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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–018 · अध्याय 44

मंडल आयोग और राम मंदिर आंदोलन : ‘मंडल बनाम कमंडल’ की वास्तविकता

रामशिला, राजनीति और निर्णायक लामबंदी

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskविस्तृत हिंदी शोध संस्करण · सितंबर 2026

भारतीय राजनीति में 1990 का वर्ष अक्सर एक लोकप्रिय सूत्र से समझाया जाता है—“मंडल बनाम कमंडल।” एक ओर प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह ने अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा की; दूसरी ओर कुछ ही सप्ताह बाद लालकृष्ण आडवाणी सोमनाथ से अयोध्या की राम रथयात्रा पर निकल पड़े। बाद की राजनीति में यह धारणा व्यापक हुई कि भाजपा ने मंडल आयोग के कारण हिंदू समाज में पैदा हुई जातिगत विभाजन-रेखा का उत्तर राम मंदिर आंदोलन के माध्यम से दिया।

इस धारणा में पर्याप्त राजनीतिक सत्य है, लेकिन इसे सीधे कारण-परिणाम के रूप में लिख देना इतिहास को बहुत सरल बना देगा।

राम जन्मभूमि आंदोलन मंडल आयोग लागू होने से कई वर्ष पहले शुरू हो चुका था। 1984 में धर्म संसद, राम-जानकी यात्रा और बजरंग दल का गठन हो चुका था। 1986 में ताला खुल चुका था। 1989 में पालमपुर प्रस्ताव, रामशिला पूजन और शिलान्यास हो चुके थे। जून 1990 तक विहिप सरकार को दी गई चार महीने की मोहलत समाप्त कर चुकी थी और 30 अक्टूबर की कारसेवा की दिशा बन चुकी थी।

लेकिन यह भी उतना ही सच है कि 7 अगस्त 1990 की मंडल घोषणा ने भाजपा के सामने एक नया और गंभीर सामाजिक संकट पैदा किया। उसकी पारंपरिक समर्थक ऊंची जातियों का एक हिस्सा आरक्षण-विरोधी आंदोलन में उतर रहा था, जबकि भाजपा खुलकर मंडल का विरोध करती तो पिछड़े वर्गों में विस्तार की अपनी संभावना को नुकसान पहुंचाती। इसी परिस्थिति में राम मंदिर की जाति-पार हिंदू पहचान भाजपा के लिए और अधिक राजनीतिक रूप से मूल्यवान हो गई।

इसलिए अधिक सटीक निष्कर्ष यह है—

लिब्रहान आयोग ने भी इस विवाद को दर्ज किया। उसके सामने वी. पी. सिंह ने कहा कि मंडल आयोग रथयात्रा का उत्प्रेरक था, जबकि भाजपा ने इस दावे को अस्वीकार किया। आयोग ने दोनों स्थितियां दर्ज की हैं।

मंडल आयोग का आधिकारिक नाम था—

सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग आयोग।

इसे 1979 में मोरारजी देसाई सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 340 के अंतर्गत गठित किया था। इसके अध्यक्ष बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और सांसद बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल थे।

आयोग का उद्देश्य था—

देश में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान करना,

उनकी स्थिति का अध्ययन करना,

और उनके उत्थान के उपाय सुझाना।

आयोग ने 1980 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी।

मंडल आयोग ने अनुमान लगाया कि अन्य पिछड़ा वर्ग देश की आबादी का लगभग 52 प्रतिशत है।

उसने केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की।

यह 27 प्रतिशत इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए पहले से मौजूद 22.5 प्रतिशत आरक्षण के साथ कुल आरक्षण लगभग 49.5 प्रतिशत हो जाता।

सर्वोच्च न्यायालय ने बाद के एक निर्णय में मंडल आयोग की इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश को विस्तार से दर्ज किया है।

यह बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है।

मंडल आयोग ने रिपोर्ट 1980 में दे दी थी।

लेकिन लगभग दस वर्ष तक केंद्र में विभिन्न सरकारों ने इसकी प्रमुख सिफारिश लागू नहीं की।

इंदिरा गांधी और बाद में राजीव गांधी सरकार ने इसे लागू नहीं किया।

1989 में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार बनी।

वी. पी. सिंह प्रधानमंत्री बने।

जनता दल की सामाजिक राजनीति में पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण था।

यही वह सरकार थी जिसने मंडल रिपोर्ट को क्रियान्वित करने का निर्णय लिया।

वी. पी. सिंह ने 7 अगस्त 1990 को संसद में घोषणा की कि सरकार अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए केंद्र सरकार की नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करेगी।

इसके बाद 13 अगस्त 1990 को कार्मिक विभाग ने औपचारिक कार्यालय ज्ञापन जारी किया।

सर्वोच्च न्यायालय के आधिकारिक निर्णय में 13 अगस्त 1990 के उस कार्यालय ज्ञापन का उल्लेख है, जिसमें सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया था।

यह भारत के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास का निर्णायक मोड़ था।

नहीं।

यह एक महत्वपूर्ण सुधार है।

मंडल आयोग ने अनेक सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक उपाय सुझाए थे।

1990 में सरकार ने उसकी सबसे प्रसिद्ध सिफारिश—

केंद्र सरकार की नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण—

लागू करने की दिशा में कदम उठाया।

इसलिए “पूरी मंडल रिपोर्ट 7 अगस्त को लागू हो गई” कहना तकनीकी रूप से सही नहीं।

अधिक सटीक—

वी. पी. सिंह सरकार ने मंडल आयोग की 27 प्रतिशत आरक्षण संबंधी प्रमुख सिफारिश लागू करने की घोषणा की।

घोषणा के बाद उत्तर भारत के अनेक शहरों और विश्वविद्यालयों में तीव्र आरक्षण-विरोधी आंदोलन शुरू हुआ।

