कर्नाटक राज्य रैयत संघ
नरगुंड–नवलगुंड से किसान स्वाभिमान, लाभकारी मूल्य, बीज-संप्रभुता, वैश्वीकरण-विरोध और खाद्य-संप्रभुता तक—1980–2026
कर्नाटक राज्य रैयत संघ ने स्थानीय मूल्य, बिजली और ऋण संघर्ष को किसान स्वाभिमान की व्यापक राजनीति में बदला। नरगुंड–नवलगुंड के विस्फोट से उभरी धारा ने एम.डी. नंजुंडास्वामी के नेतृत्व में गैर-दलीय संगठन, प्रत्यक्ष कार्रवाई और राज्यव्यापी लामबंदी विकसित की। 1990 के दशक में उसने बहुराष्ट्रीय कृषि कंपनियों, विश्व व्यापार व्यवस्था और बीज पर कॉरपोरेट नियंत्रण को चुनौती देकर भारतीय किसान आंदोलन को वैश्विक विमर्श से जोड़ा। इसकी शक्ति मूल्य से बीज और खाद्य-संप्रभुता तक प्रश्नों का विस्तार थी; इसकी सीमाएं सामाजिक आधार, उग्र प्रतीकात्मक कार्रवाइयों, नेतृत्व-निर्भरता और बाद के विभाजन में दिखाई देती हैं।
कर्नाटक की कृषि और ग्रामीण समाज की पृष्ठभूमि — भूमि-संबंध, सिंचाई, वर्षा-आधारित खेती, हरित क्रांति और क्षेत्रीय असमानताएं
प्रस्तावना : रैयत आंदोलन को समझने की जमीन
कर्नाटक राज्य रैयत संघ के उदय को केवल 1970–80 के दशक की कुछ सरकारी नीतियों, कृषि मूल्यों अथवा किसान प्रदर्शनों की प्रतिक्रिया के रूप में नहीं समझा जा सकता। उसके पीछे कर्नाटक के ग्रामीण समाज में लंबे समय से चल रहे परिवर्तन थे। भूमि के असमान स्वामित्व, वर्षा पर अत्यधिक निर्भर खेती, सिंचाई सुविधाओं के असमान वितरण, हरित क्रांति से पैदा हुई नई आकांक्षाओं, कृषि लागत में वृद्धि और विभिन्न क्षेत्रों के बीच विकास की गहरी विषमता ने मिलकर वह सामाजिक-आर्थिक जमीन तैयार की, जिस पर बाद में संगठित किसान राजनीति खड़ी हुई।
कर्नाटक की विशेषता यह थी कि यहां कृषि का कोई एक स्वरूप नहीं था। तटीय और पश्चिमी घाट क्षेत्र की कृषि परिस्थितियां उत्तरी शुष्क जिलों से बिल्कुल अलग थीं। कावेरी और तुंगभद्रा जैसी नदी घाटियों में सिंचित और अपेक्षाकृत व्यावसायिक खेती विकसित हुई, जबकि विशाल दक्कनी पठार में किसान मानसून की अनिश्चितता के साथ खेती करते रहे। कहीं धान और गन्ना प्रमुख थे, कहीं रागी, ज्वार और बाजरा; कहीं कपास और मूंगफली जैसी नकदी फसलें महत्वपूर्ण थीं तो कहीं बागवानी ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बदलना शुरू किया।
इसी विविधता के कारण कर्नाटक में किसान असंतोष भी अलग-अलग आर्थिक कारणों से पैदा हुआ। कहीं पानी का प्रश्न केंद्रीय था, कहीं फसल के मूल्य का, कहीं बिजली और सिंचाई शुल्क का और कहीं कर्ज तथा बाजार का। कर्नाटक राज्य रैयत संघ ने आगे चलकर इन बिखरी समस्याओं को एक व्यापक किसान राजनीतिक विमर्श में जोड़ने का प्रयास किया।
कर्नाटक का निर्माण और विविध कृषि क्षेत्रों का एक राज्य में समावेश
वर्तमान कर्नाटक का निर्माण 1956 के राज्यों के पुनर्गठन के बाद हुआ। तत्कालीन मैसूर राज्य में बंबई, हैदराबाद और मद्रास प्रांतों तथा कूर्ग से जुड़े कन्नड़भाषी क्षेत्रों को मिलाया गया। 1973 में मैसूर राज्य का नाम बदलकर कर्नाटक कर दिया गया।
यह राजनीतिक एकीकरण हुआ, लेकिन जिन क्षेत्रों को मिलाकर नया राज्य बना, उनकी कृषि व्यवस्था और ऐतिहासिक अनुभव समान नहीं थे।
पुराने मैसूर क्षेत्र में प्रशासनिक संस्थाओं, सिंचाई और सहकारिता का अपेक्षाकृत लंबा विकास हुआ था। उत्तरी कर्नाटक के बंबई-कर्नाटक क्षेत्र की कृषि परिस्थितियां अलग थीं। हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र—जिसे आज सामान्यतः कल्याण कर्नाटक कहा जाता है—ऐतिहासिक रूप से अपेक्षाकृत पिछड़ा रहा। तटीय कर्नाटक में अधिक वर्षा, धान, नारियल, सुपारी और बागवानी आधारित कृषि अर्थव्यवस्था विकसित हुई।
इसलिए कर्नाटक की किसान राजनीति शुरू से ही एक ऐसे राज्य में विकसित हुई जिसमें भौगोलिक एकता के भीतर कृषि की अत्यधिक विविधता मौजूद थी।
भूमि-संबंधों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
कर्नाटक में भूमि-संबंधों को समझने के लिए औपनिवेशिक और रियासती व्यवस्थाओं की विरासत महत्वपूर्ण है। अलग-अलग क्षेत्रों में भू-राजस्व और काश्तकारी की व्यवस्थाएं भिन्न थीं। पुराने मैसूर, बंबई-कर्नाटक और हैदराबाद-कर्नाटक की प्रशासनिक विरासतों ने ग्रामीण समाज पर अलग-अलग प्रभाव डाला।
भूमि केवल उत्पादन का साधन नहीं थी। वह ग्रामीण समाज में प्रतिष्ठा, जातीय प्रभुत्व, राजनीतिक प्रभाव और ऋण प्राप्त करने की क्षमता का भी आधार थी। बड़े तथा मध्यम भू-स्वामी गांव की संस्थाओं, सहकारी समितियों और स्थानीय राजनीति पर प्रभाव रखते थे। दूसरी ओर छोटे किसान, किरायेदार, खेतिहर मजदूर और भूमिहीन समुदाय आर्थिक रूप से अधिक असुरक्षित थे।
इस संरचना में जाति और भूमि का संबंध भी महत्वपूर्ण था। कर्नाटक के विभिन्न हिस्सों में प्रभावशाली कृषक समुदायों ने भूमि स्वामित्व और स्थानीय सत्ता में मजबूत स्थान बनाया। दक्षिणी कर्नाटक में वोक्कालिगा और उत्तरी क्षेत्रों में लिंगायत कृषक समुदायों का राजनीतिक प्रभाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा। लेकिन ग्रामीण समाज को केवल इन दो समुदायों के आधार पर समझना पर्याप्त नहीं होगा। दलित, आदिवासी, पिछड़े समुदाय, छोटे किसान और खेतिहर मजदूर भी कृषि अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग थे, जबकि भूमि और संसाधनों तक उनकी पहुंच अपेक्षाकृत सीमित रही।
यही अंतर बाद में किसान संगठन के सामने एक बुनियादी प्रश्न बना—‘किसान’ किसे माना जाए? क्या बड़े और मध्यम भूमिधर तथा सीमांत किसान एक समान आर्थिक वर्ग हैं? और भूमिहीन खेतिहर मजदूर की समस्याएं किसान आंदोलन के भीतर किस स्थान पर रखी जाएं?
स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधार
स्वतंत्रता के बाद कर्नाटक में भूमि-सुधार की प्रक्रिया कई चरणों में आगे बढ़ी। इसका उद्देश्य मध्यस्थ भू-स्वामित्व को समाप्त करना, किरायेदारों को सुरक्षा देना, भूमि पर अधिकतम सीमा निर्धारित करना और वास्तविक काश्तकारों को अधिकार प्रदान करना था।
1961 का कर्नाटक भूमि सुधार अधिनियम इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण पड़ाव था, लेकिन 1970 के दशक में देवराज उर्स सरकार के समय किए गए संशोधनों ने भूमि सुधार को अधिक प्रभावशाली रूप दिया। 1974 से लागू परिवर्तनों ने किरायेदारी और भूमि स्वामित्व के संबंधों में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया। “जोतने वाले को भूमि” की धारणा को संस्थागत रूप देने की कोशिश की गई और भूमि न्यायाधिकरणों के माध्यम से किरायेदार किसानों के स्वामित्व दावों का निपटारा किया गया।
इन सुधारों ने अनेक काश्तकारों को मालिकाना अधिकार दिलाने में योगदान दिया और पारंपरिक जमींदार-किरायेदार संबंधों को कमजोर किया। लेकिन परिणाम पूरे राज्य में समान नहीं रहे। अभिलेखों की कमी, स्थानीय शक्ति-संतुलन, मुकदमेबाजी, बेनामी अथवा पारिवारिक विभाजन जैसी व्यवस्थाओं और प्रशासनिक कठिनाइयों के कारण भूमि-सुधार की सीमा भी स्पष्ट हुई।
भूमिहीनता समाप्त नहीं हुई। कृषि मजदूरों और अत्यंत छोटे किसानों की आर्थिक असुरक्षा बनी रही।
इसलिए भूमि सुधार ने ग्रामीण सत्ता-संरचना को बदला अवश्य, लेकिन कृषि संकट समाप्त नहीं किया। इसके उलट, मालिक बने छोटे और मध्यम किसानों के सामने अब उत्पादन लागत, ऋण, सिंचाई, बिजली और बाजार मूल्य जैसे नए प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण होने लगे।
यहीं से बाद के “नए किसान आंदोलन” की सामाजिक जमीन तैयार होती दिखाई देती है।
वर्षा-आधारित खेती : कर्नाटक की केंद्रीय वास्तविकता
कर्नाटक की कृषि का बड़ा हिस्सा ऐतिहासिक रूप से वर्षा पर निर्भर रहा है। राज्य के अनेक आंतरिक और उत्तरी क्षेत्र अर्ध-शुष्क जलवायु में आते हैं। मानसून की मात्रा ही नहीं, उसका समय और वितरण भी कृषि उत्पादन तय करता रहा है।
रागी, ज्वार, बाजरा, दालें, मूंगफली और अन्य शुष्क क्षेत्रीय फसलें ऐसी कृषि परिस्थितियों के अनुरूप विकसित हुईं। लेकिन वर्षा की विफलता किसान को तेजी से आर्थिक संकट में डाल सकती थी।
वर्षा-आधारित किसान के सामने दोहरी अनिश्चितता थी—प्रकृति की अनिश्चितता और बाजार की अनिश्चितता।
अच्छी वर्षा हुई तो उत्पादन बढ़ सकता था, लेकिन बाजार में भाव गिरने का खतरा रहता था। वर्षा कम हुई तो उत्पादन घटता, जबकि बीज, उर्वरक, मजदूरी और ऋण की लागत बनी रहती।
यही कारण है कि कर्नाटक की किसान राजनीति में केवल भूमि नहीं, बल्कि पानी, लागत, कर्ज और मूल्य धीरे-धीरे केंद्रीय मुद्दे बन गए।
सिंचाई का असमान भूगोल
कर्नाटक में अनेक महत्वपूर्ण नदियां बहती हैं—कावेरी, कृष्णा, तुंगभद्रा, घटप्रभा, मलप्रभा, भीमा, शरावती आदि। स्वतंत्रता के बाद बड़े बांधों और सिंचाई परियोजनाओं को कृषि आधुनिकीकरण का प्रमुख साधन माना गया।
कृष्णराज सागर जैसी पहले से विकसित परियोजनाओं के साथ तुंगभद्रा, घटप्रभा, मलप्रभा और कृष्णा घाटी की परियोजनाओं ने कुछ क्षेत्रों में कृषि उत्पादन का स्वरूप बदल दिया।
सिंचाई उपलब्ध होने पर किसान अधिक उत्पादन देने वाली और अधिक बाजारोन्मुख फसलों की ओर बढ़ सकता था। धान, गन्ना, कपास तथा बागवानी जैसी फसलों का विस्तार कई सिंचित क्षेत्रों में इसी परिवर्तन से जुड़ा था।
लेकिन सिंचाई का लाभ समान रूप से वितरित नहीं हुआ।
नहर के निकट और दूर स्थित गांवों में अंतर रहा। ऊपरी और निचले हिस्सों में पानी की उपलब्धता अलग रही। कुछ क्षेत्रों को बड़े बांधों का लाभ मिला, जबकि विशाल भूभाग वर्षा पर निर्भर बना रहा।
इस असमानता ने पानी को केवल कृषि संसाधन नहीं रहने दिया; वह राजनीतिक संसाधन भी बन गया।
मलप्रभा क्षेत्र और नरगुंड–नवलगुंड की पृष्ठभूमि
कर्नाटक किसान राजनीति के विकास को समझने में मलप्रभा सिंचाई क्षेत्र विशेष महत्व रखता है। सिंचाई परियोजनाओं से किसानों में बेहतर उत्पादन और आय की अपेक्षाएं पैदा हुईं। लेकिन सिंचाई से जुड़े शुल्क, कर तथा कृषि लागत के प्रश्नों ने असंतोष को जन्म दिया।
1980 में नरगुंड और नवलगुंड क्षेत्र में उभरा किसान आंदोलन अचानक पैदा हुई घटना नहीं था। उसके पीछे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में वर्षों से जमा असंतोष था।
यहां एक ऐतिहासिक सावधानी आवश्यक है। नरगुंड–नवलगुंड आंदोलन और कर्नाटक राज्य रैयत संघ को पूरी तरह एक ही घटना मानना उचित नहीं है। किसान असंतोष के विभिन्न स्थानीय प्रवाह बाद में व्यापक रैयत संगठन और किसान राजनीति के उभार से जुड़े। फिर भी 1980 का किसान विस्फोट कर्नाटक में संगठित किसान राजनीति के इतिहास का निर्णायक मोड़ बना।
पुलिस गोलीबारी और किसानों की मृत्यु ने आंदोलन को व्यापक भावनात्मक और राजनीतिक शक्ति प्रदान की। किसान को यह अनुभव हुआ कि उसकी समस्या केवल व्यक्तिगत खेती की समस्या नहीं, बल्कि राज्य की कृषि नीति से जुड़ा प्रश्न है।
हरित क्रांति : उत्पादन के साथ लागत का नया युग
हरित क्रांति का प्रभाव कर्नाटक में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसा समान और व्यापक नहीं था। फिर भी सिंचित क्षेत्रों में उच्च उत्पादक किस्मों, रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों, पंपसेटों, मशीनों और संस्थागत ऋण के बढ़ते उपयोग ने कृषि की प्रकृति बदल दी।
परंपरागत खेती अपेक्षाकृत कम खरीदे गए साधनों पर निर्भर थी। नई कृषि तकनीक ने किसान को बाजार से अधिक गहराई से जोड़ दिया।
अब उसे बीज खरीदना था, उर्वरक खरीदना था, कीटनाशक खरीदना था, पंप चलाने के लिए बिजली चाहिए थी, मशीनरी के लिए पूंजी चाहिए थी और कई मामलों में बैंक अथवा सहकारी संस्था से ऋण लेना पड़ता था।
इस परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक परिणाम निकला।
किसान की आय केवल इस बात से निर्धारित नहीं होती थी कि खेत में कितना उत्पादन हुआ। अब यह भी महत्वपूर्ण था कि उत्पादन की लागत कितनी है और उपज का बाजार मूल्य कितना मिलता है।
इसी आर्थिक समीकरण ने आगे चलकर किसान संगठनों की राजनीति बदल दी।
आत्मनिर्भर किसान से बाजार-निर्भर उत्पादक तक
कृषि के व्यावसायीकरण ने किसान को कई बाजारों पर निर्भर बनाया।
वह इनपुट बाजार से बीज और उर्वरक खरीदता था; ऋण बाजार से पूंजी लेता था; ऊर्जा व्यवस्था पर सिंचाई के लिए निर्भर था और अंततः मंडी अथवा व्यापारी को अपनी उपज बेचता था।
इस प्रकार किसान एक साथ कई संस्थाओं से जुड़ गया—सरकार, बैंक, सहकारी संस्था, बिजली बोर्ड, सिंचाई विभाग, मंडी और व्यापारी।
इससे किसान आंदोलन का लक्ष्य भी बदल गया।
औपनिवेशिक काल के अनेक आंदोलनों में संघर्ष का प्रमुख लक्ष्य जमींदार, साहूकार अथवा औपनिवेशिक राजस्व व्यवस्था थी। स्वतंत्रता के बाद विकसित नई कृषि अर्थव्यवस्था में किसान का संघर्ष अक्सर राज्य की मूल्य, ऋण, बिजली, सिंचाई और व्यापार नीति से होने लगा।
KRRS इसी परिवर्तित राजनीतिक अर्थव्यवस्था की उपज था।
क्षेत्रीय असमानता : पुराना मैसूर और उत्तरी कर्नाटक
कर्नाटक की कृषि राजनीति पर क्षेत्रीय असमानताओं का गहरा प्रभाव पड़ा।
दक्षिणी पुराने मैसूर क्षेत्र में बेंगलुरु, मैसूरु, मांड्या, हासन और आसपास के क्षेत्रों में अपेक्षाकृत विकसित प्रशासन, बाजार, सिंचाई और सहकारिता का प्रभाव था। विशेष रूप से मांड्या में कावेरी सिंचाई और गन्ना आधारित अर्थव्यवस्था ने एक विशिष्ट कृषक समाज बनाया।
इसके विपरीत उत्तरी कर्नाटक के अनेक जिलों में वर्षा की अनिश्चितता, शुष्क कृषि और विकास संबंधी पिछड़ेपन की समस्याएं अधिक तीव्र थीं। धारवाड़, गदग, बेलगावी, विजयपुरा, बागलकोट तथा आसपास के क्षेत्रों में किसान राजनीति का आर्थिक संदर्भ दक्षिणी कर्नाटक से भिन्न था।
कल्याण कर्नाटक क्षेत्र में ऐतिहासिक पिछड़ापन और भी महत्वपूर्ण प्रश्न रहा।
इस प्रकार “कर्नाटक का किसान” कोई एक समान आर्थिक श्रेणी नहीं था।
तटीय और मलनाड क्षेत्र
तटीय कर्नाटक और पश्चिमी घाट का मलनाड क्षेत्र राज्य की कृषि विविधता का तीसरा महत्वपूर्ण आयाम प्रस्तुत करता है।
यहां अपेक्षाकृत अधिक वर्षा होती है। धान के साथ नारियल, सुपारी, कॉफी, मसाले और बागवानी की विभिन्न फसलें कृषि अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनीं। विशेषकर कॉफी और अन्य व्यावसायिक फसलों ने उत्पादकों को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ा।
आगे चलकर WTO और कृषि व्यापार पर कर्नाटक में पैदा हुई तीखी राजनीतिक बहस की एक पृष्ठभूमि इस बाजार-संबद्ध कृषि में भी दिखाई देती है।
जाति, वर्ग और किसान पहचान
जाति इस वर्गीय विभाजन को और जटिल बनाती थी।
स्वतंत्रता के बाद कर्नाटक में किसान राजनीति का विकास — कांग्रेस व्यवस्था, सहकारिता, भूमि सुधार, कृषि बाजार और ग्रामीण सत्ता-संरचना
प्रस्तावना : किसान से राजनीतिक किसान बनने की प्रक्रिया
स्वतंत्रता के बाद कर्नाटक की किसान राजनीति का विकास केवल खेत और फसल से संबंधित समस्याओं का इतिहास नहीं है। यह उस व्यापक परिवर्तन की कहानी है जिसमें ग्रामीण उत्पादक पहले कांग्रेस की चुनावी-सामाजिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बना, फिर सहकारी संस्थाओं, पंचायतों और कृषि बाजारों के माध्यम से संगठित राजनीतिक शक्ति हासिल करने लगा और अंततः राज्य से स्वतंत्र किसान संगठनों के जरिए अपनी मांगें रखने लगा।
1950 और 1960 के दशकों में ग्रामीण राजनीति मुख्यतः कांग्रेस के व्यापक राजनीतिक ढांचे के भीतर संचालित होती थी। किसान की शिकायतें स्थानीय विधायक, सहकारी संस्था, पंचायत, तहसील प्रशासन और पार्टी संगठन के माध्यम से राजनीतिक व्यवस्था तक पहुंचती थीं। लेकिन 1970 के दशक में भूमि सुधार, कृषि आधुनिकीकरण, सिंचाई विस्तार और बाजार पर बढ़ती निर्भरता ने ग्रामीण समाज का स्वरूप बदल दिया। किसान की अपेक्षाएं बढ़ीं और राज्य से उसका संबंध अधिक प्रत्यक्ष हुआ।
यहीं एक महत्वपूर्ण विरोधाभास पैदा हुआ। राज्य कृषि विकास का सबसे बड़ा संरक्षक भी था और बिजली दर, सिंचाई शुल्क, ऋण-वसूली, कृषि बाजार तथा मूल्य-नीति तय करने वाली सत्ता भी। इसलिए जिस राज्य पर किसान विकास के लिए निर्भर हुआ, वही धीरे-धीरे उसके आंदोलन का लक्ष्य भी बनने लगा।
इसी संक्रमण से कर्नाटक में स्वतंत्र किसान राजनीति और अंततः कर्नाटक राज्य रैयत संघ जैसी शक्ति के उभार का रास्ता बना।
स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस और ग्रामीण कर्नाटक
स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों में कांग्रेस कर्नाटक—तत्कालीन मैसूर—की प्रमुख राजनीतिक शक्ति थी। राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत, स्थानीय नेतृत्व, प्रशासनिक पहुंच और ग्रामीण अभिजात वर्ग से संबंधों ने उसे व्यापक सामाजिक आधार प्रदान किया।
ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस केवल चुनाव लड़ने वाली पार्टी नहीं थी। स्थानीय प्रभावशाली किसान, भू-स्वामी, सहकारी नेता, पंचायत प्रतिनिधि और जिला स्तर के राजनीतिक कार्यकर्ता उसके नेटवर्क का हिस्सा बनते गए।
इस व्यवस्था में किसान राजनीति स्वतंत्र किसान संगठन के रूप में कम और कांग्रेस के अंदर विभिन्न ग्रामीण हितों के प्रतिनिधित्व के रूप में अधिक दिखाई देती थी।
किसी क्षेत्र में सिंचाई परियोजना चाहिए, सड़क बनवानी है, सहकारी बैंक से ऋण चाहिए, चीनी मिल स्थापित करनी है अथवा किसी स्थानीय प्रशासनिक निर्णय को बदलवाना है—इन सबके लिए राजनीतिक प्रतिनिधि महत्वपूर्ण मध्यस्थ था।
इसने ग्रामीण समाज और राज्य के बीच संरक्षण तथा प्रतिनिधित्व पर आधारित संबंध विकसित किया।
1956 का राज्य पुनर्गठन और किसान राजनीति
1956 में भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन ने कन्नड़भाषी क्षेत्रों को एक राजनीतिक इकाई में जोड़ा। पुराने मैसूर में बंबई, हैदराबाद और मद्रास से जुड़े कन्नड़भाषी क्षेत्रों तथा कूर्ग का समावेश हुआ।
लेकिन प्रशासनिक एकीकरण का अर्थ कृषि-सामाजिक समानता नहीं था।
पुराने मैसूर की राजनीतिक संस्थाओं और सहकारिता का अनुभव उत्तरी कर्नाटक से अलग था। हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र की ऐतिहासिक परिस्थितियां और थीं। तटीय क्षेत्र की कृषि अर्थव्यवस्था भी अलग थी।
नए राज्य के सामने इसलिए केवल कन्नड़भाषी एकीकरण नहीं, बल्कि असमान कृषि क्षेत्रों को एक साझा विकास नीति में जोड़ने की चुनौती भी थी।
आगे चलकर क्षेत्रीय असमानता किसान राजनीति का महत्वपूर्ण आधार बनी।
कांग्रेस व्यवस्था और प्रभावशाली कृषक समुदाय
कर्नाटक की प्रारंभिक राजनीति में वोक्कालिगा और लिंगायत समुदायों का उल्लेख विशेष रूप से किया जाता है। दोनों समुदायों के महत्वपूर्ण हिस्से कृषि, भूमि और ग्रामीण संस्थाओं से जुड़े थे और राज्य की राजनीति में उनका प्रभाव लगातार बढ़ा।
दक्षिणी पुराने मैसूर क्षेत्र में वोक्कालिगा नेतृत्व का मजबूत आधार था, जबकि उत्तरी तथा मध्य कर्नाटक के अनेक हिस्सों में लिंगायत समुदाय का महत्वपूर्ण प्रभाव था।
लेकिन कर्नाटक की ग्रामीण सत्ता को केवल दो जातियों के द्वंद्व के रूप में देखना अत्यधिक सरलीकरण होगा। विभिन्न पिछड़े वर्ग, दलित, आदिवासी, मुस्लिम ग्रामीण समुदाय और अन्य कृषक जातियां भी स्थानीय सामाजिक संरचना का हिस्सा थीं।
फिर भी भूमि, सहकारी संस्थाओं और चुनावी प्रतिनिधित्व के बीच संबंध ने कुछ प्रभावशाली कृषक समूहों को राज्य की राजनीति में अनुपात से अधिक प्रभाव प्रदान किया।
यही वह सामाजिक संरचना थी जिसमें कांग्रेस की ग्रामीण राजनीति विकसित हुई।
सहकारिता : अर्थव्यवस्था से राजनीति तक
स्वतंत्रता के बाद कर्नाटक में सहकारी आंदोलन ग्रामीण विकास की महत्वपूर्ण संस्था बना। कृषि ऋण, दुग्ध उत्पादन, चीनी उद्योग, विपणन और कृषि निवेश के क्षेत्र में सहकारी संस्थाओं का विस्तार हुआ।
सिद्धांततः सहकारिता का उद्देश्य किसानों को साहूकार और निजी व्यापारी की निर्भरता से मुक्त करना तथा सामूहिक आर्थिक शक्ति प्रदान करना था।
व्यवहार में इसका एक राजनीतिक आयाम भी विकसित हुआ।
प्राथमिक कृषि ऋण समितियों से जिला सहकारी बैंकों तक, सहकारी चीनी मिलों से दुग्ध संघों तक—इन संस्थाओं के चुनाव और प्रबंधन ने ग्रामीण नेतृत्व की नई सीढ़ियां तैयार कीं।
एक व्यक्ति पंचायत से सहकारी संस्था, वहां से जिला राजनीति और फिर विधानसभा अथवा संसद तक पहुंच सकता था।
इस अर्थ में सहकारिता ने ग्रामीण लोकतंत्रीकरण में योगदान दिया, लेकिन उसने नए ग्रामीण अभिजात वर्ग को भी जन्म दिया।
चीनी सहकारिता और सिंचित कृषि
सिंचित क्षेत्रों में गन्ने के विस्तार ने चीनी उद्योग और किसान राजनीति के बीच निकट संबंध बनाया। गन्ना उत्पादक किसान मिल, मूल्य, भुगतान, परिवहन और सिंचाई जैसी संस्थागत व्यवस्थाओं से जुड़ गया।
सहकारी चीनी मिल आर्थिक संस्था होने के साथ राजनीतिक शक्ति-केंद्र भी बन सकती थी।
महाराष्ट्र में यह प्रक्रिया अधिक व्यापक और प्रसिद्ध रही, लेकिन कर्नाटक के कुछ हिस्सों—विशेषकर सिंचित और गन्ना उत्पादक क्षेत्रों—में भी कृषि, सहकारिता और राजनीति का महत्वपूर्ण गठजोड़ विकसित हुआ।
इसने किसान को बाजार और राजनीतिक संस्था दोनों से जोड़ा।
भूमि सुधार का राजनीतिक प्रश्न
स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधार कांग्रेस की ग्रामीण राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नों में था।
कर्नाटक भूमि सुधार अधिनियम, 1961 ने किरायेदारी, भूमि सीमा और भू-संबंधों में परिवर्तन की कानूनी नींव रखी। लेकिन वास्तविक निर्णायक मोड़ 1970 के दशक में आया।
देवराज उर्स के नेतृत्व में भूमि सुधार को अधिक व्यापक सामाजिक परिवर्तन के कार्यक्रम से जोड़ा गया। 1974 से प्रभावी संशोधित व्यवस्था ने किरायेदारों को भूमि अधिकार प्रदान करने और बड़ी जोतों पर सीमा लागू करने की दिशा में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया।
इस नीति ने पुराने भू-स्वामी प्रभुत्व को चुनौती दी और अनेक वास्तविक काश्तकारों को स्वामित्व प्राप्त करने का अवसर दिया।
लेकिन इसका राजनीतिक महत्व इससे भी व्यापक था।
देवराज उर्स और ग्रामीण सत्ता का पुनर्संतुलन
देवराज उर्स का दौर कर्नाटक की सामाजिक और राजनीतिक संरचना में महत्वपूर्ण परिवर्तन का समय था। उन्होंने पिछड़े वर्गों, दलितों, अल्पसंख्यकों और अपेक्षाकृत कमजोर सामाजिक समूहों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की दिशा में नया गठबंधन बनाने का प्रयास किया।
भूमि सुधार इस व्यापक सामाजिक रणनीति का प्रमुख हिस्सा था।
इससे पारंपरिक प्रभावशाली भू-स्वामी समूहों की शक्ति को चुनौती मिली, लेकिन साथ ही भूमि प्राप्त करने वाले छोटे और मध्यम काश्तकारों की नई श्रेणी भी मजबूत हुई।
यहां एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक परिवर्तन दिखाई देता है।
पुरानी किसान राजनीति का केंद्रीय प्रश्न था—
नई कृषि राजनीति में धीरे-धीरे प्रश्न बनने लगा—
“जमीन पर खेती करने वाले किसान को आर्थिक रूप से टिकाऊ आय कैसे मिले?”
भूमि सुधार से किसान आंदोलन समाप्त नहीं हुआ। उसने किसान राजनीति के मुद्दों को बदलने में योगदान दिया।
भूमिहीनता और भूमि सुधार की सीमा
भूमि सुधार की उपलब्धियों के बावजूद कर्नाटक के ग्रामीण समाज में असमानता समाप्त नहीं हुई।
भूमिहीन खेतिहर मजदूरों की बड़ी आबादी बनी रही। सीमांत जोतों पर खेती करने वाले परिवारों के लिए केवल भूमि का स्वामित्व आर्थिक सुरक्षा की गारंटी नहीं था। छोटे भूखंड, वर्षा की अनिश्चितता और बाजार जोखिम उनकी स्थिति को कमजोर रखते थे।
भूमि सुधार लागू करने में प्रशासनिक और कानूनी समस्याएं भी थीं। किरायेदारी के अभिलेख हर जगह स्पष्ट नहीं थे। भूमि सीमा से बचने के लिए विभिन्न व्यवस्थाओं का उपयोग किया गया। न्यायाधिकरणों के निर्णय और मुकदमे लंबे चल सकते थे।
इसलिए ग्रामीण समाज में वर्गीय अंतर नए रूप में कायम रहे।
यही आगे चलकर KRRS जैसे संगठनों के मूल्यांकन का भी महत्वपूर्ण प्रश्न बना—क्या “किसान” की साझा पहचान भूमिहीन मजदूर और छोटे किसान की समस्याओं को पर्याप्त रूप से समाहित करती थी?
कृषि बाजार का विस्तार
1960 और 1970 के दशकों में कृषि उत्पादन धीरे-धीरे अधिक बाजारोन्मुख हुआ।
किसान अब केवल परिवार की खपत के लिए उत्पादन नहीं करता था। गन्ना, कपास, मूंगफली, तंबाकू, कॉफी, सुपारी तथा अन्य व्यावसायिक फसलों के विस्तार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बाजार से अधिक निकटता से जोड़ा।
मंडियों, व्यापारियों, सहकारी विपणन संस्थाओं और प्रसंस्करण उद्योगों का महत्व बढ़ा।
इससे किसान के लिए एक नया प्रश्न केंद्रीय हुआ—
उपज का मूल्य कौन निर्धारित करता है?
यही प्रश्न आगे चलकर “लाभकारी मूल्य” की किसान राजनीति का आधार बना।
विनियमित कृषि बाजार और मंडी व्यवस्था
कृषि बाजारों में किसानों को व्यापारियों की मनमानी, गलत तौल, अनौपचारिक कटौती और कमजोर सौदेबाजी जैसी समस्याओं से बचाने के लिए विनियमित बाजार व्यवस्था विकसित की गई।
कृषि उपज विपणन समितियों—APMC—का उद्देश्य अधिक संस्थागत बाजार व्यवस्था तैयार करना था।
लेकिन केवल मंडी स्थापित हो जाने से किसान की मूल्य संबंधी समस्या समाप्त नहीं हुई।
यदि किसी फसल की बाजार कीमत उत्पादन लागत से नीचे चली जाए, तो बेहतर तौल व्यवस्था भी किसान को घाटे से नहीं बचा सकती थी।
इसलिए किसान राजनीति धीरे-धीरे मंडी सुधार से आगे बढ़कर मूल्य निर्धारण की राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर प्रश्न उठाने लगी।
न्यूनतम समर्थन मूल्य और कर्नाटक
राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था के विस्तार ने कृषि मूल्य नीति को अधिक प्रत्यक्ष सरकारी प्रश्न बनाया। लेकिन इसका लाभ सभी फसलों और सभी क्षेत्रों में समान रूप से नहीं पहुंचा।
कर्नाटक की कृषि विविध थी। धान और कुछ अन्य फसलों के अतिरिक्त राज्य के किसान रागी, ज्वार, दालें, तिलहन, कपास, गन्ना तथा बागवानी और व्यावसायिक फसलों पर निर्भर थे।
इनमें अनेक फसलों के लिए घोषित समर्थन मूल्य और वास्तविक बाजार प्राप्ति के बीच अंतर रह सकता था। सरकारी खरीद की पहुंच भी क्षेत्र और फसल के अनुसार अलग थी।
इसलिए कर्नाटक के किसान के लिए “समर्थन मूल्य घोषित होना” और “वास्तव में लाभकारी मूल्य मिलना” दो अलग बातें थीं।
राज्य पर बढ़ती कृषि निर्भरता
स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों की तुलना में 1970 के दशक तक किसान का राज्य से संबंध बहुत गहरा हो चुका था।
बिजली सरकार अथवा सार्वजनिक बिजली व्यवस्था देती थी।
सहकारी ऋण राज्य-समर्थित संस्थाओं से जुड़ा था।
उर्वरक और अन्य कृषि निवेश की कीमतों पर सरकारी नीतियों का प्रभाव था।
कई प्रमुख फसलों की मूल्य नीति केंद्र और राज्य की नीतियों से प्रभावित थी।
इस प्रकार कृषि आधुनिक हुई तो किसान की राज्य पर निर्भरता भी बढ़ी।
यही निर्भरता आगे चलकर राजनीतिक टकराव का स्रोत बनी।
पंचायत और स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व
स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं ने ग्रामीण राजनीतिक चेतना को विस्तृत किया। गांव और तालुक स्तर पर नेतृत्व विकसित हुआ।
पंचायत राजनीति ने किसान को प्रशासन और सार्वजनिक संसाधनों के वितरण से प्रत्यक्ष रूप से जोड़ा।
सड़क कहां बनेगी, पानी किसे मिलेगा, विकास योजना किस गांव में जाएगी, स्थानीय संस्था में किसका प्रतिनिधित्व होगा—इन प्रश्नों ने ग्रामीण समाज को लगातार राजनीतिक बनाया।
इससे ग्रामीण नेतृत्व के नए स्तर विकसित हुए जो आगे चलकर किसान संगठनों के लिए तैयार सांगठनिक आधार बन सकते थे।
कांग्रेस के भीतर किसान हितों की सीमा
जब तक ग्रामीण समाज की अपेक्षाएं सीमित थीं और कांग्रेस स्थानीय हितों को अपने व्यापक संगठन में समाहित कर पा रही थी, स्वतंत्र किसान संगठन की आवश्यकता अपेक्षाकृत कम महसूस हुई।
लेकिन कृषि आधुनिकीकरण ने किसान की मांगों को अधिक विशिष्ट बना दिया।
किसान अब केवल सड़क, स्कूल अथवा स्थानीय विकास नहीं चाहता था। वह कृषि मूल्य, बिजली शुल्क, सिंचाई दर, ऋण नीति और बाजार में हस्तक्षेप चाहता था।
यहां कांग्रेस की “सर्ववर्गीय” राजनीति की सीमा सामने आने लगी।
एक ही सरकार को शहरी उपभोक्ता के लिए खाद्य कीमतें नियंत्रित रखनी थीं, उद्योग की आवश्यकताओं को देखना था, सरकारी वित्त संतुलित करना था और किसान को बेहतर मूल्य भी देना था।
किसान बनाम शहरी अर्थव्यवस्था का विमर्श
1970 और विशेषकर 1980 के दशक के नए किसान आंदोलनों में एक महत्वपूर्ण विचार उभरा कि सरकारी आर्थिक व्यवस्था कृषि से अधिशेष लेकर शहरी और औद्योगिक अर्थव्यवस्था को लाभ पहुंचाती है।
रैयत आंदोलन की वैचारिक और सांगठनिक पृष्ठभूमि — 1970 के दशक का किसान असंतोष, नरगुंड–नवलगुंड से पहले के संघर्ष और स्वतंत्र किसान संगठन की आवश्यकता
प्रस्तावना : स्थानीय शिकायतों से स्वतंत्र किसान राजनीति तक
कर्नाटक राज्य रैयत संघ का उदय किसी एक दिन, एक सम्मेलन या एक नेता से नहीं हुआ। इसकी जड़ें 1950 के दशक के भूमि संघर्षों, 1960–70 के दशकों के भूमि-सुधार आंदोलनों, सिंचाई विस्तार, बढ़ती कृषि लागत, बाजार पर निर्भरता और राज्य की कृषि नीतियों के प्रति बढ़ते असंतोष में थीं। 1970 के दशक के अंत तक कर्नाटक के ग्रामीण समाज में ऐसा वातावरण बन चुका था जिसमें किसान अपनी समस्याओं को केवल स्थानीय प्रशासन की विफलता नहीं, बल्कि व्यापक कृषि नीति का परिणाम मानने लगा था।
इस परिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि किसान की राजनीति धीरे-धीरे भूमि अधिकार से उत्पादन की अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रही थी। जमीन किसकी हो—यह प्रश्न समाप्त नहीं हुआ था, लेकिन उसके साथ नए प्रश्न जुड़ गए थे: खेती की लागत कौन नियंत्रित करता है, सिंचाई का मूल्य कौन तय करता है, ऋण की शर्तें क्या हों, फसल का लाभकारी मूल्य कैसे मिले और सरकार किसान की आय तथा जोखिम के बीच संतुलन बनाने के लिए क्या करे?
कर्नाटक में 1980 का नरगुंड–नवलगुंड आंदोलन इस परिवर्तन का विस्फोटक क्षण था, लेकिन उससे पहले ही इसके वैचारिक और सांगठनिक तत्व तैयार हो चुके थे। उपलब्ध अध्ययनों में 1950 के दशक के कागोडु सत्याग्रह से लेकर 1960–70 के भूमि-सुधार संघर्षों और फिर मलप्रभा क्षेत्र के किसान असंतोष तक एक क्रम दिखाई देता है।
कागोडु सत्याग्रह : स्वतंत्र कर्नाटक की किसान प्रतिरोध परंपरा
स्वतंत्रता के तुरंत बाद कर्नाटक में किसान संघर्ष की एक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति कागोडु सत्याग्रह के रूप में सामने आई। यह मुख्यतः काश्तकारों और भूमि अधिकार से जुड़ा आंदोलन था। समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया भी इससे जुड़े और उनकी गिरफ्तारी ने आंदोलन को व्यापक राजनीतिक पहचान दिलाई।
कागोडु का मूल प्रश्न था—जो किसान जमीन जोतता है, उसका उस जमीन पर अधिकार क्या होना चाहिए?
यह प्रश्न बाद के “जोतने वाले को जमीन” के भूमि-सुधार विमर्श का अग्रदूत बना। कर्नाटक के किसान आंदोलन के इतिहास में कागोडु इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने यह स्थापित किया कि ग्रामीण सामाजिक संबंधों में परिवर्तन केवल प्रशासनिक सुधार से नहीं, किसान की संगठित कार्रवाई से भी संभव है। सरकारी और शैक्षणिक विवरणों में इसे कर्नाटक के प्रारंभिक महत्वपूर्ण किसान आंदोलनों में गिना गया है।
लेकिन कागोडु और बाद के KRRS आंदोलन में एक मूलभूत अंतर था। कागोडु की राजनीति का केंद्र भूमि और किरायेदारी थी, जबकि 1980 के दशक की नई किसान राजनीति का केंद्र तेजी से मूल्य, लागत, सिंचाई, ऋण और बाजार बनने वाला था।
1960 और 1970 के दशक : भूमि ही केंद्रीय प्रश्न
1960 और 1970 के दशकों में कर्नाटक के विभिन्न ग्रामीण आंदोलनों में भूमि-सुधार, किरायेदारों के अधिकार और वास्तविक काश्तकारों को स्वामित्व दिलाने की मांग प्रमुख रही। भूमि सुधार कानून और बाद में देवराज उर्स सरकार के हस्तक्षेप ने इस संघर्ष को संस्थागत दिशा दी।
यह दौर इसलिए निर्णायक था कि इसमें एक वर्ग ऐसा उभरा जो पहले किरायेदार था और बाद में स्वयं भूमि का स्वामी बना। स्वामित्व मिलने से किसान की समस्याएं समाप्त नहीं हुईं; बल्कि उनका स्वरूप बदल गया।
भूमि मिलने के बाद किसान को उत्पादन के लिए पूंजी चाहिए थी। सिंचाई चाहिए थी। उर्वरक, बीज और बिजली चाहिए थी। उत्पादन बढ़ा तो बाजार चाहिए था। बाजार मिला तो उचित मूल्य चाहिए था।
इस प्रकार भूमि सुधार ने अनजाने में किसान राजनीति के अगले चरण की जमीन भी तैयार की।
किसान प्रश्न में संरचनात्मक बदलाव
1970 के दशक में किसान के सामने राज्य का स्वरूप बदल चुका था। औपनिवेशिक काल में सरकार मुख्यतः लगान वसूलने वाली सत्ता के रूप में दिखाई देती थी। स्वतंत्रता के बाद वही राज्य सिंचाई परियोजनाएं बनाता, सहकारी ऋण उपलब्ध कराता, कृषि बाजार विनियमित करता और ग्रामीण विकास कार्यक्रम चलाता था।
लेकिन इससे किसान और राज्य के बीच संपर्क भी बहुत बढ़ गया।
यदि सिंचाई विभाग पानी नहीं देता तो किसान सरकार से नाराज होता।
यदि बिजली महंगी होती तो सरकार जिम्मेदार दिखाई देती।
यदि सहकारी बैंक कर्ज वसूलता तो सरकारी नीति पर प्रश्न उठता।
यदि कृषि उपज का मूल्य लागत के अनुरूप नहीं होता तो किसान मूल्य-नीति को दोष देता।
इस प्रकार सरकारी हस्तक्षेप जितना बढ़ा, किसान का राजनीतिक संघर्ष भी उतना ही सीधे सरकार की नीति से जुड़ता गया।
हरित क्रांति की असमान पहुंच और नई आकांक्षाएं
कर्नाटक हरित क्रांति का सर्वाधिक लाभ लेने वाले राज्यों में नहीं था, फिर भी सिंचित क्षेत्रों में कृषि तकनीक का तेजी से आधुनिकीकरण हुआ। उन्नत बीज, उर्वरक, पंपसेट, कीटनाशक और बाजारोन्मुख खेती का विस्तार हुआ।
इस परिवर्तन ने किसान में आय बढ़ने की अपेक्षा पैदा की।
लेकिन नई खेती अधिक जोखिमपूर्ण भी थी।
पारंपरिक कृषि में किसान के खर्च का बड़ा भाग स्थानीय संसाधनों से पूरा हो सकता था। नई कृषि में उसे बाजार से सामान खरीदना पड़ा। यदि उपज का भाव गिरा, बीज खराब निकला, पानी नहीं मिला या फसल नष्ट हुई तो घाटा कहीं अधिक गंभीर होता।
1970 के दशक में मलप्रभा क्षेत्र में किसानों ने व्यावसायिक कपास की ओर रुख किया था। बाद में कपास की कीमतों में गिरावट और खराब गुणवत्ता वाले बीज जैसी समस्याओं ने आर्थिक संकट बढ़ाया। इसी समय सिंचाई से अपेक्षित लाभ न मिलने और बेहतरमेंट लेवी जैसे बोझ ने असंतोष को तीखा किया।
वर्षा और सिंचाई के बीच फंसा किसान
उत्तरी कर्नाटक में कृषि की सबसे बड़ी समस्याओं में अनिश्चित वर्षा शामिल थी। इसलिए बड़ी सिंचाई परियोजनाओं को किसान ने आर्थिक मुक्ति की आशा के रूप में देखा।
मलप्रभा परियोजना से भी ऐसी ही उम्मीद थी।
परियोजना बनने के बाद किसान का स्वाभाविक अनुमान था कि नियमित सिंचाई मिलेगी, उत्पादन बढ़ेगा और जमीन की उत्पादकता सुधरेगी।
लेकिन जब पानी का वितरण अपेक्षित ढंग से नहीं हुआ और दूसरी ओर परियोजना से जुड़े शुल्क और बेहतरमेंट लेवी की वसूली शुरू हुई, तो किसान के लिए यह विकास की योजना के बजाय आर्थिक अन्याय का प्रतीक बनने लगा। बाद के विवरणों के अनुसार किसानों की शिकायत यही थी कि परियोजना का लाभ पर्याप्त रूप से पहुंचा ही नहीं, जबकि उससे संबंधित आर्थिक भार उनसे वसूला जा रहा था।
यहीं किसान आंदोलन की एक नई भाषा बनी—
बेहतरमेंट लेवी का अर्थ
बेहतरमेंट लेवी का तर्क यह था कि सिंचाई परियोजना बनने से भूमि का मूल्य बढ़ता है, इसलिए उससे लाभान्वित भूमिधर परियोजना की लागत का एक हिस्सा वहन करें।
कागज पर यह सिद्धांत तर्कसंगत लग सकता था।
लेकिन किसानों का प्रश्न अलग था। यदि पानी नियमित नहीं मिला, फसल में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई और भूमि का बढ़ा हुआ बाजार मूल्य केवल जमीन बेचने पर प्राप्त होना है, तो वर्तमान आय के बिना किसान अतिरिक्त कर कैसे दे?
किसान की दृष्टि में जमीन का संभावित मूल्य और वास्तविक कृषि आय दो भिन्न बातें थीं।
इस अंतर ने सरकारी आर्थिक तर्क और किसान की जीविका के तर्क के बीच संघर्ष पैदा किया।
कृषि संकट का स्थानीय से सामूहिक होना
प्रारंभिक चरण में सिंचाई शुल्क, कर और ऋण किसान की व्यक्तिगत समस्या प्रतीत हो सकते थे। लेकिन जब एक ही गांव, तालुक या कमांड क्षेत्र के हजारों किसान समान समस्या झेल रहे हों, तो वह निजी समस्या नहीं रहती।
किसानों ने महसूस किया कि यदि एक व्यक्ति कर न देने की अपील करता है तो प्रशासन उसे दबा सकता है, लेकिन यदि हजारों किसान सामूहिक रूप से विरोध करें तो सरकार को बातचीत करनी पड़ेगी।
इस प्रकार व्यक्तिगत आर्थिक संकट सामूहिक राजनीतिक चेतना में बदलने लगा।
राजनीतिक दलों की मौजूदगी, पर स्वतंत्रता की खोज
कर्नाटक के किसान संघर्षों में कांग्रेस विरोधी दल, समाजवादी, वामपंथी और स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ता सक्रिय थे। मलप्रभा क्षेत्र में भी विभिन्न राजनीतिक धाराओं से जुड़े लोग किसानों के प्रश्न उठा रहे थे। उपलब्ध शोध बताता है कि CPI(M) से जुड़े अखिल भारतीय किसान सभा के स्थानीय कार्यकर्ता भी 1979 से क्षेत्र की किसान समस्याओं का अध्ययन और संगठन कर रहे थे।
लेकिन किसान आंदोलन का धीरे-धीरे यह अनुभव भी था कि प्रत्येक राजनीतिक दल आंदोलन को अपनी चुनावी राजनीति से जोड़ना चाहता है।
यही स्थिति स्वतंत्र किसान संगठन की धारणा को मजबूत करती गई।
क्या उनका संगठन किसी दल की किसान शाखा बने या किसान हितों के आधार पर सभी दलों से समान दूरी रखते हुए सरकार पर दबाव बनाए?
आगे चलकर KRRS की पहचान में यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हुआ।
गैर-दलीय संगठन की अवधारणा
मलप्रभा क्षेत्र में मार्च 1980 में बनी मलप्रभा नीरावरी प्रदेश रैयत समन्वय समिति को गैर-दलीय आधार पर संगठित किया गया। प्रारंभ में उसका क्षेत्र नवलगुंड तक सीमित था, लेकिन बाद में नरगुंड, नवलगुंड, रोण, सौंदत्ती और रामदुर्ग सहित पांच तालुकों तक उसका विस्तार हुआ।
यह संगठनात्मक प्रयोग भविष्य की रैयत राजनीति के लिए महत्वपूर्ण था।
यह कोई स्थायी राष्ट्रीय दल नहीं था।
न कोई चुनावी घोषणापत्र उसका मूल आधार था।
उसका आधार था—किसान की साझा आर्थिक समस्या।
इससे किसान राजनीति को एक ऐसी संगठनात्मक भाषा मिली जिसमें अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े किसान भी समान मांग पर एक मंच पर आ सकते थे।
मांगें केवल सिंचाई तक सीमित नहीं थीं
मलप्रभा समन्वय समिति की मांगों का अध्ययन यह दिखाता है कि आंदोलन को केवल बेहतरमेंट लेवी विरोध कहना अधूरा होगा।
अप्रैल 1980 में मुख्यमंत्री आर. गुंडू राव को प्रस्तुत ज्ञापन में सिंचाई व्यवस्था का वैज्ञानिक प्रबंधन, फीडर चैनल, जल निकासी, छोटे किसानों के लिए भूमि समतलीकरण, नहरों के लिए अधिग्रहीत भूमि का शीघ्र मुआवजा, फसल बीमा और कृषि उपज के लाभकारी मूल्य जैसे प्रश्न उठाए गए थे।
इससे स्पष्ट है कि किसान आंदोलन की चेतना पहले ही व्यापक हो चुकी थी।
वह राज्य की पूरी कृषि नीति को प्रश्नों के घेरे में ला रहा था।
कपास और मूल्य का प्रश्न
उत्तर कर्नाटक में कपास महत्वपूर्ण व्यावसायिक फसल थी। बाजार मूल्य में अस्थिरता किसान के लिए गंभीर समस्या बन सकती थी।
यदि उत्पादन लागत लगातार बढ़े और कपास का बाजार मूल्य गिर जाए तो सिंचाई मिलने के बावजूद किसान की आय नहीं बढ़ती।
इसीलिए आंदोलन में कपास के न्यूनतम अथवा लाभकारी मूल्य का प्रश्न सामने आया।
यह किसान आंदोलन को भूमि और सिंचाई से आगे ले जाकर कृषि मूल्य नीति की ओर ले जा रहा था।
इसी भूमि पर आगे KRRS लाभकारी मूल्य को अपने प्रमुख आर्थिक मुद्दों में शामिल करेगा।
फसल बीमा की मांग
समन्वय समिति की मांगों में फसल बीमा का होना भी उल्लेखनीय था।
इससे पता चलता है कि किसान केवल तत्काल शुल्क राहत नहीं मांग रहे थे। वे कृषि जोखिम की संरचनात्मक समस्या को पहचान रहे थे।
वर्षा की विफलता, खराब बीज, बीमारी अथवा बाजार संकट किसी भी किसान को ऋणग्रस्त कर सकता था।
फसल बीमा की मांग मूलतः यह कह रही थी कि कृषि जोखिम का पूरा भार अकेला किसान क्यों उठाए?
यह प्रश्न आज की किसान राजनीति में सामान्य दिखाई देता है, लेकिन 1970–80 के दशक में इसका उभरना ग्रामीण राजनीतिक चेतना में महत्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत था।
कर न देने की रणनीति
जब ज्ञापन और बातचीत से समाधान नहीं हुआ तो किसानों ने असहयोग की दिशा अपनाई।
मलप्रभा क्षेत्र में कर न देने का आंदोलन संगठित किया गया। प्रशासन की प्रतिक्रिया भी कठोर हुई। एक अध्ययन के अनुसार कर न चुकाने वाले किसानों पर दबाव बनाने के लिए उनके बच्चों को स्कूल और कॉलेज में प्रवेश हेतु आवश्यक प्रमाणपत्र देने से इनकार जैसी कार्रवाई भी की गई।
किसान को लगा कि प्रशासन उसे नागरिक अधिकारों तक में दंडित कर रहा है।
यह अनुभव सरकार के प्रति असंतोष को और व्यापक बनाता गया।
सत्याग्रह और क्रमिक उग्रता
नरगुंड में किसानों ने तहसील कार्यालय के सामने सत्याग्रह और क्रमिक भूख हड़ताल शुरू की। जून 1980 तक हजारों किसानों की भागीदारी दिखाई देने लगी। 30 जून को लगभग दस हजार किसानों के एकत्र होने का उल्लेख मिलता है।
इसके बाद नवलगुंड सहित आसपास के क्षेत्रों में भी लामबंदी बढ़ी।
उसके पहले एक लंबी शांतिपूर्ण राजनीतिक प्रक्रिया मौजूद थी।
कर्नाटक राज्य रैयत संघ का गठन और विकास — नरगुंड–नवलगुंड के बाद किसान समूहों का एकीकरण, प्रारंभिक नेतृत्व, संगठनात्मक ढांचा, सामाजिक आधार और राज्यव्यापी विस्तार
प्रस्तावना : विद्रोह से संगठन तक
1980 का नरगुंड–नवलगुंड किसान आंदोलन कर्नाटक की ग्रामीण राजनीति में केवल एक हिंसक टकराव या प्रशासन-विरोधी घटना नहीं था। उसने यह सिद्ध कर दिया था कि किसान असंतोष राज्य के अलग-अलग हिस्सों में फैला हुआ है और स्थानीय समितियों की सीमाओं के भीतर उसे लंबे समय तक समेटना संभव नहीं होगा। सिंचाई शुल्क, बेहतरमेंट लेवी, फसल मूल्य, ऋण, बिजली, बीज और कृषि लागत से जुड़ी समस्याएं भौगोलिक रूप से अलग दिखती थीं, लेकिन उनके पीछे एक साझा संरचना थी—किसान उत्पादन करता था, पर कृषि नीति के निर्णायक औजारों पर उसका नियंत्रण नहीं था।
नरगुंड–नवलगुंड के बाद किसान नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि स्थानीय आक्रोश को स्थायी राज्यव्यापी संगठन में कैसे बदला जाए। यह परिवर्तन स्वतः नहीं हुआ। विभिन्न किसान समूहों, क्षेत्रीय नेताओं, समाजवादी कार्यकर्ताओं, गांधीवादी प्रवृत्तियों और स्थानीय संघर्षों को एक साझा मंच पर लाने की प्रक्रिया चली। इसी प्रक्रिया से कर्नाटक राज्य रैयत संघ—KRRS—का स्वरूप स्पष्ट हुआ।
KRRS का ऐतिहासिक महत्व इस बात में है कि उसने किसान को केवल कृषि-उत्पादक नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र राजनीतिक और आर्थिक हित-समूह के रूप में प्रस्तुत किया। आगे चलकर यही संगठन कर्नाटक के ग्रामीण समाज में सबसे प्रभावशाली किसान संगठनों में से एक बना।
नरगुंड–नवलगुंड के बाद नया राजनीतिक वातावरण
21 जुलाई 1980 की घटनाओं के बाद कर्नाटक सरकार और किसान नेतृत्व दोनों को यह समझ आ गया था कि किसान असंतोष अब सीमित प्रशासनिक समस्या नहीं रहा।
पुलिस गोलीबारी और हिंसक टकराव ने ग्रामीण क्षेत्रों में गहरा आक्रोश पैदा किया। आंदोलन के मृतक किसान प्रतीक बन गए और अनेक जिलों में किसान संगठनों ने सरकार के विरुद्ध बैठकें, प्रदर्शन और विरोध शुरू किए।
इस दौर में सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन भावनात्मक था।
किसान ने महसूस किया कि वह अकेला नहीं है।
नरगुंड का किसान, मंड्या का गन्ना उत्पादक, उत्तर कर्नाटक का कपास किसान, सूखा प्रभावित किसान और सिंचाई से वंचित किसान—इन सबकी समस्याएं अलग होते हुए भी राज्य की कृषि नीति से जुड़ी थीं।
यहीं राज्यव्यापी किसान पहचान का विस्तार हुआ।
स्थानीय किसान समितियों का एकीकरण
नरगुंड–नवलगुंड से पहले विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय किसान समितियां सक्रिय थीं। कहीं सिंचाई शुल्क का विरोध था, कहीं ऋण-वसूली का, कहीं बाजार मूल्य का और कहीं भूमि संबंधी विवादों का।
इन संगठनों में वैचारिक एकरूपता नहीं थी।
कुछ वामपंथी किसान संगठनों से जुड़े थे।
कुछ स्थानीय प्रभावशाली कृषक नेताओं द्वारा संचालित थे।
कुछ पूरी तरह गैर-दलीय स्वरूप में काम कर रहे थे।
1980 की घटनाओं के बाद इन सभी को समन्वित करने की आवश्यकता महसूस हुई। इसी पृष्ठभूमि में राज्यस्तरीय किसान संगठन की प्रक्रिया तेज हुई।
रैयत संघ के गठन की प्रक्रिया
कर्नाटक राज्य रैयत संघ की स्थापना को किसी एक तारीख और एक सम्मेलन से बांधकर देखना ऐतिहासिक प्रक्रिया को अत्यधिक सरल बना देगा।
असल में यह संगठन धीरे-धीरे विकसित हुआ।
इसके बाद राज्य स्तर पर बैठकों और सम्मेलनों के माध्यम से विभिन्न किसान समूहों को एक साझा संगठनात्मक पहचान दी गई।
1980 के बाद “रैयत संघ” नाम धीरे-धीरे कर्नाटक के किसान प्रतिरोध की प्रमुख पहचान बन गया।
यहां “रैयत” शब्द भी महत्वपूर्ण था। इसका अर्थ केवल भूमिधर किसान नहीं, बल्कि ग्रामीण उत्पादक की व्यापक पहचान से जुड़ा था। हालांकि व्यवहार में संगठन का मुख्य सामाजिक आधार भूमिधर छोटे और मध्यम किसान रहे।
एम. डी. नंजुंडास्वामी का उभार
प्रो. एम. डी. नंजुंडास्वामी KRRS के सबसे प्रमुख और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाने वाले नेता बने।
उनकी पृष्ठभूमि पारंपरिक ग्रामीण मुखिया जैसी नहीं थी। वे शिक्षित, वैचारिक और समाजवादी चिंतन से प्रभावित थे। उनके भीतर किसान राजनीति को व्यापक आर्थिक और राजनीतिक संदर्भ में देखने की क्षमता थी।
नंजुंडास्वामी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने किसान आंदोलन को केवल स्थानीय मांगों तक सीमित नहीं रहने दिया।
उनके नेतृत्व में धीरे-धीरे किसान प्रश्न जुड़ने लगे—
और अंततः WTO तथा वैश्वीकरण-विरोधी राजनीति से।
इस प्रकार उन्होंने KRRS को स्थानीय संगठन से वैचारिक किसान आंदोलन में बदलने में केंद्रीय भूमिका निभाई।
अन्य प्रारंभिक नेता
KRRS के इतिहास को केवल नंजुंडास्वामी-केंद्रित बनाना उचित नहीं होगा।
आरंभिक दौर में अनेक क्षेत्रीय किसान नेताओं, गांधीवादी कार्यकर्ताओं, समाजवादी विचारकों और स्थानीय संगठकों ने संगठन निर्माण में भूमिका निभाई।
एन. डी. सुंदरेश, रुद्रप्पा और विभिन्न जिला-स्तरीय किसान कार्यकर्ताओं का योगदान महत्वपूर्ण था।
इन नेताओं का महत्व इसलिए था कि वे संगठन को गांव और तालुक स्तर पर वास्तविक सामाजिक आधार प्रदान करते थे।
नंजुंडास्वामी आंदोलन को वैचारिक दिशा दे सकते थे, लेकिन हजारों किसानों को लामबंद करने के लिए स्थानीय नेतृत्व आवश्यक था।
यही KRRS की सांगठनिक शक्ति की नींव बनी।
एकल नेता नहीं, बहुस्तरीय नेतृत्व
KRRS का प्रारंभिक संगठनात्मक ढांचा अपेक्षाकृत विकेंद्रीकृत था।
इस संरचना का उद्देश्य था कि निर्णय केवल बेंगलुरु में बैठे नेता न करें।
स्थानीय संघर्ष स्थानीय नेतृत्व के माध्यम से उठे और राज्यस्तरीय संगठन उन्हें व्यापक समर्थन दे।
इस विकेंद्रीकरण ने KRRS को तेजी से विस्तार करने में मदद की।
लेकिन बाद में यही संरचना गुटबाजी और नेतृत्व विवाद का कारण भी बनी।
संगठन का गैर-दलीय चरित्र
KRRS की पहचान का एक महत्वपूर्ण तत्व था—राजनीतिक दलों से औपचारिक दूरी।
यह दावा किया गया कि किसान का हित किसी एक दल से बड़ा है।
कांग्रेस हो, जनता दल हो, भाजपा हो या कोई अन्य दल—यदि सरकार किसान-विरोधी नीति अपनाती है तो उसका विरोध होना चाहिए।
यह रुख किसान आंदोलन के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था।
इससे संगठन किसी चुनावी दल का परिशिष्ट बनने से बच सकता था।
लेकिन “गैर-दलीय” होना “गैर-राजनीतिक” होना नहीं था।
KRRS अत्यंत राजनीतिक संगठन था। वह सरकारों पर दबाव बनाता, चुनावी बहसों को प्रभावित करता और नीति प्रश्नों पर सार्वजनिक संघर्ष करता था।
संगठनात्मक पहचान : किसान पहले
KRRS के लिए किसान की पहचान जाति, क्षेत्र और दल से ऊपर रखने का प्रयास किया गया।
यह विचार सरल लेकिन राजनीतिक रूप से अत्यंत महत्वाकांक्षी था।
कर्नाटक का ग्रामीण समाज जातीय और क्षेत्रीय रूप से विभाजित था।
दक्षिण में वोक्कालिगा प्रभुत्व वाले क्षेत्र थे।
उत्तर में लिंगायत कृषक समुदायों का प्रभाव था।
दलित, पिछड़े वर्ग, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदायों की अपनी सामाजिक वास्तविकताएं थीं।
KRRS ने इन विभाजनों के ऊपर “रैयत” की साझा पहचान स्थापित करने की कोशिश की।
कुछ क्षेत्रों में यह रणनीति सफल रही, लेकिन जाति और वर्ग की वास्तविक असमानताएं कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुईं।
सामाजिक आधार : छोटे और मध्यम किसान
KRRS का सबसे मजबूत सामाजिक आधार सामान्यतः भूमिधर छोटे और मध्यम किसान थे।
ये किसान इतने गरीब नहीं थे कि पूरी तरह कृषि मजदूरी पर निर्भर हों, लेकिन इतने बड़े भी नहीं थे कि बाजार जोखिम से सुरक्षित रह सकें।
यही वर्ग कृषि लागत, सिंचाई, बिजली, ऋण और मूल्य के प्रश्नों से सबसे सीधे प्रभावित होता था।
एक सीमांत किसान के लिए खराब फसल जीविका संकट बन सकती थी।
मध्यम किसान के लिए बाजार मूल्य में गिरावट बड़े ऋण संकट में बदल सकती थी।
इसलिए KRRS की राजनीति इन दोनों श्रेणियों में मजबूत अपील रखती थी।
संपन्न किसानों की भूमिका
सिंचित क्षेत्रों और व्यावसायिक फसल क्षेत्रों में अपेक्षाकृत संपन्न किसान भी KRRS से जुड़े।
इनकी मांगें कभी-कभी छोटे किसानों से अलग थीं।
उदाहरण के लिए बड़े गन्ना उत्पादक के लिए लाभकारी मूल्य और बिजली महत्वपूर्ण थे, जबकि सीमांत वर्षा-आधारित किसान के लिए कर्ज, सूखा और जोखिम अधिक गंभीर प्रश्न हो सकते थे।
फिर भी संगठन ने इन्हें “कृषि उत्पादक” की साझा पहचान के भीतर जोड़ने की कोशिश की।
यहीं से KRRS पर बाद में एक आलोचना भी आई कि क्या वह वास्तव में सभी ग्रामीण गरीबों का संगठन था या मुख्यतः स्वामित्व वाले किसान वर्गों का?
