omkarchaudhary.comJOURNALIST · AUTHOR · RESEARCHEROCN Research Desk
दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–015 · प्रारंभिक और आदिवासी-कृषक संघर्ष · अध्याय 15

बेगूं किसान आंदोलन (1921–1925)

बिजोलिया की चेतना से ‘बोल्शेविक समझौते’ और गोविंदपुरा गोलीकांड तक

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskसंपादित समेकित शोध संस्करण · 28 अगस्त 2026

बेगूं किसान आंदोलन को केवल जुलाई 1923 के गोविंदपुरा गोलीकांड तक सीमित करना उसके लंबे सामाजिक और राजनीतिक अर्थ को छोटा कर देना होगा। इसकी शुरुआत लाग-बाग, बेगार, लाटा-कूंता और जागीरी मनमानी के विरुद्ध गांव-आधारित पंचायतों से हुई; राजस्थान सेवा संघ और रामनारायण चौधरी ने संगठन को व्यापक बनाया; ‘बोल्शेविक समझौते’ के नाम पर रियासती–ब्रिटिश सत्ता ने स्थानीय समाधान रोका; और गोविंदपुरा के रक्तपात के बाद विजय सिंह पथिक के नेतृत्व में संघर्ष बंदोबस्त तथा कर-सुधार तक जारी रहा।

खंड 1

बेगूं जागीर, कृषक समाज और असंतोष की जड़ें

बेगूं : भूगोल, जागीर और कृषक समाज

बेगूं तत्कालीन मेवाड़ रियासत का एक महत्वपूर्ण प्रथम श्रेणी ठिकाना था और आज राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में स्थित है। इसके निकट ही बिजोलिया का वह क्षेत्र था जहां किसानों ने पहले से ही सामंती करों, बेगार और जागीरी शोषण के विरुद्ध लंबा संघर्ष खड़ा कर रखा था।

इस भौगोलिक निकटता का राजनीतिक महत्व था। बिजोलिया में जो विचार विकसित हुए—किसानों की पंचायत, सामूहिक कर-अस्वीकार, बेगार का विरोध, संगठन और बाहरी राजनीतिक कार्यकर्ताओं से संपर्क—वे आसानी से बेगूं तक पहुंचे।

बेगूं के कृषक समाज में धाकड़ किसानों की महत्वपूर्ण उपस्थिति थी। यही समुदाय बिजोलिया क्षेत्र में भी किसान प्रतिरोध का प्रमुख सामाजिक आधार रहा था। इस कारण दोनों आंदोलनों के बीच केवल वैचारिक नहीं, बल्कि सामाजिक और भौगोलिक संबंध भी थे।

असंतोष की जड़ : किसान आखिर किसके विरुद्ध लड़ रहे थे?

बेगूं आंदोलन का कारण केवल ऊंचा भूमि-लगान नहीं था। समस्या उस पूरी जागीरी आर्थिक व्यवस्था की थी जिसमें किसान की उपज, श्रम, पशु और दैनिक जीवन पर ठिकाने के अनेक प्रकार के दावे थे।

विभिन्न विवरणों में किसानों पर अनेक प्रकार की लाग-बाग और करों का उल्लेख मिलता है; कुछ स्रोत इनकी संख्या 53 तक बताते हैं। इसके साथ भूमि-लगान, बैठ-बेगार तथा लाटा-कूंता जैसी उपज-आकलन प्रणालियां असंतोष के प्रमुख विषय थीं।

लाग-बाग

भूमि-लगान के अतिरिक्त अनेक अवसरों और मदों में किसानों से अतिरिक्त देय वसूले जाते थे। समस्या केवल रकम की नहीं थी; किसान के लिए यह भी महत्वपूर्ण था कि ये देय अक्सर पारदर्शी और स्थायी नियमों के बजाय सामंती अधिकार के रूप में प्रस्तुत किए जाते थे।

बेगार

किसान या उसके परिवार से बिना उचित मजदूरी श्रम लेना जागीरी व्यवस्था का अत्यंत अपमानजनक पक्ष था।

बेगार में केवल व्यक्ति का श्रम नहीं जाता था; कई परिस्थितियों में किसान के बैल, गाड़ी और दूसरे संसाधन भी ठिकाने के काम में लग सकते थे।

अर्थात किसान के लिए बेगार का प्रश्न आर्थिक होने के साथ व्यक्तिगत स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा का भी प्रश्न था।

लाटा-कूंता

फसल के आकलन और उपज में हिस्सेदारी निर्धारित करने की प्रणालियों को लेकर भी किसानों में भारी असंतोष था। किसानों की शिकायत थी कि वास्तविक उत्पादन और देयता के निर्धारण में उन्हें मनमानी का सामना करना पड़ता था।

इसलिए बेगूं आंदोलन की केंद्रीय मांग को एक वाक्य में रखा जाए तो वह थी

किसान और ठिकाने के आर्थिक संबंधों को सामंत की इच्छा के बजाय निश्चित नियमों के अधीन किया जाए।

बिजोलिया आंदोलन : बेगूं की सबसे महत्वपूर्ण प्रेरणा

बेगूं आंदोलन को बिजोलिया से अलग करके समझना संभव नहीं है।

विजय सिंह पथिक के नेतृत्व में बिजोलिया ने यह प्रदर्शित कर दिया था कि बिखरे हुए किसानों को पंचायत और सामूहिक अनुशासन के माध्यम से संगठित किया जा सकता है।

विजय सिंह पथिक ने किसान संघर्ष को केवल स्थानीय शिकायतों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने उसे व्यापक सार्वजनिक और राजनीतिक प्रश्न में बदलने का प्रयास किया।

बिजोलिया की खबरें समाचार-पत्रों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के माध्यम से बाहर पहुंचीं। इससे किसानों को यह अनुभव हुआ कि ठिकाने के विरुद्ध शिकायत करना असंभव नहीं है।

बेगूं इसी राजनीतिक वातावरण में उठा।

इसीलिए इसे कई अर्थों में बिजोलिया का विस्तार या उसकी दूसरी प्रयोगशाला कहा जा सकता है।

1921 : मेनाल के भैरूकुंड में आंदोलन का आरंभ

1921 में बेगूं के किसान मेनाल के निकट भैरूकुंड में एकत्र हुए।

यहीं सामूहिक संघर्ष का निर्णय लिया गया। उपलब्ध विवरण इस सभा को आंदोलन की औपचारिक शुरुआत मानते हैं।

अनुचित लाग-बाग समाप्त हों, बेगार बंद हो, लगान न्यायसंगत हो, फसल के आकलन में मनमानी न हो और किसानों के साथ ठिकाने के कर्मचारियों का अत्याचार समाप्त किया जाए।

यहां एक महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है।

पहले किसान व्यक्तिगत रूप से राहत मांगता था।

अब किसान समुदाय सामूहिक अधिकार की भाषा बोलने लगा था।

खंड 2

पंचायत, राजस्थान सेवा संघ और संगठित असहयोग

पंचायत : आंदोलन की वास्तविक शक्ति

बेगूं आंदोलन में किसान पंचायत केवल सभा आयोजित करने वाली संस्था नहीं थी।

उसने किसानों के सामाजिक अनुशासन को नियंत्रित करना शुरू किया।

किसान सामूहिक निर्णय लेते, एक-दूसरे को आंदोलन से जुड़े रहने के लिए प्रेरित करते और ठिकाने से व्यक्तिगत समझौते से बचने का प्रयास करते थे।

यही रणनीति जागीरदार के लिए सबसे गंभीर चुनौती थी।

क्योंकि जागीरी सत्ता का आधार किसान और सामंत के बीच व्यक्तिगत अधीनता का संबंध था।

का सामूहिक राजनीतिक संबंध बना दिया।

रामनारायण चौधरी और राजस्थान सेवा संघ

बेगूं के किसानों ने बिजोलिया के नेताओं और राजस्थान सेवा संघ से संपर्क किया।

विजय सिंह पथिक ने आंदोलन में सहायता के लिए रामनारायण चौधरी को भेजा। रामनारायण चौधरी धीरे-धीरे बेगूं आंदोलन के प्रमुख संगठकों में बदल गए।

उनकी भूमिका कई स्तरों पर महत्वपूर्ण थी

किसानों की मांगों को व्यवस्थित करना, पंचायत को संगठनात्मक रूप देना, संघर्ष को अनुशासित बनाए रखना, राजस्थान सेवा संघ से संपर्क कायम रखना और आंदोलन की सूचना बाहरी दुनिया तक पहुंचाना।

रामनारायण चौधरी पत्रकारिता से भी जुड़े थे। किसान आंदोलनों की खबरों को व्यापक सार्वजनिक क्षेत्र तक पहुंचाने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।

