पगड़ी संभाल जट्टा और पंजाब किसान आंदोलन, 1907
नहर-बस्तियों की औपनिवेशिक कृषि व्यवस्था से किसान अस्मिता और राष्ट्रवादी प्रतिरोध तक
1907 का ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ आंदोलन किसी एक विधेयक की प्रतिक्रिया भर नहीं था। नहरों से बंजर पश्चिमी पंजाब को उपजाऊ बनाने वाले किसानों ने जब भूमि के स्थायी अधिकार, उत्तराधिकार, सिंचाई दर और लगान पर औपनिवेशिक नियंत्रण को चुनौती दी, तब कृषि शिकायत राष्ट्रीय राजनीति से जुड़ गई। अजित सिंह ने इसे विदेशी शासन की वैधता के प्रश्न तक पहुँचाया; लाला लाजपत राय की भागीदारी ने राष्ट्रीय महत्व दिया; और बांके दयाल की कविता ने किसान सम्मान को स्थायी राजनीतिक प्रतीक बना दिया।
ब्रिटिश पंजाब, नहर क्रांति और औपनिवेशिक कृषि प्रयोग
1849 के बाद पंजाब : ब्रिटिश शासन की नई कृषि प्रयोगशाला
1849 में दूसरे आंग्ल-सिख युद्ध के बाद पंजाब ब्रिटिश साम्राज्य में मिला। इसके बाद औपनिवेशिक शासन के सामने केवल राजनीतिक नियंत्रण का प्रश्न नहीं था। उसे इस विशाल प्रदेश को राजस्व, कृषि उत्पादन और सैन्य भर्ती की दृष्टि से भी पुनर्गठित करना था।
1857 के विद्रोह ने पंजाब का महत्व और बढ़ा दिया। ब्रिटिश अधिकारियों की दृष्टि में पंजाब के कुछ कृषक समुदाय सेना के लिए विश्वसनीय भर्ती क्षेत्र माने जाने लगे। आगे चलकर औपनिवेशिक शासन ने ‘मार्शल रेस’ जैसी नस्ली-सामाजिक अवधारणाओं के आधार पर भी पंजाब के कुछ समुदायों को विशेष सैनिक महत्व दिया।
इसका परिणाम यह हुआ कि पंजाब में ब्रिटिश शासन की तीन नीतियां परस्पर जुड़ गईं
कृषि विस्तार, सिंचाई विस्तार और सैनिक भर्ती।
औपनिवेशिक सरकार ऐसा ग्रामीण समाज बनाना चाहती थी जो कृषि उत्पादन बढ़ाए, राजस्व दे और आवश्यकता पड़ने पर सैनिक भी उपलब्ध कराए।
यही नीति बाद में एक विरोधाभास पैदा करेगी। जिस कृषक समाज को ब्रिटिश साम्राज्य अपना मजबूत आधार समझता था, 1907 में उसी के एक हिस्से ने सरकार को चुनौती दे दी।
नहर क्रांति : बंजर पश्चिमी पंजाब को कृषि क्षेत्र में बदलना
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में पंजाब ब्रिटिश भारत की सबसे महत्वाकांक्षी सिंचाई परियोजनाओं का क्षेत्र बना।
विशाल नहर प्रणालियों के माध्यम से उन इलाकों तक पानी पहुंचाया गया जहां पहले कम आबादी थी और वर्षा आधारित कृषि कठिन थी।
पश्चिमी पंजाब के बड़े हिस्से में जमीन थी, लेकिन पर्याप्त पानी नहीं था।
ब्रिटिश इंजीनियरिंग ने नदियों से नहरें निकालीं। उनके आसपास नए गांव बसाए गए। सड़कें, मंडियां और प्रशासनिक केंद्र बनाए गए।
नहर-बस्ती—नहर-बस्ती।
यह केवल सिंचाई परियोजना नहीं थी।
यह एक प्रकार की राज्य-नियोजित कृषि उपनिवेशीकरण परियोजना थी।
सरकार जमीन और पानी दोनों की प्रदाता थी और इसलिए वह उन पर प्रशासनिक नियंत्रण भी चाहती थी।
नहर-बस्तियां कैसे बसाई गईं?
सरकार ने पंजाब के अपेक्षाकृत अधिक आबादी वाले मध्य और पूर्वी जिलों से कृषकों को पश्चिमी क्षेत्रों में बसाया।
अलग-अलग नहर-बस्तियों में भूमि आवंटन की शर्तें अलग हो सकती थीं। छोटे कृषकों, मध्यम किसानों, बड़े भूमि-अधिकारियों, पूर्व सैनिकों तथा अन्य श्रेणियों को भूमि दी गई।
किसानों के सामने अवसर आकर्षक था।
उन्हें सिंचित भूमि मिल सकती थी।
लेकिन जमीन तैयार अवस्था में नहीं थी।
झाड़ियां और बंजर क्षेत्र साफ करने, खेत बनाने, घर खड़े करने, पशु लाने, गांव बसाने, सिंचाई व्यवस्था अपनाने और नए सामाजिक जीवन का निर्माण करने
इसलिए कुछ ही समय में उनके भीतर भूमि को लेकर एक स्वाभाविक स्वामित्व-बोध पैदा हुआ।
सरकारी कागजों में वे चाहे जिस कानूनी श्रेणी में हों, किसान की दृष्टि में वह जमीन अब उसकी मेहनत से निर्मित पैतृक संपत्ति थी।
चिनाब नहर-बस्ती : 1907 के संघर्ष का हृदय
इन नहर-बस्तियों में सबसे महत्वपूर्ण थी चिनाब नहर-बस्ती।
इसका प्रमुख नगर था लायलपुर, आज का फैसलाबाद।
चिनाब नहर-बस्ती ब्रिटिश पंजाब की कृषि इंजीनियरिंग और औपनिवेशिक बसावट नीति की बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी।
यहां पंजाब के विभिन्न हिस्सों से लोग आकर बसे थे।
कृषकों के अतिरिक्त पूर्व सैनिकों और सैनिक परिवारों की उपस्थिति भी महत्वपूर्ण थी।
सरकार के लिए यह आदर्श कृषि क्षेत्र था
पानी सरकार ने दिया, जमीन सरकार ने आवंटित की, राजस्व सरकार को मिला, और कृषि उत्पादन तेजी से बढ़ा।
लेकिन किसान का अनुभव अलग था।
उसने देखा कि जमीन को मूल्यवान बनाने में उसका श्रम लगा है, लेकिन भूमि के इस्तेमाल, हस्तांतरण और उत्तराधिकार पर सरकार की शर्तें बनी हुई हैं।
यहीं 1907 के संघर्ष का बुनियादी अंतर्विरोध पैदा हुआ।
राज्य की जमीन या किसान की जमीन?
औपनिवेशिक सरकार का कानूनी दृष्टिकोण यह था कि नहर-बस्ती की सरकारी भूमि किसानों को निर्धारित शर्तों पर प्रदान की गई है।
अर्थात किसान के अधिकार पूर्णतः निरपेक्ष नहीं थे।
सरकार कुछ शर्तें लगा सकती थी
निवास संबंधी शर्त, भूमि के उपयोग की शर्त, पेड़ लगाने जैसी शर्तें, हस्तांतरण पर प्रतिबंध, उत्तराधिकार के नियम और शर्तों के उल्लंघन पर दंड।
1907 के बाद बने 1912 के कानून के उद्देश्यों में भी पूर्व व्यवस्था की ऐसी अनेक शर्तों—निवास, वृक्षारोपण, हस्तांतरण और उत्तराधिकार—का उल्लेख मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि विवाद केवल राजनीतिक प्रचार से निर्मित नहीं था; नहर-बस्ती प्रशासन वास्तव में किसानों के जीवन पर विस्तृत नियामक नियंत्रण रखता था।
अगर हम जमीन को पीढ़ियों तक जोतेंगे, उसे विकसित करेंगे और सरकार को राजस्व देंगे, तो हमारी अगली पीढ़ी के अधिकार असुरक्षित क्यों रहें?
