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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–018 · अध्याय 42

1989 लोकसभा चुनाव और भाजपा की बड़ी राजनीतिक छलांग : 2 सीटों से 85 तक की यात्रा में अयोध्या की वास्तविक भूमिका

रामशिला, राजनीति और निर्णायक लामबंदी

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskविस्तृत हिंदी शोध संस्करण · सितंबर 2026

1989 का लोकसभा चुनाव भारतीय राजनीति के पुनर्गठन का चुनाव था। कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई, वी. पी. सिंह के नेतृत्व में जनता दल केंद्र की धुरी बना, और भारतीय जनता पार्टी पहली बार ऐसी राष्ट्रीय शक्ति के रूप में सामने आई जिसे अब केवल सीमित शहरी या वैचारिक दल मानकर नहीं छोड़ा जा सकता था। 1984 में मात्र 2 लोकसभा सीटों पर सिमटी भाजपा 1989 में 85 सीटें जीत गई। निर्वाचन आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार उसने 225 सीटों पर चुनाव लड़ा, लगभग 3.42 करोड़ मत प्राप्त किए और उसका राष्ट्रीय मत प्रतिशत 11.36 प्रतिशत रहा। कांग्रेस को 197 सीटें और 39.53 प्रतिशत मत मिले, जबकि जनता दल ने 143 सीटें और 17.79 प्रतिशत मत प्राप्त किए।

यह छलांग इतनी बड़ी थी कि बाद की राजनीतिक स्मृति में इसे अक्सर सीधे राम जन्मभूमि आंदोलन से जोड़ दिया गया। लेकिन शोध की दृष्टि से प्रश्न अधिक कठिन है—क्या 1989 में भाजपा की 85 सीटें मुख्यतः राम मंदिर के कारण आईं, या कांग्रेस-विरोध, बोफोर्स, वी. पी. सिंह और विपक्षी समझौतों की भूमिका अधिक बड़ी थी? उत्तर है: इन सभी कारकों ने एक साथ काम किया। अयोध्या भाजपा को वैचारिक पहचान और भावनात्मक जनाधार दे रही थी; लेकिन 1989 की चुनावी सफलता केवल एक मुद्दे की उपज नहीं थी।

1984 का चुनाव भाजपा के लिए लगभग अस्तित्वगत संकट जैसा था। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति की प्रचंड लहर में कांग्रेस ने ऐतिहासिक बहुमत प्राप्त किया और भाजपा केवल दो सीटें जीत सकी।

इसके बाद पांच वर्षों में पार्टी ने अपनी राजनीतिक भाषा बदली।

1986 में लालकृष्ण आडवाणी पार्टी अध्यक्ष बने।

शाहबानो विवाद और अयोध्या ताला खुलने ने धर्मनिरपेक्षता की बहस को तीखा किया।

1989 में पालमपुर प्रस्ताव ने राम जन्मभूमि को पार्टी की औपचारिक प्रतिबद्धता बना दिया।

इसी वर्ष रामशिला पूजन और शिलान्यास हुआ।

यानी 1984 की पराजित भाजपा और 1989 की उभरती भाजपा के बीच केवल संगठनात्मक सुधार नहीं था; उसकी वैचारिक पहचान अधिक स्पष्ट हो चुकी थी।

1989 के चुनाव में भाजपा ने 225 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए और 85 सीटें जीतीं। उसे 3,41,71,477 मत मिले, जो देश में पड़े कुल वैध मतों का 11.36 प्रतिशत थे। जिन सीटों पर उसने चुनाव लड़ा, वहां उसके मतों का औसत लगभग 26.97 प्रतिशत था।

इसके मुकाबले—

कांग्रेस — 510 सीटों पर लड़ी, 197 जीती, 39.53 प्रतिशत मत।

जनता दल — 244 सीटों पर लड़ा, 143 जीता, 17.79 प्रतिशत मत।

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी — 33 सीटें।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी — 12 सीटें।

इससे स्पष्ट है कि भाजपा अभी देश की सबसे बड़ी पार्टी नहीं बनी थी, लेकिन वह अब राष्ट्रीय सत्ता-समीकरण की निर्णायक शक्ति बन चुकी थी।

निर्वाचन आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार भाजपा की 85 सीटों का भौगोलिक वितरण इस प्रकार था—

राज्य/केंद्रशासित क्षेत्र — भाजपा की जीती सीटें

मध्य प्रदेश — 27

राजस्थान — 13

गुजरात — 12

महाराष्ट्र — 10

बिहार — 8

उत्तर प्रदेश — 8

दिल्ली — 4

हिमाचल प्रदेश — 3

कुल — 85

यह तालिका एक महत्वपूर्ण तथ्य उजागर करती है—

1989 में भाजपा की सबसे बड़ी सफलता उत्तर प्रदेश में नहीं, मध्य प्रदेश में थी।

इसलिए यह कहना कि 85 सीटों की छलांग केवल अयोध्या-प्रदेश की “राम लहर” थी, आंकड़ों से मेल नहीं खाता।

भाजपा ने मध्य प्रदेश में 27 लोकसभा सीटें जीतीं।

यह उसकी कुल 85 सीटों का लगभग एक-तिहाई था।

मध्य प्रदेश में पार्टी का संगठन जनसंघ काल से मजबूत था। संघ का व्यापक नेटवर्क, शहरी मध्यवर्ग, व्यापारी समुदाय, अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ता प्रभाव और कांग्रेस-विरोध—सभी इसके कारण थे।

यहां अयोध्या का प्रभाव जरूर था, लेकिन भाजपा की सफलता को केवल राम मंदिर से समझना ऐतिहासिक रूप से अपर्याप्त होगा।

