omkarchaudhary.comJOURNALIST · AUTHOR · RESEARCHEROCN Research Desk
दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–004 · स्वतंत्र भारत · अध्याय 10

भारतीय किसान यूनियन और महेंद्र सिंह टिकैत

करमूखेड़ी से मेरठ–बोट क्लब, किसान स्वाभिमान, लाभकारी मूल्य, पंचायत, सामाजिक गठबंधन और 2020–21 के पुनरुत्थान तक

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskसंपादित विस्तृत शोध संस्करण · 27 अगस्त 2026

भारतीय किसान यूनियन और महेंद्र सिंह टिकैत ने 1980 के दशक में किसान को दलगत मंचों से बाहर स्वतंत्र दबाव-शक्ति के रूप में स्थापित किया। करमूखेड़ी और मेरठ ने लंबी, अनुशासित घेराबंदी की क्षमता दिखाई; बोट क्लब ने राजधानी के केंद्र में ग्रामीण भारत की संख्या और संगठन का प्रदर्शन किया। टिकैत की भाषा लाभकारी मूल्य, बिजली, कर्ज और किसान सम्मान की थी, लेकिन उसका संगठन खाप–पंचायत, जाति और क्षेत्रीय सामाजिक संरचना से भी जुड़ा रहा। यही उसकी शक्ति और सीमा दोनों बनी। 2013 की दरार और 2020–21 की पुनःएकता उस विरासत के दो विपरीत अध्याय हैं।

अध्याय 1

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कृषि-सामाजिक पृष्ठभूमि

भारतीय किसान यूनियन और महेंद्र सिंह टिकैत के किसान आंदोलन को समझने के लिए सबसे पहले उस पश्चिमी उत्तर प्रदेश को समझना आवश्यक है, जिसने 1980 के दशक में देश को किसान राजनीति का एक नया मॉडल दिया। टिकैत का आंदोलन अचानक पैदा हुआ किसान असंतोष नहीं था। उसके पीछे लगभग डेढ़ सौ वर्षों में विकसित हुई नहर-सिंचित कृषि, गन्ने की व्यावसायिक खेती, औपनिवेशिक काल से चली आ रही मंडी और चीनी मिल व्यवस्था, स्वतंत्रता के बाद भूमि संबंधों में परिवर्तन, हरित क्रांति, ग्रामीण विद्युतीकरण और कृषि के तेजी से बढ़ते बाजारीकरण की लंबी प्रक्रिया थी।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का किसान 1980 के दशक तक उस किसान से काफी अलग हो चुका था जिसके संघर्ष का मुख्य प्रश्न जमींदार से भूमि प्राप्त करना या लगान कम कराना था। उसके पास भूमि थी, सिंचाई थी, ट्रैक्टर और नलकूप तेजी से बढ़ रहे थे, वह बाजार के लिए गेहूं और गन्ना पैदा कर रहा था और उसकी आय का बड़ा हिस्सा सरकार द्वारा प्रभावित या नियंत्रित व्यवस्थाओं पर निर्भर था। इसलिए उसका संघर्ष भी बदल गया। अब सवाल केवल “जमीन किसकी?” नहीं था; सवाल था—“खेती की लागत कितनी है, बिजली और पानी की कीमत कौन तय करेगा और किसान की फसल का मूल्य कौन निर्धारित करेगा?”

इसी सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन से भारतीय किसान यूनियन की राजनीति निकली।

1 पश्चिमी उत्तर प्रदेश : भारत का विशिष्ट कृषि क्षेत्र

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सामान्यतः सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, शामली, बिजनौर, बुलंदशहर, गाजियाबाद, हापुड़ और आसपास के जिलों को उस कृषि क्षेत्र के केंद्रीय हिस्से के रूप में देखा जाता है जिसने बाद में भारतीय किसान यूनियन को मजबूत आधार दिया। प्रशासनिक सीमाएं समय के साथ बदलीं और कई नए जिले पुराने जिलों को विभाजित करके बनाए गए, इसलिए ऐतिहासिक अध्ययन में तत्कालीन जिला सीमाओं को ध्यान में रखना आवश्यक है।

यह क्षेत्र गंगा और यमुना के बीच विस्तृत उपजाऊ दोआब का बड़ा हिस्सा है। जलोढ़ मिट्टी, अपेक्षाकृत समतल भूभाग, भूजल की उपलब्धता और विशाल नहर व्यवस्था ने यहां सिंचित कृषि को बहुत पहले विकसित कर दिया था।

उन्नीसवीं सदी में ब्रिटिश शासन द्वारा विकसित ऊपरी गंगा नहर इस परिवर्तन का महत्वपूर्ण आधार बनी। 1854 में औपचारिक रूप से खोली गई यह नहर और बाद में विकसित उसकी शाखाओं ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कृषि संरचना को गहराई से बदल दिया। नहर सिंचाई ने खेती को केवल मानसून पर निर्भर रहने से आंशिक रूप से मुक्त किया और गेहूं, गन्ना तथा अन्य नकदी फसलों के विस्तार के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार कीं।

इसलिए जब 1960 के दशक में भारत में हरित क्रांति शुरू हुई, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पास उसकी कई बुनियादी पूर्वशर्तें पहले से मौजूद थीं।

2 भूमि संबंधों में बदलाव

स्वतंत्रता से पहले उत्तर प्रदेश के ग्रामीण समाज में जमींदार, भू-स्वामी, काश्तकार, उपकाश्तकार और कृषि मजदूरों के बीच जटिल संबंध थे। स्वतंत्रता के बाद उत्तर प्रदेश में जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधारों ने इन संबंधों को बदला।

उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम, 1950 इस परिवर्तन का प्रमुख कानूनी आधार बना। जमींदारों और कृषकों के बीच स्थित अनेक मध्यस्थ अधिकारों को समाप्त किया गया और खेती करने वाले कई कृषक समूहों को अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित भू-अधिकार प्राप्त हुए।

हालांकि भूमि का समान वितरण नहीं हुआ। बड़े और मध्यम किसान बने रहे तथा भूमिहीन कृषि मजदूरों की संख्या भी महत्वपूर्ण रही। फिर भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक ऐसा प्रभावशाली मध्यम कृषक वर्ग विकसित हुआ जिसके पास पर्याप्त भूमि, पारिवारिक श्रम, बाजार से जुड़ाव और उत्पादन बढ़ाने की क्षमता थी।

यही वर्ग आगे चलकर चौधरी चरण सिंह की राजनीति और बाद में महेंद्र सिंह टिकैत के किसान आंदोलन की सामाजिक शक्ति बना।

3 हरित क्रांति और किसान का आर्थिक रूपांतरण

1960 के दशक के मध्य में भारत में नई कृषि रणनीति लागू होने लगी। अधिक उत्पादन देने वाली गेहूं और धान की किस्में, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, सुनिश्चित सिंचाई, संस्थागत ऋण और कृषि मशीनरी इसके प्रमुख घटक थे।

पंजाब और हरियाणा के साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश भी हरित क्रांति से लाभान्वित होने वाले प्रमुख क्षेत्रों में शामिल हुआ।

गेहूं की नई किस्मों ने उत्पादन में महत्वपूर्ण वृद्धि की। किसानों ने परंपरागत बीजों के स्थान पर अधिक उत्पादन देने वाले बीज अपनाए। रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग बढ़ा। सिंचाई का विस्तार हुआ और कृषि मशीनरी का प्रवेश तेज हुआ।

इसका प्रभाव केवल खेत की उत्पादकता तक सीमित नहीं रहा। उसने किसान की पूरी आर्थिक संरचना बदल दी।

पहले किसान का बड़ा हिस्सा स्वयं उत्पादित बीज, पशु-शक्ति और पारिवारिक श्रम पर निर्भर था। नई कृषि व्यवस्था में उसे बाजार से बीज, उर्वरक, कीटनाशक, डीजल, मशीनरी और उपकरण खरीदने पड़े।

अर्थात जितना किसान बाजार के लिए उत्पादन करने लगा, उतना ही वह स्वयं भी बाजार पर निर्भर होता गया।

यही हरित क्रांति का वह अंतर्विरोध था जो बाद में किसान आंदोलनों में दिखाई दिया।

4 गन्ना : पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीतिक फसल

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था को गन्ने के बिना समझना संभव नहीं है।

गन्ना केवल एक फसल नहीं रहा; उसने किसान, चीनी मिल, सरकार, सहकारी संस्थाओं, श्रमिकों और स्थानीय राजनीति को एक-दूसरे से जोड़ने वाली पूरी आर्थिक व्यवस्था तैयार की।

क्षेत्र की जलवायु, सिंचाई और मिट्टी गन्ने के अनुकूल थी। ब्रिटिश काल में ही उत्तर भारत में चीनी उद्योग का विकास होने लगा था, लेकिन बीसवीं सदी के तीसरे दशक में संरक्षणवादी औद्योगिक नीति और Sugar Industry (Protection) Act, 1932 के बाद भारतीय चीनी उद्योग को नया प्रोत्साहन मिला। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चीनी मिलों का विस्तार हुआ।

स्वतंत्रता के बाद यह संबंध और मजबूत हुआ।

किसान गन्ना पैदा करता था, लेकिन उसकी फसल का प्रमुख खरीदार चीनी मिल थी। सरकार गन्ने की कीमत और आपूर्ति व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। इस कारण गन्ने का मूल्य सीधे किसान राजनीति का विषय बन गया।

गेहूं को कुछ समय तक रोका जा सकता था, लेकिन काटा गया गन्ना लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। किसान के पास मिल के अलावा सीमित विकल्प होते थे। भुगतान में देरी होने पर उसकी अगली फसल, घरेलू खर्च और ऋण भुगतान सभी प्रभावित होते थे।

इससे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक विशिष्ट राजनीतिक मांग पैदा हुई—

“गन्ने का उचित मूल्य और समय पर भुगतान।”

आने वाले दशकों में यह मांग लगभग प्रत्येक बड़े किसान आंदोलन में दिखाई देने वाली थी।

5 चीनी मिल और किसान का संबंध

गन्ना अर्थव्यवस्था ने गांव और उद्योग के बीच प्रत्यक्ष संबंध स्थापित किया।

किसान अब केवल स्थानीय व्यापारी को फसल बेचने वाला उत्पादक नहीं था। वह ऐसी औद्योगिक आपूर्ति-श्रृंखला का हिस्सा था जिसमें गन्ना क्षेत्र आरक्षण, खरीद केंद्र, तौल, पर्ची, परिवहन, मिल क्षमता और भुगतान जैसी व्यवस्थाएं महत्वपूर्ण थीं।

इस व्यवस्था में किसी भी स्तर पर समस्या किसान आंदोलन का कारण बन सकती थी।

यदि गन्ने की घोषित कीमत कम हो—असंतोष।

इस प्रकार कृषि और राज्य के बीच संपर्क लगातार बढ़ता गया।

बाद के दशकों में BKU की शक्ति का एक महत्वपूर्ण कारण यही था कि वह किसान की रोजमर्रा की आर्थिक समस्याओं को बड़े राजनीतिक प्रश्न में बदल सकती थी।

6 नहरों से नलकूपों तक

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कृषि सफलता का दूसरा बड़ा आधार सिंचाई था।

औपनिवेशिक काल की गंगा नहर व्यवस्था ने क्षेत्र को व्यापक सिंचाई नेटवर्क दिया था। स्वतंत्रता के बाद सरकारी नहरों के साथ निजी नलकूपों का तेजी से विस्तार हुआ।

नलकूप ने किसान को एक नई स्वतंत्रता दी। उसे केवल नहर में पानी आने की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती थी। आवश्यकता के अनुसार खेत की सिंचाई संभव हुई।

लेकिन इसी के साथ एक नई निर्भरता पैदा हुई—

जैसे-जैसे विद्युत चालित नलकूप बढ़े, बिजली की उपलब्धता और दर किसान के लिए केंद्रीय आर्थिक प्रश्न बन गई।

यह परिवर्तन भारतीय किसान यूनियन के इतिहास में निर्णायक साबित हुआ।

7 बिजली : सुविधा से राजनीतिक प्रश्न तक

हरित क्रांति की कृषि में बिजली केवल घरेलू उपभोग की वस्तु नहीं थी। वह उत्पादन का साधन थी।

नलकूप चलाने के लिए बिजली चाहिए। पानी से गेहूं और गन्ना पैदा होता है। इसलिए बिजली की दर में वृद्धि सीधे उत्पादन लागत बढ़ाती है।

यहीं से किसान और राज्य बिजली व्यवस्था के माध्यम से प्रत्यक्ष आर्थिक संबंध में आ गए।

किसान के सामने तीन प्रश्न महत्वपूर्ण होते गए—

किसान संगठनों का तर्क था कि सरकार जब कृषि उपज की कीमत को प्रभावित करती है, तब वह कृषि उत्पादन में प्रयुक्त बिजली, पानी और अन्य साधनों की कीमत अनियंत्रित रूप से नहीं बढ़ा सकती।

1980 के दशक में बिजली दरों का मुद्दा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में व्यापक किसान लामबंदी का आधार बना। भारतीय किसान यूनियन के प्रारंभिक बड़े संघर्षों में इसका केंद्रीय स्थान था।

8 कृषि मशीनरी और बढ़ती नकद लागत

हरित क्रांति ने बैल आधारित कृषि से मशीन आधारित कृषि की ओर संक्रमण तेज किया।

ट्रैक्टर, थ्रेशर, पंपसेट और बाद में दूसरी मशीनों का उपयोग बढ़ा।

इससे उत्पादकता और समय की बचत हुई, लेकिन किसान की नकद लागत भी बढ़ी।

ट्रैक्टर चाहिए तो पूंजी या ऋण चाहिए।

अधिक उत्पादन चाहिए तो उर्वरक चाहिए।

इस तरह खेती की अर्थव्यवस्था तेजी से मुद्रीकृत होती गई।

अब किसान की समस्या केवल अच्छी फसल पैदा करना नहीं थी। अच्छी फसल के बावजूद यदि बाजार मूल्य लागत के अनुपात में नहीं बढ़ता, तो उसकी वास्तविक आय पर दबाव पड़ सकता था।

यही आर्थिक गणित आगे चलकर टिकैत के आंदोलनों की भाषा बना।

9 मंडियां और बाजार पर बढ़ती निर्भरता

व्यावसायिक कृषि के विस्तार के साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मंडियों का महत्व बढ़ा।

मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, शामली, बड़ौत और आसपास के कस्बे कृषि व्यापार के महत्वपूर्ण केंद्र बने। कृषि उपज मंडी व्यवस्था ने किसानों और व्यापारियों के संबंधों को संस्थागत रूप दिया, लेकिन आढ़त, तौल, कटौती, शुल्क और मूल्य निर्धारण से जुड़े विवाद बने रहे।

किसान जितना अधिक बाजार के लिए उत्पादन करता गया, उतना ही उसकी आय बाजार मूल्य पर निर्भर होती गई।

पुराने किसान आंदोलन का संघर्ष प्रायः खेत के भीतर भूमि संबंधों पर केंद्रित था। नए किसान आंदोलन का संघर्ष तेजी से खेत और बाजार के बीच केंद्रित होने लगा।

10 किसान और सरकार का नया संबंध

हरित क्रांति के बाद राज्य कृषि से पहले की तुलना में कहीं अधिक गहराई से जुड़ गया।

सरकार उर्वरक नीति को प्रभावित करती थी।

बैंक और सहकारी संस्थाएं कृषि ऋण देते थे।

सरकार गेहूं की खरीद और न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था से जुड़ी थी।

गन्ने की कीमत तथा चीनी मिलों की खरीद व्यवस्था में सरकारी हस्तक्षेप था।

मंडी कानून और कृषि व्यापार भी राज्य की नीतियों से प्रभावित थे।

इस प्रकार किसान के जीवन में सरकार की उपस्थिति बढ़ी।

इसका स्वाभाविक परिणाम यह हुआ कि किसान की शिकायत भी अधिकाधिक सरकार से होने लगी।

महेंद्र सिंह टिकैत के आंदोलन की राजनीतिक शक्ति इसी संबंध में छिपी थी। किसान सरकार को यह कह सकता था कि यदि आप हमारी फसल का मूल्य, बिजली की दर, पानी का शुल्क और ऋण व्यवस्था प्रभावित करते हैं, तो हमारी आय और लागत के बीच संतुलन की जिम्मेदारी से पूरी तरह अलग नहीं हो सकते।

11 पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ग्रामीण सामाजिक संरचना

किसान आंदोलन को केवल आर्थिक आधार से नहीं समझा जा सकता। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की विशिष्ट सामाजिक संरचना ने भी BKU के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

क्षेत्र में जाट, गुर्जर, त्यागी, राजपूत, मुस्लिम कृषक समुदाय, दलित समुदाय और अनेक अन्य पिछड़ी एवं कृषक जातियां मौजूद थीं। इन समुदायों के बीच भूमि स्वामित्व और सामाजिक शक्ति समान नहीं थी।

विशेष रूप से जाट कृषकों का कई इलाकों में महत्वपूर्ण भूमि-स्वामी और राजनीतिक प्रभाव था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह की राजनीति के विकास में भी यह सामाजिक आधार महत्वपूर्ण रहा।

लेकिन टिकैत आंदोलन को केवल जाट आंदोलन मान लेना ऐतिहासिक सरलीकरण होगा। उसके बड़े आंदोलनों में विभिन्न कृषक समुदायों की भागीदारी हुई और कई अवसरों पर हिंदू तथा मुस्लिम किसान एक साझा कृषि-आर्थिक एजेंडे पर लामबंद हुए।

फिर भी यह भी उतना ही आवश्यक है कि BKU की सामाजिक पहुंच और उसकी सीमाओं—विशेषकर भूमिहीन मजदूरों, दलितों और छोटे कृषकों के प्रश्नों—का अलग से आलोचनात्मक अध्ययन किया जाए।

12 खाप और पंचायत की परंपरा

पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में खाप और पारंपरिक पंचायतों की सामाजिक उपस्थिति पुरानी रही है।

महेंद्र सिंह टिकैत स्वयं बालियान खाप से जुड़े थे और सिसौली उनके नेतृत्व का केंद्रीय स्थान बना।

टिकैत ने आधुनिक किसान संगठन को ग्रामीण पंचायत की परिचित भाषा और व्यवहार से जोड़ दिया।

यह BKU की बड़ी संगठनात्मक विशेषता बनी।

उसके लिए हर आंदोलन में औपचारिक पार्टी शाखा, सदस्यता कार्ड या विशाल स्थायी नौकरशाही आवश्यक नहीं थी। गांवों में सूचना पहुंचती, पंचायत होती और किसान ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के साथ आंदोलन स्थल की ओर निकल पड़ते।

सामुदायिक भोजन, हुक्का, चौपाल, पंचायत और सामूहिक निर्णय आंदोलन की सांस्कृतिक भाषा बन गए।

यही कारण था कि BKU कई बार अपेक्षाकृत कम औपचारिक संगठनात्मक संरचना के बावजूद बहुत बड़ी संख्या में किसानों को तेजी से लामबंद कर सकी।

13 चौधरी चरण सिंह और किसान राजनीतिक चेतना

महेंद्र सिंह टिकैत से पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान राजनीति का सबसे बड़ा नाम चौधरी चरण सिंह था।

चरण सिंह ने ग्रामीण कृषक समाज को स्वतंत्र राजनीतिक पहचान देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका आर्थिक चिंतन बड़े उद्योग-केंद्रित विकास मॉडल की आलोचना करता था और कृषि, गांव तथा छोटे उत्पादकों के महत्व पर जोर देता था।

उनकी राजनीति ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान को यह राजनीतिक आत्मविश्वास दिया कि किसान केवल किसी राष्ट्रीय दल का सामाजिक वोट-बैंक नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र आर्थिक मांगों वाला राजनीतिक वर्ग भी हो सकता है।

लेकिन चरण सिंह और टिकैत के मॉडल में महत्वपूर्ण अंतर था।

चरण सिंह ने किसान शक्ति को चुनावी राजनीति और राज्य सत्ता में बदलने का प्रयास किया।

टिकैत ने किसान शक्ति को मुख्यतः दबाव-समूह और जनांदोलन के रूप में संगठित किया।

यही अंतर आगे चलकर BKU की घोषित गैर-दलीय राजनीति की बुनियाद बना।

14 गांव में बढ़ती समृद्धि और बढ़ती बेचैनी

हरित क्रांति को केवल किसान समृद्धि की कहानी के रूप में देखना अधूरा होगा।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उत्पादन बढ़ा। पक्के मकान बने। ट्रैक्टर आए। शिक्षा और उपभोग बढ़ा। कस्बों से ग्रामीण संबंध मजबूत हुए।

लेकिन इसी प्रक्रिया ने किसान की आर्थिक अपेक्षाएं भी बढ़ाईं।

यदि किसान देश के लिए अधिक उत्पादन कर रहा है, तो उसकी आय उसी अनुपात में क्यों नहीं बढ़ रही?

16 भूमिहीन मजदूर और नए किसान आंदोलन की सीमा

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है।

अध्याय 2

भारतीय किसान यूनियन की उत्पत्ति और महेंद्र सिंह टिकैत का उदय

भारतीय किसान यूनियन और महेंद्र सिंह टिकैत का उदय स्वतंत्र भारत के किसान इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। 1980 के दशक में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जिस किसान शक्ति ने बिजलीघरों, जिला मुख्यालयों और कमिश्नरी से लेकर दिल्ली के बोट क्लब तक सरकार को चुनौती दी, उसकी जड़ें केवल किसी एक संगठन की स्थापना या किसी एक नेता के अचानक लोकप्रिय हो जाने में नहीं थीं। उसके पीछे किसान संगठनों की लंबी परंपरा, चौधरी चरण सिंह द्वारा निर्मित कृषक राजनीतिक चेतना, हरित क्रांति के बाद बदली कृषि अर्थव्यवस्था और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पंचायत तथा खाप आधारित सामाजिक संरचना मौजूद थी।

भारतीय किसान यूनियन का इतिहास लिखते समय एक तथ्यात्मक सावधानी विशेष रूप से आवश्यक है। आज जिस BKU को महेंद्र सिंह टिकैत के साथ लगभग पर्याय की तरह देखा जाता है, उसका विकास एक ही दिन में स्थापित हुए बिल्कुल नए संगठन के रूप में नहीं हुआ। इसके पीछे राष्ट्रीय स्तर पर किसान यूनियन बनाने के प्रयास, पंजाब और हरियाणा में सक्रिय किसान नेतृत्व तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में स्थानीय किसान संगठन और पंचायत नेटवर्क की अलग-अलग धाराएं थीं। 1980 के दशक के मध्य तक इन धाराओं ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ऐसा रूप लिया जिसमें महेंद्र सिंह टिकैत निर्विवाद जननेता बनकर उभरे।

1 स्वतंत्रता के बाद किसान संगठन की बदलती आवश्यकता

स्वतंत्रता-पूर्व किसान संगठनों की प्रमुख मांगें जमींदारी, लगान, बेदखली, बटाई, वनाधिकार और औपनिवेशिक शासन से जुड़ी थीं। अखिल भारतीय किसान सभा जैसे संगठनों ने इन प्रश्नों को राष्ट्रीय राजनीति में स्थान दिया था।

स्वतंत्रता के बाद जमींदारी उन्मूलन, भूमि सुधार और हरित क्रांति के साथ कृषि प्रश्न बदलने लगे। विशेषकर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे व्यावसायिक कृषि क्षेत्रों में भूमि रखने वाले किसानों की नई समस्याएं सामने आईं।

डीजल, खाद और कृषि निवेश की लागत का।

और सरकार द्वारा कृषि तथा उद्योग के बीच अपनाई जा रही मूल्य नीति का।

इस बदलती परिस्थिति ने एक ऐसे किसान संगठन की आवश्यकता पैदा की जो पारंपरिक राजनीतिक दलों के किसान प्रकोष्ठ की तरह काम करने के बजाय किसान को एक स्वतंत्र आर्थिक वर्ग के रूप में संगठित करे।

2 ‘नए किसान आंदोलन’ की राष्ट्रीय पृष्ठभूमि

1970 के दशक के उत्तरार्ध और 1980 के दशक में भारत के विभिन्न हिस्सों में किसान राजनीति का नया चरण दिखाई दिया।

महाराष्ट्र में शरद जोशी की शेतकारी संगठन कृषि उपज के लाभकारी मूल्य और बाजार संबंधी प्रश्न उठा रही थी। कर्नाटक में प्रो. एम. डी. नंजुंडास्वामी के नेतृत्व में कर्नाटक राज्य रैयत संघ किसानों की स्वतंत्र राजनीति विकसित कर रहा था। पंजाब और हरियाणा में भी कृषि मूल्य, बिजली और लागत से जुड़े किसान संगठन सक्रिय हो रहे थे।

इन संगठनों की विचारधाराएं पूरी तरह समान नहीं थीं, लेकिन उनमें एक महत्वपूर्ण समानता थी—

किसान को राजनीतिक दलों के अधीन सामाजिक समूह के बजाय स्वतंत्र आर्थिक हितों वाले उत्पादक वर्ग के रूप में प्रस्तुत करना।

भारतीय किसान यूनियन इसी व्यापक ऐतिहासिक प्रवृत्ति का उत्तर भारतीय रूप बनी।

3 भारतीय किसान यूनियन की पूर्वपीठिका

BKU की संस्थागत वंशावली के संबंध में अलग-अलग विवरण मिलते हैं और यही कारण है कि इसके इतिहास को सावधानी से प्रस्तुत करना चाहिए। 1970 के दशक के अंत में राष्ट्रीय स्तर पर किसानों के लिए गैर-दलीय मंच बनाने के प्रयास हुए। पंजाब के किसान नेता चौधरी भूपिंदर सिंह मान का नाम इस प्रक्रिया में विशेष रूप से जुड़ा है। विभिन्न क्षेत्रों में किसान यूनियन के संगठनात्मक ढांचे विकसित हुए और उत्तर भारत में इस नाम की पहचान बनने लगी।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर किसान पंचायतों और किसान संघर्षों की अपनी मजबूत परंपरा थी। यहां संगठन की वास्तविक शक्ति किसी केंद्रीय कार्यालय से नहीं, बल्कि गांवों के सामाजिक नेटवर्क से आने वाली थी।

महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की यह धारा इतनी शक्तिशाली हुई कि बाद के वर्षों में आम जनमानस में BKU की पहचान मुख्यतः टिकैत आंदोलन से जुड़ गई।

इसलिए BKU के इतिहास को दो स्तरों पर समझना अधिक उचित है—

एक, भारतीय किसान यूनियन नाम और उसके व्यापक संगठनात्मक प्रयासों का इतिहास।

दूसरा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में विकसित विशाल जनांदोलन।

4 सिसौली : एक गांव से किसान राजनीति का केंद्र

महेंद्र सिंह टिकैत का गांव सिसौली, वर्तमान मुजफ्फरनगर क्षेत्र में, आगे चलकर भारतीय किसान आंदोलन के सबसे प्रसिद्ध केंद्रों में से एक बना।

दिल्ली या लखनऊ में विशाल कार्यालय बनाने के बजाय BKU की शक्ति का प्रतीक सिसौली बना रहा।

यह प्रतीकात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण था।

संगठन का संदेश था कि किसान की राजनीति का केंद्र राजधानी नहीं, गांव होगा।

बड़े राजनीतिक दलों के नेता टिकट, विधानसभाओं और संसद के माध्यम से शक्ति प्राप्त करते थे। टिकैत की शक्ति गांव की पंचायत में जुटे किसानों की संख्या से आती थी।

धीरे-धीरे सिसौली ऐसी जगह बन गई जहां दूर-दूर से किसान अपनी शिकायतें लेकर आने लगे। यहां आयोजित पंचायतें केवल स्थानीय विवादों तक सीमित नहीं रहीं; बिजली, गन्ना, सिंचाई और कृषि नीति के बड़े प्रश्नों पर भी निर्णय होने लगे।

5 महेंद्र सिंह टिकैत : सामाजिक पृष्ठभूमि

महेंद्र सिंह टिकैत का जन्म 6 अक्टूबर 1935 को सिसौली में हुआ था। उनका परिवार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट कृषक समाज और बालियान खाप की परंपरा से जुड़ा हुआ था।

उनके पिता चौधरी छोटू सिंह बालियान खाप के चौधरी थे। पिता के निधन के बाद कम आयु में महेंद्र सिंह टिकैत को परंपरागत रूप से इस जिम्मेदारी से जोड़ा गया।

यह तथ्य उनके आगे के नेतृत्व को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

टिकैत ने राजनीति में प्रवेश किसी विश्वविद्यालयी छात्र संगठन, वैचारिक दल या चुनावी मंच से नहीं किया था। उनका सामाजिक प्रशिक्षण गांव, खेत, पंचायत और खाप व्यवस्था के भीतर हुआ।

वे जटिल आर्थिक सिद्धांतों के बजाय किसान के दैनिक अनुभव से बात करते थे—

6 बालियान खाप और नेतृत्व की सामाजिक पूंजी

बालियान खाप पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पुरानी खाप संरचनाओं में से एक है। इसके प्रभाव क्षेत्र में अनेक गांव आते रहे हैं और सिसौली उसका महत्वपूर्ण केंद्र रहा।

महेंद्र सिंह टिकैत को इस संरचना से पहले से उपलब्ध सामाजिक प्रतिष्ठा और संपर्क मिला।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण भेद करना आवश्यक है।

भारतीय किसान यूनियन और बालियान खाप एक ही संस्था नहीं थीं।

खाप एक परंपरागत सामाजिक संरचना थी, जबकि BKU आधुनिक कृषि-आर्थिक मुद्दों पर आंदोलन करने वाला किसान संगठन बना।

टिकैत की विशिष्टता यह थी कि उन्होंने दोनों के बीच उपलब्ध सामाजिक पूंजी का उपयोग किया। गांवों में पहले से मौजूद पंचायत नेटवर्क को आधुनिक किसान आंदोलन की लामबंदी में बदला गया।

इससे संगठन की लागत बहुत कम और पहुंच बहुत तेज हो गई।

किसी गांव में अलग से पार्टी कार्यालय खोलने की आवश्यकता नहीं थी। संदेश पंचायतों और व्यक्तिगत-सामाजिक संपर्कों से फैल सकता था।

7 ‘चौधरी’ से किसान नेता तक

महेंद्र सिंह टिकैत की शुरुआती पहचान मुख्यतः स्थानीय सामाजिक नेतृत्व की थी। लेकिन 1980 के दशक में कृषि संबंधी प्रश्नों पर सक्रियता ने उनकी भूमिका बदल दी।

इस परिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि उन्होंने अपनी परंपरागत सामाजिक प्रतिष्ठा को केवल जातीय नेतृत्व तक सीमित नहीं रखा।

उन्होंने किसान को संबोधित करना शुरू किया।

यही वह बिंदु था जहां खाप का चौधरी धीरे-धीरे किसान नेता में परिवर्तित हुआ।

इस परिवर्तन को समझना आवश्यक है, क्योंकि यदि टिकैत केवल जाट सामाजिक नेतृत्व तक सीमित रहते तो वे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इतना व्यापक किसान आंदोलन नहीं बना सकते थे।

उनकी राजनीति ने आर्थिक हित को सामाजिक पहचान से ऊपर रखने का प्रयास किया—

इस विचार ने 1980 के दशक में BKU को उल्लेखनीय विस्तार दिया।

8 संगठन का पुनर्गठन

1980 के दशक के मध्य में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की किसान राजनीति अधिक संगठित होने लगी। टिकैत और उनके सहयोगियों ने स्थानीय किसान नेटवर्क को भारतीय किसान यूनियन के व्यापक नाम और संरचना से जोड़कर एक प्रभावी क्षेत्रीय आंदोलन खड़ा किया।

यहां संगठनात्मक पुनर्गठन को किसी एक तारीख की घटना के रूप में देखने के बजाय एक प्रक्रिया के रूप में समझना अधिक सुरक्षित है।

लगभग 1986 के आसपास महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में BKU का नया और अधिक प्रभावी स्वरूप स्पष्ट दिखाई देने लगा। इसी दौर से संगठन तेजी से कृषि प्रश्नों पर प्रत्यक्ष जनसंघर्ष की ओर बढ़ा।

BKU की पहचान तीन विशेषताओं से बनने लगी—

गैर-दलीयता, पंचायत आधारित संगठन और प्रत्यक्ष जनांदोलन।

यही तीन तत्व टिकैत मॉडल की रीढ़ बने।

9 राजनीतिक दलों से दूरी

टिकैत ने BKU को घोषित रूप से गैर-दलीय संगठन बनाए रखने पर विशेष जोर दिया।

वास्तव में BKU का लगभग प्रत्येक बड़ा मुद्दा राजनीतिक था—बिजली दर कौन तय करेगा, गन्ना मूल्य कितना होगा, सिंचाई शुल्क कितना होगा, ऋण वसूली कैसे होगी और सरकार किसानों की मांग मानेगी या नहीं।

लेकिन संगठन का तर्क था कि इन प्रश्नों के लिए किसान को किसी एक पार्टी का समर्थक बनने की आवश्यकता नहीं है।

टिकैत किसानों से कहते थे कि चुनाव में वे अपनी पसंद से वोट दें, लेकिन किसान के सवाल पर एक साथ खड़े हों।

इस नीति ने BKU को बड़ी रणनीतिक सुविधा दी।

कांग्रेस समर्थक किसान भी आंदोलन में आ सकता था।

जनता दल या बाद में भाजपा की ओर झुकाव रखने वाला किसान भी।

इस तरह किसान पहचान को पार्टी पहचान से ऊपर रखने का प्रयास हुआ।

10 गैर-दलीयता क्यों आकर्षक बनी?

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान पहले से राजनीति से अपरिचित नहीं थे। चौधरी चरण सिंह के कारण क्षेत्र में किसान आधारित चुनावी राजनीति काफी मजबूत रही थी।

लेकिन चुनावी राजनीति की अपनी सीमाएं थीं।

सरकार बदलने के बाद भी बिजली दर का सवाल बना रह सकता था।

गन्ने के मूल्य का विवाद बना रह सकता था।

इस अनुभव ने एक वर्ग में यह धारणा मजबूत की कि किसान को राजनीतिक दलों से अलग अपना स्थायी दबाव संगठन चाहिए।

सरकार किसी की भी हो, किसान अपनी मांग सरकार से करेगा।

इस सिद्धांत ने संगठन को तत्कालीन दलगत राजनीति से अलग पहचान दी।

11 चौधरी चरण सिंह और टिकैत : निरंतरता और अंतर

चरण सिंह और महेंद्र सिंह टिकैत दोनों पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कृषक समाज से निकले, लेकिन उनकी राजनीतिक रणनीतियां अलग थीं।

चरण सिंह का उद्देश्य किसान और ग्रामीण समाज की शक्ति को चुनावी प्रतिनिधित्व तथा सरकार में बदलना था।

टिकैत का मुख्य हथियार चुनाव नहीं, आंदोलन था।

चरण सिंह विधानसभा और संसद की राजनीति करते थे।

चरण सिंह राजनीतिक दल बनाते और गठबंधन करते थे।

टिकैत राजनीतिक दल से दूरी को अपनी विश्वसनीयता का आधार बताते थे।

फिर भी दोनों के बीच गहरी ऐतिहासिक निरंतरता थी।

चरण सिंह ने जिस कृषक आत्मसम्मान और ग्रामीण राजनीतिक चेतना को विकसित किया, उसी सामाजिक जमीन पर टिकैत का आंदोलन फला-फूला।

इस अर्थ में टिकैत चरण सिंह की राजनीति के विरोधी से अधिक उसके एक नए, गैर-चुनावी चरण के प्रतिनिधि थे।

12 सदस्यता से अधिक पंचायत

BKU की संगठनात्मक शैली पारंपरिक राजनीतिक दलों से अलग थी।

उसकी वास्तविक ताकत सदस्यता पुस्तिका से अधिक पंचायत में दिखाई देती थी।

किसी मुद्दे पर संदेश जाता और हजारों किसान एक स्थान पर एकत्र हो सकते थे।

यही संगठनात्मक लचीलापन बाद में मेरठ और दिल्ली जैसे विशाल आंदोलनों में दिखाई दिया।

इस मॉडल की सबसे बड़ी ताकत थी—तेज लामबंदी।

अत्यधिक अनौपचारिक संगठन अक्सर केंद्रीय नेतृत्व और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा पर अधिक निर्भर होता है। टिकैत के जीवनकाल में उनका व्यक्तिगत प्रभाव इस कमजोरी को ढक देता था; उनके बाद संगठन में हुए विभाजनों ने इसे अधिक स्पष्ट किया।

13 हुक्का, चौपाल और आंदोलन की नई शैली

टिकैत ने किसान आंदोलन को केवल भाषण और प्रदर्शन नहीं बनाया।

उन्होंने गांव की सामाजिक संस्कृति को आंदोलन स्थल पर पुनर्निर्मित कर दिया।

धरने पर ही अस्थायी ग्रामीण समाज बस जाता।

इस शैली का राजनीतिक महत्व बहुत बड़ा था।

सामान्य प्रदर्शनकारी कुछ घंटे आंदोलन कर लौट जाता है। लेकिन किसान यदि अपने साथ अनाज, चारा, बर्तन, ट्रैक्टर और रोजमर्रा की जरूरतें लेकर आता है, तो वह कई दिनों या सप्ताह तक धरना दे सकता है।

टिकैत आंदोलन ने किसान की ग्रामीण आत्मनिर्भरता को राजनीतिक धरने की क्षमता में बदल दिया।

यही रणनीति आगे चलकर भारतीय किसान आंदोलनों की पहचान बनने वाली थी और दशकों बाद 2020–21 के दिल्ली सीमा आंदोलन में उसका कहीं अधिक विकसित रूप दिखाई दिया।

14 टिकैत की भाषा : भाषण से अधिक संवाद

महेंद्र सिंह टिकैत पारंपरिक अर्थ में चमकदार मंचीय वक्ता नहीं थे।

उनकी ताकत उनकी ग्रामीण बोली और सहज संवाद था।

वे किसान के बीच उसी सामाजिक शैली में बैठते थे जिसमें गांव का चौधरी पंचायत में बैठता है। इससे नेता और समर्थक के बीच औपचारिक दूरी कम होती थी।

उनकी भाषा में किसान की आर्थिक समस्या सीधे आती थी।

यही कारण था कि जटिल कृषि नीति भी सामान्य किसान के अनुभव से जुड़ जाती थी।

बिजली नीति का अर्थ था—नलकूप का बिल।

राज्य की मूल्य नीति का अर्थ था—गन्ने का भाव।

ऋण नीति का अर्थ था—बैंक या सहकारी संस्था की वसूली।

इस व्यावहारिक भाषा ने BKU को वैचारिक घोषणापत्रों से अधिक प्रत्यक्ष अनुभव आधारित आंदोलन बनाया।

15 नेतृत्व का नैतिक आधार

टिकैत की लोकप्रियता का एक आधार उनकी सार्वजनिक छवि भी थी।

उन्होंने लंबे समय तक स्वयं को चुनावी पद और सत्ता की दौड़ से अलग रखा। वे विधायक, सांसद या मंत्री बनने की आकांक्षा रखने वाले सामान्य राजनीतिक नेता की छवि से अलग दिखाई देते थे।

इससे किसानों के बीच यह संदेश गया कि उनका नेता सत्ता प्राप्त करने के बजाय किसान की मांग मनवाने के लिए संघर्ष कर रहा है।

यही नैतिक पूंजी उनकी नेतृत्व शक्ति का महत्वपूर्ण स्रोत बनी।

हालांकि बाद के वर्षों में BKU के राजनीतिक संबंधों और चुनावी रुख को लेकर विवाद भी हुए, लेकिन टिकैत के उत्कर्ष काल में गैर-दलीयता उनकी सबसे प्रभावी सार्वजनिक पहचान थी।

16 किसान को ‘वोट’ से ‘दबाव समूह’ में बदलना

टिकैत आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक योगदान शायद यही था कि उसने किसान को केवल चुनावी मतदाता के रूप में देखने से इनकार किया।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसान बड़ी मतदाता आबादी था। राजनीतिक दल चुनाव के समय उसकी मांगों की चर्चा करते थे।

BKU ने कहा कि किसान को पांच वर्ष में एक बार वोट देने तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

यदि गन्ने का मूल्य कम हो तो संगठित हो।

यदि प्रशासन अन्याय करे तो पंचायत बुलाए।

इस प्रकार किसान एक स्थायी राजनीतिक दबाव समूह में परिवर्तित होने लगा।

17 ‘किसान वर्ग’ की व्यापक अवधारणा

क्या यह वास्तव में सभी किसानों का आंदोलन था?

अध्याय 3

करमूखेड़ी बिजलीघर आंदोलन, 1987

महेंद्र सिंह टिकैत और भारतीय किसान यूनियन के इतिहास में करमूखेड़ी बिजलीघर आंदोलन वह निर्णायक मोड़ था जिसने एक अपेक्षाकृत स्थानीय किसान संगठन को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की बड़ी जनशक्ति में बदल दिया। बिजली दरों, नलकूपों और ग्रामीण विद्युत आपूर्ति से जुड़ी शिकायतें पहले से मौजूद थीं, लेकिन 1987 में शामली क्षेत्र के करमूखेड़ी बिजलीघर पर हुआ संघर्ष इन आर्थिक शिकायतों को व्यापक राजनीतिक चुनौती में बदल गया।

यहीं पहली बार यह स्पष्ट हुआ कि टिकैत केवल पंचायतों में लोकप्रिय ग्रामीण नेता नहीं हैं; वे हजारों किसानों को लंबे समय तक संगठित रख सकते हैं, प्रशासनिक दबाव का सामना कर सकते हैं और पुलिस गोलीबारी के बाद भी आंदोलन को विखरने से बचा सकते हैं।

करमूखेड़ी इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसके बाद किसान राजनीति की भाषा बदल गई। बिजली का बिल अब केवल विभागीय शिकायत नहीं रहा; वह किसान आय, कृषि लागत और राज्य की आर्थिक नीति का प्रश्न बन गया।

1 आंदोलन की पृष्ठभूमि : नलकूप और बिजली

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हरित क्रांति के बाद विद्युत चालित नलकूप तेजी से बढ़े थे। गन्ना और गेहूं जैसी फसलों के लिए नियमित सिंचाई आवश्यक थी। नहरें महत्वपूर्ण थीं, लेकिन निजी नलकूप किसान को समय पर पानी उपलब्ध कराने का अधिक नियंत्रण देते थे।

इसलिए बिजली कृषि उत्पादन का केंद्रीय निवेश बन चुकी थी।

जैसे-जैसे किसान बिजली पर निर्भर हुआ, बिजली दर, आपूर्ति, कनेक्शन, बकाया और दंड शुल्क भी राजनीतिक प्रश्न बनने लगे।

1980 के दशक के मध्य में किसानों में यह भावना मजबूत थी कि एक तरफ कृषि उपज का मूल्य पर्याप्त तेजी से नहीं बढ़ रहा, दूसरी तरफ बिजली और दूसरे कृषि निवेश महंगे होते जा रहे हैं।

टिकैत ने इस असंतोष को बहुत जल्दी पहचाना।

2 ट्यूबवेल बिजली दरों में वृद्धि

भारतीय किसान यूनियन के आरंभिक आंदोलन का मुख्य मुद्दा कृषि नलकूपों की बढ़ी हुई बिजली दरें थीं। उपलब्ध विवरण बताते हैं कि दिसंबर 1986 से ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस प्रश्न पर किसान लामबंदी शुरू हो चुकी थी। कुछ स्रोत करमूखेड़ी बिजलीघर घेराव को 27 जनवरी 1987 से शुरू मानते हैं, जबकि एक बाद की स्थानीय समाचार रिपोर्ट इसे 1 मार्च 1987 के संघर्ष से जोड़ती है। इस तारीख संबंधी असंगति के बावजूद इस बात पर पर्याप्त सहमति है कि 1987 के शुरुआती महीनों में करमूखेड़ी का संघर्ष BKU का पहला बड़ा टकराव बना।

यह तथ्यात्मक अंतर शोध की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसलिए करमूखेड़ी की विस्तृत समयरेखा तैयार करते समय समकालीन प्रशासनिक अभिलेख, स्थानीय समाचार-पत्र और BKU के मूल दस्तावेज प्राथमिकता से देखे जाने चाहिए।

3 करमूखेड़ी बिजलीघर क्यों चुना गया?

बिजलीघर को आंदोलन स्थल बनाना केवल प्रतीकात्मक कदम नहीं था।

यदि समस्या बिजली की दर और आपूर्ति है, तो आंदोलन भी उसी तंत्र के केंद्र पर होना चाहिए—यह टिकैत की आंदोलन शैली का प्रारंभिक संकेत था।

बाद में यही शैली मेरठ कमिश्नरी, चीनी मिलों, थानों, सरकारी कार्यालयों और दिल्ली के बोट क्लब तक दिखाई दी।

टिकैत का आंदोलन अक्सर सीधे उस प्रशासनिक या आर्थिक संस्था को घेरता था जिसे किसान अपनी समस्या के लिए जिम्मेदार मानता था।

4 हजारों किसानों का जमावड़ा

करमूखेड़ी बिजलीघर पर हजारों किसान इकट्ठे हुए। वे केवल प्रदर्शन करके लौटने नहीं आए थे; उन्होंने वहां डेरा डालने की रणनीति अपनाई।

यही वह शैली थी जो आगे चलकर BKU की पहचान बनी।

किसान अपने साथ खाने-पीने की सामग्री लाते।

प्रशासन इंतजार करता कि भीड़ थककर वापस चली जाएगी, लेकिन किसान टिके रहते।

करमूखेड़ी ने पहली बार प्रशासन को यह अहसास कराया कि यह सामान्य कुछ घंटों का विरोध प्रदर्शन नहीं है।

5 11 सूत्रीय मांगपत्र

कुछ संगठनात्मक विवरणों में करमूखेड़ी आंदोलन को राज्य सरकार पर 11 सूत्रीय मांगपत्र स्वीकार कराने के दबाव से जोड़ा गया है। इसमें बिजली की बढ़ी हुई दरें प्रमुख मुद्दा थीं। बिजली बिलों, बकाया और दंडात्मक शुल्क से संबंधित राहत की मांग भी प्रमुख थी।

यहां आंदोलन की प्रकृति को समझना जरूरी है।

मांगें क्रांतिकारी राजनीतिक व्यवस्था परिवर्तन की नहीं थीं।

वे सीधे किसान की खेती की अर्थव्यवस्था से जुड़ी थीं।

यही नए किसान आंदोलन की विशिष्टता थी।

6 प्रशासन का शुरुआती रुख

प्रशासन ने किसानों को धरना समाप्त करने के लिए समझाने और हटाने का प्रयास किया।

लेकिन किसान टिकैत के नेतृत्व में डटे रहे।

यदि वह तुरंत मांगें मानती है तो किसान संगठन की शक्ति बढ़ती है।

यदि वह बल प्रयोग करती है तो आंदोलन और व्यापक हो सकता है।

करमूखेड़ी में अंततः दूसरा रास्ता अपनाया गया और स्थिति हिंसक टकराव में बदल गई।

7 पुलिस और किसानों के बीच टकराव

उपलब्ध विवरणों के अनुसार पुलिस और किसानों के बीच गंभीर झड़प हुई। कुछ रिपोर्टें बताती हैं कि किसानों की ओर से पुलिस वाहनों और अग्निशमन वाहन को भी आग लगाए जाने जैसी हिंसक घटनाएं हुईं। एक पीएसी कर्मी की मृत्यु का उल्लेख भी मिलता है। इसके बाद पुलिस ने गोली चलाई।

इसलिए इस घटना को केवल एकतरफा शांतिपूर्ण धरने पर अचानक गोलीबारी के रूप में प्रस्तुत करना पर्याप्त नहीं होगा।

अधिक संतुलित ऐतिहासिक चित्र यह है कि आंदोलन गंभीर पुलिस–किसान टकराव में बदल गया, हिंसा हुई और अंततः पुलिस गोलीबारी में किसान मारे गए।

8 जयपाल और अकबर अली की मृत्यु

कई स्रोत इस बात पर सहमत हैं कि पुलिस गोलीबारी में दो किसान मारे गए—

इन दोनों नामों का बाद की BKU स्मृति में विशेष महत्व हो गया।

उनकी मृत्यु ने आंदोलन को केवल बिजली दरों की लड़ाई नहीं रहने दिया। अब इसके साथ किसान सम्मान, पुलिस दमन और शहादत का भाव भी जुड़ गया।

यहीं टिकैत के आंदोलन की भावनात्मक शक्ति कई गुना बढ़ी।

9 हिंदू–मुस्लिम किसान एकता का प्रतीक

जयपाल सिंह और अकबर अली—दो अलग धार्मिक समुदायों से आने वाले किसानों की एक ही आंदोलन में मृत्यु ने BKU के किसान एकता के संदेश को गहरा प्रतीकात्मक अर्थ दिया।

कुछ बाद के विवरणों में “हर-हर महादेव” और “अल्लाह-हु-अकबर” जैसे संयुक्त नारों का उल्लेख मिलता है। इसे सावधानी से ऐतिहासिक स्रोतों की रोशनी में पढ़ना चाहिए, लेकिन इतना स्पष्ट है कि करमूखेड़ी की स्मृति को हिंदू-मुस्लिम किसान एकता के प्रतीक के रूप में भी प्रस्तुत किया गया।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति के दीर्घकालीन अध्ययन में यह बिंदु अत्यंत महत्वपूर्ण है।

1980 के दशक में कृषि हित कई अवसरों पर धार्मिक पहचान से ऊपर साझा राजनीतिक पहचान बना सके।

10 गोलीबारी के बाद भी आंदोलन नहीं टूटा

सामान्यतः पुलिस गोलीबारी किसी नए संगठन को तोड़ सकती थी।

किसानों की मृत्यु ने टिकैत की राजनीतिक प्रतिष्ठा बढ़ा दी।

उन्होंने आंदोलन तत्काल समाप्त नहीं किया।

इसी क्षण किसान समुदाय में यह धारणा मजबूत हुई कि यह नेतृत्व प्रशासनिक दबाव या गोलीबारी के बाद पीछे हटने वाला नहीं है।

यही टिकैत के लिए निर्णायक परीक्षा थी।

11 शवों को लेकर संघर्ष और आंदोलन की नैतिक शक्ति

कई वर्णनों में उल्लेख मिलता है कि किसानों ने मृतकों के शव तुरंत प्रशासन को नहीं सौंपे और घटना को किसान सम्मान के प्रश्न के रूप में उठाया। बाद में मृत किसानों की अस्थियों को शुक्रताल ले जाने की यात्रा ने भी बड़ी जनभागीदारी आकर्षित की।

इन घटनाओं ने आंदोलन को प्रशासनिक विवाद से सामाजिक शोक और सामूहिक प्रतिरोध में बदल दिया।

शहादत की स्मृति किसान लामबंदी का नैतिक स्रोत बन गई।

12 अस्थि कलश यात्रा और जनसमर्थन

शुक्रताल की ओर निकली अस्थि यात्रा का उल्लेख अनेक बाद के स्रोतों में बड़े किसान जमावड़े के रूप में मिलता है। भीड़ की वास्तविक संख्या की विश्वसनीय स्वतंत्र पुष्टि कठिन है, इसलिए अतिरंजित आंकड़ों से बचना चाहिए।

लेकिन इतना स्पष्ट है कि इस यात्रा ने टिकैत के प्रभाव को करमूखेड़ी के स्थानीय क्षेत्र से बाहर फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अब लोग केवल बिजली दर की शिकायत नहीं सुन रहे थे।

वे एक ऐसे किसान नेतृत्व को देख रहे थे जिसने गोलीबारी के बाद भी संघर्ष जारी रखा।

13 किसान अस्मिता का निर्माण

करमूखेड़ी आंदोलन के बाद टिकैत की राजनीति में “किसान अस्मिता” का तत्व अधिक स्पष्ट हुआ।

उसमें यह भावना भी शामिल थी कि प्रशासन किसान के साथ अपमानजनक व्यवहार नहीं कर सकता।

पुलिस किसान को मनमाने ढंग से नहीं पीट सकती।

बिजली विभाग उसे केवल राजस्व वसूली का साधन नहीं समझ सकता।

सरकार उसकी लागत और आय की अनदेखी नहीं कर सकती।

टिकैत की भाषा में किसान आर्थिक उत्पादक भी था और सम्मान का अधिकारी नागरिक भी।

14 टिकैत की नेतृत्व शैली की पहली बड़ी परीक्षा

करमूखेड़ी ने टिकैत के नेतृत्व की कुछ मूल विशेषताएं स्थापित कर दीं।

दूसरी—वे ग्रामीण सामाजिक नेटवर्क से तेजी से बड़ी भीड़ जुटा सकते थे।

तीसरी—वे गोलीबारी जैसी गंभीर घटना के बाद भी संगठन को नियंत्रण में रख सकते थे।

चौथी—वे आंदोलन को जाति और धर्म से ऊपर किसान पहचान देने का प्रयास कर सकते थे।

पांचवीं—वे प्रशासन के साथ सीधे शक्ति-संतुलन की राजनीति कर सकते थे।

यही क्षमताएं अगले दो वर्षों में उन्हें राष्ट्रीय किसान नेता बनाने वाली थीं।

15 पंचायत आधारित निर्णय

करमूखेड़ी के बाद आंदोलन का भविष्य भी पंचायतों के माध्यम से तय किया गया।

बाद के विवरणों के अनुसार 1 अप्रैल 1987 के आसपास एक बड़ी सर्वखाप पंचायत हुई, जिसमें यह भावना सामने आई कि स्थानीय प्रशासन किसान प्रश्नों का समाधान नहीं कर रहा और संघर्ष को अधिक ऊंचे प्रशासनिक स्तर तक ले जाना चाहिए।

इससे मेरठ कमिश्नरी को भविष्य के आंदोलन के केंद्र के रूप में देखने की दिशा बनी।

16 सरकार की आंशिक प्रतिक्रिया

कुछ विवरणों के अनुसार बाद में अधिकारियों ने किसानों की मांगों पर बातचीत की और बिजली की बढ़ी दरों तथा लंबित बिलों पर लगाए गए कुछ दंडों से राहत के उपाय हुए। हालांकि अलग-अलग स्रोत आंदोलन के परिणामों का मूल्यांकन अलग तरह से करते हैं—कुछ इसे आंशिक सफलता मानते हैं, जबकि अन्य तत्काल ठोस परिणाम सीमित बताते हैं।

इसलिए करमूखेड़ी की सफलता को केवल सरकारी रियायतों से नहीं मापा जाना चाहिए।

उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि राजनीतिक थी—

17 करमूखेड़ी के बाद संगठन का तेज विस्तार

आंदोलन से पहले BKU पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सीमित क्षेत्रों में प्रभाव रखता था।

इसके बाद उसका नाम तेजी से फैलने लगा।

गांवों में संगठन की शाखाएं और संपर्क मजबूत हुए।

किसानों ने महसूस किया कि सामूहिक दबाव प्रशासन को चुनौती दे सकता है।

टिकैत की पंचायतों में भीड़ बढ़ने लगी।

उनका नाम मुजफ्फरनगर और शामली से निकलकर मेरठ मंडल और उससे बाहर तक पहुंचने लगा।

18 स्थानीय चौधरी से जननेता

करमूखेड़ी से पहले महेंद्र सिंह टिकैत की पहचान मुख्यतः सिसौली, बालियान खाप और आसपास के किसान क्षेत्र तक सीमित थी।

करमूखेड़ी के बाद उनकी पहचान बदल गई।

अब वे केवल किसी खाप के चौधरी नहीं थे।

वे ऐसे नेता थे जिनकी आवाज पर अलग-अलग गांवों और बिरादरियों के किसान जुट सकते थे।

यही संक्रमण उन्हें आगे चलकर “बाबा टिकैत” की व्यापक किसान छवि तक ले गया।

19 किसान नेतृत्व का खाली होता राष्ट्रीय स्थान

1987 का वर्ष किसान राजनीति के लिए एक और कारण से महत्वपूर्ण था।

29 मई 1987 को चौधरी चरण सिंह का निधन हुआ।

चरण सिंह लंबे समय से उत्तर भारतीय किसान राजनीति के सबसे बड़े प्रतीक थे। उनके निधन से राजनीतिक किसान नेतृत्व में एक बड़ा शून्य पैदा हुआ।

टिकैत ने चरण सिंह की जगह किसी चुनावी दल में नहीं ली, लेकिन उसी सामाजिक क्षेत्र में एक नया गैर-दलीय किसान नेतृत्व तेजी से उभरने लगा।

करमूखेड़ी ने इस संक्रमण की आधारभूमि तैयार कर दी थी।

20 करमूखेड़ी और ‘नए किसान आंदोलन’ का चरित्र

करमूखेड़ी को व्यापक भारतीय संदर्भ में देखें तो यह 1980 के दशक के नए किसान आंदोलन की एक आदर्श घटना थी।

यह भूमि पुनर्वितरण का संघर्ष नहीं था।

यह जमींदारी उन्मूलन का संघर्ष नहीं था।

यह मुख्यतः उत्पादन लागत और कृषि मूल्य व्यवस्था से जुड़ा संघर्ष था।

लेकिन बिजली, खाद, पानी और दूसरी लागत बढ़ रही है।

इसलिए मेरी आर्थिक शर्तें न्यायपूर्ण होनी चाहिए।

21 आंदोलन की सीमाएं

करमूखेड़ी के ऐतिहासिक महत्व के साथ उसकी सीमाओं को भी समझना जरूरी है।

यह आंदोलन मुख्यतः भूमि रखने वाले कृषकों की समस्याओं से जुड़ा था।

भूमिहीन कृषि मजदूरों की मजदूरी, भूमि अधिकार या सामाजिक उत्पीड़न इसके केंद्रीय विषय नहीं थे।

दूसरे, पुलिस–किसान टकराव में हिंसा हुई, जिससे यह प्रश्न भी उठता है कि बड़े जनांदोलन को अनुशासित रखना कितना कठिन होता है।

तीसरे, तत्काल आर्थिक उपलब्धियां आंदोलन की प्रतीकात्मक राजनीतिक उपलब्धियों जितनी स्पष्ट नहीं थीं।

फिर भी इन सीमाओं के बावजूद इसका प्रभाव अत्यंत व्यापक था।

22 करमूखेड़ी की ऐतिहासिक विरासत

करमूखेड़ी ने भारतीय किसान यूनियन को चार चीजें दीं—

और महेंद्र सिंह टिकैत के रूप में स्वीकार्य जननेता।

इसके बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सरकार किसी बड़े किसान निर्णय को BKU की संभावित प्रतिक्रिया से पूरी तरह अलग रखकर नहीं देख सकती थी।

किसानों को भी अपनी सामूहिक शक्ति का पहला बड़ा अनुभव मिल चुका था।

निष्कर्ष : जहां टिकैत का वास्तविक राजनीतिक जन्म हुआ

महेंद्र सिंह टिकैत का जन्म 1935 में सिसौली में हुआ था, लेकिन किसान नेता के रूप में उनका वास्तविक राजनीतिक जन्म करमूखेड़ी में हुआ।

यहां पहली बार उनकी तीन शक्तियां एक साथ दिखाई दीं—

ग्रामीण सामाजिक प्रतिष्ठा, किसान लामबंदी की क्षमता और राज्य सत्ता का सामना करने का साहस।

बिजली की दरों से शुरू हुआ संघर्ष गोलीबारी तक पहुंचा।

जयपाल सिंह और अकबर अली की मृत्यु ने आंदोलन को शहादत का प्रतीक दिया।

पुलिस–किसान हिंसा ने संघर्ष की गंभीरता दिखाई।

और आंदोलन के बाद भी किसानों का टिकैत के साथ बने रहना इस बात का प्रमाण था कि अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नया किसान नेतृत्व स्थापित हो चुका था।

करमूखेड़ी की सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि कोई एक बिजली दर कम करवाना नहीं थी।

उसने किसान को यह अनुभव कराया कि हजारों कृषक यदि एक साथ बैठ जाएं, अपने भोजन और संसाधनों के साथ लंबे संघर्ष के लिए तैयार हों और पंचायत के सामूहिक निर्णय पर टिके रहें, तो प्रशासन के लिए उन्हें अनदेखा करना कठिन हो जाता है।

यही सूत्र अगले वर्ष कहीं अधिक विशाल रूप में सामने आया।

अब आंदोलन बिजलीघर की सीमा पार कर मेरठ कमिश्नरी की ओर बढ़ने वाला था।

अगला खंड

खंड 4 — मेरठ कमिश्नरी घेराव, 1988 : 35 सूत्रीय मांगपत्र, 24 दिन का किसान पड़ाव, ट्रैक्टर–ट्रॉली और सामुदायिक रसोई, प्रशासन से टकराव, आंदोलन की उपलब्धियां–सीमाएं और महेंद्र सिंह टिकैत का पश्चिमी उत्तर प्रदेश से राष्ट्रीय किसान राजनीति की ओर उभार।

अध्याय 4

मेरठ कमिश्नरी घेराव, 1988

महेंद्र सिंह टिकैत और भारतीय किसान यूनियन के इतिहास में 27 जनवरी से 19 फरवरी 1988 तक चला मेरठ कमिश्नरी घेराव वह आंदोलन था जिसने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की किसान शक्ति को पहली बार इतने बड़े पैमाने पर सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया कि राज्य सरकार के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति को भी उसका संज्ञान लेना पड़ा। आंदोलन मूलतः चार दिनों के लिए प्रस्तावित था, लेकिन किसानों की असाधारण भागीदारी के कारण वह 24 दिन चला। समकालीन और अकादमिक विवरण इसकी अवधि को कभी 24 और कभी 25 दिन लिखते हैं; 27 जनवरी से 19 फरवरी की गणना में दोनों प्रकार की अभिव्यक्ति मिलती है।

करमूखेड़ी ने टिकैत को किसान नेता बनाया था। मेरठ ने उन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सीमाओं से बाहर पहचान दिलाई।

यह केवल धरना नहीं था। हजारों किसानों ने मेरठ के प्रशासनिक केंद्र को लगभग एक अस्थायी गांव में बदल दिया। ट्रैक्टर-ट्रॉलियां थीं, चूल्हे थे, राशन था, हुक्का था, महिलाओं की भागीदारी थी और आसपास के गांवों से भोजन की निरंतर आपूर्ति थी। आंदोलन ने पहली बार दिखाया कि ग्रामीण समाज अपनी उत्पादन और सामुदायिक व्यवस्था को आंदोलन स्थल पर स्थानांतरित करके राज्य से दीर्घकालीन राजनीतिक सौदेबाजी कर सकता है।

1 करमूखेड़ी से मेरठ तक

1987 के करमूखेड़ी संघर्ष के बाद BKU की प्रतिष्ठा तेजी से बढ़ी थी। बिजली दरों का प्रश्न समाप्त नहीं हुआ था। उसके साथ गन्ने का मूल्य, बिजली की नियमित आपूर्ति, बकाया बिल, ऋण और कृषि लागत जैसे मुद्दे जुड़ते गए।

1987 के दौरान टिकैत ने गांवों का दौरा करके संगठन को मजबूत किया। अक्टूबर 1987 की एक पंचायत में किसानों को सरकारी देयों का भुगतान रोकने की सलाह दी गई। इसके जवाब में सरकार ने बकाया रखने वाले किसानों के बिजली कनेक्शन काटने की कार्रवाई तेज करने का संकेत दिया। अकादमिक अध्ययन के अनुसार इसी पृष्ठभूमि में BKU पंचायत ने 27 जनवरी 1988 को मेरठ मंडलायुक्त कार्यालय के घेराव का निर्णय किया।

इस बार निशाना स्थानीय बिजलीघर नहीं था।

अब किसान सीधे मंडलीय प्रशासन के दरवाजे पर पहुंचने वाला था।

2 35 सूत्रीय मांगपत्र

मेरठ आंदोलन को सामान्यतः BKU के 35 सूत्रीय मांगपत्र से जोड़ा जाता है। इन मांगों का केंद्रीय स्वर कृषि को लाभकारी बनाने और किसान पर सरकारी देयों का बोझ घटाने का था।

प्रमुख मांगों में कृषि बिजली की दरों में राहत, बकाया बिजली बिलों से संबंधित रियायत, नियमित विद्युत आपूर्ति, गन्ने के मूल्य में वृद्धि, कृषि ऋण से राहत और कृषि उपज को लाभकारी मूल्य दिलाने जैसे प्रश्न शामिल थे।

विशेष रूप से गन्ने का सरकारी मूल्य लगभग 27 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़ाकर 35 रुपये प्रति क्विंटल करने की मांग का उल्लेख मिलता है।

बिजली के संबंध में मांग केवल सस्ती बिजली की नहीं थी। बाद के अकादमिक अध्ययन में BKU की मांगों में निश्चित और कम कृषि विद्युत दर, बकाया में राहत, लगभग बारह घंटे विश्वसनीय आपूर्ति, बिल भुगतान को सुविधाजनक बनाना और खराब ट्रांसफार्मरों की समयबद्ध मरम्मत जैसे मुद्दों का उल्लेख मिलता है।

इससे स्पष्ट होता है कि आंदोलन केवल “बिल कम करो” तक सीमित नहीं था।

वह पूरी कृषि उत्पादन लागत और ग्रामीण आधारभूत व्यवस्था को राजनीतिक मुद्दा बना रहा था।

3 प्रशासन की तैयारी

सरकार को पहले से सूचना थी कि बड़ी संख्या में किसान मेरठ पहुंच सकते हैं।

समकालीन रिपोर्ट के अनुसार प्रशासन ने शुरुआत में भीड़ को लगभग 15–20 हजार के स्तर पर आंका था, जबकि खुफिया सूचनाओं में एक लाख से अधिक किसानों के आने की आशंका भी व्यक्त की गई थी। मेरठ में धारा 144 लगाई गई, ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के शहर में प्रवेश पर रोक लगाने के प्रयास हुए और बड़ी संख्या में पीएसी बल तैनात किया गया।

महेंद्र सिंह टिकैत की गिरफ्तारी की योजना तक बनाई गई। समकालीन पत्रिका Imprint ने इसे प्रशासन के भीतर प्रयुक्त नाम “ऑपरेशन टिकैत” से दर्ज किया। लेकिन गिरफ्तारी की खबर फैलने से परिस्थितियां और विस्फोटक होने की आशंका पैदा हुई।

यह अपने आप में टिकैत की बढ़ती शक्ति का संकेत था।

एक वर्ष पहले तक प्रशासन उन्हें स्थानीय किसान नेता समझ सकता था।

अब उनकी गिरफ्तारी स्वयं कानून-व्यवस्था का बड़ा संकट पैदा कर सकती थी।

4 27 जनवरी : मेरठ की ओर किसानों का प्रवाह

27 जनवरी 1988 की सुबह से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों से किसान मेरठ पहुंचने लगे।

एक विस्तृत शोध में दर्ज है कि टिकैत स्वयं सिसौली से लगभग 300 ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के काफिले के साथ चले और रास्ते में किसानों का कारवां बढ़ता गया। उसी अध्ययन के अनुसार दोपहर तक लगभग 70 हजार किसान कमिश्नरी क्षेत्र में पहुंच चुके थे और रात तक संख्या लगातार बढ़ती रही।

दूसरे समकालीन स्रोत इससे कहीं बड़ी संख्या बताते हैं। Imprint की मार्च 1988 की रिपोर्ट ने टिकैत के पहुंचने तक संख्या ढाई लाख से ऊपर बताई।

अलग-अलग स्रोतों में संख्या का इतना अंतर होने के कारण किसी एक विशाल आंकड़े को निर्विवाद तथ्य मानना उचित नहीं होगा।

लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रशासन की अपेक्षा से कहीं अधिक किसान मेरठ पहुंचे और इसने आंदोलन का चरित्र बदल दिया।

5 चार दिन का आंदोलन 24 दिन में बदला

शुरुआती योजना लगभग चार दिन का शांतिपूर्ण धरना करने की थी।

लेकिन किसानों का उत्साह और लगातार आती भीड़ देखकर टिकैत ने आंदोलन जारी रखने का फैसला किया। अकादमिक अध्ययन इसे स्पष्ट रूप से चार दिन के प्रस्तावित आंदोलन से 24 दिन के धरने में परिवर्तन बताता है।

यहीं टिकैत की नेतृत्व शैली दिखाई देती है।

उन्होंने पहले से निर्धारित कार्यक्रम को यांत्रिक रूप से लागू करने के बजाय जमीन पर उपस्थित जनशक्ति को देखा।

आसपास के गांव भोजन पहुंचाने को तैयार थे।

6 कमिश्नरी के सामने बस गया गांव

मेरठ आंदोलन का सबसे असाधारण दृश्य उसका ग्रामीण स्वरूप था।

किसान ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में आए थे। इन्हीं वाहनों ने परिवहन, सामान ढोने और कई मामलों में रात बिताने का साधन उपलब्ध कराया।

आसपास के गांवों से आटा, दाल, दूध, गुड़, सब्जियां और दूसरी खाद्य सामग्री पहुंचने लगी। BKU ने सामुदायिक भोजन की व्यवस्था की।

किसान समूहों में बैठकर पंचायत करने लगे।

इस प्रकार प्रशासनिक परिसर के आसपास एक अस्थायी ग्रामीण संसार खड़ा हो गया।

यही दृश्य कुछ महीनों बाद दिल्ली के बोट क्लब पर और अधिक विशाल रूप में दिखाई देने वाला था।

7 ट्रैक्टर-ट्रॉली : खेती के साधन से राजनीतिक हथियार तक

मेरठ आंदोलन ने ट्रैक्टर को किसान राजनीति का नया प्रतीक बना दिया।

हरित क्रांति में ट्रैक्टर कृषि आधुनिकीकरण का प्रतीक था।

टिकैत आंदोलन में वही ट्रैक्टर राजनीतिक लामबंदी का वाहन बन गया।

भोजन बनाने का सामान लाया जा सकता था।

धरना लंबा चले तो उसी के आसपास अस्थायी जीवन बनाया जा सकता था।

इस प्रकार आधुनिक कृषि तकनीक ने अनजाने में किसान आंदोलन की गतिशीलता भी बढ़ा दी।

दशकों बाद 2020–21 के किसान आंदोलन में दिल्ली की सीमाओं पर ट्रैक्टर-ट्रॉली का यही रूप और अधिक विकसित अवस्था में दिखाई दिया।

8 आंदोलन की आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था

किसी भी लंबे आंदोलन के सामने सबसे बड़ा प्रश्न होता है—लोग खाएंगे कहां से?

BKU ने इसका समाधान गांवों की सामुदायिक अर्थव्यवस्था में खोजा।

किसानों से कहा गया कि वे अपने संसाधनों के साथ आएं। आसपास के गांव नियमित सामग्री भेजते रहे। इससे संगठन किसी बड़े बाहरी वित्तीय स्रोत पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहा।

जिस किसान के घर गेहूं है, दूध है, गुड़ है और ट्रैक्टर है, वह राजनीतिक धरने के लिए भी इन संसाधनों का उपयोग कर सकता है।

कृषि उत्पादन स्वयं आंदोलन को टिकाए रखने का साधन बन गया।

9 महिलाओं की भागीदारी

मेरठ आंदोलन में किसान परिवारों की महिलाओं की भी उल्लेखनीय भागीदारी दर्ज की गई है।

वे केवल भोजन तैयार करने तक सीमित नहीं थीं। अध्ययन बताते हैं कि महिलाएं दिन-रात धरना स्थल पर रहीं, नारे लगाए और लोकगीतों के माध्यम से अपना असंतोष व्यक्त किया।

यह पहलू महत्वपूर्ण है क्योंकि BKU की सार्वजनिक छवि अक्सर पुरुष किसान और खाप संरचना के संदर्भ में देखी जाती है।

लेकिन बड़े किसान आंदोलनों की वास्तविक सामाजिक संरचना परिवार और गांव दोनों पर आधारित थी।

10 मुस्लिम किसान को पंचायत की अध्यक्षता

मेरठ आंदोलन का एक महत्वपूर्ण और अक्सर कम चर्चित तथ्य यह है कि टिकैत ने स्थानीय मुस्लिम किसान हाफिज खलील अहमद को विशाल पंचायत की अध्यक्षता करने के लिए कहा था।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में BKU उस समय हिंदू और मुस्लिम कृषकों की साझा आर्थिक पहचान पर जोर दे रही थी।

गन्ने का मूल्य हिंदू-मुस्लिम देखकर निर्धारित नहीं होता।

सिंचाई संकट दोनों को प्रभावित करता है।

इसी आर्थिक समानता को टिकैत किसान एकता की राजनीतिक भाषा में बदल रहे थे।

11 राजनीतिक नेताओं के लिए मंच बंद

टिकैत की गैर-दलीयता की वास्तविक परीक्षा मेरठ में हुई।

आंदोलन बड़ा होते ही विभिन्न राजनीतिक नेताओं की दिलचस्पी स्वाभाविक थी।

लेकिन BKU ने मंच को चुनावी नेताओं के कब्जे में जाने से बचाने का प्रयास किया। शोध विवरण के अनुसार शरद जोशी और स्वामी अग्निवेश जैसे गैर-दलीय सार्वजनिक व्यक्तित्वों ने किसानों को संबोधित किया, लेकिन टिकैत ने अजित सिंह जैसे प्रमुख राजनीतिक नेता को मंच से संबोधन की अनुमति नहीं दी।

यह किसी पार्टी की रैली नहीं, किसानों का आंदोलन है।

गैर-दलीयता ने BKU की विश्वसनीयता को बहुत बढ़ाया।

12 प्रशासन बनाम टिकैत : धैर्य की लड़ाई

सरकार की रणनीति का एक महत्वपूर्ण तत्व प्रतीक्षा थी।

प्रशासन को उम्मीद थी कि सर्दी, असुविधा और लंबा समय किसानों को वापस जाने के लिए मजबूर करेगा।

लेकिन BKU की ग्रामीण आपूर्ति व्यवस्था ने यह गणना बिगाड़ दी।

यह आंदोलन धीरे-धीरे मांगों की लड़ाई के साथ धैर्य की लड़ाई भी बन गया—

यहीं टिकैत की रणनीतिक शक्ति सामने आई।

13 कड़ाके की ठंड और किसानों की मृत्यु

जनवरी–फरवरी की कठोर ठंड आंदोलन की बड़ी चुनौती थी।

स्थानीय और बाद के विवरणों में धरना स्थल पर ठंड तथा कठिन परिस्थितियों के कारण कई किसानों की मृत्यु का उल्लेख मिलता है। हालांकि मृतकों की कुल संख्या पर स्रोत एकमत नहीं हैं, इसलिए किसी निश्चित संख्या को बिना प्राथमिक अभिलेखीय पुष्टि के अंतिम तथ्य मानना उचित नहीं होगा।

इन मौतों के बावजूद आंदोलन जारी रहा।

इससे समर्थकों के बीच टिकैत की प्रतिष्ठा और आंदोलन के प्रति भावनात्मक प्रतिबद्धता दोनों बढ़े।

14 किसान की नई सार्वजनिक छवि

मेरठ घेराव ने शहर को एक नया राजनीतिक दृश्य दिखाया।

किसान अब केवल गांव में रहने वाला उत्पादक नहीं था।

वह संगठित होकर शहर के प्रशासनिक केंद्र पर कब्जे जैसा दबाव बना सकता था।

और सबसे महत्वपूर्ण—उसके पास समय था।

यदि खेती की तत्काल आवश्यकता उसे गांव वापस नहीं बुला रही, तो वह सप्ताहों तक आंदोलन कर सकता था।

15 अनुशासन और अहिंसा

मेरठ धरने का अधिकांश हिस्सा उल्लेखनीय रूप से शांतिपूर्ण रहा। एक अकादमिक अध्ययन ने इसकी तुलना संगठनात्मक अनुशासन के संदर्भ में बारदोली सत्याग्रह तक से की है।

इतनी बड़ी भीड़ को लगभग तीन सप्ताह तक नियंत्रित रखना स्वयं BKU की संगठनात्मक क्षमता का प्रमाण था।

टिकैत बार-बार अनुशासन और सामूहिक निर्णय पर जोर देते थे।

लेकिन आंदोलन के अगले चरण में सड़क और रेल अवरोध के दौरान यह अनुशासन पूरी तरह कायम नहीं रह सका।

16 आंदोलन का विस्तार और रजबपुर गोलीकांड

मेरठ धरने के बाद BKU ने आंदोलन को सड़क और रेल अवरोध जैसे कार्यक्रमों तक विस्तारित किया। इसी व्यापक आंदोलन-क्रम में मार्च 1988 में मुरादाबाद क्षेत्र के रजबपुर में पुलिस गोलीबारी हुई, जिसमें पांच किसानों की मृत्यु का उल्लेख मिलता है।

कालक्रम की दृष्टि से इसे मेरठ के 27 जनवरी–19 फरवरी वाले 24-दिवसीय धरने के भीतर मिलाना उचित नहीं है; रजबपुर की घटना 6 मार्च 1988 की बाद की घटना थी।

यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कई संक्षिप्त विवरण मेरठ आंदोलन और उसके बाद हुए सड़क-रोको संघर्षों को एक ही घटना की तरह प्रस्तुत कर देते हैं।

17 क्या सरकार ने मांगें मान ली थीं?

मेरठ आंदोलन के परिणाम को लेकर अक्सर अतिशयोक्ति की जाती है।

समकालीन रिपोर्ट के अनुसार आंदोलन शुरू होने से पहले प्रशासन ने BKU को बताया था कि 35 में से लगभग 13 गैर-वित्तीय या गैर-राजनीतिक मांगों को स्वीकार किया जा चुका है, जबकि राज्य स्तर की मांगें मुख्यमंत्री के विचार के लिए भेजी गई थीं। टिकैत इससे संतुष्ट नहीं हुए और धरना जारी रखा।

24 दिन बाद आंदोलन किसी व्यापक निर्णायक समझौते के साथ समाप्त नहीं हुआ।

अकादमिक अध्ययन भी इसे तत्काल ठोस उपलब्धियों की दृष्टि से सीमित मानता है।

इसलिए यह कहना कि मेरठ में सरकार ने BKU की सभी 35 मांगें स्वीकार कर ली थीं, ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा।

18 फिर आंदोलन सफल कैसे था?

यदि सभी मांगें नहीं मानी गईं, तो मेरठ को ऐतिहासिक सफलता क्यों माना जाता है?

क्योंकि जनांदोलन की सफलता केवल तत्काल सरकारी आदेश से नहीं मापी जाती।

मेरठ ने BKU को अभूतपूर्व संगठनात्मक प्रतिष्ठा दी।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में संगठन का नेटवर्क मजबूत किया।

किसान मुद्दों को राष्ट्रीय समाचार बनाया।

और यह सिद्ध किया कि BKU लाखों की संभावित ग्रामीण जनशक्ति को लंबे समय तक संगठित कर सकती है।

इस अर्थ में इसकी राजनीतिक सफलता आर्थिक सफलता से कहीं बड़ी थी।

19 ‘टिकैत मॉडल’ का जन्म

मेरठ में किसान आंदोलन का एक नया मॉडल पूरी तरह स्पष्ट हुआ—

और समझौता होने तक टिके रहने की घोषणा।

यह मॉडल इतना प्रभावशाली था कि बाद के अनेक किसान आंदोलनों में इसके तत्व दिखाई देते हैं।

20 किसान आंदोलन और मीडिया

मेरठ की विशालता ने टिकैत को समाचार माध्यमों में राष्ट्रीय पहचान दिलानी शुरू कर दी।

ग्रामीण वेशभूषा में हुक्का पीता किसान नेता, उसके आसपास हजारों किसान और प्रशासनिक मुख्यालय के सामने बसे अस्थायी गांव का दृश्य अपने आप में शक्तिशाली राजनीतिक संदेश था।

टिकैत की छवि किसी परंपरागत राजनेता जैसी नहीं थी।

यही अंतर उनकी लोकप्रियता का हिस्सा बना।

वे जितने ग्रामीण दिखाई देते थे, उतना ही उनका नेतृत्व “असली किसान” के प्रतिनिधि के रूप में स्थापित होता गया।

21 पश्चिमी उत्तर प्रदेश से बाहर प्रभाव

मेरठ आंदोलन में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अनेक जिलों से किसान पहुंचे। शोध विवरण में मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, बुलंदशहर, अलीगढ़, मथुरा, बिजनौर और मुरादाबाद सहित व्यापक क्षेत्र की भागीदारी दर्ज है।

इससे BKU की भौगोलिक पहुंच सिसौली–मुजफ्फरनगर क्षेत्र से बहुत आगे चली गई।

अब टिकैत को किसी एक जिले या खाप का नेता कहना कठिन था।

22 राष्ट्रीय किसान राजनीति का नया चेहरा

मेरठ के बाद महेंद्र सिंह टिकैत की तुलना देश के दूसरे नए किसान नेताओं से होने लगी।

कर्नाटक में एम. डी. नंजुंडास्वामी थे।

उत्तर भारत में अब टिकैत तेजी से उसी श्रेणी में आ रहे थे।

तीनों के विचार पूरी तरह समान नहीं थे, लेकिन उनकी राजनीति में एक साझा परिवर्तन था—

किसान को स्वतंत्र आर्थिक हित वाले उत्पादक वर्ग के रूप में संगठित करना।

निष्कर्ष : वह धरना जिसने किसान राजनीति का पैमाना बदल दिया

उसकी ऐतिहासिक उपलब्धि कहीं बड़ी थी।

अध्याय 5

दिल्ली बोट क्लब किसान आंदोलन, अक्टूबर 1988

अक्टूबर 1988 का दिल्ली बोट क्लब किसान आंदोलन भारतीय किसान यूनियन और महेंद्र सिंह टिकैत के इतिहास का सबसे निर्णायक क्षण था। करमूखेड़ी ने टिकैत को पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रभावशाली किसान नेता बनाया था, मेरठ कमिश्नरी घेराव ने उनकी संगठनात्मक क्षमता सिद्ध की थी, लेकिन दिल्ली के बोट क्लब पर हुआ विशाल किसान पड़ाव उन्हें राष्ट्रीय किसान राजनीति के अग्रिम पंक्ति के नेता के रूप में स्थापित कर गया।

25 अक्टूबर 1988 से लगभग एक सप्ताह तक राजधानी के हृदय—विजय चौक से इंडिया गेट और बोट क्लब के विस्तृत मैदानों—पर किसानों का अभूतपूर्व जमावड़ा रहा। समकालीन समाचार एजेंसी UPI ने शुरुआती दिनों में एक लाख से अधिक किसानों की उपस्थिति दर्ज की, जबकि बाद की कई रिपोर्टें और संगठनात्मक विवरण पूरे आंदोलन के चरम पर संख्या करीब पांच लाख तक बताते हैं। इसलिए भीड़ की एक निश्चित संख्या पर जोर देने के बजाय यह कहना अधिक तथ्यसम्मत है कि यह उस समय स्वतंत्र भारत की राजधानी में हुए सबसे बड़े किसान प्रदर्शनों में से एक था।

यह आंदोलन केवल संख्याबल का प्रदर्शन नहीं था। उसने राजधानी के सत्ता-क्षेत्र को कुछ दिनों के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों जैसी सामाजिक दुनिया में बदल दिया। ट्रैक्टर-ट्रॉलियां, बैलगाड़ियां, चारपाइयां, हुक्के, पशु, दूध-दही, चूल्हे और सामुदायिक भोजन—सब राजपथ के आसपास दिखाई देने लगे। बाद के विवरणों में भैंसों को वहीं दुहने और किसानों द्वारा अपने पूरे ग्रामीण जीवन को धरना स्थल पर पुनर्स्थापित करने का उल्लेख मिलता है।

यही दृश्य इस आंदोलन की सबसे स्थायी स्मृति बन गया—हुक्का और हुकूमत आमने-सामने थे।

1 मेरठ के बाद दिल्ली क्यों?

जनवरी–फरवरी 1988 का मेरठ कमिश्नरी आंदोलन BKU के लिए बड़ी राजनीतिक सफलता था, लेकिन किसानों की प्रमुख आर्थिक मांगों का स्थायी समाधान नहीं हुआ था।

सितंबर 1988 में सिसौली की मासिक पंचायत में दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर की किसान रैली आयोजित करने का निर्णय लिया गया। एक अकादमिक अध्ययन के अनुसार 17 सितंबर 1988 की पंचायत में 25 अक्टूबर को नई दिल्ली में रैली करने का निर्णय हुआ। बाद में देश के अनेक राज्यों के किसान संगठनों और नेताओं ने इसमें भाग लिया।

अब BKU राज्य सरकार से ऊपर जाकर सीधे केंद्र सरकार पर दबाव बनाना चाहती थी।

2 35 सूत्रीय मांगपत्र

दिल्ली आंदोलन के केंद्र में BKU का 35 सूत्रीय मांगपत्र था।

सभी 35 मांगों की सूची अलग-अलग स्रोतों में समान रूप से उपलब्ध नहीं है, लेकिन केंद्रीय मांगों पर व्यापक सहमति है।

गन्ने और अन्य कृषि उपज का अधिक लाभकारी मूल्य।

बिजली और पानी के बकायों तथा शुल्कों में राहत।

कृषि ऋण का बोझ घटाना या लंबित ऋणों में राहत।

किसानों के लिए ऐसी मूल्य नीति जिसमें कृषि लागत और महंगाई का वास्तविक हिसाब शामिल हो।

UPI की समकालीन रिपोर्टों ने आंदोलन की मुख्य मांगों को स्पष्ट रूप से कम बिजली दर, अधिक कृषि उपज मूल्य और बकाया कृषि ऋणों से राहत के रूप में दर्ज किया।

बाद की रिपोर्टों में गन्ने का बेहतर मूल्य तथा बिजली और पानी के शुल्कों में रियायत 35 सूत्रीय मांगपत्र के केंद्रीय बिंदुओं में गिने गए।

3 किसान दिल्ली की ओर

24 अक्टूबर की रात से ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों से किसान दिल्ली की ओर निकलने लगे।

किसान केवल आंदोलन में शामिल होने नहीं आ रहे थे; वे अपने साथ राशन, बिस्तर और लंबे प्रवास की तैयारी लेकर आ रहे थे। UPI ने 25 अक्टूबर को दर्ज किया कि उत्तर प्रदेश से आने वाले किसानों के काफिले ट्रकों, बसों और ट्रैक्टर से खींची जाने वाली गाड़ियों में भोजन और बिस्तर लेकर दिल्ली पहुंचे थे।

यही मेरठ मॉडल का राष्ट्रीय विस्तार था।

4 एक लाख से पांच लाख तक

आंदोलन की भीड़ के बारे में स्रोतों के आंकड़े अलग-अलग हैं।

25–27 अक्टूबर की समकालीन UPI रिपोर्टें एक लाख से अधिक किसानों का उल्लेख करती हैं।

बाद के Indian Express और अन्य विवरण पूरे सप्ताह में लगभग पांच लाख किसानों के राजधानी के केंद्रीय क्षेत्र में जमा होने की बात करते हैं।

यह अंतर असामान्य नहीं है। बड़े जनांदोलनों में अलग-अलग दिनों की भीड़ बदलती रहती है और आयोजक, पुलिस तथा मीडिया अलग-अलग अनुमान देते हैं।

इतिहास की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य संख्या की अंतिम इकाई नहीं, बल्कि यह है कि किसान जमावड़ा इतना विशाल था कि केंद्र सरकार की प्रस्तावित राजनीतिक रैली तक प्रभावित हो गई।

5 विजय चौक से इंडिया गेट तक किसान

बाद की रिपोर्टों के अनुसार आंदोलन का प्रभाव विजय चौक से इंडिया गेट तक फैले विशाल क्षेत्र पर दिखाई दिया।

यह स्थान प्रतीकात्मक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण था।

प्रधानमंत्री कार्यालय और केंद्रीय मंत्रालय।

टिकैत ने दिल्ली में ऐसा आंदोलन स्थल चुना था जहां किसान की उपस्थिति स्वयं सत्ता के सामने प्रत्यक्ष राजनीतिक संदेश बन जाए।

6 राजधानी में बस गया गांव

दिल्ली के अभिजात प्रशासनिक क्षेत्र में किसानों का ग्रामीण जीवन दिखाई देने लगा।

कुछ रात को खुले मैदान में कंबलों के नीचे सोते।

UPI ने आंदोलन स्थल पर ताश खेलने, हुक्का पीने, बातचीत करने और खुले मैदान में रात बिताने वाले किसानों का विवरण दर्ज किया।

बाद के अकादमिक और पत्रकारिता विवरणों में भैंसों को वहीं दुहने, चारपाइयां लगाने और चूल्हों पर खाना बनाने का उल्लेख मिलता है।

इस अर्थ में बोट क्लब केवल धरना स्थल नहीं था।

वह अस्थायी किसान गणराज्य जैसा दृश्य बन गया था।

7 हुक्का राजनीतिक प्रतीक कैसे बना

महेंद्र सिंह टिकैत की सार्वजनिक छवि हुक्के से गहरे जुड़ी।

राजनीतिक नेता मंच पर कुर्सी पर बैठता था।

टिकैत कई बार किसानों के बीच चारपाई पर बैठकर हुक्का पीते दिखाई देते थे।

यह उनकी ग्रामीण सामाजिक पहचान का हिस्सा था।

दिल्ली आंदोलन में हुक्का एक प्रकार से प्रतीक बन गया—

एक ओर आधुनिक राज्य की नौकरशाही और सत्ता।

इसी विरोधाभास को बाद में पत्रकारिता ने “हुक्का बनाम हुकूमत” जैसे रूपकों में याद किया।

8 भैंस और सत्ता की राजधानी

आंदोलन से जुड़ा एक और प्रसिद्ध दृश्य किसानों द्वारा अपने पशु राजधानी तक लाना था।

बाद के विवरणों में ट्रैक्टरों, भैंसों, बैलगाड़ियों, हल और दूसरे कृषि प्रतीकों से बोट क्लब क्षेत्र भर जाने का उल्लेख मिलता है।

इसका व्यावहारिक कारण था—लंबा पड़ाव।

लेकिन इसका प्रतीकात्मक प्रभाव कहीं बड़ा था।

जिस दिल्ली में कृषि नीति तय होती थी, वहां पहली बार कृषि का वास्तविक सामाजिक संसार उपस्थित था।

जिन किसानों के दूध, अनाज और गन्ने पर शहर निर्भर था, वे स्वयं अपने पशुओं और साधनों के साथ सत्ता के सामने बैठे थे।

9 राजनीतिक दलों को मंच से दूरी

टिकैत इस आंदोलन को किसी विपक्षी दल की रैली बनने देना नहीं चाहते थे।

यह उस समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण था क्योंकि राजीव गांधी सरकार बोफोर्स विवाद और वी. पी. सिंह के विद्रोह के कारण राजनीतिक दबाव में थी।

विपक्ष के लिए किसान आंदोलन सरकार के विरुद्ध स्वाभाविक अवसर था।

लेकिन BKU ने अपनी घोषित गैर-दलीय पहचान बनाए रखने का प्रयास किया। Indian Express के बाद के विवरण ने भी उल्लेख किया कि टिकैत उस समय राजनीतिक नेताओं को मंच अपने कब्जे में नहीं लेने देना चाहते थे।

इस रणनीति से आंदोलन की नैतिक शक्ति बढ़ी।

सरकार उसे आसानी से विपक्षी दलों की साजिश कहकर खारिज नहीं कर सकती थी।

10 राजीव गांधी सरकार पर दबाव

1988 में राजीव गांधी सरकार राजनीतिक रूप से उस स्थिति में नहीं थी जिसमें लाखों ग्रामीण मतदाताओं के असंतोष को आसानी से नजरअंदाज किया जा सके।

बोफोर्स विवाद सरकार की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा चुका था।

वी. पी. सिंह राष्ट्रीय विपक्ष के महत्वपूर्ण चेहरे बन रहे थे।

ऐसी परिस्थिति में राजधानी के केंद्र में किसानों का विशाल धरना कांग्रेस के लिए गंभीर राजनीतिक चुनौती था।

UPI ने भी उस समय लिखा कि किसान प्रश्न राजीव गांधी के लिए राजनीतिक रूप से संवेदनशील था क्योंकि आगामी आम चुनाव से पहले ग्रामीण मतदाताओं को नाराज करना जोखिमपूर्ण था।

11 शुरुआती सरकारी बातचीत

किसानों के दिल्ली पहुंचने के बाद सरकार ने बातचीत शुरू की।

25 अक्टूबर की शाम BKU प्रतिनिधियों ने कपड़ा मंत्री राम निवास मिर्धा और कृषि मंत्रालय से जुड़े राज्य मंत्री श्याम लाल यादव से बातचीत की और अपनी मांगें प्रस्तुत कीं।

लेकिन किसान नेतृत्व तत्काल परिणाम से संतुष्ट नहीं था।

बाद में केंद्रीय गृह मंत्री बूटा सिंह के साथ बातचीत हुई। यह वार्ता भी समाधान तक नहीं पहुंच सकी। UPI की 27 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार बातचीत टूटने के बाद BKU नेतृत्व ने घोषणा की कि अब वे प्रधानमंत्री राजीव गांधी से ही बात करना चाहते हैं।

12 टिकैत और प्रधानमंत्री से बातचीत का प्रश्न

यहां एक लोकप्रिय धारणा की तथ्यात्मक जांच जरूरी है।

कई बाद के वर्णनों में आंदोलन को इस तरह प्रस्तुत किया गया जैसे राजीव गांधी स्वयं टिकैत से बैठकर समझौता कर गए हों।

समकालीन रिपोर्टें अधिक जटिल तस्वीर दिखाती हैं।

BKU प्रधानमंत्री से सीधे बातचीत मांग रही थी। सरकार के मंत्री और मध्यस्थ टिकैत से संपर्क कर रहे थे। 30 अक्टूबर को राजीव गांधी सरकार के महत्वपूर्ण राजनीतिक सहयोगी और केंद्रीय राज्य मंत्री राजेश पायलट ने टिकैत से लगभग डेढ़ घंटे बातचीत की।

इसलिए यह कहना अधिक सुरक्षित है कि आंदोलन के दौरान राजीव गांधी सरकार और BKU के बीच कई स्तरों पर वार्ताएं हुईं; प्रधानमंत्री से प्रत्यक्ष निर्णायक औपचारिक समझौते का स्पष्ट समकालीन प्रमाण उतना मजबूत नहीं है जितना लोकप्रिय कथाओं में दिखाई देता है।

13 रात का दबाव

सरकार और प्रशासन ने किसानों को लंबे समय तक टिके रहने से रोकने के लिए विभिन्न प्रकार के दबाव बनाए।

बाद के प्रत्यक्षदर्शी और पत्रकारिता विवरण बताते हैं कि रात में तेज संगीत बजाया गया, पानी की उपलब्धता सीमित करने का प्रयास हुआ और भोजन की आपूर्ति बाधित करने जैसी रणनीतियां अपनाई गईं।

लेकिन मेरठ की तरह दिल्ली में भी किसान अपेक्षाकृत आत्मनिर्भर थे।

वे गांवों से खाद्य सामग्री ला सकते थे।

कई किसान लौटकर राशन लेते और फिर वापस आते।

UPI ने भी दर्ज किया कि किसान भोजन लाने के लिए गांव जा रहे थे और अधिक किसानों के साथ लौटने की बात कर रहे थे।

इससे प्रशासन की “थका देने” वाली रणनीति सीमित प्रभावी रही।

14 पहली मृत्यु

कठोर परिस्थितियों का प्रभाव किसानों पर पड़ा।

UPI ने 27 अक्टूबर को एक लगभग 50 वर्षीय किसान की मृत्यु का उल्लेख किया, जिसे उसके साथियों ने ठंडी रात में खुले में सोने के बाद बीमार पड़ने से जोड़ा। उसका शव बोट क्लब पर बर्फ की सिलों के ऊपर चारपाई पर रखा गया था।

इस घटना ने आंदोलन में भावनात्मक तीव्रता बढ़ाई।

टिकैत के लिए अब धरना केवल आर्थिक मांगों का प्रश्न नहीं रहा था।

हर बीतता दिन सरकार पर नैतिक दबाव बढ़ा रहा था।

15 पुलिस और किसानों के बीच तनाव

बोट क्लब आंदोलन अधिकांश समय शांतिपूर्ण रहा, लेकिन अंत तक यह पूरी तरह तनावमुक्त नहीं था।

30 अक्टूबर को पुलिस और किसानों के बीच गंभीर झड़प हुई। UPI के अनुसार पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसू गैस का प्रयोग किया, किसानों ने अवरोधक उखाड़कर जवाब दिया और दोनों पक्षों के लोग घायल हुए। उसी दिन दिल्ली–उत्तर प्रदेश सीमा पर भी किसानों और पुलिस के बीच टकराव हुआ।

इस घटना से टिकैत मॉडल की एक अंतर्निहित समस्या भी सामने आई—

लाखों लोगों की भीड़ जितनी बड़ी राजनीतिक शक्ति है, उतना ही उसे अनुशासित रखना कठिन है।

16 घुड़सवार पुलिस और टिकैत की प्रतिक्रिया

आंदोलन की स्मृतियों में घुड़सवार पुलिस की कार्रवाई का विशेष उल्लेख मिलता है।

बाद में BKU के पुराने नेताओं ने याद किया कि पुलिस द्वारा किसानों को हटाने की कोशिश और लाठीचार्ज देखकर टिकैत भावुक हो गए थे।

इस प्रसंग ने समर्थकों के बीच उनकी छवि को कठोर नेता के साथ-साथ किसानों की पीड़ा से भावनात्मक रूप से जुड़ा व्यक्ति भी बनाया।

17 31 अक्टूबर का राजनीतिक टकराव

राजीव गांधी सरकार के सामने एक असाधारण व्यावहारिक समस्या खड़ी हो गई।

31 अक्टूबर इंदिरा गांधी की हत्या की वर्षगांठ थी और कांग्रेस बोट क्लब क्षेत्र में बड़ी रैली आयोजित करना चाहती थी।

लेकिन किसान वहां से हटने को तैयार नहीं थे।

UPI ने 27 अक्टूबर को स्पष्ट लिखा कि किसानों की मौजूदगी कांग्रेस की प्रस्तावित विशाल रैली को बाधित कर रही थी।

टिकैत ने यहां तक कहा कि यदि समझौता नहीं हुआ तो 31 अक्टूबर की रैली किसान आंदोलन की रैली बन जाएगी।

आखिरकार कांग्रेस को अपनी रैली लाल किला मैदान की ओर स्थानांतरित करनी पड़ी।

यह किसान आंदोलन की सबसे बड़ी प्रतीकात्मक जीतों में से एक थी।

18 सत्ता ने स्थान बदला, किसान नहीं

राजनीतिक प्रतीकवाद की दृष्टि से यह अत्यंत महत्वपूर्ण था।

सरकार किसानों को तुरंत नहीं हटा सकी।

बल्कि सत्तारूढ़ कांग्रेस को अपनी रैली का स्थान बदलना पड़ा।

यानी राजधानी के प्रतिष्ठित राजनीतिक स्थान पर कुछ दिनों के लिए किसान ने सत्ता से अधिक स्थायित्व दिखाया।

इससे टिकैत की लोकप्रियता विस्फोटक रूप से बढ़ी।

अब उन्हें केवल किसान नेता नहीं, बल्कि ऐसी शक्ति के प्रतिनिधि के रूप में देखा जाने लगा जो केंद्र सरकार की राजनीतिक योजना तक बदलवा सकती थी।

19 आंदोलन कैसे समाप्त हुआ?

