर्ष का मुख्य साधन जनसंगठन था, न कि गुरिल्ला दस्ता।
सभाएं, जुलूस, सामूहिक मांगें, मजदूरी संघर्ष और प्रशासन पर दबाव—यही प्रमुख तरीके थे।
यही बात बाद की घटनाओं के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि श्रीकाकुलम ने जनसंगठन से सशस्त्र राजनीति की ओर यात्रा की, न कि सीधे हथियारबंद आंदोलन के रूप में जन्म लिया।
गिरिजन संगम का निर्माण
श्रीकाकुलम आंदोलन के संगठनात्मक विकास में सबसे महत्वपूर्ण संस्था थी गिरिजन संगम।
विभिन्न अध्ययनों में इसके गठन की समय-रेखा को लेकर कुछ भिन्न विवरण मिलते हैं, लेकिन एक महत्वपूर्ण अध्ययन इसे 1958 में अविभाजित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रयासों से गठित संगठन बताता है। उपलब्ध साहित्य यह भी दर्शाता है कि 1961 तक संगठन इतना विकसित हो चुका था कि मोंडेमखाली में उसका सम्मेलन आयोजित किया गया।
संगठन का उद्देश्य
गिरिजन संगम का उद्देश्य शुरुआत में व्यापक राजनीतिक सत्ता परिवर्तन नहीं था। वह आदिवासी किसानों की तात्कालिक समस्याओं पर केंद्रित था।
भूमि की रक्षा और कब्जाई गई जमीन वापस लेना, बेहतर मजदूरी, बेगार और जबरन वसूली रोकना, साहूकारी का विरोध, वन और राजस्व कर्मचारियों की ज्यादतियों के खिलाफ कार्रवाई तथा आदिवासियों को संगठित सामाजिक शक्ति में बदलना।
पार्वतीपुरम और पालकोंडा
संगठन प्रारंभ में मुख्य रूप से पार्वतीपुरम और पालकोंडा एजेंसी क्षेत्रों में सक्रिय हुआ और बाद में इसका प्रभाव आसपास के क्षेत्रों में फैला।
इन इलाकों में गांवों के बीच दूरी अधिक थी और संचार कमजोर था। इसलिए किसी जिला-स्तरीय राजनीतिक संगठन का निर्माण अपने आप में कठिन कार्य था।
कार्यकर्ता गांव-गांव जाते थे। स्थानीय संपर्क विकसित किए जाते थे। सभा के लिए लोगों को कई मील पैदल चलना पड़ता था।
संगठन के सम्मेलन केवल राजनीतिक आयोजन नहीं थे; वे आदिवासी समाज में नई सामूहिक चेतना के प्रदर्शन भी थे।
लाल झंडे और राजनीतिक पहचान
जब सैकड़ों आदिवासी लाल झंडे लेकर सम्मेलन या सभा में पहुंचते थे, तो यह स्थानीय सत्ता-संबंध में बड़ा परिवर्तन था।
पहले वही लोग प्रशासन, साहूकार या भूस्वामी के सामने व्यक्तिगत रूप से कमजोर थे।
अब वे संगठित समूह के रूप में दिखाई दे रहे थे।
एक विश्वविद्यालय-आधारित अध्ययन के अनुसार संगम ने राजनीतिक शिक्षा, स्कूल जैसी गतिविधियों और सामाजिक चेतना के विस्तार में भी भूमिका निभाई। महिलाओं के लिए अलग महिला संगम भी संगठित किया गया।
संगठन की वास्तविक उपलब्धि
गिरिजन संगम की सबसे बड़ी सफलता किसी एक मांग का पूरा होना नहीं थी।
उसकी सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि थी—भय का टूटना।
जब मजदूर सामूहिक रूप से मजदूरी की मांग करने लगे, जब किसान जमीन के पुराने दावों को चुनौती देने लगे और जब साहूकार के सामने पूरा संगठन खड़ा होने लगा, तब ग्रामीण शक्ति-संतुलन बदलने लगा।
यहीं से स्थानीय प्रभुत्वशाली वर्ग और संगठन के बीच संघर्ष भी तीखा हुआ।
स्थानीय आदिवासी नेतृत्व और पाल्ले रामुलु
श्रीकाकुलम आंदोलन के इतिहास को केवल वेंपाटापु सत्यनारायण, आदिभटला कैलासम और बाद में चारु मजूमदार के नामों तक सीमित कर देना उचित नहीं होगा। आंदोलन की सफलता का आधार स्थानीय आदिवासी कार्यकर्ता और ग्राम-स्तरीय नेतृत्व था।
इसी संदर्भ में पाल्ले रामुलु का नाम महत्वपूर्ण है।
उपलब्ध शोध के अनुसार गिरिजन संगम के प्रारंभिक संगठन में पाल्ले रामुलु की प्रमुख भूमिका थी और बाद में सत्यनारायण तथा कैलासम जैसे मैदानी क्षेत्रों से आए शिक्षित कम्युनिस्ट कार्यकर्ता उससे जुड़े।
बाहरी नेतृत्व और स्थानीय समाज
किसी आदिवासी क्षेत्र में बाहरी राजनीतिक कार्यकर्ता तभी सफल हो सकता था जब उसे स्थानीय समुदाय के भीतर सहयोगी और विश्वसनीय नेतृत्व मिले।
भाषा, रीति-रिवाज, गांवों के बीच संबंध, रिश्तेदारी, स्थानीय विवाद और पहाड़ी भूगोल—इन सबकी जानकारी स्थानीय कार्यकर्ताओं के पास थी।
यही लोग राजनीतिक विचारों को स्थानीय सामाजिक भाषा में अनुवाद करते थे।
आदिवासी ‘अनुयायी’ नहीं थे
पुराने राजनीतिक आख्यानों में कभी-कभी आदिवासी किसान को ऐसा दिखाया गया है जैसे उसे बाहरी क्रांतिकारी नेताओं ने संगठित कर संघर्ष में उतार दिया हो।
आधुनिक सामाजिक इतिहास इससे अधिक जटिल तस्वीर प्रस्तुत करता है।
आदिवासी समुदायों के अपने अनुभव, शिकायतें और मांगें थीं। संगठन ने उन्हें राजनीतिक संरचना दी, लेकिन संघर्ष की जमीन पहले से मौजूद थी।
इसलिए श्रीकाकुलम आंदोलन में आदिवासी एजेंसी को केंद्रीय स्थान देना आवश्यक है।
स्थानीय कार्यकर्ताओं की भूमिकाएं
स्थानीय नेता कई तरह के कार्य करते थे—
गांवों में बैठक बुलाना, अन्य गांवों तक संदेश पहुंचाना, भूमि विवादों की जानकारी इकट्ठी करना, साहूकारी के मामलों को सामने लाना, सम्मेलनों के लिए लोगों को जुटाना और बाद के चरण में पुलिस गतिविधियों की सूचना देना।
यानी जिस समय प्रमुख नेताओं के नाम इतिहास में दर्ज हो रहे थे, उसी समय गांव-स्तर पर अनेक अनाम कार्यकर्ता आंदोलन को जीवित रख रहे थे।
नेतृत्व का लोकतांत्रिक चरण
प्रारंभिक संगम राजनीति की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि समस्याओं पर सामूहिक विचार-विमर्श होता था। यही संगठन बाद में जब अधिक गुप्त और सशस्त्र संरचना की ओर गया, तब नेतृत्व की प्रकृति भी बदलने लगी।
जनसंगठन में नेतृत्व जनता के बीच प्रत्यक्ष रहता है।
गुरिल्ला संगठन में सुरक्षा, गोपनीयता और सैन्य अनुशासन बढ़ जाते हैं।
श्रीकाकुलम की आगे की कहानी इसी परिवर्तन से प्रभावित हुई।
वेंपाटापु सत्यनारायण — शिक्षक से क्रांतिकारी नेता तक
श्रीकाकुलम आंदोलन का सबसे चर्चित नाम वेंपाटापु सत्यनारायण है। स्थानीय लोगों के बीच वे ‘सत्यम मास्टर’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।
उनका महत्व केवल इसलिए नहीं था कि बाद में वे CPI(ML) नेतृत्व से जुड़े। उनकी वास्तविक ऐतिहासिक भूमिका इस तथ्य में थी कि उन्होंने वर्षों तक आदिवासी समाज के बीच रहकर संगठनात्मक आधार बनाया।
आदिवासियों के बीच जीवन
सुमंत बनर्जी के अध्ययन में सत्यनारायण का वर्णन ऐसे कम्युनिस्ट शिक्षक के रूप में मिलता है जिसने सवरा और जटापू किसानों के बीच काम किया और स्थानीय समाज में गहरी स्वीकार्यता अर्जित की।
यही लंबा सामाजिक संपर्क उनकी राजनीतिक शक्ति का स्रोत था।
उनकी राजनीति का प्रारंभिक केंद्र मजदूरी, अवैध वसूली और भूमि जैसे ठोस मुद्दे थे।
‘सत्यम मास्टर’ की लोकप्रियता
शिक्षक की सामाजिक भूमिका और आदिवासी जीवन से उनके निकट संबंध ने उन्हें केवल पार्टी कार्यकर्ता से अधिक बना दिया।
वे गांव के व्यक्ति, सलाहकार और संघर्ष के नेता के रूप में देखे जाने लगे।
यही कारण है कि बाद में जब आंदोलन उग्र हुआ, तो बड़ी संख्या में आदिवासी उनके पीछे खड़े रहे।
CPI से CPI(M)
1964 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन के बाद सत्यनारायण और उनके सहयोगी CPI(M) के साथ गए।
यह चरण महत्वपूर्ण था क्योंकि पार्टी के भीतर भारतीय क्रांति की रणनीति को लेकर तीखी बहस चल रही थी।
क्या चुनाव और जनांदोलन के माध्यम से परिवर्तन किया जाए?
या चीनी क्रांति की तरह ग्रामीण सशस्त्र संघर्ष विकसित किया जाए?
1967 के नक्सलबाड़ी विद्रोह ने इस बहस को निर्णायक रूप से तीखा कर दिया।
नक्सलबाड़ी का प्रभाव
श्रीकाकुलम में सत्यनारायण वर्षों से स्थानीय आंदोलन चला रहे थे, लेकिन नक्सलबाड़ी के बाद उन्हें राष्ट्रीय क्रांतिकारी धारा से वैचारिक समर्थन मिला।
बाद में वे All India Coordination Committee of Communist Revolutionaries से जुड़े और CPI(ML) के केंद्रीय नेतृत्व में पहुंचे।
लेकिन उनके जीवन का यह अंतिम चरण पहले के लंबे संगठनात्मक कार्य को छिपा देता है।
श्रीकाकुलम में उनकी शक्ति बंदूक से नहीं बनी थी।
वह पहले विश्वास, संगठन और स्थानीय संघर्ष से बनी थी।
आदिभटला कैलासम — किसान संगठन से सशस्त्र संघर्ष तक
आदिभटला कैलासम श्रीकाकुलम आंदोलन के दूसरे प्रमुख स्तंभ थे। वे भी शिक्षक थे, लेकिन उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि सत्यनारायण से अलग थी।
उपलब्ध विवरणों के अनुसार कैलासम एक भूस्वामी परिवार से आए थे। इसके बावजूद उन्होंने किसानों के पक्ष में अपने ही पारिवारिक हितों के विरुद्ध राजनीतिक रुख अपनाया।
वर्गीय पृष्ठभूमि से विच्छेद
यह तथ्य कम्युनिस्ट आंदोलनों के सामाजिक इतिहास में महत्वपूर्ण है।
कई क्रांतिकारी नेता स्वयं किसान या मजदूर परिवारों से नहीं आए थे। शिक्षित मध्यमवर्ग या संपन्न परिवारों से आए लोगों ने अपने वर्गीय हितों से अलग होकर गरीब किसानों की राजनीति अपनाई।
किसान संघर्ष से पूर्णकालिक राजनीति तक
उनका राजनीतिक विकास कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर हुआ। वे आदिवासी किसानों के बीच सक्रिय हुए और सत्यनारायण के साथ मिलकर संगठन मजबूत किया।
उनकी भूमिका विशेष रूप से भूमि-संबंधी संघर्षों में महत्वपूर्ण रही।
संगठनकर्ता के रूप में कैलासम
कैलासम का महत्व केवल वैचारिक नेता के रूप में नहीं था। वे स्थानीय संघर्षों को पार्टी-संगठन से जोड़ने वाले कार्यकर्ता थे।
पार्वतीपुरम एजेंसी क्षेत्र में आदिवासी किसानों की शिकायतों को संगठित राजनीतिक कार्रवाई में बदलने में उनका योगदान रहा।
1964 के विभाजन में वे भी CPI(M) के साथ गए और बाद में नक्सलबाड़ी समर्थक क्रांतिकारी धारा में शामिल हुए।
सत्यनारायण और कैलासम की साझी भूमिका
दोनों नेताओं की जोड़ी श्रीकाकुलम आंदोलन की पहचान बन गई।
सत्यनारायण की स्थानीय लोकप्रियता और कैलासम की संगठनात्मक–राजनीतिक क्षमता एक-दूसरे की पूरक थीं।
लेकिन 1967 के बाद दोनों की राजनीति तेजी से बदलने लगी।
मजदूरी बढ़ाना, जमीन वापस लेना और स्थानीय शोषण रोकना,
राज्य सत्ता को चुनौती देकर क्रांतिकारी सत्ता स्थापित करना।
यही बदलाव श्रीकाकुलम आंदोलन का सबसे निर्णायक वैचारिक संक्रमण था।
सुब्बाराव पाणिग्रही और आंदोलन की सांस्कृतिक धारा
किसान आंदोलनों की शक्ति केवल संगठनों, सभाओं और हथियारों में नहीं होती। वे अपनी संस्कृति भी बनाते हैं।
श्रीकाकुलम आंदोलन में इस सांस्कृतिक राजनीति का सबसे प्रसिद्ध नाम सुब्बाराव पाणिग्रही है।
वे कवि, गीतकार और सांस्कृतिक कार्यकर्ता के रूप में आंदोलन से जुड़े और बाद में उसके क्रांतिकारी नेतृत्व का हिस्सा बने। श्रीकाकुलम आंदोलन पर उपलब्ध साहित्य उन्हें सत्यनारायण और कैलासम के साथ प्रमुख चेहरों में गिनता है।
गीत क्यों महत्वपूर्ण थे?
एक ऐसे आदिवासी समाज में जहां साक्षरता सीमित थी, लंबा राजनीतिक दस्तावेज उतना प्रभावी नहीं हो सकता था जितना कोई गीत, कथा या लोकनाट्य।
सभा में सामूहिक रूप से गाया जाता था।
और राजनीतिक संदेश को भावनात्मक अनुभव में बदल देता था।
लोकभाषा में राजनीति
पाणिग्रही ने स्थानीय सांस्कृतिक रूपों का उपयोग किया। क्रांतिकारी विचारों को ऐसी भाषा और शैली में प्रस्तुत किया गया जिसे ग्रामीण और आदिवासी जनता समझ सके।
उनकी सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों में भूमि, गरीब किसान, शोषण, विद्रोह और सामाजिक परिवर्तन जैसे विषय प्रमुख हुए।
यही सांस्कृतिक राजनीति बाद में आंध्र प्रदेश के क्रांतिकारी आंदोलन में अत्यंत प्रभावशाली बनी। तेलुगु जनसांस्कृतिक परंपरा में आगे चलकर जन नाट्य मंडली और गद्दर जैसे कलाकारों की लोकप्रियता के पीछे भी इस पुराने अनुभव की छाया दिखाई देती है। एक आधुनिक अध्ययन पाणिग्रही की लोकशैली को बाद की क्रांतिकारी सांस्कृतिक धारा पर महत्वपूर्ण प्रभाव के रूप में देखता है।
संस्कृति और राजनीतिक चेतना
गिरिजन संगम केवल आर्थिक मांगें नहीं उठा रहा था। संगठन ने आदिवासी जनता में राजनीतिक चेतना विकसित करने की कोशिश की।
अध्ययन बताते हैं कि राजनीतिक शिक्षा, बैठकों, स्कूलों और महिला संगठनों के साथ सांस्कृतिक गतिविधियों का भी उपयोग किया गया।
शोषण को निजी भाग्य के बजाय राजनीतिक व्यवस्था का परिणाम बताना,
सांस्कृतिक आंदोलन से क्रांतिकारी प्रचार तक
प्रारंभिक चरण में संस्कृति सामाजिक जागरण का साधन थी।
बाद में जैसे-जैसे आंदोलन सशस्त्र संघर्ष की ओर गया, यही संस्कृति क्रांतिकारी प्रचार और शहादत की स्मृति का माध्यम बनती गई।
गीत अब केवल मजदूरी बढ़ाने की मांग नहीं करता था; वह क्रांति और बलिदान की भाषा बोलने लगा।
यहीं संस्कृति और हथियारबंद राजनीति का संगम हुआ।
खंड 3 का समेकित निष्कर्ष
श्रीकाकुलम आंदोलन के इतिहास में 1950 के दशक के उत्तरार्ध से 1967 तक का संगठनात्मक चरण संभवतः सबसे निर्णायक था।
इसी अवधि में असंतोष ने संगठन का रूप लिया।
गिरिजन संगम ने अलग-अलग गांवों और अलग-अलग शिकायतों को एक साझा राजनीतिक मंच दिया। पाल्ले रामुलु जैसे स्थानीय नेताओं ने आदिवासी समाज के भीतर संगठन की जड़ें मजबूत कीं। वेंपाटापु सत्यनारायण और आदिभटला कैलासम जैसे शिक्षक कार्यकर्ताओं ने भूमि, मजदूरी और साहूकारी के सवालों को व्यापक कम्युनिस्ट राजनीति से जोड़ा। सुब्बाराव पाणिग्रही जैसे सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं ने संघर्ष को गीत, कविता और लोकसंस्कृति की भाषा दी।
इस चरण की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि आदिवासी किसान स्वयं को अलग-अलग गांवों में रहने वाले असहाय व्यक्तियों के बजाय एक संगठित राजनीतिक समुदाय के रूप में देखने लगे।
और यहीं एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक निष्कर्ष निकलता है—
श्रीकाकुलम की बंदूक से पहले संगठन आया था। संगठन से पहले असंतोष था। और असंतोष की जड़ जमीन, मजदूरी, जंगल और साहूकारी में थी।
लेकिन जैसे-जैसे संगम की शक्ति बढ़ी, स्थानीय भूस्वामियों और प्रभुत्वशाली वर्गों की प्रतिक्रिया भी कठोर होती गई। 1960 के दशक के मध्य तक दोनों पक्षों के बीच टकराव तेज हो चुका था।
नक्सलबाड़ी की खबर, कम्युनिस्ट आंदोलन का वैचारिक विभाजन और श्रीकाकुलम में हिंसक स्थानीय टकराव—इन तीनों ने आंदोलन को उस मोड़ पर पहुंचा दिया जहां जनसंगठन और सशस्त्र संघर्ष के बीच की सीमा तेजी से टूटने लगी।
खंड 4 — शांतिपूर्ण जनसंघर्ष से उग्र संघर्ष की ओर (अध्याय 17–20)
अध्याय 17: भूमि वापसी की लड़ाई अध्याय 18: मजदूरी, कर्ज और ब्याज के खिलाफ आंदोलन अध्याय 19: गांवों में समानांतर सामाजिक शक्ति का उदय अध्याय 20: महिलाओं की भागीदारी और महिला संगम
इसके बाद खंड 5 — 1967 : निर्णायक मोड़ (अध्याय 21–24) आएगा, जिसमें नक्सलबाड़ी के प्रभाव, CPI–CPI(M) के वैचारिक विभाजन और 31 अक्टूबर 1967 की लेविडी घटना तथा कोरन्ना–मंगन्ना की हत्या को विस्तार से लिया जाएगा।
शांतिपूर्ण जनसंघर्ष से उग्र संघर्ष की ओर
श्रीकाकुलम आंदोलन के इतिहास में यह चरण अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी दौर में गिरिजन संगम द्वारा वर्षों से चलाए जा रहे भूमि, मजदूरी, ऋण और सामाजिक सम्मान के संघर्ष ने स्थानीय ग्रामीण सत्ता-संबंधों को चुनौती देना शुरू किया। आंदोलन अभी पूर्णतः सशस्त्र नहीं था, लेकिन वह केवल याचिका और प्रशासनिक शिकायतों तक भी सीमित नहीं रह गया था।
इसे सीधे “शांतिपूर्ण आंदोलन से हिंसा” की सरल रेखा में देखना भी उचित नहीं होगा। धरना, सामूहिक दबाव, भूमि पर पुनः कब्जा, सामाजिक बहिष्कार, फसल और संपत्ति को लेकर प्रत्यक्ष कार्रवाई—इनके बीच कई स्तर मौजूद थे। यही संक्रमण आगे 1967–68 में निर्णायक बना।
भूमि वापसी की लड़ाई
श्रीकाकुलम के आदिवासी आंदोलन की सबसे प्रभावशाली मांग थी—आदिवासियों से चली गई जमीन वापस दिलाना।
भूमि प्रश्न इसलिए विस्फोटक था क्योंकि जमीन आर्थिक संसाधन होने के साथ आदिवासी परिवार की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और सामुदायिक अस्तित्व का आधार थी।
व्यक्तिगत मुकदमे से सामूहिक संघर्ष तक
पहले भूमि विवाद प्रायः व्यक्ति और व्यक्ति के बीच दिखाई देता था। किसी आदिवासी किसान का दावा था कि साहूकार ने ऋण के बदले उसकी जमीन कब्जा ली; दूसरी ओर कब्जाधारी दस्तावेज या पुराने लेन-देन का हवाला देता था।
ऐसे विवादों में गरीब किसान को राजस्व अधिकारियों और अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते थे।
गिरिजन संगम ने इस ढांचे को बदल दिया।
अब प्रश्न यह नहीं रहा कि केवल एक व्यक्ति अपनी जमीन कैसे वापस पाएगा। संगठन ने भूमि-वियोजन को पूरे आदिवासी समाज की समस्या के रूप में प्रस्तुत किया।
संगठन की सामूहिक शक्ति
संगम किसी विवादित जमीन के मामले में ग्रामीणों को एकत्र कर सकता था, प्रशासन के सामने मांग रख सकता था और कब्जे को सामाजिक रूप से चुनौती दे सकता था।
कुछ क्षेत्रों में आदिवासी किसानों ने उन जमीनों पर पुनः खेती करने का प्रयास किया जिन्हें वे अपना मानते थे लेकिन जिन पर गैर-आदिवासियों का नियंत्रण हो चुका था।
इसके पीछे एक सरल तर्क था—यदि सरकारी व्यवस्था वर्षों में न्याय नहीं दिलाती तो संगठित समुदाय स्वयं अपने अधिकार को लागू करेगा।
यहीं आंदोलन कानूनी मांग और प्रत्यक्ष कार्रवाई के बीच की सीमा पर पहुंचने लगा।
भूमि-वापसी और शक्ति-संतुलन
जमीन वापस लेना केवल आर्थिक पुनर्वितरण नहीं था।
यदि किसी प्रभावशाली साहूकार या भूस्वामी को आदिवासी किसान के सामने जमीन छोड़नी पड़ती, तो उसका सामाजिक प्रभुत्व भी कमजोर होता।
इसलिए भूमि-संघर्ष ने ग्रामीण सत्ता को सीधे चुनौती दी।
यही कारण था कि स्थानीय संपन्न वर्गों की प्रतिक्रिया भी तीखी होने लगी।
संघर्ष की प्रारंभिक सफलता
गिरिजन संगम की बढ़ती सामूहिक शक्ति ने कई क्षेत्रों में आदिवासी किसानों की सौदेबाजी क्षमता बढ़ाई। आंदोलन के अध्ययन बताते हैं कि संगम भूमि-वापसी, मजदूरी और ऋण जैसे प्रश्नों पर उल्लेखनीय प्रभाव स्थापित करने में सफल हुआ।
लेकिन यही सफलता अगले संघर्ष की भूमिका बनी।
जिस सामाजिक व्यवस्था में जमीन, ऋण और राजनीतिक प्रभाव कुछ लोगों के हाथ में केंद्रित हो, उसमें भूमि-वापसी केवल सुधार नहीं बल्कि स्थानीय सत्ता का पुनर्वितरण बन जाती है।
मजदूरी, कर्ज और ब्याज के खिलाफ आंदोलन
यदि भूमि श्रीकाकुलम आंदोलन की केंद्रीय धुरी थी, तो मजदूरी और कर्ज उसके दूसरे बड़े स्तंभ थे।
सभी आदिवासी परिवारों के पास वापस पाने के लिए पर्याप्त जमीन नहीं थी। कई भूमिहीन या अल्पभूमिधारी थे। इसलिए आंदोलन को व्यापक आधार तभी मिल सकता था जब वह खेतिहर मजदूर और कर्जदार किसान की समस्याओं को भी उठाता।
मजदूरी का प्रश्न
कृषि मजदूरी स्थानीय शक्ति-संबंधों से निर्धारित होती थी। गरीब आदिवासी मजदूर की व्यक्तिगत सौदेबाजी क्षमता बहुत कम थी।
गिरिजन संगम ने मजदूरी को सामूहिक प्रश्न बनाया।
यदि पूरा गांव तय करे कि निश्चित दर से कम पर कोई काम नहीं करेगा, तो मालिक के सामने नई स्थिति पैदा होती है।
यह सामूहिक सौदेबाजी का ग्रामीण रूप था।
आर्थिक मांग से सम्मान तक
मजदूरी संघर्ष केवल कुछ अतिरिक्त पैसे या अनाज का मामला नहीं था।
आदिवासी मजदूर पहली बार यह कह रहा था कि उसके श्रम की कीमत वह अकेला मालिक तय नहीं करेगा।
इसलिए बेहतर मजदूरी की लड़ाई ने उस मनोवैज्ञानिक अधीनता को चुनौती दी जिस पर ग्रामीण प्रभुत्व का एक हिस्सा टिका था।
कर्ज का प्रश्न
साहूकारी व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष और कठिन था।
किसान ने वास्तविक ऋण लिया हो सकता था, लेकिन विवाद ब्याज, हिसाब और भुगतान की शर्तों को लेकर होता था।
संगम कार्यकर्ताओं ने कई स्थानों पर साहूकारों के हिसाब को चुनौती देना शुरू किया।
क्या ऋण के नाम पर जमीन या फसल पर अनुचित कब्जा किया गया?
इन सवालों ने साहूकार की उस परंपरागत सत्ता को चुनौती दी जिसमें उसका बहीखाता लगभग अंतिम सत्य माना जाता था।
ब्याज और दस्तावेज
ऋण संबंधों में लिखित दस्तावेज का महत्व था। अशिक्षित या कम पढ़े-लिखे आदिवासी किसान के लिए बहीखाते और दस्तावेज समझना कठिन हो सकता था।
कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं की उपस्थिति ने यहां अंतर पैदा किया।
अब पढ़े-लिखे संगठनकर्ता हिसाब और दस्तावेजों की जांच कर सकते थे।
सामूहिक दबाव
साहूकार के सामने अकेला किसान कमजोर था।
लेकिन यदि पूरा संगम किसी परिवार के साथ खड़ा हो जाए, तो समीकरण बदल जाता था।
इसी प्रक्रिया में कई आर्थिक विवाद राजनीतिक टकराव में बदल गए।
स्थानीय संपन्न वर्ग को लगने लगा कि संगम केवल मजदूरी या ऋण सुधारने वाला संगठन नहीं, बल्कि उसके सामाजिक अधिकार को चुनौती देने वाली शक्ति बन रहा है।
गांवों में समानांतर सामाजिक शक्ति का उदय
श्रीकाकुलम आंदोलन के प्रारंभिक चरण की संभवतः सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह थी कि गिरिजन संगम धीरे-धीरे केवल मांग रखने वाला संगठन नहीं रहा।
कुछ क्षेत्रों में वह ग्रामीण सामाजिक शक्ति बन गया।
यहां “समानांतर सत्ता” शब्द का उपयोग सावधानी से करना चाहिए। 1960 के दशक के प्रारंभिक चरण में श्रीकाकुलम में तेलंगाना संघर्ष जैसी व्यापक वैकल्पिक प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित नहीं हुई थी। लेकिन कई गांवों में संगम के निर्णयों का प्रभाव इतना बढ़ गया कि परंपरागत प्रभुत्वशाली वर्ग को उसकी उपेक्षा करना कठिन हो गया।
विवादों का सामूहिक निपटारा
भूमि, ऋण और मजदूरी से जुड़े विवाद संगठन के सामने आने लगे।
ग्रामीण बैठक में पक्षों की बात सुनी जाती थी।
संगम अपना निर्णय या सामूहिक रुख तय करता था।
पहली—गरीब आदिवासी को लगा कि न्याय के लिए केवल दूर स्थित सरकारी कार्यालय पर निर्भर रहना आवश्यक नहीं है।
दूसरी—स्थानीय साहूकार और भूस्वामी के सामाजिक अधिकार को चुनौती मिली।
भय की राजनीति का टूटना
ग्रामीण सत्ता केवल आर्थिक संपत्ति पर नहीं चलती।
वह भय, प्रतिष्ठा और सामाजिक अनुशासन पर भी आधारित होती है।
यदि गरीब किसान मानता है कि प्रभावशाली व्यक्ति का विरोध करने पर उसे काम नहीं मिलेगा, कर्ज नहीं मिलेगा या प्रशासन उसके विरुद्ध होगा, तो वह प्रतिरोध से बचेगा।
संगम ने इस व्यक्तिगत भय को सामूहिक सुरक्षा से बदलने का प्रयास किया।
सामाजिक व्यवहार में परिवर्तन
आंदोलन ने आर्थिक प्रश्नों के साथ सामाजिक संबंधों को भी प्रभावित किया।
आदिवासी किसान सभा में बोलने लगे। महिलाएं संगठित होने लगीं। गांवों के बीच राजनीतिक संपर्क बढ़ा। सम्मेलन सामूहिक पहचान के प्रदर्शन बने।
इस प्रक्रिया ने पुराने सामाजिक पदानुक्रम को कमजोर करना शुरू किया।
राज्य के लिए नई समस्या
प्रशासन की दृष्टि से स्थिति जटिल थी।
यदि संगम केवल याचिका देता तो उसे सामान्य राजनीतिक संगठन माना जा सकता था।
लेकिन जब संगठन स्वयं जमीन पर दावा लागू करे, ऋण के भुगतान पर निर्णय प्रभावित करे या ग्रामीण विवादों में निर्णायक भूमिका निभाए, तो वह राज्य की प्रशासनिक और न्यायिक सत्ता के समानांतर हस्तक्षेप करने लगता है।
यहीं से राज्य और आंदोलन के बीच तनाव बढ़ना स्वाभाविक था।
जनशक्ति की उपलब्धि और जोखिम
इस चरण में श्रीकाकुलम आंदोलन अपनी सबसे व्यापक सामाजिक शक्ति अर्जित कर रहा था।
लेकिन इसी शक्ति में भविष्य का संकट भी छिपा था।
जनता की सामूहिक शक्ति को क्या लगातार खुले जनसंगठन के रूप में विकसित किया जाए?
या इसे राज्य सत्ता के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति की दिशा में ले जाया जाए?
1967 के बाद यही प्रश्न आंदोलन को विभाजित और परिवर्तित करने वाला था।
महिलाओं की भागीदारी और महिला संगम
श्रीकाकुलम आंदोलन के इतिहास में महिलाओं की भूमिका को लंबे समय तक प्रमुख पुरुष नेताओं की कथा के पीछे अपेक्षाकृत कम स्थान मिला। जबकि उपलब्ध शोध यह संकेत देता है कि महिलाओं की भागीदारी आंदोलन की सामाजिक शक्ति का महत्वपूर्ण हिस्सा थी।
आदिवासी महिला का आर्थिक जीवन खेत, जंगल और परिवार—तीनों से जुड़ा था। इसलिए भूमि-वियोजन, कम मजदूरी, ऋण और वन प्रतिबंध का प्रभाव उस पर प्रत्यक्ष पड़ता था।
महिला का दोहरा श्रम
आदिवासी महिलाएं कृषि कार्य में सक्रिय थीं।
खेती के अतिरिक्त उन्हें ईंधन, भोजन और अन्य वन संसाधनों के संग्रह, पशुपालन तथा घरेलू कार्यों का भार भी उठाना पड़ता था।
इसलिए जमीन और जंगल का प्रश्न महिलाओं के लिए पुरुषों से कम महत्वपूर्ण नहीं था।
कई मामलों में परिवार के आर्थिक संकट का पहला प्रभाव महिला के श्रम पर पड़ता था—उसे अधिक काम करना पड़ता, दूर जाना पड़ता या कम संसाधनों में परिवार चलाना पड़ता।
महिला संगम
श्रीकाकुलम आंदोलन की उल्लेखनीय विशेषताओं में महिलाओं के पृथक संगठन की कोशिश भी थी।
उपलब्ध अध्ययनों में महिला संगम के गठन और महिलाओं की राजनीतिक शिक्षा का उल्लेख मिलता है।
इसका महत्व केवल यह नहीं था कि महिलाओं को आंदोलन की सभाओं में बुलाया गया।
महत्वपूर्ण परिवर्तन यह था कि उन्हें स्वतंत्र राजनीतिक भागीदार के रूप में संगठित करने का प्रयास हुआ।
सार्वजनिक जीवन में प्रवेश
परंपरागत ग्रामीण समाज में राजनीतिक सभा प्रायः पुरुषों का क्षेत्र मानी जाती थी।
महिलाएं सभाओं, जुलूसों और सामूहिक कार्रवाइयों में शामिल हुईं। वे गांवों के बीच संदेश पहुंचाने, भोजन और आश्रय उपलब्ध कराने तथा संगठनात्मक संपर्क बनाए रखने में भी भूमिका निभाने लगीं।
बाद के सशस्त्र चरण में महिलाओं की भूमिका और जटिल हुई।
कुछ महिलाएं प्रत्यक्ष राजनीतिक और गुरिल्ला गतिविधियों से जुड़ीं, जबकि बड़ी संख्या में महिलाओं ने ग्रामीण समर्थन तंत्र में योगदान दिया।
महिला और भूमि अधिकार
भूमि-संघर्ष में एक महत्वपूर्ण सीमा भी थी।
किसान आंदोलनों की भाषा अक्सर “किसान परिवार” के अधिकार की बात करती थी, लेकिन परिवार के भीतर जमीन पर महिला के स्वतंत्र अधिकार का प्रश्न उतनी प्रमुखता से नहीं उठता था।
इसलिए श्रीकाकुलम को महिला-मुक्ति आंदोलन के रूप में प्रस्तुत करना अतिशयोक्ति होगी।
फिर भी महिलाओं का सार्वजनिक राजनीतिक जीवन में प्रवेश अपने आप में महत्वपूर्ण सामाजिक परिवर्तन था।
संघर्ष और जोखिम
महिलाओं की भागीदारी का अर्थ जोखिम में भागीदारी भी था।
जैसे-जैसे पुलिस और आंदोलन के बीच संघर्ष बढ़ा, गांवों की महिलाओं को पूछताछ, तलाशी, गिरफ्तारी या परिवार के पुरुष सदस्यों के भूमिगत होने जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।
इस प्रकार राज्य-दमन का प्रभाव केवल सक्रिय गुरिल्लाओं पर नहीं बल्कि पूरे ग्रामीण परिवार पर पड़ा।
इतिहासलेखन में महिलाओं की वापसी
बाद के महिला-अध्ययन और सामाजिक इतिहास ने इस प्रश्न को उठाया कि आंदोलन का इतिहास केवल उसके शीर्ष नेतृत्व और सैन्य कार्रवाइयों के आधार पर क्यों लिखा जाए।
यदि आंदोलन को टिकाए रखने वाले ग्रामीण नेटवर्क को देखा जाए तो महिलाओं की भूमिका कहीं अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देती है।
यही दृष्टिकोण श्रीकाकुलम को केवल नेताओं और बंदूकों की कहानी से निकालकर समाज के भीतर हुए राजनीतिक परिवर्तन के रूप में देखने में मदद करता है।
खंड 4 का समेकित निष्कर्ष
1960 के दशक के मध्य तक श्रीकाकुलम में एक उल्लेखनीय परिवर्तन हो चुका था।
भूमि का प्रश्न अब व्यक्तिगत मुकदमा नहीं था।
कर्ज साहूकार और कर्जदार के बीच निजी मामला नहीं था।
और ग्रामीण न्याय केवल प्रभावशाली लोगों तथा सरकारी अधिकारियों के नियंत्रण में रहने वाला क्षेत्र भी नहीं रहा।
गिरिजन संगम ने इन सबको सामूहिक राजनीति में बदल दिया।
इस प्रक्रिया में आदिवासी किसानों ने जमीन पर अपने पुराने दावे पुनः प्रस्तुत किए, खेतिहर मजदूरों ने बेहतर मजदूरी मांगी, साहूकारों के हिसाब पर सवाल उठे और गांवों में संगठन एक नई सामाजिक शक्ति के रूप में उभरा।
महिलाओं की भागीदारी ने इस परिवर्तन का सामाजिक आधार और विस्तृत किया।
लेकिन आंदोलन की सफलता ने प्रतिक्रिया भी पैदा की।
जिन भूस्वामियों, साहूकारों और स्थानीय प्रभावशाली लोगों की आर्थिक तथा सामाजिक सत्ता चुनौती के घेरे में आई थी, वे इसे सामान्य सुधारवादी आंदोलन के रूप में देखने को तैयार नहीं थे। दूसरी ओर कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर भी यह बहस तीखी हो रही थी कि ऐसी जनशक्ति का अंतिम लक्ष्य क्या होना चाहिए।
उसी वर्ष श्रीकाकुलम में एक स्थानीय हिंसक घटना ने वर्षों से बढ़ रहे तनाव को विस्फोटक रूप दे दिया।
अब प्रश्न केवल यह नहीं था कि आदिवासी किसान को उसकी जमीन कैसे मिले।
क्या मौजूदा राज्य व्यवस्था के भीतर न्याय संभव है, या राज्य सत्ता को ही चुनौती देनी होगी?
यहीं श्रीकाकुलम आंदोलन का पहला बड़ा अध्याय समाप्त और उसका कहीं अधिक हिंसक चरण आरंभ होता है।
खंड 5 — 1967 : निर्णायक मोड़ (अध्याय 21–24)
अध्याय 21: नक्सलबाड़ी विद्रोह और श्रीकाकुलम — मई 1967 की घटनाओं का प्रभाव और स्थानीय आंदोलन की प्रतिक्रिया अध्याय 22: CPI से CPI(M) और क्रांतिकारी धारा — संसदीय राजनीति बनाम सशस्त्र क्रांति की वैचारिक बहस अध्याय 23: लेविडी, 31 अक्टूबर 1967 — कोरन्ना और मंगन्ना की हत्या तथा उसके बाद का विस्फोट अध्याय 24: जनसंघर्ष या सशस्त्र संघर्ष? — स्थानीय प्रतिरोध से गुरिल्ला राजनीति की ओर निर्णायक संक्रमण
इसके बाद खंड 6 — श्रीकाकुलम का सशस्त्र किसान–आदिवासी विद्रोह (अध्याय 25–29) आएगा।
1967 — निर्णायक मोड़
श्रीकाकुलम आंदोलन के इतिहास में 1967 वह वर्ष था जब लगभग एक दशक से विकसित हो रहा आदिवासी जनसंघर्ष एक नए राजनीतिक चरण में प्रवेश करने लगा। भूमि, मजदूरी, बेगार, साहूकारी और स्थानीय प्रशासन के विरुद्ध संगठित आंदोलन पहले से मौजूद था। गिरिजन संगम की जड़ें गांवों में जम चुकी थीं। वेंपाटापु सत्यनारायण, आदिभटला कैलासम और स्थानीय आदिवासी नेतृत्व वर्षों से काम कर रहे थे।
लेकिन 1967 में दो घटनाक्रम लगभग एक साथ आए।
पहला था पश्चिम बंगाल का नक्सलबाड़ी विद्रोह, जिसने भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर सशस्त्र क्रांति की बहस को नई वैचारिक शक्ति दी।
दूसरा था 31 अक्टूबर 1967 का लेविडी संघर्ष, जिसमें गिरिजन सम्मेलन की ओर जा रहे आदिवासियों पर स्थानीय भूस्वामी समर्थकों के हमले के बाद कोरन्ना और मंगन्ना मारे गए।
इन घटनाओं ने ऐसा वातावरण बनाया जिसमें श्रीकाकुलम के स्थानीय नेतृत्व के एक हिस्से ने यह निष्कर्ष निकालना शुरू किया कि केवल आर्थिक मांगों और खुले जनसंघर्ष के माध्यम से व्यवस्था को बदलना संभव नहीं है। फिर भी यह याद रखना आवश्यक है कि संगठित गुरिल्ला युद्ध तत्काल अक्टूबर 1967 में प्रारंभ नहीं हुआ। उसका स्पष्ट और योजनाबद्ध रूप 1968 के उत्तरार्ध, विशेषकर नवंबर 1968 में दिखाई देता है। एक अकादमिक अध्ययन भी रेखांकित करता है कि श्रीकाकुलम का आंदोलन नक्सलबाड़ी से पहले स्वतंत्र रूप से विकसित हो चुका था और सशस्त्र संघर्ष के समय तथा तरीके को लेकर स्थानीय, प्रांतीय और अखिल भारतीय क्रांतिकारी नेतृत्व में मतभेद थे।
मई 1967 ने भारतीय कम्युनिस्ट राजनीति को बदल दिया
1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी क्षेत्र में शुरू हुए किसान विद्रोह का भौगोलिक क्षेत्र छोटा था, लेकिन उसका राजनीतिक प्रभाव पूरे भारत में फैल गया।
मार्च 1967 में पश्चिम बंगाल में संयुक्त मोर्चा सरकार बनी थी, जिसमें CPI(M) भी शामिल थी। इसी राजनीतिक वातावरण में नक्सलबाड़ी क्षेत्र में भूमि और फसल पर किसानों के अधिकार को लेकर तनाव बढ़ा।
मई 1967 में किसानों और भूस्वामियों के बीच संघर्ष हिंसक हो गया। 24 मई को पुलिस अधिकारी सोनम वांगड़ी की हत्या हुई और 25 मई 1967 को प्रसादुजोत क्षेत्र में पुलिस गोलीबारी में महिलाओं और बच्चों सहित ग्रामीण मारे गए। नक्सलबाड़ी शीघ्र ही केवल स्थानीय भूमि-विवाद का नाम नहीं रहा; वह भारतीय क्रांतिकारी वामपंथ के लिए प्रतीक बन गया।
नक्सलबाड़ी का संदेश
चारु मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संथाल से जुड़ी क्रांतिकारी धारा का तर्क था कि भारत में मूल प्रश्न केवल भूमि सुधार नहीं है।
उनके अनुसार सवाल था—राज्य सत्ता किसके हाथ में है?
यदि ग्रामीण सामाजिक व्यवस्था और राज्य संरचना स्वयं भूस्वामी तथा शासक वर्गों के हितों की रक्षा करती है, तो उनके अनुसार किसान केवल कानून के माध्यम से वास्तविक मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता।
इस विचार ने जमीन के संघर्ष को राजनीतिक सत्ता के संघर्ष से जोड़ दिया।
यही नक्सलबाड़ी का सबसे गहरा प्रभाव था।
श्रीकाकुलम में नक्सलबाड़ी की खबर क्यों महत्वपूर्ण बनी?
यदि यही संदेश ऐसे क्षेत्र में पहुंचता जहां कोई किसान संगठन मौजूद न होता, तो उसका प्रभाव सीमित रह सकता था।
और स्थानीय भूस्वामी वर्ग से टकराव पहले ही बढ़ रहा था।
इसलिए नक्सलबाड़ी यहां किसी खाली जमीन पर नहीं आया।
उसने पहले से मौजूद आंदोलन को नई वैचारिक दिशा प्रदान की।
एक अध्ययन स्पष्ट रूप से कहता है कि श्रीकाकुलम में कम्युनिस्ट 1959 से लगभग 800 वर्ग मील के आदिवासी क्षेत्र में किसानों को संगठित कर रहे थे और यह आंदोलन नक्सलबाड़ी से पहले तथा उससे काफी हद तक स्वतंत्र रूप से विकसित हुआ था। 1967 के बाद उसने नई शक्ति प्राप्त की।
श्रीकाकुलम नक्सलबाड़ी की नकल नहीं था।
बल्कि नक्सलबाड़ी ने श्रीकाकुलम के पहले से विकसित जनसंघर्ष को यह प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित किया कि क्या उसका अगला चरण सशस्त्र होना चाहिए।
तेलंगाना की पुरानी स्मृति भी मौजूद थी
आंध्र के कम्युनिस्टों के लिए सशस्त्र किसान संघर्ष बिल्कुल नई अवधारणा नहीं थी।
1946–51 के तेलंगाना किसान संघर्ष की स्मृति अभी जीवित थी। कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं की पिछली पीढ़ी ने देखा था कि किसान गुरिल्ला दस्ते बना सकते हैं, जमीन बांट सकते हैं और कुछ क्षेत्रों में गांव-स्तर पर वैकल्पिक सत्ता संरचनाएं विकसित कर सकते हैं।
इसलिए जब चीन की क्रांति और नक्सलबाड़ी की चर्चा हुई, तो आंध्र प्रदेश के कार्यकर्ताओं के लिए उसके साथ एक स्वदेशी ऐतिहासिक अनुभव भी मौजूद था।
तेलंगाना कहता था कि भारत में किसान हथियार उठा सकता है।
नक्सलबाड़ी कहता था कि क्रांति का रास्ता अभी भी खुला है।
और श्रीकाकुलम के कुछ नेताओं को लगने लगा कि उनके सामने उसका अगला प्रयोग मौजूद है।
नक्सलबाड़ी के प्रति समर्थन
CPI(M) के भीतर नक्सलबाड़ी को लेकर तीखा विवाद हुआ।
एक पक्ष का मानना था कि पार्टी को जनसंघर्ष, चुनाव, ट्रेड यूनियन, किसान आंदोलन और संसदीय राजनीति के संयुक्त रास्ते पर चलना चाहिए।
दूसरा पक्ष इसे संशोधनवाद मान रहा था।
उसका तर्क था कि चुनावी राजनीति अंततः क्रांतिकारी आंदोलन को व्यवस्था के भीतर समाहित कर देगी।
श्रीकाकुलम के कई सक्रिय कार्यकर्ता धीरे-धीरे दूसरे पक्ष के करीब पहुंचे।
वेंपाटापु सत्यनारायण और आदिभटला कैलासम के नेतृत्व वाली स्थानीय धारा नक्सलबाड़ी समर्थक कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के साथ संबंध विकसित करने लगी। लेकिन यह प्रक्रिया एक झटके में नहीं हुई। आंध्र प्रदेश की क्रांतिकारी धारा के भीतर भी सशस्त्र संघर्ष कब और कैसे शुरू किया जाए, इस पर गंभीर मतभेद थे।
नक्सलबाड़ी ने क्या बदला?
सबसे बड़ा परिवर्तन आंदोलन के लक्ष्य में होने लगा।
जमीन छीनने वाली व्यवस्था कैसे बदले?
साहूकार और भूस्वामी जिस राजनीतिक सत्ता से सुरक्षित हैं, उसे कैसे चुनौती दी जाए?
यही परिवर्तन स्थानीय आर्थिक संघर्ष को क्रांतिकारी राजनीतिक संघर्ष की दिशा में ले जाने लगा।
CPI से CPI(M) और फिर क्रांतिकारी धारा
श्रीकाकुलम के 1967 के मोड़ को समझने के लिए भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर हुए विभाजनों को समझना आवश्यक है।
इसके पीछे भारतीय क्रांति की प्रकृति, कांग्रेस के प्रति नीति, सोवियत संघ और चीन के बीच विवाद, चुनाव और सशस्त्र संघर्ष जैसे बुनियादी प्रश्न थे।
1964 का विभाजन
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर 1950 के दशक से वैचारिक मतभेद बढ़ रहे थे।
1962 के भारत–चीन युद्ध ने इन्हें और तीखा कर दिया।
अंततः 1964 में पार्टी विभाजित हुई और Communist Party of India (Marxist)—CPI(M) बनी।
श्रीकाकुलम में सक्रिय गिरिजन संगम तथा वेंपाटापु सत्यनारायण और आदिभटला कैलासम से जुड़ी धारा CPI(M) के साथ चली गई। गिरिजन संगम स्वयं अविभाजित CPI के दौर में बना था और विभाजन के बाद उसका प्रमुख हिस्सा CPI(M) से संबद्ध रहा।
लेकिन इससे वैचारिक संघर्ष समाप्त नहीं हुआ।
कुछ ही वर्षों में CPI(M) के भीतर नया विभाजन सामने आ गया।
सवाल था—चुनाव या क्रांति?
