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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–004 · अध्याय 07

अवध किसान आंदोलन (1917–1922)

तालुकेदारी व्यवस्था और ग्रामीण संकट से किसान सभाओं, बाबा रामचंद्र, असहयोग, रायबरेली की घटनाओं, दमन और एका आंदोलन तक

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskविस्तृत शोध संस्करण · 22 अगस्त 2026

अवध किसान आंदोलन को केवल असहयोग आंदोलन का ग्रामीण विस्तार मानना उसके स्वतंत्र सामाजिक इतिहास को छोटा करना होगा। यह तालुकेदारी सत्ता, ऊँचे लगान, अवैध उपकर, बेदखली और बेगार के विरुद्ध किसान संगठन का बहुस्तरीय संघर्ष था। स्थानीय नेतृत्व और कांग्रेस के सहयोग के साथ-साथ उनके बीच उभरी दूरी, हिंसा और दमन, जाति-वर्ग की सीमाएँ तथा एका आंदोलन तक की निरंतरता—सभी को इस अध्ययन में अलग-अलग दर्ज किया गया है।

खंड 8.1

भूमिका — भारतीय किसान आंदोलनों में अवध किसान आंदोलन का स्थान

1917 से 1922 के बीच अवध में विकसित किसान आंदोलन आधुनिक भारतीय इतिहास के सबसे व्यापक और सामाजिक रूप से जटिल ग्रामीण आंदोलनों में से एक था।

इसके केंद्र में कोई एक फसल, एक कर या एक सरकारी आदेश नहीं था। किसानों की शिकायतें अनेक थीं—

ऊँचा लगान,

बेदखली,

अवैध उपकर,

नजराना,

बेगार,

जंगल और चराई संबंधी प्रतिबंध,

तालुकेदारों और उनके अमलों की मनमानी,

और प्रथम विश्वयुद्ध के बाद बढ़ी आर्थिक कठिनाइयाँ।

इन शिकायतों को स्थानीय संगठन और राजनीतिक भाषा देने में बाबा रामचंद्र जैसे नेताओं की बड़ी भूमिका रही।

अवध चंपारण, खेड़ा और बारडोली से अलग क्यों था?

चंपारण में केंद्रीय प्रश्न यूरोपीय नील प्लांटर और तिनकठिया व्यवस्था था।

खेड़ा में खराब फसल और राजस्व राहत।

बारडोली में राजस्व पुनर्मूल्यांकन।

लेकिन अवध में किसान की प्रत्यक्ष प्रतिद्वंद्वी शक्ति अक्सर औपनिवेशिक अधिकारी नहीं, बल्कि तालुकेदार और जमींदार थे।

यही बड़ा अंतर था।

ब्रिटिश शासन इस तालुकेदार व्यवस्था का राजनीतिक संरक्षक था, लेकिन किसान रोजमर्रा में शोषण को स्थानीय जमींदारी सत्ता के रूप में अनुभव करता था।

इसलिए अवध के किसान के लिए “राज” कई स्तरों पर मौजूद था—

ब्रिटिश सरकार,

जिला अधिकारी,

तालुकेदार,

जमींदार,

अमला

और स्थानीय साहूकार।

आंदोलन का भूगोल

किसान उभार विशेष रूप से—

प्रतापगढ़,

रायबरेली,

सुल्तानपुर,

फैजाबाद,

सीतापुर

और आसपास के जिलों

में फैला।

बाद में हरदोई, सीतापुर और बहराइच के क्षेत्रों में एका आंदोलन विकसित हुआ।

इन सभी को एक ही रूप में देखना गलत होगा।

अवध किसान सभा का आंदोलन और एका आंदोलन जुड़े हुए लेकिन अलग चरण और संरचनाएँ थे।

स्थानीय आंदोलन और राष्ट्रीय राजनीति

अवध किसान आंदोलन की एक बड़ी विशेषता थी कि यह स्थानीय किसान राजनीति और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के बीच सीधे संपर्क का क्षेत्र बना।

जवाहरलाल नेहरू ने 1920 से अवध के गांवों का व्यापक दौरा किया।

कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन के दौरान किसान ऊर्जा को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने की कोशिश की।

लेकिन किसान की अपनी अपेक्षाएँ थीं।

उसके लिए “स्वराज” कई बार अर्थ रखता था—

बेदखली से मुक्ति,

कम लगान,

जमींदार की मनमानी का अंत

और खेत पर सुरक्षित अधिकार।

कांग्रेस के लिए स्वराज ब्रिटिश शासन से राजनीतिक स्वतंत्रता की दिशा में व्यापक कार्यक्रम था।

यहीं दोनों के बीच सहयोग और तनाव दोनों पैदा हुए।

अवध आंदोलन का ऐतिहासिक महत्व

अवध ने भारतीय राजनीति को यह दिखाया कि ग्रामीण किसान केवल राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा सक्रिय की जाने वाली निष्क्रिय जनता नहीं था।

उसकी अपनी शिकायतें थीं।

उसके अपने नेता थे।

उसकी अपनी राजनीतिक भाषा थी।

और कई बार उसकी मांगें राष्ट्रीय नेतृत्व के कार्यक्रम से आगे निकल सकती थीं।

यही कारण है कि आधुनिक इतिहासलेखन अवध किसान आंदोलन को केवल असहयोग आंदोलन के ग्रामीण विस्तार के रूप में नहीं देखता।

खंड 8.2

अवध — भूगोल, जिले और ग्रामीण अर्थव्यवस्था

अवध उत्तर भारत के गंगा मैदान का अत्यंत उपजाऊ क्षेत्र था।

उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के आरंभ में यह संयुक्त प्रांत—आगरा एवं अवध संयुक्त प्रांत—का महत्वपूर्ण हिस्सा था।

आज यह क्षेत्र मुख्यतः उत्तर प्रदेश में आता है।

प्रमुख जिले

अवध की ऐतिहासिक सीमा में प्रमुख रूप से शामिल थे—

लखनऊ,

उन्नाव,

रायबरेली,

प्रतापगढ़,

सुल्तानपुर,

फैजाबाद,

बाराबंकी,

सीतापुर,

बहराइच,

गोंडा

और हरदोई के हिस्से।

किसान आंदोलन सभी जिलों में समान तीव्रता से नहीं फैला।

प्रतापगढ़ और रायबरेली विशेष रूप से महत्वपूर्ण केंद्र बने।

उपजाऊ मैदान

गंगा और उसकी सहायक नदियों के मैदानों ने अवध को कृषि की दृष्टि से समृद्ध बनाया।

यहाँ मुख्य रूप से—

गेहूँ,

धान,

जौ,

चना,

दालें,

गन्ना

और विभिन्न स्थानीय फसलें

उगाई जाती थीं।

लेकिन भूमि की उपजाऊ क्षमता का लाभ किसान को किस अनुपात में मिलता था, यही विवाद का मूल था।

उपजाऊ भूमि का अर्थ हमेशा किसान समृद्धि नहीं था।

यदि किराया ऊँचा हो, बेदखली का भय हो और अतिरिक्त वसूली लगातार होती रहे, तो अधिक उत्पादन का बड़ा हिस्सा जमींदारी तंत्र में चला सकता था।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बाजार से संबंध

बीसवीं सदी के आरंभ तक अवध की कृषि बाजार से अधिक जुड़ चुकी थी।

किसान को—

लगान नकद देना पड़ सकता था,

ऋण की आवश्यकता होती थी,

फसल बाजार में बेचनी पड़ती थी,

और कृषि उपकरण तथा उपभोग की वस्तुएँ खरीदनी पड़ती थीं।

इसलिए महंगाई और कीमतों के उतार-चढ़ाव का प्रभाव ग्रामीण जीवन पर बढ़ गया।

जनसंख्या और भूमि पर दबाव

अवध में जनसंख्या घनत्व अपेक्षाकृत अधिक था।

भूमि सीमित और खेती पर निर्भर आबादी बड़ी थी।

इससे भूमि की मांग बढ़ी।

तालुकेदार और जमींदार इस परिस्थिति का उपयोग किराया बढ़ाने के लिए कर सकते थे।

यदि एक किसान अधिक लगान देने से इनकार करे तो उसकी जगह दूसरा किसान तैयार मिल सकता था।

यही बेदखली के खतरे को वास्तविक बनाता था।

छोटे किसान और किरायेदार

अवध का सामान्य किसान बड़े भू-स्वामी की तरह स्वतंत्र भूमि-मालिक नहीं था।

बहुत बड़ी संख्या में किसान किसी तालुकेदार या जमींदार के अधीन किरायेदार के रूप में भूमि जोतते थे।

उनकी स्थिति कानूनी श्रेणी पर निर्भर करती थी—

कुछ को अपेक्षाकृत स्थिर स्थायी काश्तकारी अधिकार प्राप्त थे।

कुछ इच्छाधीन काश्तकार जैसी कमजोर स्थिति में थे।

कुछ उपकिरायेदार थे।

यही कानूनी विभाजन ग्रामीण समाज में असुरक्षा पैदा करता था।

खंड 8.3

1856 में अवध का ब्रिटिश विलय — ग्रामीण सत्ता-संरचना कैसे बदली?

अवध किसान आंदोलन की सबसे गहरी ऐतिहासिक जड़ 1856 का ब्रिटिश विलय था।

ईस्ट इंडिया कंपनी ने अवध पर “कुशासन” का आरोप लगाकर उसे अपने साम्राज्य में मिला लिया।

नवाब वाजिद अली शाह को सत्ता से हटा दिया गया।

लेकिन प्रशासनिक परिवर्तन केवल दरबार तक सीमित नहीं रहा।

उसने गांव और जमीन की पूरी सत्ता-संरचना को प्रभावित किया।

नवाबी अवध में तालुकेदार

अवध में तालुकेदार बड़े भू-राजस्व मध्यस्थ और ग्रामीण शक्तिशाली व्यक्ति थे।

वे एक या अनेक गांवों पर अधिकार रखते थे और राज्य को राजस्व देते थे।

उनकी स्थिति केवल आर्थिक नहीं थी।

उनके पास—

सशस्त्र अनुचर,

स्थानीय प्रभाव,

न्याय-संबंधी शक्ति,

सामाजिक प्रतिष्ठा

और राजनीतिक संबंध

भी होते थे।

लेकिन तालुकेदार और वास्तविक कृषक के बीच संबंध हर जगह एक जैसा नहीं था।

अंग्रेजों की शुरुआती नीति

अवध के विलय के बाद ब्रिटिश अधिकारियों के एक हिस्से का मानना था कि तालुकेदार किसानों और राज्य के बीच अनावश्यक तथा दमनकारी मध्यस्थ हैं।

इसलिए प्रारंभिक settlement में अनेक तालुकेदारों की शक्ति कम करने और सीधे गांव-स्तरीय proprietors से संबंध स्थापित करने का प्रयास हुआ।

इससे तालुकेदार वर्ग ब्रिटिश शासन से असंतुष्ट हुआ।

1857 में परिणाम

1857 के विद्रोह में अवध सबसे बड़े प्रतिरोध केंद्रों में से एक बना।

कई तालुकेदार ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह में शामिल हुए।

किसान और ग्रामीण समाज के अनेक हिस्से भी विद्रोह में सक्रिय हुए।

अंग्रेजों ने 1857 के अनुभव से एक बड़ा राजनीतिक सबक निकाला—

अवध के प्रभावशाली तालुकेदारों को पूरी तरह शत्रु बनाना शासन के लिए खतरनाक है।

यहीं से 1858 के बाद नीति में बड़ा परिवर्तन आया।

खंड 8.4

1857 के बाद तालुकेदारों की पुनर्स्थापना — ब्रिटिश–तालुकेदार गठबंधन

1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश शासन ने अवध की ग्रामीण राजनीति के प्रति अपना दृष्टिकोण बदल दिया।

बल्कि उनमें से बड़ी संख्या को औपनिवेशिक व्यवस्था का सहयोगी बनाना था।

यह नीति आगे किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि में निर्णायक साबित हुई।

लॉर्ड कैनिंग की नीति

विद्रोह के बाद अवध की जमीन पर ब्रिटिश सरकार के अधिकार की व्यापक घोषणा हुई।

फिर उन तालुकेदारों और जमींदारों को भूमि-अधिकार वापस देने की नीति अपनाई गई जो नई औपनिवेशिक व्यवस्था के प्रति वफादारी स्वीकार करें।

इससे तालुकेदार वर्ग का एक बड़ा हिस्सा ब्रिटिश शासन का सामाजिक आधार बन गया।

क्यों बदल गई नीति?

1857 ने अंग्रेजों को तीन बातें सिखाईं—

पहली: तालुकेदार ग्रामीण समाज में बहुत प्रभावशाली हैं।

दूसरी: उन्हें कमजोर करने से राज्य की गांवों तक पकड़ कम हो सकती है।

तीसरी: उन्हें औपनिवेशिक व्यवस्था में सम्मान और संपत्ति देकर ब्रिटिश सत्ता का सहयोगी बनाया जा सकता है।

इस प्रकार एक राजनीतिक समझौता बना—

ब्रिटिश राज तालुकेदारों के सामाजिक-आर्थिक अधिकार की रक्षा करेगा; तालुकेदार ब्रिटिश शासन की स्थिरता में सहयोग करेंगे।

किसान पर प्रभाव

यह समझौता किसान की स्थिति के लिए गंभीर था।

उसके पीछे औपनिवेशिक कानून और प्रशासनिक व्यवस्था भी खड़ी थी।

तालुकेदार को अधिकार मिला—

किराया वसूलने का,

कुछ परिस्थितियों में बेदखली का,

भूमि का नियंत्रण रखने का

और ग्रामीण समाज पर सामाजिक प्रभाव बनाए रखने का।

यहीं से किसान के लिए आर्थिक शोषण और राजनीतिक सत्ता एक-दूसरे से जुड़ गए।

तालुकेदार औपनिवेशिक अभिजात वर्ग बनते हैं

समय के साथ अवध के बड़े तालुकेदार—

ब्रिटिश अधिकारियों से संबंध,

दरबारी सम्मान,

विधान परिषदों में प्रतिनिधित्व

और राजनीतिक संगठनों

के माध्यम से औपनिवेशिक elite का हिस्सा बनने लगे।

इसलिए बीसवीं सदी में जब किसान उनके खिलाफ उठे तो यह केवल गांव के जमींदार से संघर्ष नहीं था।

वह अप्रत्यक्ष रूप से औपनिवेशिक सामाजिक व्यवस्था से भी टकराव था।

खंड 8.5

तालुकेदार, जमींदार, पट्टेदार और किसान — अवध की भूमि-संबंधी संरचना

अवध के किसान आंदोलन को समझने में सबसे कठिन लेकिन आवश्यक प्रश्न है—

जमीन पर वास्तव में अधिकार किसका था?

एक खेत पर कई स्तरों के अधिकार हो सकते थे।

सबसे ऊपर तालुकेदार।

उसके नीचे जमींदार अथवा उपभू-स्वामी।

फिर पट्टेदार।

और अंत में वास्तविक कृषक।

इस बहुस्तरीय व्यवस्था में किसान की सुरक्षा उसके कानूनी दर्जे पर निर्भर करती थी।

तालुकेदार

तालुकेदार कई गांवों या बड़े भूभाग का राजस्व और संपत्ति-अधिकार रखने वाला बड़ा भू-स्वामी हो सकता था।

कुछ तालुके बहुत विशाल थे।

तालुकेदार का प्रभाव केवल जमीन तक सीमित नहीं था।

उसका अमला—

किराया वसूलता,

बकाया की सूची बनाता,

किसानों से अतिरिक्त वसूली कर सकता था

और बेदखली की प्रक्रिया में भूमिका निभाता था।

छोटे जमींदार

सभी तालुकेदार विशाल रियासतों के स्वामी नहीं थे।

कई छोटे जमींदार, उप-भू-स्वामी और मध्यस्थ भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था का हिस्सा थे।

इसलिए किसान का शोषण केवल किसी एक बड़े “राजा” अथवा तालुकेदार से ही नहीं होता था।

स्थानीय स्तर पर अनेक मध्यस्थ मौजूद थे।

occupancy tenant

किरायेदारों की कुछ श्रेणियों को दीर्घकालिक खेती के आधार पर अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थायी काश्तकारी अधिकार मिल सकते थे।

ऐसा किसान सामान्य tenant-at-will की तुलना में अधिक सुरक्षित था।

लेकिन सुरक्षित अधिकार का अर्थ पूर्ण स्वामित्व नहीं था।

उसे किराया देना पड़ता था और विभिन्न कानूनी विवादों का सामना करना पड़ सकता था।

statutory tenant

किरायेदारी कानूनों ने कुछ किसानों को वैधानिक अधिकार दिए, लेकिन जमींदारों और किसानों के बीच संघर्ष पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।

कानून और व्यवहार के बीच अंतर बना रहा।

किसान भले कागज पर किसी सुरक्षा का अधिकारी हो, गांव में शक्तिशाली जमींदार और उसका अमला उसके जीवन पर अधिक प्रत्यक्ष प्रभाव रख सकता था।

tenant-at-will

सबसे कमजोर स्थितियों में वे किसान थे जिनकी किरायेदारी अपेक्षाकृत अस्थिर थी।

उनके सामने वास्तविक खतरा था—

किराया बढ़ाओ या जमीन छोड़ो।

ऐसी परिस्थिति में किसान की bargaining power बहुत कम थी।

बेदखली का राजनीतिक अर्थ

बेदखली केवल आर्थिक घटना नहीं थी।

किसान के लिए जमीन—

रोटी,

घर,

सामाजिक पहचान,

जातीय/परिवारिक प्रतिष्ठा

और भविष्य

सब कुछ थी।

इसीलिए आगे किसान आंदोलन में बेदखली रोकना सबसे शक्तिशाली मांगों में से एक बना।

किराया और अतिरिक्त वसूली

तालुकेदार या जमींदार की मांग केवल निर्धारित किराये तक सीमित नहीं रह सकती थी।

किसानों से विभिन्न अवसरों पर—

नजराना,

शादी-विवाह संबंधी वसूली,

मोटराना,

हथियावन,

घोड़ावन,

बेगार

और अन्य स्थानीय उपकर

लिए जाने की शिकायतें सामने आईं।

कानून बनाम ग्रामीण शक्ति

यहीं अवध की सबसे बड़ी समस्या थी।

एक ओर ब्रिटिश शासन कानून, अदालत और किरायेदारी नियमों की बात करता था।

दूसरी ओर ग्रामीण समाज में तालुकेदार—

धन,

भूमि,

पुलिस और प्रशासन से निकटता

तथा सामाजिक प्रभाव

के कारण किसान से बहुत अधिक शक्तिशाली था।

इसलिए किसान का संघर्ष सिर्फ बेहतर कानून के लिए नहीं था।

उसे उस स्थानीय शक्ति-संतुलन को बदलना था जिसमें जमींदार की बात लगभग कानून जैसी लगती थी।

अवध किसान आंदोलन की जड़ किसी एक खराब फसल अथवा अचानक बढ़े कर में नहीं थी।

उसकी जड़ें लगभग छह दशक पुरानी औपनिवेशिक ग्रामीण व्यवस्था में थीं।

क्रम कुछ इस प्रकार था—

1856 — अवध का ब्रिटिश विलय

1857 — व्यापक विद्रोह

1858 के बाद — तालुकेदारों की राजनीतिक पुनर्स्थापना

ब्रिटिश–तालुकेदार गठबंधन

किसानों पर किरायेदारी और बेदखली का दबाव

भूमि पर जनसंख्या और बाजार का बढ़ता दबाव

बीसवीं सदी में लगान तथा अतिरिक्त वसूली का संकट

1917–20 — संगठित किसान असंतोष।

इस ऐतिहासिक संरचना से एक निर्णायक निष्कर्ष निकलता है—

अवध का किसान केवल “अंग्रेज सरकार” के खिलाफ सीधे नहीं लड़ रहा था।

उसकी रोजमर्रा की लड़ाई तालुकेदार, जमींदार और उनके अमले से थी।

लेकिन उस ग्रामीण सत्ता को स्थायित्व औपनिवेशिक शासन ने दिया था।

इसलिए स्थानीय कृषक संघर्ष धीरे-धीरे औपनिवेशिक-विरोधी राजनीति से जुड़ सकता था।

यही अवध आंदोलन की जटिलता है।

किसान कहता था—

“हमें बेदखली से बचाओ, लगान कम करो, बेगार खत्म करो।”

राष्ट्रीय नेता कह रहा था—

“स्वराज्य प्राप्त करो।”

1920–21 में यही दोनों भाषाएँ एक-दूसरे से मिलने वाली थीं।

अवध किसान आंदोलन को केवल “लगान कम कराने का आंदोलन” कहना उसके वास्तविक स्वरूप को बहुत छोटा कर देना होगा। किसान के ऊपर आर्थिक दबाव कई परतों में काम करता था। एक ओर नियमित किराया था; दूसरी ओर नजराना और तरह-तरह के अबवाब; तीसरी ओर बेदखली का भय; चौथी ओर बेगार और सामाजिक अधीनता; और इन सबके ऊपर प्रथम विश्वयुद्ध के वर्षों तथा उसके बाद की महंगाई ने ग्रामीण परिवार का बजट बिगाड़ दिया।

इसलिए 1917–20 के बीच अवध में जो विस्फोटक स्थिति बनी, वह किसी एक कारण से उत्पन्न नहीं हुई थी। आधुनिक कृषक-आंदोलन अध्ययन भी अवध में ऊँचे किराये, अवैध कर, बेगार और जबरन बेदखली को किसान लामबंदी के केंद्रीय प्रश्नों में रखते हैं। (INFLIBNET E-Books)

खंड 8.6

ऊँचा लगान — किसान की आय और तालुकेदार की मांग के बीच बढ़ता अंतर

अवध के किसान आंदोलन का सबसे प्रत्यक्ष आर्थिक प्रश्न था—

लगान।

लेकिन इसे औपनिवेशिक सरकार के भू-राजस्व से अलग समझना जरूरी है।

बारडोली में किसान सीधे सरकार द्वारा निर्धारित land revenue enhancement के खिलाफ लड़ रहा था।

अवध में बड़ी संख्या में किसान तालुकेदार अथवा जमींदार के किरायेदार थे। इसलिए उसकी प्रत्यक्ष देनदारी अक्सर rent—किराया/लगान—अपने landlord को थी।

भूमि की बढ़ती मांग

उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों और बीसवीं सदी के आरंभ में भूमि पर दबाव बढ़ा।

खेती योग्य जमीन की मांग अधिक थी।

ऐसी स्थिति में जमींदार की bargaining power मजबूत होती थी।

यदि पुराना किसान बढ़ा हुआ किराया न दे तो उसे आशंका रहती थी—

दूसरा व्यक्ति अधिक किराये पर जमीन लेने को तैयार हो जाएगा।

यही स्थिति किसान की असुरक्षा का आर्थिक आधार थी।

लगान केवल संख्या नहीं था

मान लीजिए किसान ने अच्छी फसल ली।

उससे उसे—

बीज रखना था,

परिवार चलाना था,

पशु पालने थे,

कर्ज चुकाना था,

अगली फसल की तैयारी करनी थी

और लगान देना था।

इसलिए landlord द्वारा किराया बढ़ाना किसान के लिए केवल लाभ में कमी नहीं था।

वह परिवार की subsistence economy पर हमला बन सकता था।

कृषक आंदोलनों के अध्ययन में इसी बात पर जोर दिया गया है कि भारतीय किसान अक्सर अमूर्त “जमींदारी उन्मूलन” की अपेक्षा अपनी जीविका और पुराने अधिकारों की रक्षा के लिए अधिक तत्काल रूप से लड़ते थे। (INFLIBNET E-Books)

किसान कितना लगान उचित मानता था?

यहाँ किसान और जमींदार की न्याय की अवधारणा अलग थी।

जमींदार कह सकता था—

जमीन की मांग बढ़ी है; बाजार मूल्य बढ़ा है; इसलिए किराया भी बढ़ेगा।

किसान कहता था—

मैं वर्षों से यह खेत जोत रहा हूँ; जमीन को उपजाऊ बनाया है; केवल इसलिए कि कोई दूसरा अधिक पैसा देने को तैयार है, मुझे निकालना अन्याय है।

यहीं आर्थिक विवाद customary right बनाम market rent के संघर्ष में बदल जाता था।

उपकिरायेदारी की समस्या

भूमि-संबंधों की कई परतों के कारण अंतिम कृषक द्वारा दिया गया किराया ऊपर के स्तर पर दर्ज रकम से अधिक हो सकता था।

यदि बीच में उप-भू-स्वामी अथवा subletting की व्यवस्था हो तो हर स्तर अपनी आय निकालना चाहता था।

इससे वास्तविक cultivator पर दबाव बढ़ सकता था।

लगान और ऋण का चक्र

लगान समय पर देना आवश्यक था।

फसल खराब हुई या परिवार पर आकस्मिक खर्च आया तो किसान साहूकार से ऋण ले सकता था।

इस प्रकार—

ऊँचा लगान → कर्ज → ब्याज → अगली फसल पर दबाव → नया कर्ज

का चक्र बन सकता था।

इसलिए अवध में किसान असंतोष को केवल landlord–tenant संबंध के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक सरकार–जमींदार–साहूकार ग्रामीण सत्ता-संबंध के संदर्भ में समझना चाहिए। कृषक इतिहास का साहित्य इस त्रिकोण को औपनिवेशिक ग्रामीण प्रतिरोध की महत्वपूर्ण संरचना मानता है। (INFLIBNET E-Books)

खंड 8.7

नजराना, अबवाब और अवैध उपकर — लगान के ऊपर लगने वाला दूसरा लगान

यदि किसान केवल निर्धारित किराया देता तो भी उसका आर्थिक बोझ भारी हो सकता था।

लेकिन अवध की सबसे तीखी शिकायतों में से एक थी—

लगान के अतिरिक्त वसूली।

इन अतिरिक्त मांगों को अलग-अलग स्थानों और परिस्थितियों में—

नजराना, अबवाब, सेस, दस्तूरी अथवा स्थानीय नामों

से जाना जा सकता था।

नजराना क्या था?

नजराना मूलतः भेंट अथवा भुगतान का रूप था।

लेकिन भूमि-संबंधों में यह किसान पर अतिरिक्त आर्थिक मांग बन सकता था।

उदाहरण के लिए—

पट्टे के नवीकरण,

किरायेदारी जारी रखने,

उत्तराधिकार स्वीकार कराने

या किसी अन्य अवसर

पर किसान से अतिरिक्त रकम मांगी जा सकती थी।

किसान की शिकायत थी—

जब नियमित लगान दे रहे हैं तो जमीन पर बने रहने के लिए फिर अतिरिक्त पैसा क्यों?

अबवाब क्या थे?

“अबवाब” का सामान्य अर्थ था नियमित किराये के ऊपर लगाए गए अतिरिक्त उपकर।

इनकी समस्या केवल राशि नहीं थी।

सबसे बड़ी समस्या थी—

इनका अनिश्चित और मनमाना होना।

किसान अपना वार्षिक आर्थिक हिसाब तभी बना सकता है जब उसे पता हो कि कितना भुगतान करना है।

यदि हर कुछ समय बाद नया शुल्क सामने आ जाए तो उसकी आर्थिक सुरक्षा समाप्त हो जाती है।

प्रसिद्ध स्थानीय नाम

अवध किसान आंदोलन संबंधी राष्ट्रवादी और बाद के साहित्य में अनेक विचित्र नामों वाली वसूलियों का उल्लेख मिलता है, जैसे—

मोटराना — तालुकेदार की मोटर से जोड़ा गया उपकर,

हथियावन — हाथी संबंधी खर्च,

घोड़ावन — घोड़े संबंधी खर्च।

इसके अतिरिक्त विवाह, उत्सव अथवा जमींदार परिवार की दूसरी आवश्यकताओं के अवसर पर किसानों से वसूली के विवरण भी मिलते हैं।

लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण शोध-सावधानी आवश्यक है—

इन सभी नामों को पूरे अवध में समान रूप से लागू सार्वभौमिक कर नहीं माना जाना चाहिए।

वे अलग-अलग estate, क्षेत्र और समय में प्रचलित स्थानीय exactions के उदाहरण थे।

समस्या राशि से बड़ी क्यों थी?

मान लें किसान का वैधानिक किराया निश्चित है।

फिर उससे कहा जाए—

तालुकेदार ने मोटर खरीदी है—पैसा दो।

बेटे की शादी है—पैसा दो।

किसी अधिकारी का स्वागत है—पैसा दो।

अमले का खर्च है—पैसा दो।

किसान के लिए इसका अर्थ था—

उसकी मेहनत से पैदा अधिशेष पर landlord का दावा केवल निर्धारित rent तक सीमित नहीं है।

यही आर्थिक शोषण को सामाजिक अधीनता में बदलता था।

रसीद का प्रश्न

किसान आंदोलन में रसीद का प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण था।

यदि भुगतान की लिखित रसीद नहीं है तो किसान कैसे सिद्ध करेगा कि उसने कितना दिया?

बिना रसीद—

पुराना भुगतान विवादित हो सकता था,

बकाया दिखाया जा सकता था

और अतिरिक्त मांग फिर खड़ी हो सकती थी।

इसलिए किसान की मांग केवल “कम लगान” नहीं थी।

उसकी मांग प्रशासनिक पारदर्शिता भी थी—

जो लिया जाए, उसकी रसीद दो।

आंदोलन का नारा क्यों असरदार हुआ?

जब बाबा रामचंद्र और किसान सभाओं ने अवैध करों और बेगार का प्रश्न उठाया तो किसान को पहली बार उसकी रोजमर्रा की छोटी-छोटी शिकायतें एक साझा राजनीतिक भाषा में दिखाई देने लगीं।

किसी गांव में नजराना समस्या थी।

कहीं बेगार।

कहीं बेदखली।

कहीं ऊँचा किराया।

किसान सभा ने इन्हें जोड़कर कहा—

ये अलग-अलग व्यक्तिगत दुर्भाग्य नहीं, ग्रामीण व्यवस्था की सामूहिक समस्या हैं।

यहीं किसान चेतना का बड़ा परिवर्तन शुरू हुआ।

खंड 8.8

बेदखली — खेत छिन जाने का भय किसान नियंत्रण का सबसे बड़ा हथियार कैसे बना?

अवध किसान आंदोलन की संभवतः सबसे भावनात्मक मांग थी—

बेदखली बंद करो।

“बेदखली” का अर्थ केवल किसी घर से निकालना नहीं था।

कृषि संदर्भ में इसका अर्थ था—

किसान जिस जमीन को जोतता है, उससे उसका किरायेदारी अधिकार समाप्त कर देना अथवा उसे हटाना।

बेदखली इतनी भयावह क्यों थी?

ग्रामीण किसान परिवार के लिए खेत केवल income-generating asset नहीं था।

वह—

रोजगार,

भोजन,

पारिवारिक सुरक्षा,

गांव में सामाजिक स्थिति

और अगली पीढ़ी का भविष्य

था।

खेत गया तो किसान भूमिहीन मजदूर बन सकता था।

इसीलिए बेदखली की धमकी स्वयं में बहुत शक्तिशाली अनुशासन का साधन थी।

किराया बढ़ाने और बेदखली का संबंध

जमींदार कह सकता था—

नया किराया स्वीकार करो।

किसान मना करे तो—

बेदखली।

यदि क्षेत्र में भूमि की मांग अधिक है तो landlord को नया tenant मिल सकता था।

इससे किराया-वृद्धि की मांग और बेदखली एक-दूसरे से जुड़ जाते थे।

कानूनी सुरक्षा पर्याप्त क्यों नहीं थी?

औपनिवेशिक किरायेदारी कानूनों ने कुछ श्रेणियों के tenants को अधिकार दिए थे।

लेकिन कानून का होना और उसका गांव में प्रभावी होना अलग बातें थीं।

किसान को अदालत जाना पड़ता।

वकील चाहिए।

दस्तावेज चाहिए।

समय और पैसा चाहिए।

दूसरी ओर जमींदार के पास—

अमला,

धन,

दस्तावेज

और प्रशासन से संपर्क

अधिक हो सकता था।

इसलिए औपचारिक कानून के बावजूद किसान असुरक्षित रह सकता था।

“गांधी ने बेदखली रोक दी”

किसान राजनीति में बेदखली की केंद्रीयता का एक असाधारण प्रमाण औपनिवेशिक अधिकारियों की रिपोर्टों में मिलता है।

एक अधिकारी ने अवध के दूरस्थ गांवों में गांधी के नाम के प्रसार का वर्णन करते हुए दर्ज किया कि ग्रामीणों में यह धारणा फैल गई थी कि गांधी ने प्रतापगढ़ में बेदखली बंद करा दी है।

यह दावा वस्तुतः गांधी की किसी ऐसी प्रशासनिक शक्ति का प्रमाण नहीं था।

लेकिन किसान मानस का बहुत महत्वपूर्ण प्रमाण था।

गांधी का नाम किसान के लिए किस चीज का प्रतीक बन रहा था?

