मोपला आंदोलन / मालाबार विद्रोह (1921)
कृषक असंतोष, औपनिवेशिक-विरोध, खिलाफत उभार और सांप्रदायिक हिंसा के बीच एक संतुलित ऐतिहासिक अध्ययन
1921 का मोपला आंदोलन किसी एक कारण या एक स्थिर चरित्र वाली घटना नहीं था। मालाबार की असुरक्षित किरायेदारी और दीर्घ कृषक असंतोष, ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध, खिलाफत-असहयोग की जन-लामबंदी और बाद के चरणों की हिंदू-विरोधी हिंसा—इन सभी को साथ रखे बिना इसकी ईमानदार व्याख्या संभव नहीं है। यह अध्ययन न औपनिवेशिक दमन को छिपाता है, न हत्याओं, लूट, विस्थापन और जबरन धर्मांतरण के पीड़ित अनुभव को।
भूमिका — भारतीय किसान आंदोलनों में मोपला आंदोलन का स्थान
भारतीय किसान आंदोलनों के इतिहास में 1921 का मोपला या माप्पिला आंदोलन एक ऐसी घटना है, जिसे किसी एक परिभाषा में बांधकर समझना कठिन है। यह किसान असंतोष था, औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध विद्रोह था, खिलाफत और असहयोग आंदोलन से प्रभावित राजनीतिक उभार था और अपने एक चरण में गंभीर सांप्रदायिक हिंसा का भी रूप ले गया। यही बहुस्तरीय चरित्र इसे चंपारण, खेड़ा, बारदोली, पाबना या दक्कन के किसान आंदोलनों से अलग करता है।
मालाबार में 1921 का विस्फोट अचानक पैदा नहीं हुआ था। उसकी जड़ें उन्नीसवीं सदी तक जाती हैं। ब्रिटिश शासन के दौरान भूमि और किरायेदारी संबंधों में आए बदलाव, जेनमी भू-स्वामियों की मजबूत कानूनी स्थिति, किरायेदारों की असुरक्षा, ऊंचे किराए और बेदखली के खतरे ने ग्रामीण समाज में लंबे समय से असंतोष पैदा कर रखा था। आधुनिक अध्ययनों में भी मालाबार को उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के आरंभ में तीव्र कृषक संघर्ष वाले क्षेत्रों में गिना गया है। ऑक्सफोर्ड के एक अध्ययन में मालाबार के ग्रामीण समाज में लगातार बने असंतोष तथा 1836 से 1921 तक जेनमी और औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध मोपला कृषकों के संघर्ष को इसी दीर्घकालीन कृषक प्रक्रिया का हिस्सा माना गया है।
इसलिए 1921 को समझने के लिए केवल उस वर्ष की घटनाओं को देखना पर्याप्त नहीं है। 1836 से 1919 के बीच मालाबार में मोपलाओं के अनेक हिंसक उभार हो चुके थे। ब्रिटिश अधिकारियों ने लंबे समय तक इन्हें धार्मिक कट्टरता और कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में देखा, लेकिन प्रशासन के भीतर भी धीरे-धीरे यह समझ विकसित हुई कि भूमि संबंधों और कृषक असंतोष की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है। विशेष रूप से मालाबार के कलेक्टर रहे विलियम लोगन ने भूमि व्यवस्था और किरायेदारी संबंधों को समस्या की महत्वपूर्ण जड़ माना।
मालाबार के कृषक प्रश्न को समझने के लिए वहां की भूमि संरचना महत्वपूर्ण है। मोटे तौर पर इसके कई स्तर थे। सबसे ऊपर जेनमी थे, जिन्हें ब्रिटिश कानूनी व्यवस्था में भू-स्वामी के रूप में अत्यंत मजबूत अधिकार मिले। उनके नीचे विभिन्न प्रकार के मध्यवर्ती किरायेदार और फिर वास्तविक खेती करने वाले कृषक थे। दक्षिण मालाबार के एरनाड और वल्लुवनाड जैसे क्षेत्रों में गरीब मोपला कृषकों की बड़ी आबादी इसी असुरक्षित ग्रामीण संरचना में थी।
समस्या केवल लगान की मात्रा नहीं थी। किरायेदारी की असुरक्षा, पट्टे के नवीनीकरण से जुड़े भुगतान, बेदखली और भूमि पर स्थायी अधिकार का अभाव भी असंतोष के कारण थे। इसीलिए मालाबार में किरायेदारी सुधार की मांग धीरे-धीरे राजनीतिक प्रश्न बनती गई। शोध बताता है कि स्थायी किरायेदारी सुरक्षा अंततः काफी बाद में, 1930 के Malabar Tenancy Act के साथ मजबूत कानूनी रूप में आई।
यही वह बिंदु है जहां मोपला आंदोलन भारतीय किसान आंदोलनों की व्यापक परंपरा से जुड़ता है। बंगाल के पाबना आंदोलन में किसान किरायेदारी अधिकारों और मनमानी वसूली के विरुद्ध संगठित हुए थे। दक्कन के कृषक ऋण और साहूकारी व्यवस्था से परेशान थे। चंपारण में नील की बाध्यकारी खेती और बागान मालिकों के शोषण का प्रश्न था। खेड़ा में फसल खराब होने के बावजूद राजस्व वसूली संघर्ष का कारण बनी। उसी तरह मालाबार में भूमि, किराया, बेदखली और कृषक अधिकार असंतोष के केंद्रीय तत्व थे।
लेकिन मालाबार की सामाजिक संरचना में एक ऐसी विशेषता थी जिसने इस संघर्ष को असाधारण रूप से संवेदनशील बना दिया। अनेक जेनमी उच्च जाति के हिंदू थे, जबकि विद्रोही कृषकों का बड़ा हिस्सा मोपला मुसलमान था। इस कारण आर्थिक और सामाजिक संघर्ष के ऊपर धार्मिक पहचान की एक दूसरी परत मौजूद थी। जब संघर्ष हिंसक हुआ, तब कई स्थानों पर वर्ग और धार्मिक पहचान एक-दूसरे में उलझ गईं।
किसान प्रश्न से राष्ट्रीय राजनीति का मिलन
बीसवीं सदी के दूसरे दशक के अंत तक मालाबार का स्थानीय कृषक प्रश्न राष्ट्रीय राजनीति से जुड़ने लगा। 1919–20 के बाद खिलाफत आंदोलन और गांधी के असहयोग आंदोलन ने इस प्रक्रिया को तेजी दी।
1920 में मंजेरी में हुए जिला राजनीतिक सम्मेलन में किरायेदारी सुधार का प्रश्न महत्वपूर्ण रूप से सामने आया। किरायेदारी कानून की मांग का प्रस्ताव भी पारित हुआ। इसी समय खिलाफत का प्रश्न राजनीतिक लामबंदी का महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा था। गांधी और शौकत अली के मालाबार दौरे ने असहयोग और खिलाफत अभियान को और गति दी। इसके बाद कांग्रेस, खिलाफत और किरायेदारी संबंधी गतिविधियां कई स्थानों पर एक-दूसरे से जुड़ने लगीं।
इसका परिणाम यह हुआ कि जो असंतोष पहले स्थानीय जमींदार-किरायेदार संबंधों में व्यक्त होता था, उसे अब एक व्यापक राजनीतिक भाषा मिली—किरायेदारी अधिकार, खिलाफत, असहयोग और स्वराज एक ही राजनीतिक वातावरण में चर्चा के विषय बन गए।
यहीं मोपला आंदोलन और अन्य किसान आंदोलनों के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर उभरता है।
चंपारण में गांधी के नेतृत्व ने कृषक असंतोष को नियंत्रित सत्याग्रह में बदला। खेड़ा में भी आंदोलन संगठित नेतृत्व और अहिंसक अनुशासन के भीतर रहा। लेकिन मालाबार में राष्ट्रीय आंदोलन से उत्पन्न राजनीतिक ऊर्जा अंततः कांग्रेस और खिलाफत नेतृत्व के नियंत्रण से बाहर निकल गई।
अगस्त 1921 : राजनीतिक आंदोलन से सशस्त्र विद्रोह तक
अगस्त 1921 में पुलिस कार्रवाई और खिलाफत नेताओं के विरुद्ध कदमों के बाद तनाव विस्फोटक हो गया। तिरुरंगाडी और आसपास की घटनाओं के बाद विद्रोह तेजी से एरनाड और वल्लुवनाड के क्षेत्रों में फैल गया।
प्रारंभिक चरण में विद्रोहियों का निशाना ब्रिटिश प्रशासन के प्रतीक भी बने। पुलिस थानों, सरकारी कार्यालयों, अदालतों और अन्य प्रतिष्ठानों पर हमले हुए और कुछ स्थानों पर औपनिवेशिक प्रशासन अस्थायी रूप से निष्क्रिय हो गया। आधुनिक अध्ययनों में इस शुरुआती चरण के स्पष्ट औपनिवेशिक-विरोधी तत्व को स्वीकार किया गया है।
लेकिन आंदोलन इसी स्वरूप में नहीं रहा।
कुछ क्षेत्रों में हिंदुओं पर हमले, हत्या, संपत्ति की लूट, मंदिरों को क्षति, विस्थापन और जबरन धर्मांतरण की घटनाएं सामने आईं। इस कारण आंदोलन की प्रकृति को लेकर उस समय भी तीखा विवाद पैदा हुआ और बाद के इतिहासलेखन में भी यह विवाद बना रहा। बी. आर. नंदा के अध्ययन में भी इस परिवर्तन की ओर ध्यान दिलाया गया है—आरंभिक विद्रोह को ब्रिटिश-विरोधी माना गया, लेकिन हिंदुओं और हिंदू धार्मिक स्थलों पर हमलों के बाद उसका स्वरूप गंभीर रूप से बदल गया।
इस तथ्य को किसान आंदोलन की व्याख्या के नाम पर कम करके नहीं देखा जा सकता।
साथ ही यह कहना भी ऐतिहासिक रूप से अधूरा होगा कि भूमि और कृषक असंतोष की कोई भूमिका ही नहीं थी और पूरी घटना अचानक केवल धार्मिक कारणों से उत्पन्न हुई। विद्रोह से पहले मालाबार में दशकों से चले आ रहे कृषक संघर्ष और किरायेदारी विवाद इसके महत्वपूर्ण पूर्ववर्ती कारण थे।
मालाबार का भूगोल, समाज और अर्थव्यवस्था
1921 के मोपला आंदोलन को समझने के लिए सबसे पहले उस मालाबार को समझना आवश्यक है, जिसमें यह विद्रोह पैदा हुआ। मालाबार केवल एक प्रशासनिक जिला नहीं था। वह अरब सागर से पश्चिमी घाट तक फैला हुआ ऐसा ऐतिहासिक क्षेत्र था, जहां समुद्री व्यापार, कृषि, जाति व्यवस्था, भूमि स्वामित्व, हिंदू-मुस्लिम सामाजिक संबंध और औपनिवेशिक शासन सदियों से एक-दूसरे को प्रभावित करते आए थे।
1921 के विद्रोह का मुख्य क्षेत्र संपूर्ण मालाबार नहीं था। इसका सर्वाधिक तीव्र प्रभाव दक्षिण मालाबार के एरनाड और वल्लुवनाड तालुकों में दिखाई दिया। यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि मालाबार के सभी मोपला मुसलमानों ने विद्रोह में भाग नहीं लिया और न ही पूरे क्षेत्र की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां एक जैसी थीं। इतिहासकार रॉबर्ट एल. हार्डग्रेव के अध्ययन में भी इस क्षेत्रीय अंतर को महत्वपूर्ण माना गया है।
इसलिए मालाबार के भूगोल से शुरुआत करना केवल भौगोलिक परिचय नहीं, बल्कि इस प्रश्न का पहला उत्तर है कि 1921 का विस्फोट विशेष रूप से एरनाड और वल्लुवनाड में ही इतना तीव्र क्यों हुआ।
अरब सागर और पश्चिमी घाट के बीच मालाबार
ऐतिहासिक मालाबार भारत के दक्षिण-पश्चिमी समुद्र तट पर स्थित था। पश्चिम में अरब सागर और पूर्व में पश्चिमी घाट ने इसकी प्राकृतिक सीमाएं निर्धारित कीं। वर्तमान प्रशासनिक मानचित्र को सीधे 1921 पर लागू करना ठीक नहीं होगा, क्योंकि उस समय मालाबार आज के केरल राज्य का हिस्सा नहीं, बल्कि ब्रिटिश भारत की मद्रास प्रेसिडेंसी का मालाबार जिला था।
इस भौगोलिक स्थिति ने मालाबार को दो अलग लेकिन परस्पर जुड़े संसार दिए।
एक ओर समुद्र था, जिसने इसे अरब प्रायद्वीप और हिंद महासागर के व्यापारिक संसार से जोड़ा।
दूसरी ओर पहाड़ी और ग्रामीण आंतरिक क्षेत्र था, जहां कृषि, भूमि-अधिकार और जमींदार-किरायेदार संबंध सामाजिक जीवन को निर्धारित करते थे।
यही कारण है कि तटीय मालाबार और आंतरिक दक्षिण मालाबार की अर्थव्यवस्था तथा सामाजिक संरचना में महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है।
तटवर्ती नगरों के अनेक मोपला व्यापारी अपेक्षाकृत संपन्न थे और अरब सागर के पार व्यापारिक संपर्क रखते थे, जबकि आंतरिक क्षेत्रों के बहुत से मोपला खेती और कृषि श्रम पर निर्भर थे। आधुनिक शोध भी इस सामाजिक-आर्थिक अंतर को रेखांकित करता है।
इस अंतर को ध्यान में रखना इसलिए जरूरी है क्योंकि यदि सभी मोपलाओं को एक समान गरीब कृषक समुदाय मान लिया जाए, तो 1921 की सामाजिक पृष्ठभूमि की तस्वीर गलत बन जाएगी।
मालाबार भारत के सर्वाधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में था। दक्षिण-पश्चिम मानसून यहां की कृषि और जीवन का आधार था। धान निचले तथा जलयुक्त क्षेत्रों की महत्वपूर्ण खाद्य फसल थी, जबकि नारियल, सुपारी, काली मिर्च और अन्य व्यापारिक कृषि उत्पाद स्थानीय अर्थव्यवस्था को समुद्री व्यापार से जोड़ते थे।
मालाबार का कृषि उत्पादन केवल स्थानीय उपभोग के लिए नहीं था। यह क्षेत्र बहुत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय व्यापार में शामिल था। काली मिर्च और अन्य कृषि उत्पादों ने मालाबार को यूरोपीय तथा पश्चिम एशियाई व्यापारियों के लिए आकर्षण का केंद्र बनाया था। आर्थिक इतिहासकार थॉमस डब्ल्यू. शिया ने मालाबार को दो हजार वर्षों से यूरोप की ओर विभिन्न कृषि उत्पादों का महत्वपूर्ण निर्यातक क्षेत्र बताया है।
यह एक महत्वपूर्ण विरोधाभास पैदा करता था।
क्षेत्र कृषि और व्यापार की दृष्टि से समृद्ध था, लेकिन उस संपदा का वितरण अत्यंत असमान था।
व्यापारिक कृषि की समृद्धि का अर्थ यह नहीं था कि वास्तविक खेती करने वाला कृषक भी संपन्न था। भूमि पर अधिकार और कृषि उत्पादन से मिलने वाले लाभ की संरचना अलग-अलग स्तरों में बंटी हुई थी।
यही आर्थिक विरोधाभास आगे चलकर कृषक असंतोष की महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि बना।
मालाबार में भूमि केवल उत्पादन का साधन नहीं थी। भूमि सामाजिक प्रतिष्ठा, राजनीतिक प्रभाव और जातीय-सामाजिक शक्ति का आधार भी थी।
यहां की भूमि व्यवस्था को समझने के लिए तीन शब्द विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं—
इनका विस्तृत अध्ययन आगे भूमि व्यवस्था वाले स्वतंत्र अध्याय में किया जाएगा, लेकिन सामाजिक पृष्ठभूमि समझने के लिए इनका संक्षिप्त परिचय आवश्यक है।
मोपला/माप्पिला समुदाय — उत्पत्ति और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
1921 के मोपला आंदोलन को समझने के लिए उस समुदाय के इतिहास को जानना आवश्यक है, जिसने इस विद्रोह में केंद्रीय भूमिका निभाई। मोपला, अधिक सटीक रूप में माप्पिला (Mappila), मालाबार के मलयाली भाषी मुस्लिम समुदाय के लिए प्रचलित नाम है। इसका इतिहास भारत में इस्लाम के आगमन की उस धारा से जुड़ा है, जो उत्तर-पश्चिम से हुई सैन्य विजयों से भिन्न थी। मालाबार में इस्लाम का प्रारंभिक प्रसार मुख्यतः हिंद महासागर के समुद्री व्यापार, अरब व्यापारियों के संपर्क, स्थानीय सामाजिक संबंधों और धीरे-धीरे हुए धर्मांतरण से जुड़ा था।
इस तथ्य का विशेष महत्व है। आठवीं सदी में सिंध पर अरब विजय अथवा बाद के तुर्क-अफगान आक्रमणों से पहले ही अरब और पश्चिमी एशियाई व्यापारी भारत के पश्चिमी समुद्री तट से संपर्क रखते थे। इस्लाम के उदय के बाद इन्हीं पुराने व्यापारिक मार्गों से मुस्लिम व्यापारी मालाबार पहुंचते रहे। समय के साथ उनका स्थानीय समाज से संपर्क बढ़ा और एक विशिष्ट मलयाली मुस्लिम समुदाय विकसित हुआ।
लेकिन माप्पिला समुदाय की उत्पत्ति को लेकर इतिहास, परंपरा और लोकस्मृति कई स्थानों पर एक-दूसरे में घुली हुई हैं। इसलिए उपलब्ध प्रमाणों और बाद की धार्मिक परंपराओं में अंतर करना आवश्यक है।
‘माप्पिला’ शब्द की व्युत्पत्ति पर पूर्ण सहमति नहीं है।
अलग-अलग विद्वानों ने इसके अर्थ और उत्पत्ति के संबंध में विभिन्न मत प्रस्तुत किए हैं। इसे कभी विदेशी अथवा सम्मानित आगंतुक से जुड़ी स्थानीय उपाधि माना गया, तो कभी विवाह-संबंध के अर्थ में प्रयुक्त मलयालम शब्द से जोड़ा गया। ऐतिहासिक रूप से यह शब्द केवल मुसलमानों के लिए ही प्रयुक्त नहीं हुआ; केरल के कुछ अन्य समुदायों के नामों में भी ‘माप्पिला’ का प्रयोग मिलता है।
इसलिए यह मान लेना कि ‘माप्पिला’ शब्द अपने आरंभ से ही केवल मुस्लिम धार्मिक पहचान का पर्याय था, सावधानी की मांग करता है।
औपनिवेशिक अभिलेखों और अंग्रेजी साहित्य में इसे प्रायः Moplah लिखा गया। आधुनिक शोध और केरल में सामान्य प्रयोग में Mappila अधिक प्रचलित है। इस अध्ययन में ऐतिहासिक संदर्भ के अनुसार दोनों शब्दों का प्रयोग किया जाएगा, लेकिन जहां समुदाय की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान की चर्चा होगी वहां ‘माप्पिला’ अधिक उपयुक्त है।
इस्लाम से पहले मालाबार और अरब संसार
मालाबार का अरब संसार से संबंध इस्लाम के जन्म से भी पुराना था।
दक्षिण-पश्चिम भारत के मसाले—विशेष रूप से काली मिर्च—प्राचीन काल से पश्चिम एशिया और भूमध्यसागरीय बाजारों में अत्यधिक मूल्यवान थे। अरब व्यापारी हिंद महासागर के मानसूनी समुद्री मार्गों का उपयोग करते हुए भारतीय पश्चिमी तट तक पहुंचते थे।
अरब सागर वास्तव में मालाबार को पश्चिम एशिया से अलग करने वाली बाधा कम और दोनों क्षेत्रों को जोड़ने वाला व्यापारिक मार्ग अधिक था।
यही पुराना संपर्क सातवीं सदी के बाद एक नए धार्मिक आयाम से जुड़ गया।
अरब व्यापारी अब केवल व्यापारी नहीं थे; वे इस्लामी समाज से आने वाले व्यापारी थे। समुद्री व्यापार के साथ उनके धार्मिक और सांस्कृतिक संपर्क भी मालाबार पहुंचे।
माप्पिला समुदाय की उत्पत्ति की ऐतिहासिक भूमि इसी प्रक्रिया में खोजी जानी चाहिए।
क्या इस्लाम पैगंबर मुहम्मद के जीवनकाल में केरल पहुंच गया था?
