बिजौलिया किसान आंदोलन (1897–1941)
जागीरी शोषण के विरुद्ध किसान प्रतिरोध, संगठित सत्याग्रह, भूमि-अधिकार और राजस्थान में प्रजा-राजनीति का उदय
बिजौलिया आंदोलन कुछ दिनों का विद्रोह नहीं, बल्कि लगभग चार दशकों में विकसित हुआ बहु-पीढ़ी किसान संघर्ष था। स्थानीय अर्जियों से शुरू होकर यह किसान पंचायत, कर-विरोध, हल-बंदी, भूमि-इस्तीफा, सत्याग्रह, प्रेस अभियान और भूमि-वापसी तक पहुँचा। आंदोलन का यह लंबा क्रम बताता है कि देसी रियासतों में किसान राजनीति ने राष्ट्रीय आंदोलन से संवाद करते हुए भी अपनी विशिष्ट स्थानीय मांगें और संगठन विकसित किए।
भूमिका — भारतीय किसान आंदोलनों में बिजौलिया आंदोलन का स्थान
बिजौलिया किसान आंदोलन भारतीय किसान संघर्षों के इतिहास में अपनी असाधारण अवधि, संगठन और बदलती रणनीतियों के कारण विशिष्ट स्थान रखता है। मेवाड़ रियासत की बिजौलिया जागीर में लगभग 1897 से 1941 तक चला यह संघर्ष किसी एक घटना या एक नेता तक सीमित नहीं था। कई पीढ़ियों के किसानों ने लाग-बाग, बेगार, मनमाने भू-राजस्व, भूमि-अधिकार और जागीरी दमन के विरुद्ध इसे आगे बढ़ाया।
इस आंदोलन की शुरुआत स्थानीय किसान शिकायतों और गिरधरपुरा की सभा से हुई, पर समय के साथ यह संगठित किसान पंचायत, सामूहिक कर-विरोध, हल-बंदी, भूमि-इस्तीफा, सत्याग्रह, प्रेस अभियान और राष्ट्रीय नेतृत्व से संवाद तक पहुँचा। इस लंबी यात्रा में नानजी पटेल, ठाकरी पटेल, साधु सीताराम दास, विजय सिंह पथिक, माणिक्यलाल वर्मा, जमनालाल बजाज और हरिभाऊ उपाध्याय जैसे अनेक व्यक्तित्व अलग-अलग चरणों में सामने आए।
बिजौलिया को केवल कर घटाने की लड़ाई कहना पर्याप्त नहीं होगा। यह जागीरदार और किसान के संबंध, भूमि पर वास्तविक अधिकार, बेगार से मुक्ति, सामूहिक निर्णय और ग्रामीण राजनीतिक चेतना का संघर्ष भी था। किसान पंचायतों ने आंदोलन को अनुशासन और निरंतरता दी, जबकि समाचार-पत्रों और राजस्थान सेवा संघ ने स्थानीय प्रश्न को व्यापक सार्वजनिक बहस बनाया।
आंदोलन मेवाड़ की रियासती सत्ता, बिजौलिया जागीर, ब्रिटिश राजनीतिक एजेंसी और उभरते राष्ट्रीय आंदोलन—इन चारों के बीच विकसित हुआ। इसलिए इसमें औपनिवेशिक भारत की देसी रियासतों की विशिष्ट राजनीति भी दिखाई देती है, जहाँ किसान सीधे ब्रिटिश जिलाधिकारी के बजाय जागीरदार और महाराणा की बहुस्तरीय सत्ता का सामना कर रहे थे।
इस अध्ययन में आंदोलन को वीरगाथा की तरह नहीं, बल्कि प्रमाणों और बदलते चरणों के आधार पर पढ़ा गया है। 1922 के समझौते जैसी उपलब्धियों के साथ उसके अधूरे क्रियान्वयन, नेतृत्वगत मतभेद, 1927 के भूमि-इस्तीफे, 1931 के भूमि-वापसी सत्याग्रह और 1939–41 के अंतिम समाधान को एक ही ऐतिहासिक क्रम में रखा गया है।
बिजौलिया और मेवाड़ का भूगोल, समाज और अर्थव्यवस्था — जागीर क्षेत्र की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
बिजौलिया किसान आंदोलन को समझने के लिए सीधे 1897 के किसान असंतोष से शुरुआत करना पर्याप्त नहीं होगा। पहले यह समझना आवश्यक है कि बिजौलिया था कहां, मेवाड़ की राजनीतिक व्यवस्था में उसकी स्थिति क्या थी, वहां खेती किस प्रकार होती थी, भूमि पर अधिकार किसके पास था, किसान कौन थे और जागीरदार तथा कृषक के बीच आर्थिक संबंध कैसे काम करते थे।
यही संरचना आगे चलकर लगभग चार दशकों तक चले किसान संघर्ष की जमीन बनी।
आज का बिजौलिया राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में है, लेकिन आंदोलन के समय यह ब्रिटिश भारत का प्रत्यक्ष प्रशासित क्षेत्र नहीं बल्कि मेवाड़ रियासत की एक महत्वपूर्ण जागीर थी। बिजौलिया आंदोलन 1897 से 1941 तक अलग-अलग चरणों में चला और भूमि-राजस्व तथा अन्य कृषक देयों के विरुद्ध संघर्ष इसका केंद्रीय तत्व रहा। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय का डिजिटल जिला अभिलेख भी इसे 44 वर्षों तक चला आंदोलन बताता है।
इसलिए बिजौलिया का इतिहास मूलतः तीन स्तरों की सत्ता के बीच किसान की स्थिति का इतिहास है—
ब्रिटिश साम्राज्य → मेवाड़ महाराणा → बिजौलिया जागीरदार → कृषक।
यह बहुस्तरीय सत्ता-संरचना बिजौलिया आंदोलन को चंपारण, खेड़ा या ब्रिटिश प्रांतों के दूसरे किसान आंदोलनों से अलग बनाती है।
1. मेवाड़ : केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, एक रियासती राज्य
राजस्थान के दक्षिण-मध्य भाग में स्थित मेवाड़ भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे पुरानी राजसत्ताओं में से एक था। उदयपुर इसकी राजधानी और महाराणा इसका शासक था।
ब्रिटिश सर्वोच्चता के दौर में मेवाड़ एक देशी रियासत बना रहा। इसका अर्थ था कि ब्रिटिश सरकार प्रत्यक्ष रूप से हर गांव का प्रशासन नहीं चलाती थी।
लेकिन रियासत पूरी तरह स्वतंत्र भी नहीं थी।
ऊपर ब्रिटिश राजनीतिक सर्वोच्चता थी और भीतर महाराणा का शासन।
फिर मेवाड़ की भूमि का बड़ा भाग विभिन्न प्रकार की जागीरों, ठिकानों और सामंती अधिकारों से जुड़ा था।
बिजौलिया इसी व्यवस्था का हिस्सा था।
इसलिए बिजौलिया के किसान की समस्या केवल “सरकार बनाम किसान” नहीं थी।
2. बिजौलिया : मेवाड़ की महत्वपूर्ण जागीर
बिजौलिया को मेवाड़ की प्रमुख जागीरों में गिना जाता था। उपलब्ध विवरण इसे उदयपुर राज्य की प्रथम श्रेणी की जागीर बताते हैं। इसका शासन परमार/पंवार वंश के जागीरदार के अधीन था और उसका स्थान मेवाड़ के प्रभावशाली सामंतों में था।
जागीरदार के पास स्थानीय स्तर पर व्यापक अधिकार थे—
और जागीर की व्यवस्था नियंत्रित करना।
लेकिन जागीरदार स्वयं महाराणा की व्यापक राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा था।
यही कारण था कि बिजौलिया के किसान जब अपने जागीरदार से न्याय नहीं पा सके तो वे उदयपुर में महाराणा तक अपनी शिकायत पहुंचाने का प्रयास करने लगे।
1897 में नानजी पटेल और ठाकरी पटेल को इसी उद्देश्य से भेजे जाने का विवरण मिलता है।
बिजौलिया की जागीरी भूमि और राजस्व व्यवस्था — भू-राजस्व, ‘84 लाग-बाग’, बेगार, लाटा-कूंता और किसान पर आर्थिक बोझ
बिजौलिया किसान आंदोलन के इतिहास में सबसे अधिक दोहराया जाने वाला वाक्य है कि किसानों पर “84 प्रकार के कर” थे। यह संख्या आंदोलन की पहचान बन गई, लेकिन शोध की दृष्टि से केवल इतना कहना पर्याप्त नहीं है। हमें यह समझना होगा कि ये सभी देय आधुनिक अर्थ में एक जैसे “कर” नहीं थे। इनमें नियमित भू-राजस्व, उपज में हिस्सेदारी, अवसर विशेष की लाग, सामंती दस्तूर, पशुओं अथवा व्यापार से जुड़े शुल्क और बिना पारिश्रमिक श्रम—बेगार—जैसी अलग-अलग प्रकृति की देनदारियां शामिल थीं।
इसलिए बिजौलिया के किसान पर आर्थिक बोझ को समझने के लिए चार स्तर अलग करना आवश्यक है—
भूमि पर लगान, उपज के आकलन की पद्धति, लाग-बाग और बेगार।
इन्हीं के सम्मिलित प्रभाव ने किसान के सामने ऐसा आर्थिक ढांचा खड़ा किया जिसमें अच्छी फसल के समय भी बचत सीमित रह सकती थी और अकाल या खराब वर्षा के समय देय असहनीय हो जाते थे।
बिजौलिया आंदोलन के उपलब्ध इतिहास में भारी भू-राजस्व, विभिन्न उपकर और बेगार को 1897 के प्रारंभिक किसान असंतोष का केंद्रीय कारण माना गया है।
1. सबसे पहले : ‘84 कर’ का अर्थ क्या है?
बिजौलिया के किसानों पर 84 प्रकार के कर थे।
राजस्थान के किसान आंदोलनों संबंधी आधुनिक संदर्भ सामग्री में भी बिजौलिया के संदर्भ में लगभग 84 प्रकार के कर/लाग-बाग का उल्लेख मिलता है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है।
इन 84 को आधुनिक आयकर, बिक्री कर या संपत्ति कर जैसे 84 स्वतंत्र नियमित कर समझना गलत होगा।
इनमें कई प्रकार की देनदारियां शामिल थीं—
- जागीरदार के पारिवारिक अथवा राजकीय अवसरों से जुड़े भुगतान;
- पशुओं या आर्थिक गतिविधियों से जुड़े शुल्क;
- और बेगार जैसी श्रम संबंधी बाध्यताएं।
इसलिए आगे जहां “84 कर” लिखा जाए, वहां अधिक सटीक शब्द होगा—
“लगभग 84 प्रकार की लाग-बाग, कर और सामंती देनदारियां।”
2. बिजौलिया की समस्या केवल करों की संख्या नहीं थी
मान लें किसी किसान पर बहुत सारे छोटे-छोटे कर हों, लेकिन उनका कुल आर्थिक भार कम हो।
तो केवल संख्या देखकर उसकी स्थिति नहीं समझी जा सकती।
किसान की कुल उपज और आय का कितना हिस्सा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जागीरी व्यवस्था ले रही थी?
क्या किसान को पहले से पता होता था कि उससे कब, कितना और किस आधार पर लिया जाएगा?
