शाहबानो प्रकरण और अयोध्या : कांग्रेस की दोहरी राजनीतिक चुनौती
संगठित जनांदोलन का उदय
1985–86 का काल स्वतंत्र भारत की धर्मनिरपेक्ष राजनीति के इतिहास में सबसे निर्णायक मोड़ों में एक है। इसी अवधि में दो घटनाएं लगभग साथ-साथ भारतीय राजनीति के केंद्र में आईं—शाहबानो प्रकरण और अयोध्या में ताला खुलना। दोनों की कानूनी प्रकृति पूरी तरह अलग थी, लेकिन राजनीति ने उन्हें जल्दी ही एक-दूसरे से जोड़ दिया।
23 अप्रैल 1985 को सर्वोच्च न्यायालय ने मोहम्मद अहमद खान बनाम शाहबानो बेगम मामले में निर्णय दिया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत अपने निर्वाह में असमर्थ तलाकशुदा मुस्लिम महिला भी भरण-पोषण का दावा कर सकती है। मुस्लिम धार्मिक नेतृत्व के एक हिस्से ने इसे मुस्लिम व्यक्तिगत कानून में न्यायिक हस्तक्षेप माना। राजीव गांधी सरकार ने पहले फैसले का बचाव किया, लेकिन बाद में अपना रुख बदला और 1986 में नया कानून लाई। दूसरी ओर, 1 फरवरी 1986 को फैजाबाद के जिला न्यायाधीश ने अयोध्या में रामलला के दर्शन के लिए लगे ताले खुलवाने का आदेश दिया। कुछ ही मिनटों में प्रशासन ने आदेश लागू कर दिया।
इन्हीं दो घटनाओं के बीच से वह राजनीतिक आरोप पैदा हुआ जिसने कांग्रेस को दशकों तक घेरा—क्या शाहबानो पर मुस्लिम धार्मिक नेतृत्व के दबाव के आगे झुकने के बाद राजीव गांधी सरकार ने अयोध्या का ताला खुलवाकर हिंदू मतदाताओं को संतुलित करने की कोशिश की?
इस प्रश्न का उत्तर एक शब्द में नहीं दिया जा सकता। “संतुलन” या “संतुलन कार्रवाई” वाली व्याख्या समकालीन और बाद की राजनीतिक स्मृति में अत्यंत मजबूत है; अरिफ मोहम्मद खान सहित अनेक लोगों ने इसे स्पष्ट रूप से कहा। लेकिन 1 फरवरी 1986 के न्यायिक आदेश के पीछे सीधे प्रधानमंत्री राजीव गांधी का लिखित निर्देश आज तक सार्वजनिक प्राथमिक अभिलेख से निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं है। कांग्रेस के भीतर बाद की परस्पर-विरोधी स्मृतियां भी मौजूद हैं—कुछ नेता राजीव को श्रेय देते हैं, जबकि मणिशंकर अय्यर ने बाद में दावा किया कि आंतरिक जांच ने अरुण नेहरू को जिम्मेदार ठहराया और राजीव को पूर्व जानकारी नहीं थी।
इसलिए इस अध्याय का उद्देश्य किसी लोकप्रिय कथा को दोहराना नहीं, बल्कि न्यायिक तथ्य, संसदीय रिकॉर्ड और राजनीतिक दावों को अलग-अलग प्रमाण-स्तर पर रखकर पूरे प्रकरण को समझना है।
शाहबानो मध्य प्रदेश के इंदौर की मुस्लिम महिला थीं। उनका विवाह अधिवक्ता मोहम्मद अहमद खान से हुआ था। लंबे वैवाहिक जीवन और पांच बच्चों के बाद पति-पत्नी अलग हुए। 1978 में पति ने उन्हें तलाक दे दिया।
शाहबानो ने अपने निर्वाह के लिए दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 के तहत भरण-पोषण मांगा।
धारा 125 का मूल उद्देश्य धार्मिक व्यक्तिगत कानून का पुनर्लेखन नहीं, बल्कि ऐसी पत्नी, संतान या माता-पिता को न्यूनतम आर्थिक संरक्षण देना था जो स्वयं अपना निर्वाह नहीं कर सकते।
यहीं से प्रश्न पैदा हुआ—
क्या “तलाकशुदा मुस्लिम पत्नी” भी इस धर्मनिरपेक्ष आपराधिक प्रक्रिया संबंधी सामाजिक-कल्याण प्रावधान का लाभ ले सकती है?