यहां भी तथ्यात्मक सावधानी आवश्यक है।

लोकप्रिय कथाओं में अक्सर कहा जाता है कि राजीव गांधी सरकार ने किसानों की सभी 35 मांगें मान लीं और इसलिए किसान लौट गए।

समकालीन और बाद के अधिक विश्वसनीय विवरण ऐसा साफ चित्र नहीं देते।

Indian Express के अनुसार 1 नवंबर 1988 को टिकैत ने आंदोलन समाप्त किया, लेकिन उस समय कोई व्यापक औपचारिक समझौता नहीं हुआ था; सरकार की ओर से रियायतों का आश्वासन दिया गया था। बाद में 1989 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी की सरकार और BKU के बीच समझौते में कई मांगों पर रियायतें दी गईं।

इसलिए बोट क्लब आंदोलन को “राजीव गांधी ने उसी समय सभी 35 मांगें मान लीं” कहना इतिहास की दृष्टि से अतिरंजित होगा।

20 फिर आंदोलन की जीत क्या थी?

यदि सभी मांगें तत्काल स्वीकार नहीं हुईं, तो बोट क्लब आंदोलन को इतनी बड़ी जीत क्यों माना गया?

क्योंकि उसकी असली विजय राजनीतिक थी।

केंद्र सरकार किसानों से बातचीत को मजबूर हुई।

कांग्रेस की निर्धारित रैली का स्थान बदलना पड़ा।

कृषि मूल्य और लागत का प्रश्न राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आया।

और महेंद्र सिंह टिकैत की छवि राष्ट्रीय किसान नेता की बन गई।

कुछ महीनों बाद सरकारों को कृषि मांगों पर अधिक गंभीर समझौते करने पड़े।

इस प्रकार बोट क्लब ने राजनीतिक दबाव की वह क्षमता पैदा की जिसके आर्थिक परिणाम बाद में आए।

21 टिकैत का राष्ट्रीय उत्कर्ष

दिल्ली से पहले टिकैत पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बहुत प्रभावशाली थे।

दिल्ली के बाद वे राष्ट्रीय राजनीतिक शब्दावली का हिस्सा बन गए।

अखबारों ने उन्हें प्रमुखता से छापा।

अध्याय 6

टिकैत का किसान आर्थिक एजेंडा

महेंद्र सिंह टिकैत और भारतीय किसान यूनियन की राजनीति को केवल धरनों, घेरावों और विशाल किसान पंचायतों से नहीं समझा जा सकता। उनके आंदोलन की वास्तविक शक्ति एक स्पष्ट आर्थिक तर्क में निहित थी—यदि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, तो किसान की उपज का मूल्य भी ऐसा होना चाहिए जिससे खेती लाभकारी बनी रहे।

1980 के दशक में टिकैत जिस किसान राजनीति के सबसे प्रभावशाली प्रतिनिधि बनकर उभरे, उसका केंद्र भूमि-वितरण नहीं बल्कि कृषि की लाभप्रदता था। बिजली कितनी महंगी है, गन्ने का भाव कितना है, नहर का पानी कितना महंगा है, बैंक और सहकारी संस्थाओं का कर्ज किसान पर कितना दबाव डाल रहा है, खाद और डीजल की लागत क्या है और सरकार फसल का मूल्य किस आधार पर तय करती है—ये उनके किसान आर्थिक एजेंडे के केंद्रीय प्रश्न थे।

अकादमिक अध्ययनों में भी BKU के आंदोलन का मुख्य आधार खेती की आर्थिक व्यवहार्यता को माना गया है। संगठन लगातार सस्ती और नियमित बिजली, बेहतर कृषि मूल्य, कृषि ऋण में राहत, उर्वरक सहायता और कृषि मूल्य-निर्धारण संस्थाओं में किसान प्रतिनिधित्व की मांग करता रहा।

इस अर्थ में टिकैत का आंदोलन स्वतंत्र भारत के किसान इतिहास में एक महत्वपूर्ण संक्रमण का प्रतिनिधित्व करता है—“जमीन किसकी है?” से “खेती से किसान को कितना मिलता है?” तक का संक्रमण।

1 टिकैत की आर्थिक राजनीति का मूल प्रश्न

टिकैत अर्थशास्त्री नहीं थे। उन्होंने कृषि मूल्य सिद्धांत पर कोई व्यवस्थित पुस्तक नहीं लिखी। लेकिन उनकी किसान राजनीति के पीछे एक अत्यंत सरल और प्रभावी आर्थिक सवाल था—

खेती में किसान जितना खर्च करता है, क्या उसकी फसल बेचने पर उसे उससे पर्याप्त अधिक आय मिलती है?

यदि बिजली का बिल बढ़ता है, खाद महंगी होती है, डीजल महंगा होता है, मजदूरी बढ़ती है, सिंचाई शुल्क बढ़ता है और मशीनों का खर्च बढ़ता है, लेकिन गन्ने या दूसरी फसल का मूल्य उसी अनुपात में नहीं बढ़ता, तो किसान की आय घटेगी।

टिकैत इसी अंतर को राजनीतिक मुद्दा बनाते थे।

उनकी राजनीति में किसान केवल गरीब और सहायता चाहने वाला व्यक्ति नहीं था।

और उत्पादक होने के कारण उसे अपनी उपज पर न्यायपूर्ण आर्थिक प्रतिफल मिलना चाहिए—यह टिकैत आंदोलन का बुनियादी आग्रह था।

2 गन्ना : टिकैत की आर्थिक राजनीति का केंद्र

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में BKU की आर्थिक राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण आधार गन्ना था।

गन्ना किसान की समस्या दूसरी फसलों से कुछ अलग थी।

वह गन्ना पैदा करता था, लेकिन उसका प्रमुख खरीदार चीनी मिल थी।

मिल सरकार द्वारा नियंत्रित या प्रभावित मूल्य-व्यवस्था के अंतर्गत खरीद करती थी।

गन्ना लंबे समय तक घर में सुरक्षित नहीं रखा जा सकता।

इसलिए गन्ना किसान तीन स्तरों पर निर्भर था—

और मिल की वित्तीय स्थिति पर भुगतान के लिए।

यही कारण था कि टिकैत के आंदोलनों में गन्ना मूल्य बार-बार केंद्रीय प्रश्न बना। 1988 के मेरठ आंदोलन में आधिकारिक गन्ना मूल्य लगभग 27 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़ाकर 35 रुपये प्रति क्विंटल करने की मांग प्रमुख थी।

3 गन्ने का ‘भाव’ क्यों राजनीतिक प्रश्न था?

बाजार की सामान्य वस्तु में उत्पादक कई खरीदारों को बेच सकता है।

लेकिन गन्ना क्षेत्रीय चीनी मिल व्यवस्था से बंधा था।

इसलिए किसान का तर्क था कि यदि सरकार और नियामक व्यवस्था गन्ने की खरीद की शर्तों को प्रभावित करते हैं, तो सरकार उसकी आर्थिक व्यवहार्यता से भी पूरी तरह अलग नहीं रह सकती।

गन्ने के मूल्य में कुछ रुपये की वृद्धि भी बड़े कृषक परिवार की सालाना आय में बड़ा अंतर पैदा कर सकती थी।

यही कारण था कि गन्ने का भाव पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनावी और आंदोलनकारी दोनों राजनीति का स्थायी विषय बना।

टिकैत ने इस आर्थिक प्रश्न को किसान सम्मान से जोड़ दिया।

उनके समर्थकों के लिए वह किसान के श्रम और उत्पादन का कम मूल्यांकन भी था।

4 गन्ना भुगतान : मूल्य घोषित होना पर्याप्त नहीं

टिकैत के आर्थिक एजेंडे की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि केवल मूल्य घोषित कर देना पर्याप्त नहीं माना जाता था।

यदि चीनी मिल किसान का गन्ना खरीद ले और महीनों तक भुगतान न करे, तो किसान की आर्थिक स्थिति फिर भी संकट में रहती है।

गन्ने का पैसा किसान की अगली फसल में लगता है।

इसलिए समय पर गन्ना भुगतान धीरे-धीरे BKU की स्थायी मांग बन गया। 1988 के बोट क्लब आंदोलन की शिकायतों में विलंबित भुगतान का प्रश्न भी प्रमुखता से मौजूद था।

यही मुद्दा महेंद्र सिंह टिकैत के बाद भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में BKU की राजनीति में बना रहा।

5 बिजली : शायद टिकैत का सबसे शक्तिशाली आर्थिक मुद्दा

यदि गन्ना टिकैत की क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था का केंद्र था, तो बिजली उनकी किसान राजनीति का सबसे विस्फोटक मुद्दा थी।

आधुनिक शोध में 1988 के आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण मांगों में सस्ती कृषि बिजली को केंद्रीय स्थान दिया गया है। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार सस्ती बिजली की मांग ही वह अकेला मुद्दा था जिसने टिकैत को तेजी से किसानों के बड़े नेता के रूप में स्थापित करने में निर्णायक भूमिका निभाई।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सिंचाई के लिए विद्युत नलकूप अत्यंत महत्वपूर्ण हो चुके थे।

बिजली महंगी होगी तो पानी महंगा होगा।

पानी महंगा होगा तो गेहूं और गन्ने की उत्पादन लागत बढ़ेगी।

इसलिए किसान के लिए बिजली घरेलू सुविधा नहीं, उत्पादन का निवेश थी।

6 बिजली के प्रश्न के तीन आयाम

टिकैत केवल कम बिजली दर नहीं चाहते थे।

BKU की मांगों में बिजली से जुड़े कम-से-कम तीन अलग प्रश्न दिखाई देते हैं।

दूसरा—बिजली कितने घंटे और कितनी नियमित मिले?

तीसरा—बकाया और दंड की व्यवस्था कैसी हो?

किसान का तर्क था कि यदि वह बिजली का निर्धारित शुल्क दे रहा है, तो उसे सिंचाई के लिए पर्याप्त और नियमित बिजली भी मिलनी चाहिए।

अर्थात टिकैत की बिजली राजनीति केवल सब्सिडी की राजनीति नहीं थी।

उसमें सेवा की गुणवत्ता का प्रश्न भी था।

अकादमिक अध्ययनों में BKU द्वारा कम विद्युत दर के साथ पर्याप्त और नियमित ग्रामीण बिजली आपूर्ति की लगातार मांग का उल्लेख मिलता है।

7 फ्लैट रेट बनाम मीटर

कृषि बिजली व्यवस्था में एक बड़ा विवाद यह भी था कि किसान से शुल्क किस आधार पर लिया जाए।

नलकूप के हॉर्सपावर पर निश्चित शुल्क हो?

कई किसान निश्चित या फ्लैट दर को अधिक सरल और पूर्वानुमेय मानते थे।

सरकार और विद्युत बोर्ड इसे राजस्व तथा वास्तविक खपत के प्रश्न से देखते थे।

BKU का झुकाव किसान की लागत को निश्चित और कम रखने की ओर था।

यहीं एक व्यापक सिद्धांत सामने आता है—

किसान ऐसी लागत संरचना चाहता था जिसकी पहले से गणना की जा सके।

अनिश्चित बिल और अचानक बढ़ी दर कृषि योजना को अस्थिर कर देते थे।

8 सिंचाई : नहर का पानी भी लागत है

बिजली के साथ टिकैत के एजेंडे में सिंचाई शुल्क भी महत्वपूर्ण था।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नहर सिंचाई की लंबी परंपरा रही है।

सरकार सिंचाई शुल्क और जल दरें तय करती थी।

किसान का तर्क बिजली की तरह यहां भी वही था—

यदि पानी कृषि उत्पादन की बुनियादी आवश्यकता है, तो उसका शुल्क ऐसा होना चाहिए कि खेती की लाभप्रदता नष्ट न हो।

इसलिए दिल्ली बोट क्लब आंदोलन में बिजली और पानी के शुल्क में रियायत मुख्य मांगों में शामिल थी।

9 कृषि ऋण : विकास का साधन या कर्ज का जाल?

हरित क्रांति के बाद कृषि में नकद निवेश बढ़ा।

इन सबके लिए किसान को पूंजी चाहिए थी।

इसलिए बैंक और सहकारी ऋण का महत्व बढ़ा।

यदि अच्छी फसल और उचित मूल्य मिले तो किसान ऋण चुका सकता था।

समस्या तब पैदा होती थी जब लागत बढ़ जाए, उपज का मूल्य कम हो, फसल खराब हो या भुगतान देर से मिले।

तब उत्पादन बढ़ाने के लिए लिया गया ऋण किसान पर बोझ बन जाता था।

10 कर्जमाफी और ऋण स्थगन की मांग

मेरठ और दिल्ली आंदोलनों में कृषि ऋण की माफी या राहत महत्वपूर्ण मांगों में थी। SAGE में प्रकाशित BKU के अध्ययन में 1988 के मेरठ आंदोलन की मांगों में बिजली और पानी के बिलों की माफी, ऋण लिखे जाने और गन्ने के बेहतर मूल्य का स्पष्ट उल्लेख है।

BKU ने संस्थागत कृषि ऋण की वसूली पर रोक या स्थगन की मांग भी समय-समय पर उठाई।

यदि किसान की आय स्वयं सरकारी मूल्य और नीति से प्रभावित है, तो राज्य केवल कर्ज वसूली की मशीन की तरह व्यवहार नहीं कर सकता।

11 क्या टिकैत हर प्रकार की कर्जमाफी के पक्षधर थे?

टिकैत की ऋण राजनीति को सरल लोकलुभावन नारे में सीमित करना उचित नहीं होगा।

उनका बड़ा प्रश्न यह था कि किसान कर्ज में क्यों जा रहा है?

यदि उसकी उपज का उचित दाम मिले और कृषि लागत नियंत्रित रहे, तो स्थायी कर्जमाफी की जरूरत कम होगी।

इसलिए कर्ज राहत उनके एजेंडे में थी, लेकिन उसके पीछे का व्यापक आर्थिक प्रश्न कृषि आय था।

उनका अंतिम समाधान केवल ऋण हटाना नहीं बल्कि ऐसी कृषि अर्थव्यवस्था बनाना था जिसमें किसान बार-बार ऋण संकट में न फंसे।

12 न्यूनतम समर्थन मूल्य : टिकैत की राजनीति में स्थान

आज किसान आंदोलन और न्यूनतम समर्थन मूल्य को लगभग समानार्थी रूप से देखा जाता है, लेकिन महेंद्र सिंह टिकैत के मूल 1980 के दशक के आंदोलन को आज के MSP विमर्श में सीधे रख देना ऐतिहासिक रूप से सावधानी मांगता है।

टिकैत और BKU बेहतर कृषि मूल्य की मांग करते थे और संगठन ने प्रमुख फसलों के लिए ऊंचे न्यूनतम समर्थन मूल्य का समर्थन किया। एक विस्तृत अध्ययन में BKU की स्थायी मांगों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पैदा होने वाली प्रमुख फसलों के लिए अधिक MSP का स्पष्ट उल्लेख है।

लेकिन टिकैत की राजनीति का केंद्रीय व्यावहारिक प्रश्न केवल MSP नहीं था।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना मूल्य कहीं अधिक तत्काल मुद्दा था।

इसलिए 1980 के दशक के टिकैत आंदोलन को “MSP आंदोलन” कहना उसकी वास्तविक ऐतिहासिक संरचना को संकुचित कर देगा।

13 MSP और गन्ना मूल्य में अंतर

यह अंतर शोध में बनाए रखना आवश्यक है।

गेहूं जैसी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित होता था और सरकारी खरीद महत्वपूर्ण थी।

गन्ने के मूल्य का निर्धारण केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों तथा चीनी उद्योग से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा था।

इसलिए टिकैत के किसान के लिए “फसल का उचित दाम” अलग-अलग फसलों में अलग संस्थागत अर्थ रखता था।

यही कारण है कि BKU ने व्यापक कृषि मूल्य नीति की मांग की, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश की आंदोलनकारी ऊर्जा गन्ने पर विशेष रूप से केंद्रित रही।

14 किसान को मूल्य-निर्धारण में आवाज

टिकैत आंदोलन की एक महत्वपूर्ण मांग यह भी थी कि कृषि मूल्य तय करने वाली सरकारी समितियों और संस्थाओं में किसानों का प्रतिनिधित्व हो।

NPTEL के किसान आंदोलन संबंधी अध्ययन में BKU की मांगों में सरकार द्वारा मूल्य तय करने के लिए बनाई गई समितियों में संगठन के प्रतिनिधियों को शामिल करने का उल्लेख है।

यह मांग आर्थिक लोकतंत्र से जुड़ी थी।

मेरे उत्पादन का मूल्य तय किया जा रहा है।

लेकिन उस निर्णय में मेरी आवाज कहां है?

यानी BKU केवल “मूल्य बढ़ाओ” नहीं कह रही थी।

वह मूल्य निर्धारण की संस्थागत प्रक्रिया में किसान की भागीदारी भी चाहती थी।

15 कृषि लागत की किसान गणना

सरकारी संस्थाएं लागत की गणना सांख्यिकीय पद्धति से करती थीं।

किसान अपनी लागत अलग तरह से महसूस करता था।

टिकैत की ताकत यह थी कि उन्होंने इन सभी खर्चों को अर्थशास्त्रीय तकनीकी भाषा के बजाय किसान की रोजमर्रा की भाषा में प्रस्तुत किया।

किसान को यह समझाने की जरूरत नहीं थी कि “टर्म्स ऑफ ट्रेड” क्या होते हैं।

मेरे खर्च बढ़े हैं, लेकिन फसल का भाव उतना नहीं बढ़ा।

यही टिकैत का राजनीतिक अर्थशास्त्र था।

16 खाद और उर्वरक सब्सिडी

हरित क्रांति की खेती रासायनिक उर्वरकों पर काफी निर्भर हो गई थी।

इसलिए उर्वरक मूल्य में बढ़ोतरी का सीधा असर कृषि लागत पर पड़ता था।

BKU ने रासायनिक उर्वरकों पर उच्च सरकारी सहायता जारी रखने का समर्थन किया और इसे समय-समय पर अपने मांगपत्र में शामिल किया।

इससे टिकैत की आर्थिक सोच का एक और पक्ष सामने आता है।

वे कृषि बाजार में सरकार की भूमिका समाप्त करने की मांग नहीं कर रहे थे।

बल्कि चाहते थे कि सरकार अपनी शक्ति का उपयोग किसान की उत्पादन लागत कम रखने और उपज का मूल्य बढ़ाने के लिए करे।

17 डीजल और कृषि मशीनरी

बिजली के साथ डीजल भी कृषि उत्पादन की महत्वपूर्ण लागत बन चुका था।

ट्रैक्टर, पंपसेट और परिवहन में डीजल का उपयोग होता था।

जैसे-जैसे खेती यंत्रीकृत हुई, पेट्रोलियम कीमतों का किसान आय पर प्रभाव बढ़ा।

हालांकि टिकैत के शुरुआती बड़े आंदोलनों की सबसे स्पष्ट पहचान बिजली और गन्ने से थी, लेकिन उनका व्यापक आर्थिक दृष्टिकोण हर उस लागत को किसान प्रश्न में बदलता था जो कृषि लाभप्रदता को प्रभावित करती थी।

यही वजह है कि BKU का किसान एजेंडा समय के साथ बिजली, पानी और गन्ने से आगे बढ़कर डीजल, खाद, ऋण और दूसरी लागतों तक फैलता गया।

18 कृषि उत्पाद और औद्योगिक वस्तु का मूल्य

1980 के दशक के नए किसान आंदोलन के पीछे एक व्यापक वैचारिक तर्क था—

किसान जो वस्तु बेचता है उसका मूल्य अपेक्षाकृत नियंत्रित या दबा रहता है, लेकिन जो औद्योगिक वस्तुएं किसान खरीदता है उनकी कीमत बढ़ती रहती है।

यदि इन वस्तुओं की कीमत तेजी से बढ़ती है और गेहूं, गन्ना या दूसरी कृषि उपज का मूल्य धीमे बढ़ता है, तो किसान की वास्तविक क्रयशक्ति घटती है।

इसी संबंध को कृषि अर्थशास्त्र में अक्सर कृषि और गैर-कृषि क्षेत्र के बीच विनिमय की शर्तों के प्रश्न से जोड़ा जाता है।

टिकैत इसे सिद्धांत की भाषा में नहीं, ग्रामीण अनुभव की भाषा में रखते थे।

19 टिकैत और शरद जोशी का समान बिंदु

महाराष्ट्र के शरद जोशी और महेंद्र सिंह टिकैत की वैचारिक शैली अलग थी।

जोशी अधिक व्यवस्थित आर्थिक तर्क प्रस्तुत करते थे।

टिकैत ग्रामीण पंचायत की भाषा में बोलते थे।

फिर भी दोनों के बीच एक महत्वपूर्ण समानता थी—

कृषक उत्पादन को उचित आर्थिक मूल्य मिलना चाहिए।

दोनों आंदोलनों ने उस धारणा को चुनौती दी कि किसान की समस्या केवल उत्पादन बढ़ाने से हल हो जाएगी।

प्रश्न यह भी था कि बढ़े उत्पादन का आर्थिक लाभ किसे मिलता है।

यहीं से 1980 के दशक के “नए किसान आंदोलन” की साझा पहचान बनती है।

20 कृषि मूल्य बनाम सस्ता भोजन

टिकैत की आर्थिक मांग का एक बड़ा नीतिगत अंतर्विरोध था।

किसान चाहता है कि उसकी फसल का मूल्य बढ़े।

लेकिन सरकार चाहती है कि शहरी और गरीब उपभोक्ता को भोजन बहुत महंगा न मिले।

यहीं किसान मूल्य नीति का मूल द्वंद्व पैदा होता है।

उच्च कृषि मूल्य किसान के लिए अच्छा हो सकता है।

लेकिन खाद्य मुद्रास्फीति उपभोक्ता के लिए समस्या हो सकती है।

इसलिए सरकार अक्सर कृषि उत्पादक और खाद्य उपभोक्ता—दोनों के हित संतुलित करने की कोशिश करती है।

अध्याय 7

टिकैत आंदोलन की संघर्ष-पद्धति और किसान संस्कृति

महेंद्र सिंह टिकैत और भारतीय किसान यूनियन की सफलता केवल उनकी आर्थिक मांगों का परिणाम नहीं थी। उतनी ही महत्वपूर्ण थी उनकी संघर्ष-पद्धति। टिकैत ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण समाज में पहले से मौजूद पंचायत, चौपाल, सामुदायिक सहयोग और कृषि संसाधनों को आधुनिक जनांदोलन की तकनीक में बदल दिया। इसी कारण BKU अपेक्षाकृत कम औपचारिक संगठनात्मक ढांचे के बावजूद हजारों और कभी-कभी लाखों किसानों को तेजी से लामबंद कर सकी।

टिकैत मॉडल में किसान केवल रैली में भाषण सुनने नहीं आता था। वह ट्रैक्टर-ट्रॉली में राशन और बिस्तर लेकर आता था, धरना स्थल पर चूल्हा जलाता था, पंचायत करता था और आवश्यकता पड़ने पर कई दिनों या सप्ताह तक वहीं रहता था।

करमूखेड़ी, मेरठ और दिल्ली बोट क्लब—तीनों आंदोलनों में इस पद्धति का क्रमिक विकास दिखाई देता है।

इस संघर्ष संस्कृति का सबसे महत्वपूर्ण सूत्र था—

गांव को आंदोलन स्थल तक ले आओ, ताकि आंदोलन को गांव लौटने की जल्दी न रहे।

1 राजनीतिक दल से अलग संगठनात्मक मॉडल

सामान्य राजनीतिक दल की शक्ति उसकी सदस्यता, कार्यालय, पदाधिकारी, चुनावी संगठन और वित्तीय संसाधनों से आती है।

BKU की शक्ति का बड़ा हिस्सा इनसे अलग स्रोतों से आता था।

इसीलिए संगठन को प्रत्येक गांव में विशाल स्थायी कार्यालय या पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की बड़ी नौकरशाही खड़ी करने की आवश्यकता नहीं पड़ी।

इस व्यवस्था की ताकत थी—तेज लामबंदी।

लेकिन उसकी कमजोरी भी इसी में थी—संगठन का बहुत बड़ा हिस्सा व्यक्तिगत नेतृत्व और अनौपचारिक संबंधों पर निर्भर रहता था।

2 पंचायत : आंदोलन की मूल इकाई

टिकैत की राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण संस्था पंचायत थी।

यह सरकारी ग्राम पंचायत से अलग सामाजिक-राजनीतिक सभा थी।

यदि प्रश्न बड़ा हुआ तो आसपास के गांवों को बुलाया गया।

इस प्रकार आंदोलन नीचे से ऊपर बढ़ता था।

टिकैत के लिए पंचायत केवल भाषण का मंच नहीं थी।

यदि हजारों किसानों की पंचायत किसी निर्णय पर सहमत है, तो नेता उस निर्णय को व्यक्तिगत आदेश के बजाय सामूहिक इच्छा के रूप में प्रस्तुत कर सकता था।

यही टिकैत नेतृत्व की एक महत्वपूर्ण राजनीतिक तकनीक थी।

3 महापंचायत : संख्या को शक्ति में बदलना

महापंचायत पंचायत का विस्तृत रूप थी।

इसका उद्देश्य केवल भीड़ जुटाना नहीं था।

वह सामूहिक शक्ति का सार्वजनिक प्रदर्शन भी थी।

हजारों किसान यदि किसी गांव या मैदान में एकत्र होते हैं, तो सरकार को संदेश मिलता है कि मांग केवल कुछ पदाधिकारियों की नहीं है।

महापंचायत का एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव किसान पर भी पड़ता था।

अपने गांव में अकेला किसान प्रशासन के सामने कमजोर महसूस कर सकता है।

लेकिन हजारों किसानों के बीच वही व्यक्ति स्वयं को एक बड़े समुदाय का हिस्सा महसूस करता है।

यानी महापंचायत केवल राजनीतिक दबाव नहीं बनाती थी।

वह किसान की सामूहिक आत्मचेतना भी बनाती थी।

4 खाप नेटवर्क और किसान संगठन

टिकैत के नेतृत्व में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की खाप और बिरादरी आधारित सामाजिक संरचनाओं का उपयोग लामबंदी में हुआ।

लेकिन BKU को खाप का दूसरा नाम मानना गलत होगा।

खाप का आधार सामाजिक और कई मामलों में गोत्रीय था।

टिकैत की रणनीतिक क्षमता यह थी कि उन्होंने पहले से मौजूद ग्रामीण संपर्क नेटवर्क को किसान आंदोलन के लिए इस्तेमाल किया, लेकिन आंदोलन की अपील को जाति से बाहर ले जाने का प्रयास किया।

यही कारण था कि जाट सामाजिक आधार मजबूत होने के बावजूद मुस्लिम किसान, गुर्जर, त्यागी और दूसरे कृषक समुदाय भी विभिन्न आंदोलनों में शामिल हुए।

5 मौखिक संचार की शक्ति

1980 के दशक में मोबाइल फोन नहीं थे।

फिर भी हजारों किसानों तक बहुत कम समय में आंदोलन का संदेश पहुंच जाता था।

मंदिर–मस्जिद और गांव की सार्वजनिक जगहें।

BKU ने ग्रामीण समाज की इस मौजूदा संचार व्यवस्था का अत्यंत प्रभावी उपयोग किया।

यह एक प्रकार का पूर्व-डिजिटल सामाजिक नेटवर्क था।

6 ट्रैक्टर-ट्रॉली : आंदोलन का सबसे उपयोगी साधन

हरित क्रांति ने किसान को ट्रैक्टर दिया था।

टिकैत आंदोलन ने उसे राजनीतिक वाहन बना दिया।

ट्रैक्टर-ट्रॉली की सबसे बड़ी विशेषता उसकी बहुउपयोगिता थी।

रात में ट्रॉली को अस्थायी आश्रय बनाया जा सकता था।

और जरूरत पड़ने पर किसान उसी वाहन से गांव लौट सकता था।

मेरठ और दिल्ली आंदोलनों में ट्रैक्टर-ट्रॉली ने BKU को असाधारण गतिशीलता दी।

7 कृषि आधुनिकीकरण का अनपेक्षित राजनीतिक परिणाम

यहां एक रोचक ऐतिहासिक विरोधाभास था।

सरकार ने कृषि आधुनिकीकरण को बढ़ावा दिया।

इन्हीं संसाधनों ने किसान की आंदोलन क्षमता भी बढ़ा दी।

बैलगाड़ी युग में सैकड़ों किलोमीटर दूर राजधानी तक विशाल किसान जमावड़ा करना कठिन था।

इस अर्थ में हरित क्रांति ने केवल कृषि उत्पादन नहीं बढ़ाया।

उसने किसान की राजनीतिक गतिशीलता भी बढ़ाई।

8 हुक्का : ग्रामीण पहचान का राजनीतिक प्रतीक

महेंद्र सिंह टिकैत की तस्वीर हुक्के के बिना अधूरी मानी जाने लगी।

हुक्का पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण सामाजिक जीवन का पुराना हिस्सा था।

लेकिन टिकैत के आंदोलन में उसका नया राजनीतिक अर्थ बन गया।

दिल्ली के बोट क्लब जैसे राष्ट्रीय सत्ता-स्थल पर जब किसान हुक्का लेकर बैठा, तो दृश्य स्वयं राजनीतिक प्रतीक बन गया।

एक तरफ नौकरशाही का आधुनिक सत्ता तंत्र।

इसीलिए टिकैत आंदोलन को बाद की पत्रकारिता में कई बार “हुक्का बनाम हुकूमत” के रूपक में याद किया गया।

9 चारपाई भी आंदोलन का साधन

चारपाई सामान्य ग्रामीण घरेलू वस्तु थी।

लेकिन लंबे धरनों में वह अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई।

इस तरह टिकैत आंदोलन में किसान ने अलग से विशाल आंदोलन बुनियादी ढांचा खड़ा करने के बजाय अपने रोजमर्रा के ग्रामीण संसाधनों का उपयोग किया।

यही आंदोलन को सस्ता और टिकाऊ बनाता था।

10 सामुदायिक रसोई : आंदोलन की जीवनरेखा

लंबे धरने का सबसे कठिन प्रश्न भोजन है।

यदि हजारों किसान दस, बीस या तीस दिन बैठेंगे तो उन्हें भोजन कौन देगा?

किसी एक बड़े दाता पर निर्भरता कम रही।

इसने आंदोलन को वित्तीय रूप से अपेक्षाकृत आत्मनिर्भर बनाया।

मेरठ आंदोलन में आसपास के गांवों से खाद्य सामग्री की नियमित आपूर्ति इस मॉडल की सफलता का प्रमुख कारण बनी।

11 किसान परिवार आंदोलन की आर्थिक इकाई

इस व्यवस्था का एक गहरा सामाजिक अर्थ भी था।

धरने पर बैठा किसान अकेला राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं था।

कोई धरना स्थल के लिए राशन तैयार कर रहा था।

कोई ट्रैक्टर से सामान पहुंचा रहा था।

इसलिए किसान आंदोलन की वास्तविक इकाई केवल व्यक्ति नहीं, कई बार कृषक परिवार और ग्रामीण समुदाय था।

12 महिलाओं की भूमिका

टिकैत आंदोलन की सार्वजनिक छवि लंबे समय तक पुरुष प्रधान रही, लेकिन महिलाओं की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

मेरठ जैसे आंदोलनों में महिलाएं धरना स्थल पर उपस्थित थीं।

और किसान परिवार की घरेलू व्यवस्था बनाए रखकर पुरुषों के लंबे आंदोलन को संभव बनाया।

बाद के किसान आंदोलनों में महिलाओं की प्रत्यक्ष भागीदारी और बढ़ी।

इस दृष्टि से टिकैत काल ने किसान परिवार को आंदोलन की इकाई बनाने की जो पद्धति विकसित की, उसमें महिलाओं का श्रम अनिवार्य था—भले ही नेतृत्व संरचना में उन्हें समान प्रतिनिधित्व नहीं मिला।

13 धरना : प्रतीक्षा को राजनीतिक हथियार बनाना

सामान्य विरोध प्रदर्शन कुछ घंटों का होता है।

किसान जल्दी लौटने की मजबूरी से मुक्त हो जाए तो प्रशासन के सामने गंभीर समस्या पैदा होती है।

क्योंकि प्रत्येक अतिरिक्त दिन मीडिया का ध्यान बढ़ाता है।

और सरकार की प्रतिष्ठा प्रभावित होती है।

इस प्रकार लंबे धरने में किसान का सबसे बड़ा हथियार कई बार केवल यह होता था—

14 घेराव : समस्या के केंद्र पर दबाव

टिकैत आंदोलन में घेराव भी महत्वपूर्ण रणनीति था।

यह रणनीति समस्या और विरोध स्थल के बीच प्रत्यक्ष संबंध बनाती थी।

इससे आंदोलन का संदेश भी सरल रहता था।

किसान किसके खिलाफ बैठा है और क्यों बैठा है—यह आम जनता तुरंत समझ सकती थी।

15 सरकारी देयों का भुगतान रोकना

BKU की सबसे विवादास्पद संघर्ष-पद्धतियों में से एक थी सरकारी देयों के भुगतान को सामूहिक रूप से रोकने की अपील।

यदि हजारों किसान व्यक्तिगत रूप से बकाया रखें तो प्रशासन प्रत्येक किसान पर दबाव डाल सकता है।

लेकिन यदि पूरा क्षेत्र सामूहिक रूप से भुगतान रोक दे तो वसूली प्रशासन के लिए राजनीतिक संकट बन जाती है।

इस प्रकार व्यक्तिगत आर्थिक अवज्ञा को सामूहिक आर्थिक असहयोग में बदल दिया जाता था।

16 गांधीवादी असहयोग से समानता और अंतर

यह पद्धति औपनिवेशिक दौर के कर-अस्वीकार और गांधीवादी असहयोग की याद दिलाती है।

खेड़ा सत्याग्रह में राजस्व न देने का सामूहिक निर्णय हुआ था।

बारदोली में भी बढ़ा भूमि राजस्व न देने की रणनीति अपनाई गई थी।

टिकैत के यहां बिजली बिल और सिंचाई शुल्क रोकने में समान तत्व दिखाई देता है।

खेड़ा और बारदोली औपनिवेशिक शासन के राजस्व प्रश्न से जुड़े थे।

BKU लोकतांत्रिक भारत में निर्वाचित सरकार से कृषि लागत और सेवा शुल्क पर संघर्ष कर रही थी।

इसलिए पद्धति में ऐतिहासिक समानता थी, राजनीतिक संदर्भ में बड़ा अंतर।

17 गिरफ्तारी देने से अधिक गिरफ्तारी कठिन बनाना

कई पारंपरिक आंदोलनों में गिरफ्तारी देना स्वयं राजनीतिक रणनीति होती है।

विशाल किसान भीड़ के बीच नेतृत्व को गिरफ्तार करना प्रशासन के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता था।

मेरठ में टिकैत की गिरफ्तारी की संभावना पर प्रशासन को यही कठिनाई महसूस हुई।

यदि हजारों किसान अपने नेता को घेरकर बैठे हों, तो गिरफ्तारी कानून-व्यवस्था का बड़ा संकट बन सकती है।

इस तरह संख्या स्वयं नेता की राजनीतिक सुरक्षा बन जाती थी।

18 सड़क रोको

जब धरना पर्याप्त दबाव न बनाए, तो BKU सड़क अवरोध की रणनीति अपना सकती थी।

सड़क रोकने से प्रशासन पर तत्काल दबाव पड़ता है।

लेकिन यही पद्धति आंदोलन की नैतिक और सार्वजनिक सीमाओं की परीक्षा भी लेती है।

क्योंकि इससे सामान्य नागरिक भी प्रभावित होते हैं।

टिकैत आंदोलन के इतिहास में सड़क अवरोध ने कई बार प्रभावी दबाव बनाया, लेकिन कुछ अवसरों पर पुलिस टकराव भी पैदा किया।

19 रेल रोको

रेलवे अवरोध उससे भी अधिक शक्तिशाली रणनीति थी।

रेल राष्ट्रीय परिवहन तंत्र की जीवनरेखा है।

रेल रोकने का अर्थ केवल स्थानीय प्रशासन नहीं, व्यापक सरकारी व्यवस्था पर दबाव डालना है।

लेकिन यह रणनीति अधिक जोखिमपूर्ण भी थी।

पुलिस कार्रवाई की संभावना बढ़ती थी।

सामान्य यात्रियों को कठिनाई होती थी।

1988 के आंदोलन क्रम में सड़क और रेल अवरोध के दौरान पुलिस–किसान टकराव गंभीर हुआ और रजबपुर जैसी गोलीबारी की घटनाएं सामने आईं।

इसलिए BKU के इतिहास में रेल और सड़क अवरोध को केवल सफल संघर्ष तकनीक के रूप में नहीं, बल्कि उसकी जोखिमपूर्ण सीमा के रूप में भी देखना चाहिए।

20 अनुशासन क्यों आवश्यक था?

लाखों लोगों का आंदोलन दो तरीकों से सरकार को शक्ति दिखा सकता है—

टिकैत की रणनीति मुख्यतः संख्या पर आधारित थी।

यदि आंदोलन व्यापक हिंसा में बदल जाता तो सरकार को कठोर कार्रवाई का नैतिक और कानूनी आधार मिल जाता।

इसलिए नेतृत्व बार-बार अनुशासन पर जोर देता था।

सरकारी संपत्ति को नुकसान न पहुंचाओ।

व्यवहार में प्रत्येक आंदोलन में यह अनुशासन पूर्णतः कायम नहीं रह सका, लेकिन संगठन की घोषित रणनीति बड़े पैमाने पर सामूहिक दबाव और सीमित अहिंसक अवज्ञा पर आधारित थी।

21 टिकैत की अहिंसा : गांधीवाद या व्यवहारवाद?

टिकैत को सीधे गांधीवादी नेता कहना सावधानी मांगता है।

उन्होंने गांधी की तरह कोई व्यापक अहिंसात्मक राजनीतिक दर्शन विकसित नहीं किया था।

विशाल किसान संख्या स्वयं पर्याप्त दबाव पैदा कर सकती थी।

इसलिए उनकी अहिंसा को कई मामलों में रणनीतिक अहिंसा कहना अधिक उपयुक्त होगा।

हालांकि कर-अस्वीकार, लंबे धरने और शांतिपूर्ण सामूहिक अवज्ञा जैसी पद्धतियों में गांधीवादी आंदोलनों से स्पष्ट ऐतिहासिक समानताएं दिखाई देती हैं।

22 जब अनुशासन टूटा

टिकैत आंदोलन हमेशा पूर्णतः अहिंसक नहीं रहा।

करमूखेड़ी में पुलिस–किसान हिंसक टकराव हुआ।

1988 के आंदोलन क्रम में रजबपुर में गंभीर संघर्ष और पुलिस गोलीबारी हुई।

दिल्ली बोट क्लब आंदोलन के अंतिम दिनों में पुलिस और किसानों के बीच लाठीचार्ज, आंसू गैस और अवरोधक तोड़ने जैसी घटनाएं हुईं।

इन घटनाओं से एक महत्वपूर्ण सीमा सामने आती है—

विशाल अनौपचारिक भीड़ पर केंद्रीय नेतृत्व का नियंत्रण कभी पूर्ण नहीं होता।

इसलिए टिकैत आंदोलन की संघर्ष-पद्धति का मूल्यांकन करते समय उसके शांतिपूर्ण अनुशासन और हिंसक अपवाद—दोनों दर्ज करना आवश्यक है।

23 पुलिस गोलीबारी और शहादत की स्मृति

करमूखेड़ी और रजबपुर जैसी घटनाओं में किसानों की मृत्यु ने BKU की आंदोलन संस्कृति में “शहीद किसान” की स्मृति पैदा की।

इन सबने आंदोलन को भावनात्मक निरंतरता दी।

किसी आर्थिक मांग के लिए हुआ संघर्ष अब केवल बिल और मूल्य की गणना नहीं रहता।

उसके साथ सम्मान और बलिदान की स्मृति जुड़ जाती है।

यही स्मृति नए किसानों को भी आंदोलन से जोड़ती है।

24 लोकगीत और किसान संस्कृति

ग्रामीण आंदोलन केवल भाषण से नहीं चलता।

ये सभी आंदोलन संस्कृति का हिस्सा थे।

विशेषकर महिलाओं और ग्रामीण समूहों द्वारा गाए जाने वाले गीत संघर्ष को सामाजिक उत्सव और सामूहिक अनुभव में बदलते थे।

इससे लंबे धरने की थकान कम होती थी और राजनीतिक संदेश स्थानीय सांस्कृतिक भाषा में फैलता था।

25 आंदोलन और मेले के बीच

बड़े BKU धरनों का दृश्य कई बार ग्रामीण मेले जैसा दिखाई देता था।

किसान को आंदोलन में भाग लेने के लिए अपनी सामाजिक दुनिया छोड़नी नहीं पड़ती थी।

वह अपनी सामाजिक दुनिया को ही आंदोलन स्थल पर ले आता था।

26 आंदोलन का विकेंद्रीकृत वित्त

विशाल आंदोलन चलाने के लिए सामान्यतः बड़ी धनराशि चाहिए।

BKU ने इसका एक हिस्सा विकेंद्रीकृत कर दिया।

इस तरह आंदोलन की लागत हजारों परिवारों में विभाजित हो जाती थी।

यह मॉडल राजनीतिक वित्त की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था।

संगठन के पास बहुत बड़ा केंद्रीय कोष न हो तब भी विशाल आंदोलन संभव था।

27 सरकार की ‘थका दो’ रणनीति क्यों विफल होती थी?

लंबे धरनों के विरुद्ध प्रशासन की सामान्य रणनीति होती है—

लेकिन टिकैत मॉडल ने इसी गणना को चुनौती दी।

इसलिए आंदोलन कई दिनों तक टिक सकता है।

यह BKU की सबसे बड़ी रणनीतिक उपलब्धियों में से एक थी।

28 नेता और भीड़ के बीच कम दूरी

टिकैत की नेतृत्व शैली भी संघर्ष-पद्धति का हिस्सा थी।

वे बड़े सुरक्षा घेरे में अलग मंच पर बैठे राजनेता जैसी छवि नहीं बनाते थे।

इससे नेता और समर्थक के बीच सामाजिक दूरी कम दिखाई देती थी।

किसान उन्हें “दिल्ली का नेता” नहीं बल्कि “अपने बीच का चौधरी” मान सकता था।

29 मीडिया के लिए शक्तिशाली दृश्य

टिकैत आंदोलन की ग्रामीण संस्कृति मीडिया की दृष्टि से भी अत्यंत प्रभावी थी।

ये दृश्य किसी लंबे राजनीतिक भाषण से अधिक प्रभावशाली थे।

उन्होंने राष्ट्रीय मीडिया को किसान आंदोलन का ऐसा दृश्यात्मक प्रतीक दिया जो आसानी से जनता की स्मृति में बस गया।

30 गैर-दलीय मंच भी संघर्ष-पद्धति था

राजनीतिक नेताओं को आंदोलन मंच पर कब्जा न करने देना केवल वैचारिक निर्णय नहीं था।

यदि विपक्षी नेता मंच पर आ जाए तो सरकार आंदोलन को विपक्षी राजनीति कह सकती है।

यदि किसान स्वयं मंच नियंत्रित करे तो सरकार को सीधे किसान से बात करनी पड़ती है।

इसलिए टिकैत की गैर-दलीयता आंदोलन की नैतिक वैधता बनाए रखने की संघर्ष तकनीक भी थी।

31 प्रशासन से बातचीत के लिए दबाव, बातचीत का निषेध नहीं

BKU राज्य से संवाद समाप्त नहीं करती थी।

यानी आंदोलन का लक्ष्य सरकार को गिराना नहीं था।

उसे किसान की मांग पर बातचीत के लिए मजबूर करना था।

इसलिए टिकैत मॉडल को संघर्ष और सौदेबाजी का संयुक्त मॉडल कहा जा सकता है।

32 2020–21 में टिकैत मॉडल की प्रतिध्वनि

और आंदोलन स्थल को स्थायी सामाजिक जीवन में बदल देना।

अध्याय 8

टिकैत और राजनीतिक दल

महेंद्र सिंह टिकैत की किसान राजनीति का सबसे आकर्षक और सबसे विवादास्पद पक्ष था—गैर-दलीयता। भारतीय किसान यूनियन स्वयं को राजनीतिक दल नहीं, बल्कि किसानों का स्वतंत्र दबाव-संगठन मानती थी। उसका सिद्धांत था कि किसान की समस्याएं किसी एक पार्टी की नहीं हैं; इसलिए किसान को अपनी मांगों के लिए सरकार से लड़ना चाहिए, चाहे सरकार कांग्रेस की हो, जनता दल की, भाजपा की या किसी और दल की।

यही विचार 1980 के दशक में BKU की असाधारण शक्ति का कारण बना। कांग्रेस समर्थक किसान, लोकदल समर्थक किसान और भाजपा की ओर झुकाव रखने वाला किसान—सभी एक ही पंचायत में बैठ सकते थे। लेकिन जैसे-जैसे संगठन प्रभावशाली हुआ, राजनीतिक दलों ने उसे अपने पक्ष में करने की कोशिश की और BKU भी चुनावी राजनीति से पूरी तरह दूरी बनाए रखने में सफल नहीं रही।

इसलिए टिकैत की गैर-दलीय राजनीति को समझने के लिए दो स्तरों को अलग रखना आवश्यक है—

दूसरा, चुनावी राजनीति में उसका वास्तविक व्यवहार।

अकादमिक अध्ययनों में भी BKU की गैर-दलीयता को उसकी प्रारंभिक विश्वसनीयता का महत्वपूर्ण स्रोत माना गया है। संगठन ने जानबूझकर प्रतिस्पर्धी दलगत राजनीति से दूरी बनाई, क्योंकि किसी एक दल का चुनाव करने से किसान समुदाय की जाति, धर्म और पार्टी आधारित विभिन्न पहचानों को एक मंच पर लाना कठिन हो सकता था।

1 ‘गैर-राजनीतिक’ नहीं, ‘गैर-दलीय’

सबसे पहले एक सामान्य भ्रम दूर करना आवश्यक है।

BKU को “गैर-राजनीतिक संगठन” कहना शाब्दिक रूप से सही नहीं है।

बिजली दर कम करवाना राजनीतिक प्रश्न है।

गन्ना मूल्य बढ़वाना राजनीतिक प्रश्न है।

सरकारी कार्यालय घेरना राजनीतिक कार्रवाई है।

केंद्र और राज्य सरकार से वार्ता करना भी राजनीति है।

वे राजनीतिक दलों की संस्थागत प्रतिस्पर्धा से बाहर रहकर राजनीति करना चाहते थे।

2 किसान पहले, पार्टी बाद में

किसान अपनी पसंद की पार्टी को वोट दे सकता है, लेकिन किसान की मांग के प्रश्न पर उसे दूसरे किसानों के साथ खड़ा होना चाहिए।

एक अध्ययन में BKU समर्थक की सोच को इस रूप में दर्ज किया गया कि मुख्य बात सरकार से किसान की बात मनवाना है; वोट उसी को दिया जा सकता है जो किसान की सहायता करे। अध्ययन इसे उस गैर-दलीय दबाव-राजनीति का हिस्सा मानता है जिसमें संगठन विधानमंडल में प्रवेश किए बिना किसान हितों पर केंद्रित रह सकता था।

किसान आंदोलन को चुनावी गठबंधन की तरह हर प्रश्न पर समान राय रखने की जरूरत नहीं थी।

3 गैर-दलीयता की विश्वसनीयता

टिकैत जानते थे कि यदि BKU किसी एक पार्टी की शाखा बन गई तो दूसरी पार्टी का समर्थक किसान उससे दूर हो सकता है।

इसलिए 1988 के मेरठ आंदोलन में उन्होंने प्रमुख दलों के नेताओं को आंदोलन मंच पर कब्जा नहीं करने दिया।

यहां तक कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक नेताओं में से एक अजित सिंह को भी किसानों को मंच से संबोधित करने की अनुमति नहीं दी गई। इसके विपरीत शरद जोशी और स्वामी अग्निवेश जैसे गैर-दलीय आंदोलनकारी व्यक्तियों को बोलने दिया गया।

मंच किसान का है, चुनावी नेता का नहीं।

4 कांग्रेस के साथ पहला बड़ा टकराव

BKU के उत्कर्ष के समय उत्तर प्रदेश और केंद्र—दोनों स्तरों पर कांग्रेस महत्वपूर्ण सत्ता शक्ति थी।

उत्तर प्रदेश में वीर बहादुर सिंह की कांग्रेस सरकार से टिकैत का पहला बड़ा टकराव हुआ।

1987 में किसान आंदोलन बढ़ने पर मुख्यमंत्री स्वयं सिसौली पहुंचे। अकादमिक अध्ययन के अनुसार 11 अगस्त 1987 को वीर बहादुर सिंह ने किसानों की सभा को संबोधित करते हुए उचित मांगें पूरी करने का आश्वासन दिया। BKU नेतृत्व ने उनका औपचारिक राजनीतिक स्वागत नहीं किया और टिकैत ने घोषणा की कि सरकार को अपनी बात लागू करने के लिए अतिरिक्त समय दिया जा सकता है। मांगें पूरी न होने पर अक्टूबर में किसानों से सरकारी देयों का भुगतान रोकने को कहा गया।

यह घटना टिकैत की रणनीति का प्रारंभिक उदाहरण थी—

5 मेरठ में कांग्रेस सरकार को चुनौती

जनवरी–फरवरी 1988 का मेरठ कमिश्नरी घेराव सीधे कांग्रेस सरकार के विरुद्ध दबाव था।

India Today की समकालीन रिपोर्ट ने लिखा कि राज्य सरकार ने आंदोलन को थकाकर समाप्त करने की कोशिश की, लेकिन वह टिकैत की लोकप्रियता और किसानों की लामबंदी का अनुमान लगाने में विफल रही। महत्वपूर्ण बात यह थी कि वामपंथी दलों को छोड़कर लगभग सभी प्रमुख विपक्षी राजनीतिक शक्तियों ने टिकैत आंदोलन को समर्थन देना चाहा।

यही गैर-दलीय संगठन की राजनीतिक शक्ति थी।

लेकिन आंदोलन जरूरी नहीं था कि विपक्ष के नियंत्रण में चला जाए।

6 राजीव गांधी सरकार और बोट क्लब

अक्टूबर 1988 में दिल्ली बोट क्लब आंदोलन ने टिकैत और कांग्रेस के संबंध को राष्ट्रीय स्तर पर टकराव में बदल दिया।

लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए कि टिकैत की आलोचना कांग्रेस की विचारधारा से अधिक सरकार की कृषि नीति पर केंद्रित थी।

वे कांग्रेस को स्थायी राजनीतिक शत्रु घोषित नहीं कर रहे थे।

जो सरकार किसान की मांग नहीं मानेगी, किसान उसका विरोध करेगा।

यही कारण है कि BKU की राजनीति में आज का विरोधी कल बातचीत का पक्ष बन सकता था।

यह वैचारिक दल-विरोध के बजाय हित आधारित दबाव राजनीति थी।

7 क्या 1988 का आंदोलन कांग्रेस-विरोधी चुनाव अभियान था?

बोट क्लब आंदोलन के समय राजीव गांधी सरकार निश्चित रूप से गंभीर दबाव में आई।

लेकिन BKU ने स्वयं को औपचारिक विपक्षी चुनावी मोर्चे में परिवर्तित नहीं किया।

उस समय वी. पी. सिंह और राष्ट्रीय विपक्ष कांग्रेस सरकार के विरुद्ध तेजी से उभर रहे थे, फिर भी टिकैत ने आंदोलन का स्वतंत्र चरित्र बनाए रखने की कोशिश की।

लेकिन इस संघर्ष का स्वाभाविक राजनीतिक प्रभाव था।

कांग्रेस के विरुद्ध ग्रामीण असंतोष बढ़ा और BKU द्वारा निर्मित किसान वातावरण ने 1989 की राजनीति को प्रभावित किया।

8 1989 : गैर-दलीयता की पहली बड़ी दरार

1988 तक टिकैत की गैर-दलीयता अपेक्षाकृत मजबूत थी।

लेकिन 1989 के चुनावों के समय BKU ने जनता दल और राष्ट्रीय मोर्चे की ओर स्पष्ट राजनीतिक झुकाव दिखाया।

एक विस्तृत अकादमिक अध्ययन के अनुसार BKU ने 1989 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जनता दल से समझौता किया और किसानों से जनता दल उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान की अपील की। जनता दल सरकार बनने के बाद मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने।

एक दूसरे अध्ययन में भी यह निष्कर्ष दर्ज है कि उत्तर प्रदेश और हरियाणा में किसान आंदोलन ने 1989 में राष्ट्रीय मोर्चे के पक्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और कांग्रेस की पराजय में उसका योगदान रहा।

यह BKU की गैर-दलीय राजनीति में निर्णायक बदलाव था।

9 वी. पी. सिंह और राष्ट्रीय मोर्चा

1988–89 में वी. पी. सिंह कांग्रेस-विरोधी राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में थे।

किसान आंदोलनों, विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के असंतोष और राष्ट्रीय मोर्चे की राजनीति के बीच स्वाभाविक समीकरण बना।

BKU ने कांग्रेस सरकार पर जो कृषि दबाव बनाया था, उसका चुनावी लाभ विपक्ष को मिला।

लेकिन यही स्थिति टिकैत के लिए एक कठिन प्रश्न पैदा करती थी—

यदि किसी दल को चुनाव जिताने में किसान संगठन मदद करता है, तो सरकार बनने के बाद उससे क्या अपेक्षा होगी?

और यदि वह सरकार भी मांगें न माने तो क्या होगा?

10 जनता दल सरकार से मोहभंग

जनता दल सरकार बनने के बाद BKU को उम्मीद थी कि उसकी लंबित मांगों पर अधिक तेजी से कार्रवाई होगी।

अकादमिक अध्ययन के अनुसार टिकैत ने समझौते में किए गए वादों को लागू कराने की कोशिश की, लेकिन मुलायम सिंह यादव सरकार से अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। सरकार और BKU के बीच टकराव बढ़ा और पुलिस कार्रवाई तथा टिकैत की गिरफ्तारी तक की स्थिति बनी।

इस अनुभव ने BKU को उस संकट में डाल दिया जिससे वह बचना चाहती थी—

जिस पार्टी को समर्थन दिया था, उसी सरकार के विरुद्ध आंदोलन करना पड़ा।

यहीं गैर-दलीयता की उपयोगिता फिर स्पष्ट हुई।

11 सरकार बदलने से किसान समस्या क्यों नहीं बदली?

यह टिकैत राजनीति का महत्वपूर्ण अनुभव था।

लेकिन गन्ना, बिजली और किसान आय के प्रश्न बने रहे।

इससे उस मूल BKU सिद्धांत को नया आधार मिला कि किसान को किसी पार्टी के स्थायी अनुयायी नहीं बनना चाहिए।

सत्ता में आने के बाद प्रत्येक दल प्रशासनिक और वित्तीय सीमाओं से बंध जाता है।

इसलिए किसान संगठन को सरकार से स्वतंत्र रहना चाहिए।

परंतु व्यवहार में BKU अब पहले जैसी साफ दूरी नहीं बनाए रख पा रही थी।

12 चौधरी चरण सिंह : राजनीतिक गुरु, लेकिन अलग रास्ता

महेंद्र सिंह टिकैत और चौधरी चरण सिंह का संबंध भारतीय किसान राजनीति की दो अलग रणनीतियों को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

चरण सिंह किसान को राजनीतिक सत्ता तक पहुंचाना चाहते थे।

विधानसभा और संसद को किसान राजनीति का प्रमुख माध्यम माना।

टिकैत उसी कृषक सामाजिक आधार से निकले, लेकिन उनका रास्ता अलग था।

वे सत्ता में जाने के बजाय सत्ता पर दबाव डालना चाहते थे।

एक शोध में उल्लेख है कि टिकैत स्वयं चरण सिंह को अपना मार्गदर्शक मानते थे, लेकिन जहां चरण सिंह ने पार्टी व्यवस्था के भीतर शक्ति हासिल करने का मार्ग अपनाया, वहीं BKU ने गैर-विधायी दबाव संगठन बनने की रणनीति विकसित की।

यहीं दोनों की राजनीति में निरंतरता भी थी और अंतर भी।

13 चरण सिंह की सबसे बड़ी विरासत

टिकैत संगठनात्मक रूप से चरण सिंह की पार्टी के उत्तराधिकारी नहीं थे।

लेकिन सामाजिक रूप से वे चरण सिंह द्वारा निर्मित किसान चेतना की जमीन पर खड़े थे।

चरण सिंह ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मध्यम कृषक को यह राजनीतिक विश्वास दिया था कि किसान की अपनी आर्थिक पहचान है।

टिकैत ने उसी भावना को चुनावी राजनीति से निकालकर प्रत्यक्ष आंदोलन में बदल दिया।

चरण सिंह ने किसान को वोट की शक्ति दिखाई; टिकैत ने उसे धरने और पंचायत की शक्ति दिखाई।

14 अजित सिंह और टिकैत : सहयोग से अधिक प्रतिस्पर्धा

1987 में चरण सिंह के निधन के बाद उनके पुत्र अजित सिंह ने राजनीतिक विरासत संभाली।

इसी समय टिकैत किसान आंदोलनों के माध्यम से तेजी से उभर रहे थे।

इससे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक दिलचस्प शक्ति-संतुलन बना।

दोनों का सामाजिक आधार कई क्षेत्रों में एक-दूसरे से जुड़ा हुआ था, विशेषकर जाट किसान समाज में।

इसलिए उनके बीच सहयोग की संभावना भी थी और प्रतिस्पर्धा भी।

15 किसान वोट किसका?

यह प्रश्न पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति का केंद्रीय प्रश्न बन गया।

किसान आंदोलन में टिकैत के पीछे जा सकता था।

लेकिन चुनाव में वही किसान चरण सिंह परिवार या किसी दूसरे दल को वोट दे सकता था।

Indian Express ने बाद के विश्लेषण में इस स्थिति को बहुत स्पष्ट ढंग से रखा—पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जाट किसान आंदोलन के समय टिकैत के साथ चलता था, लेकिन चुनावी राजनीति में चरण सिंह परिवार का प्रभाव अधिक मजबूत रहा।

यही BKU की चुनावी सीमा का मूल कारण था।

आंदोलन की निष्ठा और वोट की निष्ठा समान नहीं थीं।

16 अजित सिंह ने टिकैत की ‘राजनीतिकता’ का विरोध क्यों किया?

जब टिकैत ने राजनीतिक नेताओं को सिसौली में बुलाना और चुनावी समीकरण बनाना शुरू किया, तो अजित सिंह ने इसका विरोध किया।

एक अकादमिक अध्ययन के अनुसार अजित सिंह गांव-गांव गए और BKU के “राजनीतिकरण” की आलोचना की। उनका तर्क था कि टिकैत राजनीतिक नेताओं को मंच देकर किसान संगठन के मूल चरित्र से समझौता कर रहे हैं। इस आलोचना का कुछ किसानों पर प्रभाव पड़ा और BKU की एकता कमजोर हुई।

इसमें राजनीतिक रणनीति भी स्पष्ट थी।

यदि BKU गैर-दलीय रहती है, तो अजित सिंह के चुनावी क्षेत्र को सीधी चुनौती कम है।

यदि BKU स्वयं चुनाव लड़ने लगे तो वही कृषक वोट दोनों के बीच बंट सकता है।

17 1991 : भाजपा की ओर झुकाव

1989 में जनता दल के समर्थन के बाद BKU का उसके साथ संबंध खराब हुआ।

1991 में संगठन का झुकाव भाजपा की ओर दिखाई दिया।

एक महत्वपूर्ण अकादमिक अध्ययन स्पष्ट रूप से कहता है कि BKU ने 1991 के चुनाव में भाजपा को खुला समर्थन दिया।

अन्य अध्ययनों में इसे कुछ अधिक सावधानी से “अनौपचारिक गठजोड़” या अप्रत्यक्ष समर्थन कहा गया है। 1990 के दशक के किसान आंदोलन पर एक प्रमुख अध्ययन ने भी लिखा कि BKU और भाजपा के बीच चुनावी समीकरण के मजबूत संकेत थे, हालांकि संगठन के नेता सार्वजनिक रूप से इस संबंध को अस्पष्ट रखते थे।

1991 में BKU की घोषित गैर-दलीयता के बावजूद भाजपा के प्रति स्पष्ट चुनावी निकटता विकसित हुई।

18 क्या BKU भाजपा की संगठनात्मक सहयोगी बन गई?

उसका अपना नेतृत्व, संगठन और कृषि एजेंडा बना रहा।

टिकैत ने अयोध्या जैसे मुद्दों को किसान संगठन का मुख्य प्रश्न मानने से इनकार किया था। 1991 के आसपास किए गए अध्ययनों में मुस्लिम BKU सदस्यों ने भी संगठन को बहुधार्मिक किसान संगठन के रूप में देखा।

इसलिए चुनावी समर्थन को वैचारिक विलय समझना गलत होगा।

लेकिन यह भी सच है कि इस समर्थन ने BKU की राजनीतिक तटस्थता की छवि कमजोर की।

19 भाजपा को समर्थन का राजनीतिक प्रभाव

1991 के चुनाव में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में बड़ी सफलता प्राप्त की।

BKU के प्रभाव वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी भाजपा मजबूत हुई।

यह कहना संभव नहीं कि परिणाम का कारण केवल BKU था—अयोध्या आंदोलन, कांग्रेस और जनता दल का संकट तथा व्यापक राजनीतिक ध्रुवीकरण उससे कहीं बड़े कारक थे।

लेकिन टिकैत का झुकाव भाजपा को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कृषक समाज में अतिरिक्त स्वीकार्यता देने वाले कारकों में शामिल था।

यहीं किसान पहचान और व्यापक धार्मिक-राजनीतिक पहचान के बीच वह तनाव दिखाई देने लगा जो आने वाले दशकों में अधिक गहरा हुआ।

20 कांग्रेस, जनता दल और भाजपा—तीनों ने टिकैत को क्यों चाहा?

क्योंकि टिकैत वोटों को प्रभावित कर सकते थे।

एक अध्ययन ने दर्ज किया कि कांग्रेस, जनता दल और 1990 के बाद भाजपा—तीनों के महत्वपूर्ण नेताओं ने टिकैत को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया।

जब हर पार्टी किसान नेता को अपने साथ चाहती है तो संगठन के सामने बड़ा प्रलोभन पैदा होता है—

या अपनी लोकप्रियता को चुनावी शक्ति में बदले?

1990 के दशक में BKU ने दूसरा रास्ता भी आजमाया।

21 1996 : स्वयं चुनावी राजनीति में प्रवेश

1996 में टिकैत आंदोलन ने अपनी गैर-दलीय परंपरा से सबसे बड़ा विचलन किया।

BKU से जुड़े नेतृत्व ने भारतीय किसान कामगार पार्टी के माध्यम से चुनावी राजनीति में प्रवेश करने का प्रयास किया।

अकादमिक अध्ययनों के अनुसार यह प्रयोग संगठन के चुनावी राजनीतिकरण का महत्वपूर्ण चरण था।

हालांकि इस चुनावी प्रयोग के परिणामों को “पूर्ण विफलता” कहना भी सावधानी मांगता है। उपलब्ध चुनावी संकलनों में भारतीय किसान कामगार पार्टी ने 1996 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सीमित सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए और कुछ सीटें हासिल भी कीं; फिर भी वह उस जनसमर्थन को राज्यव्यापी चुनावी शक्ति में नहीं बदल सकी जो टिकैत के विशाल आंदोलनों में दिखाई देता था।

22 लाखों की रैली, लेकिन वोट कम क्यों?

यही BKU के इतिहास का बड़ा राजनीतिक प्रश्न है।

क्योंकि आंदोलन और चुनाव अलग राजनीतिक व्यवहार हैं।

32 टिकैत और सत्ता का संबंध : दूरी भी, पहुंच भी

टिकैत सत्ता-विरोधी क्रांतिकारी नहीं थे।

अध्याय 9

चौधरी चरण सिंह और महेंद्र सिंह टिकैत

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की किसान राजनीति को समझने के लिए चौधरी चरण सिंह और महेंद्र सिंह टिकैत की तुलना अत्यंत महत्वपूर्ण है। दोनों एक ही व्यापक कृषक समाज से निकले, दोनों ने किसान को स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति के रूप में देखा, दोनों की सामाजिक जड़ें पश्चिमी उत्तर प्रदेश में थीं और दोनों ने ग्रामीण भारत की उपेक्षा के विरुद्ध आवाज उठाई। फिर भी उनकी राजनीति के रास्ते अलग थे।

चरण सिंह किसान को सत्ता तक ले जाना चाहते थे।

टिकैत किसान को सत्ता के सामने संगठित खड़ा करना चाहते थे।

पहला मॉडल चुनाव, दल और सरकार का था।

यही अंतर स्वतंत्र भारत की किसान राजनीति के दो बड़े मार्गों को सामने लाता है।

1 एक ही जमीन, दो राजनीतिक परंपराएं

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का सामाजिक आधार दोनों नेताओं के लिए महत्वपूर्ण था। जाट कृषक समाज, गन्ना अर्थव्यवस्था, सिंचाई, मंडियां, मध्यम किसान और ग्रामीण पंचायत संस्कृति—इन सभी ने एक ऐसी राजनीतिक जमीन तैयार की जिसमें किसान अपनी स्वतंत्र पहचान महसूस करता था।

चरण सिंह ने इसी सामाजिक आधार को चुनावी राजनीति में संगठित किया।

टिकैत ने बाद में इसी आधार को गैर-दलीय किसान आंदोलन में बदला।

इस अर्थ में टिकैत चरण सिंह से अलग भी थे और उनकी विरासत की अगली कड़ी भी।

2 चरण सिंह का राजनीतिक मॉडल

चौधरी चरण सिंह का मानना था कि भारतीय विकास नीति में कृषि और गांव को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया है। वे बड़े उद्योग-केंद्रित आर्थिक मॉडल के आलोचक थे और कृषक, छोटे उत्पादक तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को राष्ट्रीय विकास का केंद्र मानते थे।

उनकी राजनीति का रास्ता संस्थागत था।

किसान शक्ति को वोट में बदलो और वोट को राज्य सत्ता में।

3 टिकैत का राजनीतिक मॉडल

महेंद्र सिंह टिकैत ने वही समस्या अलग तरीके से देखी।

अगर किसान की बात सरकार नहीं सुनती तो क्या किसान को स्वयं सरकार बनना जरूरी है?

किसान इतना संगठित हो सकता है कि सरकार उसकी बात सुनने के लिए मजबूर हो।

किसान शक्ति को जनदबाव में बदलो और जनदबाव को नीति परिवर्तन में।

यही कारण है कि टिकैत ने लंबे समय तक चुनाव लड़ने या पद लेने की कोशिश नहीं की।

उनकी शक्ति पंचायत और आंदोलन में थी।

4 सत्ता प्राप्ति बनाम सत्ता पर दबाव

दोनों मॉडल का बुनियादी अंतर यहीं था।

चरण सिंह का लक्ष्य था सत्ता की संरचना में किसान की हिस्सेदारी बढ़ाना।

टिकैत का लक्ष्य था सत्ता को बाहर से जवाबदेह बनाना।

दोनों में कोई स्वाभाविक विरोध नहीं था, लेकिन राजनीतिक पद्धति अलग थी।

5 किसान की आर्थिक समस्या पर समानता

दोनों नेताओं की कृषि अर्थनीति में कई समान तत्व थे।

दोनों मानते थे कि कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को राष्ट्रीय नीति में अधिक महत्व मिलना चाहिए।

दोनों शहरी-औद्योगिक विकास मॉडल की आलोचना करते थे।

दोनों किसान की आय और कृषि लागत के प्रश्न को महत्वपूर्ण मानते थे।

दोनों इस बात से असंतुष्ट थे कि किसान उत्पादन करता है लेकिन मूल्य निर्धारण की शक्ति अक्सर उसके हाथ में नहीं होती।

फिर भी चरण सिंह का आर्थिक चिंतन अधिक व्यापक और व्यवस्थित था।

टिकैत का आर्थिक एजेंडा अधिक व्यावहारिक और आंदोलन-केंद्रित था।

6 चरण सिंह का कृषि अर्थशास्त्र

चरण सिंह ने कृषि, भूमि संबंधों, छोटे कृषक स्वामित्व और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर व्यापक लेखन किया।

उनका मानना था कि छोटे और मध्यम किसान पर आधारित कृषि व्यवस्था भारतीय परिस्थितियों के लिए अधिक उपयुक्त है।

वे बड़े औद्योगिक विकास के बजाय श्रमप्रधान और ग्रामीण उन्मुख आर्थिक नीति पर जोर देते थे।

इसलिए उनकी किसान राजनीति केवल गन्ना मूल्य या बिजली दर तक सीमित नहीं थी।

वह व्यापक राष्ट्रीय विकास मॉडल की आलोचना थी।

7 टिकैत का आर्थिक एजेंडा

टिकैत ने व्यापक आर्थिक सिद्धांत की जगह किसान की तत्काल समस्याओं को केंद्र में रखा।

किसान को किसी आर्थिक दर्शन का अध्ययन नहीं करना था।

इसलिए टिकैत की आर्थिक राजनीति अधिक प्रत्यक्ष और लोकप्रिय थी।

8 चरण सिंह ने किसान को राजनीतिक वर्ग बनाया

चरण सिंह का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने उत्तर भारत के कृषक समाज को राजनीतिक वर्ग के रूप में आत्मविश्वास दिया।

राष्ट्रीय गठबंधन प्रभावित कर सकता था।

यह भावना पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बहुत गहरी थी।

टिकैत का आंदोलन इसी राजनीतिक आत्मविश्वास की अगली अभिव्यक्ति था।

9 टिकैत ने किसान को दबाव समूह बनाया

टिकैत ने किसान को एक अलग प्रकार की शक्ति दिखाई।

सरकार बनाने के लिए हर किसान को पार्टी में जाने की जरूरत नहीं।

अगर लाखों किसान संगठित हो जाएं तो वे बाहर रहकर भी सरकार से नीति बदलवा सकते हैं।

टिकैत के किसान ने सड़क और चौपाल पर दबाव बनाया।

10 जाट सामाजिक आधार

दोनों नेताओं के सामाजिक आधार में जाट कृषकों की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जाट किसान भूमि, गन्ना, सिंचाई और स्थानीय राजनीति में प्रभावशाली था।

लेकिन दोनों नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षा केवल जाट नेतृत्व तक सीमित नहीं थी।

चरण सिंह ने व्यापक कृषक और पिछड़ा सामाजिक गठबंधन बनाने का प्रयास किया।

टिकैत ने किसान पहचान को जाति से ऊपर रखने की कोशिश की।

यही कारण था कि दोनों की राजनीति केवल जातीय संगठन बनकर नहीं रह गई।

11 जाट–मुस्लिम किसान गठबंधन

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाट और मुस्लिम किसानों का गठबंधन लंबे समय तक निर्णायक रहा।

दोनों समुदायों की बड़ी आबादी कृषि से जुड़ी थी।

इन प्रश्नों पर उनके आर्थिक हित कई बार समान थे।

चरण सिंह की राजनीति ने इस सामाजिक गठबंधन को चुनावी शक्ति में बदला।

टिकैत ने इसे किसान आंदोलन की सामूहिक शक्ति में।

इसलिए दोनों की राजनीति में हिंदू–मुस्लिम किसान एकता केवल सांप्रदायिक सद्भाव का प्रश्न नहीं थी।

वह कृषि अर्थव्यवस्था से उत्पन्न व्यावहारिक राजनीतिक गठबंधन भी थी।

12 चरण सिंह का ‘अजगर’ सामाजिक समीकरण

चरण सिंह की राजनीति को कभी-कभी ‘अजगर’ समीकरण—अहीर, जाट, गुर्जर और राजपूत—जैसी सामाजिक अवधारणाओं से जोड़ा जाता है।

हालांकि इसे हर समय स्थिर राजनीतिक सूत्र मानना अतिसरलीकरण होगा।

लेकिन व्यापक अर्थ में चरण सिंह ने गैर-शहरी और कृषक जातियों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की।

उनकी राजनीति ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के ऊंची जाति-केंद्रित प्रभुत्व को चुनौती दी।

यही सामाजिक पुनर्संरचना आगे मंडल राजनीति और क्षेत्रीय दलों के उदय के लिए भी जमीन तैयार करती है।

13 टिकैत की ‘किसान’ पहचान

टिकैत ने जातीय गठबंधन की भाषा से अधिक “किसान” की पहचान पर जोर दिया।

उनकी पंचायत में किसान की जाति से अधिक उसका कृषि हित सामने रखने की कोशिश होती थी।

लेकिन व्यवहार में संगठन का मजबूत आधार जाट कृषकों में था।

यहीं टिकैत मॉडल की ताकत और सीमा दोनों थीं।

वह जाति से ऊपर उठने का प्रयास करता था, लेकिन पूरी तरह जाति से मुक्त नहीं हो सकता था।

14 धार्मिक पहचान पर किसान पहचान

1980 के दशक में BKU के कई आंदोलनों में हिंदू और मुस्लिम किसान साथ दिखाई दिए।

मेरठ आंदोलन में मुस्लिम किसान हाफिज खलील अहमद को पंचायत की अध्यक्षता देना प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण था।

यह टिकैत की उस राजनीति का संकेत था जिसमें आर्थिक किसान पहचान को धार्मिक पहचान से ऊपर रखने की कोशिश की गई।

चरण सिंह की राजनीति में भी यही सामाजिक गठबंधन चुनावी रूप में दिखाई देता था।

दोनों नेताओं के लिए जाट–मुस्लिम एकता पश्चिमी उत्तर प्रदेश की शक्ति का महत्वपूर्ण स्रोत थी।

15 दोनों मॉडल और गैर-दलीयता

चरण सिंह का राजनीतिक जीवन पार्टी निर्माण से जुड़ा था।

टिकैत का प्रारंभिक राजनीतिक जीवन पार्टी से दूरी पर आधारित था।

चरण सिंह मानते थे कि बिना सत्ता के स्थायी नीति परिवर्तन कठिन है।

टिकैत मानते थे कि पार्टी में जाने से किसान संगठन की स्वतंत्रता कमजोर हो सकती है।

दोनों तर्कों में अपना व्यावहारिक आधार था।

16 चरण सिंह मॉडल की ताकत

चरण सिंह के मॉडल की सबसे बड़ी शक्ति थी—

यदि किसान राजनीति सरकार में पहुंचती है तो वह कानून बना सकती है।

अर्थात चुनावी सत्ता नीति परिवर्तन के औपचारिक साधन देती है।

टिकैत के दबाव मॉडल में ये अधिकार सीधे उपलब्ध नहीं थे।

17 चरण सिंह मॉडल की सीमा

लेकिन चुनावी राजनीति में किसान एजेंडा अकेला नहीं रहता।

दल को कई सामाजिक समूहों के हित संतुलित करने पड़ते हैं।

सत्ता में आने के बाद वित्तीय और प्रशासनिक सीमाओं का सामना करना पड़ता है।

इसलिए चुनावी किसान नेता सत्ता में पहुंचकर वही सब नहीं कर सकता जो विपक्ष में किसान से वादा करता है।

यही चरण सिंह मॉडल की संरचनात्मक सीमा थी।

18 टिकैत मॉडल की ताकत

टिकैत के मॉडल की सबसे बड़ी शक्ति थी—

यदि संगठन सत्ता में नहीं है तो वह सरकार की आर्थिक और प्रशासनिक मजबूरियों के लिए सीधे जिम्मेदार नहीं है।

वह एक ही मुद्दे पर अधिक कठोर दबाव डाल सकता है।

वह किसानों की असंतुष्टि का शुद्ध प्रतिनिधित्व कर सकता है।

यही कारण था कि BKU सरकार बदलने पर भी आंदोलन जारी रख सकती थी।

19 टिकैत मॉडल की सीमा

लेकिन दबाव समूह की शक्ति का भी अंत है।

आखिरकार उसे सरकार से समझौता करना पड़ता है।

इसलिए यदि सरकार दबाव सह ले या आंदोलन कमजोर पड़ जाए तो मांग अधूरी रह सकती है।

20 चरण सिंह बनाम टिकैत : कौन अधिक प्रभावी?

यह प्रश्न सरल तुलना से हल नहीं हो सकता।

चरण सिंह ने किसान को भारतीय राजनीति में दीर्घकालीन चुनावी पहचान दी।

टिकैत ने किसान को आंदोलनकारी स्वायत्तता दी।

चरण सिंह ने सत्ता संरचना को प्रभावित किया।

टिकैत ने सत्ता के व्यवहार को प्रभावित किया।

चरण सिंह की विरासत दलों और चुनावों में अधिक दिखाई देती है।

टिकैत की विरासत धरनों, महापंचायतों और किसान संगठनों में।

दोनों मिलकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की किसान राजनीति की पूर्ण तस्वीर बनाते हैं।

21 अजित सिंह : दोनों परंपराओं के बीच

चरण सिंह के निधन के बाद अजित सिंह उनके चुनावी उत्तराधिकारी बने।

लेकिन इसी समय टिकैत आंदोलन बढ़ रहा था।

इससे किसान समाज के भीतर दो प्रकार का नेतृत्व सामने आया—

कई किसान दोनों के साथ अलग-अलग संदर्भों में जुड़ सकते थे।

यही कारण था कि टिकैत के आंदोलन की विशाल भीड़ हमेशा चुनाव में उनके निर्देश के अनुसार मतदान नहीं करती थी।

22 वोट और आंदोलन का विभाजन

यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति की एक विशिष्ट विशेषता बन गई।

किसान गन्ना मूल्य के लिए टिकैत के साथ सड़क पर हो सकता था।

लेकिन विधानसभा चुनाव में अजित सिंह या किसी और दल को वोट दे सकता था।

आंदोलनात्मक निष्ठा और चुनावी निष्ठा अलग हो सकती हैं।

यह तथ्य BKU की चुनावी सीमाओं को समझने के लिए केंद्रीय है।

23 1989 के बाद दोनों परंपराओं का टकराव

जब BKU ने 1989 में जनता दल का समर्थन किया और बाद में 1991 में भाजपा की ओर झुकाव दिखाया, तो वह उसी चुनावी दुनिया में प्रवेश करने लगी जिससे टिकैत दूरी बनाए रखना चाहते थे।

इससे अजित सिंह और टिकैत के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ी।

अब प्रश्न केवल किसान मांग का नहीं था।

कौन किसान वोट का प्रतिनिधि है—यह भी सवाल बन गया।

यही वह बिंदु था जहां टिकैत की गैर-दलीय राजनीति कमजोर होने लगी।

24 चरण सिंह की विरासत अधिक टिकाऊ क्यों दिखी?

चरण सिंह की राजनीति से कई चुनावी दल और नेता निकले।

उनकी सामाजिक गठबंधन राजनीति राष्ट्रीय स्तर पर मंडल और क्षेत्रीय दलों की राजनीति से जुड़ गई।

उनकी विरासत चुनावी संस्थाओं में बनी रही।

टिकैत की विरासत अधिक आंदोलनकारी थी।

इसलिए वह व्यक्तिगत नेतृत्व और संगठनात्मक एकता पर अधिक निर्भर थी।

महेंद्र सिंह टिकैत के बाद BKU का विभाजन इसी संस्थागत कमजोरी का संकेत था।

25 लेकिन टिकैत की विरासत भी क्यों जीवित रही?

क्योंकि उनकी संघर्ष-पद्धति बहुत प्रभावशाली थी।

ये सभी पद्धतियां बाद के किसान आंदोलनों में लौटती रहीं।

2020–21 के किसान आंदोलन में इनका स्पष्ट पुनरावर्तन दिखाई दिया।

इस अर्थ में टिकैत का संगठनात्मक मॉडल चुनावी दल से कम स्थायी दिख सकता है, लेकिन आंदोलन संस्कृति में उसकी विरासत अत्यंत गहरी है।

26 दोनों की संयुक्त विरासत : किसान स्वाभिमान

चरण सिंह और टिकैत में सबसे बड़ी समानता थी—

दोनों ने किसान को दया का पात्र मानने से इनकार किया।

इसलिए उसे सम्मान और आर्थिक न्याय दोनों मिलना चाहिए।

चरण सिंह ने इसे राजनीतिक प्रतिनिधित्व की भाषा दी।

27 पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति पर प्रभाव

दोनों नेताओं की संयुक्त विरासत के बिना पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझना कठिन है।

चरण सिंह ने कांग्रेस के एकाधिकार को चुनौती दी।

कृषक और पिछड़ा वर्ग राजनीति को मजबूत किया।

टिकैत ने सरकारों को बताया कि किसान संगठन चुनावी दल के बाहर भी बड़ी शक्ति बन सकता है।

दोनों ने ग्रामीण समाज को दिल्ली और लखनऊ की सत्ता से सीधे जोड़ दिया।

28 जाट राजनीति का विस्तार

दोनों नेताओं की वजह से जाट समुदाय की राजनीतिक भूमिका पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बहुत प्रभावशाली हुई।

लेकिन दोनों की सफलता तभी बड़ी बनी जब वे जाट पहचान से आगे बढ़ सके।

चरण सिंह ने व्यापक किसान और पिछड़ा गठबंधन बनाया।

टिकैत ने किसान पहचान के माध्यम से अन्य कृषक समुदायों को जोड़ने का प्रयास किया।

जहां यह विस्तार सफल हुआ, उनकी राजनीति मजबूत हुई।

जहां वह कमजोर हुआ, उनका प्रभाव सीमित हुआ।

29 हिंदू–मुस्लिम गठबंधन की कमजोरी

समय के साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक राजनीति मजबूत हुई।

इससे वह जाट–मुस्लिम किसान गठबंधन कमजोर हुआ जो चरण सिंह और टिकैत दोनों की राजनीति की महत्वपूर्ण सामाजिक नींव था।

यह परिवर्तन दिखाता है कि आर्थिक हित हमेशा सांस्कृतिक या धार्मिक पहचान पर स्थायी विजय नहीं पा सकते।

किसान एकता परिस्थितिजन्य हो सकती है और दूसरे राजनीतिक प्रश्न उसे तोड़ सकते हैं।

यही दोनों नेताओं की विरासत की बड़ी ऐतिहासिक सीमा है।

30 किसान राजनीति और मंडल–कमंडल

1990 के दशक में उत्तर भारतीय राजनीति में दो बड़े परिवर्तन हुए—

इन दोनों ने किसान पहचान को चुनौती दी।

कृषक समाज अब केवल किसान के रूप में नहीं, बल्कि जाति और धार्मिक पहचान के आधार पर भी राजनीतिक रूप से लामबंद होने लगा।

चरण सिंह की कृषक राजनीति और टिकैत की गैर-दलीय किसान एकता दोनों पर इसका असर पड़ा।

यही कारण है कि 1980 के दशक जैसी एकीकृत किसान राजनीति 1990 के बाद कठिन होती गई।

31 क्या चरण सिंह और टिकैत एक ही विचारधारा थे?

उनमें समानता थी, लेकिन वे एक ही विचारधारा के प्रतिनिधि नहीं थे।

चरण सिंह के पास व्यापक आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि थी।

टिकैत का आंदोलन मांग-केंद्रित और व्यावहारिक था।

चरण सिंह राज्य सत्ता का उपयोग किसान हित में करना चाहते थे।

टिकैत राज्य पर बाहर से दबाव बनाना चाहते थे।

इसलिए दोनों की तुलना करनी चाहिए, लेकिन एक को दूसरे का सरल विस्तार नहीं मानना चाहिए।

32 दोनों की सबसे बड़ी उपलब्धियां

किसान को स्वतंत्र आंदोलनकारी शक्ति बनाना।

चरण सिंह ने किसान को राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिया।

टिकैत ने किसान को गैर-दलीय सामूहिक आवाज दी।

दोनों ने भारतीय लोकतंत्र में ग्रामीण समाज की शक्ति बढ़ाई।

33 दोनों की सबसे बड़ी सीमाएं

चरण सिंह की राजनीति व्यापक ग्रामीण समाज को स्थायी राष्ट्रीय गठबंधन में पूरी तरह नहीं बदल सकी।

उनकी राजनीति क्षेत्रीय और सामाजिक सीमाओं से बंधी रही।

टिकैत का आंदोलन भी भूमिहीन मजदूर, दलित कृषि श्रमिक और गैर-कृषक ग्रामीण गरीब की समस्याओं को उतनी मजबूती से केंद्र में नहीं ला सका।

समेकित मूल्यांकन : सत्ता और सड़क के बीच किसान

किसान को सत्ता में हिस्सेदारी चाहिए।

अध्याय 10

जाति, खाप और किसान एकता

भारतीय किसान यूनियन और महेंद्र सिंह टिकैत की राजनीति को केवल आर्थिक मांगों से नहीं समझा जा सकता। उसके पीछे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की विशिष्ट सामाजिक संरचना थी—जाट कृषक प्रभुत्व, गुर्जर और त्यागी जैसे अन्य कृषक समुदाय, बड़ी मुस्लिम किसान आबादी, दलित कृषि मजदूर, पारंपरिक खाप नेटवर्क और गांव-स्तरीय सामाजिक पंचायतें। टिकैत की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धियों में से एक यही थी कि उन्होंने इन विभाजित ग्रामीण पहचानों के ऊपर “किसान” की एक साझा पहचान खड़ी करने की कोशिश की।

लेकिन यही उनकी सबसे बड़ी सीमा भी बनी। किसान पहचान व्यापक थी, परंतु वह ग्रामीण समाज के जातीय, धार्मिक और वर्गीय विभाजनों को स्थायी रूप से समाप्त नहीं कर सकी।

1 पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का ग्रामीण समाज जाति, भूमि और पेशे के आधार पर गहराई से विभाजित रहा है। जाट, गुर्जर, त्यागी, राजपूत, मुस्लिम कृषक समुदाय और अनेक अन्य पिछड़ी जातियां खेती से जुड़ी थीं, जबकि दलित समुदायों का बड़ा हिस्सा भूमिहीन या सीमांत कृषक तथा कृषि मजदूर के रूप में मौजूद था।

भूमि स्वामित्व का वितरण समान नहीं था।

जाट कृषकों के पास कई क्षेत्रों में अपेक्षाकृत मजबूत भूमि स्वामित्व और राजनीतिक प्रभाव था।

गुर्जर और त्यागी किसान भी कई जिलों में महत्वपूर्ण थे।

मुस्लिम किसानों की भी बड़ी उपस्थिति थी, विशेषकर गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में।

इसी सामाजिक संरचना ने BKU को व्यापक किसान संगठन बनने की संभावना दी, लेकिन साथ ही जातीय व वर्गीय तनाव भी पैदा किए।

2 BKU का जाट सामाजिक आधार

भारतीय किसान यूनियन के शुरुआती विस्तार में जाट कृषकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी।

महेंद्र सिंह टिकैत स्वयं जाट समुदाय से थे।

उनका गांव सिसौली जाट बहुल क्षेत्र में था।

बालियान खाप का प्रभाव भी मुख्यतः जाट समाज में था।

इसलिए शुरुआती संगठनात्मक नेटवर्क स्वाभाविक रूप से जाट गांवों में मजबूत था।

इसी कारण कई पर्यवेक्षकों ने BKU को जाट किसान संगठन के रूप में देखा।

यदि BKU केवल जाट संगठन होता, तो वह मेरठ और दिल्ली जैसे आंदोलनों में इतनी व्यापक सामाजिक भागीदारी जुटाने में सफल नहीं होता।

3 जाट किसान क्यों केंद्रीय बने?

जाट किसानों की आर्थिक स्थिति भी महत्वपूर्ण थी।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अनेक जाट किसान मध्यम या अपेक्षाकृत बड़े भू-स्वामी थे।

वे गन्ना, गेहूं और दूसरी व्यावसायिक फसलें पैदा करते थे।

उनके पास नलकूप और ट्रैक्टर जैसी कृषि संपत्तियां अपेक्षाकृत अधिक थीं।

इसलिए बिजली, गन्ना मूल्य, सिंचाई और कृषि लागत जैसे BKU मुद्दे उनके लिए अत्यंत प्रत्यक्ष थे।

यानी जाट सामाजिक आधार और कृषि आर्थिक आधार एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।

4 खाप नेटवर्क की भूमिका

BKU के संगठनात्मक विस्तार में खाप नेटवर्क की भूमिका महत्वपूर्ण रही।

खाप पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के ग्रामीण समाज की पुरानी सामुदायिक संरचना है।

उसके माध्यम से गांवों के बीच सामाजिक संपर्क पहले से मौजूद था।

टिकैत ने इस मौजूदा नेटवर्क का उपयोग किसान लामबंदी के लिए किया।

टिकैत ने खाप नेटवर्क की सामाजिक पूंजी को किसान आंदोलन में बदला।

5 खाप की ताकत

यदि किसी पंचायत में आंदोलन का निर्णय होता, तो संदेश जल्दी फैल सकता था।

इससे संगठन कम संसाधनों में बड़ी भीड़ जुटा सकता था।

6 खाप की सीमा

लेकिन खाप नेटवर्क की अपनी सामाजिक सीमाएं भी थीं।

महिलाओं की औपचारिक भागीदारी सीमित थी।

दलित और अन्य समुदाय उसके समान हिस्सेदार नहीं थे।

इसलिए यदि किसान संगठन खाप पर अत्यधिक निर्भर रहता, तो व्यापक किसान एकता की सीमा पैदा हो सकती थी।

खाप की संगठनात्मक ताकत का उपयोग करना, लेकिन आंदोलन को खाप तक सीमित न रहने देना।

7 किसान पहचान की राजनीति

टिकैत ने जाति की जगह “किसान” शब्द को केंद्रीय राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश की।

बिजली का बिल जाट और मुस्लिम दोनों किसान देते हैं।

इस आर्थिक समानता को BKU ने सामाजिक एकता का आधार बनाया।

8 मुस्लिम किसान भागीदारी

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम किसान BKU के महत्वपूर्ण सामाजिक आधारों में शामिल रहे।

गन्ना उत्पादक जिलों में बड़ी मुस्लिम कृषक आबादी थी।

उनकी आर्थिक समस्याएं हिंदू किसानों जैसी ही थीं।

इसलिए 1980 के दशक के BKU आंदोलनों में मुस्लिम भागीदारी उल्लेखनीय रही।

मेरठ आंदोलन में मुस्लिम किसान नेतृत्व को पंचायत में सम्मानजनक भूमिका देना इसी राजनीति का प्रतीक था।

यह उस समय के किसान आंदोलन की बड़ी उपलब्धि थी।

9 जाट–मुस्लिम किसान गठबंधन

जाट–मुस्लिम किसान गठबंधन पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति का महत्वपूर्ण तत्व था।

चौधरी चरण सिंह की राजनीति ने पहले ही इस सामाजिक गठबंधन को मजबूत किया था।

टिकैत ने इसे चुनावी राजनीति से बाहर किसान आंदोलन के रूप में आगे बढ़ाया।

10 किसान एकता बनाम धार्मिक पहचान

टिकैत के शुरुआती दौर में किसान पहचान कई अवसरों पर धार्मिक पहचान से ऊपर दिखाई दी।

लेकिन 1980 के दशक में इसका राजनीतिक प्रभाव बड़ा था।

जब किसान एक ही मंच पर बैठते थे, तो धार्मिक पहचान पूरी तरह समाप्त नहीं होती थी; लेकिन आर्थिक मुद्दे उसे कुछ समय के लिए पीछे कर सकते थे।

यही BKU की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक उपलब्धियों में से एक थी।

11 गुर्जर किसान

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुर्जर किसानों की भी महत्वपूर्ण उपस्थिति है।

कई जिलों में वे कृषि और स्थानीय राजनीति में प्रभावशाली रहे हैं।

BKU की अपील गुर्जर किसानों तक भी पहुंची, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां बिजली, सिंचाई और गन्ना जैसे मुद्दे समान थे।

लेकिन संगठनात्मक नेतृत्व में जाट प्रभाव अधिक दिखाई देता रहा।

यही कारण है कि व्यापक किसान भागीदारी के बावजूद BKU की सार्वजनिक छवि लंबे समय तक जाट केंद्रित बनी रही।

12 त्यागी और अन्य कृषक समुदाय

त्यागी समुदाय भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में भूमि-स्वामी कृषक समुदाय के रूप में प्रभावशाली रहा।

BKU के कृषि मुद्दे उनके लिए भी प्रासंगिक थे।

इसी तरह राजपूत और अन्य पिछड़ी कृषक जातियों के किसान भी अलग-अलग समय पर संगठन से जुड़े।

इससे स्पष्ट होता है कि BKU की वास्तविक सामाजिक पहुंच जाट समुदाय से अधिक व्यापक थी।

लेकिन नेतृत्व संरचना में समान प्रतिनिधित्व का प्रश्न बना रहा।

13 क्या BKU जाति से ऊपर उठ सकी?

आंदोलन के क्षणों में किसान पहचान जातीय विभाजन को कमजोर कर सकती थी।

लेकिन स्थायी सामाजिक संरचना में जाति बनी रही।

गांव में भूमि संबंध जाति से जुड़े थे।

स्थानीय पंचायत शक्ति भी कई बार जाति से प्रभावित थी।

इसलिए आंदोलन में एकता और गांव में सामाजिक वास्तविकता हमेशा समान नहीं थी।

14 दलित और भूमिहीन कृषि मजदूर

यहीं BKU की सबसे गंभीर सामाजिक सीमा सामने आती है।

भूमिहीन और दलित कृषि मजदूर की प्राथमिक समस्याएं थीं—

इनसे भूमिहीन मजदूर को अप्रत्यक्ष लाभ हो सकता था, लेकिन वह इनके केंद्रीय लाभार्थियों में नहीं था।

15 किसान और मजदूर का वर्गीय अंतर

भूमि रखने वाला किसान और भूमिहीन मजदूर दोनों ग्रामीण समाज का हिस्सा हैं, लेकिन उनके हित हमेशा समान नहीं होते।

यदि कृषि मजदूरी बढ़ती है तो मजदूर के लिए अच्छा है।

यदि गन्ना मूल्य बढ़ता है तो किसान को लाभ होता है।

मजदूर को लाभ तभी मिलेगा जब उसकी मजदूरी या रोजगार बढ़े।

यानी ग्रामीण समाज में किसान और मजदूर के बीच वर्गीय अंतर वास्तविक था।

BKU इस अंतर को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकी।

16 ‘किसान’ शब्द की सीमा

भारतीय किसान राजनीति में “किसान” शब्द कई बार बहुत व्यापक रूप में प्रयोग होता है।

BKU का “किसान” मुख्यतः भूमि पर खेती करने वाला कृषक था।

यही उसकी संगठनात्मक शक्ति और सामाजिक सीमा दोनों थी।

17 दलित किसान और BKU

यह भी गलत होगा कि दलित समुदाय पूरी तरह BKU से बाहर था।

छोटे किसान के रूप में वे बिजली, सिंचाई और फसल मूल्य के प्रश्नों से प्रभावित थे।

लेकिन व्यापक रूप से दलित ग्रामीण आबादी का बड़ा हिस्सा भूमिहीन या सीमांत आर्थिक स्थिति में था।

इसलिए BKU का एजेंडा उनकी प्राथमिकताओं को उतनी मजबूती से प्रतिनिधित्व नहीं करता था।

18 सामाजिक न्याय बनाम कृषि न्याय

BKU का आंदोलन मुख्यतः कृषि आर्थिक न्याय पर केंद्रित था।

सामाजिक न्याय उसके केंद्र में नहीं था।

ये प्रश्न संगठन की मुख्य पहचान नहीं बने।

यहीं इसकी तुलना वामपंथी किसान आंदोलनों से अलग होती है।

तेलंगाना, तेभागा और नक्सलबाड़ी जैसे आंदोलनों में भूमि और वर्ग संघर्ष केंद्रीय था।

BKU में उत्पादक किसान का आर्थिक हित केंद्रीय था।

19 नेतृत्व संरचना की सामाजिक सीमा

BKU के बड़े नेतृत्व में लंबे समय तक जाट पुरुष नेतृत्व का प्रभाव अधिक रहा।

यह संगठन के सामाजिक आधार का प्रतिबिंब भी था।

लेकिन इससे व्यापक प्रतिनिधित्व का प्रश्न पैदा हुआ।

यदि संगठन सभी किसानों का दावा करता है, तो क्या उसके नेतृत्व में विभिन्न जातियों, महिलाओं, छोटे किसानों और भूमिहीनों को समान अवसर मिला?

यह सवाल बाद के इतिहासलेखन में महत्वपूर्ण बना।

20 महिलाओं और सामाजिक प्रतिनिधित्व

महिलाएं किसान आंदोलन में उपस्थित थीं।

उन्होंने रसोई, रसद, गीत और धरना—सभी स्तरों पर योगदान दिया।

लेकिन औपचारिक नेतृत्व में उनकी उपस्थिति सीमित रही।

यह खाप और ग्रामीण पितृसत्तात्मक संरचना की सीमा भी थी।

इसलिए BKU की किसान एकता में लैंगिक समानता स्वतः नहीं आई।

21 गांव की एकता और गांव की असमानता

टिकैत आंदोलन अक्सर गांव को सामूहिक इकाई की तरह प्रस्तुत करता था।

लेकिन गांव स्वयं समान समाज नहीं था।

इसलिए “गांव बनाम सरकार” की सरल छवि कई बार गांव के भीतर के संघर्षों को छिपा सकती थी।

यही आलोचनात्मक इतिहासलेखन का महत्वपूर्ण प्रश्न है।

22 BKU की व्यापकता क्यों बनी रही?

इन सीमाओं के बावजूद BKU व्यापक क्यों बनी?

