खोंड/कंध विद्रोह (1837–1856)
घुमुसर से कंधमाल तक भूमि, स्वायत्तता, राजसत्ता और औपनिवेशिक हस्तक्षेप के विरुद्ध लंबा प्रतिरोध
खोंड विद्रोह को केवल मेरिया प्रथा बचाने की प्रतिक्रिया मानना औपनिवेशिक व्याख्या को इतिहास का पूरा सत्य मान लेना होगा। घुमुसर और कंधमाल की मुठा-आधारित स्वशासी दुनिया में ब्रिटिश सैन्य–राजस्व हस्तक्षेप, स्थानीय राजसत्ता का संकट, भूमि–वन पर नियंत्रण, बेगार और धार्मिक–सांस्कृतिक हस्तक्षेप की आशंका एक-दूसरे से जुड़ी थीं। डोरा बिसोई से चक्र बिसोई तक नेतृत्व बदला; दमन, गांव जलाने, राजाओं पर कार्रवाई और समझाइश की नीतियां साथ-साथ चलीं; फिर भी लगभग दो दशकों तक छापामार प्रतिरोध समाप्त नहीं हुआ।
खोंड समाज, घुमुसर और आरंभिक नेतृत्व
प्रस्तावना : उन्नीस वर्षों का विद्रोह या उससे भी लंबा प्रतिरोध?
उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में पूर्वी भारत के पहाड़ी और वन क्षेत्रों में ब्रिटिश सत्ता को जिन सबसे लंबे और कठिन प्रतिरोधों का सामना करना पड़ा, उनमें खोंड अथवा कंध प्रतिरोध विशेष स्थान रखता है। इसका मुख्य क्षेत्र आज के ओडिशा में घुमुसर, कंधमाल, बौध, दशपल्ला, अंगुल, कालाहांडी, पटना तथा आसपास के पहाड़ी भूभाग थे। आंदोलन का सर्वाधिक प्रसिद्ध नेतृत्व पहले कमल लोचन डोरा बिसोई और फिर उनके भतीजे चक्र बिसोई ने किया।
सामान्यतः इसे 1837 से 1856 के खोंड विद्रोह के रूप में लिखा जाता है, किंतु इसकी वास्तविक शुरुआत को समझने के लिए 1835–37 की घुमुसर अशांति को छोड़ना संभव नहीं है। कुछ ओडिशा-आधारित इतिहासलेखन इसकी शुरुआत सितंबर 1835 से मानता है और डोरा बिसोई के नेतृत्व वाले प्रथम चरण को फरवरी 1837 तक रखता है। 1837 में डोरा बिसोई की गिरफ्तारी के बाद चक्र बिसोई ने नेतृत्व संभाला और संघर्ष अगले लगभग दो दशकों तक अलग-अलग रूपों में चलता रहा।
इस आंदोलन को केवल एक आदिवासी धार्मिक विद्रोह कहना भी पर्याप्त नहीं है। इसमें कम-से-कम पांच प्रश्न एक-दूसरे में गुंथे हुए थे
राजनीतिक स्वायत्तता, पारंपरिक राजसत्ता, भूमि और राजस्व, आदिवासी सामाजिक-सांस्कृतिक अधिकार तथा औपनिवेशिक प्रशासन का विस्तार।
मेरिया मानव-बलि प्रथा का प्रश्न निश्चित रूप से महत्वपूर्ण था, लेकिन वह पूरे आंदोलन का अकेला कारण नहीं था। ब्रिटिश शासन ने इसी प्रश्न को अपने हस्तक्षेप का प्रमुख नैतिक औचित्य बनाया, जबकि खोंड समाज के बड़े हिस्से ने इस हस्तक्षेप को अपनी स्वायत्त सामाजिक व्यवस्था पर बाहरी सत्ता के प्रवेश के रूप में देखा।
खोंड कौन थे? पहाड़, मुठा और स्वशासन की दुनिया
खोंड—जिन्हें विभिन्न स्रोतों में कंध, कोंध, Kondh, Khond आदि लिखा गया है—ओडिशा और उससे लगे मध्य-पूर्वी भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले प्रमुख आदिवासी समुदायों में थे।
उनका समाज किसी आधुनिक केंद्रीकृत राज्य की तरह संचालित नहीं होता था। गांव, कुल, क्षेत्रीय समुदाय और मुठा जैसी इकाइयां सामाजिक तथा राजनीतिक संगठन की आधारशिला थीं। स्थानीय मुखिया और विभिन्न पारंपरिक पदाधिकारी समुदाय तथा व्यापक क्षेत्रीय राजसत्ता के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाते थे।
पहाड़ और जंगल उनके लिए केवल आर्थिक संसाधन नहीं थे। भूमि, वन, देवता, पूर्वज, कृषि और सामुदायिक सत्ता एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। इसलिए किसी बाहरी सरकार का भूमि मापना, कर निर्धारित करना, पुलिस भेजना, मुखियाओं को आदेश देना अथवा धार्मिक अनुष्ठानों में हस्तक्षेप करना केवल प्रशासनिक सुधार नहीं माना जाता था।
वह स्थानीय समाज के लिए सत्ता के अधिकार-क्षेत्र को बदलने का प्रयास था।
घुमुसर : विद्रोह का राजनीतिक केंद्र
खोंड प्रतिरोध की प्रारंभिक कहानी घुमुसर की राजनीति से गहराई से जुड़ी हुई है।
घुमुसर पर भंज राजवंश का शासन था। उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने ओडिशा के राजनीतिक और राजस्व मामलों पर अपना नियंत्रण लगातार बढ़ाया। स्थानीय राजाओं और जमींदारों से निर्धारित राजस्व तथा राजनीतिक आज्ञाकारिता की अपेक्षा की जाने लगी।
घुमुसर के राजा धनंजय भंज और ब्रिटिश अधिकारियों के बीच संबंध बिगड़ते गए। राजस्व, प्रशासन और सत्ता के प्रश्न पर तनाव बढ़ा। ब्रिटिश हस्तक्षेप के कारण स्थानीय अभिजात वर्ग और पहाड़ी खोंड समुदाय दोनों में असंतोष उत्पन्न हुआ।
धनंजय भंज का खोंड क्षेत्रों में प्रभाव था और उनके समर्थकों में डोरा बिसोई जैसे शक्तिशाली स्थानीय नेता शामिल थे।
31 दिसंबर 1835 को धनंजय भंज की मृत्यु के बाद परिस्थितियां निर्णायक रूप से बदल गईं। ब्रिटिश सरकार ने घुमुसर पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। इससे भंज राजवंश के पुनर्स्थापन की मांग और औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध एक-दूसरे से जुड़ गए।
डोरा बिसोई : पहले चरण का नेतृत्व
कमल लोचन डोरा बिसोई, जिन्हें सामान्यतः डोरा बिसोई कहा जाता है, घुमुसर के खोंड प्रतिरोध के प्रथम महान नेता बने।
वे केवल धार्मिक परंपरा के रक्षक नहीं थे। उनका संघर्ष भंज राजसत्ता की बहाली तथा घुमुसर में ब्रिटिश हस्तक्षेप समाप्त करने के प्रश्न से जुड़ा था।
उनके नेतृत्व में खोंडों के साथ स्थानीय पाइकों और अन्य समूहों ने भी औपनिवेशिक प्रशासन को चुनौती दी। ब्रिटिश अधिकारियों के लिए समस्या यह थी कि पहाड़ी भूगोल में विद्रोहियों को निर्णायक रूप से पराजित करना कठिन था।
घने जंगल, दुर्गम घाटियां और स्थानीय भूगोल की खोंडों को असाधारण जानकारी गुरिल्ला प्रतिरोध के लिए अनुकूल थी।
ब्रिटिश सेना किसी स्थान पर पहुंचती तो विद्रोही पहाड़ियों में चले जाते; सेना हटती तो प्रतिरोध पुनः उभर आता।
1835–37 का विस्फोट और चक्र बिसोई का उदय
1835–37 : विद्रोह की वास्तविक शुरुआत
सितंबर 1835 के आसपास घुमुसर क्षेत्र में विद्रोह तीव्र होने लगा।
धनंजय भंज के समर्थकों तथा खोंड नेतृत्व का उद्देश्य ब्रिटिश हस्तक्षेप का विरोध और स्थानीय राजसत्ता की रक्षा था। धनंजय की मृत्यु के बाद भी संघर्ष समाप्त नहीं हुआ।
