शेतकारी संगठन और शरद जोशी
चाकण प्याज आंदोलन से लाभकारी मूल्य, ‘भारत बनाम इंडिया’, मुक्त बाजार, महिला संपत्ति अधिकार और आधुनिक कृषि नीति तक—1979–2026
शेतकारी संगठन ने भारतीय किसान राजनीति की भाषा बदल दी। उसने किसान को केवल सहायता पाने वाला गरीब नहीं, बाजार में वस्तु बेचने वाला उत्पादक माना और तर्क दिया कि नियंत्रित कृषि मूल्य, निर्यात प्रतिबंध तथा शहरी उपभोक्ता-केंद्रित नीति गांव से शहर की ओर संसाधन हस्तांतरित करती है। चाकण के प्याज से गन्ना और कपास तक आंदोलन फैला; ‘भारत बनाम इंडिया’ उसका वैचारिक सूत्र बना; महिला आघाड़ी और लक्ष्मी मुक्ति ने संपत्ति में महिलाओं का अधिकार उठाया। किंतु मुक्त बाजार, छोटे किसान–खेत मजदूर संबंध, जाति, चुनावी राजनीति और वैश्वीकरण पर उसकी स्थिति विवाद और सीमाएं भी लेकर आई। यह अध्ययन उपलब्धि और आलोचना दोनों को साथ रखता है।
महाराष्ट्र की कृषि अर्थव्यवस्था और किसान राजनीति की पृष्ठभूमि
स्वतंत्र भारत के किसान आंदोलनों के इतिहास में शेतकारी संगठन का उदय एक महत्वपूर्ण वैचारिक मोड़ था। औपनिवेशिक काल के किसान आंदोलनों का केंद्रीय प्रश्न प्रायः जमींदारी, लगान, बेदखली, बटाई, साहूकारी और भूमि-अधिकार था। स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधार, सिंचाई, सहकारिता और हरित क्रांति ने कृषि की परिस्थितियां बदलीं, लेकिन 1970 के दशक के अंत तक किसान राजनीति के सामने एक नया प्रश्न तेजी से उभरने लगा—यदि किसान अपनी जमीन का मालिक है, उत्पादन भी बढ़ा रहा है, तो वह आर्थिक रूप से लगातार कमजोर क्यों होता जा रहा है?
महाराष्ट्र में शरद जोशी के नेतृत्व में उभरे शेतकारी संगठन ने इसका उत्तर भूमि के स्वामित्व में नहीं, बल्कि कृषि और शेष अर्थव्यवस्था के बीच विनिमय की असमान शर्तों में खोजा। यही दृष्टि आगे चलकर संगठन के ‘लाभकारी मूल्य’ और शरद जोशी के प्रसिद्ध ‘भारत बनाम इंडिया’ सिद्धांत का आधार बनी।
महाराष्ट्र की विशिष्ट कृषि संरचना
महाराष्ट्र की कृषि को एक इकाई मानकर समझना कठिन है। राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में फसल, वर्षा, सिंचाई, बाजार और ग्रामीण सत्ता की संरचना बहुत अलग रही है।
पश्चिमी महाराष्ट्र में पुणे, अहमदनगर, सातारा, सांगली, कोल्हापुर और सोलापुर के कुछ हिस्सों में गन्ना, सिंचाई और सहकारी चीनी मिलों के आधार पर अपेक्षाकृत व्यावसायिक कृषि विकसित हुई। दूसरी ओर विदर्भ कपास उत्पादक क्षेत्र के रूप में उभरा। खानदेश में कपास, केला और अन्य नकदी फसलों का महत्व था। नासिक क्षेत्र में अंगूर, प्याज और गन्ना तथा पुणे जिले के चाकण और आसपास प्याज तथा अन्य बाजारोन्मुख फसलों का विस्तार हुआ।
मराठवाड़ा और राज्य के विशाल वर्षा-आश्रित हिस्सों में स्थिति अलग थी। वहां सिंचाई सीमित थी और किसान मानसून की अनिश्चितता के प्रति अधिक संवेदनशील थे।
इस प्रकार 1970 के दशक तक महाराष्ट्र में ऐसा कृषक वर्ग पर्याप्त संख्या में मौजूद था जो केवल परिवार के उपभोग के लिए खेती नहीं कर रहा था। वह बाजार के लिए उत्पादन करता था, उर्वरक, बीज, डीजल, बिजली और कृषि उपकरण खरीदता था तथा अपनी उपज बेचने के लिए मंडी, व्यापारी, सहकारी संस्था अथवा सरकारी खरीद व्यवस्था पर निर्भर था।
यहीं से किसान की समस्या का चरित्र बदल रहा था।
सहकारी आंदोलन और ग्रामीण सत्ता
महाराष्ट्र की स्वतंत्रता-उत्तर राजनीति में सहकारिता का असाधारण महत्व रहा। विशेषकर पश्चिमी महाराष्ट्र में चीनी सहकारी संस्थाएं केवल आर्थिक प्रतिष्ठान नहीं रहीं; वे ग्रामीण राजनीतिक नेतृत्व तैयार करने वाली संस्थाएं भी बनीं।
चीनी मिल, जिला सहकारी बैंक, कृषि ऋण संस्था, बाजार समिति और स्थानीय निकाय एक-दूसरे से जुड़ते गए। इनके माध्यम से एक प्रभावशाली ग्रामीण राजनीतिक अभिजात वर्ग विकसित हुआ।
सहकारी मॉडल की महत्वपूर्ण उपलब्धियां थीं। उसने अनेक क्षेत्रों में सिंचाई, ऋण, प्रसंस्करण और ग्रामीण औद्योगीकरण को बढ़ावा दिया। लेकिन समय के साथ सहकारी संस्थाओं और राजनीतिक सत्ता के गठजोड़ की आलोचना भी होने लगी।
शेतकारी संगठन ने आगे चलकर इसी व्यवस्था को चुनौती दी। उसका प्रश्न था—यदि सहकारिता किसान की है तो कृषि उपज की कीमत निर्धारित करने की वास्तविक शक्ति किसान के पास क्यों नहीं है?
नकदी फसल और मूल्य का नया संकट
व्यावसायिक कृषि के विस्तार ने किसान को बाजार से अधिक गहराई से जोड़ा। इसका एक विरोधाभासी परिणाम निकला।
उत्पादन अच्छा होने पर किसान की समस्या समाप्त होने के बजाय कभी-कभी बढ़ जाती थी। किसी फसल की अधिक पैदावार बाजार में पहुंचते ही भाव गिर सकता था। किसान के पास पर्याप्त भंडारण क्षमता नहीं थी और उसे तत्काल नकदी की आवश्यकता होती थी। इसलिए वह कम कीमत पर भी माल बेचने के लिए विवश हो सकता था।
प्याज इसका सबसे प्रभावशाली उदाहरण बना।
प्याज का उपभोक्ता मूल्य राजनीतिक रूप से संवेदनशील था। शहर में प्याज महंगा होने पर सरकार पर दबाव बढ़ता था। निर्यात, सरकारी खरीद और बाजार हस्तक्षेप के फैसले इसलिए किसान की आय पर तत्काल असर डाल सकते थे।
शरद जोशी ने इसी अनुभव से यह प्रश्न उठाया कि आर्थिक नीति में उपभोक्ता को सस्ता भोजन उपलब्ध कराने का भार आखिर किसान ही क्यों उठाए?
यह प्रश्न आगे चलकर पूरे आंदोलन की वैचारिक रीढ़ बना।
हरित क्रांति के बाद कृषि संकट और ‘लाभकारी मूल्य’ के प्रश्न का उदय
1960 और 1970 के दशकों में भारतीय कृषि नीति का मुख्य लक्ष्य खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाना और देश को खाद्यान्न आयात पर निर्भरता से बाहर निकालना था। उन्नत बीज, सिंचाई, रासायनिक उर्वरक, कृषि ऋण और समर्थन मूल्य जैसी व्यवस्थाओं के कारण कृषि का क्रमशः आधुनिकीकरण हुआ।
लेकिन इस परिवर्तन ने कृषि की लागत भी बढ़ाई।
किसान अब केवल जमीन और पारिवारिक श्रम पर निर्भर नहीं था। उसे बाजार से बीज, उर्वरक, कीटनाशक, मशीन, ईंधन और अन्य सामग्री खरीदनी पड़ती थी। उत्पादन जितना बाजारोन्मुख हुआ, किसान उतना ही दो बाजारों के बीच फंसता गया—जिस बाजार से वह कृषि सामग्री खरीदता था और जिस बाजार में अपनी उपज बेचता था।
शेतकारी संगठन की दृष्टि में यहीं असमानता थी।
महंगाई किसान के लिए दोहरी समस्या
सामान्यतः महंगाई की चर्चा उपभोक्ता के संदर्भ में की जाती है, लेकिन किसान उत्पादक और उपभोक्ता दोनों होता है।
यदि डीजल, खाद, मशीन, कपड़ा, दवा, शिक्षा और परिवहन महंगे होते जाएं, जबकि कृषि उपज के दाम उसी अनुपात में न बढ़ें, तो किसान की वास्तविक आय घटती है।
इसलिए शरद जोशी का तर्क था कि किसान की गरीबी केवल कम उत्पादन का परिणाम नहीं है। किसान अधिक उत्पादन करके भी गरीब रह सकता है, यदि उसे अपनी उपज का उचित मूल्य न मिले।
यह विचार उस समय की प्रचलित किसान राजनीति से काफी अलग था।
‘उत्पादन बढ़ाओ’ से ‘उत्पादन का मूल्य दो’ तक
स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों में कृषि विकास का मंत्र था—उत्पादन बढ़ाना।
किसान उत्पादन क्यों बढ़ाए, यदि अतिरिक्त उत्पादन से बाजार मूल्य और गिर जाता है?
इस तर्क में कृषि संकट की नई व्याख्या निहित थी। किसान को सहायता अथवा दया की आवश्यकता वाला वर्ग मानने के बजाय उसे एक आर्थिक उत्पादक के रूप में प्रस्तुत किया गया।
उसका अधिकार इसलिए नहीं कि वह गरीब है, बल्कि इसलिए कि उसने उत्पादन किया है और उस उत्पादन का आर्थिक मूल्य उसे मिलना चाहिए।
यही कारण है कि शेतकारी संगठन ने भूमि पुनर्वितरण के बजाय कृषि मूल्य को अपने आंदोलन का प्रमुख मुद्दा बनाया।
पुराने और नए किसान आंदोलनों का अंतर
तेलंगाना, तेभागा, बकाश्त, वारली अथवा अन्य पुराने किसान संघर्षों में जमीन और ग्रामीण वर्ग-संबंध निर्णायक थे। वहां संघर्ष का एक पक्ष जमींदार, भू-स्वामी अथवा महाजन था।
1980 के दशक के ‘नए किसान आंदोलनों’ में प्रतिपक्ष बदल गया।
अब किसान की शिकायत केवल स्थानीय जमींदार से नहीं थी। वह राज्य की कृषि मूल्य नीति, बिजली दर, सिंचाई शुल्क, सरकारी खरीद, निर्यात नीति और बाजार नियंत्रण से टकरा रहा था।
महाराष्ट्र में शेतकारी संगठन, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बाद में भारतीय किसान यूनियन और कर्नाटक में कर्नाटक राज्य रैयत संघ इसी व्यापक ऐतिहासिक परिवर्तन के अलग-अलग रूप बने।
महाराष्ट्र राज्य मराठी विश्वकोश भी शेतकारी संगठन को 1980 के बाद किसान असंतोष को संगठित आंदोलन में बदलने वाली प्रमुख धाराओं में रखता है।
शरद जोशी : अंतरराष्ट्रीय नौकरशाही से खेत तक
शेतकारी संगठन को उसके संस्थापक शरद अनंतराव जोशी की वैचारिक और व्यक्तिगत यात्रा से अलग करके नहीं समझा जा सकता।
उनका जीवन पारंपरिक किसान नेता की कहानी नहीं था। वे गांव के स्थानीय किसान नेतृत्व से क्रमशः ऊपर उठकर राष्ट्रीय नेता नहीं बने थे। वे शिक्षित, प्रशासनिक और अंतरराष्ट्रीय अनुभव लेकर ग्रामीण भारत में आए थे।
उन्होंने भारतीय डाक सेवा में कार्य किया और बाद में स्विट्जरलैंड के बर्न में यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन से जुड़े अंतरराष्ट्रीय दायित्व निभाए। उपलब्ध जीवनी विवरण उन्हें 1968–77 के दौरान बर्न में सूचना-सेवा संबंधी वरिष्ठ दायित्व में दिखाते हैं।
भारत लौटने के बाद उनका जीवन निर्णायक रूप से बदल गया।
चाकण के पास खेती
जोशी पुणे जिले के चाकण क्षेत्र में खेती से जुड़े। यह निर्णय उनके भावी राजनीतिक विचारों के लिए प्रयोगशाला साबित हुआ।
अब तक उन्होंने अर्थव्यवस्था और प्रशासन को अधिकारी की दृष्टि से देखा था; अब कृषि को उत्पादक की दृष्टि से देखने लगे।
खेती करते हुए उन्हें लागत, श्रम, बाजार और उपज के मूल्य के बीच संबंध का प्रत्यक्ष अनुभव हुआ। उनकी जीवनी संबंधी सामग्री इस दौर को सूखी खेती के प्रयोग, कृषि में आर्थिक नुकसान और अंततः कृषि मूल्य-नीति को ग्रामीण गरीबी की जड़ मानने की उनकी वैचारिक यात्रा से जोड़ती है।
किसान मेहनत करता है, उत्पादन करता है और बाजार में माल बेचता है, फिर भी उसकी पूंजी क्यों घटती जाती है?
जोशी ने इसका उत्तर किसान की कथित पिछड़ी मानसिकता, कम मेहनत अथवा तकनीकी अज्ञान में खोजने से इनकार किया।
उनका निष्कर्ष अधिक राजनीतिक था—कृषि उत्पादों के मूल्य जानबूझकर उस स्तर पर रखे जाते हैं जहां कृषि क्षेत्र से संसाधनों का हस्तांतरण गैर-कृषि अर्थव्यवस्था की ओर होता रहता है।
किसान को ‘व्यवसायी’ की तरह देखना
जोशी की सबसे विशिष्ट अवधारणाओं में से एक किसान को उद्यमी अथवा उत्पादक की तरह देखना था।
कृषि भी आर्थिक गतिविधि है। किसान भूमि, श्रम और पूंजी लगाता है, जोखिम उठाता है और उत्पादन करता है। इसलिए कृषि नीति का पहला परीक्षण यह होना चाहिए कि उत्पादन करने वाले व्यक्ति को उसकी लागत और श्रम के अनुरूप प्रतिफल मिलता है या नहीं।
यहां से एक नया राजनीतिक शब्द-संसार तैयार हुआ—
“शेतमालाला रास्त भाव” — अर्थात कृषि उपज को उचित/लाभकारी मूल्य।
यही शेतकारी संगठन का सबसे शक्तिशाली नारा बना।
राजनीतिक दलों से दूरी
प्रारंभिक शेतकारी संगठन ने स्वयं को किसी स्थापित राजनीतिक दल की किसान शाखा बनाने से परहेज किया।
कांग्रेस की ग्रामीण सत्ता मजबूत थी। कम्युनिस्ट किसान संगठनों की अपनी वैचारिक परंपरा थी। समाजवादी और शेतकरी कामगार पक्ष जैसी धाराएं भी महाराष्ट्र में मौजूद थीं।
जोशी इन सबसे अलग स्वतंत्र किसान शक्ति खड़ी करना चाहते थे।
उनका दावा था कि किसान का आर्थिक हित किसी एक पार्टी के घोषणापत्र का विषय नहीं बल्कि कृषि और गैर-कृषि अर्थव्यवस्था के बीच संरचनात्मक संबंध का प्रश्न है।
इसलिए किसान को पार्टी के पीछे खड़े होने के बजाय अपने आर्थिक हित के आधार पर स्वयं संगठित होना चाहिए।
शेतकारी संगठन की स्थापना : चाकण से एक नई किसान राजनीति
शेतकारी संगठन का निर्माण किसी विशाल सम्मेलन अथवा पहले से तैयार राजनीतिक ढांचे से नहीं हुआ। उसका विकास चाकण क्षेत्र के किसानों की ठोस आर्थिक समस्याओं के बीच हुआ।
संगठन के औपचारिक आरंभ की तारीख को लेकर स्रोतों में मामूली अंतर मिलता है। महाराष्ट्र राज्य मराठी विश्वकोश इसे अक्टूबर 1979 में राज्यस्तरीय संगठन के रूप में स्थापित बताता है, जबकि शरद जोशी से संबंधित जीवन-वृत्त और आंदोलन-साहित्य 9 अगस्त 1979 को चाकण में संगठन कार्यालय के उद्घाटन को स्थापना का प्रमुख बिंदु मानते हैं। एक जीवनी स्रोत 8 अगस्त 1979 को संगठन के आरंभ से जोड़ता है। इसलिए इतिहासलेखन में सुरक्षित निष्कर्ष यह है कि 1978 के प्रारंभिक प्याज प्रतिरोध से निकली प्रक्रिया 1979 में संगठित संस्थागत रूप में परिवर्तित हुई।
1978 : पहली चिंगारी
चाकण क्षेत्र में प्याज किसानों की समस्या पहले ही सामने आ चुकी थी।
आंदोलन संबंधी विवरणों के अनुसार 25 मार्च 1978 को चाकण बाजार समिति के सामने किसानों की सभा हुई। प्याज के गिरते भाव के विरुद्ध किसानों को संगठित करने का प्रयास किया गया और लगभग 45–60 रुपये प्रति क्विंटल मूल्य की मांग उठी।
यह अभी वह विशाल आंदोलन नहीं था जिसने बाद में महाराष्ट्र को हिला दिया, लेकिन इसमें शेतकारी संगठन की भावी राजनीति के बीज दिखाई देते हैं।
प्रतिपक्ष था—ऐसी सरकारी और बाजार व्यवस्था जो किसान को उसका आर्थिक प्रतिफल नहीं दे रही थी।
प्याज ने क्यों दिया आंदोलन को जन्म?
प्याज इस नई राजनीति के लिए लगभग आदर्श फसल सिद्ध हुआ।
यह आवश्यक उपभोक्ता वस्तु थी। इसके दाम बढ़ते ही शहरी राजनीतिक दबाव बनता था। लेकिन इसकी कीमत गिरने पर किसान का नुकसान उतना बड़ा राजनीतिक मुद्दा नहीं बनता था।
1977–78 के संकट का वर्णन करते हुए उन्होंने बाद में कहा कि निर्यात पर रोक के बाद चाकण में प्याज का मूल्य लगभग 15–18 रुपये प्रति क्विंटल तक गिर गया था। कुछ समय सरकारी खरीद से संकट कम हुआ, इसलिए व्यापक आंदोलन टल गया; लेकिन 1980 में अधिक आवक और कीमतों के फिर गिरने पर आंदोलन भड़क उठा।
संगठन का प्रारंभिक कार्यक्रम
शेतकारी संगठन के प्रारंभिक मुखपत्र ‘वारकरी’ में 1979–80 का कार्यक्रम अत्यंत व्यावहारिक था।
उसमें चाकण और संबंधित बाजारों में प्याज, आलू और मूंगफली के भाव को निश्चित न्यूनतम स्तर से नीचे न जाने देने तथा गांव-गांव संगठन बनाकर भविष्य के संघर्ष की तैयारी करने पर जोर दिया गया था।
यहां एक महत्वपूर्ण विशेषता दिखाई देती है।
संगठन ने शुरुआत में किसानों के सामने विशाल वैचारिक घोषणापत्र रखने के बजाय ऐसी समस्या चुनी जिसे किसान प्रतिदिन अनुभव कर रहा था।
मेरी फसल की लागत क्या है और मुझे बाजार में मिलता क्या है?
इस सरल प्रश्न ने बाद में एक बड़े आर्थिक सिद्धांत का रूप लिया।
एकसूत्री कार्यक्रम
शेतकारी संगठन के आंदोलन का केंद्रीय सूत्र था—कृषि उत्पाद को लाभकारी मूल्य।
संगठन के अपने वैचारिक साहित्य में इसे लगभग एकसूत्री कार्यक्रम की तरह प्रस्तुत किया गया—किसान की उपज को लाभकारी मूल्य दिलाना। संगठन स्वयं को गैर-दलीय और अहिंसक किसान शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता था।
इस एक मुद्दे की राजनीतिक क्षमता असाधारण थी।
जाति अलग हो सकती थी। भूमि का आकार अलग हो सकता था। फसल अलग हो सकती थी। राजनीतिक पार्टी अलग हो सकती थी। लेकिन बाजार में उपज बेचने वाले किसानों को मूल्य के प्रश्न पर एक मंच पर लाया जा सकता था।
यही शेतकारी संगठन की पहली बड़ी संगठनात्मक खोज थी।
1980 का चाकण प्याज आंदोलन : महाराष्ट्र की किसान राजनीति में विस्फोट
यदि 1978–79 शेतकारी संगठन के जन्म का काल था, तो 1980 का चाकण प्याज आंदोलन उसका सार्वजनिक राजनीतिक उदय था।
यहीं से शरद जोशी स्थानीय किसान कार्यकर्ता से महाराष्ट्र के प्रमुख किसान नेता बनने लगे और शेतकारी संगठन ने एक ऐसी संघर्ष-पद्धति विकसित की जिसका प्रभाव बाद के किसान आंदोलनों में भी दिखाई दिया।
प्याज के भाव का संकट
1980 में प्याज की कीमतों में फिर तेज गिरावट आई। किसानों के लिए समस्या केवल यह नहीं थी कि कीमत कम थी। समस्या यह थी कि खेती की लागत लगाने के बाद बाजार मूल्य उत्पादन को आर्थिक रूप से अव्यावहारिक बना रहा था।
शेतकारी संगठन ने इसे बाजार की क्षणिक दुर्घटना के बजाय नीति संबंधी प्रश्न बनाया।
उसका तर्क था कि सरकार जब शहरी उपभोक्ता को राहत देने के लिए निर्यात अथवा व्यापार पर नियंत्रण लगाती है तो उसका आर्थिक भार किसान पर डाल दिया जाता है।
यहीं से नारा केवल “प्याज का भाव बढ़ाओ” नहीं रहा।
कृषि उपज का मूल्य निर्धारित करने का अधिकार किसके हित में इस्तेमाल किया जा रहा है?
1 मार्च 1980 : रास्ता रोको
आंदोलन के इतिहास में 1 मार्च 1980 निर्णायक तारीख है।
शेतकारी संगठन ने चाकण में प्याज के लाभकारी मूल्य की मांग को लेकर रास्ता रोको शुरू किया। आंदोलन संबंधी जीवन-वृत्त इसे संगठन का पहला रास्ता रोको आंदोलन दर्ज करता है।
किसान अब केवल मंडी में भाव मिलने की प्रतीक्षा नहीं कर रहा था। वह सड़क पर आकर उस अर्थव्यवस्था को बाधित कर रहा था जो उसके अनुसार कृषि को नुकसान पहुंचाकर चल रही थी।
इस रणनीति में भविष्य के ‘भारत बनाम इंडिया’ सिद्धांत की व्यावहारिक अभिव्यक्ति देखी जा सकती है।
ग्रामीण उत्पादक अपनी समस्या शहरी अर्थव्यवस्था के सामने प्रत्यक्ष रूप से रख रहा था।
सड़क आंदोलन का अर्थ
शरद जोशी ने महसूस किया कि केवल सभा और भाषण पर्याप्त नहीं हैं। यदि किसान अपनी उपज मजबूरी में कम कीमत पर बेचता रहेगा तो व्यापारी और शासन पर वास्तविक दबाव नहीं बनेगा।
इसलिए आंदोलन ने रास्ता रोको को राजनीतिक हथियार बनाया।
चाकण पुणे–नासिक मार्ग पर स्थित था। यातायात रोकने से किसान का प्रश्न मंडी की सीमा से निकलकर प्रशासन और व्यापक समाज के सामने आता था।
यह पद्धति बाद में भारतीय किसान आंदोलनों की परिचित रणनीति बन गई—राजमार्ग रोकना, रेल रोकना, बाजार में आपूर्ति रोकना अथवा सरकारी कार्यालयों का घेराव।
शरद जोशी का अनशन
रास्ता रोको के बाद आंदोलन और तीखा हुआ।
उपलब्ध कालक्रम के अनुसार 8 मार्च 1980 को शरद जोशी ने अनिश्चितकालीन उपवास शुरू किया। 16 मार्च तक बढ़ी हुई कीमत पर प्याज खरीद शुरू होने के बाद आंदोलन समाप्त किया गया और उन्होंने उपवास तोड़ा।
किसानों को यह अनुभव हुआ कि संगठित होकर बाजार और सरकार दोनों पर दबाव बनाया जा सकता है।
किसी आंदोलन के विस्तार में ऐसी शुरुआती जीत का बहुत महत्व होता है। वह केवल आर्थिक लाभ नहीं देती; वह आंदोलन को विश्वसनीयता देती है।
किसान को विश्वास हुआ कि संगठन के पीछे खड़े होने से परिणाम निकल सकता है।
NAFED और सरकारी खरीद का प्रश्न
प्याज आंदोलन में राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ—NAFED की भूमिका महत्वपूर्ण थी।
सरकारी अथवा सहकारी खरीद किसान के लिए बाजार मूल्य को सहारा देने का माध्यम हो सकती थी। लेकिन खरीद रुकने अथवा खरीद मूल्य कम होने पर किसान फिर निजी व्यापारियों की शर्तों पर निर्भर हो जाता था।
आंदोलन-संबंधी विवरण बताते हैं कि NAFED द्वारा खरीद बंद करने और बाद में खरीद की शर्तों को लेकर शेतकारी संगठन ने लगातार दबाव बनाया। एक विवरण में खरीद पुनः शुरू होने पर प्याज के लिए लगभग 40 रुपये प्रति क्विंटल का समान मूल्य दर्ज है।
इससे आंदोलन ने एक महत्वपूर्ण आर्थिक प्रश्न उठाया—
सरकारी हस्तक्षेप किसान को बचाता है या बाजार को विकृत करके अंततः किसान को नुकसान पहुंचाता है?
शरद जोशी आगे चलकर इस प्रश्न का उत्तर अधिकाधिक बाजार स्वतंत्रता के पक्ष में देने वाले थे।
लेकिन 1980 में आंदोलन अभी अपने वैचारिक विकास के शुरुआती चरण में था।
चाकण से नासिक तक
चाकण आंदोलन का प्रभाव आसपास के क्षेत्रों में तेजी से फैला। प्याज और गन्ना उत्पादक किसान संगठन से जुड़ने लगे।
1980 के दौरान प्याज मूल्य को लेकर विभिन्न स्थानों पर रास्ता रोको और विरोध हुए। शोध साहित्य 19 मार्च को बंबई–आगरा मार्ग पर हुए आंदोलन और नासिक जिले के पिंपलगांव बसवंत क्षेत्र में पुलिस कार्रवाई में किसानों की मृत्यु का उल्लेख करता है।
इस बिंदु पर आंदोलन केवल चाकण का स्थानीय आंदोलन नहीं रहा।
महाराष्ट्र सरकार को एक नई किसान शक्ति का सामना करना पड़ रहा था।
अगस्त 1980 तक निफाड क्षेत्र में गन्ने के मूल्य का प्रश्न उठ चुका था और संगठन शीघ्र ही गन्ना उत्पादकों के बड़े आंदोलन की ओर बढ़ने वाला था। कालक्रम में 15 अगस्त 1980 को निफाड में गन्ना आंदोलन के आरंभ और 9 अक्टूबर को निफाड सहकारी चीनी मिल की आम सभा में 300 रुपये प्रति टन मूल्य संबंधी प्रस्ताव का उल्लेख मिलता है।
इस प्रकार प्याज ने वह दरवाजा खोला जिससे गन्ना, कपास, तंबाकू, दूध और दूसरे कृषि उत्पादों के मूल्य का प्रश्न प्रवेश करने वाला था।
चाकण आंदोलन का ऐतिहासिक महत्व
1980 का चाकण आंदोलन केवल प्याज की कीमत बढ़ाने का संघर्ष नहीं था। भारतीय किसान आंदोलन के इतिहास में उसका महत्व इससे कहीं अधिक है।
पहला परिवर्तन था—किसान संघर्ष के केंद्र में ‘मूल्य’ का आना।
दूसरा—किसान को गरीब ग्रामीण के बजाय बाजार के लिए उत्पादन करने वाले आर्थिक उत्पादक के रूप में प्रस्तुत किया गया।
तीसरा—आंदोलन का प्रतिपक्ष स्थानीय जमींदार या महाजन के बजाय राज्य की आर्थिक नीति और बाजार व्यवस्था बनी।
चौथा—आंदोलन ने जाति और पार्टी की पहचान से ऊपर उत्पादक किसान की साझा आर्थिक पहचान बनाने का प्रयास किया।
पांचवां—रास्ता रोको जैसी प्रत्यक्ष कार्रवाई ने किसान आंदोलन को गांव और मंडी से निकालकर राजमार्ग तथा राज्यव्यापी सार्वजनिक क्षेत्र में ला दिया।
और छठा—इस आंदोलन ने शरद जोशी को वह अनुभव दिया जिससे आगे चलकर उनकी विशिष्ट राजनीतिक अर्थव्यवस्था विकसित हुई।
एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सावधानी
शेतकारी संगठन के शुरुआती इतिहास में 1978, 1979 और 1980 को आपस में मिलाना नहीं चाहिए।
1978 को चाकण में प्याज मूल्य के प्रश्न पर प्रारंभिक किसान लामबंदी और पहली चिंगारी का वर्ष माना जा सकता है।
1979 संगठन के संस्थागत निर्माण का निर्णायक वर्ष था; उपलब्ध स्रोत अगस्त 1979 में चाकण में संगठन/कार्यालय की स्थापना दर्ज करते हैं, हालांकि महाराष्ट्र विश्वकोश राज्यस्तरीय संगठन के लिए अक्टूबर का उल्लेख करता है।
1980 वह वर्ष था जब 1 मार्च के रास्ता रोको और उसके बाद के संघर्ष ने इसे व्यापक किसान आंदोलन में बदल दिया।
यह भेद वेबसाइट के शोध में बनाए रखना उपयोगी होगा, क्योंकि कई संक्षिप्त विवरण सीधे 1979 या 1980 के आंदोलन को ही संगठन का जन्म बताते हैं और इस कारण घटनाक्रम अस्पष्ट हो जाता है।
खंड 1–5 का समेकित निष्कर्ष
शेतकारी संगठन का जन्म अचानक नहीं हुआ था। उसके पीछे स्वतंत्रता के बाद महाराष्ट्र की कृषि अर्थव्यवस्था में आया गहरा परिवर्तन था।
जमीन का प्रश्न समाप्त नहीं हुआ था, लेकिन बाजार का प्रश्न उसके साथ अधिक महत्वपूर्ण हो चुका था। किसान उत्पादन बढ़ा रहा था, नकदी फसल उगा रहा था, बाजार से कृषि सामग्री खरीद रहा था और अपनी उपज बेचने के लिए उसी बाजार तथा सरकारी नीति पर निर्भर होता जा रहा था।
यहीं शरद जोशी ने किसान संकट की नई व्याख्या प्रस्तुत की।
उनका प्रारंभिक संदेश अत्यंत सरल था—
किसान को दया नहीं, उसके उत्पादन का दाम चाहिए।
चाकण ने इस विचार को आंदोलन में बदला।
लेकिन अभी शेतकारी संगठन का सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक विकास बाकी था। प्याज के बाद गन्ने और कपास के संघर्षों ने शरद जोशी को यह प्रश्न राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का अवसर दिया कि क्या भारत की आर्थिक व्यवस्था में कृषि क्षेत्र को व्यवस्थित रूप से कम मूल्य दिया जा रहा है।
इसी प्रश्न से आगे दो अवधारणाएं उभरेंगी—‘भारत बनाम इंडिया’ और ‘लाभकारी मूल्य’।
और यही वे अवधारणाएं हैं जिनके कारण शेतकारी संगठन केवल महाराष्ट्र का किसान संगठन नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत के ‘नए किसान आंदोलन’ की सबसे विशिष्ट वैचारिक धाराओं में से एक बना।
नासिक और गन्ना आंदोलन : चाकण से राज्यव्यापी विस्तार
प्याज से गन्ने की ओर
चाकण में प्याज उत्पादकों की सफलता के बाद शेतकारी संगठन के सामने अगला बड़ा प्रश्न गन्ना था। गन्ना महाराष्ट्र की सामान्य नकदी फसल भर नहीं था। पश्चिमी महाराष्ट्र और नासिक-अहमदनगर क्षेत्र में इसके साथ सिंचाई, सहकारी चीनी मिलें, सहकारी बैंक और राजनीतिक नेतृत्व का पूरा तंत्र जुड़ा था।
इसलिए गन्ने के मूल्य पर संघर्ष वस्तुतः महाराष्ट्र की ग्रामीण राजनीतिक अर्थव्यवस्था को चुनौती था।
चाकण में किसान का प्रत्यक्ष सामना मुख्यतः बाजार और सरकारी खरीद नीति से हुआ था। गन्ने में स्थिति अधिक जटिल थी। किसान अपना गन्ना स्वतंत्र रूप से लंबे समय तक रोक नहीं सकता था। कटाई के बाद उसे शीघ्र मिल तक पहुंचाना आवश्यक था। चीनी मिलें खरीद, पेराई और भुगतान की व्यवस्था पर निर्णायक नियंत्रण रखती थीं।
इस कारण गन्ना किसान की मोलभाव की शक्ति सीमित थी।
शेतकारी संगठन ने इसी कमजोरी को सामूहिक शक्ति में बदलने का प्रयास किया।
निफाड : दूसरा बड़ा मोर्चा
नासिक जिले का निफाड क्षेत्र गन्ना और प्याज दोनों के कारण किसान राजनीति के लिए महत्वपूर्ण था। 1980 में चाकण आंदोलन के कुछ ही महीनों बाद संगठन ने यहां गन्ने के मूल्य का प्रश्न उठाया।
शरद जोशी संबंधी कालक्रम में 15 अगस्त 1980 को निफाड क्षेत्र में गन्ना आंदोलन के आरंभ से जोड़ा गया है। अक्टूबर में निफाड सहकारी चीनी मिल की आम सभा में गन्ने के लिए 300 रुपये प्रति टन मूल्य संबंधी प्रस्ताव का उल्लेख मिलता है।
यह मांग केवल कुछ रुपये बढ़ाने की मांग नहीं थी। संगठन का तर्क था कि गन्ने की कीमत निर्धारित करते समय किसान की वास्तविक उत्पादन लागत और उसे मिलने वाले प्रतिफल को आधार बनाया जाना चाहिए।
सहकारिता से टकराव
महाराष्ट्र की सहकारी चीनी मिलें किसान स्वामित्व और ग्रामीण विकास के मॉडल के रूप में प्रस्तुत की जाती थीं। शेतकारी संगठन ने इसी दावे के भीतर एक अंतर्विरोध खोजा।
यदि चीनी मिल किसान की सहकारी संस्था है तो गन्ना उत्पादक किसान को मूल्य के लिए उसी संस्था के विरुद्ध आंदोलन क्यों करना पड़ रहा है?