क्योंकि उसके मुद्दे बड़े कृषक क्षेत्र में वास्तविक थे।

इन प्रश्नों ने जाति से ऊपर साझा आर्थिक मंच तैयार किया।

इसी वजह से संगठन विभिन्न समुदायों तक पहुंच सका।

23 पंचायत में समानता का प्रतीक

बड़ी पंचायतों में किसान जमीन पर साथ बैठते थे।

यह दृश्य स्वयं सामाजिक समानता का प्रतीक बनता था।

बड़ा किसान और छोटा किसान एक ही मंच पर।

लेकिन प्रतीकात्मक समानता और वास्तविक आर्थिक समानता में अंतर था।

इसलिए पंचायत की दृश्य एकता को सामाजिक क्रांति मान लेना उचित नहीं होगा।

24 खाप और लोकतंत्र का संबंध

खाप की भूमिका पर एक बड़ा लोकतांत्रिक प्रश्न भी है।

समर्थकों के लिए खाप ग्रामीण सामुदायिक निर्णय संस्था है।

आलोचकों के लिए वह कई बार जातीय और पितृसत्तात्मक शक्ति संरचना का हिस्सा रही है।

टिकैत आंदोलन ने खाप की सामूहिक लामबंदी क्षमता का उपयोग किया।

लेकिन BKU को आधुनिक लोकतांत्रिक किसान संगठन मानते हुए उसकी खाप-निर्भरता की आलोचनात्मक समीक्षा भी जरूरी है।

25 किसान पंचायत बनाम जातीय पंचायत

जातीय पंचायत को किसान पंचायत में बदलने की कोशिश।

यानी मुद्दा विवाह या सामाजिक अनुशासन नहीं।

इसने परंपरागत सामाजिक संरचना को आधुनिक आर्थिक राजनीति से जोड़ा।

खाप की सामाजिक पहचान पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।

26 साझा दुश्मन की राजनीति

किसान एकता अक्सर तब मजबूत हुई जब सामने साझा प्रतिद्वंद्वी था—

साझा आर्थिक शिकायत ने आंतरिक जातीय मतभेदों को कुछ समय के लिए पीछे धकेला।

लेकिन जैसे ही वह साझा संघर्ष कमजोर पड़ा, पुरानी सामाजिक पहचानों की वापसी संभव थी।

यही किसान एकता की परिस्थितिजन्य प्रकृति थी।

27 आंदोलन के बाद गांव वापस

धरना खत्म होने के बाद किसान गांव लौटता था।

वह फिर उसी सामाजिक संरचना में प्रवेश करता था।

यानी आंदोलन में बनी किसान एकता को स्थायी सामाजिक एकता में बदलना कठिन था।

BKU इसका पूर्ण समाधान नहीं खोज सकी।

28 1990 के बाद बदलता सामाजिक वातावरण

1990 के दशक में उत्तर प्रदेश की राजनीति तेजी से बदली।

मंडल राजनीति ने जाति पहचान को नए तरीके से सक्रिय किया।

राम मंदिर आंदोलन ने धार्मिक पहचान को तेज किया।

इन सबने उस किसान पहचान को चुनौती दी जिसे टिकैत 1980 के दशक में मजबूत कर रहे थे।

वह अपनी जाति और धर्म के आधार पर भी राजनीतिक निर्णय लेने लगा।

29 जाट–मुस्लिम एकता पर दबाव

1990 के दशक के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट और मुस्लिम राजनीति धीरे-धीरे अलग दिशाओं में जाने लगी।

लेकिन धार्मिक ध्रुवीकरण और चुनावी प्रतिस्पर्धा ने किसान एकता को कमजोर किया।

इसका गंभीर प्रभाव BKU की सामाजिक शक्ति पर पड़ा।

1980 के दशक में जो साझा कृषि पहचान मजबूत दिखती थी, वह आने वाले वर्षों में कम स्थिर साबित हुई।

30 सामाजिक गठबंधन की राजनीतिक कीमत

यदि BKU किसी राजनीतिक दल की ओर झुकती, तो उसका प्रभाव सामाजिक गठबंधन पर पड़ सकता था।

उदाहरण के लिए, भाजपा के साथ निकटता मुस्लिम किसानों में संदेह पैदा कर सकती थी।

किसी दूसरे दल से निकटता जाट या दूसरे समर्थक समूह को प्रभावित कर सकती थी।

यही कारण था कि गैर-दलीयता केवल राजनीतिक रणनीति नहीं, सामाजिक एकता बनाए रखने का साधन भी थी।

31 टिकैत की व्यक्तिगत सामाजिक विश्वसनीयता

महेंद्र सिंह टिकैत की व्यक्तिगत छवि ने भी विभिन्न समुदायों को जोड़ने में भूमिका निभाई।

वे बड़े राजनीतिक पद से नहीं जुड़े थे।

इससे किसान उन्हें “अपने बीच का” नेता मान सकता था।

यही व्यक्तिगत विश्वसनीयता संगठन की जातीय सीमा को कुछ हद तक पार करने में मदद करती थी।

32 क्या किसान पहचान स्थायी राजनीतिक पहचान बन सकी?

यही BKU का सबसे बड़ा सामाजिक निष्कर्ष है।

किसान पहचान मजबूत आंदोलनकारी पहचान बन सकती थी।

लेकिन वह हमेशा चुनावी, धार्मिक और जातीय पहचान को स्थायी रूप से प्रतिस्थापित नहीं कर सकी।

यह बात 1990 के बाद बार-बार सामने आई।

33 फिर भी किसान एकता की उपलब्धि

इसके बावजूद 1980 के दशक में जो हुआ वह ऐतिहासिक था।

यह भारतीय ग्रामीण राजनीति में छोटी उपलब्धि नहीं थी।

34 BKU की सामाजिक विरासत

BKU ने किसान आंदोलन को एक व्यापक सामाजिक भाषा दी।

बाद के आंदोलनों में भी यही भाषा दिखाई देती है।

2020–21 के किसान आंदोलन में भी धार्मिक और क्षेत्रीय विविधता के बावजूद किसान पहचान को साझा मंच बनाने की कोशिश हुई।

इस ऐतिहासिक परंपरा में टिकैत काल का योगदान महत्वपूर्ण है।

35 सबसे बड़ी सामाजिक सीमा

लेकिन टिकैत मॉडल की सबसे बड़ी सामाजिक सीमा वही रही—

भूमि रखने वाले किसान को पूरे ग्रामीण समाज का प्रतिनिधि मान लेना।

इनकी समस्याएं किसान मूल्य राजनीति से अलग भी थीं।

यदि किसान आंदोलन इन प्रश्नों को शामिल नहीं करता, तो उसकी सामाजिक एकता अधूरी रहती है।

समेकित मूल्यांकन : किसान पहचान की शक्ति और उसकी सीमा

महेंद्र सिंह टिकैत की राजनीति ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण समाज में एक असाधारण प्रयोग किया—

जाति और धर्म से ऊपर किसान पहचान बनाने का।

इस प्रयोग का सामाजिक आधार जाट कृषक समाज और खाप नेटवर्क में था।

मुस्लिम किसान बड़े पैमाने पर जुड़े।

यही कारण था कि BKU केवल एक जातीय संगठन बनकर नहीं रह गई।

गन्ना और बिजली ने साझा आर्थिक मुद्दा दिया।

और टिकैत ने इन सबको “किसान” की एक राजनीतिक पहचान में जोड़ने की कोशिश की।

दलित और भूमिहीन कृषि मजदूर के प्रश्न केंद्र में नहीं आए।

महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण थी, लेकिन नेतृत्व में सीमित रही।

और 1990 के दशक के बाद इन्हीं पहचानों ने किसान एकता को चुनौती दी।

इसलिए BKU के सामाजिक इतिहास का सबसे संतुलित निष्कर्ष यह है—

टिकैत जाति समाप्त नहीं कर सके, लेकिन उन्होंने कुछ समय के लिए जाति से ऊपर किसान को राजनीतिक रूप से संगठित कर दिखाया।

वे धर्म समाप्त नहीं कर सके, लेकिन हिंदू और मुस्लिम किसान को साझा आर्थिक हित पर एक मंच पर ला सके।

अध्याय 11

हिंदू–मुस्लिम किसान एकता से सामाजिक दरार तक

भारतीय किसान यूनियन के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक कथाओं में से एक है—पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट–मुस्लिम किसान एकता का निर्माण, उसका कमजोर होना, 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों में गंभीर सामाजिक टूटन और 2020–21 किसान आंदोलन के दौरान उस रिश्ते को फिर से जोड़ने का प्रयास।

यह कहानी केवल सांप्रदायिक संबंधों की नहीं है। इसके केंद्र में कृषि अर्थव्यवस्था, गन्ना, जमीन, पंचायत, खाप, चुनावी राजनीति, हिंदुत्व का विस्तार, क्षेत्रीय दलों का संकट और बदलता ग्रामीण समाज—सभी मौजूद हैं।

महेंद्र सिंह टिकैत के उत्कर्ष काल में BKU की सबसे बड़ी सामाजिक उपलब्धि यही थी कि उसने कई अवसरों पर हिंदू और मुस्लिम किसानों को एक साझा आर्थिक पहचान के अंतर्गत संगठित किया। लेकिन यह एकता स्थायी नहीं थी। 1990 के दशक से धार्मिक और दलगत राजनीति मजबूत हुई, और 2013 तक पहुंचते-पहुंचते पश्चिमी उत्तर प्रदेश का वही कृषक समाज गंभीर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का शिकार हो गया।

फिर 2020–21 के किसान आंदोलन में उसी क्षेत्र से एक विपरीत प्रक्रिया दिखाई दी—कृषि मुद्दों ने एक बार फिर धार्मिक विभाजन से ऊपर साझा किसान पहचान पुनर्जीवित करने की कोशिश की। आधुनिक अकादमिक अध्ययनों ने भी 2020–21 के आंदोलन को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान पहचान के पुनर्जीवन और 2013 के बाद बनी सांप्रदायिक दूरी को आंशिक रूप से कम करने वाली प्रक्रिया के रूप में देखा है।

1 चरण सिंह युग का सामाजिक गठबंधन

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट और मुस्लिम किसानों की राजनीतिक निकटता महेंद्र सिंह टिकैत से पहले की थी।

चौधरी चरण सिंह की राजनीति ने इस गठबंधन को विशेष शक्ति दी।

दोनों समुदायों में बड़ी आबादी खेती से जुड़ी थी।

दोनों गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में प्रभावशाली थे।

दोनों के आर्थिक हितों में कई समानताएं थीं।

और गांव की कृषि अर्थव्यवस्था मजबूत रहनी चाहिए।

इसी आर्थिक समानता ने राजनीतिक सहयोग की जमीन तैयार की।

2 किसान गठबंधन केवल चुनावी नहीं था

गांव के स्तर पर जाट और मुस्लिम किसान एक ही चीनी मिल को गन्ना बेच सकते थे।

खेती की लागत दोनों को प्रभावित करती थी।

इसलिए किसान संघर्ष की वास्तविक सामाजिक परिस्थितियां मौजूद थीं।

चरण सिंह ने इस आर्थिक निकटता को चुनावी राजनीति में बदला।

बाद में टिकैत ने इसे आंदोलनकारी एकता में बदलने की कोशिश की।

3 टिकैत और साझा किसान पहचान

महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में BKU ने जाति और धर्म से ऊपर “किसान” की पहचान को राजनीतिक केंद्र बनाया।

वह हिंदू या मुस्लिम देखकर नहीं आती।

बिजली का बिल धार्मिक पहचान नहीं पूछता।

गन्ने का भुगतान धर्म देखकर नहीं मिलता।

यही दृष्टि 1980 के दशक की विशाल पंचायतों में दिखाई दी।

4 मेरठ आंदोलन का प्रतीकवाद

1988 के मेरठ कमिश्नरी आंदोलन में मुस्लिम किसानों की सक्रिय भागीदारी BKU की व्यापक सामाजिक पहुंच का संकेत थी।

एक महत्वपूर्ण अकादमिक अध्ययन में उल्लेख है कि आंदोलन के दौरान टिकैत ने स्थानीय मुस्लिम किसान हाफिज खलील अहमद को बड़ी पंचायत की अध्यक्षता करने के लिए कहा था।

BKU केवल जाट संगठन नहीं है; किसान आंदोलन में मुस्लिम किसान बराबर हिस्सेदार है।

यही वह समय था जब टिकैत का किसान गठबंधन अपनी सबसे व्यापक स्थिति में था।

5 ‘हर हर महादेव’ और ‘अल्लाहु अकबर’ की पुरानी परंपरा

बाद में राकेश टिकैत ने कई बार याद किया कि महेंद्र सिंह टिकैत के दौर की पंचायतों में “अल्लाहु अकबर” और “हर हर महादेव” जैसे नारे साथ लगाए जाते थे।

2021 की मुजफ्फरनगर महापंचायत में राकेश टिकैत ने इन्हीं नारों को फिर से मंच से बुलवाया।

BKU नेतृत्व इसे पुराने हिंदू–मुस्लिम किसान भाईचारे की स्मृति के रूप में प्रस्तुत कर रहा था।

यानी आंदोलन के पास केवल आर्थिक मुद्दा नहीं था; उसके पास अतीत की साझा स्मृति भी थी।

6 एकता की वास्तविक सीमा

लेकिन इस किसान एकता को आदर्शीकृत नहीं करना चाहिए।

1980 के दशक में भी ग्रामीण समाज सांप्रदायिक भेदभाव से पूरी तरह मुक्त नहीं था।

हिंदू और मुस्लिम अलग सामाजिक समुदाय थे।

अलग राजनीतिक और धार्मिक संगठन सक्रिय थे।

लेकिन कृषि संघर्ष ने इन अंतरों को कुछ समय के लिए पीछे धकेलने की क्षमता दिखाई।

यानी टिकैत की किसान एकता असमानताओं का अंत नहीं, साझा आर्थिक मुद्दे पर निर्मित राजनीतिक गठबंधन थी।

7 1990 का दशक : राजनीतिक वातावरण बदलता है

1990 के दशक में उत्तर भारत की राजनीति तेजी से बदली।

मंडल आयोग की राजनीति ने जातीय पहचान को नया राजनीतिक अर्थ दिया।

राम जन्मभूमि आंदोलन ने धार्मिक पहचान को अभूतपूर्व राजनीतिक शक्ति दी।

इन परिवर्तनों ने उस किसान पहचान को चुनौती दी जो 1980 के दशक में BKU के केंद्र में थी।

अब किसान केवल गन्ने और बिजली के आधार पर राजनीति नहीं कर रहा था।

उसकी जातीय और धार्मिक पहचान भी चुनावी निर्णय को प्रभावित करने लगी।

8 अयोध्या आंदोलन और किसान राजनीति

राम मंदिर आंदोलन ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश सहित पूरे उत्तर भारत में हिंदू राजनीतिक लामबंदी को मजबूत किया।

BKU ने औपचारिक रूप से अयोध्या को अपना कृषि मुद्दा नहीं बनाया।

महेंद्र सिंह टिकैत की मूल राजनीति कृषि आर्थिक प्रश्नों पर केंद्रित रही।

लेकिन संगठन का सामाजिक आधार राजनीतिक वातावरण से अलग नहीं रह सकता था।

BKU समर्थक किसान अलग-अलग दलों और आंदोलनों से प्रभावित हो सकते थे।

यहीं गैर-दलीय किसान पहचान और धार्मिक राजनीतिक पहचान के बीच तनाव बढ़ा।

9 भाजपा से निकटता का प्रभाव

1991 के आसपास BKU का भाजपा की ओर चुनावी झुकाव भी दिखाई दिया।

इसे संगठन के सांप्रदायिकीकरण का सरल प्रमाण मान लेना उचित नहीं होगा, क्योंकि किसान संगठन का कृषि एजेंडा स्वतंत्र रहा और मुस्लिम किसान भी उससे जुड़े रहे।

लेकिन राजनीतिक प्रतीकवाद महत्वपूर्ण था।

यदि संगठन का प्रमुख जाट सामाजिक आधार भाजपा की ओर झुकता है, तो मुस्लिम किसानों में यह आशंका स्वाभाविक हो सकती थी कि क्या BKU वास्तव में पहले जैसी गैर-दलीय और धर्मनिरपेक्ष किसान एकता बनाए रख पाएगी।

यही सामाजिक दूरी आने वाले वर्षों में बढ़ी।

10 किसान पहचान क्यों कमजोर हुई?

युवाओं का रोजगार गैर-कृषि क्षेत्र की ओर बढ़ रहा था।

राजनीतिक दलों ने अलग-अलग समुदायों को अलग चुनावी गठबंधनों में संगठित किया।

और BKU का आंदोलनकारी प्रभाव भी 1988 के शिखर की तुलना में धीरे-धीरे कम हुआ।

Satendra Kumar का अध्ययन बताता है कि कृषि संरचना में बदलाव और हिंदुत्व राजनीति के विस्तार ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पुरानी किसान-आधारित ग्रामीण राजनीति को धीरे-धीरे कमजोर किया।

11 टिकैत के अंतिम वर्षों तक संबंध

महेंद्र सिंह टिकैत का व्यक्तिगत प्रभाव दोनों समुदायों में लंबे समय तक बना रहा।

कई मुस्लिम किसान उन्हें “बाबा टिकैत” के रूप में सम्मान देते थे।

लेकिन संगठन की सामाजिक एकता पहले जैसी नहीं रही।

नई पीढ़ी के किसानों की राजनीतिक पहचान अलग थी।

क्षेत्रीय दलों, भाजपा, बसपा और समाजवादी राजनीति के बीच ग्रामीण समाज अधिक विभाजित होता गया।

इसका परिणाम यह हुआ कि BKU का साझा किसान मंच कमजोर होने लगा।

12 2011 : महेंद्र सिंह टिकैत का निधन

15 मई 2011 को महेंद्र सिंह टिकैत का निधन हुआ।

उनके बाद संगठन का नेतृत्व परिवार और वरिष्ठ BKU नेताओं के बीच आगे बढ़ा।

नरेश टिकैत अध्यक्ष बने और राकेश टिकैत प्रमुख सार्वजनिक चेहरा बने।

लेकिन यह नेतृत्व परिवर्तन ऐसे समय हुआ जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सामाजिक राजनीति पहले से अधिक विभाजित थी।

केवल दो वर्ष बाद 2013 में यह विभाजन हिंसक रूप में सामने आया।

13 2013 : मुजफ्फरनगर हिंसा की पृष्ठभूमि

अगस्त–सितंबर 2013 में मुजफ्फरनगर और शामली क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव तेजी से बढ़ा।

स्थानीय हिंसक घटना, अफवाहें, राजनीतिक लामबंदी, महापंचायतें और प्रशासनिक विफलताओं ने स्थिति को गंभीर बनाया।

सितंबर 2013 में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा हुई।

बहुत बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए।

सबसे गंभीर प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों के मुस्लिम परिवारों पर पड़ा।

यह घटना पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सामाजिक राजनीति में निर्णायक मोड़ थी।

14 BKU और 2013 : कठिन प्रश्न

BKU के इतिहास में 2013 सबसे विवादास्पद अध्यायों में से एक है।

कुछ अकादमिक अध्ययनों ने तर्क दिया है कि BKU के कुछ नेता और खाप नेटवर्क उस सांप्रदायिक राजनीतिक प्रक्रिया से अलग नहीं थे जिसने हिंसा से पहले जाट–मुस्लिम विभाजन को बढ़ाया।

R. Ramakumar के Journal of Agrarian Change में प्रकाशित अध्ययन ने इससे भी कठोर निष्कर्ष दिया। अध्ययन का तर्क है कि BKU नेतृत्व और संगठन के हिस्सों ने उस सांप्रदायिक विमर्श को आत्मसात किया जिसने दंगों की पृष्ठभूमि तैयार की; अध्ययन विशेष रूप से खाप नेटवर्क की भूमिका पर जोर देता है।

यह एक महत्वपूर्ण अकादमिक आलोचना है और BKU के इतिहास में इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

15 लेकिन पूरे संगठन को एक रंग में देखना भी गलत

यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि BKU कोई अत्यधिक केंद्रीकृत पार्टी नहीं थी।

उसमें अलग-अलग क्षेत्रीय नेता, स्थानीय इकाइयां और सामाजिक समूह थे।

इसलिए संगठन के कुछ नेताओं या सदस्यों के व्यवहार को पूरे ऐतिहासिक BKU की एकमात्र पहचान मान लेना भी सावधानी मांगता है।

2013 ने दिखाया कि BKU की पुरानी किसान पहचान सांप्रदायिक लामबंदी को रोकने में विफल रही।

और संगठन के कुछ हिस्से स्वयं उस ध्रुवीकरण से प्रभावित हुए।

16 ‘किसान’ पर ‘हिंदू–मुस्लिम’ भारी पड़ा

2013 का सबसे बड़ा ऐतिहासिक अर्थ यही था।

जिन गांवों में दशकों तक जाट और मुस्लिम किसान साथ पंचायत करते थे, वहीं दोनों समुदाय भय और हिंसा के कारण अलग हो गए।

एक अकादमिक अध्ययन ने इसे इस प्रश्न में रूपांतरित किया—

क्यों “किसान” की साझा पहचान पर “हिंदू” पहचान भारी पड़ी?

यह टिकैत मॉडल की सबसे गंभीर सामाजिक परीक्षा थी।

और इस परीक्षा में किसान पहचान कमजोर साबित हुई।

17 हिंसा के बाद मुस्लिम किसान BKU से दूर

दंगों के तुरंत बाद इसका संगठनात्मक प्रभाव साफ दिखाई दिया।

नवंबर 2013 की Indian Express रिपोर्ट ने दर्ज किया कि गन्ना किसानों के आंदोलन में मुस्लिम किसान, जो पहले जाट किसानों के साथ BKU में दिखाई देते थे, अनुपस्थित थे। मुस्लिम किसान एक अलग संगठन—भारतीय किसान मजदूर मंच—के कार्यक्रमों में शामिल होने लगे थे।

यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश की दशकों पुरानी किसान राजनीति के टूटने का संकेत था।

18 गन्ना वही था, लेकिन किसान अलग हो गए

2013 के बाद एक गहरा विरोधाभास सामने आया।

जाट किसान और मुस्लिम किसान दोनों गन्ना पैदा कर रहे थे।

दोनों को चीनी मिल से भुगतान चाहिए था।

लेकिन वे एक ही किसान मंच पर नहीं आ रहे थे।

साझा आर्थिक हित अपने आप सामाजिक एकता की गारंटी नहीं देते।

राजनीतिक और सांप्रदायिक पहचान कई बार आर्थिक हित से अधिक शक्तिशाली हो सकती है।

19 BKU की संगठनात्मक क्षति

2013 के बाद BKU की सामाजिक पहुंच पर गंभीर प्रभाव पड़ा।

संगठन के पुराने मुस्लिम कार्यकर्ता दूर हुए।

कई मुस्लिम किसानों ने अलग मंचों का सहारा लिया।

BKU के भीतर जाट प्रभुत्व की छवि और मजबूत हुई।

BKU के ही स्थानीय पदाधिकारियों ने बाद में स्वीकार किया कि 2013 के जाट–मुस्लिम दंगों से संगठन पर बड़ा प्रभाव पड़ा और मुस्लिम समुदाय ने BKU कार्यक्रमों में भाग लेना काफी कम कर दिया था।

यानी सांप्रदायिक हिंसा ने केवल सामाजिक संबंध नहीं तोड़े।

उसने किसान संगठन की राजनीतिक क्षमता भी कमजोर की।

20 चुनावी प्रभाव

2013 की हिंसा के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़ा राजनीतिक पुनर्गठन हुआ।

जाट मतदाता तेजी से भाजपा के पक्ष में संगठित हुए।

वह जाट–मुस्लिम चुनावी गठबंधन कमजोर हुआ जो चरण सिंह और बाद में राष्ट्रीय लोकदल की राजनीति का आधार था।

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़ी सफलता इस नए राजनीतिक वातावरण का हिस्सा थी।

इससे किसान पहचान की जगह धार्मिक राजनीतिक ध्रुवीकरण अधिक प्रभावशाली दिखा।

21 BKU का राजनीतिक संकट

यदि हिंदू और मुस्लिम किसान अलग राजनीतिक शिविरों में चले गए हैं, तो किसान आंदोलन कैसे चलेगा?

सिर्फ जाट किसान आधार पर विशाल पश्चिमी उत्तर प्रदेश आंदोलन खड़ा करना कठिन था।

गन्ना बेल्ट की सामाजिक संरचना ही बहु-सामुदायिक थी।

इसलिए संगठन की पुरानी शक्ति वापस लाने के लिए मुस्लिम किसान को फिर से जोड़ना आवश्यक था।

22 मेल-मिलाप की शुरुआती कोशिश

यह प्रक्रिया 2020 में अचानक शुरू नहीं हुई थी।

स्थानीय BKU नेताओं के अनुसार जाट और मुस्लिम किसानों को पुनः पास लाने की कोशिश 2018 के आसपास से ही होने लगी थी। राकेश टिकैत और पुराने मुस्लिम किसान नेता गुलाम मोहम्मद जौला के बीच संपर्क भी इस प्रक्रिया का हिस्सा था।

लेकिन कोई ऐसा साझा बड़ा मुद्दा नहीं था जो दोनों समुदायों को फिर से उसी स्तर पर एक साथ खड़ा कर सके जैसा 1980 के दशक में हुआ था।

23 तीन कृषि कानून और नई परिस्थिति

2020 में केंद्र सरकार द्वारा पारित तीन कृषि कानूनों के विरोध में पंजाब और हरियाणा से शुरू हुआ किसान आंदोलन जल्द ही उत्तर प्रदेश तक फैलने लगा।

शुरुआत में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में BKU की लामबंदी सीमित थी।

लेकिन जैसे-जैसे आंदोलन लंबा चला, गन्ना बेल्ट के किसान जुड़ने लगे।

यह मुद्दा हिंदू और मुस्लिम किसान दोनों से संबंधित था।

फिर वही पुराना आर्थिक सूत्र सामने आया—

24 गाजीपुर सीमा और 28 जनवरी 2021

2020–21 आंदोलन में BKU के पुनरुत्थान का निर्णायक क्षण जनवरी 2021 के अंत में आया।

26 जनवरी की दिल्ली घटनाओं के बाद आंदोलन दबाव में था।

28 जनवरी को गाजीपुर सीमा खाली कराने की आशंका के बीच राकेश टिकैत भावुक दिखाई दिए।

उनका वीडियो और तस्वीरें तेजी से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फैलीं।

अकादमिक अध्ययन के अनुसार इस क्षण ने हिंदू और मुस्लिम दोनों पुराने BKU समर्थकों को भावनात्मक रूप से पुनः सक्रिय किया और बड़ी संख्या में किसान गाजीपुर सीमा की ओर पहुंचे।

यह BKU के सामाजिक पुनर्जीवन का महत्वपूर्ण क्षण था।

25 मुजफ्फरनगर पंचायत : पुरानी एकता की वापसी

29 जनवरी 2021 को मुजफ्फरनगर में बड़ी पंचायत हुई।

वर्षों बाद जाट और मुस्लिम किसान फिर एक साझा किसान मंच पर दिखाई दिए।

पुराने किसान नेता और राजनीतिक चेहरे भी साथ आए।

Aaj Tak की उस समय की रिपोर्ट ने इसे 2013 के बाद जाट–मुस्लिम रिश्तों में आई खटास कम करने वाली प्रक्रिया के रूप में वर्णित किया और दर्ज किया कि मुस्लिम किसान फिर BKU के करीब आने लगे थे।

यह टिकैत परिवार के लिए केवल आंदोलन विस्तार नहीं था।

यह उनके पिता महेंद्र सिंह टिकैत की पुरानी सामाजिक विरासत की पुनर्स्थापना का प्रयास भी था।

26 गुलाम मोहम्मद जौला का महत्व

गुलाम मोहम्मद जौला महेंद्र सिंह टिकैत के पुराने सहयोगियों में रहे थे।

2013 के बाद वे BKU से दूर चले गए थे।

2021 में उनका फिर किसान पंचायत में आना प्रतीकात्मक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण था।

इसने यह संदेश दिया कि पुराने संबंध पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।

कृषि संघर्ष सामाजिक दूरी को कम करने का नया अवसर दे सकता है।

लेकिन अतीत की चोटें इतनी गहरी थीं कि यह प्रक्रिया आसान नहीं थी।

27 2013 की सार्वजनिक स्मृति

मेल-मिलाप के लिए 2013 को भूलना पर्याप्त नहीं था।

कई मुस्लिम किसान परिवारों के लिए हिंसा, विस्थापन और जान-माल की क्षति वास्तविक अनुभव था।

इसलिए जाट–मुस्लिम पुनर्मिलन केवल राजनीतिक मंच पर साथ खड़े होने से पूरा नहीं हो सकता था।

अध्याय 12

महिला किसान और BKU

भारतीय किसान यूनियन और महेंद्र सिंह टिकैत के किसान आंदोलन की सार्वजनिक छवि लंबे समय तक पुरुष किसान, खाप पंचायत, ट्रैक्टर, हुक्का और चौपाल के इर्द-गिर्द बनी रही। लेकिन यदि आंदोलन के सामाजिक इतिहास को गहराई से देखा जाए तो महिलाओं की भूमिका उससे कहीं अधिक व्यापक दिखाई देती है। वे केवल घर संभालने वाली या आंदोलनकारियों के लिए भोजन तैयार करने वाली पृष्ठभूमि की पात्र नहीं थीं; उन्होंने धरनों, पंचायतों, सामुदायिक रसोइयों, लोकगीतों, जुलूसों और लंबे किसान पड़ावों को टिकाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

फिर भी एक बड़ा विरोधाभास बना रहा—कृषि श्रम में महिलाओं की भागीदारी बहुत अधिक थी, लेकिन किसान संगठनों के औपचारिक नेतृत्व में उनकी उपस्थिति बहुत कम।

महेंद्र सिंह टिकैत के दौर का BKU भी इस व्यापक भारतीय ग्रामीण पितृसत्तात्मक संरचना से मुक्त नहीं था। आंदोलन में महिलाएं थीं, लेकिन संगठन के शीर्ष नेतृत्व और निर्णय-निर्माण में उनका प्रतिनिधित्व सीमित था। यही कारण है कि महिला किसान का प्रश्न BKU के इतिहास में उपलब्धि और सीमा—दोनों को सामने लाता है।

1 महिला किसान की अदृश्यता

भारतीय कृषि में महिलाओं की भूमिका लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है।

इन सब में ग्रामीण महिलाएं बड़ी मात्रा में श्रम करती रही हैं।

लेकिन भूमि प्रायः पुरुष के नाम पर होती थी।

और राजनीतिक मंच पर “किसान” की छवि भी पुरुष की।

इसलिए कृषि में काम करने वाली महिला अक्सर “किसान की पत्नी” मानी जाती थी, स्वयं किसान नहीं।

यही संरचनात्मक समस्या BKU के दौर में भी बनी रही।

2 टिकैत आंदोलन में महिलाओं की शुरुआती भूमिका

करमूखेड़ी और उसके बाद के आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी धीरे-धीरे दिखाई देने लगी।

लेकिन मेरठ कमिश्नरी घेराव 1988 वह चरण था जहां महिलाओं की प्रत्यक्ष उपस्थिति अधिक स्पष्ट हुई।

किसान परिवारों के बीच संपर्क बनाए रखा।

यानी वे आंदोलन की सामाजिक और रसद संरचना का हिस्सा थीं।

यह भागीदारी बिना औपचारिक पद के भी महत्वपूर्ण थी।

3 आंदोलन की रसद में महिलाओं की केंद्रीय भूमिका

लंबे किसान आंदोलन केवल भाषणों से नहीं चलते।

उनके पीछे भोजन, पानी, वस्त्र, स्वास्थ्य, बच्चों की देखभाल और गांव-घर की व्यवस्था भी होती है।

इन सभी में महिलाओं की भूमिका केंद्रीय थी।

यदि परिवार का पुरुष सदस्य मेरठ या दिल्ली में सप्ताहों तक धरने पर बैठा था, तो घर और खेत कौन संभाल रहा था?

यदि धरना स्थल पर सैकड़ों या हजारों लोगों के लिए भोजन बन रहा था, तो उसमें किसका श्रम था?

यानी आंदोलन की दृश्यमान राजनीति के पीछे एक विशाल अदृश्य महिला श्रम मौजूद था।

4 सामुदायिक रसोई और राजनीतिक श्रम

सामुदायिक रसोई को केवल घरेलू काम मानना गलत होगा।

वह आंदोलन की राजनीतिक आधारभूत संरचना थी।

किसान आंदोलन तभी लंबा चल सकता था जब लोगों को नियमित भोजन मिले।

इसलिए खाना बनाना, अनाज साफ करना, आटा गूंथना, चाय बनाना, दूध व्यवस्थित करना और बर्तन संभालना—ये सभी आंदोलन को टिकाए रखने वाले राजनीतिक श्रम थे।

लेकिन इतिहासलेखन में अक्सर इन कामों का श्रेय महिलाओं को पर्याप्त नहीं मिलता।

5 घर पर रहकर आंदोलन चलाना

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह आंदोलन से बाहर थी।

कई महिलाओं ने घर पर खेत और पशुओं की जिम्मेदारी संभाली।

इस प्रकार आंदोलन में भागीदारी का एक दूसरा रूप दिखाई देता है—

यह भी राजनीतिक भागीदारी है, भले ही वह मंच पर दिखाई न दे।

6 लोकगीत : महिलाओं की राजनीतिक भाषा

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ग्रामीण संस्कृति में लोकगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहे।

वे सामाजिक अनुभव, पीड़ा, व्यंग्य और सामूहिक भावना व्यक्त करने का साधन भी रहे हैं।

महिला किसान आंदोलनों में लोकगीतों के माध्यम से—

इस तरह ग्रामीण महिला ने अपनी राजनीतिक भाषा अक्सर भाषण के बजाय गीत में व्यक्त की।

7 मंच पर कम, मैदान में अधिक

टिकैत काल के किसान आंदोलनों की एक प्रमुख विशेषता थी—

महिलाएं आंदोलन स्थल पर दिखाई देती थीं, लेकिन मंचीय नेतृत्व में बहुत कम।

महापंचायत का नेतृत्व मुख्यतः पुरुषों के हाथ में था।

खाप नेतृत्व भी लगभग पूर्णतः पुरुष प्रधान था।

इसलिए महिलाओं की भागीदारी को दो स्तरों पर देखना चाहिए—

यही विरोधाभास महिला किसान की स्थिति को समझने की कुंजी है।

8 खाप और पितृसत्ता

BKU का सामाजिक आधार जिन खाप और ग्रामीण पंचायत संरचनाओं से जुड़ा था, वे परंपरागत रूप से पुरुष प्रधान थीं।

परिवार और विवाह के निर्णय में पुरुषों की प्रधानता।

यही सामाजिक संरचना किसान आंदोलन में भी आई।

इसलिए टिकैत आंदोलन जितना किसान स्वाभिमान की बात करता था, उतना ही उसे ग्रामीण पितृसत्ता की सीमाओं से भी जूझना पड़ता था।

9 महिला की किसान पहचान क्यों कमजोर रही?

कृषि भूमि प्रायः पुरुषों के नाम थी।

मंडी, बैंक और सरकारी कार्यालयों में परिवार का पुरुष ही किसान प्रतिनिधि माना जाता था।

महिला का कृषि श्रम “घरेलू मदद” मान लिया जाता था।

इसलिए महिला खेती करती थी, लेकिन राज्य और समाज के दस्तावेजों में किसान के रूप में नहीं दिखाई देती थी।

10 गन्ना अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की गन्ना अर्थव्यवस्था पुरुष प्रधान दिखाई देती है, क्योंकि गन्ना मिलों में बेचने और भुगतान लेने की प्रक्रिया अक्सर पुरुष संभालते थे।

लेकिन गन्ने की खेती में महिला श्रम भी महत्वपूर्ण था।

खेत की तैयारी के बाद की अनेक गतिविधियों, खरपतवार नियंत्रण, पशुपालन और घरेलू कृषि अर्थव्यवस्था में महिलाएं योगदान देती थीं।

इसलिए गन्ने का अधिक मूल्य केवल पुरुष किसान की आय नहीं बढ़ाता था।

उसका प्रभाव पूरे किसान परिवार पर पड़ता था।

फिर भी निर्णय लेने का अधिकार परिवार में असमान रह सकता था।

11 बिजली और महिला श्रम

बिजली का प्रश्न भी महिला किसान से जुड़ा था।

लेकिन बिजली संकट का असर केवल खेत तक सीमित नहीं था।

ग्रामीण घरेलू श्रम, पानी और पशुपालन भी प्रभावित होते थे।

इसलिए टिकैत के आर्थिक प्रश्न महिलाओं से अप्रत्यक्ष नहीं, बल्कि वास्तविक रूप से जुड़े थे।

12 क्या BKU ने महिला प्रश्न को अलग एजेंडा बनाया?

महेंद्र सिंह टिकैत के मुख्य आंदोलनकारी दौर में ऐसा व्यापक और स्पष्ट महिला किसान एजेंडा विकसित नहीं हुआ।

ये प्रश्न BKU के मुख्य एजेंडे के केंद्र में नहीं आए।

13 कृषि प्रश्न और महिला प्रश्न का अंतर

BKU मानती थी कि यदि किसान परिवार की आय बढ़ेगी तो परिवार के सभी सदस्य लाभान्वित होंगे।

लेकिन महिला अध्ययन का महत्वपूर्ण तर्क है कि परिवार एक समान आर्थिक इकाई नहीं होता।

यदि भूमि पुरुष के नाम है और आय पर उसका नियंत्रण है, तो बढ़ी हुई कृषि आय का लाभ महिला को समान रूप से मिलेगा—यह स्वचालित नहीं है।

यहीं “किसान परिवार” और “महिला किसान” की राजनीति अलग हो जाती है।

14 महिला किसान और भूमि अधिकार

महिला किसान की स्वतंत्र पहचान का सबसे बड़ा आधार भूमि अधिकार है।

जिस महिला के नाम भूमि नहीं है, उसे कई सरकारी योजनाओं में किसान साबित करना कठिन हो सकता है।

ये सब भूमि अभिलेख से जुड़ सकते हैं।

इसलिए महिला किसान आंदोलन की एक महत्वपूर्ण मांग आगे चलकर बनी—

महिलाओं को भूमि और कृषि संपत्ति में वास्तविक स्वामित्व अधिकार मिले।

टिकैत काल के BKU ने इसे अपने मुख्य आंदोलन की पहचान नहीं बनाया।

15 दलित और भूमिहीन महिला मजदूर

महिला प्रश्न केवल कृषक परिवार की महिला तक सीमित नहीं है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में दलित और गरीब महिलाएं कृषि मजदूर के रूप में काम करती थीं।

BKU का भूमि-स्वामी कृषक केंद्रित एजेंडा इन प्रश्नों को पूरी तरह प्रतिनिधित्व नहीं कर सका।

इसलिए महिला किसान की सामाजिक श्रेणी के भीतर भी वर्ग और जाति का अंतर महत्वपूर्ण है।

16 महिला की दोहरी मेहनत

कृषि परिवार की महिला का श्रम अक्सर दोहरा होता था।

इसके साथ पशुपालन और बच्चों की देखभाल।

यदि पुरुष आंदोलन में चला गया तो उसका श्रम और बढ़ सकता था।

यानी किसान आंदोलन में पुरुष की सार्वजनिक राजनीतिक भागीदारी कई बार महिला के अतिरिक्त घरेलू और कृषि श्रम पर आधारित थी।

इस अदृश्य श्रम को पहचानना किसान आंदोलन के सामाजिक इतिहास के लिए आवश्यक है।

17 आंदोलन ने महिलाओं को सार्वजनिक स्थान भी दिया

फिर भी किसान आंदोलन महिलाओं के लिए केवल बोझ नहीं था।

वह सार्वजनिक भागीदारी का अवसर भी बना।

सरकार के खिलाफ सार्वजनिक रूप से बोलना।

इन सबने ग्रामीण महिला की राजनीतिक चेतना को बढ़ाया।

इसलिए BKU आंदोलन को पितृसत्तात्मक संरचना के भीतर भी महिला राजनीतिक सहभागिता के विस्तार की प्रक्रिया के रूप में देखा जा सकता है।

18 परिवार से नागरिक तक

जब महिला धरने पर आती है, वह केवल किसान की पत्नी नहीं रहती।

वह स्वयं आंदोलनकारी नागरिक बनती है।

हालांकि उसे संगठन में पद न मिले, लेकिन सार्वजनिक स्थान पर उसकी उपस्थिति सामाजिक सीमाओं को चुनौती देती है।

यही प्रक्रिया बाद के किसान आंदोलनों में अधिक स्पष्ट हुई।

19 टिकैत के बाद बदलती तस्वीर

महेंद्र सिंह टिकैत के निधन के बाद BKU और व्यापक किसान राजनीति में महिलाओं की भागीदारी धीरे-धीरे अधिक स्पष्ट हुई।

2010 के दशक में भूमि, कृषि संकट और किसान आत्महत्याओं से जुड़े आंदोलनों में महिलाएं अधिक दृश्यमान हुईं।

लेकिन सबसे बड़ा परिवर्तन 2020–21 के किसान आंदोलन में दिखाई दिया।

20 2020–21 : महिला किसान का नया सार्वजनिक चेहरा

दिल्ली की सीमाओं पर 2020–21 के आंदोलन में महिलाओं ने व्यापक भागीदारी की।

गांवों से जत्थों का नेतृत्व कर रही थीं।

यह पुराने किसान आंदोलनों की तुलना में महत्वपूर्ण बदलाव था।

महिला किसान अब पृष्ठभूमि से निकलकर आंदोलन की सार्वजनिक पहचान का हिस्सा बनने लगी।

21 किसान महिला दिवस

2020–21 के आंदोलन में 18 जनवरी 2021 को महिला किसान दिवस मनाया गया।

महिला किसान ने स्वयं को स्वतंत्र राजनीतिक श्रेणी के रूप में प्रस्तुत किया।

खेती में महिला का श्रम और अधिकार दोनों स्वीकार किए जाएं।

यह वह प्रश्न था जो महेंद्र सिंह टिकैत के दौर में आंदोलन के केंद्र में नहीं आ पाया था।

22 ट्रैक्टर और महिला किसान

2020–21 आंदोलन में महिलाओं द्वारा ट्रैक्टर चलाना विशेष रूप से प्रतीकात्मक बन गया।

ट्रैक्टर लंबे समय से किसान आंदोलन की शक्ति का प्रतीक था।

जब महिला किसान ट्रैक्टर पर दिखाई दी, तो उसने उस प्रतीक की लैंगिक सीमा तोड़ी।

यह किसान राजनीति में महिला की बढ़ती स्वायत्तता का दृश्य संकेत था।

23 राकेश टिकैत के दौर में महिला भागीदारी

राकेश टिकैत के नेतृत्व वाले BKU में भी 2020–21 के दौरान महिलाओं की प्रत्यक्ष भागीदारी बढ़ी।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों से महिला जत्थे गाजीपुर सीमा पहुंचे।

इससे संगठन की पारंपरिक पुरुष प्रधान छवि कुछ हद तक बदली।

लेकिन नेतृत्व के शीर्ष स्तर पर लैंगिक समानता अभी भी सीमित रही।

24 खापों में महिलाओं की नई उपस्थिति

इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के बाद कुछ खाप पंचायतों और किसान महापंचायतों में महिलाओं की उपस्थिति बढ़ने लगी।

यह परिवर्तन पूर्ण नहीं था, लेकिन ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण था।

जिस संरचना में कभी महिलाओं को सार्वजनिक निर्णय से बाहर रखा जाता था, उसी सामाजिक क्षेत्र में अब महिला किसान मंच पर आ रही थी।

यह ग्रामीण समाज के धीमे परिवर्तन का संकेत है।

25 महिला किसान और उत्तराधिकार

महिला किसान की वास्तविक आर्थिक स्वतंत्रता भूमि अधिकार से जुड़ी है।

हिंदू उत्तराधिकार कानून में 2005 के संशोधन ने बेटियों के संपत्ति अधिकार को मजबूत किया।

लेकिन कानूनी अधिकार और वास्तविक भूमि स्वामित्व में अभी भी अंतर बना रहा।

ग्रामीण परिवारों में महिलाएं कई बार अपने हिस्से की भूमि भाइयों के पक्ष में छोड़ देती हैं या सामाजिक दबाव के कारण दावा नहीं करतीं।

इसलिए महिला किसान की पहचान केवल आंदोलन में भागीदारी से नहीं, भूमि स्वामित्व से भी जुड़ी है।

26 विधवा किसान का प्रश्न

कृषि संकट में पति की मृत्यु के बाद महिला को अक्सर खेती और ऋण दोनों संभालने पड़ते हैं।

लेकिन यदि भूमि और ऋण दस्तावेज पति के नाम हैं तो उसे कानूनी और प्रशासनिक कठिनाई होती है।

इसलिए महिला किसान की स्वतंत्र पहचान सामाजिक सुरक्षा के प्रश्न से भी जुड़ी है।

यह विषय टिकैत काल की किसान राजनीति में पर्याप्त प्रमुखता नहीं पा सका।

27 किसान आंदोलन और लैंगिक न्याय

यदि किसान आंदोलन केवल फसल मूल्य बढ़ाने तक सीमित रहे, तो वह महिला किसान की पूरी समस्या नहीं हल करता।

सरकारी किसान योजनाओं में स्वतंत्र पहचान।

और किसान संगठनों के नेतृत्व में प्रतिनिधित्व।

यही आधुनिक किसान राजनीति के सामने अगला सामाजिक एजेंडा है।

28 महिला भागीदारी और आंदोलन का चरित्र

महिलाओं की भागीदारी आंदोलन की सामाजिक भाषा भी बदलती है।

जब पूरा परिवार आंदोलन में आता है, तो सरकार के लिए उसे केवल हिंसक भीड़ के रूप में प्रस्तुत करना कठिन हो सकता है।

बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग धरने को सामाजिक समुदाय का रूप देते हैं।

यह टिकैत मॉडल की उस पुरानी रणनीति को अधिक व्यापक करता है जिसमें गांव को आंदोलन स्थल तक लाया जाता था।

29 आंदोलन में महिलाएं और अहिंसा

महिला भागीदारी कई किसान आंदोलनों में शांतिपूर्ण सार्वजनिक प्रतिरोध की छवि को मजबूत करती है।

लेकिन इसे जैविक या रूढ़िगत तरीके से नहीं समझना चाहिए कि महिलाएं स्वभावतः अहिंसक होती हैं।

सही बात यह है कि परिवार आधारित व्यापक भागीदारी आंदोलन की सामाजिक वैधता बढ़ाती है और प्रशासन के लिए बल प्रयोग की राजनीतिक लागत बढ़ा सकती है।

30 महिला नेतृत्व क्यों आवश्यक है?

यदि महिलाएं धरने में मौजूद हैं लेकिन निर्णय पुरुष लेते हैं, तो संगठन पूरी तरह प्रतिनिधिक नहीं है।

महिला नेतृत्व इसलिए आवश्यक है क्योंकि महिला किसान की समस्याएं कई मामलों में अलग होती हैं।

इन प्रश्नों को तभी पर्याप्त महत्व मिलेगा जब निर्णय-निर्माण में महिलाएं मौजूद हों।

31 टिकैत काल की उपलब्धि

महेंद्र सिंह टिकैत के किसान आंदोलनों ने ग्रामीण महिलाओं के लिए सार्वजनिक राजनीतिक भागीदारी के कुछ दरवाजे खोले।

किसान परिवार की राजनीतिक भूमिका में सक्रिय हुईं।

32 टिकैत काल की सीमा

लेकिन संगठन महिला को स्वतंत्र किसान राजनीतिक इकाई के रूप में पर्याप्त रूप से विकसित नहीं कर सका।

दलित और भूमिहीन महिला मजदूर के प्रश्न हाशिये पर रहे।

इसलिए BKU का किसान स्वाभिमान मुख्यतः पुरुष कृषक की सार्वजनिक छवि में दिखाई देता रहा।

33 टिकैत के बाद की प्रगति

बाद के दशकों में किसान राजनीति ने इस सीमा को आंशिक रूप से तोड़ा।

कृषि संकट में महिलाओं की भूमिका पर शोध बढ़ा।

2020–21 ने इसे राष्ट्रीय दृश्यता दी।

उसकी कुछ सामाजिक पूर्वपीठिका पुराने किसान आंदोलनों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी में मौजूद थी।

34 क्या महिला किसान की पहचान अब स्थापित हो गई?

आज भी अनेक महिला कृषि श्रमिक स्वयं को किसान नहीं मानतीं, क्योंकि भूमि उनके नाम नहीं है।

सरकारी नीतियों में भी किसान की पहचान कई बार भूमि-स्वामित्व आधारित है।

इसलिए महिला किसान का प्रश्न अभी भी अधूरा है।

यही आधुनिक किसान आंदोलन की बड़ी चुनौती है।

35 किसान आंदोलन की नई परिभाषा

यदि किसान आंदोलन वास्तव में व्यापक होना चाहता है तो “किसान” की परिभाषा केवल भूमि मालिक पुरुष तक सीमित नहीं रह सकती।

और परिवार की वह महिला जो बिना मजदूरी के खेत पर काम करती है।

यही वह विस्तार है जो टिकैत युग के किसान आंदोलन से आगे की ऐतिहासिक आवश्यकता बनता है।

समेकित मूल्यांकन : अदृश्य श्रम से सार्वजनिक किसान पहचान तक

महेंद्र सिंह टिकैत का किसान आंदोलन पुरुष नेतृत्व वाला था, लेकिन महिलाओं के बिना वह उस रूप में संभव नहीं था।

और लंबे किसान पड़ाव की सामाजिक व्यवस्था को जीवित रखा।

उनका योगदान आंदोलन की अदृश्य आधारभूत संरचना था।

लेकिन यही इतिहास एक बड़ा प्रश्न भी उठाता है—

अध्याय 13

भारतीय किसान यूनियन और ‘नए किसान आंदोलन’ — महेंद्र सिंह टिकैत, शरद जोशी और प्रो. एम. डी. नंजुंडास्वामी की तुलनात्मक समीक्षा

1980 के दशक में भारत के विभिन्न हिस्सों में किसान राजनीति का एक नया चरण उभरा, जिसे प्रायः “नए किसान आंदोलन” कहा गया। महाराष्ट्र में शरद जोशी की शेतकारी संगठन, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व वाली भारतीय किसान यूनियन और कर्नाटक में प्रो. एम. डी. नंजुंडास्वामी के नेतृत्व वाला कर्नाटक राज्य रैयत संघ—इन तीनों ने इस नई राजनीति को अलग-अलग रूप दिए। विद्वानों ने BKU को इसी व्यापक “नए किसान आंदोलन” और कृषि लोकवाद की परंपरा का अभिन्न हिस्सा माना है।

इन संगठनों के बीच कुछ महत्वपूर्ण समानताएं थीं। तीनों पुराने जमींदारी-विरोधी या भूमि-पुनर्वितरण आंदोलनों से अलग उस व्यावसायिक किसान की समस्याओं को केंद्र में लाते थे जो बाजार के लिए उत्पादन कर रहा था, जिसकी खेती की लागत बढ़ रही थी और जिसे लगता था कि राज्य तथा शहरी अर्थव्यवस्था उसके साथ अन्याय कर रही है। लेकिन इसी समानता के भीतर एक बहुत बड़ा वैचारिक विभाजन भी था।

शरद जोशी का उत्तर था—किसान को बाजार की स्वतंत्रता दो।

नंजुंडास्वामी का उत्तर था—किसान को बाजार और बहुराष्ट्रीय पूंजी से बचाओ।

टिकैत का उत्तर था—सरकार किसान की लागत घटाए, उसकी उपज का उचित मूल्य सुनिश्चित करे और किसान के सामने जवाबदेह बने।

यही तीन अलग रास्ते भारतीय नए किसान आंदोलन को समझने की कुंजी हैं।

1 ‘नया किसान आंदोलन’ नया क्यों था?

यह प्रश्न सबसे पहले स्पष्ट करना आवश्यक है।

क्या भारत में इससे पहले किसान आंदोलन नहीं हुए थे?

लेकिन इनमें से अधिकांश के केंद्र में भूमि, लगान, जमींदारी, बटाई, बेदखली या वर्गीय शोषण जैसे प्रश्न थे।

1980 के दशक के नए किसान आंदोलनों का केंद्रीय प्रश्न अलग था—

बाजार में कृषि उपज का मूल्य और खेती की लागत।

IGNOU की किसान आंदोलन संबंधी सामग्री भी इस परिवर्तन को रेखांकित करती है कि नए किसान आंदोलन ऐसे समय उभरे जब कृषि की आय पर दबाव था, निवेश महंगे हो रहे थे और संगठनों ने मुख्यतः लाभकारी कृषि मूल्य की मांग उठाई।

इसलिए इसे केवल “नया संगठन” नहीं, बल्कि किसान राजनीति के एजेंडे में बदलाव कहा जाना चाहिए।

2 पुराने किसान से नए बाजारोन्मुख किसान तक

पुराने कृषक संघर्ष का प्रमुख प्रश्न हो सकता था—

यह परिवर्तन हरित क्रांति, सिंचाई, कृषि मशीनरी, उर्वरक, व्यावसायिक फसल और बाजार पर बढ़ती निर्भरता से जुड़ा था।

किसान अब केवल जीविका के लिए खेती नहीं कर रहा था।

और इसी के साथ वह बिजली, डीजल, खाद, बीज और मशीनरी खरीद रहा था।

अर्थात किसान स्वयं बाजार का बड़ा उत्पादक भी था और खरीदार भी।

इसीलिए कृषि की विनिमय शर्तें नए किसान आंदोलन की मूल समस्या बनीं।

3 तीन अलग भूगोल

तीनों आंदोलनों का क्षेत्रीय भूगोल अलग था।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का सिंचित गन्ना–गेहूं क्षेत्र।

महाराष्ट्र की विविध व्यावसायिक फसलों वाली कृषि, विशेषकर प्याज, कपास, गन्ना और दूसरे बाजारोन्मुख उत्पाद।

कर्नाटक की क्षेत्रीय विविधता, जिसमें सिंचित और वर्षा-आधारित कृषि दोनों और बाद में बीज, जैव-प्रौद्योगिकी तथा वैश्वीकरण जैसे प्रश्न।

इसलिए तीनों आंदोलनों का किसान अनुभव समान नहीं था।

उनकी विचारधारा पर उनके क्षेत्रीय कृषि ढांचे का गहरा प्रभाव पड़ा।

4 महेंद्र सिंह टिकैत : किसान का व्यावहारिक अर्थशास्त्र

टिकैत की राजनीति बहुत व्यावहारिक थी।

कैम्ब्रिज के एक आधुनिक अध्ययन ने भी 1988 के BKU आंदोलन में सस्ती बिजली को वह केंद्रीय मांग माना है जिसने टिकैत की किसान नेता की पहचान तेजी से बनाई।

टिकैत राज्य को समाप्त नहीं करना चाहते थे।

वह राज्य से किसान के पक्ष में हस्तक्षेप चाहते थे।

यह बात उन्हें शरद जोशी से अलग करती है।

5 शरद जोशी : लाभकारी मूल्य से बाजार की स्वतंत्रता तक

महाराष्ट्र में शरद जोशी की शेतकारी संगठन की राजनीति अधिक स्पष्ट आर्थिक सिद्धांत पर आधारित थी।

किसान को लाभकारी मूल्य मिलना चाहिए और राज्य द्वारा कृषि बाजार पर लगाए गए नियंत्रण हटने चाहिए।

उनका मानना था कि भारतीय विकास व्यवस्था ने ग्रामीण कृषि क्षेत्र से अधिशेष निकालकर शहरी–औद्योगिक भारत को लाभ पहुंचाया।

शेतकारी संगठन के विचार में “भारत” ग्रामीण उत्पादक समाज था और “इंडिया” शहरी, नौकरशाही तथा औद्योगिक व्यवस्था का प्रतीक। संगठन से जुड़े साहित्य में जोशी के इस तर्क को कृषि से शहरी–औद्योगिक अर्थव्यवस्था की ओर अधिशेष हस्तांतरण के रूप में प्रस्तुत किया गया।

6 जोशी का ‘एक सूत्रीय’ कार्यक्रम

शेतकारी संगठन की शुरुआती राजनीति का सबसे प्रसिद्ध सूत्र था—

जोशी का तर्क था कि यदि किसान को उसकी फसल का पर्याप्त मूल्य मिल जाए, तो उसे अनेक प्रकार की सरकारी सहायता की आवश्यकता नहीं होगी।

यह टिकैत की नीति से महत्वपूर्ण अंतर था।

कम लागत + बेहतर मूल्य + सरकारी राहत।

बाजार में वास्तविक लाभकारी मूल्य + सरकारी नियंत्रण से मुक्ति।

यानी एक ओर किसान राज्य से सहायता मांग रहा था।

दूसरी ओर किसान राज्य को रास्ते से हटने के लिए कह रहा था।

7 बाजार पर सबसे बड़ा वैचारिक विभाजन

तीनों आंदोलनों को समझने का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है—

शरद जोशी के लिए समस्या मुक्त बाजार नहीं, बल्कि नियंत्रित और विकृत बाजार था।

उनका मानना था कि सरकार कृषि उपज की कीमत दबाती है, व्यापार और निर्यात पर प्रतिबंध लगाती है और किसान को बाजार की पूरी स्वतंत्रता नहीं देती।

इसलिए वे उदारीकरण और खुले व्यापार को किसान के लिए अवसर मानने लगे। आधुनिक समीक्षाएं शेतकारी संगठन को स्पष्ट रूप से बाजारोन्मुख और आर्थिक उदारीकरण समर्थक किसान संगठन के रूप में दर्ज करती हैं।

लेकिन नंजुंडास्वामी इसी प्रश्न पर लगभग विपरीत दिशा में खड़े थे।

8 नंजुंडास्वामी : बाजार नहीं, किसान संप्रभुता

कर्नाटक राज्य रैयत संघ के प्रो. एम. डी. नंजुंडास्वामी ने कृषि प्रश्न को केवल कीमत तक सीमित नहीं रखा।

बहुराष्ट्रीय कंपनियां किसान को किस दिशा में ले जाएंगी?

WTO और वैश्वीकरण का किसान पर क्या प्रभाव होगा?

यहीं KRRS की राजनीति 1990 के दशक में वैश्वीकरण-विरोध, बीज-संप्रभुता और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रतिरोध की अग्रणी आवाज बन गई।

कैम्ब्रिज के एक अध्ययन में नंजुंडास्वामी का प्रसिद्ध कथन दर्ज है कि यदि स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक चरखा था, तो नई स्वतंत्रता की रक्षा का प्रतीक बीज है।

9 बीज राजनीतिक प्रश्न कैसे बना?

हरित क्रांति ने किसान को बाहरी बीज और तकनीक पर अधिक निर्भर किया।

जैव-प्रौद्योगिकी और पेटेंट व्यवस्था के विस्तार ने प्रश्न खड़ा किया—

यदि बीज पर कंपनी का बौद्धिक संपदा अधिकार होगा तो किसान की स्वतंत्रता क्या होगी?

नंजुंडास्वामी के लिए बीज केवल कृषि निवेश नहीं था।

वह किसान की संप्रभुता का प्रतीक था।

इसलिए KRRS की राजनीति मूल्य से आगे जाकर—

बाद के वर्षों में KRRS ने स्थानीय बीज प्रणालियों, बीज बैंक और किसान-से-किसान बीज विनिमय को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया।

10 वैश्वीकरण : जोशी बनाम नंजुंडास्वामी

यहीं नए किसान आंदोलन की सबसे बड़ी वैचारिक दरार दिखाई देती है।

शरद जोशी मानते थे कि वैश्विक बाजार किसान को अधिक अवसर दे सकता है।

यदि भारतीय किसान अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेच सकता है, तो घरेलू सरकारी नियंत्रण से मुक्ति मिल सकती है।

नंजुंडास्वामी वैश्वीकरण को बहुराष्ट्रीय पूंजी, बीज कंपनियों और कृषि संप्रभुता पर खतरे के रूप में देखते थे।

एक प्रमुख अध्ययन ने KRRS और शेतकारी संगठन के इसी वैचारिक विभाजन को रेखांकित किया है—एक तरफ बाजार को स्वतंत्रता का क्षेत्र मानने वाला दृष्टिकोण, दूसरी तरफ बाजार शक्ति को प्रभुत्व के रूप में देखने वाला दृष्टिकोण।

दोनों किसान स्वतंत्रता की बात कर रहे थे।

लेकिन “स्वतंत्रता” की उनकी परिभाषा बिल्कुल अलग थी।

11 टिकैत इस विवाद में कहां थे?

महेंद्र सिंह टिकैत न तो जोशी जैसे व्यवस्थित मुक्त-बाजार समर्थक बने, न नंजुंडास्वामी जैसे व्यापक वैश्वीकरण-विरोधी वैचारिक आंदोलन के नेता।

उनकी राजनीति अधिक व्यवहारिक और मुद्दा-केंद्रित रही।

इसलिए टिकैत को दोनों विचारधाराओं के बीच किसी मध्य मार्ग पर रखना भी पूरी तरह सही नहीं होगा।

12 तीनों में किसान स्वाभिमान

विचारधारात्मक अंतर के बावजूद तीनों में एक गहरी समानता थी—

टिकैत इसे किसान की इज्जत और स्वाभिमान की भाषा में कहते थे।

शरद जोशी इसे शहरी “इंडिया” द्वारा ग्रामीण “भारत” के आर्थिक शोषण के रूप में रखते थे।

नंजुंडास्वामी इसे किसान की संप्रभुता और बहुराष्ट्रीय पूंजी के सामने स्वतंत्रता के प्रश्न में बदलते थे।

INFLIBNET की किसान आंदोलन सामग्री भी टिकैत, जोशी और नंजुंडास्वामी तीनों को ग्रामीण किसान के प्रति शहरी राजनीतिक–नौकरशाही भेदभाव की अनुभूति व्यक्त करने वाले नेताओं के रूप में जोड़ती है।

13 राज्य के प्रति तीन दृष्टिकोण

तीनों संगठनों का राज्य से संबंध भी अलग था।

नंजुंडास्वामी

बहुराष्ट्रीय पूंजी और पेटेंट व्यवस्था से किसान की रक्षा करो।

स्थानीय बीज, जैव विविधता और कृषि संप्रभुता बचाओ।

यानी तीनों राज्य से लड़ते थे, लेकिन राज्य से उनकी अपेक्षाएं अलग थीं।

14 गैर-दलीयता : साझा प्रारंभिक सूत्र

तीनों नए किसान आंदोलनों में राजनीतिक दलों से दूरी की प्रवृत्ति दिखाई दी।

टिकैत ने इसे अत्यंत स्पष्ट संगठनात्मक सिद्धांत बनाया।

शेतकारी संगठन ने भी अपने शुरुआती दौर में स्वयं को गैर-पार्टी किसान संगठन के रूप में प्रस्तुत किया।

KRRS ने भी किसान आंदोलन की स्वतंत्रता पर जोर दिया।

किसान को कांग्रेस, भाजपा, जनता दल, वाम या अन्य दलों की किसान शाखा बनने से बचाना।

BKU के संदर्भ में विद्वानों ने विशेष रूप से बताया है कि राजनीतिक तटस्थता ने विभिन्न जाति, वर्ग और समुदाय की पहचानों को “किसान” की साझा पहचान में जोड़ने में मदद की।

15 लेकिन तीनों राजनीति से बाहर नहीं रहे

गैर-दलीयता का अर्थ गैर-राजनीतिक होना नहीं था।

तीनों संगठनों ने सरकारों पर दबाव डाला।

और समय के साथ दलगत राजनीति से विभिन्न स्तरों पर संबंध बनाए।

शेतकारी संगठन के नेताओं ने बाद में औपचारिक चुनावी राजनीति में भी प्रवेश किया।

BKU ने 1989 और बाद के चुनावों में विभिन्न दलों के प्रति समर्थन या झुकाव दिखाया।

KRRS भी कर्नाटक की व्यापक राजनीतिक बहसों से अलग नहीं रहा।

इसलिए नए किसान आंदोलन की गैर-दलीयता को पूर्ण राजनीतिक निष्पक्षता समझना गलत होगा।

16 संघर्ष-पद्धति : टिकैत का ग्रामीण पड़ाव

मेरठ और दिल्ली में यही मॉडल दिखाई दिया।

उनका आंदोलन ग्रामीण समाज को शहर और प्रशासनिक केंद्र तक ले आता था।

यह दृश्यात्मक और सामाजिक रूप से अत्यंत शक्तिशाली शैली थी।

17 शरद जोशी : रास्ता रोको और बाजार रोक दो

शेतकारी संगठन की संघर्ष-पद्धति अधिक सीधे बाजार प्रवाह पर दबाव डालने वाली रही।

महाराष्ट्र में प्याज, गन्ना, दूध, कपास और दूसरी फसलों के मूल्य आंदोलन हुए।

जोशी के लिए किसान की शक्ति इस तथ्य में थी कि वह उत्पादन करता है।

यदि उत्पादक अपना माल रोक दे तो बाजार प्रभावित होगा।

यानी टिकैत जहां राज्य के सामने किसान को बैठाते थे, जोशी अक्सर बाजार को किसान की शक्ति महसूस कराते थे।

18 नंजुंडास्वामी : प्रत्यक्ष कार्रवाई और प्रतीकात्मक प्रतिरोध

KRRS की संघर्ष शैली में धरना और प्रदर्शन के साथ अधिक नाटकीय प्रत्यक्ष कार्रवाइयां भी शामिल हुईं।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ प्रदर्शन।

वैश्वीकरण-विरोधी अभियानों में सक्रियता।

कृषि-कारपोरेट प्रतिष्ठानों के खिलाफ प्रतीकात्मक कार्रवाइयां।

इन कार्रवाइयों ने KRRS को अंतरराष्ट्रीय वैश्वीकरण-विरोधी आंदोलन में भी पहचान दी।

यानी नंजुंडास्वामी का किसान आंदोलन स्थानीय कृषि मूल्य प्रश्न से निकलकर वैश्विक राजनीतिक प्रतिरोध तक पहुंच गया।

19 टिकैत का हुक्का, जोशी का आर्थिक तर्क, नंजुंडास्वामी का बीज

तीनों आंदोलनों के प्रतीक भी उनके चरित्र बताते हैं।

ग्रामीण समुदाय, सामूहिकता और किसान स्वाभिमान।

जोशी — लाभकारी मूल्य और “भारत बनाम इंडिया।”

कृषि संप्रभुता, स्वदेशी और वैश्वीकरण-विरोध।

इन तीन प्रतीकों में नए किसान आंदोलन की तीन धाराएं समाहित दिखाई देती हैं।

20 वर्गीय आधार : किस किसान का आंदोलन?

तीनों आंदोलनों की एक महत्वपूर्ण आलोचना यह रही कि उनका मुख्य आधार भूमि रखने वाला बाजारोन्मुख किसान था।

BKU के आधुनिक अध्ययन में भी बड़े और मध्यम किसानों को उसके निर्माण का महत्वपूर्ण आधार बताया गया है, हालांकि उसने जाति और धर्म की सीमाओं के पार “किसान” पहचान बनाने की कोशिश की।

इसी प्रकार शेतकारी संगठन और KRRS में भी बाजार के लिए उत्पादन करने वाले कृषक महत्वपूर्ण सामाजिक आधार थे।

21 गरीब किसान और भूमिहीन मजदूर का प्रश्न

यहीं नए किसान आंदोलन की सबसे बड़ी आलोचना आती है।

भूमिहीन कृषि मजदूर का सवाल क्या है?

लेकिन नए किसान आंदोलन का प्रश्न था—

इसलिए पुराने वामपंथी किसान आंदोलनों ने कई बार नए किसान आंदोलनों को “समृद्ध किसान” या “कुलक” राजनीति के रूप में देखा।

यह आलोचना पूरी तरह निराधार नहीं थी, लेकिन सभी छोटे और सीमांत कृषकों को इन आंदोलनों से बाहर मानना भी गलत होगा।

22 छोटे किसान क्यों जुड़े?

उसे भी बेहतर गन्ना या प्याज मूल्य चाहिए था।

इसलिए मूल्य और लागत के प्रश्नों पर छोटे किसान भी आंदोलनों से जुड़ सकते थे।

अधिक उत्पादन करने वाला किसान मूल्य वृद्धि से अधिक लाभ उठाता।

नलकूप वाला किसान सस्ती बिजली से अधिक लाभ उठा सकता था।

23 भूमि सुधार पीछे क्यों चला गया?

नए किसान आंदोलन में भूमि-वितरण का प्रश्न अपेक्षाकृत पीछे रहा।

आंदोलन का प्रमुख प्रतिभागी पहले से भूमि पर खेती कर रहा था।

इसलिए उसका प्रश्न भूमि प्राप्त करना नहीं, अपनी मौजूदा खेती को लाभकारी बनाना था।

यही नए और पुराने किसान आंदोलनों का सबसे मूल वर्गीय अंतर था।

24 किसान बनाम शहर

तीनों आंदोलनों में अलग-अलग रूपों में ग्रामीण–शहरी विभाजन की भाषा दिखाई देती है।

जोशी ने इसे सबसे व्यवस्थित रूप में “भारत बनाम इंडिया” कहा।

टिकैत भी दिल्ली जाकर इस असमानता को प्रत्यक्ष अनुभव की भाषा में व्यक्त करते थे—ग्रामीण किसान को लगता था कि शहर को सड़क, बिजली और सुविधाएं अधिक मिलती हैं जबकि कृषि क्षेत्र उपेक्षित है। INFLIBNET में टिकैत का शहरी संपत्ति और ग्रामीण भूमि सीमा की असमानता पर दिया गया उदाहरण भी इसी भावना को दर्शाता है।

नंजुंडास्वामी ने इसमें वैश्विक पूंजी और बहुराष्ट्रीय कंपनी का तत्व जोड़ दिया।

25 किसान बनाम राज्य या किसान बनाम पूंजी?

यहीं तीनों का अंतर फिर स्पष्ट होता है।

राज्य द्वारा नियंत्रित बाजार व्यवस्था।

नंजुंडास्वामी का प्रमुख प्रतिद्वंद्वी—

राज्य, बहुराष्ट्रीय पूंजी और वैश्विक कृषि व्यवस्था का गठजोड़।

यानी तीनों एक ही ग्रामीण असंतोष को अलग-अलग राजनीतिक अर्थ देते थे।

26 स्वदेशी पर मतभेद

नंजुंडास्वामी की राजनीति में स्वदेशी और स्थानीय कृषि प्रणालियों का मजबूत तत्व था।

जोशी का दृष्टिकोण इससे लगभग उलटा था।

वे किसान को दुनिया के बाजार और नई तकनीक तक पहुंच से वंचित करना किसान-विरोधी मान सकते थे।

इसलिए “किसान की आजादी” दोनों के लिए महत्वपूर्ण थी, लेकिन—

जोशी के लिए आजादी = बाजार तक पहुंच।

नंजुंडास्वामी के लिए आजादी = कंपनी और पेटेंट नियंत्रण से स्वतंत्रता।

27 टिकैत और स्वदेशी

टिकैत की भाषा स्वदेशी की वैचारिक बहस से अपेक्षाकृत कम जुड़ी रही।

उनका किसान स्वाभिमान सांस्कृतिक रूप से ग्रामीण था।

लेकिन कृषि वैश्वीकरण पर उन्होंने नंजुंडास्वामी जैसी व्यवस्थित वैकल्पिक नीति विकसित नहीं की।

यही कारण है कि 1990 के दशक के बाद जब WTO और कृषि उदारीकरण बड़े मुद्दे बने, तो KRRS की वैचारिक प्रोफाइल इस क्षेत्र में BKU से अधिक स्पष्ट दिखाई देती है।

28 आंदोलन और विशेषज्ञता

तीनों नेताओं की व्यक्तिगत शैली भी बहुत अलग थी।

अंतरराष्ट्रीय अनुभव वाला बौद्धिक और आर्थिक विचारक।

कानून, राजनीति और वैश्वीकरण-विरोधी विमर्श से जुड़ा वैचारिक नेता।

इसलिए उनकी सार्वजनिक भाषा भी अलग रही।

जोशी कृषि अर्थशास्त्र की बहस करते थे।

नंजुंडास्वामी कृषि संप्रभुता को वैश्विक राजनीति से जोड़ते थे।

29 महिलाओं पर शेतकारी संगठन का अलग प्रयोग

तीनों संगठनों की तुलना में शेतकारी संगठन ने महिलाओं के प्रश्न पर कुछ विशिष्ट प्रयोग किए।

अध्याय 14

1991 के आर्थिक उदारीकरण से WTO तक BKU

1991 के आर्थिक उदारीकरण ने भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा बदल दी। औद्योगिक लाइसेंसिंग में ढील, आयात शुल्क में कटौती, विदेशी निवेश के लिए अर्थव्यवस्था को अधिक खोलना, व्यापार उदारीकरण और बाजारोन्मुख सुधार इस नई नीति के प्रमुख तत्व थे। लेकिन कृषि में परिवर्तन उद्योग जितना तत्काल और व्यापक नहीं था। 1998 की विश्व व्यापार संगठन की भारत संबंधी समीक्षा ने भी स्पष्ट किया था कि 1991 के बाद व्यापक उदारीकरण के बावजूद कृषि क्षेत्र और कृषि सहायता संरचना अपेक्षाकृत कम बदली थी; समर्थन मूल्य, खाद, बिजली और पानी जैसी सहायता व्यवस्थाएं जारी थीं।

यही तथ्य महेंद्र सिंह टिकैत और भारतीय किसान यूनियन की 1990 के दशक की राजनीति को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

कृषि एक झटके में “मुक्त बाजार” के हवाले नहीं हुई। बल्कि किसान को एक ऐसी मिश्रित व्यवस्था का सामना करना पड़ा जिसमें एक ओर अर्थव्यवस्था अधिक खुल रही थी, दूसरी ओर कृषि मूल्य, गन्ना, बिजली, उर्वरक, आयात–निर्यात और सरकारी समर्थन पर राज्य की मजबूत भूमिका बनी हुई थी।

इसलिए 1991 के बाद BKU की समस्या केवल “सरकार बनाम किसान” नहीं रही। उसके सामने नया प्रश्न था—

जब भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक बाजार से जुड़ रही है, तब भारतीय किसान की लागत, मूल्य और सुरक्षा का क्या होगा?

1 1991 : आर्थिक संकट और नई नीति

1991 में भारत गंभीर भुगतान-संतुलन संकट से जूझ रहा था। विदेशी मुद्रा भंडार अत्यंत कम हो गया था और केंद्र सरकार ने व्यापक आर्थिक सुधार शुरू किए।

और भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व बाजार से अधिक जोड़ना।

लेकिन इन सुधारों का कृषि पर प्रभाव तत्काल और समान नहीं था।

1998 तक WTO स्वयं यह दर्ज कर रहा था कि कृषि क्षेत्र सुधार कार्यक्रम से उद्योग की तुलना में काफी कम प्रभावित हुआ था और कृषि सहायता तथा मूल्य संरचना में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं हुआ था।

इसलिए 1991 को भारतीय कृषि में अचानक पूर्ण उदारीकरण की तारीख मानना गलत होगा।

2 टिकैत के किसान के लिए नया आर्थिक वातावरण

महेंद्र सिंह टिकैत का किसान पहले ही बाजार से जुड़ चुका था।

इसलिए अर्थव्यवस्था के खुलने का उसके लिए अर्थ था—

कृषि निवेश की कीमत में क्या बदलाव होगा?

विदेशी कृषि वस्तुएं भारतीय बाजार में आएंगी या नहीं?

सरकार सहायता कम करेगी या जारी रखेगी?

3 उदारीकरण का विरोध एकरूप नहीं था

1991 के बाद सभी किसान संगठन नई आर्थिक नीति को एक ही तरह नहीं देखते थे।

शरद जोशी जैसे नेता व्यापार उदारीकरण में किसान के लिए अवसर देखते थे।

एम. डी. नंजुंडास्वामी इसे बहुराष्ट्रीय पूंजी और कृषि संप्रभुता के लिए गंभीर खतरा मानते थे।

महेंद्र सिंह टिकैत का दृष्टिकोण इन दोनों से अलग था।

उन्होंने उदारीकरण के पक्ष या विरोध में कोई व्यापक व्यवस्थित वैचारिक सिद्धांत विकसित नहीं किया।

इसीलिए BKU की प्रतिक्रिया अधिक व्यावहारिक किसान हित आधारित थी।

4 कृषि लागत पर नया दबाव

हरित क्रांति की खेती पहले ही बाहरी निवेशों पर निर्भर हो चुकी थी।

1990 के दशक में इन लागतों की गति किसान की चिंता का बड़ा कारण बनी।

यदि किसी औद्योगिक इनपुट की कीमत बढ़ती थी, तो किसान की लागत बढ़ती थी।

लेकिन वह अपनी फसल का मूल्य स्वतंत्र रूप से तय नहीं कर सकता था।

यही विरोधाभास टिकैत की राजनीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।

5 उर्वरक नीति और किसान

उर्वरक कृषि लागत का केंद्रीय घटक था।

1990 के दशक की आर्थिक नीति में सहायता व्यय और सरकारी वित्तीय बोझ पर बहस बढ़ी।

लेकिन कृषि उर्वरक सहायता समाप्त नहीं हुई।

भारत की कृषि नीति में खाद सहायता आगे भी महत्वपूर्ण बनी रही।

बाद के WTO आकलनों ने भी भारत की कृषि समर्थन व्यवस्था में उर्वरक, बिजली और पानी पर सहायता को महत्वपूर्ण तत्व माना।

BKU के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण था।

यदि उर्वरक बाजार मूल्य पर बहुत महंगा होता, तो किसान की लागत बढ़ती।

इसलिए कृषि सहायता को टिकैत केवल सरकारी दया के रूप में नहीं देखते थे।

उनके व्यापक तर्क में यह कम कृषि मूल्य की क्षतिपूर्ति का एक रूप भी थी।

6 बिजली सहायता पर बढ़ता विवाद

1990 के दशक में आर्थिक सुधारों के साथ सार्वजनिक क्षेत्र की वित्तीय स्थिति और बिजली बोर्डों के घाटे पर भी प्रश्न बढ़े।

कृषि बिजली की कम दरें आलोचना का विषय बनीं।

अर्थशास्त्रियों का तर्क था कि अत्यधिक सस्ती बिजली—

राज्य विद्युत बोर्डों पर बोझ डालती है।

बिजली की चोरी और अव्यवस्था बढ़ाती है।

लेकिन BKU के लिए बिजली उत्पादन लागत थी।

किसान से अधिक बिजली शुल्क लेकर कृषि लागत बढ़ाना समाधान नहीं है।

इसीलिए 1991 के बाद भी बिजली BKU की राजनीति से गायब नहीं हुई।

7 सुधार की दो भाषाएं

अब किसान और नीति-निर्माता लगभग दो अलग भाषाओं में बोल रहे थे।

यही 1990 के दशक की कृषि राजनीति का मूल तनाव था।

8 क्या उदारीकरण से कृषि निर्यात का अवसर बढ़ा?

व्यापार उदारीकरण का एक तर्क यह था कि भारत उन कृषि उत्पादों का निर्यात बढ़ा सकता है जिनमें वह प्रतिस्पर्धी है।

कृषि उत्पादक को केवल घरेलू बाजार तक सीमित रहने की आवश्यकता नहीं होगी।

यही शरद जोशी जैसे किसान नेताओं की आशा थी।

लेकिन BKU का पश्चिमी उत्तर प्रदेश किसान एक दूसरी वास्तविकता से भी जुड़ा था।

गन्ना और चीनी का बाजार भारी सरकारी नियमन के अधीन था।

इसलिए उसके लिए मुक्त वैश्विक बाजार कोई तत्काल वास्तविकता नहीं था।

9 गन्ना और चीनी : उदारीकरण की सबसे जटिल कहानी

चीनी उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था के सबसे अधिक नियंत्रित क्षेत्रों में से एक रहा।

चीनी मिल लाइसेंसिंग को प्रभावित करती थी।

चीनी बाजार में रिलीज व्यवस्था भी थी।

आयात–निर्यात नीति भी सरकार नियंत्रित करती थी।

इसलिए आर्थिक उदारीकरण के बावजूद चीनी उद्योग लंबे समय तक पूरी तरह मुक्त बाजार में नहीं गया।

10 चीनी उद्योग में धीरे-धीरे नियंत्रण कम हुए

1990 के दशक में चीनी उद्योग में क्रमिक उदारीकरण शुरू हुआ।

विशेष रूप से दशक के उत्तरार्ध में मिल लाइसेंसिंग व्यवस्था में ढील आई।

PRS द्वारा रंगराजन समिति की समीक्षा के सार के अनुसार चीनी क्षेत्र में लाइसेंस-मुक्ति के बाद स्थापित क्षमता की वृद्धि तेज हुई और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ी।

यही किसान के लिए सबसे कठिन स्थिति थी—

लेकिन गन्ने की खरीद और कीमत में अब भी नियमन।

इससे किसान और मिल के बीच पुराना तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।

11 गन्ने की नाशवान प्रकृति और किसान की कमजोरी

गन्ना काटने के बाद लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता।

किसान हर समय किसी दूर के बाजार में नहीं बेच सकता।

वह क्षेत्रीय चीनी मिल पर निर्भर रहता है।

इसी कारण चीनी क्षेत्र में पूर्ण बाजार स्वतंत्रता का सिद्धांत व्यवहार में सीमित था।

PRS के अनुसार चीनी क्षेत्र में नियमन का एक कारण स्वयं गन्ने की नाशवान प्रकृति और छोटे कृषकों की स्थिति थी।

यही वजह है कि टिकैत के लिए गन्ना मूल्य और भुगतान का सरकारी नियमन समाप्त करना सरल समाधान नहीं था।

12 चीनी मिल की वित्तीय स्थिति और किसान का बकाया

चीनी उद्योग की एक स्थायी समस्या थी—

सरकार मूल्य घोषित करती है, लेकिन यदि मिल समय पर भुगतान नहीं करती तो किसान को घोषित कीमत का भी पूरा लाभ नहीं मिलता।

आगे चलकर विशेषज्ञ समितियों ने भी माना कि चीनी बाजार की कुछ नियामक व्यवस्थाएं मिलों की नकदी क्षमता को प्रभावित करके अप्रत्यक्ष रूप से गन्ना किसानों के भुगतान में देरी बढ़ा सकती हैं।

इसलिए टिकैत की गन्ना राजनीति 1990 के बाद और जटिल हुई।

अब केवल “भाव बढ़ाओ” पर्याप्त नहीं था।

13 आयात–निर्यात नीति और किसान

उदारीकरण के साथ कृषि व्यापार नीति अधिक महत्वपूर्ण होती गई।

यदि किसी कृषि वस्तु का आयात सस्ता हो जाए तो घरेलू किसान पर दबाव पड़ सकता है।

यदि निर्यात खुल जाए तो घरेलू किसान को बेहतर बाजार मिल सकता है।

लेकिन सरकार अक्सर खाद्य मूल्य स्थिर रखने के लिए आयात और निर्यात दोनों को नियंत्रित करती रही।

1998 के WTO आकलन में भी उल्लेख था कि कई कृषि उत्पादों के आयात–निर्यात पर लाइसेंसिंग नियंत्रण जारी थे।

इसलिए भारत का कृषि व्यापार तत्काल पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ।

14 किसान की समस्या : नीति का अचानक बदलना

कृषक के लिए व्यापार नीति की एक बड़ी समस्या अनिश्चितता होती है।

सरकार घरेलू कीमत नियंत्रित रखने के लिए निर्यात रोक सकती है।

इससे किसान को लगता है कि अच्छे बाजार मूल्य का पूरा लाभ उसे नहीं मिलता।

शरद जोशी ने इस प्रश्न को बहुत तीखे रूप में उठाया।

टिकैत का आंदोलन भी व्यापक रूप से इसी असंतोष से जुड़ा था, हालांकि BKU ने इसे जोशी जैसी मुक्त व्यापार विचारधारा में विकसित नहीं किया।

15 Uruguay Round और भारतीय किसान

1991 का भारतीय आर्थिक उदारीकरण और वैश्विक स्तर पर चल रही Uruguay Round व्यापार वार्ताएं लगभग समान ऐतिहासिक समय में चल रही थीं।

Uruguay Round 1986 में शुरू हुई थी।

उसमें पहली बार कृषि व्यापार को अधिक व्यवस्थित बहुपक्षीय अनुशासन के अंतर्गत लाने की कोशिश हुई।

और 1 जनवरी 1995 को विश्व व्यापार संगठन अस्तित्व में आया।

यह किसान राजनीति में एक नए युग की शुरुआत थी।

16 WTO का कृषि समझौता

WTO का Agreement on Agriculture तीन मुख्य स्तंभों पर आधारित था—

WTO के अनुसार इसका उद्देश्य कृषि व्यापार को अधिक बाजारोन्मुख बनाना और आयात अवरोध, व्यापार-विकृत करने वाली घरेलू सहायता तथा निर्यात सब्सिडी को नियमों के अधीन लाना था। विकासशील देशों को विकसित देशों की तुलना में अधिक छूट और लंबी समयावधि दी गई।

इससे किसान आंदोलन के सामने बिल्कुल नया प्रश्न आया—

अब कृषि नीति केवल दिल्ली और लखनऊ में तय नहीं हो रही।

उस पर जिनेवा में बने बहुपक्षीय व्यापार नियमों का भी प्रभाव होगा।

17 बाजार पहुंच

WTO कृषि समझौते का पहला स्तंभ था बाजार पहुंच।

पहले कई देश कृषि आयात पर मात्रात्मक प्रतिबंध लगाते थे।

नई व्यवस्था इन्हें अधिकाधिक सीमा शुल्क आधारित प्रणाली में बदलना चाहती थी।

भारत ने अनेक कृषि उत्पादों पर काफी ऊंची अधिकतम सीमा शुल्क दरें बांधीं। 1998 की WTO समीक्षा के अनुसार कृषि में भारत की कई बाध्य सीमा शुल्क दरें 100 से 300 प्रतिशत तक थीं, जबकि वास्तविक लागू दरें काफी कम थीं।

WTO में शामिल होते ही भारत को अपनी कृषि सुरक्षा पूरी तरह खत्म नहीं करनी पड़ी थी।

उसके पास कृषि आयात पर पर्याप्त शुल्क लगाने की नीति-गुंजाइश बनी रही।

18 घरेलू सहायता

भारत के किसान बिजली, खाद, सिंचाई और समर्थन मूल्य व्यवस्था से जुड़े थे।

किसानों में आशंका थी कि WTO इन सभी को समाप्त करने को मजबूर कर सकता है।

लेकिन वास्तविक व्यवस्था इससे अधिक जटिल थी।

WTO कृषि समझौता सभी कृषि सहायता पर समान प्रतिबंध नहीं लगाता।

वह सहायता को उसके व्यापार-विकृत प्रभाव के आधार पर अलग श्रेणियों में रखता है और विकासशील देशों को कुछ विशेष छूट देता है।

इसलिए यह धारणा कि 1995 में WTO में शामिल होते ही भारत को कृषि सहायता समाप्त करनी थी—सही नहीं है।

19 टिकैत का मूल प्रश्न फिर लौटता है

कानूनी तकनीकी विवरण से किसान का मूल प्रश्न फिर वही था—

अगर WTO के कारण सरकार कृषि सहायता घटाती है तो हमारी लागत क्या होगी?

यदि विदेशी सब्सिडी वाली कृषि वस्तुएं भारत आएंगी तो हमारी फसल के मूल्य का क्या होगा?

यदि निर्यात खुलेगा तो क्या हमें बेहतर भाव मिलेगा?

टिकैत के किसान के लिए WTO कोई अमूर्त अंतरराष्ट्रीय संस्था नहीं था।

उसका अर्थ अंततः अपने खेत के खाते में दिखाई देना था।

20 विकसित देशों की कृषि सहायता का प्रश्न

WTO व्यवस्था की सबसे बड़ी राजनीतिक आलोचनाओं में से एक थी—

विकसित देश अपने किसानों को भारी सहायता देते हैं, लेकिन विकासशील देशों पर बाजार खोलने का दबाव डालते हैं।

इस आलोचना की आर्थिक पृष्ठभूमि वास्तविक थी। WTO की अपनी व्याख्या स्वीकार करती है कि ऐतिहासिक रूप से धनी देशों में विशाल कृषि सहायता ने उत्पादन और निर्यात को बढ़ाकर विश्व बाजार के मूल्यों को विकृत किया और कम सहायता वाले देशों के किसानों के लिए प्रतिस्पर्धा कठिन की।

यही मुद्दा भारत के किसान संगठनों में वैश्वीकरण-विरोधी राजनीति का प्रमुख आधार बना।

21 BKU और WTO : वैचारिक अस्पष्टता

यहीं BKU और कर्नाटक राज्य रैयत संघ का अंतर स्पष्ट दिखाई देता है।

KRRS ने WTO, GATT, पेटेंट और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ एक स्पष्ट वैचारिक मोर्चा बनाया।

BKU में भी वैश्वीकरण और कृषि आयात को लेकर आशंकाएं थीं, लेकिन महेंद्र सिंह टिकैत का मुख्य आंदोलनकारी विमर्श लगातार—

इसलिए BKU को 1990 के दशक का सबसे व्यवस्थित WTO-विरोधी किसान संगठन कहना उचित नहीं होगा।

22 टिकैत के लिए ‘विदेशी’ से अधिक ‘किसान हित’ महत्वपूर्ण

टिकैत की राजनीति को शुद्ध स्वदेशी बनाम विदेशी पूंजी की वैचारिक भाषा में सीमित करना कठिन है।

यदि आयात से किसान का मूल्य गिरता है—

यदि सरकार सहायता कम करके लागत बढ़ाती है—

यानी उनका दृष्टिकोण मुख्यतः परिणाम-आधारित था, न कि किसी सुसंगत मुक्त व्यापार या संरक्षणवाद के सिद्धांत पर।

23 कृषि समर्थन मूल्य की भूमिका

उदारीकरण के बावजूद सरकार ने समर्थन मूल्य व्यवस्था समाप्त नहीं की।

1998 की WTO समीक्षा ने भी यह दर्ज किया कि कृषि नीति में समर्थन मूल्य किसानों को आय-सहारा देने और खाद्य सुरक्षा बनाए रखने का महत्वपूर्ण साधन बने हुए थे।

यही भारतीय उदारीकरण की विशिष्टता थी।

लेकिन कृषि में बाजार और राज्य दोनों साथ बने रहे।

इसी मिश्रित व्यवस्था में BKU ने अपनी राजनीति जारी रखी।

24 MSP और WTO का संबंध

WTO कृषि समझौते ने सरकारी कृषि मूल्य समर्थन को नियमों के दायरे में रखा, लेकिन भारत की वास्तविक स्थिति कई कारणों से विशिष्ट थी।

इन कारणों से भारत ने समर्थन मूल्य व्यवस्था जारी रखी।

इसलिए 1990 के दशक में यह कहना कि WTO के कारण MSP तुरंत समाप्त हो जाएगी, सही साबित नहीं हुआ।

लेकिन भविष्य में नीति-स्वायत्तता पर दबाव की आशंका किसान संगठनों में बनी रही।

25 सस्ता आयात : अवसर या खतरा?

उपभोक्ता के लिए सस्ता खाद्य आयात अच्छा लग सकता है।

लेकिन किसान के लिए वही आयात संकट बन सकता है यदि उसकी घरेलू फसल का मूल्य गिर जाए।

यही कृषि व्यापार का स्थायी द्वंद्व है।

सरकार उपभोक्ता और किसान दोनों को देखती है।

किसान संगठन मुख्यतः उत्पादक की स्थिति से प्रश्न उठाता है।

इसलिए BKU के लिए आयात नीति का केंद्रीय मानदंड था—

क्या इससे घरेलू किसान का मूल्य प्रभावित होगा?

26 निर्यात : बेहतर भाव की संभावना

इसके विपरीत निर्यात किसान को अतिरिक्त मांग दे सकता है।

यदि घरेलू उत्पादन अधिशेष है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भाव अच्छा है, तो निर्यात कृषि मूल्य बढ़ा सकता है।

लेकिन यदि सरकार घरेलू महंगाई रोकने के लिए निर्यात सीमित करती है, तो किसान को लगता है कि वह अंतरराष्ट्रीय मूल्य का लाभ नहीं उठा पा रहा।

इसी प्रश्न पर नए किसान आंदोलनों और सरकार के बीच लंबा विवाद चला।

27 चीनी का वैश्विक बाजार

चीनी वैश्विक बाजार अत्यंत अस्थिर है।

कई देशों में चीनी और गन्ना उत्पादकों को सहायता मिलती है।

भारत में घरेलू चीनी मूल्य, गन्ना मूल्य, आयात–निर्यात और सरकारी नियंत्रण एक-दूसरे से जुड़े रहे।

यही जटिलता BKU के संघर्षों में लगातार दिखाई दी।

30 ‘इंडिया’ बदल गया, लेकिन ‘भारत’ का प्रश्न बना रहा

शहरी अर्थव्यवस्था तेजी से वैश्वीकृत होने लगी।

अध्याय 15

1990 और 2000 के दशक में BKU

1988 का मेरठ कमिश्नरी घेराव और दिल्ली बोट क्लब आंदोलन भारतीय किसान यूनियन तथा महेंद्र सिंह टिकैत की राजनीतिक शक्ति का सर्वोच्च बिंदु था। लेकिन किसान आंदोलनों का इतिहास केवल शिखर की घटनाओं से नहीं बनता। किसी संगठन की वास्तविक मजबूती इस बात से भी तय होती है कि बड़े जनउभार के बाद वह अपने संगठन, मुद्दों और सामाजिक आधार को कितना टिकाऊ बना पाता है।

1990 और 2000 के दशकों में BKU की कहानी इसी परीक्षा की कहानी है।

इन दो दशकों में एक विरोधाभासी प्रक्रिया चली। एक ओर 1988 जैसी अखिल भारतीय दृश्यता कम हुई, संगठन के भीतर विभाजन बढ़े, मंडल–मंदिर राजनीति ने साझा किसान पहचान कमजोर की और टिकैत का गैर-दलीय मॉडल चुनावी राजनीति से बार-बार टकराया। दूसरी ओर गन्ने का मूल्य, बिजली, खाद, कर्ज, भूमि अधिग्रहण और किसान भुगतान जैसे मुद्दों पर BKU पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक प्रभावशाली दबाव शक्ति बनी रही।

अर्थात इसे केवल “टिकैत आंदोलन का पतन” कहना अधूरा होगा।

राष्ट्रीय शिखर से क्षेत्रीय पुनर्संयोजन।

1988 में टिकैत दिल्ली की राष्ट्रीय सत्ता को चुनौती दे रहे थे।

1990 और 2000 के दशकों में वे बार-बार लखनऊ, दिल्ली, गाजियाबाद, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और किसान पंचायतों के माध्यम से यह साबित करते रहे कि संगठन की राष्ट्रीय चमक भले कम हुई हो, किसान राजनीति में उनका प्रभाव समाप्त नहीं हुआ था।

1 1988 के बाद सबसे बड़ी चुनौती

दिल्ली बोट क्लब आंदोलन के बाद BKU के सामने कठिन प्रश्न था—

एक विशाल आंदोलन खड़ा कर देना और स्थायी संगठन बनाना दो अलग चीजें हैं।

1988 में लाखों किसान टिकैत की आवाज पर आए।

लेकिन क्या वही किसान नियमित सदस्यता, संस्थागत ढांचा और स्थायी वैचारिक कार्यक्रम में संगठित हो सकते थे?