बेदखली से सुरक्षा। (Cambridge University Press)

यही आगे “गांधी राज” की ग्रामीण कल्पना समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।

बेदखली से आंदोलन तक

पहले किसान अकेला था।

जमींदार ने बेदखली की—

वह अदालत गया या गांव छोड़ गया।

किसान सभा ने नया विचार दिया—

एक किसान की बेदखली पूरे गांव का प्रश्न है।

यहीं व्यक्तिगत tenancy dispute सामूहिक किसान राजनीति में बदलता है।

किसान आंदोलन की मांग

किसान नेता पूर्ण जमींदारी उन्मूलन की आधुनिक क्रांतिकारी भाषा हमेशा नहीं बोल रहे थे।

अक्सर मांग अधिक ठोस थी—

अनुचित बेदखली बंद करो।

पुराने अधिकार मानो।

उचित किराया लो।

अवैध वसूली बंद करो।

इसीलिए इतिहासलेखन में अवध के किसान संघर्ष को तत्काल “land to the tiller” क्रांति मानना सावधानी के बिना उचित नहीं होगा। व्यापक किसान अध्ययन दिखाते हैं कि अनेक आंदोलनों में कृषक अपने खोते हुए customary rights और subsistence security की रक्षा के लिए लड़ रहे थे। (INFLIBNET E-Books)

खंड 8.9

बेगार — मुफ्त श्रम से सामाजिक अपमान तक

अवध के किसान आंदोलन में बेगार केवल आर्थिक मुद्दा नहीं था।

वह ग्रामीण सत्ता-संबंध का सबसे प्रत्यक्ष प्रदर्शन था।

बेगार का अर्थ था—

बिना उचित मजदूरी के जबरन सेवा अथवा श्रम।

कृषक आंदोलनों के समाजशास्त्रीय अध्ययनों में अवध को उन क्षेत्रों में गिना गया है जहाँ forced labour गरीब किसानों के असंतोष का महत्वपूर्ण कारण बना। (INFLIBNET E-Books)

बेगार कौन करता था?

गरीब किसान, कृषि मजदूर और सामाजिक रूप से कमजोर जातियों के लोगों पर इसका बोझ अधिक पड़ सकता था।

उन्हें जमींदार अथवा स्थानीय प्रभुत्वशाली वर्ग के लिए—

सामान ढोने,

घरेलू सेवा,

निर्माण,

सवारी/यात्रा की व्यवस्था,

पानी पहुँचाने,

ईंधन अथवा चारा जुटाने

और अन्य काम

करने पड़ सकते थे।

क्षेत्र और estate के अनुसार स्वरूप अलग था।

आर्थिक नुकसान

किसान के लिए सबसे मूल्यवान चीज केवल पैसा नहीं—

उसका श्रम-समय भी था।

बुवाई या कटाई के मौसम में यदि किसान को अपने खेत से हटाकर landlord की सेवा में जाना पड़े तो वह दोहरा नुकसान उठाता है—

उसे उस श्रम का उचित भुगतान नहीं मिलता,

और अपने खेत का काम भी प्रभावित होता है।

सामाजिक अपमान

बेगार की सबसे बड़ी समस्या यहीं समाप्त नहीं होती।

वह यह संदेश देती थी—

तुम केवल tenant नहीं; हमारे अधीन हो।

इसलिए बेगार-विरोध किसान की गरिमा का प्रश्न बन गया।

किसान कह रहा था—

मैं लगान देता हूँ।

फिर मुफ्त सेवा क्यों करूँ?

जाति और बेगार

ग्रामीण समाज में जातीय पदानुक्रम के कारण बेगार का बोझ समान नहीं था।

निचली और सेवा जातियों से परंपरागत सेवाओं की अपेक्षा अधिक हो सकती थी।

इसलिए किसान आंदोलन के भीतर आर्थिक शोषण और जातीय-सामाजिक अधीनता कई जगह एक-दूसरे से जुड़ती थीं।

यह अवध आंदोलन की जटिलता समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

सभी किसान एक ही वर्गीय स्थिति में नहीं थे।

फिर भी landlord dominance के कुछ रूप उन्हें साझा प्रतिरोध की ओर ला सकते थे।

किसान सभा ने इसे राजनीतिक मुद्दा बनाया

अक्टूबर 1920 में बनी अवध किसान सभा ने illegal taxes और forced labour दोनों के खिलाफ स्पष्ट आवाज उठाई। (INFLIBNET E-Books)

यह परिवर्तन महत्वपूर्ण था।

जिस सेवा को पहले गांव की “परंपरा” कहा जा सकता था, किसान आंदोलन ने उसे नई भाषा दी—

शोषण।

यही राजनीतिक चेतना का विकास था।

खंड 8.10

प्रथम विश्वयुद्ध, महंगाई और 1917–20 का ग्रामीण संकट

यदि ऊँचा लगान, बेदखली और बेगार पहले से मौजूद थे तो किसान आंदोलन ठीक 1917–20 के आसपास इतना तेज क्यों हुआ?

इस प्रश्न का उत्तर प्रथम विश्वयुद्ध और उसके बाद के आर्थिक संकट में भी मिलता है।

युद्ध : 1914–1918

प्रथम विश्वयुद्ध ने भारतीय अर्थव्यवस्था को गहरे रूप में प्रभावित किया।

युद्धकालीन मांग, आपूर्ति की बाधाएँ और व्यापारिक परिस्थितियों के कारण अनेक वस्तुओं के दाम बढ़े।

ग्रामीण परिवार को रोजमर्रा की वस्तुओं के लिए अधिक भुगतान करना पड़ा।

अवध संबंधी सामाजिक-अध्ययनों में विशेष रूप से आवश्यक वस्तुओं और गरीब किसानों/मजदूरों द्वारा उपभोग किए जाने वाले खाद्यान्नों की बढ़ती कीमतों को 1918–22 के कृषक असंतोष से जोड़ा गया है। (INFLIBNET E-Books)

महंगाई का किसान पर विरोधाभासी प्रभाव

पहली दृष्टि में कहा जा सकता है—

अनाज की कीमत बढ़ी तो किसान को लाभ हुआ होगा।

लेकिन सभी किसान बाजार में बड़ा surplus बेचने वाले किसान नहीं थे।

छोटा किसान अपनी उपज का बड़ा हिस्सा परिवार में खपा सकता था।

उसे बाजार से—

कपड़ा,

नमक,

तेल,

औजार

और कभी-कभी अनाज भी

खरीदना पड़ता था।

इसलिए commodity prices बढ़ने का लाभ और नुकसान ग्रामीण वर्गों में समान नहीं था।

गरीब किसान और कृषि मजदूर

भूमिहीन मजदूर और छोटे tenants विशेष रूप से प्रभावित हो सकते थे।

उनकी मजदूरी यदि कीमतों के अनुपात में नहीं बढ़ी तो वास्तविक आय घट गई।

यदि खाद्यान्न महंगा हो और उसी समय किराया भी ऊँचा हो तो परिवार की subsistence security कमजोर होती गई।

युद्धकालीन दबाव और ग्रामीण स्मृति

युद्ध केवल कीमतों का प्रश्न नहीं था।

औपनिवेशिक शासन की युद्ध आवश्यकताओं ने ग्रामीण समाज में सरकार की उपस्थिति को और अधिक महसूस कराया।

भर्ती, धन-संग्रह और युद्धकालीन प्रशासनिक दबाव के अनुभव भी ग्रामीण असंतोष की व्यापक पृष्ठभूमि में थे।

इन सभी का प्रभाव हर गांव में समान नहीं था, इसलिए युद्ध को अकेला कारण नहीं माना जाना चाहिए।

1918 — युद्ध समाप्त, संकट समाप्त नहीं

नवंबर 1918 में युद्ध समाप्त हुआ।

लेकिन महंगाई और सामाजिक तनाव तत्काल समाप्त नहीं हुए।

इसके साथ ही 1918–19 का influenza महामारी संकट आया, जिसने भारत में भारी जनहानि की।

ग्रामीण परिवार—

बीमारी,

मृत्यु,

श्रम की कमी

और आर्थिक असुरक्षा

से जूझ रहे थे।

इसी काल में किसान सभा का संगठन तेजी से बढ़ा।

फरवरी 1918 में बनी UP Kisan Sabha जून 1919 तक लगभग 450 शाखाओं तक पहुँच चुकी थी। (INFLIBNET E-Books)

इतना तेज विस्तार बताता है कि ग्रामीण समाज में संगठन की मांग पहले से मौजूद थी।

आर्थिक संकट से राजनीतिक संगठन तक

किसान की शिकायतें पुरानी थीं।

लेकिन अब तीन नई चीजें साथ आ रही थीं—

पहला — संकट अधिक तीखा हुआ

महंगाई और युद्धोत्तर असुरक्षा ने पुराने बोझ को अधिक असहनीय बनाया।

दूसरा — संगठन उपलब्ध हुआ

किसान सभा ने अलग-अलग गांवों की शिकायतों को जोड़ना शुरू किया।

तीसरा — राष्ट्रीय राजनीति गांव तक पहुँची

होम रूल, गांधी, सत्याग्रह और बाद में असहयोग की राजनीतिक भाषा ग्रामीण भारत तक पहुँचने लगी।

यहीं पुरानी आर्थिक शिकायत ने नई राजनीतिक शक्ल लेना शुरू किया।

अवध किसान आंदोलन के आर्थिक कारणों को एक सीधी पंक्ति में समझना संभव नहीं है।

किसान पर दबाव की संरचना कुछ इस प्रकार थी—

भूमि की बढ़ती मांग

किराया बढ़ाने की landlord की क्षमता

बेदखली का भय

नजराना और अतिरिक्त अबवाब

रसीद और हिसाब की अस्पष्टता

बेगार और सामाजिक अधीनता

ऋण और साहूकारी का दबाव

प्रथम विश्वयुद्ध की महंगाई

गरीब किसान और मजदूर की वास्तविक आय पर संकट

1918–20 में संगठित किसान असंतोष।

इसलिए अवध किसान आंदोलन को केवल “ऊँचे लगान का विद्रोह” कहना तथ्यात्मक रूप से अधूरा होगा।

उसकी मूल शिकायत अधिक व्यापक थी—

किसान उस पूरी व्यवस्था को चुनौती देने लगा था जिसमें जमीन वह जोतता था, लेकिन किराये की दर, जमीन पर बने रहने का अधिकार, अतिरिक्त भुगतान और यहां तक कि उसके श्रम-समय पर भी किसी दूसरे की निर्णायक शक्ति थी।

यहाँ एक और महत्वपूर्ण बात सामने आती है।

इस चरण में किसान अनिवार्य रूप से यह नहीं कह रहा था—

“जमींदारी समाप्त कर दो और सारी जमीन जोतने वाले को दे दो।”

उसकी तत्काल मांगें अधिक व्यावहारिक थीं—

उचित लगान लो।

अवैध वसूली बंद करो। बेदखली मत करो। बेगार मत लो। भुगतान की रसीद दो। हमारे पुराने अधिकारों का सम्मान करो।

यही कारण है कि अवध का किसान आंदोलन एक साथ आर्थिक प्रतिरोध, अधिकारों की पुनर्प्राप्ति और ग्रामीण गरिमा का आंदोलन था। व्यापक किसान इतिहास भी दिखाता है कि ऐसे आंदोलनों का एक बड़ा हिस्सा जीविका तथा customary rights की रक्षा से प्रेरित था, न कि आरंभ से ही आधुनिक अर्थ में जमींदारी-विरोधी क्रांति से। (INFLIBNET E-Books)

लेकिन आर्थिक पीड़ा अपने आप आंदोलन नहीं बनाती।

किसी को गांवों को जोड़ना था।

किसी को शिकायतों को मांगों में बदलना था।

किसी को किसान को बताना था कि उसकी व्यक्तिगत समस्या हजारों दूसरे किसानों की भी समस्या है।

अवध में किसान असंतोष पुराना था, लेकिन 1917–18 के आसपास पहली बार उसे अधिक संगठित राजनीतिक रूप मिलने लगा। यही वह चरण है जिसमें व्यक्तिगत शिकायतें—ऊँचा लगान, बेदखली, बेगार, नजराना और अवैध उपकर—किसान सभा जैसी संस्थागत संरचना के माध्यम से सामूहिक प्रश्न बनने लगीं।

फरवरी 1918 में उत्तर प्रदेश किसान सभा का गठन इसी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण पड़ाव था। संगठन ने तेजी से विस्तार किया और जून 1919 तक लगभग 450 शाखाओं तक पहुँचने का उल्लेख शैक्षणिक स्रोतों में मिलता है। लेकिन इसी सफलता के भीतर एक तनाव भी छिपा था—शहरी शिक्षित नेतृत्व और गांवों में उभर रही अधिक उग्र किसान राजनीति की प्राथमिकताएँ हमेशा एक जैसी नहीं थीं। (ebooks.inflibnet.ac.in)

खंड 8.11

1917–18 : किसान सभा आंदोलन की शुरुआती जमीन

अवध में संगठित किसान राजनीति का आरंभ किसी एक बैठक या किसी एक नेता से नहीं हुआ। उसकी जमीन कई वर्षों की ग्रामीण शिकायतों और स्थानीय स्तर पर चल रही लामबंदी से तैयार हुई।

1917–18 तक तीन परिस्थितियाँ एक साथ मौजूद थीं—

पहली, ग्रामीण आर्थिक संकट गहरा रहा था।

दूसरी, भारतीय राजनीति में होम रूल, गांधी और किसान प्रश्न की चर्चा बढ़ रही थी।

तीसरी, शिक्षित भारतीय नेतृत्व को यह स्पष्ट होने लगा कि राष्ट्रीय आंदोलन को ग्रामीण समाज से जोड़े बिना व्यापक जनाधार संभव नहीं होगा।

अवध में किसान समस्या अचानक दिखाई क्यों देने लगी?

किसान पहले भी ऊँचा किराया देता था।

बेदखली पहले भी होती थी।

बेगार भी नई बात नहीं थी।

लेकिन अब इन समस्याओं को अलग-अलग निजी विवाद के बजाय सार्वजनिक राजनीतिक प्रश्न के रूप में परिभाषित किया जाने लगा।

यही परिवर्तन महत्वपूर्ण था।

पहले किसान कहता था—

“मेरा जमींदार ज्यादा लगान मांग रहा है।”

“किसानों से अधिक लगान की समस्या पूरे क्षेत्र की है।”

पहले—

“मुझे बेदखल किया जा रहा है।”

अब—

“अनुचित बेदखली किसान अधिकारों का प्रश्न है।”

इस बदलाव ने किसान की व्यक्तिगत पीड़ा को सामूहिक राजनीति में बदलना शुरू किया।

होम रूल और प्रांतीय राजनीति

1916–17 के होम रूल आंदोलन ने संयुक्त प्रांत में शिक्षित राजनीतिक वर्ग को सक्रिय किया।

राजनीतिक प्रतिनिधित्व, स्वशासन और प्रशासनिक सुधार की चर्चा बढ़ी।

लेकिन ग्रामीण किसान के लिए स्वशासन का अर्थ तब तक बहुत दूर का प्रश्न था जब तक उसके दैनिक जीवन में तालुकेदार की शक्ति अपरिवर्तित रहती।

इसीलिए कुछ राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं ने किसान मुद्दों को संगठित राजनीति से जोड़ने का प्रयास शुरू किया।

किसान संगठन क्यों आवश्यक था?

व्यक्तिगत किसान की bargaining power बहुत कम थी।

यदि वह किराया-वृद्धि का विरोध करे तो बेदखली हो सकती थी।

यदि अदालत जाए तो खर्च था।

यदि अमले से भिड़े तो पुलिस-प्रशासन की आशंका थी।

लेकिन यदि एक तालुके के हजारों किसान समान शिकायत रखें तो स्थिति बदल सकती थी।

इसीलिए किसान सभा का मूल विचार था—

किसान अकेला नहीं, संगठित समुदाय है।

शुरुआती संगठन का चरित्र

प्रारंभिक किसान सभा आंदोलन पूरी तरह क्रांतिकारी या जमींदारी-विरोधी नहीं था।

उसका नेतृत्व शिक्षित राष्ट्रवादियों, वकीलों और सार्वजनिक कार्यकर्ताओं के हाथ में था।

उनकी मांगें सामान्यतः थीं—

किरायेदारी कानूनों का पालन;

अवैध वसूली समाप्त करना;

बेदखली नियंत्रित करना;

किसानों की शिकायतों को प्रशासन तक पहुँचाना;

और ग्रामीण समाज को राजनीतिक रूप से संगठित करना।

यानी प्रारंभिक किसान सभा की राजनीति सुधारवादी थी।

लेकिन गांव में पहुँचने के बाद यही संगठन अधिक उग्र रूप ले सकता था।

यही आगे की कहानी है।

खंड 8.12

फरवरी 1918 — उत्तर प्रदेश किसान सभा का गठन

फरवरी 1918 में उत्तर प्रदेश किसान सभा — उत्तर प्रदेश किसान सभा का गठन किसान राजनीति के इतिहास में महत्वपूर्ण घटना थी।

इसके साथ पहली बार संयुक्त प्रांत स्तर पर किसान प्रश्न को एक संगठित मंच मिला।

शैक्षणिक स्रोतों में इसके प्रमुख संस्थापकों में गौरीशंकर मिश्र और इंद्र नारायण द्विवेदी का नाम प्रमुख रूप से आता है; मदन मोहन मालवीय ने भी इस प्रयास को समर्थन दिया। (ebooks.inflibnet.ac.in)

किसान सभा का उद्देश्य

इस संगठन का प्रारंभिक लक्ष्य किसानों को ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह के लिए तैयार करना नहीं था।

उसकी राजनीति अधिक व्यावहारिक थी।

किसानों की शिकायतें इकट्ठी करना।

किरायेदारी कानूनों की जानकारी देना।

जमींदारों की मनमानी के खिलाफ वैधानिक उपाय सुझाना।

और किसान को राजनीतिक मंच देना।

यह संगठन महत्वपूर्ण क्यों था?

पहली बार गांवों की अलग-अलग शिकायतें एक प्रांतीय नेटवर्क से जुड़ सकती थीं।

मान लीजिए प्रतापगढ़ में किसी किसान की बेदखली हुई।

पहले वह स्थानीय घटना थी।

जिला,

प्रांत

और राजनीतिक मंच

तक पहुँचा सकती थी।

यही संगठनात्मक विस्तार किसान की शक्ति बढ़ाता था।

किसान सभा और कांग्रेस

प्रारंभिक दौर में किसान सभा और कांग्रेस के बीच तीखा विभाजन नहीं था।

कई किसान सभा नेता स्वयं कांग्रेस या राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े थे।

लेकिन दोनों संस्थाओं का सामाजिक आधार अलग था।

कांग्रेस—

शहरी शिक्षित वर्ग,

वकील,

व्यापारी

और मध्यवर्ग

से अधिक प्रभावित थी।

किसान सभा सीधे ग्रामीण आर्थिक शिकायतों से जुड़ रही थी।

इसलिए भविष्य में प्राथमिकताओं का टकराव लगभग अपरिहार्य था।

क्या किसान सभा जमींदार-विरोधी थी?

प्रारंभिक रूप में पूरी तरह नहीं।

संगठन का नेतृत्व ऐसी राजनीति से बचना चाहता था जिससे landlords और कांग्रेस के उदार समर्थक पूरी तरह अलग हो जाएँ।

इसलिए किसान सभा का प्रारंभिक कार्यक्रम सीमित और कानूनी सुधारों पर केंद्रित रहा।

लेकिन गांवों में किसान समस्या कहीं अधिक तीखी थी।

यही ऊपर के नेतृत्व और नीचे के किसान आधार के बीच तनाव का बीज था।

खंड 8.13

गौरीशंकर मिश्र, इंद्र नारायण द्विवेदी और मदन मोहन मालवीय — शुरुआती नेतृत्व की भूमिका

उत्तर प्रदेश किसान सभा का निर्माण केवल ग्रामीण नेताओं द्वारा नहीं हुआ।

उसके शुरुआती चरण में शिक्षित राष्ट्रवादी नेतृत्व की बड़ी भूमिका थी।

विशेष रूप से तीन नाम सामने आते हैं—

गौरीशंकर मिश्र,

इंद्र नारायण द्विवेदी और मदन मोहन मालवीय।

गौरीशंकर मिश्र

गौरीशंकर मिश्र संयुक्त प्रांत की किसान राजनीति के महत्वपूर्ण शुरुआती संगठनकर्ताओं में थे।

उनकी भूमिका किसान शिकायतों को राजनीतिक मंच देने, बैठकों का आयोजन करने और किसान सभा की शाखाएँ विकसित करने में थी।

वे उस शिक्षित राष्ट्रवादी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते थे जो समझ रहा था कि गांवों को राष्ट्रीय राजनीति से जोड़ना आवश्यक है।

लेकिन वे किसान आंदोलन को नियंत्रित और वैधानिक सीमाओं में रखना चाहते थे।

यहीं बाद में बाबा रामचंद्र जैसे ग्रामीण नेताओं से शैली का अंतर सामने आया।

इंद्र नारायण द्विवेदी

इंद्र नारायण द्विवेदी भी किसान सभा के प्रमुख संस्थापकों में थे।

उनकी भूमिका स्थानीय संगठन और ग्रामीण संपर्क में महत्वपूर्ण थी।

उनकी राजनीतिक दिशा भी मूलतः सुधारवादी थी—

किसान अधिकारों की रक्षा हो, लेकिन आंदोलन हिंसक अथवा uncontrolled class conflict में न बदले।

मदन मोहन मालवीय

मालवीय उस समय भारतीय राजनीति के बड़े राष्ट्रीय नेताओं में थे।

उनकी किसान सभा के प्रति सहानुभूति ने संगठन को प्रतिष्ठा दी।

लेकिन मालवीय की सामाजिक-राजनीतिक सोच अत्यधिक उग्र किसान वर्ग-संघर्ष के पक्ष में नहीं थी।

वे सामाजिक संतुलन, वैधानिक सुधार और राष्ट्रीय एकता को महत्व देते थे।

इसलिए उनकी भागीदारी यह भी दिखाती है कि शुरुआती किसान सभा को केवल radical peasant movement कहना गलत होगा।

शिक्षित नेतृत्व की ताकत

इन नेताओं की मौजूदगी से किसान सभा को लाभ मिला—

प्रशासन तक पहुँच;

वैधानिक भाषा;

प्रेस में प्रतिनिधित्व;

प्रांतीय राजनीतिक समर्थन;

और संगठन के लिए संसाधन।

लेकिन इसी में सीमा भी थी।

शहरी नेता किसान की शिकायत को कानून और सुधार की भाषा में देखते थे।

गांव का किसान कई बार अधिक सीधा समाधान चाहता था—

लगान मत बढ़ाओ।

बेदखली रोक दो। बेगार खत्म करो।

यह अंतर आगे निर्णायक होने वाला था।

खंड 8.14

जून 1919 तक लगभग 450 शाखाएँ — किसान सभा का असाधारण विस्तार

उत्तर प्रदेश किसान सभा के तेजी से विस्तार का सबसे उल्लेखनीय तथ्य है कि फरवरी 1918 में गठन के बाद जून 1919 तक उसकी लगभग 450 शाखाएँ स्थापित हो गईं। यह संख्या आधुनिक शैक्षणिक स्रोतों में बार-बार उद्धृत होती है। (ebooks.inflibnet.ac.in)

एक वर्ष से थोड़े अधिक समय में इतना विस्तार हमें दो बातें बताता है—

संगठन प्रभावी था, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण—ग्रामीण समाज पहले से संगठन की प्रतीक्षा कर रहा था।

शाखाएँ इतनी तेजी से क्यों बढ़ीं?

क्योंकि किसान की शिकायत स्थानीय नहीं थी।

लगभग हर क्षेत्र में कुछ समान समस्याएँ थीं—

किराया,

बेदखली,

अवैध वसूली,

बेगार

और जमीन की असुरक्षा।

जब एक गांव में किसान सभा बनी तो पड़ोसी गांव के किसानों को लगा—

हमारी समस्या भी वही है।

इस तरह संगठन नेटवर्क की तरह फैल सकता था।

शाखा का काम क्या था?

प्रत्येक शाखा औपचारिक कार्यालय हो, यह आवश्यक नहीं था।

वह किसान सभा, पंचायत, स्थानीय कार्यकर्ता और ग्रामीण संपर्क का केंद्र हो सकती थी।

उसके काम थे—

शिकायतें दर्ज करना,

बैठक बुलाना,

किसानों को कानून समझाना,

नेताओं को बुलाना,

और सामूहिक निर्णय लेना।

किसान सभा ने पहली बार “संख्या” दिखाई

तालुकेदार का सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक लाभ था—

किसान स्वयं को अकेला समझता था।

450 शाखाओं का नेटवर्क इस मनोविज्ञान को बदल रहा था।

किसान अब समझने लगा—

मेरी समस्या दूसरे जिले में भी है।

यही सामूहिक पहचान आगे बड़े आंदोलन का आधार बनी।

संगठन का राजनीतिक परिणाम

किसान सभा की शाखाएँ केवल कृषि शिकायत का मंच नहीं रहीं।

वे ग्रामीण राजनीतिक शिक्षा के केंद्र बन सकती थीं।

यहां किसानों को पहली बार सुनने को मिला—

अधिकार,

कानून,

सभा,

प्रतिनिधि,

संगठन

और राजनीतिक दबाव

जैसे शब्द।

यह ग्रामीण लोकतांत्रिक राजनीति के विकास में महत्वपूर्ण था।

लेकिन 450 शाखाएँ समान रूप से सक्रिय नहीं थीं

इतिहासलेखन की सावधानी आवश्यक है।

450 शाखाओं का अर्थ यह नहीं कि हर शाखा समान रूप से मजबूत, अनुशासित और स्थायी थी।

कुछ केवल नाममात्र की हो सकती थीं।

कुछ स्थानीय नेताओं पर निर्भर थीं।

कुछ तेजी से बनीं और कमजोर हो गईं।

इसलिए संख्या को किसान सभा की वास्तविक संगठनात्मक शक्ति का पूर्ण माप नहीं माना जाना चाहिए।

फिर भी विस्तार की गति असाधारण थी।

खंड 8.15

प्रांतीय अभिजात नेतृत्व और ग्रामीण किसान नेतृत्व के बीच पहली दरार

किसान सभा का तेजी से विस्तार एक नई समस्या लेकर आया—

किसान आंदोलन पर नियंत्रण किसका होगा?

प्रांतीय शिक्षित नेतृत्व का?

या गांव से उभरते किसान नेताओं का?

यहीं से वह विभाजन शुरू होता है जो 1920 में अवध किसान सभा के गठन तक पहुँचेगा।

दो अलग राजनीतिक भाषाएँ

प्रांतीय नेतृत्व की भाषा थी—

कानून,

याचिका,

संवैधानिक सुधार,

विधान परिषद

और नियंत्रित आंदोलन।

ग्रामीण किसान नेतृत्व की भाषा थी—

लगान,

बेदखली,

बेगार,

नजराना,

तालुकेदार का अमला

और रोजमर्रा का अपमान।

दोनों एक दूसरे के विरोधी नहीं थे।

लेकिन प्राथमिकताएँ अलग थीं।

किसान तेजी से आगे बढ़ रहा था

एक बार किसान संगठित हो जाए तो वह केवल वही मांगें नहीं रखता जो शहरी नेता तय करता है।

किसान सभा ने ग्रामीण समाज को बोलने का मंच दिया।

बेदखली नहीं होने देंगे।

अवैध कर नहीं देंगे।

बेगार नहीं करेंगे।

यही बिंदु प्रांतीय नेतृत्व के लिए असुविधाजनक हो सकता था।

जमींदारों से पूर्ण टकराव का प्रश्न

कांग्रेस और किसान सभा के कई शिक्षित नेता नहीं चाहते थे कि राष्ट्रीय आंदोलन खुला landlord–tenant class war बन जाए।

कारण स्पष्ट थे।

कुछ जमींदार राष्ट्रीय आंदोलन के समर्थक थे।

कई शिक्षित नेता स्वयं भूमि-स्वामी परिवारों से आते थे।

कांग्रेस सामाजिक रूप से व्यापक गठबंधन बनाना चाहती थी।

इसलिए किसान आंदोलन की अत्यधिक उग्र मांगें उस गठबंधन को तोड़ सकती थीं।

बाबा रामचंद्र का उभार

यहीं एक अलग प्रकार का नेता सामने आने वाला था—

बाबा रामचंद्र।

वे न बड़े वकील थे।

न शहरी अभिजात नेता।

उनकी शक्ति गांव की भाषा, धार्मिक प्रतीकों और किसानों के सीधे संपर्क में थी।

उन्होंने किसान की शिकायत को अधिक सरल और उग्र रूप में व्यक्त किया।

यही उन्हें प्रांतीय किसान सभा नेतृत्व से अलग बनाता था।

प्रतापगढ़ क्यों निर्णायक बना?

प्रतापगढ़ में स्थानीय किसान आंदोलन बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में अधिक तीव्र हो रहा था।

यहां किसान केवल ज्ञापन और कानून की बात नहीं कर रहे थे।

वे बड़ी सभाएँ कर रहे थे।

गांव-गांव संपर्क बना रहे थे।

और जमींदार के खिलाफ सामूहिक कार्रवाई की भाषा विकसित कर रहे थे।

इससे प्रांतीय नेतृत्व के सामने प्रश्न खड़ा हुआ—

क्या इस ऊर्जा को नियंत्रित किया जाए?

समाहित किया जाए?

या उससे दूरी बनाई जाए?

अवध किसान सभा की भूमिका की जमीन

1920 में यही मतभेद एक नए संगठनात्मक रूप में सामने आया।

अवध किसान सभा का गठन उन लोगों ने किया जिन्हें लगा कि उत्तर प्रदेश किसान सभा ग्रामीण किसान असंतोष को पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व नहीं कर रही।

आगे बाबा रामचंद्र, जवाहरलाल नेहरू और दूसरे नेताओं के साथ यह संगठन अधिक उग्र किसान राजनीति का केंद्र बना।

यानी 1918 की किसान सभा ने आंदोलन को जन्म दिया—

लेकिन 1920 तक किसान राजनीति स्वयं उस प्रारंभिक संगठन की सीमाओं से आगे निकलने लगी।

अध्याय 8.11 से 8.15 अवध किसान आंदोलन के संगठनात्मक जन्म को स्पष्ट करते हैं।

क्रम था—

पुराना ग्रामीण असंतोष

1917–18 में राजनीतिक संगठन की आवश्यकता

फरवरी 1918 — उत्तर प्रदेश किसान सभा का गठन

गौरीशंकर मिश्र और इंद्र नारायण द्विवेदी का नेतृत्व

मदन मोहन मालवीय का समर्थन

जून 1919 तक लगभग 450 शाखाएँ

किसान में सामूहिक राजनीतिक पहचान का विकास

ग्रामीण मांगें अधिक तीखी होती गईं

प्रांतीय मध्यमार्गी नेतृत्व और स्थानीय किसान नेतृत्व में अंतर।

इस पूरे चरण की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक उपलब्धि यह थी कि किसान की व्यक्तिगत शिकायत पहली बार व्यवस्थित सामूहिक भाषा में बदलने लगी।

लेकिन प्रारंभिक किसान सभा के भीतर एक अंतर्विरोध भी जन्म ले चुका था—

क्या किसान राजनीति राष्ट्रीय नेतृत्व की नियंत्रित शाखा रहेगी, या अपनी स्वतंत्र दिशा विकसित करेगी?

