एका आंदोलन (1921–1922)
अवध की कृषक राजनीति में सामूहिक शपथ, लगान और बेगार विरोध, मदारी पासी के नेतृत्व, सामाजिक विस्तार और औपनिवेशिक दमन का इतिहास
एका आंदोलन अवध के किसान प्रतिरोध की दूसरी, विशिष्ट लहर था। इसे केवल असहयोग आंदोलन की शाखा या स्वतःस्फूर्त ग्रामीण अशांति कहना पर्याप्त नहीं है। सामूहिक शपथ, पंचायत-अनुशासन, निर्धारित लगान से अधिक न देने का संकल्प, बेगार और अवैध वसूली का विरोध तथा मदारी पासी जैसे स्थानीय नेतृत्व ने इसे स्वतंत्र पहचान दी। यह अध्ययन आंदोलन की उपलब्धियों के साथ उसकी सामाजिक सीमाओं, हिंसा-अहिंसा के तनाव, कांग्रेस से दूरी और स्रोतों में मौजूद मतभेदों को भी दर्ज करता है।
भूमिका — औपनिवेशिक किसान आंदोलनों में एका आंदोलन का स्थान
प्रमुख तथ्य
भारतीय किसान आंदोलनों के इतिहास में एका आंदोलन (1921–1922) एक ऐसे संक्रमणकाल का प्रतिनिधित्व करता है, जब औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय राजनीति और गांवों के भीतर भूमि, लगान, बेगार तथा जमींदारी शोषण के विरुद्ध किसान प्रतिरोध एक-दूसरे से जुड़ भी रहे थे और कई स्थानों पर अलग रास्ते भी अपना रहे थे। उत्तर भारत, विशेषकर तत्कालीन संयुक्त प्रांत आगरा एवं अवध (United Provinces of Agra and Oudh) में उभरा यह आंदोलन इसी जटिल संबंध को समझने की महत्वपूर्ण कुंजी है।
एका आंदोलन को केवल बढ़े हुए लगान के विरुद्ध किसानों का स्थानीय विद्रोह कहना उसके ऐतिहासिक महत्व को बहुत सीमित कर देना होगा। यह आंदोलन उस समय सामने आया जब अवध के किसान पहले ही संगठित प्रतिरोध का अनुभव प्राप्त कर चुके थे, असहयोग आंदोलन ग्रामीण समाज तक राष्ट्रीय राजनीति की भाषा पहुंचा चुका था, प्रथम विश्वयुद्ध के बाद की आर्थिक कठिनाइयां किसानों पर दबाव बढ़ा रही थीं और महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पहली बार व्यापक जन-राजनीतिक संगठन का रूप ले रही थी।
इन्हीं परिस्थितियों में किसानों का एक ऐसा आंदोलन विकसित हुआ जिसमें एकता की सामूहिक शपथ, लगान की न्यायसंगत दर की मांग, बेगार और अवैध वसूली का विरोध, जमींदारों के दबाव के विरुद्ध सामूहिक कार्रवाई तथा स्थानीय किसान नेतृत्व की बढ़ती स्वायत्तता दिखाई देती है।
इस आंदोलन का सबसे चर्चित नाम मदारी पासी है। उनका उभार भारतीय किसान राजनीति के इतिहास में इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वे किसी बड़े जमींदार परिवार, शिक्षित शहरी अभिजात वर्ग या राष्ट्रीय कांग्रेस नेतृत्व से नहीं आए थे। उनका नेतृत्व ग्रामीण समाज के अपेक्षाकृत निम्न सामाजिक स्तरों से उभरा। यही कारण है कि एका आंदोलन सामाजिक इतिहास और ‘नीचे से इतिहास’ लिखने वाले इतिहासकारों के लिए विशेष महत्व रखता है।
2 अवध किसान आंदोलन से एका तक
एका आंदोलन को समझने के लिए उसके तत्काल पूर्ववर्ती अवध किसान आंदोलन को ध्यान में रखना आवश्यक है।
1919–21 के दौरान अवध के कई जिलों में किसान संगठन तेजी से विकसित हुए। किसान सभाएं बनीं। बाबा रामचंद्र जैसे नेताओं ने ग्रामीण शिकायतों को संगठित राजनीतिक भाषा दी। जवाहरलाल नेहरू सहित कांग्रेस के कई नेताओं ने भी ग्रामीण क्षेत्रों का दौरा किया।
इस दौर ने किसानों को एक महत्वपूर्ण अनुभव दिया—
व्यक्तिगत शिकायत को सामूहिक राजनीतिक मांग में बदला जा सकता है।
यही परिवर्तन आगे एका आंदोलन की जमीन बना।
फिर भी दोनों आंदोलनों को एक मानना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा।
अवध किसान आंदोलन और एका आंदोलन के बीच— भौगोलिक क्षेत्र, नेतृत्व, सामाजिक संरचना, संगठन, प्रतिरोध की पद्धतियों और कांग्रेस से संबंध में महत्वपूर्ण अंतर थे।
एका आंदोलन ने पहले से सक्रिय किसान असंतोष को ग्रहण किया, लेकिन उसे अपनी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार पुनर्गठित किया।
4 तत्कालीन संयुक्त प्रांत की ग्रामीण संरचना
1921 में आज का उत्तर प्रदेश उसी राजनीतिक-प्रशासनिक रूप में मौजूद नहीं था। क्षेत्र तत्कालीन United Provinces of Agra and Oudh का हिस्सा था।
इसके विभिन्न भागों में भूमि संबंध समान नहीं थे।
विशेषकर अवध में तालुकेदारों और बड़े जमींदारों की शक्ति का लंबा इतिहास था। उनके नीचे उप-जमींदार, ठेकेदार, किरायेदार, काश्तकार और खेतिहर श्रमिकों की जटिल संरचना मौजूद थी।
औपनिवेशिक शासन ने भूमि संबंधों को केवल आर्थिक प्रश्न नहीं रहने दिया था। राजस्व और संपत्ति संबंधों को कानूनी तथा प्रशासनिक संस्थाओं से जोड़ दिया गया।
इससे ग्रामीण शक्ति के तीन आयाम एक-दूसरे में मिल गए— भूमि का नियंत्रण, सामाजिक प्रभुत्व, और राजकीय संरक्षण।
किसान का विवाद केवल खेत के मालिक से नहीं था। उसके सामने ऐसी संरचना थी जिसे राजस्व व्यवस्था, अदालत, पुलिस और स्थानीय प्रभावशाली वर्गों का समर्थन मिल सकता था।
इसी कारण लगान का प्रश्न तेजी से राजनीतिक प्रश्न बन सकता था।
7 राष्ट्रीय राजनीति गांव तक पहुंच चुकी थी
1919 के बाद भारत की राजनीति तेजी से बदल रही थी। रॉलेट एक्ट, जलियांवाला बाग, खिलाफत प्रश्न
और फिर गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन
ने कांग्रेस की राजनीति को शहरों और शिक्षित वर्गों से बहुत आगे पहुंचाया। विदेशी कपड़ों का बहिष्कार, सरकारी संस्थाओं से असहयोग, राष्ट्रीय शिक्षा, स्वदेशी, खादी, पंचायत
और औपनिवेशिक शासन के नैतिक प्रतिरोध की भाषा गांवों तक पहुंची।
किसान इस राष्ट्रीय भाषा को अपनी परिस्थितियों में समझने लगे।
उनके लिए ‘स्वराज’ का अर्थ केवल दिल्ली या लंदन में सत्ता परिवर्तन नहीं था।
कई किसानों के लिए स्वराज की व्यावहारिक कल्पना जुड़ सकती थी— कम लगान, बेदखली से सुरक्षा, बेगार से मुक्ति, जमींदार की मनमानी से राहत और स्थानीय न्याय से।
यहीं राष्ट्रीय आंदोलन और किसान आंदोलन के अर्थों में अंतर पैदा होने लगा।
8 कांग्रेस और किसान की ‘स्वराज’ की कल्पना हमेशा समान नहीं थी
यह एका आंदोलन को समझने का केंद्रीय प्रश्न है।
कांग्रेस नेतृत्व के लिए असहयोग आंदोलन का मुख्य लक्ष्य था— ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन।
किसान के लिए उसका तत्काल शोषक कई बार सामने खड़ा— जमींदार, तालुकेदार, महाजन, ठेकेदार या स्थानीय अधिकारी था।
राष्ट्रीय नेतृत्व औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध व्यापक राजनीतिक एकता चाहता था। लेकिन किसान पूछ सकता था—
यदि स्वराज आएगा तो मेरा लगान क्या होगा? क्या बेगार समाप्त होगी? क्या बेदखली रुकेगी? क्या जमींदार की मनमानी खत्म होगी?
यह अंतर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और कृषक राजनीति के संबंधों को जटिल बनाता है।
एका आंदोलन इसी तनाव का उत्कृष्ट उदाहरण है।
9 हरदोई और आंदोलन का उभार
एका आंदोलन का प्रमुख केंद्र तत्कालीन संयुक्त प्रांत का हरदोई जिला बना और वहां से इसका प्रभाव आसपास के क्षेत्रों तक फैला।
इसके प्रभाव के संदर्भ में इतिहासकार विशेष रूप से— हरदोई, सीतापुर और बहराइच
जैसे जिलों का उल्लेख करते हैं; विभिन्न स्रोतों में प्रसार-क्षेत्र की सीमाएं कुछ भिन्न मिलती हैं।
1921 के उत्तरार्ध में आंदोलन ने अधिक स्पष्ट रूप लेना शुरू किया।
स्थानीय स्तर पर किसान सभाएं और सामूहिक प्रतिज्ञाएं आंदोलन की पहचान बनीं। यहां महत्वपूर्ण परिवर्तन था—
अब किसान केवल किसी बाहरी नेता के भाषण का श्रोता नहीं था।
वह स्वयं स्थानीय संगठन का हिस्सा बन रहा था।
10 प्रारंभिक नेतृत्व और कांग्रेस–खिलाफत संबंध
एका आंदोलन के शुरुआती चरण में स्थानीय कांग्रेस और खिलाफत कार्यकर्ताओं की भूमिका भी दिखाई देती है। यह अस्वाभाविक नहीं था।
असहयोग और खिलाफत आंदोलनों ने उस समय व्यापक राजनीतिक लामबंदी पैदा कर रखी थी।
लेकिन जैसे-जैसे किसान आंदोलन की मांगें और प्रतिरोध स्थानीय भूमि-संबंधों पर अधिक केंद्रित हुए, कांग्रेस नेतृत्व और आंदोलन के बीच दूरी बढ़ने लगी। कांग्रेस नेतृत्व को विशेष चिंता थी— अहिंसा, अनुशासन, कानून उल्लंघन की सीमाएं,
और जमींदारों के विरुद्ध आंदोलन के अधिक उग्र होने की संभावना।
यहीं से एका की स्वतंत्र पहचान और स्पष्ट होती है।
11 मदारी पासी का उभार
एका आंदोलन के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण लोकप्रिय नाम है— मदारी पासी।
उनके जीवन के बारे में उपलब्ध विश्वसनीय जीवनी-सामग्री कई राष्ट्रीय नेताओं की तुलना में सीमित है। यही तथ्य अपने आप में औपनिवेशिक और राष्ट्रवादी इतिहासलेखन की प्राथमिकताओं के बारे में बहुत कुछ कहता है।
वे ग्रामीण समाज के उस हिस्से का प्रतिनिधित्व करते थे जिसे तत्कालीन सामाजिक पदानुक्रम में ऊंचा स्थान प्राप्त नहीं था।
उनका पासी समुदाय से होना महत्वपूर्ण था।
इससे एका आंदोलन के नेतृत्व का सामाजिक चरित्र कई पूर्ववर्ती आंदोलनों से अलग दिखाई देता है।
यहां एक निम्न सामाजिक पृष्ठभूमि का स्थानीय नेता व्यापक किसान लामबंदी का प्रमुख चेहरा बन रहा था।
12 मदारी पासी का महत्व केवल जातीय पहचान नहीं
मदारी पासी को केवल “दलित नेता” कहकर सीमित करना भी उचित नहीं होगा।
उनका ऐतिहासिक महत्व इस बात में है कि वे ऐसे किसान प्रतिरोध के प्रतीक बने जिसमें सामाजिक रूप से वंचित समुदायों की सक्रियता दिखाई देती है।
आंदोलन में केवल एक जाति के किसान नहीं थे। विभिन्न ग्रामीण समुदायों की भागीदारी रही।
इसलिए मदारी पासी की सामाजिक पृष्ठभूमि महत्वपूर्ण होते हुए भी आंदोलन को किसी एक जाति का आंदोलन कहना गलत होगा। अधिक सटीक व्याख्या होगी—
सामाजिक रूप से निम्न पायदान से निकला नेतृत्व बहुस्तरीय किसान असंतोष को संगठित कर रहा था।
13 किसान आंदोलन और सामाजिक पदानुक्रम
एका आंदोलन केवल किसान बनाम जमींदार संघर्ष नहीं था।
उसके भीतर ग्रामीण समाज की जातिगत और सामाजिक संरचना भी सक्रिय थी। भूमि पर अधिकार, काश्तकारी स्थिति, श्रम, बेगार, सामाजिक प्रतिष्ठा और जाति
कई स्थानों पर एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।
इसीलिए आर्थिक प्रतिरोध सामाजिक सम्मान के प्रश्न से भी जुड़ सकता था।
जब निम्न सामाजिक समुदायों के किसान सामूहिक शपथ लेकर स्थानीय प्रभुत्व को चुनौती देते थे, तो उसका प्रभाव केवल लगान की रकम तक सीमित नहीं रहता था।
वह गांव के शक्ति-संतुलन को भी चुनौती देता था।
16 क्या एका ‘नो-रेंट मूवमेंट’ था?
इसे पूरी तरह लगान न देने का आंदोलन कहना भ्रामक होगा।
किसानों की मांग सामान्यतः हर प्रकार के लगान को समाप्त करने की नहीं थी। प्रमुख प्रश्न था—
उचित या दर्ज दर से अधिक लगान और अवैध अतिरिक्त वसूली का विरोध।
यानी किसान भूमि संबंध को पूरी तरह समाप्त करने की मांग नहीं कर रहे थे।
वे उस संबंध में न्यायसंगत शर्तें चाहते थे।
हालांकि आंदोलन के फैलने के साथ अलग-अलग स्थानों पर व्यवहार और मांगों में विविधता दिखाई दे सकती है।
इसीलिए औपनिवेशिक रिपोर्टों में दर्ज किसी एक स्थानीय घटना को पूरे आंदोलन की नीति मानना उचित नहीं होगा।
18 कांग्रेस क्यों पीछे हटी?
कांग्रेस की दूरी के पीछे केवल हिंसा का प्रश्न नहीं था।
गहरी समस्या यह थी कि किसान आंदोलन धीरे-धीरे कांग्रेस के प्रत्यक्ष नियंत्रण से बाहर जा रहा था।
यदि किसान स्वयं तय करने लगे कि— कितना लगान देना है, किस जमींदार का बहिष्कार करना है, किसे गांव में प्रवेश देना है,
और किस स्थानीय आदेश को मानना है—
तो यह कांग्रेस के लिए भी चुनौती थी। गांधीवादी आंदोलन नियंत्रित जन-असहयोग चाहता था।
स्वायत्त किसान आंदोलन स्थानीय सामाजिक व्यवस्था को अपनी शर्तों पर बदलने की ओर बढ़ सकता था।
दोनों के बीच यह तनाव भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के कई किसान प्रसंगों में आगे भी दिखाई देगा।
20 जमींदारों की प्रतिक्रिया
जमींदार वर्ग के लिए एका केवल आर्थिक चुनौती नहीं था।
यदि किसान सामूहिक रूप से तय करें कि वे अतिरिक्त वसूली नहीं देंगे, बेगार नहीं करेंगे या सामाजिक दबाव नहीं मानेंगे—
तो जमींदार की स्थानीय सत्ता कमजोर होती थी। इसलिए संघर्ष का प्रश्न था— कौन कितना लगान देगा? लेकिन उसके पीछे बड़ा प्रश्न था— गांव में आदेश किसका चलेगा?
यही एका आंदोलन को सामाजिक सत्ता के इतिहास से जोड़ता है।
22 छोटी अवधि, बड़ा ऐतिहासिक महत्व
यदि केवल अवधि देखी जाए तो एका आंदोलन बहुत लंबा नहीं था।
यदि केवल तत्काल नीतिगत उपलब्धियां देखी जाएं तो इसकी सफलता सीमित लग सकती है।
फिर इतिहास में इसका महत्व क्यों है?
क्योंकि उसने कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं उजागर कीं—
किसान राष्ट्रीय राजनीति की भाषा ग्रहण कर रहा था।
लेकिन उसे अपनी स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार बदल भी रहा था।
निम्न सामाजिक समूह नेतृत्व में आ रहे थे।
ग्रामीण एकता स्वयं राजनीतिक संगठन बन रही थी।
कांग्रेस और किसान हित हमेशा समान नहीं थे। और—
औपनिवेशिक विरोध के भीतर सामाजिक-आर्थिक न्याय की स्वतंत्र मांग विकसित हो रही थी।
24 राष्ट्रवादी इतिहासलेखन
राष्ट्रवादी इतिहासलेखन में किसान आंदोलनों को अक्सर व्यापक स्वतंत्रता संघर्ष के संदर्भ में देखा गया।
इस दृष्टिकोण का लाभ है कि वह किसानों को औपनिवेशिक शासन के खिलाफ राष्ट्रीय जागरण का हिस्सा बनाता है।
लेकिन इसकी सीमा यह हो सकती है कि स्थानीय किसान मांगें और राष्ट्रीय नेतृत्व से उनके मतभेद गौण हो जाएं।
एका आंदोलन ऐसी सरल व्याख्या को चुनौती देता है।
क्योंकि आंदोलन का महत्व उसी क्षण अधिक स्पष्ट होता है जब वह कांग्रेस से स्वतंत्र दिशा ग्रहण करने लगता है।
27 इतिहास के स्रोतों की समस्या
एका आंदोलन के अध्ययन में स्रोत-संबंधी समस्या गंभीर है।
राष्ट्रीय नेताओं की तरह ग्रामीण किसानों ने बड़ी संख्या में आत्मकथाएं, पत्र-संग्रह या व्यवस्थित अभिलेख नहीं छोड़े।
हमारे पास बड़ी मात्रा में सामग्री आती है— औपनिवेशिक प्रशासन, पुलिस, जिला अधिकारियों, राजस्व अधिकारियों, अखबारों, कांग्रेस कार्यकर्ताओं और बाद के इतिहासकारों के माध्यम से।
इससे एक methodological समस्या पैदा होती है।
जिस किसान को पुलिस रिकॉर्ड “उपद्रवी” कहता है—
वह अपने गांव में न्याय के लिए लड़ने वाला नेता भी हो सकता था।
जिस कार्रवाई को प्रशासन “intimidation” कहता है—
वह किसान की दृष्टि में सामूहिक सामाजिक बहिष्कार हो सकती थी। इसलिए स्रोत को केवल पढ़ना नहीं—
स्रोत किसने और किस उद्देश्य से लिखा, यह भी पढ़ना होगा।
29 एका और गांधीवादी किसान राजनीति
चंपारण और खेड़ा में गांधी के नेतृत्व ने किसान प्रश्न और सत्याग्रह को जोड़ा था। एका में स्थिति अलग थी।
यहां गांधी प्रत्यक्ष आंदोलनकारी नेतृत्व में नहीं थे।
उनकी राजनीति का प्रभाव वातावरण में मौजूद था—
लेकिन स्थानीय किसान आंदोलन अपनी दिशा विकसित कर रहा था।
यही कारण है कि चंपारण, खेड़ा और एका को एक ही गांधीवादी श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
चंपारण में गांधी स्वयं जांच और समझौते की प्रक्रिया के केंद्र में थे। खेड़ा में संगठित गांधीवादी सत्याग्रह था।
एका में स्थानीय किसान नेतृत्व और सामुदायिक शपथ का महत्व अधिक था।
31 समग्र मूल्यांकन
एका आंदोलन को भारतीय किसान इतिहास में तीन स्तरों पर समझना चाहिए।
पहला — आर्थिक आंदोलन के रूप में।
किसानों ने लगान, अतिरिक्त वसूली, बेगार और जमींदारी दबाव का विरोध किया।
दूसरा — सामाजिक आंदोलन के रूप में।
ग्रामीण समाज के अपेक्षाकृत निम्न और कमजोर समूहों ने सामूहिक संगठन द्वारा स्थानीय शक्ति-संतुलन को चुनौती दी।
तीसरा — राजनीतिक आंदोलन के रूप में।
किसानों ने राष्ट्रीय असहयोग की भाषा ग्रहण की, लेकिन उसे अपने स्थानीय हितों के अनुसार पुनर्परिभाषित किया।
इसी तीसरे स्तर पर एका आंदोलन का महत्व सबसे अधिक दिखाई देता है। उसने एक बुनियादी प्रश्न सामने रखा—
क्या औपनिवेशिक सत्ता से राजनीतिक स्वतंत्रता और गांव के भीतर सामाजिक-आर्थिक स्वतंत्रता एक ही चीज थीं?
किसान के अनुभव में उत्तर हमेशा ‘हां’ नहीं था।
ब्रिटिश राज से मुक्ति उसके लिए महत्वपूर्ण थी, लेकिन उसी समय वह लगान, बेदखली, बेगार और स्थानीय प्रभुत्व से भी राहत चाहता था।
‘एका’ का अर्थ : एकता की शपथ से आंदोलन के नाम तक
प्रमुख तथ्य
1921–22 के एका आंदोलन को समझने की शुरुआत उसके नाम से ही होनी चाहिए। ‘एका’ केवल किसी किसान संगठन का नाम नहीं था और न ही यह ऊपर से तय किया गया कोई राजनीतिक नारा था। अवध के ग्रामीण समाज में ‘एका’ का सीधा अर्थ था—एकता, आपसी संकल्प और सामूहिक रूप से एक-दूसरे का साथ न छोड़ना। इसी अवधारणा ने किसान असंतोष को व्यक्तिगत शिकायतों से निकालकर सामूहिक प्रतिरोध में बदलने का काम किया।
इतिहासकार ज्ञानेंद्र पांडे एका आंदोलन को 1919–22 के व्यापक अवध किसान आंदोलन के क्रम में देखते हैं। जनवरी 1921 के दमन के बाद किसान आंदोलन समाप्त नहीं हुआ; कुछ महीनों बाद उत्तरी अवध में उसने बदले हुए रूप में फिर सिर उठाया और यही नया रूप ‘एका’ कहलाया। शुरुआती दौर में मालिहाबाद क्षेत्र के कुछ कांग्रेस और खिलाफत कार्यकर्ताओं ने इसे सहायता दी, लेकिन शीघ्र ही इसकी अपनी ग्रामीण गतिशीलता और स्थानीय नेतृत्व विकसित हो गया।
इसलिए ‘एका’ शब्द को केवल Unity Movement—एकता आंदोलन कहकर आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं होगा। यह जानना आवश्यक है कि किसान किसके विरुद्ध एक हो रहे थे, किस बात पर एक हो रहे थे, इस एकता को स्थापित करने की विधि क्या थी और औपनिवेशिक प्रशासन को यह ग्रामीण एकता इतनी चिंताजनक क्यों दिखाई देने लगी।
किसान के लिए ‘एका’ की आवश्यकता क्यों पड़ी?
अवध के किसान समाज की मूल समस्या यह थी कि जमींदार, तालुकेदार, ठेकेदार और उनके कारिंदे किसान से अलग-अलग व्यवहार कर सकते थे। अकेला काश्तकार कमजोर था। वह अधिक लगान, बेदखली, बेगार अथवा दूसरे अवैध उपकरों का विरोध करता तो उसके सामने व्यक्तिगत स्तर पर प्रतिशोध का खतरा रहता था।
लेकिन यदि पूरा गांव अथवा आसपास के अनेक गांव यह तय कर लें कि—
कोई किसान दूसरे किसान की बेदखल जमीन नहीं लेगा;
निर्धारित लगान से अधिक नहीं दिया जाएगा; लगान देने पर रसीद मांगी जाएगी; बेगार नहीं की जाएगी;
किसी किसान पर दबाव पड़े तो दूसरे किसान उसका साथ नहीं छोड़ेंगे;
और विवादों में सामूहिक पंचायत के निर्णय को माना जाएगा—
तो जमींदार-किसान संबंध का शक्ति-संतुलन बदलने लगता था। यही ‘एका’ की वास्तविक शक्ति थी।
आंदोलन के बारे में उपलब्ध विवरणों में किसानों की शपथों में दर्ज लगान ही देने, बेदखल किए जाने पर जमीन न छोड़ने, बेगार से इनकार करने, अपराधियों की सहायता न करने, पंचायत के फैसले मानने और एकता बनाए रखने जैसी प्रतिज्ञाओं का उल्लेख मिलता है।
इसका अर्थ यह है कि एका केवल विरोध की भावना नहीं था। वह ग्रामीण समाज में सामूहिक अनुशासन स्थापित करने का प्रयास भी था।
‘एका’ एक शब्द से आंदोलन कैसे बना?
1920–21 के अवध किसान संघर्ष की पहली बड़ी लहर के बाद औपनिवेशिक सरकार ने दमन, गिरफ्तारियों और प्रशासनिक दबाव के माध्यम से किसान लामबंदी को नियंत्रित करने की कोशिश की। लेकिन किसान असंतोष पैदा करने वाली भूमि-संबंधी परिस्थितियां समाप्त नहीं हुईं।
ज्ञानेंद्र पांडे के अध्ययन में इसी निरंतरता पर विशेष जोर मिलता है। उनके अनुसार एका को पहले के किसान सभा आंदोलन से पूरी तरह अलग घटना मानना उचित नहीं है। दोनों में सक्रिय सामाजिक शक्तियों और कांग्रेस तथा ग्रामीण किसान नेतृत्व के बीच संबंधों में महत्वपूर्ण समानताएं थीं।
एम. एच. सिद्दीकी का *Agrarian Unrest in North India: The United Provinces, 1918–22* भी इस पूरे दौर को एक विस्तृत कृषि-असंतोष की पृष्ठभूमि में रखता है। पुस्तक का कालखंड ही 1918–22 है और बाद की विद्वत समीक्षा में नवंबर 1921 से मई 1922 के एका आंदोलन को इसी कृषि-अशांति की महत्वपूर्ण अवस्था के रूप में रेखांकित किया गया है।
अर्थात किसान सभा की पुरानी संरचना कमजोर हो सकती थी, नेता गिरफ्तार हो सकते थे, कांग्रेस की रणनीति बदल सकती थी, लेकिन किसान की मूल समस्याएं कायम थीं। इसी परिस्थिति में ‘संगठन’ से अधिक महत्वपूर्ण ‘एकता’ हो गई।
यहीं ‘एका’ शब्द राजनीतिक अर्थ ग्रहण करता है।
एका की शपथ : आंदोलन का सबसे विशिष्ट तत्व
एका आंदोलन की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में उसकी सामूहिक शपथ थी।
विभिन्न विवरणों में इस अनुष्ठान के स्वरूप में कुछ अंतर मिलता है, लेकिन सामान्यतः एका सभाओं में एक प्रतीकात्मक धार्मिक विधि के बीच किसानों द्वारा सामूहिक प्रतिज्ञा लेने का उल्लेख आता है। एक प्रचलित विवरण के अनुसार जमीन में एक गड्ढा बनाकर उसमें पानी भरा जाता था, जिसे गंगा का प्रतीक माना जाता था; धार्मिक उपस्थिति में किसान प्रतिज्ञाएं लेते थे।
यहां एक महत्वपूर्ण इतिहासलेखन संबंधी सावधानी जरूरी है।
इस प्रकार के अनुष्ठान का विवरण हमें औपनिवेशिक रिपोर्टों और बाद में उन पर आधारित इतिहास-लेखन में मिलता है। इसलिए प्रत्येक स्थान पर बिल्कुल एक जैसी रस्म हुई होगी, ऐसा मान लेना उचित नहीं होगा। ग्रामीण आंदोलनों में मौखिक परंपरा, स्थानीय धार्मिक प्रतीक और गांव-दर-गांव बदलने वाली प्रथाएं साथ-साथ चलती थीं।
फिर भी शपथ का मूल राजनीतिक अर्थ निर्विवाद रूप से महत्वपूर्ण है—किसान को व्यक्तिगत व्यक्ति से सामूहिक समुदाय में बदलना।
शपथ में धर्म और राजनीति का मेल
एका की शपथ का धार्मिक स्वरूप आधुनिक राजनीतिक संगठन की दृष्टि से विचित्र लग सकता है, लेकिन 1920 के दशक के ग्रामीण अवध की सामाजिक संरचना में इसे उसी संदर्भ में देखना होगा।
आज किसी राजनीतिक संगठन में सदस्यता-पत्र, संविधान, पहचान-पत्र अथवा लिखित प्रतिज्ञा संगठनात्मक प्रतिबद्धता स्थापित कर सकती है। उस समय बड़े पैमाने पर निरक्षर ग्रामीण समाज में धार्मिक शपथ स्वयं एक सामाजिक अनुबंध की भूमिका निभा सकती थी।
किसान के लिए गंगा, देवी-देवता, कुरान, स्थानीय देवस्थल अथवा सामुदायिक धार्मिक प्रतीक के सामने दिया गया वचन साधारण राजनीतिक घोषणा की तुलना में कहीं अधिक बाध्यकारी हो सकता था।
अवध के पहले किसान आंदोलन में भी धार्मिक भाषा की राजनीतिक शक्ति दिखाई दे चुकी थी। बाबा रामचंद्र रामायण का प्रयोग किसानों तक राजनीतिक-सामाजिक संदेश पहुंचाने के लिए करते थे। उनके आंदोलन में लगान, बेगार और किसानों की एकता जैसे प्रश्न धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ जुड़े थे।
इसलिए एका का धार्मिक अनुष्ठान अचानक पैदा हुई घटना नहीं था। वह अवध के ग्रामीण राजनीतिक संचार की पहले से विकसित परंपरा का एक नया रूप था।
शपथ का पहला अर्थ — निर्धारित लगान से अधिक नहीं
एका किसानों की शिकायतों के केंद्र में लगान का प्रश्न था।
कई क्षेत्रों में किसानों की शिकायत थी कि उनसे दर्ज अथवा निर्धारित लगान से अधिक वसूली की जाती है। इसके अतिरिक्त ठेकेदारों और जमींदारी तंत्र से जुड़ी दूसरी वसूलियां भी थीं। आंदोलन के सामान्य विवरणों में अत्यधिक लगान और ठेकेदारों का उत्पीड़न इसके प्रमुख कारणों में गिने जाते हैं।
लेकिन एका की मांग को सरल शब्दों में ‘लगान न देने का आंदोलन’ कहना भ्रामक होगा।
प्रमुख प्रतिज्ञा यह नहीं थी कि किसान किसी प्रकार का लगान ही नहीं देंगे। बल्कि आंदोलन के एक महत्वपूर्ण चरण में मांग थी कि किसान दर्ज/मान्य लगान देंगे, उससे अधिक नहीं। यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इससे पता चलता है कि आंदोलन का प्रारंभिक उद्देश्य भूमि-व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त करना नहीं, बल्कि उसके भीतर होने वाली मनमानी और अतिरिक्त वसूली को रोकना था।
दूसरा अर्थ — बेदखली के विरुद्ध सामूहिक प्रतिरोध
एका की एक अन्य महत्वपूर्ण प्रतिज्ञा थी कि किसान बेदखली के दबाव के सामने आसानी से अपनी जोत नहीं छोड़ेगा।
जमींदारी व्यवस्था में बेदखली आर्थिक दंड के साथ-साथ राजनीतिक हथियार भी बन सकती थी। यदि कोई किसान जमींदार का विरोध करे और उसकी भूमि छिन जाए, तथा दूसरा किसान तुरंत वही जमीन लेने को तैयार हो जाए, तो सामूहिक आंदोलन टूट सकता था।
इसलिए एका की सफलता के लिए केवल इतना पर्याप्त नहीं था कि पहला किसान विरोध करे।
आवश्यक था कि दूसरा किसान उसकी बेदखल जमीन लेने से इनकार करे।
यही वह बिंदु है जहां ‘एका’ शब्द अपने सबसे ठोस आर्थिक अर्थ में सामने आता है।
किसान की सुरक्षा कानून से जितनी नहीं आ रही थी, उतनी दूसरे किसान की एकजुटता से पैदा करने की कोशिश की जा रही थी।
तीसरा अर्थ — बेगार का सामूहिक बहिष्कार
बेगार अर्थात बिना उचित पारिश्रमिक के श्रम उपलब्ध कराने की प्रथा भी ग्रामीण असंतोष का कारण थी।
अकेला किसान बेगार करने से मना करता तो उसे दंडित करना संभव था। लेकिन पूरा गांव मना कर दे तो व्यवस्था चलाना कठिन हो जाता था।
इसीलिए एका की प्रतिज्ञाओं में बेगार न करने का तत्व महत्वपूर्ण था। यह केवल आर्थिक प्रश्न नहीं था।
बेगार सामाजिक अधीनता का भी प्रतीक थी। किसान का यह कहना कि वह अपनी इच्छा और अधिकार के विरुद्ध मुफ्त श्रम नहीं देगा, ग्रामीण सत्ता-संबंधों को चुनौती देता था।
इस प्रकार एका में आर्थिक प्रतिरोध और सामाजिक सम्मान का प्रश्न एक-दूसरे से जुड़ गया।
चौथा अर्थ — पंचायत को वैकल्पिक अधिकार
एका आंदोलन का एक और महत्वपूर्ण पहलू पंचायत के निर्णयों का पालन करने की प्रतिज्ञा थी।
यह व्यवस्था आंदोलन के लिए अत्यंत उपयोगी थी। यदि हर किसान अलग-अलग फैसला करता, तो जमींदार और प्रशासन किसान समुदाय को विभाजित कर सकते थे। पंचायत सामूहिक निर्णय का माध्यम बनती थी।
इससे आंदोलन में एक प्रकार की समानांतर ग्रामीण अनुशासन-व्यवस्था बनने लगी।
यहां सावधानी जरूरी है। इसे औपचारिक ‘समानांतर सरकार’ कहना अतिशयोक्ति होगी। लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि पंचायत के फैसलों को प्राथमिकता देने की प्रतिज्ञा ने जमींदारी और औपनिवेशिक अधिकार के समानांतर एक स्थानीय नैतिक-सामाजिक प्राधिकार पैदा किया।
यही कारण था कि प्रशासन के लिए किसान सभाएं केवल आर्थिक शिकायतों की बैठकें नहीं रह जाती थीं।
वे ग्रामीण सत्ता के वैकल्पिक केंद्र बनने की क्षमता रखती थीं।
पांचवां अर्थ — अपराध और आंदोलन के बीच सीमा
एका की प्रतिज्ञाओं में एक दिलचस्प तत्व यह भी बताया गया है कि आंदोलनकारी अपराधियों की सहायता नहीं करेंगे।
यह बिंदु विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि औपनिवेशिक प्रशासन किसान आंदोलनों को अक्सर ‘कानून-व्यवस्था’ की समस्या के रूप में प्रस्तुत करता था।
किसान नेतृत्व के सामने इसलिए दोहरी चुनौती थी—
एक ओर जमींदारी उत्पीड़न का प्रभावी प्रतिरोध करना था;
दूसरी ओर आंदोलन को सामान्य अपराध, लूट या निजी प्रतिशोध में बदलने से रोकना था।
एका की शपथ में अपराधियों से दूरी का तत्व इस प्रयास की ओर संकेत करता है।
हालांकि बाद के चरण में आंदोलन के कुछ हिस्सों में हिंसक घटनाएं हुईं और कांग्रेस नेतृत्व तथा स्थानीय एका नेतृत्व के बीच इसी प्रश्न पर दूरी बढ़ी। *India's Struggle for Independence* की प्रचलित व्याख्या भी बताती है कि मदारी पासी और अन्य निम्नवर्गीय स्थानीय नेताओं के उभार के बाद आंदोलन कांग्रेस द्वारा अपेक्षित अहिंसक अनुशासन से अलग दिशा में बढ़ा।
इस प्रश्न का विस्तार आगे के अध्यायों में किया जाएगा। ‘एका’ और जाति की दीवार
अवध का ग्रामीण समाज गहरे जातिगत विभाजनों वाला समाज था। किसान कोई एक समान सामाजिक वर्ग नहीं थे। काश्तकारों, उप-काश्तकारों, खेत मजदूरों, छोटे भू-स्वामियों और विभिन्न जातियों के हित हमेशा समान नहीं थे।
ऐसी स्थिति में ‘एका’ का आह्वान स्वयं राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था।
आंदोलन की बाद की पहचान विशेष रूप से मदारी पासी जैसे निम्न सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले नेतृत्व से जुड़ी। इतिहासकारों और राष्ट्रीय आंदोलन के मानक विवरणों में भी इस बात को रेखांकित किया गया है कि एका ने शीघ्र अपना जमीनी नेतृत्व विकसित कर लिया और मदारी पासी तथा अन्य निम्न जातीय पृष्ठभूमि के नेता प्रमुख हुए।
इसलिए एका को केवल ‘किसानों की एकता’ कहना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक प्रश्न है— किन किसानों की एकता? क्या भूमिहीन और काश्तकार एक थे?
क्या छोटे जमींदार भी कहीं आंदोलन के साथ थे?
क्या ऊंची और निम्न जातियों की भागीदारी समान थी?
क्या धार्मिक समुदायों की भागीदारी समान थी?
क्या ‘एका’ ने जाति को समाप्त किया या केवल तत्काल आर्थिक संघर्ष के लिए जातिगत सीमाओं को अस्थायी रूप से पार किया?
इन प्रश्नों का उत्तर आंदोलन के सामाजिक आधार के विश्लेषण से ही मिलेगा।
क्या छोटे जमींदार भी एका में थे?
एका को केवल ‘किसान बनाम जमींदार’ के सीधे द्वंद्व के रूप में देखने से एक और जटिलता छूट जाती है।
कुछ विवरण बताते हैं कि भारी भू-राजस्व मांग से असंतुष्ट छोटे जमींदारों के कुछ हिस्से भी आंदोलन से जुड़े।
यह तथ्य औपनिवेशिक भारत के किसान आंदोलनों की एक महत्वपूर्ण विशेषता को सामने लाता है—ग्रामीण संघर्षों की सामाजिक सीमाएं हमेशा साफ नहीं थीं।
एक व्यक्ति किसी बड़े तालुकेदार के सामने कमजोर भूधारक हो सकता था, लेकिन अपने नीचे के काश्तकार के लिए स्वयं प्रभुत्वशाली व्यक्ति भी हो सकता था।
इसलिए एका में ‘एकता’ का अर्थ वर्गीय समानता नहीं था।
यह कई बार साझे विरोधी अथवा साझा शिकायत के आधार पर बना अस्थायी गठबंधन भी था।
कांग्रेस का ‘एकता’ और किसान का ‘एका’
यहां आंदोलन का सबसे रोचक वैचारिक अंतर सामने आता है।
कांग्रेस के लिए 1920–22 में ‘एकता’ का अर्थ था व्यापक राष्ट्रीय असहयोग आंदोलन के भीतर जनता को संगठित करना—औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध एक अनुशासित, अहिंसक राष्ट्रीय संघर्ष।
लेकिन किसान के लिए ‘एका’ का तत्काल अर्थ अधिक स्थानीय था—
लगान की मनमानी बंद हो। बेदखली रोकी जाए। बेगार समाप्त हो। जमींदार के कारिंदों का उत्पीड़न रुके। और गांव का किसान दूसरे किसान का साथ न छोड़े।
दोनों प्रकार की राजनीति एक-दूसरे से जुड़ सकती थीं, लेकिन वे समान नहीं थीं।
यही अंतर आगे चलकर कांग्रेस और एका नेतृत्व के संबंधों में तनाव का कारण बना।
ज्ञानेंद्र पांडे ने इसी व्यापक प्रश्न को उठाया कि किसान की राजनीतिक चेतना को केवल राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा दी गई चेतना मान लेना इतिहास को ऊपर से देखने जैसा होगा। अवध के किसान अपनी स्थानीय परिस्थितियों, प्रतीकों और उद्देश्यों के आधार पर राजनीति का अपना अर्थ निर्मित कर रहे थे। उनके अध्ययन में एका को पहले के किसान आंदोलन की निरंतरता मानते हुए कांग्रेस और किसान विद्रोहियों के संबंध को ‘अस्पष्ट’ और जटिल बताया गया है।
यहीं एका आंदोलन भारतीय राष्ट्रवाद के इतिहास में विशेष महत्व ग्रहण करता है।
औपनिवेशिक प्रशासन को ‘एका’ से भय क्यों था?
यदि किसान केवल किसी अधिकारी को ज्ञापन देते तो औपनिवेशिक शासन उसे प्रशासनिक शिकायत की तरह संभाल सकता था। लेकिन एका में समस्या अलग थी।
यह किसानों को सिखा रहा था कि उनका सबसे प्रभावी हथियार संख्या नहीं बल्कि सामूहिक अनुशासन है।
एक किसान लगान देने से विवाद करे—उसे दबाया जा सकता है।
पूरा गांव तय सीमा से अधिक न दे—स्थिति कठिन हो जाती है।
एक किसान बेगार से मना करे—उसे दंडित किया जा सकता है।
पूरा गांव मना करे—जमींदारी अधिकार कमजोर पड़ता है।
एक किसान बेदखल हो—दूसरा उसकी जमीन ले सकता है।
पूरा समुदाय तय कर ले कि कोई जमीन नहीं लेगा—बेदखली का हथियार कमजोर पड़ जाता है।
इस अर्थ में ‘एका’ स्वयं ग्रामीण सत्ता का सूत्र था।
इसीलिए आंदोलन का महत्व उसकी घोषित मांगों से कहीं अधिक था। औपनिवेशिक अभिलेखों को पढ़ने की समस्या
एका आंदोलन के अध्ययन में एक बड़ी स्रोतगत समस्या भी सामने आती है।
किसानों ने अपने अनुभवों का उतना लिखित दस्तावेजीकरण नहीं छोड़ा जितना औपनिवेशिक प्रशासन ने उनके बारे में किया। पुलिस रिपोर्ट, जिला अधिकारियों के पत्र, सीआईडी टिप्पणियां, प्रशासनिक रिपोर्ट और सरकारी पत्राचार इसलिए महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत बनते हैं।
लेकिन यही स्रोत सबसे बड़ी सावधानी भी मांगते हैं।
औपनिवेशिक अधिकारी किसी विशाल किसान सभा को ‘mob’, किसी सक्रिय स्थानीय नेता को ‘agitator’, किसी प्रतिरोध को ‘lawlessness’ और ग्रामीण अफवाहों को ‘seditious propaganda’ जैसी श्रेणियों में दर्ज कर सकते थे।
एका के इतिहासलेखन में इसी कारण औपनिवेशिक अभिलेख + किसान व्यवहार + स्थानीय सामाजिक संरचना + राष्ट्रवादी स्रोत + बाद के इतिहासकारों की व्याख्या—इन सभी को साथ पढ़ना आवश्यक है।
एम. एच. सिद्दीकी, ज्ञानेंद्र पांडे और कपिल कुमार जैसे इतिहासकारों के अध्ययनों के बीच मतभेद भी इसी बात का प्रमाण हैं कि अवध के किसान आंदोलन को केवल सरकारी रिपोर्टों के आधार पर नहीं समझा जा सकता। सिद्दीकी की *Agrarian Unrest in North India* और कपिल कुमार की *Peasants in Revolt: Tenants, Landlords, Congress and the Raj in Oudh* इस क्षेत्र के अध्ययन की प्रमुख कृतियों में हैं।
पहली व्याख्या उसे कृषि असंतोष के रूप में देखती है—अधिक लगान, अवैध वसूली, बेगार, बेदखली और जमींदारी उत्पीड़न इसका आधार थे।
दूसरी व्याख्या उसे राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ी किसान लामबंदी मानती है—असहयोग आंदोलन, कांग्रेस और खिलाफत कार्यकर्ताओं ने ग्रामीण राजनीतिक सक्रियता के लिए वातावरण बनाया।
अवध की कृषि व्यवस्था : तालुकेदार, जमींदार, काश्तकार और औपनिवेशिक राजस्व तंत्र
प्रमुख तथ्य
एका आंदोलन को केवल 1921–22 की घटनाओं से समझना संभव नहीं है। किसान आखिर किस व्यवस्था के विरुद्ध संगठित हो रहे थे? लगान का प्रश्न इतना विस्फोटक क्यों बन गया? ‘बेदखली’ का भय किसान को आंदोलन की ओर क्यों धकेल रहा था? तालुकेदार और जमींदार इतने शक्तिशाली कैसे हुए कि गांव के सामान्य काश्तकार के लिए उनका विरोध करना लगभग शासन का विरोध करने जैसा हो गया?
