नक्सलबाड़ी आंदोलन
1967 के किसान विद्रोह से माओवादी धारा तक—भूमि, आदिवासी अधिकार, क्रांति, हिंसा, राज्य-दमन और लोकतंत्र की छह दशकों की यात्रा
नक्सलबाड़ी मई 1967 में दार्जिलिंग जिले की तराई में उभरा एक सीमित किसान विद्रोह था, लेकिन उसके प्रभाव ने भारतीय कम्युनिस्ट राजनीति, भूमि-सुधार, आदिवासी अधिकार, राज्य की सुरक्षा नीति और लोकतांत्रिक असहमति की भाषा को छह दशकों तक प्रभावित किया। इसे केवल किसान आंदोलन, केवल माओवादी क्रांति या केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानना इतिहास को अधूरा कर देता है। यह अध्ययन मूल भूमि-संघर्ष, सामाजिक आधार, नेतृत्व, वैचारिक बहस, राष्ट्रीय विस्तार, सशस्त्र हिंसा, राज्य-दमन, उपलब्धियों, विफलताओं और 2026 तक बदलते भूगोल—सभी को अलग प्रमाण-स्तरों और बहु-दृष्टिकोण के साथ पढ़ता है।
नक्सलबाड़ी की ऐतिहासिक और कृषि पृष्ठभूमि
:::writing{variant="document" id="58341" title="खंड 1 — नक्सलबाड़ी की ऐतिहासिक और कृषि पृष्ठभूमि"}
प्रस्तावना : 1967 का विस्फोट अचानक नहीं था
नक्सलबाड़ी का नाम भारतीय राजनीतिक इतिहास में सामान्यतः 1967 के सशस्त्र किसान विद्रोह और उसके बाद जन्मी नक्सलवादी धारा के साथ जोड़ा जाता है। लेकिन यदि नक्सलबाड़ी को केवल मई 1967 से शुरू किया जाए, तो आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक परत छूट जाती है। जिस भूभाग में यह विद्रोह हुआ, वहां भूमि, जंगल, चाय-बागान, प्रवासन, आदिवासी समुदाय, जोतदार, बटाईदार और खेतिहर मजदूरों के संबंध लगभग एक शताब्दी से बदल रहे थे।
नक्सलबाड़ी का भूगोल — सीमा, तराई, जंगल और चाय-बागान
नक्सलबाड़ी की भौगोलिक स्थिति उसके राजनीतिक इतिहास को समझने की पहली कुंजी है। यह दार्जिलिंग जिले के पहाड़ी भाग में नहीं, बल्कि उसके दक्षिणी तराई क्षेत्र में स्थित था। नक्सलबाड़ी, खोरीबाड़ी और फांसीदेवा के आसपास का इलाका नेपाल की सीमा के निकट था। पूर्व में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान और बाद में बांग्लादेश की दिशा तथा उत्तर-पूर्व की ओर सिक्किम और भूटान से जुड़ा व्यापक भूगोल इस क्षेत्र को सामरिक और सामाजिक दोनों दृष्टियों से विशिष्ट बनाता था।
औपनिवेशिक शासन और दार्जिलिंग तराई का परिवर्तन
उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटिश सत्ता के विस्तार के साथ दार्जिलिंग और उसके तराई क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में व्यापक परिवर्तन शुरू हुआ।
1835 में सिक्किम के चोग्याल द्वारा दार्जिलिंग क्षेत्र ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंपे जाने के बाद ब्रिटिश प्रशासन ने इस इलाके को तेजी से विकसित करना शुरू किया। बाद के दशकों में क्षेत्रीय सीमाओं में परिवर्तन हुए और तराई का बड़ा हिस्सा ब्रिटिश प्रशासन के अधीन आया।
ब्रिटिश शासन के लिए दार्जिलिंग केवल एक पर्वतीय स्वास्थ्य-स्थल नहीं था। जल्द ही इसकी आर्थिक क्षमता भी स्पष्ट हो गई।
चाय-बागान अर्थव्यवस्था और ग्रामीण समाज
दार्जिलिंग और तराई में चाय उद्योग के विस्तार ने क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को बदल दिया।
चाय-बागानों को बड़ी संख्या में श्रमिकों की आवश्यकता थी। स्थानीय आबादी इस मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं थी। इसलिए औपनिवेशिक काल में विभिन्न क्षेत्रों से मजदूर लाए गए।
नेपाल से बड़ी संख्या में श्रमिक आए। इसके अतिरिक्त छोटानागपुर और संथाल परगना सहित पूर्वी भारत के आदिवासी क्षेत्रों से भी श्रमिक आबादी पहुंची।
समय के साथ इन समुदायों का एक हिस्सा कृषि से भी जुड़ गया।
जोतदार व्यवस्था — ग्रामीण सत्ता का केंद्र
नक्सलबाड़ी की कृषि संरचना को समझने के लिए जोतदार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
बंगाल के ग्रामीण समाज में जमींदार और किसान के बीच कई मध्यवर्ती स्तर विकसित हुए थे। उत्तर बंगाल में जोतदार अपेक्षाकृत बड़ी कृषि जोतों पर नियंत्रण रखने वाले प्रभावशाली ग्रामीण भूधारक के रूप में उभरे।
हर जोतदार विशाल जमींदार नहीं था और पूरे बंगाल में इस शब्द का अर्थ समान नहीं था। लेकिन उत्तर बंगाल के अनेक हिस्सों में जोतदार स्थानीय ग्रामीण सत्ता का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।
बर्गादार — जमीन जोतने वाला, लेकिन जमीन का मालिक नहीं
नक्सलबाड़ी की पृष्ठभूमि में सबसे महत्वपूर्ण कृषक वर्गों में से एक था बर्गादार।
बंगाल में बर्गादार उस किसान को कहा जाता था जो किसी अन्य व्यक्ति की जमीन पर खेती करता और उपज का निर्धारित हिस्सा भूमि-स्वामी या जोतदार को देता था।
इसे सामान्यतः बटाईदारी की व्यवस्था कहा जा सकता है।
सैद्धांतिक रूप से यह साझेदारी थी—भूमि किसी की, श्रम किसी और का और फसल का बंटवारा दोनों के बीच।
व्यवहार में शक्ति-संतुलन अक्सर भूमि नियंत्रक के पक्ष में रहता था।
आदिवासी किसान और भूमि का प्रश्न
नक्सलबाड़ी आंदोलन की सबसे विशिष्ट विशेषताओं में से एक उसका मजबूत आदिवासी आधार था।
विशेषकर संथाल किसानों और खेतिहर मजदूरों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। जंगल संथाल का नेतृत्व इसी सामाजिक पृष्ठभूमि से निकला।
संथाल समुदाय का भूमि संघर्ष से संबंध नक्सलबाड़ी से बहुत पुराना था।
1855–56 का संथाल हूल ब्रिटिश शासन, महाजनों, जमींदारों और औपनिवेशिक व्यवस्था के विरुद्ध भारत के सबसे बड़े आदिवासी विद्रोहों में था।
राजबंशी किसान और उत्तर बंगाल का ग्रामीण समाज
नक्सलबाड़ी की सामाजिक संरचना को केवल संथाल या नेपाली आबादी तक सीमित करना भी गलत होगा।
उत्तर बंगाल में राजबंशी समुदाय का महत्वपूर्ण स्थान था। राजबंशी समाज लंबे समय से कृषि से जुड़ा हुआ था और क्षेत्र के ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा था।
औपनिवेशिक भूमि व्यवस्था और बाद में बाजार के विस्तार ने इस समाज के भीतर भी आर्थिक विभाजन पैदा किए।
कुछ परिवार अपेक्षाकृत बड़े भूधारक बने, जबकि अनेक छोटे और सीमांत किसान बने रहे।
महाजन, ऋण और ग्रामीण निर्भरता
भूमि संघर्ष केवल स्वामित्व का प्रश्न नहीं था। ग्रामीण ऋण व्यवस्था भी किसान की असुरक्षा का बड़ा कारण थी।
गरीब किसान को खेती के लिए बीज चाहिए।
फसल आने से पहले परिवार के लिए अनाज चाहिए।
बीमारी या विवाह जैसी परिस्थितियों में नकद धन चाहिए।
औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था ग्रामीण गरीबों तक पर्याप्त रूप से नहीं पहुंचती थी। परिणामस्वरूप महाजन और संपन्न ग्रामीण वर्ग ऋण का प्रमुख स्रोत बनते थे।
तेभागा आंदोलन — नक्सलबाड़ी की सबसे महत्वपूर्ण पूर्वपीठिका
1946–47 का तेभागा आंदोलन नक्सलबाड़ी की राजनीतिक पृष्ठभूमि का शायद सबसे महत्वपूर्ण किसान आंदोलन था।
बंगाल प्रांतीय किसान सभा ने बर्गादारों के लिए उपज के दो-तिहाई हिस्से की मांग उठाई।
तेभागा आंदोलन बंगाल के अनेक जिलों में फैला, लेकिन उत्तर बंगाल उसके प्रमुख क्षेत्रों में था।
इस आंदोलन की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि उसने किसान को केवल आर्थिक शिकायत करने वाला व्यक्ति नहीं रहने दिया।
उसने उसे संगठित राजनीतिक शक्ति में बदलने का प्रयास किया।
फसल पर नियंत्रण को लेकर संघर्ष हुआ।
स्वतंत्रता के बाद भूमि-सुधार की आशा
1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद किसानों में यह अपेक्षा स्वाभाविक थी कि औपनिवेशिक और जमींदारी भूमि संबंध तेजी से बदलेंगे।
भारत के अनेक राज्यों में जमींदारी उन्मूलन और भूमि-सुधार कानून बनाए गए।
पश्चिम बंगाल में भी भूमि संबंधों को बदलने के प्रयास हुए। बर्गादारों के अधिकारों की कानूनी मान्यता तथा भू-सीमा निर्धारित करने की दिशा में कानून बनाए गए।
लेकिन कानून बनना और गांव में उसका लागू होना दो अलग प्रक्रियाएं थीं।
यही अंतर नक्सलबाड़ी की पृष्ठभूमि में निर्णायक बनता है।
पश्चिम बंगाल एस्टेट्स एक्विजिशन और भूमि-सीमा का प्रश्न
स्वतंत्रता के बाद पश्चिम बंगाल में भूमि-सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण विधायी कदम उठाए गए।
West Bengal Estates Acquisition Act, 1953 ने मध्यवर्ती भू-स्वामित्व संरचनाओं को समाप्त करने और राज्य तथा वास्तविक कृषक के बीच संबंध पुनर्गठित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसके बाद West Bengal Land Reforms Act, 1955 भूमि-सुधार की दूसरी महत्वपूर्ण आधारशिला बना।
इन कानूनों का उद्देश्य भूमि संबंधों में परिवर्तन, भू-सीमा और बर्गादारों की स्थिति जैसे प्रश्नों को संबोधित करना था।
अभिलेख और वास्तविक कब्जे का संघर्ष
नक्सलबाड़ी आंदोलन के भूमि प्रश्न में एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू था रिकॉर्ड बनाम वास्तविक खेती।
ग्रामीण भारत में भूमि अधिकार केवल कानूनी स्वामित्व से निर्धारित नहीं होते थे। कई बार वर्षों से खेती करने वाला किसान भूमि अभिलेखों में मालिक नहीं होता था।
बर्गादारों के सामने यह समस्या विशेष रूप से गंभीर थी।
यदि उसका नाम आधिकारिक रूप से दर्ज नहीं है, तो उसे बेदखली से बचाना कठिन था।
इससे भूमि-सुधार कानूनों का लाभ उन किसानों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाता था जिनके लिए वे बनाए गए थे।
किसान सभा और ग्रामीण राजनीतिक संगठन
नक्सलबाड़ी की पृष्ठभूमि केवल आर्थिक नहीं थी। वहां पहले से राजनीतिक संगठन का अनुभव मौजूद था।
अखिल भारतीय किसान सभा और कम्युनिस्ट आंदोलन ने बंगाल के ग्रामीण क्षेत्रों में लंबे समय तक काम किया था।
तेभागा आंदोलन के दौरान बने संगठनात्मक नेटवर्क स्वतंत्रता के बाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुए।
कम्युनिस्ट कार्यकर्ता गांवों में भूमि विवाद, मजदूरी, बर्गादारी और बेदखली जैसे मुद्दों पर सक्रिय रहे।
दार्जिलिंग जिले के तराई क्षेत्र में भी किसान संगठन विकसित हुआ।
कम्युनिस्ट आंदोलन और भूमि क्रांति की बहस
भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर स्वतंत्रता के बाद एक मूल प्रश्न लगातार बना रहा—
भारत में सामाजिक परिवर्तन का रास्ता क्या होगा?
क्या संसदीय लोकतंत्र के माध्यम से भूमि-सुधार और समाजवादी परिवर्तन संभव है?
या भारतीय ग्रामीण समाज की संरचना ऐसी है कि सशस्त्र कृषि क्रांति आवश्यक होगी?
तेलंगाना संघर्ष के अनुभव ने इस बहस को और तीखा किया था।
1946 से शुरू हुआ तेलंगाना किसान संघर्ष भूमि, सामंती सत्ता और सशस्त्र ग्रामीण संगठन का बड़ा उदाहरण था।
1964 का कम्युनिस्ट विभाजन
1964 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी विभाजित हुई और Communist Party of India (Marxist)—CPI(M) अस्तित्व में आई।
अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन में सोवियत संघ–चीन विवाद,
1962 के भारत–चीन युद्ध के बाद पैदा हुए प्रश्न,
और भारतीय क्रांति की प्रकृति को लेकर मतभेद।
लेकिन CPI(M) बनने के बाद भी उसके भीतर वैचारिक एकरूपता नहीं थी।
एक धारा संसदीय चुनावों और जन आंदोलनों को साथ लेकर चलना चाहती थी।
दूसरी अधिक क्रांतिकारी धारा मानती थी कि चुनावी राजनीति अंततः क्रांति को कमजोर कर देगी।
चारु मजूमदार और क्रांतिकारी कृषि संघर्ष की अवधारणा
चारु मजूमदार का जन्म और राजनीतिक विकास उत्तर बंगाल के सामाजिक वातावरण में हुआ था। वे लंबे समय तक कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़े रहे और किसान संघर्षों का अनुभव रखते थे।
1960 के दशक के मध्य में उन्होंने लेखों और राजनीतिक टिप्पणियों की एक श्रृंखला लिखी जिन्हें बाद में सामान्यतः “ऐतिहासिक आठ दस्तावेज” कहा गया।
इन दस्तावेजों में उन्होंने भारतीय क्रांति के लिए माओवादी दिशा पर जोर दिया।
उनकी दृष्टि में भारतीय समाज में ग्रामीण वर्ग-संघर्ष निर्णायक था।
कानू सान्याल और स्थानीय संगठन
कानू सान्याल नक्सलबाड़ी आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण संगठकों में थे।
उनकी भूमिका को केवल चारु मजूमदार की विचारधारा लागू करने वाले कार्यकर्ता के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा।
सान्याल का काम ग्रामीण क्षेत्र में किसानों से प्रत्यक्ष संपर्क, संगठन और आंदोलन की वास्तविक संरचना से जुड़ा था।
वे किसानों के बीच जाते, भूमि विवादों को समझते और स्थानीय संगठन तैयार करते थे।
आगे चलकर कानू सान्याल और चारु मजूमदार की रणनीतिक दृष्टियों में गंभीर अंतर भी सामने आया।
जंगल संथाल — आंदोलन का आदिवासी चेहरा
यदि चारु मजूमदार नक्सलबाड़ी की वैचारिक दिशा के प्रतीक बने और कानू सान्याल संगठनात्मक नेतृत्व के, तो जंगल संथाल उसके ग्रामीण और आदिवासी जनाधार के सबसे महत्वपूर्ण चेहरों में थे।
उनका सामाजिक संबंध उन किसानों से था जो भूमि संघर्ष के वास्तविक सहभागी थे।
जंगल संथाल की लोकप्रियता का आधार केवल पार्टी पद नहीं था।
वे ग्रामीण गरीबों और विशेष रूप से संथाल समुदाय से संवाद स्थापित करने में सक्षम थे।
नक्सलबाड़ी के विद्रोही किसान की लोकप्रिय छवि—तीर-धनुष लिए आदिवासी किसान—काफी हद तक इसी सामाजिक आधार से बनी।
खाद्य संकट, महंगाई और 1960 का दशक
1960 का दशक पश्चिम बंगाल में व्यापक आर्थिक और राजनीतिक अस्थिरता का समय था।
खाद्यान्न की कमी और कीमतों में वृद्धि ने जन असंतोष को बढ़ाया। 1959 का खाद्य आंदोलन पहले ही पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा मोड़ ला चुका था।
1960 के दशक के मध्य में स्थिति फिर कठिन हुई।
1965–66 और 1966–67 के आसपास देश को गंभीर कृषि संकट, सूखे और खाद्यान्न की समस्या का सामना करना पड़ा।
गरीब किसान और खेतिहर मजदूर के लिए महंगाई का प्रभाव सबसे गंभीर था।
कांग्रेस व्यवस्था का संकट और पश्चिम बंगाल
स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक पश्चिम बंगाल में कांग्रेस प्रमुख राजनीतिक शक्ति रही।
लेकिन 1960 के दशक तक कांग्रेस के विरुद्ध असंतोष बढ़ रहा था।
1967 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को सत्ता से बाहर होना पड़ा और संयुक्त मोर्चा सरकार बनी।
इस सरकार में CPI(M) महत्वपूर्ण घटक थी।
यह परिस्थिति नक्सलबाड़ी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
पहली बार किसानों को लगा कि जिन वामपंथी नेताओं ने वर्षों तक भूमि-सुधार और किसान अधिकारों की बात की थी, वे अब सरकार में हैं।
हरे कृष्ण कोनार और भूमि-सुधार की उम्मीद
1967 की संयुक्त मोर्चा सरकार में CPI(M) के प्रमुख नेता हरे कृष्ण कोनार भूमि एवं भूमि-राजस्व से संबंधित विभाग के मंत्री बने।
कोनार लंबे समय से किसान और भूमि-सुधार के प्रश्न से जुड़े थे।
उनके सत्ता में आने से ग्रामीण क्षेत्रों में यह संदेश गया कि भूमि-सुधार अब अधिक गंभीरता से लागू हो सकता है।
बर्गादारों और भूमिहीन किसानों की उम्मीदें बढ़ीं।
लेकिन इसी बिंदु पर एक ऐतिहासिक विरोधाभास पैदा हुआ।
सरकार भूमि-सुधार को कानून और प्रशासन के माध्यम से आगे बढ़ाना चाहती थी।
जमीन पर वास्तविक संघर्ष
1967 से पहले नक्सलबाड़ी क्षेत्र में भूमि विवाद लगातार बढ़ रहे थे।
किसानों की शिकायतें कई प्रकार की थीं—
और पारंपरिक कब्जे की मान्यता न मिलना।
किसान संगठनों ने इन मामलों को उठाना शुरू किया।
कुछ स्थानों पर किसानों को संगठित करके भूमि पर वास्तविक अधिकार स्थापित करने की रणनीति अपनाई गई।
यहां संघर्ष केवल सरकार के खिलाफ नहीं था।
उसका तत्काल सामना स्थानीय भूधारकों और जोतदारों से था।
यही कारण है कि नक्सलबाड़ी का पहला स्वरूप किसी राजधानी पर हमला करने वाला आंदोलन नहीं था।
नक्सलबाड़ी की विस्फोटक संरचना
1967 की शुरुआत तक नक्सलबाड़ी क्षेत्र में लगभग वे सभी तत्व मौजूद थे जिनसे एक बड़ा किसान संघर्ष पैदा हो सकता था।
एक ओर भूमि की असमानता और बर्गादारों की असुरक्षा थी।
दूसरी ओर आदिवासी और गरीब किसान समुदायों में लंबे समय से असंतोष था।
तीसरी ओर किसान सभा और कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं का संगठनात्मक नेटवर्क मौजूद था।
चौथी ओर तेभागा की ऐतिहासिक स्मृति थी।
पांचवीं ओर भूमि-सुधार कानूनों और उनके अधूरे क्रियान्वयन के बीच अंतर था।
खंड 2 — तेभागा से नक्सलबाड़ी तक : किसान सभा, तेलंगाना की विरासत, भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन, CPI–CPI(M) विभाजन, चारु मजूमदार की वैचारिक तैयारी और 1967 के विद्रोह की राजनीतिक जमीन
इस खंड में हम विशेष रूप से यह समझेंगे कि 1946–47 का तेभागा किसान आंदोलन किस प्रकार 1967 के नक्सलबाड़ी से जुड़ता है, दोनों आंदोलनों में क्या समानताएं और बुनियादी अंतर थे, तथा भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन की संसदीय और क्रांतिकारी धाराएं अंततः नक्सलबाड़ी में क्यों टकराईं।
तेभागा से नक्सलबाड़ी तक
:::writing{variant="document" id="64127" title="खंड 2 — तेभागा से नक्सलबाड़ी तक : किसान सभा, तेलंगाना की विरासत और 1967 के विद्रोह की राजनीतिक जमीन"}
प्रस्तावना : बीस वर्षों में किसान आंदोलन की राजनीति कैसे बदली
1946–47 के तेभागा आंदोलन और 1967 के नक्सलबाड़ी विद्रोह के बीच लगभग बीस वर्ष का अंतर था। भौगोलिक रूप से दोनों आंदोलनों के कुछ प्रमुख क्षेत्र उत्तर बंगाल में थे और दोनों में बटाईदारों, गरीब किसानों तथा आदिवासी समुदायों की महत्वपूर्ण भागीदारी थी। दोनों पर कम्युनिस्ट किसान राजनीति का प्रभाव था और दोनों के केंद्र में भूमि तथा फसल पर अधिकार का प्रश्न था।
फिर भी तेभागा और नक्सलबाड़ी एक ही आंदोलन के दो चरण नहीं थे।
तेभागा की विरासत — किसान ने पहली बार फसल पर अपना अधिकार जताया
1946–47 का तेभागा आंदोलन बंगाल के कृषि इतिहास में निर्णायक मोड़ था।
बंगाल की बटाई व्यवस्था में बर्गादार प्रायः अपनी उपज का लगभग आधा हिस्सा जोतदार या भू-स्वामी को देता था। बंगाल प्रांतीय किसान सभा ने मांग उठाई कि बर्गादार को फसल का दो-तिहाई हिस्सा मिलना चाहिए और उपज पहले बर्गादार के अपने खलिहान में रखी जानी चाहिए।
फसल किसके खलिहान में जाएगी, यह ग्रामीण सत्ता का प्रश्न था।
तेभागा और नक्सलबाड़ी — समानता कहां, अंतर कहां?
दोनों आंदोलनों की तुलना नक्सलबाड़ी को समझने के लिए अत्यंत उपयोगी है।
तेभागा की मूल मांग थी कि बर्गादार को उपज का दो-तिहाई हिस्सा मिले।
नक्सलबाड़ी में प्रश्न धीरे-धीरे इससे आगे चला गया—
भूमि पर वास्तविक अधिकार किसका होना चाहिए?
तेभागा में बर्गादार और जोतदार का संबंध पूरी तरह समाप्त करने की मांग हर स्तर पर आंदोलन का तत्काल कार्यक्रम नहीं थी। नक्सलबाड़ी की क्रांतिकारी धारा भूमि-स्वामित्व की मौजूदा संरचना को ही चुनौती देने लगी।
तेभागा मुख्यतः किसान सभा के नेतृत्व वाला जन आंदोलन था।
तेलंगाना — भारतीय कम्युनिस्टों का सबसे बड़ा सशस्त्र किसान अनुभव
नक्सलबाड़ी की वैचारिक पृष्ठभूमि में तेलंगाना किसान संघर्ष का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
1946 से तत्कालीन हैदराबाद राज्य के तेलंगाना क्षेत्र में शुरू हुआ किसान संघर्ष धीरे-धीरे विशाल सशस्त्र आंदोलन में बदल गया।
इसका निशाना सामंती भू-स्वामियों, देशमुखों, वेत्ती जैसी जबरन श्रम व्यवस्थाओं और निजाम शासन की दमनकारी संरचना पर था।
कई क्षेत्रों में किसानों ने भूमि पर कब्जा किया।
कुछ क्षेत्रों में वैकल्पिक ग्रामीण सत्ता जैसी संरचनाएं दिखाई दीं।
1948 की क्रांतिकारी लाइन और उसका संकट
स्वतंत्रता के तुरंत बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर यह विवाद था कि 15 अगस्त 1947 के बाद भारतीय राज्य की प्रकृति को कैसे देखा जाए।
बी. टी. रणदिवे के महासचिव बनने के बाद 1948 में पार्टी ने अत्यंत उग्र राजनीतिक दिशा अपनाई।
यह माना गया कि सत्ता का हस्तांतरण वास्तविक राष्ट्रीय मुक्ति नहीं है और क्रांतिकारी परिस्थितियों का उपयोग किया जाना चाहिए।
हड़तालों, जन आंदोलनों और विद्रोही कार्रवाइयों को व्यापक क्रांति की रणनीति से जोड़ा गया।
लेकिन यह नीति गंभीर संकट में फंस गई।
1951 का मोड़ — चुनाव और संसदीय राजनीति
1951 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने नई राजनीतिक दिशा अपनाई।
पार्टी ने भारतीय चुनावी लोकतंत्र में भाग लेने का निर्णय किया और 1951–52 के पहले आम चुनाव में हिस्सा लिया।
यह भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास में निर्णायक परिवर्तन था।
अब पार्टी के पास दो समानांतर क्षेत्र थे—
जन आंदोलनों के माध्यम से सामाजिक संघर्ष,
और संसद तथा विधानसभाओं के माध्यम से राजनीतिक हस्तक्षेप।
1957 में केरल में ई. एम. एस. नंबूदरीपाद के नेतृत्व में कम्युनिस्ट सरकार का गठन इस रणनीति की ऐतिहासिक उपलब्धि थी।
चीन की क्रांति और भारतीय कम्युनिस्ट कल्पना
1949 में माओ त्से-तुंग के नेतृत्व में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की विजय का विश्व कम्युनिस्ट आंदोलन पर गहरा प्रभाव पड़ा।
भारतीय क्रांतिकारियों के लिए चीन का अनुभव विशेष रूप से आकर्षक था क्योंकि चीन भी विशाल ग्रामीण आबादी वाला एशियाई देश था।
चीनी क्रांति का लोकप्रिय राजनीतिक सूत्र था—
ग्रामीण क्षेत्रों में क्रांतिकारी आधार विकसित करना,
और धीरे-धीरे शहरों को ग्रामीण क्षेत्रों से घेरना।
भारत के कुछ कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं को इसमें भारतीय परिस्थितियों के लिए मॉडल दिखाई दिया।
लेकिन भारत और चीन में महत्वपूर्ण अंतर थे।
सोवियत संघ बनाम चीन — विश्व कम्युनिस्ट आंदोलन का विभाजन
1950 के दशक के उत्तरार्ध और 1960 के दशक में सोवियत संघ तथा चीन के बीच वैचारिक संघर्ष खुलकर सामने आया।
सोवियत नेतृत्व ने पूंजीवादी देशों के साथ ‘शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व’ और कुछ परिस्थितियों में संसदीय माध्यम से समाजवाद की ओर संक्रमण की संभावना पर जोर दिया।
माओ के नेतृत्व वाली चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने इसे संशोधनवाद की दिशा माना।
चीन का तर्क था कि साम्राज्यवाद और वर्ग-संघर्ष समाप्त नहीं हुए हैं और क्रांतिकारी संघर्ष को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।
यह अंतरराष्ट्रीय विवाद भारत पहुंचा।
1962 का भारत–चीन युद्ध और कम्युनिस्ट आंदोलन
अक्टूबर–नवंबर 1962 का भारत–चीन युद्ध भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर पहले से मौजूद मतभेदों को अत्यंत तीखा कर गया।
राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट एकजुटता के बीच तनाव पैदा हुआ।
कम्युनिस्ट नेताओं के बीच चीन की भूमिका, नेहरू सरकार और भारतीय राष्ट्रीय हित को लेकर गंभीर मतभेद सामने आए।
कई कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं और नेताओं को गिरफ्तार किया गया।
लेकिन युद्ध को CPI विभाजन का अकेला कारण मानना सही नहीं होगा।
1964 — CPI और CPI(M) का विभाजन
1964 में भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन औपचारिक रूप से विभाजित हो गया।
एक ओर पुरानी Communist Party of India—CPI रही।
दूसरी ओर Communist Party of India (Marxist)—CPI(M) का गठन हुआ।
CPI(M) ने कांग्रेस के प्रति CPI की नीति को अधिक समझौतावादी माना और स्वयं को अधिक संघर्षशील मार्क्सवादी धारा के रूप में प्रस्तुत किया।
पश्चिम बंगाल में CPI(M) तेजी से शक्तिशाली बनी।
लेकिन विभाजन के बाद जल्द ही स्पष्ट हो गया कि CPI(M) स्वयं वैचारिक रूप से एकसमान नहीं थी।
चारु मजूमदार की वैचारिक यात्रा
चारु मजूमदार का राजनीतिक विकास बंगाल के किसान आंदोलनों और भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर हुआ था।
वे तेभागा आंदोलन के अनुभव से परिचित थे।
1960 के दशक के मध्य तक वे इस निष्कर्ष की ओर बढ़ चुके थे कि भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन संसदीय राजनीति में फंसकर अपनी क्रांतिकारी दिशा खो रहा है।
उनकी दृष्टि में भारत मूलतः कृषि प्रधान समाज था और क्रांति की मुख्य शक्ति गरीब तथा भूमिहीन किसान होंगे।
उन्होंने माओ की क्रांतिकारी रणनीति से गहरा प्रभाव ग्रहण किया।
भारतीय क्रांति का रास्ता गांवों से होकर जाएगा।
‘ऐतिहासिक आठ दस्तावेज’ — वास्तव में क्या थे?
1965–67 के बीच चारु मजूमदार ने कई राजनीतिक लेख और टिप्पणियां लिखीं जिन्हें बाद में नक्सलवादी आंदोलन में ‘Historic Eight Documents’ के नाम से प्रसिद्धि मिली।
इनका महत्व इस बात में था कि उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट क्रांतिकारी धारा के लिए एक वैचारिक रूपरेखा प्रस्तुत की।
और राज्य-सत्ता को मूल प्रश्न मानना।
लेकिन इन दस्तावेजों को 1967 के पूरे नक्सलबाड़ी किसान आंदोलन का तैयार ‘संविधान’ मानना भी गलत होगा।
स्थानीय किसानों की अपनी आर्थिक शिकायतें और संघर्ष थे।
चारु मजूमदार ने उनमें भारतीय क्रांति की संभावना देखी और उन्हें व्यापक वैचारिक अर्थ दिया।
‘वर्ग-शत्रु’ की अवधारणा
चारु मजूमदार की राजनीति में आगे चलकर सबसे विवादास्पद अवधारणाओं में से एक बनी—
इसका पूर्ण विकास विशेष रूप से नक्सलबाड़ी के बाद हुआ।
इसलिए 1967 के प्रारंभिक किसान विद्रोह पर बाद की इस रणनीति को पूरी तरह आरोपित करना ऐतिहासिक भूल होगी।
लेकिन इसकी वैचारिक जमीन पहले से बन रही थी।
मजूमदार का विचार था कि ग्रामीण गरीब केवल आर्थिक मांगों के आंदोलन से क्रांतिकारी सत्ता विकसित नहीं कर सकते। उन्हें ग्रामीण प्रभुत्व के प्रतीकों को प्रत्यक्ष चुनौती देनी होगी।
कानू सान्याल — क्रांति का दूसरा पाठ
कानू सान्याल भी भारतीय राज्य और ग्रामीण भूमि-संबंधों के क्रांतिकारी परिवर्तन के पक्षधर थे, लेकिन उनकी राजनीतिक भूमिका चारु मजूमदार से भिन्न थी।
सान्याल का जोर किसानों के बीच संगठन बनाने पर था।
भूमि विवादों में हस्तक्षेप करते थे।
उनकी दृष्टि में जन भागीदारी क्रांतिकारी आंदोलन का केंद्रीय आधार थी।
आगे चलकर चारु मजूमदार की लाइन और कानू सान्याल की समझ के बीच अंतर गहरा हुआ।
नक्सलबाड़ी को समझते समय इसलिए तीन स्तर अलग रखने चाहिए—
कानू सान्याल जैसे नेताओं का ग्रामीण संगठन,
और किसानों की वास्तविक स्थानीय आकांक्षाएं।
जंगल संथाल और किसान नेतृत्व
जंगल संथाल ने नक्सलबाड़ी को वास्तविक ग्रामीण आधार देने में केंद्रीय भूमिका निभाई।
उनकी शक्ति वैचारिक लेखन से नहीं, किसानों से उनके प्रत्यक्ष संबंध से आती थी।
विशेष रूप से आदिवासी किसानों के बीच उनकी स्वीकार्यता महत्वपूर्ण थी।
जंगल संथाल की भूमिका यह भी बताती है कि नक्सलबाड़ी केवल शहरी कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों द्वारा गांवों में आरोपित आंदोलन नहीं था।
उन्होंने केवल पार्टी निर्देशों का पालन नहीं किया; उनकी अपनी भूमि-संबंधी आकांक्षाएं थीं।
इसलिए नक्सलबाड़ी में ‘विचारधारा ऊपर से आई और किसान उसके पीछे चल दिए’ जैसी व्याख्या अधूरी है।
1967 का विधानसभा चुनाव — राजनीतिक व्यवस्था बदलती है
1967 का पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव राज्य की राजनीति में बड़ा मोड़ था।
कांग्रेस अपना पुराना प्रभुत्व बनाए नहीं रख सकी।
विभिन्न विपक्षी दलों के सहयोग से संयुक्त मोर्चा सरकार बनी।
अजय मुखर्जी मुख्यमंत्री बने और CPI(M) सरकार का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी।
यह नक्सलबाड़ी के लिए निर्णायक राजनीतिक परिवर्तन था।
जिन कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने उन्हें भूमि अधिकार के लिए संगठित किया था, उनकी पार्टी स्वयं सरकार का हिस्सा थी।
किसानों को उम्मीद थी कि भूमि-सुधार तेजी से होगा।
उग्र कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं की अपेक्षा इससे भी आगे थी।
हरे कृष्ण कोनार और ‘सरकार में कम्युनिस्ट’ की परीक्षा
हरे कृष्ण कोनार पश्चिम बंगाल के भूमि-सुधार इतिहास के महत्वपूर्ण नेताओं में थे।
संयुक्त मोर्चा सरकार में भूमि विभाग से जुड़ी जिम्मेदारी मिलने के बाद उनसे गरीब किसानों और बर्गादारों को बड़ी अपेक्षा थी।
लेकिन सरकार चलाने की वास्तविकता आंदोलन चलाने से अलग थी।
मंत्री के रूप में कोनार को कानून, प्रशासन और संस्थागत प्रक्रिया के भीतर काम करना था।
नक्सलबाड़ी की क्रांतिकारी धारा इस गति से संतुष्ट नहीं थी।
यदि किसान वर्षों से जमीन जोत रहा है तो वह सरकारी सर्वेक्षण और न्यायिक प्रक्रिया की प्रतीक्षा क्यों करे?
किसान सभा के भीतर संघर्ष
दार्जिलिंग जिला किसान सभा में नक्सलबाड़ी क्षेत्र के उग्र कार्यकर्ताओं का प्रभाव बढ़ रहा था।
किसान सभाओं में भूमि पर कब्जा, बर्गादारों की रक्षा और किसानों को संगठित करने की रणनीतियां सामने आने लगीं।
स्थानीय नेतृत्व का तर्क था कि राजनीतिक परिस्थिति अनुकूल है।
अब यदि संघर्ष को पीछे खींचा गया तो किसान आंदोलन की ऊर्जा नष्ट हो सकती थी।
दूसरी ओर CPI(M) नेतृत्व को आशंका थी कि अनियंत्रित सशस्त्र कार्रवाई नई सरकार को संकट में डाल सकती है और राज्य मशीनरी के साथ टकराव पैदा कर सकती है।
सत्ता में वामपंथ और गांव में विद्रोह — ऐतिहासिक विरोधाभास
नक्सलबाड़ी की सबसे असाधारण विशेषता यही थी कि विद्रोह किसी दक्षिणपंथी या औपनिवेशिक सरकार के खिलाफ शुरू नहीं हुआ।
जब आंदोलन फूटा, पश्चिम बंगाल की सरकार में स्वयं CPI(M) शामिल थी।
इससे स्थिति वैचारिक रूप से विस्फोटक बन गई।
विद्रोही किसान किसके संगठन से निकले थे?
CPI(M) की उग्र धारा से जुड़े कार्यकर्ता।
इसलिए नक्सलबाड़ी ने भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के सामने ऐसा प्रश्न खड़ा किया जिसका उत्तर केवल सिद्धांत से नहीं दिया जा सकता था—
भूमि विवाद से क्रांतिकारी परिस्थिति तक
1967 की शुरुआत में नक्सलबाड़ी क्षेत्र में किसान गतिविधियां तेज हुईं।
किसानों को भूमि विवादों में संगठित किया जाने लगा।
बर्गादारों की बेदखली रोकने का प्रयास हुआ।
स्थानीय भूधारकों के अधिकारों को चुनौती मिलने लगी।
किसानों ने पारंपरिक हथियार भी जुटाने शुरू किए।
तीर-धनुष, भाले और अन्य ग्रामीण हथियार आगे आंदोलन की दृश्य पहचान बने।
लेकिन प्रारंभिक चरण में इसे किसी सुव्यवस्थित राष्ट्रीय गुरिल्ला युद्ध के रूप में देखना गलत होगा।
यह स्थानीय किसान संघर्ष था जो तेजी से राजनीतिक और फिर क्रांतिकारी रूप ग्रहण कर रहा था।
किसान की मांग और क्रांतिकारी नेतृत्व का लक्ष्य
यहीं नक्सलबाड़ी की सबसे महत्वपूर्ण आंतरिक जटिलता सामने आती है।
बेदखली से सुरक्षा और फसल पर उचित अधिकार।
जिस भूमि पर वह खेती करता है उस पर स्थायी अधिकार।
लेकिन क्रांतिकारी नेतृत्व का लक्ष्य इससे बड़ा था।
वह भूमि संघर्ष को भारतीय राज्य-सत्ता के खिलाफ क्रांतिकारी आंदोलन की शुरुआत बनाना चाहता था।
दोनों लक्ष्य उस समय एक-दूसरे से जुड़े दिखाई दिए।
क्रांतिकारी को भूमि संघर्ष के माध्यम से सत्ता-संबंध बदलना था।
नक्सलबाड़ी की प्रारंभिक शक्ति इसी मिलन में थी।
उसकी बाद की कठिनाइयों का एक स्रोत भी यही अंतर बना।
क्या नक्सलबाड़ी पहले से योजनाबद्ध क्रांति थी?
इस प्रश्न का उत्तर सरल ‘हां’ या ‘नहीं’ में नहीं दिया जा सकता।
चारु मजूमदार और उनके सहयोगी पहले से क्रांतिकारी कृषि संघर्ष की रणनीति पर विचार कर रहे थे।
माओवादी दिशा और सशस्त्र किसान संघर्ष की वैचारिक तैयारी मौजूद थी।
लेकिन मई 1967 में जो घटनाक्रम विकसित हुआ, उसका हर चरण पहले से तय किसी विस्तृत सैन्य योजना का परिणाम नहीं था।
इन घटनाओं ने आंदोलन को तेजी से उस स्तर तक पहुंचाया जिसकी राजनीतिक प्रतिध्वनि स्थानीय नेतृत्व की प्रारंभिक सीमा से कहीं आगे निकल गई।
1967 की दहलीज पर नक्सलबाड़ी
मार्च 1967 तक राजनीतिक मंच लगभग तैयार था।
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस सत्ता से बाहर थी।
नक्सलबाड़ी के किसान संगठित हो रहे थे।
चारु मजूमदार क्रांतिकारी कृषि संघर्ष की वैचारिक दिशा दे रहे थे।
कानू सान्याल और जंगल संथाल स्थानीय संगठन में सक्रिय थे।
किसान सभा के भीतर उग्र धारा मजबूत हो रही थी।
जोतदार और स्थानीय भूधारक चिंतित थे।
प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था और भूमि अधिकार का प्रश्न एक-दूसरे से जुड़ने लगा था।
खंड 3 — नक्सलबाड़ी विद्रोह का विस्फोट : मार्च–मई 1967 के भूमि संघर्ष, प्रसादुजोत की घटनाएं, पुलिस इंस्पेक्टर सोनम वांगडी की मृत्यु, 25 मई की पुलिस गोलीबारी, महिलाओं और बच्चों की मौतें तथा विद्रोह के निर्णायक रूप लेने का विस्तृत घटनाक्रम
इस खंड में 1967 के विद्रोह को तारीख-दर-तारीख और घटना-दर-घटना समझना विशेष रूप से महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि नक्सलबाड़ी के लोकप्रिय विवरणों में 24–25 मई की घटनाओं, पुलिस अधिकारी की मृत्यु और अगले दिन हुई पुलिस गोलीबारी को अक्सर आपस में मिला दिया जाता है।
नक्सलबाड़ी विद्रोह का विस्फोट
:::writing{variant="document" id="83416" title="खंड 3 — नक्सलबाड़ी विद्रोह का विस्फोट : मार्च–मई 1967 का विस्तृत घटनाक्रम"}
प्रस्तावना : दो दिनों ने एक स्थानीय किसान संघर्ष को राष्ट्रीय विद्रोह बना दिया
नक्सलबाड़ी आंदोलन के इतिहास में 24 और 25 मई 1967 दो निर्णायक तिथियां हैं।
2 मार्च 1967 — नई सरकार, पुरानी भूमि व्यवस्था
1967 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव ने राज्य की राजनीति बदल दी थी।
कांग्रेस का लंबे समय से चला आ रहा प्रभुत्व समाप्त हुआ और अजय मुखर्जी के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा सरकार अस्तित्व में आई। CPI(M) इसका महत्वपूर्ण घटक थी।
राजनीतिक रूप से यह परिवर्तन नक्सलबाड़ी के किसानों के लिए बहुत बड़ा था।
3 मार्च 1967 — भूमि पर लाल झंडा
नक्सलबाड़ी आंदोलन के कई विवरणों में 3 मार्च 1967 को आरंभिक निर्णायक कार्रवाई के रूप में दर्ज किया गया है।
किसानों के एक समूह ने एक जोतदार की भूमि पर कब्जे का दावा करते हुए लाल झंडे लगाए और फसल काटना शुरू किया। कुछ विवरण लगभग 150 किसानों की भागीदारी और बड़ी मात्रा में धान जब्त किए जाने का उल्लेख करते हैं।
मार्च 1967 — किसान समितियों का विस्तार
मार्च के दौरान नक्सलबाड़ी, खोरीबाड़ी और फांसीदेवा क्षेत्रों में किसान संगठन सक्रिय हुआ।
स्थानीय स्तर पर किसान समितियां बनाई गईं।
इन समितियों का उद्देश्य केवल सभा करना नहीं था।
वे भूमि विवादों में हस्तक्षेप करने लगीं।
किस जोतदार के पास सीमा से अधिक भूमि होने का आरोप है?
ऐसे मामलों को संगठन राजनीतिक प्रश्न में बदल रहा था।
18 मार्च के आसपास — भूमि कब्जे तेज
मार्च के मध्य तक भूमि कब्जे और फसल जब्ती की घटनाएं बढ़ने लगीं।
किसानों के समूह जोतदारों की भूमि पर जाते, लाल झंडे लगाते और अपने अधिकार की घोषणा करते।
कई स्थानों पर अनाज भी जब्त किया गया।
कुछ क्षेत्रों में जोतदारों से हथियार छीनने की कोशिशें हुईं।
अब यह कानूनी सुधार के लिए दबाव भर नहीं था।
यह ग्रामीण शक्ति-संरचना को प्रत्यक्ष चुनौती थी।
तीर-धनुष क्यों बने आंदोलन की पहचान?
नक्सलबाड़ी की सबसे प्रसिद्ध दृश्य छवियों में आदिवासी किसान तीर-धनुष लिए दिखाई देते हैं।
इन हथियारों का महत्व केवल सैन्य नहीं था।
वे स्थानीय आदिवासी जीवन और प्रतिरोध की परंपरा से जुड़े थे।
आधुनिक पुलिस बल के सामने तीर-धनुष तकनीकी रूप से कमजोर थे, लेकिन राजनीतिक रूप से उनका प्रभाव बहुत बड़ा था।
वे यह संदेश देते थे कि गरीब किसान अब निहत्था नहीं रहेगा।
किसान समितियां और ‘जन सत्ता’ की पहली कल्पना
चारु मजूमदार और उग्र कम्युनिस्ट नेतृत्व का उद्देश्य केवल जमीन बांटना नहीं था।
उनकी दृष्टि में किसान समितियां भविष्य की क्रांतिकारी सत्ता की इकाइयां बन सकती थीं।
तो इसका अर्थ केवल भूमि-सुधार नहीं था।
स्थानीय किसान की दृष्टि में शायद यह इतना सैद्धांतिक प्रश्न नहीं था।
लेकिन क्रांतिकारी नेतृत्व उस जमीन के संघर्ष में सत्ता की क्रांति देख रहा था।
अप्रैल 1967 — प्रशासन की चिंता बढ़ती है
अप्रैल तक प्रशासन को स्पष्ट होने लगा था कि नक्सलबाड़ी क्षेत्र में स्थिति सामान्य भूमि विवाद की सीमा से बाहर जा रही है।
जोतदारों और भूधारकों ने सुरक्षा की मांग की।
पुलिस को भूमि कब्जे और हिंसक टकराव की सूचनाएं मिलने लगीं।
दूसरी ओर किसानों को आशंका थी कि पुलिस जोतदारों की रक्षा करेगी।
यह अविश्वास धीरे-धीरे पूर्ण टकराव में बदल रहा था।
हरे कृष्ण कोनार की कठिन स्थिति
संयुक्त मोर्चा सरकार के भूमि मंत्री हरे कृष्ण कोनार भूमि-सुधार के समर्थक थे।
यही कारण था कि नक्सलबाड़ी संकट उनकी सरकार के लिए वैचारिक रूप से बेहद कठिन था।
यदि सरकार तुरंत पुलिस बल प्रयोग करती तो आरोप लगता कि कम्युनिस्ट मंत्री किसान आंदोलन को कुचल रहे हैं।
यदि भूमि कब्जे की अनुमति दी जाती तो कानून और राज्य प्रशासन का अधिकार कमजोर होता।
मई 1967 — आंदोलन और अधिक उग्र
मई आते-आते किसानों की कार्रवाई तेज हो गई।
इन सभी ने प्रशासन को अधिक सक्रिय होने पर मजबूर किया।
कुछ अध्ययनों के अनुसार पुलिस ने 19 मई तथा फिर 22–23 मई को क्षेत्र में प्रवेश करने की कोशिश की, लेकिन सशस्त्र किसान प्रतिरोध के कारण पीछे हटना पड़ा।
राज्य की पुलिस किसी गांव में प्रवेश करे और किसान उसे रोक दें—
18 मई — किसान सभा और सशस्त्र संघर्ष का समर्थन
कई कालक्रमों में 18 मई 1967 को स्थानीय किसान सभा की महत्वपूर्ण बैठक का उल्लेख मिलता है।
सिलीगुड़ी किसान सभा के भीतर उग्र नेतृत्व ने आंदोलन के समर्थन और भूमि पुनर्वितरण के लिए अधिक प्रत्यक्ष संघर्ष की दिशा स्वीकार की। उपलब्ध विवरण इस चरण को कानू सान्याल और जंगल संथाल की बढ़ती भूमिका से जोड़ते हैं।
बिगुल या बिगल किसान का भूमि विवाद
मई के अंतिम सप्ताह की निर्णायक घटनाओं से पहले एक स्थानीय बर्गादार/किसान का भूमि विवाद सामने आया।
विभिन्न स्रोत उनके नाम की वर्तनी Bigul, Bigal या Bibul Kisan के रूप में देते हैं।
भूमि विवाद अब पुलिस का मामला
किसान संगठन ने जोतदार के खिलाफ प्रतिरोध आयोजित किया।
प्रशासन की दृष्टि में स्थिति अब केवल दीवानी भूमि विवाद नहीं रही थी।
इसलिए पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा।
लेकिन यही हस्तक्षेप सबसे निर्णायक घटनाओं की शुरुआत बना।
किसानों का मानना था कि पुलिस जोतदार की रक्षा करने और किसान नेताओं को गिरफ्तार करने आ रही है।
24 मई 1967 — पुलिस दल का गांव में प्रवेश
24 मई को पुलिस अधिकारी सोनम वांगडी के नेतृत्व में पुलिस दल क्षेत्र में पहुंचा।
विभिन्न स्रोत स्थान के नाम को बाराजारु, झारुगांव, हाथीघिसा अथवा आसपास के गांवों से जोड़ते हैं; इस सूक्ष्म भौगोलिक विवरण में स्रोतों में अंतर है।
लेकिन मूल घटनाक्रम पर पर्याप्त सहमति है—
पुलिस किसान नेताओं या हिंसक भूमि कब्जे में शामिल लोगों की गिरफ्तारी के उद्देश्य से गई।
सोनम वांगडी कौन थे?
लोकप्रिय विवरणों में सोनम वांगडी को कभी-कभी गलत पदनाम के साथ प्रस्तुत किया जाता है।
विश्वसनीय अध्ययनों में उन्हें पुलिस/प्रवर्तन विभाग के इंस्पेक्टर के रूप में दर्ज किया गया है।
वे पुलिस दल का नेतृत्व कर रहे थे जो क्षेत्र में गिरफ्तारी और कानून-व्यवस्था की कार्रवाई के लिए पहुंचा था।
इस घटना के बाद उनका नाम नक्सलबाड़ी इतिहास का अभिन्न हिस्सा बन गया।
24 मई — तीरों की बौछार
पुलिस और किसानों के बीच आमना-सामना हुआ।
किसानों ने पुलिस दल को आगे बढ़ने से रोकने का प्रयास किया।
अकादमिक अध्ययनों के अनुसार वे गंभीर रूप से घायल हुए और बाद में उनकी मृत्यु हो गई।
यह नक्सलबाड़ी आंदोलन का निर्णायक मोड़ था।
लेकिन पुलिस अधिकारी की मृत्यु के बाद राज्य और आंदोलन के बीच सशस्त्र संघर्ष वास्तविकता बन गया।
क्या सोनम वांगडी की हत्या पूर्वनियोजित थी?
कई राजनीतिक विवरण इसे सुनियोजित किसान कार्रवाई बताते हैं।
दूसरी ओर स्थानीय स्मृतियों में यह भी कहा गया कि हिंसक मुठभेड़ के दौरान किसके तीर से वांगडी घायल हुए, यह स्पष्ट नहीं था। एक बाद के विवरण में प्रत्यक्ष स्मृति के आधार पर कहा गया कि तीर चलाने वाले व्यक्ति की निश्चित पहचान ज्ञात नहीं थी।
इसलिए इतिहासकार के लिए अधिक सुरक्षित निष्कर्ष है—
24 मई की घटना का तत्काल प्रभाव
वांगडी की मृत्यु की खबर तेजी से प्रशासन तक पहुंची।
राज्य सरकार पर कानून-व्यवस्था बहाल करने का दबाव बढ़ा।
दूसरी ओर किसानों के बीच यह धारणा मजबूत हुई कि उन्होंने पुलिस को गांव से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया है।
क्रांतिकारी नेतृत्व ने इसे राज्य शक्ति के विरुद्ध किसान साहस के प्रमाण के रूप में देखा।
25 मई 1967 — प्रसादुजोत में किसानों का जमावड़ा
25 मई को नक्सलबाड़ी के प्रसादुजोत/प्रसादजोत क्षेत्र में बड़ी संख्या में ग्रामीण एकत्र हुए।
कुछ अकादमिक विवरण लगभग दो हजार किसान कार्यकर्ताओं की सभा का उल्लेख करते हैं।
इस जमावड़े में बड़ी संख्या में महिलाएं थीं।
यही तथ्य आगे की घटना को विशेष रूप से महत्वपूर्ण बनाता है।
नक्सलबाड़ी के किसान आंदोलन में महिलाएं केवल पुरुष किसानों के पीछे चलने वाली सहभागी नहीं थीं।
प्रसादुजोत या बेंगाईजोत?
घटना-स्थल के नाम को लेकर भी स्रोतों में कुछ भिन्नता मिलती है।
अनेक अकादमिक और ऐतिहासिक विवरण गोलीबारी को Prasadjote से जोड़ते हैं।
स्थानीय स्मारक और अन्य विवरण इसे Bengai Jote क्षेत्र में बताते हैं।
यह आवश्यक नहीं कि दोनों विवरण पूरी तरह विरोधी हों।
नक्सलबाड़ी का विद्रोह किसी एक संगठित नगर केंद्र में नहीं, बल्कि कई छोटे ‘जोत’ और गांवों में फैला था।
पुलिस और किसानों का सामना
कुछ संस्मरण बताते हैं कि महिलाओं ने पुलिस का रास्ता रोका और पुलिस हथियारों तक को छीनने की कोशिश हुई।
अन्य विवरण किसान सभा या जुलूस पर पुलिस कार्रवाई की बात करते हैं।
इन विवरणों में अंतर के बावजूद अंतिम तथ्य निर्विवाद है—
और गोलीबारी में मुख्यतः गरीब ग्रामीण और महिलाएं मारी गईं।
कितनी गोलियां चलीं?
कुछ ऐतिहासिक अध्ययनों में पुलिस द्वारा लगभग 18 राउंड गोली चलाने का उल्लेख मिलता है।
यह संख्या हर स्रोत में समान रूप से दर्ज नहीं है, इसलिए इसे पूर्णतः निर्विवाद सरकारी आंकड़े की तरह प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
लेकिन यह स्पष्ट है कि गोलीबारी इतनी गंभीर थी कि कई ग्रामीण तत्काल मारे गए।
मृतकों की संख्या — स्रोतों में अंतर
नक्सलबाड़ी पर शोध करते समय यह एक ऐसा विषय है जहां लोकप्रिय लेखों में अक्सर बिना चेतावनी एक निश्चित संख्या लिख दी जाती है।
ऐतिहासिक स्रोतों में कम-से-कम तीन प्रकार के विवरण मिलते हैं।
एक प्रमुख अकादमिक अध्ययन सात महिलाओं, एक पुरुष और दो बच्चों—कुल दस मृतकों—का उल्लेख करता है।
मृत महिलाओं के नाम
स्थानीय स्मृति और स्मारक पर जिन महिलाओं के नाम जुड़े हैं उनमें—
जैसे नाम विभिन्न वर्तनी में मिलते हैं।
इसके अतिरिक्त खरसिंह मलिक नामक पुरुष तथा दो बच्चों का उल्लेख भी कई विवरणों में मिलता है।
नामों की वर्तनी स्रोतों में अलग-अलग है, इसलिए भविष्य की अंतिम संदर्भ-सूची में स्थानीय स्मारक, सरकारी अभिलेख और समकालीन समाचार स्रोतों का तुलनात्मक परीक्षण आवश्यक होगा।
महिलाएं अग्रिम पंक्ति में क्यों थीं?
25 मई को महिलाओं की बड़ी उपस्थिति संयोग नहीं थी।
नक्सलबाड़ी के गरीब किसान परिवारों में भूमि पूरे परिवार की आजीविका थी।
यदि जमीन जाती थी तो केवल पुरुष किसान का आर्थिक नुकसान नहीं होता था।
परिवार की खाद्य सुरक्षा समाप्त होती थी।
इसलिए भूमि संघर्ष उनके लिए भी प्रत्यक्ष जीवन-मरण का प्रश्न था।
25 मई की गोलीबारी — प्रतिशोध या कानून-व्यवस्था कार्रवाई?
आंदोलन समर्थक साहित्य ने अक्सर पुलिस गोलीबारी को 24 मई को वांगडी की मृत्यु का प्रतिशोध बताया।
राज्य की दृष्टि से इसे कानून-व्यवस्था बहाल करने की कार्रवाई के रूप में देखा गया।
इतिहासलेखन में दोनों दृष्टियों को अलग रखना जरूरी है।
यह तथ्य है कि गोलीबारी पुलिस अधिकारी की मृत्यु के ठीक अगले दिन हुई।
इसलिए प्रतिशोध की धारणा स्वाभाविक रूप से पैदा हुई।
गोलीबारी ने आंदोलन दबाया नहीं, फैलाया
प्रशासनिक दृष्टि से संभवतः गोलीबारी का उद्देश्य आंदोलन को नियंत्रित करना था।
मृत महिलाओं और बच्चों की खबर ने व्यापक आक्रोश पैदा किया।
नक्सलबाड़ी अब किसी स्थानीय जमीन विवाद का नाम नहीं रहा।
यह किसान प्रतिरोध का प्रतीक बन गया।
अकादमिक विवरण स्पष्ट करते हैं कि गोलीबारी के बाद सिलीगुड़ी उपमंडल के किसान और चाय-बागान मजदूर अधिक सक्रिय हुए।
चाय-बागान मजदूरों की प्रतिक्रिया
दार्जिलिंग और तराई की सामाजिक संरचना में किसान और चाय-बागान मजदूरों के बीच गहरे संबंध थे।
25 मई की मौतों के बाद आसपास के चाय-बागानों में विरोध और हड़तालें हुईं।
इससे नक्सलबाड़ी आंदोलन केवल कृषि भूमि तक सीमित नहीं रहा।
वह मजदूर वर्ग में भी प्रतिध्वनित हुआ।
रेलवे, बिजली और शहरी श्रमिक संगठनों में भी प्रतिक्रिया हुई।
सिलिगुड़ी और कलकत्ता तक खबर
1967 में आज की तरह इंटरनेट या चौबीस घंटे के समाचार चैनल नहीं थे।
फिर भी नक्सलबाड़ी की खबर तेजी से बंगाल के राजनीतिक हलकों में पहुंची।
कलकत्ता के वामपंथी छात्रों, बुद्धिजीवियों और कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं में तीखी प्रतिक्रिया हुई।
यदि वामपंथी दल सरकार में हैं, तो गरीब किसानों पर गोली कैसे चली?
अजय मुखर्जी सरकार पर दबाव
मुख्यमंत्री अजय मुखर्जी की संयुक्त मोर्चा सरकार पहले ही विविध राजनीतिक दलों का गठबंधन थी।
नक्सलबाड़ी ने सरकार के भीतर तनाव बढ़ा दिया।
एक ओर कानून-व्यवस्था बनाए रखने का प्रश्न था।
दूसरी ओर गठबंधन का सबसे बड़ा वाम घटक CPI(M) था, जिसके अपने स्थानीय कार्यकर्ता आंदोलन में शामिल थे।
25 मई की घटना के बाद सरकार पर दोनों दिशाओं से दबाव बढ़ा—
ज्योति बसु की भूमिका और एक जरूरी सावधानी
उस समय CPI(M) के ज्योति बसु संयुक्त मोर्चा सरकार में उपमुख्यमंत्री थे और गृह विभाग से संबंधित प्रमुख जिम्मेदारी उनके पास थी।
इस कारण पुलिस कार्रवाई की राजनीतिक जिम्मेदारी पर बाद में व्यापक विवाद हुआ।
हरे कृष्ण कोनार बनाम क्रांतिकारी धारा
25 मई के बाद CPI(M) नेतृत्व के लिए समझौते की संभावना और कठिन हो गई।
हरे कृष्ण कोनार का प्रयास था कि किसान संघर्ष को भूमि-सुधार की संवैधानिक प्रक्रिया में लाया जाए।
चारु मजूमदार की धारा अब इस घटना को अलग ढंग से पढ़ रही थी।
उसके लिए प्रसादुजोत की मौतें प्रमाण थीं कि—
चारु मजूमदार ने क्या देखा?