केरल की मुस्लिम परंपरा में एक प्रसिद्ध कथा चेरामन पेरुमल से संबंधित है।
परंपरा के अनुसार मालाबार के एक चेर शासक ने चंद्रमा के विभाजन का चमत्कार देखा, अरब गया, पैगंबर मुहम्मद से मिला, इस्लाम स्वीकार किया और वापसी के मार्ग में उसकी मृत्यु हो गई। उसके साथ अथवा उसके निर्देश पर आए मुस्लिम धर्मप्रचारकों ने मालाबार में मस्जिदें स्थापित कीं।
इस कथा से कोडुंगल्लूर की प्रसिद्ध चेरामन जुमा मस्जिद की स्थापना भी जोड़ी जाती है।
यह परंपरा केरल के मुस्लिम सामुदायिक इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे प्रमाणित समकालीन इतिहास मानने में कठिनाइयां हैं। उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाण इस कथा के सभी विवरणों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं करते। इसलिए शोध की दृष्टि से दो बातें अलग रखनी चाहिए—
9\.4 मालाबार की भूमि व्यवस्था — जेनमी, कनमदार और कृषक
मोपला आंदोलन की आर्थिक और सामाजिक जड़ों तक पहुंचने के लिए मालाबार की भूमि व्यवस्था को समझना सबसे आवश्यक चरणों में से एक है। 1921 में जो विद्रोह एरनाड और वल्लुवनाड में फूटा, उसकी व्याख्या केवल खिलाफत आंदोलन, धार्मिक लामबंदी अथवा तत्कालीन पुलिस कार्रवाई से नहीं की जा सकती। उसके पीछे भूमि पर अधिकार, किरायेदारी की सुरक्षा, किराए, बेदखली, भूमि में किए गए सुधारों और जेनमी\-किरायेदार संबंधों को लेकर लंबे समय से जमा असंतोष था।
लेकिन मालाबार की भूमि व्यवस्था को सामान्य उत्तर भारतीय ‘जमींदार बनाम किसान’ मॉडल से समझना भी गलत होगा। यहां भूमि पर अधिकार अक्सर कई स्तरों में विभाजित थे। एक ही खेत पर जेनमी, उसके नीचे कनमदार और उसके नीचे वास्तविक खेती करने वाला वेरुमपट्टमदार अलग\-अलग प्रकार के अधिकार रख सकते थे।
औपनिवेशिक शासन ने जब इन परंपरागत संबंधों को ब्रिटिश संपत्ति कानून की श्रेणियों में बांधना शुरू किया, तभी सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन पैदा हुआ। जिस व्यवस्था में अलग\-अलग स्तरों पर प्रथागत अधिकार और दायित्व मौजूद थे, उसमें औपनिवेशिक अदालतों ने यह प्रश्न निर्णायक बना दिया कि आखिर कानूनी मालिक कौन है?
इस प्रश्न का उत्तर ग्रामीण मालाबार की सत्ता\-संरचना को बदलने वाला सिद्ध हुआ।
भूमि पर अधिकार की बहुस्तरीय व्यवस्था
पूर्व\-औपनिवेशिक मालाबार में भूमि पर अधिकार को आधुनिक अर्थ में एक व्यक्ति के पूर्ण और विशिष्ट स्वामित्व के रूप में देखना कठिन है।
एक ही भूमि से कई व्यक्तियों या संस्थाओं के अधिकार जुड़े हो सकते थे।
ऊपरी स्तर पर जेनमी का मूल अथवा सर्वोच्च अधिकार था।
उसके नीचे कनम के आधार पर भूमि रखने वाला व्यक्ति हो सकता था।
और वास्तविक खेती किसी तीसरे कृषक द्वारा की जा सकती थी।
अर्थात भूमि पर स्वामित्व, कब्जा, खेती और आय प्राप्त करने के अधिकार अलग\-अलग हाथों में हो सकते थे।
यही मालाबार की भूमि व्यवस्था की केंद्रीय विशेषता थी।
बाद में ब्रिटिश प्रशासन के सामने कठिनाई यह थी कि यूरोपीय संपत्ति कानून की अपेक्षाकृत स्पष्ट श्रेणियों—मालिक और किरायेदार—में इस बहुस्तरीय व्यवस्था को कैसे रखा जाए।
मलयालम का जन्मम या जेनम &40;janmam&41; शब्द भूमि पर मूल अथवा सर्वोच्च परंपरागत अधिकार से संबंधित था और ऐसा अधिकार रखने वाले को जेनमी &40;janmi&41; कहा जाता था।
जेनमी सामान्यतः भूमि व्यवस्था के शीर्ष पर था।
बड़े जेनमियों में नंबूदरी ब्राह्मण परिवार, नायर अभिजात, मंदिर और अन्य धार्मिक संस्थाएं शामिल थीं। सभी जेनमी समान रूप से विशाल भू\-स्वामी नहीं थे; उनके अधिकार और जोत का आकार अलग\-अलग हो सकता था।
महत्वपूर्ण बात यह है कि पूर्व\-औपनिवेशिक संदर्भ में जेनमी को आधुनिक यूरोपीय अर्थ में ‘absolute proprietor’ मान लेना सावधानी की मांग करता है।
उसके नीचे भूमि पर अन्य लोगों के भी दीर्घकालीन और प्रथागत हित हो सकते थे।
कनमदार भूमि पर लंबे समय से अधिकार रख सकता था।
ब्रिटिश शासन से पहले मालाबार के भूमि संबंध
1921 के मोपला आंदोलन की कृषक पृष्ठभूमि को समझने में एक प्रश्न बार-बार सामने आता है—क्या ब्रिटिश शासन ने मालाबार में कोई नई जमींदारी व्यवस्था पैदा की थी, या उसने पहले से मौजूद भूमि संबंधों को इस प्रकार बदल दिया कि जेनमी और कृषक के बीच शक्ति-संतुलन बिगड़ गया?
जेनमी, कनम और विभिन्न प्रकार की किरायेदारी ब्रिटिशों की बनाई हुई संस्थाएं नहीं थीं। इनकी जड़ें पूर्व-औपनिवेशिक मालाबार के सामाजिक और राजनीतिक ढांचे में थीं। लेकिन ब्रिटिश शासन से पहले भूमि पर अधिकार आधुनिक निजी संपत्ति की तरह किसी एक व्यक्ति के हाथ में केंद्रित नहीं था। अलग-अलग स्तरों पर अलग व्यक्तियों और संस्थाओं के अधिकार, दावे और दायित्व मौजूद थे।
इसीलिए ब्रिटिश शासन से पहले की व्यवस्था को समझे बिना यह कहना अधूरा होगा कि औपनिवेशिक शासन ने मालाबार के कृषक समाज में वास्तव में क्या बदला।
पूर्व-औपनिवेशिक मालाबार — एक राज्य नहीं, अनेक राजनीतिक इकाइयां
ब्रिटिश प्रभुत्व से पहले मालाबार कोई एक केंद्रीकृत राज्य नहीं था।
अलग-अलग कालखंडों में यहां अनेक स्थानीय राजवंश, नाडुवाझी, देशवाझी और छोटे-बड़े राजनीतिक अधिकार केंद्र मौजूद थे। कोझिकोड के सामूतिरी, कोलत्तुनाड के शासक, कन्नूर का अरक्कल घराना और अन्य स्थानीय प्रमुख इस राजनीतिक संरचना का हिस्सा थे।
राजनीतिक अधिकार भी भूमि-अधिकार की तरह कई स्तरों में विभाजित था।
स्थानीय सरदार, मंदिर, ब्राह्मण भू-अधिकारधारी, नायर अभिजात और कृषक समुदाय एक जटिल सामाजिक व्यवस्था में जुड़े हुए थे।
इस संरचना में भूमि पर अधिकार केवल आर्थिक विषय नहीं था।
और स्थानीय राजनीतिक प्रभाव जुड़ा हुआ था।
इसलिए जेनमी को केवल आधुनिक अर्थ में ‘landlord’ कहना उसके पूर्व-औपनिवेशिक स्थान का पूरा अर्थ व्यक्त नहीं करता।
जेनमी का भूमि पर सर्वोच्च अथवा मूल अधिकार स्वीकार किया जाता था। लेकिन यह अधिकार आधुनिक निजी संपत्ति के पूर्ण स्वामित्व जैसा नहीं था।
उसके नीचे भी कई व्यक्तियों के वैध और प्रथागत हित हो सकते थे।
किसी भूमि पर जेनमी का मूल अधिकार था, लेकिन वह भूमि लंबे समय के लिए कनमदार के कब्जे में हो सकती थी।
कनमदार उसे आगे वास्तविक कृषक को दे सकता था।
वास्तविक कृषक वर्षों अथवा पीढ़ियों तक वहां खेती कर सकता था।
इस प्रकार एक ही भूमि पर तीन या उससे अधिक स्तरों के हित मौजूद रह सकते थे।
प्रत्येक स्तर को स्थानीय प्रथा से कुछ अधिकार और कुछ दायित्व प्राप्त होते थे।
इसलिए भूमि को केवल ‘किसकी है?’ पूछकर समझना कठिन था।
मैसूर शासन, टीपू सुल्तान और मालाबार में सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन
मोपला आंदोलन की दूरस्थ पृष्ठभूमि में 1766 से 1792 के बीच मालाबार पर मैसूर के हैदर अली और टीपू सुल्तान का प्रभुत्व एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इस दौर ने मालाबार की राजनीतिक सत्ता, राजस्व व्यवस्था, जेनमी वर्ग, स्थानीय शासकों और विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच संबंधों को प्रभावित किया। 1792 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने मालाबार पर नियंत्रण स्थापित किया, तब उसे वैसी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था नहीं मिली जैसी मैसूर के प्रवेश से पहले थी।
इस काल को समझना इसलिए भी कठिन है क्योंकि टीपू सुल्तान के मालाबार शासन पर इतिहासलेखन अत्यंत विवादास्पद है। एक ओर उन्हें ब्रिटिश विस्तार के विरुद्ध संघर्ष करने वाले शक्तिशाली भारतीय शासक के रूप में देखा जाता है; दूसरी ओर मालाबार और कूर्ग में उनके अभियानों के संदर्भ में जबरन धर्मांतरण, निर्वासन और धार्मिक दमन के गंभीर आरोप मिलते हैं।
इन दोनों तथ्यों को एक-दूसरे का विकल्प बनाने की आवश्यकता नहीं है। टीपू ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रमुख सैन्य प्रतिद्वंद्वी थे और उनके शासन में मालाबार में कठोर सैन्य दमन तथा धर्मांतरण की घटनाओं के प्रमाण भी मिलते हैं। प्रश्न इनके अस्तित्व का कम और इनके पैमाने, कारण तथा स्वरूप का अधिक है।
मैसूर से पहले मालाबार की राजनीतिक स्थिति
अठारहवीं सदी के मध्य तक मालाबार किसी एक केंद्रीकृत सत्ता के अधीन नहीं था। यहां अनेक छोटे-बड़े शासक और स्थानीय प्रमुख थे।
कोझिकोड के सामूतिरी प्रमुख शक्तियों में थे। उत्तर में कोलत्तिरी से जुड़ी सत्ता थी। कन्नूर में मुस्लिम अरक्कल घराना था। पालक्काड और अन्य क्षेत्रों में स्थानीय राजनीतिक शक्तियां मौजूद थीं।
इन राज्यों और स्थानीय सरदारों के बीच संघर्ष होते रहते थे।
इस विखंडन ने मैसूर जैसी अधिक केंद्रीकृत और सैन्य रूप से शक्तिशाली सत्ता के लिए हस्तक्षेप का अवसर पैदा किया।
मालाबार में मैसूर के हस्तक्षेप की प्रारंभिक पृष्ठभूमि स्थानीय राजनीतिक संघर्षों से जुड़ी थी। पालक्काड के शासक ने सामूतिरी के दबाव के विरुद्ध मैसूर से सहायता मांगी।
इस प्रकार मैसूर का मालाबार प्रवेश आरंभ से केवल धार्मिक अथवा विस्तारवादी संघर्ष नहीं था; स्थानीय सत्ता-संघर्ष ने भी उसे रास्ता दिया।
हैदर अली ने धीरे-धीरे मालाबार की राजनीतिक परिस्थितियों में हस्तक्षेप बढ़ाया।
1766 में उन्होंने बड़े सैन्य अभियान के साथ मालाबार पर आक्रमण किया।
यहीं से क्षेत्र के इतिहास का नया चरण शुरू हुआ।
1766 में हैदर अली की सेना ने मालाबार में प्रवेश किया और कोझिकोड तक पहुंच गई।
सामूतिरी की सत्ता इस आक्रमण के सामने टिक नहीं सकी। समकालीन और बाद के विवरणों में सामूतिरी द्वारा अपने महल को आग लगाकर आत्महत्या करने का उल्लेख मिलता है।
हैदर अली का मुख्य उद्देश्य मालाबार के संसाधनों और समुद्री तट पर नियंत्रण स्थापित करना था।
मालाबार आर्थिक दृष्टि से अत्यंत मूल्यवान था।
काली मिर्च और मसालों का व्यापार उसे अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ता था।
पश्चिमी समुद्री तट तक पहुंच मैसूर को रणनीतिक लाभ भी देती थी।
ब्रिटिश आधिपत्य और भूमि व्यवस्था में बदलाव
मालाबार के कृषक इतिहास में 1792 एक निर्णायक विभाजन-रेखा है। तीसरे आंग्ल-मैसूर युद्ध के बाद श्रीरंगपट्टनम की संधि के परिणामस्वरूप मालाबार ईस्ट इंडिया कंपनी के नियंत्रण में आया। इसके साथ केवल शासक नहीं बदला; भूमि, राजस्व, न्याय और संपत्ति-अधिकार को देखने वाली शासन-व्यवस्था भी बदलने लगी।
ब्रिटिशों ने मालाबार में जेनमी, कनम अथवा किरायेदारी जैसी संस्थाओं की रचना नहीं की थी। ये उनसे बहुत पहले मौजूद थीं। औपनिवेशिक शासन का ऐतिहासिक महत्व इस बात में था कि उसने इन पुराने और बहुस्तरीय अधिकारों को अपने राजस्व प्रशासन, संपत्ति संबंधी अवधारणाओं और न्यायालयों के अनुरूप परिभाषित करना शुरू किया।
इस प्रक्रिया में जेनमी के सर्वोच्च परंपरागत अधिकार को आधुनिक स्वामित्व-सदृश कानूनी शक्ति मिली, जबकि कनमदार और वास्तविक कृषक के कई अधिकार प्रथा, दीर्घकालीन कब्जे और स्थानीय सामाजिक मान्यता पर आधारित थे। धीरे-धीरे यह अंतर ग्रामीण सत्ता-संतुलन बदलने लगा।
1921 के मोपला विद्रोह की कृषक पृष्ठभूमि समझने के लिए यही परिवर्तन केंद्रीय महत्व रखता है।
1792 की श्रीरंगपट्टनम संधि के बाद टीपू सुल्तान को अपने राज्य का लगभग आधा भूभाग विजयी शक्तियों को देना पड़ा। मालाबार ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकार में आया।
लेकिन कंपनी को शांत और सुव्यवस्थित प्रांत नहीं मिला।
मैसूर शासन के दशकों ने पुराने राजनीतिक संबंधों को अस्त-व्यस्त कर दिया था।
कई जेनमी और स्थानीय अभिजात पलायन कर चुके थे।
कई क्षेत्रों में भूमि पर वास्तविक कब्जा बदल चुका था।
कनमदार और कृषक वर्षों से भूमि का उपयोग कर रहे थे।
स्थानीय शासक अपनी पुरानी सत्ता वापस चाहते थे।
और ग्रामीण आबादी नई सरकार की नीतियों को लेकर अनिश्चित थी।
कंपनी को सबसे पहले प्रशासन और राजस्व की व्यवस्था स्थापित करनी थी।
ईस्ट इंडिया कंपनी की प्राथमिकता — स्थिर राजस्व
ईस्ट इंडिया कंपनी आधुनिक कल्याणकारी राज्य नहीं थी। वह व्यापारिक कंपनी से क्षेत्रीय साम्राज्य में बदल रही राजनीतिक शक्ति थी।
उसके लिए भूमि राजस्व शासन की वित्तीय रीढ़ था।
और ब्रिटिश साम्राज्यवादी विस्तार के लिए संसाधन चाहिए थे।
इसलिए मालाबार में उसका एक प्रमुख प्रश्न था—
भूमि से निश्चित और नियमित राजस्व कैसे प्राप्त किया जाए?