विशेष रूप से—

दिल्ली,

उत्तर प्रदेश,

बिहार,

हरियाणा,

राजस्थान—

में विद्यार्थियों और युवाओं के प्रदर्शन बढ़े।

सरकारी नौकरियों की सीमित संख्या और तीखी सामाजिक प्रतिस्पर्धा ने आंदोलन को उग्र बनाया।

कुछ स्थानों पर आत्मदाह और आत्मदाह के प्रयास हुए।

युवाओं की मौतों ने आंदोलन की भावनात्मक तीव्रता और बढ़ा दी।

दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र राजीव गोस्वामी का आत्मदाह प्रयास मंडल-विरोधी आंदोलन का सबसे चर्चित प्रतीक बना।

उनकी जलती हुई तस्वीरें देशभर में प्रकाशित हुईं।

इसके बाद आरक्षण-विरोधी छात्र आंदोलन तेजी से फैल गया।

इसने वी. पी. सिंह सरकार को राजनीतिक रूप से गहरे संकट में डाल दिया।

लेकिन यहां ध्यान देना होगा—

विरोध मुख्यतः मंडल आरक्षण के खिलाफ था,

राम मंदिर के लिए नहीं।

दोनों आंदोलनों के सामाजिक आधार कुछ क्षेत्रों में आपस में मिलने लगे, लेकिन उनके आरंभिक उद्देश्य अलग थे।

मंडल केवल नौकरी आरक्षण का निर्णय नहीं था।

उसने भारतीय राजनीति में एक बड़ा प्रश्न खड़ा किया—

राजनीतिक सत्ता और सरकारी संस्थानों में पिछड़े वर्गों की भागीदारी कितनी हो?

आगे—

यादव,

कुर्मी,

कोइरी,

लोध,

जाट,

गुर्जर,

और अनेक पिछड़े समुदाय—

नई राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरने लगे।

उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति पर इसका विशेष प्रभाव पड़ा।

कांग्रेस लंबे समय तक—

ऊंची जातियों,

दलितों,

मुसलमानों,

पिछड़ों,

और क्षेत्रीय समूहों—

के व्यापक गठबंधन पर टिकी थी।

मंडल राजनीति ने पिछड़े वर्गों को स्वतंत्र राजनीतिक पहचान दी।

जनता दल और आगे—

समाजवादी पार्टी,

राष्ट्रीय जनता दल,

जनता दल की विभिन्न धाराएं—

इस सामाजिक परिवर्तन की प्रमुख राजनीतिक अभिव्यक्तियां बनीं।

इसलिए मंडल ने केवल भाजपा नहीं, कांग्रेस की राजनीति को भी गहराई से बदला।

भाजपा की स्थिति बहुत कठिन थी।

उसका पारंपरिक सामाजिक आधार—

ऊंची जातियां,

शहरी मध्यवर्ग,

व्यापारी वर्ग—

में मजबूत था।

मंडल-विरोधी आंदोलन में इन्हीं वर्गों के अनेक युवा सक्रिय थे।

यदि भाजपा खुलकर मंडल का समर्थन करती—

उसका पुराना आधार नाराज हो सकता था।

यदि वह खुलकर विरोध करती—

अन्य पिछड़ा वर्ग में अपना विस्तार रोक देती।

इसलिए पार्टी के सामने एक गहरा सामाजिक प्रश्न था।

पार्टी समझती थी कि अन्य पिछड़ा वर्ग भारतीय मतदाता का बहुत बड़ा हिस्सा है।

खुला आरक्षण-विरोध उसे स्थायी रूप से “ऊंची जातियों की पार्टी” की छवि में बंद कर सकता था।

बाद के राजनीतिक विश्लेषण भी बताते हैं कि आडवाणी और भाजपा नेतृत्व इस दुविधा से परिचित थे—पारंपरिक ऊंची जाति समर्थक मंडल से नाराज थे, लेकिन पिछड़े मतदाता खोना भी पार्टी के लिए घातक हो सकता था।

इसलिए भाजपा ने मंडल पर अधिक सावधानीपूर्ण स्थिति अपनाई।

1990 की स्थिति को आज की भाजपा की सामाजिक संरचना के आधार पर नहीं पढ़ना चाहिए।

तब पार्टी के अंदर भारी असमंजस था।

पार्टी नेतृत्व ने सामाजिक न्याय के सिद्धांत को पूर्णतः अस्वीकार नहीं किया।

साथ ही उसने मंडल लागू करने के तरीके और जातिगत विभाजन को लेकर सरकार की आलोचना की।

यानी भाजपा की भाषा थी—

पिछड़ों को न्याय मिले, लेकिन समाज जातीय संघर्ष में न टूटे।

इसी बिंदु पर राम मंदिर की राजनीति अधिक उपयोगी बनती गई।

“मंडल” का अर्थ—

पिछड़ी जातियों की सामाजिक-राजनीतिक लामबंदी।

“कमंडल”—

राम मंदिर और हिंदू धार्मिक पहचान आधारित राजनीतिक एकीकरण का प्रतीक।

यह पत्रकारिता और राजनीति में बना रूपक था।

यह किसी सरकारी दस्तावेज का शब्द नहीं।

इसका अर्थ था—

जाति की राजनीति बनाम धर्म की राजनीति।

लेकिन वास्तविकता इतनी सरल नहीं थी।

नहीं। यह कालक्रम से गलत है।

राम जन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख चरण देखें—

1984 — धर्म संसद।

1984 — राम-जानकी यात्रा।

1984 — बजरंग दल गठन।

1986 — ताला खुलना।

1989 — पालमपुर प्रस्ताव।

1989 — रामशिला पूजन।

9 नवंबर 1989 — शिलान्यास।

फरवरी–जून 1990 — विहिप द्वारा सरकार को चार महीने की मोहलत।

इन सबके बाद—

7 अगस्त 1990 — मंडल घोषणा।

इसलिए यह कहना कि राम मंदिर आंदोलन “मंडल के विरोध में बनाया गया”, तथ्यतः असंभव है।