ब्रिटिश सेना ने विद्रोह दबाने के लिए व्यापक सैन्य अभियान चलाया। गांवों पर कार्रवाई हुई, संदिग्ध विद्रोहियों को गिरफ्तार किया गया और प्रतिरोध के स्थानीय नेटवर्क तोड़ने का प्रयास किया गया।
कुछ विवरणों के अनुसार अनेक विद्रोही मारे गए अथवा पेड़ों पर फांसी दी गई। औपनिवेशिक सैन्य कार्रवाई का उद्देश्य केवल तत्काल विद्रोह को समाप्त करना नहीं बल्कि भविष्य में खोंड प्रतिरोध की क्षमता को नष्ट करना भी था।
1837 : डोरा बिसोई की गिरफ्तारी और निर्णायक नेतृत्व परिवर्तन
उन्हें सामान्य अपराधी की तरह स्थानीय जेल में रखने के बजाय दूर दक्षिण भारत में ऊटकमंड—ऊटी के निकट राज्य-बंदी बनाया गया।
वे वहीं कैद रहे और 1846 में उनकी मृत्यु हुई।
ब्रिटिश अधिकारियों को लगा कि मुख्य नेता की गिरफ्तारी से घुमुसर का प्रतिरोध समाप्त हो जाएगा।
डोरा बिसोई की जगह उनके भतीजे चक्र बिसोई ने ले ली।
यहीं से खोंड प्रतिरोध का दूसरा और कहीं अधिक लंबा चरण प्रारंभ होता है।
चक्र बिसोई : जंगलों में विकसित हुआ गुरिल्ला नेतृत्व
चक्र बिसोई के पिता राम सिंह बख्शी 1837 में ब्रिटिश सैनिकों के हाथों मारे गए बताए जाते हैं। डोरा बिसोई से चक्र ने राजनीतिक प्रेरणा और सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किया था।
इस व्यक्तिगत और पारिवारिक अनुभव ने ब्रिटिश शासन के प्रति उनके विरोध को और गहरा किया।
चक्र बिसोई की सबसे बड़ी शक्ति किसी स्थायी सेना की कमान नहीं थी।
खोंड मुठाओं के बीच संपर्क, स्थानीय मुखियाओं का सहयोग, दुर्गम जंगल, एक स्थान से दूसरे स्थान पर तेजी से जाने की क्षमता और ब्रिटिश प्रशासन के विरुद्ध व्यापक अविश्वास।
इसी कारण लगभग दो दशक के अभियानों के बावजूद अंग्रेज उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सके।
मेरिया प्रश्न और औपनिवेशिक हस्तक्षेप
ब्रिटिश शासन और ‘मेरिया’ प्रश्न
खोंड समाज की कुछ इकाइयों में पृथ्वी तथा उर्वरता से जुड़े धार्मिक अनुष्ठानों में मेरिया मानव-बलि की परंपरा का उल्लेख औपनिवेशिक अभिलेखों में मिलता है।
ब्रिटिश अधिकारियों ने इसे समाप्त करना अपनी नीति का प्रमुख उद्देश्य बनाया।
औपनिवेशिक अधिकारियों के विवरण लंबे समय तक खोंड समाज के बारे में इतिहासलेखन का प्रमुख स्रोत बने रहे। इसलिए उनके द्वारा प्रस्तुत संख्या, व्यापकता और धार्मिक व्याख्या को आधुनिक इतिहासलेखन पूर्णतः निष्पक्ष वर्णन नहीं मानता।
हाल के अध्ययनों में यह भी रेखांकित किया गया है कि मेरिया व्यवस्था स्थानीय राजनीतिक, सामाजिक और आश्रित श्रम संबंधों से जुड़ी हुई थी और उसका स्वरूप ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा प्रस्तुत सरल ‘बर्बर धार्मिक प्रथा’ की छवि से अधिक जटिल था।
फिर भी इतना स्पष्ट है कि ब्रिटिश सरकार द्वारा मेरिया प्रथा को समाप्त करने का अभियान खोंड क्षेत्रों में सत्ता के प्रत्यक्ष प्रवेश का महत्वपूर्ण माध्यम बना।
मैकफर्सन और मेरिया उन्मूलन अभियान
ब्रिटिश अधिकारी सैमुअल चार्टर्स मैकफर्सन खोंड क्षेत्रों के अध्ययन और मेरिया प्रथा के दमन से विशेष रूप से जुड़े।
मैकफर्सन केवल सैन्य अधिकारी नहीं थे। उन्होंने खोंड धर्म, सामाजिक व्यवस्था और रीति-रिवाजों का विस्तृत अध्ययन किया। उनके विवरण बाद में रॉयल एशियाटिक सोसायटी में प्रकाशित हुए और औपनिवेशिक नृविज्ञान के महत्वपूर्ण स्रोत बने।
ब्रिटिश नीति का घोषित उद्देश्य मानव-बलि समाप्त करना था।
लेकिन खोंडों के दृष्टिकोण से समस्या दूसरी थी।
सरकार अब उनके धार्मिक जीवन के भीतर प्रवेश कर रही थी, लोगों को मुक्त करा रही थी, मुखियाओं से जवाब मांग रही थी और ऐसे क्षेत्रों में प्रशासनिक अधिकार स्थापित कर रही थी जहां पहले उसका प्रभाव सीमित था।
इससे सुधार और साम्राज्य-विस्तार की सीमाएं एक-दूसरे में मिल गईं।
मेरिया-विरोध से औपनिवेशिक सत्ता-विरोध तक
चक्र बिसोई ने ब्रिटिश मेरिया-विरोधी अभियान को राजनीतिक प्रतिरोध से जोड़ दिया।
उन्होंने खोंड समुदायों में यह धारणा मजबूत की कि आज सरकार मेरिया में हस्तक्षेप कर रही है, कल वह उनकी जमीन मापेगी, कर लगाएगी, बेगार लेगी और उनके मुखियाओं को दंडित करेगी।
1846 के ब्रिटिश विवरणों में भी ऐसी आशंकाओं का उल्लेख मिलता है कि खोंडों में यह प्रचार था कि सरकार उनकी भूमि का बंदोबस्त करेगी, उनसे जबरन श्रम कराएगी और पुराने बलिदानों के लिए नेताओं को दंडित करेगी।
इसलिए धार्मिक स्वतंत्रता का प्रश्न धीरे-धीरे राजनीतिक स्वायत्तता और भूमि-अधिकार से जुड़ गया।
1846 का दूसरा विस्फोट और व्यापक दमन
विद्रोह का दूसरा विस्फोट : 1846
1846 खोंड प्रतिरोध का निर्णायक वर्ष बना।
इसी वर्ष डोरा बिसोई की कैद में मृत्यु हुई। दूसरी ओर चक्र बिसोई का प्रभाव तेजी से बढ़ा।
फरवरी 1846 में मैकफर्सन ने बड़ी संख्या में संभावित मेरिया पीड़ितों को अपने नियंत्रण में लिया। एक ओडिशा सरकारी ऐतिहासिक विवरण में संख्या लगभग 170 बताई गई है।
इसके बाद खोंडों ने मैकफर्सन से संपर्क तोड़ना शुरू किया।
स्थानीय नेताओं ने समुदायों को संगठित किया।
चक्र बिसोई अब केवल घुमुसर के भगोड़े विद्रोही नेता नहीं रहे; वे ब्रिटिश हस्तक्षेप के विरुद्ध व्यापक खोंड प्रतिरोध के प्रतीक बन गए।
बीरा खानरो की गिरफ्तारी और बौध–कंधमाल
बौध-कंधमाल क्षेत्र के प्रभावशाली खोंड नेता नबघना खानरो/कन्हर और उनके परिवार की भूमिका महत्वपूर्ण थी।
मैकफर्सन द्वारा नबघना के पुत्र बीरा खानरो को मेरिया प्रथा से संबंधित मामले में गिरफ्तार किए जाने से तनाव और बढ़ा।
चक्र बिसोई ने इस घटना का उपयोग खोंडों को संगठित करने में किया।
घुमुसर और बौध-कंधमाल के अलग-अलग प्रतिरोध केंद्र अब एक व्यापक औपनिवेशिक-विरोधी नेटवर्क में जुड़ने लगे।
बिसीपाड़ा में टकराव
1846 के संघर्ष की महत्वपूर्ण घटनाओं में बिसीपाड़ा, फूलबनी से लगभग छह मील दक्षिण, की घटना थी।
बड़ी संख्या में खोंड मैकफर्सन के शिविर के सामने एकत्र हुए।