इससे बेगूं पहली बार एक ऐसी स्थिति में पहुंचा जहां

ठिकाने का स्थानीय विवाद सार्वजनिक राजनीतिक प्रश्न बनने लगा।

आंदोलन की रणनीति : केवल प्रदर्शन नहीं, असहयोग

बेगूं आंदोलन की रणनीति में गांधीवादी दौर के व्यापक राजनीतिक वातावरण और बिजोलिया के अनुभव—दोनों की छाप दिखाई देती है।

किसानों ने विभिन्न चरणों में

अनुचित लाग-बाग न देने, बेगार न करने, फसल का मनमाना कूंता स्वीकार न करने, ठिकाने की अदालतों और कार्यालयों का बहिष्कार करने और सामूहिक पंचायत के निर्णय मानने

1922 में आंदोलन लगान न देने के अभियान की दिशा में भी बढ़ा।

लगान किसी भी सामंती अथवा औपनिवेशिक कृषि व्यवस्था में सत्ता की आर्थिक धुरी था।

इसलिए कर-अस्वीकार का अर्थ था कि किसान सीधे ठिकाने की प्रभुसत्ता को चुनौती दे रहा है।

ठिकाने की प्रतिक्रिया : समझौते और दमन के बीच

बेगूं के तत्कालीन ठिकानेदार रावत अनूप सिंह थे।

प्रारंभ में आंदोलन को दबाने के प्रयास हुए। कर्मचारियों और किसानों के बीच टकराव बढ़ा। कुछ स्रोत 1921–22 के दौरान किसान सभाओं पर हिंसक कार्रवाई का भी उल्लेख करते हैं।

लेकिन आंदोलन समाप्त नहीं हुआ।

इससे ठिकाने के सामने समस्या पैदा हुई।

यदि केवल दमन किया जाता, तो आंदोलन और फैल सकता था।

यदि किसानों की मांगें स्वीकार की जातीं, तो जागीरी अधिकार कमजोर पड़ते।

अंततः बातचीत का रास्ता खुला।

खंड 3

अनूप सिंह समझौता, ‘बोल्शेविक’ भय और राज्य नियंत्रण

अनूप सिंह–किसान समझौता

लगभग दो वर्षों के संघर्ष के बाद बेगूं के ठिकानेदार और किसान प्रतिनिधियों/राजस्थान सेवा संघ के बीच समझौते की दिशा बनी।

विजय सिंह पथिक की मध्यस्थ भूमिका महत्वपूर्ण थी।

समझौते में किसानों की कई शिकायतों को स्वीकार करने की संभावना बनी।

यदि यह समझौता लागू हो जाता तो किसान आंदोलन को अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण समाधान मिल सकता था।

लेकिन यहीं एक तीसरी शक्ति निर्णायक रूप से सामने आई

मेवाड़ राज्य और ब्रिटिश राजनीतिक सत्ता।

इसे ‘बोल्शेविक समझौता’ क्यों कहा गया?

बेगूं के इतिहास का सबसे दिलचस्प राजनीतिक प्रसंग यही है।

मेवाड़ के ब्रिटिश रेजिडेंट/राज्य अधिकारियों ने समझौते को स्वीकार नहीं किया और इसे “बोल्शेविक समझौता” अथवा “बोल्शेविक बंदोबस्त” कहा गया।

1917 की रूसी क्रांति के बाद ब्रिटिश साम्राज्य के प्रशासनिक शब्दकोश में ‘बोल्शेविक’ शब्द सामाजिक विद्रोह, संपत्ति-संबंधों को चुनौती और स्थापित सत्ता के विरुद्ध जनसंगठन के भय से जुड़ गया था।

बेगूं में किसानों और जागीरदार के बीच सीधा समझौता ब्रिटिश-रियासती सत्ता के लिए इसलिए खतरनाक था कि इससे एक मिसाल बन सकती थी

क्या किसान पंचायत दबाव बनाकर जागीरदार से सामंती अधिकारों में कटौती करा सकती है?

यदि उत्तर ‘हां’ होता तो यही तरीका दूसरे ठिकानों में भी फैल सकता था।

इसलिए बेगूं का प्रश्न अब करों की दर का प्रश्न नहीं रहा।

यह राज्य की प्रभुसत्ता और किसान पंचायत की वैधता का प्रश्न बन गया।

जागीर पर राज्य का नियंत्रण

समझौते को स्वीकार करने के बजाय मेवाड़ राज्य ने हस्तक्षेप किया।

अनूप सिंह को उदयपुर बुलाया गया और मार्च 1923 में बेगूं जागीर का प्रशासन राज्य प्रबंधन के अधीन ले लिया गया।

यह घटना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

किसान पंचायत बनाम मेवाड़ राज्य।

यानी किसानों के सामने स्थानीय सामंत से कहीं अधिक शक्तिशाली प्रशासनिक और सैन्य सत्ता आ गई।

ट्रेंच आयोग : समाधान या राज्य की शर्तें?

जून 1923 में मेवाड़ राज्य ने जी. सी. ट्रेंच, जो राज्य के बंदोबस्त आयुक्त थे, की अध्यक्षता में जांच की व्यवस्था की।

औपचारिक उद्देश्य किसानों की शिकायतों और राजस्व संबंधी विवादों की जांच था।

लेकिन आयोग और किसान पंचायत के बीच आरंभ से ही अविश्वास था।

आयोग चाहता था कि किसान बेगूं जाकर उसके सामने उपस्थित हों।

किसान चाहते थे कि आयोग उनके केंद्र रायता में आए।

किसानों ने अंततः आयोग की कार्यवाही का बहिष्कार किया।

यह छोटा प्रशासनिक विवाद नहीं था।

किसकी प्रक्रिया वैध है—राज्य की या किसान पंचायत की?

खंड 4

गोविंदपुरा का संकट, गोलीकांड और व्यापक दमन

10 जुलाई का निर्णय और बढ़ता संकट

ट्रेंच आयोग ने किसानों की सक्रिय भागीदारी के बिना अपना निर्णय तैयार किया और लगभग 10 जुलाई 1923 को इसे किसान पंचायत तक भेजा गया।

किसानों को यह स्वीकार्य नहीं था।

उन्होंने सामूहिक रूप से स्थिति पर विचार करने का फैसला किया।

इसी निर्णय ने बेगूं आंदोलन को उसके सबसे दुखद क्षण तक पहुंचाया।

गोविंदपुरा की किसान सभा

जुलाई 1923 में बड़ी संख्या में किसान गोविंदपुरा में एकत्र हुए।

उनका उद्देश्य ट्रेंच आयोग के फैसले और आगे की रणनीति पर विचार करना था।

किसान अपने आंदोलन को पंचायत के माध्यम से संचालित कर रहे थे और आयोग के निर्णय को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।

राज्य ने इस सभा को केवल शिकायतकर्ताओं की बैठक नहीं माना।

प्रशासन की दृष्टि में यह राज्य के आदेश की अवज्ञा कर रही संगठित शक्ति थी।

13 जुलाई 1923 : गोविंदपुरा गोलीकांड

13 जुलाई 1923 की सुबह ट्रेंच राज्य की सैन्य शक्ति के साथ गोविंदपुरा पहुंचा।

किसानों को आयोग का निर्णय स्वीकार करने के लिए कहा गया।

किसान नेतृत्व ने इनकार किया।

इसके बाद स्थिति हिंसक हो गई और सैनिक कार्रवाई तथा गोलीबारी हुई।

इस गोलीबारी में दो नाम राजस्थान के किसान इतिहास में स्थायी रूप से दर्ज हो गए

रूपाजी धाकड़

कृपाजी धाकड़

दोनों किसान आंदोलन के शहीद प्रतीक बन गए।

आज बेगूं आंदोलन की ऐतिहासिक स्मृति मुख्यतः इन्हीं दोनों नामों से जुड़ी हुई है।

मृतकों और घायलों की संख्या : स्रोतों में मतभेद

यहां शोध की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है।

गोविंदपुरा घटना में मृतकों, घायलों और गिरफ्तार लोगों की संख्या पर विभिन्न विवरण समान नहीं हैं।

एक उपलब्ध विवरण के अनुसार सरकारी अभिलेखों में एक मृत्यु, लगभग 25 घायल और 485 गिरफ्तारियां दर्ज थीं, जबकि तरुण राजस्थान ने 11 मृतक, लगभग 100 घायल तथा महिलाओं और बच्चों सहित 540 गिरफ्तारियों का दावा किया। दूसरी ओर आंदोलन की स्थापित स्मृति और अधिकांश बाद के विवरण विशेष रूप से रूपाजी और कृपाजी को गोलीकांड के दो शहीदों के रूप में दर्ज करते हैं।

इसलिए इतिहास लेखन में किसी एक संख्या को निर्विवाद घोषित करने के बजाय स्रोत-भेद स्पष्ट करना अधिक उचित है।

दमन केवल गोलीबारी तक सीमित नहीं था

गोविंदपुरा के बाद प्रशासन ने आंदोलन की संगठनात्मक संरचना को तोड़ने की कोशिश की।

गिरफ्तारियां हुईं, नेताओं पर दबाव बढ़ा और पंचायतों को कमजोर करने का प्रयास हुआ।

समकालीन तथा बाद के कुछ विवरण सैनिक कार्रवाई के दौरान ग्रामीणों के साथ गंभीर दुर्व्यवहार के आरोप भी दर्ज करते हैं।