इस प्रश्न ने महाराष्ट्र की कांग्रेस-प्रभावित ग्रामीण सत्ता को असहज किया।
सहकारी चीनी मिलें स्थानीय विधायक, सांसद, मंत्री, जिला बैंक और पंचायत राजनीति से जुड़ी हुई थीं। इसलिए गन्ना मूल्य आंदोलन का अर्थ केवल मिल प्रबंधन से विवाद नहीं था; वह राज्य की स्थापित ग्रामीण राजनीतिक संरचना से टकराव भी था।
नवंबर 1980 : आंदोलन का तीखा चरण
नवंबर 1980 में नासिक क्षेत्र का आंदोलन अधिक व्यापक और उग्र हुआ। रास्ता रोको और रेल रोको जैसी कार्रवाइयों के माध्यम से किसानों ने परिवहन व्यवस्था बाधित की।
पुलिस कार्रवाई हुई, गिरफ्तारियां हुईं और आंदोलन के दौरान किसानों की मौतें भी हुईं। इस संघर्ष ने शेतकारी संगठन को पूरे महाराष्ट्र में पहचान दिलाई।
यहीं आंदोलन की एक महत्वपूर्ण रणनीति स्थापित हुई—
किसान उत्पादन रोककर नहीं, बल्कि आपूर्ति और परिवहन व्यवस्था पर दबाव डालकर राज्य को बातचीत के लिए बाध्य कर सकता है।
बाद के दशकों में भारतीय किसान आंदोलनों में सड़क और रेल अवरोध की जो रणनीति बार-बार दिखाई देती है, शेतकारी संगठन ने 1980 के शुरुआती वर्षों में उसका प्रभावशाली प्रयोग किया।
गन्ने ने आंदोलन का चरित्र क्यों बदला?
प्याज आंदोलन एक बाजार संकट से निकला था। गन्ना आंदोलन ने पहली बार संगठन को महाराष्ट्र की संगठित ग्रामीण सत्ता से सीधी भिड़ंत कराई।
इससे शेतकारी संगठन का संदेश विस्तृत हुआ।
या उत्पादन करने वाला किसान भी इस निर्णय में निर्णायक पक्ष होगा?
यहीं से शरद जोशी का संघर्ष केवल मूल्य वृद्धि का आंदोलन नहीं रहा; वह कृषि उत्पादक की आर्थिक स्वतंत्रता का आंदोलन बनने लगा।
कपास उत्पादक किसानों का संघर्ष : विदर्भ और सरकारी एकाधिकार खरीद व्यवस्था
यदि गन्ने ने शेतकारी संगठन को पश्चिमी और उत्तरी महाराष्ट्र की ग्रामीण राजनीति से भिड़ाया, तो कपास ने उसे विदर्भ की कृषि अर्थव्यवस्था से जोड़ा।
विदर्भ में कपास केवल फसल नहीं बल्कि लाखों किसान परिवारों की नकदी आय का प्रमुख आधार था।
महाराष्ट्र सरकार ने कपास उत्पादकों को बाजार के उतार-चढ़ाव और व्यापारियों के शोषण से बचाने के उद्देश्य से एकाधिकार कपास खरीद योजना विकसित की थी। सिद्धांततः इसका उद्देश्य किसान को सुनिश्चित खरीद और उचित मूल्य देना था।
लेकिन शेतकारी संगठन ने इसी व्यवस्था को चुनौती दी।
सरकारी एकाधिकार का विरोध क्यों?
यहां शरद जोशी की वैचारिक विशिष्टता साफ दिखाई देती है।
परंपरागत किसान राजनीति की सहज मांग हो सकती थी कि सरकार अधिक कपास खरीदे और खरीद मूल्य बढ़ाए।
किसान को अपना कपास केवल सरकार अथवा सरकार द्वारा निर्धारित व्यवस्था को ही बेचने के लिए बाध्य क्यों किया जाए?
उनके अनुसार यदि खुले बाजार, दूसरे राज्य अथवा निर्यात बाजार में किसान को बेहतर मूल्य मिलता है तो उसे वहां बेचने का अधिकार होना चाहिए।
इस प्रकार समस्या केवल कम सरकारी खरीद मूल्य नहीं थी।
समस्या थी—किसान की बाजार चुनने की स्वतंत्रता।
कपास और मूल्य-नीति
कपास एक औद्योगिक कच्चा माल भी है। इससे वस्त्र उद्योग जुड़ा है। यदि कच्चे कपास की कीमत कम रखी जाती है तो कपड़ा उद्योग को सस्ता कच्चा माल मिल सकता है।
शरद जोशी ने इसी संबंध को कृषि से उद्योग की ओर संसाधन हस्तांतरण के उदाहरण के रूप में देखा।
उनका तर्क था कि औद्योगिक विकास के नाम पर किसान को अपने उत्पाद का वास्तविक बाजार मूल्य न मिलना एक प्रकार का अप्रत्यक्ष कर है।
किसान से सरकार स्पष्ट रूप से कर नहीं ले रही, लेकिन यदि नीति के माध्यम से उसकी उपज का मूल्य दबाया जाता है तो आर्थिक परिणाम लगभग वैसा ही है—कृषि से अधिशेष गैर-कृषि क्षेत्र में चला जाता है।
विदर्भ में संगठन का विस्तार
कपास आंदोलन ने शेतकारी संगठन को पुणे–नासिक क्षेत्र से बाहर निकालकर विदर्भ तक पहुंचाया। संगठन अब प्याज और गन्ने के अपेक्षाकृत समृद्ध उत्पादकों तक सीमित नहीं रहा।
विदर्भ की परिस्थितियां अलग थीं। सिंचाई कम थी। कपास वर्षा पर अधिक निर्भर थी। उत्पादन जोखिम अधिक था और किसान बाजार मूल्य की अनिश्चितता से गहराई से प्रभावित होते थे।
यही क्षेत्र आगे चलकर किसान ऋणग्रस्तता और आत्महत्याओं के राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बना।
इस दृष्टि से शेतकारी संगठन का 1980 के दशक में कपास मूल्य पर दिया गया जोर ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण था। उसने उस आर्थिक असुरक्षा की ओर बहुत पहले ध्यान खींचा जिसे बाद के दशकों में विदर्भ के कृषि संकट ने भयावह रूप में सामने रखा।
आंदोलन का व्यापक संदेश
कपास आंदोलन से संगठन ने तीन बातें स्थापित करने का प्रयास किया।
पहली—सरकारी खरीद किसान हित की गारंटी नहीं है।
दूसरी—किसान को देश के भीतर और बाहर जहां बेहतर मूल्य मिले, वहां बेचने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
तीसरी—कृषि नीति का लक्ष्य केवल उद्योग को सस्ता कच्चा माल और उपभोक्ता को सस्ता उत्पाद उपलब्ध कराना नहीं हो सकता।
इन तीनों विचारों से शरद जोशी की मुक्त बाजार समर्थक किसान राजनीति आकार लेने लगी।
‘भारत बनाम इंडिया’ : शरद जोशी का मूल आर्थिक सिद्धांत
शेतकारी संगठन को दूसरे किसान संगठनों से सबसे अधिक अलग करने वाली अवधारणा थी—‘भारत बनाम इंडिया’।
शरद जोशी ने भारतीय समाज को सांस्कृतिक अथवा भौगोलिक अर्थ में दो देशों में विभाजित नहीं किया था। यह मूलतः राजनीतिक अर्थव्यवस्था की अवधारणा थी।
उनके ‘भारत’ का अर्थ था वह विशाल ग्रामीण उत्पादक समाज जो मुख्यतः कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों पर निर्भर था।
‘इंडिया’ का अर्थ था संगठित शहरी–औद्योगिक अर्थव्यवस्था, राज्य तंत्र और वे वर्ग जिन्हें नीति-निर्माण में अपेक्षाकृत अधिक शक्ति प्राप्त थी।
जोशी का दावा था कि स्वतंत्रता के बाद अपनाई गई आर्थिक व्यवस्था में ‘इंडिया’ का विकास ‘भारत’ से संसाधनों के हस्तांतरण पर आधारित रहा।
कृषि से संसाधन कैसे निकलते हैं?
उनके अनुसार यह हस्तांतरण कई रास्तों से होता था।
यदि सरकार खाद्यान्न सस्ता रखना चाहती है तो कृषि मूल्य नियंत्रित किए जाते हैं।
यदि उद्योग को सस्ता कच्चा माल चाहिए तो कपास जैसी फसलों के बाजार पर नियंत्रण लगाया जाता है।
यदि घरेलू कीमत बढ़ने का डर हो तो कृषि निर्यात रोक दिया जाता है।
यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में मूल्य कम हो तो आयात से घरेलू किसान पर दबाव पड़ सकता है।
इस प्रकार किसान को बाजार की ऊंची कीमत का पूरा लाभ नहीं मिलता, लेकिन बाजार के जोखिम का बड़ा हिस्सा उसी को उठाना पड़ता है।
जोशी इसे कृषि के विरुद्ध ‘नकारात्मक सब्सिडी’ जैसी स्थिति के रूप में देखते थे।
शहर को सस्ता भोजन किसकी कीमत पर?
‘भारत बनाम इंडिया’ सिद्धांत का सबसे तीखा प्रश्न यही था।
शहरी मजदूरी और औद्योगिक लागत को नियंत्रित रखने के लिए भोजन सस्ता रखना सरकार के लिए आकर्षक नीति हो सकती है। लेकिन यदि भोजन सस्ता रखने का तरीका किसान की उपज का मूल्य दबाना है तो उसकी वास्तविक कीमत किसान चुका रहा है।
शरद जोशी के अनुसार भारतीय नीति-व्यवस्था ने लंबे समय तक उपभोक्ता के हित को उत्पादक किसान के हित से ऊपर रखा।
इसलिए कृषि संकट केवल मानसून, तकनीक अथवा छोटे खेत का संकट नहीं था।
वह नीति-निर्माण में ग्रामीण उत्पादक की कमजोर शक्ति का भी परिणाम था।
‘भारत बनाम इंडिया’ की राजनीतिक शक्ति
यह अवधारणा किसानों को एक साझा पहचान देती थी।
मराठा गन्ना उत्पादक, विदर्भ का कपास किसान, नासिक का प्याज उत्पादक और अन्य व्यावसायिक किसान अलग फसलें उगाते थे, लेकिन शरद जोशी के अनुसार सभी एक ही आर्थिक व्यवस्था में कम मूल्य पाने वाले उत्पादक थे।
इससे संगठन जाति और क्षेत्र से ऊपर ‘शेतकरी’ की पहचान स्थापित करना चाहता था।
यह उस समय महत्वपूर्ण प्रयोग था जब महाराष्ट्र की ग्रामीण राजनीति जाति, सहकारिता और राजनीतिक दलों के जटिल नेटवर्क से संचालित होती थी।
सिद्धांत की आलोचना
‘भारत बनाम इंडिया’ जितना प्रभावशाली था, उतना ही विवादास्पद भी।
आलोचकों ने पूछा—क्या पूरा ग्रामीण भारत एक समान आर्थिक वर्ग है?
एक बड़े सिंचित गन्ना उत्पादक और भूमिहीन खेत मजदूर का हित समान कैसे हो सकता है?
छोटे आदिवासी किसान और बड़े व्यावसायिक किसान को एक ही ‘भारत’ में रख देना क्या ग्रामीण वर्ग-विभाजन को छिपाता नहीं है?
इसी तरह शहर के सभी लोग संपन्न ‘इंडिया’ का हिस्सा नहीं हैं। शहरी मजदूर, झुग्गी निवासी और असंगठित क्षेत्र के श्रमिक स्वयं आर्थिक रूप से कमजोर हो सकते हैं।
इसलिए अकादमिक आलोचना में शरद जोशी की द्विभाजनकारी अवधारणा को उपयोगी राजनीतिक रूपक तो माना गया, लेकिन भारतीय समाज का पूर्ण वर्गीय विश्लेषण नहीं।
फिर भी इसका ऐतिहासिक महत्व कम नहीं होता।
उसने एक अत्यंत शक्तिशाली प्रश्न भारतीय राजनीति के सामने रखा—
क्या औद्योगिकीकरण और शहरी उपभोक्ता कल्याण की कीमत किसान से वसूली गई है?
लाभकारी मूल्य : किसान आंदोलन की नई आर्थिक भाषा
शेतकारी संगठन की पूरी राजनीति को एक मांग में समेटना हो तो वह थी—
“शेतमालाला रास्त भाव”
अर्थात कृषि उत्पाद को उचित अथवा लाभकारी मूल्य।
लेकिन शरद जोशी के लिए ‘उचित मूल्य’ केवल सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं था।
किसान को ऐसा मूल्य मिलना चाहिए जिसमें उसकी संपूर्ण उत्पादन लागत, श्रम, पूंजी, जोखिम और उत्पादक के रूप में उचित प्रतिफल समाहित हो।
लागत का प्रश्न
किसान की लागत केवल बाजार से खरीदी गई खाद, बीज और कीटनाशक नहीं है।
सिंचाई, बिजली, मशीन, पशु, परिवहन और भंडारण की लागत है।
और कृषि में मौसम तथा बाजार का जोखिम भी है।
यदि इन सबको नजरअंदाज करके केवल नकद खर्च के आधार पर कृषि मूल्य निर्धारित किया जाए तो किसान की वास्तविक लागत कम दिखाई देगी।
यही बहस आगे चलकर राष्ट्रीय स्तर पर कृषि लागत और मूल्य आयोग की विभिन्न लागत अवधारणाओं—A2, A2+FL और C2—के संदर्भ में और अधिक स्पष्ट हुई।
शेतकारी संगठन का राजनीतिक योगदान यह था कि उसने कृषि लागत और किसान के प्रतिफल को जनांदोलन की भाषा में बदल दिया।
MSP और शेतकारी संगठन
यहां एक महत्वपूर्ण वैचारिक अंतर समझना आवश्यक है।
आज लाभकारी मूल्य की मांग अक्सर न्यूनतम समर्थन मूल्य—MSP—की कानूनी गारंटी के साथ जोड़ी जाती है। लेकिन शरद जोशी की दीर्घकालीन दृष्टि केवल अधिक सरकारी MSP की मांग तक सीमित नहीं थी।
यदि बाजार में किसान को सरकारी मूल्य से अधिक कीमत मिल सकती है तो सरकार उसे स्वतंत्र बाजार में बेचने से क्यों रोके?
इसलिए उनके लिए लाभकारी मूल्य और बाजार स्वतंत्रता परस्पर विरोधी नहीं बल्कि जुड़े हुए प्रश्न थे।
किसान को घाटे का सरकारी मूल्य नहीं चाहिए; उसे बेहतर बाजार तक पहुंचने की स्वतंत्रता चाहिए।
यहीं उनकी राजनीति बाद की कई MSP-केंद्रित किसान धाराओं से अलग हो जाती है।
कृषि मूल्य और ‘टर्म्स ऑफ ट्रेड’
आर्थिक भाषा में शरद जोशी जिस समस्या की ओर संकेत कर रहे थे, उसे कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों के बीच विनिमय की शर्तों—व्यापार की शर्तें—की बहस से जोड़ा जा सकता है।
यदि किसान द्वारा खरीदी जाने वाली औद्योगिक वस्तुओं की कीमत तेजी से बढ़े और उसकी कृषि उपज की कीमत पीछे रह जाए तो कृषि क्षेत्र की वास्तविक क्रय शक्ति घटती है।
इसलिए केवल गेहूं, कपास, गन्ने या प्याज का नाममात्र मूल्य देखना पर्याप्त नहीं।
महत्वपूर्ण यह है कि उस मूल्य से किसान कितना डीजल, खाद, मशीन, कपड़ा, शिक्षा और अन्य वस्तुएं खरीद सकता है।
शेतकारी संगठन ने इसी संबंध को किसान की रोजमर्रा की भाषा में राजनीतिक प्रश्न बनाया।
मूल्य से सम्मान तक
लाभकारी मूल्य की मांग का एक सामाजिक पक्ष भी था।
शेतकारी संगठन ने किसान को सरकारी अनुदान का याचक मानने से इनकार किया।
हमें भीख नहीं चाहिए; हमारे माल का दाम चाहिए।
इस नारे ने किसान आंदोलन में स्वाभिमान की भाषा पैदा की।
किसान यदि देश के लिए भोजन और कच्चा माल पैदा करता है तो उसे सहायता पाने वाले बोझ की तरह नहीं बल्कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के उत्पादक नागरिक के रूप में देखा जाना चाहिए।
यह शेतकारी संगठन की स्थायी वैचारिक विरासतों में से एक है।
मुक्त बाजार बनाम सरकारी नियंत्रण : शेतकारी संगठन की विशिष्ट वैचारिक दिशा
1980 के दशक के दौरान शेतकारी संगठन की विचारधारा एक ऐसे बिंदु तक पहुंची जिसने उसे भारतीय किसान राजनीति में लगभग अद्वितीय बना दिया।
जहां अनेक किसान और वामपंथी संगठन कृषि संकट का समाधान अधिक सरकारी संरक्षण में देखते थे, शरद जोशी धीरे-धीरे कम सरकारी नियंत्रण और अधिक बाजार स्वतंत्रता की ओर बढ़े।
प्याज, गन्ना और कपास—तीनों आंदोलनों से उन्होंने एक समान निष्कर्ष निकाला था।
उनके अनुसार सरकार किसान के बाजार में हस्तक्षेप अक्सर किसान को लाभ पहुंचाने के लिए नहीं, बल्कि उपभोक्ता मूल्य और औद्योगिक हित नियंत्रित करने के लिए करती है।
आवश्यक वस्तु नियंत्रण की समस्या
कृषि उपज को आवश्यक वस्तु मानकर सरकार भंडारण, परिवहन और व्यापार पर नियंत्रण लगा सकती थी।
नीति का उद्देश्य जमाखोरी और महंगाई रोकना था।
लेकिन शरद जोशी का तर्क था कि इन प्रतिबंधों का दुष्प्रभाव किसान पर पड़ता है।
यदि उत्पादन अधिक है तो कीमत गिरती है।
यदि उत्पादन कम है और कीमत बढ़ने लगती है तो सरकार नियंत्रण, आयात अथवा निर्यात प्रतिबंध लगा सकती है।
इस प्रकार किसान को बाजार की मंदी का नुकसान मिलता है, लेकिन तेजी का पूरा लाभ नहीं।
जोशी इसे एकतरफा बाजार व्यवस्था मानते थे।
निर्यात की स्वतंत्रता
प्याज और कपास जैसे उत्पादों के संदर्भ में निर्यात का प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण था।
यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेहतर कीमत उपलब्ध है तो किसान को उसका लाभ मिलना चाहिए—यह शेतकारी संगठन का तर्क था।
निर्यात प्रतिबंध को वह किसान के विरुद्ध नीति मानता था, क्योंकि घरेलू उपभोक्ता कीमत नियंत्रित करने की लागत सीधे उत्पादक पर डाल दी जाती थी।
आगे चलकर यही विचार संगठन को कृषि व्यापार उदारीकरण और वैश्विक बाजार के समर्थन की ओर ले गया।
मुक्त बाजार का किसानवादी संस्करण
शरद जोशी के मुक्त बाजार को केवल उद्योगपति समर्थक आर्थिक उदारीकरण समझना गलत होगा।
उनका दावा था कि भारत में वास्तव में मुक्त बाजार उद्योग और कृषि दोनों के लिए समान रूप से मौजूद नहीं था।
उद्योग को संरक्षण, आयात शुल्क, लाइसेंस, वित्त और विभिन्न नीतिगत सुविधाएं मिल सकती थीं, जबकि किसान के उत्पादन, व्यापार, भंडारण और निर्यात पर नियंत्रण लगाया जाता था।
इसलिए वे कहते थे कि यदि बाजार व्यवस्था स्वीकार करनी है तो किसान को भी समान आर्थिक स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
किसान को यह नहीं कहा जा सकता कि वह महंगे बाजार से अपनी जरूरत की वस्तुएं खरीदे लेकिन अपनी उपज नियंत्रित बाजार में सस्ती बेचे।
समाजवाद से वैचारिक टकराव
यहीं शेतकारी संगठन की राजनीति वामपंथी किसान आंदोलनों से स्पष्ट रूप से अलग हुई।
मार्क्सवादी विश्लेषण में ग्रामीण संकट का केंद्रीय प्रश्न भूमि स्वामित्व, वर्ग-संबंध और पूंजीवादी शोषण था।
शरद जोशी के विश्लेषण में मुख्य अंतर्विरोध कृषि बनाम गैर-कृषि अर्थव्यवस्था था।
वामपंथ अधिक राज्य हस्तक्षेप, सार्वजनिक खरीद, भूमि सुधार और बाजार नियंत्रण की मांग कर सकता था।
जोशी कई क्षेत्रों में राज्य को ही समस्या का हिस्सा मानते थे।
यह अंतर बाद में वैश्वीकरण और विश्व व्यापार संगठन के प्रश्न पर बहुत स्पष्ट हुआ।
टिकैत से भी अंतर
1980 के दशक में उत्तर भारत में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में भारतीय किसान यूनियन उभरी। टिकैत भी बिजली दर, गन्ना मूल्य और किसान कर्ज जैसे प्रश्न उठा रहे थे।
लेकिन दोनों आंदोलनों की भाषा अलग थी।
टिकैत की शक्ति विशाल किसान पंचायत, सामाजिक नेटवर्क और सरकार पर प्रत्यक्ष दबाव में थी।
जोशी ने किसान आंदोलन को अधिक स्पष्ट आर्थिक सिद्धांत देने की कोशिश की।
उनका प्रश्न केवल यह नहीं था कि सरकार किसान को कितना देगी।
सरकार किसान के आर्थिक निर्णयों पर इतना नियंत्रण क्यों रखती है?
इसलिए शेतकारी संगठन का अंतिम लक्ष्य कई मामलों में सरकारी सहायता बढ़ाना नहीं बल्कि किसान को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करना था।
एक महत्वपूर्ण विरोधाभास
यहां शेतकारी संगठन के भीतर एक अंतर्निहित तनाव भी दिखाई देता है।
यदि बाजार पूरी तरह स्वतंत्र हो तो कीमत हमेशा किसान के पक्ष में नहीं होगी।
अधिक उत्पादन होने पर कीमत बहुत नीचे जा सकती है।
छोटे किसान के पास भंडारण क्षमता नहीं होती।
व्यापारी और बड़ी कंपनियां किसान की तुलना में अधिक बाजार शक्ति रख सकती हैं।
अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट घरेलू किसान को संकट में डाल सकती है।
यदि राज्य पीछे हट जाए तो कमजोर किसान को शक्तिशाली बाजार से कौन बचाएगा?
यही प्रश्न आगे चलकर शरद जोशी की विचारधारा पर सबसे गंभीर बहसों में से एक बना।
जोशी का उत्तर मूलतः यह था कि किसान को संरक्षण के नाम पर कैद नहीं किया जाना चाहिए। उसे प्रतिस्पर्धा, व्यापार, तकनीक और बाजार तक वही स्वतंत्रता मिलनी चाहिए जो दूसरे आर्थिक उत्पादकों को मिलती है।
इस विवाद का कोई सरल निष्कर्ष नहीं है।
लेकिन इसी कारण शेतकारी संगठन भारतीय किसान आंदोलन के इतिहास में इतना महत्वपूर्ण है—उसने किसान राजनीति के भीतर ही राज्य बनाम बाजार की बहस खड़ी कर दी।
1980 के दशक का निर्णायक वैचारिक परिवर्तन
खंड 6 से 10 तक की यात्रा को एक साथ देखें तो शेतकारी संगठन का असाधारण रूपांतरण दिखाई देता है।
चाकण में प्रश्न था—प्याज का भाव कितना मिले?
निफाड में प्रश्न बना—गन्ने का मूल्य कौन तय करे?
विदर्भ में प्रश्न हुआ—कपास किसान को अपना माल किसे बेचने की स्वतंत्रता है?
इसके बाद प्रश्न और व्यापक हुआ—भारत की आर्थिक नीति में कृषि के साथ व्यवहार कैसा है?
और अंततः शरद जोशी का उत्तर सामने आया—
किसान की मूल समस्या केवल गरीबी नहीं है; समस्या यह है कि उत्पादक के रूप में उसकी आर्थिक स्वतंत्रता और मोलभाव की शक्ति कमजोर है।
इसी बिंदु पर स्थानीय फसल आंदोलनों से एक किसानवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र पैदा हुआ।
शरद जोशी की वैचारिक श्रृंखला
उनकी विचार-प्रक्रिया को संक्षेप में इस क्रम में समझा जा सकता है:
कम कृषि मूल्य → किसान की आय में कमी → कृषि से गैर-कृषि क्षेत्र की ओर संसाधन हस्तांतरण → ‘भारत बनाम इंडिया’ → लाभकारी मूल्य की मांग → सरकारी बाजार नियंत्रण की आलोचना → कृषि व्यापार की स्वतंत्रता → मुक्त बाजार समर्थक किसान राजनीति।
यही श्रृंखला शेतकारी संगठन को समझने की कुंजी है।
यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि यह विचारधारा एक दिन में तैयार नहीं हुई। 1978–80 के प्रारंभिक संघर्षों से लेकर 1980 और 1990 के दशकों तक जोशी के विचार विकसित और अधिक स्पष्ट होते गए।
इसलिए बाद के उनके उदारीकरण और वैश्विक कृषि व्यापार संबंधी विचारों को सीधे 1980 के चाकण आंदोलन पर आरोपित करना इतिहास की प्रक्रिया को सरल बना देना होगा।
उपलब्धि और प्रश्न
खंड 6–10 तक शेतकारी संगठन ने भारतीय किसान राजनीति में कम-से-कम चार स्थायी प्रश्न स्थापित कर दिए थे।
पहला: किसान की वास्तविक उत्पादन लागत क्या है?
दूसरा: कृषि उत्पाद का लाभकारी मूल्य कैसे निर्धारित किया जाए?
तीसरा: उपभोक्ता को सस्ता भोजन उपलब्ध कराने का आर्थिक भार किसान पर कितना डाला जा सकता है?
चौथा: किसान को अपनी उपज बेचने, भंडारित करने और निर्यात करने की कितनी स्वतंत्रता होनी चाहिए?
चार दशक बाद भी भारतीय कृषि राजनीति इन्हीं प्रश्नों के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है।
MSP की कानूनी गारंटी की मांग हो, प्याज निर्यात प्रतिबंध का विवाद हो, आवश्यक वस्तु कानून में बदलाव हो, कृषि मंडियों का भविष्य हो अथवा निजी व्यापार को लेकर बहस—शरद जोशी द्वारा उठाए गए मूल प्रश्न समाप्त नहीं हुए हैं।
उनके उत्तरों से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन उन प्रश्नों को नजरअंदाज करके स्वतंत्र भारत की किसान राजनीति को पूरी तरह समझना कठिन है।
और शेतकारी संगठन की कहानी अभी एक और महत्वपूर्ण दिशा में जाने वाली थी।
अब किसान आंदोलन केवल पुरुष किसान, फसल और मूल्य तक सीमित नहीं रहेगा। शरद जोशी के आंदोलन के भीतर से महिला किसान के स्वतंत्र आर्थिक अधिकार, जमीन पर उसके नाम और ‘लक्ष्मी मुक्ति’ की मांग उभरेगी।
साथ ही कर्ज, बिजली, सिंचाई और प्रत्यक्ष आंदोलन की ऐसी रणनीतियां विकसित होंगी जिन्होंने संगठन को महाराष्ट्र के ग्रामीण समाज में और गहराई तक पहुंचाया।
कृषि व्यापार, आयात–निर्यात और किसान की बाजार स्वतंत्रता
‘दाम’ से आगे ‘बाजार’ का प्रश्न
शेतकारी संगठन के शुरुआती आंदोलनों में सबसे स्पष्ट मांग कृषि उपज का लाभकारी मूल्य थी। लेकिन शरद जोशी जल्दी ही इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि केवल सरकार से अधिक समर्थन मूल्य मांगना पर्याप्त नहीं है।
यदि किसान को किसी दूसरे बाजार में अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिल सकता है तो उसे वहां बेचने से रोका क्यों जाए?
यही प्रश्न शेतकारी संगठन को कृषि व्यापार की स्वतंत्रता की ओर ले गया।
प्याज के अनुभव ने संगठन को विशेष रूप से प्रभावित किया था। 1977–78 में निर्यात प्रतिबंध के बाद चाकण में प्याज के भाव के तीव्र पतन का उल्लेख स्वयं जोशी ने बाद में किया था। उनके अनुसार इसी संकट ने पहली बार उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया कि सरकारी व्यापार नीति किसान की आय को किस तरह प्रभावित करती है।
इस अनुभव से संगठन ने एक महत्वपूर्ण सिद्धांत विकसित किया—
कृषि व्यापार में सरकार की नीति ऐसी नहीं होनी चाहिए जिसमें कीमत गिरने का जोखिम किसान उठाए और कीमत बढ़ने पर संभावित लाभ उससे छीन लिया जाए।
निर्यात प्रतिबंध का विरोध
कृषि निर्यात पर नियंत्रण लगाने का सरकारी तर्क प्रायः घरेलू उपलब्धता और उपभोक्ता मूल्य से जुड़ा होता है।
यदि प्याज, चीनी, गेहूं अथवा किसी दूसरी वस्तु की घरेलू कीमत तेजी से बढ़ती है तो सरकार निर्यात रोक सकती है अथवा उस पर शुल्क लगा सकती है। इससे देश के भीतर आपूर्ति बढ़ने और कीमत नियंत्रित होने की संभावना रहती है।
शरद जोशी ने इसी व्यवस्था पर मूलभूत आपत्ति उठाई।
यदि किसान ने उत्पादन किया है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में उसे बेहतर कीमत मिल रही है, तो शहरी उपभोक्ता को सस्ता माल उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी केवल किसान पर क्यों डाली जाए?