इस प्रश्न का उत्तर देने वाला व्यक्ति अब इतिहास के केंद्र में आने वाला है—

बाबा रामचंद्र।

उनके बिना अवध किसान आंदोलन की वास्तविक प्रकृति समझी ही नहीं जा सकती।

अवध किसान आंदोलन का इतिहास बाबा रामचंद्र के बिना अधूरा है। वे न बड़े जमींदार थे, न प्रमुख वकील, न स्थापित कांग्रेस नेता। फिर भी प्रतापगढ़ और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में उनका प्रभाव इतना गहरा हुआ कि जवाहरलाल नेहरू ने बाद में उनकी “remarkable powers of organisation” का उल्लेख किया। स्थानीय मौखिक स्मृतियों में भी वे किंवदंती जैसे व्यक्तित्व बन गए। (Sage Journals)

उनकी विशिष्टता यह थी कि वे किसान से ऐसी भाषा में संवाद करते थे जो उसके धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक अनुभव से सीधे जुड़ती थी। रामचरितमानस का पाठ, जाति पंचायतों से संपर्क, गांव-गांव पैदल यात्राएँ, पंचायतें, किसान शिकायतों का संकलन और तालुकेदार-विरोधी मांगों को सरल भाषा में रखना—इन सबने उन्हें अवध की ग्रामीण राजनीति का प्रभावशाली नेता बनाया।

खंड 8.16

बाबा रामचंद्र कौन थे? — फिजी का गिरमिटिया अनुभव और भारत वापसी

बाबा रामचंद्र का वास्तविक नाम प्रायः श्रीधर बलवंत जाधव बताया जाता है। वे महाराष्ट्र से संबंधित थे और युवा अवस्था में गिरमिटिया श्रमिक के रूप में फिजी गए। उनके जीवन का यह चरण बाद की किसान राजनीति को समझने में महत्वपूर्ण है।

गिरमिटिया व्यवस्था क्या थी?

उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के आरंभ में ब्रिटिश साम्राज्य के विभिन्न उपनिवेशों में भारत से अनुबंधित मजदूर भेजे जाते थे। अंग्रेजी “agreement” शब्द से बना “गिरमिट” इन अनुबंधों के लिए प्रचलित हुआ।

मजदूरों को—

चीनी बागानों,

कृषि कार्य,

और कठोर श्रम

के लिए वर्षों के अनुबंध पर भेजा जाता था।

फिजी में भारतीय गिरमिटिया मजदूरों की परिस्थितियाँ विशेष रूप से कठिन मानी गई हैं।

Cambridge University Press के एक आधुनिक अध्ययन के अनुसार रामचंद्र स्वयं उन गिरमिटिया मजदूरों में थे जिन्होंने अपने अनुभव लिखे। वे 1915 में भारत लौटे और बाद में 1939 में अपने फिजी अनुभवों का आत्मकथात्मक अंश लिखा। इसलिए उनके संस्मरण महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उन्हें घटना के लगभग दो दशक बाद लिखा गया स्मृति-स्रोत भी समझना चाहिए। (Cambridge)

फिजी अनुभव का राजनीतिक महत्व

यह कहना सावधानी के बिना उचित नहीं होगा कि फिजी में ही रामचंद्र ने भविष्य का किसान आंदोलन तय कर लिया था।

लेकिन एक बात महत्वपूर्ण है—

उन्होंने स्वयं श्रम-अधीनता, अनुबंध, मालिक की शक्ति और मजदूर की निर्भरता का अनुभव किया था।

भारत लौटने के बाद अवध के किरायेदार किसान और तालुकेदार के संबंधों में उन्हें किसी स्तर पर ऐसी ही असमान सत्ता दिखाई पड़ना स्वाभाविक था।

फिजी में श्रमिक—

अनुबंध से बंधा था।

अवध में किसान—

किरायेदारी, लगान और बेदखली के भय से।

दोनों संरचनाएँ समान नहीं थीं, लेकिन अधीनता का अनुभव रामचंद्र की सामाजिक संवेदनशीलता के निर्माण में महत्त्वपूर्ण रहा होगा।

भारत वापसी

1915 में भारत लौटने के बाद रामचंद्र अंततः अवध क्षेत्र में आए।

उनका जीवन तत्काल किसी बड़े राष्ट्रीय नेता की तरह नहीं बदला।

वे ग्रामीण समाज के बीच रहने लगे और धीरे-धीरे किसानों से संपर्क बढ़ा।

यही उनकी सबसे बड़ी शक्ति बनी—

वे गांव में “बाहर से आया उच्च नेता” नहीं दिखाई देते थे।

उनकी जीवनशैली, धार्मिक भाषा और ग्रामीण संपर्क ने किसान से सामाजिक दूरी कम की।

साधु का रूप

रामचंद्र ने धार्मिक-साधु जैसी सार्वजनिक छवि विकसित की।

यह उस समय के ग्रामीण समाज में राजनीतिक रूप से प्रभावी थी।

किसान किसी वकील की कानूनी भाषा से दूरी महसूस कर सकता था, लेकिन रामायण पढ़ने वाले बाबा से नहीं।

यहीं से धार्मिक प्रतीक और किसान राजनीति का अनूठा मेल बना।

खंड 8.17

अवध वापसी और प्रतापगढ़ के किसानों से संपर्क

बाबा रामचंद्र की वास्तविक किसान राजनीति का केंद्र प्रतापगढ़ बना।

यहाँ तालुकेदारी और किरायेदारी संबंधों से परेशान किसानों के बीच पहले से असंतोष मौजूद था।

रामचंद्र की उपलब्धि यह नहीं थी कि उन्होंने असंतोष पैदा किया।

उनकी उपलब्धि थी—

उसे संगठन और भाषा देना।

प्रतापगढ़ क्यों?

प्रतापगढ़ अवध के उन जिलों में था जहाँ किरायेदार किसानों और जमींदारों के बीच तनाव तीखा था।

यहाँ किसान शिकायतों में शामिल थे—

किराया,

अवैध उपकर,

बेदखली,

बेगार

और स्थानीय अमले की मनमानी।

Majid Hayat Siddiqi के अध्ययन में प्रतापगढ़ किसान आंदोलन को स्थानीय ग्रामीण परिस्थितियों और रामचंद्र के असाधारण व्यक्तिगत प्रभाव—दोनों से जोड़ा गया है। फैजाबाद डिवीजन के कमिश्नर H. R. C. Hailey ने भी रामचंद्र के व्यक्तिगत प्रभाव को प्रतापगढ़ किसान आंदोलन के कारणों में गिना था। (Sage Journals)

किसानों से संपर्क कैसे हुआ?

रामचंद्र ने गांवों में जाकर सीधे किसानों से बात की।

वे केवल सार्वजनिक सभा करके शहर लौट जाने वाले नेता नहीं थे।

उनका तरीका था—

गांव में रुकना,

लोगों की शिकायत सुनना,

स्थानीय जातीय नेताओं से मिलना,

किसान पंचायत बुलाना

और अगले गांव तक संदेश पहुँचाना।

यह ग्रामीण संगठन की अत्यंत प्रभावी पद्धति थी।

जाति पंचायतों का उपयोग

Siddiqi के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है—रामचंद्र विभिन्न cultivating castes के स्थानीय नेताओं से संपर्क करते और उनके माध्यम से किसान संगठन का विस्तार करते थे। जाति पंचायतें लामबंदी का प्रभावी माध्यम बनीं। (Sage Journals)

यह अवध आंदोलन की एक बड़ी सामाजिक वास्तविकता को दिखाता है।

राष्ट्रीय नेतृत्व “किसान” को एक वर्गीय श्रेणी के रूप में देख सकता था।

लेकिन गांव में किसान—

कुर्मी,

अहीर,

कोरी,

काछी

या किसी अन्य जातीय पहचान

के माध्यम से संगठित सामाजिक जीवन जीता था।

रामचंद्र ने इस वास्तविकता की अनदेखी नहीं की।

उन्होंने मौजूदा सामाजिक नेटवर्क को किसान संगठन के साधन में बदला।

प्रतापगढ़ की लोकस्मृति

रामचंद्र का प्रभाव इतना बढ़ा कि लोकगीतों में उनके “राज” की कल्पना दिखाई देती है।

Siddiqi ने प्रतापगढ़ के एक लोकपद का उल्लेख किया है जिसमें भाव था कि बाबा रामचंद्र के राज में प्रजा सुखी होगी। (Sage Journals)

यह साधारण प्रशंसा से अधिक महत्वपूर्ण है।

यह दिखाता है कि किसान आंदोलन में रामचंद्र केवल संगठनकर्ता नहीं रह गए थे।

वे ग्रामीण न्याय की वैकल्पिक कल्पना के प्रतीक बन रहे थे।

खंड 8.18

रामचरितमानस, धार्मिक प्रतीक और किसान संगठन की भाषा

बाबा रामचंद्र की सबसे विशिष्ट संगठनात्मक तकनीकों में से एक था—

रामचरितमानस और धार्मिक प्रतीकों का राजनीतिक उपयोग।

इसे आधुनिक अर्थ में केवल “धार्मिक राजनीति” कह देना गलत होगा।

अवध के ग्रामीण समाज में धार्मिक ग्रंथ, कथा और सामूहिक पाठ दैनिक सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा थे।

रामचंद्र ने इसी परिचित भाषा को किसान अधिकार से जोड़ा।

रामचरितमानस क्यों?

किसान के लिए अंग्रेजी कानून, tenancy statutes या legislative council की भाषा कठिन थी।

लेकिन राम, सीता, न्याय, धर्म, अन्याय और अत्याचार की कथा परिचित थी।

रामचंद्र ने इस सांस्कृतिक संसार का उपयोग करके किसान की शिकायत को नैतिक भाषा दी।

“जमींदार ज्यादा किराया लेता है।”

बल्कि—

“अन्याय सहना क्यों?”

यही बदलाव किसान संगठन में शक्तिशाली था।

“सीताराम” अभिवादन

रामचंद्र से जुड़ी परंपरा में “सीताराम” पुकार को किसान लामबंदी का संकेत माना जाता है।

धार्मिक अभिवादन सामूहिक राजनीतिक पहचान में बदल सकता था।

एक व्यक्ति “सीताराम” कहता।

दूसरा उत्तर देता।

सभा जुड़ती।

यह संगठन का ऐसा माध्यम था जिसे पढ़े-लिखे पर्चे की आवश्यकता नहीं थी।

धार्मिक प्रतीक की दोहरी शक्ति

धार्मिक भाषा ने दो काम किए—

पहला: संचार को सरल बनाया।

दूसरा: किसान की मांग को नैतिक वैधता दी।

यदि रामराज्य न्याय का प्रतीक है, तो अत्यधिक लगान और बेगार अन्याय के रूप में पढ़े जा सकते थे।

यही बाद में ग्रामीण समाज में “गांधी राज” की कल्पना बनने का भी आधार बना।

धार्मिकता और जातीय संगठन

रामचंद्र ने केवल व्यापक हिंदू धार्मिक भाषा नहीं अपनाई।

उनकी संगठनात्मक पद्धति जाति पंचायतों से भी जुड़ी थी।

Siddiqi के अनुसार उन्होंने विभिन्न cultivating castes के नेताओं से संपर्क करके किसान लामबंदी की और Kurmi संगठन में भी भूमिका निभाई। (Sage Journals)

इससे अवध किसान राजनीति का एक महत्वपूर्ण सच सामने आता है—

यह आधुनिक वर्ग-राजनीति, स्थानीय जातीय नेटवर्क और धार्मिक प्रतीक—तीनों का मिश्रण थी।

इसकी सीमा भी थी

धार्मिक भाषा अत्यंत प्रभावी थी, लेकिन वह सर्वथा समावेशी राजनीतिक भाषा नहीं थी।

अवध में मुसलमान किसान भी थे।

बाद में किसान आंदोलन और खिलाफत–असहयोग की राजनीति में हिंदू–मुस्लिम संपर्क महत्वपूर्ण हुआ।

इसलिए रामचंद्र की धार्मिक संगठनात्मक शैली को किसान आंदोलन की एक प्रभावी तकनीक तो माना जा सकता है, लेकिन पूरे अवध के सभी समुदायों का एकमात्र आधार नहीं।

खंड 8.19

बाबा रामचंद्र की किसान मांगें — लगान, बेदखली, बेगार, नजराना और रसीद

रामचंद्र की लोकप्रियता केवल उनके धार्मिक व्यक्तित्व के कारण नहीं थी।

किसान उनके पीछे इसलिए आया क्योंकि वे उसकी ठोस दैनिक समस्याएँ उठा रहे थे।

उनकी किसान राजनीति को समझने के लिए मांगों को स्पष्ट रूप से देखना चाहिए।

1. अत्यधिक लगान का विरोध

किसानों की सबसे सामान्य मांग थी कि landlord मनमाने ढंग से किराया न बढ़ाए।

यह तत्काल आर्थिक राहत का प्रश्न था।

2. बेदखली बंद हो

यदि किसान वर्षों से खेत जोत रहा है तो उसे अधिक किराया पाने के लिए निकाल देना अन्याय माना गया।

बेदखली-विरोध रामचंद्र की किसान राजनीति की केंद्रीय मांग थी।

3. बेगार समाप्त हो

किसान और गरीब ग्रामीण को landlord के लिए मुफ्त श्रम न करना पड़े।

यह आर्थिक और सम्मान—दोनों का प्रश्न था।

4. अवैध उपकर बंद हों

नजराना और विभिन्न स्थानीय cesses किसान असंतोष के बड़े कारण थे।

Siddiqi का अध्ययन प्रतापगढ़ में अनेक अतिरिक्त cesses और landlord exactions के विस्तृत सरकारी अध्ययन का उल्लेख करता है। (Sage Journals)

5. भुगतान की रसीद मिले

किसान जो राशि दे, उसका प्रमाण होना चाहिए।

यह सुनने में छोटी मांग लग सकती है, लेकिन ग्रामीण शक्ति-संबंध में अत्यंत महत्वपूर्ण थी।

बिना रसीद किसान पर वही रकम दोबारा बकाया दिखाई जा सकती थी।

इसलिए रसीद—

कानूनी सुरक्षा का दस्तावेज थी।

6. पुराने अधिकारों का सम्मान

कई किसान स्वयं को पीढ़ियों से खेत जोतने वाला मानते थे।

उनका तर्क था कि बाजार में अधिक किराया देने वाला नया व्यक्ति मिल जाने से उनका पुराना संबंध समाप्त नहीं होना चाहिए।

रामचंद्र की राजनीति इन customary claims को संगठित भाषा देती थी।

क्या रामचंद्र जमींदारी उन्मूलन चाहते थे?

यहाँ सावधानी आवश्यक है।

उनके आंदोलन को तुरंत आधुनिक समाजवादी “land to the tiller” कार्यक्रम के समान नहीं मानना चाहिए।

उनकी शुरुआती मांगें मुख्यतः—

किरायेदार सुरक्षा,

कम/उचित rent,

अवैध उपकर का अंत,

बेगार समाप्ति

और बेदखली रोकने

पर केंद्रित थीं।

लेकिन जैसे-जैसे आंदोलन बढ़ा, किसान की स्थानीय अपेक्षाएँ कई जगह इन सीमित मांगों से आगे भी जा सकती थीं।

यहीं बाद में कांग्रेस नेतृत्व असहज होने लगा।

खंड 8.20

गांव-गांव यात्राएँ, पंचायतें और रामचंद्र की संगठन क्षमता

बाबा रामचंद्र की सबसे बड़ी शक्ति भाषण नहीं, संगठन थी।

जवाहरलाल नेहरू का उनकी “remarkable powers of organisation” का उल्लेख केवल प्रशंसात्मक टिप्पणी नहीं था; प्रतापगढ़ में आंदोलन के तेज विस्तार से इसका प्रमाण मिलता है। (Sage Journals)

संगठन की पहली इकाई — गांव

रामचंद्र का आंदोलन शहर से गांव की ओर नहीं, गांव से गांव की ओर बढ़ता था।

एक गांव में बैठक।

वहाँ से दूसरे गांव को खबर।

फिर पंचायत।

फिर क्षेत्रीय सभा।

यह क्षैतिज विस्तार था।

पंचायत क्यों महत्वपूर्ण थी?

किसान के लिए पंचायत परिचित संस्था थी।

यदि आंदोलन बिल्कुल नई राजनीतिक संरचना बनाता तो लोगों को समझने में समय लगता।

लेकिन पंचायत—

निर्णय,

सामाजिक दबाव,

विवाद समाधान

और सामूहिक कार्रवाई

की पहले से स्वीकृत पद्धति थी।

रामचंद्र ने उसी को किसान राजनीति के लिए इस्तेमाल किया।

जाति-नेताओं से संपर्क

जैसा ऊपर देखा, वे cultivating castes के प्रभावशाली लोगों को पहले जोड़ते थे।

इससे एक नेता के माध्यम से पूरा जातीय समूह किसान सभा तक आ सकता था। Siddiqi इस पद्धति को रामचंद्र के संगठन का महत्वपूर्ण तत्व बताते हैं। (Sage Journals)

लिखित रिकॉर्ड भी

रामचंद्र के अपने notebooks और बाद में प्राप्त निजी कागजात से पता चलता है कि वे केवल मौखिक संगठनकर्ता नहीं थे।

उनके पास कार्यक्रम, संपर्क और संगठन संबंधी लिखित सामग्री भी थी। Siddiqi ने रामचंद्र की विधवा जग्गी के पास संरक्षित ऐसे कागजात और notebook का उपयोग किया था। (Sage Journals)

यह स्रोत अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे रामचंद्र की अपनी दृष्टि सामने आती है—केवल सरकारी या कांग्रेस रिपोर्ट नहीं।

आंदोलन का संदेश तेजी से कैसे फैला?

तीन साधन प्रमुख थे—

धार्मिक अभिवादन और कथा,

जाति पंचायत नेटवर्क,

गांव-गांव यात्रा।

इनके लिए बड़े वित्तीय संसाधन आवश्यक नहीं थे।

यही कारण था कि अपेक्षाकृत साधनहीन नेता भी व्यापक संगठन बना सका।

राष्ट्रीय राजनीति से संपर्क से पहले ही प्रभाव

यह बात विशेष रूप से महत्वपूर्ण है—

रामचंद्र का किसान आधार जवाहरलाल नेहरू के गांवों में आने से पहले ही विकसित हो चुका था।

इसलिए यह कहना गलत होगा कि नेहरू या कांग्रेस ने अवध किसान आंदोलन पैदा किया।

राष्ट्रीय नेताओं ने उसे—

अधिक दृश्यता,

प्रेस,

राजनीतिक संरक्षण

और व्यापक मंच

दिया।

लेकिन उसकी ग्रामीण जड़ पहले से मौजूद थी।

प्रशासन की चिंता

औपनिवेशिक अधिकारियों ने भी रामचंद्र के प्रभाव को गंभीरता से लिया।

Hailey की रिपोर्ट में उनका व्यक्तिगत प्रभाव किसान आंदोलन के कारणों में गिना गया। एक तालुकेदार ने वायसराय को इतना तक चेताया कि रामचंद्र किसानों को रूस और आयरलैंड जैसी स्थिति की ओर ले जाने की बात कर रहे हैं—हालाँकि ऐसे आरोपों को तालुकेदार की भयग्रस्त राजनीतिक भाषा के रूप में सावधानी से पढ़ना चाहिए। (Sage Journals)

इससे इतना अवश्य स्पष्ट है—

1920 तक सत्ता-प्रतिष्ठान उन्हें साधारण धार्मिक प्रचारक नहीं मान रहा था।

वे राजनीतिक खतरे के रूप में पहचाने जाने लगे थे।

बाबा रामचंद्र का महत्व समझने के लिए उन्हें तीन अलग पहचान में एक साथ देखना होगा—

पूर्व गिरमिटिया श्रमिक,

धार्मिक-ग्रामीण प्रचारक,

और किसान संगठनकर्ता।

फिजी में अनुबंधित श्रम के अनुभव के बाद वे 1915 में भारत लौटे। उनके गिरमिटिया संस्मरण बहुत बाद में लिखे गए, इसलिए उन्हें मूल्यवान लेकिन स्मृति-आधारित स्रोत के रूप में पढ़ना चाहिए। (Cambridge)

प्रतापगढ़ में उनकी वास्तविक शक्ति बनी—

किसान की भाषा बोलना।

उन्होंने tenancy law की जटिल धाराओं के स्थान पर किसान की ठोस समस्याएँ उठाईं—

लगान, बेदखली, बेगार, नजराना, अवैध उपकर और रसीद।

उन्होंने संगठन के लिए आधुनिक पार्टी machinery पर निर्भर रहने के बजाय—

रामचरितमानस, “सीताराम”, गांव पंचायत और जातीय कृषक नेटवर्क

का उपयोग किया।

और यह पद्धति प्रभावी हुई।

इतिहासकार Majid Hayat Siddiqi के अध्ययन में जवाहरलाल नेहरू की यह टिप्पणी दर्ज है कि रामचंद्र में असाधारण संगठन क्षमता थी; प्रतापगढ़ की मौखिक परंपरा भी उन्हें किसान स्मृति का प्रमुख व्यक्तित्व बनाती है। (Sage Journals)

लेकिन उनकी सफलता ने एक नया प्रश्न पैदा कर दिया।

हजारों किसान संगठित हो गए थे।

उन्हें ऐसे मंच की आवश्यकता थी जहाँ उनकी शिकायत—

इलाहाबाद, प्रांतीय कांग्रेस और राष्ट्रीय नेताओं

तक पहुँचे।

यहीं अवध किसान आंदोलन का अगला निर्णायक चरण शुरू हुआ।

अवध किसान आंदोलन का यह चरण निर्णायक है, क्योंकि यहीं पहली बार स्थानीय किसान संगठन सीधे इलाहाबाद और राष्ट्रीय नेतृत्व तक पहुँचता है। बाबा रामचंद्र और उनके साथियों ने किसानों की समस्याओं को केवल गांव या तहसील तक सीमित नहीं रखा; जून 1920 में सैकड़ों किसान प्रतापगढ़–जौनपुर क्षेत्र से पैदल इलाहाबाद पहुँचे और शिक्षित राष्ट्रवादी नेतृत्व से कहा—हमारे गांव चलकर अपनी आंखों से देखिए।

यहीं जवाहरलाल नेहरू का अवध किसान राजनीति से पहला गहरा और प्रत्यक्ष संपर्क हुआ। NCERT भी जून 1920 से उनके अवध गांवों में घूमने, किसानों से बातचीत करने और शिकायतें समझने की प्रक्रिया दर्ज करता है। (Sathee)

खंड 8.21

प्रतापगढ़ किसान उभार — सभाएँ, पंचायतें और ग्रामीण आंदोलन का फैलाव

1920 के मध्य तक प्रतापगढ़ अवध किसान आंदोलन का सबसे सक्रिय केंद्र बन चुका था।

बाबा रामचंद्र के गांव-गांव संगठन, स्थानीय कृषक नेताओं और पंचायतों ने किसान असंतोष को व्यापक आंदोलन में बदलना शुरू कर दिया था।

वह—

सभा कर रहा था,

समूह में जमींदार से बात कर रहा था,

पंचायत के निर्णय मान रहा था,

और अन्य गांवों से संपर्क बना रहा था।

गांव रूर — महत्वपूर्ण केंद्र

प्रतापगढ़ जिले का रूर (Roor/Rure) किसान संगठन का महत्वपूर्ण केंद्र बना।

Bipan Chandra आदि के मानक इतिहास में उल्लेख है कि रूर की किसान सभा गतिविधियों का ऐसा केंद्र बनी जहाँ बड़ी संख्या में tenants ने अपनी शिकायतें दर्ज कराईं। लगभग एक लाख किरायेदारों द्वारा एक आना देकर शिकायत दर्ज कराने का विवरण भी इस स्रोत में मिलता है। (Anyflip)

यह संख्या महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे “एक ही दिन एक लाख किसान उपस्थित हुए” के अर्थ में नहीं पढ़ना चाहिए।

अधिक सुरक्षित अर्थ है—

किसान शिकायतों का संकलन एक बड़े पैमाने पर हुआ और रूर संगठनात्मक केंद्र बन गया।

पंचायतों का प्रभाव

गांव पंचायतें आंदोलन के विस्तार में उपयोगी थीं।

उनके माध्यम से निर्णय हो सकते थे—

किस जमींदार की शिकायत सामूहिक रूप से उठानी है?

किस अवैध कर का विरोध करना है?

किस किसान की बेदखली को पूरे गांव का मामला बनाना है?

और किस नेता को अगली सभा में बुलाना है?

इससे ग्रामीण सत्ता का एक वैकल्पिक ढांचा बनने लगा।

झिंगुरी सिंह और दूसरे स्थानीय नेता

Bipan Chandra के विवरण में झिंगुरी सिंह और दुर्गापाल सिंह जैसे स्थानीय नेताओं के नाम भी सामने आते हैं, जो किसान पंचायतों की शुरुआती सक्रियता से जुड़े थे। (studylib.net)

यह तथ्य महत्वपूर्ण है, क्योंकि अवध आंदोलन को बाबा रामचंद्र की अकेली कहानी बनाना भी गलत होगा।

उनके प्रभाव से पहले और उनके साथ-साथ स्थानीय कृषक नेतृत्व सक्रिय था।

प्रशासन ने ध्यान देना शुरू किया

किसान सभाओं की बढ़ती संख्या और शिकायतों के संकलन ने जिला प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया।

प्रतापगढ़ के Deputy Commissioner मेहता ने किसानों की शिकायतों की जांच का आश्वासन दिया—मानक राष्ट्रवादी इतिहास में इसका उल्लेख मिलता है। (Anyflip)

यह किसान संगठन की पहली महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से थी।

आंदोलन की राजनीति बदल रही थी

प्रतापगढ़ में किसान सभा की गतिविधि से एक नई परिस्थिति बनी—

किसान को अब केवल landlord की दया पर निर्भर नहीं रहना था।

उसके पास संगठन था।

सभा थी।

पंचायत थी।

और धीरे-धीरे बाहरी राजनीतिक नेतृत्व तक पहुँचने का रास्ता खुल रहा था।

अगला कदम यही था—

इलाहाबाद।

खंड 8.22

जून 1920 — सैकड़ों किसानों का इलाहाबाद तक पैदल पहुँचना

अवध किसान आंदोलन की सबसे प्रतीकात्मक घटनाओं में से एक जून 1920 का किसान मार्च था।

बाबा रामचंद्र कुछ सौ किसानों को लेकर इलाहाबाद पहुँचे।

मानक राष्ट्रवादी इतिहास India’s Struggle for Independence के अनुसार ये किसान जौनपुर और प्रतापगढ़ जिलों से आए थे और उन्होंने गौरीशंकर मिश्र तथा जवाहरलाल नेहरू से मुलाकात की। (Anyflip)

कुछ बाद के विवरण संख्या लगभग 500 किसानों तक बताते हैं, लेकिन स्रोतों में संख्या के फर्क के कारण शोध में “कुछ सौ किसान” कहना अधिक सुरक्षित है। (ResearchGate)

किसान इलाहाबाद क्यों गए?

उनका उद्देश्य केवल प्रदर्शन करना नहीं था।

वे चाहते थे कि बड़े नेता—

उनकी बात सुनें

और स्वयं गांव आकर हालात देखें।

यह महत्वपूर्ण है।

किसान नेता राष्ट्रीय नेतृत्व से केवल ज्ञापन पर हस्ताक्षर नहीं चाहते थे।

वे कह रहे थे—

“हमारी बात पर विश्वास करने से पहले हमारे गांव देखिए।”

गांधी से मिलने की आशा

कुछ विवरणों के अनुसार बाबा रामचंद्र की इच्छा गांधी से संपर्क की भी थी। गांधी उस समय इलाहाबाद में उपलब्ध नहीं हुए और किसानों की मुलाकात जवाहरलाल नेहरू तथा गौरीशंकर मिश्र से हुई। (Sringeri Belur)

यह घटना ग्रामीण और राष्ट्रीय राजनीति के बीच प्रत्यक्ष सेतु बनी।

बलुआ घाट की सभा

बाद के विवरणों में इलाहाबाद के बलुआ घाट पर किसान सभा का उल्लेख मिलता है, जहाँ किसानों ने दिन भर अपनी शिकायतें नेताओं के सामने रखीं। नेहरू ने गांवों में जाकर स्थितियाँ देखने का वादा किया। (Sringeri Belur)

यही वादा आगे निर्णायक साबित हुआ।

पैदल मार्च का मनोवैज्ञानिक अर्थ

सैकड़ों गरीब किसान 70–80 किलोमीटर के आसपास की दूरी तय करके शहर पहुँचे—यह स्वयं राजनीतिक संदेश था।

वे प्रशासनिक याचक बनकर नहीं आए थे।

वे संगठित किसान समुदाय का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।

उनका पैदल आना किसान आंदोलन की उस नई आत्मविश्वासपूर्ण राजनीति को दिखाता है जिसमें गांव स्वयं शहर के राजनीतिक केंद्र तक पहुँच रहा था।

राष्ट्रीय नेतृत्व के लिए चुनौती

इलाहाबाद के शिक्षित नेता अब किसान समस्या को कागज पर नहीं देख सकते थे।

सामने बैठे लोग बता रहे थे—

कितना किराया लिया जाता है,

कौन-से उपकर वसूले जाते हैं,

कैसे बेदखल किया जाता है

और बेगार कैसे कराया जाता है।

यहीं जवाहरलाल नेहरू के राजनीतिक जीवन का एक नया अध्याय शुरू हुआ।

खंड 8.23

जून–अगस्त 1920 — जवाहरलाल नेहरू पहली बार अवध के गांवों में

जून 1920 में किसानों से मुलाकात के बाद जवाहरलाल नेहरू ने अवध के ग्रामीण क्षेत्रों का दौरा शुरू किया।

NCERT इसे स्पष्ट रूप से दर्ज करता है—

जून 1920 से नेहरू अवध के गांवों में घूमने लगे, किसानों से बात की और उनकी शिकायतों को समझने की कोशिश की। (Sathee)

मानक इतिहास के अनुसार जून से अगस्त के बीच उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों के कई दौरे किए और किसान सभा आंदोलन से निकट संपर्क विकसित किया। (Anyflip)

यह नेहरू के लिए नया संसार था

जवाहरलाल नेहरू का सामाजिक जीवन और शिक्षा ग्रामीण किसान से बिल्कुल अलग थी।

वे—

समृद्ध परिवार से थे,

कैम्ब्रिज में पढ़े थे,

लंदन में बैरिस्टर बने थे

और इलाहाबाद के प्रतिष्ठित नेहरू परिवार के सदस्य थे।

अवध के गांवों में उन्हें भारत का वह संसार दिखा जो उनके अपने जीवन से बहुत दूर था।

यही अनुभव उनके राजनीतिक विकास के लिए महत्वपूर्ण रहा।

उन्होंने गांवों में क्या किया?

वे किसानों से मिले।

सभा की।

किराया और जमींदारी शिकायतें सुनीं।

किसानों के साथ गांवों में चले।

और स्थानीय सामाजिक परिस्थितियों को प्रत्यक्ष देखा।

यह कोई औपचारिक सरकारी survey नहीं था।

लेकिन राष्ट्रीय नेता के लिए ग्रामीण भारत का प्रत्यक्ष राजनीतिक अध्ययन था।

किसान ने नेहरू को कैसे देखा?

गांव के किसान के लिए नेहरू कोई स्थानीय कृषक नेता नहीं थे।

वे बड़े शहर और राष्ट्रीय राजनीति से आए व्यक्ति थे।

इसलिए उनकी उपस्थिति का अलग महत्व था।

किसान को लगा—

उसकी शिकायत अब इलाहाबाद और कांग्रेस तक पहुँच गई।

इससे आंदोलन का मनोबल बढ़ा।

नेहरू पर प्रभाव

अवध के अनुभव ने नेहरू को भारतीय किसान की आर्थिक स्थिति से अधिक निकटता से परिचित कराया।

आगे उनके राजनीतिक विचारों में—

गरीबी,

जमींदारी,

भूमि प्रश्न

और सामाजिक असमानता

का जो महत्व बढ़ा, उसमें इन शुरुआती ग्रामीण अनुभवों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

लेकिन नेतृत्व किसका था?

यहीं इतिहासलेखन की महत्वपूर्ण सावधानी है।

नेहरू का गांवों में आना आंदोलन का आरंभ नहीं था।

बाबा रामचंद्र और स्थानीय किसान नेताओं ने पहले ही ग्रामीण नेटवर्क खड़ा कर लिया था।

राष्ट्रीय नेतृत्व ने उसे नई दृश्यता दी।

इसलिए अधिक सटीक क्रम है—

ग्रामीण किसान संगठन → राष्ट्रीय नेताओं को बुलाना → नेहरू का गांवों में प्रवेश।

न कि—

नेहरू आए → किसान आंदोलन शुरू हुआ।

खंड 8.24

जवाहरलाल नेहरू ने किसानों के बीच क्या देखा?