यहीं BKU की पहली बड़ी सीमा सामने आई।

कैम्ब्रिज के एक आधुनिक अध्ययन में भी 1988 के दिल्ली आंदोलन को BKU का शिखर मानते हुए लिखा गया है कि इसके बाद संगठन के भीतर मतभेद उभरे और अनौपचारिक संरचना को स्थायी संस्थागत संगठन में बदलना कठिन साबित हुआ।

2 दिल्ली आंदोलन समाप्त करने पर असंतोष

1988 का बोट क्लब धरना महेंद्र सिंह टिकैत ने एक व्यापक औपचारिक समझौते के बिना समाप्त कर दिया था।

इस निर्णय से संगठन के कुछ युवा और अधिक उग्र कार्यकर्ता असंतुष्ट हुए।

उनका मानना था कि इतनी बड़ी किसान शक्ति को और अधिक राजनीतिक दबाव में बदला जा सकता था।

यही BKU की अनौपचारिक नेतृत्व शैली की शुरुआती कमजोरी थी।

3 1989 : संयुक्त किसान मोर्चे की कठिनाई

1980 के दशक के अंत में विभिन्न राज्यों के नए किसान संगठनों को राष्ट्रीय स्तर पर जोड़ने की कोशिश हुई।

लेकिन नीति और नेतृत्व को लेकर मतभेद जल्दी सामने आए।

1989 के एक बड़े किसान कार्यक्रम में टिकैत और अन्य किसान नेताओं के बीच सार्वजनिक विवाद तक हुआ। कैम्ब्रिज अध्ययन इसे उस बिंदु के रूप में देखता है जहां राष्ट्रीय किसान एकता की सीमाएं स्पष्ट होने लगीं।

इससे BKU धीरे-धीरे अपने मुख्य क्षेत्र—उत्तर प्रदेश—की ओर अधिक केंद्रित होती गई।

4 1989 और चुनावी राजनीति

1989 तक BKU के सामने दूसरा बड़ा अंतर्विरोध चुनावी राजनीति था।

संगठन गैर-दलीय होने का दावा करता था, लेकिन कांग्रेस-विरोधी माहौल में जनता दल और राष्ट्रीय मोर्चे के प्रति झुकाव बढ़ा।

इस राजनीतिक हस्तक्षेप का तत्काल लाभ यह था कि किसान शक्ति राष्ट्रीय सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया में प्रभावशाली दिखाई दी।

BKU को अब किसी सरकार से केवल किसान संगठन के रूप में नहीं, बल्कि चुनाव प्रभावित करने वाली शक्ति के रूप में भी देखा जाने लगा।

यही बदलाव 1990 के दशक की पूरी राजनीति पर असर डालने वाला था।

5 1990 : जनता दल सरकार से टकराव

1989 में कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई।

उत्तर प्रदेश में जनता दल की सरकार बनी और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने।

BKU को उम्मीद थी कि नई सरकार किसान मांगों के प्रति अधिक संवेदनशील होगी।

जुलाई 1990 में टिकैत ने लखनऊ में किसान पंचायत आयोजित करने का आह्वान किया।

यह उसी सरकार के विरुद्ध था जिसे किसान आंदोलन ने एक वर्ष पहले राजनीतिक रूप से लाभ पहुंचाया था।

इससे टिकैत की उस मूल बात की पुष्टि हुई—

सरकार बदल सकती है, किसान का प्रश्न नहीं।

6 जुलाई 1990 की लखनऊ पंचायत

BKU की अपनी आधिकारिक समयरेखा जुलाई 1990 में लखनऊ में दो लाख से अधिक किसानों की रैली का दावा करती है, जिसमें मुख्य मांगें गन्ने का बेहतर मूल्य और बिजली बकायों में भारी राहत थीं। संगठन के अनुसार सरकार ने अंततः रियायतें दीं।

लेकिन समकालीन India Today की रिपोर्ट आंदोलन की एक अधिक संघर्षपूर्ण तस्वीर देती है।

15 जुलाई 1990 को टिकैत लगभग 20 हजार किसानों को लेकर लखनऊ पंचायत की ओर बढ़ रहे थे। मुलायम सिंह सरकार ने कार्यक्रम रोकने के लिए कठोर प्रशासनिक कार्रवाई की और बड़ी संख्या में किसानों को गिरफ्तार किया। इससे जनता दल के भीतर भी असंतोष पैदा हुआ।

इसलिए लखनऊ आंदोलन को केवल “सरकार ने मांग मान ली” के रूप में नहीं देखना चाहिए।

यह किसान संगठन और उस जनता दल सरकार के बीच खुला राजनीतिक टकराव था जिसे किसान आंदोलन ने पहले समर्थन दिया था।

7 लखनऊ का ऐतिहासिक अर्थ

इस आंदोलन ने एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सिद्धांत स्थापित किया।

BKU किसी सरकार की स्थायी सहयोगी नहीं थी।

यदि जनता दल भी बिजली और गन्ने पर किसान की मांग नहीं मानेगा, तो उसका भी घेराव होगा।

यह टिकैत की गैर-दलीय राजनीति के पक्ष में मजबूत प्रमाण था।

लेकिन विडंबना यह थी कि संगठन चुनावी राजनीति में प्रवेश करके अपनी गैर-दलीय विश्वसनीयता पहले ही आंशिक रूप से कमजोर कर चुका था।

8 2 अक्टूबर 1991 : दिल्ली खाद सहायता पंचायत

1991 में आर्थिक सुधारों के साथ उर्वरक मूल्य और कृषि लागत का प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण हो गया।

BKU से जुड़े आंदोलन अभिलेखों में 2 अक्टूबर 1991 को दिल्ली में उर्वरक सहायता की मांग को लेकर किसान पंचायत का उल्लेख मिलता है।

1988 की दिल्ली यात्रा का केंद्र बिजली और गन्ना था।

1991 तक उर्वरक मूल्य और कृषि लागत का नया राष्ट्रीय आर्थिक संदर्भ सामने आ चुका था।

यानी BKU का एजेंडा बदलती अर्थव्यवस्था के साथ स्वयं को ढाल रहा था।

9 1991 की नई आर्थिक नीति और BKU

इसी वर्ष भारत ने आर्थिक उदारीकरण शुरू किया।

किसान संगठन के लिए इसका तत्काल अर्थ यह था—

आयात–निर्यात नीति किसान को कैसे प्रभावित करेगी?

यही प्रश्न आगे BKU को राष्ट्रीय आर्थिक नीति की नई बहस में ले गए।

लेकिन संगठन ने शरद जोशी या नंजुंडास्वामी की तरह कोई पूर्ण वैचारिक मॉडल नहीं बनाया।

विशिष्ट आर्थिक मुद्दे पर प्रत्यक्ष आंदोलन।

10 जनवरी 1992 : दूसरी लखनऊ पंचायत

जनवरी 1992 में BKU ने लखनऊ में फिर बड़ा आंदोलन किया।

उपलब्ध आंदोलन-इतिहास में इसके प्रमुख मुद्दे बताए गए हैं—

इस आंदोलन से यह स्पष्ट होता है कि 1990 के दशक में भी टिकैत की किसान राजनीति का मूल आर्थिक ढांचा वही था—

लागत घटाओ, मूल्य बढ़ाओ और किसान पर सरकारी दबाव कम करो।

11 जून 1992 : महीने भर की लखनऊ पंचायत

1992 में ही BKU ने लखनऊ में एक और लंबा आंदोलन किया।

BKU की संगठनात्मक समयरेखा इसे लगभग एक महीने की पंचायत बताती है।

मुख्य मांगों में किसानों के सरकारी ऋण 10 हजार रुपये तक माफ करने के पहले के निर्णय को लागू करना शामिल था।

अन्य जीवनी स्रोत भी 1992 के इस महीने भर के धरने और 10 हजार रुपये तक कृषि ऋण माफी की मांग की पुष्टि करते हैं।

यह मेरठ शैली की लंबी किसान पंचायत को राज्य की राजधानी में दोहराने का प्रयास था।

12 ऋण माफी का बदलता अर्थ

1980 के दशक में कर्ज राहत BKU के कई मुद्दों में से एक थी।

1990 के दशक में कृषि निवेश बढ़ने के साथ ऋण प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण हुआ।

इसलिए टिकैत की किसान राजनीति में धीरे-धीरे यह सूत्र मजबूत हुआ—

केवल ऋण मत दो; किसान की आय इतनी सुनिश्चित करो कि वह ऋण चुका सके।

लेकिन संकट की स्थिति में ऋण राहत आवश्यक है।

13 1992 : गाजियाबाद भूमि मुआवजा आंदोलन

BKU की राजनीति केवल गन्ना और बिजली तक सीमित नहीं रही।

1992 में टिकैत ने गाजियाबाद में भूमि अधिग्रहण से प्रभावित किसानों के लिए आंदोलन किया।

और लंबित मुआवजा मामलों का शीघ्र निपटारा।

यह प्रश्न आगे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान आंदोलनों में अत्यंत महत्वपूर्ण होने वाला था।

14 कृषि भूमि से शहरी भूमि तक

गाजियाबाद, नोएडा और दिल्ली के आसपास तेजी से शहरी विस्तार हो रहा था।

किसान की जमीन अब केवल खेती की जमीन नहीं थी।

वह भविष्य के शहर, औद्योगिक क्षेत्र और आवास परियोजना की जमीन भी थी।

सरकार जिस मूल्य पर भूमि अधिग्रहित करती है और बाद में जिस मूल्य पर उसका शहरी उपयोग होता है, उनके बीच इतना अंतर क्यों?

BKU की किसान राजनीति में यह प्रश्न 1990 के दशक से अधिक स्पष्ट होने लगा।

15 1993 : चिनहट–कठौता भूमि आंदोलन

जून 1993 में लखनऊ के चिनहट–कठौता क्षेत्र में अधिग्रहीत भूमि के बेहतर मुआवजे की मांग को लेकर BKU पंचायत का उल्लेख मिलता है।

इससे भूमि अधिग्रहण संगठन के स्थायी मुद्दों में शामिल होने लगा।

1980 के दशक का किसान राज्य से उत्पादन लागत पर लड़ रहा था।

1990 का किसान राज्य से अपनी कृषि भूमि के मूल्य पर भी लड़ रहा था।

16 1993 का ‘पशु सत्याग्रह’

सितंबर–अक्टूबर 1993 में BKU से जुड़े विवरणों में Cattle Satyagraha—पशु सत्याग्रह का उल्लेख मिलता है।

इसका संबंध सात सूत्रीय मांगपत्र, गन्ना किसानों को राहत, बकाया भुगतान तथा 10 हजार रुपये तक ऋण माफी जैसे प्रश्नों से था।

यह टिकैत आंदोलन की पुरानी प्रतीकात्मक राजनीति की निरंतरता थी।

जैसे 1988 में पशु और ग्रामीण जीवन दिल्ली के बोट क्लब तक पहुंचे थे, वैसे ही पशुधन किसान जीवन की राजनीतिक पहचान का हिस्सा बना रहा।

17 1993 : डंकल प्रस्ताव और बीज सत्याग्रह

1990 के दशक के किसान आंदोलन में एक नया विषय जुड़ा—

GATT–डंकल प्रस्ताव और बहुराष्ट्रीय कंपनियां।

BKU से जुड़े आंदोलन इतिहास में 1993 के “Dunkel Dunk/बीज सत्याग्रह” का उल्लेख है, जिसमें कृषि क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रवेश का विरोध किया गया।

यह महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे BKU का एजेंडा स्थानीय बिजली–गन्ना प्रश्न से वैश्विक कृषि व्यवस्था की ओर बढ़ता दिखाई देता है।

हालांकि इस विषय पर संगठन की वैचारिक स्पष्टता KRRS जैसी नहीं थी, लेकिन वैश्वीकरण की आशंका अब उसकी किसान राजनीति में प्रवेश कर चुकी थी।

18 किसान आंदोलन का विस्तार, पर वैचारिक असंगति

अब BKU एक साथ कई प्रश्न उठा रही थी—

क्योंकि संगठन के पास इन सभी प्रश्नों को एक संगठित राष्ट्रीय कृषि नीति में जोड़ने वाला वैचारिक और शोध ढांचा कमजोर था।

इसलिए आंदोलन शक्तिशाली हो सकता था, लेकिन दीर्घकालीन नीति कार्यक्रम अपेक्षाकृत अस्पष्ट रहता था।

19 1990 के दशक में किसान एकता का कमजोर होना

इस समय तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति भी बदल चुकी थी।

इन सभी ने किसान पहचान के समानांतर जाति और धर्म आधारित राजनीतिक पहचान मजबूत की।

Satendra Kumar के अध्ययन के अनुसार नवउदारवादी आर्थिक परिवर्तन और हिंदुत्व राजनीति के उभार ने अगले तीन दशकों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कृषि-केंद्रित राजनीति को काफी कमजोर किया।

20 BKU का अखिल भारतीय स्वरूप क्यों कमजोर पड़ा?

1988 में ऐसा लग सकता था कि BKU राष्ट्रीय किसान राजनीति का केंद्रीय संगठन बन सकता है।

किसान संगठनों की अलग आर्थिक विचारधाराएं।

Indian Express की ऐतिहासिक समीक्षा भी बताती है कि विभिन्न राज्यों की BKU धाराएं समय के साथ अलग-अलग नेतृत्व और गुटों में विभाजित हो गईं।

21 पंजाब की BKU धाराओं का विभाजन

“भारतीय किसान यूनियन” नाम केवल टिकैत की उत्तर प्रदेश इकाई तक सीमित नहीं था।

पंजाब में भी संगठन की अलग ऐतिहासिक धारा थी।

लेकिन 1989 के बाद पंजाब BKU में गंभीर गुटबाजी हुई।

भूपिंदर सिंह मान, बलबीर सिंह राजेवाल, अजमेर सिंह लखोवाल और बाद में उगराहां तथा दूसरे नेताओं के नेतृत्व में अलग संगठन उभरे।

अध्ययन बताते हैं कि पंजाब BKU के विभाजन ने अखिल भारतीय एकीकृत संगठन की संभावना को और कमजोर किया।

पंजाब के इन विभाजनों को महेंद्र सिंह टिकैत की उत्तर प्रदेश BKU के सीधे आंतरिक विभाजन के रूप में नहीं देखना चाहिए।

वे BKU नाम की व्यापक राष्ट्रीय संगठनात्मक परंपरा के अलग क्षेत्रीय विकास थे।

22 1996 : चुनावी प्रयोग

1990 के दशक के मध्य तक BKU के सामने यह प्रश्न फिर खड़ा हुआ कि आंदोलनकारी शक्ति को चुनावी शक्ति में बदला जाए या नहीं।

1996 में भारतीय किसान कामगार पार्टी जैसे चुनावी प्रयोग के माध्यम से संगठन से जुड़े नेतृत्व ने संसदीय राजनीति में हस्तक्षेप करने की कोशिश की।

लेकिन विशाल किसान पंचायतों में दिखाई देने वाली लोकप्रियता चुनाव में समान अनुपात में वोट में नहीं बदली।

आंदोलनकारी क्षमता और चुनावी क्षमता अलग हैं।

23 किसान–कामगार जोड़ने की कोशिश

“किसान कामगार” नाम अपने आप में महत्वपूर्ण था।

यह शायद उस आलोचना का उत्तर खोजने का प्रयास था कि BKU केवल भूमि-स्वामी किसानों का संगठन है।

यदि किसान और मजदूर को साथ लाया जाए तो सामाजिक आधार व्यापक हो सकता था।

लेकिन यह प्रयोग मजबूत स्थायी सामाजिक गठबंधन नहीं बना सका।

भूमि-स्वामी किसान और कृषि मजदूर के वर्गीय हितों को केवल संगठन के नाम से एक नहीं किया जा सकता था।

24 2000 का दशक : टिकैत अभी भी प्रभावशाली, पर वैसा सर्वव्यापी नहीं

इक्कीसवीं सदी के पहले दशक तक महेंद्र सिंह टिकैत राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित और पहचाने जाने वाले किसान नेता बने रहे।

किसान संगठनों की संख्या बढ़ चुकी थी।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का सामाजिक गठबंधन कमजोर हो चुका था।

और किसान की नई पीढ़ी की आकांक्षाएं अलग थीं।

2004 की Times of India रिपोर्ट ने इसी परिवर्तन को तीखे शीर्षक—“Tikait loses punch in Jatland”—के साथ दर्ज किया और संकेत दिया कि टिकैत का पुराना निर्विवाद प्रभाव अब कम हो चुका था।

25 नई पीढ़ी का किसान

1980 के दशक का किसान हरित क्रांति से निकला था।

2000 के दशक का किसान नई परिस्थितियों में जी रहा था।

दिल्ली–एनसीआर का शहरी विस्तार पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक पहुंच रहा था।

भूमि का बाजार मूल्य तेजी से बढ़ रहा था।

इसलिए किसान आंदोलन की भाषा भी बदलनी थी।

केवल बिजली और गन्ना पर्याप्त नहीं रह सकते थे।

26 भूमि अधिग्रहण बड़ा मुद्दा क्यों बना?

दिल्ली–एनसीआर के विस्तार ने किसान राजनीति में भूमि अधिग्रहण को केंद्रीय विषय बना दिया।

उस पर शहर बनने के बाद मूल्य कितनी गुना बढ़ जाएगा?

यह प्रश्न आगे 2000 और 2010 के दशक की उत्तर भारतीय किसान राजनीति का बड़ा हिस्सा बना।

BKU का 1992 का गाजियाबाद आंदोलन इस नई राजनीति का प्रारंभिक संकेत था।

27 हरिद्वार : संगठनात्मक और प्रतीकात्मक केंद्र

हरिद्वार बाद के BKU इतिहास में एक महत्वपूर्ण किसान आयोजन स्थल बना।

यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर भारत के किसान नेटवर्क के लिए सुविधाजनक स्थान था और संगठन ने यहां चिंतन शिविर, किसान पंचायत और बाद में यात्राओं की शुरुआत जैसी परंपराएं विकसित कीं।

इसलिए ऐतिहासिक रूप से अधिक सावधानीपूर्ण निष्कर्ष यह है—

29 2006 और बदलता राष्ट्रीय कृषि विमर्श

इससे स्पष्ट है कि BKU ने वैश्वीकरण की बहस को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया।

अध्याय 16

महेंद्र सिंह टिकैत का निधन और BKU का उत्तराधिकार

महेंद्र सिंह टिकैत की मृत्यु केवल एक किसान नेता का निधन नहीं थी; वह भारतीय किसान यूनियन के लिए नेतृत्व, संगठन, सामाजिक आधार और राजनीतिक दिशा—चारों स्तरों पर एक निर्णायक संक्रमण था। 15 मई 2011 को टिकैत के निधन के बाद BKU के सामने वही प्रश्न आ खड़ा हुआ जो करिश्माई नेतृत्व पर आधारित लगभग प्रत्येक जनांदोलन के सामने आता है—क्या नेता द्वारा निर्मित आंदोलन नेता के बिना भी उसी प्रभाव से चल सकता है?

टिकैत लगभग ढाई दशक तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश की किसान राजनीति के केंद्र में रहे थे। सिसौली, बालियान खाप, किसान पंचायत और BKU—इन सभी को उनकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा ने एक सूत्र में बांध रखा था। इसलिए उनके निधन के बाद केवल अध्यक्ष का पद खाली नहीं हुआ; वह नैतिक प्राधिकार भी चला गया जिसके सामने संगठन के आंतरिक मतभेद दब जाते थे।

उत्तराधिकार मोटे तौर पर दो हिस्सों में बंटा। उनके बड़े पुत्र नरेश टिकैत ने संगठन तथा पंचायत परंपरा के औपचारिक नेतृत्व को संभाला, जबकि छोटे पुत्र राकेश टिकैत धीरे-धीरे BKU के सबसे सक्रिय आंदोलनकारी, वार्ताकार और सार्वजनिक चेहरे के रूप में सामने आए। आगे चलकर यही दोहरी संरचना—नरेश का पंचायत एवं संगठनात्मक नेतृत्व और राकेश का आंदोलनकारी सार्वजनिक नेतृत्व—टिकैत परिवार की दूसरी पीढ़ी की पहचान बनी। BKU की आधिकारिक सामग्री भी महेंद्र सिंह टिकैत को संस्थापक नेता और नरेश टिकैत को उत्तराधिकारी नेतृत्व के रूप में प्रस्तुत करती है।

लेकिन 2011 से 2018 तक का रास्ता सीधा नहीं था। इन सात वर्षों में BKU ने संगठनात्मक टूटन, मुस्लिम किसान आधार के क्षरण, 2013 की सांप्रदायिक हिंसा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के उभार और आंदोलनकारी प्रभाव में गिरावट का सामना किया। 2018 की किसान क्रांति यात्रा इस पूरे संकट के बाद पहला बड़ा संकेत बनी कि टिकैत मॉडल अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

1 15 मई 2011 : ‘बाबा टिकैत’ का निधन

महेंद्र सिंह टिकैत का निधन 15 मई 2011 को हुआ। वे लंबे समय से अस्वस्थ थे और बोन कैंसर से पीड़ित थे। समकालीन PTI रिपोर्ट के अनुसार उनकी मृत्यु मुजफ्फरनगर में उनके पुत्र और उस समय BKU महासचिव राकेश टिकैत के आवास पर हुई। अगले दिन सिसौली स्थित BKU मुख्यालय में अंतिम संस्कार किया गया।

उनकी उम्र 75–76 वर्ष के आसपास थी; विभिन्न स्रोत जन्म और आयु की गणना में मामूली अंतर देते हैं, लेकिन जन्मतिथि 6 अक्टूबर 1935 और मृत्यु 15 मई 2011 व्यापक रूप से स्वीकार्य हैं।

टिकैत अपने पीछे केवल एक किसान संगठन नहीं छोड़ गए थे।

यही स्मृति आगे संगठन की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी बनी।

2 उत्तराधिकार इतना कठिन क्यों था?

महेंद्र सिंह टिकैत का नेतृत्व अत्यधिक व्यक्तिगत था।

विवाद होने पर अंतिम पंचायत उन्हीं के पास आती थी।

सरकार से बातचीत में उनका शब्द निर्णायक माना जाता था।

किसान उन्हें सामान्य पदाधिकारी से अधिक सामाजिक चौधरी और नैतिक मध्यस्थ के रूप में देखते थे।

इसलिए उनके बाद कोई व्यक्ति केवल पद ग्रहण करके उनकी पूरी भूमिका नहीं संभाल सकता था।

पार्टी में नेता बदल सकता है क्योंकि संविधान, चुनाव और स्पष्ट पदानुक्रम मौजूद होता है।

लेकिन वही ताकत उत्तराधिकार के समय कमजोरी बन गई।

3 नरेश टिकैत : परंपरा और संगठन

महेंद्र सिंह टिकैत के बाद बड़े पुत्र नरेश टिकैत BKU के अध्यक्ष बने।

उनकी भूमिका पारंपरिक पंचायत और संगठनात्मक निरंतरता से अधिक जुड़ी रही।

इन संस्थाओं से उनका संबंध स्वाभाविक था।

वे पिता की तरह बड़े मंचीय आंदोलनकारी व्यक्तित्व नहीं बने, लेकिन संगठन के औपचारिक और सामाजिक उत्तराधिकार का प्रतिनिधित्व करने लगे।

नरेश टिकैत का महत्व इसलिए भी था कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की खाप आधारित ग्रामीण राजनीति में उत्तराधिकार केवल संगठनात्मक चुनाव का प्रश्न नहीं होता; सामाजिक प्रतिष्ठा और परंपरा भी उसका हिस्सा होती है।

4 राकेश टिकैत : आंदोलन और सार्वजनिक राजनीति

राकेश टिकैत का राजनीतिक व्यक्तित्व अलग था।

वे पहले दिल्ली पुलिस में सेवा कर चुके थे और बाद में पूर्णकालिक रूप से किसान संगठन से जुड़े।

महेंद्र सिंह टिकैत के अंतिम वर्षों तक वे BKU के सक्रिय महासचिव और प्रमुख वार्ताकार बन चुके थे। 2011 में महेंद्र सिंह टिकैत की मृत्यु के समय समकालीन PTI रिपोर्ट भी उन्हें BKU महासचिव के रूप में दर्ज करती है।

अगले वर्षों में राकेश टिकैत की भूमिका बढ़ती गई।

दिल्ली और लखनऊ की राजनीति से संपर्क रखते।

इसलिए धीरे-धीरे BKU में एक प्रकार का कार्य-विभाजन स्पष्ट हुआ—

राकेश टिकैत—आंदोलन और सार्वजनिक राजनीति।

5 परिवार आधारित नेतृत्व का प्रश्न

यह उत्तराधिकार स्वाभाविक दिख सकता था, लेकिन उसने एक लोकतांत्रिक प्रश्न भी पैदा किया।

यदि BKU किसानों का गैर-दलीय जनसंगठन है, तो शीर्ष नेतृत्व टिकैत परिवार में ही क्यों रहे?

टिकैत परिवार आंदोलन की ऐतिहासिक विश्वसनीयता का प्रतीक है।

यह संगठनात्मक संस्थानीकरण की कमजोरी है।

यही विवाद बाद के विभाजनों में अधिक स्पष्ट हुआ।

महेंद्र सिंह टिकैत की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा रहते हुए अनेक वरिष्ठ नेता परिवार-प्रधान संरचना को स्वीकार कर लेते थे।

6 2012 : गुलाम मोहम्मद जौला का अलग होना

टिकैत के निधन के एक वर्ष बाद ही संगठन को महत्वपूर्ण झटका लगा।

महेंद्र सिंह टिकैत के पुराने सहयोगी और BKU के आंदोलनकारी ढांचे के प्रमुख मुस्लिम चेहरों में से एक गुलाम मोहम्मद जौला 2012 में संगठन से अलग हो गए।

बाद की रिपोर्टों के अनुसार जौला महेंद्र सिंह टिकैत के दौर में राष्ट्रीय संयोजक स्तर पर आंदोलन आयोजन से जुड़े रहे थे। उन्होंने 2012 में अलग होकर किसान मजदूर मंच बनाया।

यह घटना बाद के इतिहास की दृष्टि से महत्वपूर्ण थी।

क्योंकि BKU का पुराना जाट–मुस्लिम किसान गठबंधन पहले ही कमजोर हो रहा था।

जौला का अलग होना उस सामाजिक दूरी का शुरुआती संकेत था जो 2013 में बहुत गंभीर रूप लेने वाली थी।

7 संगठनात्मक विभाजन की शुरुआत

महेंद्र सिंह टिकैत के निधन के बाद अनेक पुराने नेता धीरे-धीरे BKU से अलग हुए।

हिंदुस्तान टाइम्स की बाद की समीक्षा में वरिष्ठ BKU नेताओं ने स्वयं माना कि महेंद्र सिंह टिकैत के बाद संगठन में कई विभाजन हुए, क्योंकि उनकी करिश्माई नेतृत्व क्षमता विभिन्न धाराओं को एक साथ रखती थी।

यहां एक महत्वपूर्ण भेद बनाए रखना चाहिए।

BKU नाम के अलग-अलग किसान संगठन पहले से विभिन्न राज्यों में मौजूद थे।

इसलिए 2011 के बाद के सभी “BKU विभाजन” महेंद्र सिंह टिकैत की इकाई से ही पैदा नहीं हुए।

लेकिन उत्तर प्रदेश में भी टिकैत परिवार के नेतृत्व से असहमत कार्यकर्ताओं की अलग धाराएं बढ़ीं।

बाद के वर्षों में यह प्रक्रिया और तेज हुई।

8 करिश्माई नेतृत्व की संस्थागत समस्या

महेंद्र सिंह टिकैत का मॉडल गांव की सामाजिक शक्ति पर आधारित था।

उसमें अत्यधिक लिखित संविधान, कैडर प्रशिक्षण या सुदृढ़ केंद्रीय नौकरशाही नहीं थी।

एक वरिष्ठ नेता अपने क्षेत्र में प्रभावशाली हो सकता था।

यदि उसे केंद्रीय नेतृत्व से असहमति हुई तो अलग संगठन बनाना कठिन नहीं था।

यही कारण है कि समय के साथ BKU नाम से अनेक गुट सक्रिय हुए।

इस प्रक्रिया को केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से समझना अधूरा होगा।

यह संगठनात्मक ढांचे की संरचनात्मक समस्या भी थी।

9 2011–13 : BKU के सामने सामाजिक संकट

महेंद्र सिंह टिकैत की मृत्यु के समय तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पुरानी जाट–मुस्लिम किसान एकता कमजोर हो चुकी थी।

राजनीतिक दलों का सामाजिक आधार बदल रहा था।

भाजपा हिंदू मतदाताओं में अपनी पकड़ बढ़ा रही थी।

मुस्लिम मतदाता समाजवादी पार्टी, बसपा और अन्य विकल्पों की ओर थे।

राष्ट्रीय लोकदल पुरानी चरण सिंह सामाजिक राजनीति को बनाए रखने की कोशिश कर रहा था।

ऐसे में BKU की “किसान पहले” वाली पहचान पहले जैसी प्रभावी नहीं रही।

10 अगस्त–सितंबर 2013 : मुजफ्फरनगर का विस्फोट

2013 में मुजफ्फरनगर और शामली के ग्रामीण क्षेत्रों में हुई सांप्रदायिक हिंसा स्वतंत्र भारत के पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सामाजिक इतिहास की सबसे गंभीर घटनाओं में से एक बनी।

कवाल की हिंसक घटना के बाद तनाव बढ़ा।

आधिकारिक और अलग-अलग समकालीन स्रोतों में मृतकों की संख्या में अंतर है, लेकिन व्यापक रूप से लगभग 60 से अधिक लोगों की मृत्यु और 50 हजार से अधिक लोगों के विस्थापन की बात स्वीकार की जाती है। मुस्लिम समुदाय विस्थापन से विशेष रूप से प्रभावित हुआ।

यह BKU की पुरानी किसान राजनीति की सामाजिक पराजय भी थी।

11 किसान पहचान क्यों विफल हुई?

गन्ना जाट और मुस्लिम दोनों पैदा करते हैं।

लेकिन 2013 में आर्थिक समानता धार्मिक विभाजन को रोक नहीं सकी।

यही BKU इतिहास का सबसे कठिन प्रश्न है।

क्यों वह किसान पहचान, जिसने 1988 में हिंदू और मुस्लिम किसान को एक मंच पर बैठाया था, 2013 में समाज को एकजुट नहीं रख सकी?

इस प्रश्न पर अकादमिक बहस गंभीर रही है।

12 BKU और 2013 पर अकादमिक आलोचना

R. Ramakumar का Journal of Agrarian Change में प्रकाशित अध्ययन इस संबंध में सबसे महत्वपूर्ण आलोचनात्मक अध्ययनों में है।

उनका तर्क है कि BKU नेतृत्व और सदस्यता के कुछ हिस्सों ने उस सांप्रदायिक विमर्श को ग्रहण किया जिसने हिंसा से पहले सामाजिक वातावरण को प्रभावित किया। अध्ययन विशेष रूप से खाप राजनीति की भूमिका पर जोर देता है और पूछता है कि “किसान” की वर्ग-तटस्थ पहचान पर “हिंदू” पहचान कैसे भारी पड़ गई।

इस आलोचना को BKU इतिहास से हटाना उचित नहीं होगा।

लेकिन इसे पूरे संगठन के प्रत्येक सदस्य के व्यवहार के बराबर मानना भी उचित नहीं है।

विभिन्न क्षेत्रों में अलग नेतृत्व और स्थानीय परिस्थितियां थीं।

2013 में BKU की किसान एकता सांप्रदायिक विभाजन को रोक नहीं सकी।

13 2013 के बाद मुस्लिम किसानों का हटना

दंगों का BKU पर तत्काल प्रभाव पड़ा।

मुस्लिम किसानों का बड़ा हिस्सा संगठन के कार्यक्रमों से दूर हो गया।

पुराने जाट–मुस्लिम कृषि गठबंधन की जगह अविश्वास ने ले ली।

गुलाम मोहम्मद जौला का अलग किसान मंच इस दूरी का प्रमुख प्रतीक बना।

बाद में BKU नेताओं ने भी स्वीकार किया कि 2013 के बाद मुस्लिम समुदाय की भागीदारी संगठन में काफी कम हो गई थी।

हिंदुस्तान टाइम्स की समीक्षा भी स्पष्ट रूप से कहती है कि मुजफ्फरनगर और शामली की 2013 की हिंसा ने हिंदुओं—विशेषकर जाटों—और मुसलमानों की एकता तोड़ी और इसी कारण BKU कमजोर हुई।

14 यह संगठनात्मक नुकसान इतना गंभीर क्यों था?

क्योंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की गन्ना अर्थव्यवस्था बहु-सामुदायिक थी।

BKU केवल जाट किसानों के बल पर उतनी व्यापक शक्ति नहीं बन सकती थी जितनी उसने 1980 के दशक में दिखाई थी।

और संगठन की “सभी किसान” वाली पहचान कमजोर पड़ना।

15 गन्ना वही रहा, गठबंधन बदल गया

गन्ने का मूल्य अभी भी दोनों समुदायों का मुद्दा था।

चीनी मिल दोनों का भुगतान रोक सकती थी।

लेकिन आर्थिक मुद्दे राजनीतिक विभाजन को तत्काल खत्म नहीं कर सके।

इसने BKU को एक महत्वपूर्ण पाठ दिया—

साझा आर्थिक हित पर्याप्त शर्त नहीं है; सामाजिक विश्वास भी आवश्यक है।

16 2014 का चुनाव और नया राजनीतिक भूगोल

2013 की हिंसा के कुछ महीने बाद 2014 का लोकसभा चुनाव हुआ।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में व्यापक हिंदू ध्रुवीकरण ने भाजपा को बड़ी चुनावी सफलता दिलाई।

जाट मतदाता, जो चरण सिंह–अजित सिंह की राजनीति और BKU के किसान आधार का महत्वपूर्ण हिस्सा थे, बड़ी संख्या में भाजपा की ओर गए।

इससे किसान राजनीति का पुराना सामाजिक भूगोल बदल गया।

आंदोलन में BKU से जुड़ा हो सकता था।

लेकिन चुनाव में भाजपा समर्थक भी हो सकता था।

यह वही पुराना आंदोलन बनाम वोट का अंतर था, लेकिन अब धार्मिक राजनीतिक पहचान कहीं अधिक प्रभावशाली थी।

17 राष्ट्रीय लोकदल का संकट और BKU

चरण सिंह और अजित सिंह की राजनीतिक परंपरा जाट–मुस्लिम किसान गठबंधन पर काफी निर्भर रही थी।

इससे राष्ट्रीय लोकदल भी कमजोर पड़ा।

एक ओर पारंपरिक किसान राजनीतिक प्रतिस्पर्धी कमजोर हुआ।

दूसरी ओर साझा किसान सामाजिक संरचना भी टूट गई।

बल्कि उसका क्षेत्रीय किसान समाज ही अधिक बिखर गया।

18 राकेश टिकैत के सामने नई चुनौती

इस परिस्थिति में राकेश टिकैत के सामने पिता से बिल्कुल अलग चुनौती थी।

महेंद्र सिंह टिकैत को किसान पहचान बनानी थी।

राकेश टिकैत को पहले टूटी किसान पहचान को फिर जोड़ना था।

किसान सरकार के खिलाफ कैसे संगठित हो?

पहले किसान एक-दूसरे के साथ कैसे खड़े हों?

यही 2011–18 के दौर की केंद्रीय समस्या थी।

19 क्या राकेश टिकैत तुरंत बड़े नेता बन गए?

2021 के गाजीपुर आंदोलन की लोकप्रियता को पीछे ले जाकर 2011 से ही राकेश टिकैत को उसी स्तर का नेता मानना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा।

2011 के बाद वे प्रमुख BKU नेता जरूर थे।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी पिता जैसी सर्वमान्य प्रतिष्ठा नहीं थी।

उन्हें अपना राजनीतिक नेतृत्व नए सिरे से बनाना पड़ा।

20 नरेश और राकेश की संयुक्त संरचना

टिकैत परिवार की दूसरी पीढ़ी का सबसे व्यावहारिक समाधान यही निकला कि दोनों भाई अलग प्रकार की भूमिकाएं निभाएं।

इस व्यवस्था ने परिवार के भीतर संभावित नेतृत्व प्रतिस्पर्धा को काफी हद तक नियंत्रित रखा।

21 संगठन के विभिन्न गुट

महेंद्र सिंह टिकैत के बाद BKU से जुड़े कई अलग संगठन और गुट उभरे।

इनमें कुछ पहले की क्षेत्रीय धाराओं से आए थे और कुछ बाद में टिकैत नेतृत्व से असहमति के कारण बने।

इसलिए “BKU” नाम सुनते ही यह मान लेना कि प्रत्येक संगठन राकेश–नरेश टिकैत वाली इकाई है—गलत होगा।

बाद के वर्षों में उत्तर प्रदेश में भी BKU नाम से अनेक अलग इकाइयां बनीं। 2022 तक मीडिया रिपोर्टें टिकैत धारा से अलग कम-से-कम कई संगठनों और “BKU अराजनैतिक” जैसे नए गुटों का उल्लेख करती हैं।

यह विभाजन 2011 के बाद की संस्थागत कमजोरी का दीर्घकालीन परिणाम था।

22 फिर भी ‘टिकैत BKU’ की विशिष्टता

इतने गुटों के बावजूद टिकैत परिवार वाली BKU की एक विशेष ताकत थी—

ये प्रतीक किसी नए किसान संगठन के पास नहीं थे।

इसलिए संगठन कमजोर होने के बाद भी संकट के समय यह स्मृति किसान लामबंदी में प्रयोग की जा सकती थी।

23 2015–17 : किसान संकट के नए प्रश्न

2010 के दशक के मध्य तक उत्तर भारतीय कृषि में पुराने मुद्दों के साथ नए प्रश्न भी जुड़ रहे थे।

और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की मांग।

राष्ट्रीय किसान राजनीति में MSP और उत्पादन लागत के संबंध की चर्चा तेजी से बढ़ रही थी।

BKU को यदि पुनर्जीवित होना था तो उसे बाबा टिकैत की पुरानी मांगों को नई किसान भाषा से जोड़ना था।

24 स्वामीनाथन आयोग एक नया साझा सूत्र

कृषि लागत और मूल्य आयोग तथा MSP की बहस को राष्ट्रीय किसान आंदोलन में नई ऊर्जा मिली।

स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों की लोकप्रिय व्याख्या—कृषि लागत के ऊपर 50 प्रतिशत प्रतिफल—किसान संगठनों के लिए अत्यंत प्रभावी नारा बनी।

यह टिकैत के पुराने आर्थिक सूत्र का आधुनिक संस्करण जैसा था—

लागत का हिसाब करो और लाभकारी मूल्य दो।

इसलिए BKU इसे आसानी से अपनी पुरानी किसान राजनीति में समाहित कर सकी।

25 2018 से पहले सामाजिक मेल-मिलाप की शुरुआत

2013 की सांप्रदायिक टूटन के बाद जाट और मुस्लिम किसानों को फिर एक मंच पर लाना आसान नहीं था।

लेकिन स्थानीय किसान नेताओं ने धीरे-धीरे संपर्क शुरू किया।

क्योंकि 2021 की किसान एकता अचानक नहीं बनी।

उसकी सामाजिक तैयारी पहले शुरू हो चुकी थी।

26 2018 : किसान क्रांति यात्रा का निर्णय

पुराने ट्रैक्टरों पर प्रतिबंध से जुड़ी समस्याएं।

अध्याय 17

2020–21 के कृषि कानून आंदोलन में BKU और राकेश टिकैत

2020–21 का किसान आंदोलन भारतीय किसान यूनियन के इतिहास में वह क्षण था जब महेंद्र सिंह टिकैत की आंदोलनकारी विरासत नई पीढ़ी के नेतृत्व में फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में लौट आई। लेकिन इस आंदोलन को केवल राकेश टिकैत या केवल BKU का आंदोलन मानना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा। यह अनेक किसान संगठनों का संयुक्त आंदोलन था, जिसका प्रमुख समन्वय मंच संयुक्त किसान मोर्चा बना। पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और देश के अन्य हिस्सों के किसान संगठनों ने अलग-अलग संगठनात्मक परंपराओं के बावजूद तीन कृषि कानूनों को निरस्त कराने और न्यूनतम समर्थन मूल्य की अधिक मजबूत सुरक्षा की मांग पर साझा मोर्चा बनाया। जनवरी 2021 तक केंद्र सरकार स्वयं 41 किसान संगठनों के प्रतिनिधियों से वार्ता कर रही थी।

BKU की विशिष्ट भूमिका मुख्यतः गाजीपुर बॉर्डर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उभरी। आंदोलन के शुरुआती चरण में पंजाब और हरियाणा के किसान संगठनों की उपस्थिति अधिक प्रभावशाली थी। लेकिन 28 जनवरी 2021 की रात गाजीपुर सीमा पर राकेश टिकैत के भावुक सार्वजनिक प्रतिरोध ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान लामबंदी को अचानक नई ऊर्जा दी। उसके बाद वही BKU, जो 2013 की सांप्रदायिक टूटन और महेंद्र सिंह टिकैत के निधन के बाद लंबे समय तक कमजोर दिखाई देती थी, फिर राष्ट्रीय किसान आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल हो गई।

इस आंदोलन का ऐतिहासिक महत्व इसी कारण दोहरा है—

एक, इसने केंद्र सरकार को तीन कृषि कानून वापस लेने के लिए बाध्य करने वाली व्यापक किसान लामबंदी में योगदान दिया।

दो, इसने महेंद्र सिंह टिकैत के लंबे धरने, ट्रैक्टर, सामुदायिक रसद, पंचायत और गैर-दलीय किसान दबाव की आंदोलन शैली को नई परिस्थितियों में पुनर्जीवित किया।

1 तीन कृषि कानून : विवाद की शुरुआत

5 जून 2020 को केंद्र सरकार ने तीन कृषि अध्यादेश जारी किए। बाद में संसद ने सितंबर 2020 में उनसे संबंधित विधेयक पारित किए और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद 27 सितंबर 2020 से तीनों कानून प्रभावी हो गए। इनमें थे—

कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम, 2020।

कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार अधिनियम, 2020।

आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020।

सरकार का तर्क था कि इन कानूनों से किसान को अपनी उपज मंडी से बाहर बेचने के अधिक विकल्प मिलेंगे, अनुबंध खेती के लिए कानूनी ढांचा मिलेगा और कृषि बाजार में निवेश तथा प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। प्रधानमंत्री ने बाद में कानून वापसी की घोषणा करते समय भी कहा कि इनका उद्देश्य विशेषकर छोटे किसानों को बेहतर मूल्य और अधिक बिक्री विकल्प देना था।

2 किसान संगठनों की आशंकाएं

विरोधी किसान संगठनों की आशंकाएं बिल्कुल अलग थीं।

उन्हें डर था कि मंडी व्यवस्था धीरे-धीरे कमजोर होगी।

न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद की सुरक्षा कमजोर पड़ सकती है।

बड़ी निजी कंपनियों की सौदेबाजी शक्ति छोटे किसान से कहीं अधिक होगी।

अनुबंध विवाद की स्थिति में किसान कमजोर पक्ष हो सकता है।

और लंबे समय में कृषि व्यापार में निजी कॉरपोरेट शक्ति बढ़ सकती है।

Indian Express की आंदोलन समयरेखा ने किसान संगठनों की केंद्रीय आशंका को इसी रूप में दर्ज किया कि कानून MSP आधारित सुरक्षा को कमजोर करके किसानों को बड़े कॉरपोरेट खरीदारों पर अधिक निर्भर बना सकते हैं।

यह महत्वपूर्ण है कि सरकार ने MSP समाप्त करने की घोषणा नहीं की थी। इसलिए “कानूनों में MSP समाप्त कर दिया गया था” कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। विवाद मुख्यतः भविष्य की संरचनात्मक आशंका और MSP को कानूनी सुरक्षा देने की मांग को लेकर था।

3 आंदोलन की शुरुआत पंजाब से

इन कानूनों के खिलाफ सबसे मजबूत शुरुआती विरोध पंजाब में हुआ।

पंजाब के किसान संगठन पहले अध्यादेशों और फिर कानूनों के खिलाफ लामबंद हुए।

कॉरपोरेट प्रतिष्ठानों के खिलाफ प्रदर्शन।

धीरे-धीरे हरियाणा के किसान भी बड़े पैमाने पर जुड़े।

नवंबर के अंत तक किसान संगठनों ने निर्णय लिया—

4 25–26 नवंबर 2020 : दिल्ली चलो

25 नवंबर 2020 से पंजाब और हरियाणा के हजारों किसानों ने दिल्ली की ओर बढ़ना शुरू किया।

26 नवंबर को कई स्थानों पर किसानों को रोकने के लिए पुलिस ने अवरोधक, पानी की बौछार और आंसू गैस का प्रयोग किया।

इसके बावजूद किसान दिल्ली की सीमाओं तक पहुंच गए।

सरकार ने उन्हें बुराड़ी के निर्धारित मैदान में जाने का प्रस्ताव दिया, लेकिन किसान संगठनों ने प्रमुख सीमा बिंदुओं पर ही पड़ाव बनाए रखा।

यहीं आंदोलन ने लंबे घेराव का रूप ले लिया।

5 सिंघु, टिकरी और गाजीपुर

आंदोलन के तीन प्रमुख प्रतीकात्मक केंद्र बने—

सिंघु और टिकरी पर पंजाब और हरियाणा के किसान संगठनों की उपस्थिति सबसे मजबूत थी।

गाजीपुर धीरे-धीरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश और BKU की मुख्य पहचान बना।

इसी भौगोलिक विभाजन में आंदोलन की संघीय सामाजिक संरचना दिखाई देती है।

लेकिन अलग क्षेत्रीय किसान संस्कृतियां।

6 संयुक्त किसान मोर्चा : किसी एक नेता का आंदोलन नहीं

2020–21 आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण संगठनात्मक विशेषता थी—

संयुक्त किसान मोर्चा कई किसान संगठनों का साझा मंच बना। जनवरी 2021 में इसे 41 आंदोलनरत किसान यूनियनों की छतरी संस्था के रूप में दर्ज किया गया।

इसलिए इतिहास लिखते समय यह कहना कि राकेश टिकैत या BKU ने अकेले कृषि कानून वापस कराए—गलत होगा।

BKU इस व्यापक गठबंधन का एक महत्वपूर्ण घटक थी, संपूर्ण आंदोलन नहीं।

7 BKU की प्रारंभिक स्थिति

आंदोलन के शुरुआती महीनों में गाजीपुर सीमा की ताकत सिंघु या टिकरी जैसी नहीं थी।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों का समर्थन मौजूद था, लेकिन 1988 जैसी तत्काल विशाल लामबंदी नहीं दिखाई दी।

इसके पीछे सामाजिक और राजनीतिक कारण थे।

जाट किसानों में भाजपा का मजबूत चुनावी समर्थन।

और आंदोलन के शुरुआती चरण में पंजाब का वर्चस्व।

राकेश टिकैत अभी राष्ट्रीय आंदोलन के केंद्रीय चेहरे नहीं बने थे।

यह स्थिति जनवरी 2021 के अंत में बदली।

8 सरकार से वार्ता

दिसंबर 2020 से जनवरी 2021 तक केंद्र सरकार और किसान संगठनों के बीच लगातार वार्ताएं हुईं।

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, पीयूष गोयल और सोम प्रकाश सरकार की ओर से प्रमुख वार्ताकार थे।

सरकार कुछ प्रावधानों में संशोधन पर चर्चा करने को तैयार थी।

8 जनवरी 2021 की आठवीं वार्ता तक सरकार संशोधन पर बात कर रही थी, जबकि किसान संगठन कानून निरस्त करने की मांग पर कायम थे।

9 सुप्रीम कोर्ट की दखल

12 जनवरी 2021 को सर्वोच्च न्यायालय ने तीनों कृषि कानूनों के क्रियान्वयन पर अगले आदेश तक रोक लगाई और कानूनों पर विचार करने के लिए विशेषज्ञ समिति बनाई।

अपने आदेश में न्यायालय ने यह भी दर्ज किया कि सरकार और किसान संगठनों के बीच कई दौर की बातचीत के बावजूद समाधान नहीं निकल पाया था और आंदोलन उस समय तक बड़े पैमाने पर शांतिपूर्ण रहा था।

उन पर न्यायालय ने अस्थायी रोक लगा दी।

फिर भी किसान आंदोलन समाप्त नहीं हुआ।

क्योंकि किसान संगठनों की मांग केवल क्रियान्वयन रोकना नहीं बल्कि कानूनों का विधायी निरसन था।

10 सरकार का 18 महीने रोकने का प्रस्ताव

20 जनवरी 2021 की दसवीं वार्ता में केंद्र सरकार ने महत्वपूर्ण प्रस्ताव दिया—

तीनों कानूनों के क्रियान्वयन को एक से डेढ़ वर्ष तक स्थगित रखा जाए।

इस अवधि में सरकार और किसान संगठनों की संयुक्त समिति विवादित प्रश्नों पर चर्चा करे।

लेकिन किसान संगठनों ने इसे स्वीकार नहीं किया।

21 जनवरी को संयुक्त किसान मोर्चा ने प्रस्ताव अस्वीकार करते हुए दो मुख्य मांगें दोहराईं—

और लाभकारी MSP के लिए कानूनी व्यवस्था।

11 26 जनवरी की ट्रैक्टर परेड

गणतंत्र दिवस 2021 पर किसान संगठनों ने दिल्ली में ट्रैक्टर परेड आयोजित करने का निर्णय किया।

पुलिस और किसान नेताओं के बीच निर्धारित मार्गों पर सहमति बनी थी।

लेकिन 26 जनवरी को आंदोलन का एक हिस्सा निर्धारित मार्ग से हट गया।

कई प्रदर्शनकारी मध्य दिल्ली की ओर बढ़े।

ITO और लाल किला क्षेत्र में गंभीर हिंसा और पुलिस–प्रदर्शनकारी टकराव हुआ।

कुछ प्रदर्शनकारियों ने लाल किले की प्राचीर और परिसर में प्रवेश किया तथा निशान साहिब का झंडा लगाया।

पुलिस कर्मियों सहित अनेक लोग घायल हुए।

12 26 जनवरी के बाद नैतिक संकट

26 जनवरी की हिंसा ने किसान आंदोलन की उस नैतिक शक्ति को नुकसान पहुंचाया जो महीनों के शांतिपूर्ण धरने से बनी थी।

सरकार और आंदोलन-विरोधी समूहों को आरोप लगाने का अवसर मिला कि आंदोलन नेतृत्व भीड़ पर नियंत्रण खो चुका है।

कुछ धरना स्थलों पर किसान वापस जाने लगे।

ऐसा लगा कि आंदोलन तेजी से कमजोर हो सकता है।

यहीं 28 जनवरी की घटना निर्णायक बनी।

13 गाजीपुर खाली कराने का दबाव

28 जनवरी 2021 को गाजियाबाद प्रशासन ने गाजीपुर सीमा पर किसानों को धरना स्थल खाली करने का निर्देश दिया।

शाम तक बड़ी संख्या में पुलिस और दंगा-रोधी बल वहां दिखाई देने लगे।

राकेश टिकैत ने घोषणा की कि वे धरना स्थल नहीं छोड़ेंगे।

यह वह क्षण था जब आंदोलन का भविष्य अनिश्चित दिखाई दे रहा था।

26 जनवरी की घटनाओं के कारण आंदोलन की छवि चोटिल थी।

14 28 जनवरी : राकेश टिकैत के आंसू

इसी रात कैमरों के सामने राकेश टिकैत भावुक हो गए।

उन्होंने किसान सम्मान और आंदोलन जारी रखने की बात कही।

कुछ घंटों में यह दृश्य टीवी, मोबाइल और सोशल मीडिया के माध्यम से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों में फैल गया।

Indian Express ने बाद में इसे स्पष्ट रूप से किसान आंदोलन का turning point—निर्णायक मोड़ कहा।

यह राकेश टिकैत के राजनीतिक जीवन का भी निर्णायक क्षण था।

15 किसान समाज ने आंसुओं को कैसे पढ़ा?

शहरी राजनीतिक दृष्टि से किसी नेता का रोना कमजोरी समझा जा सकता है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान समाज में इसकी प्रतिक्रिया उलटी हुई।

समर्थकों ने इसे अपने किसान नेता के अपमान और असहायता के रूप में देखा।

किसान संगठन के पुराने सामाजिक नेटवर्क अचानक सक्रिय हो गए।

और किसानों ने रात में ही गाजीपुर की ओर निकलना शुरू कर दिया।

16 डिजिटल युग में टिकैत मॉडल

यहां महेंद्र सिंह टिकैत और राकेश टिकैत के आंदोलनों के बीच एक रोचक ऐतिहासिक अंतर दिखाई देता है।

2021 में वही नेटवर्क था, लेकिन उसके ऊपर जुड़ गए थे—

Indian Express ने दर्ज किया कि टिकैत परिवार की युवा पीढ़ी ने भावुक राकेश टिकैत की तस्वीर और वीडियो को व्यापक रूप से प्रसारित करने में भूमिका निभाई, जिसके बाद अगले ही दिन मुजफ्फरनगर की विशाल पंचायत के लिए किसानों की लामबंदी हुई।

पुराना पंचायत नेटवर्क अब डिजिटल हो चुका था।

17 रातों-रात गाजीपुर फिर भर गया

28 जनवरी की रात से किसान पश्चिमी उत्तर प्रदेश से गाजीपुर पहुंचने लगे।

और आसपास के क्षेत्रों से ट्रैक्टर और वाहन आने लगे।

किसान फिर राशन और पानी साथ ला रहे थे।

31 जनवरी की रिपोर्ट में Indian Express ने दर्ज किया कि मुजफ्फरनगर पंचायत के बाद सैकड़ों किसान ट्रैक्टर और ट्रकों में राशन तथा पानी लेकर गाजीपुर पहुंचे।

यह बिल्कुल महेंद्र सिंह टिकैत मॉडल की पुनरावृत्ति थी।

18 पानी का प्रतीक

गाजीपुर में प्रशासन द्वारा पानी और बिजली व्यवस्था बाधित किए जाने की खबरों के बीच राकेश टिकैत ने कहा कि वे अपने गांवों से किसानों द्वारा लाया पानी ही पीएंगे।

उसके बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों से पानी, छाछ और भोजन धरना स्थल पर पहुंचने लगा।

इसमें महेंद्र सिंह टिकैत की पुरानी आंदोलन संस्कृति का स्पष्ट प्रतीकवाद था—

राज्य की रसद के मुकाबले किसान समाज की सामुदायिक रसद।

19 29 जनवरी मुजफ्फरनगर महापंचायत

28 जनवरी की रात के तुरंत बाद 29 जनवरी को मुजफ्फरनगर में विशाल किसान पंचायत हुई।

नरेश टिकैत और स्थानीय किसान नेतृत्व ने किसानों को आंदोलन के समर्थन में खड़ा होने का आह्वान किया।

यही वह क्षण था जब सिसौली और मुजफ्फरनगर का पुराना टिकैत सामाजिक नेटवर्क फिर सक्रिय दिखाई दिया।

नरेश पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पंचायत शक्ति को सक्रिय कर रहे थे।

इस तरह टिकैत परिवार की दूसरी पीढ़ी का दोहरा नेतृत्व पूरी तरह दिखाई दिया।

20 पिता की विरासत फिर सक्रिय

यहां महेंद्र सिंह टिकैत की स्मृति केवल श्रद्धांजलि नहीं रही।

महेंद्र सिंह टिकैत की वह छवि, जिसमें किसान नेता दबाव के सामने पीछे नहीं हटता, राकेश टिकैत के व्यवहार को समझने की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि बनी।

इसलिए 28 जनवरी के बाद राकेश की पहचान केवल वर्तमान नेता की नहीं रही।

वे अपने पिता की आंदोलनकारी विरासत के उत्तराधिकारी के रूप में देखे जाने लगे।

21 जाट किसानों की वापसी

2014 के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट मतदाताओं का बड़ा हिस्सा भाजपा की ओर गया था।

इसलिए 2020 के शुरुआती किसान आंदोलन में जाट किसान का बड़ा हिस्सा राजनीतिक रूप से दुविधा में था।

28 जनवरी के बाद किसान सम्मान का प्रश्न पार्टी पहचान से ऊपर उठा।

गांवों में भावना बनी कि किसान नेता का अपमान हुआ है।

इससे बड़ी संख्या में जाट किसान BKU के आंदोलन में लौटे।

यही BKU के सामाजिक पुनरुत्थान का पहला बड़ा आधार बना।

22 मुस्लिम किसानों की वापसी

और भी महत्वपूर्ण था मुस्लिम किसानों का लौटना।

2013 के बाद जाट और मुस्लिम किसान अलग हो गए थे।

लेकिन कृषि कानून और गन्ना–MSP जैसे प्रश्न दोनों के लिए समान थे।

2021 की पंचायतों में पुराने मुस्लिम किसान नेता फिर BKU मंच के करीब आए।

इससे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान पहचान को पुनः जीवित करने की प्रक्रिया तेज हुई।

यह 2013 की दरार पूरी तरह भरना नहीं था।

23 गन्ना और कृषि कानून का संगम

राकेश टिकैत ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आंदोलन को केवल तीन कृषि कानूनों तक सीमित नहीं रखा।

फरवरी 2021 के साक्षात्कार में उन्होंने स्पष्ट रूप से तीन मांगें रखीं—

यही रणनीति BKU की पुरानी क्षेत्रीय ताकत को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ती थी।

24 गाजीपुर का चरित्र सिंघु से अलग क्यों था?

सिंघु और टिकरी मुख्यतः पंजाब–हरियाणा किसान राजनीति के प्रतीक थे।

गाजीपुर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान समाज का केंद्र बन गया।

यही कारण है कि गाजीपुर केवल एक धरना स्थल नहीं रहा।

वह BKU के पुनर्जन्म का स्थल बन गया।

25 6 फरवरी का चक्का जाम और क्षेत्रीय रणनीति

संयुक्त किसान मोर्चा ने 6 फरवरी 2021 को देशव्यापी चक्का जाम का आह्वान किया।

लेकिन राकेश टिकैत ने उत्तर प्रदेश में सड़क जाम न करने और केवल ज्ञापन देने का निर्णय किया।

संयुक्त आंदोलन के भीतर भी क्षेत्रीय संगठनों को रणनीतिक स्वायत्तता थी।

BKU हर निर्णय यांत्रिक रूप से नहीं अपनाती थी।

वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश की स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर आंदोलन की शैली तय कर सकती थी।

26 आंदोलन और लंबा पड़ाव

फरवरी के बाद किसान आंदोलन लंबा होता गया।

फिर भी सीमाओं पर तंबू, ट्रैक्टर-ट्रॉली, रसोई और गांव आधारित रसद बनी रही।

यहीं महेंद्र सिंह टिकैत की 1988 शैली और 2020–21 आंदोलन के बीच सबसे स्पष्ट समानता दिखाई देती है।

लंबा पड़ाव स्वयं राजनीतिक हथियार था।

सरकार प्रतीक्षा कर रही थी कि आंदोलन थकेगा।

27 सामुदायिक रसोई और आत्मनिर्भरता

पंजाब की लंगर परंपरा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सामुदायिक किसान रसद ने आंदोलन को असाधारण आत्मनिर्भरता दी।

28 महिलाओं की बढ़ती भूमिका

यहां महेंद्र सिंह टिकैत के दौर से एक महत्वपूर्ण बदलाव भी हुआ।

30 5 सितंबर 2021 : मुजफ्फरनगर महापंचायत

यह पंचायत इस संदेश के लिए महत्वपूर्ण थी—

अध्याय 18

2022 से 2026 तक BKU और किसान राजनीति

तीन कृषि कानूनों की वापसी के बाद भारतीय किसान राजनीति के सामने सबसे बड़ा प्रश्न था—अब आगे क्या? नवंबर–दिसंबर 2021 में कानून निरस्त हो गए, दिल्ली की सीमाओं से किसान लौट गए और संयुक्त किसान मोर्चा ने अपना आंदोलन स्थगित कर दिया। लेकिन जिन व्यापक आर्थिक समस्याओं ने आंदोलन को जन्म दिया था—न्यूनतम समर्थन मूल्य, कृषि ऋण, बढ़ती उत्पादन लागत, बिजली, गन्ना भुगतान, भूमि अधिग्रहण और किसान आय—उनमें से अधिकांश बनी रहीं।

यही कारण है कि 2022 से अगस्त 2026 तक के दौर को कृषि कानून आंदोलन के बाद की शांति का काल नहीं कहा जा सकता। यह वास्तव में किसान आंदोलन के पुनर्संयोजन, विखंडन और नए मुद्दों पर पुनः लामबंदी का काल है।

इस दौर में भारतीय किसान यूनियन की टिकैत धारा के सामने तीन समानांतर चुनौतियां थीं।

पहली—2020–21 की असाधारण राष्ट्रीय एकता को बनाए रखना।

दूसरी—BKU के भीतर गैर-दलीयता को लेकर पैदा हुई नई दरारों से निपटना।

तीसरी—कृषि कानूनों के समाप्त होने के बाद किसान असंतोष के लिए ऐसा नया केंद्रीय मुद्दा खोजना जो पूरे देश के किसानों को जोड़ सके।

न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी।

लेकिन 2024 के बाद किसान आंदोलन स्वयं कई धाराओं में बंटा दिखाई दिया। एक ओर 2020–21 आंदोलन की मूल संयुक्त किसान मोर्चा धारा थी, जिसमें BKU टिकैत शामिल रही; दूसरी ओर संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) और किसान मजदूर मोर्चा ने शंभू–खनौरी आंदोलन की अलग धारा विकसित की। दोनों MSP की कानूनी गारंटी जैसी कई समान मांगें उठाते थे, लेकिन संगठनात्मक रणनीति और नेतृत्व अलग था। जनवरी 2025 तक इन धाराओं को फिर साथ लाने के प्रयास भी पूर्णतः सफल नहीं हो पाए थे।

इसी विभाजित किसान राजनीति में 2026 तक राकेश टिकैत और BKU की स्थिति को समझना आवश्यक है।

1 कानून वापसी के बाद अधूरी मांगें

9 दिसंबर 2021 को आंदोलन स्थगित करते समय किसान संगठनों की धारणा थी कि तीन कृषि कानूनों की वापसी के अलावा कई अन्य मुद्दों पर सरकार से प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

आंदोलन के दौरान मारे गए किसानों के परिवारों का प्रश्न।

इसलिए दिल्ली सीमाओं से किसानों की वापसी को आंदोलन की पूरी समाप्ति नहीं कहा गया।

यही 2022 के बाद की राजनीति का आधार बना।

2 MSP कानून क्यों सबसे बड़ा उत्तराधिकारी मुद्दा बना?

तीन कृषि कानून निरस्त होने के बाद किसान संगठनों को एक ऐसा मुद्दा चाहिए था जो विभिन्न फसलों और राज्यों के किसानों को साझा मंच पर ला सके।

सभी किसी न किसी रूप में कृषि मूल्य की समस्या से जुड़े थे।

इसीलिए “कानूनी MSP” 2022 के बाद किसान आंदोलन का सबसे प्रभावशाली राष्ट्रीय नारा बना।

3 MSP व्यवस्था वास्तव में क्या है?

सरकार प्रति वर्ष 22 अधिदेशित कृषि फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती है। इनमें 14 खरीफ, छह रबी और दो वाणिज्यिक फसलें शामिल हैं। इसके अतिरिक्त गन्ने के लिए उचित एवं लाभकारी मूल्य—FRP—अलग व्यवस्था के अंतर्गत निर्धारित किया जाता है। फरवरी 2026 तक भी यही ढांचा कायम था।

लेकिन घोषित MSP और कानूनी गारंटी एक ही चीज नहीं हैं।

कई फसलों की सरकारी खरीद भी होती है।

लेकिन हर किसान की पूरी उपज हर परिस्थिति में MSP पर खरीदना कानूनी अधिकार नहीं है।

यहीं किसान आंदोलन की मांग शुरू होती है।

4 किसान संगठन क्या चाहते हैं?

किसान संगठनों के भीतर MSP के कानूनी मॉडल के विवरण में भिन्नताएं हैं, लेकिन केंद्रीय मांग है—

किसी किसान को अधिसूचित फसल MSP से कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर न होना पड़े।

संयुक्त किसान मोर्चा की प्रमुख धारा इसे स्वामीनाथन आयोग के व्यापक लागत सूत्र से जोड़ती रही है और C2 लागत के ऊपर 50 प्रतिशत प्रतिफल तथा सुनिश्चित खरीद की मांग उठाती है। 2024 में भी SKM के राष्ट्रीय किसान कार्यक्रम में यही प्रमुख मांग थी।

BKU टिकैत ने भी MSP की कानूनी गारंटी को अपनी केंद्रीय राष्ट्रीय मांग बनाए रखा है।

5 सरकार का दृष्टिकोण

सरकार कहती है कि MSP व्यवस्था लगातार मजबूत की गई है और 2018–19 से अधिदेशित फसलों का MSP अखिल भारतीय भारित औसत उत्पादन लागत से कम-से-कम 50 प्रतिशत अधिक रखने का सिद्धांत अपनाया गया है। यह सरकारी लागत-परिभाषा किसान संगठनों की C2 आधारित मांग से अलग हो सकती है।

सरकार MSP पर सरकारी खरीद को भी बढ़ाने और PM-AASHA जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से दलहन, तिलहन और नारियल के उत्पादकों को मूल्य समर्थन देने का दावा करती है। 2024 में PM-AASHA के विस्तार में दलहन, तिलहन और नारियल के MSP खरीद कार्यक्रम की सीमा बढ़ाई गई।

घोषित MSP और खरीद व्यवस्था पर्याप्त है, या किसान को कानूनी मूल्य अधिकार चाहिए?

6 2022 : MSP समिति का गठन

कृषि कानून आंदोलन के बाद केंद्र सरकार ने MSP व्यवस्था को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाने के लिए समिति गठित करने की प्रक्रिया शुरू की।

फरवरी 2022 में सरकार ने संसद में कहा कि ऐसी समिति गठित करने की प्रक्रिया चल रही है।

जुलाई 2022 में समिति औपचारिक रूप से गठित हुई।

MSP को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाना।

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग को अधिक वैज्ञानिक तथा स्वायत्त बनाने के सुझाव।

लेकिन यहीं किसान संगठनों और सरकार के बीच नया विवाद शुरू हो गया।

7 SKM ने समिति से दूरी क्यों बनाई?

संयुक्त किसान मोर्चा ने समिति की संरचना और कार्यक्षेत्र पर आपत्ति की।

किसान संगठनों का तर्क था कि आंदोलन की केंद्रीय मांग MSP की कानूनी गारंटी थी, जबकि समिति का कार्यक्षेत्र इसे स्पष्ट रूप से अनिवार्य परिणाम के रूप में नहीं रखता।

2022 में SKM के लिए समिति में तीन स्थान रखे गए, लेकिन मोर्चे ने नाम भेजने से परहेज किया और समिति की संरचना पर प्रश्न उठाए।

इससे 2021 के समझौते की व्याख्या पर सरकार और किसान संगठनों के बीच अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए।

8 2022 : BKU के भीतर सबसे बड़ा नया विभाजन

कृषि कानून आंदोलन से निकली लोकप्रियता BKU को मजबूत भी कर रही थी और भीतर तनाव भी पैदा कर रही थी।

15 मई 2022—महेंद्र सिंह टिकैत की पुण्यतिथि के दिन—BKU के कई वरिष्ठ नेताओं ने अलग होकर भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) का गठन किया।

यह सामान्य संगठनात्मक विभाजन नहीं था।

क्या राकेश और नरेश टिकैत BKU को बहुत अधिक चुनावी राजनीति की ओर ले गए हैं?

9 ‘अराजनैतिक’ नाम स्वयं आरोप था

नए संगठन ने अपने नाम में ही “अराजनैतिक” जोड़ लिया।

उसका आरोप था कि मूल BKU महेंद्र सिंह टिकैत की गैर-दलीय किसान राजनीति से विचलित हो गई है।

राजेश चौहान और उनके सहयोगियों ने आरोप लगाया कि 2022 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान राकेश टिकैत के बयानों और विपक्ष के प्रति दिखाई दी निकटता ने संगठन की गैर-दलीय छवि को नुकसान पहुंचाया।

राकेश टिकैत ने पलटकर विभाजन के पीछे सरकार की भूमिका होने का आरोप लगाया।

दोनों आरोप राजनीतिक दावे थे; इन्हें सिद्ध तथ्य की तरह नहीं बल्कि संबंधित पक्षों के आरोप के रूप में दर्ज करना चाहिए।

10 2022 विभाजन का वास्तविक महत्व

यह विभाजन महेंद्र सिंह टिकैत के पुराने अंतर्विरोध को फिर सामने लाया—

क्या किसान संगठन चुनावों को प्रभावित किए बिना सरकार पर प्रभावी दबाव डाल सकता है?

यदि वह किसी सरकार की कृषि नीति का विरोध करता है, तो चुनाव में उस सरकार के खिलाफ बोलना स्वाभाविक है।

लेकिन जैसे ही वह किसी दूसरे दल के पक्ष में दिखाई देता है, गैर-दलीयता प्रश्न के घेरे में आती है।

तीन अलग कालखंडों में वही समस्या अलग रूप में सामने आई।

11 विभाजन कितना गंभीर था?

नया गुट केवल कुछ अज्ञात कार्यकर्ताओं का समूह नहीं था।

उसमें BKU के कई पुराने पदाधिकारी शामिल हुए।

कुछ नेता महेंद्र सिंह टिकैत के दौर से संगठन में थे।

इसलिए इससे उत्तर प्रदेश में टिकैत धारा के संगठनात्मक नेटवर्क को वास्तविक नुकसान हुआ।

सिसौली, नरेश टिकैत और राकेश टिकैत के पास संगठन की ऐतिहासिक पहचान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का महत्वपूर्ण सामाजिक आधार बना रहा।

12 ‘BKU’ अब एक संगठन नहीं, संगठन-परिवार

2022 तक भारतीय किसान यूनियन नाम अनेक अलग किसान संगठनों द्वारा प्रयुक्त हो रहा था।

और अलग-अलग राज्यों की ऐतिहासिक BKU इकाइयां।

इसलिए 2022–26 में “BKU ने कहा” लिखते समय यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किस BKU की बात हो रही है।

इस शोध में जहां केवल “BKU” कहा गया है, वहां संदर्भ मुख्यतः नरेश–राकेश टिकैत वाली भारतीय किसान यूनियन का है।

13 कानून वापसी के बाद BKU फिर स्थानीय मुद्दों पर लौटी

2020–21 में राष्ट्रीय कृषि कानून आंदोलन BKU का मुख्य मंच था।

उसके समाप्त होने के बाद संगठन फिर अपने पारंपरिक मुद्दों पर लौट आया—

यही महेंद्र सिंह टिकैत के आंदोलन का मूल क्षेत्रीय आधार था।

राष्ट्रीय आंदोलन के बाद संगठन को गांव में फिर उसी किसान की रोजमर्रा की समस्या से जुड़ना था।

14 2023 : मुजफ्फरनगर का लंबा धरना

जनवरी 2023 में BKU ने मुजफ्फरनगर में अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया।

किसान संगठन ने खराब मौसम के बावजूद धरना जारी रखा।

इस आंदोलन का महत्व यह था कि उसने एक बार फिर महेंद्र सिंह टिकैत की पुरानी लंबा-पड़ाव रणनीति को अपनाया।

15 गन्ना : चार दशक बाद भी वही केंद्रीय प्रश्न

1988 में गन्ना टिकैत आंदोलन का केंद्रीय मुद्दा था।

यही पश्चिमी उत्तर प्रदेश की किसान राजनीति की असाधारण निरंतरता है।

यानी कृषि राजनीति में वैश्वीकरण, WTO और डिजिटल खेती जैसे नए मुद्दे जुड़ गए, लेकिन गन्ने का पुराना सवाल समाप्त नहीं हुआ।

16 2023 लखनऊ किसान महापंचायत

सितंबर 2023 में लखनऊ की किसान महापंचायत में राकेश टिकैत ने किसानों से बड़े आंदोलन के लिए तैयार रहने की अपील की।

यहां टिकैत की राजनीतिक भाषा में एक नया सूत्र विशेष रूप से प्रमुख हुआ—

यह पुराने किसान आर्थिक आंदोलन को भूमि, सामाजिक पहचान और भविष्य की पीढ़ी से जोड़ने वाला अधिक व्यापक राजनीतिक रूपक था।

17 मुफ्त बिजली बनाम मीटर का विवाद

उत्तर प्रदेश की किसान राजनीति में बिजली फिर केंद्रीय प्रश्न बनी।

कृषि नलकूपों को बिजली राहत या मुफ्त बिजली की घोषणा और दूसरी ओर मीटरिंग/स्मार्ट मीटर की प्रक्रिया ने किसान संगठनों में शंका पैदा की।

यदि सरकार मुफ्त कृषि बिजली का वादा करती है तो फिर मीटर लगाने का उद्देश्य क्या है?

2023 की लखनऊ पंचायत में राकेश टिकैत ने इसी विरोधाभास पर प्रश्न उठाया।

यह लगभग वही विवाद था जो महेंद्र सिंह टिकैत के समय फ्लैट रेट और मीटर व्यवस्था के प्रश्न में दिखाई देता था।

18 भूमि अधिग्रहण फिर राष्ट्रीय किसान प्रश्न

दिल्ली–एनसीआर के फैलाव, एक्सप्रेसवे, औद्योगिक गलियारों, हवाई अड्डों और शहरी विकास परियोजनाओं ने भूमि अधिग्रहण को BKU के लिए तेजी से महत्वपूर्ण बनाया।

यह मुद्दा विशेष रूप से नोएडा–ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में तीखा रहा।

19 नोएडा–ग्रेटर नोएडा : नया किसान भूगोल

महेंद्र सिंह टिकैत का मुख्य क्षेत्र गन्ना पट्टी था।

इक्कीसवीं सदी में BKU को एक नए किसान भूगोल का सामना करना पड़ा—

नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र में अलग-अलग किसान संगठनों ने लगातार आंदोलन किए।

2025 में भी BKU टिकैत सहित विभिन्न किसान संगठनों ने उच्च मुआवजा, विकसित भूखंड और पुनर्वास से संबंधित मांगों पर अलग-अलग प्रदर्शन घोषित किए।

इससे BKU के एजेंडे में “खेती बचाओ” के साथ “भूमि अधिकार” नया महत्व प्राप्त करता है।

20 2024 : किसान राजनीति फिर दो धाराओं में

फरवरी 2024 में किसान आंदोलन फिर राष्ट्रीय समाचार बना।

लेकिन यहां एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्यात्मक फर्क रखना जरूरी है।

13 फरवरी 2024 से शंभू और खनौरी सीमाओं पर शुरू हुआ “दिल्ली चलो” आंदोलन 2020–21 वाले मूल संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा नहीं, बल्कि मुख्यतः—

संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक)

राकेश टिकैत वाली BKU और मूल SKM इस आंदोलन की प्रत्यक्ष आयोजक नहीं थीं। जनवरी 2025 की किसान एकता बैठकों के विवरण भी इस संगठनात्मक अंतर को स्पष्ट करते हैं।

यह फर्क इतिहास में बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।

21 मांग फिर वही : MSP कानून

शंभू–खनौरी आंदोलन की सबसे प्रमुख मांग भी MSP की कानूनी गारंटी थी।

किसान आंदोलन अलग-अलग संगठनों में बंटा था।

लेकिन उनका सबसे बड़ा आर्थिक मुद्दा लगभग समान था।

22 राकेश टिकैत और शंभू आंदोलन

राकेश टिकैत ने MSP और किसान मुद्दों पर समर्थन व्यक्त किया, लेकिन मूल SKM और शंभू–खनौरी नेतृत्व के बीच रणनीतिक मतभेद बने रहे।

जनवरी 2025 में टिकैत ने यहां तक कहा कि अलग-अलग आंदोलन चलने से केंद्र सरकार को लाभ मिल सकता है और किसान संगठनों को एक होना चाहिए।

यानी 2024–25 तक किसान राजनीति की सबसे बड़ी कमजोरी स्वयं किसान संगठनों का विभाजन बन चुकी थी।

23 मार्च 2024 : दिल्ली के रामलीला मैदान में SKM

14 मार्च 2024 को मूल संयुक्त किसान मोर्चा ने दिल्ली के रामलीला मैदान में किसान मजदूर महापंचायत आयोजित की।

देश के अनेक हिस्सों से किसान पहुंचे।

और स्वामीनाथन आयोग के आधार पर लाभकारी मूल्य।

इससे स्पष्ट था कि मूल SKM भी निष्क्रिय नहीं था।

उसकी रणनीति शंभू सीमा के आंदोलन से अलग थी।

24 गैर-दलीयता फिर विवाद में

रामलीला मैदान की महापंचायत में SKM ने केंद्र की भाजपा सरकार के विरुद्ध देशव्यापी राजनीतिक अभियान का आह्वान किया।

यही वह बिंदु है जहां BKU की पुरानी गैर-दलीयता फिर प्रश्न के घेरे में आती है।

जो सरकार किसान मांग नहीं मानती, उसे चुनाव में राजनीतिक कीमत चुकानी चाहिए।

यह सीधे दलगत राजनीति में हस्तक्षेप है।

महेंद्र सिंह टिकैत के समय का वही पुराना द्वंद्व 2024 में फिर सामने था।

25 2024 लोकसभा चुनाव और किसान आंदोलन

यह कहना कठिन होगा कि किसान आंदोलन ने किसी एक दल के चुनाव परिणाम को निर्णायक रूप से कितना प्रभावित किया, क्योंकि मतदाता एक साथ जाति, धर्म, स्थानीय उम्मीदवार, राष्ट्रीय नेतृत्व और आर्थिक प्रश्नों से प्रभावित होता है।

लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा में कृषि मुद्दे निश्चित रूप से चुनावी विमर्श का हिस्सा रहे।

आंदोलनकारी किसान पहचान चुनावी राजनीतिक व्यवहार को प्रभावित कर सकती है, लेकिन उसे पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकती।

26 सितंबर 2024 : हापुड़ का गन्ना और बिजली आंदोलन

2024 में हापुड़ में BKU टिकैत कार्यकर्ताओं ने गन्ना किसानों के बकाया भुगतान और कृषि नलकूप बिजली बिलों से जुड़े विवाद पर अनिश्चितकालीन धरना चलाया।

रिपोर्ट के अनुसार किसानों की प्रमुख मांगों में गन्ना भुगतान ब्याज सहित दिलाना और जमा किए गए नलकूप बिलों के बावजूद बकाया दिखाने की शिकायत शामिल थी।

2024 का राष्ट्रीय किसान विमर्श MSP पर था।

यही राष्ट्रीय और क्षेत्रीय किसान राजनीति का अंतर है।

27 2024 के बाद MSP पर सरकारी नीति

सरकार ने MSP व्यवस्था जारी रखी और अलग-अलग फसलों के घोषित मूल्य बढ़ाए।

2024 के बाद PM-AASHA योजना को भी जारी और पुनर्गठित किया गया, जिसमें दलहन, तिलहन और नारियल के लिए मूल्य समर्थन खरीद को मजबूत करने की व्यवस्था शामिल थी।

2026 तक सरकार का आधिकारिक दृष्टिकोण यही रहा कि 22 अधिदेशित फसलों के MSP उत्पादन लागत के ऊपर कम-से-कम 50 प्रतिशत प्रतिफल सिद्धांत के आधार पर घोषित किए जा रहे हैं।

लेकिन कानूनी MSP गारंटी की किसान मांग अलग प्रश्न बनी रही।

28 सरकार और किसान के MSP सूत्र में मूल अंतर

यहां एक तकनीकी लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण अंतर है।

सरकारी “लागत + 50 प्रतिशत” और किसान संगठनों द्वारा मांगे जाने वाले C2 + 50 प्रतिशत को एक ही चीज समझना सही नहीं है।

30 2025 : किसान संगठनों को फिर एक करने का प्रयास

दूसरी तरफ SKM (गैर-राजनीतिक) और किसान मजदूर मोर्चा।

अध्याय 19

उपलब्धियां और सीमाएं

महेंद्र सिंह टिकैत और भारतीय किसान यूनियन का ऐतिहासिक मूल्यांकन दो अतियों से बचकर करना चाहिए। पहली अति उन्हें स्वतंत्र भारत के किसानों का लगभग निर्विवाद प्रतिनिधि मान लेने की है; दूसरी उन्हें केवल पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अपेक्षाकृत संपन्न जाट किसानों का नेता मानकर उनके व्यापक प्रभाव को खारिज कर देने की। दोनों दृष्टियां अधूरी हैं।

टिकैत का आंदोलन भारतीय किसान राजनीति में वास्तविक परिवर्तन लेकर आया। उसने किसान को चुनावी दलों की परिधि से बाहर स्वतंत्र दबाव-समूह के रूप में खड़ा किया, बिजली और गन्ने जैसे दिखने में स्थानीय प्रश्नों को कृषि लागत और किसान आय के राष्ट्रीय विमर्श से जोड़ा, महापंचायत और लंबे धरने को आधुनिक किसान आंदोलन की प्रभावशाली तकनीक बनाया और 1988 के बोट क्लब आंदोलन के माध्यम से राष्ट्रीय सत्ता को यह दिखाया कि संगठित किसान राजधानी के राजनीतिक कार्यक्रम तक बदलवा सकता है।

लेकिन उसी आंदोलन में स्पष्ट सीमाएं भी थीं। उसका मुख्य सामाजिक आधार भूमि रखने वाला कृषक था। भूमिहीन कृषि मजदूर, दलित ग्रामीण गरीब और महिला किसान के स्वतंत्र अधिकार अपेक्षाकृत पीछे रहे। जाट सामाजिक आधार और खाप नेटवर्क ने संगठन को शक्ति दी, पर उसी ने सामाजिक प्रतिनिधित्व की सीमाएं भी पैदा कीं। गैर-दलीयता संगठन की सबसे बड़ी पूंजी बनी, लेकिन वह चुनावी राजनीति से बार-बार समझौता भी करती रही। और महेंद्र सिंह टिकैत की असाधारण व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को उतनी ही मजबूत लोकतांत्रिक संस्था में पूरी तरह नहीं बदला जा सका।

इसीलिए टिकैत मॉडल का मूल्यांकन उपलब्धि और सीमा—दोनों को साथ रखकर ही किया जा सकता है।

1 पहली बड़ी उपलब्धि : किसान को स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति बनाना

टिकैत की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह थी कि उन्होंने किसान से कहा—

राजनीतिक दल आपका प्रतिनिधित्व कर सकते हैं, लेकिन किसान को अपनी स्वतंत्र संगठनात्मक शक्ति भी चाहिए।

यह सोच नई नहीं थी, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में BKU ने इसे असाधारण पैमाने पर व्यवहार में उतारा।

लेकिन बिजली और गन्ने के प्रश्न पर उसे किसान के रूप में खड़ा होना था।

यही किसान की राजनीतिक स्वायत्तता टिकैत आंदोलन की केंद्रीय देन थी।

2 वोट से आगे किसान की शक्ति

चौधरी चरण सिंह की राजनीति ने किसान को वोट की शक्ति दिखाई थी।

टिकैत ने उसे बताया कि लोकतंत्र में शक्ति केवल मतदान दिवस पर नहीं होती।

इस अर्थ में BKU ने लोकतांत्रिक राजनीति में चुनावों के बीच की किसान नागरिकता को मजबूत किया।

किसान पांच वर्ष में एक बार मतदाता नहीं, निरंतर दबाव डालने वाला संगठित नागरिक भी हो सकता है।

3 दूसरी उपलब्धि : कृषि राजनीति का एजेंडा बदलना

भारतीय किसान आंदोलनों का पुराना केंद्रीय प्रश्न था—

टिकैत जिस दौर में उभरे, उसमें प्रश्न बदल चुका था।

टिकैत ने इस परिवर्तन को राष्ट्रीय राजनीतिक भाषा दी।

इसीलिए उन्हें भारत के “नए किसान आंदोलन” की प्रमुख धाराओं में रखा जाता है।

4 गन्ने को राष्ट्रीय किसान राजनीति का विषय बनाना

गन्ना पश्चिमी उत्तर प्रदेश की क्षेत्रीय फसल थी, लेकिन टिकैत ने उसके माध्यम से एक राष्ट्रीय प्रश्न उठाया—

क्या किसान को उसकी उत्पादन लागत और जोखिम के अनुरूप मूल्य मिलता है?

गन्ना मूल्य की मांग केवल रुपये प्रति क्विंटल का विवाद नहीं थी।

उत्पादक और खरीदार के बीच शक्ति किसकी है?

इसी कारण गन्ना पश्चिमी उत्तर प्रदेश की स्थायी राजनीतिक फसल बन गया।

महेंद्र सिंह टिकैत के चार दशक बाद भी BKU के आंदोलन में उसका केंद्रीय स्थान इस उपलब्धि की स्थायित्व का प्रमाण है।

5 बिजली को कृषि उत्पादन का राजनीतिक प्रश्न बनाना

करमूखेड़ी आंदोलन से टिकैत ने जिस प्रश्न को उठाया, उसका प्रभाव बहुत दूर तक गया।

सिंचाई से गन्ना और गेहूं पैदा होता था।

अर्थात बिजली का मूल्य सीधे कृषि लागत था।

टिकैत ने इस सरल संबंध को किसान राजनीति का शक्तिशाली नारा बनाया।

बाद के दशकों में मुफ्त या रियायती कृषि बिजली भारतीय राज्यों की चुनावी राजनीति का स्थायी प्रश्न बन गई।

यह केवल BKU की देन नहीं थी, लेकिन उसे राष्ट्रीय दबाव प्रश्न बनाने में टिकैत की भूमिका महत्वपूर्ण थी।

6 किसान लागत की भाषा

टिकैत किसी विश्वविद्यालय के कृषि अर्थशास्त्री नहीं थे।

फिर भी उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक प्रतिभा यह थी कि उन्होंने जटिल आर्थिक प्रश्न को किसान के घरेलू खाते में बदल दिया।

इस कारण उनका आंदोलन तकनीकी भाषा से मुक्त और व्यापक रूप से समझने योग्य बना।

किसान को “टर्म्स ऑफ ट्रेड” समझने की आवश्यकता नहीं थी।

खर्च तेजी से बढ़ रहा है, फसल का भाव उतना नहीं।

7 तीसरी उपलब्धि : किसान स्वाभिमान

टिकैत की राजनीति केवल आर्थिक नहीं थी।

उसमें किसान सम्मान का प्रश्न लगातार मौजूद रहा।

किसान दया मांगने वाला व्यक्ति नहीं।

इसलिए उसे सरकारी अधिकारी के सामने अपमानित होकर खड़ा नहीं होना चाहिए।

यही “किसान स्वाभिमान” आंदोलन की भावनात्मक शक्ति बना।

8 किसान को याचक से सौदेबाज बनाना

पुरानी सरकारी भाषा में किसान कई बार लाभार्थी के रूप में प्रस्तुत होता है—

हम सहायता नहीं, हिसाब मांग रहे हैं।

यदि हमारी फसल का मूल्य नियंत्रित है तो हमारी लागत का भी हिसाब होना चाहिए।

यहीं किसान सरकारी सहायता का निष्क्रिय प्राप्तकर्ता नहीं बल्कि राज्य से सौदेबाजी करने वाला उत्पादक वर्ग बनता है।

9 चौथी उपलब्धि : पंचायत का आधुनिक राजनीतिक रूपांतरण

महेंद्र सिंह टिकैत की सबसे मौलिक संगठनात्मक उपलब्धियों में से एक पंचायत का पुनर्प्रयोग था।

पंचायत पहले से ग्रामीण समाज में थी।

पर सामूहिक निर्णय की राजनीतिक संस्था बनाया।

इससे बिना विशाल पार्टी नौकरशाही के बड़ी संख्या में किसान संगठित किए जा सके।

10 महापंचायत की शक्ति

किसी आंदोलन के लिए दूसरा काम पहले से कम महत्वपूर्ण नहीं है।

जब किसान हजारों दूसरे किसानों को अपने जैसे प्रश्न पर उपस्थित देखता है, तो उसकी व्यक्तिगत शिकायत सामूहिक राजनीतिक प्रश्न बन जाती है।

11 पांचवीं उपलब्धि : लंबे धरने की नई तकनीक

मेरठ और दिल्ली के आंदोलनों में BKU ने लंबे किसान पड़ाव को अत्यंत प्रभावी राजनीतिक हथियार बनाया।

गांव की पूरी सामाजिक दुनिया आंदोलन स्थल पर आ गई।

इस मॉडल का दीर्घकालीन प्रभाव 2020–21 के किसान आंदोलन तक स्पष्ट दिखाई देता है।

12 आंदोलन की आत्मनिर्भरता

BKU की आंदोलन-पद्धति ने वित्तीय निर्भरता कम की।

इससे आंदोलन को चलाने के लिए किसी बड़े केंद्रीय धनदाता की अनिवार्य आवश्यकता कम हुई।

यह किसान संगठन की असाधारण संरचनात्मक शक्ति थी।

13 छठी उपलब्धि : ट्रैक्टर को राजनीतिक प्रतीक बनाना

हरित क्रांति ने ट्रैक्टर को खेत में पहुंचाया।

ट्रैक्टर किसान की उत्पादन शक्ति का प्रतीक था।

बाद में किसान आंदोलनों में ट्रैक्टर मार्च एक नियमित राजनीतिक उपकरण बन गया।

इस अर्थ में आधुनिक कृषि तकनीक को जनांदोलन की तकनीक में बदल देना टिकैत मॉडल की स्थायी विरासत है।

14 सातवीं उपलब्धि : गैर-दलीय किसान मंच

1987–88 के उत्कर्ष में BKU की गैर-दलीयता वास्तविक राजनीतिक शक्ति थी।

मेरठ में चुनावी नेताओं को मंच पर कब्जा नहीं करने देना।

सरकार किसी की भी हो, किसान प्रश्न पर विरोध करना।

इनसे संगठन विभिन्न राजनीतिक झुकाव वाले किसानों को जोड़ सका।

यह जाट–मुस्लिम तथा विभिन्न कृषक जातियों की एकता के लिए भी उपयोगी था।

15 आठवीं उपलब्धि : हिंदू–मुस्लिम किसान एकता

टिकैत के शुरुआती दौर की सबसे उल्लेखनीय सामाजिक उपलब्धियों में यह शामिल है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट और मुस्लिम किसान एक ही गन्ना अर्थव्यवस्था का हिस्सा थे।

BKU ने इस आर्थिक संबंध को राजनीतिक किसान पहचान में बदलने की कोशिश की।

मेरठ की पंचायतों और बाद के आंदोलनों में मुस्लिम किसान भागीदारी महत्वपूर्ण रही।

2020–21 में इसी पुरानी स्मृति का उपयोग जाट–मुस्लिम पुनर्संपर्क के लिए किया गया।

यह विरासत आज भी टिकैत नाम की सामाजिक पूंजी है।

16 नौवीं उपलब्धि : क्षेत्रीय प्रश्न से राष्ट्रीय किसान विमर्श

टिकैत पश्चिमी उत्तर प्रदेश से निकले।

लेकिन उनके आंदोलन ने राष्ट्रीय बहस खड़ी की।

शरद जोशी और नंजुंडास्वामी जैसे अन्य नए किसान नेताओं के साथ टिकैत ने किसान राजनीति को नया वैचारिक स्थान दिया।

17 दसवीं उपलब्धि : आंदोलन संस्कृति की दीर्घकालीन विरासत

महेंद्र सिंह टिकैत का सबसे स्थायी प्रभाव संभवतः किसी एक सरकारी रियायत में नहीं है।

वह भारतीय किसान आंदोलन की संस्कृति में है।

राजनीतिक दलों से औपचारिक दूरी का दावा।

2020–21 में ये सारे तत्व फिर दिखाई दिए।

यानी व्यक्ति की मृत्यु के बाद भी आंदोलन पद्धति जीवित रही।

टिकैत मॉडल की सीमाएं

इतिहास में महत्वपूर्ण नेतृत्व का मूल्यांकन केवल उसकी सफलताओं से नहीं किया जा सकता। कई सीमाएं उसी सामाजिक संरचना से पैदा होती हैं जिसने आंदोलन को शक्ति दी।

18 पहली सीमा : ‘किसान’ कौन?

BKU की सबसे मूल सीमा उसके किसान की परिभाषा में थी।

जो बिजली, खाद और सिंचाई की लागत उठाता है।

लेकिन ग्रामीण समाज में केवल ऐसे किसान नहीं रहते।

इसलिए BKU की किसान पहचान व्यापक होते हुए भी पूरे ग्रामीण समाज का समान प्रतिनिधित्व नहीं करती थी।

19 भूमिहीन मजदूर का प्रश्न

भूमिहीन मजदूर की प्राथमिक मांग हो सकती है—

लेकिन भूमि-स्वामी किसान की चिंता हो सकती है कि मजदूरी बढ़ने से लागत बढ़ेगी।

यानी किसान और मजदूर के हित हर समय समान नहीं हैं।

BKU इस अंतर्विरोध को पूरी तरह हल नहीं कर सकी।

यही कारण है कि पुराने वामपंथी किसान आंदोलनों और टिकैत के नए किसान आंदोलन में स्पष्ट वर्गीय अंतर दिखाई देता है।

20 दूसरी सीमा : मध्यम और संपन्न किसानों का प्रभाव

BKU के नेतृत्व और आंदोलन संसाधनों में मध्यम और अपेक्षाकृत संपन्न किसानों की भूमिका महत्वपूर्ण थी।

नलकूप वाला किसान सस्ती बिजली से अधिक लाभ ले सकता था।

अधिक गन्ना पैदा करने वाला किसान मूल्य वृद्धि से अधिक लाभ पा सकता था।

ट्रैक्टर वाला किसान आंदोलन में अधिक आसानी से पहुंच सकता था।

इसलिए आलोचकों ने इसे “समृद्ध किसान आंदोलन” कहा।

लेकिन छोटे कृषक को भी बिजली, गन्ना मूल्य और ऋण से वास्तविक लाभ मिलता था।

BKU भूमि-स्वामी कृषकों का व्यापक गठबंधन थी, जिसके भीतर आर्थिक लाभ समान नहीं था।

21 तीसरी सीमा : भूमि पुनर्वितरण का कमजोर प्रश्न

तेभागा, तेलंगाना या भूमि संघर्षों में केंद्रीय प्रश्न था—

क्योंकि उसका मुख्य आधार पहले से भूमि रखने वाला कृषक था।

इसलिए भूमि सुधार, भूमिहीनता और पुनर्वितरण उसके कार्यक्रम का केंद्रीय हिस्सा नहीं बने।

यह उसे गरीब और भूमिहीन ग्रामीणों की राजनीति से सीमित करता है।

22 चौथी सीमा : दलित प्रश्न

BKU की “किसान एकता” जाति से ऊपर जाने की कोशिश थी।

लेकिन गांव की जातिगत असमानता समाप्त नहीं हुई।

ये BKU की मूल राजनीति के केंद्र में नहीं थे।

2008 में महेंद्र सिंह टिकैत पर तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के लिए जातिसूचक टिप्पणी का आरोप और उसके बाद उनकी गिरफ्तारी ने इस सामाजिक सीमा को विशेष रूप से उजागर किया।

यह घटना याद दिलाती है कि किसान स्वाभिमान और सामाजिक समानता स्वतः एक ही परियोजना नहीं हैं।

23 पांचवीं सीमा : महिला किसान का अधूरा प्रतिनिधित्व

महिलाओं ने BKU आंदोलन को टिकाने में बड़ी भूमिका निभाई।

लेकिन शीर्ष नेतृत्व लगभग पूर्णतः पुरुष रहा।

ये प्रश्न मुख्य एजेंडे में पर्याप्त स्थान नहीं पा सके।

इसलिए टिकैत आंदोलन ने महिला सहभागिता बढ़ाई, लेकिन महिला किसान की पूर्ण राजनीतिक समानता स्थापित नहीं की।

24 छठी सीमा : खाप निर्भरता

खाप नेटवर्क ने BKU को असाधारण संगठनात्मक गति दी।

लेकिन खाप सामाजिक रूप से जाति और पितृसत्ता से जुड़ी संस्था थी।

इसलिए उसके आधार पर खड़ा किसान संगठन व्यापक लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की सीमाओं से मुक्त नहीं हो सकता था।

खाप की संगठनात्मक शक्ति का उपयोग करते हुए जाति आधारित संरचना से ऊपर उठना टिकैत मॉडल की स्थायी कठिनाई रही।

25 खाप और आधुनिक लोकतंत्र का तनाव

खाप का सामुदायिक निर्णय हमेशा आधुनिक व्यक्तिगत अधिकार आधारित लोकतंत्र के समान नहीं होता।

जैसे मामलों पर खापों की भूमिका लंबे समय से विवादित रही है।

BKU ने इन्हीं सामाजिक नेटवर्क का उपयोग आर्थिक किसान राजनीति में किया।

इसलिए संगठन को खाप से मिली क्षमता और उसके सामाजिक विवाद—दोनों का उत्तराधिकार मिला।

26 सातवीं सीमा : हिंदू–मुस्लिम एकता स्थायी नहीं रही

1980 के दशक की किसान एकता BKU की उपलब्धि थी।

लेकिन 2013 का मुजफ्फरनगर संकट उसकी सीमा का सबसे कठोर प्रमाण बना।

यदि किसान पहचान धार्मिक ध्रुवीकरण को रोकने में स्थायी रूप से सक्षम होती, तो पुराना जाट–मुस्लिम गठबंधन इतनी गंभीरता से नहीं टूटता।

अकादमिक आलोचनाओं ने BKU और खाप राजनीति के कुछ हिस्सों की भूमिका पर भी प्रश्न उठाए।

इसलिए 2013 को केवल “बाहरी राजनीति ने किसान एकता तोड़ दी” कहकर संगठन को पूरी तरह जिम्मेदारी से मुक्त करना उचित नहीं होगा।

उसकी अपनी सामाजिक और राजनीतिक कमजोरियां भी थीं।

27 आठवीं सीमा : गैर-दलीयता का अंतर्विरोध

BKU की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत ही समय के साथ उसकी सबसे बड़ी समस्या बनी।

इस इतिहास से स्पष्ट है कि गैर-दलीयता एक स्थिर अवस्था नहीं रही।

जब किसान संगठन सरकार को चुनाव में दंडित करने की अपील करता है, तो वह स्वयं चुनावी राजनीति के करीब पहुंचता है।

28 क्या गैर-दलीयता संभव ही नहीं?

हर सरकार से समान मुद्दा आधारित व्यवहार करे।

लेकिन यदि सरकार किसान की मांग नहीं मानती, तो संगठन स्वाभाविक रूप से उसके चुनावी विरोध की ओर जा सकता है।

यहीं सिद्धांत और व्यवहार का तनाव है।

टिकैत आंदोलन इस तनाव का समाधान स्थायी रूप से नहीं खोज सका।

29 नौवीं सीमा : करिश्माई नेतृत्व पर निर्भरता

महेंद्र सिंह टिकैत की व्यक्तिगत लोकप्रियता BKU की सबसे बड़ी शक्ति थी।

लेकिन संस्था की दृष्टि से यही समस्या भी थी।

निर्णय अक्सर उनकी प्रतिष्ठा से वैध होते थे।

लेकिन जब 2011 में वे नहीं रहे तो प्रश्न उठा—

नियमित आंतरिक लोकतंत्र कितना मजबूत है?

इसके बाद हुए विभाजन इसी कमजोरी के संकेत हैं।

30 पारिवारिक उत्तराधिकार

महेंद्र सिंह टिकैत के बाद नरेश और राकेश टिकैत की केंद्रीय भूमिका ने संगठन को निरंतरता दी।

क्या किसान संगठन का नेतृत्व परिवार में उत्तराधिकार से चले?

समर्थक इसे सामाजिक विश्वसनीयता और परंपरा मानते हैं।

व्यावहारिक रूप से टिकैत नाम ने संगठन को बचाने में मदद की।

लेकिन मजबूत संस्था के लिए नेतृत्व का व्यापक लोकतांत्रिक संस्थानीकरण अधिक आवश्यक होता।

31 दसवीं सीमा : वैकल्पिक कृषि नीति की कमी

लेकिन उनका संगठन हमेशा उतना मजबूत नीति-निर्माण संस्थान नहीं बन सका।

छोटे और बड़े किसान में फर्क कैसे हो?

उपभोक्ता को खाद्य मुद्रास्फीति से कैसे बचाया जाए?