कानूनी ढांचा, कृषि संकट और उपनिवेशन विधेयक
1893 का सरकारी काश्तकार अधिनियम : कानूनी पृष्ठभूमि
नहर-बस्तियों के प्रशासन के लिए सरकारी काश्तकार (पंजाब) अधिनियम, 1893 महत्वपूर्ण कानूनी आधार था।
बाद में सरकारी अनुभव में इस कानून को अपर्याप्त माना गया। स्वयं 1912 के नए कानून के आधिकारिक विवरण में कहा गया कि चिनाब नहर-बस्ती के अनुभव से 1893 के कानून में कई कमियां सामने आई थीं और इसी कारण 1907 में संशोधन कानून पारित किया गया था।
1907 का विवाद किसी शून्य में उत्पन्न नहीं हुआ।
यह लगभग डेढ़ दशक से विकसित हो रही नहर-बस्ती प्रशासन व्यवस्था को अधिक स्पष्ट और नियंत्रित करने की सरकारी कोशिश का परिणाम था।
लेकिन जो प्रशासनिक सुधार सरकार के लिए ‘व्यवस्था’ था, वही किसान को अपने अधिकारों पर हमला दिखाई दिया।
पंजाब का कृषि संकट केवल नहर-बस्तियों तक सीमित नहीं था
इस समय पंजाब के ग्रामीण समाज में दूसरे तनाव भी थे।
कृषि के व्यवसायीकरण ने किसानों को बाजार से अधिक जोड़ा था।
फसल की कीमतों, ऋण, साहूकारी और राजस्व का प्रभाव बढ़ रहा था।
किसान को नकद भुगतान की आवश्यकता अधिक पड़ती थी।
फसल खराब होने पर कर्ज बढ़ सकता था।
इसलिए पंजाब सरकार पहले से भूमि हस्तांतरण और कृषि ऋण की समस्या से चिंतित थी।
इसी संदर्भ में 1900 का प्रसिद्ध कानून आया।
पंजाब भूमि हस्तांतरण अधिनियम, 1900 : एक जरूरी ऐतिहासिक सावधानी
लोकप्रिय विवरणों में अक्सर कहा जाता है कि 1907 का आंदोलन ब्रिटिश सरकार के ‘तीन किसान कानूनों’ के विरुद्ध था और उनमें पंजाब भूमि हस्तांतरण अधिनियम, 1900 भी शामिल था।
लेकिन शोध की दृष्टि से इस कथन को सावधानी से समझना आवश्यक है।
1900 का भूमि हस्तांतरण कानून मूलतः कृषि भूमि के गैर-कृषक साहूकार और व्यापारी वर्ग के हाथों जाने को नियंत्रित करने के उद्देश्य से बनाया गया था।
सरकार ने ‘कृषक समुदाय’ जैसी विवादास्पद प्रशासनिक श्रेणियां बनाईं और कुछ प्रकार के भूमि हस्तांतरण को नियंत्रित किया।
अर्थात यह कानून स्वयं एक जटिल सामाजिक नीति था।
इससे शहरी साहूकारों और व्यापारिक वर्ग में असंतोष पैदा हुआ, जबकि इसका घोषित उद्देश्य कृषक भूमि को बचाना था।
इसलिए 1907 के उपनिवेशन विधेयक, बारी दोआब की बढ़ी जल-दरों और 1900 के भूमि हस्तांतरण अधिनियम को बिल्कुल समान प्रकृति के तीन कानून मान लेना ऐतिहासिक सरलीकरण होगा।
1907 के किसान विस्फोट के तत्काल कारण अधिक प्रत्यक्ष थे।
25 अक्टूबर 1906 : उपनिवेशन विधेयक
अक्टूबर 1906 में पंजाब विधान परिषद में भूमि उपनिवेशीकरण व्यवस्था में संशोधन का विधेयक प्रस्तुत किया गया।
इग्नू के ऐतिहासिक अध्ययन के अनुसार इसे 25 अक्टूबर 1906 को परिषद में पेश किया गया था।
1893 की व्यवस्था में कमियां थीं।
लेकिन किसान इसे अपनी जमीन और पारिवारिक अधिकारों के संदर्भ में पढ़ रहे थे।
और यही दोनों दृष्टिकोणों का टकराव था।
उपनिवेशन विधेयक में किसान को सबसे बड़ा खतरा क्या दिखाई दिया?
प्रस्तावित व्यवस्था से जुड़ी कई बातें किसानों को परेशान कर रही थीं।
उत्तराधिकार के नियम महत्वपूर्ण थे।
शर्तों के उल्लंघन पर दंड की व्यवस्था थी।
कुछ मामलों में सरकारी प्रशासनिक निर्णयों को सामान्य अदालत की समीक्षा से बाहर रखने का प्रश्न भी था।
भूमि खरीदने अथवा हस्तांतरित करने की स्वतंत्रता पर सीमाएं थीं।
इग्नू के अध्ययन में उल्लेख है कि विधेयक उल्लंघन पर जुर्माना लगाने को वैधानिक आधार देता था, ऐसे मामलों को अदालत के सामान्य क्षेत्र से बाहर रखने की व्यवस्था से जोड़ता था और उत्तराधिकार में ज्येष्ठाधिकार की दिशा में जोर देता था।
इन प्रावधानों का किसान के लिए अर्थ बहुत व्यापक था।
यह केवल भूमि प्रशासन नहीं था।
यह उसके परिवार के भविष्य का प्रश्न था।
उत्तराधिकार, पानी, रावलपिंडी और आरंभिक किसान विरोध
उत्तराधिकार का प्रश्न इतना संवेदनशील क्यों था?
पंजाब के किसान परिवार के लिए जमीन केवल वर्तमान आय का स्रोत नहीं थी।
वह अगली पीढ़ी की सुरक्षा थी।
यदि किसान को यह भय हो कि उसकी मृत्यु के बाद उसकी भूमि पर उसके परिवार का अधिकार सरकार की शर्तों से निर्धारित होगा, तो पूरा पारिवारिक भविष्य असुरक्षित दिखाई देता था।
इसीलिए उपनिवेशन विधेयक की तकनीकी धाराएं गांवों में जाकर एक सरल राजनीतिक प्रश्न बन गईं
“क्या हमारी जमीन हमारे बच्चों की रहेगी?”
इस एक प्रश्न ने कानून को किसान के जीवन से सीधे जोड़ दिया।
बारी दोआब : पानी भी विद्रोह का कारण बना
भूमि विवाद के साथ ही पंजाब सरकार ने बारी दोआब नहर की सिंचाई दरों में वृद्धि की।
नवंबर 1906 में बढ़ी हुई जल-दरों का आदेश आया।
यह नहर अमृतसर, गुरदासपुर और लाहौर जिलों के कृषि क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण थी।
कुछ श्रेणियों में वृद्धि लगभग 50 प्रतिशत तक बताई गई है।
किसान के लिए पानी कोई वैकल्पिक सुविधा नहीं था।
सिंचित कृषि में पानी उत्पादन की बुनियादी लागत था।
इसलिए जल-दर बढ़ने का सीधा अर्थ था
खेती की लागत बढ़ना।
अब दो अलग किसान समूहों की शिकायतें जुड़ सकती थीं
चिनाब नहर-बस्ती कह रही थी—हमारी जमीन सुरक्षित करो।
बारी दोआब का किसान कह रहा था—हमारे पानी का बोझ कम करो।
रावलपिंडी : तीसरा असंतोष
इसी अवधि में रावलपिंडी जिले में भूमि-राजस्व के पुनर्निर्धारण और वृद्धि को लेकर भी असंतोष था।
इस प्रकार 1907 के पंजाब संकट को किसी एक कानून से समझना गलत होगा।
इसके तीन प्रमुख आर्थिक क्षेत्र थे
भूमि-अधिकार, सिंचाई दर और भूमि-राजस्व।
इनके ऊपर औपनिवेशिक प्रशासनिक हस्तक्षेप का व्यापक प्रश्न था।
अलग-अलग क्षेत्रों के स्थानीय असंतोष को राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने एक साझा औपनिवेशिक-विरोधी भाषा प्रदान कर दी।
यही 1907 के आंदोलन की शक्ति थी।
आरंभिक किसान विरोध : आंदोलन नेताओं से पहले मौजूद था
यह भी महत्वपूर्ण है कि किसान असंतोष अजित सिंह या लाला लाजपत राय ने पैदा नहीं किया था।
स्थानीय जमींदार और कृषक संगठन विधेयक के विरुद्ध सक्रिय थे। याचिकाएं, ज्ञापन और सभाएं शुरू हो चुकी थीं।
औपनिवेशिक शासन बाद में यह प्रचार करना चाहता था कि कुछ उग्र राजनीतिक नेताओं ने शांत किसानों को भड़का दिया।
लेकिन इतिहासकार एन. जेराल्ड बैरियर के अध्ययन और प्रशासनिक अभिलेखों से अधिक जटिल तस्वीर सामने आती है—कृषि असंतोष के अपने वास्तविक कारण थे; राष्ट्रवादी नेताओं ने उसे व्यापक राजनीतिक दिशा दी।
यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है।
अजित सिंह ने आंदोलन पैदा नहीं किया; उन्होंने मौजूद किसान असंतोष को औपनिवेशिक-विरोधी राजनीति से जोड़ा।
अजित सिंह, भारत माता सोसायटी और लायलपुर
अजित सिंह का प्रवेश : आंदोलन की दिशा बदलती है
सरदार अजित सिंह इस आंदोलन के केंद्रीय व्यक्तित्व बने।
वे भगत सिंह के चाचा थे, लेकिन उन्हें केवल इस रिश्ते से देखना उनके ऐतिहासिक महत्व को कम करता है।
1907 में वे स्वयं पंजाब के सबसे उग्र युवा राष्ट्रवादी नेताओं में थे।
उन्होंने किसान प्रश्न में वह राजनीतिक संभावना देखी जो शिक्षित शहरी राजनीति से कहीं अधिक व्यापक थी।
यदि किसान औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध संगठित होता है, तो आंदोलन की सामाजिक शक्ति कई गुना बढ़ सकती थी।
अजित सिंह इसी दिशा में काम करने लगे।
किशन सिंह और क्रांतिकारी परिवार
अजित सिंह के भाई किशन सिंह, जो बाद में भगत सिंह के पिता के रूप में प्रसिद्ध हुए, भी राष्ट्रवादी गतिविधियों में सक्रिय थे।
इस परिवार में औपनिवेशिक-विरोधी राजनीति कोई बाद की घटना नहीं थी।
भगत सिंह का जन्म जिस राजनीतिक वातावरण में हुआ, उसमें उनके पिता और चाचा पहले ही ब्रिटिश शासन के विरोध में सक्रिय थे।
1907 इसलिए भगत सिंह की वैचारिक वंशावली समझने के लिए भी महत्वपूर्ण है।
उनके जन्म के वर्ष में उनका परिवार पंजाब के सबसे चर्चित राजनीतिक आंदोलनों में शामिल था।
भारत माता सोसायटी और नया संगठन
अजित सिंह, किशन सिंह, घसीटा राम और उनके सहयोगियों ने राजनीतिक संगठन और प्रचार का नेटवर्क बनाया जिसे सामान्यतः भारत माता सोसायटी/भारत माता सभा से जोड़ा जाता है।
सूफी अम्बा प्रसाद जैसे उग्र राष्ट्रवादी भी इस व्यापक राजनीतिक नेटवर्क में महत्वपूर्ण थे।
उद्देश्य केवल किसानों को किसी एक विधेयक के विरुद्ध संगठित करना नहीं था।
अजित सिंह की दृष्टि अधिक व्यापक थी
कृषक असंतोष को विदेशी शासन के विरुद्ध राजनीतिक चेतना में बदलना।
यहीं से आंदोलन के भीतर दो स्तर स्पष्ट होने लगते हैं।
अजित सिंह औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती देना चाहते थे।
दोनों लक्ष्य कुछ समय के लिए एक-दूसरे से जुड़ गए।
लायलपुर को केंद्र क्यों चुना गया?
अजित सिंह ने लायलपुर को आंदोलन का महत्वपूर्ण केंद्र बनाया।
चिनाब नहर-बस्ती में पंजाब के अलग-अलग जिलों से आए लोग बसे थे।
इसलिए यहां प्रचार का अर्थ केवल एक जिले तक संदेश पहुंचाना नहीं था।
किसान अपने मूल गांवों और रिश्तेदारी नेटवर्क के माध्यम से संदेश पूरे पंजाब में फैला सकते थे।
क्षेत्र में पूर्व सैनिक और सैनिक परिवार मौजूद थे।
अजित सिंह ने बाद में अपने संस्मरण में भी लायलपुर को विकसित क्षेत्र, पंजाब के अलग-अलग हिस्सों से आए लोगों और सेवानिवृत्त सैनिकों की उपस्थिति के कारण उपयुक्त केंद्र बताया।
यही बात ब्रिटिश सरकार को बाद में सबसे अधिक भयभीत करेगी।
मार्च 1907 का विस्फोट और ‘पगड़ी संभाल’ की राजनीतिक भाषा
मार्च 1907 : आंदोलन का विस्फोट
1907 के आरंभिक महीनों में किसान सभाओं की संख्या बढ़ने लगी।
लायलपुर की मार्च सभा आंदोलन की प्रतीकात्मक निर्णायक घटना बनी।
विभिन्न स्रोतों में अलग-अलग सभाओं और तिथियों का उल्लेख मिलता है; 3 मार्च 1907 की लायलपुर सभा विशेष रूप से प्रसिद्ध है। अजित सिंह के संस्मरण के आधार पर आधुनिक अध्ययनों में इसी सभा से बांके दयाल की कविता के लोकप्रिय होने का उल्लेख मिलता है।
आगे मार्च में अन्य बड़ी सभाएं भी हुईं।
इसलिए पूरे आंदोलन को किसी एक सभा की एक तारीख में समेटने की बजाय मार्च 1907 को लायलपुर लामबंदी के निर्णायक चरण के रूप में समझना अधिक सुरक्षित है।
लाला लाजपत राय की प्रारंभिक हिचक
लाला लाजपत राय तब तक पंजाब के प्रतिष्ठित राष्ट्रवादी नेता बन चुके थे।
लेकिन अजित सिंह और लाजपत राय की राजनीतिक पद्धतियां समान नहीं थीं।
बैरियर के शोध में एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—दोनों को एक पूर्वनियोजित संयुक्त आंदोलन के सह-निर्माता मानना भी सरलीकरण है; उनके बीच राजनीतिक मतभेद थे और आंदोलन की सभी गतिविधियां उन्होंने मिलकर पहले से तय नहीं की थीं।
अजित सिंह के संस्मरण में भी लाजपत राय की प्रारंभिक हिचक का संकेत मिलता है।
लेकिन विशाल किसान भीड़ और आंदोलन की ऊर्जा ने उन्हें इससे जोड़ दिया।
उनकी उपस्थिति ने आंदोलन को तुरंत बड़ी राजनीतिक प्रतिष्ठा दी।
बांके दयाल मंच पर आते हैं
इसी वातावरण में कवि और संपादक बांके दयाल ने अपनी कविता सुनाई
“पगड़ी संभाल ओ जट्टा…”
कविता में किसान की दुर्दशा थी।
शासकों और नेताओं के छल के प्रति चेतावनी थी।
और अंततः किसान से अपने सम्मान की रक्षा करने का आह्वान था।
एक आधुनिक शोध में इस कविता के 1907 की लगभग 28 सार्वजनिक सभाओं में बार-बार सुनाए जाने का उल्लेख है।
कविता आंदोलन की राजनीतिक भाषा बन गई।
‘पगड़ी’ का अर्थ केवल पगड़ी नहीं था
इस नारे की शक्ति समझने के लिए पंजाब के ग्रामीण समाज में पगड़ी के अर्थ को समझना आवश्यक है।
सम्मान, प्रतिष्ठा, पुरुषार्थ, परिवार की मर्यादा, समुदाय में स्थान और आत्मसम्मान।
किसी की पगड़ी उछालना उसका सार्वजनिक अपमान था।
“पगड़ी संभाल”
का अर्थ केवल वस्त्र संभालना नहीं था।
“अपनी इज्जत बचाओ।”
और किसान की इज्जत किससे जुड़ी थी?
इस तरह कविता ने भूमि कानून के कठिन कानूनी विवाद को किसान की सहज सांस्कृतिक भाषा में बदल दिया।
‘जट्टा’ : नारे की सामाजिक भाषा
लेकिन आंदोलन को केवल जातिगत जाट आंदोलन के रूप में देखना गलत होगा।
जाट कृषकों—विशेषकर जाट-सिख कृषकों—की महत्वपूर्ण भागीदारी थी, लेकिन पंजाब का कृषक समाज धार्मिक और सामाजिक रूप से विविध था।
1907 की लामबंदी में विभिन्न धार्मिक समुदायों के कृषकों की भागीदारी दिखाई देती है।
इग्नू के अध्ययन में विशेष रूप से कहा गया है कि आंदोलन ने ग्रामीण-शहरी विभाजन को भी कुछ हद तक पार किया और धार्मिक भेदों के आर-पार किसान जुड़े।
इसलिए ‘जट्टा’ यहां एक व्यापक कृषक प्रतिरोध के सांस्कृतिक संबोधन में बदल गया।
किसान आंदोलन से राष्ट्रवादी आंदोलन
अब आंदोलन तेजी से बदल रहा था।
लेकिन अजित सिंह की राजनीतिक भाषा इन मांगों को आगे ले जा रही थी।
यदि विदेशी सरकार तुम्हारी जमीन, पानी और आय नियंत्रित करती है, तो समस्या केवल एक कानून की है या पूरे शासन की?
