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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–018 · अध्याय 43

वी. पी. सिंह सरकार और समझौते की कोशिशें : चार महीने की मोहलत, गुप्त वार्ताएं और असफल समाधान

रामशिला, राजनीति और निर्णायक लामबंदी

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskविस्तृत हिंदी शोध संस्करण · सितंबर 2026

दिसंबर 1989 में वी. पी. सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार बनने के बाद अयोध्या विवाद एक बिल्कुल नए राजनीतिक चरण में प्रवेश कर गया। अब केंद्र में कांग्रेस नहीं थी। नई सरकार को बाहर से भारतीय जनता पार्टी का समर्थन प्राप्त था, और दूसरी ओर वाम दल भी उसे समर्थन दे रहे थे। यही विरोधाभास उसकी सबसे बड़ी शक्ति भी था और सबसे बड़ी कमजोरी भी।

भाजपा जून 1989 के पालमपुर प्रस्ताव से राम जन्मभूमि आंदोलन के समर्थन की औपचारिक घोषणा कर चुकी थी। विहिप 9 नवंबर 1989 के शिलान्यास के बाद मंदिर निर्माण की अगली अवस्था चाहती थी। दूसरी ओर बाबरी मस्जिद पक्ष अपने स्वामित्व और मस्जिद के दावे से पीछे हटने को तैयार नहीं था। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बन चुके थे और उनका प्रशासन विवादित स्थल पर निर्माण रोकने के लिए दृढ़ था।

वी. पी. सिंह का प्रयास था कि मंदिर आंदोलन को तत्काल टकराव से रोककर बातचीत के लिए समय खरीदा जाए और कोई ऐसा राजनीतिक-संवैधानिक सूत्र निकाला जाए जिसे दोनों पक्ष स्वीकार कर सकें।

सरकार ने कोशिश की। प्रधानमंत्री ने संतों, विहिप नेताओं, भाजपा नेताओं, मुस्लिम प्रतिनिधियों, धार्मिक मध्यस्थों और अपने सहयोगियों के माध्यम से अनेक वार्ताएं कराईं। फरवरी 1990 में विहिप ने प्रधानमंत्री को लगभग चार महीने का समय दिया। लेकिन जून तक कोई अंतिम समझौता नहीं निकला। जुलाई के बाद विहिप ने 30 अक्टूबर 1990 से कारसेवा का कार्यक्रम घोषित कर दिया। सितंबर में आडवाणी की रथयात्रा शुरू हुई और अक्टूबर तक सरकार समाधान खोजने के अंतिम, अत्यंत जल्दबाजी वाले प्रयासों तक पहुंच गई।

19 अक्टूबर 1990 को केंद्र ने राम जन्मभूमि–बाबरी मस्जिद क्षेत्र के अधिग्रहण का अध्यादेश तक जारी कर दिया, किंतु चार दिन के भीतर उसे वापस लेना पड़ा। संसद के आधिकारिक अभिलेख में 19 अक्टूबर के अधिग्रहण अध्यादेश और 23 अक्टूबर के वापसी अध्यादेश दोनों दर्ज हैं।

इस प्रकार समझौते की राजनीति अंततः कारसेवा, आडवाणी की गिरफ्तारी और वी. पी. सिंह सरकार के पतन में बदल गई।

वी. पी. सिंह ने कोई शांत विवाद विरासत में नहीं लिया था।

उनके प्रधानमंत्री बनने तक—

1986 में ताला खुल चुका था।

विहिप राष्ट्रीय संगठन बना चुकी थी।

बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी सक्रिय थी।

भाजपा पालमपुर प्रस्ताव पारित कर चुकी थी।

रामशिला अभियान हो चुका था।

9 नवंबर 1989 को शिलान्यास भी हो चुका था।

इसलिए नई सरकार के सामने प्रश्न यह नहीं था कि अयोध्या को राष्ट्रीय मुद्दा बनने से कैसे रोका जाए।

वह चरण समाप्त हो चुका था।

अब प्रश्न था—

राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के पास अपना स्पष्ट बहुमत नहीं था।

उसे भाजपा का बाहर से समर्थन प्राप्त था।

साथ ही वामपंथी दल भी सरकार को समर्थन दे रहे थे।

लेकिन अयोध्या पर दोनों लगभग विपरीत स्थितियों में थे।

भाजपा—

मंदिर आंदोलन के साथ।

वाम दल—

धर्म आधारित जनलामबंदी के विरोध में।

इसलिए प्रधानमंत्री किसी एक पक्ष के अनुरूप नीति अपनाते तो सरकार की दूसरी सहायक शक्ति नाराज होती।

अयोध्या का समाधान केवल धार्मिक नहीं, सरकार बचाने का प्रश्न भी था।

केंद्र की कठिनाई उत्तर प्रदेश की राजनीति से और बढ़ी।

दिसंबर 1989 में मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने।

उनकी सरकार विवादित ढांचे की सुरक्षा और न्यायालय की यथास्थिति बनाए रखने के पक्ष में थी।

विहिप मंदिर निर्माण के लिए कारसेवा चाहती थी।

यानी केंद्र को केवल हिंदू और मुस्लिम पक्ष के बीच ही मध्यस्थता नहीं करनी थी—

उसे अपनी समर्थक भाजपा और उत्तर प्रदेश की जनता दल सरकार के बीच भी संतुलन बनाना था।

यह प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर कठिन था।

हाँ।

बाद के विवरण बताते हैं कि प्रधानमंत्री बनने के शीघ्र बाद उन्होंने विवाद के न्यायालय-बाह्य समाधान के लिए प्रयास शुरू किए। एक विवरण के अनुसार उन्होंने तीन सदस्यीय समूह भी बनाया, हालांकि बाबरी मस्जिद पक्ष की पूर्ण भागीदारी न होने से प्रारंभिक प्रयास आगे नहीं बढ़ सका।