यहीं शेतकारी संगठन की किसान राजनीति अपने समय की अनेक दूसरी किसान धाराओं से अलग हो जाती है।
वह केवल “सरकार अधिक खरीदे” नहीं कह रहा था।
“किसान को जहां बेहतर दाम मिले, वहां बेचने दो।”
अंतरराज्यीय व्यापार की बाधाएं
शेतकारी संगठन ने केवल अंतरराष्ट्रीय निर्यात ही नहीं, देश के भीतर कृषि उत्पादों की आवाजाही पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों का भी विरोध किया।
संगठन की अपनी ऐतिहासिक सामग्री के अनुसार शरद जोशी ने महाराष्ट्र की एकाधिकार कपास खरीद व्यवस्था और कपास की अंतरराज्यीय आवाजाही पर नियंत्रण को किसान की बाजार स्वतंत्रता के विरुद्ध माना। 1984 में महाराष्ट्र राज्य सहकारी कपास विपणन महासंघ के एकाधिकार के विरुद्ध संगठन ने बड़ा अभियान छेड़ा।
किसान से यह कहना कि वह अपना कपास केवल निर्धारित संस्था को और निर्धारित शर्तों पर बेचे, शरद जोशी के लिए आर्थिक अन्याय था।
उनका तर्क था कि जिस माल का मालिक किसान है, उसके विक्रय के बारे में अंतिम निर्णय भी मूलतः किसान का होना चाहिए।
बाजार समितियों पर प्रश्न
राज्य नियंत्रित कृषि उपज बाजार समितियों—APMC—का उद्देश्य किसान को व्यवस्थित बाजार, पारदर्शी नीलामी और व्यापारी शोषण से सुरक्षा देना था।
शेतकारी संगठन ने इस व्यवस्था के वास्तविक संचालन पर भी प्रश्न उठाए।
शरद जोशी ने 1991 में पुणे कृषि उपज बाजार समिति के संबंध में बंबई उच्च न्यायालय तक मामला पहुंचाया। याचिका में बाजार समिति के प्रशासन और भूमि संबंधी निर्णयों पर प्रश्न उठाए गए थे। यह बताता है कि संगठन बाजार समितियों को किसान हित की स्वतःसिद्ध संस्था मानने के बजाय उनके कामकाज को चुनौती देने के लिए भी तैयार था।
यहां संगठन का मूल सिद्धांत स्थिर रहा—
किसान को ऐसा बाजार चाहिए जहां प्रतिस्पर्धा अधिक हो, विकल्प अधिक हों और एकाधिकारी शक्ति कम हो।
खुले बाजार की अवधारणा
शरद जोशी के अनुसार खुला बाजार किसान विरोधी नहीं, बल्कि संभावित रूप से किसान के पक्ष में हो सकता था—बशर्ते वह वास्तव में प्रतिस्पर्धी हो।
यदि केवल एक सरकारी संस्था खरीदार है तो किसान निर्भर है।
यदि केवल कुछ लाइसेंसधारी व्यापारी खरीदार हैं तो भी किसान निर्भर है।
लेकिन यदि किसान सीधे व्यापारी, प्रसंस्करण उद्योग, दूसरे राज्य अथवा निर्यातक को बेच सकता है तो खरीदारों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
यही कारण था कि शेतकारी संगठन बाजार तक पहुंच को किसान स्वतंत्रता का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता रहा। संगठन के बाद के विवरणों में भी यह बात दोहराई गई कि जोशी खुले और प्रतिस्पर्धी बाजार को कृषि मूल्य प्राप्ति की शर्त मानते थे।
क्या मुक्त बाजार अपने आप न्यायपूर्ण होता है?
बाजार तक स्वतंत्र पहुंच और बाजार में समान शक्ति एक ही चीज नहीं हैं।
छोटे किसान के पास माल रोकने की क्षमता सीमित हो सकती है।
दूसरी ओर व्यापारी, प्रसंस्करण कंपनी अथवा निर्यातक के पास अधिक पूंजी और सूचना हो सकती है।
इसलिए शेतकारी संगठन की मुक्त बाजार अवधारणा की आलोचना यह रही कि सरकारी एकाधिकार हटाना आवश्यक हो सकता है, लेकिन केवल प्रतिबंध हटाने से किसान की सौदेबाजी शक्ति स्वतः बराबर नहीं हो जाती।
शरद जोशी इसका उत्तर प्रतिस्पर्धा, संगठन और किसान की सामूहिक शक्ति में खोजते थे।
उनके लिए समस्या बाजार का अस्तित्व नहीं बल्कि किसान को बाजार से वंचित रखना था।
आगे की बहस का आधार
यही विचार 1990 के दशक में उदारीकरण, विश्व व्यापार संगठन, कृषि आयात–निर्यात और वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर संगठन के रुख का आधार बनने वाला था।
शेतकारी संगठन उस समय भी किसान आंदोलनों की एक अल्पसंख्यक लेकिन अत्यंत स्पष्ट धारा के रूप में यह कहने वाला था कि भारतीय किसान को दुनिया के बाजार से डराने के बजाय उसे दुनिया के बाजार में प्रवेश का अधिकार दिया जाए।
इस विषय का विस्तृत अध्ययन आगे खंड 20–21 में होगा।
शेतकरी महिला आघाड़ी और ‘लक्ष्मी मुक्ति’ : महिला किसान के संपत्ति-अधिकार की ऐतिहासिक पहल
शेतकारी संगठन की सबसे महत्वपूर्ण और अक्सर कम आंकी गई उपलब्धियों में एक था ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक और संपत्ति-अधिकार का प्रश्न किसान आंदोलन के भीतर उठाना।
महिलाएं संगठन के शुरुआती आंदोलनों से ही बड़ी संख्या में उपस्थित थीं।
यदि किसान आंदोलन सफल होता है, फसल का दाम बढ़ता है और किसान परिवार की आय बढ़ती है, तो क्या उस आर्थिक लाभ में महिला को स्वतंत्र अधिकार मिलेगा?
यहीं से शेतकारी संगठन की महिला राजनीति का आरंभ हुआ।
आंदोलनों में महिलाओं की प्रारंभिक भागीदारी
शेतकारी संगठन के इतिहास संबंधी सामग्री में बताया गया है कि जनवरी 1980 में वांद्रे–चाकण सड़क की मरम्मत के लिए निकाले गए लगभग आठ हजार किसानों के मार्च में करीब दो हजार महिलाएं शामिल थीं।
प्याज और गन्ना आंदोलनों में भी महिलाएं सक्रिय थीं।
कर्नाटक–महाराष्ट्र सीमा क्षेत्र के निपाणी तंबाकू आंदोलन में महिलाओं की उल्लेखनीय भागीदारी का विवरण मिलता है। वे धरना स्थलों पर आती थीं, भोजन की व्यवस्था करती थीं और प्रत्यक्ष आंदोलन में भी भाग लेती थीं।
इस भागीदारी ने संगठन के सामने एक प्रश्न रखा—
महिला किसान आंदोलन में केवल सहयोगी है या स्वयं किसान और अधिकारधारी नागरिक भी है?
चांदवड महिला अधिवेशन, 1986
इस प्रश्न का ऐतिहासिक उत्तर 9–10 नवंबर 1986 को नासिक जिले के चांदवड में आयोजित विशाल महिला किसान अधिवेशन में मिला।
शेतकारी संगठन संबंधी स्रोतों में इस सम्मेलन में लगभग दो लाख से तीन लाख तक महिलाओं की भागीदारी के अलग-अलग अनुमान मिलते हैं। संख्या में अंतर के बावजूद यह निर्विवाद है कि यह ग्रामीण महिलाओं के सबसे बड़े राजनीतिक जमावड़ों में से एक था।
सम्मेलन के लिए शरद जोशी ने “The Women's Question” शीर्षक से एक पृष्ठभूमि-पत्र तैयार किया था। इसमें उन्होंने स्वीकार किया कि महिलाएं आंदोलन के आरंभ से किसान संघर्षों में सक्रिय थीं, लेकिन संगठन अब तक किसान परिवार की समस्या उठाते हुए महिला की विशिष्ट आर्थिक और सामाजिक अधीनता पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाया था।
शेतकरी महिला आघाड़ी
चांदवड सम्मेलन से शेतकरी महिला आघाड़ी को संगठित स्वरूप मिला।
महिलाओं के प्रश्न अब किसान आंदोलन के सहायक विषय नहीं रहे।
और महिलाओं की सार्वजनिक निर्णय प्रक्रिया में स्वतंत्र भागीदारी।
शेतकारी संगठन की किसान राजनीति इस बिंदु पर पारंपरिक कृषक आंदोलन से आगे निकलती दिखाई देती है।
‘लक्ष्मी मुक्ति’ क्या थी?
1989 में संगठन ने ‘लक्ष्मी मुक्ति’ अभियान शुरू किया।
इसका मूल विचार सरल लेकिन ग्रामीण संपत्ति व्यवस्था की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था—
किसान पुरुष अपनी पत्नी के नाम परिवार की कृषि भूमि अथवा संपत्ति का हिस्सा हस्तांतरित करे।
यह केवल प्रतीकात्मक सम्मान नहीं था।
जमीन के अभिलेख में महिला का नाम आने का अर्थ था कि पहली बार उसके पास परिवार की सबसे महत्वपूर्ण उत्पादक संपत्ति में कानूनी हिस्सेदारी हो सकती थी।
शेतकारी संगठन के स्रोत इसे महिलाओं की संपत्ति-स्वामित्व संबंधी अभियान के रूप में दर्ज करते हैं और 1989 को इसका निर्णायक वर्ष बताते हैं।
विटनेर से आंदोलन तक
महाराष्ट्र में महिला भूमि-अधिकार पर किए गए अध्ययनों के अनुसार लक्ष्मी मुक्ति अभियान का एक महत्वपूर्ण प्रारंभ तत्कालीन धुले जिले के विटनेर गांव से जुड़ा था, जहां शेतकारी संगठन से संबंधित महिलाओं की पंचायत और स्थानीय पहल के संदर्भ में परिवार की भूमि महिलाओं के नाम करने का प्रयोग सामने आया।
बाद में संगठन ने इसे राज्यव्यापी अभियान का रूप दिया।
यह अभियान इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि जमीन का प्रश्न सामान्यतः किसान आंदोलनों में भूमि सुधार अथवा भूमिहीन को जमीन देने के संदर्भ में उठता था।
यहां पहली बार बड़े पैमाने पर प्रश्न था—
जिस किसान परिवार के पास जमीन है, उसमें महिला का स्वामित्व कहां है?
दो लाख महिलाओं का दावा
शेतकारी संगठन से जुड़े स्रोतों में दावा किया गया कि 1991 से 1996 के बीच लगभग दो लाख महिलाओं के नाम भूमि हस्तांतरण के दस्तावेज दर्ज हुए। अन्य अध्ययनों में भी लगभग दो लाख महिलाओं तक भूमि अधिकार पहुंचने का उल्लेख मिलता है।
इस संख्या को संगठन के अपने दावे और संबंधित अध्ययनों के रूप में ही उद्धृत करना उचित है; इसे संपूर्ण सरकारी सत्यापन वाली अंतिम संख्या नहीं माना जाना चाहिए।
फिर भी अभियान का पैमाना असाधारण था।
जमीन क्यों निर्णायक थी?
ग्रामीण समाज में संपत्ति के बिना महिला की आर्थिक निर्भरता बहुत गहरी होती है।
वह खेत में काम करती है, पशुपालन करती है, परिवार संभालती है और कृषि उत्पादन में योगदान करती है; फिर भी जमीन का शीर्षक प्रायः पुरुष के नाम होता है।
पति की मृत्यु, पारिवारिक विवाद अथवा वैवाहिक संकट की स्थिति में महिला की सुरक्षा कमजोर हो सकती है।
भूमि का अधिकार इसलिए केवल कृषि प्रश्न नहीं था।
वह आर्थिक सुरक्षा, पारिवारिक शक्ति और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रश्न था।
स्त्रीवाद और शेतकारी संगठन
शेतकरी महिला आघाड़ी की राजनीति का संबंध समकालीन भारतीय महिला आंदोलन से भी बना, लेकिन दोनों के बीच मतभेद भी रहे।
शेतकारी संगठन ने ग्रामीण परिवार को पूरी तरह पुरुष बनाम महिला संघर्ष के रूप में नहीं देखा। उसका तर्क था कि किसान पुरुष स्वयं राज्य और बाजार की अन्यायपूर्ण संरचना से पीड़ित है, जबकि उसी परिवार के भीतर महिला उससे भी अधिक असमानता झेलती है।
इसलिए महिला मुक्ति और किसान मुक्ति को परस्पर जोड़ने का प्रयास किया गया।
यह दृष्टिकोण आलोचना से मुक्त नहीं था।
कुछ नारीवादी आलोचकों ने पूछा कि पत्नी को भूमि देना पर्याप्त क्यों माना जाए—बेटियों के स्वतंत्र उत्तराधिकार का क्या?
किसी पुरुष द्वारा ‘स्वेच्छा’ से जमीन देने पर निर्भर रहने के बजाय क्या महिला को कानूनन समान अधिकार नहीं होना चाहिए?
फिर भी लक्ष्मी मुक्ति अभियान का ऐतिहासिक महत्व यही है कि उसने महिला किसान को संपत्ति के वास्तविक स्वामित्व से जोड़ दिया।
यह शेतकारी संगठन की ऐसी विरासत है जिसे केवल उसके मुक्त बाजार संबंधी विचारों से नहीं समझा जा सकता।
कर्ज मुक्ति : किसान ऋण को व्यक्तिगत विफलता से नीतिगत अन्याय तक
किसान कर्जदार क्यों है?
शेतकारी संगठन का कृषि ऋण के प्रति दृष्टिकोण भी उसकी मूल्य संबंधी विचारधारा से निकला।
सामान्य दृष्टि में ऋण इस प्रकार समझा जा सकता था—
यदि वह वापस नहीं कर पाया तो वह आर्थिक रूप से असफल रहा।
यदि सरकार की नीति के कारण किसान को वर्षों तक उसकी उपज का उत्पादन लागत से कम मूल्य मिलता रहा है, तो किसान का कर्ज केवल उसका निजी कर्ज नहीं है।
वह उस ऐतिहासिक मूल्य-अंतर का परिणाम है जो कृषि से निकाला गया।
इसलिए ऋणग्रस्त किसान को अपराधी अथवा अपव्ययी मानना अनुचित है।
‘कर्ज’ की नैतिकता उलट देना
यहीं शेतकारी संगठन का कर्ज आंदोलन विशिष्ट था।
संगठन किसान से केवल यह नहीं कह रहा था—
पहले यह हिसाब करो कि पिछले वर्षों में किसान से उसकी उपज कम मूल्य पर खरीदकर कितना आर्थिक अधिशेष लिया गया।
यदि किसान को उसके उत्पादन की वास्तविक कीमत नहीं मिली तो उसकी बैंक देनदारी को अलग से नैतिक अपराध कैसे माना जा सकता है?
इस विचार ने कर्ज को व्यक्तिगत असफलता से निकालकर राजनीतिक अर्थव्यवस्था के प्रश्न में बदल दिया।
1988 का ‘ऋण-मुक्ति’ अभियान
1988 में शेतकारी संगठन ने महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर कर्ज मुक्ति अभियान चलाया।
समकालीन रॉयटर्स विवरण के अनुसार अभियान अप्रैल 1988 से आगे बढ़ा और वर्ष के अंत तक लगभग पांच लाख किसानों द्वारा दिवालियापन संबंधी आवेदन दाखिल किए जाने का दावा किया गया। शरद जोशी ने इसे किसानों में यह नैतिक साहस पैदा करने का अभियान बताया कि वे ऐसी देनदारियां स्वीकार न करें जिन्हें वे अन्यायपूर्ण आर्थिक व्यवस्था का परिणाम मानते हैं।
यह भारतीय किसान आंदोलन में असाधारण रणनीति थी।
सामूहिक रूप से ऋण का प्रश्न अदालत और प्रशासन के सामने ले जाया गया।
लक्ष्य केवल व्यक्तिगत राहत नहीं था।
ग्रामीण ऋण को राष्ट्रीय राजनीतिक संकट के रूप में स्थापित करना।
राज्य सरकार की प्रतिक्रिया
इसी दौर में महाराष्ट्र सरकार ने कृषि ऋण राहत की घोषणाएं कीं। समकालीन रिपोर्टों में लगभग 145 मिलियन डॉलर के बराबर कृषि ऋण माफी का उल्लेख था, जबकि भारतीय रिजर्व बैंक ने व्यापक ऋण माफी के वित्तीय और ऋण-अनुशासन संबंधी दुष्परिणामों पर चिंता जताई।
यह वही बहस है जो भारत में बाद के दशकों में बार-बार लौटती रही—
क्या कृषि ऋण माफी आवश्यक सामाजिक राहत है?
या इससे भविष्य की कृषि ऋण प्रणाली कमजोर होती है?
शेतकारी संगठन ने इसका उत्तर किसान के पक्ष से दिया।
उसके अनुसार केवल वित्तीय अनुशासन की चर्चा पर्याप्त नहीं जब कृषि मूल्य नीति स्वयं किसान की भुगतान क्षमता को नष्ट कर रही हो।
2001 में फिर कर्ज और बिजली का प्रश्न
कर्ज मुक्ति शेतकारी संगठन के लिए 1988 का एकमात्र अभियान नहीं रहा।
दिसंबर 2001 में भी शरद जोशी ने किसानों से सहकारी बैंकों के ऋण और बिजली बिलों के भुगतान को रोकने का आह्वान किया। उस समय संगठन कपास उत्पादकों के भुगतान संबंधी आंदोलन से निकला था और जोशी ने व्यापक ‘debt free’ अभियान की घोषणा की।
इससे स्पष्ट होता है कि संगठन की दृष्टि में किसान कर्ज कृषि संकट का अस्थायी लक्षण नहीं बल्कि दीर्घकालीन संरचनात्मक समस्या थी।
कर्ज माफी या कर्ज से मुक्ति?
शरद जोशी के दृष्टिकोण में एक सूक्ष्म अंतर था।
कर्ज माफी एक बार की सरकारी घोषणा हो सकती है।
लेकिन यदि कृषि उपज लगातार अलाभकारी रहेगी तो किसान कुछ वर्षों बाद फिर कर्ज में डूब जाएगा।
अर्थात पहले किसान को उसके उत्पाद का सही मूल्य मिले।
तभी ऋण असाधारण परिस्थिति का साधन होगा, स्थायी जीवन-व्यवस्था नहीं।
यहीं कर्ज मुक्ति फिर लाभकारी मूल्य के मूल सिद्धांत से जुड़ जाती है।
आलोचना
संगठन की ऋण न चुकाने वाली रणनीति पर आलोचना भी हुई।
बैंकिंग व्यवस्था इस सिद्धांत पर चलती है कि ऋण वापस आएगा।
यदि राजनीतिक आंदोलन बड़े पैमाने पर भुगतान रोकने को प्रोत्साहित करे तो कृषि ऋण देने वाली संस्थाएं भविष्य में अधिक सावधान हो सकती हैं।
ऋण माफी का लाभ कभी-कभी उन किसानों को अधिक मिलता है जिन्होंने औपचारिक बैंक से ऋण लिया है, जबकि सबसे गरीब किसान साहूकार अथवा अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भर हो सकता है।
इसलिए केवल कर्ज माफी ग्रामीण ऋण संकट का पूर्ण समाधान नहीं।
यह आलोचना शरद जोशी के मूल तर्क को निरस्त नहीं करती, लेकिन बताती है कि कृषि ऋण का प्रश्न मूल्य, उत्पादन जोखिम, बैंकिंग और सामाजिक असमानता—चारों से जुड़ा है।
बिजली, सिंचाई और बढ़ती कृषि लागत के विरुद्ध संघर्ष
लाभकारी मूल्य का अर्थ केवल फसल का अधिक दाम नहीं था।
एक तरफ उसे अपनी उपज का क्या मूल्य मिलता है;
दूसरी तरफ उत्पादन करने के लिए उसे कितना खर्च करना पड़ता है।
इसलिए जैसे-जैसे शेतकारी संगठन की राजनीति विकसित हुई, बिजली, सिंचाई, उर्वरक, ऋण और अन्य कृषि लागतें भी उसके आंदोलन का हिस्सा बनीं।
बिजली क्यों केंद्रीय मुद्दा बनी?
सिंचित कृषि में बिजली केवल घरेलू सुविधा नहीं है।
कुएं या नलकूप से पानी निकालने के लिए पंप चलाना हो तो बिजली की दर सीधे कृषि लागत में जुड़ती है।
यदि बिजली दर बढ़ती है, आपूर्ति अनियमित रहती है और फिर भी किसान पर भारी बिल लगाया जाता है तो उसके लिए यह दोहरा संकट बनता है।
शेतकारी संगठन ने समय-समय पर कृषि बिजली दरों की वृद्धि का विरोध किया। शरद जोशी के प्रोफाइल और संगठन संबंधी विवरणों में बिजली शुल्क वृद्धि विरोध को संगठन के प्रमुख आंदोलनों में स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया है।
बिजली बिल न देने की राजनीति
शेतकारी संगठन ने कुछ चरणों में किसानों से बिजली बिलों का भुगतान रोकने का आह्वान भी किया।
इस रणनीति के पीछे वही तर्क था जो ऋण संबंधी आंदोलन में था—
यदि कृषि की आय नीति के कारण दबाई जा रही है तो किसान पर बढ़ते सरकारी शुल्क न्यायसंगत नहीं माने जा सकते।
2001 में जोशी द्वारा ऋण और बिजली बिल दोनों न चुकाने के आह्वान से इन दोनों मुद्दों का संबंध स्पष्ट दिखाई देता है।
मुफ्त बिजली पर जटिल दृष्टिकोण
यहां शरद जोशी की राजनीति को केवल ‘मुफ्त बिजली समर्थक आंदोलन’ समझ लेना गलत होगा।
उनके व्यापक आर्थिक दर्शन में मुफ्त सेवाओं और सब्सिडी के प्रति गहरा संदेह था।
वह किसान को स्थायी सरकारी रियायतों का आश्रित बनाने के बजाय कृषि उत्पाद का उचित मूल्य दिलाने पर अधिक जोर देते थे।
यही शेतकारी संगठन की विचारधारा का एक महत्वपूर्ण अंतर्विरोध भी था।
एक तरफ संगठन तत्काल बिजली दर वृद्धि के विरुद्ध आंदोलन कर सकता था।
दूसरी तरफ उसका दीर्घकालीन दर्शन था—
किसान को इतना लाभकारी मूल्य मिले कि उसे कृत्रिम रियायतों पर निर्भर न रहना पड़े।
इसलिए शरद जोशी की किसान राजनीति को केवल सब्सिडी मांगने वाले आंदोलन में रखना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।
सिंचाई और क्षेत्रीय असमानता
महाराष्ट्र में कृषि संकट को समझने के लिए सिंचाई की क्षेत्रीय असमानता अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पश्चिमी महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में बांध, नहर और सहकारी गन्ना अर्थव्यवस्था विकसित हुई, जबकि विदर्भ और मराठवाड़ा के बड़े हिस्से वर्षा-आश्रित बने रहे।
इसका अर्थ था कि सभी किसानों की लागत और जोखिम एक जैसे नहीं थे।
सिंचित गन्ना किसान बिजली और पानी की दरों से प्रभावित था।
वर्षा-आश्रित कपास किसान मानसून और बाजार मूल्य से कहीं अधिक असुरक्षित था।
इस क्षेत्रीय भिन्नता ने शेतकारी संगठन के लिए चुनौती पैदा की—
क्या एक ही लाभकारी मूल्य का सिद्धांत महाराष्ट्र के सभी कृषक वर्गों को स्थायी रूप से एक कर सकता है?
इस प्रश्न का उत्तर संगठन को अगले वर्षों में तलाशना पड़ा।
कृषि लागत का चक्र
शेतकारी संगठन का तर्क एक चक्र के रूप में समझा जा सकता है।
लेकिन उपज का मूल्य उसी अनुपात में नहीं बढ़ा।
फिर सरकार ने कर्ज राहत अथवा बिजली रियायत दी।
लेकिन यदि फसल फिर अलाभकारी रही तो संकट दोबारा लौट आया।
जोशी के अनुसार इस चक्र को तोड़ने का स्थायी तरीका था—
किसान को उत्पादन लागत और उचित प्रतिफल के अनुरूप बाजार मूल्य देना।
नीति की एक कठिन समस्या
यदि कृषि बिजली पूरी तरह बाजार मूल्य पर दी जाए तो सिंचाई की लागत बहुत बढ़ सकती है।
यदि अत्यधिक सब्सिडी दी जाए तो बिजली वितरण कंपनियों की वित्तीय स्थिति बिगड़ सकती है और भूजल का अंधाधुंध दोहन बढ़ सकता है।
इसी प्रकार सिंचाई शुल्क कम रखना किसान के लिए राहत हो सकता है लेकिन बड़े सिंचित किसानों को अनुपातहीन लाभ भी दे सकता है।
इसलिए बिजली–सिंचाई का प्रश्न किसान बनाम सरकार की सरल लड़ाई नहीं है।
वह कृषि आय, ऊर्जा अर्थशास्त्र, जल संसाधन और पर्यावरणीय स्थिरता का संयुक्त प्रश्न है।
शेतकारी संगठन का योगदान यह था कि उसने इन लागतों को किसान आय की बहस के केंद्र में रखा।
आंदोलन की संघर्ष-पद्धतियां : रास्ता रोको, रेल रोको, सत्याग्रह और किसान लामबंदी
शेतकारी संगठन केवल विचारों के कारण प्रभावशाली नहीं हुआ।
उसकी सफलता का बड़ा कारण उसकी संघर्ष-पद्धति थी।
शरद जोशी ने समझा कि किसान की एक विशिष्ट शक्ति है।
और ग्रामीण उत्पादन को शहर तक पहुंचाने वाली सड़क, मंडी और आपूर्ति श्रृंखला पर उसकी सामूहिक कार्रवाई तत्काल प्रभाव डाल सकती है।
सड़क क्यों बनी राजनीतिक मंच?
शेतकारी संगठन की राजनीति में सड़क का असाधारण महत्व था।
उसका ‘भारत बनाम इंडिया’ सिद्धांत केवल भाषण में नहीं था।
सड़क अवरोध उस सिद्धांत की प्रत्यक्ष राजनीतिक अभिव्यक्ति था।
यदि किसान उसी मार्ग को रोक देता है तो शहर पहली बार किसान की समस्या को अपने रोजमर्रा के जीवन में महसूस करता है।
इंडियन एक्सप्रेस ने भी शरद जोशी की आंदोलन शैली का वर्णन करते हुए लिखा कि उनके आंदोलनों को अक्सर शहरी जीवन पर प्रभाव डालने वाले स्थानों—राजमार्ग और रेल पटरी—पर आयोजित किया जाता था।
रास्ता रोको
चाकण में रास्ता रोको ने संगठन को पहली बड़ी पहचान दी।
इसके बाद गन्ना और दूसरे फसल आंदोलनों में इसका प्रयोग हुआ।
बिखरे हुए गांवों के किसानों को एक साझा मंच देना।
और किसान को यह अनुभव कराना कि उसकी संख्या स्वयं राजनीतिक शक्ति है।
शरद जोशी के शुरुआती आंदोलनों पर समकालीन विवरण में सड़क अवरोध, भू-राजस्व न चुकाना, निर्वाचित प्रतिनिधियों का घेराव और सरकारी कार्यालयों पर कब्जे की प्रस्तावित कार्रवाइयों को उनकी नई संघर्ष रणनीति के हिस्से के रूप में दर्ज किया गया था।
रेल रोको
रेल परिवहन अवरुद्ध करना आंदोलन के अगले चरण की अधिक दबावकारी रणनीति थी।
रेल राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की धमनियों में से एक थी।
इसलिए रेल रोको स्थानीय मांग को तुरंत राज्य और केंद्र सरकार की चिंता में बदल सकता था।
और पुलिस कार्रवाई का खतरा बढ़ता था।
शेतकारी संगठन ने इस जोखिम को स्वीकार किया क्योंकि उसका विश्वास था कि जिस समाज को किसान की आर्थिक पीड़ा दिखाई नहीं देती, उसे उत्पादन व्यवस्था के बाधित होने से उसकी शक्ति का अनुभव कराया जा सकता है।
आपूर्ति रोकना
कृषि आंदोलन में एक और संभावित हथियार था—
दूध, प्याज, गन्ना अथवा अन्य कृषि उत्पाद की आपूर्ति यदि सामूहिक रूप से रोकी जाए तो किसान की उत्पादक शक्ति राजनीतिक दबाव में बदल सकती है।
लेकिन यहां किसान स्वयं भी जोखिम उठाता है।
गन्ना समय पर मिल नहीं पहुंचा तो गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
इसलिए सफल आपूर्ति आंदोलन के लिए बहुत ऊंचे स्तर की सामूहिक अनुशासन और संगठनात्मक एकता आवश्यक होती है।
सामूहिक गिरफ्तारी और सत्याग्रह
शेतकारी संगठन ने अपने आंदोलनों को व्यापक रूप से अहिंसक किसान प्रतिरोध के रूप में प्रस्तुत किया।
आंदोलन में गिरफ्तारी देने और पुलिस कार्रवाई झेलने की तैयारी को संगठनात्मक अनुशासन का हिस्सा माना जाता था।
यह गांधीवादी सत्याग्रह से कुछ तत्व ग्रहण करता था, लेकिन शरद जोशी की भाषा गांधीवादी ग्राम-स्वराज की तुलना में अधिक आधुनिक आर्थिक अधिकारों की थी।
उनका किसान सरकार से नैतिक प्रार्थना मात्र नहीं कर रहा था।
वह आर्थिक उत्पादक के अधिकार के आधार पर दबाव बना रहा था।
संगठन में औपचारिक सदस्यता से अधिक आंदोलन
शेतकारी संगठन की एक महत्वपूर्ण विशेषता उसका अपेक्षाकृत ढीला संगठनात्मक ढांचा था।
शरद जोशी का जोर विस्तृत नौकरशाही संगठन खड़ा करने से अधिक किसानों को मुद्दे के आधार पर लामबंद करने पर था।
उनकी संगठनात्मक विचारधारा का प्रारंभिक रूप 26–27 फरवरी 1981 को अंबाजोगाई में हुए प्रशिक्षण शिविर से निकले पाठ ‘शेतकरी संघटना : विचार आणि कार्यपद्धती’ में मिलता है। यह बाद में संगठन की विचारधारा और कार्यपद्धति के प्रमुख दस्तावेजों में शामिल हुआ।
इसके पीछे विचार था कि किसान को लंबे राजनीतिक प्रशिक्षण के बाद कार्यकर्ता बनाना आवश्यक नहीं।
उसके जीवन का आर्थिक अनुभव स्वयं उसे आंदोलन से जोड़ सकता है।
यदि प्याज का भाव गिरा है तो प्याज किसान समझता है।
यदि कपास मूल्य घटा है तो कपास किसान समझता है।
संगठन का काम उसके अनुभव को व्यापक आर्थिक तर्क और सामूहिक कार्रवाई से जोड़ना था।
राजनीतिक दलों से दूरी
प्रारंभिक दौर में शेतकारी संगठन ने राजनीतिक दलों से स्पष्ट दूरी रखी।
इससे आंदोलन में विभिन्न राजनीतिक विचारों वाले किसान शामिल हो सकते थे।
कांग्रेस समर्थक किसान भी आ सकता था।
इसलिए किसान को अपने आर्थिक हित पर एक होना चाहिए।
यह गैर-दलीयता बाद में हमेशा कायम नहीं रही। शरद जोशी स्वयं अंततः चुनावी और संसदीय राजनीति में प्रवेश करेंगे।
लेकिन संगठन के प्रारंभिक विस्तार में गैर-दलीय किसान पहचान अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
नेतृत्व की शैली
महेंद्र सिंह टिकैत की तरह शरद जोशी ने भी अपनी व्यक्तिगत विश्वसनीयता को संगठन की शक्ति में बदला, लेकिन दोनों की नेतृत्व शैली अलग थी।
टिकैत की शक्ति ग्रामीण बिरादरी, पंचायत और मौखिक जनसंपर्क में थी।
जोशी आर्थिक तर्क, भाषण, लेखन और आंदोलन रणनीति को जोड़ते थे।
उन्होंने किसानों से जटिल आर्थिक मुद्दे सरल भाषा में कहे—
किसान घाटे में है क्योंकि उसका माल सस्ता लिया जाता है।
बाजार प्रतिबंध उसकी स्वतंत्रता रोकते हैं।
इस वैचारिक स्पष्टता ने नेतृत्व को असाधारण प्रभाव दिया।
संघर्ष की कीमत
शेतकारी संगठन की आंदोलनीय शक्ति की एक मानवीय कीमत भी थी।
महिलाओं ने भी पुलिस दमन और सामाजिक दबाव का सामना किया।
इसलिए संगठन की संघर्ष-पद्धति को केवल रोमांचक ‘रास्ता रोको’ राजनीति के रूप में नहीं देखना चाहिए।
इन आंदोलनों में वास्तविक जोखिम मौजूद था।
आंदोलन बनाम संस्था
यहीं शेतकारी संगठन की शक्ति उसकी सीमा भी बनी।
विशाल आंदोलन खड़ा करना और स्थायी संस्था बनाना दो अलग कार्य हैं।
फसल संकट के समय लाखों किसान सड़क पर आ सकते हैं।
लेकिन आंदोलन समाप्त होने के बाद वही एकता बनाए रखना कठिन है।
अलग-अलग फसलों और क्षेत्रों के किसानों के हित हमेशा समान नहीं होते।
बड़े किसान और छोटे किसान के आर्थिक विकल्प अलग हो सकते हैं।
इसलिए शेतकारी संगठन के सामने आगे सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही था—
क्या विशाल किसान लामबंदी को स्थायी सामाजिक और राजनीतिक संस्था में बदला जा सकता है?