यह प्रश्न उसके इतिहासलेखन में महत्वपूर्ण बना रहा।
खेतिहर मजदूर और भूमिहीन वर्ग
KRRS की सीमाओं को समझने के लिए खेतिहर मजदूरों की स्थिति पर ध्यान देना आवश्यक है।
भूमिहीन मजदूर का आर्थिक हित हमेशा भूमिधर किसान से समान नहीं होता।
कृषि मजदूरी बढ़े तो मजदूर को लाभ होता है, लेकिन भूमिधर किसान की लागत बढ़ती है।
भूमि वितरण का प्रश्न भी दोनों वर्गों के बीच तनाव पैदा कर सकता है।
इसलिए KRRS की “किसान एकता” की अवधारणा भूमिहीन मजदूरों को पूरी तरह समाहित नहीं कर सकी।
वामपंथी किसान और मजदूर संगठनों ने इसी बिंदु पर नए किसान आंदोलनों की आलोचना भी की।
जाति और किसान संगठन
कर्नाटक की ग्रामीण राजनीति जाति से अलग नहीं की जा सकती।
वोक्कालिगा और लिंगायत समुदायों के बड़े हिस्से कृषि से जुड़े थे और स्थानीय राजनीति में प्रभावशाली थे। स्वाभाविक रूप से KRRS के कई इलाकों में इन समुदायों की मजबूत भागीदारी रही।
लेकिन संगठन ने अपने राजनीतिक संदेश को जाति-विरोधी और किसान-केंद्रित रखने की कोशिश की।
नंजुंडास्वामी विशेष रूप से किसान को आर्थिक उत्पादक के रूप में प्रस्तुत करना चाहते थे।
व्यवहार में हालांकि सामाजिक पदानुक्रम संगठन के भीतर भी मौजूद रहे।
इसलिए KRRS को जाति से मुक्त संगठन कहना उतना ही गलत होगा जितना उसे केवल किसी एक जाति का संगठन कहना।
दक्षिण कर्नाटक में विस्तार
पुराने मैसूर क्षेत्र में कृषि का स्वरूप उत्तर कर्नाटक से अलग था।
मांड्या, मैसूरु, हासन और आसपास के क्षेत्रों में सिंचाई, गन्ना, धान और बाजारोन्मुख खेती महत्वपूर्ण थी।
यहां किसान की समस्याएं लाभकारी मूल्य, बिजली, सिंचाई जल और गन्ना भुगतान से जुड़ी थीं।
KRRS ने इन मुद्दों को अपने राज्यव्यापी कार्यक्रम में शामिल कर दक्षिण कर्नाटक में आधार विकसित किया।
विशेष रूप से मंड्या बाद के वर्षों में किसान आंदोलनों का महत्वपूर्ण क्षेत्र बना।
उत्तर कर्नाटक में संगठनात्मक शक्ति
नरगुंड–नवलगुंड की विरासत के कारण उत्तर कर्नाटक में किसान आंदोलन की भावनात्मक शक्ति पहले से मौजूद थी।
धारवाड़, गदग, बेलगावी, बागलकोट, विजयपुरा और आसपास के क्षेत्रों में वर्षा-आधारित तथा व्यावसायिक फसल किसानों की समस्याएं गंभीर थीं।
कपास, ज्वार, दालें, मूंगफली और सिंचाई से जुड़े प्रश्न यहां आंदोलन की जमीन बने।
KRRS ने स्थानीय किसान संगठनों को राज्यस्तरीय पहचान देकर इस आधार का विस्तार किया।
कावेरी क्षेत्र और जल राजनीति
दक्षिणी कर्नाटक में कावेरी जल प्रश्न धीरे-धीरे किसान राजनीति का प्रमुख मुद्दा बना।
जब कावेरी जल विवाद तीखा हुआ तो किसानों का संगठन राज्य की जल-राजनीति में प्रभावशाली आवाज बना।
यहां किसान हित और क्षेत्रीय अस्मिता एक-दूसरे से जुड़ने लगे।
KRRS ने जल वितरण को केवल अंतरराज्यीय विवाद नहीं माना, बल्कि किसान के जीविका अधिकार का प्रश्न बनाया।
आगे चलकर यही जल राजनीति संगठन को व्यापक जनसमर्थन दिलाने वाले मुद्दों में शामिल हुई।
आंदोलन की भाषा : रैयत स्वाभिमान
KRRS की राजनीति में केवल आर्थिक मांग नहीं, आत्मसम्मान का तत्व भी था।
किसान को सरकारी अनुदान का याचक नहीं, उत्पादक और अन्नदाता के रूप में प्रस्तुत किया गया।
यह कहा गया कि कृषि अर्थव्यवस्था का मूल आधार किसान है, इसलिए नीति निर्माण में उसकी प्राथमिक भूमिका होनी चाहिए।
यह भाषा ग्रामीण समाज में गहरा प्रभाव डालती थी।
आर्थिक शिकायत को जब सम्मान और अधिकार की भाषा मिलती है तो आंदोलन अधिक टिकाऊ बनता है।
धरना, बंद और रास्ता रोको
संगठन ने पारंपरिक सत्याग्रह और अधिक आक्रामक जनदबाव तकनीकों का मिश्रण अपनाया।
और कभी-कभी सरकारी संस्थानों पर प्रतीकात्मक कब्जा।
इन कार्रवाइयों का उद्देश्य केवल प्रशासन को बाधित करना नहीं था।
वे मीडिया और जनता का ध्यान किसान प्रश्न पर केंद्रित करती थीं।
प्रत्यक्ष कार्रवाई की विशिष्ट शैली
KRRS आगे चलकर “प्रत्यक्ष कार्रवाई” के लिए प्रसिद्ध हुआ।
उसका तर्क था कि यदि सरकार और कंपनियां किसान के हितों की अनदेखी करती हैं तो केवल ज्ञापन देना पर्याप्त नहीं।
यह विचार बाद में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विरुद्ध अभियानों में और स्पष्ट हुआ।
लेकिन इसकी शुरुआत स्थानीय सरकारी संस्थानों और कृषि नीतियों के विरुद्ध प्रत्यक्ष प्रतिरोध से हुई थी।
इस शैली ने KRRS को अन्य किसान संगठनों से अलग पहचान दी।
संगठन और संचार
राज्यव्यापी विस्तार के लिए संचार अत्यंत आवश्यक था।
आज की तरह मोबाइल और सोशल मीडिया उपलब्ध नहीं थे।
इसलिए संगठन गांव बैठकों, पैदल संपर्क, स्थानीय नेताओं, समाचार-पत्रों, पर्चों और सम्मेलनों पर निर्भर था।
इस प्रकार KRRS ने ग्रामीण संचार का समानांतर ढांचा बनाया।
प्रो. एम. डी. नंजुंडास्वामी — जीवन, समाजवादी वैचारिक पृष्ठभूमि, किसान नेतृत्व, KRRS को विशिष्ट पहचान देने में भूमिका और भारतीय किसान राजनीति पर प्रभाव
प्रस्तावना : एक किसान नेता से अधिक
प्रो. एम. डी. नंजुंडास्वामी—पूरा नाम महंता देवरु नंजुंडास्वामी—कर्नाटक के किसान आंदोलन के सबसे प्रभावशाली नेताओं में थे। उनका महत्व केवल इसलिए नहीं है कि वे कर्नाटक राज्य रैयत संघ के संस्थापकों और प्रमुख नेताओं में रहे। उनकी वास्तविक ऐतिहासिक भूमिका यह थी कि उन्होंने किसान आंदोलन की परिधि को स्थानीय सिंचाई, बिजली, ऋण और फसल मूल्य की मांगों से उठाकर कृषि पर नियंत्रण किसका होगा जैसे मूलभूत प्रश्न तक पहुंचाया।
उनके नेतृत्व में KRRS ने पहले कर्नाटक सरकार की कृषि नीतियों को चुनौती दी, फिर भारत की उदारीकरण नीतियों को, और अंततः GATT, WTO, बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों, पेटेंट व्यवस्था तथा जैव-प्रौद्योगिकी के प्रश्न पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिरोध का हिस्सा बन गया। नंजुंडास्वामी की वैचारिक पृष्ठभूमि लोहियावादी समाजवाद, गांधीवादी विकेंद्रीकरण, जाति-विरोधी विचार और कृषक स्वायत्तता के मिश्रण से बनी थी। एम. वी. नाडकर्णी के विस्तृत अध्ययन में उन्हें लोहिया समाजवाद से प्रभावित, पेरियार की जाति-विरोधी तर्कवादी परंपरा से प्रभावित और KRRS की रणनीति तथा विचारधारा पर निर्णायक प्रभाव डालने वाला नेता बताया गया है।
उनका जीवन इसलिए भारतीय किसान राजनीति के एक महत्वपूर्ण संक्रमण को समझने का माध्यम है—भूमि सुधार की राजनीति से खाद्य और बीज संप्रभुता की राजनीति तक।
जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
महंता देवरु नंजुंडास्वामी का जन्म 13 फरवरी 1936 को मैसूर में हुआ। उनके पिता एम. एन. महंता देवरु किसान से वकील बने थे और तत्कालीन मैसूर की प्रतिनिधि सभा तथा बाद में विधानमंडलीय राजनीति से जुड़े रहे। इस पारिवारिक वातावरण ने नंजुंडास्वामी को ग्रामीण समाज और कानून दोनों से प्रारंभिक परिचय दिया।
यही दो तत्व—किसान समाज और कानून—उनके सार्वजनिक जीवन में बार-बार दिखाई देते हैं।
वे किसान समस्या को केवल भावनात्मक या आर्थिक शिकायत के रूप में नहीं देखते थे। कानूनी प्रशिक्षण ने उन्हें सत्ता, अधिकार, अनुबंध, संपत्ति और राज्य की नीतियों का संस्थागत अर्थ समझने की क्षमता दी।
शिक्षा और विधि का अध्ययन
नंजुंडास्वामी ने विज्ञान और कानून की पढ़ाई मैसूर तथा कर्नाटक विश्वविद्यालयों से की। इसके बाद उन्होंने हेग अकादमी ऑफ इंटरनेशनल लॉ में उच्च अध्ययन किया और यूरोप में संवैधानिक कानून का अध्ययन भी किया। भारत लौटने के बाद वे विधि अध्यापन से जुड़े और मैसूर तथा बेंगलुरु में कानून पढ़ाया। उनके शिक्षण और यूरोपीय अनुभव ने उनकी वैचारिक दृष्टि को केवल प्रांतीय किसान नेता तक सीमित नहीं रहने दिया।
जब भारतीय किसान आंदोलन 1990 के दशक में GATT, WTO और बौद्धिक संपदा अधिकार जैसे जटिल अंतरराष्ट्रीय विषयों से टकराया, तब नंजुंडास्वामी ऐसे नेता थे जो इन संस्थाओं की कानूनी और राजनीतिक भाषा दोनों समझते थे।
समाजवादी राजनीति से प्रारंभ
नंजुंडास्वामी किसान आंदोलन में सीधे प्रवेश नहीं करते।
उनकी शुरुआती राजनीतिक निर्मिति समाजवादी आंदोलन के भीतर हुई।
वे समाजवादी युवजन सभा से जुड़े और डॉ. राममनोहर लोहिया की राजनीति से प्रभावित हुए। कर्नाटक के प्रमुख समाजवादी नेता शांतवेरी गोपाल गौड़ा की परंपरा से भी उनका संबंध रहा। नाडकर्णी के अध्ययन के अनुसार उन्होंने शिमोगा में समाजवादी पार्टी के युवा संगठन को खड़ा करने में मदद की और यह संगठन 1968 के आसपास कर्नाटक में कृषि मूल्य के प्रश्न को उठाने वाली शुरुआती ताकतों में था।
यह विवरण महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पता चलता है कि नंजुंडास्वामी के लिए कृषि मूल्य का प्रश्न 1980 के किसान आंदोलन के बाद अचानक पैदा नहीं हुआ था।
उसकी वैचारिक जड़ें उनके समाजवादी दौर में पहले से मौजूद थीं।
लोहिया का प्रभाव
डॉ. राममनोहर लोहिया की राजनीति में केंद्रीकरण-विरोध, जाति-विरोध, ग्रामीण भारत, छोटी तकनीक और सत्ता के विकेंद्रीकरण का विशेष महत्व था।
नंजुंडास्वामी ने इन तत्वों को किसान राजनीति में अपने ढंग से विकसित किया।
उनके लिए किसान केवल आर्थिक इकाई नहीं था। वह स्थानीय समाज, संस्कृति और संसाधनों का संरक्षक भी था।
राजनीतिक सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण उन्हें उतना ही संदिग्ध लगता था जितना आर्थिक सत्ता का बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथ में केंद्रीकरण।
इसीलिए बाद में उनके वैश्वीकरण-विरोध को केवल विदेशी कंपनियों के प्रति भावनात्मक विरोध समझना गलत होगा।
उसके पीछे सत्ता के केंद्रीकरण के प्रति समाजवादी संशय था।
पेरियार और जाति-विरोधी दृष्टि
नाडकर्णी के अनुसार नंजुंडास्वामी पर पेरियार की जाति-विरोधी और तर्कवादी विचारधारा का भी प्रभाव था। उन्होंने कर्नाटक में पिछड़े वर्गों की राजनीति और हावनूर आयोग के पक्ष में भी सक्रियता दिखाई तथा 1960–70 के दशकों में जाति-विरोधी तर्कवादी आंदोलन खड़ा करने की कोशिश की।
यह पहलू विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
यदि नंजुंडास्वामी को केवल संपन्न किसान राजनीति का प्रतिनिधि मान लिया जाए तो उनकी वैचारिक यात्रा का एक बड़ा हिस्सा छूट जाता है।
वे ग्रामीण समाज के भीतर जातीय पदानुक्रम को भी समस्या मानते थे।
हालांकि KRRS स्वयं जाति और वर्ग की असमानताओं से पूरी तरह ऊपर नहीं उठ पाया, लेकिन नंजुंडास्वामी की वैचारिक पृष्ठभूमि में सामाजिक न्याय की यह धारा मौजूद थी।
जेपी आंदोलन और सत्ता-विरोध
1970 के दशक में नंजुंडास्वामी जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से भी जुड़े। 1975 के आसपास उन्होंने कर्नाटक में जेपी आंदोलन को संगठित करने और सत्ता के केंद्रीकरण के विरुद्ध वैकल्पिक राजनीतिक गतिविधियों में भाग लिया। कुछ विवरणों में पूर्व मुख्यमंत्री कडिदाल मंजप्पा और लेखक पूर्णचंद्र तेजस्वी के साथ उनके “नव निर्माण क्रांति” जैसे प्रयासों का उल्लेख मिलता है।
इस दौर ने उनमें राज्य और राजनीतिक दलों के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि को और मजबूत किया।
किसान आंदोलन में उनकी बाद की “गैर-दलीय” सोच को इसी अनुभव से भी जोड़ा जा सकता है।
किसान और कानून के बीच
नंजुंडास्वामी की किसान राजनीति में प्रवेश का एक महत्वपूर्ण रास्ता कानूनी सहायता भी था।
कृषि ऋण न चुका पाने पर जब किसानों की संपत्ति कुर्क की जाती थी अथवा प्रशासन वसूली के लिए दबाव डालता था, तब वे किसानों को कानूनी परामर्श देने लगे।
नाडकर्णी के अध्ययन में उल्लेख है कि बेंगलुरु आने के बाद उन्होंने उन किसानों को कानूनी सहायता दी जिनकी चल संपत्ति ऋण-वसूली के लिए जब्त की जा रही थी या जिन्हें सरकारी अधिकारियों द्वारा प्रताड़ित किया जा रहा था।
यहीं से उनके लिए किसान संकट का एक नया रूप सामने आया।
वह बैंकिंग और प्रशासनिक संरचना से भी हार सकता था।
नरगुंड–नवलगुंड के बाद निर्णायक प्रवेश
1980 के नरगुंड–नवलगुंड आंदोलन ने कर्नाटक में किसान राजनीति को नई दिशा दी।
इस समय पहले से सक्रिय किसान नेताओं और स्थानीय संगठनों को ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जो राज्यस्तरीय संगठन को वैचारिक और राजनीतिक दिशा दे सके।
नाडकर्णी लिखते हैं कि नंजुंडास्वामी की बौद्धिक क्षमता, कन्नड़ और अंग्रेजी दोनों में प्रभावी वक्तृत्व और सरकार से बातचीत करने की क्षमता ने उन्हें संगठन के लिए महत्वपूर्ण संपत्ति बनाया। वे धीरे-धीरे KRRS के प्रवक्ता ही नहीं, स्वतंत्र प्रभावशाली नेता बन गए और संगठन की रणनीति तथा विचारधारा दोनों को प्रभावित करने लगे।
यहीं से नंजुंडास्वामी और KRRS लगभग पर्याय बनने लगे।
KRRS के संस्थापक नेतृत्व में स्थान
KRRS की स्थापना को केवल नंजुंडास्वामी का व्यक्तिगत निर्माण कहना उचित नहीं है। रुद्रप्पा, एन. डी. सुंदरेश और विभिन्न क्षेत्रीय किसान नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
लेकिन नंजुंडास्वामी उन संस्थापक नेताओं में थे जिन्होंने संगठन को राज्यव्यापी पहचान देने में विशेष योगदान किया। समकालीन और बाद के अध्ययनों में उन्हें KRRS के प्रमुख संस्थापकों में गिना गया है।
उनकी भूमिका विशेष रूप से तीन क्षेत्रों में निर्णायक थी—
किसान आत्मसम्मान की राजनीति
नंजुंडास्वामी के नेतृत्व की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में एक थी किसान के भीतर आत्मसम्मान पैदा करने की कोशिश।
उनकी राजनीति में किसान सरकार से दया मांगने वाला व्यक्ति नहीं था।
उसकी मेहनत पर शहर और अर्थव्यवस्था निर्भर थे।
इसलिए वह नीतिगत अधिकार मांग सकता था।
कर्नाटक किसान आंदोलन पर अध्ययनों में इस बात का विशेष उल्लेख मिलता है कि नंजुंडास्वामी ने किसानों में स्वाभिमान और आत्मगौरव की भावना मजबूत की।
यह मनोवैज्ञानिक परिवर्तन आंदोलन की शक्ति का महत्वपूर्ण स्रोत था।
लाभकारी मूल्य का प्रश्न
प्रारंभिक KRRS के लिए कृषि उपज का लाभकारी मूल्य केंद्रीय मांगों में था।
नंजुंडास्वामी का तर्क था कि कृषि उत्पादन की लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन किसान को उसकी उपज का ऐसा मूल्य नहीं मिलता जिससे कृषि आर्थिक रूप से टिकाऊ बन सके।
इसलिए किसान आंदोलन को केवल कर्ज राहत की मांग तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
यदि कृषि स्वयं लाभकारी नहीं होगी तो हर कुछ वर्षों बाद किसान कर्ज में लौटेगा।
यहीं से मूल्य नीति को कृषि संकट का संरचनात्मक समाधान मानने की धारणा मजबूत हुई।
ऋण-वसूली के विरुद्ध संघर्ष
KRRS ने जबरन ऋण-वसूली और किसानों की संपत्ति की कुर्की का विरोध किया।
यह आंदोलन नंजुंडास्वामी की कानूनी पृष्ठभूमि के अनुरूप भी था।
यदि कृषि नीति ही किसान को पर्याप्त आय नहीं देती और प्राकृतिक जोखिम उसके नियंत्रण से बाहर हैं, तो पूरे संकट का आर्थिक दंड केवल किसान क्यों भुगते?
KRRS ने कर्ज राहत को केवल आर्थिक मांग नहीं, किसान की गरिमा से जोड़ दिया।
कई अध्ययनों में जबरन ऋण वसूली का विरोध KRRS के शुरुआती प्रमुख अभियानों में गिना गया है।
बिजली और कृषि लागत
नंजुंडास्वामी के नेतृत्व में KRRS ने बिजली शुल्क, उर्वरक कीमत और अन्य कृषि लागतों को भी राजनीतिक मुद्दा बनाया।
संगठन का तर्क था कि सरकार यदि किसान से सस्ते खाद्यान्न और कृषि उत्पाद की अपेक्षा करती है तो उसे उत्पादन लागत कम रखने की जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी चाहिए।
यह सोच उन नए किसान आंदोलनों की व्यापक राजनीति से जुड़ी थी जो 1980 के दशक में भारत के विभिन्न राज्यों में उभर रही थी।
लेकिन KRRS शीघ्र ही इससे आगे जाने वाला था।
हरित क्रांति की आलोचना
नंजुंडास्वामी हरित क्रांति के आलोचक बने।
उनका तर्क यह नहीं था कि उत्पादन बढ़ना गलत है, बल्कि यह कि ऐसी कृषि तकनीक जो किसान को बाहर से खरीदे जाने वाले बीज, उर्वरक, कीटनाशक और ऋण पर निर्भर बना दे, उसकी आर्थिक स्वायत्तता कमजोर कर सकती है।
उनके यूरोपीय अध्ययन और अपने पारिवारिक खेत पर खेती के अनुभव ने इस सोच को प्रभावित किया। उनके निधन पर प्रकाशित एक प्रमुख प्रोफाइल में बताया गया कि वे हरित क्रांति को पर्यावरणीय और सामाजिक क्षरण से जोड़ते थे और पारंपरिक तथा जैविक खेती के अनुभव को वैकल्पिक मॉडल के रूप में देखते थे।
यहीं से KRRS की राजनीति “किसान को कितना मूल्य मिले?” से आगे बढ़कर “किस प्रकार की कृषि व्यवस्था हो?” तक पहुंची।
1991 के बाद वैचारिक मोड़
1991 में भारत में आर्थिक उदारीकरण शुरू होने के बाद KRRS की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण चरण आरंभ हुआ।
अब कृषि केवल राज्य सरकार के स्तर का प्रश्न नहीं रही।
नंजुंडास्वामी ने वैश्विक व्यापार समझौतों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बौद्धिक संपदा कानूनों को भारतीय किसान के भविष्य से जोड़ना शुरू किया।
उनकी दृष्टि में किसान के लिए नया खतरा केवल कम समर्थन मूल्य नहीं था।
कृषि उत्पादन के मूल साधनों पर कॉरपोरेट नियंत्रण।
बीज : वस्तु नहीं, सभ्यता की विरासत
नंजुंडास्वामी की विचारधारा में बीज का विशेष स्थान था।
पारंपरिक कृषि व्यवस्था में किसान फसल से बीज बचाता था।
वह पड़ोसी किसान से बीज का आदान-प्रदान कर सकता था।
पीढ़ियों के अनुभव से स्थानीय किस्में विकसित होती थीं।
इस प्रक्रिया में बीज किसी एक कंपनी का उत्पाद नहीं बल्कि सामुदायिक कृषि ज्ञान की विरासत था।
यदि पेटेंट व्यवस्था बीज को निजी बौद्धिक संपदा बना दे और किसान को हर मौसम में कंपनी से बीज खरीदना पड़े, तो नंजुंडास्वामी इसे किसान की स्वतंत्रता पर हमला मानते थे।
यहीं से बीज-संप्रभुता KRRS की राजनीति का केंद्रीय तत्व बनी।
GATT और डंकल प्रस्तावों का विरोध
1990 के दशक के प्रारंभ में GATT की उरुग्वे दौर की वार्ताएं और डंकल प्रस्ताव भारत में तीखी राजनीतिक बहस का विषय बने।
KRRS ने विशेष रूप से कृषि, बीज और बौद्धिक संपदा से संबंधित प्रावधानों का विरोध किया।
संगठन को भय था कि नई व्यवस्था बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बीज पर मालिकाना अधिकार प्रदान करेगी और भारतीय किसान की पारंपरिक बीज-संरक्षण प्रणाली कमजोर होगी।
यह उस समय भारत के किसी राज्यस्तरीय किसान संगठन के लिए असाधारण वैचारिक विस्तार था।
हरी शॉल की राजनीतिक पहचान
या अंतरराष्ट्रीय वैश्वीकरण-विरोधी मंच—
1980 का नरगुंड–नवलगुंड किसान आंदोलन — मलप्रभा सिंचाई परियोजना, बेहतरमेंट लेवी, किसान असंतोष, 21 जुलाई की पुलिस गोलीबारी, शहादत और कर्नाटक की किसान राजनीति पर निर्णायक प्रभाव
प्रस्तावना : कर्नाटक की किसान राजनीति का निर्णायक मोड़
कर्नाटक के आधुनिक किसान आंदोलन के इतिहास में 21 जुलाई 1980 एक निर्णायक तिथि है। इस दिन नरगुंड और नवलगुंड क्षेत्र में किसानों का आंदोलन पुलिस गोलीबारी, हिंसक प्रतिरोध और मौतों के कारण उस स्तर पर पहुंच गया जिसने पूरे राज्य की राजनीति को झकझोर दिया। लेकिन इस घटना को केवल एक दिन की हिंसा के रूप में देखना गंभीर ऐतिहासिक भूल होगी।
इसके पीछे वर्षों की आर्थिक बेचैनी थी।
मलप्रभा सिंचाई परियोजना से किसानों को समृद्धि का सपना दिखाया गया था। सिंचाई आने के बाद उनसे अपेक्षा की गई कि वे पारंपरिक वर्षा-आधारित खेती से निकलकर अधिक उत्पादक और व्यावसायिक कृषि अपनाएं। किसानों ने कर्ज लिया, नई किस्मों के बीज खरीदे, उर्वरक और कीटनाशक इस्तेमाल किए और कपास जैसी नकदी फसलों की ओर बढ़े।
कुछ क्षेत्रों में सिंचाई अनियमित रही। जलभराव और भूमि की उत्पादकता संबंधी समस्याएं सामने आईं। कपास का बाजार मूल्य गिर गया। कृषि लागत बढ़ती गई। बैंक ऋण की वसूली होने लगी और इसी समय सरकार ने बेहतरमेंट लेवी और बढ़े हुए जल-शुल्क की वसूली का दबाव बनाया।
इस प्रकार जिस सिंचाई परियोजना को ग्रामीण विकास का साधन माना गया था, वही किसानों की दृष्टि में आर्थिक अन्याय का प्रतीक बन गई।
1980 का नरगुंड–नवलगुंड आंदोलन इसी विरोधाभास का विस्फोट था।
मलप्रभा क्षेत्र : सूखे से सिंचाई की आशा तक
मलप्रभा नदी कृष्णा नदी प्रणाली की एक महत्वपूर्ण सहायक नदी है। उत्तर कर्नाटक के बड़े हिस्से में वर्षा अनिश्चित थी और पारंपरिक कृषि वर्षा पर निर्भर रहती थी।
नरगुंड, नवलगुंड, सौंदत्ती, रामदुर्ग और आसपास के क्षेत्रों के किसानों के लिए सिंचाई का विस्तार इसलिए अत्यंत आकर्षक था।
मलप्रभा परियोजना और नविलुतीर्थ बांध से यह उम्मीद पैदा हुई कि सूखा प्रभावित क्षेत्र में नियमित पानी पहुंचेगा और कृषि उत्पादन स्थिर होगा।
परियोजना के अंतर्गत दाएं और बाएं तट की नहरों के माध्यम से बड़े कृषि क्षेत्र को सिंचित करने की योजना बनाई गई।
लेकिन व्यवहार में वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल निकली।
पारंपरिक कृषि से नकदी फसल की ओर
सिंचाई से पहले मलप्रभा क्षेत्र के किसान मुख्यतः ज्वार, पारंपरिक कपास और अन्य वर्षा-आधारित फसलों की खेती करते थे।
सिंचाई आने के बाद कृषि विस्तार अधिकारियों और व्यापक आधुनिक कृषि नीति ने किसानों को अधिक उत्पादक व्यावसायिक फसलों की ओर प्रेरित किया।
विशेष रूप से वरलक्ष्मी कपास लोकप्रिय हुई।
शुरुआती वर्षों में इसका बाजार मूल्य आकर्षक था। कुछ अध्ययनों के अनुसार 1974 के आसपास इसका मूल्य लगभग 1,000 रुपये प्रति क्विंटल तक था।
किसानों के सामने नया आर्थिक अवसर दिखाई दिया।
भूमि सुधार और सिंचाई व्यवस्था पर खर्च किया।
और सबसे महत्वपूर्ण—इसके लिए बैंक ऋण लिया।
कृषि आधुनिकीकरण की छिपी लागत
नई कृषि व्यवस्था में किसान की उपज बढ़ सकती थी, लेकिन उसकी नकद लागत भी बढ़ गई।
पारंपरिक बीज बचाकर अगले मौसम में उपयोग किए जा सकते थे। आधुनिक कृषि में प्रमाणित अथवा संकर बीज खरीदने पड़ते थे।
भूमि समतलीकरण और सिंचाई वितरण के लिए अतिरिक्त पूंजी चाहिए थी।
इसका अर्थ था कि किसान अब केवल मानसून पर निर्भर नहीं था; वह बैंक, बाजार और कृषि इनपुट उद्योग पर भी निर्भर हो चुका था।
क्योंकि उत्पादन बढ़ने के साथ किसान का आर्थिक जोखिम भी बढ़ रहा था।
कर्ज का तेजी से बढ़ना
मलप्रभा क्षेत्र में कृषि आधुनिकीकरण के साथ ऋण तेजी से बढ़ा।
एक विस्तृत अध्ययन के अनुसार किसानों द्वारा लिया गया कुल ऋण 1974 में लगभग 50 लाख रुपये था, जो 1980 तक बढ़कर 5.5 करोड़ रुपये से अधिक हो गया।
इस ऋण का उपयोग भूमि विकास, बीज, उर्वरक, कीटनाशक और अन्य कृषि निवेश के लिए किया गया था।
यदि बाजार अनुकूल रहता और उत्पादन अपेक्षित स्तर पर होता तो किसान ऋण चुका सकता था।
कपास की कीमतों का पतन
किसानों ने जिस वरलक्ष्मी कपास पर आर्थिक भविष्य का भरोसा किया था, उसका बाजार मूल्य तेजी से गिरा।
लगभग 1,000 रुपये प्रति क्विंटल से कीमत 1980 के आसपास 350 रुपये प्रति क्विंटल तक आ गई।
अर्थात बाजार मूल्य लगभग दो-तिहाई गिर चुका था।
लेकिन उत्पादन लागत उसी अनुपात में नहीं घटी।
इसके विपरीत उर्वरक और बीज की कीमतें बढ़ीं।
एक अध्ययन के अनुसार उर्वरक के एक बोरे की कीमत लगभग 75 रुपये से बढ़कर 103 रुपये हुई, जबकि वरलक्ष्मी बीज की कीमत लगभग 60 रुपये से बढ़कर 170 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई।
यह किसान की अर्थव्यवस्था के लिए विनाशकारी समीकरण था—
यही संकट आगे राजनीतिक विस्फोट का मूल आधार बना।
खराब बीज और तकनीकी समस्याएं
आधुनिक कृषि तकनीक अपनाने वाले किसानों के सामने गुणवत्ता की समस्या भी आई।
और काली कपासी मिट्टी में अत्यधिक सिंचाई—
मलप्रभा कमांड क्षेत्र की काली मिट्टी में जल धारण क्षमता अधिक थी। अधिक अथवा खराब तरीके से प्रबंधित सिंचाई के कारण कुछ क्षेत्रों में जलभराव की समस्या उत्पन्न हुई।
इससे जिस सिंचाई को उत्पादन वृद्धि का साधन माना गया था, वही कुछ खेतों में उत्पादकता घटाने वाली समस्या बन गई।
अधूरी सिंचाई और पूरा आर्थिक भार
किसानों की सबसे बड़ी शिकायतों में यह थी कि परियोजना से उन्हें अपेक्षित पानी नहीं मिला।
नहर व्यवस्था का लाभ समान रूप से नहीं पहुंचा।
कुछ किसानों की पूरी जमीन सिंचित नहीं थी।
नहर के अंतिम हिस्सों—टेल एंड—पर स्थित किसानों को पर्याप्त पानी नहीं मिलता था।
कुछ क्षेत्रों को अनियमित पानी मिलता था।
फिर भी बेहतरमेंट लेवी लगाते समय पूरी भूमि को परियोजना से लाभान्वित मान लिया गया।
यही किसान आक्रोश का केंद्रीय प्रश्न बना।
“जब लाभ पूरा नहीं मिला तो कर पूरा क्यों?”
बेहतरमेंट लेवी क्या थी?
बेहतरमेंट लेवी का सिद्धांत यह था कि सिंचाई परियोजना बनने से भूमि की उत्पादकता और बाजार मूल्य बढ़ता है।
इसलिए परियोजना से लाभान्वित भूमिधरों से उसकी लागत का कुछ हिस्सा वसूला जा सकता है।
मलप्रभा क्षेत्र में किसानों पर यह लेवी लगभग 500 से 1,500/1,600 रुपये प्रति एकड़ तक अलग-अलग स्तरों पर बताई गई है।
सरकार के लिए यह विकास परियोजना में लाभार्थी की भागीदारी थी।
किसान के लिए यह ऐसे लाभ का कर था जो उसे मिला ही नहीं था।
भूमि की कीमत और किसान की आय में अंतर
बेहतरमेंट लेवी का सरकारी तर्क भूमि मूल्य में वृद्धि पर आधारित था।
लेकिन किसान आंदोलन ने इसमें एक बुनियादी आर्थिक विरोधाभास देखा।
यदि सिंचाई परियोजना के कारण खेत की बाजार कीमत बढ़ भी गई, तो किसान को उसका लाभ तभी मिलेगा जब वह खेत बेचेगा।
लेकिन किसान जमीन बेचने के लिए खेती नहीं करता।
उसे वर्तमान वर्ष में खेती से आय चाहिए।
यदि फसल खराब है, कपास का मूल्य गिर चुका है और कर्ज बढ़ रहा है तो जमीन के अनुमानित बाजार मूल्य से कर कैसे चुकाया जाए?
इस प्रश्न ने सरकारी विकास अर्थशास्त्र और किसान की वास्तविक नकद आय के बीच अंतर उजागर कर दिया।
जल-शुल्क का बढ़ना
बेहतरमेंट लेवी अकेला मुद्दा नहीं था।
एक अध्ययन के अनुसार ज्वार के लिए जल-कर लगभग 18 रुपये से 30 रुपये प्रति एकड़ और वरलक्ष्मी कपास के लिए 18 रुपये से 50 रुपये प्रति एकड़ किया गया।
यहां तक कि कुछ मामलों में पानी उपयोग न करने पर भी प्रति एकड़ शुल्क निर्धारित था।
किसानों की नजर में सरकार उनसे उस संसाधन का पैसा मांग रही थी जिसकी उपलब्धता स्वयं अविश्वसनीय थी।
अधिग्रहीत भूमि का मुआवजा
मलप्रभा परियोजना के लिए बांध और नहरों के निर्माण में किसानों की भूमि भी अधिग्रहीत हुई थी।
एक अध्ययन में दावा किया गया है कि भूमि अधिग्रहण के सात-आठ वर्ष बाद भी बड़ी संख्या में प्रभावित किसानों को पूर्ण मुआवजा नहीं मिला था।
इससे सरकार के प्रति नाराजगी और बढ़ी।
किसान के दृष्टिकोण से स्थिति विडंबनापूर्ण थी—
सरकार उसकी जमीन परियोजना के लिए ले सकती है,
यही अनुभव प्रशासन के प्रति गहरे अविश्वास में बदल गया।
मार्च 1980 : किसान संगठन का निर्माण
आर्थिक असंतोष ने मार्च 1980 में सांगठनिक रूप ग्रहण किया।
किसानों ने मलप्रभा नीरावरी प्रदेश रैयत समन्वय समिति बनाई।
महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि यह समिति गैर-दलीय आधार पर बनाई गई थी।
शुरुआत नवलगुंड से हुई, लेकिन जल्द ही इसका विस्तार पांच तालुकों तक हुआ—
यही समिति स्थानीय कृषि असंतोष को क्षेत्रीय किसान आंदोलन में बदलने वाली प्रमुख संस्था बनी।
मांगों का व्यापक स्वरूप
इस आंदोलन को केवल “बेहतरमेंट लेवी विरोध” कहना इसलिए भी अधूरा है क्योंकि किसानों की मांगें कहीं व्यापक थीं।
अप्रैल 1980 में मुख्यमंत्री आर. गुंडू राव को दिए गए ज्ञापन में किसानों ने मांग की—
सिंचाई व्यवस्था का वैज्ञानिक और व्यवस्थित प्रबंधन,
छोटे किसानों की भूमि समतलीकरण में सहायता,
कपास के लिए न्यूनतम अथवा लाभकारी मूल्य,
और कृषि से संबंधित व्यापक नीतिगत सुधार।
इससे स्पष्ट है कि आंदोलन की चेतना पहले ही स्थानीय कर-विरोध से आगे बढ़ चुकी थी।
सरकार से संवाद की कोशिश
किसानों ने शुरुआत सीधे हिंसक संघर्ष से नहीं की।
राजस्व मंत्री और सरकार के अन्य प्रतिनिधियों से मिलने की कोशिश हुई।
किसानों को उम्मीद थी कि सरकार आर्थिक संकट समझेगी और लेवी तथा सिंचाई नीति पर पुनर्विचार करेगी।
लेकिन जब किसानों को लगा कि प्रशासन उनकी मांगों को गंभीरता से नहीं ले रहा है, तो आंदोलन ने असहयोग की दिशा पकड़ी।
कर न देने का आंदोलन
समन्वय समिति ने कर और शुल्क न देने का आह्वान किया।
यह गांधीवादी असहयोग की परंपरा की याद दिलाने वाली रणनीति थी।
एक समकालीन अध्ययन के अनुसार कर न देने वाले किसानों पर प्रशासनिक दबाव इतना बढ़ा कि उनके बच्चों को स्कूल और कॉलेज प्रवेश के लिए आवश्यक प्रमाणपत्र तक न देने जैसी कार्रवाइयों का आरोप लगा।
इससे संघर्ष केवल आर्थिक मांग से आगे बढ़कर राज्य की वैधता और प्रशासनिक न्याय का प्रश्न बनने लगा।
19 जून : नरगुंड में भूख हड़ताल
19 जून 1980 को नरगुंड में तहसीलदार कार्यालय के सामने किसानों ने भूख हड़ताल और सत्याग्रह शुरू किया।
यह आंदोलन के शांतिपूर्ण चरण का महत्वपूर्ण पड़ाव था।
किसानों की रणनीति थी कि लगातार सार्वजनिक दबाव बनाकर सरकार को वार्ता के लिए मजबूर किया जाए।
लेकिन आंदोलन को अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिली।
30 जून : दस हजार किसानों की लामबंदी
30 जून को नरगुंड में लगभग 10,000 किसानों के एकत्र होने का उल्लेख मिलता है।
कुछ अन्य अध्ययनों में इस आंदोलन की भागीदारी और भी अधिक बताई गई है।
सटीक संख्या स्रोतों में भिन्न हो सकती है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि आंदोलन अब कुछ गांवों तक सीमित नहीं था।
हजारों किसानों का सार्वजनिक रूप से एकत्र होना राज्य सरकार के लिए गंभीर राजनीतिक संकेत था।
नवलगुंड में आंदोलन का विस्तार
इसके बाद नवलगुंड में भी आंदोलन तेज हुआ।
7 जुलाई को बड़ी रैली और भूख हड़ताल का उल्लेख मिलता है।
कुछ स्रोत 15 जुलाई को भी नवलगुंड बंद और नरगुंड किसानों के समर्थन में लामबंदी का उल्लेख करते हैं।
अर्थात जुलाई के मध्य तक आंदोलन क्षेत्रव्यापी रूप ले चुका था।
21 जुलाई का बंद
किसान नेतृत्व ने 21 जुलाई 1980 को व्यापक बंद और प्रदर्शन का आह्वान किया।
और आसपास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में किसान सड़कों पर आए।
आंदोलन का उद्देश्य सरकार पर निर्णायक दबाव बनाना था।
लेकिन इसी दिन घटनाक्रम हिंसक हो गया।
नवलगुंड में टकराव
नवलगुंड में हजारों किसान एकत्र हुए।
एक विवरण के अनुसार लगभग 5,000–6,000 किसान प्रदर्शन में थे। प्रदर्शन के दौरान किसानों के ट्रैक्टरों को नुकसान पहुंचाए जाने और जुलूस पर पथराव की बात भी दर्ज है।
सिंचाई विभाग के कार्यालय पर कब्जा किया गया।
गोलीबारी में बसप्पा लक्कुंडी/बसप्पा शिवप्पा—स्रोतों में नामांकन में कुछ अंतर मिलता है—की मृत्यु हुई। बाद की स्मृति में उन्हें अलागवाड़ी गांव के किसान शहीद के रूप में याद किया गया।
नरगुंड में पुलिस गोलीबारी
नरगुंड में भी लगभग दस हजार लोगों का जुलूस बताया गया है।
यहां पुलिस गोलीबारी में युवा किसान ईरप्पा बसप्पा कडलिकोप्पा की मृत्यु हुई।
आज नरगुंड में उनकी स्मृति में शहीद स्मारक मौजूद है और किसान आंदोलन में उनका नाम प्रतीकात्मक महत्व रखता है।
किसानों की हिंसक प्रतिक्रिया
गोलीबारी के बाद स्थिति तेजी से नियंत्रण से बाहर हो गई।
उत्तेजित किसानों ने प्रशासनिक कार्यालयों पर हमला किया।
सरकारी रिकॉर्ड और वाहनों को आग लगाने की घटनाएं हुईं।
पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों पर हमला हुआ।
कृषि उपज के लाभकारी मूल्य का संघर्ष — उत्पादन लागत, मंडी और सरकारी मूल्य नीति, कपास–गन्ना–धान सहित प्रमुख फसलों के मूल्य प्रश्न और KRRS की ‘किसान को न्यायपूर्ण दाम’ की राजनीति
प्रस्तावना : किसान आंदोलन का केंद्रीय आर्थिक प्रश्न
कर्नाटक राज्य रैयत संघ के इतिहास में यदि किसी एक आर्थिक मांग ने अलग-अलग क्षेत्रों, फसलों और किसान वर्गों को लंबे समय तक एक सूत्र में बांधा, तो वह थी—कृषि उपज का लाभकारी अथवा न्यायपूर्ण मूल्य।
भूमि किसान के पास हो सकती थी, सिंचाई भी उपलब्ध हो सकती थी, बैंक से ऋण भी मिल सकता था और आधुनिक बीज तथा उर्वरक से उत्पादन भी बढ़ सकता था; लेकिन यदि फसल बेचने के समय उसकी कीमत उत्पादन लागत से नीचे चली जाए, तो पूरी कृषि अर्थव्यवस्था संकट में पड़ जाती है।
यही अनुभव 1970 के दशक के अंत में कर्नाटक के किसानों ने कपास में किया था। नरगुंड–नवलगुंड आंदोलन के पीछे केवल बेहतरमेंट लेवी नहीं थी; नकदी फसल का गिरता मूल्य भी किसान संकट का महत्वपूर्ण कारण था। इसके बाद KRRS ने लाभकारी मूल्य को अपने प्रमुख कार्यक्रमों में शामिल किया।
उसकी मांग केवल यह नहीं थी कि सरकार कभी-कभार समर्थन मूल्य बढ़ा दे। संगठन मूलतः यह प्रश्न उठा रहा था—
कृषि वस्तुओं का मूल्य किस आधार पर निर्धारित होना चाहिए?
क्या किसान की मजदूरी की कीमत उसमें शामिल होगी?
क्या परिवार के सदस्यों द्वारा किए गए श्रम का मूल्य जोड़ा जाएगा?
क्या जमीन, पूंजी, सिंचाई, मशीनरी और जोखिम की लागत गिनी जाएगी?
और यदि उद्योग अपने उत्पाद की लागत में सभी खर्च जोड़कर लाभ कमाने का अधिकार रखता है, तो किसान से उसकी लागत से नीचे फसल बेचने की अपेक्षा क्यों की जाए?
यहीं से KRRS की “न्यायपूर्ण दाम” की राजनीति विकसित हुई।
भूमि से मूल्य की राजनीति की ओर
स्वतंत्रता के पहले और उसके तुरंत बाद के किसान संघर्षों में मुख्य प्रश्न भूमि, लगान और काश्तकारी अधिकार थे।
लेकिन भूमि सुधारों के बाद कर्नाटक में भूमिधर छोटे और मध्यम किसानों का एक ऐसा वर्ग विकसित हुआ जिसकी समस्याएं अलग थीं।
उसके पास जमीन थी, लेकिन आय सुनिश्चित नहीं थी।
यही पुराने और नए किसान आंदोलनों के बीच प्रमुख अंतर था।
KRRS इसी परिवर्तन की अभिव्यक्ति था।
कृषि में लागत और मूल्य का मूल विरोधाभास
आधुनिक कृषि में किसान की लागत लगातार बढ़ी।
लेकिन किसान जिस कीमत पर फसल बेचता था, उसका पूरा नियंत्रण उसके हाथ में नहीं था।
औद्योगिक उत्पादक अपने उत्पाद की लागत और लाभ जोड़कर कीमत निर्धारित करने की क्षमता रख सकता है।
किसान प्रायः फसल कटने के बाद बाजार में उपलब्ध भाव स्वीकार करने को मजबूर होता है।
KRRS की मूल आर्थिक शिकायत इसी असमानता पर आधारित थी।
किसान ‘मूल्य निर्धारक’ नहीं, ‘मूल्य स्वीकारकर्ता’
किसान बाजार की उस स्थिति में था जिसे अर्थशास्त्र में सामान्यतः price taker—मूल्य स्वीकारकर्ता कहा जाता है।
वह मंडी पहुंचने के बाद व्यापारी से यह नहीं कह सकता कि मेरी लागत इतनी है इसलिए मैं इससे कम पर फसल नहीं बेचूंगा।
इस कारण उसे फसल कटने के तुरंत बाद बेचनी पड़ती थी।
ठीक इसी समय मंडी में आपूर्ति अधिक होती और कीमत गिर सकती थी।
इस परिस्थिति को बाद के किसान विमर्श में मजबूरी की बिक्री—distress sale कहा गया।
KRRS ने इसे बाजार की सामान्य प्रक्रिया नहीं बल्कि कृषि संरचना की गंभीर कमजोरी माना।
उत्पादन लागत में क्या शामिल हो?
लाभकारी मूल्य के प्रश्न का सबसे कठिन हिस्सा था—कृषि उत्पादन लागत कैसे निकाली जाए?
यदि किसान ने अपने परिवार के सदस्यों के साथ खेत में काम किया तो क्या उस श्रम की कोई कीमत नहीं है?
यदि जमीन किसान की स्वयं की है तो क्या उसका किराया शून्य माना जाए?
यदि किसान ने अपनी पूंजी लगाई तो उस पर ब्याज क्यों न जोड़ा जाए?
यदि पंपसेट, ट्रैक्टर और कृषि उपकरण वर्षों में खराब होते हैं तो उनकी घिसावट की लागत कौन गिनेगा?
यदि सूखा, रोग अथवा बाजार गिरावट का जोखिम किसान उठाता है तो उसका मूल्यांकन कैसे होगा?
KRRS ने इन्हीं प्रश्नों के आधार पर सरकारी लागत गणना की आलोचना की।
KRRS की शुरुआती मूल्य मांग
एम. वी. नाडकर्णी द्वारा दर्ज KRRS की शुरुआती मांगों में कृषि मूल्य निर्धारण को स्पष्ट केंद्रीय स्थान मिला था।
संगठन की मांग थी कि कृषि कीमतें वैज्ञानिक आधार पर, विशेष रूप से लगाए गए मानव-श्रम और कृषि निवेश को ध्यान में रखकर तय की जाएं। साथ ही उसने शुरुआती वर्षों में विभिन्न फसलों के लिए विशिष्ट मांग-मूल्य भी रखे।
उस समय KRRS ने उदाहरणतः ज्वार के लिए 200 रुपये प्रति क्विंटल, मक्का के लिए 150 रुपये, कपास के लिए लगभग 600–800 रुपये, गेहूं के लिए 250 रुपये, प्याज के लिए 100 रुपये तथा दालों के लिए लगभग 400–500 रुपये प्रति क्विंटल जैसे मूल्य मांगे थे। संगठन का प्रमुख सिद्धांत यह था कि कृषि कीमतों की वास्तविक क्रय-शक्ति इनपुट कीमतों और किसान श्रम के अनुपात में सुरक्षित रहनी चाहिए।
इसमें केवल अधिक मूल्य मांगने की राजनीति नहीं थी।
इसके पीछे कृषि और गैर-कृषि कीमतों के बीच समानता—price parity का विचार था।
मूल्य-समानता का सिद्धांत
मान लीजिए किसी किसान को 1975 में एक क्विंटल ज्वार बेचकर जितना उर्वरक, कपड़ा, तेल अथवा कृषि उपकरण मिल सकता था, दस वर्ष बाद उसी एक क्विंटल ज्वार से उसका आधा सामान ही खरीदा जा सके।
लेकिन किसान वास्तविक अर्थ में गरीब हुआ।
KRRS इसलिए कहता था कि कृषि मूल्य को केवल रुपये की संख्या से नहीं देखा जाना चाहिए।
देखना यह चाहिए कि किसान अपनी उपज बेचकर कितना खरीद सकता है।
यही terms of trade—विनिमय अनुपात का किसान संस्करण था।
कपास : मूल्य संकट का प्रारंभिक अनुभव
नरगुंड–नवलगुंड क्षेत्र में कपास संकट ने किसानों को मूल्य की राजनीति का कठोर पाठ पढ़ाया।
सिंचाई और आधुनिक कृषि तकनीक के प्रभाव में किसानों ने व्यावसायिक कपास की खेती बढ़ाई।
इससे किसान समझ गया कि केवल अधिक उत्पादन करना समृद्धि की गारंटी नहीं है।
यदि उत्पादन बढ़े और मूल्य गिर जाए तो किसान अधिक उपज के बावजूद घाटे में जा सकता है।
इसीलिए कपास मूल्य KRRS की शुरुआती मांगों में महत्वपूर्ण रहा। संगठन के शुरुआती मूल्य-पत्र में अलग-अलग किस्मों की कपास के लिए उस समय की सरकारी या समिति सिफारिशों से अधिक मूल्य की मांग भी सामने आई थी।
कपास के जरिए बाजार का सबक
कपास किसान का अनुभव विशेष था क्योंकि यह केवल घरेलू खाद्य फसल नहीं बल्कि औद्योगिक कच्चा माल भी थी।
इससे किसान आंदोलन ने धीरे-धीरे समझना शुरू किया कि कृषि मूल्य केवल स्थानीय मंडी का प्रश्न नहीं है।
वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक नीति से भी जुड़ा है।
यही विचार आगे KRRS के वैश्वीकरण-विरोध तक पहुंचने में मदद करेगा।
गन्ना : मूल्य राजनीति का दूसरा बड़ा केंद्र
कर्नाटक में गन्ना किसान राजनीति का अत्यंत महत्वपूर्ण आधार बना।
और अन्य सिंचित क्षेत्रों में गन्ना किसानों और चीनी मिलों के बीच मूल्य को लेकर संघर्ष बार-बार हुआ।
गन्ने की विशेषता यह है कि किसान इसे लंबे समय तक घर पर रोककर नहीं रख सकता।
कटाई के बाद शीघ्र मिल तक पहुंचाना पड़ता है।
इससे किसान की सौदेबाजी शक्ति कमजोर हो सकती है।
चीनी मिल और किसान का असमान संबंध
गन्ना किसान के सामने कुछ विशिष्ट समस्याएं थीं—
चीनी के अतिरिक्त शीरा, बिजली और अन्य सह-उत्पादों से मिल को होने वाली आय का कितना हिस्सा किसान को मिलना चाहिए?