लेकिन वी. पी. सिंह काल की वार्ताओं की एक विशेष समस्या थी—

उनका बड़ा हिस्सा अनौपचारिक और अनेक समानांतर माध्यमों से चला।

इसीलिए आज भी उसके प्रत्येक चरण का स्पष्ट सरकारी अभिलेख उपलब्ध नहीं है।

बाद में भाजपा द्वारा प्रकाशित अयोध्या श्वेतपत्र ने वी. पी. सिंह सरकार की वार्ताओं की आलोचना करते हुए कहा कि बातचीत अनेक अनौपचारिक माध्यमों से हुई और कई बैठकों का पूरा सरकारी अभिलेख उपलब्ध नहीं था। उस दस्तावेज में विहिप, कांची शंकराचार्य, विभिन्न राज्यपालों, सुबोध कांत सहाय और अली मियां जैसे अनेक माध्यमों का उल्लेख है। चूंकि यह भाजपा का पक्षीय दस्तावेज है, इसकी आलोचनात्मक भाषा को सरकारी निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए; फिर भी यह उस समय की बहु-माध्यमीय वार्ता-प्रक्रिया की ओर संकेत करता है।

यही पहलू चंद्रशेखर सरकार की बाद की अधिक व्यवस्थित वार्ता से वी. पी. सिंह काल को अलग करता है।

विहिप के अपने आधिकारिक विवरण के अनुसार 1990 की शुरुआत में कारसेवा पुनः शुरू करने की तैयारी थी। प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह ने समाधान खोजने के लिए समय मांगा।

विहिप के अनुसार—

8 फरवरी 1990 से चार महीने का समय सरकार को दिया गया।

यह बहुत महत्वपूर्ण तथ्य है।

इसका अर्थ था—

विहिप तत्काल निर्माण कार्यक्रम स्थगित करने को तैयार थी,

बशर्ते सरकार चार महीने में कोई ठोस समाधान निकाले।

यानी उस समय संवाद की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी।

इसे दोनों तरह पढ़ा जा सकता है।

एक दृष्टि से—

विहिप ने सरकार को अवसर दिया।

दूसरी दृष्टि से—

वह समयसीमा देकर सरकार पर दबाव बना रही थी।

यानी संदेश था—

“हम अभी रुक रहे हैं, लेकिन अनिश्चितकाल तक नहीं।”

यही समयबद्ध दबाव आगे जून 1990 के बाद निर्णायक बना।

विहिप के आधिकारिक विवरण के अनुसार इन चार महीनों में बजरंग दल ने प्रत्येक माह प्रशासन को चेतावनी देने के कार्यक्रम चलाए। जिला मुख्यालयों पर घंटा, शंख और झांझ बजाकर सरकार को समयसीमा की याद दिलाई जाती थी। अंतिम “चेतावनी दिवस” 8 जून 1990 को मनाया गया।

यह धार्मिक प्रतीकों के माध्यम से राजनीतिक दबाव बनाने की विशिष्ट शैली थी।

सरकार को समय दिया गया था—

लेकिन जनता के सामने लगातार यह बताया जा रहा था कि समय समाप्त हो रहा है।

यह प्रश्न उस समय आंदोलन की सबसे बड़ी शिकायत बना।

विहिप का बाद का दावा था कि चार महीनों में कोई संतोषजनक समाधान नहीं निकला।

लेकिन यह कहना कि सरकार ने कुछ किया ही नहीं, ठीक नहीं।

उपलब्ध विवरण बताते हैं कि प्रधानमंत्री और उनके सहयोगियों ने—

संत नेताओं,

विहिप,

भाजपा,

मुस्लिम प्रतिनिधियों,

धार्मिक मध्यस्थों,

और विभिन्न राजनीतिक व्यक्तियों—

से लगातार संपर्क बनाए रखा।

समस्या यह थी कि वार्ताएं एक स्पष्ट, सार्वजनिक, लिखित प्रक्रिया में नहीं बदल सकीं।

वी. पी. सिंह का व्यापक रुख दो रास्तों के बीच था—

आपसी सहमति।

न्यायालय का निर्णय।

बाद में लिब्रहान आयोग के सामने अपने बयान में उन्होंने कहा कि विवाद का समाधान या तो आपसी समझ से होना चाहिए अथवा न्यायिक निर्णय से। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने विहिप को विवादित क्षेत्र से बाहर की भूमि पर निर्माण का विकल्प दिया था, बशर्ते विवादित भूमि पर न्यायालय के निर्णय का सम्मान किया जाए।

यह उनके समाधान की मूल दिशा को समझने में महत्वपूर्ण है।

यही वी. पी. सिंह की सबसे महत्वपूर्ण संभावित समझौता-रेखाओं में एक था।

कल्पना यह थी—

विवादित केंद्रीय क्षेत्र को फिलहाल न छुआ जाए।

आसपास ऐसी भूमि जहां स्वामित्व-विवाद नहीं है, वहां मंदिर निर्माण की शुरुआत की जा सकती है।

और जिस भूमि पर अदालत में मुकदमा है, उसका अंतिम निर्णय न्यायालय या समझौते से हो।

इससे विहिप को निर्माण का प्रतीक मिलता,

और मुस्लिम पक्ष का लंबित स्वामित्व दावा तुरंत समाप्त नहीं होता।

वी. पी. सिंह ने बाद में लिब्रहान आयोग के सामने कहा कि विहिप ने विवादित क्षेत्र के बाहर निर्माण के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया और शिलान्यास स्थल तक जाने पर जोर दिया।

विहिप की मूल वैचारिक समस्या थी—

उसके लिए प्रश्न “अयोध्या में मंदिर” का नहीं था।

प्रश्न था—

यदि गर्भगृह माने जाने वाले स्थान पर दावा लंबित ही रहता, तो केवल आसपास मंदिर बनाना आंदोलन की केंद्रीय मांग पूरी नहीं करता।

यहीं समझौते की सीमा थी।

मुस्लिम पक्ष की आशंका उलटी थी।

यदि पहले मंदिर निर्माण आसपास शुरू हो जाए—

तो विशाल जनदबाव और निर्माण की वास्तविकता भविष्य में विवादित केंद्र पर मुस्लिम दावे को व्यावहारिक रूप से कमजोर कर सकती थी।

इसलिए उनके लिए “पहले आसपास निर्माण, बाद में मुख्य स्थल” भी सहज समझौता नहीं था।

दोनों पक्ष भूमि के अलग-अलग हिस्सों को केवल जमीन की तरह नहीं देख रहे थे।

उनके पीछे धार्मिक प्रतीकवाद जुड़ा था।

क्योंकि विवाद केवल वर्गफुट का नहीं था।

विहिप के लिए—

विशिष्ट जन्मस्थान ही मंदिर का केंद्र था।

मुस्लिम पक्ष के लिए—

उसी स्थान पर मस्जिद का दावा था।

इसलिए आसपास जितनी भी अतिरिक्त भूमि दी जाती—

मूल प्रश्न बचा रहता।

यही कारण है कि बाद में भी अनेक भूमि-विनिमय सूत्र विफल हुए।

वी. पी. सिंह काल में प्रत्यक्ष सरकारी वार्ताओं के अतिरिक्त धार्मिक मध्यस्थता के भी प्रयास हुए।