जहां राज्य सरकार ने नक्सलबाड़ी में कानून-व्यवस्था की चुनौती देखी, चारु मजूमदार ने इसमें क्रांति की शुरुआत देखी।
उनकी दृष्टि में किसानों ने तीन बड़े कदम उठाए थे—
और पुलिस अर्थात राज्य शक्ति का सामना।
मई की घटनाओं के बाद चारु मजूमदार का विश्वास और मजबूत हुआ कि भारत में ग्रामीण सशस्त्र संघर्ष की वास्तविक संभावना मौजूद है।
नक्सलबाड़ी अब उनके लिए प्रयोग नहीं रहा।
कानू सान्याल की भूमिका
कानू सान्याल उस समय स्थानीय संगठन के सबसे महत्वपूर्ण नेताओं में थे।
वे किसानों के बीच प्रत्यक्ष रूप से सक्रिय थे और आंदोलन की जमीन से जुड़े थे।
नक्सलबाड़ी की लोकप्रिय कथा में चारु मजूमदार को अक्सर सबसे प्रमुख चेहरा बना दिया गया, लेकिन मई 1967 के वास्तविक ग्रामीण संगठन को समझने के लिए कानू सान्याल की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
जंगल संथाल — विद्रोह का जन चेहरा
जंगल संथाल की भूमिका 24 मई की घटना सहित किसान प्रतिरोध में अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
वे आदिवासी किसानों के बीच गहरी पकड़ रखते थे।
उनका नेतृत्व दिखाता है कि नक्सलबाड़ी कोई केवल शहरी वैचारिक परियोजना नहीं थी।
किसान स्वयं इसमें नेतृत्वकारी भूमिका निभा रहे थे।
नक्सलबाड़ी की वास्तविक शक्ति इसी कारण बनी—
कानू सान्याल ने संगठनात्मक दिशा दी,
25 मई के बाद नक्सलबाड़ी का नया अर्थ
25 मई से पहले ‘नक्सलबाड़ी’ एक स्थान था।
25 मई के बाद वह एक राजनीतिक शब्द बनने लगा।
कुछ ही सप्ताह में पूरे भारत में उग्र वामपंथी कार्यकर्ताओं ने इसे अलग-अलग अर्थों में अपनाया—
संसदीय कम्युनिज्म के विरुद्ध विद्रोह,
और राज्य सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध।
यहीं से आगे ‘नक्सलबाड़ी’ शब्द ‘नक्सल’ और ‘नक्सलवादी’ जैसी नई राजनीतिक शब्दावली को जन्म देने वाला था।
क्या 25 मई ही नक्सलबाड़ी विद्रोह की शुरुआत थी?
लोकप्रिय इतिहास कई बार 25 मई 1967 को नक्सलबाड़ी आंदोलन की शुरुआत बताता है।
यदि ‘नक्सलबाड़ी आंदोलन’ से आशय उसके राष्ट्रीय राजनीतिक प्रतीक बनने से है, तो 25 मई निर्णायक तारीख है।
लेकिन किसान संघर्ष इससे पहले शुरू हो चुका था।
मई के मध्य तक स्थिति सशस्त्र प्रतिरोध में बदल चुकी थी।
इसलिए अधिक सटीक ऐतिहासिक सूत्र होगा—
मार्च से मई 1967 — संक्षिप्त कालक्रम
घटनाओं को एक साथ देखें तो क्रम स्पष्ट होता है।
2 मार्च 1967 — संयुक्त मोर्चा मंत्रिमंडल का गठन।
3 मार्च — नक्सलबाड़ी क्षेत्र में किसानों द्वारा भूमि कब्जे और फसल काटने की शुरुआती चर्चित कार्रवाई।
मार्च का मध्य — भूमि कब्जों, लाल झंडे लगाने और किसान समितियों की गतिविधियों में तेजी।
भूमि पर दावा
किसानों ने जोतदारों की जमीन पर कब्जा किया, लाल झंडे लगाए, फसल काटी और किसान समितियों को मजबूत किया।
ग्रामीण सत्ता को चुनौती
किसान समितियों ने केवल मांगें नहीं उठाईं बल्कि जमीन और फसल के बारे में स्वयं निर्णय लेने का प्रयास किया।
यहीं आंदोलन भूमि-सुधार की मांग से आगे बढ़कर वैकल्पिक सत्ता की दिशा में गया।
राज्य से सीधा टकराव
24 मई को पुलिस अधिकारी सोनम वांगडी की मृत्यु और 25 मई को पुलिस गोलीबारी ने संघर्ष को अपरिवर्तनीय रूप से बदल दिया।
मई से जुलाई 1967 : नक्सलबाड़ी विद्रोह का विस्तार और दमन
:::writing{variant="document" id="73482" title="खंड 4 — मई से जुलाई 1967 : नक्सलबाड़ी विद्रोह का विस्तार और दमन"}
प्रस्तावना : गोलीबारी के बाद आंदोलन समाप्त नहीं हुआ
25 मई 1967 की पुलिस गोलीबारी नक्सलबाड़ी आंदोलन का अंत नहीं थी। इसके ठीक विपरीत, महिलाओं और बच्चों सहित ग्रामीणों की मौतों ने विद्रोह को कुछ समय के लिए और अधिक उग्र बना दिया।
25 मई के बाद — भय की जगह आक्रोश
प्रसादुजोत–बेंगाईजोत गोलीबारी के बाद सरकार संभवतः यह अपेक्षा कर सकती थी कि किसान भयभीत होकर पीछे हटेंगे।
मृतकों में महिलाओं और बच्चों की मौजूदगी ने घटना को नैतिक और राजनीतिक प्रतीक बना दिया।
ग्रामीण क्षेत्रों में यह संदेश गया कि सरकार ने गरीब किसानों पर गोली चलाई है।
उग्र कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं के लिए यह उनके पुराने तर्क की पुष्टि जैसा था—
नक्सलबाड़ी से खोरीबाड़ी और फांसीदेवा तक
जून 1967 तक किसान समितियों की गतिविधियां नक्सलबाड़ी तक सीमित नहीं थीं।
आंदोलन का प्रभाव खोरीबाड़ी और फांसीदेवा क्षेत्रों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा।
आधुनिक अध्ययनों में नक्सलबाड़ी, खोरीबाड़ी और फांसीदेवा को विद्रोह के मुख्य त्रिकोण के रूप में देखा जाता है। कुछ मजबूत केंद्र हाथीघिसा, बुरागंज और चोपुखुरिया जैसे इलाकों में बताए गए हैं।
किसान समिति — आंदोलन से सत्ता तक
नक्सलबाड़ी के इस चरण में किसान समिति आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत रूप बनी।
भूमि विवादों की जानकारी एकत्र करती थी।
जोतदारों के विरुद्ध कार्रवाई तय करती थी।
किसानों की रक्षा के लिए स्वयंसेवी समूह बनाती थी।
जमीन की जब्ती
आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण कार्रवाई थी—
किसान समितियां ऐसी भूमि की पहचान करती थीं जिसे वे बड़े भूधारकों के नियंत्रण में मानती थीं।
खेत पर किसान का दावा घोषित किया जाता।
कुछ स्थानों पर जमीन भूमिहीन अथवा गरीब किसानों के बीच बांटने की कोशिश हुई।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर ध्यान रखने योग्य है।
फसल पर कब्जा
भूमि के साथ फसल भी संघर्ष का केंद्र थी।
किसान समितियों ने जोतदारों के खेतों और गोदामों से अनाज जब्त किया।
जिस फसल को किसान ने पैदा किया, उस पर उसका अधिकार अधिक है।
अनाज पर जोतदार का नियंत्रण ग्रामीण गरीबों पर उसकी आर्थिक सत्ता का साधन था।
इसलिए धान और अन्य खाद्यान्न की जब्ती केवल आर्थिक कार्रवाई नहीं थी।
हथियारों की जब्ती
जोतदारों से बंदूकें और अन्य हथियार छीनना नक्सलबाड़ी आंदोलन के उग्र चरण की विशिष्ट विशेषता थी।
आदिवासी किसानों के पास मुख्यतः तीर-धनुष, भाले और पारंपरिक हथियार थे।
लेकिन कई प्रभावशाली ग्रामीण भूधारकों के पास लाइसेंसी बंदूकें थीं।
क्रांतिकारी नेतृत्व इन बंदूकों को जब्त करना चाहता था।
इसके पीछे व्यावहारिक और राजनीतिक दोनों कारण थे।
किसान समूह अपनी रक्षा मजबूत करना चाहते थे।
भूमि-अभिलेख जलाना
कुछ विद्रोही किसान समूहों ने भूमि-अभिलेख और ऋण संबंधी दस्तावेज नष्ट किए।
क्रांतिकारी राजनीति में इसका गहरा प्रतीकात्मक अर्थ था।
भूमि-अभिलेख राज्य के लिए स्वामित्व का प्रमाण थे।
लेकिन गरीब किसान की दृष्टि में वही दस्तावेज कई बार उस व्यवस्था का प्रमाण थे जिसने वास्तविक जोतने वाले को भूमि से वंचित रखा।
कागजी स्वामित्व की इस व्यवस्था को हम स्वीकार नहीं करते।
ग्रामीण ऋण को चुनौती
किसान विद्रोह केवल जोतदार के खिलाफ नहीं था।
महाजन और ग्रामीण ऋण व्यवस्था भी उसके निशाने पर आई।
भूमि या संपत्ति गिरवी रखी गई हो सकती थी।
ऋण के कारण आर्थिक निर्भरता बनी रहती थी।
कुछ किसान समितियों ने ऐसे ऋण रद्द घोषित करने या गिरवी रखी संपत्ति वापस दिलाने का प्रयास किया।
‘जन अदालत’ और वर्ग न्याय
नक्सलबाड़ी से संबंधित अनेक अध्ययनों में किसान समितियों द्वारा अत्याचारी भूधारकों के विरुद्ध ‘जन न्याय’ या दंडात्मक फैसले लेने का उल्लेख मिलता है।
कुछ मामलों में ‘मृत्युदंड’ जैसे निर्णय भी बताए जाते हैं।
इस प्रवृत्ति का इतिहासलेखन में गंभीर मूल्यांकन आवश्यक है।
क्रांतिकारी नेतृत्व इसे ग्रामीण वर्ग-सत्ता तोड़ने का माध्यम मानता था।
क्या वास्तव में ‘मुक्त क्षेत्र’ बन गया था?
नक्सलवादी साहित्य में इस अवधि के कुछ क्षेत्रों को ‘मुक्त क्षेत्र’ या किसान नियंत्रण वाला क्षेत्र कहा गया।
आधुनिक अध्ययनों में भी कुछ गांवों में राज्य की प्रभावी उपस्थिति कमजोर पड़ने और किसान समितियों द्वारा मजबूत नियंत्रण स्थापित करने का उल्लेख मिलता है। बर्नार्ड डी’मेलो ने हाथीघिसा, बुरागंज और चोपुखुरिया जैसे क्षेत्रों को विद्रोहियों के मजबूत ठिकानों के रूप में दर्ज किया है।
चाय-बागान मजदूर आंदोलन से जुड़ते हैं
25 मई की गोलीबारी का प्रभाव चाय-बागानों में भी दिखाई दिया।
दार्जिलिंग तराई की अर्थव्यवस्था में कृषि और चाय-बागान मजदूरी एक-दूसरे से सामाजिक रूप से जुड़ी थीं।
कई परिवारों का एक हिस्सा खेत में और दूसरा बागान में काम करता था।
गोलीबारी के विरोध में चाय-बागान मजदूरों द्वारा हड़ताल और प्रदर्शन किए जाने के उल्लेख मिलते हैं।
सिलीगुड़ी के मजदूर और शहरी समर्थन
नक्सलबाड़ी की खबर सिलीगुड़ी पहुंचते ही केवल किसान संगठनों तक सीमित नहीं रही।
और अन्य वामपंथी समर्थकों ने भी विरोध प्रदर्शन किए।
कुछ विवरण सिलीगुड़ी में रेल और बिजली कर्मचारियों के बड़े जुलूसों का उल्लेख करते हैं।
यहीं से नक्सलबाड़ी पहली बार ग्रामीण विद्रोह से आगे बढ़कर शहरी वामपंथी चेतना का प्रतीक बनने लगा।
संयुक्त मोर्चा सरकार की शुरुआती दुविधा
संयुक्त मोर्चा सरकार तत्काल व्यापक पुलिस दमन करने की स्थिति में नहीं थी।
CPI(M) स्वयं सरकार की प्रमुख शक्ति थी।
भूमि मंत्री हरे कृष्ण कोनार किसान अधिकार और भूमि-सुधार के पक्षधर नेता थे।
इसलिए प्रारंभ में प्रयास था कि आंदोलन के नेताओं को समझाया जाए और भूमि विवादों को प्रशासनिक प्रक्रिया में लाया जाए।
CPI(M) नेतृत्व का निर्णायक मोड़
25 मई के बाद CPI(M) को तय करना था कि वह स्थानीय विद्रोही धारा के साथ खड़ी होगी या संयुक्त मोर्चा सरकार की संवैधानिक व्यवस्था के साथ।
पार्टी नेतृत्व ने अंततः सशस्त्र किसान कार्रवाई को स्वीकार नहीं किया।
CPI(M) की मुख्यधारा ने नक्सलबाड़ी लाइन को वामपंथी दुस्साहसवाद, अनुशासनहीनता और पार्टी की राजनीतिक रणनीति के विरुद्ध विद्रोह के रूप में देखना शुरू किया।
चारु मजूमदार की व्याख्या — राज्य का चेहरा सामने आ गया
चारु मजूमदार और उनके समर्थकों ने 25 मई की गोलीबारी तथा बाद की सरकारी कार्रवाई को अपने वैचारिक तर्क की पुष्टि के रूप में प्रस्तुत किया।
उनका कहना था कि कम्युनिस्ट मंत्री सरकार में आ सकते हैं, लेकिन राज्य मशीनरी मूलतः शासक वर्गों की रहती है।
इन सबका वर्ग चरित्र चुनाव से नहीं बदलता।
इसलिए संसदीय राजनीति गरीब किसानों को वास्तविक मुक्ति नहीं दे सकती।
जून 1967 — विद्रोह का चरम
जून तक नक्सलबाड़ी–खोरीबाड़ी–फांसीदेवा क्षेत्र में किसान समितियों का प्रभाव अपने चरम पर पहुंचता दिखाई देता है।
पारंपरिक हथियारों से किसान समूह संगठित थे।
कुछ क्षेत्रों में बाहर से आने वालों की गतिविधियों पर भी किसान समितियां प्रभाव डाल रही थीं।
28 जून और बीजिंग की आवाज
जून के अंत में नक्सलबाड़ी को अंतरराष्ट्रीय प्रचार मिला।
चीनी सरकारी प्रचार माध्यमों ने भारतीय किसान विद्रोह का उत्साहपूर्वक स्वागत किया।
बीजिंग से प्रसारित टिप्पणी ने नक्सलबाड़ी को भारतीय क्रांति की दिशा में महत्वपूर्ण घटना बताया। इसी दौर से प्रसिद्ध “Spring Thunder over India”—भारत पर वसंत की गर्जना—वाली अभिव्यक्ति नक्सलबाड़ी से जुड़ी।
चीनी समर्थन ने विद्रोही कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाया।
चीनी समर्थन — लाभ और राजनीतिक नुकसान
नक्सलबाड़ी की क्रांतिकारी धारा के लिए चीनी कम्युनिस्ट समर्थन प्रतिष्ठा का विषय था।
उसे लगा कि विश्व की सबसे बड़ी माओवादी क्रांति उसके संघर्ष को स्वीकार कर रही है।
लेकिन भारतीय राजनीतिक संदर्भ में इससे आंदोलन की मुश्किलें बढ़ीं।
सरकार अब कह सकती थी कि यह केवल घरेलू भूमि-सुधार आंदोलन नहीं है बल्कि विदेशी प्रेरित क्रांतिकारी चुनौती भी बन रहा है।
आंदोलन की सैन्य कमजोरी
‘सशस्त्र संघर्ष’ शब्द सुनने पर ऐसा भ्रम हो सकता है कि नक्सलबाड़ी में कोई सुव्यवस्थित आधुनिक गुरिल्ला सेना तैयार हो चुकी थी।
और सीमित संख्या में जब्त बंदूकें थीं।
उनके सामने प्रशिक्षित राज्य पुलिस और आवश्यकता पड़ने पर अर्द्धसैनिक बल उपलब्ध थे।
न बड़े क्षेत्र में स्थायी सैन्य आधार।
इसलिए आंदोलन राजनीतिक दृष्टि से प्रभावशाली लेकिन सैन्य दृष्टि से अत्यंत असमान संघर्ष लड़ रहा था।
सरकार ने जुलाई तक इंतजार क्यों किया?
यदि विद्रोह मई में हिंसक हो चुका था तो व्यापक पुलिस अभियान जुलाई में क्यों चला?
संयुक्त मोर्चा सरकार राजनीतिक रूप से जटिल थी।
CPI(M) के स्थानीय कार्यकर्ता आंदोलन में शामिल थे।
सरकार समझौते की संभावना तलाशना चाहती थी।
तत्काल कठोर दमन CPI(M) के समर्थक किसान आधार में प्रतिक्रिया पैदा कर सकता था।
‘ऑपरेशन क्रॉसबो’
रक्षा एवं सुरक्षा अध्ययन संस्थान से प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार नक्सलबाड़ी के विरुद्ध जुलाई 1967 की बड़ी पुलिस कार्रवाई को ‘ऑपरेशन क्रॉसबो’ नाम दिया गया था।
यह अभियान 12 जुलाई 1967 को शुरू हुआ।
अध्ययन लगभग 1,500 पुलिसकर्मियों की तैनाती का उल्लेख करता है। पुलिस ने प्रभावित गांवों में शिविर स्थापित किए, घेराबंदी और तलाशी अभियान चलाए तथा विद्रोही ठिकानों पर लगातार छापे मारे।
घर-घर तलाशी और पुलिस शिविर
ऑपरेशन का मुख्य उद्देश्य केवल नेताओं को गिरफ्तार करना नहीं था।
विद्रोहियों की गांवों में पकड़ समाप्त करनी थी।
इसके लिए पुलिस ने कई प्रभावित गांवों में स्थायी या अस्थायी शिविर स्थापित किए।
नेताओं के छिपने के ठिकानों की जानकारी जुटाई गई।
विद्रोही समूहों के बीच संपर्क काटने का प्रयास हुआ।
राज्य की सबसे बड़ी शक्ति यहां उसकी संख्या या हथियार ही नहीं थे।
पुलिस को अपेक्षित प्रतिरोध क्यों नहीं मिला?
जुलाई की बड़ी कार्रवाई के समय पुलिस को वैसा व्यापक सशस्त्र प्रतिरोध नहीं मिला जिसकी आशंका थी।
किसानों के पास आधुनिक हथियार कम थे।
सरकारी शक्ति के सामने गांवों में भय बढ़ा।
किसान परिवारों के सामने खेत, भोजन और परिवार की सुरक्षा का प्रश्न था।
गिरफ्तारियों का सिलसिला
जुलाई से आगे पुलिस ने बड़ी संख्या में आंदोलन समर्थकों को गिरफ्तार किया।
IDSA के अध्ययन में अभियान के दौरान लगभग 562 विद्रोहियों की गिरफ्तारी का उल्लेख मिलता है।
लेकिन विभिन्न पुस्तकों और समकालीन स्रोतों में गिरफ्तारी की कुल संख्या तथा प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी की तारीखों में अंतर है।
इसलिए संख्याओं को सावधानी से पढ़ना चाहिए।
जंगल संथाल की गिरफ्तारी — तारीख को लेकर मतभेद
लोकप्रिय विवरणों में जंगल संथाल की गिरफ्तारी को अक्सर जुलाई 1967 से जोड़ दिया जाता है।
लेकिन विस्तृत स्रोत एक समान तारीख नहीं देते।
IDSA का एक अध्ययन 20 जुलाई 1967 को उनकी गिरफ्तारी बताता है।
कानू सान्याल तत्काल गिरफ्तार नहीं हुए
नक्सलबाड़ी के कई संक्षिप्त विवरण जुलाई 1967 में ‘सभी नेताओं की गिरफ्तारी’ लिख देते हैं।
कानू सान्याल पुलिस से बच निकलने में सफल रहे और तत्काल गिरफ्तार नहीं हुए।
उनका राजनीतिक कार्य आगे भी जारी रहा।
बाद में वे CPI(ML) के संस्थापकों में शामिल हुए।
उनकी गिरफ्तारी बहुत बाद में हुई; उपलब्ध जीवनी-स्रोतों के अनुसार वे अगस्त 1970 में गिरफ्तार हुए।
चारु मजूमदार भूमिगत
पुलिस कार्रवाई बढ़ने के साथ चारु मजूमदार भूमिगत हो गए।
यह निर्णय आगे पूरे नक्सलवादी आंदोलन की संगठनात्मक शैली को प्रभावित करेगा।
अब खुली किसान सभा की राजनीति धीरे-धीरे भूमिगत क्रांतिकारी नेटवर्क में बदलने लगी।
चारु मजूमदार के लिए नक्सलबाड़ी की पराजय स्वयं क्रांति की पराजय नहीं थी।
अब इसी मॉडल को भारत के अन्य हिस्सों में फैलाना है।
“72 दिनों का विद्रोह” — कितना सटीक?
नक्सलबाड़ी आंदोलन के बारे में अक्सर कहा जाता है कि मूल विद्रोह 72 दिनों में दबा दिया गया।
यह अभिव्यक्ति कई द्वितीयक स्रोतों में मिलती है और जुलाई की पुलिस कार्रवाई से जुड़ी है।
लेकिन इसे गणितीय रूप से निर्विवाद कालावधि नहीं समझना चाहिए।
समस्या यह है कि नक्सलबाड़ी की शुरुआत के लिए अलग-अलग तिथियां इस्तेमाल होती हैं—
क्या 19 जुलाई को विद्रोह समाप्त हो गया था?
कई कालक्रम 19 जुलाई 1967 को नक्सलबाड़ी विद्रोह के अंत से जोड़ते हैं।
लेकिन स्थानीय पुलिस कार्रवाइयां और गिरफ्तारियां इसके बाद भी जारी थीं।
यदि ‘विद्रोह’ से आशय संगठित किसान समितियों के खुले क्षेत्रीय नियंत्रण से है, तो जुलाई के दूसरे पखवाड़े तक वह लगभग समाप्त हो चुका था।
मूल विद्रोह इतनी जल्दी क्यों पराजित हुआ?
नक्सलबाड़ी की तेज पराजय के कई कारण थे।
विद्रोह दार्जिलिंग तराई के अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र में केंद्रित था।
तीर-धनुष और कुछ जब्त बंदूकों से आधुनिक पुलिस बल का लंबे समय तक सामना संभव नहीं था।
नक्सलबाड़ी की प्रतिध्वनि राष्ट्रीय थी, लेकिन 1967 में आसपास के पूरे बंगाल में लाखों किसान एक साथ विद्रोह में नहीं उठे।
लेकिन क्या सरकार जीत गई?
जुलाई–अगस्त 1967 तक राज्य ने नक्सलबाड़ी, खोरीबाड़ी और फांसीदेवा में विद्रोही किसान समितियों का खुला नियंत्रण समाप्त कर दिया।
इस अर्थ में मूल विद्रोह पराजित हुआ।
लेकिन राजनीतिक दृष्टि से कहानी उलट थी।
दमन से पहले नक्सलबाड़ी एक छोटा स्थान था।
और भारत के अन्य हिस्सों में क्रांतिकारी कम्युनिस्ट समूह नक्सलबाड़ी पर चर्चा करने लगे।
राज्य ने नक्सलबाड़ी क्षेत्र को नियंत्रित कर लिया।
CPI(M) के भीतर दूसरा विभाजन
नक्सलबाड़ी ने CPI(M) के भीतर उग्र क्रांतिकारी धारा और मुख्यधारा नेतृत्व को अंतिम रूप से अलग कर दिया।
विद्रोह समर्थक कार्यकर्ताओं के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई हुई।
चारु मजूमदार, सुषीतल राय चौधरी, सरोज दत्त और अन्य क्रांतिकारी कम्युनिस्टों का नेटवर्क अलग दिशा में बढ़ा।
अब उद्देश्य CPI(M) के भीतर केवल नीति बदलना नहीं था।
क्या एक नई अखिल भारतीय क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी बनाई जाए?
किसान आंदोलन से ‘नक्सलवादी’ शब्द तक
1967 से पहले भारतीय राजनीतिक शब्दावली में ‘नक्सलवादी’ शब्द अस्तित्व में नहीं था।
नक्सलबाड़ी के बाद विद्रोह समर्थक क्रांतिकारी कम्युनिस्टों को धीरे-धीरे नक्सलाइट या नक्सलवादी कहा जाने लगा।
स्थान का नाम विचारधारा का नाम बन गया।
जैसे किसी ऐतिहासिक घटना का भूगोल उसकी राजनीति की पहचान बन जाए।
अब कोई व्यक्ति नक्सलबाड़ी गांव गया हो या न गया हो—
खंड 5 — नक्सलबाड़ी से अखिल भारतीय नक्सलवादी आंदोलन तक : ‘स्प्रिंग थंडर’ की चीनी प्रतिक्रिया, CPI(M) के भीतर क्रांतिकारी विद्रोह, AICCCR की स्थापना, 22 अप्रैल 1969 को CPI(ML) का गठन, चारु मजूमदार की केंद्रीय भूमिका, कानू सान्याल की 1 मई 1969 की घोषणा और नक्सलबाड़ी मॉडल को पूरे भारत में फैलाने की रणनीति
इस खंड में हम देखेंगे कि जुलाई 1967 में स्थानीय रूप से पराजित आंदोलन केवल दो वर्षों में राष्ट्रीय संगठन कैसे बन गया, और इसी संक्रमण में मूल किसान संघर्ष तथा बाद के संगठित नक्सलवादी आंदोलन के बीच कौन-से महत्वपूर्ण वैचारिक परिवर्तन हुए।
नक्सलबाड़ी से अखिल भारतीय नक्सलवादी आंदोलन तक
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प्रस्तावना : स्थानीय पराजय से राष्ट्रीय विचार तक
जुलाई 1967 तक नक्सलबाड़ी का मूल किसान विद्रोह सैन्य और प्रशासनिक स्तर पर दबा दिया गया था। किसान समितियों की खुली सत्ता समाप्त हुई, अनेक कार्यकर्ता गिरफ्तार हुए और नेतृत्व का एक हिस्सा भूमिगत हो गया। यदि इतिहास केवल तत्काल परिणामों से तय होता, तो नक्सलबाड़ी शायद उत्तर बंगाल के किसान संघर्षों की एक सीमित घटना बनकर रह जाता।
नक्सलबाड़ी की खबर चीन तक कैसे पहुंची
नक्सलबाड़ी के घटनाक्रम पर चीन ने असाधारण रुचि दिखाई।
यह वह दौर था जब चीन में सांस्कृतिक क्रांति चल रही थी और माओ त्से-तुंग की क्रांतिकारी रेखा को विश्व स्तर पर प्रचारित किया जा रहा था।
बीजिंग की दृष्टि से नक्सलबाड़ी में तीन आकर्षक तत्व मौजूद थे—
चीनी कम्युनिस्ट प्रचार ने इसे भारत में एक संभावित ग्रामीण क्रांति के संकेत के रूप में प्रस्तुत किया।
‘स्प्रिंग थंडर ओवर इंडिया’
चीनी कम्युनिस्ट प्रेस में नक्सलबाड़ी को लेकर प्रसिद्ध टिप्पणी सामने आई—
यह अभिव्यक्ति नक्सलबाड़ी के इतिहास का स्थायी हिस्सा बन गई।
चीन नक्सलबाड़ी को किसी सीमित भूमि विवाद की तरह नहीं देख रहा था।
वह इसे भारत में क्रांतिकारी तूफान की शुरुआत के रूप में प्रस्तुत कर रहा था।
यह भाषा प्रतीकात्मक थी, लेकिन उसका प्रभाव वास्तविक था।
चीन की प्रतिक्रिया का भारतीय राजनीति पर प्रभाव
चीनी समर्थन ने नक्सलबाड़ी समर्थकों को वैचारिक प्रतिष्ठा दी, लेकिन इसने उनके खिलाफ राजनीतिक संदेह भी बढ़ाया।
1962 का भारत–चीन युद्ध अभी बहुत पुरानी घटना नहीं थी।
इसलिए भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में चीन समर्थित क्रांतिकारी आंदोलन को केवल वैचारिक असहमति की तरह नहीं देखा गया।
राष्ट्र-राज्य की दृष्टि से यह राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न भी बन सकता था।
CPI(M) के भीतर नक्सलबाड़ी समर्थक धारा
नक्सलबाड़ी के बाद CPI(M) के भीतर वैचारिक संघर्ष तीखा हो गया।
उग्र कार्यकर्ताओं का तर्क था कि पार्टी नेतृत्व संसदीय राजनीति और सरकार में भागीदारी के कारण क्रांतिकारी दिशा छोड़ चुका है।
वे मानते थे कि नक्सलबाड़ी ने साबित कर दिया है कि किसान सशस्त्र संघर्ष के लिए तैयार हो सकते हैं।
क्रांतिकारी कम्युनिस्टों का अलग नेटवर्क
CPI(M) के भीतर असंतुष्ट क्रांतिकारी विभिन्न राज्यों में पहले से सक्रिय थे।
और अन्य क्षेत्रों में ऐसे कार्यकर्ता मौजूद थे जो मानते थे कि CPI(M) पर्याप्त क्रांतिकारी नहीं है।
नक्सलबाड़ी ने इन बिखरे समूहों को साझा प्रतीक दिया।
यही वाक्य धीरे-धीरे वैचारिक नारे में बदल गया।
इसका अर्थ केवल बंगाल की घटना की नकल करना नहीं था।
नक्सलबाड़ी और पार्टी अनुशासन का टूटना
CPI(M) नेतृत्व के लिए समस्या केवल विचारों की नहीं थी।
यदि पार्टी के कार्यकर्ता अपनी स्वतंत्र सशस्त्र लाइन चला रहे हों तो संगठनात्मक रूप से दोहरी सत्ता पैदा होती है।
इसलिए नक्सलबाड़ी के बाद निष्कासन, निलंबन और संगठनात्मक अलगाव की प्रक्रिया तेज हुई।
इससे क्रांतिकारी गुट के सामने नया प्रश्न आया—
क्या CPI(M) के भीतर रहकर संघर्ष जारी रखा जाए?
AICCCR की दिशा
नक्सलबाड़ी समर्थक विभिन्न क्रांतिकारी कम्युनिस्ट समूहों को अखिल भारतीय स्तर पर जोड़ने की कोशिश शुरू हुई।
इसी प्रक्रिया से All India Coordination Committee of Communist Revolutionaries — AICCCR का गठन हुआ।
यह कोई सामान्य चुनावी गठबंधन नहीं था।
AICCCR का वैचारिक आधार
AICCCR का मूल वैचारिक आधार तीन धाराओं से बनता था।
माओ त्से-तुंग की क्रांतिकारी रणनीति।
भारतीय ग्रामीण समाज को अर्ध-सामंती और भारतीय राज्य को साम्राज्यवाद से जुड़ी शासक वर्गीय संरचना के रूप में देखने की व्याख्या।
नक्सलबाड़ी को भारतीय कृषि क्रांति के आरंभिक मॉडल के रूप में स्वीकार करना।
इस दृष्टिकोण में भारत की क्रांति का केंद्र शहर नहीं बल्कि गांव था।
चुनाव बहिष्कार की ओर
नक्सलबाड़ी समर्थक धारा का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक निष्कर्ष था—
संसदीय चुनाव क्रांतिकारी संघर्ष को कमजोर करते हैं।
चारु मजूमदार का तर्क था कि चुनावों में भागीदारी कार्यकर्ताओं को सत्ता परिवर्तन की बजाय सीटों और प्रतिनिधित्व की राजनीति में फंसा देती है।
इसलिए चुनाव बहिष्कार को केवल रणनीतिक निर्णय नहीं बल्कि क्रांतिकारी प्रतिबद्धता का संकेत माना जाने लगा।
चारु मजूमदार की केंद्रीय स्थिति
नक्सलबाड़ी के बाद चारु मजूमदार तेजी से अखिल भारतीय क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन के केंद्रीय वैचारिक नेता बन गए।
उन्होंने पहले से कृषि क्रांति की दिशा पर लेखन किया था।
नक्सलबाड़ी के विद्रोही नेतृत्व से उनका सीधा संबंध था।
चीन की माओवादी लाइन के वे सबसे स्पष्ट भारतीय व्याख्याकारों में थे।
नक्सलबाड़ी की घटना को उन्होंने स्थानीय पराजय नहीं बल्कि राष्ट्रीय क्रांति की शुरुआत घोषित किया।
चारु मजूमदार की रणनीति — छोटे क्षेत्र से राष्ट्रीय क्रांति
मजूमदार का मूल विश्वास था कि पूरे भारत में एक साथ विद्रोह की प्रतीक्षा करना आवश्यक नहीं।
कुछ क्षेत्रों में क्रांतिकारी किसान संघर्ष शुरू किए जा सकते हैं।
वहां गरीब किसानों को संगठित किया जाए।
स्थानीय प्रभुत्वशाली भूधारकों को चुनौती दी जाए।
राज्य की ग्रामीण उपस्थिति को कमजोर किया जाए।
फिर ऐसे क्षेत्र दूसरे क्षेत्रों को प्रेरित करेंगे।
‘नक्सलबाड़ी मॉडल’ वास्तव में क्या था?
‘नक्सलबाड़ी मॉडल’ को समझते समय उसे किसी निश्चित सैन्य पुस्तिका की तरह नहीं देखना चाहिए।
और संघर्ष को चुनावी राजनीति से अलग रखना।
लेकिन भारत के प्रत्येक क्षेत्र की सामाजिक संरचना अलग थी।
आंध्र प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों की परिस्थिति अलग थी।
इसलिए नक्सलबाड़ी की हूबहू पुनरावृत्ति संभव नहीं थी।
फिर भी क्रांतिकारी नेतृत्व ने उसे वैचारिक मॉडल बनाया।
श्रीकाकुलम — नक्सलबाड़ी का सबसे महत्वपूर्ण अगला पड़ाव
आंध्र प्रदेश का श्रीकाकुलम क्षेत्र नक्सलबाड़ी के बाद उभरने वाले सबसे महत्वपूर्ण क्रांतिकारी किसान संघर्षों में था।
विशेष रूप से आदिवासी क्षेत्रों में भूमि, साहूकारों, वन-अधिकार और स्थानीय प्रभुत्व के प्रश्न पहले से मौजूद थे।
वेम्पटापु सत्यनारायण और आदिभटला कैलासम जैसे नेताओं के नेतृत्व में आदिवासी किसान आंदोलन विकसित हुआ।
नक्सलबाड़ी की खबर ने यहां के क्रांतिकारी कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं को नई दिशा दी।
मुशहरी — बिहार में प्रतिध्वनि
बिहार के मुजफ्फरपुर जिले का मुशहरी क्षेत्र भी नक्सलबाड़ी से प्रभावित हुआ।
यहां भूमिहीन दलितों, गरीब किसानों और स्थानीय भू-स्वामी संरचना के बीच गंभीर असमानता थी।
क्रांतिकारी कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने भूमि प्रश्न को सशस्त्र वर्ग-संघर्ष से जोड़ने का प्रयास किया।
मुशहरी का अनुभव विशेष रूप से महत्वपूर्ण था क्योंकि यहां जाति और वर्ग का संबंध बहुत गहरा था।
देबरा–गोपीबल्लभपुर
पश्चिम बंगाल के देबरा और गोपीबल्लभपुर क्षेत्रों में भी नक्सलबाड़ी की प्रेरणा से क्रांतिकारी गतिविधियां विकसित हुईं।
इन इलाकों में आदिवासी और गरीब किसान आबादी महत्वपूर्ण थी।
भूमि संघर्षों को उग्र राजनीतिक दिशा देने की कोशिश हुई।
इस चरण में शहरी शिक्षित युवाओं और ग्रामीण संघर्षों का संपर्क बढ़ रहा था।
यह आगे नक्सलवादी आंदोलन की नई सामाजिक विशेषता बनेगा—
उत्तर प्रदेश और तराई क्षेत्र
उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में भी नक्सलबाड़ी की विचारधारा का प्रभाव पड़ा।
विशेष रूप से लखीमपुर-खीरी और तराई क्षेत्र के भूमि संबंधों पर क्रांतिकारी समूहों ने ध्यान दिया।
हालांकि यहां बंगाल या श्रीकाकुलम जैसी व्यापक स्थायी विद्रोही स्थिति विकसित नहीं हुई।
फिर भी यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि नक्सलबाड़ी के केवल एक-दो वर्ष के भीतर उसकी राजनीतिक भाषा उत्तर भारत तक पहुंच चुकी थी।
पंजाब और क्रांतिकारी युवा
पंजाब की कृषि संरचना बंगाल से काफी अलग थी।
फिर भी 1960 के दशक के उत्तरार्ध में नक्सलबाड़ी का प्रभाव वामपंथी युवाओं और कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं के बीच पहुंचा।
भूमि असमानता, खेतिहर मजदूरों और राजनीतिक क्रांतिकारिता के प्रश्न पर छोटे संगठन बने।
पंजाब में नक्सलवादी राजनीति का सामाजिक रूप बंगाल की अपेक्षा अलग था, लेकिन विचारधारा समान थी—
संसदीय कम्युनिज्म का अस्वीकार और क्रांतिकारी भूमि संघर्ष।
केरल और दक्षिण भारत
केरल में कम्युनिस्ट आंदोलन पहले से अत्यंत मजबूत था और 1957 में वहां कम्युनिस्ट सरकार बन चुकी थी।
इसलिए नक्सलबाड़ी की राजनीति ने वहां एक अलग प्रश्न उठाया—
जहां कम्युनिस्ट चुनाव के माध्यम से व्यापक जनाधार प्राप्त कर चुके हैं, वहां सशस्त्र क्रांति का औचित्य क्या है?
इसके बावजूद माओवादी विचार से प्रभावित कुछ कार्यकर्ताओं ने सशस्त्र कार्रवाई की राह चुनी।
युवाओं को नक्सलबाड़ी क्यों आकर्षित कर रहा था?
1960 के दशक के उत्तरार्ध में दुनिया भर में युवा आंदोलनों का दौर था।
इन सबने नई पीढ़ी में क्रांतिकारी रोमांच पैदा किया।
भारत में भी विश्वविद्यालयों के छात्रों का एक हिस्सा संसदीय राजनीति से निराश था।
उनके सामने नक्सलबाड़ी एक ऐसा उदाहरण था जहां गरीब किसान सीधे व्यवस्था को चुनौती दे रहे थे।
चारु मजूमदार की भाषा स्पष्ट और निर्णायक थी।
कलकत्ता — नक्सलबाड़ी का शहरी बौद्धिक केंद्र
विडंबना यह थी कि जिस आंदोलन का वैचारिक आधार ग्रामीण क्रांति था, उसका सबसे बड़ा प्रचारक केंद्र धीरे-धीरे कलकत्ता के शहरी छात्र और बुद्धिजीवी बने।
और अन्य संस्थानों में युवाओं का एक हिस्सा नक्सलबाड़ी से प्रभावित हुआ।
और राजनीतिक सभाओं ने नक्सलबाड़ी को नई भाषा दी।
यहां से ‘नक्सलबाड़ी लाल सलाम’ जैसे नारे राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बने।
किसान क्रांति और छात्र क्रांति के बीच तनाव
लेकिन जैसे-जैसे शहरी छात्र आंदोलन से जुड़े, राजनीतिक प्राथमिकताएं बदलने लगीं।
एक किसान के लिए भूमि सबसे बड़ी समस्या थी।
एक क्रांतिकारी छात्र के लिए भारतीय राज्य और ‘बुर्जुआ व्यवस्था’ का विनाश बड़ा लक्ष्य था।
इन दोनों आकांक्षाओं के बीच हमेशा स्वाभाविक समानता नहीं थी।
आगे शहरी हिंसा और ‘वर्ग-शत्रु सफाये’ की रणनीति इसी अंतर को और गहरा करेगी।
इसलिए 1967–69 का चरण महत्वपूर्ण है—
नई पार्टी बनाने की बहस
क्या केवल समन्वय समिति पर्याप्त है?
यदि CPI और CPI(M) दोनों संशोधनवादी मानी जा रही हैं तो क्रांतिकारी धारा को अपनी स्वतंत्र पार्टी चाहिए।
चारु मजूमदार नई पार्टी के पक्ष में थे।
उनका तर्क था कि क्रांतिकारी संघर्ष के लिए एक स्पष्ट मार्क्सवादी–लेनिनवादी नेतृत्व आवश्यक है।
संगठन का उद्देश्य केवल विभिन्न स्थानीय विद्रोहों को समर्थन देना नहीं होना चाहिए।
22 अप्रैल 1969 — CPI(ML) का गठन
22 अप्रैल 1969 को, व्लादिमीर लेनिन की जन्मतिथि के अवसर पर, Communist Party of India (Marxist-Leninist) — CPI(ML) के गठन की घोषणा की गई।
नई पार्टी अपनी वैचारिक वंशावली मार्क्स, लेनिन और माओ से जोड़ना चाहती थी।
CPI(ML) ने स्वयं को भारतीय क्रांति की वास्तविक कम्युनिस्ट पार्टी के रूप में प्रस्तुत किया।
CPI(ML) की स्थापना का ऐतिहासिक अर्थ
CPI(ML) का गठन केवल एक और कम्युनिस्ट पार्टी बनने की घटना नहीं थी।
यह भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन में तीसरा बड़ा वैचारिक विभाजन था।
CPI की सशस्त्र और संसदीय रणनीति के बीच पुराने विवादों में दिखाई दिया।
1964 में CPI और CPI(M) के रूप में सामने आया।
अब भारतीय वाम राजनीति में तीन मुख्य रास्ते स्पष्ट दिखाई दे रहे थे—
चारु मजूमदार — पार्टी के केंद्रीय नेता
CPI(ML) के गठन के बाद चारु मजूमदार पार्टी के निर्विवाद वैचारिक केंद्र बन गए।
उनका प्रभाव संगठनात्मक संरचना से कहीं बड़ा था।
उनकी लिखित टिप्पणियां और निर्देश पार्टी कैडरों के लिए राजनीतिक मार्गदर्शन बन गए।
वे मानते थे कि भारतीय क्रांति का ऐतिहासिक अवसर मौजूद है।
इन सबको वे एक वैश्विक क्रांतिकारी दौर का हिस्सा मानते थे।
1 मई 1969 — कानू सान्याल की ऐतिहासिक घोषणा
CPI(ML) के गठन के कुछ दिनों बाद 1 मई 1969, अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के अवसर पर कलकत्ता के विशाल सार्वजनिक कार्यक्रम में कानू सान्याल ने नई पार्टी की स्थापना की सार्वजनिक घोषणा की।
यह घटना प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण थी।
नक्सलबाड़ी का स्थानीय किसान नेता अब महानगर कलकत्ता में अखिल भारतीय क्रांतिकारी पार्टी का चेहरा बन रहा था।
22 अप्रैल और 1 मई — अंतर क्या है?
इन दोनों तारीखों को कई लोकप्रिय विवरणों में गड़बड़ कर दिया जाता है।
22 अप्रैल 1969 — CPI(ML) के गठन की तारीख।
1 मई 1969 — कलकत्ता में कानू सान्याल द्वारा नई पार्टी की सार्वजनिक घोषणा और बड़े राजनीतिक प्रदर्शन की तारीख।
दोनों घटनाएं जुड़ी हुई थीं, लेकिन समान नहीं थीं।
22 अप्रैल संगठनात्मक स्थापना का प्रतीक है।
1 मई सार्वजनिक राजनीतिक उद्घोषणा का।
CPI(ML) और माओ त्से-तुंग विचार
नई पार्टी ने माओ त्से-तुंग के विचारों को भारतीय क्रांति का मार्गदर्शक माना।
उस समय ‘मार्क्सवाद–लेनिनवाद–माओ त्से-तुंग विचार’ जैसी शब्दावली इस्तेमाल होती थी।
किसान बहुल समाज में क्रांति की रणनीति।
CPI(ML) का विश्वास था कि भारत में ग्रामीण गुरिल्ला क्षेत्र विकसित करके अंततः शहरों को घेरा जा सकता है।
‘गांवों से शहरों को घेरना’
चीनी क्रांति से प्रेरित यह रणनीति CPI(ML) की सोच के केंद्र में थी।
पहले ग्रामीण क्षेत्रों में क्रांतिकारी आधार बनेगा।
वहां राज्य का प्रभाव कमजोर किया जाएगा।
किसान समितियां और सशस्त्र दस्ते विकसित होंगे।
धीरे-धीरे अनेक मुक्त क्षेत्र आपस में जुड़ेंगे।
फिर शहर राजनीतिक और सैन्य रूप से घिरेंगे।
यह रणनीति दीर्घकालीन जनयुद्ध की अवधारणा से जुड़ी थी।
भूमि क्रांति का केंद्रीय स्थान
CPI(ML) के लिए भूमि प्रश्न कोई अलग आर्थिक कार्यक्रम नहीं था।
जमींदार या जोतदार की आर्थिक शक्ति तोड़ना।
गरीब किसान को क्रांतिकारी व्यवस्था से प्रत्यक्ष लाभ देना।
इसलिए पार्टी की दृष्टि में कृषि क्रांति और राजनीतिक क्रांति अलग नहीं थीं।
वर्ग विश्लेषण — गरीब किसान केंद्र में
CPI(ML) की रणनीति में ग्रामीण समाज को वर्गों में बांटकर देखा गया।
पार्टी गरीब किसान और भूमिहीन मजदूर को सबसे विश्वसनीय क्रांतिकारी आधार मानती थी।
मध्यम किसान को संभावित सहयोगी माना जा सकता था।
समृद्ध किसानों को लेकर दृष्टिकोण अधिक जटिल था।
और बड़े भू-स्वामियों को प्रमुख ग्रामीण विरोधी शक्ति माना गया।
वर्ग-शत्रु के ‘सफाये’ की लाइन
1969 के बाद चारु मजूमदार की राजनीति में एक अत्यंत विवादास्पद विचार तेजी से उभरा—
वर्ग-शत्रुओं के विनाश या ‘annihilation’ की लाइन।
तर्क यह था कि गांव में गरीब किसान तभी वास्तविक क्रांतिकारी आत्मविश्वास प्राप्त करेगा जब वह उस स्थानीय प्रभुत्वशाली व्यक्ति की सत्ता को प्रत्यक्ष रूप से तोड़े जिससे वह पीढ़ियों से भयभीत है।
क्या नक्सलबाड़ी में ही ‘सफाया लाइन’ पूरी तरह लागू थी?
1967 के मूल नक्सलबाड़ी विद्रोह में हिंसा हुई थी।
पुलिस अधिकारी सोनम वांगडी की मृत्यु हुई।
लेकिन बाद में विकसित व्यवस्थित ‘वर्ग-शत्रु विनाश’ की लाइन को मूल नक्सलबाड़ी आंदोलन पर पूरी तरह आरोपित करना गलत होगा।
1969–70 के CPI(ML) चरण में यह रणनीति कहीं अधिक व्यवस्थित वैचारिक रूप प्राप्त करती है।
कानू सान्याल और रणनीतिक मतभेदों के बीज
1969 में कानू सान्याल नई पार्टी के प्रमुख नेताओं में थे।
लेकिन चारु मजूमदार की रणनीति को लेकर आगे उनके मतभेद बढ़ने वाले थे।
सान्याल जनसंगठन और किसानों के बीच दीर्घकालीन राजनीतिक कार्य को अधिक महत्व देते थे।
वे बाद में इस बात की आलोचना करेंगे कि व्यक्तिगत हत्याओं और अत्यधिक भूमिगत राजनीति ने जनता से आंदोलन का संबंध कमजोर किया।
नक्सलबाड़ी मॉडल और जनसंगठन का प्रश्न
या पूरी ऊर्जा भूमिगत क्रांतिकारी दस्तों पर लगाई जाए?
माओवादी दीर्घकालीन जनयुद्ध में व्यापक जनाधार आवश्यक था।
लेकिन चारु मजूमदार की तात्कालिक क्रांतिकारी लाइन ने कई बार खुले जनसंगठनों को द्वितीयक बना दिया।
और सार्वजनिक राजनीतिक काम कमजोर हो जाएं, तो आंदोलन का सामाजिक आधार कैसे बढ़ेगा?
इसी प्रश्न पर बाद के अनेक CPI(ML) गुट चारु मजूमदार की लाइन से अलग होंगे।
‘क्रांतिकारी परिस्थिति’ का अतिमूल्यांकन
चारु मजूमदार की सबसे बड़ी रणनीतिक मान्यताओं में से एक थी कि भारत तेजी से क्रांतिकारी परिस्थिति की ओर बढ़ रहा है।
उन्हें लगता था कि नक्सलबाड़ी, श्रीकाकुलम और अन्य किसान संघर्ष एक व्यापक ऐतिहासिक उभार के संकेत हैं।
भारत में चुनावी लोकतंत्र कार्य कर रहा था।
भूमि-सुधार की सीमित प्रक्रियाएं चल रही थीं।
हरित क्रांति ग्रामीण समाज को बदल रही थी।
फिर भी नक्सलबाड़ी मॉडल क्यों फैला?
क्योंकि उसके पास अत्यंत शक्तिशाली नैतिक और राजनीतिक संदेश था।
कानून तुम्हें न्याय नहीं दे रहा तो स्वयं अधिकार लो।
यह भाषा उन क्षेत्रों में विशेष रूप से प्रभावशाली थी जहां दशकों से भूमि-सुधार लागू नहीं हुए थे और गरीब किसान सामाजिक अपमान तथा हिंसा झेलते थे।
इसलिए नक्सलबाड़ी मॉडल की शक्ति केवल माओवादी सिद्धांत में नहीं थी।
राज्य की नई दृष्टि
1967 तक प्रशासन नक्सलबाड़ी को मुख्यतः स्थानीय कानून-व्यवस्था संकट के रूप में देख सकता था।
अब एक अखिल भारतीय क्रांतिकारी पार्टी अस्तित्व में थी।
वह खुले रूप से सशस्त्र संघर्ष की बात कर रही थी।
नक्सलबाड़ी का राष्ट्रीय विस्तार
:::writing{variant="document" id="62847" title="खंड 6 — नक्सलबाड़ी का राष्ट्रीय विस्तार : श्रीकाकुलम, मुशहरी, देबरा–गोपीबल्लभपुर और शहरी नक्सलवाद"}
प्रस्तावना : नक्सलबाड़ी अब एक स्थान नहीं, राजनीतिक पद्धति बन चुका था
1967 में नक्सलबाड़ी एक सीमित भौगोलिक क्षेत्र था। 1969 तक वह एक अखिल भारतीय क्रांतिकारी प्रतीक बन चुका था। CPI(ML) के गठन के बाद पार्टी नेतृत्व की सबसे बड़ी प्राथमिकता थी—ऐसे ग्रामीण क्षेत्रों की तलाश करना जहां भूमि-वंचना, आदिवासी असंतोष, बटाईदारी, साहूकारी शोषण और सामाजिक उत्पीड़न पहले से मौजूद हों और उन्हें सशस्त्र किसान संघर्ष में बदला जा सके।
श्रीकाकुलम — नक्सलबाड़ी का सबसे गंभीर ग्रामीण विस्तार
आंध्र प्रदेश का श्रीकाकुलम नक्सलबाड़ी के बाद उभरे सबसे महत्वपूर्ण किसान–आदिवासी संघर्षों में था।
इस क्षेत्र में आदिवासी किसानों और स्थानीय साहूकारों, भू-स्वामियों तथा वन प्रशासन के बीच लंबे समय से तनाव था।
विशेषकर एजेंसी क्षेत्रों में आदिवासी समुदाय भूमि से बेदखली, ऋण, ऊंचे ब्याज, व्यापारिक शोषण और वन नियंत्रण की समस्याओं से जूझ रहे थे।
वेम्पटापु सत्यनारायण और आदिभटला कैलासम
श्रीकाकुलम आंदोलन के प्रमुख नेताओं में वेम्पटापु सत्यनारायण और आदिभटला कैलासम के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
दोनों शिक्षित राजनीतिक कार्यकर्ता थे और आदिवासी क्षेत्रों में लंबे समय से सक्रिय थे।
उनकी रणनीति केवल बाहर से क्रांतिकारी विचार थोपने की नहीं थी।
उन्होंने स्थानीय किसानों और आदिवासियों के बीच संगठन खड़ा किया।
और सामाजिक उत्पीड़न जैसे प्रश्नों को राजनीतिक संघर्ष से जोड़ा।
आदिवासी आधार और भूमि संघर्ष
श्रीकाकुलम में संघर्ष की सामाजिक जड़ नक्सलबाड़ी से मिलती-जुलती थी—
भूमि पर अधिकार और स्थानीय प्रभुत्व का प्रश्न।
आदिवासी समुदाय पारंपरिक रूप से जिस भूमि का उपयोग करते थे, वह कई बार कागजी अभिलेखों में उनके नाम नहीं होती थी।
साहूकार ऋण के बदले भूमि पर कब्जा कर सकते थे।
व्यापारी जंगल उत्पादों और कृषि उपज को कम कीमत पर खरीदते थे।
श्रीकाकुलम में गुरिल्ला रणनीति
नक्सलबाड़ी की तुलना में श्रीकाकुलम में गुरिल्ला संगठन अधिक व्यवस्थित रूप लेने लगा।
क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं ने गांवों के बीच संपर्क बनाया।
स्थानीय भू-स्वामियों और साहूकारों पर हमले हुए।
राज्य प्रशासन की पहुंच को कुछ क्षेत्रों में चुनौती दी गई।
किसान समितियों और आदिवासी संगठनों के माध्यम से वैकल्पिक अधिकार की अवधारणा विकसित करने की कोशिश हुई।
श्रीकाकुलम की सीमाएं
फिर भी श्रीकाकुलम व्यापक जनयुद्ध में परिवर्तित नहीं हो पाया।
राज्य पुलिस ने धीरे-धीरे क्षेत्रीय नियंत्रण बढ़ाया।
प्रमुख नेताओं की हत्याएं और गिरफ्तारियां हुईं।
सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि स्थानीय आदिवासी असंतोष को पूरे आंध्र प्रदेश के व्यापक किसान आंदोलन में बदलना आसान नहीं था।
कुछ क्षेत्रों में संघर्ष अत्यंत तीखा था, लेकिन उसका विस्तार सीमित रहा।
मुशहरी — बिहार का प्रयोग
बिहार के मुजफ्फरपुर जिले का मुशहरी इलाका नक्सलबाड़ी के बाद CPI(ML) प्रयोग का एक और महत्वपूर्ण क्षेत्र बना।
यहां सामाजिक संरचना उत्तर बंगाल से अलग थी।
स्थानीय सवर्ण और मध्यवर्ती जातियों के भू-स्वामी—
कृषि संबंधों में वर्ग और जाति एक-दूसरे से गहराई से जुड़े थे।
नक्सलबाड़ी की वर्गीय भाषा को यहां भारतीय जाति व्यवस्था की कठोर वास्तविकता से सामना करना पड़ा।
बिहार में वर्ग और जाति का सवाल
CPI(ML) का वैचारिक ढांचा मुख्यतः वर्ग-संघर्ष पर आधारित था।
लेकिन बिहार में भूमिहीनता अक्सर जाति से जुड़ी हुई थी।
दलित और अत्यंत पिछड़े समुदायों के बड़े हिस्से के पास जमीन नहीं थी।
प्रभावशाली जातियों के पास भूमि, सामाजिक प्रतिष्ठा और स्थानीय राजनीतिक शक्ति अधिक थी।
इसलिए बिहार में भूमि संघर्ष स्वाभाविक रूप से जातिगत तनाव में भी बदल सकता था।
मुशहरी में क्रांतिकारी गतिविधियां
मुशहरी क्षेत्र में क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं ने भूमिहीन किसानों और मजदूरों के बीच संगठन बनाने का प्रयास किया।
स्थानीय भू-स्वामियों के खिलाफ कार्रवाइयां हुईं।
भूमि और मजदूरी से जुड़े प्रश्न उठाए गए।
कुछ क्षेत्रों में हथियारबंद दस्ते विकसित किए गए।
लेकिन मजबूत और दीर्घकालीन जनसंगठन बनाने में कठिनाई आई।
व्यक्तिगत हिंसक कार्रवाइयों और भूमिगत गतिविधियों के बढ़ने से खुले किसान संगठन कमजोर हुए।
बिहार से आने वाली नई राजनीतिक धारा
मुशहरी प्रयोग तत्काल सफल नहीं हुआ, लेकिन बिहार आगे नक्सलवादी आंदोलन का अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र बना।
में भूमि, मजदूरी, जातिगत उत्पीड़न और ग्रामीण हिंसा के प्रश्न लंबे समय तक नक्सली राजनीति से जुड़े रहे।
आगे 1970 और 1980 के दशकों में बिहार का आंदोलन नक्सलबाड़ी से अलग और अधिक दीर्घकालीन सामाजिक स्वरूप ग्रहण करेगा।
देबरा–गोपीबल्लभपुर — पश्चिम बंगाल में दूसरा प्रयोग
पश्चिम बंगाल के पश्चिमी हिस्से में देबरा और गोपीबल्लभपुर क्षेत्र भी नक्सलवादी आंदोलन के महत्वपूर्ण केंद्र बने।
इन इलाकों में आदिवासी आबादी, गरीब किसान और भूमिहीन मजदूर बड़ी संख्या में थे।
शहरी छात्र और युवा कार्यकर्ता भी यहां पहुंचे।
उन्होंने गांवों में जाकर किसान संघर्षों को क्रांतिकारी दिशा देने की कोशिश की।
इस प्रयोग की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी—
गांव जाने की छात्र राजनीति
नक्सलबाड़ी से प्रभावित छात्रों के बीच एक विचार लोकप्रिय हुआ—
यदि क्रांति गांवों से आएगी, तो क्रांतिकारी छात्र को शहर छोड़कर गांव जाना चाहिए।
कुछ ने विश्वविद्यालय और परिवार से संबंध तोड़ लिए।
और क्रांतिकारी संगठन बनाने की कोशिश की।
यह त्याग और आदर्शवाद आंदोलन की महत्वपूर्ण विशेषता था।
लेकिन अनुभवहीनता भी उतनी ही बड़ी समस्या बनी।
शहरी युवाओं की सीमाएं
कई छात्र उच्च या मध्यमवर्गीय परिवारों से आए थे।
वे मार्क्सवादी और माओवादी साहित्य से प्रेरित थे, लेकिन ग्रामीण समाज की जटिलता से हमेशा परिचित नहीं थे।
इन सभी को केवल ‘वर्ग-शत्रु बनाम गरीब किसान’ के सूत्र में समेटना आसान नहीं था।
कहीं किसान उन्हें बाहरी राजनीतिक कार्यकर्ता मानते रहे।
इससे नक्सलबाड़ी मॉडल की यांत्रिक नकल की सीमा सामने आई।
पंजाब में नक्सलबाड़ी की प्रतिध्वनि
पंजाब में नक्सलवादी धारा का उदय अलग सामाजिक संदर्भ में हुआ।
हरित क्रांति के कारण पंजाब की कृषि तेजी से बदल रही थी।
और कृषि बाजार का विस्तार हो रहा था।
लेकिन इसके साथ ग्रामीण असमानता समाप्त नहीं हुई।
भूमिहीन खेतिहर मजदूरों और छोटे किसानों की समस्याएं बनी रहीं।
पंजाब में सीमित लेकिन महत्वपूर्ण प्रभाव
पंजाब में नक्सलवादी गतिविधियां व्यापक किसान विद्रोह में परिवर्तित नहीं हुईं।
और राज्य की मजबूत प्रशासनिक प्रतिक्रिया।
फिर भी क्रांतिकारी युवा राजनीति और सांस्कृतिक गतिविधियों पर नक्सलबाड़ी का प्रभाव पड़ा।
कुछ क्षेत्रों में हिंसक घटनाएं और भूमिगत संगठन विकसित हुए।
इसने यह दिखाया कि नक्सलवादी विचार केवल निर्धन कृषि क्षेत्रों तक सीमित नहीं था।
उत्तर प्रदेश में नक्सलवादी प्रयोग
उत्तर प्रदेश में विशेष रूप से तराई और कुछ पूर्वी क्षेत्रों में क्रांतिकारी संगठनों ने भूमि संघर्ष की संभावनाएं तलाशीं।
लखीमपुर-खीरी तथा आसपास के क्षेत्रों में भूमि विवाद और कृषक असमानता मौजूद थी।
लेकिन उत्तर प्रदेश का विशाल भूगोल और विविध सामाजिक संरचना नक्सलबाड़ी मॉडल के लिए कठिन चुनौती थी।
यहां व्यापक और स्थायी नक्सली क्षेत्र विकसित नहीं हो सका।
केरल — संसदीय कम्युनिज्म के भीतर सशस्त्र चुनौती
यह भारत का वह राज्य था जहां कम्युनिस्ट पार्टी चुनाव के माध्यम से पहले ही सत्ता में आ चुकी थी।
इन सबने क्रांतिकारी माओवादी रणनीति के सामने अलग प्रकार की चुनौती रखी।
फिर भी नक्सलबाड़ी से प्रेरित कुछ समूहों ने सशस्त्र कार्रवाई की।
1968 में तेलिचेरी और पुलपल्ली की घटनाएं इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं।
तेलिचेरी–पुलपल्ली कार्रवाइयां
केरल के नक्सलवादी समूहों ने पुलिस थानों और सरकारी संस्थानों पर हमले किए।
इन कार्रवाइयों में प्रमुख युवाओं और कार्यकर्ताओं की भागीदारी रही।
केरल का अनुभव दिखाता है कि केवल साहसिक सशस्त्र कार्रवाई स्वयं व्यापक क्रांति पैदा नहीं करती।
यदि मजबूत जनाधार और दीर्घकालीन संगठन न हो तो ‘क्रांतिकारी हमला’ प्रतीकात्मक घटना बनकर रह सकता है।
अजिता और महिला भागीदारी
केरल की नक्सलवादी गतिविधियों में के. अजिता जैसी महिला कार्यकर्ताओं की भागीदारी उल्लेखनीय रही।
इससे स्पष्ट हुआ कि नक्सलबाड़ी की क्रांतिकारी प्रेरणा केवल पुरुष युवाओं तक सीमित नहीं थी।
महिला छात्र और कार्यकर्ता भी भूमिगत राजनीति तथा सशस्त्र कार्रवाइयों में शामिल हुईं।
लेकिन यहां भी वही प्रश्न सामने आया—
क्या महिला भागीदारी का अर्थ महिलाओं के स्वतंत्र सामाजिक प्रश्नों का आंदोलन में समावेश था?