ऐसे आरोपों को स्रोत-समीक्षा के साथ पढ़ना आवश्यक है, क्योंकि रियासती अभिलेख और आंदोलनकारी प्रेस घटनाओं का अलग-अलग चित्र प्रस्तुत करते हैं।

लेकिन इतना निर्विवाद है कि जुलाई 1923 के बाद संघर्ष ने एक अत्यंत कठोर दमनात्मक चरण में प्रवेश किया।

खंड 5

पथिक का नेतृत्व, गिरफ्तारियां, किसान धैर्य और महिलाएं

विजय सिंह पथिक ने स्वयं कमान संभाली

गोविंदपुरा गोलीकांड के बाद विजय सिंह पथिक ने आंदोलन में अधिक प्रत्यक्ष भूमिका ग्रहण की।

पथिक पहले ही बिजोलिया के कारण मेवाड़ प्रशासन की निगाह में अत्यंत प्रभावशाली और खतरनाक राजनीतिक कार्यकर्ता माने जाते थे।

बेगूं में उनकी सक्रियता ने प्रशासन की चिंता और बढ़ा दी।

किसान प्रश्न अब स्थानीय जागीरी विवाद नहीं रह गया था।

किसान चेतना + प्रेस + राजनीतिक संगठन + राष्ट्रवादी कार्यकर्ता

की संयुक्त शक्ति का उदाहरण बन रहा था।

नेताओं पर दमन

राजस्थान सेवा संघ से जुड़े कार्यकर्ताओं पर राज्य का दबाव बढ़ा।

रामनारायण चौधरी को भी गिरफ्तार किया गया और राजद्रोह संबंधी कार्रवाई का सामना करना पड़ा। उपलब्ध जीवनी विवरण उनके 1923 में गिरफ्तारी और उदयपुर जेल में कारावास का उल्लेख करते हैं।

विजय सिंह पथिक की गतिविधियों पर भी प्रशासन ने कठोर कार्रवाई की।

किसान और बाहरी राजनीतिक नेतृत्व के बीच संपर्क काट देना।

फिर भी आंदोलन क्यों नहीं टूटा?

बेगूं आंदोलन की शक्ति उसके किसी एक नेता में नहीं थी।

उसका आधार गांवों की पंचायत और सामूहिकता थी।

यही कारण था कि नेता गिरफ्तार होने के बावजूद किसानों की मूल मांग समाप्त नहीं हुई।

यह बिजोलिया और बेगूं दोनों आंदोलनों की महत्वपूर्ण विशेषता थी

नेतृत्व आवश्यक था, लेकिन आंदोलन का वास्तविक सामाजिक आधार गांव था।

महिलाओं की भूमिका

बेगूं जैसे आंदोलनों के पुराने इतिहासलेखन में महिलाओं की भूमिका अक्सर हाशिये पर चली जाती है।

लेकिन बाद के विवरणों में अंजना देवी चौधरी सहित महिलाओं की सक्रियता का उल्लेख मिलता है।

किसान आंदोलन में महिलाओं की भूमिका केवल सभाओं तक सीमित नहीं समझी जानी चाहिए।

जब पुरुष गिरफ्तार होते थे, जब पशुओं या संपत्ति पर कार्रवाई होती थी, जब बेगार का दबाव पूरे परिवार पर पड़ता था—तब संघर्ष स्वतः परिवार और ग्रामीण समुदाय का संघर्ष बन जाता था।

इस दृष्टि से बेगूं किसान आंदोलन राजस्थान में ग्रामीण महिलाओं की राजनीतिक सक्रियता के विकास की प्रक्रिया का भी हिस्सा था।

खंड 6

नया बंदोबस्त, बेगार और कर-सुधार का प्रश्न

दिसंबर 1923 से नया बंदोबस्त

गोविंदपुरा के दमन के बावजूद प्रशासन किसान प्रश्न को केवल सैन्य बल से समाप्त नहीं कर पाया।

अंततः दिसंबर 1923 से बेगूं में नया बंदोबस्त आरंभ हुआ।

करों की दरें निश्चित करने, अनेक लागों को हटाने और बेगार समाप्त करने की दिशा में परिवर्तन हुए।

कुछ विवरण आंदोलन के व्यावहारिक समाधान को 1924 तथा सुधारों की आगे की प्रक्रिया को 1925 तक रखते हैं।

इसीलिए आंदोलन को केवल “1923 में समाप्त” कहना ऐतिहासिक प्रक्रिया को जरूरत से ज्यादा संक्षिप्त कर देता है।

क्या बेगार वास्तव में समाप्त हुई?

आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में बेगार प्रथा की समाप्ति को गिना जाता है।

लेकिन यहां भी एक अंतर समझना जरूरी है

कानूनी अथवा प्रशासनिक समाप्ति और ग्रामीण व्यवहार में तत्काल पूर्ण समाप्ति एक ही बात नहीं हैं।

सदियों से चली आ रही सामंती प्रथाएं केवल एक आदेश से सामाजिक व्यवहार से गायब नहीं होतीं।

फिर भी राज्य द्वारा बेगार को वैध सामंती अधिकार के रूप में बचाना कठिन हो जाना अपने आप में बड़ी उपलब्धि थी।

करों की मनमानी से बंदोबस्त की ओर

बेगूं आंदोलन की दूसरी बड़ी उपलब्धि कराधान को अधिक निश्चित नियमों में बांधने का प्रयास था।

पुरानी व्यवस्था में सामंत का अधिकार प्राथमिक था।

किसान से कितना लिया जा सकता है और किस नियम के आधार पर?

यही प्रश्न आगे आधुनिक भूमि-राजस्व प्रशासन और कृषक अधिकार की अवधारणा का आधार बनता है।

इस अर्थ में बेगूं केवल “कर कम कराने” का आंदोलन नहीं था।

यह मनमाने सामंती अधिकार को नियमबद्ध कृषक–राज्य संबंध में बदलने का संघर्ष था।

खंड 7

बिजोलिया से तुलना और गांधीवादी–साम्राज्यवादी द्वंद्व

बेगूं और बिजोलिया : समानताएं और अंतर

दोनों आंदोलनों में उल्लेखनीय समानताएं थीं

एक ही व्यापक मेवाड़ क्षेत्र, धाकड़ किसानों की महत्वपूर्ण भूमिका, लाग-बाग और बेगार का विरोध, विजय सिंह पथिक और राजस्थान सेवा संघ का प्रभाव तथा पंचायत आधारित संगठन।

लेकिन अंतर भी महत्वपूर्ण था।

बिजोलिया आंदोलन लंबी अवधि में अनेक चरणों से गुजरा।

बेगूं आंदोलन अपेक्षाकृत कम समय में अत्यंत तीव्र टकराव तक पहुंच गया।

और बेगूं में गोविंदपुरा गोलीकांड ने संघर्ष को तत्काल शहादत और राज्य-दमन की स्मृति प्रदान कर दी।

बिजोलिया ने किसान संगठन की पद्धति विकसित की; बेगूं ने दिखाया कि वही पद्धति पूरे जागीरी ढांचे के लिए कितनी बड़ी चुनौती बन सकती थी।

गांधीवादी असहयोग और बेगूं

बेगूं आंदोलन 1921 में शुरू हुआ—ठीक उसी समय जब पूरे भारत में असहयोग आंदोलन अपने चरम की ओर था।

लेकिन बेगूं को सीधे कांग्रेस द्वारा संचालित असहयोग आंदोलन मानना उचित नहीं होगा।

उसकी जड़ें स्थानीय कृषि-सामंती परिस्थितियों में थीं।

फिर भी दोनों के बीच राजनीतिक वातावरण का संबंध था।

अदालतों का बहिष्कार, सरकारी संस्थाओं से दूरी, सामूहिक असहयोग और स्वदेशी चेतना जैसी प्रवृत्तियां उस समय के व्यापक राष्ट्रीय राजनीतिक वातावरण से मेल खाती थीं।

स्थानीय किसान संघर्ष और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की नई राजनीतिक भाषा

एक-दूसरे को प्रभावित कर रही थीं।

‘बोल्शेविक’ और ‘गांधीवादी’—दोनों का भय

बेगूं का एक दिलचस्प वैचारिक विरोधाभास था।

किसानों के तरीके काफी हद तक सामूहिक असहयोग और पंचायत पर आधारित थे।

फिर भी उनके समझौते को ब्रिटिश राजनीतिक सत्ता ने “बोल्शेविक” कहा।

इससे स्पष्ट होता है कि औपनिवेशिक शासन के लिए वास्तविक खतरा केवल हिंसक क्रांति नहीं था।