1967 के आम चुनावों में CPI(M) ने भाग लिया और पश्चिम बंगाल तथा केरल में सत्ता-साझेदारी की।
क्रांतिकारी धारा के लिए यही एक केंद्रीय विवाद बन गया।
यदि भारत अर्ध-सामंती और साम्राज्यवाद-निर्भर व्यवस्था है, जैसा वे मानते थे, तो चुनाव में भाग लेकर उसी राज्य-संरचना के भीतर सरकार बनाना क्रांतिकारी राजनीति कैसे हो सकती है?
उसका तर्क था कि संसदीय संघर्ष और जनआंदोलन को एक-दूसरे का विरोधी नहीं समझना चाहिए।
इसी रणनीतिक टकराव के बीच नक्सलबाड़ी हुआ।
उसका एक वास्तविक विद्रोही उदाहरण सामने था।
चारु मजूमदार की वैचारिक चुनौती
चारु मजूमदार ने अपने लेखों—जिन्हें बाद में ‘ऐतिहासिक आठ दस्तावेज’ कहा गया—में भारतीय कम्युनिस्टों से माओवादी क्रांतिकारी रास्ता अपनाने का आह्वान किया।
ग्रामीण क्षेत्रों में वर्ग संघर्ष तेज करना,
और गांवों से शहरों को घेरते हुए राज्य सत्ता प्राप्त करना।
इस राजनीति पर चीनी क्रांति और माओ त्से-तुंग के दीर्घकालीन जनयुद्ध की गहरी छाप थी।
श्रीकाकुलम की वास्तविकता
यह विचार श्रीकाकुलम के कुछ नेताओं को इसलिए आकर्षक लगा क्योंकि उनके सामने पहले से संगठित आदिवासी किसान आधार मौजूद था।
उन्हें लगा कि यहां केवल प्रचार नहीं, वास्तविक ग्रामीण संघर्ष चल रहा है।
यही कारण था कि बाद में चारु मजूमदार ने श्रीकाकुलम को भारतीय क्रांति के संभावित महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में देखा।
लेकिन यह संबंध 1967 में ही पूर्ण रूप से स्थापित नहीं हुआ था। अखिल भारतीय समन्वय संगठन और आंध्र की विभिन्न क्रांतिकारी धाराओं के बीच संबंध अगले दो वर्षों में विकसित हुए।
नवंबर 1967 : अखिल भारतीय समन्वय की शुरुआत
नक्सलबाड़ी समर्थक कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों ने CPI(M) नेतृत्व के विरोध में अखिल भारतीय स्तर पर समन्वय शुरू किया।
12 नवंबर 1967 को All India Coordination Committee of Revolutionaries के गठन की प्रक्रिया सामने आई। बाद में 1968 में यह All India Coordination Committee of Communist Revolutionaries—AICCCR के रूप में विकसित हुई और अंततः 22 अप्रैल 1969 को CPI(ML) के गठन तक पहुंची।
लेकिन आंध्र प्रदेश का मामला सरल नहीं था।
आंध्र के भीतर अलग बहस
आंध्र प्रदेश के कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के बीच भी इस बात पर सहमति नहीं थी कि श्रीकाकुलम में तुरंत गुरिल्ला युद्ध शुरू कर दिया जाए।
कुछ नेता मानते थे कि पहले व्यापक जनसंगठन और राजनीतिक तैयारी को मजबूत किया जाना चाहिए।
श्रीकाकुलम जिला नेतृत्व का एक हिस्सा अधिक तेजी से सशस्त्र संघर्ष की ओर बढ़ना चाहता था।
एक समकालीन अकादमिक विश्लेषण के अनुसार श्रीकाकुलम जिला इकाई और आंध्र प्रदेश की क्रांतिकारी राज्य इकाई के बीच सशस्त्र संघर्ष के समय और सैन्य तैयारी को लेकर मतभेद थे। बाद में श्रीकाकुलम नेतृत्व ने अखिल भारतीय क्रांतिकारी केंद्र से अधिक प्रत्यक्ष संपर्क विकसित किया।
इससे स्पष्ट होता है कि सशस्त्र संघर्ष कोई सर्वसम्मत या स्वतःस्फूर्त निर्णय नहीं था।
वह वैचारिक और रणनीतिक संघर्ष का परिणाम था।
लेविडी, 31 अक्टूबर 1967 — कोरन्ना और मंगन्ना की हत्या
श्रीकाकुलम आंदोलन के स्थानीय इतिहास में यदि किसी एक घटना ने राजनीतिक मनोविज्ञान को निर्णायक रूप से बदला, तो वह थी 31 अक्टूबर 1967 की लेविडी घटना।
उस दिन की घटनाओं के विवरण अलग-अलग स्रोतों में कुछ भिन्न रूप में मिलते हैं। लेकिन मुख्य तथ्य स्पष्ट हैं—गिरिजन संगम के सम्मेलन की ओर जा रहे आदिवासियों का स्थानीय भूस्वामी समर्थकों से हिंसक टकराव हुआ और गोलीबारी में कोरन्ना और मंगन्ना मारे गए।
मोंडेमखाली का सम्मेलन
31 अक्टूबर 1967 को गिरिजन संगम का बड़ा सम्मेलन मोंडेमखाली/मोंडेमखल्लु क्षेत्र में आयोजित किया जा रहा था।
विभिन्न आदिवासी गांवों से बड़ी संख्या में लोग लाल झंडे लेकर सम्मेलन में जा रहे थे।
यह स्वयं स्थानीय शक्ति-संतुलन का प्रदर्शन था।
कुछ वर्ष पहले तक बिखरे हुए आदिवासी परिवार अब हजारों की राजनीतिक पहचान में बदल रहे थे।
स्थानीय भूस्वामी वर्ग के लिए यह केवल सम्मेलन नहीं था।
वह उस सामाजिक शक्ति का प्रदर्शन था जिसने उनकी जमीन, मजदूरी और साहूकारी संबंधों को चुनौती दी थी।
महिलाओं के जत्थे पर हमला
महिला आंदोलन पर किए गए महत्वपूर्ण अध्ययन में घटना का विस्तृत विवरण मिलता है।
उसके अनुसार लगभग 400 आदिवासी महिलाओं का एक समूह, लाल साड़ियों और लाल झंडों के साथ सम्मेलन की ओर जा रहा था। लेविडी में भूस्वामी समर्थक लोगों ने उन्हें रोका और हमला किया। महिलाओं के साथ मारपीट और दुर्व्यवहार किया गया तथा उनके झंडे जलाए गए। कुछ महिलाएं सम्मेलन स्थल पहुंचीं और घटना की सूचना दी।
इसके बाद बड़ी संख्या में सम्मेलन में शामिल लोग वापस लेविडी की ओर गए।
यहां दोनों पक्षों के बीच संघर्ष हुआ।
महिलाओं ने भी डंडों, घरेलू उपकरणों और मिर्च पाउडर से हमलावरों का प्रतिरोध किया—यह विवरण महिला-आंदोलन संबंधी अध्ययन में विशेष रूप से दर्ज है।
कोरन्ना और मंगन्ना की मौत
कोरन्ना और मंगन्ना, दो आदिवासी किसान कार्यकर्ता, मारे गए।
कुछ राजनीतिक और बाद के सांस्कृतिक स्रोत घटना को इस प्रकार बताते हैं कि दोनों सम्मेलन की ओर जा रहे थे और भूस्वामी पक्ष द्वारा उन्हें मार दिया गया; अधिक विस्तृत महिला-अध्ययन में महिलाओं पर हमले के बाद हुए बड़े टकराव के दौरान गोली चलने का विवरण मिलता है। इसलिए घटना की सूक्ष्म घटनाक्रम-श्रृंखला में स्रोतभेद है, लेकिन यह निर्विवाद है कि 31 अक्टूबर 1967 को लेविडी में भूस्वामी पक्ष की गोलीबारी में कोरन्ना और मंगन्ना की मौत आंदोलन के निर्णायक मोड़ों में से एक बनी।
दो मौतों का असाधारण प्रभाव क्यों पड़ा?
क्योंकि वे किसी सामान्य आपराधिक घटना के रूप में नहीं देखी गईं।
आदिवासी किसानों के लिए संदेश यह था—
और अब उनके कार्यकर्ताओं को गोली मार दी गई।
इस घटना ने उस धारणा को मजबूत किया कि स्थानीय भूस्वामी अपनी पुरानी सत्ता बचाने के लिए हिंसा का प्रयोग करेंगे।
और यदि राज्य उन्हें रोक नहीं सकता—या आंदोलनकारियों की दृष्टि में रोकना नहीं चाहता—तो आत्मरक्षा का प्रश्न सामने आता है।
पुलिस और न्याय व्यवस्था के प्रति अविश्वास
लेविडी के बाद हुई कार्रवाई को लेकर आंदोलनकारी साहित्य और प्रशासनिक विवरणों के बीच दृष्टिकोण का बड़ा अंतर दिखाई देता है।
आंदोलन से जुड़े अध्ययनों में पुलिस की शुरुआती निष्क्रियता तथा बाद की गिरफ्तारियों ने आदिवासियों के अविश्वास को बढ़ाया बताया गया है। महिला आंदोलन संबंधी शोध में यह भी कहा गया कि बाद की न्यायिक प्रक्रिया से भूस्वामी पक्ष के खिलाफ अपेक्षित न्याय न मिलने की धारणा ने अधिक उग्र संघर्ष की दलील को बल दिया।
इस घटना को यह कहकर सरल नहीं किया जा सकता कि “लेविडी हुआ और उसी दिन नक्सलवादी सशस्त्र विद्रोह शुरू हो गया।”
लेकिन लेविडी ने आत्मरक्षा, प्रतिशोध और हथियारबंद संगठन की दलील को स्थानीय स्तर पर कहीं अधिक स्वीकार्य बना दिया।
शहादत और सामूहिक स्मृति
कोरन्ना और मंगन्ना आंदोलन की स्मृति में “शहीद” बन गए।
उनकी मृत्यु राजनीतिक गीतों, बैठकों और प्रचार में बार-बार याद की गई।
ऐसी स्मृतियों का आंदोलन पर बड़ा प्रभाव होता है।
लेकिन शहादत का प्रश्न भावनात्मक और नैतिक है।
अब संघर्ष केवल भविष्य में मिलने वाली जमीन के लिए नहीं था।
वह मारे गए साथियों की स्मृति और बदले हुए आत्मसम्मान का प्रश्न भी बन गया।
यहीं आंदोलन के मनोविज्ञान में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ।
जनसंघर्ष या सशस्त्र संघर्ष?
लेविडी के बाद श्रीकाकुलम आंदोलन के सामने सबसे बड़ा प्रश्न था—
क्या गिरिजन संगम के व्यापक खुले जनआंदोलन को और मजबूत किया जाए?
क्या चुनाव और राजनीतिक लामबंदी का रास्ता अपनाया जाए?
या भूस्वामी और राज्य की हिंसा का जवाब सशस्त्र संगठन से दिया जाए?
यही प्रश्न अगले एक वर्ष तक आंदोलन के भीतर घूमता रहा।
आत्मरक्षा की मांग
लेविडी के बाद स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच यह भावना मजबूत हुई कि केवल निहत्थी सभा पर्याप्त नहीं है।
तो संगठन को अपनी रक्षा स्वयं करनी होगी।
यहीं से आत्मरक्षा दस्तों की अवधारणा मजबूत होने लगी।
लेकिन आत्मरक्षा और क्रांतिकारी गुरिल्ला युद्ध दो अलग चीजें थीं।
आगे चलकर इनके बीच की सीमा धीरे-धीरे मिटने लगी।
प्रतिरोध का विस्तार
लेविडी के बाद विभिन्न क्षेत्रों में भूस्वामियों और गिरिजन कार्यकर्ताओं के बीच तनाव बढ़ा। आंदोलन के कुछ विवरण कुरुपाम और सीतामपेट जैसे क्षेत्रों में हिंसक प्रतिरोध के फैलने का उल्लेख करते हैं। 1968 में पुलिस कार्रवाई और गोलीबारी ने वातावरण को और कठोर किया।
अब गांवों में यह सवाल अधिक गंभीरता से उठने लगा कि—
यदि भूस्वामी हथियारबंद हैं तो किसान क्यों नहीं?
यदि पुलिस भूस्वामियों की रक्षा करती दिखाई देती है तो पुलिस को तटस्थ कैसे माना जाए?
और यदि राज्य स्वयं वर्गीय है, जैसा क्रांतिकारी नेतृत्व तर्क देता था, तो उससे न्याय मांगना कितना सार्थक है?
नक्सलबाड़ी ने उत्तर उपलब्ध कराया
यहीं नक्सलबाड़ी की विचारधारा और स्थानीय अनुभव एक-दूसरे से मिलने लगे।
नक्सलबाड़ी की क्रांतिकारी राजनीति कह रही थी—
भूस्वामी केवल व्यक्ति नहीं, वर्ग-शक्ति है।
पुलिस शासक वर्ग के राज्य की संस्था है।
आत्मरक्षा से आगे बढ़कर राज्य सत्ता प्राप्त करने के लिए गुरिल्ला युद्ध विकसित करो।
लेकिन क्या सभी सहमत थे?
यही श्रीकाकुलम आंदोलन के इतिहास का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
आंध्र प्रदेश के कम्युनिस्ट क्रांतिकारी नेतृत्व के भीतर सशस्त्र संघर्ष के समय को लेकर मतभेद बने रहे।
कुछ नेता मानते थे कि व्यापक राजनीतिक और सैन्य तैयारी पर्याप्त नहीं है।
उनका आशय यह था कि बंदूक उठाना आसान हो सकता है, लेकिन दीर्घकालीन गुरिल्ला संघर्ष चलाने के लिए—
श्रीकाकुलम जिला नेतृत्व का उग्र हिस्सा अपेक्षाकृत तेजी से आगे जाना चाहता था। शोध साहित्य बताता है कि यही प्रश्न बाद में आंध्र प्रदेश की क्रांतिकारी इकाई और श्रीकाकुलम जिला नेतृत्व के बीच गंभीर मतभेद का कारण बना।
जनसंगठन बनाम गुरिल्ला दस्ता
यहीं एक और ऐतिहासिक प्रश्न पैदा हुआ।
गिरिजन संगम की सबसे बड़ी ताकत क्या थी?
हजारों आदिवासी खुले रूप से सभा कर सकते थे।
मजदूरी पर सामूहिक फैसला ले सकते थे।
जमीन वापस लेने के लिए दबाव बना सकते थे।
महिलाएं सार्वजनिक रूप से भाग ले सकती थीं।
लेकिन गुरिल्ला संघर्ष की प्रकृति अलग होती है।
उसमें संगठन छोटा और गोपनीय होता है।
नेतृत्व और सामान्य जनता के बीच दूरी बढ़ सकती है।
यानी आंदोलन के सामने केवल हिंसा बनाम अहिंसा का प्रश्न नहीं था।
जनता स्वयं आंदोलन का केंद्र बनी रहेगी या प्रशिक्षित क्रांतिकारी दस्ता उसकी ओर से संघर्ष का मुख्य माध्यम बन जाएगा?
आगे श्रीकाकुलम की सफलता और विफलता दोनों इसी प्रश्न से जुड़ने वाली थीं।
1967 में सशस्त्र विद्रोह शुरू हुआ या नहीं?
इतिहास लेखन में इस पर सावधानी आवश्यक है।
कई लोकप्रिय विवरण पूरे श्रीकाकुलम विद्रोह को 1967–70 कहते हैं, क्योंकि लेविडी के बाद आंदोलन का उग्र चरण शुरू हो गया था।
लेकिन संगठित गुरिल्ला अभियान को देखा जाए तो अधिक स्पष्ट मोड़ 1968 के उत्तरार्ध में आता है।
एक अन्य विवरण इसे इस प्रकार अलग करता है—1967 के अंत में आंदोलन सशस्त्र प्रतिरोध की दिशा में गया, लेकिन व्यवस्थित गुरिल्ला संघर्ष नवंबर 1968 में प्रारंभ हुआ।
1958–67 : व्यापक गिरिजन जनसंगठन और आर्थिक संघर्ष
अक्टूबर 1967–1968 : उग्र प्रतिरोध और सशस्त्र दिशा की ओर संक्रमण
नवंबर 1968 के बाद : योजनाबद्ध गुरिल्ला संघर्ष
यह विभाजन श्रीकाकुलम को बेहतर ढंग से समझाता है।
खंड 5 का समेकित निष्कर्ष
1967 ने श्रीकाकुलम आंदोलन को जन्म नहीं दिया।
आंदोलन का सामाजिक आधार पहले से तैयार था।
सत्यनारायण और कैलासम वर्षों से सक्रिय थे।
इसलिए नक्सलबाड़ी को श्रीकाकुलम का “कारण” कहना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा।
नक्सलबाड़ी ने श्रीकाकुलम को क्रांतिकारी राजनीतिक व्याख्या और अखिल भारतीय संदर्भ दिया। एक समकालीन अकादमिक विश्लेषण भी स्पष्ट करता है कि यहां का आंदोलन नक्सलबाड़ी से पहले विकसित हुआ था।
फिर 31 अक्टूबर 1967 का लेविडी संघर्ष आया।
महिलाओं सहित गिरिजन कार्यकर्ताओं पर हमला और कोरन्ना–मंगन्ना की मृत्यु ने वर्षों से बढ़ रहे वर्गीय तनाव को भावनात्मक विस्फोट में बदल दिया।
इसके बाद तीन राजनीतिक निष्कर्ष धीरे-धीरे उभरे—
पहला, स्थानीय भूस्वामी अपनी सत्ता बचाने के लिए हिंसा का सहारा ले सकते हैं।
दूसरा, राज्य और न्याय व्यवस्था पर भरोसा आंदोलन के एक हिस्से में तेजी से कमजोर हुआ।
तीसरा, नक्सलबाड़ी समर्थक नेतृत्व ने इस अनुभव को इस प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया कि आर्थिक संघर्ष को राज्य सत्ता के विरुद्ध राजनीतिक संघर्ष में बदलना होगा।
लेकिन 1967 और नवंबर 1968 के बीच अभी एक महत्वपूर्ण अंतर था।
बंदूक की वैचारिक स्वीकृति बढ़ चुकी थी।
संगठित गुरिल्ला युद्ध अभी पूरी तरह शुरू नहीं हुआ था।
अगले वर्ष यही अंतर समाप्त होने वाला था।
श्रीकाकुलम अब उस बिंदु पर पहुंच चुका था जहां जमीन लौटाने वाला आदिवासी आंदोलन स्वयं से कहीं बड़ा प्रश्न पूछ रहा था—
“जमीन किसकी?” से आगे बढ़कर—“सत्ता किसकी?”
श्रीकाकुलम का सशस्त्र किसान–आदिवासी विद्रोह
नवंबर 1968 — संगठित सशस्त्र चरण की शुरुआत
1967 की लेविडी घटना के बाद आंदोलन में यह धारणा मजबूत हुई कि केवल याचिका, मुकदमे और शांतिपूर्ण दबाव से आदिवासी भूमि और सम्मान की रक्षा संभव नहीं है। फिर भी संगठित सशस्त्र चरण को किसी एक दिन अचानक शुरू हुई घटना की तरह नहीं देखना चाहिए। गिरिजन संगम के वर्षों पुराने जन-संगठन, भूमि-वापसी अभियानों, मजदूरी संघर्षों और गांव-स्तरीय समितियों ने इसकी सामाजिक जमीन तैयार की थी। नवंबर 1968 के आसपास गुरिल्ला कार्रवाइयों का क्रम अधिक व्यवस्थित हुआ और स्थानीय कृषि संघर्ष राज्य-सत्ता को चुनौती देने वाले कार्यक्रम में बदलने लगा। इस परिवर्तन में नक्सलबाड़ी का वैचारिक प्रभाव था, किंतु श्रीकाकुलम की अपनी भूमि-वियोजन, साहूकारी, बेगार और आदिवासी स्वायत्तता की समस्याएं अधिक पुरानी थीं। सशस्त्र चरण के समर्थकों ने इसे आत्मरक्षा, भूमि पर पुनः अधिकार और दमनकारी ग्रामीण सत्ता को तोड़ने का साधन माना। उनका तर्क था कि साहूकार, भू-स्वामी और पुलिस-प्रशासन परस्पर जुड़ी संरचना बन चुके थे। आलोचकों ने चेताया कि हथियारबंद रणनीति जन-संगठन की खुली राजनीति को संकुचित कर सकती है और ग्रामीणों को कठोर प्रतिशोध के सामने छोड़ सकती है। आगे की घटनाओं ने दोनों पक्षों की आशंकाओं और दावों को अलग-अलग रूप में सही सिद्ध किया।
गुरिल्ला दस्ते, ग्राम समितियां और दुर्गम भूगोल
छोटे गुरिल्ला दस्ते स्थानीय भूगोल, जंगल के रास्तों, पहाड़ी आश्रयों और गांवों के सामाजिक नेटवर्क पर निर्भर थे। उनके सदस्य बाहर से आए सैनिक नहीं, प्रायः उसी क्षेत्र के किसान, आदिवासी युवा अथवा लंबे समय से सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता थे। संदेश पहुंचाने, भोजन और आश्रय देने, पुलिस की गतिविधि की सूचना जुटाने तथा घायल साथियों की सहायता में गांवों की भूमिका महत्वपूर्ण थी। महिलाओं ने भी संदेश, भोजन, आश्रय और सार्वजनिक लामबंदी में योगदान दिया, हालांकि औपचारिक नेतृत्व और इतिहास-लेखन में उनकी उपस्थिति कम दर्ज हुई। यह संरचना नियमित सेना जैसी केंद्रीकृत नहीं थी। स्थानीय समितियों और दस्तों के बीच संबंध क्षेत्रानुसार बदलते थे। कुछ स्थानों पर सामूहिक निर्णय और ग्राम-सभा की भूमिका बनी रही, जबकि दूसरे स्थानों पर गुप्त संगठन और सैन्य अनुशासन प्रमुख हो गया। इसी असमानता के कारण आंदोलन की शक्ति और कमजोरी दोनों पैदा हुईं—स्थानीय समर्थन ने उसे टिकाया, पर संचार टूटने, नेतृत्व की मृत्यु या गिरफ्तारी और पुलिस घेराबंदी से अलग-अलग क्षेत्र जल्दी पृथक भी हो सकते थे।
भूमि-वापसी, अनाज और ऋण-अभिलेखों पर कार्रवाई
आंदोलन की कार्रवाइयों का केंद्रीय प्रश्न भूमि था। जिन भूखंडों को आदिवासी किसान साहूकारी, छलपूर्ण दस्तावेजों अथवा दबाव में खो चुके थे, उन पर पुनः कब्जे के प्रयास किए गए। कुछ जगह साहूकारों और बड़े किसानों के यहां से अनाज जब्त कर जरूरतमंद परिवारों में बांटने, ऋण-पत्र और बहीखाते नष्ट करने तथा कथित अवैध वसूली रोकने की कार्रवाइयां हुईं। समर्थकों ने इन्हें ग्रामीण न्याय और पुरानी लूट की वापसी कहा; प्रशासन ने इन्हें लूट, आगजनी और कानून-विरोधी कब्जा माना। इन कार्रवाइयों का प्रतीकात्मक प्रभाव उनके वास्तविक आर्थिक आकार से बड़ा था। सदियों से दस्तावेज, थाना, अदालत और बाजार गैर-आदिवासी प्रभुत्व के साधन दिखाई देते थे; इसलिए बहीखाते और भूमि-अभिलेख सत्ता के चिह्न बन गए। किंतु प्रत्येक कब्जे या वितरण को समान जन-सहमति प्राप्त थी, ऐसा मानना गलत होगा। स्थानीय विवाद, निजी शत्रुता और अस्पष्ट स्वामित्व भी कई मामलों में जुड़े थे। इसी कारण प्रमाणित भूमि-वापसी, प्रचारात्मक दावे और आपराधिक आरोपों को अलग-अलग पढ़ना आवश्यक है।
‘वर्ग-शत्रु उन्मूलन’ और व्यक्तिगत हिंसा की बहस
सशस्त्र चरण का सबसे विवादास्पद पक्ष उन व्यक्तियों को निशाना बनाना था जिन्हें जमींदार, साहूकार, मुखबिर अथवा दमनकारी ग्रामीण प्रभु माना गया। क्रांतिकारी धारा ने इसे भय की संरचना तोड़ने और गरीबों में राजनीतिक आत्मविश्वास पैदा करने का तरीका बताया। पर व्यक्तिगत हत्या की नीति ने न्यायिक प्रक्रिया, प्रमाण और सामूहिक उत्तरदायित्व के प्रश्न खड़े किए। सभी लक्षित व्यक्ति एक समान भूमिका वाले नहीं थे और आरोप की स्वतंत्र जांच का कोई स्थिर तंत्र नहीं था। रणनीतिक स्तर पर भी यह नीति विभाजनकारी सिद्ध हुई। प्रारंभिक भूमि और मजदूरी मांगों से सहमत किसान हिंसक कार्रवाइयों से दूरी बना सकते थे; राज्य को व्यापक पुलिस अभियान का औचित्य मिला; और खुली ग्राम-स्तरीय संस्थाएं गुप्त संगठन के अधीन होने लगीं। आंदोलन का नैतिक मूल्यांकन करते समय आदिवासी किसानों पर पुराने शोषण और राज्य-दमन को छिपाना अनुचित होगा, लेकिन उस शोषण से व्यक्तिगत हिंसा अपने-आप न्यायसंगत भी नहीं हो जाती। वैध सामाजिक प्रश्न और अपनाए गए साधन का पृथक मूल्यांकन जरूरी है।
पुलिस से सीधा टकराव और ‘मुक्त क्षेत्र’ का दावा
1968–69 में पुलिस दलों, सरकारी प्रतिनिधियों और गुरिल्ला दस्तों के बीच टकराव बढ़े। प्रशासन ने तलाशी, गिरफ्तारी, गांवों की निगरानी और जंगल अभियानों का विस्तार किया; आंदोलनकारियों ने पुलिस को ग्रामीण प्रभुत्व की रक्षक शक्ति मानकर उसका प्रतिरोध किया। कुछ क्रांतिकारी विवरण सैकड़ों गांवों में वैकल्पिक सत्ता या ‘मुक्त क्षेत्र’ बनने का दावा करते हैं। इन दावों का अर्थ स्थायी प्रशासनिक नियंत्रण नहीं, बल्कि कुछ समय के लिए राज्य की कमजोर उपस्थिति, ग्राम समितियों का प्रभाव और पुलिस के प्रवेश में कठिनाई अधिक था। संख्या और अवधि पर स्रोतों में मतभेद है। सीधे टकराव ने स्थानीय किसान आंदोलन को राष्ट्रीय नक्सलवादी राजनीति का प्रमुख प्रतीक बनाया, किंतु इससे शक्ति-संतुलन भी निर्णायक रूप से राज्य के पक्ष में गया। बेहतर हथियार, खुफिया नेटवर्क, कानूनी अधिकार और निरंतर अभियान की क्षमता पुलिस के पास थी। नेतृत्व पर केंद्रित कार्रवाइयों, गिरफ्तारियों और मुठभेड़ों ने दस्तों और ग्राम नेटवर्क को भारी क्षति पहुंचाई। श्रीकाकुलम का अनुभव बताता है कि मजबूत सामाजिक शिकायतें किसी आंदोलन को जन्म और वैधता दे सकती हैं, पर दीर्घकालीन परिवर्तन के लिए जन-सहमति, जवाबदेह संगठन, कानूनी-संस्थागत उपलब्धियां और हिंसा से बाहर निकलने की रणनीति भी आवश्यक होती है।
जनाधार और सैन्य कार्रवाई के बीच बढ़ता तनाव
गिरिजन संगम के आरंभिक दौर में संगठन की शक्ति बैठक, जुलूस, मजदूरी बहिष्कार, भूमि-विवाद में सामूहिक उपस्थिति और सामाजिक सुधार से बनी थी। सशस्त्र चरण में इन्हीं खुले रूपों को जारी रखना अधिक कठिन हुआ। पुलिस की निगरानी से सभा और यात्रा जोखिमपूर्ण हुई, जबकि भूमिगत कार्यप्रणाली में सूचना कुछ नेताओं और दस्तों तक सीमित होने लगी। इससे आंदोलन के भीतर यह प्रश्न उभरा कि जन-संगठन सैन्य कार्रवाई को दिशा देगा या सैन्य कार्रवाई जन-संगठन की जगह ले लेगी। जिन गांवों में पुरानी समितियां मजबूत थीं वहां ग्रामीण भागीदारी अपेक्षाकृत व्यापक रही; कमजोर क्षेत्रों में प्रभाव मुख्यतः दस्तों की आवाजाही और प्रतीकात्मक कार्रवाइयों तक सीमित रहा। युवा कार्यकर्ताओं के लिए साहस और त्याग आकर्षण के केंद्र थे, पर परिवारों के लिए गिरफ्तारी, विस्थापन, फसल की हानि और पुलिस पूछताछ तत्काल वास्तविकताएं थीं। समर्थन को केवल विचारधारा या भय से समझना पर्याप्त नहीं है। एक ही गांव में सक्रिय समर्थन, मौन सहमति, तटस्थता और विरोध साथ मौजूद हो सकते थे। समय के साथ दमन बढ़ने पर ये स्थितियां बदलती भी थीं। इस सामाजिक तरलता को स्वीकार करना आंदोलन के आकार और प्रभाव के अतिरंजित दावों से बचाता है।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया और नागरिक आबादी की कीमत
राज्य की प्रतिक्रिया केवल हथियारबंद दस्तों तक सीमित नहीं रही। संदिग्ध गांवों की तलाशी, हिरासत, मुखबिर तंत्र, आवाजाही पर निगरानी और स्थानीय समर्थकों की गिरफ्तारी ने व्यापक नागरिक आबादी को प्रभावित किया। आधिकारिक दृष्टि में ये कदम कानून-व्यवस्था बहाल करने और हत्याओं को रोकने के लिए आवश्यक थे; मानवाधिकार दृष्टि से सामूहिक दंड, कथित मुठभेड़ों और प्रक्रिया-विहीन कार्रवाई के आरोप गंभीर रहे। प्रत्येक मौत या गिरफ्तारी के बारे में क्रांतिकारी और सरकारी विवरण समान नहीं हैं, इसलिए निश्चित संख्या की जगह घटना-विशिष्ट अभिलेखों को प्राथमिकता देनी चाहिए। दमन का एक राजनीतिक परिणाम यह भी हुआ कि भूमि, कर्ज और मजदूरी के मूल प्रश्न सुरक्षा की भाषा में दबने लगे। जब पूरा क्षेत्र ‘उग्रवाद प्रभावित’ कहलाया तो प्रत्येक सामाजिक मांग पर संदेह बढ़ा। दूसरी ओर आंदोलन की हिंसक कार्रवाइयों ने भी प्रशासन और आम नागरिक के बीच भेद धुंधला किया। इस दोहरे संकट में सबसे अधिक कीमत उन आदिवासी परिवारों ने चुकाई जिनके अधिकारों के नाम पर दोनों पक्ष अपने कदमों का औचित्य प्रस्तुत कर रहे थे।
सशस्त्र चरण का संतुलित ऐतिहासिक अर्थ
इस चरण को महिमामंडित करने पर व्यक्तिगत हिंसा, भय और नागरिक क्षति अदृश्य हो जाती है; केवल अपराध के रूप में लिखने पर भूमि-वियोजन, साहूकारी, बेगार और प्रशासनिक उपेक्षा का इतिहास मिट जाता है। संतुलित अध्ययन दोनों को एक साथ दर्ज करता है। किसान-आदिवासी समुदायों की राजनीतिक चेतना और भूमि की मांग वास्तविक थीं, पर उनसे निकली हर रणनीति स्वतः लोकतांत्रिक या न्यायपूर्ण नहीं थी। इसी प्रकार राज्य का कानून लागू करने का अधिकार था, पर वह प्रक्रिया, अनुपात और नागरिक अधिकारों की संवैधानिक सीमा से मुक्त नहीं था। श्रीकाकुलम का सशस्त्र चरण इसलिए भारतीय किसान आंदोलनों की श्रृंखला में एक चेतावनी और ऐतिहासिक मोड़ दोनों है। इसने दिखाया कि अधूरे भूमि सुधार और आदिवासी क्षेत्रों में कमजोर न्याय-व्यवस्था लंबे समय तक असंतोष जमा करती है। उसने यह भी दिखाया कि गुप्त हिंसा जनतांत्रिक संगठन को पीछे धकेल सकती है और राज्य का असंतुलित प्रतिकार पूरे समाज को संघर्ष-क्षेत्र बना सकता है। इस अध्याय का उद्देश्य किसी पक्ष का प्रचार नहीं, बल्कि उन कारणों, निर्णयों और परिणामों की अलग-अलग जांच है जिनसे 1968–69 का विद्रोह बना।
चारु मजूमदार, AICCCR और CPI(ML) — स्थानीय संघर्ष का अखिल भारतीय नक्सलवादी धारा से जुड़ाव
श्रीकाकुलम आंदोलन का 1968–69 का चरण केवल स्थानीय संघर्ष के उग्र होने की कहानी नहीं था। इसी समय वह एक व्यापक अखिल भारतीय क्रांतिकारी कम्युनिस्ट परियोजना से जुड़ने लगा। नक्सलबाड़ी के बाद चारु मजूमदार और उनके समर्थकों ने विभिन्न राज्यों में चल रहे उग्र किसान संघर्षों को एक साझा माओवादी राजनीतिक दिशा में संगठित करने का प्रयास किया। इसी प्रक्रिया से पहले All India Coordination Committee of Revolutionaries, फिर All India Coordination Committee of Communist Revolutionaries—AICCCR और अंततः 22 अप्रैल 1969 को Communist Party of India (Marxist-Leninist)—CPI(ML) अस्तित्व में आई।
श्रीकाकुलम इस अखिल भारतीय प्रक्रिया में असाधारण महत्व प्राप्त करने लगा, क्योंकि यहां केवल क्रांतिकारी प्रचार नहीं, बल्कि पहले से संगठित आदिवासी किसान आधार और 1968 से सक्रिय सशस्त्र संघर्ष मौजूद था।
लेकिन “श्रीकाकुलम का CPI(ML) में विलय” जैसी अभिव्यक्ति को थोड़ी सावधानी के साथ समझना चाहिए। आंध्र प्रदेश के सभी क्रांतिकारी कम्युनिस्ट एक ही समय और समान तरीके से चारु मजूमदार की लाइन से नहीं जुड़े थे। तरिमेला नागी रेड्डी के नेतृत्व वाली आंध्र धारा और AICCCR के बीच गंभीर रणनीतिक मतभेद हुए। इसलिए अधिक सटीक बात यह है कि श्रीकाकुलम का नेतृत्व धीरे-धीरे चारु मजूमदार–AICCCR धारा से निकटता बनाते हुए CPI(ML) के केंद्रीय क्रांतिकारी नेटवर्क का प्रमुख आधार बन गया।
नक्सलबाड़ी से आगे अगले ‘क्रांतिकारी क्षेत्र’ की तलाश
1967 के नक्सलबाड़ी विद्रोह को राज्य ने अपेक्षाकृत जल्दी दबा दिया था, लेकिन चारु मजूमदार के लिए नक्सलबाड़ी किसी असफल स्थानीय विद्रोह का अंत नहीं था। वह इसे भारतीय क्रांति के नए चरण की शुरुआत मानते थे।
उनकी रणनीतिक चुनौती यह थी कि नक्सलबाड़ी की चिनगारी को अन्य क्षेत्रों में फैलाया जाए।
पारंपरिक भूस्वामी सत्ता को चुनौती मिल रही हो,
और सशस्त्र संघर्ष की संभावना विकसित हो सके।
श्रीकाकुलम लगभग इन सभी कसौटियों पर महत्वपूर्ण दिखाई देता था।
मार्च 1969 : “क्या श्रीकाकुलम भारत का येनान बनेगा?”
श्रीकाकुलम को लेकर चारु मजूमदार की आशाओं का सबसे प्रसिद्ध दस्तावेज है उनका लेख “Srikakulam: Will It Be the Yenan of India?”, जो Liberation के मार्च 1969 अंक में प्रकाशित हुआ।
‘येनान’ का संदर्भ चीन की कम्युनिस्ट क्रांति से था। चीन में येनान वह क्षेत्र बना था जहां चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने दीर्घकालीन राजनीतिक और सैन्य आधार विकसित किया था।
इस तुलना में ही चारु मजूमदार की महत्वाकांक्षा छिपी थी।
वे श्रीकाकुलम को केवल स्थानीय विद्रोह नहीं बल्कि संभावित क्रांतिकारी आधार-क्षेत्र के रूप में देख रहे थे।
प्रत्यक्ष यात्रा का प्रभाव
मार्च 1969 के अपने लेख में मजूमदार ने पहाड़ी श्रीकाकुलम क्षेत्र में बैठकर आंध्र प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए युवा क्रांतिकारियों से मिलने का वर्णन किया। उन्होंने लिखा कि ये कार्यकर्ता सशस्त्र किसान क्रांति को भारतीय परिवर्तन का रास्ता मानते थे।
पहली, 1969 तक श्रीकाकुलम अब केवल स्थानीय जिला नेतृत्व की गतिविधि नहीं रहा था।
दूसरी, वह आंध्र प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों के क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं के लिए प्रशिक्षण और प्रेरणा के केंद्र की तरह देखा जाने लगा था।
श्रीकाकुलम क्यों आकर्षक था?
चारु मजूमदार को यहां वह चीज दिखाई देती थी जो नक्सलबाड़ी में लंबे समय तक स्थिर रूप में विकसित नहीं हो सकी थी—पहाड़ी भूगोल और संगठित ग्रामीण आधार का संयोजन।
सवरा और जटापू आदिवासी क्षेत्रों में पहले से गिरिजन संगठन था।
भूमि और साहूकारी के विरुद्ध संघर्ष था।
स्थानीय नेतृत्व वर्षों से सक्रिय था।
अब गुरिल्ला गतिविधियां भी प्रारंभ हो चुकी थीं।
चारु मजूमदार के लिए यह माओवादी “ग्रामीण आधार-क्षेत्र” की कल्पना के अनुकूल दिखाई देता था।
लेकिन तुलना की सीमा
यहीं इतिहासकार को राजनीतिक प्रचार और वास्तविकता के बीच अंतर रखना चाहिए।
चीनी येनान विशाल भूभाग, लंबी सैन्य परंपरा, रेड आर्मी, व्यापक प्रशासनिक संरचना और दशकों की क्रांतिकारी प्रक्रिया का परिणाम था।
राज्य की सैन्य और प्रशासनिक क्षमता बहुत अधिक थी।
और आंदोलन का आधार कुछ विशेष आदिवासी इलाकों में अधिक केंद्रित था।
इसलिए “भारत का येनान” वस्तुनिष्ठ वर्णन कम और क्रांतिकारी राजनीतिक आकांक्षा अधिक थी।
नक्सलबाड़ी समर्थकों का अखिल भारतीय संगठन
1967 में CPI(M) के भीतर नक्सलबाड़ी के प्रश्न पर विभाजन तेज होने के बाद विभिन्न राज्यों के क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं ने आपसी समन्वय शुरू किया।
12–13 नवंबर 1967 को पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार, केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और ओडिशा सहित विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधियों ने मिलकर All India Coordination Committee of Revolutionaries in CPI(M) के गठन की दिशा में कदम उठाया। 14 मई 1968 को इसका नाम All India Coordination Committee of Communist Revolutionaries—AICCCR कर दिया गया।
इसका लक्ष्य केवल नया गुट बनाना नहीं था।
AICCCR एक वैकल्पिक कम्युनिस्ट राजनीतिक धारा खड़ी करना चाहता था।
और किसान संघर्षों को राज्य सत्ता पर कब्जे की दिशा में विकसित करना।
आंध्र के क्रांतिकारियों की अलग स्थिति
आंध्र प्रदेश में भी CPI(M) से असंतुष्ट क्रांतिकारी धारा मजबूत थी।
सभी क्रांतिकारी इस बात पर सहमत नहीं थे कि तुरंत चारु मजूमदार की रणनीति स्वीकार कर ली जाए।
तरिमेला नागी रेड्डी, डी.वी. राव और उनके सहयोगियों का जोर अधिक व्यापक जनसंगठन, वर्ग संघर्ष और राजनीतिक तैयारी पर था। वे तत्काल व्यक्तिगत ‘वर्ग शत्रु सफाये’ को किसान क्रांति का केंद्रीय रास्ता बनाने को लेकर आलोचनात्मक थे।
सितंबर 1968 में Andhra Pradesh Coordination Committee of Communist Revolutionaries AICCCR से जुड़ी। लेकिन मतभेद शीघ्र तीखे हो गए। बाद में नागी रेड्डी के नेतृत्व वाली धारा AICCCR से अलग कर दी गई। CPI(ML) की अपनी ऐतिहासिक समयरेखा भी इस वैचारिक विभाजन और आंध्र के एक हिस्से के निष्कासन का उल्लेख करती है।
श्रीकाकुलम किस ओर गया?
यहीं श्रीकाकुलम की विशेष स्थिति सामने आती है।
वेंपाटापु सत्यनारायण, आदिभटला कैलासम और उनसे जुड़े स्थानीय नेतृत्व का रुझान धीरे-धीरे चारु मजूमदार की ओर मजबूत हुआ।
स्थानीय स्थिति तेजी से हिंसक हो चुकी थी।
लेविडी के बाद वर्गीय टकराव बढ़ा था।
ऐसी परिस्थिति में मजूमदार की तत्काल सशस्त्र क्रांति की रणनीति स्थानीय नेतृत्व को अधिक अनुकूल लगी।
स्थानीय आंदोलन से राष्ट्रीय नेटवर्क
AICCCR से संबंध बनने के बाद श्रीकाकुलम आंदोलन को तीन नई चीजें मिलीं।
दूसरी—अन्य राज्यों के क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं से संपर्क।
तीसरी—एक ऐसी विचारधारा जो स्थानीय भूमि संघर्ष को भारतीय राज्य के विरुद्ध राष्ट्रीय क्रांति का हिस्सा बताती थी।
अब श्रीकाकुलम केवल आदिवासी जमीन वापस दिलाने का संघर्ष नहीं था।
उसे “भारतीय क्रांति के अग्रिम मोर्चे” के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा।
नई पार्टी क्यों बनाई गई?
AICCCR नेतृत्व का निष्कर्ष था कि CPI और CPI(M) दोनों भारतीय क्रांति के रास्ते से हट चुके हैं।
फरवरी 1969 में AICCCR ने नई कम्युनिस्ट पार्टी बनाने का निर्णय लिया।
22 अप्रैल 1969, लेनिन की जन्मशती के अवसर पर, Communist Party of India (Marxist-Leninist)—CPI(ML) के गठन की घोषणा की गई। चारु मजूमदार केंद्रीय संगठन समिति के सचिव बने। 1 मई को कोलकाता के शहीद मीनार मैदान में कानू सान्याल ने सार्वजनिक रूप से पार्टी गठन की घोषणा की।
राजनीतिक प्रस्ताव
22 अप्रैल 1969 को अपनाए गए CPI(ML) के राजनीतिक प्रस्ताव में संसदीय रास्ते को अस्वीकार किया गया और भारत को “अर्ध-औपनिवेशिक, अर्ध-सामंती” समाज के रूप में परिभाषित करते हुए क्रांतिकारी संघर्ष की आवश्यकता बताई गई।
इस राजनीतिक विश्लेषण के आधार पर चुनाव में सरकार बदलना पर्याप्त नहीं था।
राज्य सत्ता का क्रांतिकारी परिवर्तन।
श्रीकाकुलम का स्थान
पार्टी गठन के समय तक श्रीकाकुलम को CPI(ML) की सबसे महत्वपूर्ण किसान गुरिल्ला गतिविधियों में गिना जा रहा था। पार्टी की बाद की आधिकारिक समयरेखा में 1969 तक देबरा–गोपीबल्लभपुर, मुशहरी, लखीमपुर खीरी और विशेष रूप से श्रीकाकुलम में प्रारंभिक गुरिल्ला क्षेत्रों के विकसित होने का उल्लेख है।
इससे श्रीकाकुलम की राष्ट्रीय स्थिति बदल गई।
लेकिन 1969 तक श्रीकाकुलम को क्रांतिकारी नेतृत्व एक ऐसा स्थान मान रहा था जहां सशस्त्र संघर्ष व्यवहार में आगे बढ़ रहा था।
वेंपाटापु सत्यनारायण की भूमिका
सत्यनारायण केवल जिला स्तर के आंदोलनकारी नहीं रहे।
वे CPI(ML) के केंद्रीय नेतृत्व से जुड़े और श्रीकाकुलम आंदोलन तथा राष्ट्रीय पार्टी नेतृत्व के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु बने।
एक ओर स्थानीय आदिवासी समाज में लंबे समय से अर्जित विश्वास,
दूसरी ओर राष्ट्रीय क्रांतिकारी पार्टी की रणनीति।
स्थानीय मांगों का नया अर्थ
इस परिवर्तन के बाद भूमि-वापसी भी नई राजनीतिक व्याख्या में रखी गई।
पहले जमीन वापस लेना स्वयं एक उद्देश्य था।
अब जमीन पर कब्जा क्रांतिकारी सत्ता निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा माना जाने लगा।
पहले मजदूरी वृद्धि सामाजिक न्याय की उपलब्धि थी।
अब उसे वर्ग संघर्ष की राजनीतिक शिक्षा के रूप में देखा जाने लगा।
यहीं श्रीकाकुलम किसान आंदोलन और CPI(ML) की क्रांतिकारी रणनीति लगभग एक-दूसरे में समाने लगे।
‘नक्सलबाड़ी का रास्ता’ और श्रीकाकुलम का अपना रास्ता
श्रीकाकुलम के इतिहास का एक केंद्रीय इतिहासलेखन-विवाद यह है—
क्या श्रीकाकुलम नक्सलबाड़ी द्वारा निर्मित आंदोलन था, या उसने अपना स्वतंत्र रास्ता विकसित किया था?
दोनों प्रक्रियाएं मौजूद थीं, लेकिन अलग समय पर।
नक्सलबाड़ी से पहले का श्रीकाकुलम
श्रीकाकुलम में गिरिजन संगठन नक्सलबाड़ी से कई वर्ष पहले सक्रिय था।
आदिवासी भूमि-वियोजन का प्रश्न पहले से मौजूद था।
सत्यनारायण और कैलासम पहले से गांवों में सक्रिय थे।
इसलिए यह कहना कि नक्सलबाड़ी ने श्रीकाकुलम आंदोलन पैदा किया, ऐतिहासिक रूप से गलत होगा।
नक्सलबाड़ी ने क्या दिया?
वैचारिक भाषा, अखिल भारतीय नेटवर्क और सशस्त्र क्रांति का स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य।
यानी स्थानीय असंतोष का कारण नक्सलबाड़ी नहीं था।
लेकिन स्थानीय संघर्ष को राष्ट्रीय माओवादी क्रांति से जोड़ने का निर्णायक उत्प्रेरक नक्सलबाड़ी बना।
दो मॉडल
नक्सलबाड़ी में विद्रोह तेजी से फूटा और तेजी से दमन का शिकार हुआ।
श्रीकाकुलम में उसके विपरीत पहले लगभग एक दशक का संगठनात्मक आधार था।
इसीलिए चारु मजूमदार को लगा कि श्रीकाकुलम नक्सलबाड़ी से आगे जा सकता है।
जिस चीज ने श्रीकाकुलम को मजबूत बनाया था—दीर्घकालीन जनसंगठन—उसी को बाद की क्रांतिकारी रणनीति ने पर्याप्त महत्व दिया या नहीं, यह विवादास्पद है।
मास लाइन बनाम सैन्य लाइन
आंदोलन के भीतर एक बुनियादी प्रश्न उभरा।
क्या किसान स्वयं अपने व्यापक संगठनों—संगम, ग्राम सभा, मजदूरी संघर्ष और भूमि आंदोलन—के जरिए क्रांति के मुख्य वाहक होंगे?
या छोटे क्रांतिकारी दस्तों द्वारा ‘वर्ग शत्रुओं’ पर हमले जनता को क्रांति की दिशा में प्रेरित करेंगे?
यह केवल तकनीकी रणनीति का फर्क नहीं था।
यह तय करता था कि आंदोलन का केंद्र जनता होगी या क्रांतिकारी अग्रदस्ता।
श्रीकाकुलम का ऐतिहासिक विरोधाभास
यहीं श्रीकाकुलम की त्रासदी दिखाई देती है।
उसकी शक्ति लंबे जनसंघर्ष से बनी थी।
लेकिन 1969–70 में उसका सबसे चर्चित चेहरा गुरिल्ला कार्रवाइयां और ‘वर्ग शत्रुओं का सफाया’ बनने लगा।
इस परिवर्तन ने आंदोलन को अखिल भारतीय प्रसिद्धि तो दी, लेकिन उसके व्यापक सामाजिक आधार के सामने जोखिम भी पैदा किया।
‘वर्ग शत्रुओं के सफाये’ की रणनीति
CPI(ML) के प्रारंभिक इतिहास की सबसे विवादास्पद अवधारणाओं में से एक थी ‘वर्ग शत्रुओं का सफाया’—annihilation of class enemies।
इसका संबंध चारु मजूमदार की उस धारणा से था कि ग्रामीण गरीब किसानों को क्रांतिकारी सत्ता के लिए संगठित करने में सबसे दमनकारी भूस्वामियों और स्थानीय शोषकों के विरुद्ध प्रत्यक्ष हिंसक कार्रवाई निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
‘वर्ग शत्रु’ कौन?