मध्य प्रदेश पार्टी के पुराने संगठनात्मक विस्तार की भी भूमि था।

राजस्थान से भाजपा ने 13 सीटें जीतीं।

राजस्थान में भी जनसंघ और संघ की पुरानी सामाजिक उपस्थिति थी।

अयोध्या आंदोलन की धार्मिक भाषा यहां प्रभावी हो सकती थी, लेकिन उसके साथ—

कांग्रेस-विरोध,

स्थानीय नेतृत्व,

जातीय समीकरण,

और विपक्षी समन्वय—

भी महत्वपूर्ण थे।

इसलिए भाजपा का 1989 विस्तार “एक मुद्दा, एक राज्य” वाला उभार नहीं था।

वह पश्चिम और मध्य भारत में अधिक गहरी पैठ बना रही थी।

गुजरात में भाजपा ने 12 सीटें जीतीं।

यह राज्य आगे चलकर भाजपा के सबसे मजबूत क्षेत्रों में बनेगा।

1980 के दशक के गुजरात में कांग्रेस की खाम रणनीति, जातीय तनाव, आरक्षण-विरोधी आंदोलनों, शहरी हिंदू मध्यवर्ग और संघ-भाजपा संगठन का प्रभाव बढ़ रहा था।

अयोध्या की सांस्कृतिक राजनीति ने इस वातावरण को नया साझा प्रतीक दिया।

यानी गुजरात में राम जन्मभूमि ने पहले से चल रहे राजनीतिक पुनर्संयोजन को गति दी।

महाराष्ट्र में भाजपा ने 10 सीटें जीतीं।

यह उस समय महत्वपूर्ण था क्योंकि महाराष्ट्र में शिवसेना भी हिंदू पहचान की राजनीति को विस्तार दे रही थी।

भाजपा का शहरी आधार—

मुंबई,

विदर्भ,

पुणे और अन्य नगरों—

में मजबूत हो रहा था।

राम जन्मभूमि ने भाजपा की सांस्कृतिक राष्ट्रवादी पहचान को महाराष्ट्र में भी राष्ट्रीय प्रश्न से जोड़ दिया।

बिहार में भाजपा ने 8 सीटें जीतीं।

लेकिन बिहार का 1989 चुनावी वातावरण अत्यंत जटिल था।

यह वी. पी. सिंह और जनता दल की बड़ी सामाजिक-राजनीतिक लहर का क्षेत्र था।

भाजपा यहां मुख्य विपक्षी शक्ति नहीं थी।

फिर भी आठ सीटें यह बताती हैं कि उसका धार्मिक-राजनीतिक संदेश और संघ संगठन उत्तर भारत में जड़ें बना चुका था।

आगे 1990 में यही बिहार लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा की गिरफ्तारी का ऐतिहासिक स्थल बनेगा।

यह सबसे रोचक प्रश्न है।

अयोध्या उत्तर प्रदेश में थी।

राम जन्मभूमि आंदोलन का सबसे तीखा केंद्र उत्तर प्रदेश था।

फिर भाजपा ने यहां 1989 में केवल 8 लोकसभा सीटें क्यों जीतीं?

उत्तर यह है कि 1989 में उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी राजनीतिक लहर वी. पी. सिंह और जनता दल की थी।

*इंडिया टुडे* की दिसंबर 1989 की तत्कालीन रिपोर्ट ने उत्तर प्रदेश में परिणाम को बोफोर्स, कांग्रेस-विरोध और वी. पी. सिंह की जबरदस्त लहर से जोड़ा। कांग्रेस यहां भारी पराजित हुई और विपक्षी नेताओं ने बड़े अंतर से जीत दर्ज की।

अर्थात अयोध्या का मुद्दा सक्रिय था, लेकिन उसका पूर्ण चुनावी लाभ भाजपा को अभी 1991 जैसी मात्रा में नहीं मिला था।

यदि 1989 केवल राम मंदिर चुनाव होता—

तो भाजपा को सबसे बड़ी सफलता अयोध्या वाले राज्य में मिलनी चाहिए थी।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

वहां जनता दल अधिक शक्तिशाली था।

इससे स्पष्ट है—

अयोध्या भाजपा की वृद्धि का महत्वपूर्ण कारक था, पर 1989 का प्रधान राष्ट्रीय चुनावी मुद्दा अकेला अयोध्या नहीं था।

यह शोध का अत्यंत महत्वपूर्ण निष्कर्ष है।

भाजपा ने दिल्ली में 4 सीटें जीतीं।

शहरी मध्यवर्ग, व्यापारी समुदाय, संघ संगठन और कांग्रेस-विरोध यहां पहले से उसके लिए अनुकूल थे।

राम मंदिर की सांस्कृतिक राष्ट्रवादी भाषा शहरी मतदाता के एक हिस्से में तेजी से प्रभावी हो रही थी।

दिल्ली की सफलता बताती है कि अयोध्या केवल धार्मिक नगरों का विषय नहीं रहा था।

हिमाचल प्रदेश में भाजपा ने 3 सीटें जीतीं।

यही वह राज्य था जहां कुछ महीने पहले पालमपुर प्रस्ताव पारित हुआ था।

यह सांकेतिक संबंध दिलचस्प है, लेकिन तीन सीटों की सफलता को केवल पालमपुर से जोड़ना उचित नहीं।

हिमाचल में भाजपा का संगठन और कांग्रेस के साथ सीधी द्विदलीय प्रतिस्पर्धा पहले से विकसित हो रही थी।

1989 का नक्शा बताता है कि भाजपा का उभार मुख्यतः—

मध्य भारत,

पश्चिम भारत,

हिंदी पट्टी,

और शहरी क्षेत्रों—

में केंद्रित था।

दक्षिण और पूर्व के बड़े हिस्सों में उसकी उपस्थिति अभी सीमित थी।

इसलिए 1989 को सर्वभारतीय प्रभुत्व नहीं, बल्कि उत्तर-पश्चिम-मध्य भारत में तेज राष्ट्रीय उभार कहना अधिक सटीक होगा।