BKU इन प्रश्नों पर एक विस्तृत वैकल्पिक राष्ट्रीय कृषि मॉडल विकसित नहीं कर सकी।

32 बिजली आंदोलन की पर्यावरणीय सीमा

सस्ती बिजली किसान के लिए महत्वपूर्ण थी।

लेकिन लंबे समय में अत्यधिक सस्ती या फ्लैट दर वाली बिजली भूजल के अति-दोहन को प्रोत्साहित कर सकती है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश सहित उत्तर भारत में भूजल संकट बाद में गंभीर हुआ।

इसलिए आज 1987 की मांग को 2026 की पर्यावरणीय परिस्थितियों में जस का तस लागू नहीं किया जा सकता।

आधुनिक किसान आंदोलन को अब दो प्रश्न साथ लेने होंगे—

टिकैत के मूल आंदोलन में दूसरा प्रश्न अपेक्षाकृत कमजोर था।

33 गन्ना राजनीति की फसल-विविधता सीमा

गन्ने का अच्छा मूल्य पश्चिमी उत्तर प्रदेश किसान के लिए लाभकारी है।

BKU की गन्ना राजनीति किसान हित में थी, लेकिन कृषि पारिस्थितिकी और दीर्घकालीन फसल संतुलन उसका प्रमुख विमर्श नहीं बना।

34 कृषि मजदूरी और लागत के बीच तनाव

जब BKU “कृषि लागत” कम करने की बात करती थी, उसमें मजदूरी भी लागत हो सकती थी।

इसलिए किसान और कृषि मजदूर के बीच संभावित अंतर्विरोध को केवल “ग्रामीण एकता” में छिपाना उचित नहीं।

वास्तव में व्यापक किसान–मजदूर गठबंधन के लिए ऐसी नीति चाहिए जिसमें—

इसके लिए केवल लागत कम करने का सूत्र पर्याप्त नहीं है।

35 आंदोलन की लोकतांत्रिक उपलब्धि

इन सीमाओं के बावजूद टिकैत मॉडल को राज्य-विरोधी अराजकता के रूप में देखना भी गलत होगा।

40 सबसे बड़ी ऐतिहासिक सीमा

यही टिकैत मॉडल की केंद्रीय विडंबना है।

अध्याय 20

इतिहासलेखन, विस्तृत समयरेखा और प्रमुख स्रोत

भारतीय किसान यूनियन और महेंद्र सिंह टिकैत का इतिहास केवल कुछ विशाल किसान रैलियों की कहानी नहीं है। यह स्वतंत्र भारत में किसान राजनीति के उस संक्रमण का इतिहास है जिसमें भूमि और लगान के पुराने प्रश्नों के साथ कृषि मूल्य, बिजली, सिंचाई, ऋण, गन्ना भुगतान, बाजार, वैश्वीकरण, भूमि अधिग्रहण और न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसे नए प्रश्न केंद्र में आए।

इस इतिहास की दूसरी विशेषता यह है कि इसका बड़ा हिस्सा अभी भी पूरी तरह सुव्यवस्थित अभिलेखीय रूप में उपलब्ध नहीं है। BKU की कई गतिविधियां औपचारिक पार्टी कार्यालय के बजाय पंचायत, मौखिक घोषणा और स्थानीय किसान नेटवर्क के माध्यम से चलती थीं। इसलिए संगठन की अपनी स्मृति, समाचार-पत्रों की समकालीन रिपोर्टिंग और बाद के अकादमिक अध्ययनों को एक-दूसरे से मिलाकर पढ़ना आवश्यक है।

यह सावधानी खास तौर पर 1986–88 के आरंभिक इतिहास में जरूरी है। BKU की वर्तमान आधिकारिक वेबसाइट संगठन को 1986 में सिसौली में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में पुनर्गठित बताती है, जबकि एक दूसरी आधिकारिक/संगठनात्मक वेबसाइट इसे 1987 में स्थापित संगठन कहती है। अकादमिक अध्ययन Gaurang Sahay इसे 1986 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में स्थापित BKU के रूप में प्रस्तुत करते हैं और साथ ही यह बताते हैं कि इससे पहले 1980 में राष्ट्रीय स्तर पर इसी नाम या निकट नाम से किसान संगठन बनाने के प्रयास हो चुके थे। इसलिए 1986–87 को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में टिकैत-नेतृत्व वाली BKU के निर्णायक पुनर्गठन और सार्वजनिक उदय का दौर मानना सबसे सुरक्षित ऐतिहासिक निष्कर्ष है।

इसी तरह 1988 के दिल्ली बोट क्लब आंदोलन के बारे में संगठनात्मक इतिहास अक्सर यह कहता है कि राजीव गांधी सरकार को सभी 35 मांगें माननी पड़ीं, जबकि समकालीन और बाद की पत्रकारिता बताती है कि तत्काल कोई व्यापक औपचारिक समझौता नहीं हुआ था; किसानों को कुछ रियायतों के आश्वासन के बाद आंदोलन समाप्त किया गया और अगले वर्ष उत्तर प्रदेश सरकार के साथ समझौते में कई मांगों पर रियायतें मिलीं। इसलिए किसी भी गंभीर इतिहासलेखन को आंदोलन-स्मृति और प्रशासनिक परिणाम के बीच यह अंतर बनाए रखना चाहिए।

1 भारतीय किसान यूनियन के इतिहासलेखन की पहली धारा : किसान स्वाभिमान और जनशक्ति

BKU के अपने संगठनात्मक इतिहास और उसके समर्थक वृत्तांत महेंद्र सिंह टिकैत को स्वतंत्र भारत के किसान स्वाभिमान के सबसे बड़े प्रतिनिधियों में रखते हैं।

इस दृष्टिकोण में टिकैत की प्रमुख उपलब्धियां हैं—

किसान को दलगत राजनीति से स्वतंत्र करना।

बिजली और गन्ने के मूल्य को राष्ट्रीय प्रश्न बनाना।

पंचायत और महापंचायत को किसान लोकतंत्र का माध्यम बनाना।

और राज्य के सामने किसान की संख्या तथा नैतिक शक्ति स्थापित करना।

BKU की वर्तमान आधिकारिक वेबसाइट टिकैत को उस नेता के रूप में प्रस्तुत करती है जिसने 1986–87 में सिसौली से संगठन को पुनर्गठित किया, मेरठ तथा दिल्ली के विशाल आंदोलनों का नेतृत्व किया और गैर-दलीय ग्रामीण किसान संगठन की पहचान बनाई।

यह परंपरा संगठन की आंतरिक ऐतिहासिक स्मृति समझने के लिए अत्यंत उपयोगी है।

लेकिन इसे स्वतंत्र स्रोतों के साथ पढ़ना चाहिए।

क्योंकि आंदोलनकारी संगठन स्वाभाविक रूप से अपनी सफलताओं पर अधिक जोर देते और असफलताओं, सामाजिक अंतर्विरोधों तथा आंतरिक विवादों को कम महत्व दे सकते हैं।

2 दूसरी धारा : ‘नए किसान आंदोलन’ का राजनीतिक अर्थशास्त्र

1980 के दशक में ही सामाजिक वैज्ञानिकों ने BKU को पुराने भूमि-सुधार आधारित किसान आंदोलनों से अलग नई कृषक राजनीति के हिस्से के रूप में देखना शुरू कर दिया।

Dipankar Gupta का 1988 का महत्वपूर्ण लेख “Country–Town Nexus and Agrarian Mobilisation: Bharatiya Kisan Union as an Instance” इस नई व्याख्या की आधारभूत रचनाओं में है। बाद के अकादमिक साहित्य में इसे BKU को ग्रामीण–शहरी आर्थिक संबंध और नए कृषक असंतोष के संदर्भ में समझने वाले प्रारंभिक मानक अध्ययन के रूप में उद्धृत किया गया है।

इस दृष्टिकोण में BKU का प्रश्न भूमि पर कब्जा नहीं था।

कृषि और उद्योग के बीच विनिमय की शर्तें क्या हैं?

किसान अपनी उपज किस मूल्य पर बेचता है?

और वह औद्योगिक वस्तुएं, खाद, मशीनरी तथा ऊर्जा किस मूल्य पर खरीदता है?

यही वह परिवर्तन था जिसने टिकैत, शरद जोशी और नंजुंडास्वामी जैसे नेताओं को “नए किसान आंदोलन” की साझा लेकिन वैचारिक रूप से विविध धारा में रखा।

3 तीसरी धारा : ग्रामीण–शहरी संबंध और ‘नया कृषिवाद’

Jim Bentall और Stuart Corbridge का 1996 का अध्ययन “Urban-Rural Relations, Demand Politics and the ‘New Agrarianism’ in Northwest India: The Bharatiya Kisan Union” BKU के इतिहासलेखन में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

यह Transactions of the Institute of British Geographers में प्रकाशित हुआ और इसने BKU को उत्तर-पश्चिम भारत के ग्रामीण–शहरी संबंधों तथा “demand politics” के संदर्भ में समझा।

इस दृष्टिकोण का महत्व यह है कि वह BKU को केवल जाट किसान संगठन के रूप में नहीं देखता।

क्यों ग्रामीण उत्पादक को लगता है कि राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था में शहर और उद्योग को अधिक लाभ मिलता है?

कृषक की राजनीतिक मांगें किस तरह उस असमानता की प्रतिक्रिया हैं?

इसीलिए टिकैत का आंदोलन बिजली बिल से शुरू होकर भारत के विकास मॉडल की व्यापक ग्रामीण आलोचना तक पहुंचता है।

4 चौथी धारा : जाति, खाप, पंचायत और ग्रामीण संस्कृति

Gaurang R. Sahay का 2004 का लेख “Traditional Institutions and Cultural Practices vis-à-vis Agrarian Mobilisation: The Case of Bhartiya Kisan Union” टिकैत आंदोलन को समझने के लिए अनिवार्य स्रोत है।

Sahay का मूल निष्कर्ष है कि 1987–89 में BKU की असाधारण लामबंदी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की मौजूदा सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं से निकली।

इन सभी का उपयोग आधुनिक किसान आंदोलन में किया गया।

यह अध्ययन करमूखेड़ी, मेरठ और रजबपुर आंदोलनों की विस्तृत घटनात्मक जानकारी भी देता है।

इसी से 27 जनवरी 1987 को चार दिन के करमूखेड़ी घेराव, बिजली दर को 22.50 रुपये से 30 रुपये प्रति हॉर्सपावर प्रति माह किए जाने तथा अनुमानतः 50 हजार किसानों की भागीदारी जैसे महत्वपूर्ण विवरण मिलते हैं।

इसलिए Sahay का अध्ययन केवल सिद्धांत नहीं, BKU के प्रारंभिक इतिहास का महत्वपूर्ण द्वितीयक दस्तावेज भी है।

5 पांचवीं धारा : जाति, सांप्रदायिकता और किसान पहचान की आलोचना

BKU के इतिहासलेखन में सबसे तीखी आलोचनात्मक धारा 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद विकसित हुई।

R. Ramakumar का लेख “Jats, Khaps and Riots: Communal Politics and the Bharatiya Kisan Union in Northern India”, Journal of Agrarian Change में प्रकाशित, इस बहस की केंद्रीय रचना है।

Ramakumar का तर्क है कि BKU नेतृत्व और सदस्यता के कुछ हिस्सों ने उस सांप्रदायिक विमर्श को ग्रहण किया जिसने 2013 की हिंसा से पहले सामाजिक जमीन तैयार की; वे विशेष रूप से खाप नेटवर्क की भूमिका को महत्व देते हैं।

यह अध्ययन टिकैत आंदोलन के लोकप्रिय “हिंदू–मुस्लिम किसान एकता” आख्यान के लिए महत्वपूर्ण आलोचनात्मक चुनौती है।

यदि किसान की साझा आर्थिक पहचान इतनी मजबूत थी, तो 2013 में “किसान” के ऊपर “हिंदू” की पहचान क्यों प्रभावी हो गई?

इस दृष्टिकोण के बिना BKU का संतुलित इतिहास संभव नहीं है।

6 छठी धारा : 2020–21 आंदोलन और ग्रामीण राजनीति का पुनरुत्थान

2020–21 के किसान आंदोलन के बाद BKU पर इतिहासलेखन का नया चरण सामने आया।

इसमें मुख्य प्रश्न यह है कि क्या कृषि कानून आंदोलन ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 2013 के बाद कमजोर हुई साझा किसान पहचान को फिर सक्रिय किया?

नए अध्ययनों में तर्क दिया गया कि नवउदारवादी आर्थिक परिवर्तन और हिंदुत्व राजनीति ने तीन दशकों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पुरानी कृषि राजनीति कमजोर की, लेकिन 2020–21 के आंदोलन ने किसान पहचान, जाट–मुस्लिम संपर्क और व्यापक ग्रामीण गठबंधन को नई ऊर्जा दी।

इस दृष्टिकोण में 28 जनवरी 2021 का गाजीपुर क्षण केवल राकेश टिकैत के व्यक्तिगत राजनीतिक उदय की घटना नहीं है।

वह किसान पहचान के सामाजिक पुनर्संगठन का क्षण भी है।

7 पत्रकारिता : BKU इतिहास का अनिवार्य स्रोत

BKU जैसे आंदोलनकारी संगठन के लिए समकालीन पत्रकारिता अत्यंत महत्वपूर्ण है।

विशेष रूप से India Today और Indian Express के 1988 के अभिलेख प्राथमिक-समान समकालीन स्रोत का काम करते हैं।

India Today ने 29 फरवरी 1988 के अंक में मेरठ के आंदोलन को “people's power” के असाधारण प्रदर्शन के रूप में दर्ज किया और 27 जनवरी से कमिश्नर कार्यालय के घेराव, वीर बहादुर सिंह सरकार की प्रतिक्रिया तथा टिकैत की बढ़ती लोकप्रियता का प्रत्यक्ष समकालीन विवरण दिया।

उसी वर्ष नवंबर की India Today रिपोर्ट ने बोट क्लब आंदोलन को ग्रामीण भारत और शहर के बीच बढ़ती आर्थिक असमानता की व्यापक प्रतिक्रिया के रूप में देखा।

Indian Express के अभिलेख 1988 के दिल्ली आंदोलन की संख्या, ग्रामीण जीवन, सरकार की रणनीति, कांग्रेस रैली के स्थानांतरण और तत्काल औपचारिक समझौता न होने जैसे महत्वपूर्ण विवरण सुरक्षित रखते हैं।

8 विस्तृत समयरेखा : 1935–2026

| वर्ष/तारीख | प्रमुख घटना | ऐतिहासिक महत्व | |---|---|---| | 6 अक्टूबर 1935 | महेंद्र सिंह टिकैत का जन्म सिसौली, मुजफ्फरनगर में | बाद में बालियान खाप और किसान आंदोलन का केंद्रीय नेतृत्व। BKU स्रोत यही जन्मतिथि देते हैं। | | 1940 के दशक | पिता की मृत्यु के बाद कम आयु में बालियान खाप की पारंपरिक चौधराहट से जुड़ाव | टिकैत की भविष्य की सामाजिक वैधता और पंचायत नेतृत्व का आधार। | | 1980 | राष्ट्रीय किसान नेताओं द्वारा अखिल भारतीय किसान संगठन बनाने के प्रयास | BKU नाम की व्यापक संस्थागत पूर्वपीठिका; बाद में क्षेत्रीय इकाइयों ने अलग रूप ग्रहण किए। | | सितंबर 1986 | पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कृषि बिजली दर वृद्धि के विरुद्ध किसान बैठकें; बारौत क्षेत्र में सक्रियता | बिजली के प्रश्न पर नई किसान लामबंदी का प्रारंभ। | | 1986–87 | सिसौली में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में BKU का निर्णायक पुनर्गठन | पश्चिमी उत्तर प्रदेश की टिकैत-नेतृत्व वाली BKU की वास्तविक संगठनात्मक शुरुआत। स्रोत 1986 और 1987 दोनों का उल्लेख करते हैं। | | 3 जनवरी 1987 | सिसौली पंचायत में करमूखेड़ी बिजलीघर घेराव का निर्णय | बिजली दर आंदोलन का औपचारिक कार्यक्रम। | | 27 जनवरी 1987 | करमूखेड़ी बिजलीघर पर प्रस्तावित चार-दिवसीय घेराव शुरू | लगभग 50 हजार किसानों की भागीदारी का अकादमिक अनुमान; टिकैत का पहला बड़ा जनसंघर्ष। | | 1987 | बिजली आंदोलन में पुलिस–किसान टकराव; जयपाल और अकबर अली की मृत्यु की आंदोलन-स्मृति | टिकैत नेतृत्व और हिंदू–मुस्लिम किसान शहादत की साझा स्मृति मजबूत हुई। | | 1987 | वीर बहादुर सिंह सरकार और BKU के बीच बढ़ता टकराव | स्थानीय किसान मुद्दा प्रदेशव्यापी राजनीतिक प्रश्न बनने लगा। | | 27 जनवरी 1988 | मेरठ कमिश्नरी घेराव शुरू | प्रस्तावित चार दिन का धरना 24/25 दिन तक चला; टिकैत की प्रदेशव्यापी शक्ति स्थापित। | | जनवरी–फरवरी 1988 | 35 सूत्रीय मांगपत्र; गन्ना मूल्य, बिजली, ऋण और कृषि लागत प्रमुख प्रश्न | BKU का आर्थिक एजेंडा स्पष्ट हुआ। | | फरवरी–जून 1988 | रजबपुर से संबंधित किसान सत्याग्रह और गिरफ्तारियां | Sahay के अनुसार 110 दिन के सत्याग्रह में 9,507 किसानों ने गिरफ्तारी दी और पांच किसानों की मृत्यु हुई। | | 17 सितंबर 1988 | सिसौली की मासिक पंचायत में दिल्ली रैली का निर्णय | BKU ने राष्ट्रीय राजधानी को अगला संघर्ष स्थल चुना। | | 25 अक्टूबर 1988 | दिल्ली बोट क्लब किसान आंदोलन शुरू | लगभग एक सप्ताह तक राजधानी के केंद्रीय क्षेत्र में विशाल किसान पड़ाव। Indian Express करीब पांच लाख किसानों का उल्लेख करता है। | | 31 अक्टूबर 1988 | कांग्रेस को इंदिरा गांधी स्मृति रैली बोट क्लब से लाल किला मैदान ले जानी पड़ी | आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक राजनीतिक सफलताओं में एक। | | 1 नवंबर 1988 | टिकैत ने दिल्ली धरना समाप्त किया | तत्काल व्यापक औपचारिक समझौता नहीं; बाद में रियायतें। | | 1989 | राष्ट्रीय किसान संगठनों के बीच नेतृत्व/रणनीति मतभेद; BKU का जनता दल/राष्ट्रीय मोर्चा की ओर झुकाव | गैर-दलीयता का पहला बड़ा अंतर्विरोध। | | 1989 | N. D. Tiwari सरकार और BKU के बीच कई मांगों पर समझौता | 1988 आंदोलन के कुछ आर्थिक परिणाम बाद में संस्थागत रूप लेते हैं। | | 15 जुलाई 1990 | महेंद्र सिंह टिकैत लखनऊ पंचायत के लिए किसानों के साथ आगे बढ़े; मुलायम सिंह सरकार का दमन और गिरफ्तारियां | उस सरकार के विरुद्ध संघर्ष जिसे किसान राजनीति ने पूर्व में समर्थन दिया था; गैर-दलीय दबाव सिद्धांत की परीक्षा। | | 1991–92 | उर्वरक, बिजली, गन्ना, ऋण और भूमि मुआवजे पर नए आंदोलन | आर्थिक उदारीकरण के दौर में BKU एजेंडे का विस्तार। | | 1992 | लखनऊ में लंबे धरने; 10,000 रुपये तक कृषि ऋण राहत का प्रश्न | कृषि ऋण BKU की प्रमुख स्थायी मांगों में मजबूत हुआ। | | 1992 | गाजियाबाद क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण मुआवजा आंदोलन | शहरीकरण और कृषि भूमि मूल्य BKU के नए विषय बने। | | 1993 | GATT/डंकल, बीज और बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर किसान विरोध | BKU की राजनीति में वैश्वीकरण-विरोधी प्रश्न का प्रवेश; हालांकि KRRS की तुलना में कम व्यवस्थित। | | 1996 | किसान राजनीति को चुनावी मंच में बदलने के प्रयोग | आंदोलनकारी शक्ति और चुनावी शक्ति के अंतर का अनुभव। | | फरवरी 2000 | टिकैत को लखनऊ पंचायत के रास्ते में मुरादाबाद में गिरफ्तार किया गया | 2000 के दशक में भी सक्रिय किसान नेतृत्व का प्रमाण। | | 2003 | पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान नेतृत्व में प्रतिद्वंद्विता; अन्य किसान संगठन सक्रिय | BKU का एकाधिकार कमजोर हुआ; किसान राजनीति बहु-केंद्रीय बनी। | | 2006 | गेहूं आयात और कृषि व्यापार नीति के विरोध में किसान प्रदर्शन | स्थानीय गन्ना–बिजली राजनीति से वैश्विक कृषि व्यापार तक एजेंडा विस्तृत। | | 2008 | मायावती के बारे में कथित जातिसूचक टिप्पणी पर टिकैत की गिरफ्तारी | जाति और किसान राजनीति की सामाजिक सीमा का प्रमुख विवाद। | | 15 मई 2011 | महेंद्र सिंह टिकैत का निधन | एक युग का अंत; नरेश टिकैत और राकेश टिकैत की दूसरी पीढ़ी का नेतृत्व। | | 2011–12 | नरेश टिकैत अध्यक्ष; राकेश टिकैत प्रमुख आंदोलनकारी/सार्वजनिक नेता | BKU में दोहरी नेतृत्व संरचना विकसित। | | 2012 | पुराने मुस्लिम सहयोगियों सहित कुछ नेताओं की अलग राह | संगठनात्मक और सामाजिक विखंडन बढ़ा। | | सितंबर 2013 | मुजफ्फरनगर–शामली सांप्रदायिक हिंसा | पुराने जाट–मुस्लिम किसान गठबंधन की सबसे गंभीर टूटन; BKU और खाप राजनीति पर तीखी आलोचना। | | 2014 के बाद | पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट राजनीतिक झुकाव का पुनर्गठन | किसान पहचान के समानांतर धार्मिक और दलगत पहचान मजबूत। | | 23 सितंबर–2 अक्टूबर 2018 | हरिद्वार से दिल्ली किसान क्रांति यात्रा | स्वामीनाथन आयोग, बिजली, गन्ना बकाया और अन्य मांगों पर BKU का राष्ट्रीय पुनरुत्थान; लगभग 25 हजार किसानों और 700 ट्रैक्टरों का समकालीन अनुमान। | | 5 जून 2020 | तीन केंद्रीय कृषि अध्यादेश | नए राष्ट्रीय किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि। | | सितंबर 2020 | संसद ने कृषि सुधार विधेयक पारित किए; 27 सितंबर से कानून प्रभावी | सरकार ने इन्हें कृषि बाजार विकल्प बढ़ाने वाला सुधार बताया; किसान संगठनों ने MSP/APMC और कॉरपोरेट शक्ति पर आशंका जताई। | | नवंबर 2020 | दिल्ली की सीमाओं पर किसान आंदोलन | पंजाब–हरियाणा केंद्रित आंदोलन में BKU ने गाजीपुर को पश्चिमी यूपी के प्रमुख केंद्र में बदला। | | 26 जनवरी 2021 | ट्रैक्टर परेड के दौरान दिल्ली में हिंसक घटनाएं | आंदोलन गंभीर नैतिक और राजनीतिक संकट में आया। | | 28 जनवरी 2021 | गाजीपुर पर राकेश टिकैत का हटने से इनकार और भावुक अपील | पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रातोंरात लामबंदी; BKU के पुनरुत्थान का निर्णायक क्षण। | | 2021 | जाट–मुस्लिम किसान पुनर्संपर्क, महापंचायतें | 2013 के बाद किसान पहचान को पुनर्जीवित करने का प्रयास। | | 19 नवंबर 2021 | प्रधानमंत्री ने तीन कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की | लगभग वर्ष भर चले आंदोलन की केंद्रीय मांग स्वीकार। | | 29 नवंबर–1 दिसंबर 2021 | संसद ने कृषि कानून Repeal Bill पारित किया; तीन कानून निरस्त | विधायी प्रक्रिया से कानून वापसी पूरी हुई। | | 2022 | MSP व्यवस्था के भविष्य पर समिति; किसान संगठनों में असहमति | आंदोलन का केंद्र कृषि कानून से MSP गारंटी की ओर। | | 15 मई 2022 | BKU से अलग BKU (Apolitical/अराजनैतिक) का गठन | टिकैत नेतृत्व पर दलगत राजनीति में अधिक हस्तक्षेप का आरोप; गैर-दलीयता फिर विवाद में। | | 2023–24 | गन्ना, बिजली, MSP, भूमि अधिग्रहण और किसान महापंचायतें | BKU ने राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दोनों एजेंडों को जोड़ा। | | 2024 | MSP कानूनी गारंटी पर नई किसान लामबंदी; शंभू–खनौरी धारा तथा मूल SKM अलग संगठनात्मक मार्ग पर | किसान आंदोलन में “मांग की समानता, नेतृत्व की बहुलता” स्पष्ट। | | 2025 | किसान संगठनों को फिर एक करने के प्रयास | MSP पर साझा मांग के बावजूद संगठनात्मक एकता अधूरी। | | फरवरी 2026 | भारत–अमेरिका व्यापार ढांचे पर किसान संगठनों का विरोध | कृषि आयात और घरेलू कीमतों पर वैश्वीकरण की पुरानी बहस फिर सक्रिय; SKM ने देशव्यापी विरोध किया। | | 25 अगस्त 2026 तक | BKU टिकैत धारा नरेश टिकैत–राकेश टिकैत के नेतृत्व में सक्रिय; MSP, गन्ना, बिजली, भूमि और कृषि व्यापार प्रमुख प्रश्न | टिकैत आंदोलन की चार दशक पुरानी मूल आर्थिक धुरी नए विषयों के साथ जारी। |

अध्याय 21

निष्कर्ष

भारतीय किसान यूनियन और महेंद्र सिंह टिकैत को भारतीय किसान इतिहास में समझने के लिए किसी एक सूत्र से काम नहीं चलता। उन्हें केवल “जाट नेता”, केवल “गन्ना किसान नेता”, केवल “खाप चौधरी”, केवल “गैर-दलीय किसान नेता” या केवल “1988 के बोट क्लब आंदोलन के नायक” के रूप में देखने से तस्वीर अधूरी रह जाती है।

उनका वास्तविक ऐतिहासिक महत्व उस परिवर्तन में है जिसमें भारतीय किसान राजनीति भूमि, लगान और जमींदारी के प्रश्नों से आगे बढ़कर कृषि लागत, लाभकारी मूल्य, बिजली, सिंचाई, ऋण, बाजार, गन्ना भुगतान, कृषि नीति और किसान आय के प्रश्नों पर केंद्रित होने लगी। 1980 के दशक के “नए किसान आंदोलन” की यही सबसे महत्वपूर्ण विशेषता थी, और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में महेंद्र सिंह टिकैत उसका सबसे प्रभावशाली जननेतृत्व बनकर उभरे।

उन्होंने कोई व्यवस्थित राजनीतिक दर्शन नहीं लिखा।

कोई लंबा कृषि आर्थिक ग्रंथ नहीं दिया।

कोई स्थायी राष्ट्रीय राजनीतिक दल नहीं बनाया।

लेकिन उन्होंने एक ऐसी आंदोलनकारी भाषा और तकनीक विकसित की जिसने आधुनिक भारतीय किसान राजनीति को गहरे रूप में प्रभावित किया।

खेती घाटे का व्यवसाय नहीं होनी चाहिए।

किसान की उपज का न्यायपूर्ण मूल्य मिले।

राजनीतिक दल किसान मंच पर हावी न हों।

और यदि सरकार नहीं सुने तो किसान संगठित होकर उसके दरवाजे तक पहुंचे।

यही टिकैतवाद की सबसे सटीक राजनीतिक व्याख्या कही जा सकती है।

1 स्वतंत्र भारत की किसान राजनीति में ऐतिहासिक मोड़

स्वतंत्रता से पहले और उसके आसपास के बड़े किसान संघर्षों के केंद्र में भूमि संबंध थे।

तेभागा और तेलंगाना जैसी धाराओं में तो भूमि और वर्गीय सत्ता स्वयं संघर्ष का केंद्र थी।

लेकिन हरित क्रांति के बाद उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों में स्थिति बदली।

अब समस्या केवल जमीन पाने की नहीं थी।

उस जमीन पर खेती लाभकारी है या नहीं?

यहीं से BKU की ऐतिहासिक भूमिका शुरू होती है।

2 ‘नए किसान आंदोलन’ में टिकैत का स्थान

1980 के दशक में महाराष्ट्र के शरद जोशी, कर्नाटक के एम. डी. नंजुंडास्वामी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के महेंद्र सिंह टिकैत जैसे नेताओं ने किसान राजनीति को नया रूप दिया।

इन तीनों की विचारधारा समान नहीं थी।

शरद जोशी बाजार की स्वतंत्रता की ओर झुकते थे।

नंजुंडास्वामी वैश्वीकरण और कॉरपोरेट नियंत्रण की आलोचना करते थे।

टिकैत की राजनीति अधिक व्यावहारिक थी।

इसलिए टिकैत नए किसान आंदोलन की सबसे जनाधारित, ग्रामीण और प्रत्यक्ष सौदेबाजी वाली धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं।

3 करमूखेड़ी : स्थानीय प्रश्न से बड़े नेतृत्व तक

1987 का करमूखेड़ी बिजली आंदोलन प्रतीकात्मक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

बिजली दर का प्रश्न देखने में स्थानीय था।

लेकिन उसके भीतर पूरी नई कृषि अर्थव्यवस्था छिपी थी।

हरित क्रांति की खेती सिंचाई पर निर्भर थी।

बिजली की दर बढ़ी तो उत्पादन लागत बढ़ी।

यानी किसान का संघर्ष राज्य की उस मूल्य व्यवस्था से था जो उसके उत्पादन खर्च को निर्धारित कर रही थी।

यहीं टिकैत ने साबित किया कि आधुनिक किसान की राजनीति खेत से अधिक कृषि निवेश की लागत पर भी होगी।

4 मेरठ : संगठन की असली परीक्षा

1988 का मेरठ कमिश्नरी घेराव BKU के इतिहास में निर्णायक चरण था।

अब आंदोलन बिजलीघर से निकलकर प्रशासनिक सत्ता के केंद्र तक पहुंचा।

24 दिनों से अधिक लंबा किसान पड़ाव इस बात का प्रमाण था कि BKU केवल क्षणिक रैली आयोजित करने वाला संगठन नहीं है।

वह हजारों किसानों को लंबे समय तक संगठित रख सकती है।

यहीं टिकैत मॉडल की एक केंद्रीय शक्ति दिखाई दी—

किसान ने बैठकर सरकार को थकाना शुरू कर दिया।

5 बोट क्लब : जब किसान राष्ट्रीय सत्ता के सामने बैठ गया

अक्टूबर 1988 का दिल्ली बोट क्लब आंदोलन महेंद्र सिंह टिकैत के जीवन का सर्वोच्च राजनीतिक क्षण था।

गांव की सामाजिक दुनिया राष्ट्रीय सत्ता के सामने पहुंच गई।

वह ग्रामीण भारत की दृश्य उपस्थिति थी।

किसान केवल ज्ञापन देने नहीं आया था।

यहीं टिकैत ने आधुनिक किसान आंदोलन की वह शैली स्थापित की जिसकी प्रतिध्वनि 2020–21 में दिल्ली की सीमाओं पर फिर दिखाई दी।

6 किसान स्वाभिमान की राजनीति

टिकैत की सबसे बड़ी भावनात्मक शक्ति “किसान स्वाभिमान” थी।

वह किसान की सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रश्न था।

सरकारी अधिकारी किसान से ऊपर क्यों बोले?

चीनी मिल भुगतान रोककर किसान को क्यों दौड़ाए?

राज्य मूल्य तय करे तो किसान की लागत क्यों न सुने?

यह भाव ग्रामीण समाज में गहरा प्रभाव डालता था।

किसान को पहली बार ऐसा नहीं लगा कि वह कोई राहत मांग रहा है।

यही मनोवैज्ञानिक परिवर्तन टिकैत की ऐतिहासिक उपलब्धियों में एक है।

7 लाभकारी मूल्य : टिकैत का केंद्रीय आर्थिक सिद्धांत

टिकैत का आर्थिक दर्शन किसी पुस्तक में बंद नहीं था।

खेती की लागत से ऊपर किसान को पर्याप्त प्रतिफल मिलना चाहिए।

यह विचार बाद में MSP की बहस में अधिक व्यवस्थित रूप से सामने आया।

आज भी जब किसान C2+50 प्रतिशत, कानूनी MSP, गन्ना मूल्य, लागत और भुगतान की बात करता है तो उसमें 1980 के दशक के नए किसान आंदोलन की स्पष्ट ऐतिहासिक निरंतरता दिखाई देती है।

यानी टिकैत की सबसे स्थायी आर्थिक विरासत किसी एक कीमत में नहीं, बल्कि इस प्रश्न में है—

कृषि उत्पादन का वास्तविक आर्थिक लाभ उत्पादक को कितना मिलता है?

8 गन्ना : क्षेत्रीय फसल से राजनीतिक संस्था तक

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना केवल फसल नहीं रहा।

वह राजनीतिक अर्थव्यवस्था का केंद्रीय स्तंभ बन गया।

इसलिए गन्ना BKU की क्षेत्रीय शक्ति का स्थायी आधार बना।

इस निरंतरता से स्पष्ट है कि टिकैत ने कोई क्षणिक मुद्दा नहीं पकड़ा था।

उन्होंने क्षेत्रीय कृषि अर्थव्यवस्था के उस वास्तविक तनाव को पहचाना था जो दशकों तक बना रहा।

9 बिजली : किसान राजनीति का दूसरा स्थायी स्तंभ

बिजली का प्रश्न भी इसी प्रकार टिकैत की राजनीति से लंबे समय तक जुड़ा रहा।

आज तक उत्तर प्रदेश की किसान राजनीति में ये प्रश्न मौजूद हैं।

इससे टिकैत के आर्थिक एजेंडे की स्थायित्व स्पष्ट होती है।

हालांकि इक्कीसवीं सदी में इसमें नया आयाम जुड़ गया है—

इसलिए आज टिकैत की पुरानी सस्ती बिजली की मांग को जल संरक्षण की नई चुनौतियों के साथ संतुलित करना आवश्यक है।

10 गैर-दलीय राजनीति : शक्ति भी, संकट भी

BKU की सबसे अनोखी विशेषता थी उसकी घोषित गैर-दलीयता।

लेकिन किसान मुद्दे पर किसान के साथ खड़ा हो।

यही सूत्र विभिन्न दलों के समर्थकों को एक मंच पर लाता था।

इससे संगठन की नैतिक शक्ति बढ़ती थी।

सरकार उसे विपक्ष की शाखा कहकर आसानी से खारिज नहीं कर सकती थी।

लेकिन यही सिद्धांत लंबे समय में पूरी तरह टिक नहीं पाया।

ये सब दिखाते हैं कि किसान संगठन और चुनावी राजनीति के बीच दूरी बनाए रखना अत्यंत कठिन है।

11 गैर-दलीयता का वास्तविक अर्थ

टिकैत की राजनीति से एक महत्वपूर्ण सिद्धांत निकलता है—

गैर-दलीयता का अर्थ राजनीति से बाहर होना नहीं।

लेकिन उसका आदर्श था कि वह किसी पार्टी की शाखा न बने।

आज भी किसान संगठनों के लिए यह महत्वपूर्ण अंतर है।

12 खाप और पंचायत : परंपरा का आधुनिक राजनीतिक उपयोग

टिकैत ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पारंपरिक सामाजिक संस्थाओं का आधुनिक राजनीतिक उपयोग किया।

इन्हें कृषि आर्थिक आंदोलन से जोड़ा गया।

यही वजह थी कि BKU बिना विशाल पार्टी ढांचे के तेजी से हजारों गांवों तक पहुंच सकती थी।

यह टिकैत की असाधारण संगठनात्मक प्रतिभा थी।

लेकिन यही संरचना सामाजिक सीमा भी बनी।

खाप जातीय और पितृसत्तात्मक समाज से निकली संस्था थी।

इसलिए संगठन जितना उससे शक्ति लेता था, उतना ही उसकी सीमाओं का जोखिम भी उठाता था।

13 खाप : न पूरी तरह लोकतांत्रिक, न केवल प्रतिक्रियावादी

खाप पर चर्चा में भी अतियों से बचना चाहिए।

उसे केवल पिछड़ी संस्था कहना ग्रामीण सामाजिक वास्तविकता को नहीं समझता।

और उसे आदर्श लोकतांत्रिक पंचायत कहना भी गलत है।

लेकिन जाति और पितृसत्ता की सीमाएं भी थीं।

टिकैत आंदोलन ने इसी विरोधाभासी संस्था का उपयोग आधुनिक आर्थिक प्रतिरोध के लिए किया।

14 किसान पहचान की सामाजिक शक्ति

लेकिन किसान आर्थिक हित ने जातीय और धार्मिक विभाजन को कुछ समय के लिए पीछे धकेला।

यही 1980 के दशक में BKU की सबसे बड़ी सामाजिक उपलब्धियों में एक थी।

15 जाट–मुस्लिम किसान गठबंधन

चरण सिंह ने जिस सामाजिक गठबंधन को चुनावी राजनीति में मजबूत किया था, टिकैत ने उसे आंदोलन में पुनर्संगठित किया।

जाट और मुस्लिम किसान एक ही गन्ना अर्थव्यवस्था में थे।

यह गठबंधन आर्थिक वास्तविकता पर आधारित था।

लेकिन 2013 ने दिखाया कि आर्थिक हित हमेशा धार्मिक पहचान पर स्थायी विजय नहीं पा सकते।

16 2013 : टिकैत मॉडल की सबसे गंभीर सामाजिक विफलता

मुजफ्फरनगर की हिंसा BKU के सामाजिक इतिहास का सबसे कठिन अध्याय है।

जिस क्षेत्र में दशकों तक हिंदू–मुस्लिम किसान एक मंच पर आते थे, वहां गंभीर सांप्रदायिक हिंसा हुई।

खाप और किसान राजनीति के कुछ हिस्सों की भूमिका पर गंभीर अकादमिक आलोचना हुई।

यही घटना प्रमाणित करती है कि किसान पहचान जाति और धर्म को स्थायी रूप से समाप्त नहीं करती।

वह केवल परिस्थितियों में उन्हें पीछे कर सकती है।

17 2020–21 : किसान पहचान की वापसी

तीन कृषि कानून आंदोलन ने वही सामाजिक प्रक्रिया उलटी दिशा में शुरू की।

अब साझा कृषि संकट धार्मिक दूरी को कम करने का माध्यम बना।

जाट और मुस्लिम किसान फिर एक मंच पर आए।

गाजीपुर और मुजफ्फरनगर की पंचायतों में पुरानी किसान स्मृति सक्रिय हुई।

लेकिन यह प्रमाण था कि आर्थिक संघर्ष टूटे सामाजिक गठबंधन को फिर जोड़ने का रास्ता खोल सकता है।

यही महेंद्र सिंह टिकैत की सामाजिक विरासत का महत्वपूर्ण पुनरुत्थान था।

18 महिलाओं की भूमिका : आंदोलन की अदृश्य रीढ़

टिकैत आंदोलन की पारंपरिक छवि पुरुष किसान की रही।

लेकिन आंदोलन की वास्तविक सामाजिक संरचना में महिलाओं का श्रम महत्वपूर्ण था।

फिर भी शीर्ष नेतृत्व पुरुष प्रधान रहा।

यही टिकैत आंदोलन की लैंगिक सीमा थी।

2020–21 में महिला किसान की अधिक प्रत्यक्ष भागीदारी ने इस पुरानी सीमा को चुनौती दी।

इस अर्थ में टिकैत आंदोलन की विरासत आगे की पीढ़ी में सामाजिक रूप से विस्तृत हुई।

19 भूमिहीन मजदूर : टिकैत मॉडल का सबसे बड़ा वर्गीय अभाव

BKU की सबसे गंभीर वर्गीय सीमा भूमिहीन कृषि मजदूर के प्रश्न में दिखाई देती है।

इसलिए BKU पूरे ग्रामीण समाज का सर्वसमावेशी संगठन कभी नहीं बन सकी।

उसकी असली सामाजिक पहचान भूमि पर खेती करने वाले कृषक की थी।

यह स्वीकार करना टिकैत आंदोलन की ऐतिहासिक उपलब्धि को कम नहीं करता; बल्कि उसे अधिक सटीक बनाता है।

20 क्या यह संपन्न किसानों का आंदोलन था?

आंशिक रूप से यह आलोचना सही है, लेकिन अधूरी।

मध्यम और अपेक्षाकृत संपन्न किसानों की भूमिका निश्चित रूप से प्रभावशाली थी।

लेकिन छोटा किसान भी बिजली, गन्ने, ऋण और लागत से प्रभावित था।

इसलिए BKU केवल बहुत बड़े किसानों का संगठन नहीं थी।

भूमि-स्वामी बाजारोन्मुख कृषकों का व्यापक गठबंधन, जिसमें छोटे से संपन्न किसान तक शामिल थे, लेकिन भूमिहीन मजदूर अपेक्षाकृत बाहर था।

21 टिकैत और चरण सिंह : दो मॉडल, एक किसान समाज

भारतीय किसान राजनीति में चरण सिंह और टिकैत की तुलना विशेष महत्व रखती है।

दोनों मॉडल विरोधी होने से अधिक पूरक थे।

भारतीय लोकतंत्र में किसान को प्रतिनिधित्व भी चाहिए और स्वतंत्र संगठन भी।

22 टिकैत बनाम शरद जोशी और नंजुंडास्वामी

नए किसान आंदोलन की तीन धाराओं की तुलना से टिकैत का स्थान और स्पष्ट होता है।

किसान-पक्षीय राज्य हस्तक्षेप और व्यावहारिक आर्थिक सौदेबाजी।

यानी टिकैत सबसे कम वैचारिक और सबसे अधिक स्थानीय अनुभव आधारित नेता थे।

लेकिन यही उनकी जनसुलभता की ताकत थी।

किसान को लंबी वैचारिक बहस नहीं करनी थी।

उसे अपना बिल और अपनी फसल का भाव पता था।

23 1991 के बाद टिकैत की वैचारिक सीमा

आर्थिक उदारीकरण और WTO के बाद कृषि राजनीति जटिल हुई।

अब प्रश्न केवल बिजली और गन्ना नहीं था।

इन पर BKU कोई उतना व्यवस्थित वैचारिक ढांचा विकसित नहीं कर सकी जितना KRRS या शेतकारी संगठन ने अपनी-अपनी दिशा में किया।

यह टिकैत मॉडल की नीति संबंधी सीमा थी।

लेकिन विस्तृत वैकल्पिक कृषि आर्थिक मॉडल में सीमित।

24 संगठनात्मक संस्थानीकरण की समस्या

महेंद्र सिंह टिकैत की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा ने BKU को लंबे समय तक एकजुट रखा।

लेकिन वही व्यक्तिगत नेतृत्व संस्था के विकास की सीमा भी बना।

नरेश और राकेश टिकैत ने उत्तराधिकार संभाला।

लेकिन परिवार आधारित नेतृत्व पर प्रश्न उठे।

इससे स्पष्ट है कि करिश्माई नेतृत्व को लोकतांत्रिक संस्था में बदलना BKU की सबसे कठिन संगठनात्मक चुनौती बनी रही।

25 टिकैत परिवार : कमजोरी भी, निरंतरता भी

पारिवारिक उत्तराधिकार पर आलोचना उचित है।

यदि टिकैत परिवार की सामाजिक विश्वसनीयता न होती, तो संभव है कि संगठन 2011 के बाद और तेजी से विखर जाता।

नरेश टिकैत ने पंचायत परंपरा बनाए रखी।

राकेश टिकैत ने आंदोलनकारी नेतृत्व विकसित किया।

इसलिए परिवार ने एक तरफ संस्थानीकरण की कमजोरी दिखाई, दूसरी तरफ ऐतिहासिक निरंतरता भी दी।

26 2018 से पुनरुत्थान

हरिद्वार से दिल्ली किसान क्रांति यात्रा ने संकेत दिया कि BKU फिर राष्ट्रीय स्तर पर किसान लामबंदी कर सकती है।

लेकिन वास्तविक पुनरुत्थान 2020–21 में हुआ।

यहीं महेंद्र सिंह टिकैत की आंदोलन तकनीक नई पीढ़ी के साथ राष्ट्रीय स्तर पर लौट आई।

नेता चला गया, लेकिन उसकी आंदोलन-पद्धति जीवित रही।

27 28 जनवरी 2021 : विरासत का पुनर्जन्म

गाजीपुर सीमा पर राकेश टिकैत की भावुक अपील को केवल मीडिया क्षण के रूप में नहीं देखना चाहिए।

उसने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों में एक पुरानी सामाजिक स्मृति सक्रिय की।

किसान रातोंरात गाजीपुर पहुंचने लगे।

यानी 1988 का ग्रामीण आंदोलन नेटवर्क 2021 में डिजिटल तकनीक के साथ फिर सक्रिय हुआ।

यह टिकैत विरासत का वास्तविक पुनर्जन्म था।

28 तीन कृषि कानूनों की वापसी : सीमित लेकिन बड़ी जीत

2021 में तीन कृषि कानूनों की वापसी भारत के किसान आंदोलनों की बड़ी राजनीतिक सफलताओं में है।

लेकिन इसे केवल BKU या राकेश टिकैत की विजय कहना गलत होगा।

यह संयुक्त किसान मोर्चा और अनेक संगठनों का साझा संघर्ष था।

BKU की विशेष भूमिका पश्चिमी उत्तर प्रदेश और गाजीपुर में थी।

इस संतुलन को बनाए रखना इतिहासलेखन के लिए आवश्यक है।

29 2022–26 : पुरानी विरासत, नए प्रश्न

कानून वापसी के बाद किसान आंदोलन समाप्त नहीं हुआ।

इससे स्पष्ट है कि टिकैत आंदोलन की मूल आर्थिक चिंता अभी समाप्त नहीं हुई।

30 MSP : टिकैत की आर्थिक विरासत का आधुनिक रूप

महेंद्र सिंह टिकैत आज के कानूनी MSP अभियान के नेता नहीं थे।

इसलिए आधुनिक मांग को सीधे उनके नाम से जोड़ना इतिहाससम्मत नहीं होगा।

लेकिन उसका मूल आर्थिक दर्शन टिकैत की राजनीति से जुड़ता है—

किसान को लागत से ऊपर न्यायपूर्ण मूल्य मिलना चाहिए।

यही सूत्र गन्ना आंदोलन से MSP बहस तक चलता है।

इस अर्थ में MSP की वर्तमान राजनीति टिकैत के आर्थिक प्रश्न का विकसित संस्थागत रूप मानी जा सकती है।

31 आंदोलनकारी लोकतंत्र की विरासत

टिकैत का सबसे बड़ा योगदान केवल कृषि क्षेत्र में नहीं, भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में भी है।

संगठित नागरिक सत्ता के बाहर रहते हुए भी नीति पर प्रभाव डाल सकते हैं।

सड़क अवरोध और लंबे घेराव दूसरे नागरिकों को प्रभावित कर सकते हैं।

इसलिए जनदबाव और सार्वजनिक अधिकारों के बीच संतुलन आधुनिक लोकतंत्र की स्थायी चुनौती है।

टिकैत मॉडल इस बहस का महत्वपूर्ण भारतीय उदाहरण है।

32 राज्य और किसान के संबंध की नई परिभाषा

टिकैत की राजनीति ने राज्य से किसान का संबंध बदला।

पहले किसान अक्सर प्रशासन का विषय था।

सरकार को किसान प्रतिनिधियों से बात करनी पड़ी।

यही किसान नागरिकता की नई अवस्था थी।

33 बाजार के प्रश्न पर टिकैत की स्थायी प्रासंगिकता

आज कृषि बाजार पहले से अधिक जटिल है।

इन सबके बीच किसान की मूल चिंता अभी भी वही है—

टिकैत का पूरा आंदोलन इसी प्रश्न का राजनीतिक रूप था।

लेखक का प्रत्यक्ष अभिलेख

महेंद्र सिंह टिकैत के साथ ओमकार चौधरी : संवाद और साक्षात्कार

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक ओमकार चौधरी ने भारतीय किसान यूनियन के आंदोलनों को प्रत्यक्ष रूप से कवर किया और चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत से अनेक अवसरों पर लंबी बातचीत तथा साक्षात्कार किए। उनके लेखों और मैदानी रिपोर्टों का उपयोग बाद में कई शोध-प्रबंधों में भी हुआ। नीचे दिए गए निजी अभिलेख के चित्र इस शोध को लेखक के प्रत्यक्ष पत्रकारिता-अनुभव से जोड़ते हैं।

युवा पत्रकार ओमकार चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के साथ बातचीत करते हुए
आरंभिक पत्रकारिता-संवादयुवा पत्रकार ओमकार चौधरी, चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के साथ किसान प्रश्नों पर बातचीत करते हुए।
ओमकार चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत का साक्षात्कार लेते हुए
मैदानी साक्षात्कारसिसौली के ग्रामीण परिवेश में महेंद्र सिंह टिकैत से साक्षात्कार करते ओमकार चौधरी।
महेंद्र सिंह टिकैत और ओमकार चौधरी आत्मीय बातचीत के दौरान
एक आत्मीय क्षणकिसान राजनीति और आंदोलन के अनुभवों पर संवाद के दौरान महेंद्र सिंह टिकैत और ओमकार चौधरी।

चित्र: ओमकार चौधरी का निजी पत्रकारिता अभिलेख · पुनर्प्रकाशन के लिए अनुमति आवश्यक।

अध्याय 6

टिकैत का किसान आर्थिक एजेंडा

महेंद्र सिंह टिकैत और भारतीय किसान यूनियन की राजनीति को केवल धरनों, घेरावों और विशाल किसान पंचायतों से नहीं समझा जा सकता। उनके आंदोलन की वास्तविक शक्ति एक स्पष्ट आर्थिक तर्क में निहित थी—यदि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, तो किसान की उपज का मूल्य भी ऐसा होना चाहिए जिससे खेती लाभकारी बनी रहे।

1980 के दशक में टिकैत जिस किसान राजनीति के सबसे प्रभावशाली प्रतिनिधि बनकर उभरे, उसका केंद्र भूमि-वितरण नहीं बल्कि कृषि की लाभप्रदता था। बिजली कितनी महंगी है, गन्ने का भाव कितना है, नहर का पानी कितना महंगा है, बैंक और सहकारी संस्थाओं का कर्ज किसान पर कितना दबाव डाल रहा है, खाद और डीजल की लागत क्या है और सरकार फसल का मूल्य किस आधार पर तय करती है—ये उनके किसान आर्थिक एजेंडे के केंद्रीय प्रश्न थे।

अकादमिक अध्ययनों में भी BKU के आंदोलन का मुख्य आधार खेती की आर्थिक व्यवहार्यता को माना गया है। संगठन लगातार सस्ती और नियमित बिजली, बेहतर कृषि मूल्य, कृषि ऋण में राहत, उर्वरक सहायता और कृषि मूल्य-निर्धारण संस्थाओं में किसान प्रतिनिधित्व की मांग करता रहा।

इस अर्थ में टिकैत का आंदोलन स्वतंत्र भारत के किसान इतिहास में एक महत्वपूर्ण संक्रमण का प्रतिनिधित्व करता है—“जमीन किसकी है?” से “खेती से किसान को कितना मिलता है?” तक का संक्रमण।

1 टिकैत की आर्थिक राजनीति का मूल प्रश्न

टिकैत अर्थशास्त्री नहीं थे। उन्होंने कृषि मूल्य सिद्धांत पर कोई व्यवस्थित पुस्तक नहीं लिखी। लेकिन उनकी किसान राजनीति के पीछे एक अत्यंत सरल और प्रभावी आर्थिक सवाल था—

खेती में किसान जितना खर्च करता है, क्या उसकी फसल बेचने पर उसे उससे पर्याप्त अधिक आय मिलती है?

यदि बिजली का बिल बढ़ता है, खाद महंगी होती है, डीजल महंगा होता है, मजदूरी बढ़ती है, सिंचाई शुल्क बढ़ता है और मशीनों का खर्च बढ़ता है, लेकिन गन्ने या दूसरी फसल का मूल्य उसी अनुपात में नहीं बढ़ता, तो किसान की आय घटेगी।

टिकैत इसी अंतर को राजनीतिक मुद्दा बनाते थे।

उनकी राजनीति में किसान केवल गरीब और सहायता चाहने वाला व्यक्ति नहीं था।

और उत्पादक होने के कारण उसे अपनी उपज पर न्यायपूर्ण आर्थिक प्रतिफल मिलना चाहिए—यह टिकैत आंदोलन का बुनियादी आग्रह था।

2 गन्ना : टिकैत की आर्थिक राजनीति का केंद्र

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में BKU की आर्थिक राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण आधार गन्ना था।

गन्ना किसान की समस्या दूसरी फसलों से कुछ अलग थी।

वह गन्ना पैदा करता था, लेकिन उसका प्रमुख खरीदार चीनी मिल थी।

मिल सरकार द्वारा नियंत्रित या प्रभावित मूल्य-व्यवस्था के अंतर्गत खरीद करती थी।

गन्ना लंबे समय तक घर में सुरक्षित नहीं रखा जा सकता।

इसलिए गन्ना किसान तीन स्तरों पर निर्भर था—

और मिल की वित्तीय स्थिति पर भुगतान के लिए।

यही कारण था कि टिकैत के आंदोलनों में गन्ना मूल्य बार-बार केंद्रीय प्रश्न बना। 1988 के मेरठ आंदोलन में आधिकारिक गन्ना मूल्य लगभग 27 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़ाकर 35 रुपये प्रति क्विंटल करने की मांग प्रमुख थी।

3 गन्ने का ‘भाव’ क्यों राजनीतिक प्रश्न था?

बाजार की सामान्य वस्तु में उत्पादक कई खरीदारों को बेच सकता है।

लेकिन गन्ना क्षेत्रीय चीनी मिल व्यवस्था से बंधा था।

इसलिए किसान का तर्क था कि यदि सरकार और नियामक व्यवस्था गन्ने की खरीद की शर्तों को प्रभावित करते हैं, तो सरकार उसकी आर्थिक व्यवहार्यता से भी पूरी तरह अलग नहीं रह सकती।

गन्ने के मूल्य में कुछ रुपये की वृद्धि भी बड़े कृषक परिवार की सालाना आय में बड़ा अंतर पैदा कर सकती थी।

यही कारण था कि गन्ने का भाव पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनावी और आंदोलनकारी दोनों राजनीति का स्थायी विषय बना।

टिकैत ने इस आर्थिक प्रश्न को किसान सम्मान से जोड़ दिया।

उनके समर्थकों के लिए वह किसान के श्रम और उत्पादन का कम मूल्यांकन भी था।

4 गन्ना भुगतान : मूल्य घोषित होना पर्याप्त नहीं

टिकैत के आर्थिक एजेंडे की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि केवल मूल्य घोषित कर देना पर्याप्त नहीं माना जाता था।

यदि चीनी मिल किसान का गन्ना खरीद ले और महीनों तक भुगतान न करे, तो किसान की आर्थिक स्थिति फिर भी संकट में रहती है।

गन्ने का पैसा किसान की अगली फसल में लगता है।

इसलिए समय पर गन्ना भुगतान धीरे-धीरे BKU की स्थायी मांग बन गया। 1988 के बोट क्लब आंदोलन की शिकायतों में विलंबित भुगतान का प्रश्न भी प्रमुखता से मौजूद था।

यही मुद्दा महेंद्र सिंह टिकैत के बाद भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में BKU की राजनीति में बना रहा।

5 बिजली : शायद टिकैत का सबसे शक्तिशाली आर्थिक मुद्दा

यदि गन्ना टिकैत की क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था का केंद्र था, तो बिजली उनकी किसान राजनीति का सबसे विस्फोटक मुद्दा थी।

आधुनिक शोध में 1988 के आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण मांगों में सस्ती कृषि बिजली को केंद्रीय स्थान दिया गया है। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार सस्ती बिजली की मांग ही वह अकेला मुद्दा था जिसने टिकैत को तेजी से किसानों के बड़े नेता के रूप में स्थापित करने में निर्णायक भूमिका निभाई।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सिंचाई के लिए विद्युत नलकूप अत्यंत महत्वपूर्ण हो चुके थे।

बिजली महंगी होगी तो पानी महंगा होगा।

पानी महंगा होगा तो गेहूं और गन्ने की उत्पादन लागत बढ़ेगी।

इसलिए किसान के लिए बिजली घरेलू सुविधा नहीं, उत्पादन का निवेश थी।

6 बिजली के प्रश्न के तीन आयाम

टिकैत केवल कम बिजली दर नहीं चाहते थे।

BKU की मांगों में बिजली से जुड़े कम-से-कम तीन अलग प्रश्न दिखाई देते हैं।

दूसरा—बिजली कितने घंटे और कितनी नियमित मिले?

तीसरा—बकाया और दंड की व्यवस्था कैसी हो?

किसान का तर्क था कि यदि वह बिजली का निर्धारित शुल्क दे रहा है, तो उसे सिंचाई के लिए पर्याप्त और नियमित बिजली भी मिलनी चाहिए।

अर्थात टिकैत की बिजली राजनीति केवल सब्सिडी की राजनीति नहीं थी।

उसमें सेवा की गुणवत्ता का प्रश्न भी था।

अकादमिक अध्ययनों में BKU द्वारा कम विद्युत दर के साथ पर्याप्त और नियमित ग्रामीण बिजली आपूर्ति की लगातार मांग का उल्लेख मिलता है।

7 फ्लैट रेट बनाम मीटर

कृषि बिजली व्यवस्था में एक बड़ा विवाद यह भी था कि किसान से शुल्क किस आधार पर लिया जाए।

नलकूप के हॉर्सपावर पर निश्चित शुल्क हो?

कई किसान निश्चित या फ्लैट दर को अधिक सरल और पूर्वानुमेय मानते थे।

सरकार और विद्युत बोर्ड इसे राजस्व तथा वास्तविक खपत के प्रश्न से देखते थे।

BKU का झुकाव किसान की लागत को निश्चित और कम रखने की ओर था।

यहीं एक व्यापक सिद्धांत सामने आता है—

किसान ऐसी लागत संरचना चाहता था जिसकी पहले से गणना की जा सके।

अनिश्चित बिल और अचानक बढ़ी दर कृषि योजना को अस्थिर कर देते थे।

8 सिंचाई : नहर का पानी भी लागत है

बिजली के साथ टिकैत के एजेंडे में सिंचाई शुल्क भी महत्वपूर्ण था।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नहर सिंचाई की लंबी परंपरा रही है।

सरकार सिंचाई शुल्क और जल दरें तय करती थी।

किसान का तर्क बिजली की तरह यहां भी वही था—

यदि पानी कृषि उत्पादन की बुनियादी आवश्यकता है, तो उसका शुल्क ऐसा होना चाहिए कि खेती की लाभप्रदता नष्ट न हो।

इसलिए दिल्ली बोट क्लब आंदोलन में बिजली और पानी के शुल्क में रियायत मुख्य मांगों में शामिल थी।

9 कृषि ऋण : विकास का साधन या कर्ज का जाल?

हरित क्रांति के बाद कृषि में नकद निवेश बढ़ा।

इन सबके लिए किसान को पूंजी चाहिए थी।

इसलिए बैंक और सहकारी ऋण का महत्व बढ़ा।

यदि अच्छी फसल और उचित मूल्य मिले तो किसान ऋण चुका सकता था।

समस्या तब पैदा होती थी जब लागत बढ़ जाए, उपज का मूल्य कम हो, फसल खराब हो या भुगतान देर से मिले।

तब उत्पादन बढ़ाने के लिए लिया गया ऋण किसान पर बोझ बन जाता था।

10 कर्जमाफी और ऋण स्थगन की मांग

मेरठ और दिल्ली आंदोलनों में कृषि ऋण की माफी या राहत महत्वपूर्ण मांगों में थी। SAGE में प्रकाशित BKU के अध्ययन में 1988 के मेरठ आंदोलन की मांगों में बिजली और पानी के बिलों की माफी, ऋण लिखे जाने और गन्ने के बेहतर मूल्य का स्पष्ट उल्लेख है।

BKU ने संस्थागत कृषि ऋण की वसूली पर रोक या स्थगन की मांग भी समय-समय पर उठाई।

यदि किसान की आय स्वयं सरकारी मूल्य और नीति से प्रभावित है, तो राज्य केवल कर्ज वसूली की मशीन की तरह व्यवहार नहीं कर सकता।

11 क्या टिकैत हर प्रकार की कर्जमाफी के पक्षधर थे?

टिकैत की ऋण राजनीति को सरल लोकलुभावन नारे में सीमित करना उचित नहीं होगा।

उनका बड़ा प्रश्न यह था कि किसान कर्ज में क्यों जा रहा है?

यदि उसकी उपज का उचित दाम मिले और कृषि लागत नियंत्रित रहे, तो स्थायी कर्जमाफी की जरूरत कम होगी।

इसलिए कर्ज राहत उनके एजेंडे में थी, लेकिन उसके पीछे का व्यापक आर्थिक प्रश्न कृषि आय था।

उनका अंतिम समाधान केवल ऋण हटाना नहीं बल्कि ऐसी कृषि अर्थव्यवस्था बनाना था जिसमें किसान बार-बार ऋण संकट में न फंसे।

12 न्यूनतम समर्थन मूल्य : टिकैत की राजनीति में स्थान

आज किसान आंदोलन और न्यूनतम समर्थन मूल्य को लगभग समानार्थी रूप से देखा जाता है, लेकिन महेंद्र सिंह टिकैत के मूल 1980 के दशक के आंदोलन को आज के MSP विमर्श में सीधे रख देना ऐतिहासिक रूप से सावधानी मांगता है।

टिकैत और BKU बेहतर कृषि मूल्य की मांग करते थे और संगठन ने प्रमुख फसलों के लिए ऊंचे न्यूनतम समर्थन मूल्य का समर्थन किया। एक विस्तृत अध्ययन में BKU की स्थायी मांगों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पैदा होने वाली प्रमुख फसलों के लिए अधिक MSP का स्पष्ट उल्लेख है।

लेकिन टिकैत की राजनीति का केंद्रीय व्यावहारिक प्रश्न केवल MSP नहीं था।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना मूल्य कहीं अधिक तत्काल मुद्दा था।

इसलिए 1980 के दशक के टिकैत आंदोलन को “MSP आंदोलन” कहना उसकी वास्तविक ऐतिहासिक संरचना को संकुचित कर देगा।

13 MSP और गन्ना मूल्य में अंतर

यह अंतर शोध में बनाए रखना आवश्यक है।

गेहूं जैसी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित होता था और सरकारी खरीद महत्वपूर्ण थी।

गन्ने के मूल्य का निर्धारण केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों तथा चीनी उद्योग से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा था।

इसलिए टिकैत के किसान के लिए “फसल का उचित दाम” अलग-अलग फसलों में अलग संस्थागत अर्थ रखता था।

यही कारण है कि BKU ने व्यापक कृषि मूल्य नीति की मांग की, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश की आंदोलनकारी ऊर्जा गन्ने पर विशेष रूप से केंद्रित रही।

14 किसान को मूल्य-निर्धारण में आवाज

टिकैत आंदोलन की एक महत्वपूर्ण मांग यह भी थी कि कृषि मूल्य तय करने वाली सरकारी समितियों और संस्थाओं में किसानों का प्रतिनिधित्व हो।

NPTEL के किसान आंदोलन संबंधी अध्ययन में BKU की मांगों में सरकार द्वारा मूल्य तय करने के लिए बनाई गई समितियों में संगठन के प्रतिनिधियों को शामिल करने का उल्लेख है।

यह मांग आर्थिक लोकतंत्र से जुड़ी थी।

मेरे उत्पादन का मूल्य तय किया जा रहा है।

लेकिन उस निर्णय में मेरी आवाज कहां है?

यानी BKU केवल “मूल्य बढ़ाओ” नहीं कह रही थी।

वह मूल्य निर्धारण की संस्थागत प्रक्रिया में किसान की भागीदारी भी चाहती थी।

15 कृषि लागत की किसान गणना

सरकारी संस्थाएं लागत की गणना सांख्यिकीय पद्धति से करती थीं।

किसान अपनी लागत अलग तरह से महसूस करता था।

टिकैत की ताकत यह थी कि उन्होंने इन सभी खर्चों को अर्थशास्त्रीय तकनीकी भाषा के बजाय किसान की रोजमर्रा की भाषा में प्रस्तुत किया।

किसान को यह समझाने की जरूरत नहीं थी कि “टर्म्स ऑफ ट्रेड” क्या होते हैं।

मेरे खर्च बढ़े हैं, लेकिन फसल का भाव उतना नहीं बढ़ा।

यही टिकैत का राजनीतिक अर्थशास्त्र था।

16 खाद और उर्वरक सब्सिडी

हरित क्रांति की खेती रासायनिक उर्वरकों पर काफी निर्भर हो गई थी।

इसलिए उर्वरक मूल्य में बढ़ोतरी का सीधा असर कृषि लागत पर पड़ता था।

BKU ने रासायनिक उर्वरकों पर उच्च सरकारी सहायता जारी रखने का समर्थन किया और इसे समय-समय पर अपने मांगपत्र में शामिल किया।

इससे टिकैत की आर्थिक सोच का एक और पक्ष सामने आता है।

वे कृषि बाजार में सरकार की भूमिका समाप्त करने की मांग नहीं कर रहे थे।

बल्कि चाहते थे कि सरकार अपनी शक्ति का उपयोग किसान की उत्पादन लागत कम रखने और उपज का मूल्य बढ़ाने के लिए करे।

17 डीजल और कृषि मशीनरी

बिजली के साथ डीजल भी कृषि उत्पादन की महत्वपूर्ण लागत बन चुका था।

ट्रैक्टर, पंपसेट और परिवहन में डीजल का उपयोग होता था।

जैसे-जैसे खेती यंत्रीकृत हुई, पेट्रोलियम कीमतों का किसान आय पर प्रभाव बढ़ा।

हालांकि टिकैत के शुरुआती बड़े आंदोलनों की सबसे स्पष्ट पहचान बिजली और गन्ने से थी, लेकिन उनका व्यापक आर्थिक दृष्टिकोण हर उस लागत को किसान प्रश्न में बदलता था जो कृषि लाभप्रदता को प्रभावित करती थी।

यही वजह है कि BKU का किसान एजेंडा समय के साथ बिजली, पानी और गन्ने से आगे बढ़कर डीजल, खाद, ऋण और दूसरी लागतों तक फैलता गया।

18 कृषि उत्पाद और औद्योगिक वस्तु का मूल्य

1980 के दशक के नए किसान आंदोलन के पीछे एक व्यापक वैचारिक तर्क था—

किसान जो वस्तु बेचता है उसका मूल्य अपेक्षाकृत नियंत्रित या दबा रहता है, लेकिन जो औद्योगिक वस्तुएं किसान खरीदता है उनकी कीमत बढ़ती रहती है।

यदि इन वस्तुओं की कीमत तेजी से बढ़ती है और गेहूं, गन्ना या दूसरी कृषि उपज का मूल्य धीमे बढ़ता है, तो किसान की वास्तविक क्रयशक्ति घटती है।

इसी संबंध को कृषि अर्थशास्त्र में अक्सर कृषि और गैर-कृषि क्षेत्र के बीच विनिमय की शर्तों के प्रश्न से जोड़ा जाता है।

टिकैत इसे सिद्धांत की भाषा में नहीं, ग्रामीण अनुभव की भाषा में रखते थे।

19 टिकैत और शरद जोशी का समान बिंदु

महाराष्ट्र के शरद जोशी और महेंद्र सिंह टिकैत की वैचारिक शैली अलग थी।

जोशी अधिक व्यवस्थित आर्थिक तर्क प्रस्तुत करते थे।

टिकैत ग्रामीण पंचायत की भाषा में बोलते थे।

फिर भी दोनों के बीच एक महत्वपूर्ण समानता थी—

कृषक उत्पादन को उचित आर्थिक मूल्य मिलना चाहिए।

दोनों आंदोलनों ने उस धारणा को चुनौती दी कि किसान की समस्या केवल उत्पादन बढ़ाने से हल हो जाएगी।

प्रश्न यह भी था कि बढ़े उत्पादन का आर्थिक लाभ किसे मिलता है।

यहीं से 1980 के दशक के “नए किसान आंदोलन” की साझा पहचान बनती है।

20 कृषि मूल्य बनाम सस्ता भोजन

टिकैत की आर्थिक मांग का एक बड़ा नीतिगत अंतर्विरोध था।

किसान चाहता है कि उसकी फसल का मूल्य बढ़े।

लेकिन सरकार चाहती है कि शहरी और गरीब उपभोक्ता को भोजन बहुत महंगा न मिले।

यहीं किसान मूल्य नीति का मूल द्वंद्व पैदा होता है।

उच्च कृषि मूल्य किसान के लिए अच्छा हो सकता है।

लेकिन खाद्य मुद्रास्फीति उपभोक्ता के लिए समस्या हो सकती है।

इसलिए सरकार अक्सर कृषि उत्पादक और खाद्य उपभोक्ता—दोनों के हित संतुलित करने की कोशिश करती है।

अध्याय 7

टिकैत आंदोलन की संघर्ष-पद्धति और किसान संस्कृति

महेंद्र सिंह टिकैत और भारतीय किसान यूनियन की सफलता केवल उनकी आर्थिक मांगों का परिणाम नहीं थी। उतनी ही महत्वपूर्ण थी उनकी संघर्ष-पद्धति। टिकैत ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण समाज में पहले से मौजूद पंचायत, चौपाल, सामुदायिक सहयोग और कृषि संसाधनों को आधुनिक जनांदोलन की तकनीक में बदल दिया। इसी कारण BKU अपेक्षाकृत कम औपचारिक संगठनात्मक ढांचे के बावजूद हजारों और कभी-कभी लाखों किसानों को तेजी से लामबंद कर सकी।

टिकैत मॉडल में किसान केवल रैली में भाषण सुनने नहीं आता था। वह ट्रैक्टर-ट्रॉली में राशन और बिस्तर लेकर आता था, धरना स्थल पर चूल्हा जलाता था, पंचायत करता था और आवश्यकता पड़ने पर कई दिनों या सप्ताह तक वहीं रहता था।

करमूखेड़ी, मेरठ और दिल्ली बोट क्लब—तीनों आंदोलनों में इस पद्धति का क्रमिक विकास दिखाई देता है।

इस संघर्ष संस्कृति का सबसे महत्वपूर्ण सूत्र था—

गांव को आंदोलन स्थल तक ले आओ, ताकि आंदोलन को गांव लौटने की जल्दी न रहे।

1 राजनीतिक दल से अलग संगठनात्मक मॉडल

सामान्य राजनीतिक दल की शक्ति उसकी सदस्यता, कार्यालय, पदाधिकारी, चुनावी संगठन और वित्तीय संसाधनों से आती है।

BKU की शक्ति का बड़ा हिस्सा इनसे अलग स्रोतों से आता था।

इसीलिए संगठन को प्रत्येक गांव में विशाल स्थायी कार्यालय या पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की बड़ी नौकरशाही खड़ी करने की आवश्यकता नहीं पड़ी।

इस व्यवस्था की ताकत थी—तेज लामबंदी।

लेकिन उसकी कमजोरी भी इसी में थी—संगठन का बहुत बड़ा हिस्सा व्यक्तिगत नेतृत्व और अनौपचारिक संबंधों पर निर्भर रहता था।

2 पंचायत : आंदोलन की मूल इकाई

टिकैत की राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण संस्था पंचायत थी।

यह सरकारी ग्राम पंचायत से अलग सामाजिक-राजनीतिक सभा थी।

यदि प्रश्न बड़ा हुआ तो आसपास के गांवों को बुलाया गया।

इस प्रकार आंदोलन नीचे से ऊपर बढ़ता था।

टिकैत के लिए पंचायत केवल भाषण का मंच नहीं थी।

यदि हजारों किसानों की पंचायत किसी निर्णय पर सहमत है, तो नेता उस निर्णय को व्यक्तिगत आदेश के बजाय सामूहिक इच्छा के रूप में प्रस्तुत कर सकता था।

यही टिकैत नेतृत्व की एक महत्वपूर्ण राजनीतिक तकनीक थी।

3 महापंचायत : संख्या को शक्ति में बदलना

महापंचायत पंचायत का विस्तृत रूप थी।

इसका उद्देश्य केवल भीड़ जुटाना नहीं था।

वह सामूहिक शक्ति का सार्वजनिक प्रदर्शन भी थी।

हजारों किसान यदि किसी गांव या मैदान में एकत्र होते हैं, तो सरकार को संदेश मिलता है कि मांग केवल कुछ पदाधिकारियों की नहीं है।

महापंचायत का एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव किसान पर भी पड़ता था।

अपने गांव में अकेला किसान प्रशासन के सामने कमजोर महसूस कर सकता है।

लेकिन हजारों किसानों के बीच वही व्यक्ति स्वयं को एक बड़े समुदाय का हिस्सा महसूस करता है।

यानी महापंचायत केवल राजनीतिक दबाव नहीं बनाती थी।

वह किसान की सामूहिक आत्मचेतना भी बनाती थी।

4 खाप नेटवर्क और किसान संगठन

टिकैत के नेतृत्व में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की खाप और बिरादरी आधारित सामाजिक संरचनाओं का उपयोग लामबंदी में हुआ।

लेकिन BKU को खाप का दूसरा नाम मानना गलत होगा।

खाप का आधार सामाजिक और कई मामलों में गोत्रीय था।

टिकैत की रणनीतिक क्षमता यह थी कि उन्होंने पहले से मौजूद ग्रामीण संपर्क नेटवर्क को किसान आंदोलन के लिए इस्तेमाल किया, लेकिन आंदोलन की अपील को जाति से बाहर ले जाने का प्रयास किया।

यही कारण था कि जाट सामाजिक आधार मजबूत होने के बावजूद मुस्लिम किसान, गुर्जर, त्यागी और दूसरे कृषक समुदाय भी विभिन्न आंदोलनों में शामिल हुए।

5 मौखिक संचार की शक्ति

1980 के दशक में मोबाइल फोन नहीं थे।

फिर भी हजारों किसानों तक बहुत कम समय में आंदोलन का संदेश पहुंच जाता था।

मंदिर–मस्जिद और गांव की सार्वजनिक जगहें।

BKU ने ग्रामीण समाज की इस मौजूदा संचार व्यवस्था का अत्यंत प्रभावी उपयोग किया।

यह एक प्रकार का पूर्व-डिजिटल सामाजिक नेटवर्क था।

6 ट्रैक्टर-ट्रॉली : आंदोलन का सबसे उपयोगी साधन

हरित क्रांति ने किसान को ट्रैक्टर दिया था।

टिकैत आंदोलन ने उसे राजनीतिक वाहन बना दिया।

ट्रैक्टर-ट्रॉली की सबसे बड़ी विशेषता उसकी बहुउपयोगिता थी।

रात में ट्रॉली को अस्थायी आश्रय बनाया जा सकता था।

और जरूरत पड़ने पर किसान उसी वाहन से गांव लौट सकता था।

मेरठ और दिल्ली आंदोलनों में ट्रैक्टर-ट्रॉली ने BKU को असाधारण गतिशीलता दी।

7 कृषि आधुनिकीकरण का अनपेक्षित राजनीतिक परिणाम

यहां एक रोचक ऐतिहासिक विरोधाभास था।

सरकार ने कृषि आधुनिकीकरण को बढ़ावा दिया।

इन्हीं संसाधनों ने किसान की आंदोलन क्षमता भी बढ़ा दी।

बैलगाड़ी युग में सैकड़ों किलोमीटर दूर राजधानी तक विशाल किसान जमावड़ा करना कठिन था।

इस अर्थ में हरित क्रांति ने केवल कृषि उत्पादन नहीं बढ़ाया।

उसने किसान की राजनीतिक गतिशीलता भी बढ़ाई।

8 हुक्का : ग्रामीण पहचान का राजनीतिक प्रतीक

महेंद्र सिंह टिकैत की तस्वीर हुक्के के बिना अधूरी मानी जाने लगी।

हुक्का पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण सामाजिक जीवन का पुराना हिस्सा था।

लेकिन टिकैत के आंदोलन में उसका नया राजनीतिक अर्थ बन गया।

दिल्ली के बोट क्लब जैसे राष्ट्रीय सत्ता-स्थल पर जब किसान हुक्का लेकर बैठा, तो दृश्य स्वयं राजनीतिक प्रतीक बन गया।

एक तरफ नौकरशाही का आधुनिक सत्ता तंत्र।

इसीलिए टिकैत आंदोलन को बाद की पत्रकारिता में कई बार “हुक्का बनाम हुकूमत” के रूपक में याद किया गया।

9 चारपाई भी आंदोलन का साधन

चारपाई सामान्य ग्रामीण घरेलू वस्तु थी।

लेकिन लंबे धरनों में वह अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई।

इस तरह टिकैत आंदोलन में किसान ने अलग से विशाल आंदोलन बुनियादी ढांचा खड़ा करने के बजाय अपने रोजमर्रा के ग्रामीण संसाधनों का उपयोग किया।

यही आंदोलन को सस्ता और टिकाऊ बनाता था।

10 सामुदायिक रसोई : आंदोलन की जीवनरेखा

लंबे धरने का सबसे कठिन प्रश्न भोजन है।

यदि हजारों किसान दस, बीस या तीस दिन बैठेंगे तो उन्हें भोजन कौन देगा?

किसी एक बड़े दाता पर निर्भरता कम रही।

इसने आंदोलन को वित्तीय रूप से अपेक्षाकृत आत्मनिर्भर बनाया।

मेरठ आंदोलन में आसपास के गांवों से खाद्य सामग्री की नियमित आपूर्ति इस मॉडल की सफलता का प्रमुख कारण बनी।

11 किसान परिवार आंदोलन की आर्थिक इकाई

इस व्यवस्था का एक गहरा सामाजिक अर्थ भी था।

धरने पर बैठा किसान अकेला राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं था।

कोई धरना स्थल के लिए राशन तैयार कर रहा था।

कोई ट्रैक्टर से सामान पहुंचा रहा था।

इसलिए किसान आंदोलन की वास्तविक इकाई केवल व्यक्ति नहीं, कई बार कृषक परिवार और ग्रामीण समुदाय था।

12 महिलाओं की भूमिका

टिकैत आंदोलन की सार्वजनिक छवि लंबे समय तक पुरुष प्रधान रही, लेकिन महिलाओं की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

मेरठ जैसे आंदोलनों में महिलाएं धरना स्थल पर उपस्थित थीं।

और किसान परिवार की घरेलू व्यवस्था बनाए रखकर पुरुषों के लंबे आंदोलन को संभव बनाया।

बाद के किसान आंदोलनों में महिलाओं की प्रत्यक्ष भागीदारी और बढ़ी।

इस दृष्टि से टिकैत काल ने किसान परिवार को आंदोलन की इकाई बनाने की जो पद्धति विकसित की, उसमें महिलाओं का श्रम अनिवार्य था—भले ही नेतृत्व संरचना में उन्हें समान प्रतिनिधित्व नहीं मिला।

13 धरना : प्रतीक्षा को राजनीतिक हथियार बनाना

सामान्य विरोध प्रदर्शन कुछ घंटों का होता है।

किसान जल्दी लौटने की मजबूरी से मुक्त हो जाए तो प्रशासन के सामने गंभीर समस्या पैदा होती है।

क्योंकि प्रत्येक अतिरिक्त दिन मीडिया का ध्यान बढ़ाता है।

और सरकार की प्रतिष्ठा प्रभावित होती है।

इस प्रकार लंबे धरने में किसान का सबसे बड़ा हथियार कई बार केवल यह होता था—

14 घेराव : समस्या के केंद्र पर दबाव

टिकैत आंदोलन में घेराव भी महत्वपूर्ण रणनीति था।

यह रणनीति समस्या और विरोध स्थल के बीच प्रत्यक्ष संबंध बनाती थी।

इससे आंदोलन का संदेश भी सरल रहता था।

किसान किसके खिलाफ बैठा है और क्यों बैठा है—यह आम जनता तुरंत समझ सकती थी।

15 सरकारी देयों का भुगतान रोकना

BKU की सबसे विवादास्पद संघर्ष-पद्धतियों में से एक थी सरकारी देयों के भुगतान को सामूहिक रूप से रोकने की अपील।

यदि हजारों किसान व्यक्तिगत रूप से बकाया रखें तो प्रशासन प्रत्येक किसान पर दबाव डाल सकता है।

लेकिन यदि पूरा क्षेत्र सामूहिक रूप से भुगतान रोक दे तो वसूली प्रशासन के लिए राजनीतिक संकट बन जाती है।

इस प्रकार व्यक्तिगत आर्थिक अवज्ञा को सामूहिक आर्थिक असहयोग में बदल दिया जाता था।

16 गांधीवादी असहयोग से समानता और अंतर

यह पद्धति औपनिवेशिक दौर के कर-अस्वीकार और गांधीवादी असहयोग की याद दिलाती है।

खेड़ा सत्याग्रह में राजस्व न देने का सामूहिक निर्णय हुआ था।

बारदोली में भी बढ़ा भूमि राजस्व न देने की रणनीति अपनाई गई थी।

टिकैत के यहां बिजली बिल और सिंचाई शुल्क रोकने में समान तत्व दिखाई देता है।

खेड़ा और बारदोली औपनिवेशिक शासन के राजस्व प्रश्न से जुड़े थे।

BKU लोकतांत्रिक भारत में निर्वाचित सरकार से कृषि लागत और सेवा शुल्क पर संघर्ष कर रही थी।

इसलिए पद्धति में ऐतिहासिक समानता थी, राजनीतिक संदर्भ में बड़ा अंतर।

17 गिरफ्तारी देने से अधिक गिरफ्तारी कठिन बनाना

कई पारंपरिक आंदोलनों में गिरफ्तारी देना स्वयं राजनीतिक रणनीति होती है।

विशाल किसान भीड़ के बीच नेतृत्व को गिरफ्तार करना प्रशासन के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता था।

मेरठ में टिकैत की गिरफ्तारी की संभावना पर प्रशासन को यही कठिनाई महसूस हुई।

यदि हजारों किसान अपने नेता को घेरकर बैठे हों, तो गिरफ्तारी कानून-व्यवस्था का बड़ा संकट बन सकती है।

इस तरह संख्या स्वयं नेता की राजनीतिक सुरक्षा बन जाती थी।

18 सड़क रोको

जब धरना पर्याप्त दबाव न बनाए, तो BKU सड़क अवरोध की रणनीति अपना सकती थी।

सड़क रोकने से प्रशासन पर तत्काल दबाव पड़ता है।

लेकिन यही पद्धति आंदोलन की नैतिक और सार्वजनिक सीमाओं की परीक्षा भी लेती है।

क्योंकि इससे सामान्य नागरिक भी प्रभावित होते हैं।

टिकैत आंदोलन के इतिहास में सड़क अवरोध ने कई बार प्रभावी दबाव बनाया, लेकिन कुछ अवसरों पर पुलिस टकराव भी पैदा किया।

19 रेल रोको

रेलवे अवरोध उससे भी अधिक शक्तिशाली रणनीति थी।

रेल राष्ट्रीय परिवहन तंत्र की जीवनरेखा है।

रेल रोकने का अर्थ केवल स्थानीय प्रशासन नहीं, व्यापक सरकारी व्यवस्था पर दबाव डालना है।

लेकिन यह रणनीति अधिक जोखिमपूर्ण भी थी।

पुलिस कार्रवाई की संभावना बढ़ती थी।

सामान्य यात्रियों को कठिनाई होती थी।

1988 के आंदोलन क्रम में सड़क और रेल अवरोध के दौरान पुलिस–किसान टकराव गंभीर हुआ और रजबपुर जैसी गोलीबारी की घटनाएं सामने आईं।

इसलिए BKU के इतिहास में रेल और सड़क अवरोध को केवल सफल संघर्ष तकनीक के रूप में नहीं, बल्कि उसकी जोखिमपूर्ण सीमा के रूप में भी देखना चाहिए।

20 अनुशासन क्यों आवश्यक था?

लाखों लोगों का आंदोलन दो तरीकों से सरकार को शक्ति दिखा सकता है—

टिकैत की रणनीति मुख्यतः संख्या पर आधारित थी।

यदि आंदोलन व्यापक हिंसा में बदल जाता तो सरकार को कठोर कार्रवाई का नैतिक और कानूनी आधार मिल जाता।

इसलिए नेतृत्व बार-बार अनुशासन पर जोर देता था।

सरकारी संपत्ति को नुकसान न पहुंचाओ।

व्यवहार में प्रत्येक आंदोलन में यह अनुशासन पूर्णतः कायम नहीं रह सका, लेकिन संगठन की घोषित रणनीति बड़े पैमाने पर सामूहिक दबाव और सीमित अहिंसक अवज्ञा पर आधारित थी।

21 टिकैत की अहिंसा : गांधीवाद या व्यवहारवाद?

टिकैत को सीधे गांधीवादी नेता कहना सावधानी मांगता है।

उन्होंने गांधी की तरह कोई व्यापक अहिंसात्मक राजनीतिक दर्शन विकसित नहीं किया था।

विशाल किसान संख्या स्वयं पर्याप्त दबाव पैदा कर सकती थी।

इसलिए उनकी अहिंसा को कई मामलों में रणनीतिक अहिंसा कहना अधिक उपयुक्त होगा।

हालांकि कर-अस्वीकार, लंबे धरने और शांतिपूर्ण सामूहिक अवज्ञा जैसी पद्धतियों में गांधीवादी आंदोलनों से स्पष्ट ऐतिहासिक समानताएं दिखाई देती हैं।

22 जब अनुशासन टूटा

टिकैत आंदोलन हमेशा पूर्णतः अहिंसक नहीं रहा।

करमूखेड़ी में पुलिस–किसान हिंसक टकराव हुआ।

1988 के आंदोलन क्रम में रजबपुर में गंभीर संघर्ष और पुलिस गोलीबारी हुई।

दिल्ली बोट क्लब आंदोलन के अंतिम दिनों में पुलिस और किसानों के बीच लाठीचार्ज, आंसू गैस और अवरोधक तोड़ने जैसी घटनाएं हुईं।

इन घटनाओं से एक महत्वपूर्ण सीमा सामने आती है—

विशाल अनौपचारिक भीड़ पर केंद्रीय नेतृत्व का नियंत्रण कभी पूर्ण नहीं होता।

इसलिए टिकैत आंदोलन की संघर्ष-पद्धति का मूल्यांकन करते समय उसके शांतिपूर्ण अनुशासन और हिंसक अपवाद—दोनों दर्ज करना आवश्यक है।

23 पुलिस गोलीबारी और शहादत की स्मृति

करमूखेड़ी और रजबपुर जैसी घटनाओं में किसानों की मृत्यु ने BKU की आंदोलन संस्कृति में “शहीद किसान” की स्मृति पैदा की।

इन सबने आंदोलन को भावनात्मक निरंतरता दी।

किसी आर्थिक मांग के लिए हुआ संघर्ष अब केवल बिल और मूल्य की गणना नहीं रहता।

उसके साथ सम्मान और बलिदान की स्मृति जुड़ जाती है।

यही स्मृति नए किसानों को भी आंदोलन से जोड़ती है।

24 लोकगीत और किसान संस्कृति

ग्रामीण आंदोलन केवल भाषण से नहीं चलता।

ये सभी आंदोलन संस्कृति का हिस्सा थे।

विशेषकर महिलाओं और ग्रामीण समूहों द्वारा गाए जाने वाले गीत संघर्ष को सामाजिक उत्सव और सामूहिक अनुभव में बदलते थे।

इससे लंबे धरने की थकान कम होती थी और राजनीतिक संदेश स्थानीय सांस्कृतिक भाषा में फैलता था।

25 आंदोलन और मेले के बीच

बड़े BKU धरनों का दृश्य कई बार ग्रामीण मेले जैसा दिखाई देता था।

किसान को आंदोलन में भाग लेने के लिए अपनी सामाजिक दुनिया छोड़नी नहीं पड़ती थी।

वह अपनी सामाजिक दुनिया को ही आंदोलन स्थल पर ले आता था।

26 आंदोलन का विकेंद्रीकृत वित्त

विशाल आंदोलन चलाने के लिए सामान्यतः बड़ी धनराशि चाहिए।

BKU ने इसका एक हिस्सा विकेंद्रीकृत कर दिया।

इस तरह आंदोलन की लागत हजारों परिवारों में विभाजित हो जाती थी।

यह मॉडल राजनीतिक वित्त की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था।

संगठन के पास बहुत बड़ा केंद्रीय कोष न हो तब भी विशाल आंदोलन संभव था।

27 सरकार की ‘थका दो’ रणनीति क्यों विफल होती थी?

लंबे धरनों के विरुद्ध प्रशासन की सामान्य रणनीति होती है—

लेकिन टिकैत मॉडल ने इसी गणना को चुनौती दी।

इसलिए आंदोलन कई दिनों तक टिक सकता है।

यह BKU की सबसे बड़ी रणनीतिक उपलब्धियों में से एक थी।

28 नेता और भीड़ के बीच कम दूरी

टिकैत की नेतृत्व शैली भी संघर्ष-पद्धति का हिस्सा थी।

वे बड़े सुरक्षा घेरे में अलग मंच पर बैठे राजनेता जैसी छवि नहीं बनाते थे।

इससे नेता और समर्थक के बीच सामाजिक दूरी कम दिखाई देती थी।

किसान उन्हें “दिल्ली का नेता” नहीं बल्कि “अपने बीच का चौधरी” मान सकता था।

29 मीडिया के लिए शक्तिशाली दृश्य

टिकैत आंदोलन की ग्रामीण संस्कृति मीडिया की दृष्टि से भी अत्यंत प्रभावी थी।

ये दृश्य किसी लंबे राजनीतिक भाषण से अधिक प्रभावशाली थे।

उन्होंने राष्ट्रीय मीडिया को किसान आंदोलन का ऐसा दृश्यात्मक प्रतीक दिया जो आसानी से जनता की स्मृति में बस गया।

30 गैर-दलीय मंच भी संघर्ष-पद्धति था

राजनीतिक नेताओं को आंदोलन मंच पर कब्जा न करने देना केवल वैचारिक निर्णय नहीं था।

यदि विपक्षी नेता मंच पर आ जाए तो सरकार आंदोलन को विपक्षी राजनीति कह सकती है।

यदि किसान स्वयं मंच नियंत्रित करे तो सरकार को सीधे किसान से बात करनी पड़ती है।

इसलिए टिकैत की गैर-दलीयता आंदोलन की नैतिक वैधता बनाए रखने की संघर्ष तकनीक भी थी।

31 प्रशासन से बातचीत के लिए दबाव, बातचीत का निषेध नहीं

BKU राज्य से संवाद समाप्त नहीं करती थी।

यानी आंदोलन का लक्ष्य सरकार को गिराना नहीं था।

उसे किसान की मांग पर बातचीत के लिए मजबूर करना था।

इसलिए टिकैत मॉडल को संघर्ष और सौदेबाजी का संयुक्त मॉडल कहा जा सकता है।

32 2020–21 में टिकैत मॉडल की प्रतिध्वनि

और आंदोलन स्थल को स्थायी सामाजिक जीवन में बदल देना।

अध्याय 8

टिकैत और राजनीतिक दल

महेंद्र सिंह टिकैत की किसान राजनीति का सबसे आकर्षक और सबसे विवादास्पद पक्ष था—गैर-दलीयता। भारतीय किसान यूनियन स्वयं को राजनीतिक दल नहीं, बल्कि किसानों का स्वतंत्र दबाव-संगठन मानती थी। उसका सिद्धांत था कि किसान की समस्याएं किसी एक पार्टी की नहीं हैं; इसलिए किसान को अपनी मांगों के लिए सरकार से लड़ना चाहिए, चाहे सरकार कांग्रेस की हो, जनता दल की, भाजपा की या किसी और दल की।

यही विचार 1980 के दशक में BKU की असाधारण शक्ति का कारण बना। कांग्रेस समर्थक किसान, लोकदल समर्थक किसान और भाजपा की ओर झुकाव रखने वाला किसान—सभी एक ही पंचायत में बैठ सकते थे। लेकिन जैसे-जैसे संगठन प्रभावशाली हुआ, राजनीतिक दलों ने उसे अपने पक्ष में करने की कोशिश की और BKU भी चुनावी राजनीति से पूरी तरह दूरी बनाए रखने में सफल नहीं रही।

इसलिए टिकैत की गैर-दलीय राजनीति को समझने के लिए दो स्तरों को अलग रखना आवश्यक है—

दूसरा, चुनावी राजनीति में उसका वास्तविक व्यवहार।

अकादमिक अध्ययनों में भी BKU की गैर-दलीयता को उसकी प्रारंभिक विश्वसनीयता का महत्वपूर्ण स्रोत माना गया है। संगठन ने जानबूझकर प्रतिस्पर्धी दलगत राजनीति से दूरी बनाई, क्योंकि किसी एक दल का चुनाव करने से किसान समुदाय की जाति, धर्म और पार्टी आधारित विभिन्न पहचानों को एक मंच पर लाना कठिन हो सकता था।

1 ‘गैर-राजनीतिक’ नहीं, ‘गैर-दलीय’

सबसे पहले एक सामान्य भ्रम दूर करना आवश्यक है।

BKU को “गैर-राजनीतिक संगठन” कहना शाब्दिक रूप से सही नहीं है।

बिजली दर कम करवाना राजनीतिक प्रश्न है।

गन्ना मूल्य बढ़वाना राजनीतिक प्रश्न है।

सरकारी कार्यालय घेरना राजनीतिक कार्रवाई है।

केंद्र और राज्य सरकार से वार्ता करना भी राजनीति है।

वे राजनीतिक दलों की संस्थागत प्रतिस्पर्धा से बाहर रहकर राजनीति करना चाहते थे।

2 किसान पहले, पार्टी बाद में

किसान अपनी पसंद की पार्टी को वोट दे सकता है, लेकिन किसान की मांग के प्रश्न पर उसे दूसरे किसानों के साथ खड़ा होना चाहिए।

एक अध्ययन में BKU समर्थक की सोच को इस रूप में दर्ज किया गया कि मुख्य बात सरकार से किसान की बात मनवाना है; वोट उसी को दिया जा सकता है जो किसान की सहायता करे। अध्ययन इसे उस गैर-दलीय दबाव-राजनीति का हिस्सा मानता है जिसमें संगठन विधानमंडल में प्रवेश किए बिना किसान हितों पर केंद्रित रह सकता था।

किसान आंदोलन को चुनावी गठबंधन की तरह हर प्रश्न पर समान राय रखने की जरूरत नहीं थी।

3 गैर-दलीयता की विश्वसनीयता

टिकैत जानते थे कि यदि BKU किसी एक पार्टी की शाखा बन गई तो दूसरी पार्टी का समर्थक किसान उससे दूर हो सकता है।

इसलिए 1988 के मेरठ आंदोलन में उन्होंने प्रमुख दलों के नेताओं को आंदोलन मंच पर कब्जा नहीं करने दिया।

यहां तक कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक नेताओं में से एक अजित सिंह को भी किसानों को मंच से संबोधित करने की अनुमति नहीं दी गई। इसके विपरीत शरद जोशी और स्वामी अग्निवेश जैसे गैर-दलीय आंदोलनकारी व्यक्तियों को बोलने दिया गया।

मंच किसान का है, चुनावी नेता का नहीं।

4 कांग्रेस के साथ पहला बड़ा टकराव

BKU के उत्कर्ष के समय उत्तर प्रदेश और केंद्र—दोनों स्तरों पर कांग्रेस महत्वपूर्ण सत्ता शक्ति थी।

उत्तर प्रदेश में वीर बहादुर सिंह की कांग्रेस सरकार से टिकैत का पहला बड़ा टकराव हुआ।

1987 में किसान आंदोलन बढ़ने पर मुख्यमंत्री स्वयं सिसौली पहुंचे। अकादमिक अध्ययन के अनुसार 11 अगस्त 1987 को वीर बहादुर सिंह ने किसानों की सभा को संबोधित करते हुए उचित मांगें पूरी करने का आश्वासन दिया। BKU नेतृत्व ने उनका औपचारिक राजनीतिक स्वागत नहीं किया और टिकैत ने घोषणा की कि सरकार को अपनी बात लागू करने के लिए अतिरिक्त समय दिया जा सकता है। मांगें पूरी न होने पर अक्टूबर में किसानों से सरकारी देयों का भुगतान रोकने को कहा गया।

यह घटना टिकैत की रणनीति का प्रारंभिक उदाहरण थी—

5 मेरठ में कांग्रेस सरकार को चुनौती

जनवरी–फरवरी 1988 का मेरठ कमिश्नरी घेराव सीधे कांग्रेस सरकार के विरुद्ध दबाव था।

India Today की समकालीन रिपोर्ट ने लिखा कि राज्य सरकार ने आंदोलन को थकाकर समाप्त करने की कोशिश की, लेकिन वह टिकैत की लोकप्रियता और किसानों की लामबंदी का अनुमान लगाने में विफल रही। महत्वपूर्ण बात यह थी कि वामपंथी दलों को छोड़कर लगभग सभी प्रमुख विपक्षी राजनीतिक शक्तियों ने टिकैत आंदोलन को समर्थन देना चाहा।

यही गैर-दलीय संगठन की राजनीतिक शक्ति थी।

लेकिन आंदोलन जरूरी नहीं था कि विपक्ष के नियंत्रण में चला जाए।

6 राजीव गांधी सरकार और बोट क्लब

अक्टूबर 1988 में दिल्ली बोट क्लब आंदोलन ने टिकैत और कांग्रेस के संबंध को राष्ट्रीय स्तर पर टकराव में बदल दिया।

लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए कि टिकैत की आलोचना कांग्रेस की विचारधारा से अधिक सरकार की कृषि नीति पर केंद्रित थी।

वे कांग्रेस को स्थायी राजनीतिक शत्रु घोषित नहीं कर रहे थे।

जो सरकार किसान की मांग नहीं मानेगी, किसान उसका विरोध करेगा।

यही कारण है कि BKU की राजनीति में आज का विरोधी कल बातचीत का पक्ष बन सकता था।

यह वैचारिक दल-विरोध के बजाय हित आधारित दबाव राजनीति थी।

7 क्या 1988 का आंदोलन कांग्रेस-विरोधी चुनाव अभियान था?