क्रांतिकारी भाषा में वर्ग शत्रु से आशय केवल किसी संपन्न व्यक्ति से नहीं होना चाहिए था।
आदर्शतः निशाना वे व्यक्ति माने जाते थे जिन्हें—
किसानों पर हिंसा करने वाला प्रभावशाली व्यक्ति,
लेकिन व्यवहार में यह श्रेणी कितनी स्पष्ट रही—यह गंभीर विवाद का विषय है।
रणनीति के पीछे तर्क
मजूमदार समर्थक धारा का तर्क था कि सदियों से भयभीत गरीब किसान तब अपनी शक्ति पहचानेंगे जब ग्रामीण प्रभुत्व के सबसे भयावह प्रतीक को चुनौती दी जाएगी।
एक अत्याचारी भूस्वामी का “सफाया” उनके अनुसार केवल व्यक्ति की हत्या नहीं बल्कि पुराने वर्गीय आतंक को तोड़ने की राजनीतिक कार्रवाई थी।
इससे गरीब किसानों में विश्वास पैदा होगा कि भूस्वामी अजेय नहीं है।
श्रीकाकुलम में लागू होना
श्रीकाकुलम में जमीन, साहूकारी और हिंसक स्थानीय टकराव पहले से मौजूद थे। इसलिए ‘वर्ग शत्रु’ की अवधारणा को वास्तविक स्थानीय संघर्ष से जोड़ना आसान था।
गुरिल्ला दस्तों ने कुछ स्थानीय भूस्वामियों, साहूकारों और मुखबिर समझे गए व्यक्तियों पर हमले किए।
कुछ मामलों में संपत्ति, अनाज या हथियार कब्जे में लिए गए।
इन कार्रवाइयों को क्रांतिकारी नेतृत्व ने नए ग्रामीण सत्ता-संतुलन के संकेत के रूप में प्रस्तुत किया।
आत्मरक्षा और ‘सफाया’ में अंतर
यदि गांव पर हमला हो और किसान प्रतिरोध में हथियार उठाए—यह आत्मरक्षा है।
यदि किसान कब्जाई जमीन वापस लेने के दौरान हिंसक टकराव में प्रवेश करे—यह प्रत्यक्ष वर्ग संघर्ष हो सकता है।
लेकिन किसी चुने हुए व्यक्ति को योजनाबद्ध तरीके से मारने के लिए गुरिल्ला दस्ता भेजना अलग रणनीति है।
श्रीकाकुलम का संघर्ष धीरे-धीरे इन तीनों रूपों से गुजरा।
रणनीति की समस्या
‘सफाया लाइन’ के सामने कई गंभीर समस्याएं थीं।
पहली—किसे वर्ग शत्रु घोषित करने का अधिकार है?
दूसरी—गलत पहचान या व्यक्तिगत दुश्मनी का जोखिम कैसे रोका जाए?
तीसरी—क्या हत्या के बाद जनता अधिक सक्रिय होती है या पुलिस दमन के भय से पीछे हटती है?
चौथी—यदि जनता स्वयं कार्रवाई का भागीदार नहीं है तो क्या गुरिल्ला दस्ता धीरे-धीरे जनता से अलग सैन्य संरचना नहीं बन जाता?
यही प्रश्न बाद में भारतीय नक्सलवादी आंदोलन के भीतर बड़े वैचारिक विवाद बने।
नागी रेड्डी धारा की आलोचना
आंध्र प्रदेश के तरिमेला नागी रेड्डी और डी.वी. राव से जुड़ी क्रांतिकारी धारा ने चारु मजूमदार की तत्काल ‘annihilation’ रणनीति की आलोचना की।
उनका जोर व्यापक किसान आंदोलन, जनसंगठन और लंबे वर्ग संघर्ष पर था।
यह मतभेद केवल व्यक्तित्वों का संघर्ष नहीं था।
भारतीय माओवादी राजनीति के सामने यह मूल प्रश्न था—
क्या सशस्त्र कार्रवाई जनआंदोलन से पैदा होगी, या सशस्त्र कार्रवाई स्वयं जनआंदोलन पैदा करेगी?
श्रीकाकुलम इस बहस की सबसे बड़ी प्रयोगशालाओं में से एक बन गया।
राजनीतिक लाभ और सामाजिक लागत
‘सफाया’ कार्रवाइयों ने स्थानीय प्रभुत्वशाली वर्ग में भय पैदा किया।
श्रीकाकुलम राष्ट्रीय समाचार और क्रांतिकारी प्रचार में आया।
लेकिन इसके साथ राज्य-दमन भी कहीं अधिक तीव्र हुआ।
पुलिस ने आंदोलन को साधारण भूमि-संघर्ष के बजाय गंभीर आंतरिक सुरक्षा चुनौती के रूप में देखना शुरू किया।
और जब राज्य का लक्ष्य छोटे गुरिल्ला दस्तों के बजाय उनके पूरे ग्रामीण समर्थन-तंत्र को तोड़ना बन गया, तो सामान्य आदिवासी गांव भी दमन के दायरे में आ गए।
यहीं श्रीकाकुलम आंदोलन के सामने सबसे गंभीर संकट पैदा होने लगा।
खंड 7 का समेकित मूल्यांकन
1968–69 में श्रीकाकुलम आंदोलन ने अपना दूसरा बड़ा रूपांतरण पूरा किया।
स्थानीय आदिवासी शिकायत से संगठित गिरिजन आंदोलन तक।
गिरिजन आंदोलन से अखिल भारतीय क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन के प्रमुख सशस्त्र केंद्र तक।
इस परिवर्तन में चारु मजूमदार की भूमिका निर्णायक थी, लेकिन उसे बढ़ा-चढ़ाकर भी नहीं देखना चाहिए।
श्रीकाकुलम में उन्होंने संघर्ष पैदा नहीं किया।
उन्होंने एक पहले से चल रहे संघर्ष को अपनी माओवादी क्रांति की अखिल भारतीय रणनीति में स्थान दिया।
मार्च 1969 में उनका प्रश्न—क्या श्रीकाकुलम भारत का येनान बनेगा?—उसी उम्मीद का प्रतीक था।
AICCCR ने विभिन्न राज्यों के क्रांतिकारी समूहों को एक संगठनात्मक मंच दिया। मई 1968 तक वह AICCCR बन चुका था और फरवरी–अप्रैल 1969 में नई पार्टी बनाने की प्रक्रिया CPI(ML) के गठन में परिणत हुई।
22 अप्रैल 1969 को CPI(ML) के गठन के साथ श्रीकाकुलम अब किसी स्थानीय संगठन की परिधि में नहीं था।
वह नई पार्टी की क्रांतिकारी कल्पना के प्रमुख प्रतीकों में शामिल हो चुका था।
लेकिन इस उपलब्धि के भीतर भविष्य का संकट भी मौजूद था।
जिस श्रीकाकुलम आंदोलन की ताकत वर्षों की गिरिजन संगठन-निर्माण प्रक्रिया थी, वही आंदोलन अब ऐसी रणनीति अपनाने लगा जिसमें गुरिल्ला दस्ता, हथियार और व्यक्तिगत ‘वर्ग शत्रु सफाया’ अधिक केंद्रीय होते जा रहे थे।
यही परिवर्तन आगे यह निर्णायक प्रश्न उठाएगा—
क्या हथियार ने जनता की शक्ति को बढ़ाया?
या धीरे-धीरे हथियार स्वयं राजनीति का केंद्र बन गया?
और इसी प्रश्न का उत्तर श्रीकाकुलम की अंतिम परिणति समझने में सबसे अधिक महत्वपूर्ण होगा।
खंड 8 — समाज के विभिन्न वर्गों की भूमिका (अध्याय 35–39)
अध्याय 35: सवरा–जटापू और आदिवासी किसान — आंदोलन की वास्तविक सामाजिक शक्ति अध्याय 36: गरीब किसान और खेतिहर मजदूर — आदिवासी क्षेत्र से बाहर सामाजिक विस्तार अध्याय 37: महिलाओं की भूमिका — गिरिजन संगम से गुरिल्ला संघर्ष तक अध्याय 38: शिक्षक, छात्र और बुद्धिजीवी — ग्रामीण विद्रोह से जुड़ती नई पीढ़ी अध्याय 39: संस्कृति भी हथियार बनी — गीत, कविता, नाटक और सुब्बाराव पाणिग्रही की विरासत
इसके बाद खंड 9 — सरकार, पुलिस और दमन (अध्याय 40–45) में 1969–70 के पुलिस अभियान, गिरफ्तारियां, कथित मुठभेड़ों, पंचादि कृष्णमूर्ति, सुब्बाराव पाणिग्रही तथा अंततः वेंपाटापु सत्यनारायण और आदिभटला कैलासम की जुलाई 1970 में मृत्यु तक की निर्णायक घटनाओं का क्रमबद्ध विश्लेषण आएगा।
समाज के विभिन्न वर्गों की भूमिका
श्रीकाकुलम आंदोलन को यदि केवल कुछ प्रसिद्ध नेताओं, CPI(ML) या गुरिल्ला कार्रवाइयों के आधार पर देखा जाए तो उसके सामाजिक चरित्र का बड़ा हिस्सा छूट जाता है। उसकी वास्तविक शक्ति उन हजारों लोगों से बनी थी जो अलग-अलग कारणों से आंदोलन में आए—सवरा और जटापू आदिवासी किसान, भूमिहीन मजदूर, महिलाएं, शिक्षक, छात्र, युवा, लेखक और सांस्कृतिक कार्यकर्ता।
यह सामाजिक गठबंधन एक समान नहीं था। सभी समूहों के हित और अनुभव भी समान नहीं थे। आदिवासी किसान के लिए जमीन और जंगल का प्रश्न केंद्रीय था; खेतिहर मजदूर के लिए मजदूरी और सामाजिक सम्मान; महिला के लिए भूमि, श्रम और घरेलू-सामाजिक सत्ता तीनों; शिक्षित कार्यकर्ताओं के लिए यह व्यवस्था-परिवर्तन की राजनीतिक परियोजना थी; और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं ने इन सभी अनुभवों को गीत, कविता और लोकनाट्य की भाषा दी।
इसी विविध सामाजिक आधार ने श्रीकाकुलम को सामान्य भूमिगत संगठन से कहीं अधिक व्यापक किसान–आदिवासी आंदोलन बनाया।
सवरा–जटापू और आदिवासी किसान — आंदोलन की वास्तविक सामाजिक शक्ति
श्रीकाकुलम आंदोलन की रीढ़ सवरा और जटापू आदिवासी समुदाय थे। उपलब्ध अध्ययनों के अनुसार तत्कालीन श्रीकाकुलम के अनुसूचित क्षेत्रों में सवरा और जटापू मिलकर आदिवासी आबादी का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा बनाते थे और सशस्त्र विद्रोह का मुख्य सामाजिक आधार इन्हीं समुदायों ने प्रदान किया। अन्य आदिवासी समूहों में मुखा डोरा, कोंडा डोरा तथा गदबा भी शामिल थे।
दोनों समुदाय समान नहीं थे
सवरा और जटापू दोनों को एक समान ‘आदिवासी किसान’ श्रेणी में रख देना पर्याप्त नहीं है।
सवरा समुदाय में पोडु अथवा स्थानांतरित खेती की परंपरा अधिक मजबूत थी। खेती, जंगल और पहाड़ी पारिस्थितिकी उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा थे।
जटापू समुदाय के अनेक परिवार स्थायी कृषि की ओर बढ़ चुके थे। लेकिन गैर-आदिवासी साहूकारों और भूस्वामियों के हाथ जमीन जाने के कारण कुछ परिवारों को पुनः कम सुरक्षित पहाड़ी खेती पर निर्भर होना पड़ा।
यानी दोनों समुदायों का भूमि संकट अलग ऐतिहासिक रास्तों से आया, लेकिन परिणाम समान था—भूमि और आजीविका पर बढ़ता बाहरी नियंत्रण।
आदिवासी किसान आंदोलन में क्यों आए?
फसल का बड़ा हिस्सा ऋण भुगतान में चला जाता था।
वन अधिकारी पोडु खेती और जंगल के उपयोग को नियंत्रित करते थे।
राजस्व अधिकारियों पर अतिरिक्त वसूली के आरोप थे।
और पुलिस के बारे में आंदोलनकारी साहित्य में यह धारणा बार-बार सामने आती है कि वह विवादों में स्थानीय प्रभावशाली वर्ग का पक्ष लेती थी। इलिना सेन के अध्ययन में इन्हीं परिस्थितियों को गिरिजन संगम के विस्तार की प्रमुख पृष्ठभूमि बताया गया है।
संघर्ष ने पहचान बदली
श्रीकाकुलम से पहले आदिवासी किसान की सामाजिक दुनिया प्रायः अपने गांव और समुदाय तक सीमित थी।
गिरिजन संगम ने अलग-अलग गांवों को एक राजनीतिक नेटवर्क में जोड़ा।
अब किसी एक गांव की भूमि-वियोजन समस्या दूसरे गांव के किसानों की समस्या भी बन सकती थी।
किसी मजदूर की कम मजदूरी सामूहिक मुद्दा बन सकती थी।
किसी साहूकार की ज्यादती के विरुद्ध दूसरे गांव से भी लोग आ सकते थे।
यही संगठनात्मक परिवर्तन आंदोलन की सबसे बड़ी शक्ति बना।
‘हम’ और ‘वे’ की बदलती परिभाषा
आदिवासी राजनीति में पहले ‘हम’ और ‘बाहरी’ का विभाजन महत्वपूर्ण था।
लेकिन श्रीकाकुलम ने इस रेखा को भी बदला।
एक महत्वपूर्ण अध्ययन के अनुसार 1968–70 के आंदोलन में आदिवासियों ने मैदानों से आए पुरुष और महिला कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं को भी अपने व्यापक संघर्षशील ‘हम’ का हिस्सा स्वीकार किया। संघर्ष अब केवल आदिवासी बनाम गैर-आदिवासी नहीं रहा; वह शोषित और शोषक के वर्गीय विभाजन की भाषा में भी व्यक्त होने लगा।
यह परिवर्तन राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था।
क्योंकि प्रत्येक गैर-आदिवासी को शत्रु मानने की जगह आंदोलन ने भूस्वामी, साहूकार और राज्य-सत्ता को मुख्य विरोधी के रूप में परिभाषित किया।
आदिवासी एजेंसी का प्रश्न
फिर भी यह कहना गलत होगा कि बाहर से आए कम्युनिस्ट नेताओं ने निष्क्रिय आदिवासियों को क्रांति करना सिखाया।
आदिवासी समाज के पास संघर्ष के अपने कारण थे।
इसलिए अधिक उपयुक्त व्याख्या यह होगी कि कम्युनिस्ट राजनीति और आदिवासी सामाजिक असंतोष ने एक-दूसरे को रूपांतरित किया।
कम्युनिस्टों ने संघर्ष को वर्गीय भाषा और संगठन दिया।
आदिवासी किसानों ने उस राजनीति को वास्तविक सामाजिक आधार दिया।
बिना इस आधार के श्रीकाकुलम संभव नहीं था।
गरीब किसान और खेतिहर मजदूर — सामाजिक आधार का विस्तार
श्रीकाकुलम आंदोलन का केंद्र अनुसूचित पहाड़ी क्षेत्र था, लेकिन उसका प्रभाव वहीं तक सीमित नहीं रहा। आंदोलन के मैदानी हिस्सों—विशेषकर उद्दानम, सोमपेटा, टेक्कली और आसपास के क्षेत्रों—में गरीब किसान, भूमिहीन मजदूर और अन्य ग्रामीण समूह भी क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े।
इस विस्तार का महत्व था, क्योंकि इससे आंदोलन विशुद्ध आदिवासी विद्रोह से आगे बढ़कर व्यापक गरीब किसान राजनीति की दिशा में गया।
किसान समाज के भीतर वर्गीय अंतर
हर किसान एक जैसी स्थिति में नहीं था।
किसी का मुख्य जीवन मजदूरी पर निर्भर था।
इसलिए भूमि-वापसी की मांग हर व्यक्ति के लिए समान रूप से उपयोगी नहीं हो सकती थी।
भूमिहीन मजदूर के लिए मुख्य सवाल था—
यही कारण था कि गिरिजन संगम और बाद की किसान राजनीति ने मजदूरी और ऋण को भूमि प्रश्न के साथ जोड़ा।
खेतिहर मजदूरों की भूमिका
जब खेतिहर मजदूर सामूहिक रूप से अधिक मजदूरी मांगते थे, तब आंदोलन सीधे उत्पादन-संबंधों में हस्तक्षेप करता था।
भूस्वामी के लिए समस्या केवल यह नहीं थी कि उसे कुछ अतिरिक्त मजदूरी देनी पड़ेगी।
वास्तविक चुनौती यह थी कि मजदूर अब उसकी शर्तों को बिना सवाल स्वीकार नहीं कर रहा था।
ग्रामीण वर्ग-संबंध में यह बड़ा परिवर्तन था।
भूमिहीन किसान और क्रांतिकारी राजनीति
नक्सलवादी विचारधारा में गरीब और भूमिहीन किसान को क्रांति की सबसे महत्वपूर्ण ग्रामीण शक्ति माना गया।
इसलिए 1968 के बाद आंदोलन की राजनीतिक भाषा में भूमिहीन और गरीब किसानों का महत्व और बढ़ गया।
जमीन पर कब्जे और अनाज जब्ती जैसी कार्रवाइयों को इसी वर्गीय राजनीति के रूप में प्रस्तुत किया गया।
लेकिन यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि किसी गुरिल्ला कार्रवाई में गरीब ग्रामीण की सहमति, वास्तविक भागीदारी और राजनीतिक सक्रियता हमेशा समान नहीं होती।
इसीलिए बाद में आंदोलन के मूल्यांकन में प्रश्न उठता है कि व्यापक गरीब किसान कितना स्वयं निर्णय ले रहा था और कितना भूमिगत दस्तों की रणनीति का समर्थक या सहायक बन गया था।
मैदानी इलाके
श्रीकाकुलम आंदोलन का सामाजिक विस्तार मैदानी क्षेत्रों में भी हुआ। शोध में उद्दानम क्षेत्र को आंदोलन के मैदानी आधारों में गिना गया है। बाद में बोड्डापाडु जैसे गांव क्रांतिकारी गतिविधियों से गहरे जुड़े।
यहां सामाजिक संरचना पहाड़ी आदिवासी क्षेत्र से अलग थी।
इसलिए राजनीतिक संगठन की भाषा भी केवल जनजातीय भूमि-अधिकार पर आधारित नहीं रह सकती थी।
गरीब किसान, खेतिहर मजदूर, युवा और शिक्षित कार्यकर्ता अधिक महत्वपूर्ण होते गए।
सीमा भी स्पष्ट थी
इसके बावजूद श्रीकाकुलम व्यापक आंध्र ग्रामीण समाज को एक समान स्तर पर संगठित नहीं कर सका।
उसकी सबसे गहरी जड़ें विशेष आदिवासी और गरीब किसान क्षेत्रों में थीं।
इसी सीमित भौगोलिक-सामाजिक संकेंद्रण ने बाद में राज्य के लिए आंदोलन को अलग-थलग करके दबाना अपेक्षाकृत संभव बनाया।
अर्थात आंदोलन ने सामाजिक आधार बढ़ाया, लेकिन वह ऐसा सर्वव्यापक किसान विद्रोह नहीं बन सका जैसा 1940 के दशक का तेलंगाना अपने चरम पर था।
महिलाओं की भूमिका — गिरिजन संगम से गुरिल्ला संघर्ष तक
श्रीकाकुलम आंदोलन में महिलाओं की भूमिका उसके सामाजिक इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण लेकिन लंबे समय तक उपेक्षित पक्ष है।
बाद की शोधकर्ता इलिना सेन ने आंदोलन की महिला प्रतिभागियों और जीवित कार्यकर्ताओं के साक्षात्कार के आधार पर दिखाया कि महिलाएं केवल पुरुष आंदोलनकारियों की पत्नियां, माताएं या सहयोगी नहीं थीं। वे उत्पादन, जनसंगठन, प्रतिरोध और बाद के सशस्त्र संघर्ष—सभी में सक्रिय थीं।
कृषि अर्थव्यवस्था में महिलाओं की केंद्रीयता
सवरा समाज में महिलाओं की कृषि भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण थी।
इसलिए भूमि-वियोजन पुरुष किसान की समस्या भर नहीं थी।
जमीन जाने का अर्थ महिला के उत्पादन-संसाधन का भी जाना था।
जंगल पर रोक उसके रोजमर्रा के श्रम को सीधे प्रभावित करती थी।
महिला संगम
गिरिजन संगम के साथ महिलाओं को महिला संगम में संगठित करने का भी प्रयास हुआ। राजनीतिक शिक्षा, बैठकों और सार्वजनिक आंदोलनों में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ी।
इस परिवर्तन को उसके समय के संदर्भ में देखना चाहिए।
महिलाओं का सार्वजनिक रूप से लाल झंडे लेकर राजनीतिक सम्मेलन में जाना स्वयं ग्रामीण सामाजिक व्यवस्था के लिए नया अनुभव था।
लेविडी में महिलाएं
31 अक्टूबर 1967 की लेविडी घटना में महिलाओं की भूमिका इसका बड़ा उदाहरण है।
महिला आंदोलन संबंधी अध्ययन के अनुसार लगभग 400 आदिवासी महिलाओं का एक जत्था सम्मेलन की ओर जा रहा था जब उस पर स्थानीय भूस्वामी समर्थकों ने हमला किया। बाद के संघर्ष में महिलाएं निष्क्रिय दर्शक नहीं रहीं; उन्होंने उपलब्ध साधनों से प्रतिरोध किया।
इस घटना ने स्पष्ट किया कि श्रीकाकुलम में महिला राजनीतिक भागीदारी प्रतीकात्मक नहीं रह गई थी।
भूमिगत चरण में भूमिका
खुले सम्मेलन और जुलूस कठिन होते गए।
पुलिस की गतिविधियों की जानकारी देने वालों की,
भूमिगत कार्यकर्ताओं को आश्रय देने वालों की,
और कहीं-कहीं प्रत्यक्ष गुरिल्ला भागीदारी की।
महिलाओं ने इन सभी भूमिकाओं में हिस्सा लिया।
केवल ‘सहायक’ शब्द पर्याप्त नहीं
क्रांतिकारी संघर्षों के इतिहास में महिलाओं के काम को अक्सर ‘सहयोग’ कहकर छोटा कर दिया जाता है।
लेकिन यदि भूमिगत दस्ता भोजन, आश्रय, रास्तों की जानकारी और स्थानीय संपर्क के बिना टिक नहीं सकता, तो यह काम सैन्य संरचना के बाहर होते हुए भी आंदोलन के अस्तित्व के लिए आवश्यक है।
इसलिए महिलाओं की भूमिका को ग्रामीण समर्थन संरचना के केंद्र में देखना अधिक उचित होगा।
महिला गुरिल्ला और दमन
कुछ महिलाएं सीधे भूमिगत गतिविधियों में भी गईं।
इलिना सेन के अध्ययन में मण्डंगी सायम्मा तथा पट्टी सुक्कु जैसी महिलाओं सहित कई महिला कार्यकर्ताओं का विवरण मिलता है, जिनमें कुछ गिरफ्तार हुईं और बाद में उनकी मौतों को लेकर मुठभेड़ अथवा हिरासत में हत्या के आरोप आंदोलनकारी स्रोतों में दर्ज हुए।
इन मामलों की घटनात्मक प्रकृति पर अलग-अलग स्रोतों की जांच आवश्यक है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि महिलाएं राज्य-दमन के जोखिम से बाहर नहीं थीं।
क्या आंदोलन ने पितृसत्ता तोड़ी?
आंदोलन ने महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में लाया।
उन्हें राजनीतिक भाषण और संगठन में स्थान मिला।
कुछ पारंपरिक सामाजिक मान्यताओं को चुनौती दी गई।
लेकिन आंदोलन ने महिला की स्वतंत्र संपत्ति, विवाह, घरेलू श्रम और नेतृत्व में समानता जैसे सभी प्रश्नों को व्यवस्थित नारीवादी कार्यक्रम के रूप में नहीं उठाया।
इलिना सेन भी इसी जटिलता की ओर संकेत करती हैं—आंदोलन में आधुनिक नारीवादी चेतना नहीं थी, फिर भी उसकी राजनीतिक प्रक्रिया ने पारंपरिक पितृसत्तात्मक संरचना में कुछ दरारें पैदा कीं।
शिक्षक, छात्र और बुद्धिजीवी — ग्रामीण विद्रोह से जुड़ती नई पीढ़ी
श्रीकाकुलम आंदोलन की एक असाधारण विशेषता यह थी कि उसके कई प्रमुख आयोजक शिक्षक थे।
वेंपाटापु सत्यनारायण और आदिभटला कैलासम इसके सबसे प्रसिद्ध उदाहरण हैं। पाल्ले रामुलु भी प्रारंभिक संगठनात्मक कार्य से जुड़े शिक्षक थे। यही शिक्षित निम्न-मध्यवर्गीय परत आदिवासी गांव और आधुनिक राजनीतिक संगठन के बीच सेतु बनी।
शिक्षक की विशिष्ट स्थिति
वह सरकारी व्यवस्था के कुछ नियम जानता था।
और कई मामलों में उसका सामाजिक सम्मान भी था।
इसलिए शिक्षक सामान्य बाहरी पार्टी कार्यकर्ता की तुलना में ग्रामीण संगठन बनाने की बेहतर स्थिति में था।
शिक्षा से राजनीतिक चेतना
गिरिजन संगम ने केवल आर्थिक प्रश्न नहीं उठाए। उपलब्ध शोध में स्कूल स्थापित करने, राजनीतिक शिक्षा देने और पुराने अंधविश्वासों को चुनौती देने का उल्लेख मिलता है।
यहां शिक्षा स्वयं राजनीतिक औजार बन रही थी।
राज्य और वर्ग की राजनीतिक अवधारणाएं जानना—
छात्र और युवा
1967 के बाद नक्सलबाड़ी ने पूरे भारत के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में युवाओं के एक हिस्से को आकर्षित किया।
आंध्र प्रदेश भी इससे अछूता नहीं रहा।
श्रीकाकुलम अब उन युवाओं के लिए एक ऐसी जगह बन गया जहां क्रांतिकारी राजनीति किताब या भाषण के बजाय वास्तविक संघर्ष के रूप में दिखाई देती थी।
कुछ शिक्षित मध्यवर्गीय युवाओं ने अपना सामान्य जीवन छोड़कर आंदोलन में प्रवेश किया।
पंचादि कृष्णमूर्ति इस नई पीढ़ी के चर्चित उदाहरणों में गिने जाते हैं। एक अध्ययन श्रीकाकुलम के सशस्त्र दस्तों में शामिल मध्यवर्गीय युवाओं की चर्चा करते हुए कृष्णमूर्ति का उल्लेख करता है।
बोड्डापाडु और युवाओं का राजनीतिकरण
बाद के शोध में बोड्डापाडु गांव और वहां के विद्यालय को युवाओं के राजनीतिकरण का महत्वपूर्ण केंद्र बताया गया है। वहां सुब्बाराव पाणिग्रही, पंचादि कृष्णमूर्ति, पंचादि निर्मला और अन्य कार्यकर्ताओं से जुड़ा सक्रिय राजनीतिक वातावरण विकसित हुआ।
यह दिखाता है कि आंदोलन का प्रसार केवल आदिवासी पहाड़ियों में नहीं, बल्कि कुछ मैदानी गांवों और शिक्षित युवा नेटवर्कों में भी हुआ।
बुद्धिजीवियों का आकर्षण
श्रीकाकुलम और नक्सलबाड़ी जैसे आंदोलनों ने उस समय के कुछ लेखकों, डॉक्टरों, छात्रों और दूसरे शिक्षित पेशेवरों को प्रभावित किया।
यह पीढ़ी स्वतंत्रता के दो दशक बाद भारतीय लोकतंत्र, गरीबी, भूमि असमानता और सामाजिक न्याय की गति से असंतुष्ट थी।
नक्सलवादी राजनीति ने उन्हें एक कट्टर विकल्प दिया—
व्यवस्था सुधारने के बजाय व्यवस्था बदलने का।
लेकिन शिक्षित युवाओं के प्रवेश में एक विरोधाभास भी था।
उन्होंने संगठन को नए विचार, लेखन, संपर्क और राजनीतिक ऊर्जा दी।
साथ ही आंदोलन के भीतर ऐसी वैचारिक भाषा भी आई जो कई बार स्थानीय आदिवासी अनुभव से अधिक अखिल भारतीय या अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी अवधारणाओं पर आधारित थी।
यही स्थानीय आवश्यकता और वैचारिक क्रांति के बीच तनाव श्रीकाकुलम की पूरी राजनीति में दिखाई देता है।
संस्कृति भी हथियार बनी — गीत, कविता, नाटक और सुब्बाराव पाणिग्रही की विरासत
श्रीकाकुलम आंदोलन को समझने में संस्कृति को परिधीय विषय नहीं माना जा सकता।
गीत, कविता और लोकनाट्य यहां केवल मनोरंजन नहीं थे। वे राजनीतिक संचार, सामूहिक स्मृति और जनसंगठन के साधन बन गए।
इलिना सेन के अध्ययन में यहां तक कहा गया है कि बुर्राकथा और जमुकुल कथा जैसे लोक रूप आंदोलन में जनसंगठन के सबसे महत्वपूर्ण माध्यमों में थे। सत्यनारायण स्वयं गीत लिखते और रचते थे तथा सुब्बाराव पाणिग्रही के गीत और लोकनाट्य बाद में इस क्षेत्र की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बन गए।
लिखित घोषणापत्र की सीमा
आदिवासी और गरीब ग्रामीण आबादी में साक्षरता सीमित थी।
ऐसी स्थिति में लंबा राजनीतिक दस्तावेज कितने लोगों तक पहुंच सकता था?
सुब्बाराव पाणिग्रही
श्रीकाकुलम की क्रांतिकारी सांस्कृतिक परंपरा का सबसे प्रसिद्ध नाम सुब्बाराव पाणिग्रही है।
वे कवि, गीतकार, नाटककार और राजनीतिक कार्यकर्ता थे।
उनकी विशेषता यह थी कि उन्होंने क्रांतिकारी राजनीति को लोककलाओं की भाषा में प्रस्तुत किया।
विशेष रूप से जमुकुल कथा से उनका नाम जुड़ा है। यह गीत और नाटकीय प्रस्तुति का लोक रूप था जिसे उन्होंने समकालीन सामाजिक और राजनीतिक प्रश्नों से जोड़ा। बाद के सांस्कृतिक अध्ययनों में इसे तेलुगु क्रांतिकारी सांस्कृतिक राजनीति के महत्वपूर्ण पूर्ववर्ती के रूप में देखा गया है।
संस्कृति का विषय
गीतों में केवल अमूर्त क्रांति नहीं थी।
इन सबको स्थानीय भाषा में अभिव्यक्ति मिली।
किसी राजनीतिक विचार को तब अधिक शक्ति मिलती है जब जनता उसमें अपने अनुभव को पहचान सके।
पाणिग्रही और दूसरे सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं ने यही किया।
सत्यम मास्टर और राजनीतिक गीत
सत्यनारायण स्वयं भी गीतों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के महत्व को समझते थे।
इससे स्पष्ट है कि श्रीकाकुलम में राजनीतिक संगठन और संस्कृति अलग-अलग गतिविधियां नहीं थीं।
लोकनाट्य राजनीतिक शिक्षा का माध्यम था।
और शहीद की स्मृति गीत के जरिए अगली पीढ़ी तक पहुंचती थी।
संस्कृति में भी परिवर्तन
आंदोलन के अलग चरणों के साथ सांस्कृतिक भाषा भी बदली।
और सामाजिक सुधार पर केंद्रित हो सकते थे।
इससे संस्कृति केवल सामाजिक जागरण नहीं रही; वह क्रांतिकारी वैधता निर्माण का माध्यम बन गई।
सामाजिक सुधार भी सांस्कृतिक राजनीति का हिस्सा
गिरिजन संगम ने केवल आर्थिक प्रश्नों में हस्तक्षेप नहीं किया। अध्ययन बताता है कि भोजन, वस्त्र, स्वास्थ्य, स्वच्छता और कुछ सामाजिक वर्जनाओं के प्रश्नों पर भी परिवर्तन की कोशिश हुई।
इसका अर्थ था कि क्रांति की अवधारणा केवल जमीन बांटने तक सीमित नहीं थी।
नई सामाजिक संस्कृति बनाने की आकांक्षा भी मौजूद थी।
आगे की तेलुगु क्रांतिकारी संस्कृति पर प्रभाव
श्रीकाकुलम की सांस्कृतिक विरासत आंदोलन के दमन के साथ समाप्त नहीं हुई।
1970 में विप्लव रचयितल संघम—विरसम जैसे क्रांतिकारी लेखक संगठनों का उदय हुआ। बाद के वर्षों में जन नाट्य मंडली और गद्दर जैसी सांस्कृतिक परंपराओं ने लोकगीत तथा जनप्रदर्शन को राजनीतिक संचार के शक्तिशाली माध्यम के रूप में विकसित किया।
अध्ययन पाणिग्रही की जमुकुल कथा और बाद की गद्दर-परंपरा के बीच सांस्कृतिक प्रभाव की निरंतरता देखते हैं।
इसलिए श्रीकाकुलम केवल किसान संघर्ष की विरासत नहीं छोड़ता।
वह तेलुगु समाज को एक क्रांतिकारी सांस्कृतिक व्याकरण भी देता है।
खंड 8 का समेकित मूल्यांकन
श्रीकाकुलम आंदोलन की वास्तविक शक्ति किसी एक नेता, राजनीतिक पार्टी या गुरिल्ला दस्ते में नहीं थी।
उसकी शक्ति एक असामान्य सामाजिक गठबंधन में थी।
उसके केंद्र में सवरा और जटापू आदिवासी किसान थे, जिन्होंने जमीन, जंगल और सामाजिक सम्मान के लिए वर्षों तक संगठन बनाया। ये समुदाय तत्कालीन क्षेत्र में आदिवासी आबादी के बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करते थे और विद्रोह की मुख्य सामाजिक रीढ़ बने।
गरीब किसान और खेतिहर मजदूरों ने संघर्ष को भूमि-वापसी से आगे मजदूरी और वर्ग-संबंधों तक पहुंचाया।
महिलाओं ने कृषि उत्पादन से लेकर महिला संगम, जुलूस, प्रतिरोध और भूमिगत नेटवर्क तक आंदोलन को टिकाने में भूमिका निभाई। महिला भागीदारी पर उपलब्ध शोध इस पुराने पुरुष-प्रधान इतिहासलेखन को महत्वपूर्ण रूप से संशोधित करता है।
शिक्षकों ने आदिवासी गांव और राजनीतिक विचारधारा के बीच सेतु का काम किया।
छात्रों और शिक्षित युवाओं के प्रवेश ने आंदोलन को नई ऊर्जा दी, लेकिन साथ ही स्थानीय संघर्ष को अखिल भारतीय क्रांतिकारी विचारों से और गहराई से जोड़ा।
और संस्कृति ने इन सभी समूहों को साझा भाषा प्रदान की।
गीत ने राजनीतिक भाषण का काम किया। लोककथा ने घोषणापत्र का। सभा ने विद्यालय का। और शहीद की स्मृति ने संगठन का।
लेकिन इस सामाजिक विस्तार के भीतर एक गंभीर प्रश्न भी पैदा हुआ।
जैसे-जैसे आंदोलन सशस्त्र और भूमिगत हुआ, उसके व्यापक खुले जनसंगठन की जगह छोटी गुरिल्ला संरचनाओं का महत्व बढ़ने लगा।
इसका प्रभाव केवल नेतृत्व पर नहीं पड़ा।
आदिवासी किसान, महिलाएं, शिक्षक, सांस्कृतिक कार्यकर्ता और पूरे गांव अब राज्य के सुरक्षा अभियान की निगाह में आने लगे।
यानी जिस सामाजिक नेटवर्क ने श्रीकाकुलम को शक्तिशाली बनाया था, वही नेटवर्क अगले चरण में पुलिस दमन का मुख्य लक्ष्य बनने वाला था।
खंड 9 — सरकार, पुलिस और दमन (अध्याय 40–45)
अध्याय 40: आंध्र प्रदेश सरकार की प्रारंभिक प्रतिक्रिया — किसान प्रश्न से कानून-व्यवस्था की समस्या तक अध्याय 41: पुलिस अभियान, जंगल की घेराबंदी और गांवों पर दबाव अध्याय 42: गिरफ्तारियां, हिरासत और ‘मुठभेड़’ विवाद — सरकारी और आंदोलनकारी विवरणों की तुलना अध्याय 43: पंचादि कृष्णमूर्ति और सुब्बाराव पाणिग्रही — 1969 में नेतृत्व पर निर्णायक प्रहार अध्याय 44: वेंपाटापु सत्यनारायण और आदिभटला कैलासम — जुलाई 1970 की मौतें और विवाद अध्याय 45: नेतृत्व-विहीन होता आंदोलन — दमन, गिरफ्तारियां और ग्रामीण नेटवर्क का टूटना
इसके बाद खंड 10 — आंदोलन की पराजय और उसके कारण (अध्याय 46–50) में यह विश्लेषण होगा कि इतने मजबूत स्थानीय सामाजिक आधार के बावजूद श्रीकाकुलम का सशस्त्र चरण कुछ ही वर्षों में क्यों कमजोर पड़ गया।
सरकार, पुलिस और दमन
श्रीकाकुलम आंदोलन के 1968–70 के चरण को केवल किसान–आदिवासी विद्रोह की दृष्टि से नहीं समझा जा सकता। जैसे-जैसे आंदोलन खुले जनसंगठन से गुरिल्ला कार्रवाइयों, भूस्वामियों पर हमलों, हथियारों की जब्ती और पुलिस से सीधे टकराव की ओर बढ़ा, वैसे-वैसे आंध्र प्रदेश सरकार की दृष्टि भी बदलती गई। जो समस्या पहले भूमि-अधिकार, साहूकारी, मजदूरी और आदिवासी प्रशासन से जुड़ी थी, वह अब कानून-व्यवस्था और अंततः आंतरिक सुरक्षा का प्रश्न बन गई।
राज्य की प्रतिक्रिया के दो पहलू साथ-साथ चले। एक ओर अनुसूचित क्षेत्रों की भूमि-सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने जैसे सुधारात्मक उपाय हुए; दूसरी ओर बड़े पैमाने पर पुलिस अभियान, गिरफ्तारियां, तलाशी, भूमिगत नेतृत्व की खोज और मुठभेड़ों में मौतें हुईं।
इसी दौर में श्रीकाकुलम आंदोलन के लगभग पूरे शीर्ष नेतृत्व को समाप्त कर दिया गया या गिरफ्तार कर लिया गया। पंचादि कृष्णमूर्ति, सुब्बाराव पाणिग्रही, वेंपाटापु सत्यनारायण और आदिभटला कैलासम जैसे नेताओं की मौतों को पुलिस ने सामान्यतः सशस्त्र मुठभेड़ों का परिणाम बताया, जबकि आंदोलनकारी और कई बाद के अध्ययनों में आरोप लगाया गया कि उनमें से अनेक को पकड़ने के बाद मारकर ‘मुठभेड़’ घोषित किया गया। इसलिए इस अध्याय में दोनों प्रकार के दावों के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है।
आंध्र प्रदेश सरकार की प्रारंभिक प्रतिक्रिया — किसान प्रश्न से कानून-व्यवस्था की समस्या तक
श्रीकाकुलम के प्रारंभिक गिरिजन आंदोलन और उसके सशस्त्र चरण पर राज्य की प्रतिक्रिया समान नहीं थी।
1950 और 1960 के दशक के शुरुआती वर्षों में आदिवासी भूमि-वियोजन, ऋणग्रस्तता और मजदूरी की समस्या को मुख्यतः प्रशासनिक तथा विकासात्मक प्रश्न के रूप में देखा जा सकता था। इसके लिए भूमि हस्तांतरण पर नियंत्रण, आदिवासी कल्याण और अनुसूचित क्षेत्र प्रशासन जैसी व्यवस्थाएं मौजूद थीं।
लेकिन जैसे-जैसे गिरिजन संगम स्थानीय साहूकारों और भूस्वामियों की सत्ता को चुनौती देने लगा, संघर्ष अधिक राजनीतिक होने लगा।
1967 के बाद बदलाव
लेविडी में कोरन्ना और मंगन्ना की हत्या और उसके बाद हुए प्रतिरोध ने परिस्थिति बदल दी।
1968 में जब सशस्त्र दस्ते बनने लगे और नवंबर से संगठित गुरिल्ला कार्रवाइयां प्रारंभ हुईं, तो प्रशासन के सामने चुनौती केवल यह नहीं थी कि किसी आदिवासी किसान की जमीन किसके नाम दर्ज है।
और कुछ गांवों में आंदोलनकारी समितियों का बढ़ता प्रभाव।
राज्य के लिए यह अब सामान्य किसान आंदोलन नहीं रह गया था।
‘कानून-व्यवस्था’ की दृष्टि
सरकार और पुलिस ने आंदोलन को क्रमशः ऐसी संगठित हिंसक चुनौती के रूप में देखना शुरू किया जिसका उद्देश्य स्थानीय प्रशासन की वैधता और राज्य की सत्ता को तोड़ना था।
यह दृष्टिकोण पूरी तरह निराधार भी नहीं था।
CPI(ML) स्वयं संसदीय राज्य को उखाड़ने और सशस्त्र क्रांति स्थापित करने की घोषणा कर रही थी। चारु मजूमदार श्रीकाकुलम को संभावित क्रांतिकारी आधार-क्षेत्र के रूप में देख रहे थे।
इसलिए 1969 तक दोनों पक्षों के लक्ष्य मूलतः असंगत हो चुके थे।
आंदोलन राज्य को वर्गीय दमन का उपकरण मान रहा था।
राज्य आंदोलन को अपनी संप्रभु सत्ता के लिए चुनौती मान रहा था।
सामाजिक प्रश्न पीछे छूटने लगा
यही वह बिंदु था जहां सबसे बड़ी विडंबना पैदा हुई।
भूमि-वियोजन, साहूकारी और आदिवासी शोषण—जिनसे संघर्ष शुरू हुआ था—वे प्रश्न सुरक्षा विमर्श के पीछे दबने लगे।
इस प्रकार आंदोलन का सामाजिक कारण और उसका सुरक्षा परिणाम दो अलग विमर्श बन गए।
पुलिस अभियान, जंगल की घेराबंदी और गांवों पर दबाव
श्रीकाकुलम की पहाड़ियों में गुरिल्ला आंदोलन के विस्तार ने पुलिस के सामने एक कठिन परिचालन चुनौती पैदा की।
जंगल और पहाड़ी रास्तों की स्थानीय जानकारी आदिवासी कार्यकर्ताओं के पास थी।
और गुरिल्ला दस्ता सामान्य स्थायी सैन्य इकाई की तरह किसी एक स्थान पर नहीं रहता था।
इसलिए पुलिस अभियान का लक्ष्य केवल सशस्त्र दस्तों से लड़ना नहीं रहा; उनके ग्रामीण समर्थन तंत्र को अलग करना भी महत्वपूर्ण हो गया।
खोज और घेराबंदी अभियान
1969 में पुलिस कार्रवाई तीव्र हुई। बाद के ऐतिहासिक अध्ययनों में अक्टूबर 1969 से बड़े स्तर की “encirclement and suppression” कार्रवाई का उल्लेख मिलता है।
जंगल और पहाड़ी क्षेत्रों में तलाशी,
भूमिगत कार्यकर्ताओं की जानकारी जुटाना,
रास्तों और संपर्क बिंदुओं पर नियंत्रण,
गिरफ्तार कार्यकर्ताओं से सूचना प्राप्त करना,
और स्थानीय मुखबिर नेटवर्क विकसित करना।
गुरिल्ला और गांव का संबंध
गुरिल्ला दस्ता जनता के सहयोग के बिना लंबे समय तक नहीं टिक सकता।
इसलिए सुरक्षा बलों का लक्ष्य धीरे-धीरे केवल बंदूकधारी कार्यकर्ता नहीं रहा।
गांव स्वयं संघर्ष का रणक्षेत्र बन गया।
ग्रामीण आबादी पर दबाव
बाद के अध्ययनों में ऐसे उपायों का उल्लेख मिलता है जिनमें आदिवासी ग्रामीणों की आवाजाही नियंत्रित करने और गुरिल्लाओं से संपर्क काटने की कोशिश की गई। कुछ क्षेत्रों में ग्रामीण आबादी को नियंत्रित अथवा पुनर्गठित बस्तियों में रखने जैसी रणनीतियों का भी उल्लेख मिलता है। इन विवरणों की स्थानीय सीमा और समय को लेकर अलग-अलग स्रोतों में अंतर है, इसलिए पूरे श्रीकाकुलम क्षेत्र पर एक समान नीति लागू होने का दावा सावधानी से करना चाहिए।
लेकिन व्यापक रणनीतिक उद्देश्य स्पष्ट था—
पुलिस अभियान का प्रभाव
इस नीति का आंदोलन पर गंभीर असर पड़ा।
भूमिगत नेताओं के लिए गांवों में सुरक्षित रहना कठिन हुआ।
गिरफ्तारी के भय से सामान्य ग्रामीण भी दूरी बनाने लगे।
यानी राज्य ने सैन्य रूप से गुरिल्ला को हराने से पहले उसकी सामाजिक ऑक्सीजन काटने का प्रयास किया।
गिरफ्तारियां, हिरासत और ‘मुठभेड़’ विवाद
श्रीकाकुलम आंदोलन के इतिहास का सबसे विवादास्पद पहलू पुलिस ‘मुठभेड़ों’ का प्रश्न है।
यहां भाषा का सावधानीपूर्वक उपयोग आवश्यक है।
पुलिस और सरकारी विवरणों में अनेक नेता सशस्त्र मुठभेड़ों में मारे गए बताए गए।
दूसरी ओर आंदोलनकारी स्रोतों, मानवाधिकार साहित्य और कुछ बाद के अकादमिक अध्ययनों में आरोप लगाया गया कि कई कार्यकर्ताओं को पहले गिरफ्तार किया गया, फिर जंगल या पहाड़ी क्षेत्रों में ले जाकर मार दिया गया और बाद में उनकी मृत्यु को मुठभेड़ बताया गया।
‘एन्काउंटर’ शब्द का राजनीतिक अर्थ
इलिना सेन के श्रीकाकुलम संबंधी अध्ययन में पंचादि कृष्णमूर्ति और छह अन्य की मई 1969 की मौत का विवरण इसी संदर्भ में दिया गया है। अध्ययन का दावा है कि उन्हें 27 मई 1969 को कंचिली रेलवे स्टेशन के पास पकड़कर जलंतराकोटा पहाड़ियों की ओर ले जाया गया और बाद में पुलिस ने उनकी मृत्यु को ‘मुठभेड़’ बताया।
यही अध्ययन तर्क देता है कि श्रीकाकुलम के दौरान ‘encounter’ शब्द भारतीय राजनीतिक शब्दावली में उस विवादास्पद अर्थ में प्रमुख हुआ जिसमें हिरासत के बाद हत्या को मुठभेड़ के रूप में प्रस्तुत करने का आरोप लगाया जाता है।
आधिकारिक पक्ष
दूसरी ओर पुलिस का सामान्य तर्क यह था कि वह सशस्त्र भूमिगत दस्तों से लड़ रही थी।
गुरिल्ला कार्यकर्ता हथियार लेकर चलते थे।
उन्होंने भूस्वामियों और पुलिस पर हमले किए थे।
इसलिए तलाशी या पीछा करने के दौरान गोलीबारी और मौत संभव थी।
इतिहासकार के लिए चुनौती यही है कि प्रत्येक घटना में स्वतंत्र दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं।
इसलिए हर पुलिस मुठभेड़ को स्वतः फर्जी कहना भी उचित नहीं और हर आधिकारिक मुठभेड़ विवरण को निर्विवाद सत्य मानना भी उचित नहीं।
बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी
1969–70 में गिरफ्तारियों का दायरा बढ़ता गया।
सिर्फ गुरिल्ला दस्तों के सदस्य ही नहीं बल्कि—
कुछ बाद के अध्ययनों में अगस्त 1970 तक 1,600 से अधिक संदिग्ध विद्रोहियों/कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी का अनुमान मिलता है, हालांकि आंकड़ों के स्रोत और परिभाषा अलग-अलग होने के कारण इसे सटीक सार्वभौमिक संख्या मानने के बजाय एक संकेतक के रूप में लेना उचित है।
दमन का मनोवैज्ञानिक प्रभाव
गिरफ्तारी केवल संगठनात्मक नुकसान नहीं थी।
यदि किसी परिवार का सदस्य भूमिगत हो तो पूरे परिवार पर निगरानी बढ़ सकती थी।
यदि कोई कार्यकर्ता गिरफ्तार हो जाए तो उससे संगठन के संपर्कों की जानकारी मिलने का खतरा होता था।
गुरिल्ला आंदोलन के लिए यह लगातार बढ़ता सुरक्षा संकट था।
पंचादि कृष्णमूर्ति और सुब्बाराव पाणिग्रही — 1969 में नेतृत्व पर निर्णायक प्रहार
1969 श्रीकाकुलम आंदोलन के लिए विस्तार का भी वर्ष था और विनाश का भी।
इसी वर्ष राज्य ने आंदोलन की दूसरी पंक्ति के ऐसे नेताओं पर गंभीर प्रहार किया जो गुरिल्ला कार्रवाइयों, छात्र-युवा संपर्क और सांस्कृतिक राजनीति को जोड़ रहे थे।
पंचादि कृष्णमूर्ति
पंचादि कृष्णमूर्ति बोड्डापाडु से जुड़े शिक्षित युवा क्रांतिकारी थे। वे उन मध्यवर्गीय युवाओं में थे जिन्होंने आदिवासी किसान संघर्ष के साथ स्वयं को जोड़ते हुए भूमिगत सशस्त्र राजनीति अपनाई।
मई 1969 में उनकी मृत्यु आंदोलन के लिए बड़ा आघात थी।
विश्वसनीय आधुनिक समाचार समयरेखा भी 26–27 मई 1969 को पुलिस कार्रवाई में कृष्णमूर्ति और छह अन्य क्रांतिकारियों की मौत दर्ज करती है।
लेकिन मृत्यु की परिस्थितियां विवादित हैं।
जैसा ऊपर उल्लेख किया गया, इलिना सेन के अध्ययन का दावा है कि उन्हें और साथियों को पुलिस ने पहले पकड़ लिया था और बाद में गोली मारकर मुठभेड़ घोषित किया।
नेतृत्व पर प्रभाव
कृष्णमूर्ति केवल बंदूकधारी कार्यकर्ता नहीं थे।
वे ग्रामीण आंदोलन और नए शिक्षित क्रांतिकारी युवाओं के बीच संपर्क का प्रतीक थे।
उनकी मृत्यु से संगठन ने ऐसे कैडर को खोया जो राजनीतिक कार्य और गुरिल्ला गतिविधि दोनों से जुड़ा था।
सुब्बाराव पाणिग्रही
1969 के अंत में दूसरा बड़ा आघात आया।
सुब्बाराव पाणिग्रही, जिन्होंने कविता, गीत और लोकनाट्य के जरिए श्रीकाकुलम आंदोलन को सांस्कृतिक आवाज दी थी, पुलिस कार्रवाई में मारे गए।
उनकी मृत्यु की तारीख को लेकर स्रोतों में कुछ असंगति मिलती है। कुछ पुलिस-संबंधी और राजनीतिक स्रोत 22 दिसंबर 1969 बताते हैं, जबकि कुछ लोकप्रिय विवरण 1969 के अंतिम महीनों की दूसरी तारीखें देते हैं। एक बाद का अकादमिक इतिहास उन्हें दिसंबर 1969 में पुलिस द्वारा मारे गए प्रमुख कार्यकर्ताओं में रखता है।
इसीलिए निश्चित तारीख देते समय 22 दिसंबर 1969 सबसे अधिक उद्धृत तिथियों में है, परंतु घटनास्थल और गिरफ्तारी–मुठभेड़ की परिस्थितियों पर स्रोतभेद दर्ज करना चाहिए।
पाणिग्रही की मौत क्यों विशेष थी?