कांची शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती जैसे धार्मिक नेताओं का नाम विभिन्न विवरणों में आता है। मुस्लिम धार्मिक नेतृत्व में अली मियां अर्थात मौलाना अबुल हसन अली नदवी जैसे व्यक्तियों से भी संपर्क की चर्चा मिलती है। बाद के स्रोत बताते हैं कि कांची शंकराचार्य और मुस्लिम नेतृत्व के बीच मध्यस्थता की धाराएं पहले भी चली थीं और वी. पी. सिंह काल में भी धार्मिक माध्यमों को उपयोगी माना गया।

इससे सरकार का दृष्टिकोण स्पष्ट होता है—

वह केवल राजनीतिक दलों के माध्यम से समाधान नहीं खोज रही थी।

क्योंकि हर मध्यस्थ की अपनी स्वीकार्यता और सीमा थी।

कोई विहिप के निकट।

कोई मुस्लिम धार्मिक नेतृत्व के निकट।

कोई प्रधानमंत्री का राजनीतिक सहयोगी।

कोई राज्यपाल।

कोई संत।

कई माध्यम होने का लाभ था—

हर दरवाजा खुला रहता।

हानि थी—

एक आधिकारिक वार्ता-पथ विकसित नहीं हुआ।

किसने क्या प्रस्ताव दिया?

किसे किसने स्वीकार किया?

कौन-सी बात प्रधानमंत्री की आधिकारिक नीति थी?

इन पर अस्पष्टता बनी रही।

वी. पी. सिंह काल में कुछ संपर्क और मध्यस्थ प्रयास हुए, लेकिन बाद की चंद्रशेखर सरकार जैसी सुव्यवस्थित, लिखित, विशेषज्ञ-आधारित प्रत्यक्ष वार्ता अभी विकसित नहीं हुई थी।

यह बहुत महत्वपूर्ण भेद है।

अक्सर अयोध्या इतिहास में 1990–91 की सारी बातचीत को वी. पी. सिंह काल में डाल दिया जाता है।

यह गलत है।

इतिहास, पुरातत्व, कानून और राजस्व अभिलेखों के व्यवस्थित आदान-प्रदान वाली मुख्य विशेषज्ञ प्रक्रिया चंद्रशेखर सरकार के समय दिसंबर 1990 से आगे अधिक स्पष्ट रूप में चली।

लिब्रहान आयोग 1991 के इस चरण में दस्तावेजों को साहित्य, इतिहास, प्राचीन सरकारी और कानूनी अभिलेख जैसी श्रेणियों में बांटकर दावों और प्रत्युत्तरों के आदान-प्रदान का उल्लेख करता है।

इसे वी. पी. सिंह की उपलब्धि के रूप में नहीं लिखना चाहिए।

उनका चरण था—

समय खरीदना + मध्यस्थ तलाशना + राजनीतिक सूत्र खोजना।

चंद्रशेखर चरण था—

दस्तावेजी बहस को औपचारिक रूप देना।

यह स्पष्ट अंतर हमारे शोध में बने रहना चाहिए।

8 जून तक विहिप द्वारा दी गई अवधि समाप्त हो गई।

सरकार कोई अंतिम समझौता प्रस्तुत नहीं कर सकी।

इसके बाद आंदोलनकारी नेतृत्व का विश्वास घटा।

विहिप का निष्कर्ष था—

सरकार समय ले रही है, समाधान नहीं दे रही।

सरकार की समस्या थी—

दोनों पक्षों की मूल मांगें इतनी दूर थीं कि कोई भी सूत्र तुरंत स्वीकार्य नहीं था।

जून की अवधि समाप्त होने के बाद विहिप ने आंदोलन तेज करने की तैयारी की।

एक व्यापक ऐतिहासिक समयरेखा जुलाई–अक्टूबर 1990 को वी. पी. सिंह सरकार की वार्ता-कोशिशों का चरण बताती है और दर्ज करती है कि विहिप ने 30 अक्टूबर 1990 से मंदिर निर्माण/कारसेवा की तिथि तय कर दी।

अब सरकार के सामने निश्चित समयसीमा थी।

30 अक्टूबर तक समाधान निकालो—

अन्यथा कारसेवक अयोध्या जाएंगे।

क्योंकि अब आंदोलन एक अस्पष्ट भविष्य की बात नहीं कर रहा था।

तिथि तय थी।

अयोध्या गंतव्य था।

कारसेवा घोषित थी।

इससे सरकार के पास विकल्प तेजी से घटने लगे।

समझौता,

न्यायालय,

प्रशासनिक रोक,

या राजनीतिक टकराव—

इनमें से कुछ चुनना था।

भाजपा बाहर से वी. पी. सिंह सरकार को समर्थन दे रही थी।

लेकिन वह पालमपुर प्रस्ताव से मंदिर आंदोलन के साथ औपचारिक रूप से प्रतिबद्ध भी थी।

इसलिए पार्टी दो भूमिकाओं में थी—

सरकार की समर्थक।

आंदोलन की राजनीतिक प्रतिनिधि।

जब तक बातचीत चलती रही, दोनों भूमिकाएं साथ चल सकती थीं।

जैसे ही सरकार और आंदोलन आमने-सामने आए—

दोनों भूमिकाओं का सह-अस्तित्व कठिन हो गया।

1990 में प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह ने लालकृष्ण आडवाणी सहित भाजपा नेताओं से भी समाधान तलाशने की कोशिश की। जनवरी 1991 की राज्यसभा बहस में भी यह दर्ज हुआ कि रथयात्रा शुरू होने के बाद वी. पी. सिंह आडवाणी और अन्य नेताओं से समाधान पर बातचीत कर रहे थे।

इसलिए सरकार ने भाजपा को केवल आंदोलनकारी पक्ष के रूप में नहीं देखा—

वह उसे अपने संसदीय अस्तित्व की आवश्यक सहयोगी शक्ति के रूप में भी वार्ता में रख रही थी।

क्योंकि सितंबर 1990 तक विहिप और भाजपा नेतृत्व को सरकार से कोई स्वीकार्य परिणाम दिखाई नहीं दे रहा था।