उन्होंने मेरिया व्यक्तियों को वापस करने की मांग की और आश्वासन दिया कि उनकी जान नहीं ली जाएगी।
परिस्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि मैकफर्सन को दबाव के सामने झुकना पड़ा।
इस सफलता से विद्रोहियों का मनोबल बढ़ा।
इसके बाद उसके शिविर को दोबारा चुनौती दी गई।
ब्रिटिश प्रशासन के लिए यह केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं रही; अब सरकारी अधिकारी की प्रतिष्ठा और राज्य की संप्रभुता सीधे चुनौती के सामने थीं।
गांव जलाने की नीति और विद्रोह का विस्तार
वर्षा ऋतु के बाद नवंबर 1846 में मैकफर्सन सेना के साथ पुनः क्षेत्र में गया।
मार्ग में कुछ खोंड गांवों को जला दिया गया।
इस दमनकारी कार्रवाई का उलटा प्रभाव पड़ा।
बौध क्षेत्र के वे खोंड भी आंदोलन में शामिल होने लगे जो पहले सीधे संघर्ष में सक्रिय नहीं थे।
इस प्रकार जिस सैन्य कार्रवाई से विद्रोह सीमित करने की आशा थी, उसने उसका भौगोलिक विस्तार कर दिया।
यह खोंड विद्रोह के इतिहास का महत्वपूर्ण मोड़ था—दमन स्वयं विद्रोह के विस्तार का कारण बन गया।
दिसंबर 1846 : घुमुसर में व्यापक विद्रोह
दिसंबर 1846 में चक्र बिसोई के नेतृत्व में घुमुसर क्षेत्र में व्यापक विद्रोह भड़क उठा।
चक्र बिसोई और उनके समर्थकों का राजनीतिक लक्ष्य अब अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।
वे भंज परिवार की सत्ता पुनर्स्थापित करना चाहते थे।
विद्रोहियों ने कुलाड़ क्षेत्र की ओर बढ़कर दिवंगत धनंजय भंज के लगभग बारह वर्षीय अवैध पुत्र पीतांबर भंज—जिसे स्रोतों में ‘राजापिला’ भी कहा गया—को घुमुसर का राजा घोषित अथवा सिंहासन पर बैठाने का प्रयास किया।
इससे सिद्ध होता है कि आंदोलन केवल धार्मिक रीति बचाने का संघर्ष नहीं था।
विद्रोही औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध वैकल्पिक वैध राजसत्ता स्थापित करने की कोशिश कर रहे थे।
राजापिला, अंगुल और ब्रिटिश नीति-परिवर्तन
‘राजापिला’ और राजनीतिक वैधता का प्रश्न
पीतांबर भंज को आगे करने की रणनीति से चक्र बिसोई ने प्रतिरोध को राजवंशीय वैधता प्रदान करने की कोशिश की।
औपनिवेशिक शासन ने घुमुसर पर जिस अधिकार का दावा किया था, उसके विरुद्ध विद्रोही यह स्थापित कर रहे थे कि वास्तविक वैधता भंज राजवंश की है।
इसलिए आंदोलन में तीन स्तर एक साथ दिखाई देते हैं
और ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की अस्वीकृति।
यही कारण है कि खोंड विद्रोह को केवल ‘आदिवासी अशांति’ कहना उसके राजनीतिक अर्थ को बहुत छोटा कर देता है।
चक्र बिसोई का अंगुल से संपर्क
चक्र बिसोई ने संघर्ष को अकेले घुमुसर तक सीमित नहीं रखा।
उन्होंने अपने भतीजे अतुंग बिसोई को अंगुल के राजा सोमनाथ सिंह के पास हथियार और गोला-बारूद प्राप्त करने के लिए भेजा।
बदले में चक्र बिसोई ने अंग्रेजों के विरुद्ध अंगुल के संघर्ष में सहायता देने का आश्वासन दिया।
यह घटना आंदोलन के राजनीतिक नेटवर्क को स्पष्ट करती है।
ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध असंतुष्ट आदिवासी नेता, स्थानीय राजा, जमींदार और पारंपरिक सत्ता-समूह एक-दूसरे से संपर्क स्थापित कर रहे थे।
अंगुल के राजा सोमनाथ सिंह की भूमिका
अंगुल के राजा सोमनाथ सिंह पहले से ब्रिटिश अधिकारियों के संदेह के घेरे में थे।
1836–37 के दौरान उन पर खोंड नेताओं को आश्रय देने तथा अंग्रेज अधिकारियों के निर्देशों का पालन न करने के आरोप लगे।
1846 के बाद ब्रिटिश सरकार को उनका चक्र बिसोई से संबंध अधिक खतरनाक दिखाई देने लगा।
अंगुल यदि चक्र बिसोई का सुरक्षित राजनीतिक-सैन्य आधार बन जाता तो खोंड प्रतिरोध और व्यापक हो सकता था।
इसलिए ब्रिटिश सरकार ने अंततः अंगुल के प्रश्न को केवल स्थानीय राजा के अनुशासन का मामला न मानकर क्षेत्रीय सुरक्षा का प्रश्न समझा।
मेजर जनरल डाइस का अभियान
1846–47 की स्थिति गंभीर होने पर मद्रास सरकार ने मेजर जनरल डाइस को विद्रोह नियंत्रित करने भेजा।
सैन्य बल का व्यापक प्रयोग किया गया।
लेकिन इस चरण की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ब्रिटिश प्रशासन के भीतर ही मैकफर्सन की नीति पर प्रश्न उठने लगे।
डाइस ने मैकफर्सन और उसके अधीन अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर आपत्तियां व्यक्त कीं।
गांव जलाना, अनाज नष्ट करना, संपत्ति बर्बाद करना और अत्यधिक बल प्रयोग जैसी कार्रवाइयों को विद्रोह बढ़ने के कारणों में गिना गया।
अर्थात ब्रिटिश शासन के भीतर यह स्वीकार किया जाने लगा कि समस्या केवल चक्र बिसोई के ‘उकसावे’ से पैदा नहीं हुई थी।
औपनिवेशिक प्रशासन की अपनी दमनकारी कार्यप्रणाली ने भी विद्रोह को जन्म दिया और फैलाया था।
ब्रिटिश सरकार का महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय : दमन से समझाइश की ओर
इस अनुभव के बाद भारत सरकार ने महत्वपूर्ण नीति परिवर्तन किया।
सरकारी सचिव जी. एच. बुशबी ने स्पष्ट किया कि लक्ष्य खोंडों को मानव-बलि छोड़ने के लिए धीरे-धीरे समझाइश और मेल-मिलाप से तैयार करना होना चाहिए, न कि अंधाधुंध बल प्रयोग से।
यह खोंड प्रतिरोध की एक बड़ी अप्रत्यक्ष उपलब्धि थी।
ब्रिटिश सरकार को अपनी रणनीति बदलनी पड़ी।
औपनिवेशिक शासन मेरिया समाप्त करने के उद्देश्य से पीछे नहीं हटा, लेकिन उसने यह स्वीकार किया कि केवल सैन्य आतंक से पहाड़ी समाज को नियंत्रित नहीं किया जा सकता।
कैंपबेल, चकापाद और छापामार युद्ध
अप्रैल 1847 : मैकफर्सन की जगह कैंपबेल
अप्रैल 1847 के अंत तक लेफ्टिनेंट कर्नल जॉन कैंपबेल को मेरिया एजेंसी की जिम्मेदारी दी गई और मैकफर्सन को हटा दिया गया।
कैंपबेल ने अपेक्षाकृत समझौतावादी और समझाइश आधारित नीति अपनाई।
नबघना खानरो जैसे कुछ नेताओं को क्षमा दी गई।
मेरिया पीड़ितों को मुक्त कराने का अभियान जारी रहा, लेकिन प्रशासन ने स्थानीय मुखियाओं को अपने पक्ष में करने, विश्वास पैदा करने और सैन्य दमन की तीव्रता कम करने का प्रयास किया।
यह औपनिवेशिक नीति का रणनीतिक परिवर्तन था
चक्र बिसोई ने समझौता क्यों नहीं किया?