कलकत्ता — किसान आंदोलन का शहरी विस्फोट
1969 के बाद कलकत्ता नक्सलवादी राजनीति का सबसे चर्चित शहरी केंद्र बन गया।
नक्सलबाड़ी की मूल वैचारिक धारणा थी—
लेकिन अब महानगर के कॉलेज और विश्वविद्यालय आंदोलन के केंद्र बनने लगे।
छात्रों ने नक्सलबाड़ी को केवल किसान संघर्ष नहीं माना।
उनके लिए वह पूरी व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह था।
प्रेसिडेंसी कॉलेज और क्रांतिकारी छात्र राजनीति
कलकत्ता के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में नक्सलबाड़ी समर्थक छात्र सक्रिय हुए।
प्रेसिडेंसी कॉलेज विशेष रूप से राजनीतिक उथल-पुथल का प्रतीक बना।
मार्क्स, लेनिन और माओ पर अध्ययन मंडल बनाए,
और ग्रामीण क्षेत्रों में जाने के अभियान चलाए।
कई छात्रों ने पारंपरिक शिक्षा को ‘बुर्जुआ व्यवस्था’ का हिस्सा मानकर उसका विरोध किया।
विश्वविद्यालय से गांव तक और गांव से शहर तक
नक्सलबाड़ी की क्रांतिकारी राजनीति में प्रारंभिक दिशा थी—
लेकिन धीरे-धीरे विपरीत प्रक्रिया भी शुरू हुई।
ग्रामीण संघर्ष की हिंसक भाषा शहरों में लौट आई।
‘वर्ग-शत्रु’ की परिभाषा अब केवल जोतदार तक सीमित नहीं रही।
यहीं ग्रामीण किसान विद्रोह शहरी नक्सलवाद में बदलने लगा।
मूर्तियां तोड़ना और प्रतीकों पर हमला
कलकत्ता और अन्य शहरों में कुछ नक्सलवादी छात्र समूहों ने औपनिवेशिक और राष्ट्रवादी प्रतीकों पर हमले किए।
सार्वजनिक संस्थानों को निशाना बनाया गया।
कुछ क्रांतिकारी कार्यकर्ता भारत के कई राष्ट्रीय नेताओं को भी ‘बुर्जुआ राष्ट्रवाद’ के प्रतीक के रूप में देखते थे।
इस प्रकार सांस्कृतिक प्रतीकों के खिलाफ हिंसक कार्रवाई आंदोलन का हिस्सा बन गई।
शिक्षा व्यवस्था पर हमला
कुछ उग्र छात्र समूहों ने परीक्षा व्यवस्था, विश्वविद्यालय संरचना और पारंपरिक शिक्षा को क्रांतिकारी दृष्टि से खारिज किया।
विद्यालयों और महाविद्यालयों में हिंसक टकराव हुए।
कहीं पुस्तकालय और प्रशासनिक कार्यालय भी निशाना बने।
इससे आंदोलन के प्रति मध्यवर्गीय सहानुभूति कम होने लगी।
जो लोग भूमि-सुधार और गरीब किसान के पक्ष में थे, वे भी शिक्षा संस्थानों पर हिंसा से सहमत नहीं थे।
पुलिसकर्मियों को लक्ष्य बनाना
शहरी नक्सलवादी राजनीति का एक अत्यंत विवादास्पद चरण था पुलिसकर्मियों पर व्यक्तिगत हमले।
नक्सलवादी नेतृत्व पुलिस को राज्य की दमनकारी मशीन का अंग मानता था।
कुछ समूहों ने निचले स्तर के पुलिसकर्मियों को भी वर्गीय राज्य के प्रतिनिधि के रूप में निशाना बनाया।
अब मुकाबला केवल प्रदर्शन और पुलिस गोलीबारी तक सीमित नहीं था।
व्यक्तिगत हत्या और प्रतिशोध की श्रृंखला शुरू हुई।
‘वर्ग-शत्रु सफाया’ शहर में पहुंचता है
ग्रामीण इलाकों में जिस ‘वर्ग-शत्रु विनाश’ की अवधारणा का प्रयोग भू-स्वामियों के विरुद्ध किया गया था, शहरों में उसका अर्थ अधिक अस्पष्ट हो गया।
इस अस्पष्टता ने हिंसा का दायरा बढ़ाया।
कई मामलों में राजनीतिक हत्या ने संगठित वर्ग-संघर्ष का स्थान लेना शुरू कर दिया।
यही आंदोलन की सबसे गंभीर रणनीतिक विकृतियों में से एक थी।
CPI(M) और नक्सलवादियों के बीच हिंसक संघर्ष
पश्चिम बंगाल में संघर्ष केवल राज्य बनाम नक्सलवादी नहीं था।
CPI(M) और CPI(ML) समर्थकों के बीच भी तीखा टकराव हुआ।
दोनों गरीब किसान और मजदूरों की राजनीति का दावा करते थे।
कई इलाकों में संगठनात्मक प्रतिस्पर्धा हिंसक संघर्ष में बदल गई।
इससे बंगाल की वाम राजनीति भीतर से विभाजित और हिंसक हो गई।
मजदूर वर्ग से संबंध क्यों कमजोर रहा?
मार्क्सवादी सिद्धांत में मजदूर वर्ग को क्रांति की अग्रणी शक्ति माना जाता है।
लेकिन नक्सलवादी आंदोलन का वास्तविक आधार मुख्यतः गरीब किसान और छात्र बने।
औद्योगिक मजदूरों में सीमित समर्थन अवश्य मिला, पर व्यापक संगठित ट्रेड यूनियन आधार विकसित नहीं हो सका।
CPI और CPI(M) पहले से मजबूत ट्रेड यूनियन नेटवर्क संचालित कर रही थीं।
नक्सलवादी नेतृत्व का अत्यधिक जोर ग्रामीण सशस्त्र संघर्ष पर था।
छात्र आकर्षण की सामाजिक मनोविज्ञान
शहरी युवाओं को नक्सलवाद इसलिए आकर्षित करता था क्योंकि वह अत्यंत स्पष्ट नैतिक भाषा में बात करता था।
यह सीधी भाषा जटिल लोकतांत्रिक राजनीति की तुलना में अधिक रोमांचक और निर्णायक लग सकती थी।
लेकिन यही सरलता उसकी समस्या भी बनी।
समाज की बहुस्तरीय वास्तविकता को ‘क्रांतिकारी बनाम प्रतिक्रियावादी’ में बांटना कई बार विनाशकारी निर्णयों का कारण बना।
युवाओं की वास्तविक कुर्बानी
नक्सलवादी छात्र आंदोलन का मूल्यांकन केवल आलोचना से नहीं किया जा सकता।
हजारों युवाओं ने वास्तव में व्यक्तिगत सुविधा छोड़ी।
कई संपन्न परिवारों से आए छात्र गांवों में गए।
उन्होंने भूमिहीन किसानों के बीच रहना चुना।
कई पुलिस मुठभेड़ों और हिरासत में मारे गए।
उनकी प्रेरणा का बड़ा हिस्सा वास्तविक सामाजिक असमानता से निकला था।
लेकिन राजनीतिक समर्पण और रणनीतिक शुद्धता एक ही चीज नहीं।
किसान प्रश्न से दूरी बढ़ती है
1967 में नक्सलबाड़ी की तस्वीर साफ थी—
1970 तक आंदोलन की तस्वीर बदल रही थी—
यहीं इतिहास का निर्णायक प्रश्न पैदा होता है—
क्या नक्सलवादी आंदोलन अपने मूल किसान आधार से दूर जा रहा था?
कई बाद के नक्सली नेताओं का उत्तर भी अंततः ‘हां’ रहा।
जनसंगठन बनाम गुप्त दस्ते
नक्सलबाड़ी से निकले आंदोलन के सामने यह सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक संकट था।
यदि क्रांतिकारी राजनीति जनसंगठनों पर आधारित हो—
और खुले राजनीतिक अभियान आवश्यक होते हैं।
यदि रणनीति मुख्यतः गुप्त सशस्त्र दस्तों पर आधारित हो—
तो संगठन छोटा, अनुशासित और भूमिगत हो सकता है।
चारु मजूमदार की दिशा दूसरी ओर बढ़ती गई।
क्षेत्रीय विस्तार बनाम संगठनात्मक स्थिरता
1969–71 में नक्सलवादी प्रभाव तेजी से अनेक राज्यों में फैला।
लेकिन विस्तार और स्थायित्व समान चीजें नहीं थे।
एक क्षेत्र में कुछ साहसिक कार्रवाइयां होना आसान था।
वहां वर्षों तक जनसंगठन बनाए रखना कठिन था।
कई जगह संगठन तेजी से बना और पुलिस दमन के बाद उतनी ही तेजी से टूट गया।
इससे स्पष्ट हुआ कि क्रांतिकारी उत्साह स्थायी संगठन का विकल्प नहीं हो सकता।
राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न
जैसे-जैसे आंदोलन कई राज्यों में फैलने लगा, केंद्र सरकार की चिंता भी बढ़ी।
अब यह किसी एक राज्य की पुलिस समस्या नहीं थी।
और केरल में संबंधित गतिविधियां दिखाई दे रही थीं।
राज्य सरकारों और केंद्र के बीच खुफिया जानकारी का आदान-प्रदान बढ़ा।
नक्सलवाद राष्ट्रीय आंतरिक सुरक्षा विमर्श में प्रवेश कर गया।
आगे यही दृष्टिकोण और कठोर होने वाला था।
1970 — CPI(ML) का पहला पार्टी कांग्रेस
1970 में CPI(ML) ने अपने संगठन को अधिक औपचारिक रूप देने की कोशिश की।
चारु मजूमदार का प्रभाव अत्यंत मजबूत था।
पार्टी ने सशस्त्र क्रांति की दिशा दोहराई।
नक्सलबाड़ी और श्रीकाकुलम को क्रांतिकारी मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया गया।
लेकिन उसी समय जमीनी वास्तविकता में अनेक क्षेत्रों में दमन बढ़ रहा था।
श्रीकाकुलम पर भारी दमन
आंध्र प्रदेश में पुलिस और सुरक्षा बलों ने श्रीकाकुलम के गुरिल्ला नेटवर्क पर लगातार दबाव बढ़ाया।
आदिवासी क्षेत्रों में पुलिस अभियान बढ़े।
संगठन की खुली गतिविधियां कठिन हो गईं।
जिस संघर्ष को CPI(ML) कभी संभावित ‘मुक्त क्षेत्र’ के रूप में देख रही थी, वह भी गंभीर सैन्य दबाव में आ गया।
इससे राष्ट्रीय क्रांति की तत्काल संभावना का दावा कमजोर पड़ने लगा।
पश्चिम बंगाल में हिंसा का चक्र
कलकत्ता और ग्रामीण बंगाल में नक्सलवादी हमलों के जवाब में पुलिस कार्रवाई लगातार कठोर हुई।
नक्सलवादी समूहों ने पुलिस और राजनीतिक विरोधियों पर हमले बढ़ाए।
इस चक्र ने राजनीतिक बहस को तेजी से सैन्य प्रश्न में बदल दिया।
शहरी नक्सलवाद की सबसे बड़ी रणनीतिक समस्या
शहर में नक्सलवादी आंदोलन का मूल संकट था—
उसके पास स्पष्ट सामाजिक आधार नहीं था।
ग्रामीण क्षेत्र में गरीब किसान स्पष्ट वर्गीय आधार था।
लेकिन शहर में छात्र समूह अपने आप क्रांतिकारी वर्ग नहीं बन सकते थे।
औद्योगिक मजदूरों का व्यापक समर्थन उपलब्ध नहीं था।
इसलिए शहरी आंदोलन कई बार ‘कार्रवाई समूहों’ की राजनीति में बदल गया।
क्या शहरी मोड़ चारु मजूमदार की मूल रणनीति से मेल खाता था?
माओ से प्रेरित दीर्घकालीन रणनीति का मूल आधार गांव था।
शहर अंतिम चरण में महत्वपूर्ण बनने थे।
लेकिन बंगाल में शहरी छात्र क्रांतिकारिता इतनी तेजी से बढ़ी कि आंदोलन का बड़ा हिस्सा शहरों में फंस गया।
यह वस्तुतः मूल ‘गांवों से शहरों को घेरने’ की रणनीति के विपरीत दिशा थी।
यही विरोधाभास आगे CPI(ML) की विफलता के महत्वपूर्ण कारणों में गिना जाएगा।
राष्ट्रीय विस्तार का वास्तविक परिणाम
1969–71 के राष्ट्रीय विस्तार से नक्सलवाद को तीन बड़ी उपलब्धियां मिलीं।
राज्य का निर्णायक प्रतिआक्रमण
:::writing{variant="document" id="47261" title="खंड 7 — राज्य का निर्णायक प्रतिआक्रमण : 1970–72 का दमन, ऑपरेशन स्टीपलचेज और चारु मजूमदार की मृत्यु"}
प्रस्तावना : जब किसान विद्रोह ‘आंतरिक सुरक्षा संकट’ बन गया
1967 में नक्सलबाड़ी की शुरुआत भूमि और किसान अधिकारों के संघर्ष से हुई थी। लेकिन 1970 तक वही राजनीतिक धारा अनेक राज्यों में फैले सशस्त्र आंदोलन, पुलिसकर्मियों और राजनीतिक विरोधियों की हत्याओं, भूमिगत दस्तों तथा कलकत्ता के हिंसक छात्र आंदोलन का रूप ग्रहण कर चुकी थी।
राज्य की प्रतिक्रिया भी उसी अनुपात में बदल गई।
1970 तक हिंसा क्यों बढ़ गई?
नक्सलवादी आंदोलन के पहले चरण में मुख्य संघर्ष भूमि और ग्रामीण सत्ता को लेकर था।
लेकिन 1969–70 तक चारु मजूमदार के प्रभाव में ‘वर्ग-शत्रु के विनाश’ की रणनीति महत्वपूर्ण होती गई।
इसका परिणाम था कि स्थानीय भू-स्वामियों के अलावा—
और कुछ क्षेत्रों में प्रतिद्वंद्वी कम्युनिस्ट कार्यकर्ता
भी हिंसक कार्रवाई के निशाने बनने लगे।
कलकत्ता में आंदोलन का शहरी विस्तार हुआ।
हिंसा केवल एक तरफ से नहीं थी
1970–72 के इतिहास को केवल ‘राज्य दमन’ अथवा केवल ‘नक्सली आतंक’ की कहानी बनाना दोनों ही अधूरे निष्कर्ष होंगे।
CPI(ML) से जुड़े समूहों ने अनेक हत्याएं और हिंसक कार्रवाइयां कीं।
ग्रामीण क्षेत्रों में कथित वर्ग-शत्रुओं की हत्या की गई।
इसके जवाब में पुलिस और राजनीतिक विरोधियों की ओर से भी हिंसा हुई।
पुलिसकर्मियों की हत्या और राज्य का आक्रोश
नक्सली समूहों द्वारा पुलिस को ‘दमनकारी राज्य मशीनरी’ का अंग माना गया।
इस राजनीतिक अवधारणा के आधार पर निम्न स्तर के पुलिसकर्मी भी हमलों का लक्ष्य बनने लगे।
सरकारी अध्ययनों में 1970–71 के दौरान पुलिसकर्मियों की मौतों में तेजी का उल्लेख मिलता है।
पुलिस बल के भीतर इसका गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा।
अब पुलिस के लिए नक्सलवादी केवल राजनीतिक आंदोलनकारी नहीं थे।
पश्चिम बंगाल में राजनीतिक व्यवस्था का संकट
1967 के बाद पश्चिम बंगाल लगातार राजनीतिक अस्थिरता से गुजर रहा था।
संयुक्त मोर्चा सरकारें स्थायी नहीं रह सकीं।
और CPI(M)–कांग्रेस–CPI(ML) के बीच कटु राजनीतिक टकराव—
इन सबने प्रशासनिक संकट को गहरा किया।
इस स्थिति में नक्सलवाद कानून-व्यवस्था की सामान्य समस्या से आगे जाकर शासन की क्षमता का प्रश्न बन गया।
1970 का कानूनी कठोरकरण
पश्चिम बंगाल सरकार ने हिंसक गतिविधियों से निपटने के लिए अधिक कठोर कानूनी उपायों का सहारा लिया।
इस दौर में West Bengal (Prevention of Violent Activities) Act, 1970 जैसी व्यवस्थाओं ने सरकार को निवारक कार्रवाई और सुरक्षा मामलों में अधिक अधिकार दिए।
प्रारंभिक भूमि-सुधार और किसान शिकायतों की राजनीति अब सुरक्षा कानूनों और पुलिस कार्रवाई के अधीन आने लगी।
यह वही ऐतिहासिक परिवर्तन है जिसमें—
CPI(ML) पर पहला बड़ा संगठनात्मक दबाव
पुलिस ने भूमिगत नेटवर्क की पहचान पर जोर बढ़ाया।
संदेशवाहकों और संपर्क व्यक्तियों पर नजर रखी गई।
नेताओं के बीच संचार तोड़ने की कोशिश हुई।
यह रणनीति महत्वपूर्ण थी क्योंकि CPI(ML) केंद्रीकृत भूमिगत संगठन की ओर बढ़ चुकी थी।
ऐसे संगठन में यदि शीर्ष नेतृत्व और स्थानीय इकाइयों के बीच संपर्क टूट जाए तो राजनीतिक दिशा तेजी से कमजोर हो सकती है।
पुलिस की खुफिया रणनीति
नक्सली संगठन छोटे भूमिगत समूहों में काम करते थे।
उनका पता लगाने के लिए केवल वर्दीधारी पुलिस पर्याप्त नहीं थी।
और गिरफ्तार व्यक्तियों से प्राप्त जानकारी
इस प्रक्रिया ने धीरे-धीरे भूमिगत आंदोलन की सुरक्षा कमजोर की।
चारु मजूमदार स्वयं लगभग तीन वर्ष तक भूमिगत रहने में सफल रहे, लेकिन अंततः उनका ठिकाना भी इसी प्रकार के खुफिया अभियान से खोज लिया गया।
जेलें भी संघर्ष का मैदान बनीं
बड़ी संख्या में नक्सली कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के बाद जेलों के भीतर भी संघर्ष हुआ।
राजनीतिक बंदियों और जेल प्रशासन के बीच टकराव की घटनाएं सामने आईं।
नक्सली साहित्य ने हिरासत में यातना, पिटाई और हत्या के अनेक आरोप लगाए।
सरकारी दृष्टि से कई कैदी हिंसक और जेल अनुशासन तोड़ने वाले माने गए।
इन घटनाओं के तथ्य प्रत्येक मामले में अलग-अलग जांच मांगते हैं।
‘मुठभेड़’ शब्द का विवाद
इस अवधि में पुलिस मुठभेड़ों में अनेक नक्सल कार्यकर्ताओं की मौतें दर्ज हुईं।
नक्सली संगठन और मानवाधिकार आलोचक कई घटनाओं को ‘फर्जी मुठभेड़’ बताते रहे।
पचास वर्ष से अधिक समय बाद प्रत्येक घटना का निश्चित पुनर्निर्माण संभव नहीं है।
जहां आधिकारिक मुठभेड़ विवरण ही उपलब्ध है वहां उसे उसी रूप में लिखा जाना चाहिए—
“पुलिस के अनुसार मुठभेड़ में मारा गया।”
1971 — संकट चरम पर
1971 के मध्य तक नक्सली हिंसा और राज्य कार्रवाई दोनों अत्यंत तीखे स्तर पर पहुंच चुके थे।
केंद्र सरकार के अपने प्रकाशन योजना के अनुसार 1970 के मध्य से 1971 के मध्य तक लगभग चार हजार नक्सली हिंसा-संबंधी घटनाओं का अनुमान था, जिनका भारी बहुमत पश्चिम बंगाल में हुआ।
इससे केंद्र सरकार के सामने स्पष्ट प्रश्न था—
ऑपरेशन स्टीपलचेज क्या था?
Operation Steeplechase 1971 में नक्सलवादी गतिविधियों के विरुद्ध चलाया गया एक व्यापक संयुक्त सुरक्षा अभियान था।
सरकारी प्रकाशन के अनुसार इसकी अवधि थी—
यह अभियान मुख्यतः पश्चिम बंगाल, बिहार और तत्कालीन उड़ीसा के सीमावर्ती नक्सल प्रभावित जिलों में चलाया गया।
इसमें सेना, केंद्रीय बल और राज्य पुलिस ने समन्वित भूमिका निभाई।
क्या यह सेना द्वारा चलाया गया युद्ध था?
इसे सामान्य सैन्य युद्ध कहना सही नहीं होगा।
सरकारी विवरण के अनुसार अभियान की रणनीति में सेना और पुलिस की भूमिकाएं अलग थीं।
योजना के ऐतिहासिक विवरण में कहा गया है कि बड़े क्षेत्र को घेरकर आवागमन के रास्ते बंद किए जाते थे।
केंद्रीय सुरक्षा बल अंदरूनी घेरा बनाते थे।
इसके बाद पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां तलाशी, गिरफ्तारी तथा संदिग्धों की पहचान करती थीं।
बांग्लादेश युद्ध की छाया
ऑपरेशन स्टीपलचेज का समय भी महत्वपूर्ण है।
1971 में पूर्वी पाकिस्तान का संकट बढ़ रहा था।
बड़ी संख्या में शरणार्थी भारत आ रहे थे।
भारत–पाकिस्तान युद्ध की आशंका बढ़ रही थी।
भारतीय सेना की बड़ी संख्या पूर्वी सीमा के आसपास मौजूद थी।
ऑपरेशन की रणनीति — क्षेत्र को काटना
नक्सली गुरिल्ला नेटवर्क की शक्ति थी—
कार्यकर्ता एक गांव से दूसरे गांव जा सकते थे।
जंगल या ग्रामीण क्षेत्रों में छिप सकते थे।
सीमावर्ती जिलों के बीच आवागमन कर सकते थे।
ऑपरेशन स्टीपलचेज की रणनीति का उद्देश्य इसी गतिशीलता को समाप्त करना था।
इसके भीतर पुलिस तलाशी अभियान चलाती।
इससे स्थानीय इकाइयों और शीर्ष नेतृत्व के बीच संपर्क टूटने लगा।
गिरफ्तारियों की संख्या — एक बड़ा स्रोत-विवाद
ऑपरेशन स्टीपलचेज में कितने लोग गिरफ्तार हुए, इस पर स्रोतों में भारी अंतर है।
एक IDSA अध्ययन लगभग 8,400 नक्सलियों के जेल भेजे जाने का अनुमान देता है।
दूसरी ओर कुछ ऐतिहासिक अध्ययनों में 20,000 से अधिक संदिग्ध नक्सलियों के गिरफ्तार या निरुद्ध होने की संख्या दी जाती है।
कुछ आंकड़े केवल अभियान की गिरफ्तारी गिनते हैं,
कानू सान्याल और अन्य नेताओं की गिरफ्तारी
इस व्यापक दमन के दौरान आंदोलन के कई महत्वपूर्ण नेता गिरफ्तार हुए।
सरकारी अध्ययन कानू सान्याल, नागभूषण पटनायक और असीम चटर्जी जैसे नेताओं के पकड़े जाने का उल्लेख करता है।
नेतृत्व की गिरफ्तारी का प्रभाव केवल प्रतीकात्मक नहीं था।
CPI(ML) की स्थानीय इकाइयां बहुत हद तक व्यक्तिगत नेतृत्व और गुप्त संपर्कों पर निर्भर थीं।
नेता गिरफ्तार होते ही कई क्षेत्रों का संगठन दिशाहीन होने लगा।
श्रीकाकुलम का क्षरण
आंध्र प्रदेश में श्रीकाकुलम का आदिवासी गुरिल्ला आंदोलन पहले से दबाव में था।
प्रमुख नेताओं के मारे जाने और गिरफ्तारियों के बाद संगठन कमजोर हुआ।
जब राष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा कार्रवाई तेज हुई तो श्रीकाकुलम का नेटवर्क भी लगातार सिकुड़ता गया।
यह CPI(ML) नेतृत्व के लिए गंभीर राजनीतिक झटका था।
बिहार और अन्य राज्यों में प्रभाव
बिहार, उड़ीसा और अन्य प्रभावित क्षेत्रों में भी संयुक्त सुरक्षा कार्रवाई का प्रभाव पड़ा।
पश्चिम बंगाल के कई शहरी और ग्रामीण नेटवर्क इस समय निर्णायक रूप से टूट रहे थे।
बिहार में भूमि, जाति और मजदूरी के जिन अंतर्विरोधों ने नक्सली राजनीति को जन्म दिया था, वे समाप्त नहीं हुए।
ऑपरेशन स्टीपलचेज की सफलता और सीमा
राज्य की दृष्टि से यह अभियान सफल था।
नक्सलवादी संगठन की अनेक इकाइयां तोड़ी गईं।
ग्रामीण गुरिल्ला क्षेत्र कमजोर पड़े।
लेकिन ऑपरेशन ने उस सामाजिक असमानता को समाप्त नहीं किया जिसने नक्सलवाद को जन्म दिया था।
इसलिए सुरक्षा अभियान तत्काल संगठन को दबा सकता था, लेकिन सामाजिक आधार को स्वतः समाप्त नहीं कर सकता था।
काशीपुर–बारानगर — हिंसा का सबसे अंधकारमय अध्याय
ऑपरेशन स्टीपलचेज की समयावधि के लगभग अंतिम दिनों में कलकत्ता के काशीपुर–बारानगर क्षेत्र में भीषण हिंसा हुई।
12 से 14 अगस्त 1971 के बीच बड़ी संख्या में लोगों की हत्या हुई।
पीड़ितों में नक्सल समर्थक अथवा नक्सली बताए जाने वाले युवा बड़ी संख्या में थे।
इस घटना की मृतक संख्या पर गंभीर विवाद है और विभिन्न राजनीतिक स्रोत अत्यंत अलग आंकड़े देते हैं।
क्या काशीपुर–बारानगर ‘राज्य प्रायोजित’ नरसंहार था?
नक्सली और वामपंथी स्मृतियों में इसे अक्सर पुलिस तथा कांग्रेस समर्थित समूहों द्वारा सुनियोजित नरसंहार कहा गया।
दूसरी ओर आधिकारिक जिम्मेदारी का प्रश्न लंबे समय तक विवादित रहा।
1971 में लोकसभा में भी इस हिंसा पर गंभीर आरोप लगाए गए। संसदीय बहस में सांसदों ने काशीपुर–बारानगर और हावड़ा में कथित नक्सलियों की सामूहिक हत्या और पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए।
प्रतिरोध वाहिनियां और राजनीतिक गिरोह
इस अवधि में पश्चिम बंगाल में कथित ‘प्रतिरोध’ समूहों और स्थानीय राजनीतिक गिरोहों की भूमिका पर भी आरोप लगे।
इनका उद्देश्य नक्सलवादियों को मोहल्लों से निकालना बताया गया।
व्यवहार में अनेक स्थानों पर राजनीतिक प्रतिशोध, निजी दुश्मनी और विचारधारात्मक हिंसा एक-दूसरे में मिश्रित हो गए।
यही स्थिति राज्य के लिए अत्यंत खतरनाक थी।
CPI(M) भी निशाने पर और प्रतिद्वंद्वी भी
नक्सली और CPI(M) कार्यकर्ताओं के बीच पहले से हिंसक प्रतिस्पर्धा थी।
CPI(ML) मुख्यधारा CPI(M) को ‘संशोधनवादी’ और क्रांति का विरोधी मानती थी।
दूसरी ओर CPI(M) नक्सली लाइन को राजनीतिक रूप से विनाशकारी मानती थी।
स्थानीय स्तर पर दोनों पार्टियां कई बार एक ही गरीब और मजदूर समुदाय में संगठन बनाने की कोशिश कर रही थीं।
इससे राजनीतिक संघर्ष व्यक्तिगत हिंसा में बदलता गया।
CPI(ML) के भीतर चारु मजूमदार की लाइन पर विद्रोह
राज्य का दमन CPI(ML) के संकट का अकेला कारण नहीं था।
भारत की क्रांतिकारी परिस्थितियों का अतिमूल्यांकन हुआ है,
और चारु मजूमदार के निर्देशों को अत्यधिक केंद्रीकृत अधिकार मिल गया है।
सुषीतल राय चौधरी जैसे नेताओं ने पार्टी की कुछ रणनीतियों पर असहमति जताई थी। मार्च 1971 में उनकी मृत्यु हो गई।
इसके बाद आंतरिक विरोध और अधिक संगठित रूप लेने लगा।
सत्यनारायण सिंह का विद्रोह
1971 में सत्यनारायण सिंह ने चारु मजूमदार की राजनीतिक लाइन के विरुद्ध खुला रुख अपनाया।
वे मानते थे कि वर्ग-शत्रुओं के व्यक्तिगत विनाश को केंद्रीय रणनीति बनाने से आंदोलन जनता से कट रहा है।
उनके नेतृत्व में CPI(ML) के भीतर अलग धारा बनी।
वर्ष के अंत तक विभाजन संगठनात्मक रूप ले चुका था और सत्यनारायण सिंह समूह ने स्वतंत्र केंद्रीय संरचना विकसित की।
नेतृत्व का संकट
1971 तक CPI(ML) की स्थिति विरोधाभासी थी।
चारु मजूमदार अभी भी केंद्रीय प्रतीक थे।
राज्यों के संगठन अपने-अपने तरीके से काम करने लगे।
पार्टी की केंद्रीय समिति का वास्तविक नियंत्रण कमजोर हुआ।
इस स्थिति में चारु मजूमदार की व्यक्तिगत वैचारिक प्रतिष्ठा और पार्टी की वास्तविक संगठनात्मक क्षमता के बीच अंतर बढ़ता गया।
1971 के अंत तक आंदोलन की स्थिति
1971 के अंत तक पहली नक्सली लहर के अधिकांश प्रमुख ग्रामीण केंद्र कमजोर पड़ चुके थे।
पश्चिम बंगाल में पुलिस कार्रवाई तीखी थी।
कानू सान्याल सहित महत्वपूर्ण नेता जेल में थे।
कलकत्ता में हिंसा जारी थी, लेकिन आंदोलन का व्यापक शहरी सामाजिक आधार सिकुड़ रहा था।
सैन्य रूप से राज्य का पलड़ा स्पष्ट रूप से भारी हो चुका था।
1972 — राजनीतिक परिस्थिति फिर बदलती है
मार्च 1972 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस की सरकार बनी।
सिद्धार्थ शंकर राय मुख्यमंत्री बने।
यहां एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक भेद आवश्यक है।
ऑपरेशन स्टीपलचेज जुलाई–अगस्त 1971 में हुआ था।
राय मार्च 1972 में मुख्यमंत्री बने।
इसलिए ऑपरेशन स्टीपलचेज को ‘मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय का अभियान’ कहना कालक्रम की दृष्टि से गलत होगा।
सिद्धार्थ शंकर राय — कानून और व्यवस्था सर्वोपरि
राय सरकार का प्राथमिक लक्ष्य पश्चिम बंगाल में सामान्य शासन और कानून-व्यवस्था स्थापित करना था।
कलकत्ता लंबे समय से राजनीतिक हत्याओं और हिंसा से प्रभावित था।
नई सरकार ने नक्सली नेटवर्क को तोड़ने को प्राथमिकता दी।
पुलिस को आक्रामक कार्रवाई की छूट मिली।
स्थानीय नक्सली दस्तों को एक-एक करके निशाना बनाया गया।
सिद्धार्थ शंकर राय की विरासत पर विवाद
राय के समर्थकों की दृष्टि में उन्होंने पश्चिम बंगाल को हिंसक अराजकता से बाहर निकाला।
उनका तर्क था कि पुलिसकर्मियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या कर रहे भूमिगत संगठन के विरुद्ध कठोर कार्रवाई आवश्यक थी।
आलोचक दूसरी तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।
बिना पर्याप्त प्रक्रिया गिरफ्तारियां,
और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त प्रतिहिंसा
क्या ‘देखते ही गोली मारने’ की कोई औपचारिक नीति थी?
लोकप्रिय विवरणों में राय शासन को कभी-कभी ऐसे प्रस्तुत किया जाता है मानो औपचारिक रूप से ‘देखते ही गोली मारने’ का आदेश था।
ऐसे व्यापक दावे के लिए स्पष्ट सरकारी आदेश आवश्यक है।
पुलिस कार्रवाई अत्यंत कठोर थी—इस पर पर्याप्त ऐतिहासिक प्रमाण हैं।
लेकिन बिना विशिष्ट दस्तावेज के किसी अनौपचारिक राजनीतिक वर्णन को सरकारी लिखित नीति कहना उचित नहीं।
चारु मजूमदार की तलाश
1972 तक पुलिस के लिए सबसे बड़ा लक्ष्य चारु मजूमदार थे।
वे CPI(ML) के संस्थापक महासचिव और आंदोलन के सबसे पहचान योग्य नेता थे।
उनकी गिरफ्तारी का प्रतीकात्मक महत्व अत्यंत बड़ा था।
पुलिस ने उनके संपर्कों पर निगरानी बढ़ाई।
संदेशवाहकों और सहयोगियों की तलाश हुई।
उनके स्वास्थ्य की स्थिति भी कमजोर थी।
16 जुलाई 1972 — चारु मजूमदार गिरफ्तार
16 जुलाई 1972 की तड़के कलकत्ता के एंटाली क्षेत्र में पुलिस ने चारु मजूमदार को गिरफ्तार किया।
समकालीन फ्रांसीसी समाचार पत्र Le Monde ने 18 जुलाई 1972 को उनकी गिरफ्तारी की खबर दी और लिखा कि वे कई वर्षों से वांछित थे तथा गंभीर श्वसन समस्याओं के कारण इलाज भी करा रहे थे।
गिरफ्तारी के समय उनका स्वास्थ्य
चारु मजूमदार गंभीर रूप से बीमार थे।
विभिन्न स्रोत उन्हें हृदय और श्वसन रोग से पीड़ित बताते हैं।
IDSA के एक अध्ययन में गिरफ्तारी के समय उन्हें cardiac asthma होने का उल्लेख है।
उनकी बीमारी आगे उनकी हिरासत और मृत्यु से संबंधित विवाद का केंद्रीय प्रश्न बन गई।
क्या उन्हें पर्याप्त चिकित्सा मिली?
क्या लगातार पूछताछ उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक थी?
लालबाजार पुलिस मुख्यालय
गिरफ्तारी के बाद मजूमदार को कलकत्ता पुलिस मुख्यालय लालबाजार में रखा गया।
पुलिस उनसे CPI(ML) की भूमिगत संरचना, संपर्कों और संगठन के बारे में जानकारी चाहती थी।
उनके स्वास्थ्य की निगरानी को लेकर आधिकारिक दावे किए गए।
लेकिन परिवार और आंदोलन समर्थकों की ओर से आरोप था कि उन्हें आवश्यक चिकित्सा और दवाएं पर्याप्त रूप से नहीं दी गईं।
बारह दिन की हिरासत
चारु मजूमदार 16 जुलाई से 28 जुलाई तक पुलिस हिरासत में रहे।
इतने कम समय में एक लंबे समय से भूमिगत नेता की मृत्यु ने तत्काल संदेह पैदा किया।
28 जुलाई 1972 — चारु मजूमदार की मृत्यु
28 जुलाई 1972 को चारु मजूमदार की पुलिस हिरासत में मृत्यु हुई।
आधिकारिक पुलिस संस्करण के अनुसार उनकी मृत्यु गंभीर हृदयाघात से हुई।
समकालीन तथा बाद के स्रोतों में मृत्यु का समय प्रातः लगभग चार बजे बताया गया है।
उनके समर्थकों और बाद की नक्सली धाराओं ने इस आधिकारिक विवरण को स्वीकार नहीं किया।
क्या चारु मजूमदार की हत्या हुई थी?
उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर इसे निर्विवाद हत्या घोषित करना ऐतिहासिक रूप से सुरक्षित नहीं है।
उसी प्रकार केवल आधिकारिक ‘हृदयाघात’ संस्करण दोहराकर विवाद समाप्त मान लेना भी पर्याप्त नहीं।
और 28 जुलाई को हिरासत में उनकी मृत्यु हुई।
क्या उन्हें उचित चिकित्सा मिली और हिरासत की परिस्थितियों ने उनकी मृत्यु को तेज किया?
शव परिवार को क्यों नहीं सौंपा गया?
मजूमदार की मृत्यु के बाद उनके अंतिम संस्कार की परिस्थितियां भी विवादित रहीं।
चारु मजूमदार की मृत्यु और CPI(ML) का केंद्रीय पतन
चारु मजूमदार की मृत्यु तक CPI(ML) पहले ही कई हिस्सों में बंट चुकी थी।
चारु मजूमदार के बाद नक्सलवादी आंदोलन का विखंडन और पुनर्गठन
:::writing{variant="document" id="58392" title="खंड 8 — चारु मजूमदार के बाद नक्सलवादी आंदोलन का विखंडन और पुनर्गठन"}
प्रस्तावना : 1972 में आंदोलन टूटा, लेकिन समाप्त नहीं हुआ
28 जुलाई 1972 को चारु मजूमदार की पुलिस हिरासत में मृत्यु के समय तक मूल CPI(ML) लगभग विघटित हो चुकी थी। उसके अनेक नेता मारे जा चुके थे, जेल में थे, भूमिगत थे अथवा चारु मजूमदार की राजनीतिक लाइन से अलग हो चुके थे।
CPI(ML) का विघटन — केवल संगठन नहीं, रणनीति भी टूटी
चारु मजूमदार की मृत्यु के बाद उत्पन्न संकट केवल नेतृत्व का संकट नहीं था।
इसका उत्तर अलग-अलग नेताओं ने अलग तरीके से दिया।
चारु मजूमदार की मूल दिशा सही थी; उसे पूरी शक्ति से लागू नहीं किया गया।
‘व्यक्तिगत सफाया’ की लाइन और जनसंगठनों की उपेक्षा ने पार्टी को जनता से काट दिया।
चुनाव बहिष्कार को स्थायी सिद्धांत बनाना गलत था।
सत्यनारायण सिंह — चारु मजूमदार के खिलाफ पहला बड़ा वैचारिक विद्रोह
सत्यनारायण सिंह CPI(ML) के वरिष्ठ नेताओं में थे।
1970–71 में ही उन्होंने चारु मजूमदार की लाइन पर गंभीर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे।
व्यक्तिगत ‘वर्ग-शत्रु विनाश’ को क्रांति का केंद्रीय साधन नहीं बनाया जा सकता।
केवल चयनित व्यक्तियों की हत्या से क्रांति नहीं आएगी।
यह आलोचना आगे लगभग सभी बड़ी नक्सली धाराओं में अलग-अलग रूपों में दिखाई देगी।
Provisional Central Committee की धारा
सत्यनारायण सिंह के नेतृत्व में आगे Provisional Central Committee, CPI(ML) जैसी संरचना विकसित हुई।
इस धारा ने चारु मजूमदार की कुछ रणनीतियों की आलोचना की और अधिक व्यापक जन राजनीति की दिशा तलाशने की कोशिश की।
लेकिन यह संगठन स्वयं स्थायी एकता नहीं बनाए रख सका।
यह नक्सलवादी आंदोलन की एक स्थायी समस्या बन गई—
हर राजनीतिक मतभेद अक्सर नए संगठन में बदल जाता था।
कानू सान्याल की जेल से पुनर्विचार की यात्रा
नक्सलबाड़ी के मूल नेताओं में कानू सान्याल का बाद का राजनीतिक विकास विशेष महत्व रखता है।
वे सशस्त्र किसान संघर्ष के समर्थक रहे, लेकिन उन्होंने धीरे-धीरे चारु मजूमदार की राजनीतिक लाइन की गंभीर आलोचना की।
और वास्तविक किसान संघर्ष की जगह कुछ गुप्त दस्तों को प्राथमिकता
कानू सान्याल और CPI(ML) की स्थापना पर पुनर्विचार
आगे चलकर कानू सान्याल ने 1969 में CPI(ML) के गठन की पद्धति तक पर सवाल उठाया।
उनका मानना था कि व्यापक क्रांतिकारी कम्युनिस्ट शक्तियों को पर्याप्त वैचारिक और संगठनात्मक तैयारी के बिना जल्दी नई पार्टी में समेट दिया गया।
उन्होंने बाद में अलग राजनीतिक संगठन बनाने की कोशिश की और खुले किसान आंदोलनों पर अधिक जोर दिया।
जेल से छूटे नेताओं के सामने नया भारत
1970 के दशक के उत्तरार्ध में अनेक नक्सली नेता जेल से बाहर आए।
इस समय भारत 1967 वाला भारत नहीं था।
1977 में कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बाहर हो चुकी थी।
पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सत्ता में आ गया।
बिहार में जाति आधारित राजनीतिक चेतना बढ़ रही थी।
आंध्र प्रदेश में ग्रामीण राजनीति बदल रही थी।
भोजपुर — नक्सलबाड़ी की नई जमीन
चारु मजूमदार के बाद नक्सलवादी आंदोलन के पुनर्गठन में बिहार का भोजपुर सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक बना।
यहां संघर्ष केवल भूमि कब्जे तक सीमित नहीं था।
भूमिहीन दलित खेतिहर मजदूरों की समस्या थी—
और प्रभावशाली भू-स्वामियों की निजी शक्ति।
इस प्रकार भोजपुर ने नक्सलबाड़ी के वर्ग प्रश्न में एक नया तत्व स्पष्ट किया—
भोजपुर की सामाजिक संरचना
भोजपुर क्षेत्र में बड़े और मध्यम भू-स्वामियों के सामने बड़ी संख्या में भूमिहीन कृषि मजदूर थे।
इन मजदूरों में दलित समुदायों का हिस्सा महत्वपूर्ण था।
जातिगत अनुशासन भी उतना ही महत्वपूर्ण था।
सामाजिक सम्मान का व्यवहार कैसा होगा—
ये सभी संघर्ष के प्रश्न बन सकते थे।
इसलिए भोजपुर में ‘वर्ग संघर्ष’ वास्तविक जीवन में जाति-विरोधी संघर्ष से अलग नहीं था।
मास्टर जगदीश और भोजपुर का उभार
भोजपुर के प्रारंभिक नक्सली आंदोलन में जगदीश महतो, जिन्हें अक्सर मास्टर जगदीश कहा जाता है, महत्वपूर्ण नाम बने।
उनके साथ रामनरेश राम और अन्य स्थानीय नेताओं ने गरीब किसानों तथा खेतिहर मजदूरों को संगठित करने में भूमिका निभाई।
यह आंदोलन केवल बाहर से आए क्रांतिकारी कैडरों का प्रयोग नहीं था।
स्थानीय दलित और गरीब किसान नेतृत्व विकसित हुआ।
भूमि से अधिक सम्मान का संघर्ष
भोजपुर ने नक्सलबाड़ी आंदोलन की राजनीति को एक महत्वपूर्ण नया पाठ दिया।
भूमिहीन किसान केवल जमीन के लिए नहीं लड़ता।
मजदूरी का विवाद कई बार केवल कुछ रुपये का नहीं था।
वह यह तय करता था कि गांव में सामाजिक शक्ति किसकी है।
दलित मजदूर यदि समान मजदूरी और सम्मान की मांग करता था तो ग्रामीण जातिगत व्यवस्था के पुराने अनुशासन को चुनौती मिलती थी।
सशस्त्र संघर्ष और जन आधार
भू-स्वामी समूहों और नक्सली कार्यकर्ताओं के बीच घातक टकराव हुए।
लेकिन धीरे-धीरे आंदोलन के भीतर यह समझ बढ़ी कि केवल छोटे सशस्त्र दस्ते पर्याप्त नहीं हैं।
यही समझ आगे CPI(ML) Liberation की रणनीतिक पुनर्रचना का आधार बनेगी।
28 जुलाई 1974 — नई केंद्रीय समिति
चारु मजूमदार की मृत्यु के ठीक दो वर्ष बाद 28 जुलाई 1974 को CPI(ML) की एक धारा ने नई केंद्रीय समिति का गठन किया।
CPI(ML) Liberation के अपने ऐतिहासिक अभिलेख के अनुसार इस नई केंद्रीय समिति को बिहार में उभरते भोजपुर–पटना किसान आंदोलन तथा पश्चिम बंगाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ संगठनों का समर्थन मिला।
यही संरचना आगे CPI(ML) Liberation में विकसित हुई।
जौहर और भूमिगत पुनर्गठन
नई केंद्रीय समिति में जौहर महासचिव बने।
पार्टी ने भोजपुर के किसान संघर्ष को प्रमुख आधार बनाया।
लेकिन राज्य दमन अभी समाप्त नहीं हुआ था।
नवंबर 1975 में भोजपुर के एक गांव में पुलिस/सुरक्षा अभियान के दौरान जौहर मारे गए।
विनोद मिश्र — नक्सलबाड़ी की विरासत की नई व्याख्या
विनोद मिश्र ने नक्सलवादी राजनीति में अत्यंत महत्वपूर्ण परिवर्तन की दिशा विकसित की।
उन्होंने मूल किसान संघर्ष और क्रांतिकारी राजनीति की विरासत को पूरी तरह अस्वीकार नहीं किया।
लेकिन धीरे-धीरे यह स्वीकार किया गया कि पुरानी ‘वाम दुस्साहसवादी’ रणनीति पर्याप्त नहीं थी।
कई वर्षों की आंतरिक बहस और ‘सुधार अभियान’ के बाद दिशा बदली।
1976 का दूसरा पार्टी कांग्रेस
फरवरी 1976 में गया जिले के ग्रामीण इलाके में इस धारा ने अपना दूसरा पार्टी कांग्रेस आयोजित किया।
यह आपातकाल का समय था और संगठन भूमिगत परिस्थितियों में काम कर रहा था।
विनोद मिश्र महासचिव के रूप में स्थापित हुए।
पार्टी अभी भी सशस्त्र किसान संघर्ष की भाषा से पूरी तरह अलग नहीं हुई थी।
आत्मालोचना — पुरानी लाइन की समीक्षा
CPI(ML) Liberation के अपने इतिहास में बाद में यह स्वीकार किया गया कि 1977 तक संगठन मूलतः पुरानी सशस्त्र गुरिल्ला लाइन पर चलता रहा और यह रणनीति व्यापक जन पहल पैदा नहीं कर पाई।
पहली बार नक्सलबाड़ी की एक प्रमुख उत्तराधिकारी धारा कह रही थी—
केवल वीरतापूर्ण सशस्त्र कार्रवाइयां पर्याप्त नहीं।
यहीं मूल चारु मजूमदारवादी लाइन से निर्णायक दूरी की शुरुआत हुई।
1977–79 का सुधार अभियान
आपातकाल समाप्त होने के बाद राजनीतिक वातावरण बदल गया।
CPI(ML) Liberation की धारा ने आंतरिक rectification campaign—सुधार अभियान चलाया।
और व्यापक लोकतांत्रिक संघर्षों में भागीदारी।
1978–79 तक यह परिवर्तन संगठनात्मक नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका था।
यह नक्सलबाड़ी विरासत का पहला बड़ा लोकतांत्रिक पुनर्पाठ था।
CPI(ML) Liberation का निर्माण
इस पुनर्गठित धारा को धीरे-धीरे उसके अंग्रेजी केंद्रीय मुखपत्र Liberation के नाम पर CPI(ML) Liberation कहा जाने लगा।
1979 तक संगठन ने बिहार के बाहर भी काम फैलाया।
और केरल के कुछ कार्यकर्ता इससे जुड़े। पार्टी के अपने अभिलेख 1979 तक इसके अखिल भारतीय चरित्र ग्रहण करने का उल्लेख करते हैं।
अब इसकी रणनीति मूल 1969 CPI(ML) से धीरे-धीरे अलग होती जा रही थी।
भारतीय पीपुल्स फ्रंट — खुली राजनीति की ओर
1980 के दशक के प्रारंभ में CPI(ML) Liberation ने भूमिगत पार्टी संरचना के साथ खुले जनराजनीतिक मंच विकसित करने शुरू किए।
Indian People's Front—IPF का निर्माण इस परिवर्तन का महत्वपूर्ण चरण था।
यह मंच किसानों, मजदूरों, छात्रों और लोकतांत्रिक आंदोलनों को खुले राजनीतिक क्षेत्र में संगठित करने का प्रयास था।
यह चारु मजूमदार की मूल चुनाव बहिष्कार नीति से स्पष्ट विचलन था।
चुनावी राजनीति में प्रवेश
CPI(ML) Liberation ने अंततः चुनावों में भाग लेना स्वीकार किया।
यह नक्सलबाड़ी की मूल माओवादी रणनीति से सबसे बड़ा विचलन था।
चुनाव में भाग लेने का अर्थ क्रांतिकारी या जन संघर्ष समाप्त करना नहीं।
संसद और विधानसभा भी वर्ग संघर्ष तथा जन आवाज के मंच हो सकते हैं।
भोजपुर से मध्य बिहार तक
Liberation धारा का किसान आधार भोजपुर तक सीमित नहीं रहा।
1980 के दशक में आंदोलन मध्य बिहार के अनेक जिलों तक फैला।
विनोद मिश्र के 1987 के राजनीतिक दस्तावेज में भोजपुर, रोहतास, पटना, गया, जहानाबाद, औरंगाबाद और नालंदा सहित सात जिलों में किसान संघर्ष की चर्चा की गई और इसे तेलंगाना तथा नक्सलबाड़ी के बाद किसान संघर्ष की महत्वपूर्ण नई अवस्था बताया गया।
मध्य बिहार — मजदूरी, जमीन और जातीय हिंसा
मध्य बिहार में किसान संघर्ष तीन मुख्य मुद्दों पर केंद्रित हुआ—
इस क्षेत्र में नक्सली संगठन और भू-स्वामी समुदायों द्वारा गठित निजी सेनाओं के बीच हिंसा का लंबा इतिहास विकसित हुआ।
आगे भूमिहार और अन्य प्रभावशाली भू-स्वामी समुदायों से जुड़े निजी सशस्त्र समूह तथा नक्सली समर्थित गरीब किसान संगठन आमने-सामने आए।
यहीं 1980–90 के दशकों में बिहार भारतीय नक्सलवादी हिंसा का प्रमुख क्षेत्र बन गया।
नक्सलबाड़ी की दूसरी विरासत — People's War
Liberation धारा जहां खुले जनसंगठन और चुनाव की ओर बढ़ रही थी, वहीं आंध्र प्रदेश में बिल्कुल अलग दिशा विकसित हो रही थी।
उन्होंने चारु मजूमदार की हर रणनीति को यथावत नहीं अपनाया, लेकिन संसदीय राजनीति को अस्वीकार किया और दीर्घकालीन सशस्त्र जनयुद्ध की रणनीति पर कायम रहे।
इसी धारा से आगे People's War Group—PWG बना।
कोंडापल्ली सीतारमैया की राजनीतिक पृष्ठभूमि
कोंडापल्ली सीतारमैया का संबंध तेलंगाना के पुराने कम्युनिस्ट आंदोलन से था।
वे CPI और बाद में CPI(ML) से जुड़े।
मूल CPI(ML) के विघटन के बाद वे आंध्र प्रदेश में क्रांतिकारी संगठन के पुनर्गठन में सक्रिय हुए।
1970 के दशक के दौरान उन्होंने स्थानीय किसान आंदोलन, क्रांतिकारी छात्र संगठनों और भूमिगत कैडरों को पुनर्गठित किया।
PWG ने चारु मजूमदार से क्या लिया और क्या छोड़ा?
PWG ने चारु मजूमदार की तीन मुख्य धारणाएं बनाए रखीं—
भारतीय राज्य को क्रांतिकारी रूप से बदलना,
संसदीय लोकतंत्र को अंतिम समाधान न मानना,
और सशस्त्र ग्रामीण संघर्ष को केंद्रीय रणनीति बनाना।
लेकिन उसने ‘व्यक्तिगत वर्ग-शत्रु सफाये’ को एकमात्र क्रांतिकारी पद्धति मानने से दूरी बनाई।
उसने व्यापक जनसंगठन बनाने पर अधिक जोर दिया।
उत्तर तेलंगाना — PWG का प्रारंभिक आधार
PWG ने अपना सबसे मजबूत प्रारंभिक आधार उत्तर तेलंगाना में विकसित किया।
और आसपास के क्षेत्रों में भूमि, मजदूरी, वन और सामाजिक उत्पीड़न से संबंधित प्रश्नों पर काम हुआ।
का उपयोग व्यापक राजनीतिक आधार बनाने के लिए किया गया।
इससे PWG मूल CPI(ML) की तुलना में अधिक व्यवस्थित जन–गुरिल्ला संरचना बनाने लगा।
‘दलम’ व्यवस्था
PWG ने सशस्त्र दस्तों को स्थानीय स्तर पर दलम के रूप में विकसित किया।
स्थानीय पुलिस और विरोधी सशस्त्र समूहों का मुकाबला,
और धीरे-धीरे गुरिल्ला क्षेत्र विकसित करना।
सरकारी अध्ययन के अनुसार 1980–85 के बीच PWG ने ऐसे सशस्त्र दस्तों का विस्तार किया और बाद में अपनी गतिविधियां दूसरे राज्यों तक फैलानी शुरू कीं।
यह आगे आधुनिक माओवादी सैन्य संरचना की महत्वपूर्ण पूर्वपीठिका बनी।
आंध्र में जनसंगठनों की भूमिका
PWG की शक्ति केवल सशस्त्र दस्तों में नहीं थी।
और सांस्कृतिक संगठन भी महत्वपूर्ण थे।
विशेष रूप से क्रांतिकारी सांस्कृतिक गतिविधियों ने ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में राजनीतिक संदेश फैलाया।
इससे आंदोलन को वह सामाजिक संपर्क मिला जिसकी कमी मूल चारु मजूमदारवादी भूमिगत राजनीति में दिखाई दी थी।
दंडकारण्य की ओर विस्तार
उत्तर तेलंगाना से PWG ने धीरे-धीरे दंडकारण्य के वन क्षेत्रों की ओर विस्तार किया।
के सीमावर्ती आदिवासी क्षेत्रों को जोड़ने वाला मुख्य माओवादी क्षेत्र बना।
आदिवासी भूमि और वन अधिकारों की समस्याएं
तथा राज्य के साथ स्थानीय समुदायों के तनाव—
इन सबने दीर्घकालीन गुरिल्ला संगठन के लिए अनुकूल परिस्थितियां प्रदान कीं।
सीतारमैया का पतन
PWG स्वयं भी आंतरिक संघर्ष से मुक्त नहीं था।
1980 के दशक के अंत और 1990 के प्रारंभ तक नेतृत्व को लेकर गंभीर मतभेद बढ़े।
1991 में कोंडापल्ली सीतारमैया को संगठन से हटा दिया गया।
इसके बाद मुप्पला लक्ष्मण राव ‘गणपति’ प्रमुख नेता के रूप में उभरे।
यह भी नक्सली आंदोलन की एक स्थायी विशेषता बनी—
तीसरी परंपरा — Dakshin Desh से MCC
नक्सलबाड़ी के बाद विकसित सबसे महत्वपूर्ण धाराओं में एक ऐसी भी थी जो मूल CPI(ML) में शामिल ही नहीं हुई थी।
इसके प्रमुख नेताओं में कनाई चटर्जी और अमूल्य सेन शामिल थे।
इस समूह ने चारु मजूमदार की कुछ रणनीतियों, विशेष रूप से जन लामबंदी के बिना व्यक्तिगत विनाश की प्रवृत्ति, से दूरी रखी।
यह समूह आगे Maoist Communist Centre—MCC में विकसित हुआ।
MCC का गठन — तारीख पर स्रोत-भेद
MCC की उत्पत्ति की तारीख को लेकर विभिन्न स्रोतों में कुछ अंतर दिखाई देता है।
कुछ संगठनात्मक स्रोत Dakshin Desh समूह से 1969 के आसपास MCC के रूप में विकास बताते हैं।
कुछ सुरक्षा अध्ययन 1975 में Maoist Communist Centre नाम अपनाए जाने का उल्लेख करते हैं।
यह विरोधाभास इस कारण है कि संगठनात्मक विकास क्रमिक था—
और बाद में MCC नाम की स्थायी पहचान।
कनाई चटर्जी की रणनीतिक दृष्टि
कनाई चटर्जी की धारा भी माओवादी क्रांति और सशस्त्र संघर्ष की समर्थक थी।
लेकिन वह किसान राजनीतिक काम को महत्वपूर्ण मानती थी।
प्रारंभिक चरण में पश्चिम बंगाल के जंगलमहल क्षेत्रों में दलित और आदिवासी किसानों के बीच काम किया गया।
छोटे राजनीतिक दस्ते गांवों में घूमते,
और स्थानीय भू-स्वामियों को चुनौती देते।
बंगाल से बिहार की ओर MCC
पश्चिम बंगाल के जंगलमहल क्षेत्र में अपेक्षित व्यापक सफलता न मिलने के बाद MCC ने बिहार की ओर विस्तार किया।
1970 के दशक के उत्तरार्ध में पूर्वी और मध्य बिहार उसके प्रमुख क्षेत्रों में बनने लगे।
बिहार–बंगाल विशेष क्षेत्रीय संरचना बनाई गई।
आगे झारखंड बनने वाले क्षेत्रों के जंगल और आदिवासी इलाकों में MCC की गहरी पकड़ बनने लगी।
MCC और CPI(ML) में मूल अंतर
MCC स्वयं को माओवादी क्रांतिकारी संगठन मानता था, लेकिन उसका संगठनात्मक इतिहास CPI(ML) से अलग था।
इसलिए नक्सलवादी राजनीति में अब कम-से-कम दो बड़ी भूमिगत वंशावलियां थीं—
आगे आधुनिक CPI (Maoist) के गठन को समझने के लिए यह भेद अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।
2004 में जिन दो प्रमुख संगठनों का विलय हुआ—
अमूल्य सेन और कनाई चटर्जी की मृत्यु
MCC के शुरुआती दोनों प्रमुख वैचारिक नेताओं की 1980 के दशक के प्रारंभ में मृत्यु हो गई।
अमूल्य सेन 1981 में और कनाई चटर्जी 1982 में चल बसे।
नेतृत्व परिवर्तन के बाद भी संगठन समाप्त नहीं हुआ।
बल्कि बिहार और झारखंड क्षेत्र में उसने अधिक जड़ें जमाईं।
1980 का दशक — नक्सलवाद की नई भौगोलिक संरचना
1980 के दशक तक नक्सलवादी राजनीति का भूगोल मूल नक्सलबाड़ी से बहुत दूर जा चुका था।
बिहार–झारखंड का पठारी और जंगल क्षेत्र।
दार्जिलिंग तराई, जहां से आंदोलन शुरू हुआ था, केंद्रीय क्षेत्र नहीं रहा।
यह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक परिवर्तन था।
नक्सलबाड़ी आंदोलन का नाम बना रहा, लेकिन नक्सलबाड़ी उसका मुख्य भूगोल नहीं रहा।
किसान से आदिवासी गुरिल्ला क्षेत्र तक
मूल नक्सलबाड़ी की राजनीति मुख्यतः बर्गादार, भूमिहीन किसान और ग्रामीण जोतदार संबंधों पर केंद्रित थी।
1980–90 के दशकों में PWG और MCC के विस्तार के साथ आदिवासी प्रश्न का महत्व तेजी से बढ़ा।
इससे नक्सलवाद की सामाजिक प्रकृति फिर बदल गई।
जंगल क्यों बने नए गुरिल्ला क्षेत्र?
