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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–013 · प्रारंभिक और आदिवासी-कृषक संघर्ष · अध्याय 13

रम्पा–गुडेम और कोया विद्रोह

पूर्वी घाट में जंगल, जमीन, पोड़ू, बेगार और स्वराज की लड़ाई—1879–80 से 1922–24 तक

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskसंपादित समेकित शोध संस्करण · 28 अगस्त 2026

रम्पा–गुडेम का प्रतिरोध एक घटना नहीं, लगभग एक शताब्दी में विकसित हुई आदिवासी–कृषक स्वायत्तता की धारा था। 1879–80 में मनसबदार, आबकारी, पुलिस, कर और बाहरी आर्थिक हस्तक्षेप के विरुद्ध उठे संघर्ष ने प्रशासन को अपनी व्यवस्था बदलने पर विवश किया; किंतु प्रत्यक्ष औपनिवेशिक शासन, वन नियंत्रण, पोड़ू पर पाबंदी और बेगार ने असंतोष को समाप्त नहीं होने दिया। 1922–24 में अल्लूरी सीताराम राजू ने इसी स्थानीय अधिकार-बोध को स्वराज की राष्ट्रीय भाषा से जोड़कर मन्यम के पहाड़ों में दीर्घ छापामार चुनौती खड़ी की।

खंड 1

पूर्वी घाट, कोया समाज और स्वायत्त पहाड़ी व्यवस्था

भूगोल : पूर्वी घाट का वह संसार जिसे अंग्रेज ‘एजेंसी’ कहते थे

रम्पा गोदावरी जिले की पहाड़ियों में लगभग 800 वर्ग मील का एक कठिन पहाड़ी क्षेत्र था। समकालीन Imperial Gazetteer ने इसे गोदावरी के उत्तर में स्थित, दो से चार हजार फुट तक ऊंची पहाड़ियों और घने जंगलों वाला भूभाग बताया। यह भूगोल राजमुंदरी के मैदानी प्रशासन से भौतिक और सामाजिक दोनों अर्थों में काफी अलग था।

ब्रिटिश प्रशासन ने मद्रास प्रेसीडेंसी के ऐसे क्षेत्रों को सामान्य जिलों की तरह सीधे प्रशासित करने के बजाय ‘एजेंसी ट्रैक्ट्स’ के रूप में रखा। जिला कलेक्टर यहां सरकार के ‘एजेंट’ के रूप में विशेष शक्तियां प्रयोग करता था। रम्पा गोदावरी एजेंसी में था, जबकि गुडेम विशाखापट्टनम एजेंसी से संबंधित था। 1922–24 में संघर्ष इन प्रशासनिक सीमाओं को पार कर गया; इसीलिए इतिहासलेखन में इसे गुडेम–रम्पा राइजिंग, रम्पा विद्रोह और मन्यम विद्रोह तीनों नामों से जाना जाता है। डेविड अर्नोल्ड के महत्वपूर्ण अध्ययन का शीर्षक ही Rebellious Hillmen: The Gudem-Rampa Risings, 1839–1924 है।

‘मन्यम’ का आशय स्थानीय प्रयोग में पहाड़ी–जंगली क्षेत्र से था। इसी से राजू की प्रसिद्ध उपाधि ‘मन्यम वीरुडु’—जंगल का वीर निकली।

कोया, कोंडा रेड्डी और पहाड़ी कृषक समाज

रम्पा और गोदावरी एजेंसी में कोया, कोंडा रेड्डी तथा अन्य पहाड़ी समुदायों की आजीविका जंगल और खेती को अलग-अलग इकाइयों में नहीं बांटती थी। पोड़ू अर्थात स्थानांतरित कृषि, वन-उपज, ताड़ी, शिकार, पशु चराई, छोटी स्थायी खेती और स्थानीय विनिमय संयुक्त आर्थिक व्यवस्था बनाते थे।

आधुनिक भूमि-स्वामित्व की अवधारणा यहां सीधे लागू नहीं होती थी। जंगल सामुदायिक संसाधन था; खेती के अधिकार सामाजिक संबंधों और स्थानीय राजनीतिक संरचनाओं से जुड़े थे। इसलिए औपनिवेशिक राज्य द्वारा किसी वन को ‘रिजर्व’, किसी पेड़ को राजस्व-संपत्ति और पोड़ू को ‘अवैध’ घोषित करना महज प्रशासनिक सुधार नहीं था। वह पूरी आदिवासी अर्थव्यवस्था की कानूनी पुनर्परिभाषा थी।

औपनिवेशिक वन प्रशासन द्वारा पोड़ू को सीमित करने से खेती की उपलब्ध भूमि और परती चक्र दोनों प्रभावित हुए। अनुसूचित/आदिवासी क्षेत्रों के प्रशासन पर अध्ययनों ने इसे उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से असंतोष का महत्वपूर्ण स्रोत बताया है।

मुत्ता, मुत्तादार और मनसबदार : सत्ता की पुरानी व्यवस्था

रम्पा क्षेत्र कई मुत्तों में विभाजित था। प्रत्येक मुत्ता के प्रमुख को मुत्तादार कहा जाता था। मुत्तादार स्थानीय स्तर पर राजस्व, पुलिस, विवाद-निपटारे और व्यवस्था संबंधी भूमिकाएं निभाते थे।

रम्पा के ऊपर एक मनसबदार था। पुराने अभिलेखों में उसे कभी जमींदार, कभी राजा और कभी मनसबदार कहा गया। अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध में वह लगभग स्वतंत्र पहाड़ी शासक जैसा था। 1787 में ईस्ट इंडिया कंपनी की एक समिति ने यह तक लिखा कि न कंपनी और न निजाम सरकार इस क्षेत्र से नियमित कर प्राप्त कर रही थी।

1802–03 के स्थायी बंदोबस्त में भी रम्पा को लगभग नजरअंदाज कर दिया गया। 1813 में, जब मनसबदार रामभूपति देवु पहाड़ियों से उतरकर मैदानी गांवों पर अधिकार करने लगा, तब कंपनी ने पहली बार उसके साथ औपचारिक समझौता किया। उसे कुछ मैदानी गांव मोखासा के रूप में और उसके पहाड़ी अधिकार इस शर्त पर मान्य किए गए कि वह शांति बनाए रखे और पहाड़ी लोगों को मैदानों पर आक्रमण करने से रोके।

यहीं से एक अंतर्विरोध जन्मा। अंग्रेजों ने स्थानीय प्रभुत्व-संरचना को समाप्त करने के बजाय अपने प्रशासन का माध्यम बनाया। इससे मनसबदार को पहले से अधिक औपनिवेशिक संरक्षण मिला।

1839–62 : 1879 से पहले की लंबी विद्रोही परंपरा

1879 किसी शांत इलाके में अचानक हुआ विस्फोट नहीं था।

रम्पा और निकटवर्ती गुडेम क्षेत्र में उन्नीसवीं सदी के पहले छह दशकों में बार-बार संघर्ष हुए। गोदावरी गजेटियर 1813, 1840, 1858 और 1862 की अशांति का उल्लेख करता है। आधुनिक इतिहासकार डेविड अर्नोल्ड ने इसी निरंतरता को देखते हुए पूरे दौर को 1839–1924 की ‘गुडेम–रम्पा राइजिंग्स’ के रूप में अध्ययन किया।

1840 के आसपास मनसबदार की सत्ता और मुत्तादारों के अधिकारों पर बड़ा विवाद पैदा हुआ। 1847–48 में ब्रिटिश अधिकारियों की मध्यस्थता से मनसबदार और पहाड़ी मुत्तादारों के बीच नया समझौता कराया गया। बाद में जांच अधिकारी एच. ई. सुलिवन ने माना कि यहीं बड़ी प्रशासनिक भूल हुई—सरकार ने पहाड़ी मुखियाओं को उस व्यक्ति को कर देने के लिए बाध्य किया जिसे वे स्वयं अविश्वसनीय और दमनकारी मानते थे।

1858 और 1862 में उसके विरुद्ध फिर प्रतिरोध हुआ। किंतु ब्रिटिश सरकार ने मनसबदार को संरक्षण देना जारी रखा। इस प्रकार 1879 तक असंतोष लगभग बीस वर्ष से जमा हो रहा था।

खंड 2

विशेष प्रशासन, आबकारी और औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था

1874 का अनुसूचित जिला अधिनियम और ‘विशेष प्रशासन’

1874 के अनुसूचित जिला अधिनियम ने ऐसे पहाड़ी क्षेत्रों को सामान्य कानून से कुछ अलग प्रशासन के अंतर्गत रखने की कानूनी व्यवस्था बनाई। स्थानीय सरकार को यह अधिकार दिया गया कि सामान्य कानूनों को निर्धारित क्षेत्रों में लागू, संशोधित या अपवाद सहित लागू करे।

एजेंसी नियमों के तहत कलेक्टर ‘एजेंट’ बना और अधीनस्थ अधिकारियों को विशेष न्यायिक व राजस्व शक्तियां मिलीं। सिद्धांततः इसका उद्देश्य कठिन जनजातीय परिस्थितियों के अनुरूप प्रशासन था; व्यवहार में एजेंसी शासन अक्सर अत्यधिक अधिकारी-केंद्रित हो गया।

1879 के विद्रोह के बाद सुलिवन ने इसी प्रशासन की विफलता की आलोचना की—विशेषकर यूरोपीय अधिकारियों द्वारा पर्याप्त निगरानी न करने और मनसबदार, पुलिस तथा आबकारी अधिकारियों की गतिविधियों को लंबे समय तक अनदेखा करने की।

आबकारी कानून : ताड़ी पर कर ने क्यों विस्फोट कराया?