25 सितंबर 1990 को लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या के लिए रथयात्रा आरंभ की।

यह अलग अध्याय का विषय है, लेकिन यहां इसका अर्थ महत्वपूर्ण है—

संवाद से जनदबाव की ओर निर्णायक संक्रमण।

अब भाजपा केवल प्रधानमंत्री से बात नहीं कर रही थी।

वह जनता के बीच अभियान चला रही थी।

दोनों प्रभाव हुए।

एक ओर—

उसने सरकार पर असाधारण दबाव बनाया कि समाधान जल्दी निकले।

दूसरी ओर—

जैसे-जैसे यात्रा में भीड़ और राजनीतिक भावनाएं बढ़ीं, समझौते के लिए नेतृत्व की स्वतंत्रता घटती गई।

अब कोई भी पक्ष अपने समर्थकों के सामने “पीछे हटता” दिखाई नहीं देना चाहता था।

यही जनांदोलन और वार्ता के बीच अंतर्निहित तनाव है।

अक्टूबर आते-आते तीन घड़ियां साथ चल रही थीं—

30 अक्टूबर की कारसेवा।

आडवाणी की अयोध्या की ओर बढ़ती रथयात्रा।

और सरकार की अपनी राजनीतिक आयु।

यदि अयोध्या में टकराव होता—

कानून-व्यवस्था संकट।

यदि सरकार कारसेवा की अनुमति देती—

मुस्लिम पक्ष और उत्तर प्रदेश सरकार का विरोध।

यदि आडवाणी को रोका जाता—

भाजपा समर्थन वापसी कर सकती थी।

यही वी. पी. सिंह की असंभव राजनीतिक स्थिति थी।

अक्टूबर के अंतिम चरण में वी. पी. सिंह सरकार ने विवाद को भूमि-अधिग्रहण के माध्यम से हल करने का प्रयास किया।

इस दिशा में विचार यह था कि केंद्र विवादित और आसपास के क्षेत्र को अपने नियंत्रण में लेकर—

तत्काल टकराव रोके,

मंदिर निर्माण के लिए कुछ व्यवस्था बनाए,

और केंद्रीय विवाद को न्यायिक/अन्य समाधान के लिए सुरक्षित रखे।

यही विचार अंततः अध्यादेश तक पहुंचा।

संसद के आधिकारिक अभिलेख में राम जन्मभूमि–बाबरी मस्जिद (क्षेत्र अधिग्रहण) अध्यादेश, 1990 की घोषणा 19 अक्टूबर 1990 को दर्ज है।

यह अत्यंत महत्वपूर्ण लेकिन अल्पजीवी संवैधानिक प्रयोग था।

सरकार अब बातचीत से आगे बढ़कर कानून की शक्ति से जमीन अपने नियंत्रण में लेने का प्रयास कर रही थी।

मूल राजनीतिक सोच थी—

विवादित भूमि पर तत्काल कोई पक्ष पूर्ण नियंत्रण न पाए।

केंद्र स्वयं क्षेत्र का अधिग्रहण करे।

और ऐसा समाधान निकाला जाए जिसमें निर्माण तथा विवादित केंद्रीय स्थल के न्यायिक प्रश्न को अलग किया जा सके।

लेकिन योजना पर हिंदू और मुस्लिम—दोनों ओर से विरोध उभरा।

यही उसकी सबसे बड़ी विफलता थी।

मुस्लिम नेतृत्व को भय था कि अधिग्रहण अंततः मंदिर निर्माण के पक्ष में भूमि हस्तांतरण का साधन बन सकता है।

उनके लिए मूल प्रश्न था—

यदि उनका स्वामित्व मुकदमा लंबित है, तो सरकार भूमि अधिग्रहित कर धार्मिक समाधान क्यों थोपे?

इससे संपत्ति-अधिकार, न्यायिक प्रक्रिया और अल्पसंख्यक धार्मिक अधिकार के प्रश्न उठे।

विहिप के लिए भी सरकार का सूत्र पर्याप्त नहीं था यदि वह वास्तविक जन्मस्थान पर मंदिर निर्माण को तत्काल सुनिश्चित नहीं करता।

वी. पी. सिंह ने बाद में कहा कि उन्होंने विवादित हिस्से से बाहर निर्माण की पेशकश की थी लेकिन विहिप उस शिलान्यास स्थल और मूल दावे से पीछे हटने को तैयार नहीं हुई।

यानी सरकारी “मध्य मार्ग” दोनों के लिए अधूरा था।

कुछ बाद के विवरणों में अक्टूबर 1990 की समझौता-चर्चाओं के दौरान काशी और मथुरा जैसे अन्य धार्मिक स्थलों पर भविष्य की मांगों को रोकने का प्रश्न भी जोड़ा गया बताया गया है। एक हालिया पुस्तक-आधारित विवरण में दावा किया गया है कि प्रस्तावित समाधान के साथ विहिप से काशी और मथुरा की मांग छोड़ने की शर्त पर भी विचार हुआ।

लेकिन यह विवरण बाद के पुनर्निर्माण पर आधारित है।

इसे किसी सार्वजनिक मूल मंत्रिमंडलीय निर्णय की तरह नहीं लिखना चाहिए।

सबसे सुरक्षित निष्कर्ष—

अक्टूबर की अंतिम वार्ताओं में अयोध्या को अंतिम विशेष मामला बनाकर भविष्य के धार्मिक विवाद सीमित करने की सोच पर भी चर्चा हुई बताई जाती है, पर उसकी ठीक शर्तें स्रोतों में समान नहीं हैं।

19 अक्टूबर को अधिग्रहण अध्यादेश आया।

23 अक्टूबर को उसे वापस लेने का अलग अध्यादेश जारी हुआ।

दोनों तिथियां संसद के आधिकारिक अभिलेख में दर्ज हैं।

चार दिन में वापसी बताती है कि सरकार का समाधान राजनीतिक रूप से टिकाऊ नहीं था।

जिस विधिक कदम से टकराव समाप्त होना था—

उसने उलटे नए विरोध पैदा कर दिए।

“घबराहट” राजनीतिक विशेषण है।

अधिक सटीक होगा—

सरकार अंतिम समय में तीव्र राजनीतिक दबाव में तेजी से बदलते समाधान खोज रही थी।

अध्यादेश का चार दिन में आना और जाना यह दिखाता है कि मंत्रणा स्थिर नहीं थी और सभी प्रमुख पक्षों की सहमति प्राप्त नहीं थी।