1984 में भाजपा का राष्ट्रीय मत प्रतिशत लगभग 7–8 प्रतिशत के आसपास था; 1989 में निर्वाचन आयोग के अनुसार यह बढ़कर 11.36 प्रतिशत हो गया।

सीटें 2 से 85 हो गईं।

यहां एक चुनावी गणित समझना आवश्यक है—

मत प्रतिशत में वृद्धि सीटों की वृद्धि जितनी विस्फोटक नहीं थी।

अर्थात केवल मतों में चार-पांच गुना वृद्धि नहीं हुई थी।

असल परिवर्तन यह था कि—

भाजपा के मत अधिक उपयोगी रूप से केंद्रित हुए,

विपक्षी समझौते हुए,

और अनेक सीटों पर कांग्रेस विरोधी मतों का विभाजन कम हुआ।

यही कारण है कि अपेक्षाकृत सीमित मत-वृद्धि से सीटों में बहुत बड़ी छलांग संभव हुई।

भाजपा ने पूरे देश की हर सीट पर उम्मीदवार नहीं उतारा।

निर्वाचन आयोग के अनुसार उसने 225 सीटों पर चुनाव लड़ा।

यह विपक्षी चुनावी समझौतों का संकेत है।

जहां जनता दल या दूसरे सहयोगी कांग्रेस के विरुद्ध अधिक मजबूत थे, वहां भाजपा ने अनेक सीटों पर उम्मीदवार नहीं खड़े किए।

इससे कांग्रेस-विरोधी मतों का बंटवारा कम हुआ।

1989 में भाजपा और जनता दल एक ही विचारधारा के दल नहीं थे।

अयोध्या पर दोनों की स्थिति अलग थी।

लेकिन दोनों का तत्काल राजनीतिक लक्ष्य था—

राजीव गांधी की कांग्रेस को सत्ता से हटाना।

इसीलिए कई राज्यों में सीट-स्तरीय समझ बने।

इससे एक विचित्र राजनीतिक समीकरण बना—

भाजपा मंदिर प्रश्न पर अलग,

जनता दल भ्रष्टाचार-विरोध और व्यापक विपक्षी गठबंधन पर अलग,

लेकिन चुनाव में कांग्रेस के विरुद्ध व्यावहारिक सहयोग।

औपचारिक वैचारिक गठबंधन कहना गलत होगा।

लेकिन चुनावी समझ और चुनाव बाद समर्थन स्पष्ट था।

वी. पी. सिंह के नेतृत्व में बनी राष्ट्रीय मोर्चा सरकार को भाजपा ने बाहर से समर्थन दिया।

वाम दल भी दूसरी ओर से सरकार को समर्थन दे रहे थे।

यानी एक ही सरकार को ऐसी शक्तियां सहारा दे रही थीं जिनके बीच अयोध्या और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर गहरे मतभेद थे।

यही विस्फोटक विरोधाभास 1990 में सरकार गिराएगा।

समकालीन पत्रकारिता बताती है कि बोफोर्स का प्रभाव अत्यंत बड़ा था।

*इंडिया टुडे* ने उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम पर तत्कालीन टिप्पणी में साफ कहा कि भ्रष्टाचार के आरोप, कांग्रेस-विरोध और सांप्रदायिक राजनीति के प्रश्न साथ काम कर रहे थे।

वी. पी. सिंह ने राजीव गांधी की व्यक्तिगत विश्वसनीयता पर हमला केंद्रित किया।

इससे चुनाव “कौन रामभक्त?” जितना ही “कौन भ्रष्टाचार के खिलाफ?” भी था।

वी. पी. सिंह पूर्व राजीव गांधी सहयोगी और वित्त/रक्षा मंत्री रह चुके थे।

सरकार से बाहर निकलकर उन्होंने भ्रष्टाचार के प्रश्न को राष्ट्रीय आंदोलन में बदल दिया।

उनकी छवि—

ईमानदार,

सत्ता से लड़ने वाले,

बोफोर्स उठाने वाले नेता—

की बनी।

इससे कांग्रेस-विरोधी मतदाता के लिए जनता दल मुख्य वाहन बना।

यही कारण है कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भाजपा से अधिक लाभ जनता दल को मिला।

अयोध्या ने भाजपा को तीन महत्वपूर्ण चीजें दीं—

जनता दल और भाजपा दोनों कांग्रेस-विरोधी थे, लेकिन राम मंदिर ने भाजपा को अलग बनाया।

भ्रष्टाचार बुद्धि और शासन का प्रश्न था; राम जन्मभूमि आस्था और पहचान का।

रामशिला पूजन, संत सम्मेलन और विहिप–संघ नेटवर्क ने भाजपा के लिए विशाल सामाजिक संपर्क क्षेत्र बनाया।

यही वह पूंजी थी जिसे पार्टी आगे 1990–91 में अधिक सीधे चुनावी मतों में बदलेगी।

जून 1989 में भाजपा ने पालमपुर में औपचारिक रूप से राम जन्मभूमि का समर्थन किया।

*इंडियन एक्सप्रेस* के ऐतिहासिक विश्लेषण में भी पालमपुर प्रस्ताव को उस निर्णायक बिंदु के रूप में देखा गया है जब भाजपा ने बढ़ते राम मंदिर आंदोलन को अपनी राष्ट्रीय राजनीति से स्पष्ट रूप से जोड़ दिया।

इससे 1989 चुनाव में मतदाता के सामने कोई भ्रम नहीं रहा—

मंदिर आंदोलन के साथ खड़ी राष्ट्रीय पार्टी कौन है?