यह प्रश्न केवल शेतकारी संगठन का नहीं बल्कि लगभग सभी किसान आंदोलनों का है।
खंड 11–15 का समेकित मूल्यांकन
इन पांच खंडों में शेतकारी संगठन एक फसल-मूल्य आंदोलन से कहीं अधिक व्यापक सामाजिक आंदोलन के रूप में दिखाई देता है।
उसके विकास की दिशा को पांच चरणों में समझा जा सकता है।
पहला — बाजार की स्वतंत्रता। किसान को अपनी उपज बेचने के अधिकतम विकल्प मिलने चाहिए।
दूसरा — महिला की संपत्ति में स्वतंत्र हिस्सेदारी। किसान परिवार की आय बढ़ना पर्याप्त नहीं; परिवार की महिला को जमीन पर वास्तविक अधिकार मिलना चाहिए।
तीसरा — कर्ज की राजनीतिक व्याख्या। ऋणग्रस्तता केवल किसान की व्यक्तिगत आर्थिक विफलता नहीं; अलाभकारी कृषि मूल्य-व्यवस्था का परिणाम भी है।
चौथा — उत्पादन लागत का प्रश्न। बिजली, सिंचाई और अन्य कृषि लागतों को किसान आय से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
पांचवां — प्रत्यक्ष सामूहिक कार्रवाई। किसान की संख्या तभी राजनीतिक शक्ति बनती है जब वह संगठित कार्रवाई में परिवर्तित हो।
इनमें सबसे आश्चर्यजनक विस्तार शायद महिला प्रश्न पर हुआ।
एक ऐसा संगठन जिसकी शुरुआत प्याज के भाव से हुई थी, केवल छह-सात वर्षों में उस स्थिति तक पहुंच गया जहां लाखों ग्रामीण महिलाओं के सम्मेलन और जमीन उनके नाम हस्तांतरित करने का अभियान उसकी राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।
यह शेतकारी संगठन को स्वतंत्र भारत के किसान आंदोलनों में विशिष्ट बनाता है।
‘लक्ष्मी मुक्ति’ की ऐतिहासिक जगह
विशेष रूप से लक्ष्मी मुक्ति अभियान का मूल्यांकन करते समय दो अतियों से बचना आवश्यक है।
इसे भारतीय ग्रामीण महिलाओं की पूर्ण मुक्ति का आंदोलन कहना अतिशयोक्ति होगी।
लेकिन इसे प्रतीकात्मक अभियान भर कहना भी गलत होगा।
जमीन के सरकारी अभिलेख में किसी महिला का नाम जुड़ना वास्तविक आर्थिक घटना थी।
इसलिए शेतकारी संगठन की महिला राजनीति उसकी मुक्त बाजार राजनीति जितनी ही गंभीर अध्ययन की मांग करती है।
किसान को ‘ऋणी’ से ‘लेनदार’ समझने की कोशिश
कर्ज मुक्ति आंदोलन में भी एक वैचारिक परिवर्तन छिपा था।
परंपरागत व्यवस्था किसान को बैंक का ऋणी मानती थी।
पहले यह देखो कि तुम्हारी उपज वर्षों से वास्तविक लागत से कम मूल्य पर खरीदी गई है या नहीं।
यदि ऐसा है तो राज्य और अर्थव्यवस्था का भी तुम पर एक अदृश्य ऋण है।
यह तर्क आर्थिक रूप से कितना सटीक है, इस पर विवाद हो सकता है।
लेकिन राजनीतिक रूप से इसका प्रभाव गहरा था।
उसने शर्म से झुके कर्जदार किसान को यह कहने की भाषा दी कि—
मेरी गरीबी केवल मेरी अक्षमता नहीं है।
यही किसान स्वाभिमान शेतकारी संगठन की पहचान बना।
सड़क से सामाजिक सत्ता तक
खंड 15 तक आते-आते एक और परिवर्तन साफ दिखाई देता है।
संगठन अब केवल सरकार से फसल मूल्य की मांग नहीं कर रहा।
उसकी पत्नी जमीन की मालिक क्यों नहीं?
बैंक का कर्ज न्यायपूर्ण है या नहीं?
ग्रामीण परिवार में निर्णय कौन करता है?
इस प्रकार कृषि मूल्य का प्रश्न धीरे-धीरे ग्रामीण सत्ता, संपत्ति और नागरिक स्वतंत्रता के प्रश्न में बदल रहा था।
लेकिन इस विस्तार के साथ नई कठिनाइयां भी आने वाली थीं।
शेतकारी संगठन किस सामाजिक वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है?
क्या छोटे और बड़े किसान के हित समान हैं?
क्या मराठा किसान और आदिवासी किसान एक ही आर्थिक मंच पर स्थायी रूप से रह सकते हैं?
महाराष्ट्र की शक्तिशाली सहकारी राजनीति से संगठन का रिश्ता क्या होगा?
क्या राजनीतिक दलों से दूरी बनाए रखकर किसान आर्थिक नीति बदल सकता है, या अंततः उसे स्वयं चुनावी राजनीति में उतरना पड़ेगा?
शेतकारी संगठन का सामाजिक आधार : छोटा किसान, मध्यम किसान या समृद्ध कृषक?
शेतकारी संगठन की सामाजिक संरचना को लेकर शुरुआत से ही गंभीर बहस रही है।
आंदोलन स्वयं को ‘शेतकरी’ अर्थात किसान की साझा आर्थिक पहचान पर खड़ा करता था। उसके लिए प्याज, कपास, गन्ना, तंबाकू या दूसरी फसल उगाने वाले किसानों का साझा हित यह था कि वे उत्पादन करते हैं और बाजार में अपने उत्पाद का पर्याप्त मूल्य नहीं पाते।
क्या सभी किसान समान आर्थिक वर्ग हैं?
यहीं से शेतकारी संगठन की सामाजिक संरचना की बहस शुरू होती है।
व्यावसायिक खेती करने वाले किसान
आंदोलन का प्रारंभ जिन क्षेत्रों में हुआ, वहां एक महत्वपूर्ण समानता थी।
चाकण का प्याज किसान बाजार के लिए फसल उगा रहा था।
नासिक का गन्ना किसान चीनी मिल से जुड़ा था।
विदर्भ का कपास किसान वस्त्र उद्योग और सरकारी खरीद व्यवस्था से जुड़ा था।
निपाणी का तंबाकू उत्पादक भी बाजार पर निर्भर था।
अर्थात आंदोलन का प्रारंभिक आधार मुख्यतः उन कृषकों में बना जिनके लिए कृषि केवल आत्मनिर्भर जीवन का साधन नहीं बल्कि बाजार से जुड़ी आर्थिक गतिविधि थी।
इसी कारण अनेक अध्ययनों ने शेतकारी संगठन को ‘नए किसान आंदोलनों’ की उस धारा में रखा जिसमें मध्यम और अपेक्षाकृत संपन्न बाजारोन्मुख किसान महत्वपूर्ण सामाजिक आधार थे। समकालीन विश्लेषणों में इसे कभी ‘rich किसान आंदोलन’, कभी ‘middle किसान mobilisation’ और कभी ‘commercial किसान’ आंदोलन’ कहा गया।
लेकिन केवल इतना कहना भी अधूरा होगा।
छोटे किसानों की भागीदारी
शेतकारी संगठन के विशाल आंदोलनों में बड़ी संख्या में छोटे और सीमांत किसान भी शामिल हुए।
फसल का मूल्य गिरने पर बड़े किसान का कुल नुकसान अधिक हो सकता है, लेकिन छोटा किसान आर्थिक रूप से अधिक असुरक्षित होता है। उसके पास माल रोककर रखने की क्षमता कम होती है और उसे तत्काल नकदी की आवश्यकता अधिक हो सकती है।
इसलिए लाभकारी मूल्य की मांग केवल बड़े किसानों का प्रश्न नहीं थी।
समकालीन अध्ययनों में यह भी स्वीकार किया गया कि यद्यपि आंदोलन की नेतृत्वकारी शक्ति कई क्षेत्रों में मध्यम और समृद्ध किसानों से आई, उसने छोटे कृषकों को भी व्यापक संख्या में आकर्षित किया।
खेत मजदूर का प्रश्न
यहीं संगठन की एक गंभीर सीमा दिखाई देती है।
कृषि उपज का अधिक मूल्य किसान के लिए लाभकारी हो सकता है, लेकिन भूमिहीन खेत मजदूर की आर्थिक स्थिति अलग है।
यदि कृषि लाभ बढ़ता है तो संभव है कि रोजगार और मजदूरी पर सकारात्मक प्रभाव पड़े, लेकिन इसकी कोई स्वचालित गारंटी नहीं।
इसीलिए वामपंथी आलोचना ने कहा कि ‘किसान’ की एकीकृत पहचान ग्रामीण समाज के भीतर भूमि मालिक और भूमिहीन के वर्गीय अंतर को ढक सकती है।
शरद जोशी का उत्तर यह था कि कृषि क्षेत्र की समग्र समृद्धि अंततः ग्रामीण मजदूर को भी लाभ पहुंचाएगी।
लेकिन यह संबंध प्रत्यक्ष और समान नहीं था।
यही शेतकारी संगठन की सामाजिक राजनीति का सबसे बड़ा वैचारिक विवाद रहा।
जाति का प्रश्न
महाराष्ट्र की ग्रामीण राजनीति को जाति से अलग करके नहीं समझा जा सकता।
विशेष रूप से मराठा–कुनबी कृषक समुदाय राज्य की कृषि और राजनीतिक संरचना में लंबे समय से प्रभावशाली रहा है।
गन्ना सहकारिता, जिला बैंक, पंचायत संस्थाएं और विधानसभा राजनीति में इन समूहों का महत्वपूर्ण प्रतिनिधित्व था।
इसके बावजूद शरद जोशी स्वयं इस पारंपरिक मराठा ग्रामीण अभिजात वर्ग से नहीं आते थे।
उनका नेतृत्व जातीय बिरादरी की परंपरागत पंचायत से नहीं बल्कि आर्थिक मुद्दे और वैचारिक भाषा से बना।
बाद के महाराष्ट्र किसान आंदोलनों के अध्ययन में भी यह तथ्य सामने आता है कि किसान मूल्य का प्रश्न कई बार जातिगत विभाजनों को पार कर सकता था। उदाहरण के लिए पश्चिमी महाराष्ट्र की किसान राजनीति में ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहां गैर-मराठा किसान नेता को भी मराठा कृषकों का व्यापक समर्थन मिला।
क्षेत्रीय विविधता
शेतकारी संगठन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक यह थी कि उसने महाराष्ट्र की अलग-अलग कृषि अर्थव्यवस्थाओं को एक मंच पर जोड़ने की कोशिश की।
पुणे–नासिक का प्याज और गन्ना क्षेत्र,
इसलिए संगठन की एकता किसी समान फसल पर आधारित नहीं थी।
“उत्पादक किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य।”
‘किसान वर्ग’ की एकता की सीमा
लेकिन कृषि समाज की वास्तविकता इस नारे से अधिक जटिल थी।
यही कारण है कि शेतकारी संगठन की ‘किसान एकता’ ऐतिहासिक रूप से शक्तिशाली तो रही, लेकिन स्थायी रूप से एकसमान सामाजिक वर्ग में नहीं बदल सकी।
यह समस्या आगे उसके राजनीतिक विखंडन में भी दिखाई देगी।
शेतकारी संगठन बनाम महाराष्ट्र की सहकारी सत्ता
महाराष्ट्र में किसान आंदोलन का अर्थ केवल सरकार से संघर्ष नहीं था।
राज्य की ग्रामीण सत्ता का एक बड़ा हिस्सा सहकारी संस्थाओं के माध्यम से संचालित होता था।
विशेष रूप से चीनी सहकारिता ने स्वतंत्रता के बाद महाराष्ट्र की राजनीति पर असाधारण प्रभाव डाला।
सहकारी चीनी मिल : उद्योग से अधिक राजनीतिक संस्था
चीनी मिल के चारों ओर केवल गन्ना खरीद नहीं होती थी।
इसलिए सहकारी चीनी मिलें राजनीतिक शक्ति के केंद्र बन गईं।
आर्थिक अध्ययनों ने 1950 के दशक से महाराष्ट्र के गन्ना उत्पादक समृद्ध कृषक वर्ग और चीनी सहकारी संस्थाओं के बीच बने संबंध को ग्रामीण सत्ता के महत्वपूर्ण आधार के रूप में रेखांकित किया है।
कांग्रेस का ग्रामीण नेटवर्क
महाराष्ट्र में लंबे समय तक कांग्रेस की ताकत केवल शहरी संगठन से नहीं आई।
सहकारी चीनी मिलों, जिला बैंकों, पंचायत समितियों और कृषि संस्थाओं से निकले नेता कांग्रेस की राज्य राजनीति के प्रमुख स्तंभ बने।
इस व्यवस्था का दावा था कि सहकारिता किसान को निजी पूंजी से मुक्त करके स्वयं उसका उद्योग खड़ा करती है।
शेतकारी संगठन ने इस मॉडल से एक असुविधाजनक प्रश्न पूछा—
यदि मिल किसान की है तो गन्ने का मूल्य तय करते समय किसान को आंदोलन क्यों करना पड़ता है?
गन्ना क्षेत्रबंदी का विरोध
शेतकारी संगठन ने गन्ना किसानों पर लागू उन व्यवस्थाओं का विरोध किया जिनसे उन्हें निर्धारित चीनी मिल को गन्ना बेचना पड़ता था।
जोशी का तर्क था कि किसान को मिल चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।
यदि निकट की मिल कम मूल्य दे रही है और दूसरी मिल अधिक मूल्य देने को तैयार है तो किसान को बेहतर खरीदार चुनने से क्यों रोका जाए?
इस मांग का सीधा टकराव सहकारी चीनी व्यवस्था से था।
शेतकारी संगठन के इतिहास में ‘जोनल प्रतिबंध’ हटाने की मांग उसके मुक्त बाजार अभियान का प्रमुख हिस्सा रही।
कपास में भी वही संघर्ष
महाराष्ट्र राज्य सहकारी कपास विपणन महासंघ के एकाधिकार के विरुद्ध 1984 का अभियान विशेष रूप से महत्वपूर्ण था।
सरकार का दावा था कि एकाधिकार खरीद व्यवस्था किसान को व्यापारी शोषण से बचाती है।
यदि किसान को दूसरे राज्य में अधिक मूल्य मिलता है तो उसे वहां बेचने की अनुमति होनी चाहिए।
आंदोलनकारियों ने कपास लेकर राज्य सीमा पार करने का प्रयास करके सीधे इस व्यवस्था को चुनौती दी।
सहकारिता की आलोचना का अर्थ निजीकरण नहीं था
यहां एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सावधानी आवश्यक है।
शेतकारी संगठन का विरोध ‘सहकारिता’ के सिद्धांत से नहीं बल्कि एकाधिकार और राजनीतिक नियंत्रण से था।
यदि किसान स्वयं किसी संस्था का मालिक है और स्वेच्छा से उसमें भाग लेता है तो यह जोशी के आर्थिक स्वतंत्रता के सिद्धांत से आवश्यक रूप से विरोधी नहीं था।
समस्या तब थी जब सहकारी संस्था राजनीतिक सत्ता का विस्तार बन जाए और किसान के पास विकल्प समाप्त हो जाए।
इसलिए उनके लिए केंद्रीय प्रश्न संस्था के स्वामित्व का नाम नहीं बल्कि—
ग्रामीण अभिजात वर्ग से संघर्ष
सहकारी संस्थाओं के निदेशक ही स्थानीय राजनीतिक नेता हो सकते थे।
उनके नियंत्रण में ग्रामीण क्रेडिट और संस्थागत संसाधन हो सकते थे।
इसलिए शेतकारी संगठन उन किसानों को उन्हीं नेताओं के विरुद्ध खड़ा कर रहा था जिन्हें लंबे समय तक ‘किसान नेतृत्व’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा था।
यही उसका सबसे बड़ा राजनीतिक नवाचार था।
उसने ग्रामीण सत्ता को दो हिस्सों में बांटा—
किसान होने का दावा करने वाला राजनीतिक अभिजात वर्ग और वास्तव में बाजार में अपनी फसल बेचने वाला किसान।
संगठन की अपनी कठिनाई
लेकिन यह विभाजन भी हमेशा इतना स्पष्ट नहीं था।
संपन्न गन्ना उत्पादक स्वयं सहकारी मिल में हिस्सेदार हो सकता था।
वह संगठन की मूल्य मांग का समर्थक भी हो सकता था और स्थानीय सहकारी राजनीति का हिस्सा भी।
इसीलिए शेतकारी संगठन ने कांग्रेस की ग्रामीण सत्ता में सेंध तो लगाई, लेकिन उसे पूरी तरह विस्थापित नहीं कर पाया।
गैर-दलीय किसान आंदोलन से चुनावी राजनीति तक
शेतकारी संगठन के शुरुआती दौर की सबसे आकर्षक विशेषताओं में एक थी उसकी गैर-दलीय पहचान।
शरद जोशी का तर्क था कि किसान को राजनीतिक दलों का वोट बैंक बनने के बजाय अपनी स्वतंत्र आर्थिक शक्ति बनानी चाहिए।
लेकिन यही सिद्धांत आगे चलकर कठिन प्रश्न से टकराया—
यदि नीति संसद और विधानसभाएं बनाती हैं, तो किसान आंदोलन हमेशा उनके बाहर रहकर नीति कैसे बदलेगा?
यह प्रश्न 1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक में अधिक तीखा हुआ।
‘राजकारण नहीं’ की सीमा
आंदोलन के शुरुआती वर्षों में राजनीतिक दलों से दूरी लाभकारी थी।
अलग-अलग दलों के किसान एक मंच पर आ सकते थे।
किसान संगठन स्वयं को कांग्रेस, समाजवादी, कम्युनिस्ट अथवा हिंदुत्ववादी राजनीति की शाखा बनने से बचा सकता था।
लेकिन जैसे ही संगठन को व्यापार नीति, कृषि मूल्य, संविधान, कर व्यवस्था और आर्थिक सुधार जैसे व्यापक प्रश्नों पर हस्तक्षेप करना पड़ा, राजनीति से पूर्ण दूरी असंभव होने लगी।
यह एक लगभग सार्वभौमिक किसान आंदोलन समस्या है—
राष्ट्रीय किसान समन्वय
शरद जोशी ने महाराष्ट्र से बाहर भी किसान संगठनों के बीच समन्वय बनाने की कोशिश की।
विभिन्न राज्यों के किसान संगठनों को जोड़कर व्यापक किसान मंच खड़ा करने का प्रयास हुआ।
इससे कृषि मूल्य, व्यापार और ग्रामीण ऋण को राष्ट्रीय राजनीति में जगह मिली।
लेकिन अलग-अलग किसान नेताओं की वैचारिक दिशाएं समान नहीं थीं।
इसलिए किसान एकता राष्ट्रीय मंच पर भी स्थायी वैचारिक एकता में नहीं बदल सकी।
स्वतंत्र भारत पक्ष की स्थापना
1990 के दशक में शरद जोशी ने यह स्वीकार किया कि आर्थिक उदारवाद का उनका कार्यक्रम केवल किसान संगठन के माध्यम से पूरा नहीं होगा।
1994 में उन्होंने स्वतंत्र भारत पक्ष की स्थापना की। पार्टी स्वयं को उदारवादी राजनीतिक दल के रूप में प्रस्तुत करती थी और बाजार स्वतंत्रता, सीमित राज्य नियंत्रण तथा व्यक्तिगत आर्थिक अधिकारों को महत्व देती थी।
यह शेतकारी संगठन के इतिहास में निर्णायक मोड़ था।
अब वह नेता जिसने किसान आंदोलन को दलगत राजनीति से अलग रखने की कोशिश की थी, स्वयं राजनीतिक दल बना रहा था।
आलोचना और विभाजन
बहुत से कार्यकर्ता किसान संगठन को राजनीतिक दल में बदलते देखना नहीं चाहते थे।
कुछ स्वयं दूसरे राजनीतिक दलों से जुड़े थे।
कई लोगों का मानना था कि चुनावी राजनीति आंदोलन की स्वतंत्रता नष्ट कर देगी।
किसान आंदोलनों के इतिहास पर बाद के विश्लेषणों में स्वतंत्र भारत पक्ष की स्थापना को शेतकारी संगठन के भीतर विभाजन और कार्यकर्ताओं के दूर होने के कारणों में गिना गया है।
चुनावी सफलता सीमित क्यों रही?
सड़क पर हजारों या लाखों किसान जुटाना और चुनाव जीतना एक समान राजनीतिक क्षमता नहीं है।
आंदोलन का समर्थक किसान चुनाव में जाति, उम्मीदवार, स्थानीय समीकरण, पार्टी गठबंधन और राष्ट्रीय मुद्दों के आधार पर अलग वोट दे सकता है।
उसकी आंदोलनकारी शक्ति विशाल थी, लेकिन स्वतंत्र भारत पक्ष उस अनुपात में चुनावी शक्ति नहीं बना।
2004 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में पार्टी ने सीमित सीटों पर चुनाव लड़ा और राजुरा से वामनराव चटप जीतने में सफल रहे।
यह सफलता प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण थी, लेकिन राज्यव्यापी आंदोलन को राज्यव्यापी चुनावी दल में बदलने के लिए पर्याप्त नहीं।
NDA के साथ संबंध
2004 के आसपास शरद जोशी ने भारतीय जनता पार्टी–शिवसेना के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साथ राजनीतिक सहयोग किया।
इसी राजनीतिक संदर्भ में वे बाद में राज्यसभा पहुंचे।
इस कदम ने उनके समर्थकों के बीच एक और प्रश्न पैदा किया—
क्या स्वतंत्र किसान राजनीति किसी बड़े गठबंधन का हिस्सा बनकर अपनी स्वायत्तता बचा सकती है?
जोशी का उत्तर व्यावहारिक था—नीति बदलने के लिए सत्ता संरचना के भीतर उपस्थित होना आवश्यक है।
लेकिन आलोचकों का कहना था कि इससे शेतकारी संगठन की गैर-दलीय विश्वसनीयता कमजोर हुई।
आंदोलन से पार्टी : उपलब्धि या विफलता?
शरद जोशी ने किसान आंदोलन को यह कठिन प्रश्न वास्तविक रूप में जीकर दिखाया कि—
सड़क की ताकत को कानून में कैसे बदला जाए?
लेकिन अनुभव ने यह भी दिखाया कि आंदोलन की सामाजिक गठबंधन क्षमता चुनावी गठबंधन क्षमता के समान नहीं होती।
यही अंतर संगठन के बाद के विखंडन का एक बड़ा कारण बना।
राज्यसभा में शरद जोशी : आंदोलनकारी किसान नेता से नीति-निर्माता तक
5 जुलाई 2004 से 4 जुलाई 2010 तक शरद जोशी महाराष्ट्र से राज्यसभा सदस्य रहे। उनके संसदीय अभिलेखों के अनुसार वे जुलाई 2004 में निर्विरोध चुने गए और स्वतंत्र भारत पक्ष के अकेले संसदीय प्रतिनिधि थे।
इस छह वर्ष के कार्यकाल का महत्व केवल इतना नहीं है कि एक किसान नेता संसद पहुंचा।
महत्व यह है कि सड़क पर विकसित उनकी आर्थिक विचारधारा अब सीधे राष्ट्रीय नीति-निर्माण के मंच पर पहुंच गई।
संसद में कौन-से प्रश्न?
जोशी का संसदीय हस्तक्षेप कृषि तक सीमित नहीं था।
उन्होंने किसान आत्महत्या, कृषि मूल्य, आर्थिक उदारीकरण, व्यापार नीति, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राज्य की भूमिका जैसे प्रश्न उठाए।
उनकी संसदीय सामग्री में जुलाई 2004 से जुलाई 2010 तक के भाषणों का विस्तृत संग्रह उपलब्ध है।
यहां उनकी पुरानी विचारधारा बनी रही—
किसान संकट को केवल राहत पैकेज से नहीं बल्कि कृषि के विरुद्ध मूल्य और व्यापार संरचना के संदर्भ में समझना होगा।
किसान आत्महत्या का प्रश्न
2000 के दशक में विदर्भ सहित महाराष्ट्र के कई हिस्सों में किसान आत्महत्या राष्ट्रीय चिंता का विषय बनी।
उनका तर्क था कि लगातार अलाभकारी कृषि, ऋण और बाजार प्रतिबंध किसान को आर्थिक रूप से असहनीय स्थिति में पहुंचाते हैं।
इसी कारण वे राहत पैकेज से अधिक कृषि को लाभकारी बनाने पर जोर देते रहे।
उनके बाद के WTO संबंधी पत्र में भी कृषि मूल्य दबाने वाली सरकारी नीतियों को किसान आत्महत्याओं से जोड़कर देखा गया।
संसद के भीतर एक सीमित आवाज
उनके अपने संसदीय विवरण से एक विडंबना सामने आती है।
संगठन की वेबसाइट पर प्रकाशित टिप्पणी के अनुसार जोशी राज्यसभा के अनुभव से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे। किसान आत्महत्या जैसे गंभीर विषय पर उन्हें कुछ मिनटों में अपनी वैकल्पिक आर्थिक दृष्टि समझानी पड़ती थी, जबकि किसान आंदोलनों में वे घंटों संवाद कर सकते थे।
यह आंदोलनकारी और संसदीय राजनीति के बीच अंतर को बहुत स्पष्ट करता है।
सड़क पर नेता अपनी भाषा और समय तय करता है।
संसद में प्रक्रिया, दल और समय-सीमा तय करते हैं कि वह कितना बोल सकता है।
संविधान और ‘समाजवाद’
जोशी का आर्थिक उदारवाद केवल कृषि नीति तक सीमित नहीं रहा।
उन्होंने संविधान की प्रस्तावना से ‘समाजवादी’ शब्द हटाने के उद्देश्य से निजी सदस्य विधेयक पेश किया था। उनके संसदीय संस्मरणों में इसे अपने महत्वपूर्ण हस्तक्षेपों में गिना गया है।
यह महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि 2000 के दशक तक शरद जोशी स्वयं को केवल किसान मूल्य नेता के रूप में नहीं बल्कि व्यापक उदारवादी राजनीतिक विचारक के रूप में देखते थे।
महिला आरक्षण पर विवाद
यहां उनकी राजनीति का एक गंभीर विवाद भी उल्लेखनीय है।
महिला किसानों के संपत्ति अधिकार और शेतकरी महिला आघाड़ी को आगे बढ़ाने वाले जोशी ने संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण की घूर्णन-आधारित व्यवस्था पर आपत्ति जताई।
राज्यसभा की संसदीय समिति के अभिलेख उनके स्वतंत्र भारत पक्ष की ऐसी आरक्षण व्यवस्था पर गंभीर आपत्तियों को दर्ज करते हैं।
यह पहली नजर में विरोधाभासी लगता है।
लेकिन जोशी इसे महिला अधिकार के विरोध के रूप में नहीं बल्कि आरक्षण-आधारित राजनीतिक प्रतिनिधित्व की पद्धति के विरोध के रूप में प्रस्तुत करते थे।
फिर भी इस रुख ने उनके महिला आंदोलन की विरासत और उदारवादी व्यक्तिगत अधिकार सिद्धांत के बीच तीखी बहस पैदा की।
संसद ने क्या बदला?
राज्यसभा का कार्यकाल शरद जोशी को राष्ट्रीय नीति में आवाज देता है, लेकिन इससे उनके किसान आंदोलन की पूर्व शक्ति पुनर्जीवित नहीं हुई।
वास्तव में उनकी अपनी संगठनात्मक सामग्री स्वीकार करती है कि दिल्ली में समय बिताने के कारण किसान आधार से उनकी दूरी बढ़ी और संगठनात्मक अनुशासन प्रभावित हुआ।
यह किसान आंदोलनों का एक परिचित विरोधाभास है—
नेता सत्ता के केंद्र में पहुंचता है, लेकिन उसी प्रक्रिया में आंदोलन के सामाजिक आधार से दूरी बढ़ सकती है।
1991 के आर्थिक सुधार, वैश्वीकरण और WTO : शेतकारी संगठन का असामान्य समर्थन
यह शेतकारी संगठन की विचारधारा का सबसे विवादास्पद और शायद सबसे विशिष्ट अध्याय है।
1990 के दशक में जब भारत आर्थिक उदारीकरण की ओर बढ़ा और विश्व व्यापार संगठन तथा कृषि के वैश्वीकरण को लेकर व्यापक विरोध शुरू हुआ, तब अधिकांश किसान संगठनों की सहज प्रतिक्रिया थी—
विदेशी कंपनियों और वैश्विक बाजार से भारतीय किसान को खतरा है।
शरद जोशी ने लगभग उलटा तर्क प्रस्तुत किया।
भारतीय किसान का सबसे बड़ा शत्रु विदेशी बाजार नहीं बल्कि अपने ही देश की वह नीति-व्यवस्था है जिसने दशकों तक उसे बाजार से बांधकर रखा।
1991 का आर्थिक परिवर्तन
1991 के आर्थिक संकट के बाद भारत ने औद्योगिक लाइसेंसिंग में कमी, व्यापार उदारीकरण, निजी निवेश और वैश्विक अर्थव्यवस्था से अधिक जुड़ाव की नीति अपनाई।
शरद जोशी ने इस परिवर्तन को कृषि के लिए संभावित अवसर के रूप में देखा।
उनकी शिकायत थी कि औद्योगिक क्षेत्र को आर्थिक स्वतंत्रता दी जा रही है लेकिन कृषि पर अभी भी—
यदि उद्योग को लाइसेंस राज से मुक्त किया जा सकता है तो किसान को क्यों नहीं?
GATT और WTO पर समर्थन
1990 के दशक में उरुग्वे दौर की व्यापार वार्ताओं और बाद में विश्व व्यापार संगठन की स्थापना ने भारत में तीखी राजनीतिक बहस पैदा की।
कर्नाटक राज्य रैयत संघ जैसे संगठनों ने बहुराष्ट्रीय कृषि कंपनियों और वैश्वीकरण के विरुद्ध आंदोलन किया।
जोशी का मानना था कि भारतीय किसान, यदि घरेलू नियंत्रण से मुक्त हो और विश्व बाजार तक पहुंच पाए, तो वह प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम है।
उनके बाद के लेखन में यह विश्वास स्पष्ट दिखाई देता है कि परिवहन, संचार और सूचना क्रांति ने कृषि को वैश्विक बाजार से जोड़ दिया है और भारतीय किसान के सामने नई तकनीक तथा निर्यात बाजार अवसर भी पैदा कर सकते हैं।
किसान वैश्वीकरण से क्यों डरे?