यदि किसान स्वयं संगठित होकर कर और सामंती अधिकार तय करने लगे, तो शांतिपूर्ण पंचायत भी सत्ता के लिए क्रांतिकारी चुनौती बन सकती थी।

खंड 8

उपलब्धियां, सीमाएं और स्वतंत्रता के बाद का समाधान

बेगूं आंदोलन की प्रमुख उपलब्धियां

आंदोलन की उपलब्धियों को केवल अंतिम समझौते से नहीं मापा जाना चाहिए।

इसने किसान को प्रजा से अधिकार मांगने वाले राजनीतिक समुदाय में बदलने में सहायता की।

बेगार के विरुद्ध निर्णायक दबाव बना।

कई लाग-बाग पर पुनर्विचार हुआ।

लगान और राजस्व निर्धारण को अधिक निश्चित बनाने की दिशा बनी।

किसान पंचायत की शक्ति स्थापित हुई।

सामंती शोषण सार्वजनिक बहस का विषय बना।

राजस्थान सेवा संघ और किसान समाज के बीच संबंध मजबूत हुए।

और गोविंदपुरा की घटना ने किसान दमन को राजपूताना के व्यापक राजनीतिक विमर्श में ला दिया।

आंदोलन की सीमाएं

बेगूं की उपलब्धियां महत्वपूर्ण थीं, लेकिन इसे संपूर्ण कृषक मुक्ति मानना भी गलत होगा।

भूमि पर किसान का पूर्ण स्वामित्व स्थापित नहीं हुआ।

रियासती राजनीतिक व्यवस्था कायम रही।

किसानों को नागरिक लोकतांत्रिक अधिकार प्राप्त नहीं हुए।

राज्य की दमनकारी शक्ति भी बनी रही।

सामंती व्यवस्था को समाप्त नहीं किया; उसके कुछ सबसे शोषणकारी अधिकारों को सीमित किया।

आंदोलन 1923 के बाद कहां गया?

गोविंदपुरा, दमन और नए बंदोबस्त के बाद बेगूं का तीव्र आंदोलन धीरे-धीरे कमजोर पड़ा।

लेकिन उसकी राजनीतिक विरासत समाप्त नहीं हुई।

राजस्थान में किसान आंदोलनों की जो श्रृंखला बिजोलिया से विकसित हुई थी, उसने आगे मेवाड़ और राजपूताना के दूसरे क्षेत्रों में किसान संगठनों और प्रजामंडल राजनीति के लिए सामाजिक आधार तैयार किया।

इस प्रक्रिया में किसान की मांग बदलती गई

उत्तरदायी शासन और जागीरदारी का अंत करो।

बेगूं इस ऐतिहासिक संक्रमण की महत्वपूर्ण कड़ी था।

स्वतंत्रता के बाद बेगूं की मांगों का व्यापक समाधान

बेगूं आंदोलन के समय किसान जागीरदारी समाप्त कराने की स्थिति में नहीं थे।

वह परिवर्तन स्वतंत्रता के बाद राजस्थान के एकीकरण और भूमि सुधारों के साथ आया।

जागीरों की समाप्ति, मध्यस्थ सामंती अधिकारों का उन्मूलन, काश्तकारी कानून और भूमि सुधारों ने उस पुराने ढांचे को कानूनी रूप से समाप्त किया जिसके विरुद्ध बिजोलिया और बेगूं के किसान दशकों पहले संघर्ष कर रहे थे।

इसलिए स्वतंत्रता के बाद के भूमि सुधारों को बेगूं की सीधी उपलब्धि कहना अतिशयोक्ति होगी, लेकिन उन्हें उस दीर्घ किसान संघर्ष की ऐतिहासिक परिणति अवश्य माना जा सकता है जिसने जागीरदार और किसान के संबंध को राजनीतिक प्रश्न बना दिया था।

खंड 9

1921 : भैरूकुंड से गांवों तक प्रतिरोध का विस्तार

1921 — मेनाल के भैरूकुंड से संगठित किसान प्रतिरोध का आरंभ

बेगूं किसान आंदोलन अचानक पैदा नहीं हुआ था। उसके ठीक पड़ोस में चल रहे बिजोलिया किसान आंदोलन ने किसानों को दिखा दिया था कि लाग-बाग, बेगार और मनमाने लगान के विरुद्ध व्यक्तिगत शिकायतों के बजाय सामूहिक संगठन बनाया जा सकता है। बेगूं के कृषकों—विशेष रूप से धाकड़ किसानों—पर इसका सीधा प्रभाव पड़ा। सरकारी और बाद के इतिहास-विवरण दोनों बेगूं को बिजोलिया से प्रेरित आंदोलन के रूप में देखते हैं।

1921 में किसान मेनाल क्षेत्र के भैरूकुंड में एकत्रित हुए। इस सभा का महत्व इसलिए था कि यहीं असंतोष को संगठित प्रतिरोध में बदलने का निर्णय हुआ। किसानों की शिकायतें केवल भूमि-लगान तक सीमित नहीं थीं। वे अत्यधिक लाग-बाग, बैठ-बेगार, जबरन श्रम, लाटा-कूंता जैसी उपज-आकलन व्यवस्था और जागीरी कर्मचारियों की मनमानी से परेशान थे। कुछ बाद के स्रोत 53 प्रकार के देयों का उल्लेख करते हैं, लेकिन इस संख्या की स्वतंत्र अभिलेखीय पुष्टि सीमित है; इसलिए इसे निर्विवाद संख्या मानने के बजाय प्रचलित विवरण के रूप में रखना उचित है।

भैरूकुंड की सभा के बाद किसानों ने केवल मांगपत्र देने की नीति नहीं अपनाई। वे धीरे-धीरे असहयोग की दिशा में बढ़े—अनुचित लाग न देना, बेगार से इनकार करना, ठिकाने की अदालतों तथा कार्यालयों का बहिष्कार और फसल के मनमाने कूंते को अस्वीकार करना आंदोलन के प्रमुख हथियार बने।

1921 — रामनारायण चौधरी और राजस्थान सेवा संघ से संपर्क

किसानों ने अपने संघर्ष को अधिक व्यवस्थित बनाने के लिए बिजोलिया आंदोलन के प्रमुख प्रेरक विजय सिंह पथिक से सहायता मांगी। पथिक ने स्वयं तत्काल स्थायी रूप से बेगूं में रहने के बजाय रामनारायण चौधरी को संगठनात्मक सहायता के लिए आगे किया।

इस प्रकार स्थानीय किसान पंचायत और बाहर के राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच संबंध बना। राजस्थान सेवा संघ की भूमिका इसी स्तर पर महत्वपूर्ण हुई। उसने किसानों की शिकायतों को स्थानीय जागीरी सीमा से बाहर सार्वजनिक प्रश्न बनाने में सहायता की।

यह बेगूं आंदोलन के विकास में पहला निर्णायक परिवर्तन था

स्थानीय कृषक असंतोष अब संगठित किसान आंदोलन बन रहा था।

1921 — चांदखेड़ी और प्रारंभिक दमन

कुछ राजस्थान-इतिहास विवरण मई 1921 में चांदखेड़ी के आसपास आयोजित किसान सभा पर ठिकाने के कर्मचारियों की कठोर कार्रवाई का उल्लेख करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि जागीरी प्रशासन ने प्रारंभ से ही पंचायत आधारित लामबंदी को सामान्य शिकायत-निवारण प्रक्रिया नहीं माना।

दमन का उद्देश्य किसानों को यह संदेश देना था कि

ठिकाने के आर्थिक अधिकारों को सामूहिक रूप से चुनौती देना स्वीकार्य नहीं होगा।

लेकिन इसका उलटा प्रभाव पड़ा। किसान संघर्ष समाप्त करने के बजाय अधिक संगठित होने लगे।

1921 के उत्तरार्ध — आंदोलन गांवों में फैलता है

भैरूकुंड की सभा के बाद संघर्ष एक ही स्थान तक सीमित नहीं रहा। गांवों में किसान पंचायतों और आपसी संपर्क का विस्तार हुआ।

किसान आंदोलन की शक्ति का आधार यह था कि किसी एक किसान पर दबाव डालने पर बाकी किसान उसके साथ खड़े हों। इस प्रकार जागीरदार की परंपरागत रणनीति—व्यक्तिगत किसान से अलग-अलग व्यवहार करना—कम प्रभावी होने लगी।

यहीं से बेगूं में एक प्रकार की ग्रामीण सामूहिक सत्ता का विकास दिखाई देता है।

ठिकाने के लिए यही सबसे चिंताजनक बात थी।

खंड 10

1922 : लगान-अस्वीकार, मंडावरी और समझौते की कोशिश

1922 — असहयोग से लगान-अस्वीकार की ओर

1922 आते-आते संघर्ष अधिक स्पष्ट आर्थिक चुनौती में बदल गया।

किसानों ने केवल अतिरिक्त लाग-बाग नहीं, बल्कि राजस्व भुगतान को भी अपने आंदोलन का साधन बनाया। उपलब्ध विवरणों के अनुसार 1922 में ‘नो-रेंट’ अथवा लगान न देने का अभियान शुरू हुआ।