1879 के विद्रोह का तात्कालिक कारण समझने के लिए आदिवासी जीवन में ताड़ी के स्थान को समझना होगा।

मद्रास आबकारी व्यवस्था पहाड़ी क्षेत्रों तक विस्तारित हुई। उपलब्ध प्रशासनिक अध्ययन के अनुसार 1864 का आबकारी कानून एजेंसी क्षेत्रों में लागू था। स्थानीय समुदाय अपने उपभोग के लिए ताड़ी और शराब तैयार करते थे; औपनिवेशिक व्यवस्था ने इसे लाइसेंस और ठेके की राजस्व प्रणाली में बदल दिया। ताड़ी के पेड़ों के अधिकार बाहरी ठेकेदारों को दिए जाने लगे।

मुत्तादारों से चिगुरुपन्नु नाम का ताड़ी कर लिया गया। इसके ऊपर मनसबदार ने मोडालुपन्नु नामक अतिरिक्त वसूली की धमकी दी—जो चिगुरुपन्नु का आधा या दो-तिहाई तक हो सकती थी। गोदावरी गजेटियर इसे विद्रोह की ‘अंतिम असहनीय कारण’ अर्थात अंतिम चिंगारी कहता है।

लेकिन यह कहना गलत होगा कि विद्रोह केवल ताड़ी-कर के कारण हुआ। इसके पीछे मनसबदार की दशकों की दमनकारी कार्रवाइयां, पुलिस की जबरन वसूली, व्यापारियों का शोषण, अदालतों का भय और औपनिवेशिक प्रशासन की उदासीनता पहले से मौजूद थे।

गजेटियर में दर्ज पहाड़ी लोगों की शिकायत का अर्थ था—पहले नया ताड़ी कर आया, अब मनसबदार अतिरिक्त कर मांग रहा है, कांस्टेबल मुर्गियां तक छीन रहे हैं; यदि ऐसे जीना असंभव है तो पुलिस से लड़कर मरना ही बेहतर है।

बाहरी व्यापारी, कर्ज और औपनिवेशिक अदालत

पहाड़ी समाज पर दूसरा दबाव मैदानी व्यापारियों और साहूकारों के प्रवेश से आया।

मानवशास्त्री क्रिस्टोफ फ्यूरर-हाइमेनडॉर्फ ने रम्पा विद्रोह की पृष्ठभूमि का विश्लेषण करते हुए बताया कि पहाड़ी लोगों की अदालती प्रक्रियाओं से अपरिचितता का फायदा मैदानी व्यापारी उठाते थे। अनुचित अनुबंध किए जाते; विवाद होने पर दीवानी अदालतों में एकतरफा डिक्री प्राप्त की जाती और आदिवासी संपत्ति जब्त की जा सकती थी।

यह महत्वपूर्ण था क्योंकि पहाड़ी समाज के लिए व्यापारी का शोषण भी अंततः ‘सरकार’ के शोषण जैसा दिखता था—व्यापारी के पीछे अदालत थी, अदालत के पीछे पुलिस और पुलिस के पीछे औपनिवेशिक राज्य।

इस प्रकार आर्थिक संघर्ष राजनीतिक रूप ग्रहण करने लगा।

1879 का विस्फोट : नेतृत्व का प्रश्न

मार्च 1879 में रम्पा क्षेत्र में खुला विद्रोह शुरू हुआ।

यहां स्रोतों की एक महत्वपूर्ण समस्या सामने आती है। पुराने औपनिवेशिक गजेटियरों में चंद्रय्या को सबसे सक्रिय नेतृत्वकर्ताओं में दिखाया गया है। आधुनिक जनजातीय प्रशासन संबंधी आधिकारिक सामग्री करम तम्मन डोरा, चंद्रय्या, सरदार जंगम पुलिकंटा सम्बैया और अम्बुल रेड्डी जैसे नेताओं का उल्लेख करती है।

इसलिए इसे केवल ‘चंद्रय्या का विद्रोह’ या केवल ‘तम्मन डोरा का विद्रोह’ कहना शोध की दृष्टि से संकीर्ण होगा।

अधिक सुरक्षित निष्कर्ष है कि 1879–80 का आंदोलन बहु-केंद्रीय कोया–पहाड़ी विद्रोह था, जिसमें अलग-अलग क्षेत्रों और चरणों में अनेक स्थानीय नेता सक्रिय थे।

खंड 3

1879 का विस्फोट, अड्डतीगला और क्षेत्रीय विस्तार

पुलिस प्रतिष्ठान क्यों पहला लक्ष्य बने?

मार्च 1879 में विद्रोहियों ने चोडावरम क्षेत्र के पुलिस प्रतिष्ठानों पर हमला शुरू किया।

पुलिस स्थानीय स्तर पर सरकार का सबसे प्रत्यक्ष चेहरा थी। वही आबकारी नियम लागू कराती, जबरन वसूली के आरोपों में घिरी थी और मनसबदार की सत्ता का संरक्षण करती थी।

इसलिए पुलिस पर हमला केवल हथियार पाने की कार्रवाई नहीं था। वह औपनिवेशिक प्रशासन की स्थानीय वैधता को अस्वीकार करने की राजनीतिक कार्रवाई थी।

यह पैटर्न 43 वर्ष बाद अल्लूरी सीताराम राजू के आंदोलन में और अधिक व्यवस्थित रूप से दोहराया गया।

चंद्रय्या और अड्डतीगला

मई 1879 में चंद्रय्या येल्लावरम क्षेत्र की ओर बढ़ा और अड्डतीगला पुलिस थाना जला दिया। जून में उसी क्षेत्र में एक यूरोपीय अधिकारी के नेतृत्व वाली पुलिस टुकड़ी को विद्रोहियों ने कई दिनों तक कठिन स्थिति में रखा।

यह घटना महत्वपूर्ण थी। विद्रोह अब कर-अस्वीकार से आगे बढ़कर सशस्त्र सत्ता-चुनौती बन चुका था।

जंगल और पहाड़ी रास्तों की जानकारी विद्रोहियों को वह लाभ देती थी जो मैदानों में ब्रिटिश सेना को उपलब्ध नहीं था।

विद्रोह का क्षेत्रीय विस्तार

रम्पा में शुरू हुई अशांति आसपास के पहाड़ी क्षेत्र में फैल गई। भद्राचलम तथा विशाखापट्टनम एजेंसी के हिस्सों तक प्रभाव जाने की आशंका थी। आधुनिक प्रशासनिक अध्ययन इसे रम्पा से भद्राचलम तक फैलता हुआ बताते हैं।

औपनिवेशिक शासन के लिए यह सबसे खतरनाक संभावना थी—यदि अलग-अलग कोया और पहाड़ी समूह एक साझा मोर्चे में जुड़ जाते, तो गोदावरी–विशाखापट्टनम का विशाल पहाड़ी क्षेत्र नियंत्रण से बाहर हो सकता था।

तम्मन डोरा और कोया प्रतिरोध की सीमा-पार प्रकृति

करम तम्मन डोरा या तामा/तम्मन डोरा से जुड़ी स्मृतियां आज के आंध्र प्रदेश और दक्षिण ओडिशा–मलकानगिरि दोनों ओर मिलती हैं।

यह एक आवश्यक इतिहासलेखन-सावधानी भी बताती है। आधुनिक प्रशासनिक सीमा—जिला, राज्य या प्रेसीडेंसी—को आदिवासी राजनीतिक भूगोल की प्राकृतिक सीमा समझना गलत है।

कोया बस्तियां गोदावरी घाटी और आसपास के विस्तृत क्षेत्र में फैली थीं। इसलिए 1879–80 के संघर्ष की विभिन्न स्थानीय परंपराएं अलग-अलग नेताओं और घटनाओं को केंद्र में रखती हैं।

ब्रिटिश सैन्य प्रतिक्रिया : पुलिस पर्याप्त नहीं थी

विद्रोह दबाने के लिए केवल जिला पुलिस पर्याप्त नहीं रही।

विभिन्न विवरणों में मद्रास पैदल सेना, घुड़सवार बल, सैपर्स एवं माइनर्स और अन्य सैन्य इकाइयों के इस्तेमाल का उल्लेख मिलता है। रम्पा के पहाड़ी रास्तों पर चौकियां स्थापित हुईं और नदी मार्गों पर निगरानी बढ़ाई गई।

लेकिन सेना के सामने प्राकृतिक परिस्थितियां भी शत्रु बन गईं। जंगल, वर्षा, बीमारी और मलेरिया ने सैन्य अभियान कठिन बनाया।

यही पारिस्थितिक लाभ बाद में 1922–24 में भी राजू के गुरिल्ला युद्ध की बड़ी शक्ति बना।

खंड 4

सैन्य दमन, सुलिवन जांच और प्रशासनिक पुनर्गठन

सुलिवन जांच : विद्रोह ने सरकार को स्वयं अपनी नीतियों की जांच पर मजबूर किया

मद्रास सरकार ने बोर्ड ऑफ रेवेन्यू के वरिष्ठ सदस्य एच. ई. सुलिवन को विद्रोह के कारणों की जांच के लिए भेजा।

सुलिवन का निष्कर्ष अत्यंत महत्वपूर्ण था। उसने असंतोष के तीन केंद्रीय कारण पहचाने

मनसबदार द्वारा 1847–48 से जारी अत्याचार और अतिक्रमण; रम्पा में आबकारी कानून लागू करना एक प्रशासनिक भूल; और यूरोपीय अधिकारियों द्वारा पर्याप्त राजस्व तथा पुलिस निगरानी का अभाव।

इससे एक महत्वपूर्ण तथ्य स्थापित होता है

ब्रिटिश सरकार के अपने जांच अधिकारी ने विद्रोह को केवल ‘अपराध’ या ‘जंगली हिंसा’ नहीं माना; उसने औपनिवेशिक प्रशासन की विफलताओं को भी कारण माना।

मनसबदार की सत्ता समाप्त

विद्रोह का सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत परिणाम मनसबदार के विरुद्ध हुआ।

सरकारी आदेश में उसके मनसबदारी और मोखासा अधिकारों को ‘पूर्णतः और हमेशा के लिए’ समाप्त किया गया। उसकी अपनी मुत्ता भी रद्द हुई और उसे बेरहामपुर में राज्यबंदी बनाया गया।

यह मामूली प्रशासनिक फेरबदल नहीं था।

जिस सत्ता-संरचना को अंग्रेजों ने दशकों तक संरक्षण दिया था, विद्रोह ने उसे ही अस्थिर सिद्ध कर दिया।

मुत्तादारों के साथ सीधा बंदोबस्त

मनसबदार हटाए जाने के बाद सरकार ने अधिकांश मुत्तादारों के साथ सीधे संबंध स्थापित किए।

सितंबर 1879 में सुलिवन ने दरबार आयोजित कर नई सनदें वितरित कीं। जहां मनसबदार ने मुत्ता हड़प ली थी, वहां कई मामलों में पुराने मुत्तादार के उत्तराधिकारी को बहाल किया गया। हालांकि विद्रोह के दौरान किसी मुत्तादार की ‘वफादारी’ या ‘बगावत’ के आधार पर उसके देय कर में अंतर भी किया गया।

मुत्तादारों से निश्चित कट्टुबड़ी अथवा हल्का कर लिया गया और उनकी सेवा-शर्तें परिभाषित की गईं।

इस प्रकार विद्रोह ने मध्यस्थ मनसबदार को हटाया, लेकिन औपनिवेशिक राज्य ने मुत्तादारी को पूरी तरह समाप्त नहीं किया; बल्कि उसे अपने अधीन प्रशासनिक संस्था में बदल दिया।

1879–80 का अंत कब हुआ? स्रोत क्यों अलग-अलग तिथियां देते हैं?