कुछ नेताओं ने कैंपबेल की नई नीति स्वीकार कर ली, लेकिन चक्र बिसोई ने संघर्ष नहीं छोड़ा।
उनके लिए प्रश्न अब मेरिया तक सीमित नहीं था।
घुमुसर पर ब्रिटिश अधिकार, भंज राजसत्ता का अंत, पारंपरिक स्थानीय अधिकारों में हस्तक्षेप और औपनिवेशिक प्रशासन की स्थापना मूल राजनीतिक प्रश्न बन चुके थे।
ब्रिटिश सरकार ने उन्हें क्षमा अथवा आत्मसमर्पण के अवसर दिए, लेकिन उपलब्ध ओडिशा ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया।
1848 : अंगुल पर ब्रिटिश कार्रवाई
ब्रिटिश सरकार को विश्वास था कि अंगुल के राजा सोमनाथ सिंह चक्र बिसोई को समर्थन दे रहे हैं।
1848 में ब्रिटिश सेना अंगुल भेजी गई।
सोमनाथ सिंह को सत्ता से हटा दिया गया और अंगुल को ब्रिटिश प्रशासन के अधीन ले लिया गया।
चक्र बिसोई के एक संभावित आश्रय और आपूर्ति केंद्र को समाप्त करना तथा अन्य स्थानीय शासकों को चेतावनी देना कि खोंड विद्रोहियों की सहायता करने की राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ेगी।
इससे विद्रोह की खुली राजकीय सहायता कमजोर हुई, लेकिन चक्र बिसोई पकड़े नहीं गए।
चकापाद : प्रतिरोध का नया केंद्र
अंगुल पर कार्रवाई और घुमुसर में दबाव बढ़ने के बाद विद्रोहियों ने अपने आधार बदलते रहे।
चकापाद क्षेत्र चक्र बिसोई और उनके समर्थकों के महत्वपूर्ण केंद्रों में उभरा।
स्थायी राजधानी अथवा सैन्य मुख्यालय के बजाय आंदोलन ने एक गतिशील नेटवर्क का रूप ले लिया।
किसी एक स्थान की रक्षा में अपनी शक्ति नष्ट न करना,
समर्थक मुखियाओं से संपर्क बनाए रखना,
और अवसर मिलने पर ब्रिटिश सत्ता पर दबाव बनाना।
गुरिल्ला युद्ध : ब्रिटिश सेना क्यों विफल होती रही?
खोंडों के पास आधुनिक तोपखाना अथवा बड़ी नियमित सेना नहीं थी।
इसके बावजूद ब्रिटिश शासन उन्हें लंबे समय तक नियंत्रित नहीं कर पाया।
दुर्गम पर्वतीय भूगोल, घने जंगल, सीमित सड़कें, स्थानीय जल और भोजन स्रोतों की जानकारी, गांवों के बीच सामाजिक संपर्क तथा विद्रोहियों की असाधारण गतिशीलता।
ब्रिटिश सैनिकों को लंबी आपूर्ति शृंखला पर निर्भर रहना पड़ता था।
विद्रोही किसी निर्णायक खुले युद्ध से बच सकते थे।
इसलिए अंग्रेज किसी गांव को जीत सकते थे, लेकिन पूरे सामाजिक भूगोल को स्थायी रूप से नियंत्रित करना कहीं अधिक कठिन था।
सामाजिक आधार, भूमि, बेगार और धर्म
विद्रोह का सामाजिक आधार
खोंड विद्रोह की एक विशेषता यह थी कि उसका सामाजिक आधार केवल एक नेता अथवा एक मुठा तक सीमित नहीं रहा।
और औपनिवेशिक विस्तार से असंतुष्ट दूसरे समुदाय समय-समय पर इसके नेटवर्क से जुड़े।
हालांकि यह आधुनिक अर्थ में केंद्रीकृत संगठन नहीं था।
इसी कारण विद्रोह को पूरी तरह समाप्त करना कठिन था, लेकिन इसी विकेंद्रीकरण ने उसे एक संयुक्त राजनीतिक कार्यक्रम विकसित करने से भी रोका।
भूमि और राजस्व का प्रश्न
ब्रिटिश शासन का मूल आधार राजस्व था।
जहां औपनिवेशिक सत्ता पहुंचती, वहां भूमि की पहचान, प्रशासनिक सीमांकन, राजस्व दायित्व और अधिकारियों की जवाबदेही की नई प्रणाली भी पहुंचती।
खोंड समाज में इससे यह भय पैदा हुआ कि सामुदायिक भूमि पर बाहरी सरकार का अधिकार स्थापित होगा।
1846 के विद्रोह में यह आशंका स्पष्ट रूप से सामने आई कि सरकार भूमि का आकलन करेगी और लोगों पर नए दायित्व लगाएगी।
इसलिए खोंड प्रतिरोध को भारतीय किसान आंदोलनों के इतिहास में रखते समय भूमि-संप्रभुता को केंद्रीय स्थान देना चाहिए।
यह केवल लगान की दर घटाने का आंदोलन नहीं था।
भूमि पर अंतिम अधिकार किसका है—समुदाय का या औपनिवेशिक राज्य का?
बेगार और प्रशासनिक नियंत्रण का भय
खोंडों के बीच यह आशंका भी फैली कि नई सरकार उनसे जबरन श्रम कराएगी।
औपनिवेशिक शासन में सड़क निर्माण, सैनिक आपूर्ति, सामान ढुलाई और प्रशासनिक आवश्यकताओं के लिए स्थानीय श्रम की मांग पहाड़ी समुदायों के लिए गंभीर चिंता थी।
इसलिए भूमि, श्रम और प्रशासन तीन अलग-अलग मुद्दे नहीं थे।
वे एक ही औपनिवेशिक परिवर्तन के अंग थे।
मिशनरी और धार्मिक हस्तक्षेप की आशंका
उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटिश शासन के साथ ईसाई मिशनरियों की गतिविधियां बढ़ने से अनेक आदिवासी क्षेत्रों में यह आशंका पैदा हुई कि सरकार केवल प्रशासन नहीं बल्कि उनकी धार्मिक-सांस्कृतिक व्यवस्था भी बदलना चाहती है।
हर स्थान पर मिशनरी गतिविधि विद्रोह का प्रत्यक्ष कारण नहीं थी, किंतु औपनिवेशिक सत्ता और सांस्कृतिक हस्तक्षेप के बीच अंतर स्थानीय समाज के लिए हमेशा स्पष्ट नहीं था।
मेरिया-विरोधी अभियान ने इस भय को और मजबूत किया।
क्या खोंड मेरिया प्रथा बचाने के लिए ही लड़ रहे थे?