पहाड़ी और वन क्षेत्रों में राज्य की प्रशासनिक उपस्थिति मैदानी इलाकों की तुलना में कमजोर हो सकती थी।
स्थानीय समुदायों की शिकायतें पुरानी थीं।
इससे भूमिगत सशस्त्र संगठन लंबे समय तक टिक सकते थे।
इसलिए PWG और MCC ने जंगल क्षेत्रों को रणनीतिक महत्व दिया।
यही भूगोल आगे आधुनिक ‘रेड कॉरिडोर’ की नींव बना।
बिहार में निजी सेनाओं का उदय
बिहार में नक्सली किसान संगठनों के विस्तार के जवाब में अनेक भू-स्वामी और जाति आधारित निजी सशस्त्र संगठन भी बने।
PWG और MCC — समानताएं
दोनों संगठनों के बीच कई वैचारिक समानताएं थीं।
People's War और MCC से CPI (Maoist) तक
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प्रस्तावना : 1967 की भूमि-राजनीति से 2004 की अखिल भारतीय माओवादी संरचना तक
नक्सलबाड़ी के इतिहास का यह चरण सबसे अधिक सावधानी से समझने योग्य है, क्योंकि यहीं से अक्सर एक ऐतिहासिक भूल शुरू होती है—1967 के नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह और इक्कीसवीं सदी के CPI (Maoist) सशस्त्र आंदोलन को बिना अंतर किए एक ही निरंतर घटना मान लेना।
दोनों के बीच वैचारिक और संगठनात्मक संबंध अवश्य है।
1990 का दशक — नक्सलवाद का नया भूगोल
1990 के दशक तक नक्सलवादी आंदोलन का केंद्रीय भूगोल मूल नक्सलबाड़ी से पूरी तरह बदल चुका था।
इन क्षेत्रों की एक साझा विशेषता थी—
और अनेक क्षेत्रों में ऐतिहासिक आर्थिक व सामाजिक उपेक्षा।
‘रेड कॉरिडोर’ शब्द का अर्थ
‘रेड कॉरिडोर’ कोई संवैधानिक या स्थायी प्रशासनिक इकाई नहीं थी।
यह मीडिया, सुरक्षा एजेंसियों और राजनीतिक विमर्श में उस विस्तृत भूभाग के लिए इस्तेमाल होने लगा जहां विभिन्न नक्सली और बाद में माओवादी संगठन सक्रिय थे।
और मध्य भारत में छत्तीसगढ़–महाराष्ट्र तक
एक प्रकार की लंबी पट्टी दिखाई देती थी।
PWG का विस्तार — तेलंगाना से दंडकारण्य
People's War Group ने 1980 के दशक में उत्तर तेलंगाना में मजबूत आधार बनाया था।
1990 के दशक में उसकी रणनीति अधिक व्यवस्थित हो गई।
स्थानीय किसान और आदिवासी संगठनों से संपर्क बढ़ाया गया।
दंडकारण्य की ओर विस्तार इस रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण चरण था।
इन सबने भूमिगत कैडरों को सुरक्षित गतिशीलता प्रदान की।
दंडकारण्य — आधुनिक माओवादी आंदोलन की केंद्रीय प्रयोगशाला
यह मध्य भारत का विशाल वन और पठारी क्षेत्र है, जिसमें आज के छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तेलंगाना और उड़ीसा के कई हिस्से जुड़े हैं।
विशेष रूप से बस्तर क्षेत्र आधुनिक माओवादी राजनीति का प्रमुख केंद्र बना।
इतिहासतः वन, भूमि, खनिज, ठेकेदारी, सरकारी परियोजनाओं और प्रशासन के साथ स्थानीय समुदायों के संबंध जटिल रहे हैं।
आदिवासी क्षेत्र क्यों बने निर्णायक?
माओवादी संगठनों की दीर्घकालीन गुरिल्ला रणनीति के लिए आदिवासी वन क्षेत्र कई कारणों से महत्वपूर्ण थे।
भौगोलिक परिस्थितियां गुरिल्ला युद्ध के लिए अनुकूल थीं।
भूमि और वन अधिकार के प्रश्न स्थानीय समाज के जीवन से सीधे जुड़े थे।
प्रमुख राजनीतिक दलों और प्रशासन की सीमित पहुंच ने माओवादी संगठनों को वैकल्पिक राजनीतिक संरचनाएं बनाने का अवसर दिया।
PWG की संगठनात्मक संरचना
1990 के दशक तक People's War Group केवल छोटे भूमिगत दस्तों का संगठन नहीं था।
और जनसंगठनों के गुप्त या अर्ध-खुले नेटवर्क—
इन सबके माध्यम से संगठन विस्तृत हुआ।
इससे वह मूल CPI(ML) के 1969–72 मॉडल की तुलना में कहीं अधिक टिकाऊ बना।
माओवादी आंदोलन ने पहली पीढ़ी की विफलताओं से कुछ संगठनात्मक सीखें ग्रहण की थीं।
Party Unity की पृष्ठभूमि
CPI(ML) Party Unity भी मूल CPI(ML) की विभाजित परंपराओं में से एक महत्वपूर्ण धारा थी।
इसका प्रभाव विशेष रूप से बिहार में था।
यह संगठन भूमिहीन किसानों, मजदूरों और ग्रामीण गरीबों के बीच सक्रिय रहा।
इसने सशस्त्र संघर्ष को जनसंगठन के साथ जोड़ने का प्रयास किया।
1990 के दशक तक Party Unity और People's War Group के बीच वैचारिक निकटता बढ़ी।
1998 — Party Unity और People's War का विलय
1998 में CPI(ML) Party Unity का People's War में विलय हो गया।
यह आधुनिक माओवादी एकीकरण की दिशा में बहुत महत्वपूर्ण कदम था।
इससे People's War का प्रभाव बिहार और झारखंड के कुछ क्षेत्रों तक बढ़ा।
संगठन अब केवल आंध्र प्रदेश और दंडकारण्य केंद्रित नहीं रहा।
उसके पास उत्तर और पूर्व भारत में भी मजबूत संपर्क और कैडर नेटवर्क बनने लगे।
People's War — ‘Group’ से व्यापक पार्टी तक
समय के साथ ‘People's War Group’ नाम लोकप्रिय बना रहा, लेकिन संगठन स्वयं को अधिक औपचारिक कम्युनिस्ट पार्टी के रूप में विकसित कर रहा था।
उसका लक्ष्य केवल कुछ क्षेत्रों में गुरिल्ला गतिविधि नहीं था।
वह अखिल भारतीय क्रांतिकारी पार्टी बनना चाहता था।
इसलिए 1990 के दशक में उसकी रणनीति में तीन स्पष्ट तत्व थे—
और अन्य माओवादी संगठनों के साथ एकीकरण।
गणपति का उदय
कोंडापल्ली सीतारमैया के हटने के बाद मुप्पला लक्ष्मण राव, जिन्हें ‘गणपति’ के नाम से जाना गया, People's War के प्रमुख नेता बने।
उनके नेतृत्व में संगठन ने अधिक केंद्रीकृत और दीर्घकालीन विस्तार रणनीति अपनाई।
आंध्र प्रदेश के बाहर नए संपर्क बनाए गए।
और MCC से एकीकरण की वार्ता आगे बढ़ी।
MCC — बिहार–झारखंड का दूसरा शक्तिशाली केंद्र
People's War के समानांतर Maoist Communist Centre—MCC बिहार और झारखंड में मजबूत हो रहा था।
उसका संगठनात्मक इतिहास CPI(ML) से अलग था, लेकिन वैचारिक आधार माओवादी था।
MCC ने स्थानीय भूमि संघर्षों, मजदूरी, जातिगत उत्पीड़न, आदिवासी अधिकार और संसाधन नियंत्रण के प्रश्नों पर काम किया।
इसके साथ वह सशस्त्र गुरिल्ला संरचना भी विकसित करता रहा।
MCC और जाति–वर्ग संघर्ष
बिहार में MCC की राजनीति एक ऐसी सामाजिक वास्तविकता से जुड़ी थी जहां वर्ग और जाति अलग नहीं थे।
भूमिहीन मजदूर अक्सर दलित और अत्यंत पिछड़े समुदायों से आते थे।
भूमि पर नियंत्रण प्रभावशाली जातियों के पास अधिक था।
इससे सामाजिक संघर्ष बेहद हिंसक हो सकता था।
निजी सेनाएं और नक्सली संगठन
बिहार के कुछ हिस्सों में रणवीर सेना सहित विभिन्न निजी सशस्त्र समूह उभरे।
इनका घोषित या वास्तविक उद्देश्य नक्सली किसान संगठनों और उनके समर्थक आधार को चुनौती देना था।
इसके परिणामस्वरूप ग्रामीण हिंसा अत्यंत गंभीर रूप ले गई।
नक्सली संगठनों द्वारा भू-स्वामी समर्थकों और विरोधियों की हत्याएं हुईं।
इसके जवाब में निजी सेनाओं द्वारा दलित और गरीब ग्रामीणों पर नरसंहार किए गए।
बिहार से झारखंड — नया भौगोलिक केंद्र
15 नवंबर 2000 को झारखंड अलग राज्य बना।
लेकिन माओवादी राजनीति की दृष्टि से यह भूभाग पहले से महत्वपूर्ण था।
माओवादी संगठन के लिए महत्वपूर्ण मुद्दे बने।
MCC ने विशेष रूप से इस क्षेत्र में मजबूत आधार विकसित किया।
आगे CPI (Maoist) के गठन के बाद झारखंड उसके महत्वपूर्ण राज्यों में रहा।
खनिज संसाधन और संघर्ष
1990 के दशक से माओवादी आंदोलन का एक नया आयाम सामने आया—
और मध्य भारत के अनेक आदिवासी क्षेत्र लौह अयस्क, कोयला, बॉक्साइट और अन्य खनिजों से समृद्ध हैं।
इन क्षेत्रों में खनन परियोजनाएं भूमि अधिग्रहण, विस्थापन और वन अधिकार के प्रश्न पैदा करती थीं।
माओवादी संगठनों ने इस असंतोष को राजनीतिक रूप दिया।
इससे आंदोलन का भूमि प्रश्न किसान खेत से आगे बढ़कर—
ठेकेदार और ‘लेवी’ की व्यवस्था
आधुनिक माओवादी आंदोलन का आर्थिक ढांचा भी मूल नक्सलबाड़ी से अलग था।
भूमिगत संगठन चलाने के लिए धन आवश्यक था।
और निर्माण परियोजनाओं से ‘लेवी’ या जबरन धन वसूलने के आरोप व्यापक रूप से लगे।
यह व्यवस्था आंदोलन की वित्तीय शक्ति का स्रोत बनी।
लेकिन यहीं गंभीर नैतिक और राजनीतिक प्रश्न भी पैदा हुआ।
‘जनताना सरकार’ जैसी स्थानीय संरचनाएं
दंडकारण्य के कुछ माओवादी प्रभाव वाले क्षेत्रों में आगे ‘जनताना सरकार’ जैसे नामों से स्थानीय समानांतर संरचनाएं विकसित की गईं।
और उत्पादन संबंधी प्रश्नों में वैकल्पिक शासन विकसित किया जाए।
यह अवधारणा 1967 की किसान समितियों की बहुत दूर की वैचारिक प्रतिध्वनि थी।
लेकिन पैमाना और संगठनात्मक संरचना बिल्कुल अलग थी।
अब यह दीर्घकालीन भूमिगत माओवादी पार्टी द्वारा संचालित संरचना थी।
गुरिल्ला सेना की ओर
माओवादी आंदोलन के विकास का सबसे बड़ा परिवर्तन था—
छोटे किसान रक्षा दस्तों से संगठित सैन्य संरचना तक जाना।
People's War और MCC दोनों ने अपने सशस्त्र दस्तों को क्रमशः अधिक संगठित किया।
आगे CPI (Maoist) बनने के बाद इन्हीं संरचनाओं को People's Liberation Guerrilla Army—PLGA के तहत अधिक समेकित किया गया।
यह 1967 के तीर-धनुषधारी किसान विद्रोह से बहुत बड़ा परिवर्तन था।
आधुनिक हथियारों की ओर
नक्सलबाड़ी के किसानों के पास मुख्यतः पारंपरिक हथियार थे।
1990 के दशक तक माओवादी संगठनों के पास पुलिस और सुरक्षा बलों से लूटे गए आधुनिक हथियार भी आने लगे।
हमलों का एक उद्देश्य हथियार हासिल करना होता था।
पुलिस चौकियों और सुरक्षा बलों पर घात लगाकर हमले किए जाते।
इससे संगठन की सैन्य क्षमता बढ़ती गई।
बारूदी सुरंग और आईईडी
आधुनिक माओवादी रणनीति का एक अत्यंत घातक तत्व था—
बारूदी सुरंगों और बाद में विभिन्न प्रकार के विस्फोटक उपकरणों का उपयोग।
सड़क से गुजर रहे पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों को निशाना बनाने के लिए विस्फोटक लगाए गए।
इससे जंगल क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की आवाजाही कठिन हुई।
लेकिन ऐसी रणनीति से कई बार नागरिक भी मारे गए।
राजनीतिक सत्ता की नई अवधारणा
गांवों में किसान सत्ता और अंततः राज्य-सत्ता का क्रांतिकारी परिवर्तन।
PWG और MCC ने इस अवधारणा को अधिक दीर्घकालीन रणनीतिक रूप दिया।
वे तुरंत राष्ट्रीय सत्ता पर कब्जा करने की बात से अधिक—
यह मूल CPI(ML) की 1969–71 की तीव्र तात्कालिकता से महत्वपूर्ण अंतर था।
चुनाव बहिष्कार जारी
PWG और MCC दोनों ने संसदीय चुनावों को क्रांतिकारी परिवर्तन का रास्ता नहीं माना।
कई प्रभावित क्षेत्रों में चुनाव बहिष्कार के आह्वान किए गए।
कुछ स्थानों पर मतदान केंद्रों पर हमला या मतदान रोकने की कोशिश भी हुई।
यह रणनीति CPI(ML) Liberation से उनका सबसे स्पष्ट अंतर थी।
Liberation उसी समय चुनावी लोकतंत्र में भाग ले रही थी।
राज्य की प्रतिक्रिया — ‘कानून-व्यवस्था’ से समन्वित प्रतिरोध तक
1990 के दशक तक राज्य सरकारों ने भी महसूस किया कि समस्या किसी एक जिले की नहीं है।
इससे राज्यों के बीच पुलिस और खुफिया समन्वय बढ़ा।
आंध्र प्रदेश की Greyhounds जैसी इकाइयां माओवादी विरोधी अभियान के लिए प्रसिद्ध हुईं।
यह भी आधुनिक माओवादी संघर्ष की विशिष्टता थी—
अब दोनों पक्ष अधिक पेशेवर सैन्य और खुफिया संरचनाएं विकसित कर रहे थे।
शांति वार्ता की कोशिशें
माओवादी संघर्ष केवल सैन्य अभियान तक सीमित नहीं रहा।
कुछ राज्यों में सरकारों ने बातचीत की कोशिशें भी कीं।
विशेषकर आंध्र प्रदेश में समय-समय पर युद्धविराम और वार्ता की मांग उठती रही।
नागरिक समाज के कुछ समूहों ने मध्यस्थता की।
क्या सरकार उन्हें वैध राजनीतिक संगठन के रूप में खुले काम की अनुमति देगी?
इन प्रश्नों पर स्थायी समझौता नहीं हो सका।
PWG और MCC में एकता की आवश्यकता
1990 के दशक के अंत तक यह स्पष्ट था कि भारत में भूमिगत माओवादी आंदोलन दो बड़ी शक्तियों में विभाजित है—
दोनों ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में सक्रिय थे।
दोनों संसदीय राजनीति को खारिज करते थे।
फिर भी ऐतिहासिक संगठनात्मक मतभेद और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा उनके बीच बाधा थे।
लेकिन राज्य की बढ़ती समन्वित प्रतिक्रिया ने भी उन्हें एकीकरण की दिशा में प्रेरित किया।
आपसी संघर्ष भी हुआ
यह मानना गलत होगा कि PWG और MCC हमेशा मित्र संगठन थे।
कुछ क्षेत्रों में दोनों के बीच प्रभाव को लेकर प्रतिस्पर्धा और हिंसक टकराव भी हुए।
विशेष रूप से बिहार–झारखंड के कुछ क्षेत्रों में संगठनात्मक वर्चस्व का प्रश्न गंभीर रहा।
इसका अर्थ था कि एकीकरण केवल वैचारिक प्रक्रिया नहीं था।
MCC का MCCI बनना
2003 में MCC ने कुछ अन्य माओवादी समूहों के साथ एकीकरण के बाद Maoist Communist Centre of India—MCCI नाम अपनाया।
इससे वह 2004 के विलय से पहले और अधिक व्यापक संगठन बना।
अब मुख्य बातचीत People's War और MCCI के बीच थी।
दोनों का विलय भारत के भूमिगत माओवादी आंदोलन का सबसे बड़ा संगठनात्मक एकीकरण बनने वाला था।
2004 — अंतिम वार्ता
2004 तक People's War और MCCI के बीच एकीकरण को लेकर महत्वपूर्ण सहमति बन चुकी थी।
अलग-अलग रहकर राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव सीमित रहेगा।
सुरक्षा बलों के बढ़ते समन्वय के सामने संयुक्त संरचना आवश्यक है।
समान राजनीतिक दस्तावेज और सैन्य रणनीति तैयार की जानी चाहिए।
इसी वार्ता का परिणाम सितंबर 2004 में सामने आया।
21 सितंबर 2004 — CPI (Maoist) का गठन
21 सितंबर 2004 को People's War और Maoist Communist Centre of India के विलय से नई पार्टी बनी—
Communist Party of India (Maoist)
यह आधुनिक भारतीय माओवादी आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण संगठनात्मक मोड़ था।
अब पहली बार दो सबसे बड़ी भूमिगत माओवादी धाराएं एक पार्टी में आ गईं।
और अन्य क्षेत्रों के नेटवर्क अधिक संगठित रूप से जुड़े।
2004 के बाद ‘माओवादी’ शब्द भारत के सुरक्षा और राजनीतिक विमर्श में अधिक स्पष्ट संगठनात्मक अर्थ ग्रहण करता है।
14 अक्टूबर 2004 — सार्वजनिक घोषणा का महत्व
हालांकि संगठनात्मक विलय 21 सितंबर 2004 को प्रभावी माना जाता है, इसकी सार्वजनिक घोषणा बाद में अक्टूबर में की गई।
इस कारण विभिन्न लोकप्रिय विवरणों में 21 सितंबर और अक्टूबर की तारीखों के बीच भ्रम मिलता है।
ऐतिहासिक रूप से अंतर रखना आवश्यक है—
21 सितंबर 2004 — संगठनात्मक गठन/विलय की तारीख।
अक्टूबर 2004 — नई पार्टी के गठन की सार्वजनिक घोषणा का चरण।
गणपति — नए संगठन के महासचिव
नई CPI (Maoist) में People's War के प्रमुख नेता गणपति केंद्रीय नेतृत्व के सबसे महत्वपूर्ण चेहरे बने।
यह चयन संगठनात्मक शक्ति-संतुलन भी दर्शाता था।
People's War का क्षेत्रीय विस्तार और सैन्य संरचना अपेक्षाकृत अधिक विकसित थी।
MCCI की बिहार–झारखंड में महत्वपूर्ण शक्ति थी।
दोनों को एक केंद्रीय संरचना में समेटना आसान नहीं था।
गणपति ने लंबे समय तक इस संयुक्त संगठन का नेतृत्व किया।
नई पार्टी की वैचारिक पहचान
पर आधारित क्रांतिकारी पार्टी घोषित किया।
भारतीय राज्य को सशस्त्र दीर्घकालीन जनयुद्ध के माध्यम से उखाड़ना और ‘नई जनवादी क्रांति’ स्थापित करना।
इस रणनीति में चुनावी लोकतंत्र को मूल परिवर्तन का रास्ता नहीं माना गया।
यानी 1969 की CPI(ML) की क्रांतिकारी आकांक्षा अब अधिक संगठित और दीर्घकालीन माओवादी रूप में पुनः सामने आई।
PLGA — सैन्य ढांचे का एकीकरण
CPI (Maoist) के गठन के बाद विभिन्न सशस्त्र संरचनाओं को People's Liberation Guerrilla Army—PLGA के तहत समेकित किया गया।
यह आधुनिक माओवादी आंदोलन की सैन्य रीढ़ बनी।
स्थानीय गुरिल्ला दस्तों से लेकर अधिक प्रशिक्षित इकाइयों तक कई स्तर बनाए गए।
यहीं नक्सलबाड़ी की स्थानीय हथियारबंद किसान टोली और आधुनिक माओवादी गुरिल्ला सेना के बीच ऐतिहासिक दूरी सबसे स्पष्ट दिखाई देती है।
केंद्रीय सैन्य आयोग और पार्टी संरचना
नई पार्टी ने केंद्रीय समिति और पोलित ब्यूरो जैसी संरचनाओं के साथ सैन्य मामलों के लिए भी केंद्रीकृत व्यवस्था विकसित की।
एक बहुस्तरीय संरचना का हिस्सा बनीं।
राजनीतिक नेतृत्व और सैन्य कार्रवाई को एकीकृत रखना।
यह मूल CPI(ML) की तुलना में अधिक संस्थागत भूमिगत पार्टी मॉडल था।
नक्सलबाड़ी से क्या निरंतरता बची?
2004 के CPI (Maoist) और 1967 के नक्सलबाड़ी के बीच कुछ वास्तविक निरंतरताएं थीं।
भूमि और गरीब ग्रामीण जनता को क्रांतिकारी राजनीति का प्रमुख आधार मानना।
संसदीय राजनीति के प्रति अविश्वास या अस्वीकार।
ग्रामीण क्षेत्रों में वैकल्पिक सत्ता बनाने की अवधारणा।
राज्य-सत्ता के क्रांतिकारी परिवर्तन का लक्ष्य।
इसी कारण CPI (Maoist) स्वयं को नक्सलबाड़ी की विरासत का उत्तराधिकारी मानता रहा।
लेकिन क्या बदल चुका था?
आधुनिक गुरिल्ला संरचना और विस्फोटक क्षमता।
भूमि, जंगल, खनिज, आदिवासी अधिकार, राज्य-सुरक्षा बल, विकास परियोजनाएं और राष्ट्रीय सत्ता।
किसान समितियां और स्थानीय कम्युनिस्ट नेतृत्व।
केंद्रीय समिति, सैन्य आयोग और व्यापक भूमिगत संरचना।
इसलिए दोनों को ‘एक ही आंदोलन’ कहना केवल वैचारिक वंशावली के स्तर पर ही सही है; सामाजिक और संगठनात्मक रूप से नहीं।
किसान आंदोलन से माओवादी विद्रोह तक
यहीं नक्सलबाड़ी की मूल कथा में सबसे बड़ा ऐतिहासिक परिवर्तन पूरा होता है।
इस क्रम को समझे बिना आधुनिक माओवादी संघर्ष का इतिहास अधूरा रहेगा।
‘रेड कॉरिडोर’ की राजनीतिक शक्ति
2004 के बाद CPI (Maoist) के पास ऐसा व्यापक भूगोल था जिसने केंद्र सरकार की चिंता बढ़ाई।
और बिहार तक विभिन्न स्तरों पर उसका प्रभाव था।
इससे पहली बार केंद्र सरकार को राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित वामपंथी उग्रवाद विरोधी नीति विकसित करने की आवश्यकता महसूस हुई।
आगे ‘Left Wing Extremism—LWE’ सरकारी शब्दावली का प्रमुख हिस्सा बनेगा।
क्या पूरा ‘रेड कॉरिडोर’ माओवादी नियंत्रण में था?
यह लोकप्रिय मीडिया की सबसे बड़ी अतिशयोक्तियों में से एक रही।
किसी जिले को ‘माओवादी प्रभावित’ कहा जाना और उस जिले पर माओवादी नियंत्रण होना अलग बातें हैं।
कई जिलों में केवल कुछ ब्लॉक प्रभावित थे।
कहीं जंगल क्षेत्र सक्रिय था लेकिन जिला मुख्यालय सामान्य प्रशासन के नियंत्रण में था।
कहीं केवल आवागमन या संपर्क नेटवर्क था।
समानांतर सत्ता का वास्तविक स्तर
कुछ अत्यंत मजबूत क्षेत्रों में माओवादी संगठन स्थानीय विवादों,
2004 के बाद माओवादी आंदोलन और भारतीय राज्य
:::writing{variant="document" id="86421" title="खंड 10 — 2004 के बाद माओवादी आंदोलन और भारतीय राज्य : सलवा जुडूम से 2026 तक"}
प्रस्तावना : 2004 के बाद संघर्ष का केंद्र बदल गया
21 सितंबर 2004 को People's War और Maoist Communist Centre of India के विलय से CPI (Maoist) का गठन होने के बाद नक्सलवादी आंदोलन एक नए चरण में प्रवेश कर गया। अब उसका प्रमुख केंद्र न तो नक्सलबाड़ी था और न कलकत्ता। संघर्ष का नया भूगोल मध्य और पूर्वी भारत के वन तथा आदिवासी क्षेत्र थे—विशेष रूप से छत्तीसगढ़ का बस्तर–दंडकारण्य क्षेत्र।
2004 के बाद सबसे महत्वपूर्ण रणक्षेत्र — बस्तर
आधुनिक माओवादी आंदोलन के इतिहास में बस्तर का महत्व वैसा ही है जैसा 1967 के आंदोलन में नक्सलबाड़ी का था—लेकिन दोनों की सामाजिक और सैन्य संरचना बिल्कुल अलग थी।
माओवादी गतिविधियों के मुख्य केंद्र बने।
यह क्षेत्र गुरिल्ला युद्ध के लिए अनुकूल था।
और छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तेलंगाना तथा ओडिशा की सीमाओं का संपर्क—
इन सबने माओवादी संगठन को गतिशीलता प्रदान की।
छत्तीसगढ़ राज्य का गठन और नया सुरक्षा संदर्भ
1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ राज्य बना।
नए राज्य के सामने सबसे कठिन प्रशासनिक चुनौतियों में से एक था—
दक्षिण बस्तर में बढ़ता माओवादी प्रभाव।
राज्य गठन के बाद प्रशासनिक ढांचा धीरे-धीरे फैलाया गया, लेकिन बहुत से आदिवासी इलाकों में सरकारी उपस्थिति कमजोर रही।
यहीं CPI (Maoist) ने अपना आधार गहरा किया।
सलवा जुडूम का उदय
2005 के आसपास दक्षिण बस्तर में सलवा जुडूम नाम से माओवादी-विरोधी जन अभियान उभरा।
इसके सबसे प्रमुख राजनीतिक चेहरे कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री महेंद्र कर्मा बने।
सलवा जुडूम की उत्पत्ति को लेकर प्रारंभ से दो विरोधी व्याख्याएं रही हैं।
एक दृष्टिकोण यह था कि यह माओवादी हिंसा और जबरन नियंत्रण के खिलाफ स्थानीय आदिवासियों का स्वतःस्फूर्त प्रतिरोध था।
सलवा जुडूम का सामाजिक आधार
माओवादी प्रभाव वाले गांवों के सभी आदिवासी माओवादियों के समर्थक नहीं थे।
स्थानीय राजनीतिक गतिविधियों को नियंत्रित करने,
और सरकारी कार्यक्रमों में बाधा डालने—
इसीलिए कुछ स्थानीय लोग माओवादियों के खिलाफ संगठित हुए।
लेकिन समस्या तब गहरी हुई जब माओवादी-विरोधी स्थानीय समूह और राज्य की सुरक्षा संरचना एक-दूसरे में मिश्रित होने लगे।
युवा आदिवासियों को विशेष पुलिस अधिकारी—SPO—के रूप में भर्ती कर हथियार दिए गए।
गांवों का खाली होना और राहत शिविर
सलवा जुडूम–माओवादी टकराव के दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीण अपने गांव छोड़कर सड़क किनारे या सरकारी सहायता प्राप्त शिविरों में पहुंचे।
सर्वोच्च न्यायालय के सामने आए NHRC रिकॉर्ड में एक समय लगभग 40,000 आदिवासियों के 23 राहत शिविरों में रहने का उल्लेख था।
इस विस्थापन की व्याख्या विवादित रही।
सरकार समर्थक पक्ष इसे माओवादी हिंसा से सुरक्षा के लिए आवश्यक मानता था।
माओवादी प्रतिहिंसा
सलवा जुडूम के जवाब में CPI (Maoist) ने भी हिंसक प्रतिक्रिया दी।
पुलिस समर्थक समझे जाने वाले ग्रामीण,
इससे गांवों में सामाजिक विभाजन बेहद गहरा हुआ।
एक ही आदिवासी समाज के लोग अलग-अलग पक्षों में खड़े हो गए।
कई परिवारों के सदस्य अलग पक्षों में चले गए।
आधुनिक बस्तर संघर्ष की यह सबसे त्रासद विशेषताओं में थी—
सुरक्षा बलों और SPO पर मानवाधिकार आरोप
सलवा जुडूम और SPO व्यवस्था पर गांव जलाने, लूटपाट, हत्या और अन्य मानवाधिकार उल्लंघनों के गंभीर आरोप लगे।
सर्वोच्च न्यायालय ने बाद में उल्लेख किया कि NHRC ने लूट, आगजनी और हिंसा की कुछ घटनाओं को SPO तथा सुरक्षा बलों से जोड़ा था।
यह तथ्य महत्वपूर्ण है क्योंकि अदालत का प्रश्न केवल प्रतिनक्सल नीति की प्रभावशीलता नहीं था।
नंदिनी सुंदर बनाम छत्तीसगढ़ राज्य
2007 में समाजशास्त्री नंदिनी सुंदर, इतिहासकार रामचंद्र गुहा और पूर्व नौकरशाह ई.ए.एस. सरमा सहित याचिकाकर्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया।
Nandini Sundar & Others v. State of Chhattisgarh।
याचिका में माओवादी हिंसा के साथ प्रतिनक्सल अभियानों और सलवा जुडूम से जुड़े मानवाधिकार उल्लंघनों का प्रश्न उठाया गया।
5 जुलाई 2011 — सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक आदेश
5 जुलाई 2011 को सर्वोच्च न्यायालय ने अत्यंत महत्वपूर्ण आदेश दिया।
अदालत ने छत्तीसगढ़ सरकार को निर्देश दिया कि वह माओवादी-विरोधी गतिविधियों में SPO का उपयोग बंद करे।
केंद्र सरकार से कहा गया कि ऐसे SPO की प्रतिनक्सल भूमिका के लिए धन देना बंद करे।
राज्य को SPO को जारी किए गए हथियार वापस लेने की दिशा में कार्रवाई करने को कहा गया।
सर्वोच्च न्यायालय का बड़ा सिद्धांत
इस फैसले का महत्व सलवा जुडूम से कहीं बड़ा था।
राज्य किसी गैरकानूनी सशस्त्र विद्रोह से लड़ते समय स्वयं संविधान से बाहर नहीं जा सकता।
कम शिक्षित अथवा अपर्याप्त प्रशिक्षित आदिवासी युवाओं को हथियार देकर नियमित पुलिस की भूमिका सौंपना अदालत ने गंभीर संवैधानिक समस्या माना।
अर्थात माओवादी हिंसा जितनी भी गंभीर क्यों न हो—
क्या सलवा जुडूम समाप्त हो गया?
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद सलवा जुडूम का पुराना औपचारिक स्वरूप समाप्त हुआ।
लेकिन बस्तर में स्थानीय आदिवासी युवाओं को सुरक्षा बलों में शामिल करने का प्रश्न समाप्त नहीं हुआ।
राज्य ने आगे नियमित प्रशिक्षण और कानूनी ढांचे के भीतर स्थानीय भर्ती आधारित इकाइयां विकसित कीं।
विशेष रूप से District Reserve Guard—DRG आगे छत्तीसगढ़ की माओवादी-विरोधी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।
स्थानीय भर्ती का रणनीतिक महत्व
माओवादी गुरिल्ला जंगल, गांव, स्थानीय भाषा और पगडंडियों से परिचित थे।
बाहरी सुरक्षा बलों को इस भूगोल में भारी कठिनाई होती थी।
स्थानीय आदिवासी युवाओं की पुलिस और DRG में भर्ती ने राज्य को स्थानीय जानकारी प्रदान की।
स्थानीय सामाजिक नेटवर्क पहचानते थे,
और माओवादी गतिविधियों के पैटर्न से परिचित हो सकते थे।
2009 और ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ की बहस
2009 के आसपास केंद्र और राज्यों द्वारा माओवादी प्रभावित क्षेत्रों में केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाने को मीडिया में व्यापक रूप से ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ कहा गया।
लेकिन यह ध्यान रखना आवश्यक है कि भारत सरकार ने लंबे समय तक स्पष्ट किया कि ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ कोई आधिकारिक राष्ट्रीय अभियान-नाम नहीं था।
यह मुख्यतः मीडिया और राजनीतिक विमर्श में इस्तेमाल हुआ शब्द था।
6 अप्रैल 2010 — दंतेवाड़ा का सबसे घातक हमला
6 अप्रैल 2010 को दंतेवाड़ा के चिंतलनार–ताड़मेटला क्षेत्र में माओवादियों ने सुरक्षा बलों पर विशाल घात लगाया।
गृह मंत्रालय के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार 75 CRPF जवान और एक राज्य पुलिसकर्मी—कुल 76 सुरक्षाकर्मी—मारे गए।
CRPF के अपने विवरण के अनुसार माओवादियों ने ऊंचे स्थानों पर पहले से स्थिति लेकर घात बनाया, IED और भारी गोलीबारी का प्रयोग किया तथा बड़ी संख्या में लड़ाके शामिल थे।
2010 ने क्या सिद्ध किया?
दंतेवाड़ा हमला बताता था कि CPI (Maoist) केवल छोटे पुलिस दलों पर हमला करने वाला संगठन नहीं रहा था।
2010 माओवादी सैन्य शक्ति के चरम काल का प्रतीक माना जा सकता है।
उसी वर्ष सरकारी आंकड़ों में LWE से संबंधित 1,936 हिंसक घटनाएं और 1,005 मौतें दर्ज हुईं—बाद के सरकारी तुलनात्मक आंकड़ों में यही उच्चतम बिंदुओं में गिना गया है।
2010 में नागरिक भी भारी कीमत चुकाते हैं
माओवादी हिंसा केवल सुरक्षा बलों तक सीमित नहीं थी।
17 मई 2010 को दंतेवाड़ा में माओवादी भूमि सुरंग विस्फोट में सुरक्षा बलों के साथ नागरिक भी मारे गए। गृह मंत्रालय के रिकॉर्ड में उस घटना में 16 सुरक्षाकर्मियों और 15 नागरिकों की मृत्यु दर्ज है।
यह तथ्य उस धारणा को चुनौती देता है कि आधुनिक माओवादी युद्ध केवल ‘राज्य बनाम विद्रोही’ था।
2004–25 में नागरिकों की मृत्यु
गृह मंत्रालय की वर्तमान LWE सामग्री के अनुसार 2004 से 30 नवंबर 2025 तक माओवादी/LWE हिंसा में 8,956 लोगों की मृत्यु हुई और सरकार ने विशेष रूप से उल्लेख किया है कि इनमें बड़ी संख्या आदिवासी तथा आर्थिक रूप से कमजोर नागरिकों की रही।
यह आंकड़ा नक्सलबाड़ी की मूल राजनीतिक दावेदारी के सामने गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
25 मई 2013 — झीरम घाटी हमला
2013 में माओवादियों ने राजनीतिक नेतृत्व को अभूतपूर्व स्तर पर निशाना बनाया।
25 मई 2013 को बस्तर की झीरम घाटी में कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं के काफिले पर घात लगाकर हमला किया गया।
महेंद्र कर्मा को विशेष रूप से निशाना क्यों बनाया गया?
महेंद्र कर्मा सलवा जुडूम के सबसे प्रमुख राजनीतिक चेहरों में थे।
इसलिए CPI (Maoist) उन्हें अपने प्रमुख शत्रुओं में मानता था।
झीरम घाटी हमले में उनका मारा जाना प्रतीकात्मक था।
यह केवल चुनावी प्रतिद्वंद्वी पर हमला नहीं था।
माओवादियों के लिए यह सलवा जुडूम की राजनीति के खिलाफ प्रतिशोध भी था।
यहीं हिंसा की लंबी स्मृति स्पष्ट दिखाई देती है—
राजनीतिक लोकतंत्र को चुनौती
झीरम घाटी हमला इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि लक्ष्य कोई सुरक्षा चौकी नहीं थी।
वह एक राजनीतिक दल का सार्वजनिक काफिला था।
यदि माओवादी किसी क्षेत्र में राजनीतिक दलों को प्रचार और संगठन से हिंसा के माध्यम से रोकते हैं, तो वहां लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा कैसे संभव होगी?
नक्सलबाड़ी की मूल बहस भूमि सुधार की थी।
सुरक्षा रणनीति का बदलना
2010 के भारी नुकसान के बाद राज्य ने केवल अधिक बल भेजने की रणनीति पर निर्भर नहीं रहना चाहा।
और छोटे लेकिन स्थायी सुरक्षा शिविरों पर।
और अन्य विशेष इकाइयों का महत्व बढ़ा।
रणनीति धीरे-धीरे ‘बड़े अभियान’ से आगे बढ़कर—
सुरक्षा शिविर क्यों निर्णायक थे?
यदि किसी गांव तक पुलिस या प्रशासन पहुंचने में कई घंटे या दिन लगते हों, तो भूमिगत संगठन के लिए वहां प्रभाव बनाए रखना आसान होता है।
इसलिए नई रणनीति में सुरक्षा शिविरों को लगातार जंगल के भीतर आगे बढ़ाया गया।
इस रणनीति का असर विशेष रूप से 2020 के दशक में दिखाई दिया।
सड़क का सुरक्षा अर्थ
माओवादी संघर्ष में सड़क का दोहरा अर्थ था।
माओवादी संगठनों ने कई स्थानों पर सड़क निर्माण का विरोध किया क्योंकि इससे सुरक्षा बलों की पहुंच बढ़ती थी।
राज्य ने उसी कारण सड़क को विकास और सुरक्षा दोनों का साधन बनाया।
मोबाइल टावर और सूचना का युद्ध
दूरस्थ क्षेत्र में मोबाइल नेटवर्क का विस्तार भी रणनीतिक था।
और सुरक्षा एजेंसियों की संचार क्षमता बढ़ती है।
2025 की सरकारी समीक्षा के अनुसार LWE प्रभावित क्षेत्रों में 8,500 से अधिक मोबाइल टावर संचालित किए जा चुके थे और 12,000 किलोमीटर से अधिक सड़कों के निर्माण का उल्लेख किया गया।
यह बताता है कि आधुनिक प्रतिनक्सल रणनीति केवल बंदूक की नहीं थी।
2015 — राष्ट्रीय नीति और कार्ययोजना
2015 में केंद्र सरकार ने National Policy and Action Plan to Address Left Wing Extremism को मंजूरी दी।
2026 तक सरकार इसी योजना को LWE के संकुचन की मुख्य नीतिगत आधारशिला बताती रही।
यह नीति महत्वपूर्ण थी क्योंकि उसने औपचारिक रूप से स्वीकार किया—
माओवादी समस्या केवल पुलिस द्वारा हल होने वाली समस्या नहीं है।
विकास बनाम सुरक्षा — गलत द्वंद्व
नक्सलवाद पर लंबे समय तक बहस दो चरमों में चली।
गरीबी और विकास की कमी दूर कर दो, नक्सलवाद समाप्त हो जाएगा।
पहले सुरक्षा स्थापित करो, विकास अपने आप आएगा।
व्यावहारिक अनुभव ने दिखाया कि दोनों को अलग करना कठिन है।
बिना प्रशासन अधिकार लागू नहीं होते।
लेकिन यदि सुरक्षा बल पहुंच जाएं और भूमि, वन, शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय न पहुंचे—
वन अधिकार और माओवादी प्रभाव
2006 का Forest Rights Act आदिवासी और वनवासी समुदायों के लिए महत्वपूर्ण कानूनी परिवर्तन था।
ऐतिहासिक वन अधिकारों को मान्यता देने का उद्देश्य था।
माओवादी क्षेत्रों में इसका महत्व विशेष था क्योंकि वन भूमि पर अधिकार संघर्ष का प्रमुख कारण था।
लेकिन कानून का प्रभाव उसके क्रियान्वयन पर निर्भर था।
और सामुदायिक अधिकारों का धीमा क्रियान्वयन—
खनन और विस्थापन
छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा के कई माओवादी प्रभावित क्षेत्र खनिज संपदा से समृद्ध हैं।
लेकिन उससे भूमि अधिग्रहण और विस्थापन भी हो सकता है।
यदि स्थानीय समुदाय को लगे कि उसकी जमीन और जंगल बाहर की कंपनियों के लिए जा रहे हैं, तो असंतोष पैदा होता है।
माओवादी संगठनों ने इसी असंतोष का राजनीतिक उपयोग किया।
आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति
राज्य ने 2010 के दशक में एक और रणनीति पर जोर बढ़ाया—
हथियार छोड़ने वालों के लिए पुनर्वास।
इसका उद्देश्य था कि हर माओवादी कार्यकर्ता को अंत तक लड़ने के लिए बाध्य न होना पड़े।
जैसे प्रावधान राज्यों की नीतियों के अनुसार दिए गए।
2024–26 में बड़े पैमाने पर आत्मसमर्पण माओवादी संगठन की कमजोरी का महत्वपूर्ण संकेत बना।
2017 — सुकमा हमला
24 अप्रैल 2017 को सुकमा क्षेत्र में CRPF पर बड़ा माओवादी हमला हुआ जिसमें बड़ी संख्या में जवान मारे गए।
इस प्रकार की घटनाओं ने दिखाया कि 2010 के बाद भी माओवादी सैन्य क्षमता समाप्त नहीं हुई थी।
विशेष रूप से सड़क निर्माण और सुरक्षा क्षेत्र-विस्तार से जुड़े दल अक्सर निशाना बने।
2021 — टेकलगुड़ा का झटका
अप्रैल 2021 में बीजापुर–सुकमा सीमा के टेकलगुड़ा क्षेत्र में सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच भीषण संघर्ष हुआ।
यह घटना महत्वपूर्ण थी क्योंकि उस समय तक माओवादी प्रभाव में कमी की प्रवृत्ति दिखाई देने लगी थी, फिर भी उनके कुछ केंद्रीय गुरिल्ला क्षेत्रों में बड़ी सैन्य क्षमता मौजूद थी।
भौगोलिक संकुचन का अर्थ तुरंत सैन्य निष्क्रियता नहीं है।
माओवादी शक्ति का नया स्वरूप
2010 के दशक के उत्तरार्ध तक माओवादी आंदोलन की स्थिति विरोधाभासी थी।
कई पुराने क्षेत्र उससे बाहर निकल रहे थे।
लेकिन बस्तर, अबूझमाड़ और कुछ सीमावर्ती वन क्षेत्रों में उसकी शक्ति अधिक केंद्रित हो गई थी।
क्षेत्र छोटा, लेकिन कुछ हिस्सों में संगठन सघन।
यह सुरक्षा बलों के लिए नई चुनौती थी।
पश्चिम बंगाल में लगभग अंत
जिस पश्चिम बंगाल से 1967 में आंदोलन शुरू हुआ था, वहां इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक तक माओवादी गतिविधि बहुत घट चुकी थी।
लालगढ़–जंगलमहल आंदोलन के दौरान 2008–11 के आसपास गतिविधियां फिर उभरीं, लेकिन राज्य कार्रवाई और राजनीतिक परिवर्तन के बाद वह चरण भी कमजोर पड़ा।
लेकिन पश्चिम बंगाल आधुनिक माओवादी विद्रोह का केंद्रीय क्षेत्र नहीं रहा।
बिहार में भी संकुचन
बिहार, जो 1970–90 के दशकों में नक्सली संघर्ष का बड़ा केंद्र था, धीरे-धीरे मुख्य प्रभावित श्रेणी से बाहर आने लगा।
और नक्सली संगठनों की नेतृत्व कमजोरी—
2024 तक सरकारी LWE प्रभावित जिलों की सूची में बिहार का कोई जिला नहीं था। 2026 के सरकारी तुलनात्मक आंकड़े भी इस संकुचन की पुष्टि करते हैं।
आंध्र प्रदेश — सबसे महत्वपूर्ण प्रतिनक्सल अनुभव
आंध्र प्रदेश कभी PWG का मुख्य क्षेत्र था।
लेकिन राज्य ने विशेष पुलिस बल Greyhounds, खुफिया नेटवर्क और स्थानीय स्तर की नीति के संयोजन से माओवादी संगठन को भारी नुकसान पहुंचाया।
2000 के दशक के मध्य के बाद संगठन का प्रमुख आधार आंध्र से दंडकारण्य की ओर और खिसकता गया।
यह उदाहरण दिखाता है कि एक समय का मजबूत माओवादी आधार स्थायी नहीं होता।
झारखंड और ओडिशा का क्षरण
झारखंड और ओडिशा में लंबे समय तक MCC/PWG और बाद में CPI (Maoist) के नेटवर्क सक्रिय रहे।
लेकिन 2010 के दशक के उत्तरार्ध और 2020 के दशक में—
2025 तक सरकारी सूची में LWE प्रभावित जिलों की संख्या केवल 11 रह गई थी और इनमें सबसे अधिक प्रभावित केवल तीन जिले—बीजापुर, सुकमा और नारायणपुर—बताए गए।
2024 — राज्य के प्रतिआक्रमण का नया चरण
2024 से छत्तीसगढ़ में सुरक्षा बलों ने माओवादी कोर क्षेत्रों पर बहुत अधिक आक्रामक और निरंतर अभियान शुरू किए।
सुरक्षा शिविर जंगल के भीतर आगे बढ़े।
DRG, STF, CRPF और CoBRA के बीच समन्वय बढ़ा।
माओवादी संगठन को उसके सुरक्षित भौगोलिक आधार से बाहर करना।
अबूझमाड़ जैसे क्षेत्र, जिन्हें दशकों से कठिन माओवादी गढ़ माना जाता था, प्रत्यक्ष अभियानों के केंद्र बने।
सुरक्षा अभियान की नई प्रकृति
नई रणनीति में कई तत्व एक साथ दिखाई दिए—
और अभियान के बाद स्थायी पुलिस शिविर।
इससे पुरानी समस्या कम हुई जिसमें सुरक्षा बल अभियान के बाद क्षेत्र खाली कर देते थे और माओवादी वापस लौट आते थे।
clear के बाद hold और फिर development।
यानी क्षेत्र लेना, वहां बने रहना और प्रशासन पहुंचाना।
2024–25 में शीर्ष नेतृत्व पर दबाव
माओवादी संगठन की बड़ी शक्ति लंबे समय तक उसका अनुभवी केंद्रीय नेतृत्व रहा था।
बसवराजू का महत्व
बसवराजू केवल राजनीतिक महासचिव नहीं था।
नक्सलबाड़ी आंदोलन में आदिवासी, दलित, भूमिहीन किसान और महिलाओं की भूमिका
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प्रस्तावना : नक्सलबाड़ी का इतिहास केवल नेताओं का इतिहास नहीं
नक्सलबाड़ी का इतिहास अक्सर चारु मजूमदार, कानू सान्याल, जंगल संथाल, CPI(ML), People's War, MCC और CPI (Maoist) के संदर्भ में लिखा जाता है। लेकिन इस आंदोलन की वास्तविक सामाजिक ऊर्जा उन समुदायों से आई जिनका नाम बड़े राजनीतिक दस्तावेजों में अक्सर पीछे छूट जाता है—आदिवासी किसान, बर्गादार, खेतिहर मजदूर, दलित ग्रामीण, गरीब महिलाएं और वे परिवार जिनके लिए भूमि और जंगल रोजमर्रा के जीवन का प्रश्न थे।
संथाल समाज और नक्सलबाड़ी का आधार
नक्सलबाड़ी क्षेत्र में संथाल समुदाय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
संथाल समुदाय का भूमि संघर्ष से ऐतिहासिक संबंध उन्नीसवीं सदी तक जाता है।
अब प्रश्न औपनिवेशिक राज के विरुद्ध नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत के भीतर ग्रामीण भूमि संरचना का था।
इसलिए उनकी आर्थिक स्थिति बहुस्तरीय थी।
हर संथाल किसान समान वर्ग स्थिति में नहीं था।
जंगल संथाल — प्रतीक से अधिक
जंगल संथाल को केवल एक आदिवासी प्रतीक के रूप में देखना उनके महत्व को कम करना होगा।
उनकी शक्ति इस बात में थी कि वे स्थानीय ग्रामीण समाज की भाषा, संबंध और सामाजिक संरचना को समझते थे।
वे उन किसानों के बीच काम कर सकते थे जिनके लिए मार्क्सवाद या माओवाद की अमूर्त भाषा से अधिक महत्वपूर्ण था—
राजबंशी समाज की भूमिका
उत्तर बंगाल में राजबंशी समुदाय भी कृषि समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा था।
राजबंशी समुदाय के भीतर आर्थिक स्थिति एकसमान नहीं थी।
इसलिए नक्सलबाड़ी संघर्ष को ‘आदिवासी बनाम गैर-आदिवासी’ रूप में समझना गलत होगा।
संघर्ष की मुख्य रेखा आर्थिक शक्ति और भूमि नियंत्रण पर आधारित थी।
राजबंशी गरीब किसान और संथाल गरीब किसान कई बार समान वर्गीय स्थिति में खड़े थे।
जातीय पहचान और वर्ग का संबंध
नक्सलबाड़ी का सामाजिक विश्लेषण एक महत्वपूर्ण सावधानी मांगता है।
आदिवासी पहचान और गरीब किसान की पहचान अक्सर एक-दूसरे से जुड़ सकती थीं, लेकिन वे एक ही चीज नहीं थीं।
इसलिए केवल जातीय पहचान से वर्गीय संबंध नहीं समझे जा सकते।
ठीक उसी प्रकार केवल वर्ग विश्लेषण से समुदाय की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान पूरी तरह नहीं समझी जा सकती।
भूमिहीन किसान — आंदोलन की सबसे विस्फोटक शक्ति
भूमिहीन किसान के पास खोने के लिए जमीन नहीं थी क्योंकि उसके पास जमीन थी ही नहीं।
लेकिन उसकी रोजी पूरी तरह कृषि पर निर्भर थी।
जोतदार से विवाद हुआ तो रोजगार समाप्त।
ऋण बढ़ा तो आर्थिक निर्भरता और गहरी।
ऐसे किसान के लिए भूमि सुधार का अर्थ था—
इसीलिए भूमि कब्जे की क्रांतिकारी भाषा उसे आकर्षित कर सकती थी।
बर्गादार — स्वामित्व और श्रम के बीच फंसा किसान
बर्गादार नक्सलबाड़ी की मूल सामाजिक संरचना में केंद्रीय वर्ग था।
स्वामित्व और श्रम के बीच यही विभाजन किसान राजनीति का मूल संघर्ष था।
तेभागा ने फसल के हिस्से का प्रश्न उठाया था।
नक्सलबाड़ी की उग्र धारा ने सवाल आगे बढ़ाया—
यदि किसान ही जमीन जोतता है, तो जमीन का अधिकार आखिर किसका होना चाहिए?
खेतिहर मजदूर और किसान में अंतर
नक्सलबाड़ी की भाषा में ‘किसान’ शब्द व्यापक अर्थ में इस्तेमाल होता था।
लेकिन खेतिहर मजदूर और छोटा किसान अलग आर्थिक वर्ग हैं।
छोटे किसान के पास कुछ भूमि हो सकती है।
खेतिहर मजदूर का मुख्य संसाधन उसका श्रम है।
भूमि क्रांति उसके लिए तभी सार्थक है जब उसे वास्तविक भूमि मिले या मजदूरी संबंध बदलें।
आगे बिहार में यही अंतर बहुत महत्वपूर्ण होने वाला था।
महिलाओं का अदृश्य कृषि श्रम
नक्सलबाड़ी के गांवों में महिलाएं कृषि उत्पादन का अभिन्न हिस्सा थीं।
लेकिन भूमि अभिलेखों में मालिकाना अधिकार प्रायः पुरुषों के नाम होता था।
इसलिए कृषि उत्पादन में महिला की भूमिका बड़ी थी, संपत्ति अधिकार छोटा।
यही लिंग असमानता भूमि संघर्ष के भीतर भी मौजूद थी।
प्रसादुजोत की महिलाओं की उपस्थिति
25 मई 1967 की पुलिस गोलीबारी में महिलाओं की बड़ी संख्या में मृत्यु इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि महिलाएं आंदोलन की परिधि में नहीं थीं।
उनकी उपस्थिति के पीछे अनेक कारण थे—
जोतदार से विवाद पूरे घर को प्रभावित करता था,
पुरुषों की गिरफ्तारी की आशंका में महिलाएं प्रतिरोध की जिम्मेदारी लेती थीं,
प्रसादुजोत की शहीद महिलाओं की स्मृति
25 मई की मृत महिलाओं के नाम स्थानीय स्मृति में आंदोलन की पहचान बन गए।
लेकिन यहां इतिहासलेखन की एक गंभीर समस्या है।
बड़े राजनीतिक इतिहास अक्सर नेतृत्व की विस्तृत जीवनी देते हैं, जबकि मारी गई ग्रामीण महिलाओं के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध होती है।
वे स्वयं राजनीतिक कार्यकर्ता थीं या सामुदायिक लामबंदी का हिस्सा?
क्या महिलाएं केवल ‘शहीद’ थीं?
महिलाओं की भूमिका को केवल मौत और बलिदान तक सीमित करना भी गलत होगा।
पुरुष कार्यकर्ताओं को छिपने में मदद करती थीं,
और कई जगह प्रत्यक्ष राजनीतिक कार्य में भाग लेती थीं।
इसलिए महिला इतिहास को केवल ‘शहीद महिलाओं की सूची’ के रूप में नहीं लिखा जाना चाहिए।
उनकी रोजमर्रा की राजनीतिक भागीदारी अधिक महत्वपूर्ण थी।
महिला भागीदारी और पितृसत्ता
क्रांतिकारी आंदोलन में शामिल होने से महिलाएं स्वतः पितृसत्ता से मुक्त नहीं हो जातीं।
कई परिवारों में निर्णय पुरुष लेते रहे।
सशस्त्र नेतृत्व में भी पुरुष प्रभुत्व था।
इसलिए वर्ग क्रांति की भाषा के भीतर लिंग समानता का प्रश्न हमेशा पर्याप्त रूप से हल नहीं हुआ।
यही समस्या आगे नक्सली और माओवादी संगठनों में बार-बार दिखाई देगी।
क्या नक्सलबाड़ी में स्वतंत्र महिला एजेंडा था?
मूल नक्सलबाड़ी आंदोलन का केंद्रीय एजेंडा भूमि और वर्ग संघर्ष था।
महिला अधिकारों का अलग विस्तृत कार्यक्रम आंदोलन के केंद्र में नहीं था।
जैसे प्रश्न स्वतंत्र मुद्दों के रूप में उतने विकसित नहीं हुए जितने बाद के महिला आंदोलनों में दिखाई देते हैं।
इसलिए महिलाओं की मजबूत भागीदारी और स्वतंत्र नारीवादी एजेंडा—दोनों को समान नहीं माना जाना चाहिए।
तेलंगाना से मिली महिला भागीदारी की विरासत
भारतीय कम्युनिस्ट किसान राजनीति में महिलाओं की भागीदारी नक्सलबाड़ी से पहले भी दिखाई दी थी।
तेभागा में भी बंगाल की महिलाओं ने किसान प्रतिरोध में भाग लिया।
इसलिए नक्सलबाड़ी की महिला भागीदारी किसी शून्य से पैदा नहीं हुई।
वह वामपंथी किसान आंदोलनों की पूर्व परंपराओं से जुड़ी थी।
भोजपुर — वर्ग संघर्ष में जाति का प्रवेश
बिहार के भोजपुर ने नक्सलबाड़ी की सामाजिक राजनीति को नया आयाम दिया।
यहां भूमिहीनता और जाति गहराई से जुड़ी थीं।
दलित और गरीब पिछड़े समुदाय बड़ी संख्या में खेतिहर मजदूर थे।
भूमि-संपन्नता अक्सर प्रभावशाली जातियों में अधिक केंद्रित थी।
इसलिए मजदूरी विवाद भी जातीय संघर्ष बन सकता था।
भूमि मांग भी सामाजिक बराबरी का प्रश्न बन सकती थी।
दलित खेतिहर मजदूर का संघर्ष
भोजपुर का दलित खेतिहर मजदूर केवल आर्थिक रूप से गरीब नहीं था।
उसे सामाजिक अपमान भी झेलना पड़ सकता था।
ये सभी मुद्दे आर्थिक शोषण से जुड़े थे।
इसलिए उसके लिए वर्ग संघर्ष का अर्थ केवल आय बढ़ाना नहीं था।
सम्मान और सामाजिक बराबरी भी केंद्रीय प्रश्न था।
यही भोजपुर की राजनीति की विशिष्टता बनी।
‘इज्जत’ भी राजनीतिक मांग
किसान आंदोलनों के आर्थिक इतिहास में अक्सर मजदूरी और जमीन के आंकड़े दर्ज होते हैं।
लेकिन भोजपुर ने दिखाया कि ‘इज्जत’ भी राजनीतिक श्रेणी है।
दलित मजदूर यदि भू-स्वामी के सामने बराबरी से खड़ा हो,
इसलिए भोजपुर आंदोलन के लिए सम्मान की राजनीति उतनी ही महत्वपूर्ण थी जितनी भूमि की।
दलित महिलाओं की दोहरी–तिहरी असमानता
दलित महिला खेतिहर मजदूर की स्थिति सबसे जटिल थी।
तीनों स्तरों पर असमानता झेलनी पड़ सकती थी।
यहीं ‘अंतर्संबंध’—intersectionality—की अवधारणा नक्सलवादी सामाजिक इतिहास को समझने में उपयोगी होती है।
निजी सेनाएं और दलित गांव
बिहार में नक्सली संगठनों के विस्तार के जवाब में भू-स्वामी निजी सेनाएं विकसित हुईं।
इन सेनाओं और नक्सली संगठनों के बीच संघर्ष में सबसे अधिक असुरक्षित समुदायों में गरीब दलित ग्रामीण थे।
सामूहिक हत्याओं में पूरे गांव निशाना बने।
इस हिंसा ने एक गंभीर नैतिक संकट पैदा किया।
क्या नक्सली संगठन दलित मुक्ति आंदोलन थे?