यही वार्ता प्रक्रिया की संस्थागत कमजोरी थी।

एक अर्थ में यह बताता है कि केंद्र द्वारा अयोध्या क्षेत्र के अधिग्रहण की अवधारणा 1993 से पहले भी सामने आ चुकी थी।

लेकिन 1990 का अध्यादेश और 1993 का अधिग्रहण कानून एक नहीं थे।

1993 का कानून 6 दिसंबर 1992 के विध्वंस के बाद अलग संवैधानिक परिस्थिति में आया और 67.703 एकड़ क्षेत्र से संबंधित था। भारत सरकार के विधिक अभिलेख 1993 के कानून को अलग अधिनियम के रूप में दर्ज करते हैं।

दोनों को मिलाना गलत होगा।

23 अक्टूबर 1990 अयोध्या राजनीति में असाधारण दिन था।

एक ओर केंद्र ने अधिग्रहण अध्यादेश वापस लिया।

दूसरी ओर बिहार के समस्तीपुर में लालू प्रसाद यादव सरकार ने लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार कर रथयात्रा रोक दी।

इसके बाद भाजपा ने वी. पी. सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया।

संसदीय इतिहास के आधिकारिक विवरण के अनुसार भाजपा के समर्थन वापस लेने से वी. पी. सिंह सरकार अल्पमत में आ गई और राष्ट्रपति ने उन्हें 7 नवंबर तक बहुमत सिद्ध करने को कहा।

यानी समझौते की प्रक्रिया उसी दिन सत्ता-संकट में बदल गई।

आडवाणी को बिहार सरकार ने गिरफ्तार किया, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर यह वी. पी. सिंह सरकार और भाजपा के संबंध-विच्छेद का प्रतीक बन गया।

भाजपा के लिए—

राम मंदिर आंदोलन के राष्ट्रीय नेता को रोक दिया गया।

सरकार के लिए—

कानून-व्यवस्था और घोषित कारसेवा की ओर बढ़ती यात्रा को अनियंत्रित नहीं छोड़ा जा सकता था।

दोनों तर्क अब टकराव की अवस्था में थे।

सिर्फ व्यक्तिगत गिरफ्तारी नहीं।

यह मंदिर प्रश्न पर विश्वास टूटने का बिंदु था।

पालमपुर से पार्टी की प्रतिबद्धता स्पष्ट थी।

रथयात्रा उसी प्रतिबद्धता की जनराजनीतिक अभिव्यक्ति थी।

जब यात्रा रोकी गई—

भाजपा यदि फिर भी सरकार को समर्थन देती रहती, तो उसके समर्थक उसे अपनी ही आंदोलनकारी राजनीति से पीछे हटना मान सकते थे।

इसलिए समर्थन वापसी लगभग राजनीतिक रूप से अपरिहार्य हो गई।

बहुत हद तक तत्काल कारण यही बना।

संसदीय अभिलेख बताते हैं कि भाजपा ने 23 अक्टूबर को समर्थन वापस लिया और 7 नवंबर को विश्वास मत में वी. पी. सिंह सरकार 152 के मुकाबले 356 मतों से पराजित हुई।

लेकिन सरकार के भीतर पहले से—

मंडल विवाद,

जनता दल की आंतरिक कलह,

देवीलाल प्रकरण,

चंद्रशेखर गुट—

जैसी समस्याएं भी थीं।

इसलिए अयोध्या अंतिम निर्णायक प्रहार था, अकेली कमजोरी नहीं।

वी. पी. सिंह सरकार की वार्ताएं पांच बड़ी वजहों से सफल नहीं हो सकीं।

विहिप विशिष्ट जन्मस्थान चाहती थी।

मुस्लिम पक्ष उसी स्थान पर मस्जिद/स्वामित्व दावा छोड़ना नहीं चाहता था।

फरवरी से जून तक चार महीने की समयसीमा।

फिर अक्टूबर तक आंदोलन तेज।

कई मध्यस्थ, कम स्पष्ट आधिकारिक अभिलेख।

भाजपा भी चाहिए, वाम समर्थन भी।

रथयात्रा और कारसेवा की घोषणा ने समझौते की राजनीतिक जगह सिकोड़ दी।

मुलायम सिंह यादव की सरकार मंदिर निर्माण या कारसेवा को अनुमति देने के लिए तैयार नहीं थी यदि उससे विवादित ढांचे या न्यायालय की यथास्थिति को खतरा हो।

केंद्र कोई समझौता प्रस्तावित करे—

उसे जमीन पर लागू करने वाला प्रशासन उत्तर प्रदेश का था।

इसलिए केंद्र के पास अकेले समाधान लागू करने की पूर्ण क्षमता नहीं थी।

यही संघीय ढांचे की वास्तविकता थी।

हिंदू पक्ष को आशंका—

सरकार समय काट रही है।

मुस्लिम पक्ष को आशंका—

सरकार अंततः बहुसंख्यक दबाव में झुक सकती है।

भाजपा को आशंका—

जनता दल राजनीतिक लाभ लेकर मंदिर पर निर्णय टाल देगा।

उत्तर प्रदेश सरकार को आशंका—

कारसेवा की अनुमति ढांचे की सुरक्षा खतरे में डालेगी।

ऐसे वातावरण में कोई समझौता केवल लिखित प्रस्ताव से नहीं बन सकता था।

विश्वास की न्यूनतम पूंजी भी आवश्यक थी।

वह मौजूद नहीं थी।

राजनीतिक रूप से यह बार-बार कहा गया कि न्यायालय शीघ्र फैसला करे।

लेकिन सरकार अदालत को किसी निश्चित परिणाम या अनुचित समयसीमा का आदेश नहीं दे सकती थी।

स्वामित्व वाद उच्च न्यायालय में लंबित थे और प्रमाण बहुत विस्तृत थे।

इसलिए “सरकार चार महीने में अदालत से फैसला करा देती” व्यावहारिक समाधान नहीं था।

क्योंकि कार्यपालिका को तत्काल कार्रवाई चाहिए थी।

न्यायालय धीमा।

वार्ता विफल।

कारसेवा निकट।

अतः भूमि अधिग्रहण से सरकार विवाद की भौतिक जगह को अपने नियंत्रण में लेना चाहती थी।