इन प्रश्नों का उत्तर अवध की विशिष्ट कृषि और भूमि व्यवस्था में छिपा है।
एका आंदोलन के समय किसान के ऊपर सत्ता की केवल एक परत नहीं थी। सबसे ऊपर औपनिवेशिक सरकार थी; उसके नीचे बड़े तालुकेदार और भू-स्वामी; कहीं उनके नीचे छोटे जमींदार, पट्टेदार अथवा ठेकेदार; और अंत में वह वास्तविक कृषक था जो जमीन जोतता था। व्यवहार में लगान, अतिरिक्त उपकर, बेगार, बेदखली और तरह-तरह की सामाजिक बाध्यताओं का बोझ इसी अंतिम कृषक पर पड़ता था।
इसीलिए एका आंदोलन की आर्थिक पृष्ठभूमि समझने के लिए हमें 1856 में अवध के ब्रिटिश अधिग्रहण और 1857 के विद्रोह के बाद हुए भूमि-व्यवस्था के पुनर्गठन तक पीछे जाना होगा।
तालुकेदार कौन थे?
अवध की कृषि व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण संस्था थी—तालुकेदारी।
‘तालुका’ सामान्यतः अनेक गांवों अथवा बड़े भू-क्षेत्र से बनी ऐसी इकाई हो सकती थी जिस पर किसी प्रभावशाली भू-स्वामी अथवा परिवार का राजस्व और स्थानीय प्रभुत्व स्थापित था। तालुकेदार केवल बड़े किसान नहीं थे।
वे ग्रामीण अभिजात वर्ग का हिस्सा थे। उनकी शक्ति के स्रोत थे— भूमि; लगान वसूली; सामाजिक प्रतिष्ठा; स्थानीय कर्मचारी और कारिंदे; राजनीतिक संपर्क;
और औपनिवेशिक शासन के साथ विकसित संबंध।
1856 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अवध का विलय किया तो आरंभिक ब्रिटिश नीति ने तालुकेदारों की शक्ति को कमजोर करने का प्रयास किया। लेकिन 1857 के विद्रोह ने ब्रिटिश शासन की नीति बदल दी।
1857 के बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने महसूस किया कि उत्तर भारत में स्थिर शासन के लिए प्रभावशाली स्थानीय भू-स्वामी वर्ग को अपने पक्ष में रखना उपयोगी होगा।
फलतः अवध में तालुकेदारों के अधिकारों को पुनर्स्थापित और मजबूत किया गया।
यही परिवर्तन आने वाले दशकों की किसान राजनीति के लिए निर्णायक साबित हुआ।
तालुकेदार और जमींदार में अंतर
इतिहास संबंधी लोकप्रिय लेखन में ‘तालुकेदार’ और ‘जमींदार’ शब्दों का प्रयोग कई बार लगभग समान अर्थ में कर दिया जाता है, जबकि अवध की वास्तविक भूमि संरचना इससे अधिक जटिल थी।
तालुकेदार सामान्यतः बड़े भू-क्षेत्र अथवा अनेक गांवों पर अधिकार रखने वाला शक्तिशाली भू-स्वामी था।
जमींदार अपेक्षाकृत व्यापक श्रेणी थी। स्थानीय स्तर पर विभिन्न प्रकार के भू-अधिकारियों को इसके अंतर्गत देखा जा सकता है।
इसके अतिरिक्त पट्टेदार, उप-पट्टेदार, ठेकेदार और अन्य मध्यस्थ भी हो सकते थे।
अर्थात किसान और सबसे बड़े तालुकेदार के बीच भी कभी-कभी कई स्तर मौजूद थे। इससे दो समस्याएं पैदा होती थीं।
पहली—किसान पर दावा करने वालों की संख्या बढ़ सकती थी।
दूसरी—प्रत्येक मध्यस्थ अपनी आय निकालना चाहता था।
अंततः इस पूरी श्रृंखला का आर्थिक भार नीचे जमीन जोतने वाले किसान तक पहुंचता था।
Oudh Rent Act, 1886 — कानून ने क्या किया?
अवध में किरायेदारी संबंधों को नियंत्रित करने वाले महत्वपूर्ण कानूनों में Oudh Rent Act, 1886 था।
इस कानून ने विभिन्न प्रकार के किरायेदारों और उनके अधिकारों को कानूनी श्रेणियों में रखा। बाद के भूमि कानूनों और न्यायिक निर्णयों में भी 1886 के कानून के तहत स्थापित किरायेदारी अधिकारों का उल्लेख मिलता रहा।
यह तथ्य महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि औपनिवेशिक राज्य ने किसान-जमींदार संबंध को पूरी तरह अनियमित नहीं छोड़ा था। समस्या दूसरी थी।
कानून में अधिकार होना और गांव में उस अधिकार को लागू करा पाना अलग-अलग बातें थीं।
काश्तकार के सामने जमींदार की आर्थिक शक्ति, स्थानीय प्रभाव, कर्मचारियों का तंत्र और मुकदमेबाजी की लागत खड़ी थी।
यही कारण है कि केवल किरायेदारी कानूनों के अस्तित्व से कृषि असंतोष समाप्त नहीं हुआ।
Property Law and Agrarian Relations in Colonial Awadh पर हुए शोध में भी 1886 के कानून और उससे पहले की व्यवस्था में किसानों के उत्तराधिकार तथा किरायेदारी अधिकारों की सीमाओं को महत्वपूर्ण प्रश्न माना गया है।
केवल लगान नहीं — अतिरिक्त उपकरों की दुनिया
किसान की शिकायत केवल मूल लगान की दर से नहीं थी।
इसके साथ विभिन्न प्रकार की अतिरिक्त वसूलियों और स्थानीय उपकरों की शिकायतें भी जुड़ी थीं।
माजिद हयात सिद्दीकी के प्रतापगढ़ किसान आंदोलन संबंधी शोध में विभिन्न cesses अर्थात अतिरिक्त वसूलियों का उल्लेख है और इसके लिए तत्कालीन प्रशासनिक रिपोर्टों—विशेषकर जे. सी. फॉनथॉर्प की एका आंदोलन संबंधी रिपोर्ट—का संदर्भ दिया गया है।
यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसान की आर्थिक पीड़ा को केवल सरकारी राजस्व की दर देखकर नहीं समझा जा सकता। किसान की वास्तविक लागत थी—
मूल लगान + अतिरिक्त वसूली + सामाजिक दायित्व + मुफ्त अथवा कम भुगतान वाला श्रम + कर्ज + खेती की लागत।
जब इन सबको जोड़कर देखा जाता है तभी किसान असंतोष की तीव्रता समझ में आती है।
बेदखली : सबसे प्रभावी दबाव
एका और उससे पहले अवध किसान सभा की मांगों में बेदखली का प्रश्न बार-बार क्यों आता है?
क्योंकि जमींदार-किसान संबंध में यह सबसे प्रभावी अनुशासनात्मक हथियारों में से एक था।
किसान के पास जमीन का पूर्ण स्वामित्व नहीं है और उसकी आजीविका उसी जोत पर निर्भर है, तो उसे हटाने की संभावना ही उसे आज्ञाकारी बनाए रखने के लिए पर्याप्त हो सकती है। बेदखली केवल वास्तविक निष्कासन नहीं थी। बेदखली का भय भी सत्ता था।
यही कारण था कि अवध किसान सभा ने किसानों से ‘बेदखली भूमि’ न जोतने का आग्रह किया था। किसान को यदि उसकी जोत से निकाल दिया जाए तो दूसरा किसान उस जमीन को स्वीकार न करे—यह सामूहिक प्रतिरोध की अत्यंत प्रभावशाली रणनीति थी।
इसी विचार का अधिक संगठित रूप बाद में एका की शपथों में दिखाई देता है।
हरि और बेगार
अवध किसान आंदोलन के दस्तावेजों में हरि और बेगार का प्रश्न भी सामने आता है।
अवध किसान सभा किसानों से बेदखली भूमि न जोतने के साथ-साथ हरि और बेगार जैसे अवैतनिक श्रम से इनकार करने को कह रही थी।
बेगार का अर्थ केवल मुफ्त काम नहीं था।
उसके पीछे सामाजिक अधीनता का पूरा संबंध था।
किसान अथवा उसके परिवार से जमींदार के लिए श्रम, सामान ढुलाई अथवा दूसरी सेवाएं अपेक्षित हो सकती थीं।
आर्थिक दृष्टि से किसान अपना समय और श्रम बिना समुचित भुगतान दे रहा था।
लेकिन सामाजिक दृष्टि से संदेश और गहरा था—
कौन आदेश देता है और कौन आदेश मानता है?
इसीलिए बेगार से इनकार करना केवल मजदूरी की मांग नहीं था।
वह ग्रामीण सामाजिक पदानुक्रम को चुनौती भी था।
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद दबाव क्यों बढ़ा?
1914–18 के प्रथम विश्वयुद्ध ने भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित किया।
युद्ध और युद्धोत्तर वर्षों में वस्तुओं की कीमतों, आवश्यक उपभोग सामग्री और व्यापक आर्थिक परिस्थितियों में बदलाव आया। 1918–20 के आसपास महामारी, मूल्य अस्थिरता और ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों ने भी असंतोष का वातावरण बनाया।
लेकिन अवध में केवल महंगाई किसान आंदोलन की व्याख्या नहीं कर सकती।
यदि संरचनात्मक समस्याएं पहले से मौजूद न होतीं तो केवल मूल्यवृद्धि इतनी व्यापक किसान लामबंदी पैदा नहीं करती। अधिक सटीक व्याख्या यह होगी कि—
पुरानी जमींदारी समस्याओं पर युद्धोत्तर आर्थिक दबाव की नई परत चढ़ गई।
इससे लंबे समय से मौजूद शिकायतें अधिक विस्फोटक हो गईं।
कानून बनाम गांव की वास्तविकता
औपनिवेशिक कृषि शासन की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक थी—
कानून की पुस्तकों में किसान के कुछ अधिकार मौजूद थे, लेकिन उनका उपयोग करने की क्षमता सभी किसानों में समान नहीं थी। मुकदमा करने के लिए पैसा चाहिए। अदालत तक पहुंच चाहिए। दस्तावेज चाहिए। समय चाहिए। कानून की समझ चाहिए।
और जमींदार के विरुद्ध खड़े होने का सामाजिक साहस चाहिए।
गरीब काश्तकार के पास इनमें से कई साधन नहीं थे।
जमींदार अथवा तालुकेदार के पास अक्सर अधिक आर्थिक संसाधन और प्रभाव था।
इसलिए औपचारिक कानूनी समानता व्यवहारिक शक्ति-समानता नहीं बनाती थी।
यहीं किसान पंचायत का महत्व बढ़ता है।
एक किसान अकेला मुकदमा लड़ने के बजाय पूरा गांव सामूहिक निर्णय ले—
यह किसान की शक्ति को बदल देता था।
औपनिवेशिक राज्य किसके साथ था?
इस प्रश्न का उत्तर सरल ‘सरकार केवल तालुकेदार के साथ थी’ कहकर देना इतिहास को जरूरत से अधिक सीधा कर देगा। सरकार के सामने कई लक्ष्य थे— राजस्व प्राप्त करना; कानून-व्यवस्था बनाए रखना; संपत्ति अधिकारों की रक्षा करना; कृषि उत्पादन बनाए रखना; और बड़े किसान विद्रोह को रोकना।
इसलिए कभी-कभी सरकार जमींदारों की अत्यधिक मनमानी पर नियंत्रण के उपाय भी करती थी। किरायेदारी कानून इसका उदाहरण हैं।
लेकिन संरचनात्मक स्तर पर औपनिवेशिक शासन ऐसी संपत्ति व्यवस्था की रक्षा करता था जिसमें तालुकेदार और जमींदार महत्वपूर्ण स्थान रखते थे।
और जैसे ही किसान आंदोलन ने कानून-व्यवस्था तथा संपत्ति संबंधों को चुनौती देना शुरू किया, प्रशासन का दमनकारी पक्ष अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगा।
एका आंदोलन के अंतिम चरण में यही स्थिति सामने आई। फॉनथॉर्प की अप्रैल 1922 की आधिकारिक जांच रिपोर्ट आंदोलन के प्रति प्रशासनिक दृष्टिकोण का प्रमुख प्राथमिक स्रोत है। ज्ञानेंद्र पांडे बताते हैं कि अंततः सशस्त्र और घुड़सवार पुलिस तथा भारतीय घुड़सवार सेना तक की शक्ति आंदोलन के विरुद्ध इस्तेमाल हुई।
किसान की नजर में सरकार
यह भी मान लेना गलत होगा कि प्रत्येक किसान औपनिवेशिक कृषि व्यवस्था की पूरी संवैधानिक संरचना समझता था। उसका अनुभव प्रत्यक्ष था। उसके लिए शासन दिखाई देता था— थानेदार में; तहसील में; अदालत में; राजस्व अधिकारी में; पुलिस में;
और उस प्रशासनिक व्यवस्था में जो जमींदार के संपत्ति अधिकार को लागू करा सकती थी।
इसलिए स्थानीय उत्पीड़न और औपनिवेशिक शासन किसान चेतना में धीरे-धीरे एक-दूसरे से जुड़ सकते थे।
राष्ट्रीय आंदोलन ने इसी जुड़ाव को और राजनीतिक भाषा दी।
गांधी का नाम, असहयोग आंदोलन और कांग्रेस की सक्रियता ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंची तो किसान अपने स्थानीय संघर्षों को व्यापक राजनीतिक परिवर्तन से जोड़ने लगा।
लेकिन किसान ने गांधी और स्वराज का अर्थ हमेशा कांग्रेस नेतृत्व की आधिकारिक परिभाषा के अनुसार नहीं समझा।
ज्ञानेंद्र पांडे के अध्ययन का यह एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष है।
किसान सभा से एका तक कृषि प्रश्न की निरंतरता
1921 के आरंभिक किसान आंदोलन को दमन से कमजोर किया गया।
लेकिन उसकी आर्थिक शिकायतें समाप्त नहीं हुईं। लगान मौजूद था। बेदखली का भय मौजूद था। जमींदारी सत्ता मौजूद थी। अतिरिक्त वसूलियों की शिकायतें मौजूद थीं।
इसलिए 1921 के अंतिम महीनों में जब एका आंदोलन उभरा तो उसने बिल्कुल नई समस्याएं नहीं खोजीं।
उसने पुराने कृषि असंतोष को नए संगठनात्मक अनुशासन में ढाला।
फॉनथॉर्प ने स्वयं अपनी आधिकारिक रिपोर्ट में एका को किसान सभा आंदोलन का पुनरुत्थान बताया था—हालांकि उसकी प्रशासनिक व्याख्या और किसान राजनीति के इतिहासकारों की व्याख्या में महत्वपूर्ण अंतर है।
इतिहासलेखन की सावधानी : ‘सामंतवाद’ शब्द कितना उपयुक्त?
अवध की व्यवस्था का वर्णन करते हुए ‘सामंती शोषण’ शब्द का प्रयोग बहुत किया गया है।
यह उपयोगी हो सकता है, लेकिन सावधानी जरूरी है।
1920 का अवध मध्ययुगीन यूरोपीय सामंतवाद नहीं था।
यह औपनिवेशिक शासन के अधीन ऐसी कृषि व्यवस्था थी जिसमें— परंपरागत भू-अभिजात वर्ग, औपनिवेशिक संपत्ति कानून, बाजार, नकद लगान, अदालतें, राजस्व प्रशासन, और आधुनिक राजनीतिक आंदोलन— सभी एक साथ मौजूद थे।
इसलिए इसे केवल ‘सामंतवाद’ कह देने से औपनिवेशिक राज्य की भूमिका अस्पष्ट हो सकती है। अधिक सटीक शब्दावली होगी— औपनिवेशिक-तालुकेदारी कृषि संरचना।
इसमें पारंपरिक सामाजिक प्रभुत्व और आधुनिक औपनिवेशिक कानूनी शक्ति एक-दूसरे से जुड़ गई थीं।
प्राथमिक स्रोत हमें क्या बताते हैं?
एका और अवध किसान आंदोलन के अध्ययन में कई प्रकार के प्राथमिक स्रोत महत्वपूर्ण हैं। विशेष महत्व रखते हैं—
जे. सी. फॉनथॉर्प की एका आंदोलन संबंधी रिपोर्ट, जो *United Provinces Gazette* में मई 1922 में प्रकाशित हुई;
संयुक्त प्रांत सरकार के प्रशासनिक और गृह विभाग के अभिलेख; जिला अधिकारियों की रिपोर्टें; पुलिस और सीआईडी अभिलेख; किरायेदारी और राजस्व संबंधी कानून; समकालीन समाचार पत्र;
कांग्रेस और किसान सभा से जुड़े दस्तावेज;
और किसान नेताओं तथा राष्ट्रीय नेताओं के पत्र और संस्मरण।
सिद्दीकी के शोध में फॉनथॉर्प रिपोर्ट के पृष्ठ 271–81 को विभिन्न अतिरिक्त उपकरों के विवरण के लिए उद्धृत किया गया है। इससे यह रिपोर्ट एका की केवल दमन-कथा नहीं, बल्कि आंदोलन की कृषि पृष्ठभूमि समझने का भी महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत बनती है।
लेकिन सरकारी रिपोर्ट को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता।
अधिकारी जिस गतिविधि को ‘अवैध दबाव’ कहता है, किसान उसे सामूहिक अनुशासन मान सकता है।
अधिकारी जिसे ‘agitator’ कहता है, ग्रामीण समाज उसे नेता मान सकता है।
इसलिए औपनिवेशिक अभिलेखों को तथ्य के स्रोत और सत्ता की दृष्टि—दोनों रूपों में पढ़ना होगा।
इस कृषि व्यवस्था का सबसे बड़ा अंतर्विरोध
अवध की कृषि व्यवस्था का मूल अंतर्विरोध बहुत सरल शब्दों में समझा जा सकता है—
जमीन जोतने वाला और जमीन पर निर्णायक अधिकार रखने वाला व्यक्ति अक्सर एक नहीं था। उत्पादन का जोखिम किसान का।
फसल खराब होने का खतरा किसान का। परिवार का श्रम किसान का। लेकिन लगान का अधिकार दूसरे का। बेदखली की शक्ति दूसरे की। कानूनी संसाधनों में बढ़त दूसरे की।
और अंतिम कानून-व्यवस्था की शक्ति औपनिवेशिक राज्य की।
यही संरचना किसान असंतोष को जन्म देती थी।
निष्कर्ष : एका की जमीन खेतों में पहले से तैयार थी
एका आंदोलन की राजनीतिक कहानी 1921 में शुरू होती दिखाई देती है, लेकिन उसकी सामाजिक-आर्थिक कहानी बहुत पुरानी थी।
1857 के बाद औपनिवेशिक शासन और तालुकेदारों के बीच विकसित संबंध; किरायेदारी की असुरक्षा; लगान और अतिरिक्त वसूली; बेदखली; बेगार; भूमि के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा;
किसान और जमींदार के बीच शक्ति की असमानता;
और कानून के औपचारिक अधिकार तथा ग्रामीण वास्तविकता के बीच अंतर—
इन सबने मिलकर अवध के किसान समाज में असंतोष जमा किया।
1919–21 की किसान सभाओं ने इस असंतोष को आवाज दी।
1921 के दमन ने उस आवाज को कुछ समय दबाया, लेकिन कारणों को समाप्त नहीं किया।
इसलिए जब आंदोलन वापस आया तो उसका नाम अत्यंत अर्थपूर्ण था— ‘एका’।
क्योंकि किसान की समस्या का उत्तर अब केवल कम लगान की मांग नहीं था।
किसान समझने लगा था कि उसकी सबसे बड़ी कमजोरी उसकी व्यक्तिगत निर्भरता है और उसकी सबसे बड़ी संभावित शक्ति— दूसरे किसान के साथ उसकी एकता।
इसी सामाजिक-आर्थिक जमीन पर 1921 के उत्तरार्ध में एका आंदोलन का वास्तविक संगठन खड़ा हुआ। इस अध्याय के प्रमुख स्रोत
इस अध्याय के लिए ज्ञानेंद्र पांडे का “Peasant Revolt and Indian Nationalism: The Peasant Movement in Awadh, 1919–22”, माजिद हयात सिद्दीकी का अवध के किसान आंदोलन पर शोध, औपनिवेशिक Oudh Rent Act, 1886, जे. सी. फॉनथॉर्प की Report on the Eka Movement (1922) तथा अवध की औपनिवेशिक भूमि और संपत्ति व्यवस्था पर उपलब्ध शोध विशेष रूप से उपयोगी हैं। फॉनथॉर्प रिपोर्ट को प्रशासनिक प्राथमिक स्रोत के रूप में पढ़ते समय उसकी औपनिवेशिक दृष्टि को ध्यान में रखना आवश्यक है।
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अवध का ग्रामीण संकट : महंगाई, लगान, कर्ज, बेदखली और किसान असंतोष
प्रमुख तथ्य
1921–22 के एका आंदोलन की पृष्ठभूमि समझने के लिए केवल अवध की तालुकेदारी व्यवस्था को जानना पर्याप्त नहीं है। वह व्यवस्था कई दशकों से मौजूद थी, लेकिन किसान आंदोलन का विस्फोट विशेष रूप से प्रथम विश्वयुद्ध के बाद क्यों हुआ? 1918 के बाद ऐसा क्या बदल गया कि लगान, बेगार और बेदखली जैसी पुरानी शिकायतें अचानक व्यापक राजनीतिक आंदोलन की भाषा बनने लगीं?
इसका उत्तर 1914 से 1921 के बीच पैदा हुए बहुस्तरीय ग्रामीण संकट में मिलता है।
प्रथम विश्वयुद्ध ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डाला। आयात बाधित हुए, उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें बढ़ीं, युद्ध की जरूरतों के लिए खाद्यान्न और दूसरे संसाधनों की मांग बढ़ी, ग्रामीण परिवारों के दैनिक खर्च में तेजी आई। इसके बाद 1918 में खराब मानसून और विनाशकारी इन्फ्लुएंजा महामारी आई। महामारी ने ग्रामीण श्रम-शक्ति, परिवारों की आय और सामाजिक सुरक्षा को गहरा आघात पहुंचाया। इसके बावजूद किसान के लगान, कर्ज और जमींदारी दायित्व स्वतः समाप्त नहीं हुए।
यही वह परिस्थिति थी जिसमें किसान का प्रश्न केवल यह नहीं रहा कि “लगान अधिक है”, बल्कि यह बन गया—
“जब हमारी आय अस्थिर है, फसल पर संकट है, बाजार महंगा है और परिवार बीमारी से टूट रहा है, तब हम पर पुराने और अतिरिक्त जमींदारी दायित्व क्यों बने रहें?”
महंगाई का गरीब किसान पर दोहरा आघात
एक ओर उसके उत्पादन पर जोखिम था।
दूसरी ओर उसकी उपभोग लागत बढ़ रही थी।
मान लें किसी किसान का परिवार अपनी जरूरत का पूरा अनाज पैदा नहीं करता। वर्ष के कुछ महीनों में उसे बाजार से खाद्यान्न खरीदना पड़ता है।
ऐसी स्थिति में खाद्यान्न की बढ़ती कीमत किसान के लिए लाभ नहीं बल्कि संकट है।
और यदि उसी समय कपड़ा, मिट्टी का तेल और दूसरी आवश्यक वस्तुएं भी महंगी हों तो परिवार की वास्तविक क्रय-शक्ति कम हो जाती है।
युद्धोत्तर भारतीय समाज पर अध्ययन यह भी बताता है कि मोटे अनाज की कीमतों में वृद्धि ने विशेष रूप से गरीब किसानों और कृषि मजदूरों को प्रभावित किया।
इसलिए अवध के ग्रामीण संकट को केवल उत्पादक किसान की अर्थव्यवस्था के रूप में नहीं, बल्कि उपभोक्ता ग्रामीण परिवार की अर्थव्यवस्था के रूप में भी देखना चाहिए।
लगान की समस्या क्यों अधिक तीखी हुई?
अब इस महंगाई को अध्याय 3 में वर्णित तालुकेदारी संरचना के साथ जोड़कर देखें।
किसान की आय फसल के अनुसार बदलती थी।
लेकिन लगान का दावा अपेक्षाकृत स्थिर रहता था।
यदि बाजार महंगा हो जाए, परिवार का खर्च बढ़ जाए और फसल सामान्य न हो, तो लगान किसान की आय में पहले से अधिक बड़ा हिस्सा लेने लगता है।
और यदि उसके ऊपर दर्ज लगान के अतिरिक्त नजराना, रसद, बेगार अथवा अन्य स्थानीय वसूली की शिकायतें भी हों, तो संकट और बढ़ जाता है।
भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के डिजिटल जिला भंडार में अवध किसान असंतोष के संदर्भ में नजराना, बेदखली, रसद और बेगारी को किसानों की प्रमुख शिकायतों में गिना गया है।
इसका अर्थ यह है कि किसान का आर्थिक संकट किसी एक भुगतान से उत्पन्न नहीं हुआ।
कर्ज : ग्रामीण संकट का अदृश्य आधार
किसान आंदोलन की चर्चा में लगान दिखाई देता है, लेकिन उसके पीछे कर्ज की समस्या भी महत्वपूर्ण थी।
ग्रामीण परिवार को अनेक अवसरों पर नकद धन की आवश्यकता पड़ती थी— बीज खरीदने के लिए; पशु खरीदने या बचाने के लिए; शादी-विवाह अथवा मृत्यु संस्कार के लिए; बीमारी में;
खराब फसल के बाद भोजन के लिए; और लगान चुकाने के लिए।
यदि नकद बचत न हो तो किसान साहूकार अथवा महाजन पर निर्भर होता था।
यहीं संकट का दूसरा चक्र बनता है।
किसान लगान चुकाने के लिए कर्ज लेता है।
अगली फसल से उसे मूलधन और ब्याज दोनों चुकाने हैं।
यदि अगली फसल भी कमजोर हुई तो पुराना कर्ज नए कर्ज में बदल जाता है।
किसान धीरे-धीरे ऐसी स्थिति में पहुंच सकता था जिसमें उसकी भविष्य की उपज पहले ही बंध चुकी हो।
संयुक्त प्रांत पर महामारी का प्रभाव
अवध तत्कालीन United Provinces of Agra and Oudh—आगरा और अवध के संयुक्त प्रांत का हिस्सा था।
1918 की महामारी संयुक्त प्रांत में भी अत्यंत गंभीर थी।
समकालीन आंकड़ों और बाद के शोधों से स्पष्ट है कि यहां महामारी से मृत्यु असाधारण स्तर पर पहुंची। एक ऐतिहासिक संकलन में संयुक्त प्रांत के लिए इन्फ्लुएंजा मृत्यु-दर लगभग 47.2 प्रति हजार दी गई है, जबकि समग्र 1918 मृत्यु-दर इससे भी अधिक थी क्योंकि अन्य रोग और अकाल-सदृश परिस्थितियां भी मौजूद थीं।
इन आंकड़ों को अवध के प्रत्येक जिले पर समान रूप से लागू नहीं किया जाना चाहिए।
लेकिन उनका महत्व यह है कि वे उस सामाजिक वातावरण को दिखाते हैं जिसमें किसान आंदोलन विकसित हुआ। यह सामान्य आर्थिक मंदी नहीं थी। यह जनसांख्यिकीय आघात था।
महामारी के बाद भी लगान था
यहीं औपनिवेशिक ग्रामीण व्यवस्था का सबसे तीखा अंतर्विरोध दिखाई देता है।
महामारी किसान परिवार को तबाह कर सकती थी।
लेकिन भूमि संबंधी दायित्व अपने-आप समाप्त नहीं होते थे। जमींदार को लगान चाहिए। साहूकार को कर्ज का भुगतान चाहिए।
कृषि के अगले चक्र के लिए बीज और पशु चाहिए। परिवार को भोजन चाहिए।
इस परिस्थिति में किसान के पास उपलब्ध संसाधन बेहद सीमित हो सकते थे।
ऐसे संकट के बाद यदि उससे अतिरिक्त लगान, नजराना या बेगार की मांग की जाती है तो आर्थिक शिकायत बहुत तेजी से नैतिक आक्रोश में बदल सकती है। किसान केवल यह नहीं पूछता— “मैं कितना दूं?” वह पूछता है— “क्या यह न्याय है?”
बेदखली : आर्थिक दुर्घटना से सामाजिक विनाश तक
आज ‘बेदखली’ शब्द को केवल किरायेदारी समाप्त होने के रूप में पढ़ना उसके ऐतिहासिक अर्थ को कम कर देता है।
ग्रामीण अवध में जमीन खोने का अर्थ हो सकता था— परिवार की आजीविका का आधार खोना; गांव में सामाजिक स्थिति कमजोर होना; पशुधन और कृषि उपकरण बेचना; मजदूरी की ओर धकेला जाना; दूसरे गांव में पलायन;
और साहूकारी कर्ज में और गहराई तक जाना।
इसलिए बेदखली का भय किसानों को सामूहिक संगठन की ओर धकेलने वाली अत्यंत शक्तिशाली भावना थी।
यही कारण है कि बेदखली का प्रश्न अवध किसान आंदोलन और एका दोनों में लगातार दिखाई देता है।
आर्थिक संकट से किसान संगठन तक
भारत में आर्थिक कठिनाई पहले भी आती रही थी।
फिर 1918–21 का संकट किसान आंदोलन क्यों बना?
क्योंकि इस बार आर्थिक संकट के साथ संगठनात्मक और राजनीतिक अवसर भी उपस्थित था।
फरवरी 1918 में उत्तर प्रदेश किसान सभा की स्थापना हुई।
गौरीशंकर मिश्र और इंद्र नारायण द्विवेदी जैसे कार्यकर्ता इसमें प्रमुख थे और मदन मोहन मालवीय का समर्थन प्राप्त था। जून 1919 तक किसान सभा की लगभग 450 शाखाएं होने का उल्लेख मिलता है।
अर्थात उसी समय जब ग्रामीण संकट गहरा रहा था, किसानों को अपनी शिकायत व्यक्त करने का नया संगठनात्मक मंच मिल रहा था। यहीं आर्थिक असंतोष राजनीति बनने लगा।
अवध किसान सभा : आंदोलन अधिक उग्र क्यों हुआ?
अक्टूबर 1920 में अवध किसान सभा का निर्माण किसान राजनीति के अधिक संघर्षशील चरण की ओर संकेत करता है।
इसने किरायेदारी अधिकार, बेदखली, अवैध कर और बेगार जैसे मुद्दों को अधिक तीखे ढंग से उठाया।
यह बदलाव केवल नेताओं के वैचारिक मतभेद से नहीं आया था।
उसके पीछे किसानों का वास्तविक दबाव था।
किसान ऐसे संगठन की अपेक्षा कर रहा था जो उसकी तत्काल भूमि-संबंधी समस्याओं पर कार्रवाई करे।
राष्ट्रीय नेतृत्व और किसान नेतृत्व के बीच भविष्य का तनाव यहीं से दिखाई देने लगता है।
राष्ट्रीय नेतृत्व व्यापक औपनिवेशिक विरोध, अहिंसा और राजनीतिक अनुशासन की चिंता कर रहा था। किसान पूछ रहा था— मेरी बेदखली आज कैसे रुकेगी?
गांधी की छवि और किसान की अपेक्षा
अवध के किसान समाज में गांधी की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी।
लेकिन किसान की कल्पना का गांधी और कांग्रेस नेतृत्व का वास्तविक गांधी हमेशा एक जैसे नहीं थे।
ग्रामीण अफवाहों और विश्वासों में यह धारणा बन सकती थी कि गांधी ने अन्यायपूर्ण लगान न देने को कहा है, या गांधी राज आने वाला है, या जल्द ही जमींदारी अत्याचार समाप्त होंगे।
ऐसी धारणाएं इतिहासकार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
उन्हें केवल ‘गलतफहमी’ कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।
वे किसान की राजनीतिक आकांक्षा का प्रमाण हैं।
जब किसान कहता है कि ‘गांधी राज’ आएगा, तो वह अपनी इच्छित सामाजिक व्यवस्था की कल्पना भी कर रहा होता है।
बाजार लूट और सामाजिक तनाव
1920 के अंत और 1921 के प्रारंभ में अवध के कुछ हिस्सों में किसान आंदोलन ने अधिक उग्र रूप लिया।
बाजारों पर हमले और लूट की घटनाएं हुईं।
जमींदारों की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया। पुलिस से टकराव हुआ।
इन घटनाओं को केवल ‘अपराध’ कह देना पर्याप्त नहीं है, लेकिन उन्हें ‘किसान क्रांति’ कहकर महिमामंडित करना भी गलत होगा। इनमें कई स्तर थे— आर्थिक अभाव; अफवाह; सामूहिक भीड़ मनोविज्ञान; स्थानीय विवाद; जमींदार-विरोध; और राष्ट्रीय राजनीतिक उत्साह।
औपनिवेशिक प्रशासन ने इन्हें कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में देखा।
किसान आंदोलन के इतिहासकारों ने इनके सामाजिक कारणों को अधिक महत्व दिया।
यही स्रोतों के आलोचनात्मक उपयोग की आवश्यकता पैदा करता है।
जनवरी 1921 : संकट का हिंसक मोड़
1921 के जनवरी में रायबरेली और अन्य क्षेत्रों में किसान जमावड़ों तथा प्रशासन के बीच टकराव गंभीर हुआ।
फुरसतगंज और मुंशीगंज जैसी घटनाओं में पुलिस गोलीबारी हुई।
इन घटनाओं ने स्पष्ट कर दिया कि ग्रामीण संकट अब केवल आर्थिक याचिका का प्रश्न नहीं रह गया था।
किसान बड़ी संख्या में जुट सकता था।
प्रशासन उसे सुरक्षा चुनौती मान सकता था।
और दोनों के बीच हिंसक टकराव संभव था।
यहीं औपनिवेशिक कृषि संबंध और औपनिवेशिक राज्य का संबंध प्रत्यक्ष हो गया।
किसान जमींदार से लड़ते हुए पुलिस से टकरा रहा था।
क्या 1921 का Rent Amendment समाधान था?
किसान असंतोष इतना गंभीर हुआ कि सरकार भूमि संबंधी शिकायतों की अनदेखी नहीं कर सकी।
1921 में अवध किराया कानून में संशोधन किया गया। सरकारी सांस्कृतिक स्रोत किसान आंदोलन के दबाव और Awadh Rent (Amendment) Act, 1921 के बीच संबंध को रेखांकित करता है।
लेकिन कानून बना देना और ग्रामीण तनाव समाप्त हो जाना एक ही बात नहीं है। किसान का अविश्वास कायम था। स्थानीय वसूली की शिकायतें बनी रहीं। जमींदार-किसान शक्ति-असमानता बनी रही।
और कई क्षेत्रों में किसानों को लगा कि उनके वास्तविक अनुभव में पर्याप्त परिवर्तन नहीं हुआ।
इसीलिए 1921 की पहली किसान लहर कमजोर होने के बाद भी ग्रामीण असंतोष समाप्त नहीं हुआ।
किसान आंदोलन क्यों शांत नहीं हुआ?
यदि समस्या केवल किसी एक नेता अथवा राजनीतिक प्रचार की होती, तो नेता की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन समाप्त हो सकता था। लेकिन समस्या संरचनात्मक थी।
बाबा रामचंद्र अथवा किसी अन्य नेता को हटाने से— महंगाई कम नहीं होती; कर्ज खत्म नहीं होता; लगान संबंध बदल नहीं जाते; बेदखली का भय समाप्त नहीं होता; बेगार तत्काल बंद नहीं होती।
इसीलिए किसान आंदोलन की पहली लहर के दमन के बाद भी उसके कारण गांवों में मौजूद रहे।
ज्ञानेंद्र पांडे के अनुसार इसी निरंतरता में 1921 के अंत का एका आंदोलन पूर्ववर्ती किसान सभा आंदोलन का पुनरुत्थान समझा जा सकता है। स्वयं सरकारी जांच अधिकारी जे. सी. फॉनथॉर्प ने भी एका को किसान सभा आंदोलन का ‘revival’ कहा था।
छोटे जमींदारों की समस्या
युद्धोत्तर संकट का एक रोचक पक्ष यह है कि हर छोटा जमींदार समृद्ध नहीं था।
कुछ छोटे भू-स्वामी भी ऊपर की राजस्व मांग और आर्थिक दबाव से परेशान हो सकते थे।
इसी कारण बाद में एका के कुछ क्षेत्रों में छोटे जमींदार भी आंदोलन से जुड़े।
ज्ञानेंद्र पांडे के अध्ययन में उल्लेख मिलता है कि आंदोलन के विस्तार के दौरान स्थानीय मतभेदों को समायोजित कर कुछ छोटे जमींदारों को भी एका में शामिल किया गया।
इससे किसान आंदोलन की सामाजिक संरचना जटिल होती है। संघर्ष हमेशा— गरीब किसान बनाम अमीर जमींदार की सीधी रेखा में नहीं चलता।
कहीं साझा संकट अस्थायी गठबंधन भी पैदा कर सकता है।
गरीब किसान और कृषि मजदूर का संकट अधिक तीखा
महंगाई का सबसे गंभीर प्रभाव उन लोगों पर पड़ा जिनके पास बाजार में बेचने योग्य अधिशेष नहीं था।
कृषि मजदूर को मजदूरी मिलती थी, लेकिन यदि खाद्यान्न की कीमत मजदूरी से तेजी से बढ़े तो उसकी वास्तविक आय घटती है।
छोटे किसान के साथ भी यही समस्या थी।
इसलिए ग्रामीण संकट की चर्चा में केवल ‘किसान’ शब्द पर्याप्त नहीं है। हमें अलग-अलग समूह देखने होंगे— बड़ा किसान; मध्यम किसान; छोटा काश्तकार; उप-काश्तकार; भूमिहीन मजदूर; छोटा भू-स्वामी। सभी की आर्थिक स्थिति अलग थी।
फिर भी महंगाई, बेदखली और तालुकेदारी दबाव ने इनके बीच कुछ साझा शिकायतें पैदा कीं।
यही साझा शिकायत एका की संभावित सामाजिक भूमि बनी।
किसान असंतोष की ‘नैतिक अर्थव्यवस्था’
एका आंदोलन को समझने के लिए एक उपयोगी अवधारणा है— नैतिक अर्थव्यवस्था।
इसका अर्थ यह नहीं कि किसान आधुनिक आर्थिक गणना नहीं करता था।
बल्कि यह कि उसकी आर्थिक अपेक्षाओं में न्याय, परंपरा और वैधता की धारणाएं भी शामिल थीं। किसान सोच सकता था—
लगान देना ठीक है, लेकिन अत्यधिक लगान नहीं।
जमींदार का अधिकार हो सकता है, लेकिन मनमानी बेदखली नहीं।
कुछ परंपरागत सामाजिक दायित्व हो सकते हैं, लेकिन अनंत बेगार नहीं।
और संकट के समय जमींदार से राहत की अपेक्षा की जा सकती है।
जब स्थापित व्यवस्था इन न्यूनतम अपेक्षाओं को तोड़ती है, तब आर्थिक असंतोष विद्रोह का रूप ले सकता है।
अवध में यही प्रक्रिया दिखाई देती है।
औपनिवेशिक रिपोर्टों में किसान : ‘उत्तेजित’, ‘भटका’ या राजनीतिक?
औपनिवेशिक प्रशासन ने किसान आंदोलन को समझाने के लिए अक्सर बाहरी ‘agitators’—उत्तेजक नेताओं—की भूमिका पर जोर दिया।
इस व्याख्या से प्रशासन को एक सुविधा मिलती थी।
यदि किसान स्वभावतः शांत है और बाहरी नेता उसे भड़का रहे हैं, तो भूमि व्यवस्था में मूल समस्या खोजने की आवश्यकता कम हो जाती है।
माजिद हयात सिद्दीकी के शोध में तत्कालीन प्रशासनिक रिपोर्टों को पढ़ने से यह दृष्टिकोण बार-बार सामने आता है। दूसरी ओर उनके शोध और ज्ञानेंद्र पांडे के बाद के अध्ययन ग्रामीण शिकायतों की स्वतंत्र सामाजिक जड़ों की ओर ध्यान खींचते हैं। इसलिए इतिहासकार को पूछना चाहिए— क्या नेता ने असंतोष पैदा किया?
या उसने पहले से मौजूद असंतोष को संगठन दिया?
अवध के मामले में दूसरा उत्तर अधिक विश्वसनीय दिखाई देता है।
महामारी अकेली वजह भी नहीं थी
इसी तरह 1918 की महामारी को भी किसान आंदोलन का सीधा कारण कहना सावधानी के विरुद्ध होगा।
महामारी ने पूरे भारत को प्रभावित किया।
लेकिन हर जगह एका जैसा आंदोलन नहीं हुआ।
महामारी का महत्व इस रूप में था कि उसने— परिवारों को कमजोर किया; श्रम-शक्ति घटाई; कर्ज बढ़ाया; खाद्यान्न संकट तीखा किया;
और औपनिवेशिक शासन की सीमित ग्रामीण कल्याण क्षमता को उजागर किया।
इसलिए महामारी कारणों की श्रृंखला का एक शक्तिशाली प्रवर्धक थी, न कि अकेला कारण।
एका : युद्धोत्तर संकट का संगठित उत्तर
अब अध्याय 2 में वर्णित एका की शपथ को एक बार फिर देखें। दर्ज लगान से अधिक नहीं देंगे। बेदखल किसान की जमीन नहीं लेंगे। बेगार नहीं करेंगे। पंचायत का निर्णय मानेंगे। आपस में एकता रखेंगे। ये प्रतिज्ञाएं आकस्मिक नहीं थीं।
प्रत्येक प्रतिज्ञा 1914–21 के संकट से निकली हुई थी।
महंगाई का उत्तर — अतिरिक्त वसूली से इनकार।
बेदखली का उत्तर — खाली कराई जमीन का सामूहिक बहिष्कार। बेगार का उत्तर — सामूहिक अस्वीकार। व्यक्तिगत कमजोरी का उत्तर — पंचायत। जमींदारी दबाव का उत्तर — एका।
इस तरह आंदोलन की रणनीति उसकी आर्थिक पृष्ठभूमि से सीधे जुड़ती है।
किसान सभा से एका तक : उत्तर प्रदेश किसान सभा, अवध किसान सभा, बाबा रामचंद्र और 1920–21 की पहली किसान लहर
प्रमुख तथ्य
1921–22 का एका आंदोलन शून्य से पैदा नहीं हुआ था। उसके पहले अवध के किसान लगभग तीन वर्षों तक संगठन, सभा, जुलूस, पंचायत, सामूहिक मांग, गिरफ्तारी, पुलिस दमन और राष्ट्रीय राजनीति के साथ संपर्क का अनुभव हासिल कर चुके थे। एका की जमीन आर्थिक संकट ने तैयार की, लेकिन किसानों को सामूहिक राजनीति की भाषा किसान सभा आंदोलन ने दी।
इस प्रक्रिया को मोटे तौर पर तीन चरणों में समझा जा सकता है।
पहला चरण फरवरी 1918 में उत्तर प्रदेश किसान सभा के गठन से शुरू हुआ, जब शिक्षित राष्ट्रवादी नेतृत्व ने किसानों की समस्याओं को संगठित मंच देने का प्रयास किया।
दूसरा चरण 1919–20 में विशेष रूप से प्रतापगढ़ और अवध के अन्य क्षेत्रों में बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में नीचे से उठी किसान लामबंदी का था।
तीसरा चरण अक्टूबर 1920 के बाद अवध किसान सभा, असहयोग आंदोलन और स्थानीय किसान प्रतिरोध के मेल का था, जो दिसंबर 1920 और जनवरी 1921 में उग्र संघर्ष में बदल गया।
इस पहली किसान लहर को औपनिवेशिक दमन और कांग्रेस की सावधान रणनीति ने 1921 के मध्य तक कमजोर जरूर किया, लेकिन किसान असंतोष समाप्त नहीं हुआ। उसी अधूरे संघर्ष ने कुछ महीनों बाद एक नए नाम और नए नेतृत्व के साथ वापसी की— ‘एका’।
किसान सभा की पहली सीमा : किसान की आवाज कौन तय करेगा?