यह कदम अत्यंत महत्वपूर्ण था।

लगान किसी जागीर की आय का मूल स्रोत था। इसलिए लगान रोकना केवल आर्थिक विरोध नहीं था; वह ठिकाने के शासनाधिकार पर सीधा दबाव था।

अन्यायपूर्ण करों की समीक्षा नहीं होगी, बेगार समाप्त नहीं होगी और लगान को न्यायसंगत नहीं बनाया जाएगा

तब तक पुराने ढंग से राजस्व देना उचित नहीं है।

1922 — रावड़ा और आसपास संघर्ष का सामाजिक विस्तार

सरकारी गजेटियरों पर आधारित विवरण जून 1922 में बेगूं क्षेत्र में व्यापक उभार का उल्लेख करते हैं। आंदोलन केवल बेगूं के राव के विरुद्ध नहीं रहा; रावड़ा, सेमलिया और चरछा जैसे स्थानीय सामंती केंद्रों के विरुद्ध भी कृषक असंतोष दिखाई दिया।

एक उल्लेखनीय प्रसंग में रतनी भीलनी और उदी मालिनी के साथ कथित मारपीट के बाद सौ से अधिक कृषकों द्वारा धरना दिए जाने का उल्लेख मिलता है। अंततः महिलाओं को मुक्त कराया गया। यह घटना महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि आंदोलन का दायरा केवल भूमि-राजस्व नहीं रहा था; ग्रामीण समुदाय अपने सदस्यों पर प्रशासनिक या सामंती अत्याचार के विरुद्ध सामूहिक प्रतिक्रिया देने लगा था।

इससे बेगूं आंदोलन में महिलाओं और निम्न सामाजिक समूहों की उपस्थिति को भी गंभीरता से देखने की जरूरत सामने आती है।

1922 — मंडावरी का टकराव

कुछ क्षेत्रीय ऐतिहासिक स्रोत 1922 में मंडावरी में किसान सभा पर बल-प्रयोग अथवा गोलीबारी का उल्लेख करते हैं। इस घटना के विवरण प्रमुख सरकारी स्रोतों में गोविंदपुरा जितने स्पष्ट नहीं हैं, इसलिए इसे स्रोत-सावधानी के साथ दर्ज करना चाहिए।

फिर भी 1921–22 की घटनाओं का समग्र चित्र स्पष्ट है

ठिकाना किसानों को केवल समझाने की नीति नहीं अपना रहा था; प्रशासनिक और दमनकारी साधनों का प्रयोग समानांतर चल रहा था।

1922 — किसान और अनूप सिंह के बीच समझौते की कोशिश

लगातार संघर्ष से बेगूं के सामंत रावत/राव अनूप सिंह चूंडावत पर दबाव बढ़ने लगा।

अंततः किसान पक्ष, राजस्थान सेवा संघ और अनूप सिंह के बीच बातचीत हुई। उपलब्ध स्रोत समझौते के वर्ष पर तो मोटे तौर पर 1922–23 की सहमति देते हैं, लेकिन इसकी सटीक तिथि के बारे में अंतर है। कई आधुनिक राजस्थान इतिहास विवरण इसे 1922 में अजमेर में विजय सिंह पथिक की मध्यस्थता से हुआ समझौता बताते हैं; कुछ इसे 1923 के घटनाक्रम में रखते हैं।

शोध की दृष्टि से सबसे सुरक्षित निष्कर्ष यह है कि

1922 के दौरान समझौते की प्रक्रिया निर्णायक रूप से आगे बढ़ी और 1923 के राज्य हस्तक्षेप से पहले किसान तथा जागीरदार किसी प्रकार की सहमति तक पहुंच चुके थे।

‘बोल्शेविक समझौता’ — एक स्थानीय समझौता साम्राज्य के लिए खतरा कैसे बना

समझौते की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह नहीं थी कि कितने कर कम होने थे।

एक जागीरदार किसान पंचायत के दबाव में किसानों से सीधे समझौता कर रहा था।

मेवाड़ में ब्रिटिश राजनीतिक अधिकारी ने इस समझौते को स्वीकार नहीं किया और इसे “बोल्शेविक समझौता” या “बोल्शेविक बंदोबस्त” कहा। सरकारी गजेटियर-आधारित विवरण भी इस पदावली की पुष्टि करते हैं।

1917 की रूसी क्रांति के बाद ‘बोल्शेविक’ शब्द औपनिवेशिक प्रशासन के लिए उस राजनीति का पर्याय बन चुका था जिसमें नीचे के वर्ग संगठित होकर पुरानी संपत्ति और सत्ता संरचनाओं को चुनौती दें।

बेगूं में वास्तविक बोल्शेविक क्रांति नहीं हो रही थी।

लेकिन ब्रिटिश अधिकारी जिस बात से चिंतित थे, वह थी

यदि किसान पंचायत जागीरदार को अपनी शर्तें स्वीकार करा सकती है, तो राजपूताना की अन्य जागीरों में यही उदाहरण क्यों नहीं दोहराया जाएगा?

खंड 11

1922–जुलाई 1923 : जागीर पर राज्य नियंत्रण और ट्रेंच आयोग

1922–23 — समझौते का निरस्तीकरण और अनूप सिंह पर कार्रवाई

ब्रिटिश रेजिडेंट और मेवाड़ राज्य ने किसान–जागीरदार समझौते को स्वीकार करने के बजाय उस पर हस्तक्षेप किया।

सरकारी गजेटियरों पर आधारित विवरण के अनुसार राव को पदच्युत किया गया और जागीर का प्रशासन राज्य नियंत्रण में चला गया। कुछ विवरण इसे राजकीय संरक्षक प्रशासन/राज्य प्रबंधन के अंतर्गत रखा जाना बताते हैं।

कुछ बाद के स्रोत प्रशासक के रूप में अमृतलाल की नियुक्ति का भी उल्लेख करते हैं।

यह बेगूं आंदोलन का दूसरा निर्णायक मोड़ था।

किसान बनाम मेवाड़ राज्य और उसके पीछे खड़ी ब्रिटिश राजनीतिक सत्ता

मार्च 1923 — बेगूं जागीर प्रत्यक्ष राज्य प्रबंधन में

मार्च 1923 में अनूप सिंह को उदयपुर बुलाया गया और बेगूं का प्रशासन मेवाड़ राज्य ने अपने नियंत्रण में ले लिया।

प्रशासन का तर्क व्यवस्था स्थापित करना था।

लेकिन किसानों की दृष्टि से यह बहुत बड़ा बदलाव था।

अब उनके सामने वह स्थानीय जागीरदार नहीं था जो समझौता करने को तैयार हो चुका था, बल्कि ऐसी राज्य मशीनरी थी जिसके पास

पुलिस, सेना, राजस्व अधिकारी और राजनीतिक वैधता

इसलिए 1923 का आंदोलन 1921 की तुलना में अधिक गंभीर टकराव बन गया।

13 जून 1923 — ट्रेंच आयोग का बेगूं पहुंचना

सरकारी गजेटियर के आधार पर अधिक स्पष्ट कालक्रम मिलता है कि जी. सी. ट्रेंच मेवाड़ का राजस्व आयुक्त था और वह जांच/बंदोबस्त आयोग का सदस्य था। आयोग लगभग 13 जून से 13 जुलाई 1923 तक बेगूं क्षेत्र में रहा।

इससे पुराने लोकप्रिय विवरण में एक सुधार आवश्यक है।

इसे केवल “ट्रेंच की अध्यक्षता वाला आयोग” लिखना कुछ अधिक सरलीकृत हो सकता है। अधिक सुरक्षित भाषा होगी

“मेवाड़ राज्य द्वारा गठित आयोग में राजस्व आयुक्त जी. सी. ट्रेंच प्रमुख प्रशासनिक भूमिका में था।”

आयोग का उद्देश्य किसानों की शिकायतों, करों और बंदोबस्त के प्रश्नों की जांच करना था।

जून–जुलाई 1923 — रायता बनाम बेगूं : जगह का विवाद वास्तव में सत्ता का विवाद था

बेगूं आंदोलन का प्रमुख संगठनात्मक केंद्र रायता गांव बन चुका था।

आयोग चाहता था कि किसान उसके सामने बेगूं जाकर बयान दें।

किसान पंचायत चाहती थी कि आयोग स्वयं रायता आए।

किसानों ने बेगूं में आयोग के सामने उपस्थित होने से इनकार कर दिया।

यह केवल स्थान को लेकर जिद नहीं थी।

किसकी शर्तों पर बातचीत होगी?