यदि भारतीय किसान कम लागत पर कपास, फल, सब्जियां अथवा अन्य कृषि उत्पाद पैदा कर सकता है तो वैश्विक बाजार उसके लिए केवल खतरा क्यों माना जाए?
उसके लिए तो विदेशी ग्राहक भी ग्राहक है।
यदि विदेश में बेहतर मूल्य मिलता है तो किसान को उसे बेचने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।
यही कारण था कि वे वैश्वीकरण और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कृषि क्षेत्र में प्रवेश का सिद्धांततः विरोध नहीं करते थे। समकालीन विवरण उन्हें भारत के प्रमुख किसान नेताओं में वैश्वीकरण और कृषि में बहुराष्ट्रीय निवेश के सबसे स्पष्ट समर्थकों में गिनते हैं।
‘स्वतंत्र व्यापार’ लेकिन समान नियम
जोशी के समर्थन को बिना शर्त वैश्वीकरण समर्थन समझना गलत होगा।
उनकी मुख्य शिकायत थी कि वैश्विक व्यापार तभी न्यायपूर्ण होगा जब भारतीय किसान को भी वही स्वतंत्रता और प्रतिस्पर्धी अवसर मिले जो अन्य देशों के उत्पादकों को हैं।
यदि विकसित देश अपने किसानों को भारी सहायता दें और भारतीय किसान पर घरेलू बाजार प्रतिबंध भी बने रहें तो प्रतिस्पर्धा असमान होगी।
इसलिए उनका लक्ष्य केवल आयात खोलना नहीं था।
कृषि को वास्तविक व्यापारिक स्वतंत्रता देना।
बीज और नई तकनीक
यही विचार कृषि जैव-प्रौद्योगिकी के प्रति उनके रुख में भी दिखाई दिया।
जहां वैश्वीकरण-विरोधी किसान आंदोलन बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों और आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों को किसान स्वायत्तता के लिए खतरा मान रहे थे, वहीं जोशी का दृष्टिकोण अधिक तकनीक-समर्थक था।
उनका तर्क था कि किसान को यह तय करने का अधिकार होना चाहिए कि कौन-सा बीज और कौन-सी तकनीक उसके लिए लाभकारी है।
अर्थात निर्णय सरकार या आंदोलनकारी वैचारिक नेतृत्व के बजाय किसान को करना चाहिए।
यह ‘तकनीक की स्वतंत्रता’ उनके बाजार स्वतंत्रता सिद्धांत का विस्तार था।
KRRS से तीखा अंतर
यहीं शेतकारी संगठन और कर्नाटक राज्य रैयत संघ के बीच सबसे बड़ा वैचारिक अंतर सामने आता है।
दोनों किसान स्वाभिमान की बात करते थे।
दोनों राज्य की कृषि नीति से असंतुष्ट थे।
दोनों विशाल किसान लामबंदी कर सकते थे।
लेकिन वैश्वीकरण के प्रश्न पर वे लगभग विपरीत दिशाओं में चले गए।
KRRS ने वैश्वीकरण, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, बीज पेटेंट और WTO को किसान संप्रभुता के लिए खतरा माना।
शेतकारी संगठन ने सरकारी संरक्षणवादी नियंत्रण को किसान की स्वतंत्रता के लिए बड़ा खतरा माना और वैश्विक बाजार को अवसर के रूप में देखा।
यह तुलना आगे खंड 23 में विस्तार से आएगी।
आंदोलन के भीतर विभाजन
वैश्वीकरण पर जोशी के समर्थन ने शेतकारी संगठन के भीतर भी असहमति पैदा की।
किसान आंदोलनों के इतिहास पर शोध में उनके GATT और आर्थिक सुधार समर्थन को संगठन तथा अंतरराज्यीय किसान समन्वय में विभाजन के प्रमुख कारणों में गिना गया है।
किसान के लिए मुक्त बाजार दो अनुभव दे सकता है—
लेकिन निजी बीज पर निर्भरता लागत बढ़ा सकती है।
निजी खरीदार प्रतिस्पर्धा बढ़ा सकता है।
लेकिन बड़ी कंपनी बाजार शक्ति भी अर्जित कर सकती है।
यही कारण है कि शरद जोशी की वैश्वीकरण समर्थक किसान राजनीति कभी भारतीय किसान आंदोलनों की सर्वसम्मत धारा नहीं बन सकी।
‘जोशी विरोधाभास’ : बाजार की स्वतंत्रता और कमजोर किसान
खंड 20 तक पहुंचते-पहुंचते शेतकारी संगठन के सामने मूल आर्थिक प्रश्न और स्पष्ट हो जाता है।
यदि सरकार कृषि पर नियंत्रण रखे तो किसान की स्वतंत्रता कम होती है।
लेकिन यदि राज्य पूरी तरह हट जाए तो क्या छोटा किसान शक्तिशाली निजी खरीदार से समान स्तर पर बातचीत कर सकता है?
यही शरद जोशी की विचारधारा पर सबसे गहरी आलोचना है।
किसान को कमजोर मानकर उसकी स्वतंत्रता नहीं छीनी जा सकती।
किसान संगठन, सहकारी प्रतिस्पर्धा, तकनीक, सूचना और खुले बाजार के माध्यम से अपनी शक्ति बढ़ा सकता है।
स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब शक्ति में न्यूनतम समानता भी मौजूद हो।
इसी बहस का आधुनिक संस्करण 2020–21 के कृषि कानून विवाद में फिर दिखाई देगा।
1991 के बाद शेतकारी संगठन का ऐतिहासिक महत्व
शेतकारी संगठन के वैश्वीकरण संबंधी रुख को उसकी शुरुआती राजनीति से अलग नहीं समझना चाहिए।
इस दृष्टि से WTO समर्थन वैचारिक पलटी नहीं बल्कि शरद जोशी के मुक्त बाजार सिद्धांत का तार्किक विस्तार था।
लेकिन इस विस्तार ने आंदोलन का सामाजिक आधार संकुचित भी किया।
क्योंकि मुक्त व्यापार पर किसान समाज की सहमति लाभकारी मूल्य की मांग जितनी व्यापक नहीं थी।
खंड 16–20 का समेकित मूल्यांकन
इन पांच खंडों तक पहुंचते-पहुंचते शेतकारी संगठन की यात्रा में एक गहरा परिवर्तन दिखाई देता है।
1979 में वह फसल के मूल्य का आंदोलन था।
1980 के दशक में वह किसान स्वाभिमान और बाजार स्वतंत्रता का आंदोलन बना।
महिला आघाड़ी और लक्ष्मी मुक्ति ने उसे सामाजिक अधिकार आंदोलन का आयाम दिया।
कर्ज और बिजली आंदोलन ने कृषि लागत को राजनीति में रखा।
और 1990 के दशक में वह एक व्यापक उदारवादी आर्थिक परियोजना में बदलने लगा।
यहीं उसकी शक्ति और संकट दोनों उत्पन्न हुए।
पहली शक्ति — किसान की स्वतंत्र पहचान
शेतकारी संगठन ने किसान को कांग्रेस, वामपंथ अथवा किसी अन्य दल की सहायक सामाजिक शक्ति मानने से इनकार किया।
किसान स्वयं एक राजनीतिक आर्थिक हित-समूह है।
दूसरी शक्ति — ग्रामीण सत्ता को चुनौती
सहकारी संस्थाओं के नाम पर स्थापित ग्रामीण राजनीतिक अभिजात वर्ग को उसने किसान हित का स्वतः प्रतिनिधि मानने से इनकार किया।
तीसरी शक्ति — आर्थिक विचार की स्पष्टता
जोशी ने कृषि राजनीति को केवल ‘राहत’ और ‘सब्सिडी’ से बाहर निकालकर मूल्य, बाजार, व्यापार और स्वतंत्रता की भाषा दी।
पहली सीमा — किसान वर्ग की विविधता
सभी किसानों का बाजार हित समान नहीं था।
छोटे, बड़े, सिंचित, वर्षा-आश्रित और भूमिहीन ग्रामीण वर्गों के बीच गहरे अंतर बने रहे।
दूसरी सीमा — आंदोलन से चुनाव तक
सड़क की भीड़ मतपेटी में उसी अनुपात में वोट नहीं बनी।
स्वतंत्र भारत पक्ष व्यापक चुनावी विकल्प नहीं बन सका।
तीसरी सीमा — वैश्वीकरण पर विभाजन
लाभकारी मूल्य पर जो व्यापक किसान एकता संभव थी, वह WTO और मुक्त व्यापार के प्रश्न पर टूटने लगी।
शरद जोशी की सबसे बड़ी वैचारिक छलांग
भारतीय किसान आंदोलन के इतिहास में शायद बहुत कम नेताओं ने यह जोखिम लिया कि वे अपने ही सामाजिक आधार से ऐसी बात कहें जो तत्काल लोकप्रिय न हो।
किसान को केवल अधिक सब्सिडी नहीं चाहिए।
किसान को विदेशी बाजार से बचाने के नाम पर बंद मत करो।
यही विचार उन्हें भारतीय किसान आंदोलन में असाधारण बनाता है।
लेकिन यही विचार उन्हें विवादास्पद भी बनाता है।
क्योंकि किसान की स्वतंत्रता और किसान की सुरक्षा के बीच संतुलन का प्रश्न आज तक पूरी तरह हल नहीं हुआ है।
आगे का निर्णायक मोड़
अब शेतकारी संगठन की वैचारिक तुलना आवश्यक हो जाती है।
एक ओर स्वदेशी और संरक्षणवादी राजनीति थी।
दूसरी ओर महेंद्र सिंह टिकैत का भारतीय किसान यूनियन था।
तीसरी ओर नंजुंडास्वामी का कर्नाटक राज्य रैयत संघ था।
और इन्हीं वर्षों में विदर्भ में कृषि संकट धीरे-धीरे उस भयावह अवस्था की ओर बढ़ रहा था जहां किसान आत्महत्या भारतीय कृषि संकट का प्रतीक बनने वाली थी।
क्या शरद जोशी का मुक्त बाजार सिद्धांत भविष्य की चेतावनी था, या उसने बाजार की असमान शक्ति को कम करके आंका?
यही अगले पांच खंडों का केंद्रीय प्रश्न रहेगा।
शेतकारी संगठन और स्वदेशी राजनीति : मुक्त व्यापार बनाम संरक्षण
एक ही किसान, दो बिल्कुल अलग निष्कर्ष
1990 के दशक में भारत में आर्थिक उदारीकरण, GATT और विश्व व्यापार संगठन को लेकर व्यापक विरोध हुआ। इस विरोध में वामपंथी दलों के साथ-साथ स्वदेशी विचारधारा से जुड़े संगठन भी सक्रिय थे।
दोनों धाराओं की वैचारिक पृष्ठभूमि अलग थी, लेकिन कृषि के प्रश्न पर एक साझा आशंका दिखाई देती थी—
यदि भारतीय बाजार विदेशी कृषि उत्पादों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खोल दिया गया तो छोटे भारतीय किसान वैश्विक पूंजी की प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पाएंगे।
शरद जोशी ने इस निष्कर्ष को स्वीकार नहीं किया।
उनकी दृष्टि में भारतीय किसान को सबसे पहले यह पूछना चाहिए था—
क्या दशकों से बंद और नियंत्रित घरेलू व्यवस्था ने वास्तव में किसान को समृद्ध किया है?
इसलिए केवल ‘विदेशी’ शब्द के आधार पर किसी व्यापार, कंपनी अथवा तकनीक का विरोध करना उन्हें उचित नहीं लगता था।
स्वदेशी की आर्थिक अवधारणा से असहमति
स्वदेशी विचार की एक प्रमुख धारणा यह रही कि स्थानीय उत्पादन और घरेलू उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से सुरक्षा मिलनी चाहिए।
कृषि क्षेत्र में विदेशी निवेश पर सावधानी,
और खाद्य सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय नियंत्रण।
यदि विदेशी ग्राहक भारतीय किसान का माल ऊंची कीमत पर खरीदना चाहता है तो किसान को उससे व्यापार करने से क्यों रोका जाए?
उन्होंने राष्ट्रवाद और किसान हित को आवश्यक रूप से एक ही नीति में नहीं रखा।
अपनी संपत्ति, अपनी उपज और अपनी आर्थिक गतिविधि पर निर्णय की स्वतंत्रता।
‘विदेशी’ बनाम ‘देशी’ से अधिक महत्वपूर्ण ‘खरीदारों की संख्या’
जोशी की बाजार राजनीति में यह महत्वपूर्ण अंतर था।
वे बाजार को इस आधार पर नहीं देखते थे कि खरीदार भारतीय है या विदेशी।
किसान के सामने कितने खरीदार उपलब्ध हैं?
यदि केवल एक सरकारी खरीदार है तो किसान कमजोर है।
यदि कुछ स्थानीय व्यापारी मिलकर कीमत तय करते हैं तो किसान कमजोर है।
यदि निजी उद्योग, दूसरे राज्य का व्यापारी और विदेशी खरीदार भी प्रतिस्पर्धा करें तो किसान के पास विकल्प बढ़ सकते हैं।
अधिक प्रतिस्पर्धा किसान की सौदेबाजी शक्ति बढ़ा सकती है।
बहुराष्ट्रीय कंपनियां : शत्रु या ग्राहक?
कर्नाटक और अन्य क्षेत्रों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विरुद्ध आंदोलन हो रहे थे। Cargill, Monsanto और अन्य कंपनियां किसान आंदोलन में विदेशी कॉरपोरेट शक्ति के प्रतीक बन रही थीं।
शरद जोशी इस सामान्यीकरण से सहमत नहीं थे।
उनके अनुसार कोई कंपनी केवल विदेशी होने के कारण किसान विरोधी नहीं हो जाती।
क्या किसान उसके साथ स्वेच्छा से लेनदेन कर सकता है?
और क्या सरकार किसान को कोई तकनीक अथवा बाजार चुनने से रोक रही है?
यही कारण है कि भारत के तीन प्रमुख किसान नेताओं—जोशी, टिकैत और नंजुंडास्वामी—में शरद जोशी वैश्वीकरण और कृषि क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रवेश के प्रति सबसे स्पष्ट रूप से सकारात्मक थे। 1990 के दशक में जहां दूसरे किसान संगठन GATT और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विरोध में लामबंद हो रहे थे, वहीं शेतकारी संगठन ने GATT के समर्थन में मार्च तक निकाले और जोशी ने 1995 में भारत के WTO में प्रवेश का स्वागत किया।
स्वदेशी आलोचना का मजबूत पक्ष
लेकिन स्वदेशी और वैश्वीकरण-विरोधी आलोचना को केवल भावनात्मक राष्ट्रवाद मानना भी गलत होगा।
उसके पीछे वास्तविक आर्थिक आशंकाएं थीं।
अमेरिका और यूरोप अपने किसानों को बड़ी कृषि सहायता देते थे।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास भारतीय किसानों की तुलना में कहीं अधिक पूंजी और तकनीकी शक्ति थी।
बीज और बौद्धिक संपदा कानून किसान की पारंपरिक बीज स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकते थे।
सस्ते आयात घरेलू कृषि कीमतों को गिरा सकते थे।
कॉन्ट्रैक्ट खेती में किसान और बड़ी कंपनी की सौदेबाजी शक्ति बराबर नहीं होती।
इसलिए प्रश्न केवल बाजार खोलने या बंद करने का नहीं था।
वैश्विक बाजार में प्रवेश किन नियमों पर होगा?
जोशी का उत्तर : समान मैदान
शरद जोशी मुक्त व्यापार के समर्थन में थे, लेकिन उनका आदर्श ऐसी दुनिया थी जिसमें भारतीय किसान के साथ समान नियमों पर व्यापार हो।
यदि विकसित देशों के किसान भारी सहायता प्राप्त कर रहे हैं और भारतीय किसान पर घरेलू बाजार नियंत्रण भी है तो यह वास्तविक मुक्त व्यापार नहीं।
यहीं उनके विचार का एक कम चर्चित पक्ष सामने आता है।
“भारतीय किसान को उस बाजार में बराबरी का खिलाड़ी बनने दो।”
राज्य सुरक्षा और स्वतंत्रता का द्वंद्व
इस बहस का मूल प्रश्न आज भी प्रासंगिक है।
किसान के लिए कौन अधिक महत्वपूर्ण है—
स्वदेशी और संरक्षणवादी मॉडल कहता है—
पहले किसान को बाहरी प्रतिस्पर्धा से बचाओ।
पहले किसान को निर्णय की स्वतंत्रता दो।
व्यवहार में भारतीय कृषि को शायद दोनों की आवश्यकता रही है—
प्रतिस्पर्धा की स्वतंत्रता और असमान प्रतिस्पर्धा से सुरक्षा।
यही वह संतुलन है जिसे शेतकारी संगठन की विचारधारा पूरी तरह हल नहीं कर सकी।
शरद जोशी और महेंद्र सिंह टिकैत : एक ही दौर के दो अलग किसान नेता
1980 के दशक की भारतीय किसान राजनीति में यदि दो नाम सबसे व्यापक जन-प्रभाव के साथ उभरे तो वे थे—
दोनों लगभग एक ही ऐतिहासिक परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करते थे।
पुराने किसान आंदोलन जमींदार और भूमि प्रश्न पर केंद्रित थे।
नए किसान आंदोलन बाजार मूल्य, बिजली, ऋण, सरकारी नीति और किसान स्वाभिमान पर केंद्रित हुए।
फिर भी जोशी और टिकैत की राजनीति, नेतृत्व शैली तथा विचारधारा में महत्वपूर्ण अंतर था। अकादमिक अध्ययन भी इन दोनों को ‘नए किसान आंदोलन’ के करिश्माई नेताओं के रूप में रखते हैं, लेकिन उनकी सामाजिक और नेतृत्व पृष्ठभूमि को स्पष्ट रूप से अलग मानते हैं—जोशी अंतरराष्ट्रीय प्रशासनिक अनुभव वाले वैचारिक नेता थे, जबकि टिकैत पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ग्रामीण जाट–खाप परंपरा से निकले किसान नेता थे।
सामाजिक पृष्ठभूमि का अंतर
महेंद्र सिंह टिकैत स्वयं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट कृषक समाज से आए।
उनकी सामाजिक शक्ति बालियान खाप और ग्रामीण पंचायत नेटवर्क से जुड़ी थी।
उनकी भाषा ग्रामीण किसान की भाषा थी।
वह मंच से जटिल आर्थिक सिद्धांत समझाने के बजाय किसान के दैनिक अनुभव—
को सीधे राजनीतिक प्रश्न में बदलते थे।
शरद जोशी की पृष्ठभूमि बिल्कुल अलग थी।
वह शिक्षित शहरी–प्रशासनिक दुनिया से खेती की ओर आए थे।
उनका नेतृत्व सामाजिक बिरादरी से नहीं, विचार, लेखन और आर्थिक तर्क से बना।
संगठनात्मक शैली
भारतीय किसान यूनियन की शक्ति पंचायत थी।
विशाल महापंचायत में हजारों–लाखों किसान जुटते थे और सामूहिक फैसला लेते थे।
शेतकारी संगठन की शक्ति मुद्दा-आधारित लामबंदी और वैचारिक अभियान थी।
जोशी किसान को समझाते थे कि प्याज का गिरा भाव केवल स्थानीय मंडी की समस्या नहीं बल्कि कृषि मूल्य नीति का परिणाम है।
टिकैत किसान को कहते थे कि बिजली की गलत दर है तो बिल मत भरो और पंचायत में एक होकर सरकार पर दबाव डालो।
लेकिन दोनों का राजनीतिक संदेश एक जगह मिलता था—
1988 का मेरठ और बोट क्लब
महेंद्र सिंह टिकैत की राष्ट्रीय पहचान 1987–88 के विशाल आंदोलनों से बनी।
मेरठ कमिश्नरी का लंबा घेराव और 1988 में दिल्ली के बोट क्लब पर लाखों किसानों का जमावड़ा भारतीय किसान राजनीति के ऐतिहासिक प्रतीक बन गए।
BKU की मांगों में गन्ना मूल्य, बिजली दर, ऋण राहत और अन्य कृषि मुद्दे शामिल थे। बाद के इतिहासलेखन में बोट क्लब आंदोलन को टिकैत की राष्ट्रीय राजनीतिक शक्ति के चरम के रूप में देखा गया है।
शरद जोशी इससे पहले महाराष्ट्र में रास्ता रोको, प्याज, गन्ना और कपास आंदोलनों से किसान संघर्ष की इसी नई राजनीति को स्थापित कर चुके थे।
इसलिए दोनों समानांतर धाराओं की तरह विकसित हुए।
कीमत पर समानता
दोनों नेताओं में सबसे बड़ी समानता थी—
कृषि उपज के लाभकारी मूल्य का प्रश्न।
जोशी इसे राष्ट्रीय आर्थिक संरचना से जोड़ते थे।
लेकिन दोनों मानते थे कि किसान को उत्पादन की तुलना में पर्याप्त प्रतिफल नहीं मिल रहा।
बिजली और सब्सिडी पर अंतर
टिकैत की BKU कृषि बिजली दरों में कमी, ऋण राहत और सरकारी रियायत के लिए बड़े आंदोलन करती थी।
जोशी भी बिजली दर और कर्ज के मुद्दे उठाते थे, लेकिन उनकी दीर्घकालीन विचारधारा सब्सिडी आधारित किसान अर्थव्यवस्था की समर्थक नहीं थी।
किसान को उसकी उपज का सही मूल्य दे दो; फिर उसे रियायत का याचक बनने की आवश्यकता कम होगी।
इस अर्थ में टिकैत की राजनीति सरकार पर किसान के पक्ष में दबाव की थी।
जोशी की राजनीति धीरे-धीरे किसान को सरकार की पकड़ से मुक्त करने की दिशा में चली।
राजनीति से दूरी
एक महत्वपूर्ण समानता प्रारंभिक गैर-दलीयता थी।
टिकैत ने भी किसान संगठन की शक्ति को राजनीतिक दलों से स्वतंत्र रखने का प्रयास किया। उनके नेतृत्व में BKU ने स्वयं को चुनावी दल के बजाय दबाव समूह के रूप में प्रस्तुत किया। इस गैर-दलीयता को विद्वानों ने उसकी व्यापक सामाजिक अपील का महत्वपूर्ण आधार माना है।
लेकिन आगे वे स्वतंत्र भारत पक्ष बनाकर प्रत्यक्ष राजनीति में उतर गए।
टिकैत ने स्वयं कोई समान स्वतंत्र राजनीतिक दल नहीं बनाया।
जाति और समुदाय
टिकैत का आंदोलन औपचारिक रूप से किसान हित पर आधारित था, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उसका सामाजिक आधार जाट किसानों में विशेष रूप से मजबूत था।
खाप संरचना संगठनात्मक शक्ति भी थी और सीमा भी।
जोशी के संगठन का जातीय आधार तुलनात्मक रूप से अधिक मिश्रित था, हालांकि महाराष्ट्र की कृषक सामाजिक संरचना के कारण मराठा–कुनबी किसान उसकी बड़ी शक्ति रहे।
जोशी की राजनीतिक भाषा जाति से अधिक उत्पादक किसान की आर्थिक पहचान पर आधारित थी।
दोनों में तनाव
राष्ट्रीय स्तर पर किसान संगठनों को एक मंच पर लाने के प्रयास हुए। 1980 के दशक में विभिन्न राज्यों के किसान संगठन साथ भी आए। शरद जोशी ने कुछ चरणों में विभिन्न किसान यूनियनों के बीच मध्यस्थता की भूमिका भी निभाई। लेकिन बाद में जोशी और टिकैत के बीच मतभेद बढ़े और दोनों अलग-अलग रास्तों पर चले गए।
यह अलगाव केवल व्यक्तित्व का संघर्ष नहीं था।
इसके पीछे कृषि नीति और राजनीति के प्रति अलग-अलग दृष्टिकोण भी थे।
टिकैत बनाम जोशी : मूल अंतर
इसे सबसे सरल रूप में ऐसे समझा जा सकता है—
टिकैत पूछते थे: सरकार किसान को क्या दे?
जोशी पूछते थे: सरकार किसान को करने से क्या रोक रही है?
टिकैत की राजनीति किसान समुदाय की सामूहिक शक्ति पर अधिक आधारित थी।
जोशी की राजनीति किसान उत्पादक की आर्थिक स्वतंत्रता पर।
दोनों ने स्वतंत्र भारत के किसान आंदोलन को बदल दिया, लेकिन अलग रास्तों से।
शेतकारी संगठन बनाम कर्नाटक राज्य रैयत संघ : मुक्त बाजार और वैश्वीकरण-विरोध की दो किसान धाराएं
यदि जोशी और टिकैत में पर्याप्त समानताएं थीं, तो शरद जोशी और एम. डी. नंजुंडास्वामी के बीच का अंतर कहीं अधिक वैचारिक था।
शेतकारी संगठन और कर्नाटक राज्य रैयत संघ दोनों 1980 के दशक के ‘नए किसान आंदोलन’ के महत्वपूर्ण स्तंभ थे।
दोनों ने कृषि उपज के लाभकारी मूल्य की मांग की।
दोनों ने किसान स्वाभिमान की भाषा अपनाई।
दोनों राज्य और नौकरशाही के नियंत्रण की आलोचना करते थे।
लेकिन 1990 के दशक में वैश्वीकरण आते ही दोनों लगभग विपरीत ध्रुव बन गए। उपलब्ध सामाजिक आंदोलन साहित्य भी इसी को नए किसान आंदोलनों के भीतर सबसे स्पष्ट वैचारिक विभाजन मानता है—शेतकारी संगठन ने उदारीकरण और व्यापार स्वतंत्रता का समर्थन किया, जबकि KRRS ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों और वैश्वीकरण के विरुद्ध प्रतिरोध की राजनीति विकसित की।
नंजुंडास्वामी का प्रश्न
KRRS के लिए किसान की समस्या केवल राज्य नियंत्रण नहीं थी।
वह वैश्विक कॉरपोरेट पूंजी से भी किसान की स्वायत्तता को खतरा मानता था।
बहुराष्ट्रीय कंपनी किसान से अनुबंध किस शर्त पर करेगी?
और यदि कृषि वैश्विक कंपनियों पर निर्भर हो गई तो किसान की आर्थिक तथा सांस्कृतिक स्वतंत्रता का क्या होगा?
यहीं KRRS की राजनीति आगे चलकर बीज-संप्रभुता और खाद्य-संप्रभुता की ओर गई।
जोशी का बिल्कुल अलग उत्तर
किसान को यह अधिकार क्यों न हो कि वह नई तकनीक खरीदे?
यदि नया बीज अधिक उत्पादन देता है तो सरकार उसे रोकने वाली कौन है?
यदि विदेशी खरीदार अधिक मूल्य दे रहा है तो किसान को उससे व्यापार करने से क्यों रोका जाए?
Cargill और Monsanto
KRRS ने 1990 के दशक में Cargill जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बाद में Monsanto के विरुद्ध प्रत्यक्ष कार्रवाइयां कीं। बीज सत्याग्रह और बहुराष्ट्रीय कृषि कंपनियों के खिलाफ अभियान उसकी अंतरराष्ट्रीय पहचान बने। किसान आंदोलन के अध्ययन इन कार्रवाइयों को वैश्वीकरण-विरोधी ग्रामीण प्रतिरोध के प्रमुख उदाहरण के रूप में देखते हैं।
उधर शेतकारी संगठन उसी समय GATT और वैश्विक कृषि व्यापार के समर्थन में अभियान चला रहा था।
यह भारतीय किसान आंदोलन का असाधारण दृश्य था—
दो बड़े किसान संगठन किसान स्वतंत्रता के नाम पर बिल्कुल विपरीत नीतियां मांग रहे थे।
बीज का प्रश्न
किसान का बीज किसान के हाथ में रहना चाहिए।
किसान को हर प्रकार के बीज में से अपनी पसंद का बीज चुनने का अधिकार होना चाहिए।
पहली दृष्टि सामूहिक संप्रभुता की थी।
दूसरी व्यक्तिगत आर्थिक स्वतंत्रता की।
यही अंतर आगे जैव-प्रौद्योगिकी और आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों पर दोनों की अलग-अलग स्थितियों में दिखाई दिया।
पर्यावरण
KRRS की राजनीति में पर्यावरण, जैव-विविधता, पारंपरिक बीज और स्थानीय कृषि ज्ञान का महत्व बढ़ता गया।
शेतकारी संगठन की प्राथमिक चिंता किसान की आय और आर्थिक स्वतंत्रता थी।
जोशी आधुनिक तकनीक के विरोधी नहीं थे।
उनके लिए प्रश्न यह था कि कोई तकनीक किसान के लिए लाभकारी है या नहीं।
इसलिए पर्यावरणीय एहतियात की तुलना में किसान की तकनीक चुनने की स्वतंत्रता उनके लिए अधिक महत्वपूर्ण थी।
किसान की दो अवधारणाएं
दोनों संगठनों की तुलना में किसान की दो अलग छवियां सामने आती हैं।
KRRS का किसान
भूमि और स्थानीय समुदाय का संरक्षक है।
उसे बाजार के साथ-साथ सांस्कृतिक और पारिस्थितिक संप्रभुता भी चाहिए।
दोनों दृष्टियों में किसान स्वाभिमान है।
लेकिन किसान की स्वतंत्रता का अर्थ अलग है।
कौन सही था?
इतिहास यहां किसी एक को पूरी तरह सही सिद्ध नहीं करता।
जोशी सही थे कि अत्यधिक सरकारी नियंत्रण किसान के बाजार अवसर रोक सकता है।
नंजुंडास्वामी सही थे कि बाजार शक्ति अत्यंत असमान हो सकती है और बहुराष्ट्रीय कंपनियां किसान से कहीं अधिक प्रभावशाली होती हैं।
आज भारतीय कृषि को समझने के लिए दोनों चेतावनियां महत्वपूर्ण हैं।
1980 के दशक के ‘नए किसान आंदोलन’ में शेतकारी संगठन का स्थान
‘नया किसान आंदोलन’ क्या था?
1970 के दशक के अंत और 1980 के दशक में भारतीय किसान राजनीति में एक नया चरण शुरू हुआ।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भारतीय किसान यूनियन,
कर्नाटक में कर्नाटक राज्य रैयत संघ,
तमिलनाडु में नारायणसामी नायडू की किसान धारा,
और पंजाब, हरियाणा तथा गुजरात में विभिन्न कृषि संगठन—
एक नए प्रकार की किसान राजनीति का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।
इन्हें अकादमिक साहित्य में व्यापक रूप से ‘New किसान’ Movements’ कहा गया।
पुराने किसान आंदोलनों से अंतर
फसल में बटाईदार का हिस्सा कितना हो?