आरंभिक किसान सभा के सामने बुनियादी प्रश्न था—
क्या किसानों के लिए शिक्षित नेता बोलेंगे?
या किसान स्वयं अपने नेताओं और अपनी मांगों को जन्म देंगे?
1918 में पहला मॉडल अधिक स्पष्ट था।
लेकिन 1919–20 तक दूसरा मॉडल उभरने लगा।
और इसी दूसरे मॉडल का सबसे प्रभावशाली चेहरा बने— बाबा रामचंद्र।
रामचरितमानस किसान राजनीति का माध्यम कैसे बना?
बाबा रामचंद्र की सबसे प्रसिद्ध संगठन पद्धति थी— रामचरितमानस का पाठ।
वे गांवों में तुलसीदास की चौपाइयां पढ़ते और किसानों को एकत्र करते।
‘सीताराम’ अभिवादन उनके आंदोलन की पहचान बन गया।
भारत सरकार के सांस्कृतिक अभिलेख में भी उनके किसान संगठन में रामचरितमानस और ‘सीताराम’ के उपयोग का उल्लेख है।
इसे केवल धार्मिक प्रचार समझना भूल होगी।
यह वास्तव में राजनीतिक संचार की तकनीक थी।
ग्रामीण समाज में बड़ी संख्या में लोग पढ़े-लिखे नहीं थे। रामायण की कथा परिचित थी।
धार्मिक सभा प्रशासन को आरंभ में राजनीतिक सभा की तुलना में कम संदिग्ध लग सकती थी। और सबसे महत्वपूर्ण—
समान धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीक किसानों के बीच सामुदायिक विश्वास पैदा कर सकते थे।
जमींदार के सामने अकेले नहीं—समूह में जाना
रामचंद्र की संगठन पद्धति का एक महत्वपूर्ण तत्व था— व्यक्तिगत शिकायत को सामूहिक शिकायत बनाना।
यदि किसी किसान के साथ अन्याय हुआ तो बड़ी संख्या में किसान उसके साथ जमींदार अथवा प्रशासन के सामने पहुंच सकते थे। यह साधारण बदलाव नहीं था। पुरानी व्यवस्था का आधार था—
जमींदार और व्यक्तिगत काश्तकार का असमान संबंध।
किसान सभा ने इस समीकरण को बदल दिया— जमींदार बनाम संगठित किसान समुदाय।
एका आंदोलन आगे इसी सामूहिक अनुशासन को अधिक कठोर शपथ में बदलने वाला था।
इलाहाबाद तक किसानों का पैदल मार्च
1920 में बाबा रामचंद्र ने प्रतापगढ़ क्षेत्र से किसानों के एक बड़े दल को लेकर इलाहाबाद तक मार्च किया।
सरकारी संस्कृति मंत्रालय के एक स्रोत के अनुसार लगभग पांच सौ किसान इस यात्रा में शामिल हुए और उद्देश्य राष्ट्रीय नेताओं का ध्यान अवध के किसानों की शिकायतों की ओर आकर्षित करना था।
मार्च की सटीक तारीख/वर्ष को लेकर लोकप्रिय सरकारी अभिलेखों में थोड़ा अंतर मिलता है—एक स्रोत इसे 1919 बताता है जबकि विद्वत इतिहासलेखन सामान्यतः 1920 की किसान लामबंदी के क्रम में रखता है।
शोध की दृष्टि से जून 1920 का कालक्रम अधिक व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है।
लेकिन घटना का महत्व तारीख से बड़ा है।
गांव का किसान पहली बार अपनी स्थानीय समस्या लेकर प्रांतीय-राष्ट्रीय राजनीतिक नेतृत्व के दरवाजे तक पहुंच रहा था।
नेहरू के लिए भारतीय गांव का पहला वास्तविक अनुभव
जवाहरलाल नेहरू उच्च शिक्षित, संपन्न और शहर-केंद्रित राजनीतिक परिवार से आए थे।
ग्रामीण अवध की यात्राओं में उनके सामने ऐसा भारत खुला जिसे उन्होंने उस निकटता से पहले नहीं देखा था— गरीबी; फटे वस्त्र; कुपोषण; जमींदारी दबाव; ऋण; और विशाल किसान आबादी।
नेहरू की *An Autobiography* 1930 के दशक में लिखी गई, लेकिन उसमें 1920 के किसान अनुभव उनके राजनीतिक विकास की महत्वपूर्ण स्मृति के रूप में आते हैं। आधिकारिक नेहरू पोर्टल इस आत्मकथा को उनके राजनीतिक जागरण और भारतीय समाज से जुड़ने का महत्वपूर्ण स्रोत मानता है।
यहीं शहरी राष्ट्रवाद और ग्रामीण भारत का सीधा संपर्क हुआ।
लेकिन किसान और नेहरू एक ही राजनीति नहीं कर रहे थे
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है।
नेहरू किसान की गरीबी देखकर प्रभावित थे। लेकिन किसान की तत्काल मांग थी— मेरा लगान कम हो; मेरी जमीन बची रहे; मुझसे बेगार न ली जाए। कांग्रेस का बड़ा लक्ष्य था— औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय असहयोग। दोनों एक-दूसरे से जुड़ सकते थे। लेकिन दोनों समान नहीं थे।
यही अंतर 1920–21 के आंदोलन में बार-बार सामने आया।
अगस्त 1920 : बाबा रामचंद्र की गिरफ्तारी
किसान लामबंदी बढ़ी तो औपनिवेशिक प्रशासन चिंतित हुआ।
अगस्त 1920 में बाबा रामचंद्र को गिरफ्तार किया गया।
भारत सरकार के जिला इतिहास भंडार के अनुसार उनकी गिरफ्तारी के बाद बड़ी संख्या में किसानों ने प्रतापगढ़ में प्रदर्शन किया और प्रशासन पर उन्हें रिहा करने का भारी दबाव पड़ा। स्रोत लगभग 50,000 किसानों तक की संख्या बताता है; ऐसी भीड़-संख्या को औपनिवेशिक/स्मृति स्रोतों की प्रकृति को देखते हुए अनुमान के रूप में पढ़ना अधिक सुरक्षित है। घटना का मूल महत्व निर्विवाद है—
रामचंद्र अब केवल स्थानीय कार्यकर्ता नहीं रह गए थे।
उनकी गिरफ्तारी स्वयं किसान लामबंदी का कारण बन सकती थी।
उत्तर प्रदेश किसान सभा के भीतर मतभेद
किसान आंदोलन के विस्तार के साथ पुराने किसान सभा नेतृत्व और नए जमीनी नेतृत्व के बीच अंतर स्पष्ट होने लगा।
मालवीय, गौरीशंकर मिश्र आदि के लिए संगठन मुख्यतः सुधारवादी था।
बाबा रामचंद्र और उनके साथ जुड़े किसान अधिक सीधी कार्रवाई चाहते थे। प्रश्न था—
क्या किसान जमींदार का सामाजिक बहिष्कार करेगा?
क्या बेदखल जमीन की खेती रोकी जाएगी? क्या बेगार से सामूहिक इनकार होगा?
क्या अतिरिक्त लगान सीधे रोक दिया जाएगा?
पुराने नेतृत्व के लिए ऐसी रणनीतियां जोखिमपूर्ण थीं।
किसान के लिए यही आंदोलन का वास्तविक अर्थ था।
पंचायत : वैकल्पिक किसान अनुशासन
किसान सभा ने पंचायतों को भी राजनीतिक भूमिका दी। ग्रामीण विवाद पंचायत में सुलझाए जाएं। किसान सामूहिक फैसले माने।
जमींदार की अदालत अथवा सरकारी तंत्र पर निर्भरता कम हो। यह अभी समानांतर सरकार नहीं थी।
लेकिन उसमें उस दिशा की संभावना अवश्य थी।
जब ग्रामीण समाज अपने फैसलों को स्वयं लागू करने लगे तो औपनिवेशिक शासन के लिए यह केवल कृषि विवाद नहीं रहता।
यह अधिकार के स्रोत का प्रश्न बन जाता है।
गांधी के संदेश का ग्रामीण अनुवाद
यहीं भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु सामने आता है।
गांधी जो कह रहे थे और किसान जो सुन रहा था, दोनों हमेशा बिल्कुल समान नहीं थे। गांधी अहिंसक राष्ट्रीय असहयोग चाहते थे।
किसान उसे अपनी भूमि संबंधी शिकायतों से जोड़ रहा था। उसकी कल्पना में—
गांधी राज = अन्यायपूर्ण लगान का अंत; गांधी राज = बेदखली से मुक्ति; गांधी राज = जमींदार की मनमानी पर रोक।
ज्ञानेंद्र पांडे ने इसी प्रक्रिया को अवध किसान आंदोलन की राजनीतिक चेतना समझने का केंद्रीय माध्यम माना है। उनके अनुसार किसान राष्ट्रीय प्रतीकों को अपने सामाजिक अनुभवों के अनुसार पुनर्परिभाषित कर रहे थे।
दिसंबर 1920 : आंदोलन तेजी से फैलता है
1920 के अंतिम महीनों में किसान लामबंदी अवध के कई क्षेत्रों में तेजी से फैल गई। सभाओं में हजारों किसान आने लगे।
जमींदारों के विरुद्ध शिकायतें सामूहिक रूप से उठाई गईं। कहीं अतिरिक्त वसूली रोकी गई। कहीं बेगार का विरोध हुआ। कहीं सामाजिक बहिष्कार। कहीं बेदखली के विरुद्ध सीधी कार्रवाई।
किसान संगठन अब केवल सदस्यता-पंजी नहीं था। वह ग्रामीण शक्ति बन रहा था।
जनवरी 1921 : अवध की पहली बड़ी किसान विस्फोटक लहर
जनवरी 1921 में किसान असंतोष ने कई स्थानों पर उग्र रूप ग्रहण किया।
रायबरेली के फुरसतगंज और मुंशीगंज में विशाल किसान जमावड़ों पर 6 और 7 जनवरी को पुलिस गोलीबारी हुई।
रायबरेली, फैजाबाद और सुल्तानपुर के दूसरे हिस्सों में बाजार लूट, जमींदारों पर हमले और पुलिस से संघर्ष की घटनाएं हुईं।
ज्ञानेंद्र पांडे के अध्ययन का आरंभ ही इसी नाटकीय जनवरी 1921 से होता है; उनके अनुसार कुछ सप्ताह तक कई जमींदार अपने क्षेत्रों में खुले रूप से जाने से भी डर रहे थे।
यह अवध किसान आंदोलन का निर्णायक मोड़ था।
फुरसतगंज : आंदोलन और हिंसा की सीमा
फुरसतगंज में बाजार लूट और पुलिस गोलीबारी की घटनाओं ने किसान आंदोलन की दिशा को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े किए।
क्या भूख और आर्थिक संकट ने बाजारों को निशाना बनाया?
क्या आंदोलन के नाम पर सामान्य लूट भी हुई?
क्या स्थानीय व्यापारी जमींदारी व्यवस्था का हिस्सा माने जा रहे थे? क्या भीड़ नियंत्रण विफल हुआ?
इन सभी प्रश्नों का उत्तर स्थान विशेष के स्रोतों की जांच से ही दिया जा सकता है। लेकिन एक बात स्पष्ट है—
अब आंदोलन को केवल ‘शांत किसान सभा’ नहीं कहा जा सकता था।
प्रशासन ने दमन कैसे किया?
कई स्थानों पर भीड़ को तितर-बितर किया गया। किसान कार्यकर्ताओं के विरुद्ध मुकदमे हुए।
और प्रशासन ने कांग्रेस नेतृत्व पर भी दबाव बनाया कि वह ग्रामीण आंदोलन को नियंत्रित करे। औपनिवेशिक राज्य का लक्ष्य दोहरा था— कृषि व्यवस्था को स्थिर रखना;
और किसान संघर्ष को राष्ट्रीय विद्रोह बनने से रोकना।
कांग्रेस के सामने कठिन दुविधा
कांग्रेस के सामने एक कठिन राजनीतिक प्रश्न था।
यदि वह किसान की हर मांग का समर्थन करती, तो उसे जमींदारों के साथ खुले वर्ग-संघर्ष में उतरना पड़ सकता था।
और अनेक जमींदार स्वयं कांग्रेस समर्थक थे।
यदि वह किसान को नियंत्रित करती, तो ग्रामीण जनता का विश्वास खो सकती थी।
गांधी विशेष रूप से आंदोलन को अहिंसक सीमाओं में रखना चाहते थे।
उन्होंने किसान को वैधानिक लगान का पूर्ण बहिष्कार करने की खुली अनुमति नहीं दी।
यहीं किसान की अपेक्षा और कांग्रेस रणनीति में दूरी स्पष्ट होने लगी।
बाबा रामचंद्र और कांग्रेस के बीच दूरी
बाबा रामचंद्र को उम्मीद थी कि कांग्रेस किसान प्रश्न को अधिक स्पष्टता से उठाएगी।
कांग्रेस नेतृत्व को लगता था कि रामचंद्र की राजनीति कभी-कभी आंदोलन को नियंत्रित अहिंसा की सीमा से बाहर ले जा सकती है। इससे संबंध तनावपूर्ण हुए।
यहीं किसान नेतृत्व के स्वतंत्र चरित्र का प्रमाण मिलता है।
यदि रामचंद्र केवल कांग्रेस के कार्यकर्ता होते तो मतभेद इतनी स्पष्टता से सामने नहीं आते।
उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी किसान समुदाय के प्रति थी।
लेकिन एका किसान सभा की हूबहू पुनरावृत्ति नहीं था
किसान सभा का नेतृत्व शिक्षित राष्ट्रवादी और बाबा रामचंद्र जैसे बड़े किसान नेता कर रहे थे।
एका में आगे मदारी पासी जैसे स्थानीय निम्नवर्गीय नेता प्रमुख हुए।
किसान सभा का कांग्रेस से प्रत्यक्ष संबंध अधिक था।
एका धीरे-धीरे कांग्रेस के नियंत्रण से दूर चला गया।
पहली लहर में राष्ट्रीय नेतृत्व की उपस्थिति अधिक स्पष्ट थी।
एका में स्थानीय पंचायत और ग्रामीण नेतृत्व का वजन बढ़ा।
कुछ क्षेत्रों में छोटे जमींदार भी एका में शामिल हुए।
और आंदोलन का सामाजिक चरित्र अधिक जटिल हो गया।
औपनिवेशिक प्राथमिक स्रोतों की समस्या
किसान सभा आंदोलन के अधिकांश प्रशासनिक अभिलेख पुलिस, जिला मजिस्ट्रेट, कमिश्नर और राजस्व अधिकारियों ने तैयार किए। इनसे घटनाओं की जानकारी अमूल्य है। लेकिन उनकी भाषा तटस्थ नहीं थी। ‘agitator’; ‘mob’; ‘intimidation’; ‘lawlessness’; ‘criminal elements’—
जैसे शब्द प्रशासनिक दस्तावेजों में आंदोलन का अर्थ पहले ही निर्धारित कर सकते हैं।
इसलिए जब कोई रिपोर्ट कहती है कि बाबा रामचंद्र ने किसानों को ‘भड़काया’, तो इतिहासकार को साथ में यह भी पूछना चाहिए—
किस बात ने किसानों को इतनी आसानी से लामबंद होने योग्य बनाया?
यदि कोई शिकायत नहीं थी तो हजारों किसान किसी व्यक्ति के पीछे क्यों चलते?
स्वयं किसान के स्रोत इतने कम क्यों हैं?
हजारों किसानों ने आंदोलन किया, लेकिन उन्होंने हजारों लिखित आत्मकथाएं नहीं छोड़ीं। उनकी आवाज हमें मिलती है— याचिकाओं में; लोक स्मृतियों में; किसान गीतों में; नेताओं की नोटबुक में; अदालती बयानों में; पुलिस द्वारा दर्ज कथनों में; और नेताओं की यादों में।
इसीलिए किसान इतिहास लिखना केवल सरकारी फाइल पढ़ना नहीं है।
हमें उन फाइलों के बीच से किसान की आवाज निकालनी पड़ती है।
बाबा रामचंद्र से जुड़े दस्तावेज और नेहरू स्मारक संग्रह में सुरक्षित उनके कागजात इसी दृष्टि से मूल्यवान हैं। बाबा रामचंद्र पत्रावली का उपयोग बाद के शोधकर्ताओं ने भी किया है।
किसान सभा की पहली लहर के बाद : दमन, कांग्रेस की दूरी और उत्तरी अवध में एका के उदय की परिस्थितियां
प्रमुख तथ्य
1921 की शुरुआत अवध के किसान आंदोलन के लिए एक निर्णायक मोड़ थी। जनवरी में रायबरेली, फैजाबाद और सुल्तानपुर के क्षेत्रों में किसान लामबंदी, पुलिस गोलीबारी, बाजारों पर हमले और जमींदारों के साथ टकराव ने औपनिवेशिक प्रशासन को स्पष्ट कर दिया था कि किसान प्रश्न अब केवल लगान अथवा किरायेदारी संबंधी शिकायत नहीं रह गया है। वह व्यापक ग्रामीण राजनीतिक चुनौती का रूप ले चुका था।
सरकार ने दमन किया। किसान नेताओं को गिरफ्तार किया गया। कांग्रेस ने हिंसा से दूरी बनाई। महात्मा गांधी ने किसानों को संयम, अहिंसा, समय पर लगान भुगतान और जमींदारों को विरोधी के बजाय संभावित सहयोगी मानने की सलाह दी। अवध किराया कानून में संशोधन भी किया गया।
ऊपरी तौर पर ऐसा दिखाई देने लगा कि आंदोलन शांत हो गया है।
ज्ञानेंद्र पांडे का अध्ययन इसी बिंदु पर विशेष महत्व रखता है। वे स्पष्ट रूप से लिखते हैं कि जनवरी 1921 के बाद किसान आंदोलन को उसके पुराने शहरी सहयोगियों के समर्थन से वंचित कर सरकारी दमन का सामना करना पड़ा, लेकिन वह पूरी तरह कुचला नहीं गया। कुछ महीने बाद वही संघर्ष उत्तरी अवध में बदले हुए रूप में फिर उभरा—एका अर्थात ‘एकता’ आंदोलन के रूप में।
इसलिए 1921 के जनवरी और नवंबर के बीच के महीनों को किसान आंदोलन का ‘खाली काल’ मानना गंभीर भूल होगी। यही वह संक्रमणकाल था जिसमें—
कांग्रेस और किसान संघर्ष के बीच दूरी बढ़ी; कानूनी सुधारों की सीमाएं सामने आईं; किसानों के स्थानीय नेटवर्क बने रहे;
और अंततः मदारी पासी जैसे नए जमीनी नेता उभरे।
जनवरी 1921 के बाद स्थिति क्यों बदल गई?
1920 के अंतिम महीनों तक कांग्रेस, असहयोग आंदोलन और अवध किसान राजनीति के बीच पर्याप्त निकटता दिखाई देती थी।
कई कांग्रेस कार्यकर्ता किसानों की सभाओं में जाते थे।
जवाहरलाल नेहरू गांवों में घूम रहे थे।
बाबा रामचंद्र जैसे नेता राष्ट्रीय आंदोलन से संपर्क बनाए हुए थे।
लेकिन दिसंबर 1920 और जनवरी 1921 में किसान संघर्ष का चरित्र अधिक उग्र होने लगा। कुछ स्थानों पर बाजार लूटे गए। जमींदारों की संपत्ति पर हमले हुए। पुलिस से टकराव हुआ। सामाजिक बहिष्कार की कार्रवाइयां बढ़ीं।
कांग्रेस नेतृत्व के सामने अब कठिन प्रश्न था—
क्या किसान आंदोलन को उसकी अपनी गति से चलने दिया जाए, भले वह हिंसा अथवा व्यापक जमींदार-विरोध में बदल जाए? गांधी का उत्तर स्पष्ट था— नहीं।
गांधी फरवरी 1921 में अवध पहुंचे
जनवरी की हिंसक घटनाओं के बाद महात्मा गांधी ने फरवरी 1921 में संयुक्त प्रांत का दौरा किया और किसानों के लिए विस्तृत निर्देश जारी किए।
इन निर्देशों का महत्व अत्यंत बड़ा है क्योंकि वे किसान आंदोलन के प्रति कांग्रेस की तत्कालीन रणनीति को स्पष्ट करते हैं। गांधी ने किसानों से कहा कि— हिंसा न करें; लाठी का उपयोग न करें; गाली न दें; दुकानें न लूटें; विरोधियों पर सामाजिक दबाव न डालें;
नाई और धोबी की सेवाएं बंद कराकर उन्हें मजबूर न करें; सरकारी आदेशों का पालन करें;
सरकारी कर और जमींदार का लगान न रोकें; विवादों को पंचायती मध्यस्थता से सुलझाएं;
और जमींदारों को शत्रु के बजाय मित्र बनाने का प्रयास करें।
ज्ञानेंद्र पांडे ने गांधी के इन निर्देशों को कांग्रेस की अवध किसान आंदोलन पर निर्णायक प्रतिक्रिया माना है। निर्देशों का मूल स्रोत *Collected Works of Mahatma Gandhi*, खंड 19 है।
गांधी जमींदारों को मित्र क्यों बनाए रखना चाहते थे?
इस प्रश्न का उत्तर केवल ‘गांधी जमींदारों के पक्ष में थे’ कहकर नहीं दिया जा सकता।
उनकी राजनीति व्यापक राष्ट्रीय गठबंधन बनाने की थी। कांग्रेस को आवश्यकता थी— किसान की; व्यापारी की; शिक्षित वर्ग की; मध्यवर्ग की;
और संभव हो तो जमींदार की भी।
यदि राष्ट्रीय असहयोग तत्काल ग्रामीण वर्ग-युद्ध में बदल जाता तो कांग्रेस का व्यापक गठबंधन टूट सकता था।
गांधी की बाद की व्याख्याओं में भी यह दृष्टि स्पष्ट दिखाई देती है कि वे जमींदार और काश्तकार को परस्पर शत्रु बनाने के बजाय न्यायपूर्ण संबंध की ओर ले जाना चाहते थे।
इस रणनीति के अपने राजनीतिक कारण थे।
लेकिन किसान के दृष्टिकोण से समस्या थी—
उसकी तत्काल लड़ाई उसी जमींदार से थी जिसे कांग्रेस राष्ट्रीय गठबंधन के भीतर रखना चाहती थी।
क्या कांग्रेस ने किसान आंदोलन को छोड़ दिया?
‘कांग्रेस ने किसानों को पूरी तरह छोड़ दिया’ कहना भी अत्यधिक सरलीकरण होगा।
कई स्थानीय कांग्रेस नेता किसानों के मामलों में सहायता करते रहे।
कानूनी मुकदमों में किसानों की पैरवी हुई।
स्थानीय कार्यकर्ता किसान संगठनों से जुड़े रहे।
और वर्ष के अंत में जब एका आंदोलन शुरू हुआ, उसके शुरुआती संगठन में भी कांग्रेस और खिलाफत कार्यकर्ताओं ने मदद की।
लेकिन जनवरी–फरवरी 1921 के बाद कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व स्वतंत्र, उग्र किसान कार्रवाई को समर्थन देने के लिए तैयार नहीं था।
बिपन चंद्र और सहयोगियों के राष्ट्रीय आंदोलन संबंधी मानक अध्ययन में भी उल्लेख है कि राष्ट्रवादी नेताओं ने किसानों के मुकदमों की सहायता जारी रखी, लेकिन व्यापक किसान संघर्ष को पहले की तरह आगे नहीं बढ़ाया। इसलिए उचित शब्द होगा— दूरी, न कि पूर्ण संबंध-विच्छेद।
शहरी सहयोगियों से किसान आंदोलन का अलगाव
ज्ञानेंद्र पांडे ने एक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति का उपयोग किया—
किसान आंदोलन अपने पहले के urban allies—शहरी सहयोगियों के समर्थन से वंचित हो गया।
यह केवल कांग्रेस नेतृत्व की बात नहीं थी।
पहली किसान सभा की संरचना में शिक्षित कार्यकर्ताओं, वकीलों, राष्ट्रवादी नेताओं और स्थानीय मध्यवर्ग की भूमिका थी।
जब आंदोलन हिंसक और अधिक वर्ग-संघर्षकारी दिखाई देने लगा, इन सहयोगियों का एक हिस्सा पीछे हट गया। इसका अर्थ था—
किसानों को अब पहले से अधिक स्थानीय नेतृत्व पर निर्भर होना पड़ेगा।
यही परिस्थिति आगे मदारी पासी जैसे नेताओं को स्थान देती है।
नेतृत्व गिरफ्तार हुआ—लेकिन नेटवर्क जीवित रहे
किसान आंदोलन की वास्तविक शक्ति केवल उसके शीर्ष नेता नहीं थे।
गांवों में पहले से पंचायतें बन चुकी थीं।
संदेश पहुंचाने की पद्धति विकसित हो चुकी थी।
किसानों के बीच आपसी संपर्क स्थापित हो चुका था।
लोग जानते थे कि सभा कैसे बुलानी है। किसे सूचना देनी है।
आसपास के गांवों को कैसे जोड़ना है।
किसानों को यह भी पता था कि—
बेदखली भूमि का बहिष्कार किया जा सकता है;
बेगार से सामूहिक इनकार किया जा सकता है;
सामाजिक बहिष्कार प्रभावी हथियार हो सकता है।
इसलिए नेताओं की गिरफ्तारी से संगठन कमजोर हुआ—
लेकिन किसान की राजनीतिक स्मृति समाप्त नहीं हुई।
यही राजनीतिक स्मृति एका की असली पूंजी थी
एका के पास प्रारंभ में कोई विशाल केंद्रीय कार्यालय नहीं था। कोई बड़ा प्रांतीय संगठन नहीं था। कोई भारी आर्थिक कोष नहीं था।
फिर वह इतनी तेजी से कैसे फैला?
क्योंकि जिन क्षेत्रों में वह पहुंचा वहां किसान आंदोलन की पद्धति अब अपरिचित नहीं थी।
पिछले तीन वर्षों ने अवध के ग्रामीण समाज को सिखाया था— सामूहिकता ही शक्ति है।
इसलिए एका को केवल नए संगठन के रूप में देखने के बजाय पुराने आंदोलन की सामाजिक स्मृति का पुनर्गठन कहना अधिक उचित होगा।
Oudh Rent Amendment Act, 1921 — सुधार की राजनीति
जनवरी 1921 के किसान विस्फोट ने सरकार को यह भी एहसास कराया कि केवल पुलिस कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी।
भूमि व्यवस्था से जुड़ी कुछ शिकायतों पर विधायी प्रतिक्रिया आवश्यक थी।
ज्ञानेंद्र पांडे द्वारा उद्धृत जनवरी 1921 के सरकारी पत्राचार से स्पष्ट है कि अधिकारियों ने स्वयं स्वीकार किया था कि अवध किराया कानून में संशोधन लंबे समय से आवश्यक था।
इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में Oudh Rent (Amendment) Act, 1921 सामने आया।
सरकार के लिए यह दोहरी रणनीति थी— दमन + सुधार। जहां आंदोलन उग्र हो, वहां पुलिस।
जहां शिकायत वैध दिखाई दे, वहां कानून।
लेकिन गांव में कानून का असर कितना था?
किसी अधिनियम का पारित होना और गांव की सत्ता-संरचना का बदल जाना दो अलग बातें हैं।
जमींदार और किसान का प्रत्यक्ष संबंध गांव में चलता था। कारिंदा वहीं था। ठेकेदार वहीं था। रसीद वही देता था। लगान वही वसूलता था।
किसान यदि कानून का लाभ लेना चाहता था तो उसे— कानून की जानकारी चाहिए; दस्तावेज चाहिए; अदालत तक पहुंच चाहिए;
और मुकदमे का खर्च उठाना पड़ सकता था।
इसलिए विधायी अधिकार का वास्तविक लाभ अक्सर किसान की व्यावहारिक क्षमता पर निर्भर था।
नजराना समाप्त क्यों नहीं हुआ?
किसानों की पुरानी शिकायतों में नजराना महत्वपूर्ण था।
किरायेदारी अधिकार देने, नवीनीकरण अथवा भूमि संबंधी दूसरे अवसरों पर अतिरिक्त रकम की मांग किसान के लिए बड़ा बोझ बन सकती थी।
यदि नया किराया कानून इस प्रकार की सारी वसूली समाप्त नहीं करता था, तो किसान की शिकायत का बड़ा हिस्सा बना रहता था।
इसीलिए 1921 का कानून ग्रामीण संकट का अंतिम समाधान नहीं बन सका। कानून बदल गया—
लेकिन किसान के अनुभव में ‘मनमानी’ समाप्त नहीं हुई।
दर्ज लगान से ‘50 प्रतिशत अधिक’ का प्रश्न
एका आंदोलन के विवरणों में बार-बार यह दावा आता है कि कई क्षेत्रों में किसान से दर्ज लगान से लगभग 50 प्रतिशत तक अधिक वसूली की जा रही थी।
यह संख्या प्रसिद्ध है और मानक राष्ट्रीय आंदोलन इतिहास तथा भारत सरकार के जिला इतिहास विवरण में भी मिलती है।
लेकिन शोध की दृष्टि से इसे सावधानीपूर्वक लिखना चाहिए।
यह पूरे अवध के प्रत्येक किसान पर लागू सार्वभौमिक दर नहीं थी। अधिक सटीक कथन होगा—
एका के कुछ प्रमुख क्षेत्रों में किसानों की शिकायत थी कि वास्तविक वसूली अभिलेखित लगान से लगभग 50 प्रतिशत तक, अथवा कुछ मामलों में उससे भी अधिक, बढ़ गई थी।
यही वेबसाइट के शोध संस्करण में उपयुक्त भाषा होगी।
अनाज में लगान — grain rent की समस्या
उत्तरी अवध में एका के उभार की एक विशिष्ट पृष्ठभूमि थी—
अनाज अथवा हिस्सेदारी के रूप में लगान।
जब लगान नकद के बजाय फसल के हिस्से के रूप में लिया जाता है तो विवाद पैदा हो सकता है— उपज कितनी हुई? जमींदार का हिस्सा कितना है? माप कौन करेगा? फसल की कीमत कैसे तय होगी?
ज्ञानेंद्र पांडे लिखते हैं कि एका उन उत्तरी अवध जिलों में विशेष रूप से मजबूत हुआ जहां grain rents और disguised rents की बुराइयां अधिक थीं। किसान संगठनों ने नकद लगान में परिवर्तन और दर्ज लगान से अधिक भुगतान का प्रतिरोध उठाया।
यह एका के भौगोलिक स्थानांतरण की एक महत्वपूर्ण आर्थिक व्याख्या है।
सीतापुर और बहराइच में विस्तार
हरदोई के साथ सीतापुर और बहराइच भी आंदोलन के प्रमुख क्षेत्र बने।
मानक राष्ट्रीय आंदोलन इतिहास इसी त्रिकोण—हरदोई, बहराइच और सीतापुर—को एका के शुरुआती मुख्य क्षेत्र के रूप में चिन्हित करता है।
इन जिलों का महत्व बताता है कि एका केवल किसी एक गांव या नेता का विद्रोह नहीं था।
कुछ ही महीनों में वह बड़े भू-क्षेत्र में फैलने वाली ग्रामीण लामबंदी बन गया।
खिलाफत कार्यकर्ताओं की उपस्थिति क्यों महत्वपूर्ण थी?
1920–21 में खिलाफत और असहयोग आंदोलन एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।
कांग्रेस और खिलाफत के संयुक्त राजनीतिक नेटवर्क ने गांव तक राष्ट्रीय राजनीतिक संदेश पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस नेटवर्क के कार्यकर्ता सभा आयोजित करना जानते थे। संदेश फैलाना जानते थे। स्वयंसेवक व्यवस्था बना सकते थे।
और औपनिवेशिक विरोध की भाषा से परिचित थे।
इसलिए जब स्थानीय किसान शिकायतें उभरीं तो यही नेटवर्क प्रारंभिक संगठनात्मक सहायता दे सकता था।
एका के जन्म में यह राष्ट्रीय आंदोलन की महत्वपूर्ण अप्रत्यक्ष विरासत थी।
एक नए नेतृत्व की आवश्यकता क्यों थी?
पहली किसान सभा लहर में बड़े चेहरे स्पष्ट थे— बाबा रामचंद्र; जवाहरलाल नेहरू; गौरीशंकर मिश्र; और दूसरे शिक्षित नेता।
1921 के अंत तक परिस्थितियां बदल गईं।
कांग्रेस केंद्रीय रूप से उग्र किसान संघर्ष से दूरी बनाए हुए थी। रामचंद्र कमजोर हो चुके थे।
सरकार बड़े नेताओं पर निगरानी रखती थी।
इस स्थिति में आंदोलन को ऐसे नेता चाहिए थे जो— गांवों के भीतर से आएं; किसानों की भाषा बोलें; स्थानीय जातिगत और सामाजिक संरचना समझें; गिरफ्तारी और दमन का जोखिम लें;
और कांग्रेस की स्वीकृति पर निर्भर न हों।
यहीं मदारी पासी की ऐतिहासिक भूमिका शुरू होती है।
मदारी पासी का उदय सामाजिक परिवर्तन का संकेत था
मदारी पासी का उभार केवल नेतृत्व परिवर्तन नहीं था।
वह किसान आंदोलन की सामाजिक दिशा में परिवर्तन का भी संकेत था।
बाबा रामचंद्र ब्राह्मण पृष्ठभूमि के बाहरी धार्मिक-संगठनकर्ता थे।
कांग्रेस के कई नेता शिक्षित शहरी और उच्च सामाजिक पृष्ठभूमि से थे।
मदारी पासी ग्रामीण निम्न जातीय समाज से आते थे। इसका प्रतीकात्मक अर्थ अत्यंत महत्वपूर्ण था—
अब किसान आंदोलन का नेतृत्व स्वयं उन सामाजिक समूहों से निकल रहा था जो ग्रामीण सत्ता संरचना के निचले हिस्सों में थे।
मानक राष्ट्रीय आंदोलन इतिहास में मदारी पासी और अन्य निम्न जातीय नेताओं को एका के स्वतंत्र grassroots leadership के रूप में पहचाना गया है।
एका कोई शुद्ध वर्ग-संघर्ष क्यों नहीं था?
इसी कारण एका को आधुनिक अर्थ में शुद्ध किसान-वर्ग आंदोलन कहना सावधानी मांगता है। उसमें थे— काश्तकार; छोटे किसान; निम्न जातीय कृषक समुदाय; कुछ छोटे जमींदार;
कांग्रेस और खिलाफत से आए प्रारंभिक कार्यकर्ता; और स्थानीय पंचायत नेतृत्व।
इनके हित पूरी तरह समान नहीं थे।
लेकिन कुछ साझा मुद्दों ने इन्हें जोड़ दिया— अधिक वसूली; राजस्व दबाव; ठेकेदार; बेगार; और स्थानीय सत्ता की मनमानी।
इसलिए एका अधिक सही अर्थ में ग्रामीण विरोध का बहुस्तरीय गठबंधन था।
शपथ का महत्व यहां और स्पष्ट होता है
यदि आंदोलन के सदस्यों की जाति, आर्थिक स्थिति और गांव अलग-अलग हैं तो संगठन कैसे सुनिश्चित करेगा कि वे साथ रहें? लिखित सदस्यता-पत्र पर्याप्त नहीं। केंद्रीय पार्टी अनुशासन नहीं। तब सामाजिक-धार्मिक शपथ उपयोगी होती है।
एका सभाओं में किसानों द्वारा सामूहिक धार्मिक अनुष्ठान के बीच प्रतिज्ञा लेने का उल्लेख मिलता है— दर्ज लगान देंगे; समय पर देंगे; उससे अधिक नहीं देंगे; बेदखल होने पर जमीन नहीं छोड़ेंगे; बेगार नहीं करेंगे; अपराधियों की मदद नहीं करेंगे; पंचायत के निर्णय मानेंगे।
यह विवरण सरकारी जिला इतिहास और राष्ट्रीय आंदोलन के मानक अध्ययन दोनों में मिलता है।
इस शपथ में एक महत्वपूर्ण संतुलन था
एका किसान यह नहीं कह रहा था कि वह किसी भी प्रकार का लगान नहीं देगा। वह कह रहा था—
दर्ज लगान देंगे और समय पर देंगे। लेकिन— उससे अधिक नहीं देंगे।
इससे आंदोलन अपने को पूर्ण अराजक लगान-बंदी से अलग दिखाता था।
किसान अपने प्रतिरोध को ‘वैध अधिकार’ की भाषा में प्रस्तुत कर सकता था।
यह उसकी नैतिक राजनीति की महत्वपूर्ण विशेषता थी।
मदारी पासी : सामाजिक पृष्ठभूमि, नेतृत्व का उदय और एका आंदोलन का नया ग्रामीण नेतृत्व
प्रमुख तथ्य
एका आंदोलन के इतिहास में यदि किसी एक व्यक्ति का नाम सबसे अधिक प्रतीकात्मक महत्व रखता है, तो वह मदारी पासी है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस नेता ने 1921–22 में उत्तरी अवध के हजारों किसानों को लामबंद किया, उसके जीवन के बारे में आज भी जानकारी अत्यंत सीमित, बिखरी हुई और कई मामलों में परस्पर विरोधी है।
यही कारण है कि मदारी पासी का इतिहास लिखते समय सावधानी सबसे पहली आवश्यकता है।
उनके बारे में उपलब्ध तथ्य तीन अलग-अलग प्रकार के स्रोतों से मिलते हैं— औपनिवेशिक प्रशासन और पुलिस के अभिलेख;
राष्ट्रीय आंदोलन और किसान आंदोलनों पर बाद के इतिहासकारों के अध्ययन;
और स्थानीय स्मृतियां, मौखिक परंपराएं तथा अपेक्षाकृत हाल के पुनर्स्मरण।
इन तीनों में मदारी पासी की छवि समान नहीं है।
राष्ट्रीय आंदोलन के कुछ पुराने विवरणों में वे किसान आंदोलन को गांधीवादी अनुशासन से बाहर ले जाने वाले उग्र नेता बन जाते हैं।
जबकि बाद के सामाजिक इतिहास और स्थानीय स्मृतियों में वे दलित-पिछड़े ग्रामीण समाज से निकले ऐसे किसान नेता दिखाई देते हैं जिन्होंने बड़े तालुकेदारों और औपनिवेशिक सत्ता—दोनों को चुनौती दी।
इसलिए मदारी पासी को न तो केवल ‘हिंसक नेता’ के रूप में समेटना उचित है, न ही बिना प्रमाण उन्हें किसी आधुनिक वैचारिक श्रेणी में रख देना।
मदारी पासी उस क्षण के प्रतीक हैं जब अवध का किसान आंदोलन शिक्षित राष्ट्रवादी नेतृत्व से आगे बढ़कर स्वयं ग्रामीण समाज के भीतर अपना नेतृत्व पैदा करने लगा।
मदारी पासी कौन थे?
इतिहासलेखन में उनके बारे में जो न्यूनतम तथ्य अपेक्षाकृत सुरक्षित रूप से स्वीकार किए जा सकते हैं, वे हैं— वे अवध क्षेत्र से जुड़े थे;
उनका सामाजिक संबंध पासी समुदाय से था;
उनका प्रमुख राजनीतिक क्षेत्र हरदोई और उसके आसपास का उत्तरी अवध था;
वे 1921 के अंतिम महीनों में तेजी से उभरे;
और जल्द ही एका आंदोलन के सबसे प्रभावशाली स्थानीय नेताओं में शामिल हो गए।
भारत सरकार के *Digital District Repository* में भी उन्हें हरदोई से जुड़े प्रमुख किसान नेता के रूप में दर्ज किया गया है। वहां लिखा है कि कांग्रेस और खिलाफत नेताओं से प्रारंभिक गति पाने वाले एका आंदोलन में बाद में मदारी पासी महत्वपूर्ण नेता बनकर उभरे।
लेकिन उनके जन्म-वर्ष, परिवार, शिक्षा, प्रारंभिक जीवन और मृत्यु के बारे में प्रामाणिक समकालीन सामग्री बहुत कम है।
बाबा रामचंद्र और मदारी पासी : नेतृत्व की दो पीढ़ियां
एका आंदोलन को समझने का सबसे अच्छा तरीका है—
बाबा रामचंद्र और मदारी पासी के नेतृत्व की तुलना करना।
बाबा रामचंद्र महाराष्ट्र मूल के ब्राह्मण थे।
वे फिजी के गिरमिटिया अनुभव के बाद अवध आए।
उन्होंने धार्मिक कथा, रामचरितमानस और ‘सीताराम’ के माध्यम से किसानों को संगठित किया। उनका राष्ट्रीय नेताओं से संपर्क था। मदारी पासी इसके विपरीत—
स्वयं ग्रामीण अवध के निम्न सामाजिक संसार से निकले नेता थे।
उनकी वैधता कांग्रेस नेता से मुलाकात से नहीं आती थी।
वह गांव के किसान से आती थी। यही बदलाव अत्यंत महत्वपूर्ण है।
क्या मदारी पासी ने एका आंदोलन शुरू किया था?
लोकप्रिय विवरणों में अक्सर लिखा जाता है—
“मदारी पासी ने एका आंदोलन शुरू किया।”
यह कथन पूरी तरह सटीक नहीं है।
आंदोलन के शुरुआती चरण को कांग्रेस और खिलाफत के स्थानीय नेताओं ने गति दी थी।
हरदोई, बहराइच और सीतापुर में कृषि असंतोष पहले से मौजूद था।
एका की धार्मिक शपथ और संगठनात्मक रूप भी धीरे-धीरे विकसित हुआ।
मदारी पासी बाद में उसके सबसे प्रभावशाली जमीनी नेताओं में उभरे।
मानक इतिहास स्पष्ट करता है कि आरंभिक प्रोत्साहन कांग्रेस और खिलाफत नेताओं ने दिया और उसके बाद मदारी पासी तथा अन्य स्थानीय निम्न जातीय नेताओं ने आंदोलन पर प्रभावी नेतृत्व स्थापित किया। इसलिए अधिक सटीक कथन होगा—
मदारी पासी एका आंदोलन के संस्थापक नहीं, बल्कि उसके सबसे महत्वपूर्ण जमीनी नेता और उग्र चरण के प्रमुख प्रतीक थे।
उनका प्रभाव किन क्षेत्रों में था?
मदारी पासी का नाम विशेष रूप से— हरदोई; सीतापुर; बाराबंकी; लखनऊ के ग्रामीण क्षेत्र; और आसपास के उत्तरी अवध— से जुड़ता है।
एका आंदोलन स्वयं हरदोई, बहराइच और सीतापुर में विशेष रूप से प्रभावशाली था। सरकारी और मानक ऐतिहासिक स्रोत इन जिलों को आंदोलन के मुख्य केंद्रों के रूप में पहचानते हैं।
कुछ स्रोत बाराबंकी और लखनऊ को भी उनकी सक्रियता से जोड़ते हैं।
इसलिए मदारी पासी को केवल किसी एक गांव का नेता कहना उनके प्रभाव को कम करके आंकना होगा।
मदारी पासी और एका की शपथ
एका की राजनीतिक शक्ति उसकी प्रतिज्ञाओं में थी। किसान शपथ लेते— दर्ज लगान से अधिक नहीं देंगे; लगान समय पर देंगे;
बेदखल किए जाने पर जमीन नहीं छोड़ेंगे; बेगार नहीं करेंगे; अपराधियों को सहायता नहीं देंगे; और पंचायत के निर्णय मानेंगे।
सरकारी हरदोई विवरण और मानक राष्ट्रीय आंदोलन इतिहास दोनों इस मूल संरचना की पुष्टि करते हैं।
मदारी पासी का नेतृत्व इसी सामूहिक अनुशासन को अधिक आक्रामक ग्रामीण राजनीतिक शक्ति में बदलता दिखाई देता है।
मदारी का सबसे बड़ा राजनीतिक कौशल — अलग-अलग ग्रामीण वर्गों को जोड़ना
एका आंदोलन की संरचना पहले अवध किसान सभा से अधिक जटिल थी। उसमें केवल काश्तकार नहीं थे। छोटे जमींदार भी शामिल थे।
भारत सरकार का विवरण मदारी पासी को ऐसा नेता बताता है जिसने छोटे जमींदारों का समर्थन प्राप्त करने में मध्यस्थ भूमिका निभाई। यह राजनीतिक कौशल अत्यंत महत्वपूर्ण था।
बड़े तालुकेदारों के विरुद्ध छोटे किसान और छोटे जमींदार के हित कुछ परिस्थितियों में मिल सकते थे।
मदारी ने इसी साझा असंतोष को इस्तेमाल किया।
क्या इससे आंदोलन का जातिगत आधार भी व्यापक हुआ?