यहीं से गन्ने का मूल्य साधारण MSP से अलग जटिल राजनीतिक मुद्दा बन गया।
शिमोगा के गन्ना किसानों की प्रारंभिक भूमिका
कर्नाटक में KRRS के उभार से पहले भी शिमोगा क्षेत्र के गन्ना उत्पादक संगठित थे।
शिमोगा जिला गन्ना उत्पादक संघ ने चीनी मिलों द्वारा किसानों के आर्थिक शोषण, भुगतान में देरी और गन्ने के लाभकारी मूल्य के प्रश्न उठाए।
एक अध्ययन इस संगठन को KRRS की पूर्ववर्ती किसान-संगठन परंपराओं में रखता है। इसी तरह बेल्लारी क्षेत्र में भी किसानों ने कृषि उपज के न्यूनतम मूल्य, ऋण, कर और गन्ने के लाभकारी मूल्य जैसे प्रश्न उठाए थे।
इससे स्पष्ट होता है कि KRRS ने मूल्य का प्रश्न शून्य से शुरू नहीं किया।
उसने पहले से मौजूद फसल-विशिष्ट संघर्षों को राज्यव्यापी किसान राजनीति में जोड़ा।
गन्ने पर खरीद कर का विरोध
KRRS की शुरुआती मांगों में गन्ने पर खरीद कर समाप्त करने की मांग भी शामिल थी।
उसका तर्क था कि यदि किसी कर का अंतिम आर्थिक भार किसान के मूल्य को कम करता है, तो वह कृषि उत्पादक की आय पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
इसलिए संगठन केवल घोषित खरीद मूल्य नहीं देखता था।
वह अंतिम किसान प्राप्ति को देखता था।
यही अंतर आगे गन्ना आंदोलनों में बार-बार सामने आया—
घोषित मूल्य और किसान के हाथ में आने वाली वास्तविक राशि अलग हो सकती है।
FRP और किसान की वास्तविक प्राप्ति
समय के साथ गन्ना मूल्य निर्धारण में केंद्र सरकार की Fair and लाभकारी मूल्य—उचित एवं लाभकारी मूल्य (FRP) व्यवस्था प्रमुख हुई।
लेकिन KRRS और अन्य किसान संगठनों का प्रश्न बना रहा कि घोषित FRP वास्तव में लागत और किसान आय की भरपाई करता है या नहीं।
2025–26 के गन्ना विवाद में भी यही पुराना सवाल सामने आया। केंद्र द्वारा आधार रिकवरी दर पर FRP निर्धारित होने के बावजूद कटाई और परिवहन व्यय घटने के बाद किसानों की वास्तविक प्राप्ति काफी कम रहने की शिकायत उठी। नवंबर 2025 के किसान आंदोलन में कर्नाटक के गन्ना उत्पादकों ने प्रति टन अधिक शुद्ध मूल्य की मांग की और अंततः राज्य तथा चीनी मिलों द्वारा अतिरिक्त भुगतान पर समझौता हुआ।
इससे स्पष्ट है कि 1980 के दशक में उठाया गया “घोषित मूल्य बनाम वास्तविक किसान आय” का प्रश्न दशकों बाद भी जीवित रहा।
2013 का गन्ना मूल्य संघर्ष
2013 में भी KRRS ने सरकार द्वारा तय गन्ना मूल्य को अपर्याप्त बताया।
संगठन के नेताओं ने लगभग 2,500 रुपये प्रति टन के प्रस्तावित मूल्य को अस्वीकार करते हुए 3,500 रुपये से अधिक की मांग दोहराई थी।
KRRS का तर्क था कि चीनी मिल केवल चीनी से आय नहीं कमाती; उससे बिजली, स्पिरिट और अन्य सह-उत्पाद भी निकलते हैं। इसलिए गन्ने का मूल्य तय करते समय मिल की संपूर्ण आर्थिक प्राप्ति को देखना चाहिए।
यह KRRS के मूल्य-विमर्श की एक विशिष्ट विशेषता थी—
किसान को केवल कच्चे माल की लागत से नहीं, मूल्य श्रृंखला में पैदा कुल संपदा से जोड़कर देखना।
धान : MSP और वास्तविक खरीद का अंतर
धान का मूल्य प्रश्न कपास और गन्ने से कुछ अलग था।
धान उन प्रमुख फसलों में था जिनके लिए केंद्र सरकार MSP घोषित करती रही।
लेकिन किसान की वास्तविक सुरक्षा इस पर निर्भर करती थी कि—
क्या सरकारी खरीद केंद्र समय पर खुलेंगे?
क्या गुणवत्ता के आधार पर कटौती होगी?
क्या किसान को MSP से नीचे निजी व्यापारियों को बेचने के लिए मजबूर होना पड़ेगा?
इसलिए MSP की घोषणा स्वयं में पर्याप्त सुरक्षा नहीं थी।
MSP घोषणा बनाम MSP उपलब्धता
KRRS की व्यापक मूल्य राजनीति ने इसी अंतर की ओर ध्यान खींचा।
यदि सरकार किसी फसल का समर्थन मूल्य घोषित कर दे लेकिन किसान के जिले में कोई प्रभावी खरीद व्यवस्था न हो, तो वह मूल्य केवल कागज पर रह सकता है।
कृषि नीति में इसलिए दो अलग चरण हैं—
उस मूल्य पर वास्तविक खरीद सुनिश्चित करना।
किसान के लिए दूसरा अधिक निर्णायक है।
रागी, ज्वार और मोटे अनाज
कर्नाटक की कृषि केवल धान और गन्ने की नहीं थी।
विशाल वर्षा-आधारित क्षेत्र रागी, ज्वार और अन्य मोटे अनाजों पर निर्भर थे।
इन किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन और सार्वजनिक खरीद का प्रश्न अलग महत्व रखता था।
यदि सरकारी खाद्य नीति मुख्यतः चावल और गेहूं पर केंद्रित रहे, तो मोटे अनाज उगाने वाले किसान संरचनात्मक रूप से कमजोर स्थिति में रह सकते हैं।
KRRS ने इसलिए विभिन्न फसलों के लिए मूल्य निर्धारण की व्यापक प्रणाली पर जोर दिया।
दालें और तिलहन
कर्नाटक दालों और तिलहन का भी महत्वपूर्ण उत्पादक क्षेत्र रहा है।
इन फसलों में बाजार मूल्य अक्सर बहुत अस्थिर होता है।
उत्पादन कम हुआ तो कीमत तेजी से बढ़ सकती है।
अगले वर्ष किसान अधिक बोआई करे तो अधिक उत्पादन के कारण कीमत गिर सकती है।
यानी जिस वर्ष किसान देश की आवश्यकता पूरी करने के लिए अधिक उत्पादन करता है, उसी वर्ष उसे कम भाव मिलने का खतरा रहता है।
यह कृषि बाजार का विडंबनापूर्ण चक्र है।
बिजली, सिंचाई और कृषि लागत के विरुद्ध KRRS का संघर्ष — बिजली दर, पंपसेट, सिंचाई शुल्क, उर्वरक–बीज की बढ़ती लागत, कर-अवज्ञा और खेती की लागत कम करने की किसान राजनीति
प्रस्तावना : जब उत्पादन बढ़ा, पर लागत भी बढ़ती गई
कर्नाटक राज्य रैयत संघ की राजनीति को केवल लाभकारी मूल्य की मांग से नहीं समझा जा सकता। उसके आर्थिक दर्शन का दूसरा उतना ही महत्वपूर्ण पक्ष था—खेती की लागत कम करना।
यदि किसान को फसल का बेहतर मूल्य मिले, लेकिन उसी समय बिजली, सिंचाई, उर्वरक, बीज, कीटनाशक, मशीनरी और ऋण की लागत तेजी से बढ़ जाए, तो उसकी वास्तविक आय फिर घट सकती है। इसी कारण KRRS ने कृषि मूल्य और उत्पादन लागत को एक ही आर्थिक समीकरण के दो पक्ष माना।
इस संगठन के शुरुआती मांगपत्रों में बिजली शुल्क कम करने, न्यूनतम बिजली शुल्क समाप्त करने, बेहतरमेंट लेवी हटाने, जल-कर घटाने, ऐसी भूमि पर जल-शुल्क न लगाने जहां वास्तव में पानी उपलब्ध नहीं कराया गया हो, कृषि ऋण की मात्रा को बढ़ती उत्पादन लागत से जोड़ने, ट्रैक्टर और ट्रेलर पर प्रतिबंध तथा कर कम करने और उर्वरकों पर राहत जैसी मांगें एक साथ दिखाई देती हैं। एम. वी. नाडकर्णी के अध्ययन में KRRS की शुरुआती मांगों में बिजली की दर 6.5 पैसे प्रति यूनिट करने और न्यूनतम शुल्क समाप्त करने तक की मांग दर्ज है।
किसान की आय बढ़ाने के दो ही मूल रास्ते हैं: उपज का दाम बढ़े या खेती की लागत घटे।
इस अध्याय में उसी दूसरी लड़ाई का इतिहास है।
आधुनिक कृषि और नकद खर्च का विस्तार
पारंपरिक वर्षा-आधारित कृषि में किसान अपनी अनेक आवश्यकताएं स्थानीय संसाधनों से पूरी कर सकता था।
लेकिन हरित क्रांति और सिंचित व्यावसायिक कृषि के विस्तार के बाद खेती का नकद खर्च तेजी से बढ़ा।
इस परिवर्तन का अर्थ था कि किसान प्राकृतिक जोखिम के साथ इनपुट कीमतों के जोखिम का भी सामना करने लगा।
यहीं से उत्पादन लागत किसान राजनीति का केंद्रीय प्रश्न बनी।
सिंचाई : वरदान और आर्थिक दायित्व
कर्नाटक जैसे वर्षा-निर्भर राज्य में सिंचाई कृषि स्थिरता का महत्वपूर्ण साधन थी।
बड़े बांधों और नहर परियोजनाओं के साथ जुड़े थे—
दूसरी ओर भूजल सिंचाई के लिए किसान को पंपसेट, कुआं अथवा बोरवेल और बिजली की आवश्यकता थी।
इस प्रकार सिंचाई के दोनों प्रमुख मॉडल किसान को राज्य की नीति से जोड़ते थे—
यही कारण है कि KRRS की राजनीति में पानी और बिजली अलग मुद्दे नहीं रहे।
मलप्रभा आंदोलन की मूल विरासत
1980 का नरगुंड–नवलगुंड संघर्ष KRRS के लिए सिंचाई लागत की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पृष्ठभूमि था।
किसानों की शिकायत केवल यह नहीं थी कि बेहतरमेंट लेवी अधिक है।
उनका कहना था कि जहां सिंचाई का पूरा लाभ नहीं मिला, वहां सरकार लाभ मानकर शुल्क क्यों लगा रही है?
कर्नाटक का 1957 का संबंधित कानून बेहतरमेंट योगदान को सिंचाई परियोजना के कारण भूमि मूल्य में हुई वृद्धि से जोड़ता था और इसमें प्रति एकड़ अधिकतम सीमा का प्रावधान भी था।
लेकिन किसान की आपत्ति व्यवहारिक थी—
भूमि मूल्य बढ़ना और खेती से नकद आय बढ़ना एक ही बात नहीं है।
यही तर्क आगे KRRS की सिंचाई नीति की आलोचना का आधार बना।
पानी मिला नहीं, शुल्क क्यों?
कृषि सिंचाई व्यवस्था में सबसे गंभीर विवाद तब पैदा होता है जब कागज पर क्षेत्र “सिंचित” घोषित हो, लेकिन खेत तक पर्याप्त पानी न पहुंचे।
नहर के अंतिम हिस्से में स्थित किसान को पानी कम मिल सकता था।
कुछ खेत ऊंचाई के कारण प्रभावित हो सकते थे।
कहीं पानी की आपूर्ति समय पर नहीं होती थी।
फिर भी यदि जल-शुल्क समान रूप से लगाया जाए तो किसान इसे अन्यायपूर्ण मानता था।
KRRS की शुरुआती मांगों में इसलिए स्पष्ट रूप से ऐसी भूमि पर जल-शुल्क हटाने की बात शामिल थी जहां वास्तव में पानी उपलब्ध नहीं कराया जाता था।
यह मांग एक व्यापक सिद्धांत पर आधारित थी—
जल-कर घटाने की मांग
KRRS की शुरुआती मांगों में जल दरों को 1972–73 के स्तर तक वापस ले जाने की मांग दर्ज है।
इसके साथ टैंक और रिसाव के पानी पर शुल्क समाप्त करने तथा सिंचाई सुविधा न प्राप्त करने वाली भूमि से जल-कर न लेने की मांग भी शामिल थी।
इससे स्पष्ट है कि नरगुंड की घटना के बाद भी जल-शुल्क संगठन के एजेंडे से गायब नहीं हुआ।
वास्तव में KRRS ने इस प्रश्न को पूरे राज्य की कृषि लागत नीति से जोड़ दिया।
कानूनी रूप से निर्धारित जल दरें
कर्नाटक में अलग-अलग फसलों के लिए सिंचाई जल दरें कानूनी और प्रशासनिक नियमों से निर्धारित की जाती रही हैं।
1980 के दशक के एक न्यायिक विवाद में लागू नियमों में गन्ना, धान, ज्वार, मक्का, रागी, कपास, मूंगफली, सब्जी, तंबाकू, सुपारी और बागवानी फसलों के लिए अलग-अलग प्रति एकड़ दरों का उल्लेख मिलता है।
यानी किसान के लिए सिंचाई की लागत फसल चयन से भी जुड़ी थी।
जैसे ही किसान अधिक पानी वाली नकदी फसल की ओर जाता, उसका उत्पादन खर्च और सरकारी शुल्क दोनों बढ़ सकते थे।
भूजल क्रांति और पंपसेट
विशाल वर्षा-आधारित क्षेत्र में किसान ने कुओं और बाद में बोरवेलों के जरिए सिंचाई बढ़ाई।
इस परिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण साधन था—
पंपसेट ने किसान को मानसून और सरकारी नहर दोनों से कुछ हद तक स्वतंत्रता दी।
लेकिन साथ ही उसे बिजली बोर्ड पर निर्भर कर दिया।
इस तरह बिजली किसान की उत्पादन लागत का निर्णायक हिस्सा बन गई।
बिजली शुल्क राजनीतिक प्रश्न क्यों बना?
शहर में बिजली घरेलू सुविधा हो सकती है।
यदि पंपसेट नहीं चलेगा तो फसल सूख सकती है।
इसलिए बिजली की कीमत में वृद्धि सीधे सिंचाई की लागत बढ़ाती है।
यदि सरकार सस्ती कृषि उपज चाहती है, तो किसान को महंगी बिजली देकर वह कैसे संभव होगा?
यहीं से बिजली दर केवल बिजली बोर्ड का प्रशासनिक मामला नहीं रही।
KRRS की 6.5 पैसे प्रति यूनिट की मांग
KRRS की शुरुआती मांगों में एक अत्यंत उल्लेखनीय मांग थी कि कृषि बिजली की दर 6.5 पैसे प्रति यूनिट की जाए।
संगठन ने तुलना औद्योगिक उपयोगकर्ता—एल्यूमिनियम फैक्टरी—को मिलने वाली दर से की।
साथ ही उसने न्यूनतम शुल्क समाप्त करने की मांग की।
इस तुलना का राजनीतिक संदेश स्पष्ट था—
यदि उद्योग को सस्ती बिजली विकास के नाम पर मिल सकती है, तो कृषि को क्यों नहीं?
यह किसान बनाम औद्योगिक नीति के व्यापक विमर्श का हिस्सा था।
न्यूनतम शुल्क का विरोध
बिजली बिल की एक समस्या यह थी कि कभी-कभी वास्तविक खपत से अलग न्यूनतम निश्चित शुल्क देना पड़ सकता था।
तो केवल कनेक्शन होने के कारण न्यूनतम शुल्क क्यों दिया जाए?
यह शिकायत विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसान के लिए महत्वपूर्ण थी।
KRRS ने इसलिए केवल प्रति यूनिट दर कम करने नहीं, बल्कि न्यूनतम शुल्क खत्म करने की मांग भी की।
मीटर बनाम फ्लैट दर
कृषि बिजली में एक पुराना विवाद यह रहा कि किसान से वास्तविक यूनिट खपत के आधार पर शुल्क लिया जाए या पंप की अश्वशक्ति के आधार पर निश्चित वार्षिक शुल्क।
1980 के दशक में विभिन्न राज्यों में फ्लैट रेट प्रणाली का विस्तार हुआ। सरकारी तर्क था कि ग्रामीण क्षेत्रों में मीटरों का रखरखाव, रीडिंग और बिलिंग कठिन है तथा भूजल आधारित सिंचाई करने वाले किसानों की लागत पहले ही अधिक है। एक सर्वोच्च न्यायालय से जुड़े मामले में राज्य की ऐसी नीति के पीछे छोटे और सीमांत किसानों की कठिनाइयों तथा मीटरिंग की प्रशासनिक समस्याओं का उल्लेख दर्ज है।
कर्नाटक में भी बिजली शुल्क किसान राजनीति का लगातार संवेदनशील विषय बना।
1987 की कृषि विद्युत दरें
कर्नाटक बिजली बोर्ड की 1987 की विद्युत दरों में कृषि पंपसेट के लिए अश्वशक्ति पर आधारित फ्लैट दरें दर्ज थीं।
5 HP तक के पंपसेट के लिए कैपेसिटर लगाए जाने की स्थिति में 75 रुपये प्रति HP प्रति वर्ष तथा उससे अधिक क्षमता पर अलग दरें थीं।
इन दरों का महत्व केवल राशि में नहीं है।
यह दिखाता है कि बिजली दर किसान और सरकार के बीच लगातार पुनर्निर्धारित होने वाला राजनीतिक समझौता बन चुकी थी।
1990 के दशक में बिजली दरों का बढ़ना
समय के साथ कृषि पंपसेट की फ्लैट दरें भी बढ़ीं।
1997 के कर्नाटक बिजली शुल्क में 10 HP तक के कृषि पंपसेट के लिए लगभग 300 रुपये प्रति HP प्रति वर्ष का उल्लेख मिलता है।
इसी तरह की बढ़ोतरी किसान संगठनों के लिए आंदोलन का कारण बनती रही।
क्योंकि किसान मूल्य की वृद्धि और लागत की वृद्धि की तुलना करता था।
यदि बिजली की लागत तेजी से बढ़े और उसकी फसल का मूल्य उतनी तेजी से न बढ़े, तो खेती की लाभप्रदता घट जाती है।
केवल सस्ती नहीं, नियमित बिजली भी
कृषि बिजली की समस्या केवल दर नहीं थी।
कम कीमत की बिजली भी बेकार है यदि वह समय पर उपलब्ध न हो।
1999–2000 के आसपास कर्नाटक पर किए गए एक ऊर्जा अध्ययन ने भी कृषि क्षेत्र में बिजली की अपूर्ण उपलब्धता और पंपसेट उपयोग पर गंभीर प्रभाव दर्ज किया।
इससे एक महत्वपूर्ण बिंदु सामने आता है—
कृषि बिजली की वास्तविक लागत बिल से अधिक होती है।
खराब आपूर्ति की छिपी लागत
वोल्टेज गिरता है और मोटर जल जाती है।
इस पूरी क्षति का कोई हिस्सा बिजली बिल में दिखाई नहीं देता।
इसलिए किसान की दृष्टि में “बिजली की लागत” का अर्थ केवल प्रति यूनिट शुल्क नहीं था।
उसमें आपूर्ति की गुणवत्ता भी शामिल थी।
बिजली सब्सिडी की राजनीति
समय के साथ कर्नाटक सहित विभिन्न राज्यों में कृषि बिजली पर भारी सब्सिडी राजनीतिक रूप से स्थापित हुई।
इस नीति के समर्थकों का तर्क था कि किसान खाद्य सुरक्षा प्रदान करता है और कृषि प्राकृतिक जोखिमों से भरी है, इसलिए बिजली सहायता न्यायसंगत है।
आलोचकों का तर्क था कि सस्ती अथवा मुफ्त बिजली से—
और बड़े पंपसेट वाले किसानों को अधिक लाभ—
यह बहस KRRS के पुराने प्रश्न से आगे की थी, लेकिन उसी आंदोलन ने कृषि बिजली को मुख्यधारा राजनीतिक मुद्दा बनाने में योगदान दिया।
उर्वरक लागत का बढ़ना
हरित क्रांति के बाद उर्वरक कृषि उत्पादन का महत्वपूर्ण इनपुट बन गया।
और अन्य रासायनिक उर्वरकों के बिना उच्च उत्पादक किस्मों की अपेक्षित उपज प्राप्त करना कठिन हो सकता था।
किसान के लिए समस्या थी कि वह अपनी फसल का मूल्य तय नहीं करता, लेकिन उर्वरक का मूल्य उसे बाजार या सरकारी व्यवस्था द्वारा तय कीमत पर देना पड़ता है।
यही लागत-मूल्य असंतुलन KRRS की आलोचना का केंद्र बना।
उर्वरक सब्सिडी की मांग
KRRS के शुरुआती अभियानों में उर्वरक पर सब्सिडी और कृषि इनपुट की लागत कम करने की मांग प्रमुख रही।
एक अध्ययन स्पष्ट रूप से बताता है कि संगठन ने जबरन ऋण-वसूली का विरोध करने के साथ मुफ्त बिजली, उर्वरक सब्सिडी और अधिक समर्थन मूल्य जैसी मांगें उठाईं।
यह मांगों का अत्यंत महत्वपूर्ण संयोजन था।
सस्ता इनपुट + बेहतर आउटपुट मूल्य = किसान आय में सुधार।
यही KRRS की प्रारंभिक आर्थिक रणनीति थी।
क्या यह हरित क्रांति की उपलब्धियों को बचाने की कोशिश थी?
दिलचस्प बात यह है कि KRRS का शुरुआती लागत-विरोध पूर्णतः हरित क्रांति-विरोधी नहीं था।
एक अध्ययन ने उसकी शुरुआती मुफ्त बिजली, उर्वरक सब्सिडी और समर्थन मूल्य जैसी मांगों को हरित क्रांति से प्राप्त लाभों को स्थिर करने की कोशिश के रूप में देखा है।
आधुनिक कृषि अपनाओ, लेकिन उसे किसान के लिए आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाओ।
बाद में नंजुंडास्वामी की विचारधारा और आगे जाएगी और बाहरी इनपुट पर निर्भर कृषि मॉडल की मूलभूत आलोचना करेगी।
यह KRRS के वैचारिक विकास का महत्वपूर्ण अंतर है।
बीज की लागत
उन्नत और संकर बीजों ने किसान की लागत संरचना बदल दी।
पारंपरिक बीज किसान स्वयं बचा सकता था।
संकर बीज में हर मौसम बाजार से खरीद की आवश्यकता अधिक हो सकती थी।
यदि बीज की कीमत बढ़ती है और गुणवत्ता खराब निकलती है, तो किसान को दोहरी हानि होती है—
नरगुंड क्षेत्र के कपास अनुभव ने बीज लागत और गुणवत्ता दोनों के प्रश्न को पहले ही सामने ला दिया था।
बीज से निर्भरता का प्रश्न
यहीं लागत-विरोध धीरे-धीरे बीज-संप्रभुता में बदल गया।
यदि किसान अपने बीज का उत्पादन, संरक्षण और विनिमय कर सकता है तो उसका नकद खर्च घटता है और कंपनी पर निर्भरता भी कम होती है।
इस प्रकार बीज-संप्रभुता केवल सांस्कृतिक या जैव-विविधता का प्रश्न नहीं था।
वह कृषि लागत कम करने की रणनीति भी थी।
कीटनाशक और कृषि रसायन
व्यावसायिक फसलों में कीटनाशक का खर्च भी बढ़ा।
कृषि ऋण, बैंक-वसूली और कुर्की के विरुद्ध KRRS का संघर्ष — सहकारी और वाणिज्यिक ऋण, बढ़ती किसान ऋणग्रस्तता, संपत्ति की नीलामी, सामूहिक प्रतिरोध और कर्ज राहत की किसान राजनीति
प्रस्तावना : आधुनिक कृषि का ऋण-जाल
कर्नाटक राज्य रैयत संघ के उभार में कृषि ऋण का प्रश्न अत्यंत केंद्रीय था। हरित क्रांति, सिंचाई विस्तार, पंपसेट, उन्नत बीज, उर्वरक, कीटनाशक, मशीनरी और नकदी फसलों के विस्तार ने खेती को अधिक पूंजी-निर्भर बना दिया। किसान का नकद खर्च बढ़ा और इसके साथ ही संस्थागत ऋण की आवश्यकता भी बढ़ी।
सिद्धांततः सहकारी बैंकों और वाणिज्यिक बैंकों का विस्तार ग्रामीण साहूकारी से मुक्ति का साधन था। किसान को सस्ता और संस्थागत ऋण मिलना था ताकि वह उत्पादन बढ़ा सके। लेकिन जब फसल खराब हुई, बाजार मूल्य गिरा, सिंचाई विफल हुई या उत्पादन लागत बढ़ी, तो वही ऋण किसान के लिए संकट बन गया।
यदि कृषि नीति, बाजार और मौसम की विफलता से आय घटती है, तो पूरा जोखिम केवल किसान क्यों उठाए?
यही प्रश्न KRRS की ऋण राजनीति का आधार बना।
साहूकार से बैंक तक : क्या बदला?
स्वतंत्रता से पहले और उसके बाद लंबे समय तक ग्रामीण किसान निजी साहूकारों पर निर्भर था। उच्च ब्याज दर, बंधक, फसल पूर्व बिक्री और भूमि हस्तांतरण जैसी समस्याएं व्यापक थीं।
स्वतंत्रता के बाद सहकारी ऋण संस्थाओं और राष्ट्रीयकृत बैंकों के विस्तार से यह उम्मीद पैदा हुई कि किसान को सस्ता और सुरक्षित ऋण मिलेगा।
इस परिवर्तन की ऐतिहासिक उपलब्धि को कम नहीं आंका जाना चाहिए। संस्थागत ऋण ने बड़ी संख्या में किसानों को आधुनिक कृषि निवेश तक पहुंच दी।
लेकिन समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
साहूकार की जगह बैंक आ गया, पर ऋण चुकाने की क्षमता अभी भी किसान की अनिश्चित आय पर निर्भर थी।
हरित क्रांति और ऋण की बढ़ती आवश्यकता
इनमें से अधिकांश निवेश किसान अपनी बचत से नहीं कर सकता था।
इसलिए ऋण कृषि आधुनिकीकरण का अभिन्न हिस्सा बन गया।
जितनी आधुनिक खेती, उतनी अधिक पूंजी की जरूरत; जितनी अधिक पूंजी, उतना अधिक ऋण जोखिम।
मलप्रभा क्षेत्र और बढ़ती ऋणग्रस्तता
नरगुंड–नवलगुंड आंदोलन की आर्थिक पृष्ठभूमि में कृषि ऋण तेजी से बढ़ने का तथ्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
मलप्रभा सिंचाई क्षेत्र में किसानों ने कपास और अन्य व्यावसायिक फसलों के लिए निवेश बढ़ाया। भूमि सुधार, सिंचाई, बीज और कृषि रसायनों के लिए ऋण लिया गया।
जब कपास का बाजार मूल्य गिरा और उत्पादन अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा, तब किसानों की आय घट गई।
लेकिन ऋण की देनदारी समाप्त नहीं हुई।
इसलिए 1980 का किसान संकट केवल कर और सिंचाई शुल्क का संकट नहीं था; वह ऋण और बाजार के संयुक्त संकट का भी परिणाम था।
संस्थागत ऋण की विडंबना
संस्थागत ऋण का उद्देश्य किसान को साहूकार से बचाना था।
लेकिन यदि बैंक की वसूली प्रणाली कठोर हो और कृषि आय अस्थिर हो, तो किसान को अनुभव हो सकता है कि औपचारिक संस्था भी उसके संकट को नहीं समझती।
ऋण की समय-सारिणी कृषि चक्र के अनुरूप है या नहीं?
फसल विफल होने पर पुनर्गठन होगा या नहीं?
सूखा आने पर किस्त स्थगित होगी या नहीं?
बाजार भाव गिरने पर बैंक जोखिम साझा करेगा या नहीं?
यही प्रश्न KRRS ने राजनीतिक मुद्दा बनाया।
नंजुंडास्वामी और कानूनी सहायता
प्रो. एम. डी. नंजुंडास्वामी की किसान राजनीति से जुड़ाव में ऋण-वसूली का प्रश्न विशेष महत्व रखता था।
वे विधि के अध्यापक और प्रशिक्षित कानूनविद थे। किसानों की संपत्ति ऋण-वसूली के लिए जब्त होने या सरकारी अधिकारियों द्वारा दबाव डाले जाने के मामलों में उन्होंने कानूनी सहायता प्रदान की।
यहीं उन्हें ग्रामीण ऋण संकट की संरचना प्रत्यक्ष रूप से देखने का अवसर मिला।
उनके लिए बैंक-वसूली केवल आर्थिक प्रक्रिया नहीं थी।
वह किसान की गरिमा, संपत्ति और जीविका से जुड़ा प्रश्न था।
कुर्की का अर्थ
यदि किसान ऋण नहीं चुका पाता, तो उसकी संपत्ति जब्त की जा सकती थी।
और परिस्थितियों के अनुसार भूमि अथवा अन्य संपत्ति।
किसान के लिए यह केवल आर्थिक नुकसान नहीं था।
कृषि उपकरण या पशु की कुर्की का अर्थ था कि उसकी उत्पादन क्षमता भी खत्म हो रही है।
यानी जिस ऋण को खेती चलाने के लिए लिया गया था, उसकी वसूली खेती बंद कराने का कारण बन सकती थी।
नीलामी के विरुद्ध सामूहिक प्रतिरोध
KRRS ने किसानों की जब्त संपत्ति की नीलामी का विरोध किया।
संगठन की रणनीति थी कि किसी एक किसान को बैंक और प्रशासन के सामने अकेला न छोड़ा जाए।
यदि किसी गांव में किसान के पशु या कृषि उपकरण नीलाम होने वाले हों, तो बड़ी संख्या में किसान वहां पहुंचें।
और प्रशासन को संदेश दें कि यह निजी ऋण विवाद नहीं बल्कि सामूहिक किसान प्रश्न है।
यही व्यक्तिगत आर्थिक संकट का राजनीतिकरण था।
जब्त संपत्ति वापस करने की मांग
KRRS की शुरुआती मांगों में उन किसानों की संपत्ति लौटाने की बात शामिल थी जो ऋण-वसूली के कारण जब्त या नीलाम की गई थी।
संगठन कह रहा था कि किसान को दंडित करने के बजाय कृषि संकट की जड़ को पहचानना चाहिए।
और यदि कृषि प्राकृतिक जोखिम से प्रभावित है,
तो केवल कुर्की करना समाधान नहीं है।
ऋण की मात्रा और खेती की वास्तविक लागत
KRRS ने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया—
यदि उत्पादन लागत बढ़ रही है तो बैंक ऋण सीमा क्यों नहीं बढ़ती?
मान लें किसी फसल की प्रति एकड़ लागत 2,000 रुपये से बढ़कर 4,000 रुपये हो गई, लेकिन किसान को संस्थागत ऋण अभी भी 2,000 रुपये मिलता है।
इसलिए संगठन ने ऋण की मात्रा को वास्तविक उत्पादन लागत से जोड़ने की मांग की।
अल्पकालीन और दीर्घकालीन ऋण
कृषि ऋण को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
यदि एक ही वर्ष में फसल विफल हो जाए तो अल्पकालीन फसल ऋण संकट बन सकता है।
यदि कई वर्षों तक बाजार प्रतिकूल रहे तो दीर्घकालीन निवेश ऋण भी असहनीय हो सकता है।
KRRS की ऋण राजनीति दोनों प्रकार के संकटों से जुड़ी थी।
सहकारी बैंक का विशेष महत्व
कर्नाटक की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सहकारी बैंकों की बड़ी भूमिका थी।
प्राथमिक कृषि सहकारी समितियां किसान के सबसे निकट थीं।
उनके माध्यम से ऋण और कृषि इनपुट उपलब्ध होते थे।
लेकिन यही निकटता वसूली के समय सामाजिक तनाव में बदल सकती थी।
सहकारी संस्था गांव के भीतर ही मौजूद थी।
उसके पदाधिकारी स्थानीय राजनीति से जुड़े हो सकते थे।
इसलिए ऋण विवाद कई बार आर्थिक से अधिक सामाजिक और राजनीतिक रूप ले लेते थे।
वाणिज्यिक बैंक और राष्ट्रीयकरण
1969 के बैंक राष्ट्रीयकरण के बाद ग्रामीण शाखाओं का विस्तार हुआ।
प्राथमिकता क्षेत्र ऋण और कृषि वित्त को बढ़ावा मिला।
इससे औपचारिक बैंकिंग की पहुंच व्यापक हुई।
लेकिन किसानों के अनुभव में बैंकिंग की नौकरशाही भी समस्या बन सकती थी—
KRRS का संघर्ष इसलिए केवल “बैंक विरोध” नहीं था।
वह किसान-अनुकूल बैंकिंग की मांग भी था।
ऋण और फसल चक्र का असंतुलन
कृषि आय निश्चित मासिक वेतन की तरह नहीं आती।
किसान को आय फसल कटने और बिकने के बाद मिलती है।
यदि बैंक की किस्त उसी समय देय हो जब फसल अभी बाजार में नहीं गई, तो किसान को नया ऋण लेकर पुराना ऋण चुकाना पड़ सकता है।
इसलिए ऋण पुनर्भुगतान को कृषि चक्र से जोड़ना आवश्यक था।
किसान आंदोलन ने इस संरचनात्मक समस्या को बार-बार उठाया।
सूखा और ऋण
कर्नाटक के बड़े हिस्से में वर्षा अनिश्चित रही है।
सूखे में किसान की दोहरी हानि होती है—
लेकिन खर्च का बड़ा हिस्सा पहले ही किया जा चुका होता है।
यदि वर्षा विफल हो जाए तो आय नहीं आती, लेकिन ऋण कायम रहता है।
ऐसी स्थिति में सामान्य बैंक-वसूली किसान आंदोलन की नजर में अन्यायपूर्ण थी।
फसल मूल्य गिरने पर ऋण संकट
किसान को अच्छी पैदावार होने के बाद भी कर्ज हो सकता है।
मान लें किसान ने 100 इकाई खर्च की और 120 इकाई की आय की उम्मीद की।
यदि बाजार मूल्य गिरने से आय 80 रह जाए तो किसान 20 का नुकसान करता है।
बैंक को इससे फर्क नहीं पड़ता; मूलधन और ब्याज देय रहते हैं।
यहीं KRRS ने बाजार जोखिम और बैंक ऋण को एक-दूसरे से जोड़कर देखा।
ऋण-माफी बनाम ऋण-पुनर्गठन
किसान आंदोलनों में “कर्ज माफी” सबसे अधिक राजनीतिक नारा बनता है।
लेकिन हर संकट में पूर्ण ऋण माफी ही एकमात्र समाधान नहीं है।
और अल्पकालीन ऋण को मध्यम अवधि में बदलना।
KRRS की व्यापक राजनीति में इस तरह की राहत भी किसान संरक्षण का हिस्सा थी।
ब्याज का प्रश्न
समय पर भुगतान न हो तो ब्याज बढ़ता है।
कुछ परिस्थितियों में दंडात्मक ब्याज भी लग सकता है।
यदि किसान की आय कई मौसम तक कमजोर रहे तो ब्याज स्वयं मूलधन के बराबर या उससे अधिक हो सकता है।
इसलिए किसान की भाषा में अक्सर प्रश्न होता था—
“हमने जितना लिया उससे अधिक ब्याज चुका दिया, फिर भी कर्ज क्यों बाकी है?”
यही अनुभव ग्रामीण ऋण के प्रति आक्रोश को बढ़ाता था।
साहूकार का पुनरागमन
संस्थागत ऋण पर्याप्त न होने पर किसान फिर निजी बाजार में लौटता है।
कई बार ऋण और फसल बिक्री एक ही व्यक्ति से जुड़ जाते हैं।
व्यापारी किसान को पहले पैसा देता है और बाद में उससे कम कीमत पर फसल खरीदता है।
इस प्रकार ऋण बाजार और कृषि बाजार एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
बैंक और व्यापारी के बीच फंसा किसान
एक किसान की स्थिति कई बार ऐसी होती है—
फसल तैयार होते ही उसे बिक्री करनी पड़ती है।
इस मजबूरी से बाजार में उसकी सौदेबाजी शक्ति घटती है।
इसलिए ऋण समस्या को कृषि मूल्य से अलग नहीं किया जा सकता।
KRRS का सामूहिक प्रतिरोध मॉडल
KRRS की सबसे प्रभावी रणनीतियों में एक थी—
व्यक्ति की समस्या को संगठन की समस्या बनाना।
यह मॉडल किसान के मन से प्रशासन का भय कम करता था।
कानून और नैतिकता का संघर्ष
अनुबंध आर्थिक संदर्भ से अलग नहीं देखा जा सकता।
यदि प्राकृतिक आपदा, बाजार विफलता या नीति ने किसान की आय नष्ट कर दी तो सामान्य वसूली नैतिक रूप से न्यायपूर्ण नहीं।
यहां कानूनी दायित्व और सामाजिक न्याय के बीच संघर्ष दिखाई देता है।
नंजुंडास्वामी की कानूनी पृष्ठभूमि ने इसी प्रश्न को राजनीतिक भाषा दी।
“डिफॉल्टर” की छवि का विरोध
बैंकिंग भाषा में ऋण न चुकाने वाला व्यक्ति “डिफॉल्टर” है।
किसान आंदोलन इस शब्द से पैदा होने वाले नैतिक आरोप का विरोध करता था।
कई बार वह भुगतान करना चाहता है लेकिन आय नहीं है।
इसलिए KRRS किसान को “बेईमान देनदार” के बजाय “संकटग्रस्त उत्पादक” के रूप में प्रस्तुत करता था।
यह पहचान परिवर्तन राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था।
किसान की संपत्ति की सामाजिक प्रकृति
कृषि पशु और उपकरण सामान्य उपभोक्ता संपत्ति नहीं हैं।
यदि किसान का बैल नीलाम हो गया तो अगली फसल की जुताई कैसे होगी?
यदि पंपसेट जब्त हो गया तो सिंचाई कैसे होगी?
यदि ट्रैक्टर चला गया तो उत्पादन कैसे होगा?
इसीलिए KRRS ने उत्पादक संपत्ति की कुर्की को विशेष रूप से अन्यायपूर्ण माना।
उसका तर्क था कि ऐसी वसूली किसान की ऋण चुकाने की भविष्य की क्षमता भी समाप्त कर देती है।
ऋण और आत्मसम्मान
ग्रामीण समाज में कर्ज केवल आर्थिक तनाव नहीं है।
किसान के सामाजिक सम्मान को भी प्रभावित करती है।
KRRS ने कर्ज को इसलिए किसान आत्मसम्मान से जोड़ा।
कर्ज संकट शर्म का व्यक्तिगत कारण नहीं, कृषि व्यवस्था का सामूहिक प्रश्न है।
राजनीतिक दलों की कर्ज-माफी राजनीति
समय के साथ किसान ऋण-माफी चुनावी राजनीति का प्रमुख वादा बन गई।
विभिन्न सरकारों ने अलग-अलग समय पर सहकारी ऋण या फसल ऋण में राहत योजनाएं घोषित कीं।
इसका एक कारण किसान आंदोलनों द्वारा ऋण प्रश्न को राजनीतिक रूप देना भी था।
लेकिन ऋण-माफी की राजनीति पर सवाल भी उठे—
क्या हर किसान को समान लाभ मिलता है?
क्या नियमित भुगतान करने वाला किसान नुकसान में पड़ता है?
ये प्रश्न आगे की किसान राजनीति में महत्वपूर्ण बने।
ऋण-माफी का नैतिक संकट
यदि हर कुछ वर्षों में ऋण माफी की उम्मीद बने, तो बैंकिंग अनुशासन प्रभावित हो सकता है।
दूसरी ओर यदि गंभीर कृषि संकट में भी राहत न मिले, तो किसान दिवालिया हो सकता है।
इसलिए नीति को दो उद्देश्यों में संतुलन बनाना पड़ता है—
और संस्थागत ऋण व्यवस्था को टिकाऊ रखना।
KRRS की राजनीति ने पहला पक्ष शक्तिशाली ढंग से सामने रखा।
छोटे किसान और ऋण
ऋणग्रस्तता का प्रभाव सभी किसानों पर समान नहीं होता।
बड़े किसान के पास संपत्ति, भंडारण और वैकल्पिक आय हो सकती है।
KRRS की आंदोलन-पद्धति — धरना, रास्ता रोको, बंद, सरकारी कार्यालयों का घेराव, कर-अवज्ञा, सामूहिक गिरफ्तारी, प्रत्यक्ष कार्रवाई और गांधीवादी सत्याग्रह से उग्र प्रतीकात्मक प्रतिरोध तक
प्रस्तावना : आंदोलन केवल मांगों से नहीं, पद्धति से भी पहचाना जाता है
कर्नाटक राज्य रैयत संघ की पहचान केवल उसके मुद्दों से नहीं बनी; उसकी विशिष्टता उसकी आंदोलन-पद्धति में भी थी। KRRS ने एक ओर गांधीवादी सत्याग्रह, धरना, असहयोग, कर-अवज्ञा और सामूहिक गिरफ्तारी जैसी विधियों को अपनाया, तो दूसरी ओर रास्ता रोको, सरकारी कार्यालयों का घेराव, नीलामी रोकना, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के परिसरों में प्रवेश, खेतों में प्रत्यक्ष कार्रवाई और प्रतीकात्मक विनाश जैसे अधिक आक्रामक तरीकों का भी प्रयोग किया।
यही मिश्रण उसे अन्य किसान संगठनों से अलग करता है।
यदि किसान की समस्या सामूहिक है, तो उसका प्रतिरोध भी सामूहिक होना चाहिए।
यदि ज्ञापन, बातचीत और संस्थागत प्रक्रियाएं विफल हों, तो किसान को प्रत्यक्ष लोकतांत्रिक कार्रवाई का अधिकार है।
यहीं गांधीवादी सत्याग्रह और नंजुंडास्वामी की “प्रत्यक्ष लोकतांत्रिक कार्रवाई” की अवधारणा एक-दूसरे से जुड़ती हैं।
याचिका से प्रतिरोध तक
किसान आंदोलनों का सामान्य प्रारंभ प्रायः मांगपत्र से होता था।
समस्या के समाधान के लिए समय मांगा जाता।
KRRS भी इन संस्थागत तरीकों का उपयोग करता था।
लेकिन यदि किसान नेतृत्व को लगता कि सरकार केवल समय काट रही है या आश्वासन दे रही है, तो अगला चरण सामूहिक दबाव का होता था।
यहीं आंदोलन क्रमिक रूप से तेज होता—
ज्ञापन → धरना → जुलूस → घेराव → बंद → असहयोग → प्रत्यक्ष कार्रवाई।
यह क्रम KRRS की रणनीति को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
धरना : सबसे मूल राजनीतिक हथियार
धरना KRRS की सबसे सामान्य आंदोलन विधियों में था।
इन सभी के सामने किसान धरने आयोजित करते थे।
यदि कुछ किसान बैठें तो वह शिकायत है।
यदि हजारों किसान बैठें तो वह राजनीतिक संकट बन सकता है।
इसलिए KRRS का संगठनात्मक नेटवर्क धरना को केवल प्रतीकात्मक कार्यक्रम नहीं रहने देता था; वह उसे सामूहिक शक्ति-प्रदर्शन में बदलता था।
धरने का सामाजिक प्रभाव
किसान लंबे समय तक गांव से बाहर राजनीतिक आंदोलन में नहीं रहता।
इसलिए किसान का कई दिनों तक धरने में बैठना अपने आप में राजनीतिक प्रतिबद्धता का संकेत है।
KRRS ने इस कठिनाई को सामूहिक संगठन से संभाला।
गीत और नारे आंदोलन का वातावरण बनाते,
और किसानों को राजनीतिक शिक्षा भी दी जाती।
इस अर्थ में धरना केवल विरोध नहीं, राजनीतिक प्रशिक्षण शिविर भी था।
रास्ता रोको
रास्ता रोको की रणनीति का उद्देश्य प्रशासन और समाज को यह महसूस कराना था कि किसान संकट निजी मामला नहीं है।
सड़क रोकने से परिवहन प्रभावित होता था।
सरकार पर तुरंत प्रतिक्रिया देने का दबाव बढ़ता था।
किसान आंदोलन की दृष्टि से यह प्रश्न था—
यदि सामान्य तरीके से बात सुनाई नहीं जाती, तो आर्थिक गतिविधि को अस्थायी रूप से बाधित करके ध्यान क्यों न खींचा जाए?
लेकिन यह रणनीति विवादास्पद भी थी क्योंकि आम नागरिक भी प्रभावित होते थे।
बंद की राजनीति
KRRS ने कई अवसरों पर बंद का समर्थन या आयोजन किया।
बंद केवल दुकानें बंद कराने की कार्रवाई नहीं था।
वह यह दिखाने की कोशिश थी कि किसान प्रश्न पूरे क्षेत्र का प्रश्न है।
और सार्वजनिक गतिविधि रुकती है तो किसान की आर्थिक भूमिका सामने आती है।
नरगुंड–नवलगुंड के दौर में बंद एक महत्वपूर्ण आंदोलन उपकरण बना था।
आगे KRRS ने भी इसे दबाव निर्माण की तकनीक के रूप में अपनाया।
सरकारी कार्यालयों का घेराव
सरकारी कार्यालय किसान के लिए सत्ता का दृश्य प्रतीक थे।
इन्हीं जगहों से शुल्क, वसूली, बिजली कनेक्शन, पानी और अन्य निर्णय आते थे।
इसलिए कार्यालय घेरना प्रशासनिक संरचना पर प्रत्यक्ष दबाव था।
और मांग करते कि निर्णय तुरंत लिया जाए।
यह पद्धति प्रशासनिक दूरी को समाप्त करती थी।
बैंक घेराव और नीलामी रोकना
कृषि ऋण के प्रश्न पर KRRS ने बैंक और नीलामी स्थल को भी आंदोलन का केंद्र बनाया।
यदि किसी किसान की संपत्ति नीलाम हो रही हो तो संगठन के कार्यकर्ता वहां पहुंचते।
खरीदारों को बोली न लगाने के लिए कहते।
बैंक अधिकारियों पर पुनर्गठन का दबाव बनाते।
एक किसान की कुर्की पूरे किसान समुदाय का प्रश्न है।
यह व्यक्तिगत ऋण विवाद का राजनीतिकरण था।
कर-अवज्ञा
कर-अवज्ञा KRRS की आंदोलन शैली का महत्वपूर्ण गांधीवादी तत्व था।
यदि किसान मानता था कि कोई कर अन्यायपूर्ण है, तो संगठन सामूहिक रूप से उसे न देने का निर्णय कर सकता था।
और कुछ अन्य देनदारियों के संदर्भ में यह रणनीति दिखाई दी।
लेकिन इसका प्रभाव तभी होता जब बड़ी संख्या में किसान एक साथ पालन करें।
यही सामूहिकता प्रशासन को कठिन स्थिति में डालती थी।
कर-अवज्ञा और गांधीवादी परंपरा
गांधीवादी सविनय अवज्ञा का मूल सिद्धांत था—
अन्यायपूर्ण कानून का शांतिपूर्ण उल्लंघन करो,
KRRS की कर-अवज्ञा इसी राजनीतिक परंपरा से कुछ हद तक जुड़ी थी।
हम भुगतान नहीं करेंगे क्योंकि हम इसे न्यायपूर्ण नहीं मानते।
यदि सरकार गिरफ्तारी करे तो करेंगे सामना।
यह प्रतिरोध और नैतिक वैधता का मिश्रण था।
सामूहिक गिरफ्तारी
KRRS के आंदोलन में हजारों किसानों का गिरफ्तारी देना एक सामान्य राजनीतिक हथियार बन गया।
इसका उद्देश्य जेल भरना नहीं, राज्य को यह दिखाना था कि आंदोलन कुछ नेताओं तक सीमित नहीं है।
यदि हजारों किसान गिरफ्तारी दें तो सरकार के लिए आंदोलन को “कुछ उपद्रवियों” का अभियान बताना कठिन हो जाता है।
सामूहिक गिरफ्तारी से आंदोलनकारियों में भी एकता की भावना मजबूत होती थी।
गिरफ्तारी को भय नहीं, प्रतीक बनाना
किसान के लिए पुलिस और जेल स्वाभाविक रूप से भय का कारण हो सकते हैं।
KRRS ने राजनीतिक प्रशिक्षण के जरिए गिरफ्तारी को उलट प्रतीक में बदलने की कोशिश की।
किसान अधिकार के लिए संघर्ष का प्रमाण है।
यह मनोवैज्ञानिक परिवर्तन किसी भी जनांदोलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।
जब गिरफ्तारी का भय घटता है, तो राज्य की दमन क्षमता भी कुछ सीमा तक कमजोर पड़ती है।
पदयात्रा और जुलूस
जुलूस और पदयात्रा KRRS की दृश्य राजनीति का हिस्सा थे।
इनसे आंदोलन को विशिष्ट सार्वजनिक पहचान मिलती थी।
वह किसान को खेत से शहर की सड़क पर लाता है।
और शहरी समाज को याद दिलाता है कि कृषि संकट केवल गांव की खबर नहीं है।
हरी शॉल : आंदोलन की दृश्य भाषा
KRRS के कार्यकर्ताओं की हरी शॉल संगठन की पहचान का सबसे शक्तिशाली प्रतीक बनी।
जब हजारों किसान एक ही पहचान के साथ सड़क पर उतरते थे तो संगठनात्मक एकता दृश्य रूप से भी दिखाई देती थी।
यह सांस्कृतिक प्रतीक राजनीति को भावनात्मक गहराई देता था।
नारे और किसान स्वाभिमान
KRRS के आंदोलन में नारे केवल मांग नहीं बताते थे।
वे किसान की राजनीतिक पहचान बनाते थे।
इन रूपों में प्रस्तुत किया जाता था।
इससे आर्थिक असंतोष सम्मान की राजनीति से जुड़ता था।
यदि किसान स्वयं को सम्मानित उत्पादक समझता है तो वह प्रशासनिक अपमान को आसानी से स्वीकार नहीं करता।
गांधीवादी प्रभाव
KRRS की आंदोलन-पद्धति पर गांधीवादी परंपरा का स्पष्ट प्रभाव था।
ये सभी गांधीवादी आंदोलन के परिचित उपकरण थे।
लेकिन KRRS शुद्ध गांधीवादी संगठन नहीं था।
उसके नेतृत्व पर समाजवादी और उग्र प्रत्यक्ष कार्रवाई की धाराओं का भी प्रभाव था।
लोहियावादी समाजवाद की छाप
राममनोहर लोहिया की आंदोलन राजनीति में सत्ता के विरुद्ध प्रत्यक्ष जनदबाव और सविनय अवज्ञा का महत्व था।
नंजुंडास्वामी की समाजवादी पृष्ठभूमि ने KRRS को केवल नैतिक अपील तक सीमित नहीं रहने दिया।
इसलिए उसका सत्याग्रह कई बार प्रशासनिक अवरोध और तीखे प्रत्यक्ष दबाव के साथ जुड़ गया।
“प्रत्यक्ष लोकतांत्रिक कार्रवाई”
नंजुंडास्वामी KRRS की अधिक आक्रामक कार्रवाइयों को अक्सर प्रत्यक्ष लोकतांत्रिक कार्रवाई की अवधारणा से वैधता देते थे।
यदि निर्वाचित सरकार जनता की बात न सुने,
और यदि संस्थागत रास्ते विफल हो जाएं,
तो नागरिकों को शांतिपूर्ण प्रत्यक्ष हस्तक्षेप का अधिकार है।
यही सिद्धांत आगे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ अभियानों में केंद्रीय बन गया।
कार्यालय में प्रवेश से प्रत्यक्ष कब्जे तक
KRRS की कुछ कार्रवाइयां सामान्य घेराव से आगे गईं।
कार्यकर्ता कार्यालयों में प्रवेश करते।
दस्तावेजों और प्रतीकों को निशाना बनाते।
कभी उपकरण या संपत्ति को क्षति पहुंचाई जाती।
यहां गांधीवादी सत्याग्रह की सीमा को लेकर विवाद शुरू होता है।
कारगिल के विरुद्ध कार्रवाई
1990 के दशक में अमेरिकी कृषि कंपनी Cargill के विरुद्ध KRRS की कार्रवाइयों ने उसे अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।
बीज और कृषि बाजार में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रवेश का संगठन तीखा विरोध कर रहा था।
कारगिल के बेंगलुरु कार्यालय और बाद में बीज इकाई के विरुद्ध कार्रवाई में कार्यकर्ताओं ने प्रत्यक्ष प्रवेश और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसी रणनीतियां अपनाईं।
यह कॉरपोरेट नियंत्रण के खिलाफ नाटकीय राजनीतिक संदेश था।
“बीज सत्याग्रह” और प्रतीकात्मक राजनीति
KRRS ने बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों के विरोध को “बीज सत्याग्रह” कहा।
नाम स्वयं गांधीवादी विरासत से लिया गया था।
लेकिन कार्रवाई का स्वरूप कई बार अधिक उग्र था।
यहीं संगठन का विरोधाभास सामने आता है—
लेकिन साधन कभी-कभी संपत्ति-विनाश तक।
यह इतिहासलेखन में KRRS पर सबसे महत्वपूर्ण विवादों में से एक है।
KFC के विरुद्ध कार्रवाई
बेंगलुरु में Kentucky Fried Chicken के आउटलेट के खिलाफ KRRS कार्रवाई भी इसी नाटकीय प्रत्यक्ष राजनीति का उदाहरण बनी।
संगठन के लिए KFC केवल रेस्तरां नहीं था।
और विदेशी आर्थिक-सांस्कृतिक प्रभुत्व का प्रतीक था।
इसलिए स्थानीय प्रत्यक्ष कार्रवाई को वैश्विक आर्थिक संदेश से जोड़ा गया।
Monsanto और GM फसलों के विरुद्ध खेत कार्रवाई
KRRS ने आनुवंशिक रूप से परिवर्तित फसलों के परीक्षणों और Monsanto जैसी कंपनियों के विरुद्ध भी प्रत्यक्ष कार्रवाई की।
कार्यकर्ता परीक्षण खेतों में पहुंचे।
“Cremate Monsanto” जैसे अभियानों ने वैश्विक ध्यान खींचा।
यहां आंदोलन सड़क से खेत के भीतर चला गया।
यदि तकनीक किसान के भविष्य को प्रभावित करती है, तो किसान को केवल प्रयोग का निष्क्रिय विषय नहीं बनाया जा सकता।
संपत्ति-विनाश और हिंसा का प्रश्न
क्या कंपनी की संपत्ति नष्ट करना हिंसा है?
नंजुंडास्वामी और समर्थकों का तर्क था कि व्यक्ति के विरुद्ध हिंसा और कॉरपोरेट संपत्ति के विरुद्ध प्रतीकात्मक कार्रवाई में अंतर है।
आलोचकों ने यह अंतर स्वीकार नहीं किया।
उनके अनुसार कानून तोड़ना और संपत्ति नष्ट करना लोकतांत्रिक विरोध की सीमा से बाहर है।
इस विवाद को छिपाकर KRRS को समझना संभव नहीं।
हिंसक जनउभार और संगठित रणनीति में अंतर
नरगुंड–नवलगुंड जैसी घटनाओं में हिंसा कई बार भीड़ के नियंत्रण से बाहर होने का परिणाम थी।
दूसरी ओर बाद की कुछ कॉरपोरेट-विरोधी कार्रवाइयां पूर्वनियोजित प्रतीकात्मक प्रत्यक्ष कार्रवाई थीं।
पहला अनियंत्रित जनक्रोध हो सकता है।
KRRS के इतिहास का मूल्यांकन करते समय यह भेद महत्वपूर्ण है।
मीडिया की भूमिका
KRRS ने बहुत जल्दी समझ लिया कि आधुनिक आंदोलन केवल स्थल पर उपस्थित लोगों के लिए नहीं होता।
मीडिया के माध्यम से उसका प्रभाव कई गुना बढ़ सकता है।
एक साधारण ज्ञापन शायद छोटी खबर बने।
लेकिन यदि हजारों किसान विधानसभा घेरें,
बहुराष्ट्रीय कंपनी के कार्यालय पर कार्रवाई करें,
तो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान मिलता है।
नंजुंडास्वामी इस प्रतीकात्मक राजनीति को प्रभावी ढंग से समझते थे।
नाटकीयता एक राजनीतिक साधन
KRRS की कुछ कार्रवाइयों को “थिएटर ऑफ प्रोटेस्ट”—प्रतिरोध की नाटकीय राजनीति—की तरह समझा जा सकता है।
उद्देश्य केवल तात्कालिक प्रशासनिक परिणाम नहीं था।
और जटिल आर्थिक प्रश्न को दृश्य घटना में बदलना।
WTO का समझौता किसान को समझाना कठिन है।
“बीज पर कंपनी का कब्जा” अधिक सरल है।
कंपनी के बीज केंद्र पर प्रत्यक्ष कार्रवाई इस विचार को दृश्य बना देती है।
गांव-स्तरीय लामबंदी
राज्यस्तरीय बड़े आंदोलनों के पीछे गांव-स्तर की तैयारी आवश्यक थी।
और गिरफ्तारी की स्थिति में क्या करना है।
यही सांगठनिक अनुशासन बड़े प्रदर्शन संभव बनाता था।
इसलिए KRRS की आंदोलन-पद्धति का वास्तविक आधार उसकी जमीनी इकाइयां थीं।
पंचायत शैली की निर्णय प्रक्रिया
कई किसान आंदोलन स्थानीय बैठक और सामूहिक चर्चा की परंपरा पर चलते थे।
फिर निर्णय सामूहिक रूप से स्वीकार किया जाता।
इससे आंदोलन में भागीदारी की भावना मजबूत होती थी।
लेकिन बड़े संगठन में वास्तविक लोकतांत्रिक नियंत्रण कितना था, यह अलग सवाल है।
करिश्माई नेतृत्व के कारण कई रणनीतिक निर्णय ऊपर से भी प्रभावित होते थे।
नेतृत्व और जनसमूह का संबंध
नंजुंडास्वामी जैसे नेता आंदोलन को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय दिशा दे सकते थे।
लेकिन किसी तालुक में सड़क रोकने या बैंक नीलामी रोकने की वास्तविक क्षमता स्थानीय नेताओं पर निर्भर थी।
KRRS की शक्ति इसी दोहरे ढांचे में थी—
लेकिन आगे यही संरचना नेतृत्व विवाद का कारण भी बनी।
पुलिस और किसान का संबंध
बड़े किसान आंदोलनों में पुलिस की भूमिका निर्णायक हो जाती थी।
ये टकराव आंदोलन की दिशा बदल सकते थे।
नरगुंड की स्मृति के कारण KRRS और पुलिस के बीच संबंध पहले से संवेदनशील थे।
बहुराष्ट्रीय कृषि कंपनियों के विरुद्ध KRRS का संघर्ष — कारगिल, बीज उद्योग, कॉरपोरेट कृषि, किसान स्वायत्तता और 1990 के दशक में वैश्वीकरण-विरोधी प्रत्यक्ष कार्रवाइयों का उदय
प्रस्तावना : स्थानीय किसान आंदोलन से वैश्विक प्रतिरोध तक
कर्नाटक राज्य रैयत संघ के इतिहास में 1990 का दशक एक निर्णायक मोड़ था। 1980 के दशक तक संगठन मुख्यतः बिजली दर, सिंचाई शुल्क, ऋण-वसूली, फसल मूल्य और कृषि लागत जैसे प्रश्नों पर संघर्ष कर रहा था। लेकिन आर्थिक उदारीकरण, GATT की उरुग्वे दौर की वार्ताओं, डंकल प्रस्तावों और कृषि क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बढ़ती भूमिका ने उसके सामने एक नया प्रश्न खड़ा किया—
क्या किसान का संकट केवल सरकार की गलत कृषि नीति से पैदा होता है, या कृषि पर बढ़ते कॉरपोरेट नियंत्रण से भी?