यहीं लाग-बाग की व्यवस्था विशेष रूप से समस्याग्रस्त थी।
किसान केवल खेत का लगान नहीं देता था। जीवन की दूसरी गतिविधियों पर भी सामंती सत्ता का आर्थिक दावा हो सकता था।
3. भू-राजस्व : जागीर की आर्थिक रीढ़
कृषि प्रधान बिजौलिया में जागीरदार की आय का प्रमुख आधार भूमि और कृषि उत्पादन था।
1897–1913 का प्रारंभिक किसान प्रतिरोध — गिरधरपुरा की सभा, नानजी-ठाकरी पटेल, चंवरी कर, तलवार-बांधाई और हल-बंदी की ओर बढ़ता आंदोलन
बिजौलिया किसान आंदोलन के इतिहास में 1897 से 1913 का काल निर्णायक है। यही वह दौर था जिसमें अलग-अलग किसानों की आर्थिक शिकायत धीरे-धीरे सामूहिक प्रतिरोध में बदली। इस चरण में न विजय सिंह पथिक आंदोलन के नेता थे, न कोई अखिल भारतीय किसान संगठन मौजूद था और न बिजौलिया का संघर्ष राष्ट्रीय राजनीति का चर्चित विषय बना था। फिर भी इसी अवधि में आंदोलन की वे पद्धतियां विकसित हो गईं जो बाद में उसकी पहचान बनीं—पंचायत, प्रतिनिधि भेजना, सामूहिक याचिका, सामाजिक अनुशासन, पलायन, खेती का बहिष्कार और अंततः हल-बंदी।
इस कालखंड की दूसरी विशेषता यह है कि किसानों ने शुरुआत में जागीरी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की मांग नहीं की। वे उसी राजनीतिक व्यवस्था के भीतर न्याय खोज रहे थे। पहले जागीरदार के सामने शिकायत रखी गई, फिर मेवाड़ के महाराणा से न्याय मांगा गया। जब बार-बार यह अनुभव हुआ कि शिकायत, जांच और आंशिक रियायत के बाद भी मूल समस्याएं लौट आती हैं, तब किसानों की रणनीति बदलने लगी।
इसलिए 1897–1913 को बिजौलिया आंदोलन का “राजनीतिक प्रशिक्षण काल” कहा जा सकता है।
1. 1897 से पहले : असंतोष मौजूद था, आंदोलन नहीं
पिछले अध्याय में हमने देखा कि बिजौलिया के कृषकों पर भू-राजस्व के अतिरिक्त अनेक लाग-बाग और बेगार का बोझ था। राजस्व वसूली की पद्धतियों और जागीरी कर्मचारियों के व्यवहार को लेकर भी शिकायतें थीं।
लेकिन किसी क्षेत्र में आर्थिक शोषण होना और वहां संगठित किसान आंदोलन होना दो अलग बातें हैं।
आंदोलन के लिए आवश्यक था कि किसान यह समझें कि उनकी समस्या व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामूहिक है।
यही परिवर्तन 1890 के दशक में दिखाई देने लगता है।
बिजौलिया आंदोलन की शुरुआत सामान्यतः 1897 से मानी जाती है। राजस्थान सरकार से जुड़ी शैक्षणिक सामग्री और भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के विवरण भी इस शुरुआती चरण को गिरधरपुरा में किसानों की बैठक तथा महाराणा तक शिकायत पहुंचाने के प्रयास से जोड़ते हैं।
2. 1894 : राव कृष्ण सिंह और बढ़ती शिकायतें
1894 में बिजौलिया की जागीर राव कृष्ण सिंह के हाथ में आई। उनके शासनकाल में राजस्व व्यवस्था और विभिन्न लागों को लेकर किसानों की शिकायतें बढ़ने का उल्लेख विभिन्न विवरणों में मिलता है।
यह कहना उचित नहीं होगा कि किसान शोषण 1894 में अचानक शुरू हुआ। जागीरी देनदारियां उससे बहुत पुरानी थीं।
पुरानी जागीरी संरचना में नई अथवा अधिक कठोर वसूली ने पहले से मौजूद कृषक असंतोष को तीखा किया।
यही पृष्ठभूमि 1897 की पहली संगठित कार्रवाई तक पहुंची।
3. गिरधरपुरा : सामाजिक अवसर से राजनीतिक सभा तक
1897 में गिरधरपुरा गांव में एक महत्वपूर्ण घटना हुई।
उपलब्ध विवरणों के अनुसार एक सामाजिक/सामुदायिक अवसर पर बड़ी संख्या में किसान एकत्र हुए। सामान्यतः ऐसे अवसर बिरादरी और सामाजिक संपर्क के लिए होते थे।
किसानों ने अपनी समस्याओं पर सामूहिक विचार किया।
यहीं एक महत्वपूर्ण मानसिक परिवर्तन हुआ।
गिरधरपुरा की बैठक को आधुनिक राजनीतिक सम्मेलन समझना गलत होगा।
साधु सीताराम दास और विजय सिंह पथिक का प्रवेश — स्थानीय किसान असंतोष से संगठित राजनीतिक आंदोलन की ओर (1913–1916)
1913 की हल-बंदी तक बिजौलिया के किसान एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल कर चुके थे—उन्होंने यह समझ लिया था कि सामूहिक रूप से खेती रोककर जागीर की आय पर दबाव बनाया जा सकता है। लेकिन आंदोलन की एक बड़ी कमजोरी बनी हुई थी। किसानों के पास असंतोष था, सामूहिकता थी और प्रतिरोध का अनुभव भी था, परंतु स्थायी संगठन, नियमित नेतृत्व, व्यापक प्रचार और बिजौलिया से बाहर राजनीतिक संपर्क अभी पर्याप्त विकसित नहीं थे।
1913 से 1916 के बीच यही स्थिति बदलने लगी।
इस परिवर्तन में दो नाम निर्णायक हैं—
साधु सीताराम दास और विजय सिंह पथिक।
साधु सीताराम दास ने स्थानीय किसान असंतोष और बाहरी राष्ट्रवादी-क्रांतिकारी राजनीति के बीच सेतु का काम किया। विजय सिंह पथिक ने उस आंदोलन को नई संगठनात्मक संरचना, राजनीतिक भाषा और प्रचार क्षमता दी, जिसकी नींव किसान स्वयं 1897 से तैयार करते आ रहे थे।
इसलिए 1913–1916 बिजौलिया आंदोलन के इतिहास में केवल नेतृत्व परिवर्तन का समय नहीं था। यह वह संक्रमण था जिसमें एक स्थानीय जागीरी किसान संघर्ष आधुनिक राजनीतिक किसान आंदोलन में बदलने लगा।
हल-बंदी ने जागीरदार को किसानों की सामूहिक शक्ति का एहसास करा दिया था।
किसानों ने बड़ी मात्रा में भूमि पड़ती छोड़ दी। आसपास के क्षेत्रों में खेती और जीविका के विकल्प खोजे। जागीर की राजस्व आय प्रभावित हुई।
लेकिन यह रणनीति किसानों के लिए भी अत्यंत महंगी थी।
खेती छोड़ना कोई स्थायी समाधान नहीं हो सकता था।
इसलिए आंदोलन को अब केवल विरोध नहीं, बल्कि स्थायी समाधान की रणनीति चाहिए थी।
1913 की हल-बंदी ने एक बात सिद्ध कर दी—
किसान जागीरदार की आर्थिक व्यवस्था रोक सकता है।
लेकिन उसने दूसरी समस्या भी सामने रख दी—
किसान स्वयं कितने समय तक उत्पादन रोक सकता है?
लेकिन किसान का भोजन भी उसी उत्पादन से आता था।
इसलिए लंबी लड़ाई के लिए आवश्यक था कि आंदोलन—
बिजौलिया आंदोलन के लोकप्रिय इतिहास में विजय सिंह पथिक का नाम इतना प्रमुख हो गया कि कई बार उनसे पहले के नेतृत्व को पर्याप्त महत्व नहीं मिलता।
लेकिन साधु सीताराम दास के बिना आंदोलन के विकास की कड़ी अधूरी रहती है।
वे बिजौलिया क्षेत्र से परिचित थे और स्थानीय किसानों की समस्याओं को समझते थे। उन्होंने कृषक शिकायतों को केवल अलग-अलग कर विवाद के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक किसान समस्या के रूप में देखना शुरू किया।
स्थानीय किसान समाज और राजनीतिक रूप से प्रशिक्षित बाहरी कार्यकर्ताओं के बीच संपर्क स्थापित करना।
ऊपरमाल पंच बोर्ड और किसान पंचायतों का गठन — संगठन, सदस्यता, अनुशासन, शिक्षा और समानांतर कृषक नेतृत्व की स्थापना
बिजौलिया किसान आंदोलन के इतिहास में 1916–17 का संगठनात्मक पुनर्गठन उतना ही महत्वपूर्ण था जितना 1897 की पहली सामूहिक शिकायत या 1913 की हल-बंदी। पहले किसानों ने यह सिद्ध किया था कि वे सामूहिक रूप से प्रतिरोध कर सकते हैं; अब चुनौती थी कि उस सामूहिकता को ऐसी संस्था में बदला जाए जो आंदोलन को वर्षों तक चला सके।
विजय सिंह पथिक और उनके सहयोगियों ने इसी आवश्यकता को पहचाना। गांवों में किसान पंचायतों का ढांचा खड़ा किया गया और उनके ऊपर केंद्रीय समन्वयकारी संस्था के रूप में ऊपरमाल पंच बोर्ड विकसित हुआ। उपलब्ध अध्ययनों में इसके गठन का वर्ष सामान्यतः 1917 और स्थान बैरीसाल/बेरीसाल गांव बताया गया है; बोर्ड में 13 सदस्यों और मन्ना पटेल के सरपंच होने का उल्लेख भी मिलता है।
इस संगठन की ऐतिहासिक महत्ता केवल इतनी नहीं थी कि उसने आंदोलन चलाया। उसने जागीरदार के सामने पहली बार किसानों की एक स्थायी, प्रतिनिधिक और अनुशासित सामूहिक सत्ता खड़ी कर दी।
1. किसान आंदोलन को स्थायी संगठन की आवश्यकता क्यों पड़ी?
1897 से 1913 तक किसानों ने कई प्रकार के प्रतिरोध किए थे—
वे किसी विशेष शिकायत या अवसर पर तेज होते और फिर कमजोर पड़ सकते थे।
स्थायी संगठन के बिना यह तय करना कठिन था—
गिरफ्तारी होने पर परिवार की सहायता कौन करे?
और आंदोलन की अगली रणनीति कौन तय करे?
किसान भी अपना संस्थागत नेतृत्व बनाए।
2. पुरानी पंचायत से आधुनिक किसान पंचायत तक
भारतीय गांवों में पंचायत कोई नई संस्था नहीं थी।
बिजौलिया में नवीनता यह थी कि इसी पारंपरिक संस्था को राजनीतिक किसान संगठन में बदला जाने लगा।
“जागीरदार के सामने किसान की सामूहिक नीति क्या होगी?”
3. साधु सीताराम दास ने आधार पहले ही तैयार कर दिया था
विजय सिंह पथिक के आने से पहले साधु सीताराम दास ने किसानों के बीच जागरण और संगठन की जमीन तैयार कर दी थी।
भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान की हाल की शोध-पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन बताता है कि सीताराम दास ने मित्र मंडल और बाद में विद्या प्रचारिणी सभा जैसी संस्थाओं का उपयोग शिक्षा, साक्षरता और राजनीतिक जागरण के लिए किया। वे गांव-गांव जाते और किसानों को उनकी परिस्थितियों तथा बाहर की राजनीतिक दुनिया से परिचित कराते थे।
इसलिए ऊपरमाल पंच बोर्ड अचानक शून्य में पैदा नहीं हुआ।
शिक्षा + सामाजिक जागरण + किसान संपर्क
इस दौर की एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्था थी—
इसके नाम से ही स्पष्ट है कि उसका घोषित उद्देश्य शिक्षा का प्रसार था।
लेकिन रियासती राजनीतिक परिस्थितियों में शिक्षा का अर्थ केवल अक्षरज्ञान नहीं था।
देशी रियासतों में खुली राजनीतिक गतिविधि पर नियंत्रण होने के कारण शिक्षा और सामाजिक सुधार की संस्थाएं राजनीतिक चेतना फैलाने का अपेक्षाकृत सुरक्षित माध्यम बन सकती थीं। आधुनिक अकादमिक अध्ययन भी बिजौलिया में मित्र मंडल और विद्या प्रचारिणी सभा की इसी भूमिका को रेखांकित करता है।
पथिक के बिजौलिया से जुड़ने के बाद विद्या प्रचारिणी सभा के अंतर्गत—
जैसी गतिविधियों का उल्लेख मिलता है।
प्रथम विश्वयुद्ध, युद्ध-अंशदान और 1917 का किसान प्रतिरोध — कर न देने का अभियान, बेगार-विरोध, गिरफ्तारियां और जागीर से खुला टकराव
बिजौलिया किसान आंदोलन के विकास में 1917–1918 का दौर निर्णायक राजनीतिक मोड़ था। 1897 में किसानों ने शिकायत की थी, 1913 में हल-बंदी का रास्ता अपनाया था और 1916–17 तक विजय सिंह पथिक के नेतृत्व में किसान पंचायतों तथा ऊपरमाल पंच बोर्ड के रूप में संगठन खड़ा हो चुका था। अब पहली बार इस संगठन की वास्तविक परीक्षा होने वाली थी।
इस परीक्षा का तात्कालिक कारण बना प्रथम विश्वयुद्ध।
ब्रिटिश साम्राज्य युद्ध लड़ रहा था। देशी रियासतों से धन और संसाधन जुटाए जा रहे थे और इसका बोझ अंततः ग्रामीण जनता तक पहुंच रहा था। बिजौलिया में पहले से भू-राजस्व, लाग-बाग और बेगार से परेशान किसानों से जब युद्ध के लिए अतिरिक्त आर्थिक योगदान मांगा गया तो संघर्ष फिर भड़क उठा। उपलब्ध अध्ययनों में 1916 से युद्ध-कोष संबंधी अतिरिक्त मांगों के कारण असंतोष बढ़ने और पथिक द्वारा किसानों को संगठित कर इनका विरोध कराने का उल्लेख मिलता है।
लेकिन यहां एक कालक्रम संबंधी सावधानी आवश्यक है। अलग-अलग स्रोत युद्ध-अंशदान के तीव्र विरोध को 1916, 1917 अथवा 1918 से जोड़ते हैं। इसलिए इसे किसी एक दिन या वर्ष की घटना के बजाय 1916–18 में विकसित संघर्ष के रूप में समझना अधिक सुरक्षित है। 1917 में संगठन और मांगपत्रों का चरण स्पष्ट दिखाई देता है, जबकि 1918 में व्यापक असहयोग अधिक तीखा हुआ।
1. यूरोप का युद्ध बिजौलिया के किसान तक कैसे पहुंचा?
28 जुलाई 1914 को प्रथम विश्वयुद्ध शुरू हुआ और ब्रिटेन उसके प्रमुख पक्षों में था। ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य भी स्वतः युद्ध में शामिल हो गया।
ब्रिटिश भारत के साथ देशी रियासतों से भी सहयोग अपेक्षित था।
मेवाड़ जैसी रियासतें ब्रिटिश सर्वोच्चता के अधीन थीं और साम्राज्य के प्रति राजनीतिक निष्ठा प्रदर्शित करना उनके लिए महत्वपूर्ण था।
लेकिन रियासत संसाधन कहां से जुटाती?
अंततः उसका आर्थिक आधार उसकी प्रजा थी।
इस प्रकार हजारों किलोमीटर दूर चल रहा यूरोपीय युद्ध बिजौलिया के किसान की जेब तक पहुंच गया।
इसलिए जब उससे युद्ध के लिए अतिरिक्त योगदान मांगा गया तो प्रश्न स्वाभाविक था—
जिस युद्ध का निर्णय हमने नहीं किया, उसका अतिरिक्त आर्थिक बोझ हम क्यों उठाएं?
यही प्रश्न युद्ध-अंशदान को सामान्य कर से अलग राजनीतिक अर्थ देता है।
3. युद्ध-अंशदान वास्तव में क्या था?