जवाहरलाल नेहरू ने बाद में अपने ग्रामीण अनुभवों को आत्मकथात्मक और राजनीतिक लेखन में याद किया।

उन पर सबसे गहरा प्रभाव किसानों की गरीबी, असुरक्षा और उनकी असाधारण राजनीतिक ऊर्जा ने डाला।

गरीबी की वास्तविकता

अवध के ग्रामीण क्षेत्रों में उन्हें ऐसा समाज दिखाई दिया जहाँ बड़ी संख्या में किसान—

कम संसाधनों पर निर्भर,

ऊँचे किराये से दबे,

बेदखली से भयभीत

और स्थानीय landlord power के अधीन

थे।

कांग्रेस की शहरी राजनीति में “भारत” एक राजनीतिक राष्ट्र था।

गांव में नेहरू को उसका सामाजिक-आर्थिक चेहरा दिखाई दिया।

किसान का उत्साह

बाद में उनके विवरणों में किसान आंदोलन की असाधारण उत्सुकता का उल्लेख मिलता है।

गांवों में समाचार तेजी से फैलता।

नेता आने वाला हो तो हजारों किसान जुट जाते।

सभा और पंचायतें राजनीतिक शिक्षण के स्थल बन रही थीं।

यह वह शक्ति थी जिसे राष्ट्रीय कांग्रेस अभी पूरी तरह समझ नहीं पाई थी।

किसान की भाषा और नेहरू की भाषा

नेहरू अंग्रेजी-शिक्षित आधुनिक राजनीतिक भाषा में सोचते थे—

राष्ट्रवाद,

स्वराज,

औपनिवेशिक शासन,

नागरिक अधिकार।

किसान की प्राथमिक भाषा थी—

लगान,

बेदखली,

बेगार,

नजराना,

जमीन।

दोनों धीरे-धीरे एक-दूसरे की भाषा समझ रहे थे।

यही अवध का राजनीतिक प्रयोग था।

जनवरी 1921 का आगे का प्रमाण

यह संबंध कितना गहरा हुआ, इसका प्रमाण जनवरी 1921 में दिखाई देता है।

NCERT में 6 जनवरी 1921 के रायबरेली क्षेत्र की पुलिस गोलीबारी के बाद नेहरू का प्रसिद्ध वर्णन उद्धृत है—वे किसानों की भीड़ के बीच पहुंचे, स्वयं क्षण भर क्रोधित हुए, फिर गांधी की अहिंसा को याद करके किसानों को शांत रहने को कहा। (Drishti IAS)

1920 में शुरू हुआ गांव संपर्क कुछ महीनों में ऐसा संबंध बन चुका था कि संकट की स्थिति में किसान नेहरू की बात सुनने को तैयार थे।

क्या नेहरू किसान की सभी मांगों से सहमत थे?

नहीं।

यही आगे महत्वपूर्ण होगा।

वे किसान की दुर्दशा से प्रभावित हुए।

लेकिन वे—

हिंसक landlord-विरोध,

लूट,

अनियंत्रित rent refusal

या कांग्रेस कार्यक्रम से बाहर की कार्रवाइयों

को स्वीकार नहीं कर सकते थे।

यहीं किसान सहानुभूति और कांग्रेस अनुशासन के बीच तनाव पैदा हुआ।

खंड 8.25

बाबा रामचंद्र और जवाहरलाल नेहरू — सहयोग, दूरी और नेतृत्व का प्रश्न

1920 के अवध किसान आंदोलन में बाबा रामचंद्र और जवाहरलाल नेहरू का संबंध अत्यंत महत्वपूर्ण और जटिल था।

इसे केवल—

“रामचंद्र ने नेहरू को बुलाया और दोनों ने मिलकर आंदोलन चलाया”

कहना पर्याप्त नहीं है।

दोनों की सामाजिक पृष्ठभूमि, राजनीतिक शैली और किसान आंदोलन से संबंध बहुत अलग थे।

बाबा रामचंद्र की शक्ति

रामचंद्र की शक्ति गांव से आती थी।

वे—

किसानों के बीच रहते थे,

धार्मिक भाषा बोलते थे,

जातीय पंचायत नेटवर्क समझते थे,

और किसान की रोजमर्रा की समस्या को सीधे उठाते थे।

उनकी वैधता ग्रामीण थी।

नेहरू की शक्ति

नेहरू की शक्ति अलग प्रकार की थी।

उनके पास—

राष्ट्रीय कांग्रेस से संबंध,

प्रेस की पहुँच,

उच्च शिक्षित राजनीतिक प्रतिष्ठा,

प्रशासन से संवाद की क्षमता

और राष्ट्रीय मंच

था।

इसलिए दोनों का गठबंधन परस्पर उपयोगी था।

रामचंद्र ने राष्ट्रीय नेताओं को ग्रामीण आंदोलन से जोड़ा।

नेहरू ने किसान प्रश्न को राष्ट्रीय राजनीतिक वैधता दी।

लेकिन सत्ता-संतुलन बदल सकता था

जैसे-जैसे राष्ट्रीय नेता किसान आंदोलन में आए, प्रश्न पैदा हुआ—

आंदोलन की दिशा कौन तय करेगा?

गांव के किसान नेता?

या कांग्रेस?

यह केवल व्यक्तिगत अहंकार का प्रश्न नहीं था।

दो अलग राजनीतिक दृष्टियाँ थीं।

रामचंद्र के लिए

मुख्य प्रश्न था किसान को तत्काल राहत।

कांग्रेस/नेहरू के लिए

किसान आंदोलन को राष्ट्रीय असहयोग की व्यापक, नियंत्रित और अहिंसक रणनीति में रखना भी आवश्यक था।

यही अंतर आगे अधिक स्पष्ट हुआ।

ग्रामीण आंदोलन की स्वायत्तता

शोध का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह होना चाहिए कि बाबा रामचंद्र राष्ट्रीय नेतृत्व के अधीनस्थ एजेंट नहीं थे।

उन्होंने अपनी स्वतंत्र किसान राजनीति विकसित की थी।

जून 1920 का इलाहाबाद मार्च इसका सबसे साफ प्रमाण है—

किसान राष्ट्रीय नेता के बुलावे पर शहर नहीं गए थे।

किसानों ने स्वयं राष्ट्रीय नेताओं को अपने आंदोलन में बुलाया था।

यही agency का महत्वपूर्ण उलटाव है।

नेहरू भी बदल रहे थे

दूसरी ओर यह कहना भी गलत होगा कि राष्ट्रीय नेतृत्व ने केवल किसान आंदोलन को “हड़प” लिया।

नेहरू स्वयं ग्रामीण अनुभव से बदल रहे थे।

अवध ने उन्हें भारतीय राजनीति की सामाजिक जड़ों से गहरा परिचय कराया।

आगे किसान और मजदूर प्रश्नों में उनकी बढ़ती रुचि को इस अनुभव से अलग नहीं किया जा सकता।

सहयोग की सीमा

जैसे-जैसे आंदोलन तीखा हुआ, दोनों के बीच तनाव बढ़ना लगभग तय था।

यदि किसान—

किराया देना रोक दे,

तालुकेदार के बाजार पर हमला करे,

अनाज उठा ले

या गांधी के नाम पर जमीन पुनर्वितरण की कल्पना करने लगे—

तो कांग्रेस नेतृत्व पीछे हटेगा।

लेकिन किसान कह सकता था—

यदि स्वराज का अर्थ यही नहीं कि स्थानीय अत्याचार खत्म हो, तो हमारे लिए उसका अर्थ क्या है?

यही अवध किसान राजनीति और राष्ट्रीय आंदोलन का केंद्रीय अंतर्विरोध था।

और यह 1920 के अंत से खुलकर सामने आने वाला था।

अध्याय 8.21 से 8.25 अवध किसान आंदोलन में एक ऐतिहासिक मोड़ दिखाते हैं।

पहले आंदोलन था—

गांव → पंचायत → स्थानीय किसान नेता।

जून 1920 में उसमें नई दिशा जुड़ी—

गांव → इलाहाबाद → राष्ट्रीय नेतृत्व।

बाबा रामचंद्र कुछ सौ किसानों को इलाहाबाद लाए और गौरीशंकर मिश्र तथा जवाहरलाल नेहरू से कहा कि किसानों के गांवों में जाकर हालात स्वयं देखें। मानक इतिहास इस मार्च और उसके बाद जून–अगस्त में नेहरू के ग्रामीण दौरों को स्पष्ट रूप से दर्ज करता है। (Anyflip)

NCERT भी जून 1920 को नेहरू के अवध गांवों में प्रवेश का निर्णायक समय मानता है। (Sathee)

इस संपर्क से दोनों पक्ष बदले।

किसानों को राष्ट्रीय राजनीतिक मंच मिला।

नेहरू को ग्रामीण भारत का प्रत्यक्ष अनुभव मिला।

लेकिन इसी सहयोग के भीतर भविष्य का तनाव भी मौजूद था।

बाबा रामचंद्र की राजनीति नीचे से ऊपर जाती थी।

कांग्रेस की राजनीति राष्ट्रीय कार्यक्रम को नीचे गांव तक ले जाना चाहती थी।

1920 के कुछ महीनों तक दोनों दिशाएँ एक-दूसरे से मिलीं।

लेकिन जब किसान संगठन और अधिक तेजी से फैलने लगा, तो सवाल सामने आया—

क्या अवध का किसान आंदोलन कांग्रेस के कार्यक्रम का हिस्सा बनेगा, या अपनी स्वतंत्र सामाजिक मांगों के साथ आगे बढ़ेगा?

इस प्रश्न का उत्तर अक्टूबर 1920 में मिलेगा।

1920 के उत्तरार्ध तक अवध का किसान आंदोलन एक नए मोड़ पर पहुँच चुका था। प्रतापगढ़ में बाबा रामचंद्र का प्रभाव बढ़ चुका था, जवाहरलाल नेहरू गांवों का दौरा कर चुके थे और किसान प्रश्न इलाहाबाद के राजनीतिक नेतृत्व तक पहुँच चुका था। लेकिन इसी समय यह भी स्पष्ट होने लगा कि फरवरी 1918 में बनी उत्तर प्रदेश किसान सभा और अवध में तेजी से उभर रही ग्रामीण किसान राजनीति के बीच प्राथमिकताओं का अंतर बढ़ रहा है।

इसी पृष्ठभूमि में अक्टूबर 1920 में अवध किसान सभा (Oudh Kisan Sabha) अस्तित्व में आई। जवाहरलाल नेहरू, बाबा रामचंद्र और अन्य लोगों के नाम इसके गठन से जुड़े मिलते हैं। दिसंबर 1920 तक इसके बारे में 330 शाखाएँ स्थापित होने का विवरण मानक इतिहास में मिलता है।

यह मात्र संगठन-विस्तार नहीं था। अब गांवों में किसान पंचायतें निर्णय लेने लगीं, सामाजिक बहिष्कार को राजनीतिक हथियार बनाया गया और “नाई–धोबी बंद” जैसी रणनीतियों ने तालुकेदार के सामाजिक प्रभुत्व को चुनौती दी। इसी दौर में किसान की “स्वराज” की अपनी परिभाषा अधिक स्पष्ट होने लगी।

खंड 8.26

अक्टूबर 1920 — अवध किसान सभा का गठन क्यों आवश्यक हुआ?

यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि जब 1918 से उत्तर प्रदेश किसान सभा मौजूद थी, तब 1920 में एक अलग अवध किसान सभा की आवश्यकता क्यों पड़ी?

उत्तर केवल संगठनात्मक नहीं था।

इसके पीछे किसान आंदोलन के चरित्र में आया परिवर्तन था।

उत्तर प्रदेश किसान सभा की सीमा

उत्तर प्रदेश किसान सभा का प्रारंभिक नेतृत्व गौरीशंकर मिश्र, इंद्र नारायण द्विवेदी जैसे शिक्षित राजनीतिक कार्यकर्ताओं के हाथ में था और मदन मोहन मालवीय जैसे नेताओं का समर्थन भी उसे प्राप्त था।

उसकी प्राथमिक रणनीति थी—

किसान शिकायतों को संगठित करना,

किरायेदारी कानूनों में सुधार कराना,

अवैध वसूली का विरोध करना

और वैधानिक माध्यमों से दबाव बनाना।

लेकिन अवध के गांवों में आंदोलन इससे तेजी से आगे बढ़ रहा था।

किसान अब केवल ज्ञापन नहीं देना चाहता था।

वह पूछ रहा था—

बेदखली अभी क्यों न रुके?

बेगार अभी क्यों न बंद हो? अवैध कर अभी क्यों दिया जाए?

यह गति पुराने संगठन के लिए असुविधाजनक थी।

बाबा रामचंद्र का स्वतंत्र ग्रामीण आधार

1920 तक बाबा रामचंद्र ने प्रतापगढ़ में एक ऐसा ग्रामीण आधार तैयार कर लिया था जो केवल प्रांतीय किसान सभा नेतृत्व पर निर्भर नहीं था।

उनकी शक्ति थी—

गांव पंचायतें,

स्थानीय जातीय नेटवर्क,

रामचरितमानस और धार्मिक प्रतीकों की भाषा,

“सीताराम” का संगठनात्मक अभिवादन

और किसान के दैनिक आर्थिक प्रश्न।

इससे किसान आंदोलन की दिशा नीचे से तय होने लगी।

कांग्रेस के भीतर किसान प्रश्न

इसी समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस असहयोग आंदोलन की ओर बढ़ रही थी।

सितंबर 1920 के कलकत्ता विशेष अधिवेशन और दिसंबर के नागपुर अधिवेशन के बीच कांग्रेस जन-आंदोलन की नई संरचना तैयार कर रही थी।

इसलिए अवध के विशाल किसान आधार का राष्ट्रीय राजनीति से जुड़ना स्वाभाविक था।

लेकिन एक समस्या थी—

कांग्रेस ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अहिंसक असहयोग चाहती थी।

किसान का तत्काल संघर्ष अक्सर भारतीय तालुकेदार से था।

यहीं दोनों एजेंडों को जोड़ने की चुनौती थी।

अवध किसान सभा की स्थापना

अक्टूबर 1920 में अवध किसान सभा का गठन इसी परिस्थिति में हुआ।

NCERT के मानक विवरण में भी उल्लेख है कि अक्टूबर 1920 में जवाहरलाल नेहरू, बाबा रामचंद्र और कुछ अन्य लोगों ने Oudh Kisan Sabha स्थापित की।

इसका महत्व केवल नया संगठन बनाने में नहीं था।

इसने अवध की विशिष्ट कृषक समस्याओं को अधिक सीधे राजनीतिक मंच दिया।

पुरानी किसान सभा से अलगाव

इसे पूर्ण संस्थागत युद्ध मानना उचित नहीं होगा।

दोनों के बीच लोग, नेटवर्क और मुद्दे overlapping थे।

लेकिन राजनीतिक दृष्टि में अंतर स्पष्ट होता जा रहा था।

एक ओर अधिक नियंत्रित, वैधानिक किसान सुधार।

दूसरी ओर गांवों में तेजी से फैलता जन-संगठन।

अवध किसान सभा दूसरे प्रवाह की प्रमुख अभिव्यक्ति बनी।

खंड 8.27

उत्तर प्रदेश किसान सभा बनाम अवध किसान सभा — अंतर कहाँ था?

दोनों संगठनों को केवल नाम के आधार पर अलग करना पर्याप्त नहीं है।

उनके बीच अंतर नेतृत्व, सामाजिक आधार, राजनीतिक गति और संघर्ष की शैली में दिखाई देता है।

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आयाम

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उत्तर प्रदेश किसान सभा

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अवध किसान सभा

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स्थापना

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फरवरी 1918

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अक्टूबर 1920

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क्षेत्र

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संयुक्त प्रांत स्तर

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मुख्यतः अवध

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प्रारंभिक प्रमुख नेतृत्व

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गौरीशंकर मिश्र, इंद्र नारायण द्विवेदी आदि

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बाबा रामचंद्र, जवाहरलाल नेहरू तथा अन्य

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मुख्य शैली

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वैधानिक/सुधारवादी संगठन

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अधिक प्रत्यक्ष ग्रामीण लामबंदी

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प्रमुख प्रश्न

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tenancy reform, किसान शिकायतें

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लगान, बेदखली, बेगार, अवैध उपकर

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सामाजिक आधार

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व्यापक प्रांतीय संगठन

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अवध के किरायेदार किसानों में तीव्र आधार

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पंचायत

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संगठन का माध्यम

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ग्रामीण कार्रवाई की महत्वपूर्ण इकाई

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कांग्रेस संबंध

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निकट लेकिन अपेक्षाकृत मध्यमार्गी

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असहयोग से तेजी से जुड़ाव

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आंदोलन की गति

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क्रमिक

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अत्यंत तीव्र

यह तालिका कठोर विभाजन नहीं है। दोनों के बीच कई साझा तत्व थे। फिर भी अवध किसान आंदोलन की दिशा समझने के लिए यह अंतर उपयोगी है।

नेतृत्व का सामाजिक अंतर

पुरानी किसान सभा में शिक्षित नेतृत्व अपेक्षाकृत प्रभावशाली था।

अवध किसान सभा में बाबा रामचंद्र जैसे ग्रामीण जननेता का महत्व अधिक था।

इसका अर्थ यह नहीं कि अवध किसान सभा “किसानों की शुद्ध स्वतंत्र संस्था” थी—जवाहरलाल नेहरू जैसे राष्ट्रीय नेता भी उससे जुड़े थे।

लेकिन ग्रामीण आधार की राजनीतिक शक्ति कहीं अधिक स्पष्ट थी।

मांगों की भाषा

उत्तर प्रदेश किसान सभा कह सकती थी—

किरायेदारी कानून में सुधार चाहिए।

अवध का किसान कहता था—

बेदखली बंद करो।

पहला कानूनी कार्यक्रम है।

दूसरा तत्काल जन-मांग।

दोनों का लक्ष्य संबंधित था, लेकिन राजनीतिक प्रभाव अलग था।

संगठनात्मक अनुशासन की समस्या

जैसे-जैसे आंदोलन हजारों किसानों तक पहुँचा, नेतृत्व के सामने एक कठिन प्रश्न आया—

क्या प्रत्येक गांव की कार्रवाई केंद्रीय नेतृत्व के निर्देश से होगी?

उत्तर था—नहीं।

यही अवध किसान आंदोलन की शक्ति और कमजोरी दोनों बनी।

उसका विस्तार बहुत तेज था, लेकिन स्थानीय किसान कई बार अपनी समझ से कार्रवाई करते थे।

आगे जनवरी 1921 में यही समस्या गंभीर रूप लेगी।

खंड 8.28

एक महीने में 300 से अधिक शाखाएँ — आंदोलन इतनी तेजी से क्यों फैला?

अवध किसान सभा की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में उसका विस्फोटक विस्तार था।

NCERT के अनुसार गठन के एक महीने के भीतर क्षेत्र के गांवों में 300 से अधिक शाखाएँ स्थापित हो चुकी थीं।

कुछ मानक इतिहास इसे दिसंबर 1920 तक लगभग 330 शाखाएँ बताते हैं।

संख्या चाहे 300+ कही जाए या लगभग 330, मुख्य तथ्य निर्विवाद है—

संगठन असाधारण तेजी से फैला।

क्या संगठन ने असंतोष पैदा किया?

नहीं।

यही सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है।

किसान सभा ने उस असंतोष को संगठित किया जो पहले से मौजूद था।

यदि गांवों में समस्या न होती तो कुछ सप्ताह में सैकड़ों शाखाएँ नहीं बन सकती थीं।

एक गांव दूसरे गांव को कैसे जोड़ता था?

आधुनिक संचार माध्यम नहीं थे।

फिर भी ग्रामीण समाज में सूचना के अपने नेटवर्क थे—

साप्ताहिक बाजार,

मेले,

धार्मिक स्थल,

विवाह संबंध,

जातीय पंचायतें,

नाई और धोबी जैसी सेवा जातियों के व्यापक संपर्क,

और गांव से गांव आने-जाने वाले लोग।

किसान आंदोलन इन्हीं नेटवर्कों पर सवार हुआ।

सभा स्वयं राजनीतिक घटना थी

हजारों ग्रामीणों का एक जगह जमा होना औपनिवेशिक अवध में साधारण बात नहीं थी।

सभा किसान को यह दृश्य प्रमाण देती थी—

मैं अकेला नहीं हूँ।

एक किसान जिसकी बेदखली होने वाली है, जब हजारों दूसरे tenants को वही शिकायत करते देखता है तो उसका भय कम होता है।

यही सामूहिकता आंदोलन की मनोवैज्ञानिक शक्ति थी।

पंचायतों का जाल

शाखाओं के साथ किसान पंचायतों का विस्तार हुआ।

किसान अपने संगठन में भी उन्हें उठा सकता था।

इससे गांव में किसान सभा की वैधता बढ़ी।

असहयोग आंदोलन का प्रभाव

1920 के अंतिम महीनों में देश का राजनीतिक वातावरण भी तेजी से बदल रहा था।

खिलाफत और असहयोग आंदोलन ने—

ब्रिटिश संस्थाओं का बहिष्कार,

स्वदेशी,

राष्ट्रीय शिक्षा,

विदेशी कपड़ों का विरोध

और स्वराज

को जन-चर्चा का विषय बना दिया था।

अवध के किसान ने इसी वातावरण में अपनी स्थानीय शिकायत को राष्ट्रीय राजनीति से जोड़ा।

लेकिन “स्वराज” का अर्थ बदल गया

कांग्रेस नेतृत्व के लिए स्वराज का अर्थ ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राजनीतिक परिवर्तन था।

ग्रामीण किसान के लिए वह ठोस रूप ले सकता था—

लगान कम होगा।

बेदखली बंद होगी। बेगार खत्म होगी। तालुकेदार की मनमानी नहीं चलेगी।

यही अर्थांतर आगे बहुत महत्वपूर्ण होगा।

खंड 8.29

“नाई–धोबी बंद” — सामाजिक बहिष्कार किसान का हथियार कैसे बना?

अवध किसान आंदोलन की सबसे विशिष्ट रणनीतियों में से एक थी—

नाई–धोबी बंद

NCERT इसे स्पष्ट रूप से दर्ज करता है: कुछ स्थानों पर पंचायतों ने जमींदारों को नाई और धोबी की सेवाओं से वंचित करने के लिए सामाजिक बहिष्कार आयोजित किया।

आज यह मामूली प्रतीत हो सकता है।

1920 के ग्रामीण अवध में इसका अर्थ बहुत गहरा था।

नाई और धोबी केवल सेवा प्रदाता नहीं थे

परंपरागत गांव व्यवस्था में नाई और धोबी सामाजिक जीवन के महत्वपूर्ण अंग थे।

नाई—

बाल/दाढ़ी काटने के अतिरिक्त विवाह और सामाजिक संदेशों में भूमिका निभा सकता था।

धोबी—

परिवार और सामाजिक समारोहों की आवश्यक सेवा देता था।

इन सेवाओं को बंद करना किसी व्यक्ति को गांव के सामाजिक जीवन से अलग करने जैसा हो सकता था।

आर्थिक प्रतिरोध से सामाजिक प्रतिरोध

किसान के पास landlord की तुलना में—

धन कम था,

कानूनी शक्ति कम थी,

पुलिस पर प्रभाव नहीं था।

लेकिन किसान के पास एक चीज थी—

समुदाय।

यदि पूरा गांव तय करे कि oppressive landlord को सामाजिक सेवाएँ नहीं मिलेंगी तो शक्ति-संतुलन आंशिक रूप से बदल सकता था।

यही “नाई–धोबी बंद” का राजनीतिक अर्थ था।

अहिंसक coercion का प्रश्न

यहाँ इतिहासलेखन का कठिन प्रश्न उठता है।

क्या सामाजिक बहिष्कार पूरी तरह अहिंसक था?

शारीरिक हिंसा नहीं होना एक बात है।

लेकिन किसी सेवा जाति को पंचायत के दबाव में किसी व्यक्ति को सेवा न देने के लिए बाध्य करना सामाजिक coercion भी हो सकता था।

इसलिए इसे केवल आदर्श गांधीवादी अहिंसा कहना सावधानी के बिना उचित नहीं है।

यह ग्रामीण समाज की अपनी collective sanction की परंपरा थी।

कांग्रेस को चिंता क्यों हो सकती थी?

यदि सामाजिक बहिष्कार नियंत्रित रहे तो वह अहिंसक दबाव है।

लेकिन यदि वह—

धमकी,

मारपीट,

घर पर हमला

या संपत्ति नष्ट करने

तक पहुँचे तो कांग्रेस की अहिंसक रणनीति टूट जाती।

यही सीमा 1921 में गंभीर होने वाली थी।

सामाजिक संरचना का उलटाव

नाई–धोबी बंद का एक और गहरा अर्थ था।

सामान्य ग्रामीण पदानुक्रम में तालुकेदार ऊपर और सेवा जातियाँ नीचे थीं।

लेकिन किसान पंचायत कह रही थी—

गांव की सामूहिक सहमति के बिना ऊँची सामाजिक स्थिति भी पर्याप्त नहीं।

यह प्रतीकात्मक रूप से ग्रामीण सत्ता का उलटाव था।

खंड 8.30

किसान पंचायतें, प्रतिज्ञाएँ और वैकल्पिक ग्रामीण अनुशासन

अवध किसान आंदोलन में पंचायत केवल बैठक नहीं थी।

वह धीरे-धीरे वैकल्पिक ग्रामीण राजनीतिक संस्था का रूप लेने लगी।

यहीं आंदोलन की सबसे बड़ी शक्ति और औपनिवेशिक शासन की सबसे बड़ी चिंता निहित थी।

पंचायत क्या तय कर सकती थी?

स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार किसान पंचायत निर्णय कर सकती थी—

अनुचित लगान का विरोध कैसे हो;

बेदखल किसान की सहायता कौन करेगा;

किस landlord का सामाजिक बहिष्कार होगा;

किस किसान को संगठन तोड़ने से रोका जाए;

किस गांव में अगली सभा होगी;

और नेताओं तक शिकायत कैसे पहुँचाई जाएगी।

इससे किसान सभा केवल प्रचार संस्था नहीं रही।

वह व्यवहार में collective decision-making body बन रही थी।

प्रतिज्ञा की शक्ति

जन-आंदोलन में लिखित कानून से अधिक महत्वपूर्ण कई बार सामूहिक प्रतिज्ञा होती है।

यदि किसान सभा में हजारों लोग घोषणा करें कि—

अनुचित मांग स्वीकार नहीं करेंगे,

तो व्यक्तिगत किसान पर पीछे हटने का सामाजिक दबाव बढ़ जाता है।

यही सामूहिक प्रतिज्ञा की शक्ति थी।

वैकल्पिक न्याय की शुरुआत

जब किसान landlord या अदालत के बजाय अपनी पंचायत के सामने विवाद ले जाने लगे, तो इसका राजनीतिक अर्थ गंभीर था।

राज्य के लिए न्याय और वैध authority उसके संस्थानों से आनी चाहिए।

किसान कह रहा था—

हम अपनी सामूहिक संस्था में भी न्याय तय कर सकते हैं।

यही औपनिवेशिक शासन को असहज करता था।

पंचायत और गांधीवादी राजनीति

गांधी स्वयं पंचायत और ग्रामीण स्वशासन को महत्व देते थे।

लेकिन अवध की वास्तविक किसान पंचायतें हमेशा गांधीवादी अनुशासन के अनुरूप काम करें, इसकी गारंटी नहीं थी।

उनकी अपनी स्थानीय सामाजिक परंपराएँ थीं।

कभी उनका निर्णय अहिंसक बहिष्कार हो सकता था।

कभी भीड़ का दबाव।

कभी किराया रोकना।

कभी बाजार पर हमला।

यहीं राष्ट्रीय नेतृत्व और स्थानीय किसान agency के बीच अंतर फिर सामने आता है।

संगठन की सबसे बड़ी समस्या — नियंत्रण

अक्टूबर–दिसंबर 1920 तक आंदोलन इतनी तेजी से फैला कि केंद्रीय नेतृत्व प्रत्येक गांव को नियंत्रित नहीं कर सकता था।

मान लीजिए—

किसी क्षेत्र में बाबा रामचंद्र ने कहा केवल अवैध कर का विरोध करो।

लेकिन स्थानीय किसान समझे—

कोई लगान नहीं देना है।

कांग्रेस कहे—

अहिंसक रहो।

स्थानीय भीड़ तालुकेदार के बाजार पर हमला कर दे।

यह केवल अनुशासनहीनता नहीं थी।

यह बताता था कि अलग-अलग किसान समूह आंदोलन के संदेश को अपने सामाजिक अनुभव के अनुसार अर्थ दे रहे थे।

अफवाह और राजनीतिक संचार

ग्रामीण समाज में समाचार मौखिक रूप से फैलता था।

इससे संदेश बदल सकता था।

“अन्यायपूर्ण लगान का विरोध करो” बदलकर—

“गांधी ने लगान माफ कर दिया”

हो सकता था।

“बेदखली का विरोध करो” बदलकर—

“अब कोई जमींदार किसी किसान को निकाल नहीं सकता”

हो सकता था।

इसी तरह “स्वराज” का अर्थ भी गांवों में अपनी कल्पनाओं के साथ बदलता गया।

यह आगे के अध्यायों का केंद्रीय प्रश्न होगा।

अक्टूबर से दिसंबर 1920 के बीच अवध किसान आंदोलन ने संगठनात्मक छलांग लगाई।

क्रम को इस प्रकार समझा जा सकता है—

उत्तर प्रदेश किसान सभा की सीमाएँ

बाबा रामचंद्र का स्वतंत्र ग्रामीण आधार

जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रीय नेतृत्व से संपर्क

अक्टूबर 1920 — अवध किसान सभा का गठन

एक महीने के भीतर 300 से अधिक शाखाएँ

गांव-स्तरीय किसान पंचायतें

नाई–धोबी बंद और सामाजिक बहिष्कार

सामूहिक प्रतिज्ञाएँ

ग्रामीण समाज में वैकल्पिक किसान authority का उदय।

यह आंदोलन की बड़ी उपलब्धि थी।

लेकिन इसी सफलता में संकट भी छिपा था।

किसान सभा का विस्तार उसके केंद्रीय नेतृत्व की नियंत्रण-क्षमता से अधिक तेजी से हो रहा था।

और सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन था—

“स्वराज” के अर्थ का स्थानीयकरण।

कांग्रेस कह रही थी—

ब्रिटिश शासन से स्वराज।

किसान सुन रहा था—

तालुकेदार के अत्याचार से स्वराज।

कांग्रेस कह रही थी—

असहयोग।

किसान उसका अर्थ निकाल सकता था—

अन्यायपूर्ण लगान नहीं देंगे।

गांधी अहिंसा की बात कर रहे थे।

लेकिन किसान की पीढ़ियों की नाराजगी कभी-कभी प्रत्यक्ष कार्रवाई की ओर जा सकती थी।

यही वह बिंदु है जहाँ अवध किसान आंदोलन को केवल कांग्रेस के असहयोग आंदोलन की ग्रामीण शाखा मानना असंभव हो जाता है। किसान राष्ट्रीय प्रतीकों को स्वीकार कर रहा था, लेकिन उन्हें अपनी परिस्थितियों के अनुसार नया अर्थ भी दे रहा था।

1920 के अंत तक दो राजनीतिक धाराएँ एक ही गांव में पहुँच चुकी थीं—राष्ट्रीय असहयोग और स्थानीय कृषक विद्रोह।

अभी तक दोनों साथ चल रही थीं।

लेकिन जनवरी 1921 में इनके बीच तनाव खुलकर सामने आने वाला था।

1920 के अंतिम महीनों में अवध किसान आंदोलन एक ऐसे मुकाम पर पहुँचा जहाँ दो अलग राजनीतिक धाराएँ एक-दूसरे में प्रवेश कर रही थीं। पहली थी गांधी के नेतृत्व में असहयोग और खिलाफत से जुड़ी राष्ट्रव्यापी औपनिवेशिक-विरोधी राजनीति; दूसरी थी अवध के किरायेदार किसानों की स्थानीय लड़ाई—तालुकेदार, ऊँचा लगान, बेदखली, बेगार और अवैध वसूली के विरुद्ध।

दोनों ने एक-दूसरे को शक्ति दी, लेकिन दोनों के लक्ष्य पूरी तरह समान नहीं थे।

IGNOU के अध्ययन में भी यह महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आता है कि असहयोग आंदोलन ने किसानों को अपनी शिकायतों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने का अवसर दिया, किंतु किसानों ने कांग्रेस के समर्थन की व्याख्या अपने ढंग से की। कई जगह कर न देने, लगान न देने, सामाजिक बहिष्कार और कभी-कभी हिंसक कार्रवाई जैसी प्रवृत्तियाँ कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व की नीति से टकराईं। (eGyankosh)

यही खंड अवध किसान आंदोलन की राजनीति समझने की कुंजी है।

खंड 8.31

गांधी का असहयोग और अवध किसान — दो आंदोलनों का मिलन

1920 भारत की राजनीति में निर्णायक वर्ष था।

रॉलेट एक्ट, जलियांवाला बाग, खिलाफत प्रश्न और ब्रिटिश शासन से बढ़ते मोहभंग की पृष्ठभूमि में गांधी ने असहयोग को व्यापक राष्ट्रीय रणनीति बनाया।

सितंबर 1920 के कलकत्ता विशेष अधिवेशन और दिसंबर के नागपुर अधिवेशन ने कांग्रेस को जन-आंदोलन की दिशा में आगे बढ़ाया।

गांधी ने अहिंसक असहयोग के माध्यम से ब्रिटिश शासन की नैतिक और संस्थागत शक्ति कमजोर करने की योजना बनाई।

इसके प्रमुख रूप थे—

सरकारी उपाधियों का त्याग, विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार, सरकारी शिक्षण संस्थानों से दूरी, अदालतों और चुनावों के बहिष्कार की दिशा में कदम तथा स्वदेशी को प्रोत्साहन।

लेकिन जब यही संदेश अवध के गांव में पहुँचा तो उसका अर्थ बदलने लगा।

किसान ने असहयोग को अपनी परिस्थिति से जोड़ा

शहरी मध्यवर्ग के लिए असहयोग का अर्थ हो सकता था—

सरकारी कॉलेज छोड़ना।

वकील के लिए—

अदालत का बहिष्कार।

लेकिन किरायेदार किसान पूछ सकता था—

मैं किससे असहयोग करूँ?