यह इस इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
मेरिया का प्रश्न वास्तविक था और चक्र बिसोई ने उसका राजनीतिक उपयोग भी किया।
लेकिन आंदोलन के अन्य लक्ष्य भी स्पष्ट हैं
घुमुसर की भंज सत्ता की पुनर्स्थापना,
ब्रिटिश प्रशासनिक हस्तक्षेप का विरोध,
स्थानीय मुखियाओं की सत्ता की रक्षा,
भूमि और श्रम पर बाहरी नियंत्रण का प्रतिरोध,
आदिवासी सामाजिक-सांस्कृतिक स्वायत्तता,
और औपनिवेशिक राजनीतिक प्रभुत्व की अस्वीकृति।
यदि आंदोलन केवल मेरिया की रक्षा का होता तो ब्रिटिश नीति में नरमी आने के बाद समाप्त हो जाना चाहिए था।
कालाहांडी से पारलाखेमुंडी और चक्र बिसोई का रहस्य
कालाहांडी की ओर विस्तार
ब्रिटिश दबाव बढ़ने पर चक्र बिसोई का नेटवर्क पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम की ओर भी फैला।
कालाहांडी के कुछ स्थानीय शासक और जमींदार उनके संपर्क में आए।
मदनपुर के जमींदार ने उन्हें सहायता दी।
कालाहांडी में खोंड विद्रोहियों ने ब्रिटिश अधिकारी लेफ्टिनेंट मैकनील, जो ओडिशा के पहाड़ी क्षेत्रों से संबंधित एजेंसी से जुड़ा था, के शिविर पर ओरला-धोनी नामक जंगल क्षेत्र में हमला किया।
स्थिति इतनी गंभीर हुई कि मैकनील संकट में पड़ गया।
कंधमाल के तहसीलदार दीनबंधु पटनायक सशस्त्र सिबंदियों के साथ सहायता के लिए पहुंचे और ब्रिटिश अधिकारी को बचाया।
यह घटना बताती है कि 1850 के दशक तक प्रतिरोध समाप्त नहीं हुआ था।
पटना राज्य और आठगांव
कालाहांडी से चक्र बिसोई पटना राज्य की ओर गए।
वहां आठगांव के जमींदार धर्मसिंह मांधाता ने उन्हें आश्रय दिया।
यह समर्थन ब्रिटिश सरकार के लिए अत्यंत गंभीर था।
अब चक्र बिसोई को पकड़ने की कार्रवाई केवल जंगलों में सैन्य खोज तक सीमित नहीं रही; उनके समर्थक जमींदारों और आश्रयदाताओं पर भी दबाव डाला जाने लगा।
मार्च 1856 : चक्र बिसोई को पकड़ने का बड़ा प्रयास
मार्च 1856 में ब्रिटिश प्रशासन ने आठगांव में चक्र बिसोई को पकड़ने का अभियान चलाया।
लेफ्टिनेंट मैकडोनाल्ड, मेरिया एजेंट का सहायक, सैनिकों तथा दीनबंधु पटनायक के नेतृत्व वाले सिबंदियों को लेकर वहां पहुंचा।
लेकिन एक बार फिर चक्र बिसोई गिरफ्तारी से बच निकले।
उनके प्रमुख सहयोगी भीतर सरदार भोरी पकड़े गए।
धर्मसिंह मांधाता ने ब्रिटिश सैनिकों का सशस्त्र विरोध करने की कोशिश की और उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया।
बाद में धर्मसिंह की जेल में मृत्यु हुई।
पारलाखेमुंडी की ओर चक्र बिसोई
1856 की कार्रवाई के बाद चक्र बिसोई जंगलों के रास्ते निकल गए।
ओडिशा के सरकारी ऐतिहासिक विवरण के अनुसार वे आगे पारलाखेमुंडी क्षेत्र की ओर गए और वहां सवरा/सौरा प्रतिरोध से जुड़े।
इसके बाद उनके जीवन के बारे में प्रमाणित जानकारी बहुत कम हो जाती है।
यही कारण है कि 1856 को खोंड विद्रोह के मुख्य चरण का अंतिम वर्ष माना जाता है।
यह कहना अधिक सटीक होगा कि 1856 में संगठित चक्र बिसोई-नेतृत्व वाला मुख्य खोंड प्रतिरोध इतिहास के अभिलेखों से ओझल होने लगता है, न कि यह कि किसी एक निर्णायक युद्ध में अंग्रेजों ने उसे पूरी तरह नष्ट कर दिया।
चक्र बिसोई का अंत : इतिहास की अनसुलझी पहेली
चक्र बिसोई अंग्रेजों के हाथ नहीं लगे।
उनकी गिरफ्तारी के लिए अनेक प्रयास किए गए।
क्षमा और आत्मसमर्पण के प्रस्तावों के बावजूद उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया—ऐसा ओडिशा के कई ऐतिहासिक विवरणों में दर्ज है।
1856 के बाद उनके अंतिम जीवन को लेकर अलग-अलग किंवदंतियां मिलती हैं।
इसलिए उनके निधन की निश्चित तिथि अथवा स्थान को बिना पुष्ट प्रमाण के प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
उनका ब्रिटिश अभिलेखों से गायब हो जाना ही उनकी ऐतिहासिक छवि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया
लगभग दो दशकों तक पीछा करने के बावजूद औपनिवेशिक शासन अपने प्रमुख शत्रु को जीवित गिरफ्तार नहीं कर सका।
ब्रिटिश निर्णय, मेरिया उन्मूलन और औपनिवेशिक नृविज्ञान
ब्रिटिश सरकार के प्रमुख निर्णय
खोंड प्रतिरोध के दौरान ब्रिटिश नीति कई चरणों से गुजरी।
पहला निर्णय था घुमुसर की राजनीतिक स्वायत्तता समाप्त कर उस पर नियंत्रण स्थापित करना।
दूसरा था विद्रोह को सैन्य शक्ति से कुचलना।
तीसरा था मेरिया प्रथा समाप्त करने के लिए विशेष प्रशासनिक हस्तक्षेप।
चौथा था मैकफर्सन के नेतृत्व में प्रत्यक्ष और कठोर अभियान।
पांचवां—और अत्यंत महत्वपूर्ण—था 1846–47 के अनुभव के बाद अत्यधिक दमन से पीछे हटना।
छठा था अप्रैल 1847 में कैंपबेल को मेरिया एजेंट बनाकर समझाइश और सहयोग की नीति अपनाना।
सातवां था विद्रोहियों को सहयोग देने वाली रियासतों और जमींदारों पर दबाव बढ़ाना।
आठवां था 1848 में अंगुल के राजा को हटाकर वहां प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित करना।
नौवां था चक्र बिसोई को अलग-थलग करने के लिए उनके आश्रयदाताओं और सहयोगियों पर कार्रवाई।
और अंतिम चरण में 1850 के दशक में कालाहांडी, पटना और आसपास के क्षेत्रों तक पीछा करके विद्रोही नेटवर्क तोड़ने की नीति अपनाई गई।
मेरिया प्रथा का अंत : उपलब्धि और विवाद
ब्रिटिश प्रशासन ने अंततः खोंड क्षेत्रों में मानव-बलि की प्रथा को बड़े पैमाने पर समाप्त कराया।
मानव-बलि का अंत निस्संदेह मानवीय दृष्टि से महत्वपूर्ण परिवर्तन था।
क्या किसी अमानवीय प्रथा को समाप्त करने का नैतिक उद्देश्य औपनिवेशिक राजनीतिक अधीनता को भी न्यायोचित बना देता है?