उनके साथ केवल एक भूमिगत नेता नहीं मरा।
आंदोलन ने अपना सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक प्रचारक खोया।
लोकगीत और राजनीतिक संदेश के बीच जो सेतु उन्होंने बनाया था, उसकी तत्काल भरपाई आसान नहीं थी।
उनकी मृत्यु ने यह भी दिखाया कि राज्य अभियान का लक्ष्य केवल हथियारबंद लड़ाके नहीं थे।
राजनीतिक और सांस्कृतिक नेतृत्व भी लक्ष्य बन चुका था।
1969 : क्रमिक नेतृत्व-विनाश
मई से दिसंबर 1969 के बीच पंचादि कृष्णमूर्ति, तमादा गणपति, पाणिग्रही और कई अन्य प्रमुख कार्यकर्ता मारे गए। विभिन्न स्रोत नाम और तारीखों की अलग-अलग सूची देते हैं, लेकिन व्यापक तथ्य निर्विवाद है कि 1969 के दौरान श्रीकाकुलम के मध्य और स्थानीय नेतृत्व को भारी क्षति हुई।
अब आंदोलन अत्यधिक निर्भर हो गया था—
वेंपाटापु सत्यनारायण और आदिभटला कैलासम — जुलाई 1970 की मौतें
श्रीकाकुलम आंदोलन के सशस्त्र चरण का वास्तविक निर्णायक मोड़ 10–11 जुलाई 1970 था।
इसी दौरान आंदोलन के दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण नेता—
वेंपाटापु सत्यनारायण और आदिभटला कैलासम
CPI(ML) की अपनी ऐतिहासिक समयरेखा 10–11 जुलाई को दोनों नेताओं को पकड़कर पुलिस द्वारा मार दिए जाने का दावा करती है। आधुनिक समाचार समयरेखाएं भी 10 जुलाई 1970 को दोनों की पुलिस मुठभेड़ में मौत दर्ज करती हैं।
बोरिकोंडा/बोरी पहाड़ियों का घटनाक्रम
कई बाद के स्रोत इस घटना को श्रीकाकुलम क्षेत्र की बोरी या बोरिकोंडा पहाड़ियों से जोड़ते हैं।
पुलिस का विवरण इसे मुठभेड़ बताता था।
नक्सलवादी स्रोतों का आरोप था कि दोनों नेता पकड़े जाने के बाद मारे गए।
यही विवाद श्रीकाकुलम की अन्य प्रमुख मौतों की तरह यहां भी मौजूद है।
निश्चित रूप से क्या कहा जा सकता है?
इतिहास की दृष्टि से तीन बातें अपेक्षाकृत स्पष्ट हैं।
पहली—दोनों नेता 10–11 जुलाई 1970 के पुलिस अभियान में मारे गए।
दूसरी—वे उस समय श्रीकाकुलम आंदोलन और CPI(ML) दोनों के महत्वपूर्ण नेतृत्व में थे।
तीसरी—उनकी मृत्यु के बाद आंदोलन तेजी से कमजोर हुआ।
मृत्यु का सटीक घटनाक्रम—पहले गिरफ्तारी हुई या वास्तविक गोलीबारी में मारे गए—विवादित है और इसे दावे के रूप में ही लिखा जाना चाहिए।
सत्यनारायण की क्षति
वेंपाटापु सत्यनारायण की भूमिका असाधारण थी।
उन्होंने वर्षों तक आदिवासी किसानों के बीच काम किया था।
वे गिरिजन जनआंदोलन के पुराने नेता थे।
बाद में गुरिल्ला संघर्ष के नेता बने।
और फिर CPI(ML) के केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचे।
इसलिए वे केवल सैन्य कमांडर नहीं थे।
उनके पास वह सामाजिक वैधता थी जो एक दशक के संगठनात्मक काम से बनी थी।
उनकी मौत ने आंदोलन से उसकी सबसे मजबूत जनसंगठनात्मक स्मृति छीन ली।
कैलासम की क्षति
आदिभटला कैलासम संगठन, राजनीति और सशस्त्र रणनीति के दूसरे प्रमुख स्तंभ थे।
1970 में वे CPI(ML) की आंध्र इकाई और केंद्रीय नेतृत्व से भी जुड़े थे।
इसलिए सत्यनारायण और कैलासम का एक साथ समाप्त होना केवल दो व्यक्तियों की मृत्यु नहीं थी।
यह लगभग पूरे शीर्ष नेतृत्व के एक साथ समाप्त हो जाने जैसा था।
आंदोलन का मनोबल
गुरिल्ला आंदोलन में शीर्ष नेता केवल आदेश नहीं देता।
स्थानीय कार्यकर्ता उस पर भरोसा करते हैं।
उसकी मृत्यु से पूरा नेटवर्क अस्थिर हो सकता है।
CPI(ML) की अपनी बाद की समयरेखा भी मानती है कि जुलाई 1970 में दोनों की मृत्यु के बाद श्रीकाकुलम गुरिल्ला क्षेत्र को गंभीर उलटफेर का सामना करना पड़ा।
नेतृत्व-विहीन होता आंदोलन — दमन, गिरफ्तारियां और ग्रामीण नेटवर्क का टूटना
जुलाई 1970 तक राज्य की रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम सामने आ चुका था।
लगभग तीन वर्षों में आंदोलन ने अपने अधिकांश चर्चित नेतृत्व को खो दिया था।
अन्य अनेक कार्यकर्ता मारे गए या जेल में थे।
केवल नेता नहीं, संरचना टूटी
किसी गुरिल्ला आंदोलन को केवल शीर्ष नेता के नामों से नहीं चलाया जा सकता।
पुलिस अभियान ने धीरे-धीरे इसी नेटवर्क को निशाना बनाया।
अनेक गिरफ्तारियां और लगातार तलाशी ने भूमिगत नेतृत्व और गांवों के संपर्क को कमजोर किया।
भय और थकान
यदि किसी गांव में पुलिस बार-बार आए,
और सशस्त्र कार्रवाई का जवाब पूरे गांव को भुगतना पड़े,
तो आंदोलन की सामाजिक लागत बढ़ती जाती है।
जो गांव पहले संगम के खुले सम्मेलन में निर्भय होकर आते थे, वे अब सुरक्षा अभियान के बीच फंस गए।
जनसंगठन की कमजोरी का प्रभाव
यहीं आंदोलन की रणनीतिक समस्या सामने आई।
सशस्त्र चरण में गुरिल्ला दस्तों का महत्व बढ़ा और खुले संगठन सिकुड़ते गए।
जब पुलिस ने गुरिल्ला नेतृत्व को समाप्त करना शुरू किया, तब उसके स्थान पर मजबूत स्वतंत्र जनसंस्थाएं पर्याप्त रूप से मौजूद नहीं थीं जो आंदोलन को दूसरे रूप में जारी रख सकें।
यानी नेतृत्व खत्म हुआ तो संगठन का बड़ा हिस्सा भी तेजी से बिखर गया।
दमन अकेला कारण नहीं था
यह कहना भी अधूरा होगा कि आंदोलन केवल इसलिए पराजित हुआ क्योंकि राज्य अधिक शक्तिशाली था।
दमन निर्णायक था, लेकिन उसके प्रभाव को कई आंतरिक कमजोरियों ने बढ़ाया—
‘वर्ग शत्रु सफाया’ पर बढ़ती निर्भरता,
और किसान आंदोलन को लंबे राजनीतिक संघर्ष के बजाय तीव्र क्रांतिकारी युद्ध में बदलने की कोशिश।
इन प्रश्नों का विस्तृत विश्लेषण अगले खंड में होगा।
क्या आंदोलन समाप्त हो गया?
1970 में आंदोलन सैन्य और संगठनात्मक रूप से गंभीर रूप से टूट गया।
लेकिन जिस सामाजिक संकट ने उसे जन्म दिया था, वह समाप्त नहीं हुआ।
आदिवासी भूमि-वियोजन का प्रश्न बना रहा।
अनुसूचित क्षेत्रों की भूमि-सुरक्षा अभी भी महत्वपूर्ण थी।
और राज्य स्वयं इसी दौर में भूमि हस्तांतरण कानून को अधिक कठोर करने की दिशा में गया।
इसलिए 1970 को श्रीकाकुलम के सशस्त्र विद्रोह की पराजय कहा जा सकता है, लेकिन आदिवासी भूमि और सामाजिक न्याय के प्रश्न की समाप्ति नहीं।
खंड 9 का समेकित मूल्यांकन
श्रीकाकुलम में राज्य और आंदोलन के संबंध का इतिहास एक महत्वपूर्ण विरोधाभास प्रस्तुत करता है।
आंदोलन की शुरुआत उन समस्याओं से हुई थी जिन्हें स्वयं भारतीय राज्य सामाजिक न्याय के प्रश्न के रूप में स्वीकार करता था—
और अनुसूचित क्षेत्रों में कमजोर समुदायों की सुरक्षा।
लेकिन जब आंदोलन ने हथियार उठाए, लोगों की हत्याएं कीं, गुरिल्ला दस्ते बनाए और राज्य सत्ता को उखाड़ने का लक्ष्य घोषित किया, तब सरकार की प्रतिक्रिया भी विकास और भूमि सुधार की भाषा से हटकर सुरक्षा और पुलिस कार्रवाई की ओर चली गई।
1969–70 में पुलिस अभियान का परिणाम अत्यंत प्रभावशाली था।
और जुलाई 1970 में सत्यनारायण तथा कैलासम की मृत्यु के बाद आंदोलन तेजी से बिखरने लगा।
लेकिन इस दमन के तरीकों पर गंभीर विवाद भी छोड़ा गया।
विशेष रूप से पंचादि कृष्णमूर्ति और अन्य कार्यकर्ताओं की मौतों के बारे में बाद के अध्ययनों ने हिरासत के बाद हत्या और उसे ‘मुठभेड़’ बताने के आरोप दर्ज किए।
इसलिए श्रीकाकुलम का इतिहास दो अतियों से बचकर लिखा जाना चाहिए।
यह कहना गलत होगा कि पुलिस पूरी तरह एक शांतिपूर्ण किसान आंदोलन को ही कुचल रही थी—क्योंकि 1968 के बाद वास्तविक सशस्त्र गुरिल्ला संघर्ष और लक्षित हिंसा मौजूद थी।
लेकिन यह मान लेना भी उतना ही समस्याग्रस्त होगा कि राज्य द्वारा की गई प्रत्येक कार्रवाई केवल वैध और नियमित पुलिस मुठभेड़ थी—क्योंकि हिरासत, गैर-न्यायिक हत्या और मुठभेड़ के रूप में प्रस्तुत किए जाने के गंभीर आरोप अनेक ऐतिहासिक स्रोतों में दर्ज हैं।
यही संतुलन श्रीकाकुलम की दमन-कथा को समझने की कुंजी है।
अंततः सरकार सशस्त्र आंदोलन को दबाने में सफल हुई।
लेकिन इससे एक और प्रश्न पैदा होता है—
यदि आंदोलन का सामाजिक आधार इतना मजबूत था, तो कुछ वर्षों के दमन में वह इतनी तेजी से क्यों टूट गया?
इसका उत्तर केवल पुलिस की ताकत में नहीं मिलेगा।
उसके लिए आंदोलन की अपनी रणनीति और कमजोरियों को भी देखना होगा।
खंड 10 — आंदोलन की पराजय और उसके कारण (अध्याय 46–50)
अध्याय 46: 1970–71 तक आंदोलन क्यों कमजोर पड़ा? — दमन, नेतृत्व की क्षति और संगठनात्मक विघटन अध्याय 47: जनसंगठन से दूरी — गिरिजन संगम की शक्ति से गुरिल्ला-केंद्रित राजनीति तक अध्याय 48: ‘वर्ग शत्रु सफाया’ की सीमाएं — भय, प्रतिहिंसा और सामाजिक आधार का संकुचन अध्याय 49: भारतीय परिस्थितियों में चीनी क्रांति का मॉडल — येनान की कल्पना और श्रीकाकुलम की वास्तविकता अध्याय 50: क्या श्रीकाकुलम वास्तव में पराजित हुआ? — सैन्य विफलता बनाम भूमि-अधिकार और राजनीतिक चेतना की विरासत
इसके बाद खंड 11 — भूमि कानून और आदिवासी अधिकार (अध्याय 51–54) में 1959 के अनुसूचित क्षेत्र भूमि हस्तांतरण विनियमन, Regulation I of 1970 (‘1/70 कानून’), आंदोलन और कानूनी सुधार के संबंध तथा उसके क्रियान्वयन की सीमाओं का विस्तृत अध्ययन आएगा।
आंदोलन की पराजय और उसके कारण
श्रीकाकुलम आंदोलन की सबसे बड़ी ऐतिहासिक पहेली यह है कि जिस आंदोलन ने लगभग एक दशक तक आदिवासी किसानों के बीच संगठन बनाया, भूमि-वापसी और मजदूरी जैसे प्रश्नों पर ठोस सामाजिक शक्ति अर्जित की और 1968–69 में भारतीय नक्सलवादी आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में स्थान बना लिया, वह 1970–71 तक इतनी तेजी से क्यों कमजोर पड़ गया?
राज्य-दमन निर्णायक था, लेकिन अकेला कारण नहीं। पुलिस ने शीर्ष नेतृत्व को समाप्त किया, बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया और गुरिल्ला दस्तों तथा गांवों के बीच संपर्क काटने की कोशिश की। साथ ही आंदोलन के भीतर भी ऐसी रणनीतिक कमजोरियां विकसित हुईं जिन्होंने राज्य की कार्रवाई को अधिक प्रभावी बना दिया।
इनमें प्रमुख थीं—खुले जनसंगठनों का कमजोर पड़ना, गुरिल्ला कार्रवाई पर बढ़ती निर्भरता, ‘वर्ग शत्रुओं के सफाये’ को आवश्यकता से अधिक महत्व, सीमित भौगोलिक आधार, हथियार और संसाधनों की कमी, तेजी से क्रांतिकारी परिस्थिति विकसित होने का अतिशय आशावाद और चीनी क्रांति के अनुभव को भारतीय परिस्थितियों पर यांत्रिक ढंग से लागू करने की प्रवृत्ति।
यदि पराजय का अर्थ केवल राज्य सत्ता पर कब्जा करना है, तो श्रीकाकुलम स्पष्ट रूप से विफल हुआ।
यदि कसौटी यह है कि क्या उसने आदिवासी भूमि, सामाजिक न्याय और ग्रामीण सत्ता-संबंधों को स्थायी रूप से राजनीतिक प्रश्न बनाया, तो उसकी कहानी कहीं अधिक जटिल है।
1970–71 तक आंदोलन क्यों कमजोर पड़ा? — दमन, नेतृत्व की क्षति और संगठनात्मक विघटन
1970 की गर्मियों तक श्रीकाकुलम का सशस्त्र आंदोलन अपने चरम से उतरने लगा था। जुलाई में वेंपाटापु सत्यनारायण और आदिभटला कैलासम की मौत ने उस नेतृत्व को लगभग समाप्त कर दिया जिसने वर्षों से आदिवासी समाज, गिरिजन संगम और बाद की CPI(ML) राजनीति के बीच संबंध बनाए रखा था।
इससे पहले 1969 में पंचादि कृष्णमूर्ति, सुब्बाराव पाणिग्रही और अनेक प्रमुख कार्यकर्ता मारे जा चुके थे।
नेतृत्व की असाधारण क्षति
किसी भी आंदोलन में नेताओं की मृत्यु महत्वपूर्ण होती है, लेकिन श्रीकाकुलम में इसका प्रभाव अधिक इसलिए पड़ा क्योंकि संगठन का राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व अपेक्षाकृत छोटे समूह में केंद्रित हो गया था।
सत्यनारायण जैसे नेता की भूमिका कई स्तरों पर थी।
आदिवासी किसान उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानते थे।
वे कम्युनिस्ट राजनीति की भाषा समझते थे।
उन्होंने सशस्त्र संघर्ष की दिशा स्वीकार की थी।
और वे CPI(ML) के राष्ट्रीय नेतृत्व से जुड़े थे।
ऐसे व्यक्ति की जगह केवल नया सैन्य कमांडर नियुक्त करके नहीं भरी जा सकती थी।
सामाजिक पूंजी का नुकसान
आंदोलन में कुछ नेतृत्व वर्षों में तैयार होता है।
एक शिक्षक गांव में दस वर्ष काम करता है।
भूमि विवाद में किसान के साथ खड़ा होता है।
उसके बाद जो विश्वास बनता है, वह पार्टी आदेश से दूसरे व्यक्ति को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता।
सत्यनारायण और कैलासम की मृत्यु से श्रीकाकुलम ने इसी सामाजिक पूंजी का बड़ा हिस्सा खो दिया।
गिरफ्तारियों का प्रभाव
पुलिस कार्रवाई का दूसरा लक्ष्य मध्य और निचले स्तर का संगठन था।
यदि केवल शीर्ष नेता मारा जाए लेकिन गांव समितियां और स्थानीय संगम मजबूत बने रहें, तो आंदोलन नए नेतृत्व के साथ पुनर्गठित हो सकता है।
खुफिया बढ़त
भूमिगत आंदोलन के विरुद्ध राज्य की सबसे बड़ी शक्ति केवल हथियार नहीं होती।
गिरफ्तारी से नया संपर्क पता चलता है।
किसी संपर्क से दूसरे गांव की जानकारी मिलती है।
स्थानीय मुखबिर रास्तों और आश्रयों की सूचना देता है।
धीरे-धीरे भूमिगत संगठन का गोपनीय नक्शा राज्य के सामने खुलने लगता है।
इस प्रक्रिया ने पुलिस को उन नेताओं तक पहुंचने में सहायता की जो पहाड़ी क्षेत्र और ग्रामीण समर्थन के कारण पहले अपेक्षाकृत सुरक्षित थे।
लगातार भूमिगत रहने की कठिनाई
गुरिल्ला जीवन रोमांटिक राजनीतिक साहित्य में जितना सरल दिखाई देता है, व्यवहार में उतना नहीं होता।
श्रीकाकुलम जैसे सीमित भूगोल में पुलिस का दबाव बढ़ने के बाद यह सब अधिक कठिन होता गया।
ग्रामीण जनता पर लागत
आंदोलन को टिकाने की कीमत केवल गुरिल्लाओं ने नहीं चुकाई।
यदि किसी परिवार ने भूमिगत कार्यकर्ता को भोजन दिया और पुलिस को पता चल गया, तो उस परिवार पर कार्रवाई हो सकती थी।
यदि गांव में गुरिल्ला दस्ता आया तो गांव पुलिस निगरानी में आ सकता था।
यही परिस्थिति जनता के सामने कठिन चुनाव रखती थी—
राजनीतिक निष्ठा बनाए रखें या परिवार और आजीविका की सुरक्षा करें?
समय के साथ बड़ी संख्या में सामान्य ग्रामीणों के लिए दूसरा विकल्प अधिक महत्वपूर्ण होना स्वाभाविक था।
जनसंगठन से दूरी — गिरिजन संगम की शक्ति से गुरिल्ला-केंद्रित राजनीति तक
श्रीकाकुलम आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण आंतरिक कमजोरी को समझने के लिए उसकी शुरुआत की ओर लौटना होगा।
यही संगठन हजारों आदिवासी किसानों को खुले राजनीतिक जीवन में लाया था।
शुरुआती राजनीति
प्रारंभिक दौर में आंदोलन का तरीका था—
इस प्रकार आंदोलन के निर्णयों और कार्रवाई में ग्रामीण समाज की प्रत्यक्ष भागीदारी थी।
गुरिल्ला चरण में परिवर्तन
1968 के बाद सुरक्षा परिस्थितियां बदलने लगीं।
सशस्त्र कार्रवाई के लिए छोटे समूहों की जरूरत थी।
इससे व्यापक जनसंगठन और भूमिगत सैन्य संगठन के बीच संतुलन बदलने लगा।
CPI(ML) की प्रारंभिक रणनीतिक सोच
CPI(ML) के शुरुआती नेतृत्व में एक मजबूत धारणा विकसित हुई कि क्रांतिकारी हिंसा स्वयं किसान जनता की चेतना को ऊंचा करेगी।
विशेष रूप से ‘वर्ग शत्रुओं के सफाये’ को ग्रामीण भय तोड़ने और राजनीतिक सत्ता के प्रश्न को सामने लाने का माध्यम माना गया।
यदि छोटा दस्ता जनता की ओर से कार्रवाई करने लगे, तो जनता सक्रिय राजनीतिक कर्ता से धीरे-धीरे समर्थक दर्शक बन सकती है।
मास लाइन का प्रश्न
यही मुद्दा बाद में माओवादी और नक्सलवादी राजनीति के भीतर “मास लाइन” की बहस का केंद्र बना।
जनता की राजनीतिक चेतना और संगठन से सशस्त्र संघर्ष पैदा होगा?
या सशस्त्र संघर्ष से जनता की राजनीतिक चेतना पैदा होगी?
श्रीकाकुलम का प्रारंभिक अनुभव पहले रास्ते के पक्ष में मजबूत प्रमाण देता था।
वर्षों के जनसंगठन के बाद ही आंदोलन उस स्तर तक पहुंचा था जहां व्यापक ग्रामीण प्रतिरोध संभव हुआ।
इसके बावजूद बाद के चरण में दूसरा रास्ता अधिक प्रभावी होने लगा।
खुले संगठन के सिकुड़ने का नुकसान
गुरिल्ला संघर्ष तेज होने के साथ खुले संगठन बनाए रखना कठिन था।
लेकिन उन्हें पूरी तरह कमजोर होने देना रणनीतिक समस्या बन गया।
जब पुलिस ने हथियारबंद दस्तों को तोड़ा, तब गांव में ऐसी मजबूत वैधानिक अथवा अर्ध-वैधानिक संरचना कम बची थी जो भूमि और मजदूरी संघर्ष को दूसरे रूप में आगे ले जा सके।
यानी संगठन के पास सैन्य पराजय के बाद राजनीतिक वापसी का मार्ग कमजोर था।
इसी से आंध्र में बाद में सबक लिया गया
यह अनुभव बाद के आंध्र नक्सलवादी आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण बना।
अगली पीढ़ी के क्रांतिकारी संगठनों ने छात्र, किसान, मजदूर, महिला और सांस्कृतिक जनसंगठनों के महत्व को अधिक व्यवस्थित रूप से समझने की कोशिश की।
यानी श्रीकाकुलम की पराजय स्वयं बाद की रणनीति का पाठ बनी।
‘वर्ग शत्रु सफाया’ की सीमाएं — भय, प्रतिहिंसा और सामाजिक आधार का संकुचन
श्रीकाकुलम के सशस्त्र चरण की सबसे विवादास्पद रणनीति थी ‘वर्ग शत्रुओं के सफाये’ की नीति।
इसकी मूल धारणा थी कि अत्याचारी भूस्वामी और साहूकार ग्रामीण गरीबों पर केवल आर्थिक नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक आतंक भी कायम रखते हैं।
यदि उनमें से सबसे दमनकारी व्यक्तियों को निशाना बनाया जाए तो गरीब किसान का भय टूटेगा।
लेकिन सिद्धांत और व्यवहार के बीच गंभीर अंतर पैदा हो सकता था।
हिंसा का शुरुआती राजनीतिक प्रभाव
कुछ मामलों में प्रभावशाली भूस्वामी के खिलाफ कार्रवाई ने वास्तव में ग्रामीणों में उत्साह पैदा किया होगा।
जिस व्यक्ति को पहले अजेय माना जाता था, उसकी सत्ता चुनौती के घेरे में आई।
जमीन पर किसान पुनः कब्जा कर सकता था।
इससे गुरिल्ला दस्ते की प्रतिष्ठा बढ़ी।
लेकिन भय केवल एक ओर नहीं गया
हिंसा का एक दूसरा परिणाम भी होता है।
यदि भूस्वामी डरता है तो सामान्य ग्रामीण भी डर सकता है।
यदि किसी व्यक्ति पर मुखबिरी का संदेह हुआ तो निर्णय कौन करेगा?
क्या निजी दुश्मनी राजनीतिक आरोप का रूप ले सकती है?
ऐसे प्रश्न आंदोलन की नैतिक वैधता को कमजोर कर सकते हैं।
राजनीतिक न्याय और प्रक्रिया
जनआंदोलन में किसी व्यक्ति के विरुद्ध आरोप खुली सभा में चर्चा का विषय हो सकता है।
भूमिगत युद्ध में वही प्रक्रिया कठिन होती है।
सुरक्षा और गोपनीयता के कारण निर्णय छोटे समूह लेते हैं।
अतः किसी भी क्रांतिकारी आंदोलन के लिए यह गंभीर समस्या थी कि वह न्याय की जिस व्यवस्था को स्थापित करने का दावा कर रहा है, कहीं उसके अपने हिंसक निर्णय उसी लोकतांत्रिक जवाबदेही से रहित न हों जिसका आरोप वह राज्य पर लगा रहा था।
प्रतिहिंसा का चक्र
लक्षित हत्याओं ने राज्य-दमन को भी अधिक कठोर करने का राजनीतिक आधार दिया।
पुलिस अब यह कह सकती थी कि वह केवल प्रदर्शनकारी किसानों से नहीं बल्कि हत्या करने वाले भूमिगत दस्तों से लड़ रही है।
भूस्वामी स्वयं हथियारबंद हो सकते थे।
इस तरह हमला → प्रतिशोध → पुलिस कार्रवाई → नया हमला का चक्र बनता गया।
सामाजिक गठबंधन पर प्रभाव
किसान आंदोलन की सफलता के लिए केवल सबसे गरीब किसानों का समर्थन पर्याप्त नहीं होता।
उसे कभी-कभी मध्यम किसान, छोटे व्यापारी, शिक्षक और दूसरे ग्रामीण वर्गों को कम से कम तटस्थ रखना पड़ता है।
यदि हिंसा की परिभाषा बहुत व्यापक हो जाए तो ये समूह आंदोलन से दूरी बना सकते हैं।
इससे आंदोलन का आधार संकुचित होकर सबसे प्रतिबद्ध समर्थकों तक रह जाता है।
सैन्य उग्रता बनाम राजनीतिक विस्तार
जैसे-जैसे गुरिल्ला कार्रवाई अधिक उग्र दिखाई देने लगी, आंदोलन की राष्ट्रीय प्रसिद्धि बढ़ी।
लेकिन प्रसिद्धि और जनाधार एक ही चीज नहीं हैं।
एक कार्रवाई पूरे देश के क्रांतिकारी युवाओं को प्रेरित कर सकती है, जबकि उसी कार्रवाई के बाद स्थानीय गांव पुलिस दमन के डर से पीछे हट सकता है।
इस अंतर को प्रारंभिक CPI(ML) रणनीति पर्याप्त गंभीरता से नहीं समझ सकी।
भारतीय परिस्थितियों में चीनी क्रांति का मॉडल — येनान की कल्पना और श्रीकाकुलम की वास्तविकता
चारु मजूमदार ने 1969 में प्रश्न उठाया था—क्या श्रीकाकुलम भारत का येनान बन सकता है?
यह उस समय के क्रांतिकारी उत्साह का सबसे प्रभावशाली प्रतीक था।
लेकिन कुछ ही वर्षों बाद अनुभव ने दिखाया कि चीन और भारत के बीच अनेक बुनियादी अंतर थे।
चीन का ऐतिहासिक संदर्भ
चीनी कम्युनिस्ट क्रांति ऐसे समय विकसित हुई जब चीन की केंद्रीय राज्य सत्ता लंबे समय तक कमजोर और विखंडित थी।
विभिन्न युद्ध-सामंतों का प्रभाव था।
राष्ट्रीय सरकार और कम्युनिस्टों के बीच गृहयुद्ध चला।
विशाल ग्रामीण क्षेत्रों में राज्य की पकड़ सीमित थी।
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के पास अंततः बड़ी संगठित सेना, नियंत्रित क्षेत्र और वैकल्पिक प्रशासन विकसित करने का अवसर मिला।
स्वतंत्र भारत की परिस्थिति
श्रीकाकुलम 1960 के दशक के उस भारत में था जहां—
राज्य की प्रशासनिक संरचना गांव तक पहुंचती थी,
और सरकार भूमि सुधार तथा आदिवासी संरक्षण के कानूनी कदम भी उठा सकती थी।
इसलिए भारतीय राज्य की क्षमता चीनी गृहयुद्ध के कई चरणों की राज्य-संरचना से बहुत अलग थी।
लोकतांत्रिक व्यवस्था का प्रश्न
कम्युनिस्ट पार्टियां चुनाव लड़ सकती थीं।
1967 में गैर-कांग्रेस सरकारें कई राज्यों में सत्ता में आई थीं।
कम्युनिस्ट केरल और पश्चिम बंगाल की सरकारों में हिस्सेदार बने।
इससे ग्रामीण गरीब के सामने राजनीतिक परिवर्तन के एक से अधिक रास्ते उपलब्ध थे।
CPI(ML) ने संसदीय रास्ते को मूलतः प्रतिक्रियावादी मानकर अस्वीकार किया।
लेकिन व्यापक ग्रामीण समाज ने ऐसा सार्वभौमिक रूप से नहीं किया।
यह क्रांतिकारी आंदोलन के विस्तार की महत्वपूर्ण सीमा बनी।
भूमि सुधार भी राज्य का हथियार
यदि किसान आंदोलन जमीन का प्रश्न उठाता है तो सरकार भूमि-सुरक्षा कानून कठोर कर सकती है।
यही श्रीकाकुलम के संदर्भ में 1970 के भूमि हस्तांतरण संशोधन के साथ दिखाई देता है।
इससे क्रांतिकारी आंदोलन का एक बड़ा मुद्दा आंशिक रूप से राज्य की सुधारात्मक राजनीति में समाहित किया जा सकता था।
येनान और श्रीकाकुलम का आकार
येनान विशाल क्रांतिकारी क्षेत्र का केंद्र था।
श्रीकाकुलम का आंदोलन अपेक्षाकृत छोटे भौगोलिक इलाके में केंद्रित था।
कोई सुरक्षित अंतरराष्ट्रीय सीमा या बड़ा मुक्त क्षेत्र नहीं था जहां राज्य का प्रवेश असंभव हो।
इसलिए ‘आधार क्षेत्र’ बनाने की संभावना राजनीतिक इच्छा से कहीं अधिक कठिन थी।
यांत्रिक अनुकरण की समस्या
माओ का अपना राजनीतिक सिद्धांत भी विशिष्ट चीनी परिस्थितियों के विश्लेषण पर आधारित था।
किसी दूसरे देश में वही रणनीति लागू करने के लिए उसकी सामाजिक और राज्य संरचना का स्वतंत्र अध्ययन आवश्यक था।
लेकिन 1967–70 के उग्र वामपंथी वातावरण में चीनी अनुभव कई बार लगभग तैयार मॉडल की तरह ग्रहण किया गया।
भारत को ‘अर्ध-सामंती, अर्ध-औपनिवेशिक’ घोषित कर देने से सभी स्थानीय जटिलताएं समाप्त मान ली गईं।
यहीं विचारधारा ने कभी-कभी वास्तविक समाज के विश्लेषण पर वरीयता प्राप्त कर ली।
क्या श्रीकाकुलम वास्तव में पराजित हुआ? — सैन्य विफलता बनाम सामाजिक-राजनीतिक विरासत
1971 तक यदि श्रीकाकुलम का मूल्यांकन उसके घोषित क्रांतिकारी लक्ष्य के आधार पर किया जाए तो परिणाम स्पष्ट है।
उसने राज्य सत्ता पर कब्जा नहीं किया।
CPI(ML) स्वयं राष्ट्रीय स्तर पर गहरे संकट और विभाजन की ओर चली गई।
इस अर्थ में श्रीकाकुलम का सशस्त्र विद्रोह पराजित हुआ।
लेकिन इतिहास में पराजय हमेशा आंदोलन के प्रभाव की समाप्ति नहीं होती।
पहली विरासत : भूमि प्रश्न अब दबाया नहीं जा सकता था
श्रीकाकुलम ने आदिवासी जमीन के गैर-आदिवासियों के हाथ जाने के प्रश्न को ऐसा राजनीतिक महत्व दिया जिसे सरकार नजरअंदाज नहीं कर सकती थी।
1959 का भूमि हस्तांतरण विनियमन पहले से मौजूद था, लेकिन आंदोलन के वर्षों में यह स्पष्ट हो गया कि उसका मौजूदा स्वरूप और क्रियान्वयन पर्याप्त नहीं था।
1970 में अधिक कठोर संशोधन आया, जिसे सामान्यतः Regulation I of 1970 या ‘1/70’ कहा जाता है।
इस कानून और आंदोलन के बीच सीधा एकल कारण-संबंध स्थापित करना सावधानी के बिना उचित नहीं होगा; व्यापक आदिवासी भूमि संकट, प्रशासनिक अनुभव और राजनीतिक दबाव सभी कारक थे।
फिर भी श्रीकाकुलम संघर्ष उस राजनीतिक वातावरण का महत्वपूर्ण हिस्सा था जिसमें भूमि सुरक्षा को मजबूत करना अपरिहार्य बन गया।
दूसरी विरासत : आदिवासी राजनीतिक चेतना
आंदोलन ने हजारों आदिवासियों को पहली बार संगठित राजनीतिक अनुभव दिया।
महिलाओं का सार्वजनिक राजनीति में आना—
ये अनुभव पुलिस कार्रवाई के साथ मिट नहीं जाते।
संगठन टूट सकता है, लेकिन सामूहिक राजनीतिक स्मृति बनी रह सकती है।
तीसरी विरासत : भारतीय नक्सलवादी आंदोलन का पाठ
श्रीकाकुलम ने भावी नक्सलवादी संगठनों को दो प्रकार की विरासत दी।
उसने दिखाया कि लंबे सामाजिक काम के जरिए आदिवासी क्षेत्र में शक्तिशाली जनाधार बनाया जा सकता है।
जनसंगठन को कमजोर कर केवल गुरिल्ला दस्तों पर निर्भर होना,
शीर्ष नेतृत्व का अत्यधिक केंद्रीकरण,
जल्दबाजी में मुक्त क्षेत्र की कल्पना,
और व्यक्तिगत सफाया-कार्रवाइयों पर अधिक भरोसा
इन्हीं अनुभवों से बाद की आंध्र क्रांतिकारी राजनीति ने कुछ अलग रणनीतिक निष्कर्ष निकाले।
चौथी विरासत : राज्य ने भी सीखा
राज्य ने भी श्रीकाकुलम से सबक लिया।
आदिवासी भूमि प्रश्न को संबोधित करना आवश्यक था।
भूमि हस्तांतरण पर कड़े कानूनी प्रतिबंध लगाने थे।
यानी आंदोलन को दबाने के साथ राज्य को उसके द्वारा उठाए गए कुछ वास्तविक सामाजिक प्रश्नों का उत्तर भी देना पड़ा।
पांचवीं विरासत : संघर्ष की स्मृति
और अनेक कम प्रसिद्ध आदिवासी कार्यकर्ता बाद की क्रांतिकारी स्मृति का हिस्सा बने।
गीतों, पुस्तकों और राजनीतिक आयोजनों में श्रीकाकुलम का उल्लेख जारी रहा।
इस स्मृति ने बाद की तेलुगु क्रांतिकारी संस्कृति को भी प्रभावित किया।
पराजय की दो कसौटियां
श्रीकाकुलम को समझने के लिए “जीत” और “हार” की दो अलग कसौटियां रखनी होंगी।
सामाजिक परिवर्तन की कसौटी पर
भूमि प्रश्न राष्ट्रीय और राज्य राजनीति के सामने अधिक तीखे रूप में आया।
आदिवासी राजनीतिक संगठन की नई परंपरा बनी।
महिलाओं और गरीब किसानों की भागीदारी बढ़ी।
राज्य को कानूनी प्रतिक्रिया देनी पड़ी।
और भारतीय क्रांतिकारी वामपंथ को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ा।
इसीलिए श्रीकाकुलम को केवल “असफल नक्सलवादी विद्रोह” कह देना भी अधूरा है।
खंड 10 का समेकित मूल्यांकन
श्रीकाकुलम आंदोलन की पराजय पांच परस्पर जुड़े कारणों से हुई।
पहला—राज्य की अत्यधिक सैन्य, प्रशासनिक और खुफिया श्रेष्ठता।
पुलिस ने नेतृत्व, ग्रामीण संपर्क और रसद नेटवर्क को व्यवस्थित रूप से निशाना बनाया।
दूसरा—शीर्ष नेतृत्व की तेज और लगभग एक साथ क्षति।
1969–70 में ऐसे अनुभवी नेताओं को खो दिया गया जिनकी जगह तत्काल भरना संभव नहीं था।
तीसरा—व्यापक जनसंगठन से गुरिल्ला-केंद्रित राजनीति की ओर अत्यधिक झुकाव।
जिस गिरिजन संगम ने आंदोलन बनाया था, उसकी खुली राजनीतिक शक्ति धीरे-धीरे पीछे चली गई।
चौथा—‘वर्ग शत्रु सफाया’ और हिंसक कार्रवाइयों की रणनीतिक सीमा।
इनसे कुछ स्थानों पर पुराने भय टूटे, लेकिन राज्य-दमन, प्रतिहिंसा और राजनीतिक अलगाव भी बढ़ा।
पांचवां—चीनी क्रांति के मॉडल को भारतीय परिस्थितियों पर आवश्यकता से अधिक सीधे लागू करना।
भारत की लोकतांत्रिक संस्थाएं, मजबूत केंद्रीकृत राज्य, सामाजिक विविधता और सुधार करने की सरकारी क्षमता चीनी गृहयुद्ध के संदर्भ से अलग थीं।
जिस आंदोलन को पुलिस 1970–71 तक सैन्य रूप से दबाने में सफल हुई, उसी आंदोलन के दौरान आदिवासी भूमि-अधिकार का प्रश्न इतना तीखा हो गया कि राज्य को अपनी भूमि-सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करनी पड़ी।
इसलिए श्रीकाकुलम की ऐतिहासिक परिणति एक विरोधाभास में समाहित है—
क्रांति पराजित हुई, लेकिन वह प्रश्न नहीं जिसे क्रांति ने उठाया था।
लेकिन जमीन, जंगल और आदिवासी अधिकार का सवाल भारतीय राजनीति में और अधिक दृश्यमान होकर सामने आया।
और इसी बिंदु से श्रीकाकुलम की कहानी बंदूक से वापस कानून और भूमि-अधिकार की ओर लौटती है।
खंड 11 — भूमि कानून और आदिवासी अधिकार (अध्याय 51–54)
अध्याय 51: 1959 का अनुसूचित क्षेत्र भूमि हस्तांतरण विनियमन — उद्देश्य, प्रावधान और शुरुआती कमजोरियां अध्याय 52: Regulation I of 1970 — ‘1/70 कानून’ और आदिवासी भूमि सुरक्षा का कठोर ढांचा अध्याय 53: श्रीकाकुलम आंदोलन और कानूनी सुधार — प्रत्यक्ष कारण, राजनीतिक दबाव और इतिहासलेखन की बहस अध्याय 54: कानून बनाम क्रियान्वयन — भूमि-वापसी, रिकॉर्ड, बेनामी कब्जे और दीर्घकालीन समस्या
इसके बाद खंड 12 — तेलंगाना, नक्सलबाड़ी और श्रीकाकुलम : तीन किसान विद्रोहों की तुलनात्मक समीक्षा (अध्याय 55–58) आएगा।
भूमि कानून और आदिवासी अधिकार
श्रीकाकुलम आंदोलन का सबसे स्थायी प्रभाव केवल उसकी क्रांतिकारी स्मृति या नक्सलवादी राजनीति पर नहीं पड़ा। उसका अधिक ठोस प्रभाव उस प्रश्न पर दिखाई देता है जिससे आंदोलन की शुरुआत हुई थी—आदिवासी की जमीन किसकी है और उसे गैर-आदिवासी कब्जे से कैसे बचाया जाए?
स्वतंत्र भारत ने अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी भूमि की रक्षा के लिए संवैधानिक और कानूनी व्यवस्था बनाई थी। आंध्र प्रदेश में इसका प्रमुख आधार Andhra Pradesh अनुसूचित क्षेत्र भूमि हस्तांतरण Regulation, 1959—Regulation I of 1959 बना। लेकिन 1960 के दशक का अनुभव दिखा रहा था कि केवल हस्तांतरण पर नियंत्रण पर्याप्त नहीं है। पुराने कब्जे, अस्पष्ट भूमि अभिलेख, ऋण और बंधक, गैर-आदिवासी के पक्ष में प्रमाण की व्यावहारिक श्रेष्ठता और प्रशासनिक कमजोरी कानून को अप्रभावी बना सकती थी।
इसी पृष्ठभूमि में 1970 में इस कानून को बहुत कठोर बनाया गया। संशोधित व्यवस्था का मूल सिद्धांत था कि अनुसूचित क्षेत्र में भूमि का हस्तांतरण सामान्यतः आदिवासी के पक्ष में ही वैध होगा और गैर-आदिवासी के कब्जे वाली जमीन के बारे में प्रमाण का बोझ भी बड़े पैमाने पर उसी गैर-आदिवासी पर डाला जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय ने बाद में Samatha v. State of Andhra Pradesh में इस कानून की पृष्ठभूमि और उसके उद्देश्य की विस्तृत व्याख्या की तथा स्वीकार किया कि 1970 का संशोधन 1959 की व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के लिए किया गया था।
इसलिए श्रीकाकुलम की कहानी में कानून और विद्रोह को अलग-अलग अध्याय नहीं माना जा सकता। दोनों उसी भूमि संकट के अलग-अलग उत्तर थे—एक राज्य का संवैधानिक उत्तर, दूसरा आंदोलन का प्रतिरोधात्मक उत्तर।
संवैधानिक आधार : पांचवीं अनुसूची
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 244 और पांचवीं अनुसूची ने अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के लिए विशेष व्यवस्था प्रदान की।
पांचवीं अनुसूची के पैरा 5 के अंतर्गत राज्यपाल को अनुसूचित क्षेत्र की “शांति और सुशासन” के लिए विनियम बनाने की शक्ति दी गई। इसमें विशेष रूप से तीन विषय महत्वपूर्ण थे—
आदिवासियों की भूमि के हस्तांतरण पर रोक या नियंत्रण,
आदिवासियों को भूमि आवंटन का विनियमन,
और आदिवासियों को ऋण देने वाले साहूकारों के व्यवसाय का नियंत्रण।
यानी संविधान निर्माताओं ने शुरुआत से ही यह स्वीकार किया था कि आदिवासी भूमि और साहूकारी सामान्य बाजार संबंधों का प्रश्न नहीं हैं; उनमें विशेष संरक्षण आवश्यक है। Samatha फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने इसी संवैधानिक इतिहास को विस्तार से रेखांकित किया।
Regulation I of 1959
इसी संवैधानिक शक्ति का प्रयोग करते हुए आंध्र प्रदेश के राज्यपाल ने Andhra Pradesh अनुसूचित क्षेत्र भूमि हस्तांतरण Regulation, 1959 जारी किया।
यह विनियमन आंध्र क्षेत्र में 4 मार्च 1959 से लागू हुआ। बाद में तेलंगाना के अनुसूचित क्षेत्रों में भी इसे विस्तारित किया गया, जहां यह 1 दिसंबर 1963 से प्रभावी हुआ। सर्वोच्च न्यायालय ने Samatha में इन तिथियों और विधिक विकास को स्पष्ट रूप से दर्ज किया है।
किन क्षेत्रों पर लागू हुआ?
विनियमन उन क्षेत्रों पर लागू था जिन्हें संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्र घोषित किया गया था।
ऐतिहासिक रूप से इसमें तत्कालीन श्रीकाकुलम जिले के एजेंसी क्षेत्र भी शामिल थे।
यहीं यह कानून श्रीकाकुलम किसान–आदिवासी संघर्ष से सीधे जुड़ता है।
1959 के मूल कानून का उद्देश्य
आदिवासी की अचल संपत्ति को गैर-आदिवासी के हाथ जाने से रोकना।
मूल व्यवस्था में अनुसूचित जनजाति का सदस्य अपनी जमीन दूसरे आदिवासी अथवा पूरी तरह आदिवासियों से बनी सहकारी संस्था को हस्तांतरित कर सकता था।
गैर-आदिवासी के पक्ष में हस्तांतरण सामान्य स्वतंत्र बाजार लेन-देन की तरह नहीं किया जा सकता था। उसके लिए पूर्व सरकारी स्वीकृति अथवा सक्षम अधिकारी की लिखित अनुमति की व्यवस्था थी। सर्वोच्च न्यायालय ने बाद में मूल 1959 प्रावधान का यही अर्थ स्पष्ट किया।
‘हस्तांतरण’ का व्यापक अर्थ
कानून में हस्तांतरण का अर्थ केवल बिक्री नहीं था।
और अचल संपत्ति से जुड़ा अन्य लेन-देन
यह महत्वपूर्ण था क्योंकि आदिवासी भूमि हमेशा औपचारिक बिक्री से नहीं जाती थी।
कई बार ऋण के बदले बंधक ही बाद में स्थायी कब्जे का माध्यम बन जाता था।
फिर भी समस्या क्यों बनी रही?