लेकिन उन्हें पूर्णतः दलित आंदोलन कहना सही नहीं होगा।
उनकी मूल विचारधारा वर्ग आधारित मार्क्सवादी–माओवादी थी।
जाति को वे अक्सर वर्ग संरचना के भीतर समझते थे।
भोजपुर जैसे क्षेत्रों में व्यवहार ने उन्हें जाति प्रश्न को अधिक गंभीरता से लेने पर मजबूर किया।
लेकिन स्वतंत्र दलित राजनीतिक विचारधारा और माओवादी राजनीति समान नहीं थीं।
आदिवासी और दलित संघर्षों में अंतर
दोनों समुदायों के संघर्ष को एक जैसा नहीं समझना चाहिए।
दलित खेतिहर मजदूर का मुख्य संघर्ष कई बार—
दोनों में गरीब ग्रामीण वर्ग मौजूद था, लेकिन उनकी ऐतिहासिक सामाजिक स्थितियां अलग थीं।
दंडकारण्य — आदिवासी समाज और माओवादी संगठन
दंडकारण्य में माओवादी आंदोलन का मुख्य सामाजिक आधार आदिवासी क्षेत्रों में विकसित हुआ।
गोंड, माड़िया और अन्य समुदायों के गांवों में संगठन ने काम किया।
माओवादी संगठन ने इन शिकायतों को राजनीतिक भाषा दी।
यही उसकी सामाजिक शक्ति का स्रोत बना।
आदिवासी समाज एकरूप नहीं
‘आदिवासी समर्थन’ को एक शब्द में व्यक्त करना भ्रामक है।
किसी गांव में माओवादी समर्थन अधिक हो सकता था।
किसी परिवार का एक सदस्य संगठन में हो सकता था और दूसरा पुलिस में।
कुछ लोग माओवादी प्रभाव को स्थानीय शोषण से सुरक्षा मानते थे।
कुछ उनके दबाव और हिंसा से परेशान थे।
कुछ केवल जीवित रहने के लिए दोनों पक्षों से संबंध रखते थे।
आदिवासी भूमि का प्रश्न
आदिवासी समाज में भूमि का अर्थ केवल निजी खेत नहीं है।
इसलिए यदि केवल व्यक्तिगत भू-अधिकार देखा जाए तो आदिवासी अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा छूट जाता है।
माओवादी राजनीति ने कई क्षेत्रों में सामुदायिक संसाधनों के प्रश्न को उठाया।
लेकिन यह भी सच है कि संगठन स्वयं कई जगह स्थानीय संसाधनों पर राजनीतिक नियंत्रण स्थापित करता गया।
वन विभाग और स्थानीय संघर्ष
वन कानूनों के कारण आदिवासी समुदायों और वन विभाग के बीच लंबे समय से तनाव रहा है।
इन विषयों पर अधिकार विवाद पैदा होते रहे।
माओवादी संगठन ने इस विरोधाभास का उपयोग राज्य-विरोधी राजनीति के लिए किया।
यहां संगठन की शक्ति केवल हथियार से नहीं आई।
उसने वास्तविक प्रशासनिक शिकायतों को राजनीतिक मुद्दा बनाया।
खनन और विस्थापन
खनिज क्षेत्रों में आदिवासी समुदायों को भूमि अधिग्रहण का भय रहा।
माओवादियों ने खनन-विरोधी असंतोष को अपने प्रभाव का आधार बनाया।
लेकिन हर स्थानीय खनन-विरोध स्वतः माओवादी समर्थन नहीं था।
महिला माओवादी कैडर का उदय
दंडकारण्य और अन्य क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी मूल नक्सलबाड़ी की तुलना में कहीं अधिक संगठित सैन्य रूप में दिखाई दी।
कुछ महिला कैडर कमांडर स्तर तक पहुंचीं।
इससे माओवादी संगठन स्वयं को महिला मुक्ति का समर्थक बताता रहा।
लेकिन वास्तविक अनुभव इससे अधिक जटिल था।
महिलाएं संगठन में क्यों शामिल हुईं?
कुछ महिलाएं राजनीतिक विश्वास से जुड़ीं।
कुछ स्थानीय अन्याय से प्रभावित थीं।
कुछ परिवार या गांव के सामाजिक नेटवर्क के माध्यम से आईं।
कुछ राज्य हिंसा या विस्थापन के अनुभव के बाद शामिल हुईं।
और कुछ मामलों में जबरन या दबाव आधारित भर्ती के आरोप भी लगे।
इसलिए महिला कैडर को केवल ‘क्रांतिकारी नायिका’ या केवल ‘पीड़िता’ के दो चरमों में नहीं समझा जा सकता।
संगठन में महिला समानता का दावा
माओवादी दस्तावेजों में महिला मुक्ति को सामंती और पितृसत्तात्मक संबंधों के खिलाफ संघर्ष से जोड़ा गया।
और कुछ क्षेत्रों में महिलाओं की स्थानीय भागीदारी
को प्रोत्साहित करने का दावा करता रहा।
इसके कारण कुछ युवा महिलाओं को संगठन पारंपरिक ग्रामीण सामाजिक संरचना की तुलना में अधिक स्वतंत्र स्थान दे सकता था।
पार्टी अनुशासन और सैन्य संरचना भी अत्यंत कठोर थीं।
नेतृत्व में पुरुष प्रभुत्व
महिलाओं की बड़ी संख्या में भागीदारी के बावजूद शीर्ष केंद्रीय नेतृत्व लंबे समय तक लगभग पूरी तरह पुरुष रहा।
यदि संगठन महिला मुक्ति की बात करता है लेकिन—
तो संरचनात्मक समानता अधूरी रहती है।
यह समस्या केवल माओवादी संगठनों की नहीं, लगभग सभी भारतीय राजनीतिक दलों में देखी जा सकती है, लेकिन क्रांतिकारी समानता का दावा करने वाले संगठन के लिए इसका महत्व अधिक है।
महिला कैडर और मातृत्व
भूमिगत जीवन महिलाओं के लिए विशिष्ट समस्याएं पैदा करता है।
इन विषयों को सामान्य सैन्य संगठन आसानी से समाहित नहीं करता।
कई पूर्व महिला कैडरों के संस्मरणों में ऐसे अनुभव सामने आए हैं।
यह दिखाता है कि ‘समान सैनिक’ की अवधारणा हमेशा जैविक और सामाजिक वास्तविकताओं को पर्याप्त रूप से नहीं समझती।
यौन हिंसा के आरोप — दोनों पक्षों पर सावधानी
माओवादी संघर्ष क्षेत्रों में महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के आरोप सुरक्षा बलों और सशस्त्र संगठनों—दोनों से जुड़े विभिन्न मामलों में सामने आए हैं।
ऐसे मामलों में विशेष तथ्य-सावधानी आवश्यक है।
सामान्य राजनीतिक आरोप को पूरे संगठन या पूरे बल की सिद्ध नीति नहीं माना जा सकता।
जहां न्यायिक, जांच या विश्वसनीय दस्तावेज उपलब्ध हों, प्रत्येक मामले को अलग देखा जाना चाहिए।
सलवा जुडूम में महिलाएं
सलवा जुडूम और उसके बाद के विस्थापन ने महिलाओं पर अलग प्रभाव डाला।
महिला की घरेलू जिम्मेदारी ऐसे संकट में और बढ़ती है।
इसलिए विस्थापन केवल जनसंख्या का स्थानांतरण नहीं था।
माओवादी हिंसा में महिलाएं और बच्चे
माओवादी IED, सड़क विस्फोट और कथित मुखबिर हत्याओं में नागरिक महिलाएं और बच्चे भी मारे गए।
यह आधुनिक संघर्ष का बड़ा नैतिक प्रश्न है।
यदि आंदोलन जनता के नाम पर है, लेकिन उसके हथियारों से वही जनता मरती है, तो उसकी वैधता कमजोर होती है।
ठीक इसी प्रकार राज्य कार्रवाई में नागरिक हताहत हों तो राज्य की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठता है।
आदिवासी युवक — कैडर या नागरिक?
माओवादी प्रभाव वाले क्षेत्रों में युवा आदिवासी की पहचान अत्यंत जोखिमपूर्ण हो सकती थी।
तब भी मुखबिरी के शक में फंस सकता था।
यही आधुनिक बस्तर संघर्ष की सबसे कठिन मानवीय स्थिति थी।
DRG में स्थानीय आदिवासी
District Reserve Guard जैसी इकाइयों में स्थानीय युवाओं की भागीदारी ने संघर्ष को नया आयाम दिया।
माओवादी दृष्टि में ऐसे जवान ‘जनता से अलग होकर राज्य के साथ गए’ लोग थे।
इससे स्थानीय समाज के भीतर संघर्ष और व्यक्तिगत हो सकता था।
यह सलवा जुडूम के इतिहास की छाया भी याद दिलाता है, हालांकि DRG औपचारिक पुलिस संरचना का हिस्सा है।
वर्ग और आदिवासी पहचान में तनाव
मार्क्सवादी विश्लेषण आदिवासी समाज को भी आर्थिक वर्गों में विभाजित करके देख सकता है।
लेकिन आदिवासी पहचान सामुदायिक भूमि, संस्कृति और स्वशासन से भी जुड़ी है।
यदि केवल वर्ग विश्लेषण किया जाए तो—
आधुनिक माओवादी आंदोलन ने आदिवासी प्रश्न को अपनाया, लेकिन उसकी अंतिम वैचारिक भाषा फिर भी वर्ग क्रांति की ही रही।
वर्ग और जाति का तनाव
भोजपुर में इसी प्रकार वर्ग और जाति के बीच तनाव था।
एक भूमिहीन दलित मजदूर निश्चित रूप से गरीब वर्ग का हिस्सा था।
लेकिन उसका जातिगत अनुभव किसी गरीब सवर्ण किसान से अलग हो सकता था।
यदि पार्टी केवल आर्थिक वर्ग देखती है तो यह अंतर छूट जाता है।
आगे कई नक्सली और वाम संगठनों को जाति प्रश्न पर अपनी भाषा विकसित करनी पड़ी।
वर्ग और लिंग का तनाव
गरीब महिला किसान वर्गीय शोषण झेलती है।
लेकिन वही महिला परिवार के भीतर पितृसत्ता भी झेल सकती है।
यदि जमीन सामूहिक रूप से गरीब किसानों को मिले लेकिन उसका नाम केवल पति के नाम दर्ज हो—
तो वर्गीय सुधार के बावजूद लिंग असमानता बची रहती है।
इसीलिए भूमि सुधार की आधुनिक बहस में संयुक्त या महिला स्वामित्व महत्वपूर्ण है।
तीन असमानताओं का संगम
नक्सलबाड़ी की सामाजिक यात्रा का सबसे जटिल पात्र हो सकता है—
उसकी स्थिति को केवल ‘किसान’ कह देने से पूरा अनुभव नहीं दिखता।
इसीलिए आधुनिक सामाजिक इतिहास केवल वर्ग विश्लेषण से आगे जाता है।
क्या क्रांतिकारी आंदोलन ने सामाजिक गतिशीलता दी?
भूमिगत और किसान आंदोलनों ने ऐसे लोगों को नेतृत्व का अवसर दिया जिन्हें पारंपरिक ग्रामीण समाज में शायद राजनीतिक स्थान नहीं मिलता।
पुराने भू-स्वामी प्रभुत्व को चुनौती मिली।
भय टूटना स्वयं एक राजनीतिक परिवर्तन था।
सशस्त्र संगठन का अनुशासन नई प्रकार की सत्ता पैदा कर सकता था।
पुरानी सत्ता टूटे और नई अविवेचित सत्ता आए—तो मुक्ति अधूरी रहती है।
नक्सलबाड़ी की विचारधारा
:::writing{variant="document" id="73146" title="खंड 12 — नक्सलबाड़ी की विचारधारा : मार्क्सवाद–लेनिनवाद–माओवाद और भारतीय परिस्थितियों में चीनी मॉडल का आलोचनात्मक परीक्षण"}
प्रस्तावना : नक्सलबाड़ी की राजनीति का असली वैचारिक प्रश्न
नक्सलबाड़ी को केवल भूमि-संघर्ष के रूप में समझना अधूरा है और केवल माओवादी विचारधारा के प्रयोग के रूप में समझना भी उतना ही अधूरा।
1967 की घटना में दो प्रक्रियाएं एक-दूसरे से मिली थीं।
उत्तर बंगाल के किसानों, बर्गादारों और आदिवासी समुदायों की वास्तविक भूमि-संबंधी शिकायतें।
मार्क्सवाद — वर्ग संघर्ष की मूल अवधारणा
नक्सलबाड़ी की वैचारिक जड़ कार्ल मार्क्स के वर्ग-संघर्ष सिद्धांत में है।
मार्क्सवादी दृष्टि में समाज की आर्थिक संरचना राजनीतिक सत्ता को गहराई से प्रभावित करती है।
उत्पादन के साधनों पर किसका नियंत्रण है—
यह सामाजिक शक्ति का केंद्रीय प्रश्न बनता है।
ग्रामीण समाज में इसका सबसे सरल रूप था—
जमीन पर किसका नियंत्रण है और खेती कौन करता है?
मार्क्स से माओ तक — किसान का स्थान कैसे बदला?
शास्त्रीय मार्क्सवाद का मुख्य क्रांतिकारी वर्ग औद्योगिक सर्वहारा था।
मार्क्स और एंगेल्स ने औद्योगिक पूंजीवाद के संदर्भ में मजदूर वर्ग को क्रांतिकारी परिवर्तन का केंद्रीय सामाजिक बल माना।
लेकिन बीसवीं सदी के चीन की वास्तविकता अलग थी।
माओ त्से-तुंग ने इसी परिस्थिति में मार्क्सवादी क्रांति के सिद्धांत को कृषि समाज की परिस्थितियों के अनुसार पुनर्गठित किया।
उन्होंने किसान को केवल पिछड़ा सामाजिक वर्ग नहीं माना।
लेनिन का योगदान — पार्टी और राज्य-सत्ता
व्लादिमीर लेनिन की राजनीति ने नक्सलवादी विचारधारा को दूसरा महत्वपूर्ण तत्व दिया—
लेनिन का विचार था कि केवल स्वतःस्फूर्त मजदूर संघर्ष से सत्ता परिवर्तन नहीं होगा।
क्रांति के लिए अनुशासित राजनीतिक पार्टी आवश्यक है जो—
नक्सलवादी संगठनों ने इसी अवधारणा को अपनाया।
किसान संघर्ष स्वयं महत्वपूर्ण था, लेकिन उसके ऊपर एक क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी का राजनीतिक नेतृत्व आवश्यक माना गया।
माओवाद — भारतीय नक्सलबाड़ी का वास्तविक वैचारिक स्रोत
नक्सलबाड़ी की विशिष्टता केवल मार्क्सवाद या लेनिनवाद में नहीं थी।
उसकी विशिष्ट पहचान माओवादी रणनीति से बनी।
माओ के लिए चीन की क्रांति का मुख्य क्षेत्र गांव था।
कृषि क्रांति के माध्यम से गरीब किसानों को संगठित किया गया।
ग्रामीण गुरिल्ला आधार क्षेत्र बनाए गए।
राज्य की शक्ति को ग्रामीण क्षेत्रों में धीरे-धीरे चुनौती दी गई।
और अंततः शहरों पर राजनीतिक–सैन्य दबाव बढ़ाया गया।
‘मार्क्सवाद–लेनिनवाद–माओ त्से-तुंग विचार’ से ‘माओवाद’ तक
1960–70 के दशकों में भारतीय नक्सलवादी संगठन अक्सर अपनी वैचारिक पहचान को—
Marxism-Leninism-Mao Tse-tung Thought
बाद में अंतरराष्ट्रीय माओवादी धारा में ‘Maoism’ को मार्क्सवाद–लेनिनवाद के आगे विकसित चरण के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा।
2004 की CPI (Maoist) ने स्पष्ट रूप से Marxism-Leninism-Maoism को अपनी विचारधारा घोषित किया। उसकी पार्टी संविधान और कार्यक्रम दोनों इसी वैचारिक आधार को संगठन की मार्गदर्शक विचारधारा बताते हैं।
नई जनवादी क्रांति क्या है?
नक्सलवादी विचारधारा की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणाओं में से एक है—
नई जनवादी क्रांति — New Democratic Revolution।
यह माओ की चीनी क्रांति से आई अवधारणा है।
माओवादी सिद्धांत के अनुसार कुछ देशों में सीधे समाजवादी क्रांति संभव नहीं क्योंकि वहां पूंजीवादी लोकतांत्रिक क्रांति के ऐतिहासिक कार्य अभी पूरे नहीं हुए हैं।
इसलिए पहले एक मध्यवर्ती क्रांतिकारी चरण होगा—
साम्राज्यवाद का प्रभाव समाप्त करना,
भारत में ‘नई जनवादी क्रांति’ क्यों?
नक्सलवादी विश्लेषण कहता था कि 1947 में भारत को वास्तविक जनवादी क्रांति नहीं मिली।
राजनीतिक सत्ता अंग्रेजों से भारतीय शासक वर्ग को हस्तांतरित हुई।
जमींदारी और सामंती संबंध पूरी तरह समाप्त नहीं हुए,
और भारतीय बड़े पूंजीपति अंतरराष्ट्रीय पूंजी से जुड़े रहे।
इसलिए भारतीय लोकतांत्रिक क्रांति अधूरी मानी गई।
भारत को पहले नई जनवादी क्रांति चाहिए।
‘अर्ध-सामंती’ भारत की अवधारणा
नक्सलवादी सिद्धांत के अनुसार स्वतंत्रता के बाद भी भारतीय ग्रामीण समाज में सामंती या अर्ध-सामंती संबंध बचे रहे।
इसके प्रमाण के रूप में वे देखते थे—
और ग्रामीण भू-स्वामी की सामाजिक सत्ता।
1960 के दशक के भारत में इन तत्वों में से अनेक वास्तव में मौजूद थे।
इसीलिए इस विश्लेषण में कुछ ऐतिहासिक आधार था।
भारतीय कृषि में पूंजीवाद का विस्तार
1960 के दशक के बाद भारतीय कृषि तेजी से बदल रही थी।
कई पुराने जमींदार पूंजीवादी किसान में बदल रहे थे।
खेती बाजार के लिए अधिक उत्पादन करने लगी।
भूमि का उपयोग लाभ और निवेश के आधार पर बदल रहा था।
इसलिए बाद के अनेक मार्क्सवादी विद्वानों ने प्रश्न उठाया—
‘सामंतवाद’ और सामाजिक दमन में अंतर
मौजूद हैं तो वे अवश्य ही गंभीर समस्याएं हैं।
लेकिन हर सामाजिक उत्पीड़न को आर्थिक अर्थ में ‘सामंतवाद’ कहना सही नहीं।
इसलिए आधुनिक सामाजिक विज्ञान में प्रश्न अधिक जटिल है—
भारत में पूंजीवाद पुराने सामाजिक संबंधों को समाप्त करता है या उन्हें अपने भीतर समाहित कर लेता है?
नक्सलवादी सिद्धांत अक्सर इस जटिलता को ‘अर्ध-सामंती’ श्रेणी में समेट देता है।
‘अर्ध-औपनिवेशिक’ भारत का अर्थ
semi-colonial — अर्ध-औपनिवेशिक भारत।
नक्सलवादी विचार के अनुसार 1947 में औपचारिक राजनीतिक स्वतंत्रता मिली, लेकिन विदेशी साम्राज्यवादी शक्तियों का आर्थिक प्रभाव समाप्त नहीं हुआ।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव डालते रहे।
इसलिए भारत को पूर्णतः स्वतंत्र पूंजीवादी राष्ट्र-राज्य नहीं माना गया।
CPI (Maoist) का वर्तमान रणनीतिक दस्तावेज भी भारत को “neo-colonial form of indirect rule” के अंतर्गत अर्ध-औपनिवेशिक बताता है।
इस अवधारणा की सबसे बड़ी समस्या
भारतीय सेना और प्रशासन भारतीय नियंत्रण में रहे,
और राज्य ने अनेक मामलों में पश्चिमी शक्तियों से अलग नीति अपनाई।
इसलिए भारत को औपनिवेशिक चीन जैसी स्थिति में रखना कठिन था।
विदेशी पूंजी का प्रभाव और आर्थिक निर्भरता वास्तविक प्रश्न हो सकते हैं।
लेकिन आर्थिक वैश्विक संबंध और औपनिवेशिक शासन एक ही चीज नहीं हैं।
यहीं ‘अर्ध-औपनिवेशिक’ अवधारणा सबसे अधिक विवादित होती है।
चीन और भारत — मूल ऐतिहासिक अंतर
चीनी क्रांति का मॉडल भारत में लागू करने की सबसे बड़ी समस्या दोनों देशों की ऐतिहासिक परिस्थितियों का अंतर था।
ग्रामीण क्षेत्रों में सैन्य सरदारों की शक्ति थी,
और राष्ट्रीय राजनीतिक संस्थाएं अत्यंत अस्थिर थीं।
राजनीतिक दलों को वैध काम की अनुमति थी,
इन अंतरों को नजरअंदाज करना नक्सलवादी रणनीति की मूल समस्याओं में से एक था।
गांवों से शहरों को घेरना
माओवादी रणनीति का प्रसिद्ध सूत्र था—
ग्रामीण आधार क्षेत्र बनाओ और धीरे-धीरे शहरों को गांवों से घेरो।
और अंततः शहरों पर निर्णायक राजनीतिक–सैन्य दबाव डालना।
CPI (Maoist) का रणनीतिक दस्तावेज आज भी “protracted people's war”, कृषि क्रांति और ग्रामीण आधार क्षेत्रों को केंद्रीय रणनीति बताता है।
भारत में यह रणनीति क्यों आकर्षक लगी?
भारत की विशाल ग्रामीण आबादी इसका एक कारण थी।
1960 के दशक में अधिकांश भारतीय गांवों में रहते थे।
अनेक आदिवासी क्षेत्रों में प्रशासन कमजोर था।
इसलिए क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं को लगा कि चीन जैसी दीर्घकालीन ग्रामीण क्रांति संभव हो सकती है।
नक्सलबाड़ी, श्रीकाकुलम और बाद में भोजपुर जैसी घटनाएं उन्हें इसी निष्कर्ष का प्रमाण लगती थीं।
लेकिन भारतीय राज्य चीन जैसा कमजोर नहीं था
यह रणनीति जहां सबसे कमजोर पड़ी, वह था राज्य शक्ति का आकलन।
के माध्यम से गांवों तक धीरे-धीरे पहुंच रहा था।
किसी क्षेत्र में विद्रोह होने पर सरकार वहां सुरक्षा बल भेज सकती थी।
राज्य के भीतर परिवर्तन के कानूनी रास्ते भी मौजूद थे।
इसलिए ‘मुक्त क्षेत्रों’ को स्थायी बनाए रखना कठिन था।
नक्सलबाड़ी और श्रीकाकुलम की तेज पराजय इसका शुरुआती प्रमाण था।
लोकतांत्रिक चुनाव — भ्रम या राजनीतिक वास्तविकता?
नक्सलवादी विचारधारा का एक केंद्रीय दावा था कि संसदीय चुनाव जनता में ‘संवैधानिक भ्रम’ पैदा करते हैं।
CPI (Maoist) का रणनीतिक दस्तावेज आज भी यह मानता है कि चुनाव में भागीदारी क्रांतिकारी वर्ग संघर्ष को कमजोर करती है और संसदीय व्यवस्था के प्रति भ्रम पैदा करती है।
लेकिन भारतीय राजनीति का अनुभव इस दावे को जटिल बनाता है।
कांग्रेस राज्यों में सत्ता से बाहर हुई,
1967 स्वयं चुनाव की देन भी था
नक्सलबाड़ी के इतिहास की विडंबना यह है कि उसका विस्फोट उस राजनीतिक परिस्थिति में हुआ जिसे स्वयं चुनाव ने पैदा किया था।
1967 के पश्चिम बंगाल चुनाव में कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई।
किसानों की भूमि-सुधार संबंधी अपेक्षाएं बढ़ीं।
अर्थात नक्सलबाड़ी की तत्काल राजनीतिक परिस्थिति स्वयं चुनावी लोकतंत्र से पैदा हुई थी।
फिर भी क्रांतिकारी नेतृत्व ने इसी प्रणाली को निरर्थक माना।
चुनाव बहिष्कार — रणनीति से सिद्धांत
किसी विशेष परिस्थिति में चुनाव बहिष्कार एक रणनीतिक निर्णय हो सकता है।
लेकिन चारु मजूमदार की धारा ने इसे लगभग स्थायी क्रांतिकारी सिद्धांत का रूप दिया।
चारु मजूमदार के ‘ऐतिहासिक आठ दस्तावेज’
1965 से 1967 के बीच चारु मजूमदार ने लेखों की एक श्रृंखला लिखी जिन्हें बाद में Historic Eight Documents कहा गया।
ग्रामीण सशस्त्र संघर्ष की आवश्यकता,
किसान संघर्ष का क्रांतिकारी रूपांतरण,
बाद के CPI (Maoist) दस्तावेज इन्हें भारतीय माओवादी क्रांतिकारी धारा की वैचारिक–राजनीतिक नींव मानते हैं।
लेकिन इन्हीं दस्तावेजों से आगे विकसित लाइन पर बाद के अनेक नक्सली नेताओं ने गंभीर आपत्तियां भी कीं।
चारु मजूमदार का सबसे विवादास्पद सिद्धांत
वर्ग-शत्रु का विनाश — annihilation of class enemy।
इसका मूल तर्क यह था कि गरीब किसान तभी वास्तविक क्रांतिकारी सत्ता का अनुभव करेगा जब वह अपने स्थानीय उत्पीड़क से भय तोड़ेगा।
भूमि मालिक या अत्याचारी ग्रामीण प्रभु को प्रत्यक्ष दंड देने से किसान का राजनीतिक आत्मविश्वास बढ़ेगा।
चारु मजूमदार के समर्थकों ने इसे केवल हत्या नहीं बल्कि ग्रामीण सत्ता-विनाश की प्रक्रिया माना।
‘वर्ग-शत्रु’ कौन?
लेकिन जमीन पर कौन ‘वर्ग-शत्रु’ घोषित होगा?
क्या राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को भी इस श्रेणी में डाल दिया जाएगा?
जैसे-जैसे यह शब्द विस्तृत हुआ, राजनीतिक हिंसा का दायरा बढ़ता गया।
जनसंघर्ष का विकल्प बन गई हत्या?
चारु मजूमदार की लाइन की सबसे गंभीर आलोचना यही थी।
तारिमेला नागी रेड्डी और अन्य क्रांतिकारी कम्युनिस्टों ने आरोप लगाया कि व्यक्तिगत सशस्त्र कार्रवाइयां व्यापक जन आंदोलन का स्थान ले रही हैं। बाद की आलोचनात्मक दस्तावेजी सामग्री यह दर्ज करती है कि ‘annihilation’ और खुले जनसंगठनों की उपेक्षा पर गंभीर दो-लाइन संघर्ष हुआ।
‘मास लाइन’ बनाम ‘स्क्वाड लाइन’
माओवादी परंपरा स्वयं ‘जन-रेखा’ अर्थात जनता से सीखकर, जनता को संगठित करके और जनता के बीच वापस जाने की बात करती है।
लेकिन भारतीय नक्सलवादी आंदोलन की प्रारंभिक आलोचना यह रही कि—
क्रांतिकारी दस्ते जनता के पूरक होने की बजाय जनता का स्थान लेने लगे।
क्या माओ ने व्यक्तिगत हत्या को केंद्रीय रणनीति बनाया था?
चीनी क्रांति में हिंसा और भूमि संघर्ष अवश्य हुए।
लेकिन चीनी कम्युनिस्ट क्रांति का केंद्रीय आधार था—
व्यक्तिगत हत्या अपने आप में पूरी रणनीति नहीं थी।
इसीलिए चारु मजूमदार की ‘वर्ग-शत्रु उन्मूलन की रणनीति’ की आलोचना करने वाले भारतीय माओवादी और मार्क्सवादी समूहों ने तर्क दिया कि यह स्वयं चीनी अनुभव का सरलीकरण था।
गांवों की शक्ति और शहरों की उपेक्षा
लेकिन भारत में शहरों का आर्थिक महत्व तेजी से बढ़ रहा था।
यदि क्रांति का सिद्धांत शहर को केवल अंतिम कब्जे के लक्ष्य के रूप में देखे, तो औद्योगिक और शहरी राजनीति की जटिलता कमजोर पड़ सकती है।
मजदूर वर्ग और किसान नेतृत्व का विरोधाभास
इससे व्यावहारिक प्रश्न पैदा होता है—
यदि वास्तविक आंदोलन मुख्यतः किसान और आदिवासी क्षेत्रों में है तो ‘सर्वहारा नेतृत्व’ व्यवहार में कैसे स्थापित होगा?
कम्युनिस्ट पार्टी सर्वहारा वर्ग का राजनीतिक प्रतिनिधित्व करती है।
लेकिन इससे एक दूसरी समस्या पैदा हुई।
यदि पार्टी स्वयं जनता की ओर से ‘सर्वहारा नेतृत्व’ घोषित करे, तो वास्तविक मजदूर भागीदारी कितनी आवश्यक रह जाती है?
भारतीय औद्योगिक मजदूर क्यों व्यापक रूप से नहीं जुड़े?
नक्सलवादी आंदोलन को औद्योगिक मजदूर वर्ग में वह व्यापक आधार नहीं मिला जिसकी मार्क्सवादी क्रांति में अपेक्षा की जाती थी।
CPI और CPI(M) की मजबूत ट्रेड यूनियन उपस्थिति,
नक्सलवादी नेतृत्व का ग्रामीण संघर्ष पर अत्यधिक जोर,
इससे आंदोलन की वास्तविक सामाजिक संरचना किसान–आदिवासी केंद्रित रही।
‘अर्ध-सामंती’ विश्लेषण और जाति
नक्सलवादी विचारधारा ने प्रारंभ में जाति को अक्सर वर्गीय संरचना के भीतर समझा।
लेकिन बिहार और अन्य क्षेत्रों ने दिखाया कि जाति केवल आर्थिक स्थिति का प्रतिबिंब नहीं।
एक गरीब दलित और गरीब सवर्ण की सामाजिक स्थिति समान नहीं हो सकती।
महिला प्रश्न और वर्ग-व्याख्या
प्रारंभिक नक्सलवादी सिद्धांत महिला उत्पीड़न को मुख्यतः सामंती–वर्ग संरचना से जोड़ता था।
लेकिन महिला आंदोलन ने आगे दिखाया कि—
पितृसत्ता केवल भूमि संबंधों से पैदा नहीं होती।
इसलिए महिला मुक्ति को केवल वर्ग क्रांति का स्वतः परिणाम मानना अपर्याप्त है।
यह वही समस्या है जो जाति के प्रश्न पर भी दिखाई देती है।
क्या भारत में लोकतांत्रिक सुधार असंभव थे?
चारु मजूमदार की मूल धारा का अनुमान था कि मौजूदा राज्य संरचना के भीतर वास्तविक भूमि सुधार संभव नहीं।
कुछ राज्यों में भूमि-सुधार सीमित रहे।
पश्चिम बंगाल में ऑपरेशन बर्गा ने बर्गादार पंजीकरण और सुरक्षा को व्यापक रूप दिया।
अनुसूचित जाति–जनजाति आरक्षण ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व बदला।
लेकिन यह भी सिद्ध करता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था पूरी तरह स्थिर और सुधार-असमर्थ नहीं थी।
ऑपरेशन बर्गा — विचारधारा के लिए सबसे कठिन उदाहरण
नक्सलबाड़ी पश्चिम बंगाल में पैदा हुआ।
लेकिन दस वर्ष बाद वही राज्य भूमि सुधार का एक अलग मॉडल प्रस्तुत करने लगा।
यह नक्सलवादी विचारधारा के लिए कठिन प्रश्न था।
यदि बर्गादार अधिकार कानून और राजनीतिक संगठन के माध्यम से बढ़ाए जा सकते हैं, तो सशस्त्र क्रांति ही एकमात्र रास्ता कैसे हो सकती है?
यहां नक्सलबाड़ी और संसदीय वाम के बीच ऐतिहासिक तुलना महत्वपूर्ण है।
लेकिन सुधार की सीमाएं भी थीं
लोकतांत्रिक सुधार की सफलता को बढ़ा-चढ़ाकर देखना भी गलत होगा।
दलित खेतिहर मजदूरों का उत्पीड़न अनेक क्षेत्रों में बना रहा।
खनन और विस्थापन नए भूमि संघर्ष लाए।
इसलिए यह कहना भी गलत होगा कि संसदीय लोकतंत्र ने भूमि न्याय का प्रश्न पूरी तरह हल कर दिया।
लोकतांत्रिक सुधार संभव थे, लेकिन अधूरे थे।
क्या चुनाव गरीब वर्गों को राजनीतिक शक्ति दे सकते हैं?
भारतीय लोकतंत्र का अनुभव बताता है कि सामाजिक रूप से वंचित समूह चुनाव के माध्यम से शक्ति प्राप्त कर सकते हैं।
यह प्रक्रिया पूंजीवाद या असमानता समाप्त नहीं करती।
लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व का वास्तविक परिवर्तन अवश्य करती है।
नक्सलवादी सिद्धांत ने इस संभावना को लंबे समय तक कम करके आंका।
‘संसदीय भ्रम’ या वास्तविक लोकतांत्रिक चेतना?
यदि कोई गरीब किसान चुनाव में मतदान करता है तो नक्सलवादी व्याख्या उसे संसदीय भ्रम में फंसा हुआ कह सकती है।
वह उपलब्ध लोकतांत्रिक साधन का उपयोग कर रहा है।
भारतीय ग्रामीण समाज में मतदान स्वयं कई जगह सामाजिक समानता का प्रतीक बना।
दलित मतदाता का मतदान केंद्र तक जाना भी पुराने ग्रामीण प्रभुत्व को चुनौती हो सकता था।
हिंसा और क्रांति का संबंध
इसलिए शासक वर्ग स्वेच्छा से सत्ता नहीं छोड़ेगा।
यह मार्क्सवादी–लेनिनवादी क्रांतिकारी परंपरा का केंद्रीय तर्क है।
लेकिन लोकतांत्रिक संदर्भ में प्रश्न बदल जाता है।
यदि न्यायालय राज्य के खिलाफ फैसला दे सकता है,
तो राजनीतिक हिंसा की अनिवार्यता का दावा कमजोर पड़ता है।
इसी प्रश्न पर नक्सलवादी और संसदीय वाम की सबसे गहरी वैचारिक दूरी है।
क्या भारतीय राज्य पूरी तरह वर्ग-राज्य था?
नक्सलवादी विश्लेषण राज्य को बड़े भू-स्वामी और बड़े पूंजीपति वर्ग के हितों की मशीन मानता है।
राज्य की नीतियों में वर्गीय पक्षपात निश्चित रूप से हो सकता है।
पूंजी और राजनीतिक सत्ता के संबंध वास्तविक हैं।
इन नीतियों को केवल शासक वर्ग की चाल कह देने से राज्य की आंतरिक बहुलता समझ में नहीं आती।
लोकतांत्रिक राज्य स्वयं संघर्ष का क्षेत्र भी होता है।
संविधान की नक्सलवादी आलोचना
नक्सलवादी विचारधारा भारतीय संविधान को वास्तविक जनसत्ता का आधार नहीं मानती।
उसके अनुसार संसद और संविधान उस वर्गीय राज्य को वैधता देते हैं जिसे क्रांति द्वारा तोड़ा जाना चाहिए।
इन संस्थाओं की सीमाएं और विफलताएं वास्तविक हो सकती हैं।
लेकिन उन्हें केवल आवरण कहना भारत के वास्तविक राजनीतिक अनुभव को कम करके आंकता है।
‘नई जनवादी राज्य’ का लोकतांत्रिक प्रश्न
नक्सलवादी सिद्धांत वर्तमान संसदीय लोकतंत्र की जगह ‘जनवादी राज्य’ की बात करता है।
उस व्यवस्था में राजनीतिक असहमति का स्थान क्या होगा?
क्या क्रांतिकारी पार्टी से असहमति वैध होगी?
ऐतिहासिक माओवादी राज्यों का अनुभव इस प्रश्न को अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है।
यदि ‘जनवादी तानाशाही’ अंततः एक पार्टी के राजनीतिक एकाधिकार में बदल जाए तो वर्तमान लोकतंत्र से उसका नैतिक श्रेष्ठता दावा चुनौती में पड़ता है।
चीन की क्रांति का आकर्षण और सांस्कृतिक क्रांति का प्रभाव
1960 के दशक के भारतीय युवाओं ने चीन को केवल 1949 की क्रांति के रूप में नहीं देखा।
नक्सलबाड़ी और भूमि-सुधार
:::writing{variant="document" id="82614" title="खंड 13 — नक्सलबाड़ी और भूमि-सुधार : क्रांतिकारी भूमि कब्जे से ऑपरेशन बर्गा तक"}
प्रस्तावना : बंदूक और कानून—किसने किसान को अधिक स्थायी अधिकार दिया?
नक्सलबाड़ी की पूरी ऐतिहासिक यात्रा अंततः उसी प्रश्न पर लौटती है जिससे उसका जन्म हुआ था—
1967 के विद्रोही किसानों ने इसका उत्तर प्रत्यक्ष कार्रवाई से दिया—
जिस किसान का श्रम जमीन पर लगता है, वास्तविक अधिकार उसी का होना चाहिए।
‘जमीन जोते उसकी’ — नारा वास्तव में क्या कहता था?
“जमीन जोते उसकी” भारतीय किसान राजनीति के सबसे शक्तिशाली सूत्रों में से एक रहा।
यदि किसी खेत का मालिक शहर में रहता है, खेती नहीं करता, लेकिन उसका बर्गादार पूरा श्रम करता है—
तो उत्पादन पर वास्तविक नैतिक अधिकार किसका है?
जोतने वाले किसान का अधिकार मजबूत होना चाहिए।
लेकिन इस नारे के भीतर भी कई संभावित नीतियां छिपी थीं।
बर्गादार को सुरक्षित किरायेदारी मिले।
1967 के भूमि कब्जे का स्वरूप
नक्सलबाड़ी में भूमि कब्जा किसी विस्तृत सरकारी सर्वेक्षण के बाद नहीं हुआ।
किसान समितियां स्थानीय जानकारी के आधार पर जमीन की पहचान करती थीं।
जोतदार या भू-स्वामी के अधिकार को चुनौती दी जाती।
किसी बर्गादार की बेदखली रोकने के लिए सामूहिक कार्रवाई होती।
कई मामलों में भूमि और ऋण अभिलेखों को भी चुनौती दी गई।
क्रांतिकारी कब्जे की पहली सीमा — स्थायित्व
यदि किसान ने जमीन पर कब्जा किया लेकिन राज्य उस कब्जे को मान्यता नहीं देता, तो अधिकार उसकी सामूहिक शक्ति पर निर्भर रहेगा।
इसलिए भूमि अधिकार की एक मूल समस्या है—
कब्जा और वैधानिक अधिकार समान नहीं हैं।
लेकिन वे उसे दीर्घकालीन कानूनी संपत्ति अधिकार में बदलने से पहले ही पराजित हो गए।
यही क्रांतिकारी भूमि कब्जे की संरचनात्मक सीमा थी।
पश्चिम बंगाल के भूमि कानून नक्सलबाड़ी से पहले के थे
यहां एक बहुत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य स्पष्ट रखना चाहिए।
पश्चिम बंगाल में भूमि सुधार नक्सलबाड़ी के बाद शुरू नहीं हुआ था।
West Bengal Estates Acquisition Act, 1953 पहले ही जमींदारी मध्यस्थ संरचना समाप्त करने, भूमि सीमा और अधिशेष भूमि के राज्य में निहित होने की दिशा तय कर चुका था।
कानून था, बर्गादार रिकॉर्ड में नहीं था
पश्चिम बंगाल के अनुभव की सबसे बड़ी समस्या यही थी।
बर्गादार को कानूनी सुरक्षा मिल सकती थी—
लेकिन पहले यह सिद्ध होना आवश्यक था कि वह बर्गादार है।
कई बर्गादारों के नाम सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं थे।
और किसान की कानूनी जानकारी का अभाव।
1977 — वाम मोर्चा और राजनीतिक सत्ता
1977 में पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सत्ता में आया।
नक्सलबाड़ी की क्रांतिकारी धारा जिस पार्टी को 1967 में ‘संसदीय संशोधनवादी’ कहकर छोड़ चुकी थी, वही पार्टी अब स्थायी राज्य सरकार बनाने में सफल हुई।
वाम मोर्चे के पास दो महत्वपूर्ण राजनीतिक संसाधन थे—
ग्रामीण किसान संगठनों का पुराना नेटवर्क,
यही संयोजन भूमि सुधार के प्रभावी क्रियान्वयन में निर्णायक सिद्ध हुआ।
1977 के संशोधन और बर्गादार सुरक्षा
वाम मोर्चा सरकार ने West Bengal Land Reforms Act में संशोधन और प्रशासनिक सक्रियता के माध्यम से बर्गादारों की स्थिति मजबूत की।
फसल बंटवारे के नियम लागू कराने पर जोर दिया गया।
यदि खेती का अधिकांश निवेश बर्गादार करता था तो उसके हिस्से को अधिक सुरक्षित किया गया।
लेकिन इन अधिकारों का वास्तविक उपयोग तभी संभव था जब उसका नाम सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हो।
ऑपरेशन बर्गा कब शुरू हुआ?
1978 में ऑपरेशन बर्गा शुरू किया गया।
पश्चिम बंगाल सरकार के 5 जुलाई 1978 के आधिकारिक निर्देश में जून 23–24 के कार्यशाला निर्णयों के आधार पर बर्गादार पंजीकरण के लिए विशेष अभियान की पांच चरणीय पद्धति बताई गई—
यह भूमि सुधार के इतिहास में महत्वपूर्ण प्रशासनिक नवाचार था।
सरकार यह प्रतीक्षा नहीं कर रही थी कि गरीब किसान स्वयं कार्यालय में आवेदन करे।
ऑपरेशन बर्गा क्यों असाधारण था?
भारतीय भूमि सुधार की सामान्य समस्या थी—
ऑपरेशन बर्गा ने इस दूरी को कम करने की कोशिश की।
प्रशासनिक शिविर गांवों के पास लगाए गए।
उन्हें समझाया गया कि पंजीकरण कराने पर उन्हें तुरंत जमीन से नहीं निकाला जा सकता।
किसान संगठनों को भी प्रक्रिया से जोड़ा गया।
नक्सलबाड़ी और ऑपरेशन बर्गा में एक रोचक समानता
दोनों आंदोलनों ने गरीब किसान का भय तोड़ने की कोशिश की।
नक्सलबाड़ी में किसान समिति कहती थी—
जोतदार से मत डरो; जमीन पर कब्जा करो।
जोतदार से मत डरो; अपना नाम दर्ज कराओ।
दोनों में गरीब किसान को ग्रामीण प्रभुत्व के सामने खड़ा करने का तत्व था।
14 लाख बर्गादारों का पंजीकरण
ऑपरेशन बर्गा के बाद पश्चिम बंगाल में लगभग 14 लाख बर्गादारों का रिकॉर्ड तैयार हुआ। विश्व बैंक के भूमि शासन अध्ययन में यही संख्या दी गई है।
यह संख्या केवल प्रशासनिक उपलब्धि नहीं थी।
हर रिकॉर्डेड बर्गादार के लिए इसका अर्थ था—
उसका अस्तित्व सरकार की भूमि व्यवस्था में मान्यता प्राप्त करता है।
वह अदृश्य बटाईदार से कानूनी अधिकार वाला कृषक बनता है।
बर्गादार को जमीन का मालिक बनाया गया था?
यहां एक आम भ्रम स्पष्ट करना आवश्यक है।
ऑपरेशन बर्गा का मुख्य उद्देश्य सभी बर्गादारों को भूमि का पूर्ण मालिक बनाना नहीं था।
वंशानुगत खेती का अधिकार मजबूत करना,
और फसल बंटवारे के कानूनी नियम लागू करना।
अर्थात बर्गादार के tenurial rights—कृषि-कब्जा अधिकार मजबूत हुए।
यह “जमीन जोते उसकी” नारे का पूर्ण स्वामित्व वाला संस्करण नहीं था।
भूमि पुनर्वितरण — दूसरा स्तंभ
पश्चिम बंगाल भूमि सुधार का दूसरा पहलू बर्गादार सुरक्षा से अलग था—
ceiling-surplus/vested land का वितरण।
राज्य ने भूमि सीमा से अधिक जमीन अपने अधिकार में लेकर भूमिहीन तथा गरीब किसानों में बांटने का कार्यक्रम चलाया।
पश्चिम बंगाल की राष्ट्रीय विशिष्टता
भारतीय भूमि सुधार पर तुलनात्मक अध्ययनों में पश्चिम बंगाल और केरल बार-बार अलग दिखाई देते हैं।
ऑक्सफोर्ड के एक व्यापक विश्लेषण के अनुसार पूरे भारत में tenancy reform और ceiling laws से कुल कृषि भूमि का लगभग छह प्रतिशत पुनर्वितरित हुआ, और कुल पुनर्वितरण का 40 प्रतिशत से अधिक हिस्सा केरल और पश्चिम बंगाल में केंद्रित था।
पंचायतों की भूमिका
पश्चिम बंगाल के भूमि सुधार को केवल भूमि विभाग ने लागू नहीं किया।
1978 के बाद मजबूत की गई त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इन प्रश्नों की जानकारी ग्रामीण राजनीतिक नेटवर्क के पास थी।
भूमि सुधार और पंचायत का यह संयोजन वाम मोर्चा शासन की महत्वपूर्ण विशेषता बना।
क्या ऑपरेशन बर्गा ने कृषि उत्पादन बढ़ाया?
यह प्रश्न लंबे समय से शोध का विषय है।
पश्चिम बंगाल में 1980 के दशक में धान उत्पादकता और कृषि वृद्धि में उल्लेखनीय तेजी आई।
कुछ अध्ययनों ने ऑपरेशन बर्गा को इसके महत्वपूर्ण कारणों में माना।
यदि बर्गादार को जमीन से निकाले जाने का भय कम हो और फसल का बड़ा हिस्सा उसके पास रहे, तो वह भूमि में अधिक निवेश करेगा।
नक्सलबाड़ी की तुलना में स्थायित्व
नक्सलबाड़ी में किसान का अधिकार उसकी संगठनात्मक शक्ति पर निर्भर था।
ऑपरेशन बर्गा में अधिकार सरकारी रिकॉर्ड और कानून में दर्ज हुआ।
किस रास्ते से बर्गादार को अधिक स्थायी सुरक्षा मिली?
लेकिन इससे नक्सलबाड़ी की राजनीतिक भूमिका शून्य नहीं हो जाती।
क्या नक्सलबाड़ी ने ऑपरेशन बर्गा पैदा किया?
ऑपरेशन बर्गा की कानूनी जड़ें नक्सलबाड़ी से पहले के भूमि कानूनों और उससे भी पहले तेभागा आंदोलन में थीं।
West Bengal Estates Acquisition Act 1953 और Land Reforms Act 1955 पहले से मौजूद थे।
तेभागा ने बर्गादार अधिकार का प्रश्न 1940 के दशक में ही उठा दिया था।
इसलिए सीधा कारण-संबंध स्थापित करना गलत होगा।
क्या नक्सलबाड़ी ने भूमि प्रश्न की राजनीतिक तात्कालिकता बढ़ाई?
नक्सलबाड़ी का अप्रत्यक्ष दबाव
1967 ने पश्चिम बंगाल के वाम नेतृत्व के सामने एक कठोर राजनीतिक तथ्य रखा—
यदि भूमि सुधार कानून वास्तविक गांव तक नहीं पहुंचेंगे, तो वाम राजनीति के भीतर भी अधिक उग्र किसान धारा पैदा हो सकती है।
CPI(M) ने नक्सलबाड़ी लाइन का विरोध किया।
लेकिन वह यह नहीं कह सकती थी कि भूमि प्रश्न महत्वहीन है।
उसकी अपनी किसान राजनीति उसी प्रश्न पर आधारित थी।
तेभागा–नक्सलबाड़ी–ऑपरेशन बर्गा : लंबी श्रृंखला
पश्चिम बंगाल के भूमि इतिहास को अधिक सही ढंग से इस क्रम में समझा जा सकता है—
कानून के कमजोर क्रियान्वयन से असंतोष
संसदीय बनाम क्रांतिकारी भूमि राजनीति का टकराव
इस श्रृंखला में कोई एक घटना अकेली कारण नहीं।
हर चरण पिछले संघर्ष की सामाजिक स्मृति से जुड़ा था।
केरल — सबसे महत्वपूर्ण वैकल्पिक मॉडल
यदि पश्चिम बंगाल ने बर्गादार सुरक्षा पर जोर दिया, तो केरल ने tenancy संबंधों में और गहरा संस्थागत परिवर्तन किया।
1957 में ई.एम.एस. नंबूदिरिपाद की कम्युनिस्ट सरकार ने सत्ता में आने के कुछ ही दिनों बाद बेदखली रोकने की दिशा में कदम उठाया।
केरल भूमि सुधार की तीन मुख्य दिशाएं बनीं—
किरायेदार किसान को सुरक्षा और स्वामित्व,
Kerala Land Reforms Act
Kerala Land Reforms Act, 1963 और उसके बाद के संशोधनों का लक्ष्य था—
मध्यस्थ भूमि संबंधों को समाप्त करना,
और ceiling के माध्यम से असमानता कम करना।
केरल सरकार का आधिकारिक सांख्यिकीय विवरण भी भूमि सुधार के दो स्पष्ट उद्देश्य बताता है—
शोषणकारी tenancy समाप्त कर वास्तविक जोतने वाले को स्वामित्व देना,
और भूमि सीमा के माध्यम से असमान वितरण घटाना।
केरल में वास्तविक परिणाम
केरल के एक महत्वपूर्ण दीर्घकालीन ग्राम अध्ययन ने पाया कि 1969 के भूमि सुधार ने landlord–tenant संबंध में गहरा परिवर्तन किया, tenancy समाप्त की और भूमि तथा आय असमानता को कम किया।
लेकिन ceiling-surplus भूमि वितरण अपेक्षाकृत सीमित रहा।
उसी अध्ययन में लगभग 85,000 परिवारों को ceiling भूमि मिलने और औसत जोत लगभग 0.59 एकड़ रहने का पुराना राज्यव्यापी अनुमान उद्धृत किया गया है।
केरल ने नक्सलबाड़ी के लिए क्या चुनौती पेश की?
केरल का उदाहरण नक्सलवादी विचारधारा के लिए कठिन था।
यहां कम्युनिस्ट पार्टी चुनाव जीतकर सरकार में आई।
उसने संवैधानिक और विधायी प्रक्रिया से tenancy संबंधों को बदला।
लेकिन यह केवल प्रतीकात्मक सुधार भी नहीं था।
जोतने वाले को जमीन दिलाने के लिए सशस्त्र राज्य-विनाश अनिवार्य है।
लेकिन केरल मॉडल की भी सीमाएं
केरल के भूमि सुधार से सभी ग्रामीण गरीब भूमि-मालिक नहीं बने।
बागान क्षेत्रों और कुछ श्रेणियों पर कानून के प्रभाव की सीमाएं थीं।
भूमि सीमा की exemptions और व्यावहारिक कठिनाइयां भी रहीं।
इसलिए केरल को पूर्ण भूमि समानता का मॉडल कहना गलत होगा।
tenancy और सामाजिक शक्ति संबंधों का परिवर्तन।
बिहार — कानून बहुत, क्रियान्वयन कमजोर
बिहार का अनुभव पश्चिम बंगाल और केरल से लगभग विपरीत दिशा प्रस्तुत करता है।
जमींदारी उन्मूलन के शुरुआती कानूनों के बावजूद भूमि का वास्तविक वितरण अत्यंत असमान रहा।
बिहार में भूमि सुधार क्यों कमजोर रहा?
भूमि सीमा कानून का अर्थ तभी है जब सरकार सही ढंग से तय कर सके कि किसके पास वास्तव में कितनी जमीन है।
यदि भूमि रिश्तेदारों, कर्मचारियों या बेनामी नामों में बांट दी जाए, तो ceiling कानून का उद्देश्य कमजोर हो सकता है।
बिहार में यही समस्या लंबे समय तक दिखाई दी।
भोजपुर नक्सलवाद और असफल भूमि सुधार
यहीं बिहार का अनुभव नक्सलबाड़ी से दोबारा जुड़ता है।
यदि भूमि सुधार कानून पर्याप्त रूप से लागू होता,
यदि भूमिहीन दलित किसान को जमीन और सुरक्षा मिलती,
यदि कृषि मजदूरी का विवाद प्रशासनिक–राजनीतिक संस्थाओं से हल होता—
तो सशस्त्र किसान संघर्ष का सामाजिक आधार कितना रहता?
यह प्रतिपक्षीय प्रश्न है, जिसका निश्चित उत्तर नहीं दिया जा सकता।
बिहार में ‘जमीन’ से ‘इज्जत’ तक
बिहार यह भी दिखाता है कि केवल भूमि बांट देने से पूरा ग्रामीण प्रश्न हल नहीं होता।
इसलिए नक्सलबाड़ी का “जमीन जोते उसकी” नारा भोजपुर पहुंचकर अधिक व्यापक हुआ।
भूमि सुधार तभी पूर्ण सामाजिक सुधार बन सकता है जब जातिगत सत्ता भी बदले।
आंध्र प्रदेश — दो अलग ऐतिहासिक क्षेत्र
आंध्र प्रदेश का भूमि इतिहास भी सरल नहीं था।
1956 में राज्य बनने से पहले आंध्र और तेलंगाना की कृषि संरचनाएं अलग थीं।
आंध्र क्षेत्र ब्रिटिश मद्रास व्यवस्था से आया था।
तेलंगाना निजाम शासन, जागीर और सामंती संबंधों की अलग विरासत से आया।
तेलंगाना की protected tenancy
तेलंगाना में Hyderabad Tenancy and Agricultural Lands Act, 1950 ने tenants के अधिकारों को सुरक्षित करने की कोशिश की।
और protected tenant को कुछ परिस्थितियों में भूमि स्वामित्व हासिल करने का अधिकार—
बाद के अध्ययनों में 1970 के दशक के मध्य तक लगभग 33,000 protected tenants के पास लगभग 82,000 हेक्टेयर भूमि के अधिकार का उल्लेख मिलता है।
1961 का आंध्र ceiling कानून — विफल प्रयोग
आंध्र प्रदेश ने 1961 में भूमि सीमा कानून बनाया।
लेकिन बाद में स्वयं आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने 1977 के फैसले में टिप्पणी की कि 1961 का कानून अपने उद्देश्य में प्रभावी नहीं रहा और इसी पृष्ठभूमि में अधिक कठोर 1973 कानून आया।
प्रारंभिक ceiling सीमा बहुत ऊंची और अपवाद व्यापक थे।
इससे बहुत कम भूमि वास्तव में अधिशेष घोषित हुई।
Andhra Pradesh Land Reforms Act, 1973
1973 के कानून ने कृषि holdings पर नई सीमा और surplus land के सरकारी अधिग्रहण का ढांचा बनाया।
यह अधिनियम 1 जनवरी 1975 से प्रभावी हुआ। India Code में इसका घोषित उद्देश्य ही कृषि भूमि पर ceiling निर्धारित करना और surplus भूमि राज्य के अधीन लेना था।
भूमि की गुणवत्ता के अनुसार ceiling अलग थी।
आंध्र में ceiling का सीमित प्रभाव
आंध्र प्रदेश के अकादमिक अध्ययनों ने पाया कि 1973 का कानून 1961 के कानून से मजबूत था, लेकिन भूमि पुनर्वितरण पर उसका प्रभाव फिर भी अपेक्षाकृत सीमित रहा।
LBSNAA की ceiling laws समीक्षा भी 1961 के आंध्र कानून को बड़े loopholes वाला विफल कानून बताती है और 1973 के कानून के बाद भी व्यापक न्यायिक विवादों का उल्लेख करती है।
आंध्र में नक्सलवाद क्यों बचा?
यदि tenancy और ceiling कानून मौजूद थे, तो People's War क्यों उभरा?
क्योंकि सामाजिक वास्तविकता केवल कानून से निर्धारित नहीं होती।
मजदूरी और स्थानीय सत्ता विवाद बने रहे,
विशेष रूप से उत्तर तेलंगाना और बाद में दंडकारण्य में संघर्ष पारंपरिक tenancy से आगे बढ़कर वन और आदिवासी अधिकारों से जुड़ गया।
चार राज्यों की तुलना — मूल अंतर
यदि पश्चिम बंगाल, केरल, बिहार और आंध्र प्रदेश को एक साथ देखें तो भूमि सुधार की सफलता का सबसे बड़ा निर्धारक केवल कानून नहीं था।
पश्चिम बंगाल में चारों अपेक्षाकृत अधिक मजबूत हुए।
केरल में tenancy परिवर्तन की राजनीतिक इच्छा और सामाजिक आंदोलन मजबूत थे।
बिहार में कानून था लेकिन ग्रामीण सत्ता-संतुलन और प्रशासनिक क्रियान्वयन कमजोर रहा।
भूमि रिकॉर्ड — क्रांति से अधिक उबाऊ, लेकिन अधिक निर्णायक?
भूमि सुधार की राजनीति में यह शायद सबसे कम रोमांचक लेकिन सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है।
यदि प्रशासन इन प्रश्नों का विश्वसनीय उत्तर नहीं दे सकता तो किसी भी ceiling कानून का प्रभाव सीमित होगा।
विश्व बैंक के भारतीय भूमि सुधार अध्ययन ने भी अधूरे भूमि रिकॉर्ड को गरीबों के अधिकार लागू करने की प्रमुख बाधाओं में गिना।
इतिहास में यह विरोधाभास अत्यंत महत्वपूर्ण है।
नक्सलबाड़ी, 1967
भूमि रिकॉर्ड उस व्यवस्था का प्रतीक हैं जिसने जोतदार को अधिकार दिया।
इसलिए किसान उन्हें अस्वीकार करता है।
ऑपरेशन बर्गा, 1978
भूमि रिकॉर्ड किसान के अधिकार की सुरक्षा का साधन बनाए जाते हैं।
इसलिए किसान अपना नाम उनमें दर्ज कराता है।
राज्य की प्रकृति के प्रति दो विपरीत राजनीतिक दृष्टियों का प्रतीक है।
राज्य के रिकॉर्ड को गरीब किसान के पक्ष में बदलो।
किस मॉडल ने अधिक किसानों को वास्तविक लाभ दिया?
यदि केवल पश्चिम बंगाल की तुलना की जाए, तो उपलब्ध प्रमाण स्पष्ट हैं।
1967 के नक्सलबाड़ी भूमि कब्जे कुछ हजार किसानों तक सीमित क्षेत्रीय प्रयोग रहे और कुछ महीनों में राज्य ने उन्हें समाप्त कर दिया।
ऑपरेशन बर्गा ने लगभग 14 लाख बर्गादारों को दर्ज किया।
इसके अतिरिक्त लाखों भूमिहीन परिवारों को vested land का हिस्सा मिला।
फिर नक्सलबाड़ी की उपयोगिता क्या थी?
यदि कानून का रास्ता अधिक प्रभावी निकला, तो क्या नक्सलबाड़ी निरर्थक था?
नक्सलबाड़ी ने उस विफलता को दृश्यमान बनाया जिसे प्रशासन वर्षों से टाल रहा था।
गरीब किसान को वास्तविक कब्जा और सुरक्षा चाहिए।
उसने संसदीय वाम को भी चुनौती दी कि वह अपने भूमि-सुधार वादे को व्यवहार में सिद्ध करे।
इसलिए नक्सलबाड़ी का महत्व नीति के मॉडल से अधिक—
नक्सलबाड़ी की उपलब्धियां, विफलताएं और ऐतिहासिक विवाद
:::writing{variant="document" id="91834" title="खंड 14 — नक्सलबाड़ी की उपलब्धियां, विफलताएं और ऐतिहासिक विवाद"}
प्रस्तावना : नक्सलबाड़ी की सफलता या विफलता का फैसला किस कसौटी पर हो?