उत्तर—

भाजपा।

यह प्रश्न बहस का विषय है।

आलोचक कहते हैं—

1984 की दो सीटों की पराजय के बाद भाजपा ने धार्मिक मुद्दे में चुनावी अवसर देखा।

समर्थक कहते हैं—

पार्टी की सांस्कृतिक राष्ट्रवादी वैचारिक जड़ें जनसंघ और संघ परंपरा में पहले से थीं; उसने केवल समाज में उभरे वास्तविक आंदोलन का राजनीतिक प्रतिनिधित्व किया।

दोनों में कुछ तथ्य हैं।

अयोध्या आंदोलन भाजपा ने पैदा नहीं किया।

लेकिन उसने 1989 में उसके चुनावी महत्व को निश्चित रूप से पहचाना और अपना लिया।

लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में पार्टी ने महसूस किया कि केवल कांग्रेस-विरोध पर्याप्त नहीं।

क्योंकि उस क्षेत्र में जनता दल उससे बड़ा खिलाड़ी था।

भाजपा को अलग पहचान चाहिए थी।

राम जन्मभूमि ने यह पहचान दी।

*इंडियन एक्सप्रेस* का बाद का ऐतिहासिक आकलन भी आडवाणी को उस नेता के रूप में देखता है जिन्होंने मंदिर आंदोलन में हिंदू मतों के राजनीतिक एकीकरण की संभावना पहचानी।

अटल बिहारी वाजपेयी भाजपा को व्यापक स्वीकार्यता और लोकतांत्रिक मध्यमार्ग की दिशा में रखते थे।

आडवाणी पार्टी की वैचारिक विशिष्टता को अधिक स्पष्ट कर रहे थे।

1989 में पार्टी ने आडवाणी की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ाया।

लेकिन वाजपेयी संगठन से बाहर नहीं हुए।

यानी भाजपा के भीतर—

विस्तारवादी मध्यमार्ग

और

सांस्कृतिक राष्ट्रवादी तीव्रता—

दोनों साथ मौजूद रहे।

आगे यही संयोजन पार्टी की दीर्घकालीन शक्ति बनेगा।

सितंबर से नवंबर 1989 तक चलने वाले रामशिला अभियान का चुनाव से सीधा समयगत संबंध था।

गांवों में पूजा।

जुलूस।

संतों के कार्यक्रम।

अयोध्या की ओर शिलाएं।

और 9 नवंबर का शिलान्यास।

यह सब चुनाव प्रचार के ठीक पहले चल रहा था।

इससे भाजपा को अलग से हर गांव में चुनावी सभा करने की आवश्यकता नहीं थी; मंदिर आंदोलन स्वयं एक विशाल सामाजिक चर्चा बना रहा था।

यह भेद अनिवार्य है।

रामशिला अभियान विहिप का था।

भाजपा चुनाव लड़ रही थी।

दोनों को एक संस्था मानना गलत होगा।

लेकिन पालमपुर के बाद उनके संदेशों में स्पष्ट राजनीतिक निकटता थी।

इसलिए विहिप की जनलामबंदी से भाजपा को अप्रत्यक्ष चुनावी लाभ मिल सकता था।

कुछ हद तक।

भाजपा का राष्ट्रीय मत प्रतिशत 11.36 प्रतिशत हुआ।

लेकिन यदि रामशिला अभियान ने पूरे देश को समान रूप से भाजपा में बदल दिया होता, तो राष्ट्रीय मत प्रतिशत कहीं अधिक होना चाहिए था।

इसके बजाय सफलता क्षेत्रीय रूप से केंद्रित रही।

इससे स्पष्ट है—

मंदिर मुद्दे का प्रभाव संगठनात्मक शक्ति और स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों से मिलकर परिणाम देता था।

यह बताता है कि मजबूत संगठन + अनुकूल चुनावी समीकरण + वैचारिक मुद्दा मिलें तो भाजपा अधिक सफल हुई।

जहां वी. पी. सिंह की जनता दल लहर बहुत मजबूत थी, वहां राम मुद्दे के बावजूद भाजपा सीमित रही।

इसलिए संगठन और गठबंधन राजनीति को धार्मिक भावना से अलग नहीं किया जा सकता।

नहीं।

यदि ऐसा होता तो भाजपा 11.36 प्रतिशत पर नहीं रहती।

हिंदू मतदाता—

कांग्रेस,

जनता दल,

भाजपा,

वाम दल,

क्षेत्रीय दल—

सभी को वोट दे रहे थे।

इसलिए “1989 में हिंदू वोट पूरी तरह भाजपा के साथ आ गया” गलत है।

अधिक सटीक—

राम जन्मभूमि ने हिंदू पहचान आधारित एक नए राजनीतिक एकीकरण की प्रक्रिया को तेज किया, जो अभी अपूर्ण थी।

1990 की रथयात्रा,

आडवाणी की गिरफ्तारी,

भाजपा द्वारा वी. पी. सिंह सरकार से समर्थन वापसी,

30 अक्टूबर और 2 नवंबर की अयोध्या घटनाएं—

इन सबके बाद 1991 में राम मुद्दा कहीं अधिक सीधे चुनावी केंद्र बनेगा।

इसलिए 1989 आरंभिक चुनावी छलांग था।

1991 उसका अधिक विकसित चरण।

1989 में कांग्रेस 197 सीटों पर रह गई और यद्यपि वह सबसे बड़ी एकल पार्टी थी, बहुमत से बहुत दूर थी। निर्वाचन आयोग उसके 39.53 प्रतिशत राष्ट्रीय मत दर्ज करता है।

यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है—

कांग्रेस का मत प्रतिशत भाजपा से अभी बहुत अधिक था।

इसलिए 1989 में “कांग्रेस समाप्त और भाजपा स्थापित” कहना गलत होगा।

सत्ता-संतुलन टूटा था; कांग्रेस का राष्ट्रीय सामाजिक आधार अभी विशाल था।

क्योंकि विपक्ष का संयुक्त संख्या-बल अधिक था और कांग्रेस के विरुद्ध व्यापक राजनीतिक सहमति थी।