इसके लिए यह तय करना आवश्यक था कि राजस्व देने के लिए कानूनी रूप से जिम्मेदार कौन होगा।
जमींदार-किसान संबंध और बढ़ता कृषक असंतोष
मालाबार की भूमि व्यवस्था में औपनिवेशिक हस्तक्षेप को समझने के बाद अगला प्रश्न यह है कि इन परिवर्तनों का वास्तविक कृषक के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा। कानून में जेनमी का अधिकार मजबूत होना एक बात थी; गांव में उसका अर्थ क्या था—किराया कितना देना पड़ा, पट्टा कैसे नवीनीकृत हुआ, बेदखली का खतरा कितना वास्तविक था, किसान द्वारा भूमि में किए गए सुधारों का लाभ किसे मिला और विवाद होने पर अदालत तथा पुलिस किस भूमिका में दिखाई दी—इन प्रश्नों से ही कृषक असंतोष की वास्तविक प्रकृति सामने आती है।
मोपला आंदोलन की पृष्ठभूमि में यह अध्याय विशेष महत्व रखता है, क्योंकि यहीं हमें उस प्रक्रिया की कड़ी मिलती है जिसमें भूमि संबंधी निजी शिकायत धीरे-धीरे सामूहिक कृषक असंतोष, जेनमी-विरोध और अंततः औपनिवेशिक राज्य के विरुद्ध हिंसक प्रतिरोध की जमीन तैयार करती दिखाई देती है।
लेकिन यह प्रक्रिया न तो पूरे मालाबार में समान थी, न प्रत्येक जेनमी-किरायेदार संबंध संघर्षपूर्ण था और न प्रत्येक मोपला कृषक विद्रोही बना। क्षेत्रीय और सामाजिक अंतर को ध्यान में रखे बिना 1921 की पृष्ठभूमि को समझना संभव नहीं है।
ग्रामीण कृषक के लिए भूमि केवल उत्पादन का साधन नहीं थी।
उसके परिवार की सामाजिक स्थिति उससे जुड़ी थी।
कुएं अथवा सिंचाई की व्यवस्था की हो सकती थी।
झाड़ियों और जंगल को साफ करके खेती योग्य बनाया हो सकता था।
उसका परिवार वर्षों अथवा पीढ़ियों से उसी स्थान पर रहता आया हो सकता था।
इसलिए भूमि से बेदखली का अर्थ केवल एक आर्थिक अनुबंध समाप्त होना नहीं था।
वह आजीविका, निवेश, घर और सामाजिक सुरक्षा—चारों को एक साथ खोने का खतरा था।
यही कारण है कि किरायेदारी सुरक्षा मालाबार के कृषक प्रश्न का केंद्रीय मुद्दा बनी।
जेनमी और किसान सीधे हमेशा आमने-सामने नहीं थे
‘जमींदार-किसान संबंध’ शब्द से ऐसा लग सकता है कि एक ओर जेनमी और दूसरी ओर सीधे वास्तविक कृषक था।
कई भूमि पर क्रम कुछ इस प्रकार हो सकता था—
जेनमी → कनमदार → उप-किरायेदार → वास्तविक कृषक।
कुछ मामलों में एक से अधिक मध्यवर्ती स्तर मौजूद हो सकते थे।
इसलिए वास्तविक कृषक पर पड़ने वाला आर्थिक भार केवल जेनमी की मांग का परिणाम नहीं होता था। मध्यवर्ती अधिकारधारी भी कृषि अधिशेष में हिस्सा लेते थे।
यही कारण है कि हर कृषक शिकायत को सीधे किसी एक जेनमी के व्यक्तिगत शोषण के रूप में पढ़ना उचित नहीं होगा।
समस्या बड़े पैमाने पर भूमि संबंधों की संरचना में थी।
किसान की सबसे नियमित आर्थिक जिम्मेदारी किराया था।
उन्नीसवीं सदी के मोपला विद्रोह — 1836 से 1890 के दशक तक
1921 का मोपला विद्रोह अचानक पैदा हुई घटना नहीं था। उससे लगभग 85 वर्ष पहले, 1836 से दक्षिण मालाबार में माप्पिला मुसलमानों से जुड़े छोटे-छोटे लेकिन कई बार अत्यंत हिंसक उभारों की एक श्रृंखला शुरू हो चुकी थी। औपनिवेशिक प्रशासन ने इन्हें अलग-अलग समय पर Moplah Outrages, Moplah Outbreaks अथवा ‘fanatical outbreaks’ कहा। आधुनिक इतिहासलेखन में इन्हें कृषक विद्रोह, धार्मिक प्रतिरोध, औपनिवेशिक-विरोध और सामुदायिक संघर्ष—इन सभी कोणों से समझने की कोशिश हुई है। उपलब्ध शोध भी इस बात पर बहस करता है कि धार्मिक विचारधारा और कृषक-सामाजिक परिस्थितियों में किसे कितना महत्व दिया जाए।
इन उभारों को 1921 का केवल ‘पूर्वाभ्यास’ मानना भी उचित नहीं होगा। उन्नीसवीं सदी की अधिकांश घटनाएं सीमित क्षेत्र और सीमित संख्या के लोगों से जुड़ी थीं। इनमें आधुनिक अर्थ में विशाल किसान सेना, अखिल भारतीय राजनीतिक संगठन या व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन नहीं था। फिर भी इन घटनाओं ने दक्षिण मालाबार में प्रतिरोध, धार्मिक शहादत, जेनमी-विरोध और ब्रिटिश सत्ता से मुठभेड़ की एक ऐतिहासिक स्मृति पैदा की, जिसका 1921 की परिस्थितियों पर प्रभाव पड़ा।
आमतौर पर इस श्रृंखला का पहला प्रमुख दर्ज उभार 26 नवंबर 1836 को एरनाड तालुक के पंडलूर क्षेत्र में माना जाता है। उपलब्ध विवरण के अनुसार कल्लिंगल कुंजोलन नामक माप्पिला ने एक स्थानीय व्यक्ति पर हमला किया, जिसकी बाद में मृत्यु हो गई। इसके बाद दक्षिण मालाबार के विभिन्न हिस्सों में लगातार घटनाएं सामने आने लगीं। 1836 से 1853 के बीच लगभग 22 उभारों का उल्लेख मिलता है, इनके अतिरिक्त असफल प्रयास और कथित षड्यंत्र भी थे।
1836 इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसके बाद हिंसा छिटपुट व्यक्तिगत अपराध की श्रेणी से निकलकर औपनिवेशिक प्रशासन के लिए एक पहचानी हुई क्षेत्रीय समस्या बनने लगी।
प्रशासन ने धीरे-धीरे महसूस किया कि एरनाड और आसपास के क्षेत्रों में एक विशिष्ट प्रकार का हिंसक प्रतिरोध बार-बार दोहराया जा रहा है।
उन्नीसवीं सदी के कई मोपला उभारों में एक लगभग परिचित पैटर्न दिखाई देता है।
किसी स्थानीय विवाद, जेनमी से संघर्ष, अपमान, धार्मिक प्रश्न अथवा अन्य शिकायत के बाद कुछ व्यक्ति हथियार उठाते।
वे किसी जेनमी, उसके एजेंट, स्थानीय अधिकारी अथवा विरोधी व्यक्ति पर हमला करते।
इसके बाद हमलावर अक्सर किसी घर, मस्जिद अथवा सुरक्षित स्थान में शरण लेते।
ब्रिटिश पुलिस या सैनिक उन्हें घेरते।
आत्मसमर्पण के बजाय कई विद्रोही अंतिम संघर्ष चुनते।
इस अंतिम चरण ने इन घटनाओं को सामान्य कृषक हिंसा से अलग विशिष्ट चरित्र दिया।
माप्पिला लोकस्मृति में ऐसे हिंसक अभियान और मृत्यु को कई बार धार्मिक शहादत की अवधारणा से अर्थ मिलता था।
विद्रोही जानता था कि कुछ पुलिसकर्मियों अथवा सैनिकों के सामने सीमित हथियारों से लड़ते हुए उसके बचने की संभावना बहुत कम है।
यहीं ब्रिटिश अधिकारियों ने ‘fanaticism’ देखा।
लेकिन आधुनिक इतिहासकारों ने प्रश्न उठाया कि यदि केवल धार्मिक कट्टरता ही कारण थी, तो ऐसे उभार पूरे मुस्लिम मालाबार में क्यों नहीं हुए? वे विशेष रूप से दक्षिण मालाबार के ग्रामीण इलाकों और खासकर एरनाड में क्यों केंद्रित रहे? इसी सवाल ने इतिहासलेखन को कृषक संबंधों और स्थानीय सामाजिक परिस्थितियों की ओर लौटाया।
इन घटनाओं में शामिल लोगों की सामाजिक पृष्ठभूमि महत्वपूर्ण है।
वे सामान्यतः औपनिवेशिक प्रशासन के उच्च पदों पर बैठे लोग नहीं थे।
मोपला उभारों पर ब्रिटिश दमन, विशेष कानून और प्रशासनिक प्रतिक्रिया
उन्नीसवीं सदी के मोपला उभारों ने ब्रिटिश प्रशासन के सामने ऐसी समस्या खड़ी की जिसका समाधान सामान्य पुलिस और आपराधिक कानून से होता दिखाई नहीं दे रहा था। 1836 के बाद दक्षिण मालाबार, विशेषकर एरनाड और वल्लुवनाड में, छोटे समूहों द्वारा किए जाने वाले हिंसक हमलों का एक विशिष्ट पैटर्न सामने आया। कई हमलावर जानते थे कि कार्रवाई के बाद उनका बच निकलना लगभग असंभव है, फिर भी वे आत्मसमर्पण करने के बजाय पुलिस अथवा सैनिकों से अंतिम मुठभेड़ चुनते थे।
औपनिवेशिक शासन के लिए यह सामान्य अपराध से अलग चुनौती थी। दंड का भय उस व्यक्ति को कैसे रोके जो स्वयं मृत्यु के लिए तैयार होकर निकला हो?
इसी प्रश्न ने ब्रिटिश नीति को धीरे-धीरे सामान्य कानून-व्यवस्था से विशेष कानून, हथियार नियंत्रण, संपत्ति जब्ती, सामूहिक आर्थिक दंड, धार्मिक नेतृत्व की निगरानी और अतिरिक्त पुलिस व्यवस्था की ओर धकेला। 1859 के कानून की प्रस्तावना ने स्वयं स्वीकार किया कि सरकार की दृष्टि में सामान्य कानून इन घटनाओं को दबाने के लिए पर्याप्त नहीं था।
यह औपनिवेशिक प्रतिक्रिया इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि 1921 में ब्रिटिश सरकार ने जिन दमनकारी उपायों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया, उनकी प्रशासनिक मानसिकता की जड़ें उन्नीसवीं सदी के इसी अनुभव में थीं।
प्रारंभिक प्रतिक्रिया — इसे सामान्य अपराध मानना
1836 में शुरू हुई घटनाओं के शुरुआती दौर में प्रशासन ने हत्या, हमला और संपत्ति संबंधी अपराधों को सामान्य आपराधिक कानून के तहत नियंत्रित करने की कोशिश की।
लेकिन जल्दी ही समस्या स्पष्ट हो गई।
कुछ मोपला विद्रोही गिरफ्तारी से बचने की कोशिश करने के बजाय हथियार लेकर अंतिम मुठभेड़ के लिए तैयार रहते थे।
ऐसे व्यक्ति के सामने कारावास अथवा मृत्युदंड की धमकी की निवारक क्षमता सीमित थी।
इससे ब्रिटिश प्रशासन के भीतर यह धारणा बनी कि केवल अपराधी को दंड देना पर्याप्त नहीं है; उस सामाजिक वातावरण को भी नियंत्रित करना होगा जिससे ऐसे विद्रोही निकलते हैं।
यहीं से नीति अधिक व्यापक और कठोर होने लगी।
ब्रिटिश शब्दावली — ‘Outrage’ और ‘Fanaticism’
औपनिवेशिक अभिलेखों की भाषा स्वयं इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत है।
ब्रिटिश अधिकारियों ने इन घटनाओं के लिए अक्सर Moplah Outrage और धार्मिक प्रेरणा के लिए fanaticism जैसे शब्दों का प्रयोग किया।
इस शब्दावली का प्रभाव केवल वर्णन तक सीमित नहीं था।
यदि घटना को मुख्यतः कृषक विद्रोह माना जाए, तो सरकार को भूमि संबंधों और किरायेदारी की समीक्षा करनी पड़ती।
यदि इसे धार्मिक ‘fanaticism’ माना जाए, तो समाधान होगा—
और संदिग्ध क्षेत्रों पर अतिरिक्त प्रशासनिक नियंत्रण।
इस प्रकार किसी घटना की प्रशासनिक व्याख्या सीधे सरकारी नीति को प्रभावित कर रही थी।
ब्रिटिश अधिकारियों के सामने दो प्रश्न थे।
दूसरा—नए हमलावर पैदा क्यों हो रहे हैं?
बीसवीं सदी के आरंभ में मालाबार — किरायेदारी सुधार, राजनीतिक जागरण और कृषक संगठन
उन्नीसवीं सदी के मोपला उभारों और उन पर ब्रिटिश दमन के बाद बीसवीं सदी के आरंभ में मालाबार एक महत्वपूर्ण संक्रमण से गुजर रहा था। पुरानी समस्याएं समाप्त नहीं हुई थीं—जेनमी का मजबूत भू-अधिकार, कनमदार और वास्तविक कृषक की असुरक्षा, किराए में वृद्धि, नवीनीकरण शुल्क, मेलचार्थ और बेदखली का भय अब भी मौजूद थे। लेकिन एक चीज बदल रही थी: इन शिकायतों को व्यक्त करने का तरीका।
उन्नीसवीं सदी में असंतोष कई बार छोटे समूहों की हिंसक कार्रवाई में फूटता था। बीसवीं सदी के दूसरे दशक तक उसी सामाजिक धरातल पर सम्मेलन, प्रस्ताव, याचिकाएं, किरायेदार संगठन, प्रेस और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की राजनीति प्रवेश कर रही थी।
यही परिवर्तन 1921 के मोपला विद्रोह की पृष्ठभूमि में निर्णायक है।
अब मालाबार का कृषक प्रश्न केवल जेनमी बनाम किरायेदार का स्थानीय विवाद नहीं रहने वाला था। वह धीरे-धीरे औपनिवेशिक शासन, भारतीय राष्ट्रवाद और अंततः खिलाफत-असहयोग आंदोलन से जुड़ने लगा।
1899–1900 का कानून — सुधार की शुरुआत, समाधान नहीं
पिछले अध्याय में हमने देखा कि लंबे विवाद के बाद सरकार ने Malabar Compensation for Tenants' Improvements Act, 1899 बनाया। इसे गवर्नर की स्वीकृति 4 दिसंबर 1899 और गवर्नर-जनरल की स्वीकृति 3 जनवरी 1900 को मिली। इसने पहले के 1887 के कानून की जगह ली।
इस कानून का मूल सिद्धांत महत्वपूर्ण था।
यदि किसी किरायेदार ने भूमि में सुधार किया है और बाद में उसे बेदखल किया जाता है, तो वह उन सुधारों के लिए मुआवजे का अधिकारी होगा।
‘सुधार’ में ऐसी गतिविधियां शामिल हो सकती थीं जिनसे भूमि का मूल्य अथवा उत्पादकता बढ़ती थी।
कानून ने यह भी व्यवस्था की कि मुआवजे के प्रश्न को अदालत में निर्धारित किया जाए।
पहली नजर में यह कृषक हित में बड़ा परिवर्तन दिखाई देता है।
लेकिन उसकी सीमा भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी।
कानून ने किसान को सुधारों का मूल्य दिया; उसने किसान को भूमि पर स्थायी अधिकार नहीं दिया।
1887 के प्रयोग की विफलता से क्या सीखा गया था?
इससे पहले 1887 में भी किरायेदारों द्वारा किए गए सुधारों के मुआवजे के लिए कानून बनाया गया था। लेकिन उसके बाद सरकार ने पाया कि बेदखली और मुकदमों में अपेक्षित कमी नहीं आई।
1893 में मालाबार के कलेक्टर एच. जी. ब्रैडली से इसके प्रभाव की समीक्षा कराई गई। ब्रैडली ने बताया कि बेदखली और मेलचार्थ की समस्या जारी थी तथा किरायेदारों को वास्तविक सुरक्षा नहीं मिल सकी थी। बाद में व्यापक किरायेदारी कानून पर विचार हुआ, लेकिन वह तत्काल लागू नहीं हो सका और अंततः संशोधित मुआवजा कानून ही 1899–1900 में अस्तित्व में आया।
औपनिवेशिक सरकार को उन्नीसवीं सदी के अंत तक मालूम हो चुका था कि केवल सुधारों का मुआवजा किरायेदारी समस्या का पूर्ण समाधान नहीं है।
किसान की असली मांग — मुआवजा नहीं, सुरक्षा
यदि उसने भूमि में नारियल लगाए, कुआं बनाया अथवा जमीन विकसित की और बेदखली के समय उसे उसका मुआवजा मिल गया, तो उसका निवेश कुछ हद तक सुरक्षित हुआ।
लेकिन उसके सामने इससे बड़ा प्रश्न था—
यही प्रश्न धीरे-धीरे किरायेदारी आंदोलन का केंद्र बना।
खिलाफत आंदोलन का उदय और मालाबार में उसका प्रसार
1921 के मोपला विद्रोह को समझने के लिए खिलाफत आंदोलन की पृष्ठभूमि को अलग से समझना अनिवार्य है। मालाबार में पहले से मौजूद भूमि संबंधी असंतोष, जेनमी-किरायेदार तनाव और ब्रिटिश प्रशासन के प्रति अविश्वास ने विद्रोह की सामाजिक जमीन तैयार की थी; लेकिन 1919–21 में खिलाफत आंदोलन ने माप्पिला ग्रामीण समाज के एक बड़े हिस्से को ऐसी धार्मिक और राजनीतिक लामबंदी से जोड़ा, जिसका दायरा मालाबार से बहुत बाहर था।
यहीं 1921 के इतिहास का एक बड़ा परिवर्तन दिखाई देता है।
उन्नीसवीं सदी का माप्पिला कृषक किसी स्थानीय जेनमी, पुलिस अधिकारी अथवा ब्रिटिश प्रशासन से लड़ सकता था। 1920 तक वही ग्रामीण समाज इस्तांबुल के उस्मानी खलीफा, ब्रिटिश साम्राज्य की पश्चिम एशिया नीति, गांधी के असहयोग आंदोलन और भारत की स्वतंत्रता के प्रश्न से भी जुड़ रहा था।
इस परिवर्तन को केवल ‘धार्मिक उन्माद’ कहना गलत होगा। लेकिन खिलाफत के धार्मिक चरित्र को केवल ब्रिटिश-विरोधी राष्ट्रवाद में विलीन कर देना भी इतिहास को अधूरा करेगा।
मालाबार में खिलाफत एक साथ धार्मिक आस्था, औपनिवेशिक-विरोध, कांग्रेस की जन-राजनीति और स्थानीय कृषक असंतोष से जुड़ गई थी।
‘खिलाफत’ शब्द इस्लामी राजनीतिक परंपरा में खलीफा की संस्था से जुड़ा है।
प्रथम विश्वयुद्ध के समय उस्मानी साम्राज्य का सुल्तान व्यापक सुन्नी मुस्लिम संसार में खलीफा के रूप में भी प्रतिष्ठित था। सभी मुसलमान उसके राजनीतिक अधीन नहीं थे और खलीफा के अधिकार की व्याख्या मुस्लिम समाजों में एक समान नहीं थी, लेकिन भारत के अनेक सुन्नी मुसलमानों के लिए उस्मानी खलीफा का महत्वपूर्ण धार्मिक-प्रतीकात्मक स्थान था।
इसलिए प्रथम विश्वयुद्ध में उस्मानी साम्राज्य का भविष्य भारतीय राजनीति का प्रश्न बन गया।
प्रथम विश्वयुद्ध और उस्मानी साम्राज्य
1914 में प्रथम विश्वयुद्ध शुरू हुआ।
ब्रिटेन, फ्रांस और रूस मित्र राष्ट्रों की ओर थे।
उस्मानी साम्राज्य जर्मनी और उसके सहयोगियों की ओर से युद्ध में उतरा।
इससे ब्रिटिश भारतीय मुसलमानों के सामने एक असहज स्थिति पैदा हुई।
वे ब्रिटिश शासन के अधीन थे, लेकिन ब्रिटेन उस साम्राज्य से युद्ध कर रहा था जिसके सुल्तान को वे खलीफा मानते थे।
युद्ध के दौरान भारतीय मुस्लिम नेतृत्व को चिंता थी कि यदि उस्मानी साम्राज्य पराजित हुआ तो उसके क्षेत्र और खलीफा की राजनीतिक स्थिति का क्या होगा।