हां, लेकिन प्रमाणों की सीमा को ध्यान में रखते हुए।
एका का नेतृत्व निम्न जातीय किसानों से अधिक स्पष्ट रूप से जुड़ा था। मदारी पासी स्वयं इसका प्रतीक थे।
मानक इतिहास भी ‘Madari Pasi and other low-caste leaders’ की भूमिका विशेष रूप से दर्ज करता है।
लेकिन आंदोलन को केवल पासी आंदोलन कहना गलत होगा।
उसमें अन्य कृषक जातियां और छोटे भू-स्वामी भी थे। अर्थात—
पासी नेतृत्व महत्वपूर्ण था, लेकिन आंदोलन बहुजातीय किसान गठबंधन था।
पासी समुदाय के लिए मदारी का नेतृत्व क्यों महत्वपूर्ण था?
सामाजिक दृष्टि से यह अत्यंत महत्वपूर्ण परिवर्तन था।
सदियों से स्थानीय प्रभुत्व की संरचना में नीचे रखे गए समुदाय का व्यक्ति अब बड़े तालुकेदारों के सामने हजारों किसानों का नेता बन रहा था।
इसका प्रतीकात्मक अर्थ आर्थिक मांगों से भी आगे जाता है। किसान आंदोलन कह रहा था—
राजनीतिक नेतृत्व केवल ऊंची जाति, जमींदार अथवा शिक्षित शहरवासी का अधिकार नहीं है।
गांव का वंचित किसान भी नेता हो सकता है।
यही कारण है कि मदारी पासी की स्मृति बाद के दलित और किसान इतिहास में विशेष महत्व ग्रहण करती है।
लेकिन क्या मदारी जाति की राजनीति कर रहे थे?
उपलब्ध प्रमाण ऐसा निष्कर्ष निकालने की अनुमति नहीं देते कि मदारी पासी आधुनिक अर्थ में किसी संगठित ‘पासी राजनीति’ अथवा ‘दलित राजनीतिक कार्यक्रम’ के नेता थे।
उनका आंदोलन मुख्यतः कृषि प्रश्नों पर केंद्रित था— लगान; बेदखली; बेगार; ठेकेदार; भूमि अधिकार; और औपनिवेशिक सत्ता।
इसलिए उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि और आधुनिक पहचान-राजनीति को सीधे एक मान लेना अनुचित होगा।
अधिक ऐतिहासिक रूप से सटीक बात यह होगी—
एक निम्न जातीय नेता ने वर्गीय और कृषि प्रश्नों पर व्यापक किसान गठबंधन बनाया।
मदारी पासी और कांग्रेस का संबंध
एका के शुरुआती चरण में कांग्रेस और खिलाफत कार्यकर्ताओं का योगदान था।
इसलिए मदारी का कांग्रेस से कोई पूर्ण प्रारंभिक विच्छेद नहीं था।
लेकिन जैसे-जैसे वे प्रभावशाली हुए, आंदोलन स्थानीय किसान हितों के अनुसार चलने लगा। कांग्रेस की प्राथमिकता थी— अहिंसा; अनुशासन; राष्ट्रीय असहयोग। मदारी की प्राथमिकता थी— ग्रामीण अन्याय का तत्काल प्रतिरोध। यह अंतर धीरे-धीरे संबंध तोड़ने लगा।
मानक राष्ट्रीय आंदोलन इतिहास के अनुसार स्थानीय एका नेतृत्व गांधीवादी अहिंसा के अनुशासन को पूरी तरह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था और इसी कारण आंदोलन का राष्ट्रवादी नेतृत्व से संपर्क कम होता गया।
क्या मदारी पासी ‘हिंसा के समर्थक’ थे?
लोकप्रिय इतिहास में उन्हें अक्सर सीधे ‘हिंसक नेता’ कहा जाता है।
भारत सरकार के एक विवरण में भी कहा गया है कि उन्होंने सामाजिक न्याय और भूमि अधिकारों के प्रश्न पर हिंसक तरीकों का समर्थन किया।
लेकिन यहां दो स्तर अलग करने होंगे। पहला—
क्या उनके नेतृत्व में आंदोलन के कुछ हिस्सों ने हिंसा, धमकी अथवा संपत्ति पर हमले किए? हां, स्रोत इसका संकेत देते हैं। दूसरा—
क्या उनकी पूरी राजनीतिक विचारधारा केवल हिंसा पर आधारित थी?
इस निष्कर्ष के लिए उपलब्ध प्रमाण अपर्याप्त हैं।
उनकी राजनीति में शपथ, पंचायत, सामूहिक लगान प्रतिरोध और बहिष्कार जैसे अहिंसक साधन भी महत्वपूर्ण थे।
मदारी और ‘भूमि अधिकार’ का प्रश्न
भारत सरकार का मदारी पासी संबंधी विवरण एक महत्वपूर्ण दावा करता है—
वे किरायेदारों को भूमि अधिकार देने अथवा भूमि अधिकारों के पुनर्वितरण की अधिक उग्र दिशा का समर्थन कर रहे थे।
यदि इसे अन्य प्राथमिक स्रोतों से पुष्ट किया जाए तो यह आंदोलन के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण चरण होगा। क्योंकि शुरुआती एका प्रतिज्ञा कहती थी— दर्ज लगान देंगे।
भूमि अधिकार पुनर्वितरण का विचार उससे आगे जाता है। वह पूछता है—
जमीन का वास्तविक अधिकार किसका होना चाहिए?
इसी बिंदु पर आर्थिक सुधार भूमि-संबंधों के पुनर्गठन की दिशा ले सकता था।
लेकिन इस दावे के साथ स्रोतगत सावधानी जरूरी है
मदारी पासी द्वारा व्यापक रूप से भूमि का ‘पुनर्वितरण’ करने के लोकप्रिय दावे बाद के स्रोतों में मिलते हैं।
लेकिन इनका समकालीन अभिलेखीय आधार हर स्थान पर स्पष्ट नहीं है।
इसलिए शोध-खंड में अधिक सुरक्षित भाषा यह होगी—
कुछ बाद के स्रोत मदारी पासी के नेतृत्व को किरायेदारों के भूमि-अधिकार को अधिक व्यापक रूप देने और जमींदारी अधिकार को सीधे चुनौती देने से जोड़ते हैं।
इसे सर्वमान्य तथ्य की तरह नहीं लिखना चाहिए जब तक संबंधित जिला अभिलेख और पुलिस रिपोर्ट उसका विशिष्ट प्रमाण न दें।
मदारी पासी की वेशभूषा और छवि
कुछ बाद के शोधों में मदारी पासी को— गांधी टोपी पहने; धनुष-बाण रखने वाले; और उग्र ग्रामीण नेता—
के रूप में चित्रित किया गया है।
2024 के एक शोध लेख में भी उनकी ऐसी छवि प्रस्तुत की गई है तथा उनके जीवन के बाद के चरण को हरदोई के जंगलों और क्रांतिकारी गतिविधियों से जोड़ने का प्रयास किया गया है।
लेकिन यह सामग्री एका आंदोलन के दशकों बाद संकलित स्रोतों पर आधारित है। इसे उपयोगी नवीन शोध मानना चाहिए— निर्विवाद अंतिम जीवनी नहीं।
स्वराज की मदारी-परिभाषा क्या थी?
हमारे पास मदारी पासी का लंबा राजनीतिक घोषणापत्र उपलब्ध नहीं है।
इसलिए उनके ‘स्वराज’ की पूरी वैचारिक परिभाषा बनाना जोखिमपूर्ण होगा।
लेकिन आंदोलन के व्यवहार से कुछ बातें समझी जा सकती हैं। स्वराज का ग्रामीण अर्थ था— जमींदारी मनमानी से मुक्ति;
दर्ज लगान से अधिक वसूली का अंत; बेगार का अंत; बेदखली से सुरक्षा; स्थानीय पंचायत का सम्मान; और किसान की सामाजिक प्रतिष्ठा।
इसलिए एका का स्वराज राष्ट्रीय संसद से पहले गांव की सत्ता-संरचना का प्रश्न था।
क्या मदारी पासी ब्रिटिश-विरोधी थे?
एका का तत्काल संघर्ष जमींदारों और ठेकेदारों के साथ था।
लेकिन आंदोलन औपनिवेशिक व्यवस्था के भीतर ही चलता था।
भूमि-अधिकार की रक्षा ब्रिटिश कानून करता था।
पुलिस जमींदार की संपत्ति की रक्षा करती थी।
प्रशासन किसान पंचायत को चुनौती मानता था।
इसलिए स्थानीय संघर्ष धीरे-धीरे औपनिवेशिक सत्ता से सीधा टकराव बन गया।
भारत सरकार का विवरण भी मदारी के आंदोलन को किसानों और औपनिवेशिक शासन के बीच व्यापक प्रतिरोध से जोड़ता है।
क्या मदारी पासी ‘करिश्माई’ नेता थे?
उपलब्ध विवरण उनके व्यापक ग्रामीण प्रभाव की ओर संकेत करते हैं। किसान सभाओं में बड़ी भागीदारी;
उनके नाम का प्रशासनिक रिपोर्टों में बार-बार आना; कांग्रेस की चिंता; जमींदारों का भय; और पुलिस दमन—
ये सब बताते हैं कि उनका प्रभाव सामान्य स्थानीय कार्यकर्ता से कहीं अधिक था।
सरकारी विवरण भी उन्हें ‘popular peasant leader’ के रूप में वर्णित करता है।
लेकिन ‘करिश्मा’ को केवल व्यक्तित्व नहीं समझना चाहिए।
वह सामाजिक परिस्थिति से पैदा होता है।
मदारी इसलिए प्रभावशाली बने क्योंकि वे उस भाषा में बोल रहे थे जिसे किसान अपनी जिंदगी से जोड़ सकता था।
मदारी के नेतृत्व की सबसे बड़ी विशेषता : मध्यस्थ नहीं, सहभागी
कांग्रेस नेता किसान के बीच जाता था— लेकिन अंततः शहर लौटता था। जमींदार किसान से बात करता था— लेकिन सत्ता की ऊंची स्थिति से।
मदारी पासी स्वयं उसी ग्रामीण सामाजिक संरचना का हिस्सा थे। यही उन्हें अलग बनाता था।
किसान उन्हें ‘हमारे बीच का आदमी’ समझ सकता था।
यह पहचान राजनीतिक विश्वास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
एका पंचायत और मदारी की सत्ता
जैसे-जैसे आंदोलन मजबूत हुआ, स्थानीय एका पंचायतों का महत्व बढ़ा।
कुछ औपनिवेशिक रिपोर्टों में यहां तक चिंता व्यक्त की गई कि किसान पंचायतें सरकारी प्रशासन के समानांतर अधिकार जताने लगी थीं।
एक समकालीन ब्रिटिश प्रेस रिपोर्ट का बाद में उद्धृत विवरण बताता है कि कुछ गांवों में एका से जुड़े लोगों ने पंचायतों और प्रतीकात्मक प्रशासनिक पदों तक की व्यवस्था बनाई थी। यह विवरण औपनिवेशिक चिंता की मानसिकता को दिखाता है; इसे पूरे आंदोलन की सार्वभौमिक संरचना नहीं माना जाना चाहिए।
फिर भी इससे यह स्पष्ट होता है कि पंचायत केवल सामाजिक बैठक नहीं रही थी।
वह सत्ता का प्रश्न बन रही थी।
एका आंदोलन का औपचारिक उदय : पहली सभाएं, धार्मिक शपथ, पंचायत और संगठन की संरचना
प्रमुख तथ्य
1921 के अंतिम महीनों तक अवध के किसान आंदोलन में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन हो चुका था। किसान सभा की पहली लहर दबा दी गई थी, बाबा रामचंद्र का प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा था और कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व स्वतंत्र जमींदार-विरोधी किसान संघर्ष को अपने नियंत्रण में रखने के प्रति अत्यंत सावधान था। इसके बावजूद गांवों में किसान असंतोष समाप्त नहीं हुआ। उत्तरी अवध—विशेषकर हरदोई, सीतापुर, बहराइच, लखनऊ और बाद में बाराबंकी तथा खीरी—में किसान फिर संगठित होने लगे।
लेकिन इस बार संगठन का तरीका अलग था।
किसी बड़े अधिवेशन में संविधान पारित नहीं हुआ।
कोई प्रांतीय मुख्यालय बनाकर हजारों सदस्य नहीं जोड़े गए।
किसी एक नेता ने किसी एक तारीख को पूरे प्रदेश के लिए आंदोलन घोषित नहीं किया। इसके बजाय गांव में सभा हुई। जमीन में गड्ढा खोदा गया। उसमें पानी भरा गया।
उसे पवित्र गंगा का प्रतीक बनाया गया। एक पंडित ने प्रार्थना पढ़ी। किसान एकत्र हुए। सामूहिक शपथ ली गई। पंचायत बनाई गई। और गांव ने घोषणा की— हम एक हैं।
ज्ञानेंद्र पांडे के विस्तृत अध्ययन में 1921 की पहली किसान लहर के बाद उत्तरी अवध में उभरे इस आंदोलन को पुराने किसान सभा संघर्ष का परिवर्तित पुनरुत्थान बताया गया है। उसके आरंभिक संगठन में मालिहाबाद के कुछ कांग्रेस और खिलाफत कार्यकर्ताओं ने सहायता की, लेकिन एका संघ तेजी से उनके नियंत्रण से बाहर निकल गए और अपना स्वतंत्र ग्रामीण स्वरूप ग्रहण करने लगे।
क्या वास्तव में गंगा का पानी ही लाया जाता था?
यहां एक सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण स्रोतगत अंतर है। लोकप्रिय विवरण अक्सर कहते हैं कि—
‘गंगा जल से गड्ढा भरा जाता था।’
लेकिन ज्ञानेंद्र पांडे द्वारा उद्धृत मूल विवरण अधिक सावधानीपूर्वक है—
गड्ढा पानी से भरा जाता था और वह पवित्र गंगा का प्रतिनिधित्व करता था।
अर्थात यह आवश्यक नहीं कि हर सभा में वास्तविक गंगाजल ही दूर से लाया गया हो। संभवतः अधिक महत्वपूर्ण था— पानी को गंगा का प्रतीक मानना।
वेबसाइट के शोध संस्करण में इसी भाषा का प्रयोग अधिक प्रमाणसम्मत होगा।
एका शपथ के 11 प्रमुख निर्देश
ज्ञानेंद्र पांडे द्वारा पुनर्निर्मित अधिक विस्तृत सूची के अनुसार किसानों ने स्वयं को निम्न बातों के लिए बांधा—
सहमत समय पर नियमित लगान देंगे।
अर्थात आंदोलन प्रारंभ में पूर्ण लगान-बंदी नहीं था।
गांव के अपराधियों की सहायता नहीं करेंगे।
आंदोलन और सामान्य अपराध के बीच सीमा स्थापित करने का प्रयास।
जमींदार के उत्पीड़न का विरोध करेंगे।
यह केवल एक विशेष कर का विरोध नहीं, व्यापक प्रतिरोध की प्रतिज्ञा थी।
शपथ का पहला सिद्धांत : लगान देंगे—पर कितना?
एका को ‘No Rent Movement’ कहना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा।
उसके प्रारंभिक कार्यक्रम में स्पष्ट रूप से कहा गया—
केवल दर्ज लगान देंगे, और उसे समय पर देंगे। यह घोषणा दो संदेश देती थी। पहला जमींदार को—
हम वैध दायित्व से भाग नहीं रहे। दूसरा किसान को—
तुम्हें अकेले मनमानी मांग स्वीकार करने की जरूरत नहीं।
इसी कारण एका की प्रारंभिक राजनीति को वैधता के भीतर प्रतिरोध कहा जा सकता है।
किसान औपनिवेशिक अभिलेख को ही जमींदार के विरुद्ध हथियार बना रहा था।
‘रसीद’ क्यों इतनी महत्वपूर्ण थी?
आज लगान की रसीद मामूली प्रशासनिक बात लग सकती है।
लेकिन उस समय इसका बहुत बड़ा महत्व था।
यदि किसान पैसा देता है और रसीद नहीं मिलती—
तो बाद में फिर दावा हो सकता है कि भुगतान नहीं हुआ। रसीद— भुगतान का प्रमाण; किरायेदारी का प्रमाण; और भविष्य के विवाद में सुरक्षा— तीनों हो सकती थी।
इसीलिए एका की विस्तृत शपथ में स्पष्ट रूप से कहा गया कि किसान रसीद के बिना लगान नहीं देगा।
यह दिखाता है कि किसान आंदोलन केवल भावनात्मक विद्रोह नहीं था।
उसमें प्रशासनिक अनुभव से निकली अत्यंत व्यावहारिक मांगें थीं।
‘दर्ज लगान’ स्वयं राजनीतिक हथियार बन गया
औपनिवेशिक भूमि व्यवस्था ने लगान और किरायेदारी के अभिलेख बनाए थे।
आम तौर पर यह रिकॉर्ड व्यवस्था सरकार और जमींदार की शक्ति बढ़ाती थी।
लेकिन एका किसान ने उसी दस्तावेज को उलटकर कहा—
यदि सरकारी रिकॉर्ड में इतना लगान है, तो मुझसे उससे अधिक क्यों लिया जाए?
इस प्रकार औपनिवेशिक रिकॉर्ड स्वयं किसान प्रतिरोध का प्रमाण बन गया।
यह एका की राजनीति का अत्यंत दिलचस्प पक्ष था—
किसान व्यवस्था को पूरी तरह नकारे बिना उसकी अपनी लिखित शर्तों का पालन मांग रहा था।
‘हरि’ और ‘भूसा’ का विरोध
लोकप्रिय एका इतिहास में यह हिस्सा प्रायः गायब रहता है।
ज्ञानेंद्र पांडे की विस्तृत सूची में किसानों ने हरि और भूसा जैसे प्रचलित उपकरों को देने से भी इनकार किया।
यही दिखाता है कि संघर्ष केवल ‘50 प्रतिशत अधिक किराए’ का नहीं था। किसान की समस्या थी— मुख्य लगान के ऊपर छोटे-छोटे दावे। भूसा; श्रम; रसद; चराई; पानी; और दूसरी सेवाएं।
प्रत्येक मांग अकेले छोटी लग सकती थी।
लेकिन सभी मिलकर किसान पर बड़ी आर्थिक और सामाजिक निर्भरता बनाती थीं।
पंचायत : एका की वास्तविक संगठनात्मक रीढ़
यदि शपथ एका की आत्मा थी तो— पंचायत उसका संगठनात्मक शरीर थी।
शपथ लेने के बाद पंचायत गठित की जाती थी और किसानों को निर्देश था कि अपने विवाद उसी के सामने लाएं तथा उसका निर्णय स्वीकार करें। इससे तीन चीजें संभव होती थीं—
पहली, गांव में संगठन का स्थायी केंद्र बनता।
दूसरी, किसान आपसी विवाद के कारण टूटने से बचते।
तीसरी, औपनिवेशिक अदालत और जमींदार की मध्यस्थता पर निर्भरता घट सकती थी।
यहीं पंचायत साधारण ग्राम संस्था से राजनीतिक संस्था में बदलती है।
पंचायत किन मामलों पर फैसला कर सकती थी?
स्रोत हमें प्रत्येक गांव की पंचायत की कार्यवाही पुस्तिका नहीं देते।
इसलिए कोई सर्वमान्य अधिकार-सूची बनाना संभव नहीं है।
लेकिन आंदोलन की प्रतिज्ञाओं और व्यवहार से अनुमान लगाया जा सकता है कि पंचायतों का संबंध ऐसे प्रश्नों से था— किसान-जमींदार विवाद; लगान भुगतान; बेदखली; संगठन तोड़ने वाले किसान; आपसी झगड़े; और आंदोलन संबंधी अनुशासन।
यह भी संभव है कि अलग-अलग गांवों में पंचायत की शक्ति अलग रही हो। कहीं वह केवल मध्यस्थता संस्था थी।
कहीं उसने अधिक मजबूत सामाजिक अनुशासन लागू किया होगा।
इसीलिए इसे हर जगह ‘समानांतर सरकार’ कहना अतिशयोक्ति होगी।
फिर भी पंचायत औपनिवेशिक शासन के लिए खतरनाक क्यों थी?
औपनिवेशिक शासन केवल कर और पुलिस पर आधारित नहीं होता।
उसकी वैधता इस बात पर भी निर्भर होती है कि— विवाद कौन सुलझाता है? कानून किसका माना जाता है? अंतिम आदेश कौन देता है? यदि पूरा गांव कहने लगे—
हम अपने विवाद अपनी पंचायत में ले जाएंगे
तो स्थानीय स्तर पर सत्ता का दूसरा स्रोत पैदा होता है।
इसीलिए एका पंचायत की राजनीतिक शक्ति उसकी औपचारिक कानूनी स्थिति में नहीं— लोगों की आज्ञाकारिता में थी।
यदि किसान सरकारी अधिकारी से अधिक पंचायत का फैसला मानता है, तो सत्ता-संतुलन बदल रहा है।
क्या पंचायत लोकतांत्रिक संस्था थी?
इसे आधुनिक निर्वाचित ग्राम पंचायत के समान मानना उचित नहीं होगा।
हमारे पास ऐसे व्यापक प्रमाण नहीं हैं कि— हर सदस्य का एक मत था;
पदाधिकारी नियमित चुनाव से चुने जाते थे; लिखित संविधान था;
या महिलाओं और सभी जातियों को समान प्रतिनिधित्व मिलता था।
इसलिए ‘लोकतांत्रिक’ शब्द सावधानी से इस्तेमाल करना चाहिए।
लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि—
पंचायत ने ग्रामीण निर्णय-प्रक्रिया में किसान समुदाय की सामूहिक भागीदारी बढ़ाई।
औपनिवेशिक तथा जमींदारी एकतरफा आदेश की तुलना में यह बहुत बड़ा परिवर्तन था।
क्या सदस्यता शुल्क लिया जाता था?
ज्ञानेंद्र पांडे के अध्ययन में शपथ समारोह में प्रति व्यक्ति चार आने या उससे अधिक धन एकत्र किए जाने का उल्लेख है और उस राशि का एक हिस्सा पंडित की सेवा के भुगतान में दिया जाता था।
कुछ बाद के अध्ययनों में अलग और छोटी राशियों का उल्लेख भी मिलता है। उदाहरणतः एक अध्ययन कथा अथवा संगठन के लिए दो पैसे जैसी राशि का दावा करता है। यहां सावधानी आवश्यक है।
चार आने को स्वचालित रूप से ‘एका का सार्वभौमिक सदस्यता शुल्क’ कहना उचित नहीं होगा। अधिक सुरक्षित निष्कर्ष है—
सभा और धार्मिक आयोजन के अवसर पर कुछ स्थानों पर सहभागी किसानों से सामूहिक धन-संग्रह किया जाता था; उपलब्ध स्रोतों में राशि एक समान नहीं है।
यह स्थानीय विविधता का प्रमाण भी हो सकता है।
हरदोई का सण्डीला कैसे प्रमुख केंद्र बना?
जनवरी 1922 के अंत तक सण्डीला तहसील, हरदोई एका का अत्यंत मजबूत केंद्र बन चुकी थी। ज्ञानेंद्र पांडे बताते हैं कि वहां जमींदार आंदोलन से गंभीर रूप से चिंतित थे। फरवरी तक मदारी पासी का प्रभाव इतना बढ़ गया कि जब किशन लाल नेहरू ने अतरौली जाकर कांग्रेस का प्रभाव पुनर्स्थापित करने की कोशिश की तो उन्हें मदारी प्रभावी नियंत्रण में दिखाई दिए।
इसके बाद मदारी ने मालिहाबाद से संबंध तोड़ते हुए आंदोलन का केंद्र सण्डीला की ओर स्थानांतरित किया। यह परिवर्तन केवल भौगोलिक नहीं था। यह संकेत था—
एका अब अपने प्रारंभिक कांग्रेस–खिलाफत संरक्षकों से स्वतंत्र हो रहा था।
छोटे जमींदारों को कैसे जोड़ा गया?
एका की संगठनात्मक संरचना की विशिष्टता थी कि उसमें कुछ छोटे जमींदार भी शामिल हो सके।
पांडे के अनुसार मदारी ने सण्डीला में केंद्र स्थानांतरित करते समय स्थानीय मतभेद ‘समायोजित’ किए और छोटे जमींदारों को एका में आने के लिए प्रेरित किया। बाद के सप्ताहों में पर्याप्त संख्या में छोटे जमींदार आंदोलन से जुड़े। इसका संगठनात्मक अर्थ महत्वपूर्ण था।
एका की शपथ को केवल ‘काश्तकार बनाम हर प्रकार के जमींदार’ की भाषा में नहीं रखा गया। उसका तत्काल विरोध मुख्यतः— अत्यधिक वसूली; बड़े तालुकेदार; ठेकेदार; और औपनिवेशिक राजस्व दबाव— से जुड़ सकता था।
इस लचीलेपन ने उसका सामाजिक आधार बढ़ाया।
शपथ सामाजिक अनुबंध कैसे बनी?
एका में शपथ केवल मांग-पत्र नहीं थी।
वह किसान और संगठन के बीच पारस्परिक अनुबंध थी। किसान कह रहा था— मैं अधिक लगान नहीं दूंगा।
लेकिन इसके बदले मुझे भरोसा चाहिए कि दूसरा किसान भी अधिक नहीं देगा। मैं खेत नहीं छोड़ूंगा।
लेकिन दूसरा किसान मेरी बेदखली का लाभ नहीं उठाएगा। मैं बेगार नहीं करूंगा। लेकिन पूरा गांव साथ देगा। मैं पंचायत मानूंगा।
और पंचायत भी दूसरे किसान के मामले में यही नियम लागू करेगी।
इसलिए शपथ ने व्यक्तिगत आर्थिक निर्णय को सामूहिक नियम बनाया।
क्या शपथ स्वेच्छा से ली जाती थी?
औपनिवेशिक अधिकारियों का दावा था कि कुछ गांवों में किसानों को— गाली; धमकी; और सामाजिक बहिष्कार—
के जरिए सभा में लाया जाता था। पांडे इस औपनिवेशिक दावे को स्पष्ट रूप से दर्ज करते हैं।
लेकिन इसे तत्काल प्रमाणित सार्वभौमिक तथ्य मान लेना उचित नहीं होगा।
सरकार किसी भी मजबूत सामूहिक अनुशासन को ‘intimidation’ कह सकती थी।
दूसरी ओर यह मान लेना भी उचित नहीं कि विशाल ग्रामीण आंदोलन में किसी प्रकार का दबाव कभी हुआ ही नहीं। संतुलित निष्कर्ष होगा—
कई किसानों ने वास्तविक कृषि शिकायतों के कारण स्वेच्छा से एका अपनाया; साथ ही कुछ स्थानों पर संगठनात्मक अनुशासन लागू करने के लिए सामाजिक दबाव अथवा धमकी के प्रयोग की प्रशासनिक शिकायतें भी दर्ज हुईं।
सामाजिक बहिष्कार की शक्ति
ग्रामीण समाज में पुलिस से पहले समाज दंड दे सकता था। नाई सेवा बंद। धोबी सेवा बंद। रिश्तेदारी व्यवहार टूटे। सामाजिक प्रतिष्ठा समाप्त। स्थानीय बाजार और श्रम सहयोग प्रभावित।
इसलिए सामाजिक बहिष्कार अत्यंत शक्तिशाली राजनीतिक हथियार था।
पुरानी किसान सभा में इसका उपयोग पहले ही हो चुका था।
एका ने सामूहिक शपथ के माध्यम से उसी सामाजिक नियंत्रण को नई शक्ति दी।
यही कारण है कि कांग्रेस इस पद्धति को लेकर असहज थी—
उसकी दृष्टि में यह स्वैच्छिक अहिंसक असहयोग और जबरदस्ती के बीच की रेखा पार कर सकता था।
एका की आर्थिक मांगें : दर्ज लगान, अनाज-लगान, नजराना, बेगार, बेदखली और साझा संसाधनों पर किसान अधिकार
प्रमुख तथ्य
एका आंदोलन की राजनीतिक शक्ति उसकी एकता में थी, लेकिन उसकी जड़ें ठोस आर्थिक शिकायतों में थीं। यदि यह स्पष्ट न किया जाए कि किसान वास्तव में किस आर्थिक व्यवस्था का विरोध कर रहे थे, तो ‘एका’ केवल एक अस्पष्ट जमींदार-विरोधी आंदोलन बनकर रह जाएगा।
वास्तव में आंदोलन की मांगें अत्यंत व्यावहारिक थीं। किसान पूछ रहा था—
सरकारी और जमींदारी अभिलेख में मेरा लगान जितना लिखा है, उससे अधिक क्यों लिया जा रहा है?
लगान नकद तय है या मेरी पूरी उपज का हिस्सा जमींदार और ठेकेदार अपनी इच्छा के अनुसार ले सकते हैं?
हर बार पट्टा अथवा किरायेदारी के नवीनीकरण पर नजराना क्यों?
जमींदार के लिए मेरा श्रम मुफ्त क्यों?
मुझे खेत से मनमाने ढंग से निकालने का अधिकार किसे है?
ज्ञानेंद्र पांडे ने इस आंदोलन को उत्तरी अवध के उन क्षेत्रों में विशेष रूप से मजबूत बताया है जहां grain rents—अनाज-लगान और disguised rents—छिपी अथवा अतिरिक्त वसूली अधिक प्रचलित थीं। एका संगठनों ने अनाज में लगान को नकद लगान में बदलने और दर्ज लगान से अधिक किसी भी मांग का प्रतिरोध करने का कार्यक्रम अपनाया।
‘दर्ज लगान’ वास्तव में क्या था?
औपनिवेशिक भूमि व्यवस्था में किरायेदारी और लगान संबंधी अभिलेख रखे जाते थे।
किस किसान के पास कौन-सी जमीन है; कितना क्षेत्र है; किस श्रेणी की किरायेदारी है;
और उस पर कितना किराया या लगान निर्धारित है—
इनका रिकॉर्ड भूमि प्रशासन में मौजूद हो सकता था।
यही ‘recorded rent’ किसान के लिए महत्वपूर्ण था।
यदि अभिलेख में दस रुपये लगान दर्ज है और व्यवहार में जमींदार, ठेकेदार या कारिंदा पंद्रह रुपये मांग रहा है, तो किसान उसे अतिरिक्त और अन्यायपूर्ण मान सकता था।
एका ने इसी अंतर को आंदोलन का प्रश्न बनाया।
इसलिए औपनिवेशिक अभिलेख, जो सामान्यतः राज्य और भू-स्वामी की शक्ति का साधन थे, यहां किसान के हाथ में प्रतिरोध का प्रमाण बन गए।
ठेकेदार — किसान और तालुकेदार के बीच सबसे विवादास्पद मध्यस्थ
एका क्षेत्रों में ठेकेदार अथवा thekedar की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण थी।
बड़े तालुकेदार कई बार किसी क्षेत्र में लगान वसूली का अधिकार किसी ठेकेदार को दे देते थे।
ठेकेदार तालुकेदार को निश्चित रकम देने के लिए बाध्य हो सकता था।
उसका अपना लाभ इस बात पर निर्भर था कि वह किसानों से कितना वसूल करता है। इससे स्वाभाविक प्रोत्साहन पैदा होता था— जितनी अधिक वसूली, उतना अधिक लाभ।
बिपन चंद्र के अध्ययन और सरकारी हरदोई विवरण दोनों एका की मुख्य शिकायतों में ठेकेदारों के उत्पीड़न को स्पष्ट रूप से रखते हैं।
ठेकेदार किसान के लिए तालुकेदार से भी अधिक कठोर क्यों लग सकता था?
तालुकेदार का संबंध किसी क्षेत्र से पीढ़ियों पुराना हो सकता था।
उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा, राजनीतिक भूमिका और स्थानीय संबंध थे।
ठेकेदार का हित अधिक प्रत्यक्ष आर्थिक था।
यदि उसने किसी इलाके की लगान-वसूली का ठेका लिया है तो उसके पास सीमित समय में अधिकतम वसूली का दबाव हो सकता था।
यही कारण है कि किसान शिकायत में अक्सर बड़ा तालुकेदार दूर दिखाई देता है—
और तत्काल शोषक के रूप में सामने आता है— ठेकेदार या उसका कारिंदा।
एका के हिंसक प्रसंगों में भी ठेकेदार कई बार सीधा लक्ष्य बने।
अनाज-लगान क्या था?
अनाज-लगान में किसान नकद रकम देने के बजाय अपनी उपज का निश्चित अथवा निर्धारित हिस्सा देता था।
सिद्धांततः यह व्यवस्था किसान और भू-स्वामी के बीच जोखिम साझा करने जैसी दिखाई दे सकती है। उपज अधिक— भू-स्वामी को अधिक। उपज कम— भू-स्वामी को कम। लेकिन व्यवहार में विवाद कई थे। उपज कौन नापेगा? कितना हिस्सा लिया जाएगा? अनाज किस गुणवत्ता का माना जाएगा? किस समय उसका मूल्य तय होगा?
और क्या जमींदार या ठेकेदार पारंपरिक हिस्से से अधिक ले रहा है?
यहीं share-rent अर्थात हिस्सेदारी लगान किसान संघर्ष का प्रश्न बन गया।
नकद लगान किसान को क्यों आकर्षक लगा?
यदि लगान एक निश्चित नकद रकम है—
तो बाजार में अनाज का मूल्य बढ़ने पर बढ़ी कीमत का कुछ लाभ किसान के पास रह सकता है। उदाहरण—
मान लें किसान को 10 रुपये नकद लगान देना है। अनाज की कीमत बढ़ी।
अब वही अनाज अधिक रुपये में बिकता है।
किसान 10 रुपये देकर शेष मूल्य अपने पास रख सकता है।
लेकिन यदि जमींदार उपज का निश्चित हिस्सा लेता है—
तो कीमत बढ़ने का लाभ उसी अनुपात में भू-स्वामी के पास भी चला जाता है।
इसीलिए उत्तरी अवध में grain rent से cash rent में commutation—अनाज-लगान को नकद लगान में बदलना महत्वपूर्ण किसान मांग बनी।
‘Disguised rents’ — छिपा हुआ लगान
ज्ञानेंद्र पांडे उत्तरी अवध में केवल grain rent नहीं, बल्कि disguised rents की भी बात करते हैं। इस शब्द का अर्थ था—
ऐसी वसूली जो औपचारिक रूप से मुख्य लगान न कहलाए, लेकिन वास्तविकता में किसान पर भूमि रखने की कीमत के रूप में थोपी जाए।
इन्हीं में विभिन्न स्थानीय उपकर, अनिवार्य सामान, श्रम और दूसरे भुगतान शामिल हो सकते थे।
यह प्रणाली भू-स्वामी के लिए उपयोगी थी क्योंकि आधिकारिक लगान दर एक हो सकती थी—
लेकिन किसान की वास्तविक देनदारी कहीं अधिक।
नजराना क्या था?
नजराना किरायेदारी अथवा भूमि संबंध के विभिन्न अवसरों पर जमींदार को दिया जाने वाला अतिरिक्त भुगतान हो सकता था। विशेष रूप से— नया पट्टा; किरायेदारी का नवीनीकरण; उत्तराधिकार की मान्यता; या भूमि पर अधिकार की पुष्टि—
जैसे अवसरों पर ऐसी मांग सामने आ सकती थी।
किसान के लिए यह समस्या इसलिए गंभीर थी क्योंकि वह नियमित लगान से अलग अतिरिक्त नकद भुगतान था।
बहऱाइच संबंधी भारत सरकार के विवरण में किसानों द्वारा अधिक लगान के साथ renewal fees called nazrana—नवीनीकरण शुल्क के रूप में नजराना न देने का उल्लेख स्पष्ट रूप से है।
नजराना और बेदखली आपस में जुड़े थे
दोनों समस्याओं को अलग-अलग देखना गलत होगा। जमींदार कह सकता था— नया नजराना दो। किसान मना करे। तो किरायेदारी पर संकट। अर्थात—
नजराना मांग के पीछे बेदखली का मौन खतरा हो सकता था।
इसीलिए किसान आंदोलन में नजराना और बेदखली दोनों लगातार साथ दिखाई देते हैं।
एका ने बेगार के बारे में क्या कहा?
एका की शपथ के मानक सार में साफ था—
किसान forced labour—जबर्दस्ती का श्रम नहीं करेंगे।
भारत सरकार के हरदोई और बहराइच विवरण दोनों इस मांग की पुष्टि करते हैं।
ज्ञानेंद्र पांडे का अधिक विस्तृत पुनर्निर्माण इसे और स्पष्ट करता है—
किसान बिना पारिश्रमिक जमींदार के लिए बेगार नहीं करेंगे।
अर्थात किसान श्रम संबंध को समाप्त नहीं कर रहा था।
वह मुफ्त श्रम को समाप्त करना चाहता था।
बेगार का सामाजिक अर्थ इससे भी बड़ा था
बेगार में आर्थिक नुकसान के साथ सम्मान का प्रश्न जुड़ा था। आदेश देने वाला कौन? आदेश मानने वाला कौन?
जमींदार के यहां बिना पारिश्रमिक काम करना उसकी सामाजिक श्रेष्ठता और किसान की अधीनता को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित कर सकता था। इसलिए जब किसान कहता है— “बेगार नहीं करेंगे”
तो वह केवल मजदूरी नहीं मांग रहा। वह कह रहा है— मेरा श्रम मेरा है।
यह ग्रामीण सामाजिक संबंधों में बहुत बड़ा परिवर्तन था।
एका की शपथ बेदखली पर कितनी आगे गई?
बेदखल किसान की जमीन दूसरा किसान न ले। एका ने इससे आगे कहा—
अवैध रूप से बेदखल किए जाने पर किसान स्वयं खेत न छोड़े।
सरकारी हरदोई विवरण में भी किसान की प्रतिज्ञा के रूप में स्पष्ट है कि वे ejected होने पर भूमि नहीं छोड़ेंगे।
यह आर्थिक प्रतिरोध को सीधी संपत्ति चुनौती में बदल सकता था।
तालाब और सिंचाई जल का प्रश्न
एका की विस्तृत मांगों का शायद सबसे कम चर्चित हिस्सा है—
तालाब के पानी के उपयोग पर अलग शुल्क से इनकार।
पांडे के पुनर्निर्माण में किसान इस प्रकार के शुल्क का विरोध करते दिखाई देते हैं।
इसे केवल ‘कुछ पैसे बचाने की मांग’ समझना गलत होगा।
इसके पीछे ग्रामीण संसाधन अधिकार का बड़ा प्रश्न था।
तालाब गांव की कृषि अर्थव्यवस्था का हिस्सा था। पशु पानी पीते। सिंचाई होती। घरेलू उपयोग होता।
यदि जमींदार पूरे संसाधन पर निजी आर्थिक स्वामित्व जताता है तो सदियों पुराने सामुदायिक उपयोग अधिकार संकट में पड़ते हैं।
गांव का भूसा, पानी और चरागाह — छोटी चीजें क्यों नहीं थीं?
कृषि अर्थव्यवस्था केवल खेत में पैदा अनाज नहीं है। उसे चाहिए— पशु; चारा; पानी; ईंधन; श्रम; सामुदायिक रास्ते; और विभिन्न प्राकृतिक संसाधन।
यदि किसान को हर चीज के लिए अतिरिक्त भुगतान करना पड़े—
तो उसकी खेती की वास्तविक लागत बढ़ती जाती है।
इसलिए एका की मांगें आधुनिक अर्थशास्त्र की भाषा में किसान की total cost of cultivation—खेती की कुल लागत कम करने की कोशिश थीं।
सुधारवादी मांगों से संरचनात्मक चुनौती तक
यही एका का सबसे दिलचस्प अंतर्विरोध है। भाषा कहती है— “हम उचित लगान देंगे।” लेकिन व्यवहार कहता है—
जमींदार केवल उतना ही ले सकेगा जितना हम वैध मानते हैं; बेदखली हम स्वीकार नहीं करेंगे; मुफ्त श्रम नहीं देंगे;
पानी और चरागाह पर उसका पूरा अधिकार नहीं मानेंगे; और विवाद पंचायत तय करेगी। यदि ये सभी मांगें पूरी हों—
तो पुराने जमींदार का सामाजिक और आर्थिक प्रभुत्व बहुत कम हो जाएगा।
अर्थात आंदोलन का घोषित कार्यक्रम सुधारवादी था—
लेकिन उसका संयुक्त प्रभाव संरचनात्मक हो सकता था।
मदारी पासी और भूमि-पुनर्वितरण का दावा
कुछ बाद के सरकारी सार्वजनिक इतिहास में मदारी पासी को tenants को land-owning rights देने और भूमि अधिकार के पुनर्वितरण जैसी अधिक उग्र मांगों से जोड़ा गया है।
यह दावा महत्वपूर्ण है, लेकिन जैसा पिछले अध्याय में कहा गया—
इसे मूल एका कार्यक्रम का निर्विवाद सर्वमान्य हिस्सा नहीं माना जाना चाहिए।
प्रमुख समकालीन और मानक द्वितीयक स्रोतों में सबसे स्पष्ट मांगें हैं— दर्ज लगान; अनाज-लगान; बेदखली; बेगार; उपकर; और पंचायत।
व्यापक भूमि पुनर्वितरण के दावे के लिए और प्राथमिक अभिलेखीय पुष्टि आवश्यक है।
‘उचित लगान’ कौन तय करेगा?
एका की आर्थिक राजनीति का यह मौलिक प्रश्न था। औपनिवेशिक राज्य कहता था— रिकॉर्ड और कानून तय करेंगे। जमींदार कहता था—
भूमि का मालिक होने के नाते मेरे अधिकार हैं। किसान कहता था— रिकॉर्ड से अधिक नहीं।
लेकिन यदि रिकॉर्ड और वास्तविक पुरानी परंपरा में अंतर हो?
यदि लगान का रिकॉर्ड बदल दिया जाए? यदि किरायेदारी नई हो?
इन स्थितियों में पंचायत का महत्व बढ़ता था।
इसलिए आर्थिक संघर्ष अंततः निर्णय करने के अधिकार का संघर्ष बन गया।
पंचायत आर्थिक नियामक बन रही थी
एका पंचायत केवल झगड़े नहीं सुलझाती थी।
उसकी सामूहिक शक्ति इस बात में थी कि वह स्थानीय आर्थिक व्यवहार तय कर सकती थी— कौन कितना देगा; किस अतिरिक्त मांग का विरोध होगा; किस बेदखल किसान को सहायता मिलेगी; और कौन संगठन तोड़ रहा है।
यह ग्रामीण स्तर पर एक प्रकार का collective regulation—सामूहिक आर्थिक नियमन था।
यही जमींदार और औपनिवेशिक प्रशासन दोनों के लिए चिंता का कारण बना।
अनिश्चितता कम करना इतना महत्वपूर्ण क्यों था?
गरीब किसान के लिए केवल औसत आय महत्वपूर्ण नहीं होती। उसे यह भी जानना होता है— इस वर्ष मुझसे कितना लिया जाएगा?