जनता दल ने राष्ट्रीय मोर्चा सरकार बनाई।

भाजपा और वाम दलों ने बाहर से समर्थन दिया।

राजीव गांधी ने विपक्ष में बैठना स्वीकार किया।

यानी 1989 ने भारत को एक-दलीय प्रभुत्व से गठबंधन राजनीति की ओर आगे धकेला।

85 सीटें बहुमत नहीं थीं।

लेकिन सरकार की स्थिरता के लिए वे अत्यंत महत्वपूर्ण थीं।

वी. पी. सिंह सरकार भाजपा के समर्थन के बिना टिकना कठिन पाती।

इससे पहली बार भाजपा को राष्ट्रीय सत्ता के निर्णयों पर महत्वपूर्ण प्रभाव मिला—

बिना स्वयं सरकार चलाए।

यही शक्ति 1990 में अयोध्या प्रश्न पर निर्णायक बनेगी।

भाजपा के सामने दुविधा थी—

सरकार गिराए तो कांग्रेस लौट सकती है।

सरकार बचाए तो अयोध्या पर अपनी प्रतिबद्धता कमजोर लग सकती है।

वी. पी. सिंह के सामने उलटी समस्या—

भाजपा को नाराज करे तो सरकार गिरे।

मुस्लिम और धर्मनिरपेक्ष सहयोगियों को नाराज करे तो गठबंधन टूटे।

यह राजनीतिक अस्थिरता 1989 चुनाव परिणाम में ही निर्मित हो चुकी थी।

1984 में राम जन्मभूमि सड़क का आंदोलन था।

1989 में वह राष्ट्रीय सरकार के अस्तित्व से जुड़ चुका था।

यह सबसे बड़ा परिवर्तन था।

भाजपा की 85 सीटें मंदिर मांग को संसद और सत्ता-समीकरण में वजन दे रही थीं।

यही संख्या आगे वी. पी. सिंह पर समझौते का दबाव बढ़ाएगी।

1984 तक पार्टी पर शहरी, ऊंची जाति, व्यापारी और शिक्षित मध्यवर्ग की पार्टी होने का आरोप था।

रामशिला अभियान और सामाजिक समरसता की राजनीति उसे—

किसान,

ग्रामीण,

पिछड़े,

दलित,

युवा—

तक पहुंचाने का प्रयास कर रही थी।

1989 के चुनाव में इसका पूर्ण परिणाम नहीं आया था, लेकिन दिशा बदल चुकी थी।

पिछले अध्याय में देखा कि पहली शिला दलित कार्यकर्ता कामेश्वर चौपाल से रखवाई गई।

इसे 1989 की चुनावी सामाजिक रणनीति से पूरी तरह अलग नहीं देखा जा सकता।

भाजपा-विहिप-संघ की व्यापक दिशा थी—

राम को जाति-पार हिंदू पहचान का केंद्र बनाना।

यह राजनीतिक विस्तार के लिए आवश्यक था।

नहीं।

मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा वी. पी. सिंह ने 1990 में की।

इसलिए 1989 की भाजपा सफलता को “मंडल के खिलाफ कमंडल” कहना कालक्रम की दृष्टि से गलत होगा।

हाँ, जातीय और धार्मिक राजनीतिक एकीकरण की अलग-अलग धाराएं पहले से विकसित हो रही थीं।

उनका खुला टकराव अगले वर्ष होगा।

संपूर्ण भारत के 1989 चुनाव में बोफोर्स और कांग्रेस-विरोध का प्रभाव अत्यंत व्यापक था।

अयोध्या का प्रभाव भाजपा के लिए अधिक विशिष्ट था।

इसे इस प्रकार समझें—

बोफोर्स ने कांग्रेस को कमजोर किया।

वी. पी. सिंह ने कांग्रेस-विरोधी मतों को संगठित किया।

अयोध्या ने भाजपा को जनता दल से अलग विशिष्ट पहचान दी।

यह तीनों प्रक्रियाएं एक-दूसरे को पूरक थीं।

इसका निश्चित उत्तर इतिहास नहीं दे सकता।

लेकिन यह संभव है कि भाजपा कांग्रेस-विरोध के कारण फिर भी बढ़ती।

फिर भी—

पालमपुर,

रामशिला,

शिलान्यास,

और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद—

ने उसे ऐसी पहचान दी जो जनता दल के पास नहीं थी।

इसलिए अयोध्या को गौण भी नहीं माना जा सकता।

तब कांग्रेस की केंद्रीय कमजोरी काफी कम हो सकती थी।

राजीव गांधी का 1984 वाला राजनीतिक पूंजी भंडार अधिक बचा रहता।

इसलिए भाजपा और जनता दल दोनों की सफलता कठिन हो सकती थी।

यही कारण है कि एकल कारण से चुनाव समझना गलत है।

भाजपा की सीट दक्षता का एक कारण यह भी था कि उसने केवल 225 सीटों पर चुनाव लड़ा।

जहां विपक्षी उम्मीदवार अधिक मजबूत था, वहां कांग्रेस-विरोधी प्रतिस्पर्धा को कम किया गया।

इससे भाजपा के मत कम बिखरे।

यही चुनावी गणित 2 से 85 की छलांग में अत्यंत महत्वपूर्ण था।

भाजपा—

मत 11.36 प्रतिशत।

सीटें 85।

कांग्रेस—

मत 39.53 प्रतिशत।

सीटें 197।

यह भारत की बहुलता-आधारित निर्वाचन प्रणाली की विशेषता है।

किसी दल के मत कितने हैं, उससे उतना ही महत्वपूर्ण है—

वे कहां केंद्रित हैं।

1989 में भाजपा के मत अनेक मजबूत क्षेत्रों में प्रभावी रूप से केंद्रित थे।

भाजपा पहले भी राष्ट्रीय दल थी, लेकिन राजनीतिक महत्व सीमित था।

1989 के बाद उसे—

राष्ट्रीय संसद,

सरकार निर्माण,

विदेश नीति,

सुरक्षा,

आर्थिक नीति,

और अयोध्या—

हर विषय पर निर्णायक शक्ति की तरह देखना पड़ा।

यह मनोवैज्ञानिक परिवर्तन भी बहुत बड़ा था।

1989 में तुरंत नहीं।

उस समय जनता दल सरकार बना रहा था और वी. पी. सिंह सबसे बड़ा विपक्षी विजेता थे।

लेकिन भाजपा का स्वतंत्र उभार यह संकेत दे रहा था कि दीर्घकाल में कांग्रेस के सामने सबसे स्थायी वैचारिक चुनौती यही पार्टी बन सकती है।