बिजौलिया आंदोलन के विभिन्न स्रोत इसे अलग-अलग शब्दों में दर्ज करते हैं—
युद्ध चंदा, युद्ध कोष, युद्ध-अंशदान, युद्ध ऋण अथवा वार फंड।
इतिहास की दृष्टि से मुख्य तथ्य यह है कि प्रथम विश्वयुद्ध की आवश्यकताओं के नाम पर किसानों से अतिरिक्त आर्थिक योगदान मांगा जा रहा था और किसान पंचायत ने उसका विरोध किया। IGNCA के राजस्थान संबंधी इतिहास-विवरण में भी पथिक के आह्वान पर किसानों द्वारा युद्ध ऋण देने से इनकार का उल्लेख मिलता है।
हमारी शोध सामग्री में इसलिए सबसे सुरक्षित शब्द होगा—
युद्ध-अंशदान/युद्ध कोष संबंधी अतिरिक्त मांग।
राष्ट्रीय प्रेस में बिजौलिया — गणेश शंकर विद्यार्थी का ‘प्रताप’, विजय सिंह पथिक की प्रचार रणनीति और स्थानीय किसान संघर्ष का राष्ट्रीय मुद्दे में रूपांतरण
बिजौलिया किसान आंदोलन की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक उसकी भौगोलिक और राजनीतिक एकांतता थी। किसान लगभग दो दशकों से संघर्ष कर रहे थे, लेकिन जागीर और मेवाड़ की रियासती संरचना के भीतर उनकी आवाज आसानी से सीमित की जा सकती थी। स्थानीय स्तर पर गिरफ्तारी, बेदखली, कर-वसूली या दमन हो—यदि उसकी खबर बाहर न जाए तो प्रशासन पर सार्वजनिक दबाव बहुत कम रहता था।
विजय सिंह पथिक ने इस कमजोरी को पहचाना।
उन्होंने बिजौलिया की लड़ाई को दो मोर्चों पर लड़ने की रणनीति विकसित की। पहला मोर्चा था खेत और गांव, जहां किसान पंचायतें जागीरदार के विरुद्ध संघर्ष कर रही थीं। दूसरा था जनमत और प्रेस, जहां यह साबित करना था कि बिजौलिया कोई स्थानीय झगड़ा नहीं बल्कि किसानों के अधिकारों और रियासती शासन की जवाबदेही का प्रश्न है।
इस दूसरे मोर्चे पर सबसे महत्वपूर्ण सहयोग मिला कानपुर से निकलने वाले हिंदी समाचार पत्र ‘प्रताप’ और उसके निर्भीक संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी का।
यहीं से बिजौलिया आंदोलन की एक नई यात्रा शुरू हुई—
गांव → पंचायत → पथिक → समाचार पत्र → राष्ट्रीय जनमत।
1. रियासत में किसान की सबसे बड़ी कमजोरी — उसकी आवाज बाहर नहीं जाती थी
ब्रिटिश भारत और देशी रियासतों की राजनीतिक परिस्थितियों में महत्वपूर्ण अंतर था।
ब्रिटिश प्रांतों में भी प्रेस पर अनेक प्रतिबंध थे, लेकिन—
में सक्रिय समाचार पत्र सार्वजनिक राजनीतिक बहस का मंच बन चुके थे।
देशी रियासतों में स्थिति अधिक जटिल हो सकती थी।
राजा, जागीरदार और स्थानीय प्रशासन के खिलाफ खुली आलोचना जोखिमपूर्ण थी।
बिजौलिया जैसे जागीरी क्षेत्र में किसान की शिकायत पहले स्थानीय सत्ता की दीवार से टकराती थी।
इसलिए प्रेस तक पहुंचना आंदोलन के लिए केवल प्रचार नहीं—
2. पथिक ने प्रेस की शक्ति क्यों समझी?
विजय सिंह पथिक का राजनीतिक अनुभव स्थानीय कृषक राजनीति तक सीमित नहीं था।
वे क्रांतिकारी राष्ट्रवादी नेटवर्क से जुड़े रह चुके थे।
वे जानते थे कि ब्रिटिश शासन और रियासती सत्ता के खिलाफ संघर्ष में—
बिजौलिया पहुंचने के बाद उन्होंने महसूस किया कि किसान के पास संख्या है, लेकिन उसकी आवाज सीमित है।
प्रेस उस संख्या को राजनीतिक दृश्यता दे सकता था।
यदि किसान के साथ हुए अन्याय की खबर बाहर पहुंच जाए तो शक्ति-संतुलन बदल सकता था।
बिजौलिया आंदोलन को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने वाले प्रमुख पत्रकार थे—
वे हिंदी पत्रकारिता और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के महत्वपूर्ण व्यक्तित्व थे।
गांधी, तिलक और बिजौलिया — राष्ट्रीय नेतृत्व का हस्तक्षेप, महादेव देसाई की जांच, महाराणा को पत्र और विजय सिंह पथिक से रणनीतिक मतभेद
बिजौलिया किसान आंदोलन के इतिहास में 1918–1919 का दौर स्थानीय संघर्ष और अखिल भारतीय राष्ट्रीय राजनीति के सीधे संपर्क का समय था। विजय सिंह पथिक और किसान पंचायतों ने आंदोलन को संगठित किया, राष्ट्रीय प्रेस—विशेषकर गणेश शंकर विद्यार्थी के ‘प्रताप’—ने उसे राजस्थान की सीमाओं से बाहर पहुंचाया और अब उसकी प्रतिध्वनि देश के दो सबसे प्रभावशाली राष्ट्रवादी नेताओं तक पहुंच रही थी—लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और महात्मा गांधी।
लेकिन इस राष्ट्रीय हस्तक्षेप को केवल इस सरल कथा में नहीं समेटा जा सकता कि “गांधी और तिलक ने बिजौलिया आंदोलन का समर्थन कर दिया।”
तिलक किसानों की शिकायतों को राष्ट्रीय मंच तक उठाने के प्रति अपेक्षाकृत अधिक तत्पर दिखाई देते हैं। गांधी ने भी शिकायतों को गंभीर माना, महादेव देसाई को बिजौलिया भेजा और एक चरण पर स्वयं सत्याग्रह का नेतृत्व करने की संभावना तक स्वीकार की; लेकिन वे देशी रियासतों में कांग्रेस के प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के प्रश्न पर अत्यंत सावधान थे। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण गांधी के अपने संकलित पत्राचार में मिलता है—फरवरी 1919 के एक पत्र में उन्होंने लिखा कि महादेव अभी बिजौलिया से वापस नहीं लौटे थे; संपादकीय टिप्पणी भी स्पष्ट करती है कि महादेव देसाई को गांधी ने विशेष रूप से वहां की जनता की शिकायतों की जांच के लिए भेजा था और गांधी ने एक चरण पर वहां सत्याग्रह का नेतृत्व करने पर सहमति दी थी।
यहीं विजय सिंह पथिक और गांधी की रणनीतियों के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर उभरता है।
1. बिजौलिया अब राष्ट्रीय नेतृत्व की नजर में क्यों आया?
1897 से लगभग दो दशक तक बिजौलिया का आंदोलन मुख्यतः मेवाड़ और राजस्थान के राजनीतिक दायरे में था।
1916 के बाद परिस्थितियां तेजी से बदलीं।
और राष्ट्रीय प्रेस में आंदोलन की खबरें—
इन सबने बिजौलिया को स्थानीय जागीरी विवाद से कहीं बड़ा प्रश्न बना दिया।
क्या राष्ट्रीय आंदोलन देशी रियासतों में सामंती उत्पीड़न के खिलाफ संघर्षरत जनता के साथ खड़ा होगा?
2. तिलक और गांधी तक पहुंचने के दो अर्थ
बिजौलिया का राष्ट्रीय नेताओं तक पहुंचना केवल प्रतिष्ठा की बात नहीं थी।
किसान नेतृत्व को इससे तीन चीजें मिल सकती थीं—
यदि तिलक अथवा गांधी बिजौलिया के किसानों की शिकायत को न्यायोचित मानते हैं तो मेवाड़ दरबार के लिए उसे केवल “उपद्रव” बताना कठिन हो जाता।
यही विजय सिंह पथिक की प्रचार रणनीति की बड़ी सफलता थी।
entity["politician","Bal Gangadhar Tilak","Indian nationalist leader 1856–1920"] उस समय भारतीय राष्ट्रवादी राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में थे।
बिजौलिया की परिस्थितियां उनके संज्ञान में आने के बाद उन्होंने किसानों की शिकायतों को गंभीरता से लिया।
पथिक संबंधी जीवनी साहित्य और बिजौलिया के इतिहास के अनेक विवरणों में दर्ज है कि तिलक ने मेवाड़ के महाराणा फतेह सिंह को पत्र लिखकर किसानों की मांगों पर ध्यान देने को कहा।
यह अपने आप में बड़ी राजनीतिक घटना थी।
एक जागीर के किसान प्रश्न पर अखिल भारतीय प्रतिष्ठा वाला नेता सीधे मेवाड़ के शासक से संवाद कर रहा था।
1919 की जांच, बिंदुलाल भट्टाचार्य आयोग और किसानों की शिकायतों की आधिकारिक पड़ताल — निष्कर्ष, सीमाएं और अधूरा समाधान
बिजौलिया किसान आंदोलन के इतिहास में अप्रैल 1919 में गठित बिंदुलाल भट्टाचार्य आयोग एक महत्वपूर्ण मोड़ था। लगभग दो दशकों से किसान जिन शिकायतों को सभा, प्रतिनिधिमंडल, हल-बंदी, कर-विरोध, बेगार-विरोध और असहयोग के माध्यम से उठा रहे थे, अब पहली बार मेवाड़ राज्य को उनकी औपचारिक जांच करानी पड़ी।
1897 में प्रशासन के सामने प्रश्न था—किसानों को कैसे शांत किया जाए?
क्या किसानों की शिकायतें वास्तव में न्यायसंगत हैं और क्या जागीरी व्यवस्था में सुधार आवश्यक है?
आयोग ने किसानों की शिकायतों को पर्याप्त आधार वाला पाया और राजस्व भार तथा लाग-बाग में राहत की दिशा में सिफारिशें कीं। लेकिन इन सिफारिशों को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया गया। यही कारण है कि आयोग आंदोलन का समाधान बनने के बजाय किसानों की शिकायतों की आधिकारिक पुष्टि और रियासती सुधार-तंत्र की सीमा—दोनों का प्रमाण बन गया। राजस्थान संबंधी उपलब्ध शैक्षिक स्रोत भी बताते हैं कि आयोग ने किसानों के पक्ष में सिफारिशें कीं, लेकिन उन पर निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई।
1. जांच आयोग की आवश्यकता क्यों पड़ी?
1919 तक बिजौलिया की परिस्थिति 1897 या 1913 जैसी नहीं रही थी।
और राष्ट्रीय प्रेस में बिजौलिया की चर्चा।
सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन यह था कि किसान संघर्ष को अब जागीर की सीमाओं के भीतर बंद रखना संभव नहीं था।
‘प्रताप’ सहित विभिन्न समाचार पत्र आंदोलन की खबरें बाहर पहुंचा रहे थे।
तिलक और गांधी जैसे राष्ट्रीय नेताओं तक प्रश्न पहुंच चुका था।
ऐसी परिस्थिति में मेवाड़ सरकार के सामने केवल दमन पर्याप्त विकल्प नहीं रहा।
राज्य किसानों की शिकायत सुनने को तैयार है।
अप्रैल 1919 में उदयपुर/मेवाड़ राज्य सरकार ने बिजौलिया किसानों की शिकायतों की जांच के लिए आयोग गठित किया।
उपलब्ध स्रोत उन्हें मांडलगढ़ का हाकिम बताते हैं। आयोग में उनके साथ अफजल अली और ठाकुर अमर सिंह के नाम भी मिलते हैं। राजस्थान संबंधी समकालीन परीक्षा-संदर्भ और इतिहास सामग्री में यही तीन सदस्य बार-बार दर्ज हैं।
| बिंदुलाल भट्टाचार्य | मांडलगढ़ हाकिम/अध्यक्ष |
| ठाकुर अमर सिंह | बिजौलिया प्रशासन से संबंधित अधिकारी |
अलग-अलग द्वितीयक स्रोत पदनामों की शब्दावली में थोड़ा अंतर देते हैं, इसलिए वेबसाइट के अंतिम संदर्भ संस्करण में मूल मेवाड़ अभिलेख मिलने पर पदनामों का पुनः सत्यापन उपयोगी रहेगा।
3. आयोग बनना ही किसान आंदोलन की उपलब्धि क्यों था?