यदि हर बार नई मांग आ जाए—
तो वह कृषि योजना नहीं बना सकता।
दर्ज लगान ने उसे कम से कम एक निश्चित संख्या दी। रसीद ने प्रमाण दिया। बेदखली सुरक्षा ने भविष्य दिया।
साझा संसाधन ने कृषि लागत नियंत्रित रखी।
इसलिए एका का बड़ा आर्थिक लक्ष्य था— अनिश्चितता को नियंत्रण में लाना।
बहराइच में grain rent का उन्मूलन मांगना कितना महत्वपूर्ण था?
यह केवल भुगतान-पद्धति बदलने की मांग नहीं थी।
यदि किसान नकद लगान प्राप्त कर लेता—
तो उसकी उपज पर प्रत्यक्ष नियंत्रण बढ़ता। वह तय कर सकता था— कब बेचनी है; किसे बेचनी है; किस कीमत पर।
अर्थात नकद लगान की मांग किसान को बाजार में अधिक स्वतंत्र आर्थिक एजेंट बना सकती थी।
पांडे द्वारा दर्ज बहराइच की जनवरी 1922 की गतिविधियां इसी कारण आर्थिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
एका आंदोलन का सामाजिक आधार : जातियां, काश्तकार, छोटे जमींदार, खेत मजदूर और हिन्दू-मुस्लिम भागीदारी
प्रमुख तथ्य
किसी किसान आंदोलन को केवल उसकी मांगों से नहीं समझा जा सकता। उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न है— आंदोलन में शामिल कौन था?
एका आंदोलन में ‘किसान’ कोई एकसमान सामाजिक श्रेणी नहीं था। अवध का ग्रामीण समाज भूमि, जाति, धर्म, किरायेदारी और आर्थिक हैसियत के अनेक स्तरों में बंटा हुआ था।
कोई व्यक्ति स्वयं जमीन जोतता था लेकिन कानूनी स्वामी नहीं था।
कोई छोटा जमींदार था, जिसके नीचे कुछ काश्तकार थे, लेकिन ऊपर औपनिवेशिक राजस्व मांग का दबाव था।
कोई खेत मजदूर था जिसके पास अपनी जोत नहीं थी।
किसी समुदाय के लोगों के पास अपेक्षाकृत मजबूत काश्तकारी अधिकार थे, तो दूसरे समूहों की स्थिति बहुत अधिक असुरक्षित थी।
इसी जटिल ग्रामीण समाज में ‘एका’ ने घोषणा की— एक हो जाओ।
क्या वह वास्तव में जाति, धर्म और आर्थिक हैसियत की दीवारों को पार कर सका? उपलब्ध स्रोतों का उत्तर है—
एका ने निम्न जातीय काश्तकारों, गरीब किसानों, कुछ खेत मजदूरों, मुस्लिम किसानों और यहां तक कि कुछ छोटे जमींदारों तक को एक साझा संघर्ष में जोड़ने की उल्लेखनीय क्षमता दिखाई। लेकिन यह एकता स्थायी सामाजिक समानता पर आधारित नहीं थी। वह मुख्यतः साझी कृषि शिकायतों और बड़े तालुकेदारों, ठेकेदारों तथा औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध तत्काल संघर्ष से बनी थी।
काश्तकार आंदोलन की रीढ़ क्यों थे?
फिर भी आंदोलन का मूल सामाजिक आधार काश्तकार किसान ही थे। इसका कारण स्पष्ट था। सबसे प्रत्यक्ष समस्याएं उन्हीं की थीं— अधिक लगान; अनाज-लगान; ठेकेदार; नजराना; बेदखली; बेगार; और लगान की रसीद न मिलना। काश्तकार खेत जोतता था—
लेकिन भूमि पर अंतिम अधिकार उसका नहीं था।
इसलिए जमीन से उसका वास्तविक संबंध मजबूत था— और कानूनी सुरक्षा कमजोर।
यही उसे आंदोलन की ओर धकेलता था।
एका की लगभग प्रत्येक प्रमुख मांग tenant insecurity—काश्तकारी असुरक्षा से जुड़ती थी।
क्या एका मूलतः ‘पासी आंदोलन’ था?
मदारी पासी का नेतृत्व इतना प्रभावशाली हुआ कि लोकप्रिय इतिहास में कभी-कभी एका को लगभग पासी आंदोलन की तरह प्रस्तुत कर दिया जाता है। यह सरलीकरण है।
एक शोध लेख में दावा किया गया है कि आंदोलन में बड़ी संख्या में निम्न जातीय किसान, विशेषकर पासी, शामिल थे।
लेकिन प्रमुख मानक स्रोत आंदोलन को केवल पासियों तक सीमित नहीं करते। उसमें— अन्य निम्न जातीय किसान; काश्तकार; छोटे जमींदार; हिन्दू; मुस्लिम— सभी शामिल थे। अतः अधिक सटीक निष्कर्ष है—
एका में पासी नेतृत्व अत्यंत महत्वपूर्ण था, लेकिन सामाजिक आधार बहुजातीय था।
पासी समुदाय की भूमिका क्यों विशेष थी?
अवध के अनेक हिस्सों में पासी सामाजिक और आर्थिक रूप से निम्न स्थिति में थे। वे— छोटे कृषक; काश्तकार; खेत मजदूर; और विभिन्न ग्रामीण सेवाओं— से जुड़े हो सकते थे।
भूमि पर असुरक्षा और सामाजिक अधीनता उनके लिए दोहरी समस्या थी।
इसलिए एका जैसा आंदोलन केवल आर्थिक राहत का प्रश्न नहीं बनता।
निम्न सामाजिक पृष्ठभूमि का व्यक्ति जब पंचायत का नेता बनता है और बड़े जमींदार के सामने किसानों की ओर से बोलता है—
तो वह ग्रामीण प्रतिष्ठा-संबंध भी बदल रहा होता है।
मदारी पासी का महत्व इसी कारण आर्थिक मांग से कहीं आगे जाता है।
मुराओ, अहिर और अन्य जातियों का प्रश्न
लोकप्रिय आधुनिक विवरणों में एका के सामाजिक आधार में— पासी; कुर्मी; मुराओ; अहिर— जैसी जातियों का उल्लेख मिलता है।
लेकिन इनमें से कई वेब-आधारित परीक्षा सामग्री पर निर्भर हैं और उनके पीछे विस्तृत जिला-वार प्राथमिक प्रमाण हमेशा स्पष्ट नहीं हैं।
इसलिए इस शोध में हम सावधानी बरतेंगे। यह कहना उचित है—
एका का आधार निम्न और मध्य कृषक जातियों में व्यापक था।
लेकिन ऐसा कोई विश्वसनीय सर्वमान्य जातिगत जनगणना उपलब्ध नहीं है जिससे कहा जा सके कि— अमुक प्रतिशत पासी; अमुक प्रतिशत कुर्मी; अमुक प्रतिशत अहिर— आंदोलन में थे। जातिगत संरचना जिले-दर-जिले बदल सकती थी।
‘जाति पंचायत’ से ‘एका पंचायत’ तक
अर्थात पंचायत की सामाजिक तकनीक पुरानी थी— लेकिन उसका राजनीतिक उपयोग नया।
इससे अलग-अलग जातियों के किसानों को एक साझा आर्थिक नियम के तहत लाना संभव हुआ।
इसी बिंदु पर एका का नाम सबसे अर्थपूर्ण हो जाता है—
जाति अलग हो सकती है, लेकिन लगान के प्रश्न पर एका करो।
छोटे जमींदार एका में क्यों शामिल हुए?
यह आंदोलन के सामाजिक आधार का सबसे असामान्य पहलू था।
यदि एका जमींदारों के विरुद्ध किसान आंदोलन था— तो जमींदार उसमें कैसे?
बिपन चंद्र बताते हैं कि अनेक छोटे जमींदार स्वयं सरकार की heavy land revenue demand—ऊंची भू-राजस्व मांग से असंतुष्ट थे और इसलिए एका से जुड़े।
इसका अर्थ यह है कि ‘जमींदार’ भी एक समान वर्ग नहीं था।
एक विशाल तालुकेदार और दो-चार गांवों अथवा थोड़ी भूमि वाला छोटा जमींदार आर्थिक रूप से समान नहीं थे।
छोटा जमींदार ऊपर पीड़ित और नीचे प्रभुत्वशाली—दोनों हो सकता था
सरकार उससे भारी राजस्व मांग सकती थी।
इस अर्थ में वह ऊपर से दबाव झेल रहा था। लेकिन उसके नीचे यदि काश्तकार हैं—
तो वह उनसे लगान वसूलने वाला व्यक्ति भी है। अर्थात एक ही व्यक्ति—
राज्य के सामने अधीन; काश्तकार के सामने प्रभुत्वशाली।
एका ने इस विरोधाभास को कुछ समय के लिए साझा आंदोलन में समाहित किया।
मदारी पासी ने छोटे जमींदारों को क्यों जोड़ा?
भारत सरकार का मदारी पासी संबंधी विवरण उन्हें छोटे जमींदारों को समर्थन के लिए जोड़ने वाला moderator—मध्यस्थ बताता है। यह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक निर्णय था। यदि आंदोलन केवल— “हर जमींदार हमारा दुश्मन है” कहता— तो छोटे जमींदार बाहर हो जाते।
लेकिन यदि संघर्ष को इस प्रकार परिभाषित किया जाए— बड़े तालुकेदार की मनमानी; ठेकेदार का उत्पीड़न; सरकारी ऊंचा राजस्व; अवैध वसूली—
तो व्यापक ग्रामीण गठबंधन संभव हो सकता था।
छोटे जमींदारों की भागीदारी और आंदोलन की सीमा
यहीं एका की भविष्य की सीमा भी छिपी थी।
मान लें सरकार भू-राजस्व कम कर दे। छोटा जमींदार संतुष्ट। लेकिन tenant चाहता है— लगान और कम हो; बेदखली अधिकार खत्म हो। अब दोनों के हित टकराते हैं।
इसलिए छोटे जमींदार और काश्तकार की एकता स्थायी वर्गीय गठबंधन नहीं थी।
वह विशिष्ट परिस्थितियों में बनी राजनीतिक एकता थी।
भूमिहीन मजदूर और गरीब tenant के हित कैसे मिलते थे?
दोनों ग्रामीण अभिजात वर्ग पर निर्भर थे।
गरीब tenant भूमि खोकर मजदूर बन सकता था।
मजदूर को काम के लिए बड़े किसान या जमींदार पर निर्भर रहना पड़ सकता था। दोनों महंगाई से प्रभावित। दोनों सामाजिक रूप से कमजोर। दोनों की खाद्य सुरक्षा अस्थिर।
इसलिए आर्थिक संकट में दोनों के बीच दूरी कम हो सकती थी।
पांडे बताते हैं कि दिसंबर 1920 के बाद पहले किसान आंदोलन में बाजारों, तालुकेदारों के अनाज भंडार और संपन्न ग्रामीणों पर हमले ग्रामीण गरीबों की अधिक व्यापक भागीदारी की ओर संकेत करते हैं।
खिलाफत आंदोलन ने मुस्लिम किसान भागीदारी का रास्ता कैसे बनाया?
1920–21 में खिलाफत और असहयोग आंदोलन का संयुक्त नेटवर्क पहले से गांवों में सक्रिय था।
लखनऊ जिले के मालिहाबाद में खिलाफत नेताओं ने किसानों को संगठित किया।
नवीन अध्ययन विशेष रूप से ख्वाजा अहमद का नाम देता है, जिन्होंने मालिहाबाद तथा पड़ोसी हरदोई के tenants को तालुकेदारों की अवैध मांगों का विरोध करने के लिए प्रेरित किया। स्थानीय कांग्रेस ने भी इसका समर्थन किया।
इसलिए एका के प्रारंभिक चरण में हिन्दू-मुस्लिम सहयोग केवल आदर्शवादी नारा नहीं था। उसके पीछे वास्तविक संगठनात्मक नेटवर्क था।
ख्वाजा अहमद की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
एका इतिहास मदारी पासी पर इतना केंद्रित हो गया है कि प्रारंभिक मुस्लिम नेतृत्व अक्सर पीछे छूट जाता है।
लेकिन मालिहाबाद का उदाहरण बताता है कि आंदोलन के प्रारंभिक निर्माण में खिलाफत कार्यकर्ताओं की वास्तविक भूमिका थी।
इससे एका के विकास का अधिक संतुलित क्रम मिलता है— कांग्रेस; खिलाफत; स्थानीय tenant आंदोलन;
फिर मदारी पासी और स्वतंत्र ग्रामीण नेतृत्व।
अर्थात एका की उत्पत्ति में हिन्दू और मुस्लिम राजनीतिक कार्यकर्ता दोनों शामिल थे।
फिर गंगा-प्रतीक वाली शपथ मुस्लिम किसानों के लिए बाधा क्यों नहीं बनी?
एका सभा में पानी से भरे गड्ढे को गंगा का प्रतीक मानने और पंडित की उपस्थिति के पर्याप्त प्रमाण हैं।
फिर भी मजबूत मुस्लिम भागीदारी का प्रमाण मिलता है।
इससे पता चलता है कि धार्मिक प्रतीक हमेशा सांप्रदायिक सीमा नहीं बनाते।
किसान एक हिन्दू धार्मिक प्रतीक से जुड़ी रस्म में शामिल सामाजिक आंदोलन का समर्थन कर सकता था—
यदि आंदोलन की आर्थिक मांगें उसकी अपनी थीं।
और प्रारंभिक खिलाफत नेतृत्व स्वयं इस एकता को बढ़ा रहा था।
क्या तालुकेदारों का धर्म संघर्ष में निर्णायक था?
अवध के तालुकेदार हिन्दू भी थे और मुस्लिम भी।
इसलिए एका को हिन्दू किसान बनाम मुस्लिम भू-स्वामी या मुस्लिम किसान बनाम हिन्दू जमींदार जैसी सांप्रदायिक रेखा में रखना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा। किसान का तत्काल प्रश्न था— कौन अधिक लगान ले रहा है? कौन बेदखल कर रहा है? कौन बेगार मांग रहा है?
भू-स्वामी का धर्म इस आर्थिक संबंध में निर्णायक श्रेणी नहीं था।
यही कारण है कि एका मूलतः agrarian—कृषि-संबंधी, न कि सांप्रदायिक आंदोलन बना रहा।
सामाजिक समानता और राजनीतिक एकता अलग चीजें हैं
यह अंतर विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
दो किसान एक मंच पर खड़े हो सकते हैं—
लेकिन घर लौटकर सामाजिक दूरी बनाए रख सकते हैं।
वे मिलकर अधिक लगान का विरोध कर सकते हैं— लेकिन भोजन साथ न करें। वे एक पंचायत मान सकते हैं— लेकिन विवाह संबंध न बनाएं।
इसलिए ‘एका ने जाति खत्म कर दी’ कहना गलत होगा। उसकी उपलब्धि अधिक यथार्थवादी थी—
उसने तत्काल आर्थिक संघर्ष के लिए जाति से ऊपर सहयोग संभव बनाया।
क्या महिलाएं इस सामाजिक आधार का हिस्सा थीं?
किसान परिवार की अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका केंद्रीय थी— खेत; पशुपालन; चारा; अनाज प्रसंस्करण; घरेलू श्रम।
इसलिए लगान और बेदखली का असर महिलाओं पर सीधे पड़ता था।
लेकिन एका संबंधी उपलब्ध प्रमुख स्रोत पुरुष नेतृत्व और पुरुष किसान सभाओं पर अधिक केंद्रित हैं।
इसलिए महिलाओं की संख्या या संगठित भूमिका पर ठोस निष्कर्ष देना कठिन है।
यह अभाव स्वयं स्रोतों की सीमा है।
पुरुष अधिकारी पुरुष नेताओं को दर्ज करते थे—
इससे महिला भागीदारी ऐतिहासिक रिकॉर्ड में कम दिखाई दे सकती है।
पासियों को अपराध से जोड़ने वाले पुराने विवरणों की समस्या
कुछ बाद के लेख पुराने औपनिवेशिक जातिगत विवरणों को उद्धृत करते हुए पासियों को चोरी, लूट अथवा चौकीदारी से जोड़ते हैं।
ऐसे विवरणों को बिना आलोचनात्मक संदर्भ के दोहराना गलत होगा।
औपनिवेशिक शासन ने अनेक समुदायों को उनके सामाजिक व्यवहार के बारे में रूढ़ धारणाओं में दर्ज किया।
इसलिए किसी पूरे समुदाय की राजनीतिक भागीदारी को ‘अपराधी प्रवृत्ति’ से समझाना औपनिवेशिक पूर्वाग्रह को पुनरुत्पादित करना होगा। एका में पासी भागीदारी को उसकी— भूमि स्थिति; काश्तकारी; गरीबी; और सामाजिक वंचना—
के संदर्भ में देखना अधिक ऐतिहासिक रूप से उचित है।
क्या एका ‘राष्ट्रीय आंदोलन’ था?
उसका मूल आधार ग्रामीण कृषि प्रश्न थे। लेकिन— कांग्रेस; खिलाफत; असहयोग; स्वराज; और औपनिवेशिक-विरोध— उसके राजनीतिक वातावरण का हिस्सा थे।
मालिहाबाद के कांग्रेस और खिलाफत कार्यकर्ताओं ने शुरुआती एका संगठनों की सहायता की।
बाद में आंदोलन अपना स्वतंत्र नेतृत्व विकसित करता गया। इसलिए—
एका न केवल स्थानीय था, न केवल राष्ट्रीय।
वह दोनों के बीच बना किसान आंदोलन था।
धार्मिक शपथ ने इस सामाजिक एकता को कैसे मजबूत किया?
सभी किसानों ने एक ही सभा में एक ही प्रतिज्ञा ली।
इससे जाति और समुदाय से ऊपर एक साझा नैतिक बंधन बना। हर व्यक्ति जानता था— दूसरे ने भी यही कहा है।
वही नियम उस पर भी लागू है। यही एका की सामाजिक तकनीक थी। वह विविधता को समाप्त नहीं करता—
उसे एक साझा अनुशासन में बांधता है।
एका का भौगोलिक विस्तार : मालिहाबाद से सण्डीला, हरदोई, सीतापुर, बहराइच, बाराबंकी और खीरी तक
प्रमुख तथ्य
एका आंदोलन को समझने के लिए केवल यह जानना पर्याप्त नहीं है कि वह 1921–22 में अवध के किसानों का आंदोलन था। इससे अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है—
वह कहां से उठा, किन रास्तों से फैला, किन जिलों में सबसे मजबूत हुआ और हर क्षेत्र में उसका स्वरूप एक जैसा था या अलग-अलग?
यही भौगोलिक अध्ययन आंदोलन की वास्तविक प्रकृति को खोलता है।
1920–21 की पहली अवध किसान सभा लहर का मुख्य क्षेत्र प्रतापगढ़, रायबरेली, सुल्तानपुर और फैजाबाद जैसे मध्य एवं दक्षिणी अवध के जिले थे। इसके विपरीत 1921 के अंतिम महीनों में उभरने वाला एका मुख्यतः उत्तरी और उत्तर-पश्चिमी अवध की ओर स्थानांतरित हो गया।
इसका विस्तार मोटे तौर पर इस धुरी पर देखा जा सकता है—
मालिहाबाद → हरदोई → सण्डीला → सीतापुर → बहराइच → खीरी → बाराबंकी, जबकि लखनऊ जिले के ग्रामीण क्षेत्र स्वयं इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बने रहे।
ज्ञानेंद्र पांडे के अध्ययन में आंदोलन को स्पष्ट रूप से हरदोई, बहराइच, खीरी, बाराबंकी, सीतापुर और लखनऊ जिलों में फैलती हुई ग्रामीण लहर के रूप में दर्ज किया गया है। जनवरी 1922 के अंत तक सण्डीला तहसील इसका अत्यंत मजबूत केंद्र बन चुकी थी, और फरवरी में हरदोई के केवल एक पुलिस सर्किल ने तीन दिनों में 21 एका बैठकों की सूचना दी, जिनमें प्रत्येक में लगभग 150 से 2,000 तक लोग शामिल बताए गए।
हर जिले की अपनी कृषि संरचना थी। कहीं ठेकेदार मुख्य समस्या था। कहीं अनाज-लगान। कहीं बड़े तालुकेदार।
कहीं छोटे जमींदारों की सरकारी राजस्व से नाराजगी।
कहीं कांग्रेस–खिलाफत नेटवर्क ने संगठनात्मक आधार प्रदान किया।
1921 का संयुक्त प्रांत और अवध का प्रशासनिक भूगोल
एका आंदोलन के समय आज का उत्तर प्रदेश United Provinces of Agra and Oudh—आगरा और अवध के संयुक्त प्रांत का हिस्सा था।
1921 की जनगणना के समकालीन प्रशासनिक मानचित्र में— हरदोई, सीतापुर, खीरी, लखनऊ, बाराबंकी, बहराइच, रायबरेली, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, फैजाबाद, गोंडा—
जैसे जिले स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। 1921 की जनगणना का यह मानचित्र आंदोलन के समय के वास्तविक प्रशासनिक भूगोल को समझने के लिए उपयोगी प्राथमिक संदर्भ है।
आज की जिला सीमाओं को सीधे 1921 पर लागू करना सावधानी मांगता है।
एक शताब्दी के दौरान तहसील और जिला सीमाएं बदली हैं।
इसलिए किसी वर्तमान गांव को 1921 के किसी जिले से जोड़ते समय समकालीन प्रशासनिक रिकॉर्ड प्राथमिक होना चाहिए।
दिसंबर 1921 तक मालिहाबाद कितना सक्रिय था?
जवाहरलाल नेहरू के 19 दिसंबर 1921 के एक समकालीन नोट से मालिहाबाद की असहयोग राजनीति की असाधारण सक्रियता का संकेत मिलता है।
इस नोट में 8 दिसंबर को मालिहाबाद में 2,160 स्वयंसेवकों के नामांकन का उल्लेख है और कहा गया है कि क्षेत्र ने विशेष रूप से उल्लेखनीय प्रतिक्रिया दी थी।
यह आंकड़ा सीधे एका सदस्यता का आंकड़ा नहीं है। लेकिन इसका महत्व बहुत बड़ा है।
यह बताता है कि जिस क्षेत्र से शुरुआती एका संपर्क जुड़े थे, वहां पहले से— राजनीतिक स्वयंसेवक; कांग्रेस नेटवर्क; खिलाफत प्रभाव; और असहयोग का संगठनात्मक वातावरण— बहुत मजबूत था।
इसलिए एका को फैलने के लिए बिल्कुल शून्य से नेटवर्क नहीं बनाना पड़ा।
लेकिन मालिहाबाद आंदोलन की अंतिम राजधानी क्यों नहीं बना?
यहीं एका की स्वायत्तता की कहानी शुरू होती है।
मालिहाबाद में आंदोलन के शुरुआती समर्थक कांग्रेस और खिलाफत से जुड़े थे। उनकी अपनी सीमाएं थीं— अहिंसा; राष्ट्रीय अनुशासन; कांग्रेस की संगठनात्मक नीति।
लेकिन जैसे-जैसे किसान आंदोलन उग्र हुआ, स्थानीय किसान नेतृत्व उसकी दिशा स्वयं तय करने लगा।
ज्ञानेंद्र पांडे लिखते हैं कि एका संघ बहुत जल्दी अपने प्रारंभिक कांग्रेस समर्थकों के नियंत्रण से बाहर चले गए; कांग्रेस कार्यकर्ता इससे काफी असंतुष्ट हुए।
अंततः मदारी पासी ने मालिहाबाद से अपना राजनीतिक संबंध लगभग तोड़कर आंदोलन का मुख्य केंद्र सण्डीला की ओर स्थानांतरित कर दिया। यह केवल स्थानांतरण नहीं था। यह था—
राष्ट्रीय नेटवर्क से स्वतंत्र किसान नेतृत्व की ओर संक्रमण।
हरदोई : एका का वास्तविक हृदय
यदि किसी एक जिले को एका आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र कहा जाए तो वह था— हरदोई।
भारत सरकार का जिला इतिहास भी हरदोई को उत्तरी अवध के किसान असंतोष का प्रमुख केंद्र बताता है। यहां मुख्य शिकायतें थीं— दर्ज लगान से अधिक वसूली; ठेकेदारों का उत्पीड़न;
और share-rents अर्थात हिस्सेदारी/अनाज लगान। ज्ञानेंद्र पांडे भी स्पष्ट लिखते हैं—
हरदोई वह जिला था जहां एका आंदोलन ने सबसे पहले मजबूत जड़ें जमाईं।
1921 के अंत में ही tenants स्थानीय स्तर पर संगठित होकर दर्ज लगान से अधिक वसूली का विरोध करने लगे थे।
हरदोई की कृषि संरचना आंदोलन के लिए अनुकूल क्यों थी?
और छोटे जमींदारों पर भी सरकारी भूमि-राजस्व का दबाव।
इससे आंदोलन को केवल गरीब tenant का आधार नहीं मिला।
कुछ छोटे जमींदार भी उसमें शामिल हो सके।
इस सामाजिक चौड़ाई ने हरदोई में एका को मजबूत किया।
सण्डीला : तहसील से आंदोलन के ‘मुख्यालय’ तक
हरदोई जिले में सण्डीला तहसील आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र बनी।
जनवरी 1922 के अंत तक आंदोलन यहां इतना मजबूत था कि स्थानीय जमींदार गंभीर रूप से चिंतित हो चुके थे।
सण्डीला का महत्व तीन कारणों से था। पहला— मदारी पासी का प्रभाव। दूसरा— तेजी से फैलती स्थानीय एका पंचायतें। तीसरा—
यहां से आसपास के गांवों और दूसरे जिलों तक संगठन बढ़ने लगा।
हरदोई में तीन दिनों में 21 बैठकें
एका की गति समझने के लिए सबसे प्रभावशाली आंकड़ा फरवरी 1922 का है।
हरदोई के केवल एक पुलिस सर्किल ने तीन दिनों में— 21 एका बैठकों की सूचना दी। इनमें प्रत्येक सभा में लगभग— 150 से 2,000 लोग बताए गए।
इसे पूरे हरदोई जिले की पूर्ण सभा-सूची नहीं समझना चाहिए।
यह केवल एक पुलिस क्षेत्र की रिपोर्ट थी।
और इसी कारण यह आंकड़ा और भी महत्वपूर्ण है।
यदि एक सीमित पुलिस सर्किल में तीन दिनों में इतनी गतिविधि थी तो आंदोलन की वास्तविक ग्रामीण घनत्व का अनुमान लगाया जा सकता है।
हरदोई से आंदोलन बाहर कैसे निकला?
एक बार सण्डीला और आसपास के गांवों में एका की पद्धति स्थापित हो गई तो उसे दूसरे क्षेत्रों में ले जाना आसान था। प्रक्रिया लगभग वही— सभा; शपथ; पंचायत; संदेशवाहक; और अगला गांव।
ज्ञानेंद्र पांडे के अनुसार आंदोलन हरदोई से फैलते हुए— बहराइच; खीरी; बाराबंकी; सीतापुर; और लखनऊ— तक जा पहुंचा।
इस प्रसार में स्थानीय कृषि शिकायतें निर्णायक थीं।
सीतापुर में बड़े तालुकेदारों की चिंता
एका ने केवल छोटे स्थानीय भू-स्वामियों को परेशान नहीं किया।
नए अध्ययन में सीतापुर के प्रमुख तालुकेदार राजा महमूदाबाद का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने अपनी संपत्तियों की रक्षा के लिए लगभग 100 गोरखा सशस्त्र रक्षकों को रखा हुआ था।
यह तथ्य यदि प्रशासनिक और द्वितीयक स्रोत के संदर्भ में पढ़ा जाए तो आंदोलन के प्रभाव की गंभीरता दिखाता है।
एक शक्तिशाली तालुकेदार निजी सशस्त्र सुरक्षा पर निर्भर हो रहा था—
अर्थात ग्रामीण सत्ता-संतुलन वास्तव में प्रभावित हो रहा था।
सीतापुर में आंदोलन का विशिष्ट आर्थिक स्वरूप
हमारे पास हरदोई और बहराइच की तुलना में सीतापुर के विस्तृत गांव-दर-गांव अभिलेख कम उपलब्ध हैं।
इसलिए सीतापुर को ठीक उसी प्रकार अनाज-लगान आंदोलन कहना उचित नहीं होगा जैसा बहराइच को। लेकिन यह स्पष्ट है कि— किरायेदारी; अधिक लगान; जमींदारी प्रभुत्व; और व्यापक उत्तरी अवध किसान असंतोष— वहां भी आधार थे।
इसीलिए जिला एका के प्रमुख केंद्रों में बना रहा।
बहराइच : जहां आर्थिक संघर्ष सबसे प्रत्यक्ष दिखाई देता है
यदि हरदोई एका का राजनीतिक हृदय था—
तो बहराइच उसके आर्थिक संघर्ष का सबसे स्पष्ट उदाहरण है।
यहां जनवरी 1922 की शुरुआत में कम से कम दो अवसरों पर tenants ने ठेकेदारों को पीटा और लगान के रूप में लिया गया अनाज वापस ले गए।
कुछ ही सप्ताह बाद किसान समूह गांव-गांव घूमते हुए— अनाज-लगान तत्काल समाप्त करने की मांग कर रहे थे।
यह आंदोलन के भूगोल और स्थानीय कृषि व्यवस्था के सीधे संबंध का उत्कृष्ट उदाहरण है।
बहराइच में grain rent इतना बड़ा मुद्दा क्यों था?
पांडे बताते हैं कि अनाज-लगान के माध्यम से तालुकेदार और ठेकेदार उच्च कृषि कीमतों का लगभग पूरा लाभ उठा सकते थे। किसान इसलिए चाहता था—
अनाज में हिस्सा देने के बजाय नकद लगान।
इससे वह बाजार में अपनी उपज का अधिक नियंत्रण अपने पास रख सकता था। इसीलिए बहराइच में एका केवल— “अधिक लगान मत लो” नहीं रहा। वह कह रहा था— लगान लेने का तरीका भी बदलो।
बहराइच में आंदोलन का चरित्र अधिक उग्र क्यों दिखता है?
इसके पीछे अनाज की प्रत्यक्ष जब्ती का प्रश्न था।
नकद लगान विवाद में भुगतान रोका जा सकता है।
लेकिन grain rent में अनाज सामने पड़ा है। किसका हिस्सा? किसके गोदाम में जाएगा?
यदि किसान ठेकेदार से अनाज वापस लेता है—
तो आर्थिक विवाद तुरंत शारीरिक टकराव बन सकता है।
इसलिए बहराइच में अनाज-लगान ने आंदोलन को अधिक प्रत्यक्ष संघर्ष की ओर धकेला।
गिरफ्तारी पर इतनी तीखी प्रतिक्रिया क्यों?
किसान सभा और असहयोग आंदोलन के पिछले अनुभव ने किसानों को यह सिखाया था कि— नेता की गिरफ्तारी राजनीतिक कार्रवाई है। यदि स्वयंसेवक गिरफ्तार होता—
तो उसे व्यक्तिगत अपराधी की तरह नहीं देखा जाता।
वह आंदोलन पर हमला माना जा सकता था। इसीलिए पुलिस थाना घेरना—
स्थानीय किसान की नजर में अपने संगठन की रक्षा हो सकता था। औपनिवेशिक राज्य की नजर में— कानून और व्यवस्था को खुली चुनौती।
खीरी से हमें आंदोलन की राजनीतिक प्रकृति क्या पता चलती है?
तो गिरफ्तार कांग्रेस स्वयंसेवक को छुड़ाने के लिए पुलिस थाने का घेराव क्यों?
यही कारण है कि ज्ञानेंद्र पांडे फॉनथॉर्प के उस प्रयास से असहमत दिखाई देते हैं जिसमें किसान सभा को राजनीतिक और एका को अपेक्षाकृत गैर-राजनीतिक कृषि आंदोलन की तरह अलग करने की कोशिश की गई थी। खीरी स्पष्ट करता है—
एका में कृषि और औपनिवेशिक-विरोधी राजनीति आपस में घुल चुकी थीं।
क्या मदारी पासी ने आंदोलन बाराबंकी से शुरू किया था?
भारत सरकार की एक लोकप्रिय प्रविष्टि ऐसा संकेत देती है।
लेकिन प्रमुख विद्वत स्रोतों से यह स्थापित नहीं होता कि मदारी ने किसी एक निश्चित बाराबंकी स्थान से पूरे एका आंदोलन की शुरुआत की। पांडे का क्रम अधिक जटिल है— मालिहाबाद का प्रारंभिक संगठन; हरदोई में स्थानीय किसान संगठन; मदारी का नेतृत्व; सण्डीला केंद्र; और फिर अनेक जिलों में विस्तार। इसलिए इस शोध में बाराबंकी को— एका के विस्तार का महत्वपूर्ण जिला माना जाएगा— मूल संस्थापक स्थल नहीं।
फिर भी मोटा प्रसार-क्रम क्या दिखाई देता है?
उपलब्ध स्रोतों के आधार पर एक सावधानीपूर्ण क्रम इस प्रकार रखा जा सकता है—
प्रथम चरण : 1921 के अंतिम महीने मालिहाबाद–लखनऊ क्षेत्र
कांग्रेस और खिलाफत कार्यकर्ताओं से प्रारंभिक सहायता। दूसरा चरण : 1921 का अंत हरदोई
दर्ज लगान से अधिक वसूली के विरुद्ध स्थानीय tenant संगठन। तीसरा चरण : जनवरी 1922 हरदोई–सण्डीला और बहराइच आंदोलन तीव्र; grain rent पर संघर्ष। चौथा चरण : जनवरी–फरवरी 1922
सीतापुर, खीरी, बाराबंकी और अन्य पड़ोसी क्षेत्र तेज क्षेत्रीय विस्तार। पांचवां चरण : फरवरी 1922 सण्डीला का स्वतंत्र नेतृत्व केंद्र
मदारी पासी का कांग्रेस-मालिहाबाद नेटवर्क से निर्णायक अलगाव। छठा चरण : मार्च–अप्रैल 1922 स्थानीय संघर्ष जारी, लेकिन—
व्यापक सरकारी दमन से आंदोलन का विघटन। यह पूर्ण दैनिक समयरेखा नहीं—
बल्कि स्रोतों से दिखाई देने वाला प्रमुख भू-राजनीतिक क्रम है।
कांग्रेस का स्वयंसेवक नेटवर्क कितना उपयोगी था?
1921 के असहयोग आंदोलन ने गांवों तक स्वयंसेवक नेटवर्क पहुंचाया।
नेहरू के दिसंबर 1921 के नोट से मालिहाबाद में स्वयंसेवक नामांकन की बड़ी संख्या का संकेत मिलता है। ऐसे स्वयंसेवक जानते थे— सभा कैसे आयोजित करनी है; लोगों को कैसे बुलाना है; संदेश कैसे पहुंचाना है;
और औपनिवेशिक प्रतिबंधों का राजनीतिक उत्तर कैसे देना है।
एका ने इस नेटवर्क का कुछ हिस्सा ग्रहण किया—
भले आगे जाकर कांग्रेस से अलग हो गया।
धार्मिक कथा और शपथ भी ‘मोबाइल संगठन’ थे
एका का धार्मिक अनुष्ठान दोहराना आसान था। नई शाखा खोलने के लिए— कार्यालय नहीं चाहिए। केवल— स्थान; पानी; धार्मिक प्रतीक; किसान; प्रतिज्ञा; और पंचायत। इसी कारण संगठन स्थल-विशिष्ट नहीं रहा।
एक गांव से दूसरी जगह उसकी पूरी पद्धति ‘स्थानांतरित’ की जा सकती थी।
यही उसके भौगोलिक विस्तार का महत्वपूर्ण कारण था।
एका की संघर्ष-पद्धतियां : लगान प्रतिरोध, बहिष्कार, बेगार से इनकार, खेत पर कब्जा, जमींदारों का घेराव और हिंसा का प्रश्न
प्रमुख तथ्य
एका आंदोलन की मांगों और उसके भौगोलिक विस्तार को समझने के बाद अब उस प्रश्न पर आना आवश्यक है जो इस आंदोलन के चरित्र को निर्धारित करता है—किसानों ने प्रतिरोध किया कैसे?
क्या एका मूलतः लगान न देने का आंदोलन था? क्या किसान जमींदारों की जमीन पर जबरन कब्जा कर रहे थे? क्या उन्होंने सामाजिक बहिष्कार को हथियार बनाया? क्या बेदखल किए जाने पर खेत छोड़ने से इनकार किया गया? क्या जमींदारों, ठेकेदारों और उनके कारिंदों पर हमले आंदोलन की घोषित नीति थे? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या एका को एक ‘हिंसक किसान आंदोलन’ कहना ऐतिहासिक रूप से उचित है?
इस अंतिम प्रश्न का उत्तर विशेष सावधानी मांगता है, क्योंकि औपनिवेशिक प्रशासन, कांग्रेस नेतृत्व और बाद के इतिहासलेखन ने एका की हिंसा को अलग-अलग दृष्टि से देखा।
एका की मूल शपथ स्वयं एक महत्वपूर्ण साक्ष्य है। किसानों की प्रतिज्ञाओं में दर्ज लगान समय पर देना, बेदखल होने पर जमीन न छोड़ना, बेगार से इनकार करना, अपराधियों की सहायता न करना और पंचायत के निर्णय मानना शामिल था। अर्थात उसके घोषित कार्यक्रम में एक ओर संगठित अवज्ञा थी, दूसरी ओर अपराध से दूरी रखने की प्रतिज्ञा भी।
2 समय पर लगान देने की प्रतिज्ञा क्यों महत्वपूर्ण थी?
एका की शपथ में केवल यह नहीं कहा गया कि दर्ज लगान ही देंगे। साथ में यह भी था— उसे समय पर देंगे।
यह किसान की राजनीतिक स्थिति मजबूत करता था। वह यह नहीं कह रहा था— “मैं किसी का अधिकार नहीं मानता।” वह कह रहा था—
“मैं आपका वैध अधिकार मानता हूं; आपकी अवैध मांग नहीं।”
इससे जमींदार और प्रशासन के लिए किसान को केवल ‘लगान न देने वाला अपराधी’ बताना कठिन हो जाता था।
एका के प्रारंभिक कार्यक्रम में इसलिए एक प्रकार की ग्रामीण वैधानिकता दिखाई देती है—किसान औपनिवेशिक-जमींदारी व्यवस्था के अपने ही दस्तावेज को उसके विरुद्ध इस्तेमाल कर रहा था।
4 नजराना से इनकार
नजराना—विशेषतः पट्टे अथवा काश्तकारी अधिकार के नवीनीकरण से जुड़ी अतिरिक्त रकम—किसान असंतोष का दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा था।
एका आंदोलन से संबंधित सरकारी विवरण स्पष्ट करता है कि किसानों ने—
दर्ज लगान से अधिक रकम और नजराना देने से इनकार किया।
यहां भी प्रतिरोध का स्वरूप आर्थिक था। किसान कह रहा था—
खेती जारी रखने के लिए बार-बार अतिरिक्त भुगतान क्यों?
इसलिए एका ने केवल लगान की ‘मात्रा’ को नहीं—
जमींदारी अर्थव्यवस्था में किसान से धन निकालने के अतिरिक्त रास्तों को चुनौती दी।
6 बेगार बंद करना जमींदार के लिए इतना गंभीर क्यों था?
यदि किसान जमींदार के आदेश पर बिना मजदूरी काम करता है तो वह केवल श्रम नहीं दे रहा— वह सत्ता-संबंध स्वीकार कर रहा है। और जब पूरा गांव कहे— “अब बेगार नहीं।”
तो वह जमींदार को केवल कुछ मजदूरों से वंचित नहीं करता।
वह उसके सामाजिक अधिकार को चुनौती देता है।
इसीलिए बेगार से इनकार एका के सबसे क्रांतिकारी अहिंसक हथियारों में था।
8 बेदखली के विरुद्ध सबसे असाधारण प्रतिज्ञा
एका की प्रसिद्ध शपथ में एक अत्यंत महत्वपूर्ण वाक्य था—
किसान बेदखल किए जाने पर भी जमीन नहीं छोड़ेगा।
यह संघर्ष को एक नए स्तर पर ले जाता है। दर्ज लगान का विवाद आर्थिक था। बेगार सामाजिक-आर्थिक।
लेकिन बेदखली का प्रतिरोध सीधे प्रश्न उठाता था— खेत पर वास्तविक अधिकार किसका है? कागज पर मालिक का?
या पीढ़ियों से उसे जोतने वाले किसान का?
एका ने इस प्रश्न का व्यवहारिक उत्तर किसान के पक्ष में देना शुरू किया।
12 पंचायत का निर्णय इतना प्रभावी क्यों था?
क्योंकि किसान की दुनिया गांव से जुड़ी थी। विवाह; श्रम; पानी; पशु; खेती; लेन-देन; सामाजिक सहायता— सब समुदाय पर निर्भर।
यदि पंचायत किसी व्यक्ति को आंदोलन-विरोधी घोषित कर दे—
तो उसके लिए गांव में सामान्य सामाजिक जीवन कठिन हो सकता था।
इसलिए पंचायत के पास पुलिस नहीं थी—
लेकिन उसके पास सामाजिक अनुशासन की शक्ति थी।
14 एका का बहिष्कार गांधीवादी बहिष्कार जैसा था?
गांधीवादी आंदोलन में विदेशी वस्त्र, सरकारी संस्थाओं और औपनिवेशिक सहयोग का बहिष्कार राजनीतिक साधन था।
एका में बहिष्कार का लक्ष्य अधिक स्थानीय हो सकता था— जमींदार का सहयोगी; कारिंदा; आंदोलन तोड़ने वाला किसान; अवैध वसूली में मददगार।
इसलिए एका का बहिष्कार राष्ट्रीय राजनीतिक बहिष्कार का ग्रामीण सामाजिक रूपांतरण था।
18 क्या जमींदारों का घेराव हुआ?
एका और व्यापक अवध किसान आंदोलन के संदर्भ में बड़ी किसान भीड़ द्वारा भू-स्वामियों, उनके प्रतिनिधियों और प्रशासन पर सामूहिक दबाव के अनेक संकेत मिलते हैं।
लेकिन प्रत्येक लोकप्रिय कथा—जैसे किसी विशिष्ट जमींदार को घेरकर उससे सार्वजनिक माफी मंगवाने का दावा—को बिना प्राथमिक संदर्भ के सामान्य एका-पद्धति नहीं माना जाना चाहिए। हमारे पास अधिक ठोस प्रमाण हैं— लगान-वसूली रोकने; ठेकेदारों से टकराव; अनाज वापस लेने; पुलिस थाना घेरने;
और जमींदार के कर्मचारी से हिंसक संघर्ष के।
इसलिए ‘घेराव’ को आंदोलन की संभावित सामूहिक तकनीक माना जा सकता है, पर हर स्थानीय कथा को स्वतंत्र सत्यापन चाहिए।
22 बाराबंकी का कोठी : हिंसा का गंभीर उदाहरण
मार्च 1922 में बाराबंकी जिले के कोठी गांव में संघर्ष और अधिक गंभीर हुआ।
ज्ञानेंद्र पांडे के अनुसार लगान वसूलने का प्रयास कर रहे एक जमींदार के चपरासी की किसानों के आक्रोश के दौरान हत्या हो गई।
यह एका के इतिहास में दर्ज सबसे गंभीर हिंसक घटनाओं में से एक है।
इससे स्पष्ट है कि आंदोलन के कुछ हिस्सों में संघर्ष वास्तविक घातक हिंसा तक पहुंच गया था।
24 ‘अपराधियों की सहायता नहीं करेंगे’—शपथ का भूला हुआ हिस्सा
एका की शपथ में एक दिलचस्प प्रतिज्ञा थी— अपराधियों को सहायता नहीं देंगे।
यह तथ्य हिंसा की बहस में बहुत महत्वपूर्ण है।
यदि आंदोलन की मूल प्रतिज्ञा ही अपराधियों को सहायता न देने की हो—
तो यह कहना कठिन है कि उसका प्रारंभिक घोषित उद्देश्य अराजक हिंसा था।
बल्कि वह अपने प्रतिरोध को एक नैतिक अनुशासन में बांधने का प्रयास कर रहा था।
26 मदारी पासी और हिंसा : लोकप्रिय कथा की जांच
कई पाठ्य और परीक्षा-केंद्रित स्रोत लिखते हैं कि मदारी पासी ‘अहिंसा में विश्वास नहीं करते थे’ और उनके नेतृत्व में आंदोलन हिंसक हो गया। इस कथन का आधार है— कांग्रेस से आंदोलन का अलगाव; कुछ हिंसक घटनाएं;
मदारी के अधीन अधिक स्वतंत्र ग्रामीण नेतृत्व।
लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना कि मदारी ने औपचारिक रूप से एक व्यापक हिंसक कार्यक्रम घोषित किया था—अधिक सावधानी मांगता है।
उपलब्ध प्रमाण आंदोलन के उग्र होने की पुष्टि करते हैं।
वे किसी सुव्यवस्थित सशस्त्र क्रांति की स्पष्ट केंद्रीय योजना सिद्ध नहीं करते।
28 कांग्रेस और किसान के लिए ‘अहिंसा’ का अर्थ समान नहीं था
“मुझे खेत से कौन निकाल रहा है?” “मुझसे बेगार कौन करा रहा है?”