यहां स्रोतगत मतभेद है, जिसे शोध-अध्याय में छिपाना उचित नहीं होगा।

गोदावरी गजेटियर से संबंधित विवरण चंद्रय्या की मृत्यु को 1880 के आसपास रखते हैं और 1880 तक मुख्य विद्रोह कमजोर पड़ने की सूचना देते हैं। दूसरी ओर Imperial Gazetteer of India का बाद का संस्करण कहता है कि अशांति 1881 तक पूरी तरह समाप्त नहीं हुई और चेंद्रय्या उसी समय मारा गया।

इसलिए 1879–80 आंदोलन के सक्रिय मुख्य चरण के लिए उचित तिथि है, लेकिन छिटपुट प्रतिरोध और अंतिम दमन 1880–81 तक खिंचने की संभावना स्वीकार करनी चाहिए।

यही कारण है कि अलग-अलग पुस्तकों में 1879, 1879–80 और 1879–81 तीनों रूप मिलते हैं।

1879 की उपलब्धि और उसकी सीमा

विद्रोही ब्रिटिश सत्ता को क्षेत्र से स्थायी रूप से बाहर नहीं कर पाए। कई लड़ाके मारे गए, गिरफ्तार हुए और दंडित किए गए।

फिर भी आंदोलन ने तीन ठोस परिणाम पैदा किए।

मनसबदार की सत्ता समाप्त हुई; मुत्तादारों के साथ सीधे प्रशासनिक संबंध बने; और मद्रास सरकार को स्वीकार करना पड़ा कि पहाड़ी क्षेत्रों में आबकारी तथा पुलिस नीति ने असंतोष बढ़ाया था।

लेकिन मूल प्रश्न खत्म नहीं हुआ।

राज्य अब पहले से अधिक प्रत्यक्ष रूप में आदिवासी समाज में प्रवेश करने वाला था।

खंड 5

वन-राज, मुत्तादार असंतोष, बेगार और बास्टियन विवाद

1880 के बाद नया मोड़ : मनसबदार गया, वन-राज्य आया

उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों में औपनिवेशिक शासन की रुचि जंगलों के वैज्ञानिक प्रबंधन और वाणिज्यिक उपयोग में तेजी से बढ़ी।

रेलवे स्लीपर, निर्माण, राजस्व और औद्योगिक आवश्यकता ने जंगल को स्थानीय जीवन-संसाधन से अधिक ‘राज्य संपत्ति’ बना दिया।

मद्रास वन कानून और बाद की वन प्रशासनिक व्यवस्थाओं के कारण आरक्षित वनों में खेती, चराई, पेड़ काटना, शिकार और वन-उपज एकत्र करने की स्वतंत्रता सीमित हुई।

विशेष रूप से पोड़ू कृषि पर नियंत्रण ने पहाड़ी समुदायों की आजीविका पर प्रभाव डाला। आधुनिक शोध इसे 1922 के विद्रोह की दीर्घकालीन पृष्ठभूमि का केंद्रीय तत्व मानता है।

एक आवश्यक सुधार : ‘1882 मद्रास वन अधिनियम’ वाली लोकप्रिय व्याख्या

लोकप्रिय सरकारी और सामान्य विवरण अक्सर 1922 के आंदोलन को 1882 मद्रास वन अधिनियम से सीधे जोड़ देते हैं। यह व्यापक कारण समझाने में उपयोगी है, किंतु शोध की दृष्टि से सावधानी जरूरी है।

वन नियंत्रण कोई एक कानून लागू होते ही अचानक पैदा नहीं हुआ था। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से मद्रास प्रेसीडेंसी में वन आरक्षण और स्थानीय उपयोग-अधिकारों को नियंत्रित करने की क्रमिक प्रक्रिया चली। 1922 का असंतोष इसी लंबे वन-राज्य के विस्तार का परिणाम था।

इसलिए “एक कानून आया और विद्रोह हो गया” जैसी रैखिक व्याख्या से बचना चाहिए।

मुत्तादारों का नया असंतोष

1879 के बाद मुत्तादार औपनिवेशिक प्रशासन के अधीन हुए। उनकी पारंपरिक स्वायत्तता और उत्तराधिकार पर सरकार का अंतिम नियंत्रण था।

बीसवीं सदी तक अनेक मुत्तादारों में भी असंतोष था। कभी जो स्थानीय स्तर पर अर्ध-स्वायत्त मुखिया थे, वे औपनिवेशिक नौकरशाही के अधीन सेवा-प्रमुख बनते जा रहे थे।

यहां एक रोचक सामाजिक गठबंधन संभव हुआ

1879 में आदिवासी जनता और कुछ स्थानीय प्रमुखों के हित हमेशा समान नहीं थे; लेकिन 1922 तक औपनिवेशिक राज्य दोनों के लिए साझा विरोधी बन सकता था।

इतिहासकारों ने इसीलिए 1922 के विद्रोह को केवल निर्धन आदिवासियों और राज्य के द्वंद्व के रूप में नहीं, बल्कि विभिन्न स्थानीय हित-समूहों के अस्थायी गठबंधन के रूप में भी देखा है।

गुडेम में बेगार और सड़क निर्माण : तात्कालिक असंतोष

1922 से ठीक पहले गुडेम क्षेत्र में सड़क निर्माण बड़ा विवाद बना।

पहाड़ी लोगों से सड़क के लिए श्रम लिया जाता था। मजदूरी कम, विलंबित अथवा अधिकारियों की मनमानी पर निर्भर होने की शिकायतें थीं। यह श्रम स्थानीय स्मृति में बेगार/वेट्टी जैसी जबरन सेवा के अनुभव से जुड़ गया।

विशेषकर गुडेम एजेंसी के अधिकारियों और सड़क कार्य के प्रबंधन को लेकर नाराजगी बढ़ी।

इसलिए सड़क को केवल विकास-परियोजना मानना गलत होगा। आदिवासी दृष्टिकोण से वही सड़क औपनिवेशिक पुलिस, वन अधिकारी और राजस्व तंत्र को पहाड़ों के भीतर तेजी से पहुंचाने का माध्यम भी थी।

डिप्टी तहसीलदार बास्टियन का विवाद

1922 की तात्कालिक पृष्ठभूमि में गुडेम के डिप्टी तहसीलदार बास्टियन का नाम बार-बार आता है।

स्थानीय लोगों और मुत्तादारों ने उस पर सड़क-निर्माण और मजदूरी से संबंधित कठोरता, दुर्व्यवहार और उत्पीड़न के आरोप लगाए। बाद के इतिहासलेखन में बास्टियन और कुछ अन्य अधिकारियों के व्यवहार को असंतोष की प्रमुख तात्कालिक वजह माना गया।

वन अधिकार सीमित हुए; पोड़ू पर दबाव था; बेगार बढ़ी; और शिकायत का समाधान देने वाला प्रशासन स्वयं आरोपी था।

यही वातावरण राजू के लिए राजनीतिक आधार बना।

खंड 6

अल्लूरी सीताराम राजू और स्वराज की पहाड़ी भाषा

अल्लूरी सीताराम राजू : जन्म और प्रारंभिक जीवन पर सावधानी

राजू का जन्म सामान्यतः 4 जुलाई 1897 माना जाता है। भारत सरकार भी यही तिथि स्वीकार करती है।

लेकिन जन्मस्थान को लेकर स्थानीय परंपराओं में मतभेद रहे हैं। पंद्रंगी और मोगल्लु दोनों उनकी स्मृति से जुड़े हैं। भारत सरकार के 125वीं जयंती कार्यक्रम में पंद्रंगी को जन्मस्थान से संबंधित स्मारकीय स्थल और मोगल्लु में ध्यान मंदिर की परियोजना का उल्लेख हुआ।

इसलिए किसी एक स्थानीय परंपरा को निर्विवाद घोषित करना आवश्यक नहीं है।

राजू औपचारिक आधुनिक शिक्षा में बहुत आगे नहीं गए, लेकिन व्यापक यात्रा, धार्मिक–आध्यात्मिक रुचि, ज्योतिष, आयुर्वेद और स्थानीय जीवन से संपर्क ने उनके चारों ओर एक संन्यासी-सदृश छवि बनाई।

राजू आदिवासी नहीं थे—फिर इतने प्रभावशाली कैसे हुए?

राजू स्वयं कोया समुदाय से नहीं थे।

यही प्रश्न उनके नेतृत्व को ऐतिहासिक रूप से और रोचक बनाता है।

उन्होंने पहाड़ी क्षेत्रों में समय बिताया, लोगों की शिकायतें सुनीं और औपनिवेशिक अधिकारियों के सामने उनके मुद्दे उठाए। शराब से दूरी, पंचायतों में विवाद निपटाने और सरकारी अदालतों के बहिष्कार जैसे विचारों ने उनकी नैतिक प्रतिष्ठा बढ़ाई।

कुछ अनुयायी उन्हें असाधारण आध्यात्मिक शक्ति से युक्त व्यक्ति मानते थे।

इतिहासकार इस छवि को अक्सर करिश्माई या मिलेनरियन नेतृत्व के संदर्भ में पढ़ते हैं—अर्थात ऐसा नेतृत्व जिसमें राजनीतिक संघर्ष धार्मिक–नैतिक विश्वास और उद्धार की आकांक्षा से जुड़ जाता है।

लेकिन राजू को केवल ‘चमत्कारी बाबा’ बना देना भी गलत होगा। उनका सैन्य संगठन और लक्ष्य स्पष्ट राजनीतिक गणना पर आधारित था।

असहयोग आंदोलन और पहाड़ों तक पहुंचा ‘स्वराज’

1920–22 का गांधीवादी असहयोग आंदोलन भारतीय राजनीति का निर्णायक मोड़ था।

राजू ने उसके कुछ कार्यक्रमों को पहाड़ी परिस्थितियों के अनुरूप अपनाया—शराब से दूरी, औपनिवेशिक अदालतों का बहिष्कार, पंचायतों का उपयोग और स्वराज की भाषा।

भारत सरकार की पर्यटन संबंधी सामग्री भी स्वीकार करती है कि उन्होंने असहयोग आंदोलन की कुछ पद्धतियां आदिवासी क्षेत्रों में प्रचारित कीं।

लेकिन फरवरी 1922 में चौरी-चौरा के बाद गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया।

राजू ने यह निष्कर्ष स्वीकार नहीं किया कि राजनीतिक संघर्ष भी समाप्त हो जाना चाहिए।