प्रो. एम. डी. नंजुंडास्वामी के नेतृत्व में KRRS ने इस दूसरे प्रश्न का उत्तर अत्यंत स्पष्ट रूप से दिया। संगठन ने दावा किया कि यदि बीज, कृषि तकनीक, जैव संसाधन, प्रसंस्करण और व्यापार कुछ बड़ी कंपनियों के नियंत्रण में चले गए, तो किसान भूमि का मालिक होते हुए भी उत्पादन संबंधी महत्वपूर्ण निर्णयों पर अपना अधिकार खो सकता है।
इसी विचार ने KRRS को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विरुद्ध भारत के सबसे मुखर किसान आंदोलनों में बदल दिया।
1992 में बीज सत्याग्रह, दिसंबर 1992 में कारगिल के बेंगलुरु कार्यालय पर कार्रवाई और जुलाई 1993 में बेल्लारी स्थित कारगिल बीज इकाई पर हमला इस परिवर्तन के सबसे चर्चित प्रतीक बने। अक्टूबर 1993 में GATT और वैश्वीकरण के विरोध में बेंगलुरु में विशाल किसान प्रदर्शन ने KRRS को अंतरराष्ट्रीय पहचान प्रदान की।
1991 का आर्थिक उदारीकरण और नया किसान प्रश्न
1991 में भारत ने गंभीर भुगतान-संतुलन संकट के बीच आर्थिक सुधारों की नई दिशा अपनाई।
और अर्थव्यवस्था को विश्व बाजार से अधिक गहराई से जोड़ने की प्रक्रिया शुरू हुई।
कृषि क्षेत्र तुरंत पूरी तरह मुक्त बाजार में नहीं चला गया, लेकिन किसान संगठनों को आशंका थी कि नई आर्थिक दिशा अंततः—
में विदेशी कंपनियों की भूमिका बढ़ाएगी।
KRRS ने इस परिवर्तन को केवल “आर्थिक सुधार” नहीं माना।
उसने इसे कृषि सत्ता-संबंधों में परिवर्तन के रूप में पढ़ा।
कंपनी से समस्या क्या थी?
KRRS का बहुराष्ट्रीय कंपनियों से विरोध केवल इसलिए नहीं था कि वे विदेशी थीं।
यदि कृषि का आवश्यक इनपुट किसी कंपनी के नियंत्रण में हो जाए, तो किसान की निर्भरता कितनी बढ़ेगी?
मान लें किसान को हर वर्ष कंपनी का बीज खरीदना पड़े।
उस बीज के लिए विशेष रसायन भी उसी उत्पादन प्रणाली का हिस्सा हों।
कंपनी तकनीक का मूल्य निर्धारित करे।
और बौद्धिक संपदा कानून किसान के बीज बचाने और विनिमय करने के पारंपरिक अधिकार को सीमित करें।
तो भूमि किसान की होगी, लेकिन कृषि प्रणाली पर नियंत्रण क्रमशः कंपनी की ओर जा सकता है।
नंजुंडास्वामी ने इसी खतरे को किसान स्वायत्तता का प्रश्न बनाया।
बीज : संघर्ष का केंद्रीय प्रतीक
कृषि उत्पादन के सभी साधनों में बीज का विशेष महत्व है।
बीज केवल खरीदी जाने वाली वस्तु नहीं था।
परंपरागत ग्रामीण व्यवस्था में किसान—
गांव में दूसरे किसानों से बीज बदलता,
स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार किस्मों का चयन करता,
और पीढ़ियों के अनुभव से कृषि जैव-विविधता विकसित करता था।
इसलिए KRRS के लिए बीज पर निजी एकाधिकार का अर्थ केवल एक और महंगा कृषि इनपुट नहीं था।
यह किसान की पुनरुत्पादन क्षमता पर नियंत्रण का प्रश्न था।
संकर बीज और बाजार निर्भरता
हर संकर बीज को पेटेंटेड बीज समझना गलत होगा, लेकिन संकर कृषि ने किसान को एक नया आर्थिक अनुभव दिया।
पारंपरिक किस्म में किसान बीज बचाकर दोबारा बो सकता था।
कई संकरों में अगली पीढ़ी में समान गुण कायम न रहने के कारण किसान को नया बीज खरीदना अधिक उपयोगी होता था।
यदि इसी प्रणाली को बौद्धिक संपदा अधिकार और बड़ी बीज कंपनियों की बाजार शक्ति से जोड़ा जाए, तो किसान आंदोलन को आशंका हुई कि भविष्य में बीज खरीदना विकल्प नहीं बल्कि मजबूरी बन सकता है।
GATT और डंकल प्रस्तावों की पृष्ठभूमि
इसी समय GATT की उरुग्वे दौर की वार्ताएं अंतिम चरण में थीं।
डंकल ड्राफ्ट ने भारतीय राजनीति में तीखी बहस पैदा की।
कृषि व्यापार के अलावा बौद्धिक संपदा अधिकार से संबंधित प्रस्ताव किसान संगठनों के लिए विशेष चिंता का विषय बने।
KRRS और अन्य आलोचक आशंकित थे कि अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक संपदा व्यवस्था पौध किस्मों और जैव संसाधनों पर निजी अधिकार को मजबूत कर सकती है।
एक प्रमुख अकादमिक अध्ययन में KRRS की इस आशंका को इस रूप में दर्ज किया गया है कि बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों के एकाधिकार से किसान को हर मौसम बीज खरीदने की निर्भरता बढ़ सकती थी और पारंपरिक बीज-संग्रह तथा विनिमय पर प्रभाव पड़ सकता था।
पेटेंट और पौध प्रजनक अधिकार
उस समय बहस में अक्सर “बीज पर पेटेंट” शब्द व्यापक अर्थ में इस्तेमाल होता था, जबकि अंतरराष्ट्रीय समझौते विभिन्न देशों को पौध किस्मों की सुरक्षा के लिए पेटेंट अथवा एक प्रभावी विशिष्ट व्यवस्था जैसी अलग कानूनी राहें उपलब्ध कराने वाले थे।
किसान आंदोलन की चिंता कानूनी तकनीकीता से आगे थी।
यदि पौध किस्म पर किसी निजी संस्था का मजबूत स्वामित्व अधिकार बनता है, तो किसान के पारंपरिक अधिकार का क्या होगा?
KRRS ने कानूनी जटिलता को किसान की भाषा में बदल दिया—
जैव संसाधन और ‘जीन चोरी’ का आरोप
बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों के विरुद्ध आंदोलन में “gene theft” और “biopiracy”—जीन चोरी तथा जैव-डकैती—जैसी अभिव्यक्तियां लोकप्रिय हुईं।
तर्क यह था कि विकासशील देशों के किसानों और समुदायों द्वारा सदियों से संरक्षित पौध आनुवंशिक संसाधनों का उपयोग कंपनियां नई किस्में विकसित करने में कर सकती हैं, लेकिन अंतिम उत्पाद पर निजी अधिकार हासिल कर सकती हैं।
1993 की समकालीन Down To Earth रिपोर्ट ने कारगिल विरोध को इसी उभरती चिंता से जोड़ा था और बताया था कि किसान बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा आनुवंशिक संसाधनों के एकाधिकार को लेकर चिंतित थे।
यह विमर्श आगे वैश्विक जैव-विविधता और लाभ-साझेदारी की बहसों तक पहुंचा।
बीज सत्याग्रह : गांधीवादी भाषा में नया आर्थिक संघर्ष
2 अक्टूबर 1992—महात्मा गांधी की जयंती—को KRRS ने व्यापक बीज सत्याग्रह की शुरुआत की।
स्वतंत्रता आंदोलन में गांधी का सत्याग्रह औपनिवेशिक राजनीतिक सत्ता के विरुद्ध था।
KRRS अब उसी नैतिक परंपरा को कृषि में कथित आर्थिक नियंत्रण के विरुद्ध इस्तेमाल कर रहा था।
राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद आर्थिक स्वतंत्रता की रक्षा भी आवश्यक है।
एक अकादमिक अध्ययन किसान प्रतिरोध के बड़े चरण की शुरुआत 2 अक्टूबर 1992 के इसी बीज सत्याग्रह से जोड़ता है।
कारगिल क्यों बना प्रतीक?
अमेरिकी कंपनी Cargill विश्व की बड़ी कृषि व्यापार और कृषि-व्यवसाय कंपनियों में थी।
भारत में उसकी बीज संबंधी गतिविधियों ने KRRS का ध्यान आकर्षित किया।
संगठन के लिए कारगिल केवल एक कंपनी नहीं थी।
वह उस संभावित भविष्य का प्रतीक थी जिसमें बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां—
के बड़े हिस्सों पर प्रभाव स्थापित कर सकती थीं।
इसलिए कारगिल को निशाना बनाना रणनीतिक और प्रतीकात्मक दोनों था।
29 दिसंबर 1992 : बेंगलुरु कार्यालय पर कार्रवाई
29 दिसंबर 1992 को KRRS कार्यकर्ताओं ने बेंगलुरु स्थित Cargill Seeds India के कार्यालय में प्रवेश किया।
समकालीन विवरणों के अनुसार कार्यकर्ताओं ने कार्यालय को नुकसान पहुंचाया, दस्तावेज और बीज पैकेट बाहर फेंके और अपना विरोध दर्ज कराया। कुछ विवरण बताते हैं कि किसानों ने कंपनी को भारत छोड़ने का संदेश भी दिया।
कार्यालय की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया।
लेकिन मीडिया प्रभाव की दृष्टि से यह अत्यंत सफल प्रत्यक्ष कार्रवाई थी।
कारगिल और बीज स्वामित्व का प्रश्न राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया।
व्यक्तिगत हिंसा से दूरी का दावा
इस कार्रवाई से जुड़े एक प्रत्यक्ष विवरण में किसान नेता ने कर्मचारियों को कहा कि आंदोलन उन्हें नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं आया है; निशाना कंपनी और उसकी नीतियां थीं। इसके बाद कार्यालय की वस्तुओं और दस्तावेजों को नुकसान पहुंचाया गया।
यही KRRS की प्रत्यक्ष कार्रवाई का विवादास्पद नैतिक तर्क था—
लेकिन कॉरपोरेट संपत्ति के विरुद्ध कार्रवाई स्वीकार्य हो सकती है।
आलोचकों ने इस अंतर को अस्वीकार किया और इसे स्पष्ट रूप से गैर-कानूनी संपत्ति-विनाश माना।
दोनों दृष्टियों को साथ दर्ज करना आवश्यक है।
अमेरिकी प्रतिक्रिया और घटना का अंतरराष्ट्रीय प्रभाव
कारगिल कार्यालय की घटना केवल स्थानीय पुलिस मामला नहीं रही।
एक समकालीन विवरण के अनुसार अमेरिकी राजनयिक अधिकारियों ने घटना पर चिंता व्यक्त की और अमेरिकी राजदूत ने कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरप्पा मोइली से भी मुलाकात की।
यह घटनाक्रम KRRS के लिए राजनीतिक रूप से उपयोगी था।
संगठन जिस मुद्दे को उठा रहा था—कृषि में बहुराष्ट्रीय शक्ति—वही घटना अचानक भारत-अमेरिका आर्थिक संबंधों की चर्चा से जुड़ गई।
इससे एक राज्यस्तरीय किसान संगठन को अप्रत्याशित अंतरराष्ट्रीय दृश्यता मिली।
दिसंबर की कार्रवाई के बाद भी संघर्ष जारी
यदि दिसंबर 1992 की कार्रवाई केवल क्षणिक भावनात्मक विस्फोट होती, तो आंदोलन वहीं समाप्त हो जाता।
KRRS ने कारगिल और GATT-विरोध को लगातार आगे बढ़ाया।
मार्च 1993 में दिल्ली में भी किसान संगठनों द्वारा डंकल प्रस्तावों के विरोध में कार्यक्रम हुए। KRRS की उस दौर की गतिविधियों पर एक विवरण इसे देशव्यापी बीज सत्याग्रह की प्रमुख प्रेरक शक्तियों में रखता है।
यानी कारगिल-विरोध अब राष्ट्रीय कृषि नीति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था के प्रश्न से जुड़ चुका था।
जुलाई 1993 : बेल्लारी बीज इकाई पर हमला
जुलाई 1993 में KRRS के लगभग 50 कार्यकर्ताओं ने कारगिल की बेल्लारी स्थित बीज प्रसंस्करण इकाई पर कार्रवाई की।
India Today की समकालीन रिपोर्ट के अनुसार यह लगभग 32 एकड़ में फैली, करीब दो करोड़ रुपये लागत वाली इकाई थी और कार्रवाई में लगभग दस लाख रुपये के नुकसान का अनुमान लगाया गया। यह कारगिल के खिलाफ KRRS की दूसरी बड़ी प्रत्यक्ष कार्रवाई थी।
एक अन्य अकादमिक विवरण इसे जुलाई 1993 में कारगिल बीज इकाई के “physical demolition” के रूप में दर्ज करता है।
यह कार्रवाई क्यों अधिक महत्वपूर्ण थी?
बेंगलुरु कार्यालय प्रशासनिक प्रतीक था।
बेल्लारी की इकाई वास्तविक कृषि उत्पादन और बीज वितरण ढांचे का हिस्सा थी।
इसलिए बेल्लारी कार्रवाई का संदेश अधिक स्पष्ट था—
KRRS केवल कंपनी की नीतियों का प्रतीकात्मक विरोध नहीं कर रहा।
वह उसके कृषि उत्पादन नेटवर्क को चुनौती दे रहा है।
यहीं प्रत्यक्ष कार्रवाई की रणनीति और अधिक उग्र हुई।
क्या कारगिल किसान का बीज छीन रही थी?
ऐतिहासिक विश्लेषण में आंदोलन के नारे और वास्तविक कानूनी स्थिति के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।
यह कहना कि कारगिल उस समय हर भारतीय किसान को अपना बीज बचाने से रोक रही थी, अतिशयोक्ति होगी।
KRRS का विरोध उस संभावित व्यवस्था के खिलाफ था जिसमें—
मिलकर किसान की स्वतंत्र बीज व्यवस्था को कमजोर कर सकते थे।
अर्थात आंदोलन एक तत्काल वास्तविकता के साथ-साथ भविष्य के संरचनात्मक खतरे के विरुद्ध भी था।
कॉरपोरेट बीज उद्योग का आर्थिक तर्क
दूसरी ओर कंपनियों और कृषि तकनीक समर्थकों का तर्क भी समझना आवश्यक है।
यदि किसी कंपनी को अपनी विकसित किस्म पर कुछ अवधि तक व्यावसायिक अधिकार न मिले तो निजी अनुसंधान का प्रोत्साहन कम हो सकता है।
इसलिए बौद्धिक संपदा समर्थकों के लिए यह नवाचार का प्रश्न था।
KRRS के लिए वही व्यवस्था किसान निर्भरता का प्रश्न थी।
यहीं दोनों आर्थिक दृष्टियों का मूल टकराव था।
किसान स्वायत्तता बनाम कृषि नवाचार
बहस को “कंपनी अच्छी या बुरी” तक सीमित करना उपयोगी नहीं है।
किसान अधिकार और कृषि नवाचार के बीच संतुलन कैसे बने?
नई किस्म विकसित करने वाले को प्रोत्साहन मिले।
लेकिन किसान का बीज बचाने, बोने और उचित सीमा तक साझा करने का पारंपरिक अधिकार भी सुरक्षित रहे।
भारत ने आगे पौध किस्म संरक्षण व्यवस्था बनाते समय इसी संतुलन को एक विशिष्ट कानूनी रूप देने की कोशिश की।
KRRS जैसे आंदोलनों ने इस बहस को सार्वजनिक स्तर पर तीखा बनाया।
कॉरपोरेट कृषि का व्यापक अर्थ
KRRS की नजर में कॉरपोरेट कृषि का अर्थ केवल कंपनी द्वारा विशाल खेत खरीदना नहीं था।
कंपनी भूमि का मालिक हुए बिना भी कृषि पर प्रभाव बढ़ा सकती थी—
इसलिए किसान की स्वायत्तता केवल भूमि स्वामित्व से सुरक्षित नहीं होती।
आर्थिक निर्णयों की श्रृंखला पर नियंत्रण भी महत्वपूर्ण है।
बीज से बाजार तक नियंत्रण की आशंका
मान लें एक कंपनी किसान को बीज देती है।
फिर उसकी फसल अनुबंध के तहत खरीदती है।
ऐसी स्थिति में किसान तकनीकी रूप से स्वतंत्र भूमिधर है, लेकिन उसकी आय के कई निर्णायक बिंदु एक ही कॉरपोरेट श्रृंखला से जुड़े हैं।
नंजुंडास्वामी इसी संभावना को लेकर सतर्क थे।
उनकी राजनीतिक भाषा में यही किसान स्वायत्तता का क्षरण था।
कृषि ज्ञान का प्रश्न
कॉरपोरेट कृषि की आलोचना केवल कीमत पर नहीं थी।
स्वदेशी की नई व्याख्या
नंजुंडास्वामी इसे अधिक व्यापक अर्थ में इस्तेमाल करते थे—
बीज सत्याग्रह, पेटेंट और किसान की बीज-संप्रभुता — डंकल प्रस्ताव, GATT–TRIPS, पौध किस्म अधिकार, देशी बीज, जैव-डकैती और ‘बीज पर किसान का अधिकार’ की KRRS राजनीति
प्रस्तावना : बीज पर अधिकार का प्रश्न
कर्नाटक राज्य रैयत संघ की राजनीति में बीज केवल कृषि इनपुट नहीं था। वह किसान की स्वतंत्रता, कृषि ज्ञान, जैव-विविधता और आने वाली पीढ़ियों के उत्पादन-अधिकार का प्रतीक था। इसी कारण 1990 के दशक में जब GATT की उरुग्वे दौर की वार्ताओं, डंकल प्रस्तावों और बाद में TRIPS समझौते के जरिए बौद्धिक संपदा अधिकारों का प्रश्न कृषि तक पहुंचा, KRRS ने इसे किसान आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में बदल दिया।
प्रो. एम. डी. नंजुंडास्वामी और उनके सहयोगियों का मूल तर्क था कि यदि किसान को हर मौसम किसी निजी कंपनी से बीज खरीदने की मजबूरी बढ़ती जाए और बीज पर कानूनी स्वामित्व की व्यवस्था ऐसी बने जिसमें पारंपरिक रूप से बीज बचाने, दोबारा बोने और किसानों के बीच बांटने का अधिकार कमजोर हो जाए, तो भूमि का स्वामित्व होते हुए भी किसान की कृषि स्वतंत्रता कम हो सकती है।
इसी सोच से बीज सत्याग्रह और आगे चलकर बीज-संप्रभुता की राजनीति विकसित हुई।
लेकिन इस पूरे विवाद को समझने के लिए एक बुनियादी तथ्य स्पष्ट रखना आवश्यक है—TRIPS ने प्रत्येक पौध किस्म को अनिवार्य रूप से पेटेंट करने का निर्देश नहीं दिया। उसके अनुच्छेद 27.3(b) ने सदस्य देशों को पौधों और पशुओं को कुछ परिस्थितियों में पेटेंट व्यवस्था से बाहर रखने की गुंजाइश दी, लेकिन पौध किस्मों के लिए पेटेंट, किसी विशेष स्वतंत्र sui generis व्यवस्था अथवा दोनों के संयोजन से संरक्षण अनिवार्य किया।
यही कानूनी गुंजाइश आगे भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुई।
किसान के लिए बीज का पारंपरिक अर्थ
औद्योगिक बीज बाजार के व्यापक होने से पहले गांव की कृषि व्यवस्था में बीज एक चक्रीय संसाधन था।
उसमें से अगली बुवाई के लिए बीज चुनता।
किसी स्थानीय किस्म को बेहतर प्रदर्शन करते देखकर उसका विस्तार करता।
इस प्रक्रिया में किसान केवल बीज का उपभोक्ता नहीं था।
वह चयनकर्ता, संरक्षक और व्यवहारिक अर्थ में पौध-सुधार की प्रक्रिया का सहभागी भी था।
KRRS का तर्क था कि आधुनिक कानून बनाते समय इस ऐतिहासिक भूमिका को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
बीज की पुनरुत्पादक प्रकृति
बीज की एक विशेषता इसे अन्य औद्योगिक वस्तुओं से अलग करती है।
ट्रैक्टर स्वयं नया ट्रैक्टर पैदा नहीं करता।
उर्वरक अगली फसल के लिए नया उर्वरक नहीं बनता।
लेकिन बीज जीवित पुनरुत्पादक संसाधन है।
एक बीज से फसल होती है और उसी फसल से अगली पीढ़ी का बीज प्राप्त हो सकता है।
इसी कारण बीज पर बौद्धिक संपदा अधिकार का प्रश्न सामान्य मशीन या औद्योगिक आविष्कार के पेटेंट से अलग सामाजिक प्रभाव पैदा करता है।
यदि पुनरुत्पादक संसाधन पर विशेष व्यावसायिक अधिकार लागू हो, तो किसान के परंपरागत व्यवहार और अधिकार सीधे प्रभावित हो सकते हैं।
आधुनिक पौध प्रजनन का दूसरा पक्ष
दूसरी ओर नई पौध किस्म तैयार करना भी संसाधन मांगता है।
स्थिरता और विशिष्टता साबित करनी होती है।
इस प्रक्रिया पर समय और धन खर्च होता है।
पौध प्रजनक अधिकार के समर्थकों का तर्क था कि यदि नई किस्म विकसित करने वाले को सीमित अवधि का व्यावसायिक अधिकार न मिले तो निजी और संस्थागत अनुसंधान के लिए प्रोत्साहन कमजोर हो सकता है।
अतः मूल नीति विवाद दो वैध लक्ष्यों के बीच था—
नवाचार को प्रोत्साहन कैसे दिया जाए और किसान के पारंपरिक अधिकार कैसे सुरक्षित रखे जाएं?
डंकल प्रस्ताव क्या थे?
GATT की उरुग्वे दौर की बहुपक्षीय व्यापार वार्ताओं के अंतिम चरण में तत्कालीन महानिदेशक आर्थर डंकल ने दिसंबर 1991 में एक समेकित मसौदा प्रस्तुत किया।
भारत में इसे सामान्यतः डंकल ड्राफ्ट या डंकल प्रस्ताव कहा गया।
इसमें कृषि, व्यापार, सेवाओं और बौद्धिक संपदा सहित अनेक विषय शामिल थे।
भारतीय सार्वजनिक बहस में कृषि और बौद्धिक संपदा संबंधी प्रावधान विशेष रूप से विवादास्पद बने।
किसान संगठनों को आशंका थी कि नई वैश्विक व्यापार व्यवस्था बीज और पौध सामग्री पर निजी स्वामित्व अधिकारों को मजबूत करेगी।
KRRS ने इसी बहस को गांवों तक पहुंचाया।
TRIPS और पौध किस्मों की वास्तविक कानूनी स्थिति
आगे WTO के गठन के साथ 1995 में TRIPS समझौता प्रभावी हुआ।
TRIPS के अनुच्छेद 27.3(b) के अनुसार सदस्य देश पौधों और पशुओं—सूक्ष्मजीवों के अपवाद के साथ—तथा मूलतः जैविक उत्पादन प्रक्रियाओं को पेटेंट से बाहर रख सकते हैं। लेकिन उन्हें पौध किस्मों को या तो पेटेंट, या एक प्रभावी sui generis व्यवस्था, या दोनों के संयोजन से संरक्षण देना होगा।
भारत के लिए UPOV मॉडल को हूबहू अपनाना अनिवार्य नहीं था।
TRIPS किसी एक विशिष्ट पौध किस्म संरक्षण सम्मेलन को अनिवार्य नहीं करता। WTO की अपनी व्याख्या भी मानती है कि sui generis व्यवस्था की संरचना में सदस्य देशों के पास नीति-स्थान है और वे किसान की बीज पुनः उपयोग जैसी प्रथाओं को ध्यान में रख सकते हैं।
यही वह कानूनी स्थान था जिसमें भारत ने बाद में अपना अलग मॉडल विकसित किया।
KRRS की आशंका क्यों थी?
यदि TRIPS में लचीलापन था तो KRRS इतना चिंतित क्यों था?
क्योंकि 1990 के दशक की शुरुआत में अंतिम भारतीय व्यवस्था अभी बनी नहीं थी।
किसानों के सामने कई संभावित मॉडल थे।
यदि भारत ऐसी व्यवस्था अपनाता जिसमें पौध प्रजनक अधिकार अत्यधिक मजबूत और किसान विशेषाधिकार बहुत सीमित होते, तो किसान के बीज बचाने तथा विनिमय की प्रथा प्रभावित हो सकती थी।
इसलिए KRRS तत्काल कानून का ही नहीं, भविष्य में बनने वाले कानून की दिशा का विरोध कर रहा था।
“पेटेंट बीज” की राजनीतिक भाषा
आंदोलनों में तकनीकी कानूनी अंतर प्रायः सरल नारों में बदल जाते हैं।
KRRS के अभियानों में “बीज पर पेटेंट” एक प्रभावशाली राजनीतिक अभिव्यक्ति बनी।
इन सभी के कानूनी प्रभाव अलग हो सकते हैं।
इसलिए ऐतिहासिक अध्ययन में आंदोलन की भाषा को हूबहू कानूनी तथ्य नहीं मानना चाहिए।
फिर भी उस नारे की राजनीतिक शक्ति असाधारण थी।
इसने किसान के सामने प्रश्न बेहद सरल बना दिया—
क्या कोई और मेरे बीज पर ऐसा अधिकार प्राप्त कर सकता है जो मेरे पारंपरिक उपयोग को सीमित करे?
2 अक्टूबर 1992 का बीज सत्याग्रह
इसी आशंका के बीच KRRS ने 2 अक्टूबर 1992 को बीज सत्याग्रह अभियान शुरू किया।
गांधी जयंती का चयन जानबूझकर किया गया था।
गांधी के स्वदेशी और सत्याग्रह की भाषा को कृषि के नए आर्थिक प्रश्न से जोड़ा गया।
अंग्रेज चले गए, लेकिन यदि कृषि के आधारभूत संसाधनों पर बाहरी आर्थिक नियंत्रण स्थापित होता है तो स्वतंत्रता अधूरी रहेगी।
इस प्रकार बीज सत्याग्रह ने राजनीतिक स्वतंत्रता और आर्थिक संप्रभुता को जोड़ दिया।
नमक सत्याग्रह से बीज सत्याग्रह तक
KRRS के प्रतीकवाद को समझने के लिए नमक सत्याग्रह से तुलना उपयोगी है।
ब्रिटिश शासन में नमक ऐसी वस्तु थी जिसकी प्रत्येक नागरिक को आवश्यकता थी।
औपनिवेशिक राज्य ने उस पर कर और नियंत्रण स्थापित किया।
गांधी ने नमक को स्वतंत्रता का प्रतीक बना दिया।
KRRS ने बीज के साथ वैसा ही प्रतीकात्मक संबंध बनाने की कोशिश की।
जिस तरह नमक जीवन के लिए आवश्यक था, उसी तरह किसान के लिए बीज कृषि जीवन का मूल संसाधन है।
लेकिन ऐतिहासिक रूप से दोनों व्यवस्थाएं समान नहीं थीं; तुलना आंदोलन की राजनीतिक प्रतीकात्मकता थी, कानूनी समानता नहीं।
बीज पर किसान का “प्राकृतिक अधिकार”
KRRS का राजनीतिक दर्शन औपचारिक कानून से पहले किसान के ऐतिहासिक व्यवहार को अधिकार का आधार मानता था।
तो नया कानून उस अधिकार को क्यों सीमित करे?
यह तर्क अधिकार को संसद की देन के बजाय सामाजिक परंपरा से उत्पन्न मानता था।
यहीं से “किसान' Rights”—किसान अधिकार—की धारणा भारतीय सार्वजनिक विमर्श में अधिक मजबूत हुई।
देशी बीज और स्वायत्तता
देशी अथवा स्थानीय किस्मों का प्रश्न भी इसी राजनीति से जुड़ा।
स्थानीय बीज का लाभ केवल यह नहीं था कि किसान को कंपनी से खरीदना नहीं पड़ता।
इसलिए देशी बीज संरक्षण को KRRS ने आर्थिक स्वायत्तता और कृषि जैव-विविधता दोनों से जोड़ा।
क्या हर देशी बीज बेहतर है?
स्थानीय होना स्वयं किसी किस्म को अधिक उत्पादक, पोषक या रोग प्रतिरोधी सिद्ध नहीं करता।
आधुनिक पौध प्रजनन ने कई मामलों में उत्पादन, रोग प्रतिरोध और गुणवत्ता में महत्वपूर्ण सुधार किए हैं।
इसलिए वैज्ञानिक दृष्टि से प्रश्न “देशी बनाम आधुनिक” का सरल द्वंद्व नहीं है।
किस स्थिति में कौन-सी किस्म किसान के लिए आर्थिक, पर्यावरणीय और कृषि दृष्टि से बेहतर है?
KRRS की वैचारिक शक्ति बीज विविधता और किसान विकल्प की रक्षा में थी; किसी एक प्रकार के बीज को सार्वभौमिक समाधान मानना उसकी सीमा बन सकता था।
जैव-डकैती क्या है?
Biopiracy—जैव-डकैती शब्द उस विवाद को व्यक्त करता है जिसमें किसी समुदाय या देश के जैव संसाधन अथवा पारंपरिक ज्ञान का व्यावसायिक उपयोग बिना पर्याप्त अनुमति, मान्यता या लाभ-साझेदारी के किया जाता है।
उदाहरणतः यदि कोई समुदाय सदियों से किसी पौधे का विशेष उपयोग जानता है और कोई कंपनी उसी ज्ञान से उत्पाद विकसित कर निजी अधिकार का दावा करे, तो प्रश्न उठता है—
KRRS ने इसी चिंता को बीज और कृषि आनुवंशिक संसाधनों से जोड़ा।
जर्मप्लाज्म का प्रश्न
भारत सहित वैश्विक दक्षिण कृषि जैव-विविधता से समृद्ध रहा है।
इनकी हजारों स्थानीय किस्में किसान समुदायों द्वारा संरक्षित की गईं।
आधुनिक पौध प्रजनक इन्हीं आनुवंशिक संसाधनों से उपयोगी गुण प्राप्त कर सकते हैं।
इसलिए KRRS और अन्य आंदोलनों ने प्रश्न उठाया—
यदि नई व्यावसायिक किस्म किसी किसान समुदाय द्वारा संरक्षित आनुवंशिक संसाधन से विकसित हुई है, तो उस समुदाय को क्या अधिकार मिलेगा?
यह प्रश्न आगे लाभ-साझेदारी की अवधारणा तक पहुंचा।
पारंपरिक ज्ञान और वैश्विक बौद्धिक संपदा व्यवस्था
TRIPS के लागू होने के बाद जैव-विविधता और पारंपरिक ज्ञान के साथ बौद्धिक संपदा व्यवस्था का संबंध WTO में भी विवाद का विषय बना रहा।
2001 की दोहा घोषणा ने TRIPS परिषद को समझौते और जैव-विविधता पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के संबंध तथा पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण पर विचार करने के लिए कहा।
इससे स्पष्ट है कि KRRS ने जिस टकराव को 1990 के दशक के प्रारंभ में राजनीतिक मुद्दा बनाया था, वह बाद में औपचारिक अंतरराष्ट्रीय नीति-विमर्श में भी महत्वपूर्ण प्रश्न बना रहा।
UPOV मॉडल को लेकर चिंता
दुनिया के अनेक देशों ने पौध किस्म संरक्षण के लिए UPOV—International Union for the Protection of New Varieties of Plants—के मॉडल अपनाए।
विशेषकर UPOV 1991 में प्रजनक अधिकार अपेक्षाकृत मजबूत हैं और किसान द्वारा संरक्षित बीज के उपयोग की छूट राष्ट्रीय कानूनों पर निर्भर तथा सीमित हो सकती है।
भारतीय किसान संगठनों में आशंका थी कि यदि भारत बहुत कठोर प्रजनक-अधिकार मॉडल स्वीकार करता है तो छोटे किसान की पारंपरिक बीज व्यवस्था प्रभावित होगी।
भारत ने अंततः UPOV 1991 में शामिल होने के बजाय स्वतंत्र sui generis कानून बनाया। भारत की PPV&FR Authority स्वयं अपने दस्तावेज में भारतीय किसान अधिकारों की विशिष्टता और भारत के UPOV 1991 में न जुड़ने को रेखांकित करती है।
भारत का उत्तर : PPV&FR Act, 2001
भारत ने Protection of Plant Varieties and किसान’ Rights Act, 2001—पौधा किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2001 बनाया।
इस कानून की विशेषता उसके नाम में ही दिखाई देती है।
यह केवल “Plant Breeders' Rights” कानून नहीं था।
उसने प्रजनक और किसान दोनों अधिकारों को कानूनी ढांचे में रखा। इसका आधिकारिक प्रशासन कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अधीन Protection of Plant Varieties and किसान’ Rights Authority द्वारा किया जाता है।
भारतीय कानून ने TRIPS दायित्वों को पूरा करते हुए एक अलग संतुलन बनाने की कोशिश की।
किसान का बीज बचाने का अधिकार
इस कानून की धारा 39 विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
इसके अनुसार किसान संरक्षित पौध किस्म की अपनी कृषि उपज सहित बीज को—
लेकिन वह संरक्षित किस्म के बीज को ब्रांडेड बीज के रूप में नहीं बेच सकता।
यह व्यवस्था सीधे उस मूल चिंता से जुड़ती है जिसे 1990 के दशक के किसान आंदोलनों ने उठाया था—
भारत का कानूनी उत्तर था—व्यापक रूप से हां, पर ब्रांडेड व्यावसायिक बिक्री पर सीमा के साथ।
किसान भी प्रजनक
PPV&FR कानून का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि किसान को केवल बीज उपयोगकर्ता नहीं माना गया।
यदि किसान ने नई किस्म विकसित की है तो वह भी प्रजनक के समान पंजीकरण और संरक्षण प्राप्त कर सकता है।
किसान किस्मों के पंजीकरण का भी प्रावधान है।
बीज के खराब प्रदर्शन पर मुआवजा
PPV&FR कानून ने एक और महत्वपूर्ण सुरक्षा दी।
GATT, WTO और वैश्वीकरण के विरुद्ध KRRS — उरुग्वे दौर से WTO तक कृषि व्यापार, आयात–निर्यात, कृषि सब्सिडी, विकसित देशों के दोहरे मानदंड, किसान संप्रभुता और वैश्विक किसान प्रतिरोध की राजनीति
प्रस्तावना : जब कर्नाटक का किसान विश्व व्यापार व्यवस्था से टकराया
कर्नाटक राज्य रैयत संघ के इतिहास में 1990 का दशक केवल नए मुद्दों का दौर नहीं था; यह उसके राजनीतिक भूगोल के विस्तार का समय था। 1980 में नरगुंड–नवलगुंड के किसान मुख्यतः सिंचाई, बेहतरमेंट लेवी, कृषि लागत और फसल मूल्य के प्रश्न पर सरकार से संघर्ष कर रहे थे। एक दशक बाद उसी किसान आंदोलन का नेतृत्व GATT, डंकल प्रस्ताव, विश्व व्यापार संगठन, कृषि आयात, पेटेंट, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और विकसित देशों की कृषि सब्सिडी पर बहस कर रहा था।
किसी राज्यस्तरीय किसान संगठन ने यह दावा करना शुरू किया कि कर्नाटक के किसान की आय केवल बेंगलुरु और नई दिल्ली की नीति से निर्धारित नहीं होती; जिनेवा में तैयार होने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियम भी उसके खेत तक पहुंच सकते हैं।
प्रो. एम. डी. नंजुंडास्वामी के नेतृत्व में KRRS ने वैश्वीकरण का विरोध मुख्यतः तीन आधारों पर विकसित किया—
कृषि बाजारों का असमान उदारीकरण, विकसित देशों में भारी कृषि सहायता के रहते विकासशील देशों पर बाजार खोलने का दबाव, और किसान के बीज–उत्पादन–बाजार संबंधी निर्णयों पर बाहरी आर्थिक शक्तियों का बढ़ता प्रभाव।
यदि किसान को अपनी फसल, बीज और बाजार पर निर्णय की वास्तविक शक्ति नहीं है, तो आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ क्या है?
इसलिए KRRS का WTO-विरोध केवल व्यापार नीति का आंदोलन नहीं था। वह धीरे-धीरे किसान संप्रभुता और खाद्य संप्रभुता का आंदोलन बन गया।
GATT क्या था?
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद 1947 में General Agreement on Tariffs and Trade—GATT की स्थापना अंतरराष्ट्रीय व्यापार में शुल्क और अन्य बाधाओं को कम करने के उद्देश्य से हुई।
शुरुआती दशकों में कृषि कई मामलों में सामान्य औद्योगिक व्यापार नियमों से अलग और अत्यधिक संरक्षित क्षेत्र बनी रही।
विशेषकर विकसित देशों ने अपने किसानों को—
परिणाम यह हुआ कि अंतरराष्ट्रीय कृषि बाजार वास्तविक अर्थ में “मुक्त” बाजार नहीं था।
WTO स्वयं स्वीकार करता है कि विकसित देशों की मूल्य-समर्थन और आयात संरक्षण नीतियों ने कई कृषि क्षेत्रों में उत्पादन अधिशेष पैदा किए और इन अधिशेषों को निर्यात सब्सिडी के जरिए विश्व बाजार में भेजे जाने से अंतरराष्ट्रीय कृषि कीमतों पर नीचे की ओर दबाव पड़ा।
यही ऐतिहासिक असमानता आगे विकासशील देशों के किसान आंदोलनों की सबसे बड़ी शिकायत बनी।
उरुग्वे दौर : कृषि पहली बार केंद्र में
1986 में शुरू हुआ GATT का उरुग्वे दौर पूर्ववर्ती व्यापार वार्ताओं की तुलना में अधिक व्यापक था।
इसमें कृषि को पहली बार अंतरराष्ट्रीय व्यापार अनुशासन के केंद्र में लाने का गंभीर प्रयास हुआ।
वार्ताओं का उद्देश्य कृषि व्यापार में—
व्यापार-विकृत करने वाली घरेलू सहायता को अनुशासित करना,
यही तीन विषय आगे WTO के कृषि समझौते के मूल स्तंभ बने। WTO आज भी कृषि समझौते को इन्हीं तीन प्रमुख क्षेत्रों—market access, domestic support और export competition—के आधार पर समझाता है।
सैद्धांतिक रूप से उद्देश्य कृषि व्यापार को अधिक निष्पक्ष बनाना था।
क्या नियम सभी देशों और किसानों पर समान आर्थिक प्रभाव डालेंगे?
डंकल मसौदा और भारत में भय
दिसंबर 1991 में GATT के तत्कालीन महानिदेशक आर्थर डंकल ने उरुग्वे दौर को समाप्त करने के लिए एक समेकित मसौदा प्रस्तुत किया।
भारत में यह डंकल ड्राफ्ट के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
किसान आंदोलनों को इसमें विशेष चिंता थी—
और घरेलू कृषि नीति पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की।
KRRS ने इस दस्तावेज को ग्रामीण राजनीतिक प्रश्न बना दिया।
नंजुंडास्वामी का तर्क था कि किसान यदि केवल स्थानीय तहसीलदार से लड़ता रहे, जबकि उसकी कृषि के नियम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदल रहे हों, तो आंदोलन अधूरा रहेगा।
इसी दौर से KRRS का स्थानीय किसान संघर्ष वैश्वीकरण-विरोधी आंदोलन में रूपांतरित होने लगा।
1994 का मराकेश समझौता और WTO
उरुग्वे दौर का समापन 1994 में मराकेश समझौते के साथ हुआ।
1 जनवरी 1995 से विश्व व्यापार संगठन—WTO—अस्तित्व में आया।
कृषि समझौता भी उसी दिन प्रभावी हुआ।
उसका घोषित दीर्घकालीन उद्देश्य अधिक निष्पक्ष और बाजारोन्मुख कृषि व्यापार व्यवस्था स्थापित करना था। समझौते ने कृषि समर्थन और संरक्षण को मुख्यतः बाजार पहुंच, घरेलू सहायता और निर्यात प्रतिस्पर्धा के नियमों के अंतर्गत रखा।
यहीं KRRS की आलोचना का केंद्रीय प्रश्न पैदा हुआ—
यदि सभी देश बाजार खोल रहे हैं तो क्या सभी देशों के किसान समान प्रारंभिक स्थिति में हैं?
विकसित और विकासशील किसान की असमान शुरुआत
अमेरिका, यूरोपीय देशों और कुछ अन्य विकसित अर्थव्यवस्थाओं में कृषि दशकों से बड़े सार्वजनिक समर्थन ढांचे के भीतर विकसित हुई थी।
इसके विपरीत भारत के अधिकांश किसान छोटी अथवा सीमांत जोतों, मानसून जोखिम, कमजोर भंडारण, सीमित बाजार शक्ति और अपेक्षाकृत कम प्रति किसान सार्वजनिक सहायता के साथ कृषि करते थे।
एक छोटे भारतीय किसान और अत्यधिक पूंजीकृत विकसित देश के किसान को एक ही वैश्विक बाजार में उतार देना क्या वास्तव में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा है?
यही उसके वैश्वीकरण-विरोध का आर्थिक केंद्र था।
WTO की घरेलू सहायता व्यवस्था
WTO कृषि समझौते ने सभी कृषि सब्सिडी को समाप्त नहीं किया।
इसने सहायता को विभिन्न श्रेणियों में बांटा।
व्यापार को अधिक विकृत करने वाली सहायता पर अनुशासन लगाया गया।
जबकि ऐसी सहायता जिसे कम या न्यूनतम व्यापार-विकृत माना गया, उसे Green Box जैसी श्रेणियों में रखा गया और उस पर कटौती की बाध्यता नहीं थी।
WTO के अनुसार अनुसंधान, प्रशिक्षण और कुछ अलग प्रकार की सहायता Green Box के अंतर्गत हो सकती है, जबकि गारंटीशुदा मूल्य के माध्यम से बाजार मूल्य समर्थन जैसी व्यवस्था व्यापार-विकृत सहायता में आ सकती है।
यहीं किसान आंदोलनों ने एक महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रश्न उठाया।
सब्सिडी समाप्त नहीं, पुनर्वर्गीकृत भी हो सकती है
KRRS और वैश्वीकरण-विरोधी आंदोलनों की आलोचना थी कि विकसित देशों के पास अपनी कृषि सहायता को WTO-संगत श्रेणियों में ढालने की वित्तीय और संस्थागत क्षमता कहीं अधिक थी।
अर्थात प्रत्यक्ष बाजार समर्थन कम किया जाए, लेकिन—
जैसे दूसरे साधनों से किसान को सहायता जारी रह सकती है।
इसलिए किसान आंदोलनों का आरोप था कि “सब्सिडी घटाने” की औपचारिक प्रतिबद्धता वास्तविक समर्थन में समान अनुपात की कमी का अर्थ नहीं है।
WTO व्यवस्था स्वयं Green Box सहायता को कटौती प्रतिबद्धताओं से मुक्त रखती है और इसकी कोई सामान्य वित्तीय सीमा निर्धारित नहीं करती।
यहीं से “दोहरे मानदंड” की किसान राजनीति को बल मिला।
विकासशील देशों के लिए विशेष प्रावधान
यह भी तथ्य है कि WTO कृषि समझौते ने विकासशील देशों को बिल्कुल विकसित देशों जैसा व्यवहार नहीं दिया।
और कुछ विकासात्मक कृषि सहायता के लिए विशेष छूट—
विशेष रूप से विकासशील देशों के निम्न-आय अथवा संसाधन-विहीन उत्पादकों को उपलब्ध कुछ कृषि इनपुट सब्सिडी और कृषि निवेश सहायता कटौती प्रतिबद्धताओं से मुक्त हो सकती है।
इसलिए यह कहना कि WTO ने भारत को सभी कृषि सब्सिडियां समाप्त करने का आदेश दिया, तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।
KRRS की वास्तविक चिंता अधिक व्यापक थी—
वैश्विक नियमों की संरचना दीर्घकाल में किस प्रकार की कृषि अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करती है?
बाजार पहुंच : टैरिफ में बदलती सीमाएं
WTO कृषि समझौते ने कई गैर-शुल्क आयात प्रतिबंधों को शुल्क में बदलने और शुल्कों को निर्धारित सीमा में बांधने की दिशा अपनाई।
इसका उद्देश्य बाजार पहुंच को अधिक पारदर्शी बनाना था।
WTO व्यवस्था में कृषि बाजार पहुंच का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत यही था कि अनेक प्रकार के मात्रात्मक आयात प्रतिबंधों की जगह टैरिफ आधारित प्रणाली हो।
मुक्त व्यापार समर्थकों के लिए इससे व्यापार अधिक स्पष्ट और पूर्वानुमानित होता था।
यदि आयात अचानक बढ़े और घरेलू कृषि मूल्य गिर जाए तो छोटे किसान को कौन बचाएगा?
सस्ता आयात : उपभोक्ता को लाभ, किसान को जोखिम
आयात नीति का सबसे बड़ा राजनीतिक विरोधाभास यही है।
विदेश से सस्ता खाद्य तेल, अनाज या दूसरी कृषि वस्तु आए तो शहरी उपभोक्ता को कम कीमत मिल सकती है।
लेकिन उसी वस्तु का उत्पादन करने वाले घरेलू किसान का भाव गिर सकता है।
इसलिए सरकार दो सामाजिक समूहों के बीच संतुलन करती है—
KRRS का तर्क था कि भारतीय नीति लंबे समय तक उपभोक्ता कीमत नियंत्रित करने के लिए किसान आय को बलिदान करने की प्रवृत्ति रखती रही है।
वैश्वीकरण इस दबाव को और बढ़ा सकता है।
आयात तभी मुक्त, जब प्रतिस्पर्धा निष्पक्ष हो
KRRS का मुक्त व्यापार-विरोध पूर्ण आत्मनिर्भरता का सरल सिद्धांत नहीं था।
उसका तर्क था कि व्यापार तभी न्यायपूर्ण कहा जा सकता है जब प्रतिस्पर्धी परिस्थितियां तुलनीय हों।
यदि विदेशी किसान को बड़े पैमाने पर सरकारी समर्थन मिलता है और उसका उत्पाद भारतीय बाजार में आता है, तो भारतीय किसान वास्तव में केवल विदेशी किसान से प्रतिस्पर्धा नहीं कर रहा।
वह उस किसान के पीछे खड़ी उसकी राज्य-व्यवस्था से भी प्रतिस्पर्धा कर रहा है।
निर्यात सब्सिडी और विश्व बाजार
उरुग्वे दौर से पहले निर्यात सब्सिडी विकसित देशों की कृषि नीति का महत्वपूर्ण उपकरण थीं।
अधिशेष कृषि उत्पादन को सरकारी सहायता के जरिए विश्व बाजार में भेजने से अंतरराष्ट्रीय कीमतें प्रभावित हो सकती थीं।
WTO ने निर्यात सब्सिडियों को अनुशासित किया और आगे 2015 की नैरोबी मंत्रीस्तरीय बैठक में शेष कृषि निर्यात सब्सिडियों को समाप्त करने का निर्णय लिया गया। विकसित देशों के लिए अधिकांश निर्यात सब्सिडियों की तत्काल समाप्ति और विकासशील देशों के लिए चरणबद्ध समय-सारिणी तय की गई।
यह बदलाव उस प्रकार की समस्या को संबोधित करता था जिसकी आलोचना KRRS जैसे संगठन पहले से कर रहे थे।
लेकिन प्रत्यक्ष निर्यात सब्सिडी ही पूरी कहानी नहीं
KRRS की व्यापक आपत्ति यह थी कि कृषि प्रतिस्पर्धा केवल प्रत्यक्ष निर्यात सब्सिडी से प्रभावित नहीं होती।
यदि घरेलू किसान को पर्याप्त आय सहायता मिलती है,
और उत्पादन ढांचा सार्वजनिक निवेश से मजबूत है,
तो उसकी निर्यात क्षमता स्वयं अधिक हो सकती है।
इसलिए किसान आंदोलनों के लिए प्रश्न था—
कुल सरकारी सहायता कितनी है और उससे बाजार मूल्य पर क्या प्रभाव पड़ता है?
सिर्फ सब्सिडी का कानूनी नाम पर्याप्त नहीं।
कृषि के तीन WTO स्तंभ और KRRS की प्रतिक्रिया
WTO कृषि समझौते के तीन मूल स्तंभों को KRRS की दृष्टि से इस प्रकार समझा जा सकता है।
बाजार पहुंच — भारतीय बाजार कितना खुलेगा?
घरेलू सहायता — भारत अपने किसान को कितना और किस प्रकार सहायता दे सकेगा?
निर्यात प्रतिस्पर्धा — विकसित देशों का समर्थित कृषि उत्पादन वैश्विक बाजार को कितना प्रभावित करेगा?
WTO के लिए ये व्यापार सुधार के औजार थे।
KRRS के लिए यही किसान की आर्थिक सुरक्षा के प्रश्न थे।
इसलिए संगठन अंतरराष्ट्रीय व्यापार की तकनीकी शब्दावली को ग्रामीण राजनीतिक भाषा में बदल रहा था।
भारतीय किसान के लिए आयात का भय
1990 के दशक में वैश्वीकरण-विरोधी किसान आंदोलनों ने कई संभावित उदाहरण सामने रखे—
और अन्य कृषि वस्तुओं में आयात का घरेलू किसानों पर दबाव।
कर्नाटक में नारियल, सुपारी, कपास और अन्य बाजारोन्मुख फसल उत्पादकों को अंतरराष्ट्रीय कीमतों की अस्थिरता का अनुभव था।
इसलिए वैश्विक व्यापार उनके लिए काल्पनिक समस्या नहीं था।
यदि विश्व बाजार में कीमत गिरती है, उसका असर गांव तक पहुंच सकता है।
आयात प्रतिबंध और दूसरा पक्ष
लेकिन यहां संतुलित आर्थिक विश्लेषण आवश्यक है।
अत्यधिक आयात संरक्षण के भी नुकसान हो सकते हैं।
घरेलू उद्योग प्रतिस्पर्धाहीन रह सकता है।
कृषि प्रसंस्करण उद्योग को कच्चा माल महंगा मिल सकता है।
और निर्यात करने वाले दूसरे देश भारत के खिलाफ जवाबी कदम उठा सकते हैं।
इसलिए प्रश्न “आयात बंद करो” बनाम “पूरा बाजार खोलो” जितना सरल नहीं।
KRRS का ऐतिहासिक योगदान इस बहस में किसान की सौदेबाजी शक्ति को केंद्रीय बनाना था।
निर्यात स्वतंत्रता का प्रश्न
किसान आंदोलन केवल आयात का विरोध नहीं करता।
जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत अधिक हो तो भारतीय किसान को निर्यात का पूरा लाभ क्यों न मिले?
सरकार घरेलू महंगाई नियंत्रित करने के लिए कई बार निर्यात प्रतिबंध लगा सकती है।
उपभोक्ता के लिए यह उपयोगी हो सकता है।
लेकिन किसान के लिए इससे अधिक मूल्य का अवसर समाप्त हो जाता है।
इसलिए कृषि व्यापार नीति में किसान एक दोहरे जोखिम का अनुभव कर सकता है—
कम अंतरराष्ट्रीय मूल्य पर आयात से दबाव, और ऊंचे अंतरराष्ट्रीय मूल्य पर निर्यात प्रतिबंध।
KRRS और शरद जोशी : निर्णायक वैचारिक विभाजन
यहीं कर्नाटक राज्य रैयत संघ और महाराष्ट्र के शरद जोशी के शेतकरी संगठन के बीच महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है।
दोनों ने 1980 के दशक में किसान को बेहतर कृषि मूल्य दिलाने के लिए संघर्ष किया।
दोनों ने सरकारी मूल्य नियंत्रण की आलोचना की।
दो किसान स्वतंत्रताएं
पहली अवधारणा market freedom—बाजार स्वतंत्रता पर जोर देती थी।
KRRS और वैश्विक किसान एकजुटता — La Via Campesina, People’s Global Action, 1999 की Intercontinental Caravan, सिएटल WTO विरोध और ‘खाद्य संप्रभुता’ के अंतरराष्ट्रीय आंदोलन में कर्नाटक के किसानों की भूमिका
प्रस्तावना : कर्नाटक के गांव से वैश्विक किसान मंच तक
कर्नाटक राज्य रैयत संघ की सबसे असाधारण विशेषताओं में एक यह थी कि उसने अपेक्षाकृत कम समय में स्थानीय कृषि प्रश्नों और वैश्विक आर्थिक राजनीति के बीच संबंध स्थापित कर लिया। 1980 में नरगुंड और नवलगुंड के किसान सिंचाई शुल्क, बेहतरमेंट लेवी, कर्ज और कपास के गिरते मूल्य के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे। 1990 के दशक के मध्य तक उसी आंदोलन के प्रतिनिधि यूरोप, लैटिन अमेरिका, एशिया और अफ्रीका के किसान आंदोलनों से संवाद कर रहे थे और WTO, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, बीज पेटेंट तथा मुक्त व्यापार के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय अभियानों में भाग लेने लगे थे।
इस परिवर्तन के केंद्र में प्रो. एम. डी. नंजुंडास्वामी और KRRS की यह समझ थी कि कृषि संकट की कई शक्तियां राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर नहीं रहतीं।
कृषि वस्तुओं की कीमत विश्व बाजार से प्रभावित हो सकती है।
बौद्धिक संपदा कानून अंतरराष्ट्रीय समझौतों से बन सकते हैं।
और कृषि व्यापार के नियम जिनेवा में तय हो सकते हैं।
ऐसी स्थिति में केवल राष्ट्रीय स्तर का किसान संगठन पर्याप्त नहीं था।
यदि पूंजी और व्यापार वैश्विक हैं तो किसान एकजुटता भी वैश्विक होनी चाहिए।
इसी सोच ने उसे La Via Campesina, People’s Global Action, 1999 की Intercontinental Caravan for Solidarity and Resistance, और व्यापक WTO-विरोधी अंतरराष्ट्रीय राजनीति से जोड़ा। KRRS 1996 में La Via Campesina से जुड़ा और 1990 के दशक के उत्तरार्ध में वैश्विक मुक्त व्यापार-विरोधी नेटवर्कों के महत्वपूर्ण एशियाई किसान संगठनों में शामिल हो गया।
1990 के दशक की नई वैश्विक किसान राजनीति
1990 के दशक की शुरुआत में विश्व कृषि एक महत्वपूर्ण परिवर्तन से गुजर रही थी।
सोवियत संघ के विघटन के बाद मुक्त बाजार आधारित आर्थिक मॉडल का प्रभाव बढ़ा।
उरुग्वे दौर की GATT वार्ताएं अंतिम चरण में थीं।
विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष अनेक विकासशील देशों में संरचनात्मक आर्थिक सुधारों का समर्थन कर रहे थे।
कृषि व्यापार और बौद्धिक संपदा को अधिक स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय नियमों में लाया जा रहा था।
इसी दौर में दुनिया के विभिन्न हिस्सों के किसान संगठनों ने महसूस किया कि स्थानीय कृषि संघर्षों के पीछे कई समान समस्याएं हैं—
और छोटे उत्पादकों की कमजोर सौदेबाजी शक्ति।
इन्हीं परिस्थितियों में अंतरराष्ट्रीय किसान आंदोलन के नए नेटवर्क विकसित हुए।
La Via Campesina का उदय
La Via Campesina का औपचारिक गठन अप्रैल 1993 में हुआ।
यह केवल किसान संगठनों की एक और अंतरराष्ट्रीय संस्था नहीं थी।
को एक साझा राजनीतिक मंच पर जोड़ने का प्रयास कर रही थी।
उसकी स्थापना ऐसे समय हुई जब GATT का उरुग्वे दौर अंतिम चरण में था और कृषि को विश्व व्यापार के नए नियमों में अधिक गहराई से शामिल किया जा रहा था।
La Via Campesina का दावा था कि किसानों को वैश्विक कृषि नीति के विषय के रूप में नहीं, बल्कि निर्णय प्रक्रिया के राजनीतिक पक्षकार के रूप में देखा जाना चाहिए।
यह विचार KRRS की अपनी राजनीति से स्वाभाविक रूप से मेल खाता था।
KRRS और La Via Campesina का वैचारिक मेल
KRRS और La Via Campesina के बीच समानता केवल WTO-विरोध में नहीं थी।
दोनों की राजनीति में कुछ मूलभूत साझा तत्व थे—
और खाद्य प्रणाली में किसान की केंद्रीय भूमिका।
KRRS के अपने इतिहास संबंधी विवरण के अनुसार संगठन 1996 में La Via Campesina का सदस्य बना।
यही वर्ष वैश्विक किसान राजनीति में एक और निर्णायक घटना का था—
खाद्य-संप्रभुता—खाद्य संप्रभुता की अवधारणा का अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक उदय।
1996 : खाद्य संप्रभुता का उदय
अप्रैल 1996 में मेक्सिको के Tlaxcala में La Via Campesina के दूसरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में आंदोलन के उद्देश्यों को अधिक स्पष्ट वैश्विक मंच पर ले जाने का निर्णय हुआ।
उसी वर्ष नवंबर में रोम में संयुक्त राष्ट्र के World Food Summit के दौरान La Via Campesina ने खाद्य-संप्रभुता की अवधारणा को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रमुख रूप से प्रस्तुत किया।
उस समय इसकी मूल धारणा थी कि प्रत्येक देश और समाज को अपनी बुनियादी खाद्य उत्पादन क्षमता और कृषि व्यवस्था विकसित करने का अधिकार होना चाहिए, अपनी सांस्कृतिक तथा उत्पादक विविधता का सम्मान करते हुए।
यह अवधारणा आगे KRRS की कृषि राजनीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बनी।
खाद्य सुरक्षा से अलग खाद्य संप्रभुता
Food Security—खाद्य सुरक्षा और खाद्य-संप्रभुता—खाद्य संप्रभुता को समान मानना गलत होगा।
क्या प्रत्येक व्यक्ति को पर्याप्त और पौष्टिक भोजन उपलब्ध है?
और इन निर्णयों पर नियंत्रण किसका है?
FAO से जुड़े साहित्य में भी खाद्य संप्रभुता को लोगों द्वारा अपनी खाद्य और कृषि व्यवस्था स्वयं परिभाषित करने के अधिकार से जोड़ा गया है।
KRRS के लिए यह अवधारणा उसकी पहले से विकसित किसान स्वायत्तता की राजनीति का स्वाभाविक विस्तार थी।
यदि भोजन पर्याप्त है तो उत्पादन कहां हुआ, इससे फर्क क्यों?
यहीं मुक्त व्यापार और खाद्य संप्रभुता के बीच बुनियादी अंतर पैदा होता है।
मुक्त व्यापार का आर्थिक तर्क कह सकता है—
जहां भोजन सबसे सस्ता पैदा हो, वहां से खरीदो।
यदि पूरा समाज आयात पर निर्भर हो जाए और स्थानीय किसान खेती छोड़ दें तो दीर्घकाल में क्या होगा?
और संकट के समय राष्ट्रीय खाद्य क्षमता?
KRRS दूसरे प्रकार के प्रश्नों पर अधिक जोर देता था।
किसान केवल उत्पादक नहीं, राजनीतिक नागरिक
La Via Campesina की 1996 की घोषणा में किसानों और छोटे उत्पादकों की कृषि नीति बनाने में प्रत्यक्ष भागीदारी की मांग भी महत्वपूर्ण थी।
उसका तर्क था कि कृषि नीति केवल सरकार, व्यापार विशेषज्ञ और कंपनियां तय नहीं कर सकते।
जो लोग भोजन पैदा करते हैं, उन्हें भी निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक आवाज मिलनी चाहिए।
यह विचार KRRS के पुराने सिद्धांत से मेल खाता था—
किसान को अपने बारे में बनने वाली नीति का निष्क्रिय प्राप्तकर्ता नहीं होना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय किसान एकजुटता क्यों आवश्यक थी?