किसान की हर मांग स्वीकार हो जाए तभी आंदोलन सफल हुआ—इतिहास को इस कसौटी से नहीं देखा जा सकता।
1920–21 का नया चरण — राज सिंह बेदला आयोग, असहयोग आंदोलन का प्रभाव, राजस्थान सेवा संघ और बिजौलिया संघर्ष का पुनर्गठन
1919 का बिंदुलाल भट्टाचार्य आयोग बिजौलिया किसानों की शिकायतों को समाप्त नहीं कर सका। उसने समस्या की वास्तविकता को उजागर किया, लेकिन अनुशंसाओं का पर्याप्त क्रियान्वयन नहीं हुआ। इसलिए 1920 में प्रवेश करते समय बिजौलिया में एक असामान्य स्थिति थी—किसानों की शिकायतों को गलत साबित नहीं किया गया था, फिर भी किसानों को अपेक्षित राहत नहीं मिली थी।
इसी बीच भारत की राष्ट्रीय राजनीति तेजी से बदल रही थी। जलियांवाला बाग के बाद ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष बढ़ चुका था, खिलाफत प्रश्न राष्ट्रीय राजनीति से जुड़ रहा था और महात्मा गांधी असहयोग आंदोलन की दिशा में बढ़ रहे थे। दूसरी ओर विजय सिंह पथिक बिजौलिया के अनुभव को पूरे राजपूताना की प्रजा के संघर्ष से जोड़ने में लगे थे।
इन्हीं परिस्थितियों में फरवरी 1920 में मेवाड़ सरकार ने बिजौलिया की समस्या की दूसरी औपचारिक जांच के लिए ठाकुर राज सिंह बेदला की अध्यक्षता में नया आयोग गठित किया। उपलब्ध स्रोत इसके अन्य सदस्यों के रूप में तख्त सिंह मेहता और रमाकांत मालवीय का उल्लेख करते हैं। आयोग ने भी किसानों की शिकायतों में आधार पाया, लेकिन एक बार फिर निर्णायक समाधान नहीं निकला।
इस प्रकार 1920–21 बिजौलिया के इतिहास में केवल दूसरा जांच-चरण नहीं था। यह वह समय था जब—
स्थानीय किसान आंदोलन + राष्ट्रीय असहयोग + राजस्थान सेवा संघ + प्रेस + दूसरे रियासती आंदोलनों
1. 1919 के बाद किसान के सामने मूल प्रश्न
बिंदुलाल भट्टाचार्य आयोग के बाद किसान पूछ सकता था—
यदि हमारी शिकायतें वास्तविक हैं, तो राहत कहां है?
यही प्रश्न 1920 के आंदोलन की पृष्ठभूमि बना।
अब किसान नेतृत्व के सामने दो रास्ते थे।
सरकार की अगली कार्रवाई की प्रतीक्षा की जाए।
विजय सिंह पथिक और किसान नेतृत्व ने दूसरे रास्ते को चुना।
यह निर्णय महत्वपूर्ण था, क्योंकि इससे बिजौलिया आंदोलन आयोग-निर्भर सुधार आंदोलन बनने से बच गया।
2. पहला आयोग क्यों पर्याप्त नहीं रहा?
1919 के आयोग ने आर्थिक और प्रशासनिक शिकायतों में आधार देखा था, लेकिन समस्या केवल किसी एक अधिकारी या एक कर की नहीं थी।
विवाद के केंद्र में पूरी जागीरी व्यवस्था थी—
और किसान पंचायत की बढ़ती राजनीतिक भूमिका।
इसलिए आंशिक प्रशासनिक राहत से मूल संघर्ष समाप्त नहीं हो सकता था।
1919 के बाद भी आंदोलन जारी रहना इसका सबसे स्पष्ट प्रमाण है।
पहली जांच के बाद पर्याप्त कार्रवाई न होने से किसानों ने दबाव बनाए रखा।
उपलब्ध विवरणों में किसानों द्वारा बिजौलिया की ऐसी भूमि की खेती न करने अथवा खेती की रणनीति बदलने का उल्लेख मिलता है जिस पर राजस्व भार अधिक था। आंदोलन की आर्थिक रणनीति का उद्देश्य स्पष्ट था—
यदि जागीर किसान की भुगतान क्षमता नहीं समझती, तो किसान ऐसी भूमि लेकर ही क्यों बैठे जिससे उसकी देनदारी बढ़ती जाए?
1922 का ऐतिहासिक बिजौलिया समझौता — रॉबर्ट हॉलैंड की मध्यस्थता, किसान प्रतिनिधियों से वार्ता, 35 लाग-बाग की समाप्ति और आंदोलन की पहली बड़ी विजय
लगभग पच्चीस वर्षों से चल रहे बिजौलिया किसान आंदोलन में 11 फरवरी 1922 एक ऐतिहासिक तारीख है। 1897 की गिरधरपुरा सभा से शुरू हुई यात्रा—चंवरी कर-विरोध, हल-बंदी, विजय सिंह पथिक का नेतृत्व, ऊपरमाल पंच बोर्ड, बेगार-विरोध, युद्ध-अंशदान से इनकार, गिरफ्तारियां, राष्ट्रीय प्रेस, गांधी-तिलक का ध्यान, दो सरकारी जांच आयोग और राजस्थान सेवा संघ—आखिरकार उस मुकाम पर पहुंची जहां किसान और जागीर के बीच एक व्यापक औपचारिक समझौता हुआ।
इस बार परिस्थितियां पहले से अलग थीं।
1919 और 1920 में मेवाड़ सरकार द्वारा गठित दो आयोग स्थायी समाधान नहीं निकाल सके थे। 1921 तक आंदोलन बिजौलिया से निकलकर बेगूं, पारसोली, भिंडर और दूसरे क्षेत्रों को प्रभावित करने लगा था। दिसंबर 1921 की एक प्रशासनिक रिपोर्ट में भी आसपास के ठिकानों में राजस्व न देने और असंतोष फैलने की चिंता दर्ज होने का उल्लेख मिलता है। इस बढ़ते संकट ने ब्रिटिश राजनीतिक प्रशासन को सीधे हस्तक्षेप के लिए प्रेरित किया।
राजपूताना में गवर्नर-जनरल के एजेंट सर रॉबर्ट हॉलैंड की मध्यस्थता में फरवरी 1922 में बातचीत हुई और अंततः 11 फरवरी को समझौता सामने आया।
यह बिजौलिया किसानों की पहली बड़ी संस्थागत विजय थी।
लेकिन एक महत्वपूर्ण बात शुरू में ही स्पष्ट रहनी चाहिए—
1922 का समझौता बिजौलिया आंदोलन का अंतिम अंत नहीं था।
कुछ पुराने विवरण इसे आंदोलन की समाप्ति बताते हैं, लेकिन आंदोलन 1920 के दशक में फिर उभरा और भूमि संबंधी विवादों के अंतिम समाधान तक उसकी यात्रा 1941 तक चली। इसलिए 1922 को “पहली बड़ी विजय” कहना “अंतिम विजय” कहने से अधिक ऐतिहासिक रूप से सटीक है।
1. 1921 के अंत तक स्थिति कितनी गंभीर हो चुकी थी?
उसकी संगठनात्मक पद्धति आसपास फैल रही थी।
लाग-बाग का सामूहिक विरोध किया जा सकता है,
और प्रेस के माध्यम से रियासत के बाहर समर्थन जुटाया जा सकता है।
इसका प्रभाव विशेष रूप से मेवाड़ की दूसरी जागीरों में दिखाई देने लगा।
प्रशासनिक रिपोर्टों में पारसोली, बेगूं, बासी और भिंडर तक बिगड़ती स्थिति का उल्लेख मिलता है।
“यदि बिजौलिया की पद्धति पूरे मेवाड़ और राजपूताना में फैल गई तो क्या होगा?”
2. ब्रिटिश प्रशासन अब सीधे क्यों चिंतित था?
देशी रियासतों की स्थिरता ब्रिटिश भारतीय व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण थी।
ब्रिटिश शासन रियासतों पर प्रत्यक्ष शासन नहीं करता था, लेकिन उन पर उसकी सर्वोच्चता थी।
यदि किसी रियासत में व्यापक कृषक आंदोलन पैदा हो—
और वह दूसरे क्षेत्रों में फैलने लगे—
तो ब्रिटिश राजनीतिक प्रशासन उसे केवल जागीरदार की निजी समस्या मानकर नहीं छोड़ सकता था।
विशेष रूप से 1921 में परिस्थिति और संवेदनशील थी।
1922 के समझौते के बाद का बिजौलिया — समझौते का क्रियान्वयन, उल्लंघन के आरोप, बारानी भूमि का संकट और किसान असंतोष का पुनरुत्थान (1923–1926)
11 फरवरी 1922 का समझौता बिजौलिया किसान आंदोलन की पहली बड़ी संस्थागत विजय था, लेकिन उसने उस संघर्ष को समाप्त नहीं किया जिसकी जड़ें जागीरी भूमि व्यवस्था में थीं। समझौते में अनेक लाग-बाग समाप्त करने, बेगार से राहत, लगान में कमी और आंदोलनकारियों के मुकदमों जैसे प्रश्नों पर किसानों को महत्वपूर्ण सफलता मिली थी। फिर भी कुछ ही वर्षों में किसान नेतृत्व को अनुभव होने लगा कि समझौते में स्वीकार सिद्धांत और जागीर के वास्तविक प्रशासनिक व्यवहार के बीच दूरी बनी हुई है।
यहीं से बिजौलिया आंदोलन का तीसरा और सबसे लंबा चरण आरंभ होता है।
आम तौर पर इतिहासकार 1923 से 1941 को आंदोलन का तीसरा चरण मानते हैं। इस चरण की प्रकृति पहले दोनों चरणों से अलग थी। 1897–1915 में मुख्य प्रश्न अनेक कर और जागीरी उत्पीड़न थे; 1916–22 में संगठन, पंचायत, बेगार और कर-अवज्ञा प्रमुख बने; लेकिन 1923 के बाद संघर्ष धीरे-धीरे एक अत्यंत कठिन प्रश्न पर केंद्रित होने लगा—
भूमि किस शर्त पर किसान के पास रहेगी, उसका लगान कितना होगा और यदि किसान अत्यधिक लगान के विरोध में भूमि छोड़ दे तो क्या वह उसे वापस पा सकेगा?
1923–26 इसी भूमि-संकट की भूमिका तैयार करने वाले वर्ष थे। 1928 तक किसानों में यह शिकायत व्यापक हो चुकी थी कि 1922 के समझौते का उल्लंघन किया गया है और असिंचित भूमि पर कर अत्यधिक है।
1. 1922 की विजय के तुरंत बाद उम्मीद का वातावरण
समझौते के बाद किसान की अपेक्षा स्वाभाविक थी कि अब—
भूमि-राजस्व की व्यवस्था न्यायसंगत होगी,
और किसान पंचायत को प्रशासन शत्रु संस्था की तरह नहीं देखेगा।
लगभग पच्चीस वर्ष के संघर्ष के बाद यह पहली बार था जब किसान अपनी अनेक मांगें औपचारिक रूप से मनवा चुका था।
इसलिए 1922 का वातावरण केवल राजनीतिक विजय का नहीं—
सामान्य जीवन लौटने की आशा का भी था।
लेकिन यही आशा शीघ्र ही निराशा में बदलने लगी।
2. समझौता और उसका क्रियान्वयन दो अलग प्रश्न थे
किसी किसान आंदोलन में समझौता तभी स्थायी समाधान बनता है जब—
और उल्लंघन होने पर किसान के पास प्रभावी शिकायत-तंत्र हो।
1922 में उच्च स्तर पर समझौता हो गया था।
या उच्च ब्रिटिश अधिकारी से नहीं होता था।
कुछ बाद के स्रोतों में बिजौलिया के तत्कालीन जागीरदार द्वारा 1922 के समझौते को पूरी तरह स्वीकार न करने अथवा उसके क्रियान्वयन में प्रतिरोध करने का उल्लेख मिलता है। आधुनिक राजस्थान इतिहास सामग्री भी इस बात पर जोर देती है कि समझौते के बाद उसके पालन को लेकर गंभीर समस्या बनी रही।
“11 फरवरी 1922 का पूरा समझौता अगले दिन ही रद्द कर दिया गया”
समझौते की अनेक रियायतें दी गईं, लेकिन उसके स्थायी और पूर्ण क्रियान्वयन को लेकर जागीर और किसानों के बीच शीघ्र ही विवाद पैदा हो गया।
इसका कारण केवल किसी अधिकारी की व्यक्तिगत दुर्भावना नहीं था।
यदि किसान संघर्ष के कारण बड़ी संख्या में अतिरिक्त देय समाप्त हों, बेगार पर अंकुश लगे और लगान घटे, तो जागीर की पुरानी आय-संरचना प्रभावित होना स्वाभाविक था।
इसलिए 1922 का समझौता केवल प्रशासनिक सुधार नहीं था।
1927 का भूमि-इस्तीफा आंदोलन — बढ़े हुए लगान के विरुद्ध बारानी जमीनों का सामूहिक त्याग, जमीनों की नीलामी और किसान रणनीति का गंभीर संकट
बिजौलिया किसान आंदोलन के लगभग आधी सदी लंबे इतिहास में 1927 का भूमि-इस्तीफा आंदोलन सबसे नाटकीय ही नहीं, बल्कि सबसे विवादास्पद मोड़ों में से एक था। 1922 में जिस आंदोलन ने 35 लाग-बाग हटवाकर और बेगार जैसी प्रथाओं पर महत्वपूर्ण विजय हासिल की थी, पांच वर्ष बाद वही आंदोलन ऐसी रणनीतिक उलझन में फंस गया जिसमें हजारों बीघा भूमि किसानों के हाथ से निकल गई।
इस संकट की जड़ नई भूमि-बंदोबस्त व्यवस्था और बढ़ी हुई लगान दरों में थी।
नई दरें विशेष रूप से ‘माल’ श्रेणी की भूमि पर पहले से अधिक थीं। किसान पंचायत ने आपत्ति की। बंदोबस्त अधिकारी ट्रेंच बिजौलिया आए, दोनों पक्षों को सुना और कुछ रियायतें दीं, लेकिन भूमि-राजस्व की मूल बढ़ी हुई दरें कम नहीं की गईं।
इसके बाद किसान नेतृत्व के सामने प्रश्न था—
यदि बढ़ा हुआ लगान स्वीकार नहीं करना है, तो क्या किसान उस भूमि को ही जागीर को वापस कर दें जिस पर यह लगान लगाया गया है?