यदि ठेकेदार अनाज उठा ले जाए तो उसे रोकना किसान को आत्मरक्षा लग सकता था।
कांग्रेस नेतृत्व उसी कार्रवाई को हिंसक अनुशासनहीनता मान सकता था।
इसलिए दोनों की ‘न्याय’ और ‘अहिंसा’ की व्यावहारिक सीमाएं अलग थीं।
30 क्या वह सशस्त्र विद्रोह था?
हमारे पास ऐसी केंद्रीय सैन्य संरचना का प्रमाण नहीं— सेना; संगठित हथियार वितरण; सैन्य कमान; राज्य पर कब्जे की योजना; स्थायी सशस्त्र दस्ते। हिंसा हुई।
लाठियां और ग्रामीण हथियार कुछ सभाओं या नेताओं से जुड़े विवरणों में आते हैं।
लेकिन इससे आंदोलन आधुनिक अर्थ में ‘armed rebellion’ नहीं बन जाता। एका अधिक सटीक रूप में—
सामूहिक किसान अवज्ञा का आंदोलन था जिसमें कुछ क्षेत्रों में हिंसक प्रतिरोध विकसित हुआ।
34 किसान पंचायत और ‘समानांतर सत्ता’
इसी बिंदु पर आर्थिक आंदोलन राजनीतिक बन जाता है। क्योंकि वह केवल पैसा नहीं—
आदेश देने के अधिकार को चुनौती दे रहा है।
36 ‘खेत पर कब्जा’ वास्तव में क्या था?
अध्याय के शीर्षक में ‘खेत पर कब्जा’ को इसलिए शामिल किया गया है क्योंकि बेदखली-विरोध व्यवहार में कब्जा बनाए रखने की कार्रवाई बन सकता था। लेकिन सटीक भाषा होनी चाहिए— काश्तकारी कब्जा बनाए रखना। अर्थात किसान कह रहा था—
“जिस खेत को मैं जोत रहा हूं, केवल जमींदार की बेदखली की घोषणा से नहीं छोड़ूंगा।”
यह भूमि पुनर्वितरण की संगठित क्रांतिकारी योजना नहीं थी।
यह tenancy security—काश्तकारी सुरक्षा—का प्रत्यक्ष ग्रामीण दावा था।
38 वैकल्पिक काश्तकार न मिलने की रणनीति
यदि गांव सामूहिक रूप से तय करे कि बेदखल किसान की जमीन कोई नहीं लेगा—
जमींदार की बेदखली शक्ति कमजोर हो जाती है। क्यों?
क्योंकि जमीन खाली रह जाए तो आय बंद।
इस प्रकार सामाजिक एकता कानूनी मालिक के आर्थिक हित के विरुद्ध दबाव बनाती है। यह अत्यंत परिष्कृत सामूहिक कार्रवाई है—
बिना संपत्ति का कानूनी स्वामित्व बदले किसान उसकी व्यावहारिक उपयोगिता नियंत्रित करने की कोशिश करता है।
40 छोटे जमींदारों की भागीदारी से संघर्ष और जटिल हुआ
एका की विशेषता थी कि इसमें केवल tenants नहीं— कुछ छोटे जमींदार भी शामिल हुए।
वे स्वयं ऊंची सरकारी भूमि-राजस्व मांगों से असंतुष्ट थे। इससे संघर्ष को केवल— ‘किसान बनाम जमींदार’ कहना गलत हो जाता है। वास्तविक संरचना कहीं अधिक जटिल थी— गरीब काश्तकार; मध्यम किसान; छोटा भू-स्वामी; बड़ा तालुकेदार; ठेकेदार; औपनिवेशिक राजस्व राज्य।
एका ने इनमें से कुछ निचली-मध्य परतों को बड़े भू-स्वामियों और राज्य के विरुद्ध जोड़ दिया।
42 हिंसा के औपनिवेशिक विवरणों को कैसे पढ़ें?
औपनिवेशिक पुलिस रिपोर्ट का उद्देश्य केवल इतिहास लिखना नहीं था। उसे सरकार को बताना था— कानून-व्यवस्था की स्थिति क्या है; कितनी पुलिस चाहिए; किसे गिरफ्तार करना है; आंदोलन कितना खतरनाक है।
इसलिए प्रशासन की स्वाभाविक प्रवृत्ति उन घटनाओं पर अधिक ध्यान देने की थी जो— हिंसक; गैरकानूनी; धमकीपूर्ण— दिखाई दें। यह नहीं कि रिपोर्टें झूठी थीं। बल्कि— उनका संस्थागत दृष्टिकोण अलग था।
44 लेकिन अभिलेखीय पक्षपात कहकर हिंसा नकारना भी गलत
इतिहासकार को दूसरी गलती से भी बचना होगा। यदि स्रोत कहता है— ठेकेदार पीटे गए; पुलिस थाना घेरा गया; चपरासी मारा गया—
तो इन्हें केवल ‘औपनिवेशिक प्रचार’ कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।
ज्ञानेंद्र पांडे जैसे इतिहासकार इन्हीं अभिलेखों की आलोचनात्मक व्याख्या करते हुए इन घटनाओं को स्वीकार करते हैं। संतुलित इतिहास का अर्थ है—
हिंसा को स्वीकार करना, लेकिन उसी से पूरे आंदोलन की परिभाषा न करना।
46 क्या हिंसा स्वतःस्फूर्त थी?
इसलिए हर कार्रवाई पूरी तरह अचानक नहीं।
लेकिन संगठन का होना और हत्या की पूर्व-योजना होना अलग बातें हैं। इसलिए बेहतर निष्कर्ष—
संगठित आंदोलन के भीतर स्थानीय परिस्थितियों से उत्पन्न उग्र और कभी-कभी हिंसक कार्रवाइयां।
जमींदार, तालुकेदार और ठेकेदारों की प्रतिक्रिया : निजी सुरक्षा, कारिंदे, पुलिस सहयोग और किसान प्रतिरोध के विरुद्ध ग्रामीण सत्ता का संगठन
प्रमुख तथ्य
एका आंदोलन को केवल किसानों की मांगों, मदारी पासी के नेतृत्व और बड़ी सभाओं के इतिहास के रूप में पढ़ने से तस्वीर अधूरी रहती है। आंदोलन ने जिस सत्ता-संरचना को चुनौती दी, उसकी प्रतिक्रिया को समझना उतना ही आवश्यक है। अवध के गांव में किसान के सामने केवल एक ‘जमींदार’ नहीं था। बड़े तालुकेदार, छोटे भू-स्वामी, ठेकेदार, पटवारी, मुनीम, चपरासी, लगान वसूलने वाले कर्मचारी, स्थानीय प्रभावशाली लोग और अंततः पुलिस तथा जिला प्रशासन—इन सबकी भूमिकाएं एक-दूसरे से जुड़ सकती थीं।
एका ने इसी ग्रामीण सत्ता-व्यवस्था के रोजमर्रा के संचालन को चुनौती दी।
किसान ने जब कहा कि वह केवल दर्ज लगान देगा, अतिरिक्त वसूली और नजराना नहीं देगा, बेगार नहीं करेगा और बेदखली के बाद भी अपनी काश्त नहीं छोड़ेगा, तब प्रश्न केवल कुछ रुपये बचाने का नहीं रह गया। चुनौती यह थी कि गांव में आदेश देने का अधिकार किसका है?
यही कारण था कि एका की प्रतिक्रिया में भू-स्वामियों का भय, आर्थिक दबाव, कारिंदों की सक्रियता, पुलिस की सहायता और अंततः औपनिवेशिक दमन—सभी एक-दूसरे से जुड़ते चले गए।
2 अवध का तालुकेदार केवल भूमि-मालिक नहीं था
अवध की भूमि-व्यवस्था को समझते समय आधुनिक अर्थ में ‘landlord’ शब्द पर्याप्त नहीं है।
बड़ा तालुकेदार अनेक गांवों और विस्तृत भू-क्षेत्र पर प्रभाव रख सकता था। उसका प्रभाव केवल आर्थिक नहीं था। औपनिवेशिक शासन ने 1857 के बाद अवध के बड़े तालुकेदारों के साथ जिस प्रकार राजनीतिक समझौता विकसित किया, उसने उन्हें ग्रामीण शासन-व्यवस्था में महत्वपूर्ण मध्यस्थ बना दिया।
1856 में अवध के विलय और 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश नीति में बड़ा परिवर्तन आया। विद्रोह के बाद तालुकेदारों को पुनः स्थापित करके औपनिवेशिक शासन ने ग्रामीण स्थिरता के लिए उनके सहयोग को महत्व दिया।
इस दीर्घकालीन व्यवस्था का परिणाम 1921 में भी दिखाई देता था।
किसान का जमींदार से संघर्ष इसलिए केवल निजी व्यक्ति से विवाद नहीं था। उसके पीछे औपनिवेशिक कानून से संरक्षित संपत्ति और अधिकारों की पूरी संरचना खड़ी थी।
4 तालुकेदार, जमींदार और ठेकेदार—तीनों को एक न समझें
यहां एक महत्वपूर्ण शब्दगत सावधानी आवश्यक है।
एका से संबंधित साहित्य में कई बार— तालुकेदार, जमींदार, ठेकेदार, *thekadar*, *landlord*—
शब्द एक-दूसरे के स्थान पर इस्तेमाल होते दिखाई देते हैं।
लेकिन इनके सामाजिक-आर्थिक स्थान समान नहीं थे।
तालुकेदार प्रायः बड़ी भू-संपत्ति और अनेक गांवों पर अधिकार रखने वाला शक्तिशाली भू-स्वामी था।
जमींदार शब्द व्यापक था और विभिन्न स्तर के भूमि-अधिकारियों के लिए प्रयुक्त हो सकता था।
ठेकेदार कई मामलों में स्वयं अंतिम स्वामी नहीं बल्कि किसी भू-स्वामी से राजस्व अथवा लगान वसूली का अधिकार लेकर किसानों से वसूली करने वाला मध्यस्थ था।
एका को समझने में यह तीसरी श्रेणी विशेष महत्वपूर्ण है।
6 ठेकेदारी व्यवस्था क्यों अधिक शोषणकारी हो सकती थी?
यदि किसी व्यक्ति ने भू-स्वामी से एक निश्चित रकम पर लगान-वसूली का अधिकार लिया हो, तो उसका आर्थिक हित क्या होगा?
उसे भू-स्वामी को तय रकम देनी है।
उसके ऊपर की वसूली उसका लाभ बन सकती है।
ऐसी व्यवस्था में किसान पर अधिकतम वसूली का दबाव स्वाभाविक रूप से बढ़ सकता था।
इसीलिए अवध के किसान आंदोलनों में ठेकेदारों के प्रति विशेष नाराजगी दिखाई देती है।
एका के संदर्भ में यह महत्वपूर्ण है क्योंकि आंदोलन की एक प्रमुख शिकायत थी— दर्ज लगान से अधिक वसूली।
ठेकेदार इस अतिरिक्त वसूली की प्रक्रिया में प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देने वाला पात्र बन सकता था।
8 जमींदार की पहली प्रतिक्रिया—आंदोलन को रोकना
भू-स्वामियों के सामने सबसे पहली चुनौती थी कि एका की शपथ उनके गांवों में फैलने न पाए। एक गांव शपथ लेता। फिर पड़ोसी गांव। सभा होती। लोग दूसरे गांव जाते। पंचायत बनती।
यदि यह श्रृंखला जारी रहती तो व्यक्तिगत किसान पर दबाव डालने की जमींदार की क्षमता घटती जाती।
इसलिए भू-स्वामी वर्ग के लिए एका की संगठनात्मक संक्रामकता स्वयं खतरा थी।
सरकार की रिपोर्टों में लगातार बैठकों, शपथों और बड़ी किसान भीड़ों पर चिंता इसी कारण दिखाई देती है।
10 बेदखली—जमींदार का सबसे बड़ा अनुशासनात्मक हथियार
काश्तकार पर नियंत्रण का सबसे गंभीर साधन था— बेदखली।
किसान की आजीविका खेत पर निर्भर थी।
यदि जमींदार उसे जमीन से निकाल सकता था तो लगान और अन्य मांगों के विरुद्ध किसान की सौदेबाजी क्षमता बहुत सीमित रहती थी।
एका ने सीधे इसी हथियार को चुनौती दी। शपथ थी—
बेदखल होने पर भी खेत नहीं छोड़ेंगे।
यह जमींदार के लिए असाधारण चुनौती थी।
क्योंकि इसका अर्थ था कि कानूनी आदेश को जमीन पर लागू करने के लिए अब केवल कागज पर्याप्त नहीं रहेगा।
13 बेगार का अंत—प्रतिष्ठा पर भी प्रहार
जमींदार के लिए बेगार केवल मुफ्त श्रम नहीं था।
वह सामाजिक पदानुक्रम की पुष्टि भी थी।
किसान बुलाया जाए और वह काम करने आए—
यह ग्रामीण सत्ता का सार्वजनिक प्रदर्शन था।
अब किसान सामूहिक रूप से कह रहे थे— बेगार नहीं करेंगे।
यह कुछ मजदूरी बचाने का प्रश्न नहीं था।
यह ‘मालिक–आश्रित’ संबंध के सांस्कृतिक आधार को चुनौती थी।
इसीलिए एका की बेगार-विरोधी प्रतिज्ञा बड़े आर्थिक प्रश्नों जितनी ही राजनीतिक थी।
14 नजराना रोकने से क्या हुआ?
नजराना और विभिन्न अतिरिक्त देयों ने जमींदार को नियमित लगान से बाहर आय के रास्ते दिए थे। एका की मांग थी— दर्ज लगान के अतिरिक्त भुगतान नहीं।
इसका सीधा परिणाम भू-स्वामी की आय पर पड़ सकता था।
इसलिए एका का कार्यक्रम भले औपचारिक रूप से ‘जमींदारी समाप्त करो’ न कहता हो, व्यवहार में वह जमींदारी से होने वाली अतिरिक्त आर्थिक प्राप्तियों पर गंभीर प्रहार था।
16 इसलिए जमींदारों की चिंता केवल ‘लगान हड़ताल’ नहीं थी
यदि एका केवल कुछ महीनों की लगान हड़ताल होता तो भू-स्वामी शायद आर्थिक नुकसान सहकर दमन का इंतजार कर सकता था।
लेकिन एका की मांगें ग्रामीण सत्ता के अनेक स्तरों को एक साथ प्रभावित कर रही थीं— अतिरिक्त लगान; नजराना; बेगार; बेदखली; ठेकेदार; पंचायत; और सामाजिक बहिष्कार।
अर्थात किसान जमींदार से केवल रकम पर मोलभाव नहीं कर रहा था।
वह संबंध की शर्तें बदलना चाहता था।
19 निजी सुरक्षा का प्रश्न
जैसे-जैसे किसान लामबंदी बढ़ी, बड़े भू-स्वामियों के लिए अपनी संपत्ति, कर्मचारियों और निवास की सुरक्षा चिंता का विषय बनी।
एका संबंधी इतिहासलेखन में बड़े तालुकेदारों द्वारा निजी सुरक्षा बढ़ाने तथा सशस्त्र कर्मचारियों पर निर्भरता के उल्लेख मिलते हैं। लेकिन यहां विशेष सावधानी जरूरी है।
किसी बड़े तालुकेदार के पास पहले से ही सशस्त्र चौकीदार अथवा सुरक्षा कर्मचारी होना असामान्य नहीं था। इसलिए आंदोलन के दौरान सशस्त्र कर्मचारियों की उपस्थिति को स्वतः यह नहीं माना जा सकता कि एका के जवाब में कोई नई निजी सेना गठित की गई थी।
जहां स्रोत केवल ‘armed retainers’ अथवा सशस्त्र कर्मचारियों का उल्लेख करे, वहीं तक दावा रखना चाहिए।
20 राजा महमूदाबाद का मामला—स्रोतगत सावधानी
सीतापुर और आसपास के क्षेत्र में महमूदाबाद की बड़ी तालुकेदारी अत्यंत प्रभावशाली थी। राजा महमूदाबाद अवध के प्रमुख तालुकेदारों में थे।
एका संबंधी कुछ द्वितीयक विवरणों में बड़े भू-स्वामियों—और कभी-कभी विशेष रूप से महमूदाबाद—द्वारा अपनी सुरक्षा मजबूत करने अथवा सशस्त्र लोगों को रखने की चर्चा मिलती है।
लेकिन शोध में हमें तीन बातें अलग करनी चाहिए—
पहली, बड़े तालुकेदारों के पास पहले से निजी कर्मचारी और सुरक्षा तंत्र था।
दूसरी, एका के कारण उनकी सुरक्षा चिंता बढ़ी।
तीसरी, किसी विशेष संख्या में ‘निजी सेना’ भर्ती करने का दावा।
पहली दो बातें व्यापक संरचनात्मक प्रमाणों से संगत हैं।
तीसरी बात के लिए विशिष्ट अभिलेखीय प्रमाण आवश्यक है।
इसलिए वेबसाइट के शोध-पाठ में हम सनसनीखेज संख्या की बजाय यह कहेंगे—
एका के विस्तार ने बड़े तालुकेदारों को अपनी संपत्ति और कर्मचारियों की सुरक्षा मजबूत करने तथा प्रशासनिक संरक्षण पर अधिक निर्भर होने के लिए प्रेरित किया।
22 छोटे जमींदारों की भागीदारी क्यों महत्वपूर्ण है?
क्योंकि इससे आंदोलन का चरित्र स्पष्ट होता है।
एका तत्काल भूमि-संपत्ति समाप्त करने का क्रांतिकारी अभियान नहीं था।
यदि उसका लक्ष्य सभी जमींदारों की जमीन छीनना होता तो छोटे भू-स्वामी उसमें सहज रूप से शामिल नहीं होते। उसका तत्काल साझा आधार था—
ऊपर से होने वाली आर्थिक वसूली और ग्रामीण प्रभुत्व के विरुद्ध असंतोष।
इसलिए कुछ छोटे भू-स्वामी किसान प्रतिरोध के साथ खड़े हो सके।
24 कारिंदे—जमींदारी सत्ता की अग्रिम पंक्ति
‘कारिंदा’ शब्द एका के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
कारिंदा वह व्यक्ति था जो भू-स्वामी के अधिकार को गांव में व्यवहार में बदलता था। वह— लगान की मांग कर सकता था; बकाया याद दिला सकता था; किसान पर दबाव डाल सकता था; भू-स्वामी को सूचना दे सकता था;
और स्थानीय विवाद में मालिक का प्रतिनिधित्व कर सकता था।
इसलिए किसान के लिए ‘राज’ अक्सर किसी दूर बैठे अंग्रेज अधिकारी के रूप में नहीं बल्कि—
कारिंदे के चेहरे में दिखाई देता था।
25 चपरासी की भूमिका भी केवल संदेशवाहक की नहीं
बाराबंकी के कोठी की घटना इसका गंभीर उदाहरण है।
मार्च 1922 में लगान वसूली के प्रयास से जुड़े संघर्ष में एक जमींदार का चपरासी मारा गया।
यह घटना केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी।
वह ग्रामीण सत्ता की उस अग्रिम पंक्ति पर हमला था जो लगान की मांग को खेत तक पहुंचाती थी।
इसीलिए ऐसी घटना जमींदारों में भय फैलाने और प्रशासन को कठोर कदम की ओर ले जाने में सक्षम थी।
26 बहराइच में ठेकेदारों की पिटाई का संदेश
जनवरी 1922 की बहराइच घटनाओं में किसानों द्वारा ठेकेदारों को पीटना और लगान का अनाज वापस लेना आंदोलन के बदलते स्वरूप का संकेत था। यहां किसान केवल— “अगली बार नहीं देंगे” नहीं कह रहे थे। वे कह रहे थे—
“जो लिया गया है, उसे भी वापस करेंगे।”
इससे भू-स्वामी और ठेकेदार दोनों के सामने प्रश्न था—
यदि वसूली की गई रकम अथवा अनाज सुरक्षित नहीं रहेगा तो लगान-व्यवस्था कैसे चलेगी?
इसलिए ऐसी प्रत्यक्ष कार्रवाइयों ने सुरक्षा की मांग बढ़ाई।
32 पुलिस थाने का घेराव—संबंध का टूटना
खीरी में कांग्रेस स्वयंसेवक की गिरफ्तारी के बाद किसान भीड़ ने पुलिस थाना घेरकर बंदी छुड़ा लिया।
इस घटना का महत्व बहुत बड़ा है।
यहां किसान अब पुलिस को निष्पक्ष मध्यस्थ नहीं मान रहा।
वह उसकी गिरफ्तारी को अन्यायपूर्ण मानकर स्वयं उलट देता है।
औपनिवेशिक राज्य की दृष्टि से यह अस्वीकार्य था।
क्योंकि यदि गांव तय करने लगे कि किसे पुलिस हिरासत में रख सकती है—
तो राज्य की दंडात्मक संप्रभुता ही चुनौती में पड़ जाती है।
36 क्या भू-स्वामियों ने हिंसा को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया?
कुछ मामलों में इसकी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
भू-स्वामी का हित था कि प्रशासन आंदोलन को गंभीर खतरा माने।
इसलिए भीड़, धमकी और हिंसा संबंधी सूचना को स्रोत-आलोचना के साथ पढ़ना चाहिए। लेकिन इसका उलटा भी सही है— वास्तविक हिंसक घटनाएं हुई थीं। बहराइच में ठेकेदार पीटे गए। खीरी में थाना घेरा गया। कोठी में चपरासी की हत्या हुई।
इसलिए हर जमींदारी शिकायत को ‘प्रचार’ कह देना भी ऐतिहासिक रूप से अनुचित होगा।
38 भू-स्वामी का भय वास्तविक भी था
स्रोत-आलोचना का अर्थ भू-स्वामी के भय को काल्पनिक मानना नहीं।
यदि आपके क्षेत्र में हजारों किसान संगठित हों; अतिरिक्त लगान रोक दें; बेगार से इनकार करें; बेदखली न मानें; ठेकेदार पीटे जाएं; कारिंदा गांव में जाने से डरे—
तो भू-स्वामी के लिए यह वास्तविक सत्ता-संकट था।
इसलिए तालुकेदारों की सुरक्षा चिंता केवल प्रशासन को प्रभावित करने की चाल नहीं थी। उसके पीछे वास्तविक सामाजिक परिवर्तन था।
42 ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन और तालुकेदारी राजनीति की विरासत
अवध के तालुकेदारों का राजनीतिक संगठन एका से बहुत पुराना था।
ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन ऑफ अवध जैसे मंच बड़े भू-स्वामियों के हितों के प्रतिनिधित्व की संस्थागत परंपरा का हिस्सा थे।
इससे यह समझ आता है कि 1921–22 में बड़े तालुकेदार प्रशासन तक पहुंच रखने वाले असंगठित व्यक्ति नहीं थे। उनके पास— राजनीतिक प्रतिष्ठा; अधिकारी वर्ग से संपर्क; कानूनी संसाधन; और संगठित हित-प्रतिनिधित्व की परंपरा— पहले से मौजूद थी।
इसके विपरीत किसान की नई शक्ति पंचायत और एका की शपथ थी।
45 लेकिन पंचायत ने अदालत की वैधता को चुनौती दी
यह टकराव अंततः पुलिस के बिना हल होना कठिन था।
यहीं पंचायत की स्वायत्तता राज्य के लिए राजनीतिक खतरा बनती है।
औपनिवेशिक सरकार की प्रतिक्रिया और दमन : खुफिया निगरानी, पुलिस कार्रवाई, गिरफ्तारियां, मुकदमे और मदारी पासी की तलाश
प्रमुख तथ्य
एका आंदोलन के इतिहास में 1922 का आरंभ निर्णायक मोड़ था। अब प्रश्न केवल यह नहीं था कि किसान कितना लगान देगा, बेगार करेगा या नहीं, अथवा बेदखली के बाद खेत छोड़ेगा या नहीं। संयुक्त प्रांत की औपनिवेशिक सरकार के सामने बड़ा प्रश्न बन चुका था—
क्या उत्तरी अवध के गांवों में राज्य का आदेश प्रभावी रहेगा?
हरदोई में कुछ ही दिनों में दर्जनों एका सभाएं हो रही थीं। सैकड़ों से लेकर दो हजार तक किसान उनमें पहुंच रहे थे। मदारी पासी कांग्रेस और खिलाफत के प्रारंभिक प्रभाव से अलग होकर स्वतंत्र ग्रामीण नेतृत्व के रूप में उभर चुके थे। बहराइच में ठेकेदारों से टकराव हुआ था। खीरी में पुलिस थाने को घेरकर गिरफ्तार व्यक्ति छुड़ाया गया था। बाराबंकी में लगान वसूलने आए जमींदार के कर्मचारी की हत्या हुई। प्रशासन के लिए अब एका केवल tenancy agitation—काश्तकारी असंतोष—नहीं था। वह औपनिवेशिक राज्य की स्थानीय प्रभुसत्ता के लिए चुनौती बनता जा रहा था।
इसी चरण में एका के विरुद्ध सरकारी नीति ने तीन रूप लिए— निगरानी → अलगाव → दमन।
और इस पूरी कार्रवाई के केंद्र में एक नाम था— मदारी पासी।
5 तीन दिन में 21 एका सभाएं
हरदोई की एक पुलिस सर्किल रिपोर्ट विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
फरवरी 1922 में केवल तीन दिनों के भीतर 21 एका बैठकों की सूचना दर्ज की गई। इन सभाओं में लगभग— 150 से 2,000 तक लोगों की उपस्थिति बताई गई।
यह आंकड़ा केवल आंदोलन की लोकप्रियता नहीं बताता।
यह औपनिवेशिक निगरानी की गहराई भी दिखाता है।
पुलिस इतनी बारीकी से बैठकों की गणना कर रही थी कि तीन दिनों की गतिविधियों का संख्यात्मक विवरण उपलब्ध था।
8 मदारी पासी की गिरफ्तारी क्यों इतनी महत्वपूर्ण थी?
मदारी केवल भाषण देने वाले नेता नहीं थे। उनकी भूमिका थी— गांव जोड़ना; सभा करना; शपथ दिलाना; स्थानीय विवाद सुलझाना; छोटे जमींदारों को जोड़ना; पंचायत अनुशासन स्थापित करना।
अर्थात वे आंदोलन के संगठनात्मक संपर्क-बिंदु बन गए थे।
किसी आधुनिक संगठन की भाषा में कहें तो—
मदारी एका नेटवर्क के प्रमुख *organiser* थे।
उनकी गिरफ्तारी से आंदोलन की गांव-से-गांव समन्वय क्षमता टूट सकती थी।
9 फरवरी 1922 : मदारी को पकड़ने की बड़ी कोशिश
फरवरी में पुलिस ने मदारी पासी को गिरफ्तार करने का प्रयास किया।
लेकिन यह साधारण गिरफ्तारी अभियान नहीं था।
ज्ञानेंद्र पांडे द्वारा उद्धृत औपनिवेशिक रिकॉर्ड के अनुसार प्रशासन ने मदारी को पकड़ने के लिए— “arrangements on a somewhat elaborate scale”
अर्थात काफी विस्तृत स्तर पर तैयारी की थी। इस वाक्य का महत्व समझना चाहिए।
औपनिवेशिक पुलिस किसी साधारण ग्रामीण आरोपी को पकड़ने के लिए ‘विस्तृत पैमाने’ पर तैयारी दर्ज नहीं करती।
यह दिखाता है कि फरवरी 1922 तक मदारी प्रशासन की नजर में कितने महत्वपूर्ण हो चुके थे।
10 लेकिन पुलिस उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकी
पांडे के अनुसार several thousand peasants—कई हजार किसानों—की भीड़ ने पुलिस के प्रयास को विफल कर दिया।
यह एका आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। यहां किसान केवल— लगान; बेगार; जमींदार— के लिए नहीं लड़ रहा था।
वह अपने नेता को औपनिवेशिक पुलिस से बचा रहा था।
12 किसान मदारी की रक्षा क्यों कर रहे थे?
क्योंकि तब तक मदारी का प्रश्न व्यक्ति का नहीं— आंदोलन का प्रश्न बन चुका था।
किसानों के लिए उनकी गिरफ्तारी का अर्थ हो सकता था— सभा बंद; पंचायत कमजोर; जमींदार मजबूत; पुलिस का भय वापस।
इसलिए नेता की रक्षा अपने संगठन की रक्षा थी।
15 मदारी भूमिगत हुए
सरकारी दबाव बढ़ने पर एका का नेतृत्व खुले सार्वजनिक संगठन से धीरे-धीरे भूमिगत गतिविधि की ओर गया।
भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के Digital District Repository में भी उल्लेख है कि पुलिस द्वारा पीछा किए जाने और दमन के कारण आंदोलन को भूमिगत होना पड़ा। इस परिवर्तन के गंभीर परिणाम हुए। खुले आंदोलन में— सभा; शपथ; पंचायत; सार्वजनिक नेतृत्व— संभव है। भूमिगत आंदोलन में— संपर्क कठिन; संदेश धीमा; नेतृत्व अलग-थलग; अफवाह अधिक।
इसलिए भूमिगत होना नेता को बचाता है, लेकिन जनांदोलन को कमजोर भी कर सकता है।
16 मदारी की संपत्ति की कुर्की : क्या प्रमाण है?
स्थानीय इतिहास और बाद की रिपोर्टों में उल्लेख मिलता है कि मदारी की गिरफ्तारी न होने पर उनकी संपत्ति कुर्क की गई।
हरदोई से प्रकाशित एक स्थानीय ऐतिहासिक विवरण में दावा है कि— उनके घर का सामान; गाय-बैल; और बड़ी संख्या में भैंसें— जब्त कर ली गईं। लेकिन यहां स्रोतगत सावधानी आवश्यक है।
₹1,000 इनाम का प्रमाण मजबूत औपनिवेशिक इतिहासलेखन में मिलता है।
संपत्ति-कुर्की का उल्लेख स्थानीय स्रोतों में है, पर पशुओं की ठीक संख्या जैसी सूचनाओं को मूल जिला अभिलेख से स्वतंत्र रूप से सत्यापित किए बिना अंतिम तथ्य नहीं मानना चाहिए। इस शोध में इसलिए हम कहेंगे—
मदारी पर गिरफ्तारी का दबाव बढ़ाने के लिए संपत्ति-कुर्की की कार्रवाई के विवरण मिलते हैं; लेकिन कुर्क संपत्ति की लोकप्रिय रूप से बताई जाने वाली संख्या को अभिलेखीय पुष्टि की आवश्यकता है। यही स्रोतगत अनुशासन आवश्यक है।
18 मार्च 1922 : उदयपुर गांव की निर्णायक घटना
दमन और प्रतिरोध का सबसे गंभीर टकराव हरदोई जिले में हुआ।
मार्च 1922 में शाहाबाद पुलिस सर्किल के उदयपुर गांव में पुलिस दल एका की बैठकों के बारे में जांच करने पहुंचा।
यहां बड़ी संख्या में पासी किसानों ने पुलिस दल पर हमला किया। पुलिस ने गोली चलाई। और— दो किसान मारे गए।
ज्ञानेंद्र पांडे का विवरण इस घटना को स्पष्ट रूप से दर्ज करता है।
एक अन्य अध्ययन इसे 9 मार्च 1922 की घटना बताता है।
20 किसानों ने पुलिस पर हमला क्यों किया?
उपलब्ध प्रशासनिक स्रोत घटना बताते हैं, लेकिन प्रत्येक किसान की प्रेरणा नहीं। संभावित पृष्ठभूमि थी— लगातार पुलिस जांच; मदारी की गिरफ्तारी की कोशिश; नेताओं पर दबाव; सभाओं की निगरानी;
जमींदार–पुलिस संबंध को लेकर किसानों का अविश्वास।
लेकिन शोध में हमें कारण और अनुमान अलग रखने चाहिए।
हम इतना निश्चित रूप से कह सकते हैं—
एका बैठकों की जांच कर रही पुलिस पार्टी और स्थानीय पासी किसानों के बीच हिंसक टकराव हुआ और पुलिस फायरिंग में दो किसान मारे गए।
25 क्या सेना तैनात हुई थी?
पांडे स्पष्ट रूप से armed and mounted police के साथ a squadron of Indian cavalry का उल्लेख करते हैं।
इसलिए यह कहना उचित है कि दमन में पुलिस से आगे बढ़कर भारतीय घुड़सवार सैन्य बल का भी उपयोग हुआ।
लेकिन बिना विशिष्ट अभिलेख के पूरे अवध में ‘सेना ने गांवों पर कब्जा कर लिया’ जैसी व्यापक भाषा से बचना चाहिए।
दमन की भौगोलिक तीव्रता अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न थी।
26 गिरफ्तारी—दमन का सबसे प्रभावी साधन
जनांदोलन को केवल गोली चलाकर नहीं तोड़ा जाता। अधिक प्रभावी तरीका है— उसके संगठनात्मक ढांचे को हटाना। स्थानीय नेता गिरफ्तार। सभा आयोजक गिरफ्तार। संदेशवाहक गिरफ्तार। कार्यकर्ता मुकदमों में फंसे। और शीर्ष नेता भूमिगत।
इससे गांव के सामान्य किसान के सामने प्रश्न आता है—
क्या आंदोलन जारी रखने की कीमत जेल है?
यहीं दमन का मनोवैज्ञानिक प्रभाव शुरू होता है।
28 मुकदमे : राजनीति को अपराध में बदलना
गिरफ्तारी के बाद औपनिवेशिक व्यवस्था का अगला चरण था— prosecution—अभियोजन।
किसान की दृष्टि में कार्रवाई हो सकती थी— सभा; बेदखली रोकना; कारिंदे को रोकना; नेता छुड़ाना।
कानून की दृष्टि में वही कार्रवाई बन सकती थी— अवैध जमाव; मारपीट; सरकारी कार्य में बाधा; दंगा; हमला; हत्या।
यही राजनीतिक आंदोलन को आपराधिक मुकदमों में विभाजित करने की औपनिवेशिक क्षमता थी।
30 क्या एका पर विशेष कानून लगाया गया?
एका संबंधी लोकप्रिय लेखों में कई बार बिना स्रोत के धारा 144 अथवा अन्य विशेष कानूनी प्रावधानों के व्यापक इस्तेमाल की बात लिख दी जाती है।
हमारे पास उपलब्ध मजबूत स्रोत दमन, गिरफ्तारी, पुलिस और cavalry की तैनाती की पुष्टि करते हैं।
लेकिन किसी विशिष्ट जिले में किस तारीख को दंड प्रक्रिया संहिता की कौन-सी धारा लगाई गई—यह अलग अभिलेखीय प्रश्न है।
इसलिए वेबसाइट के शोध-पाठ में हम बिना प्राथमिक प्रमाण—
“पूरे एका क्षेत्र में धारा 144 लगा दी गई” जैसा दावा नहीं करेंगे।
32 दमन केवल एका के विरुद्ध नहीं था
1921 के अंत से सरकार केवल एका को नहीं— एका और कांग्रेस संगठनों
दोनों को नियंत्रित करने के लिए कठोर कार्रवाई कर रही थी।
यह असहयोग आंदोलन का व्यापक राजनीतिक संदर्भ था।
इसलिए एका का दमन किसी पृथक ग्रामीण पुलिस अभियान की तरह नहीं देखा जा सकता।
वह पूरे संयुक्त प्रांत में औपनिवेशिक सरकार और असहयोग राजनीति के संघर्ष का हिस्सा था।
33 कांग्रेस के दमन और एका के दमन में अंतर
कांग्रेस के खिलाफ कार्रवाई का केंद्र हो सकता था— राजनीतिक भाषण; असहयोग; स्वयंसेवक संगठन; राष्ट्रीय आंदोलन। एका में इसके साथ जुड़ा था— लगान; जमींदार; बेदखली; ग्रामीण पंचायत; और स्थानीय हिंसा।
इसलिए एका के मामले में औपनिवेशिक राज्य और जमींदारी हित अधिक प्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे से जुड़ सकते थे।
34 कांग्रेस की दूरी ने सरकार की राह आसान की
एका का स्वतंत्र नेतृत्व विकसित होते ही कांग्रेस और खिलाफत के साथ उसके संबंध कमजोर हुए।
मानक इतिहासकार बिपन चंद्र और उनके सहलेखकों के अनुसार मदारी पासी तथा अन्य निम्न जातीय नेताओं के नेतृत्व में आंदोलन कांग्रेस द्वारा अपेक्षित अहिंसक अनुशासन से दूर गया और राष्ट्रवादी नेतृत्व से उसका संपर्क कम हुआ। अंततः कठोर सरकारी दमन ने आंदोलन को समाप्त कर दिया। इसका दमन पर सीधा प्रभाव था।
किसानों के पास अब बड़े राष्ट्रीय संगठन की राजनीतिक ढाल कम थी।
36 चौरी चौरा का प्रभाव
4 फरवरी 1922 को चौरी चौरा में पुलिस थाना जलाए जाने और पुलिसकर्मियों की हत्या के बाद गांधी ने असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया।
चौरी चौरा एका की घटना नहीं थी।
इसे एका के खाते में रखना गंभीर ऐतिहासिक त्रुटि होगी।
लेकिन उसके बाद का वातावरण एका के लिए प्रतिकूल था।
कांग्रेस नेतृत्व हिंसा से और अधिक दूरी बना रहा था। सरकार कठोर थी।
और एका से भी पुलिस तथा जमींदारी कर्मचारियों के साथ हिंसक टकराव की खबरें आ रही थीं।
इसलिए फरवरी–मार्च 1922 में आंदोलन राजनीतिक रूप से अधिक अकेला पड़ गया।
37 दमन का दूसरा चेहरा : जमींदारों के लोग
हाल के एक विस्तृत अध्ययन में, कांग्रेस रिपोर्टों के आधार पर, यह तर्क दिया गया है कि एका को दबाने में केवल सरकारी पुलिस ही नहीं बल्कि कुछ भू-स्वामियों से जुड़े लोगों ने भी हिंसा, लूट और डराने-धमकाने का सहारा लिया। कुछ मामलों में ऐसे तत्वों को पुलिस सहायता मिलने की बात भी दर्ज की गई है।
इस स्रोत का निष्कर्ष महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सरकारी अभिलेखों से उलटी दिशा की तस्वीर देता है। औपनिवेशिक रिपोर्ट— किसान हिंसा पर जोर। कांग्रेस रिपोर्ट— जमींदार और पुलिस हिंसा पर। दोनों को साथ पढ़ना चाहिए।
38 गांव में दमन कैसा दिखाई देता था?
किसान के दैनिक जीवन में इसका अर्थ हो सकता था— पुलिस का गांव आना; पूछताछ; नेता की तलाश; गिरफ्तारी; घर की तलाशी; मुकदमा; जुर्माना; कारिंदों की वापसी; लगान-वसूली की पुनर्स्थापना; सभा करने का भय।
अर्थात दमन का लक्ष्य केवल शरीर नहीं— संगठनात्मक आत्मविश्वास भी होता है।
एका और कांग्रेस का संबंध : गांधी, जवाहरलाल नेहरू, स्थानीय कांग्रेस नेतृत्व, अहिंसा का प्रश्न और आंदोलन से बढ़ती दूरी
प्रमुख तथ्य
एका आंदोलन और कांग्रेस का संबंध भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण, किंतु अक्सर अत्यधिक सरलीकृत अध्याय है। सामान्य पाठ्यपुस्तकीय वर्णन प्रायः इतना कहकर आगे बढ़ जाता है कि एका आंदोलन प्रारंभ में कांग्रेस से जुड़ा था; बाद में मदारी पासी ने नेतृत्व संभाला, आंदोलन हिंसक हुआ और कांग्रेस ने उससे दूरी बना ली।
यह विवरण पूरी तरह गलत नहीं है। लेकिन यह अधूरा है।
इसके पीछे कई जटिल प्रश्न छिप जाते हैं—
कांग्रेस ने अवध के किसानों को पहले संगठित करने में कितनी भूमिका निभाई?
क्या किसान राजनीति कांग्रेस ने पैदा की थी, या किसानों ने राष्ट्रीय आंदोलन का उपयोग अपनी कृषि समस्याओं के लिए किया?
गांधी किसानों की शिकायतों से सहमत होते हुए भी उन्हें जमींदारों के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष से क्यों रोक रहे थे?
जवाहरलाल नेहरू स्वयं किसान उत्पीड़न देखकर अत्यंत विचलित थे, फिर भी उन्होंने गांधी की संयमित नीति का समर्थन क्यों किया?
एका के प्रारंभिक संगठन में कांग्रेस और खिलाफत कार्यकर्ता क्यों सक्रिय थे?
फरवरी 1922 में किशन लाल नेहरू को अतरौली जाकर आंदोलन पर कांग्रेस का प्रभाव पुनः स्थापित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? और सबसे बड़ा प्रश्न—
क्या कांग्रेस ने एका किसानों को उस समय अकेला छोड़ दिया जब औपनिवेशिक सरकार ने उन पर सबसे कठोर प्रहार किया?
इन प्रश्नों का सरल नैतिक उत्तर देने के बजाय उस ऐतिहासिक तनाव को समझना आवश्यक है जिसमें कांग्रेस स्वयं फंसी थी।
एका के मामले में दो राजनीतिक परियोजनाएं एक-दूसरे से मिलती हैं और फिर अलग होने लगती हैं— कांग्रेस का राष्ट्रव्यापी औपनिवेशिक-विरोधी आंदोलन और अवध किसान का स्थानीय सामाजिक-आर्थिक संघर्ष।
यही एका–कांग्रेस संबंध की केंद्रीय समस्या थी।
ज्ञानेंद्र पांडे ने इसी संबंध को “ambiguous relationship”—द्व्यर्थी अथवा अस्पष्ट संबंध के रूप में देखा है। उनके अनुसार एका पुराने किसान सभा संघर्ष की निरंतरता था; उसके आरंभिक संगठनों को मालिहाबाद के कांग्रेस और खिलाफत कार्यकर्ताओं से सहायता मिली, लेकिन वे शीघ्र अपने प्रारंभिक संरक्षकों से आगे निकल गए, व्यापक हुए और अधिक उग्र किसान आंदोलन में बदल गए।
2 कांग्रेस के लिए स्वराज क्या था?
कांग्रेस और गांधी के लिए 1920–22 का मुख्य लक्ष्य था—
ब्रिटिश शासन की वैधता को कमजोर करना; सरकारी संस्थाओं का असहयोग; विदेशी वस्त्र बहिष्कार; सरकारी शिक्षा और अदालतों से दूरी; खिलाफत प्रश्न पर मुस्लिम सहयोग; और व्यापक अहिंसक जनभागीदारी। यह राष्ट्रीय सत्ता का संघर्ष था।
कांग्रेस को विभिन्न सामाजिक समूहों को एक मंच पर रखना था— किसान; व्यापारी; वकील; मध्यवर्ग; शहरी पेशेवर; और संभव हो तो भू-स्वामी भी।
इसलिए उसकी राजनीति स्वभावतः बहुवर्गीय गठबंधन की राजनीति थी।
4 जवाहरलाल नेहरू ने किसान संकट को कितनी गंभीरता से देखा?