आगे 1996 तक यह बात सच हो जाएगी।

जनता दल की सरकार के पास अपनी बहुमत संख्या नहीं थी।

उसे भाजपा और वाम दल दोनों की आवश्यकता थी।

अयोध्या पर भाजपा और वाम दल लगभग विपरीत ध्रुव पर थे।

इसलिए सरकार की संरचना में ही भविष्य का संकट छिपा था।

1989 चुनाव परिणाम ने एक ऐसी सरकार बनाई जो अयोध्या जैसे प्रश्न पर स्थायी सहमति बना पाना लगभग असंभव पाती।

वह सरकार में शामिल नहीं हुई।

उसने बाहर से समर्थन दिया।

इसलिए तत्काल मंत्रिमंडलीय कार्यक्रम में राम मंदिर को लागू करवाने की सीधी स्थिति नहीं थी।

लेकिन पार्टी अपनी पालमपुर प्रतिबद्धता छोड़ भी नहीं सकती थी।

इससे उसे आंदोलन और संसदीय समर्थन दोनों को साथ संभालना पड़ा।

भाजपा की 85 सीटों ने विहिप को भी यह संकेत दिया कि मंदिर प्रश्न का राजनीतिक प्रभाव वास्तविक है।

अब आंदोलन का समर्थन करने वाली पार्टी राष्ट्रीय सरकार की स्थिरता के लिए आवश्यक थी।

इससे विहिप नेतृत्व की वार्ता-शक्ति बढ़ी।

अयोध्या के लिए सरकार से समयबद्ध निर्णय की मांग अधिक तीखी होना स्वाभाविक था।

नहीं।

1989 में मतदाता ने अनेक मुद्दों पर मतदान किया।

कांग्रेस समर्थक भी मंदिर समर्थक हो सकता था।

जनता दल मतदाता भी रामभक्त हो सकता था।

भाजपा मतदाता भी भ्रष्टाचार-विरोध से प्रभावित हो सकता था।

इसलिए 85 सीटें “मंदिर के पक्ष में राष्ट्रीय जनमत-संग्रह” नहीं थीं।

आंदोलनकारी राजनीति सामान्यतः अपने अनुकूल परिणाम को जनसमर्थन का प्रमाण बताती है।

भाजपा की छलांग को मंदिर समर्थक जनभावना से जोड़ना स्वाभाविक था।

इससे आगे आंदोलन की भाषा और आत्मविश्वास बढ़ा।

राजनीतिक अर्थ में धारणा स्वयं महत्वपूर्ण शक्ति बनता है।

राम मुद्दा प्रभावी तभी हुआ क्योंकि पार्टी और संघ के पास उसे मतों में बदलने का संगठन था।

मध्य प्रदेश,

राजस्थान,

गुजरात,

दिल्ली—

में पुराना जनसंघ-संघ ढांचा मौजूद था।

यही कारण है कि वहां सफलता उत्तर प्रदेश से अधिक मिली।

आस्था राष्ट्रीय हो सकती है।

मत में परिवर्तन के लिए बूथ, उम्मीदवार और संगठन चाहिए।

1989 की सफलता को केवल राष्ट्रीय नेताओं से नहीं समझा जा सकता।

राज्यों में स्थानीय नेता—

संगठन निर्माण,

जातीय समीकरण,

कांग्रेस-विरोधी मत,

और जनसंघ की पुरानी प्रतिष्ठा—

को साथ जोड़ रहे थे।

इसीलिए समान राम आंदोलन के बावजूद हर राज्य का परिणाम अलग रहा।

आंशिक रूप से।

पालमपुर और अयोध्या ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को स्पष्ट किया।

लेकिन पार्टी अन्य राष्ट्रीय प्रश्न भी उठा रही थी—

भ्रष्टाचार,

कश्मीर,

श्रीलंका,

शासन,

राष्ट्रीय सुरक्षा।

*इंडियन एक्सप्रेस* का बाद का विश्लेषण भी आडवाणी की उस समय की राजनीति को राम मंदिर के साथ-साथ बोफोर्स, श्रीलंका और कश्मीर पर राजीव सरकार के विरोध से जोड़ता है।

अतः इसे केवल एक-विषयी चुनाव कहना अनुचित होगा।

85 सीटें स्वयं बहुत बड़ी उपलब्धि थीं।

लेकिन उससे भी बड़ी उपलब्धि थी—

पार्टी ने सिद्ध किया कि उसकी वैचारिक राजनीति चुनावी रूप से विस्तार योग्य है।

1984 की दो सीटों के बाद यह प्रश्न था कि क्या भाजपा राष्ट्रीय राजनीति में प्रासंगिक रह पाएगी।

1989 ने इसका उत्तर दे दिया—

हाँ।

उसका मत प्रतिशत अभी 11.36 था।

देश के बड़े हिस्सों में वह कमजोर थी।

उत्तर प्रदेश में भी जनता दल उससे आगे था।

इसलिए 1989 को भाजपा की पूर्ण विजय नहीं, निर्णायक प्रस्थान-बिंदु कहना अधिक उचित है।

भाजपा को अब दो काम करने थे—

पहला, 85 सीटों की सफलता को स्थायी बनाना।

दूसरा, राम मंदिर आंदोलन को अधिक सीधे राजनीतिक जनसमर्थन में बदलना।

यही भूमिका 1990 की आडवाणी रथयात्रा निभाएगी।

यदि 85 सीटें मिल ही गई थीं तो और आंदोलन क्यों?