राज्य चाहता था कि किसान उसके संस्थागत ढांचे में आकर फरियादी बनें।

किसान पंचायत स्वयं को सामूहिक पक्षकार मान रही थी।

अंततः किसानों ने आयोग की कार्यवाही का बहिष्कार किया।

जुलाई 1923 — आयोग के निष्कर्ष और किसानों का अस्वीकार

सरकारी गजेटियर के अनुसार किसानों ने अपनी याचिकाएं आयोग को दी थीं। आयोग ने अपने निष्कर्ष तैयार किए और उनकी प्रतियां पंचायत के पंचों को भेजीं।

लेकिन पंचों ने उन्हें स्वीकार करने और आयोग के आदेशों का पालन करने से इनकार कर दिया।

कुछ द्वितीयक विवरण इन निर्णयों को 10 जुलाई 1923 को पंचायत तक पहुंचाया जाना बताते हैं।

यहीं विवाद निर्णायक टकराव की ओर बढ़ा।

10 जुलाई 1923 के आसपास — किसान पंचायत के सामने फैसला

आयोग की ओर से भेजे गए प्रस्ताव या निर्णय किसान नेतृत्व को पर्याप्त नहीं लगे।

आयोग ने कई करों को औचित्यपूर्ण माना था, जबकि किसान आंदोलन की मूल मांग ही मनमाने सामंती कराधान को बदलना थी।

इसलिए पंचायत ने निर्णय स्वीकार नहीं किया।

अब किसान आंदोलन के सामने दो विकल्प थे

राज्य का निर्णय स्वीकार कर आंदोलन समाप्त कर देना,

या सामूहिक असहयोग जारी रखना।

किसानों ने दूसरा रास्ता चुना।

खंड 12

12–13 जुलाई 1923 : गोविंदपुरा गोलीकांड और उसके बाद

12 जुलाई 1923 — गोविंदपुरा में बड़ी किसान सभा

12 जुलाई को गोविंदपुरा/सेमलिया गोविंदपुरा में बड़ी किसान सभा हुई।

एक लोकप्रिय वेब-स्रोत में इसे टंकण-दोष से “12 जुलाई 1913” लिखा गया है; घटनाक्रम और सरकारी गजेटियर से स्पष्ट है कि सही वर्ष 1923 है।

सभा का उद्देश्य आयोग के निर्णय पर विचार करना और आंदोलन की आगे की रणनीति तय करना था।

अब गोविंदपुरा आंदोलन का निर्णायक स्थल बन गया।

13 जुलाई 1923, प्रातः — राज्य सेना के साथ ट्रेंच का आगमन

13 जुलाई को तड़के लगभग पांच बजे ट्रेंच राज्य सैनिकों के साथ गोविंदपुरा पहुंचा—यह समय कुछ विस्तृत स्रोतों में दिया गया है।

किसान नेतृत्व को आयोग का निर्णय स्वीकार करने की चेतावनी दी गई।

इसके बाद गांव को सैनिक घेरे में लिया गया।

यहीं से घटनाओं के सरकारी और आंदोलनकारी वर्णन कुछ अलग हो जाते हैं।

13 जुलाई 1923 — गोविंदपुरा गोलीकांड

सरकारी गजेटियर पर आधारित विवरण में कहा गया है कि गांव को घेरा गया, किसानों ने ढोल बजाकर आसपास के लोगों को एकत्र किया और बड़ी संख्या में पुरुष तथा महिलाएं घटनास्थल पर पहुंचीं। इसके बाद सैनिकों ने गोली चलाई और अनेक लोग घायल हुए।

आंदोलनकारी और बाद के राष्ट्रीयतावादी विवरण सभा के अहिंसक होने और राज्य बल द्वारा दमन किए जाने पर अधिक जोर देते हैं।

इसी गोलीबारी से दो नाम इतिहास में अमर हुए

रूपाजी धाकड़ — जैनगर

कृपाजी धाकड़ — अमरपुरा

बाद के राजस्थान इतिहास में दोनों को बेगूं किसान आंदोलन के शहीदों के रूप में याद किया जाता है।

गोविंदपुरा में कितने लोग मारे गए? — एक आवश्यक स्रोत-सावधानी

यहां वेबसाइट के शोध अध्याय में एक ही संख्या देना उचित नहीं होगा।

सरकारी और आंदोलनकारी स्रोतों में महत्वपूर्ण अंतर है।

एक संकलित विवरण के अनुसार सरकारी अभिलेख एक मृत्यु, लगभग 25 घायल और 485 गिरफ्तारियों की बात करते हैं।

इसके विपरीत तरुण राजस्थान ने 11 मृत्यु, लगभग 100 घायल तथा महिलाओं और बच्चों सहित 540 गिरफ्तारियों का दावा किया।

चित्तौड़गढ़ और भीलवाड़ा सरकारी गजेटियरों पर आधारित हालिया स्रोत-समीक्षा में 45 गांवों से 485 धाकड़ किसानों की गिरफ्तारी दर्ज है; भीलवाड़ा गजेटियर विशेष रूप से रूपा धाकड़ की मृत्यु दर्ज करता है।

गोविंदपुरा में गंभीर गोलीबारी, बड़ी संख्या में घायल और व्यापक गिरफ्तारियां निर्विवाद हैं; मृतकों की संख्या स्रोतों में विवादित है। आंदोलन की सामूहिक स्मृति रूपाजी और कृपाजी को दो प्रमुख शहीदों के रूप में स्थापित करती है।

13 जुलाई के बाद — घायलों पर भी राजस्व भुगतान का दबाव

सरकारी गजेटियर से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सामान्य इतिहासों में कम दर्ज तथ्य सामने आता है।

गोलीबारी के बाद घायल किसानों से भी कहा गया कि वे अपने बकाया हासिल/राजस्व का भुगतान करें और अपने पंचों को प्रस्तुत करें। किसानों ने ऐसा करने से इनकार किया तो उन्हें गिरफ्तार किया गया।

इसके बाद आसपास के गांवों से किसान समूहों में पहुंचने लगे।

सैनिक बल ने उन पर भी कार्रवाई की।

घुड़सवारों द्वारा महिलाओं को तितर-बितर करने का उल्लेख भी सरकारी गजेटियर-आधारित विवरण में मिलता है।

इससे साफ है कि गोविंदपुरा केवल कुछ मिनट की गोलीबारी नहीं था।

वह राजस्व वसूली और किसान असहयोग को सैन्य शक्ति से तोड़ने का व्यापक अभियान था।

जुलाई–अगस्त 1923 — 45 गांवों तक दमन का विस्तार

गिरफ्तारियों का दायरा केवल गोविंदपुरा नहीं रहा।

सरकारी विवरण लगभग 45 गांवों से 485 धाकड़ किसानों को गिरफ्तार किए जाने की बात करता है।

यह संख्या आंदोलन के वास्तविक विस्तार को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

यदि आंदोलन कुछ नेताओं या एक गांव तक सीमित होता तो 45 गांवों से इतनी बड़ी संख्या में गिरफ्तारी की आवश्यकता नहीं पड़ती।

अर्थात बेगूं 1923 तक एक क्षेत्रव्यापी कृषक आंदोलन बन चुका था।

खंड 13

पथिक की गिरफ्तारी से दिसंबर 1923 के बंदोबस्त तक

गोविंदपुरा के बाद — विजय सिंह पथिक स्वयं नेतृत्व में

गोविंदपुरा की हिंसा के बाद विजय सिंह पथिक ने आंदोलन में अधिक प्रत्यक्ष भूमिका संभाली।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में उपलब्ध राजस्थान के ऐतिहासिक विवरण में भी यह क्रम दर्ज है कि दमन के बाद आंदोलन अधिक तीव्र हुआ और पथिक बेगूं पहुंचकर उसके संचालन में जुड़े।

यह राज्य के लिए गंभीर चुनौती थी क्योंकि पथिक

बिजोलिया के अनुभवी नेता, राजस्थान सेवा संघ के प्रमुख कार्यकर्ता और व्यापक प्रेस-संपर्क रखने वाले राजनीतिक आयोजक

10 सितंबर 1923 — विजय सिंह पथिक की गिरफ्तारी

कई स्रोत पथिक की गिरफ्तारी की तिथि 10 सितंबर 1923 बताते हैं।

उनके विरुद्ध मुकदमा चलाया गया और उन्हें दीर्घ कारावास की सजा मिली।

यहां अवधि संबंधी स्रोतों में कुछ अंतर है। सरकारी गजेटियर-आधारित विवरण पांच वर्ष की सजा और 1928 में रिहाई का उल्लेख करता है, जबकि अन्य लोकप्रिय स्रोत अप्रैल 1927 में रिहाई या लगभग साढ़े तीन वर्ष के कारावास का दावा करते हैं। अतः शोध-अध्याय में पांच वर्ष की घोषित सजा और वास्तविक रिहाई के संबंध में स्रोत-भेद अलग दर्ज करना उचित रहेगा।