यहीं 1959 कानून की सबसे बड़ी व्यावहारिक कमजोरी सामने आई।
कानून यह मानकर चल रहा था कि प्रशासन यह पता लगा सकेगा कि—
किस आधार पर गैर-आदिवासी कब्जे में आया,
और क्या हस्तांतरण वैध अनुमति के साथ हुआ था।
लेकिन वास्तविक ग्रामीण परिस्थितियों में यह साबित करना कठिन था।
भूमि रिकॉर्ड की समस्या
आदिवासी इलाकों में कई प्रकार के भूमि अधिकार लंबे समय तक प्रथागत रहे थे।
पीढ़ियों से खेती कर रहा व्यक्ति औपचारिक रिकॉर्ड में स्वामी न हो सकता था।
इसके विपरीत गैर-आदिवासी कब्जाधारी के पास कोई लिखित दस्तावेज हो सकता था।
कानूनी लड़ाई में यही असमानता निर्णायक हो सकती थी।
प्रमाण का बोझ
मूल कानून की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि प्रशासन को यह स्थापित करना पड़ सकता था कि गैर-आदिवासी ने भूमि किसी आदिवासी से अवैध रूप से प्राप्त की है।
पुराना हस्तांतरण होने पर ऐसा प्रमाण जुटाना बहुत कठिन था।
यदि 20 या 30 वर्ष पहले जमीन हाथ बदल चुकी हो,
तो गरीब आदिवासी परिवार के लिए जमीन वापस पाना अत्यंत कठिन हो जाता था।
सर्वोच्च न्यायालय ने बाद में उल्लेख किया कि सरकार को 1959 व्यवस्था लागू करने में विशेष कठिनाई इसलिए हुई क्योंकि यह पता लगाना आसान नहीं था कि गैर-आदिवासी का कब्जा किस मूल अधिकार से पैदा हुआ था और क्या जमीन पहले किसी आदिवासी से प्राप्त की गई थी।
यही कमजोरी 1970 के संशोधन का आधार बनी।
Regulation I of 1970 — ‘1/70 कानून’ और आदिवासी भूमि सुरक्षा का कठोर ढांचा
1970 का संशोधन आंध्र प्रदेश के आदिवासी भूमि कानून के इतिहास में निर्णायक परिवर्तन था।
इसे सामान्यतः Regulation I of 1970, या लोकप्रिय भाषा में ‘1/70 कानून’ कहा जाता है।
यह नया स्वतंत्र कानून नहीं था, बल्कि 1959 के विनियमन को अधिक कठोर बनाने वाला संशोधन था।
मूल विचार में परिवर्तन
1959 की व्यवस्था मुख्यतः आदिवासी द्वारा गैर-आदिवासी को भूमि हस्तांतरण नियंत्रित करती थी।
अनुसूचित क्षेत्र में अचल संपत्ति का हस्तांतरण तभी वैध होगा जब वह आदिवासी अथवा पूर्णतः आदिवासी सदस्यों वाली सहकारी संस्था के पक्ष में हो।
यानी गैर-आदिवासी के पक्ष में भविष्य के हस्तांतरण को लगभग पूरी तरह रोक दिया गया।
सर्वोच्च न्यायालय ने Samatha मामले में संशोधित धारा 3(1)(a) को उद्धृत करते हुए इस पूर्ण निषेध को स्पष्ट किया।
आदिवासी से गैर-आदिवासी ही नहीं
1970 के संशोधन की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि उसने केवल आदिवासी द्वारा गैर-आदिवासी को हस्तांतरण पर रोक नहीं लगाई।
अनुसूचित क्षेत्र में गैर-आदिवासी भी अपनी जमीन सामान्यतः दूसरे गैर-आदिवासी को हस्तांतरित नहीं कर सकता था।
इसका उद्देश्य यह था कि अनुसूचित क्षेत्रों में जमीन लगातार गैर-आदिवासी बाजार के भीतर घूमती न रहे।
समय के साथ भूमि संरचना आदिवासी हितों के पक्ष में सुरक्षित रहे।
सबसे क्रांतिकारी परिवर्तन : प्रमाण का बोझ उलटा
1970 के संशोधन का शायद सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान था कानूनी धारणा—presumption।
यदि अनुसूचित क्षेत्र में कोई अचल संपत्ति किसी गैर-आदिवासी के कब्जे में है, तो कानून यह मानकर चलेगा कि उसने या उसके पूर्वाधिकारी ने वह जमीन किसी आदिवासी से हस्तांतरण के माध्यम से प्राप्त की थी—
जब तक वह इसके विपरीत प्रमाणित न कर दे।
यानी अब आदिवासी को यह सिद्ध करने की आवश्यकता कम हुई कि जमीन उससे अवैध रूप से छीनी गई थी।
गैर-आदिवासी कब्जाधारी को साबित करना था कि उसका कब्जा वैध है।
इस परिवर्तन का व्यावहारिक महत्व
मान लीजिए किसी आदिवासी गांव में 50 एकड़ भूमि गैर-आदिवासी परिवारों के पास है।
1959 व्यवस्था में प्रशासन को प्रत्येक भूमि की पुरानी श्रृंखला तलाशनी पड़ सकती थी—
1970 के बाद शुरुआत का प्रश्न उलट गया—
गैर-आदिवासी बताए कि उसका कब्जा वैध कैसे है।
यह आदिवासी भूमि-वापसी के मामलों में बहुत बड़ा विधिक परिवर्तन था।
जमीन बेचने की विवशता और सरकार की भूमिका
संशोधित व्यवस्था ने एक व्यावहारिक समस्या भी स्वीकार की।
यदि कोई आदिवासी या अनुसूचित क्षेत्र का वैध भूमि धारक जमीन बेचना चाहता है, लेकिन उचित शर्तों पर कोई आदिवासी खरीदार उपलब्ध नहीं है, तो वह सक्षम अधिकारी के पास आवेदन कर सकता है।
सरकार निर्धारित मुआवजा देकर जमीन अधिग्रहित कर सकती थी और बाद में उसे आदिवासी या आदिवासी सहकारी संस्था के पक्ष में व्यवस्थित किया जा सकता था।
आर्थिक मजबूरी के कारण जमीन को गैर-आदिवासी बाजार में जाने से रोकना।
1971 और बाद के संशोधन
इसके बाद 1971 में कुछ वित्तीय संस्थानों के पक्ष में भूमि को ऋण-सुरक्षा के रूप में रखने संबंधी सीमित अपवाद जोड़े गए। सर्वोच्च न्यायालय ने Samatha में 1971 तथा बाद के 1978 संशोधनों का भी उल्लेख किया है।
यह दिखाता है कि आदिवासी भूमि-सुरक्षा व्यवस्था एक बार बनकर स्थिर नहीं रही; व्यावहारिक कठिनाइयों के अनुसार उसे लगातार संशोधित करना पड़ा।
श्रीकाकुलम आंदोलन और कानूनी सुधार — प्रत्यक्ष कारण, राजनीतिक दबाव और इतिहासलेखन की बहस
श्रीकाकुलम आंदोलन और Regulation I of 1970 के संबंध में एक लोकप्रिय कथन बार-बार सामने आता है—
“श्रीकाकुलम विद्रोह के कारण सरकार ने 1/70 कानून बनाया।”
यह कथन पूरी तरह असत्य नहीं है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से इसे अधिक सावधानी से लिखना चाहिए।
कानून की प्रक्रिया पहले से चल रही थी
आदिवासी भूमि-वियोजन की समस्या श्रीकाकुलम विद्रोह से पहले से ज्ञात थी।
इसीलिए 1959 का मूल विनियमन पहले ही बनाया जा चुका था।
अर्थात राज्य ने समस्या को 1967 या 1968 में पहली बार नहीं पहचाना।
1970 संशोधन के पीछे एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक कारण यह था कि 1959 कानून के तहत पुराने गैर-आदिवासी कब्जों के मूल स्रोत को सिद्ध करना कठिन हो रहा था।
सर्वोच्च न्यायालय ने बाद में इस समस्या को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया और कहा कि 1970 में किए गए परिवर्तन मूल कानून के प्रभावी प्रवर्तन को आसान बनाने के उद्देश्य से थे।
फिर श्रीकाकुलम का प्रभाव कहां था?
यहां आंदोलन की भूमिका को राजनीतिक दबाव और संकट की तीव्रता में देखना अधिक उचित है।
1959 से 1967 के बीच सरकार के सामने भूमि-वियोजन एक प्रशासनिक समस्या थी।
1967–70 में वही समस्या एक सशस्त्र विद्रोह की सामाजिक जमीन बन गई।
अब सरकार के सामने प्रत्यक्ष प्रमाण था कि—
भूमि विवाद केवल राजस्व रिकॉर्ड का मुद्दा नहीं है;
उससे व्यापक राजनीतिक असंतोष पैदा हो सकता है;
आदिवासी समुदाय संगठित होकर राज्य को चुनौती दे सकता है;
और अनुपयोगी कानून सुरक्षा संकट तक का रूप ले सकता है।
इस अर्थ में श्रीकाकुलम आंदोलन ने भूमि सुधार की राजनीतिक तात्कालिकता बहुत बढ़ा दी।
प्रत्यक्ष कारण बनाम प्रेरक दबाव
Regulation I of 1970 केवल श्रीकाकुलम विद्रोह का परिणाम नहीं था, लेकिन श्रीकाकुलम आंदोलन उस व्यापक राजनीतिक और प्रशासनिक वातावरण का एक प्रमुख कारक था जिसमें आदिवासी भूमि-सुरक्षा कानून को कठोर करना अत्यावश्यक हो गया।
क्योंकि एकल कारण की व्याख्या कानून के लंबे संवैधानिक और प्रशासनिक इतिहास को छिपा देती है।
राज्य का दोहरा उत्तर
श्रीकाकुलम संकट के दौरान सरकार ने दो रास्ते अपनाए।
भूमि-सुरक्षा की कानूनी व्यवस्था को कठोर बनाना।
यह राज्य की व्यापक रणनीति का उदाहरण है।
किसी विद्रोह का उत्तर केवल दमन नहीं होता।
यदि विद्रोह वास्तविक सामाजिक शिकायत पर आधारित है तो राज्य को उस शिकायत को राजनीतिक रूप से भी संबोधित करना पड़ता है।
आंदोलन की मांग का संस्थानीकरण
विडंबना यह थी कि जिस आंदोलन ने राज्य व्यवस्था को उखाड़ने का लक्ष्य अपनाया, उसी आंदोलन से जुड़े मूल भूमि प्रश्न का एक हिस्सा अंततः राज्य के कानून के भीतर अधिक मजबूत संरक्षण प्राप्त करने लगा।
कानूनी हस्तांतरण पर कठोर रोक लगाओ और प्रशासनिक प्रक्रिया से जमीन वापस दिलाओ।
कानून बनाम क्रियान्वयन — भूमि-वापसी, रिकॉर्ड, बेनामी कब्जे और दीर्घकालीन समस्या
लेकिन कठोर कानून का अर्थ स्वतः प्रभावी भूमि-सुरक्षा नहीं है।
यहीं श्रीकाकुलम के बाद की पूरी आदिवासी भूमि-राजनीति का अगला अध्याय शुरू होता है।
सबसे बड़ी समस्या : कानून जमीन पर कौन लागू करेगा?
भूमि बहाली के लिए प्रशासन को करना पड़ता था—
और जरूरत पड़ने पर गैर-आदिवासी कब्जाधारी को हटाकर आदिवासी को वास्तविक कब्जा दिलाना।
इन सभी चरणों में प्रशासनिक क्षमता और राजनीतिक इच्छाशक्ति आवश्यक थी।
निर्णय और वास्तविक कब्जा अलग चीजें
मान लीजिए अदालत या एजेंसी अधिकारी आदेश दे देता है कि जमीन आदिवासी की है।
लेकिन जमीन पर वर्षों से शक्तिशाली गैर-आदिवासी परिवार खेती कर रहा है।
यही जगह भूमि-सुधार कानूनों की वास्तविक सफलता और विफलता तय करती है।
बेनामी और अप्रत्यक्ष कब्जे
कड़े भूमि कानूनों से बचने के लिए लेन-देन अपना स्वरूप बदल सकते हैं।
लेकिन नियंत्रण गैर-आदिवासी के हाथ में हो।
अनौपचारिक ऋण के बदले खेती का अधिकार लिया जाए।
या आदिवासी नामधारी व्यक्ति के माध्यम से आर्थिक नियंत्रण स्थापित किया जाए।
ऐसे मामलों में कागजी स्वामित्व और वास्तविक नियंत्रण अलग हो सकते हैं।
पुराने रिकॉर्ड
भूमि के पुराने रिकॉर्ड की समस्या भी समाप्त नहीं हुई।
वन भूमि और राजस्व भूमि की अलग-अलग श्रेणियां,
इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय ने Samatha में पूरे देश के विभिन्न आदिवासी भूमि संरक्षण कानूनों की चर्चा करते हुए कानून बनाने और उसके प्रभावी प्रवर्तन के बीच मौजूद बड़े अंतर की ओर ध्यान दिलाया।
साहूकारी की मूल समस्या
भूमि-सुरक्षा कानून का एक और प्रश्न था—
तो केवल भूमि हस्तांतरण रोक देना पर्याप्त नहीं।
यदि आर्थिक संकट कायम है तो वह किसी दूसरे रूप में दिखाई देगा।
संरक्षण बनाम विकास
आदिवासी नीति के सामने यहीं मूल द्वंद्व है।
क्या केवल जमीन को गैर-आदिवासी के हाथ जाने से रोकना पर्याप्त है?
या जमीन को आर्थिक रूप से उत्पादक और परिवार को टिकाऊ आजीविका देने योग्य बनाना भी आवश्यक है?
यदि दूसरा काम नहीं हुआ तो संरक्षणात्मक कानून आर्थिक गरीबी समाप्त नहीं कर सकता।
1997 का ‘समता’ फैसला — कानून की दीर्घकालीन विरासत
1970 के संशोधन की ऐतिहासिक महत्ता लगभग तीन दशक बाद सर्वोच्च न्यायालय के प्रसिद्ध Samatha v. State of Andhra Pradesh (1997) फैसले में फिर सामने आई।
मामला अनुसूचित क्षेत्रों में खनन पट्टों और गैर-आदिवासी निजी कंपनियों को भूमि देने से जुड़ा था।
सर्वोच्च न्यायालय ने पांचवीं अनुसूची और 1959–70 की भूमि सुरक्षा व्यवस्था की विस्तृत संवैधानिक पृष्ठभूमि पर विचार किया। न्यायालय ने आदिवासी क्षेत्रों को गैर-आदिवासी आर्थिक प्रभुत्व से बचाने को इस पूरी व्यवस्था का केंद्रीय उद्देश्य माना।
इस फैसले का महत्व केवल श्रीकाकुलम तक सीमित नहीं था।
इसने दिखाया कि 1950–70 के दशकों में भूमि-वियोजन को रोकने के लिए बनाई गई कानूनी व्यवस्था बाद में खनन, प्राकृतिक संसाधनों और आदिवासी स्वायत्तता जैसे कहीं बड़े प्रश्नों की संवैधानिक बहस का आधार बन गई।
एक ऐतिहासिक निरंतरता
इस पूरी यात्रा को एक सीधी रेखा में देखा जा सकता है—
और बाद में प्राकृतिक संसाधनों पर आदिवासी अधिकार की व्यापक संवैधानिक बहस।
यानी श्रीकाकुलम का भूमि प्रश्न केवल 1960 के दशक का मुद्दा नहीं था।
वह बाद की भारतीय आदिवासी नीति का स्थायी प्रश्न बन गया।
खंड 11 का समेकित मूल्यांकन
श्रीकाकुलम आंदोलन और आदिवासी भूमि कानून के संबंध को तीन चरणों में समझना सबसे उपयुक्त है।
पहला चरण—कानूनी संरक्षण, लेकिन कमजोर क्रियान्वयन।
1959 का विनियमन यह स्वीकार कर चुका था कि अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी भूमि को विशेष संरक्षण चाहिए। लेकिन गैर-आदिवासी कब्जे की उत्पत्ति साबित करना और पुरानी जमीन वापस दिलाना कठिन रहा।
दूसरा चरण—1970 में कानून का कठोर होना।
Regulation I of 1970 ने गैर-आदिवासी के पक्ष में भूमि हस्तांतरण पर कहीं अधिक व्यापक रोक लगाई और सबसे महत्वपूर्ण रूप से गैर-आदिवासी कब्जाधारी पर यह साबित करने का बोझ डाला कि उसका स्वामित्व वैध है।
तीसरा चरण—कानून और वास्तविकता का अंतर।
कठोर कानून के बावजूद भूमि रिकॉर्ड, पुराने कब्जे, प्रशासनिक कमजोरी, अप्रत्यक्ष हस्तांतरण और आर्थिक गरीबी जैसी समस्याएं बनी रहीं।
इसलिए श्रीकाकुलम का अनुभव एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक निष्कर्ष देता है—
आदिवासी भूमि की रक्षा केवल कानून लिख देने से नहीं होती।
और ऐसी आर्थिक व्यवस्था जिसमें आदिवासी किसान जमीन बेचने के लिए विवश न हो।
श्रीकाकुलम आंदोलन ने बंदूक के माध्यम से जिस प्रश्न को राष्ट्रीय राजनीति के सामने रखा था, राज्य ने उसका एक उत्तर कानून के माध्यम से दिया।
लेकिन दोनों में से कोई भी अकेले समस्या समाप्त नहीं कर सका।
यही कारण है कि श्रीकाकुलम की भूमि-कथा हमें उस आंदोलन के अगले तुलनात्मक प्रश्न तक ले जाती है—
तेलंगाना, नक्सलबाड़ी और श्रीकाकुलम में भूमि संघर्ष समान था, लेकिन तीनों की सामाजिक संरचना, राजनीतिक रणनीति और ऐतिहासिक परिणति इतनी अलग क्यों हुई?
खंड 12 — तेलंगाना, नक्सलबाड़ी और श्रीकाकुलम : तुलनात्मक समीक्षा (अध्याय 55–58)
अध्याय 55: तेलंगाना और श्रीकाकुलम — भूमि, सामंतवाद, जनाधार और गुरिल्ला युद्ध की तुलना अध्याय 56: नक्सलबाड़ी और श्रीकाकुलम — आदिवासी सामाजिक आधार, नेतृत्व, अवधि और रणनीति में समानताएं–अंतर अध्याय 57: तेभागा–तेलंगाना–नक्सलबाड़ी–श्रीकाकुलम — भारतीय वामपंथी किसान संघर्ष की ऐतिहासिक निरंतरता और बदलाव अध्याय 58: श्रीकाकुलम की विशिष्टता — क्यों इसे केवल ‘नक्सलबाड़ी का आंध्र संस्करण’ नहीं कहा जा सकता?
इसके बाद खंड 13 — श्रीकाकुलम से पीपुल्स वार ग्रुप और बाद के माओवादी आंदोलन तक (अध्याय 59–64) आएगा।
तेलंगाना, नक्सलबाड़ी और श्रीकाकुलम — तुलनात्मक समीक्षा
भारतीय किसान और वामपंथी आंदोलनों के इतिहास में तेलंगाना, नक्सलबाड़ी और श्रीकाकुलम तीन ऐसे संघर्ष हैं जिन्हें अक्सर एक ही क्रांतिकारी परंपरा के क्रमिक पड़ावों के रूप में देखा जाता है। यह दृष्टि आंशिक रूप से सही है, क्योंकि तीनों में भूमि, ग्रामीण शोषण, गरीब किसान, कम्युनिस्ट संगठन और किसी न किसी चरण में सशस्त्र प्रतिरोध मौजूद था। लेकिन यदि इनके सामाजिक आधार, राजनीतिक संदर्भ, संगठन, हिंसा के स्वरूप और परिणामों को ध्यान से देखा जाए तो तीनों में बहुत गहरे अंतर भी दिखाई देते हैं।
तेलंगाना का संघर्ष 1946–51 में निजामशाही हैदराबाद की सामंती ग्रामीण व्यवस्था, वेट्टी-बेगार, भारी लगान और भूस्वामी प्रभुत्व के विरुद्ध विकसित हुआ। कम्युनिस्ट नेतृत्व में गांवों के संगमों, गुरिल्ला दलों और वैकल्पिक ग्राम-सत्ता तक इसका विस्तार हुआ। कई अध्ययनों में हजारों गांवों तक इसके प्रभाव का उल्लेख मिलता है।
नक्सलबाड़ी 1967 में अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र में हुआ, लेकिन उसने भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन की दिशा बदल दी। उसका सबसे बड़ा प्रभाव उसकी भौगोलिक सीमा से नहीं, बल्कि इस घोषणा से आया कि संसदीय कम्युनिस्ट राजनीति के बजाय किसान-आधारित सशस्त्र क्रांति का रास्ता अपनाया जाना चाहिए।
श्रीकाकुलम इन दोनों के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु बना। उसके पास तेलंगाना की तरह लंबे स्थानीय संगठन की परंपरा थी, लेकिन 1967 के बाद उसने नक्सलबाड़ी की वैचारिक भाषा और CPI(ML) की सशस्त्र रणनीति ग्रहण की।
तेलंगाना और श्रीकाकुलम — भूमि, सामंतवाद, जनाधार और गुरिल्ला युद्ध की तुलना
तेलंगाना और श्रीकाकुलम के बीच तुलना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि दोनों का भूगोल दक्षिण भारत में था और दोनों आंदोलनों के नेतृत्व में तेलुगु कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका थी। फिर भी दोनों की ऐतिहासिक परिस्थिति बहुत अलग थी।
तेलंगाना का सामाजिक संदर्भ
तेलंगाना किसान संघर्ष उस समय के हैदराबाद राज्य में विकसित हुआ जहां निजामशाही शासन और ग्रामीण सामंतवाद दोनों मौजूद थे।
बड़े देशमुख, जागीरदार और स्थानीय भूस्वामी ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण रखते थे।
और स्थानीय भूस्वामियों का सामाजिक-प्रशासनिक प्रभुत्व।
तेलंगाना में संघर्ष का मुख्य निशाना केवल किसी व्यक्तिगत साहूकार या जमींदार पर नहीं था। वह पूरी सामंती ग्रामीण सत्ता को चुनौती दे रहा था। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अभिलेखीय विवरण में भी इसे निजामशाही संरक्षण वाले दमनकारी भूस्वामित्व के विरुद्ध किसान सशस्त्र विद्रोह के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
श्रीकाकुलम की अलग सामाजिक संरचना
श्रीकाकुलम में भी भूमि और भूस्वामी प्रश्न था, लेकिन यहां आंदोलन का केंद्रीय सामाजिक आधार आदिवासी किसान थे।
सवरा और जटापू समुदायों की समस्याएं केवल जमींदारी से नहीं जुड़ी थीं।
आदिवासी जमीन का गैर-आदिवासियों के हाथ जाना,
अर्थात श्रीकाकुलम में वर्ग और आदिवासी पहचान अधिक गहराई से एक-दूसरे में जुड़ी थीं।
तेलंगाना में वेट्टी, श्रीकाकुलम में भूमि-वियोजन
दोनों आंदोलनों की केंद्रीय शिकायतों का जोर अलग था।
तेलंगाना में वेट्टी और सामंती शोषण निर्णायक प्रतीक बन गए।
श्रीकाकुलम में आदिवासी भूमि-वियोजन और साहूकारी अधिक केंद्रीय थे।
यह अंतर महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे दोनों आंदोलनों की राजनीतिक मांगों का स्वरूप भी बदलता है।
संगठन की तुलना
तेलंगाना में आंध्र महासभा, कम्युनिस्ट पार्टी और ग्राम संगमों ने लंबे समय तक ग्रामीण संगठन तैयार किया।
1940 के दशक के शुरुआती वर्षों से कम्युनिस्ट कार्यकर्ता गांवों में किसान प्रश्न उठा रहे थे। सुंदरैया के विवरण में 1940–44 के दौरान ही भूस्वामियों और भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ संगठित अभियान और मांगों का उल्लेख मिलता है।
श्रीकाकुलम में इसी प्रकार गिरिजन संगम ने 1950 के दशक के उत्तरार्ध से संगठनात्मक आधार तैयार किया।
इस अर्थ में दोनों आंदोलनों में एक महत्वपूर्ण समानता थी—
लेकिन पैमाना अलग था
तेलंगाना बहुत बड़े क्षेत्र में फैला।
कुछ स्रोत लगभग 3,000 गांवों में समानांतर ग्राम-सत्ता जैसी व्यवस्थाओं का उल्लेख करते हैं, जबकि अन्य अनुमान इससे भी अधिक बताते हैं। आंकड़ों में अंतर है, लेकिन आंदोलन के विशाल भूगोल को लेकर मतभेद नहीं है।
इसके विपरीत श्रीकाकुलम का मुख्य आधार तत्कालीन जिले के कुछ पहाड़ी और निकटवर्ती मैदानी क्षेत्रों में केंद्रित रहा।
इस अंतर ने दोनों की सैन्य क्षमता को भी प्रभावित किया।
गुरिल्ला युद्ध : समानता और अंतर
दोनों आंदोलनों में गुरिल्ला दस्ते बने।
लेकिन तेलंगाना में गुरिल्ला आंदोलन के साथ गांव-स्तरीय राजनीतिक संस्थाओं का अधिक व्यापक ढांचा विकसित हुआ।
तेलंगाना के कई गांवों में भूस्वामियों की सत्ता कमजोर पड़ने पर संगम और ग्राम समितियां भूमि, न्याय, सुरक्षा और स्थानीय प्रशासन में प्रभावशाली हुईं। उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोत ग्राम-राज्यम और समानांतर प्रशासन का उल्लेख करते हैं।
श्रीकाकुलम में भी संगम ने स्थानीय सामाजिक शक्ति विकसित की थी, लेकिन वह तेलंगाना जैसी व्यापक वैकल्पिक सत्ता संरचना तक नहीं पहुंचा।
हथियारों का आधार
तेलंगाना संघर्ष बड़े भूभाग और लंबे समय में विकसित हुआ। निजाम की पुलिस, रजाकार और बाद में भारतीय राज्य की सुरक्षा शक्ति से उसका सामना हुआ।
श्रीकाकुलम में हथियार बहुत सीमित थे। कई गुरिल्ला कार्रवाइयों का एक उद्देश्य भूस्वामियों या पुलिस से हथियार हासिल करना भी था।
इससे उसकी सैन्य कमजोरी स्पष्ट होती है।
राज्य का अंतर
तेलंगाना का संघर्ष दो अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं से गुजरा।
सितंबर 1948 में भारतीय सेना के प्रवेश और हैदराबाद के भारतीय संघ में विलय के बाद वही कम्युनिस्ट गुरिल्ला आंदोलन स्वतंत्र भारत की सरकार के विरुद्ध जारी रहा। सुंदरैया स्वयं 1948 के भारतीय सैन्य हस्तक्षेप और उसके बाद तीन वर्षों तक चले प्रतिरोध को तेलंगाना संघर्ष की केंद्रीय विशेषता मानते हैं।
श्रीकाकुलम शुरू से ही स्वतंत्र भारत की संवैधानिक राज्य व्यवस्था के भीतर विकसित हुआ।
तेलंगाना के शुरुआती चरण में निजामशाही के विरुद्ध लोकतांत्रिक और किसान आंदोलन के उद्देश्य आंशिक रूप से एक-दूसरे में मिल सकते थे।
श्रीकाकुलम में 1968 के बाद CPI(ML) सीधे एक निर्वाचित भारतीय राज्य को उखाड़ने की नीति पर थी।
इससे राजनीतिक वैधता की परिस्थिति पूरी तरह अलग थी।
नक्सलबाड़ी और श्रीकाकुलम — आदिवासी आधार, नेतृत्व, अवधि और रणनीति में समानताएं–अंतर
नक्सलबाड़ी और श्रीकाकुलम को सबसे अधिक एक साथ जोड़ा जाता है।
दोनों आंदोलनों में बड़ी संख्या में आदिवासी किसान थे।
दोनों में कम्युनिस्ट क्रांतिकारी नेतृत्व था।
और दोनों को बाद में भारतीय नक्सलवादी आंदोलन की प्रारंभिक धुरी माना गया।
पहली समानता : आदिवासी किसान आधार
नक्सलबाड़ी क्षेत्र में संथाल और अन्य गरीब किसान समुदाय सक्रिय थे।
श्रीकाकुलम में सवरा और जटापू मुख्य सामाजिक आधार बने।
इसलिए दोनों जगह भूमि संघर्ष के साथ जातीय/आदिवासी प्रश्न भी मौजूद था।
दूसरी समानता : भूमि
नक्सलबाड़ी में बटाईदारों, गरीब किसानों और भूमिहीनों का भूमि और फसल पर अधिकार प्रमुख प्रश्न था।
श्रीकाकुलम में गैर-आदिवासी कब्जे से जमीन वापस लेने का प्रश्न केंद्रीय था।
दोनों जगह भूमि संघर्ष ने राज्य की राजस्व और पुलिस व्यवस्था को चुनौती दी।
सबसे बड़ा अंतर : अवधि और संगठनात्मक तैयारी
नक्सलबाड़ी की 1967 की उभार-अवधि बहुत संक्षिप्त थी।
कुछ महीनों में आंदोलन राष्ट्रीय प्रतीक बना और राज्य कार्रवाई से उसका खुला विद्रोही चरण दबा दिया गया।
यहां 1950 के दशक से गिरिजन संगठन विकसित हो रहा था।
अर्थात जब 1967 में नक्सलबाड़ी की खबर आई, तब श्रीकाकुलम में पहले से—
और गांव-स्तरीय राजनीतिक नेटवर्क था।
इसलिए नक्सलबाड़ी ने यहां आंदोलन पैदा नहीं किया बल्कि उसका वैचारिक रूपांतरण तेज किया।
नक्सलबाड़ी : प्रतीक अधिक, स्थायी क्षेत्र कम
नक्सलबाड़ी का सबसे बड़ा योगदान उसके सैन्य परिणाम में नहीं था।
भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन में क्रांतिकारी विभाजन,
श्रीकाकुलम इसके विपरीत 1968–70 में CPI(ML) नेतृत्व की नजर में ऐसा क्षेत्र बन गया जहां नक्सलबाड़ी की वैचारिक घोषणा को दीर्घकालीन गुरिल्ला संघर्ष में बदलने का प्रयास हो रहा था।
यही कारण है कि चारु मजूमदार ने श्रीकाकुलम को संभावित “भारत का येनान” कहने तक की आशा व्यक्त की।
नेतृत्व की तुलना
चारु मजूमदार का प्रभाव नक्सलबाड़ी पर शुरुआत से वैचारिक रूप से निर्णायक था।
श्रीकाकुलम में सत्यनारायण और कैलासम नक्सलबाड़ी से पहले लंबे समय से स्थानीय किसान संगठन चला रहे थे।
इसलिए श्रीकाकुलम का नेतृत्व पहले स्थानीय, बाद में अखिल भारतीय CPI(ML) नेतृत्व का हिस्सा बना।
हिंसा की संरचना
नक्सलबाड़ी में किसान प्रतिरोध, भूमि कब्जे और पुलिस से संघर्ष के साथ हिंसा तेजी से विकसित हुई।
श्रीकाकुलम में पहले लंबा गैर-सशस्त्र संगठनात्मक दौर था।
31 अक्टूबर 1967 की लेविडी घटना के बाद आत्मरक्षा और सशस्त्र कार्रवाई की स्वीकृति बढ़ी।
फिर नवंबर 1968 से योजनाबद्ध गुरिल्ला संघर्ष आया।
अर्थात श्रीकाकुलम में संक्रमण अधिक स्पष्ट चरणों में दिखाई देता है—
जनसंगठन → उग्र प्रतिरोध → गुरिल्ला संघर्ष → CPI(ML) की ‘सफाया’ रणनीति।
परिणाम का अंतर
नक्सलबाड़ी का स्थानीय विद्रोह जल्दी दब गया, लेकिन उसकी राजनीतिक विचारधारा पूरे भारत में फैल गई।
श्रीकाकुलम का गुरिल्ला आंदोलन कुछ अधिक समय तक चला, लेकिन 1969–70 के पुलिस अभियान और नेतृत्व के खत्म होने से टूट गया।
नक्सलबाड़ी सैन्य रूप से छोटा, वैचारिक रूप से विशाल था।
श्रीकाकुलम सामाजिक और संगठनात्मक रूप से अधिक विकसित, लेकिन राष्ट्रीय वैचारिक प्रतीक के रूप में नक्सलबाड़ी से द्वितीय था।
फिर भी CPI(ML) की शुरुआती क्रांतिकारी रणनीति की सबसे महत्वपूर्ण वास्तविक प्रयोगशालाओं में श्रीकाकुलम का स्थान अत्यंत ऊंचा था।
तेभागा–तेलंगाना–नक्सलबाड़ी–श्रीकाकुलम — भारतीय वामपंथी किसान संघर्ष की ऐतिहासिक निरंतरता और बदलाव
यदि भारतीय कम्युनिस्ट किसान आंदोलनों का लंबा इतिहास देखा जाए तो चार नाम विशेष रूप से एक क्रम बनाते हैं—
तेभागा — तेलंगाना — नक्सलबाड़ी — श्रीकाकुलम।
यह भारतीय वामपंथ के किसान प्रश्न में बदलती रणनीति का इतिहास भी है।
तेभागा : उत्पादन के हिस्से का प्रश्न
1946–47 का तेभागा आंदोलन मुख्य रूप से बंगाल के बटाईदारों का संघर्ष था।
मांग थी कि जोतदार को आधी उपज देने के बजाय केवल एक-तिहाई दिया जाए और उत्पाद का दो-तिहाई हिस्सा वास्तविक उत्पादक बर्गादार को मिले।
इस आंदोलन में किसान सभा की केंद्रीय भूमिका थी।
यह बड़े पैमाने पर संगठित प्रत्यक्ष किसान आंदोलन था, लेकिन उसने राज्य सत्ता पर कब्जे की सर्वभारतीय गुरिल्ला रणनीति नहीं अपनाई।
तेलंगाना : जमीन और ग्रामीण सत्ता
यहां प्रश्न केवल लगान या हिस्सेदारी नहीं रहा।
कई क्षेत्रों में जमीन पर कब्जा, भूस्वामी सत्ता का विघटन, गुरिल्ला दस्ते और ग्राम-स्तरीय वैकल्पिक सत्ता विकसित हुई। आंदोलन 1946 से 1951 तक चला और निजाम तथा बाद में भारतीय सुरक्षा बलों से टकराया।
तेलंगाना ने भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन को दिखाया कि किसान संघर्ष स्थानीय मांग से आगे ग्रामीण सत्ता-संघर्ष में बदल सकता है।
लेकिन 1951 के बाद दिशा बदली
तेलंगाना की वापसी के बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने संसदीय लोकतंत्र में सक्रिय भागीदारी का रास्ता अपनाया।
1952 से चुनावी राजनीति में CPI एक महत्वपूर्ण शक्ति बन गई।
1957 में केरल में कम्युनिस्ट सरकार बनी।
अर्थात पार्टी के भीतर यह धारणा मजबूत हुई कि भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनआंदोलन और चुनाव दोनों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
नक्सलबाड़ी ने इसी दिशा को चुनौती दी
1967 में नक्सलबाड़ी समर्थक धारा ने कहा—
तेलंगाना की क्रांतिकारी विरासत छोड़ दी गई है।
संसदीय कम्युनिज्म संशोधनवादी बन चुका है।
वास्तविक रास्ता फिर से किसान सशस्त्र संघर्ष है।
यहीं नक्सलबाड़ी ने तेलंगाना की स्मृति को नए माओवादी सिद्धांत से जोड़ दिया।
श्रीकाकुलम : दोनों परंपराओं का मिलन
श्रीकाकुलम में एक अनोखी स्थिति बनी।
उसकी सामाजिक-राजनीतिक तैयारी पुराने कम्युनिस्ट जनसंगठन जैसी थी।
लेकिन 1967 के बाद उसकी रणनीति नक्सलबाड़ी की क्रांतिकारी धारा की ओर मुड़ गई।
इसलिए उसमें दो परंपराएं एक साथ दिखाई देती हैं—
तेलंगाना जैसी दीर्घकालीन किसान संगठन प्रक्रिया
नक्सलबाड़ी जैसी तत्काल माओवादी क्रांतिकारी राजनीति।
यही मिश्रण श्रीकाकुलम को विशेष बनाता है।
किसान प्रश्न का रूपांतरण
इन चार आंदोलनों को उनकी केंद्रीय मांग के आधार पर भी समझा जा सकता है।
तेलंगाना : जमीन, वेट्टी से मुक्ति और ग्रामीण सत्ता।
नक्सलबाड़ी : भूमि से आगे राज्य सत्ता पर क्रांतिकारी हमला।
श्रीकाकुलम : आदिवासी भूमि-अधिकार से शुरू होकर माओवादी गुरिल्ला क्रांति तक।
इस यात्रा में भारतीय किसान आंदोलन का प्रश्न क्रमशः आर्थिक मांग से राजनीतिक सत्ता की ओर बढ़ता दिखाई देता है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक अगला आंदोलन पिछले का “उन्नत संस्करण” था।
बल्कि प्रत्येक की अपनी सामाजिक परिस्थिति थी।
रणनीति का सबसे बड़ा परिवर्तन
तेभागा और तेलंगाना के बड़े हिस्से में व्यापक किसान संगठन संघर्ष का मुख्य आधार था।
नक्सलबाड़ी और प्रारंभिक CPI(ML) राजनीति में छोटे क्रांतिकारी दस्ते और चयनित ‘वर्ग शत्रुओं’ पर कार्रवाई कहीं अधिक केंद्रीय हो गई।
श्रीकाकुलम में यही परिवर्तन प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है।
इसलिए श्रीकाकुलम भारतीय वामपंथी किसान इतिहास में केवल आंदोलन नहीं, बल्कि रणनीतिक संक्रमण का अध्ययन भी है।
श्रीकाकुलम की विशिष्टता — क्यों इसे केवल ‘नक्सलबाड़ी का आंध्र संस्करण’ नहीं कहा जा सकता?
लोकप्रिय इतिहास में श्रीकाकुलम को कई बार “आंध्र का नक्सलबाड़ी” कहा जाता है।
यह संक्षिप्त परिचय के लिए सुविधाजनक हो सकता है, लेकिन ऐतिहासिक विश्लेषण के लिए पर्याप्त नहीं।
श्रीकाकुलम की कम से कम छह ऐसी विशेषताएं थीं जो उसे स्वतंत्र ऐतिहासिक पहचान देती हैं।
पहली विशेषता : आंदोलन नक्सलबाड़ी से पहले शुरू हो चुका था
श्रीकाकुलम में गिरिजन संगठन 1950 के दशक से विकसित हो चुका था।
इसलिए दोनों के बीच कारण-परिणाम संबंध स्थापित करना गलत होगा।
नक्सलबाड़ी ने श्रीकाकुलम की दिशा बदली, उसकी उत्पत्ति नहीं की।
दूसरी विशेषता : आदिवासी भूमि-वियोजन केंद्रीय था
नक्सलबाड़ी में भूमि और बटाई का प्रश्न प्रमुख था।
अनुसूचित क्षेत्र की आदिवासी जमीन का गैर-आदिवासी कब्जे में जाना।
इसलिए संघर्ष भूमि सुधार के साथ संवैधानिक आदिवासी संरक्षण से भी जुड़ता है।
1959 और 1970 के भूमि हस्तांतरण विनियम इसी विशिष्ट परिस्थिति का कानूनी पक्ष थे।
तीसरी विशेषता : सामाजिक संगठन की लंबी अवधि
सत्यनारायण और कैलासम ने अचानक पहाड़ियों में जाकर गुरिल्ला संगठन नहीं बनाया।
उनके पीछे वर्षों का सामाजिक कार्य था।
इसलिए श्रीकाकुलम की सबसे महत्वपूर्ण पूंजी पूर्व-सशस्त्र संगठनात्मक विरासत थी।
चौथी विशेषता : संस्कृति की असाधारण भूमिका
सुब्बाराव पाणिग्रही, सत्यनारायण और अन्य सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं ने गीत, लोककथा और नाट्य का व्यापक प्रयोग किया।
इससे आंदोलन का प्रभाव केवल राजनीतिक बैठकों तक सीमित नहीं रहा।
उसने तेलुगु क्रांतिकारी संस्कृति की ऐसी धारा को जन्म दिया जिसका प्रभाव आगे विरसम, जन नाट्य मंडली और बाद की क्रांतिकारी सांस्कृतिक राजनीति में देखा जा सकता है।
पांचवीं विशेषता : भूमि संघर्ष और आदिवासी नीति पर प्रभाव
नक्सलबाड़ी की सबसे बड़ी विरासत वैचारिक और संगठनात्मक थी।
श्रीकाकुलम का प्रभाव अधिक प्रत्यक्ष रूप से आदिवासी भूमि कानून की बहस से भी जुड़ा।
हालांकि Regulation I of 1970 को केवल विद्रोह का परिणाम मानना सरलीकरण होगा, लेकिन यह निर्विवाद है कि उसी दौर के भूमि संकट ने राज्य को अधिक कठोर कानूनी सुरक्षा की आवश्यकता का सामना कराया।
यानी श्रीकाकुलम ने बंदूक और कानून—दोनों की राजनीति को प्रभावित किया।
छठी विशेषता : आंदोलन अपनी सफलता से भी कमजोर हुआ
यह श्रीकाकुलम का सबसे रोचक विरोधाभास है।
लेकिन CPI(ML) चरण में गुरिल्ला दस्ते अधिक केंद्रीय हुए।
उसकी ताकत स्थानीय सामाजिक संघर्ष था।
लेकिन बाद में अखिल भारतीय क्रांतिकारी रणनीति अधिक प्रभावशाली हुई।
उसकी ताकत जनता की खुली भागीदारी थी।
लेकिन सुरक्षा की जरूरत ने भूमिगत संगठन को बढ़ाया।
इसीलिए श्रीकाकुलम की पराजय केवल बाहरी दमन की कहानी नहीं है।
वह एक सफल जनआंदोलन के सैन्यीकरण की सीमा का भी अध्ययन है।
तुलनात्मक सार
| कसौटी | तेलंगाना | नक्सलबाड़ी | श्रीकाकुलम | |---|---|---|---| | प्रमुख काल | 1946–51 | 1967 | लगभग 1950 के दशक के उत्तरार्ध–1970; सशस्त्र चरण 1968–70 | | मुख्य सामाजिक आधार | गरीब किसान, खेतिहर मजदूर, दलित व ग्रामीण गरीब | आदिवासी व गरीब किसान, बटाईदार | मुख्यतः सवरा-जटापू आदिवासी किसान, गरीब किसान | | केंद्रीय प्रश्न | सामंतवाद, वेट्टी, जमीन | भूमि, फसल, ग्रामीण वर्ग सत्ता | आदिवासी भूमि-वियोजन, साहूकारी, मजदूरी, बाद में राज्य सत्ता | | प्रमुख संगठन | आंध्र महासभा, CPI, ग्राम संगम | CPI(M) की क्रांतिकारी धारा | गिरिजन संगम, बाद में CPI(ML) | | सशस्त्र चरण | व्यापक और दीर्घकालीन | संक्षिप्त | लगभग दो वर्षों का तीव्र गुरिल्ला चरण | | वैकल्पिक ग्राम सत्ता | व्यापक क्षेत्रों में | सीमित | कुछ क्षेत्रों में सामाजिक प्रभाव, लेकिन तेलंगाना जितना व्यापक नहीं | | राज्य विरोधी चरण | निजाम/रजाकार, बाद में भारतीय राज्य | पश्चिम बंगाल सरकार/भारतीय राज्य | स्वतंत्र भारत का राज्य | | प्रमुख विरासत | भूमि-सुधार, किसान राजनीति, कम्युनिस्ट इतिहास | भारतीय नक्सलवाद का वैचारिक जन्म | आदिवासी भूमि-अधिकार + प्रारंभिक CPI(ML) गुरिल्ला प्रयोग | | प्रमुख सीमा | दमन, बदली राजनीतिक परिस्थिति, CPI की रणनीति | अल्प अवधि व कमजोर स्थायी आधार | दमन, सीमित विस्तार, जनसंगठन से दूरी, ‘सफाया लाइन’ |
खंड 12 का समेकित मूल्यांकन
तेलंगाना, नक्सलबाड़ी और श्रीकाकुलम को एक ही क्रांतिकारी वंशावली में रखना उपयोगी है, लेकिन उन्हें एक जैसा मानना गलत होगा।
तेलंगाना सबसे व्यापक ग्रामीण सत्ता-संघर्ष था।
उसका पैमाना, ग्राम संगठन, भूमि कब्जा और गुरिल्ला संरचना कहीं अधिक विस्तृत थी। निजाम और रजाकारों से संघर्ष के बाद उसने भारतीय राज्य की सेना से भी मुकाबला किया।
नक्सलबाड़ी सबसे बड़ा वैचारिक विस्फोट था।
उसने सीमित भूभाग में संघर्ष किया, लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन को स्थायी रूप से विभाजित कर दिया और ‘नक्सलवाद’ नाम की नई राजनीतिक धारा को जन्म दिया।
श्रीकाकुलम सबसे महत्वपूर्ण संक्रमण-स्थल था।
यह वह जगह थी जहां लंबे समय से चल रहा संगठित किसान–आदिवासी आंदोलन नक्सलबाड़ी की वैचारिक क्रांति से मिला।
इसीलिए श्रीकाकुलम के भीतर एक साथ तीन इतिहास दिखाई देते हैं—
आदिवासी अधिकार का इतिहास, किसान जनसंगठन का इतिहास, और भारतीय नक्सलवादी सशस्त्र राजनीति का इतिहास।
इसकी सबसे बड़ी शिक्षा भी इसी त्रिवेणी में छिपी है।
श्रीकाकुलम बताता है कि स्थानीय सामाजिक संघर्ष और राष्ट्रीय क्रांतिकारी विचारधारा एक-दूसरे को शक्ति दे सकते हैं, लेकिन उनके बीच संतुलन टूट जाए तो वही संबंध आंदोलन की कमजोरी भी बन सकता है।
नक्सलबाड़ी ने श्रीकाकुलम को नई भाषा दी।
तेलंगाना ने उसे ऐतिहासिक स्मृति दी।
लेकिन श्रीकाकुलम ने अपना संघर्ष स्वयं बनाया था।
इसीलिए उसे केवल “आंध्र का नक्सलबाड़ी” कहना उसकी ऐतिहासिक विशिष्टता को कम कर देता है।
खंड 13 — श्रीकाकुलम से पीपुल्स वार ग्रुप और बाद के माओवादी आंदोलन तक (अध्याय 59–64)
अध्याय 59: CPI(ML) के विघटन के बाद आंध्र प्रदेश की क्रांतिकारी राजनीति अध्याय 60: कोंडापल्ली सीतारमैया और श्रीकाकुलम–तेलंगाना अनुभवों से नई रणनीति अध्याय 61: 1980 में पीपुल्स वार ग्रुप का गठन — संगठन, लक्ष्य और रणनीतिक बदलाव अध्याय 62: जनसंगठनों की वापसी — छात्र, किसान, मजदूर, महिला और सांस्कृतिक मोर्चे अध्याय 63: तेलंगाना से दंडकारण्य तक — आंध्र के नक्सलवादी आंदोलन का भौगोलिक विस्तार अध्याय 64: 2004 में CPI (Maoist) और श्रीकाकुलम की विरासत — वास्तविक निरंतरता, वैचारिक स्मृति और मिथक
इसके बाद खंड 14 — उपलब्धियां, सीमाएं और ऐतिहासिक मूल्यांकन (अध्याय 65–69) आएगा।
श्रीकाकुलम से पीपुल्स वार ग्रुप और बाद के माओवादी आंदोलन तक
श्रीकाकुलम का सशस्त्र चरण 1970–71 तक कमजोर पड़ गया, लेकिन उससे जुड़ी राजनीतिक धारा समाप्त नहीं हुई। आंध्र प्रदेश में नक्सलवादी राजनीति ने अगले दशक में नए संगठन, नई रणनीति और नए सामाजिक आधार तलाशे। इसी प्रक्रिया से अंततः 22 अप्रैल 1980 को कोंडापल्ली सीतारमैया के नेतृत्व में CPI(ML) People’s War, जिसे सामान्यतः पीपुल्स वार ग्रुप—PWG कहा गया, सामने आया। बाद में यही संगठन उत्तर तेलंगाना से दंडकारण्य और आंध्र–ओडिशा सीमा तक फैला तथा 21 सितंबर 2004 को Maoist Communist Centre of India के साथ विलय करके Communist Party of India (Maoist) के गठन का प्रमुख घटक बना।
लेकिन इस पूरी यात्रा को “श्रीकाकुलम → PWG → CPI (Maoist)” जैसी सीधी संगठनात्मक रेखा मान लेना सरलीकरण होगा। श्रीकाकुलम का पुराना नेतृत्व लगभग समाप्त हो चुका था; CPI(ML) अनेक गुटों में टूट गई थी; आंध्र प्रदेश में नई पीढ़ी के नेताओं, छात्रों और किसान आंदोलनों ने 1970 के दशक में अलग संगठनात्मक अनुभव विकसित किए। इसलिए श्रीकाकुलम की विरासत मुख्यतः तीन रूपों में आगे गई—स्मृति, रणनीतिक सबक और आदिवासी–किसान क्षेत्रों में लंबे संगठन की परंपरा।
1972 : पहली नक्सलवादी लहर का संकट
श्रीकाकुलम आंदोलन के टूटने के तुरंत बाद पूरे भारतीय नक्सलवादी आंदोलन पर संकट आया।
चारु मजूमदार जुलाई 1972 में गिरफ्तार हुए और कुछ दिनों बाद पुलिस हिरासत में उनकी मृत्यु हो गई। उनके बाद CPI(ML) में पहले से मौजूद रणनीतिक मतभेद खुलकर सामने आए।
क्या ‘वर्ग शत्रुओं के सफाये’ को केंद्रीय रणनीति बनाए रखा जाए?