जवाहरलाल नेहरू के 21 जनवरी 1921 के लेख “Babas on the Brain! Facts about the Kisan Crisis” में वे उन दावों का तीखा विरोध करते हैं जिनमें अवध के किसान संकट को केवल बाबा रामचंद्र जैसे ‘उत्तेजकों’ की करतूत बताया जा रहा था।
नेहरू स्पष्ट लिखते हैं कि किसानों की शिकायतें वास्तविक थीं और ‘बाबा’ समस्या की जड़ नहीं थे। यह महत्वपूर्ण प्रमाण है।
कांग्रेस के प्रमुख युवा नेता स्वयं यह स्वीकार कर रहे थे—
समस्या किसान को भड़काने वाला नेता नहीं; ग्रामीण व्यवस्था में वास्तविक अन्याय है।
6 नेहरू सरकार के दमन के आलोचक थे
अप्रैल 1921 में जवाहरलाल नेहरू ने लिखा कि प्रतापगढ़, सुल्तानपुर, रायबरेली और फैजाबाद जैसे किसान सभा वाले जिलों में किसानों और पंचायत कार्यकर्ताओं को भयभीत और गिरफ्तार किया जा रहा था। उन्होंने लिखा कि उन क्षेत्रों में—
हजारों लोगों को परेशान किया जा रहा था; सैकड़ों जेल में थे;
और पंचायत चलाना तक अपराध जैसा बना दिया गया था।
जून 1921 के एक भाषण में उन्होंने फिर कहा कि किसान सभा वाले जिलों में हर पंचायत अध्यक्ष और पंच को धमकाया जा रहा था, मुकदमे चलाए जा रहे थे और सुरक्षा की मांग की जा रही थी।
अर्थात नेहरू किसान दमन से उदासीन नहीं थे।
7 फिर समस्या कहां थी?
नेहरू किसान की शिकायत से सहमत थे।
गांधी भी किसानों की तकलीफ से अनजान नहीं थे।
लेकिन कांग्रेस नेतृत्व यह नहीं चाहता था कि असहयोग आंदोलन तत्काल ग्रामीण वर्ग-संघर्ष में बदल जाए। विशेषकर— लगान-बंदी; जमींदार पर हमला; बाजार लूट; सामाजिक जबरदस्ती; और हिंसक प्रतिरोध— से कांग्रेस चिंतित थी।
यहीं सहानुभूति और रणनीति अलग होने लगी।
8 फरवरी 1921 में गांधी के निर्देश निर्णायक क्यों थे?
जनवरी 1921 के किसान विस्फोट और हिंसक घटनाओं के बाद गांधी फरवरी में संयुक्त प्रांत पहुंचे।
उन्होंने किसानों के लिए स्पष्ट निर्देश जारी किए। उनका सार था— हिंसा न करें; गाली न दें; लूट न करें; लाठी का उपयोग न करें;
सामाजिक बहिष्कार के जबरदस्ती वाले रूप से बचें; सरकारी आदेश मानें;
और उस समय कर तथा जमींदार का लगान रोकने का प्रश्न न उठाएं।
ज्ञानेंद्र पांडे गांधी के इन्हीं निर्देशों को कांग्रेस की किसान नीति समझने की केंद्रीय कुंजी मानते हैं।
10 गांधी ऐसा क्यों कर रहे थे?
इसका उत्तर उनके राष्ट्रीय गठबंधन की रणनीति में है। यदि हर जिले में राष्ट्रीय आंदोलन— किसान बनाम जमींदार; मजदूर बनाम उद्योगपति; किरायेदार बनाम भू-स्वामी—
के स्थानीय वर्गीय युद्ध में बदल जाए तो कांग्रेस का व्यापक गठबंधन टूट सकता था। गांधी का लक्ष्य था—
पहले ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय एकता।
सामाजिक वर्ग-संघर्ष को ऐसी सीमा तक न जाने देना जिससे राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर ही विभाजन हो। यह रणनीतिक राजनीति थी।
लेकिन किसान की दृष्टि से इसका अर्थ था—
जिस व्यक्ति से मेरी प्रत्यक्ष लड़ाई है, उसी से संघर्ष मत करो। यहीं तनाव पैदा होना स्वाभाविक था।
12 क्या गांधी किसान-विरोधी थे?
गांधी ग्रामीण गरीबी को भारत की सबसे बड़ी समस्याओं में मानते थे।
चंपारण और खेड़ा में वे स्वयं किसानों के संघर्ष का नेतृत्व कर चुके थे। समस्या थी—
किस प्रकार का संघर्ष और किस समय?
वे नियंत्रित, घोषित और अहिंसक सत्याग्रह चाहते थे।
अवध की किसान लामबंदी उनकी प्रत्यक्ष कमान में नहीं थी।
वह अपने स्थानीय अर्थ और रणनीति विकसित कर रही थी।
इसीलिए गांधी का सावधान होना उनकी व्यापक राजनीतिक दर्शन से संगत था।
लेकिन इससे किसान के स्थानीय हित और कांग्रेस रणनीति का वास्तविक टकराव समाप्त नहीं हो जाता।
14 यह नेहरू का अंतर्विरोध था या राजनीतिक संक्रमण?
नेहरू अभी अपने राजनीतिक जीवन के प्रारंभिक दौर में थे।
उन्होंने किसान दमन की तीखी आलोचना की—
लेकिन गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस के राष्ट्रीय कार्यक्रम के भीतर।
वे तत्काल स्वतंत्र किसान वर्ग राजनीति के नेता नहीं थे।
आने वाले वर्षों में किसान और समाजवादी प्रश्न पर उनका दृष्टिकोण अधिक विकसित होगा।
लेकिन 1921–22 में वे कांग्रेस के राष्ट्रीय अनुशासन से बाहर नहीं गए।
17 1921 की पहली किसान लहर दबने के बाद कांग्रेस–किसान संबंध
किसान सभा का पहला उभार कम हुआ। लेकिन ग्रामीण शिकायतें नहीं मिटीं।
कुछ महीने बाद उत्तरी अवध में वही असंतोष नई संरचना में लौटा— एका।
पांडे इसी कारण एका को पहले किसान सभा संघर्ष की निरंतरता मानते हैं।
18 एका की शुरुआत कांग्रेस-विरोधी नहीं थी
यह तथ्य बार-बार रेखांकित करना आवश्यक है।
एका किसी ‘कांग्रेस-विरोधी किसान विद्रोह’ के रूप में शुरू नहीं हुआ।
मालिहाबाद के कुछ कांग्रेस और खिलाफत कार्यकर्ताओं ने उसके आरंभिक संगठन में सहायता की। इसलिए प्रारंभिक संबंध था— सहयोग।
यहीं से बाद की दूरी को समझना चाहिए। यदि शुरू से दोनों अलग होते—
तो ‘दूरी बढ़ने’ का प्रश्न ही नहीं उठता।
21 मदारी पासी का उदय इस परिवर्तन का प्रतीक था
मदारी पासी का उभरना सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन नहीं था।
वह कांग्रेस के बाहर विकसित हो रही स्वायत्त किसान राजनीति का प्रतीक था। अब नेता— शहरी वकील नहीं; प्रांतीय कांग्रेस पदाधिकारी नहीं;
बल्कि गांव के सामाजिक संसार से निकला व्यक्ति था। उसकी वैधता राष्ट्रीय संगठन से नहीं—
किसानों के प्रत्यक्ष समर्थन से आती थी।
यही कांग्रेस के लिए नई परिस्थिति थी।
22 क्या मदारी कांग्रेस के विरोधी थे?
उपलब्ध प्रमाण उन्हें प्रारंभ से कांग्रेस-विरोधी नेता नहीं बनाते।
एका का प्रारंभिक वातावरण स्वयं कांग्रेस–खिलाफत सहयोग से बना था। लेकिन जैसे-जैसे किसान कार्यक्रम स्वतंत्र हुआ—
मदारी की प्राथमिकताएं कांग्रेस की रणनीति से अलग होने लगीं। इसलिए संबंध को—
सहयोग → स्वायत्तता → तनाव → दूरी के क्रम में समझना बेहतर है।
24 क्या एका लगान न देने लगा था?
इसलिए इसे प्रारंभ से blanket no-rent आंदोलन नहीं कहा जा सकता।
लेकिन किसान स्वयं तय करने लगा कि कौन-सी मांग ‘वैध’ है। यहीं कांग्रेस के लिए समस्या थी।
यदि हर ग्रामीण आंदोलन अपनी आर्थिक वैधता स्वयं तय करे—
तो राष्ट्रीय नेतृत्व का नियंत्रण सीमित होता है।
26 किसान हिंसा की वास्तविकता से इनकार नहीं किया जा सकता
बाराबंकी में जमींदार के चपरासी की हत्या— जैसी घटनाएं वास्तविक थीं।
इसलिए कांग्रेस की चिंता काल्पनिक नहीं थी।
यदि गांधी के राष्ट्रीय आंदोलन को अहिंसा पर टिकना था तो ऐसी कार्रवाइयां गंभीर राजनीतिक समस्या थीं। लेकिन प्रश्न यह है— क्या ये पूरी एका रणनीति थीं? उत्तर— नहीं।
28 कांग्रेस का प्रश्न था—हिंसा किसे कहते हैं?
गांधीवादी राजनीति में केवल हत्या ही हिंसा नहीं। धमकी; जबरदस्ती; सामाजिक बहिष्कार का दबाव;
भीड़ के माध्यम से किसी को विवश करना— भी समस्या हो सकती थी।
एका पंचायत के लिए यही साधन सामूहिक अनुशासन हो सकते थे।
इसलिए दोनों की हिंसा की परिभाषा भी पूरी तरह एक नहीं थी।
30 कांग्रेस के स्थानीय कार्यकर्ता भी एकमत नहीं थे
यह समझना जरूरी है कि ‘कांग्रेस’ एक व्यक्ति नहीं थी।
स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ता किसान के बहुत निकट हो सकते थे। किसी गांव का कार्यकर्ता— खुद किसान परिवार से; जमींदार से परेशान; पंचायत में शामिल— हो सकता था।
वहीं प्रांतीय और राष्ट्रीय नेतृत्व व्यापक रणनीति देख रहा था।
इसलिए नीचे और ऊपर की कांग्रेस नीति हमेशा पूरी तरह समान नहीं रही।
32 किशन लाल नेहरू की अतरौली यात्रा क्यों महत्वपूर्ण है?
फरवरी 1922 में कांग्रेस नेता किशन लाल नेहरू अतरौली पहुंचे। उनका उद्देश्य था—
आंदोलन में कांग्रेस का प्रभाव पुनः स्थापित करना।
लेकिन वहां उन्हें मदारी पासी पहले से प्रभावी नेतृत्व में मिले।
ज्ञानेंद्र पांडे की सामग्री के अनुसार मदारी तब आंदोलन पर लगभग पूर्ण नियंत्रण में दिखाई दिए और उसी समय एका नए गांवों में फैल रहा था। यह एक छोटी घटना नहीं।
यह कांग्रेस–एका संबंध का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
34 मदारी ने सण्डीला को केंद्र बनाया
इसके बाद मदारी का मालिहाबाद के प्रारंभिक कांग्रेस–खिलाफत नेटवर्क से संबंध कमजोर हुआ और आंदोलन का प्रभावी केंद्र सण्डीला की ओर चला गया।
यही भूगोल राजनीतिक परिवर्तन का प्रतीक है— मालिहाबाद = राष्ट्रीय नेटवर्क से सण्डीला = स्वतंत्र किसान नेतृत्व।
अब एका पर कांग्रेस का प्रभाव सीमित था।
35 कांग्रेस ने मदारी को क्यों नहीं अपनाया?
यह प्रश्न इतिहास की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। मदारी पासी— लोकप्रिय; किसानों में प्रभावशाली; निम्न सामाजिक समुदाय से; संगठन क्षमता वाले।
कांग्रेस उन्हें किसान नेता के रूप में अपनी संरचना में क्यों नहीं समाहित कर सकी? उत्तर का एक भाग— उनकी रणनीति और militancy। दूसरा— कांग्रेस की सामाजिक संरचना। तीसरा—
स्थानीय किसान कार्यक्रम और राष्ट्रीय नेतृत्व की प्राथमिकताओं का अंतर।
पांडे का अध्ययन विशेष रूप से इस असफल गठजोड़ को भारतीय राष्ट्रवाद की सीमा के रूप में देखता है।
एका आंदोलन का पतन : दमन, नेतृत्व का बिखराव, संगठनात्मक कमजोरियां और 1922 में आंदोलन का अंत
प्रमुख तथ्य
एका आंदोलन का पतन किसी एक घटना, एक गिरफ्तारी या एक राजनीतिक निर्णय का परिणाम नहीं था। न ही यह कहना पर्याप्त है कि आंदोलन ‘हिंसक हो गया और समाप्त हो गया’। 1921 के अंतिम महीनों में जिस तेजी से उत्तरी अवध में एका फैला था, 1922 के शुरुआती महीनों में लगभग उतनी ही तेजी से उसकी संगठित शक्ति कमजोर होने लगी। इसके पीछे कई कारक एक साथ काम कर रहे थे—औपनिवेशिक राज्य का संगठित दमन, कांग्रेस और खिलाफत नेतृत्व से बढ़ती दूरी, मदारी पासी जैसे केंद्रीय नेता का भूमिगत होना, गांव-आधारित संगठन की सीमाएं, स्थानीय कार्रवाइयों में एकरूपता का अभाव, हिंसक टकरावों से पैदा हुआ दबाव और चौरी चौरा के बाद राष्ट्रीय असहयोग आंदोलन की वापसी।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण कालक्रम-संबंधी सावधानी आवश्यक है।
मानक इतिहास-ग्रंथों में प्रायः लिखा मिलता है कि मार्च 1922 तक कठोर सरकारी दमन ने एका आंदोलन समाप्त कर दिया था। बिपन चंद्र और सहलेखकों का विवरण भी यही समय-सीमा देता है।
दूसरी ओर ज्ञानेंद्र पांडे के अधिक विस्तृत अभिलेखीय अध्ययन से पता चलता है कि मदारी पासी फरवरी 1922 में गिरफ्तारी से बच गए थे, उन पर 1,000 रुपये का इनाम घोषित हुआ और वे जून 1922 तक गिरफ्तार नहीं किए जा सके।
इसलिए ‘मार्च 1922 में एका समाप्त हो गया’ और ‘मदारी जून तक सक्रिय/भूमिगत रहे’—दोनों कथनों में आवश्यक रूप से विरोधाभास नहीं है।
मार्च 1922 तक एका की व्यापक, खुली और संगठित जन-लामबंदी निर्णायक रूप से टूट चुकी थी; उसके बाद उसके अवशेष, भूमिगत नेतृत्व और स्थानीय गतिविधियां कुछ समय तक बनी रहीं।
यही इस अध्याय की समयरेखा का आधार रहेगा।
3 पतन का पहला और सबसे बड़ा कारण — औपनिवेशिक दमन
इसका विस्तृत विवरण पिछले अध्याय में आ चुका है, इसलिए यहां घटनाओं की पुनरावृत्ति आवश्यक नहीं।
लेकिन पतन के संदर्भ में उसका परिणाम समझना जरूरी है।
ज्ञानेंद्र पांडे के अनुसार संयुक्त प्रांत की सरकार 1921 के अंत तक एका के राजनीतिक निहितार्थ को समझ चुकी थी और उसने एका तथा कांग्रेस संगठनों को तोड़ने के लिए अपने कठोर प्रशासनिक अधिकारों का प्रयोग किया। फरवरी 1922 में मदारी को पकड़ने के लिए व्यापक तैयारी की गई; कई हजार किसानों के इकट्ठा हो जाने से वह प्रयास विफल हुआ और मदारी की गिरफ्तारी पर 1,000 रुपये का इनाम घोषित किया गया।
यह केवल एक नेता की तलाश नहीं थी।
सरकार आंदोलन की संगठनात्मक रीढ़ पर प्रहार कर रही थी।
4 दमन का उद्देश्य आंदोलन को ‘हराना’ नहीं, उसे चलाना असंभव बनाना था
किसी जनांदोलन को समाप्त करने के लिए प्रत्येक सहभागी किसान को गिरफ्तार करना आवश्यक नहीं होता।
राज्य को केवल इतना करना होता है कि— सभा आयोजित करना कठिन हो जाए; नेता गांवों में घूम न सके; संदेश पहुंचना बंद हो; प्रमुख कार्यकर्ता मुकदमों में फंसें;
गांव को पुलिस कार्रवाई का भय हो;
और आंदोलन में शामिल होने की व्यक्तिगत कीमत बढ़ जाए। एका के साथ यही हुआ।
किसान मांगों से सहमत रह सकता था—
लेकिन आंदोलन में सक्रिय भागीदारी अधिक जोखिमपूर्ण होती चली गई।
5 मदारी पासी का भूमिगत होना—आंदोलन की शक्ति भी, कमजोरी भी
फरवरी में मदारी की गिरफ्तारी रोकने के लिए हजारों किसान जमा हुए।
यह उनके प्रभाव की चरम अभिव्यक्ति थी।
लेकिन इसके बाद मदारी को गिरफ्तारी से बचना पड़ा। व्यक्तिगत स्तर पर यह सफलता थी— सरकार उन्हें तत्काल नहीं पकड़ सकी। संगठनात्मक स्तर पर यह समस्या थी।
क्योंकि अब आंदोलन का सबसे प्रभावशाली नेता खुले तौर पर— सभा; गांव यात्रा; पंचायत; संगठन विस्तार— नहीं कर सकता था। अर्थात नेता बच गया—
लेकिन उसकी खुले जननेतृत्व की क्षमता सीमित हो गई।
10 आंदोलन के पास एक समान रणनीति नहीं रही
एका की मूल शपथ काफी स्पष्ट थी।
लेकिन जमीन पर कार्रवाई अलग-अलग रूप लेने लगी। कहीं— अतिरिक्त लगान से इनकार। कहीं— बेगार बंद। कहीं— बेदखली रोकना। कहीं— अनाज वापस लेना। कहीं— जमींदार के कर्मचारियों को घेरना। और कुछ स्थानों पर— हिंसक टकराव।
इस विविधता ने आंदोलन को जीवंत बनाया— लेकिन केंद्रीय अनुशासन कमजोर किया।
12 पहला परिणाम—कांग्रेस से दूरी
गांधीवादी असहयोग आंदोलन की केंद्रीय शर्त अहिंसा थी।
एका में हिंसक घटनाएं बढ़ने पर कांग्रेस के लिए आंदोलन का खुला समर्थन कठिन होता गया। जैसा पिछले अध्याय में देखा गया—
यह दूरी केवल हिंसा के कारण नहीं थी;
जमींदार–किसान संबंध और स्वतंत्र ग्रामीण नेतृत्व का प्रश्न भी था।
लेकिन हिंसा ने दूरी को वैचारिक औचित्य अवश्य दिया।
13 दूसरा परिणाम—सरकारी दमन को औचित्य
औपनिवेशिक प्रशासन किसान आंदोलन को कानून-व्यवस्था के खतरे के रूप में प्रस्तुत कर सकता था। यदि पुलिस पर हमला; जमींदार कर्मचारी की हत्या; या हिंसक घेराव—
हो तो सरकार के लिए यह कहना आसान था कि वह ‘कृषि विवाद’ नहीं बल्कि ‘अपराध’ नियंत्रित कर रही है। राजनीतिक मांग— आपराधिक अभियोजन— में बदल सकती थी।
यह एका के लिए गंभीर रणनीतिक नुकसान था।
15 क्या ‘हिंसा’ ही एका की विफलता का कारण थी?
यह इतिहास का अत्यधिक गांधी-केंद्रित सरलीकरण होगा। यदि सरकार दमन न करती; नेतृत्व सुरक्षित रहता; कांग्रेस सहयोग जारी रहता; और संगठन अधिक संस्थागत होता—
तो केवल कुछ हिंसक घटनाएं अनिवार्य रूप से आंदोलन समाप्त नहीं करतीं।
इसलिए हिंसा को एक कारण माना जाना चाहिए— मुख्य और अकेला कारण नहीं।
16 कांग्रेस से अलगाव ने क्या बदल दिया?
एका की प्रारंभिक गति कांग्रेस और खिलाफत कार्यकर्ताओं की सहायता से बनी थी।
लेकिन बाद में आंदोलन स्वतंत्र स्थानीय नेतृत्व के हाथ में चला गया और राष्ट्रवादियों से उसका संपर्क कम हुआ। इससे किसान ने स्वायत्तता प्राप्त की। लेकिन साथ ही उसने खोया— राष्ट्रीय संगठनात्मक नेटवर्क; राजनीतिक प्रचार; कांग्रेस नेतृत्व की प्रतिष्ठा; और व्यापक औपनिवेशिक-विरोधी आंदोलन की सुरक्षा।
यही एका की सबसे बड़ी रणनीतिक दुविधाओं में से एक थी।
19 असहयोग की वापसी का मनोवैज्ञानिक प्रभाव
1921 में गांवों में यह भावना फैल रही थी— देश बदल रहा है; स्वराज निकट है; सरकार कमजोर पड़ रही है; गांधी का आंदोलन बढ़ रहा है।
फरवरी 1922 में राष्ट्रीय आंदोलन स्थगित होने से इस वातावरण को झटका लगा। अब औपनिवेशिक प्रशासन को संकेत मिला—
राष्ट्रीय आंदोलन की केंद्रीय लामबंदी रुक गई है। एका के लिए इसका अर्थ था—
वह अब बड़े राष्ट्रीय राजनीतिक ज्वार का हिस्सा कम और स्थानीय विद्रोह अधिक दिखाई देने लगा। यह परिवर्तन बहुत महत्वपूर्ण था।
20 क्या गांधी ने एका बंद कराया?
ऐसा कहना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा।
गांधी ने राष्ट्रीय असहयोग आंदोलन स्थगित किया।
एका अपने स्थानीय संगठन और नेतृत्व के साथ अलग अस्तित्व रखता था। उसका दमन औपनिवेशिक सरकार ने किया।
लेकिन असहयोग की वापसी ने राजनीतिक वातावरण बदल दिया और एका के अलगाव को बढ़ाया।
यह कारण और संदर्भ के बीच आवश्यक अंतर है।
21 फरवरी–मार्च 1922—एका के लिए निर्णायक दो महीने
खुले आंदोलन का तेजी से कमजोर होना।
इसीलिए मानक इतिहास मार्च 1922 को एका के अंत की सीमा मानता है।
24 आंदोलन की आर्थिक लागत
एका में शामिल किसान पहले से ही आर्थिक संकट में था। उसके सामने— लगान; कर्ज; फसल; परिवार— की समस्या थी।
अब आंदोलन से जुड़ने की अतिरिक्त लागत— सभा में जाना; गिरफ्तारी; मुकदमे का खर्च; खेती से अनुपस्थिति; पुलिस कार्रवाई— जुड़ गई।
दीर्घकालीन संघर्ष के लिए आर्थिक सहायता-तंत्र आवश्यक था।
एका के पास ऐसा व्यापक स्थायी कोष होने का प्रमाण नहीं मिलता। यह एक गंभीर संगठनात्मक सीमा थी।
29 संगठन की मांगें भी पूरी तरह एकसमान नहीं थीं
ठेकेदार से परेशान किसान की समस्या अलग।
साझा शत्रु और साझा शपथ ने इन्हें जोड़ा।
लेकिन लंबे संघर्ष में प्रश्न उठता है—
यदि कुछ मांगें पूरी हों और कुछ न हों तो कौन जारी रहेगा?
ऐसे सामाजिक गठबंधन को बनाए रखने के लिए मजबूत केंद्रीय राजनीतिक कार्यक्रम चाहिए। एका के पास वह सीमित था।
30 छोटे जमींदारों की भागीदारी—शक्ति भी, अंतर्विरोध भी
छोटे जमींदारों की भागीदारी एका को विशिष्ट बनाती है। लेकिन सोचिए— काश्तकार अधिक अधिकार चाहता है।
छोटा जमींदार सरकारी राजस्व से राहत चाहता है।
दोनों बड़े तालुकेदार और राज्य के विरुद्ध साथ आ सकते हैं।
लेकिन भूमि संबंधों के प्रश्न पर उनके हित हमेशा समान नहीं।
इसलिए गठबंधन की एक स्वाभाविक सीमा थी।
34 क्या आंदोलन मदारी पर अत्यधिक निर्भर था?
उपलब्ध घटनाक्रम से ऐसा काफी हद तक दिखाई देता है। सरकार भी यही समझती थी। इसीलिए—
फरवरी में उन्हें पकड़ने की बड़ी तैयारी; 1,000 रुपये इनाम; लगातार तलाश— हुई। औपनिवेशिक प्रशासन जानता था—
यदि आंदोलन पूरी तरह संस्थागत और बहु-नेतृत्व वाला होता तो एक व्यक्ति पर इतना ध्यान पर्याप्त नहीं होता।
मदारी की केंद्रीयता स्वयं आंदोलन की संरचनात्मक कमजोरी का संकेत है।
35 लेकिन मदारी की गिरफ्तारी की तारीख पर भ्रम
मार्च 1922 में मदारी गिरफ्तार हुए और आंदोलन समाप्त हुआ।
लेकिन पांडे के अभिलेख-आधारित अध्ययन में साफ है—
फरवरी में गिरफ्तारी का प्रयास विफल हुआ; 1,000 रुपये इनाम घोषित हुआ;
और मदारी जून 1922 तक नहीं पकड़े गए।
एक अन्य राजनीतिक इतिहास भी उनकी गिरफ्तारी जून 1922 में रखता है।
इसलिए हमारी समयरेखा में जून 1922 को प्राथमिकता देना अधिक उचित है।
36 लेकिन IGNOU स्रोत अलग बात क्यों कहता है?
IGNOU की इतिहास सामग्री सरकारी दमन को एका की विफलता का केंद्रीय कारण बताती है, लेकिन उसमें यह भी कहा गया है कि मदारी पासी गिरफ्तार नहीं किए जा सके। इससे स्पष्ट है—
मदारी के अंतिम गिरफ्तारी-क्रम पर द्वितीयक स्रोत एकमत नहीं।
इस शोध में इसलिए सबसे मजबूत समकालीन-अभिलेख आधारित विवरण को प्राथमिकता दी जाएगी— लेकिन स्रोत-विरोध को छिपाया नहीं जाएगा।
39 इसलिए इसे ‘असफल किसान आंदोलन’ कहना भी अधूरा है
इसलिए ‘पतन’ और ‘ऐतिहासिक विफलता’ समान शब्द नहीं।
42 पंचायत बनाम अदालत
यानी संघर्ष केवल लगान का नहीं था।
दो प्रकार की वैधता टकरा रही थीं। पंचायत के पास सामाजिक वैधता थी—
लेकिन राज्य के पास दंड देने की कानूनी शक्ति।
लंबे संघर्ष में दूसरी शक्ति भारी पड़ी।
एका आंदोलन की उपलब्धियां, सीमाएं और किसान राजनीति पर प्रभाव
प्रमुख तथ्य
एका आंदोलन केवल 1921–22 के कुछ महीनों का किसान विद्रोह नहीं था। उसकी ऐतिहासिक महत्ता इस बात से तय नहीं होती कि वह ब्रिटिश सरकार को पराजित कर सका या नहीं, अथवा उसने तत्काल जमींदारी व्यवस्था समाप्त कर दी या नहीं। उसका महत्व इस बात में है कि उसने किसान को एक स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति के रूप में सामने लाया, स्थानीय कृषि शिकायतों को संगठित प्रतिरोध में बदला, निम्न सामाजिक पृष्ठभूमि से नेतृत्व उभारा और राष्ट्रीय आंदोलन तथा ग्रामीण वर्ग-संघर्ष के बीच मौजूद तनाव को उजागर किया।
इसीलिए एका की उपलब्धियों और सीमाओं का मूल्यांकन केवल ‘सफल’ अथवा ‘असफल’ की दो श्रेणियों में नहीं किया जा सकता।
ज्ञानेंद्र पांडे एका को 1920–21 की अवध किसान सभा लहर की निरंतरता मानते हैं। उनके अनुसार पहली लहर दबाए जाने के बाद वही मूल सामाजिक शक्तियां कुछ महीनों बाद उत्तरी अवध में नए रूप—एका—में फिर उभरीं। प्रारंभ में कांग्रेस और खिलाफत कार्यकर्ताओं से सहायता मिलने के बावजूद आंदोलन तेजी से अपनी स्वतंत्र दिशा में बढ़ा और रिकॉर्डेड रेंट से अधिक भुगतान का प्रतिरोध, अनाज-लगान को नकद लगान में बदलने की मांग तथा औपनिवेशिक शासन से असहयोग तक पहुंच गया।
दमन किसान राजनीति को समाप्त नहीं कर सका।
4 एका की आर्थिक उपलब्धियां कितनी थीं?
ऐसा प्रमाण नहीं कि एका ने पूरे प्रभावित क्षेत्र में—
लगान स्थायी रूप से कम करा दिया; बेगार समाप्त करा दी; नजराना खत्म कर दिया;
या किसानों को स्थायी भूमि-अधिकार दिला दिए।
मार्च 1922 तक सरकार ने आंदोलन की खुली शक्ति दबा दी। सरकारी विवरण भी कठोर repression—दमन—को उसके अंत का कारण बताता है।
इसलिए तत्काल आर्थिक उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बताना चाहिए।
एका की सबसे बड़ी उपलब्धि नीति परिवर्तन से अधिक किसान की सौदेबाजी शक्ति और राजनीतिक चेतना का विस्तार थी।
8 मदारी पासी का महत्व केवल उनकी जाति नहीं थी
मदारी का ऐतिहासिक महत्व इस बात में नहीं कि वे केवल पासी समुदाय के नेता थे। महत्व यह था कि—
निम्न सामाजिक पृष्ठभूमि से आया व्यक्ति बहुस्तरीय ग्रामीण किसान आंदोलन का नेतृत्व कर सकता था।
यह स्थापित ग्रामीण पदानुक्रम को चुनौती थी। नेतृत्व का अधिकार अब केवल— शिक्षित; संपन्न; ऊंची जातीय स्थिति वाले; या शहर से आए— लोगों तक सीमित नहीं रहा।
यह ग्रामीण लोकतंत्रीकरण की प्रारंभिक अभिव्यक्ति थी।
9 क्या एका जाति-व्यवस्था समाप्त कर सका?
इसलिए एका को पूर्ण जाति-विरोधी सामाजिक क्रांति कहना उचित नहीं होगा।
उसकी उपलब्धि इससे अधिक सीमित लेकिन महत्वपूर्ण थी—
आर्थिक संघर्ष के दौरान अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच राजनीतिक सहयोग संभव करना। यह जाति का उन्मूलन नहीं—
जाति के ऊपर अस्थायी किसान पहचान का निर्माण था।
12 पंचायत — एका की दीर्घकालीन राजनीतिक विरासत
एका पंचायतें किसी आधुनिक निर्वाचित ग्राम सरकार की तरह नहीं थीं। लेकिन उनका महत्व था— ग्रामीण विवाद का सामूहिक निर्णय; आंदोलन का अनुशासन; आर्थिक नियम पर सामूहिक सहमति;
और जमींदार की एकतरफा सत्ता के विकल्प की कल्पना।
किसान पहली बार नहीं, लेकिन बहुत प्रभावी ढंग से यह कह रहा था—
गांव का निर्णय केवल ऊपर से नहीं आएगा।
यही पंचायत-आधारित सामूहिकता बाद की किसान राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण अनुभव थी।
13 क्या एका ने ‘समानांतर सरकार’ बनाई?
कुछ औपनिवेशिक विवरण एका पंचायतों को बहुत उग्र वैकल्पिक प्रशासन की तरह प्रस्तुत करते हैं।
लेकिन पूरे आंदोलन के लिए समानांतर सरकार स्थापित होने का पर्याप्त प्रमाण नहीं। पंचायत का वास्तविक महत्व था— स्थानीय वैकल्पिक प्राधिकार। यह राज्य का पूर्ण विकल्प नहीं—
लेकिन उसकी वैधता को चुनौती देने वाला ग्रामीण केंद्र था।
17 कांग्रेस के लिए एका की सबसे बड़ी शिक्षा
किसान को आंदोलन में बुलाना आसान है;
लेकिन उसकी मांगों को नियंत्रित करना कठिन। किसान केवल— ब्रिटिश शासन; स्वराज; विदेशी कपड़ा— की बात नहीं करेगा। वह पूछेगा— मेरा लगान? मेरी जमीन? मेरी बेदखली? मेरी बेगार?
इसीलिए किसान राजनीति को राष्ट्रीय आंदोलन में स्थायी रूप से समाहित करने के लिए स्वतंत्र किसान कार्यक्रम आवश्यक होगा।
आगे 1930 के दशक में यही प्रश्न और अधिक स्पष्ट हुआ।
21 राष्ट्रीय आंदोलन को ‘किसान प्रश्न’ से बचना असंभव हुआ
इन सबने मिलकर कांग्रेस के सामने स्पष्ट कर दिया—
भारत की विशाल ग्रामीण आबादी को राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल करना है तो कृषि प्रश्न को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
INFLIBNET का अध्ययन भी किसान सभा, अवध किसान सभा और एका को उसी विकासक्रम में रखता है जिसमें राष्ट्रवादी नेतृत्व और कृषक मांगों के बीच बार-बार तनाव पैदा हुआ।
यह एका की व्यापक राजनीतिक उपलब्धि थी।
26 पांचवीं सीमा — मजबूत केंद्रीय संस्थान का अभाव
यह तेजी से फैलने वाला आंदोलन था— दीर्घकालीन संस्थागत संगठन नहीं।
दमन के समय यही सीमा निर्णायक बनी।
30 नौवीं सीमा — अल्प अवधि
एका का व्यापक सक्रिय चरण कुछ ही महीनों का था। इतने कम समय में— संगठन फैलाना; कार्यकर्ता प्रशिक्षित करना; सामाजिक अंतर्विरोध सुलझाना; राष्ट्रीय सहयोग बनाना; और राज्य दमन का सामना करना— बहुत कठिन था।
दीर्घकालीन किसान संगठन बनाने के लिए समय ही नहीं मिला।
34 किसान राजनीति पर पहला दीर्घकालीन प्रभाव — ‘किसान’ एक राजनीतिक पहचान
के बावजूद सामूहिक संघर्ष के दौरान एक नई पहचान बनी— किसान। यह पूर्ण वर्ग चेतना नहीं थी।
लेकिन पर्याप्त थी यह कहने के लिए— हमारी कुछ साझा आर्थिक समस्याएं हैं;
और हम मिलकर उनका प्रतिरोध कर सकते हैं।
यही पहचान आगे किसान सभाओं के लिए बुनियादी राजनीतिक संसाधन बनी।
38 पांचवां प्रभाव — जमींदारी प्रश्न राजनीति के केंद्र में
एका स्वयं पूर्ण जमींदारी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं था।
लेकिन उसकी मांगों ने जमींदारी अधिकार की व्यावहारिक सीमाओं पर प्रश्न उठा दिया। आगे किसान राजनीति अधिक दूर जाएगी।
1936 की अखिल भारतीय किसान सभा के कार्यक्रम में जमींदारी उन्मूलन, ग्रामीण ऋण मुक्ति, भू-राजस्व कमी और जोतने वाले को भूमि-अधिकार जैसे अधिक व्यापक लक्ष्य सामने आए। अर्थात कृषि राजनीति की दिशा धीरे-धीरे— ‘जमींदार कितना ले?’ से ‘जमींदारी रहे क्यों?’ की ओर बढ़ी।
एका इस संक्रमण की शुरुआती सीढ़ियों में था।
39 छठा प्रभाव — किसान के लिए कानून की नई समझ
एका किसान ने औपनिवेशिक कानून को दो तरह से अनुभव किया। एक ओर— recorded rent उसके बचाव का आधार। दूसरी ओर—
बेदखली, पुलिस, मुकदमा और जमींदार के अधिकार उसी कानून से संरक्षित।
इस अनुभव ने किसान को यह समझने में सहायता की कि— कानून हमेशा निष्पक्ष सामाजिक न्याय नहीं। वह सत्ता-संबंधों का भी हिस्सा है।
यह किसान राजनीतिक चेतना का महत्वपूर्ण विकास था।
43 क्या एका का राष्ट्रवादी आंदोलन पर प्रभाव था?
प्रत्यक्ष राष्ट्रीय नीति-निर्धारण पर उसका प्रभाव सीमित था।
लेकिन व्यापक स्तर पर किसान आंदोलनों ने राष्ट्रवादी आंदोलन को ग्रामीण समाज में पहुंचाया।
सरकारी भारतीय संस्कृति पोर्टल मदारी पासी और एका जैसे आंदोलनों को राष्ट्रवादी आंदोलन को जनता के बीच लोकप्रिय बनाने वाले संघर्षों में रखता है।
इस कथन का सबसे सुरक्षित अर्थ है—
राष्ट्रीय राजनीति गांव की स्थानीय कृषि दुनिया से जुड़ गई।
‘ब्रिटिश राज’ अब दूर दिल्ली या लखनऊ का प्रश्न नहीं रहा—
वह किसान के थाने, अदालत, लगान और जमींदार के अनुभव में दिखाई दिया।
47 बारडोली से तुलना से क्या सीख मिलती है?
1928 का बारडोली सत्याग्रह अधिक सुव्यवस्थित था— संगठित नेतृत्व; स्पष्ट मांग; कठोर अहिंसक अनुशासन; सूचना नेटवर्क; कांग्रेस समर्थन; राष्ट्रीय प्रचार।
एका में किसान ऊर्जा अत्यंत मजबूत थी—
लेकिन इनमें से कई संस्थागत तत्व कमजोर।
इसलिए एका की विफलता आगे किसान आंदोलन की रणनीति के लिए एक अप्रत्यक्ष शिक्षा की तरह पढ़ी जा सकती है—
सिर्फ असंतोष और संख्या पर्याप्त नहीं; संगठन और अनुशासन भी जरूरी हैं।
इसे सीधे ‘बारडोली ने एका से सीखा’ नहीं कहना चाहिए—उसका प्रमाण नहीं है।
51 एका की उपलब्धियां — संक्षेप में
अगर आंदोलन की प्रमुख उपलब्धियों को एक जगह रखें तो वे थीं— किसान राजनीतिक चेतना का विस्तार। जमींदारी मनमानी पर सामूहिक प्रश्न।
रिकॉर्डेड लगान और रसीद जैसी अधिकार-आधारित मांग।
बेगार और बेदखली के विरुद्ध सामूहिक प्रतिरोध।
पंचायत को किसान संगठन का केंद्र बनाना।
निम्न सामाजिक पृष्ठभूमि से स्वतंत्र ग्रामीण नेतृत्व का उभार।
हिन्दू–मुस्लिम और विभिन्न ग्रामीण सामाजिक समूहों को कृषि प्रश्न पर जोड़ने की क्षमता।
राष्ट्रीय आंदोलन से अलग किसान राजनीति की संभावना दिखाना।
औपनिवेशिक राज्य और स्थानीय भू-स्वामी सत्ता के संबंध को प्रत्यक्ष अनुभव में लाना।
इनमें सबसे अधिक स्थायी उपलब्धि पहली और पांचवीं–आठवीं श्रेणियों की थी।
56 एका के बाद सबसे बड़ा बदलाव क्या था?
भारतीय राजनीति के लिए किसान को वापस केवल ‘रैयत’ बनाना कठिन हो गया। वह अब— मतदाता बनने से पहले; नागरिक बनने से पहले— एक राजनीतिक किसान बन चुका था।
उसकी भूमि समस्या राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा बन रही थी।
और यही प्रक्रिया आगे स्वतंत्र भारत के भूमि सुधार और जमींदारी उन्मूलन की राजनीति की सामाजिक पृष्ठभूमि में योगदान करेगी। लेकिन यहां फिर सावधानी—
यह कहना कि जमींदारी उन्मूलन सीधे एका की उपलब्धि था, गलत होगा।
वह बहुत व्यापक और दीर्घकालीन राजनीतिक प्रक्रियाओं का परिणाम था।
58 मदारी पासी की विरासत
मदारी की सबसे बड़ी विरासत किसी एक नीति की सफलता नहीं। वह इस ऐतिहासिक तथ्य में है—
ग्रामीण निम्न सामाजिक पृष्ठभूमि का व्यक्ति औपनिवेशिक काल में व्यापक किसान राजनीतिक नेतृत्व का केंद्र बन सकता था।
यह तथ्य भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति के दीर्घ इतिहास में महत्वपूर्ण है।
उनकी स्मृति का बाद में कमजोर पड़ना स्वयं इतिहासलेखन का प्रश्न है—
जिसे अगले अध्याय में विस्तार से लिया जाएगा।
निष्कर्ष — एका की तात्कालिक हार, किसान राजनीति की दीर्घकालीन उपलब्धि
एका आंदोलन 1922 में औपनिवेशिक सत्ता को पराजित नहीं कर सका। उसने जमींदारी व्यवस्था समाप्त नहीं की। किसानों को सार्वभौमिक भूमि-अधिकार नहीं दिलाया।
उसकी संगठनात्मक संरचना कठोर राज्य-दमन झेलने के लिए पर्याप्त मजबूत नहीं थी। उसका कांग्रेस से गठबंधन टूट गया।
और कुछ महीनों में उसका व्यापक खुला आंदोलन दबा दिया गया। सरकारी हरदोई विवरण भी मार्च 1922 तक कठोर दमन से आंदोलन समाप्त होने की बात स्वीकार करता है।
लेकिन यदि यहीं इतिहास समाप्त कर दें तो एका का वास्तविक महत्व दिखाई नहीं देगा।
उसने यह सिद्ध किया कि पहली अवध किसान लहर का दमन किसान प्रश्न को खत्म नहीं कर पाया था। कुछ ही महीनों बाद वही संघर्ष उत्तरी अवध में नए रूप में उभरा। ज्ञानेंद्र पांडे इसी कारण एका को किसान सभा आंदोलन की निरंतरता बताते हैं।
अकेले की जगह सामूहिक निर्णय संभव है। जमींदार की हर मांग वैध नहीं।
बेगार से इनकार किया जा सकता है। बेदखली का सामूहिक प्रतिरोध संभव है।
पंचायत आर्थिक संघर्ष की राजनीतिक संस्था बन सकती है।
मदारी पासी इसी परिवर्तन के प्रतीक बने।
एका की उपलब्धि यह भी थी कि उसने राष्ट्रीय आंदोलन और किसान राजनीति के बीच संबंध का एक कठिन प्रश्न उजागर किया। कांग्रेस और खिलाफत कार्यकर्ताओं ने उसकी शुरुआत में सहायता की, लेकिन आंदोलन अपनी स्वतंत्र दिशा में आगे निकल गया। पांडे के शब्दों में इसी स्वायत्तता और कांग्रेस के साथ अस्पष्ट संबंध ने उसे विशेष ऐतिहासिक महत्व दिया।
1936 में अखिल भारतीय किसान सभा जब जमींदारी उन्मूलन, ऋण मुक्ति, राजस्व कटौती और भूमि जोतने वाले के अधिकार जैसे अधिक संरचनात्मक प्रश्न उठाती है, तब भारतीय किसान राजनीति एका की तुलना में कहीं अधिक संस्थागत चरण में पहुंच चुकी थी।
‘किसान’ को केवल करदाता या काश्तकार नहीं, एक स्वतंत्र राजनीतिक समुदाय के रूप में स्थापित करना।
इसी कारण एका की पराजय 1922 में हो सकती है—
लेकिन उसकी कहानी भारतीय किसान राजनीति में वहीं समाप्त नहीं होती। स्रोतगत टिप्पणी
एका का अधिक विश्वसनीय दीर्घकालीन प्रभाव तीन स्तरों पर देखा जाना चाहिए—किसान राजनीतिक चेतना, स्वतंत्र ग्रामीण नेतृत्व और राष्ट्रीय आंदोलन तथा कृषक मांगों के बीच स्वायत्तता का प्रश्न। इस अर्थ में ज्ञानेंद्र पांडे का अध्ययन केंद्रीय है; वह एका को पहले अवध किसान संघर्ष की निरंतरता और कांग्रेस से जटिल संबंध रखने वाली स्वतंत्र किसान राजनीति के रूप में प्रस्तुत करता है।
एका आंदोलन का इतिहासलेखन : औपनिवेशिक अभिलेख, फॉनथॉर्प रिपोर्ट, राष्ट्रवादी व्याख्या, सबाल्टर्न अध्ययन और मदारी पासी का पुनर्मूल्यांकन
प्रमुख तथ्य
एका आंदोलन का इतिहास केवल यह जानने का विषय नहीं है कि 1921–22 में क्या हुआ। उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न है— हमें यह सब पता कैसे चला? किन अभिलेखों से? किसने लिखा? किस उद्देश्य से लिखा?