KRRS के लिए वैश्विक गठबंधन का तर्क सीधा था।
यदि Cargill अनेक देशों में काम करती है,
Monsanto अनेक देशों में बीज और तकनीक बेचती है,
और WTO सभी सदस्य देशों को प्रभावित करने वाले नियम बनाता है,
तो केवल कर्नाटक में विरोध पर्याप्त नहीं।
के किसान कई मामलों में एक ही कॉरपोरेट और व्यापारिक संरचनाओं से प्रभावित हो सकते हैं।
इसलिए उनका संयुक्त प्रतिरोध संभव है।
किसान अंतरराष्ट्रीयवाद बनाम राष्ट्रवाद
यहां KRRS की राजनीति का एक महत्वपूर्ण विकास दिखाई देता है।
कारगिल विरोध की शुरुआती भाषा में विदेशी कंपनी बनाम भारतीय किसान का राष्ट्रवादी तत्व मजबूत था।
लेकिन अंतरराष्ट्रीय किसान संबंध बढ़ने के साथ एक अधिक जटिल समझ विकसित हुई—
फ्रांस का छोटा किसान भारतीय किसान का शत्रु नहीं।
ब्राजील का भूमिहीन किसान उसका सहयोगी हो सकता है।
इंडोनेशिया का बीज आंदोलन भी वही प्रश्न उठा सकता है।
छोटा उत्पादक बनाम केंद्रीकृत कॉरपोरेट कृषि व्यवस्था
यह KRRS की वैश्विक राजनीति का महत्वपूर्ण वैचारिक परिवर्तन था।
1998 : Monsanto के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय अभियान
1998 में KRRS ने Operation Cremate Monsanto अभियान शुरू किया।
कर्नाटक में Monsanto से जुड़े GM कपास परीक्षणों के खिलाफ कार्यकर्ताओं ने खेतों में जाकर फसल नष्ट की।
इस अभियान की विशेषता यह थी कि इसे केवल भारतीय कार्यक्रम नहीं रहने दिया गया।
फ्रांस और इंडोनेशिया सहित दूसरे देशों के किसान आंदोलनों ने भी ऐसी कार्रवाइयों के साथ एकजुटता दिखाई।
इससे एक नया नारा राजनीतिक व्यवहार में बदल रहा था—
एक कंपनी अनेक देशों में है; उसके विरुद्ध प्रतिरोध भी अनेक देशों में होगा।
People’s Global Action की पृष्ठभूमि
1990 के दशक के उत्तरार्ध में वैश्वीकरण-विरोधी विभिन्न जमीनी आंदोलनों ने एक अधिक व्यापक नेटवर्क बनाने का प्रयास शुरू किया।
अगस्त 1997 में स्पेन में हुई बैठकों में भारत के KRRS, फिलीपींस के किसान आंदोलन, ब्राजील के MST, इंडोनेशिया के किसान संगठनों और अन्य आंदोलनों के प्रतिनिधियों ने वैश्विक मुक्त व्यापार-विरोधी समन्वय पर चर्चा की।
इसी प्रक्रिया से आगे People’s Global Action against ‘Free’ Trade and the WTO—PGA बना।
फरवरी 1998 : जिनेवा में PGA का गठन
23–25/26 फरवरी 1998 को विभिन्न महाद्वीपों के जमीनी आंदोलनों ने जिनेवा में मिलकर People’s Global Action की स्थापना की।
PGA स्वयं को केंद्रीकृत संगठन के बजाय वैश्विक समन्वय और संवाद का माध्यम मानता था।
इस नेटवर्क में शामिल प्रारंभिक आंदोलनों में भारत का KRRS, ब्राजील का Movimento Sem Terra, फिलीपींस का किसान आंदोलन, नाइजीरिया का Ogoni आंदोलन और अन्य जमीनी संगठन शामिल थे।
यह KRRS की वैश्विक भूमिका की बड़ी उपलब्धि थी।
कर्नाटक का किसान संगठन अब केवल किसी अंतरराष्ट्रीय मंच का सहभागी नहीं, बल्कि नए अंतरराष्ट्रीय प्रतिरोध नेटवर्क के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा रहा था।
PGA एक संगठन क्यों नहीं बनना चाहता था?
People’s Global Action का ढांचा जानबूझकर विकेंद्रीकृत रखा गया।
और स्थानीय आंदोलनों को स्वायत्त रहते हुए वैश्विक कार्रवाई से जोड़ना।
यह संरचना KRRS की अपनी गैर-दलीय और विकेंद्रीकृत आंदोलन संस्कृति के बहुत अनुकूल थी।
‘मुक्त व्यापार’ के विरुद्ध ‘People’s Global Action’
PGA का नाम स्वयं उसकी राजनीति बताता था।
उसका तर्क था कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था बाजार और कॉरपोरेट शक्ति को अंतरराष्ट्रीय बनाती है।
तो जन आंदोलनों को भी अपनी कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय करनी चाहिए।
इस विचार को बाद में 1999 की Intercontinental Caravan ने सबसे दृश्य रूप दिया।
मई 1998 : WTO की दूसरी मंत्रीस्तरीय बैठक और प्रतिरोध
मई 1998 में जिनेवा में WTO की दूसरी मंत्रीस्तरीय बैठक हुई।
साथ ही GATT बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था की पचासवीं वर्षगांठ भी मनाई जा रही थी।
PGA ने इसके विरोध में वैश्विक कार्रवाइयों का आह्वान किया।
भारत में भी WTO-विरोधी लामबंदी हुई।
मई 1998 में हैदराबाद में विभिन्न किसान, मजदूर, आदिवासी और अन्य संगठनों ने एक बड़े सम्मेलन और रैली में भाग लिया। इस संयुक्त अभियान में KRRS और भारतीय किसान यूनियन सहित अनेक संगठन जुड़े थे।
इससे स्पष्ट होता है कि KRRS अंतरराष्ट्रीय विरोध के साथ भारतीय संयुक्त किसान-सामाजिक मंचों पर भी सक्रिय था।
स्थानीय संघर्षों का वैश्विक समन्वय
PGA की बड़ी वैचारिक उपलब्धि यह थी कि उसने कहा—
हर देश का आंदोलन समान मुद्दे पर ही लड़ना जरूरी नहीं।
ब्राजील में भूमि का प्रश्न प्रमुख हो सकता है।
नाइजीरिया में तेल और आदिवासी अधिकार।
लेकिन यदि इन सभी संघर्षों के पीछे आर्थिक केंद्रीकरण और स्थानीय समुदायों के अधिकार का प्रश्न है, तो वे एक-दूसरे से सीख सकते हैं।
इस दृष्टि से “वैश्विक आंदोलन” का अर्थ एक ही मांग नहीं, बल्कि विविध संघर्षों की एकजुटता था।
Intercontinental Caravan की कल्पना
1998 में वैश्विक आंदोलन के भीतर एक अत्यंत महत्वाकांक्षी योजना सामने आई—
वैश्विक दक्षिण के किसान और सामाजिक आंदोलन यूरोप जाएंगे।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुख्यालयों,
के सामने प्रत्यक्ष प्रदर्शन करेंगे।
Intercontinental Caravan for Solidarity and Resistance।
इसे तैयार करने में KRRS और अन्य भारतीय जमीनी आंदोलनों की केंद्रीय भूमिका थी।
1999 की यात्रा : लगभग 400 भारतीय प्रतिभागी
स्रोतों में कुल संख्या में थोड़ा अंतर मिलता है। PGA के समकालीन दस्तावेज लगभग 450 दक्षिणी और पूर्वी आंदोलनों के प्रतिनिधियों का उल्लेख करते हैं, जबकि KRRS संबंधी विवरण लगभग 400 भारतीय किसानों और अन्य देशों के लगभग 50 प्रतिनिधियों की संरचना बताते हैं।
इसलिए सुरक्षित निष्कर्ष यह है कि लगभग 450 लोगों का कारवां था, जिसमें बहुमत भारत से था और KRRS के किसान इसकी सबसे बड़ी किसान टुकड़ियों में थे।
यह अपने समय के लिए असाधारण संगठनात्मक उपलब्धि थी।
कौन-कौन शामिल था?
कारवां केवल KRRS का प्रतिनिधिमंडल नहीं था।
नेपाल और अन्य देशों के सामाजिक आंदोलन—
इस विविधता ने यात्रा को केवल किसान दौरा नहीं, वैश्विक दक्षिण के जन आंदोलनों की राजनीतिक यात्रा बना दिया।
नारा : “हमारा प्रतिरोध भी पूंजी जितना अंतरराष्ट्रीय”
कारवां की राजनीति का सार उसके एक लोकप्रिय नारे में व्यक्त हुआ—
“Our resistance is as transnational as capital.”
अर्थात यदि पूंजी सीमाएं पार करती है तो प्रतिरोध भी सीमाएं पार करेगा।
KRRS के अंतरराष्ट्रीय अभियान का यही सबसे स्पष्ट सिद्धांत था।
यह नारा किसान आंदोलन की कल्पना को गांव और राष्ट्र से आगे ले जाता था।
यूरोप में एक महीने का अभियान
कारवां लगभग एक महीने तक यूरोप के विभिन्न हिस्सों में घूमता रहा।
PGA के समकालीन दस्तावेज के अनुसार प्रतिभागियों को लगभग दस देशों के सामाजिक और जमीनी संगठनों ने आमंत्रित किया।
यात्रा का समापन जून 1999 में जर्मनी के कोलोन में G8 शिखर सम्मेलन के आसपास हुए विरोधों में हुआ।
लंदन से समकालीन रिपोर्टों में भी भारतीय किसानों को मुक्त बाजार व्यवस्था के विरुद्ध प्रदर्शन करते हुए दर्ज किया गया।
यह भारतीय किसान आंदोलन के इतिहास की बिल्कुल अलग तस्वीर थी—
केवल भाषण नहीं, प्रत्यक्ष कार्रवाई
इसमें प्रत्यक्ष कार्रवाइयां भी हुईं।
प्राकृतिक खेती, कृषि-पारिस्थितिकी और अमृता भूमि — हरित क्रांति की आलोचना से कम बाहरी लागत वाली खेती, देशी बीज, शून्य बजट प्राकृतिक खेती, किसान प्रशिक्षण और खाद्य संप्रभुता के वैकल्पिक कृषि मॉडल तक
प्रस्तावना : प्रतिरोध के बाद विकल्प का प्रश्न
किसी भी आंदोलन की दीर्घकालीन विश्वसनीयता केवल इस पर निर्भर नहीं करती कि वह किसका विरोध करता है; उससे भी महत्वपूर्ण यह है कि वह किस विकल्प की कल्पना करता है। कर्नाटक राज्य रैयत संघ के सामने भी यही चुनौती 1990 के दशक के उत्तरार्ध और 2000 के दशक में अधिक स्पष्ट होकर सामने आई।
KRRS ने पहले बिजली, सिंचाई, कर्ज और कृषि मूल्य के सवाल उठाए। फिर उसने कारगिल, Monsanto, GATT, WTO, पेटेंट और कॉरपोरेट बीज व्यवस्था का विरोध किया। लेकिन यदि रासायनिक, उच्च-बाहरी-इनपुट और कॉरपोरेट नियंत्रित कृषि मॉडल पर आपत्ति थी, तो उसके स्थान पर किसान क्या करे?
यहीं से संगठन की राजनीति का एक नया चरण शुरू हुआ—
देशी बीज, कम बाहरी लागत, जैविक व प्राकृतिक खेती, कृषि-पारिस्थितिकी, किसान-से-किसान ज्ञान और खाद्य संप्रभुता।
इस वैकल्पिक कृषि दृष्टि का सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत रूप बना अमृता भूमि—एक किसान-नेतृत्व वाला कृषि-पारिस्थितिकी प्रशिक्षण और अनुसंधान केंद्र, जो KRRS तथा प्रो. एम. डी. नंजुंडास्वामी की वैचारिक विरासत से जुड़ा है। अमृता भूमि स्वयं अपने मिशन को किसान स्वायत्तता, कृषि-पारिस्थितिकी, देशी बीज और खाद्य संप्रभुता से जोड़ती है।
हरित क्रांति पर KRRS की आलोचना
हरित क्रांति ने भारत में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने में ऐतिहासिक योगदान दिया। उच्च उत्पादक किस्मों, सिंचाई, उर्वरक, कीटनाशक और कृषि अनुसंधान ने अनेक क्षेत्रों में उपज बढ़ाई और खाद्य सुरक्षा मजबूत की।
लेकिन KRRS की आलोचना का केंद्र उत्पादन वृद्धि नहीं था।
इस उत्पादन वृद्धि की आर्थिक और पारिस्थितिक कीमत क्या है?
बिजली और पानी पर अधिक खर्च करना पड़े,
तो अधिक उत्पादन के बावजूद उसकी वास्तविक आर्थिक स्वतंत्रता घट सकती है।
यहीं से KRRS ने कृषि उत्पादकता की जगह कृषि स्वायत्तता को अधिक महत्वपूर्ण मानना शुरू किया।
उच्च बाहरी निवेश वाली कृषि
आधुनिक कृषि के उस मॉडल को जिसमें बड़ी मात्रा में बाहरी खरीदे गए इनपुट लगते हैं, अक्सर high external input agriculture कहा जाता है।
इसमें किसान की खेती निर्भर हो सकती है—
यदि इनमें से किसी इनपुट का मूल्य बढ़े, किसान की लागत बढ़ती है।
यदि फसल मूल्य उसी अनुपात में न बढ़े, लाभ घटता है।
यदि फसल विफल हो जाए, तो खर्च का बड़ा हिस्सा ऋण में बदल सकता है।
KRRS ने इस निर्भरता को केवल कृषि अर्थशास्त्र नहीं, किसान स्वतंत्रता का प्रश्न माना।
लागत घटाना : प्राकृतिक खेती का पहला आर्थिक तर्क
प्राकृतिक और कम बाहरी इनपुट वाली खेती की ओर आकर्षण का एक मुख्य कारण लागत था।
स्थानीय जीवामृत अथवा अन्य जैविक घोल बनाए,
और रासायनिक कीटनाशक पर निर्भरता घटाए,
तो बाजार से खरीदे जाने वाले इनपुट का खर्च कम हो सकता है।
इस दृष्टि में प्राकृतिक खेती पहले एक ऋण और लागत नियंत्रण रणनीति है, पर्यावरणीय विचार बाद में जुड़ता है।
इसी कारण यह KRRS की पुरानी आर्थिक राजनीति से सीधा जुड़ती है।
हरित क्रांति की दूसरी आलोचना : मिट्टी
KRRS और उससे जुड़े वैकल्पिक कृषि आंदोलनों की दूसरी चिंता मिट्टी की दीर्घकालीन गुणवत्ता थी।
रासायनिक उर्वरकों का संतुलित और वैज्ञानिक उपयोग अपने आप में मिट्टी के लिए विनाशकारी नहीं है; समस्या तब होती है जब पोषण असंतुलित हो, जैविक पदार्थ घटें और फसल प्रणाली अत्यधिक एकरूप हो जाए।
प्राकृतिक खेती समर्थकों का तर्क था कि मिट्टी को केवल NPK पोषक तत्वों का माध्यम न माना जाए।
मिट्टी एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र है—
कृषि-पारिस्थितिकी इसी व्यापक दृष्टि पर बल देती है।
कीटनाशक और स्वास्थ्य
व्यावसायिक कपास और अन्य नकदी फसलों में कीटनाशकों का भारी उपयोग किसान की लागत बढ़ा सकता है।
इसके साथ श्रमिक और किसान स्वास्थ्य का जोखिम भी जुड़ता है।
KRRS की बाद की पर्यावरणीय राजनीति ने कृषि रसायनों पर निर्भरता को आर्थिक और स्वास्थ्य दोनों दृष्टियों से चुनौती दी।
यहां फिर ध्यान देना आवश्यक है कि सभी कृषि रसायन समान जोखिम वाले नहीं होते; वैज्ञानिक जोखिम उपयोग की मात्रा, पदार्थ और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। आंदोलन की व्यापक आलोचना को इसी संतुलित दृष्टि से समझना चाहिए।
एकल फसल बनाम विविध खेती
उच्च व्यावसायिक कृषि अक्सर एक या कुछ फसलों पर अधिक निर्भर हो सकती है।
जैसी एकल फसल यदि बाजार या रोग संकट में आए तो किसान की पूरी आय प्रभावित हो सकती है।
कृषि-पारिस्थितिकी का तर्क है कि फसल विविधता—
और परिवार की खाद्य जरूरतें पूरी कर सकती है।
KRRS के खाद्य संप्रभुता विचार में इसलिए विविध खेती का महत्व बढ़ा।
देशी बीज का आर्थिक महत्व
देशी बीज की राजनीति केवल सांस्कृतिक संरक्षण नहीं थी।
यदि किसान स्वयं बीज बचा सकता है, तो हर साल बीज खरीदने का खर्च घट सकता है।
इसके अतिरिक्त स्थानीय किस्में कई बार—
लेकिन यह भी सत्य है कि देशी किस्म हमेशा आधुनिक किस्म से अधिक उत्पादक नहीं होती।
इसलिए वैकल्पिक कृषि की सबसे मजबूत दृष्टि देशी बीज को एक विकल्प और संसाधन के रूप में संरक्षित करना है, न कि हर परिस्थिति में वैज्ञानिक रूप से श्रेष्ठ घोषित करना।
कृषि-पारिस्थितिकी क्या है?
कृषि-पारिस्थितिकी—कृषि-पारिस्थितिकी केवल जैविक खेती का दूसरा नाम नहीं है।
यह कृषि को पारिस्थितिक तंत्र के रूप में देखती है।
La Via Campesina ने कृषि-पारिस्थितिकी को खाद्य संप्रभुता की महत्वपूर्ण रणनीति के रूप में विकसित किया, और KRRS जैसे सदस्य संगठनों ने इसे स्थानीय कार्यक्रमों में अपनाया।
कृषि-पारिस्थितिकी केवल तकनीक नहीं
KRRS की दृष्टि में कृषि-पारिस्थितिकी का अर्थ केवल खेती की तकनीक बदलना नहीं था।
यदि किसान जैविक खेती करे लेकिन बीज, बाजार और मूल्य पर उसका कोई नियंत्रण न हो, तो स्वायत्तता अधूरी रहेगी।
इसलिए कृषि-पारिस्थितिकी को जोड़ा गया—
यही इसे साधारण organic farming से अलग राजनीतिक अर्थ देता है।
जैविक खेती और प्राकृतिक खेती में अंतर
दोनों शब्द अक्सर एक-दूसरे के स्थान पर इस्तेमाल किए जाते हैं, लेकिन वे समान नहीं हैं।
जैविक खेती में प्रमाणित जैविक इनपुट खरीदे जा सकते हैं।
प्राकृतिक खेती का जोर अक्सर खेत के भीतर या स्थानीय संसाधनों से इनपुट तैयार करने पर होता है।
इसलिए प्राकृतिक खेती समर्थकों का विशेष तर्क है—
KRRS के किसान स्वायत्तता विमर्श के लिए यही पहलू विशेष आकर्षक था।
शून्य बजट प्राकृतिक खेती का उदय
कर्नाटक में Zero Budget प्राकृतिक खेती—शून्य बजट प्राकृतिक खेती की धारणा विशेष रूप से सुभाष पालेकर से जुड़ी।
उनका मॉडल जीवामृत, बीजामृत, आच्छादन और मिट्टी में वायु-नमी संतुलन जैसी अवधारणाओं पर आधारित था।
“शून्य बजट” का उद्देश्य शाब्दिक रूप से यह नहीं कि खेती का कोई खर्च बिल्कुल न हो।
राजनीतिक और आर्थिक संदेश यह था कि किसान बाहरी खरीदे गए इनपुट पर निर्भरता बहुत कम कर सकता है।
यह विचार कर्नाटक के विभिन्न किसान और वैकल्पिक कृषि नेटवर्कों में तेजी से लोकप्रिय हुआ।
KRRS और ZBNF का संबंध
KRRS और शून्य बजट प्राकृतिक खेती को पूरी तरह एक ही आंदोलन मानना उचित नहीं है।
दोनों की अपनी स्वतंत्र सांगठनिक और वैचारिक यात्राएं थीं।
KRRS के खाद्य संप्रभुता तथा कृषि-पारिस्थितिकी नेटवर्क और कर्नाटक में प्राकृतिक खेती की व्यापक धारा कई स्तरों पर एक-दूसरे से जुड़ीं।
प्राकृतिक खेती का सबसे मजबूत आर्थिक तर्क
मान लें पारंपरिक रासायनिक खेती में किसान की प्रति एकड़ लागत बहुत अधिक है।
यदि प्राकृतिक पद्धति से उपज शुरुआती वर्षों में थोड़ी कम भी हो जाए, लेकिन नकद लागत उससे अधिक अनुपात में घट जाए, तो शुद्ध आय बेहतर हो सकती है।
इसलिए केवल प्रति एकड़ उपज देखकर दोनों प्रणालियों की तुलना अधूरी है।
KRRS की लागत राजनीति स्वाभाविक रूप से इसी शुद्ध आय दृष्टि से जुड़ती है।
क्या प्राकृतिक खेती हमेशा अधिक लाभकारी है?
ऐसा सार्वभौमिक निष्कर्ष सुरक्षित नहीं है।
कुछ परिस्थितियों में उपज घट सकती है।
कुछ में लागत बचत नुकसान की भरपाई कर सकती है।
इसलिए प्राकृतिक खेती का वैज्ञानिक मूल्यांकन फसल और क्षेत्र-विशिष्ट होना चाहिए।
KRRS की वैकल्पिक दृष्टि का मूल्य इस प्रयोग को बढ़ावा देने में है, न कि हर परिस्थिति में एक ही परिणाम का दावा करने में।
अमृता भूमि की स्थापना
KRRS की वैकल्पिक कृषि राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत केंद्र बना अमृता भूमि।
यह चामराजनगर जिले में स्थित किसान प्रशिक्षण, कृषि-पारिस्थितिकी और खाद्य संप्रभुता से जुड़ा केंद्र है।
यह प्रो. एम. डी. नंजुंडास्वामी की विरासत से गहराई से जुड़ा है और KRRS के व्यापक आंदोलन का रचनात्मक पक्ष प्रस्तुत करता है।
अमृता भूमि स्वयं को किसान कृषि-पारिस्थितिकी school और किसान-नेतृत्व वाले कृषि-पारिस्थितिकी केंद्र के रूप में प्रस्तुत करती है।
आंदोलन से विद्यालय तक
यह परिवर्तन प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण है।
1980 में किसान तहसील कार्यालय घेर रहा था।
अब वही आंदोलन खेत को सीखने का स्थान बना रहा था।
अमृता भूमि का विचार था कि किसान केवल आंदोलनकारी नहीं—
शोधकर्ता, प्रशिक्षक और ज्ञान निर्माता भी है।
यह KRRS की सबसे परिपक्व वैचारिक अवस्थाओं में से एक थी।
किसान-से-किसान ज्ञान
औपचारिक कृषि विस्तार मॉडल में ज्ञान अक्सर ऊपर से नीचे आता है—
कृषि-पारिस्थितिकी में एक वैकल्पिक मॉडल उभरा—
किसान-to-किसान learning—किसान से किसान सीखना।
स्थानीय अनुभव के आधार पर पद्धति बदलती है।
यह ज्ञान मॉडल KRRS की लोकतांत्रिक कृषि दृष्टि के अनुकूल था।
वैज्ञानिक ज्ञान और किसान ज्ञान का संबंध
यह जरूरी नहीं कि किसान ज्ञान और वैज्ञानिक ज्ञान परस्पर विरोधी हों।
वैज्ञानिक अनुसंधान नियंत्रित प्रयोग, मापन और व्यापक तुलना देता है।
सबसे मजबूत कृषि प्रणाली दोनों को जोड़ सकती है।
अमृता भूमि जैसे प्रशिक्षण केंद्रों का संभावित महत्व इसी संवाद में है।
अमृता भूमि और देशी बीज
अमृता भूमि की गतिविधियों में देशी बीज संरक्षण और जैव-विविधता महत्वपूर्ण रही है।
विभिन्न स्थानीय फसलों और किस्मों का संरक्षण किसान की बीज स्वतंत्रता के विचार से जुड़ा है।
इससे बीज सत्याग्रह का नारा व्यावहारिक कार्यक्रम में बदलता है—
बीज बैंक क्यों महत्वपूर्ण?
सामुदायिक बीज बैंक कई काम कर सकते हैं—
लेकिन उन्हें लगातार सक्रिय खेती और पुनरुत्पादन की आवश्यकता होती है।
बीज केवल संग्रहालय में रख देने से जीवित कृषि संसाधन नहीं रहता।
इसलिए संरक्षण और खेती एक-दूसरे से जुड़े हैं।
रागी और मोटे अनाज की वापसी
कर्नाटक की पारंपरिक कृषि में रागी, ज्वार, बाजरा और विभिन्न दालों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है।
हरित क्रांति और बाजारोन्मुख खेती के दौर में कुछ क्षेत्रों में इनका महत्व कम हुआ।
खाद्य संप्रभुता और कृषि-पारिस्थितिकी आंदोलनों ने इन फसलों की पुनर्खोज की।
इसलिए मिलेट पुनरुत्थान को भी KRRS की व्यापक वैकल्पिक कृषि दृष्टि से जोड़ा जा सकता है।
जलवायु परिवर्तन और पुरानी बहस की नई प्रासंगिकता
ऐसी परिस्थिति में फसल विविधता और कम पानी वाली स्थानीय फसलें नई प्रासंगिकता प्राप्त करती हैं।
जिसे 1990 के दशक में KRRS मुख्यतः किसान स्वायत्तता और जैव-विविधता के रूप में देख रहा था, वह 21वीं सदी में जलवायु अनुकूलन का प्रश्न भी बन गया।
मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ
कृषि-पारिस्थितिकी और प्राकृतिक खेती में मिट्टी के कार्बनिक पदार्थ को बढ़ाने पर जोर दिया जाता है।
मिट्टी की संरचना और जल धारण क्षमता सुधारने में मदद कर सकते हैं।
शुष्क कर्नाटक में यह विशेष महत्व रखता है।
यदि मिट्टी अधिक नमी रोक सके तो वर्षा-असमानता का कुछ जोखिम कम हो सकता है।
आच्छादन
प्राकृतिक खेती में मिट्टी को खुला न छोड़ने की अवधारणा महत्वपूर्ण है।
यह जल-संकट वाले क्षेत्रों में उपयोगी रणनीति हो सकती है।
लेकिन व्यवहारिक उपयोग फसल और स्थानीय परिस्थिति पर निर्भर करता है।
पशुधन की भूमिका
कम बाहरी लागत वाली कृषि में पशुधन को पुनः महत्वपूर्ण स्थान मिलता है।
स्थानीय पोषक चक्र का हिस्सा बन सकते हैं।
इससे रासायनिक इनपुट की आवश्यकता कुछ हद तक घट सकती है।
लेकिन छोटे किसानों के पास पर्याप्त पशुधन न हो तो यह मॉडल कठिन हो सकता है।
इसलिए प्राकृतिक खेती की व्यवहार्यता किसान की वास्तविक संसाधन स्थिति से जोड़कर देखनी चाहिए।
श्रम लागत का प्रश्न
प्राकृतिक और विविध खेती कई बार अधिक मानवीय श्रम मांग सकती है।
यदि परिवार श्रम उपलब्ध है तो किसान के लिए यह संभव हो सकता है।
लेकिन ग्रामीण मजदूरी अधिक हो और परिवार के सदस्य गैर-कृषि रोजगार में चले गए हों तो श्रम-प्रधान मॉडल महंगा पड़ सकता है।
इसलिए “बाहरी इनपुट कम” का अर्थ जरूरी नहीं कि “कुल लागत हमेशा कम” हो।
मजदूरी लागत का वास्तविक हिसाब आवश्यक है।
बाजार का प्रश्न
यदि किसान प्राकृतिक पद्धति से उत्पादन करता है लेकिन उसे सामान्य मंडी में वही भाव मिलता है, तो अतिरिक्त श्रम का लाभ नहीं मिल सकता।
इसलिए वैकल्पिक कृषि मॉडल में महत्वपूर्ण हैं।
KRRS की खाद्य संप्रभुता दृष्टि बाजार को भी स्थानीय और लोकतांत्रिक बनाने का प्रयास करती है।
महिलाओं, दलितों, भूमिहीनों और छोटे किसानों का प्रश्न — KRRS का सामाजिक आधार, ग्रामीण जाति–वर्ग संबंध, महिला नेतृत्व, खेतिहर मजदूरों से संबंध और ‘सभी किसानों की एकता’ की उपलब्धियां तथा सीमाएं
प्रस्तावना : ‘किसान’ एक है या कई?
कर्नाटक राज्य रैयत संघ की राजनीति का सबसे शक्तिशाली नारा था—किसान की एकता। लेकिन इतिहासलेखन का कठिन प्रश्न यह है कि “किसान” कोई एक समान सामाजिक श्रेणी नहीं है।
एक भूमिधर मध्यम किसान और भूमिहीन खेतिहर मजदूर की आर्थिक स्थिति अलग होती है।
एक सिंचित गन्ना उत्पादक और वर्षा-आधारित सीमांत किसान का जोखिम अलग होता है।
एक दलित खेत मजदूर और प्रभावशाली कृषक जाति के बड़े किसान की सामाजिक शक्ति समान नहीं होती।
महिला खेतिहर श्रमिक और भूमि के पुरुष स्वामी की कृषि भूमिका भी समान नहीं होती।
इसीलिए KRRS की उपलब्धियों का मूल्यांकन केवल यह देखकर नहीं किया जा सकता कि उसने कितने किसानों को सड़क पर उतारा। यह भी देखना होगा कि उसने ग्रामीण समाज की आंतरिक असमानताओं को कितना समझा, महिलाओं, छोटे किसानों, दलितों और भूमिहीनों को कितना प्रतिनिधित्व दिया और “रैयत” की व्यापक पहचान जाति तथा वर्ग की वास्तविकताओं से कैसे टकराई।
यही इस अध्याय का केंद्रीय प्रश्न है।
KRRS का प्रमुख सामाजिक आधार
KRRS का मुख्य सामाजिक आधार सामान्यतः भूमिधर छोटे और मध्यम किसान रहे।
के प्रश्नों से सीधे प्रभावित होते थे।
वे पूरी तरह भूमिहीन नहीं थे, इसलिए उनके पास कृषि उत्पादन और बाजार में बेचने योग्य उपज थी। लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति इतनी सुरक्षित भी नहीं थी कि लागत बढ़ने या फसल मूल्य गिरने का असर न पड़े।
इसलिए KRRS की मांगें इस वर्ग के अनुभव से गहराई से जुड़ी थीं।
बड़े किसान भी आंदोलन में क्यों जुड़े?
बड़े और व्यावसायिक किसान भी संगठन से जुड़े।
उनके लिए लाभकारी मूल्य, बिजली, सिंचाई और कृषि व्यापार अत्यंत महत्वपूर्ण थे।
यदि किसी किसान के पास अधिक गन्ना, कपास या दूसरी बाजारोन्मुख फसल है, तो मूल्य में थोड़ी वृद्धि भी उसकी कुल आय पर बड़ा प्रभाव डाल सकती है।
इससे संगठन में एक अंतर्विरोध पैदा हुआ—
जिस मांग से छोटे किसान को जीविका सुरक्षा मिलती है, उसी मांग से बड़े किसान को अपेक्षाकृत अधिक आर्थिक लाभ मिल सकता है।
यही कारण है कि नए किसान आंदोलनों को कई अध्येताओं ने “मध्यम और संपन्न किसानों” की राजनीति से जोड़कर देखा।
लेकिन KRRS का वास्तविक सामाजिक आधार इससे अधिक विविध था।
छोटे किसान की केंद्रीयता
छोटे किसान के लिए कृषि संकट अधिक तीखा हो सकता है।
इनमें से कोई भी घटना पूरे परिवार की अर्थव्यवस्था को संकट में डाल सकती है।
इसलिए KRRS का कर्ज, बिजली और लाभकारी मूल्य का एजेंडा छोटे किसानों में स्वाभाविक अपील रखता था।
यही संगठन की व्यापक जनाधार क्षमता का एक कारण था।
सीमांत किसान की अलग समस्या
सीमांत किसान के पास इतना कम भूमि क्षेत्र हो सकता है कि केवल फसल मूल्य बढ़ने से सम्मानजनक आय संभव न हो।
यदि एक किसान केवल एक या दो एकड़ पर खेती करता है, तो प्रति क्विंटल बेहतर मूल्य उपयोगी है, लेकिन उसकी कुल वार्षिक आय फिर भी सीमित रह सकती है।
ऐसे किसान के लिए जरूरी हो सकते हैं—
यही वह क्षेत्र है जहां “लाभकारी मूल्य” की राजनीति अकेले पर्याप्त नहीं पड़ती।
भूमिहीन खेतिहर मजदूर का प्रश्न
भूमिहीन कृषि मजदूर KRRS की राजनीति के सामने सबसे कठिन वर्गीय प्रश्न था।
सिंचाई सब्सिडी का सीमित अथवा कोई प्रत्यक्ष लाभ नहीं।
कृषि बिजली की मुफ्त व्यवस्था भी उसका प्राथमिक मुद्दा नहीं।
उसकी सबसे महत्वपूर्ण मांगें हो सकती हैं—
इसलिए भूमिधर किसान और भूमिहीन मजदूर के हित पूरी तरह समान नहीं होते।
मजदूरी का अंतर्विरोध
यहीं किसान एकता का सबसे स्पष्ट आर्थिक विरोधाभास दिखाई देता है।
यदि मजदूरी बढ़ती है तो किसान की लागत बढ़ती है।
यानी एक ही गांव में दोनों समूह अन्य कई प्रश्नों पर सहयोगी हो सकते हैं, लेकिन मजदूरी के प्रश्न पर उनके हित टकरा सकते हैं।
KRRS की “सभी किसानों की एकता” की राजनीति इस संरचनात्मक अंतर को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकती थी।
भूमि का प्रश्न
भूमिहीन मजदूर के लिए भूमि वितरण एक केंद्रीय मांग हो सकती है।
लेकिन भूमिधर किसान संगठन के लिए भूमि पुनर्वितरण अधिक कठिन प्रश्न है।
यदि संगठन के सदस्य स्वयं भूमि स्वामी हैं तो बड़े पैमाने पर पुनर्वितरण उसकी आंतरिक एकता पर दबाव डाल सकता है।
यही कारण है कि नए किसान आंदोलनों में भूमि-सुधार का प्रश्न अक्सर औपनिवेशिक और प्रारंभिक स्वतंत्रता काल के किसान आंदोलनों की तुलना में पीछे चला गया।
KRRS भी इस व्यापक प्रवृत्ति से पूरी तरह बाहर नहीं था।
दलित और भूमिहीनता
कर्नाटक के ग्रामीण समाज में भूमि और जाति का संबंध ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है।
दलित समुदायों का बड़ा हिस्सा अनेक क्षेत्रों में भूमिहीन या बहुत छोटे भू-स्वामी वर्ग में रहा।
इसलिए भूमि-वंचना और जातीय पदानुक्रम परस्पर जुड़े थे।
यदि किसान आंदोलन केवल “भूमिधर उत्पादक” की भाषा में चलता है, तो दलित खेत मजदूर की सामाजिक वास्तविकता पूरी तरह उसमें समाहित नहीं होती।
यही KRRS के सामाजिक आधार की सबसे महत्वपूर्ण सीमाओं में एक थी।
जाति और ग्रामीण सत्ता
गांव में भूमि केवल आर्थिक संपत्ति नहीं।
इसलिए कृषक जाति और खेतिहर मजदूर के बीच संबंध केवल बाजार लेनदेन का नहीं, सत्ता का भी होता है।
KRRS यदि “किसान” की साझा पहचान बनाना चाहता था तो उसे इस सत्ता-संबंध से भी सामना करना था।
वोक्कालिगा और लिंगायत कृषक आधार
कर्नाटक के कई कृषि क्षेत्रों में वोक्कालिगा और लिंगायत समुदायों का मजबूत कृषक आधार रहा है।
दक्षिणी पुराने मैसूर क्षेत्र में वोक्कालिगा कृषक समुदाय का प्रभाव महत्वपूर्ण था।
उत्तर और मध्य कर्नाटक में लिंगायत कृषक समूहों का प्रभाव मजबूत रहा।
इन समुदायों की उपस्थिति KRRS में स्वाभाविक थी।
लेकिन संगठन को किसी एक प्रभावशाली जाति के मंच में बदलने से बचना था।
इसलिए उसकी सार्वजनिक भाषा जाति के बजाय “रैयत” पहचान पर आधारित रही।
‘रैयत’ पहचान का राजनीतिक उद्देश्य
“रैयत” शब्द का उपयोग संगठनात्मक रूप से महत्वपूर्ण था।
उत्तर कर्नाटक का किसान हो या दक्षिण का,
सभी कृषि उत्पादक एक साझा आर्थिक वर्ग का हिस्सा हैं।
यह रणनीति जातीय विभाजनों के ऊपर किसान पहचान बनाने का प्रयास थी।
कुछ परिस्थितियों में यह सफल भी हुई।
लेकिन जातीय संरचना केवल नारे से समाप्त नहीं होती।
जाति से ऊपर उठने की उपलब्धि
KRRS ने कई बड़े आंदोलनों में अलग-अलग जातियों के किसानों को एक मंच पर जुटाया।
ऐसे मुद्दे थे जो जाति की सीमा पार कर सकते थे।
ग्रामीण राजनीति जहां अक्सर जातीय आधार पर विभाजित होती थी, वहां किसान हित का साझा मंच बनाना अपने आप में राजनीतिक परिवर्तन था।
लेकिन जाति समाप्त नहीं हुई
यह भी सच है कि आंदोलन में साथ बैठना सामाजिक संरचना को स्वतः समाप्त नहीं करता।
इसलिए किसान एकता को जाति-मुक्त ग्रामीण समाज का प्रमाण मानना गलत होगा।
नंजुंडास्वामी की जाति-विरोधी पृष्ठभूमि
एम. डी. नंजुंडास्वामी की वैचारिक पृष्ठभूमि में समाजवाद और जाति-विरोधी चिंतन महत्वपूर्ण था।
लोहिया और पेरियार जैसी परंपराओं से उनके विचार प्रभावित हुए।
इससे KRRS नेतृत्व में सामाजिक समानता की एक वैचारिक धारा मौजूद रही।
लेकिन किसी नेता की विचारधारा और संगठन के वास्तविक सामाजिक व्यवहार में अंतर हो सकता है।
महिला किसान : दिखाई कम, काम अधिक
कृषि उत्पादन में महिलाओं की भूमिका व्यापक रही है—
लेकिन भूमि के दस्तावेज और औपचारिक किसान पहचान प्रायः पुरुष के नाम पर होती है।
लेकिन कानूनी रूप से “किसान” नहीं मानी जाती।
KRRS जैसे किसान संगठनों के लिए यह प्रश्न धीरे-धीरे महत्वपूर्ण हुआ।
आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी
KRRS की रैलियों, धरनों, मार्चों और किसान सम्मेलनों में ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी रही।
लेकिन शुरुआती दशकों में आंदोलन के सार्वजनिक और औपचारिक नेतृत्व में पुरुषों का प्रभुत्व अधिक था।
यह लगभग पूरे भारतीय किसान आंदोलन की सामान्य समस्या रही।
महिला भागीदारी और महिला नेतृत्व अलग बातें हैं
किसी आंदोलन में हजारों महिलाओं की भागीदारी अपने आप महिला नेतृत्व का अर्थ नहीं।
वार्ता प्रतिनिधिमंडल में कौन जाता है?
संगठन की जिला और राज्य इकाइयों में महिलाएं कितनी हैं?
यही वास्तविक प्रतिनिधित्व का पैमाना है।
KRRS की बाद की पीढ़ियों में इस प्रश्न को अधिक गंभीरता मिली।
चुक्की नंजुंडास्वामी और महिला नेतृत्व
चुक्की नंजुंडास्वामी KRRS की बाद की पीढ़ी में प्रमुख महिला नेता के रूप में उभरीं।
उन्होंने कृषि-पारिस्थितिकी, बीज-संप्रभुता, खाद्य संप्रभुता और महिला किसान के प्रश्नों को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया।
अमृता भूमि से जुड़ी उनकी भूमिका ने भी KRRS की वैचारिक विरासत को नई पीढ़ी और महिला नेतृत्व से जोड़ा।
यह संगठन के ऐतिहासिक विकास में महत्वपूर्ण परिवर्तन था।
भूमि के नाम पर महिला का अधिकार
महिला किसान की वास्तविक आर्थिक शक्ति का मूल प्रश्न भूमि स्वामित्व है।
यदि जमीन केवल पति या पिता के नाम है तो महिला—
इसलिए महिला किसान अधिकार को केवल आंदोलन में भागीदारी से नहीं, संपत्ति अधिकार से जोड़ना आवश्यक है।
यह प्रश्न व्यापक भारतीय किसान राजनीति में धीरे-धीरे अधिक प्रमुख हुआ।
विधवा किसान और ऋण संकट
किसान आत्महत्या अथवा किसान की मृत्यु के बाद परिवार की महिला पर ऋण और खेती दोनों की जिम्मेदारी आ सकती है।
लेकिन यदि भूमि अभिलेख उसके नाम नहीं हैं तो सहायता प्राप्त करना कठिन हो सकता है।
इससे “किसान कौन है?” की सरकारी परिभाषा का लैंगिक पक्ष सामने आता है।
KRRS की सामाजिक राजनीति के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न था।
महिला और बीज-संप्रभुता
बीज संरक्षण में महिलाओं की पारंपरिक भूमिका ने KRRS की बाद की बीज-संप्रभुता राजनीति को महिला किसान के अनुभव से जोड़ने का अवसर दिया।
इनमें महिलाओं का अनुभव महत्वपूर्ण होता है।
इसलिए कृषि-पारिस्थितिकी की राजनीति में महिला किसान केवल प्रतिनिधित्व का प्रश्न नहीं, ज्ञान का स्रोत भी है।
महिला श्रम का अदृश्य होना
कृषि लागत की गणना में परिवार श्रम शामिल करने की KRRS की मांग का लैंगिक अर्थ भी है।
परिवार श्रम का बड़ा हिस्सा महिलाओं द्वारा किया जाता है।
यदि उसे “मुफ्त पारिवारिक श्रम” मान लिया जाए तो महिला का आर्थिक योगदान अदृश्य हो जाता है।
इसलिए लाभकारी मूल्य की सही गणना महिला श्रम की मान्यता से भी जुड़ी है।
खेतिहर महिला मजदूर की अलग स्थिति
महिला भूमिधर किसान और महिला खेतिहर मजदूर की समस्याएं समान नहीं।
किसान आंदोलन में दोनों को एक ही “महिला किसान” श्रेणी में रख देना भी अत्यधिक सरल होगा।
दलित महिला : जाति, वर्ग और लिंग का संगम
दलित भूमिहीन महिला ग्रामीण समाज में तीन स्तरों की असमानता का सामना कर सकती है—
इसी कारण किसान आंदोलन का केवल वर्गीय या केवल लैंगिक विश्लेषण पर्याप्त नहीं।
KRRS के सामाजिक आधार का आलोचनात्मक अध्ययन इस अंतर्संबंध को ध्यान में रखे बिना अधूरा रहेगा।
खेत मजदूरों से KRRS के संबंध
KRRS और खेतिहर मजदूर संगठनों के संबंध हमेशा समान नहीं रहे।
लेकिन मजदूरी, भूमि वितरण और मालिक–मजदूर संबंधों में टकराव भी संभव था।
इसलिए KRRS को ग्रामीण एकता बनाने के लिए वर्गीय समझौता तैयार करना पड़ता था।
वामपंथी आलोचना
वामपंथी किसान और मजदूर संगठनों ने नए किसान आंदोलनों पर अक्सर आरोप लगाया कि वे भूमिधर किसानों के हित को “संपूर्ण ग्रामीण समाज” का हित घोषित करते हैं।
उनका तर्क था कि ग्रामीण समाज में वर्ग विभाजन वास्तविक है।
बड़ा किसान और खेत मजदूर एक वर्ग नहीं।
KRRS को भी इस आलोचना का सामना करना पड़ा।
यह आलोचना पूरी तरह असंगत नहीं थी, लेकिन KRRS का आधार केवल धनी किसानों तक सीमित मानना भी वास्तविकता का अतिसरलीकरण होगा।
‘संपन्न किसान आंदोलन’ की बहस
1980 के दशक के नए किसान आंदोलनों पर अकादमिक बहस में “rich किसान आंदोलन” अथवा “bullock capitalist” जैसी अवधारणाएं सामने आईं।
तर्क था कि हरित क्रांति के बाद उभरे बाजारोन्मुख किसान राज्य से बेहतर मूल्य और सस्ती इनपुट सहायता मांग रहे थे।
लेकिन KRRS का बाद का कॉरपोरेट-विरोध और कृषि-पारिस्थितिकी एजेंडा इस सरल वर्गीकरण को जटिल बनाता है।
यदि संगठन केवल धनी किसान का मंच होता तो बीज-संप्रभुता और कम बाहरी लागत की कृषि पर उसका जोर समझाना कठिन होता।
इसलिए उसके सामाजिक आधार को बहुस्तरीय रूप में देखना चाहिए।
मंड्या और व्यावसायिक किसान
मांड्या जैसे सिंचित क्षेत्रों में गन्ना और धान उत्पादक किसानों की राजनीतिक शक्ति अपेक्षाकृत अधिक थी।
इन किसानों के लिए गन्ना मूल्य और कावेरी जल प्रमुख मुद्दे रहे।
इस सामाजिक आधार ने KRRS को राज्य पर दबाव बनाने की शक्ति दी।
लेकिन इसी कारण कभी-कभी संगठन की छवि शक्तिशाली सिंचित किसान वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में भी बनी।
उत्तर कर्नाटक के शुष्क किसान
उत्तर कर्नाटक के शुष्क क्षेत्रों में स्थिति अलग थी।
कावेरी आंदोलन और क्षेत्रीय एकता
इसमें जाति और वर्ग कुछ समय के लिए पीछे चले जाते।
कन्नड़ अस्मिता, स्वदेशी और जल-राजनीति — कावेरी, महादायी–कलसा-बंडूरी, क्षेत्रीय अधिकार, स्थानीय संसाधनों पर नियंत्रण और KRRS की किसान राजनीति में कर्नाटक पहचान का स्थान
प्रस्तावना : किसान प्रश्न से क्षेत्रीय अधिकार तक
कर्नाटक राज्य रैयत संघ की राजनीति का एक महत्वपूर्ण आयाम केवल कृषि अर्थशास्त्र नहीं, बल्कि क्षेत्रीय पहचान और संसाधनों पर अधिकार भी रहा है। कावेरी और महादायी जैसे नदी-जल विवादों ने इस राजनीति को विशेष रूप से प्रभावित किया।
किसान के लिए नदी का पानी केवल संवैधानिक संघवाद का प्रश्न नहीं है।
लेकिन जैसे ही नदी दो या अधिक राज्यों से होकर गुजरती है, किसान का स्थानीय जल प्रश्न अंतरराज्यीय राजनीति, न्यायाधिकरण, सर्वोच्च न्यायालय, केंद्र सरकार और क्षेत्रीय अस्मिता का प्रश्न बन जाता है।
दक्षिणी कर्नाटक में कावेरी, और उत्तरी कर्नाटक में महादायी–कलसा-बंडूरी ने किसान आंदोलनों को ऐसी क्षेत्रीय राजनीति से जोड़ा जिसमें “हमारा पानी”, “हमारा राज्य”, “हमारे किसान” और “कर्नाटक के अधिकार” जैसी भाषा मजबूत हुई।
KRRS ने कई अवसरों पर इस क्षेत्रीय चेतना को किसान अधिकार से जोड़ा, लेकिन उसका ऐतिहासिक स्वरूप केवल संकीर्ण भाषायी राष्ट्रवाद नहीं था। नंजुंडास्वामी की राजनीति में स्वदेशी, विकेंद्रीकरण और स्थानीय संसाधनों पर समुदाय का नियंत्रण अधिक व्यापक सिद्धांत थे।
इसलिए KRRS की कन्नड़ अस्मिता को समझने का सबसे उपयुक्त सूत्र है—
कर्नाटक की पहचान + किसान की जीविका + स्थानीय संसाधनों पर लोकतांत्रिक अधिकार।
कन्नड़ एकीकरण और ग्रामीण राजनीति
1956 में भाषाई आधार पर कन्नड़भाषी क्षेत्रों को मिलाकर विस्तृत मैसूर राज्य बनाया गया और 1973 में उसका नाम कर्नाटक हुआ।
राजनीतिक एकीकरण के साथ एक साझा कन्नड़ पहचान मजबूत हुई।
लेकिन इस नए राज्य के भीतर कृषि क्षेत्र अत्यंत विविध थे।
उत्तर में कृष्णा और उसकी सहायक नदियां।
पश्चिम में भारी वर्षा वाला तटीय और मलनाड क्षेत्र।
उत्तर-मध्य भाग में सूखा और वर्षा-आधारित खेती।
इसलिए “कर्नाटक हित” हमेशा एक समान कृषि हित नहीं था।
फिर भी अंतरराज्यीय जल विवादों ने समय-समय पर इन विविधताओं के ऊपर राज्यीय पहचान को मजबूत किया।
किसान और भाषायी पहचान
किसान की प्राथमिक पहचान प्रायः स्थानीय होती है—
लेकिन जब जल किसी दूसरे राज्य के साथ विवाद का विषय बन जाए, तो उसकी राजनीतिक पहचान बदल सकती है।
मांड्या का किसान केवल गन्ना किसान नहीं रहता।
इसी तरह महादायी के मामले में उत्तरी कर्नाटक का किसान केवल धारवाड़ या गदग का किसान नहीं रहता।
वह राज्य के जल अधिकार की भाषा अपनाने लगता है।
यहीं कृषि आंदोलन और कन्नड़ अस्मिता एक-दूसरे से जुड़ते हैं।
स्वदेशी की KRRS अवधारणा
KRRS की स्वदेशी राजनीति को केवल विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तक सीमित करना उचित नहीं।
नंजुंडास्वामी की दृष्टि में स्वदेशी का संबंध था—
यदि गांव का पानी, बीज और भूमि किसी दूर स्थित आर्थिक सत्ता द्वारा नियंत्रित हों, तो किसान की स्वतंत्रता सीमित होगी।
इस अर्थ में स्वदेशी और जल-अधिकार एक ही व्यापक दर्शन के हिस्से थे।
“हमारा पानी” का राजनीतिक अर्थ
“हमारा पानी” सुनने में स्वामित्व का सरल दावा लगता है, लेकिन अंतरराज्यीय नदी में कोई राज्य नदी का पूर्ण स्वामी नहीं होता।
ऊपरी और निचले दोनों राज्यों के हित होते हैं।
इसलिए संवैधानिक व्यवस्था साझा नदी के उपयोग को न्यायिक और संस्थागत तंत्र के जरिए संतुलित करती है।
लेकिन किसान आंदोलन की भाषा अलग होती है।
उसके लिए “हमारा पानी” का अर्थ अक्सर होता है—
हमारी पीने और खेती की जरूरतों को नजरअंदाज मत करो।
इसी राजनीतिक अर्थ को कावेरी और महादायी दोनों में समझना चाहिए।
कावेरी का कृषि महत्व
कावेरी दक्षिणी कर्नाटक की कृषि अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है।
कृष्णराज सागर बांध और उससे जुड़ी सिंचाई व्यवस्था ने विशेष रूप से मांड्या क्षेत्र में कृषि का रूप बदल दिया।
इससे नदी केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं रही।
उसके जल स्तर का सीधा संबंध किसान की आय से बन गया।
इसलिए कावेरी विवाद में मांड्या किसान की भूमिका ऐतिहासिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।
कावेरी विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
कावेरी जल विवाद की जड़ें औपनिवेशिक काल के मैसूर और मद्रास प्रेसीडेंसी के बीच हुए 1892 और 1924 के समझौतों तक जाती हैं।
स्वतंत्रता के बाद कर्नाटक ने तर्क दिया कि पुरानी व्यवस्थाएं उसकी बढ़ती सिंचाई जरूरतों के अनुरूप नहीं हैं।
तमिलनाडु का तर्क था कि उसके पुराने सिंचित डेल्टा क्षेत्र की ऐतिहासिक निर्भरता की रक्षा आवश्यक है।
इस प्रकार विवाद केवल दो सरकारों का नहीं रहा।
दोनों राज्यों के लाखों किसान इससे जुड़े।
न्यायाधिकरण और किसान आंदोलन
भारत सरकार ने 1990 में कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण गठित किया।
1991 के अंतरिम आदेश ने कर्नाटक में व्यापक विरोध पैदा किया।
इसके बाद कावेरी पर लगभग हर महत्वपूर्ण जल-विमोचन निर्देश के साथ कर्नाटक में किसान और क्षेत्रीय संगठन सक्रिय होते रहे।
2026 तक भी यह चक्र समाप्त नहीं हुआ। जुलाई 2026 में Cauvery Water Regulation Committee द्वारा तमिलनाडु की ओर जल छोड़ने के निर्देश के बाद मांड्या, श्रीरंगपट्टन और मैसूरु क्षेत्र में फिर आंदोलन तेज हुआ; प्रदर्शनकारियों ने राज्य में अपर्याप्त मानसून और खड़ी फसल के लिए पानी की कमी का तर्क दिया।
इससे स्पष्ट है कि कावेरी आज भी जीवित किसान प्रश्न है।
मांड्या : कावेरी आंदोलन का केंद्र
मांड्या जिले की अर्थव्यवस्था कावेरी सिंचाई से गहराई से जुड़ी है।
इसीलिए जब भी जलाशय में पानी कम हो और तमिलनाडु को पानी छोड़ने का निर्देश आए, किसान का भय तुरंत बढ़ता है।
पहले मेरी खड़ी फसल बचेगी या पानी बाहर जाएगा?
यह राजनीतिक भाषा अक्सर आक्रामक हो सकती है।
लेकिन उसके आर्थिक आधार को समझना जरूरी है।
एक असफल गन्ना या धान फसल का अर्थ केवल उत्पादन नुकसान नहीं—
KRRS और कावेरी
KRRS कावेरी जल आंदोलन में अनेक चरणों में सक्रिय रहा।
संगठन ने जल छोड़ने के निर्णयों पर विरोध, रास्ता रोको, धरना और किसान लामबंदी में भाग लिया।
कावेरी क्षेत्र के गांवों में KRRS की पुरानी संगठनात्मक उपस्थिति थी। 2012 की एक रिपोर्ट में बेंगलुरु–मैसूर मार्ग के गेज्जलगेर गांव की कावेरी-विरोधी आंदोलन परंपरा को 1970–80 के दशक के शुरुआती KRRS दौर से जोड़ा गया था।
इसलिए कावेरी आंदोलन और KRRS का संबंध केवल बाद की राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं था।
इसकी जड़ें संगठन की प्रारंभिक ग्रामीण लामबंदी में थीं।
जल छोड़ना किसान को ‘अन्याय’ क्यों लगता है?
मान लें KRS जलाशय में पानी सीमित है।
किसान ने पहले ही गन्ना या धान बो दिया।
अब सरकार पानी तमिलनाडु की ओर छोड़े।
किसान के लिए यह वास्तविक आर्थिक जोखिम है।
वह न्यायाधिकरण के कानूनी सूत्र से नहीं, अपने खेत की खड़ी फसल से समस्या देखता है।
इसीलिए कावेरी विवाद में भावनाएं अत्यंत तीव्र हो जाती हैं।
तमिलनाडु किसान का समान प्रश्न
लेकिन संतुलित इतिहास में दूसरी ओर भी देखना आवश्यक है।
कावेरी डेल्टा के तमिलनाडु किसान भी नदी जल पर निर्भर हैं।
ऊपरी राज्य पानी रोक दे तो उनकी फसल प्रभावित हो सकती है।
इसलिए “कर्नाटक किसान बनाम तमिलनाडु” की भाषा दोनों तरफ के वास्तविक कृषि संकट को राष्ट्रवादी अथवा क्षेत्रीय टकराव में बदल सकती है।
दोनों राज्यों के किसानों की जीविका को साझा नदी और बदलती वर्षा के संदर्भ में देखना।
न्यायपालिका बनाम सड़क
कावेरी विवाद एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक तनाव भी दिखाता है।
संस्थागत व्यवस्था नदी का वैज्ञानिक और कानूनी वितरण तय करना चाहती है।
यही कारण है कि तकनीकी निर्णय भी राजनीतिक विस्फोट बन सकते हैं।
2026 तक आंदोलन की निरंतरता
जुलाई 2026 के आंदोलन इसका ताजा उदाहरण हैं।
कर्नाटक के प्रदर्शनकारियों ने दावा किया कि KRS में पर्याप्त जल भंडारण नहीं और खड़ी फसल तथा पेयजल की जरूरत पूरी होने से पहले तमिलनाडु को जल छोड़ना उचित नहीं होगा। KRRS सदस्यों के प्रदर्शन की भी रिपोर्ट हुई।
इससे कावेरी राजनीति की एक महत्वपूर्ण निरंतरता दिखाई देती है—
कानूनी निर्णय बदलते हैं, सरकारें बदलती हैं, लेकिन पानी और फसल का मूल तनाव बना रहता है।
उत्तर कर्नाटक का अलग जल संकट
कावेरी का आंदोलन मुख्यतः दक्षिणी कर्नाटक की सिंचित कृषि से जुड़ा रहा।
इसी पृष्ठभूमि में महादायी–कलसा-बंडूरी आंदोलन उभरा।
दिलचस्प तथ्य यह है कि इसके कई आंदोलन क्षेत्र वही हैं जहां 1980 का नरगुंड–नवलगुंड किसान विद्रोह हुआ था।
इसलिए नई जल राजनीति पुरानी किसान स्मृति पर खड़ी हुई।
महादायी नदी
महादायी—गोवा में मंडोवी कहलाने वाली नदी—कर्नाटक के पश्चिमी घाट क्षेत्र से निकलती है और गोवा से होकर अरब सागर में जाती है।
कर्नाटक लंबे समय से इसकी कुछ सहायक धाराओं से पानी मलप्रभा बेसिन की ओर मोड़ने की योजना चाहता रहा है।
इसका उद्देश्य विशेष रूप से उत्तरी कर्नाटक के जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों को पेयजल उपलब्ध कराना बताया गया।
यहीं से कलसा-बंडूरी नाला परियोजना का विवाद पैदा हुआ।
कलसा-बंडूरी परियोजना क्या है?