विजय सिंह पथिक की सलाह और किसान प्रतिनिधियों के विचार-विमर्श के बाद मई 1927 में सामूहिक भूमि-त्याग का निर्णय लिया गया।
किसान भूमि छोड़ेंगे → कोई दूसरा किसान उसे नहीं लेगा → जागीर को राजस्व नहीं मिलेगा → जागीर लगान घटाने को मजबूर होगी।
लेकिन इस गणना की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी गलत सिद्ध हुई।
जागीर ने छोड़ी हुई भूमि दूसरे काश्तकारों को दे दी।
और जिस भूमि को किसान ने दबाव बनाने के लिए अस्थायी राजनीतिक हथियार समझकर छोड़ा था, वही भूमि वापस प्राप्त करना अगले कई वर्षों के संघर्ष का केंद्रीय प्रश्न बन गई। इस प्रकरण पर विस्तृत ऐतिहासिक अध्ययन लगभग 8,000 बीघा माल भूमि, ऊपरमाल के 96 में से करीब 40 गांवों के किसानों के इस्तीफों और अधिकांश छोड़ी गई भूमि के शीघ्र पुनः आवंटन का उल्लेख करता है।
इसलिए 1927 बिजौलिया आंदोलन को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यह किसान आंदोलन की पराजय मात्र नहीं थी।
एक अत्यंत सफल जनांदोलन भी परिस्थितियों का गलत आकलन करके गंभीर रणनीतिक संकट में फंस सकता है।
1. भूमि प्रश्न अचानक 1927 में पैदा नहीं हुआ
1927 के भूमि-इस्तीफे को समझने के लिए 1922 के समझौते के बाद की घटनाओं को ध्यान में रखना आवश्यक है।
1922 के समझौते का पूरा पालन नहीं हुआ,
किसान पंचायत के काम में हस्तक्षेप हो रहा था
1920 के दशक के उत्तरार्ध तक ये शिकायतें स्पष्ट रूप से सामने आ चुकी थीं।
इसलिए भूमि-इस्तीफा कोई अचानक उठाया गया भावनात्मक कदम नहीं था।
उसके पीछे कई वर्षों का बढ़ता आर्थिक असंतोष था।
भूमि बंदोबस्त का उद्देश्य सामान्यतः भूमि का वर्गीकरण करके राजस्व निर्धारित करना होता था।
पथिक से जमनालाल बजाज और हरिभाऊ उपाध्याय तक — नेतृत्व परिवर्तन, माणिक्यलाल वर्मा की भूमिका और भूमि वापसी के लिए आंदोलन का पुनर्गठन (1927–1930)
1927 का भूमि-इस्तीफा बिजौलिया किसान आंदोलन के लिए केवल आर्थिक झटका नहीं था। उसने आंदोलन की नेतृत्व-संरचना, रणनीति और लक्ष्य—तीनों को बदल दिया। लगभग एक दशक तक बिजौलिया के सबसे प्रभावशाली रणनीतिक नेता रहे विजय सिंह पथिक धीरे-धीरे आंदोलन के प्रत्यक्ष नेतृत्व से अलग हो गए। राजस्थान सेवा संघ भी आंतरिक मतभेदों और सरकारी दमन के कारण कमजोर पड़ गया। इसके बाद आंदोलन में तीन नाम विशेष रूप से महत्वपूर्ण होते गए—
जमनालाल बजाज, हरिभाऊ उपाध्याय और माणिक्यलाल वर्मा।
इन तीनों की भूमिकाएं समान नहीं थीं।
जमनालाल बजाज राष्ट्रीय प्रतिष्ठा, गांधी से निकटता और उच्च स्तर पर मध्यस्थता की क्षमता लेकर आए।
हरिभाऊ उपाध्याय संगठन और गांधीवादी सत्याग्रह की रणनीति के प्रमुख सूत्रधार बने।
और माणिक्यलाल वर्मा किसान समाज से सीधे जुड़े स्थानीय नेतृत्व, जनसंपर्क और संघर्ष की निरंतरता के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों में रहे।
1927 से 1930 के बीच आंदोलन का लक्ष्य भी बदल चुका था। अब केवल बढ़े हुए लगान का विरोध पर्याप्त नहीं था।
जिन किसानों ने बढ़े हुए लगान के विरोध में अपनी माल/बारानी जमीनों से इस्तीफा दिया था, उनकी जमीनें वापस दिलाई जाएं।
यही मांग 1931 के बड़े भूमि-सत्याग्रह की जमीन तैयार करेगी।
1. 1927 : विजय के आंदोलन से संकट के आंदोलन तक
1922 तक बिजौलिया का इतिहास लगातार बढ़ती सफलताओं की कहानी दिखाई देता है।
ब्रिटिश राजनीतिक प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा।
लेकिन 1927 में पहली बार आंदोलन को अपनी ही रणनीति से गंभीर नुकसान हुआ।
लगभग 8,000 बीघा माल भूमि छोड़ने के बाद किसानों को उम्मीद थी कि जागीर उसे दूसरे काश्तकारों को नहीं दे पाएगी।
जिस भूमि पर उसने राजनीतिक दबाव बनाने के लिए दावा छोड़ा था, उसे वापस कैसे प्राप्त किया जाए?
2. विजय सिंह पथिक के नेतृत्व का निर्णायक मोड़
1916 से बिजौलिया और विजय सिंह पथिक लगभग पर्याय बन चुके थे।
राष्ट्रीय नेताओं से संपर्क स्थापित किया,
और किसान आंदोलन को मेवाड़ की सीमाओं से बाहर पहचान दिलाई।
लेकिन 1927 का भूमि-त्याग निर्णय अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाया।
1931 का भूमि-वापसी सत्याग्रह — अक्षय तृतीया पर किसानों का छोड़ी हुई जमीनों पर हल चलाना, पुलिस-दमन, गिरफ्तारियां और जमनालाल बजाज की महाराणा से निर्णायक वार्ता
बिजौलिया किसान आंदोलन में 21 अप्रैल 1931 का दिन एक असाधारण मोड़ था। 1927 में बढ़े हुए भू-राजस्व के विरोध में जिन किसानों ने अपनी जमीनें छोड़ दी थीं, चार वर्ष बाद उन्होंने उसी भूमि पर वापस जाकर हल चलाने का निर्णय किया। यह केवल खेती शुरू करने की कोशिश नहीं थी; यह किसान द्वारा अपने पुराने काश्तकारी अधिकार को प्रत्यक्ष कार्रवाई के माध्यम से पुनः स्थापित करने का प्रयास था।
किसान पंचायत ने पहले ही मेवाड़ सरकार और बिजौलिया ठिकाने को इसकी सूचना दे दी थी। 19 अप्रैल 1931 को चेतावनी दी गई कि अक्षय तृतीया के दिन किसान अपनी छोड़ी हुई जमीनों को फिर अपने कब्जे में लेकर जोतना शुरू करेंगे। उस वर्ष अक्षय तृतीया 21 अप्रैल को पड़ी। सरकार ने भी तैयारी कर ली और क्षेत्र में राज्य-बल भेज दिया। उपलब्ध विस्तृत अध्ययन के अनुसार लगभग 400 किसान अपने पुराने खेतों पर हल चलाने के लिए आगे आए। राज्य-बल और ठिकाने के कर्मचारियों ने उन्हें बलपूर्वक हटाया और स्थानीय नेता माणिक्यलाल वर्मा गिरफ्तार कर लिए गए।
यही घटना 1927 की रणनीतिक पराजय को एक नए सत्याग्रह में बदल देती है।
“जिस भूमि को हमने अन्यायपूर्ण लगान के विरोध में छोड़ा था, उस पर हमारा पुराना अधिकार है और हम उस पर फिर हल चलाएंगे।”
1931 के सत्याग्रह की जड़ 1927 में थी।
नई बंदोबस्त व्यवस्था और बढ़ी हुई राजस्व दरों के विरोध में किसानों के एक हिस्से ने लगभग 8,000 बीघा माल/असिंचित भूमि छोड़ दी थी। रणनीति यह थी कि जमीन लेने वाला कोई नहीं मिलेगा और जागीर को अंततः कम लगान पर पुराने किसानों को वापस बुलाना पड़ेगा।
लेकिन जागीर ने छोड़ी हुई भूमि दूसरे काश्तकारों को दे दी।
इससे आंदोलन के सामने नया प्रश्न पैदा हुआ—
1927 से 1931 तक यही बिजौलिया संघर्ष का केंद्रीय मुद्दा बना रहा। विस्तृत ऐतिहासिक अध्ययन बताता है कि किसान पंचायत ने माणिक्यलाल वर्मा को स्थानीय नेतृत्व सौंपा और किसानों की प्राथमिक मांग छोड़ी हुई जमीनों की वापसी बन गई।
विजय सिंह पथिक 1927 में किसान पंचायत और बिजौलिया आंदोलन के प्रत्यक्ष नेतृत्व से अलग हो गए। इसके बाद जमनालाल बजाज ने हस्तक्षेप किया और हरिभाऊ उपाध्याय को आंदोलन के कार्य में लगाया।
किसान पंचायत ने इस नई व्यवस्था को स्वीकार किया—
जमनालाल बजाज और हरिभाऊ उपाध्याय सलाहकार भूमिका में,
यह विभाजन समझना महत्वपूर्ण है क्योंकि 1931 के भूमि-सत्याग्रह में प्रत्यक्ष ग्रामीण नेतृत्व वर्मा के हाथ में था, जबकि बजाज और उपाध्याय व्यापक राजनीतिक बातचीत और रणनीति से जुड़े थे।
1931 में किसान अचानक खेतों पर नहीं चढ़ गए थे।
1927 से लगातार यह प्रयास हो रहा था कि मेवाड़ सरकार और बिजौलिया ठिकाना पुराने किसानों को उनकी छोड़ी हुई जमीन वापस कर दें।
माणिक्यलाल वर्मा ने इस दिशा में प्रयास किए।
हरिभाऊ उपाध्याय ने अधिकारियों से संपर्क रखा।
वार्ता विफल होने के बाद अपनाया गया रास्ता था।
4. हरिभाऊ उपाध्याय और 1930 का सविनय अवज्ञा आंदोलन
इसी बीच देश की राजनीति तेजी से बदल रही थी।
1930 में गांधी के नमक सत्याग्रह के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ।
1931 से 1939 तक बिजौलिया का लंबा संघर्ष — भूमि-वापसी की अधूरी मांग, जमनालाल बजाज–हरिभाऊ उपाध्याय की मध्यस्थता, माणिक्यलाल वर्मा और मेवाड़ प्रजामंडल का उदय
1931 के अक्षय तृतीया भूमि-सत्याग्रह के बाद भी बिजौलिया के किसानों को वह परिणाम नहीं मिला जिसके लिए वे अपने पुराने खेतों पर हल लेकर उतरे थे। माणिक्यलाल वर्मा की गिरफ्तारी, किसानों पर कार्रवाई और जमनालाल बजाज तथा हरिभाऊ उपाध्याय के हस्तक्षेप के बावजूद 1927 में छोड़ी गई जमीनों की वापसी का प्रश्न वर्षों तक अनसुलझा रहा।
इसलिए 1931 से 1939 का काल बिजौलिया आंदोलन में पहली दृष्टि में कम नाटकीय दिखाई देता है, लेकिन ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यही वह समय है जब लगभग साढ़े तीन दशक पुराना किसान संघर्ष धीरे-धीरे एक व्यापक राजनीतिक प्रश्न में बदलता है।
मेवाड़ जैसी देशी रियासत में प्रजा के अधिकार क्या हैं, शासन किसके प्रति उत्तरदायी है और यदि रियासती प्रशासन न्याय न दे तो जनता अपनी बात किस राजनीतिक संस्था के माध्यम से रखे?
इसी संक्रमण से 1938 में मेवाड़ प्रजामंडल का जन्म हुआ और बिजौलिया के प्रमुख किसान नेता माणिक्यलाल वर्मा उसके केंद्रीय संस्थापक व्यक्तित्व के रूप में सामने आए। उपलब्ध अध्ययनों में भी बिजौलिया आंदोलन से पैदा हुई राजनीतिक चेतना को मेवाड़ प्रजामंडल के उदय की महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि माना गया है।
1. 1931 के बाद समस्या कहां अटकी थी?
21 अप्रैल 1931 को किसानों ने छोड़ी हुई भूमि पर हल चलाकर अपना दावा प्रत्यक्ष रूप से स्थापित करने का प्रयास किया था।
लेकिन राज्य ने इसे स्वीकार नहीं किया।
इसका कारण मूलतः वही था जो 1927 के बाद पैदा हुआ था—
उसे दूसरे काश्तकारों को दिया जा चुका था।
“पुराने किसानों को जमीन वापस कर दो”
भूमि के प्रशासनिक अधिकार बदल चुके थे और नए काश्तकार भी अस्तित्व में आ चुके थे।
हमने जमीन स्थायी रूप से छोड़ने के लिए नहीं, अन्यायपूर्ण लगान के विरोध में छोड़ी थी।
यही विरोधाभास पूरे दशक तक समस्या को जीवित रखता है।
2. 1931 का सत्याग्रह तत्काल सफल क्यों नहीं हुआ?