उसके जीवन में प्रतिदिन उपस्थित सत्ता थी—

तालुकेदार,

जमींदार,

उसका अमला,

लगान वसूलने वाला कर्मचारी

और बेगार मांगने वाला स्थानीय प्रभुत्व।

इसलिए राष्ट्रीय “Non-Cooperation” का स्थानीय अनुवाद बहुत स्वाभाविक रूप से landlord authority के विरुद्ध भी होने लगा।

दो आंदोलनों ने एक-दूसरे को क्या दिया?

असहयोग ने किसान आंदोलन को दिया—

गांधी का नाम,

राष्ट्रीय वैधता,

स्वराज की भाषा,

कांग्रेस का नेटवर्क

और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक राजनीतिक संदर्भ।

किसान आंदोलन ने असहयोग को दिया—

विशाल ग्रामीण जनाधार,

गांवों में संगठन,

हजारों की सभाएँ

और ऐसी जनता जो पहली बार राष्ट्रीय राजनीति में प्रत्यक्ष रूप से प्रवेश कर रही थी।

इसलिए यह संबंध एकतरफा नहीं था।

कांग्रेस ने केवल किसानों को संगठित नहीं किया।

पहले से संगठित किसान समुदाय ने भी कांग्रेस को ग्रामीण जन-आंदोलन में बदलने में योगदान दिया।

अवध किसान सभा की भूमिका

अक्टूबर 1920 में अवध किसान सभा का गठन इसी संगम का संस्थागत रूप था।

IGNOU के अध्ययन के अनुसार असहयोग समर्थकों और संवैधानिक आंदोलन पसंद करने वाले पुराने नेताओं के मतभेद के बाद अवध किसान सभा बनी और उसके अंतर्गत लगभग 330 स्थानीय किसान सभाएँ जुड़ गईं। संगठन किसानों को बेदखल किए गए tenant की भूमि न जोतने, बेगार न करने और विवाद पंचायतों से सुलझाने के लिए प्रेरित करता था। (eGyankosh)

यह कार्यक्रम ध्यान देने योग्य है।

यह सीधे ब्रिटिश संस्थानों के बहिष्कार तक सीमित नहीं था।

यह गांव की सामाजिक और कृषि व्यवस्था बदलने का कार्यक्रम भी था।

खंड 8.32

कांग्रेस किसान ऊर्जा को राष्ट्रीय आंदोलन में कैसे समाहित करना चाहती थी?

कांग्रेस के लिए अवध का किसान उभार एक असाधारण अवसर भी था और गंभीर चुनौती भी।

अवसर इसलिए कि लाखों ग्रामीण पहली बार राजनीतिक रूप से सक्रिय हो सकते थे।

चुनौती इसलिए कि उनकी शिकायतें सीधे उन तालुकेदारों और जमींदारों से थीं जिनमें से कुछ स्वयं भारतीय थे और राष्ट्रीय राजनीति से सहानुभूति भी रख सकते थे।

कांग्रेस का व्यापक गठबंधन

गांधी की रणनीति केवल किसान वर्ग का आंदोलन बनाने की नहीं थी।

राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल होने थे—

किसान,

व्यापारी,

मध्यवर्ग,

छात्र,

वकील,

कारीगर,

मुसलमान खिलाफत समर्थक

और विभिन्न सामाजिक समूह।

यदि कांग्रेस खुला किसान बनाम जमींदार वर्गयुद्ध स्वीकार कर लेती, तो यह गठबंधन टूट सकता था।

इसलिए किसान आंदोलन को नियंत्रित रखना आवश्यक समझा गया।

किसान को संगठित करो—लेकिन अहिंसक अनुशासन में

कांग्रेस नेतृत्व किसान की वैध शिकायतों को स्वीकार कर सकता था।

लेकिन वह नहीं चाहता था कि किसान—

जमींदार के घर पर हमला करे,

फसल जला दे,

बाजार लूटे,

बलपूर्वक जमीन पर कब्जा करे

या अपनी ओर से पूर्ण rent strike घोषित कर दे।

IGNOU के विश्लेषण में यही तनाव स्पष्ट रूप से दर्ज है। किसानों द्वारा no-tax, no-rent, बहिष्कार और कभी-कभी हिंसक कार्रवाई कांग्रेस के उच्च नेतृत्व को स्वीकार्य नहीं थी। (eGyankosh)

क्यों?

इसके कम से कम चार कारण थे।

पहला — अहिंसा।

गांधी के लिए साधन और लक्ष्य अलग नहीं थे।

दूसरा — राष्ट्रीय एकता।

कांग्रेस किसान और landlord दोनों को ब्रिटिश शासन के खिलाफ व्यापक राष्ट्रीय गठबंधन में रखना चाहती थी।

तीसरा — आंदोलन पर नियंत्रण।

स्थानीय हिंसा से सरकार को व्यापक दमन का आधार मिल सकता था।

चौथा — स्वराज की प्राथमिकता।

कांग्रेस के लिए केंद्रीय विरोधी औपनिवेशिक राज्य था; किसान के लिए तत्काल विरोधी कई बार landlord था।

यही मूल अंतर्विरोध था

कांग्रेस कहती थी—

राष्ट्रीय संघर्ष को कमजोर मत करो।

किसान पूछता था—

मेरी जमीन और आजीविका का प्रश्न राष्ट्रीय संघर्ष से अलग कैसे है?

इस प्रश्न का कोई आसान उत्तर नहीं था।

खंड 8.33

किसान के लिए ‘स्वराज’ — ब्रिटिश सत्ता से अधिक स्थानीय सत्ता से मुक्ति

“स्वराज” अवध किसान आंदोलन में एक अत्यंत महत्वपूर्ण लेकिन बहुअर्थी शब्द था।

गांधी के राजनीतिक चिंतन में स्वराज केवल सत्ता हस्तांतरण नहीं बल्कि आत्मशासन और नैतिक आत्मानुशासन का भी विचार था। उनके चिंतन पर आधुनिक अध्ययन इस व्यापक अर्थ को रेखांकित करते हैं। (Cambridge)

लेकिन अवध का गरीब tenant इसे अपने अनुभव से समझ रहा था।

किसान के लिए स्वराज कैसा दिख सकता था?

ऐसा शासन जिसमें—

अनुचित बेदखली न हो,

लगान मनमाने ढंग से न बढ़े,

बेगार न हो,

नजराना न देना पड़े,

जमींदार का अमला अपमान न करे

और किसान की पंचायत की बात सुनी जाए।

अर्थात किसान ने एक अमूर्त राष्ट्रीय विचार का ग्रामीण सामाजिक अनुवाद कर लिया।

स्वराज का स्थानीयकरण

यह इतिहास की सामान्य प्रक्रिया है।

राजनीतिक नेता कोई नारा देता है।

जनता उसे अपनी परिस्थितियों में अर्थ देती है।

“स्वराज” का अर्थ वकील, व्यापारी और tenant किसान के लिए समान होना आवश्यक नहीं था।

अवध इसका उत्कृष्ट उदाहरण है।

“किसान स्वराज”

कुछ क्षेत्रों में किसान पंचायतों और संगठन का प्रभाव इतना बढ़ा कि ग्रामीण स्तर पर वैकल्पिक authority की भावना बनने लगी।

IGNOU की सामग्री अवध के कई गांवों में किसानों द्वारा “Swaraj” स्थापित करने जैसी स्थिति का उल्लेख करती है। (eGyankosh)

इसका अर्थ यह नहीं कि कोई स्थायी समानांतर राज्य स्थापित हो गया था।

अधिक सावधानीपूर्ण अर्थ यह है कि कुछ गांवों में किसान संगठन स्वयं—

सामाजिक अनुशासन,

विवाद समाधान

और सामूहिक निर्णय

की authority का दावा करने लगा।

ब्रिटिश राज्य के लिए यह क्यों खतरनाक था?

सरकार केवल कर वसूलने से शासन नहीं करती।

शासन तब स्थिर रहता है जब जनता यह स्वीकार करे कि—

कानून कौन बनाएगा,

विवाद कौन सुलझाएगा,

आदेश किसका माना जाएगा।

यदि किसान कहे—

हम अपने विवाद पंचायत में सुलझाएँगे,

तो राज्य की वैधता पर छोटी लेकिन महत्वपूर्ण चुनौती खड़ी होती है।

इसीलिए किसान पंचायत केवल कृषि संस्था नहीं थी।

वह राजनीतिक संस्था बन सकती थी।

खंड 8.34

गांवों में ‘गांधी राज’ — महात्मा गांधी की ग्रामीण कल्पना

अवध किसान आंदोलन का सबसे रोचक पहलू है—

वास्तविक गांधी और ग्रामीण किसान की कल्पना के गांधी के बीच अंतर।

कई किसानों ने गांधी को देखा तक नहीं था।

वे उनकी विस्तृत राजनीतिक विचारधारा नहीं जानते थे।

लेकिन गांधी का नाम दूर-दराज के गांवों तक पहुँच चुका था।

सरकारी अधिकारी भी चकित थे

W. F. Crawley द्वारा उद्धृत एक समकालीन CID रिपोर्ट में अधिकारी ने गांधी के नाम की ग्रामीण लोकप्रियता पर आश्चर्य व्यक्त किया।

अलग-अलग ग्रामीण गांधी के बारे में अलग कल्पनाएँ रखते थे—

कोई उन्हें महात्मा या साधु समझता, कोई पंडित, कोई ब्राह्मण, यहाँ तक कि कोई देवतुल्य व्यक्ति।

सबसे महत्वपूर्ण अफवाहों में यह भी था कि गांधी ने प्रतापगढ़ में बेदखली बंद करा दी है। (Cambridge)

यह तथ्य असाधारण है।

क्योंकि गांधी ने ऐसा कोई प्रशासनिक आदेश जारी नहीं किया था।

फिर यह धारणा क्यों बनी?

क्योंकि किसान ने गांधी के नाम को अपनी सबसे बड़ी समस्या के समाधान से जोड़ लिया था।

गांधी एक व्यक्ति से प्रतीक बने

ग्रामीण राजनीतिक संचार में गांधी का वास्तविक कार्यक्रम संक्षिप्त होकर कुछ इस तरह पहुँच सकता था—

गांधी गरीब के साथ हैं।

गांधी अंग्रेजों को चुनौती दे रहे हैं। गांधी अन्याय खत्म करेंगे। गांधी का राज आने वाला है।

तो बेदखली भी खत्म होगी।

लगान भी घटेगा।

तालुकेदार की मनमानी भी समाप्त होगी।

अफवाह को केवल अज्ञान क्यों न माना जाए?

यह महत्वपूर्ण इतिहासलेखन का प्रश्न है।

किसान की “गलतफहमी” को केवल अशिक्षा कहना पर्याप्त नहीं है।

अफवाहें बताती हैं कि ग्रामीण जनता राष्ट्रीय राजनीति को किस अर्थ में स्वीकार कर रही थी।

“गांधी ने बेदखली रोक दी” तथ्यात्मक रूप से गलत हो सकता था।

लेकिन राजनीतिक रूप से वह किसान की इच्छा का अत्यंत सटीक बयान था—

वह ऐसे स्वराज की कल्पना कर रहा था जिसमें उसका खेत सुरक्षित हो।

गांधी का नाम वैधता का स्रोत

किसी स्थानीय नेता ने यदि कहा—

अन्याय का विरोध करो,

तो किसान सोच सकता था कि परिणाम क्या होगा।

यदि वही बात “गांधी के आदेश” के रूप में फैले तो उसे राष्ट्रीय और नैतिक वैधता मिल जाती।

यही गांधी के नाम की अपार शक्ति थी।

लेकिन यही कांग्रेस के लिए खतरा भी था।

क्योंकि अब गांधी के नाम पर ऐसी कार्रवाइयाँ भी हो सकती थीं जिनका गांधी ने कभी आदेश नहीं दिया।

खंड 8.35

कांग्रेस नेतृत्व और किसान आकांक्षाओं के बीच बढ़ती दूरी

1920 के अंत तक अवध में कांग्रेस और किसान आंदोलन का संबंध अपने चरम पर दिखाई देता है।

लेकिन भीतर से दूरी बढ़ने लगी थी।

इस दूरी को केवल “कांग्रेस ने किसानों को धोखा दिया” या “किसान हिंसक हो गए” जैसे सरल निष्कर्ष से नहीं समझा जा सकता।

यह दो अलग राजनीतिक परियोजनाओं के बीच वास्तविक तनाव था।

पहला अंतर — विरोधी कौन है?

कांग्रेस के लिए:

मुख्य राजनीतिक विरोधी ब्रिटिश औपनिवेशिक राज्य।

किसान के लिए:

उसके दैनिक जीवन का प्रत्यक्ष विरोधी अक्सर तालुकेदार या जमींदार।

यह मूलभूत अंतर था।

दूसरा अंतर — लगान देना है या नहीं?

कांग्रेस की असहयोग रणनीति का अर्थ स्वतः यह नहीं था कि हर tenant landlord को rent देना बंद कर दे।

लेकिन ग्रामीण आंदोलन में “असहयोग” का अर्थ इस दिशा में बढ़ सकता था।

IGNOU के अध्ययन में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि किसानों ने कांग्रेस समर्थन की अपनी व्याख्या की और no-tax तथा no-rent जैसे आग्रह उच्च कांग्रेस नेतृत्व की स्थिति से टकराए। (eGyankosh)

तीसरा अंतर — अहिंसा

कांग्रेस नेतृत्व के लिए अहिंसा आंदोलन की अनिवार्य शर्त थी।

लेकिन किसान की स्थानीय स्मृति में पीढ़ियों का शोषण था।

यदि हजारों किसान इकट्ठे हों और सामने उसी तालुकेदार का बाजार या अनाज भंडार हो जिससे वे वर्षों से नाराज हैं, तो भीड़ का व्यवहार केंद्रीय निर्देश से अलग हो सकता था।

1921 में यही हुआ।

IGNOU के अनुसार आंदोलन के अधिक militant होने पर कुछ स्थानों पर landlords और moneylenders के घरों पर हमले, बाजारों और अनाज भंडारों की लूट तथा पुलिस से संघर्ष हुए। (eGyankosh)

चौथा अंतर — नेतृत्व किसका?

यह सबसे संवेदनशील प्रश्न था।

किसान सभा की ऊर्जा बाबा रामचंद्र और स्थानीय नेताओं से आई थी।

लेकिन जैसे-जैसे कांग्रेस सक्रिय हुई, आंदोलन की सार्वजनिक पहचान में जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रीय नेतृत्व का महत्व बढ़ा।

यहाँ सत्ता-संबंध का प्रश्न पैदा हुआ—

क्या ग्रामीण आंदोलन अपनी दिशा स्वयं तय करेगा?

या

राष्ट्रीय नेतृत्व उसे असहयोग आंदोलन की रणनीति के भीतर नियंत्रित करेगा?

W. F. Crawley का अध्ययन इसी कारण महत्वपूर्ण है। वह बताता है कि संयुक्त प्रांत के जिन क्षेत्रों में कृषि उग्रवाद सबसे मजबूत था, वहाँ विशिष्ट tenancy और agrarian समस्याएँ थीं; स्थानीय radical leadership काफी हद तक स्वतंत्र थी और व्यापक राजनीतिक आंदोलनों से उसके संबंध कई बार कमजोर तथा ambivalent थे। (Cambridge)

यह निष्कर्ष अवध किसान आंदोलन को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

किसान कांग्रेस का अनुयायी भर नहीं था

वह गांधी का नाम इस्तेमाल कर सकता था।

कांग्रेस के झंडे के नीचे आ सकता था।

स्वराज का नारा लगा सकता था।

लेकिन वह इन प्रतीकों का अर्थ स्वयं निर्धारित कर रहा था।

यही किसान की राजनीतिक agency थी।

और यहीं से इतिहासलेखन में अवध आंदोलन को केवल “असहयोग आंदोलन का ग्रामीण अध्याय” मानने की धारणा कमजोर पड़ती है।

1920 के उत्तरार्ध में अवध के गांवों में एक असाधारण राजनीतिक प्रयोग चल रहा था।

क्रम को इस प्रकार समझा जा सकता है—

पुराना तालुकेदारी असंतोष

बाबा रामचंद्र और किसान सभाएँ

जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस से संपर्क

अक्टूबर 1920 — अवध किसान सभा

राष्ट्रीय असहयोग से किसान आंदोलन का जुड़ाव

गांधी और स्वराज की भाषा गांव तक पहुँची

किसान ने स्वराज का अपना अर्थ निकाला

बेदखली-मुक्ति + कम लगान + बेगार का अंत + पंचायत की शक्ति

‘गांधी राज’ की ग्रामीण कल्पना

कांग्रेस कार्यक्रम और स्थानीय किसान अपेक्षाओं के बीच अंतर।

यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है।

अवध में राष्ट्रीय आंदोलन ने किसान को केवल राजनीतिक भाषा नहीं दी।

किसान ने भी राष्ट्रीय राजनीति के शब्दों का पुनर्निर्माण किया।

“स्वराज” अब केवल ब्रिटिश शासन के अंत का विचार नहीं था।

उसके भीतर किसान ने अपनी इच्छाएँ भर दीं—

मेरा खेत सुरक्षित हो।

मेरी बेदखली न हो। मेरी मेहनत पर मनमाना लगान न लगे। मुझसे बेगार न ली जाए। तालुकेदार का अन्याय समाप्त हो।

और “गांधी” केवल राष्ट्रीय नेता नहीं रहे।

दूरस्थ गांवों में उनका नाम न्याय आने की आशा का प्रतीक बन गया। समकालीन CID विवरण तक गांधी के नाम की इस आश्चर्यजनक ग्रामीण “currency” को दर्ज करते हैं। (Cambridge)

लेकिन यहीं आंदोलन अपने सबसे खतरनाक मोड़ पर पहुँच गया।

जब हजारों किसानों को विश्वास हो जाए कि परिवर्तन का समय आ गया है, तब उनकी कार्रवाई को सीमित रखना कठिन होता है।

कांग्रेस कह रही थी—

अहिंसा और अनुशासन।

किसान के भीतर वर्षों का संचित क्रोध कह रहा था—

अब अन्याय का प्रत्यक्ष प्रतिरोध।

1921 के आरंभ में यह अंतर्विरोध विस्फोट करने वाला था।

जनवरी 1921 अवध किसान आंदोलन का निर्णायक मोड़ था। पिछले महीनों तक आंदोलन का मुख्य रूप सभाएँ, किसान पंचायतें, बेदखली-विरोध, नाई–धोबी बंद, अवैध उपकरों का प्रतिरोध और किसान नेताओं की गिरफ्तारी के विरुद्ध प्रदर्शन था। लेकिन जनवरी में कई स्थानों पर यह प्रतिरोध विशाल ग्रामीण जमावड़ों, बाजार-लूट, तालुकेदारों की संपत्ति पर हमलों और पुलिस से सीधे टकराव में बदल गया।

इतिहासकार ज्ञानेंद्र पांडे ने इस क्षण को अवध किसान के “राष्ट्रीय मंच पर फूट पड़ने” के रूप में देखा है। 6 जनवरी को फुरसतगंज और 7 जनवरी को मुंशीगंज में विशाल किसान जमावड़ों पर गोली चली; लगभग उसी समय रायबरेली, फैजाबाद और सुल्तानपुर में बाजारों, तालुकेदारों और पुलिस के विरुद्ध हिंसक कार्रवाइयाँ हुईं। मार्च 1921 में प्रांत के गवर्नर हार्कोर्ट बटलर ने भी दक्षिणी अवध के तीन जिलों में “कुछ क्रांति जैसा आरंभ” देखने की बात कही थी। (Taylor & Francis)

खंड 8.36

रायबरेली, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर और फैजाबाद — जनवरी 1921 में आंदोलन का चरित्र क्यों बदल गया?

जनवरी 1921 की घटनाओं को अचानक पैदा हुई “भीड़ हिंसा” कह देना गलत होगा। इनके पीछे पिछले कई महीनों का किसान संगठन और बढ़ती अपेक्षाएँ मौजूद थीं।

1920 के अंत तक किसान को तीन अनुभव हो चुके थे—

पहला, बड़ी संख्या में इकट्ठा होकर वह प्रशासन पर दबाव डाल सकता है।

दूसरा, राष्ट्रीय आंदोलन और गांधी का नाम उसके संघर्ष को वैधता देता है।

तीसरा, किसान नेता की गिरफ्तारी को सामूहिक कार्रवाई से चुनौती दी जा सकती है।

यहीं से जनवरी का विस्फोट समझ में आता है।

प्रतापगढ़ का पूर्व अनुभव

प्रतापगढ़ में किसान नेताओं की गिरफ्तारी के बाद किसानों ने अदालत और जेल के आसपास बड़ी शांतिपूर्ण भीड़ जुटाकर उनकी रिहाई की मांग की थी। जवाहरलाल नेहरू ने बाद में लिखा कि उस सफलता ने किसानों में यह विश्वास बढ़ाया कि संख्या के बल पर वे प्रशासन को झुका सकते हैं।

यही तरीका जब रायबरेली में अपनाया गया, सरकार इस बार पीछे हटने को तैयार नहीं थी।

अतिरिक्त पुलिस और सशस्त्र बल तैनात किए गए।

2 जनवरी के आसपास से रायबरेली में तनाव

एक विस्तृत कृषि-विधान अध्ययन के अनुसार रायबरेली में जनवरी की शुरुआत में तालुकेदार की फसल नष्ट किए जाने और ग्रामीण समूहों की गतिविधियों के बाद स्थिति तेजी से बिगड़ी। 5 जनवरी के बाद कई क्षेत्रों में बड़ी टोलियाँ घूमने लगीं और प्रशासन ने दक्षिणी रायबरेली को लगभग अराजक स्थिति में बताया। (Amazon Web Services, Inc.)

लेकिन सरकारी शब्द “anarchy” को सावधानी से पढ़ना चाहिए।

क्योंकि किसान कार्रवाइयाँ हर जगह अंधाधुंध नहीं थीं।

ज्ञानेंद्र पांडे ने दिखाया है कि लक्ष्य अक्सर सामाजिक रूप से पहचाने हुए थे—

तालुकेदार,

उनके अमले,

अनाज भंडार,

मुनाफाखोर व्यापारी,

पटवारी,

धनी कृषक

और आंदोलन का विरोध करने वाले प्रभावशाली लोग। (University of Warwick)

आंदोलन का सामाजिक आधार बदल रहा था

किसान सभा के प्रारंभिक आंदोलन में मध्य और छोटे कृषक महत्वपूर्ण थे।

जनवरी 1921 तक—

पासी,

चमार,

अहीर,

भर,

लुनिया

और भूमिहीन कृषि मजदूर

जैसे अधिक गरीब सामाजिक समूह भी बड़ी संख्या में सक्रिय होने लगे।

फुरसतगंज और मुंशीगंज की भीड़ों की बहुजातीय संरचना पर औपनिवेशिक अधिकारियों ने विशेष ध्यान दिया था। ज्ञानेंद्र पांडे के अनुसार फैजाबाद में अधिकारियों ने दर्ज किया कि उच्च जातियों की तुलना में निम्न कृषक एवं श्रमिक जातियों पर आंदोलन का प्रभाव अधिक गहरा था। (Scribd)

यह आंदोलन के चरित्र में बड़ा बदलाव था।

ग्रामीण समाज के सबसे गरीब हिस्से भी स्थानीय संपत्ति और शक्ति-संबंधों पर हमला करने लगे थे।

फैजाबाद में विस्तार

फैजाबाद के अकबरपुर और टांडा क्षेत्रों में भी जनवरी के मध्य तक आंदोलन उग्र हुआ।

ज्ञानेंद्र पांडे के अध्ययन में 12 जनवरी 1921 की एक सभा के बाद डंकारा के जमींदारों पर हमले और लूट का उल्लेख है। अगले दो दिनों में 500–1000 पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के समूह अलग-अलग स्थानों पर घूमे और पुराने हिसाब चुकाने लगे। (dokumen.pub)

यह वर्णन महत्वपूर्ण है।

क्योंकि यह दिखाता है कि हिंसा केवल पुरुष किसान-सैनिकों की कार्रवाई नहीं थी।

परिवार और गरीब ग्रामीण समूह भी इसमें शामिल थे।

सुल्तानपुर और प्रतापगढ़

प्रतापगढ़ में तालुकेदार के जिलेदार पर हमला हुआ।

सुल्तानपुर में भी landlord authority और उनके प्रत्यक्ष नियंत्रण के विरुद्ध प्रतिरोध फैला। फैजाबाद डिवीजन में अधिकारियों ने प्रतापगढ़, सुल्तानपुर और फैजाबाद के कुछ हिस्सों में किसानों द्वारा जमींदार की निजी खेती—sir—को जोतने से इनकार की सूचना दी। (dokumen.pub)

इसका अर्थ था—

वह landlord की आर्थिक शक्ति के लिए अपना श्रम देना भी अस्वीकार कर रहा था।

खंड 8.37

6 जनवरी 1921 — फुरसतगंज : मूल्य-विरोध, बाजार और पुलिस गोलीबारी

फुरसतगंज की घटना को अक्सर मुंशीगंज की बड़ी त्रासदी की प्रस्तावना भर मान लिया जाता है। लेकिन अपने आप में यह अवध किसान आंदोलन के चरित्र को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

6 जनवरी 1921 को रायबरेली जिले के फुरसतगंज बाजार में बड़ी किसान भीड़ एकत्र हुई और पुलिस गोलीबारी हुई। इस तारीख की पुष्टि ज्ञानेंद्र पांडे सहित अनेक स्रोत करते हैं। (Taylor & Francis)

भीड़ क्यों जुटी?

एक नवीन शोध में फुरसतगंज की शुरुआत बहुत रोचक ढंग से दर्ज है।

करीब 300–400 किसान स्थानीय व्यापारियों की दुकानों के सामने इकट्ठे हुए। वे अनाज और कपड़े की ऊँची कीमतों तथा तालुकेदारों के अत्याचार का विरोध कर रहे थे। वे “रामचंद्र महाराज की जय”, “महात्मा गांधी की जय” तथा अली बंधुओं के समर्थन के नारे लगा रहे थे। भीड़ बाद में हजारों तक पहुँच गई। (dokumen.pub)

यह किसान आंदोलन की नई दिशा दिखाता है।

बाजार और महंगाई भी किसान प्रतिरोध के विषय बन रहे थे।

बनियों पर नाराजगी क्यों?

प्रथम विश्वयुद्ध और उसके बाद आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ी थीं।

गरीब किसान और भूमिहीन मजदूर इस महंगाई से विशेष रूप से प्रभावित थे।

यदि स्थानीय व्यापारी अनाज जमा करे या ऊँची कीमत ले, तो वह किसान की नजर में उसी शोषणकारी व्यवस्था का हिस्सा बन सकता था जिसमें—

तालुकेदार किराया लेता है,

साहूकार ब्याज लेता है,

और व्यापारी महंगा अनाज बेचता है।

ज्ञानेंद्र पांडे के अनुसार जनवरी की हिंसा में बनिए विशेष लक्ष्य बने क्योंकि गरीब ग्रामीणों का विश्वास था कि कठिन परिस्थितियों में व्यापारियों ने अत्यधिक लाभ कमाया। (University of Warwick)

विरोध लूट में कैसे बदला?

प्रारंभिक मांग उचित कीमत पर सामान बेचने की थी।

लेकिन बड़ी भीड़, बढ़ा हुआ तनाव और प्रशासनिक हस्तक्षेप के बीच स्थिति बिगड़ी।

दुकानों और बाजार की लूट हुई।

यही वह क्षण है जहाँ किसान आंदोलन की सामूहिक bargaining और crowd violence के बीच सीमा टूटती दिखती है।

गोलीबारी

फुरसतगंज में पुलिस ने भीड़ पर गोली चलाई।

मृतकों की अलग-अलग संख्या मिलती है। एक कृषि-विधान संबंधी शोध सरकारी विवरण के आधार पर पाँच लोगों की मृत्यु का उल्लेख करता है। दूसरी ओर जवाहरलाल नेहरू के संग्रह का संपादकीय नोट फुरसतगंज और मुंशीगंज दोनों घटनाओं को मिलाकर कुल 13 किसानों की मौत बताता है। इसलिए अलग-अलग स्थलों की निश्चित संख्या को बिना अतिरिक्त प्राथमिक अभिलेख के अंतिम मानना उचित नहीं होगा। (Amazon Web Services, Inc.)

इस शोध में सुरक्षित निष्कर्ष रहेगा—

6 जनवरी को फुरसतगंज में पुलिस गोलीबारी में किसान मारे गए; अलग-अलग स्रोतों में मृतक संख्या अलग है।

अगले दिन पर प्रभाव

फुरसतगंज की घटना ने रायबरेली का वातावरण और विस्फोटक कर दिया।

जवाहरलाल नेहरू को जब 7 जनवरी को रायबरेली बुलाया गया, उन्हें सबसे पहले बताया गया कि एक दिन पहले फुरसतगंज में गोली चली थी। अपने जुलाई 1921 के न्यायालयीन बयान में उन्होंने इसे स्पष्ट रूप से दर्ज किया। (The Nehru Archive)

और उसी समय हजारों किसान मुंशीगंज की ओर बढ़ रहे थे।

खंड 8.38

7 जनवरी 1921 — मुंशीगंज गोलीकांड : क्या हुआ और कितने किसान मारे गए?

मुंशीगंज अवध किसान आंदोलन की सबसे प्रसिद्ध और सबसे विवादित घटना है।

7 जनवरी 1921 को रायबरेली नगर के निकट सई नदी के पास हजारों किसानों और सरकारी बल के आमने-सामने आने के बाद गोलीबारी हुई।

इस घटना को बाद की स्थानीय स्मृति में कई बार “दूसरा जलियांवाला बाग” कहा गया।

लेकिन शोध की दृष्टि से तीन अलग प्रश्न हैं—

किसान क्यों जमा हुए?

गोली किसने शुरू की? और कितने लोग मारे गए?

तीनों पर सावधानी आवश्यक है।

किसान क्यों पहुँचे?