बंधुआ श्रम, भूमि और आदिवासी अधिकार।
नए किसान आंदोलन में प्रश्न बदल गया—
अर्थात संघर्ष का केंद्र उत्पादन संबंध से विनिमय संबंध की ओर आ गया।
हरित क्रांति की भूमिका
इस परिवर्तन का एक आधार भारतीय कृषि का व्यावसायीकरण था।
जब किसान बाजार के लिए अधिक उत्पादन करने लगा तो उसकी समस्या भी बाजार से जुड़ गई।
खरीदनी पड़ती थी और कृषि उत्पाद बेचना पड़ता था।
उसकी अर्थव्यवस्था बाजार में मिलने वाले दाम पर निर्भर हुई।
यही वह संरचनात्मक परिवर्तन था जिसे नए किसान आंदोलनों ने राजनीतिक भाषा दी। कुछ अध्ययनों में इन्हें बाजारोन्मुख मध्य और समृद्ध कृषक वर्ग के उभार से जोड़ा गया है, हालांकि छोटे किसानों की व्यापक भागीदारी भी इन आंदोलनों में मौजूद थी।
राज्य नया प्रतिपक्ष
पुराने किसान संघर्षों में प्रतिपक्ष अक्सर जमींदार या स्थानीय भू-स्वामी था।
आयात–निर्यात नीति सरकार तय करती है।
इसलिए किसान की लड़ाई ग्रामीण गांव के भीतर से निकलकर राज्य की आर्थिक नीति के विरुद्ध हो गई।
आंदोलन की नई भाषा
इस किसान आंदोलन ने नई राजनीतिक भाषा भी पैदा की—
शेतकारी संगठन का ‘भारत बनाम इंडिया’ इस दौर की सबसे प्रभावशाली वैचारिक अवधारणाओं में था।
टिकैत किसान के ‘सम्मान’ की भाषा बोलते थे।
शहरी नीति-निर्माता किसान को समझते नहीं और उसके आर्थिक हित की उपेक्षा करते हैं।
आंदोलन की संघर्ष शैली
1980 के दशक में विशाल धरने, घेराव, रास्ता रोको, रेल रोको और कई दिनों तक चलने वाले किसान जमावड़े नए किसान आंदोलनों की प्रमुख पहचान बने।
कई मामलों में किसान अपनी उपज बाजार में जाने से रोकते थे।
कुछ आंदोलनों में गांवों ने सरकारी अधिकारियों या नेताओं का बहिष्कार किया।
इन कार्रवाइयों को उस दौर के अध्ययन पारंपरिक सविनय अवज्ञा की आधुनिक ग्रामीण पुनर्व्याख्या के रूप में देखते हैं।
इन नए आंदोलनों में शेतकारी संगठन का योगदान चार स्तरों पर अलग था।
पहला — आर्थिक सिद्धांत
शरद जोशी ने आंदोलन को सबसे स्पष्ट राजनीतिक अर्थशास्त्र दिया।
दूसरा — महिला प्रश्न
शेतकरी महिला आघाड़ी और लक्ष्मी मुक्ति ने किसान आंदोलन की सीमाओं को तोड़ा।
तीसरा — मुक्त बाजार
दूसरे किसान संगठनों की तुलना में शेतकारी संगठन ने किसान हित को बाजार स्वतंत्रता से सबसे स्पष्ट रूप से जोड़ा।
चौथा — किसान को उद्यमी मानना
जोशी की किसान छवि केवल ‘अन्नदाता’ की भावनात्मक छवि नहीं थी।
‘ग्रामीण अमीरों का आंदोलन’ आलोचना
नए किसान आंदोलनों पर सबसे गंभीर मार्क्सवादी आलोचना यह रही कि ये भूमिहीन और गरीब ग्रामीण समाज की तुलना में बाजार के लिए अधिशेष पैदा करने वाले मध्यम और संपन्न किसानों की राजनीति थे।
यह आलोचना पूरी तरह निराधार नहीं थी।
जिस किसान के पास बाजार में बेचने के लिए अधिक उपज है, उसे मूल्य वृद्धि का अधिक प्रत्यक्ष लाभ मिलता है।
भूमिहीन मजदूर के पास बेचने के लिए कृषि उपज नहीं होती।
उलटे खाद्य कीमत बढ़ने से वह प्रभावित हो सकता है।
इसी कारण इतिहासलेखन में ‘किसान एकता’ की अवधारणा को सावधानी से पढ़ना आवश्यक है।
फिर भी केवल ‘अमीर किसान आंदोलन’ कहना अपर्याप्त
दूसरी ओर, छोटे किसान भी बाजार पर निर्भर थे।
उनके लिए फसल के कम मूल्य का संकट और अधिक गंभीर हो सकता था।
वे उत्पादन लागत, कर्ज और बाजार अस्थिरता से सीधे प्रभावित थे।
इसलिए इन आंदोलनों को केवल ग्रामीण कुलकों का आंदोलन मानना भी बहुत सरल निष्कर्ष होगा।
बेहतर समझ यह है कि नए किसान आंदोलनों ने भूमि स्वामी कृषक समाज के विभिन्न स्तरों को कृषि और गैर-कृषि अर्थव्यवस्था के बीच विनिमय की शर्तों के प्रश्न पर एक करने की कोशिश की।
1990 के दशक में पतन क्यों?
1980 के दशक में इतने शक्तिशाली आंदोलन 1990 के दशक में कमजोर क्यों हुए?
जातिगत और क्षेत्रीय राजनीति का पुनरुत्थान,
2026 में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन भी 1980 के दशक में जोशी और टिकैत जैसे नेताओं के नेतृत्व में किसान आंदोलन की असाधारण शक्ति तथा 1990 के दशक में उसके क्रमिक क्षय को आधुनिक भारतीय कृषि राजनीति का महत्वपूर्ण ऐतिहासिक परिवर्तन मानता है।
लेकिन आंदोलन की भाषा खत्म नहीं हुई।
आज भी किसान राजनीति के केंद्रीय विषय हैं।
विदर्भ किसान संकट और आत्महत्याएं : शरद जोशी के सिद्धांत की सबसे कठिन परीक्षा
शेतकारी संगठन के इतिहास की सबसे कठिन परीक्षा विदर्भ में हुई।
जिस विदर्भ में संगठन ने 1980 के दशक में कपास के लाभकारी मूल्य और बाजार स्वतंत्रता का सवाल उठाया था, वही क्षेत्र 1990 के दशक के उत्तरार्ध और विशेष रूप से 2000 के दशक में किसान आत्महत्याओं का राष्ट्रीय प्रतीक बन गया।
यदि बाजार स्वतंत्रता किसान की मुक्ति का रास्ता है तो बाजारोन्मुख कपास क्षेत्र इतना गंभीर संकटग्रस्त क्यों हुआ?
विदर्भ का कृषि ढांचा
विदर्भ के कपास क्षेत्र की कई संरचनात्मक कमजोरियां थीं।
कृषि का बड़ा हिस्सा वर्षा-आश्रित था।
कपास जैसी नकदी फसल की लागत बढ़ रही थी।
किसानों को बीज, कीटनाशक, उर्वरक और अन्य सामग्री बाजार से खरीदनी पड़ती थी।
उत्पादन मौसम के जोखिम पर निर्भर था।
किसान प्राकृतिक और बाजार—दोनों जोखिम एक साथ उठाता था।
कपास : उच्च जोखिम वाली नकदी अर्थव्यवस्था
यदि कपास की फसल अच्छी हुई और कीमत भी अच्छी रही तो किसान की आय बढ़ सकती थी।
लेकिन यदि बारिश विफल हुई अथवा कीमत गिर गई तो उसकी लागत पहले ही लग चुकी होती थी।
अगले मौसम में वह पिछले ऋण के साथ नई फसल में प्रवेश करता।
लगातार दो–तीन खराब वर्षों के बाद ऋण संकट तेजी से बढ़ सकता था।
यहीं विदर्भ का संकट केवल ‘कम उत्पादकता’ नहीं बल्कि—
लागत + ऋण + बाजार मूल्य + मानसून + संस्थागत कमजोरी
आत्महत्या : व्यक्तिगत त्रासदी से संरचनात्मक संकट तक
1990 के दशक और विशेषकर 2000 के दशक में महाराष्ट्र में किसान आत्महत्याओं के बढ़ते मामलों ने कृषि संकट को राष्ट्रीय राजनीतिक प्रश्न बना दिया।
विदर्भ इसका सबसे चर्चित केंद्र बना।
यहां आत्महत्या को किसी एक कारण से जोड़ना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।
हर मामले में व्यक्तिगत परिस्थितियां अलग थीं।
लेकिन व्यापक स्तर पर अध्ययन बार-बार कुछ संरचनात्मक कारणों की ओर संकेत करते रहे—
क्या इस संकट ने शरद जोशी को सही साबित किया?
यदि किसान को कृषि उत्पाद का लाभकारी मूल्य नहीं मिलेगा तो बाजार के लिए उत्पादन करने वाला किसान भी गरीब और ऋणी बना रहेगा।
विदर्भ का संकट इस चेतावनी को भयावह रूप में पुष्ट करता दिखाई दिया।
1980 के दशक में कपास आंदोलन के समय उनका तर्क था कि कपास किसान को नीतिगत रूप से दबे मूल्य पर बेचने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए।
दो दशक बाद भी कपास उत्पादक किसान की आय का प्रश्न हल नहीं हुआ था।
इस अर्थ में उनका ‘उत्पादन नहीं, मूल्य भी देखो’ वाला तर्क अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुआ।
लेकिन क्या संकट ने उनकी बाजार अवधारणा पर प्रश्न भी उठाया?
विदर्भ के संकट ने यह भी दिखाया कि केवल बाजार खोल देना पर्याप्त नहीं।
किसान को बाजार की स्वतंत्रता मिल सकती है, लेकिन—
यदि विकसित देशों की कृषि सब्सिडी अंतरराष्ट्रीय कीमतों को प्रभावित करे?
यदि किसान ऋण में हो और फसल रोक नहीं सकता?
यदि निर्यात मूल्य का लाभ किसान तक न पहुंचे?
यदि एक ओर बड़ी बीज कंपनियां हों और दूसरी ओर छोटा किसान?
तब ‘मुक्त विकल्प’ कितना वास्तविक है?
यहीं शेतकारी संगठन का सिद्धांत कठिन परीक्षा में पड़ता है।
वैश्विक कपास बाजार
विश्व कपास बाजार लंबे समय से विकसित देशों की कृषि सहायता और अंतरराष्ट्रीय कीमतों से प्रभावित रहा है।
अमेरिकी कपास सब्सिडी विशेष रूप से वैश्विक व्यापार विवादों का विषय बनी।
ऐसी परिस्थिति में भारतीय किसान के लिए केवल आयात–निर्यात प्रतिबंध हटाना समान प्रतिस्पर्धा की गारंटी नहीं देता।
शरद जोशी स्वयं बाद के वर्षों में विकसित देशों की कृषि सहायता और भारत में किसानों पर घरेलू नियंत्रण की असमानता की आलोचना करते रहे।
इसलिए उनके मुक्त बाजार सिद्धांत को ‘राज्य हटाओ और सब ठीक हो जाएगा’ के रूप में पढ़ना अत्यधिक सरलीकरण होगा।
सरकार की राहत नीति
किसान आत्महत्या संकट के बाद केंद्र और महाराष्ट्र सरकार ने विदर्भ तथा अन्य प्रभावित क्षेत्रों के लिए राहत पैकेज, ऋण सहायता और कृषि योजनाएं शुरू कीं।
क्या राहत पैकेज आय की संरचनात्मक समस्या हल कर सकते हैं?
जब तक खेती लाभकारी नहीं होगी, राहत स्थायी समाधान नहीं।
ऋण माफी बनाम स्थायी आय
विदर्भ संकट ने भारतीय किसान नीति में बार-बार ऋण माफी की मांग पैदा की।
लेकिन कर्ज माफ होने के बाद यदि अगले मौसम में किसान फिर घाटे में खेती करता है तो ऋण चक्र लौट सकता है।
यहीं शेतकारी संगठन की पुरानी अवधारणा प्रासंगिक होती है—
किसान की आर्थिक समस्या का अंतिम समाधान केवल कर्ज माफ करना नहीं बल्कि कृषि को आय-सक्षम बनाना है।
तकनीक का विवाद
विदर्भ और कपास के संकट में बीज और जैव-प्रौद्योगिकी का प्रश्न भी जुड़ा।
Bt कपास के विस्तार को लेकर भारतीय कृषि में तीखी बहस हुई।
कुछ आलोचकों ने किसान आत्महत्याओं को सीधे महंगे बीज और कॉरपोरेट नियंत्रण से जोड़ा।
लेकिन इस संबंध को सार्वभौमिक और एक-कारणी निष्कर्ष के रूप में स्वीकार करना सावधानी के बिना उचित नहीं।
शरद जोशी और उनकी वैचारिक परंपरा नई कृषि तकनीक के प्रयोग की स्वतंत्रता के पक्ष में रही।
किसान स्वयं तय करे कि कौन-सा बीज आर्थिक रूप से उसके लिए उपयोगी है।
यह रुख उन्हें फिर KRRS जैसी बीज-संप्रभुता केंद्रित धारा से अलग करता है।
विदर्भ की सबसे बड़ी सीख
विदर्भ ने भारतीय किसान नीति को यह सिखाया कि—
बाजार मूल्य महत्वपूर्ण है, लेकिन अकेला पर्याप्त नहीं।
कृषि संकट को समझने के लिए साथ-साथ देखना होगा—
इसी बिंदु पर शरद जोशी का सिद्धांत महत्वपूर्ण भी है और अधूरा भी।
महत्वपूर्ण इसलिए कि उन्होंने कृषि मूल्य को केंद्रीय प्रश्न बनाया।
अधूरा इसलिए कि किसान संकट केवल मूल्य-अंतर से नहीं समझा जा सकता।
शरद जोशी, टिकैत और नंजुंडास्वामी : तीन किसान दृष्टियां
1980–90 के दशकों की भारतीय किसान राजनीति को इन तीन नेताओं के माध्यम से अत्यंत स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है।
महेंद्र सिंह टिकैत
किसान को संगठित सामुदायिक शक्ति के रूप में देखते हैं।
सरकार से उचित मूल्य, बिजली, पानी और राहत मांगते हैं।
एम. डी. नंजुंडास्वामी
किसान को भूमि, बीज, प्रकृति और स्थानीय संप्रभुता का रक्षक मानते हैं।
राज्य और बहुराष्ट्रीय पूंजी दोनों से किसान की रक्षा चाहते हैं।
शरद जोशी
किसान को स्वतंत्र आर्थिक उत्पादक और उद्यमी मानते हैं।
सरकारी नियंत्रण हटाकर उसे बाजार, तकनीक और व्यापार की स्वतंत्रता देना चाहते हैं।
लाभकारी मूल्य, संगठन और आर्थिक स्वतंत्रता।
इसीलिए तीनों किसान नेता हैं, लेकिन उनकी किसान राजनीति तीन अलग आर्थिक दर्शन प्रस्तुत करती है।
क्या ‘नया किसान आंदोलन’ वास्तव में एक आंदोलन था?
इतिहासलेखन का एक महत्वपूर्ण प्रश्न यही है।
हम महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक की इन धाराओं को एक साथ ‘नया किसान आंदोलन’ कहते हैं।
लेकिन वास्तव में उनके बीच गहरी असहमति थी।
वे भूमि सुधार से अधिक कृषि मूल्य पर केंद्रित थे;
राज्य उनकी राजनीति का प्रमुख प्रतिपक्ष था;
मध्यम और बाजारोन्मुख किसान महत्वपूर्ण आधार थे;
वे राजनीतिक दलों से स्वतंत्र संगठन चाहते थे;
और किसान को एक पृथक राजनीतिक पहचान देते थे।
लेकिन बाजार, वैश्वीकरण, तकनीक, पर्यावरण और राजनीति पर उनकी दृष्टियां अलग थीं।
इसलिए ‘नया किसान आंदोलन’ को एक केंद्रीय संगठन नहीं बल्कि 1980 के दशक की भारतीय कृषि राजनीति की समान ऐतिहासिक परिस्थिति से निकली अनेक किसान धाराओं के रूप में समझना अधिक उचित है।
इन धाराओं में शेतकारी संगठन की विशिष्टता पांच कारणों से बनी रहती है।
पहला — सबसे व्यवस्थित आर्थिक सिद्धांत।
‘भारत बनाम इंडिया’ ने कृषि संकट को व्यापक राजनीतिक अर्थव्यवस्था से जोड़ा।
दूसरा — किसान को उत्पादक और उद्यमी की पहचान।
उसने किसान को केवल गरीब ग्रामीण अथवा अन्नदाता की भावनात्मक छवि तक सीमित नहीं किया।
लक्ष्मी मुक्ति और शेतकरी महिला आघाड़ी नए किसान आंदोलन में अत्यंत विशिष्ट प्रयोग थे।
चौथा — मुक्त बाजार समर्थक किसान राजनीति।
भारत के बड़े किसान आंदोलनों में इतनी स्पष्ट आर्थिक उदारवादी विचारधारा दुर्लभ थी।
पांचवां — राज्य से स्वतंत्रता की मांग।
जोशी की किसान राजनीति का अंतिम प्रश्न अक्सर यह नहीं था कि सरकार किसान के लिए और क्या करे, बल्कि—
खंड 21–25 का समेकित निष्कर्ष
इन पांच खंडों के बाद शेतकारी संगठन के इतिहास का सबसे बड़ा वैचारिक विरोधाभास स्पष्ट हो जाता है।
शरद जोशी ने एक ऐसी किसान राजनीति बनाई जिसमें किसान को कमजोर और संरक्षित किए जाने वाले व्यक्ति के रूप में नहीं बल्कि निर्णय लेने में सक्षम स्वतंत्र उत्पादक के रूप में देखा गया।
लेकिन स्वतंत्रता और आर्थिक शक्ति एक ही चीज नहीं हैं।
यदि किसान बाजार में स्वतंत्र तो है लेकिन इतना छोटा है कि उसके पास माल रोकने की क्षमता नहीं;
यदि अंतरराष्ट्रीय कीमत पर उसका कोई नियंत्रण नहीं;
तो उसकी कानूनी बाजार स्वतंत्रता व्यावहारिक आर्थिक स्वतंत्रता में बदलना कठिन हो सकता है।
यही विदर्भ की त्रासदी शेतकारी संगठन की विचारधारा के सामने रखती है।
फिर भी उलटा प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है—
यदि इसी किसान की रक्षा करने के नाम पर सरकार उसे बाजार, निर्यात, तकनीक और खरीदार चुनने से रोकती है, तो क्या वह वास्तव में सुरक्षित है या केवल नियंत्रित?
इसी दोहरे प्रश्न के कारण शरद जोशी का किसान दर्शन आज भी प्रासंगिक है।
किसान को सुरक्षा कितनी चाहिए और स्वतंत्रता कितनी?
शेतकारी संगठन का पूरा इतिहास इसी संतुलन की तलाश है।
आंदोलन के अगले चरण की ओर
1990 और 2000 के दशकों में परिस्थितियां बदल चुकी थीं।
स्वतंत्र भारत पक्ष अपेक्षित राजनीतिक सफलता नहीं पा सका।
शेतकारी संगठन के भीतर नई नेतृत्व धाराएं उभर रही थीं।
महाराष्ट्र की किसान राजनीति में नए संगठन सामने आए।
दिसंबर 2015 में शरद जोशी के निधन के बाद यह प्रश्न और गंभीर हुआ—
क्या कोई आंदोलन अपने संस्थापक नेता की वैचारिक शक्ति के बाद भी उसी रूप में जीवित रह सकता है?
फिर 2020 में तीन केंद्रीय कृषि कानून आए।
देश के अधिकांश बड़े किसान संगठन उनके विरोध में खड़े हुए।
लेकिन शेतकारी संगठन की शरद जोशी परंपरा के एक हिस्से ने उन्हीं कानूनों में उस बाजार स्वतंत्रता की झलक देखी जिसकी मांग संगठन दशकों से करता आया था।
इस प्रकार 1979 के चाकण आंदोलन की बहस चार दशक बाद फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में लौट आई।
शरद जोशी के बाद शेतकारी संगठन : नेतृत्व, विभाजन और घटता प्रभाव
शेतकारी संगठन का इतिहास अपने संस्थापक से असाधारण रूप से जुड़ा रहा। शरद जोशी केवल संगठन के अध्यक्ष अथवा प्रमुख वक्ता नहीं थे। उन्होंने उसे उसकी भाषा, आर्थिक सिद्धांत, संघर्ष-पद्धति और विशिष्ट पहचान दी।
इसी कारण जैसे-जैसे उनकी सक्रियता कम हुई, संगठन के सामने नेतृत्व-संक्रमण का प्रश्न गंभीर होता गया।
आंदोलन पहले ही कमजोर क्यों होने लगा था?
शरद जोशी के निधन से बहुत पहले, 1990 के दशक से ही संगठन की पूर्व शक्ति में कमी दिखाई देने लगी थी।
पहला कारण था आर्थिक उदारीकरण पर विभाजन। शरद जोशी GATT, WTO और खुले कृषि बाजार के समर्थक बने, जबकि किसान राजनीति का बड़ा हिस्सा वैश्वीकरण के प्रति आशंकित था।
दूसरा कारण था चुनावी राजनीति में प्रवेश। स्वतंत्र भारत पक्ष की स्थापना ने संगठन के उस गैर-दलीय चरित्र को बदल दिया जिसने आरंभिक वर्षों में विभिन्न राजनीतिक विचारों वाले किसानों को एक मंच पर जोड़ा था।
तीसरा कारण था क्षेत्रीय नेतृत्व का उभार। कृषि की समस्याएं फसल और क्षेत्र के अनुसार अधिक अलग होती गईं। महाराष्ट्र में गन्ना किसानों, कपास किसानों, प्याज उत्पादकों और अन्य कृषक समूहों के अपने स्वतंत्र नेता और संगठन उभरे।
चौथा कारण था शरद जोशी की करिश्माई केंद्रीयता। जिस आंदोलन का वैचारिक केंद्र एक असाधारण व्यक्तित्व हो, उसके लिए उत्तराधिकारी व्यवस्था बनाना कठिन होता है।
नए किसान नेता और नए संगठन
महाराष्ट्र की किसान राजनीति में आगे चलकर राजू शेट्टी और स्वाभिमानी शेतकरी संगठन जैसे नए मंच उभरे। विशेष रूप से गन्ना उत्पादक क्षेत्र में राजू शेट्टी ने बड़ी राजनीतिक जगह बनाई।
यह तथ्य भी शेतकारी संगठन के बदलते प्रभाव को दर्शाता है।
महाराष्ट्र में किसान असंतोष समाप्त नहीं हुआ था; बल्कि उसका प्रतिनिधित्व विभाजित हो गया।
शेतकारी संगठन कमजोर हुआ, लेकिन किसान राजनीति कमजोर नहीं हुई।
उसकी जगह नए मुद्दा-आधारित और क्षेत्रीय संगठनों ने ली।
अनिल घनवट की भूमिका
शरद जोशी की परंपरा को आगे ले जाने वाले प्रमुख नेताओं में अनिल घनवट का नाम विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। 2020–21 के कृषि कानून विवाद के समय वे शेतकारी संगठन के अध्यक्ष के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर सामने आए।
जनवरी 2021 में सर्वोच्च न्यायालय ने तीन कृषि कानूनों पर किसानों और सरकार के पक्ष सुनने के लिए विशेषज्ञ समिति बनाई। चार सदस्यीय मूल समिति में अनिल घनवट को शेतकारी संगठन के अध्यक्ष के रूप में शामिल किया गया। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश में उनके साथ कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी और प्रमोद कुमार जोशी तथा किसान नेता भूपिंदर सिंह मान का नाम था; मान बाद में समिति से अलग हो गए।
यह अपने आप में शेतकारी संगठन की वैचारिक विरासत की मान्यता थी।
जिस संगठन की जनशक्ति अब 1980 के दशक जैसी नहीं थी, उसकी कृषि बाजार सुधार संबंधी विचारधारा राष्ट्रीय नीति-विवाद में इतनी महत्वपूर्ण थी कि उसका प्रतिनिधि सर्वोच्च न्यायालय की विशेषज्ञ समिति में शामिल किया गया।
संगठन की पहचान का संकुचन
फिर भी संस्थागत स्तर पर संगठन की सीमाएं स्पष्ट थीं।
बाद के दौर में वही केंद्रीकरण नहीं रहा।
संगठन के विभिन्न समूह और नेता शरद जोशी की विरासत के अलग-अलग पक्षों पर जोर देने लगे।
इसलिए 2015 के बाद के शेतकारी संगठन को 1980 के दशक की एकीकृत किसान शक्ति समझना सही नहीं होगा।
उसे अधिक उचित रूप से शरद जोशी की कृषि-उदारवादी विचारधारा को जीवित रखने वाली किसान धारा के रूप में समझना चाहिए।
विरासत संगठन से बड़ी
यहीं एक असामान्य स्थिति उत्पन्न हुई।
संगठन की जनशक्ति घटी, लेकिन उसके मूल प्रश्न—
किसान को अपनी उपज कहां बेचने का अधिकार है?
कॉन्ट्रैक्ट खेती क्यों प्रतिबंधित हो?
नई कृषि तकनीक चुनने का अधिकार किसका है?
अर्थात शेतकारी संगठन का संस्थागत प्रभाव घटा, लेकिन वैचारिक एजेंडा समाप्त नहीं हुआ।
12 दिसंबर 2015 : शरद जोशी का निधन और उनकी विरासत
12 दिसंबर 2015 को पुणे में शरद जोशी का निधन हुआ।
उनके साथ स्वतंत्र भारत के किसान आंदोलन का एक युग समाप्त हुआ।
लेकिन उनके जीवन की अंतिम घटना भी लगभग उसी राजनीति का प्रतीक बनी जिसके लिए उन्होंने दशकों तक काम किया था।
अपनी संपत्ति भी किसान आंदोलन को
मृत्यु के बाद सामने आई उनकी वसीयत के अनुसार शरद जोशी ने अपनी अधिकांश संपत्ति शेतकरी ट्रस्ट को किसान हित के काम में लगाने के लिए दे दी; पुणे का एक फ्लैट अपनी दो बेटियों के लिए छोड़ा। यह उनके निजी जीवन और सार्वजनिक प्रतिबद्धता के बीच गहरे संबंध का उल्लेखनीय उदाहरण था।
इससे उस व्यक्ति की छवि और स्पष्ट होती है जिसने सुरक्षित प्रशासनिक जीवन छोड़कर किसान आंदोलन को अपना जीवन दिया था।
जोशी की विरासत को कैसे बांटें?
उनकी विरासत को केवल ‘किसान नेता’ कहकर पूरा नहीं समझा जा सकता।
कम से कम पांच अलग-अलग शरद जोशी दिखाई देते हैं।
पहला—चाकण का किसान नेता, जिसने प्याज का लाभकारी मूल्य मांगा।
दूसरा—‘भारत बनाम इंडिया’ का विचारक, जिसने कृषि से गैर-कृषि क्षेत्र की ओर संसाधन हस्तांतरण का सिद्धांत दिया।
तीसरा—आर्थिक उदारवादी, जिसने बाजार, निर्यात और तकनीकी स्वतंत्रता को किसान मुक्ति से जोड़ा।
चौथा—महिला संपत्ति अधिकार का समर्थक, जिसने लक्ष्मी मुक्ति जैसा असाधारण अभियान चलाया।
और पांचवां—राजनीतिक उदारवादी, जिसने समाजवादी राज्य व्यवस्था और अत्यधिक सरकारी नियंत्रण को व्यापक स्तर पर चुनौती दी।
इन पांचों को साथ रखे बिना उनकी विरासत अधूरी रहेगी।
किसान को ‘अन्नदाता’ से आगे ले जाना
भारतीय राजनीतिक भाषा किसान को अक्सर ‘अन्नदाता’ कहती है।
यह सम्मानजनक शब्द है, लेकिन शरद जोशी इससे आगे गए।
और लाभ कमाने का वैध अधिकार रखता है।
यह किसान की आर्थिक नागरिकता का विचार था।
उनके अनुसार किसान से यह अपेक्षा करना कि वह राष्ट्रहित में हमेशा सस्ता उत्पादन उपलब्ध कराए, एक प्रकार से उसके श्रम का नैतिक शोषण था।
उनका सबसे स्थायी नारा
शरद जोशी की किसान राजनीति का सार एक वाक्य में था—
अर्थात किसान की समस्या का स्थायी समाधान सब्सिडी और राहत में नहीं बल्कि उसकी उपज के न्यायपूर्ण प्रतिफल में है।
लेकिन विरासत विवादमुक्त नहीं
जोशी की मृत्यु के बाद उनकी प्रशंसा करते हुए उनकी सीमाओं को भूल जाना इतिहास नहीं होगा।
उनका किसान सिद्धांत भूमि स्वामी उत्पादक पर अधिक केंद्रित था।
भूमिहीन खेत मजदूर उसके केंद्र में नहीं था।
मुक्त बाजार पर उनका विश्वास बाजार शक्ति की असमानताओं को कुछ हद तक कम करके देखता था।
चुनावी राजनीति में उनका प्रयोग अपेक्षित सफलता नहीं पा सका।
उनके कुछ राजनीतिक गठबंधन पुराने समर्थकों को असहज करते रहे।
और वैश्वीकरण पर उनका रुख किसान राजनीति के भीतर कभी बहुमत का दृष्टिकोण नहीं बन पाया।
लेकिन इन्हीं विवादों के कारण उनका ऐतिहासिक महत्व बढ़ता है।
वे केवल लोकप्रिय मांग दोहराने वाले नेता नहीं थे।
उन्होंने किसान राजनीति को एक स्वतंत्र आर्थिक दर्शन देने की कोशिश की।
2020–21 के तीन कृषि कानून : शेतकारी संगठन दूसरे किसान संगठनों से अलग क्यों खड़ा हुआ?
2020 में नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा बनाए गए तीन कृषि कानूनों ने भारतीय किसान राजनीति में कई दशकों की सबसे बड़ी राष्ट्रीय टकराहट पैदा कर दी।
पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के अनेक किसान संगठनों ने कानूनों का विरोध किया और दिल्ली की सीमाओं पर लंबा आंदोलन चला।
लेकिन शेतकारी संगठन कानूनों का विरोध करने के बजाय उनके समर्थन में सामने आया। दिसंबर 2020 में संगठन के प्रतिनिधियों ने केंद्रीय कृषि मंत्री से मिलकर तीनों कानूनों के समर्थन की बात कही। समकालीन रिपोर्टों ने स्पष्ट रूप से इसे शरद जोशी की पुरानी खुले बाजार की विचारधारा का स्वाभाविक विस्तार माना।
यह आकस्मिक राजनीतिक निर्णय नहीं था।
इसके पीछे चार दशक पुरानी विचारधारा थी।
पहला कानून : APMC के बाहर व्यापार
किसान’ Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Act, 2020 ने अधिसूचित मंडियों से बाहर कृषि उपज के व्यापार के लिए नया कानूनी ढांचा बनाया।
विरोधी किसान संगठनों की आशंका थी कि इससे APMC मंडियां और MSP व्यवस्था धीरे-धीरे कमजोर हो सकती हैं।
शेतकारी संगठन ने इसे अलग दृष्टि से देखा।
किसान को मंडी में ही बेचने के लिए बाध्य मत करो।
इसलिए APMC के बाहर व्यापार की स्वतंत्रता उसके लिए शरद जोशी की पुरानी मांग की आंशिक पूर्ति जैसी थी।
दूसरा कानून : अनुबंध खेती
किसान (Empowerment and Protection) Agreement on Price Assurance and Farm Services Act, 2020 का उद्देश्य किसानों और खरीदारों के बीच कृषि समझौतों का ढांचा तैयार करना था।
विरोधियों की आशंका थी कि छोटा किसान बड़ी कंपनी के सामने कमजोर होगा।
यदि किसान स्वेच्छा से किसी खरीदार के साथ पहले से कीमत तय करना चाहता है तो सरकार उसे क्यों रोके?
इसलिए संगठन अनुबंध खेती को सिद्धांततः किसान की बाजार स्वतंत्रता का विस्तार मानता था।
लेकिन यहीं वही पुरानी आलोचना मौजूद थी—
क्या किसान और कॉरपोरेट कंपनी की सौदेबाजी शक्ति वास्तव में बराबर है?