क्या चुनाव का पूर्ण बहिष्कार उचित है?
क्या सशस्त्र संघर्ष तत्काल पूरे देश में फैलाया जा सकता है?
इन सवालों पर CPI(ML) अनेक धाराओं में विभाजित होती चली गई।
आंध्र प्रदेश की विशिष्ट स्थिति
आंध्र प्रदेश में यह बहस पहले से मौजूद थी।
तरिमेला नागी रेड्डी और डी.वी. राव की धारा चारु मजूमदार की अतिउग्र ‘सफाया लाइन’ की आलोचक थी।
दूसरी ओर ऐसे कार्यकर्ता भी थे जो CPI(ML) की मूल माओवादी दिशा बनाए रखना चाहते थे, लेकिन श्रीकाकुलम की विफलता से कुछ रणनीतिक निष्कर्ष निकालना आवश्यक मानते थे।
इसी वातावरण में कोंडापल्ली सीतारमैया महत्वपूर्ण नेता के रूप में उभरे।
श्रीकाकुलम से मिला सबसे बड़ा सबक
आंध्र के क्रांतिकारियों के सामने श्रीकाकुलम का अनुभव बहुत स्पष्ट था।
वर्षों का किसान संगठन शक्तिशाली आधार बना सकता है;
लेकिन केवल गुरिल्ला दस्ते व्यापक जनराजनीति का विकल्प नहीं हो सकते;
शीर्ष नेतृत्व पर अत्यधिक निर्भरता खतरनाक है;
और पुलिस दमन के सामने टिकने के लिए एक विस्तृत कैडर संरचना तथा सामाजिक नेटवर्क आवश्यक है।
यही कारण है कि 1970 के दशक में आंध्र की नई क्रांतिकारी धारा ने छात्रों, युवाओं और ग्रामीण जनसंगठन पर फिर से अधिक जोर देना शुरू किया।
रैडिकल स्टूडेंट्स यूनियन
इस नई राजनीति में Radical Students Union—RSU महत्वपूर्ण बनी।
RSU का गठन 12 अक्टूबर 1974 को हुआ। उसका उद्देश्य केवल कॉलेजों के प्रश्न उठाना नहीं था; उससे जुड़े कार्यकर्ता छात्रों को ग्रामीण समाज, वर्ग संघर्ष और किसान राजनीति से जोड़ने की कोशिश करते थे।
इससे नक्सलवादी राजनीति को ऐसी नई पीढ़ी मिली जो—
और भूमिगत राजनीति तथा जनसंगठन दोनों के बीच सेतु बन सकती थी।
‘गो टू विलेज’ अभियान
1970 के दशक के उत्तरार्ध में छात्र और युवा कार्यकर्ताओं के गांवों में जाने के अभियान महत्वपूर्ण बने। इन अभियानों ने उत्तर तेलंगाना के ग्रामीण क्षेत्रों में नई राजनीतिक पहुंच बनाई।
इस प्रक्रिया से एक महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है।
श्रीकाकुलम में शिक्षकों ने गांवों में लंबे समय तक रहकर संगठन बनाया था।
नई पीढ़ी ने उसी विचार को अधिक व्यवस्थित राजनीतिक अभियान के रूप में अपनाया—
शहर के क्रांतिकारी युवा गांव में जाएं और किसान संघर्ष के साथ जुड़ें।
रैडिकल यूथ लीग
1977 में Radical Youth League—RYL सामने आई और 1978 के गांव अभियान में उसकी सक्रिय भूमिका रही। उपलब्ध स्रोत RSU को 1974 और RYL को 1977 की स्थापना से जोड़ते हैं।
इस छात्र–युवा नेटवर्क ने आगे उत्तर तेलंगाना के किसान संघर्षों के लिए कैडर उपलब्ध कराया।
यही 1970 के दशक की नई जमीन थी जिस पर 1980 में पीपुल्स वार खड़ा होने वाला था।
कोंडापल्ली सीतारमैया और श्रीकाकुलम–तेलंगाना अनुभवों से नई रणनीति
कोंडापल्ली सीतारमैया आंध्र नक्सलवादी आंदोलन के उस दूसरे चरण के प्रमुख वास्तुकार बने जिसने श्रीकाकुलम के बाद संगठन को फिर से खड़ा किया।
उनकी राजनीति पर दो ऐतिहासिक अनुभवों का प्रभाव था—
श्रीकाकुलम की उपलब्धियां तथा पराजय।
श्रीकाकुलम की हूबहू पुनरावृत्ति नहीं
सीतारमैया ने केवल श्रीकाकुलम मॉडल दोहराने की कोशिश नहीं की।
आंध्र में नई रणनीति उत्तर तेलंगाना के उन जिलों पर केंद्रित हुई जहां—
करिमनगर और आदिलाबाद विशेष रूप से महत्वपूर्ण बने।
जनसंगठन का महत्व
श्रीकाकुलम का एक बड़ा सबक यह था कि गुरिल्ला संघर्ष को टिकाने के लिए राजनीतिक आधार आवश्यक है।
सीतारमैया की धारा ने कम से कम प्रारंभिक चरण में चारु मजूमदार की व्यक्तिगत ‘सफाया’ नीति से कुछ दूरी बनाते हुए जन-सक्रियता और किसान लामबंदी पर अधिक जोर देने की कोशिश की। सुरक्षा अध्ययन साहित्य भी PWG के प्रारंभिक विकास में इस बदलाव का उल्लेख करता है।
अब विचार केवल यह नहीं था कि किसी अत्याचारी भूस्वामी को समाप्त करके वर्ग संघर्ष बढ़ेगा।
फिर उस सामाजिक आधार पर सशस्त्र संगठन विकसित करो।
तेलंगाना की वापसी
इस दृष्टि से उत्तर तेलंगाना स्वाभाविक क्षेत्र बना।
यह वही व्यापक भूभाग था जहां पुराने तेलंगाना किसान संघर्ष की ऐतिहासिक स्मृति मौजूद थी।
अब संघर्ष स्वतंत्र भारत की निर्वाचित सरकार, आधुनिक पुलिस और बदले हुए कृषि समाज के भीतर चल रहा था।
22 अप्रैल 1980
22 अप्रैल 1980, लेनिन की जयंती पर, कोंडापल्ली सीतारमैया ने Communist Party of India (Marxist-Leninist) People’s War की स्थापना की। इसे सामान्यतः पीपुल्स वार ग्रुप कहा गया। सुरक्षा अध्ययन स्रोत इसकी स्थापना 22 अप्रैल 1980 को आंध्र प्रदेश में सीतारमैया के नेतृत्व में दर्ज करते हैं।
यह नई पार्टी अपने को नक्सलबाड़ी और CPI(ML) की क्रांतिकारी परंपरा की उत्तराधिकारी मानती थी।
लेकिन संगठनात्मक व्यवहार में वह 1969 की CPI(ML) की हूबहू पुनरावृत्ति नहीं थी।
चार प्रमुख आधार
PWG की शुरुआती रणनीति को चार तत्वों में समझा जा सकता है—
भूमि, मजदूरी, ग्रामीण सामाजिक शक्ति और स्थानीय उत्पीड़न के प्रश्नों पर संघर्ष।
छात्र, युवा, किसान, मजदूर और सांस्कृतिक मोर्चों के जरिए राजनीतिक विस्तार।
सशस्त्र दस्तों का निर्माण और ग्रामीण क्षेत्रों में दीर्घकालीन संघर्ष।
उत्तर तेलंगाना से बाहर उन वन और आदिवासी क्षेत्रों में जाना जहां लंबी गुरिल्ला गतिविधि के लिए भूगोल अनुकूल माना जाता था।
श्रीकाकुलम से पहला बड़ा बदलाव
श्रीकाकुलम में सशस्त्र आंदोलन एक सीमित भौगोलिक क्षेत्र में तेजी से केंद्रित हो गया था।
PWG ने शुरुआत से एक विस्तृत और परस्पर जुड़ा गुरिल्ला क्षेत्र बनाने की दिशा अपनाई।
IDSA के एक अध्ययन के अनुसार संगठन ने उत्तर तेलंगाना, दंडकारण्य और आंध्र–ओडिशा सीमा को प्रमुख गुरिल्ला क्षेत्रों के रूप में विकसित करने की योजना बनाई।
यानी लक्ष्य किसी एक “श्रीकाकुलम” को बचाए रखना नहीं था।
लक्ष्य अनेक जुड़े हुए संघर्ष-क्षेत्र बनाना था।
जनसंगठनों की वापसी — छात्र, किसान, मजदूर, महिला और सांस्कृतिक मोर्चे
श्रीकाकुलम की सबसे बड़ी ताकत गिरिजन संगम था। उसकी पराजय के बाद आंध्र के नक्सलवादी आंदोलन ने व्यापक सामाजिक संगठनों का महत्व फिर पहचाना।
PWG और उससे पहले की सीतारमैया धारा ने अनेक प्रकार के जनमंच विकसित किए।
छात्र
RSU ने छात्र राजनीति में नक्सलवादी विचारों को फैलाया।
छात्र केवल विश्वविद्यालय में आंदोलन न करें, बल्कि गांवों में जाकर किसान समाज को समझें—यह उसका महत्वपूर्ण राजनीतिक आग्रह था।
युवा
Radical Youth League ने ग्रामीण युवाओं को संगठित करने का प्रयास किया।
1978 के गांव अभियानों में उसके नेटवर्कों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
किसान और खेतिहर मजदूर
यही काम PWG को केवल भूमिगत सशस्त्र संगठन बनने से रोकता था।
मजदूर संगठन
बाद में खदान और औद्योगिक क्षेत्रों में भी संगठनात्मक काम हुआ। विशेष रूप से सिंगरेनी कोयला क्षेत्र में मजदूर राजनीति नक्सलवादी प्रभाव का महत्वपूर्ण क्षेत्र बनी।
महिला संगठन
महिलाओं के बीच भी अलग राजनीतिक नेटवर्क बनाए गए।
यह श्रीकाकुलम की महिला संगम परंपरा से एक वैचारिक समानता दिखाता है, हालांकि इसे सीधी संगठनात्मक निरंतरता नहीं माना जाना चाहिए।
संस्कृति
आंध्र की क्रांतिकारी राजनीति में संस्कृति फिर केंद्रीय बनी।
श्रीकाकुलम में सुब्बाराव पाणिग्रही और लोकनाट्य जो भूमिका निभाते थे, बाद के दौर में जन नाट्य मंडली और गद्दर जैसे कलाकारों ने कहीं बड़े पैमाने पर वही कार्य किया—
राजनीतिक विचारों को गीत और प्रदर्शन के माध्यम से ग्रामीण तथा शहरी गरीब तक पहुंचाना।
यानी श्रीकाकुलम का एक महत्वपूर्ण सबक यहां भी जीवित था—
बंदूक अकेले राजनीतिक आंदोलन नहीं बनाती; भाषा, गीत और जनसंपर्क भी चाहिए।
क्या यह ‘मास लाइन’ की पूरी वापसी थी?
PWG ने जनसंगठनों का विस्तार किया, लेकिन उसका अंतिम राजनीतिक लक्ष्य सशस्त्र सत्ता-परिवर्तन ही था।
उसके अपने दस्तावेजों में जनसंघर्ष को दीर्घकालीन जनयुद्ध की रणनीति से जोड़ा गया।
इसलिए जनसंगठन स्वतंत्र लोकतांत्रिक राजनीति नहीं, बल्कि व्यापक क्रांतिकारी परियोजना का हिस्सा थे।
तेलंगाना से दंडकारण्य तक — आंध्र नक्सलवादी आंदोलन का भौगोलिक विस्तार
PWG के इतिहास का सबसे निर्णायक विकास था दंडकारण्य की ओर विस्तार।
यह विस्तार ही वह कड़ी बना जिसने आंध्र की नक्सलवादी राजनीति को बाद में मध्य भारत की विशाल आदिवासी पट्टी से जोड़ दिया।
1980 में सात दस्ते
IDSA के अध्ययन के अनुसार 1980 में PWG ने सात सशस्त्र गुरिल्ला दस्ते उस रणनीतिक क्षेत्र में भेजे जो तत्कालीन आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की सीमाओं के आसपास फैला था। बाद में यही व्यापक क्षेत्र दंडकारण्य आंदोलन का केंद्र बना।
यह भविष्य के भारतीय माओवादी आंदोलन का भौगोलिक पुनर्स्थापन था।
दंडकारण्य क्यों?
राज्य की सीमित विकासात्मक उपस्थिति।
वन विभाग, व्यापारियों और स्थानीय मध्यस्थों से शिकायतें।
और तीन राज्यों की सीमाओं के कारण सुरक्षा बलों के लिए समन्वय की कठिनाई।
ये सभी तत्व PWG को यहां दीर्घकालीन कार्य की संभावना देते थे।
श्रीकाकुलम की स्मृति
यहां श्रीकाकुलम से समानता स्पष्ट थी।
लेकिन PWG ने श्रीकाकुलम की तुलना में कहीं बड़े भूभाग में धीरे-धीरे संगठन बनाने की कोशिश की।
दंडकारण्य आदिवासी किसान मजदूर संगठन
समय के साथ आदिवासी समुदायों में विभिन्न जनसंगठन बनाए गए। IDSA अध्ययन Dandakaranya Adivasi Kisan Mazdoor Sangathan—DAKMS जैसे संगठन का उल्लेख करता है।
यही वह प्रक्रिया थी जिसने सशस्त्र दस्तों के लिए सामाजिक आधार तैयार किया।
1980–84 : विस्तार की शुरुआती अवधि
CPI (Maoist) के बाद के संगठनात्मक दस्तावेज भी स्वीकार करते हैं कि 1980–84 के बीच उत्तर तेलंगाना और दंडकारण्य में किसान संघर्ष और राजनीतिक अभियान चलाए गए और विभिन्न क्षेत्रों में गुरिल्ला संरचनाएं विकसित की गईं।
यह स्वयं संगठन का स्रोत है, इसलिए इसे तटस्थ तथ्य के बजाय उसके अपने इतिहासलेखन के रूप में पढ़ना चाहिए; फिर भी भौगोलिक विस्तार की व्यापक दिशा अन्य स्रोतों से भी पुष्ट होती है।
आंध्र–ओडिशा सीमा
PWG ने पूर्व की ओर आंध्र–ओडिशा सीमा क्षेत्र में भी विस्तार किया।
इस भूभाग का ऐतिहासिक महत्व श्रीकाकुलम से प्रत्यक्ष भौगोलिक निकटता रखता था।
उत्तर तटीय आंध्र के आदिवासी इलाके, पूर्वी घाट और दक्षिणी ओडिशा की जनजातीय पट्टी मिलकर ऐसा विस्तृत भूगोल बनाते थे जहां क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं को पुराने श्रीकाकुलम अनुभव से कुछ परिचित सामाजिक परिस्थितियां दिखाई देती थीं।
यहां फिर जमीन, जंगल, आदिवासी अधिकार और राज्य की सीमित पहुंच जैसे प्रश्न महत्वपूर्ण बने।
लेकिन आंदोलन बदल चुका था
श्रीकाकुलम का गुरिल्ला संगठन अपेक्षाकृत छोटा और प्रारंभिक था।
1980–90 के दशक तक PWG अधिक जटिल संगठन बन चुका था—
इसलिए दोनों को समान आंदोलन कहना उचित नहीं।
PWG ने श्रीकाकुलम के अनुभवों को अधिक संस्थागत और दीर्घकालीन संरचना में रूपांतरित किया।
2004 में CPI (Maoist) और श्रीकाकुलम की विरासत — वास्तविक निरंतरता, वैचारिक स्मृति और मिथक
1980 के बाद PWG कई उतार-चढ़ावों से गुजरा।
उत्तर तेलंगाना और आंध्र प्रदेश से उसकी गतिविधियां महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, ओडिशा और अन्य क्षेत्रों तक फैलीं।
1990 के दशक में संगठन ने अपनी सैन्य और संगठनात्मक संरचना को अधिक जटिल बनाया। इसी अवधि में दंडकारण्य माओवादी गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बनने लगा। SOAS के एक अकादमिक अध्ययन में भी PWG के बस्तर और गढ़चिरौली विस्तार को 1980 के दशक से विकसित होती प्रक्रिया के रूप में बताया गया है।
पीपुल्स वार और MCC
इसी समय पूर्वी भारत में एक अन्य महत्वपूर्ण माओवादी धारा Maoist Communist Centre—MCC थी, जिसका प्रभाव विशेष रूप से बिहार और झारखंड क्षेत्र में था।
PWG और MCC की ऐतिहासिक उत्पत्तियां अलग थीं।
दोनों के बीच लंबे समय तक वैचारिक और क्षेत्रीय मतभेद भी रहे।
लेकिन 2000 के दशक के प्रारंभ में एकता की बातचीत आगे बढ़ी।
21 सितंबर 2004
21 सितंबर 2004 को CPI(ML) People’s War और Maoist Communist Centre of India ने विलय कर Communist Party of India (Maoist) का गठन किया।
भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने भी 2004 के इस विलय को दर्ज किया है।
नए संगठन के अपने संयुक्त वक्तव्य के अनुसार विलय 21 सितंबर को हुआ और इसकी सार्वजनिक घोषणा अक्टूबर 2004 में की गई।
इस प्रकार लगभग 37 वर्ष पहले 1967 के नक्सलबाड़ी से निकली कई बिखरी क्रांतिकारी धाराओं का एक बड़ा हिस्सा एक बार फिर एक संगठन में आ गया।
क्या CPI (Maoist) को श्रीकाकुलम की सीधी संतान कहा जा सकता है?
नहीं—कम से कम ऐतिहासिक रूप से इतना सीधा दावा सही नहीं होगा।
श्रीकाकुलम और CPI (Maoist) के बीच 34 वर्षों का अंतर है।
दंडकारण्य में नया सामाजिक आधार बना,
और MCC जैसी अलग ऐतिहासिक धारा विलय में शामिल हुई।
इसलिए संगठनात्मक वंशावली कई शाखाओं से गुजरती है।
वास्तविक निरंतरता कहां है?
फिर भी कम से कम चार प्रकार की निरंतरता स्पष्ट दिखाई देती हैं।
पहली — आदिवासी क्षेत्र को क्रांतिकारी आधार मानने की धारणा
श्रीकाकुलम ने दिखाया था कि दुर्गम आदिवासी क्षेत्र में लंबे राजनीतिक कार्य से मजबूत सामाजिक आधार बनाया जा सकता है।
PWG ने यही सिद्धांत उत्तर तेलंगाना, दंडकारण्य और आंध्र–ओडिशा सीमा में कहीं बड़े पैमाने पर लागू करने का प्रयास किया।
दूसरी — जमीन और जंगल का प्रश्न
श्रीकाकुलम में आंदोलन का शुरुआती आधार था—
बाद के दंडकारण्य आंदोलन में भी वन अधिकार, वन उपज, मजदूरी, विस्थापन और स्थानीय संसाधनों का प्रश्न महत्वपूर्ण रहा।
इस अर्थ में सामाजिक संघर्ष के विषयों में उल्लेखनीय समानता थी।
तीसरी — जनसंगठन और गुरिल्ला संघर्ष का संयोजन
श्रीकाकुलम में यह संतुलन अंततः टूट गया था।
बाद के PWG ने जनसंगठन और सशस्त्र दस्ते दोनों को समानांतर विकसित करने की अधिक व्यवस्थित कोशिश की।
IDSA के अध्ययन में PWG द्वारा छात्र, युवा, महिला, मजदूर और अन्य मोर्चों के निर्माण को इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा बताया गया है।
चौथी — शहीद और स्मृति की राजनीति
नक्सलबाड़ी, श्रीकाकुलम और तेलंगाना के पुराने नेताओं को बाद के माओवादी साहित्य में ऐतिहासिक पूर्वजों के रूप में प्रस्तुत किया गया।
इस स्मृति का संगठनात्मक कार्य भी था।
नई पीढ़ी को यह बताया जाता था कि वर्तमान संघर्ष अचानक पैदा नहीं हुआ; वह दशकों पुरानी क्रांतिकारी परंपरा की निरंतरता है।
यहीं इतिहास राजनीतिक वैधता का साधन बनता है।
लेकिन महत्वपूर्ण अंतर भी हैं
श्रीकाकुलम के लगभग सभी महत्वपूर्ण निर्णय कुछ सीमित जिलों और नेताओं के इर्द-गिर्द थे।
CPI (Maoist) 2004 तक बहुराज्यीय भूमिगत संगठन था।
उसके पास अधिक विकसित सैन्य ढांचा, अलग-अलग क्षेत्रीय समितियां और संयुक्त गुरिल्ला संरचना थी। 2004 के विलय में पूर्व PW और MCCI की गुरिल्ला सेनाओं को एकीकृत People’s Liberation Guerrilla Army—PLGA में संगठित करने की घोषणा की गई।
यानी 1968 के श्रीकाकुलम और 2004 के CPI (Maoist) के बीच आकार, संगठन और सैन्य क्षमता में बहुत बड़ा अंतर था।
श्रीकाकुलम : प्रेरणा या चेतावनी?
बाद की माओवादी राजनीति के लिए श्रीकाकुलम दोनों था।
प्रेरणा, क्योंकि वहां कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने वर्षों तक आदिवासी किसानों के बीच रहकर वास्तविक जनाधार बनाया था।
चेतावनी, क्योंकि छोटे क्षेत्र में तीव्र सैन्य संघर्ष, नेतृत्व का केंद्रीकरण और पुलिस द्वारा सामाजिक नेटवर्क काट दिए जाने पर पूरा आंदोलन बहुत तेजी से टूट गया था।
इसीलिए PWG की रणनीति में एक तरफ सशस्त्र संघर्ष जारी रहा, लेकिन दूसरी तरफ—
इसे श्रीकाकुलम से निकला एक महत्वपूर्ण रणनीतिक पाठ माना जा सकता है, भले ही इसे प्रत्यक्ष लिखित “श्रीकाकुलम सिद्धांत” न कहा जाए।
खंड 13 का समेकित मूल्यांकन
श्रीकाकुलम की सैन्य पराजय ने आंध्र प्रदेश में नक्सलवादी राजनीति समाप्त नहीं की।
1970 के दशक में आंदोलन ने नए रूप में स्वयं को पुनर्गठित किया।
छात्र राजनीति के माध्यम से नई पीढ़ी आई।
गांवों में संगठित राजनीतिक अभियान हुए।
फिर 22 अप्रैल 1980 को कोंडापल्ली सीतारमैया ने पीपुल्स वार की स्थापना की।
नई धारा ने श्रीकाकुलम की सबसे बड़ी शक्ति—लंबे सामाजिक संगठन—को पुनः महत्व देने की कोशिश की, लेकिन सशस्त्र क्रांति का मूल लक्ष्य नहीं छोड़ा।
उसने उत्तर तेलंगाना में आधार बनाया।
आदिवासी किसान संगठनों और दूसरे जनमंचों का उपयोग किया।
और अंततः यही PWG सितंबर 2004 में MCC के साथ मिलकर CPI (Maoist) का प्रमुख घटक बना।
लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सावधानी आवश्यक है।
श्रीकाकुलम से CPI (Maoist) तक सीधी संगठनात्मक रेखा नहीं है।
और MCC जैसी स्वतंत्र माओवादी परंपरा भी 2004 के संगठन में प्रवेश करती है।
इसलिए श्रीकाकुलम की सही ऐतिहासिक स्थिति यह है—
वह आधुनिक भारतीय माओवादी आंदोलन का अकेला “जनक” नहीं था।
लेकिन वह उसकी सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक प्रयोगशालाओं और स्मृतियों में से एक अवश्य था।
आदिवासी किसान के बीच वर्षों तक काम किए बिना टिकाऊ ग्रामीण आंदोलन नहीं बनता।
जनसंगठन से कटकर केवल सैन्य कार्रवाई पर निर्भर आंदोलन राज्य के दमन के सामने तेजी से कमजोर पड़ सकता है।
बाद की नक्सलवादी–माओवादी राजनीति का बड़ा हिस्सा इन दोनों शिक्षाओं के बीच संतुलन तलाशने का इतिहास भी है।
और इसीलिए श्रीकाकुलम की कहानी 1970 में समाप्त नहीं होती।
उसकी प्रतिध्वनि उत्तर तेलंगाना से दंडकारण्य और वहां से 2004 के CPI (Maoist) तक सुनाई देती है—लेकिन बदलते रूप, अलग नेतृत्व और नई सामाजिक परिस्थितियों के साथ।
खंड 14 — उपलब्धियां, सीमाएं और ऐतिहासिक मूल्यांकन (अध्याय 65–69)
अध्याय 65: श्रीकाकुलम आंदोलन की प्रमुख उपलब्धियां — भूमि, आदिवासी चेतना और ग्रामीण सत्ता को चुनौती अध्याय 66: आंदोलन की प्रमुख सीमाएं और विफलताएं — हिंसा, सीमित भूगोल, नेतृत्व और संगठनात्मक संकट अध्याय 67: क्या हिंसा ने आंदोलन को मजबूत किया या कमजोर? — जनसंघर्ष और सशस्त्र चरण की तुलनात्मक समीक्षा अध्याय 68: आदिवासी एजेंसी बनाम ‘बाहरी नेतृत्व’ — क्या आदिवासी स्वयं राजनीतिक कर्ता थे? अध्याय 69: किसान आंदोलन या नक्सलवादी आंदोलन? — श्रीकाकुलम के बदलते चरित्र का समेकित विश्लेषण
इसके बाद खंड 15 — स्मृति, संस्कृति और इतिहासलेखन (अध्याय 70–73) आएगा।
उपलब्धियां, सीमाएं और ऐतिहासिक मूल्यांकन
श्रीकाकुलम आंदोलन का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि वह राज्य सत्ता पर कब्जा करने में सफल हुआ या विफल। यदि यही एकमात्र कसौटी हो, तो निष्कर्ष सीधा है—आंदोलन सैन्य और राजनीतिक लक्ष्य की दृष्टि से पराजित हुआ। 1970 तक उसका शीर्ष नेतृत्व लगभग समाप्त हो चुका था, गुरिल्ला नेटवर्क टूट रहा था और 1971 के आसपास तक उसका संगठित सशस्त्र चरण प्रभावहीन हो गया।
लेकिन इतिहास की दूसरी कसौटी भी होती है—क्या किसी आंदोलन ने समाज में प्रश्न बदले? क्या उसने पहले से मौजूद असमानताओं को राजनीतिक मुद्दा बनाया? क्या उसने कमजोर समूहों को संगठित किया? क्या उसके कारण राज्य को नीति बदलनी पड़ी? क्या उसने बाद की राजनीतिक धाराओं को प्रभावित किया?
इन कसौटियों पर श्रीकाकुलम का मूल्यांकन कहीं अधिक जटिल है।
उसने आदिवासी भूमि-वियोजन, साहूकारी, मजदूरी, वन अधिकार और ग्रामीण सत्ता के प्रश्नों को तीखी राजनीतिक भाषा दी। उसने हजारों आदिवासी किसानों को संगठन और संघर्ष का अनुभव दिया। कुछ क्षेत्रों में ऋण समझौते रद्द करने, जमीन पुनर्वितरण, जन-अदालतों और स्थानीय वैकल्पिक संस्थाओं जैसी कार्रवाइयों का उल्लेख मिलता है। एक विस्तृत अध्ययन के अनुसार आंदोलन ने सामाजिक एजेंडा बदलने में सफलता प्राप्त की और सरकार को आदिवासी भूमि तथा विकास संबंधी प्रश्नों पर अधिक सक्रिय होना पड़ा।
इसी के साथ उसकी गंभीर सीमाएं भी थीं। चारु मजूमदार की ‘वर्ग शत्रु सफाया’ रणनीति, जनसंगठनों को गौण करने की प्रवृत्ति और गुरिल्ला कार्रवाइयों पर अत्यधिक निर्भरता ने कुछ क्षेत्रों में आंदोलन को जनता से अलग किया। 1972 के एक समकालीन विश्लेषण में साफ दर्ज है कि CPI(ML) नेतृत्व ने एक समय खुले जनसंगठनों को अनावश्यक मानते हुए गुरिल्ला युद्ध को मुख्य रणनीति बना दिया था।
इसलिए श्रीकाकुलम का अंतिम मूल्यांकन न तो महिमामंडन होना चाहिए, न केवल हिंसक विफलता की कहानी।
पहली उपलब्धि : आदिवासी भूमि को राजनीतिक प्रश्न बनाया
श्रीकाकुलम आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि थी कि उसने आदिवासी भूमि-वियोजन को स्थानीय प्रशासनिक विवाद से निकालकर राजनीतिक सत्ता और सामाजिक न्याय के प्रश्न में बदल दिया।
पहले किसी परिवार की जमीन किसी साहूकार या गैर-आदिवासी के कब्जे में चली जाए तो वह व्यक्तिगत विवाद दिखाई दे सकता था।
यदि एक आदिवासी किसान जमीन खो रहा है तो दूसरे गांव का किसान भी इसी खतरे में है।
यही सामूहिक समझ राजनीतिक चेतना की शुरुआत थी।
भूमि-वापसी का प्रत्यक्ष संघर्ष
उसने कई क्षेत्रों में भूमि पर पुनः कब्जे की कोशिश की।
साहूकारों और भूस्वामियों के दावों को चुनौती दी।
और बाद के सशस्त्र चरण में संपत्ति तथा अनाज कब्जे जैसी कार्रवाइयां भी कीं।
एक अध्ययन के अनुसार जुलाई 1969 तक आंदोलनकारी दावों में लगभग 300 गांवों में प्रभाव और ऋण-रद्दीकरण, भूमि पुनर्वितरण तथा जन-अदालत जैसी संस्थाओं का उल्लेख मिलता है। इन आंकड़ों को संगठनात्मक दावों के रूप में सावधानी से पढ़ना चाहिए, लेकिन वे आंदोलन की स्थानीय शक्ति का संकेत अवश्य देते हैं।
दूसरी उपलब्धि : भय का टूटना
गरीब किसान की सबसे बड़ी कमजोरी केवल गरीबी नहीं होती।
कई बार उससे भी बड़ी कमजोरी होती है—
गिरिजन संगम ने इस भय को सामूहिक संगठन से चुनौती दी।
जब अकेला व्यक्ति नहीं बल्कि पूरा गांव मजदूरी मांगता है, तब शक्ति-संतुलन बदलता है।
जब पूरा संगठन किसी आदिवासी किसान की जमीन के दावे के साथ खड़ा होता है, तब भूस्वामी का सामाजिक अधिकार चुनौती के घेरे में आता है।
यही परिवर्तन आंदोलन की सबसे गहरी उपलब्धियों में था।
तीसरी उपलब्धि : आदिवासी राजनीतिक एजेंसी
श्रीकाकुलम ने यह भी दिखाया कि आदिवासी समुदाय केवल सरकारी ‘कल्याण’ के निष्क्रिय लाभार्थी नहीं हैं।
वे स्वयं राजनीतिक संगठन बना सकते हैं।
और राज्य तथा स्थानीय प्रभुत्वशाली वर्ग को चुनौती दे सकते हैं।
इलिना सेन का अध्ययन विशेष रूप से बताता है कि आंदोलन मुख्यतः आदिवासी समाज के बीच आधारित था और महिलाओं सहित स्थानीय प्रतिभागियों की भूमिका बाद के पुरुष-प्रधान इतिहासलेखन में पर्याप्त रूप से दर्ज नहीं हुई।
यानी आंदोलन ने केवल भूमि संबंध नहीं बदले; उसने राजनीतिक व्यक्तित्व भी पैदा किया।
चौथी उपलब्धि : महिलाओं का सार्वजनिक राजनीति में प्रवेश
महिला संगम, जुलूस, सम्मेलन, ग्रामीण संपर्क और बाद के भूमिगत नेटवर्क में महिलाओं की भागीदारी महत्वपूर्ण थी।
यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि श्रीकाकुलम एक व्यापक नारीवादी आंदोलन था।
लेकिन यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि उसने अनेक आदिवासी महिलाओं को परिवार और कृषि श्रम की सीमाओं से बाहर राजनीतिक कार्रवाई में प्रवेश कराया।
इलिना सेन के अध्ययन की सबसे बड़ी देन यही है कि वह महिलाओं को आंदोलन के परिधीय सहायक के बजाय राजनीतिक प्रतिभागी के रूप में स्थापित करता है।
पांचवीं उपलब्धि : ग्रामीण सत्ता-संबंधों को चुनौती
आंदोलन की शक्ति केवल जमीन वापस लेने में नहीं थी।
कुछ क्षेत्रों में उसने यह प्रश्न भी उठाया—
ऐसे प्रश्न ग्रामीण सत्ता-संबंधों की नींव को चुनौती देते हैं।
समकालीन विश्लेषण में CPI(ML) द्वारा किसान समितियों, जन-अदालतों, भूमि-वितरण और ग्रामीण प्रशासन का दावा दर्ज किया गया है।
उन दावों की वास्तविक भौगोलिक सीमा पर विवाद हो सकता है, लेकिन यह स्पष्ट है कि आंदोलन की महत्वाकांक्षा सामान्य सुधार से आगे बढ़कर वैकल्पिक ग्रामीण सत्ता बनाने की थी।
छठी उपलब्धि : राज्य की सामाजिक नीति पर दबाव
श्रीकाकुलम विद्रोह को 1970 के भूमि-सुरक्षा संशोधन का अकेला कारण कहना सही नहीं होगा।
लेकिन आंदोलन ने सरकार को यह स्पष्ट कर दिया कि आदिवासी भूमि-वियोजन केवल राजस्व विभाग का मामला नहीं है।
यह राजनीतिक विस्फोट का कारण बन सकता है।
बाद के अध्ययनों में यह दर्ज है कि आंदोलन के बाद सरकार ने आदिवासी क्षेत्रों में राहत, विकास योजनाओं और भूमि समस्याओं पर अधिक ध्यान दिया।
यानी आंदोलन राज्य को हटाने में सफल नहीं हुआ।
लेकिन उसने राज्य की प्राथमिकताओं को प्रभावित किया।
आंदोलन की प्रमुख सीमाएं और विफलताएं — हिंसा, सीमित भूगोल, नेतृत्व और संगठनात्मक संकट
किसी आंदोलन की उपलब्धियों को समझने के लिए उसकी सीमाओं का उतनी ही स्पष्टता से मूल्यांकन आवश्यक है।
श्रीकाकुलम की पहली बड़ी सीमा उसका सीमित भौगोलिक और सामाजिक विस्तार था।
आदिवासी क्षेत्र में मजबूत, मैदानी क्षेत्र में कमजोर
पहाड़ी गिरिजन क्षेत्रों में आंदोलन की जड़ें गहरी थीं।
लेकिन जैसे ही वही रणनीति उन मैदानी क्षेत्रों में लागू की गई जहां संगठनात्मक आधार उतना मजबूत नहीं था, कठिनाइयां बढ़ीं।
एक महत्वपूर्ण अध्ययन का निष्कर्ष है कि ‘annihilation tactics’ मैदानी क्षेत्रों में उलटी पड़ीं, क्योंकि वहां संगठनात्मक आधार कमजोर था।
यह तथ्य रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
जिस रणनीति को मजबूत जनाधार वाले क्षेत्र में सीमित समर्थन मिल सकता है, वही कमजोर क्षेत्र में राजनीतिक अलगाव पैदा कर सकती है।
दूसरी सीमा : नेतृत्व का केंद्रीकरण
वेंपाटापु सत्यनारायण, आदिभटला कैलासम, पंचादि कृष्णमूर्ति और सुब्बाराव पाणिग्रही जैसे नेताओं का योगदान असाधारण था।
यदि किसी आंदोलन का संगठनात्मक ज्ञान, संपर्क और वैचारिक नेतृत्व कुछ व्यक्तियों में अत्यधिक केंद्रित हो जाए तो उनकी गिरफ्तारी या मृत्यु से पूरा ढांचा अस्थिर हो सकता है।
नेताओं के क्रमिक रूप से खत्म होने के बाद समान क्षमता वाला दूसरा नेतृत्व पर्याप्त तेजी से नहीं उभर सका।
तीसरी सीमा : हथियार और संसाधन
श्रीकाकुलम ने माओवादी दीर्घकालीन जनयुद्ध की कल्पना अपनाई।
श्रीकाकुलम के पास इनमें से कुछ तत्व थे, लेकिन पर्याप्त नहीं।
उसके पास राज्य जैसी सैन्य क्षमता नहीं थी।
इसलिए जैसे ही पुलिस और सुरक्षा तंत्र ने लगातार अभियान चलाया, गुरिल्लाओं के लिए टिकना कठिन होता गया।
चौथी सीमा : राष्ट्रीय क्रांति का अतिशय आशावाद
चारु मजूमदार द्वारा श्रीकाकुलम को संभावित “भारत का येनान” देखना उस समय के क्रांतिकारी उत्साह का प्रतीक था।
लेकिन वास्तविकता कहीं अधिक कठिन थी।
और सामाजिक सुधारों के जरिए विद्रोह की कुछ मांगों को आत्मसात भी कर सकता था।
श्रीकाकुलम को शीघ्र मुक्त क्षेत्र में बदल सकने का अनुमान इसलिए व्यावहारिक वास्तविकताओं से अधिक आशावादी सिद्ध हुआ।
पांचवीं सीमा : व्यापक राजनीतिक गठबंधन का अभाव
किसान आंदोलन यदि लंबे समय तक टिकना चाहता है तो उसे केवल अपने सबसे प्रतिबद्ध आधार से अधिक व्यापक राजनीतिक सहानुभूति भी चाहिए।
श्रीकाकुलम का सशस्त्र चरण धीरे-धीरे—
CPI(ML) की चुनाव बहिष्कार और राज्य को पूर्णतः उखाड़ने वाली राजनीति ने समझौते और व्यापक लोकतांत्रिक सहयोग की गुंजाइश बहुत सीमित कर दी।
यह उसकी दीर्घकालीन राजनीतिक सीमा बनी।
क्या हिंसा ने आंदोलन को मजबूत किया या कमजोर? — जनसंघर्ष और सशस्त्र चरण की तुलना
श्रीकाकुलम आंदोलन के मूल्यांकन का सबसे कठिन प्रश्न है—
हिंसा ने उसे शक्ति दी या नष्ट किया?
दोनों बातें अलग-अलग चरणों में सत्य दिखाई देती हैं।
प्रारंभिक प्रतिरोध में हिंसा का संदर्भ
31 अक्टूबर 1967 की लेविडी घटना के बाद आदिवासियों के भीतर आत्मरक्षा की मांग स्वाभाविक रूप से बढ़ी।
जब किसी राजनीतिक सम्मेलन की ओर जा रहे लोगों पर हमला हो और कार्यकर्ता मारे जाएं, तब निहत्थे रहने के प्रश्न पर पुनर्विचार होना असामान्य नहीं।
इसलिए श्रीकाकुलम की हर हिंसक प्रतिक्रिया को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
इनका नैतिक और रणनीतिक मूल्यांकन भी अलग होना चाहिए।
शुरुआती सशस्त्र प्रतिरोध का प्रभाव
कुछ चरणों में हथियारबंद प्रतिरोध ने भूस्वामियों के पुराने भय को तोड़ा।
साहूकारों और प्रभावशाली लोगों को लगा कि वे अब बिना प्रतिरोध ग्रामीणों पर नियंत्रण नहीं रख सकते।
भूमि कब्जा और ऋण रद्दीकरण जैसी कार्रवाइयों को लागू करने में भी सशस्त्र शक्ति ने योगदान दिया।
सुमंत बनर्जी के विवरण में भी श्रीकाकुलम में भूस्वामियों को हटाने, कर्ज समाप्त करने और जमीन गरीब किसानों में बांटने की क्रांतिकारी योजना का उल्लेख मिलता है।
इस अर्थ में सीमित चरण में सशस्त्र शक्ति ने ग्रामीण सत्ता-संतुलन बदला।
निर्णायक समस्या : हिंसा कब साधन से रणनीति बनी?
समस्या तब पैदा हुई जब हिंसा किसी विशिष्ट परिस्थिति का साधन न रहकर क्रांति की प्रमुख पद्धति बन गई।
1972 के समकालीन विश्लेषण के अनुसार CPI(ML) नेतृत्व इस निष्कर्ष तक पहुंचा कि व्यापक जनसंगठन आवश्यक नहीं हैं और क्रांतिकारी संघर्ष को छोटे गुरिल्ला समूहों द्वारा ‘वर्ग शत्रुओं’ के सफाये से आगे बढ़ाया जा सकता है।
यहीं श्रीकाकुलम की मूल शक्ति कमजोर होने लगी।
उलटा क्रम
असंतोष → संगठन → जनसंघर्ष → प्रतिरोध।
गुरिल्ला कार्रवाई → राजनीतिक प्रचार → जनता की लामबंदी।
यानी बंदूक से जनआंदोलन पैदा करने का प्रयास हुआ।
समकालीन आलोचना ने इसी उलटाव को गंभीर समस्या माना।
‘सफाया लाइन’ की सामाजिक लागत
व्यक्तिगत हत्याओं के अभियान से कई समस्याएं पैदा हुईं।
गलत व्यक्ति को लक्ष्य बनाने का खतरा।
स्थानीय व्यक्तिगत विवादों के वर्गीय संघर्ष में बदलने का जोखिम।
और जनता तथा भूमिगत दस्तों के बीच बढ़ती दूरी।
यह आलोचना केवल बाहरी इतिहासकारों की नहीं थी। बाद के CPI(ML) इतिहासलेखन ने भी स्वीकार किया कि कई क्षेत्रों में ‘annihilation’ अभियान अनावश्यक और अंधाधुंध हिंसा में बदल गया और किसान वर्ग-संघर्ष से अलगाव पैदा हुआ।
फिर क्या हिंसा पूरी तरह गलत थी?
इतिहासकार का उत्तर इतना सरल नहीं हो सकता।
भूमि संघर्ष में हिंसक भूस्वामी प्रतिक्रिया वास्तविक थी।
आत्मरक्षा का प्रश्न इसलिए काल्पनिक नहीं था।
लेकिन श्रीकाकुलम का अनुभव यह दिखाता है कि आत्मरक्षा और हिंसा को केंद्रीय राजनीतिक सिद्धांत बनाने में बड़ा अंतर है।
दूसरा आंदोलन की पूरी राजनीति को सैन्य तर्क के अधीन कर सकता है।
श्रीकाकुलम में यही दूसरा खतरा धीरे-धीरे वास्तविक हुआ।
आदिवासी एजेंसी बनाम ‘बाहरी नेतृत्व’ — क्या आदिवासी स्वयं राजनीतिक कर्ता थे?
श्रीकाकुलम के इतिहास में एक दूसरी बड़ी बहस है—
क्या यह आदिवासियों का स्वयं का आंदोलन था?
या शिक्षित गैर-आदिवासी कम्युनिस्ट नेताओं ने उन्हें क्रांतिकारी राजनीति में खींचा?
दोनों में से कोई भी एकतरफा उत्तर पर्याप्त नहीं है।
बाहरी नेतृत्व की वास्तविक भूमिका
वेंपाटापु सत्यनारायण, आदिभटला कैलासम और अन्य शिक्षित कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं का योगदान असाधारण था।
और स्थानीय संघर्ष को राज्य तथा वर्ग-सत्ता के प्रश्न से जोड़ा।
इस भूमिका को कम करके नहीं देखा जा सकता।
लेकिन आंदोलन का कारण उन्होंने पैदा नहीं किया
इसलिए कम्युनिस्ट कार्यकर्ता आंदोलन के निर्माता उतने नहीं थे जितने उसकी असंतोषपूर्ण जमीन को संगठित राजनीति में बदलने वाले उत्प्रेरक।
स्थानीय आदिवासी नेतृत्व
पाल्ले रामुलु और अनेक कम चर्चित ग्राम-स्तरीय कार्यकर्ताओं की भूमिका इसी कारण महत्वपूर्ण है।
वे गांवों की भाषा, रिश्तों, भूगोल और समस्याओं को जानते थे।
उनके बिना बाहरी राजनीतिक नेता व्यापक विश्वास अर्जित नहीं कर सकते थे।
आदिवासी किसानों ने केवल निर्देश नहीं माने।
उन्होंने आंदोलन की मांगों और स्थानीय रूपों को स्वयं भी आकार दिया।
महिलाओं की गवाही
इलिना सेन का शोध इस तर्क को और मजबूत करता है।
जीवित महिला कार्यकर्ताओं के साक्षात्कार बताते हैं कि आंदोलन के भीतर महिलाओं और स्थानीय आदिवासी प्रतिभागियों का अपना अनुभव था जिसे पुराने पार्टी दस्तावेजों में अक्सर स्थान नहीं मिला।
यानी आधिकारिक क्रांतिकारी इतिहास और सामाजिक इतिहास में अंतर है।
दूसरा उन लोगों को भी देखता है जिन्होंने आंदोलन को व्यवहार में संभव बनाया।
वर्ग बनाम जनजाति
कम्युनिस्ट आंदोलन ने आदिवासी प्रश्न को मुख्यतः वर्गीय भाषा में पढ़ा।
इस विश्लेषण में सत्य का बड़ा हिस्सा था।
आदिवासी समुदाय की जमीन से संबंध केवल आर्थिक नहीं था।
इसलिए आधुनिक इतिहासलेखन के लिए श्रीकाकुलम को वर्ग संघर्ष और आदिवासी अधिकार दोनों के रूप में पढ़ना अधिक उपयुक्त है।
राजनीतिक एजेंसी का संतुलित निष्कर्ष
श्रीकाकुलम न तो केवल बाहर से लाई गई माओवादी क्रांति थी, न किसी बाहरी विचारधारा से बिल्कुल अलग स्वस्फूर्त आदिवासी विद्रोह।
स्थानीय सामाजिक असंतोष ने कम्युनिस्ट राजनीति को आधार दिया।
कम्युनिस्ट संगठन ने उस असंतोष को व्यापक राजनीतिक दिशा दी।
यही उसकी शक्ति भी थी और बाद में तनाव का कारण भी।
किसान आंदोलन या नक्सलवादी आंदोलन? — श्रीकाकुलम के बदलते चरित्र का समेकित विश्लेषण
श्रीकाकुलम को किस श्रेणी में रखा जाए?
समय के अलग-अलग चरणों में वह इन सभी में से अलग-अलग अनुपात में था।
पहला चरण : किसान–आदिवासी सामाजिक आंदोलन
1950 के दशक के उत्तरार्ध से 1967 तक उसका मूल चरित्र स्पष्ट रूप से किसान–आदिवासी जनआंदोलन का था।
संगठन का मुख्य माध्यम गिरिजन संगम था।
इस चरण में उसे नक्सलवादी आंदोलन कहना कालक्रम की दृष्टि से गलत होगा।
दूसरा चरण : उग्र किसान प्रतिरोध
31 अक्टूबर 1967 के बाद आंदोलन के भीतर आत्मरक्षा और सशस्त्र कार्रवाई का प्रश्न तेजी से बढ़ा।
नक्सलबाड़ी का प्रभाव पहले से मौजूद स्थानीय संघर्ष के साथ जुड़ा।
अभी आंदोलन के सामाजिक और आर्थिक प्रश्न केंद्रीय थे, लेकिन सशस्त्र क्रांति की वैचारिक भाषा प्रवेश कर चुकी थी।
तीसरा चरण : CPI(ML) का गुरिल्ला आंदोलन
1968 के उत्तरार्ध से 1970 तक आंदोलन का चरित्र स्पष्ट रूप से बदल गया।
‘वर्ग शत्रु सफाया’ की रणनीति लागू हुई।
और 1969 में CPI(ML) के गठन के बाद श्रीकाकुलम अखिल भारतीय नक्सलवादी आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में शामिल हो गया।
इस चरण में उसे केवल किसान आंदोलन कहना भी अधूरा होगा।
अब उसका घोषित लक्ष्य जमीन सुधार नहीं बल्कि राज्य सत्ता का क्रांतिकारी परिवर्तन था।
कौन-सी पहचान सबसे महत्वपूर्ण?