यहीं गांधी और राजू के रास्ते अलग हो गए।

गांधी से प्रेरणा, गांधी की अहिंसा से असहमति

राजू का आंदोलन गांधीवादी नहीं था, लेकिन गांधी-युग से बाहर भी नहीं था।

स्वराज की आकांक्षा और औपनिवेशिक संस्थाओं का बहिष्कार गांधीवादी राजनीति से आया।

लेकिन राजू मानते थे कि अंग्रेजी शासन केवल नैतिक अपील से नहीं जाएगा।

सामाजिक सुधार और राजनीतिक जागरण में गांधी की कुछ पद्धतियां; औपनिवेशिक सत्ता से अंतिम संघर्ष में हथियार।

इसी कारण मन्यम विद्रोह भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और आदिवासी सशस्त्र प्रतिरोध के बीच एक अनोखा सेतु है।

हथियार कहां से आएंगे? पुलिस थानों को शस्त्रागार में बदलने की योजना

आदिवासियों के पास धनुष, तीर, भाले और कुछ पुरानी बंदूकें थीं। आधुनिक रायफल से लैस औपनिवेशिक पुलिस का लंबे समय तक सामना इनके सहारे संभव नहीं था।

राजू ने इसका व्यावहारिक समाधान निकाला

पुलिस थानों पर हमला कर सरकारी हथियार कब्जे में लिए जाएं।

इस रणनीति में तीन लाभ थे। हथियार मिलते; औपनिवेशिक प्रतिष्ठा को झटका लगता; और स्थानीय जनता को यह संदेश जाता कि अंग्रेजी पुलिस अजेय नहीं है।

खंड 7

अगस्त 1922 : पुलिस थानों पर योजनाबद्ध अभियान

22 अगस्त 1922 : चिंतापल्ली — विद्रोह का सैन्य उद्घाटन

22 अगस्त 1922 को राजू और उनके कई सौ समर्थकों ने चिंतापल्ली पुलिस स्टेशन पर हमला किया।

सरकारी स्मृति में यही 1922 के मन्यम विद्रोह का आरंभ माना जाता है; भारत सरकार ने विद्रोह की शताब्दी पर चिंतापल्ली थाने के संरक्षण/पुनर्स्थापन को इसी कारण प्रतीकात्मक महत्व दिया।

यह आकस्मिक भीड़ की कार्रवाई नहीं थी।

हमलावरों ने हथियार और कारतूस अपने कब्जे में लिए।

अगले दो दिनों की घटनाओं ने दिखा दिया कि यह पूर्वनियोजित श्रृंखला थी।

23 अगस्त : कृष्णदेवीपेटा

अगले दिन, 23 अगस्त 1922, कृष्णदेवीपेटा पुलिस स्टेशन पर हमला हुआ।

इस तेज अभियान ने औपनिवेशिक प्रशासन को पुनर्गठन का समय नहीं दिया।

एक थाना पड़ने के तुरंत बाद दूसरा लक्ष्य बन गया।

राजू का उद्देश्य केवल एक स्थान पर विद्रोह घोषित करना नहीं था; वह पुलिस के पूरे स्थानीय नेटवर्क की मनोवैज्ञानिक श्रेष्ठता तोड़ रहे थे।

24 अगस्त : राजवोम्मंगी

24 अगस्त को राजवोम्मंगी पुलिस स्टेशन निशाना बना।

भारत सरकार का आधिकारिक विवरण चिंतापल्ली, कृष्णदेवीपेटा और राजवोम्मंगी पर क्रमशः 22, 23 और 24 अगस्त को हमलों की पुष्टि करता है और विद्रोही बल की संख्या लगभग 500 बताता है।

इन तीन कार्रवाइयों में विद्रोहियों को लगभग 26 हथियार और करीब 2,500 कारतूस मिलने का विवरण अनेक स्रोतों में मिलता है।

तीन दिन के भीतर विद्रोह के पास अब आधुनिक आग्नेयास्त्र भी थे।

पुलिस डायरी में हस्ताक्षर : अपराधी नहीं, घोषित विद्रोही

राजू की कार्रवाइयों की उल्लेखनीय विशेषता यह थी कि वह कभी-कभी पुलिस रिकॉर्ड में यह दर्ज करा देते या छोड़ जाते थे कि कौन-से हथियार लिए गए।

वह चोरी छिपाना नहीं चाहते थे।

हथियार हमने लिए हैं और इनका उपयोग आपकी सत्ता के विरुद्ध होगा।

यह व्यवहार राजू के आंदोलन को साधारण डकैती या अपराध से स्पष्ट रूप से अलग करता है।

गाम गंतम डोरा और गाम मल्लू डोरा

राजू की सफलता अकेले व्यक्ति की उपलब्धि नहीं थी।

प्रमुख स्थानीय सहयोगियों में गाम गंतम/गौतम डोरा और गाम मल्लू अथवा मल्लैया डोरा का नाम विशेष रूप से आता है।

ये स्थानीय आदिवासी नेतृत्व और राजू के बीच वह सेतु थे जिसके बिना बाहर से आए किसी गैर-आदिवासी व्यक्ति के लिए गांव-दर-गांव समर्थन नेटवर्क बनाना कठिन होता।

उनके महत्व का प्रमाण औपनिवेशिक इनामों से भी मिलता है। बाद में राजू पर 1,500 रुपये और इन प्रमुख सहयोगियों पर लगभग 1,000 रुपये के पुरस्कार घोषित किए गए।

खंड 8

गुरिल्ला युद्ध, दमनापल्ली और जंगल की सैन्य शक्ति

सितंबर 1922 : पुलिस से खुले गुरिल्ला युद्ध तक

पहले तीन थानों की सफलताओं के बाद सरकार ने अतिरिक्त बल भेजे।

सितंबर तक विद्रोहियों और पुलिस के बीच अनेक संघर्ष हुए। सरकारी विवरण स्वीकार करता है कि विद्रोहियों ने सितंबर तक ब्रिटिश पुलिस को पांच बार पराजित किया और इसके बाद मालाबार स्पेशल पुलिस को पहाड़ियों में भेजना पड़ा।

यहीं से संघर्ष का स्वरूप बदल गया।

अब दोनों पक्ष समझ चुके थे कि यह अल्पकालीन पुलिस समस्या नहीं है।

दमनापल्ली घाट और स्कॉट कावर्ड–हाइटर की मृत्यु

सितंबर 1922 की सबसे प्रसिद्ध मुठभेड़ों में दमनापल्ली घाट की घात-कार्रवाई थी।

राजू के लोगों ने पहाड़ी भूगोल का उपयोग कर पुलिस दल पर हमला किया। ब्रिटिश अधिकारी स्कॉट कावर्ड और हाइटर मारे गए।

यह सफलता सैन्य से अधिक मनोवैज्ञानिक थी।

कुछ सप्ताह पहले तक जिन आदिवासियों को प्रशासन ‘अव्यवस्थित पहाड़ी प्रजा’ समझता था, उन्हीं ने प्रशिक्षित और सशस्त्र अधिकारियों को योजनाबद्ध घात में मार गिराया।

इस घटना के बाद राजू की किंवदंती तेजी से फैली।

अड्डतीगला : 1879 और 1922 के इतिहास को जोड़ता स्थल

अड्डतीगला का नाम दोनों विद्रोहों में दिखाई देता है।

1879 में चंद्रय्या के नेतृत्व में यहां पुलिस प्रतिष्ठान पर हमला हुआ था।

1922 के आंदोलन में भी यह क्षेत्र विद्रोही गतिविधियों का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।

यह ऐतिहासिक निरंतरता बताती है कि राजू ने कोई मनमाना युद्ध-क्षेत्र नहीं चुना था।

वह ऐसे भूभाग में आंदोलन कर रहे थे जिसकी सामाजिक स्मृति में पहले से राज्य-विरोधी संघर्ष मौजूद था।

राम्पाचोडावरम, गुडेम और दूसरे अभियान

1922 के उत्तरार्ध में संघर्ष चिंतापल्ली–कृष्णदेवीपेटा की प्रारंभिक सीमा से आगे बढ़ा।

राम्पाचोडावरम, अड्डतीगला, गुडेम और कई पहाड़ी क्षेत्रों में विद्रोही कार्रवाई और पुलिस अभियान चलते रहे।

राजू का तरीका था कि किसी स्थायी मुख्यालय या खुले मोर्चे पर लंबे समय तक न रुका जाए।

छोटी टुकड़ियां तेजी से पहाड़ों में चलतीं, सरकारी दल की गतिविधि पर नजर रखतीं और अवसर मिलते ही हमला करतीं।

यह गतिशील गुरिल्ला युद्ध था।

जंगल स्वयं सैन्य शक्ति कैसे बना

औपनिवेशिक सैनिकों के पास बेहतर बंदूकें थीं।

पूर्वी घाट के संकरे दर्रे, घना जंगल, तीखी ढलानें, नदी-नाले और बीमारी ने सरकारी अभियान की तकनीकी श्रेष्ठता काफी हद तक सीमित कर दी।

स्थानीय लड़ाके दिनों में वह दूरी तय कर सकते थे जिसके लिए पुलिस को भारी रसद और मार्गदर्शकों की आवश्यकता पड़ती।

ग्रामीण सूचना-तंत्र उन्हें बताता कि पुलिस किस रास्ते आ रही है।

यह वही पारिस्थितिक युद्ध-लाभ था जिसने 1879 के विद्रोह को भी लंबा खींचा था।

खंड 9

ग्रामीण सहयोग, विशेष पुलिस और सामूहिक दंड

ग्रामीण समाज विद्रोह की अदृश्य सेना था

राजू के साथ हर समय सैकड़ों हथियारबंद लोग नहीं चलते थे।

आंदोलन की असली संरचना कहीं व्यापक थी।

गांव भोजन उपलब्ध कराते; खबरें पहुंचाते; पुलिस की गतिविधियों की जानकारी देते; घायल अथवा थके लड़ाकों को आश्रय देते; और पुलिस पूछताछ में जानकारी छिपाते।

यही कारण था कि सरकार धीरे-धीरे समझ गई

राजू को पकड़ना सैन्य समस्या कम और सामाजिक नेटवर्क तोड़ने की समस्या अधिक है।

यहीं से दमन की दिशा गांवों की ओर मुड़ी।

मालाबार स्पेशल पुलिस और विशेष दमन

सामान्य पुलिस बार-बार असफल हुई तो जंगल और कठिन भूभाग में कार्रवाई का अनुभव रखने वाली मालाबार स्पेशल पुलिस को बुलाया गया।

इसके बाद अभियान अधिक संगठित हुआ।

पुलिस चौकियां बढ़ीं; गश्त तेज हुई; गांवों की निगरानी हुई; संदिग्ध समर्थकों को पकड़ा गया और मुखबिर तैयार करने का प्रयास किया गया।

अर्थात ब्रिटिश रणनीति अब ‘लड़ाई जीतने’ से ‘विद्रोही संगठन की जीवनरेखा काटने’ की ओर बढ़ी।

सामूहिक दंड और दंडात्मक कर

सरकार ने विद्रोह समर्थक समझे जाने वाले गांवों पर दंडात्मक आर्थिक दबाव बनाया।

भारत सरकार के आधिकारिक विवरण में दंडात्मक कर अर्थात दंडात्मक कर लगाए जाने का उल्लेख स्पष्ट रूप से मिलता है।

यह औपनिवेशिक प्रतिविद्रोह की परिचित नीति थी।

यदि कोई गांव विद्रोहियों को भोजन या आश्रय देता है, तो केवल व्यक्ति को नहीं, पूरे गांव को कीमत चुकानी पड़ सकती थी।

जनसमर्थन को आर्थिक रूप से असहनीय बना देना।

क्या वास्तव में ‘मार्शल लॉ’ लगा था?

