मुंडा उलगुलान (1899–1900)
खूंटकट्टी भूमि-व्यवस्था से बिरसा मुंडा के ‘अबुआ राज’, उलगुलान, दमन और कानूनी परिणामों तक
मुंडा उलगुलान छोटानागपुर की खूंटकट्टी सामुदायिक भूमि-व्यवस्था के औपनिवेशिक विघटन, दिकू हस्तक्षेप, बेथ-बेगारी, वन नियंत्रण और सांस्कृतिक अस्मिता के संकट से जन्मा व्यापक प्रतिरोध था। बिरसा मुंडा के धार्मिक–सामाजिक सुधार और ‘अबुआ दिशुम, अबुआ राज’ की राजनीतिक कल्पना ने भूमि-अधिकार को समुदाय, धर्म और स्वशासन से जोड़ा। यह अध्ययन सरदारी लड़ाई से उलगुलान की तैयारी, दिसंबर 1899 के विस्फोट, डोम्बारी बुरू–सैल रकाब, दमन, बिरसा की गिरफ्तारी–मृत्यु और 1908 के छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम तक उपलब्धियों, सीमाओं और इतिहासलेखन का संतुलित मूल्यांकन करता है।
छोटानागपुर और मुंडा समाज की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
उलगुलान को समझने से पहले छोटानागपुर को समझना होगा
1899–1900 के मुंडा उलगुलान को केवल बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुआ ब्रिटिश-विरोधी विद्रोह मान लेने से उसकी ऐतिहासिक गहराई पकड़ में नहीं आती। उलगुलान उस सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था के संकट से पैदा हुआ था जिसकी जड़ें मुंडा समाज के गांव, जमीन, जंगल, वंश और सामुदायिक शासन में थीं। औपनिवेशिक हस्तक्षेप ने इन्हीं संस्थाओं को क्रमशः कमजोर किया।
इसलिए उलगुलान की कहानी वास्तव में दो व्यवस्थाओं के टकराव की कहानी भी है—एक ओर भूमि और समुदाय के परस्पर संबंधों पर आधारित मुंडा व्यवस्था और दूसरी ओर भूमि को राजस्व, व्यक्तिगत अधिकार और बाजार की वस्तु के रूप में देखने वाली औपनिवेशिक व्यवस्था।
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में पुरानी खूंटकट्टी व्यवस्था के स्थान पर जमींदारों, जागीरदारों और ठेकेदारों से जुड़ी नई व्यवस्था के विस्तार ने मुंडा समाज में गहरा असंतोष पैदा किया। बाद में यही भूमि-संकट बिरसा आंदोलन की केंद्रीय पृष्ठभूमि बना।
छोटानागपुर : पठार, जंगल और अलग सामाजिक संसार
ऐतिहासिक छोटानागपुर वर्तमान झारखंड के बड़े हिस्से और उससे जुड़े आसपास के क्षेत्रों को समेटने वाला विस्तृत पठारी क्षेत्र था। रांची का पठार, खूंटी, तमाड़, बुंडू और सिंहभूम से जुड़े इलाके मुंडा आबादी के महत्वपूर्ण क्षेत्र थे। बिरसा आंदोलन का मुख्य प्रभाव भी इसी भूभाग में दिखाई देता है।
यह भूगोल केवल आंदोलन का मंच नहीं था; उसने मुंडा समाज की अर्थव्यवस्था और सामाजिक संगठन को भी आकार दिया।
ऊबड़-खाबड़ पठारी भूमि, जंगल, छोटी नदियां, पहाड़ियां और बिखरी हुई कृषि योग्य जमीन के कारण यहां गांव और जंगल के बीच संबंध मैदानी कृषि क्षेत्रों से भिन्न था। कृषि महत्वपूर्ण थी, लेकिन जंगल भी भोजन, ईंधन, लकड़ी, पशुचारण और अनेक घरेलू आवश्यकताओं का आधार था।
इसलिए जमीन और जंगल को अलग-अलग आर्थिक संसाधन मानना मुंडा जीवन को समझने के लिए पर्याप्त नहीं है। वे सामुदायिक जीवन की एक संयुक्त पारिस्थितिकी का हिस्सा थे।
औपनिवेशिक शासन ने जब जमीन का सर्वेक्षण, लगान निर्धारण, निजी अधिकारों की पहचान और जंगलों पर प्रशासनिक नियंत्रण बढ़ाया, तब परिवर्तन केवल आर्थिक नहीं था। इससे समाज और सत्ता की पारंपरिक संरचनाएं भी प्रभावित हुईं।
मुंडा कौन थे?
मुंडा छोटानागपुर के प्रमुख आदिवासी समुदायों में थे। उनकी भाषा मुंडारी ऑस्ट्रोएशियाटिक भाषा-परिवार की मुंडा शाखा से संबंधित है। लेकिन मुंडा पहचान को केवल भाषा अथवा आधुनिक प्रशासनिक ‘जनजाति’ श्रेणी के माध्यम से नहीं समझा जाना चाहिए।
उनकी ऐतिहासिक सामाजिक संरचना में तीन चीजें अत्यंत महत्वपूर्ण थीं—
किस वंश ने जंगल साफ कर गांव बसाया? कौन-सी भूमि पर उस वंश का परंपरागत अधिकार था? गांव के धार्मिक और प्रशासनिक दायित्व किसके पास थे? दूसरे परिवार किस तरह गांव में बसे?
इन प्रश्नों के उत्तर से मुंडा सामाजिक व्यवस्था का स्वरूप निर्धारित होता था।
इसी व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण संस्था थी—खूंटकट्टी।
‘खूंटकट्टी’ : जमीन का अर्थ केवल निजी संपत्ति नहीं
‘खूंटकट्टी’ को सामान्यतः उस भूमि-अधिकार व्यवस्था के रूप में समझा जाता है जिसमें जंगल साफ कर गांव और खेती स्थापित करने वाले मूल वंशों के वंशजों को भूमि पर परंपरागत अधिकार प्राप्त होते थे।
इसका अर्थ आधुनिक अर्थों में किसी एक व्यक्ति की पूर्ण निजी संपत्ति नहीं था।
भूमि के अधिकार का आधार समुदाय, वंश और गांव बसाने की ऐतिहासिक स्मृति थी।
इस व्यवस्था को समझना इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि बाद में मुंडा असंतोष का बड़ा हिस्सा इसी धारणा से पैदा हुआ कि—
जिस भूमि को हमारे पूर्वजों ने जंगल काटकर खेती योग्य बनाया, उस पर बाहर से आया जमींदार, ठेकेदार या महाजन हमसे लगान लेने अथवा हमें बेदखल करने का अधिकारी कैसे हो गया?
उन्नीसवीं सदी के सरदारी आंदोलन में भी इसी ऐतिहासिक अधिकार की भाषा दिखाई देती है। 1867 और 1879 सहित विभिन्न याचिकाओं में मुंडा सरदारों ने भूमि और बाहरी जमींदारों के प्रश्न को औपनिवेशिक अधिकारियों के सामने उठाया।
यही प्रश्न आगे चलकर बिरसा आंदोलन में अधिक उग्र राजनीतिक रूप ग्रहण करेगा।
गांव : मुंडा समाज की मूल राजनीतिक इकाई
मुंडा समाज में गांव केवल निवास की जगह नहीं था। वह सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक संगठन की बुनियादी इकाई था।
गांव के भीतर भूमि उपयोग, पारिवारिक संबंध, त्योहार, धार्मिक स्थल, सामुदायिक श्रम और विवाद-निपटारे जैसी गतिविधियां परस्पर जुड़ी हुई थीं।
परंपरागत व्यवस्था में गांव का प्रमुख सामान्यतः मुंडा कहलाता था।
इस शब्द को लेकर भ्रम हो सकता है क्योंकि ‘मुंडा’ समुदाय का नाम भी है और गांव के पारंपरिक मुखिया का पद भी।
गांव के मुंडा की भूमिका आधुनिक सरकारी अधिकारी जैसी नहीं थी। उसका अधिकार सामुदायिक परंपरा, वंश और सामाजिक स्वीकृति से निकलता था।
गांवों के ऊपर एक व्यापक संगठन भी विकसित हुआ जिसे सामान्यतः मानकी–मुंडा व्यवस्था कहा जाता है।
मानकी–मुंडा व्यवस्था : नीचे से ऊपर की स्थानीय सत्ता
मुंडा सामाजिक–राजनीतिक संगठन में गांव की इकाई के ऊपर कई गांवों का समूह होता था।
गांव के स्तर पर मुंडा नेतृत्व करता था, जबकि गांवों के समूह से जुड़े प्रमुख को मानकी कहा जाता था।
परिवार/वंश → गांव → मुंडा → गांवों का समूह → मानकी।
लेकिन इसे आज की ग्राम पंचायत–ब्लॉक प्रशासन की हूबहू प्रतिकृति समझना गलत होगा। यह रिश्तेदारी, परंपरा, भूमि-अधिकार और सामुदायिक उत्तरदायित्व से विकसित संस्था थी।
औपनिवेशिक शासन के आने के बाद इन संस्थाओं के कार्य और अधिकार स्थिर नहीं रहे। कहीं उन्हें राजस्व प्रशासन में समायोजित किया गया, कहीं उनकी शक्ति सीमित हुई और कहीं उनके समानांतर नए मध्यस्थ खड़े हो गए।
यही बदलाव आगे राजनीतिक संघर्ष का कारण बना।
मुंडा, मानकी और पाहन
मुंडा गांव की सत्ता में राजनीतिक और धार्मिक कार्य हमेशा एक ही व्यक्ति के पास हों, ऐसा आवश्यक नहीं था।
पाहन गांव के धार्मिक अनुष्ठानों और सामुदायिक पूजा से जुड़ा होता था। कृषि चक्र, वर्षा, फसल और ग्राम-देवताओं से संबंधित अनुष्ठानों में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी।
इस प्रकार पारंपरिक गांव में मोटे तौर पर सत्ता का एक विभाजन दिखाई देता है—
मुंडा — गांव का लौकिक/प्रशासनिक नेतृत्व
पाहन — धार्मिक और अनुष्ठानिक नेतृत्व
मानकी — कई गांवों के व्यापक संगठन से जुड़ा नेतृत्व
यह संरचना दिखाती है कि मुंडा समाज ‘राज्य-विहीन अव्यवस्था’ नहीं था। उसमें अपने नियम, पद, अधिकार और सामाजिक नियंत्रण की संस्थाएं मौजूद थीं।
औपनिवेशिक अधिकारियों ने धीरे-धीरे इन व्यवस्थाओं को अपने राजस्व और प्रशासनिक ढांचे के संदर्भ में समझने और नियंत्रित करने का प्रयास किया।
वंश और ‘किली’
मुंडा समाज में रिश्तेदारी की महत्वपूर्ण संस्था किली थी, जिसे सामान्यतः कुल या गोत्र-सदृश वंश-समूह के रूप में समझा जा सकता है।
किली सामाजिक पहचान और विवाह संबंधों को व्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण थी। समान किली के लोगों को व्यापक वंशीय संबंध से जुड़ा माना जाता था और विवाह संबंधों पर इसके नियम लागू होते थे।
इसलिए व्यक्ति की पहचान केवल उसके व्यक्तिगत परिवार तक सीमित नहीं थी।
परिवार, किली, गांव और व्यापक मुंडा समुदाय
भूमि संबंधों में भी यह सामुदायिक तत्व दिखाई देता था। खूंटकट्टी व्यवस्था में मूल बसाहटकर्ता वंशों की स्मृति भूमि-अधिकार से जुड़ी हुई थी।
यही कारण है कि भूमि का नुकसान केवल आर्थिक संपत्ति का नुकसान नहीं था; वह वंशीय और सामुदायिक पहचान के क्षरण के रूप में भी अनुभव किया जा सकता था।
सरना, प्रकृति और धार्मिक संसार
मुंडा धार्मिक जीवन प्रकृति, पूर्वजों और स्थानीय पवित्र स्थलों से गहराई से जुड़ा था।
सिंगबोंगा मुंडा धार्मिक परंपरा में महत्वपूर्ण सर्वोच्च सत्ता के रूप में उपस्थित है। इसके साथ विभिन्न आत्माओं, पूर्वजों और स्थानीय धार्मिक शक्तियों की मान्यताएं भी थीं।
गांव के निकट स्थित पवित्र उपवन—जिसे व्यापक छोटानागपुरी संदर्भ में सरना कहा जाता है—सामुदायिक धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण केंद्र था।
इसलिए जंगल केवल लकड़ी प्राप्त करने का क्षेत्र नहीं था।
उसमें आर्थिक संसाधन के साथ-साथ धार्मिक और सांस्कृतिक अर्थ भी निहित थे।
यह बात बाद में अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुई। औपनिवेशिक वन-व्यवस्था जब जंगल को सरकारी नियंत्रण वाले संसाधन के रूप में परिभाषित करने लगी, तो आदिवासी समुदाय उसे अपने जीवन-संसार पर हस्तक्षेप के रूप में भी अनुभव कर सकते थे।
त्योहार और कृषि जीवन
मुंडा सामुदायिक जीवन कृषि ऋतुओं और प्रकृति के चक्र से जुड़ा हुआ था।
सरहुल, करम, सोहराय और अन्य पर्वों में प्रकृति, कृषि, पशुधन और सामुदायिक संबंधों का महत्व दिखाई देता है।
त्योहार केवल धार्मिक आयोजन नहीं थे।
वे गांव को सामुदायिक इकाई के रूप में पुनर्स्थापित करते थे—सामूहिक भोजन, नृत्य, संगीत और अनुष्ठानों के माध्यम से सामाजिक संबंध मजबूत होते थे।
इसलिए उन्नीसवीं सदी में जब भूमि और जंगल संबंधी व्यवस्था बदल रही थी, तब उसके प्रभाव को केवल प्रति एकड़ लगान अथवा कर्ज की मात्रा में नहीं मापा जा सकता।
वह उस पूरे सामाजिक संसार को प्रभावित कर रहा था जिसमें भूमि, पूर्वज, धर्म, त्योहार और सामुदायिक सत्ता एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।
गांव की सामुदायिकता और व्यक्तिगत परिवार
यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि मुंडा समाज को अत्यधिक रोमानी दृष्टि से एक पूर्णतः समानतावादी और संघर्षविहीन समुदाय के रूप में प्रस्तुत न किया जाए।
परिवारों की स्थिति, भूमि पर वास्तविक नियंत्रण, मूल बसाहटकर्ता वंश और बाद में आने वाले परिवारों के अधिकार तथा स्थानीय प्रभाव में अंतर मौजूद हो सकते थे।
लेकिन औपनिवेशिक भूमि व्यवस्था से महत्वपूर्ण अंतर यह था कि भूमि-अधिकार को समुदाय के इतिहास और वंशीय संबंधों से अलग करके देखना कठिन था।
औपनिवेशिक प्रशासन धीरे-धीरे भूमि को सर्वेक्षण, नक्शे, रिकॉर्ड, लगान और कानूनी स्वामित्व की श्रेणियों में बांध रहा था।
यहां से दो अलग अवधारणाओं का टकराव शुरू हुआ—
भूमि राजस्व और कानूनी स्वामित्व की परिभाषित इकाई है।
यही अंतर्विरोध आगे विस्फोटक सिद्ध हुआ।
छोटानागपुर में सत्ता की पुरानी और नई परतें
यह मानना भी ठीक नहीं होगा कि ब्रिटिश शासन आने से पहले छोटानागपुर में केवल स्वतंत्र आदिवासी गांव थे और उनके ऊपर किसी प्रकार की राजनीतिक सत्ता नहीं थी।
छोटानागपुर में राजाओं, स्थानीय प्रमुखों, जागीरों और विभिन्न स्तरों की सत्ता का इतिहास पहले से था।
समस्या तब अधिक गंभीर हुई जब औपनिवेशिक शासन ने राजस्व वसूली को व्यवस्थित और बढ़ाने के लिए स्थानीय शासकों तथा नए मध्यस्थों के अधिकारों को ऐसी कानूनी और प्रशासनिक शक्ति प्रदान की जिसका प्रभाव गांवों तक पहुंचा।
जमींदार, जागीरदार, ठेकेदार, महाजन और अन्य मध्यस्थ धीरे-धीरे मुंडा किसान के सामने केवल बाहरी व्यक्ति नहीं बल्कि भूमि, लगान और कर्ज पर अधिकार जताने वाली शक्तियां बन गए।
IGNOU के अध्ययन में भी उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में पुरानी खूंटकट्टी व्यवस्था पर जागीरदारों और ठेकेदारों से जुड़ी नई शोषणकारी व्यवस्था के बढ़ते दबाव को बिरसा आंदोलन की प्रमुख पृष्ठभूमि माना गया है।
‘दिकू’ : केवल बाहरी आदमी नहीं
आगे बिरसा आंदोलन में बार-बार आने वाला शब्द है—दिकू।
इसे केवल ‘गैर-आदिवासी’ का पर्याय मानना ऐतिहासिक रूप से अत्यधिक सरलीकरण होगा।
उलगुलान के संदर्भ में दिकू की धारणा विशेष रूप से उन बाहरी अथवा मध्यस्थ शक्तियों से जुड़ती गई जिन्हें मुंडा समाज भूमि, लगान, कर्ज, बेगार या प्रशासनिक शोषण से जोड़कर देखता था।
इनमें परिस्थिति के अनुसार जमींदार, ठेकेदार, महाजन और अन्य मध्यस्थ शामिल हो सकते थे।
इसलिए दिकू-विरोध में जातीय सीमा और आर्थिक संघर्ष एक-दूसरे में घुलते दिखाई देते हैं।
यही बात बिरसा आंदोलन को केवल ‘आदिवासी बनाम गैर-आदिवासी’ संघर्ष मानने से रोकती है।
मुंडा समाज पर परिवर्तन का दबाव
उन्नीसवीं सदी तक छोटानागपुर के मुंडा क्षेत्रों में कई परिवर्तन एक साथ सक्रिय हो चुके थे—
जमींदार और ठेकेदार मजबूत हो रहे थे।
बेगार और विभिन्न प्रकार की देनदारियां असंतोष पैदा कर रही थीं।
मिशनरी गतिविधियां सामाजिक–धार्मिक जीवन में नई उपस्थिति बना रही थीं।
औपनिवेशिक अदालतें और प्रशासन भूमि-विवादों का नया मंच बन रहे थे।
जंगलों पर राज्य का नियंत्रण बढ़ रहा था।
और सबसे महत्वपूर्ण—मुंडा समाज को लग रहा था कि अपनी ही भूमि पर उसका पुराना अधिकार कमजोर होता जा रहा है।
प्रतिरोध की स्मृति : बिरसा से पहले भी संघर्ष था
1895 में बिरसा के उभरने से पहले छोटानागपुर शांत क्षेत्र नहीं था।
1831–32 का कोल विद्रोह इस क्षेत्र में औपनिवेशिक सत्ता, बाहरी मध्यस्थों और बदलते भूमि संबंधों के विरुद्ध पहले बड़े विस्फोटों में था।
बाद में उन्नीसवीं सदी के मध्य और उत्तरार्ध में सरदारी लड़ाई या सरदार आंदोलन ने भूमि-अधिकार का प्रश्न उठाया।
सरदारों ने याचिकाओं और कानूनी उपायों के माध्यम से अपनी जमीन वापस पाने तथा जमींदारों के हस्तक्षेप से मुक्ति की मांग की। 1867 और 1879 की याचिकाओं सहित यह संघर्ष औपनिवेशिक प्रशासन के सामने लगातार रखा गया, लेकिन मुंडाओं की अपेक्षाओं के अनुरूप समाधान नहीं निकला।
इसलिए बिरसा ने शून्य से आंदोलन खड़ा नहीं किया।
भूमि का प्रश्न, सरदारों की राजनीतिक स्मृति, दिकुओं के प्रति असंतोष और अपनी सत्ता पुनः प्राप्त करने की आकांक्षा।
समुदाय से ‘राज’ तक
यहीं मुंडा सामाजिक संरचना और बिरसा की बाद की राजनीतिक कल्पना के बीच महत्वपूर्ण संबंध दिखाई देता है।
यदि मुंडा और मानकी जैसी अपनी संस्थाएं थीं,
तो औपनिवेशिक राज और जमींदारी मध्यस्थता को चुनौती देने का अर्थ केवल कर कम करवाना नहीं रह जाता।
बिरसा आंदोलन में आगे यही भावना अधिक स्पष्ट हुई। औपनिवेशिक अभिलेखों में दर्ज है कि बिरसा ने महारानी का राज समाप्त होने और मुंडा राज आने की घोषणा जैसी राजनीतिक भाषा अपनाई तथा लगान न देने का आह्वान किया।
इसीलिए उलगुलान आर्थिक शिकायत से राजनीतिक विद्रोह की दिशा में बढ़ सका।
उलगुलान की पहली ऐतिहासिक कुंजी
मुंडा समाज की इस पृष्ठभूमि से उलगुलान की पहली बड़ी व्याख्यात्मक कुंजी मिलती है।
मुंडाओं के लिए जमीन केवल उत्पादन का साधन नहीं थी।
गांव से मुंडा और मानकी की सत्ता जुड़ी थी।
और इन सबके साथ समुदाय की स्वतंत्र पहचान जुड़ी थी।
इसलिए भूमि पर नियंत्रण खोने का अर्थ केवल किसान का खेत खोना नहीं था।
वह एक साथ आर्थिक अधिकार, सामाजिक प्रतिष्ठा, सामुदायिक स्वायत्तता और राजनीतिक सत्ता खोने की प्रक्रिया बन सकता था।
इसी बिंदु पर मुंडा उलगुलान भारतीय किसान इतिहास और आदिवासी इतिहास—दोनों का हिस्सा बनता है।
इसे केवल किसान विद्रोह कहना अधूरा है और केवल धार्मिक आदिवासी आंदोलन कहना भी।
यह उस समाज की प्रतिक्रिया थी जिसे लग रहा था कि उसकी भूमि के साथ-साथ उसकी अपनी दुनिया पर किसी दूसरी व्यवस्था का अधिकार स्थापित हो रहा है।
और यहीं से अगला प्रश्न पैदा होता है—जिस खूंटकट्टी व्यवस्था पर मुंडा समाज का भूमि-अधिकार टिका था, वह वास्तव में कैसे काम करती थी और औपनिवेशिक शासन ने उसे किस प्रकार बदल दिया?
खूंटकट्टी भूमि व्यवस्था : मुंडा भूमि-अधिकार की बुनियाद और उसका औपनिवेशिक विघटन
उलगुलान की जड़ में जमीन का प्रश्न
1899–1900 के मुंडा उलगुलान को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण शब्दों में एक है—खूंटकट्टी। बिरसा मुंडा के आंदोलन में धर्म, औपनिवेशिक सत्ता, मिशनरी गतिविधियां, जंगल, बेगार और दिकू-विरोध सभी महत्वपूर्ण थे, लेकिन इन प्रश्नों के नीचे बार-बार जमीन और उस पर अधिकार का प्रश्न उभरता है।
मुंडाओं की शिकायत केवल यह नहीं थी कि उनसे अधिक लगान लिया जा रहा है। अधिक गहरा प्रश्न यह था कि जिस भूमि को उनके पूर्वजों ने जंगल साफ करके बसाया, उस पर किसी जमींदार, ठेकेदार या दूसरे मध्यस्थ का श्रेष्ठ अधिकार कैसे स्थापित हो गया?
यहीं खूंटकट्टी को समझना आवश्यक हो जाता है।
शब्द की व्युत्पत्ति को सामान्यतः दो हिस्सों में समझाया जाता है—‘खूंट’, अर्थात वंश अथवा मूल बसाहटकर्ता परिवारों से जुड़ा समूह, और ‘कट्टी’, अर्थात जंगल काटकर भूमि को बसाहट और खेती के योग्य बनाना। इस प्रकार खूंटकट्टी मूलतः उन वंशीय समूहों के ऐतिहासिक अधिकार से जुड़ी व्यवस्था थी जिन्होंने जंगल साफ करके गांव बसाए और खेती स्थापित की।
लेकिन इसे आधुनिक निजी संपत्ति के बराबर रखना गलत होगा।
भूमि पर अधिकार केवल वर्तमान कब्जे से नहीं, बल्कि गांव बसाने वाले वंश की ऐतिहासिक भूमिका से उत्पन्न होता है।
जंगल काटना केवल आर्थिक गतिविधि नहीं था
छोटानागपुर के पुराने मुंडा बसाव के संदर्भ में जंगल साफ कर गांव बसाना एक सामूहिक प्रक्रिया थी। किसी वंश या उससे जुड़े परिवारों का समूह किसी क्षेत्र में बसता, जंगल साफ करता, खेती योग्य भूमि विकसित करता और धीरे-धीरे गांव स्थापित होता।
इस प्रक्रिया से केवल खेत नहीं बनते थे।
इसके साथ गांव की सीमा निर्धारित होती थी, आवास क्षेत्र विकसित होता था, धार्मिक स्थल बनते थे, सामुदायिक उपयोग की जमीन पहचानी जाती थी और गांव तथा आसपास के जंगल के बीच उपयोग के परंपरागत संबंध स्थापित होते थे।
इसलिए जंगल काटने वाले मूल बसाहटकर्ता परिवारों की संततियां भूमि पर विशेष ऐतिहासिक अधिकार का दावा करती थीं।
इन्हीं को बाद में प्रशासनिक और कानूनी भाषा में खूंटकट्टीदार कहा गया।
खूंटकट्टीदार का अधिकार इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि उसका दावा केवल यह नहीं था कि—
“मेरे पूर्वजों ने इस गांव को बसाया और इस भूमि को खेती योग्य बनाया।”
पहला वर्तमान खेती का अधिकार है; दूसरा गांव के निर्माण से निकला ऐतिहासिक–वंशीय अधिकार।
‘खूंट’ क्या था?
खूंट को केवल आधुनिक संयुक्त परिवार समझना उचित नहीं होगा। यह मूल बसाहटकर्ता वंश अथवा उससे संबंधित वंशीय समूह की ओर संकेत करता था।
समय के साथ परिवारों की संख्या बढ़ती गई, भूमि का उपयोग विभिन्न परिवारों में विभाजित होता गया और गांव में दूसरे लोग भी आकर बसते गए। फिर भी मूल बसाहटकर्ता वंश की स्मृति बनी रहती थी।
इस स्मृति का भूमि-अधिकार में महत्व था।
यही कारण है कि खूंटकट्टी व्यवस्था में भूमि का प्रश्न वंशावली से जुड़ जाता था।
किस परिवार का अधिकार मूल बसाहटकर्ता के रूप में था और किसका अधिकार खेती अथवा निवास के आधार पर विकसित हुआ?
ये केवल सामाजिक प्रश्न नहीं थे। आगे चलकर ये राजस्व और कानूनी विवादों के विषय बन गए।
खूंटकट्टी और निजी संपत्ति में अंतर
आधुनिक भूमि व्यवस्था में सामान्य धारणा है कि किसी भूखंड का एक निश्चित स्वामी होता है और वह भूमि खरीद, बेच, गिरवी या हस्तांतरित कर सकता है।
खूंटकट्टी की ऐतिहासिक संरचना इससे अलग थी।
व्यक्तिगत परिवार निश्चित खेतों की खेती कर सकते थे और पीढ़ियों तक उन पर व्यवहारिक अधिकार रख सकते थे, लेकिन गांव की भूमि का व्यापक ढांचा मूल बसाहटकर्ता वंशों और समुदाय के ऐतिहासिक अधिकार से जुड़ा था।
व्यक्तिगत खेती मौजूद थी, लेकिन उसके ऊपर सामुदायिक–वंशीय अधिकार की एक व्यापक परत भी थी।
इसी कारण खूंटकट्टी को न तो पूर्ण सामूहिक स्वामित्व कहना पर्याप्त है, न आधुनिक निजी स्वामित्व।
यह दोनों के बीच स्थित एक विशिष्ट ऐतिहासिक भूमि-अधिकार व्यवस्था थी।
क्या सारी जमीन सबकी थी?
यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है।
खूंटकट्टी व्यवस्था का अर्थ यह नहीं था कि गांव की प्रत्येक भूमि पर प्रत्येक व्यक्ति का बराबर अधिकार था।
मूल बसाहटकर्ता वंशों और बाद में गांव में बसने वाले परिवारों की स्थिति अलग हो सकती थी। खेती की जमीन परिवारों में विभाजित हो सकती थी। गांव के भीतर सामाजिक और आर्थिक असमानताएं भी मौजूद थीं।
इसलिए इसे एक आदर्श साम्यवादी ग्राम व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत करना इतिहास को रोमानी बनाना होगा।
लेकिन इसका महत्वपूर्ण तत्व यह था कि भूमि-अधिकार का स्रोत समुदाय और गांव के ऐतिहासिक निर्माण में निहित था, न कि केवल किसी बाहरी शासक द्वारा दिया गया पट्टा।
यही तत्व औपनिवेशिक व्यवस्था से टकराया।
गांव बसाने वाला वंश और भूमि पर अधिकार
मान लें कि किसी मुंडा वंश के कुछ परिवारों ने किसी वन क्षेत्र में बसावट स्थापित की।
गांव का धार्मिक स्थल निर्धारित किया।
चराई और जंगल उपयोग के क्षेत्र विकसित किए।
पानी के स्रोतों का उपयोग व्यवस्थित किया।
लेकिन गांव की सामूहिक स्मृति में पहला वंश संस्थापक वंश बना रहा।
इसलिए उसके वंशजों का दावा था कि गांव की भूमि पर उनका अधिकार किसी जमींदार की कृपा से पैदा नहीं हुआ है।
यही दावा आगे औपनिवेशिक भूमि व्यवस्था के लिए असुविधाजनक साबित हुआ।
क्योंकि यदि भूमि पर अधिकार गांव बसाने से पैदा हुआ है, तो प्रश्न उठता है—
खूंटकट्टी और मुंडा–मानकी व्यवस्था
खूंटकट्टी केवल खेतों की व्यवस्था नहीं थी। उसका संबंध गांव की राजनीतिक संरचना से भी था।
गांव का मुंडा स्थानीय नेतृत्व से जुड़ा था। कई गांवों के व्यापक समूह में मानकी की भूमिका थी। धार्मिक मामलों में पाहन का अपना स्थान था।
भूमि और सत्ता के ये संबंध पूरी तरह अलग-अलग नहीं थे।
यदि गांव बसाने वाले वंशों का भूमि पर ऐतिहासिक अधिकार था, तो उसी सामाजिक संरचना से स्थानीय नेतृत्व की वैधता भी निकलती थी।
इसलिए बाहरी भूमि-मध्यस्थ का प्रवेश केवल आर्थिक परिवर्तन नहीं था।
वह स्थानीय सत्ता-संतुलन को भी बदल सकता था।
यही कारण है कि आगे मुंडा प्रतिरोध में भूमि वापस पाने और अपनी सत्ता वापस पाने की आकांक्षाएं एक-दूसरे से जुड़ती चली गईं।
छोटानागपुर के राजा और मुंडा गांव
ब्रिटिश शासन से पहले भी छोटानागपुर में राजसत्ता मौजूद थी। नागवंशी शासकों और स्थानीय प्रमुखों का राजनीतिक प्रभाव था। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि मुंडा गांव किसी भी उच्च राजनीतिक सत्ता से पूरी तरह स्वतंत्र थे।
लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि ऊपरी सत्ता और गांव के आंतरिक भूमि-अधिकार के बीच संबंध कैसा था।
समय के साथ शासकों द्वारा विभिन्न व्यक्तियों को भूमि-अधिकार, जागीर या राजस्व संबंधी विशेषाधिकार दिए गए। इससे गांव और ऊपरी राजनीतिक सत्ता के बीच मध्यस्थ परतें बढ़ीं।
औपनिवेशिक शासन के आने के बाद यह प्रक्रिया अधिक निर्णायक हो गई क्योंकि ब्रिटिश प्रशासन को नियमित राजस्व चाहिए था।
इस प्रश्न का उत्तर खोजते हुए औपनिवेशिक राज्य ने भूमि पर अधिकारों को उन श्रेणियों में बांटना शुरू किया जिन्हें उसका प्रशासन और न्यायालय पहचान सकें।
यहीं पारंपरिक खूंटकट्टी अधिकारों और औपनिवेशिक संपत्ति-व्यवस्था के बीच तनाव बढ़ा।
औपनिवेशिक राजस्व राज्य की समस्या
ब्रिटिश शासन को गांव की सामाजिक स्मृति से अधिक दिलचस्पी निश्चित और वसूल किए जा सकने वाले राजस्व में थी।
खूंटकट्टी जैसी व्यवस्था में अधिकारों की कई परतें थीं। मूल बसाहटकर्ता वंश का अधिकार, वास्तविक खेती करने वाले परिवार का अधिकार, गांव के सामुदायिक उपयोग का अधिकार और ऊपर की राजनीतिक सत्ता के दावे—ये सभी एक साथ मौजूद हो सकते थे।
औपनिवेशिक प्रशासन की प्रवृत्ति इन्हें अधिक निश्चित कानूनी और राजस्व श्रेणियों में बदलने की थी।
इसी प्रक्रिया में कई जगह परंपरागत अधिकार कमजोर और मध्यस्थ अधिकार मजबूत हुए।
जमींदार, जागीरदार और ठेकेदार
मुंडा क्षेत्रों में सबसे गंभीर परिवर्तन तब हुआ जब भूमि पर बाहरी अथवा ऊपरी मध्यस्थों के दावे मजबूत होने लगे।
जमींदार और जागीरदार अपनी स्थिति के आधार पर गांवों से लगान और दूसरी देनदारियां मांग सकते थे। कुछ क्षेत्रों में राजस्व संग्रह के लिए ठेकेदारों और अन्य मध्यस्थों की भूमिका बढ़ी।
मुंडाओं के लिए समस्या केवल लगान की रकम नहीं थी।
मूल विवाद अधिकार की प्रकृति को लेकर था।
मुंडा खूंटकट्टीदार स्वयं को उस भूमि का ऐतिहासिक अधिकारधारी मानता था।
नई व्यवस्था उसे धीरे-धीरे किरायेदार या रैयत जैसी अधीन स्थिति में धकेल सकती थी।
अर्थात जिस व्यक्ति की सामाजिक स्मृति कहती थी—
“तुम इस भूमि के रैयत हो और तुम्हें ऊपर के अधिकारधारी को लगान देना है।”
मालिक से रैयत बनने की अनुभूति
मुंडा असंतोष की मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक गहराई इसी परिवर्तन में दिखाई देती है।
जिस वंश का दावा था कि उसने जंगल साफ करके गांव बनाया, वही वंश यदि बाद में किसी बाहरी अधिकारधारी को लगान देने लगे, तो उसे यह व्यवस्था स्वाभाविक क्यों लगेगी?
और यदि लगान न देने पर बेदखली का खतरा पैदा हो जाए, तो संकट और गहरा हो जाता है।
इसलिए उलगुलान से पहले मुंडा राजनीतिक चेतना में एक महत्वपूर्ण धारणा विकसित हुई—
हम अपनी ही जमीन पर अधीन बना दिए गए हैं।
बिरसा मुंडा बाद में इसी असंतोष को अधिक व्यापक धार्मिक और राजनीतिक भाषा प्रदान करेंगे।
लगान के साथ अतिरिक्त देनदारियां
भूमि संबंधों के परिवर्तन के साथ केवल नियमित लगान का प्रश्न नहीं था।
विभिन्न प्रकार की देनदारियां और श्रम-दायित्व भी ग्रामीण जीवन पर बोझ डालते थे।
विशेष रूप से बेथ-बेगारी—अर्थात बिना उचित पारिश्रमिक के श्रम कराने की प्रथा—आदिवासी किसानों के असंतोष का महत्वपूर्ण कारण बनी।
जमींदार अथवा उसके प्रतिनिधियों के लिए परिवहन, कृषि, निर्माण या दूसरे कार्यों में श्रम देना पड़ सकता था।
इससे भूमि-अधीनता केवल रुपये में दिए जाने वाले लगान तक सीमित नहीं रहती थी।
वह शरीर और श्रम पर भी नियंत्रण बन जाती थी।
यही कारण है कि मुंडा प्रतिरोध में भूमि-अधिकार और बेगार-विरोध अक्सर एक-दूसरे से जुड़े दिखाई देते हैं।
महाजन और कर्ज का प्रवेश
कृषि अर्थव्यवस्था में नकद लगान और बाजार संबंधों के विस्तार से कर्ज का महत्व बढ़ सकता था।
ऐसी स्थिति में किसान महाजन या साहूकार से कर्ज लेता।
भुगतान न होने पर जमीन अथवा फसल पर दबाव बढ़ता।
इस तरह राजस्व व्यवस्था, बाजार और महाजनी कर्ज एक-दूसरे से जुड़ सकते थे।
मुंडा समाज की दृष्टि में यही विभिन्न मध्यस्थ धीरे-धीरे व्यापक दिकू व्यवस्था के हिस्से के रूप में दिखाई देने लगे।
लेकिन यहां भी सावधानी जरूरी है—हर बाहरी व्यक्ति को समान रूप से दिकू या शत्रु मान लेना उचित नहीं। शब्द का राजनीतिक अर्थ विशेष रूप से शोषणकारी बाहरी शक्तियों के संदर्भ में तीखा हुआ।
अदालत : न्याय का नया मैदान
औपनिवेशिक शासन का एक बड़ा परिवर्तन था—भूमि विवादों का अदालतों में जाना।
मुंडा खूंटकट्टीदार का दावा सामुदायिक स्मृति, वंश और गांव की परंपरा पर आधारित हो सकता था।
राजस्व अभिलेख में किसका नाम दर्ज है?
इस अंतर ने पारंपरिक समाज को कठिन स्थिति में डाला।
जो अधिकार पीढ़ियों से सामाजिक रूप से स्वीकृत था, वह आवश्यक नहीं कि उसी रूप में लिखित औपनिवेशिक अभिलेख में दर्ज हो।
यहीं मौखिक परंपरा बनाम दस्तावेजी कानून का संघर्ष पैदा हुआ।
भाषा और कानून की दूरी
अदालत की दुनिया मुंडा किसान की परिचित दुनिया नहीं थी।
कानूनी भाषा, दस्तावेज, वकील, फीस, गवाही और राजस्व अभिलेख—ये सभी एक नई संस्थागत व्यवस्था का हिस्सा थे।
जिस किसान के लिए भूमि-अधिकार उसके पूर्वजों और गांव की स्मृति से स्वयं सिद्ध था, उसे अब वही अधिकार किसी बाहरी न्यायिक संस्था के सामने प्रमाणित करना पड़ रहा था।
यदि वह मुकदमा हारता, तो उसके लिए इसका अर्थ केवल कानूनी हार नहीं था।
उसे लग सकता था कि विदेशी कानून ने उसके पूर्वजों के अधिकार को अस्वीकार कर दिया।
इसी अनुभव ने औपनिवेशिक राज्य के प्रति अविश्वास को बढ़ाया।
सरदारी लड़ाई : खूंटकट्टी अधिकार वापस पाने का प्रयास
बिरसा आंदोलन से पहले मुंडाओं ने भूमि-अधिकार के लिए लंबे समय तक अपेक्षाकृत कानूनी और संगठित संघर्ष भी किया।
इसे सामान्यतः सरदारी लड़ाई या सरदार आंदोलन कहा जाता है।
उन्नीसवीं सदी के मध्य से अंतिम दशकों तक मुंडा सरदारों ने अपने पुराने भूमि-अधिकारों की बहाली, जमींदारों के हस्तक्षेप में कमी और अनुचित देनदारियों से राहत की मांग उठाई।
भूमि के इतिहास को अपने पक्ष में प्रस्तुत किया।
यह आंदोलन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि उलगुलान सीधे हिंसक विद्रोह से शुरू नहीं हुआ था।
उसके पहले दशकों का भूमि-अधिकार संघर्ष मौजूद था।
1860 और 1870 के दशकों की भूमि बेचैनी
उन्नीसवीं सदी के दूसरे भाग में छोटानागपुर में भूमि संबंधी शिकायतें इतनी गंभीर हो गईं कि औपनिवेशिक प्रशासन को भी उनके समाधान के उपाय खोजने पड़े।
भूमि सर्वेक्षण, रिकॉर्ड तैयार करने और किरायेदारी संबंधों को नियमित करने के प्रयास किए गए।
1869 का Chota Nagpur Tenures Act और बाद के अन्य उपाय इसी व्यापक भूमि-संकट के संदर्भ में देखे जाने चाहिए।
लेकिन समस्या यह थी कि प्रशासनिक सुधार और मुंडाओं की ऐतिहासिक अपेक्षाएं समान नहीं थीं।
राज्य व्यवस्था को स्थिर करना चाहता था।
मुंडा सरदार अपने पुराने सामुदायिक अधिकार की पुनर्स्थापना चाहते थे।
1879 की प्रसिद्ध शिकायत
सरदारी आंदोलन के दौरान मुंडाओं की याचिकाओं में एक केंद्रीय दावा बार-बार सामने आया—छोटानागपुर की भूमि पर उनके पूर्वजों का अधिकार है और बाहरी जमींदारों ने उस अधिकार का अतिक्रमण किया है।
1879 के आसपास प्रस्तुत शिकायतों में इस प्रकार की भावना विशेष रूप से स्पष्ट दिखाई देती है।
यही विचार बाद में बिरसा आंदोलन में और अधिक शक्तिशाली रूप ग्रहण करता है।
खूंटकट्टी से ‘मुंडा राज’ तक
भूमि का प्रश्न धीरे-धीरे राजनीतिक सत्ता के प्रश्न में बदल सकता था।
यदि मुंडा मानते थे कि जमीन उनके पूर्वजों की है,
और यदि गांव की अपनी मुंडा–मानकी व्यवस्था थी,
तो बाहरी जमींदार और उसके पीछे खड़ा औपनिवेशिक राज्य दोनों प्रश्नों के घेरे में आते थे।
भूमि हमारी है तो शासन किसका होना चाहिए?
बिरसा आंदोलन में बाद में ‘मुंडा राज’ अथवा अपने शासन की कल्पना इसी सामाजिक–आर्थिक पृष्ठभूमि से शक्ति प्राप्त करती है।
इसलिए बिरसा की राजनीतिक भाषा को भूमि के इतिहास से अलग करके नहीं पढ़ा जा सकता।
क्या ब्रिटिश शासन ने खूंटकट्टी को पूरी तरह नष्ट कर दिया?
इस प्रश्न का उत्तर सरल ‘हां’ या ‘नहीं’ में नहीं दिया जा सकता।
औपनिवेशिक शासन ने खूंटकट्टी को एक ही आदेश से समाप्त नहीं कर दिया था। अलग-अलग क्षेत्रों में भूमि संबंध अलग थे और प्रशासन को समय के साथ पारंपरिक अधिकारों को पहचानने तथा दर्ज करने की आवश्यकता भी महसूस हुई।
समस्या यह थी कि औपनिवेशिक राजस्व व्यवस्था और मध्यस्थ अधिकारों के विस्तार ने खूंटकट्टी के वास्तविक सामाजिक आधार को गंभीर रूप से कमजोर किया।
बाद में सर्वेक्षण और बंदोबस्त के दौरान खूंटकट्टी अधिकारों की पहचान करने के प्रयास हुए और अंततः बीसवीं सदी के प्रारंभिक भूमि कानूनों में उन्हें कुछ कानूनी संरक्षण मिला।
इसलिए इतिहास को इस रूप में लिखना अधिक सही होगा—
औपनिवेशिक शासन ने पहले पारंपरिक भूमि संबंधों को गहरे संकट में डाला; लंबे प्रतिरोध और प्रशासनिक अनुभव के बाद उसी राज्य को उन अधिकारों के कुछ हिस्सों को कानूनी रूप से पहचानना पड़ा।
बिरसा के समय तक संकट कितना गहरा हो चुका था?
जब बिरसा मुंडा 1890 के दशक में एक बड़े नेता के रूप में उभरते हैं, तब तक मुंडा भूमि-संकट नया नहीं था।
और औपनिवेशिक प्रशासन से बढ़ती निराशा।
इसलिए बिरसा को केवल एक करिश्माई धार्मिक नेता मानना पर्याप्त नहीं होगा।
उन्होंने पहले से मौजूद भूमि-असंतोष को एक नए राजनीतिक–धार्मिक आंदोलन में बदलने की क्षमता दिखाई।
उलगुलान में खूंटकट्टी की केंद्रीयता
1899–1900 के उलगुलान में विभिन्न प्रकार की मांगें और आकांक्षाएं थीं। फिर भी भूमि प्रश्न उसकी संरचनात्मक जड़ था।
बिरसा के अनुयायियों के लिए संघर्ष का एक अर्थ था—
इसलिए उलगुलान को केवल अंग्रेजों को भारत से निकालने की आधुनिक राष्ट्रवादी भाषा में पढ़ना पर्याप्त नहीं है।
उसकी राजनीति अधिक स्थानीय और साथ ही अधिक गहरी थी।
छोटानागपुर की जमीन पर वास्तविक अधिकार किसका है?
उलगुलान की सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक धारणा
मुंडा किसान की समस्या को यदि केवल ‘गरीबी’ कहा जाए तो इतिहास का बड़ा हिस्सा छूट जाता है।
उसकी दृष्टि में उसकी स्थिति बदल रही थी।
वह अपने पूर्वजों द्वारा बसाई गई भूमि का अधिकारधारी था।
नई व्यवस्था उसके ऊपर जमींदार और प्रशासन खड़ा कर रही थी।
उसके जंगल पर परंपरागत उपयोग-अधिकार थे।
उसका विवाद गांव और परंपरा से तय होता था।
अब अदालत और दस्तावेज निर्णय कर रहे थे।
संपत्ति का भी, सत्ता का भी और पहचान का भी।
खूंटकट्टी का ऐतिहासिक महत्व
खूंटकट्टी व्यवस्था का अध्ययन भारतीय भूमि इतिहास के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें याद दिलाता है कि ‘संपत्ति’ की आधुनिक अवधारणा सार्वभौमिक और शाश्वत नहीं है।
भारत के अलग-अलग समाजों में भूमि पर अधिकार की अलग व्यवस्थाएं रही हैं।
कहीं गांव की सामुदायिक भूमिका अधिक थी।
कहीं वास्तविक काश्तकार का अधिकार निर्णायक था।
औपनिवेशिक शासन ने इन जटिल व्यवस्थाओं को राजस्व और कानून की निश्चित श्रेणियों में बांधने का प्रयास किया।
कंपनी राज और छोटानागपुर की नई भूमि व्यवस्था
जब राजस्व की नई भाषा छोटानागपुर पहुंची
मुंडा उलगुलान की पृष्ठभूमि में सबसे निर्णायक परिवर्तनों में एक था ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा छोटानागपुर के भूमि-संबंधों को राजस्व व्यवस्था के भीतर पुनर्गठित करना। यह परिवर्तन एक दिन में नहीं हुआ और न ही ब्रिटिश शासन ने छोटानागपुर में बिल्कुल शून्य से जमींदारी पैदा की। नागवंशी राजसत्ता, जागीर, स्थानीय प्रमुख, कर और विभिन्न प्रकार के मध्यस्थ ब्रिटिश आगमन से पहले भी मौजूद थे।
लेकिन कंपनी शासन ने इन पुराने संबंधों की प्रकृति बदल दी।
अब भूमि से प्राप्त आय स्थानीय राजनीतिक संबंध का हिस्सा भर नहीं रही। वह औपनिवेशिक राज्य की नियमित, गणना योग्य और नकद में वसूली जाने वाली राजस्व मांग बनती गई।
मुंडा खूंटकट्टीदार की दृष्टि में भूमि का अधिकार इस तथ्य से पैदा हुआ था कि उसके पूर्वजों ने जंगल साफ किया, गांव बसाया और पीढ़ियों से भूमि का उपयोग किया।
औपनिवेशिक प्रशासन के लिए अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न था—
राजस्व किससे वसूला जाए और उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
इस छोटे-से प्रशासनिक प्रश्न ने अंततः छोटानागपुर के सामाजिक ढांचे में बहुत बड़ा परिवर्तन पैदा किया।
1765 की दीवानी और छोटानागपुर
1765 भारतीय औपनिवेशिक इतिहास का निर्णायक वर्ष था। मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय से ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी, अर्थात राजस्व वसूली का अधिकार प्राप्त हुआ।
छोटानागपुर को कंपनी ने इसी व्यापक बंगाल–बिहार राजस्व क्षेत्र के अंतर्गत देखना शुरू किया।
लेकिन किसी क्षेत्र पर राजस्व का सैद्धांतिक दावा और वास्तव में वहां से राजस्व वसूल कर पाना दो अलग बातें थीं।
स्थानीय सामाजिक संरचना बंगाल के मैदानी इलाकों से अलग थी।
जमीन पर वंशीय और सामुदायिक अधिकारों की जटिल परंपराएं थीं।
और कंपनी के पास प्रारंभ में न तो पर्याप्त प्रशासनिक तंत्र था, न गांव-स्तर के भूमि संबंधों की स्पष्ट जानकारी।
इसलिए कंपनी ने पुराने राजनीतिक ढांचे को तत्काल समाप्त करने के बजाय उसके ऊपर अपनी राजस्व मांग स्थापित करनी शुरू की।
झारखंड पर किए गए एक भूमि-शासन अध्ययन के अनुसार, कंपनी ने 1772 में छोटानागपुर के महाराजा के साथ राजस्व निर्धारण का समझौता किया और वार्षिक राशि 12,000 रुपये तय की; 1775 में यह समझौता नए आकलन के साथ दोहराया गया। समस्या यह रही कि स्थानीय व्यवस्था इतनी नियमित नकद राजस्व वसूली के लिए बनी ही नहीं थी।
औपनिवेशिक राज्य ने राजा से राजस्व मांगा → राजा ने नीचे से अधिक नियमित वसूली की जरूरत महसूस की → मध्यस्थों की उपयोगिता बढ़ी → गांव और किसान पर दबाव नीचे तक पहुंचा।
नागवंशी राजा : स्वतंत्र शासक से राजस्व मध्यस्थ तक?
छोटानागपुर में नागवंशी राजवंश का इतिहास ब्रिटिश शासन से कई शताब्दी पुराना था। राजा की सत्ता क्षेत्र में मान्य थी, लेकिन उसकी प्रकृति आधुनिक केंद्रीकृत राज्य जैसी नहीं थी।
गांवों और स्थानीय समुदायों के अपने संस्थागत ढांचे थे।
मुंडा–मानकी व्यवस्था की अपनी भूमिका थी।
स्थानीय प्रमुख, जागीरदार और सेवा आधारित भूमि-अधिकार मौजूद थे।
राजा और गांव के बीच संबंध हमेशा भूमि के आधुनिक निजी स्वामित्व के सिद्धांत पर आधारित नहीं था।
ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन ने इस संबंध को बदलना शुरू किया।
कंपनी को राजा में एक ऐसी राजस्व इकाई दिखाई दी जिससे निश्चित राशि की मांग की जा सके।
पुराने राजनीतिक अधिपत्य और नए राजस्व स्वामित्व के बीच की सीमा धीरे-धीरे धुंधली होने लगी।
राजा अथवा उसके अधीनस्थों का अधिकार अब केवल राजनीतिक वरिष्ठता नहीं रह गया; उसे भूमि और लगान पर अधिक स्पष्ट आर्थिक अधिकार के रूप में परिभाषित किया जाने लगा।
यहीं एक ऐसी प्रक्रिया शुरू हुई जिसमें ऊपरी राजनीतिक अधिकार को नीचे की जमीन पर स्वामित्व-सदृश अधिकार में बदला जाने लगा।
स्थायी बंदोबस्त की छाया
1793 में लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा बंगाल में लागू स्थायी बंदोबस्त ने औपनिवेशिक भूमि व्यवस्था की मूल दिशा स्पष्ट कर दी।
इसका केंद्रीय विचार था कि राज्य अपनी राजस्व मांग निश्चित करे और जमींदार उस राजस्व की अदायगी के लिए उत्तरदायी हो।
बंगाल के मैदानों की व्यवस्था को छोटानागपुर पर हूबहू लागू करना आसान नहीं था। यहां स्थानीय अपवाद, विशेष प्रशासनिक व्यवस्थाएं और पुराने अधिकार बने रहे।
फिर भी स्थायी बंदोबस्त की मूल औपनिवेशिक मानसिकता ने छोटानागपुर को गहराई से प्रभावित किया।
भूमि के ऊपर किसी स्पष्ट ‘प्रोपराइटर’ अर्थात स्वामित्वधारी को पहचानना प्रशासन के लिए सुविधाजनक था।
या वह व्यक्ति था जिसे राजा ने किसी समय राजस्व अथवा सेवा अधिकार दिया था?
औपनिवेशिक कानून को एक स्पष्ट उत्तर चाहिए था, जबकि स्थानीय समाज में अधिकारों की कई परतें एक साथ मौजूद थीं।
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से जुड़े एक आधुनिक अध्ययन ने इसी समस्या को रेखांकित करते हुए लिखा है कि स्थायी बंदोबस्त के विस्तार और औपनिवेशिक संपत्ति अवधारणाओं ने छोटानागपुर में खूंटकट्टी जैसे संयुक्त वंशीय भूमि अधिकारों को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
औपनिवेशिक राज्य को ‘मालिक’ क्यों चाहिए था?
कंपनी प्रशासन की राजस्व व्यवस्था को एक ऐसी व्यक्ति या संस्था की आवश्यकता थी जिसे वह कह सके—
बकाया बढ़े तो संपत्ति पर कार्रवाई हो सकती है।
इस व्यवस्था में भूमि के सामुदायिक इतिहास से अधिक महत्वपूर्ण उसकी राजस्व क्षमता थी।
यही कारण है कि ब्रिटिश कानून में धीरे-धीरे तीन वर्ग अधिक स्पष्ट हुए—
मुंडा खूंटकट्टी व्यवस्था इस सरल त्रिभाजन में आसानी से फिट नहीं होती थी।
वह गांव बसाने वाले वंश का सदस्य भी था।
भूमि पर उसका ऐतिहासिक अधिकार भी था।
और सामुदायिक व्यवस्था में वह किसी बाहरी जमींदार का साधारण किरायेदार नहीं था।
लेकिन औपनिवेशिक प्रशासन की सुविधा के लिए उसे किसी कानूनी श्रेणी में रखना आवश्यक था।
इसी प्रक्रिया ने मुंडा अधिकारों के अर्थ को बदलना शुरू किया।
गांव का मुखिया क्या गांव का मालिक था?
यह औपनिवेशिक गलतफहमियों का एक महत्वपूर्ण स्रोत बना।
मुंडा व्यवस्था में गांव का मुखिया—मुंडा—समुदाय का नेतृत्व करता था, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि वह आधुनिक अर्थों में गांव की सारी भूमि का निजी स्वामी था।
वह व्यापक समुदाय और मूल बसाहटकर्ता वंशीय व्यवस्था के भीतर पदाधिकारी था।
औपनिवेशिक प्रशासन ऐसी स्थानीय संस्थाओं को अक्सर अपने परिचित संपत्ति संबंधों में समझने का प्रयास करता था।
यदि कोई व्यक्ति गांव का प्रतिनिधि है और वही राजस्व से संबंधित बातचीत करता है, तो प्रशासन के लिए उसे ‘मालिक’ जैसा समझ लेना आसान था।
लेकिन इससे सामुदायिक अधिकारों की प्रकृति बदल सकती थी।
एक पद जो मूलतः सामुदायिक प्रतिनिधित्व का था, वह राजस्व व्यवस्था में संपत्ति-अधिकार का आधार बन सकता था।
और एक बार भूमि पर कोई श्रेष्ठ मालिक मान लिया गया, तो खेती करने वाले परिवार नीचे की श्रेणी—रैयत—में आने लगे।
खूंटकट्टीदार के लिए सबसे बड़ा उलटफेर
यही इस पूरे परिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू था।
परंपरागत मुंडा धारणा में खूंटकट्टीदार कहता था—
“यह जमीन हमारे पूर्वजों ने बसाई है।”
“इस भूमि का ऊपर एक जमींदार है और तुम उसके अधीन खेती करने वाले रैयत हो।”
मुंडा किसान की दृष्टि में यह केवल प्रशासनिक वर्गीकरण नहीं था।
यह उसकी पूरी ऐतिहासिक स्थिति को उलट देता था।
वह स्वयं को भूमि का आदिम अधिकारधारी मानता था।
अब उसे किसी दूसरे व्यक्ति को लगान देना था।
यदि वह लगान नहीं देता तो उस पर मुकदमा हो सकता था।
उसकी स्थिति को अदालत में चुनौती दी जा सकती थी।
इसलिए मुंडा भूमि संघर्ष को केवल लगान कम कराने का संघर्ष समझना गलत होगा।
जागीरदार : पुरानी संस्था, नया अर्थ
छोटानागपुर में जागीरें ब्रिटिश शासन से पहले भी मौजूद थीं। राजाओं द्वारा सैनिक, प्रशासनिक, धार्मिक अथवा अन्य सेवाओं के बदले भूमि या उससे प्राप्त आय के अधिकार दिए जा सकते थे।
इसलिए हर जागीरदार को औपनिवेशिक निर्माण मानना गलत होगा।
लेकिन कंपनी शासन ने ऐसी संस्थाओं को नई कानूनी और आर्थिक परिस्थितियों में डाल दिया।
जब राजस्व का दबाव बढ़ा, तो किसी जागीरदार या मध्यस्थ के लिए गांव से अधिक नियमित वसूली करना अधिक महत्वपूर्ण हो गया।
इसका परिणाम था कि पुराने सेवा-संबंध धीरे-धीरे कठोर भू-राजस्व संबंध में बदल सकते थे।
जहां पहले कोई देनदारी सीमित या परंपरागत थी, वहां अब उसका विस्तार हो सकता था।
यहीं पुरानी संस्था औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के भीतर नया रूप ग्रहण करती है।
जागीरदार पहले से था या अंग्रेजों ने बनाया?
औपनिवेशिक शासन ने उसके अधिकार की प्रकृति कैसे बदल दी?
ठेकेदार : राजस्व की नई कड़ी
मुंडा असंतोष की कहानी में ठेकेदार या थिकेदार अत्यंत महत्वपूर्ण पात्र बने।
राजस्व या भूमि-अधिकार को किसी अवधि के लिए ठेके पर देना प्रशासन और बड़े अधिकारधारियों के लिए उपयोगी था।
ठेकेदार का हित सामान्यतः दीर्घकालीन सामुदायिक संतुलन में नहीं बल्कि निश्चित अवधि में अधिक से अधिक वसूली में होता था।
यदि उसे ऊपर निर्धारित राशि देनी है, तो उसकी प्रवृत्ति नीचे से उससे अधिक वसूलने की हो सकती है।
कुछ ऐतिहासिक अध्ययनों में उन्नीसवीं सदी के आरंभिक दशकों में बाहर से आए व्यापारियों और अन्य व्यक्तियों को गांव अथवा राजस्व अधिकार दिए जाने का उल्लेख है। ऐसे अल्पकालिक हित वाले मध्यस्थों द्वारा रैयतों से लगान, अबवाब और सलामी वसूलने की शिकायतें बढ़ीं।
दिकू केवल बाहर से नहीं आया—उसे व्यवस्था ने शक्ति दी
यहां ‘दिकू’ की धारणा फिर महत्वपूर्ण हो जाती है।
बाहरी व्यक्ति छोटानागपुर में पहले भी आते थे।
समस्या केवल उनके बाहरी होने से पैदा नहीं हुई।
समस्या तब अधिक गंभीर हुई जब उन्हें ऐसी संस्थागत शक्ति मिली जिसके माध्यम से वे भूमि, लगान, कर्ज और अदालत पर प्रभाव डाल सकते थे।
इसलिए दिकू-विरोध को केवल नस्ली अथवा जातीय बाहरी-विरोध मानना अनुचित होगा।
मुंडा किसान का सामना अब ऐसे व्यक्ति से था जिसके पीछे—
इसने शक्ति-संतुलन को पूरी तरह बदल दिया।
लगान का नकदीकरण
औपनिवेशिक राजस्व व्यवस्था का एक और महत्वपूर्ण पहलू था नकद भुगतान का बढ़ता महत्व।
परंपरागत ग्रामीण संबंधों में कई प्रकार की देनदारियां वस्तु, श्रम अथवा परंपरागत सेवाओं के रूप में हो सकती थीं।
लेकिन कंपनी राज्य के लिए राजस्व का अंतिम उद्देश्य नकद आय था।
इससे किसान पर नकदी जुटाने का दबाव बढ़ा।
यदि कृषि मुख्यतः निर्वाह-आधारित है और बाजार तक पहुंच सीमित है, तो नकद लगान कठिन समस्या बन सकता है।
इस प्रकार राजस्व का नकदीकरण महाजनी कर्ज के विस्तार से जुड़ता गया।
महाजन और भूमि
महाजन केवल पैसा उधार देने वाला व्यक्ति नहीं रहा।
जब भूमि का आर्थिक मूल्य बढ़ा और अदालत में दस्तावेजी दावे महत्वपूर्ण हुए, तो ऋणदाता भूमि पर भी दावा कर सकता था।
अदालत ने ऋणदाता के पक्ष में फैसला दिया।
किसान की जमीन पर कब्जे का रास्ता खुला।
छोटानागपुर के औपनिवेशिक इतिहास पर किए गए अध्ययनों में ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहां गांव या भूमि को ऋण की गारंटी के रूप में रखने और अदालत के माध्यम से ऋणदाता के जमींदार-सदृश अधिकार हासिल करने की प्रक्रिया ने भूमि-अलगाव को बढ़ाया।
मुंडा किसान की दृष्टि से यह अत्यंत विचित्र था।
जिसका गांव बसाने वाले खूंट से संबंध नहीं,
वह केवल कर्ज और कागज के आधार पर भूमि का अधिकारधारी कैसे बन गया?