1918 में प्रथम विश्वयुद्ध समाप्त हुआ और उस्मानी साम्राज्य पराजित शक्तियों में था।
अब विजयी मित्र राष्ट्रों ने उसके क्षेत्रों के भविष्य का निर्णय करना शुरू किया।
भारतीय मुस्लिम नेतृत्व में यह आशंका बढ़ी कि—
खलीफा की राजनीतिक शक्ति कमजोर होगी,
और इस्लाम के पवित्र स्थलों से जुड़े प्रश्न पर भी यूरोपीय शक्तियों का प्रभाव बढ़ सकता है।
इस चिंता ने भारतीय खिलाफत आंदोलन को जन्म दिया।
कांग्रेस, खिलाफत और असहयोग — मालाबार में संयुक्त राजनीतिक लामबंदी
1920–21 का मालाबार भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में एक असाधारण प्रयोगस्थल बन गया था। यहां तीन अलग-अलग ऐतिहासिक धाराएं लगभग एक ही समय पर एक-दूसरे से मिल रही थीं—कांग्रेस का स्वराज आंदोलन, खिलाफत की धार्मिक-राजनीतिक लामबंदी और मालाबार का पुराना कृषक-किरायेदारी असंतोष।
इन तीनों के उद्देश्य पूरी तरह समान नहीं थे। कांग्रेस ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अहिंसक असहयोग के माध्यम से स्वराज चाहती थी। खिलाफत नेतृत्व उस्मानी खलीफा से संबंधित ब्रिटिश नीति का विरोध कर रहा था। दक्षिण मालाबार का कृषक अपने जीवन में जेनमी, किराया, बेदखली और भूमि-असुरक्षा जैसे अधिक प्रत्यक्ष प्रश्नों से जूझ रहा था।
फिर भी 1920 के बाद कुछ समय के लिए ये तीनों धाराएं एक साझा राजनीतिक मंच पर आ गईं।
यही संयुक्त लामबंदी 1921 के मोपला विद्रोह की तत्काल राजनीतिक पृष्ठभूमि बनी। लेकिन यहां एक तथ्य शुरू में ही स्पष्ट रखना आवश्यक है—कांग्रेस-खिलाफत आंदोलन और बाद में विकसित हिंसक मोपला विद्रोह को एक ही चीज मानना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा। पहला घोषित रूप से अहिंसक असहयोग आंदोलन था; दूसरा अगस्त 1921 के बाद औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह में बदल गया और उसके कुछ चरणों में हिंदुओं के विरुद्ध गंभीर सांप्रदायिक हिंसा भी हुई।
इन दोनों अवस्थाओं के बीच परिवर्तन कैसे हुआ—यही इस अध्याय का केंद्रीय प्रश्न है।
उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में कांग्रेस की मालाबार राजनीति मुख्यतः शिक्षित और संपन्न वर्गों तक सीमित थी। वकील, पेशेवर, स्थानीय प्रतिष्ठित व्यक्ति और कुछ जेनमी उसके सामाजिक आधार का हिस्सा थे।
1916 के बाद होमरूल आंदोलन और जिला राजनीतिक सम्मेलनों ने इस स्थिति को बदलना शुरू किया।
लेकिन निर्णायक मोड़ 1920 के आसपास आया।
और सीमित राजनीतिक सदस्यता से जन-आंदोलन—
मालाबार में इसका सबसे बड़ा संभावित जनाधार कृषक समाज था।
अप्रैल 1920 के मंजेरी जिला राजनीतिक सम्मेलन का महत्व पिछले अध्याय में देखा जा चुका है। यहां किरायेदारों की मांगों को अधिक स्पष्ट राजनीतिक समर्थन मिला।
इससे कांग्रेस और ग्रामीण कृषक समाज के बीच नई निकटता पैदा हुई।
मालाबार में भूमि व्यवस्था का प्रश्न अब केवल अदालत अथवा राजस्व प्रशासन का मामला नहीं था। वह राजनीतिक मंच पर उठने लगा।
इग्नू की कृषक आंदोलनों संबंधी अध्ययन सामग्री भी मंजेरी सम्मेलन को 1921 के आंदोलन की महत्वपूर्ण पूर्वपीठिका मानती है और उल्लेख करती है कि सम्मेलन ने किरायेदारों के पक्ष का समर्थन तथा जेनमी-किरायेदार संबंधों को नियंत्रित करने के लिए कानून की मांग की।
इसका ग्रामीण राजनीति पर दूरगामी प्रभाव पड़ा।
उसी समय खिलाफत आंदोलन ने माप्पिला मुस्लिम समाज को व्यापक राजनीतिक लामबंदी का दूसरा कारण दिया।
ब्रिटिश सरकार ने खलीफा के साथ अन्याय किया है।
ब्रिटिश कानून जेनमी के अधिकार को संरक्षण देता है और मेरी भूमि सुरक्षा अपर्याप्त है।
इन तीनों संदेशों में एक साझा राजनीतिक लक्ष्य बन सकता था—
यही वह बिंदु था जहां स्थानीय शिकायत राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति से जुड़ गई।
जनवरी से अगस्त 1921 — बढ़ता तनाव, सरकारी प्रतिबंध और तिरुरंगाडी की ओर बढ़ता टकराव
1921 के मोपला विद्रोह की शुरुआत को केवल 20 अगस्त 1921 की तिरुरंगाडी पुलिस कार्रवाई से समझना अधूरा होगा। उस दिन जो विस्फोट हुआ, उसकी राजनीतिक और प्रशासनिक परिस्थितियां कई महीनों से बन रही थीं। जनवरी से अगस्त के बीच दक्षिण मालाबार में कांग्रेस-खिलाफत की गतिविधियों का विस्तार, ब्रिटिश प्रशासन की बढ़ती आशंका, सभाओं पर प्रतिबंध, नेताओं के विरुद्ध कार्रवाई, स्वयंसेवकों और पुलिस के टकराव, पूक्कोट्टूर का विवाद और तिरुरंगाडी में अली मुसलियार का बढ़ता प्रभाव—इन सबने मिलकर स्थिति को अत्यंत संवेदनशील बना दिया था।
इस अवधि को समझते समय दो अतियों से बचना आवश्यक है।
पहली यह धारणा कि ब्रिटिश प्रशासन बिना किसी सुरक्षा कारण के केवल शांतिपूर्ण राजनीतिक आंदोलन को कुचल रहा था।
दूसरी यह कि जनवरी 1921 से ही माप्पिला नेतृत्व योजनाबद्ध सशस्त्र विद्रोह की तैयारी कर रहा था।
उपलब्ध साक्ष्य अधिक जटिल तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।
प्रशासन के पास उन्नीसवीं सदी के हिंसक मोपला उभारों का वास्तविक ऐतिहासिक अनुभव था। लेकिन उसी इतिहास के कारण वह 1921 की राजनीतिक गतिविधियों को भी बहुत जल्दी सुरक्षा संकट के रूप में पढ़ने लगा। दूसरी ओर कांग्रेस और खिलाफत नेतृत्व का घोषित कार्यक्रम अहिंसक था, परंतु आंदोलन का ग्रामीण विस्तार इतना तेज था कि उसका नियंत्रण स्थानीय नेतृत्व, धार्मिक प्रतिष्ठा और गांवों की अपनी शिकायतों के हाथ में जाने लगा।
जनवरी से अगस्त 1921 के बीच सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन यही था—राजनीतिक असहमति धीरे-धीरे परस्पर अविश्वास और फिर प्रत्यक्ष टकराव में बदल गई।
जनवरी 1921 : ऊपर से शांत, नीचे से तेजी से बदलता मालाबार
1921 की शुरुआत में दक्षिण मालाबार में कोई व्यापक सशस्त्र विद्रोह नहीं चल रहा था।
लेकिन पिछले एक वर्ष में राजनीतिक वातावरण बहुत बदल चुका था।
मंजेरी सम्मेलन किरायेदारी प्रश्न को राजनीति में ला चुका था।
गांधी और शौकत अली मालाबार का दौरा कर चुके थे।
खिलाफत समितियां गांवों तक पहुंच चुकी थीं।
माप्पिला कृषकों की बड़ी संख्या पहली बार संगठित राजनीतिक गतिविधियों में प्रवेश कर रही थी।
और कांग्रेस तथा खिलाफत के स्थानीय कार्यकर्ता एक साथ काम कर रहे थे।
यानी प्रशासन के सामने अब उन्नीसवीं सदी के छोटे मोपला समूह नहीं बल्कि व्यापक राजनीतिक नेटवर्क था।
प्रशासन को एरनाड और वल्लुवनाड से विशेष भय
पूरे मालाबार को प्रशासन समान दृष्टि से नहीं देखता था।
उन्नीसवीं सदी के अधिकांश हिंसक मोपला उभार इसी व्यापक क्षेत्र में हुए थे।
यहां बड़ी ग्रामीण माप्पिला आबादी थी।
20 अगस्त 1921 — तिरुरंगाडी की पुलिस कार्रवाई, मस्जिद की अफवाह और विद्रोह का विस्फोट
20 अगस्त 1921 मालाबार के इतिहास की निर्णायक तारीख है। इससे पहले कांग्रेस-खिलाफत आंदोलन, कृषक असंतोष और ब्रिटिश प्रशासन के बीच महीनों से तनाव चल रहा था, लेकिन व्यापक सशस्त्र विद्रोह आरंभ नहीं हुआ था। तिरुरंगाडी में 20 अगस्त की पुलिस कार्रवाई ने इस तनाव को खुले विद्रोह में बदल दिया। केरल पुलिस भी तिरुरंगाडी की 20 अगस्त की घटना को माप्पिला विद्रोह के विस्फोट का तात्कालिक बिंदु मानती है।
इस दिन की घटनाओं को लेकर इतिहासलेखन में तीखा विवाद है। औपनिवेशिक अभिलेख पुलिस कार्रवाई को कानून लागू करने और संदिग्ध नेताओं की गिरफ्तारी के प्रयास के रूप में प्रस्तुत करते हैं। राष्ट्रवादी तथा बाद के कुछ स्थानीय विवरण पुलिस के व्यवहार और धार्मिक स्थल में प्रवेश को उकसावे की कार्रवाई मानते हैं। इसके ऊपर सबसे महत्वपूर्ण तत्व था—माम्बुरम अथवा तिरुरंगाडी की मस्जिद को नष्ट या अपवित्र कर दिए जाने की अफवाह।
इसलिए 20 अगस्त को समझते समय तीन चीजों को अलग रखना आवश्यक है—जो पुलिस ने वास्तव में किया, जो स्थानीय लोगों ने समझा कि पुलिस ने किया, और जो खबर आसपास के गांवों में फैल गई।
इन्हीं तीन स्तरों के बीच 1921 का विद्रोह फूटा।
तिरुरंगाडी कार्रवाई अचानक लिया गया निर्णय नहीं था। 18 अगस्त को जिला प्रशासन ने ऐसे व्यक्तियों की सूची तैयार की जिन्हें वह दक्षिण मालाबार में बढ़ते तनाव के लिए महत्वपूर्ण मान रहा था।
कालीकट विश्वविद्यालय की अध्ययन सामग्री के अनुसार जिला मजिस्ट्रेट ई. एफ. थॉमस ने 24 व्यक्तियों को गिरफ्तार करने की सूची तैयार की थी। इनमें खिलाफत और कांग्रेस से जुड़े नेताओं के साथ अली मुसलियार, एम. पी. नारायण मेनन और कट्टिलस्सेरी मुहम्मद मुसलियार जैसे नाम शामिल थे।
इस कार्रवाई की पृष्ठभूमि में जुलाई का पूक्कोट्टूर प्रकरण भी था।
ब्रिटिश प्रशासन की दृष्टि में स्थिति अब केवल राजनीतिक भाषणों की नहीं रही थी। पूक्कोट्टूर में पुलिस कार्रवाई का सामूहिक विरोध हो चुका था और तिरुरंगाडी में अली मुसलियार का प्रभाव बढ़ रहा था।
इसलिए प्रशासन ने नेतृत्व को एक साथ निष्क्रिय करने की रणनीति अपनाई।
लोकप्रिय विवरणों में कई बार यह कहा जाता है कि पुलिस केवल अली मुसलियार को पकड़ने पहुंची थी।
लगभग दो दर्जन प्रमुख व्यक्तियों को पकड़ने का प्रयास था। अली मुसलियार उनमें सबसे महत्वपूर्ण स्थानीय धार्मिक नेताओं में थे, लेकिन कार्रवाई का उद्देश्य कांग्रेस-खिलाफत नेटवर्क के एक बड़े हिस्से को एक साथ निष्क्रिय करना था। कालीकट विश्वविद्यालय के शोध में भी इसे लगभग 24 प्रमुख व्यक्तियों की गिरफ्तारी के लिए किया गया आकस्मिक छापा बताया गया है।
इससे यह समझ आता है कि प्रशासन इतने बड़े बल के साथ क्यों आया।
कार्रवाई गोपनीय ढंग से तैयार की गई।
एक विस्तृत शोध-विवरण के अनुसार 20 अगस्त की रात लगभग एक बजे कोझिकोड के वेस्ट हिल से विशेष ट्रेन चली। सैन्य बल के साथ रिजर्व पुलिस भी अभियान में शामिल थी। दल परप्पनंगाडी पहुंचा और वहां से तिरुरंगाडी की ओर बढ़ा। अलग-अलग रास्तों को नियंत्रित करने और तलाशी में सहायता के लिए अतिरिक्त बल भी लगाया गया।
यह किसी सामान्य गिरफ्तारी वारंट की तामील नहीं थी।
प्रशासन इस संभावना के लिए तैयार था कि गिरफ्तारी का प्रतिरोध हो सकता है।
यही तैयारी दूसरी ओर ग्रामीण समाज को यह संकेत दे सकती थी कि सरकार किसी बड़े दमन अभियान पर उतर आई है।
सुबह होने से पहले बल तिरुरंगाडी पहुंच चुका था।
तिरुरंगाडी से एरनाड और वल्लुवनाड तक — विद्रोह का तीव्र प्रसार और औपनिवेशिक सत्ता का विघटन
20 अगस्त 1921 को तिरुरंगाडी में पुलिस कार्रवाई और उसके बाद हुई हिंसा ने जिस विद्रोह को जन्म दिया, वह किसी एक कस्बे तक सीमित नहीं रहा। अगले कुछ दिनों में वह एरनाड और वल्लुवनाड के बड़े हिस्से में इतनी तेजी से फैला कि कई स्थानों पर ब्रिटिश प्रशासन की सामान्य व्यवस्था लगभग निष्क्रिय हो गई। पुलिस थाने, अदालतें, रजिस्ट्रार कार्यालय, राजस्व प्रतिष्ठान और संचार व्यवस्था निशाना बने; सरकारी दस्तावेज जलाए गए, कोषागारों से धन लिया गया और पुलिस के हथियार विद्रोहियों के हाथ लगे। कालीकट विश्वविद्यालय की अध्ययन सामग्री के अनुसार विद्रोह शीघ्र ही कालीकावु, मलप्पुरम, मंजेरी, पांडिक्काड, तिरूर और पोन्नानी तक फैल गया।
लेकिन ‘विद्रोह फैल गया’ कहना घटनाक्रम की गंभीरता को पूरी तरह व्यक्त नहीं करता।
कुछ ही दिनों में दक्षिण मालाबार में सवाल यह नहीं रह गया था कि पुलिस किसी प्रदर्शन को नियंत्रित कर पाएगी या नहीं। सवाल था—
क्या ब्रिटिश सरकार कुछ क्षेत्रों में अपना सामान्य प्रशासन चला भी सकती है?
अगस्त के अंतिम सप्ताह तक कई स्थानों पर इसका उत्तर लगभग ‘नहीं’ था।
यही 1921 के मोपला विद्रोह को उन्नीसवीं सदी के पुराने मोपला उभारों से अलग करता है। पहले के अधिकांश उभार सीमित समूहों, कुछ गांवों और अपेक्षाकृत कम समय तक चलने वाले हिंसक संघर्ष थे। 1921 में पहली बार विद्रोह ने एक विस्तृत भूभाग में औपनिवेशिक सत्ता के स्थानीय ढांचे को अस्थायी रूप से विघटित करने की क्षमता दिखाई।
20 अगस्त की घटना के बाद दो तरह की खबरें एक साथ गांवों में पहुंचीं।
पुलिस ने तिरुरंगाडी में कार्रवाई की है,
खिलाफत नेताओं की गिरफ्तारी की कोशिश हुई है,
पुलिस और माप्पिला भीड़ के बीच गोलीबारी हुई है,
माम्बुरम अथवा तिरुरंगाडी की मस्जिद नष्ट कर दी गई,
और अंग्रेज अब मुस्लिम धार्मिक संस्थाओं पर हमला कर रहे हैं।
जैसा पिछले अध्याय में देखा गया, मस्जिद ध्वस्त किए जाने की खबर तथ्यात्मक रूप से प्रमाणित नहीं है। लेकिन विद्रोह के प्रसार को समझने के लिए उसका सत्य होना नहीं, लोगों द्वारा सत्य मान लिया जाना निर्णायक था।
एक गांव में पहुंचते-पहुंचते पुलिस कार्रवाई की सूचना धार्मिक आक्रमण की खबर बन सकती थी।
और जिस क्षेत्र में खिलाफत आंदोलन पहले ही महीनों से लोगों को संगठित कर चुका था, वहां इस संदेश की विस्फोटक क्षमता बहुत बड़ी थी।
मोपला विद्रोह पूरे मालाबार में समान रूप से नहीं फैला।
इसके भीतर तिरुरंगाडी, मलप्पुरम, मंजेरी, पूक्कोट्टूर, पांडिक्काड, पेरिंतलमन्ना, कालीकावु, नीलांबुर और आसपास के इलाके प्रमुख केंद्र बने। केरल की आधिकारिक शैक्षिक सामग्री भी एरनाड और वल्लुवनाड को विद्रोह से सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र दिखाती है।
जेनमी-किरायेदार तनाव लंबे समय से मौजूद था,
उन्नीसवीं सदी के अधिकांश मोपला उभार हुए थे,
खिलाफत आंदोलन का ग्रामीण संगठन मजबूत हुआ था,
और ब्रिटिश प्रशासन के प्रति अविश्वास पहले से गहरा था।
इसलिए तिरुरंगाडी की चिंगारी वहीं सबसे तेजी से फैली जहां सामाजिक ईंधन पहले से मौजूद था।
विद्रोह के शुरुआती प्रसार की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी कि विद्रोहियों ने बड़ी संख्या में राज्य की संस्थाओं को निशाना बनाया।
कालीकट विश्वविद्यालय के विवरण में पुलिस थानों, रजिस्ट्रार और ग्राम कार्यालयों, रेलवे स्टेशनों तथा यात्री बंगलों पर हमले, सरकारी रिकॉर्ड जलाने, कोषागारों से धन लेने और हथियार कब्जे में लेने का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
इससे विद्रोह के प्रारंभिक चरित्र का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है।
वारियमकुन्नथ कुंजाहम्मद हाजी — उदय, नेतृत्व और ‘समानांतर शासन’ की ऐतिहासिक वास्तविकता
1921 के मोपला विद्रोह में यदि किसी एक व्यक्ति को लेकर आज सबसे अधिक परस्पर-विरोधी दावे किए जाते हैं, तो वह वारियमकुन्नथ कुंजाहम्मद हाजी हैं। एक इतिहास-धारा उन्हें ब्रिटिश शासन के विरुद्ध लड़ने वाला कृषक और औपनिवेशिक-विरोधी नेता मानती है; दूसरी उन्हें खिलाफत के नाम पर इस्लामी शासन स्थापित करने और हिंदुओं पर हुए अत्याचारों के लिए उत्तरदायी नेतृत्व का हिस्सा मानती है। समकालीन तथा बाद के स्रोतों में उनके लिए ‘राजा’, ‘सुल्तान’, ‘खिलाफत राज’ और ‘समानांतर सरकार’ जैसे शब्द भी मिलते हैं।
इस विवाद के कारण उनके बारे में तीन अलग प्रश्नों को एक-दूसरे से अलग रखना आवश्यक है।
पहला—वारियमकुन्नथ हाजी वास्तव में कौन थे और 1921 में उनका उदय कैसे हुआ?
दूसरा—उन्होंने ब्रिटिश प्रशासन के हटने के बाद वास्तव में कैसी शासन-व्यवस्था स्थापित की?
तीसरा—उनके शासन के बारे में आज प्रचलित ‘स्वतंत्र देश’, ‘इस्लामी राज्य’, ‘अपनी मुद्रा’, ‘पासपोर्ट’, ‘सुल्तान’ और ‘हिंदू-विरोधी शासन’ जैसे दावों में कितना ठोस ऐतिहासिक प्रमाण है?