ब्रिटिश शासन ने एक ओर मानव-बलि रोकने का कार्य किया; दूसरी ओर इसी प्रक्रिया में उसने खोंड समाज की राजनीतिक स्वायत्तता, स्थानीय सत्ता-संरचनाओं और पहाड़ी क्षेत्रों पर अपने राज्य का विस्तार भी किया।
आधुनिक शोध इसी द्वंद्व को रेखांकित करता है।
ब्रिटिश नृविज्ञान और खोंड समाज
खोंड अभियान का एक अप्रत्याशित परिणाम यह भी हुआ कि ब्रिटिश अधिकारियों ने खोंड समाज का विस्तृत अध्ययन शुरू किया।
मैकफर्सन जैसे अधिकारियों ने धर्म, देवी-देवताओं, कृषि, बलि, सामाजिक संगठन और राजनीतिक संरचना के बारे में लेख लिखे।
1852 में खोंड धर्म पर मैकफर्सन का महत्वपूर्ण अध्ययन प्रकाशित हुआ।
लेकिन इन स्रोतों का उपयोग सावधानी से करना चाहिए।
लेखक स्वयं औपनिवेशिक सत्ता के अधिकारी थे।
वे जिस समाज का अध्ययन कर रहे थे, उसी समाज को नियंत्रित करने की सरकारी परियोजना का हिस्सा भी थे।
इसलिए खोंड इतिहास के लिए औपनिवेशिक अभिलेख अपरिहार्य भी हैं और आलोचनात्मक परीक्षण के विषय भी।
स्वायत्तता, सीमाएं और भारतीय प्रतिरोध की ऐतिहासिक कड़ी
आंदोलन की सबसे बड़ी शक्ति : स्थानीय स्वायत्तता
खोंड विद्रोह के लंबे जीवन का मुख्य कारण उसकी सामाजिक जड़ें थीं।
चक्र बिसोई को कोई राजधानी नहीं चाहिए थी।
फिर भी आंदोलन वर्षों तक जीवित रहा क्योंकि उसकी शक्ति गांवों, मुठाओं, जंगलों और स्थानीय संबंधों में थी।
ब्रिटिश शासन किसी राजा को पदच्युत कर सकता था, लेकिन पहाड़ी समाज की पूरी संरचना को एक आदेश से समाप्त नहीं कर सकता था।
आंदोलन की सीमाएं
इतने लंबे संघर्ष के बावजूद खोंड विद्रोह ब्रिटिश सत्ता को क्षेत्र से बाहर नहीं कर सका।
कोई अखिल भारतीय अथवा व्यापक प्रांतीय राजनीतिक संगठन नहीं था।
विभिन्न खोंड समूहों के हित हमेशा समान नहीं थे।
कुछ स्थानीय प्रमुख ब्रिटिश सरकार से समझौता करते गए।
मेरिया प्रथा जैसे प्रश्न ने आंदोलन की नैतिक स्थिति को जटिल बनाया।
स्थानीय राजाओं और जमींदारों का समर्थन भी स्थायी नहीं था।
ब्रिटिश सरकार ने सैन्य दमन के साथ समझौता, क्षमा, प्रशासनिक सुधार और सहयोगी स्थानीय नेतृत्व तैयार करने की रणनीति अपनाई।
यह संयोजन अंततः विद्रोही नेटवर्क को कमजोर करने में सैन्य शक्ति से अधिक प्रभावी सिद्ध हुआ।
क्या यह किसान आंदोलन भी था?
खोंड विद्रोह को सामान्यतः ‘आदिवासी विद्रोह’ की श्रेणी में रखा जाता है।
लेकिन भारतीय किसान आंदोलनों के इतिहास में भी उसका महत्वपूर्ण स्थान है।
खोंड समाज की अर्थव्यवस्था भूमि, कृषि और वन पर आधारित थी।
भूमि केवल निजी संपत्ति नहीं बल्कि सामुदायिक जीवन और राजनीतिक स्वायत्तता का आधार थी।
इसलिए जब औपनिवेशिक सरकार ने भूमि, राजस्व और प्रशासन पर अधिकार बढ़ाया, तब प्रतिरोध का प्रश्न स्वाभाविक रूप से कृषि-अधिकार से जुड़ गया।
इसी अर्थ में खोंड विद्रोह आदिवासी-कृषक प्रतिरोध था।
यह बाद के संथाल हूल और मुंडा उलगुलान की तरह उस मूल प्रश्न को सामने रखता है
चुआड़, कोल, खोंड और संथाल : एक ऐतिहासिक श्रृंखला
खोंड विद्रोह को अकेले देखने से उसका महत्व कम दिखाई देता है।
इन आंदोलनों की परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन एक साझा संरचनात्मक प्रश्न बार-बार सामने आया
औपनिवेशिक राज्य जंगल, जमीन, राजस्व और स्थानीय सत्ता-संबंधों को अपनी प्रशासनिक व्यवस्था में शामिल कर रहा था।
आदिवासी समाज इसे केवल शासन परिवर्तन नहीं बल्कि अपनी जीवन-व्यवस्था पर नियंत्रण खोने के रूप में अनुभव कर रहा था।
खोंड विद्रोह और 1857 की पूर्वपीठिका
1856 तक खोंड क्षेत्रों में चक्र बिसोई का प्रतिरोध सक्रिय था।
अगले ही वर्ष उत्तर और मध्य भारत में 1857 का महान विद्रोह शुरू हुआ।
दोनों आंदोलनों को सीधे एक संगठनात्मक श्रृंखला मानना उचित नहीं होगा।
लेकिन एक व्यापक ऐतिहासिक निरंतरता अवश्य थी।
1830 से 1850 के दशकों के बीच भारत के अनेक क्षेत्रों में स्थानीय समाज ब्रिटिश राज्य की बढ़ती राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक शक्ति का प्रतिरोध कर रहे थे।
खोंड विद्रोह इसी व्यापक औपनिवेशिक-विरोधी असंतोष की महत्वपूर्ण कड़ी था।
1835–1856 की विस्तृत समयरेखा
विस्तृत समयरेखा : 1835–1856
1835
घुमुसर में ब्रिटिश हस्तक्षेप और भंज राजसत्ता के प्रश्न पर असंतोष तीव्र हुआ। डोरा बिसोई के नेतृत्व में खोंड प्रतिरोध संगठित होने लगा।
31 दिसंबर 1835
धनंजय भंज की मृत्यु। इसके बाद घुमुसर पर ब्रिटिश नियंत्रण मजबूत हुआ।
1836
डोरा बिसोई के नेतृत्व में प्रतिरोध जारी। ब्रिटिश सैन्य अभियान तेज।
1836–37
अंगुल के राजा सोमनाथ सिंह पर खोंड नेताओं को संरक्षण देने का संदेह।
1837
डोरा बिसोई गिरफ्तार। ऊटी में राज्य-बंदी बनाए गए। चक्र बिसोई ने नेतृत्व संभाला। उनके पिता राम सिंह बख्शी भी इसी समय ब्रिटिश सैनिकों के हाथों मारे गए बताए जाते हैं।
1837–45
चक्र बिसोई जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों से नेटवर्क पुनर्गठित करते रहे। ब्रिटिश सरकार ने मेरिया प्रथा समाप्त करने के लिए हस्तक्षेप बढ़ाया।
1846
फरवरी 1846
मैकफर्सन द्वारा लगभग 170 संभावित मेरिया पीड़ितों को मुक्त अथवा अपने नियंत्रण में लेने की कार्रवाई। खोंड नेतृत्व ने इसका तीखा विरोध किया।
1846
बीरा खानरो की गिरफ्तारी के बाद बौध-कंधमाल में असंतोष बढ़ा।
1846
बिसीपाड़ा में खोंडों का मैकफर्सन के शिविर के सामने प्रदर्शन और मेरिया व्यक्तियों को वापस करने की मांग।
नवंबर 1846
मैकफर्सन की सैन्य वापसी; कुछ खोंड गांव जलाए गए। बौध क्षेत्र के खोंडों की व्यापक भागीदारी बढ़ी।
दिसंबर 1846
घुमुसर में व्यापक विद्रोह। चक्र बिसोई के समर्थकों ने पीतांबर भंज ‘राजापिला’ को राजसत्ता के दावेदार के रूप में आगे किया।
1846–47
मेजर जनरल डाइस का सैन्य अभियान। मैकफर्सन की कठोर नीति की आलोचना।
अप्रैल 1847
कैंपबेल मेरिया एजेंट नियुक्त। दमन के स्थान पर समझाइश और सहयोग पर अधिक जोर।
1847–48
चक्र बिसोई ने आत्मसमर्पण नहीं किया। चकापाद सहित विभिन्न पहाड़ी क्षेत्रों से गतिविधियां जारी रखीं।
1848
अंगुल के राजा सोमनाथ सिंह पर विद्रोहियों को सहायता देने का आरोप। ब्रिटिश सैन्य कार्रवाई; राजा पदच्युत और अंगुल प्रत्यक्ष प्रशासन के अधीन।