भारत सरकार की आधुनिक जिला-स्मृति सामग्री विद्रोह के दौरान ‘सैनिक शासन’ लगाए जाने की भाषा प्रयोग करती है।

किन्तु शोध में इसे सावधानी से लिखना चाहिए। औपनिवेशिक प्रशासन में औपचारिक ‘मार्शल लॉ’ की विधिक घोषणा और अत्यधिक सैन्यीकृत विशेष प्रशासन हमेशा एक ही चीज नहीं थे।

इसलिए अधिक सुरक्षित वाक्य है

क्षेत्र में प्रशासन अत्यधिक सैन्यीकृत हुआ, विशेष पुलिस और दंडात्मक शक्तियों का व्यापक उपयोग हुआ; कुछ सरकारी आधुनिक विवरण इसे मार्शल लॉ के रूप में वर्णित करते हैं।

यह भेद शोध की विश्वसनीयता के लिए आवश्यक है।

इनाम की राजनीति

सरकार ने राजू को पकड़वाने के लिए 1,500 रुपये का इनाम घोषित किया।

गाम गंतम/गौतम डोरा और गाम मल्लैया डोरा जैसे प्रमुख सहयोगियों पर 1,000 रुपये तक के इनाम घोषित हुए।

उस समय की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में यह अत्यंत बड़ी रकम थी।

इनाम केवल व्यक्ति को पकड़ने का साधन नहीं था।

उसका उद्देश्य विद्रोह की सामाजिक नैतिकता को तोड़ना था

क्या कोई ग्रामीण सामुदायिक निष्ठा छोड़कर धन के लिए सूचना देगा?

दो वर्ष तक राजू का बचना बताता है कि यह नीति तत्काल सफल नहीं हुई।

खंड 10

1923–24 का निर्णायक प्रतिविद्रोह और राजू की मृत्यु

1923 : युद्ध का दूसरा चरण

1923 में आंदोलन का स्वरूप बदल गया।

1922 जैसी लगातार साहसी पुलिस-थाना कार्रवाइयां कम हुईं और संघर्ष अधिक रक्षात्मक तथा गतिशील गुरिल्ला अभियान में बदलने लगा।

सरकार का खुफिया नेटवर्क धीरे-धीरे विस्तृत हुआ।

आपूर्ति और संपर्क कठिन होते गए।

विद्रोही हथियार पुलिस से छीन सकते थे, लेकिन आधुनिक हथियारों और गोला-बारूद की स्थायी उत्पादन या आपूर्ति व्यवस्था उनके पास नहीं थी।

यही गुरिल्ला आंदोलन की संरचनात्मक सीमा थी।

राजू की रणनीतिक सफलता और रणनीतिक सीमा

राजू ने औपनिवेशिक सुरक्षा व्यवस्था की तीन कमजोरियां पहचान ली थीं

पहाड़ी भूगोल की अपर्याप्त जानकारी; स्थानीय जनता पर निर्भरता; और छोटे पुलिस थानों में हथियारों का केंद्रीकरण।

उन्होंने तीनों का इस्तेमाल किया।

लेकिन ब्रिटिश राज्य की श्रेष्ठता भी तीन स्तरों पर थी

असीमित पुनर्बल, संगठित वित्त और रसद तथा लंबे अभियान को जारी रखने की क्षमता।

इसलिए राजू युद्ध जीत सकते थे; युद्ध की संपूर्ण संरचना नहीं बदल सकते थे।

राष्ट्रीय कांग्रेस और राजू : दूरी क्यों रही?

यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है।

1922–24 का विद्रोह उसी समय हुआ जब कांग्रेस असहयोग वापसी के बाद अपनी रणनीति पुनर्गठित कर रही थी।

राजू का सशस्त्र तरीका कांग्रेस की घोषित अहिंसक नीति से मेल नहीं खाता था।

इसलिए उन्हें व्यापक कांग्रेस संगठन से खुला सैन्य या राजनीतिक समर्थन नहीं मिला।

यह मन्यम विद्रोह की बड़ी सीमा थी।

स्थानीय स्तर पर असाधारण समर्थन के बावजूद वह अखिल भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के संस्थागत नेटवर्क से जुड़ नहीं पाया।

1924 : ब्रिटिश प्रतिविद्रोह निर्णायक होता है

1924 आते-आते सरकार ने विद्रोह समाप्त करने को उच्च प्राथमिकता दी।

जंगल में लगातार खोज-अभियान, मुखबिर तंत्र, गांवों पर दबाव और नेताओं की तलाश तेज हुई।

राजू की गतिशीलता का क्षेत्र धीरे-धीरे संकुचित किया गया।

और अंततः मई 1924 में सरकार उन्हें पकड़ने में सफल हुई।

7 मई 1924 : अल्लूरी सीताराम राजू की मृत्यु

राजू की मृत्यु की स्वीकृत तिथि 7 मई 1924 है। भारत सरकार और आंध्र प्रदेश से संबंधित आधिकारिक स्मृतियां यही तारीख देती हैं।

लोकप्रिय विवरण के अनुसार उन्हें पकड़कर कोय्यूरु क्षेत्र में पेड़ से बांधा गया और गोली मार दी गई।

यह विवरण सार्वजनिक स्मृति और कई सरकारी प्रस्तुतियों में स्वीकार किया गया है।

हालांकि उनकी गिरफ्तारी की ठीक परिस्थितियों, किस अधिकारी/दल ने पकड़ा और मृत्यु-स्थल के सूक्ष्म विवरण में स्रोतगत भिन्नताएं हैं।

शोध में इसलिए निर्विवाद तथ्य और लोकस्मृति को अलग-अलग रखना उचित है

निर्विवाद: 7 मई 1924 को ब्रिटिश अभियान में राजू मारे गए।

व्यापक लोक-स्मृति: उन्हें पकड़ा गया, पेड़ से बांधा गया और गोली मार दी गई।

क्या राजू ने आत्मसमर्पण किया था?

कुछ लोकप्रिय कथाओं में यह दावा मिलता है कि ग्रामीणों को और दमन से बचाने के लिए राजू ने स्वयं को अधिकारियों के हवाले किया।

दूसरे विवरण गिरफ्तारी की बात करते हैं।

इस प्रश्न पर समकालीन विश्वसनीय स्रोतों की एकरूपता नहीं है।

अतः “राजू ने निश्चित रूप से स्वेच्छा से आत्मसमर्पण किया” जैसी घोषणा से बचना चाहिए।

इतिहासकार का सुरक्षित निष्कर्ष यही है कि मई 1924 में वह ब्रिटिश कब्जे में आए और 7 मई को मारे गए।

खंड 11

राजू के बाद : गिरफ्तारी, मुकदमे और दमन की सामाजिक कीमत

राजू के बाद : आंदोलन एक दिन में समाप्त नहीं हुआ

राजू की मृत्यु प्रतीकात्मक और संगठनात्मक दोनों अर्थों में सबसे बड़ा झटका थी।

लेकिन उनके सहयोगियों के विरुद्ध अभियान जारी रहा।

कुछ नेता मारे गए, कुछ पकड़े गए और कुछ को लंबी सजाएं दी गईं।

गाम गंतम डोरा और गाम मल्लैया डोरा से संबंधित अभियानों ने विद्रोह के अंतिम चरण को चिह्नित किया।

इसलिए 7 मई 1924 को आंदोलन की राजनीतिक कमर टूटती है; पूरा प्रतिरोध उसी क्षण शून्य नहीं हो जाता।

गिरफ्तारियां, मुकदमे और सजाएं : एक कम चर्चित अध्याय

लोकप्रिय स्मृति राजू की मृत्यु पर समाप्त हो जाती है।

औपनिवेशिक राज्य की दृष्टि से काम तब भी बाकी था।

विद्रोह में भागीदारी, हथियार रखने, पुलिस पर हमला, हत्या, राजद्रोह अथवा विद्रोहियों को सहायता देने के आरोपों में अनेक लोगों को गिरफ्तार किया गया। अदालतों और विशेष प्रशासनिक प्रक्रियाओं में उन्हें विभिन्न सजाएं मिलीं।

1879 के विद्रोह की तरह 1922–24 में भी कुछ बंदियों के दूरस्थ कारागारों और दीर्घ कारावास से जुड़ने के विवरण मिलते हैं।

यह विषय अभी भी नेताओं की वीरगाथा की तुलना में कम शोधित है। इसलिए किसी निश्चित कुल संख्या का दावा बिना संबंधित न्यायिक रजिस्टर जांचे नहीं करना चाहिए।

यही इतिहासलेखन की एक बड़ी रिक्ति है।

औपनिवेशिक दमन की वास्तविक कीमत किसने चुकाई?

सशस्त्र नेता प्रत्यक्ष लक्ष्य थे, लेकिन दमन का बड़ा भार गांवों ने उठाया।

दंडात्मक कर, गिरफ्तारी, पुलिस छापे, खाद्य और आवागमन पर नियंत्रण, पूछताछ और मुखबिर-प्रणाली ने पूरे सामाजिक क्षेत्र को प्रभावित किया।

अर्थात मन्यम विद्रोह की ‘लागत’ केवल मारे गए लड़ाकों की संख्या से नहीं मापी जा सकती।

उसमें वह आर्थिक और सामाजिक दबाव भी शामिल है जिसे हजारों सामान्य ग्रामीण परिवारों ने सहा।

महिलाओं की भूमिका : अभिलेख क्यों मौन हैं?