इन तीनों प्रश्नों का उत्तर एक जैसा नहीं है।
वारियमकुन्नथ कुंजाहम्मद हाजी का जन्म एरनाड क्षेत्र के नेल्लिकुथ में हुआ माना जाता है। उनका परिवार स्थानीय माप्पिला समाज से जुड़ा था और औपनिवेशिक सत्ता के साथ संघर्ष की स्मृति से अपरिचित नहीं था।
उनकी युवावस्था के बारे में उपलब्ध विवरण पूरी तरह समान नहीं हैं। लेकिन इतना स्पष्ट है कि वे साधारण अर्थ में केवल धार्मिक मौलवी नहीं थे।
यही उन्हें अली मुसलियार से अलग करता है।
अली मुसलियार की शक्ति मुख्यतः धार्मिक प्रतिष्ठा से आती थी।
वारियमकुन्नथ हाजी की शक्ति आगे चलकर संगठन और सैन्य नेतृत्व में अधिक दिखाई देती है।
परिवार और ब्रिटिश शासन से टकराव की स्मृति
हाजी की राजनीतिक मानसिकता को समझने के लिए उनके पारिवारिक अनुभव को भी ध्यान में रखना चाहिए।
उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों में एरनाड में हुए मोपला संघर्षों और उन पर ब्रिटिश दमन की स्मृति स्थानीय समाज में जीवित थी।
उनके परिवार के सदस्यों के भी ब्रिटिश-विरोधी संघर्षों से जुड़े होने के विवरण मिलते हैं।
इसलिए उनके लिए ब्रिटिश शासन कोई दूर बैठी सरकार नहीं थी।
वह स्थानीय इतिहास में उपस्थित शक्ति थी—
जिससे उनका सामाजिक संसार पहले से परिचित था।
हाजी के जीवन का एक चरण मक्का में भी बीता।
इस प्रवास की अवधि और परिस्थितियों के बारे में विभिन्न स्रोतों में अंतर मिलता है, इसलिए निश्चित वर्षों को अत्यधिक आत्मविश्वास से लिखना उचित नहीं होगा।
अली मुसलियार, चेम्ब्रस्सेरी तंगल और अन्य विद्रोही नेता — नेतृत्व संरचना, प्रभाव-क्षेत्र और भूमिकाएं
1921 के मोपला विद्रोह को केवल वारियमकुन्नथ कुंजाहम्मद हाजी के नेतृत्व वाला आंदोलन समझना उसकी वास्तविक संरचना को बहुत सरल कर देना होगा। हाजी निस्संदेह इसके सबसे प्रभावशाली नेताओं में थे, लेकिन विद्रोह का कोई एक केंद्रीकृत मुख्यालय, एक सर्वोच्च कमांडर अथवा पूरे एरनाड–वल्लुवनाड पर समान अधिकार रखने वाली एकीकृत सरकार नहीं थी। अलग-अलग क्षेत्रों में अली मुसलियार, चेम्ब्रस्सेरी इम्बिची कोया तंगल, कुमारमपुथुर सीती कोया तंगल, कोन्नारा तंगल, अबूबकर मुसलियार, लवकुट्टी, कुंजलवी और दूसरे स्थानीय नेता प्रभावी थे। कालीकट विश्वविद्यालय की सामग्री भी इन्हीं नामों को विद्रोह के प्रमुख नेतृत्व में रखती है।
यही विकेंद्रीकृत संरचना मोपला विद्रोह की एक साथ शक्ति और कमजोरी थी।
शक्ति इसलिए कि एक नेता की गिरफ्तारी या पराजय से पूरा आंदोलन समाप्त नहीं होता था। कमजोरी इसलिए कि किसी एक नेतृत्व के पास सभी विद्रोही समूहों पर अनुशासन लागू करने की क्षमता नहीं थी।
आगे हिंदुओं पर हिंसा, जबरन धर्मांतरण, लूट, ब्रिटिश समर्थकों की हत्या और स्थानीय प्रतिशोध की घटनाओं का मूल्यांकन करते समय यह संरचना अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। किसी घटना को केवल ‘मोपला नेतृत्व’ से जोड़ देना पर्याप्त नहीं है; हमें जहां संभव हो, यह भी देखना होगा कि उस क्षेत्र पर उस समय किस नेता का प्रभाव था।
कांग्रेस-खिलाफत नेतृत्व से विद्रोही नेतृत्व तक
20 अगस्त से पहले मालाबार आंदोलन का सार्वजनिक नेतृत्व मुख्यतः दो स्तरों पर था।
एक ओर कांग्रेस और खिलाफत के अपेक्षाकृत शिक्षित राजनीतिक नेता थे—
दूसरी ओर गांवों और मस्जिदों में स्थानीय खिलाफत नेता, मुसलियार और तंगल थे।
कांग्रेस का जिला नेतृत्व हिंसा रोकना चाहता था, लेकिन ग्रामीण लामबंदी उसके नियंत्रण से बाहर निकल गई। कालीकट विश्वविद्यालय के एक शोध में भी उल्लेख है कि अब्दुर रहमान साहिब, मोइदु मौलवी, केशव मेनन और माधवन नायर जैसे कांग्रेस-खिलाफत नेताओं ने लोगों को नियंत्रित करने की कोशिश की, लेकिन अंततः स्थानीय विद्रोही नेताओं का प्रभाव निर्णायक हो गया।
राजनीतिक समिति से स्थानीय विद्रोही कमांडरों की ओर चला गया।
यदि 1921 के विद्रोही नेतृत्व का नक्शा बनाया जाए तो वह किसी नियमित सेना की तरह नहीं दिखेगा—
अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय नेता थे।
उनकी धार्मिक अथवा सामाजिक प्रतिष्ठा थी।
और परिस्थितियों के अनुसार वे एक-दूसरे के साथ सहयोग कर सकते थे।
सितंबर 1921 की औपनिवेशिक रिपोर्टों में भी यह विकेंद्रीकरण दिखाई देता है। एक रिपोर्ट में पूर्वी एरनाड में सबसे बड़ा विद्रोही समूह वारियमकुन्नथ हाजी और चेम्ब्रस्सेरी तंगल के सामान्य नेतृत्व में बताया गया, जबकि पूर्वी वल्लुवनाड में कुमारमपुथुर सीती कोया तंगल का अलग समूह सक्रिय था। अन्य दल मलप्पुरम और मंजेरी के आसपास काम कर रहे थे। इन समूहों की कुल शक्ति उस समय लगभग 8,000–10,000 आंकी गई थी।
यह संख्या औपनिवेशिक अनुमान थी, इसलिए इसे सटीक जनगणना नहीं मानना चाहिए। लेकिन इससे नेतृत्व की बहु-केंद्रीय संरचना स्पष्ट होती है।
अली मुसलियार — तिरुरंगाडी का धार्मिक-राजनीतिक केंद्र
अली मुसलियार 1921 के शुरुआती चरण के सबसे महत्वपूर्ण नेताओं में थे।
उनका प्रभाव मुख्यतः तिरुरंगाडी और आसपास के क्षेत्र में था।
वे धार्मिक शिक्षक थे और खिलाफत आंदोलन के प्रसार के साथ उनकी राजनीतिक प्रतिष्ठा तेजी से बढ़ी।
1921 से संबंधित समकालीन सामग्री बताती है कि तिरुरंगाडी में उनके नेतृत्व में खिलाफत और असहयोग की नियमित बैठकें होती थीं। जून तक कांग्रेस और खिलाफत संगठन इतने घनिष्ठ हो चुके थे कि औपनिवेशिक विवरण भी दोनों आंदोलनों को मालाबार में लगभग अविभाज्य राजनीतिक मंच के रूप में दर्ज कर रहे थे।
अली मुसलियार की शक्ति का आधार किसी आधुनिक राजनीतिक संगठन से अधिक था—
धार्मिक प्रतिष्ठा + खिलाफत नेतृत्व + ग्रामीण माप्पिला समर्थन।
विद्रोही क्षेत्रों में ‘खिलाफत राज’ — प्रशासन, न्याय, कर, भूमि और समानांतर सत्ता की वास्तविक संरचना
1921 के मोपला विद्रोह के सबसे विवादित प्रश्नों में से एक यह है कि ब्रिटिश प्रशासन के कुछ हिस्सों से पीछे हटने के बाद एरनाड और वल्लुवनाड में आखिर किस प्रकार की सत्ता स्थापित हुई थी। क्या वह केवल हथियारबंद विद्रोहियों का अस्थायी नियंत्रण था? क्या वहां व्यवस्थित समानांतर प्रशासन बनाया गया? क्या उसे वास्तव में ‘खिलाफत राज’ कहा जा सकता है? क्या शरीयत आधारित राज्य स्थापित हुआ? क्या विद्रोहियों ने अपनी अदालतें, कर व्यवस्था, मुद्रा और पासपोर्ट बनाए? और भूमि व्यवस्था में क्या वास्तविक परिवर्तन किए गए?
इन प्रश्नों का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि 1921 की घटनाओं पर बाद का राजनीतिक विमर्श दो विपरीत छवियां प्रस्तुत करता है।
एक छवि में यह ब्रिटिश शासन को हटाकर स्थापित स्वतंत्र स्वदेशी प्रशासन है।
दूसरी में यह इस्लामी राज्य अथवा धार्मिक शासन है।
ऐतिहासिक प्रमाण दोनों की तुलना में अधिक जटिल तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।
सबसे पहले एक बुनियादी तथ्य स्पष्ट होना चाहिए—
पूरे विद्रोही क्षेत्र में एक समान, केंद्रीकृत और स्थायी ‘खिलाफत सरकार’ नहीं थी।
अलग-अलग क्षेत्रों में अलग नेताओं के प्रभाव में स्थानीय समानांतर व्यवस्थाएं विकसित हुईं। वारियमकुन्नथ कुंजाहम्मद हाजी की व्यवस्था इनमें सबसे संगठित दिखाई देती है, लेकिन अली मुसलियार, चेम्ब्रस्सेरी तंगल और सीती कोया तंगल जैसे नेताओं के प्रभाव वाले क्षेत्रों में भी औपनिवेशिक सत्ता के स्थान पर वैकल्पिक अधिकार स्थापित करने के प्रयास हुए।
‘खिलाफत राज’ अथवा ‘Khilafat Raj’ शब्द समकालीन औपनिवेशिक दस्तावेजों और बाद के इतिहासलेखन दोनों में मिलता है।
विद्रोह से पहले दक्षिण मालाबार में जो राजनीतिक संगठन सबसे तेजी से फैला था, वह खिलाफत आंदोलन था। अगस्त 1921 के बाद जब ब्रिटिश प्रशासन कई क्षेत्रों में पीछे हटा तो उसी संगठनात्मक और प्रतीकात्मक भाषा का इस्तेमाल विद्रोही सत्ता ने किया।
कालीकट विश्वविद्यालय की ऐतिहासिक सामग्री में अली मुसलियार, वारियमकुन्नथ कुंजाहम्मद हाजी और सीती कोया तंगल के प्रभाव वाले क्षेत्रों में ‘खिलाफत राज’ स्थापित किए जाने का उल्लेख मिलता है।
लेकिन इस शब्द को सीधे सातवीं शताब्दी के ‘खिलाफत’ अथवा आधुनिक अर्थ में ‘इस्लामी राज्य’ के समान मान लेना गंभीर ऐतिहासिक त्रुटि होगी।
1921 का मालाबार प्रशासन युद्धकालीन, स्थानीय और अल्पकालिक था।
राज्य के लिए सामान्यतः अपेक्षित हैं—
विद्रोही मालाबार में इनमें से कुछ तत्व दिखाई देते हैं, लेकिन सभी नहीं।
दूसरी ओर शासन के लिए इतना पर्याप्त हो सकता है कि किसी क्षेत्र में एक शक्ति—
इस दूसरे अर्थ में विद्रोही क्षेत्रों में शासन निश्चित रूप से विकसित हुआ।
इसलिए ‘समानांतर प्रशासन’ सबसे सुरक्षित ऐतिहासिक शब्द है।
इस समानांतर सत्ता की शुरुआत किसी संविधान सभा से नहीं हुई।
और कई ग्रामीण क्षेत्रों में सामान्य प्रशासन समाप्त हो गया।
28 अगस्त तक मलप्पुरम, तिरुरंगाडी, मंजेरी और पेरिंतलमन्ना जैसे क्षेत्रों में औपनिवेशिक प्रशासन गंभीर रूप से बाधित हो चुका था।
ब्रिटिश प्रतिआक्रमण — मार्शल लॉ, सेना की तैनाती, सैन्य अभियान और विद्रोही क्षेत्रों की पुनर्विजय
अगस्त 1921 के तीसरे सप्ताह में मालाबार की स्थिति ब्रिटिश प्रशासन की प्रारंभिक कल्पना से कहीं आगे निकल चुकी थी। तिरुरंगाडी में गिरफ्तारी और तलाशी की पुलिस कार्रवाई से शुरू हुआ टकराव कुछ ही दिनों में एरनाड और वल्लुवनाड के बड़े हिस्सों में सशस्त्र विद्रोह में बदल गया। पुलिस थाने खाली हुए, सरकारी कार्यालयों और अभिलेखों पर हमले हुए, सड़क तथा तार संचार बाधित हुआ और कई इलाकों में ब्रिटिश प्रशासन व्यवहारतः समाप्त हो गया। विद्रोही नेताओं ने स्थानीय समानांतर सत्ता स्थापित करनी शुरू कर दी।
ब्रिटिश सरकार के सामने अब सामान्य ‘कानून-व्यवस्था’ की समस्या नहीं थी। उसे अपने ही शासन-क्षेत्र में औपनिवेशिक संप्रभुता पुनः स्थापित करनी थी।
यहीं से मोपला आंदोलन का दूसरा बड़ा चरण शुरू होता है—पुलिस कार्रवाई से सैन्य अभियान की ओर संक्रमण।
इस प्रतिआक्रमण को समझना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके बाद विद्रोह का स्वरूप बदल गया। अगस्त के बड़े जनसमूहों और खुले संघर्षों की जगह धीरे-धीरे जंगलों तथा पहाड़ियों में गुरिल्ला युद्ध ने ली। दूसरी ओर ब्रिटिश शासन ने सेना, मार्शल लॉ, विशेष न्यायिक प्रावधान, हथियारबंद पुलिस और गांव-दर-गांव तलाशी को एक संयुक्त प्रतिरोध-विरोधी अभियान में बदल दिया।
तिरुरंगाडी की घटनाओं के तुरंत बाद प्रशासन को यह स्पष्ट नहीं था कि सामने कितनी बड़ी चुनौती है।
ब्रिटिश अधिकारियों के पिछले अनुभव मुख्यतः उन्नीसवीं सदी के मोपला उभारों से बने थे। उनमें प्रायः सीमित संख्या में विद्रोही किसी जेनमी, पुलिस अधिकारी अथवा सरकारी प्रतिष्ठान पर हमला करते और फिर पुलिस अथवा सेना से अंतिम मुकाबला करते थे।
खिलाफत समितियों का विस्तृत नेटवर्क,
असहयोग आंदोलन से पैदा हुआ राजनीतिक वातावरण,
और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक राजनीतिक संदेश।
इसलिए जिस कार्रवाई को प्रारंभ में स्थानीय पुलिस संभाल सकती थी, वह कुछ दिनों में सेना की समस्या बन गई।
सेना बुलाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
पुलिस की सबसे बड़ी समस्या संख्या और हथियारों की नहीं बल्कि भूगोल और व्यापकता की थी।
पश्चिमी घाट की ओर बढ़ते हुए भूभाग में—
ब्रिटिश सरकार को जल्द समझ आया कि केवल पुलिस चौकियां दोबारा खोल देना पर्याप्त नहीं होगा।
मालाबार में पहले से कुछ सैन्य उपस्थिति थी, लेकिन इतने बड़े विद्रोह से निपटने के लिए वह अपर्याप्त थी।
इसके बाद मद्रास तथा दक्षिणी कमान से अतिरिक्त सैनिक भेजे जाने लगे।
अभियान में अलग-अलग समय पर ब्रिटिश और भारतीय सेना की विभिन्न इकाइयों का उपयोग किया गया। उपलब्ध सैन्य अभिलेखों में ब्रिटिश पैदल सेना के साथ गुरखा तथा अन्य भारतीय सैनिक टुकड़ियों की तैनाती दिखाई देती है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि एक ही दिन कोई विशाल सेना मालाबार में नहीं उतर गई थी।
यही कारण है कि अगस्त के अंतिम दिनों में विद्रोहियों को कई क्षेत्रों में सत्ता स्थापित करने का समय मिला।
ब्रिटिश प्रशासन की सबसे बड़ी प्रारंभिक समस्या
सैनिक पहुंच भी जाएं तो उन्हें यह पता होना चाहिए—
विद्रोहियों को स्थानीय भूगोल का लाभ था।
ब्रिटिश सेना को अपरिचित ग्रामीण और जंगल क्षेत्र में काम करना पड़ रहा था।
ब्रिटिश दमन — तलाशी, गिरफ्तारियां, सामूहिक दंड, विशेष न्यायाधिकरण और नागरिक आबादी पर प्रभाव
1921 के मोपला विद्रोह का सैन्य इतिहास केवल इस प्रश्न से पूरा नहीं होता कि ब्रिटिश सेना ने विद्रोही क्षेत्रों को किस प्रकार वापस अपने नियंत्रण में लिया। उससे अधिक कठिन प्रश्न यह है कि उस पुनर्नियंत्रण की कीमत किसने चुकाई और औपनिवेशिक शासन ने विद्रोहियों तथा सामान्य नागरिकों के बीच अंतर किस सीमा तक बनाए रखा।
अगस्त 1921 के अंतिम सप्ताह से फरवरी 1922 तक मालाबार में जिस दमन-तंत्र का विकास हुआ, उसमें केवल सेना नहीं थी। उसके कई परस्पर जुड़े अंग थे—
मार्शल लॉ, गांवों की तलाशी, हथियार जब्ती, सामूहिक गिरफ्तारियां, आत्मसमर्पण अभियान, विशेष मजिस्ट्रेट, विशेष न्यायाधिकरण, सैन्य अदालतें, संपत्ति संबंधी दंड और अंततः हजारों बंदियों को जेलों तथा दूरस्थ कारागारों में भेजना।
इस प्रक्रिया को समझते समय दो अतियों से बचना आवश्यक है।
पहली यह कि ब्रिटिश कार्रवाई को केवल ‘कानून-व्यवस्था बहाल करने’ की सामान्य कार्रवाई मान लिया जाए।
दूसरी यह कि हर गिरफ्तारी, हर तलाशी और हर सैन्य कार्रवाई को बिना प्रमाण एक ही प्रकार का अत्याचार घोषित कर दिया जाए।
मालाबार में वास्तविक सशस्त्र विद्रोह था; पुलिसकर्मी, अधिकारी और नागरिक मारे गए थे; सरकारी प्रतिष्ठान नष्ट हुए थे और कुछ क्षेत्रों में ब्रिटिश प्रशासन समाप्त हो गया था। इसलिए राज्य की सैन्य प्रतिक्रिया की पृष्ठभूमि वास्तविक थी। लेकिन इसी के साथ असाधारण कानूनों और व्यापक दमन ने ऐसी स्थिति भी पैदा की जिसमें हथियारबंद विद्रोही, उसके समर्थक, भयभीत ग्रामीण और निर्दोष नागरिक एक ही सुरक्षा-जाल में फंस सकते थे।
यही इस अध्याय का केंद्रीय प्रश्न है।
26 अगस्त 1921 के मार्शल लॉ अध्यादेश और उसके बाद प्रभावित क्षेत्रों में मार्शल लॉ की घोषणा ने प्रशासन को सामान्य पुलिस व्यवस्था से असाधारण शासन की ओर पहुंचा दिया।
अब प्राथमिक उद्देश्य अपराध होने के बाद अपराधी पकड़ना नहीं था।
विद्रोही क्षेत्र को नियंत्रित करना।
इसमें राज्य को यह पता लगाने की आवश्यकता थी कि—
और कौन किसी विद्रोही नेता के संपर्क में है।
इससे सामान्य आपराधिक न्याय और प्रतिरोध-विरोधी सैन्य अभियान के बीच की रेखा धुंधली होने लगी।
ब्रिटिश प्रशासन के सामने वास्तविक कठिनाई थी कि विद्रोही कोई नियमित वर्दी नहीं पहनते थे।
दिन में कोई व्यक्ति कृषक हो सकता था।
रात में वही विद्रोही दल को भोजन दे सकता था।
कोई ग्रामीण स्वयं लड़ाकू न होकर संदेशवाहक हो सकता था।
किसी घर में हथियार छिपाए जा सकते थे।
हिंदुओं पर हिंसा — हत्याएं, लूट, मंदिरों पर हमले, विस्थापन और जबरन धर्मांतरण : दावों, प्रमाणों और संख्याओं की स्रोत-आधारित जांच
1921 के मोपला आंदोलन का सबसे कठिन, संवेदनशील और राजनीतिक रूप से विवादित पक्ष हिंदू नागरिकों के विरुद्ध हुई हिंसा है। यदि इसे केवल ‘किसान विद्रोह’ कहा जाए और हिंदुओं की हत्या, लूट, जबरन धर्मांतरण तथा विस्थापन को हाशिये पर डाल दिया जाए तो इतिहास अधूरा रह जाता है। दूसरी ओर यदि पूरे आंदोलन को आरंभ से अंत तक केवल हिंदुओं के विनाश के लिए चलाया गया एक संगठित धार्मिक अभियान घोषित कर दिया जाए तो अगस्त 1921 से पहले के भूमि संघर्ष, ब्रिटिश-विरोध, खिलाफत-असहयोग लामबंदी और विद्रोह के आरंभिक चरण के सरकारी लक्ष्यों को मिटाना पड़ेगा।
इसलिए इस अध्याय में हमारा तरीका पहले से अधिक कठोर रहेगा।
जहां घटना प्रमाणित है, उसे स्पष्ट रूप से प्रमाणित कहा जाएगा।
जहां संख्या विवादित है, वहां कोई सुविधाजनक संख्या चुनकर उसे तथ्य नहीं बनाया जाएगा।
जहां पीड़ितों की समकालीन गवाही है, उसे महत्व दिया जाएगा, लेकिन प्रत्येक सनसनीखेज विवरण को स्वतंत्र सत्यापन के बिना स्थापित तथ्य नहीं माना जाएगा।
और जहां विद्रोही नेतृत्व के भीतर ही हिंदुओं के प्रति व्यवहार को लेकर मतभेद दिखाई देते हैं, उसे भी दर्ज किया जाएगा।
इस पद्धति से एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष शुरुआत में ही सामने आता है—
1921 में हिंदुओं की हत्याएं, लूट, जबरन धर्मांतरण और बड़े पैमाने पर विस्थापन हुए थे। इन्हें नकारने के लिए विश्वसनीय ऐतिहासिक आधार नहीं है। विवाद मुख्यतः इनके पैमाने, संख्या, क्षेत्रीय विस्तार, समय और केंद्रीय विद्रोही नेतृत्व की भूमिका को लेकर है।
सबसे पहले : क्या हिंदू-विरोधी हिंसा वास्तव में हुई थी?
समकालीन ब्रिटिश सरकारी दस्तावेज, भारतीय राष्ट्रवादी स्रोत, हिंदू पीड़ितों के बयान, कांग्रेस से जुड़े व्यक्तियों के विवरण, समाचार पत्र और बाद का इतिहासलेखन—सभी किसी न किसी स्तर पर इसकी पुष्टि करते हैं।
25 अक्टूबर 1921 को ब्रिटिश संसद में भारत सचिव एडविन मॉन्टेग्यू ने स्वीकार किया कि हिंदुओं के जबरन धर्मांतरण की ‘काफी संख्या’ की सूचना थी। छह दिन बाद, 31 अक्टूबर को सरकार ने कहा कि सटीक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन गंभीर अत्याचार और अनेक जबरन खतनों के होने में संदेह नहीं है।
इसलिए यह बहस अब इस बात की नहीं हो सकती कि ‘कुछ हुआ ही नहीं।’
क्या हुआ, कहां हुआ, कब हुआ, कितने लोगों के साथ हुआ और किसके आदेश पर हुआ?