1848–55
चक्र बिसोई विभिन्न पहाड़ी रियासतों और स्थानीय समर्थकों की सहायता से गुरिल्ला प्रतिरोध जारी रखते रहे। आंदोलन घुमुसर से बाहर कालाहांडी और पटना की दिशा में भी फैलता गया।
कालाहांडी चरण
ओरला-धोनी में खोंडों ने लेफ्टिनेंट मैकनील के शिविर पर हमला किया। दीनबंधु पटनायक के सिबंदियों ने उसकी सहायता की।
पटना चरण
आठगांव के जमींदार धर्मसिंह मांधाता ने चक्र बिसोई को आश्रय दिया।
मार्च 1856
लेफ्टिनेंट मैकडोनाल्ड ने चक्र बिसोई को पकड़ने के लिए आठगांव में अभियान चलाया। चक्र बच निकले; भीतर सरदार भोरी और धर्मसिंह मांधाता गिरफ्तार। धर्मसिंह की बाद में जेल में मृत्यु।
1856
चक्र बिसोई पारलाखेमुंडी की ओर निकल गए और सवरा प्रतिरोध से संपर्क की सूचना मिलती है। इसके बाद उनका जीवन प्रमाणित ऐतिहासिक अभिलेखों में अस्पष्ट हो जाता है।
प्रमुख व्यक्तित्व और परस्पर विरोधी भूमिकाएं
प्रमुख व्यक्तित्व
कमल लोचन डोरा बिसोई
खोंड प्रतिरोध के प्रथम प्रमुख नेता। धनंजय भंज के समर्थक। 1837 में गिरफ्तार; ऊटी में राज्य-बंदी; 1846 में मृत्यु।
चक्र बिसोई
डोरा बिसोई के भतीजे और आंदोलन के सबसे दीर्घकालिक नेता। लगभग दो दशकों तक ब्रिटिश शासन को चुनौती दी और गिरफ्तारी से बचते रहे।
धनंजय भंज
घुमुसर के राजा, जिनकी राजसत्ता और ब्रिटिश हस्तक्षेप के बीच संघर्ष ने आंदोलन की राजनीतिक पृष्ठभूमि बनाई।
पीतांबर भंज
धनंजय भंज के अल्पवयस्क पुत्र, जिन्हें 1846 में विद्रोहियों ने भंज सत्ता की बहाली के प्रतीक के रूप में आगे किया।
नबघना खानरो/कन्हर
बौध-कंधमाल के महत्वपूर्ण खोंड नेता।
बीरा खानरो
नबघना के पुत्र; उनकी गिरफ्तारी 1846 के तनाव का महत्वपूर्ण कारण बनी।
अतुंग बिसोई
चक्र बिसोई के भतीजे; अंगुल से हथियार और सहायता प्राप्त करने के संपर्क में भूमिका।
राजा सोमनाथ सिंह
अंगुल के शासक; ब्रिटिश सरकार ने उन पर खोंड नेताओं को सहायता देने का संदेह किया। 1848 में सत्ता से हटाए गए।
धर्मसिंह मांधाता
आठगांव के जमींदार; चक्र बिसोई को आश्रय दिया; 1856 में गिरफ्तार और बाद में जेल में मृत्यु।
सैमुअल चार्टर्स मैकफर्सन
ब्रिटिश अधिकारी तथा मेरिया उन्मूलन अभियान के प्रमुख व्यक्तियों में एक। खोंड समाज पर महत्वपूर्ण औपनिवेशिक अध्ययन भी लिखे।
मेजर जनरल डाइस
1846–47 में विद्रोह दबाने भेजे गए अधिकारी; मैकफर्सन की कठोर नीतियों की आलोचना की।
कर्नल कैंपबेल
1847 से मेरिया एजेंसी की जिम्मेदारी संभाली और अपेक्षाकृत समझौतावादी नीति अपनाई।
दीनबंधु पटनायक
कंधमाल के तहसीलदार; ब्रिटिश प्रशासन की ओर से विद्रोह-विरोधी अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका।
आंदोलन की उपलब्धियां और सबसे बड़ी विडंबना
आंदोलन की उपलब्धियां
खोंड विद्रोह ब्रिटिश शासन को उखाड़ नहीं सका, लेकिन उसकी उपलब्धियां महत्वपूर्ण थीं।
पहली—उसने लगभग दो दशकों तक औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती दी।
दूसरी—ब्रिटिश सरकार को केवल सैन्य दमन की नीति बदलनी पड़ी।
तीसरी—मैकफर्सन की कठोर कार्यप्रणाली की औपनिवेशिक प्रशासन के भीतर आलोचना हुई।
चौथी—कैंपबेल के समय समझाइश और सहयोग की नीति अपनानी पड़ी।
पांचवीं—खोंड क्षेत्रों में शासन स्थापित करने के लिए अंग्रेजों को स्थानीय सामाजिक संरचना को समझना और उससे बातचीत करना पड़ा।
छठी—चक्र बिसोई को ब्रिटिश शासन कभी निर्णायक रूप से पकड़ नहीं पाया।
सातवीं—आंदोलन ने घुमुसर, बौध-कंधमाल, अंगुल, कालाहांडी और पटना जैसे क्षेत्रों के अलग-अलग असंतोषों को एक व्यापक प्रतिरोध-क्षेत्र में जोड़ दिया।
सबसे बड़ी विडंबना
इस संघर्ष की सबसे बड़ी ऐतिहासिक विडंबना यह है कि दोनों पक्षों के दावों में अलग-अलग प्रकार की वैधता मौजूद थी।
लेकिन खोंडों की भूमि, संस्कृति और राजनीतिक स्वायत्तता पर औपनिवेशिक अधिकार स्थापित करना उसी मानवीय सुधार का स्वाभाविक अथवा अनिवार्य परिणाम नहीं था।
ब्रिटिश शासन ने दोनों को एक साथ जोड़ा।
चक्र बिसोई ने भी मेरिया की रक्षा और राजनीतिक स्वतंत्रता को एक साथ जोड़ दिया।
इसी कारण इस आंदोलन को किसी सरल ‘अच्छा बनाम बुरा’ कथा में नहीं रखा जा सकता।
इतिहासलेखन और स्रोतगत सावधानियां
इतिहासलेखन : ‘बर्बरता के विरुद्ध सभ्यता’ से आदिवासी संप्रभुता तक
औपनिवेशिक इतिहासलेखन ने लंबे समय तक खोंड संघर्ष को मुख्यतः ‘मेरिया मानव-बलि समाप्त करने के ब्रिटिश प्रयास के विरुद्ध आदिवासी प्रतिरोध’ के रूप में प्रस्तुत किया।
इस कथा में ब्रिटिश अधिकारी सुधारक थे और खोंड प्रतिरोध अंधविश्वास का परिणाम।
राष्ट्रवादी इतिहासलेखन ने दूसरी दिशा में जाकर डोरा और चक्र बिसोई को औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध स्वतंत्रता सेनानियों के रूप में प्रतिष्ठित किया।
आधुनिक इतिहासलेखन अधिक जटिल तस्वीर प्रस्तुत करता है।
मेरिया का प्रश्न वास्तविक था, लेकिन उसके पीछे सत्ता, भूमि, स्थानीय राजसत्ता, सामुदायिक अधिकार और औपनिवेशिक राज्य के विस्तार का संघर्ष भी चल रहा था।
मैकफर्सन के अपने नृवंशविज्ञान संबंधी लेख तथा आधुनिक अध्ययन दोनों बताते हैं कि खोंड समाज और मेरिया व्यवस्था को केवल एक धार्मिक अनुष्ठान में समेटना संभव नहीं है।
स्रोतों के बारे में सावधानी
खोंड विद्रोह के इतिहास में एक बड़ी स्रोतगत समस्या है।
अधिकांश समकालीन लिखित दस्तावेज ब्रिटिश अधिकारियों ने तैयार किए।
खोंड समाज की अपनी राजनीतिक स्मृति मुख्यतः मौखिक परंपराओं में रही।
इसलिए ‘विद्रोही’, ‘उपद्रवी’, ‘बर्बर’, ‘मेरिया समर्थक’ जैसे औपनिवेशिक शब्दों को सीधे ऐतिहासिक सत्य नहीं माना जाना चाहिए।
दूसरी ओर राष्ट्रवादी स्मृति में प्रत्येक स्थानीय संघर्ष को आधुनिक राष्ट्र-राज्य की स्वतंत्रता की स्पष्ट चेतना से जोड़ देना भी सावधानी मांगता है।
चक्र बिसोई उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य के उस आदिवासी-स्थानीय राजनीतिक संसार के नेता थे जिसमें अपना राजा, अपना पहाड़, अपनी जमीन, अपनी सामाजिक व्यवस्था और बाहरी शासन से मुक्ति एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।
समेकित निष्कर्ष : खोंड विद्रोह को कैसे समझें?