यह प्रश्न अधिक जटिल है।

रथयात्रा स्वयं 25 सितंबर 1990 को शुरू हुई—अर्थात मंडल घोषणा के लगभग सात सप्ताह बाद।

उसकी औपचारिक रूपरेखा सितंबर में बनी।

एक समकालीन-आधारित पुनर्निर्माण के अनुसार 12 सितंबर को भाजपा की दिल्ली बैठक में यात्रा की योजना बनी और 14–16 सितंबर की भोपाल राष्ट्रीय कार्यकारिणी में विस्तृत कार्यक्रम तय हुआ।

इसलिए समय की दृष्टि से मंडल का प्रभाव रथयात्रा के अंतिम राजनीतिक निर्णय पर पड़ सकता था।

यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

विहिप 30 अक्टूबर को अयोध्या में कारसेवा की घोषणा कर चुकी थी।

आडवाणी ने बाद में स्वयं बताया कि उन्होंने पहले सोमनाथ से अयोध्या तक पदयात्रा करने का विचार किया था और फिर प्रमोद महाजन की सलाह पर उसे रथयात्रा में बदल दिया।

लिब्रहान आयोग के सामने भी आडवाणी ने कहा कि उनका पहला विचार पदयात्रा का था, जिसे दूरी और जनसंपर्क के कारण रथ में बदला गया। आयोग ने यात्रा के उद्देश्यों के रूप में—

अयोध्या विवाद के प्रति जागरूकता,

भाजपा का दृष्टिकोण फैलाना,

राजनीतिक जागरण,

और धर्मनिरपेक्षता पर बहस—

दर्ज किए।

इससे स्पष्ट है कि मंदिर आंदोलन स्वयं यात्रा का वास्तविक और स्वतंत्र कारण था।

मंडल ने समय, तात्कालिकता और राजनीतिक उपयोगिता बदल दी।

राम मंदिर आंदोलन पहले से था।

लेकिन मंडल घोषणा के बाद भाजपा के सामने एक नया संकट आया—

हिंदू मतदाता जातीय रेखाओं में विभाजित हो सकता था।

मंडल की राजनीति कह रही थी—

आपकी राजनीतिक पहचान आपकी जाति और सामाजिक पिछड़ेपन से जुड़ी है।

राम आंदोलन कह रहा था—

आपकी साझा पहचान हिंदू और रामभक्त की है।

इसलिए दोनों राजनीतिक धाराएं स्वाभाविक रूप से प्रतिस्पर्धी बनीं।

आयोग के अनुसार वी. पी. सिंह ने कहा कि मंडल आयोग की घोषणा रथयात्रा के लिए उत्प्रेरक बनी।

भाजपा ने इसका खंडन किया।

आयोग ने यह मतभेद स्पष्ट रूप से दर्ज किया।

इसलिए शोध में किसी एक दावे को निर्विवाद तथ्य नहीं बनाया जाना चाहिए।

अधिक सटीक भाषा होगी—

आडवाणी ने बाद में विस्तार से बताया कि वे अयोध्या प्रश्न पर जनसंपर्क के लिए यात्रा करना चाहते थे।

पहले पदयात्रा का विचार था।

प्रमोद महाजन ने कहा—

इतनी लंबी दूरी पैदल तय करने में बहुत समय लगेगा।

फिर जीप का विचार आया।

अंततः राम मंदिर अभियान के कारण उसे रथ के रूप में प्रस्तुत करने का सुझाव दिया गया।

यह विवरण यात्रा को मंदिर-केंद्रित योजना के रूप में प्रस्तुत करता है।

प्रमोद महाजन ने यात्रा को आधुनिक राजनीतिक प्रचार और धार्मिक प्रतीक के संयोजन में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आडवाणी के अनुसार उन्हीं ने सुझाव दिया—

यदि यात्रा राम मंदिर के लिए है तो वाहन को रथ बनाया जाए।

इससे सामान्य राजनीतिक यात्रा एक धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीक में बदल गई।

यही आगे उसकी असाधारण जनस्वीकृति का कारण बना।

यह चयन पालमपुर की विचारधारा से जुड़ा था।

भाजपा पहले ही अयोध्या के लिए सोमनाथ पुनर्निर्माण का उदाहरण दे चुकी थी।

सोमनाथ—

मध्यकालीन आक्रमण,

विध्वंस,

स्वतंत्र भारत में पुनर्निर्माण—

का प्रतीक था।

अयोध्या आंदोलन के समर्थकों के लिए संदेश था—

सोमनाथ में ऐतिहासिक क्षति सुधारी गई; अब अयोध्या में भी वही होना चाहिए।

इसलिए यात्रा का प्रारंभ-बिंदु स्वयं एक राजनीतिक कथन था।

रथयात्रा 25 सितंबर 1990 को शुरू हुई।

यह पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती थी।

आडवाणी ने स्वयं बताया कि वे 2 अक्टूबर या 25 सितंबर—इनमें से किसी तिथि से यात्रा आरंभ करने पर विचार कर रहे थे।

अंततः 25 सितंबर चुनी गई।

यात्रा को 30 अक्टूबर की घोषित अयोध्या कारसेवा तक पहुंचना था।

यह तथ्य “रथयात्रा केवल मंडल के कारण” वाले दावे को कमजोर करता है।

उसका गंतव्य—

अयोध्या।

उसकी अंतिम तिथि—

30 अक्टूबर की कारसेवा।

उसका प्रतीक—

राम मंदिर।

उसके आरंभ का स्थान—

सोमनाथ।

ये सभी तत्व पहले से चल रहे मंदिर आंदोलन से सीधे जुड़े थे।

मंडल ने उस यात्रा को नई राजनीतिक परिस्थिति दी, पर उसका धार्मिक-आंदोलनकारी ढांचा अयोध्या से ही आता था।