20 अगस्त को तिरुरंगाडी के बाद आरंभिक विद्रोही कार्रवाई का बड़ा हिस्सा औपनिवेशिक सत्ता के प्रतीकों पर केंद्रित था—
और ब्रिटिश अधिकारियों से जुड़े प्रतिष्ठान।
लेकिन बहुत जल्दी एक दूसरा हिंसक आयाम सामने आया।
ब्रिटिश समर्थक समझे गए हिंदुओं पर हमले हुए।
इसके बाद अनेक क्षेत्रों में सामान्य हिंदू नागरिक भी हिंसा, लूट और धर्मांतरण का लक्ष्य बने।
सितंबर के अंत तक सरकारी पत्राचार स्पष्ट रूप से बता रहा था कि तिरुरंगाडी, वेंगरा, चेलारी और तेनहिपालम के आसपास हथियारबंद माप्पिला समूह हिंदुओं की लूट और जबरन धर्मांतरण कर रहे थे।
इसलिए सांप्रदायिक हिंसा को विद्रोह के बहुत बाद की कोई छोटी परिघटना मानना भी कठिन है।
जबरन धर्मांतरण का प्रश्न — वास्तविक संख्या, पीड़ित गवाहियां, सरकारी रिकॉर्ड, कांग्रेस जांच और पुनर्धर्मांतरण अभियान
1921 के मोपला विद्रोह पर जितने प्रश्न विवादित हैं, उनमें हिंदुओं के जबरन धर्मांतरण की वास्तविक संख्या शायद सबसे अधिक उलझी हुई है। एक ओर ऐसे विवरण हैं जिनमें हजारों हिंदुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाए जाने का दावा किया गया। दूसरी ओर आरंभिक कांग्रेस जांच में संख्या केवल कुछ मामलों तक सीमित बताई गई। ब्रिटिश प्रशासन के पास नवंबर 1921 तक 180 मामलों की ‘विश्वसनीय सूचना’ थी, लेकिन उसी प्रशासन के जिला मजिस्ट्रेट और विशेष आयुक्त का अनुमान लगभग 500 था और उन्होंने स्वीकार किया कि सबसे बुरी तरह प्रभावित क्षेत्रों का पूरा विवरण तब तक मिला ही नहीं था।
इसके बाद एक और महत्वपूर्ण संख्या सामने आती है।
आर्य समाज के पुनर्धर्मांतरण संबंधी अभिलेखों में 1,766 जबरन धर्मांतरित व्यक्तियों का उल्लेख किया गया और उसके कार्यकर्ताओं का अनुमान था कि सभी राहत संगठनों के रिकॉर्ड जोड़ने पर संख्या 2,500 से अधिक हो सकती है। बाद के अकादमिक अध्ययन भी इन आंकड़ों का उल्लेख करते हैं।
इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि कौन-सी संख्या सही है।
पहले यह समझना होगा कि ये संख्याएं अलग-अलग समय, अलग-अलग स्रोत और अलग-अलग गणना-पद्धति से निकली थीं।
और यहीं से इस विवाद की असली जांच शुरू होती है।
सबसे पहले उस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर आवश्यक है जिसे बाद के राजनीतिक विवाद ने अनावश्यक रूप से उलझाया है।
हां, 1921 के मोपला विद्रोह के दौरान हिंदुओं के जबरन धर्मांतरण हुए थे।
इस तथ्य को केवल ब्रिटिश प्रचार कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।
25 अक्टूबर 1921 को ब्रिटिश संसद में भारत सचिव एडविन मॉन्टेग्यू ने कहा कि उन्हें बड़ी संख्या में जबरन धर्मांतरणों की जानकारी मिली थी। नवंबर में ब्रिटिश सरकार ने भारत सरकार और मद्रास सरकार से विशेष रूप से संख्या मांगी।
11 नवंबर को मद्रास सरकार ने जो उत्तर भेजा, वह इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिक दस्तावेजों में से एक है।
उसमें कहा गया कि मालाबार के जिला मजिस्ट्रेट को 180 जबरन धर्मांतरणों की विश्वसनीय सूचना मिली है।
लेकिन तत्काल उसके बाद एक महत्वपूर्ण चेतावनी दी गई—
यह संख्या उन सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों के धर्मांतरणों को शामिल नहीं करती जहां विद्रोह समाप्त होने तक विस्तृत जानकारी प्राप्त करना संभव नहीं था।
जिला मजिस्ट्रेट और विशेष आयुक्त दोनों का मत था कि वास्तविक संख्या इससे काफी अधिक होगी और उन्होंने लगभग 500 का अनुमान लगाया।
सरकार ने साफ लिखा कि 500 केवल अनुमान था, प्रमाणित गणना नहीं।
यही दस्तावेज इस प्रश्न पर हमारी प्रारंभिक आधाररेखा होना चाहिए।
180 का अर्थ यह नहीं है कि कुल 180 हिंदुओं का धर्मांतरण हुआ था।
यह नवंबर 1921 तक जिला मजिस्ट्रेट के पास पहुंचे उन मामलों की संख्या थी जिन्हें प्रशासन ‘विश्वसनीय सूचना’ के रूप में स्वीकार कर चुका था।
हिंदू पीड़ितों की गवाहियां और राहत शिविर — विस्थापन, महिलाओं की स्थिति, संपत्ति की क्षति और वापसी की कठिनाइयां
1921 के मोपला विद्रोह को यदि केवल नेताओं, सैन्य अभियानों, ब्रिटिश दमन और राजनीतिक संगठनों के इतिहास के रूप में पढ़ा जाए तो उस त्रासदी का सबसे मानवीय हिस्सा छूट जाता है। विद्रोह के बीच हजारों ऐसे लोग थे जिनके पास कोई सेना नहीं थी, कोई राजनीतिक पद नहीं था और घटनाओं की दिशा तय करने की कोई शक्ति नहीं थी। वे केवल अपने घर, खेत, परिवार और जीवन को बचाने की कोशिश कर रहे थे।
इनमें बड़ी संख्या हिंदू परिवारों की थी।
कुछ ने परिवार के सदस्य खोए। कुछ की संपत्ति लूटी गई। कुछ के घर जला दिए गए। कुछ महिलाओं ने हिंसा, अपहरण अथवा यौन उत्पीड़न की शिकायत की। कुछ परिवारों को जबरन धर्मांतरण का सामना करना पड़ा। और बहुत बड़ी संख्या में लोग अपने गांव छोड़कर कालीकट, पालघाट, त्रिशूर, कोचीन और अन्य सुरक्षित स्थानों की ओर भागे।
लेकिन इस मानवीय संकट की एक और परत थी जिसे भूलना नहीं चाहिए।
विद्रोह के बाद निर्धन माप्पिला महिलाएं और बच्चे भी राहत के पात्र बने। मालाबार केंद्रीय राहत समिति ने बाद में ऐसे हजारों लोगों की सहायता की।
इसलिए 1921 का शरणार्थी संकट केवल एक धार्मिक समुदाय की कहानी नहीं था। फिर भी विद्रोही क्षेत्रों से हिंदुओं का व्यापक पलायन उसकी सबसे प्रमुख विशेषताओं में था।
विद्रोह शुरू हुआ और घर छोड़ने का सिलसिला भी
20 अगस्त 1921 को तिरुरंगाडी की घटनाओं के बाद जब विद्रोह तेजी से एरनाड और वल्लुवनाड में फैला, सामान्य ग्रामीण आबादी के सामने सबसे पहला प्रश्न राजनीतिक नहीं था—
प्रशासन कई क्षेत्रों से गायब हो चुका था।
पुलिस थाने खाली अथवा नष्ट हो चुके थे।
ब्रिटिश सेना अभी हर गांव तक नहीं पहुंची थी।
ऐसी स्थिति में जिन परिवारों को खतरा महसूस हुआ उन्होंने जो कुछ तत्काल साथ ले सकते थे, लेकर गांव छोड़ना शुरू कर दिया।
कई लोगों को यह भी पता नहीं था कि वे कब वापस लौट सकेंगे।
हर हिंदू परिवार पर प्रत्यक्ष हमला हुआ हो, यह आवश्यक नहीं।
लेकिन हिंसा में भय केवल उस व्यक्ति को नहीं होता जिसके घर पर हमला हुआ है।
किसी परिवार का धर्मांतरण कराया गया,
तो आसपास के गांवों में खबर फैलते ही लोग स्वयं को अगला संभावित लक्ष्य मान सकते थे।
इसलिए शरणार्थियों की संख्या और प्रत्यक्ष हिंसा के पीड़ितों की संख्या समान नहीं हो सकती।
ब्रिटिश प्रशासन ने भी संकट की गंभीरता स्वीकार की
सितंबर के अंत तक सरकारी पत्राचार में शरणार्थी समस्या प्रमुख प्रशासनिक प्रश्न बन चुकी थी।
28 सितंबर के एक सरकारी संदेश में पूछा गया कि जिन लोगों ने विद्रोह में अपनी संपत्ति खो दी है उन्हें फिर से जीवन शुरू करने में किस प्रकार सहायता दी जाएगी।
गांधी, कांग्रेस और राष्ट्रीय नेतृत्व की प्रतिक्रिया — निंदा, बचाव, खिलाफत गठबंधन और मोपला हिंसा पर वैचारिक विवाद
मोपला आंदोलन के इतिहास में अगस्त 1921 से आगे का सबसे कठिन प्रश्न केवल यह नहीं है कि मालाबार में क्या हुआ। उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न है—जब विद्रोह औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध संघर्ष से आगे बढ़कर हत्या, लूट, जबरन धर्मांतरण और हिंदू विस्थापन तक पहुंच गया, तब महात्मा गांधी, कांग्रेस और खिलाफत नेतृत्व ने क्या कहा?
इस प्रश्न पर आज भी दो परस्पर विरोधी आख्यान चलते हैं।
एक आख्यान कहता है कि गांधी और कांग्रेस ने हिंदू पीड़ितों की उपेक्षा की, मोपला हिंसा को बचाने की कोशिश की और हिंदू-मुस्लिम एकता बनाए रखने के लिए अत्याचारों को कम करके प्रस्तुत किया।
दूसरा आख्यान कहता है कि गांधी ने हिंसा और जबरन धर्मांतरण की स्पष्ट निंदा की, लेकिन पूरे माप्पिला समुदाय को अपराधी मानने तथा ब्रिटिश सरकार को इस घटना के आधार पर असहयोग-खिलाफत आंदोलन को बदनाम करने की अनुमति नहीं दी।
ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताता है कि दोनों आख्यानों में कुछ तथ्य हैं, लेकिन कोई भी अपने सरल रूप में पूरी कहानी नहीं बताता।
गांधी ने अत्याचारों को नकारा नहीं था। कांग्रेस ने भी मोपला हिंसा की निंदा की। लेकिन साथ ही गांधी और कांग्रेस नेतृत्व ने खिलाफत-असहयोग आंदोलन को विद्रोह के लिए उत्तरदायी मानने से इनकार किया और हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक गठबंधन को टूटने से बचाने का प्रयास किया। इसी दोहरी रणनीति ने बाद में सबसे तीखा विवाद पैदा किया।
मालाबार ने कांग्रेस के सामने अभूतपूर्व संकट खड़ा कर दिया
1920–21 में कांग्रेस की राजनीति तीन बड़े स्तंभों पर खड़ी थी—
गांधी की रणनीति थी कि खिलाफत के प्रश्न पर मुसलमानों की चिंता को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़कर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक व्यापक जनांदोलन खड़ा किया जाए।
मालाबार में कांग्रेस और खिलाफत कार्यकर्ता भी साथ काम कर रहे थे।
लेकिन अगस्त 1921 में स्थिति पलट गई।
औपनिवेशिक सत्ता को कई क्षेत्रों से हटा दिया।
यदि कहानी यहीं समाप्त होती तो कांग्रेस इसे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक विद्रोह के रूप में देख सकती थी।
लेकिन जल्द ही हिंदुओं के विरुद्ध हिंसा, लूट और जबरन धर्मांतरण की खबरें आने लगीं।
अब कांग्रेस के सामने नैतिक और राजनीतिक दोनों संकट था।
यदि वह विद्रोह का समर्थन करती तो अहिंसा का सिद्धांत टूटता।
यदि वह मोपला विद्रोहियों की कठोर निंदा करती तो खिलाफत गठबंधन संकट में पड़ सकता था।
यदि वह अत्याचारों को नकारती तो हिंदू पीड़ितों के सामने उसकी विश्वसनीयता समाप्त होती।
और यदि वह पूरे घटनाक्रम को खिलाफत आंदोलन का परिणाम मान लेती तो ब्रिटिश सरकार का आरोप स्वीकार करना पड़ता कि गांधी की राजनीति ने मालाबार में अराजकता पैदा की।
गांधी की पहली प्रतिक्रिया — पीड़ा और स्पष्ट निंदा
गांधी की शुरुआती प्रतिक्रिया को अक्सर बाद के विवादों के कारण भुला दिया जाता है।
वागन त्रासदी — 19 नवंबर 1921 की रेल यात्रा, बंद मालगाड़ी में कैद मोपला बंदी, मौतें और औपनिवेशिक प्रशासन की जवाबदेही
मोपला विद्रोह के इतिहास में 19–20 नवंबर 1921 की रात एक ऐसी घटना हुई जिसे विद्रोहियों की हिंसा, हिंदुओं पर अत्याचार अथवा ब्रिटिश सेना के युद्ध अभियान की किसी सामान्य श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। यह उन लोगों की मृत्यु थी जो पहले ही ब्रिटिश हिरासत में थे और जिनकी सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी औपनिवेशिक प्रशासन पर थी।
तिरुर से जेल स्थानांतरण के लिए मोपला बंदियों को रेलवे के एक सामान ढोने वाले वागन में बंद कर भेजा गया। आधी रात के बाद जब वागन पोदनूर पहुंचा और उसका दरवाजा खोला गया तो भीतर बंद लोग दम घुटने और अत्यधिक गर्मी से अचेत पड़े थे। अनेक की मृत्यु हो चुकी थी और कुछ अन्य बाद में मर गए।
यह घटना इतिहास में “वागन त्रासदी” या “Wagon Tragedy” के नाम से दर्ज हुई।
लेकिन इस अध्याय के शीर्षक में लिखी 67 मौतों की संख्या से शुरुआत में ही एक महत्वपूर्ण तथ्यात्मक सुधार आवश्यक है। विभिन्न लोकप्रिय और बाद के स्रोत 61, 64 या 67 मृतकों की संख्या देते हैं, जबकि अधिक विस्तृत समकालीन/अकादमिक विवरण 100 बंदियों में कुल 70 मौतें बताते हैं। रॉबर्ट एल. हार्डग्रेव के अध्ययन में भी 100 बंदियों और अंततः 70 मृतकों का विवरण है। ब्रिटिश संसद में फरवरी 1922 में प्रश्न पूछे जाने के समय 64 मोपला बंदियों की मृत्यु का उल्लेख हुआ था—संभवतः उस समय प्रयुक्त प्रशासनिक गणना/वर्गीकरण के कारण। इसलिए इस अध्याय में जहां आवश्यक होगा, अलग-अलग संख्याओं का स्रोत स्पष्ट किया जाएगा।
यह सावधानी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वागन त्रासदी को समझने के लिए हमें न तो औपनिवेशिक प्रशासन की जिम्मेदारी कम करनी है और न किसी लोकप्रिय संख्या को बिना जांच के अंतिम तथ्य घोषित करना है।
नवंबर 1921 : जेलें बंदियों से भर रही थीं
अगस्त से नवंबर तक ब्रिटिश सेना धीरे-धीरे विद्रोही क्षेत्रों पर फिर नियंत्रण स्थापित कर रही थी।
मालाबार की स्थानीय जेलों में इतने बंदियों को रखने की पर्याप्त क्षमता नहीं थी।
इसलिए बंदियों को मालाबार से बाहर दूसरी जेलों में भेजना पड़ा।
यही प्रशासनिक आवश्यकता वागन त्रासदी की पृष्ठभूमि बनी।
यह बात समझना आवश्यक है कि रेल से कैदियों का स्थानांतरण स्वयं कोई असामान्य प्रक्रिया नहीं थी। समस्या यह थी कि किस प्रकार के वागन में, कितने लोगों को और किन सुरक्षा व्यवस्थाओं के साथ भेजा गया।
19 नवंबर को तिरुर उप-जेल में बड़ी संख्या में बंदी मौजूद थे।
कालीकट विश्वविद्यालय की अध्ययन सामग्री में उपलब्ध विवरण के अनुसार परिवहन के लिए जिम्मेदार ट्रैफिक इंस्पेक्टर और सार्जेंट एंड्रयूज ने 100 बंदियों को बेल्लारी की ओर भेजने का निर्णय किया।
दो वागन उपलब्ध होने के बावजूद केवल एक इस्तेमाल करने का निर्णय लिया गया।
शाम लगभग 7:15 बजे बंदियों को वागन संख्या LV 1711 में भरकर दरवाजे बाहर से बंद कर दिए गए। उनके साथ सार्जेंट एंड्रयूज और पुलिसकर्मी सुरक्षा में थे।
यहीं वह प्रशासनिक निर्णय था जो कुछ घंटों बाद विनाशकारी सिद्ध हुआ।
एक समकालीन संकलन The Moplah Rebellion 1921 में घटना का विवरण देते हुए 100 कैदियों का उल्लेख है।
बाद की मृत्यु संख्या में भी इन तीन हिंदू बंदियों का उल्लेख आता है।
इसलिए इसे केवल धार्मिक पहचान के आधार पर “मुस्लिम बंदियों की हत्या” के रूप में प्रस्तुत करना तकनीकी रूप से पूर्ण नहीं होगा।
विद्रोह की मानवीय और भौतिक कीमत — मृतक, घायल, गिरफ्तारियां, आत्मसमर्पण, संपत्ति की क्षति और सरकारी आंकड़ों की विश्वसनीयता
1921 के मोपला आंदोलन का सबसे कठिन सांख्यिकीय प्रश्न है—आखिर इसकी वास्तविक कीमत कितनी थी?
कितने विद्रोही मारे गए? कितने घायल हुए? कितने लोगों को ब्रिटिश प्रशासन ने गिरफ्तार किया? कितनों ने आत्मसमर्पण किया? जेलों में कितने मरे? कितने हिंदू नागरिक मारे गए? कितने विस्थापित हुए? कितने घर, मंदिर, सरकारी भवन और निजी संपत्तियां नष्ट हुईं?
इन प्रश्नों का एक ही सर्वमान्य उत्तर उपलब्ध नहीं है।
ब्रिटिश सरकार ने सैन्य कार्रवाई के आंकड़े व्यवस्थित रूप से दर्ज किए, लेकिन नागरिक हताहतों और निजी संपत्ति के नुकसान का ऐसा समग्र, नाम-आधारित लेखा नहीं छोड़ा जिससे आज अंतिम संख्या निकाली जा सके। दूसरी ओर बाद के राजनीतिक, धार्मिक और स्मृति-आधारित विवरणों में कभी-कभी ऐसे आंकड़े मिलते हैं जिन्हें स्वतंत्र रूप से सत्यापित करना कठिन है।
इसलिए इस अध्याय का उद्देश्य कोई एक विशाल संख्या घोषित करना नहीं, बल्कि यह अलग करना है कि—
क्या प्रमाणित है, क्या आधिकारिक अनुमान है, क्या वैकल्पिक अनुमान है और क्या आज भी अनिश्चित है।
1921–22 के सरकारी रिकॉर्ड और बाद में इतिहासकार रॉबर्ट एल. हार्डग्रेव द्वारा उद्धृत अंतिम औपनिवेशिक आंकड़ों के अनुसार विद्रोह के दौरान—
ये आंकड़े इस अध्याय की सांख्यिकीय आधाररेखा हैं।
लेकिन इन्हें “मोपला विद्रोह में कुल मृतकों की संख्या” कहना गलत होगा।
ये मुख्यतः ब्रिटिश प्रशासन द्वारा विद्रोही श्रेणी में दर्ज किए गए लोगों और सरकारी बलों की सैन्य क्षति के आंकड़े हैं।
इनमें हिंदू नागरिकों की हत्या, जेल में बाद की मौतें, वागन त्रासदी, बीमारी, विस्थापन अथवा दूसरे अप्रत्यक्ष प्रभाव स्वतः शामिल नहीं माने जा सकते।
एक महत्वपूर्ण सुधार : 2,337 या 2,339?