यह संवैधानिक रूप से साहसिक था—

लेकिन राजनीतिक सहमति के बिना टिक नहीं सका।

विभिन्न बाद के पुनर्निर्माणों में न्यायिक या संवैधानिक संदर्भ के अनेक सूत्रों का उल्लेख मिलता है, लेकिन 1990 में कोई ऐसा स्थायी राष्ट्रपति संदर्भ अंतिम रूप में सर्वोच्च न्यायालय के सामने नहीं गया जैसा जनवरी 1993 में हुआ।

इसलिए 1990 की चर्चा और 1993 के वास्तविक अनुच्छेद 143 संदर्भ को अलग रखना आवश्यक है।

यह एक महत्वपूर्ण संस्थागत आलोचना है।

यदि सरकार फरवरी में ही—

सभी पक्ष,

दावे,

समयसीमा,

मध्यस्थ,

दस्तावेज,

और संभावित समाधान—

को एक औपचारिक वार्ता-ढांचे में रख देती, तो कम-से-कम प्रक्रिया अधिक पारदर्शी होती।

इससे समझौता निश्चित हो जाता—ऐसा नहीं।

लेकिन बाद में यह विवाद कम रहता कि सरकार ने “चार महीने में किया क्या?”

वी. पी. सिंह काल की वार्ताओं का यही सबसे कमजोर हिस्सा था।

वी. पी. सिंह सरकार गिरने के बाद चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने।

उनकी सरकार ने विहिप और बाबरी मस्जिद पक्ष को विशेषज्ञों सहित अधिक व्यवस्थित तरीके से बैठाने का प्रयास किया।

इतिहास,

पुरातत्व,

कानून,

राजस्व और दस्तावेज—

पर दावों का आदान-प्रदान शुरू हुआ।

लिब्रहान आयोग इस बाद के चरण में दावों, प्रत्युत्तरों और विशेषज्ञ सूचियों का उल्लेख करता है।

यानी वी. पी. सिंह की असंगठित मध्यस्थता के बाद संवाद को अधिक अभिलेखीय रूप देने की कोशिश हुई।

इस अध्याय में हमें चंद्रशेखर काल की दस्तावेजी बहस को विस्तार से नहीं लेना चाहिए।

वी. पी. सिंह चरण की समाप्ति—

23 अक्टूबर समर्थन वापसी,

30 अक्टूबर कारसेवा की ओर टकराव,

7 नवंबर सरकार का पतन—

पर होती है।

दिसंबर 1990 से शुरू व्यवस्थित प्रमाण-विवाद एक अलग बाद का प्रसंग है।

उन्होंने बाद में कहा कि उन्होंने समझौते का गंभीर प्रयास किया था और विहिप को विवादित स्थल के बाहर भूमि पर निर्माण का बेहतर विकल्प दिया था, बशर्ते न्यायालय के निर्णय का सम्मान किया जाए।

यह उनका अपना पक्ष है।

इसे अंतिम निष्पक्ष निष्कर्ष नहीं मानना चाहिए।

लेकिन इससे यह स्पष्ट है कि वे स्वयं अपनी नीति को—

न मंदिर-विरोधी, न मस्जिद-विरोधी; बल्कि विवादित हिस्से को न्यायिक निर्णय तक सुरक्षित रखते हुए निर्माण का वैकल्पिक रास्ता—

मानते थे।

विहिप की आधिकारिक स्मृति का जोर अलग है—

प्रधानमंत्री ने चार महीने मांगे।

चार महीने दिए गए।

अंत तक समाधान नहीं आया।

इस दौरान बजरंग दल चेतावनी कार्यक्रम करता रहा।

यानी विहिप की कहानी है—

हमने अवसर दिया; सरकार असफल हुई।

सरकार निष्क्रिय नहीं थी।

लेकिन सफल भी नहीं हुई।

विहिप बातचीत से पूरी तरह इंकार नहीं कर रही थी।

लेकिन मूल जन्मस्थान से पीछे भी नहीं हटना चाहती थी।

मुस्लिम पक्ष संवाद के कुछ रूपों में था।

लेकिन मस्जिद का दावा छोड़ने को तैयार नहीं।

इसलिए विफलता केवल किसी एक पक्ष की “बदनीयती” से समझना इतिहास को छोटा कर देगा।

मूल समस्या दावों की संरचना में थी।

सैद्धांतिक रूप से कुछ सूत्र थे—

भूमि-विनिमय,

विवादित स्थल पर अदालत,

आसपास मंदिर निर्माण,

केंद्र द्वारा अधिग्रहण,

धार्मिक नेतृत्व के बीच समझौता।

लेकिन व्यवहार में हर सूत्र किसी न किसी पक्ष की मूल लाल रेखा छूता था।

इसलिए समझौता संभव था—लेकिन अत्यंत कठिन।

हाँ, एक सीमा तक।

क्योंकि आंदोलन समर्थकों के लिए निर्माण की प्रतीकात्मक शुरुआत हो चुकी थी।

अब उनसे कहना—

“फिर रुकिए, पहले कई वर्ष मुकदमा चले”—

राजनीतिक रूप से कठिन था।

दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष के लिए शिलान्यास स्वयं चेतावनी था कि यदि वह सहमति देता गया तो धीरे-धीरे स्थिति उसके विरुद्ध स्थायी हो सकती है।

इसलिए 1989 ने दोनों ओर कठोरता बढ़ाई।

भाजपा अब छोटी पार्टी नहीं थी।

उसके 85 सांसद केंद्र सरकार की स्थिरता के लिए जरूरी थे।

इससे मंदिर आंदोलन की मांग अब सरकार से बाहर की आवाज नहीं रही।

वह संसद के शक्ति-समीकरण के भीतर थी।

लेकिन यही शक्ति वी. पी. सिंह की बातचीत को स्वतंत्र भी नहीं रहने देती थी।

वे ऐसा समाधान नहीं दे सकते थे जिसे भाजपा पूर्णतः अस्वीकार कर दे।

दूसरी ओर सरकार पर वाम दलों का भी प्रभाव था।

वे धार्मिक जनदबाव से भूमि हस्तांतरण या मंदिर निर्माण स्वीकार करने के विरोध में थे।

यानी प्रधानमंत्री एक ऐसे राजनीतिक त्रिभुज में थे—

भाजपा,

वाम,

और जनता दल के भीतर समाजवादी-धर्मनिरपेक्ष धारा।

अयोध्या पर इन तीनों की सहमति लगभग असंभव थी।

भ्रष्टाचार-विरोध ने इन्हें एक किया था।

अयोध्या ने अलग कर दिया।

1989 में साझा लक्ष्य था—

कांग्रेस हटाओ।

1990 में प्रश्न था—

राम जन्मभूमि पर क्या करो?