इस बिंदु पर सावधानी आवश्यक है।

मंदिर आंदोलन, कारसेवा और यात्रा-जैसे जनसंपर्क की आवश्यकता मंडल से पहले मौजूद थी।

लेकिन रथयात्रा का औपचारिक स्वरूप, सार्वजनिक घोषणा और विस्तृत मार्ग सितंबर 1990 में तय हुआ, अर्थात मंडल घोषणा के बाद।

इसलिए दो अतियां दोनों गलत हैं—

“मंडल का कोई प्रभाव नहीं पड़ा।”

और

“मंडल के कारण ही रथयात्रा पैदा हुई।”

हिंदू समाज स्वयं अनेक जातियों में विभाजित था।

राम आंदोलन का सामाजिक तर्क था—

जाति से ऊपर हिंदू पहचान।

मंडल का राजनीतिक प्रभाव था—

जाति और पिछड़ेपन को सत्ता-वितरण का केंद्रीय प्रश्न बनाना।

दोनों धाराएं एक ही मतदाता से अलग पहचान की मांग कर रही थीं।

यही “मंडल बनाम कमंडल” का वास्तविक राजनीतिक अर्थ है।

नहीं।

यह महत्वपूर्ण है।

कोई व्यक्ति—

पिछड़ी जाति का हो सकता था,

मंडल आरक्षण का समर्थक हो सकता था,

और साथ ही राम मंदिर का समर्थक भी।

जाति और धर्म की पहचान परस्पर निषेधात्मक नहीं।

यही कारण है कि आगे भाजपा बड़ी संख्या में अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाता और नेता अपने साथ जोड़ने में सफल हुई।

इसलिए “मंडल मतदाता बनाम राम मतदाता” दो स्थायी अलग समुदाय नहीं थे।

यदि वह राम आंदोलन को केवल ऊंची जातियों की मंडल-विरोधी प्रतिक्रिया बना देती—

तो उसका विस्तार सीमित हो जाता।

इसलिए हिंदू एकता की भाषा आवश्यक थी—

राम सबके हैं।

मंदिर सबका है।

जाति से ऊपर हिंदू समाज है।

1989 में कामेश्वर चौपाल से पहली शिला रखवाने की सामाजिक प्रतीक-व्यवस्था इस रणनीति का पूर्व उदाहरण थी।

अर्थात पिछड़े और दलित समाज तक पहुंच मंडल के बाद अचानक शुरू नहीं हुई थी।

9 नवंबर 1989 को कामेश्वर चौपाल ने पहली शिला रखी।

मंडल घोषणा—

7 अगस्त 1990।

इसलिए दलित प्रतिनिधित्व को मंदिर आंदोलन में स्थान देना मंडल की प्रतिक्रिया नहीं था।

यह पहले से मौजूद समरसता-आधारित सामाजिक विस्तार की रणनीति थी।

यह तथ्य “कमंडल केवल मंडल का जवाब था” वाली अत्यधिक सरल व्याख्या को कमजोर करता है।

मंडल के बाद जाति राजनीति तेज हुई।

अब भाजपा केवल आदर्श रूप से नहीं, चुनावी अस्तित्व के लिए भी जाति-पार हिंदू आधार चाहती थी।

यही अंतर है—

रणनीति पहले से थी,

लेकिन अगस्त 1990 के बाद उसका राजनीतिक महत्व कई गुना बढ़ गया।

वी. पी. सिंह स्वयं सामाजिक न्याय के बड़े प्रतीक बन गए।

विशेष रूप से पिछड़े वर्गों में जनता दल की नई राजनीतिक पहचान बनी।

उत्तर प्रदेश और बिहार में यही प्रक्रिया आगे मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं के उभार से जुड़ी।

इससे भाजपा के सामने एक स्थायी चुनौती पैदा हुई—

जातीय सामाजिक न्याय की राजनीति का मुकाबला केवल ऊंची जाति समर्थन से नहीं किया जा सकता।

बिहार में लालू प्रसाद यादव 1990 में मुख्यमंत्री बने।

उनकी राजनीति—

पिछड़े वर्ग,

मुस्लिम समाज,

सामाजिक सम्मान—

पर आधारित होने लगी।

मंडल ने इस राजनीति को राष्ट्रीय वैचारिक आधार दिया।

कुछ ही महीनों बाद वही लालू प्रसाद आडवाणी की रथयात्रा रोकने वाले मुख्यमंत्री बने।

इस तरह—

मंडल की सामाजिक राजनीति

और

राम मंदिर की धार्मिक राजनीति—

व्यक्ति और घटना के स्तर पर सीधे टकराईं।

उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव भी पिछड़े वर्ग की समाजवादी राजनीति का बड़ा चेहरा बने।

उन्होंने अयोध्या में विवादित ढांचे की सुरक्षा को अपनी सरकार की जिम्मेदारी बताया।

30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 की कारसेवा के दौरान उनकी सरकार और कारसेवकों का सीधा टकराव हुआ।

इससे मंडल-उन्मुख पिछड़ा वर्ग राजनीति और राम आंदोलन की राजनीतिक दूरी और अधिक स्पष्ट हुई।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सभी पिछड़े हिंदू मंदिर आंदोलन के विरोधी थे।

जनता दल की मंडल राजनीति का एक संभावित चुनावी समीकरण था—

पिछड़े वर्ग + मुस्लिम मतदाता + अन्य सामाजिक समूह।

उत्तर प्रदेश और बिहार में आगे इसे अलग-अलग रूपों में देखा गया।

राम मंदिर आंदोलन के कारण मुस्लिम मतदाता भाजपा-विरोधी दलों की ओर अधिक संगठित होने लगे।

इस प्रकार अयोध्या और मंडल ने मिलकर नई सामाजिक गठबंधन-राजनीति पैदा की।

भाजपा और व्यापक संघ परिवार की सामाजिक भाषा थी—

जाति हिंदू समाज को बांटती है।

राम जोड़ते हैं।

यह राजनीतिक रूप से शक्तिशाली संदेश था।

लेकिन आलोचकों का प्रश्न था—

क्या “हिंदू एकता” की भाषा वास्तविक सामाजिक विषमता और पिछड़े वर्गों की प्रतिनिधित्व मांग को दबाती है?