नक्सलबाड़ी के बारे में दो विपरीत ऐतिहासिक स्मृतियां मौजूद हैं।
एक स्मृति उसे भारतीय किसान क्रांति की महान शुरुआत मानती है—एक ऐसा क्षण जब भूमिहीन, बर्गादार और आदिवासी किसानों ने पहली बार राज्य और ग्रामीण प्रभुत्व को सीधी चुनौती दी।
पहली उपलब्धि — गरीब किसान को राजनीतिक केंद्र में लाना
नक्सलबाड़ी की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह थी कि उसने स्वतंत्र भारत की राजनीति के सामने उस गरीब किसान को खड़ा कर दिया जो कागज पर नागरिक था लेकिन गांव में आर्थिक और सामाजिक रूप से निर्भर था।
ये राजनीतिक भाषणों में पहले भी मौजूद थे।
भूमि को कल्याण नहीं, सत्ता का प्रश्न बनाना
नक्सलबाड़ी से पहले भी भूमि सुधार कानून बन चुके थे।
लेकिन प्रशासनिक भाषा में भूमि प्रश्न अक्सर—
भूमि पर अधिकार केवल आर्थिक विषय नहीं।
और कई जगह स्थानीय राजनीति पर नियंत्रण भी हो सकता है।
इसलिए जमीन का पुनर्वितरण केवल संपत्ति का बंटवारा नहीं—
यह विचार आगे भारतीय भूमि सुधार की बहस का स्थायी हिस्सा बना।
भूमि सुधार के खोखले क्रियान्वयन को उजागर करना
नक्सलबाड़ी ने यह प्रश्न भी राष्ट्रीय राजनीति में तीखा किया—
यदि कानून पहले से है तो किसान को उसका लाभ क्यों नहीं मिल रहा?
यही समस्या पश्चिम बंगाल में स्पष्ट थी।
भूमि-सुधार कानून 1950 के दशक से मौजूद थे, लेकिन बड़ी संख्या में बर्गादार रिकॉर्ड से बाहर थे।
किसान चेतना में भय का टूटना
नक्सलबाड़ी की सबसे कम मापी जा सकने वाली लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण उपलब्धि थी—
सामंती या अर्ध-सामंती ग्रामीण संबंध केवल आर्थिक निर्भरता से नहीं चलते।
वे सामाजिक अनुशासन पर भी निर्भर होते हैं।
गरीब किसान जोतदार के सामने खड़ा नहीं होता।
दलित ग्रामीण सामाजिक अपमान का प्रतिरोध नहीं करता।
नक्सलबाड़ी ने सामूहिकता के माध्यम से इस भय को चुनौती दी।
आदिवासी किसान को केंद्रीय राजनीतिक पात्र बनाना
नक्सलबाड़ी में संथाल और अन्य आदिवासी किसानों की महत्वपूर्ण भागीदारी ने स्वतंत्र भारत की किसान राजनीति में आदिवासी प्रश्न को अधिक स्पष्ट किया।
यह प्रक्रिया बाद में श्रीकाकुलम और दंडकारण्य में और गहरी हुई।
महिलाओं की भूमिका को दृश्य बनाना
25 मई 1967 की गोलीबारी में महिलाओं और बच्चों की मौत ने नक्सलबाड़ी के इतिहास में महिलाओं की भूमिका को अमिट कर दिया।
लेकिन उनकी उपलब्धि केवल शहादत नहीं थी।
नक्सलबाड़ी ने यह दिखाया कि कृषि संघर्ष ‘पुरुष किसान’ का अकेला संघर्ष नहीं है।
भूमि परिवार की खाद्य सुरक्षा का आधार है और महिला कृषि श्रम की केंद्रीय सहभागी है।
युवा राजनीति पर अभूतपूर्व प्रभाव
नक्सलबाड़ी का सबसे बड़ा प्रभाव उन युवाओं पर पड़ा जो स्वयं गरीब किसान नहीं थे।
कलकत्ता और अन्य शहरों के शिक्षित छात्र—
उनमें से अनेक ने व्यक्तिगत सुविधा छोड़ी।
उनकी राजनीति से सहमत होना आवश्यक नहीं, लेकिन यह स्वीकार करना होगा कि नक्सलबाड़ी ने सामाजिक असमानता के प्रश्न पर एक पीढ़ी को गहरे स्तर पर झकझोरा।
भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन को आत्मपरीक्षण पर मजबूर करना
नक्सलबाड़ी ने CPI और CPI(M) दोनों से पूछा—
यदि कम्युनिस्ट राजनीति केवल चुनाव, विधानसभा और मंत्रालय तक सीमित हो जाए तो उसका किसान क्रांतिकारी कार्यक्रम क्या रह जाता है?
यह प्रश्न CPI(M) के लिए विशेष रूप से कठिन था क्योंकि 1967 में वह स्वयं संयुक्त मोर्चा सरकार का हिस्सा थी।
नक्सलबाड़ी ने संसदीय वाम को अपनी ग्रामीण राजनीति गंभीरता से लेने पर मजबूर किया।
संसदीय वाम के भूमि एजेंडे को तीखा करना
यह दावा प्रमाण से आगे होगा कि ऑपरेशन बर्गा सीधे नक्सलबाड़ी के कारण आया।
भूमि सुधार की जड़ें तेभागा और पूर्ववर्ती कानूनों में थीं।
लेकिन नक्सलबाड़ी ने एक महत्वपूर्ण राजनीतिक तुलना पैदा की—
क्या कम्युनिस्ट सरकार लोकतांत्रिक रास्ते से वह अधिकार दे सकती है जिसे क्रांतिकारी धारा बंदूक से लेने की बात करती है?
भारतीय राजनीति में ‘नक्सल’ शब्द का जन्म
नक्सलबाड़ी की एक असाधारण उपलब्धि—या परिणाम—भाषिक था।
एक गांव का नाम राष्ट्रीय राजनीतिक श्रेणी बन गया।
ये शब्द भारतीय राजनीतिक शब्दकोश का स्थायी हिस्सा बन गए।
बहुत कम किसान आंदोलनों का नाम इस प्रकार स्वतंत्र विचारधारात्मक पहचान में बदलता है।
यह स्वयं उसके ऐतिहासिक प्रभाव की विशालता का संकेत है।
क्या यह उपलब्धि थी कि आंदोलन राष्ट्रीय बन गया?
लेकिन किसान आंदोलन के दृष्टिकोण से यह उपलब्धि जितनी है उतनी ही समस्या भी।
क्योंकि जैसे-जैसे आंदोलन राष्ट्रीय क्रांतिकारी संगठन बना, मूल भूमि प्रश्न कई बार व्यापक राज्य-सत्ता संघर्ष में पीछे चला गया।
नक्सलबाड़ी का पहला बड़ा विरोधाभास
क्रांतिकारी नेतृत्व राज्य-सत्ता बदलना चाहता था।
प्रारंभिक क्षण में दोनों लक्ष्य एक-दूसरे से जुड़े हुए लगे।
यदि किसान को भूमि सुरक्षा मिल जाती तो क्या वह राज्य-सत्ता के लिए दीर्घकालीन युद्ध जारी रखता?
यहीं नक्सलबाड़ी की पहली रणनीतिक समस्या थी—
स्थानीय सामाजिक मांग को राष्ट्रीय क्रांतिकारी लक्ष्य के साथ लगभग पूर्णतः समान मान लेना।
पहली विफलता — स्थायी भूमि अधिकार स्थापित न कर पाना
किसान आंदोलन का सबसे सीधा मूल्यांकन उसके भौतिक परिणाम से किया जाना चाहिए।
मार्च–जुलाई 1967 के कब्जे पुलिस कार्रवाई के बाद टिक नहीं पाए।
इसलिए प्रत्यक्ष भूमि पुनर्वितरण की कसौटी पर आंदोलन सफल नहीं था।
यह वह बिंदु है जहां ऑपरेशन बर्गा जैसे संवैधानिक सुधारों का परिणाम कहीं बड़ा दिखाई देता है।
दूसरी विफलता — स्थानीय विद्रोह को राष्ट्रीय क्रांति मान लेना
चारु मजूमदार ने नक्सलबाड़ी को भारतीय क्रांति की शुरुआत के रूप में देखा।
1968 में उन्होंने स्पष्ट लिखा कि नक्सलबाड़ी का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि किसानों का संघर्ष केवल भूमि या फसल की मांग तक सीमित नहीं, राज्य-सत्ता पर कब्जे की दिशा में है।
नक्सलबाड़ी ने निश्चित रूप से किसान विद्रोह की संभावना दिखाई।
क्रांतिकारी परिस्थिति का अतिमूल्यांकन
1960 के दशक के उत्तरार्ध में विश्व राजनीति ने क्रांति की निकटता का भ्रम मजबूत किया।
एक बड़े वैश्विक उभार का वातावरण बना रहे थे।
चारु मजूमदार की धारा ने भारत को भी इसी तत्काल क्रांतिकारी क्षण में देखा।
किसान व्यापक राष्ट्रीय गृहयुद्ध में नहीं उठे।
तीसरी विफलता — ‘वर्ग-शत्रु सफाया’ का सामान्यीकरण
नक्सलबाड़ी की सबसे विवादित विरासत चारु मजूमदार की ‘annihilation’ लाइन रही।
गरीब किसान स्थानीय उत्पीड़क को चुनौती देकर भयमुक्त होगा और क्रांतिकारी शक्ति महसूस करेगा।
लेकिन कई क्षेत्रों में यह लाइन व्यक्तिगत हत्या अभियान में बदल गई।
यही आंदोलन के नैतिक और रणनीतिक संकट का केंद्र था।
राजनीतिक हत्या और किसान संघर्ष का अंतर
एक किसान आंदोलन सामूहिकता पर आधारित होता है।
इनमें बड़ी संख्या में किसान सक्रिय होते हैं।
लेकिन यदि दस भूमिगत कार्यकर्ता किसी कथित वर्ग-शत्रु की हत्या कर दें, तो किसान दर्शक भी रह सकता है।
यानी सशस्त्र कार्रवाई हमेशा जन संघर्ष का पर्याय नहीं।
यहीं ‘स्क्वाड लाइन’ और ‘मास लाइन’ का अंतर पैदा हुआ।
हिंसा ने भय तोड़ा भी और नया भय पैदा किया
यह नक्सलबाड़ी की सबसे जटिल विरासत है।
प्रारंभिक किसान हिंसा ने स्थानीय उत्पीड़क का भय तोड़ा।
जब हिंसा के निशाने बनने लगे तो एक नया भय पैदा हुआ।
अब गांव या शहर में प्रश्न हो सकता था—
इसलिए मुक्ति की राजनीति स्वयं अनुशासन और भय की राजनीति में बदल सकती थी।
चौथी विफलता — खुले जनसंगठनों की उपेक्षा
चारु मजूमदार की राजनीतिक दिशा के सबसे गंभीर परिणामों में एक था खुले जनसंगठनों का महत्व घट जाना।
लंबे सामाजिक संघर्ष की रीढ़ बन सकते थे।
लेकिन जब भूमिगत सशस्त्र दस्ते केंद्र में आए, तो खुले संगठन कई जगह गौण हो गए।
इससे आंदोलन की विस्तार क्षमता और लोकतांत्रिक सहभागिता दोनों कमजोर हुए।
पांचवीं विफलता — शहरी हिंसा की ओर विचलन
नक्सलबाड़ी का माओवादी सिद्धांत कहता था—
लेकिन पश्चिम बंगाल में आंदोलन तेजी से कलकत्ता की शहरी हिंसा में उलझ गया।
यह ग्रामीण जनयुद्ध की मूल रणनीति के भीतर भी विरोधाभासी था।
किसान भूमि संघर्ष और महानगरीय ‘एक्शन’ राजनीति के बीच दूरी बढ़ गई।
मध्यवर्ग का एक हिस्सा, जो प्रारंभ में सामाजिक प्रश्नों से प्रभावित था, आंदोलन से दूर होने लगा।
‘क्रांतिकारी रोमांच’ की समस्या
नक्सलबाड़ी ने युवाओं को गहरी नैतिक प्रेरणा दी।
लेकिन युवाओं का उत्साह कई बार सामाजिक विश्लेषण का विकल्प बन गया।
को समझे बिना केवल क्रांतिकारी साहस पर्याप्त नहीं।
आंदोलन के कुछ हिस्सों में बलिदान स्वयं राजनीतिक सत्य का प्रमाण माना जाने लगा।
लेकिन व्यक्ति का साहस किसी रणनीति की शुद्धता सिद्ध नहीं करता।
यही युवा नक्सलवाद की बड़ी त्रासदियों में से एक थी।
छठी विफलता — भारतीय लोकतंत्र का गलत आकलन
नक्सलवादी विचारधारा ने संसदीय लोकतंत्र को मुख्यतः शासक वर्ग का आवरण माना।
लेकिन भारतीय अनुभव अलग दिशा में विकसित हुआ।
कम्युनिस्ट दल चुनाव से सत्ता में आए।
दलित और पिछड़ी जातियों के राजनीतिक दल उभरे।
क्षेत्रीय पार्टियों ने केंद्र की राजनीति बदली।
इससे साबित हुआ कि भारतीय लोकतंत्र केवल स्थिर दिखावा नहीं था।
वह सामाजिक शक्ति-संतुलन बदलने का वास्तविक मंच भी था।
सातवीं विफलता — चीन को यांत्रिक मॉडल मानना
1940 के दशक का चीन और 1960 के दशक का भारत एक जैसी राजनीतिक व्यवस्था नहीं थे।
फिर भी माओवादी रणनीति ने ग्रामीण आधार क्षेत्र और शहरों की घेराबंदी को भारत का मूल क्रांतिकारी रास्ता माना।
कैम्ब्रिज के तुलनात्मक अध्ययन में भी नक्सलबाड़ी की पहली लहर को अपेक्षाकृत अल्पकालीन और बाद के माओवादी आंदोलन की तुलना में असामान्य बताया गया है।
आठवीं विफलता — वर्ग के भीतर जाति को कम आंकना
नक्सलबाड़ी की मूल राजनीति वर्ग पर केंद्रित थी।
लेकिन बिहार के भोजपुर ने दिखाया कि भूमिहीनता और जाति का संबंध अलग-अलग नहीं समझा जा सकता।
दलित मजदूर की समस्या केवल मजदूरी नहीं थी।
आगे नक्सली और माओवादी संगठनों को जाति, दलित और आदिवासी प्रश्नों को अलग पहचान देनी पड़ी।
यह स्वयं मूल विश्लेषण की सीमा का प्रमाण था।
नौवीं विफलता — महिला भागीदारी को स्वतंत्र महिला राजनीति में न बदल पाना
प्रसादुजोत की महिलाएं आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में थीं।
आगे महिला कैडर माओवादी संगठनों में बड़ी संख्या में आए।
जैसे प्रश्न लंबे समय तक वर्ग संघर्ष के भीतर गौण रहे।
अर्थात आंदोलन महिलाओं को लड़ने का स्थान दे सकता था—
लेकिन हमेशा उनकी स्वतंत्र सामाजिक मुक्ति की पूर्ण रूपरेखा नहीं।
दसवीं विफलता — पार्टी को जनता का पर्याय मान लेना
क्रांतिकारी पार्टी स्वयं को गरीब जनता का प्रतिनिधि मानती थी।
वह भूमि सुधार मिलने पर सशस्त्र संघर्ष छोड़ सकता है।
आदिवासी सड़क या विद्यालय चाह सकता है जिसे भूमिगत संगठन सामरिक खतरे के रूप में देखे।
यदि पार्टी अपनी राजनीतिक लाइन को ही ‘जन इच्छा’ मान ले—
तो वास्तविक जनता की स्वतंत्रता कम हो सकती है।
नक्सलबाड़ी समर्थक इतिहासलेखन का तर्क
नक्सलबाड़ी समर्थक लेखन में आंदोलन की उपलब्धियां सामान्यतः इस प्रकार देखी गईं—
उसने ग्रामीण गरीब को राजनीति के केंद्र में लाया,
संसदीय कम्युनिज्म की सीमाएं उजागर कीं,
भूमि क्रांति को तत्काल एजेंडा बनाया,
और युवाओं की पीढ़ी को राजनीतिक संघर्ष में खींचा।
CPI(M) और संसदीय वाम की आलोचना
संसदीय वाम ने नक्सलबाड़ी को मुख्यतः वाम दुस्साहसवाद माना।
लेकिन कुछ क्षेत्रों की सशस्त्र कार्रवाइयों को राष्ट्रीय क्रांति समझना गलत।
पुलिस और राज्य के साथ सीधा युद्ध उस समय जन आंदोलन को नष्ट करेगा जब संगठनात्मक आधार अपर्याप्त है।
बाद के परिणामों ने इस आलोचना के कई हिस्सों को मजबूत किया।
लेकिन संसदीय वाम की अपनी चुनौती भी रही—
राज्य का दृष्टिकोण — कानून-व्यवस्था की समस्या
सरकारों ने नक्सलबाड़ी को धीरे-धीरे सशस्त्र कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा समस्या के रूप में देखा।
राज्य पर सशस्त्र कब्जे का घोषित लक्ष्य था।
इसलिए राज्य का कार्रवाई करना वैध सरकारी दायित्व था।
लेकिन यहीं दूसरा प्रश्न पैदा होता है—
राज्य-दमन — सफलता और नैतिक संकट
1970–72 की पहली लहर का दमन बहुत कठोर था।
और कथित गैर-न्यायिक हत्याओं के आरोप—
आगे सलवा जुडूम के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सशस्त्र विद्रोह से लड़ने के नाम पर राज्य स्वयं संवैधानिक सीमाओं से बाहर नहीं जा सकता।
इसलिए नक्सलबाड़ी का इतिहास केवल यह नहीं सिखाता कि विद्रोही हिंसा खतरनाक है।
क्या पुलिस दमन ने नक्सलवाद पैदा किया?
लेकिन राज्य की अत्यधिक या अवैध हिंसा ने आंदोलन को प्रचार, शहादत और नई भर्ती का आधार अवश्य दिया।
25 मई 1967 की गोलीबारी इसका पहला बड़ा उदाहरण बनी।
लेकिन उसका उत्तेजक और पुनरुत्पादक कारक हो सकता था।
क्या माओवादी हिंसा राज्य-दमन की प्रतिक्रिया मात्र थी?
माओवादी विचारधारा में सशस्त्र संघर्ष स्वयं रणनीतिक सिद्धांत था।
वह केवल पुलिस हिंसा के जवाब में पैदा नहीं हुआ।
राज्य-सत्ता के सशस्त्र उखाड़ने का कार्यक्रम स्वतंत्र रूप से मौजूद था।
इसलिए बाद की हिंसा को केवल ‘प्रतिरोध’ कहकर समझना अधूरा है।
यह एक संगठित राजनीतिक-सैन्य परियोजना भी थी।
यह अंतर ऐतिहासिक जिम्मेदारी तय करने में महत्वपूर्ण है।
‘दोनों तरफ हिंसा’ कहना भी पर्याप्त नहीं
यह कहना कि “दोनों तरफ हिंसा हुई” तथ्यात्मक रूप से सही लेकिन विश्लेषणात्मक रूप से अधूरा है।
राज्य और भूमिगत संगठन की जिम्मेदारी समान प्रकार की नहीं।
राज्य संविधान, कानून और सार्वजनिक जवाबदेही के अधीन है।
भूमिगत संगठन द्वारा हत्या अपराध और राजनीतिक हिंसा है।
राज्य द्वारा गैर-न्यायिक हत्या, यदि सिद्ध हो, सार्वजनिक सत्ता का अवैध प्रयोग है।
क्या नक्सलबाड़ी ने संसदीय वाम को मजबूत किया या कमजोर?
उसने CPI(M) को तत्काल संगठनात्मक चुनौती दी।
लेकिन दीर्घकाल में नक्सलबाड़ी ने संसदीय वाम को एक राजनीतिक तुलना का अवसर भी दिया।
देखिए, सशस्त्र रास्ता पराजय और दमन लाया; हम कानून और किसान संगठन से भूमि सुधार कर सकते हैं।
ऑपरेशन बर्गा ने इस तर्क को व्यावहारिक आधार दिया।
इस अर्थ में नक्सलबाड़ी ने अपने विरोधी संसदीय वाम को भी अप्रत्यक्ष रूप से मजबूत किया।
पश्चिम बंगाल में नक्सलबाड़ी की सबसे बड़ी राजनीतिक विडंबना
लेकिन आगे उसी राज्य में नक्सलवादी राजनीति मुख्य शक्ति नहीं बनी।
1977 के बाद दशकों तक CPI(M)-नेतृत्व वाला वाम मोर्चा शासन करता रहा।
इससे एक गहरी ऐतिहासिक विडंबना पैदा हुई—
नक्सलबाड़ी ने जिस संसदीय कम्युनिज्म को अस्वीकार किया, वही पश्चिम बंगाल के गरीब ग्रामीणों में कहीं अधिक स्थायी राजनीतिक आधार बनाने में सफल हुआ।
लेकिन संसदीय वाम की विजय पूर्ण नहीं थी
वाम मोर्चा शासन का लंबा इतिहास यह भी बताता है कि कोई राजनीतिक मॉडल स्थायी रूप से निष्कलंक नहीं रहता।
भूमि सुधारों की गति बाद में धीमी हुई।
कृषि और औद्योगिकीकरण के नए प्रश्न पैदा हुए।
सिंगूर और नंदीग्राम जैसे भूमि विवादों ने फिर राज्य, किसान और औद्योगिक विकास का तनाव सामने रखा।
क्या नक्सलबाड़ी किसान आंदोलन था या क्रांतिकारी राजनीतिक आंदोलन?
अखिल भारतीय क्रांतिकारी राजनीतिक आंदोलन।
2004 के बाद CPI (Maoist) के संदर्भ में—
एक संगठित भूमिगत राजनीतिक-सैन्य विद्रोह।
इसलिए पूरे 1967–2026 इतिहास को एक ही श्रेणी ‘किसान आंदोलन’ में रखना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा।
मूल नक्सलबाड़ी और आधुनिक माओवाद को अलग क्यों रखना चाहिए?
दशकों के संगठनात्मक विकास से बना अखिल भारतीय गुरिल्ला आंदोलन था।
मूल संघर्ष में किसान प्रत्यक्ष सामाजिक पात्र था।
आधुनिक माओवादी संगठन में केंद्रीय समिति, सैन्य संगठन, वित्तीय नेटवर्क और राजनीतिक रणनीति विकसित थी।
लेकिन सामाजिक और संगठनात्मक समानता नहीं।
सफलता की पहली कसौटी — घोषित लक्ष्य
यदि आंदोलन को उसके घोषित सर्वोच्च लक्ष्य से मापा जाए—
भारतीय राज्य-सत्ता पर क्रांतिकारी कब्जा—
तो नक्सलबाड़ी स्पष्ट रूप से विफल हुआ।
छह दशक में भी नक्सलवादी आंदोलन राष्ट्रीय सत्ता के निकट नहीं पहुंचा।
इसके विपरीत उसका भूगोल लंबे समय में संकुचित हुआ।
सफलता की दूसरी कसौटी — भूमि क्रांति
जोतदार व्यवस्था का स्थानीय अंत और भूमि का स्थायी किसान पुनर्वितरण—
तो 1967 का मूल आंदोलन भी सीमित परिणाम दे पाया।
इसलिए प्रत्यक्ष भूमि परिणाम की कसौटी पर भी सफलता सीमित थी।
सफलता की तीसरी कसौटी — राजनीतिक चेतना
किसान को अपनी शक्ति का अहसास दिलाना और भूमि प्रश्न को राष्ट्रीय बहस में लाना—
यहां उसकी ऐतिहासिक शक्ति सबसे स्पष्ट दिखाई देती है।
छोटे विद्रोह का नाम छह दशकों तक जीवित रहना स्वयं इसका प्रमाण है।
सफलता की चौथी कसौटी — संगठनात्मक प्रभाव
क्या नक्सलबाड़ी ने नई राजनीतिक परंपरा पैदा की?
सभी अलग-अलग रूप में उसकी विरासत से जुड़े।
इतिहास में बहुत कम स्थानीय किसान आंदोलनों ने इतनी बड़ी राष्ट्रीय संगठनात्मक वंशावली पैदा की।
इस कसौटी पर उसका प्रभाव असाधारण है।
सफलता की पांचवीं कसौटी — ग्रामीण समाज में स्थायी सुधार
नक्सलबाड़ी के प्रत्यक्ष नियंत्रण से स्थायी ग्रामीण सुधार सीमित रहे।
लेकिन उसके व्यापक ऐतिहासिक दबाव और समानांतर किसान आंदोलनों ने भूमि सुधार की राजनीति को मजबूत किया।
फिर भी स्थायी अधिकार जहां सबसे व्यापक रूप से मिले, वे मुख्यतः कानून, प्रशासन और किसान संगठन के संयोजन से मिले—जैसे ऑपरेशन बर्गा।
सफलता की छठी कसौटी — गरीब जनता की मानवीय लागत
किसी आंदोलन का मूल्यांकन उसके आदर्श से ही नहीं, कीमत से भी होना चाहिए।
सबसे नकारात्मक स्थायी विरासत
राजनीतिक हिंसा को वैचारिक नैतिकता प्रदान करना।
नक्सलबाड़ी का भारतीय किसान आंदोलनों और राजनीति पर दीर्घकालीन प्रभाव
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प्रस्तावना : नक्सलबाड़ी के बाद किसान राजनीति अधिक क्रांतिकारी हुई या अधिक लोकतांत्रिक?
नक्सलबाड़ी की सबसे दिलचस्प ऐतिहासिक विरासत यह है कि उसने किसान राजनीति को सशस्त्र क्रांति की दिशा में धकेलने की कोशिश की, लेकिन स्वतंत्र भारत की मुख्य किसान राजनीति अंततः उस रास्ते पर नहीं चली।
1967 के बाद भारतीय किसान आंदोलनों ने अनेक रूप ग्रहण किए—
हरित क्रांति के बाद मूल्य और लागत की राजनीति,
और 2020–21 का विशाल कृषि कानून विरोधी आंदोलन।
तेभागा से नक्सलबाड़ी — अधिकार की मांग से सत्ता के प्रश्न तक
तेभागा और नक्सलबाड़ी के बीच प्रत्यक्ष ऐतिहासिक संबंध था।
दोनों में बर्गादार प्रश्न महत्वपूर्ण था।
दोनों पर कम्युनिस्ट किसान सभा का प्रभाव था।
लेकिन उनके राजनीतिक लक्ष्य समान नहीं थे।
नक्सलबाड़ी ने प्रश्न को अधिक उग्र रूप दिया—
भूमि और ग्रामीण सत्ता किसके हाथ में हो?
यानी तेभागा ने मौजूदा कृषि संबंध के भीतर हिस्सेदारी बदलने की मांग की।
तेभागा की संगठनात्मक विरासत
नक्सलबाड़ी कोई राजनीतिक शून्य में नहीं पैदा हुआ था।
इसी कारण नक्सलबाड़ी में किसान को संगठित करने के लिए पूरी तरह नया राजनीतिक शब्दकोश बनाने की आवश्यकता नहीं थी।
किसान पहले से जानता था कि सामूहिक संगठन से फसल और भूमि प्रश्न उठाया जा सकता है।
इस अर्थ में नक्सलबाड़ी तेभागा का वैचारिक और संगठनात्मक उत्तराधिकार था—
लेकिन उससे कहीं अधिक क्रांतिकारी निष्कर्ष के साथ।
तेलंगाना से नक्सलबाड़ी — सशस्त्र किसान संघर्ष की स्मृति
तेलंगाना संघर्ष ने भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन को उससे भी बड़ी विरासत दी थी—
संगठित सशस्त्र किसान संघर्ष का अनुभव।
नक्सलबाड़ी नेतृत्व के सामने इसलिए भारतीय धरती पर सशस्त्र किसान आंदोलन का कोई पूर्व उदाहरण नहीं था—ऐसा कहना गलत होगा।
तेलंगाना उसका सबसे बड़ा पूर्ववर्ती अनुभव था।
लेकिन 1951 के बाद CPI ने संसदीय दिशा अपनाई।
तेलंगाना और नक्सलबाड़ी में बड़ा वैचारिक अंतर
तेलंगाना संघर्ष का विकास भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के अपने युद्धकालीन और निजाम-विरोधी संदर्भ में हुआ था।
नक्सलबाड़ी पर चीन और माओ की क्रांतिकारी रणनीति का प्रभाव कहीं अधिक स्पष्ट था।
इसलिए नक्सलबाड़ी केवल पुराने तेलंगाना की वापसी नहीं था।
यह भारतीय सशस्त्र किसान परंपरा और अंतरराष्ट्रीय माओवाद का संगम था।
यही कारण है कि उसका राजनीतिक प्रभाव भूगोल से बहुत बड़ा हुआ।
तेभागा–तेलंगाना–नक्सलबाड़ी की साझा धुरी
तीनों आंदोलनों के बीच एक बुनियादी निरंतरता थी—
कृषि उत्पादन करने वाला गरीब किसान भूमि और फसल की व्यवस्था में नीचे क्यों रहे?
जमींदारी दमन और भूमि पर नियंत्रण की चुनौती।
भूमि कब्जा और राज्य-सत्ता का प्रश्न।
इसलिए नक्सलबाड़ी किसान आंदोलनों की लंबी क्रांतिकारी श्रृंखला का अंतिम अचानक विस्फोट नहीं, बल्कि पहले के संघर्षों का अधिक उग्र वैचारिक रूप था।
भूमि सुधार पर संयुक्त दबाव
भारत में भूमि सुधार की राजनीतिक स्वीकृति केवल सरकारी योजना से पैदा नहीं हुई।
और बाद में नक्सलबाड़ी जैसे संघर्षों ने कृषि असमानता को राजनीतिक संकट बनाया।
नक्सलबाड़ी के बाद किसान राजनीति का पहला विभाजन
1967 के बाद भारतीय किसान राजनीति दो व्यापक रास्तों में दिखाई देती है।
भूमि, मजदूरी और सामाजिक सत्ता का वर्ग-संघर्ष, जिसमें नक्सली और विभिन्न वाम किसान संगठन सक्रिय रहे।
कृषि उत्पादक के आर्थिक हित की राजनीति, जिसमें कृषि मूल्य, लागत, बिजली, ऋण, सिंचाई और बाजार मुख्य मांगें बनीं।
पहला रास्ता गरीब किसान, भूमिहीन और कृषि मजदूर की भाषा अधिक बोलता था।
हरित क्रांति ने किसान राजनीति क्यों बदली?
लेकिन हरित क्रांति के बाद पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कुछ अन्य क्षेत्रों में कृषि प्रश्न बदल रहे थे।
सरकार कृषि उत्पादन से कितनी कीमत वसूल रही है?
यानी किसान संघर्ष उत्पादन संबंध से बढ़कर terms of trade—कृषि और शहरी अर्थव्यवस्था के बीच विनिमय संबंध का संघर्ष बन रहा था।
1980 के दशक के ‘नए किसान आंदोलन’
1970 के दशक के अंत और 1980 के दशक में भारत में ऐसी किसान राजनीति उभरी जिसे अकादमिक साहित्य में New Farmers' Movements कहा गया।
महेंद्र सिंह टिकैत की भारतीय किसान यूनियन,
इन आंदोलनों का सामाजिक आधार नक्सलबाड़ी से बहुत अलग था।
वे मुख्यतः खेती करने वाले छोटे, मध्यम और कई क्षेत्रों में समृद्ध उत्पादक किसानों के हितों पर केंद्रित थे।
नक्सलबाड़ी बनाम 1980 का किसान आंदोलन
दोनों की तुलना भारतीय किसान राजनीति के बदलाव को बहुत साफ करती है।
नक्सलबाड़ी भूमि-मालिक किसान और भूमिहीन में वर्ग अंतर पर जोर देता था।
नया किसान आंदोलन कई बार सब cultivators को एक संयुक्त ‘किसान’ पहचान में रखता था।
यहीं दोनों परंपराओं का मूल अंतर है।
शरद जोशी और ‘भारत बनाम इंडिया’
शरद जोशी की किसान राजनीति में एक प्रभावशाली विचार था—
ग्रामीण उत्पादक ‘भारत’ का शोषण शहरी–औद्योगिक ‘इंडिया’ द्वारा किया जाता है।
इसमें किसान और राज्य के संघर्ष का ढांचा नक्सलबाड़ी से बिल्कुल अलग था।
किसान को सर्वहारा–गरीब किसान क्रांति का हिस्सा नहीं बल्कि बाजार में नुकसान झेल रहे स्वतंत्र उत्पादक के रूप में देखा गया।
यह वर्ग-संघर्ष से अधिक उत्पादक हित आधारित राजनीति थी।
महेंद्र सिंह टिकैत और BKU
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भारतीय किसान यूनियन ने विशाल पंचायतों और धरनों के माध्यम से राज्य पर दबाव बनाया।
1980 के दशक की BKU को अकादमिक अध्ययनों ने एक शक्तिशाली ग्रामीण राजनीतिक बल माना है जिसने 1989 के चुनावी वातावरण तक पर प्रभाव डाला।
लेकिन BKU का रास्ता नक्सलबाड़ी का नहीं था।
लाखों किसान जुटाओ, प्रशासन घेरो, सरकार से बातचीत करो, मांग मनवाओ।
विशाल लामबंदी, लेकिन बंदूक नहीं
यही 1980 के दशक के किसान आंदोलन की सबसे बड़ी ऐतिहासिक भिन्नता थी।
वे सरकार को चुनौती देने में कमजोर नहीं थे।
लेकिन उनका उद्देश्य राज्य-सत्ता उखाड़ना नहीं था।
वे मौजूदा राज्य से नीति बदलवाना चाहते थे।
इसने भारतीय किसान राजनीति का अधिक प्रभावी मुख्यधारा मॉडल स्थापित किया—
सामूहिक दबाव, न कि सशस्त्र क्रांति।
नए किसान आंदोलनों की वर्गीय सीमा
SAGE में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार 1980 के दशक के कई नए किसान आंदोलन मुख्यतः मध्यम और बड़े किसानों तथा प्रभावशाली ग्रामीण जातियों द्वारा संचालित थे; दलित खेतिहर मजदूर और उनकी मजदूरी संबंधी मांगें अपेक्षाकृत कमजोर प्रतिनिधित्व पाती थीं।
यानी नक्सलबाड़ी और नए किसान आंदोलन की सीमाएं विपरीत थीं।
नक्सलबाड़ी ने गरीब किसान को केंद्र में रखा लेकिन हिंसक क्रांतिकारी रणनीति में फंस गया।
किसान बनाम खेतिहर मजदूर
यह अंतर आगे भारतीय किसान राजनीति का स्थायी विवाद बना।
यदि सरकार गेहूं का मूल्य बढ़ाती है—
इसलिए किसान और खेतिहर मजदूर के हित हमेशा समान नहीं।
नक्सलबाड़ी की वर्गीय राजनीति इस अंतर पर जोर देती थी।
‘नए किसान आंदोलन’ अक्सर संयुक्त किसान पहचान बनाने के लिए इसे पीछे रखते थे।
मंडल युग और ग्रामीण राजनीति
1980 के उत्तरार्ध और 1990 के दशक में ग्रामीण राजनीति पर एक नई शक्ति का प्रभाव बढ़ा—
जाति आधारित लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व।
मंडल आयोग की राजनीति ने OBC समूहों को राष्ट्रीय राजनीतिक केंद्र में ला दिया।
यह परिवर्तन किसान राजनीति के लिए महत्वपूर्ण था क्योंकि भारत की अनेक कृषक जातियां OBC सामाजिक संरचना का हिस्सा थीं।
किसान पहचान बनाम जाति पहचान
1980 के किसान आंदोलनों की कोशिश थी—
और अन्य कृषक समूहों को ‘किसान’ पहचान के भीतर जोड़ना।
इन सभी की सामाजिक स्थिति और राज्य से अपेक्षा समान नहीं।
इससे अखिल ‘किसान’ पहचान कमजोर पड़ सकती थी।
नक्सलबाड़ी और मंडल राजनीति का मूल अंतर
जाति स्वयं सत्ता और प्रतिनिधित्व का केंद्रीय आधार है।
यह भारतीय मार्क्सवादी राजनीति के लिए बड़ी चुनौती थी।
बिहार में नक्सली आंदोलनों ने पहले ही देख लिया था कि जाति को वर्ग के भीतर पूरी तरह समेटा नहीं जा सकता।
मंडल युग ने इस सत्य को राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित कर दिया।
दलित राजनीति का स्वतंत्र उभार
दलित राजनीति ने भी नक्सलबाड़ी की वर्गीय भाषा से अलग रास्ता बनाया।
बहुजन राजनीति ने बताया कि दलित को केवल ‘भूमिहीन मजदूर’ कह देना उसके अनुभव का पूरा वर्णन नहीं।
इससे नक्सलवादी वर्ग विश्लेषण की सीमा और स्पष्ट हुई।
फिर भी दलित भूमि प्रश्न क्यों बना रहा?
जाति राजनीति के उभार से भूमि प्रश्न समाप्त नहीं हुआ।
कई ग्रामीण क्षेत्रों में दलित परिवारों की भूमिहीनता बनी रही।
भोजपुर इसका प्रमुख ऐतिहासिक उदाहरण था।
जाति और वर्ग की राजनीति प्रतिस्पर्धी भी हो सकती है और पूरक भी।
आदिवासी राजनीति की स्वतंत्र धारा
आदिवासी राजनीति भी नक्सलबाड़ी–माओवादी राजनीति का पर्याय नहीं।
सभी ने संवैधानिक रास्तों से आदिवासी प्रतिनिधित्व की अलग परंपरा बनाई।
माओवादी आंदोलन कुछ आदिवासी क्षेत्रों में मजबूत रहा, लेकिन उसने आदिवासी राजनीति पर एकाधिकार कभी हासिल नहीं किया।
झारखंड का गठन — सशस्त्र आंदोलन के बिना संरचनात्मक राजनीतिक परिवर्तन
15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य का गठन भारतीय संघ के भीतर संवैधानिक राजनीतिक प्रक्रिया से हुआ।
यह एक बड़ा उदाहरण था कि क्षेत्रीय–आदिवासी पहचान का प्रश्न राज्य पुनर्गठन और चुनावी राजनीति के माध्यम से भी समाधान पा सकता है।
इससे माओवादी तर्क के सामने एक वैकल्पिक मॉडल मौजूद था—
राजनीतिक पहचान को संस्थागत प्रतिनिधित्व में बदलना।
किसान राजनीति में उदारीकरण का प्रवेश
1991 के बाद कृषि प्रश्न का एक नया आयाम था—
अब संघर्ष केवल भू-स्वामी के विरुद्ध नहीं था।
वैश्विक बाजार में उसकी कीमत और सुरक्षा क्या होगी?
यह नक्सलबाड़ी की भूमि राजनीति से काफी अलग आर्थिक युग था।
1990–2000 के दशक की किसान राजनीति
इस काल में विभिन्न किसान संगठनों ने—
कहीं किसान संगठन बाजार उदारीकरण के समर्थक रहे।
अर्थात किसान राजनीति स्वयं एक वैचारिक परिवार नहीं रही।
आत्महत्या और कृषि संकट का नया विमर्श
1990 के दशक के बाद किसान आत्महत्या का प्रश्न राष्ट्रीय चिंता का विषय बना।
यहां नक्सलबाड़ी की ‘भूमि बनाम जोतदार’ संरचना सीमित पड़ती है।
इसलिए आधुनिक किसान संकट ने साबित किया—
भूमि स्वामित्व आवश्यक है, लेकिन पर्याप्त नहीं।
भूमि अधिग्रहण विरोधी किसान राजनीति
उदारीकरण के बाद एक दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न था—
कृषि भूमि का उद्योग, सड़क, शहरीकरण या विशेष आर्थिक क्षेत्र के लिए अधिग्रहण।
और अन्य आंदोलनों ने भूमि प्रश्न को फिर राजनीतिक केंद्र में ला दिया।
लेकिन यह भूमि संघर्ष नक्सलबाड़ी से अलग था।
बल्कि उसे अपने पास बनाए रखने के लिए।
सिंगूर–नंदीग्राम और नक्सलबाड़ी का उलटा इतिहास
यह पश्चिम बंगाल के इतिहास की अद्भुत विडंबना है।
1967 में नक्सलबाड़ी किसान का प्रश्न था—
2000 के दशक में सिंगूर–नंदीग्राम का प्रश्न था—
किसान की जमीन औद्योगिक या परियोजनागत उपयोग के लिए कितनी और किस प्रक्रिया से ली जाए?
यानी भूमि राजनीति redistribution से acquisition तक पहुंच चुकी थी।
यह बदलती भारतीय अर्थव्यवस्था का संकेत था।
किसान आंदोलन का लोकतांत्रिक संस्थानीकरण
स्वतंत्र भारत में किसान राजनीति धीरे-धीरे कई संस्थागत रूपों में प्रवेश कर गई—
यह वही प्रक्रिया थी जिसे नक्सलबाड़ी ने ‘संसदीय भ्रम’ कहकर अस्वीकार किया था।
लेकिन किसान राजनीति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते पर आगे गया।
क्या नक्सलबाड़ी ने किसान आंदोलनों को अधिक उग्र बनाया?
जैसी विधियों को राजनीतिक वैधता का एक नया संदर्भ मिला।
लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर किसान संगठनों ने माओवादी हिंसा को सामान्य पद्धति नहीं बनाया।
इसलिए नक्सलबाड़ी ने किसान आंदोलनों की प्रतिरोध क्षमता को प्रभावित किया, लेकिन उनकी मुख्य रणनीति नहीं निर्धारित की।
1980 के दशक से 2020 तक एक महत्वपूर्ण निरंतरता
1980 के किसान आंदोलनों और 2020–21 के आंदोलन में एक बड़ी समानता थी—
दोनों ने सड़क और सार्वजनिक स्थान को राजनीतिक मंच बनाया।
दोनों ने किसान की अखिल पहचान बनाने की कोशिश की।
और दोनों का उद्देश्य तत्काल राज्य-सत्ता पर कब्जा नहीं बल्कि नीति बदलवाना था।
अकादमिक शोध भी 1980 के New Farmers' Movements और 2020–21 के आंदोलन के बीच महत्वपूर्ण ऐतिहासिक निरंतरताएं देखता है।
2020–21 किसान आंदोलन का उद्भव
2020 में केंद्र सरकार ने तीन कृषि कानून बनाए।
इनका घोषित उद्देश्य कृषि विपणन सुधार, अनुबंध खेती और व्यापारिक ढांचे में परिवर्तन था।
किसान संगठनों के एक बड़े हिस्से—विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में—को आशंका थी कि इससे सरकारी मंडी और MSP आधारित सुरक्षा कमजोर हो सकती है तथा बड़ी निजी कंपनियों की शक्ति बढ़ सकती है।
नक्सलबाड़ी और 2020–21 — पहली समानता : किसान राज्य को चुनौती देता है
राज्य की कृषि नीति स्वीकार करना अनिवार्य नहीं।
1967 में किसान भूमि नीति और ग्रामीण सत्ता को चुनौती दे रहा था।
2020 में किसान कृषि विपणन कानूनों को चुनौती दे रहा था।
दोनों में किसान निष्क्रिय नीति-लाभार्थी नहीं था।
वह स्वयं राजनीतिक एजेंडा तय करने का दावा कर रहा था।
दूसरी समानता — ग्रामीण प्रश्न राष्ट्रीय प्रश्न बनता है
नक्सलबाड़ी उत्तर बंगाल के छोटे क्षेत्र से शुरू होकर राष्ट्रीय बहस बना।
2020 का आंदोलन प्रारंभ में पंजाब–हरियाणा में मजबूत था, लेकिन तेजी से राष्ट्रीय किसान राजनीति का प्रश्न बन गया।
कृषि संकट किसी स्थानीय राजस्व विभाग का मामला नहीं।
वह राष्ट्रीय सत्ता की राजनीति बदल सकता है।
तीसरी समानता — किसान संगठन का महत्व
दोनों आंदोलनों ने संगठन की शक्ति दिखाई।
2020–21 में अनेक किसान यूनियनों का समन्वय था।
लेकिन यहीं से भिन्नता भी शुरू होती है।
नक्सलबाड़ी की समितियां कुछ क्षेत्रों में वैकल्पिक सत्ता की दिशा में बढ़ीं।
2020–21 की यूनियनें सरकार से वार्ता, सार्वजनिक दबाव और कानून निरसन चाहती थीं।
सबसे मूलभूत भिन्नता — राज्य बदलना बनाम नीति बदलना
नक्सलबाड़ी का क्रांतिकारी नेतृत्व कहता था—
मौजूदा राज्य व्यवस्था स्वयं समस्या है।
यह दोनों आंदोलनों के बीच सबसे बड़ा वैचारिक अंतर है।
दूसरी मूलभूत भिन्नता — बंदूक बनाम संवैधानिक जनदबाव
नक्सलबाड़ी के नेतृत्व ने सशस्त्र संघर्ष को केंद्रीय रणनीति बनाया।
2020–21 आंदोलन की मुख्य धारा ने धरना, पंचायत, जुलूस, ट्रैक्टर मार्च, वार्ता और सार्वजनिक दबाव का रास्ता अपनाया।
26 जनवरी 2021 को दिल्ली में हिंसक टकराव और अव्यवस्था हुई, लेकिन अकादमिक अध्ययन पूरे आंदोलन की मुख्य शैली को फिर भी मुख्यतः शांतिपूर्ण धरनों और जन लामबंदी के रूप में वर्णित करते हैं।
तीसरी भिन्नता — आंदोलन का अंतिम परिणाम
1967 का नक्सलबाड़ी विद्रोह राज्य ने कुछ महीनों में दबा दिया।
2020–21 का आंदोलन एक वर्ष से अधिक चला और सरकार ने अंततः तीनों कृषि कानून वापस लेने का निर्णय किया।
Farm Laws Repeal Act, 2021 ने 30 नवंबर 2021 को तीनों कानून औपचारिक रूप से निरस्त कर दिए।
इस तुलना का ऐतिहासिक अर्थ बहुत बड़ा है।
क्या इससे नक्सलबाड़ी की रणनीति पर ऐतिहासिक प्रश्न उठता है?
यदि किसान संगठन राज्य-सत्ता उखाड़े बिना केंद्रीय सरकार को महत्वपूर्ण कानून वापस लेने पर मजबूर कर सकते हैं—
तो यह दावा कमजोर होता है कि वास्तविक किसान हित केवल सशस्त्र क्रांति से ही आगे बढ़ सकते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि हर लोकतांत्रिक आंदोलन सफल होगा।
लोकतांत्रिक जनदबाव वास्तविक शक्ति है।
नक्सलबाड़ी की मूल विचारधारा ने इसी शक्ति को पर्याप्त महत्व नहीं दिया था।
2020–21 और किसान पहचान का पुनर्निर्माण
2020–21 आंदोलन ने लंबे समय बाद ‘किसान’ को फिर अखिल राजनीतिक पहचान के रूप में स्थापित किया।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आंदोलन ने ऐसे सामाजिक समूहों के बीच भी सहयोग पैदा किया जिन्हें पूर्ववर्ती वर्षों में सामुदायिक या जातिगत राजनीति ने विभाजित किया था।
1980 बनाम 2020 — सामाजिक आधार का फर्क
1980 के New Farmers' Movements पर यह आलोचना थी कि वे अपेक्षाकृत बड़े और मध्यम कृषकों तथा प्रभावशाली जातियों की राजनीति थे।
2020–21 के आंदोलन में भी सामाजिक असमानताएं समाप्त नहीं हुईं।
लेकिन अध्ययन संकेत करते हैं कि इसमें छोटे किसान, किसान-मजदूर, महिलाएं, विभिन्न जाति समूह और नागरिक समाज की भागीदारी पहले की तुलना में व्यापक थी।
महिलाओं की भूमिका — नक्सलबाड़ी से 2020 तक
नक्सलबाड़ी में महिलाओं की भागीदारी महत्वपूर्ण थी लेकिन स्वतंत्र महिला नेतृत्व सीमित था।
2020–21 आंदोलन में महिला किसान, मजदूर और सामाजिक संगठन सार्वजनिक मंचों पर व्यापक रूप से दिखाई दिए।
इससे आधुनिक किसान राजनीति में ‘किसान = पुरुष भूमि-मालिक’ की पुरानी छवि को चुनौती मिली।
यह परिवर्तन नक्सलबाड़ी के सामाजिक इतिहास से जुड़ता भी है और उससे आगे भी जाता है।
दलित खेतिहर मजदूर और 2020 आंदोलन
2020–21 का आंदोलन पूरी तरह वर्ग-विभेद से मुक्त नहीं था।
भूमिहीन मजदूर और भूमि-मालिक किसान के हितों में अंतर बना रहा।
लेकिन पंजाब और अन्य क्षेत्रों में खेत मजदूर संगठनों तथा दलित समूहों की भागीदारी ने इस अंतर को राजनीतिक बहस में बनाए रखा।
यही वह क्षेत्र है जहां नक्सलबाड़ी की पुरानी वर्गीय चेतावनी आज भी प्रासंगिक रहती है—
MSP की राजनीति नक्सलबाड़ी से कितनी अलग है?
MSP का प्रश्न जमीन के स्वामित्व से अधिक—
यह उस ग्रामीण भारत का प्रश्न है जिसमें किसान बाजार के लिए उत्पादन करता है।
नक्सलबाड़ी का इतिहासलेखन, साहित्य, सिनेमा और सांस्कृतिक स्मृति
प्रस्तावना : एक घटना, अनेक इतिहास
नक्सलबाड़ी का इतिहास केवल यह नहीं है कि मार्च से मई 1967 के बीच दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी–खोरीबाड़ी–फांसीदेवा क्षेत्र में क्या हुआ। इसका दूसरा इतिहास यह है कि उस घटना को बाद की पीढ़ियों ने कैसे याद किया, लिखा, महिमामंडित किया, निंदा की और राजनीतिक प्रतीक में बदल दिया।
16.1 नक्सलबाड़ी का पहला इतिहास स्वयं आंदोलनकारियों ने लिखा
नक्सलबाड़ी के इतिहासलेखन की पहली परत आंदोलन के नेताओं के अपने दस्तावेज हैं।
16.2 चारु मजूमदार की कथा : नक्सलबाड़ी एक स्थानीय विद्रोह नहीं, भारतीय क्रांति का आरंभ
चारु मजूमदार की व्याख्या में नक्सलबाड़ी का महत्व उसके तत्काल आकार में नहीं था।
कुछ गांवों में भूमि संघर्ष कितने दिन चला, कितने किसान उसमें शामिल थे अथवा राज्य ने उसे कितनी जल्दी दबा दिया—ये उनके लिए निर्णायक कसौटियां नहीं थीं।
निर्णायक बात यह थी कि नक्सलबाड़ी ने उनके अनुसार भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के सामने दो रास्ते स्पष्ट कर दिए—
16.3 ‘नक्सलबाड़ी रास्ता’ कैसे बना?
1967 की वास्तविक घटना बहुत स्थानीय थी।
लेकिन आंदोलन की राजनीतिक भाषा ने उसे तत्काल अखिल भारतीय अर्थ दिया।
‘नक्सलबाड़ी रास्ता’ का मतलब अब केवल उत्तर बंगाल के किसानों की मांग नहीं रहा।
और अंततः भारतीय राज्य के विरुद्ध क्रांति।
यानी एक भौगोलिक नाम राजनीतिक सिद्धांत बन गया।
भारत में बहुत कम गांव ऐसे हैं जिनका नाम स्वयं एक विचारधारा का पर्याय बन गया हो।
16.4 कानू सान्याल : नक्सलबाड़ी की दूसरी अंदरूनी व्याख्या
कानू सान्याल का महत्व इसलिए असाधारण है कि वे नक्सलबाड़ी के प्रत्यक्ष नेताओं में थे, लेकिन बाद में उन्होंने आंदोलन के कई रणनीतिक निष्कर्षों की आलोचना भी की।
इससे उनकी गवाही दो स्तरों पर महत्वपूर्ण हो जाती है—
16.5 क्या नक्सलबाड़ी ‘जनविद्रोह’ था या ‘पार्टी लाइन’ का परिणाम?
यह इतिहासलेखन का महत्वपूर्ण प्रश्न है।
यदि चारु-केंद्रित इतिहास पढ़ा जाए तो नक्सलबाड़ी एक सही क्रांतिकारी वैचारिक लाइन की परिणति दिखाई दे सकता है।
स्थानीय आदिवासी किसान क्या वास्तव में माओ की ‘दीर्घकालीन जनयुद्ध’ रणनीति के लिए उठे थे?
या वे जमीन, फसल, बर्गादारी, बेदखली और जोतदार वर्चस्व के स्थानीय प्रश्नों पर संघर्ष कर रहे थे?
16.6 जंगल संथाल की स्मृति क्यों महत्वपूर्ण है?
नक्सलबाड़ी के लोकप्रिय इतिहास में चारु मजूमदार और कानू सान्याल के नाम सबसे अधिक आते हैं।
लेकिन इससे जंगल संथाल जैसे स्थानीय आदिवासी किसान नेता कई बार पीछे चले जाते हैं।
यदि आंदोलन को केवल वैचारिक नेताओं के माध्यम से पढ़ेंगे तो उसका किसान–आदिवासी चरित्र कमजोर दिखाई देगा।
16.7 CPI(M) की व्याख्या : क्रांति नहीं, अतिवामपंथी विचलन
CPI(M) के लिए नक्सलबाड़ी एक अत्यंत असुविधाजनक ऐतिहासिक घटना थी।
विद्रोह के प्रमुख नेता उसी पार्टी की पृष्ठभूमि से निकले थे और 1967 में पश्चिम बंगाल की संयुक्त मोर्चा सरकार में CPI(M) स्वयं भागीदार थी।
इसलिए पार्टी को दो दावे एक साथ स्थापित करने पड़े—
किसानों की वास्तविक समस्याएं स्वीकार करना,
लेकिन नक्सलबाड़ी नेतृत्व की सशस्त्र रणनीति अस्वीकार करना।
16.8 CPI(M) के इतिहास की अपनी समस्या
लेकिन CPI(M) की कथा को भी अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता।
क्योंकि पार्टी स्वयं उस राजनीतिक संघर्ष की पक्षकार थी।
यदि CPI(ML) साहित्य नक्सलबाड़ी का महिमामंडन कर सकता है तो CPI(M) साहित्य अपने नेतृत्व के निर्णयों को वैध ठहराने की प्रवृत्ति रख सकता है।
इसलिए इतिहासकार को दोनों के बीच स्वतंत्र साक्ष्य तलाशने पड़ते हैं—
16.9 CPI(ML) का इतिहास : ‘नक्सलबाड़ी लाल सलाम’
1969 में CPI(ML) बनने के बाद नक्सलबाड़ी उसका संस्थापक मिथक बन गया।
‘नक्सलबाड़ी लाल सलाम’ केवल नारा नहीं था।
नक्सलबाड़ी को उस क्षण के रूप में प्रस्तुत किया गया जब भारतीय क्रांति ने ‘संशोधनवादी’ कम्युनिस्ट राजनीति से निर्णायक विच्छेद किया।
कानू सान्याल और जंगल संथाल किसान विद्रोह के नेता,
और नक्सलबाड़ी भारतीय क्रांति की जन्मभूमि—
16.10 लेकिन CPI(ML) स्वयं एक इतिहास नहीं रहा
1972 के बाद CPI(ML) अनेक धाराओं में टूट गया।
यहीं से नक्सलबाड़ी की क्रांतिकारी स्मृति भी विभाजित हुई।
एक धारा ने चारु मजूमदार की लाइन का बचाव किया।
दूसरी ने ‘वर्ग-शत्रु विनाश’ की नीति की आलोचना की।
कुछ ने भूमिगत सशस्त्र संघर्ष जारी रखा।
इसलिए आज ‘CPI(ML) की नक्सलबाड़ी पर राय’ कहना पर्याप्त नहीं।
16.11 CPI(ML) Liberation की पुनर्व्याख्या
CPI(ML) Liberation का विकास विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
उसकी ऐतिहासिक जड़ नक्सलबाड़ी और 1969 की CPI(ML) में है, लेकिन बाद में उसने जनसंगठन, खुले राजनीतिक कार्य और चुनावी राजनीति को स्वीकार किया।
इस धारा के लिए नक्सलबाड़ी की विरासत बनी रही—
यानी एक ही ऐतिहासिक स्मृति से संसदीय क्रांतिकारी वाम और भूमिगत माओवादी वाम दोनों ने अलग निष्कर्ष निकाले।
16.12 माओवादी इतिहास : 1967 से वर्तमान तक एक सीधी क्रांतिकारी रेखा?
माओवादी इतिहासलेखन नक्सलबाड़ी को एक लंबी क्रांतिकारी निरंतरता की शुरुआत मानता है—
इस कथा में 1967 कोई समाप्त विद्रोह नहीं।
वह एक ऐसी क्रांतिकारी प्रक्रिया का प्रारंभ है जो बाद के दशकों में अलग-अलग क्षेत्रों में आगे बढ़ती रही।
लेकिन अकादमिक इतिहासकार इस सीधी रेखा को सावधानी से देखते हैं।
16.13 सरकारी इतिहास : ‘नक्सलवादी’ से ‘वामपंथी उग्रवाद’ तक
1967 में नक्सलबाड़ी मुख्यतः कानून-व्यवस्था और राजनीतिक विद्रोह का प्रश्न था।
1970 के दशक में ‘नक्सलाइट’ शब्द राजनीतिक हिंसा और भूमिगत कम्युनिस्ट समूहों के लिए व्यापक रूप से प्रयुक्त होने लगा।
बाद के दशकों में सरकारी शब्दावली में Left Wing Extremism—वामपंथी उग्रवाद अधिक प्रचलित हुई।
यह शब्दावली केवल भाषा परिवर्तन नहीं है।
इससे इतिहास का केंद्र किसान आंदोलन से हटकर—
16.14 सरकारी दृष्टिकोण की सीमा
राज्य के दस्तावेज हिंसा और सुरक्षा घटनाओं के अध्ययन के लिए आवश्यक हैं।
लेकिन यदि नक्सलबाड़ी का पूरा इतिहास केवल पुलिस रिकॉर्ड से लिखा जाए तो किसान क्यों उठे—यह प्रश्न पीछे छूट सकता है।
सुरक्षा रिपोर्ट में गौण हो सकते हैं।
इसलिए सरकारी स्रोत आवश्यक हैं, पर पर्याप्त नहीं।
16.15 क्रांतिकारी स्रोतों की विपरीत सीमा
दूसरी ओर केवल माओवादी साहित्य पढ़ने से भी उलटी समस्या पैदा होती है।
और राजनीतिक असफलता ‘अस्थायी पीछे हटना’—
इसलिए इतिहासकार को दोनों पक्षों की भाषा से दूरी रखनी होती है।
राज्य की प्रत्येक कार्रवाई स्वतः वैध नहीं और विद्रोही की प्रत्येक कार्रवाई स्वतः जनक्रांति नहीं।
16.16 सुमंत बनर्जी : नक्सलबाड़ी इतिहासलेखन का प्रमुख मोड़
नक्सलबाड़ी पर सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक व्यापक अध्ययनों में सुमंत बनर्जी की पुस्तक _In the Wake of Naxalbari: A History of the Naxalite आंदोलन in India_ है।
मूल संस्करण 1980 में प्रकाशित हुआ और लगभग 436 पृष्ठों में ग्रामीण आंदोलन, शहरी दृश्य, कम्युनिस्ट पार्टी और आंदोलन के विभिन्न आयामों को समेटता था।
16.17 सुमंत बनर्जी की पुस्तक क्यों महत्वपूर्ण बनी?