बोट क्लब आंदोलन के समय राजीव गांधी सरकार निश्चित रूप से गंभीर दबाव में आई।

लेकिन BKU ने स्वयं को औपचारिक विपक्षी चुनावी मोर्चे में परिवर्तित नहीं किया।

उस समय वी. पी. सिंह और राष्ट्रीय विपक्ष कांग्रेस सरकार के विरुद्ध तेजी से उभर रहे थे, फिर भी टिकैत ने आंदोलन का स्वतंत्र चरित्र बनाए रखने की कोशिश की।

लेकिन इस संघर्ष का स्वाभाविक राजनीतिक प्रभाव था।

कांग्रेस के विरुद्ध ग्रामीण असंतोष बढ़ा और BKU द्वारा निर्मित किसान वातावरण ने 1989 की राजनीति को प्रभावित किया।

8 1989 : गैर-दलीयता की पहली बड़ी दरार

1988 तक टिकैत की गैर-दलीयता अपेक्षाकृत मजबूत थी।

लेकिन 1989 के चुनावों के समय BKU ने जनता दल और राष्ट्रीय मोर्चे की ओर स्पष्ट राजनीतिक झुकाव दिखाया।

एक विस्तृत अकादमिक अध्ययन के अनुसार BKU ने 1989 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जनता दल से समझौता किया और किसानों से जनता दल उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान की अपील की। जनता दल सरकार बनने के बाद मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने।

एक दूसरे अध्ययन में भी यह निष्कर्ष दर्ज है कि उत्तर प्रदेश और हरियाणा में किसान आंदोलन ने 1989 में राष्ट्रीय मोर्चे के पक्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और कांग्रेस की पराजय में उसका योगदान रहा।

यह BKU की गैर-दलीय राजनीति में निर्णायक बदलाव था।

9 वी. पी. सिंह और राष्ट्रीय मोर्चा

1988–89 में वी. पी. सिंह कांग्रेस-विरोधी राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में थे।

किसान आंदोलनों, विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के असंतोष और राष्ट्रीय मोर्चे की राजनीति के बीच स्वाभाविक समीकरण बना।

BKU ने कांग्रेस सरकार पर जो कृषि दबाव बनाया था, उसका चुनावी लाभ विपक्ष को मिला।

लेकिन यही स्थिति टिकैत के लिए एक कठिन प्रश्न पैदा करती थी—

यदि किसी दल को चुनाव जिताने में किसान संगठन मदद करता है, तो सरकार बनने के बाद उससे क्या अपेक्षा होगी?

और यदि वह सरकार भी मांगें न माने तो क्या होगा?

10 जनता दल सरकार से मोहभंग

जनता दल सरकार बनने के बाद BKU को उम्मीद थी कि उसकी लंबित मांगों पर अधिक तेजी से कार्रवाई होगी।

अकादमिक अध्ययन के अनुसार टिकैत ने समझौते में किए गए वादों को लागू कराने की कोशिश की, लेकिन मुलायम सिंह यादव सरकार से अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। सरकार और BKU के बीच टकराव बढ़ा और पुलिस कार्रवाई तथा टिकैत की गिरफ्तारी तक की स्थिति बनी।

इस अनुभव ने BKU को उस संकट में डाल दिया जिससे वह बचना चाहती थी—

जिस पार्टी को समर्थन दिया था, उसी सरकार के विरुद्ध आंदोलन करना पड़ा।

यहीं गैर-दलीयता की उपयोगिता फिर स्पष्ट हुई।

11 सरकार बदलने से किसान समस्या क्यों नहीं बदली?

यह टिकैत राजनीति का महत्वपूर्ण अनुभव था।

लेकिन गन्ना, बिजली और किसान आय के प्रश्न बने रहे।

इससे उस मूल BKU सिद्धांत को नया आधार मिला कि किसान को किसी पार्टी के स्थायी अनुयायी नहीं बनना चाहिए।

सत्ता में आने के बाद प्रत्येक दल प्रशासनिक और वित्तीय सीमाओं से बंध जाता है।

इसलिए किसान संगठन को सरकार से स्वतंत्र रहना चाहिए।

परंतु व्यवहार में BKU अब पहले जैसी साफ दूरी नहीं बनाए रख पा रही थी।

12 चौधरी चरण सिंह : राजनीतिक गुरु, लेकिन अलग रास्ता

महेंद्र सिंह टिकैत और चौधरी चरण सिंह का संबंध भारतीय किसान राजनीति की दो अलग रणनीतियों को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

चरण सिंह किसान को राजनीतिक सत्ता तक पहुंचाना चाहते थे।

विधानसभा और संसद को किसान राजनीति का प्रमुख माध्यम माना।

टिकैत उसी कृषक सामाजिक आधार से निकले, लेकिन उनका रास्ता अलग था।

वे सत्ता में जाने के बजाय सत्ता पर दबाव डालना चाहते थे।

एक शोध में उल्लेख है कि टिकैत स्वयं चरण सिंह को अपना मार्गदर्शक मानते थे, लेकिन जहां चरण सिंह ने पार्टी व्यवस्था के भीतर शक्ति हासिल करने का मार्ग अपनाया, वहीं BKU ने गैर-विधायी दबाव संगठन बनने की रणनीति विकसित की।

यहीं दोनों की राजनीति में निरंतरता भी थी और अंतर भी।

13 चरण सिंह की सबसे बड़ी विरासत

टिकैत संगठनात्मक रूप से चरण सिंह की पार्टी के उत्तराधिकारी नहीं थे।

लेकिन सामाजिक रूप से वे चरण सिंह द्वारा निर्मित किसान चेतना की जमीन पर खड़े थे।

चरण सिंह ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मध्यम कृषक को यह राजनीतिक विश्वास दिया था कि किसान की अपनी आर्थिक पहचान है।

टिकैत ने उसी भावना को चुनावी राजनीति से निकालकर प्रत्यक्ष आंदोलन में बदल दिया।

चरण सिंह ने किसान को वोट की शक्ति दिखाई; टिकैत ने उसे धरने और पंचायत की शक्ति दिखाई।

14 अजित सिंह और टिकैत : सहयोग से अधिक प्रतिस्पर्धा

1987 में चरण सिंह के निधन के बाद उनके पुत्र अजित सिंह ने राजनीतिक विरासत संभाली।

इसी समय टिकैत किसान आंदोलनों के माध्यम से तेजी से उभर रहे थे।

इससे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक दिलचस्प शक्ति-संतुलन बना।

दोनों का सामाजिक आधार कई क्षेत्रों में एक-दूसरे से जुड़ा हुआ था, विशेषकर जाट किसान समाज में।

इसलिए उनके बीच सहयोग की संभावना भी थी और प्रतिस्पर्धा भी।

15 किसान वोट किसका?

यह प्रश्न पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति का केंद्रीय प्रश्न बन गया।

किसान आंदोलन में टिकैत के पीछे जा सकता था।

लेकिन चुनाव में वही किसान चरण सिंह परिवार या किसी दूसरे दल को वोट दे सकता था।

Indian Express ने बाद के विश्लेषण में इस स्थिति को बहुत स्पष्ट ढंग से रखा—पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जाट किसान आंदोलन के समय टिकैत के साथ चलता था, लेकिन चुनावी राजनीति में चरण सिंह परिवार का प्रभाव अधिक मजबूत रहा।

यही BKU की चुनावी सीमा का मूल कारण था।

आंदोलन की निष्ठा और वोट की निष्ठा समान नहीं थीं।

16 अजित सिंह ने टिकैत की ‘राजनीतिकता’ का विरोध क्यों किया?

जब टिकैत ने राजनीतिक नेताओं को सिसौली में बुलाना और चुनावी समीकरण बनाना शुरू किया, तो अजित सिंह ने इसका विरोध किया।

एक अकादमिक अध्ययन के अनुसार अजित सिंह गांव-गांव गए और BKU के “राजनीतिकरण” की आलोचना की। उनका तर्क था कि टिकैत राजनीतिक नेताओं को मंच देकर किसान संगठन के मूल चरित्र से समझौता कर रहे हैं। इस आलोचना का कुछ किसानों पर प्रभाव पड़ा और BKU की एकता कमजोर हुई।

इसमें राजनीतिक रणनीति भी स्पष्ट थी।

यदि BKU गैर-दलीय रहती है, तो अजित सिंह के चुनावी क्षेत्र को सीधी चुनौती कम है।

यदि BKU स्वयं चुनाव लड़ने लगे तो वही कृषक वोट दोनों के बीच बंट सकता है।

17 1991 : भाजपा की ओर झुकाव

1989 में जनता दल के समर्थन के बाद BKU का उसके साथ संबंध खराब हुआ।

1991 में संगठन का झुकाव भाजपा की ओर दिखाई दिया।

एक महत्वपूर्ण अकादमिक अध्ययन स्पष्ट रूप से कहता है कि BKU ने 1991 के चुनाव में भाजपा को खुला समर्थन दिया।

अन्य अध्ययनों में इसे कुछ अधिक सावधानी से “अनौपचारिक गठजोड़” या अप्रत्यक्ष समर्थन कहा गया है। 1990 के दशक के किसान आंदोलन पर एक प्रमुख अध्ययन ने भी लिखा कि BKU और भाजपा के बीच चुनावी समीकरण के मजबूत संकेत थे, हालांकि संगठन के नेता सार्वजनिक रूप से इस संबंध को अस्पष्ट रखते थे।

1991 में BKU की घोषित गैर-दलीयता के बावजूद भाजपा के प्रति स्पष्ट चुनावी निकटता विकसित हुई।

18 क्या BKU भाजपा की संगठनात्मक सहयोगी बन गई?

उसका अपना नेतृत्व, संगठन और कृषि एजेंडा बना रहा।

टिकैत ने अयोध्या जैसे मुद्दों को किसान संगठन का मुख्य प्रश्न मानने से इनकार किया था। 1991 के आसपास किए गए अध्ययनों में मुस्लिम BKU सदस्यों ने भी संगठन को बहुधार्मिक किसान संगठन के रूप में देखा।

इसलिए चुनावी समर्थन को वैचारिक विलय समझना गलत होगा।

लेकिन यह भी सच है कि इस समर्थन ने BKU की राजनीतिक तटस्थता की छवि कमजोर की।

19 भाजपा को समर्थन का राजनीतिक प्रभाव

1991 के चुनाव में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में बड़ी सफलता प्राप्त की।

BKU के प्रभाव वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी भाजपा मजबूत हुई।

यह कहना संभव नहीं कि परिणाम का कारण केवल BKU था—अयोध्या आंदोलन, कांग्रेस और जनता दल का संकट तथा व्यापक राजनीतिक ध्रुवीकरण उससे कहीं बड़े कारक थे।

लेकिन टिकैत का झुकाव भाजपा को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कृषक समाज में अतिरिक्त स्वीकार्यता देने वाले कारकों में शामिल था।

यहीं किसान पहचान और व्यापक धार्मिक-राजनीतिक पहचान के बीच वह तनाव दिखाई देने लगा जो आने वाले दशकों में अधिक गहरा हुआ।

20 कांग्रेस, जनता दल और भाजपा—तीनों ने टिकैत को क्यों चाहा?

क्योंकि टिकैत वोटों को प्रभावित कर सकते थे।

एक अध्ययन ने दर्ज किया कि कांग्रेस, जनता दल और 1990 के बाद भाजपा—तीनों के महत्वपूर्ण नेताओं ने टिकैत को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया।

जब हर पार्टी किसान नेता को अपने साथ चाहती है तो संगठन के सामने बड़ा प्रलोभन पैदा होता है—

या अपनी लोकप्रियता को चुनावी शक्ति में बदले?

1990 के दशक में BKU ने दूसरा रास्ता भी आजमाया।

21 1996 : स्वयं चुनावी राजनीति में प्रवेश

1996 में टिकैत आंदोलन ने अपनी गैर-दलीय परंपरा से सबसे बड़ा विचलन किया।

BKU से जुड़े नेतृत्व ने भारतीय किसान कामगार पार्टी के माध्यम से चुनावी राजनीति में प्रवेश करने का प्रयास किया।

अकादमिक अध्ययनों के अनुसार यह प्रयोग संगठन के चुनावी राजनीतिकरण का महत्वपूर्ण चरण था।

हालांकि इस चुनावी प्रयोग के परिणामों को “पूर्ण विफलता” कहना भी सावधानी मांगता है। उपलब्ध चुनावी संकलनों में भारतीय किसान कामगार पार्टी ने 1996 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सीमित सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए और कुछ सीटें हासिल भी कीं; फिर भी वह उस जनसमर्थन को राज्यव्यापी चुनावी शक्ति में नहीं बदल सकी जो टिकैत के विशाल आंदोलनों में दिखाई देता था।

22 लाखों की रैली, लेकिन वोट कम क्यों?

यही BKU के इतिहास का बड़ा राजनीतिक प्रश्न है।

क्योंकि आंदोलन और चुनाव अलग राजनीतिक व्यवहार हैं।

32 टिकैत और सत्ता का संबंध : दूरी भी, पहुंच भी

टिकैत सत्ता-विरोधी क्रांतिकारी नहीं थे।

अध्याय 9

चौधरी चरण सिंह और महेंद्र सिंह टिकैत

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की किसान राजनीति को समझने के लिए चौधरी चरण सिंह और महेंद्र सिंह टिकैत की तुलना अत्यंत महत्वपूर्ण है। दोनों एक ही व्यापक कृषक समाज से निकले, दोनों ने किसान को स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति के रूप में देखा, दोनों की सामाजिक जड़ें पश्चिमी उत्तर प्रदेश में थीं और दोनों ने ग्रामीण भारत की उपेक्षा के विरुद्ध आवाज उठाई। फिर भी उनकी राजनीति के रास्ते अलग थे।

चरण सिंह किसान को सत्ता तक ले जाना चाहते थे।

टिकैत किसान को सत्ता के सामने संगठित खड़ा करना चाहते थे।

पहला मॉडल चुनाव, दल और सरकार का था।

यही अंतर स्वतंत्र भारत की किसान राजनीति के दो बड़े मार्गों को सामने लाता है।

1 एक ही जमीन, दो राजनीतिक परंपराएं

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का सामाजिक आधार दोनों नेताओं के लिए महत्वपूर्ण था। जाट कृषक समाज, गन्ना अर्थव्यवस्था, सिंचाई, मंडियां, मध्यम किसान और ग्रामीण पंचायत संस्कृति—इन सभी ने एक ऐसी राजनीतिक जमीन तैयार की जिसमें किसान अपनी स्वतंत्र पहचान महसूस करता था।

चरण सिंह ने इसी सामाजिक आधार को चुनावी राजनीति में संगठित किया।

टिकैत ने बाद में इसी आधार को गैर-दलीय किसान आंदोलन में बदला।

इस अर्थ में टिकैत चरण सिंह से अलग भी थे और उनकी विरासत की अगली कड़ी भी।

2 चरण सिंह का राजनीतिक मॉडल

चौधरी चरण सिंह का मानना था कि भारतीय विकास नीति में कृषि और गांव को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया है। वे बड़े उद्योग-केंद्रित आर्थिक मॉडल के आलोचक थे और कृषक, छोटे उत्पादक तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को राष्ट्रीय विकास का केंद्र मानते थे।

उनकी राजनीति का रास्ता संस्थागत था।

किसान शक्ति को वोट में बदलो और वोट को राज्य सत्ता में।

3 टिकैत का राजनीतिक मॉडल

महेंद्र सिंह टिकैत ने वही समस्या अलग तरीके से देखी।

अगर किसान की बात सरकार नहीं सुनती तो क्या किसान को स्वयं सरकार बनना जरूरी है?

किसान इतना संगठित हो सकता है कि सरकार उसकी बात सुनने के लिए मजबूर हो।

किसान शक्ति को जनदबाव में बदलो और जनदबाव को नीति परिवर्तन में।

यही कारण है कि टिकैत ने लंबे समय तक चुनाव लड़ने या पद लेने की कोशिश नहीं की।

उनकी शक्ति पंचायत और आंदोलन में थी।

4 सत्ता प्राप्ति बनाम सत्ता पर दबाव

दोनों मॉडल का बुनियादी अंतर यहीं था।

चरण सिंह का लक्ष्य था सत्ता की संरचना में किसान की हिस्सेदारी बढ़ाना।

टिकैत का लक्ष्य था सत्ता को बाहर से जवाबदेह बनाना।

दोनों में कोई स्वाभाविक विरोध नहीं था, लेकिन राजनीतिक पद्धति अलग थी।

5 किसान की आर्थिक समस्या पर समानता

दोनों नेताओं की कृषि अर्थनीति में कई समान तत्व थे।

दोनों मानते थे कि कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को राष्ट्रीय नीति में अधिक महत्व मिलना चाहिए।

दोनों शहरी-औद्योगिक विकास मॉडल की आलोचना करते थे।

दोनों किसान की आय और कृषि लागत के प्रश्न को महत्वपूर्ण मानते थे।

दोनों इस बात से असंतुष्ट थे कि किसान उत्पादन करता है लेकिन मूल्य निर्धारण की शक्ति अक्सर उसके हाथ में नहीं होती।

फिर भी चरण सिंह का आर्थिक चिंतन अधिक व्यापक और व्यवस्थित था।

टिकैत का आर्थिक एजेंडा अधिक व्यावहारिक और आंदोलन-केंद्रित था।

6 चरण सिंह का कृषि अर्थशास्त्र

चरण सिंह ने कृषि, भूमि संबंधों, छोटे कृषक स्वामित्व और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर व्यापक लेखन किया।

उनका मानना था कि छोटे और मध्यम किसान पर आधारित कृषि व्यवस्था भारतीय परिस्थितियों के लिए अधिक उपयुक्त है।

वे बड़े औद्योगिक विकास के बजाय श्रमप्रधान और ग्रामीण उन्मुख आर्थिक नीति पर जोर देते थे।

इसलिए उनकी किसान राजनीति केवल गन्ना मूल्य या बिजली दर तक सीमित नहीं थी।

वह व्यापक राष्ट्रीय विकास मॉडल की आलोचना थी।

7 टिकैत का आर्थिक एजेंडा

टिकैत ने व्यापक आर्थिक सिद्धांत की जगह किसान की तत्काल समस्याओं को केंद्र में रखा।

किसान को किसी आर्थिक दर्शन का अध्ययन नहीं करना था।

इसलिए टिकैत की आर्थिक राजनीति अधिक प्रत्यक्ष और लोकप्रिय थी।

8 चरण सिंह ने किसान को राजनीतिक वर्ग बनाया

चरण सिंह का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने उत्तर भारत के कृषक समाज को राजनीतिक वर्ग के रूप में आत्मविश्वास दिया।

राष्ट्रीय गठबंधन प्रभावित कर सकता था।

यह भावना पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बहुत गहरी थी।

टिकैत का आंदोलन इसी राजनीतिक आत्मविश्वास की अगली अभिव्यक्ति था।

9 टिकैत ने किसान को दबाव समूह बनाया

टिकैत ने किसान को एक अलग प्रकार की शक्ति दिखाई।

सरकार बनाने के लिए हर किसान को पार्टी में जाने की जरूरत नहीं।

अगर लाखों किसान संगठित हो जाएं तो वे बाहर रहकर भी सरकार से नीति बदलवा सकते हैं।

टिकैत के किसान ने सड़क और चौपाल पर दबाव बनाया।

10 जाट सामाजिक आधार

दोनों नेताओं के सामाजिक आधार में जाट कृषकों की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जाट किसान भूमि, गन्ना, सिंचाई और स्थानीय राजनीति में प्रभावशाली था।

लेकिन दोनों नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षा केवल जाट नेतृत्व तक सीमित नहीं थी।

चरण सिंह ने व्यापक कृषक और पिछड़ा सामाजिक गठबंधन बनाने का प्रयास किया।

टिकैत ने किसान पहचान को जाति से ऊपर रखने की कोशिश की।

यही कारण था कि दोनों की राजनीति केवल जातीय संगठन बनकर नहीं रह गई।

11 जाट–मुस्लिम किसान गठबंधन

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाट और मुस्लिम किसानों का गठबंधन लंबे समय तक निर्णायक रहा।

दोनों समुदायों की बड़ी आबादी कृषि से जुड़ी थी।

इन प्रश्नों पर उनके आर्थिक हित कई बार समान थे।

चरण सिंह की राजनीति ने इस सामाजिक गठबंधन को चुनावी शक्ति में बदला।

टिकैत ने इसे किसान आंदोलन की सामूहिक शक्ति में।

इसलिए दोनों की राजनीति में हिंदू–मुस्लिम किसान एकता केवल सांप्रदायिक सद्भाव का प्रश्न नहीं थी।

वह कृषि अर्थव्यवस्था से उत्पन्न व्यावहारिक राजनीतिक गठबंधन भी थी।

12 चरण सिंह का ‘अजगर’ सामाजिक समीकरण

चरण सिंह की राजनीति को कभी-कभी ‘अजगर’ समीकरण—अहीर, जाट, गुर्जर और राजपूत—जैसी सामाजिक अवधारणाओं से जोड़ा जाता है।

हालांकि इसे हर समय स्थिर राजनीतिक सूत्र मानना अतिसरलीकरण होगा।

लेकिन व्यापक अर्थ में चरण सिंह ने गैर-शहरी और कृषक जातियों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की।

उनकी राजनीति ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के ऊंची जाति-केंद्रित प्रभुत्व को चुनौती दी।

यही सामाजिक पुनर्संरचना आगे मंडल राजनीति और क्षेत्रीय दलों के उदय के लिए भी जमीन तैयार करती है।

13 टिकैत की ‘किसान’ पहचान

टिकैत ने जातीय गठबंधन की भाषा से अधिक “किसान” की पहचान पर जोर दिया।

उनकी पंचायत में किसान की जाति से अधिक उसका कृषि हित सामने रखने की कोशिश होती थी।

लेकिन व्यवहार में संगठन का मजबूत आधार जाट कृषकों में था।

यहीं टिकैत मॉडल की ताकत और सीमा दोनों थीं।

वह जाति से ऊपर उठने का प्रयास करता था, लेकिन पूरी तरह जाति से मुक्त नहीं हो सकता था।

14 धार्मिक पहचान पर किसान पहचान

1980 के दशक में BKU के कई आंदोलनों में हिंदू और मुस्लिम किसान साथ दिखाई दिए।

मेरठ आंदोलन में मुस्लिम किसान हाफिज खलील अहमद को पंचायत की अध्यक्षता देना प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण था।

यह टिकैत की उस राजनीति का संकेत था जिसमें आर्थिक किसान पहचान को धार्मिक पहचान से ऊपर रखने की कोशिश की गई।

चरण सिंह की राजनीति में भी यही सामाजिक गठबंधन चुनावी रूप में दिखाई देता था।

दोनों नेताओं के लिए जाट–मुस्लिम एकता पश्चिमी उत्तर प्रदेश की शक्ति का महत्वपूर्ण स्रोत थी।

15 दोनों मॉडल और गैर-दलीयता

चरण सिंह का राजनीतिक जीवन पार्टी निर्माण से जुड़ा था।

टिकैत का प्रारंभिक राजनीतिक जीवन पार्टी से दूरी पर आधारित था।

चरण सिंह मानते थे कि बिना सत्ता के स्थायी नीति परिवर्तन कठिन है।

टिकैत मानते थे कि पार्टी में जाने से किसान संगठन की स्वतंत्रता कमजोर हो सकती है।

दोनों तर्कों में अपना व्यावहारिक आधार था।

16 चरण सिंह मॉडल की ताकत

चरण सिंह के मॉडल की सबसे बड़ी शक्ति थी—

यदि किसान राजनीति सरकार में पहुंचती है तो वह कानून बना सकती है।

अर्थात चुनावी सत्ता नीति परिवर्तन के औपचारिक साधन देती है।

टिकैत के दबाव मॉडल में ये अधिकार सीधे उपलब्ध नहीं थे।

17 चरण सिंह मॉडल की सीमा

लेकिन चुनावी राजनीति में किसान एजेंडा अकेला नहीं रहता।

दल को कई सामाजिक समूहों के हित संतुलित करने पड़ते हैं।

सत्ता में आने के बाद वित्तीय और प्रशासनिक सीमाओं का सामना करना पड़ता है।

इसलिए चुनावी किसान नेता सत्ता में पहुंचकर वही सब नहीं कर सकता जो विपक्ष में किसान से वादा करता है।

यही चरण सिंह मॉडल की संरचनात्मक सीमा थी।

18 टिकैत मॉडल की ताकत

टिकैत के मॉडल की सबसे बड़ी शक्ति थी—

यदि संगठन सत्ता में नहीं है तो वह सरकार की आर्थिक और प्रशासनिक मजबूरियों के लिए सीधे जिम्मेदार नहीं है।

वह एक ही मुद्दे पर अधिक कठोर दबाव डाल सकता है।

वह किसानों की असंतुष्टि का शुद्ध प्रतिनिधित्व कर सकता है।

यही कारण था कि BKU सरकार बदलने पर भी आंदोलन जारी रख सकती थी।

19 टिकैत मॉडल की सीमा

लेकिन दबाव समूह की शक्ति का भी अंत है।

आखिरकार उसे सरकार से समझौता करना पड़ता है।

इसलिए यदि सरकार दबाव सह ले या आंदोलन कमजोर पड़ जाए तो मांग अधूरी रह सकती है।

20 चरण सिंह बनाम टिकैत : कौन अधिक प्रभावी?

यह प्रश्न सरल तुलना से हल नहीं हो सकता।

चरण सिंह ने किसान को भारतीय राजनीति में दीर्घकालीन चुनावी पहचान दी।

टिकैत ने किसान को आंदोलनकारी स्वायत्तता दी।

चरण सिंह ने सत्ता संरचना को प्रभावित किया।

टिकैत ने सत्ता के व्यवहार को प्रभावित किया।

चरण सिंह की विरासत दलों और चुनावों में अधिक दिखाई देती है।

टिकैत की विरासत धरनों, महापंचायतों और किसान संगठनों में।

दोनों मिलकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की किसान राजनीति की पूर्ण तस्वीर बनाते हैं।

21 अजित सिंह : दोनों परंपराओं के बीच

चरण सिंह के निधन के बाद अजित सिंह उनके चुनावी उत्तराधिकारी बने।

लेकिन इसी समय टिकैत आंदोलन बढ़ रहा था।

इससे किसान समाज के भीतर दो प्रकार का नेतृत्व सामने आया—

कई किसान दोनों के साथ अलग-अलग संदर्भों में जुड़ सकते थे।

यही कारण था कि टिकैत के आंदोलन की विशाल भीड़ हमेशा चुनाव में उनके निर्देश के अनुसार मतदान नहीं करती थी।

22 वोट और आंदोलन का विभाजन

यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति की एक विशिष्ट विशेषता बन गई।

किसान गन्ना मूल्य के लिए टिकैत के साथ सड़क पर हो सकता था।

लेकिन विधानसभा चुनाव में अजित सिंह या किसी और दल को वोट दे सकता था।

आंदोलनात्मक निष्ठा और चुनावी निष्ठा अलग हो सकती हैं।

यह तथ्य BKU की चुनावी सीमाओं को समझने के लिए केंद्रीय है।

23 1989 के बाद दोनों परंपराओं का टकराव

जब BKU ने 1989 में जनता दल का समर्थन किया और बाद में 1991 में भाजपा की ओर झुकाव दिखाया, तो वह उसी चुनावी दुनिया में प्रवेश करने लगी जिससे टिकैत दूरी बनाए रखना चाहते थे।

इससे अजित सिंह और टिकैत के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ी।

अब प्रश्न केवल किसान मांग का नहीं था।

कौन किसान वोट का प्रतिनिधि है—यह भी सवाल बन गया।

यही वह बिंदु था जहां टिकैत की गैर-दलीय राजनीति कमजोर होने लगी।

24 चरण सिंह की विरासत अधिक टिकाऊ क्यों दिखी?

चरण सिंह की राजनीति से कई चुनावी दल और नेता निकले।

उनकी सामाजिक गठबंधन राजनीति राष्ट्रीय स्तर पर मंडल और क्षेत्रीय दलों की राजनीति से जुड़ गई।

उनकी विरासत चुनावी संस्थाओं में बनी रही।

टिकैत की विरासत अधिक आंदोलनकारी थी।

इसलिए वह व्यक्तिगत नेतृत्व और संगठनात्मक एकता पर अधिक निर्भर थी।

महेंद्र सिंह टिकैत के बाद BKU का विभाजन इसी संस्थागत कमजोरी का संकेत था।

25 लेकिन टिकैत की विरासत भी क्यों जीवित रही?

क्योंकि उनकी संघर्ष-पद्धति बहुत प्रभावशाली थी।

ये सभी पद्धतियां बाद के किसान आंदोलनों में लौटती रहीं।

2020–21 के किसान आंदोलन में इनका स्पष्ट पुनरावर्तन दिखाई दिया।

इस अर्थ में टिकैत का संगठनात्मक मॉडल चुनावी दल से कम स्थायी दिख सकता है, लेकिन आंदोलन संस्कृति में उसकी विरासत अत्यंत गहरी है।

26 दोनों की संयुक्त विरासत : किसान स्वाभिमान

चरण सिंह और टिकैत में सबसे बड़ी समानता थी—

दोनों ने किसान को दया का पात्र मानने से इनकार किया।

इसलिए उसे सम्मान और आर्थिक न्याय दोनों मिलना चाहिए।

चरण सिंह ने इसे राजनीतिक प्रतिनिधित्व की भाषा दी।

27 पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति पर प्रभाव

दोनों नेताओं की संयुक्त विरासत के बिना पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझना कठिन है।

चरण सिंह ने कांग्रेस के एकाधिकार को चुनौती दी।

कृषक और पिछड़ा वर्ग राजनीति को मजबूत किया।

टिकैत ने सरकारों को बताया कि किसान संगठन चुनावी दल के बाहर भी बड़ी शक्ति बन सकता है।

दोनों ने ग्रामीण समाज को दिल्ली और लखनऊ की सत्ता से सीधे जोड़ दिया।

28 जाट राजनीति का विस्तार

दोनों नेताओं की वजह से जाट समुदाय की राजनीतिक भूमिका पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बहुत प्रभावशाली हुई।

लेकिन दोनों की सफलता तभी बड़ी बनी जब वे जाट पहचान से आगे बढ़ सके।

चरण सिंह ने व्यापक किसान और पिछड़ा गठबंधन बनाया।

टिकैत ने किसान पहचान के माध्यम से अन्य कृषक समुदायों को जोड़ने का प्रयास किया।

जहां यह विस्तार सफल हुआ, उनकी राजनीति मजबूत हुई।

जहां वह कमजोर हुआ, उनका प्रभाव सीमित हुआ।

29 हिंदू–मुस्लिम गठबंधन की कमजोरी

समय के साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक राजनीति मजबूत हुई।

इससे वह जाट–मुस्लिम किसान गठबंधन कमजोर हुआ जो चरण सिंह और टिकैत दोनों की राजनीति की महत्वपूर्ण सामाजिक नींव था।

यह परिवर्तन दिखाता है कि आर्थिक हित हमेशा सांस्कृतिक या धार्मिक पहचान पर स्थायी विजय नहीं पा सकते।

किसान एकता परिस्थितिजन्य हो सकती है और दूसरे राजनीतिक प्रश्न उसे तोड़ सकते हैं।

यही दोनों नेताओं की विरासत की बड़ी ऐतिहासिक सीमा है।

30 किसान राजनीति और मंडल–कमंडल

1990 के दशक में उत्तर भारतीय राजनीति में दो बड़े परिवर्तन हुए—

इन दोनों ने किसान पहचान को चुनौती दी।

कृषक समाज अब केवल किसान के रूप में नहीं, बल्कि जाति और धार्मिक पहचान के आधार पर भी राजनीतिक रूप से लामबंद होने लगा।

चरण सिंह की कृषक राजनीति और टिकैत की गैर-दलीय किसान एकता दोनों पर इसका असर पड़ा।

यही कारण है कि 1980 के दशक जैसी एकीकृत किसान राजनीति 1990 के बाद कठिन होती गई।

31 क्या चरण सिंह और टिकैत एक ही विचारधारा थे?

उनमें समानता थी, लेकिन वे एक ही विचारधारा के प्रतिनिधि नहीं थे।

चरण सिंह के पास व्यापक आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि थी।

टिकैत का आंदोलन मांग-केंद्रित और व्यावहारिक था।

चरण सिंह राज्य सत्ता का उपयोग किसान हित में करना चाहते थे।

टिकैत राज्य पर बाहर से दबाव बनाना चाहते थे।

इसलिए दोनों की तुलना करनी चाहिए, लेकिन एक को दूसरे का सरल विस्तार नहीं मानना चाहिए।

32 दोनों की सबसे बड़ी उपलब्धियां

किसान को स्वतंत्र आंदोलनकारी शक्ति बनाना।

चरण सिंह ने किसान को राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिया।

टिकैत ने किसान को गैर-दलीय सामूहिक आवाज दी।

दोनों ने भारतीय लोकतंत्र में ग्रामीण समाज की शक्ति बढ़ाई।

33 दोनों की सबसे बड़ी सीमाएं

चरण सिंह की राजनीति व्यापक ग्रामीण समाज को स्थायी राष्ट्रीय गठबंधन में पूरी तरह नहीं बदल सकी।

उनकी राजनीति क्षेत्रीय और सामाजिक सीमाओं से बंधी रही।

टिकैत का आंदोलन भी भूमिहीन मजदूर, दलित कृषि श्रमिक और गैर-कृषक ग्रामीण गरीब की समस्याओं को उतनी मजबूती से केंद्र में नहीं ला सका।

समेकित मूल्यांकन : सत्ता और सड़क के बीच किसान

किसान को सत्ता में हिस्सेदारी चाहिए।

अध्याय 10

जाति, खाप और किसान एकता

भारतीय किसान यूनियन और महेंद्र सिंह टिकैत की राजनीति को केवल आर्थिक मांगों से नहीं समझा जा सकता। उसके पीछे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की विशिष्ट सामाजिक संरचना थी—जाट कृषक प्रभुत्व, गुर्जर और त्यागी जैसे अन्य कृषक समुदाय, बड़ी मुस्लिम किसान आबादी, दलित कृषि मजदूर, पारंपरिक खाप नेटवर्क और गांव-स्तरीय सामाजिक पंचायतें। टिकैत की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धियों में से एक यही थी कि उन्होंने इन विभाजित ग्रामीण पहचानों के ऊपर “किसान” की एक साझा पहचान खड़ी करने की कोशिश की।

लेकिन यही उनकी सबसे बड़ी सीमा भी बनी। किसान पहचान व्यापक थी, परंतु वह ग्रामीण समाज के जातीय, धार्मिक और वर्गीय विभाजनों को स्थायी रूप से समाप्त नहीं कर सकी।

1 पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का ग्रामीण समाज जाति, भूमि और पेशे के आधार पर गहराई से विभाजित रहा है। जाट, गुर्जर, त्यागी, राजपूत, मुस्लिम कृषक समुदाय और अनेक अन्य पिछड़ी जातियां खेती से जुड़ी थीं, जबकि दलित समुदायों का बड़ा हिस्सा भूमिहीन या सीमांत कृषक तथा कृषि मजदूर के रूप में मौजूद था।

भूमि स्वामित्व का वितरण समान नहीं था।

जाट कृषकों के पास कई क्षेत्रों में अपेक्षाकृत मजबूत भूमि स्वामित्व और राजनीतिक प्रभाव था।

गुर्जर और त्यागी किसान भी कई जिलों में महत्वपूर्ण थे।

मुस्लिम किसानों की भी बड़ी उपस्थिति थी, विशेषकर गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में।

इसी सामाजिक संरचना ने BKU को व्यापक किसान संगठन बनने की संभावना दी, लेकिन साथ ही जातीय व वर्गीय तनाव भी पैदा किए।

2 BKU का जाट सामाजिक आधार

भारतीय किसान यूनियन के शुरुआती विस्तार में जाट कृषकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी।

महेंद्र सिंह टिकैत स्वयं जाट समुदाय से थे।

उनका गांव सिसौली जाट बहुल क्षेत्र में था।

बालियान खाप का प्रभाव भी मुख्यतः जाट समाज में था।

इसलिए शुरुआती संगठनात्मक नेटवर्क स्वाभाविक रूप से जाट गांवों में मजबूत था।

इसी कारण कई पर्यवेक्षकों ने BKU को जाट किसान संगठन के रूप में देखा।

यदि BKU केवल जाट संगठन होता, तो वह मेरठ और दिल्ली जैसे आंदोलनों में इतनी व्यापक सामाजिक भागीदारी जुटाने में सफल नहीं होता।

3 जाट किसान क्यों केंद्रीय बने?

जाट किसानों की आर्थिक स्थिति भी महत्वपूर्ण थी।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अनेक जाट किसान मध्यम या अपेक्षाकृत बड़े भू-स्वामी थे।

वे गन्ना, गेहूं और दूसरी व्यावसायिक फसलें पैदा करते थे।

उनके पास नलकूप और ट्रैक्टर जैसी कृषि संपत्तियां अपेक्षाकृत अधिक थीं।

इसलिए बिजली, गन्ना मूल्य, सिंचाई और कृषि लागत जैसे BKU मुद्दे उनके लिए अत्यंत प्रत्यक्ष थे।

यानी जाट सामाजिक आधार और कृषि आर्थिक आधार एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।

4 खाप नेटवर्क की भूमिका

BKU के संगठनात्मक विस्तार में खाप नेटवर्क की भूमिका महत्वपूर्ण रही।

खाप पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के ग्रामीण समाज की पुरानी सामुदायिक संरचना है।

उसके माध्यम से गांवों के बीच सामाजिक संपर्क पहले से मौजूद था।

टिकैत ने इस मौजूदा नेटवर्क का उपयोग किसान लामबंदी के लिए किया।

टिकैत ने खाप नेटवर्क की सामाजिक पूंजी को किसान आंदोलन में बदला।

5 खाप की ताकत

यदि किसी पंचायत में आंदोलन का निर्णय होता, तो संदेश जल्दी फैल सकता था।

इससे संगठन कम संसाधनों में बड़ी भीड़ जुटा सकता था।

6 खाप की सीमा

लेकिन खाप नेटवर्क की अपनी सामाजिक सीमाएं भी थीं।

महिलाओं की औपचारिक भागीदारी सीमित थी।

दलित और अन्य समुदाय उसके समान हिस्सेदार नहीं थे।

इसलिए यदि किसान संगठन खाप पर अत्यधिक निर्भर रहता, तो व्यापक किसान एकता की सीमा पैदा हो सकती थी।

खाप की संगठनात्मक ताकत का उपयोग करना, लेकिन आंदोलन को खाप तक सीमित न रहने देना।

7 किसान पहचान की राजनीति

टिकैत ने जाति की जगह “किसान” शब्द को केंद्रीय राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश की।

बिजली का बिल जाट और मुस्लिम दोनों किसान देते हैं।

इस आर्थिक समानता को BKU ने सामाजिक एकता का आधार बनाया।

8 मुस्लिम किसान भागीदारी

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम किसान BKU के महत्वपूर्ण सामाजिक आधारों में शामिल रहे।

गन्ना उत्पादक जिलों में बड़ी मुस्लिम कृषक आबादी थी।

उनकी आर्थिक समस्याएं हिंदू किसानों जैसी ही थीं।

इसलिए 1980 के दशक के BKU आंदोलनों में मुस्लिम भागीदारी उल्लेखनीय रही।

मेरठ आंदोलन में मुस्लिम किसान नेतृत्व को पंचायत में सम्मानजनक भूमिका देना इसी राजनीति का प्रतीक था।

यह उस समय के किसान आंदोलन की बड़ी उपलब्धि थी।

9 जाट–मुस्लिम किसान गठबंधन

जाट–मुस्लिम किसान गठबंधन पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति का महत्वपूर्ण तत्व था।

चौधरी चरण सिंह की राजनीति ने पहले ही इस सामाजिक गठबंधन को मजबूत किया था।

टिकैत ने इसे चुनावी राजनीति से बाहर किसान आंदोलन के रूप में आगे बढ़ाया।

10 किसान एकता बनाम धार्मिक पहचान

टिकैत के शुरुआती दौर में किसान पहचान कई अवसरों पर धार्मिक पहचान से ऊपर दिखाई दी।

लेकिन 1980 के दशक में इसका राजनीतिक प्रभाव बड़ा था।

जब किसान एक ही मंच पर बैठते थे, तो धार्मिक पहचान पूरी तरह समाप्त नहीं होती थी; लेकिन आर्थिक मुद्दे उसे कुछ समय के लिए पीछे कर सकते थे।

यही BKU की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक उपलब्धियों में से एक थी।

11 गुर्जर किसान

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुर्जर किसानों की भी महत्वपूर्ण उपस्थिति है।

कई जिलों में वे कृषि और स्थानीय राजनीति में प्रभावशाली रहे हैं।

BKU की अपील गुर्जर किसानों तक भी पहुंची, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां बिजली, सिंचाई और गन्ना जैसे मुद्दे समान थे।

लेकिन संगठनात्मक नेतृत्व में जाट प्रभाव अधिक दिखाई देता रहा।

यही कारण है कि व्यापक किसान भागीदारी के बावजूद BKU की सार्वजनिक छवि लंबे समय तक जाट केंद्रित बनी रही।

12 त्यागी और अन्य कृषक समुदाय

त्यागी समुदाय भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में भूमि-स्वामी कृषक समुदाय के रूप में प्रभावशाली रहा।

BKU के कृषि मुद्दे उनके लिए भी प्रासंगिक थे।

इसी तरह राजपूत और अन्य पिछड़ी कृषक जातियों के किसान भी अलग-अलग समय पर संगठन से जुड़े।

इससे स्पष्ट होता है कि BKU की वास्तविक सामाजिक पहुंच जाट समुदाय से अधिक व्यापक थी।

लेकिन नेतृत्व संरचना में समान प्रतिनिधित्व का प्रश्न बना रहा।

13 क्या BKU जाति से ऊपर उठ सकी?

आंदोलन के क्षणों में किसान पहचान जातीय विभाजन को कमजोर कर सकती थी।

लेकिन स्थायी सामाजिक संरचना में जाति बनी रही।

गांव में भूमि संबंध जाति से जुड़े थे।

स्थानीय पंचायत शक्ति भी कई बार जाति से प्रभावित थी।

इसलिए आंदोलन में एकता और गांव में सामाजिक वास्तविकता हमेशा समान नहीं थी।

14 दलित और भूमिहीन कृषि मजदूर

यहीं BKU की सबसे गंभीर सामाजिक सीमा सामने आती है।

भूमिहीन और दलित कृषि मजदूर की प्राथमिक समस्याएं थीं—

इनसे भूमिहीन मजदूर को अप्रत्यक्ष लाभ हो सकता था, लेकिन वह इनके केंद्रीय लाभार्थियों में नहीं था।

15 किसान और मजदूर का वर्गीय अंतर

भूमि रखने वाला किसान और भूमिहीन मजदूर दोनों ग्रामीण समाज का हिस्सा हैं, लेकिन उनके हित हमेशा समान नहीं होते।

यदि कृषि मजदूरी बढ़ती है तो मजदूर के लिए अच्छा है।

यदि गन्ना मूल्य बढ़ता है तो किसान को लाभ होता है।

मजदूर को लाभ तभी मिलेगा जब उसकी मजदूरी या रोजगार बढ़े।

यानी ग्रामीण समाज में किसान और मजदूर के बीच वर्गीय अंतर वास्तविक था।

BKU इस अंतर को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकी।

16 ‘किसान’ शब्द की सीमा

भारतीय किसान राजनीति में “किसान” शब्द कई बार बहुत व्यापक रूप में प्रयोग होता है।

BKU का “किसान” मुख्यतः भूमि पर खेती करने वाला कृषक था।

यही उसकी संगठनात्मक शक्ति और सामाजिक सीमा दोनों थी।

17 दलित किसान और BKU

यह भी गलत होगा कि दलित समुदाय पूरी तरह BKU से बाहर था।

छोटे किसान के रूप में वे बिजली, सिंचाई और फसल मूल्य के प्रश्नों से प्रभावित थे।

लेकिन व्यापक रूप से दलित ग्रामीण आबादी का बड़ा हिस्सा भूमिहीन या सीमांत आर्थिक स्थिति में था।

इसलिए BKU का एजेंडा उनकी प्राथमिकताओं को उतनी मजबूती से प्रतिनिधित्व नहीं करता था।

18 सामाजिक न्याय बनाम कृषि न्याय

BKU का आंदोलन मुख्यतः कृषि आर्थिक न्याय पर केंद्रित था।

सामाजिक न्याय उसके केंद्र में नहीं था।

ये प्रश्न संगठन की मुख्य पहचान नहीं बने।

यहीं इसकी तुलना वामपंथी किसान आंदोलनों से अलग होती है।

तेलंगाना, तेभागा और नक्सलबाड़ी जैसे आंदोलनों में भूमि और वर्ग संघर्ष केंद्रीय था।

BKU में उत्पादक किसान का आर्थिक हित केंद्रीय था।

19 नेतृत्व संरचना की सामाजिक सीमा

BKU के बड़े नेतृत्व में लंबे समय तक जाट पुरुष नेतृत्व का प्रभाव अधिक रहा।

यह संगठन के सामाजिक आधार का प्रतिबिंब भी था।

लेकिन इससे व्यापक प्रतिनिधित्व का प्रश्न पैदा हुआ।

यदि संगठन सभी किसानों का दावा करता है, तो क्या उसके नेतृत्व में विभिन्न जातियों, महिलाओं, छोटे किसानों और भूमिहीनों को समान अवसर मिला?

यह सवाल बाद के इतिहासलेखन में महत्वपूर्ण बना।

20 महिलाओं और सामाजिक प्रतिनिधित्व

महिलाएं किसान आंदोलन में उपस्थित थीं।

उन्होंने रसोई, रसद, गीत और धरना—सभी स्तरों पर योगदान दिया।

लेकिन औपचारिक नेतृत्व में उनकी उपस्थिति सीमित रही।

यह खाप और ग्रामीण पितृसत्तात्मक संरचना की सीमा भी थी।

इसलिए BKU की किसान एकता में लैंगिक समानता स्वतः नहीं आई।

21 गांव की एकता और गांव की असमानता

टिकैत आंदोलन अक्सर गांव को सामूहिक इकाई की तरह प्रस्तुत करता था।

लेकिन गांव स्वयं समान समाज नहीं था।

इसलिए “गांव बनाम सरकार” की सरल छवि कई बार गांव के भीतर के संघर्षों को छिपा सकती थी।

यही आलोचनात्मक इतिहासलेखन का महत्वपूर्ण प्रश्न है।

22 BKU की व्यापकता क्यों बनी रही?

इन सीमाओं के बावजूद BKU व्यापक क्यों बनी?

क्योंकि उसके मुद्दे बड़े कृषक क्षेत्र में वास्तविक थे।

इन प्रश्नों ने जाति से ऊपर साझा आर्थिक मंच तैयार किया।

इसी वजह से संगठन विभिन्न समुदायों तक पहुंच सका।

23 पंचायत में समानता का प्रतीक

बड़ी पंचायतों में किसान जमीन पर साथ बैठते थे।

यह दृश्य स्वयं सामाजिक समानता का प्रतीक बनता था।

बड़ा किसान और छोटा किसान एक ही मंच पर।

लेकिन प्रतीकात्मक समानता और वास्तविक आर्थिक समानता में अंतर था।

इसलिए पंचायत की दृश्य एकता को सामाजिक क्रांति मान लेना उचित नहीं होगा।

24 खाप और लोकतंत्र का संबंध

खाप की भूमिका पर एक बड़ा लोकतांत्रिक प्रश्न भी है।

समर्थकों के लिए खाप ग्रामीण सामुदायिक निर्णय संस्था है।

आलोचकों के लिए वह कई बार जातीय और पितृसत्तात्मक शक्ति संरचना का हिस्सा रही है।

टिकैत आंदोलन ने खाप की सामूहिक लामबंदी क्षमता का उपयोग किया।

लेकिन BKU को आधुनिक लोकतांत्रिक किसान संगठन मानते हुए उसकी खाप-निर्भरता की आलोचनात्मक समीक्षा भी जरूरी है।

25 किसान पंचायत बनाम जातीय पंचायत

जातीय पंचायत को किसान पंचायत में बदलने की कोशिश।

यानी मुद्दा विवाह या सामाजिक अनुशासन नहीं।

इसने परंपरागत सामाजिक संरचना को आधुनिक आर्थिक राजनीति से जोड़ा।

खाप की सामाजिक पहचान पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।

26 साझा दुश्मन की राजनीति

किसान एकता अक्सर तब मजबूत हुई जब सामने साझा प्रतिद्वंद्वी था—

साझा आर्थिक शिकायत ने आंतरिक जातीय मतभेदों को कुछ समय के लिए पीछे धकेला।

लेकिन जैसे ही वह साझा संघर्ष कमजोर पड़ा, पुरानी सामाजिक पहचानों की वापसी संभव थी।

यही किसान एकता की परिस्थितिजन्य प्रकृति थी।

27 आंदोलन के बाद गांव वापस

धरना खत्म होने के बाद किसान गांव लौटता था।

वह फिर उसी सामाजिक संरचना में प्रवेश करता था।

यानी आंदोलन में बनी किसान एकता को स्थायी सामाजिक एकता में बदलना कठिन था।

BKU इसका पूर्ण समाधान नहीं खोज सकी।

28 1990 के बाद बदलता सामाजिक वातावरण

1990 के दशक में उत्तर प्रदेश की राजनीति तेजी से बदली।

मंडल राजनीति ने जाति पहचान को नए तरीके से सक्रिय किया।

राम मंदिर आंदोलन ने धार्मिक पहचान को तेज किया।

इन सबने उस किसान पहचान को चुनौती दी जिसे टिकैत 1980 के दशक में मजबूत कर रहे थे।

वह अपनी जाति और धर्म के आधार पर भी राजनीतिक निर्णय लेने लगा।

29 जाट–मुस्लिम एकता पर दबाव

1990 के दशक के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट और मुस्लिम राजनीति धीरे-धीरे अलग दिशाओं में जाने लगी।

लेकिन धार्मिक ध्रुवीकरण और चुनावी प्रतिस्पर्धा ने किसान एकता को कमजोर किया।

इसका गंभीर प्रभाव BKU की सामाजिक शक्ति पर पड़ा।

1980 के दशक में जो साझा कृषि पहचान मजबूत दिखती थी, वह आने वाले वर्षों में कम स्थिर साबित हुई।

30 सामाजिक गठबंधन की राजनीतिक कीमत

यदि BKU किसी राजनीतिक दल की ओर झुकती, तो उसका प्रभाव सामाजिक गठबंधन पर पड़ सकता था।

उदाहरण के लिए, भाजपा के साथ निकटता मुस्लिम किसानों में संदेह पैदा कर सकती थी।

किसी दूसरे दल से निकटता जाट या दूसरे समर्थक समूह को प्रभावित कर सकती थी।

यही कारण था कि गैर-दलीयता केवल राजनीतिक रणनीति नहीं, सामाजिक एकता बनाए रखने का साधन भी थी।

31 टिकैत की व्यक्तिगत सामाजिक विश्वसनीयता

महेंद्र सिंह टिकैत की व्यक्तिगत छवि ने भी विभिन्न समुदायों को जोड़ने में भूमिका निभाई।

वे बड़े राजनीतिक पद से नहीं जुड़े थे।

इससे किसान उन्हें “अपने बीच का” नेता मान सकता था।

यही व्यक्तिगत विश्वसनीयता संगठन की जातीय सीमा को कुछ हद तक पार करने में मदद करती थी।

32 क्या किसान पहचान स्थायी राजनीतिक पहचान बन सकी?

यही BKU का सबसे बड़ा सामाजिक निष्कर्ष है।

किसान पहचान मजबूत आंदोलनकारी पहचान बन सकती थी।

लेकिन वह हमेशा चुनावी, धार्मिक और जातीय पहचान को स्थायी रूप से प्रतिस्थापित नहीं कर सकी।

यह बात 1990 के बाद बार-बार सामने आई।

33 फिर भी किसान एकता की उपलब्धि

इसके बावजूद 1980 के दशक में जो हुआ वह ऐतिहासिक था।

यह भारतीय ग्रामीण राजनीति में छोटी उपलब्धि नहीं थी।

34 BKU की सामाजिक विरासत

BKU ने किसान आंदोलन को एक व्यापक सामाजिक भाषा दी।

बाद के आंदोलनों में भी यही भाषा दिखाई देती है।

2020–21 के किसान आंदोलन में भी धार्मिक और क्षेत्रीय विविधता के बावजूद किसान पहचान को साझा मंच बनाने की कोशिश हुई।

इस ऐतिहासिक परंपरा में टिकैत काल का योगदान महत्वपूर्ण है।

35 सबसे बड़ी सामाजिक सीमा

लेकिन टिकैत मॉडल की सबसे बड़ी सामाजिक सीमा वही रही—

भूमि रखने वाले किसान को पूरे ग्रामीण समाज का प्रतिनिधि मान लेना।

इनकी समस्याएं किसान मूल्य राजनीति से अलग भी थीं।

यदि किसान आंदोलन इन प्रश्नों को शामिल नहीं करता, तो उसकी सामाजिक एकता अधूरी रहती है।

समेकित मूल्यांकन : किसान पहचान की शक्ति और उसकी सीमा

महेंद्र सिंह टिकैत की राजनीति ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण समाज में एक असाधारण प्रयोग किया—

जाति और धर्म से ऊपर किसान पहचान बनाने का।

इस प्रयोग का सामाजिक आधार जाट कृषक समाज और खाप नेटवर्क में था।

मुस्लिम किसान बड़े पैमाने पर जुड़े।

यही कारण था कि BKU केवल एक जातीय संगठन बनकर नहीं रह गई।

गन्ना और बिजली ने साझा आर्थिक मुद्दा दिया।

और टिकैत ने इन सबको “किसान” की एक राजनीतिक पहचान में जोड़ने की कोशिश की।

दलित और भूमिहीन कृषि मजदूर के प्रश्न केंद्र में नहीं आए।

महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण थी, लेकिन नेतृत्व में सीमित रही।

और 1990 के दशक के बाद इन्हीं पहचानों ने किसान एकता को चुनौती दी।

इसलिए BKU के सामाजिक इतिहास का सबसे संतुलित निष्कर्ष यह है—

टिकैत जाति समाप्त नहीं कर सके, लेकिन उन्होंने कुछ समय के लिए जाति से ऊपर किसान को राजनीतिक रूप से संगठित कर दिखाया।

वे धर्म समाप्त नहीं कर सके, लेकिन हिंदू और मुस्लिम किसान को साझा आर्थिक हित पर एक मंच पर ला सके।

अध्याय 11

हिंदू–मुस्लिम किसान एकता से सामाजिक दरार तक

भारतीय किसान यूनियन के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक कथाओं में से एक है—पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट–मुस्लिम किसान एकता का निर्माण, उसका कमजोर होना, 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों में गंभीर सामाजिक टूटन और 2020–21 किसान आंदोलन के दौरान उस रिश्ते को फिर से जोड़ने का प्रयास।

यह कहानी केवल सांप्रदायिक संबंधों की नहीं है। इसके केंद्र में कृषि अर्थव्यवस्था, गन्ना, जमीन, पंचायत, खाप, चुनावी राजनीति, हिंदुत्व का विस्तार, क्षेत्रीय दलों का संकट और बदलता ग्रामीण समाज—सभी मौजूद हैं।

महेंद्र सिंह टिकैत के उत्कर्ष काल में BKU की सबसे बड़ी सामाजिक उपलब्धि यही थी कि उसने कई अवसरों पर हिंदू और मुस्लिम किसानों को एक साझा आर्थिक पहचान के अंतर्गत संगठित किया। लेकिन यह एकता स्थायी नहीं थी। 1990 के दशक से धार्मिक और दलगत राजनीति मजबूत हुई, और 2013 तक पहुंचते-पहुंचते पश्चिमी उत्तर प्रदेश का वही कृषक समाज गंभीर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का शिकार हो गया।

फिर 2020–21 के किसान आंदोलन में उसी क्षेत्र से एक विपरीत प्रक्रिया दिखाई दी—कृषि मुद्दों ने एक बार फिर धार्मिक विभाजन से ऊपर साझा किसान पहचान पुनर्जीवित करने की कोशिश की। आधुनिक अकादमिक अध्ययनों ने भी 2020–21 के आंदोलन को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान पहचान के पुनर्जीवन और 2013 के बाद बनी सांप्रदायिक दूरी को आंशिक रूप से कम करने वाली प्रक्रिया के रूप में देखा है।

1 चरण सिंह युग का सामाजिक गठबंधन

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट और मुस्लिम किसानों की राजनीतिक निकटता महेंद्र सिंह टिकैत से पहले की थी।

चौधरी चरण सिंह की राजनीति ने इस गठबंधन को विशेष शक्ति दी।

दोनों समुदायों में बड़ी आबादी खेती से जुड़ी थी।

दोनों गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में प्रभावशाली थे।

दोनों के आर्थिक हितों में कई समानताएं थीं।

और गांव की कृषि अर्थव्यवस्था मजबूत रहनी चाहिए।

इसी आर्थिक समानता ने राजनीतिक सहयोग की जमीन तैयार की।

2 किसान गठबंधन केवल चुनावी नहीं था

गांव के स्तर पर जाट और मुस्लिम किसान एक ही चीनी मिल को गन्ना बेच सकते थे।

खेती की लागत दोनों को प्रभावित करती थी।

इसलिए किसान संघर्ष की वास्तविक सामाजिक परिस्थितियां मौजूद थीं।

चरण सिंह ने इस आर्थिक निकटता को चुनावी राजनीति में बदला।

बाद में टिकैत ने इसे आंदोलनकारी एकता में बदलने की कोशिश की।

3 टिकैत और साझा किसान पहचान

महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में BKU ने जाति और धर्म से ऊपर “किसान” की पहचान को राजनीतिक केंद्र बनाया।

वह हिंदू या मुस्लिम देखकर नहीं आती।

बिजली का बिल धार्मिक पहचान नहीं पूछता।

गन्ने का भुगतान धर्म देखकर नहीं मिलता।

यही दृष्टि 1980 के दशक की विशाल पंचायतों में दिखाई दी।

4 मेरठ आंदोलन का प्रतीकवाद

1988 के मेरठ कमिश्नरी आंदोलन में मुस्लिम किसानों की सक्रिय भागीदारी BKU की व्यापक सामाजिक पहुंच का संकेत थी।

एक महत्वपूर्ण अकादमिक अध्ययन में उल्लेख है कि आंदोलन के दौरान टिकैत ने स्थानीय मुस्लिम किसान हाफिज खलील अहमद को बड़ी पंचायत की अध्यक्षता करने के लिए कहा था।

BKU केवल जाट संगठन नहीं है; किसान आंदोलन में मुस्लिम किसान बराबर हिस्सेदार है।

यही वह समय था जब टिकैत का किसान गठबंधन अपनी सबसे व्यापक स्थिति में था।

5 ‘हर हर महादेव’ और ‘अल्लाहु अकबर’ की पुरानी परंपरा

बाद में राकेश टिकैत ने कई बार याद किया कि महेंद्र सिंह टिकैत के दौर की पंचायतों में “अल्लाहु अकबर” और “हर हर महादेव” जैसे नारे साथ लगाए जाते थे।

2021 की मुजफ्फरनगर महापंचायत में राकेश टिकैत ने इन्हीं नारों को फिर से मंच से बुलवाया।

BKU नेतृत्व इसे पुराने हिंदू–मुस्लिम किसान भाईचारे की स्मृति के रूप में प्रस्तुत कर रहा था।

यानी आंदोलन के पास केवल आर्थिक मुद्दा नहीं था; उसके पास अतीत की साझा स्मृति भी थी।

6 एकता की वास्तविक सीमा

लेकिन इस किसान एकता को आदर्शीकृत नहीं करना चाहिए।

1980 के दशक में भी ग्रामीण समाज सांप्रदायिक भेदभाव से पूरी तरह मुक्त नहीं था।

हिंदू और मुस्लिम अलग सामाजिक समुदाय थे।

अलग राजनीतिक और धार्मिक संगठन सक्रिय थे।

लेकिन कृषि संघर्ष ने इन अंतरों को कुछ समय के लिए पीछे धकेलने की क्षमता दिखाई।

यानी टिकैत की किसान एकता असमानताओं का अंत नहीं, साझा आर्थिक मुद्दे पर निर्मित राजनीतिक गठबंधन थी।

7 1990 का दशक : राजनीतिक वातावरण बदलता है

1990 के दशक में उत्तर भारत की राजनीति तेजी से बदली।

मंडल आयोग की राजनीति ने जातीय पहचान को नया राजनीतिक अर्थ दिया।

राम जन्मभूमि आंदोलन ने धार्मिक पहचान को अभूतपूर्व राजनीतिक शक्ति दी।

इन परिवर्तनों ने उस किसान पहचान को चुनौती दी जो 1980 के दशक में BKU के केंद्र में थी।

अब किसान केवल गन्ने और बिजली के आधार पर राजनीति नहीं कर रहा था।

उसकी जातीय और धार्मिक पहचान भी चुनावी निर्णय को प्रभावित करने लगी।

8 अयोध्या आंदोलन और किसान राजनीति

राम मंदिर आंदोलन ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश सहित पूरे उत्तर भारत में हिंदू राजनीतिक लामबंदी को मजबूत किया।

BKU ने औपचारिक रूप से अयोध्या को अपना कृषि मुद्दा नहीं बनाया।

महेंद्र सिंह टिकैत की मूल राजनीति कृषि आर्थिक प्रश्नों पर केंद्रित रही।

लेकिन संगठन का सामाजिक आधार राजनीतिक वातावरण से अलग नहीं रह सकता था।

BKU समर्थक किसान अलग-अलग दलों और आंदोलनों से प्रभावित हो सकते थे।

यहीं गैर-दलीय किसान पहचान और धार्मिक राजनीतिक पहचान के बीच तनाव बढ़ा।

9 भाजपा से निकटता का प्रभाव

1991 के आसपास BKU का भाजपा की ओर चुनावी झुकाव भी दिखाई दिया।

इसे संगठन के सांप्रदायिकीकरण का सरल प्रमाण मान लेना उचित नहीं होगा, क्योंकि किसान संगठन का कृषि एजेंडा स्वतंत्र रहा और मुस्लिम किसान भी उससे जुड़े रहे।

लेकिन राजनीतिक प्रतीकवाद महत्वपूर्ण था।

यदि संगठन का प्रमुख जाट सामाजिक आधार भाजपा की ओर झुकता है, तो मुस्लिम किसानों में यह आशंका स्वाभाविक हो सकती थी कि क्या BKU वास्तव में पहले जैसी गैर-दलीय और धर्मनिरपेक्ष किसान एकता बनाए रख पाएगी।

यही सामाजिक दूरी आने वाले वर्षों में बढ़ी।

10 किसान पहचान क्यों कमजोर हुई?

युवाओं का रोजगार गैर-कृषि क्षेत्र की ओर बढ़ रहा था।

राजनीतिक दलों ने अलग-अलग समुदायों को अलग चुनावी गठबंधनों में संगठित किया।

और BKU का आंदोलनकारी प्रभाव भी 1988 के शिखर की तुलना में धीरे-धीरे कम हुआ।

Satendra Kumar का अध्ययन बताता है कि कृषि संरचना में बदलाव और हिंदुत्व राजनीति के विस्तार ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पुरानी किसान-आधारित ग्रामीण राजनीति को धीरे-धीरे कमजोर किया।

11 टिकैत के अंतिम वर्षों तक संबंध

महेंद्र सिंह टिकैत का व्यक्तिगत प्रभाव दोनों समुदायों में लंबे समय तक बना रहा।

कई मुस्लिम किसान उन्हें “बाबा टिकैत” के रूप में सम्मान देते थे।

लेकिन संगठन की सामाजिक एकता पहले जैसी नहीं रही।

नई पीढ़ी के किसानों की राजनीतिक पहचान अलग थी।

क्षेत्रीय दलों, भाजपा, बसपा और समाजवादी राजनीति के बीच ग्रामीण समाज अधिक विभाजित होता गया।

इसका परिणाम यह हुआ कि BKU का साझा किसान मंच कमजोर होने लगा।

12 2011 : महेंद्र सिंह टिकैत का निधन

15 मई 2011 को महेंद्र सिंह टिकैत का निधन हुआ।

उनके बाद संगठन का नेतृत्व परिवार और वरिष्ठ BKU नेताओं के बीच आगे बढ़ा।

नरेश टिकैत अध्यक्ष बने और राकेश टिकैत प्रमुख सार्वजनिक चेहरा बने।

लेकिन यह नेतृत्व परिवर्तन ऐसे समय हुआ जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सामाजिक राजनीति पहले से अधिक विभाजित थी।

केवल दो वर्ष बाद 2013 में यह विभाजन हिंसक रूप में सामने आया।

13 2013 : मुजफ्फरनगर हिंसा की पृष्ठभूमि

अगस्त–सितंबर 2013 में मुजफ्फरनगर और शामली क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव तेजी से बढ़ा।

स्थानीय हिंसक घटना, अफवाहें, राजनीतिक लामबंदी, महापंचायतें और प्रशासनिक विफलताओं ने स्थिति को गंभीर बनाया।

सितंबर 2013 में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा हुई।

बहुत बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए।

सबसे गंभीर प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों के मुस्लिम परिवारों पर पड़ा।

यह घटना पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सामाजिक राजनीति में निर्णायक मोड़ थी।

14 BKU और 2013 : कठिन प्रश्न

BKU के इतिहास में 2013 सबसे विवादास्पद अध्यायों में से एक है।

कुछ अकादमिक अध्ययनों ने तर्क दिया है कि BKU के कुछ नेता और खाप नेटवर्क उस सांप्रदायिक राजनीतिक प्रक्रिया से अलग नहीं थे जिसने हिंसा से पहले जाट–मुस्लिम विभाजन को बढ़ाया।

R. Ramakumar के Journal of Agrarian Change में प्रकाशित अध्ययन ने इससे भी कठोर निष्कर्ष दिया। अध्ययन का तर्क है कि BKU नेतृत्व और संगठन के हिस्सों ने उस सांप्रदायिक विमर्श को आत्मसात किया जिसने दंगों की पृष्ठभूमि तैयार की; अध्ययन विशेष रूप से खाप नेटवर्क की भूमिका पर जोर देता है।

यह एक महत्वपूर्ण अकादमिक आलोचना है और BKU के इतिहास में इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

15 लेकिन पूरे संगठन को एक रंग में देखना भी गलत

यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि BKU कोई अत्यधिक केंद्रीकृत पार्टी नहीं थी।

उसमें अलग-अलग क्षेत्रीय नेता, स्थानीय इकाइयां और सामाजिक समूह थे।

इसलिए संगठन के कुछ नेताओं या सदस्यों के व्यवहार को पूरे ऐतिहासिक BKU की एकमात्र पहचान मान लेना भी सावधानी मांगता है।

2013 ने दिखाया कि BKU की पुरानी किसान पहचान सांप्रदायिक लामबंदी को रोकने में विफल रही।

और संगठन के कुछ हिस्से स्वयं उस ध्रुवीकरण से प्रभावित हुए।

16 ‘किसान’ पर ‘हिंदू–मुस्लिम’ भारी पड़ा

2013 का सबसे बड़ा ऐतिहासिक अर्थ यही था।

जिन गांवों में दशकों तक जाट और मुस्लिम किसान साथ पंचायत करते थे, वहीं दोनों समुदाय भय और हिंसा के कारण अलग हो गए।

एक अकादमिक अध्ययन ने इसे इस प्रश्न में रूपांतरित किया—

क्यों “किसान” की साझा पहचान पर “हिंदू” पहचान भारी पड़ी?

यह टिकैत मॉडल की सबसे गंभीर सामाजिक परीक्षा थी।

और इस परीक्षा में किसान पहचान कमजोर साबित हुई।

17 हिंसा के बाद मुस्लिम किसान BKU से दूर

दंगों के तुरंत बाद इसका संगठनात्मक प्रभाव साफ दिखाई दिया।

नवंबर 2013 की Indian Express रिपोर्ट ने दर्ज किया कि गन्ना किसानों के आंदोलन में मुस्लिम किसान, जो पहले जाट किसानों के साथ BKU में दिखाई देते थे, अनुपस्थित थे। मुस्लिम किसान एक अलग संगठन—भारतीय किसान मजदूर मंच—के कार्यक्रमों में शामिल होने लगे थे।

यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश की दशकों पुरानी किसान राजनीति के टूटने का संकेत था।

18 गन्ना वही था, लेकिन किसान अलग हो गए

2013 के बाद एक गहरा विरोधाभास सामने आया।

जाट किसान और मुस्लिम किसान दोनों गन्ना पैदा कर रहे थे।

दोनों को चीनी मिल से भुगतान चाहिए था।

लेकिन वे एक ही किसान मंच पर नहीं आ रहे थे।

साझा आर्थिक हित अपने आप सामाजिक एकता की गारंटी नहीं देते।

राजनीतिक और सांप्रदायिक पहचान कई बार आर्थिक हित से अधिक शक्तिशाली हो सकती है।

19 BKU की संगठनात्मक क्षति

2013 के बाद BKU की सामाजिक पहुंच पर गंभीर प्रभाव पड़ा।

संगठन के पुराने मुस्लिम कार्यकर्ता दूर हुए।

कई मुस्लिम किसानों ने अलग मंचों का सहारा लिया।

BKU के भीतर जाट प्रभुत्व की छवि और मजबूत हुई।

BKU के ही स्थानीय पदाधिकारियों ने बाद में स्वीकार किया कि 2013 के जाट–मुस्लिम दंगों से संगठन पर बड़ा प्रभाव पड़ा और मुस्लिम समुदाय ने BKU कार्यक्रमों में भाग लेना काफी कम कर दिया था।

यानी सांप्रदायिक हिंसा ने केवल सामाजिक संबंध नहीं तोड़े।

उसने किसान संगठन की राजनीतिक क्षमता भी कमजोर की।

20 चुनावी प्रभाव

2013 की हिंसा के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़ा राजनीतिक पुनर्गठन हुआ।

जाट मतदाता तेजी से भाजपा के पक्ष में संगठित हुए।

वह जाट–मुस्लिम चुनावी गठबंधन कमजोर हुआ जो चरण सिंह और बाद में राष्ट्रीय लोकदल की राजनीति का आधार था।

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़ी सफलता इस नए राजनीतिक वातावरण का हिस्सा थी।

इससे किसान पहचान की जगह धार्मिक राजनीतिक ध्रुवीकरण अधिक प्रभावशाली दिखा।

21 BKU का राजनीतिक संकट

यदि हिंदू और मुस्लिम किसान अलग राजनीतिक शिविरों में चले गए हैं, तो किसान आंदोलन कैसे चलेगा?

सिर्फ जाट किसान आधार पर विशाल पश्चिमी उत्तर प्रदेश आंदोलन खड़ा करना कठिन था।

गन्ना बेल्ट की सामाजिक संरचना ही बहु-सामुदायिक थी।

इसलिए संगठन की पुरानी शक्ति वापस लाने के लिए मुस्लिम किसान को फिर से जोड़ना आवश्यक था।

22 मेल-मिलाप की शुरुआती कोशिश

यह प्रक्रिया 2020 में अचानक शुरू नहीं हुई थी।

स्थानीय BKU नेताओं के अनुसार जाट और मुस्लिम किसानों को पुनः पास लाने की कोशिश 2018 के आसपास से ही होने लगी थी। राकेश टिकैत और पुराने मुस्लिम किसान नेता गुलाम मोहम्मद जौला के बीच संपर्क भी इस प्रक्रिया का हिस्सा था।

लेकिन कोई ऐसा साझा बड़ा मुद्दा नहीं था जो दोनों समुदायों को फिर से उसी स्तर पर एक साथ खड़ा कर सके जैसा 1980 के दशक में हुआ था।

23 तीन कृषि कानून और नई परिस्थिति

2020 में केंद्र सरकार द्वारा पारित तीन कृषि कानूनों के विरोध में पंजाब और हरियाणा से शुरू हुआ किसान आंदोलन जल्द ही उत्तर प्रदेश तक फैलने लगा।

शुरुआत में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में BKU की लामबंदी सीमित थी।

लेकिन जैसे-जैसे आंदोलन लंबा चला, गन्ना बेल्ट के किसान जुड़ने लगे।

यह मुद्दा हिंदू और मुस्लिम किसान दोनों से संबंधित था।

फिर वही पुराना आर्थिक सूत्र सामने आया—

24 गाजीपुर सीमा और 28 जनवरी 2021

2020–21 आंदोलन में BKU के पुनरुत्थान का निर्णायक क्षण जनवरी 2021 के अंत में आया।

26 जनवरी की दिल्ली घटनाओं के बाद आंदोलन दबाव में था।

28 जनवरी को गाजीपुर सीमा खाली कराने की आशंका के बीच राकेश टिकैत भावुक दिखाई दिए।

उनका वीडियो और तस्वीरें तेजी से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फैलीं।

अकादमिक अध्ययन के अनुसार इस क्षण ने हिंदू और मुस्लिम दोनों पुराने BKU समर्थकों को भावनात्मक रूप से पुनः सक्रिय किया और बड़ी संख्या में किसान गाजीपुर सीमा की ओर पहुंचे।

यह BKU के सामाजिक पुनर्जीवन का महत्वपूर्ण क्षण था।

25 मुजफ्फरनगर पंचायत : पुरानी एकता की वापसी

29 जनवरी 2021 को मुजफ्फरनगर में बड़ी पंचायत हुई।

वर्षों बाद जाट और मुस्लिम किसान फिर एक साझा किसान मंच पर दिखाई दिए।

पुराने किसान नेता और राजनीतिक चेहरे भी साथ आए।

Aaj Tak की उस समय की रिपोर्ट ने इसे 2013 के बाद जाट–मुस्लिम रिश्तों में आई खटास कम करने वाली प्रक्रिया के रूप में वर्णित किया और दर्ज किया कि मुस्लिम किसान फिर BKU के करीब आने लगे थे।

यह टिकैत परिवार के लिए केवल आंदोलन विस्तार नहीं था।

यह उनके पिता महेंद्र सिंह टिकैत की पुरानी सामाजिक विरासत की पुनर्स्थापना का प्रयास भी था।

26 गुलाम मोहम्मद जौला का महत्व

गुलाम मोहम्मद जौला महेंद्र सिंह टिकैत के पुराने सहयोगियों में रहे थे।

2013 के बाद वे BKU से दूर चले गए थे।

2021 में उनका फिर किसान पंचायत में आना प्रतीकात्मक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण था।

इसने यह संदेश दिया कि पुराने संबंध पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।

कृषि संघर्ष सामाजिक दूरी को कम करने का नया अवसर दे सकता है।

लेकिन अतीत की चोटें इतनी गहरी थीं कि यह प्रक्रिया आसान नहीं थी।

27 2013 की सार्वजनिक स्मृति

मेल-मिलाप के लिए 2013 को भूलना पर्याप्त नहीं था।

कई मुस्लिम किसान परिवारों के लिए हिंसा, विस्थापन और जान-माल की क्षति वास्तविक अनुभव था।

इसलिए जाट–मुस्लिम पुनर्मिलन केवल राजनीतिक मंच पर साथ खड़े होने से पूरा नहीं हो सकता था।

अध्याय 12

महिला किसान और BKU

भारतीय किसान यूनियन और महेंद्र सिंह टिकैत के किसान आंदोलन की सार्वजनिक छवि लंबे समय तक पुरुष किसान, खाप पंचायत, ट्रैक्टर, हुक्का और चौपाल के इर्द-गिर्द बनी रही। लेकिन यदि आंदोलन के सामाजिक इतिहास को गहराई से देखा जाए तो महिलाओं की भूमिका उससे कहीं अधिक व्यापक दिखाई देती है। वे केवल घर संभालने वाली या आंदोलनकारियों के लिए भोजन तैयार करने वाली पृष्ठभूमि की पात्र नहीं थीं; उन्होंने धरनों, पंचायतों, सामुदायिक रसोइयों, लोकगीतों, जुलूसों और लंबे किसान पड़ावों को टिकाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

फिर भी एक बड़ा विरोधाभास बना रहा—कृषि श्रम में महिलाओं की भागीदारी बहुत अधिक थी, लेकिन किसान संगठनों के औपचारिक नेतृत्व में उनकी उपस्थिति बहुत कम।

महेंद्र सिंह टिकैत के दौर का BKU भी इस व्यापक भारतीय ग्रामीण पितृसत्तात्मक संरचना से मुक्त नहीं था। आंदोलन में महिलाएं थीं, लेकिन संगठन के शीर्ष नेतृत्व और निर्णय-निर्माण में उनका प्रतिनिधित्व सीमित था। यही कारण है कि महिला किसान का प्रश्न BKU के इतिहास में उपलब्धि और सीमा—दोनों को सामने लाता है।

1 महिला किसान की अदृश्यता

भारतीय कृषि में महिलाओं की भूमिका लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है।

इन सब में ग्रामीण महिलाएं बड़ी मात्रा में श्रम करती रही हैं।

लेकिन भूमि प्रायः पुरुष के नाम पर होती थी।

और राजनीतिक मंच पर “किसान” की छवि भी पुरुष की।

इसलिए कृषि में काम करने वाली महिला अक्सर “किसान की पत्नी” मानी जाती थी, स्वयं किसान नहीं।

यही संरचनात्मक समस्या BKU के दौर में भी बनी रही।

2 टिकैत आंदोलन में महिलाओं की शुरुआती भूमिका

करमूखेड़ी और उसके बाद के आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी धीरे-धीरे दिखाई देने लगी।

लेकिन मेरठ कमिश्नरी घेराव 1988 वह चरण था जहां महिलाओं की प्रत्यक्ष उपस्थिति अधिक स्पष्ट हुई।

किसान परिवारों के बीच संपर्क बनाए रखा।

यानी वे आंदोलन की सामाजिक और रसद संरचना का हिस्सा थीं।

यह भागीदारी बिना औपचारिक पद के भी महत्वपूर्ण थी।

3 आंदोलन की रसद में महिलाओं की केंद्रीय भूमिका

लंबे किसान आंदोलन केवल भाषणों से नहीं चलते।

उनके पीछे भोजन, पानी, वस्त्र, स्वास्थ्य, बच्चों की देखभाल और गांव-घर की व्यवस्था भी होती है।

इन सभी में महिलाओं की भूमिका केंद्रीय थी।

यदि परिवार का पुरुष सदस्य मेरठ या दिल्ली में सप्ताहों तक धरने पर बैठा था, तो घर और खेत कौन संभाल रहा था?

यदि धरना स्थल पर सैकड़ों या हजारों लोगों के लिए भोजन बन रहा था, तो उसमें किसका श्रम था?

यानी आंदोलन की दृश्यमान राजनीति के पीछे एक विशाल अदृश्य महिला श्रम मौजूद था।

4 सामुदायिक रसोई और राजनीतिक श्रम

सामुदायिक रसोई को केवल घरेलू काम मानना गलत होगा।

वह आंदोलन की राजनीतिक आधारभूत संरचना थी।

किसान आंदोलन तभी लंबा चल सकता था जब लोगों को नियमित भोजन मिले।

इसलिए खाना बनाना, अनाज साफ करना, आटा गूंथना, चाय बनाना, दूध व्यवस्थित करना और बर्तन संभालना—ये सभी आंदोलन को टिकाए रखने वाले राजनीतिक श्रम थे।

लेकिन इतिहासलेखन में अक्सर इन कामों का श्रेय महिलाओं को पर्याप्त नहीं मिलता।

5 घर पर रहकर आंदोलन चलाना

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह आंदोलन से बाहर थी।

कई महिलाओं ने घर पर खेत और पशुओं की जिम्मेदारी संभाली।

इस प्रकार आंदोलन में भागीदारी का एक दूसरा रूप दिखाई देता है—

यह भी राजनीतिक भागीदारी है, भले ही वह मंच पर दिखाई न दे।

6 लोकगीत : महिलाओं की राजनीतिक भाषा

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ग्रामीण संस्कृति में लोकगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहे।

वे सामाजिक अनुभव, पीड़ा, व्यंग्य और सामूहिक भावना व्यक्त करने का साधन भी रहे हैं।

महिला किसान आंदोलनों में लोकगीतों के माध्यम से—

इस तरह ग्रामीण महिला ने अपनी राजनीतिक भाषा अक्सर भाषण के बजाय गीत में व्यक्त की।

7 मंच पर कम, मैदान में अधिक

टिकैत काल के किसान आंदोलनों की एक प्रमुख विशेषता थी—

महिलाएं आंदोलन स्थल पर दिखाई देती थीं, लेकिन मंचीय नेतृत्व में बहुत कम।

महापंचायत का नेतृत्व मुख्यतः पुरुषों के हाथ में था।

खाप नेतृत्व भी लगभग पूर्णतः पुरुष प्रधान था।

इसलिए महिलाओं की भागीदारी को दो स्तरों पर देखना चाहिए—

यही विरोधाभास महिला किसान की स्थिति को समझने की कुंजी है।

8 खाप और पितृसत्ता

BKU का सामाजिक आधार जिन खाप और ग्रामीण पंचायत संरचनाओं से जुड़ा था, वे परंपरागत रूप से पुरुष प्रधान थीं।

परिवार और विवाह के निर्णय में पुरुषों की प्रधानता।

यही सामाजिक संरचना किसान आंदोलन में भी आई।

इसलिए टिकैत आंदोलन जितना किसान स्वाभिमान की बात करता था, उतना ही उसे ग्रामीण पितृसत्ता की सीमाओं से भी जूझना पड़ता था।

9 महिला की किसान पहचान क्यों कमजोर रही?

कृषि भूमि प्रायः पुरुषों के नाम थी।

मंडी, बैंक और सरकारी कार्यालयों में परिवार का पुरुष ही किसान प्रतिनिधि माना जाता था।

महिला का कृषि श्रम “घरेलू मदद” मान लिया जाता था।

इसलिए महिला खेती करती थी, लेकिन राज्य और समाज के दस्तावेजों में किसान के रूप में नहीं दिखाई देती थी।

10 गन्ना अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की गन्ना अर्थव्यवस्था पुरुष प्रधान दिखाई देती है, क्योंकि गन्ना मिलों में बेचने और भुगतान लेने की प्रक्रिया अक्सर पुरुष संभालते थे।

लेकिन गन्ने की खेती में महिला श्रम भी महत्वपूर्ण था।

खेत की तैयारी के बाद की अनेक गतिविधियों, खरपतवार नियंत्रण, पशुपालन और घरेलू कृषि अर्थव्यवस्था में महिलाएं योगदान देती थीं।

इसलिए गन्ने का अधिक मूल्य केवल पुरुष किसान की आय नहीं बढ़ाता था।

उसका प्रभाव पूरे किसान परिवार पर पड़ता था।

फिर भी निर्णय लेने का अधिकार परिवार में असमान रह सकता था।

11 बिजली और महिला श्रम

बिजली का प्रश्न भी महिला किसान से जुड़ा था।

लेकिन बिजली संकट का असर केवल खेत तक सीमित नहीं था।

ग्रामीण घरेलू श्रम, पानी और पशुपालन भी प्रभावित होते थे।

इसलिए टिकैत के आर्थिक प्रश्न महिलाओं से अप्रत्यक्ष नहीं, बल्कि वास्तविक रूप से जुड़े थे।

12 क्या BKU ने महिला प्रश्न को अलग एजेंडा बनाया?

महेंद्र सिंह टिकैत के मुख्य आंदोलनकारी दौर में ऐसा व्यापक और स्पष्ट महिला किसान एजेंडा विकसित नहीं हुआ।

ये प्रश्न BKU के मुख्य एजेंडे के केंद्र में नहीं आए।

13 कृषि प्रश्न और महिला प्रश्न का अंतर

BKU मानती थी कि यदि किसान परिवार की आय बढ़ेगी तो परिवार के सभी सदस्य लाभान्वित होंगे।

लेकिन महिला अध्ययन का महत्वपूर्ण तर्क है कि परिवार एक समान आर्थिक इकाई नहीं होता।

यदि भूमि पुरुष के नाम है और आय पर उसका नियंत्रण है, तो बढ़ी हुई कृषि आय का लाभ महिला को समान रूप से मिलेगा—यह स्वचालित नहीं है।

यहीं “किसान परिवार” और “महिला किसान” की राजनीति अलग हो जाती है।

14 महिला किसान और भूमि अधिकार

महिला किसान की स्वतंत्र पहचान का सबसे बड़ा आधार भूमि अधिकार है।

जिस महिला के नाम भूमि नहीं है, उसे कई सरकारी योजनाओं में किसान साबित करना कठिन हो सकता है।

ये सब भूमि अभिलेख से जुड़ सकते हैं।

इसलिए महिला किसान आंदोलन की एक महत्वपूर्ण मांग आगे चलकर बनी—

महिलाओं को भूमि और कृषि संपत्ति में वास्तविक स्वामित्व अधिकार मिले।

टिकैत काल के BKU ने इसे अपने मुख्य आंदोलन की पहचान नहीं बनाया।

15 दलित और भूमिहीन महिला मजदूर

महिला प्रश्न केवल कृषक परिवार की महिला तक सीमित नहीं है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में दलित और गरीब महिलाएं कृषि मजदूर के रूप में काम करती थीं।

BKU का भूमि-स्वामी कृषक केंद्रित एजेंडा इन प्रश्नों को पूरी तरह प्रतिनिधित्व नहीं कर सका।

इसलिए महिला किसान की सामाजिक श्रेणी के भीतर भी वर्ग और जाति का अंतर महत्वपूर्ण है।

16 महिला की दोहरी मेहनत

कृषि परिवार की महिला का श्रम अक्सर दोहरा होता था।

इसके साथ पशुपालन और बच्चों की देखभाल।

यदि पुरुष आंदोलन में चला गया तो उसका श्रम और बढ़ सकता था।

यानी किसान आंदोलन में पुरुष की सार्वजनिक राजनीतिक भागीदारी कई बार महिला के अतिरिक्त घरेलू और कृषि श्रम पर आधारित थी।

इस अदृश्य श्रम को पहचानना किसान आंदोलन के सामाजिक इतिहास के लिए आवश्यक है।

17 आंदोलन ने महिलाओं को सार्वजनिक स्थान भी दिया

फिर भी किसान आंदोलन महिलाओं के लिए केवल बोझ नहीं था।

वह सार्वजनिक भागीदारी का अवसर भी बना।

सरकार के खिलाफ सार्वजनिक रूप से बोलना।

इन सबने ग्रामीण महिला की राजनीतिक चेतना को बढ़ाया।

इसलिए BKU आंदोलन को पितृसत्तात्मक संरचना के भीतर भी महिला राजनीतिक सहभागिता के विस्तार की प्रक्रिया के रूप में देखा जा सकता है।

18 परिवार से नागरिक तक

जब महिला धरने पर आती है, वह केवल किसान की पत्नी नहीं रहती।

वह स्वयं आंदोलनकारी नागरिक बनती है।

हालांकि उसे संगठन में पद न मिले, लेकिन सार्वजनिक स्थान पर उसकी उपस्थिति सामाजिक सीमाओं को चुनौती देती है।

यही प्रक्रिया बाद के किसान आंदोलनों में अधिक स्पष्ट हुई।

19 टिकैत के बाद बदलती तस्वीर

महेंद्र सिंह टिकैत के निधन के बाद BKU और व्यापक किसान राजनीति में महिलाओं की भागीदारी धीरे-धीरे अधिक स्पष्ट हुई।

2010 के दशक में भूमि, कृषि संकट और किसान आत्महत्याओं से जुड़े आंदोलनों में महिलाएं अधिक दृश्यमान हुईं।

लेकिन सबसे बड़ा परिवर्तन 2020–21 के किसान आंदोलन में दिखाई दिया।

20 2020–21 : महिला किसान का नया सार्वजनिक चेहरा

दिल्ली की सीमाओं पर 2020–21 के आंदोलन में महिलाओं ने व्यापक भागीदारी की।

गांवों से जत्थों का नेतृत्व कर रही थीं।

यह पुराने किसान आंदोलनों की तुलना में महत्वपूर्ण बदलाव था।

महिला किसान अब पृष्ठभूमि से निकलकर आंदोलन की सार्वजनिक पहचान का हिस्सा बनने लगी।

21 किसान महिला दिवस

2020–21 के आंदोलन में 18 जनवरी 2021 को महिला किसान दिवस मनाया गया।

महिला किसान ने स्वयं को स्वतंत्र राजनीतिक श्रेणी के रूप में प्रस्तुत किया।

खेती में महिला का श्रम और अधिकार दोनों स्वीकार किए जाएं।

यह वह प्रश्न था जो महेंद्र सिंह टिकैत के दौर में आंदोलन के केंद्र में नहीं आ पाया था।

22 ट्रैक्टर और महिला किसान

2020–21 आंदोलन में महिलाओं द्वारा ट्रैक्टर चलाना विशेष रूप से प्रतीकात्मक बन गया।

ट्रैक्टर लंबे समय से किसान आंदोलन की शक्ति का प्रतीक था।

जब महिला किसान ट्रैक्टर पर दिखाई दी, तो उसने उस प्रतीक की लैंगिक सीमा तोड़ी।

यह किसान राजनीति में महिला की बढ़ती स्वायत्तता का दृश्य संकेत था।

23 राकेश टिकैत के दौर में महिला भागीदारी

राकेश टिकैत के नेतृत्व वाले BKU में भी 2020–21 के दौरान महिलाओं की प्रत्यक्ष भागीदारी बढ़ी।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों से महिला जत्थे गाजीपुर सीमा पहुंचे।

इससे संगठन की पारंपरिक पुरुष प्रधान छवि कुछ हद तक बदली।

लेकिन नेतृत्व के शीर्ष स्तर पर लैंगिक समानता अभी भी सीमित रही।

24 खापों में महिलाओं की नई उपस्थिति

इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के बाद कुछ खाप पंचायतों और किसान महापंचायतों में महिलाओं की उपस्थिति बढ़ने लगी।

यह परिवर्तन पूर्ण नहीं था, लेकिन ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण था।

जिस संरचना में कभी महिलाओं को सार्वजनिक निर्णय से बाहर रखा जाता था, उसी सामाजिक क्षेत्र में अब महिला किसान मंच पर आ रही थी।

यह ग्रामीण समाज के धीमे परिवर्तन का संकेत है।

25 महिला किसान और उत्तराधिकार

महिला किसान की वास्तविक आर्थिक स्वतंत्रता भूमि अधिकार से जुड़ी है।

हिंदू उत्तराधिकार कानून में 2005 के संशोधन ने बेटियों के संपत्ति अधिकार को मजबूत किया।

लेकिन कानूनी अधिकार और वास्तविक भूमि स्वामित्व में अभी भी अंतर बना रहा।

ग्रामीण परिवारों में महिलाएं कई बार अपने हिस्से की भूमि भाइयों के पक्ष में छोड़ देती हैं या सामाजिक दबाव के कारण दावा नहीं करतीं।

इसलिए महिला किसान की पहचान केवल आंदोलन में भागीदारी से नहीं, भूमि स्वामित्व से भी जुड़ी है।

26 विधवा किसान का प्रश्न

कृषि संकट में पति की मृत्यु के बाद महिला को अक्सर खेती और ऋण दोनों संभालने पड़ते हैं।

लेकिन यदि भूमि और ऋण दस्तावेज पति के नाम हैं तो उसे कानूनी और प्रशासनिक कठिनाई होती है।

इसलिए महिला किसान की स्वतंत्र पहचान सामाजिक सुरक्षा के प्रश्न से भी जुड़ी है।

यह विषय टिकैत काल की किसान राजनीति में पर्याप्त प्रमुखता नहीं पा सका।

27 किसान आंदोलन और लैंगिक न्याय

यदि किसान आंदोलन केवल फसल मूल्य बढ़ाने तक सीमित रहे, तो वह महिला किसान की पूरी समस्या नहीं हल करता।

सरकारी किसान योजनाओं में स्वतंत्र पहचान।

और किसान संगठनों के नेतृत्व में प्रतिनिधित्व।

यही आधुनिक किसान राजनीति के सामने अगला सामाजिक एजेंडा है।

28 महिला भागीदारी और आंदोलन का चरित्र

महिलाओं की भागीदारी आंदोलन की सामाजिक भाषा भी बदलती है।

जब पूरा परिवार आंदोलन में आता है, तो सरकार के लिए उसे केवल हिंसक भीड़ के रूप में प्रस्तुत करना कठिन हो सकता है।

बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग धरने को सामाजिक समुदाय का रूप देते हैं।

यह टिकैत मॉडल की उस पुरानी रणनीति को अधिक व्यापक करता है जिसमें गांव को आंदोलन स्थल तक लाया जाता था।

29 आंदोलन में महिलाएं और अहिंसा

महिला भागीदारी कई किसान आंदोलनों में शांतिपूर्ण सार्वजनिक प्रतिरोध की छवि को मजबूत करती है।

लेकिन इसे जैविक या रूढ़िगत तरीके से नहीं समझना चाहिए कि महिलाएं स्वभावतः अहिंसक होती हैं।

सही बात यह है कि परिवार आधारित व्यापक भागीदारी आंदोलन की सामाजिक वैधता बढ़ाती है और प्रशासन के लिए बल प्रयोग की राजनीतिक लागत बढ़ा सकती है।

30 महिला नेतृत्व क्यों आवश्यक है?

यदि महिलाएं धरने में मौजूद हैं लेकिन निर्णय पुरुष लेते हैं, तो संगठन पूरी तरह प्रतिनिधिक नहीं है।

महिला नेतृत्व इसलिए आवश्यक है क्योंकि महिला किसान की समस्याएं कई मामलों में अलग होती हैं।

इन प्रश्नों को तभी पर्याप्त महत्व मिलेगा जब निर्णय-निर्माण में महिलाएं मौजूद हों।

31 टिकैत काल की उपलब्धि

महेंद्र सिंह टिकैत के किसान आंदोलनों ने ग्रामीण महिलाओं के लिए सार्वजनिक राजनीतिक भागीदारी के कुछ दरवाजे खोले।

किसान परिवार की राजनीतिक भूमिका में सक्रिय हुईं।

32 टिकैत काल की सीमा

लेकिन संगठन महिला को स्वतंत्र किसान राजनीतिक इकाई के रूप में पर्याप्त रूप से विकसित नहीं कर सका।

दलित और भूमिहीन महिला मजदूर के प्रश्न हाशिये पर रहे।

इसलिए BKU का किसान स्वाभिमान मुख्यतः पुरुष कृषक की सार्वजनिक छवि में दिखाई देता रहा।

33 टिकैत के बाद की प्रगति

बाद के दशकों में किसान राजनीति ने इस सीमा को आंशिक रूप से तोड़ा।

कृषि संकट में महिलाओं की भूमिका पर शोध बढ़ा।

2020–21 ने इसे राष्ट्रीय दृश्यता दी।

उसकी कुछ सामाजिक पूर्वपीठिका पुराने किसान आंदोलनों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी में मौजूद थी।

34 क्या महिला किसान की पहचान अब स्थापित हो गई?

आज भी अनेक महिला कृषि श्रमिक स्वयं को किसान नहीं मानतीं, क्योंकि भूमि उनके नाम नहीं है।

सरकारी नीतियों में भी किसान की पहचान कई बार भूमि-स्वामित्व आधारित है।

इसलिए महिला किसान का प्रश्न अभी भी अधूरा है।

यही आधुनिक किसान आंदोलन की बड़ी चुनौती है।

35 किसान आंदोलन की नई परिभाषा

यदि किसान आंदोलन वास्तव में व्यापक होना चाहता है तो “किसान” की परिभाषा केवल भूमि मालिक पुरुष तक सीमित नहीं रह सकती।

और परिवार की वह महिला जो बिना मजदूरी के खेत पर काम करती है।

यही वह विस्तार है जो टिकैत युग के किसान आंदोलन से आगे की ऐतिहासिक आवश्यकता बनता है।

समेकित मूल्यांकन : अदृश्य श्रम से सार्वजनिक किसान पहचान तक

महेंद्र सिंह टिकैत का किसान आंदोलन पुरुष नेतृत्व वाला था, लेकिन महिलाओं के बिना वह उस रूप में संभव नहीं था।

और लंबे किसान पड़ाव की सामाजिक व्यवस्था को जीवित रखा।

उनका योगदान आंदोलन की अदृश्य आधारभूत संरचना था।

लेकिन यही इतिहास एक बड़ा प्रश्न भी उठाता है—

अध्याय 13

भारतीय किसान यूनियन और ‘नए किसान आंदोलन’ — महेंद्र सिंह टिकैत, शरद जोशी और प्रो. एम. डी. नंजुंडास्वामी की तुलनात्मक समीक्षा

1980 के दशक में भारत के विभिन्न हिस्सों में किसान राजनीति का एक नया चरण उभरा, जिसे प्रायः “नए किसान आंदोलन” कहा गया। महाराष्ट्र में शरद जोशी की शेतकारी संगठन, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व वाली भारतीय किसान यूनियन और कर्नाटक में प्रो. एम. डी. नंजुंडास्वामी के नेतृत्व वाला कर्नाटक राज्य रैयत संघ—इन तीनों ने इस नई राजनीति को अलग-अलग रूप दिए। विद्वानों ने BKU को इसी व्यापक “नए किसान आंदोलन” और कृषि लोकवाद की परंपरा का अभिन्न हिस्सा माना है।

इन संगठनों के बीच कुछ महत्वपूर्ण समानताएं थीं। तीनों पुराने जमींदारी-विरोधी या भूमि-पुनर्वितरण आंदोलनों से अलग उस व्यावसायिक किसान की समस्याओं को केंद्र में लाते थे जो बाजार के लिए उत्पादन कर रहा था, जिसकी खेती की लागत बढ़ रही थी और जिसे लगता था कि राज्य तथा शहरी अर्थव्यवस्था उसके साथ अन्याय कर रही है। लेकिन इसी समानता के भीतर एक बहुत बड़ा वैचारिक विभाजन भी था।

शरद जोशी का उत्तर था—किसान को बाजार की स्वतंत्रता दो।

नंजुंडास्वामी का उत्तर था—किसान को बाजार और बहुराष्ट्रीय पूंजी से बचाओ।

टिकैत का उत्तर था—सरकार किसान की लागत घटाए, उसकी उपज का उचित मूल्य सुनिश्चित करे और किसान के सामने जवाबदेह बने।

यही तीन अलग रास्ते भारतीय नए किसान आंदोलन को समझने की कुंजी हैं।

1 ‘नया किसान आंदोलन’ नया क्यों था?

यह प्रश्न सबसे पहले स्पष्ट करना आवश्यक है।

क्या भारत में इससे पहले किसान आंदोलन नहीं हुए थे?