यही मंडल–कमंडल विवाद का वैचारिक केंद्र है।

भाजपा-समर्थक दृष्टि से—

वी. पी. सिंह ने मंडल को राजनीतिक संकट से बचने के लिए जल्दबाजी में लागू किया।

इससे हिंदू समाज जातियों में विभाजित हुआ।

राम आंदोलन उस विभाजन का उत्तर नहीं, पहले से चल रहा सांस्कृतिक आंदोलन था।

रथयात्रा का उद्देश्य मंदिर और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद था।

इस दृष्टिकोण के समर्थन में आंदोलन का 1984–89 का पूरा पूर्व इतिहास मौजूद है।

आलोचक कहते हैं—

मंडल ने भाजपा की ऊंची जाति समर्थक राजनीति के सामने चुनौती खड़ी कर दी।

इससे ध्यान जाति-आधारित सामाजिक न्याय से हटाकर हिंदू धार्मिक पहचान पर केंद्रित करने की आवश्यकता पैदा हुई।

इसलिए सितंबर 1990 की रथयात्रा का समय राजनीतिक रूप से मंडल-विरोधी आंदोलन के साथ जुड़ा था।

कुछ राजनीतिक इतिहासकार रथयात्रा को मंडल के प्रति अवसरवादी प्रतिक्रिया मानते हैं।

यह व्याख्या भी पूरी तरह निराधार नहीं।

सबसे मजबूत ऐतिहासिक निष्कर्ष यह है—

मंदिर आंदोलन मंडल से पहले था।

लेकिन—

रथयात्रा का अंतिम राजनीतिक स्वरूप मंडल के बाद बना।

यही दो तथ्य साथ रखने पर विवाद काफी साफ हो जाता है।

लिब्रहान आयोग के अनुसार वी. पी. सिंह ने रथयात्रा को मंडल आयोग का परिणाम या उत्प्रेरित प्रतिक्रिया माना।

भाजपा ने आयोग के सामने इसका खंडन किया।

यह स्वयं इस बात का प्रमाण है कि “मंडल बनाम कमंडल” केवल बाद के विद्वानों का बनाया विवाद नहीं था।

उस समय के प्रमुख राजनीतिक पक्ष भी इसी कारण-सम्बंध पर लड़ रहे थे।

वी. पी. सिंह सरकार के विश्वास मत की बहस में आडवाणी ने कहा कि सरकार अब मंडल आयोग की बात उठा रही है, जबकि वे जून से अयोध्या विवाद को हल करने के लिए सरकार को चेताते रहे थे। संसद के आधिकारिक अभिलेख में उनका वक्तव्य दर्ज है कि उन्होंने जून में ही कहा था कि चार महीने बीत चुके हैं और अयोध्या विवाद का समाधान होना चाहिए।

यह उनके पक्ष का मजबूत समकालीन प्रमाण है—

भाजपा कहना चाहती थी कि मंदिर अभियान मंडल घोषणा से पहले ही निर्णायक अवस्था में था।

क्योंकि यह बाद की आत्मकथा नहीं।

यह 7 नवंबर 1990 की तत्कालीन संसदीय बहस है।

आडवाणी सीधे सरकार पर आरोप लगा रहे थे कि अयोध्या पर जून से चेतावनी दी जा रही थी।

इससे कम-से-कम इतना सिद्ध होता है—

अयोध्या पर राजनीतिक टकराव अगस्त की मंडल घोषणा से पहले ही तीव्र था।

नहीं।

यही सूक्ष्म अंतर है।

जून में मंदिर विवाद और सरकार के लिए समयसीमा का संकट था।

रथयात्रा का विशिष्ट रूप सितंबर में सामने आया।

इसलिए—

अयोध्या संकट पूर्व-मंडल।

रथयात्रा का अंतिम राजनीतिक साधन उत्तर-मंडल।

यही सबसे शुद्ध कालक्रम है।

लिब्रहान आयोग के अनुसार आडवाणी ने यात्रा के चार उद्देश्य बताए—

अयोध्या विवाद के प्रति जागरूकता बढ़ाना,

भाजपा का दृष्टिकोण फैलाना,

जनता का राजनीतिक जागरण,

और धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा पर बहस खोलना।

यहां मंडल आरक्षण को यात्रा का घोषित मुख्य उद्देश्य नहीं बताया गया।

यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है।

राजनीतिक वातावरण में निश्चित रूप से थी।

उस समय उत्तर भारत का विद्यार्थी आंदोलन मंडल-विरोध से उग्र था।

भाजपा के पारंपरिक समर्थकों में भी असंतोष था।

इसलिए रथयात्रा उस सामाजिक वातावरण से पृथक नहीं थी।

लेकिन यात्रा का आधिकारिक और प्रतीकात्मक केंद्र—

राम मंदिर—

था।

इसलिए उसे “आरक्षण-विरोधी रथयात्रा” कहना गलत होगा।

नहीं।

1990 के बाद भी उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति में जाति अधिक शक्तिशाली हुई।

मुलायम सिंह,

लालू प्रसाद,

कांशीराम,

मायावती—

इसी दौर में बड़ी राजनीतिक शक्तियों के रूप में उभरे।

यदि राम आंदोलन ने जाति राजनीति समाप्त कर दी होती, तो यह संभव नहीं होता।

इसलिए “कमंडल ने मंडल को खत्म कर दिया” इतिहास से मेल नहीं खाता।

1990 के दशक की उत्तर भारतीय राजनीति में दो प्रक्रियाएं एक साथ बढ़ीं—

पिछड़े और दलित वर्गों की स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति।