यहीं 1907 का किसान आंदोलन राष्ट्रवादी राजनीति में प्रवेश करता है।
प्रसार, प्रेस, राजस्व-अस्वीकार, हिंसा और 1857 का भय
आंदोलन का प्रसार
लायलपुर से उठी आवाज पंजाब के अनेक क्षेत्रों में पहुंची।
लाहौर, अमृतसर, रावलपिंडी, गुजरांवाला और अन्य नगरों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में सभाएं हुईं।
किसान, वकील, विद्यार्थी, पत्रकार और राष्ट्रवादी कार्यकर्ता अलग-अलग स्तरों पर जुड़े।
स्थानीय प्रेस ने विवाद को फैलाया।
किसान सभाओं में हजारों लोग आने लगे।
कुछ अध्ययनों में सांगला, गोजरा और अन्य कस्बों में भी बड़े विरोध तथा वकीलों की सभाओं का उल्लेख है।
यह अब स्थानीय याचिका आंदोलन नहीं रह गया था।
प्रेस : आंदोलन का दूसरा मैदान
1907 में समाचारपत्रों और राजनीतिक साहित्य की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
औपनिवेशिक शासन प्रेस को इसलिए खतरनाक मानता था क्योंकि एक जिले की घटना अगले दिन पूरे प्रदेश का राजनीतिक मुद्दा बन सकती थी।
पंजाब के राष्ट्रवादी समाचारपत्र किसान शिकायतों को सार्वजनिक कर रहे थे।
कविता और राजनीतिक लेखों ने ग्रामीण असंतोष को शहरी शिक्षित वर्ग तक पहुंचाया।
दूसरी ओर शहरों की राष्ट्रवादी भाषा गांव तक पहुंच रही थी।
यह ग्रामीण और शहरी राजनीतिक क्षेत्रों के मेल की प्रक्रिया थी।
बाद में सरकार ने संपादकों और प्रकाशनों के विरुद्ध राजद्रोह संबंधी प्रावधानों का इस्तेमाल भी किया। अभिलेखीय अध्ययनों में धारा 124-A के अंतर्गत संपादकीय दमन के उदाहरण मिलते हैं।
राजस्व न देने की दिशा : आंदोलन अधिक उग्र होता है
अजित सिंह केवल ज्ञापन देकर संतुष्ट रहने वाले नेता नहीं थे।
आंदोलन में धीरे-धीरे आर्थिक असहयोग की भाषा भी आने लगी।
किसान यदि अन्यायपूर्ण कर और जल-दर सामूहिक रूप से न दे तो सरकार की आर्थिक शक्ति को चुनौती दी जा सकती थी।
यहीं 1907 का आंदोलन भारतीय किसान संघर्ष की आगे आने वाली रणनीतियों का पूर्वाभास देता है।
बाद में खेड़ा और बारदोली में कर-अस्वीकार अत्यंत संगठित राजनीतिक हथियार बनेगा।
1907 में यह विचार अभी अधिक उग्र, कम नियंत्रित और राष्ट्रवादी विद्रोह की व्यापक कल्पना से जुड़ा हुआ था।
लाहौर, अमृतसर और रावलपिंडी : तनाव बढ़ता है
मार्च से अप्रैल और फिर मई 1907 तक पंजाब का राजनीतिक वातावरण लगातार तनावपूर्ण होता गया।
लाहौर और अन्य स्थानों की सभाओं ने सरकार को चिंतित किया।
रावलपिंडी विशेष रूप से महत्वपूर्ण बन गया।
यहां भूमि-राजस्व वृद्धि के प्रश्न पर पहले से असंतोष था।
राष्ट्रवादी नेताओं के भाषणों के बाद स्थिति अधिक तनावपूर्ण हुई और शहर में हिंसक घटनाएं तथा यूरोपीय प्रतिष्ठानों पर हमलों की खबरें आईं।
अब सरकार आंदोलन को केवल ‘कृषक आंदोलन’ नहीं बल्कि व्यापक ‘Punjab अशांति’ के रूप में देखने लगी।
हिंसा और आंदोलन : आवश्यक भेद
यहां एक ऐतिहासिक भेद जरूरी है।
पूरे आंदोलन को हिंसक विद्रोह कहना गलत होगा।
सभाएं, भाषण, ज्ञापन, प्रेस प्रचार, किसान लामबंदी और आर्थिक प्रतिरोध की अपील।
लेकिन कुछ स्थानों पर भीड़ की हिंसा और सार्वजनिक व्यवस्था भंग होने की घटनाएं हुईं।
औपनिवेशिक सरकार ने इन्हीं घटनाओं को पूरे आंदोलन की प्रकृति सिद्ध करने के लिए इस्तेमाल किया।
आर्थिक शिकायत को राजनीतिक षड्यंत्र बताना और राजनीतिक विरोध को कानून-व्यवस्था की समस्या में बदलना।
1857 की पचासवीं वर्षगांठ : ब्रिटिश भय का मनोविज्ञान
1907 कोई सामान्य वर्ष नहीं था।
यह 1857 के महान विद्रोह की पचासवीं वर्षगांठ का वर्ष था।
ब्रिटिश प्रशासन की ऐतिहासिक स्मृति में 1857 अभी बहुत जीवित था।
पंजाब में किसान उत्तेजित थे।
राष्ट्रवादी नेता सभाएं कर रहे थे।
कुछ क्षेत्रों में पूर्व सैनिक और सैनिक परिवार आंदोलन के प्रभाव क्षेत्र में थे।
रावलपिंडी जैसी सैनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जगह में अशांति थी।
इसलिए प्रशासन ने घटनाओं को केवल वर्तमान की दृष्टि से नहीं देखा।
क्या 1857 जैसी स्थिति फिर बन सकती है?
सेना, सरकारी व्याख्या और मई 1907 का निर्वासन
ब्रिटिश भारतीय सेना और पंजाब
1857 के बाद ब्रिटिश भारतीय सेना में पंजाब का महत्व लगातार बढ़ा था।
पंजाब के कई समुदाय सेना में बड़ी संख्या में भर्ती होते थे।
नहर-बस्तियों में पूर्व सैनिकों को भूमि आवंटन भी औपनिवेशिक राज्य और सैनिक समाज के बीच संबंध मजबूत करने का माध्यम था।
लेकिन यही नीति अब उलटी पड़ सकती थी।
यदि सेवानिवृत्त सैनिक किसान आंदोलन में शामिल हों और उनका प्रभाव सक्रिय सैनिकों तक पहुंचे, तो कृषि आंदोलन सैनिक अनुशासन के लिए खतरा बन सकता था।
सरकारी अभिलेखों में राष्ट्रवादी साहित्य सैनिकों तक पहुंचने की चिंता के संकेत मिलते हैं; उदाहरणतः मर्दान में सैनिकों के पास स्वराज संबंधी सामग्री मिलने का उल्लेख शोध में दर्ज है।
यह सरकार के लिए लाल चेतावनी थी।
सरकार की व्याख्या : ‘किसान नहीं, राजनीतिक उकसावे वाले नेता’
औपनिवेशिक प्रशासन के लिए राजनीतिक रूप से सुविधाजनक व्याख्या यह थी कि किसान स्वयं विद्रोही नहीं हैं।
उन्हें कुछ शिक्षित उग्रवादी भड़का रहे हैं।
इससे सरकार दो काम कर सकती थी
पहला, वास्तविक कृषि शिकायतों की गंभीरता कम दिखाना।
दूसरा, कुछ नेताओं को हटाकर आंदोलन समाप्त करने का प्रयास करना।
अजित सिंह इस सरकारी कथा के केंद्रीय ‘खतरे’ बने।
लाला लाजपत राय की प्रतिष्ठा ने सरकार की चिंता और बढ़ाई।
सार्वजनिक सभाओं पर अंकुश
आंदोलन फैलने के साथ प्रशासन ने सभाओं और राजनीतिक गतिविधियों को नियंत्रित करना शुरू किया।
कुछ जिलों में सार्वजनिक बैठकों पर प्रतिबंधात्मक व्यवस्था लगाई गई।
राजद्रोह और सार्वजनिक व्यवस्था संबंधी कानूनों का इस्तेमाल हुआ।
नेताओं की गतिविधियों पर नजर रखी गई।
यह दिखाता है कि मई 1907 तक सरकार समस्या का प्रशासनिक समाधान नहीं, बल्कि राजनीतिक नियंत्रण खोज रही थी।
9 मई 1907 : लाला लाजपत राय का निर्वासन
9 मई 1907 आंदोलन के इतिहास की निर्णायक तारीख बनी।
लाला लाजपत राय के विरुद्ध 1818 का विनियमन तृतीय का प्रयोग किया गया।
यह असाधारण औपनिवेशिक कानून था।
इसके अंतर्गत सरकार किसी व्यक्ति को सामान्य न्यायिक मुकदमे के बिना राज्य सुरक्षा के नाम पर हिरासत में रख सकती थी।
यह स्वयं इस बात का प्रमाण था कि सरकार सामान्य आपराधिक मुकदमे से अधिक राजनीतिक निरोध चाहती थी।
लाजपत राय को पंजाब से हटाकर मांडले, बर्मा भेज दिया गया।
अजित सिंह का निर्वासन
अजित सिंह के विरुद्ध भी वही असाधारण औपनिवेशिक शक्ति इस्तेमाल की गई और उन्हें मांडले भेजा गया।
यह निर्णय केवल दो व्यक्तियों को गिरफ्तार करना नहीं था।
आंदोलन का राजनीतिक सिर काट देना।
सामान्य मुकदमा चलाया जाता तो अदालत में प्रमाण देने पड़ते।
बचाव पक्ष राजनीतिक मंच बना सकता था।
1818 का विनियमन तृतीय ने सरकार को इन कठिनाइयों से बचाया।
लेकिन यही कार्रवाई ब्रिटिश शासन की निरंकुशता का राष्ट्रीय प्रतीक बन गई।
निर्वासन का प्रभाव, सरकारी वापसी और तत्काल सफलता
निर्वासन ने लाजपत राय को और बड़ा नेता बना दिया
लाला लाजपत राय पहले पंजाब के बड़े नेता थे।
मांडले निर्वासन ने उन्हें राष्ट्रीय प्रतिरोध के प्रतीक में बदल दिया।
यदि कोई भारतीय नेता सरकार की नीति का विरोध करता है तो क्या उसे बिना सामान्य न्यायिक प्रक्रिया के निर्वासित किया जा सकता है?