यही संघर्ष परंपरा और औपनिवेशिक कानून के बीच था।
कचहरी : कागज बनाम स्मृति
मुंडा खूंटकट्टीदार अपने अधिकार का प्रमाण किससे देता था?
औपनिवेशिक अदालत में वही दावा अधिक मजबूत हो सकता था जिसके पास लिखित पट्टा, ऋणपत्र, राजस्व रसीद अथवा अन्य दस्तावेज हों।
दूसरी ओर मुंडा किसान का सबसे शक्तिशाली प्रमाण उसकी सामुदायिक स्मृति थी।
आधुनिक शोध में इस बात की ओर ध्यान दिलाया गया है कि लिखित स्वामित्व दस्तावेज न होने के कारण कई मुंडा दावे औपनिवेशिक अदालत में कमजोर पड़े और इससे दिकू भूमि-अधिग्रहण को अवसर मिला।
इसलिए कचहरी स्वयं एक नई सत्ता बन गई।
राजस्व, पुलिस और अदालत का गठजोड़
औपनिवेशिक राज्य ने ग्रामीण सत्ता की प्रकृति इसलिए भी बदल दी क्योंकि जमींदार अथवा मध्यस्थ अकेला नहीं था।
इसलिए स्थानीय आर्थिक विवाद अंततः राज्य की शक्ति से जुड़ जाता था।
मुंडा किसान के लिए यह अनुभव बहुत महत्वपूर्ण था।
उसका सीधा शोषक संभवतः कोई स्थानीय जमींदार या ठेकेदार हो सकता था, लेकिन धीरे-धीरे उसे अनुभव हुआ कि उस मध्यस्थ को शक्ति किससे मिल रही है।
यहीं से स्थानीय विरोध औपनिवेशिक राज्य-विरोध की दिशा में बढ़ सकता था।
बेथ-बेगारी : लगान से आगे का शोषण
जमीन पर नियंत्रण के साथ श्रम पर नियंत्रण भी बढ़ सकता था।
बेथ-बेगारी विभिन्न रूपों में बिना उचित मजदूरी या परंपरागत दायित्व के नाम पर कराया जाने वाला श्रम था।
रैयत को जमींदार अथवा उसके प्रतिनिधि के लिए काम करना पड़ सकता था।
ऐसी मांगों से किसान का समय और श्रम दोनों प्रभावित होते थे।
समस्या यह थी कि जिस भूमि को मुंडा अपना पुश्तैनी अधिकार मानता था, उसी भूमि पर बने रहने के लिए उसे किसी दूसरे के लिए मुफ्त श्रम करना पड़े।
इसलिए बाद के प्रतिरोध में बेगारी-विरोध भूमि-अधिकार से अलग नहीं था।
अबवाब, सलामी और अतिरिक्त वसूली
नियमित लगान के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार की अतिरिक्त देनदारियां ग्रामीण असंतोष को बढ़ाती थीं।
उत्सवों अथवा विशेष अवसरों पर देनदारियां,
इन सभी से वास्तविक बोझ घोषित लगान से कहीं अधिक हो सकता था।
हर अतिरिक्त देनदारी मुंडा किसान को याद दिलाती थी कि उसकी भूमि पर कोई दूसरा व्यक्ति अपने श्रेष्ठ अधिकार का दावा कर रहा है।
इसलिए आर्थिक बोझ और राजनीतिक अपमान एक-दूसरे में जुड़ते गए।
क्या 1793 का स्थायी बंदोबस्त ही सारी समस्या की जड़ था?
यहां इतिहासलेखन की एक महत्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है।
कई लोकप्रिय विवरणों में कहानी इस प्रकार लिखी जाती है—
1793 में स्थायी बंदोबस्त लागू हुआ → जमींदार आए → मुंडाओं की भूमि छिन गई।
छोटानागपुर में पहले से राजा, जागीरदार, स्थानीय प्रमुख और विभिन्न भूमि-अधिकार मौजूद थे।
क्षेत्र की विशिष्ट परिस्थितियों के कारण बंगाल का सामान्य प्रशासन यहां बार-बार संशोधित किया गया।
कई क्षेत्रों को विशेष प्रशासनिक व्यवस्था के अंतर्गत रखा गया।
इसलिए स्थायी बंदोबस्त को एकमात्र कारण मानना उचित नहीं।
औपनिवेशिक राजस्व राज्य ने पुरानी बहुस्तरीय भूमि व्यवस्था को अधिक कठोर, मुद्रीकृत और कानूनी रूप दिया; इससे मध्यस्थ अधिकार मजबूत हुए और खूंटकट्टी जैसे सामुदायिक अधिकार कमजोर पड़ते गए।
यही दीर्घकालीन प्रक्रिया निर्णायक थी।
1831–32 का कोल विद्रोह : पहली बड़ी चेतावनी
इस बदलती व्यवस्था के विरुद्ध असंतोष 1899 तक दबा नहीं रहा।
1831–32 का कोल विद्रोह इस संकट का बड़ा विस्फोट था।
हो, मुंडा, उरांव और क्षेत्र के अन्य समूहों का असंतोष बाहरी जमींदारों, ठेकेदारों, महाजनों और औपनिवेशिक प्रशासन से जुड़े व्यापक परिवर्तन से जुड़ा हुआ था।
विद्रोह ने ब्रिटिश शासन को यह स्पष्ट कर दिया कि छोटानागपुर को बंगाल के सामान्य प्रशासन की तरह चलाना कठिन है।
इसके बाद प्रशासनिक पुनर्गठन हुआ और South-West Frontier Agency जैसी विशेष व्यवस्था सामने आई।
लेकिन प्रशासनिक पुनर्गठन ने भूमि प्रश्न को समाप्त नहीं किया।
लेकिन भूमि-अधिकार की मूल समस्या बनी रहती है।
विशेष प्रशासन, लेकिन पुरानी समस्या
कोल विद्रोह के बाद ब्रिटिश शासन ने महसूस किया कि छोटानागपुर की सामाजिक संरचना को कुछ अलग तरीके से संभालना होगा।
इसलिए क्षेत्र के लिए विशेष प्रशासनिक प्रावधान किए गए।
लेकिन इससे राजस्व और भूमि संबंधी समस्या अपने आप समाप्त नहीं हुई।
राज्य एक ओर आदिवासी रीति-रिवाजों की विशिष्टता को पहचानता था,
दूसरी ओर भूमि और राजस्व को अपने कानूनी ढांचे में बांधना चाहता था।
यही विरोधाभास पूरे उन्नीसवीं सदी में बना रहा।
1854 के बाद प्रशासनिक पुनर्गठन
South-West Frontier Agency की व्यवस्था अंततः 1854 में समाप्त कर दी गई और प्रशासनिक अधिकार बंगाल सरकार के अधीन नियुक्त आयुक्त के ढांचे में पुनर्गठित हुए।
लेकिन जिस समय प्रशासन अपनी संस्थागत संरचना बदल रहा था, गांवों में भूमि विवाद जारी थे।
मुंडाओं की शिकायत थी कि मूल बसाहटकर्ताओं के अधिकार समाप्त अथवा संकुचित हो रहे हैं।
जमींदार और मध्यस्थ अपने अधिकार बढ़ा रहे हैं।
भूमि मुकदमों में पारंपरिक अधिकार पर्याप्त सुरक्षा नहीं दे पा रहे हैं।
इससे धीरे-धीरे सरदारी लड़ाई का जन्म हुआ।
1858 के बाद : राज बदला, भूमि संबंध नहीं
1857 के विद्रोह के बाद 1858 में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हुआ और भारत सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन आ गया।
लेकिन मुंडा किसान के लिए केवल शासक संस्था बदलने से भूमि प्रश्न हल नहीं हुआ।
इसलिए बिरसा आंदोलन के संदर्भ में ‘ब्रिटिश शासन’ का अर्थ केवल कंपनी अथवा क्राउन के बीच अंतर नहीं है।
मुंडा गांव के लिए महत्वपूर्ण था औपनिवेशिक भूमि-राजस्व राज्य की निरंतरता।
1869 का छोटानागपुर टेन्योर कानून
लगातार शिकायतों और भूमि-विवादों ने सरकार को कुछ पारंपरिक भूमि-अधिकारों की पहचान की दिशा में कदम उठाने के लिए बाध्य किया।
17 मार्च 1869 को Chota Nagpur Tenures Act लागू हुआ।
इस कानून की प्रस्तावना अत्यंत महत्वपूर्ण है। उसमें स्वयं स्वीकार किया गया कि छोटानागपुर में बहुत पुराने समय से कुछ ऐसे भू-अधिकार मौजूद थे जिन्हें भुईंहरी कहा जाता था और जिन्हें गांव के मूल संस्थापकों के वंशजों से जोड़ा जाता था। कानून ने पाहन और अन्य ग्राम पदाधिकारियों से संबंधित कुछ परंपरागत भूमि श्रेणियों को दर्ज करने की आवश्यकता भी स्वीकार की।
कानून आया, असंतोष क्यों नहीं गया?
भूमि हस्तांतरण पर नियंत्रण होगा या नहीं?
‘दिकू’ का प्रश्न : भूमि, कर्ज, बेगार और औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध मुंडा प्रतिरोध
‘दिकू’ को केवल ‘बाहरी’ कह देना पर्याप्त नहीं
मुंडा उलगुलान के इतिहास में ‘दिकू’ सबसे अधिक प्रयुक्त और साथ ही सबसे अधिक गलत समझे जाने वाले शब्दों में से एक है। सामान्य विवरणों में इसका अर्थ अक्सर सीधे-सीधे ‘बाहरी व्यक्ति’ या ‘गैर-आदिवासी’ कर दिया जाता है। यह अर्थ पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन अधूरा है।
उन्नीसवीं सदी के छोटानागपुर में दिकू की राजनीतिक धारणा मुख्यतः उन बाहरी अथवा मध्यस्थ समूहों के लिए तीखी हुई जो मुंडा समाज की जमीन, लगान, कर्ज, श्रम और प्रशासनिक अधीनता से जुड़े थे।
इसमें परिस्थिति के अनुसार शामिल हो सकते थे—
और औपनिवेशिक प्रशासन से लाभ प्राप्त करने वाले दूसरे बाहरी तत्व।
बिरसा आंदोलन के समय तक इस धारणा का दायरा और बढ़ गया। ब्रिटिश सरकार और उसके विभिन्न संस्थानों को भी उस व्यापक सत्ता-संरचना से जोड़ा जाने लगा जिसने इन मध्यस्थों को शक्ति प्रदान की थी।
NCERT भी बिरसा आंदोलन की व्याख्या करते हुए दिकुओं को उन ‘outsiders’ से जोड़ता है जिनकी सत्ता के कारण आदिवासी अपने पुराने जीवन, आजीविका और अधिकारों के संकट का अनुभव कर रहे थे।
इसलिए दिकू केवल यह नहीं बताता था कि—
दिकू-विरोध नस्ली घृणा नहीं था
यदि दिकू का अर्थ हर गैर-मुंडा या हर बाहरी व्यक्ति मान लिया जाए, तो मुंडा उलगुलान को एक सरल जातीय संघर्ष में बदल दिया जाएगा।
छोटानागपुर में सदियों से विभिन्न समुदायों के बीच संपर्क था। व्यापार, कारीगरी, सेवा, कृषि और राजनीतिक संबंधों के कारण बाहर से आने वाले लोग पहले भी वहां रहते थे।
‘दिकू’ की राजनीतिक धारणा तब अधिक शक्तिशाली हुई जब बाहरी व्यक्ति ऐसी आर्थिक या प्रशासनिक भूमिका में दिखाई दिया जिसके कारण मुंडा अपने भूमि-अधिकार, स्वतंत्रता या श्रम पर दबाव अनुभव करता था।
इसलिए दिकू-विरोध का मूल सामाजिक अर्थ था—
बाहरीपन + शोषणकारी आर्थिक भूमिका + नई सत्ता का संरक्षण।
सबसे पहले जमीन
दिकू-विरोध का सबसे गहरा आधार भूमि थी।
पिछले खंडों में हमने देखा कि मुंडा खूंटकट्टीदार स्वयं को भूमि का साधारण किरायेदार नहीं मानता था।
भूमि पर वंशीय–सामुदायिक अधिकार स्थापित किया।
अब यदि कोई बाहरी जमींदार या ठेकेदार आकर कहे कि—
“यह जमीन मेरे अधिकार में है और तुम्हें मुझे लगान देना होगा,”
तो मुंडा किसान की दृष्टि में संघर्ष केवल रकम को लेकर नहीं था।
आधुनिक अध्ययनों में भी स्थायी बंदोबस्त और बाद के औपनिवेशिक भूमि कानूनों द्वारा खूंटकट्टी जैसी संयुक्त वंशीय भूमि व्यवस्था को बदलने तथा जमींदार–रैयत संबंध मजबूत होने की प्रक्रिया को छोटानागपुर के कृषि संकट की केंद्रीय पृष्ठभूमि माना गया है।
जमींदार : सबसे दिखाई देने वाला दिकू
मुंडा किसान के सामने औपनिवेशिक भूमि व्यवस्था का सबसे स्पष्ट चेहरा अक्सर जमींदार था।
रैयत की स्थिति तय करने का दावा करता था,
अतिरिक्त देनदारियों की मांग कर सकता था,
और विवाद होने पर अदालत तथा प्रशासन का सहारा ले सकता था।
यहां एक ऐतिहासिक सावधानी आवश्यक है।
छोटानागपुर में जमींदारी या उच्च भूमि-अधिकार ब्रिटिश शासन से पूरी तरह पहले से अनुपस्थित नहीं थे। नागवंशी राजसत्ता और विभिन्न स्थानीय भू-अधिकार पहले भी मौजूद थे।
लेकिन औपनिवेशिक शासन ने इन अधिकारों को अधिक स्पष्ट राजस्व और संपत्ति संबंधों में बदल दिया।
इससे जमींदार की शक्ति केवल स्थानीय सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं रही।
उसके पीछे औपनिवेशिक कानून खड़ा हो गया।
और यही परिवर्तन मुंडा किसान की दृष्टि में निर्णायक था।
जमीन पर दो विरोधी दावे
इस संघर्ष को सरल रूप में इस तरह समझा जा सकता है।
खूंटकट्टीदार का दावा
“यह हमारे पूर्वजों की बसाई हुई भूमि है।”
जमींदार का दावा
“मुझे इस गांव अथवा भूमि से लगान लेने का कानूनी अधिकार है।”
औपनिवेशिक प्रशासन का प्रश्न
“राजस्व अभिलेख में अधिकार किसके नाम दर्ज है?”
यहीं तीन अलग-अलग संसार टकरा रहे थे—
उलगुलान की पृष्ठभूमि इसी टकराव से बनी।
ठेकेदार : कम समय में अधिक वसूली
जमींदार की तुलना में ठेकेदार या थिकेदार कई बार मुंडा किसान के जीवन में अधिक प्रत्यक्ष और आक्रामक शक्ति बन सकता था।
यदि किसी क्षेत्र से लगान वसूली का अधिकार ठेके पर दिया गया, तो ठेकेदार का आर्थिक हित स्पष्ट था—
स्थायी भू-समुदाय से उसके संबंध दीर्घकालीन न भी हों, तो उसे गांव की सामाजिक स्थिरता से उतनी चिंता नहीं होगी जितनी वसूली से।
यही संरचना अनेक प्रकार की अतिरिक्त मांगों को जन्म दे सकती थी।
यानी ठेकेदार मुंडा किसान के लिए केवल कर-वसूलने वाला नहीं बल्कि उसके रोजमर्रा के जीवन में प्रवेश करने वाली सत्ता बन गया।
‘दिकू राज’ की सामाजिक संरचना
यहां यह समझना उपयोगी है कि मुंडा किसान की दृष्टि में अलग-अलग दिकू हमेशा अलग दिखाई नहीं देते होंगे।
ठेकेदार कहता है—अतिरिक्त भुगतान करो।
राजस्व अधिकारी कहता है—रजिस्टर में यही दर्ज है।
किसान के अनुभव में ये सभी अलग संस्थाएं होते हुए भी एक सत्ता-श्रृंखला बन सकती थीं।
इसीलिए दिकू-विरोध धीरे-धीरे किसी एक व्यक्ति के विरुद्ध रोष न रहकर एक व्यवस्था-विरोध में बदल गया।
महाजन : कर्ज से जमीन तक
दिकू की दूसरी महत्वपूर्ण आकृति था महाजन या साहूकार।
औपनिवेशिक कृषि व्यवस्था में नकद भुगतान का महत्व बढ़ने पर किसान की नकदी आवश्यकता भी बढ़ी।
ऐसी स्थिति में महाजन से कर्ज लिया जाता।
समस्या कर्ज लेने में नहीं, बल्कि उसकी शर्तों और भुगतान की असमान शक्ति में थी।
भूमि या फसल को सुरक्षा के रूप में लेना,
इन प्रक्रियाओं के कारण ऋण आर्थिक सहायता से भूमि-अधिग्रहण का माध्यम बन सकता था।
कर्ज का गणित और किसान की निर्भरता
किसान की सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि कर्ज का समय और कृषि का समय अलग होते हैं।
नई जरूरत पैदा हुई तो पुराना कर्ज चुकाने के लिए नया कर्ज लिया जाता है।
इस प्रकार किसान ऋण-जाल में प्रवेश कर सकता है।
यदि उसके पास सबसे मूल्यवान संपत्ति जमीन ही है, तो अंततः कर्ज का संघर्ष भूमि पर पहुंच जाता है।
इसलिए मुंडा समाज में महाजन-विरोध केवल ब्याज दर का प्रश्न नहीं था।
लिखित हिसाब बनाम मौखिक समझ
महाजन की शक्ति औपनिवेशिक कानून के कारण और बढ़ सकती थी।
मुंडा किसान आर्थिक व्यवहार को स्थानीय परंपरा और आपसी समझ के आधार पर देखता हो सकता था।
लेकिन महाजन के पास लिखित दस्तावेज हो सकता था।
अदालत में यही कागज निर्णायक बन सकते थे।
इससे वही समस्या उत्पन्न हुई जो भूमि विवाद में दिखाई देती है—
जिस व्यवस्था में दस्तावेजी प्रमाण सर्वोच्च है, उसमें साक्षर और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से परिचित व्यक्ति को स्वाभाविक लाभ मिलता है।
साहूकार और जमींदार का संबंध
महाजन और जमींदार हमेशा एक ही व्यक्ति नहीं थे।
लेकिन किसान के अनुभव में दोनों की भूमिकाएं जुड़ सकती थीं।
यही कारण है कि भूमि और महाजनी शोषण अलग-अलग प्रश्न नहीं थे।
बेथ-बेगारी : दिकू सत्ता का सबसे अपमानजनक रूप
दिकू प्रभुत्व का एक महत्वपूर्ण पहलू था बेथ-बेगारी।
इसके अंतर्गत रैयत से बिना उचित मजदूरी के अथवा पारंपरिक दायित्व के नाम पर श्रम कराया जा सकता था।
जमींदार या उसके अधिकारियों की यात्रा में सेवा देना।
आर्थिक दृष्टि से यह किसान के श्रम का अवैतनिक दोहन था।
लेकिन सामाजिक दृष्टि से इसका अर्थ इससे भी बड़ा था।
मुंडा किसान स्वयं को उस भूमि का मूल अधिकारधारी समझता था।
अब उसे उसी क्षेत्र में किसी बाहरी अधिकारधारी की मुफ्त सेवा करनी पड़ रही थी।
इससे बेगार केवल शोषण नहीं बल्कि अधीनता का प्रतीक बन गई।
1890 के दशक में सरदारी आंदोलन और फिर उलगुलान के पीछे भूमि-अधिकार के क्षरण के साथ जबरन श्रम की समस्या को भी इतिहासलेखन बार-बार रेखांकित करता है।
आर्थिक नुकसान से अधिक—सम्मान का प्रश्न
यहीं मुंडा प्रतिरोध की एक महत्वपूर्ण मानसिक संरचना समझ में आती है।
मान लें किसी किसान से एक दिन मुफ्त श्रम लिया गया।
उसका सीधा आर्थिक नुकसान सीमित दिखाई दे सकता है।
इसलिए बेगारी आर्थिक और सामाजिक अपमान दोनों का प्रतीक बनी।
बाद के किसान आंदोलनों में भी हम देखते हैं कि प्रतिरोध केवल रकम के कारण नहीं फूटता; सम्मान और अधीनता भी उतने ही शक्तिशाली कारण हो सकते हैं।
मुंडा उलगुलान इसका प्रारंभिक और प्रभावशाली उदाहरण है।
अतिरिक्त कर और ‘अबवाब’
नियमित लगान के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार की स्थानीय देनदारियां भी किसानों पर बोझ डाल सकती थीं।
इनमें अलग-अलग क्षेत्रों और कालों में विभिन्न अबवाब, शुल्क, सलामी अथवा अवसर विशेष पर भुगतान शामिल हो सकते थे।
यहां सावधानी जरूरी है कि हम हर स्थान के लिए एक निश्चित सूची न मान लें।
जमींदार या मध्यस्थ का दावा केवल निर्धारित लगान तक सीमित न रहकर किसानों के उत्पादन और श्रम के अनेक हिस्सों तक फैल सकता था।
इससे किसान को अनुभव होता था कि उसकी खेती का अधिशेष लगातार बाहर जा रहा है।
बाजार का प्रवेश और व्यापारी
मुंडा समाज आत्मनिर्भर और बाहरी दुनिया से पूर्णतः कटा हुआ नहीं था।
लेकिन बाजार संबंधों के विस्तार ने नए आर्थिक मध्यस्थों की भूमिका बढ़ाई।
व्यापारी गांव से कृषि या वन उत्पाद खरीद सकता था।
किसान बाजार भाव से हमेशा परिचित नहीं होता।
परिवहन और बाजार तक पहुंच व्यापारी के हाथ में हो सकती थी।
जब व्यापारी, महाजन और ठेकेदार की भूमिकाएं परस्पर जुड़ती गईं, तब बाहरी आर्थिक शक्ति के प्रति अविश्वास बढ़ना स्वाभाविक था।
क्या मिशनरी भी ‘दिकू’ थे?
बिरसा आंदोलन में यह प्रश्न विशेष रूप से जटिल है।
ईसाई मिशनरियों को सीधे महाजन या जमींदार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
कुछ परिस्थितियों में आदिवासी किसानों ने मिशन से जमींदारों और भूमि-संबंधी शोषण के विरुद्ध सहायता की आशा भी की।
स्वयं बिरसा का जीवन भी मिशनरी शिक्षा के संपर्क से गुजरा।
लेकिन जब भूमि अधिकार की अपेक्षाएं पूरी नहीं हुईं और मिशनरी धर्म मुंडा परंपरा के लिए चुनौती के रूप में देखा जाने लगा, तो मिशन के प्रति निराशा बढ़ी।
आधुनिक शोध बिरसा उलगुलान के निर्माण में भूमि और मिशनरी संबंध दोनों को महत्वपूर्ण मानता है।
इसलिए मिशनरी को दिकू-विरोध में शामिल करने की प्रक्रिया मुख्यतः आर्थिक शोषण की वही प्रकृति नहीं थी जो महाजन या ठेकेदार के मामले में थी; इसमें धार्मिक–सांस्कृतिक सत्ता का प्रश्न भी जुड़ गया।
धर्म क्यों भूमि के संघर्ष में आया?
आधुनिक दृष्टि से जमीन और धर्म अलग विषय प्रतीत हो सकते हैं।
मुंडा समाज में ऐसा स्पष्ट विभाजन नहीं था।
भूमि से पूर्वजों की स्मृति जुड़ी थी।
गांव के धार्मिक स्थल भूमि से जुड़े थे।
कृषि पर्व सामुदायिक धर्म से जुड़े थे।
इसलिए भूमि व्यवस्था में परिवर्तन स्वयं सांस्कृतिक परिवर्तन बन सकता था।
जब मिशनरी नए धर्म का प्रचार करते हैं और उसी समय औपनिवेशिक शासन भूमि-संबंधों में बदलाव ला रहा है, तो गांव के अनुभव में दोनों को बिल्कुल अलग रखना हमेशा संभव नहीं था।
बिरसा इसी परिस्थिति में धार्मिक पुनरुत्थान को राजनीतिक संघर्ष से जोड़ते हैं।
दिकू और अदालत
औपनिवेशिक न्यायालय दिकू व्यवस्था की धारणा में क्यों शामिल हुआ?
क्योंकि मुंडा किसान ने बार-बार देखा कि जमींदार, महाजन या ठेकेदार अपने दावे को लागू कराने के लिए अदालत का उपयोग कर सकता है।
और अंतिम फैसला ऐसी कानूनी अवधारणाओं के आधार पर हो सकता है जो स्थानीय परंपरा से अलग थीं।
फिर भी यह ध्यान रखना चाहिए कि आदिवासी समुदाय केवल अदालत से दूर भागे नहीं। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बाद में उन्होंने कानूनी मुकदमों का सक्रिय उपयोग भी किया। शोध बताता है कि विद्रोह के साथ-साथ अदालतों के जरिए भूमि-अधिकार स्थापित करने की आदिवासी रणनीति भी महत्वपूर्ण थी।
यानी संघर्ष केवल बंदूक और तीर का नहीं था।
याचिका, मुकदमा और विद्रोह—तीनों साथ मौजूद थे।
पुलिस : राज्य का प्रत्यक्ष चेहरा
यदि जमींदार आर्थिक शक्ति था और अदालत कानूनी शक्ति, तो पुलिस औपनिवेशिक राज्य की प्रत्यक्ष भौतिक शक्ति थी।
इन सभी परिस्थितियों में पुलिस गांव तक पहुंच सकती थी।
इससे किसान के लिए ब्रिटिश शासन कोई दूर बैठी अमूर्त शक्ति नहीं रहा।
वह सिपाही और थाने के रूप में गांव के सामने उपस्थित था।
जब बिरसा आंदोलन उग्र हुआ, तो पुलिस और सरकारी प्रतिष्ठान स्वाभाविक रूप से प्रतिरोध के प्रतीकात्मक लक्ष्य बने।
‘सरकार’ कब दिकू व्यवस्था का हिस्सा बनी?
शुरुआत में मुंडा किसान की शिकायत प्रत्यक्ष शोषक के विरुद्ध हो सकती थी।
महाजन ने धोखा दिया है, अदालत न्याय करेगी।
ठेकेदार अत्याचार कर रहा है, अधिकारी उसे रोकेगा।
सरदारी आंदोलन के लंबे अनुभव में याचिकाएं और कानूनी उपाय इसी आशा को दिखाते हैं।
लेकिन यदि बार-बार शिकायत करने के बाद भी भूमि वापस न मिले,
यदि अदालत जमींदार का अधिकार मान ले,
यदि प्रशासनिक सुधार पर्याप्त न हों,
क्या समस्या केवल दिकू है, या वह सरकार भी है जो दिकू को शक्ति देती है?
यही परिवर्तन स्थानीय सामाजिक संघर्ष को औपनिवेशिक सत्ता-विरोध में बदलने की दिशा में निर्णायक कदम था।
सरदारी लड़ाई की निराशा
1850 के दशक से 1890 के दशक तक चली सरदारी लड़ाई ने मुंडा समाज को राजनीतिक अनुभव दिया।
सरकारी अधिकारियों तक शिकायतें पहुंचाईं।
इसीलिए सरदारी आंदोलन की सीमित सफलता बिरसा के उभार को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यदि शांतिपूर्ण कानूनी उपाय पर्याप्त होते, तो उलगुलान शायद वही रूप न लेता जो उसने लिया।
‘दिकू हटाओ’ से ‘राज बदलो’ तक
यहीं दिकू-विरोध का राजनीतिक विकास दिखाई देता है।
दूसरा चरण
जमींदार, महाजन और ठेकेदार मिलकर हमारा शोषण करते हैं।
चौथा चरण
औपनिवेशिक सरकार इस पूरी व्यवस्था के पीछे है।
छठा चरण
इसी मार्ग से सामाजिक–आर्थिक असंतोष मुंडा राज की राजनीतिक कल्पना तक पहुंचता है।
समुदाय की सीमा अधिक स्पष्ट हुई
दिकू की अवधारणा का एक दूसरा प्रभाव भी पड़ा।
जब कोई समुदाय बाहरी दबाव अनुभव करता है, तो उसकी आंतरिक पहचान अधिक स्पष्ट हो सकती है।
दिकू-विरोध इसलिए केवल शत्रु की पहचान नहीं था।
वह अपने समुदाय की पहचान को भी पुनर्परिभाषित कर रहा था।
लेकिन ‘हम’ भी एकरूप नहीं थे
मुंडा समाज के सभी लोग एक समान आर्थिक स्थिति में नहीं थे।
सभी मुंडा बिरसा के समर्थक नहीं बने।
सभी ईसाई मुंडाओं की स्थिति समान नहीं थी।
सभी सरदारों ने एक ही रणनीति नहीं अपनाई।
कुछ लोगों के औपनिवेशिक प्रशासन, मिशन या स्थानीय जमींदारों से अलग-अलग प्रकार के संबंध हो सकते थे।
को पूर्णतः दो साफ, एकरूप शिविरों में बांटना इतिहास की वास्तविक जटिलता को मिटा देगा।
आंदोलन में पहचान राजनीतिक रूप से निर्मित और पुनर्गठित हो रही थी।
दिकू-विरोध और जातीय चेतना
दिकू की राजनीतिक अवधारणा ने मुंडा जातीय–सामुदायिक चेतना को तीखा किया।
अब भूमि का संघर्ष केवल व्यक्तिगत किसान की समस्या नहीं रहा।
यदि किसी एक खूंट की भूमि जाती है, तो यह पूरे मुंडा भूमि-संसार के लिए खतरे का उदाहरण बन सकती है।
यदि बेगार किसी एक गांव में है, तो वही व्यवस्था दूसरे गांव तक पहुंच सकती है।
यदि मिशनरी धर्म परिवर्तन कराते हैं, तो इसे सामुदायिक धार्मिक व्यवस्था के संकट के रूप में देखा जा सकता है।
यदि पुलिस बिरसा के अनुयायियों को गिरफ्तार करती है, तो संघर्ष सीधे सरकार से हो जाता है।
इस प्रकार स्थानीय शिकायतें एक सामूहिक ऐतिहासिक संकट में बदल गईं।
बिरसा की सफलता इसी जोड़ में थी
बिरसा मुंडा की ऐतिहासिक क्षमता यही थी कि उन्होंने अलग-अलग शिकायतों को एक साझा राजनीतिक–धार्मिक कथा में जोड़ दिया।
पुराना धर्म और समाज क्यों संकट में है?
क्योंकि वही इस व्यवस्था की संरक्षक है।
इस प्रकार अनेक स्थानीय समस्याओं को एक ही उत्तर में बदला जा सकता था—
पुराना न्यायपूर्ण संसार समाप्त हो गया है और उसे वापस लाना होगा।
यही बिरसा के आंदोलन में ‘स्वर्ण युग’ और ‘नए राज’ की कल्पना को शक्ति देता है।
बिरसा का ‘स्वर्ण युग’
बिरसा के संदेश में एक ऐसे अतीत की कल्पना दिखाई देती है जिसमें—
इतिहास की दृष्टि से यह पूछना आवश्यक नहीं कि ऐसा आदर्श स्वर्ण युग ठीक उसी रूप में कभी अस्तित्व में था या नहीं।
राजनीतिक दृष्टि से उसका महत्व यह था कि उसने वर्तमान शोषण के मुकाबले एक वैकल्पिक व्यवस्था की कल्पना प्रस्तुत की।
NCERT भी बिरसा की दृष्टि में एक ऐसे पुराने ‘golden age’ की पुनर्स्थापना का उल्लेख करता है जिसमें मुंडा अपने पुराने अधिकार और जीवन-पद्धति पुनः प्राप्त करें।
दिकू-विरोध और मिलेनरियन राजनीति
इतिहासकार बिरसा आंदोलन में कई बार मिलेनरियन या मसीहाई तत्व की चर्चा करते हैं।
इसका अर्थ है ऐसी राजनीतिक–धार्मिक धारणा जिसमें वर्तमान अन्यायपूर्ण व्यवस्था के शीघ्र अंत और एक नई न्यायपूर्ण दुनिया के आगमन की आशा हो।
बिरसा केवल आर्थिक मांगों का ज्ञापन नहीं दे रहे थे।
उनके अनुयायियों के लिए वे धार्मिक शक्ति से संपन्न नेता थे।
उनके माध्यम से पुरानी दुनिया समाप्त होगी।
इस धार्मिक विश्वास ने आर्थिक असंतोष को अत्यंत शक्तिशाली राजनीतिक ऊर्जा प्रदान की।
आधुनिक इतिहासलेखन उलगुलान के इस मसीहाई तत्व को भूमि संकट और सामाजिक शोषण से जोड़कर देखता है, न कि उनसे अलग।
दिकू और ब्रिटिश सरकार में अंतर मिटना
उलगुलान के निर्णायक चरण तक पहुंचते-पहुंचते स्थानीय शोषक और औपनिवेशिक राज्य के बीच राजनीतिक अंतर काफी हद तक मिट चुका था।
जमींदार का अधिकार औपनिवेशिक कानून से सुरक्षित था।
ठेकेदार की वसूली व्यवस्था राजस्व ढांचे से जुड़ी थी।
और सरकार बिरसा के संगठन को चुनौती मान रही थी।
क्या उलगुलान सभी दिकुओं की हत्या का आंदोलन था?
1899–1900 में हिंसा हुई और कुछ लक्ष्यों का चयन उनकी सत्ता और पहचान के कारण किया गया। मिशन प्रतिष्ठानों, पुलिस और औपनिवेशिक सत्ता से जुड़े प्रतीकों पर हमले हुए।
बिरसा आंदोलन का व्यापक उद्देश्य था—
पुराने भूमि-अधिकारों की पुनर्स्थापना,
और अपनी राजनीतिक–धार्मिक व्यवस्था की स्थापना।
बेथ-बेगारी और ग्रामीण शोषण : श्रम, लगान, देनदारियां और मुंडा स्वाभिमान का प्रश्न
जमीन पर अधिकार के बाद शरीर और श्रम पर अधिकार
मुंडा उलगुलान की पृष्ठभूमि में भूमि-अधिकार जितना महत्वपूर्ण था, उतना ही महत्वपूर्ण था श्रम पर नियंत्रण। यदि खूंटकट्टी भूमि पर जमींदार–ठेकेदार का दावा मुंडा किसान को अपनी ही जमीन पर रैयत में बदल रहा था, तो बेथ-बेगारी उसे सामाजिक रूप से अधीन प्रजा का अनुभव करा रही थी।
बेथ-बेगारी का सामान्य अर्थ था ऐसा श्रम या सेवा जो किसान से बिना सामान्य मजदूरी के, अत्यल्प प्रतिफल पर अथवा भूमि-अधीनता और परंपरागत दायित्व के नाम पर कराई जाती थी। इसके वास्तविक रूप क्षेत्र, समय और जमींदारी व्यवस्था के अनुसार अलग हो सकते थे; इसलिए इसे किसी एक निश्चित सूची में बांधना उचित नहीं। फिर भी ऐतिहासिक स्रोत स्पष्ट हैं कि छोटानागपुर में ठेकेदारों और दूसरे भू-अधिकारधारियों द्वारा rent and services के साथ beth begari, अर्थात बाध्य श्रम, की मांग आदिवासी असंतोष का गंभीर कारण बन चुकी थी। 1831–32 के कोल विद्रोह की पृष्ठभूमि में भी इसका उल्लेख मिलता है।
बाद के दशकों तक समस्या खत्म नहीं हुई। रांची के आधिकारिक जिला इतिहास में भी उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध के सरदारी आंदोलन की पृष्ठभूमि में बेगारी और मध्यस्थों द्वारा अवैध रूप से लगान बढ़ाने को कृषि असंतोष के प्रमुख कारणों में गिना गया है।
इसलिए बेगारी को केवल मुफ्त मजदूरी कह देना पर्याप्त नहीं है। वह मुंडा समाज में एक बड़े प्रश्न का प्रतीक बन चुकी थी—
‘बेथ’ और ‘बेगारी’ : एक आवश्यक सावधानी
इतिहासलेखन में ‘बेथ’, ‘बेगारी’, ‘बेथ-बेगारी’ और भूमि से जुड़ी सेवा देनदारियों का उल्लेख मिलता है। व्यवहार में इनके रूप और स्थानीय नाम अलग-अलग हो सकते थे।
व्यापक अर्थ में तीन स्थितियां अलग करना उपयोगी है।
पहली, ऐसी सामुदायिक श्रम-परंपराएं जिनमें गांव के लोग परस्पर सहायता के आधार पर काम करते थे।
दूसरी, किसी भूमि-अधिकार या प्रथा से जुड़ी ऐसी सेवाएं जिन्हें स्थानीय व्यवस्था वैध दायित्व मानती थी।
तीसरी, जमींदार, ठेकेदार या दूसरे शक्तिशाली व्यक्ति द्वारा किसान पर थोपी गई ऐसी सेवा जो बाध्यकारी, अत्यधिक अथवा बिना समुचित भुगतान की थी।
उलगुलान की पृष्ठभूमि में शिकायत विशेष रूप से तीसरे प्रकार के शोषण और परंपरागत सेवा-दायित्वों के विस्तार को लेकर थी।
इस भेद को बनाए रखना आवश्यक है, क्योंकि मुंडा समाज स्वयं सामुदायिक श्रम से अपरिचित नहीं था। समस्या सहयोगात्मक सामुदायिक श्रम नहीं बल्कि ऊपरी सत्ता द्वारा बाध्य श्रम थी।
बेगार किन कामों में ली जाती थी?
उन्नीसवीं सदी के छोटानागपुर में बेगार के रूप पूरी तरह एक जैसे नहीं थे। अलग-अलग इलाकों और जमींदारियों में रैयतों पर अलग सेवा-दायित्व हो सकते थे।
इनमें व्यापक रूप से शामिल हो सकते थे—
जमींदार अथवा उसके प्रतिनिधियों के लिए परिवहन की व्यवस्था करना,
घर अथवा अन्य निर्माण कार्यों में श्रम देना,
अधिकारियों अथवा भू-स्वामी की यात्राओं में सहायता करना,
हर सेवा को हर गांव पर समान रूप से लागू मानना उचित नहीं होगा, लेकिन मूल तत्व समान था—
रैयत की श्रम-शक्ति पर भू-अधिकारधारी का दावा।
यही दावा आर्थिक और राजनीतिक दोनों था।
किसान के सबसे मूल्यवान संसाधन पर कब्जा
गरीब किसान के पास हमेशा नकदी कम होती है, लेकिन उसके पास एक अत्यंत मूल्यवान संपत्ति होती है—
उसका श्रम और समय।
इनमें कुछ दिनों की देरी भी उत्पादन को प्रभावित कर सकती है।
यदि ठीक कृषि के महत्वपूर्ण समय में किसान को जमींदार या ठेकेदार के लिए बेगार करनी पड़े, तो उसका वास्तविक नुकसान केवल उस दिन की मजदूरी नहीं है।
उसकी अपनी खेती प्रभावित हो सकती है।
मुफ्त श्रम भी गया और अपनी खेती का समय भी।
भूमि-अधीनता से श्रम-अधीनता
बेगारी की सबसे महत्वपूर्ण संरचनात्मक विशेषता यह थी कि उसका संबंध भूमि से था।
क्योंकि वह जमींदार की भूमि पर रैयत माना जाता है।
यानी भूमि का श्रेष्ठ अधिकार दावा करने वाला व्यक्ति केवल लगान ही नहीं मांगता; वह रैयत से सेवा भी मांग सकता है।
मुंडा खूंटकट्टीदार के लिए यह विशेष रूप से अस्वीकार्य था।
तुम रैयत हो और रैयत के कुछ सेवा-दायित्व हैं।
यहीं खूंटकट्टी और बेगारी के प्रश्न एक-दूसरे से जुड़ते हैं।
लगान केवल एक रकम नहीं था
उपनिवेशकालीन कृषि संबंधों को समझते समय ‘लगान’ शब्द भी सावधानी से पढ़ना चाहिए।
किसान पर वास्तविक बोझ केवल मूल किराया या लगान नहीं था।
उसके ऊपर अतिरिक्त भुगतान, वस्तु के रूप में देनदारियां और श्रम-सेवाएं भी हो सकती थीं।
बाद के बंदोबस्त संबंधी स्रोतों में अबवाब और रकुमत जैसी श्रेणियों का उल्लेख मिलता है। IGNOU के अध्ययन के अनुसार अबवाब किसानों से जमींदारों और अधिकारियों द्वारा वसूले जाने वाले विभिन्न अतिरिक्त कर थे, जबकि रकुमत वस्तु के रूप में देनदारियों से संबंधित थी। बाद के बंदोबस्त में इन प्रेडियल अर्थात भूमि-संबंधी सेवाओं और रकुमतों को नकद में बदलने की प्रक्रिया अपनाई गई।
इसलिए किसी रैयत की वास्तविक देनदारी को केवल मूल लगान देखकर नहीं समझा जा सकता।
अबवाब : छोटे-छोटे भुगतान, बड़ा बोझ
अबवाब सामान्यतः मूल लगान के ऊपर लगाए जाने वाले अतिरिक्त उपकरों या देनदारियों के लिए प्रयुक्त शब्द था।
इनकी प्रकृति जगह-जगह भिन्न हो सकती थी।
समस्या यह थी कि कई छोटे भुगतान मिलकर किसान पर बड़ा बोझ डाल सकते थे।
एक किसान को यदि केवल एक निश्चित किराया देना हो तो वह अपने उत्पादन की योजना उसके अनुसार बना सकता है।
लेकिन यदि उसके ऊपर बार-बार अतिरिक्त मांगें आएं—
तो वास्तविक देनदारी अनिश्चित हो जाती है।
अनिश्चितता स्वयं शोषण का साधन बन सकती है।
क्योंकि किसान पहले से नहीं जानता कि वर्ष के अंत तक उससे कुल कितना लिया जाएगा।
रकुमत : वस्तु में देनदारी
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सभी भुगतान नकद में नहीं होते थे।
कुछ देनदारियां वस्तुओं के रूप में दी जाती थीं।
या स्थानीय व्यवस्था के अनुसार दूसरी सामग्री।
इन्हें व्यापक तौर पर रकुमत जैसी श्रेणियों में दर्ज किया गया।
बाद में औपनिवेशिक प्रशासन ने इन सेवाओं और वस्तु-देयताओं को नकद में परिवर्तित करने की कोशिश की। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पता चलता है कि औपनिवेशिक प्रशासन स्वयं स्वीकार कर रहा था कि रैयत की देनदारी केवल साधारण किराया नहीं थी।
1908 के छोटानागपुर काश्तकारी कानून में भी किराये को नकदी में बदलने की प्रक्रिया में उन रकुमतों और बेगारी को गणना में शामिल करने का प्रावधान दिखाई देता है जिन्हें कानूनन देय माना जाता था।
इससे एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट होती है—
बेगारी मुंडा शिकायतों की कल्पना मात्र नहीं थी; औपनिवेशिक भूमि कानून को भी उसका सामना करना पड़ा।
नकद में परिवर्तन—समाधान या नया संकट?
प्रशासन ने भूमि से जुड़ी सेवाओं और वस्तु-देयताओं को नकद किराये में बदलने को एक प्रकार की नियमितता माना।
अनिश्चित देनदारियों के बजाय एक निश्चित नकद राशि निर्धारित कर दी जाए।
सैद्धांतिक रूप से इससे रैयत को पता चल सकता था कि उसे कितना भुगतान करना है।
नकदी रहित अथवा सीमित नकदी वाली कृषि अर्थव्यवस्था में हर दायित्व को नकद में बदलने से किसान की बाजार और महाजन पर निर्भरता बढ़ सकती थी।
फसल चाहे घर के उपभोग के लिए पर्याप्त हो, नकद लगान के लिए उसे कुछ उपज बाजार में बेचनी पड़ सकती है।
इस प्रकार एक शोषणकारी श्रम-दायित्व को नकद में बदल देना अपने आप किसान को स्वतंत्र नहीं करता।
लगान बढ़ाने का प्रश्न
उन्नीसवीं सदी के छोटानागपुर में किसानों की शिकायतों में rent enhancement, अर्थात लगान बढ़ाए जाने का प्रश्न भी महत्वपूर्ण था।
रांची के आधिकारिक जिला इतिहास में मध्यस्थों द्वारा illegal enhancement of rent को सरदारी आंदोलन की प्रमुख पृष्ठभूमियों में गिना गया है। 1887 तक अनेक मुंडा और उरांव किसानों द्वारा जमींदारों को लगान देने से इनकार की स्थिति का भी उल्लेख मिलता है।
क्योंकि इससे संघर्ष की दिशा दिखाई देती है—
लगान-अस्वीकार।
जब किसान यह कहने लगे कि वह जमींदार को लगान ही नहीं देगा, तो वह केवल रकम पर सौदेबाजी नहीं कर रहा था।
वह जमींदार के अधिकार की वैधता को चुनौती दे रहा था।
“हम लगान क्यों दें?”
यही प्रश्न खूंटकट्टी व्यवस्था से निकलता था।
यदि मुंडा किसान स्वयं को साधारण किरायेदार मानता, तो उसका संघर्ष मुख्यतः उचित किराये तक सीमित रह सकता था।
तो किसी जमींदार को भूमि का श्रेष्ठ स्वामी मानकर उसे लगान क्यों दें?
इसलिए सरदारी आंदोलन में लगान-अस्वीकार और भूमि-अधिकार का दावा एक-दूसरे से जुड़ गया।
यहीं आर्थिक संघर्ष राजनीतिक अधिकार की ओर बढ़ता है।
ठेकेदार की समस्या और भी गंभीर क्यों थी?
स्थायी जमींदार का कम से कम किसी क्षेत्र से दीर्घकालीन हित जुड़ा हो सकता था।
लेकिन अल्पकालीन ठेकेदार की आर्थिक प्रवृत्ति अलग हो सकती थी।
यदि उसे सीमित समय के लिए राजस्व संग्रह का अधिकार मिला है, तो उसका उद्देश्य उस अवधि में अधिकतम वसूली करना हो सकता है।
ऊपर जितना देना है उससे अधिक नीचे से वसूलो।
इसीलिए ठेकेदारी प्रणाली में लगान, अतिरिक्त देनदारियों और बेगार का दबाव अधिक तीखा हो सकता था।
1831–32 के कोल विद्रोह के विवरण में भी ठेकेदारों द्वारा आदिवासी भूमि लेने, किराया और सेवाएं मांगने तथा बेथ-बेगारी कराने को विद्रोह के कारणों में गिना गया है।
यह बताता है कि बेगार का संकट बिरसा के जन्म से बहुत पहले शुरू हो चुका था।
एक शताब्दी लंबा असंतोष
यदि 1831–32 में बेथ-बेगारी और ठेकेदार-विरोध विद्रोह का कारण बन रहे थे,
और 1880–90 के दशकों में लगान तथा बेगारी सरदारी आंदोलन की शिकायत बने हुए थे,
तो 1899 का उलगुलान किसी क्षणिक आर्थिक संकट की प्रतिक्रिया नहीं था।
यह कई पीढ़ियों तक चले संघर्ष का परिणाम था।
मुंडा परिवार में एक पीढ़ी कोल विद्रोह की स्मृति सुनती है।
तीसरी बिरसा के उलगुलान में शामिल होती है।
इस प्रकार आर्थिक शोषण ऐतिहासिक स्मृति में बदल जाता है।
बेगार और परिवार की अर्थव्यवस्था
बेगारी का बोझ केवल उस पुरुष किसान पर नहीं पड़ता था जिसे श्रम के लिए बुलाया गया।
यदि वह अपनी खेती से अनुपस्थित है, तो परिवार के दूसरे सदस्यों पर काम का बोझ बढ़ता है।
महिलाओं को अधिक कृषि श्रम करना पड़ सकता है।
बच्चों और बुजुर्गों पर घरेलू दायित्व बढ़ सकते हैं।
अपनी फसल के महत्वपूर्ण काम प्रभावित हो सकते हैं।
इसलिए बेगार का सामाजिक प्रभाव परिवार के पूरे श्रम-विभाजन पर पड़ता था।
यही कारण है कि इसे केवल ‘एक आदमी से कुछ दिन मुफ्त काम’ की गणना में नहीं समेटना चाहिए।
महिलाओं पर अप्रत्यक्ष बोझ
मुंडा उलगुलान के लोकप्रिय इतिहास में अक्सर पुरुष योद्धाओं और बिरसा के नेतृत्व पर अधिक ध्यान रहता है।
लेकिन ग्रामीण शोषण की अर्थव्यवस्था का प्रभाव महिलाओं तक भी पहुंचता था।
पूरे परिवार की आजीविका संकट में आई।
इसलिए बेगारी और लगान का इतिहास मूलतः परिवार की अर्थव्यवस्था का भी इतिहास है।
श्रम की चोरी
आर्थिक दृष्टि से बेगारी को एक प्रकार से श्रम-अधिशेष के प्रत्यक्ष अधिग्रहण के रूप में समझा जा सकता है।
सामान्य मजदूरी संबंध में श्रमिक श्रम देता है और बदले में मजदूरी पाता है।
बेगारी में भू-अधिकार की असमानता के आधार पर श्रम लिया जाता है।
अर्थात किसान का अधिशेष दो रास्तों से बाहर जा सकता था—
बेगारी और स्वतंत्रता
यहां आर्थिक प्रश्न राजनीतिक हो जाता है।
वह जो अपनी खेती के बारे में स्वयं निर्णय ले सके।
अपना श्रम किसे देगा, यह स्वयं तय कर सके।
अपने उत्पादन का उपयोग कैसे करेगा, यह तय कर सके।
बेगारी इस स्वतंत्रता को सीमित करती थी।
किसी दूसरे के आदेश पर श्रम देना पड़ा तो किसान की व्यक्तिगत स्वायत्तता कम हो गई।
इसीलिए बेगार-विरोध केवल आर्थिक मांग नहीं था।
बेगारी और सम्मान
आर्थिक इतिहास कई बार आय, लगान और ऋण की गणना पर रुक जाता है, लेकिन किसान आंदोलनों में सम्मान भी महत्वपूर्ण आर्थिक श्रेणी बन जाता है।
मुंडा खूंटकट्टीदार स्वयं को गांव के मूल अधिकारधारी वंश का हिस्सा मानता है।
वह सामाजिक रूप से स्मरण करता है कि उसके पूर्वजों ने जंगल साफ कर गांव बसाया।
और अब कोई ठेकेदार उसे आदेश देता है—
ऐसी स्थिति में संघर्ष सिर्फ श्रम की कीमत का नहीं है।
क्या मैं रैयत हूं या गुलाम?
यहीं बेगारी स्वाभिमान का प्रश्न बन जाती है।
आर्थिक दायित्व से सामाजिक अधीनता तक
एक जमींदार के प्रति कई प्रकार की देनदारी होने का अर्थ यह था कि उसका प्रभाव किसान के जीवन के अनेक क्षेत्रों तक फैल गया।
इसलिए ग्रामीण शोषण अलग-अलग आर्थिक लेन-देन का समूह नहीं था।
मुंडा किसान के ऊपर ऐसी शक्तियों की श्रृंखला खड़ी थी जिनमें वह स्वयं को नीचे की स्थिति में देख रहा था।
यही ‘दिकू’ को अनुभव में वास्तविक बनाता था
‘दिकू’ कोई केवल वैचारिक शब्द नहीं था।
वह रोजमर्रा के जीवन में अनुभव किया जाता था।
सुबह खेत पर जाओ—जमीन पर जमींदार का दावा।
इस प्रकार दिकू व्यवस्था किसान के जीवन के हर चरण में दिखाई देती थी।
इसीलिए बिरसा के लिए अलग-अलग शिकायतों को एक व्यापक व्यवस्था-विरोध में जोड़ना संभव हुआ।
सरदारी आंदोलन में बेगारी का स्थान
सरदारी लड़ाई को केवल भूमि वापस पाने का आंदोलन कहना भी अधूरा है।
1887 तक अनेक मुंडा और उरांव किसानों का जमींदारों को लगान देने से इनकार करना बताता है कि आंदोलन अब याचिकाओं से आगे बढ़कर आर्थिक असहयोग की दिशा में पहुंच चुका था।
यह बाद के उलगुलान के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रशिक्षण था।
लगान न देना एक राजनीतिक कार्रवाई क्यों थी?
सामान्यतः लगान को आर्थिक भुगतान माना जाता है।
लेकिन यदि जमींदार का अधिकार ही विवादित हो, तो लगान देना राजनीतिक मान्यता बन जाता है।
लगान देकर किसान मानो स्वीकार कर रहा है—
इसलिए जब सरदार और किसान लगान न देने की ओर बढ़ते हैं, तो उसका अर्थ हो सकता है—
यहीं आर्थिक असहयोग समानांतर वैधता का प्रश्न बन जाता है।
बिरसा ने इसी असंतोष को नई भाषा दी
बिरसा मुंडा से पहले भूमि और बेगारी का संघर्ष मौजूद था।
बिरसा की विशेषता यह थी कि उन्होंने इसे केवल जमींदार से शिकायत के रूप में नहीं छोड़ा।
उन्होंने भूमि, धर्म और राज को एक साथ जोड़ दिया।
यदि बेगारी हमारी स्वतंत्रता के विरुद्ध है,
तो क्यों न पूरी व्यवस्था समाप्त की जाए?
यहीं बिरसा का संदेश अधिक क्रांतिकारी हो जाता है।
वह केवल बेहतर रैयती शर्तें नहीं मांगता।
उसकी राजनीति के भीतर अंततः रैयत होने की स्थिति से मुक्ति की आकांक्षा दिखाई देती है।
किसान से प्रजा और प्रजा से अधीन श्रमिक
औपनिवेशिक–जमींदारी व्यवस्था के भीतर मुंडा के अनुभव को तीन स्तरों पर पढ़ा जा सकता है।
राजनीतिक रूप से औपनिवेशिक शासन की प्रजा बनता है।
बेगारी में उसके श्रम पर भी श्रेष्ठ अधिकार का दावा होता है।
भूमि की अधीनता + राजनीतिक अधीनता + श्रम की अधीनता।
उलगुलान इन तीनों के विरुद्ध प्रतिक्रिया बनता है।
क्या हर बेगारी गैर-कानूनी थी?
इतिहास को सटीक रखने के लिए इस प्रश्न का उत्तर भी आवश्यक है।
नहीं। औपनिवेशिक कानून में कुछ भूमि-संबंधी सेवाओं या देनदारियों को परंपरागत और कानूनी रूप से देय माना जा सकता था, जबकि दूसरी वसूली अवैध अथवा विवादित हो सकती थी।
1908 के छोटानागपुर काश्तकारी कानून में भी नकद किराये में परिवर्तन करते समय “legally renderable” रकुमत और बेगारी को शामिल करने की भाषा दिखाई देती है।
मुंडा किसान का असंतोष केवल कानून तोड़ने वाले जमींदार से नहीं था।
कई बार समस्या स्वयं उस व्यवस्था से थी जो कुछ सेवा-दायित्वों को कानूनी मानती थी।
कानूनन वैध, लेकिन सामाजिक रूप से अन्यायपूर्ण
यही औपनिवेशिक शासन की एक बड़ी समस्या थी।
किसी देनदारी का कानूनन वैध होना यह सिद्ध नहीं करता कि किसान उसे न्यायपूर्ण मानता था।
हमारे पूर्वज भूमि के मालिक थे; हम किसी जमींदार के सेवक कैसे हुए?
इस प्रकार कानून और सामाजिक वैधता अलग हो गए।
यही दूरी विद्रोह के लिए उर्वर जमीन बनाती है।
बेगारी का नकदीकरण और औपनिवेशिक सुधार
उलगुलान के बाद हुए बंदोबस्त में प्रशासन ने भूमि से जुड़ी सेवाओं, अबवाबों और रकुमतों को अधिक स्पष्ट नकद भुगतान में बदलने का प्रयास किया। IGNOU के विवरण में उल्लेख है कि बिरसा आंदोलन के केंद्रीय क्षेत्रों में नई बंदोबस्त कार्रवाइयों के दौरान प्रेडियल सेवाओं को नकदी में बदला गया।
यह अपने आप में महत्वपूर्ण प्रशासनिक स्वीकारोक्ति थी।
इसलिए व्यवस्था को लिखित और अधिक निश्चित बनाना आवश्यक था।
लेकिन क्या इससे शोषण खत्म हो गया?
किसी दायित्व को नकद में बदल देने से शक्ति-संबंध समाप्त नहीं होते।
तो नकद किराया भी भारी बोझ बन सकता है।
इसलिए औपनिवेशिक सुधारों की सीमा यही थी—
उन्होंने कई बार शोषण के रूप को व्यवस्थित किया, उसके सामाजिक आधार को पूरी तरह खत्म नहीं किया।
1908 का कानून और बेगारी
छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 की विशेष महत्ता इस तथ्य में भी थी कि उसने खूंटकट्टी और मुंडारी खूंटकट्टी जैसी विशिष्ट काश्तकारी श्रेणियों को कानूनी रूप से परिभाषित किया और भूमि संबंधों को रिकॉर्ड करने का व्यापक ढांचा दिया। IGNOU के अध्ययन के अनुसार इस प्रक्रिया में कुछ मुंडाओं के खूंटकट्टी और भुईंहरी अधिकार भी बहाल किए गए।
कानून में रकुमत और बेगारी के नकदीकरण की व्यवस्था का होना बताता है कि ग्रामीण सेवा-दायित्व स्वयं भूमि-सुधार के एजेंडे का हिस्सा बन चुके थे।
इसलिए उलगुलान की विरासत केवल भूमि हस्तांतरण पर रोक तक सीमित नहीं है।
जंगल पर औपनिवेशिक नियंत्रण : वन कानून, सामुदायिक अधिकार और उलगुलान की पारिस्थितिकी
मुंडा समाज में जंगल केवल जंगल नहीं था
मुंडा उलगुलान को समझने के लिए जमीन और जंगल को दो पूरी तरह अलग विषयों के रूप में देखना उचित नहीं होगा। छोटानागपुर के मुंडा समाज में खेत, गांव और जंगल एक-दूसरे से जुड़े हुए जीवन-संसार के हिस्से थे।
कृषि उपकरणों के लिए सामग्री देता था।
फल, फूल, पत्ते और अन्य वन-उत्पाद देता था।
पेड़ों और पहाड़ियों से धार्मिक स्मृतियां जुड़ी थीं।
पूर्वजों और प्राकृतिक शक्तियों की उपस्थिति का अनुभव था।
आर्थिक संसाधन, सामुदायिक क्षेत्र, सांस्कृतिक भूगोल और धार्मिक संसार था।
यही कारण है कि औपनिवेशिक शासन द्वारा जंगल पर अधिकार का विस्तार केवल वन-प्रशासन में परिवर्तन नहीं था।
वह गांव की स्वायत्तता की सीमा को भी बदल रहा था।
फिर एक आवश्यक सावधानी : क्या उलगुलान मुख्यतः वन विद्रोह था?
मुंडा उलगुलान की सबसे प्रत्यक्ष और लगातार दिखाई देने वाली संरचनात्मक पृष्ठभूमि थी—
खूंटकट्टी भूमि-अधिकार का क्षरण, जमींदार–ठेकेदार का हस्तक्षेप, लगान, बेथ-बेगारी और सरदारी भूमि आंदोलन की विफलता।
मानक अध्ययन बिरसा आंदोलन की पृष्ठभूमि में सबसे पहले इसी परिवर्तन को रखते हैं—पुरानी खूंटकट्टी व्यवस्था की जगह जागीरदारों और ठेकेदारों से जुड़ी शोषणकारी व्यवस्था के विस्तार को।
“अंग्रेजों ने जंगल बंद कर दिए, इसलिए बिरसा विद्रोह हुआ”
लेकिन इसका उलटा निष्कर्ष भी गलत होगा कि जंगल का कोई महत्व नहीं था।
भूमि, जंगल और सामुदायिक स्वायत्तता एक-दूसरे से इतने गहरे जुड़े थे कि औपनिवेशिक वन नियंत्रण ने उस व्यापक संकट को और तीखा किया जिसमें उलगुलान पैदा हुआ।
जंगल और खूंटकट्टी का संबंध
खूंटकट्टी व्यवस्था की उत्पत्ति ही जंगल से हुई थी।
और उस ऐतिहासिक प्रक्रिया से भूमि पर अपना अधिकार निकाला।
इसलिए मुंडा की दृष्टि में जंगल कोई ऐसी खाली ‘सरकारी जमीन’ नहीं था जो गांव से बाहर शुरू हो जाती हो।
गांव और जंगल के बीच उपयोग की कई परतें थीं।
कुछ से लकड़ी और वन-उत्पाद लिए जाते थे।
इसलिए जंगल पर राज्य का दावा अंततः उस भूमि-अधिकार की अवधारणा से टकरा सकता था जिसमें पूर्वजों द्वारा बसाया गया भू-दृश्य एक संयुक्त सामाजिक क्षेत्र था।
औपनिवेशिक राज्य जंगल को किस नजर से देखता था?
ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने धीरे-धीरे जंगल को एक अलग प्रशासनिक श्रेणी के रूप में देखना शुरू किया।
रेलवे और सार्वजनिक निर्माण के लिए सामग्री,
सैन्य और प्रशासनिक आवश्यकता का संसाधन,
और ऐसा क्षेत्र जिसे वैज्ञानिक वन प्रबंधन के माध्यम से नियंत्रित किया जा सकता था।
यह दृष्टिकोण स्थानीय समुदाय की दृष्टि से बहुत अलग था।
मुंडा समाज जंगल को जीवन के भीतर देखता था।
औपनिवेशिक राज्य उसे धीरे-धीरे प्रशासन के अधीन संसाधन के रूप में वर्गीकृत करने लगा।
रेलवे और लकड़ी की बढ़ती मांग
उन्नीसवीं सदी में भारत में रेलवे के तेजी से विस्तार ने लकड़ी की मांग बढ़ाई।
रेलवे पटरियों के नीचे लगाए जाने वाले स्लीपर,
इन सबने जंगल को साम्राज्य के लिए आर्थिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण बना दिया।
वन अब केवल स्थानीय गांव के उपयोग का क्षेत्र नहीं था।
इसी व्यापक पृष्ठभूमि में ब्रिटिश भारत में संगठित वन विभाग और वन कानून विकसित हुए।
1865 का भारतीय वन अधिनियम
ब्रिटिश भारत में जंगलों पर राज्य नियंत्रण स्थापित करने की दिशा में Indian Forest Act, 1865 पहला महत्वपूर्ण अखिल-भारतीय कदम था।
इसका मूल उद्देश्य सरकार को कुछ वन क्षेत्रों पर अधिकार जताने और वन-उत्पादों के उपयोग को नियंत्रित करने की कानूनी शक्ति देना था।
1865 का कानून आगे आने वाली अधिक कठोर व्यवस्था की शुरुआत था।
सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन वैचारिक था—
अब राज्य कह रहा था कि कुछ जंगलों पर उसका ऐसा अधिकार है जिसके आधार पर वह तय कर सकता है कि—
और स्थानीय समुदाय के कौन-से उपयोग मान्य होंगे।
यानी जो काम पहले रिवाज से चलता था, वह धीरे-धीरे अनुमति का विषय बनने लगा।
1878 का भारतीय वन अधिनियम : निर्णायक मोड़
Indian Forest Act, 1878 ने औपनिवेशिक वन नियंत्रण को कहीं अधिक विस्तृत और व्यवस्थित बनाया।
इस कानून ने जंगलों को अलग-अलग कानूनी श्रेणियों में बांटने का ढांचा विकसित किया—विशेष रूप से Reserved Forests और Protected Forests।
आरक्षित वन सबसे नियंत्रित श्रेणी थी।
किसी क्षेत्र को आरक्षित घोषित करने से पहले वहां मौजूद स्थानीय अधिकारों और दावों की जांच की प्रक्रिया रखी गई।
लेकिन उसके बाद जंगल में उपयोग की स्वतंत्रता सीमित हो सकती थी।
इस व्यवस्था की मूल दिशा महत्वपूर्ण थी—
पहले स्थानीय समुदाय जंगल का उपयोग परंपरा के आधार पर करता था और राज्य की उपस्थिति सीमित थी।
राज्य कौन-सा उपयोग स्वीकार करेगा?
यही औपनिवेशिक वन शासन का मूल परिवर्तन था।
1927 का भारतीय वन अधिनियम बाद में इसी ढांचे को समेकित करते हुए संरक्षित जंगलों को ऐसी वन या बंजर भूमि से जोड़ता है जिस पर सरकार का मालिकाना अथवा अधिकार हो और सरकार को वन-उत्पाद तथा उपयोग पर नियंत्रण देता है।
अधिकार से ‘रियायत’ बनने की प्रक्रिया
क्या यह आपका कानूनी अधिकार दर्ज है?
यदि कोई प्रथा कानून में स्वीकार की गई तो वह बनी रह सकती थी।
तो उसका उपयोग प्रतिबंधित, नियंत्रित अथवा अनुमति-आधारित हो सकता था।
राज्य की दृष्टि
यह ऐसा उपयोग है जिसे सरकार मान्यता दे सकती है।
एक अधिकार को ‘सरकारी अनुमति’ में बदल देना सत्ता-संबंध का मूल परिवर्तन है।
आरक्षित जंगल और अधिकारों का ‘सेटलमेंट’
आरक्षित वन बनाने की प्रक्रिया में एक अधिकारी स्थानीय अधिकारों की जांच करता था।
सिद्धांततः यह अधिकारों को पहचानने की व्यवस्था भी थी।
स्थानीय समुदाय के अधिकार हमेशा लिखित नहीं थे।
उनकी सीमाएं आधुनिक नक्शे की तरह निश्चित नहीं थीं।
कोई गांव सदियों से जंगल का उपयोग करता हो सकता था लेकिन उसके पास लिखित शीर्षक नहीं था।
भूमि विवाद की वही समस्या अब जंगल में भी सामने आती है—
चराई क्यों महत्वपूर्ण थी?
पशु ग्रामीण कृषि अर्थव्यवस्था का आवश्यक हिस्सा थे।
गाय और अन्य पशु दूध, खाद तथा दूसरी जरूरतें पूरी करते थे।
पशुओं के लिए पर्याप्त निजी चरागाह हर किसान के पास नहीं था।
इसलिए गांव के आसपास के जंगल और खुले क्षेत्र चराई के लिए महत्वपूर्ण थे।
कुछ क्षेत्रों में प्रवेश नियंत्रित हुआ,
तो इसका प्रभाव केवल पशुपालन पर नहीं पड़ता था।
जंगल पर नियंत्रण अंततः खेत की उत्पादकता को भी प्रभावित कर सकता था।
जलावन : गरीब परिवार की ऊर्जा
आज ऊर्जा के लिए बिजली, गैस और कई दूसरे विकल्प उपलब्ध हैं।
उन्नीसवीं सदी के ग्रामीण छोटानागपुर में ऐसा नहीं था।
और अन्य वन सामग्री घरेलू जीवन के लिए आवश्यक थीं।
तो उसका प्रभाव सीधे घर की अर्थव्यवस्था पर पड़ता था।
विशेष रूप से गरीब परिवारों और महिलाओं के दैनिक श्रम पर।
घर और कृषि उपकरणों के लिए लकड़ी
हल, जुआ, हत्था और दूसरे कृषि उपकरणों के लिए भी लकड़ी आवश्यक थी।
यानी जंगल के बिना खेती भी पूरी तरह संभव नहीं थी।
वह सीधे कृषि अर्थव्यवस्था से जुड़ा था।
वन-उत्पाद और घरेलू अर्थव्यवस्था
छोटानागपुर के आदिवासी जीवन में अनेक प्रकार के गैर-काष्ठ वन-उत्पादों की भूमिका थी।
इनका उपयोग घर में भी होता और कुछ चीजें विनिमय अथवा बिक्री में भी काम आ सकती थीं।
विशेष रूप से महुआ जैसे वृक्ष का आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व बहुत व्यापक था।
NCERT छोटानागपुर के मुंडा और संथाल समाजों में महुआ और कदंब जैसे वृक्षों के धार्मिक महत्व का भी उल्लेख करता है।
यानी किसी वृक्ष का मूल्य सिर्फ बाजार में उसकी लकड़ी की कीमत से निर्धारित नहीं था।
क्या मुंडा मुख्यतः झूम खेती करते थे?
यहां एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सुधार आवश्यक है।
औपनिवेशिक आदिवासी इतिहास के सामान्य विवरणों में अक्सर झूम या shifting cultivation को सभी आदिवासी समुदायों पर समान रूप से लागू कर दिया जाता है।
मुंडाओं के मामले में ऐसा करना गलत होगा।
मुंडा खूंटकट्टी व्यवस्था स्वयं इस बात का प्रमाण है कि छोटानागपुर में मुंडा समाज लंबे समय से स्थिर गांव और स्थायी कृषि से गहराई से जुड़ा था।
उन्होंने जंगल साफ करके गांव और खेत स्थापित किए थे।
इसलिए उन्हें मुख्यतः घुमंतू झूम कृषक के रूप में प्रस्तुत करना गलत है।
हां, वन-आधारित भूमि उपयोग के विविध रूप, अस्थायी खेती, जंगल साफ करने की प्रक्रियाएं और गांव की कृषि सीमा के विस्तार जैसी गतिविधियां मौजूद हो सकती थीं।
दूसरे आदिवासी क्षेत्रों में shifting cultivation पर औपनिवेशिक प्रतिबंध बड़ा संघर्ष बना; छोटानागपुर के मुंडाओं में खूंटकट्टी और स्थायी कृषि की केंद्रीयता को अलग पहचानना चाहिए।
जंगल साफ करना : औपनिवेशिक नीति का विरोधाभास
औपनिवेशिक राज्य के रवैये में भी एक महत्वपूर्ण विरोधाभास था।
एक समय कृषि विस्तार और राजस्व बढ़ाने के लिए जंगल साफ करना उपयोगी माना गया।
लेकिन जैसे-जैसे व्यावसायिक लकड़ी और ‘वैज्ञानिक वानिकी’ का महत्व बढ़ा, वही जंगल राज्य के संरक्षण योग्य संसाधन बन गया।
कैम्ब्रिज के एक अध्ययन में छोटानागपुर के औपनिवेशिक भू-दृश्य के संदर्भ में यह दिखाया गया है कि राज्य ने एक ओर जंगल काटकर कृषि और स्थिर ग्राम समुदायों के विस्तार को प्रोत्साहित किया, दूसरी ओर कानून के माध्यम से भूमि और संसाधनों पर अपना श्रेष्ठ अधिकार विकसित किया।
बाद में जंगल बचाना ‘वैज्ञानिक प्रबंधन’ बन गया।
दोनों अवस्थाओं में अंतिम निर्णय समुदाय के बजाय राज्य के हाथ में जाता गया।
वैज्ञानिक वानिकी किसके लिए?
ब्रिटिश वन प्रशासन ने ‘scientific forestry’ की अवधारणा विकसित की।
और वन संसाधन को दीर्घकालीन सरकारी संपत्ति की तरह संचालित करना।
प्रशासनिक दृष्टि से यह तर्कसंगत व्यवस्था थी।
लेकिन स्थानीय समाज के लिए समस्या यह थी कि जंगल का मूल्य केवल व्यापारिक लकड़ी नहीं था।
व्यावसायिक वानिकी की दृष्टि इस बहु-उपयोगी संसार को संकीर्ण कर सकती थी।
‘बेकार भूमि’ किसकी?
औपनिवेशिक प्रशासन में जंगल, झाड़ी अथवा असर्वेक्षित भूमि को कई बार waste land जैसी श्रेणियों में रखा जाता था।
यहीं भाषा स्वयं राजनीतिक हो जाती है।
जो भूमि नियमित खेती में नहीं है, वह ‘बेकार’ दिखाई दे सकती है।
भविष्य के कृषि विस्तार की भूमि हो सकती है।
इसलिए ‘बेकार’ जमीन वास्तव में बेकार नहीं थी।
वह केवल राज्य की राजस्व गणना में पर्याप्त रूप से दिखाई नहीं देती थी।
सामुदायिक कॉमन्स पर राज्य का दावा
आधुनिक इतिहासलेखन में औपनिवेशिक वन कानून की सबसे महत्वपूर्ण आलोचनाओं में एक यह है कि उसने commons, यानी साझा प्राकृतिक संसाधनों, पर राज्य का दावा मजबूत किया।
आधुनिक Modern Asian Studies का एक अध्ययन भी बताता है कि भूमि-अधिकारों की रक्षा के लिए छोटानागपुर में विशिष्ट काश्तकारी कानून विकसित हुए, लेकिन वन कानून ऊपर से राज्य द्वारा लागू किए गए और सामुदायिक प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण ने ग्रामीण एवं आदिवासी जीवन को गहरे प्रभावित किया।
इसलिए उसे राज्य-अधीन घोषित करना पूरे समुदाय को एक साथ प्रभावित करता था।
अधिकार खोया या उपयोग सीमित हुआ?
यहां भाषा को सावधानी से इस्तेमाल करना चाहिए।
हर वन क्षेत्र में स्थानीय लोगों के सारे अधिकार एक साथ समाप्त नहीं हुए थे।
वन-उत्पाद लेने की सीमित अनुमति बनी रही,
“1878 के बाद आदिवासियों का जंगल में जाना पूरी तरह प्रतिबंधित हो गया”
गांव से वन विभाग तक
पहले जंगल के उपयोग का बड़ा हिस्सा स्थानीय रिवाज और समुदाय के स्तर पर तय होता था।
नई व्यवस्था में एक अलग संस्था खड़ी हुई—
यानी गांव और जंगल के बीच अब एक तीसरी सत्ता आ गई।
भूमि में पहले ही जमींदार और राजस्व प्रशासन गांव के ऊपर खड़े हो चुके थे।
अब जंगल में वन प्रशासन भी प्रवेश कर रहा था।
इससे मुंडा स्वायत्तता का क्षेत्र और संकुचित हुआ।
वन अपराध की नई अवधारणा
यह औपनिवेशिक वन कानून का सबसे गहरा सामाजिक परिणाम था।
ऐसा काम जो किसी परिवार ने पीढ़ियों से किया हो—
नई कानूनी व्यवस्था में कुछ परिस्थितियों में अपराध बन सकता था।
अपराध किसने बनाया?
यानी कानून केवल संसाधन नहीं नियंत्रित कर रहा था।
वह वैध और अवैध व्यवहार की नई परिभाषा भी बना रहा था।
वन रक्षक : राज्य का नया ग्रामीण चेहरा
जिस प्रकार भूमि क्षेत्र में पुलिस, कचहरी और राजस्व अधिकारी औपनिवेशिक सत्ता के प्रत्यक्ष चेहरे थे, उसी तरह जंगल में वन अधिकारी और वन रक्षक नई सत्ता का प्रतिनिधित्व करने लगे।
स्थानीय व्यक्ति को अब ऐसे अधिकारी का सामना करना पड़ सकता था जो तय करे—
इस प्रकार राज्य गांव के रोजमर्रा के जीवन में पहले से कहीं अधिक निकट उपस्थित हुआ।
जंगल और महिलाओं का श्रम
वन नियंत्रण का प्रभाव विशेष रूप से ग्रामीण महिलाओं पर भी पड़ सकता था।
इनका संग्रह अक्सर महिलाओं के दैनिक श्रम का हिस्सा होता था।
यह प्रभाव औपनिवेशिक अभिलेखों में हमेशा प्रमुखता से दर्ज नहीं होता, क्योंकि प्रशासन अधिकतर राजस्व, लकड़ी और कानून पर केंद्रित था।
लेकिन परिवार की अर्थव्यवस्था की दृष्टि से यह अत्यंत महत्वपूर्ण था।
जंगल और अकाल-प्रतिरोध
वन केवल सामान्य समय का संसाधन नहीं था।
कृषि संकट के समय उसकी भूमिका और बढ़ सकती थी।
फसल खराब हो तो जंगल से प्राप्त खाद्य पदार्थ परिवार को सहारा देते हैं।
ईंधन और घरेलू सामग्री बाजार से खरीदने की जरूरत कम होती है।
अर्थात जंगल ग्रामीण परिवार का एक प्रकार का सुरक्षा-जाल था।
यदि उस पर पहुंच सीमित होती है, तो किसान की बाजार और महाजन पर निर्भरता बढ़ सकती है।
इसलिए वन नियंत्रण और कर्ज का संबंध भी अप्रत्यक्ष रूप से बनता है।
जमीन कम हुई तो जंगल का महत्व बढ़ा
भूमि-अलगाव के संकट को जंगल से जोड़कर देखें।
यदि किसान की खेती योग्य जमीन कम हो गई—
परिवार की जरूरतें जंगल से पूरी करेगा।
लेकिन ठीक उसी समय यदि जंगल भी राज्य के नियंत्रण में जा रहा हो—
खेत पर जमींदार का दबाव और जंगल पर सरकार का नियंत्रण।
यहीं भूमि और वन प्रश्न एक-दूसरे में मिलते हैं।
बेगारी से जंगल तक
पिछले खंड में हमने देखा कि मुंडा किसान अपने श्रम पर बाहरी दावा अनुभव कर रहा था।
जंगल
राज्य कहता है—उपयोग हमारे नियम से होगा।
इस तरह मुंडा परिवार की आर्थिक दुनिया के लगभग हर आधार पर कोई न कोई बाहरी सत्ता खड़ी हो गई।
यही वह संरचनात्मक स्थिति थी जिसमें उलगुलान की भाषा इतनी शक्तिशाली बन सकी।
जंगल का धार्मिक संसार
मुंडा धार्मिक जीवन प्रकृति से गहराई से जुड़ा था।
सिंगबोंगा, गांव की पवित्र शक्तियां, पूर्वजों की स्मृति, पहाड़, वृक्ष और पवित्र उपवन—इन सबका धार्मिक महत्व था।
छोटानागपुर के आदिवासी समाजों में सरना, अर्थात पवित्र उपवन, केवल वनस्पति का समूह नहीं था।
NCERT भी प्रकृति-पूजा और sacred groves की परंपरा का उल्लेख करते हुए मुंडा और संथाल समाजों में विशिष्ट वृक्षों की पवित्रता की ओर संकेत करता है।
इसलिए जंगल पर बाहरी नियंत्रण धार्मिक भूगोल को भी प्रभावित कर सकता था।
‘पवित्र’ और ‘उत्पादक’ जंगल की दो दृष्टियां
यहां दो विश्व-दृष्टियों का अंतर स्पष्ट दिखाई देता है।
मुंडा समुदाय के लिए वही जंगल पूछता था—
यहां कौन-सी आत्मा या देवता का स्थान है?
कौन-सी सामग्री हमारे जीवन के लिए आवश्यक है?
दोनों दृष्टियों में जंगल की कीमत अलग थी।
यही केवल अर्थशास्त्र का विवाद नहीं था।
यह ज्ञान और मूल्य की दो प्रणालियों का टकराव भी था।
पूर्वज और भू-दृश्य
मुंडा खूंटकट्टी व्यवस्था स्वयं ऐतिहासिक स्मृति पर आधारित थी—
इसलिए भू-दृश्य में इतिहास समाया हुआ था।
ये मिलकर समुदाय की स्मृति बनाते थे।
आधुनिक इतिहासकार राहुल रंजन ने बिरसा उलगुलान के अध्ययन में भूमि, मिशनरी गतिविधियों और स्मृति के माध्यम से ‘मुंडा राज’ के दावे को विशेष महत्व दिया है।
अर्थात भू-दृश्य पर अधिकार राजनीतिक स्मृति से जुड़ गया था।
जंगल और बिरसा का धार्मिक संदेश
बिरसा का आंदोलन केवल वन उपयोग की मांगों पर आधारित नहीं था, फिर भी उनका धार्मिक–राजनीतिक संदेश उसी प्राकृतिक और ग्रामीण संसार में विकसित हुआ।
बिरसा के अनुयायियों के लिए नई व्यवस्था से मुक्ति का अर्थ केवल नया भूमि बंदोबस्त नहीं था।
अपने धर्म और रीति की प्रतिष्ठा लौटे,
प्रकृति और भूमि से जुड़े धार्मिक संसार के कारण यह कल्पना अधिक व्यापक थी।
क्या वन विभाग उलगुलान का प्रत्यक्ष लक्ष्य था?
इस प्रश्न का उत्तर सावधानी से देना चाहिए।
उलगुलान के उपलब्ध प्रमुख विवरणों में जमींदार, मिशन, पुलिस, चर्च और औपनिवेशिक सत्ता के दूसरे प्रतीक अधिक प्रत्यक्ष लक्ष्य के रूप में दिखाई देते हैं।
इसकी तुलना उन आदिवासी विद्रोहों से नहीं करनी चाहिए जिनका केंद्रीय और घोषित मुद्दा सीधे वन विभाग अथवा जंगल में प्रवेश पर प्रतिबंध था।
इसलिए वन प्रश्न को उलगुलान का एकमात्र या प्रधान तत्काल कारण कहना उचित नहीं।
वन नियंत्रण ने उस व्यापक औपनिवेशिक अतिक्रमण की अनुभूति को मजबूत किया जिसमें मुंडा समाज भूमि, श्रम, संसाधन और सांस्कृतिक स्वायत्तता—सभी पर दबाव महसूस कर रहा था।
यह भेद इस अध्याय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
1890 के दशक का संयुक्त संकट
अब 1890 के दशक के मुंडा किसान की स्थिति को एक साथ रखें।
मिशनरी सामाजिक–धार्मिक परिवर्तन का नया तत्व है।
औपनिवेशिक प्रशासन भूमि और कानून नियंत्रित करता है।
और जंगल पर राज्य का नियंत्रण बढ़ता जा रहा है।
इनमें से हर समस्या की तीव्रता हर गांव में समान नहीं थी।
जमीन
पहले गांव और खूंट की केंद्रीय भूमिका।
वन नियंत्रण और ‘दिकू’ की विस्तृत अवधारणा
यहां दिकू-विरोध का अर्थ और गहरा होता है।
दिकू केवल वह आदमी नहीं जो बाहर से गांव में आया।
दिकू सत्ता अब उस पूरी व्यवस्था का प्रतीक बन सकती थी जिसमें—
इसीलिए दिकू-विरोध और औपनिवेशिक सत्ता-विरोध धीरे-धीरे मिलते गए।
क्या ब्रिटिश वन नीति केवल लूट थी?
इतिहास को संतुलित रखने के लिए औपनिवेशिक वन प्रशासन को केवल ‘पेड़ काटने की लूट’ कहना भी अधूरा होगा।
उस संरक्षण की कीमत किसने चुकाई और निर्णय का अधिकार किसके पास था?
यदि वन बचाने के नाम पर उस समुदाय की परंपरागत पहुंच सीमित हो जो पीढ़ियों से उसका उपयोग और संरक्षण करता आया है, तो ‘संरक्षण’ स्वयं सत्ता का प्रश्न बन जाता है।
जंगल किसका?
राज्य कहता है—अंतिम अधिकार हमारा है।
उलगुलान से पहले मुंडा प्रतिरोध की परंपरा
1831–32 के कोल विद्रोह से सरदारी लड़ाई तक : भूमि-अधिकार, दिकू-विरोध और बिरसा के लिए तैयार होती जमीन
मुंडा उलगुलान 1899–1900 को यदि अचानक पैदा हुआ विद्रोह माना जाए तो उसकी ऐतिहासिक गहराई समझ में नहीं आएगी। बिरसा मुंडा जिस समाज में नेता बनकर उभरे, वह समाज लगभग पूरी उन्नीसवीं सदी में औपनिवेशिक हस्तक्षेप, भूमि-अधिकार के क्षरण और बाहरी मध्यस्थों के विरुद्ध संघर्ष करता रहा था।
1831–32 का कोल विद्रोह और लगभग 1858 से 1890 के दशक तक चली सरदारी लड़ाई इस लंबी प्रतिरोध-परंपरा की दो निर्णायक कड़ियां थीं। सरकारी और अकादमिक विवरण भी सरदारी आंदोलन को लगान-वृद्धि, बेगारी और मध्यस्थों के हस्तक्षेप से पैदा हुए कृषि असंतोष से जोड़ते हैं; 1887 तक अनेक मुंडा और उरांव किसानों के जमींदारों को लगान देने से इनकार करने का उल्लेख मिलता है।
लेकिन बिरसा ने केवल इस परंपरा को आगे नहीं बढ़ाया। उन्होंने उसकी रणनीति, लक्ष्य और राजनीतिक भाषा—तीनों को बदल दिया।
बिरसा से पहले भी छोटानागपुर शांत नहीं था
औपनिवेशिक अभिलेखों को पढ़ते समय एक भ्रम हो सकता है कि आदिवासी क्षेत्र तब तक शांत थे जब तक कोई करिश्माई नेता उन्हें विद्रोह के लिए नहीं उकसाता।
छोटानागपुर का इतिहास इसके विपरीत है।
औपनिवेशिक सत्ता के विस्तार के साथ ही स्थानीय समाज बार-बार प्रतिक्रिया कर रहा था। भूमि-राजस्व, बाहरी ठेकेदारों, जमींदारों, महाजनों और प्रशासनिक हस्तक्षेप के विरुद्ध अलग-अलग क्षेत्रों में प्रतिरोध हुआ।
“सोए हुए समाज को अचानक जगाने वाला पहला नेता”
1831–32 का कोल विद्रोह : पहला बड़ा विस्फोट
उन्नीसवीं सदी के छोटानागपुर का सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक विद्रोह 1831–32 का कोल विद्रोह था।
यहां ‘कोल’ शब्द को आधुनिक अर्थ में किसी एक स्पष्ट जनजाति का नाम समझना भी उचित नहीं है। औपनिवेशिक अधिकारियों ने छोटानागपुर के विभिन्न आदिवासी समुदायों के लिए इसका व्यापक प्रयोग किया। विद्रोह में मुंडाओं के साथ अन्य स्थानीय आदिवासी समूहों की भी भागीदारी थी।
इस विद्रोह के पीछे कई कारण जुड़े थे—
और स्थानीय समाज पर बढ़ता बाहरी नियंत्रण।
IGNOU के किसान-प्रतिरोध संबंधी अध्ययन में तत्कालीन ब्रिटिश अधिकारी थॉमस विल्किंसन के हवाले से उल्लेख है कि जमींदारों और ठेकेदारों द्वारा राजस्व-दबाव बढ़ाया गया था। 1831 में सोनपुर क्षेत्र के सिंहराय मानकी से संबंधित बारह गांव बाहरी लोगों को सौंपे जाने की घटना भी तत्कालीन तनाव से जुड़ी थी।
भूमि ही फिर केंद्र में थी
कोल विद्रोह और बाद के बिरसा आंदोलन के बीच सबसे महत्वपूर्ण निरंतरता थी—
भूमि।
आदिवासी समुदाय भूमि को केवल खरीद-बिक्री योग्य निजी संपत्ति नहीं समझता था।
जब बाहरी व्यक्ति को गांव या भूमि पर राजस्व और भू-अधिकार प्राप्त होता था, तो स्थानीय समाज की दृष्टि में यह केवल नया कर नहीं था।
जिस जमीन को हमारे पूर्वजों ने बसाया, उसका मालिक अचानक कोई दूसरा कैसे हो गया?
लगभग यही प्रश्न छह-सात दशक बाद उलगुलान के भीतर फिर सुनाई देगा।
सिंहराय मानकी और बारह गांव
1831 के विस्फोट से जुड़ी घटनाओं में सोनपुर क्षेत्र के सिंहराय मानकी का प्रसंग महत्वपूर्ण माना जाता है।
उनसे संबंधित बारह गांव बाहरी लोगों को दिए जाने की बात स्रोतों में आती है। इसके साथ परिवार की महिलाओं के अपमान और एक मुंडा महिला के अपहरण जैसी घटनाओं की खबरों ने तनाव को और बढ़ाया। इसके बाद सोनपुर, तमाड़ और आसपास के क्षेत्रों के लोगों को एकत्र होने के लिए बुलाया गया।
यहां भूमि और सम्मान एक साथ दिखाई देते हैं।
बाद के मुंडा प्रतिरोध में भी यही संयोजन मिलेगा—
जमीन का नुकसान + सामाजिक अपमान = राजनीतिक विस्फोट।
विद्रोह का विस्तार
कोल विद्रोह सीमित गांव का विवाद नहीं रहा।
यह छोटानागपुर के व्यापक क्षेत्र में फैल गया और सिंहभूम तथा पलामू तक इसका प्रभाव पहुंचा। विद्रोहियों ने उन लोगों और प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया जिन्हें वे नई शोषणकारी व्यवस्था से जोड़ते थे।
यहां इस हिंसा को रोमानी रूप देने से बचना चाहिए।
लेकिन उसे केवल ‘कानून-विहीन आदिवासी हिंसा’ कहना भी औपनिवेशिक दृष्टिकोण को दोहराना होगा।
हिंसा के पीछे एक स्पष्ट सामाजिक भूगोल था—
कौन भूमि ले रहा है? कौन राजस्व वसूल रहा है? कौन नई सत्ता का प्रतिनिधि है?
कोल विद्रोह की सबसे बड़ी ऐतिहासिक सीख
1831–32 ने औपनिवेशिक प्रशासन को पहली बार बहुत स्पष्ट रूप से बताया कि छोटानागपुर की पारंपरिक भूमि और सामाजिक संरचना में तीव्र हस्तक्षेप राजनीतिक रूप से विस्फोटक हो सकता है।
दीर्घकालीन राजनीतिक कार्यक्रम स्पष्ट नहीं था,
और ब्रिटिश सैन्य शक्ति के सामने टिकना कठिन था।
भूमि-अधिकार का प्रश्न।
यही प्रश्न अगली पीढ़ियों को विरासत में मिला।
विद्रोह से प्रशासनिक पुनर्गठन तक
कोल विद्रोह के बाद ब्रिटिश प्रशासन को यह स्वीकार करना पड़ा कि छोटानागपुर को सामान्य बंगाल प्रशासन की तरह चलाना आसान नहीं है।
इसी पृष्ठभूमि में दक्षिण-पश्चिम सीमांत एजेंसी—South-West Frontier Agency—जैसी विशेष प्रशासनिक व्यवस्था विकसित हुई और विल्किंसन जैसे अधिकारियों को क्षेत्रीय प्रशासन में विशेष भूमिका मिली।
यह औपनिवेशिक शासन का एक परिचित पैटर्न था—
पहले स्थानीय व्यवस्था में हस्तक्षेप,
यही पैटर्न हम आगे उलगुलान के बाद भी देखेंगे।
लेकिन मूल भूमि-संकट समाप्त नहीं हुआ
प्रशासनिक पुनर्गठन का अर्थ यह नहीं था कि—
इसलिए 1831–32 को समाप्त संघर्ष के बजाय लंबी कृषि लड़ाई के पहले बड़े विस्फोट के रूप में देखना अधिक उचित है।
अगले दशकों में प्रतिरोध का रूप बदल गया।
यहीं से सरदारी लड़ाई की दुनिया खुलती है।
1858 के आसपास : सरदारी लड़ाई का उदय
1857 के विद्रोह के बाद के वर्षों में छोटानागपुर में एक नया कृषि आंदोलन उभरने लगा जिसे अलग-अलग स्रोतों में—
Sardari Larai, Sardar Movement, Mulki Larai, Mulkui Larai, Bokta Movement
नामों और काल-विभाजन में इतिहासकारों के बीच कुछ भिन्नताएं हैं, इसलिए किसी एक पदावली को बिल्कुल निर्विवाद नहीं मानना चाहिए।
लगभग 1858 से 1890 के दशक तक मुंडा और कुछ अन्य आदिवासी कृषक अपने पुराने भूमि-अधिकारों की पुनर्स्थापना और जमींदारी–मध्यस्थ शोषण से मुक्ति के लिए लंबे संघर्ष में लगे रहे।
सरकारी जनजातीय विश्वकोश भी इसे लगभग चालीस वर्ष चली भूमि पर नियंत्रण की लड़ाई के रूप में वर्णित करता है।
इसे ‘सरदारी’ क्यों कहा गया?
‘सरदार’ वे स्थानीय नेता थे जो आदिवासी किसानों के भूमि-अधिकार संबंधी संघर्ष का नेतृत्व करने लगे।
उनकी भूमिका केवल सैन्य नेतृत्व की नहीं थी।
मिशनरियों या अधिकारियों से संपर्क करते,
इस अर्थ में सरदारी लड़ाई को एक प्रकार की ग्रामीण राजनीतिक संगठन-प्रक्रिया भी कहा जा सकता है।
पुराने भूमि-अधिकार वापस करो।
सरदारों का दावा था कि आदिवासी कृषकों के पुराने अधिकार जमींदारों और बाहरी मध्यस्थों ने हड़प लिए हैं।
इसलिए समस्या किराये की दर से अधिक बड़ी थी।
जमीन पर वैध श्रेष्ठ अधिकार किसका है?
IGNOU का अध्ययन सरदारी लड़ाई के उद्देश्य को आदिवासियों के प्राचीन भूमि-अधिकार वापस प्राप्त करने और जमींदारों को हटाने की आकांक्षा से जोड़ता है।
लगान-वृद्धि के विरुद्ध संघर्ष
सरदारी आंदोलन की तत्काल शिकायतों में लगान महत्वपूर्ण था।
और भूमि पर अपने अधिकार को मजबूत कर रहे थे।
रांची के आधिकारिक जिला विवरण में आंदोलन की पृष्ठभूमि में बेगारी और मध्यस्थों द्वारा अवैध लगान-वृद्धि दोनों का उल्लेख है।
यानी खूंटकट्टी का बड़ा संवैधानिक प्रश्न गांव के रोजमर्रा जीवन में इस रूप में दिखाई देता था—
बेगारी के विरुद्ध भी आंदोलन
सरदारी लड़ाई भूमि की ही नहीं, श्रम की भी लड़ाई थी।
जमींदारों और मध्यस्थों द्वारा बेगार की मांग मुंडा कृषकों के लिए आर्थिक बोझ और सामाजिक अपमान दोनों थी।
सरकारी जनजातीय स्रोत भी सरदार आंदोलन को forced labour के विरोध से जोड़ते हैं।
इससे हमारी पिछले खंडों की श्रृंखला फिर सामने आती है—
जमीन पर अधिकार खोया → रैयत बने → लगान दिया → बेगार करनी पड़ी।
इसलिए सरदारों का संघर्ष अंततः सामाजिक प्रतिष्ठा की पुनर्स्थापना भी था।
सरदारी आंदोलन का पहला चरण : कृषि संघर्ष
प्रमुख इतिहासकार कुमार सुरेश सिंह ने सरदारी आंदोलन के विकास को मोटे तौर पर तीन चरणों में समझने की रूपरेखा दी—
कृषि चरण, पुनरुत्थानवादी चरण और राजनीतिक चरण।
यह विभाजन विश्लेषण के लिए उपयोगी है, हालांकि वास्तविक घटनाएं हमेशा इतनी साफ सीमाओं में नहीं बंटी थीं। उनके Birsa Munda and His Movement, 1874–1901 को इस विषय का मानक अध्ययन माना जाता है।
अर्थात आंदोलन की शुरुआत मूलतः कृषि अधिकारों से हुई।
दूसरा चरण : पुरानी व्यवस्था की पुनर्स्थापना
धीरे-धीरे संघर्ष केवल आर्थिक मांग तक सीमित नहीं रहा।
यह धारणा मजबूत होने लगी कि समस्या का समाधान तभी होगा जब पुरानी मुंडा व्यवस्था की प्रतिष्ठा वापस आए।
यहां अतीत एक राजनीतिक संसाधन बनता है।
यही पुनरुत्थानवादी तत्व बाद में बिरसा के स्वर्णयुग और मुंडा राज की कल्पना में कहीं अधिक शक्तिशाली रूप ग्रहण करेगा।
तीसरा चरण : संघर्ष राजनीतिक होता गया
1890 के आसपास सरदारी आंदोलन में महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है।
यूरोपीय अधिकारी और मिशनरी भी संदेह की दृष्टि से देखे जाने लगे क्योंकि आंदोलनकारियों को लगने लगा कि अंततः जमींदारी व्यवस्था को ब्रिटिश सत्ता ही संरक्षण दे रही है।
IGNOU के अध्ययन के अनुसार 1890 के बाद आंदोलन ने यूरोपीय अधिकारियों और मिशनरियों के प्रति अधिक प्रतिरोधी रुख अपनाया; ब्रिटिश शासन को व्यापक संकट का स्रोत समझने की प्रवृत्ति बढ़ी।
कृषि संघर्ष → औपनिवेशिक सत्ता-विरोध
सरदारों ने पहले हिंसा क्यों नहीं चुनी?
1831–32 के अनुभव की स्मृति महत्वपूर्ण थी।
सशस्त्र विद्रोह ब्रिटिश सेना के सामने कुचल दिया गया था।
इसलिए सरदारी आंदोलन ने लंबे समय तक दूसरे रास्ते आजमाए।
यानी यह आंदोलन दिखाता है कि आदिवासी किसान औपनिवेशिक आधुनिक संस्थाओं को केवल अस्वीकार नहीं कर रहे थे।
वे उन्हें अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश भी कर रहे थे।
मिशनरियों से बड़ी आशा
सरदारी आंदोलन और ईसाई मिशनों का संबंध विशेष रूप से जटिल था।
अंग्रेज अधिकारियों तक पहुंच रखते हैं,
और जमींदारों के विरुद्ध उनकी सहायता कर सकते हैं।
कुछ मिशनरियों ने वास्तव में आदिवासियों की कठिनाइयों पर ध्यान भी दिया।
इस कारण अनेक मुंडाओं ने ईसाई मिशन को केवल धार्मिक संस्था नहीं बल्कि संभावित राजनीतिक संरक्षक के रूप में भी देखा।
यहीं भूमि और धर्म का संबंध फिर सामने आता है।
धर्म परिवर्तन और भूमि की आशा
कुछ मुंडाओं के ईसाई बनने के पीछे केवल आध्यात्मिक कारण नहीं थे। सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा और जमींदारी अत्याचार के विरुद्ध सहायता की अपेक्षा भी व्यापक संदर्भ का हिस्सा थी।
लेकिन जल्द ही एक समस्या स्पष्ट हुई।
मिशनरी किसी मुंडा को धर्म बदलने में सहायता कर सकता था।
क्या वह उसकी जमीन वापस दिला सकता था?
यहीं अपेक्षा और वास्तविक क्षमता के बीच अंतर था।
मिशन से मोहभंग
जब भूमि-अधिकार की मूल समस्या हल नहीं हुई, तो सरदारों के एक हिस्से में मिशनरियों के प्रति निराशा बढ़ी।
या अंततः वह भी उसी यूरोपीय सत्ता-संसार का हिस्सा है?
यह धारणा पूरी तरह सरल वास्तविकता का प्रतिबिंब नहीं थी; अलग-अलग मिशनरियों और संस्थाओं की भूमिकाएं अलग थीं।
लेकिन राजनीतिक आंदोलन में धारणा स्वयं ऐतिहासिक शक्ति बन जाती है।
1890 के दशक तक यही मोहभंग बिरसा के लिए महत्वपूर्ण जमीन तैयार कर चुका था। सरकारी प्रकाशन भी इस बात का उल्लेख करता है कि सरदार नेताओं में मिशनरियों से निराशा बढ़ने पर वे बिरसा जैसे लोकप्रिय नेता में अपने आंदोलन को नया जीवन देने की संभावना देखने लगे।
1887 : लगान देने से इनकार
सरदारी आंदोलन का एक महत्वपूर्ण चरण 1880 के दशक में आया।
रांची के आधिकारिक जिला विवरण के अनुसार 1887 तक आंदोलन इतना बढ़ चुका था कि अनेक मुंडा और उरांव कृषकों ने जमींदारों को लगान देने से इनकार कर दिया।
यह अत्यंत महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना थी।
जमींदार के श्रेष्ठ भूमि-अधिकार को चुनौती।
“जमीन हमारी है तो लगान किस बात का?”
सरदारी आंदोलन की मूल तर्क-श्रृंखला सरल लेकिन क्रांतिकारी थी।
तो बाद में आया जमींदार हमसे लगान किस अधिकार से मांगता है?
यह तर्क बाद में बिरसा की भाषा में और तीखा होगा।
रांची के आधिकारिक विवरण में बिरसा से जुड़ी धारणा भी यही दर्ज है कि जंगल साफ कर भूमि बनाने वाले लोगों की जमीन है, इसलिए उसके लिए जमींदार को लगान नहीं दिया जाना चाहिए।
इसलिए बिरसा का भूमि-संदेश शून्य से पैदा नहीं हुआ था।
याचिकाओं की राजनीति
सरदारों ने औपनिवेशिक प्रशासन तक अपनी शिकायतें पहुंचाने की कोशिश की।
यह ऐतिहासिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
वे राज्य को पहले शत्रु नहीं बल्कि संभावित न्यायाधीश के रूप में देख रहे थे।
उनकी सोच में कुछ समय तक यह अंतर था—
जमींदार अन्यायी है; सरकार शायद न्याय दे सकती है।
इसलिए याचिका देना राजनीतिक विश्वास का संकेत भी था।
यानी अभी तक औपनिवेशिक सत्ता की वैधता पूरी तरह अस्वीकार नहीं हुई थी।
लेकिन बार-बार की विफलता ने क्या किया?
और फिर भी मूल भूमि-अधिकार वापस न मिले—
तो उसके राजनीतिक निष्कर्ष बदलने लगते हैं।
शायद पूरी व्यवस्था ही उसके पक्ष में है।
यहीं सुधार की मांग से राज-विरोध की यात्रा शुरू होती है।
1892 : हिंसक मोड़ की कोशिश
सरदारी आंदोलन के अंतिम चरण में निराशा इतनी बढ़ गई कि कुछ तत्व हिंसक कार्रवाई की ओर बढ़े।
IGNOU के विवरण के अनुसार सितंबर 1892 में कुछ सरदारों ने ठेकेदारों और जर्मन मिशनरियों पर हमला करने की योजना बनाई, लेकिन पर्याप्त संगठन के अभाव में यह सफल नहीं हुई।
यह घटना दो कारणों से महत्वपूर्ण है।
संवैधानिक और कानूनी उपायों से विश्वास कम हो रहा था।
आंदोलन के पास असंतोष था, लेकिन ऐसा केंद्रीय नेतृत्व नहीं था जो उसे व्यापक कार्रवाई में बदल सके।
यही शून्य कुछ वर्षों बाद बिरसा भरेंगे।
सरदारी आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि
सरदारी लड़ाई तत्काल अपने मूल लक्ष्य में पूरी तरह सफल नहीं हुई।
वह जमींदारों को छोटानागपुर से निकाल नहीं सकी।
लेकिन उसकी ऐतिहासिक उपलब्धि बहुत बड़ी थी।
उसकी समस्या व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक है।
यदि एक गांव की जमीन गई है, तो दूसरे गांव की भी जा सकती है।
यदि एक खूंट का अधिकार कमजोर हुआ है, तो पूरी व्यवस्था संकट में है।
यानी उसने कृषि शिकायत को सामुदायिक राजनीतिक चेतना में बदला।
गांवों के बीच संगठन
सरदारी आंदोलन लगभग चार दशकों तक इसलिए टिक सका क्योंकि उसने गांवों के बीच संपर्क बनाया।
स्थानीय नेताओं का नेटवर्क विकसित हुआ।
संदेश एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक पहुंचा।
लगान-अस्वीकार जैसी कार्रवाइयों में समन्वय हुआ।
यह सब बाद के उलगुलान के लिए अमूल्य संगठनात्मक पूंजी थी।
बिरसा को हर गांव में शून्य से संगठन नहीं बनाना पड़ा।
राजनीतिक संचार का सामाजिक ढांचा पहले से मौजूद था।
सरदारों और बिरसा का मिलन
1895 तक बिरसा की धार्मिक प्रतिष्ठा तेजी से बढ़ रही थी।
दूसरी ओर सरदारी आंदोलन लंबे संघर्ष के बाद थकान और निराशा में था।
भूमि संघर्ष का अनुभव और संगठनात्मक नेटवर्क।
करिश्मा, धार्मिक वैधता और व्यापक जन-आकर्षण।
सरकारी प्रकाशन के विवरण के अनुसार सरदार नेताओं ने बिरसा की जन-प्रभाव क्षमता को पहचाना और उन्हें अपने आंदोलन से जोड़ने का प्रयास किया।
यहीं सरदारी लड़ाई और बिरसा आंदोलन के बीच सीधा पुल बनता है।
बिरसा ने सरदारों से क्या ग्रहण किया?
बिरसा के आंदोलन में सरदारी लड़ाई की कई केंद्रीय बातें स्पष्ट दिखाई देती हैं।
भूमि का प्रश्न
खूंटकट्टी अधिकारों की पुनर्स्थापना।
जमींदार-विरोध
बाहरी भू-अधिकारधारियों की वैधता पर प्रश्न।
लगान-विरोध
जिस भूमि पर हमारा मूल अधिकार है, उसके लिए बाहरी जमींदार को लगान क्यों?
मुंडा राज की स्मृति
पुरानी स्वायत्त व्यवस्था की पुनर्स्थापना।
इस अर्थ में बिरसा आंदोलन सरदारी लड़ाई का उत्तराधिकारी था।
लेकिन बिरसा सरदारों से कहां आगे निकल गए?
यहीं दोनों आंदोलनों का निर्णायक अंतर है।
सरदारी आंदोलन लंबे समय तक पूछता रहा—
सरकार को हम पर शासन करने का अधिकार ही क्यों है?
सरदार औपनिवेशिक कानून के भीतर न्याय खोजते रहे।
बिरसा अंततः औपनिवेशिक सत्ता की वैधता को ही चुनौती देने लगे।
याचिका से भविष्यवाणी तक
उन्होंने एक नई दुनिया की संभावना प्रस्तुत की।
इससे राजनीति की भावनात्मक शक्ति कई गुना बढ़ गई।
वकील से ‘धरती आबा’ तक
बिरसा ने राजनीतिक वैधता का स्रोत ही बदल दिया।
हमारा अधिकार इसलिए नहीं है कि अंग्रेज अदालत उसे मानती है।
और बिरसा स्वयं अनुयायियों के बीच धरती आबा की असाधारण धार्मिक–राजनीतिक प्रतिष्ठा प्राप्त करते गए। 1895 तक उनका धार्मिक आंदोलन स्पष्ट राजनीतिक स्वर ग्रहण कर चुका था।
यह वैधता का क्रांतिकारी पुनर्स्थापन था।
धर्म ने क्या बदला?
सरदारी आंदोलन मुख्यतः कृषि प्रश्न से शुरू हुआ था।
बिरसा ने धर्म के माध्यम से उसे सामाजिक पुनर्गठन की परियोजना में बदल दिया।
अब संघर्ष का लक्ष्य केवल जमीन नहीं था।
दिकू सांस्कृतिक प्रभाव से मुक्त होना था।
भूमि आंदोलन + धार्मिक सुधार + सामाजिक पुनर्जागरण + राजनीतिक विद्रोह
करिश्माई नेतृत्व का अंतर
सरदारी आंदोलन के पास अनेक सरदार थे।
स्थानीय नेतृत्व मजबूत था, लेकिन ऐसा सर्वमान्य केंद्रीय व्यक्तित्व नहीं था जो पूरे आंदोलन को एक प्रतीक में बदल दे।
चिकित्सक के रूप में प्रतिष्ठित व्यक्ति,
IGNOU का अध्ययन भी बिरसा के करिश्माई, पैगंबर-सदृश नेतृत्व को आंदोलन की सामूहिक ऊर्जा के केंद्र के रूप में रेखांकित करता है।
सरदारी आंदोलन की सीमाएं
सरदारी लड़ाई की कुछ स्पष्ट सीमाएं थीं।
लंबे समय तक औपनिवेशिक प्रशासन से न्याय की अत्यधिक आशा।
मिशनरियों से अपेक्षाएं, जिन्हें वे पूरी तरह पूरा नहीं कर सकते थे।
स्थानीय नेतृत्व के बीच रणनीतिक मतभेद।
व्यापक विद्रोह के लिए पर्याप्त सैन्य संगठन का अभाव।
1892 की असफल हिंसक योजना ने अंतिम सीमा विशेष रूप से स्पष्ट कर दी।
फिर भी सरदारों को ‘विफल’ कहना गलत होगा
यदि किसी आंदोलन का मूल्यांकन केवल इस आधार पर किया जाए कि उसकी तत्काल मांग पूरी हुई या नहीं, तो सरदारी लड़ाई विफल दिखाई दे सकती है।
लेकिन इतिहास में आंदोलन अगली पीढ़ी के लिए राजनीतिक भाषा भी बनाते हैं।
भूमि सामुदायिक अधिकार का प्रश्न है।
लगान देने से इनकार किया जा सकता है।
और जब न्याय न मिले तो सरकार स्वयं प्रश्न के घेरे में आ सकती है।
बिरसा मुंडा का प्रारंभिक जीवन और वैचारिक निर्माण
उलिहातू से चाईबासा तक : मिशनरी शिक्षा, सरदारी आंदोलन, वैष्णव प्रभाव और एक नए धार्मिक नेता का निर्माण
बिरसा मुंडा का जीवन केवल एक महान विद्रोही की जीवनी नहीं है। यह उस प्रक्रिया का इतिहास भी है जिसमें उन्नीसवीं सदी के छोटानागपुर का एक गरीब मुंडा युवक अपने समाज की भूमि-विहीनता, धार्मिक परिवर्तन, मिशनरी प्रभाव, सरदारी आंदोलन और कई धार्मिक परंपराओं के संपर्क से गुजरते हुए एक नए धार्मिक–सामाजिक नेतृत्व तक पहुंचा।
उनके विचारों को केवल एक स्रोत से निकला हुआ मानना कठिन है।
और सबसे ऊपर अपने समाज की वास्तविक परिस्थितियों का अनुभव था।
इन सबके मेल से वह व्यक्तित्व बना जिसे कुछ वर्षों बाद हजारों लोग धरती आबा के रूप में स्वीकार करने लगे।
जन्म : 15 नवंबर 1875, लेकिन इतिहास में विवाद भी
आज बिरसा मुंडा की आधिकारिक और सर्वाधिक स्वीकृत जन्मतिथि 15 नवंबर 1875 मानी जाती है और जन्मस्थान वर्तमान झारखंड के खूंटी जिले का उलिहातू गांव माना जाता है।
लेकिन शोध की दृष्टि से एक सावधानी आवश्यक है।
उनके जन्म-वर्ष और जन्मस्थान को लेकर पुराने स्रोतों में पूर्ण एकरूपता नहीं है। कुछ विवरण 1872 तक की तारीख देते हैं और लोकस्मृति में उलिहातू के साथ चलकद भी जुड़ता रहा है। आधुनिक शोध ने इस विवाद को दर्ज किया है; हालांकि 15 नवंबर 1875 और उलिहातू आज सर्वाधिक स्वीकृत परंपरा हैं।
यह छोटा विवाद वास्तव में एक बड़ी समस्या की ओर संकेत करता है—
उन्नीसवीं सदी के गरीब आदिवासी परिवारों के जीवन के दस्तावेज उतने व्यवस्थित नहीं थे जितने औपनिवेशिक अधिकारियों या उच्च वर्गों के।
इसलिए बिरसा के आरंभिक जीवन को लिखते समय सरकारी स्मृति, मिशन अभिलेख, बाद की जीवनी और मुंडा मौखिक परंपराओं को एक साथ पढ़ना पड़ता है।
नाम में भी समुदाय की स्मृति
एक प्रचलित व्याख्या के अनुसार बिरसा का जन्म गुरुवार को हुआ था और मुंडा नामकरण-परंपरा में सप्ताह के दिन से संबंधित नाम दिए जाने के कारण उनका नाम बिरसा पड़ा। यह विवरण बाद के जीवनी-साहित्य में व्यापक रूप से स्वीकार किया गया।
यह बात छोटी लग सकती है, लेकिन बिरसा के जीवन की पहली ही घटना उन्हें उस सामाजिक संसार में रखती है जिसमें व्यक्ति की पहचान परिवार और समुदाय की परंपराओं के भीतर बनती थी।
जिस व्यक्ति को आगे चलकर एक नया धर्म स्थापित करने वाला नेता माना गया, उसके आरंभिक जीवन की जड़ें अत्यंत सामान्य मुंडा ग्रामीण संसार में थीं।
माता-पिता : सुगना मुंडा और करमी
बिरसा के पिता का नाम सामान्यतः सुगना मुंडा और माता का नाम करमी हातू अथवा करमी मुंडाइन दिया जाता है।
परिवार संपन्न खूंटकट्टीदार अभिजात वर्ग का नहीं था।
रोजगार और खेती की तलाश में परिवार को एक स्थान से दूसरे स्थान जाना पड़ा।
जिस व्यक्ति ने आगे चलकर भूमि-अधिकार और मुंडा स्वायत्तता का आंदोलन खड़ा किया, उसका अपना बाल्यकाल भी ग्रामीण आर्थिक असुरक्षा और स्थानांतरण से जुड़ा था।
कुछ जीवनी स्रोतों में सुगना के परिवार के उलिहातू से कुरुम्बदा, बंबा और बाद में चलकद की ओर जाने का उल्लेख मिलता है।
अलग-अलग विवरणों में गांवों की क्रमावली और जन्मस्थान को लेकर मतभेद हैं, इसलिए प्रत्येक विवरण को बिल्कुल निश्चित जीवनी-क्रम मानना उचित नहीं होगा।
उलिहातू : केवल जन्मस्थान नहीं
उलिहातू को समझना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस खूंटकट्टी संसार का हिस्सा था जिसकी चर्चा हम पहले कर चुके हैं।
इस वातावरण में पला बालक भूमि को आधुनिक व्यक्तिगत संपत्ति के रूप में नहीं बल्कि समुदाय के इतिहास के हिस्से के रूप में देखता था।
बिरसा की बाद की भूमि राजनीति को इस बचपन से पूर्णतः निकाल देना संभव नहीं।
चलकद : बिरसा के राजनीतिक जीवन का पहला बड़ा केंद्र
बिरसा का परिवार अंततः चलकद क्षेत्र से जुड़ा और यही गांव आगे उनके धार्मिक आंदोलन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना।
इसलिए लोकस्मृति में चलकद इतना प्रमुख हो गया कि कुछ परंपराओं ने उसे जन्मस्थान तक मान लिया।
लेकिन ऐतिहासिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि—
उलिहातू ने बिरसा को वंशीय पहचान दी, जबकि चलकद ने आगे उनके नेतृत्व को सामाजिक मंच दिया।
1890 के दशक में लोग उन्हें देखने और सुनने के लिए चलकद आने लगे।
इसलिए उनके जीवन की भौगोलिक यात्रा में यह गांव विशेष महत्व रखता है।
गरीब मुंडा बालक का सामान्य जीवन
बिरसा के आरंभिक जीवन के अनेक लोकप्रिय विवरणों में—
इनमें से कुछ बातें लोकस्मृति से आती हैं और हर घटना का स्वतंत्र दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
इसलिए उन्हें किंवदंती और संभावित सामाजिक वास्तविकता के बीच रखकर पढ़ना चाहिए।
एक गरीब मुंडा बालक के जीवन में पशु चराना और ग्रामीण श्रम असामान्य नहीं था।
लेकिन बाद के राष्ट्रीय नायक को बचपन से ही ‘असाधारण योद्धा’ साबित करने वाली कहानियों को ऐतिहासिक तथ्य मान लेने से बचना चाहिए।
बिरसा की वास्तविक असाधारणता उनके जन्म में नहीं थी।
वह उनके बौद्धिक और राजनीतिक विकास में थी।
आयुभातू और प्राथमिक शिक्षा
बिरसा ने बाल्यकाल का कुछ समय अपने रिश्तेदारों के यहां भी बिताया। स्रोतों में आयुभातू का उल्लेख मिलता है।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा सलगा में जयपाल नाग नामक शिक्षक के अधीन होने का विवरण सरकारी स्रोत में भी मिलता है।
यहां से बिरसा की जीवनी में एक नया तत्व प्रवेश करता है—
औपचारिक शिक्षा।
मुंडा ग्रामीण समाज और आधुनिक मिशनरी शिक्षा के बीच यह पहला पुल था।
जयपाल नाग की भूमिका
प्रचलित जीवनी के अनुसार बिरसा पढ़ाई में सक्षम थे और शिक्षक जयपाल नाग ने उन्हें आगे मिशन स्कूल में पढ़ने की सलाह दी।
यह घटना बाद के इतिहास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुई।
क्योंकि इसी रास्ते बिरसा उस धार्मिक और बौद्धिक संसार में पहुंचे जिससे वे आगे संघर्ष भी करेंगे और कुछ अवधारणाएं ग्रहण भी करेंगे।
अर्थात मिशनरी शिक्षा केवल उनके जीवन का ऐसा अध्याय नहीं थी जिसे बाद में पूरी तरह अस्वीकार कर दिया गया।
उसने उनके वैचारिक निर्माण में स्थायी निशान छोड़े।
जर्मन मिशन और ईसाई धर्म से संपर्क
बिरसा आगे जर्मन लूथरन मिशन से जुड़े और चाईबासा के जर्मन मिशन स्कूल में पढ़े।
सरकारी तथा अकादमिक स्रोतों में उनके ईसाई धर्म ग्रहण करने और Birsa David / Birsa Daud जैसे ईसाई नाम से जुड़े होने का उल्लेख मिलता है।
लेकिन यहां भी लोकप्रिय कथा को सावधानी से पढ़ना चाहिए।
“स्कूल में प्रवेश के लिए उन्हें जबरन ईसाई बनाया गया।”
कुछ सरकारी लोकप्रिय विवरण ऐसा कहते हैं।
लेकिन व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ अधिक जटिल है।
आधुनिक शोध बताता है कि बिरसा का परिवार पहले से लूथरन मिशन के संपर्क में था और उनके पिता सुगना भी मिशन से जुड़े हुए थे। इसलिए बिरसा का ईसाई संसार से संबंध केवल किसी एक क्षण में जबरन धर्म-परिवर्तन की सरल कहानी नहीं था।
चाईबासा : 1886–1890 के निर्णायक वर्ष
बिरसा के जीवन में 1886 से 1890 के लगभग चार वर्ष सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक कालों में हैं।
और उसी समय आसपास सरदारी आंदोलन सक्रिय था।
आधुनिक और सरकारी स्रोत दोनों इस काल को उनके वैचारिक निर्माण का महत्वपूर्ण चरण मानते हैं।
इसलिए चाईबासा को केवल ‘बिरसा का स्कूल’ कहना बहुत कम होगा।
एक ही समय में दो संसार
चाईबासा में युवा बिरसा दो बिल्कुल अलग लेकिन परस्पर जुड़े संसार देख रहे थे।
अर्थात शिक्षा उन्हें आधुनिक धार्मिक और संस्थागत भाषा दे रही थी, जबकि ग्रामीण जीवन उन्हें बता रहा था कि उनके समुदाय का सबसे बड़ा संकट जमीन और सत्ता है।
आगे बिरसा इन दोनों अनुभवों को अपने ढंग से जोड़ेंगे।
ईसाई धर्म का प्रभाव केवल नकारात्मक नहीं था
बिरसा के इतिहास को कई बार इस तरह लिखा जाता है—
फिर ईसाई धर्म को पूरी तरह त्यागकर शुद्ध मुंडा परंपरा में वापस लौट आए।
आदि तत्वों में मिशनरी अनुभव की संभावित छाप देखी गई है।
कैम्ब्रिज से संबद्ध आधुनिक अध्ययन भी जर्मन लूथरन शिक्षा द्वारा बिरसा को ईसाई धार्मिक अवधारणाओं से परिचित कराने और उनके बाद के Birsa Dharam पर संभावित प्रभाव की ओर संकेत करता है।
इसलिए मिशन से संघर्ष का अर्थ मिशन से सीखे प्रत्येक तत्व का अंत नहीं था।
‘स्वर्ग का राज्य’ और जमीन की राजनीति
बिरसा के मिशनरी अनुभव से जुड़ा एक अत्यंत रोचक विवरण शोध-साहित्य में मिलता है।
मैक्स प्लैंक संस्थान के अध्ययन में, कुमार सुरेश सिंह तथा अन्य जीवनी सामग्री के आधार पर, चाईबासा मिशन से जुड़े डॉ. अल्फ्रेड नॉट्रॉट के एक उपदेश का उल्लेख है जिसमें ईसाई बने रहने और निर्देश मानने के साथ खोई हुई भूमि वापस पाने की आशा जैसी बात जोड़ी गई थी।
इस विवरण की शब्दशः पुनर्रचना के बजाय उसके ऐतिहासिक अर्थ पर ध्यान देना अधिक उपयोगी है।
मुंडा ईसाई धर्म को केवल मोक्ष के प्रश्न से नहीं देख रहे थे।
क्या यह नया धर्म हमारी जमीन वापस दिलाएगा?
यहीं मिशन और सरदारी राजनीति का संपर्क दिखाई देता है।
सरदारों और मिशनरियों का तनाव
सरदारी आंदोलन के नेता मिशनरियों से सहायता चाहते थे, लेकिन संबंध जल्दी ही तनावपूर्ण हो गए।
भूमि की वापसी जितनी व्यापक रूप से सरदार चाहते थे, मिशन उतनी दूर तक नहीं जा सकता था।
कुछ मिशनरी सरदारों की रणनीति और दावों से असहमत हुए।
आधुनिक अध्ययन में यह भी दर्ज है कि बिरसा ने एक ऐसे मिशनरी का विरोध किया जिसने सरदारों को धोखेबाज या अविश्वसनीय बताने जैसी टिप्पणी की थी; उनके स्कूल छोड़ने के प्रसंग से इसे जोड़ा जाता है।
विवरणों में कुछ अंतर हैं, लेकिन व्यापक तथ्य निर्विवाद है—
युवा बिरसा सरदारी भूमि संघर्ष और मिशन के बीच बढ़ते तनाव से प्रभावित हुए।
मिशन से मोहभंग क्यों हुआ?
इसे केवल धार्मिक असहमति से नहीं समझना चाहिए।
मिशन से मोहभंग के कम-से-कम तीन स्तर थे।
पहला — भूमि
मुंडा किसानों की जमीन वापस नहीं आई।
दूसरा — राजनीति
मिशन औपनिवेशिक सत्ता से पूरी तरह स्वतंत्र संस्था के रूप में दिखाई नहीं देता था।
तीसरा — संस्कृति
ईसाई धर्म मुंडा की कई पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं और अनुष्ठानों को गलत अथवा अंधविश्वासी मानता था।
1890 के आसपास मिशन से अलगाव
लगभग 1890 में बिरसा चाईबासा का मिशन परिवेश छोड़कर परिवार के साथ ईसाई मिशन से दूर हो गए।
विभिन्न स्रोत इसे जर्मन मिशन से संबंध विच्छेद और अपने पुराने धार्मिक संसार की ओर वापसी के रूप में वर्णित करते हैं।
वे ठीक उसी धार्मिक स्थिति में वापस नहीं गए जहां से चले थे।
और बाहरी धार्मिक परंपराओं को तुलना के साथ देखने की क्षमता
इसलिए वापस आने वाला बिरसा वही बालक नहीं था जो गया था।
धार्मिक खोज का दूसरा चरण
मिशन से अलग होने के बाद बिरसा ने केवल पुरानी परंपराओं को निष्क्रिय रूप से स्वीकार नहीं किया।
इसी काल में उनका संपर्क एक व्यक्ति से हुआ जिसे विभिन्न स्रोत आनंद पांडे, आनंद पाण्डेय अथवा आनंद पानरे के नाम से दर्ज करते हैं।
नाम की वर्तनी और सामाजिक पहचान को लेकर स्रोतों में अंतर है।
इसलिए उसे बिना जांचे ‘महान वैष्णव गुरु’ जैसे अतिशयोक्तिपूर्ण रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं।
लेकिन वैष्णव धार्मिक प्रभाव का तथ्य महत्वपूर्ण है।
आनंद पांडे का प्रभाव
आधुनिक शोध के अनुसार आनंद पानरे/पांडे के माध्यम से बिरसा वैष्णव धार्मिक अवधारणाओं से परिचित हुए।
रामायण और महाभारत से संबंधित कथाएं,
सरकारी लोकप्रिय विवरण भी वैष्णव संत के संपर्क तथा रामायण–महाभारत के अध्ययन का उल्लेख करते हैं।
फिर भी यह कहना गलत होगा कि बिरसा बस ‘वैष्णव बन गए’।
उन्होंने जो आगे बनाया वह किसी एक हिंदू संप्रदाय की नकल नहीं था।
वैष्णव प्रभाव के बाहरी चिह्न
बिरसा के जीवन के इस चरण से जुड़े विवरणों में—
इनमें से कुछ विवरण बाद के जीवनी-साहित्य में अधिक स्पष्ट रूप से विकसित हुए हैं, इसलिए प्रत्येक प्रथा को हर समय और हर अनुयायी पर लागू मानना उचित नहीं।
लेकिन इतना स्पष्ट है कि बिरसा के धार्मिक सुधार में व्यक्तिगत आचरण और शुद्धता महत्वपूर्ण बने।
यह पहलू उनके मुंडा समाज-सुधार अभियान में आगे दिखाई देगा।
क्या बिरसा ‘हिंदू’ हो गए थे?