किसान नेताओं की गिरफ्तारी इस संकट का तत्काल कारण थी।

रायबरेली के आधिकारिक जिला विवरण में भी किसान नेताओं की गिरफ्तारी और उनके मारे जाने संबंधी अफवाह से किसानों के भड़कने का उल्लेख मिलता है। (Census India)

ज्ञानेंद्र पांडे के विश्लेषण में भी मुंशीगंज को उन घटनाओं में रखा गया है जो नेताओं की गिरफ्तारी अथवा गिरफ्तारी संबंधी अफवाह से भड़कीं। (NCERT Books)

किसानों की पूर्व रणनीति थी—

बड़ी संख्या में जेल या अदालत के पास पहुँचकर नेता की रिहाई की मांग करो।

प्रतापगढ़ में ऐसा दबाव पहले काम कर चुका था।

रायबरेली में प्रशासन ने इस बार शहर तक पहुँच रोक दी।

सई नदी का पुल

किसानों का मुख्य समूह रायबरेली की ओर बढ़ते हुए सई नदी के मुंशीगंज पुल के दूसरी ओर रोक दिया गया।

पुल और आसपास सशस्त्र पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी तैनात थे।

नेहरू के बाद के न्यायालयीन बयान के अनुसार जब वे मुंशीगंज की ओर बढ़े तो रास्ते में किसान समूह मिले; कुछ उन्हें पीछे-पीछे चलने लगे लेकिन sentries ने रोक दिया। पुल से लगभग 150 गज पहले उन्हें बताया गया कि दूसरी ओर गोली चल रही है। (The Nehru Archive)

यह बिंदु महत्वपूर्ण है—

नेहरू गोलीबारी शुरू होने के प्रत्यक्ष साक्षी नहीं थे।

उन्होंने स्वयं न्यायालय में कहा कि उस समय उन्हें नहीं पता था कि firing कैसे शुरू हुई और किसने शुरू की। (The Nehru Archive)

इसलिए किसी लोकप्रिय विवरण में यह लिखना कि “नेहरू ने अपनी आंखों से वीरपाल सिंह को पहली गोली चलाते देखा” गलत होगा।

वीरपाल सिंह का विवाद

घटना से जुड़ा सबसे विवादित नाम तालुकेदार सरदार वीरपाल सिंह का है।

नेहरू ने उसी रात स्थानीय लोगों से सुना कि वीरपाल सिंह ने firing शुरू की थी। अगले दिन घायल किसानों ने भी उन्हें ऐसा ही बताया। जुलाई 1921 में प्रताप मानहानि मुकदमे में गवाही देते समय नेहरू ने साफ कहा कि उनकी सामान्य धारणा थी कि वीरपाल सिंह ने firing में भाग लिया और शायद पहली गोली चलाई; लेकिन उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि यह प्रत्यक्ष दृश्य नहीं बल्कि उनके द्वारा प्राप्त साक्ष्यों पर आधारित धारणा थी। (The Nehru Archive)

रायबरेली जिला गजेटियर/जनगणना विवरण का आधुनिक संस्करण भी स्थानीय परंपरा के अनुसार वीरपाल सिंह के गोली चलाने और उसके बाद mounted force द्वारा firing का उल्लेख करता है। (Census India)

इसलिए शोध में सबसे सुरक्षित भाषा होगी—

समकालीन किसान गवाहों और राष्ट्रवादी विवरणों ने वीरपाल सिंह पर पहली गोली चलाने का आरोप लगाया; सरकारी पक्ष ने इसे आत्मरक्षा की परिस्थिति से जोड़ा। नेहरू स्वयं firing की शुरुआत के प्रत्यक्ष साक्षी नहीं थे।

क्या firing का औपचारिक आदेश हुआ था?

यह भी विवादित है।

22 जनवरी के अपने लेख में नेहरू ने सरकारी कथा पर व्यंग्य करते हुए लिखा कि पुलिस को मानो बिना स्पष्ट आदेश के ही गोली चलानी पड़ी। (The Nehru Archive)

जुलाई की गवाही में उन्होंने कहा कि उनके पास उस समय यह तय करने का प्रत्यक्ष आधार नहीं था कि firing उचित आदेश से हुई या नहीं। (The Nehru Archive)

इसलिए “फायर का आदेश फलाँ अधिकारी ने दिया” जैसा निश्चित कथन तभी किया जाना चाहिए जब स्वतंत्र आधिकारिक आदेश-पत्र उपलब्ध हो।

मृतक संख्या — सबसे बड़ा विवाद

यहीं सबसे अधिक सावधानी चाहिए।

नेहरू अभिलेख के संपादकीय नोट में फुरसतगंज और मुंशीगंज की गोलीबारी में 13 किसानों के मारे जाने का उल्लेख है। (The Nehru Archive)

लेकिन मुंशीगंज की स्थानीय और राष्ट्रवादी स्मृति में संख्या बहुत अधिक बताई गई। रायबरेली के आधिकारिक जिला विवरण में कहा गया है कि सरकारी रिकॉर्ड में संख्या कम दिखाई गई, जबकि गणेश शंकर विद्यार्थी के प्रताप सहित राष्ट्रवादी विवरणों ने मृतकों की संख्या सैकड़ों तक बताई। (Census India)

जवाहरलाल नेहरू ने 8 जनवरी को क्षेत्र का दौरा करते समय घायल किसानों को देखा और मुंशीगंज पुल के निकट एक ताँगे पर कपड़े से ढके कई शव देखे; उन्होंने लगभग दस से चौदह पैर बाहर निकले होने का वर्णन किया। यह प्रत्यक्ष अवलोकन कम-से-कम इतना प्रमाणित करता है कि हताहत सरकारी न्यूनतम कथाओं से कहीं अधिक गंभीर दिखाई देते थे, लेकिन इससे कुल मृतक संख्या निर्धारित नहीं की जा सकती। (The Nehru Archive)

इसलिए हमारी अंतिम शोध भाषा होगी—

मुंशीगंज में मृतकों की निश्चित संख्या स्थापित नहीं है। आधिकारिक/संपादकीय स्रोत अपेक्षाकृत कम संख्या देते हैं, जबकि समकालीन राष्ट्रवादी प्रेस और स्थानीय स्मृति संख्या बहुत अधिक बताते हैं। बिना पूर्ण casualty register के ‘सैकड़ों मारे गए’ को निर्विवाद तथ्य की तरह लिखना उचित नहीं होगा।

यही इतिहासलेखन की ईमानदार स्थिति है।

खंड 8.39

जवाहरलाल नेहरू और मुंशीगंज — वे वास्तव में कहाँ थे और उन्होंने क्या किया?

मुंशीगंज की घटना में नेहरू की भूमिका पर भी बाद की कथाओं में भ्रम है।

उनका अपना जुलाई 1921 का न्यायालयीन बयान हमारे पास उपलब्ध सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोतों में है।

उससे घटनाक्रम काफी स्पष्ट होता है। (The Nehru Archive)

6 जनवरी — रायबरेली बुलावा

नेहरू 5 जनवरी को नागपुर कांग्रेस से इलाहाबाद लौटे थे।

6 जनवरी को उन्हें पंडित मार्तंड वैद्य का तार मिला कि रायबरेली की स्थिति गंभीर है और उन्हें तुरंत आना चाहिए।

वे अगले दिन रेल से रायबरेली पहुँचे। (The Nehru Archive)

7 जनवरी — शहर में प्रवेश

रायबरेली स्टेशन पर कुछ दर्जन लोगों ने उनका स्वागत किया।

उन्हें डॉ. अवंतिका प्रसाद के घर ले जाया गया।

वहीं उन्होंने फुरसतगंज की पिछले दिन की firing और मुंशीगंज में किसानों की बड़ी भीड़ के बारे में सुना। (The Nehru Archive)

नेहरू ने स्वयं मुंशीगंज जाने का प्रस्ताव दिया।

रास्ते में उनका उद्देश्य क्या था?

उनकी बाद की गवाही के अनुसार उद्देश्य था—

सभा कर किसानों को शांत करना और घर लौटने को कहना।

उन्होंने चलते समय भी लोगों से शांत तथा अहिंसक रहने की अपील की। (The Nehru Archive)

यह तथ्य महत्वपूर्ण है क्योंकि आगे कांग्रेस की भूमिका पर बहस में अक्सर पूछा जाता है कि नेहरू किसानों को संघर्ष तेज कराने गए थे या शांत कराने।

उनका अपना समकालीन विवरण दूसरा विकल्प समर्थित करता है।

पुल के पास रोके गए

जब नेहरू मुंशीगंज पुल के पास पहुँचे, उन्हें दूसरी ओर firing होने की खबर मिली।

सशस्त्र sentries ने उन्हें पुल पार नहीं करने दिया।

उन्होंने नदी के रायबरेली वाले हिस्से पर एक खेत में किसानों को इकट्ठा किया।

उनके अपने अनुमान के अनुसार वहाँ लगभग 2,000 किसान थे। (The Nehru Archive)

ध्यान दें—

यह संख्या पुल के उस पार मुख्य किसान जमावड़े की कुल संख्या नहीं है।

यह नेहरू के सामने रायबरेली-side में इकट्ठे लोगों का उनका अनुमान है।

नेहरू ने क्या कहा?

उन्होंने लगभग बीस मिनट बोलकर किसानों से—

अहिंसा,

निर्भयता

और आत्मसंयम

की अपील की।

उन्होंने firing के मूल कारण पर दावा नहीं किया क्योंकि उस समय उन्हें तथ्य नहीं पता थे। (The Nehru Archive)

यह स्रोत-सावधानी विशेष रूप से मूल्यवान है।

उनका अपना मानसिक संकट

22 जनवरी को प्रकाशित The Rai Bareli Tragedy में नेहरू ने स्वीकार किया कि दूसरी ओर गोली चलने की खबर सुनकर एक क्षण के लिए उनका अपना क्रोध भड़क उठा था और अहिंसा लगभग भूल गए थे; गांधी की याद और अपने आसपास शांत बैठे किसानों को देखकर उन्होंने स्वयं को संभाला। फिर उन्होंने किसानों से अहिंसा की अपील की और भीड़ शांतिपूर्वक बिखर गई। (The Nehru Archive)

यह केवल आत्मकथात्मक प्रसंग नहीं है।

यह 1921 में नेहरू के राजनीतिक प्रशिक्षण का महत्वपूर्ण क्षण था।

Deputy Commissioner ने उन्हें जाने को कहा

नेहरू को डिप्टी कमिश्नर की ओर से रायबरेली छोड़ने का संदेश दिया गया।

उन्होंने उत्तर दिया कि यदि औपचारिक आदेश होगा तो मानेंगे, केवल अनुरोध पर नहीं जाएंगे। बाद में अधिकारी से मिले और किसानों को dispersal order बताने की अनुमति मांगी। (The Nehru Archive)

डिप्टी कमिश्नर ने बाद में माना कि नेहरू की छोटी अपील का किसानों पर अच्छा प्रभाव पड़ा।

क्या नेहरू गिरफ्तार हुए थे?

नहीं।

उनकी अपनी गवाही के अनुसार उन्हें डिप्टी कमिश्नर के घर लगभग दो घंटे रोका/ठहराया गया, लेकिन पूछने पर अधिकारी ने कहा कि वे गिरफ्तारी में नहीं हैं। (The Nehru Archive)

इसलिए “मुंशीगंज गोलीकांड के दौरान नेहरू गिरफ्तार कर लिए गए” कहना सटीक नहीं होगा।

उन्हें रोका गया और जाने के लिए कहा गया, लेकिन औपचारिक गिरफ्तारी नहीं हुई।

8–9 जनवरी की जांच

अगले दिन नेहरू गौरीशंकर के साथ मुंशीगंज और आसपास के गांवों में गए।

उन्होंने घायल किसानों से बात की।

8 जनवरी को उन्होंने पुल के पास ढके हुए शव देखे।

9 जनवरी को मोतीलाल नेहरू के साथ अस्पताल में घायलों से मिले। कई घायलों ने वीरपाल सिंह पर firing शुरू करने का आरोप लगाया। (The Nehru Archive)

14 जनवरी को मदन मोहन मालवीय के साथ वे फिर घटनास्थल गए।

इसलिए मुंशीगंज घटना केवल नेहरू की कुछ घंटे की उपस्थिति नहीं थी।

उन्होंने बाद के दिनों में व्यवस्थित रूप से साक्ष्य जुटाने, घायल किसानों से मिलने और घटना को राष्ट्रीय प्रेस तक पहुँचाने की भूमिका निभाई।

खंड 8.40

बाजारों की लूट, अनाज पर कब्जा और तालुकेदार-विरोधी हिंसा — आंदोलन नियंत्रण से बाहर गया या नया सामाजिक संघर्ष बना?

जनवरी 1921 में अवध आंदोलन का सबसे कठिन इतिहासलेखन प्रश्न यह है—

क्या किसान आंदोलन “हिंसक होकर बिगड़ गया”, या हिंसा उसकी सामाजिक दिशा को अधिक स्पष्ट कर रही थी?

दोनों दृष्टियों में कुछ सत्य है।

राष्ट्रवादी मुख्यधारा की समस्या

कांग्रेस नेतृत्व ने आंदोलन को अहिंसक और नियंत्रित रखना चाहा।

जब—

बाजार लूटे गए,

अनाज गोदाम तोड़े गए,

जमींदार की फसल नष्ट हुई,

अमले पर हमले हुए,

तो राष्ट्रीय नेताओं के लिए इसे स्वीकार करना कठिन था।

मानक राष्ट्रवादी इतिहास भी जनवरी 1921 में गतिविधियों के चरित्र में स्पष्ट बदलाव दर्ज करता है—रायबरेली, फैजाबाद और सुल्तानपुर में बाजार, घर और अनाज-भंडार लूटे गए और पुलिस से संघर्ष हुए। (NCERT Books)

क्या हिंसा अंधाधुंध थी?

ज्ञानेंद्र पांडे इसी जगह एक महत्वपूर्ण संशोधन प्रस्तुत करते हैं।

औपनिवेशिक अधिकारी कई बार आंदोलन को “anarchy” और indiscriminate looting के रूप में वर्णित कर रहे थे।

पांडे के अनुसार उपलब्ध साक्ष्य बताते हैं कि लक्ष्य अक्सर वर्गीय और सामाजिक रूप से पहचाने गए थे। (University of Warwick)

मुख्य लक्ष्य बन सकते थे—

तालुकेदार और उनके अनाज भंडार — landlord power का प्रतीक।

बनिए/व्यापारी — महंगाई और profiteering की शिकायत।

पटवारी — किसान की नजर में landlord और सरकार दोनों का स्थानीय प्रतिनिधि।

धनी कृषक और ऊंची जातियों के लोग — जहाँ वे किसान सभा का विरोध कर रहे हों।

यानी हिंसा कई जगह “किसके पास धन और स्थानीय शक्ति है?” इस प्रश्न के अनुसार संचालित हो रही थी।

वर्गीय आधार और अधिक स्पष्ट हुआ

फैजाबाद में हिंसा के उग्र चरण में छोटे tenants और भूमिहीन श्रमिक आगे आए।

ज्ञानेंद्र पांडे के अनुसार अहिर, भर, लुनिया, पासी और चमार जैसे समूह बड़ी संख्या में शामिल थे; यही वे समुदाय थे जो छोटे किरायेदार और कृषि श्रमिक आधार का बड़ा हिस्सा बनाते थे। (Scribd)

इससे आंदोलन की सामाजिक दिशा बदल गई।

मध्य किसान की मांग थी—

मेरी tenancy सुरक्षित करो।

गरीब श्रमिक की शिकायत कहीं व्यापक हो सकती थी—

गांव की पूरी संपत्ति-सत्ता मेरे विरुद्ध है।

यही अंतर बाजार और धनी ग्रामीणों पर हमलों को समझने में सहायक है।

अनाज पर कब्जे का अर्थ

अनाज भंडार की लूट को केवल सामान्य चोरी के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं है।

महंगाई और खाद्य असुरक्षा की स्थिति में stored grain राजनीतिक प्रतीक था।

यदि किसान भूखा है और तालुकेदार अथवा व्यापारी के पास अनाज भरा है तो crowd इसे “न्यायपूर्ण पुनर्वितरण” की अपनी नैतिक भाषा में देख सकता है।

यह कानूनी रूप से लूट थी।

लेकिन सामाजिक इतिहास में इसे किसान की moral economy के संदर्भ में भी पढ़ना पड़ता है।

हिंसा ने किसे डरा दिया?

तालुकेदारों को।

ज्ञानेंद्र पांडे के अनुसार कुछ सप्ताह तक कई landlords अपनी estates पर निकलने से डरते थे। गवर्नर बटलर का “something like revolution” वाला कथन इस भय की तीव्रता दिखाता है। (Taylor & Francis)

लेकिन कांग्रेस भी चिंतित हुई।

क्योंकि यदि आंदोलन खुला ग्रामीण class revolt बन जाता तो—

गांधीवादी अहिंसा टूटती,

ब्रिटिश दमन बढ़ता,

landlord समर्थक कांग्रेस से दूर होते

और राष्ट्रीय असहयोग की केंद्रीय रणनीति कमजोर होती।

क्या बाबा रामचंद्र ने हिंसा का आदेश दिया था?

उपलब्ध मुख्यधारा और आधुनिक शोध इस प्रकार की सामान्य किसान हिंसा को किसी एक केंद्रीय आदेश से नहीं जोड़ता।

कई जनवरी की कार्रवाइयों में नेतृत्व स्थानीय साधुओं, छोटे ग्रामीण नेताओं, बेदखल पुराने भू-स्वामियों और spontaneous crowd figures ने किया; मान्यता प्राप्त किसान सभा नेताओं की प्रत्यक्ष भूमिका हर घटना में नहीं थी। (NCERT Books)

यह महत्वपूर्ण है।

आंदोलन इतना बड़ा हो चुका था कि बाबा रामचंद्र, नेहरू या अवध किसान सभा हर कार्रवाई नियंत्रित नहीं कर सकते थे।

यही उसकी शक्ति भी थी और कमजोरी भी।

सरकार की प्रतिक्रिया

सरकार ने हिंसक कार्रवाइयों को तेजी से दबाया।

भीड़ पर गोली चली।

नेता गिरफ्तार हुए।

मुकदमे चले।

मानक इतिहास के अनुसार जनवरी के अंत तक हिंसक उभार काफी हद तक दबा दिया गया; फरवरी–मार्च में कुछ घटनाएँ जारी रहीं और मार्च में प्रभावित जिलों पर राजद्रोहात्मक सभा अधिनियम लागू करके राजनीतिक गतिविधियों पर कठोर नियंत्रण स्थापित किया गया। (NCERT Books)

यहीं अवध किसान आंदोलन का एक चरण समाप्त होने लगता है।

जनवरी 1921 अवध किसान आंदोलन का वह क्षण था जब पिछले चार वर्षों की कृषि शिकायत और पिछले एक वर्ष की राजनीतिक लामबंदी एक विस्फोटक रूप में सामने आई।

क्रम लगभग इस प्रकार था—

लगान, बेदखली, नजराना और बेगार

बाबा रामचंद्र और किसान सभाएँ

गांधी, नेहरू और स्वराज की ग्रामीण भाषा

किसान पंचायतों का विस्तार

नेताओं की गिरफ्तारी

रिहाई के लिए विशाल किसान जमावड़े

6 जनवरी — फुरसतगंज गोलीबारी

7 जनवरी — मुंशीगंज गोलीकांड

रायबरेली, फैजाबाद और सुल्तानपुर में बाजार व landlord property पर हमले

सरकारी दमन।

इस चरण के बारे में तीन निष्कर्ष विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।

पहला — मुंशीगंज का तथ्यात्मक इतिहास लोकप्रिय स्मृति से अधिक जटिल है

7 जनवरी को गोली चली और किसान मारे गए—यह निर्विवाद है।

लेकिन कुल मृतक संख्या विवादित है।

वीरपाल सिंह पर पहली गोली चलाने का आरोप व्यापक था, पर नेहरू स्वयं firing की शुरुआत के प्रत्यक्ष साक्षी नहीं थे। उनका न्यायालयीन बयान इस अंतर को स्पष्ट करता है। (The Nehru Archive)

दूसरा — नेहरू की भूमिका हिंसा भड़काने की नहीं, भीड़ शांत करने की थी

वे firing शुरू होने के बाद पुल के रायबरेली पक्ष पर पहुँचे। उन्होंने लगभग 2,000 किसानों को अहिंसा का संदेश दिया और dispersal में मदद की। बाद में घायल किसानों और घटनास्थल की जांच की तथा राष्ट्रीय प्रेस में सरकारी कार्रवाई की तीखी आलोचना की। (The Nehru Archive)

तीसरा — किसान हिंसा पूरी तरह अंधाधुंध नहीं थी

बाजार, अनाज, तालुकेदार, पटवारी और संपन्न ग्रामीण तबके अक्सर सामाजिक रूप से पहचाने हुए लक्ष्य थे। आधुनिक इतिहासलेखन इसी कारण जनवरी 1921 को “अनुशासनहीन भीड़” भर नहीं, बल्कि ग्रामीण शक्ति-संबंधों पर अधिक व्यापक हमले के रूप में पढ़ता है। (University of Warwick)

यही कारण है कि जनवरी 1921 कांग्रेस और अवध किसान आंदोलन के संबंध में निर्णायक दरार लाता है।

राष्ट्रीय नेतृत्व अब किसानों के वैध दुःख का समर्थन करना चाहता था—

लेकिन किसान विद्रोह का नहीं।

सरकार किसान असंतोष की कुछ वास्तविक जड़ों को स्वीकार करने लगी—

लेकिन राजनीतिक किसान संगठन को नहीं।

और तालुकेदार अब समझ चुके थे कि उनकी ग्रामीण सत्ता पहली बार व्यापक चुनौती के सामने है।

जनवरी 1921 की फुरसतगंज–मुंशीगंज घटनाओं और रायबरेली, फैजाबाद, सुल्तानपुर तथा प्रतापगढ़ में किसान उग्रता के बाद औपनिवेशिक सरकार ने आंदोलन को केवल कृषि शिकायत के रूप में नहीं देखा। अब उसका लक्ष्य था—किसान संगठन की रीढ़ तोड़ना, नेताओं को अलग करना, सभाओं को रोकना, गांवों में भय पैदा करना और तालुकेदारों के साथ मिलकर ग्रामीण नियंत्रण पुनः स्थापित करना।

इसी समय कांग्रेस नेतृत्व भी अधिक सतर्क हो गया। उसे किसानों की शिकायतों से सहानुभूति थी, लेकिन बाजार-लूट, संपत्ति पर हमले, no-rent की स्वतंत्र घोषणाएँ और हिंसक प्रतिरोध उसके घोषित अहिंसक कार्यक्रम से बाहर थे। परिणामतः 1921 के मध्य तक अवध किसान आंदोलन के उस पहले उग्र चरण की गति कमजोर पड़ गई। IGNOU के अध्ययन में भी सरकारी दमन, कांग्रेस द्वारा आंदोलन को नियंत्रित करने के प्रयास और Oudh Rent (Amendment) Act द्वारा सीमित राहत—इन तीनों को आंदोलन के क्षय के प्रमुख कारणों में रखा गया है। (eGyankosh)

खंड 8.41

बाबा रामचंद्र की गिरफ्तारी — नेतृत्व पर सीधा प्रहार

बाबा रामचंद्र की गिरफ्तारी अवध किसान आंदोलन में एक निर्णायक घटना थी। लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण कालक्रमीय सावधानी जरूरी है—वे केवल एक बार गिरफ्तार नहीं हुए थे।

1920 में भी उनकी गिरफ्तारी ने किसान लामबंदी को तीखा किया था। 1921 की शुरुआत में, जनवरी के हिंसक उभार के बाद, सरकार ने प्रमुख किसान नेताओं के विरुद्ध अधिक व्यवस्थित कार्रवाई की।

जवाहरलाल नेहरू ने अगस्त 1921 में लिखा कि फरवरी के आरंभ में रामचंद्र, केदारनाथ और देवनारायण गिरफ्तार किए गए और इसके बाद सरकार ने किसान आंदोलन को कुचलने के लिए संयुक्त कार्रवाई तेज कर दी। (The Nehru Archive)

गिरफ्तारी का उद्देश्य क्या था?

सरकार के सामने समस्या केवल एक व्यक्ति नहीं था।

बाबा रामचंद्र के पास तीन प्रकार की शक्ति थी—

ग्रामीण प्रतीकात्मक शक्ति: किसान उन्हें अपना नेता मानते थे।

संगठनात्मक शक्ति: गांव-पंचायतों और स्थानीय कार्यकर्ताओं का नेटवर्क।

राजनीतिक सेतु: किसान शिकायतों को कांग्रेस और राष्ट्रीय प्रेस तक पहुँचाने की क्षमता।

इसलिए उनकी गिरफ्तारी का अर्थ था—

नेता को भीड़ से अलग करना।

क्या गिरफ्तारी से तुरंत विद्रोह हुआ?

दिलचस्प बात यह है कि फरवरी 1921 की गिरफ्तारी के बाद वैसी बड़ी तात्कालिक हिंसक प्रतिक्रिया नहीं हुई जैसी सरकार आशंकित कर सकती थी।

नेहरू ने लिखा कि गिरफ्तारी के समय “कोई disturbance नहीं हुआ” और इससे सरकार को आगे व्यापक दमन करने का साहस मिला। (The Nehru Archive)

यह तथ्य महत्वपूर्ण है।

जनवरी की हिंसा के बाद किसान समाज पहले ही पुलिस कार्रवाई और गोलीबारी से भयभीत था।

संगठन की केंद्रीय कमान कमजोर हो रही थी।

और कांग्रेस भी हिंसक प्रतिक्रिया रोकने में सक्रिय थी।

देवनारायण का मामला

नेहरू आर्काइव की टिप्पणी के अनुसार देवनारायण अवध किसान कांग्रेस के महासचिव थे और 1921 में उन्हें दो वर्ष के कठोर कारावास तथा 200 रुपये जुर्माने की सजा मिली। (The Nehru Archive)

यह बताता है कि सरकार ने केवल प्रसिद्ध बाबा पर निर्भर नहीं किया।

मध्यस्तरीय संगठनकर्ताओं को भी निशाना बनाया गया।

यही किसी जनआंदोलन को कमजोर करने की अधिक प्रभावी रणनीति होती है—

नेता गिरफ्तार करो,

फिर उसके नीचे के नेटवर्क को भी तोड़ो।

आंदोलन पर असर

रामचंद्र की गिरफ्तारी के बाद किसान संगठन तीन कठिनाइयों से जूझने लगा—

पहली—एक समान संदेश का अभाव।

दूसरी—स्थानीय नेतृत्व की असमान गुणवत्ता।

तीसरी—कांग्रेस नेतृत्व पर अधिक निर्भरता।

यहीं से आंदोलन की स्वायत्त ग्रामीण दिशा कमजोर पड़ने लगी।

खंड 8.42

पुलिस दमन, मुकदमे, धारा 144 और राजद्रोहात्मक सभा अधिनियम

सरकारी प्रतिक्रिया केवल गिरफ्तारियों तक सीमित नहीं रही।

1921 में अवध के किसान क्षेत्रों में कानूनी, पुलिस और सैन्य दबाव का संयुक्त प्रयोग हुआ।

धारा 144

नेहरू के अगस्त 1921 के विवरण के अनुसार कई जिलों में पहले Section 144 के तहत सभाओं पर रोक लगाई गई।

उन्होंने लिखा कि किसानों ने इन प्रतिबंधों का पालन किया और सभाएँ बंद कर दीं, फिर भी बाद में अधिक कठोर राजद्रोहात्मक सभा अधिनियम लागू कर दिया गया। (The Nehru Archive)

यह एक महत्वपूर्ण बिंदु है।

सरकार का उद्देश्य केवल तत्काल हिंसा रोकना नहीं था।

वह राजनीतिक संगठन की क्षमता को भी सीमित करना चाहती थी।

किन जिलों में?

नेहरू ने विशेष रूप से दर्ज किया कि—

फैजाबाद, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर और रायबरेली

में राजद्रोहात्मक सभा अधिनियम लागू था। (The Nehru Archive)

अप्रैल 1921 में भी उन्होंने लिखा कि इन चार जिलों में यह कानून लागू है और पंचायत सदस्य होना तक अपराध जैसा बनाया जा रहा है। (The Nehru Archive)

राजद्रोहात्मक सभा अधिनियम का प्रभाव

नेहरू आर्काइव की टिप्पणी के अनुसार इस कानून के अंतर्गत सार्वजनिक सभाएँ प्रतिबंधित की जा सकती थीं और सभा आयोजित करने या उसमें भाग लेने वाले व्यक्ति को warrant के बिना गिरफ्तार किया जा सकता था। (The Nehru Archive)

किसान आंदोलन के लिए यह अत्यंत गंभीर था।

क्योंकि उसकी शक्ति ही थी—

सभा,

पंचायत,

गांव संपर्क

और हजारों की लामबंदी।

सभा पर रोक का अर्थ संगठन के रक्त-संचार को रोकना था।

पुलिस और CID निगरानी

नेहरू का विवरण बताता है कि कार्यकर्ताओं के पीछे CID और वर्दीधारी पुलिस लगाई जाती थी।

गांव वालों को कांग्रेस या किसान संगठन की मदद न करने की धमकियाँ दी जाती थीं।

यहाँ तक कि उन्होंने ऐसे मौखिक प्रचार का उल्लेख किया कि—

चरखा चलाना गैरकानूनी है,

“महात्मा गांधी की जय” बोलना अपराध है,

कांग्रेस फॉर्म पर हस्ताक्षर करना गैरकानूनी है। (The Nehru Archive)

इन दावों को नेहरू की सरकार-विरोधी समकालीन रिपोर्ट के रूप में पढ़ना चाहिए, न कि हर जिले की सिद्ध न्यायिक तथ्य-सूची की तरह। लेकिन वे उस दमनकारी वातावरण को स्पष्ट करते हैं जिसमें ग्रामीण राजनीतिक संगठन चल रहा था।

सैन्य शक्ति का प्रदर्शन

नेहरू ने यह भी आरोप लगाया कि cavalry, artillery और infantry की टुकड़ियाँ प्रमुख किसान जिलों से मार्च कराई गईं और गांवों से रसद उपलब्ध कराने का दबाव डाला गया। (The Nehru Archive)

ज्ञानेंद्र पांडे भी सरकार की रणनीति में—

प्रमुख किसान नेताओं की गिरफ्तारी,

Rent Act में सीमित संशोधन,

सरकारी प्रचार,

और massive display of armed force

को शामिल करते हैं। (University of Warwick)

जेलों की संख्या

13 जून 1921 के एक भाषण में नेहरू ने अवध जिलों में हजारों किसान कैद होने का दावा किया और फैजाबाद से ही लगभग 600 बंदियों की बात कही। (The Nehru Archive)

ये संख्याएँ राजनीतिक भाषण से आती हैं, इसलिए इन्हें exact prison census की तरह नहीं लेना चाहिए।

लेकिन इतना स्पष्ट है कि repression व्यापक था।

उद्देश्य

सरकार को केवल हिंसक crowd रोकना नहीं था।

उसे रोकना था—

किसान का राजनीतिक रूप से संगठित होना।

इसीलिए पंचायत, पर्चा वितरण, सार्वजनिक सभा और कांग्रेस सदस्यता तक निगरानी का विषय बन गए।

खंड 8.43

तालुकेदारों की प्रतिक्रिया — निजी प्रभुत्व से संगठित राजनीतिक प्रतिरोध तक

किसान आंदोलन से सबसे प्रत्यक्ष चुनौती तालुकेदारों और जमींदारों को मिली।

जनवरी 1921 की हिंसा के दौरान कुछ दिनों तक कई landlords अपनी estates पर खुलकर निकलने से भयभीत थे। ज्ञानेंद्र पांडे ने गवर्नर हार्कोर्ट बटलर का वह प्रसिद्ध निष्कर्ष उद्धृत किया है कि दक्षिणी अवध के तीन जिलों में “कुछ क्रांति जैसा आरंभ” दिखाई दिया। (Taylor & Francis)

लेकिन तालुकेदार केवल भयभीत पीड़ित नहीं रहे।

उन्होंने संगठित प्रतिक्रिया की।

किसान हितकरिणी सभा

1920 में ही एक Kisan Hitkarini Sabha बनाई गई थी।

जवाहरलाल नेहरू ने सितंबर 1920 में इसकी तीखी आलोचना की और इसे कुछ अधिकारियों, तालुकेदारों तथा उनके समर्थकों का ऐसा मंच बताया जिसका उद्देश्य किसानों को आंदोलन से दूर रखना और उन्हें सीमित सुधारों की प्रतीक्षा करने के लिए समझाना था। नेहरू आर्काइव की संपादकीय टिप्पणी भी इसे officials और taluqdars द्वारा प्रायोजित संस्था बताती है। (The Nehru Archive)

यह अत्यंत महत्वपूर्ण है।

किसान सभा के जवाब में landlords ने भी अपनी किसान-राजनीति बनाने की कोशिश की।

उनकी रणनीति क्या थी?