मोपला विद्रोह पर लिखी सामग्री में अक्सर 2,337 विद्रोहियों की मृत्यु का आंकड़ा मिलता है।
कुछ आधिकारिक अभिलेखों पर आधारित आधुनिक शोध भी यही संख्या देता है। कालीकट विश्वविद्यालय से संबंधित एक शोध में राष्ट्रीय अभिलेखागार की Home Political 1923 फाइल के आधार पर 2,337 मृत और 1,652 घायल बताए गए हैं।
लेकिन बाद के सरकारी संकलनों और हार्डग्रेव के अध्ययन में अंतिम संख्या 2,339 मिलती है।
अंतर केवल दो व्यक्तियों का है, लेकिन शोध में इसे छिपाना उचित नहीं।
वेबसाइट के लिए अधिक सुरक्षित भाषा होगी—
“औपनिवेशिक सरकारी आंकड़ों में लगभग 2,337–2,339 विद्रोहियों के मारे जाने का उल्लेख मिलता है; बाद के अंतिम सरकारी आंकड़े सामान्यतः 2,339 बताते हैं।”
सरकारी संख्या एक दिन में तैयार नहीं हुई थी।
15 दिसंबर 1921 को ब्रिटिश संसद में भारत सचिव एडविन मॉन्टेग्यू ने 9 दिसंबर तक प्राप्त आंकड़े प्रस्तुत किए।
विद्रोह का अंत और मालाबार में पुनर्स्थापना — आत्मसमर्पण, मार्शल लॉ की समाप्ति, बंदियों का भविष्य, पुनर्वास और सामान्य जीवन की वापसी
मोपला विद्रोह का अंत किसी एक निर्णायक युद्ध, किसी एक समझौते अथवा किसी एक तारीख को नहीं हुआ। अगस्त 1921 में जिस विस्फोटक गति से विद्रोह फैला था, उसका अंत उससे बिल्कुल अलग ढंग से हुआ—सैन्य दबाव, नेताओं की गिरफ्तारी और मृत्यु, छोटे विद्रोही दलों के विघटन, हजारों आत्मसमर्पण, हथियारों की कमी और धीरे-धीरे नागरिक प्रशासन की वापसी के माध्यम से।
जनवरी 1922 तक संगठित विद्रोह लगभग समाप्त हो चुका था, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि मालाबार सामान्य हो गया था। फरवरी में भी कुछ सशस्त्र समूह सक्रिय थे, हजारों बंदियों के मुकदमे बाकी थे, हिंदू शरणार्थियों में घर लौटने का भय था, अनेक जेनमी अपने क्षेत्रों में वापस नहीं आए थे और औपनिवेशिक सरकार स्वयं मार्शल लॉ हटाने के बाद भी असाधारण शक्तियां छोड़ने को तैयार नहीं थी।
सरकारी सैन्य रिपोर्ट ने 6 फरवरी 1922 को स्थिति का सार देते हुए कहा कि संगठित विद्रोह अब समाप्त हो चुका है, हालांकि कुछ विद्रोही अभी गिरफ्तारी से बच रहे थे। 27 फरवरी की सैन्य रिपोर्ट में कहा गया कि अब सैन्य महत्व की कोई घटना नहीं है और मालाबार फोर्स का मुख्यालय भंग किया जा रहा है।
इसलिए फरवरी 1922 को विद्रोह के सैन्य अंत की सीमा माना जा सकता है।
लेकिन मालाबार की सामाजिक पुनर्स्थापना की कहानी उससे कहीं लंबी थी।
अंत की शुरुआत : विद्रोही क्षेत्रों का सिकुड़ना
सितंबर और अक्टूबर 1921 में विद्रोह अपने चरम पर था। एरनाड, वल्लुवनाड और आसपास के क्षेत्रों में कई जगह औपनिवेशिक प्रशासन लगभग समाप्त हो गया था।
लेकिन ब्रिटिश सरकार ने धीरे-धीरे अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाई।
सड़कों और रेलवे पर नियंत्रण पुनः स्थापित किया गया।
गोरखा और अन्य सैन्य टुकड़ियों को अंदरूनी क्षेत्रों में भेजा गया।
विद्रोहियों के हथियार और खाद्य आपूर्ति के स्रोतों पर दबाव बढ़ा।
संदिग्ध लोगों को गिरफ्तार किया गया।
विद्रोही दलों को खुले क्षेत्र से जंगलों और पहाड़ी इलाकों की ओर जाना पड़ा।
नवंबर तक लड़ाई का चरित्र बदल चुका था।
अब विद्रोही बड़े क्षेत्र पर स्थायी नियंत्रण बनाए रखने के बजाय छोटे समूहों में छापामार शैली अपनाने लगे थे। कालीकट विश्वविद्यालय की अध्ययन सामग्री भी इस चरण में “हिट एंड रन” रणनीति और अंदरूनी क्षेत्रों में गोरखा सैनिकों की तैनाती का उल्लेख करती है।
पांडिक्काड की लड़ाई और सैन्य संतुलन का बदलना
14 नवंबर 1921 को पांडिक्काड क्षेत्र में गोरखा सैनिकों पर विद्रोहियों के हमले ने यह दिखाया कि सशस्त्र प्रतिरोध अभी समाप्त नहीं हुआ था।
लेकिन ऐसी लड़ाइयों में विद्रोहियों को भारी क्षति उठानी पड़ी।
अब दोनों पक्षों के बीच सैन्य क्षमता का अंतर निर्णायक हो रहा था।
ब्रिटिश पक्ष के पास संगठित सेना, आधुनिक हथियार, रेलवे, संचार और अतिरिक्त सैन्य बल उपलब्ध था।
मोपला आंदोलन की उपलब्धियां और विफलताएं — कृषक प्रश्न, औपनिवेशिक सत्ता, भूमि सुधार, सांप्रदायिक विभाजन और दीर्घकालीन प्रभाव
1921 के मोपला आंदोलन का मूल्यांकन भारतीय किसान आंदोलनों के इतिहास की सबसे कठिन समस्याओं में से एक है। चंपारण, खेड़ा या बारडोली की तरह इसके परिणाम को कुछ स्पष्ट मांगों, समझौते और रियायतों में नहीं मापा जा सकता। मोपला विद्रोह ने औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती दी और मालाबार के कृषक प्रश्न को राष्ट्रीय स्तर पर उजागर किया, लेकिन वह अपनी घोषित अथवा अंतर्निहित सामाजिक-आर्थिक मांगों को किसी संगठित समझौते में परिवर्तित नहीं कर सका। उसके अंतिम चरण की सांप्रदायिक हिंसा ने उसकी कृषक और औपनिवेशिक-विरोधी प्रकृति को भी गहरे विवाद में डाल दिया।
इसलिए यह पूछना कि मोपला आंदोलन “सफल” था या “असफल”, अपने-आप में अपर्याप्त प्रश्न है।
क्या विद्रोह ने ब्रिटिश शासन को स्थायी राजनीतिक नुकसान पहुंचाया?
क्या खिलाफत और कांग्रेस को लाभ हुआ?
क्या आंदोलन की उपलब्धियां उसकी मानवीय और सांप्रदायिक कीमत से बड़ी थीं?
इन प्रश्नों के उत्तर एक जैसे नहीं हैं।
पहला मूल्यांकन : सैन्य दृष्टि से विद्रोह पराजित हुआ
सबसे स्पष्ट तथ्य से शुरुआत करनी चाहिए।
मोपला विद्रोह ब्रिटिश शासन को मालाबार से हटाने में सफल नहीं हुआ।
और कुछ क्षेत्रों में विद्रोही नेतृत्व ने समानांतर सत्ता स्थापित करने की कोशिश की।
ब्रिटिश सरकार ने सेना भेजी, विद्रोही क्षेत्रों पर पुनः कब्जा किया और फरवरी 1922 तक संगठित प्रतिरोध समाप्त कर दिया।
इसलिए यदि आंदोलन का मानदंड औपनिवेशिक सत्ता को उखाड़ फेंकना था—
लेकिन ब्रिटिश सत्ता की कमजोरी उजागर हुई
सैन्य पराजय के बावजूद विद्रोह ने एक महत्वपूर्ण बात सिद्ध की—
ग्रामीण समाज का व्यापक असंतोष संगठित हो जाए तो औपनिवेशिक प्रशासन स्थानीय स्तर पर तेजी से ढह सकता है।
अगस्त 1921 के शुरुआती दिनों में कई स्थानों पर—
और औपनिवेशिक प्रशासन का सामान्य ढांचा टूट गया।
इससे ब्रिटिश सरकार को मालाबार में अपनी पुलिस, खुफिया और प्रशासनिक व्यवस्था की कमजोरियों का सामना करना पड़ा।
विद्रोह के बाद सुरक्षा व्यवस्था के पुनर्गठन और विशेष पुलिस बल को मजबूत करने में इस अनुभव की भूमिका रही।
क्या इसे औपनिवेशिक-विरोधी उपलब्धि कहा जा सकता है?
विद्रोह ने ब्रिटिश शासन को कई महीनों तक गंभीर सैन्य और प्रशासनिक चुनौती दी।
लेकिन इसे राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन की सफल राजनीतिक कार्रवाई कहना कठिन है।
उसके पास अखिल भारतीय राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था,
कांग्रेस नेतृत्व उसके हिंसक रूप के साथ नहीं था,
और विद्रोही सत्ता के अलग-अलग क्षेत्रों में उद्देश्य भी पूरी तरह समान नहीं थे।
मोपला आंदोलन का इतिहासलेखन — औपनिवेशिक, राष्ट्रवादी, मार्क्सवादी, सांप्रदायिक और आधुनिक अकादमिक व्याख्याओं का तुलनात्मक अध्ययन
1921 के मोपला आंदोलन के बारे में शायद सबसे बड़ा विवाद यह नहीं है कि क्या हुआ, बल्कि यह है कि जो हुआ उसे क्या कहा जाए।
क्या यह ब्रिटिश-विरोधी स्वतंत्रता संघर्ष था?
क्या यह खिलाफत से प्रेरित धार्मिक विद्रोह था?
क्या यह हिंदू जेनमियों के विरुद्ध वर्ग-संघर्ष था?
क्या यह हिंदुओं के विरुद्ध सांप्रदायिक हिंसा थी?
या इन सभी तत्वों का ऐसा मिश्रण था जिसका चरित्र अगस्त 1921 से 1922 तक लगातार बदलता गया?
पिछले अध्यायों में घटनाओं और स्रोतों की विस्तृत जांच के बाद अब यह स्पष्ट है कि इनमें से किसी एक व्याख्या को पूरे आंदोलन पर आरोपित कर देना समस्या पैदा करता है। इतिहासलेखन का विकास भी लगभग इसी दिशा में हुआ है। औपनिवेशिक अधिकारियों ने धार्मिक कट्टरता पर अधिक जोर दिया; राष्ट्रवादी लेखन ब्रिटिश शासन और खिलाफत-असहयोग की पृष्ठभूमि से जूझता रहा; मार्क्सवादी इतिहासकारों ने भूमि और वर्ग संबंधों को केंद्र में रखा; धार्मिक-सामुदायिक स्मृतियों ने अलग-अलग पीड़ित समुदायों को केंद्र बनाया; और आधुनिक अकादमिक इतिहासलेखन ने इन श्रेणियों के बीच संबंध खोजने की कोशिश की है।
के. एन. पणिक्कर की महत्त्वपूर्ण पुस्तक Against Lord and State का मूल तर्क ही यह है कि मोपला उभारों को केवल सांप्रदायिक तनाव या केवल कृषि असंतोष से समझना पर्याप्त नहीं; आर्थिक असंतोष और धार्मिक विचारधारा के परस्पर संबंधों को देखना आवश्यक है।
इस अध्याय में हमारा उद्देश्य यह तय करना नहीं है कि कौन-सा राजनीतिक पक्ष “जीता”, बल्कि यह समझना है कि 1921 को देखने के अलग-अलग इतिहासलेखकीय चश्मे हमें क्या दिखाते हैं—और क्या छिपा देते हैं।
इतिहास केवल घटनाओं का संग्रह नहीं है।
एक ही तथ्य को अलग प्रश्नों के माध्यम से पढ़ने पर उसका अर्थ बदल सकता है।
यदि प्रश्न है कि विद्रोही किसके विरुद्ध हथियार उठा रहे थे, तो ब्रिटिश राज्य सामने आता है।
यदि प्रश्न है कि विद्रोहियों का सामाजिक आधार क्या था, तो माप्पिला कृषक दिखाई देते हैं।
यदि प्रश्न है कि लामबंदी की भाषा क्या थी, तो खिलाफत, इस्लामी प्रतीक और धार्मिक नेतृत्व सामने आते हैं।
यदि प्रश्न है कि हिंसा के शिकार नागरिक कौन थे, तो हिंदू पीड़ित सामने आते हैं।
यदि प्रश्न है कि दमन किसने किया, तो ब्रिटिश सेना और औपनिवेशिक राज्य सामने आते हैं।
और यदि प्रश्न है कि संघर्ष की दीर्घकालीन जड़ क्या थी, तो मालाबार की भूमि व्यवस्था दिखाई देती है।
प्रश्न बदलते ही इतिहास का केंद्र बदल जाता है।
मोपला आंदोलन के प्रमुख व्यक्तित्व — वारियमकुन्नथ कुंजाहम्मद हाजी, अली मुसलियार, चेम्ब्रस्सेरी तंगल, एम. पी. नारायण मेनन, के. माधवन नायर, याकूब हसन, गांधी और ब्रिटिश प्रशासन के प्रमुख अधिकारी
1921 के मोपला आंदोलन को केवल घटनाओं, भूमि संबंधों या धार्मिक-सामाजिक परिस्थितियों से समझना पर्याप्त नहीं है। उसके चरित्र और दिशा को उन व्यक्तियों ने भी प्रभावित किया जो अलग-अलग स्तरों पर इसमें सक्रिय थे। इनमें सशस्त्र विद्रोही नेता थे, खिलाफत के धार्मिक नेता थे, कांग्रेस के कार्यकर्ता थे, कृषक संगठनकर्ता थे और वे ब्रिटिश अधिकारी भी थे जिनके निर्णयों ने पहले तनाव बढ़ाया और बाद में विद्रोह के दमन की रणनीति निर्धारित की।
इन व्यक्तियों का मूल्यांकन विशेष सावधानी मांगता है क्योंकि 1921 की राजनीतिक स्मृति ने उन्हें लगभग दो विपरीत खेमों में बांट दिया है। एक परंपरा कुछ विद्रोही नेताओं को स्वतंत्रता सेनानी और शहीद मानती है; दूसरी उन्हें हिंदुओं पर हुई हिंसा से जोड़कर देखती है। इसी तरह ब्रिटिश अधिकारियों के अपने विवरण उन्हें कानून-व्यवस्था बचाने वाले प्रशासक के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जबकि राष्ट्रवादी स्रोत उनके निर्णयों को विद्रोह भड़काने वाली दमनकारी नीति मानते हैं।
इसलिए यहां किसी व्यक्ति को पहले से “नायक” या “खलनायक” घोषित करने के बजाय तीन प्रश्न पूछे जाएंगे—
उसके बारे में समकालीन स्रोत क्या कहते हैं?
बाद की राजनीतिक स्मृति ने उसकी छवि को किस तरह बदला?
वारियमकुन्नथ कुंजाहम्मद हाजी — आंदोलन का सबसे चर्चित चेहरा
मोपला आंदोलन के किसी एक व्यक्ति का नाम आज सबसे अधिक राजनीतिक और ऐतिहासिक विवाद पैदा करता है तो वह है वारियमकुन्नथ कुंजाहम्मद हाजी।
उनका जन्म दक्षिण मालाबार के एरनाड क्षेत्र में एक माप्पिला परिवार में हुआ था। परिवार का ब्रिटिश शासन और पूर्ववर्ती मोपला प्रतिरोध की परंपरा से संबंध बताया जाता है। युवा अवस्था से ही वे स्थानीय समाज, व्यापार और माप्पिला समुदाय के नेटवर्क से परिचित थे।
1921 तक वे अचानक शून्य से उभरे नेता नहीं थे। उनके पीछे—
और दक्षिण मालाबार की पुरानी विद्रोही परंपरा—
लेकिन अगस्त 1921 के बाद उनकी भूमिका तेजी से बदल गई।
स्थानीय कार्यकर्ता से विद्रोही शासक तक
20 अगस्त 1921 को तिरुरंगाडी की घटनाओं के बाद जब सरकारी नियंत्रण कई क्षेत्रों में कमजोर हुआ, हाजी प्रमुख विद्रोही नेताओं में उभरे।
उनका प्रभाव विशेष रूप से एरनाड के कुछ हिस्सों में दिखाई देता है।
अन्य विद्रोही नेताओं से उनकी एक महत्वपूर्ण भिन्नता थी—
वे केवल लड़ाकू दस्ते का नेतृत्व करने तक सीमित नहीं रहे।
उन्होंने नियंत्रित क्षेत्र में किसी प्रकार की वैकल्पिक प्रशासनिक व्यवस्था खड़ी करने का प्रयास किया।
इसी कारण बाद के साहित्य में उनके शासन को कभी—
जैसा अध्याय 9.17 और 9.19 में हमने देखा, अंतिम शब्दावली में सावधानी जरूरी है।
क्या हाजी ने स्वतंत्र राज्य स्थापित किया था?
लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि समानांतर सत्ता की बात पूरी तरह काल्पनिक है।
और ब्रिटिश प्रशासन की जगह स्थानीय नियंत्रण स्थापित करने—
अल्पकालिक विद्रोही समानांतर प्रशासन।
यहीं उनके मूल्यांकन का सबसे विवादास्पद हिस्सा आता है।
हाजी की आधुनिक समर्थक छवि में अक्सर दावा किया जाता है कि उन्होंने हिंदुओं की सुरक्षा के आदेश दिए और लूटपाट करने वालों को दंडित किया।
कुछ स्रोतों और स्थानीय स्मृतियों में ऐसे संकेत मिलते हैं कि उन्होंने अनुशासन स्थापित करने तथा निजी लूट को रोकने की कोशिश की।
1792 से 1922 तक मोपला आंदोलन की विस्तृत समयरेखा — ब्रिटिश आधिपत्य, उन्नीसवीं सदी के उभार, खिलाफत-असहयोग, 1921 का विद्रोह और अंतिम दमन
1921 का मोपला या मालाबार विद्रोह 20 अगस्त 1921 को अचानक पैदा हुई घटना नहीं था। उसकी ऐतिहासिक जड़ें कम-से-कम 1792 तक जाती हैं, जब तीसरे आंग्ल-मैसूर युद्ध के बाद मालाबार पर ईस्ट इंडिया कंपनी का नियंत्रण स्थापित हुआ। आधुनिक शोध भी इंगित करता है कि दक्षिण मालाबार के ग्रामीण माप्पिला समाज द्वारा ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देने की परंपरा कंपनी शासन के आरंभिक दशक तक पीछे जाती है।
इसलिए 1921 को समझने के लिए लगभग 130 वर्षों की समयरेखा देखना आवश्यक है।
इस कालक्रम में तीन प्रक्रियाएं साथ-साथ चलती दिखाई देती हैं—
माप्पिला कृषक असंतोष और छोटे हिंसक उभार,
खिलाफत-असहयोग की अखिल भारतीय राजनीति का मालाबार की स्थानीय परिस्थितियों से मिलना।
इन्हीं तीन धाराओं का संगम 1921 में हुआ।
1792 : ब्रिटिश आधिपत्य की निर्णायक शुरुआत
तीसरे आंग्ल-मैसूर युद्ध में टीपू सुल्तान की पराजय के बाद श्रीरंगपट्टनम की संधि हुई।
मैसूर द्वारा छोड़े गए क्षेत्रों में मालाबार भी शामिल था और ईस्ट इंडिया कंपनी ने यहां अपना प्रशासन स्थापित करना शुरू किया।
यही मोपला आंदोलन की दीर्घकालीन पृष्ठभूमि का निर्णायक मोड़ है।
कॉनराड वुड के शोध का महत्वपूर्ण निष्कर्ष है कि ग्रामीण माप्पिलाओं का ब्रिटिश सत्ता के प्रति प्रतिरोध 1836 से नहीं, बल्कि कंपनी शासन के शुरुआती वर्षों तक जाता है।
1792–1793 : नई भूमि व्यवस्था को समझने का ब्रिटिश प्रयास
कंपनी अधिकारियों ने मालाबार में भूमि, लगान और परंपरागत अधिकारों का सर्वेक्षण शुरू किया।
समस्या यह थी कि मालाबार की भूमि व्यवस्था यूरोपीय अर्थ में सरल “मालिक-किरायेदार” व्यवस्था नहीं थी।
ब्रिटिश कानून ने धीरे-धीरे इन जटिल परंपरागत अधिकारों को संपत्ति के अधिक कठोर कानूनी ढांचे में बदलना शुरू किया।
यही परिवर्तन आगे कृषक असंतोष की महत्वपूर्ण संरचनात्मक पृष्ठभूमि बना।
1793–1800 : कंपनी शासन के विरुद्ध प्रारंभिक प्रतिरोध
कंपनी शासन स्थापित होते ही दक्षिण मालाबार पूरी तरह शांत नहीं हुआ।
पुराने राजनीतिक और सामाजिक संबंध टूट रहे थे।
ब्रिटिश राजस्व नीति और जेनमी अधिकारों को दी गई कानूनी शक्ति से ग्रामीण शक्ति-संतुलन बदलने लगा।
माप्पिला कृषक आबादी के एक हिस्से में असंतोष बढ़ा।
इस शुरुआती दौर को 1921 का सीधा पूर्वरूप नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह सिद्ध करता है कि ब्रिटिश-माप्पिला टकराव उन्नीसवीं सदी के मध्य की अचानक घटना नहीं था।
1800–1802 : मंजेरी क्षेत्र का प्रारंभिक प्रतिरोध
कॉनराड वुड ने कंपनी शासन के शुरुआती काल के एक महत्वपूर्ण माप्पिला प्रतिरोध का अध्ययन करते हुए इसे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध पहला उल्लेखनीय मोपला विद्रोह कहा है।
मोपला आंदोलन के प्रमुख प्राथमिक स्रोत और दस्तावेज — सरकारी रिपोर्ट, मालाबार अभिलेख, न्यायिक रिकॉर्ड, कांग्रेस-खिलाफत दस्तावेज, गांधी लेखन, प्रत्यक्षदर्शी विवरण और समकालीन समाचार पत्र
मोपला आंदोलन पर अब तक की चर्चा में हमने भूमि व्यवस्था, उन्नीसवीं सदी के उभार, खिलाफत-असहयोग, 1921 के विद्रोह, हिंदुओं पर हिंसा, जबरन धर्मांतरण, ब्रिटिश दमन, वागन त्रासदी, नेतृत्व और इतिहासलेखन जैसे लगभग सभी प्रमुख पक्षों का अध्ययन किया है। लेकिन किसी भी गंभीर शोध का अंतिम आधार यह नहीं होता कि बाद के इतिहासकारों ने क्या लिखा; अंतिम आधार यह होता है कि घटना के समय के दस्तावेज क्या कहते हैं।
मोपला आंदोलन के मामले में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि 1921 के बारे में आज भी परस्पर विरोधी दावे किए जाते हैं। किसी के लिए यह किसान क्रांति है, किसी के लिए खिलाफत विद्रोह, किसी के लिए स्वतंत्रता संग्राम और किसी के लिए हिंदुओं के विरुद्ध सांप्रदायिक हिंसा।
इन दावों की जांच करने का सबसे विश्वसनीय तरीका है—
सौभाग्य से मोपला आंदोलन के बारे में प्राथमिक सामग्री असाधारण रूप से समृद्ध है। कॉनराड वुड जैसे शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी, मद्रास रिकॉर्ड ऑफिस, निजी पत्रों, समाचार पत्रों, संस्मरणों, अदालती कार्यवाहियों और साक्षात्कारों सहित विशाल स्रोत-संग्रह का उपयोग किया।
इसलिए 1921 के इतिहास को स्रोत-विहीन राजनीतिक बहस के भरोसे समझने की आवश्यकता नहीं है।
सबसे पहले यह अंतर स्पष्ट होना चाहिए।
1921 में जिला मजिस्ट्रेट द्वारा मद्रास सरकार को भेजी गई रिपोर्ट—
1921 के Young India में गांधी का लेख—
ब्रिटिश सेना की सैन्य कार्रवाई रिपोर्ट—
लेकिन 1977 में रॉबर्ट हार्डग्रेव द्वारा लिखा गया शोध—
महत्वपूर्ण होने के बावजूद द्वितीयक स्रोत है।
द्वितीयक स्रोत हमें प्राथमिक दस्तावेज खोजने, उनकी तुलना करने और उनका ऐतिहासिक अर्थ समझने में सहायता करते हैं।
प्राथमिक स्रोत भी स्वतः “सत्य” नहीं होता
यदि ब्रिटिश अधिकारी ने 1921 में कुछ लिखा—
उसका अनुभव अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन संख्या संबंधी प्रत्येक अनुमान स्वतंत्र जांच मांगता है।
वह विद्रोही दृष्टिकोण बताता है, लेकिन दूसरे पक्ष की पूरी कहानी नहीं।
प्राथमिक स्रोत घटना के सबसे निकट होता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह घटना का सबसे निष्पक्ष वर्णन हो।
इसीलिए इतिहासकार स्रोत-समीक्षा करता है।
1921 में मालाबार मद्रास प्रेसीडेंसी का हिस्सा था।
इसलिए विद्रोह से संबंधित सबसे बड़ा प्रशासनिक दस्तावेज-संग्रह मद्रास सरकार की व्यवस्था से पैदा हुआ।
ये दस्तावेज घटनाक्रम की तारीख तय करने में अत्यंत उपयोगी हैं।
मालाबार के जिला प्रशासन के प्रमुख अधिकारी ई. एफ. थॉमस के पत्र 1921 की पृष्ठभूमि समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
उदाहरण के लिए 16 अगस्त 1921 को थॉमस द्वारा मद्रास सरकार को भेजे गए पत्र का उल्लेख रॉबर्ट हार्डग्रेव ने आधिकारिक संकलनों के आधार पर किया है। इसी प्रकार 18 अगस्त के दस्तावेज और तिरुरंगाडी कार्रवाई से पहले पुलिस योजना के अभिलेख भी उपलब्ध हैं।
इन दस्तावेजों का महत्व इसलिए असाधारण है क्योंकि वे बताते हैं—
20 अगस्त से पहले प्रशासन क्या जानता था?