क्योंकि भाजपा नेतृत्व समझ रहा था कि—

अयोध्या के मुद्दे पर सामाजिक समर्थन पार्टी के मत प्रतिशत से कहीं बड़ा हो सकता है।

उस समर्थन को सीधे भाजपा से जोड़ना बाकी था।

रथयात्रा यही राजनीतिक सेतु बनने वाली थी।

85 सीटों ने साबित किया कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद चुनावी रूप से कार्य कर सकता है।

लेकिन उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में भाजपा अभी सीमित थी।

1990 की यात्रा का सबसे बड़ा मार्ग हिंदी पट्टी से होकर जाना था।

यह कोई संयोग नहीं।

अब राष्ट्रीय मुद्दे को प्रत्यक्ष राजनीतिक यात्रा के माध्यम से मतदाता तक पहुंचाया जाना था।

क्योंकि शिलान्यास के बाद निर्माण रुक गया था।

विहिप मंदिर निर्माण चाहती थी।

भाजपा पालमपुर से प्रतिबद्ध थी।

नई सरकार बातचीत करना चाहती थी।

मुस्लिम पक्ष मस्जिद का दावा नहीं छोड़ रहा था।

इसलिए चुनाव ने विवाद का समाधान नहीं किया; उसने उसे संसद के भीतर और अधिक शक्तिशाली बना दिया।

चुनाव के बाद व्यवस्था व्यापक रूप से यह थी—

वी. पी. सिंह — प्रधानमंत्री।

जनता दल — सरकार की मुख्य शक्ति।

भाजपा — बाहर से समर्थक, 85 सांसद।

वाम दल — बाहर से समर्थक।

कांग्रेस — सबसे बड़ी एकल पार्टी, लेकिन विपक्ष में।

विहिप — मंदिर आंदोलन जारी।

बाबरी मस्जिद कार्य समिति/अखिल भारतीय मुस्लिम व्यक्तिगत विधि बोर्ड — मुस्लिम पक्ष का दबाव जारी।

यानी राजनीतिक संतुलन अत्यंत नाजुक था।

व्यवहारतः उसका समर्थन अत्यंत महत्वपूर्ण था।

इसीलिए जब 1990 में आडवाणी गिरफ्तार हुए और अयोध्या कारसेवा को लेकर टकराव बढ़ा, भाजपा समर्थन वापसी की वास्तविक शक्ति रखती थी।

यह शक्ति उसे 1989 के 85 सांसदों ने दी थी।

अर्थात चुनाव परिणाम का अयोध्या आंदोलन पर सीधा संस्थागत प्रभाव पड़ा।

भारत की राजनीति की धुरी अब केवल—

कांग्रेस बनाम समाजवाद

या

कांग्रेस बनाम वाम—

नहीं रही।

अब एक तीसरी बड़ी वैचारिक धुरी उभर चुकी थी—

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और भाजपा।

राम जन्मभूमि इस उभार का सबसे प्रभावशाली प्रतीक बना।

संभवतः पार्टी की वैचारिक और संगठनात्मक जड़ें उसे बढ़ाती रहतीं।

लेकिन गति और सामाजिक विस्तार अलग हो सकते थे।

राम जन्मभूमि ने उसे—

स्पष्ट प्रतीक,

भावनात्मक मुद्दा,

संत नेटवर्क,

जनलामबंदी,

और कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता पर आक्रमण का एक केंद्रीकृत आधार—

दिया।

इसीलिए अयोध्या उसकी वृद्धि का त्वरक थी, अकेला कारण नहीं।

1989 के पूरे चुनाव का सबसे उपयोगी सूत्र शायद यही है।

बोफोर्स और वी. पी. सिंह ने कांग्रेस-विरोध का राष्ट्रीय वातावरण बनाया।

अयोध्या ने भाजपा को उस कांग्रेस-विरोध के भीतर अलग वैचारिक स्थान दिया।

यही कारण है कि जनता दल सरकार बना सका, जबकि भाजपा भविष्य की बड़ी राष्ट्रीय पार्टी बनकर निकली।

1984 के बाद भाजपा के सामने प्रश्न था—

क्या जनता उसकी राजनीति स्वीकार करती है?

1989 के बाद प्रश्न बदल गया—

वह कितनी दूर तक जा सकती है?

यह मनोवैज्ञानिक बदलाव आगे पार्टी रणनीति पर गहरा प्रभाव डालता है।

अब वह रक्षात्मक नहीं, विस्तारवादी राजनीतिक शक्ति थी।

राज्य — भाजपा सीटें 1989 — ऐतिहासिक संकेत

मध्य प्रदेश — 27 — पुराना संगठन + कांग्रेस-विरोध + सांस्कृतिक राष्ट्रवाद

राजस्थान — 13 — मजबूत संगठन, द्विध्रुवीय प्रतिस्पर्धा

गुजरात — 12 — सामाजिक पुनर्संयोजन और शहरी विस्तार

महाराष्ट्र — 10 — शहरी आधार और हिंदू राजनीति का विस्तार

बिहार — 8 — जनता दल लहर के बीच भाजपा की पैठ

उत्तर प्रदेश — 8 — अयोध्या प्रभाव के बावजूद वी. पी. सिंह/जनता दल प्रधान

दिल्ली — 4 — शहरी मध्यवर्ग और पुराना जनसंघ आधार

हिमाचल प्रदेश — 3 — मजबूत क्षेत्रीय संगठन

कुल — 85

राज्यवार सीट संख्या निर्वाचन आयोग की आधिकारिक 1989 रिपोर्ट से है।

दल — लड़ी सीटें — जीती सीटें — राष्ट्रीय मत प्रतिशत

कांग्रेस — 510 — 197 — 39.53%

जनता दल — 244 — 143 — 17.79%

भाजपा — 225 — 85 — 11.36%

माकपा — 64 — 33 — 6.55%

भाकपा — 50 — 12 — 2.57%

निर्वाचन आयोग की आधिकारिक 1989 रिपोर्ट में भाजपा की संख्या 85 है।

कुछ बाद के लेखों में 86 का उल्लेख मिलता है, लेकिन शोध के लिए निर्वाचन आयोग की 85 सीटों वाली संख्या ही स्वीकार की जानी चाहिए।