पहले प्रश्न का उत्तर साझा था।

दूसरे का नहीं।

यही सरकार के पतन की वैचारिक जड़ थी।

अगस्त 1990 में वी. पी. सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की घोषणा की।

इससे देश में अलग सामाजिक विस्फोट हुआ।

भाजपा को अब एक साथ—

मंडल की जातीय राजनीति,

राम मंदिर की धार्मिक राजनीति,

और सरकार के समर्थन—

तीनों से निपटना था।

यही अगला अध्याय 44 का केंद्रीय विषय होगा।

नहीं।

अयोध्या वार्ता पहले से कठिन थी।

चार महीने की अवधि जून में समाप्त हो चुकी थी—मंडल की अगस्त घोषणा से पहले।

इसलिए “मंडल आया और तभी मंदिर वार्ता टूट गई” कालक्रमगत रूप से गलत होगा।

हाँ, अगस्त के बाद राजनीतिक वातावरण और जटिल अवश्य हुआ।

फरवरी—

समय दो।

जून—

समय समाप्त।

जुलाई—

कारसेवा घोषित।

सितंबर—

रथयात्रा।

अक्टूबर—

अध्यादेश।

23 अक्टूबर—

अध्यादेश वापसी + आडवाणी गिरफ्तारी + भाजपा समर्थन वापसी।

30 अक्टूबर—

कारसेवा का घोषित दिन।

यह क्रम दिखाता है कि संवाद धीरे-धीरे टकराव में कैसे बदला।

भाजपा द्वारा समर्थन वापस लेने के बाद प्रधानमंत्री ने लोकसभा में विश्वास मत मांगा।

7 नवंबर 1990 को सरकार 152 के मुकाबले 356 मतों से हार गई। संसदीय इतिहास का आधिकारिक विवरण इस मतगणना को दर्ज करता है।

10 नवंबर को चंद्रशेखर ने नई सरकार बनाई।

इस प्रकार वी. पी. सिंह का अयोध्या समाधान प्रयास उनके प्रधानमंत्रित्व के साथ समाप्त हो गया।

व्यापक राजनीतिक अर्थ में 1990 का संकट निश्चित रूप से ऐसा क्षण था जब राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़ा प्रश्न केंद्र सरकार के अस्तित्व का निर्णायक कारण बना।

लेकिन सरकार में आंतरिक विभाजन पहले से मौजूद थे।

इसलिए सबसे सटीक भाषा होगी—

हालांकि समझौता नहीं हुआ, एक बात स्थापित हुई—

सभी पक्ष यह समझ रहे थे कि केवल बल या नारे से स्थायी समाधान संभव नहीं।

संवाद,

भूमि,

न्यायालय,

इतिहास,

धार्मिक विश्वास—

सभी को किसी न किसी रूप में जोड़ना पड़ेगा।

इसी अनुभव ने बाद की चंद्रशेखर और नरसिंह राव सरकारों की वार्ता प्रक्रियाओं को प्रभावित किया।

सरकार कोई ऐसा विश्वसनीय, लिखित, सर्वमान्य वार्ता ढांचा नहीं बना सकी जिसमें दोनों पक्षों को लगे कि प्रक्रिया निष्पक्ष और परिणामोन्मुख है।

यही कारण था कि चार महीने समाप्त होते ही आंदोलन नेतृत्व ने सरकार को समय-कटाई करने वाला बताना शुरू किया।

और अक्टूबर आते-आते राजनीतिक संवाद लगभग समाप्त हो चुका था।

दिसंबर 1989 — वी. पी. सिंह प्रधानमंत्री; भाजपा का बाहर से समर्थन।

दिसंबर 1989–जनवरी 1990 — अयोध्या पर मध्यस्थता और प्रारंभिक संपर्क।

8 फरवरी 1990 के आसपास — विहिप द्वारा प्रधानमंत्री को समाधान के लिए चार महीने का समय देने का अपना आधिकारिक उल्लेख।

फरवरी–जून — सरकार की विभिन्न माध्यमों से बातचीत; बजरंग दल के मासिक चेतावनी कार्यक्रम।

8 जून — अंतिम चेतावनी दिवस; चार माह की अवधि समाप्त।

जून–जुलाई — विहिप मंदिर निर्माण के अगले कार्यक्रम पर आगे बढ़ती है।

जुलाई 1990 — 30 अक्टूबर कारसेवा/निर्माण की तिथि तय होने की दिशा स्पष्ट।

अगस्त 1990 — मंडल आयोग लागू करने की घोषणा; राजनीतिक वातावरण और तनावपूर्ण।

25 सितंबर — आडवाणी सोमनाथ से रथयात्रा शुरू करते हैं।

19 अक्टूबर — राम जन्मभूमि–बाबरी मस्जिद क्षेत्र अधिग्रहण अध्यादेश।

23 अक्टूबर — अध्यादेश वापसी; समस्तीपुर में आडवाणी गिरफ्तार; भाजपा समर्थन वापसी।

30 अक्टूबर — घोषित कारसेवा।

7 नवंबर — वी. पी. सिंह सरकार विश्वास मत हारती है, 152–356।

10 नवंबर — चंद्रशेखर प्रधानमंत्री।

प्रस्तावित दिशा — उद्देश्य — मुख्य कठिनाई

आपसी समझौता — अदालत से बाहर समाधान — मूल धार्मिक दावे पर सहमति नहीं

न्यायालय का निर्णय — विधिक समाधान — आंदोलन लंबी प्रतीक्षा को तैयार नहीं

विवादित स्थल के बाहर मंदिर — निर्माण शुरू हो सके — विहिप के लिए जन्मस्थान केंद्रीय

भूमि अधिग्रहण — केंद्र नियंत्रण लेकर टकराव रोके — दोनों पक्षों का अविश्वास

धार्मिक मध्यस्थता — संत–मुस्लिम नेतृत्व समझौता — प्रतिनिधित्व और अधिकार का प्रश्न

समय मांगना — तनाव कम कर समाधान खोजना — समय के साथ आंदोलन और तेज

गलत। सरकार ने अनेक माध्यमों से समझौते की कोशिश की; समस्या यह थी कि प्रक्रिया पर्याप्त औपचारिक और अभिलेखित नहीं थी।

गलत। विहिप के अपने आधिकारिक विवरण के अनुसार फरवरी 1990 में प्रधानमंत्री को चार महीने दिए गए।