यही 2020–21 के विवाद का मूल प्रश्न था।
तीसरा कानून : आवश्यक वस्तु नियंत्रण
Essential Commodities (Amendment) Act, 2020 ने कुछ कृषि वस्तुओं पर स्टॉक सीमा लागू करने की परिस्थितियों को सीमित करने का प्रयास किया।
शेतकारी संगठन दशकों से आवश्यक वस्तु कानून के तहत कृषि व्यापार और भंडारण पर अचानक लगाए जाने वाले प्रतिबंधों का विरोध करता आया था।
इसलिए यह संशोधन भी उसकी मूल विचारधारा से मेल खाता था।
उसी दौर में प्याज निर्यात पर प्रतिबंध लगाए जाने पर शेतकारी संगठन ने सरकार का विरोध किया।
“सरकार के कृषि कानून अच्छे हैं, इसलिए सरकार सही है।”
“जहां सरकार बाजार खोलती है, समर्थन; जहां वह किसान का बाजार बंद करती है, विरोध।”
दिसंबर 2020 की रिपोर्टों में यही विरोधाभास दर्ज हुआ—संगठन तीन कृषि कानूनों के समर्थन में था, पर साथ ही प्याज निर्यात प्रतिबंध तत्काल हटाने की मांग कर रहा था।
सर्वोच्च न्यायालय की समिति
12 जनवरी 2021 को सर्वोच्च न्यायालय ने कानूनों के अमल पर रोक लगाते हुए विशेषज्ञ समिति बनाई।
अनिल घनवट उसके सदस्य बने। न्यायालय के आधिकारिक आदेश में समिति का उद्देश्य तीनों कानूनों से प्रभावित पक्षों की शिकायतें और सरकार का दृष्टिकोण सुनकर सिफारिश देना बताया गया था।
यह नियुक्ति विवादास्पद बनी क्योंकि आंदोलनकारी किसान संगठनों ने कहा कि समिति के सदस्य पहले से कृषि सुधारों के समर्थक रहे हैं।
घनवट ने कहा कि समिति निजी विचारधारा से अलग होकर सभी पक्षों की बात सुनेगी।
समिति की रिपोर्ट
समिति ने किसान संगठनों और अन्य हितधारकों से विचार लिए और अपनी रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय को सौंपी।
बाद में अनिल घनवट ने सार्वजनिक रूप से रिपोर्ट जारी करने की मांग की। नवंबर 2021 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की, तब भी घनवट ने कहा कि कृषि सुधारों की आवश्यकता समाप्त नहीं हुई है।
यह शेतकारी संगठन और दिल्ली आंदोलन के बीच मूल वैचारिक अंतर को दर्शाता है।
कृषि कानूनों की वापसी
2021 के अंत में संसद ने तीनों कानून वापस ले लिए।
आंदोलनकारी किसान संगठनों ने इसे बड़ी विजय माना।
शेतकारी संगठन की शरद जोशी परंपरा के लिए यह निराशाजनक परिणाम था।
उसका तर्क था कि कानूनों में दोष हो सकते हैं और संशोधन आवश्यक हो सकते हैं, लेकिन बाजार सुधार की दिशा को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जाना चाहिए।
घनवट ने स्वयं कहा था कि संगठन कानूनों का समर्थन करता है, हालांकि कुछ प्रावधानों को लेकर उसकी चिंताएं भी थीं।
इसलिए संगठन का समर्थन शब्दशः हर धारा के बिना शर्त समर्थन के बजाय कृषि बाजार सुधार की दिशा का समर्थन था।
भारतीय किसान राजनीति का वैचारिक विभाजन
2020–21 ने चार दशक पुराने मतभेद को पुनर्जीवित कर दिया।
किसान को मजबूत सार्वजनिक मंडी, MSP और राज्य सुरक्षा चाहिए।
किसान को खरीदार और बाजार चुनने की स्वतंत्रता चाहिए।
दोनों पक्ष स्वयं को किसान हित का प्रतिनिधि मान रहे थे।
2022–2026 : MSP, निर्यात प्रतिबंध, बाजार सुधार और किसान आय में शरद जोशी की प्रासंगिकता
तीन कृषि कानून वापस होने के बाद ऐसा लग सकता था कि कृषि बाजार सुधार की बहस समाप्त हो गई।
2022 से 2026 के बीच MSP, प्याज निर्यात, खाद्य मुद्रास्फीति, कृषि व्यापार और किसान आय के प्रश्न लगातार लौटते रहे।
और इनमें कई बार वही प्रश्न सामने आए जिन्हें शरद जोशी 1980 के दशक में उठा चुके थे।
MSP की कानूनी गारंटी
2020–21 आंदोलन के बाद MSP की कानूनी गारंटी किसान राजनीति की प्रमुख मांग बन गई।
यहां शेतकारी संगठन की विचारधारा मुख्यधारा किसान आंदोलन से अलग रहती है।
शरद जोशी के लिए समस्या केवल यह नहीं थी कि सरकार पर्याप्त MSP घोषित नहीं करती।
क्या किसान को बाजार में MSP से अधिक मूल्य पाने के विकल्प भी खुले हैं?
उनकी विचारधारा में सरकारी मूल्य एक न्यूनतम सुरक्षा हो सकता है, लेकिन कृषि बाजार का स्थायी मॉडल केवल सरकारी खरीद नहीं हो सकता।
यही कारण है कि शेतकारी संगठन की परंपरा MSP व्यवस्था के विस्तार की तुलना में प्रतिस्पर्धी बाजार और व्यापार स्वतंत्रता पर अधिक जोर देती रही।
MSP का वास्तविक द्वंद्व
MSP पर बहस में दो सत्य एक साथ मौजूद हैं।
छोटे किसान को कीमत गिरने से सुरक्षा चाहिए।
लेकिन सरकार हर फसल की पूरी उपज खरीद नहीं सकती।
यदि कानूनी MSP से नीचे कोई व्यापार न हो तो निजी बाजार के व्यवहार और कम गुणवत्ता वाली उपज के व्यापार पर जटिल प्रभाव पड़ सकते हैं।
दूसरी ओर यदि कोई प्रभावी मूल्य सुरक्षा नहीं है तो किसान फसल कटाई के समय कम कीमत स्वीकार करने को मजबूर हो सकता है।
इसीलिए शरद जोशी की बहस और MSP समर्थक बहस को परस्पर पूर्ण विरोधी मानना भी पर्याप्त नहीं।
न्यूनतम सुरक्षा + अधिकतम बाजार विकल्प।
प्याज : चाकण की बहस चार दशक बाद भी
यदि शरद जोशी की प्रासंगिकता देखने के लिए एक ही फसल चुननी हो तो वह प्याज है।
1978–80 में चाकण के किसान निर्यात और बाजार नीति से प्रभावित मूल्य के खिलाफ उठे थे।
दिसंबर 2023 में भारत सरकार ने घरेलू कीमतों को नियंत्रित करने के लिए प्याज निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया। मई 2024 में प्रतिबंध हटाया गया, लेकिन 550 डॉलर प्रति टन का न्यूनतम निर्यात मूल्य और 40 प्रतिशत निर्यात शुल्क लगाया गया।
चार दशक बाद मूल राजनीतिक प्रश्न लगभग वही था—
शहरी उपभोक्ता को सस्ता प्याज देने की कीमत कौन चुकाए?
2025 में फिर किसान विरोध
जनवरी 2025 में लासलगांव में प्याज उत्पादकों ने निर्यात शुल्क के विरुद्ध आंदोलन किया और नीलामी रोकी। उस आंदोलन में शेतकारी संगठन तथा महाराष्ट्र राज्य प्याज उत्पादक संघ शामिल थे। किसानों का कहना था कि उत्पादन लागत लगभग 2,500 रुपये प्रति क्विंटल पड़ रही थी जबकि उन्हें कई बार 2,000 रुपये से कम मूल्य मिल रहा था; मांग थी कि 20 प्रतिशत निर्यात शुल्क हटाया जाए।
यह घटना शेतकारी संगठन के इतिहास में अत्यंत प्रतीकात्मक है।
1980 — चाकण : प्याज का भाव और बाजार स्वतंत्रता।
2025 — लासलगांव : प्याज का भाव और निर्यात स्वतंत्रता।
बीच में लगभग पैंतालीस वर्ष बीत चुके थे।
उपभोक्ता बनाम उत्पादक
भारत की कृषि नीति का यह सबसे कठिन राजनीतिक द्वंद्व है।
प्याज का मूल्य बहुत बढ़े तो करोड़ों उपभोक्ता प्रभावित होते हैं और सरकार पर तत्काल दबाव आता है।
प्याज का मूल्य बहुत गिर जाए तो उत्पादक किसान प्रभावित होता है, लेकिन उसका राजनीतिक असर उतना तत्काल नहीं दिखाई देता।
इसलिए सरकारें निर्यात शुल्क, प्रतिबंध, न्यूनतम निर्यात मूल्य, सरकारी बफर और आयात जैसे औजार प्रयोग करती हैं।
शरद जोशी की आपत्ति थी कि इस प्रक्रिया में उपभोक्ता महंगाई को राजनीतिक प्राथमिकता और किसान की आय को अवशिष्ट विषय बना दिया जाता है।
2023–25 के प्याज विवाद ने दिखाया कि यह प्रश्न अभी भी जीवित है।
निर्यात नीति की अनिश्चितता
कृषि निर्यात में एक और समस्या नीति की अस्थिरता है।
यदि किसान और व्यापारी यह नहीं जानते कि कुछ महीने बाद निर्यात खुला रहेगा या प्रतिबंधित हो जाएगा तो वे दीर्घकालीन बाजार संबंध विकसित नहीं कर सकते।
शेतकारी संगठन लंबे समय से इसी ‘स्टॉप–गो’ निर्यात नीति का विरोध करता रहा है।
उसका तर्क है कि लगातार बाजार बदलने से विदेशी खरीदार वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता खोज लेते हैं और भारत अपनी दीर्घकालीन निर्यात विश्वसनीयता खो सकता है।
यही कारण था कि अनिल घनवट ने 2022 में भी प्याज और टमाटर के लिए नए निर्यात बाजार खोलने की मांग करते हुए भारत–पाकिस्तान व्यापार में आंशिक ढील तक का सुझाव दिया था।
इस प्रस्ताव से संगठन के मुक्त व्यापार संबंधी पुराने सिद्धांत की निरंतरता साफ दिखाई देती है।
2026 तक शरद जोशी की कौन-सी बातें प्रासंगिक हैं?
सबसे पहले—कृषि मूल्य और उपभोक्ता मूल्य के बीच संघर्ष।
दूसरा—निर्यात प्रतिबंध का किसान आय पर प्रभाव।
तीसरा—सरकारी खरीद और खुले बाजार का संतुलन।
चौथा—कृषि उपज के भंडारण और व्यापार पर प्रतिबंध।
पांचवां—नई कृषि तकनीक चुनने का किसान का अधिकार।
छठा—किसान को राहत के बजाय स्थायी लाभकारी आय।
इनमें से एक भी प्रश्न 2026 तक समाप्त नहीं हुआ है।
जहां जोशी का सिद्धांत अधूरा पड़ता है
लेकिन 2026 का कृषि क्षेत्र 1980 से बहुत अधिक जटिल है।
जलवायु परिवर्तन कृषि जोखिम बढ़ा रहा है।
कृषि विपणन में बड़ी कंपनियों और डिजिटल मंचों का प्रवेश बढ़ा है।
अंतरराष्ट्रीय कृषि कीमतें भू-राजनीतिक संकटों से प्रभावित होती हैं।
इसलिए किसान को केवल ‘बाजार स्वतंत्रता’ देना पर्याप्त नहीं।
इसलिए शरद जोशी का सिद्धांत आज भी आवश्यक प्रश्न पूछता है, लेकिन हर उत्तर अपने भीतर नहीं रखता।
शेतकारी संगठन की उपलब्धियां और सीमाएं : समेकित मूल्यांकन
करीब आधी सदी की ऐतिहासिक दूरी से शेतकारी संगठन को देखें तो उसका महत्व केवल इस बात से तय नहीं किया जा सकता कि आज उसके कितने सदस्य हैं या वह कितनी चुनावी सीटें जीत सकता है।
इतिहास में आंदोलन का मूल्य इस बात से भी तय होता है कि उसने राजनीतिक भाषा और नीति के प्रश्न कितने बदल दिए।
इस कसौटी पर शेतकारी संगठन स्वतंत्र भारत के सबसे प्रभावशाली किसान आंदोलनों में स्थान पाता है।
पहली उपलब्धि — फसल के ‘दाम’ को किसान राजनीति के केंद्र में रखना
पुराने किसान आंदोलनों में भूमि, लगान, जमींदारी और बटाई मुख्य प्रश्न थे।
भूमि का मालिक किसान भी शोषित हो सकता है यदि उसके उत्पाद का मूल्य उसकी लागत से कम है।
यह एक निर्णायक ऐतिहासिक परिवर्तन था।
इसके बाद लाभकारी कृषि मूल्य भारत की किसान राजनीति का स्थायी विषय बन गया।
दूसरी उपलब्धि — किसान को आर्थिक उत्पादक के रूप में स्थापित करना
शरद जोशी ने किसान की दया-आधारित छवि का विरोध किया।
यह कृषि राजनीति की भाषा में आत्मसम्मान का बड़ा परिवर्तन था।
तीसरी उपलब्धि — ‘भारत बनाम इंडिया’
इस अवधारणा में अतिसरलीकरण था, लेकिन उसकी राजनीतिक शक्ति असाधारण थी।
उसने पहली बार व्यापक जनभाषा में यह प्रश्न उठाया कि—
क्या भारत का औद्योगिकीकरण और शहरी उपभोक्ता कल्याण कृषि से संसाधन हस्तांतरण पर आधारित रहा?
इस तर्क ने ग्रामीण आर्थिक असमानता की ओर राष्ट्रीय ध्यान खींचा।
चौथी उपलब्धि — महिला किसान को संपत्ति का अधिकार
शेतकरी महिला आघाड़ी और लक्ष्मी मुक्ति अभियान को संगठन की सबसे प्रगतिशील विरासतों में गिना जाना चाहिए।
किसान आंदोलन प्रायः ‘किसान’ शब्द के भीतर पुरुष भूमि मालिक को मानकर चलता था।
खेत में काम करने वाली महिला का जमीन में नाम कहां है?
भूमि महिलाओं के नाम करने का अभियान केवल प्रतीकात्मक नारी सम्मान नहीं बल्कि ग्रामीण संपत्ति संबंधों में वास्तविक हस्तक्षेप था।
पांचवीं उपलब्धि — किसान की बाजार स्वतंत्रता
इन सभी प्रश्नों पर संगठन का एक स्थायी सिद्धांत था:
किसान को अधिक खरीदार और अधिक विकल्प दो।
2020 के कृषि कानूनों की बहस ने दिखाया कि यह प्रश्न आज भी राष्ट्रीय नीति के केंद्र में है।
छठी उपलब्धि — आंदोलन की नई पद्धति
और आर्थिक मुद्दे पर फसल-विशिष्ट लामबंदी—
शेतकारी संगठन ने किसान आंदोलन की संघर्ष शैली को आधुनिक बनाया।
उसने दिखाया कि किसान की आर्थिक शक्ति उसकी संख्या के साथ-साथ आपूर्ति श्रृंखला में उसकी केंद्रीय भूमिका से आती है।
पहली सीमा — ‘किसान’ एक समान वर्ग नहीं
शेतकारी संगठन की सबसे बड़ी सैद्धांतिक कमजोरी यही थी।
लाभकारी फसल मूल्य भूमि मालिक को सीधे लाभ देता है।
इसलिए ‘सभी किसान एक हैं’ की भाषा राजनीतिक रूप से प्रभावी थी, लेकिन सामाजिक वास्तविकता अधिक जटिल थी।
दूसरी सीमा — भूमिहीन मजदूर आंदोलन के केंद्र में नहीं
शेतकारी संगठन के आर्थिक सिद्धांत का केंद्र कृषि उत्पादक था।
भूमिहीन मजदूर उसके मुख्य वैचारिक विषय में नहीं आया।
यह उसे तेलंगाना, तेभागा अथवा वामपंथी किसान आंदोलनों से अलग करता है।
उन आंदोलनों ने ग्रामीण वर्ग-संबंध को केंद्र में रखा था।
जोशी ने कृषि बनाम गैर-कृषि अर्थव्यवस्था को।
दोनों दृष्टियां ग्रामीण भारत का अलग हिस्सा समझाती हैं।
तीसरी सीमा — मुक्त बाजार में शक्ति की असमानता
किसान को विकल्प देना महत्वपूर्ण है।
लेकिन विकल्प तभी वास्तविक है जब वह आर्थिक रूप से उनका उपयोग कर सके।
तो औपचारिक स्वतंत्रता वास्तविक सौदेबाजी शक्ति नहीं बनती।
शेतकारी संगठन इस असमानता को स्वीकार तो करता था, लेकिन उसकी विचारधारा इसका पूर्ण संस्थागत समाधान नहीं देती।
चौथी सीमा — चुनावी राजनीति में विफलता
स्वतंत्र भारत पक्ष किसान आंदोलन की सामाजिक ताकत को चुनावी ताकत में नहीं बदल पाया।
यह अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक निष्कर्ष है।
लाखों किसानों की सभा आवश्यक रूप से लाखों स्थायी राजनीतिक मतदाताओं में नहीं बदलती।
शेतकारी संगठन इस अंतर को पार नहीं कर सका।
पांचवीं सीमा — संस्थापक पर अत्यधिक निर्भरता
आंदोलन का वैचारिक केंद्र शरद जोशी इतने अधिक थे कि उनके बाद उसी स्तर का सर्वमान्य नेतृत्व नहीं बन पाया।
लेकिन यही शक्ति उत्तराधिकार की कमजोरी बन गई।
संगठन विचारधारा तो छोड़ गया, लेकिन उसी पैमाने की संस्था नहीं।
छठी सीमा — विभिन्न किसान संगठनों से स्थायी गठबंधन न बन पाना
जोशी, टिकैत और नंजुंडास्वामी जैसे नेता एक समय राष्ट्रीय किसान एकता की संभावना प्रस्तुत करते थे।
लेकिन बाजार, राज्य, वैश्वीकरण, तकनीक और राजनीति पर मतभेद इतने गहरे थे कि स्थायी राष्ट्रीय संगठन नहीं बन सका।
यह किसान समाज के भीतर मौजूद वास्तविक आर्थिक विविधता का परिणाम था।
सबसे बड़ा ऐतिहासिक विरोधाभास
शेतकारी संगठन की कहानी अंततः एक बहुत बड़े विरोधाभास तक पहुंचती है।
जिस संगठन ने राज्य नियंत्रण के विरुद्ध किसान की स्वतंत्रता मांगी, उसी किसान को कई बार राज्य सुरक्षा की भी आवश्यकता पड़ती है।
जिस खुले बाजार में ऊंचा निर्यात मूल्य मिल सकता है, उसी बाजार में कीमत ध्वस्त भी हो सकती है।
जिस निजी कंपनी से किसान को नया खरीदार मिलता है, वही कंपनी उससे अधिक बाजार शक्ति भी रख सकती है।
जिस MSP से किसान को सुरक्षा मिलती है, वही व्यवस्था यदि अत्यधिक सरकारी खरीद पर निर्भर हो जाए तो कुछ फसलों और क्षेत्रों को disproportionate लाभ दे सकती है।
इसलिए किसान नीति को ‘राज्य या बाजार’ के सरल विकल्प से नहीं समझा जा सकता।
शेतकारी संगठन की सबसे बड़ी ऐतिहासिक देन शायद यही है कि उसने राज्य की शक्ति पर प्रश्न उठाया।
उसकी सबसे बड़ी सीमा यह रही कि उसने कभी-कभी बाजार की शक्ति पर उतनी गहरी शंका नहीं की।
1979 से 2026 : क्या बचा?
करीब सैंतालीस वर्ष बाद शेतकारी संगठन की विरासत को पांच शब्दों में समेटा जा सकता है—
मूल्य। स्वतंत्रता। स्वाभिमान। बाजार। संपत्ति-अधिकार।
मेरा माल मेरी लागत से नीचे मत खरीदो।
मुझे अपना माल वहां बेचने दो जहां अधिक मूल्य मिले।
खेत में मेरा श्रम है तो जमीन पर मेरा नाम भी हो।
किसान की देनदारी का हिसाब कृषि नीति से अलग मत करो।
किसान को मंडी के बाहर खरीदार चुनने का अधिकार मिलना चाहिए।
इस अर्थ में शेतकारी संगठन की मूल वैचारिक रेखा असाधारण रूप से निरंतर रही।
खंड 26–30 का अंतिम निष्कर्ष
शरद जोशी के बाद शेतकारी संगठन अपनी पुरानी जनशक्ति कायम नहीं रख सका।
लेकिन वह भारतीय किसान इतिहास से गायब भी नहीं हुआ।
2020–21 के कृषि कानून विवाद ने दिखाया कि भारत की किसान राजनीति में एक ऐसी धारा अब भी मौजूद है जो किसान मुक्ति को मुख्यतः बाजार स्वतंत्रता और सरकारी नियंत्रण से मुक्ति में देखती है। सर्वोच्च न्यायालय की कृषि कानून समिति में अनिल घनवट की नियुक्ति उसी वैचारिक उपस्थिति का प्रमाण थी।
2023–25 के प्याज निर्यात प्रतिबंध और शुल्क विवाद ने इससे भी अधिक प्रतीकात्मक ढंग से शरद जोशी की विरासत को पुनर्जीवित किया। जिस फसल ने 1980 में उनका आंदोलन बनाया था, वही प्याज चार दशक बाद फिर यह सवाल पूछ रहा था—
जब बाजार में बेहतर कीमत संभव हो तो किसान को निर्यात से क्यों रोका जाए?
यही कारण है कि शेतकारी संगठन का मूल्यांकन उसके वर्तमान संगठनात्मक आकार से नहीं होना चाहिए।
उसका वास्तविक ऐतिहासिक महत्व इस बात में है कि उसने भारतीय कृषि राजनीति के सामने एक ऐसा प्रश्न छोड़ा जिसका अंतिम उत्तर 2026 तक भी नहीं मिला है—
क्या किसान की समृद्धि का रास्ता अधिक सरकारी संरक्षण से निकलेगा, अधिक बाजार स्वतंत्रता से, या ऐसी नई व्यवस्था से जिसमें उसे दोनों—सुरक्षा भी और स्वतंत्रता भी—मिलें?
शरद जोशी ने इसका उत्तर स्वतंत्रता की ओर झुककर दिया।
भारतीय किसान राजनीति अभी भी उस उत्तर की परीक्षा कर रही है।
शेतकारी संगठन का इतिहासलेखन : आंदोलन को इतिहासकारों ने कैसे समझा?
शेतकारी संगठन के इतिहासलेखन को मोटे तौर पर पांच प्रमुख व्याख्यात्मक धाराओं में बांटा जा सकता है।
‘नए किसान आंदोलन’ की व्याख्या
शेतकारी संगठन पर अकादमिक शोध का सबसे महत्वपूर्ण ढांचा ‘New किसान’ Movements’—नए किसान आंदोलन का है।
1980 के दशक में महाराष्ट्र का शेतकारी संगठन, पश्चिमी उत्तर प्रदेश की भारतीय किसान यूनियन और कर्नाटक राज्य रैयत संघ जैसे संगठनों ने किसान राजनीति का एक नया रूप प्रस्तुत किया।
इन आंदोलनों की मांग पुराने किसान संघर्षों से भिन्न थी।
लेकिन शेतकारी संगठन में मुख्य प्रश्न था—
स्टाफान लिंडबर्ग ने नए किसान आंदोलनों का विश्लेषण करते हुए शेतकारी संगठन को ऐसे आंदोलन के रूप में देखा जो नियमित नौकरशाही संगठन की तुलना में विशिष्ट मुद्दे और आंदोलन के समय तेजी से सक्रिय होता था। उनके अनुसार संगठन में औपचारिक सदस्यता और कठोर पदानुक्रम अपेक्षाकृत कमजोर था; आंदोलन के समय विशाल लामबंदी और शांत चरणों में न्यूनतम संगठनात्मक सक्रियता उसकी विशिष्टता थी।
यह विश्लेषण शेतकारी संगठन की शक्ति और कमजोरी दोनों समझाता है।
उसे विशाल स्थायी सदस्यता सूची की आवश्यकता नहीं थी।
लेकिन यही ढीलापन नेतृत्व-संक्रमण और दीर्घकालीन संस्थागत स्थिरता के लिए समस्या बना।
मध्यम और समृद्ध किसान की राजनीति
दूसरी प्रमुख व्याख्या शेतकारी संगठन को व्यावसायिक, मध्यम अथवा समृद्ध किसानों के आंदोलन के रूप में देखती है।
इस दृष्टि का आधार यह है कि संगठन जिन फसलों पर सबसे अधिक सक्रिय हुआ—
वे बाजार के लिए उत्पादन की जाने वाली वस्तुएं थीं।
इन फसलों का उत्पादक किसान बाजार मूल्य से सीधे प्रभावित होता था।
इसलिए कुछ मार्क्सवादी और वर्गीय विश्लेषणों ने कहा कि नए किसान आंदोलन भूमिहीन खेत मजदूर की तुलना में कृषि बाजार में अधिशेष बेचने वाले भूमि-स्वामी किसानों की राजनीति अधिक थे।
लेकिन इसे पूर्ण सत्य मानना कठिन है।
छोटे किसान भी बाजार में फसल बेचते हैं और मूल्य गिरने का आर्थिक आघात उनके लिए कहीं अधिक गंभीर हो सकता है। इसलिए आंदोलन में छोटे किसानों की भागीदारी भी बड़ी थी।
इतिहासलेखन का अधिक संतुलित निष्कर्ष यह है कि शेतकारी संगठन ने भूमि-स्वामी कृषक समाज के विभिन्न स्तरों को कृषि बनाम गैर-कृषि अर्थव्यवस्था के प्रश्न पर जोड़ने की कोशिश की, लेकिन भूमिहीन मजदूर उसकी केंद्रीय सामाजिक श्रेणी नहीं था।
‘भारत बनाम इंडिया’ और कृषि से अधिशेष हस्तांतरण
तीसरी व्याख्या शरद जोशी के राजनीतिक अर्थशास्त्र पर केंद्रित है।
जोशी का तर्क था कि भारतीय आर्थिक व्यवस्था कृषि उत्पादों की कीमतें अपेक्षाकृत कम रखकर कृषि से गैर-कृषि क्षेत्र की ओर संसाधनों का हस्तांतरण करती है।
लिंडबर्ग ने भी जोशी की वैचारिक संरचना को ‘urban bias’ अर्थात शहरी पक्षपात की व्यापक धारणा से जोड़ा है। उनके अनुसार जोशी ग्रामीण गरीबी को केवल ग्रामीण सामाजिक पिछड़ेपन का परिणाम नहीं मानते थे; वे कृषि अधिशेष के शहरी अर्थव्यवस्था की ओर हस्तांतरण को केंद्रीय कारण मानते थे।
जोशी के अपने लेखन में यह धारणा और स्पष्ट दिखाई देती है। 1982 में पहली बार प्रकाशित ‘प्रचलित अर्थव्यवस्थेवर नवा प्रकाश’ में उन्होंने कृषि मूल्य, सरकारी नीति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बीच इसी संबंध पर विचार किया।
उनकी हिंदी पुस्तक ‘समस्याएं भारत की’ में भी औपनिवेशिक काल और स्वतंत्र भारत की आर्थिक नीति के बीच कृषि अधिशेष हस्तांतरण की निरंतरता का तर्क मिलता है।
आर्थिक उदारवाद की किसान धारा
चौथी व्याख्या शरद जोशी को केवल किसान नेता नहीं बल्कि भारतीय आर्थिक उदारवाद के महत्वपूर्ण विचारक के रूप में देखती है।
यह दृष्टि विशेष रूप से 1990 के दशक के बाद मजबूत हुई।
उनकी पुस्तक ‘खुल्या व्यवस्थेकडे खुल्या मनाने’ में 1991–98 के बीच लिखे गए लेख मुक्त अर्थव्यवस्था और GATT संबंधी उनके विचारों को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करते हैं।
यहीं शेतकारी संगठन भारतीय किसान राजनीति की मुख्यधारा से अलग हुआ।
जब अनेक किसान संगठन वैश्वीकरण को खतरे के रूप में देख रहे थे, जोशी उसमें कृषि व्यापार की संभावित स्वतंत्रता देख रहे थे।
2015 में उनके निधन पर लिखे एक मूल्यांकन में भी उन्हें उन प्रमुख किसान नेताओं में गिना गया जिन्होंने किसान के लिए ‘negative subsidy’ और मुक्त बाजार का प्रश्न उठाया।
महिला आंदोलन और सामाजिक परिवर्तन
शेतकारी संगठन पर प्रारंभिक लेखन का बड़ा भाग मूल्य और बाजार पर केंद्रित था, लेकिन बाद के अध्ययनों में शेतकरी महिला आघाड़ी और लक्ष्मी मुक्ति को अधिक महत्व मिला।
लिंडबर्ग ने ग्रामीण महिलाओं की इतनी विशाल राजनीतिक लामबंदी को आंदोलन की सबसे नवीन विशेषताओं में से एक माना।
1986 के चांदवड महिला सम्मेलन और उसके बाद भूमि महिलाओं के नाम करने के अभियान ने शेतकारी संगठन को केवल मूल्य आंदोलन से सामाजिक सुधार आंदोलन तक विस्तृत कर दिया।
जोशी का महिला प्रश्न संबंधी लेखन बाद में ‘चांदवडची शिदोरी : स्त्रियांचा प्रश्न’ के रूप में संकलित हुआ। इसमें लगभग ढाई दशकों के महिला, कृषि और संपत्ति संबंधी उनके विचार संग्रहीत हैं।
इतिहासलेखन की एक बड़ी समस्या
शेतकारी संगठन पर लिखे साहित्य का एक हिस्सा अत्यधिक प्रशंसात्मक है और दूसरा अत्यधिक आलोचनात्मक।
समर्थक साहित्य में शरद जोशी को किसान मुक्ति का लगभग पूर्ण वैचारिक उत्तर देने वाला नेता माना जाता है।
वामपंथी आलोचना में कई बार संगठन को केवल संपन्न किसानों का आंदोलन बताकर उसकी व्यापक सामाजिक और महिला लामबंदी को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता।
संतुलित इतिहासलेखन के लिए दोनों अतियों से बचना आवश्यक है।
न तो केवल ‘अमीर किसानों का आंदोलन’ था,
और न कृषि संकट का सार्वभौमिक समाधान।
वह स्वतंत्र भारत की बदलती बाजारोन्मुख कृषि से पैदा हुआ एक विशिष्ट किसानवादी आर्थिक आंदोलन था।
2026 का नया इतिहासलेखन
2026 में प्रकाशित एक नवीन अध्ययन ने 1980 के दशक के किसान आंदोलनों में शरद जोशी और महेंद्र सिंह टिकैत की असाधारण लामबंदी क्षमता तथा 1990 के दशक में उनके क्रमिक क्षय को आज के किसान आंदोलनों के साथ तुलना की है। अध्ययन का निष्कर्ष यह संकेत करता है कि पुराने ‘नए किसान आंदोलन’ भले संस्थागत रूप से कमजोर हुए हों, लेकिन कर्ज माफी, कृषि लागत और MSP जैसे प्रश्न नई किसान राजनीति में वापस आए हैं।
इससे शेतकारी संगठन का इतिहास समाप्त अध्याय नहीं बल्कि समकालीन किसान राजनीति को समझने की पृष्ठभूमि बन जाता है।
शेतकारी संगठन और शरद जोशी की विस्तृत समयरेखा
1935
3 सितंबर 1935 — शरद अनंतराव जोशी का जन्म महाराष्ट्र के सतारा जिले में।
राज्यसभा के आधिकारिक श्रद्धांजलि अभिलेख में उनका जन्म सितंबर 1935 में सतारा जिले में दर्ज है।
1950 का दशक
कोल्हापुर में अर्थशास्त्र अध्यापन सहित प्रारंभिक शैक्षणिक कार्य।
1968–1977
स्विट्जरलैंड के बर्न में Universal Postal Union के अंतरराष्ट्रीय ब्यूरो में कार्य।
शरद जोशी के जीवन-वृत्त में 1968 से 1977 तक Chief, Informatics Service के रूप में उनका कार्य दर्ज है।
1977
पुणे जिले के अंबेठाण–चाकण क्षेत्र में खेती की शुरुआत।
उनके जीवनीकार के अनुसार जोशी ने अपनी बचत का बड़ा हिस्सा अंबेठाण में लगभग 27 एकड़ जमीन खरीदने में लगाया।
1978
चाकण क्षेत्र में प्याज उत्पादकों के मूल्य प्रश्न पर प्रारंभिक किसान आंदोलन।