जाति-पार हिंदू धार्मिक-राजनीतिक पहचान।

इन दोनों ने कांग्रेस के पुराने व्यापक गठबंधन को कमजोर किया।

यही सबसे बड़ा संरचनात्मक परिवर्तन था।

मंडल पर जनता दल ने सामाजिक न्याय की स्पष्ट राजनीति अपनाई।

राम मंदिर पर भाजपा ने स्पष्ट सांस्कृतिक-राजनीतिक स्थिति ली।

कांग्रेस बीच में फंसी रही।

यानी दो नई पहचान-राजनीतियों ने उसकी दो अलग दिशाओं से जमीन छीनी।

इसीलिए 1990 के दशक में उत्तर प्रदेश और बिहार से कांग्रेस लगभग सत्ता की मुख्य प्रतिस्पर्धा से बाहर होने लगी।

यह दीर्घकालीन परिणाम अत्यंत महत्वपूर्ण है।

यदि भाजपा केवल ऊंची जातियों की पार्टी बनी रहती—

तो राष्ट्रीय बहुमत की राजनीति कठिन होती।

इसलिए आगे उसने—

लोध,

कुर्मी,

कोइरी,

गुर्जर,

निषाद,

और अनेक गैर-प्रभुत्वशाली पिछड़ी जातियों—

में संगठन बढ़ाया।

यानी मंडल भाजपा के लिए केवल चुनौती नहीं था।

वह उसे सामाजिक रूपांतरण की ओर धकेलने वाला कारक भी बना।

उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह लोध समुदाय से आते थे।

1991 में भाजपा के मुख्यमंत्री बने।

उनका नेतृत्व यह दिखाता है कि पार्टी केवल सवर्ण नेतृत्व पर निर्भर नहीं रहना चाहती थी।

राम मंदिर आंदोलन और पिछड़े वर्ग के नेतृत्व का यह मेल आगे भाजपा की महत्वपूर्ण राजनीतिक रणनीति बना।

यानी मंडल और मंदिर पूरी तरह विरोधी नहीं रहे—

भाजपा ने दोनों के कुछ सामाजिक तत्वों को जोड़ने की कोशिश की।

राम आंदोलन के कई प्रमुख चेहरे ऊंची जातियों से नहीं थे।

उमा भारती लोध समुदाय से आईं।

विनय कटियार कुर्मी पृष्ठभूमि से थे।

कामेश्वर चौपाल दलित थे।

इससे आंदोलन के नेतृत्व ने जाति-पार प्रतिनिधित्व का दावा मजबूत किया।

यह भी प्रमाण है कि “कमंडल = केवल सवर्ण प्रतिक्रिया” कहना अत्यधिक सरल है।

दूसरी ओर मंडल-विरोधी आंदोलन में ऊंची जातियों के युवाओं की बड़ी उपस्थिति थी।

इनमें से अनेक भाजपा के सामाजिक आधार से आते थे।

इसलिए भाजपा को उनकी नाराजगी का राजनीतिक लाभ भी मिला।

यानी राम आंदोलन का सामाजिक विस्तार बहुस्तरीय था—

ऊंची जातियों का मंडल-विरोधी असंतोष,

पिछड़ों तक हिंदू पहचान का विस्तार,

शहरी मध्यवर्ग,

धार्मिक श्रद्धालु—

सभी अलग कारणों से जुड़ सकते थे।

रथ पर—

राम की छवि,

मंदिर का चित्र,

भाजपा का कमल—

एक साथ दिखाई देते थे।

लिब्रहान आयोग ने भी इस प्रतीकात्मक संयोजन को दर्ज किया है।

यह धार्मिक प्रतीक और पार्टी राजनीति का प्रत्यक्ष दृश्य-संगम था।

यही रथयात्रा को विहिप की धार्मिक यात्रा से अलग करता था।

बाद के साक्षात्कार में आडवाणी ने कहा कि यात्रा के दौरान उन्होंने पहली बार प्रत्यक्ष रूप से देखा कि लोग रथ को धार्मिक श्रद्धा से छूते, भूमि को प्रणाम करते और मंदिर के नाम पर बड़ी संख्या में उमड़ते थे। उन्होंने इसे भारत में धार्मिक प्रतीक की असाधारण संप्रेषण शक्ति से जोड़ा।

यह बताता है कि यात्रा का प्रभाव स्वयं आयोजकों की अपेक्षा से भी आगे चला गया।

मंडल कह रहा था—

ऐतिहासिक सामाजिक पिछड़ेपन का उपचार प्रतिनिधित्व से होना चाहिए।

रथयात्रा कह रही थी—

राष्ट्र और समाज की सांस्कृतिक एकता राम जन्मभूमि जैसे प्रश्नों से जुड़ी है।

दोनों अलग न्याय-सिद्धांत प्रस्तुत कर रहे थे।

एक—

सामाजिक समूहों के बीच संसाधन-वितरण।

दूसरा—

सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक स्मृति।

इसलिए उनका टकराव केवल चुनावी नहीं, वैचारिक भी था।

ऐसा नैतिक विभाजन इतिहास को पक्षीय बना देगा।

मंडल के समर्थकों के लिए वह सामाजिक न्याय था।

आलोचकों के लिए जातिगत राजनीतिक ध्रुवीकरण।

राम आंदोलन के समर्थकों के लिए सांस्कृतिक न्याय और धार्मिक अधिकार।

आलोचकों के लिए धार्मिक ध्रुवीकरण।

शोध में दोनों पक्षों की अपनी वैध आत्म-व्याख्या दर्ज होनी चाहिए।

पहली नजर में दोनों विरोधी दिखते हैं।

लेकिन दोनों ने—

कांग्रेस की पुरानी व्यवस्था को चुनौती दी,

नई पहचान को राजनीतिक शक्ति में बदला,

नए सामाजिक नेतृत्व पैदा किए,

और उत्तर भारतीय राजनीति की भाषा बदल दी।

मंडल ने पूछा—

सत्ता में कौन प्रतिनिधित्व करेगा?

राम आंदोलन ने पूछा—

राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान क्या होगी?