बिजौलिया आंदोलन के पहले चरणों में किसान के आर्थिक असहयोग का प्रभाव अपेक्षाकृत सीधा था।
पुराना किसान अपनी भूमि पर वापस जाता तो वहां नया काश्तकार मौजूद हो सकता था।
इसलिए भूमि-वापसी के लिए केवल सत्याग्रह पर्याप्त नहीं था।
3. किसान संघर्ष का नया चरण — आंदोलन से मध्यस्थता तक
1931 के बाद बिजौलिया आंदोलन की रणनीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है।
अब हर समय व्यापक कर-अवज्ञा या सामूहिक भूमि-कब्जा संभव नहीं था।
1939–1941 का अंतिम समाधान — महाराणा का भूमि-वापसी आदेश, सर टी. विजय राघवाचार्य और मोहन सिंह मेहता की भूमिका, किसानों को जमीन की वास्तविक वापसी और 44 वर्ष लंबे बिजौलिया आंदोलन का अंत
बिजौलिया किसान आंदोलन का अंतिम अध्याय किसी एक दिन हुए समझौते की कहानी नहीं है। 1939 से 1941 के बीच तीन अलग-अलग स्तरों पर समाधान विकसित हुआ—राजनीतिक सहमति, महाराणा का भूमि-वापसी आदेश और अंततः प्रशासनिक क्रियान्वयन। इसी अंतर को समझने पर उन स्रोतों का विरोधाभास भी काफी हद तक दूर हो जाता है जो कभी 1939 और कभी 1941 को किसानों की विजय का वर्ष बताते हैं।
उपलब्ध स्रोतों को साथ रखकर सबसे सावधान निष्कर्ष यह निकलता है—
1939 में किसानों की छोड़ी हुई भूमि लौटाने की दिशा में महाराणा का आदेश आया, लेकिन जमीन की वास्तविक और व्यापक वापसी 1941 में मेवाड़ के प्रधानमंत्री सर टी. विजय राघवाचार्य की पहल तथा राजस्व मंत्री मोहन सिंह मेहता की बिजौलिया में प्रत्यक्ष बातचीत के बाद हुई। इसी के साथ 1897 से चला आंदोलन समाप्त माना गया।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के राजस्थान इतिहास विवरण में भी स्पष्ट रूप से कहा गया है कि 1941 में किसानों को उनकी जमीनें लौटा दी गईं और इसके कारण आंदोलन समाप्त हुआ।
इस प्रकार 1897 में गिरधरपुरा की किसान सभा से शुरू हुआ संघर्ष 1941 में भूमि-वापसी तक पहुंचा—
यह अवधि बिजौलिया को आधुनिक भारत के सबसे लंबे संगठित किसान संघर्षों में स्थान देती है।
1. 1939 से पहले की स्थिति — जीतें बहुत थीं, लेकिन मूल घाव बाकी था
1941 तक पहुंचते-पहुंचते बिजौलिया किसान बहुत कुछ हासिल कर चुका था।
1922 के समझौते में अनेक लाग-बाग हटाने और बेगार जैसी शिकायतों पर राहत का रास्ता खुला था।
जागीर की मनमानी राष्ट्रीय प्रश्न बन चुकी थी।
किसान आंदोलन ने मेवाड़ के बाहर पहचान बना ली थी।
लेकिन 1927 में पैदा हुआ एक प्रश्न अभी तक पूरी तरह हल नहीं हुआ था—
1927 में बढ़े लगान के विरोध में किसानों द्वारा छोड़ी गई जमीनों का एक हिस्सा दूसरे काश्तकारों को दे दिया गया था।
1931 में किसान उन खेतों पर हल लेकर लौटे।
जमनालाल बजाज ने महाराणा से बातचीत की।
फिर भी जमीन की पूर्ण वास्तविक वापसी नहीं हुई।
राजनीतिक आंदोलन सफल हो रहा था, लेकिन किसान का खेत अभी उसके हाथ में नहीं आया था।
2. 1931 में भी भूमि-वापसी का आश्वासन मिल चुका था
यह तथ्य अंतिम समाधान समझने में बहुत महत्वपूर्ण है।
जुलाई 1931 में जमनालाल बजाज उदयपुर पहुंचे और महाराणा तथा तत्कालीन प्रधानमंत्री सर सुखदेव प्रसाद से बातचीत की।
उपलब्ध विस्तृत राजस्थान इतिहास विवरण के अनुसार इस बातचीत से एक ऐसा समझौता बना जिसमें—
माल की जमीनें धीरे-धीरे पुराने बापीदारों को लौटाने,
लेकिन समस्या वही रही जो बिजौलिया के इतिहास में बार-बार सामने आई—
समझौता और उसका क्रियान्वयन अलग-अलग चीजें थीं।
3. इसलिए 1939 अचानक आया समाधान नहीं था
1939 का घटनाक्रम 1927 से चली लगभग बारह वर्ष पुरानी भूमि समस्या का अगला चरण था।
बिजौलिया आंदोलन की उपलब्धियां और सीमाएं — लाग-बाग व बेगार पर प्रहार, भूमि-अधिकार, किसान संगठन, नेतृत्व के मतभेद, रणनीतिक भूलें और दीर्घकालीन राजनीतिक प्रभाव
बिजौलिया किसान आंदोलन का मूल्यांकन केवल इस प्रश्न से नहीं किया जा सकता कि किसानों की कितनी मांगें स्वीकार हुईं या कितने कर समाप्त हुए। 1897 से 1941 तक लगभग 44 वर्षों में फैले इस आंदोलन की वास्तविक उपलब्धि तीन स्तरों पर दिखाई देती है—आर्थिक राहत, किसान का स्थायी संगठन और सामंती व्यवस्था के अधीन रहने वाली कृषक प्रजा में राजनीतिक अधिकार-बोध का विकास।
लेकिन इसकी कहानी केवल सफलताओं की नहीं है। आंदोलन को लंबे समय तक इसलिए भी चलना पड़ा क्योंकि समझौते अधूरे रहे, नेतृत्व में मतभेद हुए, राष्ट्रीय नेतृत्व का समर्थन हमेशा समान स्तर का नहीं रहा और कुछ रणनीतियां किसानों के लिए उलटी साबित हुईं। विशेष रूप से 1927 का भूमि-इस्तीफा आंदोलन की सबसे गंभीर रणनीतिक भूलों में था, जिसका समाधान पाने में लगभग चौदह वर्ष लगे।
इसीलिए बिजौलिया को न तो केवल “किसानों की महान विजय” के रूप में और न “सामंती व्यवस्था के विरुद्ध असफल विद्रोह” के रूप में देखना पर्याप्त है।
बिजौलिया ने जागीरदारी व्यवस्था को समाप्त नहीं किया, लेकिन उसने किसान और जागीरदार के बीच शक्ति-संबंध को स्थायी रूप से बदल दिया। किसान अब केवल कर देने वाली प्रजा नहीं रहा; वह संगठित होकर कर, बेगार, भूमि-अधिकार और अंततः शासन की जवाबदेही पर प्रश्न उठाने वाला राजनीतिक समुदाय बन गया।
राजस्थान में किसान आंदोलनों पर हुए अकादमिक अध्ययन भी इस व्यापक प्रभाव की पुष्टि करते हैं। राजपूताना के किसान संगठनों ने ग्रामीण समाज में परिवर्तन पैदा किया और बाद की राजनीतिक संस्थाओं तथा कांग्रेस को नेतृत्व और जनाधार दोनों उपलब्ध कराए।
1. पहली बड़ी उपलब्धि — आर्थिक शोषण को राजनीतिक प्रश्न बनाना
बिजौलिया के शुरुआती किसान की शिकायत मूलतः आर्थिक थी।
और अनेक दूसरी देनदारियों का बोझ था।
किसान इनमें से प्रत्येक को अलग-अलग स्थानीय परंपरा या जागीरदार के अधिकार के रूप में झेलता आया था।
बिजौलिया आंदोलन ने पहली बार बड़े पैमाने पर यह प्रश्न उठाया—
जागीरदार किसान से आखिर कितना ले सकता है?
यही प्रश्न अपने आप में सामंती आर्थिक व्यवस्था को चुनौती था।
2. ‘84 लाग-बाग’ — संख्या से अधिक व्यवस्था का प्रतीक
बिजौलिया के इतिहास में “84 लाग-बाग” सबसे प्रसिद्ध पदों में है।
लेकिन जैसा हम पहले अध्याय में स्पष्ट कर चुके हैं, 84 को प्रत्येक समय लागू ठीक 84 अलग करों की प्रमाणित स्थिर सूची मानना सावधानीपूर्ण इतिहासलेखन नहीं होगा।
इस संख्या का ऐतिहासिक महत्व यह है कि उसने किसान पर पड़े अनेक प्रकार के—
इसलिए बिजौलिया आंदोलन की सफलता को केवल इस गणित से नहीं मापना चाहिए—
मनमाने सामंती उपकरों की वैधता को चुनौती देना।
3. 1922 का समझौता — आर्थिक मांगों की पहली बड़ी संस्थागत स्वीकृति
1922 का समझौता बिजौलिया की सबसे स्पष्ट उपलब्धियों में था।
ब्रिटिश भारत सरकार के राजपूताना एजेंट रॉबर्ट हॉलैंड की मध्यस्थता से किसान प्रतिनिधियों और बिजौलिया ठिकाने के बीच वार्ता हुई।
कई विवरणों में इसके परिणामस्वरूप लगभग 35 लाग-बाग समाप्त किए जाने का उल्लेख मिलता है।
लेकिन इस संख्या के संबंध में भी वही सावधानी आवश्यक है जो पिछले अध्यायों में अपनाई गई है—
इसलिए अधिक महत्वपूर्ण तथ्य संख्या नहीं बल्कि यह है कि—
जागीर प्रशासन को पहली बार संगठित किसान प्रतिनिधियों के साथ बैठकर करों और कृषक शिकायतों पर औपचारिक समझौता करना पड़ा।
बिजौलिया आंदोलन का इतिहासलेखन — औपनिवेशिक और रियासती अभिलेख, राष्ट्रवादी व्याख्या, किसान-केंद्रित अध्ययन, राजस्थान के इतिहासकार और आधुनिक अकादमिक मूल्यांकन
बिजौलिया किसान आंदोलन का इतिहास केवल घटनाओं का इतिहास नहीं है; यह इस बात का भी अच्छा उदाहरण है कि एक ही आंदोलन को अलग-अलग समय में अलग दृष्टियों से कैसे लिखा गया। जिस संघर्ष को मेवाड़ की जागीरी और औपनिवेशिक प्रशासनिक भाषा में कभी कानून-व्यवस्था, राजस्व-अवज्ञा अथवा राजनीतिक उत्तेजना की समस्या के रूप में देखा गया, राष्ट्रवादी लेखन में वही किसान जागरण और सामंती उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष बना। बाद के इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों ने इससे आगे जाकर भूमि-संबंधों, कृषक वर्ग-संरचना, नेतृत्व, जाति, राजनीतिक चेतना और देशी रियासतों की सत्ता-संरचना का विश्लेषण किया।
इसीलिए बिजौलिया पर शोध करते समय केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं कि—
“यह विवरण किसने लिखा, कब लिखा, किन स्रोतों के आधार पर लिखा और लेखक की दृष्टि क्या थी?”
इतिहासलेखन की दृष्टि से बिजौलिया विशेष रूप से समृद्ध है क्योंकि हमारे पास सरकारी अभिलेख, रियासती दस्तावेज, आंदोलनकारी नेताओं की स्मृतियां और पत्राचार, समकालीन समाचार-पत्र तथा स्वतंत्रता के बाद किए गए अकादमिक अध्ययन—सभी प्रकार की सामग्री उपलब्ध हैं। राम पांडे की Agrarian Movement in Rajasthan और बृज किशोर शर्मा की Peasant Movements in Rajasthan, 1920–1949 जैसे अध्ययनों में सरकारी रिकॉर्ड, राष्ट्रीय अभिलेखागार, राजस्थान राज्य अभिलेखागार, निजी पत्रों और आंदोलनकारी सामग्री के व्यापक उपयोग के संकेत मिलते हैं।
1. बिजौलिया का इतिहास लिखना कठिन क्यों है?