इसे हां या नहीं में बांटना ऐतिहासिक रूप से भ्रामक होगा।
बिरसा ने वैष्णव परंपरा से तत्व ग्रहण किए।
लेकिन उन्होंने मुंडा सामुदायिक पहचान छोड़ी नहीं।
बाद में उन्होंने ईसाई मिशन से भी दूरी रखी और कई ऐसे मुंडा धार्मिक व्यवहारों की आलोचना भी की जिन्हें वे सुधारना चाहते थे।
ग्रहण + चयन + अस्वीकार + पुनर्निर्माण।
यही बिरसा की धार्मिक मौलिकता थी
अक्सर ‘बिरसाइत धर्म’ को तीन धर्मों का सरल मिश्रण कह दिया जाता है—
बिरसा ने केवल तीन परंपराओं के तत्व जोड़कर कोई मिश्रित धर्म तैयार नहीं किया।
उन्होंने उन्हें अपने समाज के वास्तविक संकट के अनुसार पुनर्व्याख्यायित किया।
एकेश्वरवाद उनके लिए सामाजिक एकता का साधन बन सकता था।
पुरानी मुंडा पहचान सांस्कृतिक स्वाभिमान का।
वह समाज को पुनर्गठित करने की तकनीक बन रहा था।
जादू-टोना और सामाजिक सुधार
बिरसा आगे अपने अनुयायियों से कई सामाजिक व्यवहारों को बदलने की बात करते हैं।
इन सुधारों को केवल धार्मिक शुद्धतावाद नहीं समझना चाहिए।
एक ऐसा समुदाय जो उलगुलान करेगा उसे अनुशासित होना होगा।
यदि शराब, आंतरिक झगड़े और जादू-टोना संबंधी भय समाज को विभाजित करते हैं, तो सामूहिक संगठन कठिन होगा।
इसलिए धार्मिक सुधार आगे राजनीतिक संगठन की नींव बना।
‘एक ईश्वर’ और राजनीतिक एकता
मुंडा धार्मिक संसार में विविध आत्माओं और शक्तियों की मान्यताएं थीं।
बिरसा के आंदोलन में एक सर्वोच्च ईश्वर की धारणा और स्वयं बिरसा की पैगंबर-सदृश स्थिति अधिक स्पष्ट होती गई।
इसमें ईसाई एकेश्वरवाद और वैष्णव भक्ति के संभावित प्रभावों को इतिहासकारों ने देखा है।
स्वीकार करते हैं, तो राजनीतिक संगठन आसान होता है।
अर्थात धार्मिक केंद्रीकरण ने राजनीतिक केंद्रीकरण को बल दिया।
सरदारी आंदोलन ने विचार को भूमि दी
बिरसा यदि केवल धार्मिक अनुभवों से गुजरे होते, तो संभव है कि वे एक स्थानीय धर्म-सुधारक बनकर रह जाते।
लेकिन उनके सामने सरदारी लड़ाई का प्रश्न था।
यही कारण है कि उनका धर्म जल्दी ही भूमि की राजनीति से जुड़ गया।
उनका धार्मिक निर्माण और राजनीतिक निर्माण अलग-अलग प्रक्रियाएं नहीं थीं।
चाईबासा ने उन्हें क्या सिखाया?
चाईबासा के लगभग चार वर्षों को संक्षेप में देखें तो युवा बिरसा ने वहां पांच महत्वपूर्ण बातें सीखीं।
लिखित शब्द और संगठित संस्था कितनी प्रभावशाली हो सकती है।
मिशन का अपना स्कूल, प्रचारक और अनुशासन था।
तीसरी—भूमि प्रश्न धार्मिक जीवन से अलग नहीं है।
ईसाई बने मुंडा भी जमीन खो सकते हैं।
पांचवीं—बाहरी संस्था पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं।
आगे बिरसा इन्हीं अनुभवों का उपयोग करेंगे।
मिशन भी एक संगठनात्मक पाठशाला था
यह पहलू विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
बिरसा मिशन के विरोधी बने, लेकिन उन्होंने मिशन को बहुत निकट से देखा था।
इसलिए विरोधी संस्था भी राजनीतिक शिक्षा का स्रोत बन सकती है।
वैष्णव परंपरा ने क्या दिया?
वैष्णव प्रभाव ने बिरसा को दूसरी तरह की धार्मिक राजनीति दिखाई।
वैष्णव भक्ति भारतीय सांस्कृतिक संसार के भीतर व्यक्तिगत भक्ति, अवतार और नैतिक धार्मिक जीवन की भाषा देती थी।
विशेष रूप से अवतार संबंधी अवधारणाएं एक ऐसे समाज में प्रभावशाली हो सकती थीं जो उद्धारकर्ता नेतृत्व की तलाश में था।
कैम्ब्रिज से संबद्ध अध्ययन आनंद पानरे के माध्यम से बिरसा के वैष्णव अवधारणाओं और दस अवतारों की धारणा से परिचित होने की ओर संकेत करता है।
आगे बिरसा स्वयं साधारण धार्मिक प्रचारक की सीमा पार कर असाधारण दैवीय व्यक्तित्व के रूप में प्रतिष्ठित होंगे।
लेकिन मुंडा आधार कभी समाप्त नहीं हुआ
बिरसा के धार्मिक विचारों में जितने भी बाहरी प्रभाव आए हों, उनकी राजनीतिक भाषा अंततः मुंडा भूमि और समाज से निकली।
इसलिए बिरसा को किसी ‘हिंदू सुधारक’ या ‘पूर्व ईसाई प्रचारक’ में सीमित करना दोनों ही गलत होंगे।
वे एक मुंडा नेता थे जिन्होंने विभिन्न धार्मिक संसारों के अनुभव को अपनी सामुदायिक राजनीति में रूपांतरित किया।
धार्मिक पहचान और औपनिवेशिक आधुनिकता
बिरसा का जीवन एक और महत्वपूर्ण तथ्य दिखाता है—
आदिवासी राजनीतिक चेतना केवल ‘परंपरा बनाम आधुनिकता’ का संघर्ष नहीं थी।
बिरसा ने आधुनिक शिक्षा का अनुभव किया।
नई धार्मिक अवधारणाओं से संपर्क किया।
फिर इन्हीं अनुभवों का उपयोग करते हुए अपनी नई सामुदायिक विचारधारा बनाई।
अर्थात वह केवल पुरानी दुनिया वापस नहीं मांग रहे थे।
वे पुरानी स्मृति और नए अनुभवों से एक नई राजनीतिक आधुनिकता बना रहे थे।
अनुभव से आलोचना तक
युवा बिरसा ने तीन धार्मिक–सामाजिक संसारों को भीतर से देखा।
वैष्णव प्रभाव
इन तीनों ने उन्हें तुलनात्मक दृष्टि दी।
यही आलोचनात्मक चयन उन्हें एक सामान्य अनुयायी से नेता बनने की दिशा में ले गया।
1890–94 : अस्पष्ट लेकिन निर्णायक संक्रमण
बिरसा के जीवन का 1890 से लगभग 1894 तक का काल बाद के 1895–1900 की तुलना में दस्तावेजों में कम स्पष्ट है।
और बिरसा की स्थानीय प्रतिष्ठा बनने लगी।
इसी काल के बारे में लोककथाएं और बाद की जीवनियां कई चमत्कारिक घटनाएं भी जोड़ती हैं।
ऐतिहासिक शोध में इन्हें सावधानी से पढ़ना चाहिए।
लेकिन यह निर्विवाद है कि दशक के मध्य तक बिरसा सामान्य ग्रामीण युवक नहीं रह गए थे।
बीमारी और उपचार की प्रतिष्ठा
बिरसा की प्रारंभिक प्रसिद्धि का एक महत्वपूर्ण आधार उनकी उपचारकर्ता या healer के रूप में प्रतिष्ठा भी थी।
ग्रामीण समाज में बीमारी केवल चिकित्सा का विषय नहीं होती थी।
यदि कोई व्यक्ति रोगियों को ठीक करने वाला माना जाए तो उसकी आध्यात्मिक प्रतिष्ठा तेजी से बढ़ सकती है।
धीरे-धीरे लोग उन्हें केवल उपदेशक नहीं बल्कि विशेष दैवीय शक्ति वाला व्यक्ति मानने लगे।
चमत्कार की कथा और इतिहासकार की सावधानी
बिरसा के बारे में अनेक चमत्कारिक कथाएं प्रचलित हुईं।
ऐतिहासिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है—
बिरसा का धार्मिक–सामाजिक आंदोलन और बिरसाइत पंथ
‘धरती आबा’ से संगठित समुदाय तक : धर्म, सामाजिक शुद्धि और उलगुलान की राजनीतिक तैयारी
1894–95 के आसपास बिरसा मुंडा के जीवन में एक निर्णायक परिवर्तन आया। अब वे केवल मिशनरी शिक्षा से गुजरा, वैष्णव प्रभावों से परिचित और सरदारी आंदोलन से प्रभावित युवा नहीं रहे। उनके आसपास एक ऐसा धार्मिक समुदाय बनने लगा जो उन्हें दैवीय शक्ति-संपन्न नेता, भविष्यवक्ता और ‘धरती आबा’ के रूप में देखने लगा।
यहीं से बिरसा आंदोलन का पहला संगठित चरण शुरू होता है।
उस समय अभी 1899 का सशस्त्र उलगुलान नहीं आया था। लेकिन उसकी सामाजिक जमीन तैयार होने लगी थी।
समाज को ‘शुद्ध’ करने का कार्यक्रम दिया,
एक ऐसा सामुदायिक संगठन दिया जो गांव की सीमाओं को पार कर सकता था।
इसलिए बिरसाइत आंदोलन को केवल धार्मिक पुनरुत्थान कहना पर्याप्त नहीं है।
वह धर्म के माध्यम से समाज को राजनीतिक रूप से पुनर्गठित करने की प्रक्रिया भी था।
IGNOU का मानक अध्ययन भी इस चरण को इसी क्रम में रखता है—1895 में बिरसा ने आंदोलन शुरू किया, मुंडाओं को नया धर्म और जीवन-संहिता दी और उनके सामने विदेशी शासन के स्थान पर ‘मुंडा राज’ की संभावना रखी।
1895 : धार्मिक नेता का सार्वजनिक उदय
1895 बिरसा आंदोलन के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण वर्ष है।
इसी समय तक उनकी प्रतिष्ठा इतनी बढ़ चुकी थी कि लोग दूर-दूर से उन्हें देखने और उनका उपदेश सुनने आने लगे।
दैवीय संदेशवाहक, उपचारकर्ता और समुदाय को संकट से निकालने वाले नेता
IGNOU के विवरण के अनुसार मुंडा समाज ने बिरसा में अपनी आकांक्षाओं का प्रतिनिधि देखा और उन्हें ऐसे नेता के रूप में स्वीकार किया जिसने धर्म, जीवन-संहिता और बेहतर भविष्य—तीनों की आशा दी।
यहां से करिश्मा राजनीतिक शक्ति बनना शुरू करता है।
‘दैवीय अनुभव’ : इतिहास और विश्वास के बीच
बिरसा की जीवनी में एक ऐसे आध्यात्मिक अनुभव की कई कथाएं मिलती हैं जिसके बाद उन्होंने स्वयं को विशेष दैवीय मिशन वाला व्यक्ति घोषित किया।
इन सभी कथाओं को शाब्दिक ऐतिहासिक घटना मान लेना कठिन है।
लेकिन इतिहासकार के लिए अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है—
मुंडा समाज ने बिरसा के दैवीय दावे को स्वीकार क्यों किया?
सरदारी आंदोलन पर्याप्त सफलता नहीं पा रहा था,
और औपनिवेशिक शासन से न्याय की उम्मीद कम हो रही थी—
उस समाज के लिए एक ऐसे नेता की संभावना अत्यंत आकर्षक थी जो कहे कि वर्तमान अन्यायपूर्ण व्यवस्था स्थायी नहीं है।
इसलिए बिरसा का ‘दैवीय अनुभव’ निजी आध्यात्मिक घटना से अधिक बड़ा सामाजिक अर्थ ग्रहण कर गया।
करिश्मे का जन्म
करिश्माई नेतृत्व केवल नेता द्वारा घोषित नहीं किया जाता।
और मुंडा समाज को मुक्त करने की क्षमता
IGNOU के विवरण में उनके अनुयायियों द्वारा उन्हें ‘Birsa Bhagwan’ समझने और उनके उपचार-संबंधी चमत्कारों में विश्वास करने का उल्लेख है। उसी स्रोत में बिरसा को सिंगबोंगा का पैगंबर मानने की बात भी दर्ज है।
यहां इतिहासकार को चमत्कार की सत्यता नहीं, उसके राजनीतिक प्रभाव का अध्ययन करना चाहिए।
विश्वास ने बिरसा के आदेश को साधारण राजनीतिक अपील से कहीं अधिक शक्तिशाली बना दिया।
धरती आबा
धरती का पिता / धरती से जुड़ा संरक्षक।
यह उपाधि इतनी महत्वपूर्ण क्यों बनी?
क्योंकि मुंडा संकट का केंद्रीय प्रश्न ही धरती था।
इसलिए ऐसे नेता को ‘धरती आबा’ कहना धार्मिक और राजनीतिक दोनों अर्थ रखता था।
वह उस धरती के वैध अधिकार का प्रतिनिधि बन रहा था जिसे मुंडा अपना मानते थे।
‘धरती आबा’ और खूंटकट्टी
यह उपाधि खूंटकट्टी व्यवस्था से जोड़कर और स्पष्ट होती है।
इसलिए भूमि पर उनका वंशीय अधिकार है।
बिरसा का नेतृत्व इसी धरती पर अधिकार की रक्षा का नेतृत्व बना।
इसलिए बिरसा की धार्मिक प्रतिष्ठा किसी अमूर्त स्वर्गीय सत्ता से नहीं जुड़ी थी।
यहीं धार्मिक प्रतीक भूमि राजनीति में बदल जाता है।
क्या बिरसा ने नया धर्म स्थापित किया?
बाद के साहित्य में इसे प्रायः बिरसा धर्म, बिरसाइत धर्म या बिरसाइत पंथ कहा जाता है।
जनजातीय कार्य मंत्रालय के डिजिटल संग्रह में उपलब्ध एक नृवंशीय विश्वकोश भी ‘Birsa Dharam’ को उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में मुंडाओं के बीच विकसित एक धार्मिक धारा के रूप में दर्ज करता है, जिसमें एक ईश्वर, चरित्र की शुद्धता और विशिष्ट आचार-नियमों पर बल था; इसके अनुयायियों को ‘Birsait Munda’ कहा गया।
1895 में बिरसा ने संभवतः किसी आधुनिक संस्थागत धर्म की तरह—
‘बिरसाइत’ धीरे-धीरे उस धार्मिक समुदाय का नाम बना जो उनके उपदेश और आचार को मानता था।
नया धर्म क्यों आवश्यक लगा?
मुंडा समाज के सामने दो धार्मिक चुनौतियां थीं।
अपनी धार्मिक परंपराओं के भीतर वे व्यवहार जिन्हें बिरसा सामाजिक कमजोरी के रूप में देखने लगे थे।
“अपने समाज को भीतर से बदलो।”
यहीं बिरसा का आंदोलन केवल प्रतिक्रियावादी धार्मिक वापसी नहीं रहता।
वह सुधारवादी पुनरुत्थान बन जाता है।
सिंगबोंगा और एकेश्वरवाद
बिरसा के धार्मिक संदेश में एक सर्वोच्च ईश्वर की धारणा महत्वपूर्ण होती गई।
विभिन्न स्रोतों में इसे सिंगबोंगा से जोड़ा जाता है, हालांकि बिरसा की धार्मिक अवधारणाओं को बाद के व्यवस्थित धर्मशास्त्र की तरह पढ़ने से बचना चाहिए।
IGNOU के अध्ययन में उन्हें सिंगबोंगा के पैगंबर और एकमात्र सर्वोच्च ईश्वर की घोषणा करने वाले नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
इस पर ईसाई एकेश्वरवाद का प्रभाव संभव है।
वैष्णव भक्ति के अनुभव ने भी एक सर्वोच्च दैवीय सत्ता की अवधारणा को बल दिया होगा।
लेकिन बिरसा ने इसे मुंडा समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप पुनर्गठित किया।
एक ईश्वर का राजनीतिक महत्व
एकेश्वरवाद को केवल धार्मिक सिद्धांत के रूप में पढ़ना अधूरा होगा।
स्वीकार करते हैं, तो सामाजिक संगठन आसान हो जाता है।
स्थानीय धार्मिक विविधता के ऊपर एक साझा पहचान खड़ी होती है।
धार्मिक एकता राजनीतिक एकता की संभावना पैदा करती है।
बिरसा आंदोलन में यही प्रक्रिया दिखाई देती है।
बिरसा स्वयं कहां स्थित थे?
अलग-अलग स्रोत और अनुयायी परंपराएं अलग भाषा इस्तेमाल करती हैं।
यही करिश्माई धार्मिक आंदोलनों की प्रकृति होती है।
नेता के आसपास अनेक अर्थ एक साथ विकसित हो सकते हैं।
सरकारी जनजातीय साहित्य में बिरसा को अनुयायियों द्वारा Birsa Bhagwan अथवा धरती आबा के रूप में स्वीकार किए जाने का उल्लेख मिलता है।
इसलिए किसी एक धर्मशास्त्रीय श्रेणी में उन्हें बंद करना उचित नहीं।
धर्म का पहला उद्देश्य : सामाजिक शुद्धि
बिरसा के उपदेशों का बड़ा हिस्सा तत्काल अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार उठाने के बारे में नहीं था।
उन्होंने पहले समाज सुधार पर जोर दिया।
और कुछ परंपरागत धार्मिक व्यवहारों की आलोचना
भारत सरकार के अमृत महोत्सव के आधिकारिक विवरण में भी बिरसा द्वारा जादू-टोना छोड़ने, प्रार्थना करने, शराब से दूर रहने, ईश्वर में विश्वास रखने और आचार-संहिता का पालन करने की शिक्षा देने का उल्लेख है।
शराब-विरोध क्यों?
मुंडा सामाजिक जीवन में स्थानीय मदिरा के सांस्कृतिक उपयोग को देखते हुए बिरसा का शराब-विरोध केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य-सुधार नहीं था।
यदि कोई समुदाय संघर्ष के लिए संगठित होना चाहता है तो—
इसलिए मद्य-विरोध को धार्मिक शुद्धि के साथ राजनीतिक संगठन की तैयारी के रूप में भी पढ़ा जा सकता है।
लेकिन आदिवासी संस्कृति को ‘शराबी समाज’ कहना गलत होगा
औपनिवेशिक और मिशनरी लेखन में आदिवासी समाजों को कई बार शराब, अंधविश्वास और ‘असभ्यता’ से जोड़कर चित्रित किया गया।
यदि हम बिरसा के शराब-विरोध को उसी भाषा में लिखें, तो अनजाने में औपनिवेशिक दृष्टि दोहरा सकते हैं।
बिरसा का सुधार कार्यक्रम अपने समाज के भीतर से आया राजनीतिक–धार्मिक अनुशासन था।
उसे यह सिद्ध करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए कि पूरा मुंडा समाज नैतिक रूप से पतित था।
जादू-टोना और ओझा-प्रथा पर प्रहार
बिरसा ने जादू-टोना संबंधी विश्वासों और उनसे जुड़े कुछ धार्मिक विशेषज्ञों की भूमिका को चुनौती दी।
सरकारी विवरण भी इस बात को दर्ज करता है कि उन्होंने अपने अनुयायियों से witchcraft जैसी मान्यताओं से दूरी बनाने को कहा।
बीमारी के कारण की गलत पहचान कर सकते थे,
और कभी-कभी विशेषकर कमजोर व्यक्तियों पर हिंसा का आधार बन सकते थे।
बिरसा का संदेश इन विभाजनों के स्थान पर एक साझा धार्मिक व्यवस्था स्थापित कर रहा था।
रोग और उपचार
बिरसा की धार्मिक प्रतिष्ठा तेजी से बढ़ने में उनकी उपचारकर्ता की छवि का महत्वपूर्ण योगदान था।
महामारी और बीमारी के समय आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं सीमित थीं।
ग्रामीण समाज में चिकित्सा, धर्म और आध्यात्मिकता की सीमाएं स्पष्ट नहीं थीं।
जब लोग बिरसा के पास उपचार के लिए आने लगे और कुछ लोगों ने स्वास्थ्य लाभ का अनुभव उनके आशीर्वाद से जोड़ा, तो उनकी प्रतिष्ठा फैलती गई।
IGNOU के स्रोत में महामारियों के समय बिरसा द्वारा लोगों के बीच जाने और रोगियों को ठीक करने की उनकी प्रसिद्धि का उल्लेख है।
यह धार्मिक विश्वास राजनीतिक नेतृत्व का आधार बन गया।
उपचारकर्ता से उद्धारकर्ता
बिरसा व्यक्ति की बीमारी ठीक करते हैं।
इसलिए धार्मिक उपचार धीरे-धीरे सामाजिक उपचार में बदलता है।
व्यक्तिगत शुद्धि और सामूहिक परिवर्तन
बिरसा का सुधार कार्यक्रम यह संकेत देता था कि केवल अंग्रेजों और जमींदारों को दोष देने से परिवर्तन नहीं आएगा।
यह अत्यंत महत्वपूर्ण राजनीतिक विचार था।
क्योंकि आंदोलन केवल शत्रु की पहचान नहीं कर रहा था।
वह नए समाज के लिए नया मनुष्य भी बना रहा था।
बिरसाइत समुदाय : विश्वास से संगठन
जैसे-जैसे बिरसा के अनुयायी बढ़े, उनके चारों ओर एक स्पष्ट धार्मिक समुदाय बनने लगा।
इसके सदस्यों की पहचान केवल इस बात से नहीं थी कि वे बिरसा को पसंद करते हैं।
और दूसरे अनुयायियों के साथ साझा पहचान बनाते थे।
यही समुदाय आगे बिरसाइत पहचान का आधार बना।
जनजातीय कार्य मंत्रालय के संग्रह में उपलब्ध नृवंशीय सामग्री भी बिरसा धर्म के अनुयायियों को विशिष्ट नियमों का पालन करने वाले ‘Birsait Munda’ के रूप में दर्ज करती है।
धर्म से गांवों के बीच नेटवर्क
यह राजनीतिक संगठन की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण था।
सरदारी आंदोलन ने पहले से गांवों के बीच संपर्क बनाए थे।
बिरसा का धार्मिक आंदोलन उस नेटवर्क को नया भावनात्मक आधार देता था।
अब लोग केवल भूमि याचिका पर हस्ताक्षर करने के लिए नहीं जुड़ रहे थे।
वे एक साझा धार्मिक समुदाय के सदस्य बन रहे थे।
यानी धर्म एक प्रकार का संचार नेटवर्क बन गया।
धार्मिक सभा राजनीतिक मंच कैसे बनी?
जब लोग बिरसा का उपदेश सुनने के लिए एकत्र होते थे, तो स्वाभाविक रूप से केवल धर्म की चर्चा नहीं होती होगी।
इसलिए धार्मिक सभा धीरे-धीरे सामाजिक शिकायतों के साझा मंच में बदल सकती थी।
औपनिवेशिक राज्य राजनीतिक सभा पर जल्दी संदेह कर सकता था।
लेकिन धार्मिक आंदोलन गांव-समाज में अधिक सहजता से फैल सकता था।
क्या बिरसाइत आंदोलन शुरुआत से ब्रिटिश-विरोधी था?
1894–95 के धार्मिक चरण को सीधे दिसंबर 1899 की सशस्त्र बगावत के बराबर नहीं रखना चाहिए।
IGNOU भी बिरसा आंदोलन में प्रारंभिक धार्मिक–करिश्माई चरण से बाद के quasi-political and militaristic चरण की ओर संक्रमण की बात करता है।
धर्म और सरदारी आंदोलन का मिलन
बिरसा का धार्मिक आंदोलन अब कह रहा था—
जब ये दोनों धाराएं मिलीं तो आंदोलन का स्वरूप बदल गया।
सरदारों को बिरसा में क्या मिला?
सरदारी आंदोलन की सबसे बड़ी कमजोरी थी—
बिरसा में उन्हें ऐसा व्यक्ति दिखाई दिया जिसके पीछे सामान्य मुंडा बड़ी संख्या में आ सकते थे।
उनके पास वह शक्ति थी जो याचिका में नहीं थी—
यह अधिकार ईश्वरीय और नैतिक दोनों है।
राजनीतिक दावे के लिए इससे अधिक शक्तिशाली वैधता कठिन थी।
भूमि का धार्मिककरण
यहीं एक अत्यंत महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ।
खूंटकट्टी पहले ऐतिहासिक भूमि-अधिकार था।
बिरसा आंदोलन में भूमि धीरे-धीरे पवित्र अधिकार भी बन गई।
यानी भूमि छीनना अब केवल आर्थिक अन्याय नहीं रहा।
वह सामाजिक और नैतिक व्यवस्था का उल्लंघन बन गया।
दिकू-विरोध को धार्मिक अर्थ
दिकू पहले आर्थिक शोषणकारी शक्ति का नाम था।
अब उसे व्यापक नैतिक संकट का कारण भी समझा जाने लगा।
और समाज की पुरानी व्यवस्था को बदलती है।
इसलिए दिकू से मुक्ति केवल आर्थिक राहत नहीं रही।
समाज की शुद्धि
यहीं धार्मिक भाषा राजनीति को अत्यंत शक्तिशाली बनाती है।
मिशनरी विरोध क्यों तीखा हुआ?
बिरसा के आंदोलन में ईसाई मिशन का प्रश्न जटिल था।
बिरसा स्वयं मिशन शिक्षा से गुजरे थे।
कुछ मिशनरियों ने भूमि-अत्याचार के विरुद्ध आदिवासियों का पक्ष भी लिया था।
लेकिन 1890 के दशक में बिरसा और उनके अनुयायियों के लिए मिशन—
लेकिन मिशनरी को महाजन या जमींदार जैसा आर्थिक शोषक मान लेना गलत होगा।
उसके प्रति विरोध मुख्यतः धार्मिक–सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रतीकात्मकता से जुड़ा था।
बिरसा का धर्म ईसाई-विरोध भर नहीं था
यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि बिरसा धर्म का पूरा अर्थ केवल ईसाई-विरोध मान लें तो उसके सामाजिक सुधार का बड़ा हिस्सा गायब हो जाएगा।
बिरसा ने केवल मिशन की आलोचना नहीं की।
उन्होंने मुंडा समाज की भी आलोचना की।
यानी उनके लिए बाहरी प्रभुत्व और आंतरिक कमजोरी—दोनों प्रश्न थे।
यह किसी भी गंभीर समाज-सुधार आंदोलन की पहचान है।
क्या यह ‘हिंदूकरण’ था?
इस आधार पर कभी-कभी आंदोलन को हिंदू प्रभाव के भीतर रख दिया जाता है।
बिरसाइत समुदाय का राजनीतिक केंद्र था—
इसलिए वैष्णव तत्वों का ग्रहण अपने आप व्यापक हिंदू सामाजिक व्यवस्था में विलय का प्रमाण नहीं है।
उन्होंने उपयोगी प्रतीक लिए और उन्हें नई सामुदायिक राजनीति में बदला।
ईसाई और वैष्णव प्रभाव का रचनात्मक पुनर्गठन
जनजातीय नृवंशीय साहित्य में ऐसा मिश्रित वर्णन मिलता है, लेकिन आधुनिक इतिहासलेखन हमें अधिक सावधानी से देखने को कहता है।
ईसाई मिशन से संगठन और एकेश्वरवादी धार्मिक भाषा के कुछ तत्व,
वैष्णव परंपरा से नैतिकता और भक्ति के तत्व,
मुंडा परंपरा से भूमि, समुदाय और सिंगबोंगा का आधार,
और सरदारी आंदोलन से राजनीतिक प्रश्न
बिरसा धर्म का वास्तविक केंद्र : मुंडा पुनर्निर्माण
इसलिए बिरसाइत आंदोलन की सबसे उपयुक्त परिभाषा हो सकती है—
मुंडा समाज का धार्मिक–नैतिक पुनर्निर्माण।
और अपने भूमि-अधिकार के लिए खड़ा हो।
यानी नया धर्म स्वयं में अंतिम लक्ष्य नहीं था।
IGNOU के शब्दों में बिरसा का धर्म उनके समुदाय के दुःख समाप्त करने का means to an end भी था।
प्रार्थना और अनुशासन की राजनीति
बिरसा का अनुयायी यदि नियमित प्रार्थना करता है और आचार मानता है, तो एक महत्वपूर्ण परिवर्तन होता है।
वह सचेत रूप से संगठित धार्मिक समुदाय का सदस्य बनता है।
यह पहचान व्यवहार से प्रमाणित होती है।
क्योंकि आंदोलन अब केवल भीड़ नहीं है।
उसके सदस्य एक-दूसरे को पहचान सकते हैं।
उन्हें पता है कि वे किस नियम को मानते हैं।
सामुदायिक अनुशासन और आंदोलन
सफल आंदोलन के लिए तीन चीजें आवश्यक होती हैं—
संचार
धार्मिक सभाओं और प्रचारकों के माध्यम से।
अनुशासन
नया आचार और नेतृत्व के प्रति निष्ठा।
यही कारण है कि धर्म आगे सशस्त्र उलगुलान की संगठनात्मक आधारभूमि बन सका।
क्या सभी मुंडा बिरसाइत बन गए?
बिरसा का प्रभाव व्यापक था, लेकिन पूरा मुंडा समाज उनके साथ नहीं आया।
कुछ लोग औपनिवेशिक शासन अथवा स्थानीय जमींदारी से अलग तरह के संबंध रखते थे।
उनका आंदोलन शक्तिशाली था, लेकिन समुदाय के भीतर मतभेद भी थे।
बिरसाइत पहचान ने नई आंतरिक सीमा भी बनाई
हर नया धार्मिक समुदाय एक नया ‘हम’ बनाता है।
लेकिन उसी के साथ नया ‘वे’ भी बन सकता है।
बिरसाइतों और ईसाई मुंडाओं के बीच तनाव बढ़ सकता था।
पुराने धार्मिक विशेषज्ञों और नए आंदोलन के बीच विवाद हो सकता था।
इसलिए सामाजिक पुनर्गठन हमेशा केवल एकता नहीं लाता।
वह नई विभाजन रेखाएं भी बना सकता है।
यही बिरसा आंदोलन की एक जटिल सीमा थी।
फिर भी साझा संकट अधिक शक्तिशाली था
इन मतभेदों के बावजूद भूमि और दिकू का संकट इतना व्यापक था कि धार्मिक भिन्नता हमेशा राजनीतिक सीमा नहीं बनी रही।
उलगुलान के बाद के चरण में आंदोलन की सामाजिक संरचना को समझते समय यह देखना होगा कि—
आंदोलन किसी एक धार्मिक पहचान का यांत्रिक विस्तार नहीं था।
स्वर्णयुग की कल्पना
बिरसा के धार्मिक संदेश में एक ऐसे पुराने न्यायपूर्ण संसार की कल्पना विकसित हुई जिसमें—
इस प्रकार का ‘स्वर्णयुग’ ऐतिहासिक रूप से शाब्दिक वास्तविकता रहा हो या नहीं, राजनीतिक रूप से बहुत शक्तिशाली था।
क्योंकि वह वर्तमान की आलोचना के लिए मानदंड देता था।
उस न्यायपूर्ण व्यवस्था की पुनर्स्थापना।
धर्म में समय भी बदलता है
धार्मिक पुनरुत्थानवादी आंदोलनों में समय का अर्थ अक्सर बदल जाता है।
कुछ वर्षों में स्थितियां बेहतर होंगी।
एक निर्णायक परिवर्तन आने वाला है।
बिरसा के अनुयायियों में भी ऐसी आशा विकसित हुई कि वर्तमान अन्यायपूर्ण संसार समाप्त होगा।
इससे आंदोलन में असाधारण उत्साह पैदा हुआ।
‘मिलेनरियन’ आंदोलन का प्रश्न
इतिहासकारों ने बिरसा आंदोलन को अक्सर millenarian अथवा मसीहाई आंदोलन कहा है—अर्थात ऐसा आंदोलन जो वर्तमान अन्यायपूर्ण व्यवस्था के शीघ्र अंत और एक नए न्यायपूर्ण युग की अपेक्षा करता है।
लेकिन आधुनिक शोध ने सावधान किया है कि ‘मिलेनरियन’ लेबल पर बहुत अधिक जोर देने से आंदोलन की ठोस कृषि और राजनीतिक परिस्थितियां पीछे छूट सकती हैं।
जनजातीय अध्ययन के एक सर्वेक्षण में उद्धृत उदय चंद्र के शोध का केंद्रीय प्रश्न भी यही है—बिरसाइतों ने हथियार क्यों उठाए, किसके विरुद्ध उठाए और धर्म की वास्तविक भूमिका क्या थी; यानी विद्रोह को केवल ‘मिलेनरियन’ कह देने के बजाय उसके सामाजिक संसार को गंभीरता से समझना चाहिए।
यह बेहद महत्वपूर्ण इतिहासलेखन संबंधी सावधानी है।
धर्म अफीम था या राजनीतिक शक्ति?
औपनिवेशिक अथवा बाद के कुछ आधुनिक दृष्टिकोण धार्मिक आंदोलनों को ‘अंधविश्वास’ मानकर उनके राजनीतिक महत्व को कम कर सकते हैं।
इसलिए यहां धर्म सामाजिक निष्क्रियता का साधन नहीं था।
चमत्कार और राजनीतिक साहस
बिरसा के अनुयायियों में उनकी अलौकिक शक्ति संबंधी विश्वासों के बारे में कई स्रोत बताते हैं।
कुछ कथाओं में यह विश्वास भी मिलता है कि अंग्रेजों की गोलियां निष्प्रभावी हो जाएंगी या उनका प्रभाव समाप्त हो जाएगा।
जनजातीय शोध की पुरानी पत्रिका में भी बिरसा के दैवीय खुलासों और बंदूकों के निष्प्रभावी हो जाने के विश्वास का उल्लेख है।
क्योंकि धार्मिक आत्मविश्वास सैन्य वास्तविकता का विकल्प नहीं था।
‘अबुआ दिशुम, अबुआ राज’ और मुंडा राज की राजनीतिक कल्पना
भूमि-अधिकार से स्वशासन तक : लगान-अस्वीकार, महारानी के राज को चुनौती और बिरसा राज की अवधारणा
बिरसा मुंडा के आंदोलन का सबसे प्रसिद्ध राजनीतिक सूत्र आज “अबुआ दिशुम, अबुआ राज” के रूप में स्मरण किया जाता है—अर्थात मोटे तौर पर “हमारा देश/हमारी धरती, हमारा राज।” आधुनिक झारखंड की राजनीतिक स्मृति में यह वाक्य आदिवासी स्वशासन, जल–जंगल–जमीन और क्षेत्रीय अस्मिता का अत्यंत शक्तिशाली प्रतीक बन चुका है। आधुनिक शोध भी इसे भूमि पर अधिकार, सामुदायिक स्वायत्तता और राजनीतिक नियंत्रण को एक सूत्र में समेटने वाली अभिव्यक्ति मानता है।
लेकिन इतिहास की दृष्टि से एक सावधानी अत्यंत आवश्यक है।
आज जिस सुस्पष्ट रूप में “अबुआ दिशुम, अबुआ राज” बिरसा से जोड़ा जाता है, उसे उन्नीसवीं सदी के किसी आधुनिक राजनीतिक घोषणापत्र की शब्दशः पंक्ति मान लेना उचित नहीं होगा। बिरसा से संबंधित औपनिवेशिक और बाद के स्रोतों में इससे निकट राजनीतिक भाव अधिक स्पष्ट रूप से इस रूप में मिलता है कि महारानी का राज समाप्त होगा और बिरसा/मुंडा राज स्थापित होगा, सरकार को नहीं बल्कि बिरसा को माना जाएगा और रैयत जमींदारों को लगान नहीं देंगे। समकालीन या निकटवर्ती औपनिवेशिक विवरण में यही राजनीतिक चुनौती दर्ज हुई।
इसलिए इस पूरे विचार को समझने का सही तरीका है—
‘दिशुम’ का अर्थ केवल आधुनिक ‘देश’ नहीं
‘दिशुम’ को सामान्य हिंदी में ‘देश’ अनूदित किया जाता है, लेकिन आधुनिक राष्ट्र-राज्य के अर्थ वाला ‘देश’ यहां भ्रम पैदा कर सकता है।
मुंडारी सामाजिक–राजनीतिक संदर्भ में यह शब्द—
और उस क्षेत्र से जुड़ी राजनीतिक–सांस्कृतिक पहचान
“हमारी अपनी धरती और हमारा अपना सामाजिक–भौगोलिक संसार।”
आधुनिक शोध में abua disum को ‘lost Munda raj’ और आदिवासी भू-अधिकार की पुनर्प्राप्ति से जोड़कर पढ़ा गया है।
‘राज’ किस अर्थ में?
‘राज’ शब्द भी कई स्तरों पर काम करता था।
मुंडा–मानकी जैसी स्थानीय संस्थाओं की प्रतिष्ठा,
खूंटकट्टी भूमि-अधिकार की पुनर्स्थापना,
या बिरसा के नेतृत्व में नई धार्मिक–राजनीतिक सत्ता।
यानी ‘राज’ का अर्थ केवल आधुनिक लोकतांत्रिक सरकार नहीं था।
बिरसा के अनुयायियों के लिए राज का प्रश्न था—
हमारे जीवन के नियम कौन बनाएगा?
यही प्रश्न जमीन, लगान, धर्म और कचहरी से निकलकर संप्रभुता तक पहुंचता है।
आधुनिक अर्थ में नहीं।
बिरसा के पास बीसवीं सदी के भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन जैसा कोई अखिल-भारतीय राष्ट्र-राज्य कार्यक्रम उपलब्ध नहीं था।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की संवैधानिक मांगों से संचालित नहीं था,
आधुनिक संसदीय लोकतंत्र का कार्यक्रम नहीं देता था,
और न ही भारत के सभी औपनिवेशिक प्रांतों के लिए एक केंद्रीकृत राष्ट्रीय राज्य की रूपरेखा प्रस्तुत करता था।
इसलिए बिरसा को सीधे आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद की विकसित अवधारणा के भीतर रख देना कालभ्रम होगा।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि उनका संघर्ष राजनीतिक स्वतंत्रता का संघर्ष नहीं था।
एक विशिष्ट आदिवासी–कृषक क्षेत्र की विदेशी और दिकू सत्ता से मुक्ति का संघर्ष।
और इस अर्थ में उसमें स्पष्ट औपनिवेशिक-विरोधी स्वशासन की आकांक्षा मौजूद थी।
NCERT भी आंदोलन का राजनीतिक लक्ष्य ब्रिटिश सरकार, जमींदार, महाजन और मिशनरियों के प्रभुत्व को समाप्त कर मुंडा राज स्थापित करना बताता है।
इसलिए ‘आदिम राष्ट्रवाद’ कहना भी सावधानी मांगता है
बिरसा आंदोलन को कभी-कभी ‘प्रारंभिक राष्ट्रवादी आंदोलन’ कहा जाता है।
यह आंशिक रूप से सही है यदि हमारा अर्थ है—
लेकिन यदि ‘राष्ट्रवाद’ से हमारा अर्थ है—
एक आधुनिक भारतीय राष्ट्र की स्पष्ट राजनीतिक चेतना,
स्वदेशी क्षेत्रीय संप्रभुता अथवा आदिवासी स्वशासन की राजनीतिक चेतना।
इसमें विदेशी राज का विरोध है, लेकिन उसकी राजनीतिक भाषा मुंडा भूमि और समुदाय से निकलती है।
खूंटकट्टी से स्वराज की ओर
बिरसा की राजनीतिक कल्पना को खूंटकट्टी से अलग करके नहीं समझा जा सकता।
इसलिए जमीन पर हमारा पुराना अधिकार है।
तो जमींदार का श्रेष्ठ अधिकार अनुचित है।
और यदि उसकी शक्ति अंग्रेजी कानून से आती है,
उस अंग्रेजी सरकार का अधिकार कितना वैध है?
यहीं भूमि-अधिकार राजनीतिक संप्रभुता में बदलता है।
लगान-अस्वीकार : आर्थिक निर्णय नहीं, सत्ता-अस्वीकार
बिरसा द्वारा रैयतों को लगान न देने की बात राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
औपनिवेशिक और शैक्षणिक स्रोतों में बिरसा द्वारा किसानों को जमींदारों को किराया/लगान न देने का आदेश दर्ज है।
यदि किसान केवल अधिक लगान से नाराज हो तो उसकी मांग हो सकती है—
लेकिन बिरसा की राजनीति आगे बढ़कर कहती थी—
लगान मत दो।
और जब राजस्व व्यवस्था औपनिवेशिक सरकार द्वारा संरक्षित हो तो—
लगान-अस्वीकार अप्रत्यक्ष रूप से सरकार की वैधता पर भी प्रहार था।
लगान देना राजनीतिक आज्ञाकारिता क्यों था?
जमींदार को दिया गया लगान केवल आर्थिक भुगतान नहीं था।
“मैं तुम्हारे श्रेष्ठ भूमि-अधिकार को नहीं मानता।”
इसलिए लगान-अस्वीकार में ‘कर प्रतिरोध’ से अधिक गहरा अर्थ था।
‘महारानी का राज समाप्त’ : निर्णायक राजनीतिक घोषणा
1895 के आसपास प्रशासन को जो सबसे अधिक चिंतित करने वाली बात दिखाई दी, वह यही थी कि बिरसा की धार्मिक गतिविधि अब राजनीतिक घोषणा में बदल रही थी।
ब्रिटिश सरकारी स्रोत के आधुनिक पुनर्निर्माण के अनुसार 6 अगस्त 1895 को स्थानीय चौकीदारों ने तमाड़ थाने में सूचना दी कि एक मुंडा नेता बिरसा ब्रिटिश शासन के अंत की घोषणा कर रहा है। प्रशासन ने इसके बाद उन्हें गिरफ्तार करने की कार्रवाई तेज की।
एक अन्य निकटवर्ती ऐतिहासिक विवरण बिरसा के उपदेश का सार इस रूप में दर्ज करता है—
यह वह क्षण है जहां धार्मिक आंदोलन खुली राजनीतिक चुनौती बन जाता है।
‘महारानी राज’ क्यों?
बिरसा के समय ब्रिटिश साम्राज्य की सर्वोच्च प्रतीक थीं क्वीन विक्टोरिया।
1858 के बाद भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन था।
इसलिए औपनिवेशिक सत्ता की कल्पना कई ग्रामीण समुदायों तक—
जब बिरसा राज बनाम महारानी राज की भाषा उभरती है तो संघर्ष बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है—
‘अबुआ राज’ और प्रसिद्ध दूसरा सूत्र
बिरसा से जुड़ी राजनीतिक स्मृति में एक अन्य प्रसिद्ध अभिव्यक्ति भी मिलती है—
“अबुआ राज एते जाना, महारानी राज तुंदु जाना”
“हमारा राज स्थापित हो और महारानी का राज समाप्त हो।”
इस वाक्य के अलग-अलग भाषिक रूप आधुनिक स्रोतों और स्मृति में मिलते हैं। एक आदिवासी अध्ययन इसे बिरसा की राजनीतिक स्वायत्तता की मांग से जोड़ता है।
इतिहासलेखन की दृष्टि से इस सूत्र की राजनीतिक सामग्री महत्वपूर्ण है—
यह सत्ता के स्थानांतरण की कल्पना करता है।
किसके हाथ में सत्ता जाएगी?
यदि ब्रिटिश राज समाप्त हो तो सत्ता किसके पास आए?
NCERT के अनुसार औपनिवेशिक अधिकारियों को इस आंदोलन से सबसे अधिक चिंता इसलिए थी कि यह सरकार, जमींदार, महाजन और मिशनरियों को हटाकर बिरसा के नेतृत्व में मुंडा राज स्थापित करना चाहता था।
इसलिए बिरसा केवल विरोध के नेता नहीं थे।
वे वैकल्पिक सत्ता के केंद्र के रूप में भी उभर रहे थे।
‘बिरसा राज’ और ‘मुंडा राज’ क्या एक ही थे?
पूरी तरह नहीं, लेकिन आंदोलन में दोनों काफी हद तक एक-दूसरे में समा गए।
समुदाय की खोई हुई सत्ता की पुनर्स्थापना।
उस पुनर्स्थापना का करिश्माई और धार्मिक नेतृत्व बिरसा के हाथ में होना।
क्या बिरसा राजा बनना चाहते थे?
औपनिवेशिक स्रोतों में बिरसा को अपने राज की घोषणा करने वाला नेता दिखाया गया है, और NCERT भी “Munda Raj with Birsa at its head” जैसी व्याख्या प्रस्तुत करता है।
लेकिन इसे आधुनिक व्यक्तिगत तानाशाही की इच्छा के रूप में पढ़ना गलत होगा।
इसलिए ‘बिरसा राज’ में व्यक्ति और समुदाय की सत्ता अलग करना कठिन था।
खोया हुआ ‘मुंडा राज’ : इतिहास या राजनीतिक स्मृति?
बिरसा आंदोलन में ऐसे अतीत की कल्पना महत्वपूर्ण थी जिसमें मुंडा स्वतंत्र और समृद्ध थे।
आधुनिक इतिहासकार राहुल रंजन इसे ‘lost Munda raj’ की स्मृति और उसे पुनः प्राप्त करने की राजनीतिक आकांक्षा से जोड़ते हैं।
ब्रिटिश शासन से पहले छोटानागपुर में पूर्णतः स्वतंत्र, समानतावादी और केंद्रीकृत ‘मुंडा राज्य’ बिल्कुल उसी रूप में अस्तित्व में था—ऐसा मानना कठिन है।
नागवंशी राजसत्ता और अन्य राजनीतिक संबंध पहले भी मौजूद थे।
इसलिए ‘मुंडा राज’ इतिहास की शाब्दिक पुनर्स्थापना से अधिक—
राजनीतिक अतीत का निर्माण
आंदोलन अक्सर अतीत को वैसे ही नहीं याद करते जैसा इतिहास वास्तव में था।
वे वर्तमान आवश्यकता के अनुसार अतीत को पुनर्गठित करते हैं।
ऐसा अतीत वर्तमान औपनिवेशिक व्यवस्था की आलोचना का शक्तिशाली हथियार था।
इसलिए ‘स्वर्णयुग’ की ऐतिहासिक सटीकता से अधिक महत्वपूर्ण उसका राजनीतिक कार्य था।
आधुनिक राज्य नहीं, लेकिन वास्तविक शासन की कल्पना
यह भी गलत होगा कि मुंडा राज को केवल अस्पष्ट धार्मिक स्वप्न मान लिया जाए।
मिशनरी और यूरोपीय सत्ता की भूमिका क्या होगी?
ये सभी वास्तविक शासन-संबंधी प्रश्न थे।
इसलिए बिरसा राज एक political programme की दिशा में बढ़ रहा था, भले वह आधुनिक लिखित संविधान न हो।
आज्ञाकारिता।
निकटवर्ती विवरण में यह दर्ज है कि बिरसा के संदेश में सरकार के बजाय केवल उन्हें मानने की बात थी।
यह केवल धार्मिक आज्ञाकारिता नहीं रही।
यह राजनीतिक निष्ठा के हस्तांतरण का दावा था।
समानांतर सत्ता का दूसरा तत्व : राजस्व
तो औपनिवेशिक सत्ता की आर्थिक नींव पर प्रहार होता है।
उसे आर्थिक संसाधन भी मत दो।
इसलिए लगान-अस्वीकार समानांतर राजनीतिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण संकेत था।
समानांतर सत्ता का तीसरा तत्व : धार्मिक वैधता
बिरसा की सत्ता की वैधता का स्रोत अलग था—
इसलिए दोनों राजनीतिक व्यवस्थाओं के पास अलग-अलग वैधता-स्रोत थे।
समानांतर सत्ता का चौथा तत्व : क्षेत्र
राज केवल व्यक्ति पर नहीं, क्षेत्र पर भी दावा करता है।
यहीं ‘दिशुम’ महत्वपूर्ण हो जाता है।
बिरसा आंदोलन किसी अमूर्त धार्मिक समुदाय की मुक्ति नहीं चाहता था।
यह वही जमीन थी जिसे खूंटकट्टी स्मृति अपना कहती थी।
इसलिए राजनीतिक स्वशासन का दावा भौगोलिक भी था।
‘हमारी धरती, हमारा राज’ क्यों इतना शक्तिशाली सूत्र है?
क्योंकि इसमें दो अलग प्रश्न एक हो जाते हैं।
दूसरा
भूमि निजी व्यक्ति की हो सकती है लेकिन संप्रभुता राज्य की होगी।
मुंडा प्रतिरोध में दोनों अलग नहीं थे।
उस पर अंतिम राजनीतिक अधिकार भी समुदाय का होना चाहिए।
आधुनिक शोध इसी कारण ‘abua disum, abua raj’ में agrarian sovereignty, cosmological attachment और political autonomy के संयुक्त अर्थ को देखता है।
भूमि-अधिकार से ‘कृषि संप्रभुता’ तक
‘कृषि संप्रभुता’ इस आंदोलन को समझने के लिए उपयोगी अवधारणा है।
प्रश्न केवल यह नहीं कि किसान के नाम कितनी जमीन दर्ज है।
भूमि हस्तांतरण कौन नियंत्रित करेगा?
इस अर्थ में खूंटकट्टी की पुनर्स्थापना केवल संपत्ति सुधार नहीं थी।
वह स्थानीय राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण की मांग थी।
दिकू-मुक्त व्यवस्था
मुंडा राज की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी—
इसका अर्थ हर गैर-मुंडा व्यक्ति का निष्कासन जरूरी नहीं।
राजनीतिक लक्ष्य विशेष रूप से उन शक्तियों की समाप्ति से जुड़ा था जिन्हें आंदोलन शोषण का आधार मानता था—
NCERT भी आंदोलन द्वारा इन्हीं शक्तियों को मुंडाओं की दुर्दशा का कारण मानने की बात करता है।
लेकिन दिकू-विरोध की राजनीति की सीमा
यदि बाहरी शोषक और बाहरी व्यक्ति की पहचान पूरी तरह एक हो जाए तो आंदोलन में जातीय बहिष्करण का खतरा पैदा हो सकता है।
मुंडा समाज स्वयं पूरी तरह एकरूप नहीं था।
दूसरे समुदायों के गरीब किसान भी थे।
कुछ गैर-मुंडा लोग औपनिवेशिक शोषक संरचना का हिस्सा नहीं थे।
इसलिए आधुनिक इतिहासकार को आंदोलन की अपनी ‘दिकू’ भाषा को समझते हुए उसके सामाजिक सरलीकरण को भी पहचानना चाहिए।
क्या यह लोकतांत्रिक राज था?
बिरसा राज को आधुनिक लोकतंत्र कहना उचित नहीं होगा।
हमारे पास ऐसा कोई स्पष्ट कार्यक्रम नहीं है जिसमें—
इसलिए आधुनिक राजनीतिक श्रेणियों से तुलना करते समय सावधानी जरूरी है।
लेकिन इसी आधार पर उसे ‘अराजक’ या ‘राजनीतिहीन’ भी नहीं कहा जा सकता।
मुंडा–मानकी व्यवस्था की भूमिका
क्या बिरसा केवल पुरानी मानकी–मुंडा शासन-व्यवस्था बहाल करना चाहते थे?
आंशिक रूप से यह स्मृति उनके आंदोलन के पीछे थी।
पुरानी स्थानीय संस्थाएं मुंडा स्वायत्तता के प्रतीक थीं।
बिरसा स्वयं ऐसा केंद्रीय धार्मिक–राजनीतिक नेता बन रहे थे जो पारंपरिक मुंडा अथवा मानकी पद से अलग था।
परंपरा के नाम पर नया राज
यही बिरसा आंदोलन का सबसे रोचक विरोधाभास है।
लेकिन जिस नेतृत्व के माध्यम से यह होना था—
धरती आबा जैसा केंद्रीय करिश्माई पद पारंपरिक ग्राम नेतृत्व से अलग था।
गांवों के बीच धार्मिक नेटवर्क नया था।
औपनिवेशिक राज्य-विरोध की तीव्रता नई थी।
धरती आबा
यह प्रतीकात्मक संघर्ष बेहद प्रभावशाली था।
यहीं उलगुलान की राजनीतिक कल्पना सबसे स्पष्ट दिखाई देती है।
1895 की गिरफ्तारी क्यों अपरिहार्य होती गई?
थे, प्रशासन उन्हें असामान्य धार्मिक नेता मान सकता था।
लेकिन जब आंदोलन में यह बातें जुड़ गईं—
तो यह औपनिवेशिक शासन के लिए सीधी चुनौती बन गया।
ब्रिटिश सरकार की चिंता इसी राजनीतिक दिशा से बढ़ी और अगस्त 1895 में गिरफ्तारी के प्रयास तेज हुए।
इसलिए उनकी पहली गिरफ्तारी धार्मिक मतभेद के कारण नहीं बल्कि राजनीतिक अवज्ञा की संभावना से जुड़ी थी।
गिरफ्तारी ने क्या सिद्ध किया?
औपनिवेशिक सरकार की कार्रवाई ने बिरसा के अनुयायियों के सामने एक महत्वपूर्ण तथ्य पुष्ट किया—
सरकार स्वयं विरोधी पक्ष है।
सरदारी आंदोलन के दौरान लंबे समय तक यह उम्मीद थी कि अंग्रेजी सरकार जमींदारों के विरुद्ध न्याय दे सकती है।
अब वही सरकार धरती आबा को गिरफ्तार कर रही थी।
इससे सरकार और दिकू व्यवस्था के बीच राजनीतिक अंतर और कम होता गया।
राज-विरोध को दमन ने और मजबूत किया
औपनिवेशिक सत्ता की एक कठिनाई यही थी।
वह शहीद अथवा और बड़ा धार्मिक प्रतीक बन सकते थे।
1895 की गिरफ्तारी के बाद बिरसा की प्रतिष्ठा समाप्त नहीं हुई।
1897 में रिहा होने के बाद वे फिर आंदोलन खड़ा करते हैं। NCERT बताता है कि रिहाई के बाद उन्होंने गांव-गांव घूमकर समर्थन जुटाया और ‘रावण’ के रूपक से दिकू तथा यूरोपीय सत्ता के विनाश और अपने राज की स्थापना का आह्वान किया।
इससे स्पष्ट है कि जेल ने राजनीतिक विचार समाप्त नहीं किया।
धार्मिक मुक्ति से राजनीतिक क्रांति तक
बिरसा के आंदोलन में इस परिवर्तन को क्रम से समझना जरूरी है।
महारानी का राज समाप्त करो और अपना राज स्थापित करो।
यहीं धार्मिक आंदोलन पूर्ण राजनीतिक चुनौती बन जाता है।
‘अबुआ राज’ का सामाजिक कार्यक्रम
मुंडा राज का अर्थ केवल सत्ता की कुर्सी पर नया व्यक्ति बैठाना नहीं था।
इसलिए इसे केवल किसान विद्रोह कहना अधूरा
यदि मांग केवल लगान की होती तो इसे कृषि विद्रोह कहा जा सकता था।
यदि मांग केवल धर्म की होती तो धार्मिक आंदोलन।
यदि केवल अंग्रेजों को हटाना होता तो औपनिवेशिक-विरोधी विद्रोह।
क्या इसमें ‘जल–जंगल–जमीन’ का आधुनिक सिद्धांत था?
आधुनिक आदिवासी राजनीति में बिरसा को अक्सर जल–जंगल–जमीन के संघर्ष से जोड़ा जाता है।
यह संबंध ऐतिहासिक रूप से सार्थक है, क्योंकि उनका आंदोलन भूमि और संसाधनों की सामुदायिक स्वायत्तता से जुड़ा था।
लेकिन उन्नीसवीं सदी के बिरसा आंदोलन को आज की विकसित ‘जल–जंगल–जमीन’ राजनीतिक शब्दावली का हूबहू कार्यक्रम मानना उचित नहीं।
यह बाद की स्मृति द्वारा किया गया महत्वपूर्ण विस्तार है।
आधुनिक शोध भी बिरसा की स्मृति और वर्तमान आदिवासी राजनीति के बीच इसी निरंतरता और पुनर्निर्माण पर बल देता है।
क्या ‘अबुआ दिशुम, अबुआ राज’ आज के झारखंड की मांग थी?
आधुनिक अलग झारखंड राज्य की संगठित मांग मुख्यतः बीसवीं सदी में विकसित हुई।
1912 के बाद छोटानागपुर उन्नति समाज और आगे आदिवासी महासभा तथा झारखंड पार्टी जैसी संस्थाओं ने अलग क्षेत्रीय राजनीति को विकसित किया। आधुनिक इतिहासलेखन भी बिरसा की ‘अबुआ राज’ की कल्पना और बाद के झारखंड आंदोलन के बीच प्रेरणात्मक संबंध मानता है, लेकिन दोनों को एक नहीं मानता।
इसलिए बिरसा को 1900 में आज के झारखंड राज्य की सीमाओं और संविधान की मांग करते दिखाना कालभ्रम होगा।
लेकिन झारखंड आंदोलन ने बिरसा को क्यों अपनाया?
क्योंकि उनके राजनीतिक सूत्र में तीन चीजें पहले से मौजूद थीं—
और बाहरी राजनीतिक नियंत्रण से स्वायत्तता।
बाद के झारखंड आंदोलन के लिए यह अत्यंत उपयोगी ऐतिहासिक स्मृति थी।
इसी कारण ‘अबुआ दिशुम, अबुआ राज’ आधुनिक झारखंडी राजनीतिक चेतना का सबसे शक्तिशाली ऐतिहासिक सूत्र बन गया।
आधुनिक भारतीय राज्य और बिरसा की स्मृति
आज बिरसा मुंडा को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के महान नायक के रूप में भी स्मरण किया जाता है।
यह सम्मान उनके औपनिवेशिक-विरोधी संघर्ष की वास्तविकता पर आधारित है।
लेकिन इतिहासकार को दो स्तर अलग रखने चाहिए—
ऐतिहासिक बिरसा
उन्नीसवीं सदी का मुंडा भूमि और स्वशासन संघर्ष।
स्मृति का बिरसा
आधुनिक भारतीय राष्ट्र, झारखंड और आदिवासी राजनीति का प्रतीक।
2026 के एक आधुनिक इतिहासलेखन अध्ययन ने भी इस बात पर जोर दिया है कि बिरसा की स्मृति अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं द्वारा पुनः निर्मित होती रही है, जबकि ‘abua disum, abua raj’ की विद्रोही अंतर्वस्तु आज भी स्थानीय स्वायत्तता की आलोचनात्मक भाषा बनी हुई है।
‘अबुआ राज’ की सबसे गहरी अवधारणा : संप्रभुता
अंततः यह पूरा प्रश्न एक शब्द तक पहुंचता है—
संप्रभुता।
यदि हर अंतिम निर्णय अंग्रेजी सरकार और उसके संरक्षित मध्यस्थ करें, तो मुंडा स्वायत्तता समाप्त है।
यही ‘अबुआ राज’ का सबसे गहरा राजनीतिक अर्थ है।
लेकिन यह संप्रभुता आधुनिक नहीं थी
इसे आधुनिक वेस्टफेलियाई sovereignty की तरह न पढ़ें।
फिर भी इसका मूल प्रश्न संप्रभुता का था—
राजनीतिक वैधता का उलटाव
अब पूरे आंदोलन का सबसे क्रांतिकारी परिवर्तन दिखाई देता है।
सरकार स्वयं अवैध है।
यही राजनीतिक चेतना का निर्णायक विकास था।
महारानी का राज बनाम ‘हमारा राज’
इस संघर्ष में अब कोई मध्य मार्ग लगभग नहीं बचता।
तो लगान, जमींदारी और बाहरी प्रशासन की पूरी संरचना प्रश्न के घेरे में है।
समानांतर सत्ता की मानसिक स्थापना
1895 तक बिरसा के पास कोई भौतिक सरकार नहीं थी।
फिर भी समानांतर सत्ता पहले मानसिक रूप से स्थापित होती है।
तो पुरानी सत्ता की नींव कमजोर होने लगती है।
इसलिए राज्य के लिए विचार स्वयं खतरा था।
सफेद झंडा और बिरसा राज
रिहाई के बाद के आंदोलन में बिरसा के अनुयायियों द्वारा सफेद झंडे को बिरसा राज के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किए जाने का उल्लेख NCERT करता है।
प्रतीक किसी आंदोलन को दृश्य रूप देते हैं।
आगे उलगुलान में ऐसे प्रतीक आंदोलन की पहचान और लामबंदी में महत्वपूर्ण होंगे।
राजनीतिक कल्पना की शक्ति
किसी विद्रोह को सफल सैन्य शक्ति से पहले वैकल्पिक भविष्य चाहिए।
लोग तभी बड़ा जोखिम लेते हैं जब उन्हें लगे कि—
वर्तमान व्यवस्था समाप्त हो सकती है,
राजनीतिक कल्पना की कमजोरी
बिरसा राज की विस्तृत संस्थागत रूपरेखा हमारे पास नहीं है।
व्यापक क्षेत्र का प्रशासन कैसे होगा?