जोशी स्वयं बाद में कहते थे कि चाकण का किसान आंदोलन 1978 में प्रारंभ हुआ।
1979
9 अगस्त 1979 — चाकण में शेतकारी संगठन के कार्यालय का उद्घाटन; संगठनात्मक स्थापना का प्रमुख संदर्भ-बिंदु।
“शेतमालास रास्त भाव”, अर्थात कृषि उपज को उचित/लाभकारी मूल्य।
1980
रास्ता रोको और मूल्य आंदोलन के माध्यम से शेतकारी संगठन महाराष्ट्र स्तर पर पहचाना जाने लगा।
इसके बाद गन्ना आंदोलन नासिक–निफाड क्षेत्र तक फैला।
1981
26–27 फरवरी 1981, अंबाजोगाई — संगठनात्मक प्रशिक्षण शिविर।
इसी शिविर की रिकॉर्ड सामग्री से बाद में ‘शेतकरी संघटना : विचार आणि कार्यपद्धती’ तैयार हुई, जो संगठन की विचारधारा और कार्यपद्धति का मूल दस्तावेज बना।
1982
‘प्रचलित अर्थव्यवस्थेवर नवा प्रकाश’ का प्रकाशन।
इसी काल में कृषि मूल्य से व्यापक आर्थिक व्यवस्था की आलोचना तक जोशी की वैचारिक यात्रा अधिक स्पष्ट हुई।
31 अक्टूबर 1982 — देश के गैर-दलीय किसान संगठनों के समन्वय का प्रयास; जीवन-वृत्त इसे राष्ट्रीय किसान संगठन समन्वय समिति की स्थापना से जोड़ता है।
1984
महाराष्ट्र की एकाधिकार कपास खरीद व्यवस्था के विरुद्ध आंदोलन।
किसान को अपना कपास खुले बाजार में बेचने की स्वतंत्रता संगठन की प्रमुख मांगों में शामिल हुई।
1985
शरद जोशी की आर्थिक व्यवस्था संबंधी विचारधारा का दूसरा चरण और अधिक स्पष्ट।
1986
9–10 नवंबर 1986 — चांदवड महिला अधिवेशन।
लगभग दो लाख ग्रामीण महिलाओं की उपस्थिति का उल्लेख शरद जोशी जीवन-वृत्त में मिलता है।
महिला संपत्ति-अधिकार और महिला किसान की स्वतंत्र पहचान आंदोलन का केंद्रीय विषय बना।
1988
कृषि ऋण को व्यक्तिगत किसान की असफलता के बजाय अलाभकारी कृषि मूल्य नीति से जोड़ने का अभियान।
हिंदी में ‘समस्याएं भारत की’ प्रकाशित।
1989
किसान पुरुषों से पत्नी के नाम कृषि भूमि दर्ज कराने का आह्वान।
शरद जोशी जीवन-वृत्त 1989 को अभियान के आरंभ से जोड़ता है और 1991 तक एक लाख से अधिक महिलाओं के नाम भूमि अभिलेखों में दर्ज होने का संगठनात्मक दावा करता है।
1991
शेतकारी संगठन ने इसे कृषि नियंत्रण समाप्त करने की दिशा में संभावित अवसर के रूप में देखा।
10 नवंबर 1991 — शेगांव किसान महासम्मेलन।
‘शेतकरी संघटक’ के उपलब्ध अंक में शेगांव घोषणापत्र तथा कृषि नीति के नए कार्यक्रम का विवरण मिलता है। इसमें कृषि प्रसंस्करण, व्यापार और निर्यात की स्वतंत्रता पर विशेष जोर था।
1991–1998
GATT, खुले बाजार, कृषि व्यापार और आर्थिक उदारीकरण पर जोशी का विस्तृत लेखन।
बाद में यही लेख ‘खुल्या व्यवस्थेकडे खुल्या मनाने’ में संकलित हुए।
1994
गैर-दलीय किसान आंदोलन से प्रत्यक्ष चुनावी राजनीति की ओर निर्णायक कदम।
इसी वर्ष नागपुर में शेतकारी संगठन का छठा संयुक्त अधिवेशन भी दर्ज है।
1995
भारत के विश्व व्यापार संगठन में प्रवेश के समय जोशी कृषि व्यापार उदारीकरण के प्रमुख समर्थक किसान नेताओं में रहे।
1990 के दशक का उत्तरार्ध
किसान संगठनों के भीतर WTO, वैश्वीकरण और राजनीतिक सहभागिता को लेकर मतभेद बढ़े।
शेतकारी संगठन की 1980 के दशक वाली व्यापक एकता धीरे-धीरे कमजोर हुई।
2000–2001
कपास, किसान ऋण और बिजली संबंधी आंदोलनों का नया चरण।
कृषि संकट और किसान आत्महत्या शरद जोशी की राजनीति में अधिक महत्वपूर्ण विषय बने।
2003
‘खुल्या व्यवस्थेकडे खुल्या मनाने’ का पहला संस्करण—खुली अर्थव्यवस्था और GATT पर उनके लेखों का महत्वपूर्ण संग्रह।
2004
शरद जोशी महाराष्ट्र से राज्यसभा पहुंचे।
2004–2010
राज्यसभा सदस्य के रूप में कृषि, किसान आत्महत्या, आर्थिक नीति, WTO और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों पर हस्तक्षेप।
2010
उनके व्यापक लेखन को संकलित रूप में प्रकाशित करने का बड़ा अभियान।
‘बळीचे राज्य येणार आहे’, ‘भारता’साठी, ‘पोशिंद्यांची लोकशाही’, ‘अन्वयार्थ’, महिला प्रश्न संबंधी संकलन
जैसी पुस्तकें प्रकाशित/पुनर्प्रकाशित हुईं।
2015
12 दिसंबर 2015 — पुणे में शरद जोशी का निधन, आयु 80 वर्ष।
राज्यसभा ने 14 दिसंबर को आधिकारिक श्रद्धांजलि दी।
2016 और बाद
उनके लेखन, भाषण और आंदोलन-साहित्य के संग्रह प्रकाशित और डिजिटल रूप में उपलब्ध होने लगे।
2020
तीन केंद्रीय कृषि कानूनों पर देशव्यापी विवाद।
शेतकारी संगठन की जोशी परंपरा ने कानूनों में बाजार स्वतंत्रता के कई तत्वों का समर्थन किया।
2021
सर्वोच्च न्यायालय की कृषि कानून विशेषज्ञ समिति में शेतकारी संगठन के अनिल घनवट की भूमिका।
2022
संगठन ने प्याज और टमाटर के लिए नए निर्यात बाजार खोलने की मांग जारी रखी; भारत–पाकिस्तान कृषि व्यापार आंशिक रूप से खोलने का सुझाव भी दिया गया।
2023–2024
प्याज निर्यात पर केंद्र सरकार की पाबंदियों ने महाराष्ट्र में किसान असंतोष फिर बढ़ाया।
2025
लासलगांव में प्याज निर्यात शुल्क के खिलाफ किसानों ने नीलामी रोकी। शेतकारी संगठन इस आंदोलन में शामिल था।
उसी वर्ष महाराष्ट्र के कुछ किसान उत्पादक संगठनों ने पहली बार बिचौलियों के बिना सीधे मध्य-पूर्व बाजार में प्याज निर्यात करने की पहल की—जो किसान को सीधे निर्यात बाजार से जोड़ने की उस अवधारणा के निकट दिखाई देती है जिसे जोशी दशकों से प्रतिपादित करते रहे थे।
2026
वित्त वर्ष 2025–26 में महाराष्ट्र से प्याज निर्यात लगभग 10.59 लाख टन तक पहुंचा, जो पिछले वित्त वर्ष के लगभग पांच लाख टन से दोगुने से अधिक था। निर्यातकों ने इस बढ़ोतरी को केंद्र द्वारा पूर्ववर्ती प्रतिबंधों और शुल्कों में ढील से जोड़ा।
इस प्रकार 2026 तक भी शेतकारी संगठन के जन्म का मूल प्रश्न—निर्यात स्वतंत्रता और कृषि मूल्य—महाराष्ट्र की किसान राजनीति में जीवित है।
शेतकारी संगठन के प्रमुख प्राथमिक स्रोत और दस्तावेज
शेतकारी संगठन पर गंभीर शोध के लिए सबसे पहले उसके अपने दस्तावेज पढ़ना आवश्यक है। केवल बाद के इतिहासकारों से आंदोलन को समझने पर शरद जोशी की वैचारिक भाषा का महत्वपूर्ण हिस्सा छूट जाता है।
‘शेतकरी संघटना : विचार आणि कार्यपद्धती’
यह शेतकारी संगठन की विचारधारा समझने का सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत है।
मूल सामग्री 26–27 फरवरी 1981 के अंबाजोगाई प्रशिक्षण शिविर में दिए गए जोशी के व्याख्यानों से निकली। बाद में इसे पुस्तक का रूप दिया गया।
और किसान की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान
‘प्रचलित अर्थव्यवस्थेवर नवा प्रकाश’
1982 और 1985 के लेखों का यह संग्रह शरद जोशी के राजनीतिक अर्थशास्त्र का प्रारंभिक मूल स्रोत है।
पर उनके शुरुआती वैचारिक तर्क इसमें मिलते हैं।
‘समस्याएं भारत की’
हिंदी भाषी शोधकर्ताओं के लिए विशेष रूप से उपयोगी।
इसमें कृषि और शहरी अर्थव्यवस्था के बीच असमानता तथा ‘भारत’ की आर्थिक समस्या पर जोशी के तर्क मिलते हैं।
‘शेतकरी संघटक’
संगठन का पाक्षिक मुखपत्र आंदोलन के इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण प्राथमिक अभिलेख है।
और जोशी के तत्कालीन भाषणों का विवरण इसमें मिलता है।
21 नवंबर 1991 का उपलब्ध अंक शेगांव सम्मेलन और घोषणापत्र के अध्ययन के लिए विशेष रूप से उपयोगी है।
Indian Liberals डिजिटल संग्रह में ‘शेतकरी संघटक’ के अनेक अंक संरक्षित हैं।
‘बळीचे राज्य येणार आहे’
यह संग्रह 1979 से आगे के लेखों और आंदोलन-संबंधी हस्तक्षेपों को समेटता है।
इसमें चिंतन, आंदोलन, सहकारिता और किसान ऋण जैसे विषय एक साथ आते हैं।
शेतकारी संगठन के ऐतिहासिक विकास को भीतर से समझने के लिए यह अनिवार्य स्रोत है।
‘माझ्या शेतकरी भावांनो, मायबहिणींनो’
इस संकलन में 1981 से 2009 तक जोशी के 29 प्रमुख किसान भाषण उपलब्ध हैं।
किसान सभा में जोशी किस भाषा में अपने आर्थिक सिद्धांत समझाते थे, यह जानने के लिए यह विशेष रूप से उपयोगी है।
‘चांदवडची शिदोरी : स्त्रियांचा प्रश्न’
महिला किसान, संपत्ति-अधिकार, ग्रामीण परिवार और शेतकरी महिला आघाड़ी पर जोशी का प्रमुख स्रोत संग्रह।
चांदवड सम्मेलन और लक्ष्मी मुक्ति को समझने के लिए इसे प्राथमिक स्रोत की तरह पढ़ना चाहिए।
‘खुल्या व्यवस्थेकडे खुल्या मनाने’
1991–98 के बीच मुक्त अर्थव्यवस्था और GATT पर जोशी के लेख।
वैश्वीकरण पर शेतकारी संगठन की स्थिति समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोतों में से एक।
‘भारता’साठी’
आर्थिक और सामाजिक प्रश्नों पर जोशी के 44 लेखों का संग्रह।
इसमें बिजली, राज्य व्यवस्था और ‘भारत’ संबंधी उनका व्यापक दृष्टिकोण मिलता है।
‘पोशिंद्यांची लोकशाही’
जोशी के 39 राजनीतिक लेखों का महत्वपूर्ण संग्रह।
किसान, लोकतंत्र और राज्य व्यवस्था के संबंध को समझने के लिए उपयोगी।
‘अन्वयार्थ’
1990 और 2000 के दशकों के समाचार-पत्र स्तंभ।
इनसे यह समझने में सहायता मिलती है कि किसान आंदोलन से बाहर राष्ट्रीय राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक प्रश्नों पर जोशी का दृष्टिकोण कैसे विकसित हुआ।
शेगांव घोषणापत्र, 1991
शेतकरी संघटक में प्रकाशित 10 नवंबर 1991 का शेगांव घोषणापत्र संगठन की कृषि नीति के इतिहास में महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
इसमें प्रसंस्करण, व्यापार, निर्यात और सरकारी नियंत्रण हटाने संबंधी कार्यक्रम स्पष्ट है।
राज्यसभा कार्यवाही
2004–10 के शरद जोशी के संसदीय भाषण आंदोलनकारी विचार से नीति-निर्माण तक उनकी यात्रा के प्राथमिक दस्तावेज हैं।
2015 की राज्यसभा श्रद्धांजलि भी उनके जीवन और सार्वजनिक कार्य की महत्वपूर्ण आधिकारिक जीवनी सामग्री देती है।
महाराष्ट्र सरकार के दस्तावेज
से संबंधित सरकारी अधिसूचनाएं तथा विधानसभा अभिलेख आंदोलन की मांगों को सत्यापित करने के लिए आवश्यक हैं।
समकालीन समाचार-पत्र
और क्षेत्रीय मराठी प्रेस शेतकारी संगठन की सड़क राजनीति का महत्वपूर्ण समकालीन स्रोत हैं।
प्रमुख द्वितीयक स्रोत और संदर्भ ग्रंथ
Staffan Lindberg — “New किसान’ Movements in India”
शेतकारी संगठन के अध्ययन के लिए सर्वाधिक उपयोगी अकादमिक लेखों में एक।
D. N. Dhanagare
भारतीय किसान आंदोलनों के इतिहासलेखन में धनागरे का कार्य आधारभूत है।
नए किसान आंदोलन पर उनकी व्याख्या पुराने भूमि-केंद्रित किसान संघर्षों और 1980 के दशक की मूल्य-केंद्रित किसान राजनीति के बीच अंतर समझने में उपयोगी है।
विशेष रूप से महाराष्ट्र के सामाजिक परिवर्तन, वर्ग और जाति की पृष्ठभूमि में शेतकारी संगठन को पढ़ने के लिए उनका अध्ययन महत्वपूर्ण है।
Gail Omvedt
गेल ऑम्वेट का महाराष्ट्र के सामाजिक आंदोलनों, जाति-विरोधी परंपरा और नए किसान आंदोलन पर लेखन शेतकारी संगठन को केवल कृषि मूल्य आंदोलन न मानकर व्यापक सामाजिक परिवर्तन से जोड़ता है।
लिंडबर्ग भी जोशी के विचारों में फुले–आंबेडकर और महाराष्ट्र की सामाजिक सुधार परंपराओं से संबंध की ओर संकेत करते हैं।
ग्रामीण राजनीतिक अर्थव्यवस्था संबंधी अध्ययन
और ग्रामीण बैंकिंग पर किए गए अध्ययन शेतकारी संगठन की पृष्ठभूमि समझने के लिए आवश्यक हैं।
संगठन की राजनीति को इन संरचनाओं से अलग करके पढ़ना उचित नहीं।
‘नए किसान आंदोलन’ पर तुलनात्मक साहित्य
शेतकारी संगठन को BKU और KRRS से तुलना करने वाले अध्ययन विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
इनसे तीन वैचारिक दिशाएं स्पष्ट होती हैं—
टिकैत — सरकारी दबाव और किसान पंचायत, नंजुंडास्वामी — किसान संप्रभुता और वैश्वीकरण-विरोध, जोशी — आर्थिक स्वतंत्रता और मुक्त बाजार।
महिला भूमि-अधिकार अध्ययन
लक्ष्मी मुक्ति और शेतकरी महिला आघाड़ी पर महिला अध्ययन, भूमि अधिकार और ग्रामीण नारीवाद से संबंधित शोध आवश्यक हैं।
इनसे यह समझने में मदद मिलती है कि महिला के नाम जमीन दर्ज कराने का अभियान प्रतीकात्मक था या वास्तविक सामाजिक परिवर्तन लाया।
कृषि मूल्य और ‘व्यापार की शर्तें’ अध्ययन
कृषि बनाम गैर-कृषि क्षेत्र के विनिमय संबंधों पर अर्थशास्त्रीय साहित्य शरद जोशी के ‘भारत बनाम इंडिया’ सिद्धांत की जांच के लिए आवश्यक है।
जोशी की राजनीतिक भाषा को आर्थिक आंकड़ों से सत्यापित करने का यही सबसे उपयुक्त माध्यम है।
WTO और भारतीय कृषि
और वैश्विक कृषि व्यापार संबंधी अध्ययन शेतकारी संगठन की 1990 के बाद की राजनीति समझने के लिए जरूरी हैं।
विदर्भ किसान संकट और आत्महत्या अध्ययन
शरद जोशी की विचारधारा की सबसे गंभीर परीक्षा विदर्भ संकट है।
इसलिए किसान आत्महत्या पर केवल संगठन साहित्य नहीं बल्कि—
समकालीन पुनर्मूल्यांकन
2026 का Suthar–Singh अध्ययन पुराने नए किसान आंदोलनों और वर्तमान ग्रामीण किसान आंदोलनों में निरंतरता तथा बदलाव की तुलना करता है। शरद जोशी और टिकैत की 1980 के दशक वाली किसान लामबंदी को आज के MSP और कर्ज आंदोलनों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में समझने के लिए यह उपयोगी नवीन संदर्भ है।
शोध के लिए 25 अनिवार्य स्रोतों की संक्षिप्त सूची
1. Sharad Joshi — Shetkari Sanghatana: Vichar Ani Karyapaddhati 2. Sharad Joshi — Prachalit Arthavyavasthevar Nava Prakash 3. Sharad Joshi — Samasyayen Bharat Ki 4. Sharad Joshi — Baliche Rajya Yenar Aahe 5. Sharad Joshi — Chandvadachi Shidori 6. Sharad Joshi — Khulya Vyavasthekade Khulya Manane 7. Sharad Joshi — Bharatasathi 8. Sharad Joshi — Poshindyanchi Lokshahi 9. Sharad Joshi — Anvyartha 10. Sharad Joshi — Majya Shetkari Bhavana, Mai-Bahinino 11. Shetkari Sanghatak के पुराने अंक 12. शेगांव घोषणापत्र, 1991 13. शेतकरी महिला आघाड़ी दस्तावेज 14. लक्ष्मी मुक्ति अभियान अभिलेख 15. शरद जोशी राज्यसभा भाषण 16. महाराष्ट्र कपास एकाधिकार खरीद संबंधी सरकारी अभिलेख 17. महाराष्ट्र चीनी सहकारिता एवं गन्ना मूल्य दस्तावेज 18. कृषि उपज बाजार समिति कानून और अभिलेख 19. Staffan Lindberg — New किसान’ Movements in India 20. D. N. Dhanagare — भारतीय किसान आंदोलनों पर प्रमुख अध्ययन 21. Gail Omvedt — महाराष्ट्र के सामाजिक और किसान आंदोलनों पर लेखन 22. नए किसान आंदोलन पर तुलनात्मक समाजशास्त्रीय साहित्य 23. WTO तथा भारतीय कृषि व्यापार पर मानक आर्थिक अध्ययन 24. विदर्भ किसान आत्महत्या एवं कृषि संकट अध्ययन 25. 2020–21 कृषि कानून, सर्वोच्च न्यायालय समिति और 2023–26 कृषि निर्यात नीति के आधिकारिक तथा समकालीन स्रोत।
डिजिटल अभिलेखों की उपयोगिता
आज शेतकारी संगठन पर शोध पहले की तुलना में आसान है क्योंकि शरद जोशी के लेखन का एक बड़ा हिस्सा डिजिटल रूप में उपलब्ध है।
Indian Liberals अभिलेख में हजारों प्राथमिक दस्तावेजों के साथ ‘शेतकरी संघटक’ के पुराने अंक, जोशी की पुस्तकें, भाषण और लेख उपलब्ध हैं।
SharadJoshi.in पर जीवन-वृत्त, संगठन इतिहास, सम्मेलन विवरण और आंदोलन साहित्य उपलब्ध है। स्थापना के लिए 9 अगस्त 1979, 1982 का किसान समन्वय और 1986 चांदवड सम्मेलन जैसी अनेक महत्वपूर्ण तिथियां वहीं संकलित हैं।
इन दोनों अभिलेखों का उपयोग करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि इनमें से कुछ सामग्री संगठन अथवा समर्थक परंपरा से आती है। इसलिए विवादित संख्या और दावों को स्वतंत्र स्रोतों से मिलाना शोध की अनिवार्य पद्धति होनी चाहिए।
निष्कर्ष : शेतकारी संगठन को कैसे समझें?
शेतकारी संगठन को समझने का सबसे सरल तरीका यह है कि उसे उस ऐतिहासिक बिंदु पर रखा जाए जहां भारतीय किसान राजनीति का केंद्रीय प्रश्न बदल रहा था।
और 1980 का शेतकारी संगठन पूछ रहा था—
यही परिवर्तन उसका ऐतिहासिक महत्व है।
भूमि से बाजार तक किसान प्रश्न का परिवर्तन
स्वतंत्रता के बाद जमींदारी उन्मूलन और कृषि के व्यावसायीकरण ने किसान राजनीति की परिस्थितियां बदल दी थीं।
अब किसान अपनी जमीन का मालिक हो सकता था और फिर भी आर्थिक संकट में रह सकता था।
क्योंकि खेती बाजार से जुड़ चुकी थी।
यदि इस पूरे चक्र में उसकी उपज का मूल्य पर्याप्त न हो तो भूमि का स्वामित्व स्वयं आर्थिक समृद्धि की गारंटी नहीं था।
शरद जोशी ने इसी नए संकट को राजनीतिक भाषा दी।
किसान को ‘पीड़ित’ नहीं, ‘उत्पादक’ कहना
यह शेतकारी संगठन का सबसे गहरा वैचारिक परिवर्तन था।
किसान गरीब है इसलिए उसे मदद मिलनी चाहिए—
मैं उत्पादन करता हूं; मेरा आर्थिक अधिकार मेरे उत्पादन से आता है।
यह किसान को कल्याणकारी राज्य के लाभार्थी से आर्थिक नागरिक में बदलने की कोशिश थी।
‘भारत बनाम इंडिया’ : शक्ति भी, सीमा भी
‘भारत बनाम इंडिया’ ने आंदोलन को अत्यंत शक्तिशाली राजनीतिक भाषा दी।
तुम्हारी गरीबी व्यक्तिगत दुर्भाग्य नहीं; आर्थिक व्यवस्था का परिणाम हो सकती है।
पूरा गांव गरीब और पूरा शहर संपन्न नहीं।
भूमिहीन खेत मजदूर और बड़े गन्ना किसान समान आर्थिक वर्ग नहीं।
शहरी मजदूर और औद्योगिक पूंजीपति भी समान ‘इंडिया’ नहीं।
इसलिए ‘भारत बनाम इंडिया’ को वैज्ञानिक वर्ग-विभाजन नहीं बल्कि कृषि–गैर कृषि असमानता का प्रभावशाली राजनीतिक रूपक मानना अधिक उचित है।
लाभकारी मूल्य : स्थायी विरासत
यदि शेतकारी संगठन की केवल एक उपलब्धि चुननी हो तो शायद वह यही होगी।
उसने कृषि राजनीति में यह प्रश्न स्थायी कर दिया—
उत्पादन लागत के बाद किसान को वास्तविक प्रतिफल कितना मिलता है?
हर जगह यही प्रश्न किसी न किसी रूप में मौजूद है।
बाजार स्वतंत्रता : सबसे विवादास्पद विरासत
शरद जोशी की दूसरी बड़ी विरासत बाजार स्वतंत्रता है।
यही विचार 2020 के कृषि कानून विवाद में फिर राष्ट्रीय बहस बना।
लेकिन विरोधियों का प्रश्न भी वैध था—
यदि सामने बहुत बड़ी कंपनी हो और किसान बहुत छोटा हो तो ‘स्वतंत्र अनुबंध’ कितना स्वतंत्र है?
यही शरद जोशी की विरासत की सबसे कठिन बहस है।
महिला किसान : आंदोलन का प्रगतिशील विस्तार
शेतकारी संगठन की चर्चा केवल मुक्त बाजार तक सीमित कर देना उसके इतिहास के साथ अन्याय होगा।
चांदवड सम्मेलन और लक्ष्मी मुक्ति अभियान ने एक अत्यंत मूलभूत प्रश्न उठाया—
क्या केवल वह पुरुष जिसके नाम जमीन है?
या वह महिला भी जो खेत में काम करती है?
और यदि वह किसान है तो जमीन में उसका नाम क्यों नहीं?
भारतीय किसान आंदोलन की लंबी परंपरा में महिला भूमि-अधिकार को इतने बड़े सामाजिक अभियान के रूप में उठाना शेतकारी संगठन की विशिष्ट उपलब्धि है।
आंदोलन की सबसे बड़ी संगठनात्मक कमजोरी
शेतकारी संगठन शरद जोशी से अत्यधिक जुड़ा रहा।
लिंडबर्ग ने आंदोलन को एक ऐसे संगठन के रूप में वर्णित किया जिसमें मुद्दे के समय असाधारण ऊर्जा पैदा होती थी लेकिन स्थायी संगठनात्मक संरचना अपेक्षाकृत कमजोर थी।
यही विशेषता 1980 के दशक में शक्ति थी।
लेकिन उसी स्तर की राज्यव्यापी लामबंदी नहीं।
चुनावी राजनीति : संख्या संस्था क्यों नहीं बनी?
शेतकारी संगठन का अनुभव भारतीय किसान आंदोलनों के एक बड़े प्रश्न की पुष्टि करता है—
सड़क की संख्या चुनावी संस्था क्यों नहीं बनती?
इसलिए स्वतंत्र भारत पक्ष शेतकारी संगठन की आंदोलनकारी ताकत को उसी अनुपात में राजनीतिक सीटों में नहीं बदल पाया।
भारतीय किसान राजनीति में बार-बार यह समस्या सामने आती रही है।
2026 : चाकण का प्रश्न अभी जीवित है
इतिहास की सबसे दिलचस्प बात यह है कि शेतकारी संगठन का पहला बड़ा मुद्दा 2026 तक भी प्रासंगिक है—
2023–25 में निर्यात प्रतिबंध और शुल्क ने फिर महाराष्ट्र के प्याज किसानों को सड़कों पर उतारा।
और 2025–26 में प्रतिबंधों में ढील के बाद महाराष्ट्र का प्याज निर्यात दोगुने से अधिक बढ़कर 10.59 लाख टन पहुंच गया।
यह आंकड़ा स्वयं किसी एक नीति को सही सिद्ध नहीं करता।
लेकिन वह शरद जोशी के पुराने प्रश्न की प्रासंगिकता दिखाता है—
निर्यात नीति किसान की कीमत को प्रभावित करती है।
भारतीय किसान आंदोलन में समेकित स्थान
शेतकारी संगठन को भारतीय किसान इतिहास में पांच बड़े चरणों के बीच रखा जा सकता है।
तेभागा, तेलंगाना, वारली और बकाश्त जैसे वर्गीय–भूमि संघर्ष।
स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधार और किसान संगठन।
1980 के दशक का नया किसान आंदोलन—मूल्य, बिजली, कर्ज और स्वाभिमान।
1991 के बाद बाजार, वैश्वीकरण, MSP, व्यापार और कृषि आय की राजनीति।
शेतकारी संगठन चौथे और पांचवें चरण के बीच सबसे महत्वपूर्ण पुलों में से एक है।
शरद जोशी को कैसे याद किया जाना चाहिए?
उन्हें केवल किसान नेता कहना अधूरा होगा।
केवल मुक्त बाजार समर्थक कहना भी अधूरा होगा।
केवल प्याज आंदोलन का नेता कहना और भी अधूरा है।
उन्हें अधिक सही रूप में इस तरह समझा जा सकता है—
किसान आंदोलनकारी + कृषि राजनीतिक अर्थशास्त्री + आर्थिक उदारवादी + महिला संपत्ति-अधिकार समर्थक + गैर-दलीय किसान राजनीति के प्रयोगकर्ता।
उनकी सभी राजनीतिक रणनीतियां सफल नहीं हुईं।
लेकिन उन्होंने प्रश्न ऐसे उठाए जिन्हें भारतीय कृषि नीति आज भी टाल नहीं सकी है।
अंतिम प्रश्न : सुरक्षा या स्वतंत्रता?
शेतकारी संगठन का लगभग पूरा इतिहास अंततः इसी प्रश्न में समा जाता है।
शरद जोशी का उत्तर स्वतंत्रता की ओर था।
लेकिन भारत के कृषि अनुभव ने दिखाया कि केवल स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं।
किसान को बाजार में प्रतिस्पर्धा करने के लिए—
उधर केवल सरकारी सुरक्षा भी पर्याप्त नहीं।
यदि किसान को अपना माल बेचने, निर्यात करने और तकनीक चुनने की स्वतंत्रता नहीं है तो संरक्षण नियंत्रण में बदल सकता है।
इसलिए शेतकारी संगठन के इतिहास से निकलने वाला अधिक परिपक्व निष्कर्ष यह है—
किसान को सुरक्षा और स्वतंत्रता में से एक चुनने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। उसे ऐसी कृषि व्यवस्था चाहिए जिसमें न्यूनतम आर्थिक सुरक्षा भी हो और अधिकतम न्यायपूर्ण बाजार स्वतंत्रता भी।
अंतिम ऐतिहासिक मूल्यांकन
शेतकारी संगठन ने कोई क्रांति करके भारतीय कृषि व्यवस्था नहीं बदल दी।
वह स्थायी राष्ट्रीय राजनीतिक शक्ति भी नहीं बन पाया।
शरद जोशी के बाद उसका संगठनात्मक प्रभाव घटा।
लेकिन इतिहास केवल इस बात से तय नहीं होता कि कौन सत्ता में पहुंचा।
इतिहास यह भी देखता है कि किसने प्रश्न बदल दिए।
और शेतकारी संगठन ने भारतीय किसान राजनीति के प्रश्न बदल दिए।
भूमि मेरी है, लेकिन कीमत कौन तय करता है?
उत्पादन मेरा है, लेकिन निर्यात कौन रोकता है?
जोखिम मेरा है, लेकिन लाभ क्यों नियंत्रित है?
खेत में पत्नी का श्रम है, लेकिन जमीन केवल पति के नाम क्यों?
सरकार किसान की सहायता कर रही है या उसे नियंत्रित?
और बाजार किसान को मुक्त करेगा या नई शक्ति के अधीन कर देगा?
इन प्रश्नों के अंतिम उत्तर 2026 तक भी भारत के पास नहीं हैं।
इसीलिए शेतकारी संगठन इतिहास का बंद अध्याय नहीं है।
वह भारतीय कृषि के भविष्य की बहस का भी हिस्सा है।
और शायद शरद जोशी की सबसे स्थायी विरासत किसी एक आंदोलन, संगठन या नारे में नहीं, बल्कि उस आग्रह में है कि—
किसान को केवल वोट, लाभार्थी या ‘अन्नदाता’ के रूप में नहीं; एक स्वतंत्र आर्थिक नागरिक और उत्पादक के रूप में देखा जाए।
इसी कसौटी पर भारतीय किसान आंदोलन के इतिहास में शेतकारी संगठन और शरद जोशी का स्थान विशिष्ट, विवादास्पद और स्थायी है।
शेतकारी संगठन की संक्षिप्त समयरेखा
शेतकारी संगठन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उसने कृषि-मूल्य को किसान के श्रम, निवेश और उत्पादक नागरिकता के प्रश्न में बदला। उसने सड़क के आंदोलन को आर्थिक सिद्धांत, राष्ट्रीय समन्वय और महिला संपत्ति अधिकार से जोड़ा। उसकी सीमा यह रही कि एक समान ‘किसान वर्ग’ की धारणा भूमिहीन मजदूर, सीमांत किसान, जातिगत असमानता और अलग फसली क्षेत्रों के अंतर्विरोध पूरी तरह नहीं समेट सकी। बाजार स्वतंत्रता ने राज्य नियंत्रण की विकृतियां उजागर कीं, पर असमान बाजार शक्ति और जोखिम का समाधान अपने-आप नहीं दिया। फिर भी लाभकारी मूल्य, व्यापार प्रतिबंध और किसान की आर्थिक स्वतंत्रता पर आज की बहस उसकी बौद्धिक विरासत को जीवित रखती है।
प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक स्रोत
स्रोत-सावधानी: संगठनात्मक साहित्य, सरकारी आंकड़े और अकादमिक अध्ययनों में जनाधार, आंदोलन की सफलता तथा बाजार नीति के प्रभाव पर अलग दृष्टियां हैं। दावे उनके स्रोत और संदर्भ के साथ पढ़े गए हैं।