लेकिन इनमें से अधिकांश के केंद्र में भूमि, लगान, जमींदारी, बटाई, बेदखली या वर्गीय शोषण जैसे प्रश्न थे।

1980 के दशक के नए किसान आंदोलनों का केंद्रीय प्रश्न अलग था—

बाजार में कृषि उपज का मूल्य और खेती की लागत।

IGNOU की किसान आंदोलन संबंधी सामग्री भी इस परिवर्तन को रेखांकित करती है कि नए किसान आंदोलन ऐसे समय उभरे जब कृषि की आय पर दबाव था, निवेश महंगे हो रहे थे और संगठनों ने मुख्यतः लाभकारी कृषि मूल्य की मांग उठाई।

इसलिए इसे केवल “नया संगठन” नहीं, बल्कि किसान राजनीति के एजेंडे में बदलाव कहा जाना चाहिए।

2 पुराने किसान से नए बाजारोन्मुख किसान तक

पुराने कृषक संघर्ष का प्रमुख प्रश्न हो सकता था—

यह परिवर्तन हरित क्रांति, सिंचाई, कृषि मशीनरी, उर्वरक, व्यावसायिक फसल और बाजार पर बढ़ती निर्भरता से जुड़ा था।

किसान अब केवल जीविका के लिए खेती नहीं कर रहा था।

और इसी के साथ वह बिजली, डीजल, खाद, बीज और मशीनरी खरीद रहा था।

अर्थात किसान स्वयं बाजार का बड़ा उत्पादक भी था और खरीदार भी।

इसीलिए कृषि की विनिमय शर्तें नए किसान आंदोलन की मूल समस्या बनीं।

3 तीन अलग भूगोल

तीनों आंदोलनों का क्षेत्रीय भूगोल अलग था।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का सिंचित गन्ना–गेहूं क्षेत्र।

महाराष्ट्र की विविध व्यावसायिक फसलों वाली कृषि, विशेषकर प्याज, कपास, गन्ना और दूसरे बाजारोन्मुख उत्पाद।

कर्नाटक की क्षेत्रीय विविधता, जिसमें सिंचित और वर्षा-आधारित कृषि दोनों और बाद में बीज, जैव-प्रौद्योगिकी तथा वैश्वीकरण जैसे प्रश्न।

इसलिए तीनों आंदोलनों का किसान अनुभव समान नहीं था।

उनकी विचारधारा पर उनके क्षेत्रीय कृषि ढांचे का गहरा प्रभाव पड़ा।

4 महेंद्र सिंह टिकैत : किसान का व्यावहारिक अर्थशास्त्र

टिकैत की राजनीति बहुत व्यावहारिक थी।

कैम्ब्रिज के एक आधुनिक अध्ययन ने भी 1988 के BKU आंदोलन में सस्ती बिजली को वह केंद्रीय मांग माना है जिसने टिकैत की किसान नेता की पहचान तेजी से बनाई।

टिकैत राज्य को समाप्त नहीं करना चाहते थे।

वह राज्य से किसान के पक्ष में हस्तक्षेप चाहते थे।

यह बात उन्हें शरद जोशी से अलग करती है।

5 शरद जोशी : लाभकारी मूल्य से बाजार की स्वतंत्रता तक

महाराष्ट्र में शरद जोशी की शेतकारी संगठन की राजनीति अधिक स्पष्ट आर्थिक सिद्धांत पर आधारित थी।

किसान को लाभकारी मूल्य मिलना चाहिए और राज्य द्वारा कृषि बाजार पर लगाए गए नियंत्रण हटने चाहिए।

उनका मानना था कि भारतीय विकास व्यवस्था ने ग्रामीण कृषि क्षेत्र से अधिशेष निकालकर शहरी–औद्योगिक भारत को लाभ पहुंचाया।

शेतकारी संगठन के विचार में “भारत” ग्रामीण उत्पादक समाज था और “इंडिया” शहरी, नौकरशाही तथा औद्योगिक व्यवस्था का प्रतीक। संगठन से जुड़े साहित्य में जोशी के इस तर्क को कृषि से शहरी–औद्योगिक अर्थव्यवस्था की ओर अधिशेष हस्तांतरण के रूप में प्रस्तुत किया गया।

6 जोशी का ‘एक सूत्रीय’ कार्यक्रम

शेतकारी संगठन की शुरुआती राजनीति का सबसे प्रसिद्ध सूत्र था—

जोशी का तर्क था कि यदि किसान को उसकी फसल का पर्याप्त मूल्य मिल जाए, तो उसे अनेक प्रकार की सरकारी सहायता की आवश्यकता नहीं होगी।

यह टिकैत की नीति से महत्वपूर्ण अंतर था।

कम लागत + बेहतर मूल्य + सरकारी राहत।

बाजार में वास्तविक लाभकारी मूल्य + सरकारी नियंत्रण से मुक्ति।

यानी एक ओर किसान राज्य से सहायता मांग रहा था।

दूसरी ओर किसान राज्य को रास्ते से हटने के लिए कह रहा था।

7 बाजार पर सबसे बड़ा वैचारिक विभाजन

तीनों आंदोलनों को समझने का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है—

शरद जोशी के लिए समस्या मुक्त बाजार नहीं, बल्कि नियंत्रित और विकृत बाजार था।

उनका मानना था कि सरकार कृषि उपज की कीमत दबाती है, व्यापार और निर्यात पर प्रतिबंध लगाती है और किसान को बाजार की पूरी स्वतंत्रता नहीं देती।

इसलिए वे उदारीकरण और खुले व्यापार को किसान के लिए अवसर मानने लगे। आधुनिक समीक्षाएं शेतकारी संगठन को स्पष्ट रूप से बाजारोन्मुख और आर्थिक उदारीकरण समर्थक किसान संगठन के रूप में दर्ज करती हैं।

लेकिन नंजुंडास्वामी इसी प्रश्न पर लगभग विपरीत दिशा में खड़े थे।

8 नंजुंडास्वामी : बाजार नहीं, किसान संप्रभुता

कर्नाटक राज्य रैयत संघ के प्रो. एम. डी. नंजुंडास्वामी ने कृषि प्रश्न को केवल कीमत तक सीमित नहीं रखा।

बहुराष्ट्रीय कंपनियां किसान को किस दिशा में ले जाएंगी?

WTO और वैश्वीकरण का किसान पर क्या प्रभाव होगा?

यहीं KRRS की राजनीति 1990 के दशक में वैश्वीकरण-विरोध, बीज-संप्रभुता और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रतिरोध की अग्रणी आवाज बन गई।

कैम्ब्रिज के एक अध्ययन में नंजुंडास्वामी का प्रसिद्ध कथन दर्ज है कि यदि स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक चरखा था, तो नई स्वतंत्रता की रक्षा का प्रतीक बीज है।

9 बीज राजनीतिक प्रश्न कैसे बना?

हरित क्रांति ने किसान को बाहरी बीज और तकनीक पर अधिक निर्भर किया।

जैव-प्रौद्योगिकी और पेटेंट व्यवस्था के विस्तार ने प्रश्न खड़ा किया—

यदि बीज पर कंपनी का बौद्धिक संपदा अधिकार होगा तो किसान की स्वतंत्रता क्या होगी?

नंजुंडास्वामी के लिए बीज केवल कृषि निवेश नहीं था।

वह किसान की संप्रभुता का प्रतीक था।

इसलिए KRRS की राजनीति मूल्य से आगे जाकर—

बाद के वर्षों में KRRS ने स्थानीय बीज प्रणालियों, बीज बैंक और किसान-से-किसान बीज विनिमय को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया।

10 वैश्वीकरण : जोशी बनाम नंजुंडास्वामी

यहीं नए किसान आंदोलन की सबसे बड़ी वैचारिक दरार दिखाई देती है।

शरद जोशी मानते थे कि वैश्विक बाजार किसान को अधिक अवसर दे सकता है।

यदि भारतीय किसान अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेच सकता है, तो घरेलू सरकारी नियंत्रण से मुक्ति मिल सकती है।

नंजुंडास्वामी वैश्वीकरण को बहुराष्ट्रीय पूंजी, बीज कंपनियों और कृषि संप्रभुता पर खतरे के रूप में देखते थे।

एक प्रमुख अध्ययन ने KRRS और शेतकारी संगठन के इसी वैचारिक विभाजन को रेखांकित किया है—एक तरफ बाजार को स्वतंत्रता का क्षेत्र मानने वाला दृष्टिकोण, दूसरी तरफ बाजार शक्ति को प्रभुत्व के रूप में देखने वाला दृष्टिकोण।

दोनों किसान स्वतंत्रता की बात कर रहे थे।

लेकिन “स्वतंत्रता” की उनकी परिभाषा बिल्कुल अलग थी।

11 टिकैत इस विवाद में कहां थे?

महेंद्र सिंह टिकैत न तो जोशी जैसे व्यवस्थित मुक्त-बाजार समर्थक बने, न नंजुंडास्वामी जैसे व्यापक वैश्वीकरण-विरोधी वैचारिक आंदोलन के नेता।

उनकी राजनीति अधिक व्यवहारिक और मुद्दा-केंद्रित रही।

इसलिए टिकैत को दोनों विचारधाराओं के बीच किसी मध्य मार्ग पर रखना भी पूरी तरह सही नहीं होगा।

12 तीनों में किसान स्वाभिमान

विचारधारात्मक अंतर के बावजूद तीनों में एक गहरी समानता थी—

टिकैत इसे किसान की इज्जत और स्वाभिमान की भाषा में कहते थे।

शरद जोशी इसे शहरी “इंडिया” द्वारा ग्रामीण “भारत” के आर्थिक शोषण के रूप में रखते थे।

नंजुंडास्वामी इसे किसान की संप्रभुता और बहुराष्ट्रीय पूंजी के सामने स्वतंत्रता के प्रश्न में बदलते थे।

INFLIBNET की किसान आंदोलन सामग्री भी टिकैत, जोशी और नंजुंडास्वामी तीनों को ग्रामीण किसान के प्रति शहरी राजनीतिक–नौकरशाही भेदभाव की अनुभूति व्यक्त करने वाले नेताओं के रूप में जोड़ती है।

13 राज्य के प्रति तीन दृष्टिकोण

तीनों संगठनों का राज्य से संबंध भी अलग था।

नंजुंडास्वामी

बहुराष्ट्रीय पूंजी और पेटेंट व्यवस्था से किसान की रक्षा करो।

स्थानीय बीज, जैव विविधता और कृषि संप्रभुता बचाओ।

यानी तीनों राज्य से लड़ते थे, लेकिन राज्य से उनकी अपेक्षाएं अलग थीं।

14 गैर-दलीयता : साझा प्रारंभिक सूत्र

तीनों नए किसान आंदोलनों में राजनीतिक दलों से दूरी की प्रवृत्ति दिखाई दी।

टिकैत ने इसे अत्यंत स्पष्ट संगठनात्मक सिद्धांत बनाया।

शेतकारी संगठन ने भी अपने शुरुआती दौर में स्वयं को गैर-पार्टी किसान संगठन के रूप में प्रस्तुत किया।

KRRS ने भी किसान आंदोलन की स्वतंत्रता पर जोर दिया।

किसान को कांग्रेस, भाजपा, जनता दल, वाम या अन्य दलों की किसान शाखा बनने से बचाना।

BKU के संदर्भ में विद्वानों ने विशेष रूप से बताया है कि राजनीतिक तटस्थता ने विभिन्न जाति, वर्ग और समुदाय की पहचानों को “किसान” की साझा पहचान में जोड़ने में मदद की।

15 लेकिन तीनों राजनीति से बाहर नहीं रहे

गैर-दलीयता का अर्थ गैर-राजनीतिक होना नहीं था।

तीनों संगठनों ने सरकारों पर दबाव डाला।

और समय के साथ दलगत राजनीति से विभिन्न स्तरों पर संबंध बनाए।

शेतकारी संगठन के नेताओं ने बाद में औपचारिक चुनावी राजनीति में भी प्रवेश किया।

BKU ने 1989 और बाद के चुनावों में विभिन्न दलों के प्रति समर्थन या झुकाव दिखाया।

KRRS भी कर्नाटक की व्यापक राजनीतिक बहसों से अलग नहीं रहा।

इसलिए नए किसान आंदोलन की गैर-दलीयता को पूर्ण राजनीतिक निष्पक्षता समझना गलत होगा।

16 संघर्ष-पद्धति : टिकैत का ग्रामीण पड़ाव

मेरठ और दिल्ली में यही मॉडल दिखाई दिया।

उनका आंदोलन ग्रामीण समाज को शहर और प्रशासनिक केंद्र तक ले आता था।

यह दृश्यात्मक और सामाजिक रूप से अत्यंत शक्तिशाली शैली थी।

17 शरद जोशी : रास्ता रोको और बाजार रोक दो

शेतकारी संगठन की संघर्ष-पद्धति अधिक सीधे बाजार प्रवाह पर दबाव डालने वाली रही।

महाराष्ट्र में प्याज, गन्ना, दूध, कपास और दूसरी फसलों के मूल्य आंदोलन हुए।

जोशी के लिए किसान की शक्ति इस तथ्य में थी कि वह उत्पादन करता है।

यदि उत्पादक अपना माल रोक दे तो बाजार प्रभावित होगा।

यानी टिकैत जहां राज्य के सामने किसान को बैठाते थे, जोशी अक्सर बाजार को किसान की शक्ति महसूस कराते थे।

18 नंजुंडास्वामी : प्रत्यक्ष कार्रवाई और प्रतीकात्मक प्रतिरोध

KRRS की संघर्ष शैली में धरना और प्रदर्शन के साथ अधिक नाटकीय प्रत्यक्ष कार्रवाइयां भी शामिल हुईं।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ प्रदर्शन।

वैश्वीकरण-विरोधी अभियानों में सक्रियता।

कृषि-कारपोरेट प्रतिष्ठानों के खिलाफ प्रतीकात्मक कार्रवाइयां।

इन कार्रवाइयों ने KRRS को अंतरराष्ट्रीय वैश्वीकरण-विरोधी आंदोलन में भी पहचान दी।

यानी नंजुंडास्वामी का किसान आंदोलन स्थानीय कृषि मूल्य प्रश्न से निकलकर वैश्विक राजनीतिक प्रतिरोध तक पहुंच गया।

19 टिकैत का हुक्का, जोशी का आर्थिक तर्क, नंजुंडास्वामी का बीज

तीनों आंदोलनों के प्रतीक भी उनके चरित्र बताते हैं।

ग्रामीण समुदाय, सामूहिकता और किसान स्वाभिमान।

जोशी — लाभकारी मूल्य और “भारत बनाम इंडिया।”

कृषि संप्रभुता, स्वदेशी और वैश्वीकरण-विरोध।

इन तीन प्रतीकों में नए किसान आंदोलन की तीन धाराएं समाहित दिखाई देती हैं।

20 वर्गीय आधार : किस किसान का आंदोलन?

तीनों आंदोलनों की एक महत्वपूर्ण आलोचना यह रही कि उनका मुख्य आधार भूमि रखने वाला बाजारोन्मुख किसान था।

BKU के आधुनिक अध्ययन में भी बड़े और मध्यम किसानों को उसके निर्माण का महत्वपूर्ण आधार बताया गया है, हालांकि उसने जाति और धर्म की सीमाओं के पार “किसान” पहचान बनाने की कोशिश की।

इसी प्रकार शेतकारी संगठन और KRRS में भी बाजार के लिए उत्पादन करने वाले कृषक महत्वपूर्ण सामाजिक आधार थे।

21 गरीब किसान और भूमिहीन मजदूर का प्रश्न

यहीं नए किसान आंदोलन की सबसे बड़ी आलोचना आती है।

भूमिहीन कृषि मजदूर का सवाल क्या है?

लेकिन नए किसान आंदोलन का प्रश्न था—

इसलिए पुराने वामपंथी किसान आंदोलनों ने कई बार नए किसान आंदोलनों को “समृद्ध किसान” या “कुलक” राजनीति के रूप में देखा।

यह आलोचना पूरी तरह निराधार नहीं थी, लेकिन सभी छोटे और सीमांत कृषकों को इन आंदोलनों से बाहर मानना भी गलत होगा।

22 छोटे किसान क्यों जुड़े?

उसे भी बेहतर गन्ना या प्याज मूल्य चाहिए था।

इसलिए मूल्य और लागत के प्रश्नों पर छोटे किसान भी आंदोलनों से जुड़ सकते थे।

अधिक उत्पादन करने वाला किसान मूल्य वृद्धि से अधिक लाभ उठाता।

नलकूप वाला किसान सस्ती बिजली से अधिक लाभ उठा सकता था।

23 भूमि सुधार पीछे क्यों चला गया?

नए किसान आंदोलन में भूमि-वितरण का प्रश्न अपेक्षाकृत पीछे रहा।

आंदोलन का प्रमुख प्रतिभागी पहले से भूमि पर खेती कर रहा था।

इसलिए उसका प्रश्न भूमि प्राप्त करना नहीं, अपनी मौजूदा खेती को लाभकारी बनाना था।

यही नए और पुराने किसान आंदोलनों का सबसे मूल वर्गीय अंतर था।

24 किसान बनाम शहर

तीनों आंदोलनों में अलग-अलग रूपों में ग्रामीण–शहरी विभाजन की भाषा दिखाई देती है।

जोशी ने इसे सबसे व्यवस्थित रूप में “भारत बनाम इंडिया” कहा।

टिकैत भी दिल्ली जाकर इस असमानता को प्रत्यक्ष अनुभव की भाषा में व्यक्त करते थे—ग्रामीण किसान को लगता था कि शहर को सड़क, बिजली और सुविधाएं अधिक मिलती हैं जबकि कृषि क्षेत्र उपेक्षित है। INFLIBNET में टिकैत का शहरी संपत्ति और ग्रामीण भूमि सीमा की असमानता पर दिया गया उदाहरण भी इसी भावना को दर्शाता है।

नंजुंडास्वामी ने इसमें वैश्विक पूंजी और बहुराष्ट्रीय कंपनी का तत्व जोड़ दिया।

25 किसान बनाम राज्य या किसान बनाम पूंजी?

यहीं तीनों का अंतर फिर स्पष्ट होता है।

राज्य द्वारा नियंत्रित बाजार व्यवस्था।

नंजुंडास्वामी का प्रमुख प्रतिद्वंद्वी—

राज्य, बहुराष्ट्रीय पूंजी और वैश्विक कृषि व्यवस्था का गठजोड़।

यानी तीनों एक ही ग्रामीण असंतोष को अलग-अलग राजनीतिक अर्थ देते थे।

26 स्वदेशी पर मतभेद

नंजुंडास्वामी की राजनीति में स्वदेशी और स्थानीय कृषि प्रणालियों का मजबूत तत्व था।

जोशी का दृष्टिकोण इससे लगभग उलटा था।

वे किसान को दुनिया के बाजार और नई तकनीक तक पहुंच से वंचित करना किसान-विरोधी मान सकते थे।

इसलिए “किसान की आजादी” दोनों के लिए महत्वपूर्ण थी, लेकिन—

जोशी के लिए आजादी = बाजार तक पहुंच।

नंजुंडास्वामी के लिए आजादी = कंपनी और पेटेंट नियंत्रण से स्वतंत्रता।

27 टिकैत और स्वदेशी

टिकैत की भाषा स्वदेशी की वैचारिक बहस से अपेक्षाकृत कम जुड़ी रही।

उनका किसान स्वाभिमान सांस्कृतिक रूप से ग्रामीण था।

लेकिन कृषि वैश्वीकरण पर उन्होंने नंजुंडास्वामी जैसी व्यवस्थित वैकल्पिक नीति विकसित नहीं की।

यही कारण है कि 1990 के दशक के बाद जब WTO और कृषि उदारीकरण बड़े मुद्दे बने, तो KRRS की वैचारिक प्रोफाइल इस क्षेत्र में BKU से अधिक स्पष्ट दिखाई देती है।

28 आंदोलन और विशेषज्ञता

तीनों नेताओं की व्यक्तिगत शैली भी बहुत अलग थी।

अंतरराष्ट्रीय अनुभव वाला बौद्धिक और आर्थिक विचारक।

कानून, राजनीति और वैश्वीकरण-विरोधी विमर्श से जुड़ा वैचारिक नेता।

इसलिए उनकी सार्वजनिक भाषा भी अलग रही।

जोशी कृषि अर्थशास्त्र की बहस करते थे।

नंजुंडास्वामी कृषि संप्रभुता को वैश्विक राजनीति से जोड़ते थे।

29 महिलाओं पर शेतकारी संगठन का अलग प्रयोग

तीनों संगठनों की तुलना में शेतकारी संगठन ने महिलाओं के प्रश्न पर कुछ विशिष्ट प्रयोग किए।

अध्याय 14

1991 के आर्थिक उदारीकरण से WTO तक BKU

1991 के आर्थिक उदारीकरण ने भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा बदल दी। औद्योगिक लाइसेंसिंग में ढील, आयात शुल्क में कटौती, विदेशी निवेश के लिए अर्थव्यवस्था को अधिक खोलना, व्यापार उदारीकरण और बाजारोन्मुख सुधार इस नई नीति के प्रमुख तत्व थे। लेकिन कृषि में परिवर्तन उद्योग जितना तत्काल और व्यापक नहीं था। 1998 की विश्व व्यापार संगठन की भारत संबंधी समीक्षा ने भी स्पष्ट किया था कि 1991 के बाद व्यापक उदारीकरण के बावजूद कृषि क्षेत्र और कृषि सहायता संरचना अपेक्षाकृत कम बदली थी; समर्थन मूल्य, खाद, बिजली और पानी जैसी सहायता व्यवस्थाएं जारी थीं।

यही तथ्य महेंद्र सिंह टिकैत और भारतीय किसान यूनियन की 1990 के दशक की राजनीति को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

कृषि एक झटके में “मुक्त बाजार” के हवाले नहीं हुई। बल्कि किसान को एक ऐसी मिश्रित व्यवस्था का सामना करना पड़ा जिसमें एक ओर अर्थव्यवस्था अधिक खुल रही थी, दूसरी ओर कृषि मूल्य, गन्ना, बिजली, उर्वरक, आयात–निर्यात और सरकारी समर्थन पर राज्य की मजबूत भूमिका बनी हुई थी।

इसलिए 1991 के बाद BKU की समस्या केवल “सरकार बनाम किसान” नहीं रही। उसके सामने नया प्रश्न था—

जब भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक बाजार से जुड़ रही है, तब भारतीय किसान की लागत, मूल्य और सुरक्षा का क्या होगा?

1 1991 : आर्थिक संकट और नई नीति

1991 में भारत गंभीर भुगतान-संतुलन संकट से जूझ रहा था। विदेशी मुद्रा भंडार अत्यंत कम हो गया था और केंद्र सरकार ने व्यापक आर्थिक सुधार शुरू किए।

और भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व बाजार से अधिक जोड़ना।

लेकिन इन सुधारों का कृषि पर प्रभाव तत्काल और समान नहीं था।

1998 तक WTO स्वयं यह दर्ज कर रहा था कि कृषि क्षेत्र सुधार कार्यक्रम से उद्योग की तुलना में काफी कम प्रभावित हुआ था और कृषि सहायता तथा मूल्य संरचना में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं हुआ था।

इसलिए 1991 को भारतीय कृषि में अचानक पूर्ण उदारीकरण की तारीख मानना गलत होगा।

2 टिकैत के किसान के लिए नया आर्थिक वातावरण

महेंद्र सिंह टिकैत का किसान पहले ही बाजार से जुड़ चुका था।

इसलिए अर्थव्यवस्था के खुलने का उसके लिए अर्थ था—

कृषि निवेश की कीमत में क्या बदलाव होगा?

विदेशी कृषि वस्तुएं भारतीय बाजार में आएंगी या नहीं?

सरकार सहायता कम करेगी या जारी रखेगी?

3 उदारीकरण का विरोध एकरूप नहीं था

1991 के बाद सभी किसान संगठन नई आर्थिक नीति को एक ही तरह नहीं देखते थे।

शरद जोशी जैसे नेता व्यापार उदारीकरण में किसान के लिए अवसर देखते थे।

एम. डी. नंजुंडास्वामी इसे बहुराष्ट्रीय पूंजी और कृषि संप्रभुता के लिए गंभीर खतरा मानते थे।

महेंद्र सिंह टिकैत का दृष्टिकोण इन दोनों से अलग था।

उन्होंने उदारीकरण के पक्ष या विरोध में कोई व्यापक व्यवस्थित वैचारिक सिद्धांत विकसित नहीं किया।

इसीलिए BKU की प्रतिक्रिया अधिक व्यावहारिक किसान हित आधारित थी।

4 कृषि लागत पर नया दबाव

हरित क्रांति की खेती पहले ही बाहरी निवेशों पर निर्भर हो चुकी थी।

1990 के दशक में इन लागतों की गति किसान की चिंता का बड़ा कारण बनी।

यदि किसी औद्योगिक इनपुट की कीमत बढ़ती थी, तो किसान की लागत बढ़ती थी।

लेकिन वह अपनी फसल का मूल्य स्वतंत्र रूप से तय नहीं कर सकता था।

यही विरोधाभास टिकैत की राजनीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।

5 उर्वरक नीति और किसान

उर्वरक कृषि लागत का केंद्रीय घटक था।

1990 के दशक की आर्थिक नीति में सहायता व्यय और सरकारी वित्तीय बोझ पर बहस बढ़ी।

लेकिन कृषि उर्वरक सहायता समाप्त नहीं हुई।

भारत की कृषि नीति में खाद सहायता आगे भी महत्वपूर्ण बनी रही।

बाद के WTO आकलनों ने भी भारत की कृषि समर्थन व्यवस्था में उर्वरक, बिजली और पानी पर सहायता को महत्वपूर्ण तत्व माना।

BKU के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण था।

यदि उर्वरक बाजार मूल्य पर बहुत महंगा होता, तो किसान की लागत बढ़ती।

इसलिए कृषि सहायता को टिकैत केवल सरकारी दया के रूप में नहीं देखते थे।

उनके व्यापक तर्क में यह कम कृषि मूल्य की क्षतिपूर्ति का एक रूप भी थी।

6 बिजली सहायता पर बढ़ता विवाद

1990 के दशक में आर्थिक सुधारों के साथ सार्वजनिक क्षेत्र की वित्तीय स्थिति और बिजली बोर्डों के घाटे पर भी प्रश्न बढ़े।

कृषि बिजली की कम दरें आलोचना का विषय बनीं।

अर्थशास्त्रियों का तर्क था कि अत्यधिक सस्ती बिजली—

राज्य विद्युत बोर्डों पर बोझ डालती है।

बिजली की चोरी और अव्यवस्था बढ़ाती है।

लेकिन BKU के लिए बिजली उत्पादन लागत थी।

किसान से अधिक बिजली शुल्क लेकर कृषि लागत बढ़ाना समाधान नहीं है।

इसीलिए 1991 के बाद भी बिजली BKU की राजनीति से गायब नहीं हुई।

7 सुधार की दो भाषाएं

अब किसान और नीति-निर्माता लगभग दो अलग भाषाओं में बोल रहे थे।

यही 1990 के दशक की कृषि राजनीति का मूल तनाव था।

8 क्या उदारीकरण से कृषि निर्यात का अवसर बढ़ा?

व्यापार उदारीकरण का एक तर्क यह था कि भारत उन कृषि उत्पादों का निर्यात बढ़ा सकता है जिनमें वह प्रतिस्पर्धी है।

कृषि उत्पादक को केवल घरेलू बाजार तक सीमित रहने की आवश्यकता नहीं होगी।

यही शरद जोशी जैसे किसान नेताओं की आशा थी।

लेकिन BKU का पश्चिमी उत्तर प्रदेश किसान एक दूसरी वास्तविकता से भी जुड़ा था।

गन्ना और चीनी का बाजार भारी सरकारी नियमन के अधीन था।

इसलिए उसके लिए मुक्त वैश्विक बाजार कोई तत्काल वास्तविकता नहीं था।

9 गन्ना और चीनी : उदारीकरण की सबसे जटिल कहानी

चीनी उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था के सबसे अधिक नियंत्रित क्षेत्रों में से एक रहा।

चीनी मिल लाइसेंसिंग को प्रभावित करती थी।

चीनी बाजार में रिलीज व्यवस्था भी थी।

आयात–निर्यात नीति भी सरकार नियंत्रित करती थी।

इसलिए आर्थिक उदारीकरण के बावजूद चीनी उद्योग लंबे समय तक पूरी तरह मुक्त बाजार में नहीं गया।

10 चीनी उद्योग में धीरे-धीरे नियंत्रण कम हुए

1990 के दशक में चीनी उद्योग में क्रमिक उदारीकरण शुरू हुआ।

विशेष रूप से दशक के उत्तरार्ध में मिल लाइसेंसिंग व्यवस्था में ढील आई।

PRS द्वारा रंगराजन समिति की समीक्षा के सार के अनुसार चीनी क्षेत्र में लाइसेंस-मुक्ति के बाद स्थापित क्षमता की वृद्धि तेज हुई और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ी।

यही किसान के लिए सबसे कठिन स्थिति थी—

लेकिन गन्ने की खरीद और कीमत में अब भी नियमन।

इससे किसान और मिल के बीच पुराना तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।

11 गन्ने की नाशवान प्रकृति और किसान की कमजोरी

गन्ना काटने के बाद लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता।

किसान हर समय किसी दूर के बाजार में नहीं बेच सकता।

वह क्षेत्रीय चीनी मिल पर निर्भर रहता है।

इसी कारण चीनी क्षेत्र में पूर्ण बाजार स्वतंत्रता का सिद्धांत व्यवहार में सीमित था।

PRS के अनुसार चीनी क्षेत्र में नियमन का एक कारण स्वयं गन्ने की नाशवान प्रकृति और छोटे कृषकों की स्थिति थी।

यही वजह है कि टिकैत के लिए गन्ना मूल्य और भुगतान का सरकारी नियमन समाप्त करना सरल समाधान नहीं था।

12 चीनी मिल की वित्तीय स्थिति और किसान का बकाया

चीनी उद्योग की एक स्थायी समस्या थी—

सरकार मूल्य घोषित करती है, लेकिन यदि मिल समय पर भुगतान नहीं करती तो किसान को घोषित कीमत का भी पूरा लाभ नहीं मिलता।

आगे चलकर विशेषज्ञ समितियों ने भी माना कि चीनी बाजार की कुछ नियामक व्यवस्थाएं मिलों की नकदी क्षमता को प्रभावित करके अप्रत्यक्ष रूप से गन्ना किसानों के भुगतान में देरी बढ़ा सकती हैं।

इसलिए टिकैत की गन्ना राजनीति 1990 के बाद और जटिल हुई।

अब केवल “भाव बढ़ाओ” पर्याप्त नहीं था।

13 आयात–निर्यात नीति और किसान

उदारीकरण के साथ कृषि व्यापार नीति अधिक महत्वपूर्ण होती गई।

यदि किसी कृषि वस्तु का आयात सस्ता हो जाए तो घरेलू किसान पर दबाव पड़ सकता है।

यदि निर्यात खुल जाए तो घरेलू किसान को बेहतर बाजार मिल सकता है।

लेकिन सरकार अक्सर खाद्य मूल्य स्थिर रखने के लिए आयात और निर्यात दोनों को नियंत्रित करती रही।

1998 के WTO आकलन में भी उल्लेख था कि कई कृषि उत्पादों के आयात–निर्यात पर लाइसेंसिंग नियंत्रण जारी थे।

इसलिए भारत का कृषि व्यापार तत्काल पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ।

14 किसान की समस्या : नीति का अचानक बदलना

कृषक के लिए व्यापार नीति की एक बड़ी समस्या अनिश्चितता होती है।

सरकार घरेलू कीमत नियंत्रित रखने के लिए निर्यात रोक सकती है।

इससे किसान को लगता है कि अच्छे बाजार मूल्य का पूरा लाभ उसे नहीं मिलता।

शरद जोशी ने इस प्रश्न को बहुत तीखे रूप में उठाया।

टिकैत का आंदोलन भी व्यापक रूप से इसी असंतोष से जुड़ा था, हालांकि BKU ने इसे जोशी जैसी मुक्त व्यापार विचारधारा में विकसित नहीं किया।

15 Uruguay Round और भारतीय किसान

1991 का भारतीय आर्थिक उदारीकरण और वैश्विक स्तर पर चल रही Uruguay Round व्यापार वार्ताएं लगभग समान ऐतिहासिक समय में चल रही थीं।

Uruguay Round 1986 में शुरू हुई थी।

उसमें पहली बार कृषि व्यापार को अधिक व्यवस्थित बहुपक्षीय अनुशासन के अंतर्गत लाने की कोशिश हुई।

और 1 जनवरी 1995 को विश्व व्यापार संगठन अस्तित्व में आया।

यह किसान राजनीति में एक नए युग की शुरुआत थी।

16 WTO का कृषि समझौता

WTO का Agreement on Agriculture तीन मुख्य स्तंभों पर आधारित था—

WTO के अनुसार इसका उद्देश्य कृषि व्यापार को अधिक बाजारोन्मुख बनाना और आयात अवरोध, व्यापार-विकृत करने वाली घरेलू सहायता तथा निर्यात सब्सिडी को नियमों के अधीन लाना था। विकासशील देशों को विकसित देशों की तुलना में अधिक छूट और लंबी समयावधि दी गई।

इससे किसान आंदोलन के सामने बिल्कुल नया प्रश्न आया—

अब कृषि नीति केवल दिल्ली और लखनऊ में तय नहीं हो रही।

उस पर जिनेवा में बने बहुपक्षीय व्यापार नियमों का भी प्रभाव होगा।

17 बाजार पहुंच

WTO कृषि समझौते का पहला स्तंभ था बाजार पहुंच।

पहले कई देश कृषि आयात पर मात्रात्मक प्रतिबंध लगाते थे।

नई व्यवस्था इन्हें अधिकाधिक सीमा शुल्क आधारित प्रणाली में बदलना चाहती थी।

भारत ने अनेक कृषि उत्पादों पर काफी ऊंची अधिकतम सीमा शुल्क दरें बांधीं। 1998 की WTO समीक्षा के अनुसार कृषि में भारत की कई बाध्य सीमा शुल्क दरें 100 से 300 प्रतिशत तक थीं, जबकि वास्तविक लागू दरें काफी कम थीं।

WTO में शामिल होते ही भारत को अपनी कृषि सुरक्षा पूरी तरह खत्म नहीं करनी पड़ी थी।

उसके पास कृषि आयात पर पर्याप्त शुल्क लगाने की नीति-गुंजाइश बनी रही।

18 घरेलू सहायता

भारत के किसान बिजली, खाद, सिंचाई और समर्थन मूल्य व्यवस्था से जुड़े थे।

किसानों में आशंका थी कि WTO इन सभी को समाप्त करने को मजबूर कर सकता है।

लेकिन वास्तविक व्यवस्था इससे अधिक जटिल थी।

WTO कृषि समझौता सभी कृषि सहायता पर समान प्रतिबंध नहीं लगाता।

वह सहायता को उसके व्यापार-विकृत प्रभाव के आधार पर अलग श्रेणियों में रखता है और विकासशील देशों को कुछ विशेष छूट देता है।

इसलिए यह धारणा कि 1995 में WTO में शामिल होते ही भारत को कृषि सहायता समाप्त करनी थी—सही नहीं है।

19 टिकैत का मूल प्रश्न फिर लौटता है

कानूनी तकनीकी विवरण से किसान का मूल प्रश्न फिर वही था—

अगर WTO के कारण सरकार कृषि सहायता घटाती है तो हमारी लागत क्या होगी?

यदि विदेशी सब्सिडी वाली कृषि वस्तुएं भारत आएंगी तो हमारी फसल के मूल्य का क्या होगा?

यदि निर्यात खुलेगा तो क्या हमें बेहतर भाव मिलेगा?

टिकैत के किसान के लिए WTO कोई अमूर्त अंतरराष्ट्रीय संस्था नहीं था।

उसका अर्थ अंततः अपने खेत के खाते में दिखाई देना था।

20 विकसित देशों की कृषि सहायता का प्रश्न

WTO व्यवस्था की सबसे बड़ी राजनीतिक आलोचनाओं में से एक थी—

विकसित देश अपने किसानों को भारी सहायता देते हैं, लेकिन विकासशील देशों पर बाजार खोलने का दबाव डालते हैं।

इस आलोचना की आर्थिक पृष्ठभूमि वास्तविक थी। WTO की अपनी व्याख्या स्वीकार करती है कि ऐतिहासिक रूप से धनी देशों में विशाल कृषि सहायता ने उत्पादन और निर्यात को बढ़ाकर विश्व बाजार के मूल्यों को विकृत किया और कम सहायता वाले देशों के किसानों के लिए प्रतिस्पर्धा कठिन की।

यही मुद्दा भारत के किसान संगठनों में वैश्वीकरण-विरोधी राजनीति का प्रमुख आधार बना।

21 BKU और WTO : वैचारिक अस्पष्टता

यहीं BKU और कर्नाटक राज्य रैयत संघ का अंतर स्पष्ट दिखाई देता है।

KRRS ने WTO, GATT, पेटेंट और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ एक स्पष्ट वैचारिक मोर्चा बनाया।

BKU में भी वैश्वीकरण और कृषि आयात को लेकर आशंकाएं थीं, लेकिन महेंद्र सिंह टिकैत का मुख्य आंदोलनकारी विमर्श लगातार—

इसलिए BKU को 1990 के दशक का सबसे व्यवस्थित WTO-विरोधी किसान संगठन कहना उचित नहीं होगा।

22 टिकैत के लिए ‘विदेशी’ से अधिक ‘किसान हित’ महत्वपूर्ण

टिकैत की राजनीति को शुद्ध स्वदेशी बनाम विदेशी पूंजी की वैचारिक भाषा में सीमित करना कठिन है।

यदि आयात से किसान का मूल्य गिरता है—

यदि सरकार सहायता कम करके लागत बढ़ाती है—

यानी उनका दृष्टिकोण मुख्यतः परिणाम-आधारित था, न कि किसी सुसंगत मुक्त व्यापार या संरक्षणवाद के सिद्धांत पर।

23 कृषि समर्थन मूल्य की भूमिका

उदारीकरण के बावजूद सरकार ने समर्थन मूल्य व्यवस्था समाप्त नहीं की।

1998 की WTO समीक्षा ने भी यह दर्ज किया कि कृषि नीति में समर्थन मूल्य किसानों को आय-सहारा देने और खाद्य सुरक्षा बनाए रखने का महत्वपूर्ण साधन बने हुए थे।

यही भारतीय उदारीकरण की विशिष्टता थी।

लेकिन कृषि में बाजार और राज्य दोनों साथ बने रहे।

इसी मिश्रित व्यवस्था में BKU ने अपनी राजनीति जारी रखी।

24 MSP और WTO का संबंध

WTO कृषि समझौते ने सरकारी कृषि मूल्य समर्थन को नियमों के दायरे में रखा, लेकिन भारत की वास्तविक स्थिति कई कारणों से विशिष्ट थी।

इन कारणों से भारत ने समर्थन मूल्य व्यवस्था जारी रखी।

इसलिए 1990 के दशक में यह कहना कि WTO के कारण MSP तुरंत समाप्त हो जाएगी, सही साबित नहीं हुआ।

लेकिन भविष्य में नीति-स्वायत्तता पर दबाव की आशंका किसान संगठनों में बनी रही।

25 सस्ता आयात : अवसर या खतरा?

उपभोक्ता के लिए सस्ता खाद्य आयात अच्छा लग सकता है।

लेकिन किसान के लिए वही आयात संकट बन सकता है यदि उसकी घरेलू फसल का मूल्य गिर जाए।

यही कृषि व्यापार का स्थायी द्वंद्व है।

सरकार उपभोक्ता और किसान दोनों को देखती है।

किसान संगठन मुख्यतः उत्पादक की स्थिति से प्रश्न उठाता है।

इसलिए BKU के लिए आयात नीति का केंद्रीय मानदंड था—

क्या इससे घरेलू किसान का मूल्य प्रभावित होगा?

26 निर्यात : बेहतर भाव की संभावना

इसके विपरीत निर्यात किसान को अतिरिक्त मांग दे सकता है।

यदि घरेलू उत्पादन अधिशेष है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भाव अच्छा है, तो निर्यात कृषि मूल्य बढ़ा सकता है।

लेकिन यदि सरकार घरेलू महंगाई रोकने के लिए निर्यात सीमित करती है, तो किसान को लगता है कि वह अंतरराष्ट्रीय मूल्य का लाभ नहीं उठा पा रहा।

इसी प्रश्न पर नए किसान आंदोलनों और सरकार के बीच लंबा विवाद चला।

27 चीनी का वैश्विक बाजार

चीनी वैश्विक बाजार अत्यंत अस्थिर है।

कई देशों में चीनी और गन्ना उत्पादकों को सहायता मिलती है।

भारत में घरेलू चीनी मूल्य, गन्ना मूल्य, आयात–निर्यात और सरकारी नियंत्रण एक-दूसरे से जुड़े रहे।

यही जटिलता BKU के संघर्षों में लगातार दिखाई दी।

30 ‘इंडिया’ बदल गया, लेकिन ‘भारत’ का प्रश्न बना रहा

शहरी अर्थव्यवस्था तेजी से वैश्वीकृत होने लगी।

अध्याय 15

1990 और 2000 के दशक में BKU

1988 का मेरठ कमिश्नरी घेराव और दिल्ली बोट क्लब आंदोलन भारतीय किसान यूनियन तथा महेंद्र सिंह टिकैत की राजनीतिक शक्ति का सर्वोच्च बिंदु था। लेकिन किसान आंदोलनों का इतिहास केवल शिखर की घटनाओं से नहीं बनता। किसी संगठन की वास्तविक मजबूती इस बात से भी तय होती है कि बड़े जनउभार के बाद वह अपने संगठन, मुद्दों और सामाजिक आधार को कितना टिकाऊ बना पाता है।

1990 और 2000 के दशकों में BKU की कहानी इसी परीक्षा की कहानी है।

इन दो दशकों में एक विरोधाभासी प्रक्रिया चली। एक ओर 1988 जैसी अखिल भारतीय दृश्यता कम हुई, संगठन के भीतर विभाजन बढ़े, मंडल–मंदिर राजनीति ने साझा किसान पहचान कमजोर की और टिकैत का गैर-दलीय मॉडल चुनावी राजनीति से बार-बार टकराया। दूसरी ओर गन्ने का मूल्य, बिजली, खाद, कर्ज, भूमि अधिग्रहण और किसान भुगतान जैसे मुद्दों पर BKU पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक प्रभावशाली दबाव शक्ति बनी रही।

अर्थात इसे केवल “टिकैत आंदोलन का पतन” कहना अधूरा होगा।

राष्ट्रीय शिखर से क्षेत्रीय पुनर्संयोजन।

1988 में टिकैत दिल्ली की राष्ट्रीय सत्ता को चुनौती दे रहे थे।

1990 और 2000 के दशकों में वे बार-बार लखनऊ, दिल्ली, गाजियाबाद, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और किसान पंचायतों के माध्यम से यह साबित करते रहे कि संगठन की राष्ट्रीय चमक भले कम हुई हो, किसान राजनीति में उनका प्रभाव समाप्त नहीं हुआ था।

1 1988 के बाद सबसे बड़ी चुनौती

दिल्ली बोट क्लब आंदोलन के बाद BKU के सामने कठिन प्रश्न था—

एक विशाल आंदोलन खड़ा कर देना और स्थायी संगठन बनाना दो अलग चीजें हैं।

1988 में लाखों किसान टिकैत की आवाज पर आए।

लेकिन क्या वही किसान नियमित सदस्यता, संस्थागत ढांचा और स्थायी वैचारिक कार्यक्रम में संगठित हो सकते थे?

यहीं BKU की पहली बड़ी सीमा सामने आई।

कैम्ब्रिज के एक आधुनिक अध्ययन में भी 1988 के दिल्ली आंदोलन को BKU का शिखर मानते हुए लिखा गया है कि इसके बाद संगठन के भीतर मतभेद उभरे और अनौपचारिक संरचना को स्थायी संस्थागत संगठन में बदलना कठिन साबित हुआ।

2 दिल्ली आंदोलन समाप्त करने पर असंतोष

1988 का बोट क्लब धरना महेंद्र सिंह टिकैत ने एक व्यापक औपचारिक समझौते के बिना समाप्त कर दिया था।

इस निर्णय से संगठन के कुछ युवा और अधिक उग्र कार्यकर्ता असंतुष्ट हुए।

उनका मानना था कि इतनी बड़ी किसान शक्ति को और अधिक राजनीतिक दबाव में बदला जा सकता था।

यही BKU की अनौपचारिक नेतृत्व शैली की शुरुआती कमजोरी थी।

3 1989 : संयुक्त किसान मोर्चे की कठिनाई

1980 के दशक के अंत में विभिन्न राज्यों के नए किसान संगठनों को राष्ट्रीय स्तर पर जोड़ने की कोशिश हुई।

लेकिन नीति और नेतृत्व को लेकर मतभेद जल्दी सामने आए।

1989 के एक बड़े किसान कार्यक्रम में टिकैत और अन्य किसान नेताओं के बीच सार्वजनिक विवाद तक हुआ। कैम्ब्रिज अध्ययन इसे उस बिंदु के रूप में देखता है जहां राष्ट्रीय किसान एकता की सीमाएं स्पष्ट होने लगीं।

इससे BKU धीरे-धीरे अपने मुख्य क्षेत्र—उत्तर प्रदेश—की ओर अधिक केंद्रित होती गई।

4 1989 और चुनावी राजनीति

1989 तक BKU के सामने दूसरा बड़ा अंतर्विरोध चुनावी राजनीति था।

संगठन गैर-दलीय होने का दावा करता था, लेकिन कांग्रेस-विरोधी माहौल में जनता दल और राष्ट्रीय मोर्चे के प्रति झुकाव बढ़ा।

इस राजनीतिक हस्तक्षेप का तत्काल लाभ यह था कि किसान शक्ति राष्ट्रीय सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया में प्रभावशाली दिखाई दी।

BKU को अब किसी सरकार से केवल किसान संगठन के रूप में नहीं, बल्कि चुनाव प्रभावित करने वाली शक्ति के रूप में भी देखा जाने लगा।

यही बदलाव 1990 के दशक की पूरी राजनीति पर असर डालने वाला था।

5 1990 : जनता दल सरकार से टकराव

1989 में कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई।

उत्तर प्रदेश में जनता दल की सरकार बनी और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने।

BKU को उम्मीद थी कि नई सरकार किसान मांगों के प्रति अधिक संवेदनशील होगी।

जुलाई 1990 में टिकैत ने लखनऊ में किसान पंचायत आयोजित करने का आह्वान किया।

यह उसी सरकार के विरुद्ध था जिसे किसान आंदोलन ने एक वर्ष पहले राजनीतिक रूप से लाभ पहुंचाया था।

इससे टिकैत की उस मूल बात की पुष्टि हुई—

सरकार बदल सकती है, किसान का प्रश्न नहीं।

6 जुलाई 1990 की लखनऊ पंचायत

BKU की अपनी आधिकारिक समयरेखा जुलाई 1990 में लखनऊ में दो लाख से अधिक किसानों की रैली का दावा करती है, जिसमें मुख्य मांगें गन्ने का बेहतर मूल्य और बिजली बकायों में भारी राहत थीं। संगठन के अनुसार सरकार ने अंततः रियायतें दीं।

लेकिन समकालीन India Today की रिपोर्ट आंदोलन की एक अधिक संघर्षपूर्ण तस्वीर देती है।

15 जुलाई 1990 को टिकैत लगभग 20 हजार किसानों को लेकर लखनऊ पंचायत की ओर बढ़ रहे थे। मुलायम सिंह सरकार ने कार्यक्रम रोकने के लिए कठोर प्रशासनिक कार्रवाई की और बड़ी संख्या में किसानों को गिरफ्तार किया। इससे जनता दल के भीतर भी असंतोष पैदा हुआ।

इसलिए लखनऊ आंदोलन को केवल “सरकार ने मांग मान ली” के रूप में नहीं देखना चाहिए।

यह किसान संगठन और उस जनता दल सरकार के बीच खुला राजनीतिक टकराव था जिसे किसान आंदोलन ने पहले समर्थन दिया था।

7 लखनऊ का ऐतिहासिक अर्थ

इस आंदोलन ने एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सिद्धांत स्थापित किया।

BKU किसी सरकार की स्थायी सहयोगी नहीं थी।

यदि जनता दल भी बिजली और गन्ने पर किसान की मांग नहीं मानेगा, तो उसका भी घेराव होगा।

यह टिकैत की गैर-दलीय राजनीति के पक्ष में मजबूत प्रमाण था।

लेकिन विडंबना यह थी कि संगठन चुनावी राजनीति में प्रवेश करके अपनी गैर-दलीय विश्वसनीयता पहले ही आंशिक रूप से कमजोर कर चुका था।

8 2 अक्टूबर 1991 : दिल्ली खाद सहायता पंचायत

1991 में आर्थिक सुधारों के साथ उर्वरक मूल्य और कृषि लागत का प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण हो गया।

BKU से जुड़े आंदोलन अभिलेखों में 2 अक्टूबर 1991 को दिल्ली में उर्वरक सहायता की मांग को लेकर किसान पंचायत का उल्लेख मिलता है।

1988 की दिल्ली यात्रा का केंद्र बिजली और गन्ना था।

1991 तक उर्वरक मूल्य और कृषि लागत का नया राष्ट्रीय आर्थिक संदर्भ सामने आ चुका था।

यानी BKU का एजेंडा बदलती अर्थव्यवस्था के साथ स्वयं को ढाल रहा था।

9 1991 की नई आर्थिक नीति और BKU

इसी वर्ष भारत ने आर्थिक उदारीकरण शुरू किया।

किसान संगठन के लिए इसका तत्काल अर्थ यह था—

आयात–निर्यात नीति किसान को कैसे प्रभावित करेगी?

यही प्रश्न आगे BKU को राष्ट्रीय आर्थिक नीति की नई बहस में ले गए।

लेकिन संगठन ने शरद जोशी या नंजुंडास्वामी की तरह कोई पूर्ण वैचारिक मॉडल नहीं बनाया।

विशिष्ट आर्थिक मुद्दे पर प्रत्यक्ष आंदोलन।

10 जनवरी 1992 : दूसरी लखनऊ पंचायत

जनवरी 1992 में BKU ने लखनऊ में फिर बड़ा आंदोलन किया।

उपलब्ध आंदोलन-इतिहास में इसके प्रमुख मुद्दे बताए गए हैं—

इस आंदोलन से यह स्पष्ट होता है कि 1990 के दशक में भी टिकैत की किसान राजनीति का मूल आर्थिक ढांचा वही था—

लागत घटाओ, मूल्य बढ़ाओ और किसान पर सरकारी दबाव कम करो।

11 जून 1992 : महीने भर की लखनऊ पंचायत

1992 में ही BKU ने लखनऊ में एक और लंबा आंदोलन किया।

BKU की संगठनात्मक समयरेखा इसे लगभग एक महीने की पंचायत बताती है।

मुख्य मांगों में किसानों के सरकारी ऋण 10 हजार रुपये तक माफ करने के पहले के निर्णय को लागू करना शामिल था।

अन्य जीवनी स्रोत भी 1992 के इस महीने भर के धरने और 10 हजार रुपये तक कृषि ऋण माफी की मांग की पुष्टि करते हैं।

यह मेरठ शैली की लंबी किसान पंचायत को राज्य की राजधानी में दोहराने का प्रयास था।

12 ऋण माफी का बदलता अर्थ

1980 के दशक में कर्ज राहत BKU के कई मुद्दों में से एक थी।

1990 के दशक में कृषि निवेश बढ़ने के साथ ऋण प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण हुआ।

इसलिए टिकैत की किसान राजनीति में धीरे-धीरे यह सूत्र मजबूत हुआ—

केवल ऋण मत दो; किसान की आय इतनी सुनिश्चित करो कि वह ऋण चुका सके।

लेकिन संकट की स्थिति में ऋण राहत आवश्यक है।

13 1992 : गाजियाबाद भूमि मुआवजा आंदोलन

BKU की राजनीति केवल गन्ना और बिजली तक सीमित नहीं रही।

1992 में टिकैत ने गाजियाबाद में भूमि अधिग्रहण से प्रभावित किसानों के लिए आंदोलन किया।

और लंबित मुआवजा मामलों का शीघ्र निपटारा।

यह प्रश्न आगे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान आंदोलनों में अत्यंत महत्वपूर्ण होने वाला था।

14 कृषि भूमि से शहरी भूमि तक

गाजियाबाद, नोएडा और दिल्ली के आसपास तेजी से शहरी विस्तार हो रहा था।

किसान की जमीन अब केवल खेती की जमीन नहीं थी।

वह भविष्य के शहर, औद्योगिक क्षेत्र और आवास परियोजना की जमीन भी थी।

सरकार जिस मूल्य पर भूमि अधिग्रहित करती है और बाद में जिस मूल्य पर उसका शहरी उपयोग होता है, उनके बीच इतना अंतर क्यों?

BKU की किसान राजनीति में यह प्रश्न 1990 के दशक से अधिक स्पष्ट होने लगा।

15 1993 : चिनहट–कठौता भूमि आंदोलन

जून 1993 में लखनऊ के चिनहट–कठौता क्षेत्र में अधिग्रहीत भूमि के बेहतर मुआवजे की मांग को लेकर BKU पंचायत का उल्लेख मिलता है।

इससे भूमि अधिग्रहण संगठन के स्थायी मुद्दों में शामिल होने लगा।

1980 के दशक का किसान राज्य से उत्पादन लागत पर लड़ रहा था।

1990 का किसान राज्य से अपनी कृषि भूमि के मूल्य पर भी लड़ रहा था।

16 1993 का ‘पशु सत्याग्रह’

सितंबर–अक्टूबर 1993 में BKU से जुड़े विवरणों में Cattle Satyagraha—पशु सत्याग्रह का उल्लेख मिलता है।

इसका संबंध सात सूत्रीय मांगपत्र, गन्ना किसानों को राहत, बकाया भुगतान तथा 10 हजार रुपये तक ऋण माफी जैसे प्रश्नों से था।

यह टिकैत आंदोलन की पुरानी प्रतीकात्मक राजनीति की निरंतरता थी।

जैसे 1988 में पशु और ग्रामीण जीवन दिल्ली के बोट क्लब तक पहुंचे थे, वैसे ही पशुधन किसान जीवन की राजनीतिक पहचान का हिस्सा बना रहा।

17 1993 : डंकल प्रस्ताव और बीज सत्याग्रह

1990 के दशक के किसान आंदोलन में एक नया विषय जुड़ा—

GATT–डंकल प्रस्ताव और बहुराष्ट्रीय कंपनियां।

BKU से जुड़े आंदोलन इतिहास में 1993 के “Dunkel Dunk/बीज सत्याग्रह” का उल्लेख है, जिसमें कृषि क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रवेश का विरोध किया गया।

यह महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे BKU का एजेंडा स्थानीय बिजली–गन्ना प्रश्न से वैश्विक कृषि व्यवस्था की ओर बढ़ता दिखाई देता है।

हालांकि इस विषय पर संगठन की वैचारिक स्पष्टता KRRS जैसी नहीं थी, लेकिन वैश्वीकरण की आशंका अब उसकी किसान राजनीति में प्रवेश कर चुकी थी।

18 किसान आंदोलन का विस्तार, पर वैचारिक असंगति

अब BKU एक साथ कई प्रश्न उठा रही थी—

क्योंकि संगठन के पास इन सभी प्रश्नों को एक संगठित राष्ट्रीय कृषि नीति में जोड़ने वाला वैचारिक और शोध ढांचा कमजोर था।

इसलिए आंदोलन शक्तिशाली हो सकता था, लेकिन दीर्घकालीन नीति कार्यक्रम अपेक्षाकृत अस्पष्ट रहता था।

19 1990 के दशक में किसान एकता का कमजोर होना

इस समय तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति भी बदल चुकी थी।

इन सभी ने किसान पहचान के समानांतर जाति और धर्म आधारित राजनीतिक पहचान मजबूत की।

Satendra Kumar के अध्ययन के अनुसार नवउदारवादी आर्थिक परिवर्तन और हिंदुत्व राजनीति के उभार ने अगले तीन दशकों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कृषि-केंद्रित राजनीति को काफी कमजोर किया।

20 BKU का अखिल भारतीय स्वरूप क्यों कमजोर पड़ा?

1988 में ऐसा लग सकता था कि BKU राष्ट्रीय किसान राजनीति का केंद्रीय संगठन बन सकता है।

किसान संगठनों की अलग आर्थिक विचारधाराएं।

Indian Express की ऐतिहासिक समीक्षा भी बताती है कि विभिन्न राज्यों की BKU धाराएं समय के साथ अलग-अलग नेतृत्व और गुटों में विभाजित हो गईं।

21 पंजाब की BKU धाराओं का विभाजन

“भारतीय किसान यूनियन” नाम केवल टिकैत की उत्तर प्रदेश इकाई तक सीमित नहीं था।

पंजाब में भी संगठन की अलग ऐतिहासिक धारा थी।

लेकिन 1989 के बाद पंजाब BKU में गंभीर गुटबाजी हुई।

भूपिंदर सिंह मान, बलबीर सिंह राजेवाल, अजमेर सिंह लखोवाल और बाद में उगराहां तथा दूसरे नेताओं के नेतृत्व में अलग संगठन उभरे।

अध्ययन बताते हैं कि पंजाब BKU के विभाजन ने अखिल भारतीय एकीकृत संगठन की संभावना को और कमजोर किया।

पंजाब के इन विभाजनों को महेंद्र सिंह टिकैत की उत्तर प्रदेश BKU के सीधे आंतरिक विभाजन के रूप में नहीं देखना चाहिए।

वे BKU नाम की व्यापक राष्ट्रीय संगठनात्मक परंपरा के अलग क्षेत्रीय विकास थे।

22 1996 : चुनावी प्रयोग

1990 के दशक के मध्य तक BKU के सामने यह प्रश्न फिर खड़ा हुआ कि आंदोलनकारी शक्ति को चुनावी शक्ति में बदला जाए या नहीं।

1996 में भारतीय किसान कामगार पार्टी जैसे चुनावी प्रयोग के माध्यम से संगठन से जुड़े नेतृत्व ने संसदीय राजनीति में हस्तक्षेप करने की कोशिश की।

लेकिन विशाल किसान पंचायतों में दिखाई देने वाली लोकप्रियता चुनाव में समान अनुपात में वोट में नहीं बदली।

आंदोलनकारी क्षमता और चुनावी क्षमता अलग हैं।

23 किसान–कामगार जोड़ने की कोशिश

“किसान कामगार” नाम अपने आप में महत्वपूर्ण था।

यह शायद उस आलोचना का उत्तर खोजने का प्रयास था कि BKU केवल भूमि-स्वामी किसानों का संगठन है।

यदि किसान और मजदूर को साथ लाया जाए तो सामाजिक आधार व्यापक हो सकता था।

लेकिन यह प्रयोग मजबूत स्थायी सामाजिक गठबंधन नहीं बना सका।

भूमि-स्वामी किसान और कृषि मजदूर के वर्गीय हितों को केवल संगठन के नाम से एक नहीं किया जा सकता था।

24 2000 का दशक : टिकैत अभी भी प्रभावशाली, पर वैसा सर्वव्यापी नहीं

इक्कीसवीं सदी के पहले दशक तक महेंद्र सिंह टिकैत राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित और पहचाने जाने वाले किसान नेता बने रहे।

किसान संगठनों की संख्या बढ़ चुकी थी।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का सामाजिक गठबंधन कमजोर हो चुका था।

और किसान की नई पीढ़ी की आकांक्षाएं अलग थीं।

2004 की Times of India रिपोर्ट ने इसी परिवर्तन को तीखे शीर्षक—“Tikait loses punch in Jatland”—के साथ दर्ज किया और संकेत दिया कि टिकैत का पुराना निर्विवाद प्रभाव अब कम हो चुका था।

25 नई पीढ़ी का किसान

1980 के दशक का किसान हरित क्रांति से निकला था।

2000 के दशक का किसान नई परिस्थितियों में जी रहा था।

दिल्ली–एनसीआर का शहरी विस्तार पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक पहुंच रहा था।

भूमि का बाजार मूल्य तेजी से बढ़ रहा था।

इसलिए किसान आंदोलन की भाषा भी बदलनी थी।

केवल बिजली और गन्ना पर्याप्त नहीं रह सकते थे।

26 भूमि अधिग्रहण बड़ा मुद्दा क्यों बना?

दिल्ली–एनसीआर के विस्तार ने किसान राजनीति में भूमि अधिग्रहण को केंद्रीय विषय बना दिया।

उस पर शहर बनने के बाद मूल्य कितनी गुना बढ़ जाएगा?

यह प्रश्न आगे 2000 और 2010 के दशक की उत्तर भारतीय किसान राजनीति का बड़ा हिस्सा बना।

BKU का 1992 का गाजियाबाद आंदोलन इस नई राजनीति का प्रारंभिक संकेत था।

27 हरिद्वार : संगठनात्मक और प्रतीकात्मक केंद्र

हरिद्वार बाद के BKU इतिहास में एक महत्वपूर्ण किसान आयोजन स्थल बना।

यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर भारत के किसान नेटवर्क के लिए सुविधाजनक स्थान था और संगठन ने यहां चिंतन शिविर, किसान पंचायत और बाद में यात्राओं की शुरुआत जैसी परंपराएं विकसित कीं।

इसलिए ऐतिहासिक रूप से अधिक सावधानीपूर्ण निष्कर्ष यह है—

29 2006 और बदलता राष्ट्रीय कृषि विमर्श

इससे स्पष्ट है कि BKU ने वैश्वीकरण की बहस को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया।

अध्याय 16

महेंद्र सिंह टिकैत का निधन और BKU का उत्तराधिकार

महेंद्र सिंह टिकैत की मृत्यु केवल एक किसान नेता का निधन नहीं थी; वह भारतीय किसान यूनियन के लिए नेतृत्व, संगठन, सामाजिक आधार और राजनीतिक दिशा—चारों स्तरों पर एक निर्णायक संक्रमण था। 15 मई 2011 को टिकैत के निधन के बाद BKU के सामने वही प्रश्न आ खड़ा हुआ जो करिश्माई नेतृत्व पर आधारित लगभग प्रत्येक जनांदोलन के सामने आता है—क्या नेता द्वारा निर्मित आंदोलन नेता के बिना भी उसी प्रभाव से चल सकता है?

टिकैत लगभग ढाई दशक तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश की किसान राजनीति के केंद्र में रहे थे। सिसौली, बालियान खाप, किसान पंचायत और BKU—इन सभी को उनकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा ने एक सूत्र में बांध रखा था। इसलिए उनके निधन के बाद केवल अध्यक्ष का पद खाली नहीं हुआ; वह नैतिक प्राधिकार भी चला गया जिसके सामने संगठन के आंतरिक मतभेद दब जाते थे।

उत्तराधिकार मोटे तौर पर दो हिस्सों में बंटा। उनके बड़े पुत्र नरेश टिकैत ने संगठन तथा पंचायत परंपरा के औपचारिक नेतृत्व को संभाला, जबकि छोटे पुत्र राकेश टिकैत धीरे-धीरे BKU के सबसे सक्रिय आंदोलनकारी, वार्ताकार और सार्वजनिक चेहरे के रूप में सामने आए। आगे चलकर यही दोहरी संरचना—नरेश का पंचायत एवं संगठनात्मक नेतृत्व और राकेश का आंदोलनकारी सार्वजनिक नेतृत्व—टिकैत परिवार की दूसरी पीढ़ी की पहचान बनी। BKU की आधिकारिक सामग्री भी महेंद्र सिंह टिकैत को संस्थापक नेता और नरेश टिकैत को उत्तराधिकारी नेतृत्व के रूप में प्रस्तुत करती है।

लेकिन 2011 से 2018 तक का रास्ता सीधा नहीं था। इन सात वर्षों में BKU ने संगठनात्मक टूटन, मुस्लिम किसान आधार के क्षरण, 2013 की सांप्रदायिक हिंसा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के उभार और आंदोलनकारी प्रभाव में गिरावट का सामना किया। 2018 की किसान क्रांति यात्रा इस पूरे संकट के बाद पहला बड़ा संकेत बनी कि टिकैत मॉडल अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

1 15 मई 2011 : ‘बाबा टिकैत’ का निधन

महेंद्र सिंह टिकैत का निधन 15 मई 2011 को हुआ। वे लंबे समय से अस्वस्थ थे और बोन कैंसर से पीड़ित थे। समकालीन PTI रिपोर्ट के अनुसार उनकी मृत्यु मुजफ्फरनगर में उनके पुत्र और उस समय BKU महासचिव राकेश टिकैत के आवास पर हुई। अगले दिन सिसौली स्थित BKU मुख्यालय में अंतिम संस्कार किया गया।

उनकी उम्र 75–76 वर्ष के आसपास थी; विभिन्न स्रोत जन्म और आयु की गणना में मामूली अंतर देते हैं, लेकिन जन्मतिथि 6 अक्टूबर 1935 और मृत्यु 15 मई 2011 व्यापक रूप से स्वीकार्य हैं।

टिकैत अपने पीछे केवल एक किसान संगठन नहीं छोड़ गए थे।

यही स्मृति आगे संगठन की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी बनी।

2 उत्तराधिकार इतना कठिन क्यों था?

महेंद्र सिंह टिकैत का नेतृत्व अत्यधिक व्यक्तिगत था।

विवाद होने पर अंतिम पंचायत उन्हीं के पास आती थी।

सरकार से बातचीत में उनका शब्द निर्णायक माना जाता था।

किसान उन्हें सामान्य पदाधिकारी से अधिक सामाजिक चौधरी और नैतिक मध्यस्थ के रूप में देखते थे।

इसलिए उनके बाद कोई व्यक्ति केवल पद ग्रहण करके उनकी पूरी भूमिका नहीं संभाल सकता था।

पार्टी में नेता बदल सकता है क्योंकि संविधान, चुनाव और स्पष्ट पदानुक्रम मौजूद होता है।

लेकिन वही ताकत उत्तराधिकार के समय कमजोरी बन गई।

3 नरेश टिकैत : परंपरा और संगठन

महेंद्र सिंह टिकैत के बाद बड़े पुत्र नरेश टिकैत BKU के अध्यक्ष बने।

उनकी भूमिका पारंपरिक पंचायत और संगठनात्मक निरंतरता से अधिक जुड़ी रही।

इन संस्थाओं से उनका संबंध स्वाभाविक था।

वे पिता की तरह बड़े मंचीय आंदोलनकारी व्यक्तित्व नहीं बने, लेकिन संगठन के औपचारिक और सामाजिक उत्तराधिकार का प्रतिनिधित्व करने लगे।

नरेश टिकैत का महत्व इसलिए भी था कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की खाप आधारित ग्रामीण राजनीति में उत्तराधिकार केवल संगठनात्मक चुनाव का प्रश्न नहीं होता; सामाजिक प्रतिष्ठा और परंपरा भी उसका हिस्सा होती है।

4 राकेश टिकैत : आंदोलन और सार्वजनिक राजनीति

राकेश टिकैत का राजनीतिक व्यक्तित्व अलग था।

वे पहले दिल्ली पुलिस में सेवा कर चुके थे और बाद में पूर्णकालिक रूप से किसान संगठन से जुड़े।

महेंद्र सिंह टिकैत के अंतिम वर्षों तक वे BKU के सक्रिय महासचिव और प्रमुख वार्ताकार बन चुके थे। 2011 में महेंद्र सिंह टिकैत की मृत्यु के समय समकालीन PTI रिपोर्ट भी उन्हें BKU महासचिव के रूप में दर्ज करती है।

अगले वर्षों में राकेश टिकैत की भूमिका बढ़ती गई।

दिल्ली और लखनऊ की राजनीति से संपर्क रखते।

इसलिए धीरे-धीरे BKU में एक प्रकार का कार्य-विभाजन स्पष्ट हुआ—

राकेश टिकैत—आंदोलन और सार्वजनिक राजनीति।

5 परिवार आधारित नेतृत्व का प्रश्न

यह उत्तराधिकार स्वाभाविक दिख सकता था, लेकिन उसने एक लोकतांत्रिक प्रश्न भी पैदा किया।

यदि BKU किसानों का गैर-दलीय जनसंगठन है, तो शीर्ष नेतृत्व टिकैत परिवार में ही क्यों रहे?

टिकैत परिवार आंदोलन की ऐतिहासिक विश्वसनीयता का प्रतीक है।

यह संगठनात्मक संस्थानीकरण की कमजोरी है।

यही विवाद बाद के विभाजनों में अधिक स्पष्ट हुआ।

महेंद्र सिंह टिकैत की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा रहते हुए अनेक वरिष्ठ नेता परिवार-प्रधान संरचना को स्वीकार कर लेते थे।

6 2012 : गुलाम मोहम्मद जौला का अलग होना

टिकैत के निधन के एक वर्ष बाद ही संगठन को महत्वपूर्ण झटका लगा।

महेंद्र सिंह टिकैत के पुराने सहयोगी और BKU के आंदोलनकारी ढांचे के प्रमुख मुस्लिम चेहरों में से एक गुलाम मोहम्मद जौला 2012 में संगठन से अलग हो गए।

बाद की रिपोर्टों के अनुसार जौला महेंद्र सिंह टिकैत के दौर में राष्ट्रीय संयोजक स्तर पर आंदोलन आयोजन से जुड़े रहे थे। उन्होंने 2012 में अलग होकर किसान मजदूर मंच बनाया।

यह घटना बाद के इतिहास की दृष्टि से महत्वपूर्ण थी।

क्योंकि BKU का पुराना जाट–मुस्लिम किसान गठबंधन पहले ही कमजोर हो रहा था।

जौला का अलग होना उस सामाजिक दूरी का शुरुआती संकेत था जो 2013 में बहुत गंभीर रूप लेने वाली थी।

7 संगठनात्मक विभाजन की शुरुआत

महेंद्र सिंह टिकैत के निधन के बाद अनेक पुराने नेता धीरे-धीरे BKU से अलग हुए।

हिंदुस्तान टाइम्स की बाद की समीक्षा में वरिष्ठ BKU नेताओं ने स्वयं माना कि महेंद्र सिंह टिकैत के बाद संगठन में कई विभाजन हुए, क्योंकि उनकी करिश्माई नेतृत्व क्षमता विभिन्न धाराओं को एक साथ रखती थी।

यहां एक महत्वपूर्ण भेद बनाए रखना चाहिए।

BKU नाम के अलग-अलग किसान संगठन पहले से विभिन्न राज्यों में मौजूद थे।

इसलिए 2011 के बाद के सभी “BKU विभाजन” महेंद्र सिंह टिकैत की इकाई से ही पैदा नहीं हुए।

लेकिन उत्तर प्रदेश में भी टिकैत परिवार के नेतृत्व से असहमत कार्यकर्ताओं की अलग धाराएं बढ़ीं।

बाद के वर्षों में यह प्रक्रिया और तेज हुई।

8 करिश्माई नेतृत्व की संस्थागत समस्या

महेंद्र सिंह टिकैत का मॉडल गांव की सामाजिक शक्ति पर आधारित था।

उसमें अत्यधिक लिखित संविधान, कैडर प्रशिक्षण या सुदृढ़ केंद्रीय नौकरशाही नहीं थी।

एक वरिष्ठ नेता अपने क्षेत्र में प्रभावशाली हो सकता था।

यदि उसे केंद्रीय नेतृत्व से असहमति हुई तो अलग संगठन बनाना कठिन नहीं था।

यही कारण है कि समय के साथ BKU नाम से अनेक गुट सक्रिय हुए।

इस प्रक्रिया को केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से समझना अधूरा होगा।

यह संगठनात्मक ढांचे की संरचनात्मक समस्या भी थी।

9 2011–13 : BKU के सामने सामाजिक संकट

महेंद्र सिंह टिकैत की मृत्यु के समय तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पुरानी जाट–मुस्लिम किसान एकता कमजोर हो चुकी थी।

राजनीतिक दलों का सामाजिक आधार बदल रहा था।

भाजपा हिंदू मतदाताओं में अपनी पकड़ बढ़ा रही थी।

मुस्लिम मतदाता समाजवादी पार्टी, बसपा और अन्य विकल्पों की ओर थे।

राष्ट्रीय लोकदल पुरानी चरण सिंह सामाजिक राजनीति को बनाए रखने की कोशिश कर रहा था।

ऐसे में BKU की “किसान पहले” वाली पहचान पहले जैसी प्रभावी नहीं रही।

10 अगस्त–सितंबर 2013 : मुजफ्फरनगर का विस्फोट

2013 में मुजफ्फरनगर और शामली के ग्रामीण क्षेत्रों में हुई सांप्रदायिक हिंसा स्वतंत्र भारत के पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सामाजिक इतिहास की सबसे गंभीर घटनाओं में से एक बनी।

कवाल की हिंसक घटना के बाद तनाव बढ़ा।

आधिकारिक और अलग-अलग समकालीन स्रोतों में मृतकों की संख्या में अंतर है, लेकिन व्यापक रूप से लगभग 60 से अधिक लोगों की मृत्यु और 50 हजार से अधिक लोगों के विस्थापन की बात स्वीकार की जाती है। मुस्लिम समुदाय विस्थापन से विशेष रूप से प्रभावित हुआ।

यह BKU की पुरानी किसान राजनीति की सामाजिक पराजय भी थी।

11 किसान पहचान क्यों विफल हुई?

गन्ना जाट और मुस्लिम दोनों पैदा करते हैं।

लेकिन 2013 में आर्थिक समानता धार्मिक विभाजन को रोक नहीं सकी।

यही BKU इतिहास का सबसे कठिन प्रश्न है।

क्यों वह किसान पहचान, जिसने 1988 में हिंदू और मुस्लिम किसान को एक मंच पर बैठाया था, 2013 में समाज को एकजुट नहीं रख सकी?

इस प्रश्न पर अकादमिक बहस गंभीर रही है।

12 BKU और 2013 पर अकादमिक आलोचना

R. Ramakumar का Journal of Agrarian Change में प्रकाशित अध्ययन इस संबंध में सबसे महत्वपूर्ण आलोचनात्मक अध्ययनों में है।

उनका तर्क है कि BKU नेतृत्व और सदस्यता के कुछ हिस्सों ने उस सांप्रदायिक विमर्श को ग्रहण किया जिसने हिंसा से पहले सामाजिक वातावरण को प्रभावित किया। अध्ययन विशेष रूप से खाप राजनीति की भूमिका पर जोर देता है और पूछता है कि “किसान” की वर्ग-तटस्थ पहचान पर “हिंदू” पहचान कैसे भारी पड़ गई।

इस आलोचना को BKU इतिहास से हटाना उचित नहीं होगा।

लेकिन इसे पूरे संगठन के प्रत्येक सदस्य के व्यवहार के बराबर मानना भी उचित नहीं है।

विभिन्न क्षेत्रों में अलग नेतृत्व और स्थानीय परिस्थितियां थीं।

2013 में BKU की किसान एकता सांप्रदायिक विभाजन को रोक नहीं सकी।

13 2013 के बाद मुस्लिम किसानों का हटना

दंगों का BKU पर तत्काल प्रभाव पड़ा।

मुस्लिम किसानों का बड़ा हिस्सा संगठन के कार्यक्रमों से दूर हो गया।

पुराने जाट–मुस्लिम कृषि गठबंधन की जगह अविश्वास ने ले ली।

गुलाम मोहम्मद जौला का अलग किसान मंच इस दूरी का प्रमुख प्रतीक बना।

बाद में BKU नेताओं ने भी स्वीकार किया कि 2013 के बाद मुस्लिम समुदाय की भागीदारी संगठन में काफी कम हो गई थी।

हिंदुस्तान टाइम्स की समीक्षा भी स्पष्ट रूप से कहती है कि मुजफ्फरनगर और शामली की 2013 की हिंसा ने हिंदुओं—विशेषकर जाटों—और मुसलमानों की एकता तोड़ी और इसी कारण BKU कमजोर हुई।

14 यह संगठनात्मक नुकसान इतना गंभीर क्यों था?

क्योंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की गन्ना अर्थव्यवस्था बहु-सामुदायिक थी।

BKU केवल जाट किसानों के बल पर उतनी व्यापक शक्ति नहीं बन सकती थी जितनी उसने 1980 के दशक में दिखाई थी।

और संगठन की “सभी किसान” वाली पहचान कमजोर पड़ना।

15 गन्ना वही रहा, गठबंधन बदल गया

गन्ने का मूल्य अभी भी दोनों समुदायों का मुद्दा था।

चीनी मिल दोनों का भुगतान रोक सकती थी।

लेकिन आर्थिक मुद्दे राजनीतिक विभाजन को तत्काल खत्म नहीं कर सके।

इसने BKU को एक महत्वपूर्ण पाठ दिया—

साझा आर्थिक हित पर्याप्त शर्त नहीं है; सामाजिक विश्वास भी आवश्यक है।

16 2014 का चुनाव और नया राजनीतिक भूगोल

2013 की हिंसा के कुछ महीने बाद 2014 का लोकसभा चुनाव हुआ।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में व्यापक हिंदू ध्रुवीकरण ने भाजपा को बड़ी चुनावी सफलता दिलाई।

जाट मतदाता, जो चरण सिंह–अजित सिंह की राजनीति और BKU के किसान आधार का महत्वपूर्ण हिस्सा थे, बड़ी संख्या में भाजपा की ओर गए।

इससे किसान राजनीति का पुराना सामाजिक भूगोल बदल गया।

आंदोलन में BKU से जुड़ा हो सकता था।

लेकिन चुनाव में भाजपा समर्थक भी हो सकता था।

यह वही पुराना आंदोलन बनाम वोट का अंतर था, लेकिन अब धार्मिक राजनीतिक पहचान कहीं अधिक प्रभावशाली थी।

17 राष्ट्रीय लोकदल का संकट और BKU

चरण सिंह और अजित सिंह की राजनीतिक परंपरा जाट–मुस्लिम किसान गठबंधन पर काफी निर्भर रही थी।

इससे राष्ट्रीय लोकदल भी कमजोर पड़ा।

एक ओर पारंपरिक किसान राजनीतिक प्रतिस्पर्धी कमजोर हुआ।

दूसरी ओर साझा किसान सामाजिक संरचना भी टूट गई।

बल्कि उसका क्षेत्रीय किसान समाज ही अधिक बिखर गया।

18 राकेश टिकैत के सामने नई चुनौती

इस परिस्थिति में राकेश टिकैत के सामने पिता से बिल्कुल अलग चुनौती थी।

महेंद्र सिंह टिकैत को किसान पहचान बनानी थी।

राकेश टिकैत को पहले टूटी किसान पहचान को फिर जोड़ना था।

किसान सरकार के खिलाफ कैसे संगठित हो?

पहले किसान एक-दूसरे के साथ कैसे खड़े हों?

यही 2011–18 के दौर की केंद्रीय समस्या थी।

19 क्या राकेश टिकैत तुरंत बड़े नेता बन गए?

2021 के गाजीपुर आंदोलन की लोकप्रियता को पीछे ले जाकर 2011 से ही राकेश टिकैत को उसी स्तर का नेता मानना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा।

2011 के बाद वे प्रमुख BKU नेता जरूर थे।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी पिता जैसी सर्वमान्य प्रतिष्ठा नहीं थी।

उन्हें अपना राजनीतिक नेतृत्व नए सिरे से बनाना पड़ा।

20 नरेश और राकेश की संयुक्त संरचना

टिकैत परिवार की दूसरी पीढ़ी का सबसे व्यावहारिक समाधान यही निकला कि दोनों भाई अलग प्रकार की भूमिकाएं निभाएं।

इस व्यवस्था ने परिवार के भीतर संभावित नेतृत्व प्रतिस्पर्धा को काफी हद तक नियंत्रित रखा।

21 संगठन के विभिन्न गुट

महेंद्र सिंह टिकैत के बाद BKU से जुड़े कई अलग संगठन और गुट उभरे।

इनमें कुछ पहले की क्षेत्रीय धाराओं से आए थे और कुछ बाद में टिकैत नेतृत्व से असहमति के कारण बने।

इसलिए “BKU” नाम सुनते ही यह मान लेना कि प्रत्येक संगठन राकेश–नरेश टिकैत वाली इकाई है—गलत होगा।

बाद के वर्षों में उत्तर प्रदेश में भी BKU नाम से अनेक अलग इकाइयां बनीं। 2022 तक मीडिया रिपोर्टें टिकैत धारा से अलग कम-से-कम कई संगठनों और “BKU अराजनैतिक” जैसे नए गुटों का उल्लेख करती हैं।

यह विभाजन 2011 के बाद की संस्थागत कमजोरी का दीर्घकालीन परिणाम था।

22 फिर भी ‘टिकैत BKU’ की विशिष्टता

इतने गुटों के बावजूद टिकैत परिवार वाली BKU की एक विशेष ताकत थी—

ये प्रतीक किसी नए किसान संगठन के पास नहीं थे।

इसलिए संगठन कमजोर होने के बाद भी संकट के समय यह स्मृति किसान लामबंदी में प्रयोग की जा सकती थी।

23 2015–17 : किसान संकट के नए प्रश्न

2010 के दशक के मध्य तक उत्तर भारतीय कृषि में पुराने मुद्दों के साथ नए प्रश्न भी जुड़ रहे थे।

और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की मांग।

राष्ट्रीय किसान राजनीति में MSP और उत्पादन लागत के संबंध की चर्चा तेजी से बढ़ रही थी।

BKU को यदि पुनर्जीवित होना था तो उसे बाबा टिकैत की पुरानी मांगों को नई किसान भाषा से जोड़ना था।

24 स्वामीनाथन आयोग एक नया साझा सूत्र

कृषि लागत और मूल्य आयोग तथा MSP की बहस को राष्ट्रीय किसान आंदोलन में नई ऊर्जा मिली।

स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों की लोकप्रिय व्याख्या—कृषि लागत के ऊपर 50 प्रतिशत प्रतिफल—किसान संगठनों के लिए अत्यंत प्रभावी नारा बनी।

यह टिकैत के पुराने आर्थिक सूत्र का आधुनिक संस्करण जैसा था—

लागत का हिसाब करो और लाभकारी मूल्य दो।

इसलिए BKU इसे आसानी से अपनी पुरानी किसान राजनीति में समाहित कर सकी।

25 2018 से पहले सामाजिक मेल-मिलाप की शुरुआत

2013 की सांप्रदायिक टूटन के बाद जाट और मुस्लिम किसानों को फिर एक मंच पर लाना आसान नहीं था।

लेकिन स्थानीय किसान नेताओं ने धीरे-धीरे संपर्क शुरू किया।

क्योंकि 2021 की किसान एकता अचानक नहीं बनी।

उसकी सामाजिक तैयारी पहले शुरू हो चुकी थी।

26 2018 : किसान क्रांति यात्रा का निर्णय

पुराने ट्रैक्टरों पर प्रतिबंध से जुड़ी समस्याएं।

अध्याय 17

2020–21 के कृषि कानून आंदोलन में BKU और राकेश टिकैत

2020–21 का किसान आंदोलन भारतीय किसान यूनियन के इतिहास में वह क्षण था जब महेंद्र सिंह टिकैत की आंदोलनकारी विरासत नई पीढ़ी के नेतृत्व में फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में लौट आई। लेकिन इस आंदोलन को केवल राकेश टिकैत या केवल BKU का आंदोलन मानना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा। यह अनेक किसान संगठनों का संयुक्त आंदोलन था, जिसका प्रमुख समन्वय मंच संयुक्त किसान मोर्चा बना। पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और देश के अन्य हिस्सों के किसान संगठनों ने अलग-अलग संगठनात्मक परंपराओं के बावजूद तीन कृषि कानूनों को निरस्त कराने और न्यूनतम समर्थन मूल्य की अधिक मजबूत सुरक्षा की मांग पर साझा मोर्चा बनाया। जनवरी 2021 तक केंद्र सरकार स्वयं 41 किसान संगठनों के प्रतिनिधियों से वार्ता कर रही थी।

BKU की विशिष्ट भूमिका मुख्यतः गाजीपुर बॉर्डर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उभरी। आंदोलन के शुरुआती चरण में पंजाब और हरियाणा के किसान संगठनों की उपस्थिति अधिक प्रभावशाली थी। लेकिन 28 जनवरी 2021 की रात गाजीपुर सीमा पर राकेश टिकैत के भावुक सार्वजनिक प्रतिरोध ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान लामबंदी को अचानक नई ऊर्जा दी। उसके बाद वही BKU, जो 2013 की सांप्रदायिक टूटन और महेंद्र सिंह टिकैत के निधन के बाद लंबे समय तक कमजोर दिखाई देती थी, फिर राष्ट्रीय किसान आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल हो गई।

इस आंदोलन का ऐतिहासिक महत्व इसी कारण दोहरा है—

एक, इसने केंद्र सरकार को तीन कृषि कानून वापस लेने के लिए बाध्य करने वाली व्यापक किसान लामबंदी में योगदान दिया।

दो, इसने महेंद्र सिंह टिकैत के लंबे धरने, ट्रैक्टर, सामुदायिक रसद, पंचायत और गैर-दलीय किसान दबाव की आंदोलन शैली को नई परिस्थितियों में पुनर्जीवित किया।

1 तीन कृषि कानून : विवाद की शुरुआत

5 जून 2020 को केंद्र सरकार ने तीन कृषि अध्यादेश जारी किए। बाद में संसद ने सितंबर 2020 में उनसे संबंधित विधेयक पारित किए और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद 27 सितंबर 2020 से तीनों कानून प्रभावी हो गए। इनमें थे—

कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम, 2020।

कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार अधिनियम, 2020।

आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020।

सरकार का तर्क था कि इन कानूनों से किसान को अपनी उपज मंडी से बाहर बेचने के अधिक विकल्प मिलेंगे, अनुबंध खेती के लिए कानूनी ढांचा मिलेगा और कृषि बाजार में निवेश तथा प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। प्रधानमंत्री ने बाद में कानून वापसी की घोषणा करते समय भी कहा कि इनका उद्देश्य विशेषकर छोटे किसानों को बेहतर मूल्य और अधिक बिक्री विकल्प देना था।

2 किसान संगठनों की आशंकाएं

विरोधी किसान संगठनों की आशंकाएं बिल्कुल अलग थीं।

उन्हें डर था कि मंडी व्यवस्था धीरे-धीरे कमजोर होगी।

न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद की सुरक्षा कमजोर पड़ सकती है।

बड़ी निजी कंपनियों की सौदेबाजी शक्ति छोटे किसान से कहीं अधिक होगी।

अनुबंध विवाद की स्थिति में किसान कमजोर पक्ष हो सकता है।

और लंबे समय में कृषि व्यापार में निजी कॉरपोरेट शक्ति बढ़ सकती है।

Indian Express की आंदोलन समयरेखा ने किसान संगठनों की केंद्रीय आशंका को इसी रूप में दर्ज किया कि कानून MSP आधारित सुरक्षा को कमजोर करके किसानों को बड़े कॉरपोरेट खरीदारों पर अधिक निर्भर बना सकते हैं।

यह महत्वपूर्ण है कि सरकार ने MSP समाप्त करने की घोषणा नहीं की थी। इसलिए “कानूनों में MSP समाप्त कर दिया गया था” कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। विवाद मुख्यतः भविष्य की संरचनात्मक आशंका और MSP को कानूनी सुरक्षा देने की मांग को लेकर था।

3 आंदोलन की शुरुआत पंजाब से

इन कानूनों के खिलाफ सबसे मजबूत शुरुआती विरोध पंजाब में हुआ।

पंजाब के किसान संगठन पहले अध्यादेशों और फिर कानूनों के खिलाफ लामबंद हुए।

कॉरपोरेट प्रतिष्ठानों के खिलाफ प्रदर्शन।

धीरे-धीरे हरियाणा के किसान भी बड़े पैमाने पर जुड़े।

नवंबर के अंत तक किसान संगठनों ने निर्णय लिया—

4 25–26 नवंबर 2020 : दिल्ली चलो

25 नवंबर 2020 से पंजाब और हरियाणा के हजारों किसानों ने दिल्ली की ओर बढ़ना शुरू किया।

26 नवंबर को कई स्थानों पर किसानों को रोकने के लिए पुलिस ने अवरोधक, पानी की बौछार और आंसू गैस का प्रयोग किया।

इसके बावजूद किसान दिल्ली की सीमाओं तक पहुंच गए।

सरकार ने उन्हें बुराड़ी के निर्धारित मैदान में जाने का प्रस्ताव दिया, लेकिन किसान संगठनों ने प्रमुख सीमा बिंदुओं पर ही पड़ाव बनाए रखा।

यहीं आंदोलन ने लंबे घेराव का रूप ले लिया।

5 सिंघु, टिकरी और गाजीपुर

आंदोलन के तीन प्रमुख प्रतीकात्मक केंद्र बने—

सिंघु और टिकरी पर पंजाब और हरियाणा के किसान संगठनों की उपस्थिति सबसे मजबूत थी।

गाजीपुर धीरे-धीरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश और BKU की मुख्य पहचान बना।

इसी भौगोलिक विभाजन में आंदोलन की संघीय सामाजिक संरचना दिखाई देती है।

लेकिन अलग क्षेत्रीय किसान संस्कृतियां।

6 संयुक्त किसान मोर्चा : किसी एक नेता का आंदोलन नहीं

2020–21 आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण संगठनात्मक विशेषता थी—

संयुक्त किसान मोर्चा कई किसान संगठनों का साझा मंच बना। जनवरी 2021 में इसे 41 आंदोलनरत किसान यूनियनों की छतरी संस्था के रूप में दर्ज किया गया।

इसलिए इतिहास लिखते समय यह कहना कि राकेश टिकैत या BKU ने अकेले कृषि कानून वापस कराए—गलत होगा।

BKU इस व्यापक गठबंधन का एक महत्वपूर्ण घटक थी, संपूर्ण आंदोलन नहीं।

7 BKU की प्रारंभिक स्थिति

आंदोलन के शुरुआती महीनों में गाजीपुर सीमा की ताकत सिंघु या टिकरी जैसी नहीं थी।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों का समर्थन मौजूद था, लेकिन 1988 जैसी तत्काल विशाल लामबंदी नहीं दिखाई दी।

इसके पीछे सामाजिक और राजनीतिक कारण थे।

जाट किसानों में भाजपा का मजबूत चुनावी समर्थन।

और आंदोलन के शुरुआती चरण में पंजाब का वर्चस्व।

राकेश टिकैत अभी राष्ट्रीय आंदोलन के केंद्रीय चेहरे नहीं बने थे।

यह स्थिति जनवरी 2021 के अंत में बदली।

8 सरकार से वार्ता

दिसंबर 2020 से जनवरी 2021 तक केंद्र सरकार और किसान संगठनों के बीच लगातार वार्ताएं हुईं।

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, पीयूष गोयल और सोम प्रकाश सरकार की ओर से प्रमुख वार्ताकार थे।

सरकार कुछ प्रावधानों में संशोधन पर चर्चा करने को तैयार थी।

8 जनवरी 2021 की आठवीं वार्ता तक सरकार संशोधन पर बात कर रही थी, जबकि किसान संगठन कानून निरस्त करने की मांग पर कायम थे।

9 सुप्रीम कोर्ट की दखल

12 जनवरी 2021 को सर्वोच्च न्यायालय ने तीनों कृषि कानूनों के क्रियान्वयन पर अगले आदेश तक रोक लगाई और कानूनों पर विचार करने के लिए विशेषज्ञ समिति बनाई।

अपने आदेश में न्यायालय ने यह भी दर्ज किया कि सरकार और किसान संगठनों के बीच कई दौर की बातचीत के बावजूद समाधान नहीं निकल पाया था और आंदोलन उस समय तक बड़े पैमाने पर शांतिपूर्ण रहा था।

उन पर न्यायालय ने अस्थायी रोक लगा दी।

फिर भी किसान आंदोलन समाप्त नहीं हुआ।

क्योंकि किसान संगठनों की मांग केवल क्रियान्वयन रोकना नहीं बल्कि कानूनों का विधायी निरसन था।

10 सरकार का 18 महीने रोकने का प्रस्ताव

20 जनवरी 2021 की दसवीं वार्ता में केंद्र सरकार ने महत्वपूर्ण प्रस्ताव दिया—

तीनों कानूनों के क्रियान्वयन को एक से डेढ़ वर्ष तक स्थगित रखा जाए।

इस अवधि में सरकार और किसान संगठनों की संयुक्त समिति विवादित प्रश्नों पर चर्चा करे।

लेकिन किसान संगठनों ने इसे स्वीकार नहीं किया।

21 जनवरी को संयुक्त किसान मोर्चा ने प्रस्ताव अस्वीकार करते हुए दो मुख्य मांगें दोहराईं—

और लाभकारी MSP के लिए कानूनी व्यवस्था।

11 26 जनवरी की ट्रैक्टर परेड

गणतंत्र दिवस 2021 पर किसान संगठनों ने दिल्ली में ट्रैक्टर परेड आयोजित करने का निर्णय किया।

पुलिस और किसान नेताओं के बीच निर्धारित मार्गों पर सहमति बनी थी।

लेकिन 26 जनवरी को आंदोलन का एक हिस्सा निर्धारित मार्ग से हट गया।

कई प्रदर्शनकारी मध्य दिल्ली की ओर बढ़े।

ITO और लाल किला क्षेत्र में गंभीर हिंसा और पुलिस–प्रदर्शनकारी टकराव हुआ।

कुछ प्रदर्शनकारियों ने लाल किले की प्राचीर और परिसर में प्रवेश किया तथा निशान साहिब का झंडा लगाया।

पुलिस कर्मियों सहित अनेक लोग घायल हुए।

12 26 जनवरी के बाद नैतिक संकट

26 जनवरी की हिंसा ने किसान आंदोलन की उस नैतिक शक्ति को नुकसान पहुंचाया जो महीनों के शांतिपूर्ण धरने से बनी थी।

सरकार और आंदोलन-विरोधी समूहों को आरोप लगाने का अवसर मिला कि आंदोलन नेतृत्व भीड़ पर नियंत्रण खो चुका है।

कुछ धरना स्थलों पर किसान वापस जाने लगे।

ऐसा लगा कि आंदोलन तेजी से कमजोर हो सकता है।

यहीं 28 जनवरी की घटना निर्णायक बनी।

13 गाजीपुर खाली कराने का दबाव

28 जनवरी 2021 को गाजियाबाद प्रशासन ने गाजीपुर सीमा पर किसानों को धरना स्थल खाली करने का निर्देश दिया।

शाम तक बड़ी संख्या में पुलिस और दंगा-रोधी बल वहां दिखाई देने लगे।

राकेश टिकैत ने घोषणा की कि वे धरना स्थल नहीं छोड़ेंगे।

यह वह क्षण था जब आंदोलन का भविष्य अनिश्चित दिखाई दे रहा था।

26 जनवरी की घटनाओं के कारण आंदोलन की छवि चोटिल थी।

14 28 जनवरी : राकेश टिकैत के आंसू

इसी रात कैमरों के सामने राकेश टिकैत भावुक हो गए।

उन्होंने किसान सम्मान और आंदोलन जारी रखने की बात कही।

कुछ घंटों में यह दृश्य टीवी, मोबाइल और सोशल मीडिया के माध्यम से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों में फैल गया।

Indian Express ने बाद में इसे स्पष्ट रूप से किसान आंदोलन का turning point—निर्णायक मोड़ कहा।

यह राकेश टिकैत के राजनीतिक जीवन का भी निर्णायक क्षण था।

15 किसान समाज ने आंसुओं को कैसे पढ़ा?

शहरी राजनीतिक दृष्टि से किसी नेता का रोना कमजोरी समझा जा सकता है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान समाज में इसकी प्रतिक्रिया उलटी हुई।

समर्थकों ने इसे अपने किसान नेता के अपमान और असहायता के रूप में देखा।

किसान संगठन के पुराने सामाजिक नेटवर्क अचानक सक्रिय हो गए।

और किसानों ने रात में ही गाजीपुर की ओर निकलना शुरू कर दिया।

16 डिजिटल युग में टिकैत मॉडल

यहां महेंद्र सिंह टिकैत और राकेश टिकैत के आंदोलनों के बीच एक रोचक ऐतिहासिक अंतर दिखाई देता है।

2021 में वही नेटवर्क था, लेकिन उसके ऊपर जुड़ गए थे—

Indian Express ने दर्ज किया कि टिकैत परिवार की युवा पीढ़ी ने भावुक राकेश टिकैत की तस्वीर और वीडियो को व्यापक रूप से प्रसारित करने में भूमिका निभाई, जिसके बाद अगले ही दिन मुजफ्फरनगर की विशाल पंचायत के लिए किसानों की लामबंदी हुई।

पुराना पंचायत नेटवर्क अब डिजिटल हो चुका था।

17 रातों-रात गाजीपुर फिर भर गया

28 जनवरी की रात से किसान पश्चिमी उत्तर प्रदेश से गाजीपुर पहुंचने लगे।

और आसपास के क्षेत्रों से ट्रैक्टर और वाहन आने लगे।

किसान फिर राशन और पानी साथ ला रहे थे।

31 जनवरी की रिपोर्ट में Indian Express ने दर्ज किया कि मुजफ्फरनगर पंचायत के बाद सैकड़ों किसान ट्रैक्टर और ट्रकों में राशन तथा पानी लेकर गाजीपुर पहुंचे।

यह बिल्कुल महेंद्र सिंह टिकैत मॉडल की पुनरावृत्ति थी।

18 पानी का प्रतीक

गाजीपुर में प्रशासन द्वारा पानी और बिजली व्यवस्था बाधित किए जाने की खबरों के बीच राकेश टिकैत ने कहा कि वे अपने गांवों से किसानों द्वारा लाया पानी ही पीएंगे।

उसके बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों से पानी, छाछ और भोजन धरना स्थल पर पहुंचने लगा।

इसमें महेंद्र सिंह टिकैत की पुरानी आंदोलन संस्कृति का स्पष्ट प्रतीकवाद था—

राज्य की रसद के मुकाबले किसान समाज की सामुदायिक रसद।

19 29 जनवरी मुजफ्फरनगर महापंचायत

28 जनवरी की रात के तुरंत बाद 29 जनवरी को मुजफ्फरनगर में विशाल किसान पंचायत हुई।

नरेश टिकैत और स्थानीय किसान नेतृत्व ने किसानों को आंदोलन के समर्थन में खड़ा होने का आह्वान किया।

यही वह क्षण था जब सिसौली और मुजफ्फरनगर का पुराना टिकैत सामाजिक नेटवर्क फिर सक्रिय दिखाई दिया।

नरेश पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पंचायत शक्ति को सक्रिय कर रहे थे।

इस तरह टिकैत परिवार की दूसरी पीढ़ी का दोहरा नेतृत्व पूरी तरह दिखाई दिया।

20 पिता की विरासत फिर सक्रिय

यहां महेंद्र सिंह टिकैत की स्मृति केवल श्रद्धांजलि नहीं रही।

महेंद्र सिंह टिकैत की वह छवि, जिसमें किसान नेता दबाव के सामने पीछे नहीं हटता, राकेश टिकैत के व्यवहार को समझने की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि बनी।

इसलिए 28 जनवरी के बाद राकेश की पहचान केवल वर्तमान नेता की नहीं रही।

वे अपने पिता की आंदोलनकारी विरासत के उत्तराधिकारी के रूप में देखे जाने लगे।

21 जाट किसानों की वापसी

2014 के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट मतदाताओं का बड़ा हिस्सा भाजपा की ओर गया था।

इसलिए 2020 के शुरुआती किसान आंदोलन में जाट किसान का बड़ा हिस्सा राजनीतिक रूप से दुविधा में था।

28 जनवरी के बाद किसान सम्मान का प्रश्न पार्टी पहचान से ऊपर उठा।

गांवों में भावना बनी कि किसान नेता का अपमान हुआ है।

इससे बड़ी संख्या में जाट किसान BKU के आंदोलन में लौटे।

यही BKU के सामाजिक पुनरुत्थान का पहला बड़ा आधार बना।

22 मुस्लिम किसानों की वापसी

और भी महत्वपूर्ण था मुस्लिम किसानों का लौटना।

2013 के बाद जाट और मुस्लिम किसान अलग हो गए थे।

लेकिन कृषि कानून और गन्ना–MSP जैसे प्रश्न दोनों के लिए समान थे।

2021 की पंचायतों में पुराने मुस्लिम किसान नेता फिर BKU मंच के करीब आए।

इससे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान पहचान को पुनः जीवित करने की प्रक्रिया तेज हुई।

यह 2013 की दरार पूरी तरह भरना नहीं था।

23 गन्ना और कृषि कानून का संगम

राकेश टिकैत ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आंदोलन को केवल तीन कृषि कानूनों तक सीमित नहीं रखा।

फरवरी 2021 के साक्षात्कार में उन्होंने स्पष्ट रूप से तीन मांगें रखीं—

यही रणनीति BKU की पुरानी क्षेत्रीय ताकत को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ती थी।

24 गाजीपुर का चरित्र सिंघु से अलग क्यों था?