1990 के दशक की राजनीति इन दोनों प्रश्नों से बनी।

तात्कालिक रूप से—

मंडल से जनता दल और क्षेत्रीय पिछड़ा वर्ग नेतृत्व मजबूत हुआ।

राम आंदोलन से भाजपा मजबूत हुई।

दीर्घकाल में—

जनता दल अनेक क्षेत्रीय दलों में टूट गया।

भाजपा ने मंडल के बाद स्वयं पिछड़े और दलित समूहों में विस्तार कर लिया।

इसलिए लंबी अवधि में भाजपा ने “मंडल” और “कमंडल” को पूर्ण विरोधी न रखकर कुछ हद तक एक साथ साधने की कोशिश की।

उस समय तस्वीर बहुत अलग थी।

सड़क पर मंडल-विरोध।

सड़क पर राम आंदोलन।

वी. पी. सिंह सरकार संकट में।

भाजपा असमंजस में।

विहिप कारसेवा पर अड़ी।

मुलायम सिंह ढांचे की सुरक्षा पर दृढ़।

लालू प्रसाद आडवाणी की यात्रा रोकने को तैयार।

इसलिए उस समय “मंडल बनाम कमंडल” वास्तविक राजनीतिक संघर्ष जैसा दिखाई देना स्वाभाविक था।

इसका निर्णायक प्रमाण नहीं।

एक राजनीतिक व्याख्या यह है कि मंडल से उन्होंने जनता दल के पिछड़े सामाजिक आधार को मजबूत करना चाहा और आंतरिक राजनीतिक संकट से निकलना चाहा।

लेकिन यह कहना कि मंडल आयोग केवल राम मंदिर आंदोलन रोकने के लिए लागू किया गया—अत्यधिक दावा होगा।

रिपोर्ट 1980 से मौजूद थी।

जनता दल की सामाजिक न्याय राजनीति का अपना स्वतंत्र इतिहास था।

ऐसा भी सिद्ध नहीं।

यात्रा का घोषित लक्ष्य अयोध्या आंदोलन और 30 अक्टूबर की कारसेवा से जुड़ा था।

भाजपा उस समय सरकार को समर्थन दे रही थी।

यदि उसका मूल उद्देश्य पहले दिन से सरकार गिराना ही होता, तो यह अलग राजनीतिक रणनीति होती।

सरकार का पतन यात्रा के टकराव का परिणाम बना।

क्योंकि समय लगभग एक ही था।

7 अगस्त—

मंडल घोषणा।

13 अगस्त—

सरकारी आदेश।

अगस्त–सितंबर—

मंडल-विरोधी आंदोलन।

सितंबर—

रथयात्रा का निर्णय।

25 सितंबर—

सोमनाथ से यात्रा।

23 अक्टूबर—

आडवाणी गिरफ्तारी।

30 अक्टूबर—

कारसेवा।

7 नवंबर—

वी. पी. सिंह सरकार गिर गई।

इतना सघन घटनाक्रम दोनों को एक ही राजनीतिक कथा में जोड़ देता है।

तिथि/अवधि — मंडल धारा — राम मंदिर धारा

फरवरी 1990 — — — विहिप सरकार को समाधान हेतु समय देती है

जून 1990 — — — चार माह की अवधि समाप्त; अयोध्या पर तनाव बढ़ता है

जुलाई 1990 — — — 30 अक्टूबर कारसेवा की दिशा स्पष्ट

7 अगस्त — वी. पी. सिंह 27% आरक्षण लागू करने की घोषणा करते हैं — मंदिर आंदोलन पहले से सक्रिय

13 अगस्त — सरकारी कार्यालय ज्ञापन जारी — —

अगस्त–सितंबर — मंडल-विरोधी छात्र आंदोलन — भाजपा अयोध्या पर राजनीतिक रणनीति तीव्र करती है

लगभग 12–16 सितंबर — — — रथयात्रा की औपचारिक योजना/कार्यक्रम तय

25 सितंबर — मंडल विवाद जारी — आडवाणी सोमनाथ से रथयात्रा शुरू करते हैं

23 अक्टूबर — जातीय राजनीति का तनाव जारी — आडवाणी गिरफ्तार; भाजपा समर्थन वापस लेती है

30 अक्टूबर — — — अयोध्या कारसेवा

7 नवंबर — — — वी. पी. सिंह सरकार विश्वास मत हारती है

गलत। मंदिर आंदोलन 1984 से संगठित था और 1989 तक पालमपुर, रामशिला और शिलान्यास हो चुके थे।

पूरी तरह सिद्ध नहीं। मंदिर आंदोलन और 30 अक्टूबर की कारसेवा पहले से तय दिशा में थे; लेकिन विशिष्ट रथयात्रा का सार्वजनिक और विस्तृत कार्यक्रम सितंबर 1990 में बना।

यह भी अत्यधिक दावा है। मंडल ने भाजपा के सामने जातिगत विभाजन की गंभीर राजनीतिक चुनौती खड़ी की; वी. पी. सिंह ने भी इसे रथयात्रा का उत्प्रेरक कहा, हालांकि भाजपा ने इसका खंडन किया।

गलत। उसका घोषित और प्रतीकात्मक केंद्र राम जन्मभूमि था। आयोग के सामने आडवाणी ने इसके उद्देश्य अयोध्या जागरूकता, भाजपा का दृष्टिकोण और धर्मनिरपेक्षता पर बहस बताए।

गलत। मंडल-आधारित पिछड़ा वर्ग राजनीति ने उत्तर प्रदेश और बिहार में अगले दशकों तक भारी प्रभाव बनाए रखा।

अत्यधिक सरलीकरण। आंदोलन में दलित और पिछड़े वर्ग के अनेक प्रमुख चेहरे भी थे; 1989 में कामेश्वर चौपाल से पहली शिला रखवाना मंडल घोषणा से भी पहले का उदाहरण है।