और तिरुरंगाडी कार्रवाई की योजना कैसे बनी?
20 अगस्त को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्रोत
तिरुरंगाडी में वास्तव में क्या हुआ?
तो बाद की राजनीतिक पुस्तकों से शुरुआत नहीं करनी चाहिए।
कार्रवाई में शामिल अधिकारियों की रिपोर्ट,
इसके बाद इन स्रोतों की तुलना कांग्रेस तथा स्थानीय प्रत्यक्षदर्शी विवरणों से करनी चाहिए।
यही विधि अफवाह और तथ्य अलग करने में सहायता करती है।
दूसरा महत्वपूर्ण सरकारी स्रोत — पुलिस रिकॉर्ड
मालाबार पुलिस के पास उन्नीसवीं सदी से मोपला उभारों का विस्तृत रिकॉर्ड था।
आर. एच. हिचकॉक जैसे अधिकारियों ने पूर्ववर्ती मोपला घटनाओं और 1921 दोनों पर सामग्री तैयार की।
लेकिन पुलिस रिकॉर्ड की अपनी सीमा है।
लोग कानून तोड़ने की स्थिति तक क्यों पहुंचे?
मोपला आंदोलन पर प्रमुख द्वितीयक स्रोत और संदर्भ ग्रंथ — मानक पुस्तकें, आधुनिक शोध, शोध-प्रबंध, प्रमुख इतिहासकार और उपयोगी डिजिटल अभिलेख
मोपला आंदोलन पर शोध की सबसे बड़ी चुनौती सामग्री की कमी नहीं, बल्कि व्याख्याओं की बहुलता और परस्पर विरोध है। 1921 की एक ही घटना को औपनिवेशिक अधिकारियों, कांग्रेस नेताओं, मार्क्सवादी इतिहासकारों, इस्लामी समाज के अध्येताओं और आधुनिक सैन्य इतिहासकारों ने अलग-अलग दृष्टि से देखा है। इसलिए किसी एक पुस्तक को आधार बनाकर मोपला आंदोलन की प्रकृति तय करना सुरक्षित पद्धति नहीं है।
पिछले अध्याय में हमने प्राथमिक स्रोतों की चर्चा की थी। अब आवश्यकता उन द्वितीयक स्रोतों को व्यवस्थित करने की है जिनकी सहायता से सरकारी दस्तावेजों, गवाहियों, भूमि अभिलेखों और समकालीन सामग्री का अर्थ समझा जा सकता है।
मोपला आंदोलन के लिए विशेष रूप से छह प्रश्नों पर अलग-अलग साहित्य देखना उपयोगी है—
भूमि और कृषक संबंध, माप्पिला समुदाय का इतिहास, उन्नीसवीं सदी के उभार, खिलाफत-असहयोग, 1921 का विद्रोह और औपनिवेशिक सैन्य दमन।
इन छहों को एक ही इतिहासकार समान गहराई से नहीं देखता। इसीलिए स्रोतों का संयोजन आवश्यक है।
1. कॉनराड वुड — The Moplah Rebellion of 1921–22 and Its Genesis
मोपला आंदोलन के आधुनिक अकादमिक अध्ययन में कॉनराड वुड का काम आधारभूत महत्व रखता है।
उनका 1975 का SOAS, University of London का पीएचडी शोध-प्रबंध है—
The Moplah Rebellion of 1921–22 and Its Genesis.
यह आज SOAS के आधिकारिक शोध भंडार में उपलब्ध है।
urlSOAS — Conrad Wood का मूल शोध-प्रबंधturn0search0
इस शोध की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वुड 1921 से शुरुआत नहीं करते।
वे कहानी को 1792 तक पीछे ले जाते हैं—जब मालाबार ईस्ट इंडिया कंपनी के नियंत्रण में आया।
ब्रिटिश शासन ने मालाबार के ग्रामीण सामाजिक और भूमि संबंधों को कैसे बदला और इस परिवर्तन ने माप्पिला कृषक समाज और औपनिवेशिक सत्ता के बीच संघर्ष की परिस्थितियां कैसे तैयार कीं?
वुड के शोध-प्रबंध की संरचना भी इसी दृष्टिकोण को स्पष्ट करती है। वे पहले ब्रिटिश शासन के प्रभाव में ग्रामीण मालाबार के सामाजिक संबंधों की जांच करते हैं, फिर माप्पिला असंतोष के स्रोत देखते हैं, और उसके बाद खिलाफत-असहयोग अभियान तथा 1921 के विद्रोह के संबंध की व्याख्या करते हैं।
वुड हमारे शोध में कहां सबसे उपयोगी हैं?
9.4–9.10 : भूमि व्यवस्था और उन्नीसवीं सदी के उभार,
9.12–9.16 : खिलाफत-असहयोग से विद्रोह तक,
9.29–9.30 : विद्रोह की प्रकृति और इतिहासलेखन—
वुड का शोध बाद में संशोधित पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ—
The Moplah Rebellion and Its Genesis, People's Publishing House, New Delhi, 1987.
पुस्तक 262 पृष्ठों की है और मूल 1975 पीएचडी शोध का संशोधित रूप है।
urlConrad Wood — पुस्तक का अभिलेख और उपलब्ध डिजिटल संस्करणturn0search10
यदि वेबसाइट के पाठक के लिए एक ऐसी पुस्तक सुझानी हो जो 1921 को उसकी लंबी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रखती हो, तो वुड की पुस्तक शीर्ष स्रोतों में रहेगी।
3. रॉबर्ट एल. हार्डग्रेव जूनियर — The Mappilla Rebellion, 1921: Peasant Revolt in Malabar
मोपला आंदोलन पर सबसे अधिक उद्धृत अकादमिक शोध-पत्रों में एक है—
Robert L. Hardgrave Jr., “The Mappilla Rebellion, 1921: Peasant Revolt in Malabar.”
यह Modern Asian Studies, Volume 11, Issue 1, फरवरी 1977 में पृष्ठ 57–99 पर प्रकाशित हुआ।
urlCambridge University Press — Hardgrave का शोध-पत्रturn0search1
हार्डग्रेव की विशेषता यह है कि उन्होंने केवल प्रकाशित पुस्तकों पर भरोसा नहीं किया।
और Jawaharlal Nehru Museum, New Delhi—
इसलिए उनका लेख केवल वैचारिक व्याख्या नहीं बल्कि व्यापक अभिलेखीय शोध पर आधारित है।
शीर्षक में ही उनकी दृष्टि दिखाई देती है—
हार्डग्रेव कृषक असंतोष, किरायेदारी संबंध और सामाजिक संरचना को विद्रोह की व्याख्या में महत्वपूर्ण स्थान देते हैं।
लेकिन उनके लेख को यह कहकर संक्षिप्त कर देना कि उन्होंने 1921 को “सिर्फ किसान विद्रोह” कहा, उचित नहीं होगा।
और विद्रोह के सांप्रदायिक रूपांतरण—
उनकी सबसे बड़ी उपयोगिता यह है कि वे जटिल कारणों को एक सामाजिक-राजनीतिक ढांचे में रखने का प्रयास करते हैं।
5. हार्डग्रेव की एक और बड़ी उपयोगिता — उनकी संदर्भ सूची
हार्डग्रेव का लेख स्वयं एक प्रकार का शोध-मार्गदर्शक है।
उनकी संदर्भ सूची से हमें पता चलता है कि गंभीर मोपला शोध के लिए किन अभिलेखों और पुस्तकों तक जाना चाहिए।
उदाहरणतः वे जी. आर. एफ. टॉटनहम के The Mapilla Rebellion, 1921–22 को आर. एच. हिचकॉक के इतिहास के साथ विद्रोह के दो प्रमुख प्रकाशित आधिकारिक स्रोतों में रखते हैं।
वे के. माधवन नायर के Malabar Kalapam को उपलब्ध विवरणों में अत्यंत महत्वपूर्ण और संतुलित बताते हैं।
अर्थात हार्डग्रेव को पढ़ने का एक लाभ यह भी है कि उससे पुराने स्रोतों की पूरी श्रृंखला खुलती है।
निष्कर्ष — मोपला आंदोलन को कैसे समझें? किसान विद्रोह, औपनिवेशिक-विरोध, खिलाफत उभार और सांप्रदायिक हिंसा के बीच एक संतुलित ऐतिहासिक मूल्यांकन
मालाबार का 1921 का मोपला या माप्पिला आंदोलन भारतीय इतिहास की उन घटनाओं में है जिन्हें किसी एक शब्द में समेटने की कोशिश इतिहास को समझने के बजाय उसे सरल बना देती है। इसे केवल ‘किसान विद्रोह’ कहने पर हिंदुओं की हत्याएं, लूट, विस्थापन और जबरन धर्मांतरण जैसी घटनाएं पर्याप्त रूप से नहीं समझाई जा सकतीं। इसे केवल ‘हिंदू-विरोधी सांप्रदायिक हिंसा’ कह देने पर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष, पुलिस थानों और सरकारी संस्थानों पर हमले, औपनिवेशिक भूमि व्यवस्था तथा दशकों पुराने कृषक असंतोष की अनदेखी होती है। इसे केवल ‘खिलाफत विद्रोह’ कहने से मालाबार की विशिष्ट भूमि और सामाजिक संरचना गायब हो जाती है, और इसे बिना किसी योग्यता के ‘स्वतंत्रता संग्राम’ कहने पर आंदोलन के उन चरणों और कार्रवाइयों की व्याख्या कठिन हो जाती है जिनमें निर्दोष हिंदू नागरिक निशाना बने।
इस पूरे अध्ययन—1792 में ब्रिटिश आधिपत्य की स्थापना से लेकर उन्नीसवीं सदी के मोपला उभारों, भूमि व्यवस्था, खिलाफत-असहयोग, अगस्त 1921 के विस्फोट, विद्रोही सत्ता, सांप्रदायिक हिंसा, ब्रिटिश प्रतिआक्रमण, वागन त्रासदी और 1922 में आंदोलन के अंत तक—से एक अधिक जटिल तस्वीर सामने आती है।
मोपला आंदोलन एक कारण से पैदा हुआ आंदोलन नहीं था और पूरे घटनाक्रम में उसका चरित्र भी एक जैसा नहीं रहा।
आधुनिक अकादमिक साहित्य में भी आर्थिक और धार्मिक आयाम दोनों स्वीकार किए गए हैं; मतभेद मुख्यतः इस बात पर है कि किस तत्व को कितना महत्व दिया जाए। डेविड अर्नोल्ड ने इस बहस को उपयोगी ढंग से इस निष्कर्ष तक पहुंचाया कि धर्म और अर्थव्यवस्था को वैकल्पिक कारण मानना ही समस्या है—माप्पिला कृषक संसार में दोनों गहरे जुड़े हुए थे।
1921 को समझने के लिए 1792 से शुरुआत क्यों जरूरी है?
यदि इतिहास केवल 20 अगस्त 1921 से शुरू किया जाए तो पहली नजर में ऐसा प्रतीत हो सकता है कि खिलाफत आंदोलन ने अचानक धार्मिक उन्माद पैदा किया और मालाबार हिंसा में डूब गया।
लेकिन हमारा अध्ययन दिखाता है कि कहानी उससे कहीं पुरानी थी।
1792 में टीपू सुल्तान से मालाबार ईस्ट इंडिया कंपनी के नियंत्रण में आने के बाद ब्रिटिश सत्ता ने वहां के भूमि संबंधों को जिस कानूनी और प्रशासनिक ढांचे में बदला, उसके गंभीर सामाजिक परिणाम हुए। जेनमी के अधिकार अधिक ठोस संपत्ति-अधिकारों में बदलते गए, जबकि वास्तविक कृषकों और निम्नतर किरायेदारों की स्थिति असुरक्षित बनी रही।
कॉनराड वुड इसी कारण 1921 की उत्पत्ति 1792 से खोजते हैं। उनका तर्क है कि ब्रिटिश शासन द्वारा ग्रामीण सामाजिक संबंधों में आए परिवर्तनों ने वह दीर्घकालीन परिस्थिति बनाई जिसमें माप्पिला असंतोष विद्रोह का रूप ले सका।
1921 की जमीन एक सदी से अधिक समय में तैयार हुई थी।
इस तथ्य को नकारना कठिन है कि विद्रोह का मुख्य सामाजिक आधार दक्षिण मालाबार का गरीब माप्पिला कृषक समाज था।
जहां जेनमी-किरायेदार विवाद लंबे समय से मौजूद थे,
जहां माप्पिला कृषक बड़ी संख्या में थे,
और जहां उन्नीसवीं सदी में बार-बार हिंसक उभार हुए—
1921 में भी विद्रोह के प्रमुख केंद्र बने।
इस निरंतरता को संयोग मानना कठिन है।
वुड, हार्डग्रेव, पणिक्कर, धनागरे और अर्नोल्ड जैसे इतिहासकारों की अलग-अलग व्याख्याओं में भी कृषक प्रश्न केंद्रीय बना रहता है। हार्डग्रेव ने अपने प्रसिद्ध अध्ययन को ही Peasant Revolt in Malabar कहा, जबकि अर्नोल्ड का निष्कर्ष है कि माप्पिला उभारों को व्यापक भारतीय कृषक प्रतिरोध के संदर्भ में समझा जाना चाहिए।
“1921 का भूमि अथवा कृषक प्रश्न से कोई संबंध ही नहीं था”
उपलब्ध ऐतिहासिक साहित्य के साथ न्याय नहीं करेगा।
लेकिन क्या यह केवल जमींदार के विरुद्ध किसान था?
यही वह बिंदु है जहां “किसान विद्रोह” का सरल मॉडल टूटने लगता है।
यदि संघर्ष केवल किराया कम कराने या बेदखली रोकने का आंदोलन होता तो—
खिलाफत की भाषा क्यों इतनी महत्वपूर्ण बनी?
मस्जिदें लामबंदी के केंद्र क्यों बनीं?
अली मुसलियार जैसे धार्मिक नेता क्यों उभरे?
शहादत और धार्मिक कर्तव्य की अवधारणाएं क्यों दिखाई देती हैं?
और हिंदू नागरिकों पर धार्मिक पहचान के आधार पर हिंसा तथा जबरन धर्मांतरण क्यों हुए?
स्टीफन डेल की आलोचना इसी बिंदु पर महत्वपूर्ण है। उन्नीसवीं सदी के माप्पिला उभारों पर उनके अध्ययन में सामाजिक संघर्ष के साथ विचारधारा और धार्मिक पहचान को स्वतंत्र विश्लेषणात्मक महत्व दिया गया।
लेकिन किसान की चेतना केवल आर्थिक नहीं थी।
दूसरा तत्व : यह औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध वास्तविक विद्रोह था
इस तथ्य को भी कम करके नहीं आंका जा सकता।
1921 के विद्रोहियों ने केवल हिंदू जेनमियों को निशाना नहीं बनाया।
मोपला आंदोलन की संक्षिप्त समयरेखा
मोपला आंदोलन को केवल किसान विद्रोह कहने से सांप्रदायिक हिंसा और हिंदू पीड़ितों का अनुभव अदृश्य होता है; केवल धार्मिक उन्माद कहने से भूमि-संबंध, औपनिवेशिक शासन और ब्रिटिश दमन छूट जाते हैं। अधिक विश्वसनीय निष्कर्ष यह है कि आंदोलन का चरित्र समय और स्थान के साथ बदला। उसके आरंभ में कृषक, औपनिवेशिक-विरोधी और खिलाफत आयाम जुड़े थे; सत्ता-विघटन और युद्ध-जैसी परिस्थितियों में कई क्षेत्रों में यह हिंदू नागरिकों के विरुद्ध गंभीर हिंसा में बदल गया। इतिहास की जिम्मेदारी इन परतों में से किसी को मिटाना नहीं, बल्कि उनके संबंध और परिवर्तन को प्रमाणों सहित दर्ज करना है।
प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक स्रोत
स्रोत-सावधानी: औपनिवेशिक रिपोर्टें कानून-व्यवस्था और सैन्य दृष्टि से लिखी गईं; राष्ट्रवादी स्रोत राजनीतिक बचाव या आलोचना से प्रभावित हो सकते हैं; पीड़ित गवाहियाँ मानवीय अनुभव का अनिवार्य पक्ष प्रस्तुत करती हैं। संख्याओं और विवादित दावों में स्रोत-भेद स्पष्ट रखा गया है।