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने शाहबानो के पक्ष में रखरखाव बढ़ाया।
उनके पूर्व पति मोहम्मद अहमद खान सर्वोच्च न्यायालय पहुंचे।
उनका तर्क व्यापक रूप से यह था कि मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के अनुसार उनकी आर्थिक जिम्मेदारी इद्दत अवधि और मेहर तक सीमित थी और धारा 125 को उस सीमा से आगे लागू नहीं किया जाना चाहिए।
मामला संविधान पीठ के सामने गया।
23 अप्रैल 1985 को मुख्य न्यायाधीश वाई. वी. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीश पीठ ने निर्णय सुनाया।
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह था कि धारा 125 धर्म-निरपेक्ष सामाजिक न्याय प्रावधान है।
यदि कोई तलाकशुदा मुस्लिम महिला स्वयं अपना निर्वाह नहीं कर सकती, तो केवल इस आधार पर उसे धारा 125 से बाहर नहीं किया जा सकता कि उसका विवाह मुस्लिम कानून के अधीन था।
अदालत ने यह भी माना कि मेहर की अदायगी अपने-आप पति की धारा 125 की जिम्मेदारी समाप्त नहीं करती।
यानी निर्णय का मूल प्रश्न था—
गरीबी और निर्वाह बनाम व्यक्तिगत-कानून सीमा।
नहीं।
यह बहुत महत्वपूर्ण है।
फैसले ने मुस्लिम विवाह या तलाक की पूरी व्यवस्था समाप्त नहीं की।
उसने केवल यह कहा कि धारा 125 का वैधानिक दायित्व उस तलाकशुदा महिला को भी उपलब्ध है जो स्वयं को maintain नहीं कर सकती।
इसलिए “सुप्रीम कोर्ट ने शरीयत खत्म कर दी थी” जैसी तत्कालीन राजनीतिक भाषा कानूनी निर्णय का सही वर्णन नहीं थी।
फैसले में अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 44—समान नागरिक संहिता—पर भी टिप्पणी की।
यही हिस्सा विवाद को रखरखाव के सीमित मुकदमे से निकालकर व्यापक धर्म और राज्य की बहस में ले गया।
अदालत ने समान नागरिक संहिता की दिशा में प्रगति न होने पर खेद व्यक्त किया।
मुस्लिम धार्मिक नेतृत्व के कई हिस्सों ने इसे व्यक्तिगत कानून के भविष्य पर खतरे के रूप में देखा।
इस प्रकार एक वृद्ध तलाकशुदा महिला का रखरखाव प्रकरण अचानक—
मुस्लिम पहचान,
व्यक्तिगत कानून,
धार्मिक स्वायत्तता,
और समान नागरिक संहिता—
की राष्ट्रीय बहस बन गया।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और विभिन्न मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने निर्णय का विरोध किया।
उनका मुख्य तर्क था कि—
मुस्लिम विवाह और तलाक के अधिकारों का निर्धारण शरीयत के अनुसार होना चाहिए,
और धर्मनिरपेक्ष अदालत व्यक्तिगत कानून की धार्मिक सीमाओं को पुनर्परिभाषित नहीं कर सकती।
कुछ मुस्लिम नेताओं की चिंता केवल शाहबानो के रखरखाव तक सीमित नहीं थी।
वे इसे एक नजीर मान रहे थे—
आज रखरखाव,
कल विवाह और उत्तराधिकार,
फिर व्यक्तिगत कानून की स्वायत्तता।
यही भय राजनीतिक लामबंदी में बदल गया।
यह भी स्पष्ट रखना आवश्यक है।
मुस्लिम समाज एकरूप नहीं था।
कई प्रगतिशील मुस्लिम बुद्धिजीवियों, महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और नेताओं ने निर्णय का समर्थन किया।
सबसे महत्वपूर्ण नाम था—
अरिफ मोहम्मद खान।
वे राजीव गांधी सरकार में मंत्री थे और प्रारंभ में सरकार की ओर से संसद में शाहबानो फैसले की जोरदार रक्षा की। शीला दीक्षित ने अपनी आत्मकथा में भी लिखा कि राजीव गांधी की पहली प्रवृत्ति फैसले का समर्थन करने की थी और उन्होंने अरिफ मोहम्मद खान को संसद में उसका प्रभावशाली बचाव करने दिया।