गलत। तत्काल निर्णायक कारण भाजपा की अयोध्या प्रश्न पर समर्थन वापसी था।

मंडल–कमंडल का घटनाक्रम यह सिद्ध करता है कि—

पहला, राम मंदिर आंदोलन मंडल आयोग की प्रतिक्रिया में उत्पन्न नहीं हुआ।

दूसरा, मंडल घोषणा के बाद भाजपा की जाति-पार हिंदू राजनीति का महत्व बढ़ा।

तीसरा, रथयात्रा का औपचारिक निर्णय मंडल के बाद हुआ, इसलिए उसके समय पर मंडल की राजनीति का प्रभाव असंभव नहीं माना जा सकता।

चौथा, आडवाणी और भाजपा का अपना समकालीन दावा था कि अयोध्या संकट और सरकार पर दबाव मंडल से पहले जून से चल रहा था।

पांचवां, वी. पी. सिंह ने इसे मंडल से जुड़ी प्रतिक्रिया माना, जबकि भाजपा ने अस्वीकार किया—अर्थात कारण पर उसी समय विवाद था।

यह घटनाक्रम यह सिद्ध नहीं करता कि—

वी. पी. सिंह ने मंडल केवल भाजपा तोड़ने के लिए लागू किया।

भाजपा ने राम मंदिर केवल आरक्षण-विरोध के लिए अपनाया।

सभी पिछड़े वर्ग मंडल समर्थक और मंदिर विरोधी थे।

सभी सवर्ण मंदिर समर्थक और मंडल विरोधी थे।

या धर्म और जाति की राजनीतिक पहचान एक-दूसरे को पूर्णतः समाप्त करती हैं।

भारतीय मतदाता एक साथ अनेक सामाजिक पहचानों में जीता है।

लोकप्रिय सूत्र में “बनाम” है।

लेकिन इतिहास की दृष्टि से अधिक सटीक सूत्र होगा—

पहले दोनों ने अलग राजनीतिक ध्रुव बनाए।

फिर भाजपा ने पिछड़े वर्गों में विस्तार किया।

क्षेत्रीय पिछड़ा वर्ग दलों ने भी धार्मिक हिंदू पहचान से अपने मतदाताओं को पूरी तरह अलग नहीं रखा।

इसलिए लंबी अवधि में भारतीय राजनीति ने दोनों को नए रूपों में मिला दिया।

वी. पी. सिंह कह रहे थे—

सामाजिक न्याय।

आडवाणी कह रहे थे—

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और राम जन्मभूमि।

मुलायम सिंह—

संविधान और विवादित ढांचे की सुरक्षा।

लालू प्रसाद—

पिछड़े वर्ग की सत्ता और रथयात्रा का प्रतिरोध।

विहिप—

30 अक्टूबर की कारसेवा।

इस प्रकार 1990 में भारतीय राजनीति के चार बड़े प्रश्न एक साथ टकरा रहे थे—

जाति, धर्म, सामाजिक न्याय और राज्य की वैध शक्ति।

यही वर्ष आगे पूरे दशक की दिशा तय करेगा।

“मंडल बनाम कमंडल” उपयोगी राजनीतिक रूपक है, लेकिन यदि इसे शाब्दिक इतिहास मान लिया जाए तो गलतियां होंगी।

मंदिर आंदोलन मंडल से छह वर्ष पहले शुरू हो चुका था।

भाजपा 1989 में ही पालमपुर प्रस्ताव ले चुकी थी।

शिलान्यास भी 1989 में हो चुका था।

विहिप ने जून 1990 तक सरकार से समाधान की समयसीमा पूरी होने का दावा कर दिया था।

इसलिए राम आंदोलन मंडल की संतान नहीं था।

लेकिन 7 अगस्त 1990 के बाद राजनीतिक परिस्थिति बदल गई।

मंडल ने जाति को सत्ता और प्रतिनिधित्व की सबसे तीखी धुरी बना दिया।

भाजपा के सामने अपने सवर्ण आधार और संभावित पिछड़ा वर्ग विस्तार के बीच कठिन संतुलन आया।

राम मंदिर की जाति-पार हिंदू पहचान ने इस संकट से निकलने का एक शक्तिशाली राजनीतिक मार्ग प्रदान किया।

और इसी अर्थ में—

मंडल ने कमंडल को जन्म नहीं दिया, लेकिन उसने कमंडल की राजनीतिक शक्ति कई गुना बढ़ा दी।

1990 में दो भारत एक साथ राजनीतिक रूप से उभर रहे थे।

एक भारत पूछ रहा था—

सदियों से सामाजिक रूप से पिछड़े समुदायों को सत्ता और सरकारी नौकरियों में कितना प्रतिनिधित्व मिले?

दूसरा पूछ रहा था—

क्या राम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण को राष्ट्रीय सांस्कृतिक न्याय के प्रश्न के रूप में स्वीकार किया जाएगा?

इन दोनों प्रश्नों के अपने स्वतंत्र इतिहास थे।

लेकिन अगस्त 1990 में वे एक-दूसरे से टकरा गए।

यही टकराव “मंडल बनाम कमंडल” कहलाया।

और उसके केवल कुछ सप्ताह बाद भाजपा ने वह कदम उठाया जिसने राम मंदिर आंदोलन को भारतीय राजनीति के घर-घर तक पहुंचा दिया—

25 सितंबर 1990 की सोमनाथ से अयोध्या राम रथयात्रा।

अब आंदोलन का नेतृत्व केवल विहिप और संतों के हाथ में नहीं रहने वाला था। भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वयं एक रथ पर बैठकर हजारों किलोमीटर की यात्रा करने वाला था।

रथ का प्रारंभ सोमनाथ से क्यों हुआ?

मार्ग किन राज्यों से बनाया गया?

प्रमोद महाजन और नरेंद्र मोदी की क्या भूमिका थी?

यात्रा में कितनी सभाएं हुईं?

और उसने लालकृष्ण आडवाणी को भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में कैसे बदल दिया?

ये अगले चरण के प्रश्न हैं।