पहली समस्या आंदोलन की असाधारण लंबी अवधि है।
1897 से 1941 तक लगभग 44 वर्षों में—
इसलिए 1917 की सरकारी रिपोर्ट से 1931 की घटना समझना या 1941 की स्मृति से 1897 की प्रत्येक घटना निर्धारित करना खतरनाक हो सकता है।
जागीर का अधिकारी किसान को राजस्व-अवज्ञाकारी मान सकता था।
किसान नेता उसे शोषण के विरुद्ध सत्याग्रही कह सकता था।
राष्ट्रीय समाचार-पत्र उसे जननायक बना सकता था।
औपनिवेशिक अधिकारी उसे राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने वाला कार्यकर्ता मान सकता था।
इतिहासकार को इन सभी आवाजों को पढ़ना पड़ता है।
2. स्रोतों की पांच प्रमुख श्रेणियां
बिजौलिया के इतिहास को मोटे तौर पर पांच प्रकार के स्रोतों से पुनर्निर्मित किया जा सकता है—
1. मेवाड़ और बिजौलिया जागीर के प्रशासनिक अभिलेख
2. ब्रिटिश राजपूताना एजेंसी और भारत सरकार के रिकॉर्ड
3. आंदोलनकारी नेताओं के पत्र, संस्मरण और संगठनात्मक दस्तावेज
4. समकालीन समाचार-पत्र और पत्रिकाएं
5. स्वतंत्रता के बाद के ऐतिहासिक एवं समाजशास्त्रीय अध्ययन
इनमें से कोई भी अकेला पर्याप्त नहीं है।
3. रियासती अभिलेख — सत्ता की नजर से किसान
मेवाड़ प्रशासन और बिजौलिया जागीर के अभिलेखों का महत्व इसलिए बहुत अधिक है क्योंकि उनमें—
जैसे प्रश्नों के प्रशासनिक रिकॉर्ड मिल सकते हैं।
राजस्थान राज्य अभिलेखागार इस प्रकार के इतिहास के लिए केंद्रीय संस्था है। एम. एस. जैन की Rajasthan Through the Ages: A Comprehensive History of Rajasthan, Vol. III स्वयं राजस्थान राज्य अभिलेखागार से प्रकाशित मानक संदर्भों में है और बिजौलिया पर बाद के संदर्भ-लेखन में इसका लगातार उपयोग होता है।
सरकारी रिकॉर्ड विशेष रूप से उपयोगी होते हैं जब हमें निश्चित करना हो—
इस प्रकार की तथ्यात्मक समयरेखा बनाने में प्रशासनिक अभिलेख अक्सर संस्मरणों से अधिक विश्वसनीय आधार देते हैं।
सरकारी दस्तावेज निष्पक्ष नहीं होते।
5. प्रशासन की भाषा को इतिहास का अंतिम सत्य नहीं मानना चाहिए
किसान आंदोलन प्रशासन के लिए शासन की समस्या भी था।
इसलिए अभिलेखों में हमें ऐसी शब्दावली मिल सकती है जिसमें आंदोलनकारी गतिविधियों को—
ऐसे शब्द प्रशासन की मानसिकता बताते हैं।
बिजौलिया आंदोलन के प्रमुख व्यक्तित्व — नानजी पटेल, ठाकरी पटेल, साधु सीताराम दास, विजय सिंह पथिक, माणिक्यलाल वर्मा, जमनालाल बजाज, हरिभाऊ उपाध्याय, गणेश शंकर विद्यार्थी और आंदोलन से जुड़े प्रमुख रियासती-ब्रिटिश अधिकारी
बिजौलिया किसान आंदोलन की लगभग चार दशक लंबी यात्रा की एक विशेषता यह थी कि इसका नेतृत्व कभी एक व्यक्ति के हाथ में स्थायी रूप से नहीं रहा। 1897 के स्थानीय किसान प्रतिनिधियों से लेकर 1941 में अंतिम भूमि-वापसी कराने वाले मेवाड़ के प्रशासनिक अधिकारियों तक नेतृत्व और मध्यस्थता की कई पीढ़ियां दिखाई देती हैं।
इसीलिए बिजौलिया को केवल विजय सिंह पथिक का आंदोलन कहना जितना अधूरा है, उतना ही इसे केवल गांधीवादी किसान सत्याग्रह कहना भी। आंदोलन पथिक के बिजौलिया पहुंचने से लगभग दो दशक पहले शुरू हो चुका था और उनके सक्रिय नेतृत्व से हटने के लगभग दो दशक बाद जाकर समाप्त हुआ।
इसके प्रमुख व्यक्तित्वों को उनके ऐतिहासिक कार्य के आधार पर समझना अधिक उपयोगी होगा—
नानजी पटेल और ठाकरी पटेल — किसान शिकायत को पहली बार दरबार तक ले जाने वाले स्थानीय प्रतिनिधि।
साधु सीताराम दास — स्थानीय असंतोष और संगठित आंदोलन के बीच की कड़ी।
विजय सिंह पथिक — आंदोलन को संगठन, रणनीति और राष्ट्रीय पहचान देने वाले प्रमुख नेता।
माणिक्यलाल वर्मा — बिजौलिया से प्रजामंडल तक आंदोलन की राजनीतिक निरंतरता के प्रतिनिधि।
गणेश शंकर विद्यार्थी — स्थानीय किसान प्रश्न को राष्ट्रीय सार्वजनिक विमर्श तक पहुंचाने वाले पत्रकार।
जमनालाल बजाज और हरिभाऊ उपाध्याय — गांधीवादी मध्यस्थता और आंदोलन के उत्तरवर्ती चरण के प्रमुख सहयोगी।
महाराणा फतेह सिंह, बिजौलिया के ठिकानेदार, मेवाड़ के अधिकारी, रॉबर्ट हॉलैंड, बिंदुलाल भट्टाचार्य, राज सिंह बेदला, टी. विजय राघवाचार्य और मोहन सिंह मेहता जैसे व्यक्तियों की भूमिका हमें यह समझाती है कि राज्य ने अलग-अलग चरणों में आंदोलन का सामना कैसे किया।
1. नानजी पटेल — किसान की शिकायत को दरबार तक पहुंचाने वाला प्रारंभिक प्रतिनिधि
बिजौलिया के इतिहास में नानजी पटेल का महत्व किसी बड़े वैचारिक नेता के रूप में नहीं बल्कि स्थानीय किसान प्रतिनिधित्व के प्रारंभिक प्रतीक के रूप में है।
1897 की गिरधरपुरा सभा के बाद किसानों ने अपनी शिकायत मेवाड़ के महाराणा फतेह सिंह तक पहुंचाने का निर्णय लिया।
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की किसान आंदोलनों संबंधी अध्ययन-सामग्री में भी 1897 की गिरधरपुरा पंचायत के बाद इन दोनों को महाराणा के पास शिकायत पहुंचाने के लिए नियुक्त किए जाने का उल्लेख मिलता है।
इस घटना का महत्व सामान्य प्रतिनिधिमंडल से कहीं अधिक था।
जागीरदार और किसान के बीच का संबंध पूरी तरह जागीर का आंतरिक मामला नहीं है; किसान ऊंची सत्ता से न्याय मांग सकता है।
नानजी किसी राष्ट्रीय राजनीतिक संगठन से नहीं आए थे।
वे स्वयं उसी कृषक समाज से निकले प्रतिनिधि थे जिसकी शिकायतें आंदोलन का कारण बनीं।
इसलिए बिजौलिया की शुरुआत को बाहर से आए राजनीतिक नेताओं द्वारा पैदा किया गया आंदोलन मानने की धारणा नानजी और ठाकरी जैसे व्यक्तित्वों की मौजूदगी से खंडित हो जाती है।
1897 से 1941 तक बिजौलिया आंदोलन की विस्तृत समयरेखा — गिरधरपुरा सभा, चंवरी कर, हल-बंदी, पथिक का नेतृत्व, किसान पंचायत, 1922 समझौता, भूमि-इस्तीफा, 1931 सत्याग्रह और अंतिम भूमि-वापसी
बिजौलिया किसान आंदोलन की समयरेखा केवल तारीखों की सूची नहीं है। 1897 से 1941 के बीच इसकी प्रकृति कई बार बदली—शुरुआत स्थानीय किसान शिकायत से हुई; फिर कर और बेगार के विरुद्ध सामूहिक प्रतिरोध विकसित हुआ; विजय सिंह पथिक के समय स्थायी किसान संगठन बना; राष्ट्रीय प्रेस और राष्ट्रीय नेताओं से संपर्क हुआ; 1922 में बड़ा समझौता हुआ; 1927 में भूमि-इस्तीफे की रणनीति गंभीर संकट में बदली; 1931 में किसान अपनी जमीन वापस लेने खेतों पर पहुंचे; और अंततः 1939–41 के बीच भूमि-वापसी के साथ लगभग चार दशक पुराना विवाद समाप्त हुआ।
अकादमिक साहित्य में भी बिजौलिया को सामान्यतः 1897–1941 के तीन व्यापक चरणों में देखा गया है। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की अध्ययन-सामग्री पहला चरण 1897–1916, दूसरा 1916–1923 और तीसरा उसके बाद का मानती है; आधुनिक अकादमिक अध्ययन भी पुष्पेंद्र सुराणा और राजस्थान राज्य अभिलेखागार से प्रकाशित बिजौलिया इतिहास के आधार पर 1897–1941 की त्रिचरणीय संरचना का उल्लेख करता है।
लेकिन हमारी समयरेखा इससे अधिक सूक्ष्म होगी। जहां किसी वर्ष या तारीख पर स्रोतों में मतभेद हैं, वहां उसे स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाएगा।
1897 : गिरधरपुरा की सभा — संगठित शिकायत की शुरुआत
बिजौलिया आंदोलन का आरंभ सामान्यतः 1897 माना जाता है।
गिरधरपुरा गांव में किसानों की सभा हुई। किसान जागीर द्वारा लगाए जाने वाले करों, लाग-बाग और दूसरी देनदारियों से असंतुष्ट थे।
सभा में निर्णय हुआ कि उनकी शिकायत मेवाड़ के महाराणा तक पहुंचाई जाए।
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की अध्ययन सामग्री भी 1897 की गिरधरपुरा पंचायत, नानजी–ठाकरी के प्रतिनिधित्व और महाराणा द्वारा हामिद हुसैन को जांच के लिए भेजने का उल्लेख करती है।
इसलिए 1897 को बिजौलिया आंदोलन का प्रारंभिक वर्ष मानना उचित है।
किसानों की शिकायत के बाद मेवाड़ दरबार ने मामले की जांच के लिए—
विश्वविद्यालयी विवरण के अनुसार जांच हुई, लेकिन उसके बाद किसानों को अपेक्षित प्रभावी राहत नहीं मिली।
यह बिजौलिया के अगले चार दशकों में बार-बार दिखाई देने वाले पैटर्न की शुरुआत थी—
शिकायत → जांच → सीमित कार्रवाई → फिर असंतोष।
1898–1902 : शिकायतकर्ताओं पर दबाव और असंतोष की निरंतरता
जांच के बाद भी जागीर और किसानों के संबंध सामान्य नहीं हुए।
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की सामग्री में नानजी और ठाकरी को मेवाड़ से निष्कासित किए जाने का उल्लेख मिलता है।
इससे किसान समाज को एक महत्वपूर्ण अनुभव मिला—
दरबार तक शिकायत पहुंचाना भी जागीर सत्ता को चुनौती माना जा सकता है।
इस दौर में आंदोलन अभी स्थायी राजनीतिक संगठन नहीं बना था, लेकिन असंतोष समाप्त भी नहीं हुआ।
1903 बिजौलिया इतिहास का महत्वपूर्ण वर्ष है।
इसमें किसान की बेटी के विवाह पर ठिकाने को नकद भुगतान करना पड़ता था। विश्वविद्यालयी स्रोत इसकी राशि पांच रुपये बताते हैं।
आज पांच रुपये मामूली लग सकते हैं, लेकिन तत्कालीन ग्रामीण अर्थव्यवस्था में यह महत्वपूर्ण रकम थी।
बिजौलिया आंदोलन के प्रमुख प्राथमिक स्रोत और दस्तावेज — मेवाड़ दरबार व बिजौलिया जागीर के अभिलेख, जांच आयोगों की रिपोर्टें, 1922 समझौता, किसान पंचायत के दस्तावेज, विजय सिंह पथिक–गांधी पत्राचार, ‘प्रताप’ और समकालीन समाचार-पत्र
बिजौलिया किसान आंदोलन पर उपलब्ध साहित्य बहुत विस्तृत है, लेकिन इसकी एक बड़ी समस्या यह है कि बाद की पुस्तकों और लोकप्रिय विवरणों में कई घटनाएं बार-बार दोहराए जाने के कारण लगभग निर्विवाद तथ्य जैसी दिखाई देने लगी हैं, जबकि उनके वर्ष, तारीख, व्यक्तियों के पदनाम, करों की संख्या और समझौतों की शर्तों में स्रोतगत अंतर मिलता है।
हम पिछले अध्यायों में ऐसी कई समस्याएं देख चुके हैं—किसान पंचायत 1916 में बनी या 1917 में; 1922 में वास्तव में कितने लाग-बाग समाप्त हुए; 1939 का भूमि-वापसी आदेश और 1941 का अंतिम समाधान किस तरह एक-दूसरे से जुड़े थे; 1919 और 1920 की जांच समितियों की सटीक संरचना क्या थी।
इन प्रश्नों का अंतिम उत्तर द्वितीयक पुस्तकों से नहीं बल्कि—
इसलिए यह अध्याय बिजौलिया आंदोलन की घटनाओं को दोहराने के बजाय यह निर्धारित करेगा कि किस दावे की जांच किस प्राथमिक स्रोत से की जानी चाहिए।
1. प्राथमिक स्रोत क्या है और बिजौलिया में इसका महत्व क्यों है?
प्राथमिक स्रोत वह सामग्री है जो घटना के समय या उसके निकट तैयार हुई हो।
बिजौलिया के मामले में इनमें शामिल हैं—
- मेवाड़ दरबार की सरकारी फाइलें और आदेश
- ब्रिटिश राजपूताना एजेंसी की राजनीतिक रिपोर्टें
- किसान पंचायत के प्रस्ताव और ज्ञापन
- विजय सिंह पथिक और उनके सहयोगियों की सामग्री
- गिरफ्तारी, मुकदमे और पुलिस संबंधी दस्तावेज
इन स्रोतों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे हमें केवल यह नहीं बताते कि क्या हुआ, बल्कि यह भी बताते हैं कि उस समय विभिन्न पक्ष घटना को कैसे देख रहे थे।
2. बिजौलिया के स्रोतों को पांच पक्षों में बांटना चाहिए
पूरे प्राथमिक-स्रोत संग्रह को पांच दृष्टिकोणों में बांटना उपयोगी होगा।
किसान पंचायत, ज्ञापन, प्रतिज्ञाएं, पथिक और स्थानीय नेताओं की सामग्री।
ठिकाने के राजस्व, कर, बेगार, भूमि और प्रशासनिक रिकॉर्ड।
महाराणा, महकमा खास, राजस्व प्रशासन और जांच समितियों के दस्तावेज।
राजपूताना एजेंसी, एजेंट टू द गवर्नर-जनरल और भारत सरकार के राजनीतिक विभाग की रिपोर्टें।
समाचार-पत्र, गांधी, तिलक, गणेश शंकर विद्यार्थी, राजस्थान सेवा संघ और राष्ट्रीय राजनीतिक संगठनों की सामग्री।
इन पांचों को साथ पढ़े बिना संतुलित इतिहास संभव नहीं है।
3. राजस्थान राज्य अभिलेखागार — सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत स्रोत
बिजौलिया पर गंभीर शोध का प्रमुख केंद्र है—
राजस्थान राज्य अभिलेखागार, बीकानेर।
भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के डिजिटल जिला रिपॉजिटरी में रामनारायण चौधरी संबंधी सामग्री का स्रोत भी स्पष्ट रूप से Rajasthan State Archives, Bikaner दिया गया है। उसी सरकारी विवरण में चौधरी को बिजौलिया आंदोलन, राजस्थान सेवा संघ और पथिक से जोड़ा गया है।
राजस्थान के किसान आंदोलनों पर किए गए अकादमिक शोध में भी बार-बार—
Confidential Record, English Record, departmental files, memoranda और inquiry records
जैसे अभिलेखीय स्रोत दिखाई देते हैं। पेमाराम के Agrarian Movement in Rajasthan, 1913–1947 A.D. की उपलब्ध पुस्तक-सूचना में भी ऐसे अभिलेखीय स्रोतों के व्यापक उपयोग के संकेत मिलते हैं।
बिजौलिया स्वयं एक जागीर थी, लेकिन वह मेवाड़ राज्य की राजनीतिक संरचना का हिस्सा थी।
5. 1897 की गिरधरपुरा सभा की जांच कैसे होगी?