सितंबर–नवंबर 1923 — नेतृत्व गिरफ्तार, लेकिन किसान प्रश्न जीवित

पथिक की गिरफ्तारी से आंदोलन को बड़ा झटका लगा।

लेकिन राज्य जिस मूल समस्या से जूझ रहा था, वह समाप्त नहीं हुई

किसान पुरानी दरों और पुरानी जागीरी शर्तों पर लौटने के लिए तैयार नहीं थे।

यही बेगूं आंदोलन की ताकत थी।

नेता को गिरफ्तार किया जा सकता था; लेकिन हजारों किसानों की आर्थिक शिकायत को जेल नहीं भेजा जा सकता था।

इसलिए प्रशासन के लिए किसी प्रकार का नया राजस्व समाधान आवश्यक हो गया।

दिसंबर 1923 — नया बंदोबस्त शुरू

लगातार संघर्ष और दमन के बाद दिसंबर 1923 में बेगूं में नया बंदोबस्त प्रारंभ हुआ।

यह आंदोलन का निर्णायक संस्थागत परिणाम था।

और मनमाने राजस्व निर्धारण के बजाय अधिक व्यवस्थित बंदोबस्त लागू करने

यही कारण है कि दिसंबर 1923 को आंदोलन के परिणाम की शुरुआत मानना चाहिए, न कि आवश्यक रूप से उसका अंतिम दिन।

1924 — सुधारों के क्रियान्वयन का चरण

कुछ राजस्थान इतिहास विवरण 1924 में लगान दरों में कमी और बेगार समाप्ति को आंदोलन के सफल अंत के रूप में दर्ज करते हैं।

लेकिन इसे थोड़ा अधिक सावधानी से लिखना बेहतर होगा।

1923 के अंत में बंदोबस्त प्रक्रिया शुरू हुई और 1924 में उसका प्रशासनिक प्रभाव दिखाई देने लगा।

संघर्ष से सुधार-क्रियान्वयन की ओर संक्रमण का वर्ष

किसानों की हर मांग एक साथ पूरी नहीं हुई थी, लेकिन राज्य अब पुरानी स्थिति को जस का तस बनाए रखने की स्थिति में नहीं था।

खंड 14

1924–25 के सुधार और समेकित घटना-क्रम

1925 — करों में आगे कटौती और समझौते की अंतिम अवस्था

कुछ राजस्थान इतिहास स्रोत बेगूं आंदोलन की अवधि को 1921–1925 तक मानते हैं और 1925 में एक आगे के समझौते या अंतिम समाधान का उल्लेख करते हैं। इनमें 34 प्रकार की लाग-बाग/करों के हटने या उनकी दरों के समाप्त होने की बात कही जाती है।

इन संख्याओं के संबंध में सरकारी प्राथमिक स्रोतों की पुष्टि उतनी स्पष्ट नहीं है जितनी 1923 के गोविंदपुरा घटनाक्रम की है। इसलिए वेबसाइट पर बेहतर वाक्य होगा

“1924–25 तक बंदोबस्त और सुधारों की प्रक्रिया में अनेक लाग-बाग समाप्त अथवा सीमित की गईं, बेगार समाप्त की गई और राजस्व निर्धारण को निश्चित नियमों के अधीन लाया गया; बाद के राजस्थान इतिहास स्रोत 1925 तक इस समाधान प्रक्रिया को जारी मानते हैं।”

इससे तथ्य भी सुरक्षित रहेगा और स्रोतों के बीच अंतर भी नहीं छिपेगा।

1925 के बाद — क्या बेगूं आंदोलन समाप्त हो गया?

सक्रिय प्रतिरोध की दृष्टि से 1923–25 के बीच आंदोलन का मुख्य चरण समाप्त हो गया।

लेकिन उसका राजनीतिक प्रभाव कहीं अधिक लंबा था।

बेगूं ने राजपूताना के किसानों के सामने तीन बातें स्थापित कर दी थीं।

पहली—लाग-बाग और बेगार शासक का शाश्वत अधिकार नहीं हैं।

दूसरी—गांव की पंचायत जागीरदार के सामने सामूहिक सौदेबाजी कर सकती है।

तीसरी—किसान प्रश्न को स्थानीय जागीर की सीमा से बाहर प्रेस, राजनीतिक संगठन और सार्वजनिक आंदोलन का विषय बनाया जा सकता है।

इसी विरासत को आगे सीकर, शेखावाटी, बूंदी और राजस्थान के दूसरे किसान आंदोलनों में अलग-अलग रूपों में देखा जा सकता है। बिजोलिया की सफलता से बेगूं सहित कई क्षेत्रों में किसान संघर्ष फैलने का उल्लेख आधुनिक इतिहासलेखन में भी मिलता है।

बेगूं की विस्तृत समयरेखा : एक नजर में

समय — घटना — ऐतिहासिक महत्व

1921 — मेनाल–भैरूकुंड में किसान सभा — संगठित आंदोलन का आरंभ

1921 — रामनारायण चौधरी और राजस्थान सेवा संघ का सहयोग — स्थानीय संघर्ष को संगठन मिला

1921 — चांदखेड़ी क्षेत्र में दमन के उल्लेख — राज्य–किसान टकराव प्रारंभ

1921–22 — पंचायतों का विस्तार — सामूहिक किसान सत्ता विकसित

1922 — लगान-अस्वीकार — ठिकाने की आर्थिक सत्ता को चुनौती

जून 1922 — रावड़ा आदि क्षेत्रों में कृषक उभार; महिलाओं से जुड़े प्रतिरोध के प्रसंग — आंदोलन का सामाजिक व भौगोलिक विस्तार

1922 — अनूप सिंह से समझौते की प्रक्रिया — किसानों की पहली बड़ी राजनीतिक सफलता

1922–23 — ब्रिटिश रेजिडेंट द्वारा समझौते को “बोल्शेविक” बताकर अस्वीकार — आंदोलन साम्राज्यवादी राजनीतिक प्रश्न बना

मार्च 1923 — बेगूं राज्य प्रबंधन में — संघर्ष जागीरदार से राज्य के विरुद्ध परिवर्तित

13 जून 1923 के आसपास — जांच/बंदोबस्त आयोग बेगूं में — राज्य ने प्रशासनिक समाधान की कोशिश की

जून–जुलाई — रायता बनाम बेगूं विवाद; आयोग का बहिष्कार — पंचायत बनाम राजकीय अधिकार

10 जुलाई के आसपास — आयोग के निष्कर्ष पंचायत को — किसानों ने अस्वीकार किया

12 जुलाई — गोविंदपुरा में बड़ी सभा — सामूहिक प्रतिक्रिया

13 जुलाई — सैनिक कार्रवाई और गोलीबारी — आंदोलन का निर्णायक रक्तरंजित मोड़

13 जुलाई के बाद — व्यापक गिरफ्तारी; 45 गांव प्रभावित — आंदोलन का क्षेत्रीय विस्तार प्रमाणित

जुलाई–सितंबर — पथिक का प्रत्यक्ष नेतृत्व — संघर्ष पुनर्गठित

10 सितंबर — विजय सिंह पथिक गिरफ्तार — नेतृत्व पर राज्य का प्रहार

दिसंबर 1923 — नया बंदोबस्त प्रारंभ — आंदोलन की संस्थागत उपलब्धि

1924 — लगान/कर सुधार और बेगार समाप्ति का क्रियान्वयन — किसान मांगों की आंशिक–महत्वपूर्ण स्वीकृति

1925 — सुधार/समझौते की आगे की प्रक्रिया — मुख्य कृषक संघर्ष का समापन चरण

आगे — किसान चेतना प्रजामंडल और जागीरदारी-विरोधी राजनीति में प्रवाहित — दीर्घकालीन राजनीतिक विरासत

खंड 15

प्रमुख व्यक्तित्व, इतिहासलेखन और स्रोत-समीक्षा

प्रमुख व्यक्तित्व

विजय सिंह पथिक

बिजोलिया और बेगूं के बीच सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक सेतु। राजस्थान के किसान आंदोलनों को संगठन, प्रेस और व्यापक राजनीतिक दृष्टि देने वाले प्रमुख नेताओं में से एक।

रामनारायण चौधरी

बेगूं आंदोलन के प्रारंभिक संगठन और मार्गदर्शन में केंद्रीय भूमिका। राजस्थान सेवा संघ के माध्यम से किसानों के संघर्ष को व्यापक राजनीतिक मंच तक पहुंचाया।

रावत अनूप सिंह

बेगूं के ठिकानेदार। किसानों से समझौते की दिशा में बढ़े, लेकिन मेवाड़ और ब्रिटिश राजनीतिक सत्ता ने समझौते को स्वीकार नहीं किया।

जी. सी. ट्रेंच

मेवाड़ राज्य के बंदोबस्त अधिकारी; 1923 की जांच और गोविंदपुरा घटनाक्रम से उनका नाम स्थायी रूप से जुड़ गया।

रूपाजी धाकड़

गोविंदपुरा गोलीकांड के प्रमुख किसान शहीद।

कृपाजी धाकड़

रूपाजी के साथ बेगूं किसान संघर्ष की शहादत के सबसे महत्वपूर्ण प्रतीक।

अंजना देवी चौधरी

राजस्थान के किसान और जनआंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी की महत्वपूर्ण प्रतिनिधि; बेगूं आंदोलन के संदर्भ में भी उनका उल्लेख मिलता है।