इस प्रकार किसान आंदोलन से निकला विवाद अब नागरिक स्वतंत्रता बनाम औपनिवेशिक निरंकुशता के प्रश्न में बदल गया।
अजित सिंह की राजनीतिक प्रतिष्ठा भी बढ़ी
अजित सिंह को हटाकर सरकार ने तत्काल संगठन को कमजोर अवश्य किया, लेकिन दीर्घकाल में उन्हें एक बड़े क्रांतिकारी प्रतीक में बदल दिया।
ब्रिटिश सरकार उनसे इसलिए डरती है क्योंकि वे किसानों को जगा रहे हैं।
इस प्रकार दमन ने नेता और आंदोलन दोनों को राजनीतिक वैधता दी।
भारतीय राष्ट्रवादी राजनीति में यह पैटर्न आगे भी बार-बार दिखाई देगा।
क्या आंदोलन के कारण सरकार झुकी?
हां—लेकिन इसकी प्रकृति को ठीक समझना आवश्यक है।
सरकार पहले कुछ संशोधन और रियायतों के माध्यम से असंतोष शांत करना चाहती थी।
अंततः विवादास्पद उपनिवेशन कानून को सर्वोच्च औपनिवेशिक स्वीकृति नहीं मिली।
1912 के पंजाब सरकारी भूमि उपनिवेशन अधिनियम के आधिकारिक उद्देश्यों और कारणों का विवरण में साफ दर्ज है कि 1893 के कानून में संशोधन के लिए 1907 में पंजाब विधान परिषद ने कानून पारित किया था, लेकिन
वह कभी लागू नहीं हुआ क्योंकि गवर्नर-जनरल ने स्वीकृति रोक दिया।
यह 1907 के किसान प्रतिरोध की महत्वपूर्ण राजनीतिक विजय थी।
जल-दरों पर भी सरकार पीछे हटती है
बारी दोआब की बढ़ी हुई सिंचाई दरों के प्रश्न पर भी सरकार को पीछे हटना पड़ा।
इग्नू का अध्ययन स्पष्ट रूप से निष्कर्ष देता है कि वायसराय ने उपनिवेशन विधेयक को वीटो किया और पंजाब सरकार ने बढ़ी हुई जल-दरों को वापस लिया।
इससे आंदोलन का आर्थिक परिणाम भी सामने आता है।
किसानों ने केवल प्रतीकात्मक विरोध नहीं किया था।
उनकी लामबंदी ने वास्तविक सरकारी नीतियों को प्रभावित किया।
नवंबर 1907 : नेताओं की रिहाई
निर्वासन को अनिश्चितकाल तक बनाए रखना सरकार के लिए कठिन था।
भारत और ब्रिटेन दोनों में राजनीतिक प्रश्न उठ रहे थे।
अंततः नवंबर 1907 में लाला लाजपत राय और अजित सिंह को मुक्त कर दिया गया।
लगभग छह महीने के भीतर स्थिति उलट चुकी थी
विवादास्पद कानून लागू नहीं हुआ, जल-दरों के प्रश्न पर सरकार पीछे हटी, और निर्वासित नेता वापस आए।
लेकिन पंजाब की राजनीति पहले जैसी नहीं रही।
क्या यह आंदोलन सफल था?
तत्काल उद्देश्यों के संदर्भ में इसे महत्वपूर्ण सफलता माना जाना चाहिए।
उपनिवेशन कानून को लागू होने से रोकना।
सिंचाई दर वृद्धि पर सरकार को पीछे हटाना।
कृषि शिकायतों को प्रांतीय और राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में लाना।
औपनिवेशिक सरकार को यह अहसास कराना कि पंजाब का कृषक समाज स्वभावतः राजभक्त नहीं है।
किसान राजनीति को राष्ट्रवादी राजनीति से जोड़ना।
वर्ग, धर्म, गांव–शहर, संस्कृति और भगत सिंह की विरासत
लेकिन इसकी सीमाएं भी थीं
आंदोलन स्थायी किसान संगठन नहीं बना सका।
उसका सक्रिय उभार बहुत तीव्र लेकिन अपेक्षाकृत अल्पकालिक था।
नेताओं के निर्वासन से संगठनात्मक संरचना कमजोर हुई।
किसान समाज के भीतर वर्गीय भेदों—बड़े कृषक, मध्यम किसान, छोटे किसान, काश्तकार और भूमिहीन मजदूर—के लिए अलग-अलग कार्यक्रम विकसित नहीं हुआ।
भूमिहीन कृषि मजदूर इसका केंद्रीय सामाजिक आधार नहीं बने।
इस अर्थ में यह बाद के तेभागा अथवा तेलंगाना जैसे वर्ग-आधारित किसान आंदोलनों से भिन्न था।
बड़े और मध्यम कृषकों की भूमिका
नहर-बस्तियों में भूमि पाने वाले सभी किसान निर्धन नहीं थे।
कुछ अपेक्षाकृत संपन्न कृषक और बड़े भूमि-अधिकारधारी भी थे।
स्थानीय जमींदार संगठनों ने प्रारंभिक विरोध में भूमिका निभाई।
इसलिए 1907 को केवल ‘गरीब किसान बनाम अंग्रेज’ की सरल कहानी में नहीं बदला जाना चाहिए।
औपनिवेशिक राज्य की कृषि नियंत्रण व्यवस्था बनाम विभिन्न स्तरों के कृषक भूमि-अधिकार।
धार्मिक एकता का आयाम
पंजाब धार्मिक रूप से विविध प्रदेश था।
सिख, मुस्लिम और हिंदू किसान अलग-अलग क्षेत्रों और सामाजिक संरचनाओं में मौजूद थे।
1907 के आंदोलन में कृषि प्रश्न ने धार्मिक सीमाओं को कुछ हद तक पार करने वाला साझा मंच बनाया।
यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण था क्योंकि आगे के दशकों में पंजाब की राजनीति में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न अधिक मजबूत होता जाएगा।
1907 में आंदोलन की केंद्रीय भाषा थी
जमीन, पानी, कर और किसान सम्मान।
धर्म उसका मुख्य राजनीतिक विभाजक नहीं था।
ग्रामीण और शहरी समाज का मिलन
आंदोलन की एक और बड़ी विशेषता थी
वकील, पत्रकार, संपादक, राजनीतिक कार्यकर्ता, विद्यार्थी और शहरी राष्ट्रवादी वर्ग
यह आधुनिक जनराजनीति की महत्वपूर्ण प्रक्रिया थी।
ग्रामीण आर्थिक शिकायत को शहर का प्रेस राजनीतिक भाषा देता था।
शहरी नेता गांव की सभा में जाता था।
गांव की भीड़ शहर की राजनीति को जनाधार देती थी।
1907 इसी नए गठबंधन का प्रारंभिक महत्वपूर्ण उदाहरण था।
आंदोलन में संस्कृति की शक्ति
बांके दयाल की कविता का महत्व केवल साहित्यिक नहीं है।
इसने दिखाया कि आंदोलन केवल ज्ञापन और प्रस्तावों से नहीं बनते।
उन्हें भावनात्मक भाषा चाहिए।
‘उपनिवेशन एक्ट संशोधन’ एक कानूनी वाक्य था।
‘पगड़ी संभाल जट्टा’ एक जनघोषणा थी।
इसलिए आंदोलन का नाम सरकारी विधेयक से नहीं, कविता से इतिहास में दर्ज हुआ।
भगत सिंह और 1907 की विरासत
भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को हुआ—उसी वर्ष जिसमें पंजाब किसान आंदोलन, अजित सिंह का निर्वासन और औपनिवेशिक-विरोधी राजनीति उनके परिवार के जीवन का हिस्सा बने हुए थे।
उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजित सिंह पहले से राजनीतिक रूप से सक्रिय थे।
इसलिए भगत सिंह जिस परिवार में बड़े हुए, उसमें ब्रिटिश-विरोध कोई अमूर्त विचार नहीं था।
गिरफ्तारी, निर्वासन, राजनीतिक साहित्य और किसान प्रश्न उनके पारिवारिक वातावरण में मौजूद थे।
यह कहना अत्यधिक सरल होगा कि भगत सिंह की पूरी विचारधारा 1907 से निकली; लेकिन उनकी राजनीतिक परवरिश की महत्वपूर्ण जड़ों में यह आंदोलन अवश्य था।
अजित सिंह के बाद और भारतीय किसान आंदोलनों की अगली कड़ियां
अजित सिंह : 1907 के बाद
सरकार की निगरानी और दबाव जारी रहने के कारण अजित सिंह अंततः 1909 में भारत से बाहर चले गए।
इसके बाद उनका लंबा राजनीतिक निर्वासन शुरू हुआ।
उन्होंने ईरान, तुर्की, यूरोप और अन्य क्षेत्रों में रहते हुए भारतीय स्वतंत्रता के लिए संपर्क बनाए।
उनका जीवन इस अर्थ में असाधारण था कि 1907 में पंजाब के किसान नेता के रूप में उभरा व्यक्ति बाद में अंतरराष्ट्रीय भारतीय क्रांतिकारी नेटवर्क का हिस्सा बन गया।
लगभग चार दशकों बाद वे भारत लौट सके।
15 अगस्त 1947 : अजित सिंह की अंतिम ऐतिहासिक विडंबना
अजित सिंह स्वतंत्र भारत देखने के लिए जीवित रहे।
और जिस दिन भारत औपचारिक रूप से स्वतंत्र हुआ
15 अगस्त 1947
उसी दिन डलहौजी में उनका निधन हुआ।
1907 में जिस व्यक्ति को ब्रिटिश साम्राज्य ने पंजाब से उठाकर मांडले भेज दिया था, उसने चालीस वर्ष बाद ब्रिटिश शासन का अंत देखा।
1907 और चंपारण 1917 : क्या संबंध है?