यदि पूरे इतिहास को एक वाक्य में समझना हो तो श्रीकाकुलम को कहा जा सकता है—
“एक दीर्घकालीन आदिवासी किसान जनसंघर्ष, जो 1967–68 के बाद माओवादी नेतृत्व के प्रभाव में सशस्त्र नक्सलवादी विद्रोह में परिवर्तित हुआ।”
यह परिभाषा उसकी दोनों वास्तविकताओं को बचाती है।
वह उसकी सामाजिक जड़ों को नहीं मिटाती।
और उसके बाद के सशस्त्र चरित्र को भी छिपाती नहीं।
वर्गीकरण क्यों महत्वपूर्ण है?
क्योंकि यदि हम पूरे आंदोलन को केवल नक्सलवादी कह दें तो 1950 के दशक की गिरिजन संगठन प्रक्रिया गायब हो जाती है।
साहूकारी और मजदूरी का प्रश्न गायब हो जाता है।
और आदिवासी राजनीतिक एजेंसी केवल CPI(ML) की रणनीति में समा जाती है।
इसके विपरीत यदि हम केवल किसान आंदोलन कहें तो—
इसलिए दोनों चरणों को अलग-अलग पहचानना ही सबसे संतुलित इतिहासलेखन है।
उपलब्धियां और सीमाएं : अंतिम संतुलन
श्रीकाकुलम की उपलब्धियां वास्तविक थीं।
महिलाओं को राजनीतिक क्षेत्र में लाया।
राज्य को सामाजिक नीति पर प्रतिक्रिया के लिए मजबूर किया।
और भारतीय किसान तथा क्रांतिकारी राजनीति पर स्थायी प्रभाव छोड़ा। एक बाद का समेकित अध्ययन भी निष्कर्ष देता है कि आंदोलन सैन्य रूप से दब गया, फिर भी उसने क्षेत्र का सामाजिक एजेंडा बदल दिया।
लेकिन उसकी सीमाएं भी उतनी ही वास्तविक थीं।
और ‘वर्ग शत्रु सफाया’ जैसी रणनीति ने कई क्षेत्रों में जनसंगठन की जगह गुरिल्ला कार्रवाई को प्रधान बना दिया। समकालीन विश्लेषण तथा बाद के वामपंथी आत्ममूल्यांकन दोनों ने इस प्रवृत्ति की समस्याओं को स्वीकार किया।
खंड 14 का समेकित मूल्यांकन
श्रीकाकुलम आंदोलन की सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि यह नहीं थी कि उसने कुछ समय के लिए किसी इलाके में भूस्वामी सत्ता को चुनौती दी।
उससे भी बड़ी उपलब्धि थी कि उसने राजनीतिक प्रश्न की परिभाषा बदल दी।
जिस आदिवासी किसान की जमीन चली गई थी, उसे अब यह नहीं बताया जा सकता था कि यह केवल निजी लेन-देन है।
जिस मजदूर को कम मजदूरी मिली, वह अब अकेला सौदेबाज नहीं था।
जिस महिला ने लाल झंडा उठाया, वह केवल किसान की पत्नी नहीं रही।
और जिस पहाड़ी गांव को प्रशासन दूरस्थ पिछड़ा क्षेत्र मानता था, वह अब राजनीतिक शक्ति का केंद्र बन गया।
लेकिन यही आंदोलन हमें दूसरी शिक्षा भी देता है।
जनआंदोलन की शक्ति और सैन्य शक्ति एक ही चीज नहीं हैं।
श्रीकाकुलम ने अपनी सबसे बड़ी शक्ति तब अर्जित की जब हजारों लोग खुले रूप से संगठित हुए।
उसकी सबसे बड़ी कमजोरी तब सामने आई जब संघर्ष की दिशा अधिकाधिक छोटे भूमिगत दस्तों, लक्ष्य-हत्याओं और त्वरित क्रांतिकारी विजय की कल्पना पर निर्भर होने लगी।
इसीलिए श्रीकाकुलम का इतिहास हिंसा के पक्ष या विपक्ष में एक साधारण नैतिक फैसला नहीं देता।
जहां सामाजिक अन्याय गहरा हो, वहां प्रतिरोध पैदा होगा। जहां जनता संगठित हो, वहां सत्ता-संबंध बदल सकते हैं। लेकिन जब संगठन पर हथियार हावी हो जाए, तो वही आंदोलन अपने सामाजिक आधार से दूर भी हो सकता है।
श्रीकाकुलम की सैन्य क्रांति विफल हुई।
लेकिन आदिवासी भूमि, जंगल, सम्मान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न जीवित रहा।
इसीलिए उसकी विरासत दो विरोधी शब्दों में एक साथ दर्ज होती है—
और यही द्वंद्व श्रीकाकुलम को स्वतंत्र भारत के सबसे महत्वपूर्ण किसान–आदिवासी आंदोलनों में विशिष्ट स्थान देता है।
खंड 15 — स्मृति, संस्कृति और इतिहासलेखन (अध्याय 70–73)
अध्याय 70: श्रीकाकुलम आंदोलन का इतिहास किसने लिखा? — सरकारी, CPI, CPI(M), CPI(ML), अकादमिक और मानवाधिकार आख्यान अध्याय 71: सत्यनारायण, कैलासम, पाणिग्रही और अन्य कार्यकर्ताओं की क्रांतिकारी स्मृति — शहादत, गीत और राजनीतिक प्रतीक अध्याय 72: आदिवासी और महिला स्मृति — मौखिक इतिहास, भूली हुई आवाजें और स्थानीय अनुभव अध्याय 73: आधुनिक इतिहासलेखन में श्रीकाकुलम — वर्ग से जनजाति, लिंग, राज्य और हिंसा तक बदलती व्याख्याएं
इसके बाद खंड 16 — विस्तृत समयरेखा, प्राथमिक दस्तावेज और प्रमुख संदर्भ-स्रोत (अध्याय 74–76) तथा अंत में खंड 17 — निष्कर्ष : श्रीकाकुलम आंदोलन को कैसे समझें? (अध्याय 77) आएगा।
स्मृति, संस्कृति और इतिहासलेखन
श्रीकाकुलम आंदोलन का इतिहास केवल 1950 के दशक के गिरिजन संगठन, 1967 के मोड़, 1968–70 के सशस्त्र संघर्ष और पुलिस दमन की घटनाओं में सीमित नहीं है। किसी आंदोलन की दूसरी जिंदगी उसकी स्मृति में शुरू होती है। कौन-सी घटनाएं याद रखी जाती हैं, किन नेताओं को शहीद बनाया जाता है, किन लोगों की भूमिका भुला दी जाती है और बाद की पीढ़ियां आंदोलन से क्या अर्थ निकालती हैं—इन सबके माध्यम से इतिहास लगातार पुनर्निर्मित होता रहता है।
CPI(ML) और उससे निकली विभिन्न क्रांतिकारी धाराओं ने इसे भारतीय माओवादी क्रांति की गौरवपूर्ण विरासत के रूप में याद किया। सरकारी और सुरक्षा-केंद्रित आख्यानों ने इसे हिंसक नक्सलवादी विद्रोह के रूप में देखा। कुछ प्रारंभिक कम्युनिस्ट अध्ययनों ने इसे वर्ग संघर्ष और भूमि क्रांति की कहानी बनाया। बाद के सामाजिक इतिहास ने पूछा कि इस कथा में सवरा और जटापू आदिवासियों की अपनी आवाज कहां है? महिलाएं कहां हैं? संस्कृति की भूमिका क्या थी?
इसी इतिहासलेखन के परिवर्तन ने श्रीकाकुलम को केवल “नक्सलवादी विद्रोह” से निकालकर भूमि, जनजातीय पहचान, लिंग, संस्कृति, राज्य और राजनीतिक हिंसा के अधिक व्यापक अध्ययन में बदल दिया है।
इतिहास एक नहीं, कई हैं
श्रीकाकुलम की घटनाओं पर उपलब्ध सामग्री पढ़ने पर सबसे पहले यह स्पष्ट होता है कि आंदोलन का कोई एक सर्वसम्मत इतिहास नहीं है।
कम से कम छह प्रकार के आख्यान दिखाई देते हैं—
CPI(ML) और नक्सलवादी आंदोलन का अपना इतिहास,
बाद के मार्क्सवादी और वामपंथी आलोचनात्मक अध्ययन,
और महिला तथा आदिवासी-केंद्रित पुनर्पाठ।
और इसलिए उसका श्रीकाकुलम भी अलग दिखाई देता है।
सरकारी और पुलिस आख्यान
सरकारी दृष्टि में 1968 के बाद श्रीकाकुलम का केंद्रीय प्रश्न था—
इस दृष्टिकोण में मुख्य घटनाएं होती हैं—
इस आख्यान में राज्य का मुख्य कार्य संवैधानिक व्यवस्था और नागरिक सुरक्षा की रक्षा करना है।
ऐसी व्याख्या में आंदोलन की शुरुआत के सामाजिक प्रश्न—भूमि-वियोजन, साहूकारी, मजदूरी और वन-अधिकार—अक्सर पृष्ठभूमि में चले जाते हैं।
यहीं सरकारी इतिहास की सबसे बड़ी सीमा दिखाई देती है।
यदि केवल 1968–70 देखा जाए तो श्रीकाकुलम हिंसक नक्सलवादी विद्रोह दिखाई देगा।
यदि 1950 के दशक से कहानी शुरू की जाए तो वही संघर्ष पहले किसान–आदिवासी जनआंदोलन के रूप में सामने आता है।
CPI और CPI(M) की व्याख्या
भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन की मुख्यधारा ने श्रीकाकुलम को अलग दृष्टि से देखा।
भूमि, साहूकारी और आदिवासी शोषण के प्रश्नों को वास्तविक माना गया।
लेकिन CPI(ML) की तत्काल सशस्त्र क्रांति और व्यक्तिगत ‘वर्ग शत्रु सफाया’ रणनीति की आलोचना की गई।
और केवल गुरिल्ला कार्रवाई के जरिए जनता की शक्ति का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
इसलिए मुख्यधारा वामपंथ के लिए श्रीकाकुलम एक तरफ वास्तविक किसान असंतोष का प्रतीक था और दूसरी तरफ वाम अतिवाद की रणनीतिक सीमा का उदाहरण।
CPI(ML) का क्रांतिकारी आख्यान
CPI(ML) और उससे निकली अनेक धाराओं के इतिहासलेखन में श्रीकाकुलम को लगभग वीरगाथा का स्थान मिला।
इस आख्यान में इन व्यक्तियों को केवल नेता नहीं, बल्कि शहीद माना गया।
पुलिस कार्रवाइयों को राज्य-दमन और कथित फर्जी मुठभेड़ों के रूप में प्रस्तुत किया गया।
श्रीकाकुलम को नक्सलबाड़ी से निकली भारतीय क्रांति की अगली बड़ी छलांग माना गया।
चारु मजूमदार का “क्या श्रीकाकुलम भारत का येनान बनेगा?” वाला प्रश्न इसी स्मृति का सबसे शक्तिशाली प्रतीक बना।
इस आख्यान की शक्ति
क्रांतिकारी इतिहासलेखन की बड़ी विशेषता यह है कि उसने आंदोलन से जुड़े अनेक नाम, घटनाएं, गीत और संगठनात्मक दस्तावेज बचाकर रखे।
यदि केवल सरकारी अभिलेख उपलब्ध होते तो आंदोलन की सामाजिक दुनिया का बड़ा हिस्सा गायब हो सकता था।
लेकिन इसकी सीमा भी है
शहीद-केंद्रित राजनीतिक इतिहास कई बार आलोचनात्मक प्रश्नों को पीछे कर देता है।
क्या ग्रामीण जनता हर गुरिल्ला कार्रवाई से सहमत थी?
क्या CPI(ML) नेतृत्व ने स्थानीय परिस्थितियों की तुलना में अखिल भारतीय क्रांतिकारी सिद्धांत को अधिक महत्व दिया?
ऐसे प्रश्न क्रांतिकारी स्मृति में सहज नहीं थे।
बाद की कुछ वामपंथी धाराओं ने स्वयं इन रणनीतिक गलतियों की आलोचना की।
शुरुआती अकादमिक इतिहास
1970 के दशक के शुरुआती अध्ययनों ने श्रीकाकुलम को भारतीय नक्सलवाद और कृषि क्रांति के संदर्भ में समझने का प्रयास किया।
कौन से सामाजिक और आर्थिक कारण किसान विद्रोह पैदा कर रहे थे?
कम्युनिस्ट आंदोलन क्यों विभाजित हुआ?
माओवादी रणनीति का भारतीय समाज पर क्या प्रभाव हुआ?
एक महत्वपूर्ण समकालीन विश्लेषण ने यह भी दर्ज किया कि आंदोलन पहले व्यापक किसान संगठन पर आधारित था, लेकिन बाद में CPI(ML) नेतृत्व ने छोटे गुरिल्ला दस्तों और ‘annihilation’ को केंद्रीय रणनीति बनाने की दिशा पकड़ी। इस दृष्टिकोण ने बहुत जल्दी उस विरोधाभास को पहचान लिया था जो बाद में आंदोलन की विफलता के विश्लेषण का मुख्य विषय बना।
इतिहास का प्रश्न बदलता गया
“आंदोलन में साधारण लोग कैसे शामिल हुए?”
“आदिवासी स्वयं आंदोलन को कैसे देखते थे?”
“क्या वर्ग की भाषा आदिवासी पहचान को पूरी तरह समझ सकती है?”
यहीं से श्रीकाकुलम का इतिहास अधिक बहुआयामी हुआ।
सत्यनारायण, कैलासम और पाणिग्रही की स्मृति — शहादत, गीत और राजनीतिक प्रतीक
किसी क्रांतिकारी आंदोलन में मारे गए नेता केवल ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं रहते।
वे धीरे-धीरे राजनीतिक प्रतीक बन जाते हैं।
श्रीकाकुलम में यह प्रक्रिया बहुत स्पष्ट दिखाई देती है।
सत्यम मास्टर की स्मृति
वेंपाटापु सत्यनारायण की स्मृति का आधार केवल उनकी मृत्यु नहीं थी।
उनकी प्रतिष्ठा उससे पहले के लगभग एक दशक के सामाजिक कार्य से बनी थी।
भूमि, मजदूरी और साहूकारी के प्रश्न उठाते थे।
और बाद में सशस्त्र संघर्ष के नेता बने।
इसीलिए बाद की क्रांतिकारी स्मृति में वे केवल CPI(ML) के नेता नहीं, बल्कि जनता के बीच से निकले ‘सत्यम मास्टर’ के रूप में याद किए गए।
“मास्टर” उन्हें राजनीतिक नेता से अधिक सामाजिक व्यक्ति बनाता है।
कैलासम की स्मृति
आदिभटला कैलासम की राजनीतिक स्मृति थोड़ा अलग स्वरूप रखती है।
वे शिक्षित और अपेक्षाकृत संपन्न सामाजिक पृष्ठभूमि से आए लेकिन किसान राजनीति में शामिल हुए।
बाद की क्रांतिकारी कथा में यह उनके वर्गीय आत्मत्याग का प्रतीक बना।
यानी जिस सामाजिक वर्ग से लाभ मिल सकता था, उसके विरुद्ध गरीब किसानों का पक्ष चुनना क्रांतिकारी नैतिकता के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत हुआ।
सत्यनारायण और कैलासम की जोड़ी
दोनों की जुलाई 1970 में लगभग एक साथ मृत्यु ने उन्हें आंदोलन की स्मृति में स्थायी जोड़ी बना दिया।
व्यक्तिगत जीवन और राजनीतिक शैली में अंतर होने के बावजूद बाद की स्मृति उन्हें लगभग एक संयुक्त प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करती है—
उनके नाम केवल इतिहास पुस्तकों में नहीं रहे; वे स्मृति सभाओं, गीतों और विभिन्न नक्सलवादी धाराओं के राजनीतिक साहित्य में दोहराए जाते रहे।
सुब्बाराव पाणिग्रही : जब कवि स्वयं स्मृति बन गया
इन नेताओं में सबसे विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत सुब्बाराव पाणिग्रही की है।
वे राजनीतिक कार्यकर्ता थे, लेकिन उनकी ऐतिहासिक पहचान उससे कहीं अधिक व्यापक हुई।
श्रीकाकुलम आंदोलन पर सामाजिक इतिहास में स्पष्ट रूप से दर्ज है कि बुर्राकथा और जमुकुल कथा जैसे लोक रूप जनसंगठन के प्रमुख माध्यम थे, सत्यनारायण स्वयं गीत लिखते थे और पाणिग्रही के गीत बाद में स्थानीय सांस्कृतिक इतिहास का हिस्सा बन गए।
गीत क्यों जीवित रहते हैं?
राजनीतिक प्रस्ताव की उम्र छोटी हो सकती है।
लेकिन गीत स्मृति में लंबे समय तक रह सकता है।
वह पढ़े-लिखे व्यक्ति तक सीमित नहीं होता।
एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को सुना सकती है।
इसीलिए पाणिग्रही का प्रभाव उनके जीवन से आगे गया।
बाद की तेलुगु क्रांतिकारी संस्कृति
सांस्कृतिक इतिहास के अध्ययनों में पाणिग्रही के प्रदर्शन और गीतों का प्रभाव बाद की विप्लव रचयितल संघम—विरसम और जनसांस्कृतिक कार्यकर्ताओं पर दर्ज किया गया है। शोध यह भी रेखांकित करता है कि बाद के क्रांतिकारी कलाकारों ने अशिक्षित और अर्धशिक्षित जनता तक राजनीतिक संदेश पहुंचाने के लिए गीत की वही शक्ति पहचानी।
इसलिए श्रीकाकुलम की सांस्कृतिक विरासत का एक लंबा क्रम दिखाई देता है—
इसे सीधी संगठनात्मक वंशावली नहीं, लेकिन स्पष्ट सांस्कृतिक प्रभाव-परंपरा कहा जा सकता है।
आज भी जारी स्मृति
श्रीकाकुलम के पुराने नेताओं की स्मृति केवल अतीत के दस्तावेजों में बंद नहीं हुई।
उदाहरण के लिए दिसंबर 2024 में बोड्डापाडु सहित विभिन्न स्थानों पर पाणिग्रही की पुण्यतिथि पर कार्यक्रम हुए, जहां जनसांस्कृतिक संगठनों और वामपंथी कार्यकर्ताओं ने उन्हें याद किया और उनके गीत प्रस्तुत किए। इससे पता चलता है कि आंदोलन की सांस्कृतिक स्मृति पचास वर्ष से अधिक समय बाद भी स्थानीय राजनीतिक संस्कृति में जीवित है।
लेकिन स्मृति और इतिहास समान चीजें नहीं हैं।
इसलिए किसी नेता की शहादत को स्वीकार करने के साथ उसकी रणनीति की आलोचना करना भी संभव होना चाहिए।
आदिवासी और महिला स्मृति — मौखिक इतिहास, भूली हुई आवाजें और स्थानीय अनुभव
श्रीकाकुलम के इतिहासलेखन में सबसे बड़ा परिवर्तन तब आया जब शोधकर्ताओं ने यह पूछना शुरू किया—
जो लोग स्वयं आंदोलन में थे, वे उसे कैसे याद करते हैं?
पार्टी दस्तावेज नेतृत्व की लाइन बताते हैं।
पुलिस दस्तावेज सुरक्षा की कहानी बताते हैं।
लेकिन गांव की महिला या आदिवासी किसान का अनुभव दोनों से अलग हो सकता है।
मौखिक इतिहास की आवश्यकता
आदिवासी समाज में बड़ी संख्या में प्रतिभागियों ने स्वयं संस्मरण या राजनीतिक पुस्तकें नहीं लिखीं।
इसलिए यदि केवल लिखित अभिलेखों पर निर्भर रहा जाए तो इतिहास स्वाभाविक रूप से शिक्षित पुरुष नेताओं की ओर झुक जाएगा।
मौखिक इतिहास इस असंतुलन को कुछ हद तक ठीक करता है।
पुराने प्रतिभागियों से बात करते हैं।
परिवारों की स्मृतियां दर्ज करते हैं।
यहीं ऐसी जानकारियां सामने आती हैं जो पार्टी प्रस्ताव में कभी दर्ज नहीं हुई थीं।
इलिना सेन और महिलाओं की पुनर्खोज
इस क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण कार्यों में इलिना सेन द्वारा संपादित A Space Within the Struggle: Women’s Participation in People’s Movements में श्रीकाकुलम पर किया गया अध्ययन है।
यह अध्ययन आंदोलन की महिला भागीदारी को केंद्र में रखता है और दिखाता है कि महिलाओं की भूमिका केवल भोजन, आश्रय या परिवार तक सीमित नहीं थी।
और कुछ मामलों में गुरिल्ला गतिविधियों में भी शामिल थीं।
पुरुष-केंद्रित इतिहास को चुनौती
पुराना क्रांतिकारी इतिहास भी अक्सर पुरुष था।
लेकिन यदि इतिहास केवल इन्हीं नामों तक सीमित हो तो हजारों अनाम आदिवासी महिला और पुरुष कार्यकर्ता गायब हो जाते हैं।
महिला इतिहासलेखन ने इसी खाली स्थान को भरा।
महिलाओं के अनुभव समान नहीं थे
बाद के अध्ययन यह भी दिखाते हैं कि आंदोलन में शामिल सभी महिलाओं का अनुभव समान नहीं था।
एक ओर पहाड़ी आदिवासी महिलाएं थीं जिनकी राजनीतिक चेतना अक्सर भूमि, मजदूरी, वन और स्थानीय उत्पीड़न के अनुभव से विकसित हुई।
दूसरी ओर मैदानी क्षेत्र की शिक्षित महिलाएं थीं जो क्रांतिकारी विचारधारा से अधिक प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी थीं।
1989 में किए गए महिला प्रतिभागियों के अध्ययन और बाद के शोध में इस अंतर की ओर ध्यान दिलाया गया है। कुछ महिला संगमों में यौन शोषण जैसे विशिष्ट लैंगिक मुद्दे भी सामने आए थे।
इससे एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है—
“महिला भागीदारी” स्वयं एक समान श्रेणी नहीं है।
जाति, जनजाति, शिक्षा, वर्ग और पारिवारिक पृष्ठभूमि महिला के राजनीतिक अनुभव को बदलते हैं।
मौखिक स्मृति की सीमाएं
मौखिक इतिहास अत्यंत उपयोगी है, लेकिन उसे भी आलोचनात्मक ढंग से पढ़ना चाहिए।
घटना के बीस या तीस वर्ष बाद स्मृति बदल सकती है।
राजनीतिक निष्ठा स्मरण को प्रभावित कर सकती है।
किसी प्रिय नेता की मृत्यु के बाद उसके बारे में आलोचनात्मक स्मृति कम हो सकती है।
व्यक्तिगत अनुभव व्यापक आंदोलन की पूरी तस्वीर नहीं देता।
आदिवासी स्मृति : वर्ग से अधिक व्यापक
आदिवासी प्रतिभागियों की स्मृति एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है।
क्या वे स्वयं आंदोलन को केवल मार्क्सवादी वर्ग संघर्ष के रूप में याद करते थे?
इसीलिए बाद का इतिहासलेखन यह प्रश्न उठाता है कि क्या कम्युनिस्ट ‘वर्ग’ की भाषा आदिवासी अनुभव की पूरी जटिलता को पकड़ती है।
आधुनिक इतिहासलेखन में श्रीकाकुलम — वर्ग से जनजाति, लिंग, राज्य और हिंसा तक
श्रीकाकुलम के इतिहासलेखन का विकास स्वयं भारतीय सामाजिक विज्ञान के बदलते प्रश्नों को प्रतिबिंबित करता है।
पहला चरण : वर्ग संघर्ष
प्रारंभिक वामपंथी और अकादमिक व्याख्या में केंद्रीय अवधारणाएं थीं—
इस दृष्टिकोण की बड़ी शक्ति यह थी कि उसने ग्रामीण गरीबी को व्यक्तिगत समस्या न मानकर संरचनात्मक शोषण से जोड़ा।
लेकिन इसकी सीमा यह थी कि ‘गरीब किसान’ की श्रेणी के भीतर आदिवासी पहचान और संस्कृति का विशिष्ट अनुभव कभी-कभी दब गया।
दूसरा चरण : आदिवासी प्रश्न
सवरा और जटापू केवल गरीब किसान नहीं थे।
वे विशिष्ट इतिहास, संस्कृति और भूमि–जंगल संबंध वाले समुदाय भी थे।
अब भूमि-वियोजन केवल वर्गीय संपत्ति संबंध नहीं रहा।
वह आदिवासी क्षेत्र पर बाहरी नियंत्रण का प्रश्न भी था।
एक प्रमुख महिला-केंद्रित अध्ययन स्पष्ट रूप से बताता है कि श्रीकाकुलम का संघर्ष पहले के आदिवासी विद्रोहों से इस अर्थ में भिन्न था कि उसने गैर-आदिवासी पुरुष और महिला क्रांतिकारियों को भी व्यापक “हम” में शामिल किया—यानी पहचान की रेखा आदिवासी बनाम गैर-आदिवासी से आगे बढ़कर शोषित बनाम दमनकारी राज्य की ओर गई।
यह श्रीकाकुलम की विशिष्टता को समझने का महत्वपूर्ण सूत्र है।
तीसरा चरण : लिंग
यदि हजारों महिलाएं आंदोलन में थीं, तो इतिहास में वे दिखाई क्यों नहीं देतीं?
क्या महिलाओं को जमीन पर स्वतंत्र अधिकार मिला?
क्या महिला संगम केवल पार्टी की सहायक संरचना था या उसमें स्वतंत्र महिला प्रश्न भी उठे?
इन सवालों ने श्रीकाकुलम के इतिहास को अधिक आलोचनात्मक बनाया।
अब महिला की उपस्थिति केवल “महिलाओं ने भी भाग लिया” जैसी एक पंक्ति नहीं रही।
उसके श्रम, शरीर, परिवार, राजनीतिक चुनाव और दमन के अनुभव अध्ययन का विषय बने।
चौथा चरण : संस्कृति
पुराने राजनीतिक इतिहास में गीत और लोकनाट्य को प्रचार का साधन मानकर कुछ पंक्तियों में छोड़ दिया जाता था।
नए सांस्कृतिक अध्ययन बताते हैं कि यह आंदोलन समझने में केंद्रीय है।
बुर्राकथा और जमुकुल कथा केवल संदेश पहुंचाने की तकनीक नहीं थीं।
वे उस भाषा का निर्माण करती थीं जिसमें किसान स्वयं को राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा समझता था।
पाणिग्रही की सांस्कृतिक विरासत ने आगे तेलुगु क्रांतिकारी साहित्य और प्रदर्शन-परंपरा को प्रभावित किया। सांस्कृतिक इतिहासकारों ने उनके प्रदर्शन का प्रभाव विरसम की पहली पीढ़ी और बाद की जनगीत परंपरा तक खोजा है।
इससे श्रीकाकुलम राजनीतिक इतिहास के साथ सांस्कृतिक इतिहास का विषय भी बन गया।
पांचवां चरण : राज्य और हिंसा
आधुनिक अध्ययन एक दूसरा कठिन प्रश्न पूछते हैं—
राज्य ने हिंसक चुनौती का उत्तर कैसे दिया?
पहली यह कि हर पुलिस कार्रवाई को सामान्य और वैध मान लिया जाए।
दूसरी यह कि पूरे संघर्ष में केवल राज्य हिंसा दिखाई जाए और CPI(ML) की लक्षित हत्याओं को नजरअंदाज कर दिया जाए।
ऐतिहासिक रूप से दोनों प्रकार की हिंसा मौजूद थीं।
आंदोलनकारी और कुछ अकादमिक स्रोतों में कथित फर्जी मुठभेड़ों और हिरासत के बाद हत्या के गंभीर आरोप दर्ज हैं।
दूसरी ओर गुरिल्ला दस्तों द्वारा भूस्वामियों, साहूकारों, मुखबिर समझे गए लोगों और पुलिस को निशाना बनाए जाने के प्रमाण भी हैं।
इसलिए आधुनिक इतिहासलेखन का अधिक संतुलित प्रश्न है—
राज्य हिंसा और क्रांतिकारी हिंसा ने एक-दूसरे को कैसे बढ़ाया?
छठा चरण : स्थानीय संघर्ष बनाम वैश्विक विचारधारा
श्रीकाकुलम पर नया इतिहास एक और प्रश्न उठाता है।
क्या स्थानीय किसान संघर्ष ने माओवादी विचारधारा को अपनाया?
या माओवादी नेतृत्व ने स्थानीय आंदोलन को अपने अखिल भारतीय मॉडल में ढाला?
स्थानीय संघर्ष नक्सलबाड़ी से पहले मौजूद था।
लेकिन 1968–69 के बाद चीन, माओ, येनान और ‘जनयुद्ध’ की भाषा उसकी रणनीति पर हावी होती गई।
यहीं इतिहासलेखन स्थानीय और वैश्विक के संबंध की जांच करता है।
सातवां चरण : असफलता की नई परिभाषा
अब इतिहासकार अधिक व्यापक प्रश्न पूछते हैं—
क्या महिला की सार्वजनिक भूमिका बदली?
क्या बाद की राजनीतिक संस्कृति बदली?
इस नई कसौटी पर श्रीकाकुलम का परिणाम मिश्रित दिखाई देता है।
एक संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय से जुड़े ग्रामीण परिवर्तन अध्ययन ने भी निष्कर्ष निकाला कि सशस्त्र आंदोलन के दमन के बावजूद श्रीकाकुलम ने क्षेत्र के सामाजिक एजेंडे को बदलने में योगदान दिया और राज्य को भूमि तथा आदिवासी विकास के प्रश्नों का उत्तर देना पड़ा।
यानी सैन्य विफलता और ऐतिहासिक प्रभाव साथ-साथ संभव हैं।
खंड 15 का समेकित मूल्यांकन
श्रीकाकुलम के इतिहास की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि हमारे पास स्रोत कम हैं।
समस्या यह है कि हमारे पास परस्पर विरोधी स्मृतियां हैं।
शहीदों ने भूमि और मुक्ति के लिए बलिदान दिया।
वास्तविक किसान संघर्ष को अतिवादी रणनीति ने नुकसान पहुंचाया।
इन सभी आख्यानों में हमारी आवाज कहां है?
क्या वर्ग की भाषा जमीन, जंगल और सामुदायिक पहचान के पूरे अनुभव को समझती है?
यदि गीत और लोकनाट्य को हटा दिया जाए तो आंदोलन की जनशक्ति ही समझ में नहीं आएगी।
इन सभी को साथ पढ़ने पर श्रीकाकुलम का अधिक पूर्ण चित्र सामने आता है।
वह केवल पुलिस दमन की कहानी नहीं था।
और वह केवल भूमि सुधार का आंदोलन भी नहीं था।
वह एक ऐसा सामाजिक क्षण था जिसमें जमीन, आदिवासी पहचान, वर्ग, स्त्री, संस्कृति, क्रांतिकारी विचारधारा और राज्य—सभी एक-दूसरे से टकराए।
इसीलिए श्रीकाकुलम की स्मृति आज भी विवादित है।
जिस व्यक्ति को पुलिस रिकॉर्ड “उग्रवादी” कह सकता है, राजनीतिक स्मृति उसे “शहीद” कहती है।
जिस गुरिल्ला कार्रवाई को पार्टी “वर्ग संघर्ष” कहती है, किसी प्रभावित परिवार की स्मृति उसे हत्या के रूप में देख सकती है।
जिस महिला को पार्टी रिकॉर्ड केवल समर्थक मान सकता है, उसकी अपनी स्मृति उसे स्वतंत्र राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में प्रस्तुत कर सकती है।
इतिहास का काम इनमें से किसी एक स्मृति को अंतिम सत्य घोषित करना नहीं है।
सभी आवाजों को सुनना, स्रोतों को परखना, विरोधाभास दर्ज करना और उपलब्ध प्रमाण के आधार पर संतुलित निष्कर्ष निकालना।
श्रीकाकुलम का इतिहासलेखन हमें यही सिखाता है।
और शायद इसी कारण आंदोलन के इतिहास की सबसे स्थायी विरासत बंदूक नहीं बल्कि उस पर चलती बहस है।
खंड 16 — विस्तृत समयरेखा, प्राथमिक दस्तावेज और प्रमुख संदर्भ-स्रोत (अध्याय 74–76)
अध्याय 74: श्रीकाकुलम आंदोलन की विस्तृत समयरेखा — औपनिवेशिक भूमि–वन व्यवस्था से 1950 के दशक के गिरिजन संगठन, 31 अक्टूबर 1967 लेविडी, नवंबर 1968 के सशस्त्र चरण, 1969 CPI(ML), 1970 में शीर्ष नेतृत्व की मृत्यु और बाद की विरासत तक।
अध्याय 75: प्रमुख प्राथमिक स्रोत और दस्तावेज — आंध्र प्रदेश सरकार व पुलिस अभिलेख, भूमि हस्तांतरण विनियम, गिरिजन संगम सामग्री, CPI–CPI(M)–AICCCR–CPI(ML) दस्तावेज, चारु मजूमदार और स्थानीय नेताओं के लेखन, समकालीन समाचार-पत्र, गीत और मौखिक इतिहास।
अध्याय 76: प्रमुख द्वितीयक स्रोत और संदर्भ ग्रंथ — सुमंत बनर्जी, इलिना सेन, आंध्र के किसान–आदिवासी आंदोलनों के मानक अध्ययन, महिला इतिहास, सांस्कृतिक अध्ययन, शोध-प्रबंध और उपयोगी डिजिटल अभिलेख।
इसके बाद अंतिम खंड 17 — निष्कर्ष : श्रीकाकुलम आंदोलन को कैसे समझें? (अध्याय 77) में 1950 के दशक से 1970 तक भूमि–जंगल–आदिवासी अधिकार, जनसंगठन, सशस्त्र क्रांति, राज्य-दमन और दीर्घकालीन विरासत का समेकित ऐतिहासिक मूल्यांकन आएगा।
विस्तृत समयरेखा, प्राथमिक दस्तावेज और प्रमुख संदर्भ-स्रोत
श्रीकाकुलम किसान–आदिवासी आंदोलन का इतिहास लिखने में सबसे बड़ी चुनौती केवल घटनाओं को क्रम में रखना नहीं है, बल्कि अलग-अलग प्रकार के स्रोतों के बीच अंतर करना भी है। सरकारी कानून और न्यायालयी निर्णय एक प्रकार का साक्ष्य देते हैं; CPI, CPI(M), AICCCR और CPI(ML) के दस्तावेज दूसरे प्रकार का; पुलिस और प्रशासनिक अभिलेख तीसरा; जबकि आंदोलन में शामिल आदिवासी पुरुषों और महिलाओं की मौखिक स्मृतियां चौथा।
इन स्रोतों में कई बार गंभीर मतभेद हैं। नेताओं की मौत की परिस्थितियां, आंदोलन के प्रभाव वाले गांवों की संख्या, हिंसक कार्रवाइयों का स्वरूप और पुलिस ‘मुठभेड़ों’ की प्रकृति जैसे प्रश्नों पर किसी एक पक्षीय स्रोत को अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।
इसलिए इस खंड का उद्देश्य केवल संदर्भों की सूची बनाना नहीं है, बल्कि यह भी बताना है कि किस स्रोत का उपयोग किस प्रश्न के लिए और कितनी सावधानी से किया जाना चाहिए।
1839 — गंजाम और विजागपट्टम अधिनियम
ब्रिटिश प्रशासन ने गंजाम और विजागपट्टम के पहाड़ी क्षेत्रों के लिए सामान्य मैदानी प्रशासन से अलग व्यवस्था विकसित की। Ganjam and Vizagapatam Act, 1839 ने इन क्षेत्रों में विशेष प्रशासनिक ढांचे की नींव रखी। बाद में इन्हीं क्षेत्रों को ‘एजेंसी’ अथवा ‘एजेंसी ट्रैक्ट्स’ के रूप में जाना जाने लगा। जनजातीय मामलों से संबंधित सरकारी अध्ययन भी आंध्र के अनुसूचित क्षेत्रों की विशेष प्रशासनिक व्यवस्था को 1839 तक पीछे ले जाते हैं।
1874 — Scheduled Districts Act
Scheduled Districts Act, 1874 ने विशेष प्रशासन वाले आदिवासी क्षेत्रों के लिए औपचारिक कानूनी ढांचा मजबूत किया। जिला कलेक्टर ‘Agent’ और अधीनस्थ अधिकारी Agency Divisional Officer के रूप में विशेष न्यायिक और प्रशासनिक शक्तियां प्रयोग करते थे।
इस व्यवस्था का दीर्घकालीन महत्व इसलिए था कि स्वतंत्रता के बाद भी ‘एजेंसी क्षेत्र’ और विशेष भूमि-सुरक्षा की प्रशासनिक अवधारणा समाप्त नहीं हुई।
14 अगस्त 1917 — एजेंसी क्षेत्र Interest and भूमि हस्तांतरण Act
एजेंसी क्षेत्र Interest and Land Transfers Act, 1917 आदिवासी जमीन और साहूकारी की समस्या से सीधे संबंधित महत्वपूर्ण औपनिवेशिक कानून था।
गंजाम, विजागपट्टम और गोदावरी एजेंसी क्षेत्रों में ब्याज दर नियंत्रित करना और आदिवासी भूमि के हस्तांतरण पर रोक लगाना।
धारा 4 के तहत किसी ‘hill tribe’ सदस्य की अचल संपत्ति का हस्तांतरण सामान्यतः किसी अन्य hill tribe सदस्य को ही वैध था; अन्य हस्तांतरण के लिए सक्षम अधिकारी की पूर्व लिखित अनुमति आवश्यक थी। अवैध हस्तांतरण की स्थिति में भूमि वापस दिलाने का भी प्रावधान था।
यानी श्रीकाकुलम आंदोलन से लगभग आधी सदी पहले ही औपनिवेशिक राज्य यह स्वीकार कर चुका था कि आदिवासी भूमि-वियोजन और साहूकारी गंभीर समस्याएं हैं।
1950 — संविधान और पांचवीं अनुसूची
26 जनवरी 1950 से भारतीय संविधान लागू हुआ। अनुच्छेद 244 और पांचवीं अनुसूची ने अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन तथा अनुसूचित जनजातियों की भूमि और हितों की सुरक्षा के लिए विशेष संवैधानिक व्यवस्था प्रदान की।
श्रीकाकुलम एजेंसी क्षेत्र की बाद की भूमि-सुरक्षा इसी संवैधानिक ढांचे पर आधारित थी।
1950 के दशक का प्रारंभ — कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं का प्रवेश
उत्तरी आंध्र के पार्वतीपुरम, पालकोंडा और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों में कम्युनिस्ट कार्यकर्ता भूमि, मजदूरी, साहूकारी और राजस्व अधिकारियों की कथित अवैध वसूली जैसे प्रश्नों पर संगठित काम करने लगे।
बाद के मानक अध्ययनों में सत्यनारायण और कैलासम के नेतृत्व में आदिवासी क्षेत्रों में 1950 के दशक से कम्युनिस्ट जनाधार विकसित होने का उल्लेख मिलता है।
1958 — गिरिजन संगम
इलिना सेन के अध्ययन के अनुसार Girijan Sangham 1958 में अविभाजित CPI के अंतर्गत बना। पाल्ले रामुलु और वेंपाटापु सत्यनारायण शुरुआती संगठनकर्ताओं में थे; बाद में आदिभटला कैलासम भी आंदोलन से जुड़े।
1958–60 के दशक का प्रारंभ
संगम ने जिन मुद्दों को उठाया उनमें शामिल थे—
यह श्रीकाकुलम आंदोलन का जनसंगठन चरण था।
4 मार्च 1959 — अनुसूचित क्षेत्र भूमि हस्तांतरण Regulation
आंध्र प्रदेश में Andhra Pradesh अनुसूचित क्षेत्र भूमि हस्तांतरण Regulation, 1959—Regulation I of 1959 लागू हुआ।
यह विशेष रूप से श्रीकाकुलम, विशाखापत्तनम, पूर्वी और पश्चिमी गोदावरी के अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी भूमि हस्तांतरण नियंत्रित करने के लिए बनाया गया था।
1961 के आसपास — बड़े गिरिजन सम्मेलन
उपलब्ध आंदोलन-संबंधी स्रोत 1960 के दशक के प्रारंभ तक गिरिजन संगम के व्यापक सम्मेलनों और बढ़ते संगठनात्मक प्रभाव का उल्लेख करते हैं। यही दौर था जब आंदोलन व्यक्तिगत शिकायतों से क्षेत्रीय सामूहिक राजनीति में बदल रहा था।
1964 — CPI का विभाजन
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन के बाद श्रीकाकुलम का प्रमुख गिरिजन संगठन और सत्यनारायण–कैलासम से जुड़ी धारा CPI(M) के साथ चली गई।
लेकिन स्थानीय आंदोलन का केंद्र अभी भी मुख्यतः भूमि, ऋण, मजदूरी और आदिवासी अधिकार थे।
1965–66
इस अवधि में स्थानीय भूस्वामियों और संगम के बीच संघर्ष अधिक तीखा हुआ।
उसी समय राष्ट्रीय स्तर पर चारु मजूमदार के वे दस्तावेज प्रसारित हो रहे थे जिन्हें बाद में ‘ऐतिहासिक आठ दस्तावेज’ कहा गया। उनमें संसदीय वामपंथ की आलोचना और सशस्त्र किसान संघर्ष की दिशा पर जोर था।
अभी श्रीकाकुलम उनसे पूरी तरह संचालित नहीं था, लेकिन वैचारिक वातावरण बदल रहा था।
फरवरी–मार्च 1967 — आम चुनाव
CPI(M) ने चुनावों में हिस्सा लिया। भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर संसदीय राजनीति बनाम क्रांतिकारी सशस्त्र मार्ग की बहस और तीखी हुई।
मई 1967 — नक्सलबाड़ी
पश्चिम बंगाल में नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह ने भारतीय वाम राजनीति में गहरा विभाजन पैदा किया।
श्रीकाकुलम में इसका प्रभाव विशेष रूप से इसलिए पड़ा क्योंकि वहां पहले से संगठित किसान–आदिवासी आधार मौजूद था।
31 अक्टूबर 1967 — लेविडी घटना
गिरिजन सम्मेलन से जुड़ी यात्रा के दौरान लेविडी में स्थानीय भूस्वामी पक्ष के साथ हिंसक संघर्ष हुआ और आदिवासी कार्यकर्ता कोरन्ना और मंगन्ना मारे गए।
यह घटना श्रीकाकुलम आंदोलन का निर्णायक मनोवैज्ञानिक मोड़ बनी।
इसके बाद आत्मरक्षा, प्रतिशोध और हथियारबंद प्रतिरोध की मांग तेजी से मजबूत हुई।
नवंबर 1967 — क्रांतिकारी कम्युनिस्टों का अखिल भारतीय समन्वय
नक्सलबाड़ी समर्थक कम्युनिस्टों ने All India Coordination Committee of Revolutionaries के रूप में संगठनात्मक एकता की दिशा शुरू की। बाद में यह AICCCR बना।
4 मार्च 1968 — पुलिस गोलीबारी
कुछ क्षेत्रीय इतिहासों में पेदाकराजा में पुलिस गोलीबारी और दो आदिवासियों की मृत्यु का उल्लेख मिलता है। इसे आंदोलन के और उग्र होने वाले घटनाक्रमों में गिना जाता है।
मई 1968 — AICCCR
क्रांतिकारी कम्युनिस्टों का अखिल भारतीय संगठन All India Coordination Committee of Communist Revolutionaries—AICCCR के रूप में पुनर्गठित हुआ।
1968 — आंध्र के भीतर रणनीतिक मतभेद
आंध्र प्रदेश के क्रांतिकारी कम्युनिस्टों में दो प्रमुख प्रश्नों पर मतभेद तेज हुए—
या तत्काल गुरिल्ला और ‘वर्ग शत्रु सफाया’ रणनीति अपनाई जाए?