इन प्रश्नों का स्पष्ट व्यवस्थित उत्तर उपलब्ध नहीं।
इसलिए बिरसा राज एक पूर्ण विकसित राज्य-सिद्धांत से अधिक—
क्या इससे उसका महत्व कम होता है?
किसान और आदिवासी विद्रोहों को आधुनिक संविधान की कसौटी पर मापना अनुचित होगा।
उनकी राजनीतिक उपलब्धि इस बात में होती है कि वे अपने अनुभव से सत्ता की वैकल्पिक अवधारणा पैदा करते हैं।
भूमि का औपनिवेशिक कानून ही अंतिम सत्य नहीं।
महारानी की सत्ता ही अंतिम सत्ता नहीं।
1895 की पहली बड़ी टक्कर और बिरसा की गिरफ्तारी
चलकद की भीड़ से औपनिवेशिक मुकदमे तक : जेल ने आंदोलन क्यों नहीं तोड़ा और बिरसा 1897 में अधिक राजनीतिक नेता बनकर कैसे लौटे?
1895 बिरसा मुंडा आंदोलन में वह वर्ष था जब धार्मिक पुनरुत्थान पहली बार औपनिवेशिक राज्य से सीधे टकराया। इससे पहले बिरसा एक उपचारकर्ता, धार्मिक उपदेशक, ‘धरती आबा’ और बढ़ते बिरसाइत समुदाय के केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे। लेकिन जब उनके संदेश में लगान न देने, विदेशी शासन के अंत और बिरसा/मुंडा राज की स्थापना का विचार स्पष्ट होने लगा, तो ब्रिटिश प्रशासन की दृष्टि में वे धार्मिक व्यक्ति से राजनीतिक खतरे में बदल गए।
इस परिवर्तन को समझने के लिए अगस्त 1895 की घटनाएं विशेष महत्व रखती हैं।
सरकारी विवरण के अनुसार 6 अगस्त 1895 को तमाड़ थाने के स्थानीय चौकीदारों ने सूचना दी कि बिरसा नामक मुंडा ब्रिटिश शासन के अंत की घोषणा कर रहा है। इसके बाद प्रशासन ने चलकद की स्थिति की जांच और बिरसा की गिरफ्तारी के प्रयास शुरू किए।
लेकिन पहली गिरफ्तारी आसान नहीं हुई।
यहीं राज्य को पहली बार पता चला कि वह किसी अकेले धर्म-प्रचारक का सामना नहीं कर रहा था।
उसके सामने एक जन-विश्वास से संरक्षित नेता था।
चलकद क्यों प्रशासन की चिंता का केंद्र बना?
बिरसा के धार्मिक आंदोलन का महत्वपूर्ण केंद्र चलकद बन चुका था।
किसी औपनिवेशिक अधिकारी के लिए ग्रामीण क्षेत्र में हजारों लोगों का किसी ऐसे व्यक्ति के आसपास संगठित होना अपने आप में चिंता का कारण था जो सरकार की वैधता पर प्रश्न उठा रहा हो।
धार्मिक सभा कब राजनीतिक सभा बन जाएगी?
समस्या भीड़ नहीं, उसकी निष्ठा थी
ब्रिटिश प्रशासन को केवल संख्या से भय नहीं था।
यह भीड़ किसका आदेश मानती है?
यदि लोग बिरसा को भगवान या धरती आबा मानते हैं,
यदि उनका आदेश जमींदार के आदेश से ऊपर माना जाता है,
और यदि ब्रिटिश सरकार का राज समाप्त होने वाला है—
तो राज्य के सामने चुनौती केवल कानून-व्यवस्था की नहीं रहती।
वह राजनीतिक निष्ठा की चुनौती बन जाती है।
6 अगस्त 1895 : पहली स्पष्ट सरकारी सूचना
भारत सरकार के Employment News में प्रकाशित बिरसा संबंधी ऐतिहासिक विवरण के अनुसार 6 अगस्त 1895 को तमाड़ पुलिस स्टेशन में स्थानीय चौकीदारों ने रिपोर्ट की कि बिरसा ने ब्रिटिश शासन के अंत की घोषणा की है। उसी दिन मामले की जांच के लिए एक हेड कांस्टेबल भेजा गया।
क्योंकि प्रशासन अब बिरसा को केवल धार्मिक विचित्रता नहीं बल्कि संभावित राजद्रोही ग्रामीण आंदोलन के रूप में देख रहा था।
8 अगस्त : पुलिस चलकद पहुंची
सरकारी विवरण के अनुसार जांच के लिए भेजा गया हेड कांस्टेबल 8 अगस्त की शाम चलकद पहुंचा।
उसके सामने स्थिति सामान्य पुलिस कार्रवाई जैसी नहीं थी।
बिरसा के आसपास बड़ी संख्या में अनुयायी थे।
वे अपने नेता को साधारण आरोपी नहीं मानते थे।
यानी पुलिस के सामने दो प्रकार की सत्ता थीं—
बिरसा की सत्ता
धार्मिक विश्वास और सामुदायिक निष्ठा।
अगली सुबह इन दोनों का पहला प्रत्यक्ष सामना हुआ।
9 अगस्त का पहला गिरफ्तारी प्रयास
सरकारी विवरण के अनुसार 9 अगस्त की सुबह हेड कांस्टेबल ने बिरसा को हिरासत में लेने का प्रयास किया। वह उन्हें पकड़ भी सका, लेकिन आसपास एकत्र अनुयायियों की भीड़ ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि पुलिस कार्रवाई पूरी नहीं हो सकी और कांस्टेबल को पीछे हटना पड़ा।
इस घटना का राजनीतिक महत्व बहुत बड़ा था।
औपनिवेशिक ग्रामीण प्रशासन में एक पुलिसकर्मी भी राज्य की बड़ी शक्ति का प्रतिनिधित्व करता था।
अब ग्रामीण मुंडा उसके सामने खड़े होकर कह रहे थे—
गिरफ्तारी रोकना क्या विद्रोह था?
अभी 1899 जैसा सशस्त्र उलगुलान नहीं हुआ था।
लेकिन राज्य की दृष्टि से यह गंभीर संकेत था।
क्योंकि पुलिस की कार्रवाई का प्रतिरोध यह बताता था कि—
बिरसा का व्यक्तिगत करिश्मा सामूहिक अवज्ञा में बदल सकता है।
और यदि एक दिन पुलिस को रोका जा सकता है तो अगले दिन—
यानी 9 अगस्त की घटना छोटी होते हुए भी राजनीतिक अवज्ञा का पूर्वाभ्यास थी।
सरकार की प्रतिष्ठा पर चोट
इस घटना को उस समय के औपनिवेशिक संदर्भ में समझना चाहिए।
ग्रामीण पुलिस केवल अपराध रोकने वाली संस्था नहीं थी।
वह राज्य की प्रतिष्ठा का स्थानीय चेहरा थी।
यदि हेड कांस्टेबल बिरसा को गिरफ्तार करने जाए और जनता उसे वापस लौटने के लिए मजबूर कर दे, तो संदेश दूर तक जाता है—
सरकार सर्वशक्तिमान नहीं है।
किसी भी विद्रोह की शुरुआत में यही मनोवैज्ञानिक परिवर्तन निर्णायक होता है।
13 अगस्त : दूसरा प्रयास
पहला प्रयास विफल होने के बाद प्रशासन पीछे नहीं हटा।
सरकारी विवरण के अनुसार 13 अगस्त 1895 को कोचांग के पादरी पॉलुस की सहायता से बिरसा को पकड़ने का एक और प्रयास किया गया। यह भी सफल नहीं हुआ।
यह प्रसंग एक और महत्वपूर्ण बात दिखाता है—
औपनिवेशिक प्रशासन ने मिशनरी संपर्कों का उपयोग करने की कोशिश की।
यह वही समय था जब बिरसा और ईसाई मिशन के संबंध पहले ही तनावपूर्ण हो चुके थे।
ऐसी कार्रवाई ने उनके अनुयायियों के बीच इस धारणा को और मजबूत किया होगा कि—
सरकार और मिशन एक ही व्यापक बाहरी सत्ता-संसार के हिस्से हैं।
गिरफ्तारी के प्रयासों से गांवों में रोष
बार-बार की पुलिस कार्रवाई से बिरसा की प्रतिष्ठा कम नहीं हुई।
उलटा आसपास के गांवों में तनाव बढ़ा।
सरकारी विवरण भी बताता है कि गिरफ्तारी के इन प्रयासों ने निकटवर्ती गांवों में काफी आक्रोश पैदा किया।
यह औपनिवेशिक सत्ता की पुरानी दुविधा थी—
बिरसा को न पकड़े तो उनका प्रभाव बढ़े।
पकड़ने जाए तो लोगों को विश्वास हो कि—
दोनों स्थितियां आंदोलन को राजनीतिक अर्थ दे रही थीं।
अब प्रशासन ने अधिक संगठित कार्रवाई की
पहले प्रयास की विफलता के बाद गिरफ्तारी को स्थानीय पुलिस की साधारण कार्रवाई नहीं छोड़ा जा सकता था।
सरकारी विवरण में मीयर्स/मेयर्स (Meyers) के नेतृत्व में कार्रवाई का उल्लेख मिलता है।
भीड़ के एकत्र होने से पहले अचानक बिरसा को पकड़ना।
अंतिम गिरफ्तारी की तारीख : स्रोतों में थोड़ा अंतर
यहां इतिहासलेखन की सावधानी आवश्यक है।
भारत सरकार के Employment News के विवरण में बिरसा की सफल गिरफ्तारी 26 अगस्त 1895 की सुबह बताई गई है।
भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की Dictionary of Martyrs में गिरफ्तारी 24 अगस्त की मध्यरात्रि से जुड़ी बताई गई है।
इसलिए लोकप्रिय लेखन में 24, 25 या 26 अगस्त जैसी अलग-अलग तारीखें दिखाई देती हैं।
अगस्त 1895 के अंतिम सप्ताह में रात/सुबह की अचानक कार्रवाई में बिरसा को गिरफ्तार कर लिया गया।
जब तक मूल गिरफ्तारी डायरी या न्यायिक अभिलेख के आधार पर मिनट-दर-मिनट घटनाक्रम निर्धारित न हो, इस छोटे तारीखी अंतर को छिपाना उचित नहीं होगा।
भारी वर्षा में कार्रवाई
Employment News के विवरण के अनुसार जिस सुबह मीयर्स की टुकड़ी ने बिरसा को पकड़ा, उस समय भारी वर्षा हो रही थी। गिरफ्तारी कुल मिलाकर शांतिपूर्वक संपन्न हुई और दल उन्हें लेकर बांदगांव की ओर लौट गया।
पहले प्रयास इसलिए विफल हुआ क्योंकि अनुयायियों को प्रतिक्रिया का अवसर मिला।
इस बार अचानक कार्रवाई ने भीड़ को संगठित होने का अवसर नहीं दिया।
क्या बिरसा हथियारबंद प्रतिरोध करते पकड़े गए?
1895 की गिरफ्तारी को 1899–1900 के उलगुलान के साथ मिला देना गलत होगा।
इस समय आंदोलन अभी अपने पहले राजनीतिक चरण में था।
यह अभी वह व्यापक सैन्य अभियान नहीं था जो दिसंबर 1899 में दिखाई देगा।
यानी 1895 की कार्रवाई का मूल भय था—
बिरसा पर कौन-से आरोप लगे?
यहां भी स्रोतों में भाषा का अंतर मिलता है।
संस्कृति मंत्रालय की Dictionary of Martyrs बिरसा की सजा को भारतीय दंड संहिता की धारा 505 से जोड़ती है।
IGNOU की अपेक्षाकृत नई अध्ययन-सामग्री 19 नवंबर 1895 को बिरसा और साथियों की दोषसिद्धि को rioting तथा सरकार-विरोधी आंदोलन के व्यापक संदर्भ में रखती है।
अलग-अलग मुकदमों और सह-अभियुक्तों के कारण आरोपों का विवरण स्रोतों में संक्षिप्त रूप से अलग दिखाई दे सकता है।
औपनिवेशिक सरकार ने बिरसा के धार्मिक–राजनीतिक प्रचार को सार्वजनिक शांति और राज्य की सत्ता के लिए खतरा माना।
धारा 505 क्यों महत्वपूर्ण थी?
भारतीय दंड संहिता की धारा 505 का संबंध ऐसी सार्वजनिक वक्तव्यों या अफवाहों से था जो लोगों में भय, विद्रोह या सार्वजनिक शांति भंग करने की प्रवृत्ति पैदा कर सकती थीं।
तो औपनिवेशिक प्रशासन इसे साधारण धार्मिक उपदेश नहीं मान सकता था।
मुकदमा खूंटी में क्यों?
बिरसा और गिरफ्तार अनुयायियों का मुकदमा खूंटी में चलाने का प्रयास किया गया।
एक पुराने विस्तृत मुंडा नृवंशीय सरकारी विवरण के अनुसार प्रशासन को आशा थी कि मुंडा क्षेत्र के केंद्र में मुकदमा चलाने से लोगों को ‘सबक’ मिलेगा कि बिरसा के दावे भ्रमपूर्ण हैं।
यानी मुकदमा केवल न्यायिक प्रक्रिया नहीं था।
वह राज्य का राजनीतिक प्रदर्शन भी था।
वह ब्रिटिश अदालत के सामने आरोपी है।
लेकिन मुकदमा उलटा प्रदर्शन बन गया
प्रशासन का अनुमान पूरी तरह सही नहीं निकला।
खूंटी में मुकदमे के समय बिरसा के अनुयायियों की बड़ी संख्या एकत्र होने लगी।
सरकारी नृवंशीय विवरण के अनुसार मुकदमा 24 अक्टूबर को शुरू होने के बाद अनुयायियों की उत्तेजना के कारण कार्यवाही रोकनी पड़ी और अनेक व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया। बिरसा तथा सह-अभियुक्तों को बाद में वापस रांची ले जाया गया।
जिस मुकदमे को राज्य ‘सबक’ बनाना चाहता था—
वह बिरसा की लोकप्रियता का प्रदर्शन बन गया।
अदालत के बाहर जमा भीड़ क्या कह रही थी?
हर व्यक्ति का उद्देश्य हिंसा रहा हो, ऐसा कहना सही नहीं होगा।
वास्तव में उसी पुराने सरकारी विवरण में बाद में पकड़े गए कुछ लोगों को इसलिए छोड़ दिए जाने की बात है क्योंकि उनकी भाषा को गलत समझा गया था और उनका हिंसक उद्देश्य सिद्ध नहीं हुआ।
औपनिवेशिक प्रशासन कभी-कभी धार्मिक उत्साह को भी तत्काल विद्रोही हिंसा के रूप में पढ़ सकता था।
इसलिए इतिहासकार को राज्य के भय और वास्तविक जन-इरादे के बीच अंतर बनाए रखना चाहिए।
फिर भी भीड़ का राजनीतिक अर्थ स्पष्ट था
भले ही हर व्यक्ति हिंसा के लिए न आया हो, इतना निर्विवाद था कि—
उनकी गिरफ्तारी से श्रद्धा खत्म नहीं हुई।
इससे ब्रिटिश प्रशासन के लिए चुनौती और स्पष्ट हुई—
नवंबर 1895 : सजा
बिरसा की सजा के बारे में भी स्रोतों में कुछ अंतर मिलता है।
संस्कृति मंत्रालय की Dictionary of Martyrs के अनुसार उन्हें दो वर्ष के कठोर कारावास की सजा मिली।
IGNOU की अध्ययन सामग्री 19 नवंबर 1895 को दोषसिद्धि, दो वर्ष की कैद और 50 रुपये जुर्माने का उल्लेख करती है; जुर्माना न देने पर अतिरिक्त छह महीने के कठोर कारावास का प्रावधान था।
दूसरी ओर एक पुराने सरकारी नृवंशीय विवरण में प्रारंभिक दंड ढाई वर्ष बताया गया है।
इन विवरणों को मिलाकर देखें तो संभवतः निम्न अदालत की सजा और बाद में संशोधित दंड के कारण दो और ढाई वर्ष दोनों आंकड़े इतिहासलेखन में चलते रहे।
तारीख की सटीकता क्यों महत्वपूर्ण है?
बिरसा जैसे जननायक की जीवनी में बाद में स्मृति और किंवदंती तेजी से बढ़ती है।
यदि स्रोतों में छोटा अंतर है तो उसे छिपाकर एक कृत्रिम निश्चितता पैदा करना शोध की दृष्टि से उचित नहीं।
इसलिए यहां तीन स्तर अलग रखना चाहिए—
निश्चित
अगस्त 1895 के अंतिम सप्ताह में गिरफ्तारी।
अत्यधिक विश्वसनीय
नवंबर 1895 में दोषसिद्धि और कठोर कारावास।
स्रोतगत अंतर
गिरफ्तारी की ठीक तारीख और दो बनाम ढाई वर्ष की प्रारंभिक सजा।
इस प्रकार इतिहास अधिक मजबूत होता है।
बिरसा को हजारीबाग क्यों भेजा गया?
सजा के बाद बिरसा को हजारीबाग जेल भेजा गया।
यदि उन्हें रांची–खूंटी क्षेत्र के पास रखा जाता तो—
प्रशासन के लिए लगातार समस्या बन सकती थी।
हजारीबाग उन्हें उनके मुख्य सामाजिक आधार से भौगोलिक रूप से दूर करता था।
Employment News भी उनके हजारीबाग कारावास का स्पष्ट उल्लेख करता है।
सरकार की अपेक्षा : आंदोलन समाप्त हो जाएगा
औपनिवेशिक प्रशासन की सामान्य गणना समझ में आती है।
कुछ महीनों बाद लोग सामान्य जीवन में लौट जाएंगे।
एक पुराने सरकारी विवरण के अनुसार बिरसा के जेल जाने के बाद कुछ समय तक आंदोलन की प्रत्यक्ष गतिविधि वास्तव में शांत दिखाई दी और प्रशासन को लगा कि समस्या समाप्त हो गई है।
बिरसा जेल में थे—‘भगवान’ नहीं
बिरसा के अनुयायियों के विश्वास का सबसे रोचक पहलू जेल संबंधी लोककथाओं में दिखाई देता है।
पुराने सरकारी विवरण में दर्ज है कि कुछ मुंडा अनुयायी मानते ही नहीं थे कि वास्तविक बिरसा को सरकार कैद कर सकती है। उनके बीच ऐसी धारणा तक थी कि—
और जेल में सरकार ने केवल मिट्टी की प्रतिमा रखी है।
आज इस कथन को हास्यास्पद समझना आसान है।
लेकिन राजनीतिक दृष्टि से इसका अर्थ अत्यंत गंभीर था—
कारावास ने चमत्कारिक छवि क्यों बढ़ाई?
यदि अनुयायी पहले ही मानते हैं कि नेता ईश्वरीय शक्ति से संपन्न है, तो उसकी गिरफ्तारी के दो संभावित परिणाम होते हैं।
“वह भगवान होता तो पकड़ा क्यों जाता?”
या फिर विश्वास स्वयं को नई व्याख्या देगा—
“सरकार वास्तव में उसे बंद नहीं कर सकती।”
बिरसा के मामले में दूसरी प्रक्रिया दिखाई देती है।
इससे उनका करिश्मा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।
बल्कि जेल ने उन्हें और रहस्यमय बना दिया।
दूसरा — बिरसा की धार्मिक प्रतिष्ठा
वे केवल संगठन के अध्यक्ष नहीं थे जिन्हें गिरफ्तार करके समिति भंग की जा सके।
तीसरा — सरदारी नेटवर्क
गांवों के बीच संगठन पहले से मौजूद था।
चौथा — बिरसाइत पहचान
अनुयायियों के पास धार्मिक समुदाय की स्थायी पहचान थी।
पांचवां — सरकार से बढ़ा अविश्वास
गिरफ्तारी ने सरकार को दिकू व्यवस्था से और स्पष्ट रूप से जोड़ा।
छठा — बिरसा जीवित थे
आंदोलन को भविष्य में उनके लौटने की आशा थी।
आंदोलन का मौन चरण
1895–97 को पूर्ण निष्क्रियता कहना गलत होगा।
दृश्य राजनीतिक आंदोलन कमजोर पड़ा, लेकिन सामाजिक स्मृति बनी रही।
करिश्माई आंदोलन अक्सर इसी प्रकार चलता है—
खुली लामबंदी → दमन → भूमिगत स्मृति → पुनरुत्थान।
उलगुलान की तैयारी में यह बीच का चरण अत्यंत महत्वपूर्ण था।
जेल में बिरसा ने क्या सोचा?
यहां इतिहासकार को सावधानी बरतनी चाहिए।
हमारे पास बिरसा की कोई विस्तृत जेल डायरी नहीं है जिससे उनके प्रतिदिन के विचार पढ़े जा सकें।
इसलिए यह कहना कि जेल में उन्होंने अमुक सैन्य योजना बनाई या किसी निश्चित राजनीतिक सिद्धांत पर पहुंचे—जब तक स्रोत न हो—कल्पना होगी।
लेकिन रिहाई के बाद उनके व्यवहार से इतना अवश्य स्पष्ट है कि—
दूसरा आंदोलन पहले से अधिक संगठित और अधिक स्पष्ट राजनीतिक–सैन्य दिशा वाला था।
IGNOU भी इसी अंतर को रेखांकित करता है—जेल से निकलने के बाद बिरसा ने अपने लोगों को हथियार तैयार करने और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष के लिए संगठित किया।
कारावास ने राजनीतिक पाठ क्या दिया होगा?
प्रत्यक्ष निजी लेखन न होने पर भी घटनाक्रम से कुछ संरचनात्मक निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।
1895 ने बिरसा और उनके साथियों को दिखाया—
खुली भीड़ राज्य का ध्यान तुरंत आकर्षित करती है।
स्थानीय चौकीदार सरकार तक खबर पहुंचाते हैं।
मिशनरी नेटवर्क का उपयोग हो सकता है।
खुले उपदेश के आधार पर मुकदमा चल सकता है।
नेता को अलग कर आंदोलन दबाया जा सकता है।
रिहाई के बाद आंदोलन अधिक गुप्त बैठकों और संगठन की ओर बढ़ा।
1895 का आंदोलन ‘अधूरी कहानी’
IGNOU की एक अध्ययन सामग्री कुमार सुरेश सिंह के मूल्यांकन को उद्धृत करते हुए 1895 की घटनाओं को मूलतः अधूरी कहानी—व्यापक आंदोलन का आरंभ बताती है।
यही सबसे उपयुक्त ऐतिहासिक मूल्यांकन है।
लेकिन उसमें उलगुलान के लगभग सारे तत्व उपस्थित हो चुके थे—
अब केवल दूसरे चरण का संगठन बाकी था।
रिहाई की तारीख : 30 नवंबर 1897
भारत सरकार के Employment News के विस्तृत विवरण के अनुसार बिरसा को 30 नवंबर 1897 को जेल से रिहा किया गया और उन्हें चलकद ले जाया गया।
पुराने सरकारी नृवंशीय विवरण में उनकी रिहाई को क्वीन विक्टोरिया की डायमंड जुबिली के अवसर से जुड़ी समयपूर्व रिहाई के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
अलग स्रोतों में रिहाई की प्रक्रिया के वर्णन में थोड़ा अंतर है, लेकिन नवंबर 1897 में उनकी वापसी सुरक्षित ऐतिहासिक आधार है।
सरकार क्या चाहती थी?
सरकार का उद्देश्य स्वाभाविक रूप से यह था कि बिरसा रिहा होकर शांत जीवन बिताएं।
और बिरसा फिर किसी गांव में सामान्य कृषक की तरह रह जाएं।
पुराने सरकारी विवरण के शब्दों में भी रिहाई के बाद उन्होंने शीघ्र ही फिर बड़ी संख्या में अनुयायियों को अपने आसपास एकत्र करना शुरू कर दिया।
जेल से लौटे बिरसा पहले जैसे नहीं थे
और राजनीतिक विद्रोह की ओर बढ़ता व्यक्ति
1897 के बाद का बिरसा अधिक स्पष्ट रूप से—
राजनीतिक संगठनकर्ता
IGNOU इसे धार्मिक नेता से ऐसे राजनीतिक नेता में परिवर्तन के रूप में देखता है जो स्वशासन के लक्ष्य के लिए लोगों को तैयार कर रहा था।
लेकिन उसके अगले चरण को अधिक स्पष्ट भी किया।
रिहाई के बाद पहला प्रश्न : अब क्या?
इसलिए दूसरे चरण में संगठन की प्रकृति बदलती है।
विश्वसनीय अनुयायियों का नेटवर्क मजबूत होता है।
धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों का उपयोग किया जाता है।
संदेश अधिक व्यवस्थित रूप से फैलाया जाता है।
और धीरे-धीरे प्रतिरोध को सैन्य रूप देने की तैयारी होने लगती है।
चुटिया की यात्रा
रिहाई के बाद बिरसा और उनके अनुयायियों की चुटिया यात्रा विशेष महत्व रखती है।
यहां तारीखों के बारे में फिर सावधानी आवश्यक है। संस्कृति मंत्रालय की Dictionary of Martyrs इसे 28 जनवरी 1898 से जोड़ती है।
पुराने सरकारी विवरण में भी जनवरी 1898 में चुटिया मंदिर की घटना का उल्लेख मिलता है।
चुटिया छोटानागपुर के पुराने राजनीतिक इतिहास और नागवंशी अतीत से जुड़ा था।
इसलिए इस यात्रा को केवल धार्मिक मंदिर-विवाद के रूप में नहीं पढ़ा गया है; उसमें पुराने अधिकार और राज की स्मृति का राजनीतिक तत्व भी था।
पुराने राज की स्मृति खोजने का प्रयास
संस्कृति मंत्रालय का विवरण बताता है कि बिरसा और उनके अनुयायी चुटिया में ‘मुंडा अधिकारों’ से संबंधित अभिलेखों को खोजने या पुनः प्राप्त करने की धारणा से जुड़े थे।
1897–1899 में उलगुलान की गुप्त तैयारी
जेल से रिहाई के बाद धार्मिक नेटवर्क से सैन्य संगठन तक : चुटिया–जगन्नाथपुर यात्राएं, रात्रि-सभाएं, हथियार और दिसंबर 1899 की योजना
30 नवंबर 1897 को जेल से बाहर आए बिरसा मुंडा के सामने दो रास्ते थे। पहला—1895 से पहले की तरह खुली धार्मिक सभाएं, जनसमूह और सार्वजनिक घोषणाएं फिर शुरू की जाएं। दूसरा—पहली गिरफ्तारी से सबक लेकर आंदोलन को अधिक संगठित, अधिक गुप्त और अधिक राजनीतिक बनाया जाए।
अगले दो वर्षों में दूसरा रास्ता अपनाया गया।
1897 से 1899 का दौर इसलिए मुंडा उलगुलान का अत्यंत महत्वपूर्ण लेकिन लोकप्रिय इतिहास में अपेक्षाकृत कम समझा गया चरण है। दिसंबर 1899 की हिंसक घटनाओं को यदि केवल अचानक भड़के आदिवासी क्रोध के रूप में देखा जाए, तो इन दो वर्षों की तैयारी अदृश्य हो जाती है।
वास्तव में इस अवधि में कम-से-कम तीन प्रक्रियाएं समानांतर चल रही थीं—
बिरसा के धार्मिक समुदाय का पुनर्गठन, सरदारी भूमि-संघर्ष के नेटवर्क का राजनीतिक उपयोग और धीरे-धीरे सशस्त्र कार्रवाई की तैयारी।
IGNOU के अध्ययन में 1898–99 के दौरान जंगलों में आयोजित रात्रिकालीन सभाओं और बिरसा द्वारा अपने अनुयायियों को हथियार तैयार करने के लिए कहने का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
यानी उलगुलान की तैयारी का वास्तविक समय दिसंबर 1899 से बहुत पहले शुरू हो चुका था।
जेल से बाहर आया व्यक्ति, लेकिन पुरानी परिस्थिति कायम
बिरसा की दो वर्ष की कैद के दौरान छोटानागपुर की मूल समस्याएं समाप्त नहीं हुई थीं।
बेथ-बेगारी की स्मृति और शिकायतें थीं।
और दिकू प्रभुत्व के प्रति असंतोष था।
इसलिए जब बिरसा लौटे तो उन्हें आंदोलन नए सिरे से पैदा नहीं करना पड़ा।
जिस सामाजिक संकट ने 1895 में उन्हें नेता बनाया था, वह अभी मौजूद था।
फर्क सिर्फ इतना था कि अब बिरसा और उनके अनुयायी दोनों जान चुके थे—
सरकार खुली चुनौती को सहन नहीं करेगी।
यही अनुभव संगठन की नई शैली का आधार बना।
पहला आंदोलन खुला था, दूसरा अधिक गुप्त
1895 के आंदोलन में बिरसा का करिश्मा इतना तेज फैल रहा था कि चलकद में खुले तौर पर भीड़ जुटती थी।
पुलिस आसानी से सूचना प्राप्त कर सकती थी।
स्थानीय चौकीदार गतिविधियों की खबर दे सकते थे।
किसी बड़ी सभा को निगरानी में लिया जा सकता था।
और नेता को गिरफ्तार कर पूरा आंदोलन अस्थायी रूप से निष्क्रिय किया जा सकता था।
IGNOU का विवरण 1898–99 में ऐसी रात्रि सभाओं को स्पष्ट रूप से दर्ज करता है।
जेल से रिहाई का पहला राजनीतिक प्रभाव
कारावास ने बिरसा की प्रतिष्ठा समाप्त करने के बजाय बढ़ा दी थी।
अंग्रेज सरकार द्वारा जेल भेजे गए और जेल से वापस लौटे नेता
गांव के किसान के सामने उनका जीवन स्वयं प्रमाण बन गया था कि—
सरकार और बिरसा एक-दूसरे के विरोधी हैं।
1895 से पहले कुछ सरदार अभी भी सरकार से न्याय की अपेक्षा कर सकते थे।
1897 के बाद यह विश्वास और कमजोर हुआ।
चुटिया की यात्रा : केवल धार्मिक तीर्थ नहीं
रिहाई के शीघ्र बाद बिरसा और उनके अनुयायी चुटिया गए।
भारत सरकार के Dictionary of Martyrs के अनुसार यह यात्रा 28 जनवरी 1898 को हुई और इसका उद्देश्य ‘मुंडा अधिकारों’ से संबंधित अभिलेखों की खोज तथा वहां के मंदिर प्रतिष्ठान के साथ पुराने सामाजिक संबंधों की पुनर्स्थापना से जुड़ा था।
यह घटना असाधारण रूप से महत्वपूर्ण है।
क्योंकि इससे उलगुलान की राजनीति में तीन चीजें एक साथ दिखाई देती हैं—
बिरसा आंदोलन केवल भविष्यवाणी नहीं कर रहा था।
वह अपने अधिकारों की ऐतिहासिक वैधता खोज रहा था।
चुटिया क्यों महत्वपूर्ण था?
चुटिया छोटानागपुर के पुराने राजनीतिक भूगोल और नागवंशी सत्ता से संबंधित स्मृतियों का क्षेत्र था।
इसलिए वहां जाना केवल मंदिर-दर्शन नहीं था।
यदि आंदोलन यह सिद्ध करना चाहता है कि—
मुंडा कभी इस भूमि के वास्तविक अधिकारधारी थे,
और उनका पुराना राज या अधिकार बाद में छीना गया,
तो पुरानी राजनीतिक स्मृतियां बहुत महत्वपूर्ण हो जाती हैं।
इस अर्थ में चुटिया यात्रा को कहा जा सकता है—
‘दस्तावेज’ और स्मृति का नया संबंध
पिछले खंडों में हमने देखा कि मुंडा भूमि-दावा लंबे समय तक सामुदायिक स्मृति पर आधारित था।
अब आंदोलन स्वयं अपने अतीत के दस्तावेज खोजने की कोशिश कर रहा था।
स्मृति के समर्थन में अपना दस्तावेज खोजो।
यानी मुंडा प्रतिरोध औपनिवेशिक राजनीतिक भाषा को केवल अस्वीकार नहीं कर रहा था; वह उसके भीतर वैधता के उपकरण भी खोज रहा था।
जगन्नाथपुर की यात्रा
चुटिया के साथ जगन्नाथपुर मंदिर की यात्रा भी इस चरण के स्रोतों में आती है।
संस्कृति मंत्रालय के Dictionary of Martyrs में जेल से रिहाई के बाद बिरसा द्वारा जगन्नाथपुर मंदिर जाने, गुप्त बैठकों में भाग लेने और आंदोलन को पुनर्गठित करने का उल्लेख मिलता है।
इन यात्राओं का अर्थ केवल धार्मिक भक्ति नहीं था।
पवित्र भूगोल राजनीतिक भूगोल बनता है
किसी आंदोलन के लिए स्थान बहुत महत्वपूर्ण होते हैं।
धीरे-धीरे राजनीतिक अर्थ ग्रहण करने लगे।
आंदोलन अब केवल लोगों को नहीं जोड़ रहा था।
वह भूगोल को भी राजनीतिक बना रहा था।
रात्रिकालीन सभाएं क्यों?
लोग खेत और दैनिक काम के बाद जुट सकते थे।
दूर गांवों से आने-जाने वाले लोगों पर कम ध्यान जाता।
जंगल और पहाड़ी स्थान प्राकृतिक आवरण देते थे।
केवल विश्वसनीय लोगों को बुलाया जा सकता था।
1898–99 की ऐसी रात्रि सभाओं का उल्लेख IGNOU स्रोत में मिलता है।
यह आंदोलन की रणनीतिक परिपक्वता दिखाता है।
अदालत में दर्ज एक अनुयायी की गवाही
उलगुलान की तैयारी के सबसे मूल्यवान स्रोतों में एक है बाद में अदालत में दर्ज एक बिरसा अनुयायी की गवाही, जिसे एस. सी. राय की Mundas and Their Country से सरकारी जनगणना प्रकाशन ने उद्धृत किया।
उसके अनुसार एक पहाड़ी पर आयोजित बैठक में लगभग साठ–अस्सी लोग पहले से जमा थे। बिरसा एक पत्थर पर बैठे थे। लोगों के जुटने के बाद उन्होंने पूछा कि उन्हें किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
जमींदारों, जागीरदारों और ठेकेदारों का उत्पीड़न।
यह गवाही उलगुलान की तैयारी के सामाजिक आधार को सीधे दिखाती है।
शिकायत से हथियार तक
उसी न्यायिक गवाही के अनुसार शिकायतें सुनने के बाद बिरसा ने लोगों से—
तैयार करने को कहा। उन्होंने यह भी कहा कि दूसरे क्षेत्रों की बैठकों में भी यही आदेश दिया गया है और उनके धर्म से जुड़े लोग हथियार बना रहे हैं।
हथियार जुटाना किसी एक गांव की स्वतःस्फूर्त पहल नहीं था।
विभिन्न बैठकों में समान निर्देश दिए जा रहे थे।
यानी संगठन में एक प्रकार का समन्वित सैन्य कार्यक्रम विकसित हो चुका था।
परंपरागत हथियार क्यों?
मुंडाओं के पास ब्रिटिश सेना जैसी आधुनिक बंदूकें नहीं थीं।
जनवरी 1900 की घटनाओं के समकालीन विवरण में मुंडा समूहों को धनुष–तीर, battle-axes और spears से लैस बताया गया है।
इसमें एक गहरा सैन्य असंतुलन पहले से मौजूद था।
फिर भी आंदोलन सशस्त्र संघर्ष की तैयारी कर रहा था।
यह बताता है कि उसकी शक्ति की गणना केवल सैन्य तकनीक पर आधारित नहीं थी।
धार्मिक विश्वास ने सैन्य कमजोरी की भरपाई कैसे की?
अदालती गवाही का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है।
राजा, अधिकारी और ईसाई बंदूक चलाएंगे तो क्या होगा?
बिरसा से जुड़ी गवाही में उत्तर दर्ज है कि—
उनकी बंदूक और गोलियां प्रभावहीन हो जाएंगी, ‘पानी’ बन जाएंगी।
1931 की औपनिवेशिक जनगणना संबंधी नृवंशीय सामग्री भी बिरसा के अनुयायियों में इस प्रकार के विश्वास का उल्लेख करती है कि सरकारी बंदूकें और गोलियां निष्प्रभावी हो जाएंगी।
यहीं धार्मिक करिश्मा सैन्य रणनीति में प्रवेश करता है।
चमत्कारिक सुरक्षा का विश्वास : शक्ति भी, कमजोरी भी
यह विश्वास आंदोलन के लिए दोहरे परिणाम वाला था।
शक्ति
राइफल के सामने खड़े होने का साहस मिला।
औपनिवेशिक सेना की अजेयता का मिथक टूटा।
कमजोरी
सैन्य शक्ति का वास्तविक आकलन बिगड़ा।
तीर–धनुष और राइफल के बीच अंतर को धार्मिक विश्वास से पाटने की कोशिश हुई।
इसका परिणाम जनवरी 1900 में बहुत महंगा पड़ने वाला था।
लामबंदी की ताकत और सैन्य त्रासदी—दोनों
क्या सभी अनुयायी इस चमत्कार पर विश्वास करते थे?
अदालती और औपनिवेशिक स्रोत अक्सर आंदोलन की सबसे असाधारण धार्मिक धारणाओं को प्रमुखता देते थे।
सभी मुंडा अनुयायी एक समान विश्वास रखते थे—यह सिद्ध नहीं।
इसलिए चमत्कारिक विश्वास को पूरे आंदोलन का एकमात्र प्रेरक नहीं मानना चाहिए।
सरदार नेटवर्क क्यों निर्णायक था?
लेकिन केवल करिश्मा से दर्जनों गांवों में गुप्त संगठन नहीं बनता।
यहां पुराने सरदारी आंदोलन की विरासत बहुत उपयोगी हुई।
इसलिए बिरसा आंदोलन को शून्य से संगठन खड़ा नहीं करना पड़ा।
पुराने कृषि आंदोलन का ढांचा नए धार्मिक–राजनीतिक आंदोलन में इस्तेमाल हुआ।
सरदार
जमींदार और कचहरी से वर्षों का संघर्ष था।
संगठन को विचार और विचार को संगठन मिला।
यही 1897–99 की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया थी।
क्या सभी पुराने सरदार बिरसा के साथ थे?
कुछ अभी भी कानूनी उपायों को प्राथमिकता दे सकते थे।
कुछ धार्मिक आंदोलन से पूरी तरह सहमत नहीं होंगे।
कुछ बिरसा की बढ़ती व्यक्तिगत सत्ता से असहज रहे होंगे।
इसलिए ‘सरदार + बिरसा = पूर्ण एकता’ जैसी सरल तस्वीर सही नहीं।
लेकिन आंदोलन के महत्वपूर्ण हिस्से का संयोजन स्पष्ट था।
प्रचारक और संगठनकर्ता
बड़े आंदोलन में केंद्रीय नेता हर गांव में व्यक्तिगत रूप से नहीं पहुंच सकता।
इसलिए स्थानीय प्रचारकों और विश्वसनीय अनुयायियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
बिरसा के धार्मिक समुदाय ने पहले ही ऐसे लोगों को तैयार किया था जो—
स्थानीय अनुयायियों से संपर्क रख सकते थे,
यही धार्मिक नेटवर्क 1897 के बाद संगठनात्मक ढांचे में बदलता गया।
धर्म ने विश्वास की जांच आसान बनाई
उस पर किसी बिल्कुल अपरिचित व्यक्ति की तुलना में अधिक भरोसा किया जा सकता है।
गुप्त संदेश कैसे चलते थे?
उपलब्ध स्रोत हमें आधुनिक भूमिगत संगठन की तरह विस्तृत लिखित ‘संचार नियमावली’ नहीं देते।
इसलिए यह दावा नहीं करना चाहिए कि आंदोलन के पास कोई औपचारिक गुप्त कोड था जिसका पूरा विवरण आज उपलब्ध है।
लेकिन गांव-से-गांव संपर्क, व्यक्तिगत संदेशवाहक, सभाओं का मौखिक निमंत्रण और धार्मिक नेटवर्क मिलकर सूचना प्रसार का प्रभावी ढांचा बना सकते थे।
उलगुलान के लगभग एक साथ कई क्षेत्रों में शुरू होने से इतना स्पष्ट है कि—
लिखित आदेश कम क्यों?
एक ग्रामीण आदिवासी विद्रोह के लिए मौखिक संदेश कई कारणों से अधिक उपयोगी था।
मौखिक संदेश पुलिस के लिए प्रमाणित करना कठिन था।
और रिश्तेदारी तथा गांव-नेटवर्क पहले से मौजूद थे।
इसलिए उलगुलान के संगठन को आधुनिक राजनीतिक दल की तरह फाइल और पत्राचार खोजकर नहीं समझा जा सकता।
उसकी राजनीति मौखिक नेटवर्क में चलती थी।
प्रतीक क्यों जरूरी थे?
जहां लिखित घोषणापत्र सीमित हों वहां प्रतीकों का महत्व बढ़ जाता है।
जैसे प्रतीक आंदोलन की पहचान बनते हैं।
वह लंबे भाषण के बिना राजनीतिक अर्थ देता है।
एक गांव का व्यक्ति उसे देखकर समझ सकता है—
महारानी विक्टोरिया के पुतले पर तीर
संस्कृति मंत्रालय के Dictionary of Martyrs में इस दौर में एक पारंपरिक अनुष्ठान के रूप में क्वीन विक्टोरिया के पुतले पर तीर चलाने का उल्लेख मिलता है।
यदि इसे स्रोतगत सावधानी के साथ स्वीकार करें, तो इसका राजनीतिक अर्थ अत्यंत स्पष्ट है।
साम्राज्य के प्रतीकात्मक वध का अभ्यास।
यह धार्मिक अनुष्ठान और राजनीतिक युद्धाभ्यास दोनों हो सकता था।
प्रतीकात्मक हिंसा से वास्तविक हिंसा
राजनीतिक आंदोलनों में पहले प्रतीकात्मक कार्रवाई होती है।
फिर कुछ आंदोलनों में यह वास्तविक हिंसक कार्रवाई की ओर बढ़ सकता है।
बिरसा आंदोलन में 1897–99 का चरण इसी संक्रमण का प्रतीक है।
आगे चलकर पुलिस, मिशन प्रतिष्ठानों और अन्य सत्ता-प्रतीकों पर वास्तविक तीरों में बदलेंगे।
सैन्य तैयारी केवल हथियार बनाना नहीं थी
‘उलगुलान की तैयारी’ सुनकर सबसे पहले हथियार याद आते हैं।
लेकिन सैन्य संगठन के लिए उससे अधिक चाहिए—
उपलब्ध गवाही से कम-से-कम इतना स्पष्ट है कि विभिन्न क्षेत्रों की बैठकों में समान निर्देश दिए गए और एक निश्चित अवसर तक हथियार तैयार रखने को कहा गया।
यह समन्वय उलगुलान को स्वतःस्फूर्त दंगे से अलग करता है।
हथियार निर्माण स्थानीय क्यों था?
बाहरी हथियार बाजार से बड़ी मात्रा में बंदूक खरीदना न व्यावहारिक था, न संभव।
स्थानीय परंपरागत हथियारों का लाभ था—
उन्हें गांव में बनाया या प्राप्त किया जा सकता था।
और वे आदिवासी योद्धा संस्कृति के परिचित उपकरण थे।
इसलिए धनुष–तीर केवल ‘पिछड़े हथियार’ नहीं थे।
वे उपलब्ध संसाधनों के अनुसार स्वाभाविक युद्ध-साधन थे।
बलुआ और कुल्हाड़ी का महत्व
कुल्हाड़ी और बलुआ का ग्रामीण जीवन में पहले से उपयोग था।
यानी वह केवल युद्ध के लिए बना हथियार नहीं।
इसे लेकर चलना बंदूक जितना संदिग्ध नहीं था।
ऐसे उपकरण विद्रोह की तैयारी को छिपाने में भी मदद कर सकते थे।
लेकिन युद्ध के समय इन्हें निकट दूरी के हथियार के रूप में प्रयोग किया जा सकता था।
यह ग्रामीण विद्रोह की परिचित रणनीतिक विशेषता है—
दैनिक औजार युद्ध के हथियार बन जाते हैं।
बैठक में लक्ष्य किन्हें बताया गया?
अदालती गवाही में बिरसा से जुड़े निर्देशों में ठेकेदार, जागीरदार, राजा, अधिकारी और ईसाइयों को लक्षित करने की बात दर्ज है।
यह एक अनुयायी की न्यायालयी गवाही है, इसलिए इसे पूरे आंदोलन का औपचारिक लिखित घोषणापत्र नहीं मान सकते।
लेकिन दिसंबर 1899 की वास्तविक घटनाओं में—
इसलिए गवाही आंदोलन की वास्तविक दिशा से मेल खाती है।
‘राजा’ भी लक्ष्य क्यों?
यदि संघर्ष केवल अंग्रेजों से था तो स्थानीय राजा अथवा जागीरदार विरोधी क्यों?
क्योंकि उलगुलान आधुनिक राष्ट्रवादी संघर्ष की तरह—
मुंडा किसान की दृष्टि में शोषणकारी संरचना में शामिल हो सकते थे—
मुंडा अधिकार बनाम दिकू–शोषक व्यवस्था।
यह आधुनिक राष्ट्रवादी श्रेणी से अलग था।
ईसाइयों को लक्ष्य बनाने का जटिल प्रश्न
उलगुलान की तैयारी में ‘Christians’ को लक्ष्य बताने वाले स्रोत हैं।
लेकिन इसका अर्थ सभी ईसाई व्यक्तियों के समान संहार का कार्यक्रम मान लेना उचित नहीं होगा।
ईसाई मिशन औपनिवेशिक यूरोपीय उपस्थिति का अत्यंत दृश्यमान प्रतीक था।
आगे दिसंबर 1899 की घटनाओं में इस प्रश्न को विशेष सावधानी से अलग करना होगा।
क्षेत्रीय विस्तार : खूंटी
खूंटी बिरसा आंदोलन का केंद्रीय क्षेत्र था।
यह खूंटकट्टी मुंडा आबादी का महत्वपूर्ण केंद्र था।
बिरसा की सामाजिक पृष्ठभूमि यहीं थी।
और आगे जनवरी 1900 में खूंटी पुलिस स्टेशन पर हमला होगा।
इसलिए आंदोलन की राजनीतिक धुरी समझने के लिए खूंटी को केंद्र में रखना आवश्यक है।
तमाड़
तमाड़ पहले से आदिवासी प्रतिरोध की ऐतिहासिक परंपरा वाला क्षेत्र था।
1831–32 के कोल विद्रोह से लेकर बाद के भूमि संघर्षों तक यहां बाहरी हस्तक्षेप और स्थानीय प्रतिरोध की स्मृति मौजूद थी।
1895 में बिरसा के राजनीतिक संदेश की सूचना भी तमाड़ पुलिस क्षेत्र तक पहुंची थी।
इसलिए 1897–99 के नेटवर्क के लिए तमाड़ स्वाभाविक विस्तार क्षेत्र था।
तोरपा
तोरपा क्षेत्र भी मुंडा गांवों और मिशनरी प्रभाव के संदर्भ में महत्वपूर्ण था।
यहां धार्मिक और कृषि दोनों प्रकार के प्रश्न सक्रिय थे।
बिरसा आंदोलन के फैलाव में ऐसे क्षेत्र विशेष रूप से उपयोगी थे जहां—
क्योंकि यही तीनों बिरसा की राजनीति के केंद्र में थे।
बसिया
बसिया क्षेत्र तक आंदोलन का फैलना बताता है कि उलगुलान केवल बिरसा के जन्म और निवास क्षेत्र के आसपास सीमित नहीं रहा।
संस्कृति मंत्रालय के विवरण में दिसंबर 1899 के उलगुलान का प्रसार खूंटी, तमाड़, बसिया और रांची तक बताया गया है।
इसका अर्थ है कि तैयारी ने व्यापक क्षेत्रीय संपर्क बना लिया था।
स्थानीय धार्मिक आंदोलन अब एक बहु-क्षेत्रीय ग्रामीण विद्रोह बनने की क्षमता प्राप्त कर चुका था।
सिंहभूम की दिशा
उलगुलान का प्रभाव सिंहभूम के कुछ क्षेत्रों तक भी पहुंचा।
यह भौगोलिक विस्तार महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रशासनिक सीमाएं समुदाय की सामाजिक सीमाओं के समान नहीं थीं।
जिलों की औपनिवेशिक सीमा पार करते थे।
इसलिए विद्रोह का संचार प्रशासनिक नक्शे से अधिक सामाजिक भूगोल के अनुसार चलता था।
रांची क्यों महत्वपूर्ण था?
रांची औपनिवेशिक प्रशासन का महत्वपूर्ण केंद्र था।
इसलिए रांची क्षेत्र तक आंदोलन का पहुंचना केवल विस्तार नहीं था।
यह औपनिवेशिक सत्ता के केंद्र की ओर बढ़ना था।
जनवरी 1900 में रांची में अचानक हमले की आशंका तक उत्पन्न हो गई थी। पुराने सरकारी विवरण में कुछ दिनों तक रांची में इस बात को लेकर भय होने का उल्लेख है कि बिरसाइत अचानक शहर पर धावा बोल सकते हैं।
आंदोलन का मानचित्र किसी राजनीतिक राज्य जैसा क्यों लगने लगा?
फैल जाए, तो आंदोलन की अपनी राजनीतिक भौगोलिकता बन जाती है।
यानी औपनिवेशिक प्रशासन का नक्शा एक ओर था।
महिलाएं केवल दर्शक नहीं थीं
बिरसा आंदोलन के लोकप्रिय सैन्य इतिहास में अक्सर पुरुष योद्धाओं पर अधिक जोर मिलता है।
लेकिन संस्कृति मंत्रालय की Dictionary of Martyrs एक मुंडा महिला साली को बिरसा की लंबे समय की सहयोगी बताती है और महिला लामबंदी में उसकी भूमिका का उल्लेख करती है।
उलगुलान के सामाजिक संगठन में महिलाएं—
और कुछ परिस्थितियों में संघर्ष की सहभागी
डोम्बारी/सैल रकाब की घटनाओं में महिलाओं और बच्चों की उपस्थिति भी बाद के सरकारी स्रोतों में दर्ज है।
परिवार स्वयं संगठन का हिस्सा था
ग्रामीण विद्रोह शहर के पेशेवर क्रांतिकारी संगठन की तरह नहीं चलता।
इसलिए उलगुलान की गुप्त संरचना को केवल पुरुष राजनीतिक कार्यकर्ताओं की सूची में नहीं समझा जा सकता।
भोजन और रसद
सशस्त्र विद्रोह के लिए केवल हथियार पर्याप्त नहीं।
दूर गांव से आने वालों के रहने की व्यवस्था चाहिए।
पहाड़ी पर टिकना हो तो सामग्री चाहिए।
जनवरी 1900 में सरकारी बलों द्वारा पहाड़ी पर विद्रोही ठिकाने की जांच में महिलाओं और बच्चों के साथ बड़ी मात्रा में वस्त्र, भोजन और खाना पकाने के सामान की मौजूदगी दर्ज की गई।
यह संकेत देता है कि आंदोलन केवल अचानक युद्ध करने आए व्यक्तियों का समूह नहीं था।
उसने कुछ स्थानों पर लंबी सामुदायिक मौजूदगी की तैयारी की थी।
पहाड़ियां और जंगल रणनीतिक क्यों थे?
मुंडा भूगोल विद्रोह के लिए स्वाभाविक लाभ देता था।
1898–99 की रात्रिकालीन जंगल सभाएं इसी भूगोल का रणनीतिक उपयोग थीं।
डोम्बारी जैसी पहाड़ियां पहले से राजनीतिक स्थल कैसे बनीं?
किसी पहाड़ी पर गुप्त सभा बार-बार हो तो वह केवल सुरक्षित जगह नहीं रहती।
दिसंबर 1899 में उलगुलान का विस्फोट
क्रिसमस ईव से खुले औपनिवेशिक युद्ध तक : मिशन केंद्र, पुलिस, दिकू सत्ता और मुंडा विद्रोह का क्षेत्रीय विस्तार
24 दिसंबर 1899 की रात तक बिरसा मुंडा का आंदोलन लगभग दो वर्षों से गुप्त तैयारी कर रहा था। गांवों में बैठकें हो चुकी थीं। तीर–धनुष और अन्य स्थानीय हथियार तैयार किए जा रहे थे। बिरसाइत धार्मिक नेटवर्क तथा पुराने सरदारी संपर्कों के माध्यम से संदेश फैल चुका था। आंदोलन का राजनीतिक लक्ष्य भी पहले की तुलना में बहुत स्पष्ट था—दिकू प्रभुत्व का अंत, भूमि-अधिकार की पुनर्स्थापना और बिरसा/मुंडा राज की स्थापना।
अब धार्मिक भविष्यवाणी को वास्तविक कार्रवाई में बदलना था।
क्रिसमस 1899।
IGNOU के मानक विवरण में भी विद्रोह की शुरुआत क्रिसमस 1899 से जोड़ी गई है और खूंटी, तमाड़, बसिया तथा रांची पुलिस-थाना क्षेत्रों में अनेक हमलों का उल्लेख मिलता है।
लेकिन इस शुरुआती चरण को समझते समय दो अतियों से बचना होगा।
पहली—इसे केवल ईसाई-विरोधी धार्मिक हिंसा मानना।
दूसरी—मिशन और ईसाई व्यक्तियों पर हुए हमलों को पूरी तरह नजरअंदाज करके इसे केवल आधुनिक राष्ट्रवादी ब्रिटिश-विरोधी युद्ध बना देना।
24 दिसंबर क्यों?
उलगुलान का पहला समन्वित विस्फोट 24 दिसंबर 1899, यानी क्रिसमस की पूर्वसंध्या से जुड़ा था।
पिछले खंड में देखी गई न्यायिक गवाही में बिरसा द्वारा अनुयायियों से एक बड़े ईसाई पर्व तक हथियार तैयार रखने की बात दर्ज है। बाद का विद्रोह ठीक उसी समय शुरू हुआ। एक पुराने सरकारी नृवंशीय विवरण में बिरसा के अनुयायियों को तीर–धनुष और अन्य हथियार तैयार रखने तथा ईसाई पर्व के समय कार्रवाई की अपेक्षा का उल्लेख मिलता है।
क्या क्रिसमस चुनने का अर्थ केवल धार्मिक घृणा था?
ईसाई मिशन औपनिवेशिक छोटानागपुर में केवल पूजा स्थल नहीं था।
भूमि-विवादों में हस्तक्षेप की अपेक्षा और निराशा,
इसलिए चर्च अथवा मिशन पर हमला स्थानीय अनुयायियों की दृष्टि में केवल धर्म पर हमला नहीं, बल्कि बाहरी सत्ता के प्रतीक पर हमला भी हो सकता था।
लेकिन यह तथ्य स्वीकार करने से ईसाई व्यक्तियों पर हुई हिंसा समाप्त नहीं हो जाती।
क्रिसमस ने रणनीतिक अवसर भी दिया
क्रिसमस के दौरान मिशन केंद्रों में लोग एकत्र होते थे।
यूरोपीय मिशनरी और ईसाई समुदाय के सदस्य धार्मिक कार्यक्रमों में व्यस्त रहते।
कौन-सा स्थल औपनिवेशिक–ईसाई उपस्थिति का प्रतीक है।
धार्मिक प्रतीक और रणनीतिक अवसर—दोनों
हालांकि उपलब्ध स्रोत हमें ऐसा कोई पूर्ण सैन्य दस्तावेज नहीं देते जिसमें इन कारणों को क्रमबद्ध योजना के रूप में लिखा गया हो।
विद्रोह एक जगह से नहीं फूटा
उलगुलान की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता थी—
समकालिकता।
24–25 दिसंबर के आसपास एक ही समय में कई क्षेत्रों में कार्रवाई हुई।
IGNOU के नए अध्ययन में 24 दिसंबर 1899 से विद्रोह के फैलाव को तोरपा, खूंटी, तमाड़, बसिया से लेकर सिंहभूम के चक्रधरपुर क्षेत्र तक जोड़ा गया है।
इसके पीछे पहले से संपर्क और तैयारी थी।
आंदोलन का मुख्य भूगोल
उलगुलान का केंद्र मुख्यतः वर्तमान झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र में था।
और सिंहभूम की ओर चक्रधरपुर–पोड़ाहाट क्षेत्र।
इसलिए विद्रोह का नक्शा आकस्मिक नहीं था।
मुरहू मिशन क्यों प्रमुख लक्ष्य बना?
स्रोतों में मुरहू का Anglican Mission प्रमुख लक्ष्य के रूप में आता है।
IGNOU की अध्ययन सामग्री मुरहू के एंग्लिकन मिशन और सरवदा/सरवादा के रोमन कैथोलिक मिशन को प्रारंभिक हमलों के मुख्य निशानों में गिनती है।
मुरहू क्षेत्र में मुंडा आबादी और मिशन दोनों का महत्व था।
इसलिए यहां संघर्ष के तीन स्तर एक साथ थे—
सरवदा का रोमन कैथोलिक मिशन
इसी तरह Sarwada/सरवदा स्थित कैथोलिक मिशन भी लक्ष्य बना।
यह महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाता है कि हमला किसी एक मिशन संप्रदाय के विरुद्ध नहीं था।
बिरसा आंदोलन की राजनीतिक दृष्टि में अलग-अलग यूरोपीय ईसाई संस्थाएं एक व्यापक बाहरी धार्मिक सत्ता-संसार का हिस्सा दिखाई दे सकती थीं।
लेकिन वास्तविक ऐतिहासिक भूमिकाएं हर मिशन की अलग थीं।
इसलिए सभी मिशनरियों को एक समान शोषक कहना भी उचित नहीं होगा।
सिंहभूम तक आग की लपटें
24 दिसंबर के आसपास हमले केवल रांची जिले तक सीमित नहीं रहे।
IGNOU के विवरण में आंदोलन के फैलाव को चक्रधरपुर पुलिस थाना क्षेत्र तक बताया गया है और पोड़ाहाट सहित कुछ क्षेत्रों में सरकारी प्रतिष्ठानों तथा आवासों को आग लगाने का उल्लेख मिलता है।
इससे स्पष्ट होता है कि आंदोलन का संगठन औपनिवेशिक जिला सीमाओं से आगे जा चुका था।
सामाजिक नेटवर्क प्रशासनिक नक्शे से बड़ा था।
‘लगभग 60 दल’ का उल्लेख
IGNOU की नवीन सामग्री में लगभग 60 समूहों द्वारा सरकारी प्रतिष्ठानों और चर्चों पर एक साथ कार्रवाई करने का उल्लेख मिलता है।
इस संख्या को बिल्कुल सटीक सैन्य इकाइयों की गणना मानना उचित नहीं।
लेकिन यदि स्रोत का मोटा अनुमान भी सही है, तो वह एक बात स्पष्ट करता है—
कार्रवाई विकेंद्रित लेकिन समन्वित थी।
कोई एक विशाल सेना एक स्थान से नहीं निकली।
छोटे स्थानीय दल अलग-अलग स्थानों पर सक्रिय हुए।
यह ग्रामीण विद्रोह के लिए अधिक व्यावहारिक रणनीति थी।
पहला लक्ष्य : मिशन या सरकार?
प्रारंभिक हमलों को देखकर ऐसा लग सकता है कि मिशन ही मुख्य लक्ष्य थे।
लेकिन पूरे घटनाक्रम को देखें तो जल्दी ही स्पष्ट हो जाता है कि लक्ष्य अधिक व्यापक था।
जमींदार और ठेकेदार विरोध का केंद्र बने रहेंगे।
इसलिए प्रारंभिक मिशन हमलों को पूरे विद्रोह का अंतिम उद्देश्य मानना गलत होगा।
फिर चर्च पहले निशाने पर क्यों?
क्योंकि चर्च स्थानीय स्तर पर बेहद दृश्य संस्थाएं थीं।
किसी दूर स्थित जिला कलेक्टर कार्यालय की तुलना में गांव के पास का मिशन—
और उसके साथ लोगों का प्रत्यक्ष अनुभव था।
मिशनरियों से बिरसा का अपना पुराना संबंध और बाद का मोहभंग भी आंदोलन की स्मृति में मौजूद था।
इसलिए प्रतीकात्मक राजनीति की दृष्टि से चर्च आसान और शक्तिशाली लक्ष्य था।
क्या चर्च जलाए गए?