दोनों आंदोलनों में किसान आर्थिक शोषण के विरुद्ध खड़ा था, लेकिन उनकी संरचना अलग थी।
भूमि-अधिकार, नहर-बस्ती की शर्तें, सिंचाई शुल्क और राजस्व।
चंपारण में केंद्रीय प्रश्न था
1907 का नेतृत्व अधिक उग्र राष्ट्रवादी था।
1917 में गांधी जांच, सत्याग्रह, नैतिक दबाव और वार्ता की विशिष्ट पद्धति लेकर आए।
लेकिन दोनों में एक साझा सिद्धांत था
स्थानीय कृषि शिकायत राष्ट्रीय राजनीतिक प्रश्न बन सकती है।
1907 और खेड़ा 1918
खेड़ा में किसान ने फसल खराब होने के बावजूद राजस्व वसूली के विरुद्ध संगठित कर-अस्वीकार किया।
1907 के पंजाब में भी राजस्व और सरकारी आर्थिक मांगों को अस्वीकार करने की भाषा उभर चुकी थी।
अंतर यह था कि खेड़ा में गांधीवादी अनुशासन अधिक व्यवस्थित था।
1907 में आंदोलन अधिक उग्र और बहुध्रुवीय था।
फिर भी किसान द्वारा सरकार की आर्थिक मांग को सामूहिक राजनीतिक प्रतिरोध का साधन बनाने की दिशा पंजाब में पहले दिखाई दे चुकी थी।
1907 और बारदोली 1928
बारदोली में वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में राजस्व वृद्धि के विरुद्ध अत्यंत संगठित आंदोलन हुआ।
यदि दोनों को साथ रखकर देखें तो भारतीय किसान राजनीति का विकास स्पष्ट होता है।
पंजाब 1907 — उग्र कृषक राष्ट्रवाद।
बारदोली 1928 — अनुशासित गांधीवादी कर-सत्याग्रह।
दोनों में किसान सम्मान अत्यंत महत्वपूर्ण था।
बारदोली ने जिस संगठनात्मक परिपक्वता को प्राप्त किया, उसकी पूर्वपीठिका भारतीय किसान संघर्षों की उसी लंबी परंपरा में थी जिसमें 1907 पंजाब का महत्वपूर्ण स्थान है।
क्या 1907 आधुनिक भारतीय किसान आंदोलन का आरंभ था?
नहीं—यदि इसका अर्थ यह लिया जाए कि उससे पहले किसान आंदोलन नहीं हुए थे।
रंगपुर, पागलपंथी, फराजी, कोल, संथाल हूल, नील विद्रोह, पाबना और दक्कन
जैसे अनेक कृषक तथा आदिवासी प्रतिरोध हो चुके थे।
लेकिन 1907 की विशिष्टता अलग है।
यह बीसवीं सदी की आधुनिक राजनीतिक संरचना में किसान आंदोलन और उग्र राष्ट्रवाद के स्पष्ट मिलन के शुरुआती बड़े उदाहरणों में था।
औपनिवेशिक ‘विकास’ का अंतर्विरोध
1907 का आंदोलन औपनिवेशिक विकास नीति का एक गहरा विरोधाभास उजागर करता है।
नहरों ने वास्तविक आर्थिक परिवर्तन किया।
इस विकास से पैदा हुई संपत्ति पर अधिकार किसका होगा?
इसलिए 1907 आधुनिक भारत के उस प्रश्न का प्रारंभिक रूप भी है जिसे बाद में अनेक भूमि आंदोलनों में देखा जाएगा
विकास का लाभ और संसाधन पर अधिकार किसका?
राजनीतिक नागरिकता, लोकप्रिय कथाएं, उपलब्धियां और सीमाएं
किसान ‘प्रजा’ से राजनीतिक नागरिक बनता है
इस आंदोलन की सबसे गहरी उपलब्धि किसी एक कानून की वापसी नहीं थी।
वह किसान के राजनीतिक आत्मबोध में परिवर्तन था।
औपनिवेशिक प्रशासन किसान को मुख्यतः
उत्पादक, राजस्वदाता, किरायेदार/भूमि-अधिकारधारी और सैनिक भर्ती स्रोत
लेकिन आंदोलन में किसान कह रहा था
मेरे बारे में कानून मेरी सहमति के बिना नहीं बनाया जा सकता।
यहीं किसान केवल प्रशासन की ‘प्रजा’ नहीं रहता।
वह राजनीति का सक्रिय दावेदार बनता है।
1907 के बारे में प्रचलित ‘तीन कृषि कानून’ वाली कथा
आधुनिक सार्वजनिक विमर्श में 1907 को अक्सर 2020 के किसान आंदोलन के समानांतर रखकर कहा गया कि तब भी अंग्रेज तीन कृषि कानून लाए और किसानों ने तीनों वापस करा दिए।
यह आकर्षक समानता है, लेकिन शोध अध्याय में इसे हूबहू स्वीकार करना उचित नहीं।
1900 का भूमि हस्तांतरण अधिनियम, 1906–07 का उपनिवेशन विधेयक और बारी दोआब की जल-दर वृद्धि अलग-अलग कानूनी/प्रशासनिक प्रकृति की चीजें थीं।
विशेषतः भूमि हस्तांतरण अधिनियम का उद्देश्य और सामाजिक प्रभाव जटिल था।
इसलिए ‘तीन कानून बनाम किसान’ का सूत्र आधुनिक स्मृति में उपयोगी हो सकता है, लेकिन 1907 की वास्तविक इतिहास-व्याख्या उससे अधिक जटिल है।
क्या उपनिवेशन कानून ‘रद्द’ हुआ था?