तालुकेदार पक्ष की राजनीतिक रणनीति broadly तीन स्तरों पर थी—

1. किसान आंदोलन को “agitators” का परिणाम बताना

यह तर्क था कि किसान मूलतः शांत हैं; बाहरी बाबा, कांग्रेस कार्यकर्ता और agitators उन्हें भड़का रहे हैं।

यदि यह कथा स्वीकार हो जाए तो भूमि-संबंधों की संरचनात्मक समस्या से ध्यान हट जाता है।

2. सीमित सुधार स्वीकार करना

कुछ सुधारों और राहत को स्वीकार करके किसान की तीव्रता कम की जा सकती थी।

इससे मूल तालुकेदारी व्यवस्था सुरक्षित रहती।

3. सरकार से सुरक्षा

1857 के बाद बना ब्रिटिश–तालुकेदार गठबंधन 1921 में फिर स्पष्ट हुआ।

नेहरू ने अगस्त 1921 में लिखा कि “zamindars और कुछ local Moderates” सरकार के साथ मिल गए हैं और किसान की स्थिति असहनीय बना दी गई है। (The Nehru Archive)

यह नेहरू की राजनीतिक भाषा है, लेकिन इससे राष्ट्रीय नेतृत्व की धारणा स्पष्ट होती है—

किसान अब केवल landlord से नहीं बल्कि landlord–administration गठबंधन से लड़ रहा था।

तालुकेदार वर्ग क्यों इतना चिंतित था?

क्योंकि आंदोलन उनकी केवल आय को चुनौती नहीं दे रहा था।

वह उनकी social authority पर हमला था।

नाई–धोबी बंद कह रहा था—

आपका सामाजिक दर्जा गांव की सामूहिक सहमति से ऊपर नहीं।

बेदखली-विरोध कह रहा था—

जमीन पर आपकी कानूनी शक्ति सीमित होनी चाहिए।

बेगार-विरोध कह रहा था—

किसान आपका सामाजिक आश्रित नहीं।

पंचायत कह रही थी—

विवाद के न्यायाधीश केवल आप नहीं हैं।

यानी किसान आंदोलन ग्रामीण सत्ता की पूरी भाषा बदल रहा था।

खंड 8.44

कांग्रेस हिंसा से क्यों पीछे हटी? — समर्थन और नियंत्रण की सीमा

कांग्रेस की अवध किसान आंदोलन से दूरी को समझने के लिए दो अतिवादी व्याख्याओं से बचना जरूरी है।

एक—

“कांग्रेस ने किसानों को इस्तेमाल करके छोड़ दिया।”

दूसरी—

“किसान हिंसक हो गए इसलिए कांग्रेस का हटना स्वाभाविक था।”

वास्तविकता अधिक जटिल थी।

कांग्रेस किसान शिकायतों को वैध मानती थी

जवाहरलाल नेहरू स्वयं 1928 में पीछे मुड़कर लिखते हैं कि अवध में बड़े तालुकेदार किसानों से भारी नजराना लेते थे, स्थायी काश्तकारी अधिकार न रखने वाले किसानों को जब चाहे बेदखल करते थे और विभिन्न प्रकार से उनका उत्पीड़न करते थे। उन्होंने 1920–21 की किसान agitation को इसी पृष्ठभूमि से जोड़ा। (The Nehru Archive)

अर्थात कांग्रेस नेतृत्व यह नहीं कह रहा था कि किसान समस्या काल्पनिक है।

समस्या हिंसक स्वतंत्रता थी

दिक्कत तब पैदा हुई जब किसान आंदोलन ने ऐसे रूप लेने शुरू किए जो केंद्रीय कांग्रेस नियंत्रण से बाहर थे—

no-rent,

landlord property पर हमला,

बाजार लूट,

फसल जलाना,

पुलिस से संघर्ष।

IGNOU के इतिहास में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि किसान कांग्रेस समर्थन की अपनी व्याख्या कर रहे थे और no-tax, no-rent, बहिष्कार तथा occasional violence कांग्रेस उच्च नेतृत्व को स्वीकार नहीं था। (eGyankosh)

गांधी की अहिंसा

गांधी के लिए हिंसा केवल tactical mistake नहीं थी।

वह आंदोलन की नैतिक वैधता को नष्ट कर सकती थी।

इसके अतिरिक्त चौरी-चौरा अभी भविष्य—फरवरी 1922—की घटना थी, लेकिन 1921 अवध ने पहले ही दिखा दिया था कि विशाल किसान भीड़ को नियंत्रित करना कितना कठिन है।

कांग्रेस को आशंका थी कि व्यापक agrarian violence से—

सरकार सैन्य repression बढ़ाएगी,

असहयोग का नैतिक आधार टूटेगा,

और राष्ट्रीय आंदोलन को “lawlessness” के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा।

वर्गीय गठबंधन की समस्या

कांग्रेस स्वयं केवल किसानों की पार्टी नहीं थी।

उसमें—

जमींदार,

वकील,

व्यापारी,

मध्यम वर्ग

और छोटे भू-स्वामी

भी थे।

यदि कांग्रेस पूर्ण no-rent और landlord property seizure स्वीकार करती तो उसका सामाजिक गठबंधन टूट सकता था।

इसलिए राष्ट्रीय नेतृत्व किसान शिकायत और सामाजिक क्रांति के बीच सीमा बनाना चाहता था।

किसान के लिए यह दूरी कैसी दिखी?

यहीं समस्या थी।

किसान को लग सकता था—

जब हमें संगठित करना था तब नेता आए।

यानी कांग्रेस की रणनीतिक सावधानी किसान की नजर में पीछे हटना प्रतीत हो सकती थी।

यही आगे स्थानीय नेताओं और कांग्रेस के बीच अविश्वास बढ़ाने वाला तत्व बना।

खंड 8.45

बाबा रामचंद्र, स्थानीय किसान नेतृत्व और कांग्रेस — संबंध क्यों बिगड़े?

अवध किसान आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक दरार किसी एक निजी झगड़े से उत्पन्न नहीं हुई।

उसकी जड़ें थीं—

सामाजिक पृष्ठभूमि, आंदोलन पर नियंत्रण और राजनीतिक लक्ष्य के अंतर में।

बाबा रामचंद्र की वैधता कहाँ से आती थी?

गांव से।

उनका प्रभाव—

जातीय नेटवर्क,

किसान पंचायत,

धार्मिक प्रतीक,

सीताराम की पुकार

और प्रत्यक्ष ग्रामीण जीवन

से बना था।

उनकी राजनीति का केंद्र किसान का तत्काल अनुभव था।

कांग्रेस की वैधता कहाँ से आती थी?

राष्ट्रीय संगठन से।

उसकी रणनीति पूरे भारत को ध्यान में रखकर बनती थी।

वह किसी एक जिले की किरायेदारी लड़ाई को ऐसा रूप नहीं देना चाहती थी जिससे पूरे राष्ट्रीय आंदोलन की दिशा बदल जाए।

यहीं टकराव था।

रामचंद्र और Congress “parting company”

नेहरू आर्काइव की जीवनी-सूचना बाबा रामचंद्र के बारे में साफ लिखती है कि उन्होंने प्रतापगढ़, सुल्तानपुर और जौनपुर में किसान आंदोलन संगठित किया, कांग्रेसियों—विशेषकर टंडन और जवाहरलाल—का समर्थन हासिल किया और बाद में “parted company with the Congress movement.” (The Nehru Archive)

यह छोटा-सा वाक्य बड़ी राजनीतिक प्रक्रिया का संकेत है।

दूरी के कारण

पहला — नेतृत्व पर नियंत्रण

किसान आंदोलन में कांग्रेस की भागीदारी बढ़ने पर स्थानीय नेतृत्व की स्वायत्तता कम हो सकती थी।

दूसरा — rent question

रामचंद्र और किसानों की प्राथमिकता landlord–tenant संबंध था।

कांग्रेस की केंद्रीय प्राथमिकता colonial state थी।

तीसरा — हिंसा

स्थानीय कार्रवाई को कांग्रेस द्वारा लगातार रोकने का प्रयास ग्रामीण कार्यकर्ताओं में असंतोष पैदा कर सकता था।

चौथा — सामाजिक भाषा

रामचंद्र की राजनीति ग्रामीण और धार्मिक-सांस्कृतिक भाषा में थी।

कांग्रेस नेतृत्व अधिक संस्थागत और राष्ट्रीय राजनीतिक भाषा में काम कर रहा था।

पाँचवाँ — repression के बाद रणनीति

जब सरकार ने बड़े पैमाने पर संगठन कुचलना शुरू किया तो कांग्रेस के सामने पूरे Non-Cooperation Movement को बचाने की जिम्मेदारी थी।

स्थानीय किसान नेतृत्व के लिए प्राथमिकता अपने किसान आधार को बचाना था।

दोनों की आवश्यकताएँ अलग हो गईं।

क्या कांग्रेस ने आंदोलन समाप्त कर दिया?

नहीं।

यही बहुत महत्वपूर्ण है।

यदि किसान आंदोलन केवल कांग्रेस द्वारा निर्मित होता तो कांग्रेस की दूरी के साथ समाप्त हो जाना चाहिए था।

ऐसा नहीं हुआ।

ज्ञानेंद्र पांडे बताते हैं कि नेताओं की गिरफ्तारी, armed repression और Rent Act संशोधन के बावजूद आंदोलन समाप्त नहीं हुआ; नवंबर 1921 के अंत में वह एका आंदोलन के रूप में फिर फूट पड़ा। (University of Warwick)

यह अवध किसान राजनीति की स्वतंत्र सामाजिक शक्ति का सबसे अच्छा प्रमाण है।

कांग्रेस पीछे हट सकती थी।

किसान प्रश्न नहीं।

1921 के मध्य तक अवध किसान आंदोलन का पहला बड़ा चरण दबा दिया गया था, लेकिन उसकी मूल समस्याएँ समाप्त नहीं हुई थीं।

सरकार की रणनीति बहुस्तरीय थी—

प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी

मध्यस्तरीय कार्यकर्ताओं पर मुकदमे

धारा 144

राजद्रोहात्मक सभा अधिनियम

CID और पुलिस निगरानी

सैन्य शक्ति का प्रदर्शन

तालुकेदारों के साथ प्रशासनिक गठबंधन

और साथ ही सीमित किरायेदारी सुधार।

फरवरी 1921 में बाबा रामचंद्र, केदारनाथ और देवनारायण की गिरफ्तारी के बाद सरकार ने किसान संगठन को व्यवस्थित रूप से कमजोर किया। नेहरू के अनुसार फैजाबाद, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर और रायबरेली में राजद्रोहात्मक सभा अधिनियम लागू किया गया और कार्यकर्ताओं के खिलाफ व्यापक पुलिस कार्रवाई हुई। (The Nehru Archive)

दूसरी ओर सरकार ने केवल दमन पर निर्भर नहीं किया। Oudh Rent (Amendment) Act के माध्यम से सीमित tenant relief भी दी गई। बाद में स्वयं नेहरू ने माना कि 1920–21 के आंदोलन के प्रभाव से नया कानून बना और कम-से-कम कागज पर बेदखली कुछ सीमित हुई। (The Nehru Archive)

यानी औपनिवेशिक नीति थी—

दमन + सीमित सुधार।

कांग्रेस की रणनीति अलग लेकिन समान रूप से जटिल थी—

किसान की वैध शिकायत का समर्थन + हिंसक agrarian revolt से दूरी।

यहीं बाबा रामचंद्र और राष्ट्रीय नेतृत्व का संबंध कमजोर पड़ा।

लेकिन सबसे बड़ा निष्कर्ष यह है—

सरकार और कांग्रेस दोनों किसान आंदोलन की दिशा नियंत्रित करना चाहते थे—अलग कारणों से। किसान समाज पूरी तरह किसी के नियंत्रण में नहीं रहा।

इसीलिए 1921 की गर्मियों में पहला उभार दब जाने के बाद भी समस्या समाप्त नहीं हुई।

वह अवध के दूसरे भूभाग में नई भाषा और नए नेतृत्व के साथ फिर सामने आई।

इस बार केंद्र बनने वाले थे—

हरदोई, सीतापुर, बहराइच और बाराबंकी के हिस्से।

नेतृत्व में उभरेंगे—

मदारी पासी और स्थानीय निम्न कृषक समूह।

और आंदोलन का नाम होगा—

एका।

1921 के मध्य तक अवध किसान सभा का पहला बड़ा उभार दमन, गिरफ्तारियों, सभा-प्रतिबंधों और सीमित किरायेदारी सुधारों के कारण कमजोर पड़ चुका था। लेकिन किसान असंतोष समाप्त नहीं हुआ। वह उत्तर और मध्य अवध के नए भूभागों—विशेषतः हरदोई, सीतापुर, बहराइच और बाराबंकी—में एक नए रूप में उभरा, जिसे इतिहास में एका आंदोलन कहा गया।

एका का अर्थ ही था—एकता।

लेकिन यह केवल अवध किसान सभा का दूसरा नाम नहीं था। इसका सामाजिक आधार कुछ अलग था, इसमें छोटे जमींदार भी शामिल हुए, इसकी शपथ-पद्धति अधिक अनुष्ठानिक थी, और मदारी पासी जैसे स्थानीय निम्नवर्गीय नेता के उभार के बाद इसकी दिशा कांग्रेस के नियंत्रण से काफी हद तक बाहर चली गई। मानक इतिहास भी स्पष्ट करता है कि इसकी प्रारंभिक प्रेरणा कांग्रेस और खिलाफत कार्यकर्ताओं से मिली, पर जल्दी ही यह अपने स्वतंत्र ग्रामीण नेतृत्व के अधीन हो गया। (NCERT Books)

खंड 8.46

1921 के उत्तरार्ध में आंदोलन का भूगोल क्यों बदला?

अवध किसान आंदोलन का पहला मुख्य केंद्र प्रतापगढ़, रायबरेली, सुल्तानपुर और फैजाबाद था। लेकिन 1921 के अंत तक किसान उभार का केंद्र उत्तर की ओर खिसकने लगा।

हरदोई

सीतापुर

बहराइच

बाराबंकी के हिस्से

यह परिवर्तन आकस्मिक नहीं था।

पहला कारण — पुराने केंद्रों में दमन

दक्षिणी अवध में सरकार ने—

नेताओं की गिरफ्तारी,

राजद्रोहात्मक सभा अधिनियम,

पुलिस निगरानी,

मुकदमे

और सैन्य शक्ति के प्रदर्शन

के माध्यम से संगठनात्मक क्षमता कमजोर कर दी थी।

इसलिए किसान राजनीति का नया उभार उन क्षेत्रों में अधिक आसानी से विकसित हुआ जहाँ दमन का स्वरूप अभी उतना केंद्रीकृत नहीं था।

दूसरा कारण — उत्तर अवध की अलग किरायेदारी समस्या

हरदोई, सीतापुर और बहराइच में किसान शिकायतों की संरचना कुछ अलग थी।

मानक इतिहास के अनुसार यहाँ मुख्य असंतोष था—

दर्ज किराये से लगभग 50 प्रतिशत तक अधिक वसूली,

ठेकेदारों/थीकेदारों की मनमानी,

और share-rent अर्थात उपज में हिस्सेदारी पर आधारित किराया व्यवस्था। (NCERT Books)

इसलिए किसान केवल वही पुरानी मांगें नहीं दोहरा रहे थे जो प्रतापगढ़ में उठी थीं।

उनके स्थानीय आर्थिक प्रश्न अलग तीखेपन के साथ सामने आए।

तीसरा कारण — छोटे जमींदार भी असंतुष्ट थे

एका आंदोलन की एक बड़ी विशेषता थी कि इसमें केवल tenants ही नहीं थे।

कई छोटे जमींदार भी जुड़े, क्योंकि वे स्वयं सरकार की ऊँची land revenue demand से असंतुष्ट थे। (NCERT Books)

यह अवध किसान सभा से बड़ा अंतर था।

यहाँ सामाजिक गठबंधन था—

किरायेदार किसान + छोटे जमींदार + स्थानीय निम्न जातीय कृषक नेतृत्व।

यानी ऊपर के विशाल तालुकेदार और औपनिवेशिक प्रशासन के खिलाफ नीचे के विभिन्न ग्रामीण हित अस्थायी रूप से एकजुट हो रहे थे।

चौथा कारण — असहयोग और खिलाफत का प्रभाव

एका आंदोलन की शुरुआती प्रेरणा कांग्रेस और खिलाफत कार्यकर्ताओं ने दी। (NCERT Books)

इसका मतलब है कि राष्ट्रीय आंदोलन का नेटवर्क अभी भी ग्रामीण राजनीति के लिए संसाधन था।

लेकिन आगे यही आंदोलन राष्ट्रीय नेतृत्व से अलग दिशा लेने वाला था।

खंड 8.47

एका आंदोलन का उद्भव — “एकता” की राजनीति और उसकी शपथ

एका आंदोलन का नाम ही उसकी केंद्रीय रणनीति बताता है—

किसान आपस में न टूटें।

जमींदार या ठेकेदार की सबसे बड़ी शक्ति यही थी कि वह किसानों को अलग-अलग दबा सकता था।

एका की शपथ इस कमजोरी को खत्म करने की कोशिश थी।

बैठकें कैसे होती थीं?

मानक विवरण के अनुसार एका बैठकों में एक विशेष धार्मिक अनुष्ठान होता था।

जमीन में एक छोटा गड्ढा खोदा जाता।

उसे गंगा का प्रतीक माना जाता।

उसमें पानी भरा जाता।

एक पुजारी की मौजूदगी में किसान शपथ लेते। (NCERT Books)

यह अनुष्ठान राजनीतिक संगठन को धार्मिक-सांस्कृतिक वैधता देता था।

किसान क्या शपथ लेते थे?

मुख्य प्रतिज्ञाएँ थीं—

केवल दर्ज किया हुआ किराया देंगे।

लेकिन उसे समय पर देंगे।

बेदखल किए जाने पर जमीन नहीं छोड़ेंगे।

बेगार नहीं करेंगे।

अपराधियों की सहायता नहीं करेंगे।

पंचायत के निर्णय मानेंगे। (NCERT Books)

यह सूची अत्यंत महत्वपूर्ण है।

यह दिखाती है कि एका का मूल कार्यक्रम प्रारंभ में पूर्ण rent refusal नहीं था।

किसान कह रहा था—

जो वैधानिक रूप से दर्ज है, वह देंगे; उससे अधिक नहीं।

यानी संघर्ष का केंद्र अवैध या अतिरिक्त वसूली था।

“समय पर किराया देंगे” क्यों महत्वपूर्ण था?

इससे आंदोलन अपने नैतिक पक्ष को मजबूत करता था।

किसान यह नहीं कह रहा था—

“हम landlord को कुछ नहीं देंगे।”

वह कह रहा था—

“जितना रिकॉर्ड में है, उतना देंगे।”

यह ब्रिटिश प्रशासन और जमींदार दोनों के उस प्रचार को कमजोर कर सकता था कि किसान सामान्य कानूनहीनता की ओर बढ़ रहे हैं।

बेदखली पर खेत न छोड़ना

यह शपथ का सबसे चुनौतीपूर्ण भाग था।

किसान कह रहा था—

कागज पर आप मुझे बेदखल कर सकते हैं,

लेकिन मैं खेत छोड़कर नहीं जाऊँगा।

यह landlord के कानूनी अधिकार और किसान के customary claim के बीच सीधा संघर्ष था।

पंचायत सर्वोच्च क्यों?

एका ने पंचायत को केवल सलाहकारी संस्था नहीं रखा।

किसानों ने पंचायत के निर्णय मानने की शपथ ली।

यानी गांव में एक वैकल्पिक राजनीतिक अनुशासन उभर रहा था।

यह पहले अवध किसान सभा में दिखाई दे चुका था; एका ने उसे और मजबूत किया।

खंड 8.48

मदारी पासी — एका का नया ग्रामीण नेतृत्व

एका आंदोलन का सबसे प्रसिद्ध नाम है—

मदारी पासी

उनका महत्व केवल इसलिए नहीं कि वे आंदोलन के नेता बने।

उनका सामाजिक स्थान भी महत्वपूर्ण था।

वे उस उच्च जातीय, शिक्षित, शहरी नेतृत्व से नहीं आते थे जो कांग्रेस या प्रारंभिक किसान सभा में प्रभावशाली था।

सरकारी डिजिटल इतिहास-संग्रह उन्हें हरदोई क्षेत्र से उभरे लोकप्रिय किसान नेता के रूप में दर्ज करता है। (Amrit Mahotsav)

पासी समुदाय और नेतृत्व का अर्थ

मदारी पासी का उभार किसान आंदोलन के सामाजिक आधार में बदलाव दिखाता है।

यह केवल नेतृत्व परिवर्तन नहीं था।

यह किसान राजनीति की भाषा भी बदल सकता था।

कांग्रेस से अलग शैली

शुरुआत में कांग्रेस और खिलाफत कार्यकर्ताओं ने आंदोलन को दिशा दी।

लेकिन जल्द ही मदारी पासी और अन्य स्थानीय निम्नवर्गीय नेताओं ने नेतृत्व अपने हाथ में ले लिया। मानक इतिहास कहता है कि ये नेता कांग्रेस द्वारा मांगे गए अहिंसक अनुशासन को स्वीकार करने के प्रति उतने इच्छुक नहीं थे। (NCERT Books)

यहीं से राष्ट्रीय नेतृत्व और एका के बीच दूरी बढ़ी।

मदारी पासी की संगठन शैली

भारत सरकार के डिजिटल इतिहास-संग्रह के अनुसार मदारी पासी—

कथाएँ सुनाते,

किसान सभाएँ करते,

पंचायतों को सक्रिय करते,

छोटे जमींदारों को भी साथ लाने की कोशिश करते,

और सामाजिक न्याय तथा भूमि अधिकार की अधिक उग्र भाषा अपनाते थे। (Amrit Mahotsav)

इस विवरण को सावधानी से पढ़ना चाहिए, विशेषतः जब उसमें उनके द्वारा हिंसा और भूमि-पुनर्वितरण की वकालत की बात आती है; प्रत्येक विशिष्ट कथन के लिए समकालीन प्राथमिक स्रोत की पुष्टि उपयोगी होगी।

लेकिन इतना स्पष्ट है कि उनका नेतृत्व कांग्रेस की वैधानिक-संयमित किसान राजनीति से अधिक militant था।

क्या मदारी पासी शुरू से ही एका के निर्माता थे?

इसे भी सरल नहीं करना चाहिए।

मानक इतिहास स्पष्ट रूप से कहता है कि आंदोलन को प्रारंभिक thrust कांग्रेस और खिलाफत नेताओं ने दिया; बाद में grassroots leadership मदारी पासी और अन्य स्थानीय नेताओं के हाथ में आई। (NCERT Books)

इसलिए सही क्रम है—

कांग्रेस–खिलाफत की शुरुआती प्रेरणा → किसान संगठन → मदारी पासी का स्वतंत्र स्थानीय नेतृत्व।

उनकी गिरफ्तारी पर स्रोत-विवाद

कुछ आधुनिक लोकप्रिय स्रोत मार्च 1922 में मदारी पासी की गिरफ्तारी का दावा करते हैं। दूसरी ओर IGNOU का एक इतिहास-पाठ कहता है कि कठोर repression के बावजूद मदारी पासी गिरफ्तार नहीं किए जा सके। (eGyankosh)

यानी यहाँ स्रोत-विरोध है।

इस शोध में सावधानीपूर्ण निष्कर्ष होगा—

मार्च 1922 तक सरकारी दमन ने एका आंदोलन को प्रभावी रूप से समाप्त कर दिया; मदारी पासी के अंतिम गिरफ्तारी-क्रम पर स्रोतों में मतभेद है, इसलिए बिना प्राथमिक पुलिस/न्यायिक अभिलेख के निश्चित दावा उचित नहीं होगा।

खंड 8.49

अवध किसान सभा और एका — समानताएँ, अंतर और वास्तविक निरंतरता

अवध किसान सभा और एका को अलग-अलग बंद डिब्बों में रखना भी गलत है, और दोनों को पूरी तरह एक ही आंदोलन कहना भी।

इनके बीच स्पष्ट निरंतरता और विच्छेद दोनों थे।

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आयाम

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अवध किसान सभा

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एका आंदोलन

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मुख्य काल

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1920–21

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1921 के अंत–1922

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मुख्य क्षेत्र

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प्रतापगढ़, रायबरेली, सुल्तानपुर, फैजाबाद

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हरदोई, सीतापुर, बहराइच, बाराबंकी

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प्रमुख नेता

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बाबा रामचंद्र, स्थानीय किसान नेता, नेहरू से संपर्क

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मदारी पासी एवं स्थानीय निम्नवर्गीय नेता

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शुरुआती राष्ट्रीय संबंध

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कांग्रेस से निकट

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कांग्रेस–खिलाफत से प्रारंभिक प्रेरणा

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प्रमुख शिकायत

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बेदखली, बेगार, अवैध उपकर, rent

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दर्ज से अधिक rent, ठेकेदार अत्याचार, share-rent

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सामाजिक आधार

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मुख्यतः tenants

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tenants + छोटे zamindars

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संगठन

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किसान सभा, पंचायत

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एका शपथ, पंचायत

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धार्मिक प्रतीक

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रामचरितमानस, सीताराम

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गंगा-जल प्रतीक, शपथ

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किराया नीति

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अलग-अलग क्षेत्रों में विविध

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केवल recorded rent, समय पर

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बेगार

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विरोध

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स्पष्ट अस्वीकृति

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अहिंसा

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कांग्रेस अनुशासन का दबाव

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बाद में अधिक militant

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कांग्रेस से संबंध

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सहयोग और तनाव

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प्रारंभिक सहयोग, बाद में दूरी

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अंत

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दमन + Rent Act + विखंडन

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कठोर repression से मार्च 1922 तक पतन

समानता 1 — किरायेदार सुरक्षा

दोनों आंदोलनों के केंद्र में किसान का जमीन पर बने रहना था।

बेदखली केवल आर्थिक समस्या नहीं बल्कि अस्तित्व का प्रश्न थी।

समानता 2 — बेगार का विरोध

अवध किसान सभा ने भी बेगार का विरोध किया।

एका शपथ में भी forced labour न करने की स्पष्ट प्रतिज्ञा थी। (Inflibnet Ebooks)

समानता 3 — पंचायत

दोनों में पंचायत वैकल्पिक राजनीतिक अनुशासन का साधन बनी।

समानता 4 — कांग्रेस से जटिल संबंध

दोनों राष्ट्रीय आंदोलन से ऊर्जा लेते हैं।

दोनों अंततः अपनी ग्रामीण मांगों के कारण कांग्रेस की सीमाओं से टकराते हैं।

सबसे बड़ा अंतर — सामाजिक आधार

अवध किसान सभा मुख्यतः tenants पर आधारित थी।

एका में छोटे जमींदार भी शामिल हुए। (NCERT Books)

यह महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे एका को साधारण tenant revolt मानना गलत होगा।

दूसरा बड़ा अंतर — नेतृत्व

बाबा रामचंद्र के पास एक धार्मिक-साधु और किसान संगठनकर्ता की पहचान थी, जबकि मदारी पासी सामाजिक रूप से अधिक नीचे के ग्रामीण समुदाय से उभरे militant नेता थे।

इससे आंदोलन की वर्गीय और जातीय भाषा अधिक तीखी हुई।

तीसरा अंतर — हिंसा की सीमा

अवध किसान सभा में भी जनवरी 1921 में हिंसा हुई थी।

इसलिए यह कहना गलत होगा कि “पहला आंदोलन पूर्ण अहिंसक और एका हिंसक था।”

सही अंतर यह है—

एका के स्वतंत्र स्थानीय नेतृत्व ने कांग्रेस के अहिंसक अनुशासन को अधिक खुलकर अस्वीकार किया और यही राष्ट्रीय नेतृत्व से उसकी दूरी का प्रमुख कारण बना। (eGyankosh)

खंड 8.50

कांग्रेस और एका — शुरुआती सहयोग से दूरी, दमन और अंत

एका की कहानी कांग्रेस और ग्रामीण किसान राजनीति के संबंध की सबसे स्पष्ट परीक्षा है।

शुरुआत कांग्रेस और खिलाफत नेताओं की सहायता से हुई।

लेकिन अंत तक कांग्रेस उससे काफी दूर हो चुकी थी।

कांग्रेस ने प्रारंभ में समर्थन क्यों दिया?

क्योंकि मांगें वैध और राष्ट्रीय असहयोग की भाषा से जुड़ सकने वाली थीं—

दर्ज से अधिक किराया नहीं,

बेगार नहीं,

अवैध landlord oppression का विरोध।

इन मांगों में तत्काल कोई ऐसा तत्व नहीं था जो गांधीवादी राजनीति के लिए अस्वीकार्य हो।

दूरी कब बढ़ी?

जब आंदोलन का स्थानीय नेतृत्व मदारी पासी जैसे लोगों के हाथ में गया और प्रतिरोध अधिक militant हुआ।

IGNOU के अध्ययन में स्पष्ट है कि हिंसक कार्रवाइयों के कारण कांग्रेस नेताओं ने आंदोलन से दूरी बनाई। (eGyankosh)

यही पहले अवध किसान आंदोलन में भी हुआ था।

कांग्रेस की मूल दुविधा फिर सामने आई

कांग्रेस किसान से कहती थी—

अन्याय के खिलाफ खड़े हो।

लेकिन साथ ही—

हिंसा मत करो।

किसान का अनुभव कहता था—

यदि landlord हमारी जमीन छीनता है, पुलिस उसकी मदद करती है और अदालत महंगी है, तो केवल निवेदन से क्या होगा?

यहीं राष्ट्रीय strategy और ग्रामीण lived reality का टकराव था।

फरवरी 1922 — चौरी-चौरा का व्यापक प्रभाव

एका आंदोलन के अंतिम चरण के साथ ही फरवरी 1922 में चौरी-चौरा की घटना के बाद गांधी ने अखिल भारतीय असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया।

यह एका का प्रत्यक्ष कारण नहीं था, क्योंकि उसका अपना दमन पहले से चल रहा था।

लेकिन राजनीतिक वातावरण बदल गया।

सरकारी repression

मानक इतिहास के अनुसार मार्च 1922 तक कठोर सरकारी दमन एका आंदोलन को समाप्त करने में सफल हो गया। (NCERT Books)

कार्रवाइयों में शामिल थे—

नेताओं और कार्यकर्ताओं पर मुकदमे,

गिरफ्तारियाँ,

पुलिस छापे,

सभा पर नियंत्रण

और गांवों पर दबाव।

क्या Oudh Rent Amendment Act ने किसानों को शांत कर दिया था?

1921 का किरायेदारी संशोधन कुछ राहत लाया था, लेकिन वह पर्याप्त नहीं था।

यदि वह किसान असंतोष का मूल समाधान कर चुका होता, तो उसके तुरंत बाद एका आंदोलन इतनी ताकत से नहीं उभरता।

इसलिए Rent Act को समाधान नहीं बल्कि सीमित concession कहना अधिक उचित है। IGNOU भी कहता है कि पुराने आंदोलन को शांत करने के प्रयास के बावजूद किसान असंतोष उत्तर अवध में फिर उभरा। (eGyankosh)

एका की विफलता या उपलब्धि?