इतिहासलेखन और स्रोत-समीक्षा

बेगूं के अध्ययन में एक समस्या यह है कि इसकी कई घटनाओं के बारे में सरकारी अभिलेख, आंदोलनकारी साहित्य और बाद के राजस्थान-इतिहास ग्रंथों में संख्यात्मक अथवा कालक्रम संबंधी अंतर दिखाई देते हैं।

विशेषकर तीन मामलों में सावधानी आवश्यक है

गोविंदपुरा में मृतकों की वास्तविक संख्या, समझौते की ठीक तिथि और शर्तें तथा आंदोलन के अंत की तिथि।

कुछ स्रोत इसे 1921–23 कहते हैं, कुछ 1921–24 और कुछ सुधारों को 1925 तक ले जाते हैं। इसलिए शोध अध्याय में मुख्य संघर्ष 1921–23, समाधान/बंदोबस्त 1923–24, और उसके प्रभाव को आगे की किसान राजनीति तक देखना अधिक उपयुक्त है।

गोविंदपुरा के संबंध में भी सरकारी आंकड़ों और आंदोलनकारी समाचार-पत्रों के दावों को अलग-अलग दर्ज करना चाहिए; यही स्रोत-समीक्षा की अधिक विश्वसनीय पद्धति है।

खंड 16

समेकित मूल्यांकन : बेगूं को कैसे समझें?

समेकित मूल्यांकन : बेगूं को कैसे समझें?

बेगूं किसान आंदोलन की शुरुआत करों से हुई थी, लेकिन उसका अंतिम अर्थ करों से कहीं बड़ा था।

मेरी उपज पर आपका कितना अधिकार है, यह आप अकेले तय नहीं करेंगे।

बेगार के विरोध में वह कह रहा था

मेरे श्रम पर मेरा अधिकार है।

हम व्यक्तिगत प्रजा नहीं, संगठित समुदाय हैं।

आर्थिक अन्याय के विरुद्ध सामूहिक असहयोग हमारा हथियार है।

और ट्रेंच आयोग का बहिष्कार करके उसने राज्य के सामने एक और कठिन प्रश्न रख दिया

न्याय की प्रक्रिया केवल शासक तय करेगा या किसान की सहमति भी आवश्यक होगी?

यही कारण है कि एक स्थानीय जागीर का विवाद ब्रिटिश राजनीतिक अधिकारियों को “बोल्शेविक” दिखाई देने लगा।

गोविंदपुरा में रूपाजी और कृपाजी की मृत्यु ने आंदोलन को शहादत दी, लेकिन बेगूं की वास्तविक ऐतिहासिक उपलब्धि इससे भी व्यापक थी। उसने साबित किया कि राजस्थान की जागीरी व्यवस्था में किसान अब निष्क्रिय करदाता और बेगार देने वाली प्रजा बने रहने को तैयार नहीं था।

बिजोलिया ने जिस किसान चेतना को संगठित रूप दिया था, बेगूं ने उसे दूसरी जागीर में स्थानांतरित कर दिखाया। इसके बाद यह तर्क देना कठिन होता गया कि किसान असंतोष किसी एक अत्याचारी जागीरदार अथवा एक क्षेत्र की असामान्य समस्या है। समस्या स्वयं जागीरी कृषि-संबंधों की संरचना में थी।

इसलिए भारतीय किसान आंदोलनों के इतिहास में बेगूं का स्थान तीन स्तरों पर महत्वपूर्ण है

बिजोलिया की विरासत का विस्तार, सामंती मनमानी के विरुद्ध किसान पंचायत की राजनीतिक चुनौती और भूमि-संबंधों को निश्चित नियम तथा कृषक अधिकारों के अधीन करने की लंबी ऐतिहासिक यात्रा का एक निर्णायक पड़ाव।

और शायद बेगूं की सबसे सटीक ऐतिहासिक व्याख्या यही होगी

1921 में किसान लाग-बाग कम कराने निकला था; 1923 तक वह यह प्रश्न उठा चुका था कि गांव, भूमि, उपज और श्रम पर निर्णय लेने का अधिकार आखिर किसका है।

यही प्रश्न आगे राजस्थान की किसान राजनीति को बेगार-विरोध से जागीरदारी-विरोध, जागीरदारी-विरोध से प्रजामंडल और अंततः लोकतांत्रिक भूमि-सुधार की दिशा में ले गया।

इस अर्थ में बेगूं किसान आंदोलन 1923 में समाप्त हुई घटना नहीं, राजस्थान के कृषक नागरिक बनने की लंबी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण अध्याय था।

प्रमुख संदर्भ-आधार

इस अध्याय के तथ्य उपलब्ध राजस्थान इतिहास सामग्री, बेगूं आंदोलन के घटनाक्रम, राजस्थान सेवा संघ और रामनारायण चौधरी संबंधी विवरण तथा गोविंदपुरा घटना के परस्पर भिन्न अभिलेखीय/पत्रकारीय विवरणों के तुलनात्मक अध्ययन पर आधारित हैं। विशेष रूप से घटनाक्रम और स्रोत-भेद के लिए उपलब्ध संकलित राजस्थान इतिहास सामग्री उपयोगी है।

अगला स्वाभाविक अध्याय: शेखावाटी किसान आंदोलन और सीकर किसान संघर्ष — लाग-बाग, जाट किसान संगठन, महिला भागीदारी, ठिकानेदारों से टकराव और राजस्थान में किसान राजनीति का विस्तार।

OCN ऐतिहासिक आकलन

बेगूं की केंद्रीय उपलब्धि यह थी कि उसने जागीरी कर, बेगार और राजस्व निर्धारण को शासक की निजी कृपा के बजाय किसान अधिकार तथा सार्वजनिक जवाबदेही का विषय बनाया। आंदोलन संपूर्ण सामाजिक क्रांति नहीं था; वर्ग, जाति, नेतृत्व और दस्तावेजी प्रतिनिधित्व की सीमाएँ थीं। फिर भी पंचायत, असहयोग, समझौता, राज्य-दमन और पुनः संगठन का उसका क्रम दिखाता है कि मेवाड़ का किसान न तो निष्क्रिय प्रजा था, न बिजोलिया की मात्र छाया। गोविंदपुरा ने इसकी मानवीय कीमत उजागर की, जबकि 1923–25 के बंदोबस्त और कर-सुधार ने सिद्ध किया कि दमन के बाद भी किसान प्रश्न को प्रशासनिक समाधान देना पड़ा।

शोधार्थियों के लिए

प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक स्रोत

राजस्थान राज्य अभिलेखागारमेवाड़ दरबार, बेगूं जागीर, राजस्व बंदोबस्त, ट्रेंच आयोग, गोविंदपुरा और किसान शिकायतों से संबंधित रियासती अभिलेख।स्रोत तक जाएँ ↗
राष्ट्रीय अभिलेखागार — अभिलेख पटलराजपूताना एजेंसी, मेवाड़ राज्य, ब्रिटिश रेजिडेंट और देसी रियासतों के कृषक आंदोलनों से संबंधित राजनीतिक पत्राचार।स्रोत तक जाएँ ↗
गांधी विरासत पोर्टलराजस्थान के किसान आंदोलनों, विजय सिंह पथिक, असहयोग और राष्ट्रीय नेतृत्व से जुड़े संदर्भ तथा समकालीन पत्राचार।स्रोत तक जाएँ ↗
नेहरू स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालयराजस्थान सेवा संघ, रामनारायण चौधरी, विजय सिंह पथिक, प्रजामंडल और रियासती आंदोलनों से संबंधित निजी पत्र-संग्रह।स्रोत तक जाएँ ↗
भारतीय संस्कृति पोर्टलराजस्थान के स्वतंत्रता सेनानियों, किसान आंदोलनों और क्षेत्रीय स्मृतियों पर सरकारी डिजिटल सामग्री।स्रोत तक जाएँ ↗
आधुनिक अकादमिक शोधबेगूं, बिजोलिया, मेवाड़ की जागीरी व्यवस्था, राजस्थान सेवा संघ और राजपूताना किसान राजनीति पर शोध-पुस्तकें एवं शोध-प्रबंध।स्रोत तक जाएँ ↗

स्रोत-सावधानी: गोविंदपुरा में मृतकों–घायलों की संख्या, कुछ घटनाओं की तिथियां, समझौते की धाराएं और सुधारों के वास्तविक क्रियान्वयन पर स्रोत भिन्न हैं। रियासती अभिलेख आंदोलन को कानून-व्यवस्था की समस्या, राष्ट्रवादी साहित्य किसान बलिदान और स्थानीय स्मृति शहीदों के अनुभव के रूप में दर्ज करती है; इसलिए परस्पर स्रोत-मिलान आवश्यक है।