औपनिवेशिक रिकॉर्ड पुरुष विद्रोहियों, बंदूकों, पुलिस थानों और सैन्य अभियानों पर केंद्रित हैं।

इसका अर्थ महिलाओं की अनुपस्थिति नहीं है।

दो वर्ष लंबे गुरिल्ला संघर्ष में भोजन, आश्रय, संदेश, स्थानीय सूचना और परिवारों की रक्षा जैसी भूमिकाएं आंदोलन की निरंतरता के लिए अनिवार्य थीं।

फिर भी महिला प्रतिभागियों के नाम बहुत कम संरक्षित हुए।

यह रम्पा की नहीं, औपनिवेशिक आदिवासी इतिहासलेखन की बड़ी समस्या है

राज्य उस व्यक्ति का नाम दर्ज करता है जिस पर मुकदमा चलाना है; उस महिला का नहीं जिसने उसे भोजन दिया।

खंड 12

आदिवासी–कृषक चरित्र और 1879 से 1922 की निरंतरता

क्या मन्यम विद्रोह ‘आदिवासी विद्रोह’ था?

हाँ—उसका सामाजिक आधार मुख्यतः आदिवासी था।

लेकिन केवल इतना कहना अधूरा है।

राजू स्वयं आदिवासी नहीं थे। कुछ मुत्तादार और गैर-आदिवासी समर्थक भी जुड़े। स्वराज की भाषा राष्ट्रीय आंदोलन से आई।

इसलिए इसे अधिक सटीक रूप से कहा जा सकता है

आदिवासी सामाजिक आधार वाला, वन–कृषि और बेगार-विरोध से जन्मा, लेकिन ब्रिटिश शासन के उन्मूलन की दिशा में विकसित सशस्त्र औपनिवेशिक-विरोधी विद्रोह।

क्या यह किसान आंदोलन था?

भारतीय किसान इतिहास की आपकी व्यापक श्रृंखला में इसे शामिल करना पूर्णतः उचित है।

लेकिन यहां ‘किसान’ की मैदानी परिभाषा लागू नहीं करनी चाहिए।

कोया और कोंडा रेड्डी परिवार खेती भी करते थे और जंगल पर भी निर्भर थे। पोड़ू खेती, चराई और वन उपज अलग-अलग आर्थिक पेशे नहीं थे।

भूमि अधिकार = वन अधिकार = कृषि अधिकार = सामुदायिक अस्तित्व।

यही आदिवासी कृषक संघर्ष का विशिष्ट रूप है।

क्या यह केवल वन कानून के विरुद्ध विद्रोह था?

यह लोकप्रिय पुस्तकों में होने वाला सबसे बड़ा सरलीकरण है।

1922 के कारणों में कम-से-कम पांच परतें एक साथ थीं

वन और पोड़ू पर नियंत्रण; बेगार/सड़क निर्माण; पुलिस–राजस्व अधिकारियों का व्यवहार; मुत्तादारों की घटती स्वायत्तता; और असहयोग युग में फैली स्वराज की राजनीतिक चेतना।

किसी एक कारण को संपूर्ण कारण बना देना आंदोलन की सामाजिक जटिलता समाप्त कर देता है।

1879 और 1922 को क्या जोड़ता है?

दोनों विद्रोहों के बीच लगभग 43 वर्ष का अंतर है।

राष्ट्रीय राजनीतिक वातावरण बिल्कुल अलग था।

फिर भी कुछ संरचनात्मक समानताएं आश्चर्यजनक हैं।

दोनों में पहाड़ी समाज ने बाहर से थोपे गए प्रशासनिक नियंत्रण का विरोध किया।

दोनों में पुलिस प्रतिष्ठान राजनीतिक सत्ता के प्रतीक बने।

दोनों में जंगल और दुर्गम भूगोल ने गुरिल्ला प्रतिरोध को शक्ति दी।

दोनों में ब्रिटिश सरकार को सामान्य पुलिस से अधिक बल लगाना पड़ा।

और दोनों में दमन के साथ-साथ प्रशासन को अपनी पहाड़ी नीति की समस्याओं से सामना करना पड़ा।

सबसे बड़ा अंतर : ‘हमारा अधिकार’ से ‘अंग्रेजी राज हटाओ’ तक

यही पूरे अध्याय का निर्णायक परिवर्तन है।

मनसबदार का अत्याचार, आबकारी कर, पुलिस, बाहरी व्यापारी और स्थानीय स्वायत्तता।

1922 में वही स्थानीय प्रश्न बने रहे, लेकिन अब उन पर एक नया विचार चढ़ चुका था

इसलिए 1879 मुख्यतः स्थानीय औपनिवेशिक–प्रशासनिक व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह था।

1922–24 में ब्रिटिश शासन स्वयं राजनीतिक लक्ष्य बन गया।

खंड 13

हिंसा, गांधी, राष्ट्रवादी स्मृति और इतिहासलेखन

हिंसा : इतिहास में इसका मूल्यांकन कैसे हो?

1922–24 का आंदोलन सशस्त्र था।

पुलिस थानों पर हमला, सरकारी हथियार कब्जा करना और कुछ अधिकारियों की हत्या उसकी रणनीति का हिस्सा थे।

इसे अहिंसक आंदोलन बताना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।

लेकिन इसे सामान्य ‘कानूनहीन हिंसा’ कहना भी औपनिवेशिक प्रशासन की भाषा को इतिहास मान लेना होगा।

राजू की हिंसा राजनीतिक लक्ष्य वाली औपनिवेशिक राज्य-विरोधी गुरिल्ला हिंसा थी।

साथ ही इसकी रोमानी व्याख्या करते हुए ग्रामीणों पर पड़े दमन और मृत्यु की मानवीय लागत को भुलाना भी उचित नहीं है।

क्या राजू गांधी-विरोधी थे?

अहिंसा से असहमति का अर्थ गांधी-विरोध नहीं है।

राजू ने गांधी की लोकप्रियता और स्वराज के संदेश को सम्मान दिया और उनके कुछ कार्यक्रम अपनाए।

लेकिन उन्होंने संघर्ष की पद्धति पर अलग निष्कर्ष निकाला।

अतः राजू को गांधीवादी या गांधी-विरोधी दो सरल खानों में रखना ऐतिहासिक रूप से कमजोर विश्लेषण होगा।

वह गांधी युग का एक वैकल्पिक क्रांतिकारी मार्ग प्रस्तुत करते हैं।

राष्ट्रवादी इतिहासलेखन : ‘मन्यम वीरुडु’

स्वतंत्रता के बाद राजू को राष्ट्रीय स्वतंत्रता सेनानी और आंध्र के महान लोकनायक के रूप में स्थापित किया गया।

सरकारी स्मृति उन्हें ‘Manyam Veerudu’ कहती है और 2022 में उनकी 125वीं जयंती तथा रम्पा विद्रोह की शताब्दी को राष्ट्रीय स्तर पर मनाया गया।

यह इतिहासलेखन राजू के देशभक्ति और बलिदान को केंद्र में रखता है।

इसकी शक्ति यह है कि उसने औपनिवेशिक अभिलेखों में ‘विद्रोही’ कहे गए व्यक्ति को स्वतंत्रता सेनानी के रूप में पुनर्स्थापित किया।

उसकी सीमा यह है कि कभी-कभी इससे हजारों आदिवासी प्रतिभागी राजू की विराट छवि के पीछे अदृश्य हो जाते हैं।

सबाल्टर्न इतिहासलेखन : डेविड अर्नोल्ड का हस्तक्षेप

डेविड अर्नोल्ड का 1982 का अध्ययन “Rebellious Hillmen: The Gudem-Rampa Risings, 1839–1924” इस आंदोलन के इतिहासलेखन में निर्णायक है। यह अधीनस्थ-वर्गीय Studies I में प्रकाशित हुआ। विश्वविद्यालयी इतिहास पाठ्यक्रमों में भी इसे मूल अध्ययन के रूप में पढ़ाया जाता है।

अर्नोल्ड का महत्व यह है कि उसने 1922 को अकेले राजू की वीरगाथा नहीं माना।

उसने उसे लगभग एक सदी की पहाड़ी सत्ता, औपनिवेशिक हस्तक्षेप और स्थानीय प्रतिरोध की परंपरा में रखा।

इससे इतिहास का नायक केवल एक व्यक्ति नहीं, ‘hillmen’ अर्थात स्वयं पहाड़ी समाज बनता है।

अट्लुरी मुरली की व्याख्या और इतिहासलेखन-विवाद

अट्लुरी मुरली का 1984 का महत्वपूर्ण शोध-पत्र “Alluri Sitarama Raju and the Manyam Rebellion of 1922–1924” Social Scientist में प्रकाशित हुआ। अगले वर्ष उन्होंने विवाद पर प्रत्युत्तर भी लिखा। ये दोनों लेख इस विषय के प्रमुख आधुनिक अकादमिक स्रोत हैं।

बाद के शोध में मुरली ने औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा आदिवासी विद्रोहों के कारणों को प्रस्तुत करने की राजनीति पर भी प्रश्न उठाया—अर्थात राज्य कभी-कभी संघर्ष को कुछ ‘दुष्ट अधिकारियों’ या स्थानीय शिकायतों का परिणाम बताकर स्वयं औपनिवेशिक शासन की संरचनात्मक भूमिका को छोटा करता था।

यह 1879 की सुलिवन जांच को पढ़ते समय भी महत्वपूर्ण सावधानी है।

मनसबदार वास्तव में दमनकारी था; लेकिन यदि पूरा दोष उसी पर डाल दिया जाए, तो यह छिप सकता है कि उसे दशकों तक संरक्षण किसने दिया था।

औपनिवेशिक अभिलेख की सबसे बड़ी समस्या

गजेटियर अत्यंत उपयोगी हैं, लेकिन तटस्थ नहीं।

वे तिथियां, नाम, सैन्य अभियान और प्रशासनिक निर्णय देते हैं।

पर उनकी शब्दावली में विद्रोही अक्सर ‘उपद्रवी’, ‘कानून-बाह्य विद्रोही’, ‘hillmen’ या ‘लुटेरे’ बन जाते हैं।

उसी घटना को गांव की लोकस्मृति स्वतंत्रता-संघर्ष कह सकती है।

इसलिए शोध में औपनिवेशिक अभिलेख को न तो त्यागना चाहिए और न निर्विवाद सत्य मानना चाहिए।

औपनिवेशिक अभिलेख + प्रशासनिक गजेटियर + आदिवासी स्मृति + आधुनिक अकादमिक इतिहासलेखन का परस्पर परीक्षण।