गलत। सबसे अधिक 27 सीटें मध्य प्रदेश से आईं; उत्तर प्रदेश से केवल 8।

गलत। बोफोर्स, भ्रष्टाचार-विरोध, वी. पी. सिंह और कांग्रेस-विरोध बड़े राष्ट्रीय कारक थे।

यह भी गलत। पालमपुर, रामशिला और शिलान्यास ने भाजपा को अलग वैचारिक पहचान और व्यापक सामाजिक जनसंपर्क दिया।

गलत। भाजपा का राष्ट्रीय मत प्रतिशत केवल 11.36 था।

अधूरा। मत वृद्धि के साथ विपक्षी सीट-समझौते, क्षेत्रीय एकाग्रता और कांग्रेस-विरोधी मतों का कम विभाजन भी महत्वपूर्ण था।

गलत। राष्ट्रीय मोर्चा सरकार वी. पी. सिंह के नेतृत्व में बनी; भाजपा ने उसे बाहर से समर्थन दिया।

1989 का परिणाम यह सिद्ध करता है कि—

पहला, भाजपा अब राष्ट्रीय सत्ता-समीकरण की निर्णायक शक्ति बन चुकी थी।

दूसरा, अयोध्या ने उसे जनता दल से अलग राजनीतिक पहचान दी।

तीसरा, उसका सबसे मजबूत चुनावी विस्तार मध्य और पश्चिम भारत में हुआ, केवल उत्तर प्रदेश में नहीं।

चौथा, कांग्रेस की गिरावट बहु-कारकीय थी; बोफोर्स और वी. पी. सिंह की भूमिका बहुत बड़ी थी।

पांचवां, 85 सांसदों ने भाजपा को पहली बार केंद्र सरकार की स्थिरता पर वास्तविक प्रभाव दिया।

यह चुनाव यह सिद्ध नहीं करता कि—

देश ने राम मंदिर पर जनमत-संग्रह में भाजपा को बहुमत दिया।

सभी हिंदू भाजपा के साथ हो गए।

अयोध्या अकेले कांग्रेस को सत्ता से बाहर ले गई।

वी. पी. सिंह की भूमिका गौण थी।

या भाजपा की 1989 सफलता अपरिवर्तनीय हो चुकी थी।

वह अभी भी उभार की अवस्था में थी।

1989 में भाजपा की सफलता को समझने के लिए किसी एक कारण का चयन करना इतिहास को विकृत करेगा।

उसकी छलांग पांच शक्तियों के संगम से बनी—

कांग्रेस-विरोध, बोफोर्स, वी. पी. सिंह के नेतृत्व में विपक्षी पुनर्गठन, चुनावी सीट-समझौते, और राम जन्मभूमि से मिली भाजपा की विशिष्ट वैचारिक पहचान।

इनमें अयोध्या की विशेष भूमिका यह थी कि उसने भाजपा को केवल “एक और कांग्रेस-विरोधी दल” नहीं रहने दिया।

जनता दल भ्रष्टाचार-विरोध का सबसे बड़ा मंच था।

भाजपा के पास अब उसके अतिरिक्त—

राम जन्मभूमि और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद—

का अपना विशिष्ट प्रश्न था।

यही प्रश्न अगले वर्ष उसकी पूरी राजनीति को बदल देगा।

1984 में भाजपा के पास दो सांसद थे।

1989 में 85।

लेकिन इस संख्या से भी अधिक महत्वपूर्ण था उसका नया राजनीतिक स्थान।

वह सरकार में नहीं थी, फिर भी सरकार उसके समर्थन पर निर्भर थी।

वह अयोध्या आंदोलन की औपचारिक संचालक संस्था नहीं थी, फिर भी मंदिर मांग की प्रमुख संसदीय प्रतिनिधि बन चुकी थी।

वह उत्तर प्रदेश में अभी केवल आठ सीटें जीत पाई थी, फिर भी राम जन्मभूमि उसके राष्ट्रीय विस्तार का सबसे शक्तिशाली प्रतीक बन चुकी थी।

1989 इसलिए भाजपा की अंतिम विजय नहीं था।

वह निर्णायक राजनीतिक प्रस्थान था।

अब वी. पी. सिंह को ऐसी सरकार चलानी थी जिसे एक ओर भाजपा का समर्थन चाहिए था और दूसरी ओर मुस्लिम नेतृत्व, वाम दलों तथा धर्मनिरपेक्ष सहयोगियों का विश्वास भी।

इसी विरोधाभास से अगला चरण जन्म लेगा—

समझौते की कोशिश।

सरकार विहिप और बाबरी मस्जिद पक्ष को बातचीत की मेज पर लाने का प्रयास करेगी।

इतिहास, पुरातत्व और दस्तावेजों की मांग उठेगी।

समय मांगा जाएगा।

लेकिन आंदोलन अब उस गति पर पहुंच चुका था जहां केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं था।

अगला अध्याय 43 — “वी. पी. सिंह सरकार और समझौते की कोशिशें” होगा। इसमें दिसंबर 1989 से 1990 तक प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्रालय, विहिप, बाबरी मस्जिद पक्ष और संत नेतृत्व के बीच वार्ताओं, समाधान के विभिन्न सूत्रों, प्रमाणों के आदान-प्रदान, सरकार द्वारा समय मांगने, भाजपा के राजनीतिक दबाव तथा यह प्रक्रिया अंततः क्यों विफल हुई—इनका क्रमबद्ध दस्तावेजी अध्ययन किया जाएगा।