परियोजना का मूल विचार कलसा और बंडूरी धाराओं के पानी का एक हिस्सा मलप्रभा प्रणाली की ओर मोड़ना है।
इससे उत्तरी कर्नाटक के सूखा प्रभावित क्षेत्रों को पेयजल उपलब्ध कराने की योजना है।
विभिन्न चरणों में लगभग 7.56 TMC जल को मोड़ने का प्रस्ताव चर्चा में रहा है।
कर्नाटक इसे गंभीर जल आवश्यकता का प्रश्न बताता है।
गोवा इसकी पारिस्थितिक और नदी प्रवाह संबंधी लागत पर आपत्ति करता रहा है।
महादायी विवाद केवल कृषि का नहीं
कलसा-बंडूरी को सामान्यतः किसान आंदोलन से जोड़ा जाता है, लेकिन परियोजना का प्रमुख औपचारिक उद्देश्य पेयजल भी रहा है।
इसलिए इसे केवल “सिंचाई परियोजना” कहना अधूरा होगा।
हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल और कृषि जल पूर्णतः अलग भी नहीं होते।
जल उपलब्धता बढ़ने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि दोनों प्रभावित होते हैं।
यही कारण है कि किसानों ने इस परियोजना को अपना मुद्दा बनाया।
नरगुंड की ऐतिहासिक स्मृति
महादायी आंदोलन की सबसे रोचक बात उसकी भौगोलिक स्मृति है।
1980 में नरगुंड और नवलगुंड के किसान मलप्रभा सिंचाई परियोजना और शुल्क के विरुद्ध उठे थे।
2015 के बाद उसी क्षेत्र में किसान फिर लंबे धरने पर बैठे—
इस बार मांग थी कि मलप्रभा में पर्याप्त पानी लाया जाए।
नरगुंड में 1980 किसान शहीद स्मारक से कुछ ही दूरी पर महादायी–कलसा-बंडूरी आंदोलन का स्थायी धरना स्थल विकसित हुआ।
यह किसान इतिहास की अद्भुत निरंतरता है।
1980 और महादायी में अंतर
मलप्रभा परियोजना से लाभ नहीं मिला, शुल्क मत लो।
पहली नजर में दोनों विरोधाभासी लगते हैं।
लेकिन वास्तव में दोनों एक ही प्रश्न के दो चरण हैं—
किसान को विश्वसनीय और न्यायपूर्ण जल उपलब्धता चाहिए।
1980 की समस्या थी खराब परियोजना प्रबंधन।
बाद की समस्या थी जल की पर्याप्त उपलब्धता।
2015 से लंबा आंदोलन
महादायी आंदोलन ने जुलाई 2015 के आसपास विशेष तीव्रता हासिल की और नरगुंड क्षेत्र में लंबे समय तक धरना जारी रहा। Indian Express ने 2023 में लिखा कि रैत सेना का प्रदर्शन स्थल 16 जुलाई 2015 से सक्रिय रहा था।
यह आंदोलन सामान्य एक-दिवसीय बंद नहीं रहा।
वह वर्षों तक चलने वाला क्षेत्रीय जल आंदोलन बन गया।
किसान और कन्नड़ संगठनों का गठबंधन
2017 के महादायी बंद में किसान संगठनों के साथ कई कन्नड़ समर्थक संगठन भी जुड़े।
महादायी कलसा-बंडूरी नाला होराटा समन्वय समिति के बंद को विभिन्न क्षेत्रीय संगठनों का समर्थन मिला।
यहीं जल राजनीति और कन्नड़ पहचान का मेल स्पष्ट दिखाई देता है।
कर्नाटक को उसका न्यायपूर्ण हिस्सा क्यों नहीं मिल रहा?
क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीतिक शक्ति
यदि कोई स्थानीय जल मांग केवल तकनीकी परियोजना के रूप में उठे तो उसकी राजनीतिक पहुंच सीमित रह सकती है।
लेकिन यदि वह राज्यीय सम्मान से जुड़ जाए तो उसका प्रभाव बढ़ जाता है।
सभी एक ही राजनीतिक कथा में जुड़ने लगे।
यह क्षेत्रीय लामबंदी की अत्यंत प्रभावी रणनीति थी।
पर्यावरणीय पक्ष
लेकिन महादायी विवाद का दूसरा पक्ष भी महत्वपूर्ण है।
गोवा और पर्यावरणविदों की चिंता है कि पश्चिमी घाट से नदी जल मोड़ने से—
इसलिए किसान की जल आवश्यकता और पर्यावरणीय प्रवाह में संतुलन आवश्यक है।
यदि पानी का पूरा विमर्श केवल “हमारा हिस्सा” बन जाए तो नदी को जीवित पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में देखने की दृष्टि पीछे जा सकती है।
KRRS के लिए पर्यावरणीय विरोधाभास
यह KRRS की राजनीति के भीतर दिलचस्प तनाव पैदा करता है।
एक तरफ संगठन कृषि-पारिस्थितिकी और पर्यावरण संरक्षण की बात करता है।
दूसरी तरफ किसान जल आवश्यकता के लिए नदी मोड़ने वाली परियोजनाओं का समर्थन कर सकता है।
दोनों को सरलता से एक नहीं किया जा सकता।
क्या स्थानीय जल संरक्षण के विकल्प हैं?
यह आधुनिक किसान पर्यावरण राजनीति का कठिन प्रश्न है।
कन्नड़ भाषा का आंदोलन में महत्व
KRRS की राजनीतिक भाषा मुख्यतः कन्नड़ रही।
इससे कन्नड़ केवल सांस्कृतिक पहचान नहीं—
कन्नड़ और अंग्रेजी के बीच पुल
नंजुंडास्वामी दोनों भाषाओं में प्रभावी थे।
KRRS और राजनीतिक दलों का संबंध — कांग्रेस, जनता परिवार, भाजपा और वामपंथ से दूरी–निकटता, गैर-दलीय किसान राजनीति, चुनावी हस्तक्षेप, ‘कन्नड़ देश’ प्रयोग और आंदोलन बनाम सत्ता की दुविधा
प्रस्तावना : सड़क पर शक्ति, लेकिन सत्ता से कैसा संबंध?
कर्नाटक राज्य रैयत संघ के इतिहास का सबसे पेचीदा प्रश्न यह है कि एक शक्तिशाली किसान आंदोलन राजनीतिक दलों और चुनावी सत्ता से किस प्रकार संबंध बनाए। सरकार से कृषि नीति बदलवानी हो तो राजनीति से दूरी संभव नहीं; लेकिन यदि आंदोलन स्वयं किसी दल की चुनावी मशीनरी बन जाए तो उसकी स्वतंत्रता समाप्त होने का खतरा पैदा होता है।
उसने कांग्रेस सरकारों का विरोध किया, जनता परिवार के नेताओं से संवाद और कभी-कभी निकटता रखी, भाजपा की सरकारों के विरुद्ध भी किसान प्रश्नों पर आंदोलन किया और वामपंथ के साथ साम्राज्यवाद, WTO तथा कॉरपोरेट-विरोध जैसे मुद्दों पर समानताएं होते हुए भी अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखी। संगठन की मूल राजनीतिक शैली रही—किसी स्थायी पार्टी निष्ठा के बजाय किसान हित के आधार पर सरकार का समर्थन या विरोध।
लेकिन आंदोलन जितना प्रभावशाली हुआ, उतना ही एक प्रश्न तीखा हुआ—
यदि हमारे पास लाखों किसानों की ताकत है, तो नीति बनाने का अधिकार स्वयं क्यों न हासिल किया जाए?
इसी प्रश्न से चुनावी हस्तक्षेप और अंततः प्रो. एम. डी. नंजुंडास्वामी के कन्नड़ देश पार्टी प्रयोग की पृष्ठभूमि बनी।
गैर-दलीय होने का अर्थ गैर-राजनीतिक होना नहीं
KRRS को गैर-दलीय किसान संगठन कहा जाता है, लेकिन इसे गैर-राजनीतिक संगठन समझना गलत होगा।
वास्तव में उसका लगभग पूरा कार्यक्रम राजनीतिक था—
WTO समझौते पर भारत की नीति क्या होगी?
बीज पेटेंट किस सीमा तक स्वीकार होंगे?
ये सभी राज्य-सत्ता से जुड़े प्रश्न हैं।
इसलिए KRRS ने राजनीति से दूरी नहीं बनाई; उसने दलीय अधीनता से दूरी बनाने की कोशिश की।
किसान संगठन और राजनीतिक दल में मूल अंतर
राजनीतिक दल का अंतिम उद्देश्य सामान्यतः चुनाव जीतकर सरकार बनाना होता है।
किसान संगठन का उद्देश्य अपने सामाजिक आधार के हितों के लिए सरकार और राजनीतिक व्यवस्था पर दबाव बनाना होता है।
किसान संगठन अधिक स्पष्ट रूप से कृषि हित को प्राथमिकता दे सकता है।
यही KRRS की स्वतंत्र शक्ति का आधार था।
कांग्रेस व्यवस्था की पृष्ठभूमि
स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक कर्नाटक—और उससे पहले मैसूर—की राजनीति में कांग्रेस प्रमुख शक्ति रही।
ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस की शक्ति केवल चुनावी नहीं थी। वह जुड़ी थी—
इसलिए जब स्वतंत्र किसान आंदोलन उभरा, उसका पहला स्वाभाविक टकराव उस व्यवस्था से हुआ जिस पर राज्य में सत्ता थी।
और वह मुख्यतः कांग्रेस व्यवस्था थी।
नरगुंड–नवलगुंड और कांग्रेस सरकार
1980 के नरगुंड–नवलगुंड किसान आंदोलन के समय कर्नाटक में कांग्रेस सरकार थी और आर. गुंडू राव मुख्यमंत्री थे।
मलप्रभा क्षेत्र में बेहतरमेंट लेवी और किसान असंतोष के बीच 21 जुलाई 1980 की पुलिस गोलीबारी ने सरकार के प्रति गहरा आक्रोश पैदा किया।
इस घटना ने किसान राजनीति में एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक परिवर्तन किया—
सरकार अब किसान की स्वाभाविक संरक्षक नहीं मानी जा सकती।
यदि आवश्यकता हो तो किसान को सरकार के विरुद्ध स्वतंत्र संगठन बनाना होगा।
यही वातावरण KRRS के विस्तार के लिए निर्णायक बना।
कांग्रेस-विरोध, लेकिन स्थायी पार्टी-विरोध नहीं
KRRS के शुरुआती उभार में कांग्रेस-विरोध प्रबल था।
लेकिन इसे किसी दूसरी पार्टी के स्थायी समर्थन के रूप में नहीं देखना चाहिए।
जो सरकार किसान-विरोधी नीति अपनाएगी, उसका विरोध होगा।
इससे KRRS सरकार बदलने के बाद भी आंदोलन जारी रख सकता था।
यही उसकी गैर-दलीय विश्वसनीयता का आधार बना।
1983 और कर्नाटक की बदलती राजनीति
1983 का कर्नाटक विधानसभा चुनाव राज्य की राजनीति में निर्णायक मोड़ था। कांग्रेस पहली बार सत्ता से बाहर हुई और रामकृष्ण हेगड़े के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी।
इस परिवर्तन के पीछे अनेक राजनीतिक कारण थे, लेकिन 1980 के किसान असंतोष ने कांग्रेस-विरोधी वातावरण को मजबूत करने में भूमिका निभाई।
इस दौर में किसान संगठनों और गैर-कांग्रेसी राजनीति के बीच संवाद स्वाभाविक रूप से बढ़ा।
लेकिन यही वह क्षण भी था जब स्वतंत्र किसान आंदोलन के सामने नई चुनौती आई—
जिस विपक्ष के साथ कल सड़क पर थे, यदि वही आज सरकार में है तो उसके साथ व्यवहार कैसा हो?
रामकृष्ण हेगड़े और किसान राजनीति
हेगड़े सरकार ने विकेंद्रीकरण और पंचायत सुधारों पर जोर दिया। यह वातावरण KRRS की स्थानीय लोकतंत्र संबंधी सोच के कुछ तत्वों से मेल खाता था।
फिर भी किसान और सरकार के हित पूरी तरह समान नहीं हुए।
और अन्य प्रश्नों पर संघर्ष जारी रहा।
यही गैर-दलीय आंदोलन की वास्तविक परीक्षा थी—
विरोधी दल सत्ता में आने के बाद भी क्या संगठन स्वतंत्र रह सकता है?
KRRS ने कम-से-कम सिद्धांततः यही कोशिश की।
जनता परिवार से वैचारिक निकटता क्यों?
KRRS और जनता परंपरा के बीच कुछ वैचारिक समानताएं थीं।
राममनोहर लोहिया की समाजवादी परंपरा,
कांग्रेस की केंद्रीकृत सत्ता की आलोचना,
और ग्रामीण समाज को राजनीतिक शक्ति देने की धारणा।
नंजुंडास्वामी की वैचारिक पृष्ठभूमि भी समाजवादी और लोहियावादी विचारों से प्रभावित थी।
इसलिए जनता परिवार के साथ संवाद केवल चुनावी सुविधा नहीं, कुछ हद तक वैचारिक निकटता पर भी आधारित था।
लेकिन जनता दल भी सरकार था
जैसे ही जनता परिवार सरकार में आया, वही प्रशासनिक वास्तविकताएं उसके सामने थीं—
अब किसान की हर मांग स्वीकार करना आसान नहीं था।
इससे KRRS ने एक महत्वपूर्ण अनुभव प्राप्त किया—
किसान-अनुकूल विपक्ष और किसान-अनुकूल सरकार आवश्यक रूप से एक ही चीज नहीं हैं।
सत्ता में पहुंचने पर राजनीतिक दलों की प्राथमिकताएं बदल सकती हैं।
एच. डी. देवेगौड़ा और ग्रामीण राजनीति
एच. डी. देवेगौड़ा की राजनीतिक पहचान कर्नाटक में लंबे समय तक ग्रामीण, सिंचाई और किसान प्रश्नों से जुड़ी रही।
इस कारण जनता दल की राजनीति और किसान संगठनों के बीच संवाद की संभावनाएं बनी रहीं।
लेकिन KRRS ने स्वयं को जनता दल का किसान मोर्चा नहीं बनाया।
व्यक्तिगत नेताओं से संबंध हो सकते थे, मुद्दों पर सहयोग हो सकता था, लेकिन संगठनात्मक स्वतंत्रता KRRS की पहचान का हिस्सा रही।
‘समान दूरी’ हमेशा वास्तविक समान दूरी नहीं
किसी संगठन का यह कहना कि वह सभी दलों से समान दूरी रखता है, व्यवहार में हमेशा पूर्ण समानता नहीं पैदा करता।
और किसी सरकार के साथ तत्काल संघर्ष—
संगठन के व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
KRRS में भी समय-समय पर अलग-अलग राजनीतिक धाराओं के प्रति अलग स्तर की निकटता दिखाई दी।
इसलिए उसे बिल्कुल निष्पक्ष राजनीतिक शून्य में खड़ा संगठन मानना उचित नहीं होगा।
स्वायत्त, लेकिन राजनीतिक रूप से संवादशील किसान संगठन।
वामपंथ से समानता
KRRS और वामपंथी किसान संगठनों के बीच कई महत्वपूर्ण समानताएं थीं—
कृषि में कॉरपोरेट नियंत्रण का विरोध,
1990 के दशक में वैश्वीकरण-विरोधी आंदोलनों ने इन समानताओं को और स्पष्ट किया।
लेकिन समान मुद्दों का अर्थ समान राजनीति नहीं था।
मुख्य अंतर : वर्ग की परिभाषा
मार्क्सवादी किसान राजनीति ग्रामीण समाज को वर्गों में विभाजित करके देखती है—
KRRS की प्रमुख रणनीति इन विभाजनों के ऊपर “रैयत” की साझा पहचान बनाना थी।
कृषि क्षेत्र और किसान को राज्य तथा बाजार से न्याय मिल रहा है या नहीं?
यहीं दोनों धाराओं का महत्वपूर्ण सैद्धांतिक अंतर था।
भूमि सुधार बनाम लाभकारी मूल्य
पुरानी वाम किसान राजनीति का केंद्रीय प्रश्न था—
नए किसान आंदोलनों का बड़ा प्रश्न बना—
KRRS भूमि-संबंधों की उपेक्षा पूरी तरह नहीं करता था, लेकिन उसकी जन राजनीति का केंद्र भूमि पुनर्वितरण की तुलना में—
इसी कारण वामपंथी आलोचकों ने उसे कई बार भूमिधर किसान राजनीति के रूप में देखा।
फिर भी वैश्वीकरण ने दोनों को करीब लाया
1991 के बाद आर्थिक उदारीकरण, GATT, WTO और बहुराष्ट्रीय कृषि कंपनियों के प्रश्न ने KRRS और वामपंथी आंदोलनों के बीच नए साझा क्षेत्र बनाए।
दोनों कह रहे थे कि वैश्विक व्यापार नियमों में विकासशील देशों के छोटे उत्पादकों के हितों की रक्षा होनी चाहिए।
फिर भी KRRS ने अपनी अलग आंदोलन शैली बनाए रखी—
भाजपा के उदय के साथ नया राजनीतिक समीकरण
1990 के दशक के बाद कर्नाटक में भाजपा धीरे-धीरे प्रमुख राजनीतिक शक्ति बनी।
इससे KRRS को तीसरी बड़ी सत्ता-धारा से संबंध तय करना पड़ा।
की भाषा में सतही समानता दिखाई दे सकती थी।
लेकिन दोनों की स्वदेशी अवधारणा समान नहीं थी।
KRRS की स्वदेशी राजनीति किसान स्वायत्तता, विकेंद्रीकरण और कॉरपोरेट नियंत्रण-विरोध से निकली थी।
भाजपा सरकारों के विरुद्ध किसान आंदोलन
भाजपा के सत्ता में आने के बाद KRRS ने बिजली, कृषि मूल्य, भूमि, जल और अन्य किसान मुद्दों पर उसके विरुद्ध भी आंदोलन किए।
सत्ता में जो है, किसान की मांग उसी से है।
यदि संगठन कांग्रेस के खिलाफ उग्र हो और भाजपा सरकार के समय शांत रहे, तो उसकी गैर-दलीय विश्वसनीयता खत्म हो जाती।
KRRS की विभिन्न धाराओं ने इस स्वतंत्रता को बनाए रखने का प्रयास किया।
2020 के कृषि कानून और नई परीक्षा
केंद्र की भाजपा सरकार द्वारा 2020 में लाए गए तीन कृषि कानूनों ने पूरे देश में किसान आंदोलन पैदा किया।
कर्नाटक में KRRS भी उनके विरोध की व्यापक किसान लामबंदी का हिस्सा बना।
यह चरण महत्वपूर्ण था क्योंकि संगठन की पुरानी कॉरपोरेट कृषि और बाजार उदारीकरण संबंधी आशंकाएं फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गईं।
इससे KRRS की 1990 के दशक की कई बहसों—मंडी, कॉरपोरेट खरीद, किसान स्वायत्तता और कृषि बाजार—को नई प्रासंगिकता मिली।
संयुक्त किसान मोर्चा और KRRS
2020–21 के आंदोलन में विभिन्न विचारधाराओं के किसान संगठन संयुक्त किसान मोर्चा जैसे व्यापक मंच पर साथ आए।
और अलग-अलग किसान परंपराओं के संगठन शामिल थे।
KRRS की राजनीति के लिए यह स्वाभाविक था—
अपनी संगठनात्मक पहचान बनाए रखते हुए साझा किसान प्रश्न पर व्यापक गठबंधन।
यह उसकी पुरानी coalition politics का राष्ट्रीय रूप था।
चुनाव से दूरी क्यों आकर्षक थी?
चुनावी राजनीति से बाहर रहने के कई लाभ थे।
KRRS किसी भी सरकार का विरोध कर सकता था।
जातीय चुनावी समीकरण संभालने की आवश्यकता कम थी।
सरकार बनाने के लिए असंबद्ध मुद्दों पर समझौते नहीं करने पड़ते थे।
उसकी नैतिक शक्ति इस धारणा पर आधारित रहती थी कि वह सत्ता नहीं, किसान हित के लिए लड़ रहा है।
लेकिन चुनाव से दूरी की सीमा
किसान लाखों की संख्या में सड़क पर उतरें।
फिर नौकरशाही या मंत्रिमंडल निर्णय बदल दे।
इस अनुभव से प्रश्न पैदा होना स्वाभाविक था—
यदि कानून विधानसभा बनाती है, तो किसान वहां स्वयं क्यों न पहुंचे?
यही आंदोलन से चुनाव की ओर आकर्षण का मूल कारण था।
“Pressure group” या “Political power”?
सरकार किसी की भी हो, उससे मांग मनवाओ।
अपने विधायक भेजो और स्वयं नीति बनाओ।
KRRS के इतिहास में यह बहस लगातार बनी रही।
चुनाव लड़ने की पहली कठिनाई
आंदोलन में लाखों लोग आ सकते हैं, लेकिन वे सभी एक ही पार्टी को वोट दें—यह आवश्यक नहीं।
एक किसान KRRS की रैली में शामिल हो सकता है और चुनाव में—
क्योंकि चुनाव में किसान केवल किसान नहीं रहता।
यही किसान आंदोलन को चुनावी पार्टी में बदलने की सबसे बड़ी संरचनात्मक बाधा है।
आंदोलन की भीड़ वोट में क्यों नहीं बदलती?
यह भारतीय किसान राजनीति की बार-बार दिखाई देने वाली पहेली है।
लेकिन चुनाव में उनके वोट दस दलों में बंट सकते हैं।
इसलिए mobilisation और electoral conversion अलग राजनीतिक क्षमताएं हैं।
चुनावी विकल्प बनाने का प्रयास
समय के साथ नंजुंडास्वामी ने यह निष्कर्ष निकाला कि केवल सड़क आंदोलन पर्याप्त नहीं।
किसान और कन्नड़ हितों की स्वतंत्र राजनीतिक आवाज के लिए चुनावी मंच आवश्यक है।
इसी दिशा में कन्नड़ देश पार्टी का प्रयोग सामने आया।
यह KRRS के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था क्योंकि पहली बार आंदोलन और राजनीतिक दल के बीच की रेखा अधिक अस्पष्ट होने लगी।
कन्नड़ देश की वैचारिक कल्पना
कन्नड़ देश की अवधारणा केवल चुनावी पार्टी बनाने की तकनीकी कोशिश नहीं थी।
उसमें कई पुराने KRRS विचार एक साथ दिखाई देते थे—
कर्नाटक के संसाधनों पर स्थानीय अधिकार,
कल्पना यह थी कि किसान आंदोलन अपनी स्वतंत्र राजनीतिक अभिव्यक्ति विकसित करे।
क्षेत्रीय पार्टी बनने की संभावना
सैद्धांतिक रूप से कर्नाटक में इसके लिए आधार दिखाई देता था।
कांग्रेस और जनता परिवार से असंतोष के दौर आते रहते थे।
इसके बावजूद यह प्रयोग तमिलनाडु या आंध्र प्रदेश जैसी शक्तिशाली क्षेत्रीय पार्टी राजनीति में नहीं बदल सका।
पहला कारण : किसान पहचान पर्याप्त नहीं
और किसान भी एक समान राजनीतिक समुदाय नहीं।
चुनावी राजनीति को प्रभावित करते हैं।
किसान की एकल आर्थिक पहचान पूरे राज्य में स्थायी चुनावी गठबंधन नहीं बना सकी।
दूसरा कारण : स्थापित दलों की ग्रामीण जड़ें
कांग्रेस, जनता दल और बाद में भाजपा के पास पहले से—
आंदोलन संगठन को चुनावी संगठन में बदलने के लिए बूथ स्तर तक अलग मशीनरी चाहिए।
KRRS की आंदोलन क्षमता बड़ी थी, लेकिन चुनावी संस्थागत क्षमता समान स्तर की नहीं बनी।
तीसरा कारण : नेतृत्व का केंद्रीकरण
नंजुंडास्वामी KRRS की सबसे बड़ी ताकत थे।
लेकिन यही चुनावी विस्तार में कमजोरी भी बन सकती थी।
नंजुंडास्वामी के बाद KRRS — नेतृत्व संकट, संगठनात्मक विभाजन, अलग-अलग गुट, किसान राजनीति की बदलती प्राथमिकताएं, नई पीढ़ी और आंदोलन की निरंतरता
प्रस्तावना : करिश्माई नेता के बाद संस्था की परीक्षा
प्रो. एम. डी. नंजुंडास्वामी की मृत्यु 2004 में कर्नाटक राज्य रैयत संघ के लिए केवल नेतृत्व परिवर्तन नहीं थी; यह संगठन की संस्थागत क्षमता की सबसे कठिन परीक्षा थी। लगभग दो दशकों तक वे KRRS के सबसे प्रमुख वैचारिक चेहरा, रणनीतिकार, अंतरराष्ट्रीय संपर्क सूत्र और जननेता रहे थे। उनकी उपस्थिति संगठन के भीतर अनेक विचारधारात्मक और क्षेत्रीय मतभेदों को ढककर रख सकती थी। उनके जाने के बाद वही मतभेद अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगे।
यह संकट केवल व्यक्ति-निर्भर संगठन का परिणाम नहीं था। उसके पीछे गहरे प्रश्न थे—
क्या KRRS का मुख्य एजेंडा फिर से बिजली, कर्ज, मूल्य और सिंचाई जैसे स्थानीय किसान प्रश्नों पर लौटे?
या WTO, बीज-संप्रभुता और वैश्वीकरण-विरोध जैसे व्यापक मुद्दे केंद्रीय बने रहें?
क्या संगठन चुनावी राजनीति से दूरी रखे?
क्या विभिन्न किसान गुटों को एक केंद्रीकृत नेतृत्व के नीचे रहना चाहिए?
और नई पीढ़ी को आंदोलन में कैसे स्थान मिले?
इन प्रश्नों ने 2004 के बाद KRRS को अनेक धाराओं और गुटों में बांटा। फिर भी संगठन समाप्त नहीं हुआ। बल्कि उसका इतिहास एक नई अवस्था में प्रवेश करता है—एकल नेता से बहु-केंद्रित किसान राजनीति तक।
2004 : नेतृत्व रिक्ति
नंजुंडास्वामी के निधन के बाद सबसे बड़ी समस्या यह थी कि उनका कोई स्वाभाविक सर्वमान्य उत्तराधिकारी नहीं था।
और संगठनात्मक विवादों में निर्णायक मध्यस्थ भी।
ऐसी स्थिति में केवल नया अध्यक्ष चुन लेना पर्याप्त नहीं था।
कौन उनकी वैचारिक और संगठनात्मक दोनों भूमिकाएं निभाएगा?
करिश्माई नेतृत्व की सीमा
करिश्माई नेतृत्व सामाजिक आंदोलन को तेजी से विस्तार दे सकता है।
यदि संगठनात्मक संस्थाएं, दूसरी पंक्ति का नेतृत्व और स्पष्ट उत्तराधिकार प्रणाली पर्याप्त मजबूत न हो तो नेता के जाने के बाद संकट बढ़ सकता है।
नंजुंडास्वामी की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा इतनी बड़ी थी कि कई आंतरिक मतभेद उनके रहते खुले विभाजन में नहीं बदलते थे।
संगठनात्मक विभाजन के कारण
KRRS में विभाजन को केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से समझना गलत होगा।
उत्तर कर्नाटक का सूखा प्रभावित किसान,
बीज-संप्रभुता आंदोलन से जुड़ा कार्यकर्ता—
सभी की तात्कालिक प्राथमिकताएं हमेशा समान नहीं थीं।
स्थानीय बनाम वैश्विक एजेंडा
नंजुंडास्वामी के समय KRRS का अंतरराष्ट्रीय प्रभाव अत्यधिक बढ़ा था।
लेकिन कुछ कार्यकर्ताओं का मानना था कि संगठन को फिर अधिक स्थानीय कृषि प्रश्नों पर केंद्रित होना चाहिए—
दूसरी धारा बीज, WTO, कॉरपोरेट कृषि और खाद्य संप्रभुता को आंदोलन का केंद्रीय वैचारिक आधार मानती रही।
यही तनाव आगे अलग-अलग गुटों में दिखाई दिया।
नाम एक, संगठन अनेक
2004 के बाद “कर्नाटक राज्य रैयत संघ” नाम से अलग-अलग नेतृत्व समूह सक्रिय रहे।
यह स्थिति भारतीय किसान राजनीति में असामान्य नहीं है।
कई ऐतिहासिक संगठन समय के साथ गुटों में विभाजित हुए, लेकिन प्रत्येक अपनी वैधता मूल आंदोलन की विरासत से जोड़ता रहा।
KRRS में भी अलग-अलग गुटों ने स्वयं को नंजुंडास्वामी और मूल किसान आंदोलन की असली परंपरा का उत्तराधिकारी बताया।
यही कारण है कि बाद के इतिहास में “KRRS” शब्द का उपयोग करते समय यह देखना जरूरी है कि किस गुट या नेतृत्व की बात की जा रही है।
कोडिहल्ली चंद्रशेखर का उभार
बाद के वर्षों में कोडिहल्ली चंद्रशेखर KRRS के प्रमुख सार्वजनिक चेहरों में उभरे।
और राज्य सरकार के विरुद्ध आंदोलनों—
उनकी नेतृत्व शैली नंजुंडास्वामी से अलग थी।
वे अधिक स्थानीय और राज्यस्तरीय मुद्दों पर केंद्रित दिखाई दिए।
इससे KRRS की एक धारा फिर पारंपरिक किसान मांगों की ओर अधिक झुकी।
बडगलपुरा नागेंद्र और दूसरी नेतृत्व धारा
बडगलपुरा नागेंद्र भी KRRS की महत्वपूर्ण बाद की नेतृत्व धाराओं में रहे।
वे विशेष रूप से दक्षिण कर्नाटक और किसान मुद्दों पर सक्रिय सार्वजनिक नेता के रूप में उभरे।
इस प्रकार संगठन का नेतृत्व एक व्यक्ति में केंद्रित न रहकर विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग चेहरों के रूप में विकसित हुआ।
यह संगठनात्मक कमजोरी भी थी और एक तरह की विकेंद्रीकृत ताकत भी।
चुक्की नंजुंडास्वामी और वैचारिक विरासत
दूसरी ओर चुक्की नंजुंडास्वामी ने अपने पिता एम. डी. नंजुंडास्वामी की वैचारिक विरासत—विशेषकर बीज-संप्रभुता, कृषि-पारिस्थितिकी, खाद्य संप्रभुता और वैश्विक किसान एकजुटता—को आगे बढ़ाया।
उनकी भूमिका सीधे पारंपरिक चुनावी किसान राजनीति से अधिक वैकल्पिक कृषि और अंतरराष्ट्रीय किसान नेटवर्कों से जुड़ी रही।
इससे KRRS की मूल वैश्विक किसान राजनीति की धारा समाप्त नहीं हुई।
Green Brigade और आंदोलन की नई संरचना
नंजुंडास्वामी की विरासत से जुड़ी एक धारा KRRS and Green Brigade के नाम से भी सक्रिय रही।
इसमें प्रत्यक्ष किसान कार्रवाई, पर्यावरण, बीज और ग्रामीण आंदोलन की पुरानी परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास दिखाई देता है।
इस प्रकार 2004 के बाद संगठनात्मक विखंडन के बावजूद KRRS की वैचारिक विरासत कई संस्थागत रूपों में जीवित रही।
विभाजन का पहला बड़ा नुकसान
राज्य सरकार के सामने एकीकृत किसान वार्ता शक्ति का कमजोर होना।
यदि पांच किसान गुट अलग-अलग मांगपत्र दें तो सरकार के लिए उन्हें अलग-अलग संभालना आसान हो सकता है।
एक संयुक्त संगठन की तुलना में विभाजित आंदोलन की bargaining power कम हो सकती है।
यही KRRS की सबसे बड़ी बाद की चुनौतियों में एक रही।
लेकिन विभाजन हमेशा अंत नहीं होता
इसके विपरीत, अलग-अलग गुट स्थानीय मुद्दों पर अधिक सक्रिय हो सकते हैं।
एक समूह गन्ना किसानों पर केंद्रित हो।
इससे संगठनात्मक विविधता बढ़ सकती है।
इसलिए विभाजन का प्रभाव केवल नकारात्मक नहीं।
समस्या तब होती है जब गुट एक-दूसरे को वैधता से बाहर करने लगें और साझा किसान प्रश्न पर सहयोग न कर सकें।
नंजुंडास्वामी के बाद वैचारिक केंद्रीकरण का अंत
नंजुंडास्वामी के रहते संगठन का वैचारिक आख्यान अपेक्षाकृत स्पष्ट था—
उनके बाद अलग गुटों ने इन तत्वों को अलग-अलग प्राथमिकता दी।
कुछ ने आर्थिक किसान मुद्दों को आगे रखा।
कुछ ने राष्ट्रीय किसान गठबंधनों को।
इससे KRRS अधिक बहुस्तरीय आंदोलन बन गया।
गन्ना मूल्य फिर केंद्रीय मुद्दा
2004 के बाद गन्ना मूल्य लगातार किसान आंदोलन का प्रमुख प्रश्न बना रहा।
मांड्या और उत्तरी कर्नाटक के चीनी क्षेत्र में—
विभिन्न KRRS गुटों ने इन आंदोलनों में भाग लिया।
यह दिखाता है कि संगठन की पुरानी “न्यायपूर्ण मूल्य” राजनीति अब भी जीवित थी।
किसान कर्ज और आत्महत्या
2000 के दशक में किसान आत्महत्या और ऋणग्रस्तता कर्नाटक में गंभीर मुद्दे बने।
इससे KRRS का पुराना कर्ज-विरोध फिर केंद्रीय हुआ।
नंजुंडास्वामी के बाद भी आर्थिक किसान संकट संगठन की आधारभूत राजनीति से गायब नहीं हुआ।
जल आंदोलन की निरंतरता
कावेरी और महादायी जैसे जल प्रश्नों ने KRRS की बाद की पीढ़ी को निरंतर राजनीतिक जमीन दी।
विशेष रूप से महादायी–कलसा-बंडूरी आंदोलन ने उत्तर कर्नाटक के किसान संगठनों को लंबे समय तक सक्रिय रखा।
KRRS की शक्ति केवल ऐतिहासिक स्मृति पर निर्भर नहीं थी।
वास्तविक नए जल संकट उसे बार-बार प्रासंगिक बनाते रहे।
2010 के दशक में नई कृषि परिस्थितियां
इस दशक तक भारतीय कृषि कई नए दबावों का सामना कर रही थी—
इससे 1980 के दशक के किसान आंदोलन की भाषा में भी परिवर्तन आवश्यक हुआ।
अब केवल बिजली और MSP पर्याप्त कार्यक्रम नहीं था।
किसान आय और कृषि टिकाऊपन का व्यापक प्रश्न उठने लगा।
प्राकृतिक खेती का पुनरुत्थान
इस नई परिस्थिति में KRRS की कृषि-पारिस्थितिकी धारा ने विशेष महत्व प्राप्त किया।
इससे आंदोलन की नंजुंडास्वामी वाली वैचारिक विरासत नई पीढ़ी के संदर्भ में पुनर्गठित हुई।
युवा किसान की अलग आकांक्षा
नई पीढ़ी का किसान 1980 के किसान से अलग सामाजिक संसार में है।
कृषि को अकेली जीवन नियति नहीं मानता।
इसलिए किसान संगठन को युवाओं को केवल “खेती बचाओ” का नारा देकर नहीं रोक सकता।
उसे खेती को आर्थिक रूप से सम्मानजनक और तकनीकी रूप से आधुनिक बनाना होगा।
डिजिटल संचार और आंदोलन
जहां पुराने KRRS को गांव-गांव पर्चे और बैठकें करनी पड़ती थीं, नई पीढ़ी WhatsApp, सोशल मीडिया और डिजिटल वीडियो के जरिए तेजी से लामबंद हो सकती है।
इससे आंदोलन का संगठनात्मक खर्च घटा।
इसलिए डिजिटल किसान आंदोलन को तथ्य और संगठनात्मक अनुशासन की नई आवश्यकता है।
राष्ट्रीय किसान गठबंधनों में भूमिका
KRRS की बाद की राजनीति केवल कर्नाटक तक सीमित नहीं रही।
विभिन्न किसान गुट राष्ट्रीय स्तर के गठबंधनों में शामिल हुए।
जैसे प्रश्नों पर कर्नाटक के किसानों की आवाज राष्ट्रीय मंच तक पहुंची।
यह नंजुंडास्वामी के वैश्विक नेटवर्क मॉडल की एक अलग, अधिक घरेलू निरंतरता थी।
2015 के बाद महादायी आंदोलन
महादायी–कलसा-बंडूरी आंदोलन ने KRRS और अन्य किसान संगठनों को नई ऊर्जा दी।
ने यह दिखाया कि पारंपरिक आंदोलन तकनीक अब भी प्रभावी हो सकती है।
नरगुंड की 1980 की स्मृति और 2015 के बाद का महादायी संघर्ष एक ऐतिहासिक निरंतरता बन गए।
2020 के कृषि कानून : संगठनात्मक पुनःएकता का अवसर
2020 में केंद्र सरकार द्वारा तीन कृषि कानून लाए जाने के बाद देशव्यापी किसान आंदोलन शुरू हुआ।
यह ऐसा प्रश्न था जिसने अलग-अलग विचारधारा और क्षेत्रीय किसान संगठनों को एक साझा मंच दिया।
KRRS की विभिन्न धाराएं भी इस व्यापक विरोध का हिस्सा बनीं।
यह महत्वपूर्ण था क्योंकि लंबे समय बाद राष्ट्रीय कृषि नीति ने संगठन के पुराने कॉरपोरेट और बाजार प्रश्न को फिर केंद्रीय बना दिया।
तीन कृषि कानून और पुरानी KRRS आशंका
कानून समर्थकों का तर्क था कि किसानों को अधिक बाजार विकल्प मिलेंगे।
KRRS और अन्य विरोधी किसान संगठनों की आशंका थी—
कॉरपोरेट खरीदार की शक्ति बढ़ सकती है,
और छोटे किसान की सौदेबाजी क्षमता सीमित होगी।
यह लगभग वही वैचारिक प्रश्न था जो नंजुंडास्वामी 1990 के दशक में मुक्त बाजार और किसान शक्ति के संदर्भ में उठा रहे थे।
संयुक्त किसान मोर्चा
संयुक्त किसान मोर्चा का मॉडल KRRS के लिए विशेष रूप से उपयुक्त था।
यह ठीक वही रणनीतिक ढांचा था जिसे KRRS लंबे समय से अपनाता रहा था—
मुद्दे पर एकता, संगठन में स्वायत्तता।
2021 में कृषि कानून वापसी का प्रभाव
नवंबर 2021 में केंद्र सरकार ने तीन कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की।
किसान आंदोलनों ने इसे बड़ी राजनीतिक जीत के रूप में देखा।
KRRS के लिए यह एक ऐतिहासिक पुष्टि भी थी—
व्यापक, टिकाऊ और गैर-दलीय किसान लामबंदी नीति बदलवा सकती है।
यह नरगुंड से दिल्ली तक आंदोलन राजनीति की लंबी निरंतरता थी।
MSP की नई राष्ट्रीय राजनीति
कृषि कानून वापसी के बाद MSP की कानूनी गारंटी प्रमुख राष्ट्रीय किसान मुद्दा बनी।
KRRS की ऐतिहासिक मूल्य राजनीति के लिए यह स्वाभाविक प्रश्न था।
1980 के दशक में संगठन लाभकारी मूल्य मांग रहा था।
पुरानी मांग नई आर्थिक भाषा में लौट आई।
2022–26 : संगठन का निरंतर सक्रिय रहना
2020 के बाद KRRS के अलग-अलग गुट लगातार—
इससे एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है—
संगठनात्मक विभाजन के बावजूद रैयत आंदोलन की राजनीतिक परंपरा समाप्त नहीं हुई।
उसकी शक्ति अब एक केंद्रीय मुख्यालय से कम और अनेक क्षेत्रीय नेटवर्कों में अधिक दिखाई देती है।
गुटीय नामों की समस्या
पत्रकारिता और इतिहासलेखन में एक समस्या यह है कि कई समाचार रिपोर्टों में केवल “KRRS” लिखा जाता है, जबकि वास्तविक घटना किसी विशिष्ट गुट से संबंधित हो सकती है।
इसलिए बाद के काल के अध्ययन में आवश्यक है—
अन्यथा अलग-अलग KRRS समूहों की गतिविधियां एक ही केंद्रीकृत संगठन की गतिविधि समझ ली जाती हैं।
यह तथ्यात्मक सावधानी बेहद महत्वपूर्ण है।
नेतृत्व का क्षेत्रीयकरण
नंजुंडास्वामी के बाद नेतृत्व एक राज्यव्यापी अकेले व्यक्ति में केंद्रित नहीं रहा।
इससे क्षेत्रीय नेताओं की भूमिका बढ़ी।
बेंगलुरु और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्कों में अलग।
यह संगठन को अधिक विकेंद्रीकृत बनाता है।
लेकिन राज्यव्यापी रणनीति बनाना कठिन भी करता है।
नेतृत्व लोकतंत्रीकरण का अवसर
इसे केवल कमजोरी के रूप में नहीं देखना चाहिए।
करिश्माई नेता के बाद संगठन यदि अनेक नेताओं को स्थान देता है तो उसका आंतरिक लोकतंत्रीकरण संभव है।
KRRS के लिए यह विभाजन से पुनर्निर्माण की संभावित दिशा है।
महिला नेतृत्व की बढ़ती दृश्यता
नंजुंडास्वामी के बाद महिला किसान और महिला नेतृत्व का प्रश्न अधिक प्रमुख हुआ।
चुक्की नंजुंडास्वामी जैसी नेताओं ने खाद्य संप्रभुता और कृषि-पारिस्थितिकी को महिला किसान की भूमिका से जोड़ा।
यह 1980 के दशक के पुरुष-प्रधान किसान आंदोलन से महत्वपूर्ण बदलाव है।
लेकिन संगठनात्मक स्तर पर व्यापक महिला प्रतिनिधित्व अभी भी चुनौती बना हुआ है।
अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की निरंतरता
La Via Campesina जैसे वैश्विक नेटवर्कों के साथ संबंध ने KRRS की एक धारा को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय बनाए रखा।
जलवायु और कृषि-पारिस्थितिकी विमर्श,
और विभिन्न देशों के किसान आंदोलनों से संपर्क।
इससे नंजुंडास्वामी की अंतरराष्ट्रीय विरासत पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
आंदोलन की भाषा में बदलाव
यह परिवर्तन संगठन की जीवित प्रकृति दर्शाता है।
कॉरपोरेट विरोध का नया रूप
1990 के दशक में कॉरपोरेट विरोध का प्रतीक Cargill और Monsanto थे।
21वीं सदी में प्रश्न अधिक जटिल हो गया।
इसलिए किसान स्वायत्तता की पुरानी अवधारणा अब डेटा और डिजिटल बाजार तक विस्तारित हो सकती है।
जलवायु परिवर्तन और KRRS
अब किसान केवल सिंचाई परियोजना नहीं मांगता।
KRRS की उपलब्धियां और सीमाएं — कृषि मूल्य, कर्ज, बिजली, जल, बीज-संप्रभुता, वैश्वीकरण-विरोध, सामाजिक आधार, संगठनात्मक विभाजन और कर्नाटक की किसान राजनीति पर चार दशकों के प्रभाव का समेकित मूल्यांकन
प्रस्तावना : किसी आंदोलन की सफलता कैसे मापी जाए?
कर्नाटक राज्य रैयत संघ—KRRS—का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि उसकी कितनी मांगें सरकारों ने स्वीकार कीं, कितने धरने सफल हुए या कितनी बार बिजली दर, गन्ना मूल्य अथवा ऋण-वसूली पर सरकार पीछे हटी। चार दशक से अधिक पुराने आंदोलन का प्रभाव उससे कहीं व्यापक है।
किसी किसान आंदोलन की सफलता कम-से-कम चार स्तरों पर मापी जानी चाहिए।
पहला, उसने किसानों को तत्काल क्या आर्थिक राहत दिलाई?
दूसरा, उसने सरकारी कृषि नीति की दिशा कितनी बदली?
तीसरा, उसने किसान की राजनीतिक चेतना और सामाजिक पहचान में क्या परिवर्तन किया?
और चौथा, उसके द्वारा उठाए गए प्रश्न आंदोलन की तत्काल अवधि समाप्त होने के बाद भी कितने प्रासंगिक बने रहे?
इन सभी कसौटियों पर KRRS का इतिहास असाधारण भी है और विरोधाभासी भी।
उसने कृषि मूल्य, बिजली, कर्ज और सिंचाई जैसे रोजमर्रा के प्रश्नों को राज्य राजनीति के केंद्र में पहुंचाया। बीज पर किसान के अधिकार, GATT–WTO, बहुराष्ट्रीय कृषि कंपनियों और खाद्य संप्रभुता जैसे विषयों को उस समय ग्रामीण राजनीतिक विमर्श में उतारा जब वे मुख्यतः विशेषज्ञों की भाषा माने जाते थे। दूसरी ओर वह भूमिहीन खेत मजदूर, महिला भूमि-अधिकार और ग्रामीण जाति-वर्ग की असमानताओं को समान केंद्रीयता नहीं दे पाया। नंजुंडास्वामी के बाद संगठनात्मक विखंडन ने उसकी राज्यव्यापी शक्ति को भी कमजोर किया।
इसीलिए KRRS न तो केवल सफल आंदोलन की कहानी है और न विफल संगठन की।
यह भारतीय किसान राजनीति की संभावनाओं और सीमाओं दोनों का महत्वपूर्ण अध्ययन है।
पहली बड़ी उपलब्धि : किसान को स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति बनाना
किसान को राजनीतिक दलों का केवल वोटदाता न रहने देना।
1980 के नरगुंड–नवलगुंड आंदोलन ने दिखाया कि किसान स्वयं स्वतंत्र रूप से संगठित होकर सरकार की नीति बदलवा सकता है।
इससे पहले गांव की राजनीति अक्सर कांग्रेस, जनता या स्थानीय राजनीतिक नेताओं की संरचनाओं से संचालित होती थी।
और सरकार किसी भी दल की हो, उससे किसान प्रश्न पर संघर्ष किया जा सकता है।
यही स्वतंत्र किसान राजनीति उसकी सबसे स्थायी विरासतों में है।
नरगुंड–नवलगुंड : भय की दीवार टूटना
21 जुलाई 1980 की पुलिस गोलीबारी और उसके बाद हुए राज्यव्यापी किसान उभार की सबसे महत्वपूर्ण विरासत केवल बेहतरमेंट लेवी पर सरकारी रियायत नहीं थी।
उसने ग्रामीण किसान के मन में राज्य के प्रति राजनीतिक संबंध बदल दिया।
संगठित होकर उसका विरोध किया जा सकता है।
यही मनोवैज्ञानिक परिवर्तन हर बड़े सामाजिक आंदोलन की मूल उपलब्धि होती है।
शहीदों की स्मृति ने इसे स्थायी राजनीतिक पूंजी में बदल दिया।
लाभकारी मूल्य को राज्य राजनीति का मुद्दा बनाना
KRRS ने कृषि उपज मूल्य को ऐसी भाषा दी जिसमें किसान केवल सरकारी सहायता का याचक नहीं बल्कि एक उत्पादक था जिसे अपने श्रम और निवेश का न्यायपूर्ण प्रतिफल चाहिए।
यह विमर्श आगे पूरे भारतीय किसान आंदोलन में गहराता गया।
आज लागत आधारित MSP और C2+50 प्रतिशत जैसे सूत्रों पर राष्ट्रीय बहस उसी व्यापक मूल्य-न्याय परंपरा की विकसित अभिव्यक्तियां हैं।
कपास से गन्ने तक मुद्दे की निरंतरता
नरगुंड क्षेत्र में कपास मूल्य संकट ने किसान को यह सिखाया कि अधिक उत्पादन समृद्धि की गारंटी नहीं।
बाद के दशकों में गन्ने ने यही प्रश्न दूसरे रूप में उठाया।
चीनी मिल के लाभ में किसान का हिस्सा कितना?
कटाई और परिवहन घटाने के बाद वास्तविक प्राप्ति कितनी?
इस तरह KRRS ने केवल MSP की तकनीकी बहस नहीं की।
उसने कृषि मूल्य श्रृंखला में किसान की हिस्सेदारी का प्रश्न उठाया।
यह उसकी महत्वपूर्ण आर्थिक उपलब्धि थी।
सीमा : बेहतर मूल्य का लाभ सभी ग्रामीण गरीबों को समान नहीं
लेकिन लाभकारी मूल्य की राजनीति की एक वर्गीय सीमा है।
जिस किसान के पास अधिक बाजार योग्य अधिशेष है, उसे मूल्य वृद्धि से अधिक कुल लाभ होगा।
भूमिहीन मजदूर को प्रत्यक्ष लाभ नहीं।
वह खाद्यान्न खरीदार है, इसलिए कुछ परिस्थितियों में ऊंची खाद्य कीमत उसके घरेलू बजट को नुकसान भी पहुंचा सकती है।
इसलिए “कृषि उत्पाद का ऊंचा मूल्य = पूरे ग्रामीण समाज का लाभ” स्वतः सत्य नहीं।
KRRS इस अंतर्विरोध का पूर्ण समाधान नहीं दे पाया।
कृषि बिजली को सार्वजनिक नीति का प्रश्न बनाना
KRRS ने कृषि बिजली की बहस में बड़ा राजनीतिक परिवर्तन किया।
पंपसेट के लिए बिजली दर अब केवल बिजली बोर्ड की प्रशासनिक टैरिफ तालिका नहीं रही।
संगठन ने सस्ती बिजली, न्यूनतम शुल्क समाप्त करने और खराब आपूर्ति के खिलाफ आंदोलन किए।
इस राजनीति ने पूरे कर्नाटक में यह धारणा मजबूत की कि कृषि बिजली सामान्य व्यावसायिक उपभोग से अलग है।
किसान खाद्य उत्पादन करता है और इसलिए उसे विशेष सार्वजनिक सहायता मिलनी चाहिए।
उत्पादन लागत का व्यापक ढांचा
KRRS की खासियत यह थी कि उसने लागत को केवल उर्वरक या बिजली तक सीमित नहीं किया।
इससे किसान संकट की अधिक वास्तविक आर्थिक तस्वीर सामने आई—
आय = फसल का मूल्य – कुल उत्पादन लागत।
यदि लागत मूल्य से तेज बढ़ती है तो किसान संकट में जाएगा, चाहे उत्पादन कितना भी बढ़े।
सीमा : मुफ्त या सस्ती बिजली का पर्यावरणीय प्रभाव
कृषि बिजली सब्सिडी की राजनीति का दीर्घकालीन विरोधाभास भी सामने आया।
सस्ती बिजली से भूजल पंपिंग बढ़ सकती है।
और सहायता का लाभ अधिक क्षमता वाले पंप तथा अधिक भूमि रखने वाले किसान को अधिक मिल सकता है।
यानी जिस नीति ने किसान लागत घटाई, वह कुछ क्षेत्रों में भविष्य के जल संकट का कारक भी बनी।
KRRS की शुरुआती आर्थिक राजनीति इस पर्यावरणीय विरोधाभास को पर्याप्त रूप से नहीं देख पाई; उसकी बाद की कृषि-पारिस्थितिकी धारा ने इस कमी को आंशिक रूप से संबोधित किया।
किसान ऋण को व्यक्तिगत शर्म से सार्वजनिक संकट बनाना
KRRS की एक अत्यंत महत्वपूर्ण सामाजिक उपलब्धि कृषि ऋण के प्रति दृष्टिकोण बदलना थी।
कर्ज न चुका पाने वाले किसान को केवल “डिफॉल्टर” मानना आसान था।
पहले पूछिए कि वह चुका क्यों नहीं पाया।
इससे ऋण संकट को किसान की निजी नैतिक असफलता के बजाय कृषि अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक समस्या के रूप में देखने का रास्ता खुला।
कुर्की-विरोध की सामाजिक शक्ति
किसी किसान की संपत्ति नीलाम होने पर सामूहिक रूप से पहुंचकर उसे रोकना KRRS की सबसे प्रभावी स्थानीय रणनीतियों में था।
इसने एक बहुत महत्वपूर्ण संदेश दिया—
आर्थिक संकट में सामाजिक संगठन का यह रूप किसान आत्मसम्मान और राजनीतिक साहस दोनों बढ़ाता था।
सीमा : ऋण-माफी स्थायी कृषि नीति नहीं
लेकिन आंदोलन की दीर्घकालीन सीख यह भी है कि लगातार ऋण राहत खेती की मूल समस्या हल नहीं करती।
इसलिए KRRS की परिपक्व आर्थिक दृष्टि की वास्तविक शक्ति तब दिखाई देती है जब कर्ज राहत को मूल्य, लागत और जोखिम नीति से जोड़ा जाए।
सिंचाई परियोजना के लाभार्थी की वास्तविकता सामने लाना
मलप्रभा संघर्ष ने विकास परियोजनाओं की सरकारी भाषा को चुनौती दी।
नहर बनी, इसलिए जमीन का मूल्य बढ़ा, अतः बेहतरमेंट लेवी दो।
यदि नहीं, तो केवल परियोजना के नक्शे पर मुझे लाभार्थी क्यों माना जाए?
इस प्रश्न ने विकास योजनाओं के मूल्यांकन में वास्तविक उपयोगकर्ता अनुभव का महत्व उजागर किया।
कावेरी और महादायी में क्षेत्रीय किसान शक्ति
बाद में KRRS ने जल को क्षेत्रीय अधिकार के प्रश्न से जोड़ा।
कावेरी में दक्षिण कर्नाटक के किसान और महादायी में उत्तर कर्नाटक के किसान संगठित हुए।
इसने जल नीति को चुनावी और सार्वजनिक राजनीति का स्थायी विषय बना दिया।
लेकिन इसका सबसे स्वस्थ रूप वह था जिसमें किसान जल उपलब्धता, फसल और क्षेत्रीय न्याय की मांग करे—न कि दूसरे राज्य के समाज को शत्रु बनाए।
सीमा : ‘हमारा पानी’ की राजनीति
अंतरराज्यीय नदी में क्षेत्रीय भावनाएं अत्यधिक तीखी हो सकती हैं।
ऐसी राजनीति का खतरा है कि नदी विज्ञान, पर्यावरणीय प्रवाह और दूसरे राज्य के किसानों की वैध जरूरतें पीछे चली जाएं।
यदि किसान राजनीति केवल अधिक पानी की मांग करे, लेकिन—
पर प्रश्न न उठाए तो समाधान अधूरा रहेगा।
KRRS की नई कृषि-पारिस्थितिकी दिशा इस पुराने जल आंदोलन को अधिक व्यापक टिकाऊ जल नीति से जोड़ने का अवसर देती है।
बीज को किसान राजनीति का विषय बनाना
KRRS की शायद सबसे विशिष्ट ऐतिहासिक देन है—
बीज पर किसान के अधिकार का राजनीतिकरण।
1990 के दशक में GATT और डंकल प्रस्ताव आम किसान के लिए अत्यंत तकनीकी विषय थे।
नंजुंडास्वामी ने प्रश्न सरल कर दिया—
पारंपरिक किस्म पर किसका अधिकार होगा?
इस राजनीतिक अनुवाद ने बौद्धिक संपदा को गांव की बहस बना दिया।
भविष्य के खतरे को पहले पहचानना
KRRS के कुछ तत्कालीन दावे कानूनी रूप से अतिरंजित थे—TRIPS ने सभी पौध बीजों पर अनिवार्य पेटेंट नहीं थोपा।
लेकिन संगठन ने एक वास्तविक दीर्घकालीन प्रश्न बहुत जल्दी पहचान लिया—
कृषि जैव संसाधनों और बीज उद्योग में निजी बौद्धिक संपदा तथा बाजार केंद्रीकरण किसान की स्वतंत्रता को किस तरह प्रभावित करेंगे?
भारतीय किसान अधिकार कानून से वैचारिक संगति
भारत ने 2001 में पौधा किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण व्यवस्था में किसान को बीज बचाने, उपयोग करने, बोने, पुनः बोने, विनिमय करने और गैर-ब्रांडेड रूप में बेचने के व्यापक अधिकार दिए।
इस कानून को KRRS की अकेली उपलब्धि कहना गलत होगा।
लेकिन 1990 के दशक के किसान और जैव-विविधता आंदोलनों ने यह सुनिश्चित करने में योगदान दिया कि किसान अधिकार को राष्ट्रीय बहस में नजरअंदाज न किया जा सके।
यह KRRS की महत्वपूर्ण अप्रत्यक्ष नीति विरासत है।
सीमा : तकनीक और कंपनी को एक मानने का जोखिम
KRRS ने कई बार नई जैव-प्रौद्योगिकी और कॉरपोरेट नियंत्रण के प्रश्न को एक साथ रखा।
कोई तकनीक वैज्ञानिक रूप से उपयोगी हो सकती है और उसका स्वामित्व ढांचा समस्याग्रस्त।
या कंपनी निजी हो सकती है लेकिन उसका बीज किसान के लिए लाभकारी।
इसलिए आधुनिक मूल्यांकन में तीन अलग प्रश्न होने चाहिए—
और स्वामित्व व्यवस्था न्यायपूर्ण है या नहीं?