तरिमेला नागी रेड्डी–डी.वी. राव धारा और चारु मजूमदार समर्थक नेतृत्व के बीच यही केंद्रीय वैचारिक अंतर बन गया।
अक्टूबर–नवंबर 1968 — सशस्त्र चरण
श्रीकाकुलम में अधिक व्यवस्थित गुरिल्ला संघर्ष नवंबर 1968 से शुरू माना जाता है। एक महत्वपूर्ण बाद का विवरण 25 नवंबर 1968 को लगभग 250 आदिवासी किसानों द्वारा एक साहूकार/भूस्वामी के घर पर कार्रवाई को संगठित गुरिल्ला चरण का प्रमुख प्रारंभिक बिंदु मानता है।
25 नवंबर 1968
क्रांतिकारी स्रोतों के अनुसार बड़ी संख्या में आदिवासी किसानों ने खाद्यान्न, संपत्ति और ऋण दस्तावेज कब्जे में लिए।
फरवरी 1969 — AICCCR बैठक
AICCCR की बैठक के बाद चारु मजूमदार आंध्र प्रदेश पहुंचे।
6 मार्च 1969 — चारु मजूमदार का श्रीकाकुलम लेख
श्रीकाकुलम यात्रा के बाद चारु मजूमदार ने “Srikakulam: Will It Be the Yenan of India?” लिखा। यह Liberation के मार्च 1969 अंक में प्रकाशित हुआ।
लेख पर तारीख 6 मार्च 1969 है और मजूमदार श्रीकाकुलम को संभावित भारतीय क्रांतिकारी आधार-क्षेत्र के रूप में देखते हैं।
यह श्रीकाकुलम से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिक राजनीतिक दस्तावेजों में से एक है।
अप्रैल 1969 — Srikakulam Marches On
Liberation, Vol. 2, No. 6, April 1969 में “Srikakulam Marches On” प्रकाशित हुआ। यह तत्कालीन CPI(ML)-समर्थक दृष्टिकोण से सशस्त्र संघर्ष की गतिविधियों का महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत है।
इसी समय आंध्र प्रदेश Revolutionary Communist Committee के On Srikakulam Girijan सशस्त्र संघर्ष जैसे mimeographed दस्तावेज भी प्रसारित हुए। इनके अस्तित्व और अप्रैल 1969 की तारीख की पुष्टि समकालीन अकादमिक ग्रंथसूची से होती है।
22 अप्रैल 1969 — CPI(ML) की स्थापना
लेनिन की जयंती पर Communist Party of India (Marxist-Leninist) के गठन की घोषणा हुई।
श्रीकाकुलम अब नए अखिल भारतीय नक्सलवादी संगठन के प्रमुख सशस्त्र क्षेत्रों में गिना जाने लगा।
मई 1969
26–27 मई 1969 के आसपास पंचादि कृष्णमूर्ति और छह अन्य क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं की पुलिस कार्रवाई में मृत्यु हुई। पुलिस और आंदोलनकारी स्रोत घटना की प्रकृति पर भिन्न मत रखते हैं।
जुलाई 1969
समकालीन आंदोलनकारी रिपोर्टों में इस दौर तक श्रीकाकुलम के अनेक गांवों में किसान समितियां, जमीन और अनाज कब्जे, ऋण दस्तावेज नष्ट करने तथा ‘प्रजा अदालतों’ जैसी गतिविधियों का दावा किया गया।
इन आंकड़ों को प्रत्यक्ष सत्यापन योग्य सरकारी गणना के रूप में नहीं बल्कि पार्टी/आंदोलनकारी दावे के रूप में पढ़ना चाहिए।
जुलाई 1969 — रणनीतिक बहस
Andhra Pradesh Revolutionary Communist Committee का On सशस्त्र संघर्ष in Andhra Pradesh इसी दौर के वैचारिक विवाद को समझने के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इसका उल्लेख समकालीन शोध में किया गया है।
20 सितंबर 1969
Narayanamurthi का “The Srikakulam Story—II” Frontier में प्रकाशित हुआ। यह CPI(ML) और आंध्र की दूसरी क्रांतिकारी धारा के रणनीतिक मतभेदों को समझने के लिए विशेष महत्व रखता है।
नवंबर 1969
चारु मजूमदार का “Carry Forward the किसान Struggle” Liberation में प्रकाशित हुआ। इसमें आर्थिक संघर्ष और सशस्त्र संघर्ष के संबंध तथा हथियार एकत्र करने को केंद्रीय राजनीतिक कार्य मानने वाली CPI(ML) रणनीति स्पष्ट रूप से सामने आती है।
दिसंबर 1969
सुब्बाराव पाणिग्रही और आंदोलन के अन्य कार्यकर्ताओं पर पुलिस कार्रवाई ने नेतृत्व तथा सांस्कृतिक नेटवर्क को गंभीर आघात पहुंचाया।
उनकी मृत्यु के घटनाक्रम और तारीख के अलग-अलग विवरण मिलते हैं; इसलिए अंतिम समयरेखा में स्रोतभेद दर्ज करना आवश्यक है।
15 जनवरी 1970
चारु मजूमदार का “A Few Words on Guerrilla Actions” Deshabrati में प्रकाशित हुआ। इस दस्तावेज का उल्लेख समकालीन अकादमिक संदर्भ-सूची में मिलता है और यह CPI(ML) की गुरिल्ला रणनीति समझने के लिए उपयोगी है।
शुरुआती 1970
पुलिस और प्रशासनिक अभियान अधिक व्यापक होते गए। गांवों, ग्रामीण संपर्कों और भूमिगत कार्यकर्ताओं पर दबाव तेज हुआ।
Regulation I of 1970
1959 के अनुसूचित क्षेत्र भूमि हस्तांतरण Regulation को Regulation I of 1970 द्वारा कठोर किया गया। संशोधित व्यवस्था ने अनुसूचित क्षेत्रों में गैर-आदिवासियों के पक्ष में भूमि हस्तांतरण को बहुत अधिक सीमित किया और गैर-आदिवासी कब्जे के मामलों में कानूनी धारणा आदिवासी हित में बदली।
इसे केवल श्रीकाकुलम विद्रोह का प्रत्यक्ष परिणाम कहना सरलीकरण होगा, लेकिन उस दौर के आदिवासी भूमि संकट और राजनीतिक दबाव से इसे अलग भी नहीं किया जा सकता।
मई 1970
CPI(ML) का पहला पार्टी कांग्रेस भूमिगत परिस्थितियों में हुआ। चारु मजूमदार महासचिव बने।
जून–जुलाई 1970
श्रीकाकुलम क्षेत्र में व्यापक पुलिस अभियान और गिरफ्तारियों ने आंदोलन के ग्रामीण नेटवर्क को गंभीर रूप से कमजोर किया।
10–11 जुलाई 1970
वेंपाटापु सत्यनारायण और आदिभटला कैलासम पुलिस कार्रवाई में मारे गए।
CPI(ML) का अपना इतिहास उन्हें पकड़कर मारे जाने का दावा करता है; अन्य स्रोत पुलिस मुठभेड़ की भाषा प्रयोग करते हैं। लेकिन उनकी मृत्यु की तारीख और आंदोलन पर पड़े निर्णायक प्रभाव पर व्यापक सहमति है।
यह श्रीकाकुलम के संगठित सशस्त्र चरण का सबसे बड़ा निर्णायक आघात था।
1971–72 : विघटन
1971 तक श्रीकाकुलम का संगठित गुरिल्ला नेटवर्क अत्यंत कमजोर हो चुका था।
उसी दौरान CPI(ML) स्वयं राष्ट्रीय स्तर पर तीखे अंतर्विरोधों और गुटबंदी में फंस गई।
जुलाई 1972
चारु मजूमदार की गिरफ्तारी और हिरासत में मृत्यु के साथ प्रारंभिक CPI(ML) चरण का भी अंत निकट आ गया।
लेकिन श्रीकाकुलम की राजनीतिक और सांस्कृतिक स्मृति बनी रही।
1970 — विरसम
तेलुगु क्रांतिकारी साहित्य और सांस्कृतिक राजनीति में श्रीकाकुलम की स्मृति बाद के लेखक और सांस्कृतिक संगठनों के लिए प्रेरक बनी।
1974 — Radical Students Union
आंध्र प्रदेश में नई नक्सलवादी पीढ़ी ने छात्र राजनीति के माध्यम से संगठनात्मक आधार फिर बनाया।
22 अप्रैल 1980 — CPI(ML) People’s War
कोंडापल्ली सीतारमैया के नेतृत्व में पीपुल्स वार की स्थापना हुई।
श्रीकाकुलम और तेलंगाना के पुराने अनुभव बाद की रणनीतिक स्मृति का हिस्सा बने।
1980 के दशक — दंडकारण्य विस्तार
आंध्र की नक्सलवादी राजनीति उत्तर तेलंगाना से दंडकारण्य और आंध्र–ओडिशा सीमा तक फैलने लगी।
1997 — Samatha v. State of Andhra Pradesh
सर्वोच्च न्यायालय ने अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि और संसाधन अधिकारों पर ऐतिहासिक फैसला दिया। इस निर्णय ने 1959 और 1970 के भूमि हस्तांतरण कानूनों की संवैधानिक पृष्ठभूमि की विस्तृत समीक्षा की।
21 सितंबर 2004 — CPI (Maoist)
People’s War और Maoist Communist Centre के विलय से CPI (Maoist) बनी।
श्रीकाकुलम की सीधी संगठनात्मक निरंतरता नहीं थी, लेकिन वह इस व्यापक माओवादी राजनीतिक परंपरा की प्रारंभिक ऐतिहासिक स्मृतियों में बना रहा।
श्रीकाकुलम आंदोलन के प्रमुख प्राथमिक स्रोत और दस्तावेज
श्रीकाकुलम के गंभीर अध्ययन के लिए प्राथमिक स्रोतों को पांच वर्गों में विभाजित करना सबसे उपयोगी है।
1. एजेंसी क्षेत्र Interest and Land Transfers Act, 1917
आदिवासी भूमि और ऋण सुरक्षा की औपनिवेशिक पृष्ठभूमि समझने के लिए अनिवार्य दस्तावेज।
यह बताता है कि भूमि-वियोजन और साहूकारी की समस्या 1960 के दशक में अचानक पैदा नहीं हुई थी।
2. Rules under the एजेंसी क्षेत्र Interest and भूमि हस्तांतरण Act, 1917
इन नियमों में ‘hill tribes’ की सूची और भूमि हस्तांतरण की प्रशासनिक प्रक्रिया दी गई थी; Savaras और Jatapus जैसे समुदायों का उल्लेख भी मिलता है।
3. Constitution of India — Fifth Schedule
अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन और जनजातीय भूमि-सुरक्षा का संवैधानिक आधार।
4. Andhra Pradesh अनुसूचित क्षेत्र भूमि हस्तांतरण Regulation, 1959
श्रीकाकुलम भूमि प्रश्न के लिए सबसे महत्वपूर्ण कानूनी प्राथमिक स्रोत।
मूल कानून की तारीख 4 मार्च 1959 थी और इसका उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि हस्तांतरण नियंत्रित करना था।
5. Andhra Pradesh अनुसूचित क्षेत्र Laws (Extension and Amendment) Regulation, 1963
इसके माध्यम से अनुसूचित क्षेत्रों की भूमि और साहूकारी संबंधी कानूनों का व्यापक राज्य क्षेत्र में विस्तार हुआ।
6. Regulation I of 1970
1959 के भूमि हस्तांतरण कानून का महत्वपूर्ण कठोर संशोधन।
इसे श्रीकाकुलम आंदोलन के सामाजिक-राजनीतिक परिणामों के अध्ययन में अवश्य शामिल किया जाना चाहिए।
7. बाद के भूमि-संशोधन — 1971 और 1978
ये दिखाते हैं कि आदिवासी भूमि सुरक्षा की कानूनी संरचना लगातार विकसित होती रही।
8. Samatha v. State of Andhra Pradesh, Supreme Court, 1997
यह बाद का न्यायालयी स्रोत है, लेकिन 1917 से 1970 तक के भूमि कानूनों और पांचवीं अनुसूची की व्याख्या के लिए अत्यंत उपयोगी है।
2. गिरिजन संगम और आंध्र कम्युनिस्ट दस्तावेज
यह श्रेणी सबसे कठिन है, क्योंकि शुरुआती गिरिजन संगम के बहुत से दस्तावेज आसानी से उपलब्ध प्रकाशित रूप में नहीं मिलते।
भूमि विवाद और मजदूरी आंदोलन से संबंधित पर्चे,
इन स्रोतों का बड़ा महत्व इसलिए है क्योंकि वे 1967 से पहले के श्रीकाकुलम को पुनर्निर्मित कर सकते हैं।
9. AICCCR Declaration, 1968
नक्सलबाड़ी के बाद क्रांतिकारी कम्युनिस्टों की राष्ट्रीय राजनीतिक दिशा समझने के लिए आवश्यक।
10. Charu Mazumdar — Historic Eight Documents
श्रीकाकुलम पर सीधे केंद्रित नहीं, लेकिन उस वैचारिक धारा को समझने के लिए अनिवार्य जिसने 1967 के बाद स्थानीय नेतृत्व को प्रभावित किया।
11. Charu Mazumdar — “Srikakulam: Will It Be the Yenan of India?”
श्रीकाकुलम पर उपलब्ध सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिक वैचारिक दस्तावेजों में से एक। इसमें मजूमदार स्वयं अपनी श्रीकाकुलम यात्रा और क्षेत्र के प्रति क्रांतिकारी उम्मीद व्यक्त करते हैं।
12. “Srikakulam Marches On”
सशस्त्र कार्रवाइयों, किसान दस्तों और CPI(ML)-समर्थक राजनीतिक व्याख्या को समझने के लिए अनिवार्य।
13. Andhra Pradesh Revolutionary Communist Committee — On Srikakulam Girijan सशस्त्र संघर्ष, April 1969
समकालीन अकादमिक ग्रंथसूची में इसका उल्लेख मिलता है। यह चारु मजूमदार लाइन से असहमत आंध्र की क्रांतिकारी बहस समझने के लिए विशेष महत्व रखता है।
14. Andhra Pradesh Revolutionary Communist Committee — On सशस्त्र संघर्ष in Andhra Pradesh, July 1969
आंध्र के क्रांतिकारी वाम के भीतर जनसंगठन और सशस्त्र संघर्ष पर मतभेदों का महत्वपूर्ण स्रोत।
15. Narayanamurthi — “The Srikakulam Story—II”
यह आंदोलन के भीतर रणनीतिक मतभेद और सशस्त्र संघर्ष की आलोचना समझने के लिए महत्वपूर्ण समकालीन पाठ है।
16. Charu Mazumdar — “Some Current Political and Organizational Problems”
CPI(ML) की संगठनात्मक दिशा और ‘वर्ग शत्रु सफाया’ की विकसित होती रणनीति का महत्वपूर्ण स्रोत।
17. Charu Mazumdar — “Carry Forward the किसान Struggle”
आर्थिक आंदोलनों और सशस्त्र राजनीति के संबंध पर मजूमदार की दृष्टि समझने के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण।
18. Charu Mazumdar — “A Few Words on Guerrilla Actions”
गुरिल्ला कार्रवाइयों के राजनीतिक सिद्धांत को समझने के लिए उपयोगी। इसका समकालीन ग्रंथसूचीगत उल्लेख उपलब्ध है।
19. APRCC — Problems of People’s War
लगभग 1970 का mimeographed दस्तावेज।
यह आंध्र की वैकल्पिक क्रांतिकारी रणनीति को CPI(ML) की मजूमदार लाइन से तुलना करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
Liberation
1968–70 के CPI(ML) इतिहास के लिए सबसे महत्वपूर्ण पत्रिका स्रोतों में से एक।
विशेष रूप से मार्च–अप्रैल 1969 तथा 1969 के बाद के अंक देखने चाहिए।
मूल अंक डिजिटल अभिलेखों में उपलब्ध हैं; अप्रैल 1969 अंक में “Srikakulam Marches On” स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध है।
Frontier
कोलकाता से प्रकाशित Frontier ने नक्सलबाड़ी और बाद की क्रांतिकारी राजनीति पर CPI(ML)-समर्थक तथा आलोचनात्मक दोनों प्रकार की सामग्री प्रकाशित की।
श्रीकाकुलम पर Narayanamurthi की श्रृंखला विशेष रूप से उपयोगी है।
Deshabrati
चारु मजूमदार और CPI(ML) की राजनीतिक दिशा समझने के लिए आवश्यक।
राष्ट्रीय और आंध्र के समकालीन समाचार-पत्र
इनसे पुलिस कार्रवाइयों, गिरफ्तारी, अदालती मामलों और नेताओं की मौतों की तारीखों की स्वतंत्र पुष्टि की जा सकती है।
Parvatipuram Conspiracy Case
श्रीकाकुलम आंदोलन के कानूनी दमन और गिरफ्तार क्रांतिकारी नेटवर्क को समझने के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण केस-रिकॉर्ड है।
बाद के विवरण इसे बड़े मुकदमों में गिनते हैं, जिसमें बड़ी संख्या में अभियुक्त और गवाह शामिल थे।
निचली अदालत और उच्च न्यायालय के फैसले।
इन अभिलेखों का महत्व यह है कि उनमें ऐसे नाम और संगठनात्मक संपर्क मिल सकते हैं जो पार्टी साहित्य में दर्ज नहीं हैं।
पुलिस और गृह विभाग फाइलें
आंध्र प्रदेश राज्य अभिलेखागार में खोजे जाने योग्य श्रेणियां—
भूमि हस्तांतरण Regulation enforcement,
और Srikakulam/Parvatipuram district correspondence।
इनमें सरकारी दृष्टिकोण उपलब्ध होगा, लेकिन पुलिस स्रोत को भी आलोचनात्मक ढंग से पढ़ना आवश्यक है।
6. गीत, लोकनाट्य और मौखिक इतिहास
श्रीकाकुलम की संस्कृति स्वयं प्राथमिक स्रोत है।
गिरिजन सम्मेलन के सांस्कृतिक कार्यक्रम,
और जीवित प्रतिभागियों के साक्षात्कार।
महिला और आदिवासी इतिहास के लिए ये स्रोत विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं क्योंकि लिखित पार्टी दस्तावेजों में साधारण प्रतिभागियों की आवाज सीमित है।
प्रमुख द्वितीयक स्रोत और संदर्भ ग्रंथ
श्रीकाकुलम पर केवल एक पुस्तक पर्याप्त नहीं है। संतुलित शोध के लिए कम से कम चार दृष्टिकोण साथ रखने चाहिए—
नक्सलवादी आंदोलन का सामान्य इतिहास, आदिवासी–किसान अध्ययन, महिला इतिहास और राज्य/भूमि कानून संबंधी अध्ययन।
नीचे प्राथमिकता के आधार पर उपयोगी स्रोत दिए जा रहे हैं।
1. Sumanta Banerjee — In the Wake of Naxalbari: A History of the Naxalite आंदोलन in India
नक्सलबाड़ी, श्रीकाकुलम और प्रारंभिक CPI(ML) आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण शुरुआती समग्र इतिहासों में से एक।
के लिए। पुस्तक 1980 में प्रकाशित हुई और 436 पृष्ठों की थी।
स्रोत-सावधानी
बनर्जी स्वयं बाद में स्वीकार करते हैं कि आंदोलन के कई प्रमुख कार्यकर्ता मारे जा चुके थे, जीवित प्रतिभागियों की स्मृतियां परस्पर विरोधी थीं और उपलब्ध सामग्री में अफवाह तथा राजनीतिक पक्षधरता की समस्या थी। इसलिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत है, लेकिन अंतिम प्रमाण नहीं।
2. Sumanta Banerjee — India’s Simmering Revolution: The Naxalite Uprising
यह In the Wake of Naxalbari का संशोधित और अद्यतन संस्करण है।
327 पृष्ठों की यह पुस्तक नक्सलवादी आंदोलन के सामाजिक आधार, CPI(ML), गुरिल्ला रणनीति और श्रीकाकुलम पर व्यापक संदर्भ देती है।
श्रीकाकुलम शोध के लिए इसे अनिवार्य ग्रंथ माना जाना चाहिए।
3. Ilina Sen (ed.) — A Space Within the Struggle: Women’s Participation in People’s Movements
इसमें श्रीकाकुलम पर अध्ययन महिलाओं की भूमिका, गिरिजन संगम, स्थानीय आदिवासी अर्थव्यवस्था और मौखिक इतिहास के लिए अनिवार्य स्रोत है।
और महिला प्रतिभागियों की स्मृतियां।
यह पुरुष-नेता और पार्टी-केंद्रित इतिहास को संतुलित करने के लिए सबसे उपयोगी अध्ययन है।
4. समकालीन 1972 का भारतीय माओवादी आंदोलन पर अकादमिक अध्ययन
Bulletin of Concerned Asian Scholars में प्रकाशित अध्ययन श्रीकाकुलम, AICCCR, CPI(ML) और Andhra Pradesh Revolutionary Communist Committee के रणनीतिक मतभेदों को बहुत निकट समय से दर्ज करता है।
इसकी सबसे बड़ी उपयोगिता इसकी विस्तृत प्राथमिक ग्रंथसूची है, जिसमें शामिल हैं—
On Srikakulam Girijan सशस्त्र संघर्ष,
On सशस्त्र संघर्ष in Andhra Pradesh,
5. Ministry of आदिवासी Affairs / आदिवासी Research Institute — Evolution of अनुसूचित क्षेत्र and Changes in Muttadari System in Andhra Area
अनुसूचित क्षेत्रों के औपनिवेशिक इतिहास, Agency administration, 1839 और 1874 की व्यवस्थाओं तथा 1917 के भूमि कानून को समझने के लिए उपयोगी सरकारी शोध।
6. Land Alienation and Restoration Studies
आदिवासी भूमि-वियोजन संबंधी सरकारी और शोध संस्थानों के अध्ययन 1917, 1959 तथा 1970 के कानूनों की व्यावहारिक सीमाओं को समझने में मदद करते हैं।
विशेष रूप से Regulation I of 1970 में—
और गैर-आदिवासी कब्जे के संबंध में statutory presumption
7. Readings in Land Reforms
LBSNAA से उपलब्ध भूमि सुधार सामग्री में एजेंसी क्षेत्र Act 1917 और 1959 Regulation का उपयोगी ऐतिहासिक सार मिलता है।
8. Prakash Singh — The Naxalite आंदोलन in India
भारत के नक्सलवादी आंदोलन का सुरक्षा और प्रशासनिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मानक अध्ययन।
इसे बनर्जी जैसे वामपंथी/सामाजिक इतिहास के साथ पढ़ना चाहिए, क्योंकि दोनों की दृष्टि अलग है।
9. Biplab Dasgupta — नक्सलवादी आंदोलन और कृषि संबंधों पर लेखन
भूमि, वर्ग संरचना और नक्सलबाड़ी से आगे फैले किसान संघर्षों के आर्थिक संदर्भ के लिए उपयोगी।
12. श्रीकाकुलम महिला प्रतिभागियों के मौखिक इतिहास
आदिवासी महिलाओं और मैदानी शिक्षित महिलाओं के अनुभवों में अंतर,
निष्कर्ष — श्रीकाकुलम आंदोलन को कैसे समझें?
श्रीकाकुलम किसान–आदिवासी आंदोलन को किसी एक शब्द में परिभाषित करना कठिन है। वह केवल किसान आंदोलन नहीं था, केवल आदिवासी विद्रोह नहीं था, और केवल नक्सलवादी सशस्त्र संघर्ष भी नहीं था। उसकी ऐतिहासिक विशिष्टता इसी तथ्य में है कि 1950 के दशक के भूमि, मजदूरी, साहूकारी और आदिवासी अधिकार के जनसंघर्ष ने 1967 के बाद क्रमशः उग्र किसान प्रतिरोध और फिर CPI(ML) से जुड़े सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन का रूप ग्रहण किया।
इसलिए श्रीकाकुलम को समझने का सबसे उपयुक्त तरीका उसे एक क्रमिक रूपांतरण के रूप में देखना है—
आदिवासी असंतोष → गिरिजन संगठन → भूमि और मजदूरी संघर्ष → ग्रामीण सत्ता को चुनौती → नक्सलबाड़ी का वैचारिक प्रभाव → सशस्त्र प्रतिरोध → CPI(ML) गुरिल्ला आंदोलन → राज्य-दमन और सैन्य पराजय → भूमि-अधिकार तथा भारतीय माओवादी राजनीति पर दीर्घकालीन प्रभाव।
यही क्रम श्रीकाकुलम को नक्सलबाड़ी की साधारण प्रतिकृति से अलग करता है।
श्रीकाकुलम की कहानी बंदूक से शुरू नहीं हुई
श्रीकाकुलम के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि उसकी कहानी 1967 या 1968 से शुरू नहीं की जानी चाहिए।
पूर्वी घाट की पहाड़ियों में रहने वाले सवरा, जटापू और अन्य आदिवासी समुदायों के लिए भूमि और जंगल केवल आर्थिक संसाधन नहीं थे। वे जीवन, समुदाय, संस्कृति और सामाजिक स्वायत्तता के आधार थे।
औपनिवेशिक राज्य ने जमीन, जंगल और राजस्व को औपचारिक प्रशासनिक नियंत्रण में लिया। बाजार और साहूकारी संबंधों के विस्तार ने आदिवासी किसान को नकदी और ऋण पर अधिक निर्भर बनाया। भूमि-वियोजन ने धीरे-धीरे ऐसी परिस्थिति बनाई जिसमें कुछ आदिवासी परिवार अपनी जमीन से बेदखल हुए, ऋणग्रस्त हुए या मजदूरी पर निर्भर होते चले गए।
स्वतंत्रता के बाद संविधान ने पांचवीं अनुसूची और विशेष भूमि-सुरक्षा की व्यवस्था दी। 1959 का अनुसूचित क्षेत्र भूमि हस्तांतरण Regulation भी आया। फिर भी कानून और ग्रामीण वास्तविकता के बीच अंतर बना रहा।
गिरिजन संगम : आंदोलन की वास्तविक नींव
श्रीकाकुलम की सबसे बड़ी शक्ति किसी हथियारबंद दस्ते में नहीं थी।
1950 के दशक के उत्तरार्ध से आदिवासी किसानों को भूमि, मजदूरी, साहूकारी और सामाजिक सम्मान के प्रश्नों पर संगठित करने की जो प्रक्रिया शुरू हुई, उसी ने आंदोलन को वास्तविक सामाजिक आधार दिया।
पाल्ले रामुलु जैसे स्थानीय कार्यकर्ताओं और वेंपाटापु सत्यनारायण तथा आदिभटला कैलासम जैसे शिक्षकों ने गांवों के बीच राजनीतिक नेटवर्क बनाया।
इस संगठन ने एक मौलिक परिवर्तन किया।
पहले जमीन छिनना व्यक्तिगत समस्या थी।
पहले कम मजदूरी मजदूर और मालिक का निजी मामला थी।
अब पूरा गांव मजदूरी दर पर बात कर सकता था।
पहले साहूकार का हिसाब अंतिम माना जाता था।
पहले आदिवासी किसान प्रशासन के सामने अकेला था।
यहीं श्रीकाकुलम का सबसे बड़ा सामाजिक परिवर्तन हुआ—
व्यक्ति समुदाय में और समुदाय राजनीतिक शक्ति में बदलने लगा।
आंदोलन का आदिवासी चरित्र
श्रीकाकुलम को सामान्य किसान आंदोलन कह देना इसलिए पर्याप्त नहीं है क्योंकि उसका मुख्य सामाजिक आधार आदिवासी समाज था।
सवरा और जटापू किसान केवल गरीब किसान नहीं थे।
उनका संघर्ष भूमि के साथ जंगल, परंपरागत अधिकार और सामुदायिक पहचान से भी जुड़ा था।
यहीं वर्ग और जनजाति एक-दूसरे में मिलते हैं।
कम्युनिस्ट नेतृत्व ने उनके संघर्ष को वर्गीय भाषा दी—
लेकिन आदिवासी अनुभव इससे व्यापक था।
बाहरी व्यापारी और साहूकार की सीमा क्या होगी?
और राज्य उसकी भूमि की रक्षा करेगा या केवल कागजी कानून बनाएगा?
इसलिए श्रीकाकुलम का सबसे उपयुक्त वर्णन किसान–आदिवासी आंदोलन ही है।
आदिवासी स्वयं इतिहास के कर्ता थे
श्रीकाकुलम के पुराने राजनीतिक इतिहास में कई बार प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेताओं को इतना अधिक स्थान दिया गया कि आदिवासी किसान पृष्ठभूमि में चले गए।
लेकिन आंदोलन को केवल बाहर से आए विचारकों की रचना मानना गंभीर भूल होगी।
स्थानीय संगठनकर्ता पहले से सक्रिय थे।
कम्युनिस्ट नेतृत्व ने इन समस्याओं को राजनीतिक भाषा, संगठन और व्यापक रणनीति दी, लेकिन संघर्ष की सामाजिक ऊर्जा आदिवासी समाज से आई।
अतः आदिवासी किसान केवल “mobilised population” नहीं थे।
महिलाओं ने आंदोलन की सामाजिक सीमा तोड़ी
श्रीकाकुलम के इतिहास का दूसरा महत्वपूर्ण निष्कर्ष महिलाओं की भूमिका से निकलता है।
आदिवासी महिलाएं कृषि, जंगल, घरेलू श्रम और परिवार की अर्थव्यवस्था में केंद्रीय थीं। इसलिए भूमि और वन पर नियंत्रण का प्रश्न उनके जीवन से प्रत्यक्ष जुड़ा था।
महिला संगम, राजनीतिक बैठकें, सम्मेलन, लेविडी जैसे प्रतिरोध, भूमिगत कार्यकर्ताओं को सहायता और कहीं-कहीं प्रत्यक्ष गुरिल्ला भागीदारी—इन सबने महिलाओं की भूमिका को केवल सहायक स्तर से ऊपर उठाया।
श्रीकाकुलम ने महिलाओं को सार्वजनिक राजनीति में स्थान दिया, परंतु वह संगठित नारीवादी आंदोलन नहीं था। संपत्ति में स्वतंत्र महिला अधिकार, घरेलू सत्ता और पितृसत्ता के सभी प्रश्न उसके कार्यक्रम के केंद्र में नहीं आए।
फिर भी उसकी एक उपलब्धि निर्विवाद है—
आदिवासी महिला पहली बार बड़े पैमाने पर ग्रामीण राजनीतिक संघर्ष की दृश्यमान भागीदार बनी।
संस्कृति आंदोलन का हथियार थी
श्रीकाकुलम को केवल भूमि और बंदूक की भाषा में समझना भी अधूरा होगा।
सुब्बाराव पाणिग्रही, सत्यनारायण और अन्य कार्यकर्ताओं ने गीत, लोककथा और नाट्य को राजनीतिक संगठन का माध्यम बनाया।
जहां लिखित घोषणापत्र की पहुंच सीमित थी, वहां गीत राजनीतिक शिक्षा बन गया।
शहीद की स्मृति संगठन का माध्यम बन गई।
यही सांस्कृतिक राजनीति आगे तेलुगु क्रांतिकारी साहित्य और जनसांस्कृतिक आंदोलनों में दिखाई देती है।
इस अर्थ में श्रीकाकुलम ने केवल राजनीतिक कैडर नहीं बनाए।
उसने एक क्रांतिकारी सांस्कृतिक शब्दावली भी निर्मित की।
1967 : आंदोलन का वास्तविक मोड़
नक्सलबाड़ी ने श्रीकाकुलम आंदोलन पैदा नहीं किया।
1967 से पहले श्रीकाकुलम की राजनीति मुख्यतः—
मई 1967 के नक्सलबाड़ी विद्रोह ने एक नया राजनीतिक निष्कर्ष सामने रखा—
भूमि का प्रश्न राज्य सत्ता के प्रश्न से अलग नहीं है।
चारु मजूमदार और नक्सलबाड़ी समर्थक धारा का तर्क था कि यदि राज्य स्वयं भूस्वामी और शासक वर्गों का उपकरण है तो केवल कानून और सुधार से किसानों की मुक्ति संभव नहीं।
यह विचार श्रीकाकुलम में इसलिए प्रभावी हुआ क्योंकि वहां पहले से संघर्ष मौजूद था।
लेविडी : जब प्रतिरोध का मनोविज्ञान बदल गया
31 अक्टूबर 1967 की लेविडी घटना ने इस वैचारिक परिवर्तन को स्थानीय अनुभव से जोड़ दिया।
कोरन्ना और मंगन्ना की हत्या आंदोलन की स्मृति में निर्णायक मोड़ बनी।
इस घटना के बाद आंदोलन के एक हिस्से में यह धारणा मजबूत हुई कि—
और संगठन को अपनी रक्षा स्वयं करनी होगी।
आत्मरक्षा से आगे बढ़कर यही तर्क अंततः सशस्त्र क्रांति की रणनीति में बदल गया।
लेकिन यहां इतिहास का महत्वपूर्ण अंतर फिर सामने आता है—
लेविडी के बाद उग्र प्रतिरोध शुरू हुआ; संगठित गुरिल्ला युद्ध नवंबर 1968 में स्पष्ट रूप से विकसित हुआ।
बंदूक का आगमन : शक्ति भी, संकट भी
1968 के उत्तरार्ध में श्रीकाकुलम ने योजनाबद्ध गुरिल्ला संघर्ष अपनाया।
पहले चरण में इसका प्रभाव उल्लेखनीय रहा।
कुछ क्षेत्रों में किसान समितियों और स्थानीय वैकल्पिक न्याय जैसी संरचनाओं के दावे सामने आए।
लेकिन यहीं आंदोलन की सबसे बड़ी रणनीतिक समस्या भी पैदा हुई।
जब दोनों एक-दूसरे के पूरक रहे, आंदोलन मजबूत था।
जब दूसरा पहले पर हावी होने लगा, संकट बढ़ा।
चारु मजूमदार और “भारत का येनान”
1969 में चारु मजूमदार ने श्रीकाकुलम को संभावित “भारत का येनान” कहा।
यह उस समय की क्रांतिकारी आशा का चरम था।
लेकिन यह तुलना अंततः भारतीय परिस्थितियों की गलत समझ भी सिद्ध हुई।
और ऐसी सरकार जो दमन के साथ सुधार भी कर सकती थी।
भारत में राज्य केवल पुलिस नहीं भेज सकता था।
यही 1970 के भूमि-सुरक्षा संशोधन में दिखाई देता है।
CPI(ML) : स्थानीय संघर्ष का राष्ट्रीय क्रांति में प्रवेश
22 अप्रैल 1969 को CPI(ML) के गठन के बाद श्रीकाकुलम स्थानीय किसान आंदोलन की सीमा से बाहर निकल गया।
अब उसे भारतीय क्रांति के अग्रिम क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा।
यह परिवर्तन आंदोलन को राष्ट्रीय पहचान देता है।
लेकिन इसके साथ जोखिम भी पैदा करता है।
स्थानीय मांगों पर अखिल भारतीय क्रांतिकारी रणनीति का दबाव बढ़ता है।
आंदोलन स्थानीय समाज की जरूरतों के अनुसार चलेगा?
या राष्ट्रीय पार्टी लाइन स्थानीय संघर्ष की दिशा तय करेगी?
श्रीकाकुलम में दोनों के बीच संतुलन धीरे-धीरे दूसरी ओर झुका।
‘वर्ग शत्रु सफाया’ : सबसे विवादास्पद मोड़
आंदोलन की सबसे गंभीर रणनीतिक कमजोरी ‘वर्ग शत्रुओं के सफाये’ की नीति थी।
और यह दिखाना कि पुरानी सत्ता अजेय नहीं है।
लेकिन व्यवहार में इसके कई खतरे सामने आए।
क्या व्यक्तिगत विवाद राजनीतिक हत्या में बदल सकता है?
क्या जनता स्वयं निर्णय का हिस्सा है?
या छोटा भूमिगत समूह उसकी ओर से फैसला कर रहा है?
यहीं प्रतिरोध और आतंक के बीच सीमा धुंधली होने का खतरा पैदा हुआ।
और यहीं आंदोलन की राजनीतिक वैधता कमजोर होने लगी।
हिंसा का संतुलित मूल्यांकन
श्रीकाकुलम पर चर्चा करते समय हिंसा के प्रश्न को दो अतियों से बचाकर देखना होगा।
सभी हिंसा को क्रांतिकारी न्याय मान लेना।
आंदोलन को केवल हिंसक अपराध के रूप में देखना।
भूमि संघर्ष में वास्तविक भूस्वामी हिंसा थी।
कथित फर्जी मुठभेड़ों के गंभीर आरोप थे।
इसलिए आत्मरक्षा का प्रश्न वास्तविक था।
लेकिन बाद की व्यक्तिगत लक्ष्य-हत्याएं और ‘वर्ग-शत्रु उन्मूलन की रणनीति’ अलग राजनीतिक श्रेणी थीं।
सशस्त्र आत्मरक्षा ने कुछ चरणों में आंदोलन की क्षमता बढ़ाई; हिंसा को केंद्रीय क्रांतिकारी रणनीति बना देने ने उसके सामाजिक आधार को कमजोर करने में योगदान दिया।
राज्य-दमन : वास्तविक और निर्णायक
आंदोलन की रणनीतिक कमजोरियों का अर्थ यह नहीं कि उसकी पराजय को केवल आंतरिक गलतियों से समझा जाए।
इनमें कई मौतों को लेकर पुलिस और आंदोलनकारी स्रोतों के विवरण अलग हैं।
इसीलिए श्रीकाकुलम का इतिहास लिखते समय “मुठभेड़” शब्द को बिना स्रोत-स्पष्टीकरण के अंतिम सत्य नहीं माना जाना चाहिए।
1970 : नेतृत्व की समाप्ति और आंदोलन का विघटन
जुलाई 1970 में सत्यनारायण और कैलासम की मृत्यु ने आंदोलन को निर्णायक आघात दिया।
इन दोनों में केवल सैन्य नेतृत्व नहीं था।
उनमें वर्षों का स्थानीय अनुभव और सामाजिक विश्वास भी निहित था।
और स्थानीय तथा राष्ट्रीय नेतृत्व के बीच सेतु का समाप्त होना।
शीर्ष नेतृत्व की मौत के बाद नया नेतृत्व उसी गति से नहीं उभर सका।
यहीं श्रीकाकुलम की एक और कमजोरी सामने आई—
नेतृत्व पर्याप्त रूप से संस्थागत नहीं हुआ था।
जनसंगठन कमजोर पड़ना क्यों निर्णायक था?
यदि गिरिजन संगम जैसी व्यापक सामाजिक संस्थाएं उसी शक्ति से बनी रहतीं तो संभव था कि सैन्य पराजय के बाद आंदोलन खुले किसान संघर्ष में लौट आता।
लेकिन 1968–70 के दौरान गुरिल्ला राजनीति का महत्व बढ़ते-बढ़ते ऐसा हुआ कि खुले जनसंगठन पीछे चले गए।
जब पुलिस ने गुरिल्ला ढांचे को तोड़ा तो आंदोलन के पास उतना मजबूत वैकल्पिक राजनीतिक ढांचा नहीं बचा जो संघर्ष को दूसरे रूप में आगे बढ़ा सके।
इसलिए श्रीकाकुलम का अनुभव एक बड़ी राजनीतिक शिक्षा देता है—
सशस्त्र दस्ता जनसंगठन का विकल्प नहीं हो सकता।
फिर भी क्या आंदोलन पूरी तरह विफल था?
लेकिन यदि कसौटी बदली जाए तो निष्कर्ष भी बदलता है।
क्या उसने भूमि प्रश्न को राजनीतिक बनाया?
क्या उसने आदिवासी किसानों को संगठित किया?
क्या उसने ग्रामीण सामाजिक भय को चुनौती दी?
क्या उसने राज्य को भूमि-सुरक्षा और आदिवासी प्रशासन पर प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर किया?
कम से कम राजनीतिक दबाव के स्तर पर—हाँ।
क्या उसने बाद की नक्सलवादी राजनीति को रणनीतिक सबक दिए?
इसलिए उसे केवल विफल क्रांति कहना अधूरा है।
1/70 कानून : बंदूक से कानून तक
1970 का Regulation I, जिसे लोकप्रिय रूप से ‘1/70 कानून’ कहा गया, श्रीकाकुलम की दीर्घकालीन विरासत समझने में महत्वपूर्ण है।
1959 का भूमि हस्तांतरण कानून पहले से था।
इसलिए 1970 के संशोधन को केवल विद्रोह का प्रत्यक्ष परिणाम नहीं कहा जा सकता।
लेकिन श्रीकाकुलम ने यह स्पष्ट कर दिया था कि कमजोर भूमि-सुरक्षा केवल प्रशासनिक कमी नहीं, राजनीतिक संकट बन सकती है।
गैर-आदिवासी के पक्ष में भूमि हस्तांतरण पर कड़ा नियंत्रण लगाया,
और गैर-आदिवासी कब्जे की वैधता साबित करने का बोझ उसी पर डाला।
यह स्वतंत्र भारत की आदिवासी भूमि-सुरक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव था।
यानी जिस आंदोलन ने राज्य को उखाड़ने का लक्ष्य अपनाया था, उसके मूल सामाजिक प्रश्न का एक हिस्सा अंततः राज्य के कानून में अधिक मजबूत रूप से समाहित हुआ।
यह श्रीकाकुलम की सबसे बड़ी ऐतिहासिक विडंबनाओं में से एक है।
भूमि कानून भी अंतिम समाधान नहीं था
फिर भी कानून आने से समस्या समाप्त नहीं हुई।
क्योंकि भूमि-वियोजन का कारण केवल कानूनी हस्तांतरण नहीं था।
यदि किसान आर्थिक रूप से असुरक्षित है तो कठोर भूमि कानून भी उसे पूरी तरह सुरक्षित नहीं कर सकता।
इसलिए श्रीकाकुलम एक स्थायी नीति-पाठ देता है—
आदिवासी भूमि-सुरक्षा को भूमि रिकॉर्ड, संस्थागत ऋण, वन-अधिकार, स्वास्थ्य, शिक्षा और आजीविका से अलग नहीं किया जा सकता।
तेलंगाना, नक्सलबाड़ी और श्रीकाकुलम
श्रीकाकुलम का ऐतिहासिक स्थान इन दो बड़े किसान संघर्षों के बीच देखने पर और स्पष्ट होता है।
तेलंगाना से उसने क्या विरासत पाई?
और गांव में वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति विकसित कर सकता है।
आंध्र कम्युनिस्ट राजनीति में यह स्मृति गहरी थी।
नक्सलबाड़ी से क्या मिला?
और अखिल भारतीय क्रांतिकारी नेटवर्क।
श्रीकाकुलम ने इन दोनों को कैसे जोड़ा?
उसके पास तेलंगाना जैसी लंबी जनसंगठन की तैयारी के कुछ तत्व थे।
और उसने नक्सलबाड़ी की माओवादी क्रांतिकारी भाषा ग्रहण की।
इसलिए श्रीकाकुलम इन दोनों के बीच सेतु है।
लेकिन वह किसी की प्रतिलिपि नहीं था।
क्यों नहीं था ‘आंध्र का नक्सलबाड़ी’ मात्र?
इस प्रश्न का अंतिम उत्तर अब स्पष्ट है।
पहला—श्रीकाकुलम का संगठन नक्सलबाड़ी से पहले मौजूद था।
दूसरा—उसका केंद्रीय प्रश्न विशिष्ट आदिवासी भूमि-वियोजन था।
तीसरा—उसमें लगभग एक दशक का जनसंगठन था।
चौथा—महिला और सांस्कृतिक संगठन उसकी विशेष शक्ति थे।
पांचवां—उसका भूमि कानून और आदिवासी प्रशासन की बहस पर विशिष्ट प्रभाव पड़ा।
छठा—उसने नक्सलबाड़ी की विचारधारा को अधिक दीर्घकालीन ग्रामीण गुरिल्ला प्रयोग में बदलने की कोशिश की।
इसलिए उसे केवल नक्सलबाड़ी की शाखा कहना इतिहास को उलटा पढ़ना होगा।
नक्सलबाड़ी ने श्रीकाकुलम को बदल दिया, लेकिन श्रीकाकुलम नक्सलबाड़ी से पैदा नहीं हुआ।
श्रीकाकुलम से PWG तक
1970 में पुराने आंदोलन की पराजय के बाद आंध्र प्रदेश में नक्सलवादी राजनीति समाप्त नहीं हुई।
1970 के दशक में गांवों में नई राजनीतिक गतिविधियां विकसित हुईं।
कोंडापल्ली सीतारमैया के नेतृत्व में 1980 में CPI(ML) People’s War बनी।
PWG ने श्रीकाकुलम के अनुभव से कुछ महत्वपूर्ण सबक लिए—
एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता खतरनाक है,
और गुरिल्ला संघर्ष को विस्तृत भौगोलिक आधार चाहिए।
बाद में यही राजनीति उत्तर तेलंगाना से दंडकारण्य तक गई।
लेकिन CPI (Maoist) तक सीधी रेखा नहीं
2004 में PWG और Maoist Communist Centre के विलय से CPI (Maoist) बनी।
श्रीकाकुलम की स्मृति उस राजनीतिक परंपरा में जीवित रही।
लेकिन इतिहास में सावधानी आवश्यक है।
श्रीकाकुलम सीधे CPI (Maoist) में परिवर्तित नहीं हुआ था।
इसलिए श्रीकाकुलम को आधुनिक भारतीय माओवादी आंदोलन का एक महत्वपूर्ण पूर्वज और प्रारंभिक प्रयोग, लेकिन अकेला स्रोत नहीं माना जाना चाहिए।
इतिहासलेखन की अंतिम शिक्षा
श्रीकाकुलम की सबसे पूर्ण व्याख्या किसी एक स्रोत से संभव नहीं।
यदि केवल पुलिस दस्तावेज पढ़े जाएं तो वह नक्सलवादी हिंसा बन जाएगा।
यदि केवल CPI(ML) साहित्य पढ़ा जाए तो वह शहादत और क्रांति की गौरवगाथा बन जाएगा।
यदि केवल भूमि कानून देखा जाए तो वह प्रशासनिक सुधार का इतिहास लगेगा।
यदि केवल महिला स्मृतियां पढ़ी जाएं तो आंदोलन का अलग सामाजिक संसार सामने आएगा।
इसलिए संतुलित इतिहास को साथ पढ़ना होगा—
यही इस पूरे शोध का मूल इतिहासलेखन सिद्धांत है।
श्रीकाकुलम की दस केंद्रीय ऐतिहासिक शिक्षाएं
पूरे आंदोलन से दस बड़े निष्कर्ष निकलते हैं।
एक—सामाजिक संघर्ष की जड़ स्थानीय होती है। बाहर की विचारधारा उसे दिशा दे सकती है, पैदा नहीं कर सकती।
दो—भूमि आदिवासी समाज में केवल संपत्ति नहीं है। वह आजीविका, संस्कृति और सामाजिक स्वायत्तता है।
तीन—संगठन आंदोलन की सबसे बड़ी शक्ति है। गिरिजन संगम ने जो किया, वह बंदूक अकेले कभी नहीं कर सकती थी।
चार—महिलाओं और स्थानीय नेतृत्व के बिना इतिहास अधूरा है।
पांच—संस्कृति राजनीतिक संगठन का शक्तिशाली साधन हो सकती है।
छह—आत्मरक्षा और योजनाबद्ध राजनीतिक हत्या को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
सात—जनसंगठन से अलग सैन्य राजनीति अपने आधार को कमजोर कर सकती है।
आठ—मजबूत लोकतांत्रिक राज्य से संघर्ष की परिस्थितियां गृहयुद्धग्रस्त चीन से अलग थीं।
नौ—राज्य केवल दमन नहीं करता; सुधार द्वारा असंतोष की मांगों को संस्थागत भी कर सकता है।
दस—किसी आंदोलन की सैन्य पराजय उसके सामाजिक प्रभाव की समाप्ति नहीं होती।
अंतिम प्रश्न : श्रीकाकुलम आखिर क्या था?
अब इस पूरे अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न सामने रखा जा सकता है—
क्या वह माओवादी क्रांति का प्रयास था?
लेकिन इनमें से कोई एक उत्तर पूरा नहीं है।
श्रीकाकुलम एक दीर्घकालीन किसान–आदिवासी जनसंघर्ष था, जो भूमि, जंगल, मजदूरी और साहूकारी के प्रश्नों से पैदा हुआ; नक्सलबाड़ी और CPI(ML) के प्रभाव में सशस्त्र माओवादी विद्रोह में बदल गया; राज्य-दमन और अपनी रणनीतिक सीमाओं के कारण सैन्य रूप से पराजित हुआ; लेकिन आदिवासी भूमि-अधिकार, राजनीतिक चेतना, तेलुगु क्रांतिकारी संस्कृति और बाद की नक्सलवादी राजनीति पर स्थायी प्रभाव छोड़ गया।
भारतीय किसान इतिहास में श्रीकाकुलम का स्थान
भारतीय किसान आंदोलनों के लंबे इतिहास में श्रीकाकुलम का महत्व किसी सबसे बड़े आंदोलन के रूप में नहीं है।
तेभागा का क्षेत्रीय प्रभाव व्यापक था।
नक्सलबाड़ी की वैचारिक प्रतिध्वनि उससे अधिक राष्ट्रीय थी।
लेकिन श्रीकाकुलम की विशिष्टता यह है कि उसने इन विभिन्न परंपराओं को एक छोटे भूगोल में एक साथ समाहित किया—
भूमि संघर्ष, आदिवासी अधिकार, जनसंगठन, महिला भागीदारी, सांस्कृतिक राजनीति, माओवादी विचारधारा, गुरिल्ला युद्ध, राज्य-दमन, कानूनी सुधार और दीर्घकालीन राजनीतिक विरासत।
इसलिए स्वतंत्र भारत के किसान आंदोलन का इतिहास श्रीकाकुलम के बिना पूरा नहीं हो सकता।
अंतिम निष्कर्ष
श्रीकाकुलम आंदोलन की कहानी एक गहरे ऐतिहासिक विरोधाभास में समाप्त होती है।
जिस आंदोलन ने राज्य को नष्ट करने का लक्ष्य अपनाया, वह स्वयं राज्य द्वारा नष्ट कर दिया गया।
लेकिन जिस सामाजिक प्रश्न ने उसे जन्म दिया था, वह राज्य के कानून और नीति में अधिक मजबूती से प्रवेश कर गया।
जिस बंदूक ने कुछ वर्षों के लिए आंदोलन की पहचान निर्धारित की, उससे अधिक स्थायी सिद्ध हुआ—
जिस गुरिल्ला दस्ते को पुलिस ने समाप्त कर दिया, उससे अधिक दीर्घजीवी सिद्ध हुई—
जिस पार्टी की शुरुआती संरचना टूट गई, उससे अधिक दूर तक गई—
और जिन नेताओं को मार दिया गया, उनकी तुलना में अधिक समय तक जीवित रहे—
इसीलिए श्रीकाकुलम को केवल पराजित विद्रोह नहीं कहा जा सकता।
वह स्वतंत्र भारत के इतिहास में उस स्थायी प्रश्न का प्रतीक है—
जब कानून जमीन पर न्याय नहीं पहुंचा पाता, तो सामाजिक असंतोष किस दिशा में जाता है?
और अंततः इतिहास ने दिखाया कि स्थायी समाधान फिर भी लौटकर वहीं आता है—
भूमि-अधिकार, न्यायपूर्ण शासन, सामाजिक संगठन और लोकतांत्रिक जवाबदेही पर।
यही श्रीकाकुलम की सबसे बड़ी ऐतिहासिक शिक्षा और भारतीय किसान–आदिवासी आंदोलनों के इतिहास में उसका स्थायी स्थान है।
श्रीकाकुलम शोध-खंड पूर्ण
इस प्रकार 17 खंड और 77 अध्यायों में श्रीकाकुलम किसान–आदिवासी आंदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, भूमि और साहूकारी, गिरिजन संगठन, 1967 का मोड़, सशस्त्र संघर्ष, CPI(ML), सामाजिक आधार, राज्य-दमन, पराजय, भूमि-कानून, तेलंगाना–नक्सलबाड़ी तुलना, PWG–CPI (Maoist) विरासत, उपलब्धियां–सीमाएं, इतिहासलेखन, विस्तृत समयरेखा और स्रोत-सूची सहित संपूर्ण अध्ययन पूरा होता है।
श्रीकाकुलम की संक्षिप्त समयरेखा
श्रीकाकुलम ने आदिवासी भूमि, ग्रामीण शोषण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न को राष्ट्रीय विमर्श में रखा तथा भय से मुक्त जन-संगठन की क्षमता दिखाई। किंतु व्यक्तिगत हिंसा, गुप्त सैन्य ढांचे और लोकतांत्रिक संस्थाओं से दूरी ने उसके सामाजिक आधार को संकुचित किया; राज्य के कठोर दमन ने नागरिक आबादी और नेतृत्व को भारी क्षति पहुंचाई। इसकी विरासत का न्यायपूर्ण मूल्यांकन तभी संभव है जब वैध भूमि–आदिवासी मांगों, सशस्त्र रणनीति की सीमाओं और राज्य की संवैधानिक जवाबदेही को एक-दूसरे में मिलाए बिना पढ़ा जाए।
प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक स्रोत
स्रोत-सावधानी: सरकारी, आंदोलनकारी, मौखिक और अकादमिक विवरणों में घटनाओं, मौतों, गांवों की संख्या और नियंत्रण के दावों पर मतभेद हैं। विवादित संख्याओं को अंतिम तथ्य की तरह प्रस्तुत नहीं किया गया है।