समेकित निष्कर्ष : खोंड विद्रोह को कैसे समझें?
खोंड/कंध विद्रोह 1837–1856 भारतीय आदिवासी और किसान प्रतिरोध के इतिहास का एक असाधारण लंबा अध्याय है।
उसकी शुरुआत समझने के लिए 1835 के घुमुसर संकट तक जाना पड़ता है।
धनंजय भंज और ब्रिटिश सत्ता का संघर्ष,
पीतांबर भंज को राजा बनाने का प्रयास,
कालाहांडी और पटना तक चक्र बिसोई का नेटवर्क
और मार्च 1856 में आठगांव की कार्रवाई
इन सभी को एक साथ रखने पर ही आंदोलन का वास्तविक स्वरूप सामने आता है।
यह मेरिया की कहानी था—लेकिन केवल मेरिया की नहीं।
यह राजा की कहानी था—लेकिन केवल राजवंश की नहीं।
यह आदिवासी संस्कृति की कहानी था—लेकिन केवल संस्कृति की नहीं।
इसके केंद्र में अंततः सत्ता का प्रश्न था।
ब्रिटिश सरकार कह रही थी कि पहाड़ों में अंतिम कानून अब औपनिवेशिक राज्य का होगा।
खोंड प्रतिरोध कह रहा था कि जंगल, जमीन, देवता, मुखिया और राजनीतिक व्यवस्था पर बाहरी सत्ता का अधिकार स्वीकार नहीं किया जाएगा।
इसीलिए चक्र बिसोई की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक विरासत किसी एक युद्ध की विजय नहीं है।
उनकी विरासत है लगभग दो दशकों तक औपनिवेशिक राज्य को पहाड़ी भूगोल में पूर्ण राजनीतिक नियंत्रण से वंचित रखना।
ब्रिटिश सेना ने गांव जलाए, नेताओं को गिरफ्तार किया, सहयोगी राजाओं को हटाया, मेरिया एजेंसी बनाई और अंततः सैन्य दमन के साथ समझाइश तथा प्रशासनिक समावेशन की नीति अपनाई।
फिर भी चक्र बिसोई स्वयं उसके हाथ नहीं आए।
1856 में वे इतिहास के लिखित अभिलेखों से धीरे-धीरे ओझल हो गए।
लेकिन जिस प्रश्न के लिए खोंड संघर्ष कर रहे थे, वह समाप्त नहीं हुआ
जंगल किसका? जमीन किसकी? स्थानीय समाज पर शासन का अधिकार किसका? और क्या ‘सुधार’ के नाम पर कोई बाहरी सत्ता किसी समुदाय की राजनीतिक स्वायत्तता भी छीन सकती है?
यही प्रश्न आगे संथाल हूल, वन-अधिकार संघर्षों, मुंडा उलगुलान, बस्तर भूमकाल और बीसवीं सदी के अनेक आदिवासी-कृषक आंदोलनों में नए रूप में फिर सामने आया।
इस दृष्टि से खोंड विद्रोह 1837–1856 किसी पृथक पहाड़ी अशांति का नाम नहीं, बल्कि औपनिवेशिक भारत में भूमि, संस्कृति और राजनीतिक संप्रभुता के संघर्ष की एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कड़ी था।
अध्याय पूर्ण है। इसमें 1835–37 की आवश्यक पूर्वपीठिका इसलिए रखी गई है ताकि 1837 को अचानक आरंभ-बिंदु मानने की त्रुटि न हो। विशेष रूप से डोरा बिसोई → चक्र बिसोई नेतृत्व परिवर्तन, मेरिया प्रश्न, 1846 का पुनरुत्थान, बिसीपाड़ा, पीतांबर भंज, डाइस–मैकफर्सन विवाद, 1847 का नीतिगत परिवर्तन, कैंपबेल, 1848 अंगुल, कालाहांडी–पटना विस्तार और मार्च 1856 आठगांव अभियान को समाहित किया गया है।
एक महत्वपूर्ण संपादकीय बात: कुछ लोकप्रिय विवरण इस आंदोलन की अवधि 1835–1856, कुछ 1837–1856, और कुछ स्थानीय इतिहास इससे आगे तक बताते हैं। वेबसाइट पर शीर्षक “खोंड/कंध विद्रोह (1837–1856)” रखना ठीक है, लेकिन प्रारंभिक खंड में 1835–37 की पूर्वपीठिका रहने देना ऐतिहासिक रूप से अधिक सुरक्षित होगा।
खोंड प्रतिरोध में मेरिया का प्रश्न वास्तविक था, पर वह संपूर्ण कारण नहीं था। औपनिवेशिक ‘मानवीय सुधार’ सैन्य प्रवेश, राजनीतिक अधीनता और सांस्कृतिक शासन से अलग नहीं था; वहीं मानव बलि को केवल सांस्कृतिक स्वायत्तता कहकर नैतिक आलोचना से बाहर भी नहीं रखा जा सकता। आंदोलन की केंद्रीय शक्ति मुठा, स्थानीय नेतृत्व और कठिन पहाड़ी भूगोल पर आधारित स्वायत्तता थी। चक्र बिसोई की गिरफ्तारी में विफलता और उनके अंत की अनिश्चितता इस संघर्ष की उस ऐतिहासिक सीमा को भी दिखाती है जहाँ औपनिवेशिक अभिलेख सब कुछ नियंत्रित करने का दावा करते हैं, लेकिन प्रतिरोध की पूरी दुनिया दर्ज नहीं कर पाते।
प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक स्रोत
स्रोत-सावधानी: खोंड समाज के अधिकांश समकालीन लिखित विवरण ब्रिटिश अधिकारियों, मेरिया एजेंटों, मिशनरियों और सैन्य अभियानों से जुड़े लोगों ने तैयार किए। इन अभिलेखों में ‘सभ्यता बनाम बर्बरता’ की औपनिवेशिक भाषा प्रबल है। चक्र बिसोई के अंतिम वर्षों, कुछ नेताओं के नाम, विद्रोही संख्या, गांवों के विनाश और मेरिया संबंधी विवरणों पर स्रोतगत अंतर स्पष्ट रूप से दर्ज किए गए हैं।