KRRS की आंदोलनकारी राजनीति में ये अंतर हमेशा पर्याप्त स्पष्ट नहीं रहे।
कारगिल विरोध की ऐतिहासिक शक्ति
कारगिल कार्यालय और बीज इकाइयों के विरुद्ध कार्रवाइयों ने KRRS को भारत और दुनिया में असाधारण पहचान दी।
इससे पहली बार बड़ी संख्या में लोगों ने किसान और बहुराष्ट्रीय बीज उद्योग के संबंध पर ध्यान दिया।
मीडिया की दृष्टि से यह अत्यंत प्रभावशाली रणनीति थी।
KRRS ने एक तकनीकी आर्थिक विवाद को दृश्य राजनीतिक घटना में बदल दिया।
सीमा : संपत्ति-विनाश और लोकतांत्रिक वैधता
लेकिन कारगिल तथा अन्य प्रत्यक्ष कार्रवाइयों में संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की रणनीति गंभीर आलोचना का विषय रही।
नीति विरोध और संपत्ति-विनाश अलग बातें हैं।
संगठन ने व्यक्ति के खिलाफ हिंसा और कॉरपोरेट संपत्ति के खिलाफ कार्रवाई में नैतिक अंतर किया, लेकिन कानून और लोकतांत्रिक राजनीति की दृष्टि से यह विभाजन सार्वभौमिक रूप से स्वीकार्य नहीं।
इसलिए KRRS की प्रत्यक्ष कार्रवाई को न तो केवल “वीर किसान प्रतिरोध” के रूप में रोमानी बनाया जाना चाहिए, न उसके पीछे के वास्तविक आर्थिक प्रश्नों को कार्रवाइयों के कारण खारिज किया जाना चाहिए।
विश्व व्यापार को किसान की भाषा में उतारना
KRRS का सबसे बड़ा बौद्धिक योगदान यह था कि उसने किसान की राजनीतिक दृष्टि का पैमाना बदल दिया।
आपकी फसल कीमत विश्व बाजार से जुड़ सकती है।
आयात नीति खेत को प्रभावित कर सकती है।
विदेशी कृषि सब्सिडी यहां कीमत गिरा सकती है।
इससे किसान राजनीति का भूगोल बदल गया।
विकसित देशों की कृषि सहायता पर प्रश्न
KRRS ने एक वास्तविक असमानता उजागर की—
विश्व बाजार में सभी किसान समान आर्थिक क्षमता से प्रवेश नहीं करते।
पूंजीकृत विकसित देशों के कृषि उत्पादकों और छोटे भारतीय किसान की वित्तीय तथा संस्थागत परिस्थितियां बहुत अलग हो सकती हैं।
इसलिए केवल टैरिफ घटाना अपने आप “निष्पक्ष बाजार” नहीं बनाता।
आज भी कृषि WTO वार्ताओं में घरेलू सहायता और विकासशील देशों की नीति-स्वतंत्रता विवाद का बड़ा विषय हैं।
इस दृष्टि से KRRS की आलोचना दीर्घजीवी सिद्ध हुई।
सीमा : वैश्वीकरण को एकतरफा खतरे के रूप में देखना
लेकिन वैश्विक बाजार किसान को अवसर भी दे सकता है—
KRRS की राजनीति ने इन संभावनाओं की तुलना में जोखिमों पर अधिक बल दिया।
महाराष्ट्र के शरद जोशी जैसे किसान नेताओं ने ठीक विपरीत तर्क दिया कि भारतीय किसान को विश्व बाजार की स्वतंत्रता से लाभ हो सकता है।
इस बहस में कोई सार्वभौमिक सरल उत्तर नहीं।
किस फसल, किस किसान और किस बाजार की बात है—यह निर्णायक है।
एक क्षेत्रीय संगठन का वैश्विक नेटवर्क बनना
La Via Campesina, People’s Global Action और Intercontinental Caravan से KRRS का जुड़ना उसकी असाधारण उपलब्धि थी।
कर्नाटक के गांवों के किसान यूरोप में WTO और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विरुद्ध प्रदर्शन कर रहे थे।
इसने छोटे किसान को एक वैश्विक राजनीतिक पहचान दी।
वह स्वयं को अकेला भारतीय उत्पादक नहीं, दुनिया के छोटे उत्पादकों के व्यापक समुदाय का हिस्सा देखने लगा।
सीमा : वैश्विक एजेंडा और स्थानीय किसान के बीच दूरी
KRRS के भीतर यही आलोचना समय-समय पर उभरी।
शेतकरी संगठन, भारतीय किसान यूनियन और KRRS — महाराष्ट्र, उत्तर भारत और कर्नाटक के ‘नए किसान आंदोलनों’ की तुलनात्मक समीक्षा; नेतृत्व, सामाजिक आधार, लाभकारी मूल्य, बाजार, राज्य, वैश्वीकरण और आंदोलन-पद्धति के अंतर
प्रस्तावना : एक नाम, तीन अलग किसान राजनीतिक अर्थशास्त्र
1980 के दशक से भारत में उभरे जिन किसान संगठनों को प्रायः “नए किसान आंदोलन” कहा गया, उनमें महाराष्ट्र का शेतकरी संगठन, उत्तर भारत की भारतीय किसान यूनियन—BKU और कर्नाटक का कर्नाटक राज्य रैयत संघ—KRRS सबसे महत्वपूर्ण उदाहरणों में हैं।
तीनों के बीच उल्लेखनीय समानताएं थीं।
तीनों का मुख्य सामाजिक आधार मुख्यतः भूमिधर किसान थे।
तीनों ने लाभकारी कृषि मूल्य, बिजली, सिंचाई, ऋण और कृषि लागत के प्रश्न उठाए।
तीनों ने राजनीतिक दलों से स्वतंत्र किसान शक्ति बनाने का दावा किया।
तीनों ने बड़ी ग्रामीण लामबंदी और सड़क आंदोलन का उपयोग किया।
और तीनों ने कांग्रेस-प्रधान पुरानी ग्रामीण राजनीति को चुनौती दी।
लेकिन इसी बिंदु से उनके रास्ते अलग होने लगे।
शरद जोशी के शेतकरी संगठन ने किसान की मुक्ति को मुख्यतः राज्य-नियंत्रण से मुक्त बाजार और विश्व बाजार तक पहुंच में देखा।
महेंद्र सिंह टिकैत की BKU ने किसान को स्थानीय सामाजिक समुदाय, पंचायत परंपरा और राज्य से व्यावहारिक आर्थिक रियायत हासिल करने वाली दबाव-शक्ति के रूप में संगठित किया।
एम. डी. नंजुंडास्वामी के KRRS ने पहले लाभकारी मूल्य और सस्ती लागत की राजनीति की, लेकिन आगे जाकर कॉरपोरेट कृषि, बीज पेटेंट, GATT–WTO और वैश्वीकरण के विरोध तथा खाद्य-संप्रभुता की दिशा अपना ली।
इसलिए इन तीनों को एक ही “धनी किसान आंदोलन” अथवा “लाभकारी मूल्य आंदोलन” कह देना अपर्याप्त है।
उनकी तुलना भारतीय किसान राजनीति के तीन अलग रास्ते सामने लाती है—
बाजार की स्वतंत्रता, राज्य पर दबाव और किसान-संप्रभुता।
‘नए किसान आंदोलन’ का अर्थ
1960 और 1970 के दशकों तक किसान राजनीति में भूमि सुधार, जमींदारी उन्मूलन, बटाईदार अधिकार और कृषि मजदूर के प्रश्न महत्वपूर्ण थे।
हरित क्रांति और कृषि बाजार के विस्तार के बाद नई परिस्थितियां पैदा हुईं।
सरकार कृषि कीमत क्यों नियंत्रित करती है?
उत्पादन बढ़ने के बाद भी किसान की आय क्यों नहीं बढ़ती?
यहीं से 1970 के अंतिम वर्षों और 1980 के दशक में नए प्रकार के किसान आंदोलनों का विस्तार हुआ।
इनका संघर्ष मुख्यतः भूमि प्राप्त करने से आगे कृषि से आय प्राप्त करने पर केंद्रित था।
तीन संगठन : तीन भौगोलिक पृष्ठभूमियां
शेतकरी संगठन का सामाजिक आधार महाराष्ट्र की बाजारोन्मुख कृषि में विकसित हुआ।
BKU पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बाद में उत्तर भारत के उस किसान क्षेत्र में शक्तिशाली हुई जहां—
KRRS कर्नाटक की कहीं अधिक विविध कृषि से निकला—
इस भौगोलिक अंतर ने तीनों की राजनीति की दिशा भी प्रभावित की।
नेतृत्व : शरद जोशी, टिकैत और नंजुंडास्वामी
इन तीन आंदोलनों की पहचान तीन अत्यंत अलग नेताओं से बनी।
शरद जोशी पूर्व नौकरशाह और आर्थिक विश्लेषण पर आधारित वक्ता थे।
महेंद्र सिंह टिकैत ग्रामीण चौधरी और पंचायत शैली के जननेता थे।
एम. डी. नंजुंडास्वामी कानूनविद, समाजवादी विचारक और अंतरराष्ट्रीय किसान आंदोलन के बौद्धिक नेता थे।
लेकिन उनका करिश्मा अलग प्रकार का था।
वैचारिक प्रतिरोध और राजनीतिक नाटकीयता।
शरद जोशी : किसान बनाम ‘इंडिया’
शरद जोशी की किसान राजनीति की सबसे विशिष्ट अवधारणाओं में से एक थी—
उनके विमर्श में “भारत” मुख्यतः ग्रामीण उत्पादक समाज था, जबकि “इंडिया” राज्य-संरक्षित शहरी, औद्योगिक और नौकरशाही अर्थव्यवस्था का प्रतीक था।
उनका तर्क था कि भारतीय राज्य जानबूझकर कृषि उत्पादों का मूल्य दबाता है ताकि शहर और उद्योग को सस्ता भोजन तथा कच्चा माल मिले।
यह कृषि से गैर-कृषि क्षेत्र में अदृश्य संसाधन हस्तांतरण है।
इसलिए किसान की मुख्य मांग होनी चाहिए—
महेंद्र सिंह टिकैत : चौपाल से राष्ट्रीय किसान मंच तक
महेंद्र सिंह टिकैत की शैली शरद जोशी से बिल्कुल अलग थी।
उनकी शक्ति आर्थिक सिद्धांत की तुलना में ग्रामीण सामाजिक संगठन में थी।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट किसान समाज की—
टिकैत स्वयं को अक्सर पारंपरिक ग्रामीण किसान प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत करते थे।
उनका आंदोलन वैचारिक घोषणापत्र से अधिक प्रत्यक्ष मांग और जन दबाव पर आधारित था।
नंजुंडास्वामी : किसान से वैश्विक नागरिक तक
नंजुंडास्वामी की विशिष्टता यह थी कि उन्होंने किसान राजनीति की सीमा लगातार विस्तृत की।
खाद्य संप्रभुता तथा कृषि-पारिस्थितिकी।
इसलिए KRRS के किसान को उन्होंने केवल उत्पादक या मतदाता नहीं माना।
वह स्थानीय संसाधनों, राष्ट्रीय नीति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर अधिकार मांगने वाला राजनीतिक नागरिक था।
सामाजिक आधार : क्या तीनों ‘धनी किसान’ आंदोलन थे?
तीनों आंदोलनों पर अकादमिक आलोचना हुई कि उनका मुख्य आधार मध्यम और अपेक्षाकृत संपन्न भूमिधर किसान था।
जिस किसान के पास बाजार में बेचने योग्य फसल है, वही कृषि मूल्य आंदोलन का सबसे प्रत्यक्ष हितधारक है।
लेकिन तीनों को केवल बड़े किसानों का आंदोलन कहना भी गलत होगा।
छोटे और मध्यम किसान बड़ी संख्या में शामिल थे।
विशेषकर बिजली, ऋण और फसल मूल्य संकट छोटे किसान के लिए अधिक विनाशकारी हो सकते थे।
इनका मूल आधार भूमिधर उत्पादक किसान था, न कि समूचा ग्रामीण गरीब समाज।
भूमिहीन मजदूर : तीनों की साझा सीमा
तीनों आंदोलनों की सबसे महत्वपूर्ण समान सीमा थी—
भूमिहीन कृषि मजदूर उनके केंद्रीय सामाजिक आधार में नहीं था।
इसलिए ग्रामीण वर्ग संबंधों का अंतर्विरोध तीनों के भीतर मौजूद रहा।
वामपंथी आलोचना ने इसी बिंदु पर इन्हें भूमिधर किसान राजनीति कहा।
जाति और सामाजिक संरचना
BKU की सामाजिक पहचान पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट किसान आधार से विशेष रूप से जुड़ी रही।
हालांकि उसके आंदोलनों में अन्य जातियों के किसान भी शामिल थे।
शेतकरी संगठन महाराष्ट्र के मराठा-कुनबी और अन्य कृषक समूहों तक फैला।
KRRS में वोक्कालिगा, लिंगायत और अन्य कृषक समुदाय शामिल हुए।
इसलिए तीनों ने जातीय सीमाओं के ऊपर “किसान” पहचान बनाने की कोशिश की।
लेकिन किसी ने भी ग्रामीण जाति संरचना को पूरी तरह समाप्त नहीं किया।
तीनों का साझा सूत्र
तीनों आंदोलनों के बीच सबसे बड़ी समानता थी—
किसान को अपनी लागत से ऊपर न्यायपूर्ण आय मिलनी चाहिए।
यहीं तीनों की विचारधारा अलग होती है।
राज्य मूल्य नियंत्रण का विरोध
शरद जोशी का मानना था कि समस्या यह नहीं कि बाजार किसान को कम मूल्य देता है।
समस्या यह है कि राज्य बाजार को किसान के खिलाफ विकृत करता है।
आवश्यक वस्तु कानून से नियंत्रण करता है।
राज्य पीछे हटे और किसान को बाजार स्वतंत्रता मिले।
‘न्यूनतम समर्थन’ से अधिक ‘मुक्त मूल्य’
इस दृष्टि से शेतकरी संगठन केवल अधिक MSP की राजनीति तक सीमित नहीं था।
किसान को उस बाजार में बेचने दें जहां उसे अधिक मूल्य मिले।
यदि विदेश में बेहतर भाव है तो निर्यात क्यों रोका जाए?
यदि व्यापारी अधिक मूल्य देता है तो सरकारी मंडी में क्यों बांधा जाए?
यह किसान स्वतंत्रता की उदार आर्थिक व्याख्या थी।
टिकैत की मूल्य राजनीति
BKU का दृष्टिकोण अधिक व्यावहारिक था।
उसकी राजनीति राज्य के पूर्ण पीछे हटने की नहीं थी।
वह राज्य को किसान के पक्ष में हस्तक्षेप करने के लिए मजबूर करना चाहती थी।
राज्य समस्या भी है, लेकिन समाधान का साधन भी।
शुरुआती समानता
KRRS के शुरुआती मूल्य संघर्षों में शेतकरी संगठन और BKU दोनों की झलक दिखाई देती है।
इस चरण में तीनों नए किसान आंदोलनों की आर्थिक मांगें काफी समान थीं।
लेकिन 1990 के दशक के बाद KRRS अलग दिशा में चला गया।
शरद जोशी : राज्य पर अविश्वास
शरद जोशी के लिए भारतीय राज्य ने कृषि के साथ ऐतिहासिक अन्याय किया।
किसान को सरकार से अधिक स्वतंत्र बाजार चाहिए।
यह दृष्टि आर्थिक उदारीकरण के कुछ तत्वों के साथ आगे सामंजस्य स्थापित कर सकी।
BKU : मजबूत राज्य, किसान के पक्ष में
BKU की मांगों में राज्य केंद्रीय बना रहा।
अर्थात BKU राज्य को समाप्त नहीं करना चाहती।
वह राज्य की किसान-हितैषी भूमिका बढ़ाना चाहती है।
KRRS : राज्य और कॉरपोरेट दोनों पर अविश्वास
इसलिए केवल सरकारी नियंत्रण हटाना समाधान नहीं।
यदि राज्य हटे और उसकी जगह Monsanto या Cargill आ जाए तो किसान स्वतंत्र कैसे हुआ?
यहीं KRRS शेतकरी संगठन से निर्णायक रूप से अलग होता है।
तीनों की साझा राजनीति
सस्ती कृषि बिजली तीनों नए किसान आंदोलनों की प्रमुख मांग रही।
क्योंकि पंपसेट सिंचाई ने खेती को बिजली पर निर्भर किया।
BKU ने उत्तर प्रदेश में बिजली दर के विरुद्ध विशाल आंदोलन किए।
KRRS ने कर्नाटक में कृषि बिजली और न्यूनतम शुल्क का विरोध किया।
महाराष्ट्र में भी सिंचाई और कृषि लागत महत्वपूर्ण रहे।
इससे “इनपुट लागत कम करो” नया किसान आंदोलन का साझा एजेंडा बना।
विरोधाभास : मुक्त बाजार और सब्सिडी
यहीं नए किसान आंदोलनों की एक रोचक वैचारिक समस्या थी।
यदि बाजार को मुक्त रखना है तो बिजली और अन्य इनपुट पर सरकारी सब्सिडी क्यों?
शेतकरी संगठन के आर्थिक उदारवाद को इस विरोधाभास का सामना अधिक करना पड़ा।
KRRS ने बाद में इसका अलग उत्तर खोजा—
सब्सिडी की जगह बाहरी इनपुट निर्भरता ही घटाओ।
यहीं से उसका कृषि-पारिस्थितिकी की ओर जाना महत्वपूर्ण बनता है।
BKU और किसान कर्ज
BKU की किसान राजनीति में कर्ज राहत और वसूली विरोध प्रमुख रहे।
ग्रामीण किसान को तहसील और बैंक प्रशासन के सामने सामूहिक शक्ति देने में संगठन प्रभावी था।
टिकैत की पंचायत शैली किसान को प्रशासनिक भय से बाहर लाती थी।
KRRS और कुर्की विरोध
KRRS ने भी बैंक नीलामी और संपत्ति कुर्की को सामूहिक किसान प्रश्न बनाया।
उसका कानूनी आयाम अधिक मजबूत था क्योंकि नंजुंडास्वामी स्वयं कानूनविद थे।
इसलिए ऋण को कृषि संरचना से जोड़कर देखने की उसकी क्षमता विशेष थी।
शेतकरी संगठन का मूल जोर मूल्य पर
यदि किसान को न्यायपूर्ण बाजार मूल्य मिले तो बार-बार ऋण-माफी की जरूरत ही कम होगी।
इसलिए उसने ऋण संकट के मूल में कृषि के प्रतिकूल विनिमय संबंध को देखा।
इस दृष्टि में कर्ज समस्या का स्थायी समाधान था—
शेतकरी संगठन : आर्थिक नाकेबंदी
शेतकरी संगठन की प्रमुख रणनीतियों में—
प्याज और दूध जैसे उत्पादों की आपूर्ति रोकना राज्य पर आर्थिक दबाव बनाने की प्रभावी तकनीक थी।
यदि किसान उत्पाद न भेजे तो शहर चल नहीं सकता।
BKU : धरना और घेराव की विशाल शक्ति
BKU की सबसे प्रसिद्ध आंदोलन शैली थी—
1988 का दिल्ली का बोट क्लब किसान प्रदर्शन इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।
हजारों किसान ट्रैक्टर और पशुओं के साथ राजधानी में टिके रहे।
इसके पहले मेरठ कमिश्नरी का लंबा घेराव भी टिकैत राजनीति की पहचान बना।
KRRS : सत्याग्रह से प्रत्यक्ष कार्रवाई
KRRS ने धरना और बंद के साथ अधिक नाटकीय प्रत्यक्ष कार्रवाई भी अपनाई।
उसके आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय मीडिया में ले गए।
यह तीनों में सबसे अधिक वैचारिक और प्रदर्शनकारी प्रत्यक्ष कार्रवाई थी।
तीन अलग गांधीवादी प्रयोग
तीनों आंदोलनों में गैर-दलीयता और सविनय अवज्ञा जैसी गांधीवादी परंपरा की कुछ छाप थी।
BKU की पंचायत और शांतिपूर्ण सामूहिक धरना शैली ग्रामीण गांधीवादी जनसंघर्ष से मेल खाती थी।
KRRS ने “सत्याग्रह” और “स्वदेशी” शब्द सीधे अपनाए।
शेतकरी संगठन में गांधीवादी प्रतीकवाद की तुलना में आर्थिक स्वतंत्रता की उदारवादी भाषा अधिक मजबूत रही।
जोशी : बौद्धिक नेतृत्व
उन्होंने किसान को बताया कि उसकी गरीबी उत्पादन क्षमता की कमी से नहीं, मूल्य व्यवस्था से भी पैदा होती है।
उनकी राजनीति में आर्थिक सिद्धांत का स्थान असाधारण था।
टिकैत : सामुदायिक नेतृत्व
वे किसान के बीच “चौधरी” की सामाजिक शैली में संवाद करते थे।
इसलिए उनकी अपील अत्यंत व्यापक और तत्काल हो सकती थी।
नंजुंडास्वामी : आंदोलनकारी-बौद्धिक नेतृत्व
वे एक ओर गांव में किसान रैली कर सकते थे।
इसी कारण KRRS की वैचारिक यात्रा सबसे व्यापक हुई।
शेतकरी संगठन और चुनावी राजनीति
शरद जोशी ने अंततः स्वतंत्र भारत पक्ष जैसे चुनावी प्रयोग और बाद में व्यापक राजनीतिक गठबंधनों के माध्यम से प्रत्यक्ष राजनीति में प्रवेश किया।
उनका आर्थिक उदारवाद धीरे-धीरे कुछ दक्षिणपंथी आर्थिक नीतियों के निकट आया।
इससे आंदोलन की प्रारंभिक गैर-दलीय पहचान में परिवर्तन आया।
BKU और गैर-दलीयता
महेंद्र सिंह टिकैत लंबे समय तक BKU को गैर-दलीय बनाए रखने पर जोर देते रहे।
लेकिन स्थानीय सामाजिक और जातीय राजनीति से संगठन पूरी तरह बाहर नहीं रह सकता था।
बाद के वर्षों में BKU के विभिन्न गुटों के राजनीतिक संबंध अलग-अलग दिशाओं में विकसित हुए।
यह गैर-दलीय किसान संगठनों की सामान्य चुनौती है।
KRRS और कन्नड़ देश
नंजुंडास्वामी का कन्नड़ देश प्रयास आंदोलन शक्ति को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में बदलने की कोशिश था।
लेकिन व्यापक चुनावी सफलता नहीं मिली।
इससे तीनों आंदोलनों की एक साझा सीमा सामने आती है—
किसान आंदोलन की भीड़ को स्थायी चुनावी वोट में बदलना कठिन है।
शरद जोशी : वैश्वीकरण में अवसर
1991 के बाद शरद जोशी ने आर्थिक उदारीकरण को किसान के लिए संभावित अवसर माना।
यदि भारतीय किसान प्रतिस्पर्धी है तो उसे विश्व बाजार में बेचने दें।
किसान को वैश्विक मूल्य प्राप्त करने दें।
KRRS : वैश्वीकरण में असमान शक्ति
नंजुंडास्वामी ने ठीक विपरीत खतरा देखा।
भारतीय छोटा किसान और बहुराष्ट्रीय कंपनी समान शक्ति से बाजार में प्रवेश नहीं करते।
इसलिए मुक्त बाजार असमान शक्ति को और बढ़ा सकता है।
महाराष्ट्र में आर्थिक किसान पहचान
मराठी अस्मिता उसकी मुख्य वैचारिक धुरी नहीं बनी।
KRRS का इतिहासलेखन — ‘नए किसान आंदोलन’, संपन्न किसान राजनीति, नवउदारवाद-विरोध, पर्यावरणवाद और खाद्य-संप्रभुता के संदर्भ में प्रमुख विद्वानों, विवादों और व्याख्याओं की आलोचनात्मक समीक्षा
प्रस्तावना : KRRS को इतिहासकारों ने किस रूप में देखा?
कर्नाटक राज्य रैयत संघ का इतिहास केवल घटनाओं का इतिहास नहीं है; यह व्याख्याओं का इतिहास भी है। अलग-अलग विद्वानों ने KRRS को अलग दृष्टि से समझा है।
किसी ने इसे 1980 के दशक के “नए किसान आंदोलनों” का हिस्सा माना।
किसी ने इसे मध्यम और संपन्न किसानों की राजनीति कहा।
किसी ने राज्य-नियंत्रित कृषि मूल्य व्यवस्था के विरुद्ध बाजारोन्मुख किसान विद्रोह के रूप में देखा।
किसी ने 1990 के दशक के बाद इसे नवउदारवाद-विरोधी और वैश्वीकरण-विरोधी सामाजिक आंदोलन माना।
और बाद के अध्ययनों ने इसे बीज-संप्रभुता, कृषि-पारिस्थितिकी और खाद्य-संप्रभुता के वैश्विक किसान नेटवर्क से जोड़कर पढ़ा।
इन व्याख्याओं में केवल अकादमिक मतभेद नहीं हैं। वे इस मूल प्रश्न पर अलग-अलग उत्तर देती हैं—
या इन सभी का अलग-अलग समय में बदलता हुआ संयोजन?
इस अध्याय का उद्देश्य किसी एक व्याख्या को अंतिम सत्य घोषित करना नहीं, बल्कि इन सभी प्रमुख दृष्टियों की आलोचनात्मक समीक्षा करना है।
‘नए किसान आंदोलन’ की श्रेणी
1980 के दशक में महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और कर्नाटक में उभरे किसान संगठनों को कई विद्वानों ने एक साझा श्रेणी में रखा—New किसान’ Movements।
इन आंदोलनों की कुछ सामान्य विशेषताएं बताई गईं—
भूमि सुधार से अधिक लाभकारी मूल्य पर जोर,
राजनीतिक दलों से स्वतंत्रता का दावा,
मध्यम और बाजारोन्मुख किसानों की भागीदारी,
इस ढांचे में KRRS को शेतकरी संगठन और BKU के साथ रखा गया।
यह वर्गीकरण उपयोगी था, क्योंकि इससे 1970–80 के दशक की कृषि राजनीति में आए परिवर्तन को समझा जा सकता था।
लेकिन इसकी सीमा यह थी कि 1990 के दशक के बाद KRRS की वैचारिक यात्रा इस श्रेणी से आगे निकल गई।
‘नया’ क्या था?
“नया किसान आंदोलन” पुरानी किसान राजनीति से कई मायनों में अलग था।
पुरानी किसान राजनीति में अक्सर प्रश्न थे—
इस परिवर्तन को अनेक विद्वानों ने हरित क्रांति और बाजारोन्मुख कृषि के विस्तार से जोड़ा।
KRRS इस विश्लेषण में फिट बैठता है, विशेषकर उसके शुरुआती दौर में।
एम. वी. नाडकर्णी की व्याख्या
KRRS पर शुरुआती महत्वपूर्ण अकादमिक अध्ययनों में एम. वी. नाडकर्णी का काम विशेष महत्व रखता है।
उन्होंने कर्नाटक किसान आंदोलन की मांगों, सामाजिक आधार और राजनीतिक अर्थशास्त्र का विश्लेषण करते हुए दिखाया कि संगठन केवल भावनात्मक ग्रामीण विद्रोह नहीं था, बल्कि कृषि मूल्य, बिजली, सिंचाई, ऋण और कर की सुसंगत मांगों पर आधारित था।
उनकी दृष्टि से KRRS का उभार आधुनिक कृषि के भीतर पैदा हुए असंतुलन से जुड़ा था—
लेकिन किसान को न्यायपूर्ण प्रतिफल नहीं मिला।
यह विश्लेषण KRRS की आर्थिक राजनीति को समझने के लिए आज भी अत्यंत उपयोगी है।
नाडकर्णी की सीमा
लेकिन नाडकर्णी की शुरुआती व्याख्या उस KRRS को देखती है जो अभी मुख्यतः राज्य-स्तरीय आर्थिक मांगों पर केंद्रित था।
वाला रूप पूरी तरह विकसित नहीं हुआ था।
इसलिए बाद के KRRS को केवल शुरुआती आर्थिक मांगों के आधार पर समझना अधूरा होगा।
संपन्न किसान राजनीति की थीसिस
नए किसान आंदोलनों पर सबसे प्रभावशाली आलोचनाओं में एक थी—
ये “rich किसान” या “prosperous किसान” movements हैं।
तर्क था कि इनके मुख्य लाभार्थी वे किसान हैं जिनके पास बाजार में बेचने योग्य अधिशेष है।
भूमिहीन मजदूर की प्राथमिकता इनमें नहीं।
इस दृष्टि से KRRS ग्रामीण गरीबों का आंदोलन नहीं, बल्कि भूमिधर उत्पादक किसानों का दबाव समूह था।
इस आलोचना में कितना सत्य?
इस आलोचना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
KRRS का केंद्रीय सामाजिक आधार भूमिधर किसान थे।
गन्ना, कपास, धान और अन्य बाजारोन्मुख फसलों के उत्पादक उसकी राजनीति में प्रमुख रहे।
उच्च कृषि मूल्य का लाभ बेचने योग्य अधिशेष रखने वाले किसान को अधिक मिलता है।
भूमिहीन खेत मजदूर की मुख्य मांगें अलग थीं।
लेकिन “संपन्न किसान आंदोलन” शब्द कई बार वास्तविक सामाजिक विविधता को अत्यधिक सरल कर देता है।
छोटा और मध्यम किसान कहां गया?
KRRS के आंदोलनों में बड़ी संख्या में छोटे और मध्यम किसान भी शामिल थे।
इन किसानों के लिए बिजली, कर्ज और मूल्य संकट और भी अधिक गंभीर हो सकता था।
एक बड़े किसान के पास घाटा सहने के लिए संपत्ति हो सकती है।
छोटा किसान एक खराब फसल से ही संकट में पड़ सकता है।
इसलिए केवल बड़े भूमिधरों के आंदोलन के रूप में KRRS को पढ़ना वास्तविकता से मेल नहीं खाता।
KRRS भूमिधर कृषकों का व्यापक आंदोलन था, जिसमें वर्गीय विविधता थी, लेकिन भूमिहीन मजदूर केंद्रीय आधार में नहीं थे।
गेल ऑम्वेट और नए सामाजिक आंदोलन
गेल ऑम्वेट जैसे विद्वानों ने भारत में पारंपरिक वर्ग राजनीति से बाहर उभरते नए सामाजिक आंदोलनों—किसान, महिला, दलित, पर्यावरण—को व्यापक लोकतांत्रिक परिवर्तन की दृष्टि से पढ़ा।
नए किसान आंदोलनों की उनकी व्याख्या में ग्रामीण उत्पादक वर्गों की राज्य और शहरी-औद्योगिक सत्ता के खिलाफ स्वायत्तता का प्रश्न महत्वपूर्ण था।
यह दृष्टि KRRS को केवल वर्गीय हित समूह के रूप में देखने से आगे जाती है।
क्या किसान आधुनिक राज्य और विकास मॉडल के भीतर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक आवाज बना रहा है?
KRRS के गैर-दलीय चरित्र को समझने में यह दृष्टि उपयोगी है।
‘भारत बनाम इंडिया’ और KRRS
हालांकि “भारत बनाम इंडिया” की अवधारणा शरद जोशी से अधिक जुड़ी है, लेकिन नए किसान आंदोलन पर लिखने वाले कई विद्वानों ने ग्रामीण उत्पादक और शहरी-औद्योगिक हितों के बीच संघर्ष को व्यापक ढांचे में देखा।
KRRS की शुरुआती राजनीति में भी यह तत्व था—
यानी ग्रामीण उत्पादक को राष्ट्रीय विकास की कीमत क्यों चुकानी चाहिए?
लेकिन KRRS आगे चलकर केवल “ग्रामीण बनाम शहरी” ढांचे से भी आगे गया।
उसने कॉरपोरेट और वैश्विक शक्ति को नया विरोधी बनाया।
टॉम ब्रास और वर्ग आलोचना
कुछ मार्क्सवादी विद्वानों ने नए किसान आंदोलनों की “किसान एकता” की भाषा पर गहरी आलोचना की।
उनका तर्क था कि “किसान” शब्द ग्रामीण वर्ग विभाजनों को छुपा देता है।
इस दृष्टि से KRRS की “रैयत” पहचान राजनीतिक रूप से प्रभावी हो सकती है, लेकिन विश्लेषणात्मक रूप से वर्ग अंतर मिटा देती है।
यह आलोचना विशेष रूप से अध्याय 16 में देखे गए सामाजिक आधार के प्रश्न से मेल खाती है।
वर्गवादी व्याख्या की सीमा
लेकिन शुद्ध वर्ग विश्लेषण भी KRRS की पूरी राजनीति नहीं समझा सकता।
यदि संगठन केवल संपन्न किसान हित का प्रतिनिधि होता, तो—
जैसे मुद्दों पर उसकी गहरी सक्रियता को समझना कठिन होता।
इन प्रश्नों में सीधे आर्थिक लाभ से अधिक व्यापक सामाजिक और पारिस्थितिक चिंताएं थीं।
इसलिए वर्ग विश्लेषण आवश्यक है, लेकिन पर्याप्त नहीं।
समाजवादी–लोहियावादी व्याख्या
नंजुंडास्वामी की वैचारिक पृष्ठभूमि को देखते हुए कई अध्येताओं ने KRRS को लोहियावादी समाजवादी परंपरा से जोड़ा।
इस दृष्टि में संगठन की विशेषताएं थीं—
यह व्याख्या KRRS की गैर-दलीयता, कन्नड़ स्वाभिमान और स्वदेशी राजनीति को समझने में मदद करती है।
गांधीवादी व्याख्या
इसलिए कई पर्यवेक्षकों ने नंजुंडास्वामी को गांधीवादी किसान नेता भी कहा।
लेकिन यहां महत्वपूर्ण विरोधाभास है।
गांधीवादी अहिंसा और KRRS की कुछ संपत्ति-विरोधी प्रत्यक्ष कार्रवाइयों में तनाव स्पष्ट है।
Cargill कार्यालय या GM परीक्षण खेतों पर कार्रवाई शुद्ध गांधीवादी सत्याग्रह की परंपरा में आसानी से फिट नहीं बैठती।
‘गांधीवादी’ या ‘उग्र गांधीवादी’?
कुछ अध्येताओं ने KRRS को एक प्रकार की radical Gandhian राजनीति के रूप में देखा है।
गांधी के स्वदेशी और विकेंद्रीकरण की भाषा,
लेकिन प्रत्यक्ष कार्रवाई में कहीं अधिक आक्रामकता।
यह श्रेणी KRRS की जटिलता को आंशिक रूप से पकड़ती है।
लेकिन फिर भी यह याद रखना होगा कि नंजुंडास्वामी पर केवल गांधी नहीं, लोहिया, समाजवाद और वैश्विक प्रतिरोध राजनीति का भी प्रभाव था।
1991 के बाद इतिहासलेखन का नया मोड़
1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद KRRS का स्वरूप बदलने लगा।
अब विद्वानों के लिए इसे केवल “लाभकारी मूल्य किसान आंदोलन” कहना पर्याप्त नहीं था।
ने इसे नवउदारवाद-विरोधी सामाजिक आंदोलन के रूप में स्थापित किया।
यहीं से KRRS पर अध्ययन अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक अर्थशास्त्र और वैश्वीकरण studies में भी प्रवेश करता है।
नवउदारवाद क्या?
नवउदारवाद शब्द का उपयोग अक्सर बहुत व्यापक रूप में किया जाता है।
KRRS का विरोध इन सभी का समान रूप से नहीं था।
किसान की निर्णय क्षमता और संसाधनों पर कॉरपोरेट शक्ति का विस्तार।
इसलिए उसे केवल “मुक्त बाजार विरोधी” कहना भी अपर्याप्त है।
नवउदारवाद-विरोध की ताकत
यह व्याख्या KRRS के 1990 के दशक के रूप को अच्छी तरह पकड़ती है।
Cargill और Monsanto के विरुद्ध कार्रवाई,
सभी वैश्विक नवउदारवादी व्यवस्था की आलोचना से जुड़ते हैं।
यहीं KRRS भारत के क्षेत्रीय किसान आंदोलन से वैश्विक सामाजिक आंदोलन में बदलता है।
नवउदारवाद-विरोध की सीमा
लेकिन यदि KRRS को केवल नवउदारवाद-विरोधी आंदोलन कहा जाए तो उसकी शुरुआती राजनीति छूट जाएगी।
1980 में उसका संघर्ष WTO से नहीं था।
अर्थात उस समय वह राज्य से अधिक हस्तक्षेप और सहायता मांग रहा था।
इसलिए KRRS का इतिहास एकसमान विचारधारा का नहीं, परिवर्तनशील राजनीतिक अर्थशास्त्र का इतिहास है।
क्या KRRS पर्यावरण आंदोलन था?
के कारण KRRS को पर्यावरणवादी आंदोलन के रूप में भी पढ़ा गया।
लेकिन इसकी शुरुआती राजनीति पर्यावरण संरक्षण से नहीं, किसान लागत और आय से निकली थी।
इसलिए इसे पारंपरिक conservation आंदोलन कहना सही नहीं।
यह किसान हित से विकसित पर्यावरण राजनीति थी।
‘Livelihood environmentalism’
कुछ विद्वानों की अवधारणा में ऐसे आंदोलनों को livelihood environmentalism—जीविका-आधारित पर्यावरणवाद—की श्रेणी में समझा जा सकता है।
किसान पर्यावरण इसलिए बचाना चाहता है क्योंकि—
KRRS की कृषि-पारिस्थितिकी राजनीति इस दृष्टि से समझने योग्य है।
उसके लिए जैव-विविधता कोई अलग वन्यजीव संरक्षण प्रश्न नहीं।
वह किसान स्वायत्तता का आर्थिक आधार भी है।
पर्यावरणवाद का विरोधाभास : सिंचाई और नदी मोड़ना
लेकिन पर्यावरणवादी व्याख्या की सीमा भी है।
की किसान मांगों के साथ भी खड़ा रहा।
इसलिए संगठन का पर्यावरणवाद हमेशा “कम हस्तक्षेप” वाला पारिस्थितिक सिद्धांत नहीं था।
कई बार किसान की तत्काल जल जरूरत और पर्यावरणीय संरक्षण में तनाव था।
1996 के बाद नया वैचारिक शब्द
La Via Campesina से जुड़ाव के बाद KRRS को समझने के लिए खाद्य-संप्रभुता—खाद्य संप्रभुता की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण बनी।
इसने संगठन की अनेक पुरानी मांगों को एक व्यापक ढांचे में जोड़ दिया—
यह शायद KRRS की बाद की राजनीति को सबसे समेकित रूप में समझाने वाली अवधारणा है।
खाद्य सुरक्षा से आगे
खाद्य-संप्रभुता का इतिहासलेखन KRRS को केवल किसान आय आंदोलन नहीं मानता।
खाद्य व्यवस्था की सत्ता किसके पास है?
इस दृष्टि से KRRS का लक्ष्य केवल बेहतर कृषि मूल्य नहीं रहा।
वह पूरी कृषि-खाद्य व्यवस्था के लोकतंत्रीकरण की मांग करने लगा।
खाद्य-संप्रभुता की आलोचना
लेकिन यह अवधारणा भी आलोचना से मुक्त नहीं।
क्या सभी क्षेत्र आत्मनिर्भर हो सकते हैं?
अंतरराष्ट्रीय व्यापार का सकारात्मक योगदान क्या होगा?
क्या छोटे किसान के हित और उपभोक्ता के सस्ते भोजन का प्रश्न टकरा सकता है?
इसलिए खाद्य-संप्रभुता को पूर्ण बंद अर्थव्यवस्था के रूप में पढ़ना गलत होगा।
KRRS की अधिक उपयोगी व्याख्या स्थानीय नियंत्रण और विकल्प पर आधारित है।
KRRS और ‘वैश्वीकरण from Below’
कुछ विद्वानों ने KRRS जैसे संगठनों को वैश्वीकरण from below—नीचे से वैश्वीकरण—की अवधारणा से जोड़ा।
यानी वैश्विक कॉरपोरेट और संस्थागत नेटवर्क के जवाब में किसान और सामाजिक आंदोलन भी सीमा-पार नेटवर्क बनाएं।
यह दृष्टि KRRS को अत्यंत आधुनिक सामाजिक आंदोलन बनाती है।
यहां KRRS की विशिष्टता
शेतकरी संगठन और BKU की तुलना में KRRS का अंतरराष्ट्रीयकरण कहीं अधिक वैचारिक और संस्थागत था।
वह केवल विदेशी सम्मेलन में भाग नहीं ले रहा था।
वह वैश्विक किसान नेटवर्क के निर्माण में सक्रिय था।
इसलिए इतिहासलेखन में KRRS को भारत के वैश्वीकरण-विरोधी आंदोलन की प्रारंभिक प्रमुख ताकतों में रखा जाना उचित है।
समर्थक व्याख्या : symbolic direct action
समर्थक अध्येताओं ने Cargill, KFC और Monsanto विरोध को नाटकीय प्रतीकात्मक कार्रवाई के रूप में देखा।
उनका तर्क था कि जटिल आर्थिक शक्ति को दृश्य प्रतीक में बदलने से जन चेतना बढ़ती है।
एक बहुराष्ट्रीय कार्यालय पर कार्रवाई—
किसान और कॉरपोरेट शक्ति के संघर्ष को दृश्य रूप देती है।
इस दृष्टि से KRRS ने media politics को बेहद प्रभावी ढंग से समझा।
आलोचनात्मक व्याख्या : कानून और हिंसा
दूसरे विद्वानों ने इन कार्रवाइयों की आलोचना की।
संपत्ति-विनाश लोकतांत्रिक विरोध की सीमा पार करता है।
यदि हर आंदोलन अपनी नैतिकता के आधार पर निजी संपत्ति नष्ट करे तो कानून का शासन कमजोर होगा।
यह आलोचना महत्वपूर्ण है और KRRS के संतुलित इतिहास में इसे दबाना नहीं चाहिए।
‘हिंसा’ की परिभाषा पर विवाद
KRRS समर्थकों ने व्यक्ति के विरुद्ध हिंसा और कॉरपोरेट संपत्ति के खिलाफ प्रत्यक्ष कार्रवाई में अंतर किया।
इतिहासलेखन में यही विवाद जारी रहता है—
KRRS की विस्तृत समयरेखा — 1970 के दशक के किसान असंतोष से 2026 तक
प्रस्तावना : एक आंदोलन, कई चरण
कर्नाटक राज्य रैयत संघ की यात्रा को समझने के लिए कालक्रम बेहद महत्वपूर्ण है। यह आंदोलन एक ही प्रकार का नहीं रहा। 1970 के दशक के स्थानीय किसान असंतोष से शुरू होकर 1980 के नरगुंड–नवलगुंड विद्रोह, 1980 के दशक की मूल्य–बिजली–कर्ज राजनीति, 1990 के दशक के बीज सत्याग्रह और वैश्वीकरण-विरोध, 2000 के बाद कृषि-पारिस्थितिकी तथा 2020–21 के राष्ट्रीय किसान आंदोलन तक इसकी दिशा लगातार बदलती रही।
नीचे दी गई समयरेखा उसी विकास को क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करती है।
1970 का दशक : पृष्ठभूमि तैयार होती है
1970–75 कर्नाटक में हरित क्रांति, सिंचाई विस्तार, उन्नत बीज, कृषि ऋण और नकदी फसलों की ओर बढ़त के साथ खेती अधिक बाजार-निर्भर होने लगी। बिजली, पंपसेट, उर्वरक और ऋण की लागत किसानों के लिए नए आर्थिक प्रश्न बने।
1975–79 मलप्रभा सिंचाई परियोजना क्षेत्र में बेहतरमेंट लेवी, सिंचाई लाभ के असमान वितरण, कपास की कीमत और ऋणग्रस्तता को लेकर असंतोष बढ़ा। नरगुंड, नवलगुंड और आसपास के क्षेत्रों में किसान समितियां सक्रिय हुईं।
1980 : नरगुंड–नवलगुंड निर्णायक मोड़
जुलाई 1980 मलप्रभा परियोजना से जुड़ी लेवी, कृषि संकट और सरकारी वसूली के खिलाफ आंदोलन तेज हुआ।
21 जुलाई 1980 नरगुंड में पुलिस गोलीबारी हुई। किसान मौतों ने आंदोलन को राज्यव्यापी उभार में बदल दिया। यह घटना आगे KRRS की राजनीतिक स्मृति और किसान शहीद परंपरा का आधार बनी।
जुलाई–अगस्त 1980 कर्नाटक के विभिन्न जिलों में बंद, रास्ता रोको, धरने और किसान लामबंदी बढ़ी। कांग्रेस सरकार पर भारी दबाव पड़ा।
1980–82 : स्वतंत्र किसान संगठन की दिशा
नरगुंड–नवलगुंड के बाद अलग-अलग किसान समूहों, क्षेत्रीय समितियों और कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय बढ़ा। इसी दौर में प्रो. एम. डी. नंजुंडास्वामी प्रमुख वैचारिक और सांगठनिक नेतृत्व के रूप में उभरे।
कृषि मूल्य, बिजली, सिंचाई, कर्ज और कर अब अलग-अलग मुद्दे नहीं रहे; उन्हें किसान आय और कृषि नीति के साझा ढांचे में देखा जाने लगा।
1983–85 : KRRS का राज्यव्यापी विस्तार
KRRS ने कर्नाटक के विभिन्न क्षेत्रों में संगठनात्मक ढांचा मजबूत किया। हरी शॉल संगठन की सार्वजनिक पहचान बनी।
इस दौर की प्रमुख मांगों में शामिल थे—
लाभकारी कृषि मूल्य, सस्ती बिजली, न्यूनतम बिजली शुल्क समाप्त करना, ऋण-वसूली रोकना, कृषि करों में राहत और सिंचाई शुल्क कम करना।
1986–89 : प्रतिरोध का विस्तार
कृषि मूल्य, बिजली दर, बैंक वसूली और गन्ना मूल्य जैसे मुद्दों पर किसान आंदोलन तेज हुए।
KRRS की आंदोलन शैली में धरना, बंद, सड़क अवरोध, सामूहिक गिरफ्तारी और कर-अवज्ञा प्रमुख उपकरण बने।
यह वह दौर था जब संगठन स्वयं को केवल स्थानीय किसान संघ नहीं, बल्कि स्वतंत्र राज्यव्यापी किसान शक्ति के रूप में स्थापित कर चुका था।
1990–91 : आर्थिक उदारीकरण से पहले का संक्रमण
कृषि बाजार और राज्य नियंत्रण पर बहस बढ़ी।
1991 में आर्थिक उदारीकरण शुरू होने के बाद KRRS की राजनीति तेजी से नई दिशा में गई। अब प्रश्न केवल सरकार की कृषि नीति नहीं, बल्कि विदेशी निवेश, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और वैश्विक व्यापार व्यवस्था भी बन गए।
1992 : बीज सत्याग्रह का आरंभ
2 अक्टूबर 1992 KRRS ने गांधी जयंती पर व्यापक बीज सत्याग्रह अभियान शुरू किया।
मुख्य प्रश्न था—किसान का अपना बीज बचाने, बोने और विनिमय करने का अधिकार।
इस अभियान ने डंकल प्रस्ताव, बौद्धिक संपदा अधिकार और बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों के मुद्दे को ग्रामीण राजनीति में प्रवेश कराया।
29 दिसंबर 1992 : Cargill कार्यालय पर कार्रवाई
KRRS कार्यकर्ताओं ने बेंगलुरु स्थित Cargill Seeds India के कार्यालय में प्रवेश कर विरोध प्रदर्शन किया और संपत्ति को नुकसान पहुंचाया।
यह घटना राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में प्रमुखता से आई।
इसके बाद KRRS का नाम भारत के सबसे मुखर कॉरपोरेट-विरोधी किसान संगठनों में शामिल होने लगा।
1993 : Cargill विरोध और GATT-विरोध
जुलाई 1993 बेल्लारी में Cargill की बीज इकाई पर KRRS कार्यकर्ताओं ने प्रत्यक्ष कार्रवाई की।
2 अक्टूबर 1993 बेंगलुरु में GATT और डंकल प्रस्तावों के खिलाफ विशाल किसान रैली हुई। विभिन्न अध्ययनों में लगभग एक लाख किसानों की भागीदारी का उल्लेख मिलता है।
इस कार्यक्रम ने KRRS को वैश्विक किसान राजनीति में पहचान दिलाई।
1994 : WTO से पहले की राजनीतिक तैयारी
उरुग्वे दौर के अंतिम चरण में KRRS ने GATT, कृषि व्यापार और बीज अधिकार पर विरोध जारी रखा।
इस दौर में संगठन का वैचारिक ढांचा स्पष्ट हो गया—
किसान स्वायत्तता, स्वदेशी, कॉरपोरेट-विरोध और स्थानीय संसाधनों पर नियंत्रण।
1995 : WTO और KFC विरोध
1 जनवरी 1995 विश्व व्यापार संगठन अस्तित्व में आया।
KRRS ने WTO कृषि व्यवस्था और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बढ़ते प्रभाव का विरोध तेज किया।
1995 बेंगलुरु में KFC आउटलेट के खिलाफ KRRS कार्रवाई ने कॉरपोरेट खाद्य व्यवस्था के विरोध को सार्वजनिक चर्चा में ला दिया।
1996 : La Via Campesina से जुड़ाव
KRRS वैश्विक किसान नेटवर्क La Via Campesina से जुड़ा।
इसी दौर में “खाद्य-संप्रभुता—खाद्य संप्रभुता” का विचार संगठन की राजनीति का प्रमुख हिस्सा बनने लगा।
किसान केवल उत्पादन करेगा या खाद्य व्यवस्था पर निर्णय में भी उसका अधिकार होगा?
1997 : वैश्विक किसान नेटवर्क की तैयारी
स्पेन और अन्य अंतरराष्ट्रीय बैठकों में KRRS कार्यकर्ताओं ने ब्राजील, फिलीपींस और अन्य देशों के जमीनी आंदोलनों के साथ वैश्विक मुक्त व्यापार-विरोधी समन्वय पर काम किया।
यही नेटवर्क आगे People’s Global Action की नींव बना।
फरवरी 1998 : People’s Global Action
जिनेवा में People’s Global Action against मुक्त व्यापार and the WTO का गठन हुआ।
KRRS इसके प्रारंभिक सक्रिय किसान संगठनों में शामिल था।
अब KRRS केवल राष्ट्रीय विरोधी नहीं, वैश्विक सामाजिक आंदोलन नेटवर्क का हिस्सा था।
1998 : Operation Cremate Monsanto
KRRS ने Monsanto से जुड़े Bt कपास परीक्षण खेतों के खिलाफ Operation Cremate Monsanto अभियान चलाया।
इस कार्रवाई ने बीज-संप्रभुता, जैव-प्रौद्योगिकी और कॉरपोरेट नियंत्रण को एक ही राजनीतिक विमर्श में जोड़ दिया।
1999 : Intercontinental Caravan
मई–जून 1999 भारत और अन्य वैश्विक दक्षिण आंदोलनों के लगभग 450 प्रतिनिधियों का Intercontinental Caravan for Solidarity and Resistance यूरोप पहुंचा।
इसमें बड़ी संख्या भारतीय किसानों की थी और KRRS प्रमुख भागीदार था।
यात्रा में WTO, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, GM तकनीक और वैश्विक आर्थिक संस्थाओं के खिलाफ प्रदर्शन हुए।
अगस्त 1999 : PGA सम्मेलन बेंगलुरु में
23–26 अगस्त 1999 को People’s Global Action का दूसरा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन बेंगलुरु में आयोजित हुआ।
KRRS इस आयोजन का प्रमुख स्थानीय आधार था।
सिएटल WTO सम्मेलन के विरोध की अंतरराष्ट्रीय तैयारी का भी यह एक महत्वपूर्ण मंच था।
नवंबर–दिसंबर 1999 : सिएटल WTO विरोध
सिएटल में WTO की तीसरी मंत्रीस्तरीय बैठक के खिलाफ व्यापक वैश्विक प्रदर्शन हुए।
KRRS उस व्यापक नेटवर्क का हिस्सा था जिसने सिएटल से पहले ही WTO-विरोधी किसान एकजुटता विकसित कर ली थी।
2000–01 : आंदोलन से वैकल्पिक कृषि की ओर
कॉरपोरेट-विरोधी राजनीति के साथ KRRS में देशी बीज, कम बाहरी लागत वाली खेती और कृषि-पारिस्थितिकी पर जोर बढ़ा।
2001 भारत ने पौधा किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम बनाया। इसने किसान के बीज बचाने, बोने, पुनः बोने और गैर-ब्रांडेड रूप में बेचने के व्यापक अधिकार को कानूनी मान्यता दी।
इसे KRRS की अकेली उपलब्धि नहीं कहा जा सकता, लेकिन 1990 के दशक के किसान आंदोलनों की राजनीतिक पृष्ठभूमि महत्वपूर्ण थी।
2002–03 : खाद्य संप्रभुता और वैकल्पिक कृषि
KRRS की एक धारा प्राकृतिक खेती, बीज विविधता और किसान-से-किसान ज्ञान की ओर अधिक स्पष्ट रूप से बढ़ी।
अंतरराष्ट्रीय किसान नेटवर्कों में संगठन की सक्रियता जारी रही।
2004 : एम. डी. नंजुंडास्वामी का निधन
नंजुंडास्वामी की मृत्यु KRRS के इतिहास का सबसे बड़ा संगठनात्मक मोड़ थी।
उनके बाद सर्वमान्य नेतृत्व न उभरने से संगठन अलग-अलग गुटों और नेतृत्व धाराओं में बंटने लगा।
2004–10 : विखंडन और निरंतरता
अलग-अलग KRRS गुटों ने गन्ना मूल्य, कर्ज, बिजली, कावेरी और सिंचाई जैसे स्थानीय प्रश्न उठाए।
दूसरी ओर नंजुंडास्वामी की बीज-संप्रभुता और कृषि-पारिस्थितिकी विरासत अलग नेटवर्कों में जारी रही।
यही दौर “विखंडन के भीतर निरंतरता” का था।
2010 का दशक : जल, कर्ज और प्राकृतिक खेती
कर्नाटक में किसान आत्महत्याएं, बोरवेल संकट, सूखा, गन्ना भुगतान और सिंचाई प्रमुख मुद्दे बने।
KRRS की अलग-अलग धाराएं इन प्रश्नों पर सक्रिय रहीं।
कृषि-पारिस्थितिकी और प्राकृतिक खेती की धारा भी मजबूत हुई।
2015 : महादायी–कलसा-बंडूरी आंदोलन
जुलाई 2015 से उत्तर कर्नाटक में महादायी–कलसा-बंडूरी जल परियोजना को लेकर लंबा किसान आंदोलन तेज हुआ।
नरगुंड, जो 1980 के किसान विद्रोह का प्रमुख स्थल था, फिर जल आंदोलन का केंद्र बना।
इससे KRRS की ऐतिहासिक स्मृति और नई जल राजनीति जुड़ गई।
2016–19 : कावेरी, महादायी और कृषि संकट
कावेरी जल-विमोचन, महादायी, फसल मूल्य और कर्ज के प्रश्नों पर किसान आंदोलनों का सिलसिला जारी रहा।
इस दौरान विभिन्न KRRS गुटों की स्वतंत्र सक्रियता अधिक दिखाई दी।
2019 : किसान अधिकार और बीज विवाद की नई प्रासंगिकता
PepsiCo–आलू किसान विवाद ने देश में किसान के बीज अधिकार और पौध किस्म संरक्षण कानून को फिर सार्वजनिक बहस में ला दिया।
यह मामला सीधे KRRS आंदोलन नहीं था, लेकिन उसने 1990 के दशक के बीज-संप्रभुता प्रश्न की दीर्घकालीन प्रासंगिकता दिखा दी।
2020 : तीन कृषि कानून
केंद्र सरकार ने तीन नए कृषि कानून पारित किए।
KRRS की विभिन्न धाराओं ने इनके खिलाफ व्यापक विरोध में भाग लिया।
APMC मंडियों का भविष्य, कॉरपोरेट खरीद, MSP सुरक्षा और किसान की सौदेबाजी शक्ति।
2020–21 : संयुक्त किसान मोर्चा
KRRS व्यापक राष्ट्रीय किसान गठबंधन और संयुक्त किसान आंदोलन से जुड़ा।
यह उसकी पुरानी गैर-दलीय रणनीति का नया राष्ट्रीय रूप था—
मुद्दे पर एकता, संगठन में स्वायत्तता।
नवंबर 2021 : कृषि कानून वापसी
प्रधानमंत्री ने तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की।
किसान संगठनों ने इसे लंबे आंदोलन की बड़ी सफलता माना।
KRRS के लिए यह इस सिद्धांत की पुनर्पुष्टि थी कि sustained mass mobilisation सरकार की नीति बदल सकती है।
2022–23 : MSP और गन्ना मूल्य
कृषि कानून वापसी के बाद MSP की कानूनी गारंटी राष्ट्रीय किसान राजनीति का प्रमुख मुद्दा बनी।
कर्नाटक में KRRS गुट गन्ना मूल्य, कर्ज, जल और कृषि आय प्रश्नों पर सक्रिय रहे।
2023 : महादायी फिर प्रमुख मुद्दा
महादायी परियोजना पर कानूनी, पर्यावरणीय और राजनीतिक विवादों के बीच उत्तर कर्नाटक के किसान संगठनों का दबाव जारी रहा।
नरगुंड का लंबा धरना किसान आंदोलन की ऐतिहासिक निरंतरता का प्रतीक बना रहा।
2024–25 : नई कृषि चुनौतियां
किसान राजनीति में MSP, जलवायु जोखिम, फसल बीमा, सूखा, बाजार मूल्य और कॉरपोरेट कृषि के प्रश्न अधिक प्रमुख हुए।
कृषि-पारिस्थितिकी और प्राकृतिक खेती की KRRS परंपरा ने जलवायु-सहनशील कृषि के संदर्भ में नई प्रासंगिकता हासिल की।
2026 : कावेरी और आंदोलन की निरंतरता
जुलाई 2026 कावेरी जल-विमोचन को लेकर मांड्या, श्रीरंगपट्टन और आसपास के क्षेत्रों में किसान विरोध फिर तेज हुआ।
KRRS से जुड़े कार्यकर्ताओं और अन्य किसान संगठनों ने अपर्याप्त जलाशय स्तर, खड़ी फसल और पेयजल की जरूरतों का प्रश्न उठाया।
इससे यह स्पष्ट हुआ कि 1980 में जल और सिंचाई से शुरू हुआ किसान आंदोलन 2026 तक उसी मूल संसाधन प्रश्न से जुड़ा हुआ है—हालांकि अब उसके साथ जलवायु परिवर्तन और अंतरराज्यीय जल शासन की नई जटिलताएं जुड़ चुकी हैं।
1970–2026 : आंदोलन के छह बड़े चरण
KRRS की पूरी यात्रा को छह व्यापक चरणों में समझा जा सकता है।
पहला चरण : 1970–80 कृषि असंतोष और नरगुंड–नवलगुंड।
दूसरा चरण : 1980–91 कृषि मूल्य, बिजली, कर्ज, सिंचाई और गैर-दलीय किसान शक्ति।
तीसरा चरण : 1992–99 बीज सत्याग्रह, Cargill, Monsanto, GATT–WTO और वैश्वीकरण-विरोध।
चौथा चरण : 1996–2004 La Via Campesina, खाद्य संप्रभुता और वैश्विक किसान एकजुटता।
पांचवां चरण : 2004–19 नंजुंडास्वामी के बाद विखंडन, क्षेत्रीय संघर्ष, महादायी और कृषि-पारिस्थितिकी।
छठा चरण : 2020–26 कृषि कानून आंदोलन, MSP, जल, जलवायु और नई किसान स्वायत्तता की राजनीति।
निष्कर्ष : नरगुंड से खाद्य संप्रभुता और फिर राष्ट्रीय किसान आंदोलन तक
KRRS की समयरेखा भारतीय किसान राजनीति में एक असाधारण वैचारिक विस्तार दिखाती है।
1970 के दशक में किसान का प्रश्न था—
सरकारी परियोजना और बाजार की विफलता से मेरी खेती क्यों घाटे में है?
मुझे न्यायपूर्ण मूल्य, सस्ती बिजली और कर्ज राहत चाहिए।
Monsanto और GM फसल पर किसान की भूमिका क्या है?
क्या दुनिया के छोटे किसान एक साझा वैश्विक आंदोलन बना सकते हैं?
क्या कॉरपोरेट कृषि के विकल्प के रूप में प्राकृतिक, कम लागत और किसान-नियंत्रित कृषि व्यवस्था बनाई जा सकती है?
2020–21 में पुराने प्रश्न एक नए रूप में लौटे—
बाजार किसके नियंत्रण में होगा और किसान की सौदेबाजी शक्ति कितनी होगी?