यहां भी शब्दों में सावधानी आवश्यक है।
अधिक सटीक तथ्य यह है कि 1907 में पंजाब विधान परिषद से पारित संशोधन कानून प्रभावी नहीं हुआ क्योंकि गवर्नर-जनरल ने स्वीकृति रोक दिया।
1912 के कानून के आधिकारिक विवरण में इसकी स्पष्ट पुष्टि है।
इसलिए वेबसाइट पर यह लिखना अधिक सही होगा
किसान आंदोलन के दबाव के बीच 1907 का विवादास्पद उपनिवेशन संशोधन कानून अंतिम औपनिवेशिक स्वीकृति प्राप्त नहीं कर सका और लागू नहीं हुआ।
यह “तीनों कानून रद्द हो गए” की तुलना में अधिक शोध-संगत कथन है।
आंदोलन की तत्काल उपलब्धियां : समेकित मूल्यांकन
1907 की उपलब्धियों को छह स्तरों पर देखा जा सकता है।
पहला—नीतिगत। विवादास्पद उपनिवेशन व्यवस्था को लागू होने से रोका गया और जल-दर वृद्धि पर सरकार पीछे हटी।
दूसरा—राजनीतिक। किसान प्रश्न पंजाब की प्रांतीय राजनीति के केंद्र में आया।
तीसरा—संगठनात्मक। सार्वजनिक किसान सभाओं की शक्ति दिखाई दी।
चौथा—सांस्कृतिक। ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ ने किसान सम्मान को राजनीतिक भाषा दी।
पांचवां—राष्ट्रवादी। कृषि असंतोष औपनिवेशिक-विरोधी राजनीति से जुड़ा।
छठा—मनोवैज्ञानिक। सरकार को पहली बार गंभीरता से यह भय हुआ कि पंजाब का ग्रामीण समाज और सैनिक भर्ती आधार राजनीतिक रूप से अस्थिर हो सकता है।
आंदोलन की दीर्घकालीन सीमाएं
लेकिन आंदोलन ने स्थायी किसान महासंगठन नहीं छोड़ा।
उसके पास विस्तृत कृषक घोषणापत्र नहीं था।
विभिन्न कृषक वर्गों की अलग समस्याओं को समाहित करने वाला कार्यक्रम विकसित नहीं हुआ।
महिलाओं की संगठित राजनीतिक भूमिका बाद के कई किसान आंदोलनों जैसी प्रमुख नहीं दिखाई देती।
भूमिहीन मजदूर का प्रश्न आंदोलन के केंद्र में नहीं आया।
नेतृत्व पर निर्भरता अधिक थी।
और नेतृत्व हटते ही आंदोलन की तीव्रता कम हुई।
इन सीमाओं के कारण 1907 एक अत्यंत महत्वपूर्ण किसान उभार तो बना, लेकिन स्थायी किसान संगठनात्मक आंदोलन में तुरंत परिवर्तित नहीं हुआ।
1907 से 2020–21 तक ‘पगड़ी संभाल’ की स्मृति
एक सदी से अधिक बाद 2020–21 के किसान आंदोलन में ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ फिर सुनाई दिया।
अजित सिंह की स्मृति पुनर्जीवित हुई।
किसान संगठनों ने 1907 को ऐतिहासिक प्रेरणा के रूप में याद किया।
यह स्मृति इसलिए शक्तिशाली थी क्योंकि दोनों कालों में किसानों ने कानून निर्माण और कृषि पर राज्य के अधिकार के प्रश्न को चुनौती दी।
लेकिन दोनों आंदोलनों को समान नहीं मानना चाहिए।
औपनिवेशिक भूमि–नहर–राजस्व व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष।
स्वतंत्र भारत में कृषि व्यापार, मंडी व्यवस्था, संविदा कृषि और बाजार नियमन से जुड़े केंद्रीय कानूनों का संघर्ष।
समानता ऐतिहासिक स्मृति में है; परिस्थितियां और संवैधानिक संरचना पूरी तरह अलग हैं।
1849–1912 की विस्तृत समयरेखा
विस्तृत समयरेखा : 1849 से 1912
वर्ष/तिथि — घटना और ऐतिहासिक महत्व
1849 — पंजाब ब्रिटिश शासन के अधीन; औपनिवेशिक प्रशासनिक और राजस्व पुनर्गठन आरंभ।
1857 के बाद — ब्रिटिश भारतीय सेना में पंजाब की सैनिक भर्ती का महत्व बढ़ता गया।
उन्नीसवीं सदी उत्तरार्ध — पश्चिमी पंजाब में बड़े नहर नेटवर्क और नियोजित नहर-बस्तियों का विकास।
1890 के दशक — चिनाब नहर-बस्ती का विस्तार; लायलपुर प्रमुख कृषि केंद्र के रूप में विकसित।
1893 — सरकारी काश्तकार (पंजाब) अधिनियम—सरकारी भूमि पर कृषक बसावट के प्रशासन का महत्वपूर्ण कानूनी आधार।
1900 — पंजाब भूमि हस्तांतरण अधिनियम; कृषि भूमि हस्तांतरण को नियंत्रित करने की औपनिवेशिक नीति।
25 अक्टूबर 1906 — पंजाब विधान परिषद में उपनिवेशन संशोधन विधेयक प्रस्तुत।
नवंबर 1906 — बारी दोआब नहर की सिंचाई दरों में वृद्धि; कुछ मामलों में वृद्धि लगभग 50 प्रतिशत तक।
1906–07 — रावलपिंडी में भूमि-राजस्व वृद्धि से असंतोष।
आरंभ 1907 — कॉलोनी कृषकों, स्थानीय संगठनों और जमींदार समूहों की लामबंदी तेज।
मार्च 1907 — लायलपुर किसान सभाओं का निर्णायक दौर।
3 मार्च 1907 — लोकप्रिय स्मृति और अजित सिंह के संस्मरण से जुड़ी प्रसिद्ध लायलपुर सभा; बांके दयाल की ‘पगड़ी संभाल ओ जट्टा’ आंदोलन का प्रतीक बनी।
मार्च–अप्रैल 1907 — आंदोलन पंजाब के विभिन्न जिलों में फैलता है; अनेक सार्वजनिक सभाएं।
अप्रैल 1907 — लाहौर, रावलपिंडी और अन्य स्थानों पर विरोध तीव्र।
अप्रैल–मई 1907 — रावलपिंडी सहित कुछ स्थानों पर हिंसक घटनाएं; सरकार आंदोलन को सुरक्षा खतरे के रूप में देखने लगती है।
मई 1907 — सार्वजनिक सभाओं, प्रेस और राजनीतिक नेताओं पर सरकारी दमन तेज।
9 मई 1907 — लाला लाजपत राय के विरुद्ध 1818 का विनियमन तृतीय; मांडले निर्वासन।
मई 1907 — अजित सिंह को भी मांडले निर्वासित किया गया।
1907 — पंजाब विधान परिषद से पारित उपनिवेशन संशोधन को गवर्नर-जनरल की स्वीकृति नहीं मिली; कानून प्रभावी नहीं हुआ।
1907 — बारी दोआब की बढ़ी जल-दरों पर सरकार पीछे हटी।
नवंबर 1907 — लाजपत राय और अजित सिंह की रिहाई।
1909 — अजित सिंह का भारत से प्रस्थान; लंबा विदेशी निर्वासन।
1912 — नया पंजाब सरकारी भूमि उपनिवेशन अधिनियम; 1907 के विवाद के बाद अधिक संशोधित व्यवस्था।
15 अगस्त 1947 — स्वतंत्रता के दिन डलहौजी में अजित सिंह का निधन।
प्रमुख व्यक्तित्व, प्राथमिक स्रोत और इतिहासलेखन
प्रमुख व्यक्तित्व और उनकी भूमिका
सरदार अजित सिंह
आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण उग्र राजनीतिक संगठक। उनकी विशिष्ट भूमिका किसान की आर्थिक शिकायत को औपनिवेशिक शासन-विरोधी राजनीति में बदलने की थी।
लाला लाजपत राय
पंजाब के प्रतिष्ठित राष्ट्रवादी नेता। उनकी भागीदारी ने किसान आंदोलन को प्रांतीय सीमा से ऊपर राष्ट्रीय महत्व दिया। उनकी राजनीति अजित सिंह से पूरी तरह समान नहीं थी—यह अंतर इतिहास की समझ के लिए महत्वपूर्ण है।
किशन सिंह
अजित सिंह के भाई और भगत सिंह के पिता। भारत माता से जुड़े राष्ट्रवादी नेटवर्क और औपनिवेशिक-विरोधी गतिविधियों में सक्रिय।
बांके दयाल
कवि-संपादक, जिनकी ‘पगड़ी संभाल ओ जट्टा’ कविता आंदोलन की स्थायी सांस्कृतिक पहचान बनी।
सूफी अम्बा प्रसाद
उग्र राष्ट्रवादी प्रचार और क्रांतिकारी राजनीतिक नेटवर्क से जुड़े महत्वपूर्ण कार्यकर्ता।
घसीटा राम
भारत माता से जुड़े प्रारंभिक राजनीतिक-संगठनात्मक कार्यकर्ताओं में महत्वपूर्ण।
इन प्रसिद्ध नामों के पीछे हजारों अनाम किसान, स्थानीय नेता, वकील, पत्रकार और ग्रामीण कार्यकर्ता थे जिनके बिना आंदोलन संभव नहीं था।
प्राथमिक स्रोत : शोध के लिए क्या देखना चाहिए?