खंड 14

उपलब्धियां, सीमाएं, तुलनात्मक स्थान और वैचारिक रूपांतरण

प्रथम रम्पा विद्रोह की ठोस उपलब्धियां

1879–80 को सैन्य रूप से दबा दिया गया, लेकिन वह परिणामहीन नहीं था।

मुत्तादारों से सीधा बंदोबस्त हुआ।

मनसबदार के कब्जे में गई कुछ मुत्ताओं को पुराने परिवारों अथवा उनके उत्तराधिकारियों को वापस दिया गया।

आबकारी व्यवस्था की अनुपयुक्तता सरकारी जांच में स्वीकार हुई।

और प्रशासनिक निगरानी की विफलता दर्ज हुई।

इस अर्थ में यह विद्रोह औपनिवेशिक नीति-संशोधन करवाने वाला सफल प्रतिरोध था, भले उसने औपनिवेशिक सत्ता समाप्त न की हो।

1922–24 की उपलब्धियां

राजू ब्रिटिश शासन को नहीं हटा सके।

पोड़ू के सभी अधिकार तत्काल बहाल नहीं हुए।

मुत्तादारी व्यवस्था का प्रश्न भी तत्काल हल नहीं हुआ।

फिर भी मन्यम विद्रोह ने तीन ऐतिहासिक उपलब्धियां प्राप्त कीं।

उसने आदिवासी असंतोष को राष्ट्रीय स्वराज की भाषा से जोड़ा।

उसने ब्रिटिश सरकार को दो वर्ष तक विशाल सुरक्षा अभियान चलाने पर मजबूर किया।

और उसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की राष्ट्रीय स्मृति में पूर्वी घाट के आदिवासी समाज को स्थायी स्थान दिलाया।

आंदोलन की सीमाएं

विद्रोह गोदावरी–विशाखापट्टनम पहाड़ियों से निकलकर मद्रास प्रेसीडेंसी के व्यापक जनविद्रोह में नहीं बदल पाया।

हथियार पुलिस से मिल सकते थे, किंतु गोला-बारूद और सैन्य रसद की निरंतर व्यवस्था नहीं थी।

तीसरी सीमा राष्ट्रीय संगठन से अलगाव था।

कांग्रेस उसकी सशस्त्र पद्धति स्वीकार नहीं कर सकती थी।

चौथी सीमा नेतृत्व का केंद्रीकरण था।

राजू की मृत्यु के बाद समान करिश्मा और सैन्य क्षमता वाला सर्वमान्य नेता नहीं उभर सका।

आंदोलन की सबसे बड़ी शक्ति भी उसकी कमजोरी बनी

राजू का व्यक्तिगत करिश्मा आंदोलन को असाधारण शक्ति देता था।

उनका आदेश अलग-अलग गांवों और गुटों को जोड़ सकता था।

लेकिन जब कोई आंदोलन अत्यधिक एक व्यक्ति पर निर्भर हो जाए, तो उस व्यक्ति के हटने पर संगठनात्मक रिक्ति बहुत बड़ी होती है।

रम्पा, संथाल हूल, मुंडा उलगुलान और बस्तर भूमकाल

भारतीय आदिवासी प्रतिरोध की व्यापक तुलना में रम्पा विशिष्ट है।

संथाल हूल में सिद्धू–कान्हू स्वयं संथाल समाज से निकले।

बिरसा मुंडा मुंडा समुदाय के धार्मिक–राजनीतिक नेता थे।

बस्तर भूमकाल में गुंडाधुर स्थानीय आदिवासी नेतृत्व का प्रतीक बने।

रम्पा में सर्वोच्च प्रतीक राजू बने, जो स्वयं कोया नहीं थे।

इसलिए यहां बाहरी करिश्माई नेता और स्थानीय आदिवासी नेतृत्व का गठबंधन विशेष महत्व रखता है।

1879 से 1924 तक आंदोलन का वैचारिक रूपांतरण

इस पूरे इतिहास को एक वाक्य में समझने का सबसे उपयोगी तरीका है

1879 : प्रशासन को बदलो।

1879 में मनसबदार और औपनिवेशिक प्रशासन की विशिष्ट नीतियां मुख्य निशाना थीं।

1922 में जंगल, बेगार और अधिकारियों की शिकायतें अब ब्रिटिश शासन की वैधता के व्यापक प्रश्न में बदल चुकी थीं।

यह रूपांतरण भारतीय ग्रामीण प्रतिरोध के राष्ट्रीयकरण का उत्कृष्ट उदाहरण है।

खंड 15

1839–1924 की समेकित समयरेखा

समेकित विस्तृत समयरेखा

काल/तिथि — घटना और ऐतिहासिक महत्व

18वीं सदी उत्तरार्ध — रम्पा मनसबदार लगभग स्वतंत्र पहाड़ी शासक; कंपनी का सीमित हस्तक्षेप

1787 — कंपनी अधिकारियों ने रम्पा की वास्तविक स्वायत्त स्थिति दर्ज की

1802–03 — स्थायी बंदोबस्त में रम्पा लगभग बाहर रहा

1813 — मनसबदार का मैदान में हस्तक्षेप; कंपनी के साथ पहली महत्वपूर्ण औपचारिक व्यवस्था

1839–40 — रम्पा–गुडेम क्षेत्र में सत्ता-संघर्ष का नया चरण

1847–48 — अंग्रेजी मध्यस्थता से मनसबदार–मुत्तादार समझौता

1858 — मनसबदार-विरोधी नया संघर्ष

1862 — पहाड़ी असंतोष और प्रतिरोध जारी

1860 के दशक — आबकारी व्यवस्था का पहाड़ों में प्रवेश

1874 — अनुसूचित जिला अधिनियम; एजेंसी शासन का विधिक ढांचा मजबूत

1870 के उत्तरार्ध — चिगुरुपन्नु, मोडालुपन्नु, पुलिस तथा मनसबदार के अत्याचार को लेकर तनाव

मार्च 1879 — प्रथम बड़े रम्पा विद्रोह का आरंभ

1879 — करम तम्मन डोरा, चंद्रय्या, सम्बैया, अम्बुल रेड्डी आदि विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय

मई 1879 — चंद्रय्या के नेतृत्व में अड्डतीगला थाना जलाया गया

जून 1879 — अड्डतीगला क्षेत्र में गंभीर पुलिस–विद्रोही संघर्ष

1879 — सैन्य बल और विशेष पुलिस पहाड़ियों में तैनात

1879 — एच. ई. सुलिवन को जांच के लिए भेजा गया

सितंबर 1879 — नई मुत्तादार सनदें; प्रशासनिक पुनर्गठन आरंभ

1879–80 — मनसबदार की सत्ता समाप्त; राज्यबंदी

1880–81 — शेष प्रतिरोध दबाया गया; चंद्रय्या की मृत्यु की तिथि पर स्रोतगत मतभेद

1880 के दशक बाद — प्रत्यक्ष औपनिवेशिक प्रशासन और वन नियंत्रण बढ़ा

19वीं सदी उत्तरार्ध–20वीं सदी आरंभ — पोड़ू, चराई, वन-उपयोग पर नियंत्रण का विस्तार

1920 — असहयोग आंदोलन; स्वराज की भाषा पहाड़ी क्षेत्रों में पहुंची

1921–22 — गुडेम क्षेत्र में सड़क श्रम, बेगार और स्थानीय अधिकारियों पर शिकायतें तीव्र

फरवरी 1922 — असहयोग की वापसी; राजू स्वतंत्र सशस्त्र मार्ग की ओर

22 अगस्त 1922 — चिंतापल्ली पुलिस स्टेशन पर हमला

23 अगस्त — कृष्णदेवीपेटा थाना

24 अगस्त — राजवोम्मंगी थाना

अगस्त 1922 — लगभग 26 हथियार और 2,500 कारतूस विद्रोहियों के हाथ

सितंबर 1922 — पुलिस के विरुद्ध अनेक सफल संघर्ष

सितंबर 1922 — दमनापल्ली घाट; स्कॉट कावर्ड और हाइटर मारे गए

1922 उत्तरार्ध — अड्डतीगला, राम्पाचोडावरम, गुडेम आदि में गतिविधियां

1922 — मालाबार स्पेशल पुलिस की तैनाती

1922–23 — दंडात्मक कर, छापे, गिरफ्तारी, इनाम और गांवों पर दबाव

1923 — लंबा गुरिल्ला चरण; सरकारी खुफिया नेटवर्क मजबूत

1924 आरंभ — अंतिम प्रतिविद्रोह अभियान

7 मई 1924 — अल्लूरी सीताराम राजू ब्रिटिश कब्जे में आने के बाद मारे गए

मई 1924 बाद — प्रमुख सहयोगियों के विरुद्ध अभियान; संगठनात्मक विघटन

1924 — विद्रोह का संगठित चरण समाप्त

खंड 16

प्रमुख व्यक्तित्व, नेतृत्व और अनिवार्य स्रोत

प्रमुख व्यक्तित्वों का समेकित परिचय

1879–80 में किसी एक व्यक्ति को निर्विवाद सर्वोच्च नेता मानना कठिन है। करम तम्मन डोरा, चंद्रय्या, सरदार जंगम पुलिकंटा सम्बैया और अम्बुल रेड्डी जैसे नाम आधिकारिक और स्थानीय स्रोतों में आते हैं। चंद्रय्या विशेष रूप से अड्डतीगला तथा गुरिल्ला कार्रवाइयों से जुड़े हैं।

1922–24 में इसके विपरीत सर्वोच्च राजनीतिक–सैन्य नेतृत्व स्पष्टतः अल्लूरी सीताराम राजू के हाथ में था।

लेकिन स्थानीय संगठन में गाम गंतम/गौतम डोरा, गाम मल्लैया/मल्लू डोरा और अनेक अज्ञात अथवा कम-दर्ज आदिवासी नेताओं की भूमिका निर्णायक थी।

यह अंतर भी दोनों आंदोलनों की संरचना को समझाता है

1879 अधिक विकेंद्रित विद्रोह था।

1922 अधिक राजू-केंद्रित गुरिल्ला आंदोलन।

शोध के लिए अनिवार्य प्राथमिक और द्वितीयक स्रोत

इस विषय के गंभीर शोध में F. R. Hemingway का Godavari District Gazetteer आधारभूत औपनिवेशिक स्रोत है। 1879 के कारणों, मनसबदार, चिगुरुपन्नु, मोडालुपन्नु, चंद्रय्या, अड्डतीगला, सैन्य अभियान और बाद के प्रशासनिक पुनर्गठन के लिए इसका उपयोग अपरिहार्य है। गजेटियर स्वयं 1879 के लिए न्याय विभाग के सरकारी आदेशों—5 मई 1879, 3 अप्रैल 1879, 16 जनवरी 1880—और डी. एफ. कार्माइकल की 1881 रिपोर्ट का उल्लेख करता है।