और बाद के इतिहासकारों ने उन्हीं स्रोतों को अलग-अलग ढंग से क्यों पढ़ा?
एका के मामले में यह प्रश्न विशेष महत्व रखता है, क्योंकि आंदोलन के अपने लिखित दस्तावेज बहुत कम बचे हैं। हमारे पास न तो किसी सुव्यवस्थित ‘एका केंद्रीय समिति’ के मिनट्स हैं, न विस्तृत सदस्यता रजिस्टर, न मदारी पासी द्वारा लिखी कोई व्यवस्थित आत्मकथा, और न गांव-दर-गांव किसानों के अपने बयान पर्याप्त संख्या में सुरक्षित हैं।
इसके विपरीत जो अभिलेख अपेक्षाकृत अधिक उपलब्ध हैं, वे बने— औपनिवेशिक अधिकारियों द्वारा; पुलिस द्वारा; जिला प्रशासन द्वारा; कांग्रेस और राष्ट्रवादी नेताओं द्वारा; समकालीन समाचारपत्रों द्वारा; और बाद के इतिहासकारों द्वारा।
ज्ञानेंद्र पांडे ने अपने प्रसिद्ध अध्ययन *Peasant Revolt and Indian Nationalism: The Peasant Movement in Awadh, 1919–1922* की शुरुआत ही इस समस्या से की। उनका मूल तर्क था कि अवध किसान आंदोलन पर औपनिवेशिक अधिकारी और शहरी राष्ट्रवादी नेतृत्व दोनों ने विस्तृत भाष्य छोड़े, लेकिन दोनों की अपनी राजनीतिक चिंताएं थीं; इसलिए किसान की स्वतंत्र राजनीतिक चेतना को उन स्रोतों के बीच से पुनर्निर्मित करना आवश्यक है।
1 एका के इतिहास के स्रोत चार प्रमुख श्रेणियों में
एका के अध्ययन के स्रोत मोटे तौर पर चार स्तरों पर रखे जा सकते हैं। पहला — औपनिवेशिक प्रशासनिक स्रोत इनमें शामिल हैं— पुलिस रिपोर्ट; जिला मजिस्ट्रेट की रिपोर्ट; प्रांतीय सरकार का पत्राचार; गृह विभाग की राजनीतिक फाइलें; राजस्व संबंधी दस्तावेज; और विशेष जांच रिपोर्टें। इनका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है—
लेफ्टिनेंट-कर्नल जे. सी. फॉनथॉर्प की एका आंदोलन संबंधी रिपोर्ट। दूसरा — राष्ट्रवादी स्रोत इनमें— कांग्रेस रिपोर्ट; जवाहरलाल नेहरू के लेख और भाषण; गांधी के निर्देश; कांग्रेस कार्यकर्ताओं के पत्र; खिलाफत कार्यकर्ताओं की गतिविधियों के विवरण— आते हैं। तीसरा — बाद का राष्ट्रीय इतिहासलेखन जैसे—
बिपन चंद्र और सहयोगियों का *India's Struggle for Independence*; सुमित सरकार का *Modern India*;
और स्वतंत्रता आंदोलन के अन्य मानक इतिहास। चौथा — आलोचनात्मक और सबाल्टर्न इतिहासलेखन विशेष रूप से— ज्ञानेंद्र पांडे;
इन सभी स्रोत-परंपराओं को साथ पढ़े बिना एका की संपूर्ण तस्वीर नहीं बनती।
2 फॉनथॉर्प रिपोर्ट क्या थी?
एका के सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिक औपनिवेशिक स्रोतों में एक है—
Lt. Col. J. C. Faunthorpe की रिपोर्ट।
संयुक्त प्रांत सरकार ने उन्हें एका आंदोलन की जांच के लिए विशेष रूप से नियुक्त किया था।
ज्ञानेंद्र पांडे द्वारा उद्धृत मूल संदर्भ के अनुसार फॉनथॉर्प ने लिखा—
“The Eka movement … is a revival of the Kisan Sabha movement.”
यह रिपोर्ट *United Provinces Gazette*, 13 मई 1922, भाग VIII में प्रकाशित हुई थी। पांडे इसे अपने अध्ययन में लगातार “Faunthorpe's Report” के रूप में उद्धृत करते हैं।
यह स्रोत इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि फॉनथॉर्प आंदोलन के समाप्त होने के बहुत निकट समय में लिख रहे थे।
वे बाद की स्मृति पर निर्भर इतिहासकार नहीं थे।
वे स्वयं औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा जांच के लिए भेजे गए अधिकारी थे। इसलिए उनके पास— पुलिस सूचना; जिला रिपोर्ट; अधिकारियों के बयान; स्थानीय घटनाओं की प्रशासनिक जानकारी— उपलब्ध थी।
लेकिन इसी तथ्य में इस स्रोत की शक्ति और सीमा दोनों हैं।
4 लेकिन फॉनथॉर्प निष्पक्ष दर्शक नहीं थे
आंदोलन को समझना ताकि प्रशासन उसे नियंत्रित कर सके।
उनका प्राथमिक प्रश्न किसान इतिहास नहीं था। प्रश्न था— कानून-व्यवस्था क्यों बिगड़ रही है? किसका नेतृत्व है? कहां कितनी सभा? किससे खतरा? कौन गिरफ्तार किया जाए? सरकार को कितनी शक्ति लगानी चाहिए? इसलिए उनकी रिपोर्ट स्वाभाविक रूप से— सभा; उग्र भाषण; पुलिस टकराव; अवैध वसूली-विरोध; नेताओं; और हिंसा— पर अधिक ध्यान देती है।
शांतिपूर्वक एकजुट होकर अतिरिक्त लगान न देने वाले हजारों किसानों की तुलना में पुलिस से टकराने वाला गांव अभिलेख में अधिक विस्तार से दिखाई देगा। यही archival bias—अभिलेखीय पक्षपात है।
5 औपनिवेशिक स्रोत किसान को किस श्रेणी में रखते थे?
इसलिए किसान कार्रवाई को ऐसी श्रेणियों में दर्ज किया जा सकता था— अवैध जमाव; दंगा; हमला; सरकारी कार्य में बाधा; धमकी; उत्तेजना; अपराध।
किसान उसी कार्रवाई को कह सकता था— बेदखली का प्रतिरोध; अन्यायपूर्ण लगान का विरोध; अपने नेता की रक्षा; या पंचायत के निर्णय का पालन।
अर्थात एक ही घटना के दो अर्थ थे।
यही कारण है कि इतिहासकार को औपनिवेशिक अपराध-श्रेणियों को बिना आलोचना स्वीकार नहीं करना चाहिए।
9 राष्ट्रवादी स्रोत भी निष्पक्ष नहीं थे
यदि औपनिवेशिक अभिलेख की अपनी दृष्टि थी— तो कांग्रेस की भी थी।
कांग्रेस किसानों की वैध शिकायत स्वीकार कर सकती थी।
सरकारी दमन की आलोचना कर सकती थी।
लेकिन उसे गांधीवादी अहिंसा भी बनाए रखनी थी।
वह व्यापक राष्ट्रीय गठबंधन बचाना चाहती थी।
इसलिए कांग्रेस दस्तावेजों में किसान संघर्ष को देखने की कसौटी कई बार यह बन जाती है—
क्या वह राष्ट्रीय आंदोलन के अनुशासन के भीतर है? क्या हिंसा हुई?
क्या स्थानीय नेतृत्व कांग्रेस की बात मान रहा है? यह भी एक राजनीतिक दृष्टिकोण था।
10 गांधीवादी स्रोतों की सीमा
गांधी की दृष्टि से किसान की नैतिक शक्ति महत्वपूर्ण थी—
लेकिन हिंसक या जबरदस्ती वाला वर्ग-संघर्ष स्वीकार्य नहीं। इसलिए यदि किसान— जमींदार का सामाजिक बहिष्कार करे; कारिंदे को घेर ले; अनाज वापस ले;
बेदखली रोकने के लिए बल प्रयोग करे—
तो गांधीवादी स्रोत उसे अनुशासनहीनता की दिशा में पढ़ सकते थे।
किसान स्वयं उसे न्यायपूर्ण रक्षा कह सकता था।
इसीलिए ‘अहिंसा’ का प्रश्न भी स्रोतगत दृष्टिकोण से प्रभावित है।
11 जवाहरलाल नेहरू के स्रोत अलग क्यों हैं?
जवाहरलाल नेहरू के लेख और भाषण महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे किसान शिकायत को वास्तविक मानते हैं।
1921 के अपने लेखन में उन्होंने स्पष्ट रूप से उन दावों को चुनौती दी जिनमें किसान आंदोलन को केवल बाबा रामचंद्र या अन्य ‘agitators’ द्वारा भड़काया हुआ बताया गया था।
अर्थात राष्ट्रीय नेतृत्व के भीतर भी किसान प्रश्न की अलग संवेदनशीलताएं थीं।
यही कारण है कि कांग्रेस स्रोतों को भी एकसमान दृष्टि नहीं माना जा सकता।
14 सबाल्टर्न इतिहासलेखन ने प्रश्न बदल दिया
1982 में रणजीत गुहा के संपादन में *Subaltern Studies I* प्रकाशित हुआ।
उसका उद्देश्य औपनिवेशिक भारत का इतिहास केवल अभिजात राजनीतिक नेतृत्व की दृष्टि से नहीं बल्कि अधीनस्थ सामाजिक समूहों—किसानों, मजदूरों और ग्रामीण निम्नवर्ग—की agency के आधार पर पढ़ना था।
उसी प्रथम खंड में ज्ञानेंद्र पांडे का लेख—
“Peasant Revolt and Indian Nationalism: The Peasant Movement in Awadh, 1919–1922”
पृष्ठ 143–197 पर प्रकाशित हुआ।
यह एका के आधुनिक इतिहासलेखन का निर्णायक मोड़ था।
16 एका ‘कांग्रेस से टूट गया’—या स्वतंत्र राजनीति विकसित हुई?
क्या इसे दूसरा अर्थ नहीं दिया जा सकता? शायद किसान अब— अपनी मांग; अपना नेतृत्व; अपनी पंचायत; और अपना राजनीतिक कार्यक्रम— स्वयं निर्धारित कर रहा था।
उनके अध्ययन में एका को पुराने किसान सभा संघर्ष की निरंतरता और कांग्रेस से ambiguous relationship—जटिल/द्व्यर्थी संबंध रखने वाला आंदोलन बताया गया। प्रारंभिक कांग्रेस–खिलाफत सहायता के बाद वह तेजी से स्वतंत्र और अधिक उग्र ग्रामीण आंदोलन बना। यही किसान agency की अवधारणा है।
17 पांडे के लिए मदारी पासी इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं?
क्योंकि मदारी के माध्यम से इतिहास का नेतृत्व बदल जाता है। केंद्र में अब— गांधी नहीं; नेहरू नहीं; शहरी वकील नहीं;
बल्कि निम्न सामाजिक पृष्ठभूमि का ग्रामीण नेता है।
फरवरी 1922 में किशन लाल नेहरू जब अतरौली में कांग्रेस प्रभाव पुनः स्थापित करने पहुंचे तो मदारी पहले ही एका के मान्य नेता थे और समकालीन स्रोत उन्हें लगभग पूर्ण नियंत्रण में बताते थे। उसी समय आंदोलन नए गांवों में फैल रहा था और मदारी ने सण्डीला को केंद्र बनाया।
पांडे इसे किसान आंदोलन की राजनीतिक स्वायत्तता का प्रमाण मानते हैं।
18 मदारी पासी मुख्यधारा इतिहास में इतने कम क्यों दिखाई दिए?
यह स्वयं पांडे द्वारा उठाया गया प्रश्न है।
उनके अनुसार एका के नेताओं के बारे में इतिहासकारों के पास आश्चर्यजनक रूप से कम जानकारी थी।
वे लिखते हैं कि मदारी, सोहराब और ईशरबादी जैसे नेताओं के नाम तक तो मिलते हैं, लेकिन उनके जीवन के बारे में बहुत कम पता है। और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा स्वतंत्रता की रजत जयंती के अवसर पर बनाई गई जिला-वार ‘स्वतंत्रता सेनानी’ सूचियों में भी इन नेताओं की पर्याप्त प्रविष्टियां नहीं थीं। यह विस्मृति आकस्मिक नहीं हो सकती।
23 हाल के शोध ने पांडे को भी चुनौती दी है
2024 में प्रकाशित एक अध्ययन ने मदारी पासी और एका के बारे में कुछ बाद के संस्मरणों तथा क्रांतिकारी राष्ट्रवादी स्रोतों के आधार पर पुनर्विचार का प्रयास किया।
उस अध्ययन का तर्क है कि मदारी को अत्यधिक ‘autonomous’ किसान नेता मानना संभवतः अधूरा है और उनके जीवन के बाद के चरण में क्रांतिकारी राष्ट्रवादियों—यहां तक कि भगत सिंह से जुड़े नेटवर्क—से संभावित संबंधों पर ध्यान देना चाहिए। वह गांधीवादी स्वराज और स्वदेशी के प्रभाव को भी अधिक महत्व देता है। यह नया शोध उपयोगी है—
लेकिन अभी इसे स्थापित सर्वसम्मति नहीं माना जा सकता।
27 “पासी tribal peasants” क्यों समस्याग्रस्त है?
पासी समुदाय को सीधे ‘tribal peasants’ कहना ऐतिहासिक और सामाजिक वर्गीकरण की दृष्टि से अत्यधिक सरलीकृत है।
एका का सामाजिक आधार भी केवल पासी समुदाय तक सीमित नहीं था। इसमें— अन्य कृषक समूह; मुस्लिम किसान; छोटे जमींदार— शामिल थे।
इसलिए सरकारी डिजिटल सामग्री का उपयोग तथ्य-संकेत के रूप में किया जा सकता है—
लेकिन उसकी हर सामाजिक श्रेणी को यथावत स्वीकार करना उचित नहीं।
28 मदारी और ‘भूमि पुनर्वितरण’ का दावा
आधुनिक सरकारी प्रविष्टि मदारी को भूमि-अधिकार के पुनर्वितरण और tenants के अधिकार से जोड़ती है। यह महत्वपूर्ण दावा है।
लेकिन एका की सबसे स्पष्ट और बार-बार प्रमाणित मूल प्रतिज्ञाओं में हमें मिलता है— दर्ज लगान; समय पर भुगतान; बेदखली न मानना; बेगार से इनकार; अपराधियों को सहायता न देना; पंचायत का पालन।
इसलिए पूरे एका आंदोलन का घोषित केंद्रीय लक्ष्य ‘भूमि पुनर्वितरण’ था—यह अभी अधिक मजबूत प्राथमिक प्रमाण मांगता है। अतः शोध में भाषा होनी चाहिए—
कुछ बाद के स्रोत मदारी को अधिक उग्र भूमि-अधिकार कार्यक्रम से जोड़ते हैं। न कि—
एका का सर्वमान्य कार्यक्रम भूमि वितरण था।
29 मदारी की गिरफ्तारी—इतिहासलेखन का उत्कृष्ट केस स्टडी
इस विषय में स्रोतों का विरोध विशेष रूप से उपयोगी है। कुछ लोकप्रिय स्रोत कहते हैं— मार्च 1922 में गिरफ्तार। कुछ कहते हैं— पकड़े नहीं गए। पांडे के अभिलेखीय अध्ययन के अनुसार—
फरवरी में गिरफ्तारी का प्रयास विफल हुआ; हजारों किसान जमा हुए; ₹1,000 का इनाम रखा गया;
और मदारी जून 1922 तक गिरफ्तार नहीं किए जा सके।
इसीलिए हमारे शोध में जून 1922 वाली chronology को अधिक प्राथमिकता दी गई है।
30 जब स्रोत टकराएं तो क्या करें?
मूल अभिलेखों पर आधारित गंभीर अकादमिक शोध— जैसे ज्ञानेंद्र पांडे। तीसरी प्राथमिकता मानक समग्र इतिहास— बिपन चंद्र; सुमित सरकार आदि। चौथी प्राथमिकता बाद की सरकारी लोकप्रिय सामग्री। पांचवीं प्राथमिकता स्थानीय स्मृतियां और पत्रकारिता— बहुत उपयोगी, लेकिन स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक। अंतिम प्राथमिकता
परीक्षा वेबसाइट, ब्लॉग और बिना स्रोत के लोकप्रिय सारांश।
यही पूरे शोध में अपनाई जाने वाली स्रोत-पद्धति होनी चाहिए।
32 हिंसा के प्रश्न में इतिहासलेखन कैसे विभाजित है?
यह एका के सबसे विवादित प्रश्नों में एक है। राष्ट्रवादी/मानक कथा
आंदोलन मदारी जैसे स्थानीय नेताओं के अधीन अधिक militant हुआ।
कांग्रेस ने अहिंसा के कारण दूरी बनाई। सरकार ने दमन किया। सबाल्टर्न दृष्टि हिंसा हुई—
लेकिन उससे किसान की पूरी राजनीति परिभाषित नहीं की जा सकती।
किसान अपनी स्थानीय सत्ता-संरचना से लड़ रहा था।
कांग्रेस की दूरी के पीछे वर्ग-सामंजस्य की राजनीति भी थी। हाल का पुनर्मूल्यांकन
कुछ नए अध्ययन तर्क देते हैं कि किसान पक्ष की दर्ज हिंसा को कभी-कभी बढ़ाकर पढ़ा गया है और भू-स्वामी तथा राज्य हिंसा पर अपेक्षाकृत कम ध्यान गया। यह बहस अभी खुली है।
37 क्या सबाल्टर्न किसान राष्ट्रवाद से बाहर था?
सबाल्टर्न इतिहास का मूल अर्थ किसान को राष्ट्रवाद से बाहर करना नहीं। बल्कि यह दिखाना है कि—
वह राष्ट्रवाद को अपने अनुभव से अर्थ देता है।
वह राष्ट्रीय प्रतीकों को स्थानीय प्रश्नों से जोड़ सकता है।
वह कांग्रेस से सहयोग भी कर सकता है— और उससे असहमति भी।
इसीलिए एका का कांग्रेस से संबंध ‘ambiguous’ था—
शत्रुतापूर्ण नहीं, लेकिन अधीनस्थ भी नहीं।
38 मदारी का ‘मॉडरेट’ पक्ष भी क्यों महत्वपूर्ण है?
लोकप्रिय इतिहास मदारी को अक्सर हिंसक उग्र नेता के रूप में दिखाता है।
लेकिन पांडे एक महत्वपूर्ण तथ्य उठाते हैं—
सण्डीला में आधार बढ़ाते समय मदारी ने स्थानीय मतभेद समायोजित किए और छोटे जमींदारों को एका में शामिल करने की कोशिश की।
पांडे इसे उनकी राजनीतिक ‘moderation’ का प्रमाण मानते हैं।
यह तथ्य उनकी सरल ‘उग्रवादी’ छवि को जटिल बनाता है।
समग्र निष्कर्ष, 1921–22 की प्रमाणित समयरेखा और प्राथमिक–द्वितीयक स्रोतों की व्यवस्थित सूची
प्रमुख तथ्य
एका आंदोलन पर इस विस्तृत अध्ययन का अंतिम निष्कर्ष यह है कि 1921–22 का यह संघर्ष केवल अधिक लगान के विरुद्ध एक स्थानीय किसान प्रतिक्रिया नहीं था। यह 1919–21 की अवध किसान राजनीति की निरंतरता, प्रथम विश्वयुद्धोत्तर ग्रामीण संकट, तालुकेदारी–जमींदारी संरचना, काश्तकारी असुरक्षा, बेगार, अनाज-लगान, कांग्रेस–खिलाफत नेटवर्क, निम्न सामाजिक पृष्ठभूमि से उभरे नेतृत्व और औपनिवेशिक दमन—इन सभी प्रक्रियाओं के संगम से निर्मित हुआ।
ज्ञानेंद्र पांडे ने इसे पहले किसान सभा चरण का पुनरुत्थान माना है। औपनिवेशिक जांच अधिकारी जे. सी. फॉनथॉर्प ने भी 1922 की अपनी रिपोर्ट में एका को किसान सभा आंदोलन का पुनर्जीवन बताया था। आंदोलन के प्रारंभिक एका संगठनों को मालिहाबाद के कांग्रेस और खिलाफत कार्यकर्ताओं से सहायता मिली, लेकिन वे शीघ्र ही अपने प्रारंभिक संरक्षकों से आगे निकल गए और स्वतंत्र ग्रामीण राजनीति का रूप लेने लगे।
3 मदारी पासी का अंतिम ऐतिहासिक मूल्यांकन
इस पूरे अध्ययन में मदारी पासी का स्थान सबसे अधिक सावधानी से निर्धारित किया जाना चाहिए।
उन्हें न तो अकेला ‘एका का संस्थापक’ कहना पर्याप्त है— न केवल हिंसक स्थानीय नेता।
उपलब्ध मजबूत स्रोत बताते हैं कि फरवरी 1922 तक वे एका के मान्य प्रमुख नेता बन चुके थे। किशन लाल नेहरू अतरौली में कांग्रेस का प्रभाव पुनः स्थापित करने पहुंचे, लेकिन मदारी पहले ही आंदोलन पर मजबूत नियंत्रण में थे। उसी चरण में आंदोलन लगभग तीस और गांवों तक फैल रहा था और मदारी ने मालिहाबाद से संबंध तोड़कर सण्डीला को अपना प्रमुख केंद्र बना लिया। उनकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि थी—
किसान राजनीति को स्वतंत्र ग्रामीण नेतृत्व देना।
साथ ही छोटे जमींदारों को जोड़ने का उनका प्रयास यह भी दिखाता है कि उनकी राजनीति केवल अंधे वर्गीय प्रतिशोध पर आधारित नहीं थी। पांडे उन्हें स्थानीय मतभेद समायोजित करने वाला नेता भी दिखाते हैं।
5 एका का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न
एका ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के सामने यह प्रश्न रखा—
राजनीतिक स्वतंत्रता और सामाजिक-आर्थिक न्याय का संबंध क्या है?
कांग्रेस ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक राष्ट्रीय गठबंधन चाहती थी।
किसान स्थानीय जमींदार, ठेकेदार, बेगार और बेदखली से तत्काल राहत चाहता था। दोनों हित कई बिंदुओं पर मिले— और कई पर टकराए।
यही कारण है कि प्रारंभिक कांग्रेस–खिलाफत सहायता के बावजूद एका शीघ्र स्वतंत्र ग्रामीण आंदोलन बन गया। पांडे इसी संबंध को ‘ambiguous’ बताते हैं।
6 गांधी और किसान—एक ही स्वराज के अलग अर्थ
राजनीतिक और नैतिक अनुशासन का राष्ट्रीय कार्यक्रम था। किसान के लिए स्वराज का अर्थ— अधिक लगान से मुक्ति; बेदखली से सुरक्षा; बेगार का अंत— भी हो सकता था।
जवाहरलाल नेहरू स्वयं जनवरी 1921 में स्पष्ट लिख चुके थे कि किसान शिकायतें वास्तविक थीं और केवल ‘बाबाओं’ की उत्तेजना को संकट की जड़ बताना गलत था।
यानी कांग्रेस के भीतर भी किसान प्रश्न की गंभीरता की समझ थी। लेकिन कांग्रेस की राजनीतिक सीमा थी—
वह व्यापक ग्रामीण वर्ग-संघर्ष को गांधीवादी अनुशासन से बाहर नहीं जाने देना चाहती थी। एका यहीं उससे दूर होता गया।
8 आर्थिक उपलब्धि सीमित क्यों रही?
क्योंकि आंदोलन को पर्याप्त समय नहीं मिला।
1921 के उत्तरार्ध में उभरा आंदोलन 1922 के पहले महीनों में ही कठोर औपनिवेशिक कार्रवाई के सामने आ गया। उसने— स्थायी लगान सुधार; सार्वभौमिक काश्तकारी अधिकार; बेगार की कानूनी समाप्ति; या जमींदारी उन्मूलन—
जैसी ठोस व्यापक नीतिगत जीत हासिल नहीं की।
इस अर्थ में उसकी तात्कालिक आर्थिक उपलब्धियां सीमित थीं।
लेकिन उसने किसान प्रश्न को राजनीतिक रूप से दबने नहीं दिया। यही उसका अधिक महत्वपूर्ण परिणाम था।
10 एका की पराजय का अंतिम अर्थ
एक तेजी से फैला लेकिन अपेक्षाकृत ढीला ग्रामीण नेटवर्क; सीमित संसाधन; कांग्रेस से बढ़ता राजनीतिक अलगाव; प्रमुख नेताओं पर निर्भरता; और स्थानीय हिंसक टकराव—
एक बहुत अधिक संगठित औपनिवेशिक राज्य के सामने थे। इसलिए उसकी हार— राजनीतिक-संगठनात्मक हार थी। किसान प्रश्न की समाप्ति नहीं।
12 1921–22 की प्रमाणित समयरेखा
नीचे की समयरेखा में तीन श्रेणियां रखी जा रही हैं—
प्रमाणित — मजबूत समकालीन अथवा अभिलेख-आधारित स्रोत।
संभावित/माह-स्तरीय — घटना निश्चित, exact date उपलब्ध नहीं। विवादित — स्रोतों में अंतर।
जनवरी 1921 — पहली अवध किसान लहर का संकट स्थिति: प्रमाणित
6–7 जनवरी 1921 को रायबरेली जिले के फुरसतगंज और मुंशीगंज क्षेत्रों में बड़े किसान प्रदर्शन और पुलिस फायरिंग की घटनाएं हुईं। यही पहला अवध किसान संघर्ष था, जिससे आगे एका की पृष्ठभूमि बनी।
21 जनवरी 1921 — जवाहरलाल नेहरू का किसान संकट पर लेख स्थिति: प्रमाणित
नेहरू ने *“Babas on the Brain! Facts about the Kisan Crisis”* में स्पष्ट लिखा कि किसानों की वास्तविक शिकायतें थीं और ‘बाबाओं’ को पूरे संकट की जड़ बताना गलत था।
1921 के प्रारंभिक महीने — पहली किसान लहर पर दमन स्थिति: प्रमाणित
1921 — Oudh Rent Act में संशोधन स्थिति: प्रमाणित
पहली किसान लहर के दबाव और व्यापक कृषि असंतोष की पृष्ठभूमि में किरायेदारी कानून में संशोधन हुआ। लेकिन यह परिवर्तन किसानों को पूर्णतः शांत नहीं कर सका; उसी वर्ष के अंत में एका उभरा। IGNOU भी पहली लहर के कमजोर होने और फिर late 1921–early 1922 में एका के उभार का यही क्रम देता है।
1921 का उत्तरार्ध — एका का उदय
फॉनथॉर्प के शब्दों में एका आंदोलन “towards the end of 1921” प्रारंभ हुआ। पांडे इसे किसान सभा आंदोलन का पुनरुत्थान बताते हैं।
लोकप्रिय स्रोत अक्सर नवंबर 1921 लिखते हैं, लेकिन किसी एक ‘पहली एका सभा’ की निर्विवाद तारीख उपलब्ध नहीं। अतः “1921 के अंतिम महीनों” की भाषा अधिक सुरक्षित है।
1921 का उत्तरार्ध — मालिहाबाद में कांग्रेस–खिलाफत सहायता स्थिति: प्रमाणित
प्रारंभिक एका associations को लखनऊ जिले के मालिहाबाद के कुछ कांग्रेस और खिलाफत कार्यकर्ताओं से सहायता मिली।
दिसंबर 1921–जनवरी 1922 — हरदोई और उत्तरी अवध में विस्तार स्थिति: माह-स्तर पर प्रमाणित
आंदोलन हरदोई, बहराइच, खीरी, बाराबंकी, सीतापुर और लखनऊ तक फैल गया।
जनवरी 1922 के प्रारंभिक सप्ताह — बहराइच में ठेकेदारों से टकराव स्थिति: प्रमाणित, exact day उपलब्ध नहीं
किसानों ने कम-से-कम दो अवसरों पर ठेकेदारों को पीटा और लगान के रूप में लिया गया अनाज वापस लिया। बाद में अनाज-लगान समाप्त करने का अभियान तेज हुआ।
जनवरी 1922 का अंत — सण्डीला एका का प्रमुख केंद्र स्थिति: प्रमाणित
जनवरी के अंत तक हरदोई जिले की सण्डीला तहसील में आंदोलन अत्यंत मजबूत हो चुका था और स्थानीय जमींदार चिंतित थे।
फरवरी 1922 — हरदोई में तीन दिनों में 21 एका बैठकें स्थिति: प्रमाणित
हरदोई के एक पुलिस सर्किल ने तीन दिनों में 21 एका बैठकों की सूचना दी; प्रत्येक में लगभग 150 से 2,000 तक लोगों की उपस्थिति बताई गई।
फरवरी 1922 — किशन लाल नेहरू की अतरौली यात्रा स्थिति: प्रमाणित
किशन लाल नेहरू कांग्रेस का प्रभाव पुनः स्थापित करने अतरौली पहुंचे। उन्हें मदारी पासी आंदोलन पर मजबूत नियंत्रण में मिले। इसी समय एका तीस और गांवों में फैल रहा था और मदारी ने केंद्र मालिहाबाद से सण्डीला स्थानांतरित किया।
फरवरी 1922 — मदारी पासी की गिरफ्तारी का विफल प्रयास स्थिति: प्रमाणित
प्रशासन ने मदारी को पकड़ने के लिए विस्तृत तैयारी की, लेकिन कई हजार किसान इकट्ठा हो गए और पुलिस प्रयास विफल हुआ। मदारी की गिरफ्तारी पर ₹1,000 का इनाम घोषित हुआ। 4 फरवरी 1922 — चौरी चौरा स्थिति: प्रमाणित; एका से अलग घटना
चौरी चौरा एका आंदोलन का हिस्सा नहीं था। लेकिन इस घटना के बाद गांधी द्वारा राष्ट्रीय असहयोग आंदोलन वापस लेने से एका का व्यापक राजनीतिक वातावरण प्रभावित हुआ।
फरवरी–मार्च 1922 — सरकारी दमन का तीव्र चरण स्थिति: प्रमाणित
संयुक्त प्रांत प्रशासन ने एका और कांग्रेस संगठनों को तोड़ने के लिए कठोर कार्रवाई की। पांडे के अनुसार सरकार आंदोलन के राजनीतिक निहितार्थ से पूरी तरह अवगत थी।
9 मार्च 1922 — उदयपुर, हरदोई पुलिस फायरिंग
पांडे के अनुसार शाहाबाद पुलिस सर्किल के उदयपुर गांव में एका बैठकों की जांच कर रही पुलिस पार्टी पर पासी किसानों की भीड़ ने हमला किया और पुलिस फायरिंग में दो किसान मारे गए। एक बाद का शोध इस घटना की तारीख 9 मार्च 1922 बताता है।
इसलिए घटना और दो मौतें प्रमाणित हैं; 9 मार्च की exact date को अभी द्वितीयक पुष्टि के साथ रखना चाहिए। मार्च 1922 — कोठी, बाराबंकी स्थिति: प्रमाणित, exact day नहीं
लगान वसूलने का प्रयास कर रहे जमींदार के एक चपरासी की किसानों के संघर्ष में हत्या हुई।
मार्च 1922 — खुले आंदोलन का निर्णायक पतन स्थिति: व्यापक इतिहासलेखन में स्वीकार्य
भारत सरकार की हरदोई प्रविष्टि और मानक इतिहास दोनों मार्च 1922 तक कठोर दमन से व्यापक एका आंदोलन के समाप्त होने की बात करते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि मदारी उसी समय पकड़े गए या हर स्थानीय गतिविधि समाप्त हो गई।
मार्च–अप्रैल 1922 — स्थानीय गतिविधियों का विघटन स्थिति: स्रोत-निर्भर
कुछ सरकारी आधुनिक विवरण मार्च–अप्रैल तक आंदोलन के अंत की व्यापक अवधि देते हैं।
अप्रैल 1922 — फॉनथॉर्प जांच रिपोर्ट तैयार स्थिति: अभिलेख-आधारित
पांडे के अध्ययन में फॉनथॉर्प की आधिकारिक रिपोर्ट अप्रैल 1922 में तैयार होने और बाद में प्रकाशित होने का संकेत मिलता है।
13 मई 1922 — फॉनथॉर्प रिपोर्ट का प्रकाशन स्थिति: प्रमाणित
*United Provinces Gazette*, 13 May 1922, Part VIII में फॉनथॉर्प की एका रिपोर्ट प्रकाशित हुई।
जून 1922 — मदारी पासी की गिरफ्तारी
स्थिति: मजबूत अभिलेख-आधारित परंपरा, लेकिन स्रोत-विरोध मौजूद
ज्ञानेंद्र पांडे स्पष्ट लिखते हैं कि फरवरी की विफल गिरफ्तारी के बाद मदारी जून तक नहीं पकड़े गए।
कुछ बाद के स्रोत उनकी अंतिम गिरफ्तारी जून 1922 में रखते हैं।
लेकिन IGNOU की एक सामग्री कहती है कि मदारी गिरफ्तार नहीं किए जा सके।
“ज्ञानेंद्र पांडे के अभिलेख-आधारित विवरण के अनुसार मदारी पासी फरवरी में गिरफ्तारी से बच गए और जून 1922 तक नहीं पकड़े गए; बाद की एक स्रोत-परंपरा उनकी गिरफ्तारी जून में रखती है, हालांकि कुछ द्वितीयक स्रोत इस पर असहमत हैं।”
13 किन दावों को ‘विवादित’ ही रखना चाहिए
एका पर इस विस्तृत अध्ययन के बाद भी निम्न प्रश्न पूरी तरह बंद नहीं हैं—
पहली एका सभा की exact तारीख और स्थान।
मदारी पासी का प्रमाणित जन्मस्थान और जन्मतिथि। आंदोलन में कुल गांवों की संख्या। कुल सक्रिय सदस्य संख्या। कुल गिरफ्तार किसानों की संख्या।
उदयपुर गोलीकांड के मृत किसानों के नाम।
मदारी की अंतिम गिरफ्तारी की बिल्कुल निर्विवाद तिथि।
भूमि पुनर्वितरण मदारी का व्यक्तिगत विचार था या पूरे एका का औपचारिक कार्यक्रम।
1922 के बाद मदारी की गतिविधियों का पूरा कालक्रम।
इन पर बिना अभिलेखीय पुष्टि कठोर संख्या या निश्चित भाषा नहीं अपनानी चाहिए।
जे. सी. फॉनथॉर्प, *Report on the Eka Movement*
J. C. Faunthorpe, Report on the Eka Movement, United Provinces Gazette, 13 May 1922, Part VIII.
यह एका पर उपलब्ध सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्राथमिक स्रोतों में है। पांडे इसी रिपोर्ट से आंदोलन की chronology, मदारी, पुलिस कार्रवाई और आंदोलन के प्रसार के कई तथ्य पुनर्निर्मित करते हैं।
Government of India, Home Department, Political Branch, File 862 of 1922
पांडे के footnotes में इसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है; इसमें समकालीन प्रेस clipping सहित एका और संबंधित गतिविधियों की सामग्री थी।
आगे अभिलेखीय शोध के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण file reference है।
जवाहरलाल नेहरू के समकालीन लेख और भाषण
“Agrarian Unrest in Partabgarh” — 25 September 1920
“Babas on the Brain! Facts about the Kisan Crisis” — 21 January 1921
“The Rai Bareli Tragedy” — 22 January 1921
“On the Allahabad District Conference” — 25 April 1921
ये दस्तावेज अवध किसान संकट, कांग्रेस की ग्रामीण राजनीति और सरकारी दमन पर समकालीन राष्ट्रवादी दृष्टि देते हैं। Nehru Archive इन दस्तावेजों को सूचीबद्ध और उपलब्ध कराता है।
गांधी के 1921 के अवध किसान संबंधी वक्तव्य और निर्देश
इनमें किसानों को अहिंसा, लगान, सामाजिक बहिष्कार और जमींदार–tenant संबंध पर दिए गए निर्देश महत्वपूर्ण हैं।
इनका उपयोग कांग्रेस–एका संबंध और गांधीवादी रणनीति की सीमा समझने में किया जाना चाहिए।
कांग्रेस और खिलाफत संगठन की स्थानीय रिपोर्टें
और किसान क्षेत्रों पर UP Congress Committee की सामग्री।
इनसे सरकारी स्रोत की तुलना संभव होगी।
Gyanendra Pandey — *Peasant Revolt and Indian Nationalism: The Peasant Movement in Awadh, 1919–1922*
यह किसान सभा से एका की निरंतरता, कांग्रेस–किसान संबंध, मदारी पासी, औपनिवेशिक अभिलेखों की आलोचना और किसान agency के अध्ययन का केंद्रीय स्रोत है।
इस पूरे शोध का सबसे महत्वपूर्ण द्वितीयक स्रोत यही माना जाना चाहिए।
Bipan Chandra et al. — *India's Struggle for Independence*
एका का संक्षिप्त लेकिन मानक राष्ट्रवादी इतिहासलेखन।
आंदोलन की मांगें, छोटे जमींदारों की भागीदारी, मदारी पासी तथा मार्च 1922 तक सरकारी दमन की सामान्य रूपरेखा के लिए उपयोगी।
इसे पांडे के अधिक विस्तृत अध्ययन के साथ पढ़ना चाहिए— अकेले नहीं।
Ranajit Guha (ed.) — *Subaltern Studies I: Writings on South Asian History and Society*
एका के इतिहासलेखन को समझने के लिए स्वयं यह खंड महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी में पांडे का प्रसिद्ध अध्ययन प्रकाशित हुआ था।
16 आधुनिक सरकारी स्रोत — उपयोगी लेकिन द्वितीयक
हरदोई और बहराइच में एका पर अलग प्रविष्टियां देता है। हरदोई प्रविष्टि— मुख्य शिकायतों; धार्मिक शपथ; छोटे जमींदारों की भागीदारी; और मार्च 1922 तक दमन—
की उपयोगी पुष्टि करती है। बहराइच प्रविष्टि— नजराना; बेगार; और अतिरिक्त लगान—
जैसे मुद्दे दर्ज करती है।
लेकिन दोनों सरकारी आधुनिक प्रविष्टियों के बीच उत्पत्ति और सामाजिक वर्गीकरण जैसे कुछ मुद्दों पर असंगतियां हैं। इसलिए उनका सही दर्जा है—
उपयोगी आधुनिक द्वितीयक स्रोत, प्राथमिक अभिलेख नहीं।
18 एका पर शोध करते समय उपयोग न करने योग्य शॉर्टकट
इस अध्ययन के बाद कुछ स्रोतगत सावधानियां बिल्कुल स्पष्ट हैं।
परीक्षा वेबसाइट से मिली किसी तारीख को प्राथमिक तथ्य न मानें।
विकिपीडिया अथवा लोकप्रिय सारांश में लिखी पहली सभा की तारीख को बिना अभिलेख जांच के न दोहराएं।
आधुनिक सरकारी पोर्टल को ‘सरकारी होने’ के कारण स्वतः प्राथमिक स्रोत न मानें।
मदारी पासी से जुड़ी हर स्थानीय वीरगाथा को ऐतिहासिक तथ्य न मानें।
‘हिंसक’ अथवा ‘अहिंसक’ जैसे एक शब्द में पूरे आंदोलन को परिभाषित न करें। और सबसे महत्वपूर्ण—
आंदोलन की तत्काल पराजय को ऐतिहासिक महत्व की अनुपस्थिति न समझें।
21 पांच सबसे बड़ी सीमाएं
एक — स्थायी केंद्रीय संगठन का अभाव। दो — सीमित भौगोलिक क्षेत्र।
तीन — भूमिहीन मजदूर और भूमि पुनर्वितरण पर अस्पष्ट कार्यक्रम।
चार — कांग्रेस से बढ़ता राजनीतिक अलगाव।
पांच — राज्य के संस्थागत और सैन्य संसाधनों के मुकाबले अत्यंत सीमित क्षमता।
इन्हीं सीमाओं ने तत्काल सफलता को रोका।
23 मदारी पासी को इतिहास में कहां रखना चाहिए?
मदारी पासी औपनिवेशिक भारत के उन महत्वपूर्ण जमीनी किसान नेताओं में थे जिन्होंने सामाजिक रूप से वंचित पृष्ठभूमि से उठकर व्यापक कृषक गठबंधन का नेतृत्व किया और कांग्रेस की प्रत्यक्ष कमान से बाहर किसान राजनीतिक स्वायत्तता की संभावना दिखाई।
इतना निष्कर्ष उपलब्ध प्रमाण से पर्याप्त रूप से स्थापित है।
इसके आगे उनकी जीवनी के कई हिस्से अभी गहरे अभिलेखीय शोध की प्रतीक्षा करते हैं।
अंतिम निष्कर्ष — ‘एका’ की कहानी आखिर हमें क्या बताती है?
एका आंदोलन हमें यह बताता है कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन केवल महान राष्ट्रीय नेताओं, कांग्रेस अधिवेशनों और ब्रिटिश सरकार से संवैधानिक संघर्ष की कहानी नहीं था।
उसका एक दूसरा इतिहास गांव में लिखा जा रहा था। जहां किसान पूछ रहा था— मेरा लगान कितना? मेरा खेत किसका? मेरा श्रम मुफ्त क्यों? मुझे बेदखल कौन कर सकता है? मेरी पंचायत क्यों नहीं मानी जाएगी? और यदि अन्याय हो—
1921 के अंत में यह शब्द केवल नारा नहीं रहा।
किसान ने धार्मिक शपथ को राजनीतिक अनुबंध बनाया। पंचायत को प्रतिरोध का केंद्र बनाया।
दर्ज लगान को अधिकार की सीमा बनाया।
उसका सबसे प्रभावशाली चेहरा मदारी पासी बने।
इसीलिए फरवरी–मार्च 1922 में औपनिवेशिक सरकार ने उस पर निर्णायक प्रहार किया।
हरदोई की एक पुलिस सर्किल में तीन दिनों में 21 बैठकों और 150 से 2,000 तक लोगों की सभाओं का रिकॉर्ड आंदोलन की शक्ति दिखाता है। उसी फरवरी में किशन लाल नेहरू कांग्रेस प्रभाव वापस लाने पहुंचे, लेकिन मदारी पासी पहले ही आंदोलन पर मजबूत नियंत्रण में थे।
ने मदारी को पकड़ने की योजना बनाई। हजारों किसानों ने गिरफ्तारी रोकी।
मार्च में उदयपुर में पुलिस और किसानों की भिड़ंत में दो किसान मारे गए।
क्योंकि आगे भारतीय किसान राजनीति अधिक संगठित रूप में लौटेगी। भूमि; लगान; जमींदारी; ऋण; काश्तकारी अधिकार; और किसान का राजनीतिक प्रतिनिधित्व—
इसी प्रश्न के कारण एका आंदोलन 1922 में समाप्त होकर भी भारतीय किसान आंदोलन के इतिहास में जीवित रहता है।
एका आंदोलन की संक्षिप्त समयरेखा
एका आंदोलन ने औपनिवेशिक अवध में किसान की राजनीतिक सक्रियता को स्थानीय भाषा और संगठन दिया। इसकी शपथ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आर्थिक अनुशासन और सामूहिक उत्तरदायित्व का माध्यम थी। आंदोलन ने लगान, बेगार और अवैध वसूली को सार्वजनिक राजनीतिक प्रश्न बनाया, पर केंद्रीकृत संरचना का अभाव, स्थानीय विविधता, दमन, नेतृत्व की सीमाएँ और कांग्रेस से बढ़ती दूरी इसकी स्थायित्व-क्षमता घटाते गए। तत्काल विजय सीमित रही, फिर भी एका ने दिखाया कि ग्रामीण समाज राष्ट्रीय नेतृत्व के बाहर भी अपने कार्यक्रम, प्रतीक और प्रतिरोध-पद्धतियाँ विकसित कर सकता था।
प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक संदर्भ
टिप्पणी: सरकारी अभिलेख आंदोलन को प्रायः कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में देखते हैं, जबकि राष्ट्रवादी और स्थानीय स्मृतियाँ उसके जनाधार पर बल देती हैं। तिथियों, नेतृत्व और हिंसक घटनाओं से जुड़े दावों में इन स्रोत-भेदों को ध्यान में रखकर विवेचन किया गया है।