विभिन्न स्रोत क्रिसमस 1899 में चर्चों तथा मिशन संपत्तियों को जलाने या आग लगाने के प्रयासों का उल्लेख करते हैं।
IGNOU की सामग्री में भी क्रिसमस ईव पर रांची और सिंहभूम क्षेत्र में चर्चों को जलाने के प्रयास दर्ज हैं।
लेकिन हर स्थान पर क्षति समान नहीं थी।
कुछ स्थानों पर आग लगाने का प्रयास हुआ।
इसलिए “सभी चर्च जला दिए गए” जैसी भाषा तथ्यात्मक रूप से गलत होगी।
तीर राजनीतिक संदेश भी था
वह मुंडा योद्धा पहचान का प्रतीक भी था।
चर्च की दीवार या यूरोपीय प्रतिष्ठान पर चला तीर यह संदेश देता था—
जिस शक्ति को अब तक अजेय माना जाता था, उसे चुनौती दी जा सकती है।
इस प्रतीक का मनोवैज्ञानिक प्रभाव उसकी वास्तविक सैन्य क्षमता से बड़ा था।
क्या मिशनरी बड़े पैमाने पर मारे गए?
उपलब्ध मानक स्रोत दिसंबर 1899 के शुरुआती हमलों में यूरोपीय मिशनरियों के बड़े पैमाने पर नरसंहार की तस्वीर नहीं देते।
मिशन प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया।
लेकिन लोकप्रिय कल्पना में कभी-कभी दिखाई देने वाला व्यापक ‘मिशनरी संहार’ प्रमाणित नहीं है।
इसलिए हिंसा को न छोटा करें, न बढ़ा-चढ़ाकर लिखें।
ईसाई मुंडा किस पक्ष में थे?
कुछ के परिवार बिरसाइतों से रिश्तेदारी रखते होंगे।
इसलिए संघर्ष में उनकी स्थिति किसी सरल ‘हम बनाम वे’ रेखा में फिट नहीं होती।
यह उलगुलान की सामाजिक जटिलता का सबसे स्पष्ट उदाहरण है।
शुरुआती आंदोलन में ईसाइयों को भी लक्ष्य कहा गया था
पिछले खंड में उद्धृत न्यायिक गवाही में बिरसा से जुड़े निर्देशों में Christians को संभावित लक्ष्य के रूप में दर्ज किया गया था।
प्रारंभिक सशस्त्र चरण में धार्मिक सीमा वास्तविक थी।
लेकिन आगे आंदोलन की राजनीतिक भाषा में एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है।
“असल शत्रु ब्रिटिश हैं”—दिशा का परिवर्तन
IGNOU की सामग्री का एक महत्वपूर्ण दावा है कि बिरसाइतों ने बाद में स्पष्ट किया कि वास्तविक शत्रु अंग्रेज हैं, ईसाई मुंडा नहीं।
यह बात उलगुलान की राजनीतिक परिपक्वता समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यदि आंदोलन सभी ईसाई मुंडाओं को दुश्मन मानता, तो समुदाय स्वयं टूट जाता।
बनती है, तो जातीय–सामुदायिक एकता की संभावना फिर बढ़ती है।
क्या यह परिवर्तन बिरसा ने स्वयं कराया?
इसकी ठीक प्रक्रिया पर हमारे पास पूर्ण दस्तावेज नहीं हैं।
प्रारंभिक हमला धार्मिक रूप से रंगा हुआ था,
जबकि जनवरी तक संघर्ष अधिक साफ तौर पर पुलिस और औपनिवेशिक प्रशासन से भिड़ने लगा।
अर्थात आंदोलन की प्राथमिकता बहुत तेजी से—
हिंसा का वास्तविक पैमाना कैसे मापें?
औपनिवेशिक पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज मामले—
आंदोलन की हिंसा का एक माप देते हैं।
लेकिन वे हमेशा यह नहीं बताते कि हर घटना में वास्तविक स्थिति क्या थी।
दूसरी ओर राष्ट्रवादी या स्मृति-आधारित लेखन कभी-कभी विद्रोह का पैमाना बढ़ाकर प्रस्तुत करता है।
IGNOU की एक नवीन अध्ययन सामग्री में 32 हत्या के मामले और 81 आगजनी के मामले पुलिस अभिलेखों में दर्ज होने की बात कही गई है।
लेकिन यह संख्या पूरे उलगुलान के आपराधिक मामलों से संबंधित प्रतीत होती है, केवल 24–25 दिसंबर के शुरुआती हमलों से नहीं।
इसलिए इसे “क्रिसमस की रात 32 लोग मारे गए” कहना गलत होगा।
प्रारंभिक क्रिसमस हमलों में हताहत अपेक्षाकृत सीमित थे
यही सबसे महत्वपूर्ण तथ्यात्मक संतुलन है।
लेकिन पहले कुछ दिनों में मानव-हताहतों की संख्या आंदोलन के भौगोलिक विस्तार की तुलना में अपेक्षाकृत सीमित दिखाई देती है।
अर्थात प्रारंभिक कार्रवाई का उद्देश्य संभवतः उतना ही—
भय, प्रतीकात्मक चुनौती और विद्रोह की घोषणा
फिर हिंसा तेजी से क्यों बढ़ी?
क्योंकि सरकार प्रतिक्रिया करने लगी।
विद्रोही दलों को लगा कि अब निर्णायक संघर्ष टाला नहीं जा सकता।
कुछ ही दिनों में मिशन और धार्मिक लक्ष्यों से संघर्ष सीधे—
यही वह मोड़ है जहां उलगुलान खुले युद्ध का रूप लेता है।
दिसंबर के आखिरी सप्ताह का मनोवैज्ञानिक प्रभाव
कल्पना कीजिए कि कई गांवों में लगभग एक साथ खबर पहुंचे—
विद्रोह शुरू हो चुका है।
अब जो व्यक्ति संदेह में था, उसे लग सकता था कि—
इतने गांव उठ चुके हैं तो बिरसा का समय वास्तव में आ गया है।
अफवाह की शक्ति
उन्नीसवीं सदी के ग्रामीण विद्रोहों में समाचार और अफवाह के बीच स्पष्ट सीमा नहीं होती।
एक गांव की घटना दूसरे गांव पहुंचते-पहुंचते बदल सकती थी।
किसी छोटे हमले को बड़ी विजय बताया जा सकता था।
किसी पुलिसकर्मी के भागने को अंग्रेजी राज के पतन का प्रमाण समझा जा सकता था।
करिश्माई आंदोलन में ऐसी अफवाहें विशेष रूप से प्रभावशाली होती हैं।
इसलिए दिसंबर 1899 में वास्तविक कार्रवाई से अधिक बड़ी चीज थी—
क्या बिरसा हर हमले में उपस्थित थे?
इतने विस्तृत क्षेत्र में एक साथ हुए हमलों में बिरसा व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हो सकते थे।
इससे एक महत्वपूर्ण संगठनात्मक निष्कर्ष निकलता है—
स्थानीय दल स्वयं कार्रवाई करने में सक्षम थे।
अर्थात 1897–99 की तैयारी सफल रही थी।
आंदोलन अब केवल बिरसा की भौतिक उपस्थिति पर निर्भर नहीं था।
यही गुप्त नेटवर्क की परीक्षा थी
स्थानीय दल अपने क्षेत्र में हमला करता है।
यानी नेतृत्व ने आदेश और विचार को विकेंद्रित कर दिया था।
यह किसी विद्रोह की संगठनात्मक परिपक्वता का संकेत है।
क्या इन हमलों का स्पष्ट सैन्य उद्देश्य था?
मिशन तथा औपनिवेशिक प्रतिष्ठानों पर हमले—
लेकिन उन्हें आधुनिक सैन्य रणनीति की दृष्टि से देखें तो कमजोरी भी स्पष्ट थी।
ब्रिटिश सेना की बंदूकें समाप्त नहीं होतीं।
पुलिस संचार व्यवस्था पूरी तरह नहीं टूटती।
यानी प्रारंभिक हमले राजनीतिक रूप से शक्तिशाली लेकिन सैन्य दृष्टि से सीमित थे।
विद्रोह का ‘प्रदर्शनात्मक’ चरण
इसे उलगुलान का प्रदर्शनात्मक सशस्त्र चरण कहा जा सकता है।
लेकिन अभी तक कोई भूभाग स्थायी रूप से विद्रोहियों के नियंत्रण में नहीं आया था।
कोई पुलिस व्यवस्था स्थायी रूप से समाप्त नहीं हुई थी।
यानी ‘मुंडा राज’ अभी घोषणा और कार्रवाई के बीच था।
जमींदार और महाजन क्या तत्काल निशाना बने?
आंदोलन की तैयारी में जमींदार, जागीरदार और ठेकेदार स्पष्ट दुश्मन थे। न्यायिक गवाही में उन्हें मारने तक का निर्देश आरोपित किया गया।
फिर भी क्रिसमस की पहली दृश्य लहर में मिशन लक्ष्यों का उल्लेख अधिक मिलता है।
इससे यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि कृषि प्रश्न पीछे चला गया।
वास्तविक आंदोलन की सामाजिक ऊर्जा अभी भी—
मिशन हमले उसकी राजनीतिक अभिव्यक्ति का प्रारंभिक रूप थे।
क्या दुकानदार और बाजार भी प्रभावित हुए?
आगे 7 जनवरी के खूंटी हमले में स्थानीय दुकानों और घरों को नुकसान पहुंचाने का उल्लेख मिलता है। एक पुराने सरकारी विवरण में खूंटी पुलिस स्टेशन पर हमला, एक कांस्टेबल की हत्या और कुछ घरों को जलाने की बात दर्ज है।
यह बताता है कि जैसे-जैसे उलगुलान आगे बढ़ा, लक्ष्य केवल औपचारिक सरकारी संस्थान नहीं रहे।
स्थानीय आर्थिक शक्ति और ‘दिकू’ उपस्थिति भी जोखिम में आई।
दिसंबर से जनवरी : आंदोलन की गति
उलगुलान का प्रारंभिक घटनाक्रम मोटे तौर पर इस प्रकार समझा जा सकता है—
24–25 दिसंबर — मिशन और ईसाई प्रतिष्ठानों पर हमलों की व्यापक लहर।
दिसंबर के अंतिम दिन — विद्रोही गतिविधि गांवों में फैलती है।
5 जनवरी 1900 — एटकेडीह/एटकेडीह के आसपास पुलिस से घातक टकराव।
9 जनवरी — डोम्बारी/सैल रकाब पर औपनिवेशिक सैन्य कार्रवाई।
यानी केवल लगभग दो सप्ताह में संघर्ष—
5 जनवरी 1900 : संघर्ष का निर्णायक मोड़
IGNOU की सामग्री में 5 जनवरी 1900 को एटकेडीह में बिरसा समर्थकों द्वारा दो पुलिसकर्मियों की हत्या का उल्लेख मिलता है।
अब सरकार के पास विद्रोह को केवल धार्मिक उपद्रव कहने की गुंजाइश लगभग खत्म हो गई।
राज्य के सशस्त्र प्रतिनिधि मारे जा रहे थे।
यानी उलगुलान खुले विद्रोह में प्रवेश कर चुका था।
पुलिस की हत्या का राजनीतिक अर्थ
थाना और पुलिस औपनिवेशिक राज्य के सबसे निकट प्रतीक थे।
किसान के जीवन में महारानी विक्टोरिया दूर थीं।
इसलिए पुलिस पर हमला सीधे राज्य पर हमला था।
यहीं “महारानी राज समाप्त” का विचार भौतिक रूप लेता है।
7 जनवरी : खूंटी थाना हमला
पुराने सरकारी नृवंशीय विवरण के अनुसार 7 जनवरी 1900 को लगभग 300 मुंडा, धनुष–तीर, कुल्हाड़ियों और भालों से लैस होकर खूंटी पुलिस स्टेशन पर टूट पड़े। एक कांस्टेबल मारा गया और कुछ घरों में आग लगाई गई।
यह घटना उलगुलान के इतिहास में निर्णायक है।
पुलिस थाना
यानी राजनीतिक संघर्ष की रेखा पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी थी।
लगभग 300 लड़ाके—क्या यह सेना थी?
पुराने स्रोत इन्हें कभी-कभी ‘Munda army’ जैसे शब्दों से वर्णित करते हैं।
लेकिन जैसा पिछले खंड में स्पष्ट किया गया—
यह स्थानीय हथियारबंद विद्रोही समूह था।
फिर भी 300 लोगों का एक साथ पुलिस स्टेशन पर हमला बताता है कि—
छोटे गुप्त दल अब बड़े सामूहिक सैन्य समूह में बदल सकते थे।
खूंटी हमला क्यों प्रतीकात्मक रूप से बड़ा था?
खूंटी मुंडा क्षेत्र का महत्वपूर्ण प्रशासनिक केंद्र था।
यदि विद्रोही वहां थाना पर हमला करते हैं तो संदेश है—
अब गांव नहीं, सरकार का स्थानीय केंद्र चुनौती में है।
इससे रांची प्रशासन में गंभीर भय उत्पन्न हुआ।
पुराने सरकारी विवरण में कुछ दिनों के लिए रांची शहर पर अचानक बिरसाइत हमले की आशंका का उल्लेख है।
यानी विद्रोह की वास्तविक सैन्य क्षमता से अधिक उसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव फैल चुका था।
रांची में दहशत
यदि रांची प्रशासन को आशंका हो कि बिरसा समर्थक शहर पर हमला कर सकते हैं, तो यह आंदोलन की सबसे बड़ी शुरुआती उपलब्धियों में एक थी।
एक ग्रामीण आदिवासी आंदोलन ने औपनिवेशिक जिला मुख्यालय को रक्षात्मक मानसिकता में डाल दिया।
भय पैदा करना और शहर पर वास्तविक कब्जा करना अलग बातें हैं।
बिरसा आंदोलन दूसरे लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाया।
औपनिवेशिक सरकार अब क्या समझी?
यह केवल चर्चों को जलाने का मामला नहीं।
रांची के कमिश्नर और उपायुक्त स्वयं कार्रवाई में उतरने लगे।
यहीं से उलगुलान औपनिवेशिक युद्ध के चरण में प्रवेश करता है।
कमिश्नर फोर्ब्स और उपायुक्त स्ट्रीटफील्ड
पुराने सरकारी विवरण के अनुसार खूंटी थाना हमले की खबर मिलने के बाद कमिश्नर फोर्ब्स और रांची के डिप्टी कमिश्नर एच. सी. स्ट्रीटफील्ड लगभग 150 नेटिव इन्फैंट्री सैनिकों के साथ खूंटी की ओर बढ़े।
यानी राज्य ने विद्रोह की प्रकृति स्वयं स्वीकार कर ली थी।
विद्रोह का चरित्र कैसे बदल गया?
24 दिसंबर को यदि कोई चर्च पर तीर चलाता है, तो सरकार उसे धार्मिक हिंसा या स्थानीय दंगा कह सकती है।
7 जनवरी को 300 हथियारबंद लोग थाना पर हमला कर कांस्टेबल मार दें—
क्या ‘औपनिवेशिक युद्ध’ शब्द उचित है?
यह दो समान राज्यों के बीच युद्ध नहीं था।
दूसरा संगठित हथियारबंद विद्रोही समूह।
और दोनों के बीच गोली तथा तीर चलने वाले थे।
इस अर्थ में यह सामान्य दंगे से बहुत आगे निकल चुका था।
क्या आंदोलन ने आम नागरिकों को जानबूझकर बचाया?
ऐसा व्यापक दावा करने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं।
कुछ हिंसा गैर-सरकारी व्यक्तियों के विरुद्ध भी हुई।
जमींदार, ठेकेदार, दुकानदार और ईसाई स्थानीय समुदाय संभावित लक्ष्य बने।
इसलिए उलगुलान को केवल ‘सटीक सैन्य लक्ष्य चुनने वाला आधुनिक मुक्ति-संघर्ष’ कहना अनैतिहासिक होगा।
यह उन्नीसवीं सदी का ग्रामीण विद्रोह था जिसमें—
क्या इसे ‘सांप्रदायिक हिंसा’ कहा जा सकता है?
ईसाई संस्थान और व्यक्ति लक्ष्य बने—यह तथ्य है।
जनवरी में उसका केंद्रीय सैन्य संघर्ष पुलिस और ब्रिटिश सैनिकों से हुआ।
ईसाई मुंडाओं और बिरसाइतों का संबंध
इस प्रश्न को और गहराई से समझना जरूरी है।
कुछ संभवतः बिरसा आंदोलन से सहानुभूति रखते होंगे।
कुछ बाद में आंदोलन की मुख्य लड़ाई को अंग्रेजी राज के विरुद्ध समझते होंगे।
इसलिए ईसाई धर्म ग्रहण कर लेने से किसी मुंडा की भूमि समस्या समाप्त नहीं होती थी।
यहीं वर्ग, जातीयता और धर्म की रेखाएं एक-दूसरे को काटती हैं।
मिशनरियों की प्रतिक्रिया
मिशन प्रतिष्ठानों पर हमलों से मिशनरियों में भय फैलना स्वाभाविक था।
कुछ मिशन केंद्रों को सुरक्षा की आवश्यकता पड़ी।
औपनिवेशिक शासन और मिशन के बीच संपर्क और बढ़ा।
इससे बिरसाइतों के उस पुराने विश्वास को और बल मिल सकता था कि—
मिशन और सरकार एक-दूसरे से जुड़े हैं।
यह परस्पर भय संघर्ष को और कठोर बनाता गया।
औपनिवेशिक स्रोतों की भाषा से सावधान
पुराने सरकारी स्रोत बिरसा अनुयायियों के लिए कभी—
इस भाषा को सीधे इतिहासकार की भाषा नहीं बनाया जा सकता।
क्योंकि उसमें औपनिवेशिक सत्ता का दृष्टिकोण निहित है।
लेकिन इन्हीं स्रोतों में घटनाओं, स्थानों, तारीखों और हथियारों के उपयोग जैसी महत्वपूर्ण तथ्यात्मक जानकारी भी मिलती है।
डोम्बारी बुरू और सैल रकाब की निर्णायक लड़ाई
5 जनवरी एटकेडीह से 9 जनवरी 1900 तक : आत्मसमर्पण की बातचीत, तीर बनाम राइफल, महिलाओं–बच्चों की मौजूदगी और मृतकों की संख्या का विवाद
मुंडा उलगुलान का सबसे मार्मिक और निर्णायक सैन्य प्रसंग 9 जनवरी 1900 को डोम्बारी क्षेत्र की सैल रकाब पहाड़ी पर हुआ टकराव था। आधुनिक स्मृति में इसे अक्सर सीधे डोम्बारी बुरू हत्याकांड कहा जाता है। स्थानीय आदिवासी स्मृति में इस घटना का स्थान इतना गहरा है कि इसकी तुलना कई बार 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड से की जाती है।
लेकिन ऐतिहासिक दृष्टि से हमें तीन अलग बातें स्पष्ट रखनी होंगी।
पहली—9 जनवरी की कार्रवाई से पहले विद्रोहियों और औपनिवेशिक राज्य के बीच वास्तविक हिंसक टकराव हो चुका था।
दूसरी—सैल रकाब पर केवल हथियारबंद पुरुष नहीं, महिलाएं और बच्चे भी उपस्थित थे।
तीसरी—मृतकों की वास्तविक संख्या को लेकर औपनिवेशिक अभिलेख, बाद का इतिहासलेखन और मुंडा लोकस्मृति एक-दूसरे से बहुत अलग आंकड़े देते हैं।
इसीलिए यह घटना केवल युद्ध नहीं, बल्कि स्मृति और इतिहास के संघर्ष का भी विषय बन गई।
भारत सरकार की Dictionary of Martyrs 9 जनवरी 1900 को सैल रकाब पहाड़ी पर ब्रिटिश बलों द्वारा मुंडा योद्धाओं की सभा पर भारी हमला किए जाने की पुष्टि करती है।
डोम्बारी बुरू और सैल रकाब : क्या दोनों एक ही स्थान हैं?
लोकप्रिय विवरणों में अक्सर डोम्बारी बुरू और सैल रकाब को एक ही नाम की तरह इस्तेमाल किया जाता है।
ऐतिहासिक स्रोतों में थोड़ा अधिक भेद दिखाई देता है।
पुराने सरकारी नृवंशीय विवरण, जिसमें एस. सी. राय की Mundas and Their Country के अंश शामिल हैं, 9 जनवरी की निर्णायक भिड़ंत को Dumari Hill के रूप में दर्ज करता है—सैको से लगभग तीन मील दक्षिण और जनुमपीरी, गुटूहातु तथा आसपास के गांवों के निकट।
भारत सरकार की Dictionary of Martyrs इसे अधिक स्पष्ट रूप से—
इसलिए शोध में सबसे सुरक्षित प्रयोग होगा—
सैल रकाब–डोम्बारी बुरू परिसर।
इससे स्थानीय स्मृति और औपनिवेशिक अभिलेख—दोनों का सम्मान बना रहता है।
9 जनवरी अचानक नहीं आया था
डोम्बारी की घटना को यदि सीधे 9 जनवरी से शुरू करें तो यह दिखाई देगा कि अंग्रेज सेना ने अचानक किसी आदिवासी सभा पर हमला कर दिया।
24 दिसंबर से उलगुलान शुरू हो चुका था।
मिशन प्रतिष्ठानों और चर्चों पर हमले हुए।
5 जनवरी को एटकेडीह क्षेत्र में पुलिस से घातक संघर्ष हुआ।
7 जनवरी को लगभग 300 हथियारबंद मुंडाओं ने खूंटी थाना पर हमला किया।
इसके बाद रांची प्रशासन ने स्थिति को खुले विद्रोह के रूप में देखा। पुराने सरकारी विवरण में खूंटी पर हमले और उसके बाद कमिश्नर फोर्ब्स तथा डिप्टी कमिश्नर स्ट्रीटफील्ड के 150 सैनिकों के साथ रवाना होने का स्पष्ट विवरण है।
5 जनवरी : एटकेडीह की टक्कर
5 जनवरी के आसपास एटकेडीह की घटना ने स्थिति को और गंभीर बना दिया।
बिरसा के अनुयायियों और पुलिसकर्मियों के बीच संघर्ष में दो पुलिसकर्मियों की हत्या का उल्लेख विभिन्न आधुनिक विवरणों में मिलता है।
इसका महत्व केवल मृत्यु-संख्या में नहीं था।
अब औपनिवेशिक राज्य के प्रत्यक्ष प्रतिनिधि मारे जा रहे थे।
इससे सरकार के सामने यह स्पष्ट हो गया कि—
बिरसा आंदोलन केवल धार्मिक सभा या भूमि-अस्वीकार नहीं रहा।
वह हथियारबंद राज्य-विरोध बन चुका था।
गया मुंडा और पारिवारिक प्रतिरोध
एटकेडीह की घटनाओं से जुड़ा गया मुंडा का नाम भी महत्वपूर्ण है।
आधुनिक शोध में गया मुंडा के घर को घेरने और उसके परिवार द्वारा पुलिस का प्रतिरोध करने का उल्लेख मिलता है। उसकी पत्नी माकी, बेटियों और परिवार की दूसरी महिलाओं के भी प्रतिरोध में शामिल होने के विवरण हैं।
यह तथ्य आगे सैल रकाब पर महिलाओं की उपस्थिति समझने में महत्वपूर्ण है।
उलगुलान केवल पुरुष योद्धाओं का संगठन नहीं था।
7 जनवरी : खूंटी थाना पर हमला
7 जनवरी 1900 को विद्रोहियों ने अपनी राजनीतिक चुनौती का सबसे स्पष्ट प्रदर्शन किया।
पुराने सरकारी विवरण के अनुसार लगभग 300 मुंडा, धनुष–तीर, कुल्हाड़ियों और भालों से लैस होकर खूंटी पुलिस स्टेशन पर पहुंचे।
राज्य बनाम विद्रोही
सरकार के लिए सैनिक कार्रवाई लगभग अपरिहार्य हो गई।
फोर्ब्स और स्ट्रीटफील्ड की कार्रवाई
खूंटी हमले की खबर रांची पहुंचते ही छोटानागपुर डिवीजन के कमिश्नर फोर्ब्स और रांची के डिप्टी कमिश्नर एच. सी. स्ट्रीटफील्ड सक्रिय हुए।
पुराने सरकारी विवरण के अनुसार वे लगभग 150 नेटिव इन्फैंट्री सैनिकों के साथ खूंटी पहुंचे।
अब विद्रोहियों के सामने सामान्य पुलिस दस्ते नहीं थे।
वे प्रशिक्षित सैनिकों का सामना करने वाले थे।
यानी उलगुलान का संघर्ष एक नई सैन्य अवस्था में पहुंच चुका था।
ब्रिटिश रणनीति क्या थी?
औपनिवेशिक सरकार का तत्काल उद्देश्य था—
खूंटी–तमाड़ क्षेत्र में सरकारी नियंत्रण बहाल करना,
और विद्रोह को आसपास के क्षेत्रों में और फैलने से रोकना।
सरकार के सामने सबसे बड़ी समस्या थी बिरसा स्वयं अभी हाथ नहीं आए थे।
इसलिए बड़ी सभा या पहाड़ी पर विद्रोहियों का जमाव सरकार के लिए अवसर भी था—
एक स्थान पर बड़ी संख्या में आंदोलनकारियों को घेरा जा सकता था।
सैल रकाब पर विद्रोही क्यों जमा हुए?
मुंडा समूह पहाड़ी क्षेत्र का उपयोग पहले से—
सैल रकाब जैसी पहाड़ी तीन लाभ देती थी—
विद्रोहियों ने वहां stockades, यानी अवरोध या अस्थायी रक्षात्मक संरचनाएं भी बनाई थीं। पुराने सरकारी विवरण में पहाड़ी पर कई स्थानों पर ऐसे अवरोध बनाए जाने का उल्लेख है।
इससे पता चलता है कि विद्रोही केवल धार्मिक सभा के लिए नहीं बैठे थे।
क्या यह ‘शांतिपूर्ण सभा’ थी?
आज के कुछ लोकप्रिय विवरण इसे पूरी तरह निहत्थी शांतिपूर्ण सभा बताते हैं।
यह उपलब्ध पुराने अभिलेख से मेल नहीं खाता।
सैल रकाब पर उपस्थित समूह में हथियारबंद मुंडा थे।
दो दिन पहले खूंटी थाना पर हमला हुआ था।
पुराने विवरण में उन्हें धनुष–तीर और अन्य हथियारों से लैस आंदोलनकारी बताया गया है।
इसलिए इसे पूरी तरह निहत्थे नागरिकों की शांति-सभा कहना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं।
इसका यह अर्थ भी नहीं कि वहां मौजूद हर व्यक्ति लड़ाका था।
क्योंकि महिलाओं और बच्चों की उपस्थिति स्पष्ट रूप से दर्ज है।
महिलाएं और बच्चे वहां क्यों थे?
सैनिक कार्रवाई के बाद जब सरकारी बलों ने विद्रोही ठिकाने की जांच की, तो उन्हें रक्षात्मक अवरोधों के पीछे—
इसका अर्थ है कि पहाड़ी पर मौजूद समूह केवल क्षणिक युद्ध-दल नहीं था।
कम-से-कम कुछ परिवार वहां लंबे समय तक ठहरने की तैयारी के साथ आए थे।
क्या महिलाएं केवल आश्रित थीं?
उलगुलान में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के प्रमाण हैं।
गया मुंडा के परिवार की महिलाओं के हथियार लेकर प्रतिरोध करने के विवरण हैं।
भारत सरकार की Dictionary of Martyrs में 9 जनवरी की सैल रकाब भिड़ंत में मारी गई कई महिलाओं के नाम अलग-अलग प्रविष्टियों में दर्ज हैं। उदाहरण के लिए मोनझिया मुंडा की पत्नी को ब्रिटिश पुलिस से लड़ते हुए मारा गया बताया गया है।
कुछ परिवारों की सुरक्षा और रसद का हिस्सा थीं।
बच्चे : घटना की नैतिक गंभीरता
बच्चों की उपस्थिति इस घटना की प्रकृति को और गंभीर बनाती है।
यदि सैन्य बल किसी ऐसे जमाव पर गोली चलाता है जिसमें लड़ाकों के साथ—
भी मौजूद हों, तो केवल सैन्य आवश्यकता का तर्क पर्याप्त नहीं रह जाता।
राज्य की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह—
स्ट्रीटफील्ड ने बातचीत की
पुराने सरकारी विवरण में यह स्पष्ट है कि डिप्टी कमिश्नर स्ट्रीटफील्ड ने गोली चलाने से पहले विद्रोहियों को आत्मसमर्पण के लिए मनाने की कोशिश की।
वह उनकी अपनी भाषा में स्थिति समझाने और हथियार डालने को कह रहा था।
“अंग्रेज पहुंचे और बिना किसी चेतावनी के सभा पर गोली चला दी”
पुराने आधिकारिक विवरण से मेल नहीं खाता।
बातचीत की प्रकृति
हमारे पास स्ट्रीटफील्ड और विद्रोहियों के बीच पूरी शब्दशः बातचीत का विश्वसनीय विस्तृत लिप्यंतरण नहीं है।
पुराना विवरण कहता है कि स्ट्रीटफील्ड ने उन्हें स्थिति समझाकर हथियार डालने को कहा।
विद्रोहियों ने प्रस्ताव अस्वीकार किया और ब्रिटिश सैन्य शक्ति को चुनौती दी।
यहां औपनिवेशिक स्रोत की भाषा सावधानी से पढ़नी होगी।
उसी विवरण में विद्रोहियों को अपमानजनक भाव से “infatuated fanatics” कहा गया है।
विद्रोहियों ने आत्मसमर्पण क्यों नहीं किया?
सरकार स्वयं दिकू व्यवस्था की संरक्षक है।
खूंटी पर उनकी कार्रवाई ने साहस बढ़ाया था।
और कुछ अनुयायियों में यह धार्मिक विश्वास भी मौजूद था कि—
ब्रिटिश गोलियां उन पर प्रभाव नहीं डालेंगी।
पिछले खंडों में देखी गई न्यायिक गवाही और पुराने नृवंशीय स्रोत दोनों ऐसे विश्वास का उल्लेख करते हैं।
इसलिए आत्मसमर्पण का अर्थ उनके लिए केवल हथियार रखना नहीं था।
तीर बनाम राइफल
सैल रकाब का सबसे शक्तिशाली प्रतीक है—
तीर बनाम राइफल।
आधुनिक सैन्य राइफलें और प्रशिक्षित सैनिक।
यह सैन्य संघर्ष शुरू होने से पहले ही असमान था।
मुंडा हथियार नजदीकी अथवा सीमित दूरी के युद्ध में प्रभावी हो सकते थे।
राइफल बहुत अधिक दूरी, वेग और मारक क्षमता देती थी।
खुले पहाड़ी क्षेत्र में यह तकनीकी अंतर निर्णायक था।
क्या तोप इस्तेमाल हुई?
लोकप्रिय स्मृति और कुछ पत्रकारिता में डोम्बारी बुरू पर अंग्रेजों द्वारा तोप चलाने की बात कही जाती है।
लेकिन उपलब्ध पुराने सरकारी विवरण में 150 पैदल सैनिकों और गोलीबारी का उल्लेख है; निर्णायक तोपखाने के इस्तेमाल का स्पष्ट प्रमाण उस स्रोत में नहीं मिलता।
इसलिए जब तक मजबूत प्राथमिक प्रमाण न मिले—
“तोपों से आदिवासियों को उड़ा दिया गया”
राइफलों की गोलियां ही पर्याप्त घातक थीं।
गोली किसने पहले चलाई?
इस प्रश्न पर भी अत्यधिक निश्चितता से बचना चाहिए।
और इसके बाद सैनिकों को गोली चलाने का आदेश दिया गया।
मुंडा स्मृति और बाद के लोकप्रिय विवरणों में घटना को अक्सर अधिक स्पष्ट रूप से एकतरफा गोलीबारी के रूप में याद किया गया।
गोलीबारी के बाद क्या हुआ?
पुराने सरकारी विवरण के अनुसार गोलीबारी के बाद मुंडा रक्षात्मक स्थान छोड़कर एक गहरी खाई/गली की ओर और फिर जंगल में भागे।
यह बताता है कि विद्रोही पहाड़ी को स्थायी रूप से बचा नहीं सके।
सैन्य दृष्टि से सैल रकाब पर औपनिवेशिक बल की जीत हुई।
यही कारण है कि उलगुलान तुरंत समाप्त नहीं हुआ।
कितने लोग मारे गए?
पुराने सरकारी नृवंशीय विवरण में लिखा है कि लड़ाई के बाद—
और जंगल में तीन महिलाओं तथा एक लड़के के शव मिले।
कम-से-कम आठ मृतक
उस तत्काल सरकारी गणना में दर्ज होते हैं।
लेकिन यही संख्या अंतिम सत्य मान लेना कठिन है।
केवल आठ? संदेह क्यों पैदा होता है?
गोलीबारी के बाद लोग जंगल और खाइयों में भागे।
घायल लोग गांव ले जाए गए हो सकते हैं।
कुछ लोग बाद में घावों से मरे होंगे।
सरकार की तत्काल गिनती केवल स्थल पर मिले शवों पर आधारित हो सकती थी।
राज्य के पास अपनी कार्रवाई के वास्तविक हताहत कम दिखाने की संस्थागत प्रवृत्ति होने की संभावना को भी इतिहासकार नजरअंदाज नहीं कर सकता।
भारत सरकार की बाद की शहीद-सूची क्या बताती है?
भारत सरकार की Dictionary of Martyrs में 9 जनवरी 1900 की सैल रकाब भिड़ंत में मारे या घायल होकर मरे कई अलग-अलग व्यक्तियों की प्रविष्टियां मौजूद हैं।
इससे स्पष्ट होता है कि पुराने तत्काल युद्ध-विवरण की छोटी संख्या घटना से संबंधित सभी बाद के मृतकों की पूर्ण सूची नहीं थी।
यानी स्वयं बाद के सरकारी संकलन भी उससे अधिक व्यक्तियों की पहचान करते हैं।
स्थानीय शिलापट्ट पर नाम
डोम्बारी क्षेत्र की आधुनिक स्मृति में कुछ विशिष्ट शहीदों के नाम संरक्षित हैं।
के नाम अंकित होने की जानकारी मिलती है।
यह संख्या भी कुल मृतकों की संख्या नहीं बताती।
वह केवल उन लोगों की स्मृति है जिनके नाम संरक्षित या पहचाने जा सके।
मुंडा लोकस्मृति क्या कहती है?
मुंडा स्मृति में मौतों की संख्या औपनिवेशिक रिकॉर्ड से कहीं अधिक है।
एक आधुनिक शोध-पत्र स्थानीय मुंडा स्मरण और पुराने आदिवासी लेखकों का हवाला देते हुए लगभग 100–200 पुरुषों और महिलाओं के मारे जाने की स्मृति दर्ज करता है।
कुछ लोकप्रिय आधुनिक लेख इससे भी अधिक—
लेकिन इतनी ऊंची संख्याओं के लिए ठोस समकालीन नामावली उपलब्ध नहीं।
400 मृतक का दावा कितना विश्वसनीय?
आधुनिक लोकप्रिय विवरणों में 400 से अधिक मृतकों का दावा मिलता है और इसे जलियांवाला बाग से भी बड़ा नरसंहार कहा जाता है।
लेकिन यह संख्या पुराने उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड से बहुत दूर है।
इतनी बड़ी संख्या की पुष्टि न करें, 400 को निश्चित तथ्य के रूप में लिखना उचित नहीं।
क्या ब्रिटिश रिकॉर्ड जानबूझकर संख्या कम कर रहा था?
संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
लेकिन बिना प्रमाण के इसे निश्चित तथ्य भी नहीं कहा जा सकता।
औपनिवेशिक राज्य अक्सर दमनकारी कार्रवाई को उचित ठहराने के लिए भाषा नियंत्रित करता था।
लेकिन कभी-कभी लोकस्मृति भी दशकों में घटना के पैमाने को प्रतीकात्मक रूप से बढ़ाती है।
वास्तविक संख्या शायद क्यों कभी न मिले?
उन्नीसवीं सदी के ग्रामीण आदिवासी क्षेत्र में—
सभी लोगों के जन्म-मृत्यु रिकॉर्ड नहीं थे।
कई मृतक दूर गांवों से आए हो सकते थे।
महिलाओं के नाम विशेष रूप से अभिलेखों में कम दर्ज होते थे।
इसलिए एक अंतिम पूर्ण सूची बनना स्वाभाविक रूप से कठिन है।
यही कारण है कि डोम्बारी की मृतक-संख्या आज भी इतिहासलेखन का खुला प्रश्न है।
महिलाओं की मृत्यु क्यों विशेष महत्व रखती है?
पुराने सरकारी विवरण स्वयं तीन महिलाओं के शव मिलने की बात स्वीकार करता है।
भारत सरकार की बाद की शहीद-सूची भी महिला प्रतिभागियों की मृत्यु दर्ज करती है।
“सैनिकों ने केवल युद्धरत पुरुषों पर गोली चलाई।”
वास्तविक गोलीबारी ऐसे मिश्रित समूह पर हुई जिसमें—
यही घटना की नैतिक और ऐतिहासिक गंभीरता का केंद्रीय बिंदु है।
क्या ब्रिटिश सैनिकों को पता था कि महिलाएं और बच्चे मौजूद हैं?
इसका बिल्कुल निश्चित उत्तर उपलब्ध स्रोतों से देना कठिन है।
सरकारी विवरण कहता है कि गोलीबारी के बाद जाकर यह पता चला कि रक्षात्मक संरचनाओं के पीछे महिलाएं और बच्चे मौजूद थे।
यदि यह विवरण सही है तो सैनिकों को पहले उनकी संख्या और स्थिति की पूरी जानकारी नहीं रही होगी।
लेकिन ऊंचे स्थान पर बड़े सामुदायिक जमाव को देखते हुए यह प्रश्न फिर भी बना रहता है कि—
क्या पर्याप्त पहचान और निकासी की कोशिश हुई?
क्या गोलीबारी ‘अंधाधुंध’ थी?
लोकप्रिय स्मृति अक्सर इस शब्द का प्रयोग करती है।
पुराने आधिकारिक स्रोत में इसे नियंत्रित सैन्य कार्रवाई के रूप में पेश किया गया है।
इन दोनों के बीच हमें सावधान भाषा चाहिए।
मृतकों की वास्तविक संख्या अस्पष्ट है।
क्या इसे ‘नरसंहार’ कहना चाहिए?
‘नरसंहार’ शब्द दो अर्थों में इस्तेमाल होता है।
एकतरफा अथवा अत्यधिक राज्य-हिंसा से बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु।
किसी जातीय, धार्मिक या राष्ट्रीय समूह को नष्ट करने के विशिष्ट इरादे वाला अपराध।
डोम्बारी की घटना के लिए दूसरे, कानूनी अर्थ वाला जनसंहार/जेनोसाइड कहना उचित नहीं।
‘Massacre’ अर्थात हत्याकांड शब्द स्थानीय स्मृति में उसकी असमान और नागरिक हताहतों वाली प्रकृति के कारण प्रयुक्त हो सकता है।
लेकिन सैन्य टकराव की वास्तविक पृष्ठभूमि भी बतानी होगी।
“मुंडाओं का जलियांवाला बाग”
और डोम्बारी की घटना जलियांवाला बाग से लगभग उन्नीस वर्ष पहले हुई थी।
इसीलिए यह तुलना स्मृति की भाषा में शक्तिशाली है।
लेकिन दोनों घटनाएं समान नहीं थीं
यह इतिहास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
डोम्बारी/सैल रकाब — 9 जनवरी 1900
उससे ठीक पहले विद्रोहियों ने पुलिसकर्मी मारे थे।
खूंटी थाना पर हथियारबंद हमला हुआ था।
आत्मसमर्पण की बातचीत का पुराना रिकॉर्ड मौजूद है।
जलियांवाला बाग — 13 अप्रैल 1919
कोई तत्काल सशस्त्र युद्ध वहां नहीं चल रहा था।
सभा पर बिना प्रभावी निकास अवसर के गोलियां चलवाई गईं।
इसलिए दोनों को सैन्य परिस्थितियों में एक जैसा कहना गलत होगा।
फिर तुलना का उपयोग क्यों करें?
क्योंकि तुलना का उद्देश्य हमेशा घटनाओं की समानता सिद्ध करना नहीं होता।
कभी वह ऐतिहासिक स्मृति में भूली हुई हिंसा को दृश्य बनाने का माध्यम होती है।
‘मुंडा जलियांवाला’ कहने से संदेश है—
औपनिवेशिक राज्य द्वारा स्थानीय समुदायों पर सामूहिक गोलीबारी केवल 1919 में नहीं हुई।
आदिवासी क्षेत्रों में ऐसी हिंसा उससे पहले भी हुई।
तुलना की सीमा
“डोम्बारी ठीक जलियांवाला बाग जैसा था”
तो हम दोनों घटनाओं का इतिहास बिगाड़ देंगे।
डोम्बारी की राजनीतिक प्रतीकात्मकता
वह आंदोलन की शहादत का केंद्र बन गई।
हम तीर लेकर बंदूक के सामने खड़े हुए।
तीर की पराजय क्या आंदोलन की पराजय थी?
हां, सैल रकाब पर मुंडा बल पीछे हटे।
पहाड़ी से भागे लोग गांवों और जंगलों में फैल गए।
उलगुलान के नेटवर्क पूरी तरह ध्वस्त नहीं हुए।
घटना ने आंदोलन की स्मृति को स्थायी बना दिया।
ब्रिटिश सैन्य सफलता
औपनिवेशिक प्रशासन की दृष्टि से सैल रकाब निर्णायक सफलता थी।
विद्रोहियों का बड़ा जमाव तोड़ा गया।
सरकार ने दिखाया कि थाना पर हमला करने के बाद वह कठोर जवाब दे सकती है।
अब छोटे विद्रोही समूहों को अलग-अलग पकड़ना आसान होने लगा।
यानी उलगुलान का खुला सैन्य चरण यहीं से कमजोर पड़ने लगा।
धार्मिक भविष्यवाणी की परीक्षा
सैल रकाब ने क्रूर वास्तविकता सामने रख दी।
यह करिश्माई आंदोलन के लिए गंभीर संकट हो सकता था।
फिर भी आंदोलन तुरंत समाप्त नहीं हुआ।
क्योंकि उसके कारण केवल चमत्कारिक विश्वास नहीं थे।
भूमि और दिकू का प्रश्न अभी भी वास्तविक था।
धार्मिक विश्वास की सीमा उजागर
सैल रकाब उलगुलान की सबसे बड़ी रणनीतिक सीख थी।
नैतिक सत्य सैन्य समानता की गारंटी नहीं देता।
मुंडाओं का भूमि दावा कितना भी न्यायपूर्ण हो,
यदि एक पक्ष के पास राइफल है और दूसरे के पास तीर—
तो खुले युद्ध का परिणाम तकनीकी शक्ति से बहुत प्रभावित होगा।
इस सैन्य असमानता को आंदोलन कभी दूर नहीं कर पाया।
क्या छापामार युद्ध बेहतर होता?
पीछे से इतिहास देखकर कहा जा सकता है कि—
विद्रोहियों के लिए अधिक प्रभावी हो सकता था।
लेकिन इतिहास में आंदोलन हमेशा हमारे बाद के सैन्य ज्ञान के अनुसार नहीं चलते।
बिरसा आंदोलन धार्मिक–सामुदायिक लामबंदी भी था।
बड़ी सभा उसका राजनीतिक प्रदर्शन थी।
परिवारों का पहाड़ी पर होना रणनीतिक समस्या क्यों बना?
यदि केवल हथियारबंद लड़ाके होते तो वे जल्दी बिखर सकते थे।
लेकिन महिलाओं, बच्चों, राशन और घरेलू सामान की मौजूदगी से लगता है कि समुदाय वहां अधिक स्थायी आश्रय या राजनीतिक केंद्र बनाने की अपेक्षा कर रहा था।
सैल रकाब के बाद औपनिवेशिक दमन, बिरसा की गिरफ्तारी और रांची जेल में मृत्यु
जनवरी–जून 1900 : खोज-अभियान, गांवों पर दबाव, जमकोपाई में गिरफ्तारी, सामूहिक मुकदमे और ‘कॉलरा बनाम विष’ का विवाद
9 जनवरी 1900 को सैल रकाब–डोम्बारी की निर्णायक भिड़ंत के बाद मुंडा उलगुलान का स्वरूप अचानक बदल गया। दिसंबर के अंत और जनवरी के पहले सप्ताह तक पहल काफी हद तक विद्रोहियों के हाथ में थी—वे लक्ष्य चुन रहे थे, मिशन प्रतिष्ठानों पर हमले कर रहे थे, पुलिस से भिड़ रहे थे और 7 जनवरी को खूंटी थाना तक आक्रमण कर चुके थे। सैल रकाब पर औपनिवेशिक सैनिक कार्रवाई ने इस खुली सैन्य क्षमता को तोड़ दिया।
अब पहल ब्रिटिश प्रशासन के हाथ में चली गई।
सरकार का लक्ष्य केवल किसी अगली बड़ी लड़ाई को रोकना नहीं था। वह उस सामाजिक नेटवर्क को तोड़ना चाहती थी जिसके कारण बिरसा दो वर्ष भूमिगत रहकर हजारों लोगों को संगठित कर सके थे।
इसलिए जनवरी 1900 के मध्य से संघर्ष का नया चरण शुरू हुआ—
बड़ी लड़ाई नहीं, बल्कि खोज, नाकेबंदी, संपत्ति जब्ती, आत्मसमर्पण, मुखबिरी, सामूहिक गिरफ्तारियां और न्यायिक दमन।
IGNOU के मानक अध्ययन के अनुसार सरकार ने 13 से 26 जनवरी 1900 तक व्यापक ‘beat and search’ अभियान चलाया। 28 जनवरी तक संपत्तियां कुर्क किए जाने के दबाव में दो प्रमुख मुंडा सरदारों सहित 32 लोगों ने आत्मसमर्पण कर दिया।
यह उलगुलान की सैन्य पराजय का आरंभ था।
सैल रकाब के बाद सरकार की प्राथमिकता : बिरसा को पकड़ो
9 जनवरी की भिड़ंत में मुंडा जमाव टूट गया था, लेकिन ब्रिटिश प्रशासन की सबसे बड़ी समस्या अभी हल नहीं हुई थी—
बिरसा जीवित और स्वतंत्र थे।
जब तक धरती आबा बाहर थे, विद्रोह फिर उठ सकता था।
बिखरे हुए अनुयायियों को फिर जोड़ सकते थे।
उनकी गिरफ्तारी से बच निकलने की प्रत्येक खबर उनके चमत्कारिक करिश्मे को मजबूत भी कर सकती थी।
इसलिए अब सरकार के लिए विद्रोह का केंद्रीय सैन्य प्रश्न था—
बड़ी सेना से अधिक महत्वपूर्ण हो गया सूचना-तंत्र
लेकिन बिरसा की गिरफ्तारी के लिए राइफल पर्याप्त नहीं थी।
जंगल में छिपे नेता को खोजने के लिए चाहिए था—
firepower से intelligence
औपनिवेशिक राज्य की वास्तविक शक्ति यहीं अधिक स्पष्ट होती है। उसके पास केवल सैनिक नहीं थे; पुलिस, राजस्व प्रशासन, गांव के चौकीदार, मुखबिर और न्यायिक शक्ति भी थी।
500 रुपये का इनाम कितना बड़ा था?
बिरसा की गिरफ्तारी के लिए प्रशासन ने 500 रुपये का इनाम घोषित किया था। यह राशि उस समय ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ी थी। IGNOU और भारत सरकार के स्रोत दोनों इस इनाम का उल्लेख करते हैं।
बिरसा की सबसे बड़ी सुरक्षा जंगल नहीं,
उनके लोग
इसलिए उस सामाजिक निष्ठा को आर्थिक प्रलोभन से तोड़ना था।
यदि कोई स्थानीय व्यक्ति सरकार को सूचना दे देता है, तो जंगल की भौगोलिक सुरक्षा समाप्त हो सकती थी।
गांवों की नाकेबंदी क्यों आवश्यक थी?
बिरसा अकेले जंगल में अनिश्चित समय तक नहीं रह सकते थे।
और पुलिस की गतिविधि के बारे में खबर।
ये सब उन्हें गांवों से ही मिल सकते थे।
इसलिए सरकार को समझ में आया कि बिरसा को पकड़ने के लिए—
बिरसा के बजाय पहले उनके सामाजिक आधार को घेरना होगा।
यही आधुनिक counter-insurgency की भी बुनियादी रणनीति है—
13–26 जनवरी : ‘बीट एंड सर्च’ अभियान
IGNOU का एक अध्ययन स्पष्ट रूप से बताता है कि सरकार ने 13 जनवरी से 26 जनवरी 1900 तक ‘beat and search’ अभियान चलाया।
यह केवल अपराधी खोजने की साधारण पुलिस कार्रवाई नहीं थी।
यह उलगुलान के पूरे सामाजिक भूगोल को नियंत्रित करने की कोशिश थी।
संपत्ति जब्ती : परिवार को राजनीतिक दबाव में बदलना
सरकार ने केवल व्यक्तियों की तलाश नहीं की।
आंदोलन से जुड़े सरदारों और संदिग्धों की संपत्ति पर भी कार्रवाई हुई।
IGNOU के विवरण में 28 जनवरी को दो प्रमुख मुंडा सरदारों और 32 अन्य लोगों के आत्मसमर्पण को संपत्ति कुर्की के दबाव से जोड़कर देखा गया है।
उसकी पत्नी, बच्चे और परिवार गांव में हैं।
तुम नहीं आए तो तुम्हारे परिवार की आर्थिक नींव टूटेगी।
यही सैन्य संघर्ष को सामाजिक दमन में बदल देता है।
आत्मसमर्पण का अर्थ आंदोलन में दरार
28 जनवरी तक अनेक लोगों के आत्मसमर्पण का अर्थ था कि सैल रकाब के बाद आंदोलन की संगठनात्मक शक्ति तेजी से कमजोर हो रही थी।
किसी भी गांव में बाहर से आए व्यक्ति पर पुलिस का संदेह हो सकता था।
इसलिए बिरसा का करिश्मा कायम था, लेकिन उनका कार्रवाई योग्य नेटवर्क सिकुड़ता जा रहा था।
क्या पूरा मुंडा समाज सरकार के खिलाफ बना रहा?
यहीं विद्रोह की एक महत्वपूर्ण सीमा दिखाई देती है।
कुछ पुराने सरदारी नेतृत्व से जुड़े थे।
और कुछ लोग सरकारी दमन, भय, आर्थिक दबाव या इनाम के कारण प्रशासन को सूचना देने लगे।
कोई भी लंबे ग्रामीण विद्रोह में यही प्रश्न निर्णायक होता है—
धार्मिक निष्ठा बनाम परिवार की सुरक्षा
बिरसा अनुयायी के सामने अब कठिन चुनाव था।
ऐसी स्थिति में धार्मिक और राजनीतिक निष्ठा की वास्तविक परीक्षा होती है।
उलगुलान केवल युद्धस्थल पर नहीं टूट रहा था।
बिरसा सिंहभूम की ओर क्यों गए?
सैल रकाब से बच निकलने के बाद बिरसा ने सिंहभूम के वन क्षेत्र की ओर शरण ली।
IGNOU के एक मानक विवरण के अनुसार सैल रकाब के बाद बिरसा सिंहभूम की पहाड़ियों में बच निकले और बाद में चक्रधरपुर क्षेत्र के जमकोपाई जंगल में पकड़े गए।
जमकोपाई जंगल : अंतिम शरणस्थल
बिरसा की अंतिम गिरफ्तारी का स्थान सामान्यतः—
जमकोपाई जंगल, चक्रधरपुर क्षेत्र, सिंहभूम
कुछ स्रोत इसे जमकोपाई/जमकोपाई वन अलग वर्तनी में लिखते हैं।
यहीं ब्रिटिश खोज-अभियान अंततः उस व्यक्ति तक पहुंचा जिसके सिर पर 500 रुपये का इनाम था।
लेकिन गिरफ्तारी की तारीख पर स्रोतों में महत्वपूर्ण अंतर है।
3 फरवरी या 3 मार्च 1900?
यह तारीखी विवाद विशेष रूप से साफ करना आवश्यक है।
IGNOU के नवीन अध्ययन में बिरसा की गिरफ्तारी 3 फरवरी 1900 को जमकोपाई जंगल, चक्रधरपुर में बताई गई है। उसी अध्ययन में रांची के डिप्टी कमिश्नर के पत्र का हवाला देकर मुकदमों की संख्या भी दी गई है।
IGNOU के एक पुराने मानक अध्ययन में भी स्पष्टतः 3 फरवरी 1900 को सिंहभूम में गिरफ्तारी दर्ज है।
दूसरी ओर भारत सरकार की Dictionary of Martyrs की बिरसा प्रविष्टि में तारीख 3 मार्च 1900 दी गई है।
इसलिए वेबसाइट पर बिना टिप्पणी किए एक तारीख देना उचित नहीं होगा।
कौन-सी तारीख अधिक विश्वसनीय लगती है?
उपलब्ध मानक इतिहासलेखन और घटनाक्रम के आधार पर 3 फरवरी 1900 अधिक व्यापक रूप से स्वीकृत तारीख है।
कुमार सुरेश सिंह पर आधारित इतिहासलेखन,
और जनवरी के तत्काल बाद चलाए गए खोज-अभियान की समय-श्रृंखला
Dictionary of Martyrs का 3 मार्च का उल्लेख महत्वपूर्ण सरकारी स्रोत है, इसलिए उसे छिपाना नहीं चाहिए; लेकिन उपलब्ध स्रोत-संगति को देखते हुए 3 फरवरी को मुख्य तारीख और 3 मार्च को स्रोतगत भिन्नता के रूप में देना अधिक सुरक्षित है।
क्या बिरसा सोते हुए पकड़े गए?
भारत सरकार की Dictionary of Martyrs में बिरसा को जमकोपाई जंगल में सोते समय पकड़े जाने का उल्लेख है।
यह विवरण कई बाद की जीवनियों में भी आता है।
ब्रिटिश सेना ने बिरसा को किसी अंतिम वीरतापूर्ण युद्ध में पराजित करके नहीं पकड़ा।
सूचना और अचानक कार्रवाई
यानी उलगुलान का अंत भी उसी शक्ति ने किया जो औपनिवेशिक राज्य की वास्तविक ताकत थी—
क्या गिरफ्तारी मुखबिरी से हुई?
लोकप्रिय परंपरा में बिरसा के ठिकाने की सूचना स्थानीय लोगों द्वारा इनाम के बदले दिए जाने की कथा व्यापक है।
इसके अलग-अलग संस्करणों में सूचनादाताओं की संख्या और पहचान बदलती है।
इतिहास की दृष्टि से इतना सुरक्षित है कि—
और जमकोपाई में बिरसा को अचानक पकड़ लिया गया।
लेकिन जब तक किसी विशेष व्यक्ति या समूह की पहचान विश्वसनीय प्राथमिक रिकॉर्ड से न मिले, उसे निश्चित ‘विश्वासघाती’ के रूप में प्रस्तुत करने से बचना चाहिए।
गिरफ्तारी के समय अंतिम युद्ध क्यों नहीं हुआ?
यह स्वयं उलगुलान की स्थिति बताता है।
300 विद्रोही खूंटी पर हमला कर सकते थे।
केंद्रीय नेता छोटे समूह के साथ जंगल में छिपा था।
अर्थात कुछ ही सप्ताह में आंदोलन की सैन्य क्षमता कितनी तेजी से टूट चुकी थी।
गिरफ्तारी इसलिए केवल बिरसा की पकड़ नहीं थी।
धरती आबा अब अंग्रेजी हिरासत में
1895 की गिरफ्तारी के बाद बिरसा लौट आए थे।
इसलिए 1900 में उनके अनुयायियों के लिए यह आशा स्वाभाविक रही होगी कि शायद फिर कुछ वैसा हो।
पहले उन पर मुख्यतः राज-विरोधी प्रचार और अवज्ञा का मुकदमा था।
इसलिए सरकार बिरसा आंदोलन को कहीं अधिक गंभीर अपराध-श्रृंखला के रूप में देख रही थी।
गिरफ्तारी के बाद उलगुलान खत्म हुआ?
लेकिन गिरफ्तारियां और मुकदमे बहुत लंबे समय तक चले।
भारत सरकार की Dictionary of Martyrs के अनुसार लगभग 482 बिरसाइत और उनके समर्थक गिरफ्तार हुए और उनके मुकदमे अक्टूबर 1901 तक चलते रहे।
IGNOU के एक नवीन अध्ययन में रांची के डिप्टी कमिश्नर के पत्र के आधार पर 15 अलग आपराधिक मामलों में 460 आदिवासियों को आरोपी बनाए जाने और उनमें 63 की दोषसिद्धि का उल्लेख है।
ये दो आंकड़े परस्पर विरोधी होना आवश्यक नहीं।
एक कुल गिरफ्तार लोगों से संबंधित हो सकता है,
दूसरा औपचारिक रूप से अलग मामलों में आरोपी बनाए गए व्यक्तियों से।
उलगुलान के बाद लगभग 460–480 लोगों के स्तर पर गिरफ्तारी/अभियोजन हुआ; विभिन्न स्रोत 460 आरोपियों और लगभग 482 गिरफ्तार बिरसाइतों–समर्थकों की संख्या देते हैं।
यह आंदोलन के पैमाने को भी दिखाता है।
सरकार ने केवल बिरसा और दस–बीस नेताओं को नहीं पकड़ा।
पूरे संगठन को न्यायिक कार्रवाई के घेरे में लाया गया।
पंद्रह अलग आपराधिक मामले
IGNOU की सामग्री के अनुसार रांची के डिप्टी कमिश्नर के पत्र में 15 विभिन्न आपराधिक मामलों में 460 आदिवासियों को आरोपी बनाए जाने का उल्लेख है।
क्योंकि उलगुलान कोई एक स्थान की एक घटना नहीं था।
और अलग-अलग क्षेत्रीय घटनाओं के आधार पर।
यानी अदालत में आंदोलन को टुकड़ों में तोड़ा गया।
राजनीतिक उलगुलान न्यायिक प्रक्रिया में अलग-अलग ‘criminal cases’ बन गया।
राज्य की भाषा बदल गई
यानी वही घटना दो भाषाओं में मौजूद थी।
अपराध की भाषा।
औपनिवेशिक न्याय की राजनीति समझने के लिए यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है।
63 दोषसिद्धियां
IGNOU की नवीन सामग्री के अनुसार 460 आरोपियों में 63 व्यक्तियों को दोषी ठहराया गया।
यदि सैकड़ों लोगों को पकड़ा गया लेकिन अपेक्षाकृत कम के खिलाफ दोषसिद्धि हुई, तो दो संभावनाएं सामने आती हैं—
सरकार ने व्यापक संदेह के आधार पर बहुत से लोगों को हिरासत में लिया।
अदालत में व्यक्तिगत आपराधिक जिम्मेदारी सिद्ध करना कठिन था।
दोनों मिलकर औपनिवेशिक दमन और न्यायिक प्रक्रिया के बीच अंतर दिखाते हैं।
सजाएं कितनी कठोर थीं?
और 39 को आजीवन ‘transportation’ यानी दंडात्मक निर्वासन की सजा
‘Transportation for life’ साधारण जेल की सजा नहीं थी।
यह दोषी व्यक्ति को अपने सामाजिक संसार से लगभग पूरी तरह काट सकता था।
भारत सरकार की Dictionary of Martyrs में उदाहरण के लिए भारतो मुंडा को आजीवन transportation की सजा और अंडमान में कैद के दौरान मृत्यु का उल्लेख मिलता है।
अर्थात उलगुलान का दमन छोटानागपुर तक सीमित नहीं रहा—
उसके कुछ प्रतिभागियों का जीवन अंडमान तक पहुंचा।
मुकदमे अक्टूबर 1901 तक
लेकिन उनके आंदोलन के मुकदमे वहीं समाप्त नहीं हुए।
Dictionary of Martyrs के अनुसार गिरफ्तार सरदारों और बिरसाइतों के मुकदमे अक्टूबर 1901 तक जारी रहे और अनेक लोगों को लंबे कारावास मिले; कुछ व्यक्तियों की मुकदमों के दौरान ही मृत्यु हुई।
उलगुलान का सशस्त्र चरण कुछ सप्ताह का था,
मुकदमों की निष्पक्षता पर उसी समय प्रश्न उठे
उलगुलान के मुकदमों पर आलोचना केवल आज नहीं होती।
IGNOU के एक पुराने अध्ययन में कलकत्ता के एक समाचार-पत्र संवाददाता की समकालीन प्रतिक्रिया उद्धृत की गई है, जिसने करीब तीस वर्षों के अनुभव के आधार पर इन मुंडा मुकदमों की प्रक्रिया को ब्रिटिश न्याय की सामान्य अवधारणा से अत्यंत असंगत बताया था।
औपनिवेशिक न्याय की आलोचना केवल विद्रोही स्मृति नहीं थी।
समकालीन बाहरी पर्यवेक्षकों ने भी प्रक्रिया पर प्रश्न उठाए।
सामूहिक गिरफ्तारी की समस्या
किसी बड़े ग्रामीण विद्रोह के बाद प्रशासन के सामने कठिनाई होती है—
यदि पुलिस पूरे गांव को संदेह की दृष्टि से देखती है तो—
राजनीतिक समर्थन और व्यक्तिगत अपराध की सीमा धुंधली हो जाती है।
460 आरोपियों में केवल 63 दोषसिद्धियों का अंतर इसी समस्या की ओर संकेत करता है।
बिरसा पर स्वयं मुकदमा कहां तक पहुंचा?
बिरसा गिरफ्तार हुए और रांची जेल में रखे गए।
लेकिन उनके विरुद्ध पूरा न्यायिक निष्कर्ष आने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई।
अर्थात जिस व्यक्ति को ब्रिटिश राज्य पूरे उलगुलान का केंद्रीय नेता मानता था—
उसके खिलाफ अदालत अंतिम फैसला नहीं दे सकी।
9 जून 1900 की मृत्यु ने न्यायिक प्रक्रिया को बीच में ही समाप्त कर दिया।
इससे उनकी मृत्यु के आसपास राजनीतिक संदेह और किंवदंतियां पैदा होना स्वाभाविक था।
जेल में बिरसा की स्थिति
बिरसा फरवरी 1900 से जून तक रांची जेल में थे।
कारावास के वातावरण ने स्वास्थ्य पर अतिरिक्त प्रभाव डाला होगा।
लेकिन उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड से उनकी पूरी रोजमर्रा की जेल-स्थिति—भोजन, कोठरी, उपचार और नियमित स्वास्थ्य रिपोर्ट—का ऐसा विस्तृत चित्र नहीं मिलता कि हर आधुनिक दावा प्रमाणित किया जा सके।
इसलिए यहां भी कल्पना से बचना आवश्यक है।
बीमारी कब दर्ज हुई?