H. E. Sullivan की 1879–80 जांच और मद्रास सरकार के Judicial Department records मनसबदार व्यवस्था और औपनिवेशिक प्रशासन की स्वयं की आलोचना समझने के लिए केंद्रीय हैं।

Christoph von Fürer-Haimendorf, Tribes of India: The Struggle for Survival 1879 के आर्थिक–सामाजिक कारण, व्यापारियों और अदालतों की भूमिका तथा पहाड़ी समाज के दृष्टिकोण को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण है।

David Arnold, “Rebellious Hillmen: The Gudem-Rampa Risings, 1839–1924”, अधीनस्थ-वर्गीय Studies I, 1982, pp. 88–142—पूरे रम्पा–गुडेम प्रतिरोध को दीर्घकालीन ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रखने वाला सबसे महत्वपूर्ण आधुनिक अध्ययन है।

Atlury Murali, “Alluri Sitarama Raju and the Manyam Rebellion of 1922–1924”, Social Scientist, Vol. 12, No. 4, 1984, pp. 3–33 और उनका 1985 का प्रत्युत्तर आधुनिक इतिहासलेखन की दूसरी अनिवार्य धुरी हैं।

बाद में मुरली का “Tribal Armed Rebellion of 1922–1924 in the Madras Presidency: A Study of Causation as Colonial Legitimation” भी कारणों की औपनिवेशिक व्याख्या की आलोचना के लिए आवश्यक है।

भारत सरकार का Digital District Repository घटनाक्रम, 22–24 अगस्त के पुलिस स्टेशन हमलों, मालाबार स्पेशल पुलिस, इनामों, दंडात्मक कर और राजू की मृत्यु की आधिकारिक आधुनिक स्मृति प्रदान करता है।

खंड 17

शोध-सावधानियां और अंतिम ऐतिहासिक मूल्यांकन

शोध-सावधानियां : किन तथ्यों को बिना जांचे नहीं लिखना चाहिए

इस आंदोलन पर लोकप्रिय लेखन में कई बातें बार-बार इतनी दोहराई गई हैं कि वे तथ्य जैसी दिखाई देने लगी हैं। शोध अध्याय में उनसे सावधानी आवश्यक है।

चंद्रय्या की मृत्यु की सटीक तिथि अलग स्रोतों में अलग है।

1879–80 में विभिन्न स्थानीय नेताओं की पदानुक्रमित भूमिका निश्चित नहीं है।

राजू के जन्मस्थान को लेकर स्थानीय परंपराएं अलग हैं।

उनकी अंतिम गिरफ्तारी—स्वैच्छिक आत्मसमर्पण अथवा सूचना के आधार पर गिरफ्तारी—पर एकरूपता नहीं है।

‘मार्शल लॉ’ की औपचारिक कानूनी स्थिति भी जाँची जानी चाहिए।

1922–24 में मारे गए, घायल और दंडित आदिवासियों की निश्चित कुल संख्या के लोकप्रिय दावों को न्यायिक/प्रशासनिक रिकॉर्ड के बिना स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।

इसी तरह प्रत्येक समस्या का कारण सीधे “1882 वन अधिनियम” को बताना इतिहास को अत्यधिक सरल बना देता है।

इन मतभेदों को छिपाने के बजाय स्पष्ट करना ही शोध अध्याय को विश्वसनीय बनाता है।

अंतिम समेकित मूल्यांकन : रम्पा–गुडेम को कैसे समझें?

रम्पा–गुडेम की कहानी भारतीय किसान–आदिवासी प्रतिरोध के इतिहास में असाधारण है क्योंकि यहां हम प्रतिरोध के राजनीतिक विकास को लगभग प्रत्यक्ष रूप से देख सकते हैं।

आरंभ में पहाड़ लगभग स्वायत्त थे।

फिर कंपनी ने मनसबदार को संरक्षण दिया।

मनसबदार ने मुत्तादारों पर अधिकार बढ़ाया।

आबकारी कानून ने ताड़ी को राजस्व में बदला।

पुलिस कानून लेकर पहाड़ों में आई।

व्यापारी और अदालतें आर्थिक संबंध बदलने लगीं।

1879 में पहाड़ी समाज फट पड़ा।

विद्रोह ने मनसबदार को हटा दिया।

लेकिन उसकी जगह स्थानीय स्वायत्तता वापस नहीं आई।

बल्कि औपनिवेशिक राज्य स्वयं अधिक प्रत्यक्ष हो गया।

वन संसाधन पर सरकार का अधिकार बढ़ा।

सड़क निर्माण ने बेगार का प्रश्न पैदा किया।

और इसी बीच गांधी ने पूरे भारत को एक नया शब्द दिया

अल्लूरी सीताराम राजू ने इस राष्ट्रीय शब्द का पहाड़ी अनुवाद किया।

उनके अनुयायी के लिए स्वराज केवल दिल्ली, मद्रास या ब्रिटिश संसद से संबंधित संवैधानिक विचार नहीं था।

हमारी जमीन पर हमारा अधिकार। हमारे जंगल में हमारा अधिकार। हमारी मेहनत पर हमारा अधिकार। हमारे गांव का न्याय हमारे हाथ। और हमारे ऊपर विदेशी सरकार का शासन नहीं।

यही कारण है कि 1922–24 को केवल वन कानून विरोधी आंदोलन कहना गलत है।

केवल कोया विद्रोह कहना भी अधूरा है।

केवल स्वतंत्रता संग्राम कहना भी उसकी सामाजिक जड़ें काट देता है।

“रम्पा–गुडेम एक दीर्घकालीन आदिवासी–कृषक स्वायत्तता संघर्ष था, जो मनसबदार और औपनिवेशिक राजस्व हस्तक्षेप के विरोध से शुरू होकर वन, पोड़ू और बेगार के संघर्ष से गुजरते हुए अल्लूरी सीताराम राजू के नेतृत्व में सशस्त्र स्वराज विद्रोह में परिणत हुआ।”

1879 और 1922 के बीच का अंतर इसी विकास को सबसे सुंदर तरीके से व्यक्त करता है।

1879 में प्रश्न था—राज हमारे जीवन में इतना हस्तक्षेप क्यों करे?

1922 में प्रश्न था—यह विदेशी राज हमारे ऊपर रहे ही क्यों?

इसलिए चंद्रय्या, तम्मन डोरा और उनके अज्ञात कोया साथियों से लेकर गाम डोराओं और अल्लूरी सीताराम राजू तक फैली इस परंपरा को भारतीय किसान–आदिवासी इतिहास की एक अखंड धारा के रूप में पढ़ना चाहिए।

ताड़ी से पोड़ू तक, मुत्तादारी से वन-राज तक, बेगार से बंदूक तक और स्थानीय अधिकार से स्वराज तक—यही रम्पा–गुडेम विद्रोह का पूरा ऐतिहासिक अर्थ है।

OCN ऐतिहासिक आकलन

रम्पा–गुडेम को केवल वन कानून-विरोध, केवल कोया विद्रोह अथवा केवल राष्ट्रीय स्वतंत्रता-संग्राम कहना उसके किसी एक पक्ष को संपूर्ण इतिहास बना देना होगा। इसकी सामाजिक जड़ें जमीन, जंगल, पोड़ू, ताड़ी, बेगार और स्थानीय न्याय में थीं; इसकी राजनीतिक यात्रा मनसबदार और औपनिवेशिक हस्तक्षेप के प्रतिरोध से विदेशी शासन के निषेध तक पहुँची। 1879 ने प्रशासनिक ढाँचा बदला, पर स्वायत्तता वापस नहीं की; 1922–24 ने पहाड़ी शिकायतों को स्वराज से जोड़ा, पर अत्यधिक नेतृत्व-केंद्रीकरण और सीमित भौगोलिक विस्तार उसकी कमजोरी बने। इसीलिए इसका सबसे सटीक अर्थ है—स्थानीय अधिकार से सशस्त्र स्वराज तक विकसित हुआ दीर्घ आदिवासी–कृषक संघर्ष।

शोधार्थियों के लिए

प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक स्रोत

राष्ट्रीय अभिलेखागार — अभिलेख पटलमद्रास सरकार के न्याय, राजस्व, वन, पुलिस और रम्पा–गुडेम अभियानों से संबंधित औपनिवेशिक अभिलेख।स्रोत तक जाएँ ↗
तमिलनाडु अभिलेखागार एवं ऐतिहासिक शोध विभागमद्रास प्रेसीडेंसी के न्याय विभाग, एजेंसी प्रशासन, विशेष पुलिस और 1922–24 के दमन संबंधी अभिलेख।स्रोत तक जाएँ ↗
गोदावरी जिला गजेटियर — एफ. आर. हेमिंग्वे1879 के कारणों, मनसबदार–मुत्तादार व्यवस्था, चंद्रय्या, अड्डतीगला और प्रशासनिक पुनर्गठन का आधारभूत औपनिवेशिक विवरण।स्रोत तक जाएँ ↗
भारत सरकार — आजादी का अमृत महोत्सव अभिलेखअल्लूरी सीताराम राजू, अगस्त 1922 के थाना अभियानों, विशेष पुलिस, दंडात्मक कर और अंतिम दमन पर आधिकारिक आधुनिक सामग्री।स्रोत तक जाएँ ↗
सबाल्टर्न स्टडीज — डेविड अर्नोल्ड‘रेबेलियस हिलमेन’ अध्ययन 1839 से 1924 तक रम्पा–गुडेम प्रतिरोध को एक दीर्घ ऐतिहासिक धारा के रूप में पढ़ता है।स्रोत तक जाएँ ↗
सोशल साइंटिस्ट — अट्लुरी मुरलीअल्लूरी सीताराम राजू, मन्यम विद्रोह और कारणों की औपनिवेशिक व्याख्या पर प्रमुख इतिहासलेखन तथा प्रत्युत्तर।स्रोत तक जाएँ ↗

स्रोत-सावधानी: 1879–80 के नेतृत्व-क्रम, चंद्रय्या की मृत्यु, राजू के जन्मस्थान, 7 मई 1924 की गिरफ्तारी अथवा आत्मसमर्पण, सैनिक शासन की औपचारिक स्थिति तथा मृतकों–दंडितों की संख्या पर स्रोत एकमत नहीं हैं। लोकप्रिय कथनों को न्यायिक और प्रशासनिक अभिलेखों से मिलाए बिना निश्चित तथ्य न माना जाए; आदिवासी समाज की आवाज दर्ज करने में औपनिवेशिक अभिलेखों की संरचनात्मक सीमाएँ भी ध्यान में रखी जाएँ।