सिंघु और टिकरी मुख्यतः पंजाब–हरियाणा किसान राजनीति के प्रतीक थे।

गाजीपुर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान समाज का केंद्र बन गया।

यही कारण है कि गाजीपुर केवल एक धरना स्थल नहीं रहा।

वह BKU के पुनर्जन्म का स्थल बन गया।

25 6 फरवरी का चक्का जाम और क्षेत्रीय रणनीति

संयुक्त किसान मोर्चा ने 6 फरवरी 2021 को देशव्यापी चक्का जाम का आह्वान किया।

लेकिन राकेश टिकैत ने उत्तर प्रदेश में सड़क जाम न करने और केवल ज्ञापन देने का निर्णय किया।

संयुक्त आंदोलन के भीतर भी क्षेत्रीय संगठनों को रणनीतिक स्वायत्तता थी।

BKU हर निर्णय यांत्रिक रूप से नहीं अपनाती थी।

वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश की स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर आंदोलन की शैली तय कर सकती थी।

26 आंदोलन और लंबा पड़ाव

फरवरी के बाद किसान आंदोलन लंबा होता गया।

फिर भी सीमाओं पर तंबू, ट्रैक्टर-ट्रॉली, रसोई और गांव आधारित रसद बनी रही।

यहीं महेंद्र सिंह टिकैत की 1988 शैली और 2020–21 आंदोलन के बीच सबसे स्पष्ट समानता दिखाई देती है।

लंबा पड़ाव स्वयं राजनीतिक हथियार था।

सरकार प्रतीक्षा कर रही थी कि आंदोलन थकेगा।

27 सामुदायिक रसोई और आत्मनिर्भरता

पंजाब की लंगर परंपरा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सामुदायिक किसान रसद ने आंदोलन को असाधारण आत्मनिर्भरता दी।

28 महिलाओं की बढ़ती भूमिका

यहां महेंद्र सिंह टिकैत के दौर से एक महत्वपूर्ण बदलाव भी हुआ।

30 5 सितंबर 2021 : मुजफ्फरनगर महापंचायत

यह पंचायत इस संदेश के लिए महत्वपूर्ण थी—

अध्याय 18

2022 से 2026 तक BKU और किसान राजनीति

तीन कृषि कानूनों की वापसी के बाद भारतीय किसान राजनीति के सामने सबसे बड़ा प्रश्न था—अब आगे क्या? नवंबर–दिसंबर 2021 में कानून निरस्त हो गए, दिल्ली की सीमाओं से किसान लौट गए और संयुक्त किसान मोर्चा ने अपना आंदोलन स्थगित कर दिया। लेकिन जिन व्यापक आर्थिक समस्याओं ने आंदोलन को जन्म दिया था—न्यूनतम समर्थन मूल्य, कृषि ऋण, बढ़ती उत्पादन लागत, बिजली, गन्ना भुगतान, भूमि अधिग्रहण और किसान आय—उनमें से अधिकांश बनी रहीं।

यही कारण है कि 2022 से अगस्त 2026 तक के दौर को कृषि कानून आंदोलन के बाद की शांति का काल नहीं कहा जा सकता। यह वास्तव में किसान आंदोलन के पुनर्संयोजन, विखंडन और नए मुद्दों पर पुनः लामबंदी का काल है।

इस दौर में भारतीय किसान यूनियन की टिकैत धारा के सामने तीन समानांतर चुनौतियां थीं।

पहली—2020–21 की असाधारण राष्ट्रीय एकता को बनाए रखना।

दूसरी—BKU के भीतर गैर-दलीयता को लेकर पैदा हुई नई दरारों से निपटना।

तीसरी—कृषि कानूनों के समाप्त होने के बाद किसान असंतोष के लिए ऐसा नया केंद्रीय मुद्दा खोजना जो पूरे देश के किसानों को जोड़ सके।

न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी।

लेकिन 2024 के बाद किसान आंदोलन स्वयं कई धाराओं में बंटा दिखाई दिया। एक ओर 2020–21 आंदोलन की मूल संयुक्त किसान मोर्चा धारा थी, जिसमें BKU टिकैत शामिल रही; दूसरी ओर संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) और किसान मजदूर मोर्चा ने शंभू–खनौरी आंदोलन की अलग धारा विकसित की। दोनों MSP की कानूनी गारंटी जैसी कई समान मांगें उठाते थे, लेकिन संगठनात्मक रणनीति और नेतृत्व अलग था। जनवरी 2025 तक इन धाराओं को फिर साथ लाने के प्रयास भी पूर्णतः सफल नहीं हो पाए थे।

इसी विभाजित किसान राजनीति में 2026 तक राकेश टिकैत और BKU की स्थिति को समझना आवश्यक है।

1 कानून वापसी के बाद अधूरी मांगें

9 दिसंबर 2021 को आंदोलन स्थगित करते समय किसान संगठनों की धारणा थी कि तीन कृषि कानूनों की वापसी के अलावा कई अन्य मुद्दों पर सरकार से प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

आंदोलन के दौरान मारे गए किसानों के परिवारों का प्रश्न।

इसलिए दिल्ली सीमाओं से किसानों की वापसी को आंदोलन की पूरी समाप्ति नहीं कहा गया।

यही 2022 के बाद की राजनीति का आधार बना।

2 MSP कानून क्यों सबसे बड़ा उत्तराधिकारी मुद्दा बना?

तीन कृषि कानून निरस्त होने के बाद किसान संगठनों को एक ऐसा मुद्दा चाहिए था जो विभिन्न फसलों और राज्यों के किसानों को साझा मंच पर ला सके।

सभी किसी न किसी रूप में कृषि मूल्य की समस्या से जुड़े थे।

इसीलिए “कानूनी MSP” 2022 के बाद किसान आंदोलन का सबसे प्रभावशाली राष्ट्रीय नारा बना।

3 MSP व्यवस्था वास्तव में क्या है?

सरकार प्रति वर्ष 22 अधिदेशित कृषि फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती है। इनमें 14 खरीफ, छह रबी और दो वाणिज्यिक फसलें शामिल हैं। इसके अतिरिक्त गन्ने के लिए उचित एवं लाभकारी मूल्य—FRP—अलग व्यवस्था के अंतर्गत निर्धारित किया जाता है। फरवरी 2026 तक भी यही ढांचा कायम था।

लेकिन घोषित MSP और कानूनी गारंटी एक ही चीज नहीं हैं।

कई फसलों की सरकारी खरीद भी होती है।

लेकिन हर किसान की पूरी उपज हर परिस्थिति में MSP पर खरीदना कानूनी अधिकार नहीं है।

यहीं किसान आंदोलन की मांग शुरू होती है।

4 किसान संगठन क्या चाहते हैं?

किसान संगठनों के भीतर MSP के कानूनी मॉडल के विवरण में भिन्नताएं हैं, लेकिन केंद्रीय मांग है—

किसी किसान को अधिसूचित फसल MSP से कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर न होना पड़े।

संयुक्त किसान मोर्चा की प्रमुख धारा इसे स्वामीनाथन आयोग के व्यापक लागत सूत्र से जोड़ती रही है और C2 लागत के ऊपर 50 प्रतिशत प्रतिफल तथा सुनिश्चित खरीद की मांग उठाती है। 2024 में भी SKM के राष्ट्रीय किसान कार्यक्रम में यही प्रमुख मांग थी।

BKU टिकैत ने भी MSP की कानूनी गारंटी को अपनी केंद्रीय राष्ट्रीय मांग बनाए रखा है।

5 सरकार का दृष्टिकोण

सरकार कहती है कि MSP व्यवस्था लगातार मजबूत की गई है और 2018–19 से अधिदेशित फसलों का MSP अखिल भारतीय भारित औसत उत्पादन लागत से कम-से-कम 50 प्रतिशत अधिक रखने का सिद्धांत अपनाया गया है। यह सरकारी लागत-परिभाषा किसान संगठनों की C2 आधारित मांग से अलग हो सकती है।

सरकार MSP पर सरकारी खरीद को भी बढ़ाने और PM-AASHA जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से दलहन, तिलहन और नारियल के उत्पादकों को मूल्य समर्थन देने का दावा करती है। 2024 में PM-AASHA के विस्तार में दलहन, तिलहन और नारियल के MSP खरीद कार्यक्रम की सीमा बढ़ाई गई।

घोषित MSP और खरीद व्यवस्था पर्याप्त है, या किसान को कानूनी मूल्य अधिकार चाहिए?

6 2022 : MSP समिति का गठन

कृषि कानून आंदोलन के बाद केंद्र सरकार ने MSP व्यवस्था को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाने के लिए समिति गठित करने की प्रक्रिया शुरू की।

फरवरी 2022 में सरकार ने संसद में कहा कि ऐसी समिति गठित करने की प्रक्रिया चल रही है।

जुलाई 2022 में समिति औपचारिक रूप से गठित हुई।

MSP को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाना।

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग को अधिक वैज्ञानिक तथा स्वायत्त बनाने के सुझाव।

लेकिन यहीं किसान संगठनों और सरकार के बीच नया विवाद शुरू हो गया।

7 SKM ने समिति से दूरी क्यों बनाई?

संयुक्त किसान मोर्चा ने समिति की संरचना और कार्यक्षेत्र पर आपत्ति की।

किसान संगठनों का तर्क था कि आंदोलन की केंद्रीय मांग MSP की कानूनी गारंटी थी, जबकि समिति का कार्यक्षेत्र इसे स्पष्ट रूप से अनिवार्य परिणाम के रूप में नहीं रखता।

2022 में SKM के लिए समिति में तीन स्थान रखे गए, लेकिन मोर्चे ने नाम भेजने से परहेज किया और समिति की संरचना पर प्रश्न उठाए।

इससे 2021 के समझौते की व्याख्या पर सरकार और किसान संगठनों के बीच अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए।

8 2022 : BKU के भीतर सबसे बड़ा नया विभाजन

कृषि कानून आंदोलन से निकली लोकप्रियता BKU को मजबूत भी कर रही थी और भीतर तनाव भी पैदा कर रही थी।

15 मई 2022—महेंद्र सिंह टिकैत की पुण्यतिथि के दिन—BKU के कई वरिष्ठ नेताओं ने अलग होकर भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) का गठन किया।

यह सामान्य संगठनात्मक विभाजन नहीं था।

क्या राकेश और नरेश टिकैत BKU को बहुत अधिक चुनावी राजनीति की ओर ले गए हैं?

9 ‘अराजनैतिक’ नाम स्वयं आरोप था

नए संगठन ने अपने नाम में ही “अराजनैतिक” जोड़ लिया।

उसका आरोप था कि मूल BKU महेंद्र सिंह टिकैत की गैर-दलीय किसान राजनीति से विचलित हो गई है।

राजेश चौहान और उनके सहयोगियों ने आरोप लगाया कि 2022 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान राकेश टिकैत के बयानों और विपक्ष के प्रति दिखाई दी निकटता ने संगठन की गैर-दलीय छवि को नुकसान पहुंचाया।

राकेश टिकैत ने पलटकर विभाजन के पीछे सरकार की भूमिका होने का आरोप लगाया।

दोनों आरोप राजनीतिक दावे थे; इन्हें सिद्ध तथ्य की तरह नहीं बल्कि संबंधित पक्षों के आरोप के रूप में दर्ज करना चाहिए।

10 2022 विभाजन का वास्तविक महत्व

यह विभाजन महेंद्र सिंह टिकैत के पुराने अंतर्विरोध को फिर सामने लाया—

क्या किसान संगठन चुनावों को प्रभावित किए बिना सरकार पर प्रभावी दबाव डाल सकता है?

यदि वह किसी सरकार की कृषि नीति का विरोध करता है, तो चुनाव में उस सरकार के खिलाफ बोलना स्वाभाविक है।

लेकिन जैसे ही वह किसी दूसरे दल के पक्ष में दिखाई देता है, गैर-दलीयता प्रश्न के घेरे में आती है।

तीन अलग कालखंडों में वही समस्या अलग रूप में सामने आई।

11 विभाजन कितना गंभीर था?

नया गुट केवल कुछ अज्ञात कार्यकर्ताओं का समूह नहीं था।

उसमें BKU के कई पुराने पदाधिकारी शामिल हुए।

कुछ नेता महेंद्र सिंह टिकैत के दौर से संगठन में थे।

इसलिए इससे उत्तर प्रदेश में टिकैत धारा के संगठनात्मक नेटवर्क को वास्तविक नुकसान हुआ।

सिसौली, नरेश टिकैत और राकेश टिकैत के पास संगठन की ऐतिहासिक पहचान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का महत्वपूर्ण सामाजिक आधार बना रहा।

12 ‘BKU’ अब एक संगठन नहीं, संगठन-परिवार

2022 तक भारतीय किसान यूनियन नाम अनेक अलग किसान संगठनों द्वारा प्रयुक्त हो रहा था।

और अलग-अलग राज्यों की ऐतिहासिक BKU इकाइयां।

इसलिए 2022–26 में “BKU ने कहा” लिखते समय यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किस BKU की बात हो रही है।

इस शोध में जहां केवल “BKU” कहा गया है, वहां संदर्भ मुख्यतः नरेश–राकेश टिकैत वाली भारतीय किसान यूनियन का है।

13 कानून वापसी के बाद BKU फिर स्थानीय मुद्दों पर लौटी

2020–21 में राष्ट्रीय कृषि कानून आंदोलन BKU का मुख्य मंच था।

उसके समाप्त होने के बाद संगठन फिर अपने पारंपरिक मुद्दों पर लौट आया—

यही महेंद्र सिंह टिकैत के आंदोलन का मूल क्षेत्रीय आधार था।

राष्ट्रीय आंदोलन के बाद संगठन को गांव में फिर उसी किसान की रोजमर्रा की समस्या से जुड़ना था।

14 2023 : मुजफ्फरनगर का लंबा धरना

जनवरी 2023 में BKU ने मुजफ्फरनगर में अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया।

किसान संगठन ने खराब मौसम के बावजूद धरना जारी रखा।

इस आंदोलन का महत्व यह था कि उसने एक बार फिर महेंद्र सिंह टिकैत की पुरानी लंबा-पड़ाव रणनीति को अपनाया।

15 गन्ना : चार दशक बाद भी वही केंद्रीय प्रश्न

1988 में गन्ना टिकैत आंदोलन का केंद्रीय मुद्दा था।

यही पश्चिमी उत्तर प्रदेश की किसान राजनीति की असाधारण निरंतरता है।

यानी कृषि राजनीति में वैश्वीकरण, WTO और डिजिटल खेती जैसे नए मुद्दे जुड़ गए, लेकिन गन्ने का पुराना सवाल समाप्त नहीं हुआ।

16 2023 लखनऊ किसान महापंचायत

सितंबर 2023 में लखनऊ की किसान महापंचायत में राकेश टिकैत ने किसानों से बड़े आंदोलन के लिए तैयार रहने की अपील की।

यहां टिकैत की राजनीतिक भाषा में एक नया सूत्र विशेष रूप से प्रमुख हुआ—

यह पुराने किसान आर्थिक आंदोलन को भूमि, सामाजिक पहचान और भविष्य की पीढ़ी से जोड़ने वाला अधिक व्यापक राजनीतिक रूपक था।

17 मुफ्त बिजली बनाम मीटर का विवाद

उत्तर प्रदेश की किसान राजनीति में बिजली फिर केंद्रीय प्रश्न बनी।

कृषि नलकूपों को बिजली राहत या मुफ्त बिजली की घोषणा और दूसरी ओर मीटरिंग/स्मार्ट मीटर की प्रक्रिया ने किसान संगठनों में शंका पैदा की।

यदि सरकार मुफ्त कृषि बिजली का वादा करती है तो फिर मीटर लगाने का उद्देश्य क्या है?

2023 की लखनऊ पंचायत में राकेश टिकैत ने इसी विरोधाभास पर प्रश्न उठाया।

यह लगभग वही विवाद था जो महेंद्र सिंह टिकैत के समय फ्लैट रेट और मीटर व्यवस्था के प्रश्न में दिखाई देता था।

18 भूमि अधिग्रहण फिर राष्ट्रीय किसान प्रश्न

दिल्ली–एनसीआर के फैलाव, एक्सप्रेसवे, औद्योगिक गलियारों, हवाई अड्डों और शहरी विकास परियोजनाओं ने भूमि अधिग्रहण को BKU के लिए तेजी से महत्वपूर्ण बनाया।

यह मुद्दा विशेष रूप से नोएडा–ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में तीखा रहा।

19 नोएडा–ग्रेटर नोएडा : नया किसान भूगोल

महेंद्र सिंह टिकैत का मुख्य क्षेत्र गन्ना पट्टी था।

इक्कीसवीं सदी में BKU को एक नए किसान भूगोल का सामना करना पड़ा—

नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र में अलग-अलग किसान संगठनों ने लगातार आंदोलन किए।

2025 में भी BKU टिकैत सहित विभिन्न किसान संगठनों ने उच्च मुआवजा, विकसित भूखंड और पुनर्वास से संबंधित मांगों पर अलग-अलग प्रदर्शन घोषित किए।

इससे BKU के एजेंडे में “खेती बचाओ” के साथ “भूमि अधिकार” नया महत्व प्राप्त करता है।

20 2024 : किसान राजनीति फिर दो धाराओं में

फरवरी 2024 में किसान आंदोलन फिर राष्ट्रीय समाचार बना।

लेकिन यहां एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्यात्मक फर्क रखना जरूरी है।

13 फरवरी 2024 से शंभू और खनौरी सीमाओं पर शुरू हुआ “दिल्ली चलो” आंदोलन 2020–21 वाले मूल संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा नहीं, बल्कि मुख्यतः—

संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक)

राकेश टिकैत वाली BKU और मूल SKM इस आंदोलन की प्रत्यक्ष आयोजक नहीं थीं। जनवरी 2025 की किसान एकता बैठकों के विवरण भी इस संगठनात्मक अंतर को स्पष्ट करते हैं।

यह फर्क इतिहास में बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।

21 मांग फिर वही : MSP कानून

शंभू–खनौरी आंदोलन की सबसे प्रमुख मांग भी MSP की कानूनी गारंटी थी।

किसान आंदोलन अलग-अलग संगठनों में बंटा था।

लेकिन उनका सबसे बड़ा आर्थिक मुद्दा लगभग समान था।

22 राकेश टिकैत और शंभू आंदोलन

राकेश टिकैत ने MSP और किसान मुद्दों पर समर्थन व्यक्त किया, लेकिन मूल SKM और शंभू–खनौरी नेतृत्व के बीच रणनीतिक मतभेद बने रहे।

जनवरी 2025 में टिकैत ने यहां तक कहा कि अलग-अलग आंदोलन चलने से केंद्र सरकार को लाभ मिल सकता है और किसान संगठनों को एक होना चाहिए।

यानी 2024–25 तक किसान राजनीति की सबसे बड़ी कमजोरी स्वयं किसान संगठनों का विभाजन बन चुकी थी।

23 मार्च 2024 : दिल्ली के रामलीला मैदान में SKM

14 मार्च 2024 को मूल संयुक्त किसान मोर्चा ने दिल्ली के रामलीला मैदान में किसान मजदूर महापंचायत आयोजित की।

देश के अनेक हिस्सों से किसान पहुंचे।

और स्वामीनाथन आयोग के आधार पर लाभकारी मूल्य।

इससे स्पष्ट था कि मूल SKM भी निष्क्रिय नहीं था।

उसकी रणनीति शंभू सीमा के आंदोलन से अलग थी।

24 गैर-दलीयता फिर विवाद में

रामलीला मैदान की महापंचायत में SKM ने केंद्र की भाजपा सरकार के विरुद्ध देशव्यापी राजनीतिक अभियान का आह्वान किया।

यही वह बिंदु है जहां BKU की पुरानी गैर-दलीयता फिर प्रश्न के घेरे में आती है।

जो सरकार किसान मांग नहीं मानती, उसे चुनाव में राजनीतिक कीमत चुकानी चाहिए।

यह सीधे दलगत राजनीति में हस्तक्षेप है।

महेंद्र सिंह टिकैत के समय का वही पुराना द्वंद्व 2024 में फिर सामने था।

25 2024 लोकसभा चुनाव और किसान आंदोलन

यह कहना कठिन होगा कि किसान आंदोलन ने किसी एक दल के चुनाव परिणाम को निर्णायक रूप से कितना प्रभावित किया, क्योंकि मतदाता एक साथ जाति, धर्म, स्थानीय उम्मीदवार, राष्ट्रीय नेतृत्व और आर्थिक प्रश्नों से प्रभावित होता है।

लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा में कृषि मुद्दे निश्चित रूप से चुनावी विमर्श का हिस्सा रहे।

आंदोलनकारी किसान पहचान चुनावी राजनीतिक व्यवहार को प्रभावित कर सकती है, लेकिन उसे पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकती।

26 सितंबर 2024 : हापुड़ का गन्ना और बिजली आंदोलन

2024 में हापुड़ में BKU टिकैत कार्यकर्ताओं ने गन्ना किसानों के बकाया भुगतान और कृषि नलकूप बिजली बिलों से जुड़े विवाद पर अनिश्चितकालीन धरना चलाया।

रिपोर्ट के अनुसार किसानों की प्रमुख मांगों में गन्ना भुगतान ब्याज सहित दिलाना और जमा किए गए नलकूप बिलों के बावजूद बकाया दिखाने की शिकायत शामिल थी।

2024 का राष्ट्रीय किसान विमर्श MSP पर था।

यही राष्ट्रीय और क्षेत्रीय किसान राजनीति का अंतर है।

27 2024 के बाद MSP पर सरकारी नीति

सरकार ने MSP व्यवस्था जारी रखी और अलग-अलग फसलों के घोषित मूल्य बढ़ाए।

2024 के बाद PM-AASHA योजना को भी जारी और पुनर्गठित किया गया, जिसमें दलहन, तिलहन और नारियल के लिए मूल्य समर्थन खरीद को मजबूत करने की व्यवस्था शामिल थी।

2026 तक सरकार का आधिकारिक दृष्टिकोण यही रहा कि 22 अधिदेशित फसलों के MSP उत्पादन लागत के ऊपर कम-से-कम 50 प्रतिशत प्रतिफल सिद्धांत के आधार पर घोषित किए जा रहे हैं।

लेकिन कानूनी MSP गारंटी की किसान मांग अलग प्रश्न बनी रही।

28 सरकार और किसान के MSP सूत्र में मूल अंतर

यहां एक तकनीकी लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण अंतर है।

सरकारी “लागत + 50 प्रतिशत” और किसान संगठनों द्वारा मांगे जाने वाले C2 + 50 प्रतिशत को एक ही चीज समझना सही नहीं है।

30 2025 : किसान संगठनों को फिर एक करने का प्रयास

दूसरी तरफ SKM (गैर-राजनीतिक) और किसान मजदूर मोर्चा।

अध्याय 19

उपलब्धियां और सीमाएं

महेंद्र सिंह टिकैत और भारतीय किसान यूनियन का ऐतिहासिक मूल्यांकन दो अतियों से बचकर करना चाहिए। पहली अति उन्हें स्वतंत्र भारत के किसानों का लगभग निर्विवाद प्रतिनिधि मान लेने की है; दूसरी उन्हें केवल पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अपेक्षाकृत संपन्न जाट किसानों का नेता मानकर उनके व्यापक प्रभाव को खारिज कर देने की। दोनों दृष्टियां अधूरी हैं।

टिकैत का आंदोलन भारतीय किसान राजनीति में वास्तविक परिवर्तन लेकर आया। उसने किसान को चुनावी दलों की परिधि से बाहर स्वतंत्र दबाव-समूह के रूप में खड़ा किया, बिजली और गन्ने जैसे दिखने में स्थानीय प्रश्नों को कृषि लागत और किसान आय के राष्ट्रीय विमर्श से जोड़ा, महापंचायत और लंबे धरने को आधुनिक किसान आंदोलन की प्रभावशाली तकनीक बनाया और 1988 के बोट क्लब आंदोलन के माध्यम से राष्ट्रीय सत्ता को यह दिखाया कि संगठित किसान राजधानी के राजनीतिक कार्यक्रम तक बदलवा सकता है।

लेकिन उसी आंदोलन में स्पष्ट सीमाएं भी थीं। उसका मुख्य सामाजिक आधार भूमि रखने वाला कृषक था। भूमिहीन कृषि मजदूर, दलित ग्रामीण गरीब और महिला किसान के स्वतंत्र अधिकार अपेक्षाकृत पीछे रहे। जाट सामाजिक आधार और खाप नेटवर्क ने संगठन को शक्ति दी, पर उसी ने सामाजिक प्रतिनिधित्व की सीमाएं भी पैदा कीं। गैर-दलीयता संगठन की सबसे बड़ी पूंजी बनी, लेकिन वह चुनावी राजनीति से बार-बार समझौता भी करती रही। और महेंद्र सिंह टिकैत की असाधारण व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को उतनी ही मजबूत लोकतांत्रिक संस्था में पूरी तरह नहीं बदला जा सका।

इसीलिए टिकैत मॉडल का मूल्यांकन उपलब्धि और सीमा—दोनों को साथ रखकर ही किया जा सकता है।

1 पहली बड़ी उपलब्धि : किसान को स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति बनाना

टिकैत की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह थी कि उन्होंने किसान से कहा—

राजनीतिक दल आपका प्रतिनिधित्व कर सकते हैं, लेकिन किसान को अपनी स्वतंत्र संगठनात्मक शक्ति भी चाहिए।

यह सोच नई नहीं थी, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में BKU ने इसे असाधारण पैमाने पर व्यवहार में उतारा।

लेकिन बिजली और गन्ने के प्रश्न पर उसे किसान के रूप में खड़ा होना था।

यही किसान की राजनीतिक स्वायत्तता टिकैत आंदोलन की केंद्रीय देन थी।

2 वोट से आगे किसान की शक्ति

चौधरी चरण सिंह की राजनीति ने किसान को वोट की शक्ति दिखाई थी।

टिकैत ने उसे बताया कि लोकतंत्र में शक्ति केवल मतदान दिवस पर नहीं होती।

इस अर्थ में BKU ने लोकतांत्रिक राजनीति में चुनावों के बीच की किसान नागरिकता को मजबूत किया।

किसान पांच वर्ष में एक बार मतदाता नहीं, निरंतर दबाव डालने वाला संगठित नागरिक भी हो सकता है।

3 दूसरी उपलब्धि : कृषि राजनीति का एजेंडा बदलना

भारतीय किसान आंदोलनों का पुराना केंद्रीय प्रश्न था—

टिकैत जिस दौर में उभरे, उसमें प्रश्न बदल चुका था।

टिकैत ने इस परिवर्तन को राष्ट्रीय राजनीतिक भाषा दी।

इसीलिए उन्हें भारत के “नए किसान आंदोलन” की प्रमुख धाराओं में रखा जाता है।

4 गन्ने को राष्ट्रीय किसान राजनीति का विषय बनाना

गन्ना पश्चिमी उत्तर प्रदेश की क्षेत्रीय फसल थी, लेकिन टिकैत ने उसके माध्यम से एक राष्ट्रीय प्रश्न उठाया—

क्या किसान को उसकी उत्पादन लागत और जोखिम के अनुरूप मूल्य मिलता है?

गन्ना मूल्य की मांग केवल रुपये प्रति क्विंटल का विवाद नहीं थी।

उत्पादक और खरीदार के बीच शक्ति किसकी है?

इसी कारण गन्ना पश्चिमी उत्तर प्रदेश की स्थायी राजनीतिक फसल बन गया।

महेंद्र सिंह टिकैत के चार दशक बाद भी BKU के आंदोलन में उसका केंद्रीय स्थान इस उपलब्धि की स्थायित्व का प्रमाण है।

5 बिजली को कृषि उत्पादन का राजनीतिक प्रश्न बनाना

करमूखेड़ी आंदोलन से टिकैत ने जिस प्रश्न को उठाया, उसका प्रभाव बहुत दूर तक गया।

सिंचाई से गन्ना और गेहूं पैदा होता था।

अर्थात बिजली का मूल्य सीधे कृषि लागत था।

टिकैत ने इस सरल संबंध को किसान राजनीति का शक्तिशाली नारा बनाया।

बाद के दशकों में मुफ्त या रियायती कृषि बिजली भारतीय राज्यों की चुनावी राजनीति का स्थायी प्रश्न बन गई।

यह केवल BKU की देन नहीं थी, लेकिन उसे राष्ट्रीय दबाव प्रश्न बनाने में टिकैत की भूमिका महत्वपूर्ण थी।

6 किसान लागत की भाषा

टिकैत किसी विश्वविद्यालय के कृषि अर्थशास्त्री नहीं थे।

फिर भी उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक प्रतिभा यह थी कि उन्होंने जटिल आर्थिक प्रश्न को किसान के घरेलू खाते में बदल दिया।

इस कारण उनका आंदोलन तकनीकी भाषा से मुक्त और व्यापक रूप से समझने योग्य बना।

किसान को “टर्म्स ऑफ ट्रेड” समझने की आवश्यकता नहीं थी।

खर्च तेजी से बढ़ रहा है, फसल का भाव उतना नहीं।

7 तीसरी उपलब्धि : किसान स्वाभिमान

टिकैत की राजनीति केवल आर्थिक नहीं थी।

उसमें किसान सम्मान का प्रश्न लगातार मौजूद रहा।

किसान दया मांगने वाला व्यक्ति नहीं।

इसलिए उसे सरकारी अधिकारी के सामने अपमानित होकर खड़ा नहीं होना चाहिए।

यही “किसान स्वाभिमान” आंदोलन की भावनात्मक शक्ति बना।

8 किसान को याचक से सौदेबाज बनाना

पुरानी सरकारी भाषा में किसान कई बार लाभार्थी के रूप में प्रस्तुत होता है—

हम सहायता नहीं, हिसाब मांग रहे हैं।

यदि हमारी फसल का मूल्य नियंत्रित है तो हमारी लागत का भी हिसाब होना चाहिए।

यहीं किसान सरकारी सहायता का निष्क्रिय प्राप्तकर्ता नहीं बल्कि राज्य से सौदेबाजी करने वाला उत्पादक वर्ग बनता है।

9 चौथी उपलब्धि : पंचायत का आधुनिक राजनीतिक रूपांतरण

महेंद्र सिंह टिकैत की सबसे मौलिक संगठनात्मक उपलब्धियों में से एक पंचायत का पुनर्प्रयोग था।

पंचायत पहले से ग्रामीण समाज में थी।

पर सामूहिक निर्णय की राजनीतिक संस्था बनाया।

इससे बिना विशाल पार्टी नौकरशाही के बड़ी संख्या में किसान संगठित किए जा सके।

10 महापंचायत की शक्ति

किसी आंदोलन के लिए दूसरा काम पहले से कम महत्वपूर्ण नहीं है।

जब किसान हजारों दूसरे किसानों को अपने जैसे प्रश्न पर उपस्थित देखता है, तो उसकी व्यक्तिगत शिकायत सामूहिक राजनीतिक प्रश्न बन जाती है।

11 पांचवीं उपलब्धि : लंबे धरने की नई तकनीक

मेरठ और दिल्ली के आंदोलनों में BKU ने लंबे किसान पड़ाव को अत्यंत प्रभावी राजनीतिक हथियार बनाया।

गांव की पूरी सामाजिक दुनिया आंदोलन स्थल पर आ गई।

इस मॉडल का दीर्घकालीन प्रभाव 2020–21 के किसान आंदोलन तक स्पष्ट दिखाई देता है।

12 आंदोलन की आत्मनिर्भरता

BKU की आंदोलन-पद्धति ने वित्तीय निर्भरता कम की।

इससे आंदोलन को चलाने के लिए किसी बड़े केंद्रीय धनदाता की अनिवार्य आवश्यकता कम हुई।

यह किसान संगठन की असाधारण संरचनात्मक शक्ति थी।

13 छठी उपलब्धि : ट्रैक्टर को राजनीतिक प्रतीक बनाना

हरित क्रांति ने ट्रैक्टर को खेत में पहुंचाया।

ट्रैक्टर किसान की उत्पादन शक्ति का प्रतीक था।

बाद में किसान आंदोलनों में ट्रैक्टर मार्च एक नियमित राजनीतिक उपकरण बन गया।

इस अर्थ में आधुनिक कृषि तकनीक को जनांदोलन की तकनीक में बदल देना टिकैत मॉडल की स्थायी विरासत है।

14 सातवीं उपलब्धि : गैर-दलीय किसान मंच

1987–88 के उत्कर्ष में BKU की गैर-दलीयता वास्तविक राजनीतिक शक्ति थी।

मेरठ में चुनावी नेताओं को मंच पर कब्जा नहीं करने देना।

सरकार किसी की भी हो, किसान प्रश्न पर विरोध करना।

इनसे संगठन विभिन्न राजनीतिक झुकाव वाले किसानों को जोड़ सका।

यह जाट–मुस्लिम तथा विभिन्न कृषक जातियों की एकता के लिए भी उपयोगी था।

15 आठवीं उपलब्धि : हिंदू–मुस्लिम किसान एकता

टिकैत के शुरुआती दौर की सबसे उल्लेखनीय सामाजिक उपलब्धियों में यह शामिल है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट और मुस्लिम किसान एक ही गन्ना अर्थव्यवस्था का हिस्सा थे।

BKU ने इस आर्थिक संबंध को राजनीतिक किसान पहचान में बदलने की कोशिश की।

मेरठ की पंचायतों और बाद के आंदोलनों में मुस्लिम किसान भागीदारी महत्वपूर्ण रही।

2020–21 में इसी पुरानी स्मृति का उपयोग जाट–मुस्लिम पुनर्संपर्क के लिए किया गया।

यह विरासत आज भी टिकैत नाम की सामाजिक पूंजी है।

16 नौवीं उपलब्धि : क्षेत्रीय प्रश्न से राष्ट्रीय किसान विमर्श

टिकैत पश्चिमी उत्तर प्रदेश से निकले।

लेकिन उनके आंदोलन ने राष्ट्रीय बहस खड़ी की।

शरद जोशी और नंजुंडास्वामी जैसे अन्य नए किसान नेताओं के साथ टिकैत ने किसान राजनीति को नया वैचारिक स्थान दिया।

17 दसवीं उपलब्धि : आंदोलन संस्कृति की दीर्घकालीन विरासत

महेंद्र सिंह टिकैत का सबसे स्थायी प्रभाव संभवतः किसी एक सरकारी रियायत में नहीं है।

वह भारतीय किसान आंदोलन की संस्कृति में है।

राजनीतिक दलों से औपचारिक दूरी का दावा।

2020–21 में ये सारे तत्व फिर दिखाई दिए।

यानी व्यक्ति की मृत्यु के बाद भी आंदोलन पद्धति जीवित रही।

टिकैत मॉडल की सीमाएं

इतिहास में महत्वपूर्ण नेतृत्व का मूल्यांकन केवल उसकी सफलताओं से नहीं किया जा सकता। कई सीमाएं उसी सामाजिक संरचना से पैदा होती हैं जिसने आंदोलन को शक्ति दी।

18 पहली सीमा : ‘किसान’ कौन?

BKU की सबसे मूल सीमा उसके किसान की परिभाषा में थी।

जो बिजली, खाद और सिंचाई की लागत उठाता है।

लेकिन ग्रामीण समाज में केवल ऐसे किसान नहीं रहते।

इसलिए BKU की किसान पहचान व्यापक होते हुए भी पूरे ग्रामीण समाज का समान प्रतिनिधित्व नहीं करती थी।

19 भूमिहीन मजदूर का प्रश्न

भूमिहीन मजदूर की प्राथमिक मांग हो सकती है—

लेकिन भूमि-स्वामी किसान की चिंता हो सकती है कि मजदूरी बढ़ने से लागत बढ़ेगी।

यानी किसान और मजदूर के हित हर समय समान नहीं हैं।

BKU इस अंतर्विरोध को पूरी तरह हल नहीं कर सकी।

यही कारण है कि पुराने वामपंथी किसान आंदोलनों और टिकैत के नए किसान आंदोलन में स्पष्ट वर्गीय अंतर दिखाई देता है।

20 दूसरी सीमा : मध्यम और संपन्न किसानों का प्रभाव

BKU के नेतृत्व और आंदोलन संसाधनों में मध्यम और अपेक्षाकृत संपन्न किसानों की भूमिका महत्वपूर्ण थी।

नलकूप वाला किसान सस्ती बिजली से अधिक लाभ ले सकता था।

अधिक गन्ना पैदा करने वाला किसान मूल्य वृद्धि से अधिक लाभ पा सकता था।

ट्रैक्टर वाला किसान आंदोलन में अधिक आसानी से पहुंच सकता था।

इसलिए आलोचकों ने इसे “समृद्ध किसान आंदोलन” कहा।

लेकिन छोटे कृषक को भी बिजली, गन्ना मूल्य और ऋण से वास्तविक लाभ मिलता था।

BKU भूमि-स्वामी कृषकों का व्यापक गठबंधन थी, जिसके भीतर आर्थिक लाभ समान नहीं था।

21 तीसरी सीमा : भूमि पुनर्वितरण का कमजोर प्रश्न

तेभागा, तेलंगाना या भूमि संघर्षों में केंद्रीय प्रश्न था—

क्योंकि उसका मुख्य आधार पहले से भूमि रखने वाला कृषक था।

इसलिए भूमि सुधार, भूमिहीनता और पुनर्वितरण उसके कार्यक्रम का केंद्रीय हिस्सा नहीं बने।

यह उसे गरीब और भूमिहीन ग्रामीणों की राजनीति से सीमित करता है।

22 चौथी सीमा : दलित प्रश्न

BKU की “किसान एकता” जाति से ऊपर जाने की कोशिश थी।

लेकिन गांव की जातिगत असमानता समाप्त नहीं हुई।

ये BKU की मूल राजनीति के केंद्र में नहीं थे।

2008 में महेंद्र सिंह टिकैत पर तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के लिए जातिसूचक टिप्पणी का आरोप और उसके बाद उनकी गिरफ्तारी ने इस सामाजिक सीमा को विशेष रूप से उजागर किया।

यह घटना याद दिलाती है कि किसान स्वाभिमान और सामाजिक समानता स्वतः एक ही परियोजना नहीं हैं।

23 पांचवीं सीमा : महिला किसान का अधूरा प्रतिनिधित्व

महिलाओं ने BKU आंदोलन को टिकाने में बड़ी भूमिका निभाई।

लेकिन शीर्ष नेतृत्व लगभग पूर्णतः पुरुष रहा।

ये प्रश्न मुख्य एजेंडे में पर्याप्त स्थान नहीं पा सके।

इसलिए टिकैत आंदोलन ने महिला सहभागिता बढ़ाई, लेकिन महिला किसान की पूर्ण राजनीतिक समानता स्थापित नहीं की।

24 छठी सीमा : खाप निर्भरता

खाप नेटवर्क ने BKU को असाधारण संगठनात्मक गति दी।

लेकिन खाप सामाजिक रूप से जाति और पितृसत्ता से जुड़ी संस्था थी।

इसलिए उसके आधार पर खड़ा किसान संगठन व्यापक लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की सीमाओं से मुक्त नहीं हो सकता था।

खाप की संगठनात्मक शक्ति का उपयोग करते हुए जाति आधारित संरचना से ऊपर उठना टिकैत मॉडल की स्थायी कठिनाई रही।

25 खाप और आधुनिक लोकतंत्र का तनाव

खाप का सामुदायिक निर्णय हमेशा आधुनिक व्यक्तिगत अधिकार आधारित लोकतंत्र के समान नहीं होता।

जैसे मामलों पर खापों की भूमिका लंबे समय से विवादित रही है।

BKU ने इन्हीं सामाजिक नेटवर्क का उपयोग आर्थिक किसान राजनीति में किया।

इसलिए संगठन को खाप से मिली क्षमता और उसके सामाजिक विवाद—दोनों का उत्तराधिकार मिला।

26 सातवीं सीमा : हिंदू–मुस्लिम एकता स्थायी नहीं रही

1980 के दशक की किसान एकता BKU की उपलब्धि थी।

लेकिन 2013 का मुजफ्फरनगर संकट उसकी सीमा का सबसे कठोर प्रमाण बना।

यदि किसान पहचान धार्मिक ध्रुवीकरण को रोकने में स्थायी रूप से सक्षम होती, तो पुराना जाट–मुस्लिम गठबंधन इतनी गंभीरता से नहीं टूटता।

अकादमिक आलोचनाओं ने BKU और खाप राजनीति के कुछ हिस्सों की भूमिका पर भी प्रश्न उठाए।

इसलिए 2013 को केवल “बाहरी राजनीति ने किसान एकता तोड़ दी” कहकर संगठन को पूरी तरह जिम्मेदारी से मुक्त करना उचित नहीं होगा।

उसकी अपनी सामाजिक और राजनीतिक कमजोरियां भी थीं।

27 आठवीं सीमा : गैर-दलीयता का अंतर्विरोध

BKU की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत ही समय के साथ उसकी सबसे बड़ी समस्या बनी।

इस इतिहास से स्पष्ट है कि गैर-दलीयता एक स्थिर अवस्था नहीं रही।

जब किसान संगठन सरकार को चुनाव में दंडित करने की अपील करता है, तो वह स्वयं चुनावी राजनीति के करीब पहुंचता है।

28 क्या गैर-दलीयता संभव ही नहीं?

हर सरकार से समान मुद्दा आधारित व्यवहार करे।

लेकिन यदि सरकार किसान की मांग नहीं मानती, तो संगठन स्वाभाविक रूप से उसके चुनावी विरोध की ओर जा सकता है।

यहीं सिद्धांत और व्यवहार का तनाव है।

टिकैत आंदोलन इस तनाव का समाधान स्थायी रूप से नहीं खोज सका।

29 नौवीं सीमा : करिश्माई नेतृत्व पर निर्भरता

महेंद्र सिंह टिकैत की व्यक्तिगत लोकप्रियता BKU की सबसे बड़ी शक्ति थी।

लेकिन संस्था की दृष्टि से यही समस्या भी थी।

निर्णय अक्सर उनकी प्रतिष्ठा से वैध होते थे।

लेकिन जब 2011 में वे नहीं रहे तो प्रश्न उठा—

नियमित आंतरिक लोकतंत्र कितना मजबूत है?

इसके बाद हुए विभाजन इसी कमजोरी के संकेत हैं।

30 पारिवारिक उत्तराधिकार

महेंद्र सिंह टिकैत के बाद नरेश और राकेश टिकैत की केंद्रीय भूमिका ने संगठन को निरंतरता दी।

क्या किसान संगठन का नेतृत्व परिवार में उत्तराधिकार से चले?

समर्थक इसे सामाजिक विश्वसनीयता और परंपरा मानते हैं।

व्यावहारिक रूप से टिकैत नाम ने संगठन को बचाने में मदद की।

लेकिन मजबूत संस्था के लिए नेतृत्व का व्यापक लोकतांत्रिक संस्थानीकरण अधिक आवश्यक होता।

31 दसवीं सीमा : वैकल्पिक कृषि नीति की कमी

लेकिन उनका संगठन हमेशा उतना मजबूत नीति-निर्माण संस्थान नहीं बन सका।

छोटे और बड़े किसान में फर्क कैसे हो?

उपभोक्ता को खाद्य मुद्रास्फीति से कैसे बचाया जाए?

BKU इन प्रश्नों पर एक विस्तृत वैकल्पिक राष्ट्रीय कृषि मॉडल विकसित नहीं कर सकी।

32 बिजली आंदोलन की पर्यावरणीय सीमा

सस्ती बिजली किसान के लिए महत्वपूर्ण थी।

लेकिन लंबे समय में अत्यधिक सस्ती या फ्लैट दर वाली बिजली भूजल के अति-दोहन को प्रोत्साहित कर सकती है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश सहित उत्तर भारत में भूजल संकट बाद में गंभीर हुआ।

इसलिए आज 1987 की मांग को 2026 की पर्यावरणीय परिस्थितियों में जस का तस लागू नहीं किया जा सकता।

आधुनिक किसान आंदोलन को अब दो प्रश्न साथ लेने होंगे—

टिकैत के मूल आंदोलन में दूसरा प्रश्न अपेक्षाकृत कमजोर था।

33 गन्ना राजनीति की फसल-विविधता सीमा

गन्ने का अच्छा मूल्य पश्चिमी उत्तर प्रदेश किसान के लिए लाभकारी है।

BKU की गन्ना राजनीति किसान हित में थी, लेकिन कृषि पारिस्थितिकी और दीर्घकालीन फसल संतुलन उसका प्रमुख विमर्श नहीं बना।

34 कृषि मजदूरी और लागत के बीच तनाव

जब BKU “कृषि लागत” कम करने की बात करती थी, उसमें मजदूरी भी लागत हो सकती थी।

इसलिए किसान और कृषि मजदूर के बीच संभावित अंतर्विरोध को केवल “ग्रामीण एकता” में छिपाना उचित नहीं।

वास्तव में व्यापक किसान–मजदूर गठबंधन के लिए ऐसी नीति चाहिए जिसमें—

इसके लिए केवल लागत कम करने का सूत्र पर्याप्त नहीं है।

35 आंदोलन की लोकतांत्रिक उपलब्धि

इन सीमाओं के बावजूद टिकैत मॉडल को राज्य-विरोधी अराजकता के रूप में देखना भी गलत होगा।

40 सबसे बड़ी ऐतिहासिक सीमा

यही टिकैत मॉडल की केंद्रीय विडंबना है।

अध्याय 20

इतिहासलेखन, विस्तृत समयरेखा और प्रमुख स्रोत

भारतीय किसान यूनियन और महेंद्र सिंह टिकैत का इतिहास केवल कुछ विशाल किसान रैलियों की कहानी नहीं है। यह स्वतंत्र भारत में किसान राजनीति के उस संक्रमण का इतिहास है जिसमें भूमि और लगान के पुराने प्रश्नों के साथ कृषि मूल्य, बिजली, सिंचाई, ऋण, गन्ना भुगतान, बाजार, वैश्वीकरण, भूमि अधिग्रहण और न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसे नए प्रश्न केंद्र में आए।

इस इतिहास की दूसरी विशेषता यह है कि इसका बड़ा हिस्सा अभी भी पूरी तरह सुव्यवस्थित अभिलेखीय रूप में उपलब्ध नहीं है। BKU की कई गतिविधियां औपचारिक पार्टी कार्यालय के बजाय पंचायत, मौखिक घोषणा और स्थानीय किसान नेटवर्क के माध्यम से चलती थीं। इसलिए संगठन की अपनी स्मृति, समाचार-पत्रों की समकालीन रिपोर्टिंग और बाद के अकादमिक अध्ययनों को एक-दूसरे से मिलाकर पढ़ना आवश्यक है।

यह सावधानी खास तौर पर 1986–88 के आरंभिक इतिहास में जरूरी है। BKU की वर्तमान आधिकारिक वेबसाइट संगठन को 1986 में सिसौली में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में पुनर्गठित बताती है, जबकि एक दूसरी आधिकारिक/संगठनात्मक वेबसाइट इसे 1987 में स्थापित संगठन कहती है। अकादमिक अध्ययन Gaurang Sahay इसे 1986 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में स्थापित BKU के रूप में प्रस्तुत करते हैं और साथ ही यह बताते हैं कि इससे पहले 1980 में राष्ट्रीय स्तर पर इसी नाम या निकट नाम से किसान संगठन बनाने के प्रयास हो चुके थे। इसलिए 1986–87 को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में टिकैत-नेतृत्व वाली BKU के निर्णायक पुनर्गठन और सार्वजनिक उदय का दौर मानना सबसे सुरक्षित ऐतिहासिक निष्कर्ष है।

इसी तरह 1988 के दिल्ली बोट क्लब आंदोलन के बारे में संगठनात्मक इतिहास अक्सर यह कहता है कि राजीव गांधी सरकार को सभी 35 मांगें माननी पड़ीं, जबकि समकालीन और बाद की पत्रकारिता बताती है कि तत्काल कोई व्यापक औपचारिक समझौता नहीं हुआ था; किसानों को कुछ रियायतों के आश्वासन के बाद आंदोलन समाप्त किया गया और अगले वर्ष उत्तर प्रदेश सरकार के साथ समझौते में कई मांगों पर रियायतें मिलीं। इसलिए किसी भी गंभीर इतिहासलेखन को आंदोलन-स्मृति और प्रशासनिक परिणाम के बीच यह अंतर बनाए रखना चाहिए।

1 भारतीय किसान यूनियन के इतिहासलेखन की पहली धारा : किसान स्वाभिमान और जनशक्ति

BKU के अपने संगठनात्मक इतिहास और उसके समर्थक वृत्तांत महेंद्र सिंह टिकैत को स्वतंत्र भारत के किसान स्वाभिमान के सबसे बड़े प्रतिनिधियों में रखते हैं।

इस दृष्टिकोण में टिकैत की प्रमुख उपलब्धियां हैं—

किसान को दलगत राजनीति से स्वतंत्र करना।

बिजली और गन्ने के मूल्य को राष्ट्रीय प्रश्न बनाना।

पंचायत और महापंचायत को किसान लोकतंत्र का माध्यम बनाना।

और राज्य के सामने किसान की संख्या तथा नैतिक शक्ति स्थापित करना।

BKU की वर्तमान आधिकारिक वेबसाइट टिकैत को उस नेता के रूप में प्रस्तुत करती है जिसने 1986–87 में सिसौली से संगठन को पुनर्गठित किया, मेरठ तथा दिल्ली के विशाल आंदोलनों का नेतृत्व किया और गैर-दलीय ग्रामीण किसान संगठन की पहचान बनाई।

यह परंपरा संगठन की आंतरिक ऐतिहासिक स्मृति समझने के लिए अत्यंत उपयोगी है।

लेकिन इसे स्वतंत्र स्रोतों के साथ पढ़ना चाहिए।

क्योंकि आंदोलनकारी संगठन स्वाभाविक रूप से अपनी सफलताओं पर अधिक जोर देते और असफलताओं, सामाजिक अंतर्विरोधों तथा आंतरिक विवादों को कम महत्व दे सकते हैं।

2 दूसरी धारा : ‘नए किसान आंदोलन’ का राजनीतिक अर्थशास्त्र

1980 के दशक में ही सामाजिक वैज्ञानिकों ने BKU को पुराने भूमि-सुधार आधारित किसान आंदोलनों से अलग नई कृषक राजनीति के हिस्से के रूप में देखना शुरू कर दिया।

Dipankar Gupta का 1988 का महत्वपूर्ण लेख “Country–Town Nexus and Agrarian Mobilisation: Bharatiya Kisan Union as an Instance” इस नई व्याख्या की आधारभूत रचनाओं में है। बाद के अकादमिक साहित्य में इसे BKU को ग्रामीण–शहरी आर्थिक संबंध और नए कृषक असंतोष के संदर्भ में समझने वाले प्रारंभिक मानक अध्ययन के रूप में उद्धृत किया गया है।

इस दृष्टिकोण में BKU का प्रश्न भूमि पर कब्जा नहीं था।

कृषि और उद्योग के बीच विनिमय की शर्तें क्या हैं?

किसान अपनी उपज किस मूल्य पर बेचता है?

और वह औद्योगिक वस्तुएं, खाद, मशीनरी तथा ऊर्जा किस मूल्य पर खरीदता है?

यही वह परिवर्तन था जिसने टिकैत, शरद जोशी और नंजुंडास्वामी जैसे नेताओं को “नए किसान आंदोलन” की साझा लेकिन वैचारिक रूप से विविध धारा में रखा।

3 तीसरी धारा : ग्रामीण–शहरी संबंध और ‘नया कृषिवाद’

Jim Bentall और Stuart Corbridge का 1996 का अध्ययन “Urban-Rural Relations, Demand Politics and the ‘New Agrarianism’ in Northwest India: The Bharatiya Kisan Union” BKU के इतिहासलेखन में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

यह Transactions of the Institute of British Geographers में प्रकाशित हुआ और इसने BKU को उत्तर-पश्चिम भारत के ग्रामीण–शहरी संबंधों तथा “demand politics” के संदर्भ में समझा।

इस दृष्टिकोण का महत्व यह है कि वह BKU को केवल जाट किसान संगठन के रूप में नहीं देखता।

क्यों ग्रामीण उत्पादक को लगता है कि राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था में शहर और उद्योग को अधिक लाभ मिलता है?

कृषक की राजनीतिक मांगें किस तरह उस असमानता की प्रतिक्रिया हैं?

इसीलिए टिकैत का आंदोलन बिजली बिल से शुरू होकर भारत के विकास मॉडल की व्यापक ग्रामीण आलोचना तक पहुंचता है।

4 चौथी धारा : जाति, खाप, पंचायत और ग्रामीण संस्कृति

Gaurang R. Sahay का 2004 का लेख “Traditional Institutions and Cultural Practices vis-à-vis Agrarian Mobilisation: The Case of Bhartiya Kisan Union” टिकैत आंदोलन को समझने के लिए अनिवार्य स्रोत है।

Sahay का मूल निष्कर्ष है कि 1987–89 में BKU की असाधारण लामबंदी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की मौजूदा सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं से निकली।

इन सभी का उपयोग आधुनिक किसान आंदोलन में किया गया।

यह अध्ययन करमूखेड़ी, मेरठ और रजबपुर आंदोलनों की विस्तृत घटनात्मक जानकारी भी देता है।

इसी से 27 जनवरी 1987 को चार दिन के करमूखेड़ी घेराव, बिजली दर को 22.50 रुपये से 30 रुपये प्रति हॉर्सपावर प्रति माह किए जाने तथा अनुमानतः 50 हजार किसानों की भागीदारी जैसे महत्वपूर्ण विवरण मिलते हैं।

इसलिए Sahay का अध्ययन केवल सिद्धांत नहीं, BKU के प्रारंभिक इतिहास का महत्वपूर्ण द्वितीयक दस्तावेज भी है।

5 पांचवीं धारा : जाति, सांप्रदायिकता और किसान पहचान की आलोचना

BKU के इतिहासलेखन में सबसे तीखी आलोचनात्मक धारा 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद विकसित हुई।

R. Ramakumar का लेख “Jats, Khaps and Riots: Communal Politics and the Bharatiya Kisan Union in Northern India”, Journal of Agrarian Change में प्रकाशित, इस बहस की केंद्रीय रचना है।

Ramakumar का तर्क है कि BKU नेतृत्व और सदस्यता के कुछ हिस्सों ने उस सांप्रदायिक विमर्श को ग्रहण किया जिसने 2013 की हिंसा से पहले सामाजिक जमीन तैयार की; वे विशेष रूप से खाप नेटवर्क की भूमिका को महत्व देते हैं।

यह अध्ययन टिकैत आंदोलन के लोकप्रिय “हिंदू–मुस्लिम किसान एकता” आख्यान के लिए महत्वपूर्ण आलोचनात्मक चुनौती है।

यदि किसान की साझा आर्थिक पहचान इतनी मजबूत थी, तो 2013 में “किसान” के ऊपर “हिंदू” की पहचान क्यों प्रभावी हो गई?

इस दृष्टिकोण के बिना BKU का संतुलित इतिहास संभव नहीं है।

6 छठी धारा : 2020–21 आंदोलन और ग्रामीण राजनीति का पुनरुत्थान

2020–21 के किसान आंदोलन के बाद BKU पर इतिहासलेखन का नया चरण सामने आया।

इसमें मुख्य प्रश्न यह है कि क्या कृषि कानून आंदोलन ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 2013 के बाद कमजोर हुई साझा किसान पहचान को फिर सक्रिय किया?

नए अध्ययनों में तर्क दिया गया कि नवउदारवादी आर्थिक परिवर्तन और हिंदुत्व राजनीति ने तीन दशकों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पुरानी कृषि राजनीति कमजोर की, लेकिन 2020–21 के आंदोलन ने किसान पहचान, जाट–मुस्लिम संपर्क और व्यापक ग्रामीण गठबंधन को नई ऊर्जा दी।

इस दृष्टिकोण में 28 जनवरी 2021 का गाजीपुर क्षण केवल राकेश टिकैत के व्यक्तिगत राजनीतिक उदय की घटना नहीं है।

वह किसान पहचान के सामाजिक पुनर्संगठन का क्षण भी है।

7 पत्रकारिता : BKU इतिहास का अनिवार्य स्रोत

BKU जैसे आंदोलनकारी संगठन के लिए समकालीन पत्रकारिता अत्यंत महत्वपूर्ण है।

विशेष रूप से India Today और Indian Express के 1988 के अभिलेख प्राथमिक-समान समकालीन स्रोत का काम करते हैं।

India Today ने 29 फरवरी 1988 के अंक में मेरठ के आंदोलन को “people's power” के असाधारण प्रदर्शन के रूप में दर्ज किया और 27 जनवरी से कमिश्नर कार्यालय के घेराव, वीर बहादुर सिंह सरकार की प्रतिक्रिया तथा टिकैत की बढ़ती लोकप्रियता का प्रत्यक्ष समकालीन विवरण दिया।

उसी वर्ष नवंबर की India Today रिपोर्ट ने बोट क्लब आंदोलन को ग्रामीण भारत और शहर के बीच बढ़ती आर्थिक असमानता की व्यापक प्रतिक्रिया के रूप में देखा।

Indian Express के अभिलेख 1988 के दिल्ली आंदोलन की संख्या, ग्रामीण जीवन, सरकार की रणनीति, कांग्रेस रैली के स्थानांतरण और तत्काल औपचारिक समझौता न होने जैसे महत्वपूर्ण विवरण सुरक्षित रखते हैं।

8 विस्तृत समयरेखा : 1935–2026

| वर्ष/तारीख | प्रमुख घटना | ऐतिहासिक महत्व | |---|---|---| | 6 अक्टूबर 1935 | महेंद्र सिंह टिकैत का जन्म सिसौली, मुजफ्फरनगर में | बाद में बालियान खाप और किसान आंदोलन का केंद्रीय नेतृत्व। BKU स्रोत यही जन्मतिथि देते हैं। | | 1940 के दशक | पिता की मृत्यु के बाद कम आयु में बालियान खाप की पारंपरिक चौधराहट से जुड़ाव | टिकैत की भविष्य की सामाजिक वैधता और पंचायत नेतृत्व का आधार। | | 1980 | राष्ट्रीय किसान नेताओं द्वारा अखिल भारतीय किसान संगठन बनाने के प्रयास | BKU नाम की व्यापक संस्थागत पूर्वपीठिका; बाद में क्षेत्रीय इकाइयों ने अलग रूप ग्रहण किए। | | सितंबर 1986 | पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कृषि बिजली दर वृद्धि के विरुद्ध किसान बैठकें; बारौत क्षेत्र में सक्रियता | बिजली के प्रश्न पर नई किसान लामबंदी का प्रारंभ। | | 1986–87 | सिसौली में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में BKU का निर्णायक पुनर्गठन | पश्चिमी उत्तर प्रदेश की टिकैत-नेतृत्व वाली BKU की वास्तविक संगठनात्मक शुरुआत। स्रोत 1986 और 1987 दोनों का उल्लेख करते हैं। | | 3 जनवरी 1987 | सिसौली पंचायत में करमूखेड़ी बिजलीघर घेराव का निर्णय | बिजली दर आंदोलन का औपचारिक कार्यक्रम। | | 27 जनवरी 1987 | करमूखेड़ी बिजलीघर पर प्रस्तावित चार-दिवसीय घेराव शुरू | लगभग 50 हजार किसानों की भागीदारी का अकादमिक अनुमान; टिकैत का पहला बड़ा जनसंघर्ष। | | 1987 | बिजली आंदोलन में पुलिस–किसान टकराव; जयपाल और अकबर अली की मृत्यु की आंदोलन-स्मृति | टिकैत नेतृत्व और हिंदू–मुस्लिम किसान शहादत की साझा स्मृति मजबूत हुई। | | 1987 | वीर बहादुर सिंह सरकार और BKU के बीच बढ़ता टकराव | स्थानीय किसान मुद्दा प्रदेशव्यापी राजनीतिक प्रश्न बनने लगा। | | 27 जनवरी 1988 | मेरठ कमिश्नरी घेराव शुरू | प्रस्तावित चार दिन का धरना 24/25 दिन तक चला; टिकैत की प्रदेशव्यापी शक्ति स्थापित। | | जनवरी–फरवरी 1988 | 35 सूत्रीय मांगपत्र; गन्ना मूल्य, बिजली, ऋण और कृषि लागत प्रमुख प्रश्न | BKU का आर्थिक एजेंडा स्पष्ट हुआ। | | फरवरी–जून 1988 | रजबपुर से संबंधित किसान सत्याग्रह और गिरफ्तारियां | Sahay के अनुसार 110 दिन के सत्याग्रह में 9,507 किसानों ने गिरफ्तारी दी और पांच किसानों की मृत्यु हुई। | | 17 सितंबर 1988 | सिसौली की मासिक पंचायत में दिल्ली रैली का निर्णय | BKU ने राष्ट्रीय राजधानी को अगला संघर्ष स्थल चुना। | | 25 अक्टूबर 1988 | दिल्ली बोट क्लब किसान आंदोलन शुरू | लगभग एक सप्ताह तक राजधानी के केंद्रीय क्षेत्र में विशाल किसान पड़ाव। Indian Express करीब पांच लाख किसानों का उल्लेख करता है। | | 31 अक्टूबर 1988 | कांग्रेस को इंदिरा गांधी स्मृति रैली बोट क्लब से लाल किला मैदान ले जानी पड़ी | आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक राजनीतिक सफलताओं में एक। | | 1 नवंबर 1988 | टिकैत ने दिल्ली धरना समाप्त किया | तत्काल व्यापक औपचारिक समझौता नहीं; बाद में रियायतें। | | 1989 | राष्ट्रीय किसान संगठनों के बीच नेतृत्व/रणनीति मतभेद; BKU का जनता दल/राष्ट्रीय मोर्चा की ओर झुकाव | गैर-दलीयता का पहला बड़ा अंतर्विरोध। | | 1989 | N. D. Tiwari सरकार और BKU के बीच कई मांगों पर समझौता | 1988 आंदोलन के कुछ आर्थिक परिणाम बाद में संस्थागत रूप लेते हैं। | | 15 जुलाई 1990 | महेंद्र सिंह टिकैत लखनऊ पंचायत के लिए किसानों के साथ आगे बढ़े; मुलायम सिंह सरकार का दमन और गिरफ्तारियां | उस सरकार के विरुद्ध संघर्ष जिसे किसान राजनीति ने पूर्व में समर्थन दिया था; गैर-दलीय दबाव सिद्धांत की परीक्षा। | | 1991–92 | उर्वरक, बिजली, गन्ना, ऋण और भूमि मुआवजे पर नए आंदोलन | आर्थिक उदारीकरण के दौर में BKU एजेंडे का विस्तार। | | 1992 | लखनऊ में लंबे धरने; 10,000 रुपये तक कृषि ऋण राहत का प्रश्न | कृषि ऋण BKU की प्रमुख स्थायी मांगों में मजबूत हुआ। | | 1992 | गाजियाबाद क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण मुआवजा आंदोलन | शहरीकरण और कृषि भूमि मूल्य BKU के नए विषय बने। | | 1993 | GATT/डंकल, बीज और बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर किसान विरोध | BKU की राजनीति में वैश्वीकरण-विरोधी प्रश्न का प्रवेश; हालांकि KRRS की तुलना में कम व्यवस्थित। | | 1996 | किसान राजनीति को चुनावी मंच में बदलने के प्रयोग | आंदोलनकारी शक्ति और चुनावी शक्ति के अंतर का अनुभव। | | फरवरी 2000 | टिकैत को लखनऊ पंचायत के रास्ते में मुरादाबाद में गिरफ्तार किया गया | 2000 के दशक में भी सक्रिय किसान नेतृत्व का प्रमाण। | | 2003 | पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान नेतृत्व में प्रतिद्वंद्विता; अन्य किसान संगठन सक्रिय | BKU का एकाधिकार कमजोर हुआ; किसान राजनीति बहु-केंद्रीय बनी। | | 2006 | गेहूं आयात और कृषि व्यापार नीति के विरोध में किसान प्रदर्शन | स्थानीय गन्ना–बिजली राजनीति से वैश्विक कृषि व्यापार तक एजेंडा विस्तृत। | | 2008 | मायावती के बारे में कथित जातिसूचक टिप्पणी पर टिकैत की गिरफ्तारी | जाति और किसान राजनीति की सामाजिक सीमा का प्रमुख विवाद। | | 15 मई 2011 | महेंद्र सिंह टिकैत का निधन | एक युग का अंत; नरेश टिकैत और राकेश टिकैत की दूसरी पीढ़ी का नेतृत्व। | | 2011–12 | नरेश टिकैत अध्यक्ष; राकेश टिकैत प्रमुख आंदोलनकारी/सार्वजनिक नेता | BKU में दोहरी नेतृत्व संरचना विकसित। | | 2012 | पुराने मुस्लिम सहयोगियों सहित कुछ नेताओं की अलग राह | संगठनात्मक और सामाजिक विखंडन बढ़ा। | | सितंबर 2013 | मुजफ्फरनगर–शामली सांप्रदायिक हिंसा | पुराने जाट–मुस्लिम किसान गठबंधन की सबसे गंभीर टूटन; BKU और खाप राजनीति पर तीखी आलोचना। | | 2014 के बाद | पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट राजनीतिक झुकाव का पुनर्गठन | किसान पहचान के समानांतर धार्मिक और दलगत पहचान मजबूत। | | 23 सितंबर–2 अक्टूबर 2018 | हरिद्वार से दिल्ली किसान क्रांति यात्रा | स्वामीनाथन आयोग, बिजली, गन्ना बकाया और अन्य मांगों पर BKU का राष्ट्रीय पुनरुत्थान; लगभग 25 हजार किसानों और 700 ट्रैक्टरों का समकालीन अनुमान। | | 5 जून 2020 | तीन केंद्रीय कृषि अध्यादेश | नए राष्ट्रीय किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि। | | सितंबर 2020 | संसद ने कृषि सुधार विधेयक पारित किए; 27 सितंबर से कानून प्रभावी | सरकार ने इन्हें कृषि बाजार विकल्प बढ़ाने वाला सुधार बताया; किसान संगठनों ने MSP/APMC और कॉरपोरेट शक्ति पर आशंका जताई। | | नवंबर 2020 | दिल्ली की सीमाओं पर किसान आंदोलन | पंजाब–हरियाणा केंद्रित आंदोलन में BKU ने गाजीपुर को पश्चिमी यूपी के प्रमुख केंद्र में बदला। | | 26 जनवरी 2021 | ट्रैक्टर परेड के दौरान दिल्ली में हिंसक घटनाएं | आंदोलन गंभीर नैतिक और राजनीतिक संकट में आया। | | 28 जनवरी 2021 | गाजीपुर पर राकेश टिकैत का हटने से इनकार और भावुक अपील | पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रातोंरात लामबंदी; BKU के पुनरुत्थान का निर्णायक क्षण। | | 2021 | जाट–मुस्लिम किसान पुनर्संपर्क, महापंचायतें | 2013 के बाद किसान पहचान को पुनर्जीवित करने का प्रयास। | | 19 नवंबर 2021 | प्रधानमंत्री ने तीन कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की | लगभग वर्ष भर चले आंदोलन की केंद्रीय मांग स्वीकार। | | 29 नवंबर–1 दिसंबर 2021 | संसद ने कृषि कानून Repeal Bill पारित किया; तीन कानून निरस्त | विधायी प्रक्रिया से कानून वापसी पूरी हुई। | | 2022 | MSP व्यवस्था के भविष्य पर समिति; किसान संगठनों में असहमति | आंदोलन का केंद्र कृषि कानून से MSP गारंटी की ओर। | | 15 मई 2022 | BKU से अलग BKU (Apolitical/अराजनैतिक) का गठन | टिकैत नेतृत्व पर दलगत राजनीति में अधिक हस्तक्षेप का आरोप; गैर-दलीयता फिर विवाद में। | | 2023–24 | गन्ना, बिजली, MSP, भूमि अधिग्रहण और किसान महापंचायतें | BKU ने राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दोनों एजेंडों को जोड़ा। | | 2024 | MSP कानूनी गारंटी पर नई किसान लामबंदी; शंभू–खनौरी धारा तथा मूल SKM अलग संगठनात्मक मार्ग पर | किसान आंदोलन में “मांग की समानता, नेतृत्व की बहुलता” स्पष्ट। | | 2025 | किसान संगठनों को फिर एक करने के प्रयास | MSP पर साझा मांग के बावजूद संगठनात्मक एकता अधूरी। | | फरवरी 2026 | भारत–अमेरिका व्यापार ढांचे पर किसान संगठनों का विरोध | कृषि आयात और घरेलू कीमतों पर वैश्वीकरण की पुरानी बहस फिर सक्रिय; SKM ने देशव्यापी विरोध किया। | | 25 अगस्त 2026 तक | BKU टिकैत धारा नरेश टिकैत–राकेश टिकैत के नेतृत्व में सक्रिय; MSP, गन्ना, बिजली, भूमि और कृषि व्यापार प्रमुख प्रश्न | टिकैत आंदोलन की चार दशक पुरानी मूल आर्थिक धुरी नए विषयों के साथ जारी। |

अध्याय 21

निष्कर्ष

भारतीय किसान यूनियन और महेंद्र सिंह टिकैत को भारतीय किसान इतिहास में समझने के लिए किसी एक सूत्र से काम नहीं चलता। उन्हें केवल “जाट नेता”, केवल “गन्ना किसान नेता”, केवल “खाप चौधरी”, केवल “गैर-दलीय किसान नेता” या केवल “1988 के बोट क्लब आंदोलन के नायक” के रूप में देखने से तस्वीर अधूरी रह जाती है।

उनका वास्तविक ऐतिहासिक महत्व उस परिवर्तन में है जिसमें भारतीय किसान राजनीति भूमि, लगान और जमींदारी के प्रश्नों से आगे बढ़कर कृषि लागत, लाभकारी मूल्य, बिजली, सिंचाई, ऋण, बाजार, गन्ना भुगतान, कृषि नीति और किसान आय के प्रश्नों पर केंद्रित होने लगी। 1980 के दशक के “नए किसान आंदोलन” की यही सबसे महत्वपूर्ण विशेषता थी, और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में महेंद्र सिंह टिकैत उसका सबसे प्रभावशाली जननेतृत्व बनकर उभरे।

उन्होंने कोई व्यवस्थित राजनीतिक दर्शन नहीं लिखा।

कोई लंबा कृषि आर्थिक ग्रंथ नहीं दिया।

कोई स्थायी राष्ट्रीय राजनीतिक दल नहीं बनाया।

लेकिन उन्होंने एक ऐसी आंदोलनकारी भाषा और तकनीक विकसित की जिसने आधुनिक भारतीय किसान राजनीति को गहरे रूप में प्रभावित किया।

खेती घाटे का व्यवसाय नहीं होनी चाहिए।

किसान की उपज का न्यायपूर्ण मूल्य मिले।

राजनीतिक दल किसान मंच पर हावी न हों।

और यदि सरकार नहीं सुने तो किसान संगठित होकर उसके दरवाजे तक पहुंचे।

यही टिकैतवाद की सबसे सटीक राजनीतिक व्याख्या कही जा सकती है।

1 स्वतंत्र भारत की किसान राजनीति में ऐतिहासिक मोड़

स्वतंत्रता से पहले और उसके आसपास के बड़े किसान संघर्षों के केंद्र में भूमि संबंध थे।

तेभागा और तेलंगाना जैसी धाराओं में तो भूमि और वर्गीय सत्ता स्वयं संघर्ष का केंद्र थी।

लेकिन हरित क्रांति के बाद उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों में स्थिति बदली।

अब समस्या केवल जमीन पाने की नहीं थी।

उस जमीन पर खेती लाभकारी है या नहीं?

यहीं से BKU की ऐतिहासिक भूमिका शुरू होती है।

2 ‘नए किसान आंदोलन’ में टिकैत का स्थान

1980 के दशक में महाराष्ट्र के शरद जोशी, कर्नाटक के एम. डी. नंजुंडास्वामी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के महेंद्र सिंह टिकैत जैसे नेताओं ने किसान राजनीति को नया रूप दिया।

इन तीनों की विचारधारा समान नहीं थी।

शरद जोशी बाजार की स्वतंत्रता की ओर झुकते थे।

नंजुंडास्वामी वैश्वीकरण और कॉरपोरेट नियंत्रण की आलोचना करते थे।

टिकैत की राजनीति अधिक व्यावहारिक थी।

इसलिए टिकैत नए किसान आंदोलन की सबसे जनाधारित, ग्रामीण और प्रत्यक्ष सौदेबाजी वाली धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं।

3 करमूखेड़ी : स्थानीय प्रश्न से बड़े नेतृत्व तक

1987 का करमूखेड़ी बिजली आंदोलन प्रतीकात्मक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

बिजली दर का प्रश्न देखने में स्थानीय था।

लेकिन उसके भीतर पूरी नई कृषि अर्थव्यवस्था छिपी थी।

हरित क्रांति की खेती सिंचाई पर निर्भर थी।

बिजली की दर बढ़ी तो उत्पादन लागत बढ़ी।

यानी किसान का संघर्ष राज्य की उस मूल्य व्यवस्था से था जो उसके उत्पादन खर्च को निर्धारित कर रही थी।

यहीं टिकैत ने साबित किया कि आधुनिक किसान की राजनीति खेत से अधिक कृषि निवेश की लागत पर भी होगी।

4 मेरठ : संगठन की असली परीक्षा

1988 का मेरठ कमिश्नरी घेराव BKU के इतिहास में निर्णायक चरण था।

अब आंदोलन बिजलीघर से निकलकर प्रशासनिक सत्ता के केंद्र तक पहुंचा।

24 दिनों से अधिक लंबा किसान पड़ाव इस बात का प्रमाण था कि BKU केवल क्षणिक रैली आयोजित करने वाला संगठन नहीं है।

वह हजारों किसानों को लंबे समय तक संगठित रख सकती है।

यहीं टिकैत मॉडल की एक केंद्रीय शक्ति दिखाई दी—

किसान ने बैठकर सरकार को थकाना शुरू कर दिया।

5 बोट क्लब : जब किसान राष्ट्रीय सत्ता के सामने बैठ गया

अक्टूबर 1988 का दिल्ली बोट क्लब आंदोलन महेंद्र सिंह टिकैत के जीवन का सर्वोच्च राजनीतिक क्षण था।

गांव की सामाजिक दुनिया राष्ट्रीय सत्ता के सामने पहुंच गई।

वह ग्रामीण भारत की दृश्य उपस्थिति थी।

किसान केवल ज्ञापन देने नहीं आया था।

यहीं टिकैत ने आधुनिक किसान आंदोलन की वह शैली स्थापित की जिसकी प्रतिध्वनि 2020–21 में दिल्ली की सीमाओं पर फिर दिखाई दी।

6 किसान स्वाभिमान की राजनीति

टिकैत की सबसे बड़ी भावनात्मक शक्ति “किसान स्वाभिमान” थी।

वह किसान की सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रश्न था।

सरकारी अधिकारी किसान से ऊपर क्यों बोले?

चीनी मिल भुगतान रोककर किसान को क्यों दौड़ाए?

राज्य मूल्य तय करे तो किसान की लागत क्यों न सुने?

यह भाव ग्रामीण समाज में गहरा प्रभाव डालता था।

किसान को पहली बार ऐसा नहीं लगा कि वह कोई राहत मांग रहा है।

यही मनोवैज्ञानिक परिवर्तन टिकैत की ऐतिहासिक उपलब्धियों में एक है।

7 लाभकारी मूल्य : टिकैत का केंद्रीय आर्थिक सिद्धांत

टिकैत का आर्थिक दर्शन किसी पुस्तक में बंद नहीं था।

खेती की लागत से ऊपर किसान को पर्याप्त प्रतिफल मिलना चाहिए।

यह विचार बाद में MSP की बहस में अधिक व्यवस्थित रूप से सामने आया।

आज भी जब किसान C2+50 प्रतिशत, कानूनी MSP, गन्ना मूल्य, लागत और भुगतान की बात करता है तो उसमें 1980 के दशक के नए किसान आंदोलन की स्पष्ट ऐतिहासिक निरंतरता दिखाई देती है।

यानी टिकैत की सबसे स्थायी आर्थिक विरासत किसी एक कीमत में नहीं, बल्कि इस प्रश्न में है—

कृषि उत्पादन का वास्तविक आर्थिक लाभ उत्पादक को कितना मिलता है?

8 गन्ना : क्षेत्रीय फसल से राजनीतिक संस्था तक

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना केवल फसल नहीं रहा।

वह राजनीतिक अर्थव्यवस्था का केंद्रीय स्तंभ बन गया।

इसलिए गन्ना BKU की क्षेत्रीय शक्ति का स्थायी आधार बना।

इस निरंतरता से स्पष्ट है कि टिकैत ने कोई क्षणिक मुद्दा नहीं पकड़ा था।

उन्होंने क्षेत्रीय कृषि अर्थव्यवस्था के उस वास्तविक तनाव को पहचाना था जो दशकों तक बना रहा।

9 बिजली : किसान राजनीति का दूसरा स्थायी स्तंभ

बिजली का प्रश्न भी इसी प्रकार टिकैत की राजनीति से लंबे समय तक जुड़ा रहा।

आज तक उत्तर प्रदेश की किसान राजनीति में ये प्रश्न मौजूद हैं।

इससे टिकैत के आर्थिक एजेंडे की स्थायित्व स्पष्ट होती है।

हालांकि इक्कीसवीं सदी में इसमें नया आयाम जुड़ गया है—

इसलिए आज टिकैत की पुरानी सस्ती बिजली की मांग को जल संरक्षण की नई चुनौतियों के साथ संतुलित करना आवश्यक है।

10 गैर-दलीय राजनीति : शक्ति भी, संकट भी

BKU की सबसे अनोखी विशेषता थी उसकी घोषित गैर-दलीयता।

लेकिन किसान मुद्दे पर किसान के साथ खड़ा हो।

यही सूत्र विभिन्न दलों के समर्थकों को एक मंच पर लाता था।

इससे संगठन की नैतिक शक्ति बढ़ती थी।

सरकार उसे विपक्ष की शाखा कहकर आसानी से खारिज नहीं कर सकती थी।

लेकिन यही सिद्धांत लंबे समय में पूरी तरह टिक नहीं पाया।

ये सब दिखाते हैं कि किसान संगठन और चुनावी राजनीति के बीच दूरी बनाए रखना अत्यंत कठिन है।

11 गैर-दलीयता का वास्तविक अर्थ

टिकैत की राजनीति से एक महत्वपूर्ण सिद्धांत निकलता है—

गैर-दलीयता का अर्थ राजनीति से बाहर होना नहीं।

लेकिन उसका आदर्श था कि वह किसी पार्टी की शाखा न बने।

आज भी किसान संगठनों के लिए यह महत्वपूर्ण अंतर है।

12 खाप और पंचायत : परंपरा का आधुनिक राजनीतिक उपयोग

टिकैत ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पारंपरिक सामाजिक संस्थाओं का आधुनिक राजनीतिक उपयोग किया।

इन्हें कृषि आर्थिक आंदोलन से जोड़ा गया।

यही वजह थी कि BKU बिना विशाल पार्टी ढांचे के तेजी से हजारों गांवों तक पहुंच सकती थी।

यह टिकैत की असाधारण संगठनात्मक प्रतिभा थी।

लेकिन यही संरचना सामाजिक सीमा भी बनी।

खाप जातीय और पितृसत्तात्मक समाज से निकली संस्था थी।

इसलिए संगठन जितना उससे शक्ति लेता था, उतना ही उसकी सीमाओं का जोखिम भी उठाता था।

13 खाप : न पूरी तरह लोकतांत्रिक, न केवल प्रतिक्रियावादी

खाप पर चर्चा में भी अतियों से बचना चाहिए।

उसे केवल पिछड़ी संस्था कहना ग्रामीण सामाजिक वास्तविकता को नहीं समझता।

और उसे आदर्श लोकतांत्रिक पंचायत कहना भी गलत है।

लेकिन जाति और पितृसत्ता की सीमाएं भी थीं।

टिकैत आंदोलन ने इसी विरोधाभासी संस्था का उपयोग आधुनिक आर्थिक प्रतिरोध के लिए किया।

14 किसान पहचान की सामाजिक शक्ति

लेकिन किसान आर्थिक हित ने जातीय और धार्मिक विभाजन को कुछ समय के लिए पीछे धकेला।

यही 1980 के दशक में BKU की सबसे बड़ी सामाजिक उपलब्धियों में एक थी।

15 जाट–मुस्लिम किसान गठबंधन

चरण सिंह ने जिस सामाजिक गठबंधन को चुनावी राजनीति में मजबूत किया था, टिकैत ने उसे आंदोलन में पुनर्संगठित किया।

जाट और मुस्लिम किसान एक ही गन्ना अर्थव्यवस्था में थे।

यह गठबंधन आर्थिक वास्तविकता पर आधारित था।

लेकिन 2013 ने दिखाया कि आर्थिक हित हमेशा धार्मिक पहचान पर स्थायी विजय नहीं पा सकते।

16 2013 : टिकैत मॉडल की सबसे गंभीर सामाजिक विफलता

मुजफ्फरनगर की हिंसा BKU के सामाजिक इतिहास का सबसे कठिन अध्याय है।

जिस क्षेत्र में दशकों तक हिंदू–मुस्लिम किसान एक मंच पर आते थे, वहां गंभीर सांप्रदायिक हिंसा हुई।

खाप और किसान राजनीति के कुछ हिस्सों की भूमिका पर गंभीर अकादमिक आलोचना हुई।

यही घटना प्रमाणित करती है कि किसान पहचान जाति और धर्म को स्थायी रूप से समाप्त नहीं करती।

वह केवल परिस्थितियों में उन्हें पीछे कर सकती है।

17 2020–21 : किसान पहचान की वापसी

तीन कृषि कानून आंदोलन ने वही सामाजिक प्रक्रिया उलटी दिशा में शुरू की।

अब साझा कृषि संकट धार्मिक दूरी को कम करने का माध्यम बना।

जाट और मुस्लिम किसान फिर एक मंच पर आए।

गाजीपुर और मुजफ्फरनगर की पंचायतों में पुरानी किसान स्मृति सक्रिय हुई।

लेकिन यह प्रमाण था कि आर्थिक संघर्ष टूटे सामाजिक गठबंधन को फिर जोड़ने का रास्ता खोल सकता है।

यही महेंद्र सिंह टिकैत की सामाजिक विरासत का महत्वपूर्ण पुनरुत्थान था।

18 महिलाओं की भूमिका : आंदोलन की अदृश्य रीढ़

टिकैत आंदोलन की पारंपरिक छवि पुरुष किसान की रही।

लेकिन आंदोलन की वास्तविक सामाजिक संरचना में महिलाओं का श्रम महत्वपूर्ण था।

फिर भी शीर्ष नेतृत्व पुरुष प्रधान रहा।

यही टिकैत आंदोलन की लैंगिक सीमा थी।

2020–21 में महिला किसान की अधिक प्रत्यक्ष भागीदारी ने इस पुरानी सीमा को चुनौती दी।

इस अर्थ में टिकैत आंदोलन की विरासत आगे की पीढ़ी में सामाजिक रूप से विस्तृत हुई।

19 भूमिहीन मजदूर : टिकैत मॉडल का सबसे बड़ा वर्गीय अभाव

BKU की सबसे गंभीर वर्गीय सीमा भूमिहीन कृषि मजदूर के प्रश्न में दिखाई देती है।

इसलिए BKU पूरे ग्रामीण समाज का सर्वसमावेशी संगठन कभी नहीं बन सकी।

उसकी असली सामाजिक पहचान भूमि पर खेती करने वाले कृषक की थी।

यह स्वीकार करना टिकैत आंदोलन की ऐतिहासिक उपलब्धि को कम नहीं करता; बल्कि उसे अधिक सटीक बनाता है।

20 क्या यह संपन्न किसानों का आंदोलन था?

आंशिक रूप से यह आलोचना सही है, लेकिन अधूरी।

मध्यम और अपेक्षाकृत संपन्न किसानों की भूमिका निश्चित रूप से प्रभावशाली थी।

लेकिन छोटा किसान भी बिजली, गन्ने, ऋण और लागत से प्रभावित था।

इसलिए BKU केवल बहुत बड़े किसानों का संगठन नहीं थी।

भूमि-स्वामी बाजारोन्मुख कृषकों का व्यापक गठबंधन, जिसमें छोटे से संपन्न किसान तक शामिल थे, लेकिन भूमिहीन मजदूर अपेक्षाकृत बाहर था।

21 टिकैत और चरण सिंह : दो मॉडल, एक किसान समाज

भारतीय किसान राजनीति में चरण सिंह और टिकैत की तुलना विशेष महत्व रखती है।

दोनों मॉडल विरोधी होने से अधिक पूरक थे।

भारतीय लोकतंत्र में किसान को प्रतिनिधित्व भी चाहिए और स्वतंत्र संगठन भी।

22 टिकैत बनाम शरद जोशी और नंजुंडास्वामी

नए किसान आंदोलन की तीन धाराओं की तुलना से टिकैत का स्थान और स्पष्ट होता है।

किसान-पक्षीय राज्य हस्तक्षेप और व्यावहारिक आर्थिक सौदेबाजी।

यानी टिकैत सबसे कम वैचारिक और सबसे अधिक स्थानीय अनुभव आधारित नेता थे।

लेकिन यही उनकी जनसुलभता की ताकत थी।

किसान को लंबी वैचारिक बहस नहीं करनी थी।

उसे अपना बिल और अपनी फसल का भाव पता था।

23 1991 के बाद टिकैत की वैचारिक सीमा

आर्थिक उदारीकरण और WTO के बाद कृषि राजनीति जटिल हुई।

अब प्रश्न केवल बिजली और गन्ना नहीं था।

इन पर BKU कोई उतना व्यवस्थित वैचारिक ढांचा विकसित नहीं कर सकी जितना KRRS या शेतकारी संगठन ने अपनी-अपनी दिशा में किया।

यह टिकैत मॉडल की नीति संबंधी सीमा थी।

लेकिन विस्तृत वैकल्पिक कृषि आर्थिक मॉडल में सीमित।

24 संगठनात्मक संस्थानीकरण की समस्या

महेंद्र सिंह टिकैत की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा ने BKU को लंबे समय तक एकजुट रखा।

लेकिन वही व्यक्तिगत नेतृत्व संस्था के विकास की सीमा भी बना।

नरेश और राकेश टिकैत ने उत्तराधिकार संभाला।

लेकिन परिवार आधारित नेतृत्व पर प्रश्न उठे।

इससे स्पष्ट है कि करिश्माई नेतृत्व को लोकतांत्रिक संस्था में बदलना BKU की सबसे कठिन संगठनात्मक चुनौती बनी रही।

25 टिकैत परिवार : कमजोरी भी, निरंतरता भी

पारिवारिक उत्तराधिकार पर आलोचना उचित है।

यदि टिकैत परिवार की सामाजिक विश्वसनीयता न होती, तो संभव है कि संगठन 2011 के बाद और तेजी से विखर जाता।

नरेश टिकैत ने पंचायत परंपरा बनाए रखी।

राकेश टिकैत ने आंदोलनकारी नेतृत्व विकसित किया।

इसलिए परिवार ने एक तरफ संस्थानीकरण की कमजोरी दिखाई, दूसरी तरफ ऐतिहासिक निरंतरता भी दी।

26 2018 से पुनरुत्थान

हरिद्वार से दिल्ली किसान क्रांति यात्रा ने संकेत दिया कि BKU फिर राष्ट्रीय स्तर पर किसान लामबंदी कर सकती है।

लेकिन वास्तविक पुनरुत्थान 2020–21 में हुआ।

यहीं महेंद्र सिंह टिकैत की आंदोलन तकनीक नई पीढ़ी के साथ राष्ट्रीय स्तर पर लौट आई।

नेता चला गया, लेकिन उसकी आंदोलन-पद्धति जीवित रही।

27 28 जनवरी 2021 : विरासत का पुनर्जन्म

गाजीपुर सीमा पर राकेश टिकैत की भावुक अपील को केवल मीडिया क्षण के रूप में नहीं देखना चाहिए।

उसने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों में एक पुरानी सामाजिक स्मृति सक्रिय की।

किसान रातोंरात गाजीपुर पहुंचने लगे।

यानी 1988 का ग्रामीण आंदोलन नेटवर्क 2021 में डिजिटल तकनीक के साथ फिर सक्रिय हुआ।

यह टिकैत विरासत का वास्तविक पुनर्जन्म था।

28 तीन कृषि कानूनों की वापसी : सीमित लेकिन बड़ी जीत

2021 में तीन कृषि कानूनों की वापसी भारत के किसान आंदोलनों की बड़ी राजनीतिक सफलताओं में है।

लेकिन इसे केवल BKU या राकेश टिकैत की विजय कहना गलत होगा।

यह संयुक्त किसान मोर्चा और अनेक संगठनों का साझा संघर्ष था।

BKU की विशेष भूमिका पश्चिमी उत्तर प्रदेश और गाजीपुर में थी।

इस संतुलन को बनाए रखना इतिहासलेखन के लिए आवश्यक है।

29 2022–26 : पुरानी विरासत, नए प्रश्न

कानून वापसी के बाद किसान आंदोलन समाप्त नहीं हुआ।

इससे स्पष्ट है कि टिकैत आंदोलन की मूल आर्थिक चिंता अभी समाप्त नहीं हुई।

30 MSP : टिकैत की आर्थिक विरासत का आधुनिक रूप

महेंद्र सिंह टिकैत आज के कानूनी MSP अभियान के नेता नहीं थे।

इसलिए आधुनिक मांग को सीधे उनके नाम से जोड़ना इतिहाससम्मत नहीं होगा।

लेकिन उसका मूल आर्थिक दर्शन टिकैत की राजनीति से जुड़ता है—

किसान को लागत से ऊपर न्यायपूर्ण मूल्य मिलना चाहिए।

यही सूत्र गन्ना आंदोलन से MSP बहस तक चलता है।

इस अर्थ में MSP की वर्तमान राजनीति टिकैत के आर्थिक प्रश्न का विकसित संस्थागत रूप मानी जा सकती है।

31 आंदोलनकारी लोकतंत्र की विरासत

टिकैत का सबसे बड़ा योगदान केवल कृषि क्षेत्र में नहीं, भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में भी है।

संगठित नागरिक सत्ता के बाहर रहते हुए भी नीति पर प्रभाव डाल सकते हैं।

सड़क अवरोध और लंबे घेराव दूसरे नागरिकों को प्रभावित कर सकते हैं।

इसलिए जनदबाव और सार्वजनिक अधिकारों के बीच संतुलन आधुनिक लोकतंत्र की स्थायी चुनौती है।

टिकैत मॉडल इस बहस का महत्वपूर्ण भारतीय उदाहरण है।

32 राज्य और किसान के संबंध की नई परिभाषा

टिकैत की राजनीति ने राज्य से किसान का संबंध बदला।

पहले किसान अक्सर प्रशासन का विषय था।

सरकार को किसान प्रतिनिधियों से बात करनी पड़ी।

यही किसान नागरिकता की नई अवस्था थी।

33 बाजार के प्रश्न पर टिकैत की स्थायी प्रासंगिकता

आज कृषि बाजार पहले से अधिक जटिल है।

इन सबके बीच किसान की मूल चिंता अभी भी वही है—

टिकैत का पूरा आंदोलन इसी प्रश्न का राजनीतिक रूप था।

घटना-क्रम

BKU और टिकैत की संक्षिप्त समयरेखा

6 अक्तूबर 1935 · महेंद्र सिंह टिकैत का जन्मसिसौली के ग्रामीण सामाजिक परिवेश से आगे चलकर किसान नेतृत्व का सबसे प्रभावशाली चेहरा उभरा।
1978–86 · भारतीय किसान यूनियन का संगठनात्मक विकासउत्तर भारत में किसान हितों के स्वतंत्र मंच ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपना सामाजिक आधार मजबूत किया।
1987 · करमूखेड़ी बिजलीघर आंदोलनबिजली आपूर्ति और दरों के प्रश्न पर लंबे धरने ने टिकैत को क्षेत्रीय किसान नेता से व्यापक आंदोलनकारी बनाया।
जनवरी–फरवरी 1988 · मेरठ कमिश्नरी घेरावलगभग 24 दिन के अनुशासित धरने ने गन्ना मूल्य, बिजली, कर्ज और राज्य से किसान वार्ता की नई शक्ति दिखाई।
25 अक्तूबर 1988 · दिल्ली बोट क्लब महापड़ावलाखों किसानों की राजधानी लामबंदी ने BKU और टिकैत को राष्ट्रीय किसान राजनीति के केंद्र में पहुंचाया।
1990 का दशक · मूल्य, बिजली और कर्ज संघर्षउदारीकरण के बाद भी संगठन ने दबाव राजनीति, पंचायत और स्थानीय लामबंदी के माध्यम से किसान प्रश्न उठाए।
2000 का दशक · संगठनात्मक विस्तार और विभाजनBKU नाम से अलग-अलग राज्यों और नेतृत्वों की धाराएं बनीं; मूल पश्चिमी उत्तर प्रदेश आधार कायम रहा।
15 मई 2011 · महेंद्र सिंह टिकैत का निधनसंगठन की विरासत नरेश और राकेश टिकैत के नेतृत्व में नए दौर में पहुंची।
2013 · मुजफ्फरनगर हिंसा और सामाजिक दरारजाट–मुस्लिम किसान एकता को गहरी क्षति पहुंची और BKU के सामाजिक आधार की सीमा उजागर हुई।
28 जनवरी 2021 · गाजीपुर मोर्चे का पुनरुत्थानराकेश टिकैत की भावुक अपील के बाद कृषि कानून आंदोलन में BKU की भूमिका निर्णायक रूप से बढ़ी।
2022–26 · न्यूनतम समर्थन मूल्य और किसान गठबंधनकानून वापसी के बाद संगठन ने न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी, कर्ज और कृषि आय के प्रश्न जारी रखे।
OCN ऐतिहासिक आकलन

टिकैत की सबसे बड़ी उपलब्धि किसान की संख्या को अनुशासित सामूहिक दबाव में बदलना और सरकार से सीधी वार्ता की स्वायत्त राजनीति बनाना थी। किंतु गैर-दलीयता हमेशा सामाजिक निष्पक्षता नहीं बन सकी; जाति, क्षेत्र और खाप पर निर्भरता ने संगठन की व्यापकता सीमित की। जाट–मुस्लिम ग्रामीण गठबंधन की क्षमता और 2013 में उसका विघटन बताता है कि आर्थिक एकता सामाजिक राजनीति से अलग नहीं रह सकती। 2020–21 ने दिखाया कि टिकैत की आंदोलन-पद्धति आज भी जीवित है, पर स्थायी किसान शक्ति के लिए भीड़ को संस्था, बहुजातीय गठबंधन और स्पष्ट नीति-ढांचे में बदलना आवश्यक है।

शोधार्थियों के लिए

प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक स्रोत

भारतीय किसान यूनियन के दस्तावेजमांगपत्र, पंचायत प्रस्ताव, आंदोलन घोषणाएं और संगठन साहित्य।स्रोत तक जाएँ ↗
उत्तर प्रदेश गन्ना विकास विभागगन्ना मूल्य, भुगतान और चीनी उद्योग से संबंधित आधिकारिक सामग्री।स्रोत तक जाएँ ↗
संसदीय डिजिटल पुस्तकालयकृषि मूल्य, किसान आंदोलन, बिजली, कर्ज और 1988 दिल्ली आंदोलन पर संसदीय अभिलेख।स्रोत तक जाएँ ↗
कृषि लागत एवं मूल्य आयोगकृषि लागत और न्यूनतम समर्थन मूल्य की आधिकारिक रिपोर्टें।स्रोत तक जाएँ ↗
Economic and Political Weeklyटिकैत, BKU, नए किसान आंदोलन और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण समाज पर शोध।स्रोत तक जाएँ ↗
ई-ज्ञानकोशभारतीय किसान यूनियन और नए किसान आंदोलनों पर शैक्षणिक अध्ययन।स्रोत तक जाएँ ↗

स्रोत-सावधानी: भीड़, अवधि, समझौते और राजनीतिक प्रभाव के आंकड़े सरकारी, संगठनात्मक और पत्रकारिता स्रोतों में भिन्न हैं। विवादित दावों को स्रोत-संदर्भ के साथ पढ़ा गया है।