एक समकालीन अकादमिक समीक्षा ने विशेष रूप से इस बात पर ध्यान दिया कि बनर्जी आंदोलन से निकट रूप से जुड़े थे, लेकिन उनकी पुस्तक न तो केवल नक्सलबाड़ी की निंदा करती है और न उसे रोमानी क्रांति बनाती है। समीक्षा के अनुसार पुस्तक उस समय की राजनीतिक बेचैनी और स्थापित संस्थाओं के संकट को समझने में मदद करती है।
‘सभी नक्सली आदर्शवादी क्रांतिकारी थे।’
16.18 सहभागी इतिहासकार की ताकत और जोखिम
सुमंत बनर्जी जैसे लेखक के पास आंदोलन की अंदरूनी दुनिया की समझ थी।
लेकिन निकटता इतिहासकार के लिए जोखिम भी होती है।
इसलिए सहभागी इतिहास अमूल्य स्रोत है, लेकिन उसे अन्य स्रोतों से मिलाना आवश्यक है।
16.19 नक्सलबाड़ी इतिहासलेखन की दूसरी पीढ़ी
बाद के अकादमिक अध्ययनों ने नक्सलबाड़ी को केवल पार्टी इतिहास से बाहर निकाला।
चाय बागान अर्थव्यवस्था का प्रभाव क्या था?
जाति और जनजाति का वर्ग से संबंध क्या था?
क्रांतिकारी संगठन में आंतरिक लोकतंत्र कितना था?
युवा और विश्वविद्यालय छात्र आंदोलन में क्यों गए?
यानी इतिहास नेताओं से समाज की ओर बढ़ा।
16.20 ‘महान पुरुषों’ से नीचे का इतिहास
पुराना राजनीतिक इतिहास अक्सर पूछता था—
संथाल किसानों की जमीन की स्थिति क्या थी?
स्थानीय किसान क्रांति को किस अर्थ में समझ रहा था?
यह परिवर्तन नक्सलबाड़ी के इतिहास को अधिक मानवीय और कम घोषणापत्र-केंद्रित बनाता है।
16.21 महिलाओं को इतिहास में वापस लाना
25 मई 1967 की पुलिस गोलीबारी में महिलाओं और बच्चों की मृत्यु नक्सलबाड़ी की स्मृति का केंद्रीय प्रतीक बनी।
लेकिन लंबे समय तक आंदोलन का इतिहास पुरुष नेताओं के नामों में सिमटा रहा।
आधुनिक सामाजिक और लैंगिक इतिहास पूछता है—
महिलाएं केवल ‘शहीद’ थीं या राजनीतिक कार्यकर्ता भी?
उन्होंने भूमि संघर्ष में क्या भूमिका निभाई?
परिवार और संगठन में उनकी स्थिति क्या थी?
16.22 आदिवासी इतिहास बनाम क्रांतिकारी इतिहास
नक्सलबाड़ी के सामाजिक आधार में संथाल और अन्य आदिवासी समुदाय महत्वपूर्ण थे।
लेकिन यदि इतिहास केवल मार्क्सवादी शब्दावली में लिखा जाए तो ‘आदिवासी’ केवल ‘गरीब किसान’ में बदल सकता है।
आधुनिक इतिहासलेखन इस कमी को सुधारता है।
16.23 दलित–जाति दृष्टि का प्रवेश
बिहार और विशेषकर भोजपुर के बाद नक्सलवादी आंदोलन का इतिहास जाति के बिना लिखा ही नहीं जा सकता।
भूमिहीन खेतिहर मजदूर की आर्थिक स्थिति और उसकी जातिगत स्थिति कई क्षेत्रों में एक-दूसरे से जुड़ी थीं।
क्या ‘वर्ग’ की भाषा जाति को पर्याप्त समझ पाई?
यह प्रश्न नक्सलबाड़ी के मूल सिद्धांतों की आलोचना तक जाता है।
16.24 इतिहासलेखन का एक बड़ा विवाद : क्या भारत ‘अर्ध-सामंती’ था?
चारु मजूमदार की राजनीति का एक बुनियादी दावा था कि भारतीय समाज अर्ध-सामंती और अर्ध-औपनिवेशिक प्रकृति का है।
यदि यह विश्लेषण सही माना जाए तो चीनी क्रांति जैसी ग्रामीण दीर्घकालीन जनयुद्ध रणनीति तार्किक दिखाई देती है।
तेजी से बदल रहे थे, तो वही रणनीति प्रश्नांकित होती है।
इसलिए कृषि अर्थव्यवस्था की प्रकृति पर विवाद केवल अकादमिक बहस नहीं।
16.25 इतिहासलेखन का दूसरा विवाद : हिंसा
नक्सलबाड़ी के इतिहास की सबसे कठिन बहस हिंसा है।
राज्य और जमींदार हिंसा पहले से मौजूद थी; विद्रोही हिंसा उसका प्रतिरोध थी।
वर्ग-शत्रु विनाश ने राजनीतिक हत्या को वैचारिक वैधता दी और जनआंदोलन को संकीर्ण सशस्त्र कार्रवाई में बदल दिया।
दोनों पक्षों में कुछ ऐतिहासिक सत्य हैं।
लेकिन यह तथ्य विद्रोही हिंसा की प्रत्येक घटना को स्वतः न्यायोचित नहीं बनाता।
16.26 तीसरा विवाद : युवा आदर्शवाद या रोमानी हिंसा?
1960–70 के दशक में बड़ी संख्या में शिक्षित युवा नक्सली राजनीति से आकर्षित हुए।
कई ने सुरक्षित मध्यवर्गीय जीवन छोड़ा।
इससे उनकी छवि आदर्शवादी विद्रोही की बनी।
क्या नैतिक आदर्शवाद राजनीतिक रणनीति को सही सिद्ध करता है?
इतिहासकार को इरादे और परिणाम अलग रखने पड़ते हैं।
व्यक्ति आदर्शवादी हो सकता है और उसकी रणनीति विनाशकारी।
16.27 बंगाल का ‘सत्तर का दशक’ एक सांस्कृतिक स्मृति कैसे बना?
पश्चिम बंगाल में नक्सलबाड़ी केवल राजनीतिक इतिहास नहीं।
इन सबने मिलकर ‘सत्तर का दशक’ बनाया।
इस सांस्कृतिक स्मृति में वास्तविक इतिहास और निजी त्रासदी एक-दूसरे में घुल जाते हैं।
16.28 कविता में नक्सलबाड़ी
क्रांतिकारी राजनीति के लिए कविता अत्यंत शक्तिशाली माध्यम बनी।
यहां इतिहास संक्षिप्त होकर प्रतीक बनता है।
यही कविता की शक्ति भी है और इतिहासकार के लिए समस्या भी।
कविता भावनात्मक सत्य दे सकती है; घटनात्मक सत्य के लिए अन्य स्रोत चाहिए।
16.29 पोस्टर, नारे और दीवार लेखन
नक्सलवादी राजनीति की सांस्कृतिक पहचान का बड़ा हिस्सा दीवारों पर बना।
शहरी स्थान को राजनीतिक युद्धभूमि बनाते थे।
राज्य के नियंत्रित सार्वजनिक क्षेत्र पर विद्रोही उपस्थिति दर्ज करना।
आज वे दीवारें अधिकांशतः नहीं हैं, लेकिन तस्वीरों, संस्मरणों और साहित्य में उनका सांस्कृतिक जीवन जारी है।
16.30 लिटिल मैगजीन संस्कृति
बंगाल की लघु पत्रिका परंपरा ने मुख्यधारा प्रेस से बाहर राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रयोगों के लिए जगह दी।
इन पत्रिकाओं का अध्ययन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वे उस समय की मानसिकता को सरकारी फाइलों से कहीं अधिक जीवंत रूप में दिखाती हैं।
16.31 ‘Deshabrati’ और ‘Liberation’ जैसे राजनीतिक प्रकाशन
क्रांतिकारी आंदोलन ने अपने समाचारपत्र और वैचारिक प्रकाशन विकसित किए।
इनका उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं था।
इसलिए इतिहासकार के लिए वे महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत हैं, लेकिन उनमें प्रचारात्मक उद्देश्य को ध्यान में रखना अनिवार्य है।
16.32 मुख्यधारा समाचारपत्रों की समस्या
दूसरी तरफ मुख्यधारा मीडिया की अपनी सीमाएं थीं।
राज्य और पुलिस से मिलने वाली जानकारी पर निर्भरता,
नक्सली घटनाओं की रिपोर्टिंग प्रभावित कर सकते थे।
इसलिए किसी एक अखबार की रिपोर्ट को अंतिम तथ्य मानना उचित नहीं।
विशेष रूप से हत्या, मुठभेड़ और हिरासत मृत्यु के मामलों में बहु-स्रोत सत्यापन आवश्यक है।
16.33 सिनेमा में नक्सलबाड़ी : इतिहास से अधिक वातावरण
नक्सलबाड़ी और उसके बाद की शहरी उग्र राजनीति का प्रभाव भारतीय समानांतर सिनेमा पर गहरा पड़ा।
विशेष रूप से मृणाल सेन की कलकत्ता-केंद्रित फिल्मों ने भूख, वर्ग असमानता, युवा बेचैनी और राजनीतिक विद्रोह के वातावरण को पकड़ा।
16.34 ‘Calcutta 71’ : भूख, अन्याय और विद्रोही युवक
Calcutta 71 नक्सलबाड़ी की घटनाओं का दस्तावेजी पुनर्निर्माण नहीं है।
यह उससे अधिक व्यापक प्रश्न उठाती है—
इतिहास में शोषण क्यों दोहराया जाता है?
फिल्म का युवा पात्र राजनीतिक असंतोष का प्रतीक बनता है।
आधुनिक विश्लेषण ने मृणाल सेन के मृत/विद्रोही युवा को बंगाली रोमानी परंपरा के विरुद्ध राजनीतिक युवा-छवि के रूप में भी पढ़ा है।
16.35 ‘Padatik’ : क्रांति के भीतर आत्मालोचना
1973 की Padatik और भी महत्वपूर्ण है।
इसमें भूमिगत क्रांतिकारी की दुनिया के माध्यम से आंदोलन के भीतर के प्रश्न सामने आते हैं—
यह क्रांति का सरल महिमामंडन नहीं करती।
यही कारण है कि मृणाल सेन की फिल्मों का ऐतिहासिक मूल्य प्रचार फिल्म से अधिक है।
वे व्यवस्था पर प्रश्न करती हैं, लेकिन क्रांतिकारी राजनीति को भी प्रश्न से बाहर नहीं रखतीं।
16.36 मृणाल सेन की विशेषता
मृणाल सेन की राजनीति वाम थी, लेकिन उनका सिनेमा पार्टी पर्चा नहीं था।
उन्होंने शहर की असमानता, भूख और विद्रोह को दिखाया, पर क्रांतिकारी व्यक्ति को आलोचना से मुक्त नहीं किया।
Cambridge University Press में प्रकाशित आधुनिक अध्ययन उनकी शहरी फिल्मों को भारतीय राजनीतिक सिनेमा और वैश्विक ‘Third Cinema’ परंपरा के बीच रखता है।
16.37 सत्यजीत राय और ‘कलकत्ता त्रयी’ का दूसरा दृष्टिकोण
ने भी शहर के संकट, बेरोजगारी, नैतिक विघटन और युवा निराशा को चित्रित किया।
इन फिल्मों का संबंध नक्सली आंदोलन से मृणाल सेन की फिल्मों जैसा प्रत्यक्ष नहीं।
लेकिन वे उस सामाजिक वातावरण को समझाती हैं जिसमें शिक्षित युवा व्यवस्था से मोहभंग अनुभव कर रहा था।
यानी एक ही शहर को दो महान फिल्मकार अलग दृष्टियों से पढ़ रहे थे।
16.38 नक्सली युवक की सिनेमाई छवि
सिनेमा में ‘नक्सल’ धीरे-धीरे एक चरित्र-प्रकार भी बन गया—
यह छवि इतनी प्रभावशाली बनी कि कई बार वास्तविक आंदोलन की ग्रामीण किसान जड़ें पीछे चली गईं।
लोकप्रिय स्मृति में नक्सलबाड़ी का किसान कभी-कभी गायब और कलकत्ता का क्रांतिकारी छात्र केंद्रीय हो गया।
यह इतिहास और सांस्कृतिक स्मृति के बीच बड़ा अंतर है।
16.39 महाश्वेता देवी और नक्सल युग
नक्सल युग के साहित्यिक स्मरण में महाश्वेता देवी का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
उनकी रचनाओं में राज्य, आदिवासी, वंचित समुदाय, हिंसा और राजनीतिक प्रतिरोध बार-बार आते हैं।
_Hajar Churashir Maa_—‘हजार चौरासी की मां’ नक्सल युग की सबसे प्रभावशाली साहित्यिक कृतियों में है।
एक मृत युवा की मां के अनुभव से देखती है।
16.40 ‘हजार चौरासी की मां’ : संख्या के पीछे मनुष्य
शीर्षक ही राज्य और मनुष्य के संबंध पर टिप्पणी है।
मृत युवक की पहचान एक शव संख्या में बदल जाती है।
यहां साहित्य इतिहास से एक अलग प्रश्न पूछता है—
क्रांति और दमन के बीच परिवारों का क्या हुआ?
इनकी स्मृति राजनीतिक इतिहास में कहां है?
16.41 साहित्य ने ‘शहीद’ को फिर मनुष्य बनाया
राजनीतिक संगठन मृत कार्यकर्ता को ‘शहीद’ कह सकता है।
यहीं साहित्य इतिहासलेखन को मानवीय बनाता है।
16.42 स्मृति साहित्य और संस्मरण
नक्सल युग से जुड़े अनेक पूर्व कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, पुलिस अधिकारियों और राजनीतिक नेताओं ने बाद में संस्मरण लिखे।
लेकिन संस्मरण सबसे कठिन स्रोतों में से हैं।
क्योंकि मनुष्य अतीत को उसी रूप में याद नहीं रखता जिस रूप में वह घटा था।
बाद की राजनीति स्मृति को बदल सकती है।
इसलिए संस्मरण को तथ्य और स्मृति दोनों के रूप में पढ़ना चाहिए।
16.43 ‘नक्सल’ शब्द का अर्थ कैसे बदल गया?
फिर ‘नक्सलाइट’ उस विद्रोह से जुड़े राजनीतिक कार्यकर्ता का नाम बना।
फिर यह व्यापक माओवादी क्रांतिकारी के लिए प्रयुक्त होने लगा।
बाद में ‘नक्सल’ भारत में हिंसक वाम उग्रवाद का सामान्य शब्द बन गया।
इस प्रक्रिया में मूल नक्सलबाड़ी किसान आंदोलन और आधुनिक माओवादी विद्रोह के बीच की ऐतिहासिक दूरी अक्सर मिट जाती है।
यही लोकप्रिय स्मृति की सबसे बड़ी समस्याओं में है।
16.44 ‘नक्सल’ और ‘माओवादी’ क्या समान शब्द हैं?
नक्सलबाड़ी 1967 की विशिष्ट घटना है।
‘नक्सलवादी’ उससे निकली विभिन्न क्रांतिकारी धाराओं के लिए व्यापक शब्द बना।
‘माओवादी’ उन संगठनों और विचारधाराओं के लिए अधिक विशिष्ट है जो माओवाद और दीर्घकालीन जनयुद्ध को अपनाते हैं।
सभी ऐतिहासिक नक्सली धाराएं आज CPI (Maoist) का हिस्सा नहीं हैं।
इसलिए तीनों शब्दों को बिना भेद के उपयोग करना ऐतिहासिक त्रुटि है।
नक्सलबाड़ी की विस्तृत समयरेखा
प्रस्तावना : नक्सलबाड़ी की समयरेखा कहां से शुरू होती है?
नक्सलबाड़ी की समयरेखा केवल 1967 से शुरू करना ऐतिहासिक रूप से पर्याप्त नहीं होगा। जिस भूमि-असमानता, बर्गादारी, आदिवासी वंचना और कम्युनिस्ट किसान संगठन से नक्सलबाड़ी निकला, उसकी जड़ें औपनिवेशिक भूमि व्यवस्था में थीं। इसी प्रकार कहानी जुलाई 1967 में समाप्त भी नहीं होती। नक्सलबाड़ी के दमन से निकली राजनीतिक धाराएं AICCCR, CPI(ML), श्रीकाकुलम, भोजपुर, People's War, MCC और अंततः 2004 की CPI (Maoist) तक पहुंचीं।
1793 — स्थायी बंदोबस्त
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल में Permanent Settlement लागू किया। जमींदारों को राजस्व वसूली के स्थायी मध्यस्थ के रूप में मान्यता मिली।
आगे बंगाल के ग्रामीण समाज में जमींदार, जोतदार, किरायेदार, बर्गादार और खेतिहर मजदूर जैसी अनेक परतें विकसित हुईं।
उन्नीसवीं सदी — जोतदार वर्ग का विस्तार
उत्तर बंगाल और आसपास के क्षेत्रों में बड़े ग्रामीण भू-धारक और जोतदार वर्ग की शक्ति बढ़ी।
जोतदार स्वयं हमेशा पुराने जमींदार नहीं थे। कई स्थानों पर वे स्थानीय बड़े कृषक या उप-मध्यस्थ थे, जिनके नीचे बटाईदार और छोटे किसान खेती करते थे।
नक्सलबाड़ी में 1967 तक संघर्ष का प्रमुख स्थानीय सामाजिक पात्र अक्सर यही जोतदार–बर्गादार संबंध था।
1855–56 — संथाल हूल
संथाल विद्रोह ब्रिटिश राज, महाजनी शोषण और बाहरी भू-व्यवस्था के विरुद्ध विशाल आदिवासी विद्रोह था।
नक्सलबाड़ी के संथाल किसानों की 1967 की राजनीतिक चेतना को सीधे 1855 से जोड़ना अतिरंजित होगा, लेकिन आदिवासी भूमि प्रतिरोध की ऐतिहासिक स्मृति इससे कहीं पुरानी थी।
1873–76 — पाबना किसान आंदोलन
पूर्वी बंगाल में किरायेदार किसानों ने जमींदारों के अवैध लगान और बेदखली के खिलाफ संगठित प्रतिरोध किया।
यह बंगाल की उस किसान परंपरा का हिस्सा था जिसमें भूमि पर काम करने वाले वास्तविक cultivator ने मध्यस्थ भू-स्वामी सत्ता को चुनौती दी।
1930 का दशक — बंगाल में किसान सभा का विस्तार
कम्युनिस्ट और समाजवादी कार्यकर्ताओं ने ग्रामीण बंगाल में किसान संगठन मजबूत किए।
बर्गादार और गरीब किसान राजनीति में अधिक संगठित होने लगे।
अप्रैल 1936 — अखिल भारतीय किसान सभा का गठन
लखनऊ में All India Kisan Sabha की स्थापना ने विभिन्न क्षेत्रीय किसान आंदोलनों को अखिल भारतीय संगठनात्मक मंच दिया।
बंगाल में किसान सभा आगे तेभागा की प्रमुख शक्ति बनी।
1940 — फ्लाउड आयोग
Bengal Land Revenue Commission, जिसे Floud Commission कहा जाता है, ने बर्गादारों की स्थिति सहित बंगाल की कृषि व्यवस्था पर महत्वपूर्ण सिफारिशें कीं।
तेभागा की मांग को बाद में इसके निष्कर्षों से वैधता मिली।
1943 — बंगाल का अकाल
1943 के अकाल ने ग्रामीण असमानता, अनाज बाजार, भूमि और किसान असुरक्षा को भयावह रूप में उजागर किया।
अकाल की सामाजिक स्मृति ने बंगाल की किसान राजनीति को और उग्र बनाया।
1946 — तेभागा आंदोलन का आरंभ
बंगाल किसान सभा ने मांग उठाई कि बर्गादार उत्पादित फसल का आधा नहीं, दो-तिहाई हिस्सा रखे।
आंदोलन बंगाल के अनेक जिलों में फैला।
महिलाओं, आदिवासी किसानों और गरीब बर्गादारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1946–47 — तेभागा का चरम
जमींदार–जोतदार शक्ति और किसान सभा के बीच कई क्षेत्रों में तीखे संघर्ष हुए।
तेभागा भूमि स्वामित्व की पूर्ण क्रांति नहीं था, लेकिन उसने बंगाल के बर्गादार को संगठित राजनीतिक पात्र बना दिया।
नक्सलबाड़ी इसी सामाजिक–राजनीतिक परंपरा के क्षेत्र में जन्मा।
जुलाई 1946 — तेलंगाना सशस्त्र किसान संघर्ष का विस्तार
हैदराबाद राज्य के तेलंगाना क्षेत्र में सामंती दमन, वेट्टी, बेदखली और भूमि प्रश्न के खिलाफ कम्युनिस्ट नेतृत्व वाला संघर्ष सशस्त्र रूप लेने लगा।
यह आगे भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन का सबसे बड़ा पूर्व-नक्सलबाड़ी सशस्त्र किसान अनुभव बना।
सितंबर 1948 — हैदराबाद का भारतीय संघ में विलय
भारतीय सैन्य कार्रवाई के बाद निजाम शासन समाप्त हुआ।
इसके बाद भी तेलंगाना में CPI का सशस्त्र संघर्ष जारी रहा।
अक्टूबर 1951 — तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष की वापसी
CPI ने संघर्ष समाप्त करने की दिशा अपनाई।
इसके बाद भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन धीरे-धीरे संसदीय राजनीति की ओर बढ़ा।
चारु मजूमदार की पीढ़ी के लिए बाद में यही सवाल महत्वपूर्ण बना—
क्या 1951 में सशस्त्र रास्ता छोड़ना ऐतिहासिक भूल थी?
1953 — West Bengal Estates Acquisition Act
पश्चिम बंगाल में जमींदारी मध्यस्थ संरचना और बड़ी जोतों को नियंत्रित करने की कानूनी दिशा तय हुई।
1955 — West Bengal Land Reforms Act
बर्गादारों और भूमि सुधार से संबंधित महत्वपूर्ण कानूनी ढांचा बनाया गया।
समस्या यह थी कि कानून होने के बावजूद अनेक वास्तविक बर्गादार रिकॉर्ड में दर्ज नहीं थे।
यही कानून और वास्तविकता की दूरी आगे नक्सलबाड़ी की भूमि राजनीति की पृष्ठभूमि बनी।
1959–62 — CPI के भीतर वैचारिक ध्रुवीकरण
सोवियत संघ और चीन के बीच बढ़ते वैचारिक संघर्ष का प्रभाव भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन पर पड़ा।
भारत–चीन सीमा विवाद ने तनाव और बढ़ाया।
अक्टूबर–नवंबर 1962 — भारत–चीन युद्ध
भारत–चीन युद्ध ने CPI के भीतर राष्ट्रीय प्रश्न और चीन के प्रति रुख को अत्यंत विवादास्पद बना दिया।
कम्युनिस्ट आंदोलन में ‘दक्षिणपंथ’, ‘वामपंथ’ और चीन समर्थक धारा के बीच तनाव बढ़ा।
1964 — CPI का विभाजन और CPI(M) का गठन
कम्युनिस्ट पार्टी दो बड़े संगठनों में बंट गई—
चारु मजूमदार, कानू सान्याल और नक्सलबाड़ी के बाद के अधिकांश प्रमुख नेता CPI(M) की ओर गए।
लेकिन शीघ्र ही उन्हें लगा कि CPI(M) भी संसदीय रास्ते की ओर बढ़ रही है।
1965–66 — ‘ऐतिहासिक आठ दस्तावेज’
चारु मजूमदार ने क्रमशः वे लेख लिखे जिन्हें बाद में Historic Eight Documents कहा गया।
यही नक्सलबाड़ी से पहले की केंद्रीय वैचारिक तैयारी थी।
1965–66 — सिलीगुड़ी समूह का निर्माण
उत्तर बंगाल में चारु मजूमदार, कानू सान्याल, जंगल संथाल और अन्य कार्यकर्ताओं के आसपास एक क्रांतिकारी समूह विकसित हुआ।
स्थानीय किसान कोशिकाएं और ग्रामीण संगठन बनने लगे।
2 मार्च 1967 — संयुक्त मोर्चा सरकार
ज्योति बसु उपमुख्यमंत्री और गृह विभाग से जुड़े प्रमुख मंत्री बने।
हरेकृष्ण कोनार भूमि एवं भूमि-राजस्व सुधार के प्रमुख वाम नेता थे।
2–3 मार्च 1967 — भूमि विवाद और प्रत्यक्ष कार्रवाई
अलग-अलग स्रोत प्रारंभिक घटना का वर्णन थोड़ा भिन्न देते हैं। व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि एक आदिवासी/बर्गादार किसान को न्यायिक या वैधानिक अधिकार के बावजूद जमीन जोतने से रोकने और भू-स्वामी पक्ष की हिंसा ने तत्काल प्रतिरोध को जन्म दिया।
3 मार्च को लगभग 150 किसानों द्वारा धान कब्जे और भूमि प्रत्यक्ष कार्रवाई का उल्लेख भी मिलता है।
18 मार्च 1967 — जोतदार भूमि पर कब्जे बढ़े
किसान समूहों ने जोतदारों की जमीन पर संगठित कब्जे बढ़ाने शुरू किए।
भूमि और फसल के साथ ग्रामीण शक्ति भी चुनौती के केंद्र में आने लगी।
मार्च–अप्रैल 1967 — किसान समितियों का विस्तार
नक्सलबाड़ी, खोरीबाड़ी और फांसीदेवा क्षेत्र में किसान समितियां सक्रिय होने लगीं।
और जोतदारों के हथियार भी जब्त करतीं।
यहीं आंदोलन ने समानांतर ग्रामीण सत्ता की दिशा ली।
मई का प्रारंभ — तनाव तेज
भूमि कब्जे, फसल कटाई और गिरफ्तारी प्रयासों के कारण किसान–जोतदार–पुलिस संघर्ष तीखा हुआ।
23–24 मई 1967 — प्रसादुजोत/झारुगांव क्षेत्र में पुलिस संघर्ष
पुलिस दल किसान नेताओं को गिरफ्तार करने पहुंचा।
ग्रामीण आदिवासी किसान तीर-धनुष और पारंपरिक हथियारों के साथ पुलिस के सामने आए।
घटनाओं की सही स्थान-पहचान और दिन को लेकर स्रोतों में कुछ भिन्नता है, लेकिन इस संघर्ष में पुलिस इंस्पेक्टर सोनम वांगडी घायल हुआ और बाद में उसकी मृत्यु हुई।
25 मई 1967 — पुलिस गोलीबारी
यह नक्सलबाड़ी आंदोलन की सबसे निर्णायक तारीख बनी।
पुलिस ने प्रसादुजोत क्षेत्र में ग्रामीण भीड़ पर गोली चलाई।
आम तौर पर 11 मृतकों का उल्लेख मिलता है, जिनमें अधिकांश महिलाएं और बच्चे थे; अलग स्रोत संख्या और वर्गीकरण में मामूली अंतर देते हैं।
यह घटना स्थानीय भूमि संघर्ष को अखिल भारतीय राजनीतिक प्रतीक में बदलने लगी।
25 मई के बाद — हड़ताल और विरोध
पश्चिम बंगाल के वाम और छात्र समूहों के भीतर तीखी प्रतिक्रिया हुई।
कई स्थानों पर पुलिस गोलीबारी के खिलाफ प्रदर्शन हुए।
जून 1967 — नक्सलबाड़ी–खोरीबाड़ी–फांसीदेवा में प्रभाव
किसान समितियों ने अनेक गांवों में भूमि, फसल और हथियार कब्जे बढ़ाए।
कुछ चाय-बागान मजदूरों ने भी सहानुभूति और हड़ताल के माध्यम से समर्थन दिया।
जून 1967 — CPI(M) के भीतर निर्णायक विवाद
पार्टी नेतृत्व ने सशस्त्र लाइन का विरोध किया।
क्रांतिकारी समूह ने CPI(M) नेतृत्व को संसदीय और संशोधनवादी बताना शुरू किया।
अब मतभेद केवल स्थानीय कार्रवाई का नहीं—
28 जून 1967 — भूमि कब्जा जारी रखने की क्रांतिकारी घोषणा
विभिन्न विवरणों में इस दिन चारु मजूमदार द्वारा चाय-बागान मजदूरों और किसानों के बीच भूमि कब्जे को आगे बढ़ाने के समर्थन का उल्लेख मिलता है।
5 जुलाई 1967 — बड़े पुलिस अभियान का निर्णय
राज्य सरकार ने विद्रोह को निर्णायक रूप से नियंत्रित करने की दिशा ली।
12 जुलाई 1967 — ‘Operation Crossbow’
एक सुरक्षा अध्ययन के अनुसार पुलिस कार्रवाई को Operation Crossbow नाम दिया गया और लगभग 1,500 पुलिसकर्मी प्रभावित क्षेत्र में लगाए गए।
13 जुलाई 1967 — गिरफ्तारियों में तेजी
पुलिस अभियान के शुरुआती दिनों में दर्जनों कार्यकर्ता पकड़े गए।
उत्तर बंगाल के शोध अभिलेखों में 13 जुलाई तक 75 गिरफ्तारियों का उल्लेख मिलता है।
19–20 जुलाई 1967 — विद्रोही नेतृत्व पर निर्णायक चोट
जंगल संथाल सहित प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार किया गया।
सुरक्षा अध्ययन जंगल संथाल की गिरफ्तारी 20 जुलाई 1967 बताता है।
जुलाई 1967 का अंत — मूल नक्सलबाड़ी विद्रोह समाप्त
पुलिस और अर्धसैनिक कार्रवाई के बाद संगठित किसान विद्रोह का स्थानीय नियंत्रण समाप्त हो गया।
प्रचलित राजनीतिक इतिहास इसे 72 दिनों का नक्सलबाड़ी विद्रोह कहता है।
ऐतिहासिक महत्व
अब ‘नक्सलबाड़ी’ एक गांव से विचारधारा बनने लगा।
जुलाई–नवंबर 1967 — भारत के विभिन्न हिस्सों में प्रतिक्रिया
और अन्य क्षेत्रों के क्रांतिकारी कम्युनिस्ट समूह नक्सलबाड़ी से प्रेरित होकर CPI(M) नेतृत्व के विरुद्ध संगठित होने लगे।
नवंबर 1967 — क्रांतिकारी समन्वय
12–13 नवंबर को विभिन्न राज्यों के क्रांतिकारी प्रतिनिधियों की बैठक हुई।
All India Coordination Committee of Revolutionaries के प्रारंभिक रूप का निर्माण हुआ।
1968 — AICCCR का औपचारिक विकास
यह संगठन आगे All India Coordination Committee of Communist Revolutionaries—AICCCR के रूप में विकसित हुआ।
अब उद्देश्य केवल CPI(M) में दबाव बनाना नहीं—
एक नई क्रांतिकारी पार्टी की दिशा तय करना था।
1967–68 — आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम में आदिवासी संघर्ष
और अन्य नेताओं के नेतृत्व में आदिवासी किसान संघर्ष अधिक उग्र होने लगा।
1968–69 — श्रीकाकुलम का सशस्त्र चरण
नक्सलबाड़ी के बाद यह सबसे महत्वपूर्ण सशस्त्र किसान–आदिवासी प्रयोगों में बना।
22 अप्रैल 1969 — CPI(ML) की स्थापना
लेनिन के जन्मदिन पर नई Communist Party of India (Marxist-Leninist) के गठन की घोषणा की गई।
स्रोत सामान्यतः 22 अप्रैल को पार्टी गठन की तारीख मानते हैं।
1 मई 1969 — कलकत्ता की सार्वजनिक घोषणा
कानू सान्याल ने कलकत्ता में विशाल मई दिवस सभा में नई पार्टी और उसकी राजनीतिक दिशा सार्वजनिक रूप से घोषित की।
इसलिए 22 अप्रैल और 1 मई दोनों तारीखें इतिहास में आती हैं—
1 मई — सार्वजनिक राजनीतिक उद्घोषणा।
1969 — चारु मजूमदार केंद्रीय नेता
चारु मजूमदार नई पार्टी की केंद्रीय वैचारिक शक्ति बने।
1969 — पश्चिम बंगाल के देबरा–गोपीबल्लभपुर में उभार
भूमि संघर्ष और नक्सली संगठन ने जंगलमहल क्षेत्र में प्रभाव बनाया।
1969–70 — बिहार का मुशहरी
मुजफ्फरपुर जिले के मुशहरी क्षेत्र में गरीब किसान और नक्सली कार्यकर्ताओं की गतिविधियां बढ़ीं।
लेकिन स्थानीय आंदोलन शीघ्र गंभीर दमन और आंतरिक कमजोरियों में घिर गया।
1969–70 — उत्तर प्रदेश, पंजाब और केरल में गतिविधि
देश के विभिन्न हिस्सों में छोटे क्रांतिकारी समूह सक्रिय हुए।
लेकिन नक्सलबाड़ी मॉडल किसी एक समान राष्ट्रीय किसान विद्रोह में नहीं बदल पाया।
27 अप्रैल 1970 — ‘देशब्रती’ कार्यालय पर पुलिस छापा
CPI(ML) का खुला राजनीतिक ढांचा अधिकाधिक भूमिगत होने लगा। पार्टी की अपनी इतिहास-सामग्री इस तारीख को पुलिस दमन के महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में दर्ज करती है।
11 मई 1970 — CPI(ML) का पहला पार्टी कांग्रेस
कलकत्ता में भूमिगत परिस्थितियों में पहला पार्टी कांग्रेस हुआ।
1970 — कलकत्ता छात्र उभार
छात्र–युवा आंदोलन तेजी से उग्र हुआ।
यहीं मूल किसान आंदोलन और शहरी नक्सलवाद में बड़ा अंतर विकसित हुआ।
10–11 जुलाई 1970 — श्रीकाकुलम नेतृत्व पर प्रहार
वेम्पटापु सत्यनारायण और अडिभटला कैलासम मारे गए।
इसके बाद श्रीकाकुलम गुरिल्ला क्षेत्र को गंभीर झटका लगा।
1971 — CPI(ML) में आंतरिक मतभेद
सत्यनारायण सिंह सहित नेताओं ने चारु मजूमदार की ‘annihilation’ लाइन पर सवाल उठाए।
1 जुलाई–15 अगस्त 1971 — Operation Steeplechase
भारत सरकार और पश्चिम बंगाल, बिहार तथा ओडिशा की राज्य सरकारों ने सेना, अर्धसैनिक बल और पुलिस के समन्वय से बड़े अभियान चलाए।
IDSA के एक अध्ययन के अनुसार अभियान में लगभग 8,400 नक्सली कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी हुई और प्रमुख नेता पकड़े गए।
5 अगस्त 1971 — सरोज दत्त की मृत्यु
CPI(ML) नेता और सांस्कृतिक व्यक्तित्व सरोज दत्त पुलिस हिरासत/कथित पुलिस कार्रवाई के बाद गायब हुए और उन्हें मारा गया माना गया।
उनकी मृत्यु नक्सली स्मृति में राज्य-दमन का प्रमुख प्रतीक बनी।
12–13 अगस्त 1971 — काशीपुर–बारानगर हिंसा
कलकत्ता क्षेत्र में भारी राजनीतिक हिंसा हुई।
नक्सल समर्थक स्रोत इसे व्यापक हत्याकांड के रूप में याद करते हैं। संख्या और परिस्थितियों को लेकर स्रोत-भेद है।
मार्च 1972 — पश्चिम बंगाल में कांग्रेस सरकार
सिद्धार्थ शंकर राय मुख्यमंत्री बने।
राज्य की नक्सल-विरोधी नीति और कठोर हुई।
16 जुलाई 1972 — चारु मजूमदार गिरफ्तार
कलकत्ता के एंटाली क्षेत्र से उन्हें गिरफ्तार किया गया।
28 जुलाई 1972 — चारु मजूमदार की पुलिस हिरासत में मृत्यु
गिरफ्तारी के बारह दिन बाद लालबाजार पुलिस लॉक-अप में उनकी मृत्यु हुई।
उनके स्वास्थ्य की स्थिति गंभीर थी; मृत्यु और हिरासत की परिस्थितियों पर राजनीतिक विवाद लंबे समय तक रहे।
उनकी मृत्यु के साथ मूल CPI(ML) की केंद्रीय सत्ता लगभग समाप्त हो गई।
1973 — भोजपुर का उभार
मध्य बिहार के भोजपुर में दलित खेतिहर मजदूरों और गरीब किसानों का नया नक्सली आंदोलन विकसित हुआ।
और अन्य स्थानीय नेता महत्वपूर्ण बने।
यहां भूमि संघर्ष जातिगत सम्मान और मजदूरी से जुड़ गया।
28 जुलाई 1974 — केंद्रीय समिति का पुनर्गठन
जौहर—सुब्रत दत्त—के नेतृत्व में एक CPI(ML) धारा ने केंद्रीय समिति पुनर्गठित की।
विनोद मिश्र और अन्य नेता इसमें शामिल थे।
नवंबर 1975 — जौहर की मृत्यु
भोजपुर क्षेत्र में पुलिस कार्रवाई में जौहर मारे गए।
इसके बाद विनोद मिश्र संगठन के प्रमुख नेता बने।
फरवरी 1976 — दूसरा पार्टी कांग्रेस
गया के ग्रामीण क्षेत्र में भूमिगत परिस्थितियों में कांग्रेस आयोजित हुई।
आगे यह धारा धीरे-धीरे जनसंगठन और खुली राजनीति की ओर बढ़ी।
1977–79 — सुधार अभियान
पुरानी सैन्यवादी लाइन की समीक्षा हुई।
1960 के दशक का उत्तरार्ध — ‘Dakshin Desh’ समूह
कनाई चटर्जी और अमूल्य सेन के आसपास माओवादी समूह विकसित हुआ।
1975 — Maoist Communist Centre नाम
अनेक मानक विवरणों के अनुसार Dakshin Desh धारा ने 1975 में Maoist Communist Centre—MCC नाम अपनाया।
यहां स्रोत-भेद ध्यान देने योग्य है; कुछ संगठनात्मक परंपराएं उत्पत्ति को 1969 तक पीछे ले जाती हैं। इसलिए 1969 को जड़ और 1975 को MCC नाम की स्पष्ट संगठनात्मक पहचान मानना अधिक सुरक्षित है।
1976 के बाद — बिहार की ओर विस्तार
MCC ने पश्चिम बंगाल से पूर्वी और मध्य बिहार की ओर संगठन बढ़ाया।
1982 — कनाई चटर्जी की मृत्यु
इसके बावजूद MCC समाप्त नहीं हुआ और बिहार–झारखंड क्षेत्र में आगे मजबूत हुआ।
22 अप्रैल 1980 — CPI(ML) People's War का गठन
कोंडापल्ली सीतारमैया के नेतृत्व में आंध्र प्रदेश में CPI(ML) People's War—लोकप्रिय नाम PWG—का गठन हुआ।
आधिकारिक प्रशिक्षण सामग्री भी गठन की तारीख 22 अप्रैल 1980 देती है।
1980 का दशक — उत्तर तेलंगाना मुख्य क्षेत्र
और आसपास के क्षेत्रों में संगठन का प्रभाव बढ़ा।
किसान संगठन, छात्र संगठन और ‘दलम’ प्रणाली विकसित हुई।
1980 का दशक — दंडकारण्य की ओर प्रवेश
PWG ने उत्तर तेलंगाना से बस्तर–दंडकारण्य वन क्षेत्र की ओर विस्तार शुरू किया।
आगे यही आधुनिक माओवादी आंदोलन का सबसे स्थायी गुरिल्ला आधार बना।
1989 — Greyhounds
आंध्र प्रदेश में विशेष नक्सल-विरोधी बल Greyhounds विकसित किया गया।
यह आगे राज्य की प्रतिनक्सल रणनीति का प्रमुख मॉडल बना।
1990 के दशक का प्रारंभ — PWG का विस्तार
और मध्य भारत में संगठनात्मक नेटवर्क बढ़ा।
1991 — सीतारमैया का नेतृत्व कमजोर
People's War में नेतृत्व-संघर्ष के बाद मुप्पला लक्ष्मण राव ‘गणपति’ प्रमुख नेता बनते गए।
1990 का दशक — MCC बिहार–झारखंड में मजबूत
और आगे झारखंड के जंगल–खनिज क्षेत्रों में MCC की पकड़ बढ़ी।
सितंबर 1993 — PWG, MCC और Party Unity का समन्वय
तीनों ने संयुक्त संघर्ष और राजनीतिक सहयोग की दिशा में कदम उठाया।
All India People's Resistance Forum बना।
21 मार्च 1994 — संयुक्त जन प्रदर्शन
AIPRF के बड़े प्रदर्शन का उल्लेख MCC इतिहास में मिलता है।
अगस्त 1998 — Party Unity का People's War में विलय
इसके बाद People's War का बिहार–झारखंड क्षेत्र में प्रभाव मजबूत हुआ। सरकारी प्रशिक्षण सामग्री भी अगस्त 1998 के इस विलय को दर्ज करती है।
यह 2004 के अंतिम बड़े माओवादी एकीकरण की महत्वपूर्ण पूर्वपीठिका थी।
2000 — People's Guerrilla Army
People's War ने अधिक औपचारिक गुरिल्ला सैन्य संरचना विकसित की। सरकारी प्रशिक्षण सामग्री वर्ष 2000 में People's Guerrilla Army गठन का उल्लेख करती है।
15 नवंबर 2000 — झारखंड राज्य
MCC के प्रभाव वाले अनेक वन–खनिज क्षेत्र अब नए राज्य में आ गए।
जनवरी 2003 — MCC और RCCI(M) का विलय
MCC ने Revolutionary Communist Centre of India (Maoist) के साथ विलय करके Maoist Communist Centre of India—MCCI नाम अपनाया।
मई 2003 — CPI(ML) Second Central Committee का MCCI में विलय
एक और माओवादी धारा MCCI में शामिल हुई।
फरवरी 2003 से 2004 — PW और MCCI एकीकरण वार्ता
दोनों संगठनों के बीच लंबी वैचारिक और संगठनात्मक बातचीत चली।
21 सितंबर 2004 — Communist Party of India (Maoist)
People's War और MCCI के विलय से CPI (Maoist) बनी।
भारत सरकार का गृह मंत्रालय भी 2004 में PW और MCCI के विलय को आधुनिक LWE इतिहास का निर्णायक संगठनात्मक मोड़ मानता है।
14 अक्टूबर 2004 — सार्वजनिक घोषणा
नई पार्टी के गठन की सार्वजनिक घोषणा अक्टूबर में की गई।
इसलिए 21 सितंबर और 14 अक्टूबर दोनों तारीखें विभिन्न स्रोतों में मिलती हैं—
21 सितंबर — वास्तविक संगठनात्मक गठन।
2005 — सलवा जुडूम
दक्षिण बस्तर में माओवादी-विरोधी अभियान उभरा।
महेंद्र कर्मा इसका प्रमुख राजनीतिक चेहरा बने।
राज्य द्वारा स्थानीय आदिवासी युवाओं को SPO के रूप में हथियार देने का विवाद आगे सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा।
2006–09 — CPI (Maoist) का दंडकारण्य विस्तार
और आसपास के क्षेत्र आधुनिक माओवादी संघर्ष के केंद्रीय भूगोल बने।
2009 — ‘Operation Green Hunt’ शब्द
केंद्रीय और राज्य सुरक्षा तैनाती के विस्तार के लिए मीडिया में यह शब्द व्यापक रूप से इस्तेमाल हुआ।
नक्सलबाड़ी के प्रमुख प्राथमिक स्रोत और दस्तावेज
प्रस्तावना : नक्सलबाड़ी का इतिहास लिखने में सबसे बड़ी समस्या स्रोतों की कमी नहीं, उनकी पक्षधरता है
नक्सलबाड़ी के इतिहास पर सामग्री की कमी नहीं है। वास्तविक समस्या यह है कि लगभग हर महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत किसी न किसी राजनीतिक पक्ष से निकला है।
चारु मजूमदार के दस्तावेज क्रांति के पक्ष में लिखे गए थे।
कानू सान्याल की रिपोर्ट स्वयं आंदोलनकारी नेतृत्व की रिपोर्ट थी।
CPI(M) के दस्तावेज नक्सलवादी लाइन के विरुद्ध पार्टी के तर्क प्रस्तुत करते हैं।
प्राथमिक स्रोत क्या है?
नक्सलबाड़ी जैसे राजनीतिक आंदोलन में ‘प्राथमिक स्रोत’ की परिभाषा सामान्य इतिहास से कुछ अधिक व्यापक है।
प्राथमिक स्रोत में शामिल हो सकते हैं—
बाद में किसी नेता द्वारा लिखा संस्मरण भी महत्वपूर्ण स्रोत है, लेकिन वह समकालीन प्राथमिक स्रोत नहीं बल्कि स्मृतिपरक स्रोत है।
स्रोतों को तीन समय-स्तरों में बांटना चाहिए
नक्सलबाड़ी शोध में प्राथमिक सामग्री को तीन कालखंडों में रखना उपयोगी है।
पहला — 1965–72
मूल नक्सलबाड़ी और पहली CPI(ML) लहर।
दूसरा — 1972–2004
और विभिन्न CPI(ML) धाराओं के दस्तावेज—
तीसरा — 2004–2026
CPI (Maoist), गृह मंत्रालय, संसद, राज्यों की पुलिस, न्यायालय और आधुनिक प्रतिनक्सल नीति के दस्तावेज।
इन तीनों चरणों को एक ही स्रोत-समूह में नहीं मिलाना चाहिए।
‘Historic Eight Documents’ — नक्सलबाड़ी की वैचारिक पूर्वपीठिका
चारु मजूमदार द्वारा 1965 से अप्रैल 1967 के बीच लिखे गए आठ लेख नक्सलबाड़ी के सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक प्राथमिक स्रोत हैं।
आज CPI(ML) Liberation के डिजिटल अभिलेख में सभी आठ दस्तावेज क्रम से उपलब्ध हैं। वहां प्रथम दस्तावेज 28 जनवरी 1965 से और आठवां अप्रैल 1967 से दिनांकित है।
पहला दस्तावेज — तत्कालीन राजनीतिक संकट
28 जनवरी 1965 के पहले दस्तावेज का संदर्भ व्यापक कम्युनिस्ट गिरफ्तारियों और भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के संकट से जुड़ा था।
यहां चारु मजूमदार संगठनात्मक कार्य, किसान आंदोलन और क्रांतिकारी दिशा की आवश्यकता पर जोर देते हैं।
इस स्रोत का महत्व यह है कि यह दिखाता है—
नक्सलबाड़ी की विचारधारा मई 1967 की गोलीबारी के बाद पैदा नहीं हुई।
दूसरे से पांचवें दस्तावेज — ‘संशोधनवाद’ केंद्रीय शत्रु
इन लेखों में चारु मजूमदार का मुख्य संघर्ष केवल कांग्रेस सरकार से नहीं बल्कि स्वयं कम्युनिस्ट आंदोलन की उस दिशा से है जिसे वे ‘revisionism—संशोधनवाद’ कहते थे।
क्या कम्युनिस्ट पार्टी चुनाव और संसदीय व्यवस्था के भीतर काम करेगी?
या राज्य-सत्ता को क्रांतिकारी संघर्ष से बदलने की तैयारी करेगी?
छठा और सातवां दस्तावेज — नई पार्टी की तैयारी
8 दिसंबर 1966 का छठा दस्तावेज ‘सच्ची क्रांतिकारी पार्टी’ निर्माण के प्रश्न को स्पष्ट रूप से आगे बढ़ाता है।
सातवां दस्तावेज armed partisan struggle—सशस्त्र पक्षधर संघर्ष—पर जोर देता है।
1967 के नक्सलबाड़ी को समझने में ये इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये सिद्ध करते हैं कि नेतृत्व पहले से—
आठवां दस्तावेज — चुनाव के बाद सीधा संघर्ष
अप्रैल 1967 का आठवां दस्तावेज नक्सलबाड़ी से ठीक पहले लिखा गया।
इसमें संयुक्त मोर्चा सरकार बनने के बाद CPI(M) नेतृत्व की दिशा की आलोचना की गई और किसान संघर्ष आगे बढ़ाने का आग्रह किया गया।
इसे नक्सलबाड़ी का सबसे तत्काल वैचारिक पूर्व-दस्तावेज कहा जा सकता है।
‘Historic Eight Documents’ की स्रोत-सीमा
CPI(M) के भीतर वैचारिक टकराव कैसा था;
सशस्त्र संघर्ष की तैयारी कैसे विकसित हुई।
नक्सलबाड़ी के प्रत्येक गांव का किसान क्या सोच रहा था;
कितने किसान वास्तव में क्रांतिकारी राज्य-सत्ता के समर्थक थे;
कितने केवल भूमि विवाद में शामिल थे।
इसलिए इन दस्तावेजों को किसान समाज का प्रत्यक्ष बयान नहीं समझना चाहिए।
चारु मजूमदार का ‘The किसान Struggle of Naxalbari — Before and After’
नक्सलबाड़ी के तुरंत आसपास लिखे गए चारु मजूमदार के पत्र और लेख भी महत्वपूर्ण हैं।
उनके संकलित लेखन में मई 1967 से जुड़ा The किसान Struggle of Naxalbari – Before and After भी उपलब्ध है।
यह स्रोत आंदोलन शुरू होने के समय नेतृत्व की मानसिकता समझने के लिए विशेष रूप से उपयोगी है।
इसे बाद की विजय-कथा के बजाय तत्कालीन स्रोत की तरह पढ़ना चाहिए।
‘Report on the किसान आंदोलन in the Terai Region’
कानू सान्याल की Report on the किसान आंदोलन in the Terai Region नक्सलबाड़ी के सामाजिक और संगठनात्मक इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण अंदरूनी स्रोतों में है।
बाद की CPI(ML) सामग्री इस रिपोर्ट को उद्धृत करती है और बताती है कि 18–19 मार्च 1967 को खोरीबाड़ी के निकट रामबोला क्षेत्र में Terai Kisan Sabha के सम्मेलन में तीन महत्वपूर्ण बातें तय हुईं—
कानू सान्याल की रिपोर्ट से किसान समितियों का आकार
इसी रिपोर्ट के आधार पर CPI(ML) की बाद की ऐतिहासिक सामग्री दावा करती है कि मार्च के अंत से अप्रैल 1967 के अंत तक बड़ी संख्या में गांव संगठित हुए और किसान सभा की सदस्यता कुछ हजार से बढ़कर लगभग 40,000 तक पहुंच गई।
लेकिन यहां विशेष स्रोत-सावधानी आवश्यक है।
यह संख्या आंदोलन के अपने स्रोत से आती है।
कानू सान्याल की 1 मई 1969 की घोषणा
1 मई 1969 को कलकत्ता में कानू सान्याल ने CPI(ML) के गठन की सार्वजनिक घोषणा से जुड़ी राजनीतिक भूमिका निभाई।
इस अवसर के भाषण और दस्तावेज नई पार्टी की—
की सार्वजनिक राजनीतिक घोषणा समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
यह स्रोत 1967 के स्थानीय किसान संघर्ष और 1969 की अखिल भारतीय पार्टी के बीच संक्रमण को दिखाता है।
बाद के कानू सान्याल — आत्मालोचना एक प्राथमिक स्रोत क्यों?
कानू सान्याल की बाद की टिप्पणियां अलग प्रकृति की सामग्री हैं।
उन्होंने आगे चारु मजूमदार की कुछ नीतियों—विशेषकर जनसंगठन की उपेक्षा और व्यक्तिगत हिंसा—पर आलोचनात्मक रुख अपनाया।
इन बयानों का उपयोग सावधानी से होना चाहिए।
वे पश्चदृष्टि—retrospective testimony हैं।
एक मूल नेता ने दशकों बाद अपने अनुभव को कैसे पुनर्मूल्यांकित किया।
कानू सान्याल और चारु मजूमदार को साथ पढ़ना क्यों जरूरी?
यदि केवल चारु मजूमदार को पढ़ेंगे तो नक्सलबाड़ी अत्यधिक वैचारिक दिखाई देगा।
यदि कानू सान्याल की तराई रिपोर्ट जोड़ेंगे तो स्थानीय किसान संगठन का स्तर अधिक स्पष्ट होगा।
यदि कानू सान्याल की बाद की आत्मालोचना भी जोड़ेंगे तो पता चलता है कि आंदोलन का नेतृत्व स्वयं आगे एकमत नहीं रहा।
AICCCR क्यों केंद्रीय प्राथमिक स्रोत है?
नवंबर 1967 के बाद विभिन्न राज्यों के कम्युनिस्ट क्रांतिकारी समूहों का समन्वय विकसित हुआ, जो आगे All India Coordination Committee of Communist Revolutionaries—AICCCR बना।
AICCCR के प्रस्ताव नक्सलबाड़ी से CPI(ML) तक संक्रमण समझने के लिए अनिवार्य हैं।
कौन-से प्रश्नों पर CPI(M) से टूट हुई,
किस प्रकार अलग पार्टी निर्माण की दिशा बनी,
कृषि क्रांति को केंद्रीय क्यों माना गया,
AICCCR के दस्तावेजों में क्या खोजें?
शोधकर्ता को विशेष रूप से इन विषयों वाले प्रस्ताव खोजने चाहिए—
माओ और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से संबंध।
इन दस्तावेजों को अलग-अलग तारीख के क्रम में पढ़ना आवश्यक है।
क्योंकि 1967 की स्थिति और 1969 की लाइन पूर्णतः एक जैसी नहीं थी।
AICCCR की सबसे महत्वपूर्ण स्रोत-सीमा
AICCCR स्वयं एक राजनीतिक पुनर्गठन अभियान था।
इसलिए इसके दस्तावेज पीछे मुड़कर नक्सलबाड़ी को ऐसी ‘ऐतिहासिक अनिवार्यता’ के रूप में पेश कर सकते हैं जो उस समय स्थानीय स्तर पर इतनी स्पष्ट नहीं थी।
यानी घटनाओं के बाद संगठन अक्सर अपनी स्थापना की कहानी व्यवस्थित करता है।
इसे इतिहासलेखन में founding narrative—संस्थापक कथा कहा जा सकता है।
22 अप्रैल 1969 — CPI(ML) की स्थापना सामग्री
CPI(ML) का गठन नक्सलबाड़ी के इतिहास में केंद्रीय प्राथमिक दस्तावेजी क्षण है।
पार्टी के गठन संबंधी घोषणाएं और आगे 1970 के प्रथम पार्टी कांग्रेस के दस्तावेज निम्न प्रश्नों पर मूल स्रोत हैं—
चीन की क्रांति को किस रूप में अपनाया गया?
CPI(ML) की अपनी ऐतिहासिक सामग्री पार्टी को CPI और CPI(M) से वैचारिक विच्छेद की परिणति बताती है।
1970 का प्रथम CPI(ML) कांग्रेस
पहले पार्टी कांग्रेस की राजनीतिक रिपोर्ट, कार्यक्रम और संगठनात्मक सामग्री इसलिए विशेष महत्व रखती है क्योंकि 1969 की घोषणा के बाद पहली बार पार्टी अपनी राष्ट्रीय राजनीतिक रणनीति को अधिक व्यवस्थित करती है।
शोधकर्ता को यहां चार विषय अलग करने चाहिए—
इन चारों को बाद के संगठनात्मक व्यवहार से मिलाना चाहिए।
CPI(ML) दस्तावेजों को एक स्रोत-परिवार न समझें
इसलिए आगे ‘CPI(ML) दस्तावेज’ नाम से एक एकरूप स्रोत-समूह नहीं रहता।
की अपनी अलग राजनीतिक स्मृतियां बनीं।
यदि कोई बाद का दस्तावेज 1969 के CPI(ML) की व्याख्या करता है तो पहले उसकी संगठनात्मक वंशावली पहचाननी चाहिए।
‘देशब्रती’ क्या था?
Deshabrati—देशब्रती नक्सलवादी आंदोलन की प्रारंभिक बंगाली राजनीतिक पत्रकारिता का अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत है।
यह क्रांतिकारी संगठन का प्रचार, राजनीतिक शिक्षा और घटनाओं की वैकल्पिक रिपोर्टिंग का माध्यम था।
और अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट राजनीति—
‘देशब्रती’ की उपयोगिता
1967–72 के लिए देशब्रती से विशेष रूप से यह जाना जा सकता है—
आंदोलन अपने समर्थकों से किस भाषा में बात करता था;
पुलिस कार्रवाई का वर्णन कैसे करता था;
किस क्षेत्र को सफल क्रांतिकारी संघर्ष घोषित करता था।
यह राजनीतिक मानसिकता का अत्यंत मूल्यवान स्रोत है।
‘देशब्रती’ को तथ्य-स्रोत की तरह कैसे पढ़ें?
किसी गांव में ‘हजारों किसान उठ खड़े हुए’—
जिला प्रशासन ने कितनी गिरफ्तारी दर्ज की?
भूमि रिकॉर्ड में क्षेत्र कितना बड़ा था?
इस प्रकार क्रांतिकारी पत्रकारिता को खारिज नहीं करना चाहिए, लेकिन अकेले उस पर निर्भर भी नहीं होना चाहिए।
प्रारंभिक ‘Liberation’ का महत्व
Liberation अंग्रेजी भाषा का प्रमुख क्रांतिकारी प्रकाशन बना।
आज CPI(ML) Liberation स्वयं अपने केंद्रीय मुखपत्र के रूप में Liberation और उसके अभिलेख उपलब्ध कराती है।
नक्सलबाड़ी के इतिहास में इसका महत्व दो चरणों में है।
प्रारंभिक क्रांतिकारी आंदोलन का वैचारिक प्रकाशन।
बाद की CPI(ML) Liberation धारा द्वारा अपने अतीत की पुनर्व्याख्या।
प्रारंभिक और आधुनिक ‘Liberation’ में अंतर
1970 के दशक का Liberation और आज का Liberation एक ही ऐतिहासिक संस्थागत परंपरा से जुड़े हो सकते हैं, लेकिन राजनीतिक परिस्थितियां बहुत बदल चुकी हैं।
आधुनिक CPI(ML) Liberation चुनावी राजनीति में भाग लेती है।
इसलिए जब उसकी वर्तमान वेबसाइट चारु मजूमदार या नक्सलबाड़ी पर ऐतिहासिक लेख प्रकाशित करती है, वह मूल दस्तावेज का डिजिटल पुनर्प्रकाशन हो सकता है या बाद की संपादकीय व्याख्या।
डिजिटल CPI(ML) अभिलेख का महत्व
आज चारु मजूमदार के संकलित लेख, नक्सलबाड़ी पर पार्टी इतिहास और Liberation सामग्री डिजिटल रूप में उपलब्ध होने से शोध आसान हुआ है।
लेकिन डिजिटल प्रकाशन में तीन चीजें जांचें—
और क्या पाठ संपादित या अनुवादित है।
CPI(M) स्रोत क्यों अनिवार्य हैं?
नक्सलबाड़ी के इतिहास में CPI(M) केवल बाहरी आलोचक नहीं थी।
और भूमि सुधार की मुख्य संसदीय वाम शक्ति भी।
और हरेकृष्ण कोनार जैसे नेताओं के भाषण—
CPI(M) स्रोतों से क्या प्रश्न पूछें?
पार्टी ने मार्च–मई 1967 में नक्सलबाड़ी को कब गंभीर संकट माना?
स्थानीय नेतृत्व को कौन-से निर्देश दिए?
भूमि सुधार पर सरकार की नीति क्या थी?
पुलिस कार्रवाई और पार्टी संगठन के बीच संबंध क्या था?
चारु मजूमदार और कानू सान्याल पर अनुशासनात्मक कार्रवाई कैसे हुई?