और 2026 में कावेरी ने फिर याद दिलाया—
इस पूरे वैचारिक विस्तार के बावजूद किसान का सबसे मूल प्रश्न अभी भी जमीन, पानी, लागत और आय ही है।
नरगुंड से WTO तक, WTO से अमृता भूमि तक, और अमृता भूमि से 2020–21 के राष्ट्रीय किसान आंदोलन तक—KRRS का केंद्रीय सूत्र किसान की स्वायत्तता रहा है।
अगला अध्याय
अध्याय 24 : KRRS के प्रमुख प्राथमिक स्रोत और दस्तावेज — संगठन के घोषणापत्र, मांगपत्र, किसान पत्रिकाएं, नंजुंडास्वामी के भाषण और लेखन, नरगुंड–नवलगुंड अभिलेख, सरकारी आदेश, न्यायालयी दस्तावेज, WTO–बीज आंदोलन सामग्री और समकालीन समाचार-पत्र
KRRS के प्रमुख प्राथमिक स्रोत और दस्तावेज — संगठन के घोषणापत्र, मांगपत्र, किसान पत्रिकाएं, नंजुंडास्वामी के भाषण और लेखन, नरगुंड–नवलगुंड अभिलेख, सरकारी आदेश, न्यायालयी दस्तावेज, WTO–बीज आंदोलन सामग्री और समकालीन समाचार-पत्र
प्रस्तावना : आंदोलन का इतिहास उसके अपने दस्तावेजों से
कर्नाटक राज्य रैयत संघ का इतिहास लिखते समय द्वितीयक पुस्तकों और अकादमिक लेखों से बहुत सहायता मिलती है, लेकिन आंदोलन की वास्तविक भाषा, उसकी प्राथमिकताएं, सरकार से उसके टकराव और समय के साथ उसकी वैचारिक यात्रा को समझने के लिए प्राथमिक स्रोतों की आवश्यकता अनिवार्य है।
KRRS के मामले में प्राथमिक स्रोत विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि संगठन का चरित्र लगातार बदलता रहा। 1980 के दशक में उसके मांगपत्र कृषि मूल्य, बिजली, सिंचाई और कर्ज पर केंद्रित थे। 1990 के दशक में दस्तावेजों की भाषा बीज, पेटेंट, Cargill, GATT और WTO की ओर मुड़ती है। बाद के स्रोत खाद्य संप्रभुता, प्राकृतिक खेती और कृषि-पारिस्थितिकी पर अधिक जोर देते हैं।
इसलिए किसी एक दशक के दस्तावेज को पूरे KRRS का प्रतिनिधि मान लेना गलत होगा।
एक गंभीर इतिहासकार को प्राथमिक सामग्री को कम-से-कम आठ श्रेणियों में देखना चाहिए—
संगठनात्मक दस्तावेज, आंदोलन मांगपत्र, नंजुंडास्वामी का लेखन, सरकारी अभिलेख, न्यायिक स्रोत, अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क सामग्री, समकालीन समाचार-पत्र और मौखिक इतिहास।
KRRS के स्थापना और संगठनात्मक दस्तावेज
सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत संगठन के अपने—
इन दस्तावेजों से यह पता चलता है कि संगठन स्वयं अपनी पहचान किस रूप में करता था।
क्या वह स्वयं को किसान संघ कहता था?
इन शब्दों का समय के साथ बदलना ही वैचारिक परिवर्तन का प्रमाण है।
प्रारंभिक मांगपत्र
1980 के दशक के KRRS मांगपत्र उसके आर्थिक दर्शन के सबसे महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
इनमें कई मांगें एक साथ दिखाई देती हैं—
और कृषि ऋण की मात्रा बढ़ती उत्पादन लागत से जोड़ना।
इन मांगपत्रों की विशेषता यह है कि वे संगठन के शुरुआती चरण को बाद के WTO-विरोधी KRRS से अलग पहचानने में मदद करते हैं।
जिला और तालुक स्तर के दस्तावेज
राज्यस्तरीय घोषणापत्र पर्याप्त नहीं हैं।
KRRS की वास्तविक सामाजिक शक्ति गांव और तालुक स्तर पर थी।
और स्थानीय प्रशासन को दिए गए ज्ञापन।
इनसे यह समझा जा सकता है कि राज्य नेतृत्व के वैचारिक प्रश्न और सामान्य किसान की तत्काल मांगों में कितना अंतर था।
नरगुंड–नवलगुंड आंदोलन के प्राथमिक स्रोत
1980 का नरगुंड–नवलगुंड आंदोलन KRRS की पृष्ठभूमि का केंद्रीय स्रोत क्षेत्र है।
यहां सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज होंगे—
मलप्रभा परियोजना संबंधी सरकारी अधिसूचनाएं,
स्थानीय किसान समितियों के प्रस्ताव,
और 21 जुलाई 1980 की गोलीबारी से संबंधित सरकारी दस्तावेज।
इन स्रोतों की तुलना आंदोलनकारी स्मृति से करना अत्यंत आवश्यक है।
पुलिस और जिला प्रशासन के रिकॉर्ड
पुलिस दस्तावेज किसी आंदोलन के इतिहास में विवादास्पद लेकिन महत्वपूर्ण स्रोत होते हैं।
लाठीचार्ज और गोलीबारी की परिस्थितियां,
लेकिन पुलिस स्रोत को निष्पक्ष सत्य नहीं मानना चाहिए।
प्रशासन आंदोलन को “कानून-व्यवस्था” के नजरिए से देखता है, जबकि किसान उसे सामाजिक न्याय का संघर्ष मान सकता है।
दोनों दृष्टियों की तुलना आवश्यक है।
मजिस्ट्रेट जांच और आधिकारिक जांच रिपोर्ट
यदि नरगुंड–नवलगुंड या अन्य किसान संघर्षों के बाद कोई मजिस्ट्रेट, न्यायिक या प्रशासनिक जांच हुई हो, तो उसकी रिपोर्ट अत्यंत मूल्यवान प्राथमिक सामग्री है।
इनका उपयोग आंदोलनकारियों के मौखिक इतिहास और अखबारों के विवरण के साथ करना चाहिए।
विधानसभा की कार्यवाही
कर्नाटक विधानमंडल की कार्यवाही KRRS इतिहास के लिए कम उपयोग किया गया लेकिन महत्वपूर्ण स्रोत है।
नरगुंड से लेकर बिजली, गन्ना, कावेरी और महादायी तक कई प्रमुख विवादों का राजनीतिक रिकॉर्ड विधानसभा में मौजूद होगा।
यह पता लगाने में भी मदद मिलेगी कि आंदोलन ने सरकार की भाषा कब और कैसे बदली।
राजपत्र और सरकारी आदेश
कृषि नीति संबंधी विवादों में सरकारी राजपत्र अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
आंदोलन ने किसी नीति को बदलवाया या केवल राजनीतिक दावा किया—इसका अंतिम प्रमाण अक्सर सरकारी आदेश से मिलता है।
इसलिए प्रत्येक प्रमुख KRRS “जीत” को राजपत्र अथवा आधिकारिक आदेश से सत्यापित करना चाहिए।
बिजली बोर्ड के अभिलेख
कृषि बिजली आंदोलन के अध्ययन के लिए तत्कालीन Karnataka Electricity Board के दस्तावेज महत्वपूर्ण हैं।
KRRS की बिजली मांगों का मूल्यांकन तभी संभव है जब वास्तविक दरों और सरकारी लागत का भी विश्लेषण किया जाए।
सिंचाई विभाग की परियोजना रिपोर्टें
मलप्रभा और अन्य सिंचाई संघर्षों के लिए परियोजना की मूल रिपोर्ट, command area data और वास्तविक सिंचाई उपलब्धता महत्वपूर्ण हैं।
यही तथ्य किसान शिकायतों की वास्तविकता का परीक्षण करते हैं।
कृषि उपज मूल्य के दस्तावेज
कृषि मूल्य संघर्ष के लिए उपयोगी प्राथमिक स्रोत हैं—
इन दस्तावेजों को किसान मांगपत्रों से जोड़कर देखने पर समझ आता है कि आंदोलन का “लाभकारी मूल्य” तर्क कितना आर्थिक आधार रखता था।
सहकारी बैंक और ऋण अभिलेख
KRRS के कर्ज-विरोध के अध्ययन के लिए आवश्यक हैं—
यदि किसी किसान की संपत्ति नीलाम होने का दावा है, तो संभव हो तो बैंक का मूल नोटिस और नीलामी रिकॉर्ड देखा जाना चाहिए।
इससे आंदोलन की कथाओं का दस्तावेजी सत्यापन संभव होता है।
नंजुंडास्वामी : स्वयं सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत
प्रो. एम. डी. नंजुंडास्वामी का लेखन KRRS को समझने के लिए अनिवार्य है।
क्योंकि वे केवल संगठन के नेता नहीं थे।
वे उसके प्रमुख वैचारिक व्याख्याकार भी थे।
भाषण और लिखित लेख अलग-अलग स्रोत हैं
सार्वजनिक भाषण आंदोलनकारी होते हैं।
उनमें नारा और अतिशयोक्ति हो सकती है।
लिखित लेख अधिक व्यवस्थित तर्क दे सकते हैं।
इसलिए दोनों को अलग-अलग पढ़ना चाहिए।
“कंपनियां किसानों का बीज छीन लेंगी”—
तो इसे सीधे कानूनी तथ्य नहीं माना जाए।
देखना होगा कि उसी विषय पर विस्तृत लेख में उनका सटीक तर्क क्या था।
इंटरव्यू
भारतीय और विदेशी मीडिया को नंजुंडास्वामी द्वारा दिए गए लंबे इंटरव्यू विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
इनमें वे अपने आंदोलन की रणनीति और विश्वदृष्टि समझाते हैं।
इंटरव्यू आंदोलन की “आत्मव्याख्या” देते हैं।
लेकिन उन्हें आलोचनात्मक स्रोत की तरह ही पढ़ना चाहिए।
KRRS पत्रिकाएं और समाचार-पत्र
यदि संगठन द्वारा नियमित पत्रिका, समाचार-पत्र, बुलेटिन अथवा कन्नड़ पर्चे प्रकाशित किए गए हों, तो वे अमूल्य स्रोत हैं।
किस मुद्दे को किस समय प्राथमिकता दी गई?
सरकार और कंपनियों को कैसे चित्रित किया गया?
और संगठन के भीतर किस प्रकार की राजनीतिक शिक्षा चल रही थी?
इनका व्यवस्थित डिजिटलीकरण भविष्य के शोध के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।
आंदोलन पर्चे
किसी रैली का छोटा पर्चा भी इतिहास में महत्वपूर्ण हो सकता है।
कई बार बड़े इतिहास में जिस घटना का उल्लेख केवल एक पंक्ति में होता है, उसका वास्तविक स्वरूप पर्चे से पता चलता है।
पोस्टर और दृश्य सामग्री
हरी शॉल, किसान शहीद स्मृति, बीज सत्याग्रह और बहुराष्ट्रीय कंपनी विरोध से जुड़े पोस्टर दृश्य इतिहास के स्रोत हैं।
आंदोलन अपने शत्रु और स्वयं को कैसे प्रस्तुत करता था।
पोस्टर का विश्लेषण राजनीतिक भाषा से अलग दृश्य प्रतीकों का अध्ययन संभव बनाता है।
1992 बीज सत्याग्रह के मूल दस्तावेज
बीज सत्याग्रह के अध्ययन में सबसे महत्वपूर्ण होंगे—
डंकल प्रस्ताव पर संगठन की टिप्पणियां,
और किसानों के लिए तैयार स्पष्टीकरण साहित्य।
इनसे यह पता चलेगा कि उस समय संगठन की वास्तविक आशंका क्या थी और बाद की स्मृति ने उसमें क्या जोड़ा।
डंकल ड्राफ्ट का मूल पाठ
KRRS की GATT आलोचना का अध्ययन केवल संगठन के साहित्य से नहीं होना चाहिए।
आर्थर डंकल द्वारा प्रस्तुत मूल GATT Draft Final Act का अध्ययन जरूरी है।
इससे आंदोलन के दावों की तुलना वास्तविक अंतरराष्ट्रीय पाठ से की जा सकती है।
विशेष रूप से बौद्धिक संपदा, कृषि और बाजार पहुंच के हिस्सों का।
TRIPS Agreement
1995 से लागू WTO TRIPS Agreement मूल प्राथमिक कानूनी स्रोत है।
इसके अनुच्छेद 27.3(b) का पाठ विशेष रूप से आवश्यक है क्योंकि बीज पेटेंट संबंधी कई सार्वजनिक बहसें इसी से जुड़ी हैं।
किसान आंदोलन के दावे और वास्तविक TRIPS प्रावधान में अंतर स्पष्ट करना वैज्ञानिक इतिहासलेखन की जिम्मेदारी है।
WTO Agreement on Agriculture
कृषि सब्सिडी, बाजार पहुंच और निर्यात प्रतिस्पर्धा पर KRRS के दावों की जांच के लिए WTO Agreement on Agriculture का मूल पाठ जरूरी है।
इसके बिना “WTO ने भारतीय सब्सिडी खत्म कर दी” या “विकसित देशों को सारी सहायता की अनुमति है” जैसे दावों का संतुलित मूल्यांकन संभव नहीं।
29 दिसंबर 1992 की कार्रवाई
Cargill Seeds India के बेंगलुरु कार्यालय पर कार्रवाई के अध्ययन के लिए तीन प्रकार के प्राथमिक स्रोत साथ रखने चाहिए—
और संगठन ने इसे किस नैतिक आधार पर सही ठहराया?
कंपनी अभिलेख और व्यावसायिक रिकॉर्ड
Cargill की भारत में वास्तविक बीज गतिविधियों को समझने के लिए कंपनी रिपोर्ट, प्रेस विज्ञप्तियां और उद्योग दस्तावेज महत्वपूर्ण हैं।
यदि आंदोलन कहता है कि कंपनी “भारतीय बीज व्यवस्था पर कब्जा” कर रही थी, तो कंपनी के वास्तविक बाजार हिस्से और गतिविधि की जांच आवश्यक है।
यही प्रचार और संरचनात्मक वास्तविकता में अंतर बताता है।
Bt कपास परीक्षण के आधिकारिक रिकॉर्ड
Operation Cremate Monsanto का अध्ययन करने के लिए केवल KRRS स्रोत पर्याप्त नहीं।
तभी यह समझा जा सकता है कि किसान जिस फसल को नष्ट कर रहे थे, उसका तकनीकी और नियामक दर्जा क्या था।
KRRS का Monsanto विरोध साहित्य
यहीं से समझ आएगा कि GM विरोध का मुख्य तर्क था—
La Via Campesina घोषणाएं
KRRS की वैश्विक राजनीति समझने के लिए La Via Campesina के मूल दस्तावेज बेहद महत्वपूर्ण हैं।
इन स्रोतों से पता चलता है कि KRRS ने वैश्विक नेटवर्क से कौन-से विचार ग्रहण किए और किन विचारों में स्वयं योगदान दिया।
People’s Global Action दस्तावेज
PGA की hallmarks, घोषणाएं, बेंगलुरु सम्मेलन दस्तावेज और इंटरकॉन्टिनेंटल कारवां से संबंधित सामग्री KRRS के वैश्वीकरण-विरोधी चरण के प्रमुख प्राथमिक स्रोत हैं।
ये महत्वपूर्ण इसलिए भी हैं क्योंकि इनमें संगठन की अंतरराष्ट्रीय भूमिका प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देती है।
1999 Intercontinental Caravan अभिलेख
से यह सत्यापित किया जा सकता है कि कौन से भारतीय संगठन किस स्तर तक शामिल थे।
यह KRRS की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा का दस्तावेजी आधार है।
PPV&FR Act, 2001
Protection of Plant Varieties and किसान’ Rights Act, 2001 का मूल पाठ बीज-संप्रभुता इतिहास के लिए आवश्यक है।
विशेष रूप से धारा 39 में किसान के अधिकारों का अध्ययन होना चाहिए।
इससे 1990 के किसान आंदोलन के दावों और 2001 की वास्तविक भारतीय कानूनी व्यवस्था की तुलना संभव होती है।
नियम और प्राधिकरण दस्तावेज
इससे पता चलेगा कि किसान अधिकार व्यवहार में कैसे लागू हुए।
जल विवाद
कावेरी के अध्ययन के लिए आवश्यक स्रोत हैं—
Cauvery Water Disputes Tribunal Award,
Cauvery Water Management Authority के आदेश,
और Regulation Committee के निर्देश।
किसान आंदोलन के दावे का वास्तविक कानूनी संदर्भ इन्हीं से स्पष्ट होगा।
महादायी न्यायाधिकरण
Mahadayi Water Disputes Tribunal का निर्णय, केंद्र सरकार की अधिसूचना और परियोजना संबंधी पर्यावरण दस्तावेज कलसा-बंडूरी आंदोलन के प्राथमिक स्रोत हैं।
इनमें कर्नाटक, गोवा और महाराष्ट्र—तीनों पक्षों के कानूनी तर्क मिलते हैं।
बीज और पौध किस्म विवाद
PPV&FR कानून से संबंधित न्यायिक मामलों—विशेष रूप से किसान अधिकार की व्याख्या वाले मामलों—का अध्ययन KRRS के बीज-संप्रभुता विमर्श की दीर्घकालीन प्रासंगिकता समझने में मदद करता है।
लेकिन बाद के न्यायालयी मामलों को KRRS की प्रत्यक्ष कार्रवाई के प्रमाण के रूप में नहीं, उसकी उठाई बहस की बाद की कानूनी पृष्ठभूमि के रूप में देखना चाहिए।
कन्नड़ प्रेस की केंद्रीय भूमिका
KRRS का इतिहास केवल अंग्रेजी प्रेस से नहीं लिखा जा सकता।
कन्नड़ समाचार-पत्रों में किसान आंदोलन की कहीं अधिक विस्तृत स्थानीय कवरेज मिल सकती है।
इनमें आंदोलन की गांव-स्तरीय घटनाएं, स्थानीय नेता और सरकार के तत्काल बयान मिल सकते हैं।
अंग्रेजी राष्ट्रीय प्रेस
जैसे स्रोत KRRS की राष्ट्रीय छवि और विश्लेषण प्रदान करते हैं।
Cargill, Monsanto और WTO जैसे अंतरराष्ट्रीय प्रश्नों पर ये विशेष रूप से उपयोगी हैं।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया
KRRS की वैश्विक पहचान के कारण विदेशी प्रेस भी महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत बन जाता है।
1990 के दशक में अमेरिकी और यूरोपीय मीडिया ने Cargill, Monsanto और नंजुंडास्वामी पर रिपोर्टें प्रकाशित कीं।
इनसे पता चलता है कि आंदोलन को विदेश में कैसे देखा गया।
लेकिन विदेशी मीडिया अक्सर नाटकीय कार्रवाई पर केंद्रित रहा; इसलिए उससे स्थानीय किसान इतिहास पूरा नहीं लिखा जा सकता।
दृश्य और श्रव्य स्रोत
किसान रैली के वीडियो, नंजुंडास्वामी के भाषण, दूरदर्शन रिपोर्ट और बाद के टीवी इंटरव्यू अत्यंत उपयोगी हैं।
यह लिखित इतिहास में न मिलने वाली सामाजिक जानकारी देता है।
वीडियो के उपयोग में सावधानी
बाद में अपलोड किया गया छोटा वीडियो क्लिप मूल संदर्भ काट सकता है।
इसलिए यथासंभव पूरा कार्यक्रम, तिथि और प्रसारण स्रोत सत्यापित करना चाहिए।
सोशल मीडिया पर किसी पुराने वीडियो को गलत वर्ष से जोड़ना सामान्य समस्या है।
आंदोलन के जीवित कार्यकर्ता
KRRS का अधिकांश इतिहास अभी इतना हाल का है कि अनेक प्रत्यक्ष सहभागी जीवित हैं।
उनके साक्षात्कार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
उनके अनुभव दस्तावेजों की खाली जगह भर सकते हैं।
लेकिन स्मृति तथ्य नहीं होती
मौखिक इतिहास अत्यंत मूल्यवान है, लेकिन स्मृति समय के साथ बदलती है।
घटनाओं को बाद की राजनीति के अनुसार याद कर सकता है।
जिला अभिलेख
इसलिए जिला-विशिष्ट स्रोत आवश्यक हैं।
KRRS के प्रमुख द्वितीयक स्रोत और संदर्भ ग्रंथ — कर्नाटक किसान आंदोलन, ‘नए किसान आंदोलन’, नंजुंडास्वामी, वैश्वीकरण-विरोध, बीज-संप्रभुता, कृषि-पारिस्थितिकी और खाद्य-संप्रभुता पर मानक पुस्तकें, शोध-पत्र, शोध-प्रबंध और उपयोगी डिजिटल अभिलेखों की आलोचनात्मक संदर्भ-सूची
प्रस्तावना : KRRS पर साहित्य बहुत है, लेकिन एक ही जगह उसका पूरा इतिहास नहीं मिलता
कर्नाटक राज्य रैयत संघ पर शोध की सबसे बड़ी कठिनाई स्रोतों की कमी नहीं, बल्कि उनका अनेक अलग-अलग बौद्धिक क्षेत्रों में बिखरा होना है।
यदि कोई शोधकर्ता केवल 1980 के दशक का साहित्य पढ़े तो KRRS मुख्यतः बिजली, सिंचाई, ऋण और लाभकारी मूल्य के लिए लड़ने वाला “नया किसान आंदोलन” दिखाई देगा।
यदि वह केवल 1990 के दशक का साहित्य पढ़े तो संगठन Cargill, Monsanto, GATT और WTO के विरुद्ध वैश्वीकरण-विरोधी आंदोलन लगता है।
यदि 2000 के बाद के अध्ययन देखे जाएं तो वही KRRS बीज-संप्रभुता, खाद्य-संप्रभुता, प्राकृतिक खेती और कृषि-पारिस्थितिकी से जुड़ा दिखाई देता है।
इसलिए KRRS के इतिहास के लिए कोई एक “मानक पुस्तक” पर्याप्त नहीं है।
सबसे विश्वसनीय अध्ययन के लिए कम-से-कम पांच प्रकार के द्वितीयक साहित्य को साथ पढ़ना आवश्यक है—
कर्नाटक के किसान आंदोलन का प्रत्यक्ष अध्ययन, नए किसान आंदोलनों का तुलनात्मक साहित्य, ग्रामीण वर्ग–जाति संबंध का आलोचनात्मक साहित्य, वैश्वीकरण-विरोध और किसान अंतरराष्ट्रीयवाद का साहित्य, तथा खाद्य-संप्रभुता और कृषि-पारिस्थितिकी का नया साहित्य।
इस अध्याय में स्रोतों को इसी आधार पर प्राथमिकता दी जा रही है।
M. V. Nadkarni — किसान’ Movements in India (1987)
यदि KRRS पर केवल एक प्रारंभिक मानक अकादमिक पुस्तक चुननी हो तो एम. वी. नाडकर्णी की किसान’ Movements in India सबसे महत्वपूर्ण स्रोतों में रखी जानी चाहिए।
Allied Publishers द्वारा 1987 में प्रकाशित लगभग 237 पृष्ठ की यह पुस्तक तमिलनाडु, महाराष्ट्र, पंजाब और कर्नाटक के किसान आंदोलनों का आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विश्लेषण करती है। पुस्तक का अध्ययन काल मुख्यतः 1970 के अंतिम वर्षों से 1984 तक जाता है।
इसकी विशेष उपयोगिता
KRRS के प्रारंभिक चरण को समझने के लिए यह स्रोत अत्यंत महत्वपूर्ण है—
नाडकर्णी कृषि मूल्य नीति के विशेषज्ञ अर्थशास्त्री भी रहे हैं; इसलिए उनकी ताकत यह है कि वे किसान आंदोलनों की मांगों को केवल राजनीतिक नारों के रूप में नहीं, कृषि अर्थशास्त्र के संदर्भ में परखते हैं। उनके प्रकाशित कार्यों में कृषि मूल्य नीति और सूखा क्षेत्रों पर अनेक मानक अध्ययन भी शामिल हैं।
Tom Brass (ed.) — New किसान’ Movements in India (1995)
टॉम ब्रास द्वारा संपादित यह पुस्तक नए किसान आंदोलनों पर सबसे महत्वपूर्ण आलोचनात्मक संग्रहों में है। इसमें महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, पंजाब और कर्नाटक के किसान आंदोलनों पर केस अध्ययन और वर्ग, लिंग, राजनीति तथा किसान विमर्श पर बहसें शामिल हैं। मूल संस्करण 1995 में प्रकाशित हुआ; Routledge ने बाद में इसे पुनः उपलब्ध कराया।
महाराष्ट्र में किसान आंदोलन का वर्ग चरित्र,
कर्नाटक–महाराष्ट्र किसान विमर्श की अस्पष्टताएं,
और conservative rural coalitions की आलोचना—
इसकी सीमा
इस संग्रह की अनेक व्याख्याएं वर्गीय आलोचना से प्रभावित हैं। इसलिए इसे KRRS की अपनी आंदोलनकारी भाषा और बाद के खाद्य-संप्रभुता साहित्य के साथ पढ़ना चाहिए।
Muzaffar Assadi — “‘Khadi Curtain’, ‘Weak Capitalism’ and ‘Operation Ryot’: Some Ambiguities in किसान’ Discourse, Karnataka and Maharashtra 1980–93”
मुजफ्फर असादी का यह लेख The Journal of किसान Studies, खंड 21, अंक 3–4 में प्रकाशित हुआ। यह कर्नाटक और महाराष्ट्र के किसान आंदोलनों की 1980–93 की राजनीति और उनके विमर्श की अंतर्विरोधपूर्ण प्रकृति का आलोचनात्मक अध्ययन करता है।
क्यों जरूरी है?
यह उस निर्णायक संक्रमण को पकड़ता है जब KRRS—
लाभकारी मूल्य और किसान आर्थिक मांगों से आगे बढ़कर
नाडकर्णी के शुरुआती आर्थिक अध्ययन और बाद के वैश्वीकरण-विरोधी KRRS के बीच यह एक महत्वपूर्ण बौद्धिक पुल है।
Jairus Banaji — “The किसान’ Movements: A Critique of Conservative Rural Coalitions”
इसी Journal of किसान Studies विशेषांक में जयरस बनर्जी/बनाजी का लेख नए किसान आंदोलनों की वर्गीय आलोचना प्रस्तुत करता है। यह किसान एकता की भाषा के पीछे भूमिधर किसान, मजदूर और ग्रामीण वर्ग संबंधों को देखने का आग्रह करता है।
उपयोगिता
अध्याय 16 में हमने जो प्रश्न उठाया था—
उच्च कृषि मूल्य से किसे कितना लाभ मिलता है?
प्रभावशाली कृषक जातियों की भूमिका क्या है?
इनके लिए यह आलोचनात्मक दृष्टि उपयोगी है।
सावधानी
KRRS को केवल “conservative rural coalition” मान लेने से उसके बाद के कॉरपोरेट-विरोध, बीज-संप्रभुता और कृषि-पारिस्थितिकी की व्याख्या अधूरी रह सकती है।
प्राथमिकता : महत्वपूर्ण आलोचनात्मक स्रोत।
Gail Omvedt — Reinventing Revolution: New Social Movements and the Socialist Tradition in India
गेल ऑम्वेट की यह महत्वपूर्ण पुस्तक किसान आंदोलन को अकेले कृषि अर्थशास्त्र में नहीं रखती। इसमें—
को स्वतंत्र भारत की नई सामाजिक आंदोलनों की धारा के रूप में पढ़ा गया है। पुस्तक में किसानों के आंदोलन के लिए स्वतंत्र अध्याय भी है।
KRRS शोध में महत्व
यह समझने में उपयोगी है कि किसान आंदोलन को केवल “धनी किसान का आर्थिक हित” मानना क्यों अपर्याप्त हो सकता है।
प्राथमिकता : अनिवार्य वैचारिक संदर्भ।
Niloshree Bhattacharya — “Networks, Solidarities and Emerging Alternatives: किसान’ आंदोलन in Karnataka”
2017 में Economic and Political Weekly में प्रकाशित नीलोश्री भट्टाचार्य का यह लेख KRRS के बाद के इतिहास को समझने के लिए सबसे उपयोगी अध्ययनों में है।
यह 2011–12 के क्षेत्र-अध्ययन पर आधारित है और विशेष रूप से यह देखता है कि कमजोर पड़ते पारंपरिक किसान आंदोलन ने—
के जरिए स्वयं को पुनर्गठित करने की कोशिश कैसे की। KRRS 1996 में La Via Campesina से जुड़ा था—यह तथ्य भी अध्ययन में केंद्रीय है।
क्यों अनिवार्य है?
नंजुंडास्वामी की मृत्यु के बाद KRRS को समझने के लिए केवल 1980–90 के दशक का साहित्य पर्याप्त नहीं।
यह लेख दिखाता है कि संगठन ने पूर्णतः गायब होने के बजाय नेटवर्क और वैकल्पिक कृषि की ओर रूपांतरण किया।
Niloshree Bhattacharya — “खाद्य-संप्रभुता and Agro-ecology in Karnataka: Interplay of Discourses, Identities, and Practices”
Development in Practice में 2017 में प्रकाशित यह लेख KRRS के खाद्य-संप्रभुता और कृषि-पारिस्थितिकी चरण का विशिष्ट अध्ययन है।
लेख KRRS को La Via Campesina सदस्य संगठन के रूप में देखता है और कर्नाटक में शून्य बजट प्राकृतिक खेती तथा खाद्य-संप्रभुता के विमर्श के बीच संबंध का विश्लेषण करता है।
उपयोगिता
अध्याय 15 के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण—
यह स्रोत आंदोलन की आधिकारिक प्रशंसात्मक कथा के बजाय व्यावहारिक अंतर्विरोध भी देखने में मदद करता है।
Ashlesha Khadse et al. — “Taking कृषि-पारिस्थितिकी to Scale: The Zero Budget प्राकृतिक खेती किसान आंदोलन in Karnataka, India”
The Journal of किसान Studies में प्रकाशित यह अध्ययन कर्नाटक के शून्य बजट प्राकृतिक खेती आंदोलन के विस्तार का विस्तृत विश्लेषण करता है।
इसके अनुसार आंदोलन की वृद्धि केवल खेती की तकनीक के कारण नहीं हुई; किसान-से-किसान प्रशिक्षण, स्थानीय नेतृत्व, स्वयंसेवा, सामाजिक आंदोलन नेटवर्क और La Via Campesina जैसे गठबंधनों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उपयोगिता
KRRS और ZBNF को एक ही संगठन समझे बिना दोनों के बीच—
महत्वपूर्ण सावधानी
यह अध्ययन ZBNF पर केंद्रित है, सीधे KRRS का संपूर्ण इतिहास नहीं।
इसे KRRS की कृषि-पारिस्थितिकी धारा के संदर्भ स्रोत के रूप में उपयोग करें।
प्राथमिकता : कृषि-पारिस्थितिकी खंड के लिए अनिवार्य।
“A New Class Alliance in the Indian Countryside? From New किसान’ Movements to the 2020 Protest Wave”
2021 के आसपास प्रकाशित यह अध्ययन 1980 के दशक के नए किसान आंदोलनों को 2020–21 के किसान विरोध तक जोड़ता है।
लेख का तर्क है कि 1980 के किसान आंदोलनों की सामाजिक गठबंधन शक्ति बाद में ग्रामीण आर्थिक विविधीकरण और वर्ग भेदों से कमजोर हुई। अध्ययन dominant agrarian castes—जैसे कर्नाटक में लिंगायत और वोक्कालिगा—की भूमिका तथा महिलाओं, दलितों और मजदूरों की सीमित उपस्थिति पर भी बल देता है।
उपयोगिता
और 2020–21 के किसान आंदोलन से तुलना—
सावधानी
यह KRRS-केंद्रित मोनोग्राफ नहीं, व्यापक वर्गीय तर्क का अध्ययन है।
प्राथमिकता : अत्यंत उपयोगी आधुनिक आलोचनात्मक स्रोत।
Journal of किसान Studies — किसान’ Protests in India Forum
2020–21 के किसान आंदोलन पर Journal of किसान Studies का साहित्य पुराने “New किसान’ Movements” और नए किसान गठबंधनों के बीच निरंतरता तथा परिवर्तन समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
एक परिचयात्मक लेख KRRS को दक्षिण भारत के प्रमुख किसान संगठन के रूप में याद करते हुए उसके बहुराष्ट्रीय बीज और खाद्य कंपनियों के विरोध तथा बाद में जैविक/वैकल्पिक कृषि की ओर झुकाव का उल्लेख करता है।
उपयोगिता
KRRS को ऐतिहासिक संग्रहालय का विषय न मानकर वर्तमान कृषि राजनीतिक अर्थशास्त्र से जोड़ने के लिए।
“किसान Leader in Karnataka, Prof. M. D. Nanjundaswamy: 1936–2004”
South Indian History Congress से जुड़ा यह जीवन-वृत्त नंजुंडास्वामी के किसान नेतृत्व, किसान सम्मेलनों, महिला सम्मेलन, चुनावी प्रयोग, Monsanto-विरोध और अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों का संक्षिप्त विवरण देता है।
उपयोगिता
घटनाओं और नेतृत्व-विकास की दिशा समझने में।
सावधानी
ऐसे स्मृति/जीवनीपरक लेखों में कई बड़ी संख्याएं अथवा राजनीतिक दावे स्वतंत्र सत्यापन की मांग करते हैं।
इसे कालक्रम के संकेतक की तरह उपयोग करें, अंतिम तथ्य के रूप में नहीं।
The Guardian — M. D. Nanjundaswamy obituary
नंजुंडास्वामी की 2004 में मृत्यु के बाद प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय श्रद्धांजलि/जीवनी लेख उनके वैश्वीकरण-विरोधी राजनीतिक महत्व को समझने में उपयोगी है।
विशेषकर यह पहलू महत्वपूर्ण है कि पश्चिम में Seattle और Genoa के बाद anti-वैश्वीकरण आंदोलन लोकप्रिय होने से पहले नंजुंडास्वामी दक्षिण भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों और वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन चला रहे थे।
यह अकादमिक मोनोग्राफ नहीं, लेकिन नंजुंडास्वामी की अंतरराष्ट्रीय छवि समझने के लिए उपयोगी पूरक स्रोत है।
प्राथमिकता : सहायक स्रोत, मूल अकादमिक स्रोत का विकल्प नहीं।
Raitha Chaluvali Yeke? — “किसान आंदोलन क्यों?”
हालांकि यह मूलतः प्राथमिक संगठनात्मक दस्तावेज है, लेकिन KRRS पर कोई गंभीर द्वितीयक अध्ययन इसे पढ़े बिना पूरा नहीं हो सकता।
1982 का लगभग 98 पृष्ठ का यह घोषणापत्र विभिन्न संस्करणों में प्रकाशित हुआ और नंजुंडास्वामी ने बाद के संस्करणों में नई प्रस्तावनाएं जोड़ीं। इसमें किसान आंदोलन की आवश्यकता, आंदोलनकारी प्रतिज्ञा और किसान पहचान की विचारधारा मिलती है।
उपयोगिता
द्वितीयक लेखकों की KRRS-विषयक व्याख्या को संगठन की अपनी भाषा से परखने के लिए।
People’s Global Action संबंधी शोध
KRRS को केवल भारत के किसान संगठन के रूप में समझने की सबसे बड़ी सीमा यह होगी कि उसकी PGA भूमिका छूट जाए।
Transnational social आंदोलन literature में KRRS को—
और People’s Global Action के निर्माण—
से जोड़ा गया है। कुछ अध्ययनों में 1999 में भारतीय किसानों के यूरोपीय कारवां को KRRS के अंतरराष्ट्रीय प्रभाव का महत्वपूर्ण उदाहरण माना गया है।
सावधानी
PGA और anti-वैश्वीकरण साहित्य में कई लेखक स्वयं आंदोलनों के निकट रहे। इसलिए संगठन की भूमिका के दावों का समकालीन अभिलेखों से सत्यापन करना उपयोगी है।
वैश्वीकरण पर शोध-प्रबंध और शोधप्रबंधीय अध्ययन
KRRS, वैश्वीकरण और किसान प्रतिरोध पर कई विश्वविद्यालयीय शोध-प्रबंध उपलब्ध हैं।
इनमें एक महत्वपूर्ण प्रकार का अध्ययन प्रत्यक्ष साक्षात्कारों, आंदोलन आंतरिक विवादों और 1990 के दशक की घटनाओं का विवरण देता है। उपलब्ध शोध-प्रबंधीय साहित्य Cargill/KFC विवाद, Monsanto Bt कपास कार्रवाई और 1999 के यूरोप कारवां जैसी घटनाओं पर अतिरिक्त विवरण प्रदान करता है।
उपयोगिता
ऐसे शोध-प्रबंध अक्सर प्रकाशित पुस्तकों से अधिक विस्तृत field interviews देते हैं।
भाग ग्यारह : खाद्य-संप्रभुता का अंतरराष्ट्रीय साहित्य
KRRS को 1996 के बाद समझने के लिए केवल भारत संबंधी साहित्य पर्याप्त नहीं।
कुछ व्यापक मानक स्रोत भी आवश्यक हैं।
La Via Campesina पर मानक साहित्य
La Via Campesina की उत्पत्ति, किसान अंतरराष्ट्रीयवाद, खाद्य-संप्रभुता और बहुराष्ट्रीय कृषि व्यवस्था के विरोध पर उपलब्ध अंतरराष्ट्रीय साहित्य KRRS की वैश्विक भूमिका समझने के लिए आवश्यक है।
1996 में खाद्य-संप्रभुता की अवधारणा का सार्वजनिक विस्तार,
और किसान संगठनों के सीमा-पार नेटवर्क।
KRRS पर बाद के ethnographic studies सीधे उसके LVC संबंध को केंद्रीय महत्व देते हैं।
खाद्य-संप्रभुता literature
खाद्य-संप्रभुता पर शोध करते समय अवधारणा को केवल “खाद्य आत्मनिर्भरता” के रूप में न पढ़ें।
महिला, आदिवासी और छोटे उत्पादक की भूमिका क्या है?
यह साहित्य KRRS के बाद के वैचारिक विकास को उसकी शुरुआती लाभकारी मूल्य राजनीति से जोड़ने में मदद करता है।
कर्नाटक का कृषि संकट
KRRS के इतिहास को केवल संगठन के साहित्य से नहीं समझा जा सकता।
इससे यह जांचा जा सकता है कि आंदोलन की शिकायतों का वस्तुगत आर्थिक आधार क्या था।
कृषि मूल्य नीति पर एम. वी. नाडकर्णी के अन्य कार्य
नाडकर्णी की Agricultural Prices and Development with Stability, Socialist Agricultural Price Policy और बाजार योग्य अधिशेष संबंधी कार्य किसान मूल्य राजनीति की आर्थिक पृष्ठभूमि समझने में उपयोगी हैं। उनके प्रकाशित ग्रंथों की सूची उनके अकादमिक परिचय में उपलब्ध है।
इन ग्रंथों को सीधे KRRS इतिहास नहीं, बल्कि KRRS की मूल्य मांगों के अर्थशास्त्रीय संदर्भ के रूप में उपयोग करना चाहिए।
शेतकरी संगठन पर अध्ययन
KRRS के आर्थिक दर्शन को समझने के लिए शरद जोशी और शेतकरी संगठन पर साहित्य अनिवार्य पूरक है।
दोनों आंदोलनों की शुरुआत में मूल्य और कृषि लागत के मुद्दे समान थे।
शेतकरी संगठन → बाजार और वैश्वीकरण के प्रति अपेक्षाकृत सकारात्मक;
KRRS → वैश्वीकरण और कॉरपोरेट शक्ति के प्रति आलोचनात्मक।
इस तुलना के बिना KRRS के वैचारिक परिवर्तन की विशिष्टता स्पष्ट नहीं होती।
Tom Brass के संपादित संग्रह में महाराष्ट्र और Karnataka–Maharashtra comparison के अध्याय इसी उद्देश्य से विशेष उपयोगी हैं।
भारतीय किसान यूनियन पर अध्ययन
BKU पर साहित्य KRRS की आंदोलन-पद्धति की तुलना के लिए उपयोगी है—
KRRS को अकेले देखने से उसकी कुछ विशेषताएं सामान्य भारतीय किसान आंदोलन की विशेषताएं लग सकती हैं।
सावधानी
इसलिए गांव-स्तर का अध्ययन आवश्यक है।
निष्कर्ष — कर्नाटक राज्य रैयत संघ को कैसे समझें?
प्रस्तावना : KRRS केवल एक किसान संगठन नहीं, किसान राजनीति की बदलती भाषा का इतिहास है
कर्नाटक राज्य रैयत संघ—KRRS—को समझने की सबसे बड़ी कठिनाई यही है कि उसे किसी एक परिभाषा में बांधा नहीं जा सकता।
यदि केवल 1980 के नरगुंड–नवलगुंड को देखा जाए, तो वह सिंचाई शुल्क, कृषि संकट और राज्य दमन के विरुद्ध किसान विद्रोह दिखाई देता है।
यदि 1980 का दशक देखा जाए, तो वह लाभकारी मूल्य, बिजली, कर्ज और कृषि लागत के लिए लड़ने वाला “नया किसान आंदोलन” है।
यदि 1990 का दशक देखा जाए, तो वही संगठन Cargill, Monsanto, डंकल प्रस्ताव, GATT और WTO को चुनौती देने वाला वैश्वीकरण-विरोधी किसान आंदोलन बन जाता है।
यदि उसके बाद की वैचारिक यात्रा देखी जाए, तो बीज-संप्रभुता, खाद्य-संप्रभुता, प्राकृतिक खेती और कृषि-पारिस्थितिकी उसके कार्यक्रम के महत्वपूर्ण तत्व बन जाते हैं।
और यदि 2004 के बाद का काल देखा जाए, तो एक करिश्माई नेता के बाद विभाजित होते संगठन के भीतर भी किसान प्रतिरोध की परंपरा, हरी शॉल, नरगुंड की स्मृति, जल आंदोलन, मूल्य और कर्ज के प्रश्न तथा राष्ट्रीय किसान गठबंधनों में भागीदारी जीवित दिखाई देती है।
इसलिए KRRS को किसी एक मांग, नेता या विचारधारा से नहीं, एक ऐतिहासिक यात्रा के रूप में समझना अधिक उचित है।
किसान अपनी खेती, आय, बीज, संसाधन और कृषि भविष्य पर कितना नियंत्रण रखता है?
यही प्रश्न अलग-अलग दशकों में अलग रूप लेकर सामने आया।
शुरुआत : विकास परियोजना के लाभार्थी से असंतुष्ट किसान तक
कर्नाटक में स्वतंत्रता के बाद राज्य ने कृषि आधुनिकीकरण की व्यापक परियोजना अपनाई।
कृषि धीरे-धीरे अधिक बाजारोन्मुख हुई।
लेकिन आधुनिक कृषि ने केवल अवसर नहीं दिए; उसने नए आर्थिक जोखिम भी पैदा किए।
किसान अब केवल मानसून पर निर्भर नहीं था।
इसी आधुनिक कृषि के भीतर विरोधाभासों से कर्नाटक की नई किसान राजनीति पैदा हुई।
नरगुंड–नवलगुंड इसका सबसे शक्तिशाली विस्फोट था।
21 जुलाई 1980 : एक तारीख से अधिक
नरगुंड की पुलिस गोलीबारी KRRS की सामूहिक स्मृति का मूल स्रोत बनी।
उस घटना ने किसान राजनीति को तीन बातें सिखाईं।
सरकारी विकास परियोजना केवल इसलिए न्यायपूर्ण नहीं हो जाती क्योंकि उसे “विकास” कहा गया है।
किसान की वास्तविक आय और लाभ की जांच जरूरी है।
यदि प्रशासन किसान की शिकायत नहीं सुनता, तो स्वतंत्र किसान संगठन आवश्यक है।
यहीं से किसान और राज्य के बीच संबंध बदलता है।
वह संगठित राजनीतिक दावेदार बनता है।
KRRS का सबसे बड़ा प्रारंभिक परिवर्तन : किसान की स्वतंत्र पहचान
स्वतंत्र भारत की ग्रामीण राजनीति लंबे समय तक राजनीतिक दलों, सहकारी संस्थाओं और जातीय स्थानीय नेतृत्व से संचालित होती रही।
KRRS ने इस संरचना में एक नई राजनीतिक पहचान बनाई—
अलग राजनीतिक निष्ठाओं के बावजूद साझा कृषि मुद्दों पर एक साथ आ सकते थे।
यहीं “रैयत” शब्द की राजनीतिक शक्ति थी।
यह किसान को वोट बैंक से आंदोलनकारी समुदाय में बदलने का प्रयास था।
किसान स्वाभिमान : आर्थिक मांग से आगे
KRRS की राजनीति को केवल रुपये और पैसे में नहीं समझा जा सकता।
उसके भीतर एक मजबूत किसान स्वाभिमान का तत्व था।
बैंक मेरे साथ अपराधी जैसा व्यवहार नहीं कर सकता।
सरकार मेरे बिना कृषि नीति तय नहीं कर सकती।
यही स्वाभिमान KRRS की लामबंदी की भावनात्मक शक्ति बना।
लाभकारी मूल्य : किसान राजनीति का आर्थिक केंद्र
कृषि उपज का न्यायपूर्ण मूल्य KRRS की सबसे स्थायी मांगों में रहा।
लेकिन फसल का मूल्य अक्सर वह स्वयं तय नहीं करता।
यहीं किसान को सबसे बड़ा आर्थिक अन्याय दिखाई देता है।
KRRS ने लागत और मूल्य के बीच इस संबंध को राजनीतिक बनाया।
यह केवल “ज्यादा दाम दो” का नारा नहीं था।
उत्पादन मूल्य श्रृंखला में किसान का हिस्सा कितना होना चाहिए?
लाभकारी मूल्य की राजनीति की स्थायी विरासत
आज भारतीय किसान राजनीति में लागत आधारित MSP, C2, लाभांश, गन्ना FRP तथा आय सुरक्षा जैसे प्रश्न जिस तीव्रता से उठते हैं, वे उसी व्यापक किसान-मूल्य राजनीति की निरंतरता हैं जिसमें KRRS भी एक प्रमुख योगदानकर्ता रहा।
KRRS ने अकेले यह विमर्श नहीं बनाया।
महाराष्ट्र के शेतकरी संगठन, BKU और अन्य किसान आंदोलनों का भी बड़ा योगदान था।
लेकिन कर्नाटक में मूल्य प्रश्न को राज्यव्यापी किसान पहचान का आधार बनाने में KRRS की भूमिका निर्णायक थी।
लेकिन मूल्य ही पूरा समाधान नहीं
KRRS के इतिहास से यह भी स्पष्ट होता है कि बेहतर कृषि मूल्य अकेले किसान संकट समाप्त नहीं करता।
यदि किसान की जोत बहुत छोटी है तो बेहतर मूल्य के बावजूद कुल आय सीमित रह सकती है।
यदि उत्पादन लागत बहुत ऊंची है तो मूल्य वृद्धि का लाभ खर्च में खत्म हो सकता है।
यदि जलवायु जोखिम अधिक है तो एक खराब फसल कई वर्षों की आय नष्ट कर सकती है।
इसलिए आधुनिक किसान नीति को केवल MSP में सीमित नहीं किया जा सकता।
यहीं KRRS की बाद की लागत और स्वायत्तता राजनीति महत्वपूर्ण बनती है।
बिजली : आर्थिक राहत से पर्यावरणीय प्रश्न तक
कृषि बिजली KRRS के सबसे बड़े शुरुआती मुद्दों में थी।
पंपसेट कृषि के लिए बिजली आवश्यक हो चुकी थी।
इसलिए बिजली शुल्क किसान लागत का केंद्रीय प्रश्न बना।
KRRS ने सस्ती कृषि बिजली के लिए संघर्ष किया।
लेकिन समय के साथ यही नीति एक नए विरोधाभास तक पहुंची—
सस्ती या मुफ्त बिजली किसान को तत्काल राहत देती है।
लेकिन यदि उससे बोरवेल अधिक गहरे होते जाएं और भूजल गिरता जाए, तो दीर्घकालीन कृषि संकट बढ़ सकता है।
यह उदाहरण दिखाता है कि किसान आंदोलन की न्यायपूर्ण तत्काल मांग भी समय के साथ नई पर्यावरणीय समस्या पैदा कर सकती है।
KRRS का विकास : आर्थिक आंदोलन से पारिस्थितिक आंदोलन तक
KRRS की विशेषता यही रही कि वह कुछ पुराने प्रश्नों को बाद में नए रूप में पढ़ने लगा।
बाहरी खरीदे गए इनपुट पर निर्भरता ही क्यों इतनी अधिक है?
बीज किसान के अपने नियंत्रण में कितना है?
यानी आंदोलन धीरे-धीरे रियायत मांगने से निर्भरता घटाने की दिशा में बढ़ा।
यह उसकी वैचारिक यात्रा का अत्यंत महत्वपूर्ण परिवर्तन था।
कर्ज : व्यक्तिगत असफलता से संरचनात्मक संकट तक
किसान ऋण और बैंक वसूली के विरुद्ध KRRS की राजनीति का सामाजिक प्रभाव भी बड़ा था।
आर्थिक संकट में फंसा किसान अक्सर स्वयं को असफल मान सकता है।
यदि पूरा कृषि मूल्य ढांचा किसान को घाटे में डालता है, तो कर्ज केवल उसकी व्यक्तिगत विफलता नहीं।
ने व्यक्तिगत आर्थिक संकट को सामूहिक राजनीतिक प्रश्न बना दिया।
यह किसान मनोविज्ञान में महत्वपूर्ण परिवर्तन था।
लेकिन कर्ज-माफी की सीमा
फिर भी बार-बार कर्ज राहत किसी स्थायी कृषि व्यवस्था का विकल्प नहीं।
यदि किसान का उत्पादन मॉडल ही ऋण आधारित है,
इसलिए KRRS की सबसे उपयोगी बाद की सोच वही थी जिसमें लागत घटाना, मूल्य सुधारना और किसान की बाहरी निर्भरता कम करना साथ रखा गया।
1991 के बाद आंदोलन क्यों बदल गया?
भारत के आर्थिक उदारीकरण और GATT की उरुग्वे दौर की वार्ताओं ने KRRS के सामने नया राजनीतिक संसार खोल दिया।
अब किसान समस्या केवल राज्य सरकार या नई दिल्ली तक सीमित नहीं लग रही थी।
यहीं नंजुंडास्वामी का नेतृत्व निर्णायक हुआ।
उन्होंने किसान आंदोलन की दृष्टि स्थानीय राज्य से विश्व अर्थव्यवस्था तक विस्तारित कर दी।
बीज सत्याग्रह : KRRS की सबसे विशिष्ट ऐतिहासिक देन
1992 का बीज सत्याग्रह संगठन की राजनीतिक पहचान का निर्णायक क्षण था।
को किसान के लिए एक सरल प्रश्न में बदल दिया—
तो नई कानूनी व्यवस्था इस व्यवहार को कैसे प्रभावित करेगी?
यह प्रश्न भारतीय किसान राजनीति में स्थायी स्थान बना गया।
आंदोलन की भाषा और कानूनी तथ्य
इतिहास का संतुलित मूल्यांकन यह भी स्वीकार करता है कि आंदोलन के कुछ नारे वास्तविक TRIPS व्यवस्था की तुलना में अधिक व्यापक थे।
TRIPS ने हर बीज पर अनिवार्य पेटेंट लागू नहीं किया।
भारत को स्वतंत्र पौध किस्म संरक्षण व्यवस्था बनाने का विकल्प उपलब्ध था।
आगे भारत ने किसान अधिकारों को स्पष्ट कानूनी स्थान भी दिया।
इसलिए KRRS के प्रत्येक आंदोलनकारी दावे को शाब्दिक कानूनी सत्य मानना उचित नहीं।
लेकिन इससे उसके उठाए मूल प्रश्न का महत्व कम नहीं होता।
किसान अधिकार कानून और आंदोलन की अप्रत्यक्ष सफलता
भारत के पौधा किस्म एवं कृषक अधिकार कानून ने किसान को बीज बचाने, उपयोग करने, पुनः बोने, विनिमय और कुछ शर्तों के तहत बिक्री जैसे व्यापक अधिकार प्रदान किए।
इस परिणाम को केवल KRRS की जीत कहना अतिशयोक्ति होगी।
परंतु यह भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि 1990 के दशक के किसान, जैव-विविधता और नागरिक समाज आंदोलनों ने किसान अधिकारों को राष्ट्रीय बहस में केंद्रीय बनाया।
इस अर्थ में बीज सत्याग्रह की नीति-विरासत वास्तविक है।
कॉरपोरेट शक्ति को दृश्य बनाना
KRRS ने बहुराष्ट्रीय कंपनी को अमूर्त आर्थिक अवधारणा नहीं रहने दिया।
Cargill और बाद में Monsanto के खिलाफ प्रत्यक्ष कार्रवाइयों ने किसान–कॉरपोरेट संबंध को दृश्य संघर्ष में बदल दिया।
और बीज तथा कृषि तकनीक की बहस जन राजनीति में आई।
यह रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत प्रभावी था।
लेकिन उग्र प्रत्यक्ष कार्रवाई की लोकतांत्रिक सीमा
संपत्ति-विनाश, कंपनी कार्यालय में तोड़फोड़ अथवा परीक्षण फसल नष्ट करने जैसी कार्रवाई लोकतांत्रिक विरोध की कठिन सीमा का प्रश्न उठाती है।
किसी नीति या कंपनी से गंभीर असहमति अपने आप संपत्ति नष्ट करने का अधिकार नहीं देती।
यह KRRS के इतिहास का वह हिस्सा है जिसे न तो छिपाया जाना चाहिए, न गौरवगाथा में बदल देना चाहिए।
उसकी राजनीतिक प्रभावशीलता और कानूनी/नैतिक वैधता अलग-अलग प्रश्न हैं।
नंजुंडास्वामी का मूल तर्क
उनकी राजनीति का केंद्रीय तर्क यह था कि व्यक्ति के खिलाफ हिंसा और कॉरपोरेट संपत्ति के खिलाफ प्रत्यक्ष कार्रवाई में अंतर है।
आलोचकों ने इस अंतर को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया।
यही KRRS की गांधीवादी भाषा और उसकी उग्र प्रत्यक्ष कार्रवाई के बीच सबसे स्पष्ट विरोधाभास था।
यह विरोधाभास संगठन की विशिष्टता भी है और सीमा भी।
जिनेवा को गांव से जोड़ना
KRRS की ऐतिहासिक विशिष्टता इस बात में भी है कि उसने किसान को समझाया कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौता उसके खेत से संबंधित हो सकता है।
इससे किसान की राजनीतिक दृष्टि का पैमाना बदल गया।
यह किसी राज्यस्तरीय आंदोलन के लिए असाधारण परिवर्तन था।
विकसित देशों के कृषि समर्थन पर उठाया गया प्रश्न
KRRS ने एक महत्वपूर्ण विरोधाभास को राजनीतिक मुद्दा बनाया—
यदि विकसित देशों के किसानों को विशाल वित्तीय और संस्थागत सहायता उपलब्ध है, तो छोटे भारतीय किसान से मुक्त बाजार प्रतिस्पर्धा की अपेक्षा कितनी न्यायपूर्ण है?
यह प्रश्न आज भी कृषि व्यापार बहस में प्रासंगिक है।
इसलिए KRRS के वैश्वीकरण-विरोध को केवल भावनात्मक विदेशी-विरोध के रूप में खारिज करना उचित नहीं।
उसके भीतर वास्तविक राजनीतिक अर्थशास्त्र था।
लेकिन वैश्वीकरण के अवसर भी वास्तविक हैं
संतुलित मूल्यांकन का दूसरा पक्ष यह है कि वैश्विक बाजार किसान के लिए अवसर भी पैदा कर सकता है।
यही कारण है कि शरद जोशी जैसे किसान नेता KRRS से अलग निष्कर्ष पर पहुंचे।
भारतीय किसान राजनीति की यह बहस महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों पक्षों में आंशिक सत्य था।
लेकिन बाजार शक्ति असमान हो सकती है।
KRRS की वास्तविक मांग : मुक्त बाजार से अधिक न्यायपूर्ण बाजार
इसलिए KRRS को केवल “मुक्त व्यापार विरोधी” कहना अधूरा है।
किसान किस शक्ति से बाजार में प्रवेश कर रहा है?
यदि नहीं, तो औपचारिक बाजार स्वतंत्रता किसान की वास्तविक स्वतंत्रता नहीं बनती।
यही संगठन की किसान-संप्रभुता अवधारणा का आधार है।
La Via Campesina से जुड़ना
KRRS की भारतीय किसान इतिहास में सबसे विशिष्ट उपलब्धियों में से एक उसका अंतरराष्ट्रीय किसान नेटवर्कों में सक्रिय प्रवेश है।
La Via Campesina के साथ संबंध ने उसे छोटे किसानों, खेत मजदूरों और ग्रामीण आंदोलनों के वैश्विक नेटवर्क से जोड़ा।
People’s Global Action और Intercontinental Caravan
1990 के दशक के उत्तरार्ध की वैश्विक गतिविधियों ने KRRS को भारत के सबसे अंतरराष्ट्रीय किसान संगठनों में एक बनाया।
कर्नाटक के किसान यूरोप में बहुराष्ट्रीय कंपनियों और वैश्विक आर्थिक संस्थाओं के सामने प्रदर्शन कर रहे थे।
यह दृश्य भारतीय किसान राजनीति की पारंपरिक कल्पना से बिल्कुल अलग था।
किसान अब केवल गांव और राज्य की सीमा में नहीं था।
सिएटल से पहले वैश्वीकरण-विरोध
KRRS की ऐतिहासिक पहचान इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उसने पश्चिमी दुनिया में 1999 के सिएटल प्रदर्शन से पहले ही कॉरपोरेट वैश्वीकरण के विरुद्ध बड़े किसान अभियान चलाए थे।
इससे वह वैश्विक दक्षिण की उन सामाजिक ताकतों में शामिल हुआ जिन्होंने नवउदारवादी वैश्वीकरण की आलोचना बहुत शुरुआती दौर में की।
इस बिंदु पर भारतीय किसान आंदोलन विश्व सामाजिक आंदोलन इतिहास से जुड़ जाता है।
सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक परिवर्तन
सिर्फ WTO का विरोध किसी आंदोलन को वैकल्पिक कृषि कार्यक्रम नहीं देता।
यहीं खाद्य-संप्रभुता महत्वपूर्ण बनी।
स्थानीय खाद्य जरूरत और निर्यात के बीच संतुलन क्या हो?
किसान और उपभोक्ता का संबंध कैसा हो?
यह आंदोलन का महत्वपूर्ण बौद्धिक विकास था।
केवल विरोध करने वाला संगठन नहीं
अमृता भूमि इसी परिवर्तन का संस्थागत प्रतीक बनी।
कर्नाटक राज्य रैयत संघ की संक्षिप्त समयरेखा
KRRS की विशिष्टता यह थी कि उसने किसान को केवल मूल्य मांगने वाला उत्पादक नहीं, बीज, ज्ञान, भोजन और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार रखने वाला नागरिक माना। उसने गैर-दलीय किसान राजनीति को विश्व व्यापार, कॉरपोरेट नियंत्रण और पर्यावरणीय न्याय से जोड़ा। फिर भी किसान की एकीकृत पहचान के भीतर छोटे किसान, खेत मजदूर, जाति और क्षेत्रीय असमानताओं का समाधान अधूरा रहा; उग्र कार्रवाइयों और नेतृत्व-निर्भरता ने भी सीमाएं पैदा कीं। अमृतभूमि, प्राकृतिक खेती और खाद्य-संप्रभुता की दिशा उसकी सबसे टिकाऊ विरासत है—प्रतिरोध को वैकल्पिक कृषि-निर्माण से जोड़ना।
प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक स्रोत
स्रोत-सावधानी: संगठन, सरकार, कंपनियों और अकादमिक अध्ययनों में प्रत्यक्ष कार्रवाइयों, जनाधार और आर्थिक प्रभाव पर अलग दावे हैं। प्रत्येक दावे को उसके स्रोत और संदर्भ में पढ़ा गया है।