हमने पहले अध्याय में लिखा कि गिरधरपुरा सभा के बाद—
इसके बाद हामिद हुसैन द्वारा जांच का उल्लेख मिलता है।
क्या नानजी–ठाकरी का मूल प्रार्थना-पत्र उपलब्ध है?
महाराणा के कार्यालय ने उसे किस तारीख को दर्ज किया?
हामिद हुसैन को किस आदेश से भेजा गया?
रिपोर्ट में कितने करों का उल्लेख था?
क्या उन्होंने किसान शिकायतों को सही माना?
बिजौलिया आंदोलन पर प्रमुख द्वितीयक स्रोत और संदर्भ ग्रंथ — मानक पुस्तकें, राजस्थान के इतिहासकार, आधुनिक अकादमिक शोध, शोध-प्रबंध और उपयोगी डिजिटल अभिलेख
बिजौलिया किसान आंदोलन पर गंभीर अध्ययन के लिए प्राथमिक दस्तावेजों के साथ द्वितीयक स्रोतों की सही पहचान और उनकी आलोचनात्मक तुलना अत्यंत आवश्यक है। 1897 से 1941 तक चले इस लंबे आंदोलन पर राजस्थान के इतिहासकारों, किसान आंदोलनों के अध्येताओं, राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहासकारों और आधुनिक विश्वविद्यालयी शोधकर्ताओं ने अलग-अलग दृष्टियों से काम किया है।
इस साहित्य की विशेषता यह है कि बिजौलिया को किसी एक रूप में नहीं देखा गया। किसी लेखक के लिए यह सामंती जागीरदारी के विरुद्ध किसान संघर्ष है; किसी के लिए राजस्थान में राजनीतिक जागरण का आरंभिक चरण; किसी के लिए विजय सिंह पथिक के नेतृत्व में विकसित संगठित किसान सत्याग्रह; और आधुनिक अध्ययनों में इसे किसान की अपनी सक्रियता, रियासती सत्ता, औपनिवेशिक सर्वोच्चता, राष्ट्रवाद और प्रजामंडल राजनीति के अंतर्संबंध में देखा जाता है।
इसलिए किसी एक पुस्तक को बिजौलिया का अंतिम इतिहास मानना उचित नहीं होगा। बेहतर पद्धति है—
मानक इतिहास + क्षेत्रीय शोध + प्राथमिक अभिलेख + आधुनिक अकादमिक विश्लेषण
1. बिजौलिया पर द्वितीयक साहित्य की मुख्य श्रेणियां
उपलब्ध साहित्य को मोटे तौर पर छह वर्गों में बांटा जा सकता है—
पहला — बिजौलिया पर केंद्रित पुस्तकें और मोनोग्राफ।
दूसरा — राजस्थान के किसान आंदोलनों पर व्यापक अध्ययन।
तीसरा — राजस्थान के स्वतंत्रता और प्रजामंडल आंदोलनों का इतिहास।
चौथा — विजय सिंह पथिक, माणिक्यलाल वर्मा, जमनालाल बजाज आदि के जीवन और राजनीतिक कार्य पर अध्ययन।
पांचवां — आधुनिक विश्वविद्यालयी शोध, शोध-पत्र और शोध-प्रबंध।
छठा — सरकारी, विश्वविद्यालयी और डिजिटल अभिलेख।
इनमें पहले चार मुख्यतः व्याख्यात्मक साहित्य हैं, जबकि अंतिम दो पुराने निष्कर्षों की पुनःजांच में विशेष उपयोगी हैं।
2. पुष्पेंद्र सुराणा — बिजौलिया के अध्ययन का केंद्रीय नाम
बिजौलिया पर आधुनिक अकादमिक साहित्य में जिस विद्वान का नाम बार-बार सामने आता है, वह हैं—
उनका बिजौलिया आंदोलन पर किया गया अध्ययन बाद के अनेक शोधकर्ताओं के लिए आधार बना।
को समझने में सुराणा का कार्य महत्वपूर्ण माना जाता है।
बाद का अकादमिक साहित्य भी बिजौलिया की 1897–1941 अवधि और उसकी चरणबद्ध संरचना पर चर्चा करते हुए सुराणा के शोध का उपयोग करता है।
सुराणा के अध्ययन का महत्व केवल घटनाएं दर्ज करने में नहीं है।
उनकी उपयोगिता यह है कि बिजौलिया को—
एक दीर्घकालीन सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रिया
के रूप में समझने का प्रयास मिलता है।
1897 की प्रारंभिक किसान शिकायत और 1941 के अंतिम समाधान को जोड़ने पर ही बिजौलिया का वास्तविक स्वरूप सामने आता है।
यदि केवल 1916–22 के पथिक काल को देखा जाए तो आंदोलन का आरंभिक किसान आधार और बाद का भूमि संघर्ष दोनों गायब हो जाते हैं।
4. राजस्थान राज्य अभिलेखागार से प्रकाशित बिजौलिया इतिहास
बिजौलिया पर दूसरी अत्यंत महत्वपूर्ण श्रेणी है—
राजस्थान राज्य अभिलेखागार से संबंधित प्रकाशित सामग्री।
ऐसे प्रकाशनों का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि उनके लेखकों/संपादकों को—
इसलिए अभिलेखागार से प्रकाशित बिजौलिया-संबंधी इतिहास को सामान्य लोकप्रिय पुस्तक से अधिक स्रोत-महत्व देना चाहिए।
5. राजस्थान राज्य अभिलेखागार, बीकानेर
गंभीर शोधार्थी के लिए संस्था स्वयं अत्यंत महत्वपूर्ण है—
राजस्थान राज्य अभिलेखागार, बीकानेर।
बिजौलिया तथा राजस्थान के दूसरे किसान और प्रजा आंदोलनों पर काम करने वाले इतिहासकारों ने इसके रिकॉर्ड का व्यापक उपयोग किया है।
भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के डिजिटल जिला रिपॉजिटरी में भी रामनारायण चौधरी संबंधी ऐतिहासिक विवरण का स्रोत Rajasthan State Archives, Bikaner बताया गया है।
इसलिए किसी द्वितीयक पुस्तक में यदि राजस्थान राज्य अभिलेखागार की—
6. पेमाराम — Agrarian Movement in Rajasthan, 1913–1947 A.D.
राजस्थान के किसान आंदोलनों के अध्ययन में—
Agrarian Movement in Rajasthan, 1913–1947 A.D.
बिजौलिया को अकेले नहीं बल्कि राजस्थान की व्यापक कृषक राजनीति में रखती है।
निष्कर्ष — बिजौलिया आंदोलन को कैसे समझें? जागीरी शोषण के विरुद्ध किसान प्रतिरोध, संगठित सत्याग्रह, भूमि-अधिकार और राजस्थान में प्रजा-राजनीति के उदय का संतुलित ऐतिहासिक मूल्यांकन
बिजौलिया किसान आंदोलन को किसी एक घटना, एक नेता या एक राजनीतिक विचारधारा में समेटना उसके इतिहास को छोटा कर देना होगा। लगभग 1897 से 1941 तक फैला यह संघर्ष कई पीढ़ियों, कई नेतृत्व-चरणों और बदलती रणनीतियों से होकर गुजरा। इसकी शुरुआत किसी राष्ट्रीय राजनीतिक दल के आह्वान से नहीं हुई थी। आरंभ में बिजौलिया के किसान अपनी रोजमर्रा की समस्याओं—भारी भू-राजस्व, अनेक लाग-बाग, बेगार और जागीरी प्रशासन की मनमानी—के विरुद्ध खड़े हुए थे। लेकिन अगले चार दशकों में यही संघर्ष किसान संगठन, प्रेस, राष्ट्रीय राजनीति, सत्याग्रह, भूमि-अधिकार और अंततः मेवाड़ की प्रजा-राजनीति से जुड़ गया।
इसी कारण बिजौलिया को केवल “किसान विद्रोह” कहना भी अधूरा है और केवल “राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा” कहना भी। इसकी सबसे सटीक पहचान संभवतः एक ऐसे दीर्घकालीन कृषक संघर्ष की है जिसमें स्थानीय आर्थिक असंतोष ने पहले संगठित किसान चेतना और फिर रियासती व्यवस्था के भीतर अधिकार-आधारित राजनीति को जन्म दिया।
1. बिजौलिया की पहली विशेषता — इसकी असाधारण अवधि
भारतीय किसान आंदोलनों के इतिहास में बिजौलिया की सबसे विशिष्ट विशेषताओं में उसकी लंबी अवधि है।
की तुलना में बिजौलिया का संघर्ष किसी एक या दो वर्ष की घटना नहीं था।
इसके आरंभ और अंतिम समाधान के बीच लगभग चार दशक से अधिक का अंतर था।
इसका अर्थ है कि हमें वास्तव में एक आंदोलन के भीतर कई आंदोलनों को देखना होगा।
2. 1897 से 1941 — एक सीधी रेखा नहीं
बिजौलिया का इतिहास निरंतर समान तीव्रता से चलने वाला संघर्ष नहीं था।
इसलिए “44 वर्ष तक लगातार आंदोलन चला” का अर्थ यह नहीं कि किसान हर दिन धरने या कर-विरोध में थे।
1897 में सामने आया मूल किसान प्रश्न अगले चार दशकों तक निर्णायक और स्थायी समाधान की प्रतीक्षा करता रहा।
3. आंदोलन की जड़ राष्ट्रीय राजनीति में नहीं, स्थानीय अर्थव्यवस्था में थी
बिजौलिया के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है।
1897 में जब गिरधरपुरा की सभा हुई, तब न गांधी बिजौलिया में थे, न विजय सिंह पथिक।
राष्ट्रीय राजनीति बाद में उसमें प्रवेश करती है।
4. ‘84 लाग-बाग’ आंदोलन का प्रतीक क्यों बना?
सबसे प्रसिद्ध प्रतीकों में से एक है।
इनकी वास्तविक सूची, एक समय में लागू संख्या और स्वरूप पर स्रोतगत पुनःसत्यापन की आवश्यकता हमने पिछले अध्यायों में रेखांकित की है।
लेकिन इतिहास की दृष्टि से संख्या से भी महत्वपूर्ण है—
किसान को लग रहा था कि कृषि उत्पादन और उसके जीवन के अनेक अवसरों पर जागीर का दावा मौजूद है।
इसलिए “84 लाग-बाग” बिजौलिया की सार्वजनिक स्मृति में—
अत्यधिक सामंती आर्थिक बोझ का प्रतीक
5. बेगार केवल आर्थिक नहीं, गरिमा का प्रश्न भी थी
बेगार का अर्थ केवल मुफ्त श्रम नहीं था।
किसान को अपनी खेती और परिवार का काम छोड़कर जागीरी आवश्यकता के लिए श्रम देना पड़ सकता था।
इसलिए बेगार-विरोध को केवल आर्थिक नुकसान की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए।
किसान की व्यक्तिगत और सामाजिक गरिमा का प्रश्न।
बिजौलिया के आंदोलन ने धीरे-धीरे किसान को यह राजनीतिक भाषा दी कि उसकी श्रम-शक्ति पर भी उसका अधिकार है।
6. चंवरी कर और तलवार-बांधाई — छोटे कर, बड़े प्रतीक
किसी एक कर की रकम आज देखने पर बहुत बड़ी न लगे।
लेकिन किसान आंदोलन में कर का महत्व उसकी राशि से ही तय नहीं होता।
परिवार की बेटी के विवाह तक जागीरी दावा पहुंचने—
इसी प्रकार तलवार-बांधाई के लिए किसानों पर आर्थिक भार डालने का प्रश्न यह बताता था कि—
जागीरदार के उत्तराधिकार और राजकीय अनुष्ठान की लागत किसान क्यों वहन करे?
बिजौलिया आंदोलन की संक्षिप्त समयरेखा
बिजौलिया की सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि केवल कुछ करों या बेगार पर रोक नहीं थी। उसने जागीरी व्यवस्था में किसान को आज्ञापालक प्रजा से संगठित राजनीतिक पक्ष में बदला। पंचायत, सामूहिक अनुशासन, प्रेस और सत्याग्रह ने ग्रामीण शिकायत को दीर्घकालीन सार्वजनिक आंदोलन बनाया। समझौतों के अधूरे क्रियान्वयन, नेतृत्वगत मतभेद और बार-बार लौटे दमन के बावजूद भूमि-वापसी तक संघर्ष जारी रहना उसकी असाधारण संगठनात्मक शक्ति का प्रमाण है। इसी प्रक्रिया ने मेवाड़ और राजस्थान की प्रजा-राजनीति के लिए सामाजिक आधार तैयार किया।
प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक स्रोत
स्रोत-सावधानी: रियासती और औपनिवेशिक अभिलेख आंदोलन को प्रशासनिक समस्या की दृष्टि से देखते हैं, जबकि राष्ट्रवादी और स्थानीय स्मृतियाँ नेतृत्व तथा जन-संघर्ष पर बल देती हैं। तिथियों, करों की संख्या और समझौतों के क्रियान्वयन से जुड़े दावों को परस्पर स्रोत-मिलान के साथ रखा गया है।