इन प्रश्नों के बिना नक्सलबाड़ी की पार्टी-विभाजन कथा अधूरी है।
संसदीय वाम की आत्मरक्षा
जैसे CPI(ML) अपने विद्रोह को वैध ठहराता है, वैसे CPI(M) अपने निर्णयों को भी वैध ठहरा सकती है।
इसलिए CPI(M) दस्तावेजों में ‘adventurism’, ‘left sectarianism’ या ‘individual terrorism’ जैसे शब्द स्वयं राजनीतिक श्रेणियां हैं।
लेकिन सीधे ऐतिहासिक तथ्य के रूप में नहीं।
नक्सलबाड़ी शोध का सबसे कम इस्तेमाल होने वाला लेकिन सबसे महत्वपूर्ण स्रोत
यदि नक्सलबाड़ी भूमि आंदोलन था तो भूमि रिकॉर्ड प्राथमिक स्रोतों के केंद्र में होने चाहिए।
राजनीतिक दस्तावेज बताएगा कि ‘जोतदार अत्याचारी था’।
West Bengal Estates Acquisition और Land Reforms रिकॉर्ड
1953 और 1955 के कानूनों के बाद जिला और उप-विभाग स्तर पर बने रिकॉर्ड नक्सलबाड़ी की वास्तविक कृषि संरचना जांचने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
यही तथ्य नक्सलबाड़ी की केंद्रीय शिकायत—
दार्जिलिंग जिला अभिलेख और सिलीगुड़ी उप-मंडल
नक्सलबाड़ी की प्रशासनिक पहचान आज के मानचित्र से पढ़ना पर्याप्त नहीं।
1967 में संबंधित क्षेत्र दार्जिलिंग जिले के सिलीगुड़ी उप-मंडल से जुड़े थे।
इनमें से बहुत सामग्री अभी पूर्णतः डिजिटाइज्ड नहीं हो सकती।
पुलिस FIR और केस डायरी
23–25 मई 1967 की घटनाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण सरकारी प्राथमिक स्रोत होंगे—
इंस्पेक्टर सोनम वांगडी की घटना संबंधी रिकॉर्ड,
और गोलीबारी से संबंधित मजिस्ट्रेट/पुलिस सामग्री।
इन दस्तावेजों से घटनाक्रम की समय-रेखा अधिक सटीक की जा सकती है।
पुलिस स्रोत की मूल सीमा
पुलिस दस्तावेज लिखते समय पुलिस स्वयं संघर्ष का पक्ष हो सकती है।
इसलिए ‘भीड़ ने हमला किया’, ‘पुलिस ने आत्मरक्षा में गोली चलाई’ जैसे वाक्य पुलिस की आधिकारिक स्थिति हैं।
उन्हें किसान गवाहियों और अन्य स्वतंत्र स्रोतों से मिलाना आवश्यक है।
उसी प्रकार नक्सली स्रोत का ‘निहत्थे किसानों पर बिना कारण गोली’ वाला वर्णन भी स्वतंत्र परीक्षण मांगता है।
पोस्टमार्टम और चिकित्सकीय रिकॉर्ड
यदि उपलब्ध हों तो पोस्टमार्टम रिपोर्ट अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
ऐसे चिकित्सकीय स्रोत राजनीतिक भाषाओं की तुलना में अधिक सीमित लेकिन अधिक प्रत्यक्ष तथ्य दे सकते हैं।
हालांकि उनसे गोली चलाने के राजनीतिक औचित्य का निर्णय नहीं होता।
गिरफ्तारी और हिरासत अभिलेख
जुलाई 1967 के पुलिस अभियान और 1970–72 के नक्सल विरोधी अभियानों के अध्ययन के लिए—
इन्हीं के माध्यम से यह सत्यापित किया जा सकता है कि किस दिन कौन-सा नेता गिरफ्तार हुआ।
विधानसभा बहसें क्यों महत्वपूर्ण हैं?
1967 का नक्सलबाड़ी उस समय हुआ जब पश्चिम बंगाल में निर्वाचित संयुक्त मोर्चा सरकार थी।
इसलिए विधानसभा की कार्यवाही से पता चल सकता है—
सरकार ने गोलीबारी का क्या औचित्य दिया;
कितने मृतकों की आधिकारिक संख्या बताई;
पुलिस कार्रवाई पर मंत्री क्या बोले;
भूमि सुधार को किस संदर्भ में उठाया गया।
यह तत्कालीन सार्वजनिक सरकारी रिकॉर्ड है।
प्रश्नोत्तर और स्थगन प्रस्ताव
पुलिस इंस्पेक्टर की मृत्यु पर प्रश्न;
ऐसी विधानसभा सामग्री समयरेखा के विवाद सुलझाने में महत्वपूर्ण हो सकती है।
गृह मंत्रालय का रिकॉर्ड
नक्सलबाड़ी से आधुनिक माओवादी आंदोलन तक सरकारी पक्ष का सबसे बड़ा स्रोत Ministry of Home Affairs—गृह मंत्रालय है।
आज MHA का Left Wing Extremism Division अपनी आधिकारिक पृष्ठभूमि में स्पष्ट रूप से दर्ज करता है कि 2004 में People's War और MCCI के विलय से CPI (Maoist) बना।
गृह मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट
MHA Annual Reports आधुनिक माओवादी आंदोलन के अध्ययन का आधारभूत स्रोत हैं।
2011–12 की रिपोर्ट, उदाहरण के लिए, सरकार की नीति को केवल पुलिस-केंद्रित न बताकर सुरक्षा, विकास और स्थानीय अधिकारों को साथ लेने वाले समेकित दृष्टिकोण की बात करती है।
2022–23 की रिपोर्ट CPI (Maoist) को सक्रिय LWE संगठनों में सबसे शक्तिशाली बताती है और हिंसा के भौगोलिक संकुचन का आंकड़ा देती है।
सरकारी आंकड़े हमेशा कटऑफ तारीख सहित लिखें
आधुनिक माओवादी इतिहास में एक आम त्रुटि है—
अलग-अलग सरकारी दस्तावेजों से आंकड़े उठाकर एक ही वर्ष की निश्चित संख्या मान लेना।
उदाहरण के लिए एक संसदीय उत्तर 30 नवंबर तक का आंकड़ा दे सकता है।
तीसरा प्रकाशित होने तक उपलब्ध डेटा।
यह छोटी सावधानी बड़े तथ्यात्मक भ्रम से बचाती है।
संसद प्रश्न — सबसे उपयोगी सरकारी प्राथमिक स्रोतों में एक
लोकसभा और राज्यसभा के प्रश्नोत्तर से अनेक विषयों पर बहुत विशिष्ट डेटा मिलता है—
वार्षिक रिपोर्ट व्यापक तस्वीर देती है।
संसदीय उत्तर कई बार अधिक ताजा और सूक्ष्म डेटा देता है।
संसद में सरकार का राजनीतिक फ्रेम भी पढ़ें
सरकार अपनी नीति की व्याख्या भी करती है।
किस वर्ष सरकार ‘law and order’ पर जोर देती है?
भाषा का यह परिवर्तन स्वयं राज्य की प्रतिनक्सल रणनीति के इतिहास का स्रोत है।
UAPA और CPI (Maoist)
आधुनिक संगठन की कानूनी स्थिति समझने के लिए UAPA के तहत प्रतिबंध संबंधी सरकारी अधिसूचनाएं महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत हैं।
MHA की वार्षिक रिपोर्ट CPI (Maoist) और उसके formations/front organisations को UAPA की आतंकवादी संगठनों की अनुसूची में शामिल होने का उल्लेख करती है।
यह कानूनी तथ्य संगठन की अपनी राजनीतिक पहचान से अलग सरकारी विधिक श्रेणी है।
दोनों को अलग शब्दों में लिखना चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय का Nandini Sundar मामला
आधुनिक नक्सल–माओवादी इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण न्यायिक प्राथमिक स्रोतों में है—
Nandini Sundar & Others v. State of Chhattisgarh, फैसला 5 जुलाई 2011।
राज्य माओवादी हिंसा से लड़ने के लिए नागरिक/आदिवासी युवाओं को किस सीमा तक हथियारबंद कर सकता है?
न्यायालय ने किन दस्तावेजों पर विचार किया?
इस मुकदमे की विशेष उपयोगिता यह है कि इसमें एक ही रिकॉर्ड में कई पक्षों की सामग्री आती है—
अदालत ने दर्ज किया कि याचिका में माओवादी हिंसा के साथ-साथ राज्य समर्थित प्रतिनक्सल कार्रवाइयों से मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप था।
इसलिए फैसला स्वयं एक बहु-स्रोत दस्तावेजी संग्रह की तरह पढ़ा जा सकता है।
अदालत ने राज्य के दावे भी दर्ज किए
न्यायिक दस्तावेज की बड़ी ताकत यह है कि केवल याचिकाकर्ता का पक्ष नहीं मिलता।
अदालत के निष्कर्ष और आरोप को अलग रखें
किसी न्यायिक फैसले में तीन स्तर होते हैं—
“याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि सलवा जुडूम राज्य समर्थित armed vigilante group था”—
“सर्वोच्च न्यायालय ने SPO के प्रतिनक्सल उपयोग को असंवैधानिक माना”—
नक्सलबाड़ी के प्रमुख द्वितीयक स्रोत और संदर्भ ग्रंथ
प्रस्तावना : नक्सलबाड़ी पर कोई एक ‘मानक इतिहास’ पर्याप्त क्यों नहीं है?
नक्सलबाड़ी पर इतिहासलेखन लगभग उतना ही विवादग्रस्त है जितना स्वयं आंदोलन। 1967 में दार्जिलिंग जिले के एक सीमित कृषि क्षेत्र से शुरू हुई घटना को अलग-अलग लेखकों ने बिल्कुल अलग रूपों में देखा है—किसान विद्रोह, माओवादी क्रांति, कम्युनिस्ट आंदोलन का अतिवाम विचलन, भूमि-सुधार की विफलता का परिणाम, आदिवासी प्रतिरोध, राज्य के लिए आंतरिक सुरक्षा चुनौती, दलित–भूमिहीन मुक्ति आंदोलन और अंततः भारत में दीर्घकालीन सशस्त्र माओवादी विद्रोह की शुरुआत।
In the Wake of Naxalbari
सुमंत बनर्जी की In the Wake of Naxalbari: A History of the Naxalite आंदोलन in India नक्सलवादी आंदोलन के आरंभिक इतिहास पर सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथों में गिनी जाती है। इसका 1980 का संस्करण 436 पृष्ठों का है और इसकी विषय-सूची ग्रामीण आंदोलन, शहरी परिदृश्य, कम्युनिस्ट पार्टी और आगे आंदोलन के विभिन्न पहलुओं को समेटती है।
इसका महत्व
बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे नक्सलबाड़ी को केवल मई 1967 की घटना तक सीमित नहीं करते।
इस पुस्तक की विषय-सूची और अनुक्रमण में ‘rural scene’, ‘urban scene’, Communist Party, annihilation, guerrilla warfare, Srikakulam, Santhal, किसान और student/youth जैसे विषयों की व्यापक उपस्थिति इसकी विषयगत सीमा को स्पष्ट करती है।
स्रोतगत ताकत
बनर्जी आंदोलन के समय के काफी निकट लिख रहे थे।
की सामग्री तक अपेक्षाकृत प्रत्यक्ष पहुंच थी।
इस कारण पुस्तक बाद में लिखे गए इतिहासों की तुलना में आरंभिक नक्सलवादी दुनिया की भाषा और वातावरण को बेहतर पकड़ती है।
सीमा
पुस्तक को आंदोलन से पूरी तरह भावनात्मक रूप से पृथक ‘दूरस्थ इतिहास’ नहीं समझना चाहिए। उसमें क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं के अनुभव के प्रति स्पष्ट सहानुभूतिपूर्ण समझ मिलती है।
अतः बनर्जी को पढ़ते हुए पश्चिम बंगाल सरकार, CPI(M), भूमि अभिलेख और बाद के स्वतंत्र अकादमिक अध्ययनों से तुलना आवश्यक है।
शोध में प्राथमिकता
1967–72 के नक्सलवादी आंदोलन पर गंभीर शोध में इसे छोड़ा नहीं जा सकता।
The Naxalite आंदोलन
विप्लव दासगुप्ता की The Naxalite आंदोलन 1974 में Allied Publishers से प्रकाशित हुई। उपलब्ध ग्रंथसूची के अनुसार पुस्तक 282 पृष्ठों की है और 1967–72 के आंदोलन की उत्पत्ति, विस्तार और पतन का अध्ययन करती है। इसके अध्यायों में ‘Naxalbari and Naxalites’, ‘Different Shades of Naxalism’ और सशस्त्र संघर्ष तथा ‘annihilation’ जैसे विषय शामिल हैं।
दासगुप्ता की विश्लेषण पद्धति
दासगुप्ता नक्सलवाद को केवल एक नेता की विचारधारा से नहीं समझते।
वे विभिन्न ‘shades of Naxalism’ पर ध्यान देते हैं।
यह महत्वपूर्ण है क्योंकि आम इतिहास में अक्सर—
चारु मजूमदार = CPI(ML) = पूरा नक्सलवाद—
जबकि नागी रेड्डी, सत्यनारायण सिंह, श्रीकाकुलम, मुशहरी और दूसरे क्षेत्रीय अनुभवों में महत्वपूर्ण रणनीतिक अंतर थे।
दासगुप्ता के लेख का स्वतंत्र महत्व
1974 में China Report में दासगुप्ता का “The Naxalite आंदोलन: An Indian Experiment in Maoist Revolution” प्रकाशित हुआ। उसके संदर्भों में चारु मजूमदार, Liberation, श्रीकाकुलम और CPI(ML) की आंतरिक सामग्री दिखाई देती है।
इससे यह ग्रंथ केवल बाद की स्मृतियों पर आधारित इतिहास नहीं रहता बल्कि तत्कालीन राजनीतिक दस्तावेजों के निकट अध्ययन बन जाता है।
सीमा
1974 में लिखे जाने के कारण लेखक को यह नहीं पता था कि—
CPI(ML) Liberation कैसे विकसित होगी,
इसलिए पुस्तक प्रथम नक्सलवादी चरण के लिए श्रेष्ठ है, पूरे 1967–2026 इतिहास के लिए नहीं।
The Naxalite आंदोलन in India
प्रकाश सिंह की The Naxalite आंदोलन in India पहली बार 1995 में Rupa से प्रकाशित हुई। बाद में इसके संशोधित संस्करण आए; वर्तमान प्रकाशक इसे 1967 से आधुनिक माओवादी आंदोलन तक का ऐतिहासिक सर्वेक्षण बताता है।
प्रकाश सिंह स्वयं वरिष्ठ भारतीय पुलिस अधिकारी रहे हैं—उत्तर प्रदेश और असम के पुलिस प्रमुख तथा सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक सहित कई सुरक्षा भूमिकाओं में।
प्रकाश सिंह को क्यों पढ़ना चाहिए?
नक्सलबाड़ी साहित्य का बड़ा भाग आंदोलनकारियों, वामपंथी बुद्धिजीवियों और सामाजिक वैज्ञानिकों द्वारा लिखा गया।
प्रकाश सिंह दूसरी दिशा से प्रश्न पूछते हैं—
इस कारण नक्सलबाड़ी से माओवादी आंदोलन तक राज्य–सुरक्षा दृष्टिकोण समझने के लिए पुस्तक महत्वपूर्ण है।
प्रकाश सिंह की सीमा
इस ग्रंथ को कृषि समाजशास्त्र का अंतिम स्रोत नहीं मानना चाहिए।
अतः प्रकाश सिंह को सुमंत बनर्जी, बेला भाटिया, नंदिनी सुंदर और अल्पा शाह जैसे लेखकों के साथ पढ़ना चाहिए।
प्राथमिकता
विशेषकर 1980 के बाद के विस्तार और राज्य की प्रतिक्रिया के लिए।
Revolutionary Violence
मनोरंजन मोहंती का नक्सलवादी आंदोलन पर कार्य भारतीय राजनीतिक विज्ञान की महत्वपूर्ण परंपरा का हिस्सा है।
उनकी केंद्रीय चिंता केवल यह नहीं कि हिंसा हुई, बल्कि—
क्रांतिकारी राजनीति किन सामाजिक परिस्थितियों में हिंसक स्वरूप ग्रहण करती है?
इस दृष्टि से भूमि संबंध, राजनीतिक संस्थाएं, कम्युनिस्ट आंदोलन और क्रांतिकारी रणनीति को एक साथ समझने का प्रयास मिलता है।
उपयोगिता
चारु मजूमदार की वैचारिक लाइन को केवल ‘हिंसा’ शब्द से समझने के बजाय उसके राजनीतिक सिद्धांत का विश्लेषण करने में उपयोगी।
सीमा
स्थानीय नृवंशशास्त्रीय अनुभव इसकी मुख्य शक्ति नहीं है।
तीन ग्रंथ साथ पढ़ें
1967–72 के लिए तीन दृष्टियों का त्रिकोण बहुत उपयोगी है—
सुमंत बनर्जी — आंदोलन के भीतर और आसपास का सामाजिक–राजनीतिक इतिहास।
विप्लव दासगुप्ता — राजनीतिक–वैचारिक विश्लेषण।
राज्य/प्रशासनिक और बाद में प्रकाश सिंह — सुरक्षा और शासन दृष्टिकोण।
इन तीनों को प्राथमिक दस्तावेजों से मिलाने पर मूल नक्सलबाड़ी की काफी संतुलित तस्वीर बनती है।
नक्सलबाड़ी का इतिहास बंगाल में समाप्त नहीं होता
चारु मजूमदार की मृत्यु के बाद यदि केवल पश्चिम बंगाल देखा जाए तो लगेगा कि आंदोलन 1972 में लगभग समाप्त हो गया।
लेकिन बिहार—विशेषकर भोजपुर और मध्य बिहार—दिखाता है कि नक्सलवादी राजनीति ने एक नया सामाजिक आधार प्राप्त किया।
भूमि + मजदूरी + जाति + सामाजिक सम्मान + राजनीतिक सत्ता।
इसीलिए बिहार संबंधी साहित्य नक्सलबाड़ी इतिहासलेखन का अनिवार्य हिस्सा है।
The Naxalite आंदोलन in Central Bihar
बेला भाटिया का The Naxalite आंदोलन in Central Bihar मूलतः Cambridge University में 2000 में प्रस्तुत पीएचडी शोध था। इसकी ग्रंथसूची पुष्टि उपलब्ध है।
इसी शोध का महत्वपूर्ण संक्षिप्त रूप 2005 में Economic and Political Weekly में प्रकाशित हुआ—खंड 40, अंक 15, पृष्ठ 1536–1549।
यह नक्सलवादी इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय अध्ययनों में है।
बेला भाटिया का मुख्य निष्कर्ष
भाटिया के अध्ययन का अत्यंत महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि मध्य बिहार में नक्सलवादी आंदोलन ने श्रमिक और उत्पीड़ित वर्गों को सशक्त किया और गांवों में शक्ति-संबंध बदले।
लेकिन उनका निष्कर्ष एकतरफा प्रशंसात्मक नहीं है।
वे यह भी पाती हैं कि लोगों के भौतिक जीवन में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ, आंदोलन में थकान और गतिरोध आया तथा गुटबाजी गंभीर समस्या बनी।
जाति और वर्ग का प्रश्न
मध्य बिहार ने नक्सलवादी सिद्धांत की एक बड़ी सीमा उजागर की।
लेकिन वास्तविक गांवों में यही संबंध अक्सर—
इसलिए बिहार का अनुभव बताता है कि भारतीय ग्रामीण क्रांति को केवल वर्ग के माध्यम से पढ़ना अपर्याप्त हो सकता है।
प्राथमिकता
भोजपुर, जहानाबाद और मध्य बिहार के लिए।
Becoming a Naxalite in Rural Bihar
George J. Kunnath का अध्ययन “Becoming a Naxalite in Rural Bihar: वर्ग-संघर्ष and its Contradictions” Journal of किसान Studies में प्रकाशित हुआ।
कोई गरीब ग्रामीण ‘नक्सली’ क्यों बनता है?
उस निर्णय में वर्ग, जाति, हिंसा, सम्मान और स्थानीय संबंधों की क्या भूमिका होती है?
नृवंशशास्त्र का लाभ
“दलित खेतिहर मजदूर क्रांतिकारी वर्ग है।”
वह व्यक्ति वास्तव में पार्टी के साथ क्यों गया?
यही सूक्ष्मता नक्सलवादी आंदोलन को वैचारिक इतिहास से सामाजिक इतिहास में बदलती है।
People Power: The Naxalite आंदोलन in Central Bihar
प्रकाश लुई की People Power: The Naxalite आंदोलन in Central Bihar बिहार के नक्सलवादी आंदोलन की सामाजिक–राजनीतिक संरचना समझने के लिए उपयोगी ग्रंथ है। इसका उल्लेख क्षेत्र के प्रमुख अकादमिक साहित्य में मिलता है।
इसे बेला भाटिया और जॉर्ज कुनाथ के साथ पढ़ने पर मध्य बिहार की तीन परतें स्पष्ट होती हैं—
रणवीर सेना और नक्सलवादी आंदोलन
मध्य बिहार के अध्ययन में केवल नक्सलवादी संगठनों का साहित्य पर्याप्त नहीं।
इसलिए लक्ष्मणपुर बाथे, बथानी टोला, सेनारी और दूसरे नरसंहारों पर मानवाधिकार रिपोर्टें, न्यायिक निर्णय और क्षेत्रीय शोध भी द्वितीयक स्रोत-संग्रह का हिस्सा होने चाहिए।
यहां ‘नक्सली हिंसा’ और ‘नक्सल विरोधी सामाजिक हिंसा’ दोनों का अध्ययन आवश्यक है।
श्रीकाकुलम साहित्य का महत्व
श्रीकाकुलम ने नक्सलबाड़ी मॉडल को एक महत्वपूर्ण आदिवासी क्षेत्र में स्थानांतरित किया।
इसलिए अध्ययन में तीन प्रश्न प्रमुख हैं—
और चारु मजूमदार की लाइन का स्थानीय नेतृत्व पर प्रभाव।
श्रीकाकुलम पर पार्टी साहित्य के साथ स्वतंत्र तेलुगु और अंग्रेजी अकादमिक सामग्री पढ़ना आवश्यक है।
के. बालगोपाल
K. Balagopal के आंध्र प्रदेश माओवादी आंदोलन पर लेख अत्यंत उपयोगी हैं क्योंकि वे न तो सरल राज्य-सुरक्षा व्याख्या स्वीकार करते हैं और न आंदोलन की हिंसा को आलोचना से बाहर रखते हैं।
उनका “Maoist आंदोलन in Andhra Pradesh” Economic and Political Weekly में 2006 में प्रकाशित हुआ था। समकालीन अकादमिक साहित्य इसे आंध्र माओवादी आंदोलन के प्रमुख अध्ययनों में रखता है।
बंगाल से बस्तर तक इतिहास का केंद्र कैसे बदला?
1967 में नक्सलवादी इतिहास का प्रतीक था—
इक्कीसवीं सदी में उसका प्रतीक धीरे-धीरे बन गया—
यह नक्सलवादी आंदोलन की सामाजिक संरचना में गहरा परिवर्तन था।
इसीलिए आधुनिक इतिहासलेखन में नंदिनी सुंदर और अल्पा शाह जैसे मानवविज्ञानी केंद्रीय हो जाते हैं।
Subalterns and Sovereigns
नंदिनी सुंदर का बस्तर पर दीर्घकालीन ऐतिहासिक–नृवंशशास्त्रीय कार्य आधुनिक माओवादी संघर्ष समझने के लिए मूल पृष्ठभूमि प्रदान करता है।
इसकी विशेषता है कि माओवाद को 2004 से शुरू नहीं किया जाता।
तभी माओवादी उपस्थिति का अर्थ स्पष्ट होता है।
The Burning Forest: India’s War in Bastar
नंदिनी सुंदर की The Burning Forest बस्तर में माओवादी–राज्य संघर्ष, सलवा जुडूम, सैन्यीकरण और आदिवासी समाज पर उसके प्रभाव का विस्तृत अध्ययन है।
प्रकाशकीय विवरण इसे बस्तर में माओवाद, राज्य, सलवा जुडूम और आदिवासी समुदायों के बीच संघर्ष की गहन नृवंशशास्त्रीय पड़ताल के रूप में प्रस्तुत करता है; सुंदर का बस्तर से शोध संबंध कई दशकों का रहा है।
ताकत
राज्य हिंसा और सलवा जुडूम की गहरी जांच।
सीमा
सुरक्षा प्रतिष्ठान की दृष्टि से पुस्तक की व्याख्याओं पर असहमति हो सकती है। अतः इसे सरकारी रिपोर्टों, पुलिस रिकॉर्ड और सुरक्षा अध्ययन के साथ पढ़ना चाहिए।
Nightmarch: Among India’s Revolutionary Guerrillas
अल्पा शाह का Nightmarch आधुनिक भारतीय माओवादी आंदोलन पर सबसे उल्लेखनीय नृवंशशास्त्रीय अध्ययनों में है।
शाह ने वर्षों आदिवासी क्षेत्रों में शोध किया और एक माओवादी गुरिल्ला दल के साथ सात रातों में लगभग 150 मील की यात्रा की। पुस्तक इसी अनुभव को व्यापक सामाजिक अध्ययन से जोड़ती है।
अल्पा शाह का मुख्य प्रश्न
भारत के कुछ सबसे वंचित नागरिक लोकतांत्रिक व्यवस्था के बजाय सशस्त्र माओवादी संगठन की ओर क्यों जाते हैं?
लेकिन वे दूसरा कठिन प्रश्न भी पूछती हैं—
क्या माओवादी आंदोलन जिन लोगों को मुक्त करना चाहता है, अपने व्यवहार में उन्हीं उद्देश्यों को कमजोर भी करता है?
यही द्वंद्व पुस्तक को प्रचार साहित्य से अलग करता है।
आदिवासी को केवल ‘माओवादी समर्थक’ कहना क्यों गलत?
नंदिनी सुंदर और अल्पा शाह के अध्ययन बताते हैं कि आदिवासी समाज एकरूप राजनीतिक समुदाय नहीं है।
या केवल जीवित रहने की कोशिश करने वाले—
इसलिए ‘माओवादी क्षेत्र’ कहना और ‘माओवादी समाज’ कहना अलग चीजें हैं।
प्रारंभिक इतिहासों की बड़ी अनुपस्थिति
नक्सलबाड़ी के आरंभिक इतिहास में महिलाओं का उल्लेख मिलता है—
विशेषकर 25 मई 1967 की मृत महिलाओं का।
लेकिन महिलाओं को राजनीतिक विषय के रूप में कम अध्ययन मिला।
प्रश्न लंबे समय तक यह नहीं पूछा गया—
क्रांतिकारी संगठन के भीतर पितृसत्ता कैसी थी?
यौनिकता, विवाह और मातृत्व का क्या हुआ?
राज्य हिंसा का महिला अनुभव क्या था?
श्रीला रॉय — Remembering Revolution
Srila Roy की Remembering Revolution: Gender, Violence and Subjectivity in India's Naxalbari आंदोलन ने इस कमी को भरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यह अध्ययन मौखिक इतिहास, स्मृति, अभिलेखीय स्रोत, साहित्य और आत्मकथात्मक सामग्री को जोड़ता है। उपलब्ध अकादमिक समीक्षा के अनुसार रॉय का शोध 2003–04 के क्षेत्रकार्य पर आधारित था और उन्होंने पूर्व नक्सलवादी महिलाओं तथा पुरुषों के जीवन-वृत्तांत दर्ज किए।
स्मृति स्वयं ऐतिहासिक स्रोत
‘लोग दशकों बाद उसे कैसे याद करते हैं?’
प्राथमिकता
महिला और सांस्कृतिक इतिहास के लिए ★★★★★
भोजपुर ने नक्सलबाड़ी को बदला
नक्सलबाड़ी में संथाल और राजबंशी गरीब किसान महत्वपूर्ण थे।
भोजपुर में आंदोलन का सामाजिक चरित्र और स्पष्ट रूप से दलित खेतिहर मजदूरों से जुड़ा।
इसलिए भोजपुर साहित्य में ‘वर्ग संघर्ष’ को पढ़ते हुए जाति को अलग नहीं किया जा सकता।
बेला भाटिया और कुनाथ इस संदर्भ में विशेष रूप से उपयोगी हैं। भाटिया का अध्ययन ग्रामीण सत्ता-संबंध में बदलाव पर जोर देता है।
‘सम्मान’ भी भौतिक उपलब्धि है
किसान आंदोलन की उपलब्धि केवल यह नहीं कि—
क्या दलित मजदूर जमींदार के सामने बैठ सकता था?
क्या महिला मजदूर प्रतिरोध कर सकती थी?
इसलिए सामाजिक इतिहास आर्थिक आंकड़ों से आगे जाता है।
नक्सलबाड़ी को भूमि-सुधार से अलग पढ़ना असंभव
नक्सलबाड़ी पर सीधे लिखी पुस्तकों के साथ भूमि-सुधार साहित्य भी पढ़ना चाहिए।
इससे यह जांचा जा सकता है कि विद्रोह की कृषि शिकायतें वस्तुतः कितनी गहरी थीं।
ऑपरेशन बर्गा पर साहित्य
पश्चिम बंगाल के भूमि सुधार और Operation Barga पर आर्थिक इतिहास, ग्रामीण विकास और राजनीतिक अर्थव्यवस्था के अध्ययन नक्सलबाड़ी के बाद की तुलना के लिए आवश्यक हैं।
क्या संसदीय वाम ने वही भूमि प्रश्न प्रशासनिक सुधार से संबोधित किया जिसे नक्सलबाड़ी ने क्रांति से उठाया था?
इस प्रश्न का उत्तर केवल नक्सलवादी साहित्य से नहीं मिल सकता।
ए. आर. देसाई
A. R. Desai द्वारा संपादित किसान संघर्ष संबंधी ग्रंथ भारतीय कृषि संघर्षों को व्यापक ऐतिहासिक संरचना में रखते हैं।
विशेष रूप से स्वतंत्रता के बाद के कृषि संघर्षों पर उनका संपादित साहित्य उपयोगी है।
इन ग्रंथों का उल्लेख बिहार नक्सलवाद के आधुनिक अकादमिक अध्ययन की संदर्भ-सूचियों में भी मिलता है।
डी. एन. धनागरे
D. N. Dhanagare की किसान आंदोलनों पर मानक पुस्तक मुख्यतः 1920–50 के काल पर है, इसलिए वह सीधे नक्सलबाड़ी का इतिहास नहीं।
की विश्लेषण पद्धति नक्सलबाड़ी को उसके ऐतिहासिक पूर्वजों से जोड़ने में उपयोगी है। इसका उल्लेख नक्सलवादी बिहार पर प्रमुख अकादमिक साहित्य में भी मिलता है।
‘विकास की कमी से नक्सलवाद’—क्या इतना सरल है?
आधुनिक नीति साहित्य में अक्सर कहा जाता है—
गरीबी + पिछड़ापन + शासन की अनुपस्थिति = माओवाद।
लेकिन अकादमिक साहित्य इसे चुनौती देता है।
कई अत्यंत गरीब क्षेत्रों में माओवाद नहीं फैला।
और कुछ संसाधन-संपन्न आदिवासी क्षेत्रों में फैला।
इसलिए विश्लेषण में जोड़ना पड़ता है—
और पहले से मौजूद क्रांतिकारी नेटवर्क।
EPW एक अनिवार्य अभिलेख क्यों?
नक्सलबाड़ी और माओवादी आंदोलन पर गंभीर शोध में Economic and Political Weekly लगभग स्वतंत्र स्रोत-संग्रह जैसा महत्व रखता है।
स्थानीय संघर्षों पर अकादमिक और क्षेत्रीय सामग्री प्रदान करते हैं। एक ही 2006 की अकादमिक चर्चा में बिहार, आंध्र और बस्तर पर भाटिया, बालगोपाल और सुंदर के अध्ययनों को साथ संदर्भित किया गया है।
किसान और ग्रामीण सत्ता के लिए
Journal of किसान Studies जैसे विशेषज्ञ जर्नल नक्सलवाद को केवल आंतरिक सुरक्षा प्रश्न के बजाय—
कुनाथ का बिहार अध्ययन इसका अच्छा उदाहरण है।
शोध-प्रबंधों को कमतर न समझें
नक्सलबाड़ी जैसे क्षेत्रीय आंदोलन में पीएचडी शोध कई बार प्रकाशित पुस्तकों से अधिक विस्तृत होते हैं।
बेला भाटिया का Cambridge शोध इसका श्रेष्ठ उदाहरण है।
शोध-प्रबंध खोजने के प्रमुख विषय
शोध करते समय केवल “Naxalbari” न खोजें।
इससे साहित्य का दायरा कई गुना बढ़ जाता है।
डिजिटल शोध-प्रबंध अभिलेख
भारतीय विश्वविद्यालयों के शोध-प्रबंधों के लिए INFLIBNET का Shodhganga महत्वपूर्ण डिजिटल स्रोत है।
लेकिन हर शोध-प्रबंध की गुणवत्ता समान नहीं होती।
इसलिए विश्वविद्यालय, पर्यवेक्षक, स्रोत-सूची और पद्धति जांचना आवश्यक है।
नक्सलवाद को केवल भारतीय साहित्य से क्यों न पढ़ें?
आधुनिक माओवादी आंदोलन पर अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विज्ञान ने भी प्रश्न उठाए हैं—
जातीय/आदिवासी राजनीति और सशस्त्र संगठन का क्या संबंध है?
लोकतंत्र के भीतर विद्रोह क्यों टिकता है?
एक आधुनिक World Politics अध्ययन, उदाहरणतः, माओवादी हिंसा और subaltern-led electoral parties के संबंध की जांच करता है और बेला भाटिया जैसे क्षेत्रीय अध्ययनों को अपने साहित्यिक आधार में रखता है।
पत्रकारिता का उपयोग कैसे करें?
आधुनिक माओवादी क्षेत्र में पत्रकारों ने कई महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष वृत्तांत लिखे हैं।
पूर्व नक्सलियों के संस्मरण
पूर्व कार्यकर्ताओं के संस्मरण बताते हैं—
निष्कर्ष : नक्सलबाड़ी को कैसे समझें?
प्रस्तावना : नक्सलबाड़ी केवल एक विद्रोह नहीं, भारतीय लोकतंत्र से पूछा गया एक कठिन प्रश्न था
नक्सलबाड़ी का इतिहास लिखने की सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि उसका भौतिक आकार और ऐतिहासिक प्रभाव एक-दूसरे के अनुपात में नहीं हैं।
1967 का मूल विद्रोह सीमित भूगोल में हुआ।
उसकी निर्णायक अवस्था कुछ ही सप्ताह चली।
किसानों द्वारा कब्जाई गई जमीन पर कोई स्थायी क्रांतिकारी शासन नहीं बन पाया।
चारु मजूमदार की कल्पना की अखिल भारतीय किसान क्रांति नहीं हुई।
नक्सलबाड़ी आखिर था क्या?
नक्सलबाड़ी की सबसे सटीक ऐतिहासिक परिभाषा क्या हो?
क्या वह आधुनिक आतंक और प्रतिआतंक की शुरुआत थी?
वह अलग-अलग चरणों में इन विभिन्न रूपों में बदलता गया।
1967 का मूल नक्सलबाड़ी सबसे पहले कृषि और भूमि संघर्ष था।
जैसे-जैसे संघर्ष आगे बढ़ा, उसे चारु मजूमदार और अन्य क्रांतिकारी नेताओं ने भारतीय राज्य-सत्ता परिवर्तन की माओवादी रणनीति से जोड़ा।
‘72 दिन’ — छोटा घटनाक्रम, असाधारण विरासत
नक्सलबाड़ी के मूल विद्रोह को प्रायः ‘72 दिनों’ से जोड़ा जाता है।
इस संख्या को प्रतीकात्मक ऐतिहासिक संक्षेप के रूप में समझना अधिक उचित है।
मार्च 1967 से भूमि कब्जे शुरू हो चुके थे।
23–25 मई की घटनाओं ने विद्रोह को निर्णायक मोड़ दिया।
जुलाई में पुलिस अभियान और नेतृत्व की गिरफ्तारियों ने मूल किसान विद्रोह को समाप्त कर दिया।
भूमि नक्सलबाड़ी का पहला और सबसे वास्तविक प्रश्न था
यदि नक्सलबाड़ी से सारे राजनीतिक विशेषण हटा दिए जाएं तो जो सबसे पहले बचता है वह है—
बर्गादार को निकाला जा सकता है या नहीं?
कानून ने किसान को जो अधिकार दिया है, वह गांव में लागू क्यों नहीं?
नक्सलबाड़ी की मूल नैतिक शक्ति इसी विरोधाभास से आई।
किसान जो खेत पर श्रम करता था, वह अधिकार की दृष्टि से कमजोर था।
लेकिन भूमि प्रश्न नया नहीं था
नक्सलबाड़ी की मौलिकता भूमि प्रश्न खोजने में नहीं थी।
तेभागा पहले ही बर्गादार अधिकार उठा चुका था।
तेलंगाना भूमि और सामंती दमन को सशस्त्र संघर्ष से जोड़ चुका था।
पश्चिम बंगाल में भूमि सुधार के कानून भी नक्सलबाड़ी से पहले बन चुके थे।
इसलिए नक्सलबाड़ी को भारतीय भूमि-सुधार का जन्मदाता कहना गलत होगा।
किसान की मांग और क्रांतिकारी पार्टी का लक्ष्य समान नहीं थे
नक्सलबाड़ी की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक जटिलता यही है।
इन संघर्षों के माध्यम से भारतीय राज्य-सत्ता का अंत और नई जनवादी क्रांति।
दोनों लक्ष्य कुछ समय तक एक-दूसरे को शक्ति देते रहे।
यदि किसान को भूमि-अधिकार मिल जाए तो वह क्रांतिकारी युद्ध जारी रखे—यह आवश्यक नहीं।
यदि पार्टी राज्य-सत्ता बदलना चाहती है तो वह स्थानीय भूमि सुधार से संतुष्ट नहीं हो सकती।
नक्सलबाड़ी की पहली महान उपलब्धि — गरीब किसान का राजनीतिक आत्मविश्वास
नक्सलबाड़ी ने गरीब किसान को केवल ‘गरीबी उन्मूलन’ की सरकारी श्रेणी नहीं रहने दिया।
उसने उसे राजनीतिक actor—स्वतंत्र राजनीतिक कर्ता—बनाया।
जोतदार के आदेश का पालन करने वाला व्यक्ति भर नहीं,
बल्कि भूमि संबंध बदलने का दावा करने वाला समूह था।
गरीब किसान के भीतर भय का टूटना स्वयं बड़ी ऐतिहासिक घटना थी।
ग्रामीण सत्ता केवल जमीन से नहीं चलती।
दूसरी बड़ी उपलब्धि — भूमि को राष्ट्रीय राजनीतिक प्रश्न बनाना
यह प्रश्न संसदीय वाम के लिए विशेष रूप से कठिन था।
CPI(M) स्वयं भूमि सुधार की पक्षधर थी।
यदि किसान उसके शासन में भी सशस्त्र संघर्ष कर रहे थे, तो पार्टी को सिद्ध करना था कि लोकतांत्रिक रास्ते से वास्तविक अधिकार दिए जा सकते हैं।
आगे पश्चिम बंगाल के ऑपरेशन बर्गा ने इसी व्यापक प्रश्न का संस्थागत उत्तर प्रस्तुत किया।
तीसरी उपलब्धि — कम्युनिस्ट आंदोलन को विभाजक प्रश्न के सामने खड़ा करना
नक्सलबाड़ी ने भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के सामने लगभग अस्तित्वगत प्रश्न रखा—
क्या क्रांति संसद के माध्यम से संभव है?
संसद को छोड़कर सशस्त्र संघर्ष ही मार्ग है?
CPI(M) स्वयं कुछ वर्ष पहले CPI से अलग हुई थी।
अब उसके भीतर से एक और धारा निकल रही थी।
इस प्रक्रिया से AICCCR और फिर CPI(ML) बनी।
यानी नक्सलबाड़ी केवल किसान आंदोलन नहीं—
चौथी उपलब्धि — वंचित ग्रामीण समूहों को इतिहास में दृश्य करना
भारतीय राजनीतिक इतिहास में अक्सर ‘जनता’ शब्द के भीतर गायब हो जाते हैं।
नक्सलबाड़ी और उसकी उत्तराधिकारी किसान धाराओं ने इन समूहों को अधिक दृश्य बनाया।
क्योंकि राजनीतिक संगठन की भाषा कई बार उनकी विशिष्ट पहचानों को फिर ‘वर्ग’ में समेट देती थी।
फिर भी उनके राजनीतिक आत्मविश्वास और दृश्यता में परिवर्तन महत्वपूर्ण था।
25 मई 1967 — नक्सलबाड़ी का नैतिक प्रतीक
प्रसादुजोत की पुलिस गोलीबारी ने आंदोलन की स्मृति बदल दी।
महिलाओं और बच्चों सहित ग्रामीणों की मौत ने नक्सलबाड़ी को केवल भूमि विवाद नहीं रहने दिया।
यह राज्य-दमन की राजनीतिक स्मृति बन गया।
क्रांतिकारी आंदोलनों में शहादत संगठनात्मक शक्ति बनती है।
लेकिन इतिहास को एक सावधानी भी रखनी होगी—
शहादत वास्तविक अन्याय की स्मृति हो सकती है,
सोनम वांगडी की मृत्यु भी उसी इतिहास का हिस्सा है
नक्सलबाड़ी का संतुलित इतिहास केवल ग्रामीण मृतकों को याद करके पूरा नहीं होगा।
पुलिस इंस्पेक्टर सोनम वांगडी की मृत्यु भी उस हिंसक टकराव का हिस्सा थी।
यदि इतिहास केवल एक पक्ष के मृतकों को मानव और दूसरे को ‘राज्य का प्रतिनिधि’ मान ले तो वह नैतिक रूप से अधूरा है।
वांगडी की मौत और 25 मई की पुलिस गोलीबारी दोनों बताती हैं—
नक्सलबाड़ी की पहली गंभीर विफलता — स्थायी भूमि परिवर्तन नहीं
किसान आंदोलन की सबसे कठोर कसौटी सरल है—
नक्सलबाड़ी में क्रांतिकारी कब्जे हुए।
लेकिन वे स्थायी कानूनी अधिकार नहीं बने।
पुलिस के लौटते ही समानांतर किसान सत्ता टूट गई।
इसलिए प्रत्यक्ष भूमि परिणाम के स्तर पर नक्सलबाड़ी सीमित रहा।
यह तथ्य उसके ऐतिहासिक प्रभाव को कम नहीं करता।
लेकिन ‘भूमि क्रांति की सफलता’ का दावा अवश्य कमजोर करता है।
ऑपरेशन बर्गा से इतिहास ने अलग परिणाम दिखाया
लगभग एक दशक बाद पश्चिम बंगाल ने अलग रास्ता अपनाया।
बर्गादारों को खोजकर रिकॉर्ड में दर्ज करना,
इसे प्रशासनिक और राजनीतिक अभियान बनाया गया।
यहीं एक असुविधाजनक ऐतिहासिक तुलना सामने आती है।
1967 के हथियारबंद कब्जे ने सीमित, अस्थायी अधिकार दिए।
1978 से वैधानिक भूमि सुधार ने लाखों बर्गादारों के अधिकार अधिक स्थायी किए।
इसका अर्थ यह नहीं कि क्रांतिकारी संघर्ष का दबाव अप्रासंगिक था।
नक्सलबाड़ी की वैचारिक छलांग — माओ का चीन और भारत
चारु मजूमदार की धारा का विश्वास था कि भारत में चीन जैसी कृषि क्रांति संभव है।
लेकिन यही सिद्धांत उसकी सबसे बड़ी दीर्घकालीन चुनौती बना।
इन संस्थाओं की सीमाएं थीं, लेकिन वे नकली नहीं थीं।
भारतीय लोकतंत्र को कम आंकना रणनीतिक भूल साबित हुई
नक्सलवादी विचारधारा की संभवतः सबसे बड़ी गलत गणना यही थी।
भारतीय लोकतंत्र स्थिर सत्ता-आवरण नहीं रहा।
CPI(M) जैसी वाम पार्टियां सत्ता में आईं।
दलित और पिछड़ी जातियों के दल राज्य सत्ता तक पहुंचे।
क्षेत्रीय दलों ने राष्ट्रीय सत्ता संतुलन बदला।
पंचायत व्यवस्था और आरक्षण ने नए सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व दिया।
न्यायपालिका ने सरकारों के विरुद्ध फैसले दिए।
क्रांति की तात्कालिकता का अतिमूल्यांकन
1967–70 के माहौल में विश्व राजनीति बहुत उग्र थी।
सब मिलकर विश्व क्रांति निकट होने की अनुभूति पैदा करते थे।
भारतीय नक्सली नेतृत्व ने इसी वातावरण को भारतीय क्रांति की तत्काल संभावना के रूप में पढ़ा।
लेकिन देशव्यापी किसान युद्ध नहीं हुआ।
औद्योगिक मजदूर व्यापक रूप से नक्सलवादी आंदोलन से नहीं जुड़े।
और 1972 तक पहली CPI(ML) लहर लगभग पराजित हो गई।
‘वर्ग-शत्रु सफाया’ — सबसे विवादास्पद विरासत
नक्सलबाड़ी की मूल भूमि राजनीति को सबसे अधिक नुकसान जिस अवधारणा ने पहुंचाया, वह थी—
स्थानीय उत्पीड़क के विरुद्ध किसान प्रतिरोध और किसी व्यक्ति को पार्टी द्वारा ‘वर्ग-शत्रु’ घोषित करके हत्या करना समान नहीं।
पहले में सामूहिक सामाजिक संघर्ष हो सकता है।
दूसरे में राजनीतिक संगठन जीवन–मृत्यु का निर्णायक बन सकता है।
जनसंगठन को स्क्वाड से बदलने की समस्या
हजार किसान स्वयं निर्णय प्रक्रिया में भाग लें।
यदि छोटे भूमिगत दस्ते गरीब किसान की ओर से सब कुछ करने लगें तो जनता क्रांति की सहभागी नहीं, दर्शक बन सकती है।
नक्सलबाड़ी की बाद की प्रथम CPI(ML) लहर में यही जोखिम बढ़ा।
आगे कई नक्सली संगठनों ने ‘जन-रेखा’ की ओर लौटने की आवश्यकता इसी अनुभव से महसूस की।
कलकत्ता का शहरी नक्सलवाद — मूल किसान आंदोलन से दूरी
1970 के आसपास लोकप्रिय छवि बदलने लगी—
शहरी नक्सलवाद ने आंदोलन को सांस्कृतिक और राजनीतिक दृश्यता तो दी, लेकिन मूल किसान आधार से दूरी भी बढ़ाई।
यह नक्सलबाड़ी का पहला बड़ा सामाजिक रूपांतरण था।
इसीलिए 1967 के किसान विद्रोह और 1970 के शहरी नक्सलवाद को समान घटना मानना अनुचित है।
राज्य-दमन और CPI(ML) का पतन
1970–72 में राज्य की प्रतिक्रिया अत्यंत कठोर हुई।
1971 के बड़े प्रतिआंदोलन अभियानों और 1972 में चारु मजूमदार की गिरफ्तारी–मृत्यु के बाद पहली CPI(ML) संरचना टूट गई।
लेकिन केवल राज्य-दमन से इस पराजय की व्याख्या पर्याप्त नहीं।
राज्य-दमन को अनिवार्यतः वैध मानना भी गलत
सशस्त्र विद्रोह से राज्य का लड़ना वैध राज्य-कार्य है।
लेकिन लोकतांत्रिक राज्य को साधनों की सीमा भी बांधती है।
यदि हों, तो वे राज्य की संवैधानिक वैधता को कमजोर करते हैं।
नक्सलबाड़ी से लेकर आधुनिक माओवादी संघर्ष तक यह एक स्थायी सिद्धांत है—
राज्य का लक्ष्य वैध होने से प्रत्येक साधन वैध नहीं हो जाता।
चारु मजूमदार की मृत्यु — आंदोलन का अंत नहीं, एक युग का अंत
28 जुलाई 1972 को चारु मजूमदार की हिरासत में मृत्यु पहली CPI(ML) लहर का प्रतीकात्मक अंत बन गई।
लेकिन यदि इतिहास यहीं रोक दिया जाए तो बड़ी भूल होगी।
नक्सलबाड़ी की राजनीतिक ऊर्जा अलग-अलग दिशाओं में फैल गई।
कुछ धारा ने पुरानी लाइन का बचाव किया।
कुछ ने सशस्त्र गुरिल्ला युद्ध को अधिक दीर्घकालीन स्वरूप दिया।
भोजपुर — नक्सलबाड़ी ने जाति से सामना किया
भोजपुर की राजनीति ने नक्सलबाड़ी की मूल वर्गीय भाषा को बदल दिया।
यहां गरीब खेतिहर मजदूर बड़ी संख्या में दलित समुदायों से आते थे।
यहीं भारतीय नक्सलवादी राजनीति को यह सीख मिली कि जाति को वर्ग में घोल देना पर्याप्त नहीं।
भोजपुर की सबसे बड़ी देन — ‘इज्जत’ को राजनीतिक श्रेणी बनाना
लेकिन दलित खेतिहर मजदूर के लिए एक तीसरा प्रश्न भी था—
क्या वह भू-स्वामी के सामने बराबर खड़ा हो सकता है?
क्या जातिगत गाली का प्रतिरोध कर सकता है?
क्या उसकी महिला परिवारजन यौन दमन का विरोध कर सकती हैं?
इस अर्थ में भोजपुर ने नक्सलबाड़ी की भूमि राजनीति को सामाजिक नागरिकता की राजनीति में विस्तृत किया।
लेकिन बिहार ने हिंसा का नया चक्र भी देखा
भूमि और जाति संघर्ष के जवाब में भू-स्वामी सेनाएं उभरीं।
ने ग्रामीण संघर्ष को अत्यंत रक्तरंजित बनाया।
इस हिंसा में गरीब नागरिक अक्सर सबसे अधिक असुरक्षित रहा।
यही सशस्त्र वर्ग-संघर्ष की बड़ी नैतिक विडंबना है—
जिस ग्रामीण समाज की मुक्ति लक्ष्य है, वही युद्धभूमि बन जाता है।
श्रीकाकुलम — आदिवासी भूगोल में नक्सलबाड़ी
श्रीकाकुलम ने नक्सलबाड़ी की रणनीति को आदिवासी क्षेत्र में नए रूप में प्रस्तुत किया।
आगे दंडकारण्य में यही आयाम और बड़ा हुआ।
इसलिए आधुनिक माओवाद को केवल ‘भूमि-सुधार विफलता’ से नहीं समझा जा सकता।
उसका सामाजिक आधार धीरे-धीरे जल–जंगल–जमीन और राज्य की अनुपस्थिति/प्रकृति से जुड़ता गया।
PWG — नक्सलबाड़ी की रणनीति का संशोधित रूप
1980 में People's War के गठन के साथ नक्सलवादी सशस्त्र परंपरा अधिक संगठित दीर्घकालीन दिशा में बढ़ी।
यह चारु मजूमदार की तत्काल क्रांति की तुलना में अधिक धैर्यपूर्ण रणनीति थी।
इससे वह उत्तर तेलंगाना और फिर दंडकारण्य में लंबे समय तक टिक सकी।
MCC — एक समानांतर लेकिन स्वतंत्र धारा
Maoist Communist Centre की ऐतिहासिक जड़ CPI(ML) से अलग विकसित हुई।
इसका बिहार–झारखंड में विस्तार महत्वपूर्ण था।
MCC और People's War दोनों ने माओवादी सशस्त्र क्रांति का लक्ष्य रखा, लेकिन उनकी अपनी संगठनात्मक परंपराएं थीं।
इसलिए आधुनिक CPI (Maoist) को 1969 CPI(ML) का सीधा नाम-परिवर्तन मानना गलत है।
उसके पीछे लगभग तीन दशकों की अलग-अलग संगठनात्मक यात्राएं थीं।
2004 — आधुनिक माओवादी चरण की वास्तविक शुरुआत
21 सितंबर 2004 में People's War और MCCI के विलय से CPI (Maoist) बनी।
यहीं नक्सलबाड़ी की लंबी सशस्त्र वंशावली ने अपनी सबसे मजबूत आधुनिक संगठनात्मक संरचना प्राप्त की।
2004 के बाद भारतीय राज्य के लिए ‘नक्सलवाद’ अब 1967 जैसा किसान विद्रोह नहीं था।
यह एक संगठित माओवादी विद्रोह/insurgency था।
CPI (Maoist) की ताकत वास्तविक सामाजिक शिकायतों से भी आई
आधुनिक माओवादी विस्तार को केवल हथियार और संगठन से समझना गलत होगा।
कुछ क्षेत्रों में उसकी सामाजिक जमीन बनी—
माओवादी संगठन ने इन शिकायतों को राजनीतिक–सैन्य ढांचे में जोड़ा।
इसलिए केवल ‘विचारधारा’ नहीं, शासन की गुणवत्ता भी उसके विस्तार का प्रश्न है।
आदिवासी समर्थन को एकसमान नहीं मानना चाहिए
दंडकारण्य का आदिवासी समाज माओवादी ‘जनता’ की एकरूप इकाई कभी नहीं था।
चौथा स्थानीय अन्याय के कारण माओवादी संगठन का समर्थन करता था।
पांचवां उसी संगठन की हिंसा से परेशान था।
इसलिए ‘आदिवासी माओवादियों के साथ थे’ या ‘आदिवासी सरकार के साथ थे’—
दोनों सामान्यीकृत कथन ऐतिहासिक रूप से असंतोषजनक हैं।
महिलाएं — आंदोलन की शक्ति और उसकी सीमा दोनों
नक्सलबाड़ी से आधुनिक माओवादी आंदोलन तक महिलाएं महत्वपूर्ण रही हैं।
लेकिन महिला भागीदारी और महिला मुक्ति एक ही बात नहीं।
यदि संगठन में महिला हथियार उठाती है लेकिन शीर्ष नेतृत्व पुरुष-प्रधान रहता है;
तो क्रांतिकारी भागीदारी पूर्ण लैंगिक मुक्ति नहीं।
यह नक्सलबाड़ी की दीर्घकालीन सामाजिक सीमा है।
‘वर्ग’ अकेले भारत को नहीं समझा सका
नक्सलबाड़ी की मूल वैचारिकी वर्ग को केंद्रीय विश्लेषण मानती थी।
छह दशकों का अनुभव बताता है कि भारतीय ग्रामीण सत्ता के लिए कम-से-कम चार धुरियां साथ देखनी होंगी—
इनके बिना ‘गरीब किसान’ एक अत्यधिक सामान्यीकृत श्रेणी बन जाती है।
सलवा जुडूम — राज्य के प्रतिआक्रमण की बड़ी गलती
आधुनिक माओवादी संघर्ष में सलवा जुडूम सबसे विवादास्पद अध्यायों में रहा।
माओवादी प्रभाव के विरुद्ध स्थानीय युवाओं को हथियारबंद करने और गांवों के व्यापक विस्थापन ने गंभीर मानवाधिकार प्रश्न पैदा किए।
2011 में सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप इस बात का संवैधानिक स्मरण था कि राज्य विद्रोह से लड़ते हुए अपनी संवैधानिक सीमाएं छोड़ नहीं सकता।
सुरक्षा बनाम विकास — बहस वास्तव में ‘या’ की नहीं थी
नक्सलवाद सुरक्षा समस्या है या विकास समस्या?
जहां सशस्त्र संगठन पुलिस पर हमला करता है, वहां सुरक्षा आवश्यक है।
जहां सड़क नहीं, प्रशासन नहीं, भूमि रिकॉर्ड नहीं, स्वास्थ्य नहीं, स्कूल नहीं—
जहां आदिवासी समुदाय के अधिकार लागू नहीं—
2010 — आधुनिक माओवादी शक्ति का उच्च बिंदु
आधिकारिक आंकड़ों में 2010 आधुनिक LWE हिंसा का चरम वर्ष दिखाई देता है।
यह उस समय के भूगोल और संगठनात्मक क्षमता का संकेत था।
लेकिन उसी बिंदु के बाद लंबी गिरावट शुरू हुई।
इसका कारण केवल एक सफल सैन्य अभियान नहीं था।
और संगठन का सामाजिक–राजनीतिक क्षरण।
2025 — संगठनात्मक क्षरण की गति
2025 तक सरकारी आंकड़े माओवादी ढांचे के तेज क्षरण का संकेत देते हैं।
इसी वर्ष CPI (Maoist) महासचिव सहित वरिष्ठ नेतृत्व को भी भारी नुकसान हुआ।
इन आंकड़ों को सरकारी स्रोत के रूप में पढ़ना चाहिए, लेकिन व्यापक प्रवृत्ति स्पष्ट है—
संगठन की सैन्य और भौगोलिक क्षमता गंभीर रूप से सिमट चुकी थी।
31 मार्च 2026 — एक सरकारी मील का पत्थर
भारत सरकार ने 31 मार्च 2026 को ‘नक्सल-मुक्त भारत’ की उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया है। जून और अगस्त 2026 की PIB सामग्री ने इसे ऐतिहासिक मील का पत्थर बताते हुए कहा कि मार्च–अप्रैल 2026 तक कोई जिला LWE-affected श्रेणी में नहीं रहा।
यह निस्संदेह सुरक्षा इतिहास में बड़ा परिवर्तन है।
लेकिन शोध में शब्द सटीक होने चाहिए—
जुलाई–अगस्त 2026 की तस्वीर — विजय के साथ सतर्कता
29 जुलाई 2026 के गृह मंत्रालय के संसदीय उत्तर में कोई जिला सक्रिय LWE affected नहीं था, लेकिन 37 जिलों को Legacy & Thrust श्रेणी में और एक को District of Concern में रखा गया। सरकार ने साफ कहा कि इन क्षेत्रों में सुरक्षा निगरानी और विकास हस्तक्षेप जारी रखना होगा ताकि पुनरुत्थान न हो।
सरकार की सफलता को केवल बंदूक से समझना भी अधूरा होगा
आधिकारिक रणनीति स्वयं मानती है कि माओवादी प्रभाव के संकुचन में केवल सुरक्षा बल नहीं बल्कि—
का विस्तार महत्वपूर्ण रहा। जुलाई 2026 तक केंद्र ने पूर्व LWE क्षेत्रों के लिए Special Central Assistance के तहत 2017 से लगभग ₹4,282.96 करोड़ जारी किए थे।
इससे एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक निष्कर्ष निकलता है—
फिर भी ‘विकास’ शब्द की आलोचनात्मक जांच आवश्यक
इसलिए विकास का अर्थ केवल infrastructure count नहीं होना चाहिए।
प्राकृतिक संसाधन पर निर्णय में भागीदारी?
यानी माओवादी प्रभाव कम होना विकास न्याय पूर्ण होने का प्रमाण नहीं।
नक्सलबाड़ी का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक पाठ
नक्सलबाड़ी ने लोकतंत्र को एक असुविधाजनक प्रश्न दिया—
मतदान का अधिकार होने मात्र से क्या ग्रामीण नागरिक वास्तव में शक्तिशाली हो जाता है?
तो मतपत्र की औपचारिक समानता के नीचे सामाजिक असमानता बनी रह सकती है।
लेकिन छह दशक का दूसरा पाठ यह भी है—
नक्सलबाड़ी की संक्षिप्त समयरेखा
नक्सलबाड़ी ने भूमि-असमानता, बेदखली, आदिवासी सम्मान और ग्रामीण सत्ता-संबंधों के वास्तविक प्रश्नों को राष्ट्रीय केंद्र में रखा। किंतु वर्ग-शत्रु उन्मूलन, राजनीतिक हिंसा और लोकतांत्रिक संस्थाओं के अस्वीकार ने भारी मानवीय क्षति, संगठनात्मक विखंडन और राज्य-दमन को जन्म दिया। उसकी विरासत का न्यायपूर्ण मूल्यांकन तभी संभव है जब किसान–आदिवासी अधिकारों की वैध मांगों, सशस्त्र रणनीति की विफलताओं और राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारियों को एक-दूसरे में मिलाए बिना पढ़ा जाए।
प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक स्रोत
स्रोत-सावधानी: आंदोलन, उग्रवाद और सुरक्षा अभियानों के आंकड़े स्रोत, अवधि और परिभाषा के अनुसार बदलते हैं। सरकारी अभिलेख, आंदोलनकारी दस्तावेज और स्वतंत्र शोध—तीनों की दृष्टि अलग है; इसलिए विवादित दावों को अंतिम तथ्य की तरह प्रस्तुत नहीं किया गया है।