भारत सरकार की Dictionary of Martyrs में संरक्षित विवरण के अनुसार 1 जून 1900 को रांची के डिप्टी कमिश्नर को सूचित किया गया कि बिरसा को कॉलरा हुआ है। जेल सुपरिंटेंडेंट कैप्टन ए. आर. एस. एंडरसन ने उपचार शुरू किया।
अर्थात आधिकारिक रिकॉर्ड में उनकी अंतिम बीमारी लगभग एक सप्ताह से अधिक चली।
क्या वे कुछ दिन ठीक हुए?
उसी सरकारी विवरण के अनुसार उपचार के बाद बिरसा की स्थिति 7 जून तक सुधरती रही, लेकिन 8 जून को फिर गंभीर गिरावट आई। अगले दिन उनकी मृत्यु हुई।
यह क्रम किसी अचानक अज्ञात विष से तत्काल मृत्यु की लोकप्रिय कल्पना से मेल नहीं खाता।
आधिकारिक रिकॉर्ड में एक रोग-क्रम दिखाई देता है—
लेकिन केवल इससे सरकारी निदान स्वतः निर्विवाद भी नहीं हो जाता।
9 जून 1900 : बिरसा की मृत्यु
बिरसा मुंडा की मृत्यु की तारीख पर व्यापक सहमति है—
9 जून 1900।
भारत सरकार की Dictionary of Martyrs के अनुसार उनकी मृत्यु सुबह लगभग 9 बजे रांची जेल में हुई।
IGNOU का मानक अध्ययन भी 9 जून 1900 को रांची जेल में कॉलरा से मृत्यु दर्ज करता है।
यह तारीख उलगुलान के इतिहास का अंतिम निर्णायक बिंदु है।
मौत का आधिकारिक कारण : कॉलरा
मानक सरकारी और शैक्षणिक स्रोतों में उनकी मृत्यु का आधिकारिक कारण कॉलरा बताया गया है।
IGNOU का मानक विवरण स्पष्ट रूप से कहता है कि बिरसा की मृत्यु रांची जेल में cholera से हुई।
भारत सरकार की Dictionary of Martyrs भी 1 जून से कॉलरा के उपचार और 9 जून की मृत्यु का विवरण देती है।
इसलिए वर्तमान उपलब्ध अभिलेखीय आधार पर—
लेकिन ‘क्रॉनिक डिसेंट्री’ का उल्लेख भी क्यों मिलता है?
कुछ द्वितीयक शैक्षणिक सामग्री में बिरसा की बीमारी के संदर्भ में cholera, weakness और chronic dysentery जैसी अलग-अलग शब्दावलियां मिलती हैं। उदाहरण के लिए IGNOU की एक पुरानी इकाई में कॉलरा और कमजोरी के साथ chronic dysentery का उल्लेख है; उसी अनुच्छेद में मृत्यु की तारीख “9 January 1900” लिखी गई है, जो अन्य स्थापित स्रोतों से स्पष्टतः मेल नहीं खाती।
इससे एक महत्वपूर्ण शोध-सिद्धांत सामने आता है—
द्वितीयक स्रोत में छपी हर तारीख या चिकित्सकीय पद को स्वतः अंतिम तथ्य न मानें।
जहां मजबूत स्रोत एक-दूसरे से सहमत हैं, वहां उन्हें प्राथमिकता दें।
कॉलरा का निदान कितना विश्वसनीय था?
प्रयोगशाला परीक्षण, आधुनिक संक्रमण-निदान और चिकित्सकीय रिकॉर्ड की गुणवत्ता सीमित थी।
इसलिए आज हम सौ प्रतिशत चिकित्सकीय निश्चितता से नहीं कह सकते कि जिस बीमारी को जेल प्रशासन ने कॉलरा कहा, वह आधुनिक निदान में बिल्कुल वही होती।
लेकिन इतिहासकार के लिए प्रश्न अलग है—
समकालीन आधिकारिक रिकॉर्ड ने क्या दर्ज किया?
जब तक इसके विपरीत मजबूत समकालीन चिकित्सकीय या फॉरेंसिक प्रमाण न मिले, यही प्राथमिक ऐतिहासिक आधार रहेगा।
फिर जहर दिए जाने की धारणा कहां से आई?
बिरसा की अचानक कम आयु में जेल मृत्यु ने स्वाभाविक रूप से अविश्वास पैदा किया।
ऐसी परिस्थिति में सवाल उठना स्वाभाविक था—
क्या वास्तव में बीमारी थी, या उन्हें मार दिया गया?
यहीं से विष दिए जाने, जानबूझकर उपचार न करने अथवा षड्यंत्र की लोकधारणाएं विकसित हुईं।
क्या जहर दिए जाने का प्रमाण है?
वर्तमान उपलब्ध विश्वसनीय अभिलेखीय आधार पर—
नहीं।
ऐसा कोई स्थापित समकालीन चिकित्सकीय, जेल या स्वतंत्र दस्तावेज उपलब्ध नहीं है जो यह प्रमाणित करे कि बिरसा को ब्रिटिश अधिकारियों ने विष दिया था।
सरकारी रिकॉर्ड बीमारी और उपचार का क्रम देता है।
“अंग्रेजों ने बिरसा को जहर देकर मार डाला”
प्रमाणित इतिहास के रूप में सही नहीं होगा।
क्या इसलिए विष की लोकधारणा ‘झूठ’ है?
इसे इतनी आसानी से भी खारिज नहीं करना चाहिए।
लेकिन वह ऐतिहासिक अनुभव का प्रमाण हो सकती है।
मुंडा समाज सरकार पर इतना अविश्वास क्यों करता था कि वह कॉलरा के आधिकारिक विवरण को स्वीकार नहीं करता?
बिरसा को दो बार गिरफ्तार कर चुकी थी,
और अब सैकड़ों अनुयायियों का मुकदमा चला रही थी।
औपनिवेशिक राज्य अपनी विश्वसनीयता खो चुका था।
यह लोककथा का वास्तविक ऐतिहासिक महत्व है।
‘प्रमाण नहीं’ और ‘असंभव’ में अंतर
इतिहास में इन दोनों वाक्यों में बड़ा अंतर है।
हमारे पास इसके लिए आधुनिक फॉरेंसिक प्रमाण नहीं।
“बिरसा को जहर दिए जाने का विश्वसनीय ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।”
इसलिए शोध में दूसरा वाक्य इस्तेमाल करना चाहिए।
कॉलरा को ‘आधिकारिक दर्ज कारण’ कहना अधिक सटीक है।
क्या पोस्टमार्टम हुआ?
लोकप्रिय लेखों में कई बार पोस्टमार्टम न होने अथवा शव परिवार को न दिए जाने जैसी बातें आती हैं।
लेकिन ऐसी प्रत्येक बात को प्रमाणित करने के लिए स्पष्ट अभिलेख चाहिए।
भारत सरकार के Dictionary of Martyrs में इतना दर्ज है कि उनका शव रांची के कोकर क्षेत्र में डिस्टिलरी ब्रिज के निकट दाह किए जाने की सूचना है।
शव परिवार या अनुयायियों को सौंपे जाने का कोई बड़ा सार्वजनिक अंतिम संस्कार नहीं हुआ।
इससे संदेह और स्मृति दोनों को बल मिला।
शव को चुपचाप जलाना क्यों महत्वपूर्ण था?
करिश्माई नेता का शव राजनीतिक प्रतीक बन सकता है।
उलगुलान के बाद भूमि-सुधार और छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908
सर्वे–बंदोबस्त, खूंटकट्टी की कानूनी पहचान, भूमि हस्तांतरण पर रोक और बिरसा आंदोलन की वास्तविक उपलब्धियां–सीमाएं
मुंडा उलगुलान सैन्य रूप से 1900 में दबा दिया गया था, लेकिन भूमि का वह प्रश्न जिसने आंदोलन को जन्म दिया था, ब्रिटिश प्रशासन के सामने बना रहा। वास्तव में उलगुलान के बाद सरकार के सामने सबसे कठिन प्रश्न यही था—यदि बिरसा आंदोलन केवल धार्मिक उन्माद या कानून-व्यवस्था की समस्या था, तो हजारों मुंडा किसान उसके पीछे क्यों खड़े हुए?
इसीलिए 1900 के बाद छोटानागपुर में व्यापक सर्वेक्षण, अधिकार-अभिलेख और किराया-बंदोबस्त की प्रक्रिया को तेज किया गया। IGNOU के मानक अध्ययन के अनुसार 1902–10 के सर्वे–सेटलमेंट की तत्काल पृष्ठभूमि में बिरसा विद्रोह ने प्रशासन को विशेष रूप से उन मुंडा क्षेत्रों में अधिकार-अभिलेख तैयार करने की आवश्यकता का अहसास कराया जहां 1869 का भुईंहरी बंदोबस्त पर्याप्त रूप से नहीं पहुंचा था।
लेकिन शुरुआत में ही एक सावधानी जरूरी है—
1908 का छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम केवल बिरसा मुंडा की देन नहीं था।
उसके पीछे लगभग आधी सदी का सरदारी संघर्ष, 1869 का छोटानागपुर टेन्योर कानून, पुराने काश्तकारी कानून, 1903 के संशोधन, अदालतों के अनुभव, सर्वे–सेटलमेंट अधिकारियों की जांच और अंततः 1899–1900 का उलगुलान—सभी थे। 1908 का कानून इन प्रक्रियाओं को समेकित करने वाला बड़ा विधायी पड़ाव था। स्वयं कानून की प्रस्तावना कहती है कि उसका उद्देश्य छोटानागपुर में landlord and tenant तथा rent settlement से संबंधित कानूनों को संशोधित और समेकित करना था।
उलगुलान के बाद अंग्रेजों ने क्या समझा?
सरकार के लिए सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष था—
मुंडा असंतोष केवल अधिक लगान की शिकायत नहीं है।
किसे जंगल साफ कर बनाई जमीन पर ऐतिहासिक अधिकार है?
जब तक इन प्रश्नों का स्पष्ट अभिलेख न बने, हर गांव में जमींदार और किसान अपने-अपने इतिहास का दावा कर सकते थे।
इसलिए प्रशासनिक समाधान का पहला कदम बना—
1902–10 का सर्वे–सेटलमेंट क्यों निर्णायक था?
IGNOU के अनुसार 1902 से 1910 के बीच हुए सर्वे–सेटलमेंट अभियान का एक तत्काल उद्देश्य था मुंडा भूमि-अधिकारों का रिकॉर्ड तैयार करना। विशेष महत्व इस तथ्य का था कि पुराने भुईंहरी बंदोबस्त ने खूंटी, तमाड़, बुंडू और सोनाहातू जैसे प्रमुख मुंडा क्षेत्रों को पर्याप्त रूप से आच्छादित नहीं किया था—और यही बिरसा आंदोलन के महत्वपूर्ण क्षेत्र थे।
उलगुलान ने प्रशासन को बता दिया कि जहां अधिकार अस्पष्ट हैं, वहां विद्रोह की संभावना अधिक है।
इसलिए सर्वेक्षण अब केवल राजस्व सुविधा नहीं रहा।
सर्वेक्षण का अर्थ क्या था?
सर्वेक्षण के दौरान प्रशासन को तय करना था—
क्या जंगल या चराई संबंधी अधिकार हैं?
क्या जमीन को दोबारा जंगल से साफ करने का अधिकार है?
1908 के अधिनियम की धारा 80 सरकार को सर्वे और record-of-rights तैयार कराने की शक्ति देती थी। धारा 81 में दर्ज की जाने वाली जानकारियों में रैयत की श्रेणी, भूमि की मात्रा और सीमाएं, लगान, विशेष काश्तकारी स्थितियां, जंगल से वन-उत्पाद लेने, चराई और जंगल-बंजर जमीन को खेती में बदलने जैसे अधिकार भी शामिल थे।
यह पहले की स्थिति से बड़ा परिवर्तन था।
सामुदायिक स्मृति पहली बार सरकारी अभिलेख में
सर्वे–सेटलमेंट ने इस दूरी को कुछ हद तक कम किया।
कौन-सी जमीन उसी अधिकार से चली आ रही है?
अर्थात सामुदायिक स्मृति को पहली बार बड़े पैमाने पर—
सरकारी रिकॉर्ड ऑफ राइट्स
यही उलगुलान की सबसे ठोस संस्थागत परिणतियों में से एक थी।
लेकिन कागज में दर्ज होने की कीमत भी थी
जब राज्य किसी परंपरागत अधिकार को दर्ज करता है तो वह उसे सुरक्षा देता है—
लेकिन उसी समय उसकी परिभाषा भी राज्य तय करता है।
लेकिन उसे औपनिवेशिक कानून की श्रेणियों में पुनर्परिभाषित भी किया गया।
इस विरोधाभास को पूरे 1908 कानून में समझना जरूरी है।
खूंटकट्टी की कानूनी परिभाषा
1908 का कानून पहली बार खूंटकट्टी अधिकारों को बहुत अधिक स्पष्ट कानूनी भाषा देता है।
अधिनियम की धारा 7 के अनुसार “रैयत having khunt-katti rights” वह रैयत था जो ऐसी भूमि पर काबिज हो अथवा उसका वैध अधिकार रखता हो जिसे गांव के मूल संस्थापकों या उनके वंशजों ने जंगल से साफ किया हो, और वह स्वयं उस संस्थापक परिवार या उसके पुरुष-वांशिक वंश का सदस्य हो।
अब कानून स्वयं स्वीकार कर रहा था कि—
जंगल साफ कर गांव बसाने का इतिहास भूमि-अधिकार का कानूनी आधार हो सकता है।
यही वह दावा था जिसके लिए मुंडा दशकों से लड़ रहे थे।
लेकिन यहां एक विडंबना भी है
कानून ने खूंटकट्टी को स्वीकार किया—
लेकिन उसे ‘रैयत’ की कानूनी भाषा में रखा।
यानी पारंपरिक खूंटकट्टीदार स्वयं को मूल भूमि-अधिकारधारी मानता था।
लेकिन औपनिवेशिक property hierarchy पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
यही 1908 कानून की केंद्रीय सीमा है।
‘मुंडारी खूंटकट्टीदारी टेनेंसी’ की अलग पहचान
उसने Mundari khunt-kattidari tenancy को अलग कानूनी श्रेणी के रूप में परिभाषित किया। अधिनियम के सामान्य परिभाषा खंड में भी इसका पृथक उल्लेख है और बाद के विशेष अध्याय में इन काश्तकारियों पर अलग नियम लागू किए गए।
औपनिवेशिक कानून पहली बार कह रहा था—
मुंडारी खूंटकट्टी को सामान्य किरायेदारी के नियम से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।
यह वस्तुतः प्रशासन द्वारा उस ऐतिहासिक विशिष्टता की स्वीकारोक्ति थी जिसे मुंडा आंदोलन लगातार सामने रखता आया था।
भूमि हस्तांतरण का प्रश्न क्यों केंद्रीय था?
इसलिए यदि कानून खूंटकट्टी को नाम दे दे लेकिन उसकी जमीन आसानी से बाहर जाती रहे तो वास्तविक सुरक्षा नहीं होगी।
यहीं 1903 और 1908 के भूमि-हस्तांतरण प्रावधान निर्णायक बनते हैं।
1903 का संशोधन : 1908 से पहले बड़ी तैयारी
1908 के कानून को समझने के लिए Chota Nagpur Tenancy (Amendment) Act, 1903—Bengal Act V of 1903 को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
LBSNAA की भूमि-सुधार सामग्री के अनुसार 1903 में लागू कई प्रावधान बाद में 1908 अधिनियम की धाराओं 46–48 और 240 में संशोधित रूप में शामिल किए गए।
भूमि-हस्तांतरण रोकने की कानूनी दिशा 1908 से पहले शुरू हो चुकी थी।
इससे फिर स्पष्ट होता है कि CNT Act किसी एक क्षण में अचानक बिरसा की मृत्यु के बाद बना कानून नहीं था।
मुंडारी खूंटकट्टी भूमि की बिक्री पर कठोर रोक
1908 के अधिनियम की धारा 240 अत्यंत महत्वपूर्ण है।
उसके अनुसार सामान्यतः मुंडारी खूंटकट्टीदारी काश्तकारी या उसके किसी हिस्से को बिक्री द्वारा हस्तांतरित नहीं किया जा सकता था, चाहे वह अदालत के डिक्री के निष्पादन में ही क्यों न हो; पुराने 1903-पूर्व बंधक मामलों के लिए सीमित अपवाद रखे गए।
क्योंकि अब कानून का मूल सिद्धांत यह था—
मुंडारी खूंटकट्टी जमीन बाजार की सामान्य वस्तु नहीं है।
यही आंदोलन के केंद्रीय भूमि-दावे की वास्तविक कानूनी सुरक्षा थी।
गिरवी पर भी नियंत्रण
धारा 240 ने गिरवी को भी नियंत्रित किया।
सामान्यतः केवल सीमित अवधि का भुगुत बंधा प्रकार का गिरवी स्वीकार किया गया; बाद के संशोधनों ने कृषि ऋण संस्थाओं के लिए कुछ अतिरिक्त प्रावधान जोड़े।
कर्ज के नाम पर भूमि हमेशा के लिए बाहर जाने से रोकना।
यह सीधे उस महाजनी संकट से जुड़ा था जिसकी चर्चा हमने दिकू प्रश्न में की थी।
पट्टे पर भी सीमाएं
मुंडारी खूंटकट्टीदारी जमीन का पट्टा भी सामान्यतः स्वतंत्र रूप से नहीं दिया जा सकता था।
धारा 240 ने कुछ विशेष प्रकार के पट्टों को ही मान्यता दी, विशेषकर ऐसी असिंचित/अनकही भूमि के मामलों में जिन्हें मुंडा कृषक खेती में लाए। सामूहिक रूप से धारण की गई मुंडारी खूंटकट्टी भूमि के कुछ हस्तांतरणों के लिए सभी सह-खूंटकट्टीदारों की सहमति की आवश्यकता भी रखी गई।
यह सामुदायिक चरित्र की कानूनी पहचान थी।
भूमि केवल व्यक्ति की नहीं, समूह की भी
यही खूंटकट्टी और सामान्य निजी संपत्ति में सबसे बड़ा अंतर था।
आधुनिक बाजार की भूमि-व्यवस्था कहती है—
भूमि का अधिकार वंश और गांव की ऐतिहासिक बसावट से आता है।
इसलिए किसी एक व्यक्ति का निर्णय पूरे समूह को प्रभावित कर सकता है।
1908 के कानून में सह-खूंटकट्टीदारों की सहमति जैसी व्यवस्था यह स्वीकार करती है कि—
भूमि में सामुदायिक हित भी है।
यह उलगुलान की एक बड़ी संस्थागत विरासत थी।
क्या भूमि कभी हस्तांतरित ही नहीं हो सकती थी?
“CNT के बाद आदिवासी जमीन बिल्कुल नहीं बिक सकती”—यह लोकप्रिय लेकिन अत्यधिक सरल कथन है।
मुंडारी खूंटकट्टी भूमि के लिए कुछ विशेष उद्देश्यों—धार्मिक, शैक्षणिक, परोपकारी, सिंचाई, निर्माण आदि—के लिए नियंत्रित हस्तांतरण संभव था, लेकिन उसके लिए पंजीकृत दस्तावेज और डिप्टी कमिश्नर की पूर्व लिखित मंजूरी आवश्यक थी। धारा 241 यही ढांचा देती है।
पूर्ण निषेध नहीं, नियंत्रित हस्तांतरण।
सामान्य रैयती भूमि और धारा 46
आज CNT Act की सबसे प्रसिद्ध धाराओं में धारा 46 है, जो रैयती अधिकारों के हस्तांतरण पर प्रतिबंध से जुड़ी है।
लेकिन यहां बहुत महत्वपूर्ण इतिहासलेखन सावधानी चाहिए—
आज पढ़ी जाने वाली धारा 46 अपने वर्तमान रूप में मूल 1908 पाठ जैसी नहीं है; बाद में इसमें महत्वपूर्ण संशोधन हुए।
उदाहरण के लिए अनुसूचित जनजाति रैयतों के बीच पुलिस-थाना क्षेत्र के भीतर और डिप्टी कमिश्नर की पूर्व अनुमति से हस्तांतरण जैसी वर्तमान व्यवस्थाएं बाद के संशोधनों से विकसित हुईं। 1966 के एक न्यायिक निर्णय ने भी स्पष्ट किया कि धारा 46 का तत्कालीन पाठ 1947 के संशोधन से प्रतिस्थापित हुआ था।
इसलिए 1908 पर चर्चा करते समय आज की पूरी धारा 46 को उसी रूप में पीछे नहीं ले जाना चाहिए।
तो 1908 की बड़ी उपलब्धि क्या थी?
मुख्य उपलब्धि यह थी कि कानून ने भूमि हस्तांतरण को स्वतंत्र निजी सौदा मानने से इनकार किया।
स्थानीय परंपरागत अधिकारों और संरक्षित काश्तकारी श्रेणियों के लिए विशेष सीमाएं स्वीकार की गईं।
1903 से विकसित इन नियंत्रणों को 1908 ने बड़े समेकित कानून में स्थान दिया। LBSNAA का अध्ययन भी 1903 के प्रावधानों और 1908 के अंतिम अधिनियम के बीच यही कानूनी निरंतरता बताता है।
रिकॉर्ड ऑफ राइट्स की शक्ति
भूमि हस्तांतरण रोकने के लिए पहले यह तय होना आवश्यक था कि—
इसीलिए रिकॉर्ड ऑफ राइट्स अत्यंत महत्वपूर्ण था।
बंजर जमीन को खेती योग्य बनाने के अधिकार
अब भूमि-विवाद में किसान कह सकता था—
सिर्फ मेरे पूर्वजों की स्मृति नहीं,
सरकारी खतियान भी मेरे अधिकार को दर्ज करता है।
यह मुंडा किसान की कानूनी स्थिति में बड़ा परिवर्तन था।
लेकिन गलत रिकॉर्ड का खतरा भी
रिकॉर्ड ऑफ राइट्स तभी सुरक्षा देता है जब रिकॉर्ड सही हो।
किसी भूमि को गलत श्रेणी में डाल दे,
तो वही सरकारी कागज भविष्य में किसान के खिलाफ भी इस्तेमाल हो सकता था।
फिर भी लिखित सुरक्षा का अभाव उससे अधिक जोखिमपूर्ण था।
यही औपनिवेशिक भूमि-सुधार का विरोधाभास था।
लगान भी अब दर्ज और नियंत्रित होना था
1908 कानून केवल भूमि स्वामित्व का कानून नहीं था।
उसका बड़ा भाग rent settlement से संबंधित था।
धारा 85 राजस्व अधिकारी को सर्वे और अधिकार-अभिलेख वाले क्षेत्रों में fair rent तय करने की शक्ति देती थी।
यानी जमींदार और रैयत का संबंध अधिक लिखित और निर्धारित होना था।
बेथ-बेगारी का क्या हुआ?
यह उलगुलान की केंद्रीय शिकायतों में से एक थी।
सर्वे–सेटलमेंट के दौरान प्रशासन ने भूमि से जुड़ी कई praedial services—यानी खेती/भूमि से संबंधित सेवा-दायित्वों—को नकद भुगतान में बदलने की दिशा अपनाई।
IGNOU के अनुसार 1902–10 के बंदोबस्त के दौरान पूरे जिले में ऐसी सेवाओं को नकद देनदारी में बदला गया; अबवाब और रकुमत जैसी मांगों का भी नकदीकरण किया गया।
इससे किसान को कम-से-कम यह पता चलने लगा कि उसका दायित्व कितना है।
‘Praedial conditions’ की कानूनी परिभाषा
1908 अधिनियम स्वयं praedial conditions को भूमि-धारण से जुड़ी, किराये से अलग सेवाओं या देनदारियों के रूप में परिभाषित करता था और इसमें रकुमत, विभिन्न मांगें और अन्य समान देनदारियां शामिल थीं।
यानी जिस बेथ-बेगारी और वस्तु-देयता को मुंडा किसान दशकों से अनुभव कर रहा था—
वह अब औपनिवेशिक कानून की स्पष्ट तकनीकी श्रेणी बन चुकी थी।
यह अपने आप में आंदोलन की शिकायतों की औपचारिक मान्यता थी।
क्या बेगारी पूरी तरह समाप्त हो गई?
इस प्रश्न में अत्यधिक सावधानी चाहिए।
अस्पष्ट और अनिश्चित सेवा-दायित्वों को दर्ज करना,
लेकिन 1908 कानून स्वयं यह मानता था कि कुछ legally renderable रकुमत और बेगारी मौजूद हो सकती थीं और उनके नकद मूल्य का निर्धारण किया जा सकता था। संबंधित नियमों में मौजूदा लगान की गणना करते समय वैधानिक रकुमत और बेगारी को शामिल करने की भाषा मिलती है।
CNT Act ने बेगारी को एक झटके में पूर्णतः समाप्त नहीं किया।
उसने उसे विनियमित और नकदीकृत करने का प्रयास किया।
बेगारी का नकदीकरण क्यों महत्वपूर्ण था?
मान लें किसान को हर वर्ष यह नहीं पता कि—
कितने दिन जमींदार का काम करना पड़ेगा।
यदि इन सेवाओं का निश्चित नकद मूल्य तय हो जाए तो—
किसान को अपनी श्रम-शक्ति पर अधिक नियंत्रण मिल सकता है।
नकद भुगतान किसान के लिए नया बोझ भी बन सकता था।
अबवाब पर नियंत्रण
अबवाब का अर्थ ही था मूल लगान के ऊपर अनेक अतिरिक्त मांगें।
सर्वे–सेटलमेंट ने इन देनदारियों को पहचानने और नियमित करने की कोशिश की।
IGNOU के अनुसार अबवाब और रकुमत क्षेत्रीय विवाद के महत्वपूर्ण द्वितीयक कारण थे, और बंदोबस्त में इन्हें नकदीकृत किया गया।
इससे जमींदार की अनिश्चित वसूली शक्ति पर कुछ अंकुश लगा।
यानी किसान और जमींदार के संबंध में पहली बार अधिक स्पष्ट लेखांकन आया।
क्या इससे जमींदार समाप्त हो गए?
बिरसा आंदोलन की क्रांतिकारी कल्पना थी—
वह जमींदार–रैयत संबंध को समाप्त नहीं करता।
उस संबंध को नियंत्रित और कानूनी बनाना।
अर्थात बिरसा का राजनीतिक कार्यक्रम था—
कानून क्रांति का विकल्प था
यदि भूमि-संबंध वैसे ही रहे तो फिर विद्रोह हो सकता है।
लेकिन सरकार मुंडा राज स्थापित नहीं कर सकती थी।
औपनिवेशिक संप्रभुता और जमींदार–रैयत ढांचे को बनाए रखो।
यानी CNT Act को एक अर्थ में कहा जा सकता है—
फिर भी यह साधारण कानून नहीं था
यह कहना भी गलत होगा कि सरकार ने केवल अपनी सत्ता बचाने के लिए मामूली सुधार किया।
1908 कानून ने स्थानीय परंपरा को जितनी विस्तृत कानूनी जगह दी, वह औपनिवेशिक भारत के सामान्य भूमि कानूनों की तुलना में उल्लेखनीय थी।
यह छोटानागपुर की विशिष्टता की औपचारिक मान्यता थी।
‘एक कानून सबके लिए’ की औपनिवेशिक सोच पीछे हटी
उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में समस्या यह थी कि बंगाल के सामान्य जमींदारी–रैयत ढांचे से छोटानागपुर को समझा जा रहा था।
1908 तक प्रशासन इस निष्कर्ष पर पहुंचा—
यहां स्थानीय customs को अलग से दर्ज करना होगा।
LBSNAA के अध्ययन के अनुसार 1908 का नया कानून खास तौर पर उन local customary rights and usages को शामिल करने के लिए बनाया गया जिन्हें सेटलमेंट अधिकारियों की जांच ने आवश्यक साबित किया था।
यह बहुत बड़ा प्रशासनिक वैचारिक परिवर्तन था।
उलगुलान की सबसे स्पष्ट अप्रत्यक्ष जीत
बिरसा ने कौन-सी मांग कानून में सबसे स्पष्ट रूप से मनवाई?
मुंडारी खूंटकट्टी के अस्तित्व और उसकी विशेष सुरक्षा को राज्य ने स्वीकार किया।
यह पूर्ण स्वामित्व की बिरसा की कल्पना नहीं थी।
लेकिन औपनिवेशिक राज्य अब यह नहीं कह सकता था कि हर मुंडा मात्र साधारण रैयत है।
कुछ भूमि-संबंध इतने विशिष्ट हैं कि उनके लिए अलग कानूनी श्रेणी और हस्तांतरण-प्रतिबंध चाहिए।
1903 से 1908 : कानून कैसे विकसित हुआ?
पूरी प्रक्रिया को तीन चरणों में समझें।
पहला
उलगुलान से पहले की लंबी भूमि समस्या।
दूसरा
1903 का संशोधन—भूमि हस्तांतरण संबंधी कई महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रावधानों को मजबूत करना।
तीसरा
1908 का व्यापक समेकित अधिनियम—स्थानीय customary rights, rent settlement, record-of-rights और विशेष मुंडारी खूंटकट्टी संरक्षण को एक बड़े ढांचे में लाना।
LBSNAA का अध्ययन 1903 के प्रावधानों को सीधे 1908 की संबंधित धाराओं का पूर्ववर्ती बताता है।
इसलिए 1908 को अचानक पैदा कानून के बजाय—
क्या 1903 स्वयं उलगुलान का परिणाम था?
आंशिक रूप से आंदोलन-उपरांत प्रशासनिक दबाव से जुड़ा माना जा सकता है, लेकिन इसे भी अकेला कारण नहीं कह सकते।
उलगुलान ने पहले से चल रही भूमि-सुधार प्रक्रिया को राजनीतिक तात्कालिकता दी।
यह बात 1902–10 के सर्वे अभियान के बारे में IGNOU के विवरण से भी स्पष्ट होती है।
‘प्रत्यक्ष परिणाम’ और ‘अप्रत्यक्ष परिणाम’ अलग करें
बिरसा आंदोलन की उपलब्धियों का बेहतर मूल्यांकन करने के लिए दो श्रेणियां उपयोगी हैं।
प्रत्यक्ष परिणाम
सरकार का मुंडा भूमि क्षेत्रों पर त्वरित ध्यान।
सर्वे और रिकॉर्ड ऑफ राइट्स की आवश्यकता की राजनीतिक स्वीकारोक्ति।
खूंटी–तमाड़ जैसे विद्रोही क्षेत्रों में बंदोबस्त की प्राथमिकता।
अप्रत्यक्ष/दीर्घकालीन परिणाम
मुंडारी खूंटकट्टी की स्पष्ट कानूनी सुरक्षा।
प्रेडियल सेवाओं और रकुमत का विनियमन।
1908 के व्यापक कानून में स्थानीय customs का समावेश।
यह भेद इतिहास को अधिक सटीक बनाता है।
उलगुलान के राजनीतिक कार्यक्रम की पूर्ति नहीं था।
वह कृषि प्रश्न पर औपनिवेशिक समझौता था।
भूमि हस्तांतरण फिर भी कैसे होता रहा?
कानून बन जाने का अर्थ अवैध भूमि हस्तांतरण का अंत नहीं।
आगे भी अनेक रास्ते इस्तेमाल किए जा सकते थे—
लेकिन उसके लिए प्रशासनिक क्रियान्वयन भी आवश्यक है।
यह सीमा आज तक CNT Act की राजनीति में दिखाई देती है।
कानून ने मुंडा भूमि को ‘फ्रीज’ भी किया?
भूमि हस्तांतरण रोकने से भूमि समुदाय के भीतर बचती है।
भूमि को ऋण के लिए collateral बनाना कठिन हो सकता है।
बाजार में उसका उपयोग सीमित हो सकता है।
औद्योगीकरण, सार्वजनिक परियोजनाओं या शहरी विस्तार में विशेष कानूनी जटिलताएं पैदा होती हैं।
1908 के संदर्भ में प्राथमिक उद्देश्य भूमि-अलगाव रोकना था—
लेकिन संरक्षण और आर्थिक लचीलेपन का यह तनाव कानून की दीर्घकालीन विरासत में बना रहा।
खूंटकट्टी की कानूनी परिभाषा की सीमा
धारा 7 में मूल बसाहटकर्ताओं और पुरुष वंशरेखा पर जोर था।
यहीं आधुनिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण सीमा दिखाई देती है।
और परिवार के भीतर वास्तविक कृषि श्रम
पूरी तरह समान रूप से दिखाई नहीं देते।
इसलिए परंपरागत अधिकार की रक्षा करते हुए कानून ने उस परंपरा की पितृवंशीय सीमाओं को भी कानूनी रूप दिया।
महिलाओं के लिए क्या बदला?
इसलिए महिलाओं के वास्तविक कृषि योगदान और आंदोलनकारी भागीदारी का अनुपात भूमि-अधिकार की कानूनी मान्यता में समान नहीं था।
यह CNT Act की सामाजिक सीमा के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए।
वन-अधिकार का क्या हुआ?
CNT Act भूमि कानून था, वन कानून का विकल्प नहीं।
फिर भी रिकॉर्ड ऑफ राइट्स में जंगल से वन-उत्पाद लेने, चराई और जंगल-बंजर जमीन को खेती में बदलने के अधिकार दर्ज किए जा सकते थे। धारा 81 में ऐसे अधिकार स्पष्ट रूप से शामिल थे।
लेकिन आरक्षित वन और वन विभाग की अलग कानूनी सत्ता बनी रही।
भूमि-सुधार ने वन-अधिकार का पूरा संकट हल नहीं किया।
भूमि और जंगल का औपनिवेशिक विभाजन कायम रहा।
बेगारी पर विजय कितनी?
बिरसा आंदोलन की स्मृति में अक्सर कहा जाता है—
‘रकुमत’ को नकदी में बदलने का असर
अब किसान जानता है कि उसे कितना देना है।
जमींदार की मनमानी से राजस्व अधिकारी की सत्ता तक
वह विवाद में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
मुंडा उलगुलान की उपलब्धियां, सीमाएं और ऐतिहासिक मूल्यांकन
सैन्य पराजय, भूमि-कानूनी उपलब्धि, आदिवासी अस्मिता और भारतीय किसान–आदिवासी प्रतिरोध में बिरसा का स्थान
मुंडा उलगुलान का मूल्यांकन केवल इस प्रश्न से नहीं किया जा सकता कि 1899–1900 में बिरसा मुंडा अंग्रेजों को हरा पाए या नहीं। यदि सैन्य परिणाम ही कसौटी हो, तो आंदोलन स्पष्ट रूप से पराजित हुआ। जनवरी 1900 में उसका बड़ा हथियारबंद जमाव टूट गया, बिरसा फरवरी में पकड़े गए, 9 जून को जेल में उनकी मृत्यु हुई और औपनिवेशिक शासन छोटानागपुर में कायम रहा।
कुछ ही वर्षों बाद वही औपनिवेशिक प्रशासन छोटानागपुर की भूमि व्यवस्था का व्यापक सर्वेक्षण करा रहा था, खूंटकट्टी अधिकारों को विधिक श्रेणी में दर्ज कर रहा था और अंततः 1908 के छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम में “रैयत having khunt-katti rights” तथा “Mundari khunt-kattidari tenancy” को अलग कानूनी पहचान दे रहा था। मुंडारी खूंटकट्टी भूमि की बिक्री पर कठोर रोक और अवैध कब्जे से पुनर्बहाली जैसी व्यवस्थाएं कानून में आईं।
इसलिए उलगुलान की कहानी का केंद्रीय विरोधाभास यही है—
विद्रोह युद्ध हार गया, लेकिन भूमि का प्रश्न जीत गया।
फिर भी यह वाक्य भी आधा सत्य है। भूमि-सुधार केवल बिरसा की देन नहीं थे; सरदारी लड़ाई, पुराने बंदोबस्त, पूर्ववर्ती कानून और प्रशासनिक जांच की लंबी प्रक्रिया पहले से चल रही थी। उलगुलान ने इस प्रक्रिया को ऐसी राजनीतिक तात्कालिकता दी जिसे औपनिवेशिक शासन अब अनदेखा नहीं कर सकता था।
पहली कसौटी : क्या उलगुलान सैन्य रूप से सफल था?
1899–1900 के घोषित राजनीतिक लक्ष्य के अनुसार आंदोलन सफल नहीं हुआ।
न बिरसा राज स्थायी रूप से स्थापित हुआ।
न रांची या छोटानागपुर का कोई बड़ा क्षेत्र लंबे समय तक विद्रोहियों के नियंत्रण में आया।
न पुलिस और न्याय व्यवस्था समाप्त हुई।
जनवरी 1900 तक अंग्रेज प्रशासन ने सैनिक शक्ति, खोज-अभियान, मुखबिर तंत्र और सामूहिक गिरफ्तारियों के माध्यम से विद्रोह की खुली क्षमता लगभग नष्ट कर दी।
उलगुलान एक असफल क्रांति था।
लेकिन इतिहास यहीं समाप्त नहीं होता।
सैन्य विफलता क्यों हुई?
उसकी पहली वजह थी स्पष्ट तकनीकी असमानता।
दूसरी ओर अंग्रेजी शासन के पास प्रशिक्षित सैनिक और आधुनिक राइफलें थीं।
डोम्बारी–सैल रकाब पर यही असमानता निर्णायक साबित हुई।
लेकिन वह राइफल की मारक क्षमता समाप्त नहीं कर सकता था।
बड़े खुले जमाव की रणनीतिक कमजोरी
उलगुलान ने 1897–99 में गुप्त संगठन की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की थी।
लेकिन निर्णायक चरण में हजारों लोगों अथवा बड़े समुदायों का खुले स्थानों और पहाड़ियों पर जुटना उसकी गंभीर कमजोरी बन गया।
छोटे छापामार समूह जंगल का लाभ उठा सकते थे।
इसलिए धार्मिक–सामुदायिक लामबंदी की जो शैली आंदोलन की सामाजिक शक्ति थी, वही उसकी सैन्य कमजोरी भी बनी।
आधुनिक सैन्य संगठन का अभाव
उलगुलान के पास नेटवर्क था, लेकिन आधुनिक सैन्य संगठन नहीं।
आधुनिक हथियारों की नियमित आपूर्ति नहीं।
केंद्रीय सैन्य मुख्यालय की स्पष्ट संरचना नहीं।
दीर्घकालीन युद्ध के लिए आर्थिक आधार नहीं।
इसलिए पहला बड़ा सैन्य आघात झेलने के बाद आंदोलन को पुनः उसी स्तर पर संगठित करना कठिन हो गया।
बिरसा पर अत्यधिक निर्भरता
करिश्माई नेतृत्व आंदोलन की विशाल शक्ति था।
लेकिन यह एक संरचनात्मक कमजोरी भी थी।
लेकिन यदि वही नेता गिरफ्तार हो जाए तो—
नेतृत्व का विकल्प कौन?
1895 में भी गिरफ्तारी से आंदोलन अस्थायी रूप से शांत पड़ा था।
1900 में बिरसा की गिरफ्तारी और मृत्यु ने केंद्रीय राजनीतिक ऊर्जा समाप्त कर दी।
क्या आंदोलन के पास द्वितीय पंक्ति का नेतृत्व नहीं था?
स्थानीय सरदार, प्रचारक और संगठनकर्ता अवश्य थे।
गया मुंडा जैसे व्यक्तित्व भी सामने आते हैं।
लेकिन वे बिरसा की तरह पूरे आंदोलन के सर्वमान्य केंद्रीय प्रतीक नहीं बन सके।
यही कारण है कि बिरसा के बाद कोई दूसरा व्यक्ति उलगुलान को उसी धार्मिक–राजनीतिक वैधता के साथ आगे नहीं बढ़ा पाया।
यह करिश्माई आंदोलनों की सामान्य सीमा है—
पहली बड़ी उपलब्धि : भूमि प्रश्न को अपरिहार्य बनाना
यहीं आंदोलन का दूसरा मूल्यांकन शुरू होता है।
उलगुलान ने औपनिवेशिक प्रशासन को बाध्य किया कि वह मुंडा भूमि-संकट को केवल ‘जनजातीय असंतोष’ न माने।
फिर हम अपनी ही जमीन पर साधारण रैयत कैसे बन गए?
1908 के कानून की धारा 7 ने अंततः उस रैयत को परिभाषित किया जिसके अधिकार गांव के मूल संस्थापकों द्वारा जंगल साफ करने और उनके वंश से निकलते थे।
यानी जिस ऐतिहासिक स्मृति के लिए मुंडा लड़ रहे थे—
दूसरी उपलब्धि : मुंडारी खूंटकट्टी की विशेष कानूनी पहचान
1908 कानून ने केवल खूंटकट्टी शब्द स्वीकार नहीं किया।
उसने Mundari khunt-kattidari tenancy को अलग कानूनी श्रेणी बनाया और उसके लिए विशेष अध्याय तथा सुरक्षा दी। धारा 240 में ऐसी भूमि को सामान्य बिक्री—यहां तक कि अदालत के आदेश से होने वाली बिक्री—से भी व्यापक सुरक्षा दी गई।
मुंडा भूमि को साधारण बाजार वस्तु मानने से कानून ने स्वयं इनकार किया।
यह उलगुलान की सबसे ठोस दीर्घकालीन उपलब्धियों में से एक थी।
क्या इसे बिरसा की सीधी जीत कहा जा सकता है?
“बिरसा ने विद्रोह किया और अंग्रेजों ने डरकर 1908 का कानून बना दिया,”
तो हम आधी सदी की भूमि राजनीति मिटा देंगे।
कोल विद्रोह ने पहले ही छोटानागपुर के प्रशासनिक प्रश्न को उजागर किया था।
पूर्ववर्ती बंदोबस्त और विधायी प्रयोग मौजूद थे।
तीसरी उपलब्धि : भूमि हस्तांतरण पर नियंत्रण
1908 के विशेष प्रावधानों ने मुंडारी खूंटकट्टी भूमि की बिक्री को सामान्य रूप से प्रतिबंधित किया और अवैध कब्जे को हटाने की शक्ति डिप्टी कमिश्नर को दी।
यानी कानून ने उस प्रश्न को सीधे संबोधित किया जिसके कारण दशकों से संघर्ष था—
भूमि समुदाय से बाहर न जाए।
उसके वास्तविक संपत्ति-संबंधी परिणाम थे।
चौथी उपलब्धि : लगान और सेवा-दायित्वों को नियंत्रित करना
उलगुलान केवल जमीन की मालिकाना स्मृति का संघर्ष नहीं था।
1908 का कानून ‘praedial conditions’ जैसी श्रेणी में भूमि से जुड़ी सेवाओं और रकुमतों को पहचानता है और किराये की व्यवस्था को अधिक स्पष्ट करने का ढांचा देता है।
इससे जमींदार की मनमानी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई, लेकिन अस्पष्ट देनदारियों को कानून और रिकॉर्ड में लाने की दिशा बनी।
पांचवीं उपलब्धि : ‘custom’ को कानून बनाना
यह उलगुलान की शायद सबसे गहरी वैचारिक उपलब्धियों में एक है।
अधिकार लिखित कानून और दस्तावेज से सिद्ध होगा।
अधिकार हमारे पूर्वज, खूंट और गांव बसाने की परंपरा से आता है।
लेकिन इस उपलब्धि की भी सीमा थी
कानून ने खूंटकट्टीदार को पूर्ण स्वतंत्र भू-स्वामी नहीं बनाया।
तुम्हें विशेष संरक्षित tenancy मिलेगी।
सैन्य पराजय बनाम भूमि-कानूनी विजय
इसलिए उलगुलान की उपलब्धि को दो अलग स्तरों पर देखना चाहिए।
कृषि–कानूनी परिणाम
इसीलिए इसे केवल हार कहना भी गलत है।
आदिवासी अस्मिता की उपलब्धि
उलगुलान की दूसरी बड़ी विरासत कानून से बाहर थी।
उसने मुंडा पहचान को एक नया राजनीतिक अर्थ दिया।
‘धरती आबा’ ने भूमि को अस्मिता से जोड़ दिया
इसमें बिरसा की उपाधि स्वयं बहुत महत्वपूर्ण थी।
इससे भूमि प्रश्न आर्थिक मांग से आगे चला गया।
पहचान जाती है।
यह विचार आगे झारखंड की राजनीति में बार-बार लौटेगा।
क्या उलगुलान आधुनिक पहचान राजनीति था?
इसे आज की जातीय अथवा संवैधानिक पहचान राजनीति की हूबहू पूर्वपीठिका मानना उचित नहीं।
अनुसूचित जनजाति की संवैधानिक श्रेणी,
या आधुनिक पहचान-आधारित प्रतिनिधित्व की मांग नहीं कर रहे थे।
लेकिन उनकी राजनीति ने वह मूल सिद्धांत स्थापित किया—
मुंडा समाज का अपना विशिष्ट ऐतिहासिक भू-अधिकार और सामुदायिक स्वायत्तता है।
आगे की आदिवासी राजनीति ने इसी स्मृति को नए रूप में इस्तेमाल किया।
बिरसाइत धर्म की उपलब्धि
बिरसाइत धार्मिक आंदोलन ने कई महत्वपूर्ण काम किए।
बिरसा के अनुयायियों को साझा पहचान दी,
और राजनीतिक लामबंदी को धार्मिक वैधता दी।
NCERT भी बिरसा आंदोलन की विशेषता इस बात में देखता है कि आदिवासी लोगों ने अपने विशिष्ट प्रतीकों, अनुष्ठानों और संघर्ष की भाषा के माध्यम से औपनिवेशिक अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध व्यक्त किया।
इसलिए बिरसाइत धर्म केवल आध्यात्मिक प्रयोग नहीं था।
बिरसाइत धर्म की सीमा
लेकिन वही धार्मिक संरचना आंदोलन की सामाजिक सीमा भी बनी।
पुरानी धार्मिक परंपरा मानने वाले लोग थे।
सभी सरदार बिरसा के धार्मिक दावों से एक समान सहमत नहीं थे।
यही धार्मिक संगठन की अंतर्निहित सीमा थी।
ईसाई मुंडाओं का प्रश्न
दिसंबर 1899 के प्रारंभिक हमलों में चर्च और ईसाई प्रतिष्ठान लक्ष्य बने।
यह इतिहास का असुविधाजनक लेकिन वास्तविक हिस्सा है।
उलगुलान को महिमामंडित करने के लिए इसे मिटाया नहीं जाना चाहिए।
कुछ ईसाई मुंडा भी भय और हिंसा के घेरे में आए।
बाद में संघर्ष का मुख्य लक्ष्य औपनिवेशिक सत्ता अधिक स्पष्ट हुआ, लेकिन प्रारंभिक धार्मिक तनाव वास्तविक था।
हिंसा : उपलब्धि या सीमा?
हिंसा ने आंदोलन को राजनीतिक गंभीरता दी।
सरकार उन्हें और वर्षों तक टाल सकती थी।
सशस्त्र उलगुलान ने शासन को बता दिया कि भूमि प्रश्न कानून-व्यवस्था के लिए विस्फोटक है।
इस अर्थ में हिंसा ने प्रशासनिक तात्कालिकता पैदा की।
स्थानीय विरोधियों और ईसाई संस्थाओं पर हमले से आंदोलन की नैतिक जटिलता बढ़ाई,
और खुले युद्ध में उसकी सैन्य कमजोरी उजागर की।
क्या हिंसा के बिना वही परिणाम मिल सकते थे?
यह प्रतिकल्पित प्रश्न है, निश्चित उत्तर नहीं।
सरदारी आंदोलन दशकों तक याचिका और कानूनी रास्ते आजमा चुका था।
इससे यह समझ आता है कि आंदोलन के भीतर क्यों यह निष्कर्ष विकसित हुआ कि—
लेकिन इससे हर हत्या या आगजनी स्वतः न्यायसंगत नहीं हो जाती।
जमींदार, महाजन और मिशन—क्या सभी एक समान ‘दिकू’ थे?
आंदोलन की भाषा में ये विभिन्न बाहरी शक्तियां एक बड़े शोषणकारी संसार में जुड़ सकती थीं।
लेकिन इतिहासकार को उनके वास्तविक कार्य अलग रखने चाहिए।
यदि इन सभी को एक ही प्रकार का शोषक मान लिया जाए तो आंदोलन की अपनी राजनीतिक सरलीकरण-भाषा इतिहासकार का विश्लेषण बन जाएगी।
उलगुलान की सामाजिक सीमा : मुख्यतः मुंडा आधार
खूंटकट्टी जैसा विशिष्ट मुद्दा उसी समुदाय में सर्वाधिक जीवंत था।
आंदोलन व्यापक छोटानागपुर किसान गठबंधन—
को एक स्थायी साझा राजनीतिक कार्यक्रम में नहीं जोड़ सका।
यदि ऐसा गठबंधन बनता तो औपनिवेशिक राज्य के लिए चुनौती कहीं बड़ी हो सकती थी।
कोल विद्रोह में यह आधार अधिक व्यापक था
1831–32 के कोल विद्रोह में ‘कोल’ औपनिवेशिक सामूहिक नाम था और उसमें मुंडा, उरांव, हो तथा अन्य समुदायों की भागीदारी थी। आधुनिक शोध इसे ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध महत्वपूर्ण आदिवासी अवज्ञा मानता है।
लेकिन वैचारिक रूप से अधिक व्यवस्थित
यहीं दोनों आंदोलनों का महत्वपूर्ण अंतर है।
कोल विद्रोह और उलगुलान : समानता
दोनों को ब्रिटिश सैनिक शक्ति ने दबाया।
दोनों ने शासन को बताया कि छोटानागपुर की स्थानीय सामाजिक संरचना को साधारण राजस्व क्षेत्र समझना खतरनाक है।
कोल विद्रोह और उलगुलान : सबसे बड़ा अंतर
1831–32 का विद्रोह अधिक तीव्र सामुदायिक विस्फोट था।
बिरसा आंदोलन तक आते-आते लगभग सत्तर वर्षों का राजनीतिक अनुभव जमा हो चुका था।
और स्पष्ट ‘मुंडा राज’ की राजनीतिक कल्पना।
लेकिन कोल विद्रोह ने जो नहीं कर पाया, उलगुलान ने किया?
कोल विद्रोह के बाद प्रशासनिक पुनर्गठन हुआ।
उलगुलान के बाद भूमि अधिकारों के रिकॉर्ड, विशेष सर्वे और अंततः CNT Act की दिशा अधिक स्पष्ट हुई।
इसलिए उलगुलान का विधायी प्रभाव अधिक ठोस दिखाई देता है।
हालांकि यह अंतर केवल विद्रोहों की ‘क्षमता’ का नहीं—समय, औपनिवेशिक प्रशासन के विकास और बीच की सरदारी राजनीति का भी परिणाम था।
अब संथाल हूल से तुलना
1855–56 का संथाल हूल उन्नीसवीं सदी का कहीं अधिक विशाल आदिवासी विद्रोह था।
30 जून 1855 को भोगनाडीह में दस हजार से अधिक संथालों के एकत्र होने और सिद्धू–कान्हू के नेतृत्व में दिकू तथा औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध विद्रोह की घोषणा का सरकारी इतिहास दर्ज करता है। उन्होंने समानांतर प्रशासन और कर-संग्रह तक की व्यवस्था बनाने का प्रयास किया।
संथालों के भूमि संकट में भारी कर, महाजनी कर्ज और जमींदारों द्वारा नियंत्रण महत्वपूर्ण थे; हूल के बाद संथाल परगना को विशेष प्रशासनिक क्षेत्र के रूप में गठित किया गया।
उलगुलान और हूल के बीच समानता इसलिए बहुत गहरी है।
हूल और उलगुलान : पहली समानता—जंगल साफ करने वाले का अधिकार
संथाल और मुंडा दोनों की भूमि-राजनीति में एक समान नैतिक तर्क दिखाई देता है—
जिसने जंगल साफ कर जमीन खेती योग्य बनाई, वास्तविक अधिकार उसी का है।
संथालों ने दामिन-इ-कोह में यही अनुभव किया—
फिर राज्य, जमींदार और महाजन उस भूमि पर दावा करें।
मुंडा खूंटकट्टी में भी यही मूल तर्क था।
कृषि श्रम भूमि-अधिकार की वैधता का स्रोत था।
दूसरी समानता : ‘दिकू’ केवल बाहरी व्यक्ति नहीं
दोनों आंदोलनों में दिकू शोषण-संबंध का प्रतिनिधि था।
इसलिए दिकू-विरोध दोनों में आर्थिक शिकायत से राजनीतिक सत्ता-विरोध की ओर बढ़ा।
तीसरी समानता : अपना राज
संथाल हूल में सिद्धू–कान्हू ने केवल महाजनों को हटाने की मांग नहीं की।
समानांतर प्रशासन और कर-संग्रह का प्रयास हुआ। सरकारी जिला इतिहास भी उन्हें ‘Suba Thakur’ के रूप में समानांतर व्यवस्था बनाने से जोड़ता है।
यानी दोनों विद्रोहों ने एक चरण पर पहुंचकर पूछा—
चौथी समानता : धार्मिक वैधता
संथाल हूल में भी विद्रोह केवल आर्थिक नहीं था।
दैवीय आदेश और धार्मिक वैधता नेतृत्व की शक्ति का हिस्सा थे।
बिरसा उलगुलान में यह तत्व और अधिक केंद्रीय था—
इसलिए दोनों आंदोलनों में धर्म निष्क्रिय अंधविश्वास नहीं—
पांचवीं समानता : समानांतर सत्ता और औपनिवेशिक युद्ध
संथालों ने पुलिस और सेना से प्रत्यक्ष युद्ध किया।
मुंडाओं ने खूंटी थाना और औपनिवेशिक बल का सामना किया।
दोनों में परंपरागत हथियार आधुनिक बंदूकों के सामने थे।
और दोनों को भारी सैन्य शक्ति से कुचला गया।
लेकिन हूल का पैमाना बड़ा था
संथाल हूल बहुत बड़े भूभाग और बहुत बड़ी आबादी में फैला।
उसने औपनिवेशिक सैन्य शक्ति को बड़े पैमाने पर चुनौती दी; मार्शल लॉ तक लागू करना पड़ा और जनवरी 1856 तक व्यापक सैन्य अभियान चला।
मुंडा उलगुलान का भौगोलिक क्षेत्र अपेक्षाकृत छोटा और उसका खुला सैन्य चरण बहुत संक्षिप्त था।
उलगुलान का भूमि कार्यक्रम अधिक विशिष्ट था
लेकिन मुंडा आंदोलन की एक अलग विशेषता थी—
यह अत्यंत स्पष्ट ऐतिहासिक भूमि-अधिकार अवधारणा थी।
मुंडा केवल सामान्यतः ‘हमारी जमीन’ नहीं कह रहा था।
उसके पास यह बताने की विशिष्ट सामाजिक व्यवस्था थी कि—
और किस प्रकार जमींदारी ने उसे बदला।
इसलिए बाद में कानून के लिए इस मांग को तकनीकी रूप से परिभाषित करना संभव हुआ।
यही उलगुलान के कानूनी परिणाम को विशेष बनाता है।
संथाल हूल का प्रशासनिक परिणाम बनाम उलगुलान का कानूनी परिणाम
संथाल परगना का विशेष प्रशासनिक गठन।
और CNT Act में भूमि हस्तांतरण सुरक्षा।
दोनों में औपनिवेशिक राज्य का पैटर्न एक जैसा है—
पहले विद्रोह दबाओ, फिर विशेष व्यवस्था बनाओ।
यही आदिवासी प्रतिरोध के इतिहास का एक महत्वपूर्ण औपनिवेशिक पैटर्न है।
क्यों विशेष कानून?
क्योंकि हर बड़े विद्रोह ने सरकार को एक ही प्रश्न सिखाया—
सामान्य कानून हर क्षेत्र पर समान रूप से लागू करना आसान नहीं।
दामिन-इ-कोह और संथाल क्षेत्र की अपनी भूमि-सामाजिक संरचना थी।
छोटानागपुर की अपनी खूंटकट्टी व्यवस्था।
यदि स्थानीय परंपरा की उपेक्षा की जाए—
राजस्व प्रशासन राजनीतिक विद्रोह पैदा कर सकता है।
इसलिए आदिवासी विद्रोहों ने औपनिवेशिक राज्य को—
कोल–हूल–उलगुलान : एक दीर्घकालीन श्रृंखला
तीनों आंदोलनों को इस प्रकार पढ़ा जा सकता है—
कोल विद्रोह, 1831–32
औपनिवेशिक भूमि हस्तक्षेप के विरुद्ध प्रारंभिक बड़ा छोटानागपुरी विस्फोट।
संथाल हूल, 1855–56
महाजन–जमींदार–पुलिस–राज के विरुद्ध विशाल आदिवासी-कृषक युद्ध और समानांतर सत्ता की घोषणा।
मुंडा उलगुलान, 1899–1900
विशिष्ट खूंटकट्टी भूमि-संकट, धार्मिक पुनर्गठन और मुंडा राज की करिश्माई राजनीतिक परियोजना।
क्या उलगुलान किसान आंदोलन था?
उसका मूल आर्थिक प्रश्न खेती और जमीन था।
इस अर्थ में वह भारतीय किसान आंदोलनों की परंपरा में स्पष्ट स्थान रखता है।
‘Tribal revolt’ शब्द की सीमा
यदि इसे केवल ‘tribal revolt’ कहा जाए तो खतरा है कि उसका कृषि अर्थ गायब हो जाए।
मानो जंगल में रहने वाले किसी ‘जनजातीय समाज’ ने सांस्कृतिक क्रोध में हमला कर दिया।
इसलिए उलगुलान को आदिवासी इतिहास और किसान इतिहास के बीच कृत्रिम रूप से बांटना गलत होगा।
‘Peasant revolt’ शब्द की भी सीमा
दूसरी ओर यदि इसे केवल किसान विद्रोह कहा जाए तो—
इसलिए यह आंदोलन हमें इतिहास की श्रेणियों की सीमा भी दिखाता है।
आधुनिक वर्ग-राजनीति से अंतर
उलगुलान आधुनिक वर्ग-संघर्ष की भाषा में नहीं चला।
सभी कृषक वर्ग बनाम सभी जमींदार वर्ग।
इसलिए जातीय–सामुदायिक पहचान वर्ग प्रश्न पर हावी थी।
यह उसके सामाजिक आधार को मजबूत भी करती थी—
लेकिन आर्थिक वर्ग तत्व अनुपस्थित नहीं था
दिकू शब्द के भीतर जिन लोगों को मुख्य रूप से निशाना बनाया गया—
इसलिए सामुदायिक भाषा के भीतर वर्ग संघर्ष मौजूद था।
आर्थिक संघर्ष जातीय और धार्मिक भाषा में व्यक्त हुआ।
इसे केवल ‘जातीय’ या केवल ‘वर्गीय’ कहने से वास्तविक इतिहास अधूरा रहेगा।
महिलाओं की भूमिका : उपलब्धि और इतिहासलेखन की सीमा
गया मुंडा परिवार से लेकर सैल रकाब तक—
इसलिए उलगुलान की सामाजिक उपलब्धि को केवल पुरुष युद्ध-नेतृत्व में सीमित नहीं करना चाहिए।
लेकिन आंदोलन ने महिलाओं के भूमि-अधिकार का अलग कार्यक्रम दिया?
यह इसकी एक महत्वपूर्ण सामाजिक सीमा है।
लेकिन आधुनिक अर्थ में लैंगिक समान भूमि-अधिकार आंदोलन का कार्यक्रम नहीं था।
1908 की खूंटकट्टी परिभाषा भी पुरुष वंशरेखा को विशेष महत्व देती है।
समुदाय की मुक्ति और समुदाय के भीतर समानता एक ही चीज नहीं।
यह उलगुलान पर आधुनिक आलोचनात्मक दृष्टि का महत्वपूर्ण बिंदु है।
धार्मिक सुधार की सामाजिक उपलब्धि
बिरसा ने केवल बाहर के शोषक को दोष नहीं दिया।
उन्होंने अपने समाज में भी सुधार चाहा।
कुछ प्रकार के जादू-टोना विश्वासों का विरोध,
इससे आंदोलन ने समुदाय को केवल पीड़ित के रूप में नहीं बल्कि—
धार्मिक सुधार की सीमा : ‘शुद्ध’ समाज की राजनीति
लेकिन हर शुद्धिकरण आंदोलन यह प्रश्न पैदा करता है—
इसलिए धार्मिक सुधार संभावित रूप से आंतरिक सामाजिक नियंत्रण भी पैदा करता है।
इसीलिए बिरसाइत आंदोलन को केवल उदार सामाजिक सुधार मानना पर्याप्त नहीं।
बिरसा की सबसे बड़ी वैचारिक उपलब्धि
उनकी सबसे बड़ी वैचारिक उपलब्धि शायद यह थी कि उन्होंने—
को एक ही राजनीतिक प्रश्न में जोड़ दिया।
राज भी बदले।
यानी कृषि प्रश्न को उन्होंने संप्रभुता के प्रश्न तक पहुंचाया।
यही उलगुलान को साधारण tenancy agitation से अलग करता है।
‘अबुआ राज’ की ऐतिहासिक उपलब्धि
मुंडा राज वास्तविक राज्य नहीं बन पाया।
फिर भी उसकी कल्पना अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
आज लोकप्रिय “अबुआ दिशुम, अबुआ राज” स्मृति इसी ऐतिहासिक आकांक्षा को संक्षेप में व्यक्त करती है।
NCERT भी बिरसा आंदोलन के राजनीतिक लक्ष्य को सरकार, जमींदार, महाजन और मिशनरी प्रभुत्व को हटाकर उनके नेतृत्व में मुंडा राज स्थापित करने की आकांक्षा से जोड़ता है।
क्या बिरसा भारतीय राष्ट्रवादी थे?