तात्कालिक दृष्टि से—

सरकार ने आंदोलन दबा दिया।

किराया व्यवस्था समाप्त नहीं हुई।

जमींदारी नहीं टूटी।

मदारी पासी का संगठन स्थायी संस्था नहीं बन पाया।

इस अर्थ में आंदोलन की सीमाएँ स्पष्ट हैं।

लेकिन उसकी राजनीतिक उपलब्धि दूसरी थी—

उसने दिखाया कि किसान राजनीति कांग्रेस से अलग भी पुनर्जीवित हो सकती है।

दमन के बाद भी ग्रामीण असंतोष अपना नया नेतृत्व, नया भूगोल और नया संगठनात्मक रूप खोज सकता है।

एका आंदोलन को समझने का सबसे गलत तरीका होगा—

“अवध किसान सभा विफल हुई, फिर मदारी पासी ने दूसरा आंदोलन शुरू कर दिया।”

इतिहास इससे अधिक जटिल था।

सही क्रम कुछ इस प्रकार था—

1920–21 का अवध किसान उभार

सरकारी दमन और Rent Amendment Act

दक्षिणी अवध में किसान सभा की कमजोरी

लेकिन मूल कृषि शिकायतें कायम

उत्तर अवध — हरदोई, सीतापुर, बहराइच, बाराबंकी में नया उभार

कांग्रेस–खिलाफत कार्यकर्ताओं की शुरुआती प्रेरणा

एका/एकता की शपथ और पंचायतें

recorded rent से अधिक भुगतान का विरोध

बेदखली के बावजूद खेत न छोड़ने की प्रतिज्ञा

बेगार से इनकार

मदारी पासी और स्थानीय grassroots leadership का उभार

कांग्रेस अनुशासन से बढ़ती दूरी

कठोर repression

मार्च 1922 तक आंदोलन का पतन।

एका आंदोलन ने अवध किसान राजनीति के बारे में तीन महत्वपूर्ण बातें सिद्ध कीं।

पहली, किसान असंतोष कांग्रेस द्वारा पैदा नहीं किया गया था। कांग्रेस पीछे हटने पर भी वह नए रूप में लौट आया।

दूसरी, “किसान” एक समान सामाजिक श्रेणी नहीं था। एका में tenants के साथ छोटे जमींदार भी शामिल हुए, जबकि नेतृत्व निम्न सामाजिक समूहों से उभरा। (NCERT Books)

तीसरी, किसान आंदोलन की अपनी राजनीतिक भाषा थी। एका की शपथ यह नहीं कहती थी कि “सारा किराया बंद”। वह कहती थी—दर्ज किराया देंगे, समय पर देंगे, उससे अधिक नहीं देंगे; बेदखली पर खेत नहीं छोड़ेंगे; बेगार नहीं करेंगे और पंचायत का निर्णय मानेंगे। (NCERT Books)

यह कानूनहीनता की घोषणा नहीं थी।

यह किसान की दृष्टि से न्यायपूर्ण ग्रामीण व्यवस्था की घोषणा थी।

यही कारण है कि अवध किसान आंदोलन की पूरी कथा 1921 की जनवरी हिंसा पर समाप्त नहीं होती। उसका अगला रूप एका था, और एका के दमन के बाद भी किसान प्रश्न भारतीय राजनीति से गायब नहीं हुआ।

अवध किसान आंदोलन का मूल्यांकन केवल इस प्रश्न से नहीं किया जा सकता कि “क्या किसानों की सभी मांगें पूरी हुईं?” यदि इसी कसौटी पर देखें तो आंदोलन अधूरा और सीमित दिखाई देगा—तालुकेदारी समाप्त नहीं हुई, जमींदारी व्यवस्था बनी रही, बेगार और अतिरिक्त वसूली पूरी तरह खत्म नहीं हुई और 1921–22 तक पहला किसान उभार तथा एका दोनों कठोर दमन से कमजोर पड़ गए।

लेकिन दूसरी ओर आंदोलन ने अवध की ग्रामीण राजनीति को स्थायी रूप से बदल दिया। किसान पहली बार व्यापक स्तर पर पंचायत, सभा, प्रतिज्ञा, सामाजिक बहिष्कार, rent resistance और राष्ट्रीय राजनीतिक भाषा के माध्यम से संगठित हुआ। सरकार को किरायेदारी कानून संशोधित करना पड़ा; कांग्रेस को किसान प्रश्न को गंभीरता से लेना पड़ा; जवाहरलाल नेहरू जैसे नेताओं की ग्रामीण भारत को देखने की दृष्टि बदली; और भारतीय इतिहासलेखन में किसान को राष्ट्रीय नेताओं के निष्क्रिय अनुयायी के बजाय स्वयं राजनीतिक agency रखने वाले सामाजिक समूह के रूप में देखने की जमीन बनी। ज्ञानेंद्र पांडे इसी कारण अवध आंदोलन को राष्ट्रीय आंदोलन और स्वतंत्र किसान राजनीति के जटिल अंतर्संबंध का महत्वपूर्ण उदाहरण मानते हैं। (NAU Jan)

खंड 8.51

अवध किसान आंदोलन की वास्तविक उपलब्धियाँ

अवध किसान आंदोलन की उपलब्धियों को तीन स्तरों पर देखना चाहिए—

तात्कालिक आर्थिक और कानूनी उपलब्धियाँ,

राजनीतिक-संगठनात्मक उपलब्धियाँ,

और दीर्घकालीन चेतना एवं नेतृत्व पर प्रभाव।

पहली उपलब्धि — किसान प्रश्न को सरकार के सामने केंद्रीय मुद्दा बनाना

1917 से पहले भी किसानों की शिकायतें थीं, लेकिन वे बिखरी हुई थीं।

किसान आंदोलन ने पहली बार यह स्पष्ट किया कि—

ऊँचा rent,

नजराना,

बेदखली,

बेगार,

अवैध उपकर

व्यक्तिगत landlord–tenant disputes नहीं हैं।

वे पूरे अवध की agrarian structure की समस्या हैं।

जनवरी 1921 के बाद सरकार इस प्रश्न को नजरअंदाज नहीं कर सकती थी।

हजारों किसानों की सभाएँ, गोलीबारी, गिरफ्तारी और प्रशासनिक संकट ने सरकार को किरायेदारी संबंधों पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य किया।

दूसरी उपलब्धि — Oudh Rent (Amendment) Act, 1921

आंदोलन के सबसे ठोस कानूनी परिणामों में Oudh Rent (Amendment) Act, 1921 था।

इसने पहले की व्यवस्था की तुलना में statutory tenants को अधिक सुरक्षा दी।

आधुनिक न्यायिक व्याख्या से स्पष्ट है कि 1886 के मूल कानून में साधारण statutory tenancy की अवधि सामान्यतः सात वर्ष थी; 1921 के संशोधन के बाद संबंधित धाराओं में यह अवधि दस वर्ष कर दी गई। (Allahabad High Court)

बाद के राजस्व प्रशासन संबंधी आधिकारिक विवरण इससे भी आगे बताते हैं कि 1921 के संशोधन के बाद statutory tenants की स्थिति इतनी मजबूत हुई कि उन्हें जीवनकाल तक holding बनाए रखने की सुरक्षा मिली और उनकी मृत्यु के बाद उत्तराधिकारी को सीमित अवधि तक बने रहने का अधिकार प्राप्त हुआ। (GIPE DSpace)

इसलिए आंदोलन को कानूनी परिणाम से पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता।

तीसरी उपलब्धि — बेदखली की शक्ति पर अंकुश

अवध के किसान की सबसे बड़ी आशंका थी—

“आज खेत मेरा है, कल निकाल दिया जाऊँगा।”

1921 के संशोधन ने इस असुरक्षा को पूरी तरह समाप्त नहीं किया, लेकिन landlord की मनमानी बेदखली की क्षमता पर पहले की तुलना में अंकुश लगाया।

यही महत्वपूर्ण था।

किसान के लिए tenancy security एक अमूर्त कानूनी सुधार नहीं थी।

वह—

भोजन,

परिवार,

सामाजिक प्रतिष्ठा

और भविष्य

की सुरक्षा थी।

चौथी उपलब्धि — नजराना और tenancy renewal पर प्रश्न

1921 के कानून को किसान आंदोलन के दबाव की प्रतिक्रिया के रूप में पढ़ा गया है। आधुनिक अध्ययनों में नजराना जैसी landlord exactions पर नियंत्रण को इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण भाग माना जाता है। हालांकि विभिन्न लोकप्रिय सारों में इसके प्रावधानों को कभी-कभी अत्यधिक सरल कर दिया जाता है, इसलिए विशिष्ट धाराओं के लिए मूल statute का उपयोग सर्वोत्तम होगा।

फिर भी व्यापक निष्कर्ष स्पष्ट है—

राज्य को landlord–tenant relation को पहले की तुलना में अधिक नियंत्रित करना पड़ा।

पाँचवीं उपलब्धि — किसान का राजनीतिक नागरिक में रूपांतरण

शायद सबसे बड़ी उपलब्धि कानून नहीं थी।

वह थी—

किसान का राजनीतिकरण।

1917 के पहले जो व्यक्ति landlord के सामने अलग-अलग खड़ा था, 1920 तक वह—

किसान सभा का सदस्य,

पंचायत का सहभागी,

सभा में वक्ता या श्रोता,

प्रतिज्ञा लेने वाला,

और हजारों की भीड़ का हिस्सा

बन चुका था।

यह परिवर्तन वापस पूरी तरह उलटा नहीं जा सकता था।

छठी उपलब्धि — राष्ट्रीय राजनीति का ग्रामीणकरण

अवध आंदोलन ने कांग्रेस को यह दिखाया कि भारत का राष्ट्रीय आंदोलन केवल शहरों, वकीलों और शिक्षित मध्यवर्ग के बल पर नहीं चल सकता।

गांव की राजनीति अलग थी।

वहाँ सवाल थे—

जमीन, rent, बेदखली और बेगार।

अवध के बाद राष्ट्रीय आंदोलन में किसान प्रश्न को अनदेखा करना कठिन हो गया।

सातवीं उपलब्धि — जवाहरलाल नेहरू पर प्रभाव

नेहरू का ग्रामीण भारत से पहला गहरा राजनीतिक संपर्क अवध में हुआ।

यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि उनके आगे के समाजवादी विचार केवल अवध से बने।

लेकिन यह निर्विवाद है कि अवध के अनुभव ने उन्हें भारतीय गरीबी और कृषि संरचना का प्रत्यक्ष अनुभव कराया।

उनके राजनीतिक विकास में यह चरण महत्वपूर्ण था।

आठवीं उपलब्धि — स्थानीय नेतृत्व की शक्ति

बाबा रामचंद्र, झिंगुरी सिंह, माताबदल जैसे ग्रामीण नेताओं और आगे मदारी पासी के उभार ने यह सिद्ध किया—

राजनीतिक नेतृत्व केवल शहर से गांव नहीं जाता; गांव भी अपना नेतृत्व पैदा करता है।

यही आधुनिक किसान इतिहास का बड़ा निष्कर्ष है।

खंड 8.52

Oudh Rent (Amendment) Act, 1921 — क्या कानून ने किसान समस्या हल कर दी?

इस कानून को आंदोलन की “जीत” कह देना उतना ही गलत होगा जितना इसे पूरी तरह महत्वहीन बताना।

वास्तव में यह सीमित लेकिन ठोस concession था।

संशोधन से पहले स्थिति

1886 के Oudh Rent Act के अंतर्गत साधारण non-occupancy/statutory tenants की स्थिति असुरक्षित थी।

Allahabad High Court द्वारा बाद में उद्धृत मूल धाराओं के अनुसार statutory tenants को सामान्यतः सात वर्ष तक holding बनाए रखने का अधिकार था; इसके बाद landlord के पास अधिक व्यापक ejectment possibilities थीं। (Allahabad High Court)

1921 के बाद

संशोधित धारा 36 और 37 ने tenancy security को दस वर्ष तक बढ़ाया। आधुनिक न्यायिक निर्णयों में संशोधित धाराएँ इसी रूप में उद्धृत हैं। (CaseMine)

बाद की tenancy व्यवस्था के ऐतिहासिक विवरण में इसे statutory tenants की सुरक्षा की दिशा में बड़ा परिवर्तन माना गया है। (GIPE DSpace)

इससे किसान को क्या मिला?

सबसे बड़ा लाभ था—

बेदखली की तत्काल मनमानी पर कुछ रोक।

किसान को अधिक स्थिरता मिली।

भूमि संबंध में समय की निश्चितता बढ़ी।

यह landlord की bargaining power को कुछ हद तक कम करता था।

क्या जमींदारी कमजोर हो गई?

सीमित रूप से—लेकिन समाप्त नहीं।

तालुकेदार अभी भी मालिक था।

Rent देना था।

ग्रामीण सत्ता-संबंध बड़े पैमाने पर बने रहे।

भूमि का स्वामित्व किसान को नहीं मिला।

इसलिए कानून ने agrarian hierarchy को खत्म नहीं किया।

उसने उस hierarchy के भीतर tenant protection बढ़ाया।

क्या किसान आंदोलन इसके बाद समाप्त हुआ?

नहीं।

यही इस कानून की सीमा का सबसे बड़ा प्रमाण है।

यदि 1921 का संशोधन किसान समस्या का पर्याप्त समाधान होता तो कुछ महीनों बाद उत्तर अवध में एका आंदोलन नहीं उभरता।

ज्ञानेंद्र पांडे का विश्लेषण स्पष्ट करता है कि सरकारी repression और सीमित सुधारों के बावजूद आंदोलन दबा तो, पर समाप्त नहीं हुआ; वह कुछ ही महीनों बाद एका के रूप में फिर सामने आया। (NAU Jan)

अर्थात—

कानून ने शिकायतें कम कीं; संरचना नहीं बदली।

औपनिवेशिक रणनीति — repression + reform

ब्रिटिश प्रशासन का तरीका बहुत महत्वपूर्ण था।

सिर्फ गोली और गिरफ्तारी नहीं।

सिर्फ सुधार भी नहीं।

दोनों साथ—

उग्र संगठन को कुचलो।

मध्यम किसान को सीमित राहत दो।

इससे आंदोलन का व्यापक गठबंधन टूट सकता था।

कुछ किसान सोच सकते थे कि कानून से राहत मिल रही है, जबकि उग्र नेता जेल में हैं।

यह औपनिवेशिक शासन की परिचित राजनीतिक रणनीति थी।

खंड 8.53

आंदोलन की सीमाएँ — हिंसा, संगठनात्मक विखंडन, वर्ग और जाति

अवध किसान आंदोलन को महिमामंडित करना उतना ही अनुचित होगा जितना उसे “lawlessness” कहकर खारिज करना।

उसकी गंभीर सीमाएँ थीं।

सीमा 1 — केंद्रीकृत संगठन कमजोर था

बारडोली की तरह अवध में कोई स्थिर और केंद्रीकृत command structure नहीं था।

बाबा रामचंद्र का प्रभाव बड़ा था, लेकिन वे प्रत्येक गांव की कार्रवाई नियंत्रित नहीं कर सकते थे।

300 से अधिक शाखाएँ तेजी से बनना शक्ति थी—

लेकिन वही समस्या भी थी।

संदेश स्थानीय रूप में बदल सकता था।

सीमा 2 — आंदोलन की मांगें एकसमान नहीं थीं

एक tenant चाहता था—

rent कम हो।

दूसरा—

बेदखली बंद हो।

भूमिहीन मजदूर की मांग अलग हो सकती थी।

छोटे जमींदार एका में इसलिए जुड़े क्योंकि वे सरकारी revenue से परेशान थे।

यानी “किसान” एक एकीकृत वर्ग नहीं था।

सीमा 3 — हिंसा

जनवरी 1921 में बाजार लूट, landlord property पर हमले और पुलिस से संघर्ष ने आंदोलन का चरित्र बदल दिया।

कांग्रेस इससे पीछे हटी।

सरकार को कठोर repression का राजनीतिक आधार मिला।

यह आंदोलन की बड़ी tactical कमजोरी थी।

लेकिन इसे केवल “किसान अनुशासनहीनता” कहना भी अधूरा है।

ज्ञानेंद्र पांडे दिखाते हैं कि हिंसा कई बार सामाजिक रूप से चयनित लक्ष्यों—landlords, व्यापारी, पटवारी और संपन्न विरोधियों—के खिलाफ थी। (NAU Jan)

सीमा 4 — जाति

किसान सभा ने अनेक जातियों को जोड़ा, लेकिन ग्रामीण जाति व्यवस्था समाप्त नहीं हुई।

निम्न जातियों की भागीदारी बढ़ी।

फिर भी सभी किसान समान सामाजिक शक्ति के साथ आंदोलन में नहीं थे।

पासी, चमार, अहीर, कुर्मी और अन्य समूहों की आर्थिक तथा सामाजिक स्थिति अलग थी।

आंदोलन ने उन्हें साझा प्रतिरोध में जोड़ा, लेकिन जातीय hierarchy नष्ट नहीं की।

सीमा 5 — महिला भागीदारी पर स्रोत कम

बारडोली की तुलना में अवध के समकालीन स्रोत महिला संगठन पर कम प्रकाश डालते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि महिलाएँ अनुपस्थित थीं—जनवरी के कुछ उग्र ग्रामीण समूहों में महिलाओं और बच्चों की उपस्थिति दर्ज है।

लेकिन आंदोलन का संस्थागत महिला नेतृत्व हमें बारडोली जैसी स्पष्टता से नहीं दिखाई देता।

इसलिए यहाँ स्रोत-सीमा को स्वीकार करना चाहिए।

सीमा 6 — स्थायी संगठन नहीं बन पाया

अवध किसान सभा विशाल आंदोलन बनी, लेकिन 1921 के repression के बाद उसका संगठन टूट गया।

एका भी मार्च 1922 तक दबा दिया गया।

कोई स्थायी प्रांतीय किसान संगठन तुरंत इस पूरे आधार को संभाल नहीं पाया।

इस अर्थ में आंदोलन की institutional continuity कमजोर रही।

सीमा 7 — भूमि स्वामित्व का प्रश्न अधूरा रहा

अवध किसान आंदोलन मुख्यतः tenant security और landlord exactions पर केंद्रित था।

इसने तत्काल व्यापक कार्यक्रम के रूप में—

जमींदारी उन्मूलन

या

land to the tiller

को स्थायी केंद्रीय मांग नहीं बनाया।

इसलिए औपनिवेशिक agrarian hierarchy के मूल स्वामित्व ढाँचे पर प्रहार सीमित था।

खंड 8.54

बाबा रामचंद्र बनाम कांग्रेस-केंद्रित इतिहास — श्रेय किसे मिला और कौन हाशिए पर गया?

अवध किसान आंदोलन के इतिहासलेखन का सबसे रोचक प्रश्न है—

आंदोलन का नायक कौन है?

पुरानी लोकप्रिय राष्ट्रवादी कथा पढ़ें तो जवाहरलाल नेहरू का अवध में किसानों से मिलना बहुत प्रमुख घटना बनती है।

लेकिन ग्रामीण संगठन की chronology हमें बताती है कि किसान आंदोलन नेहरू के आने से पहले ही विकसित हो चुका था।

बाबा रामचंद्र की स्वतंत्र भूमिका

Majid Hayat Siddiqi का 1972 का प्रतापगढ़ अध्ययन इस बात पर विशेष जोर देता है कि बाबा रामचंद्र ने असाधारण संगठन क्षमता दिखाई। उन्होंने नेहरू की टिप्पणी भी उद्धृत की कि रामचंद्र में “remarkable powers of organisation” थीं, और प्रतापगढ़ की मौखिक स्मृति में उन्हें किंवदंती जैसा स्थान मिला। (Sage Journals)

यह महत्वपूर्ण corrective है।

नेहरू ने किसान आंदोलन खोजा नहीं था।

किसान आंदोलन ने नेहरू को अपने पास बुलाया था।

इतिहास में नेहरू अधिक दृश्य क्यों?

क्योंकि राष्ट्रीय अभिलेख में उनके पास—

पत्र,

आत्मकथा,

कांग्रेस दस्तावेज,

प्रेस कवरेज

और आगे लंबा सार्वजनिक जीवन

था।

रामचंद्र के पास ऐसा संस्थागत अभिलेख कम था।

इसलिए archival visibility और historical importance एक चीज नहीं हैं।

बाबा रामचंद्र की अपनी कमियाँ

उन्हें केवल “दबा दिया गया नायक” बनाना भी ठीक नहीं होगा।

उनकी राजनीति—

धार्मिक प्रतीकों पर निर्भर थी,

जातीय नेटवर्क का उपयोग करती थी,

और अधिक व्यापक आधुनिक agrarian programme हमेशा स्पष्ट नहीं था।

उनके और कांग्रेस के संबंध भी सरल नहीं थे।

लेकिन यही तो उन्हें ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है—

वे गांव की राजनीति की उस दुनिया का प्रतिनिधित्व करते थे जिसे शहरी राष्ट्रवादी नेतृत्व पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकता था।

नेहरू की भूमिका को भी कम न आँकें

दूसरी ओर subaltern corrective का अर्थ यह नहीं कि नेहरू महत्वहीन थे।

उन्होंने—

ग्रामीण क्षेत्र का दौरा किया,

किसानों की शिकायतें राष्ट्रीय प्रेस तक पहुँचाईं,

मुंशीगंज के बाद जांच की,

सरकारी repression की आलोचना की

और किसान प्रश्न को कांग्रेस की राजनीति में अधिक गंभीरता से उठाया।

संतुलित निष्कर्ष है—

दोनों भूमिकाएँ अलग थीं।

खंड 8.55

राष्ट्रवादी, मार्क्सवादी और सबाल्टर्न इतिहासलेखन — अवध किसान आंदोलन को तीन अलग नजरों से

अवध किसान आंदोलन की सबसे बड़ी बौद्धिक विरासत यह है कि उसने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास को लिखने के तरीके पर प्रश्न खड़ा किया।

एक ही आंदोलन को अलग-अलग इतिहासकार अलग अर्थ देते हैं।

1. राष्ट्रवादी व्याख्या

राष्ट्रवादी इतिहासलेखन में किसान आंदोलन को अक्सर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के विस्तार के रूप में देखा गया।

इस दृष्टि में—

गांधी ने जनता को राजनीतिक बनाया,

कांग्रेस ने ग्रामीण समाज को संगठित किया,

नेहरू किसानों से जुड़े,

और किसान असहयोग आंदोलन में आए।

NCERT का लोकप्रिय वर्णन भी इस संबंध को स्वीकार करता है—अवध किसान आंदोलन के राष्ट्रीय असहयोग में एकीकरण के प्रयास और इसके बाद कांग्रेस को असुविधाजनक लगने वाली हिंसक कार्रवाइयों को साथ रखता है। (Drishti IAS)

राष्ट्रवादी दृष्टि की ताकत

यह किसान संघर्ष को भारत की बड़ी anti-colonial प्रक्रिया के भीतर रखता है।

यह बताता है कि गांधी, कांग्रेस और असहयोग ने ग्रामीण राजनीति को राष्ट्रीय भाषा दी।

सीमा

कभी-कभी इसमें किसान की स्वतंत्र agency कम दिखाई देती है।

ऐसा लग सकता है कि गांव तब राजनीतिक हुआ जब कांग्रेस वहाँ पहुँची।

अवध के मामले में chronology इस सरल धारणा को चुनौती देती है।

2. मार्क्सवादी/वर्गीय व्याख्या

मार्क्सवादी और agrarian-class दृष्टिकोण आंदोलन के पीछे सामाजिक-आर्थिक संरचना देखता है।

यह पूछता है—

कौन-सा किसान वर्ग आंदोलन में था?

भूमि किसके पास थी?

किराया कौन देता था?

कौन-से वर्ग और जाति नेतृत्व कर रहे थे?

किसके आर्थिक हित समान थे और कहाँ अलग?

D. N. Dhanagare के व्यापक किसान-अध्ययन ने भारतीय कृषक आंदोलनों को class differentiation, organisation और ideology के संदर्भ में पढ़ने की पद्धति विकसित की। उनका काम किसान विद्रोह को spontaneous भावनात्मक विस्फोट के बजाय विशिष्ट agrarian structure से जोड़ता है। (ResearchGate)

Majid Hayat Siddiqi का Agrarian Unrest in North India: The United Provinces, 1918–22 भी Kisan Sabha और Eka को युद्धोत्तर कृषि संरचना, किसान नेतृत्व और राष्ट्रवादी राजनीति के संबंध में रखता है। (GSL LBSNAA)

इस दृष्टि की ताकत

यह दिखाती है कि—

rent,

tenancy,

landlord power,

class differentiation

सिर्फ राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि नहीं, स्वयं आंदोलन के कारण थे।

सीमा

यदि केवल वर्गीय संरचना पर अधिक जोर दिया जाए तो धार्मिक प्रतीक, “गांधी राज”, जातीय नेटवर्क, अफवाह और किसान की सांस्कृतिक राजनीतिक भाषा कम दिखाई दे सकती है।

3. सबाल्टर्न व्याख्या

ज्ञानेंद्र पांडे का “Peasant Revolt and Indian Nationalism: The Peasant Movement in Awadh, 1919–1922” इस बहस में निर्णायक हस्तक्षेप है। यह Subaltern Studies I में 1982 में प्रकाशित हुआ। (School of Social Sciences)

पांडे का मूल प्रश्न है—

क्या हमने किसान संघर्ष को बहुत अधिक कांग्रेस नेताओं की आँख से देखा?

उनका तर्क है कि अवध का किसान आंदोलन कांग्रेस से जुड़ा जरूर था, लेकिन उसकी अपनी स्वतंत्र राजनीतिक logic भी थी। (NAU Jan)

गांधी का नाम — लेकिन किसान का अर्थ

यहाँ सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण “गांधी” हैं।

किसान गांधी को अपना प्रतीक बना सकता था—

लेकिन गांधी का अर्थ वही नहीं था जो कांग्रेस Working Committee में था।

ग्रामीण कल्पना में गांधी हो सकते थे—

बेदखली समाप्त करने वाला,

landlord को नियंत्रित करने वाला,

गरीब को जमीन दिलाने वाला

या नया न्यायपूर्ण “राज” लाने वाला।

इसलिए पांडे के लिए किसान राष्ट्रीय प्रतीक को निष्क्रिय रूप से स्वीकार नहीं करता।

वह उसे पुनः अर्थ देता है।

कांग्रेस और किसान के बीच अंतर

पांडे फरवरी 1921 में गांधी द्वारा अवध किसानों के लिए जारी विस्तृत निर्देशों को विशेष महत्व देते हैं। गांधी ने हिंसा, दुकानों की लूट, जबरन नाई-धोबी बंद और दूसरे coercive तरीकों से स्पष्ट दूरी बनाने को कहा था। (NAU Jan)

पांडे इसे केवल अनुशासन निर्देश नहीं बल्कि कांग्रेस और किसान politics के अलग एजेंडे का संकेत मानते हैं।

subaltern contribution

इस दृष्टि की बड़ी उपलब्धि है—

किसान को इतिहास का subject बनाना, object नहीं।

वह केवल “mobilised mass” नहीं है।

वह स्वयं निर्णय करता है।

अफवाह बनाता है।

नेता चुनता है।

राजनीतिक नारे का अर्थ बदलता है।

और कभी-कभी कांग्रेस के आदेश से अलग चलता है।

तीनों दृष्टियों को कैसे मिलाएँ?

सबसे संतुलित इतिहास इन तीनों में से किसी एक को पूर्ण सत्य नहीं मानेगा।

राष्ट्रवादी इतिहास हमें बताता है—

अवध और राष्ट्रीय आंदोलन का संबंध कितना महत्वपूर्ण था।

वर्गीय इतिहास बताता है—

उस संबंध के नीचे जमीन, rent और agrarian classes की ठोस संरचना क्या थी।

सबाल्टर्न इतिहास बताता है—

किसान ने इन राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों को स्वयं कैसे समझा और अपना स्वतंत्र राजनीतिक अर्थ कैसे बनाया।

तीनों को साथ पढ़ने पर अवध किसान आंदोलन कहीं अधिक स्पष्ट होता है।

1917–1922 का अवध किसान आंदोलन अंततः एक विरोधाभासी लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रक्रिया था।

उसकी तात्कालिक जीत सीमित थी।

तालुकेदारी समाप्त नहीं हुई।

जमींदारी बनी रही।

आंदोलन दबा दिया गया।

अवध किसान सभा टूट गई।

एका भी 1922 तक कमजोर पड़ गया।

लेकिन यह केवल आधी कहानी है।

दूसरी ओर—

Oudh Rent (Amendment) Act, 1921 ने tenant security बढ़ाई और statutory tenancy व्यवस्था में महत्वपूर्ण संशोधन किए। संशोधित कानून ने सात वर्ष की पुरानी व्यवस्था को दस वर्ष तक बढ़ाया और आगे tenant security को अधिक मजबूत बनाया। (Allahabad High Court)

किसान ने पंचायत की शक्ति पहचानी।

उसने सामाजिक बहिष्कार को हथियार बनाया।

उसने landlord के सामने व्यक्तिगत याचक के बजाय सामूहिक शक्ति के रूप में खड़ा होना सीखा।

कांग्रेस पहली बार उत्तर भारत के विशाल ग्रामीण संसार से सीधे टकराई।

जवाहरलाल नेहरू का किसान राजनीति से स्थायी संपर्क बना।

बाबा रामचंद्र जैसे स्थानीय नेता भारतीय राजनीतिक इतिहास में उभरे।

और सबसे महत्वपूर्ण—

किसान ने “स्वराज” का अपना अर्थ बनाया।

राष्ट्रीय नेता के लिए स्वराज औपनिवेशिक सत्ता का प्रश्न था।

अवध किसान के लिए उसमें जुड़ गया—

खेत, लगान, बेदखली, बेगार और सम्मान।

यही अवध आंदोलन की सबसे गहरी विरासत है।

इसने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को गांव दिया—

लेकिन गांव ने राष्ट्रीय आंदोलन को केवल जनसंख्या नहीं दी।

उसने अपनी मांगें, अपनी भाषा और अपनी राजनीति भी दी।

इसलिए अवध किसान आंदोलन को न केवल असहयोग आंदोलन का ग्रामीण अध्याय कहा जा सकता है, न केवल landlord–tenant संघर्ष, और न केवल spontaneous peasant revolt।

सबसे संतुलित परिभाषा होगी—

और शायद इसी वाक्य में उसकी ऐतिहासिक विशिष्टता सबसे स्पष्ट दिखाई देती है।

मुख्य 55 अध्याय अब पूर्ण

घटना-क्रम

अवध किसान आंदोलन की संक्षिप्त समयरेखा

1856–57 · विलय और तालुकेदारों की पुनर्स्थापनाअवध के विलय और 1857 के बाद ब्रिटिश–तालुकेदार गठबंधन ने ग्रामीण सत्ता की दीर्घकालीन संरचना तय की।
फरवरी 1918 · उत्तर प्रदेश किसान सभाशुरुआती प्रांतीय संगठन ने लगान, बेदखली और अवैध वसूली के प्रश्नों को सार्वजनिक मंच दिया।
1919–20 · बाबा रामचंद्र का अभियानप्रतापगढ़ से गांव-गांव पंचायतों, धार्मिक प्रतीकों और किसान मांगों के माध्यम से जनाधार तेजी से बढ़ा।
अक्टूबर 1920 · अवध किसान सभास्थानीय ग्रामीण नेतृत्व ने स्वतंत्र संगठन बनाया और कुछ ही सप्ताह में सैकड़ों शाखाएँ स्थापित हुईं।
जनवरी 1921 · रायबरेली का विस्फोटफुरसतगंज और मुंशीगंज की घटनाओं, गोलीबारी और दमन ने आंदोलन को निर्णायक मोड़ दिया।
1921–22 · एका आंदोलनसीतापुर, हरदोई और बहराइच में नई शपथ, नेतृत्व और संगठन के साथ किसान प्रतिरोध का अगला चरण उभरा।
OCN ऐतिहासिक आकलन

अवध आंदोलन ने दिखाया कि किसान राजनीति राष्ट्रीय नेतृत्व की देन मात्र नहीं थी। ग्रामीण समाज की अपनी मांगें, नेता, संगठन और स्वराज की व्याख्या थी। बाबा रामचंद्र, स्थानीय पंचायतों, किसान सभाओं और जवाहरलाल नेहरू के हस्तक्षेप ने आंदोलन को व्यापक बनाया, लेकिन कांग्रेस के अनुशासन और किसान अपेक्षाओं के बीच दूरी भी बनी रही। 1921 का किराया संशोधन आंशिक उपलब्धि था; वह तालुकेदारी ढाँचा समाप्त नहीं कर सका। दमन और विखंडन के बावजूद अवध ने उत्तर भारत में संगठित किसान राजनीति, सामाजिक बहिष्कार और भूमि-अधिकार की भाषा को स्थायी रूप दिया।

स्रोत रजिस्टर

प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक संदर्भ

औपनिवेशिक अभिलेखअवध के भूमि और लगान कानून, प्रशासनिक रिपोर्टें, जिला अभिलेख, पुलिस विवरण तथा 1921 के किराया-संशोधन संबंधी दस्तावेज़।
समकालीन राजनीतिक स्रोतजवाहरलाल नेहरू के लेखन और पत्र, कांग्रेस और किसान सभा के प्रस्ताव, समाचार-पत्रों की रिपोर्टें तथा बाबा रामचंद्र संबंधी समकालीन सामग्री।
किसान और स्थानीय स्मृतियाँप्रतापगढ़, रायबरेली और आसपास के जिलों की पंचायत-परंपराएँ, लोक-स्मृतियाँ, आंदोलन की मांगें और स्थानीय नेतृत्व के वृत्तांत।
प्रमुख इतिहासलेखनज्ञानेंद्र पांडेय, शाहिद अमीन, कपिल कुमार, डी. एन. धनागरे, सुमित सरकार और बिपन चंद्र सहित राष्ट्रवादी, मार्क्सवादी और सबाल्टर्न अध्ययनों का तुलनात्मक उपयोग।

टिप्पणी: प्रशासनिक अभिलेख, राष्ट्रवादी विवरण, स्थानीय किसान अनुभव और आधुनिक इतिहासलेखन को परस्पर मिलाकर पढ़ा गया है। मुंशीगंज में हताहतों की संख्या जैसे विवादित दावों में स्रोत-भेद को स्पष्ट रखा गया है।