इस आंदोलन का गहरा शोध केवल बाद के वर्णनों पर आधारित नहीं होना चाहिए।
इसके महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत हैं
भारत सरकार के गृह/राजनीतिक कार्यवाही, विशेषकर 1907 के पंजाब अशांति संबंधी अभिलेख; पंजाब विधान परिषद कार्यवाही; पंजाब सरकार के राजस्व और सिंचाई विभाग के दस्तावेज; भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार में गृह–राजनीतिक अभिलेख; तत्कालीन The Tribune और अन्य पंजाब समाचारपत्र; लाला लाजपत राय के आत्मकथात्मक लेखन और भाषण; अजित सिंह के आत्मकथात्मक संस्मरण; तथा ब्रिटिश संसद में भारत संबंधी प्रश्न और बहसें।
आधुनिक शोध में अगस्त 1907 की गृह/राजनीतिक–ए फाइलों सहित अनेक राष्ट्रीय अभिलेखागार दस्तावेजों का उपयोग किया गया है।
प्रमुख द्वितीयक अध्ययन
1907 के आंदोलन पर N. Gerald Barrier का अध्ययन “The Punjab अशांति of 1907: The Response of the British Government in India to कृषक असंतोष” विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यह सरकारी प्रतिक्रिया, आंदोलन की प्रकृति और नेतृत्व के संबंध को औपनिवेशिक अभिलेखों के आधार पर समझता है।
पंजाब की नहर-बस्ती व्यवस्था समझने के लिए औपनिवेशिक सिंचाई और कृषि उपनिवेशीकरण संबंधी अध्ययन आवश्यक हैं। आधुनिक शोध ने इस आंदोलन को केवल किसी विधेयक-विरोध के रूप में नहीं, बल्कि औपनिवेशिक कृषि अर्थव्यवस्था में अधिशेष निष्कर्षण, कर, बाजार और साम्राज्यवादी पुनर्गठन के विरुद्ध किसान राजनीति के रूप में भी पढ़ा है।
स्रोतों में मतभेद : शोधकर्ता को कहां सावधान रहना चाहिए?
सबसे महत्वपूर्ण विवादों में एक है लायलपुर की प्रसिद्ध सभा की सटीक तारीख और अलग-अलग सभाओं का परस्पर मिश्रण।
दूसरा है आंदोलन के ‘तीन कानूनों’ की आधुनिक व्याख्या।
तीसरा है अजित सिंह और लाला लाजपत राय के संबंध को एकदम समान राजनीतिक रणनीति के रूप में प्रस्तुत करना।
चौथा है आंदोलन को केवल जाट-सिख आंदोलन कहना।
पांचवां है उपनिवेशन कानून के परिणाम को ‘तीनों कानून रद्द’ जैसे वाक्य में समेट देना।
एक शोध-स्तरीय इतिहास में लोकप्रिय स्मृति और अभिलेखीय तथ्य के बीच यह अंतर बनाए रखना आवश्यक है।
समेकित निष्कर्ष : किसान अस्मिता से राष्ट्रवादी प्रतिरोध तक
समेकित निष्कर्ष : ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ को इतिहास में कहां रखें?
1907 का पंजाब किसान आंदोलन उस औपनिवेशिक व्यवस्था की विडंबना से पैदा हुआ जिसे ब्रिटिश शासन अपनी उपलब्धि समझता था।
लायलपुर जैसे नए कृषि नगर विकसित हुए।
लेकिन इसी विकास ने किसान में एक नया अधिकार-बोध भी पैदा कर दिया।
जिस भूमि को हमने जीवन दिया, उस पर हमारा स्थायी अधिकार होना चाहिए।
भूमि का अंतिम स्रोत राज्य है और अधिकार उसकी शर्तों के अधीन हैं।
पानी ने जमीन को मूल्यवान बनाया था, इसलिए पानी की बढ़ी कीमत भी राजनीतिक प्रश्न बनी।
राजस्व राज्य की आय था, लेकिन किसान के लिए उसकी आय पर दावा था।
उत्तराधिकार प्रशासन के लिए कानूनी नियम था, किसान के लिए अपने बच्चों का भविष्य।
इसीलिए 1907 में भूमि, पानी, कर और परिवार—चारों प्रश्न एक साथ राजनीति बन गए।
फिर अजित सिंह ने इसमें पांचवां प्रश्न जोड़ा
विदेशी शासन का अधिकार।
यहीं ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ एक सामान्य कृषि आंदोलन से आगे निकलता है।
बांके दयाल की कविता ने इस पूरे राजनीतिक अर्थशास्त्र को एक सांस्कृतिक प्रतीक में बदल दिया।
जमीन पर अधिकार = आर्थिक स्वतंत्रता।
आर्थिक स्वतंत्रता = राजनीतिक अधिकार।
और राजनीतिक अधिकार का अंतिम प्रश्न औपनिवेशिक शासन से टकराता था।
इसलिए 1907 को केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं माना जाना चाहिए कि सरकार एक विवादास्पद कानून पर पीछे हटी। उसका बड़ा ऐतिहासिक महत्व यह था कि पंजाब का किसान पहली बार बीसवीं सदी की आधुनिक राष्ट्रवादी राजनीति में इतनी शक्ति से उपस्थित हुआ कि ब्रिटिश सरकार को अपने सबसे विश्वसनीय माने जाने वाले प्रांत में किसान और सैनिक के संभावित राजनीतिक मेल का भय सताने लगा।
यह आंदोलन संपूर्ण सामाजिक क्रांति नहीं था। भूमिहीन किसान-मजदूर उसके केंद्र में नहीं था। स्थायी किसान संगठन नहीं बन सका। नेतृत्व के निर्वासन के बाद उसकी गति कमजोर हुई। फिर भी उसने भारतीय किसान राजनीति को एक स्थायी सूत्र दिया
कृषि नीति केवल सरकार का प्रशासनिक विषय नहीं है; किसान स्वयं उसका राजनीतिक पक्षकार है।
यही सूत्र आगे चंपारण में दिखाई देगा।
खेड़ा में राजस्व-अस्वीकार बनेगा।
अवध और एका में किसान संगठन बनेगा।
बारदोली में अनुशासित सत्याग्रह बनेगा।
अखिल भारतीय किसान सभा के दौर में वर्ग और संगठन का प्रश्न बनेगा।
और स्वतंत्र भारत में भी भूमि, मूल्य, बाजार और कृषि कानूनों के आंदोलनों में अलग परिस्थितियों के भीतर यही मूल प्रश्न लौटता रहेगा
किसान के जीवन को बदलने वाली नीति में किसान की आवाज कितनी है?
इस अर्थ में 1907 का आंदोलन केवल पंजाब के इतिहास का अध्याय नहीं है।
यह भारतीय किसान के राजनीतिक नागरिक बनने की यात्रा का एक निर्णायक अध्याय है।
और उस यात्रा को इतिहास ने किसी सरकारी विधेयक के नाम से नहीं, एक किसान-कविता की पुकार से याद रखा
“पगड़ी संभाल ओ जट्टा।”
इस आंदोलन की निर्णायक उपलब्धि केवल विवादास्पद उपनिवेशन संशोधन को प्रभावी होने से रोकना या जल-दरों पर सरकार को पीछे हटाना नहीं थी। इसने किसान को प्रशासन की निष्क्रिय ‘प्रजा’ से कृषि नीति के राजनीतिक पक्षकार में बदला। इसकी वर्गीय सीमा स्पष्ट थी—भूमिहीन मजदूर केंद्र में नहीं थे और स्थायी संगठन नहीं बन सका—फिर भी भूमि, पानी, परिवार और सम्मान को औपनिवेशिक शासन की वैधता से जोड़ने का इसका सूत्र चंपारण, खेड़ा, बारदोली और आगे की किसान राजनीति में नए रूपों में लौटा। लोकप्रिय स्मृति और अभिलेखीय तथ्य में अंतर रखते हुए 1907 को आधुनिक भारतीय किसान राष्ट्रवाद का एक निर्णायक मोड़ माना जाना चाहिए।
प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक स्रोत
स्रोत-सावधानी: लायलपुर की प्रसिद्ध सभा की सटीक तिथि, अलग-अलग सभाओं का परस्पर मिश्रण, ‘तीन कृषि कानून’ वाली आधुनिक व्याख्या, अजित सिंह और लाला लाजपत राय की रणनीतिक समानता तथा ‘तीनों कानून रद्द’ होने के दावे पर स्रोत एकमत नहीं हैं। आंदोलन को केवल जाट–सिख प्रतिरोध के रूप में सीमित करना भी उसके व्यापक कृषक और राष्ट्रवादी चरित्र को अधूरा करता है।