उन्हें आधुनिक बीसवीं सदी के अखिल भारतीय राष्ट्रवाद में सीधे रखना उचित नहीं।
लेकिन वे ब्रिटिश राजनीतिक अधिकार को अस्वीकार कर रहे थे।
इसलिए वह वास्तविक औपनिवेशिक-विरोधी राजनीति थी।
उसकी राजनीतिक भाषा ‘भारतीय राष्ट्र’ की नहीं,
फिर भारतीय स्वतंत्रता इतिहास में उनका स्थान क्यों?
क्योंकि स्वतंत्रता की इच्छा हमेशा एक ही राजनीतिक भाषा में व्यक्त नहीं होती।
कांग्रेस की संवैधानिक मांग एक भाषा थी।
1857 की सैनिक–राजकीय राजनीति दूसरी।
यदि कोई समुदाय विदेशी शासन की वैधता अस्वीकार कर अपने राजनीतिक अधिकार की मांग करता है—
तो वह औपनिवेशिक-विरोधी इतिहास का हिस्सा है, भले उसकी आधुनिक राष्ट्रवाद की भाषा अलग हो।
भारतीय किसान आंदोलनों में विशेष स्थान
भारतीय किसान आंदोलनों में कई संघर्ष मुख्यतः मांगों के लिए हुए—
बिरसा आंदोलन एक चरण पर इससे आगे गया—
मुंडा उलगुलान की विस्तृत समयरेखा, प्रमुख व्यक्तित्व और आलोचनात्मक संदर्भ-सूची
1765 की दीवानी से 1908 के CNT Act तक : भूमि, धर्म, विद्रोह, दमन और कानून का एकीकृत त्वरित संदर्भ
मुंडा उलगुलान को केवल दिसंबर 1899 से फरवरी 1900 के बीच घटे विद्रोह के रूप में नहीं समझा जा सकता। उसका इतिहास कम-से-कम 1765 में कंपनी की दीवानी से शुरू हुए औपनिवेशिक राजस्व विस्तार, 1831–32 के कोल विद्रोह, लगभग चार दशकों की सरदारी लड़ाई, खूंटकट्टी के क्षरण, बिरसा के धार्मिक आंदोलन और 1899–1900 के उलगुलान को जोड़ता हुआ 1908 के छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम और 1910 तक पूरे हुए सर्वे–सेटलमेंट तक जाता है।
इस अंतिम संदर्भ-खंड में दो सावधानियां विशेष रूप से जरूरी हैं। पहली, बिरसा की जीवनी की कुछ तारीखों—विशेषकर जन्म-वर्ष और फरवरी/मार्च 1900 की गिरफ्तारी—पर स्रोतगत मतभेद हैं। दूसरी, औपनिवेशिक रिकॉर्ड घटना और प्रशासन के लिए अनिवार्य हैं, लेकिन उनमें विद्रोहियों के लिए ‘fanatic’, ‘disturbed’ या अपराधी जैसी शासन-सापेक्ष भाषा मिल सकती है; दूसरी ओर लोकस्मृति कई बार संख्या और चमत्कारिक प्रसंग बढ़ाती है। इसलिए दोनों को आलोचनात्मक रूप से पढ़ना होगा।
1765 — ईस्ट इंडिया कंपनी को दीवानी
12 अगस्त 1765 की इलाहाबाद संधि के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्राप्त हुई। इसे छोटानागपुर पर तत्काल पूर्ण प्रशासनिक नियंत्रण मानना गलत होगा; क्षेत्र में कंपनी का प्रवेश और राजनीतिक अधीनता क्रमशः बढ़ी। लेकिन यही वह व्यापक राजस्व-राज्य था जिसके विस्तार ने आगे नागवंशी सत्ता, स्थानीय मुखियाओं, जमींदारों और कंपनी के संबंध बदल दिए।
ऐतिहासिक अर्थ: कृषि अधिशेष को राजस्व में बदलने वाली औपनिवेशिक व्यवस्था का संस्थागत प्रारंभ।
अठारहवीं सदी का उत्तरार्ध — नागवंशी सत्ता और कंपनी संबंधों का पुनर्गठन
छोटानागपुर के नागवंशी शासक धीरे-धीरे ब्रिटिश राजस्व-सत्ता के अधीन आते गए। स्थानीय सामाजिक भूमि-अधिकारों और राज्य के राजस्व-दावे के बीच दूरी बढ़ी। बाहरी ठेकेदारों और मध्यस्थों का प्रवेश इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।
यहीं से वह समस्या पैदा होती है जिसमें गांव बसाने वाला समुदाय और राजस्व लेने वाला व्यक्ति अलग-अलग होने लगते हैं।
1831–32 — कोल विद्रोह
मुंडा, हो, उरांव और क्षेत्र के अन्य समूहों की भागीदारी वाला विशाल विद्रोह छोटानागपुर में फूटा। भूमि पर बाहरी हस्तक्षेप, ठेकेदार, जमींदार और नए राजस्व संबंध इसके केंद्रीय कारणों में थे।
विद्रोह सशस्त्र था और ब्रिटिश सैन्य कार्रवाई से दबाया गया।
उलगुलान से संबंध: मुंडा समाज की सामूहिक स्मृति में बाहरी भूमि-अधिकार के विरुद्ध पहले बड़े औपनिवेशिक-विरोधी युद्ध की परंपरा।
1833–34 — प्रशासनिक पुनर्गठन
कोल विद्रोह के बाद Regulation XIII of 1833 के अंतर्गत दक्षिण-पश्चिम सीमांत एजेंसी जैसे विशेष प्रशासनिक ढांचे विकसित किए गए। कैप्टन थॉमस विल्किन्सन ने स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप न्याय-प्रशासन के नियम बनाने की कोशिश की; बाद के सेटलमेंट रिकॉर्ड यह भी बताते हैं कि उनकी सभी नागरिक न्याय संबंधी प्रस्तावित व्यवस्थाओं को औपचारिक सरकारी मंजूरी नहीं मिली थी।
अर्थ: ब्रिटिश शासन ने पहली बार माना कि छोटानागपुर को बंगाल के सामान्य प्रशासनिक ढांचे से पूरी तरह नहीं चलाया जा सकता।
1850 के दशक के उत्तरार्ध से — सरदारी लड़ाई
मुंडा और उरांव कृषकों का लंबा Sardar Larai आरंभ हुआ। इसका केंद्र था—
जमींदार–ठेकेदार हस्तक्षेप का विरोध,
और अंततः पुरानी स्वायत्तता की पुनर्स्थापना।
जॉन मैकडूगल ने 1858–95 के सरदार और खरवार आंदोलनों का अलग विस्तृत अध्ययन किया है।
1869 — छोटानागपुर टेन्योर कानून
Chota Nagpur Tenures Act, 1869 जैसे प्रारंभिक उपायों ने भुईंहरी और स्थानीय भूमि-अधिकारों के प्रश्न को प्रशासनिक रूप में लेना शुरू किया।
लेकिन इसकी पहुंच और समाधान अपूर्ण रहे। बाद के रांची सेटलमेंट अधिकारियों ने विशेष रूप से उन मुंडा क्षेत्रों में रिकॉर्ड की कमी पहचानी जहां आगे बिरसा आंदोलन मजबूत हुआ।
1870 का दशक — औपनिवेशिक नृवंशीय दस्तावेज
ई. टी. डाल्टन की Descriptive Ethnology of Bengal (1872) ने मुंडा तथा अन्य छोटानागपुरी समुदायों की सामाजिक व्यवस्था का प्रारंभिक औपनिवेशिक नृवंशीय विवरण दिया। यह महत्वपूर्ण स्रोत है, लेकिन ‘tribe’, ‘race’ और ‘primitive’ जैसी उन्नीसवीं सदी की औपनिवेशिक श्रेणियों के साथ पढ़ा जाना चाहिए। इसकी 1872 प्रकाशन सूचना मानक ग्रंथ-सूचियों में दर्ज है।
15 नवंबर 1875 — बिरसा मुंडा का जन्म
आज सरकारी रूप से स्वीकृत जन्मतिथि 15 नवंबर 1875 और जन्मस्थान उलिहातू है।
लेकिन इतिहासलेखन में जन्म-वर्ष पर असहमति रही है। के. एस. सिंह की अलग पुस्तकों के शीर्षकों तक में 1874–1901 और 1872–1900 जैसी अवधि मिलती है। उनका 1983 का मानक अध्ययन Birsa Munda and His Movement, 1874–1901 शीर्षक से प्रकाशित हुआ।
इसलिए 15 नवंबर 1875 वर्तमान आधिकारिक–सार्वजनिक मानक है, पर पुराने स्रोतगत मतभेद दर्ज रहने चाहिए।
1880 का दशक — शिक्षा और मिशन संपर्क
बिरसा सलगा में प्रारंभिक शिक्षा और आगे जर्मन मिशनरी शिक्षा से जुड़े। चाईबासा के वर्षों में ईसाई धर्म, मिशन संगठन और भूमि प्रश्न—तीनों उनके अनुभव का हिस्सा बने।
उसी समय सरदारी संघर्ष भी मुंडा क्षेत्रों में चल रहा था।
लगभग 1886–90 — चाईबासा काल
बिरसा जर्मन लूथरन मिशन के प्रभाव में रहे। उन्हें ईसाई नाम से भी जोड़ा जाता है।
महत्वपूर्ण यह है कि मिशनरी दुनिया ने उन्हें—
लेकिन भूमि प्रश्न का समाधान न होने से मिशन से मोहभंग बढ़ा।
लगभग 1890 — मिशन से अलगाव
बिरसा ईसाई मिशन से दूर हुए। इस अवधि के बाद वैष्णव प्रभाव और आनंद पांडे/पानरे से संपर्क का उल्लेख मिलता है।
उनकी धार्मिक विचारधारा किसी एक परंपरा की वापसी नहीं बल्कि मुंडा आधार + ईसाई अनुभव + वैष्णव प्रभाव + सरदारी भूमि संघर्ष का चयनात्मक पुनर्गठन बनी।
1894–95 — धार्मिक नेता के रूप में उदय
बिरसा उपचारकर्ता, उपदेशक और करिश्माई धार्मिक नेता के रूप में तेजी से प्रतिष्ठित हुए।
जादू-टोना संबंधी प्रथाओं की आलोचना,
1895 — धर्म से राजनीति की ओर
अब बिरसा का संदेश केवल धार्मिक सुधार नहीं रहा।
औपनिवेशिक प्रशासन उन्हें कानून-व्यवस्था और सत्ता के लिए खतरे के रूप में देखने लगा।
अगस्त 1895 — गिरफ्तारी के प्रयास
प्रारंभिक पुलिस कार्रवाई अनुयायियों के प्रतिरोध के कारण कठिन हुई। अगस्त के अंतिम सप्ताह में बिरसा अंततः गिरफ्तार कर लिए गए।
ठीक तारीख पुराने स्रोतों में कुछ बदलती है; इसलिए “अगस्त 1895 के अंतिम सप्ताह” सबसे सुरक्षित प्रस्तुति है।
नवंबर 1895 — मुकदमा और सजा
बिरसा को सरकार-विरोधी गतिविधियों के लिए दोषी ठहराया गया।
स्रोतों में प्रारंभिक दंड दो से ढाई वर्ष तक अलग-अलग दर्ज मिलता है, लेकिन प्रभावी कारावास लगभग दो वर्ष रहा।
1895–97 — कारावास
आंदोलन खुली गतिविधि में शांत पड़ा, लेकिन बिरसा की धार्मिक प्रतिष्ठा समाप्त नहीं हुई।
सरदारी और बिरसाइत नेटवर्क मौजूद रहा।
यही कारण है कि जेल से निकलते ही आंदोलन फिर सक्रिय हुआ।
30 नवंबर 1897 — रिहाई
अब उनका दूसरा राजनीतिक चरण शुरू हुआ।
पहले की खुली सभा-राजनीति की तुलना में संगठन धीरे-धीरे अधिक गुप्त, नेटवर्क-आधारित और सैन्य तैयारी वाला हुआ।
28 जनवरी 1898 के आसपास — चुटिया यात्रा
बिरसा और अनुयायियों की चुटिया यात्रा को पुराने अधिकार, धार्मिक–राजनीतिक स्मृति और कथित पुराने अभिलेखों की खोज से जोड़ा जाता है।
महत्व: आंदोलन अपना भविष्य बनाने के लिए अतीत की वैधता खोज रहा था।
1898–99 — गुप्त पुनर्गठन
जंगलों और पहाड़ियों पर रात्रि-सभाएं।
सरदारों और बिरसाइत प्रचारकों का नेटवर्क।
धनुष–तीर, बलुआ, कुल्हाड़ी और स्थानीय हथियार तैयार करने के निर्देश।
खूंटी, तोरपा, तमाड़, बसिया तथा सिंहभूम की दिशा में प्रसार।
यह दिसंबर 1899 को अचानक भड़का दंगा नहीं, बल्कि पूर्व-तैयार विद्रोह था।
24 दिसंबर 1899 — उलगुलान का सार्वजनिक विस्फोट
क्रिसमस ईव से मिशन, चर्च और बाहरी सत्ता के प्रतीकों पर समन्वित हमले शुरू हुए।
कई स्थानों पर तीर चले और आगजनी हुई।
आंदोलन का प्रारंभिक सशस्त्र चरण धार्मिक प्रतीकवाद से रंगा था, लेकिन कुछ ही दिनों में संघर्ष का मुख्य प्रत्यक्ष लक्ष्य पुलिस और औपनिवेशिक शासन बनने लगा।
दिसंबर 1899 के अंतिम दिन — विस्तार
खूंटी–तोरपा–तमाड़–बसिया और सिंहभूम के कुछ क्षेत्रों तक कार्रवाई फैली।
इस समकालिकता ने 1897–99 के गुप्त संगठन की वास्तविक क्षमता सिद्ध की।
5 जनवरी 1900 — एटकेडीह क्षेत्र
गया मुंडा और उनका परिवार उलगुलान के सक्रिय प्रतिरोध से जुड़ते हैं।
झारखंड राजभवन गया मुंडा को उलगुलान का प्रमुख सेनापति और सरदारी आंदोलन से भी जुड़ा बताता है; उनके पुत्र सानरे मुंडा के साथ उन्हें फांसी दिए जाने का उल्लेख भी करता है।
7 जनवरी 1900 — खूंटी थाना पर हमला
लगभग 300 हथियारबंद मुंडाओं ने पुलिस स्टेशन पर हमला किया।
यहां से स्पष्ट हो गया कि आंदोलन अब मिशन-विरोध से आगे राज्य की सशस्त्र सत्ता पर प्रत्यक्ष प्रहार कर रहा है।
9 जनवरी 1900 — सैल रकाब/डोम्बारी की निर्णायक भिड़ंत
फोर्ब्स और डिप्टी कमिश्नर एच. सी. स्ट्रीटफील्ड के नेतृत्व में औपनिवेशिक बल विद्रोही जमाव तक पहुंचे।
विद्रोहियों ने हथियार डालने से इनकार किया।
महिलाएं और बच्चे भी उस मिश्रित सामुदायिक जमाव में मौजूद थे।
यह उलगुलान का निर्णायक सैन्य मोड़ था।
मृतकों का विवाद
तत्काल औपनिवेशिक विवरण बहुत कम मृतकों की संख्या देता है।
बाद की सरकारी शहीद-सूचियां उससे अधिक नाम पहचानती हैं।
स्थानीय स्मृति में 100–200 अथवा उससे अधिक और लोकप्रिय कथाओं में सैकड़ों तक संख्या मिलती है।
अंतिम निश्चित संख्या स्थापित नहीं है।
इसीलिए ‘मुंडा जलियांवाला’ को सटीक सैन्य समानता नहीं, स्मृति-उपमा के रूप में इस्तेमाल करना अधिक उचित है।
13–26 जनवरी 1900 — व्यापक खोज अभियान
सैल रकाब के बाद ब्रिटिश प्रशासन ने ‘beat and search’ अभियान चलाकर गांव, जंगल और संभावित आश्रय क्षेत्र छाने।
संपत्ति कुर्की और परिवारों पर दबाव ने संगठन को तेजी से कमजोर किया।
28 जनवरी 1900 — आत्मसमर्पण
प्रमुख सरदारों सहित कई लोगों ने प्रशासन के सामने आत्मसमर्पण किया।
इससे स्पष्ट हुआ कि बड़े सशस्त्र नेटवर्क की संरचना टूट रही है।
3 फरवरी 1900 — बिरसा की गिरफ्तारी : सर्वाधिक स्वीकृत तारीख
अधिकांश मानक इतिहासलेखन बिरसा को सिंहभूम–चक्रधरपुर क्षेत्र के जमकोपाई जंगल में 3 फरवरी 1900 को पकड़ा गया मानता है।
हालांकि भारत सरकार की Dictionary of Martyrs की एक प्रविष्टि 3 मार्च लिखती है। इसलिए फरवरी मुख्य तारीख और मार्च को स्रोतगत मतभेद के रूप में दर्ज करना चाहिए।
फरवरी–मई 1900 — सामूहिक गिरफ्तारियां और मुकदमे
लगभग 460–480 व्यक्तियों के स्तर पर गिरफ्तारी/अभियोजन हुआ।
अलग-अलग मामलों में हत्या, आगजनी, पुलिस पर हमला और विद्रोही गतिविधियां शामिल थीं।
कुछ आधुनिक शैक्षणिक संकलन 460 आरोपियों और 63 दोषसिद्धियों का उल्लेख करते हैं।
1 जून 1900 — बिरसा की बीमारी
आधिकारिक जेल विवरण में बिरसा को कॉलरा से बीमार बताया गया।
उनका उपचार किया गया और कुछ दिन सुधार दर्ज हुआ।
9 जून 1900 — रांची जेल में बिरसा की मृत्यु
बिरसा लगभग 25 वर्ष की आयु में रांची जेल में मरे।
सरकारी और मानक शैक्षणिक विवरण कॉलरा को मृत्यु का कारण बताते हैं।
विष दिए जाने की लोकधारणा व्यापक है, लेकिन उसके समर्थन में स्थापित समकालीन चिकित्सकीय या अभिलेखीय प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
Ministry of Culture की Dictionary of Martyrs बिहार–झारखंड सहित पूर्वी भारत के शहीदों को Volume 4 में संकलित करती है; इसे आधिकारिक जीवनी और शहीदों के मुकदमों के लिए महत्वपूर्ण, किंतु अंतिम निर्विवाद स्रोत नहीं मानना चाहिए।
1900–01 — मुकदमों का लंबा चरण
उलगुलान के अभियुक्तों के मुकदमे बिरसा की मृत्यु के बाद भी चले।
कई लोगों को कठोर कारावास और transportation की सजा मिली।
संगठित सैन्य विद्रोह समाप्त हो चुका था, लेकिन राज्य का न्यायिक दमन जारी रहा।
1902 — व्यापक सर्वे–सेटलमेंट आरंभ
उलगुलान के बाद प्रशासन ने मुंडा क्षेत्रों में अधिकार अभिलेख तैयार करने और कृषि संबंध स्पष्ट करने की प्रक्रिया तेज की।
आगे यह पूरे रांची जिले के व्यापक सर्वे–सेटलमेंट में बदल गया।
रांची जिला गजेटियर स्वयं स्वीकार करता है कि “Birsa revolt brought matters to a head” और 1902 में मुंडा देश में सर्वे–सेटलमेंट आरंभ किया गया; बाद में इसे पूरे जिले तक विस्तारित किया गया।
यह बिरसा आंदोलन और भूमि-सुधार के संबंध का सबसे महत्वपूर्ण औपनिवेशिक प्रशासनिक स्वीकार है।
1903 — काश्तकारी कानून में संशोधन
भूमि हस्तांतरण और आदिवासी अधिकारों को अधिक सुरक्षित करने के लिए कानून में महत्वपूर्ण संशोधन आए।
इन्हीं प्रक्रियाओं के अनेक प्रावधान आगे 1908 के व्यापक कानून में समाहित हुए।
11 नवंबर 1908 — छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम
Chota Nagpur Tenancy Act, 1908 — Act VI of 1908 इसी तारीख को अधिनियमित हुआ। India Code इसका enactment date 11 नवंबर 1908 दर्ज करता है।
कानून का घोषित उद्देश्य छोटानागपुर में landlord–tenant और rent settlement संबंधी कानूनों को संशोधित और समेकित करना था।
1910 — रांची सर्वे–सेटलमेंट का समापन
1902 में शुरू हुआ सर्वे–सेटलमेंट 1910 तक पूरा हुआ।
इसके मुख्य आधिकारिक अभिलेख का प्रकाशन बाद में J. Reid, Final Report on the Survey and Settlement Operations in the District of Ranchi, 1902–1910 के रूप में 1912 में हुआ। ग्रंथ-सूची इसे 144 पृष्ठों की आधिकारिक रिपोर्ट के रूप में दर्ज करती है।
इस रिपोर्ट के बिना उलगुलान के भूमि-कानूनी परिणामों का गंभीर अध्ययन अधूरा रहेगा।
बिरसा मुंडा
आंदोलन का केंद्रीय धार्मिक–राजनीतिक नेता।
उनकी ऐतिहासिक विशिष्टता यह थी कि उन्होंने—
के. एस. सिंह का 1983 का 289-पृष्ठीय अध्ययन आज भी उनकी जीवनी और आंदोलन का अनिवार्य मानक ग्रंथ है।
सुगना मुंडा और करमी
उनका आर्थिक रूप से अस्थिर ग्रामीण जीवन बिरसा के बचपन को उसी भूमि–श्रम संसार में रखता है जिसकी रक्षा आगे उनका आंदोलन करेगा।
जयपाल नाग
बिरसा की प्रारंभिक शिक्षा से जुड़े शिक्षक।
उनकी भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण है कि यहीं से बिरसा औपचारिक शिक्षा और आगे मिशन स्कूल की दिशा में गए।
आनंद पांडे/पानरे
बिरसा के मिशन-पश्चात वैष्णव प्रभाव से जुड़े व्यक्तित्व।
उनके बारे में बाद के स्रोतों में विवरण एक समान नहीं, इसलिए भूमिका को अतिरंजित गुरु-परंपरा के रूप में प्रस्तुत करने से बचना चाहिए।
सरदारी आंदोलन के सरदार
किसी एक व्यक्ति से अधिक यह स्थानीय नेतृत्व का नेटवर्क था।
की वह राजनीतिक विरासत दी जिसका बिरसा ने उपयोग किया।
जॉन मैकडूगल इस पूर्व-इतिहास का सर्वाधिक उपयोगी विशिष्ट अध्ययन देते हैं।
गया मुंडा
बिरसा के अत्यंत महत्वपूर्ण सहयोगी और सशस्त्र चरण के प्रमुख नेता।
झारखंड राजभवन उन्हें ‘मुंडा उलगुलान’ का प्रधान सेनापति बताता है और सरदारी आंदोलन से भी जोड़ता है।
माकी मुंडा
एटकेडीह प्रतिरोध में सक्रिय महिला भूमिका के सबसे महत्वपूर्ण ज्ञात उदाहरणों में एक।
आधुनिक शोध गया मुंडा के पूरे परिवार—माकी, बेटियों और बहुओं—की प्रतिरोध में भागीदारी का उल्लेख करता है।
उनकी उपस्थिति इस धारणा को तोड़ती है कि उलगुलान केवल पुरुष योद्धाओं का आंदोलन था।
साली
बिरसा आंदोलन से जुड़ी महिला सहयोगियों में उनका नाम आधुनिक सरकारी/स्मृति-स्रोतों में आता है। उनके बारे में प्रमाण गया–माकी परिवार की तुलना में कम व्यवस्थित हैं; इसलिए उनकी भूमिका पर दावे स्रोत-विशिष्ट रखे जाने चाहिए।
एच. सी. स्ट्रीटफील्ड
गया मुंडा प्रकरण और सैल रकाब की निर्णायक सरकारी कार्रवाई से सीधे जुड़े प्रमुख औपनिवेशिक अधिकारी।
उनकी रिपोर्टें और सरकारी वृत्तांत घटनाक्रम के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उन्हें राज्य के पक्ष का स्रोत मानकर पढ़ना चाहिए।
कमिश्नर फोर्ब्स
खूंटी और सैल रकाब अभियान की उच्च प्रशासनिक–सैन्य प्रतिक्रिया में प्रमुख अधिकारी।
उनकी भूमिका यह दिखाती है कि जनवरी 1900 तक विद्रोह स्थानीय पुलिस समस्या से बढ़कर संभागीय प्रशासन का सैन्य संकट बन गया था।
मीयर्स/मेयर्स
1895 में बिरसा की गिरफ्तारी अभियान से जुड़ा अधिकारी।
पहली गिरफ्तारी को समझने के लिए औपनिवेशिक पुलिस–प्रशासन के प्रतिनिधि के रूप में महत्वपूर्ण।
पादरी पॉलुस
1895 की गिरफ्तारी के एक प्रयास में प्रशासन से जुड़े मिशनरी संपर्क का उदाहरण।
यह प्रसंग बिरसा अनुयायियों के बीच मिशन और औपनिवेशिक प्रशासन को निकट शक्ति-संसार मानने की धारणा समझने में उपयोगी है।
जॉन बैप्टिस्ट हॉफमैन
जर्मन जेसुइट मिशनरी, भाषाविद और मुंडा भूमि व्यवस्था के महत्वपूर्ण अध्येता।
बिरसा विद्रोह से उनका संबंध केवल ‘मिशन बनाम बिरसा’ की सरल रेखा में नहीं समझा जा सकता। आधुनिक शोध बताता है कि हॉफमैन मुंडाओं की कई कृषि शिकायतों को न्यायोचित मानते थे; उनके भूमि-व्यवस्था संबंधी अध्ययन का उपयोग 1902 के सेटलमेंट में हुआ और CNT Act के आदिवासी-सुरक्षा संबंधी अनेक प्रावधानों के निर्माण में उनका योगदान था।
पीटर टेटे की 1984 की पुस्तक विशेष रूप से हॉफमैन, CNT Act और सहकारी आंदोलन पर केंद्रित है।
एडवर्ड लिस्टर
1902 से प्रारंभिक रांची सेटलमेंट अभियान से जुड़े सेटलमेंट अधिकारी।
हॉफमैन की मुंडा भूमि-संबंधी जानकारी का उपयोग उनके प्रशासनिक अध्ययन में हुआ।
जे. रीड
1902–10 रांची सर्वे–सेटलमेंट के अंतिम चरण से जुड़े अधिकारी।
उनकी 1912 की Final Report भूमि इतिहास, खूंटकट्टी, रकुमत, सेवा-दायित्व और उलगुलान के प्रशासनिक परिणाम समझने के सबसे महत्वपूर्ण आधिकारिक स्रोतों में है।
शरत चंद्र राय
भारतीय मानवशास्त्र के अग्रणी विद्वान।
उनकी 1912 की The Mundas and Their Country मुंडा समाज, भूमि, धर्म और बिरसा से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण निकट-समकालीन ग्रंथों में है। मूल संस्करण 1912 का है।
राय औपनिवेशिक अधिकारी नहीं थे, इसलिए उनका दृष्टिकोण प्रशासनिक रिपोर्टों से अलग है; फिर भी उनकी अपनी बीसवीं सदी प्रारंभिक मानवशास्त्रीय श्रेणियों की सीमा है।
30 अनिवार्य प्राथमिक–निकट-प्राथमिक और द्वितीयक स्रोत
नीचे की सूची केवल ‘और पढ़ें’ नहीं है। इसे इस शोध का स्रोत-क्रम माना जा सकता है।
Chota Nagpur Tenancy Act, 1908, Act VI of 1908
सबसे महत्वपूर्ण विधिक प्राथमिक स्रोत।
और मुंडारी खूंटकट्टी के विशेष प्रावधान।
India Code enactment date 11 नवंबर 1908 देता है।
सीमा: वर्तमान संशोधित पाठ और मूल 1908 पाठ को मिलाना नहीं चाहिए।
J. Reid, Final Report on the Survey and Settlement Operations in the District of Ranchi, 1902–1910 (1912)
उलगुलान के बाद भूमि व्यवस्था का सबसे जरूरी प्रशासनिक दस्तावेज।
उपयोग: खूंटकट्टी, किराया, रकुमत, बेगारी/सेवा, सेटलमेंट और भूमि कानून।
सीमा: औपनिवेशिक प्रशासन की सुधारवादी दृष्टि।
M. G. Hallett, Bihar and Orissa District Gazetteers: Ranchi (1917)
रांची जिले का भूगोल, इतिहास, जनसंख्या, भूमि राजस्व, मिशन और प्रशासन।
गजेटियर स्पष्ट रूप से बताता है कि बिरसा विद्रोह ने भूमि-सर्वे के प्रश्न को निर्णायक बनाया।
सीमा: घटनाओं को शासन-स्थिरता की समस्या के रूप में देखने की प्रवृत्ति।
Sarat Chandra Roy, The Mundas and Their Country (1912)
मुंडा समाज का सबसे अनिवार्य निकट-समकालीन भारतीय नृवंशीय अध्ययन। मूल 1912 संस्करण उपलब्ध है।
विशेष उपयोग: खूंटकट्टी, मुंडा–मानकी, धर्म, बिरसा और मौखिक परंपरा।
E. T. Dalton, Descriptive Ethnology of Bengal (1872)
बिरसा-पूर्व मुंडा समाज देखने के लिए महत्वपूर्ण।
सीमा: उन्नीसवीं सदी का औपनिवेशिक नस्लीय–नृवंशीय दृष्टिकोण; इसकी श्रेणियों को तथ्य की तरह नहीं अपनाएं। ग्रंथ 1872 का है।
W. W. Hunter, A Statistical Account of Bengal, संबंधित छोटानागपुर/लोहरदगा खंड
औपनिवेशिक जिला अर्थव्यवस्था, जनसंख्या और प्रशासन की पृष्ठभूमि।
Hunter का 20-खंडीय Statistical Account 1875–77 में प्रकाशित हुआ।
सीमा: राज्य-केंद्रित सांख्यिकी; गांव की सामाजिक आवाज सीमित।
Government Proceedings on the Kol Insurrection, 1831–32
बंगाल सरकार, बोर्ड ऑफ रेवेन्यू और संबंधित राजनीतिक–सैन्य पत्राचार।
निष्कर्ष : मुंडा उलगुलान को कैसे समझें?
खूंटकट्टी से ‘अबुआ राज’ तक : भूमि, धर्म, दिकू-विरोध, बिरसा का करिश्मा, हिंसा, दमन और एक अधूरी किंतु स्थायी क्रांति
मुंडा उलगुलान को यदि केवल दिसंबर 1899 से फरवरी 1900 तक चले एक सशस्त्र आदिवासी विद्रोह के रूप में देखा जाए, तो उसका अधिकांश इतिहास हमारी नजर से गायब हो जाएगा। उसका वास्तविक आरंभ उस दिन नहीं हुआ जब क्रिसमस ईव पर तीर चले। वह उससे बहुत पहले शुरू हो चुका था—जब छोटानागपुर की पारंपरिक भूमि व्यवस्था पर औपनिवेशिक राजस्व राज्य का दबाव बढ़ा, जब गांव बसाने वाला खूंट अपनी ही जमीन पर साधारण रैयत में बदलने लगा, जब जमींदार–ठेकेदार–महाजन और नए मध्यस्थ भूमि तथा श्रम पर अधिकार जमाने लगे और जब मुंडा समाज ने पहली बार महसूस किया कि उसका संकट केवल अधिक लगान का नहीं बल्कि धरती पर अंतिम अधिकार का है।
इसीलिए उलगुलान की कहानी का आरंभ खूंटकट्टी से होता है और उसका सबसे गहरा राजनीतिक निष्कर्ष ‘अपना राज’ तक पहुंचता है।
भूमि से अधिकार, अधिकार से पहचान, पहचान से धर्म, धर्म से संगठन, संगठन से सत्ता और सत्ता से विद्रोह
और यही मुंडा उलगुलान को भारतीय किसान–आदिवासी प्रतिरोध के इतिहास में विशिष्ट बनाती है।
उलगुलान का मूल प्रश्न धर्म नहीं—धरती थी
बिरसा के आंदोलन में धर्म अत्यंत महत्वपूर्ण था, लेकिन संकट की जड़ धार्मिक नहीं थी।
जमीन किसकी है?
मुंडा खूंटकट्टी व्यवस्था का नैतिक तर्क सीधा था।
इसलिए भूमि पर उनका सामुदायिक–वंशीय अधिकार है।
औपनिवेशिक व्यवस्था ने भूमि को दूसरी भाषा में पढ़ा—
खूंटकट्टी का क्षरण केवल आर्थिक नुकसान नहीं था
यदि किसान की जमीन चली जाए तो आधुनिक आर्थिक भाषा कहेगी—
लेकिन मुंडा समाज के संदर्भ में इससे कहीं अधिक होता था।
सामाजिक अस्तित्व से बेदखली।
यही कारण है कि भूमि प्रश्न इतनी तीव्र राजनीतिक शक्ति पैदा कर सका।
मुंडा किसान केवल अपनी आय नहीं बचा रहा था।
वह अपने समाज की निरंतरता बचा रहा था।
‘दिकू’ : आंदोलन की सबसे शक्तिशाली और सबसे जटिल अवधारणा
दिकू को केवल ‘बाहरी व्यक्ति’ कहना उलगुलान की राजनीति को बहुत सरल कर देगा।
मुंडा अनुभव में दिकू वह व्यक्ति या शक्ति था जो गांव की पारंपरिक संरचना में बाहर से प्रवेश करके—
के माध्यम से नियंत्रण स्थापित करता था।
इस श्रेणी में अलग-अलग संदर्भों में आ सकते थे—
मिशनरी भी कुछ बिरसाइत कल्पनाओं में इसी बाहरी शक्ति-संसार में शामिल हुए।
लेकिन इतिहासकार को इन सबको एक समान आर्थिक भूमिका वाला शोषक नहीं मान लेना चाहिए।
इतिहासकार का विश्लेषण उससे अधिक सूक्ष्म होना चाहिए।
दिकू-विरोध से अंग्रेजी राज-विरोध कैसे निकला?
सरदारी लड़ाई के लंबे चरण में यह आशा बनी रही कि—
सरकार जमींदार के विरुद्ध न्याय कर सकती है।
जमींदार का अधिकार कानून से सुरक्षित था।
अदालत उसी दस्तावेजी व्यवस्था पर चलती थी।
और 1895 में वही सरकार बिरसा को गिरफ्तार करती है।
यहीं निर्णायक राजनीतिक परिवर्तन हुआ—
सरकार न्यायाधीश नहीं, संघर्ष का पक्ष है।
इस बिंदु के बाद दिकू-विरोध और औपनिवेशिक-विरोध अलग नहीं रह सकते थे।
सरदारी लड़ाई के बिना बिरसा को समझना असंभव
बिरसा किसी राजनीतिक शून्य में प्रकट नहीं हुए।
बिरसा ने इस आंदोलन से तीन चीजें ग्रहण कीं—
भूमि प्रश्न, गांवों का नेटवर्क और औपनिवेशिक न्याय से मोहभंग।
“जिस राज ने हमारा अधिकार छीना, वह राज वैध क्यों है?”
यही उनके नेतृत्व की सबसे बड़ी वैचारिक छलांग थी।
बिरसा का निर्माण कई दुनियाओं के मिलन से हुआ
बिरसा को केवल ‘शुद्ध आदिवासी परंपरा’ के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत करना इतिहास को कमजोर करता है।
और औपनिवेशिक आधुनिकता से प्रत्यक्ष संपर्क।
उन्होंने किसी एक परंपरा को पूर्णतः नहीं अपनाया।
न किसी वैष्णव संप्रदाय में विलीन हुए।
न मुंडा समाज की हर पुरानी प्रथा को अपरिवर्तनीय माना।
बिरसाइत धर्म : पलायन नहीं, संगठन
यदि धर्म को केवल व्यक्तिगत आस्था माना जाए, तो बिरसा आंदोलन समझ में नहीं आएगा।
धर्म ने मुंडा समाज के एक हिस्से को यह विश्वास दिया कि वह केवल पीड़ित समुदाय नहीं—
अपने को पुनर्गठित कर सकने वाला समुदाय है।
प्रार्थना और सामाजिक सुधार से शुरू हुआ आंदोलन अंततः लगान-अस्वीकार और राज-अस्वीकार तक पहुंचा।
सामाजिक शुद्धि का राजनीतिक अर्थ
बिरसा के शराब-विरोध, स्वच्छता, नैतिक अनुशासन और जादू-टोना संबंधी व्यवहारों की आलोचना को केवल धार्मिक सुधार के रूप में नहीं देखना चाहिए।
यानी बिरसा केवल अंग्रेजों से लड़ने की तैयारी नहीं कर रहे थे।
वे एक ऐसा समुदाय बनाने का प्रयास कर रहे थे जिसे वे अपने भविष्य के राज के योग्य मानते थे।
लेकिन ‘शुद्ध समाज’ की अपनी सीमाएं थीं
हर नया धार्मिक अनुशासन नया ‘हम’ बनाता है।
लेकिन उसके साथ नया ‘वे’ भी पैदा हो सकता है।
क्रिसमस 1899 के प्रारंभिक हमलों में चर्च और ईसाई समुदाय का लक्ष्य बनना इस तनाव की वास्तविकता दिखाता है।
इसलिए धार्मिक पुनर्गठन को केवल एकता की कथा नहीं कहा जा सकता।
धरती आबा : बिरसा की सबसे गहरी राजनीतिक उपाधि
बिरसा के लिए उपयोग की गई सबसे अर्थपूर्ण उपाधि थी—
धरती आबा।
इसमें धार्मिक और राजनीतिक अर्थ एक साथ थे।
वह उस धरती का संरक्षक था जिसके लिए संघर्ष चल रहा था।
इसीलिए बिरसा का करिश्मा भूमि से अलग नहीं किया जा सकता।
यदि वह केवल चमत्कार करने वाला धार्मिक व्यक्ति होते—
शायद उनका आंदोलन स्थानीय पंथ बनकर रह जाता।
उनकी ऐतिहासिक शक्ति इसलिए बनी क्योंकि—
करिश्मा ने वह दिया जो सरदारी आंदोलन के पास नहीं था
सरदारों के पास संगठन और भूमि की शिकायत थी।
लेकिन व्यापक केंद्रीय प्रतीक नहीं था।
यही कारण है कि 1895 में उनकी गिरफ्तारी स्वयं आंदोलन को समाप्त नहीं कर सकी।
लेकिन जिस सामाजिक विश्वास ने ‘धरती आबा’ बनाया था, उसे गिरफ्तार नहीं कर सकी।
1895 : पहली गिरफ्तारी की सबसे बड़ी शिक्षा
लेकिन इस विफलता ने आंदोलन को तीन पाठ दिए—
खुली भीड़ आसानी से निगरानी में आती है।
एक नेता की गिरफ्तारी आंदोलन रोक सकती है।
और औपनिवेशिक शासन केवल उपदेश से पीछे हटने वाला नहीं।
इसलिए 1897 में जेल से लौटने के बाद आंदोलन अधिक गुप्त और अधिक संगठित हुआ।
‘अबुआ राज’ : उलगुलान का राजनीतिक शिखर
बिरसा आंदोलन का सबसे क्रांतिकारी क्षण वह नहीं था जब पहली बार तीर चला।
महारानी का राज वैध नहीं।
यहीं भूमि संघर्ष संप्रभुता की राजनीति बन गया।
आज लोकप्रिय “अबुआ दिशुम, अबुआ राज” इसी व्यापक ऐतिहासिक आकांक्षा को व्यक्त करता है।
लेकिन इसे आधुनिक भारतीय राष्ट्र-राज्य की स्वतंत्रता का उन्नीसवीं सदी का तैयार घोषणापत्र मानना गलत होगा।
बिरसा की राजनीतिक दुनिया का केंद्र था—
इसलिए ‘अबुआ राज’ का सबसे सटीक अर्थ था—
क्या बिरसा आधुनिक राष्ट्रवादी थे?
या एक संयुक्त राष्ट्र-राज्य की विकसित योजना नहीं थी।
लेकिन इससे उनका औपनिवेशिक-विरोध कम नहीं होता।
उन्होंने ब्रिटिश संप्रभुता को अस्वीकार किया।
इसलिए उन्हें आधुनिक राष्ट्रवाद में जबरन फिट करने के बजाय—
लगान-अस्वीकार क्यों इतना क्रांतिकारी था?
तो वह जमींदार के अधिकार को चुनौती देता है।
यदि जमींदार का अधिकार औपनिवेशिक कानून से आता है—
तो अंतिम चुनौती राज्य तक पहुंचती है।
इसलिए लगान-अस्वीकार उलगुलान का केवल आर्थिक कार्यक्रम नहीं था।
‘बिरसा राज’ कितना वास्तविक था?
इसलिए उसे पूर्ण विकसित वैकल्पिक राज्य कहना अतिशयोक्ति होगी।
लेकिन वह केवल अस्पष्ट सपना भी नहीं था।
दिसंबर 1899 : योजना से विद्रोह
24 दिसंबर 1899 का उलगुलान अचानक विस्फोट नहीं था।
उससे पहले लगभग दो वर्षों की तैयारी थी।
इसलिए क्रिसमस ईव पर अलग-अलग क्षेत्रों में लगभग एक साथ हुई कार्रवाई आंदोलन की संगठनात्मक क्षमता का प्रमाण थी।
मिशन केंद्रों और चर्चों पर हमले उसके धार्मिक–राजनीतिक तनाव का प्रारंभिक रूप थे।
हिंसा को न छिपाया जाए, न रोमानी बनाया जाए
इसे हटाकर बिरसा को आधुनिक अहिंसक सुधारक बनाना इतिहास नहीं।
औपनिवेशिक सैनिक दमन भी वास्तविक था।
डोम्बारी–सैल रकाब पर राइफल फायर हुआ।
सैकड़ों लोगों को गिरफ्तारी और मुकदमों का सामना करना पड़ा।
इसलिए हिंसा को केवल विद्रोहियों की नैतिक असफलता के रूप में देखना भी अधूरा है।
हिंसा आंदोलन की शक्ति भी थी और कमजोरी भी
संभव है भूमि प्रश्न दशकों और खिंचता।
सशस्त्र विद्रोह ने सरकार के सामने संकट को तात्कालिक बनाया।
राज्य की सबसे बड़ी शक्ति सक्रिय हुई।
इसलिए हिंसा ने एक साथ दो परिणाम दिए—
डोम्बारी : उलगुलान का प्रतीकात्मक केंद्र
9 जनवरी 1900 की सैल रकाब–डोम्बारी भिड़ंत सैन्य दृष्टि से मुंडा आंदोलन की निर्णायक पराजय थी।
लेकिन स्मृति में वह पराजय नहीं बनी।
पुरुषों के साथ महिलाएं और बच्चे मौजूद थे।
और मृतकों की वास्तविक संख्या तक इतिहास आज निश्चित रूप से स्थापित नहीं कर पाया।
इसलिए डोम्बारी मुंडा स्मृति में शहादत का स्थल बना।
‘मुंडा जलियांवाला’ : उपयोगी लेकिन सीमित उपमा
डोम्बारी को कई बार ‘मुंडा जलियांवाला बाग’ कहा जाता है।
यह हमें याद दिलाती है कि औपनिवेशिक सामूहिक गोलीबारी 1919 से बहुत पहले आदिवासी क्षेत्रों में हो चुकी थी।
लेकिन ऐतिहासिक परिस्थितियां अलग थीं।
सैल रकाब सक्रिय सशस्त्र विद्रोह के बीच था।
आत्मसमर्पण की बातचीत का रिकॉर्ड है।
जलियांवाला बाग की परिस्थिति अलग थी।
‘मुंडा जलियांवाला’ स्मृति की उपमा है, घटनात्मक समानता नहीं।
डोम्बारी को महत्व देने के लिए उसे किसी दूसरी त्रासदी की प्रतिकृति बनाने की आवश्यकता नहीं।
डोम्बारी ने धार्मिक विश्वास की सीमा भी उजागर की
कुछ अनुयायियों में यह विश्वास था कि—
ब्रिटिश गोलियां निष्प्रभावी हो जाएंगी।
राइफल की तकनीकी श्रेष्ठता निर्णायक रही।
यह उलगुलान की सबसे बड़ी सैन्य सीमा थी—
नैतिक विश्वास को भौतिक शक्ति का विकल्प मान लेना।
लेकिन आंदोलन तत्काल समाप्त नहीं हुआ क्योंकि उसका आधार केवल चमत्कार नहीं था।
यही बताता है कि बिरसा आंदोलन को केवल ‘मिलेनरियन उन्माद’ कहना क्यों अपर्याप्त है।
आंदोलन बनाम संस्थागत राज्य।
पुलिस, अदालत, राजस्व, जेल और मुखबिर भी थे।
बिरसा की गिरफ्तारी : युद्ध से सूचना-राज तक
सैल रकाब के बाद बिरसा किसी अंतिम युद्ध में पकड़े नहीं गए।
उन्हें जंगल में खोज-अभियान और स्थानीय सूचना के माध्यम से गिरफ्तार किया गया।
यह औपनिवेशिक शक्ति का दूसरा रूप दिखाता है।
ब्रिटिश राज की विजय केवल बंदूक से नहीं हुई।
वह गांव के सामाजिक नेटवर्क को तोड़कर भी हुई।
इसलिए सरकार ने समुदाय पर दबाव डाला।
यही counter-insurgency की मूल राजनीति थी।
बिरसा की मृत्यु : तथ्य और स्मृति
9 जून 1900 को बिरसा रांची जेल में मरे।
आधिकारिक रिकॉर्ड कॉलरा को कारण बताता है।
जहर दिए जाने की लोकधारणा व्यापक है।
लेकिन उसके समर्थन में स्थापित समकालीन अभिलेखीय या चिकित्सकीय प्रमाण उपलब्ध नहीं।
इतिहास में इसलिए सबसे जिम्मेदार भाषा यही है—
आधिकारिक मृत्यु-कारण कॉलरा था; विष दिए जाने का दावा प्रमाणित नहीं है।
लेकिन लोकस्मृति को पूरी तरह खारिज कर देना भी उचित नहीं।
मुंडा समाज औपनिवेशिक राज्य पर विश्वास नहीं करता था।
जेल में मृत्यु ने बिरसा को और बड़ा प्रतीक बनाया
लेकिन 25 वर्ष के आसपास जेल में मृत्यु ने उनकी छवि स्थिर कर दी—
शहीद बिरसा
यही उनकी मरणोत्तर राजनीति की शुरुआत है।
सैकड़ों गिरफ्तारियां : दमन केवल बिरसा तक नहीं था
उलगुलान का दमन केवल केंद्रीय नेता को पकड़ने की कार्रवाई नहीं था।
यह महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है—
उलगुलान किसी एक व्यक्ति की निजी बगावत नहीं था।
इतने व्यापक न्यायिक अभियान की आवश्यकता नहीं होती।
इसलिए औपनिवेशिक दमन स्वयं आंदोलन के सामाजिक पैमाने का प्रमाण है।
सैन्य विजय के बाद अंग्रेजों ने भूमि व्यवस्था क्यों बदली?
यहीं उलगुलान की ऐतिहासिक उपलब्धि सबसे स्पष्ट होती है।
यदि सरकार पूरी तरह आश्वस्त होती कि—
यानी प्रशासन ने स्वयं स्वीकार किया कि—
1908 का CNT Act : जीत या औपनिवेशिक समझौता?
1908 के कानून ने बड़ा परिवर्तन किया।
मुंडारी खूंटकट्टी की विशिष्टता स्वीकार हुई।
लगान और कुछ देनदारियों को नियंत्रित किया गया।
अंतिम वैधानिक शक्ति डिप्टी कमिश्नर और औपनिवेशिक प्रशासन के हाथ में।
CNT Act केवल बिरसा की देन क्यों नहीं?
मिशनरी अध्येताओं की भूमि-संबंधी जानकारी।
उलगुलान ने पहले से चल रही भूमि-सुधार प्रक्रिया को अपरिहार्य राजनीतिक तात्कालिकता दी।
यह बिरसा की भूमिका को कम नहीं करता।
बल्कि अतिशयोक्ति से बचाकर उसे अधिक मजबूत बनाता है।
मुंडा भूमि व्यवस्था की विशिष्टता का राज्य द्वारा स्वीकार।
वह व्यवस्था जिसे औपनिवेशिक राजस्व ढांचा धीरे-धीरे साधारण tenancy में बदल रहा था—
अंततः उसी औपनिवेशिक कानून में विशेष श्रेणी बन गई।
जिस राज्य ने धरती आबा को जेल में बंद किया—
उसी ने कुछ वर्षों बाद ‘Mundari khunt-kattidari tenancy’ लिखकर उसके समाज के भूमि-दावे की विशिष्टता स्वीकार की।
लेकिन खूंटकट्टी की कानूनी पहचान भी पूर्ण मुक्ति नहीं थी
कानून ने मुंडा को पूर्ण संप्रभु भूमि-स्वामी नहीं बनाया।
वह अभी भी औपनिवेशिक tenancy व्यवस्था के भीतर था।
राज हमारा
यही उलगुलान की अंतिम उपलब्धि–सीमा का सबसे स्पष्ट सूत्र है।
बेथ-बेगारी : सम्मान का प्रश्न
उलगुलान केवल जमीन का आंदोलन नहीं था।
बेथ-बेगारी ने किसान को आर्थिक रूप से दबाया—
लेकिन उससे भी अधिक सामाजिक रूप से अधीन बनाया।
किसी जमींदार के लिए बिना स्वतंत्र इच्छा श्रम करना केवल समय का नुकसान नहीं।
वह प्रतिष्ठा और स्वायत्तता का प्रश्न था।
इसलिए बिरसा आंदोलन में भूमि और श्रम की स्वतंत्रता एक-दूसरे से जुड़ी थीं।
बाद के बंदोबस्त और कानून ने कई अस्पष्ट सेवा-दायित्वों को दर्ज या नकदीकृत किया।
यह भी आंदोलन की अप्रत्यक्ष उपलब्धि थी।
लेकिन पूर्ण बेगारी-विहीन सामाजिक क्रांति नहीं हुई।
वन का प्रश्न अधूरा रहा
मुंडा जीवन में जमीन और जंगल अलग-अलग संसार नहीं थे।
भूमि-सुधार ने कृषि अधिकार को कुछ सुरक्षा दी।
लेकिन औपनिवेशिक वन राज्य अपनी अलग शक्ति के साथ कायम रहा।
में सबसे स्पष्ट कानूनी उपलब्धि भूमि पर हुई।
वन प्रश्न काफी हद तक आगे की पीढ़ियों के लिए बचा रहा।
महिलाओं का उलगुलान
बिरसा की कहानी यदि केवल पुरुष योद्धाओं की कथा बन जाए तो वह अधूरी है।
इनसे स्पष्ट है कि उलगुलान परिवार और समुदाय के स्तर पर चला।
और कुछ प्रसंगों में प्रत्यक्ष हथियारबंद प्रतिरोध
लेकिन आंदोलन ने महिलाओं के स्वतंत्र भूमि-अधिकार का आधुनिक कार्यक्रम नहीं दिया।
समुदाय की स्वायत्तता की मांग और लैंगिक समानता की मांग एक नहीं थीं।
यह उलगुलान की महत्वपूर्ण सामाजिक सीमा है।
सामाजिक आधार की सीमा
बिरसा आंदोलन का मुख्य आधार मुंडा समाज था।
इसीलिए उसकी राजनीतिक भाषा इतनी शक्तिशाली और स्पष्ट थी।
लेकिन यह व्यापक बहुजातीय किसान गठबंधन नहीं बन सका।
एक स्थायी साझा कार्यक्रम में जुड़ते—
आंदोलन की क्षेत्रीय सीमा
संथाल हूल की तुलना में उलगुलान का भौगोलिक पैमाना छोटा था।
उसकी प्रमुख शक्ति खूंटी और आसपास के मुंडा क्षेत्रों में केंद्रित रही।
औपनिवेशिक राज्य के लिए इससे विद्रोही भूगोल को अलग करना अपेक्षाकृत आसान हुआ।
राष्ट्रीय स्तर का समर्थन नेटवर्क नहीं था।
शहरी प्रेस और संगठित अखिल भारतीय राजनीतिक नेतृत्व का सहयोग नहीं।
इसलिए सरकार पूरे साम्राज्य के बजाय एक सीमित क्षेत्र में सैन्य और प्रशासनिक संसाधन केंद्रित कर सकी।
कोल विद्रोह से क्या विरासत मिली?
1831–32 के कोल विद्रोह ने छोटानागपुर में यह स्थापित किया था कि—
बाहरी भूमि हस्तक्षेप बड़े सशस्त्र विस्फोट में बदल सकता है।
उलगुलान उसी दीर्घ परंपरा का उत्तराधिकारी था।
लेकिन बिरसा के समय तक प्रतिरोध अधिक वैचारिक हो चुका था।
संथाल हूल से सबसे गहरी समानता
1855–56 का संथाल हूल और 1899–1900 का उलगुलान एक महत्वपूर्ण साझा प्रश्न पर खड़े थे—
जिसने धरती को खेती योग्य बनाया, वास्तविक अधिकार किसका?
दोनों में औपनिवेशिक सत्ता को हटाकर समानांतर राजनीतिक अधिकार की कल्पना हुई।
और दोनों के बाद सरकार को विशेष प्रशासनिक/कानूनी उपाय करने पड़े।
लेकिन हूल और उलगुलान एक नहीं
उसमें दसियों हजार लोगों की लामबंदी और बड़े क्षेत्र में लंबा युद्ध हुआ।
खूंटकट्टी की अत्यंत विशिष्ट भूमि व्यवस्था
और एक विकसित धार्मिक–करिश्माई केंद्रीकरण।
तीन विद्रोह, एक औपनिवेशिक पाठ
तीनों के बाद ब्रिटिश राज्य ने अंततः वही मूल पाठ सीखा—
आदिवासी भू-संबंध केवल राजस्व व्यवस्था नहीं हैं।
तो आर्थिक प्रशासन राजनीतिक विद्रोह पैदा करेगा।
यही कारण है कि आदिवासी क्षेत्रों में औपनिवेशिक शासन बार-बार विशेष कानून और विशेष प्रशासन की ओर गया।
दोनों।
यदि इसे केवल आदिवासी विद्रोह कहेंगे तो—
उलगुलान इन दोनों श्रेणियों की सीमा को तोड़ता है।
वर्ग और समुदाय का अद्वितीय मेल
लेकिन उसके भीतर आर्थिक संघर्ष स्पष्ट था।
यानी आर्थिक वर्ग-संबंध जातीय–सांस्कृतिक भाषा में व्यक्त हुए।
इसीलिए इसे केवल ‘जातीय विद्रोह’ या ‘वर्ग संघर्ष’ में से किसी एक में बंद नहीं किया जा सकता।
उलगुलान की वास्तविक राजनीति दोनों का अंतर्संबंध थी।
क्या उलगुलान ‘पूर्व-राजनीतिक’ था?
पुराने औपनिवेशिक और कुछ प्रारंभिक सामाजिक सिद्धांत धार्मिक आदिवासी आंदोलनों को ‘primitive’, ‘millenarian’ या पूर्व-राजनीतिक कहने की प्रवृत्ति रखते थे।
बिरसा आंदोलन इसका शक्तिशाली प्रतिवाद है।
इससे अधिक राजनीतिक प्रश्न क्या होगा?
इसलिए धार्मिक भाषा उसकी राजनीति का अभाव नहीं थी।
‘मिलेनरियन’ व्याख्या की उपयोगिता और सीमा
वर्तमान व्यवस्था के शीघ्र अंत का विश्वास—
इन कारणों से उलगुलान में मसीहाई तत्व स्पष्ट हैं।
लेकिन यदि पूरा आंदोलन केवल ‘millenarian’ कहा जाए तो—
इसलिए धर्म को वास्तविक कृषि इतिहास से अलग करना गलत है।
बिरसा की भविष्यवाणी इसलिए शक्तिशाली थी क्योंकि—
उलगुलान की सबसे बड़ी वैचारिक उपलब्धि
भारतीय कृषक इतिहास में बिरसा का सबसे महत्वपूर्ण योगदान संभवतः यह है कि उन्होंने प्रश्न को इस स्तर तक पहुंचाया—
राज भी हमारा होना चाहिए।
यानी भूमि-अधिकार और राजनीतिक संप्रभुता अलग नहीं।
यदि अंतिम निर्णय बाहर की सत्ता करे—
तो जमीन पर स्थानीय अधिकार हमेशा असुरक्षित रहेगा।
यह विचार उन्नीसवीं सदी के ग्रामीण आदिवासी आंदोलन के लिए अत्यंत उन्नत राजनीतिक निष्कर्ष था।
भूमि के भविष्य का फैसला कौन करेगा?
या वह समुदाय जिसका सामाजिक अस्तित्व उस भूभाग से जुड़ा है?
यही कारण है कि बिरसा का इतिहास केवल अतीत नहीं।
वह आधुनिक भूमि और आदिवासी स्वशासन बहसों की ऐतिहासिक जड़ है।
संरक्षण और स्वशासन में अंतर
बिरसा की राजनीति इससे आगे पूछती थी—
राज्य को अंतिम निर्णायक अधिकार मिला किससे?
स्वशासन में समुदाय स्वयं राजनीतिक अधिकार रखता है।
इसीलिए CNT Act महत्वपूर्ण होने के बावजूद ‘अबुआ राज’ नहीं था।
उलगुलान का यह अधूरा प्रश्न आज भी बना हुआ है।
बिरसा की स्मृति और आधुनिक झारखंड
आगे बीसवीं सदी में झारखंडी अस्मिता ने बिरसा को अपनाया।
लेकिन आधुनिक अलग झारखंड राज्य की मांग को सीधे बिरसा का वही राजनीतिक कार्यक्रम कहना उचित नहीं।
बिरसा का संदर्भ उन्नीसवीं सदी का मुंडा क्षेत्र और भूमि स्वशासन था।
की आधुनिक भाषा में पुनर्परिभाषित किया।
यह स्मृति का स्वाभाविक राजनीतिक विकास है—
लेकिन ऐतिहासिक बिरसा और स्मृति के बिरसा को अलग रखना चाहिए।
क्या बिरसा की राष्ट्रीय स्मृति उनकी स्थानीय राजनीति को ढक सकती है?
जब बिरसा को केवल ‘राष्ट्रीय स्वतंत्रता सेनानी’ कहा जाता है तो सम्मान बढ़ता है—
लेकिन खतरा है कि उनका मूल प्रश्न गायब हो जाए।
इसलिए बिरसा को भारतीय स्वतंत्रता इतिहास में शामिल करते समय उनकी विशिष्ट आदिवासी–कृषक राजनीति को मिटाना नहीं चाहिए।
उन्हें महान बनाने के लिए उन्हें किसी दूसरे आंदोलन की भाषा उधार देने की जरूरत नहीं।
बिरसा एक आधुनिक लोकतांत्रिक नेता नहीं थे—फिर भी राजनीतिक रूप से आधुनिक थे
उनके पास आधुनिक लोकतंत्र का कार्यक्रम नहीं।
लेकिन उनका आंदोलन एक आधुनिक राजनीतिक कार्य कर रहा था—
वह सत्ता की वैधता का स्रोत बदल रहा था।
धरती, इतिहास और समुदाय हमें अधिकार देते हैं।
यही राजनीतिक आधुनिकता का एक वैकल्पिक रूप है।
उलगुलान की सबसे बड़ी सामाजिक उपलब्धि : आत्मसम्मान
भूमि-कानून से भी पहले एक परिवर्तन समुदाय के भीतर हुआ।
हमारे पूर्वज इस भूमि के निर्माता हैं।
सामुदायिक आत्मसम्मान।
यह किसी भी कानून से अधिक दीर्घजीवी हो सकता है।
क्या बिरसा की मृत्यु से बिरसाइत धर्म समाप्त हुआ?
वह व्यापक मुंडा समाज का एकमात्र धर्म नहीं बना।
मुंडा उलगुलान की संक्षिप्त समयरेखा
मुंडा उलगुलान ने खूंटकट्टी भूमि-अधिकार, जंगल, श्रम, धर्म और स्वशासन को एक साझा राजनीतिक प्रश्न में बदला। उसकी हिंसक कार्रवाइयों का महिमामंडन और औपनिवेशिक दमन की उपेक्षा—दोनों इतिहास को अधूरा बनाते हैं। आंदोलन तत्काल ‘अबुआ राज’ स्थापित नहीं कर सका, किंतु उसने औपनिवेशिक प्रशासन को भूमि-सर्वेक्षण और काश्तकारी संरक्षण की दिशा में धकेला। 1908 का कानून केवल उलगुलान का प्रत्यक्ष परिणाम नहीं था, फिर भी बिरसा के संघर्ष ने भूमि-विमर्श को निर्णायक नैतिक और राजनीतिक शक्ति दी।
प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक स्रोत
स्रोत-सावधानी: उलगुलान के अधिकांश समकालीन लिखित वृत्तांत औपनिवेशिक अधिकारियों, पुलिस, अदालत और मिशनरियों ने तैयार किए। बिरसा के जन्म-वर्ष, सैल रकाब की मृत्यु-संख्या, गिरफ्तारी की परिस्थितियों और कानून से कारणात्मक संबंध पर स्रोतगत मतभेद हैं; मुंडा मौखिक स्मृति तथा आधुनिक शोध को सरकारी अभिलेखों के साथ आलोचनात्मक रूप से पढ़ा गया है।