अत्यधिक दावा। वार्ताएं हुईं, लेकिन कोई अंतिम सर्वमान्य परिणाम सामने नहीं आया।

गलत। व्यवस्थित विशेषज्ञ-दस्तावेज प्रक्रिया चंद्रशेखर सरकार में अधिक स्पष्ट रूप से चली। लिब्रहान आयोग इसे 1991 के चरण में दर्ज करता है।

गलत। उनका बाद का दावा उलटा था—उन्होंने विवादित हिस्से से बाहर निर्माण और विवादित भाग पर न्यायालय का निर्णय मानने का सूत्र दिया था।

गलत। 19 अक्टूबर को जारी अध्यादेश 23 अक्टूबर को वापस ले लिया गया।

गलत। भाजपा ने 23 अक्टूबर को समर्थन वापस लिया और 7 नवंबर को सरकार विश्वास मत हार गई। अयोध्या तत्काल निर्णायक कारण बनी, हालांकि अन्य राजनीतिक संकट भी मौजूद थे।

वी. पी. सिंह काल का अभिलेख यह सिद्ध करता है कि—

पहला, फरवरी 1990 तक संवाद की वास्तविक गुंजाइश मौजूद थी।

दूसरा, विहिप तत्काल संघर्ष पर ही अड़ी नहीं थी; उसने सरकार को समय दिया।

तीसरा, सरकार किसी न किसी रूप में विवादित और अविवादित भूमि को अलग कर समाधान खोजने का प्रयास कर रही थी। वी. पी. सिंह के बाद के आयोगीय बयान इसका समर्थन करते हैं।

चौथा, वार्ता की अस्पष्ट और बहु-माध्यमीय प्रकृति ने भरोसा बढ़ाने के बजाय भ्रम भी पैदा किया।

पांचवां, अक्टूबर 1990 तक सरकार इतनी दबावग्रस्त थी कि उसने भूमि-अधिग्रहण का अध्यादेश जारी कर चार दिन में वापस ले लिया।

छठा, अयोध्या प्रश्न ने भाजपा और सरकार के राजनीतिक संबंध को अंततः तोड़ दिया।

यह काल यह सिद्ध नहीं करता कि—

वी. पी. सिंह मंदिर-विरोधी थे।

विहिप हर समझौते के विरुद्ध थी।

मुस्लिम पक्ष हर बातचीत से अनुपस्थित था।

सरकार के पास कोई सरल समाधान था जिसे उसने जानबूझकर छोड़ दिया।

या केवल एक नेता की इच्छा से विवाद समाप्त हो सकता था।

उस समय तक दावे इतने संस्थागत और जनाधारित हो चुके थे कि किसी भी समझौते को दोनों समुदायों और अनेक संगठनों की स्वीकृति चाहिए थी।

वी. पी. सिंह सरकार की अयोध्या नीति को केवल “चार महीने बर्बाद किए” या “शांति की गंभीर कोशिश की”—इनमें से किसी एक वाक्य में नहीं समेटा जा सकता।

दोनों के तत्व मौजूद थे।

सरकार वास्तव में समझौता चाहती थी।

विहिप ने वास्तव में उसे समय दिया।

मध्यस्थ वास्तव में सक्रिय थे।

भूमि और न्यायालय को अलग-अलग संभालने के सूत्र वास्तव में खोजे गए।

लेकिन—

वार्ता का कोई स्थिर संस्थागत ढांचा नहीं बना।

मूल धार्मिक दावे एक-दूसरे के विपरीत रहे।

सरकार भाजपा और वाम दोनों पर निर्भर थी।

उत्तर प्रदेश सरकार और विहिप आमने-सामने थे।

और समय बीतने के साथ आंदोलन सड़क पर अधिक शक्तिशाली होता गया।

यही कारण है कि फरवरी में शुरू हुई “समाधान के लिए चार महीने” की राजनीति अक्टूबर में अध्यादेश, गिरफ्तारी और समर्थन वापसी तक पहुंच गई।

वी. पी. सिंह ने अयोध्या विवाद को बल से नहीं, बातचीत से संभालने का प्रयास किया। उनका बाद का दावा था कि मंदिर निर्माण के लिए विवादित हिस्से से बाहर भूमि उपलब्ध कराकर मूल स्थल को न्यायालय के निर्णय तक सुरक्षित रखने का सूत्र दिया गया था। विहिप के अपने अभिलेख स्वीकार करते हैं कि प्रधानमंत्री को फरवरी 1990 में चार महीने दिए गए थे।

लेकिन दोनों के बीच मूल अंतर समाप्त नहीं हुआ।

सरकार कह रही थी—

विवादित स्थान पर न्यायालय का निर्णय मानिए।

विहिप कह रही थी—

जन्मस्थान स्वयं मंदिर का अनिवार्य केंद्र है।

मुस्लिम पक्ष कह रहा था—

लंबित स्वामित्व और मस्जिद के अधिकार को जनदबाव से समाप्त नहीं किया जा सकता।

इस त्रिकोण का कोई साझा मध्यबिंदु नहीं निकला।

19 अक्टूबर का भूमि-अधिग्रहण अध्यादेश सरकार की अंतिम बड़ी कोशिश थी। चार दिन बाद उसका वापस होना स्वयं बताता है कि राजनीतिक सहमति कितनी कमजोर थी।

23 अक्टूबर को आडवाणी की गिरफ्तारी और भाजपा की समर्थन वापसी ने संवाद के उस चरण का अंत कर दिया। 7 नवंबर को वी. पी. सिंह सरकार गिर गई।

लेकिन सरकार के पतन से पहले एक दूसरी राजनीतिक शक्ति भारतीय राजनीति को बदल चुकी थी—

मंडल आयोग।

आरक्षण की घोषणा ने जाति की राजनीति को नए स्तर पर पहुंचाया, ठीक उसी समय राम मंदिर आंदोलन जाति-पार हिंदू एकता का दावा कर रहा था।

यहीं से भारतीय राजनीति का सबसे चर्चित सूत्र जन्म लेता है—

क्या वास्तव में दोनों एक-दूसरे की प्रतिक्रिया थे? क्या आडवाणी की रथयात्रा मंडल के जवाब में शुरू हुई? या उसकी योजना पहले से बन चुकी थी? इस लोकप्रिय धारणा की कालक्रम और प्रमाणों के आधार पर जांच अगले अध्याय में आवश्यक है।