यह इस अध्याय का अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है।
राजीव गांधी सरकार ने फैसले के तुरंत बाद उसे पलटने का निश्चय नहीं किया था।
अरिफ मोहम्मद खान को फैसले की रक्षा के लिए आगे करना इस बात का प्रमाण है।
यानी कालक्रम है—
पहला चरण : फैसले का समर्थन।
दूसरा चरण : मुस्लिम धार्मिक विरोध तेज।
तीसरा चरण : कांग्रेस सरकार का राजनीतिक पुनर्विचार।
चौथा चरण : नया कानून।
इससे स्पष्ट है कि सरकारी नीति दबाव के बीच बदली।
इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के सांसद जी. एम. बनातवाला सहित विरोधी नेताओं ने दंड प्रक्रिया संहिता की व्यवस्था में संशोधन की मांग उठाई।
1985 में संसद में धारा 125–127 के संबंध में निजी सदस्य विधेयकों और बहसों का रिकॉर्ड उपलब्ध है। संसद की डिजिटल लाइब्रेरी अगस्त और दिसंबर 1985 में ऐसे विधायी प्रयास दर्ज करती है।
यानी मुस्लिम व्यक्तिगत कानून को शाहबानो निर्णय के प्रभाव से अलग रखने की मांग सरकार के अपने विधेयक से पहले संसद में आ चुकी थी।
इसके पीछे अनेक कारण बताए गए—
मुस्लिम धार्मिक नेतृत्व का दबाव,
कांग्रेस के मुस्लिम मताधार को लेकर चिंता,
संसद में विरोध,
और यह भय कि सरकार व्यक्तिगत कानून में हस्तक्षेप करती दिखाई देगी।
अरिफ मोहम्मद खान की बाद की व्याख्या में यह साफ मतदाता-समूह राजनीति थी।
कांग्रेस के कुछ नेताओं की स्मृतियों में भी सरकार के भीतर भारी संशय का उल्लेख है।
शीला दीक्षित ने लिखा कि कांग्रेस के अनेक सांसदों को नए कानून की आवश्यकता पर संदेह था, लेकिन वे पार्टी निर्णय के साथ खड़े हुए।
यह तथ्य लोकप्रिय राजनीतिक कथा को अधिक सटीक बनाता है।
अयोध्या का ताला खुला—
1 फरवरी 1986।
सरकार का मुस्लिम महिलाएँ (संरक्षण का अधिकार पर तलाक) विधेयक लोकसभा में औपचारिक रूप से प्रस्तुत हुआ—
25 फरवरी 1986। संसद की डिजिटल लाइब्रेरी इसका प्रत्यक्ष रिकॉर्ड देती है।
और अधिनियम अस्तित्व में आया—
19 मई 1986।
इसलिए यह कहना कि—
“पहले सरकार ने शाहबानो फैसला कानून बनाकर पलटा, फिर उसकी भरपाई के लिए ताला खोला”—
कालक्रम की दृष्टि से गलत है।
क्योंकि कानून भले 25 फरवरी को पेश और मई में बना, सरकार ने जनवरी 1986 तक शाहबानो फैसले को बदलने का राजनीतिक निर्णय ले लिया था—ऐसा अरिफ मोहम्मद खान सहित बाद के प्रमुख प्रतिभागियों का दावा है।
अरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि जनवरी के दूसरे सप्ताह में राजीव गांधी ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की मांग स्वीकार करने का निर्णय कर लिया था और उसके तीखे प्रतिघात के बाद सरकार को “संतुलन कार्रवाई” की जरूरत महसूस हुई; 1 फरवरी का ताला खुलना उसी संदर्भ में हुआ। यह उनका प्रत्यक्ष राजनीतिक दावा है, न अदालत द्वारा सिद्ध तथ्य।
इसलिए अधिक सटीक निर्धारण होगा—
ताला मुस्लिम महिला कानून पारित होने के बाद नहीं, बल्कि शाहबानो पर सरकार के नीति-परिवर्तन और मुस्लिम धार्मिक नेतृत्व को रियायत देने के निर्णय के बीच खुला।
राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम महिलाएँ (संरक्षण का अधिकार पर तलाक) विधेयक, 1986 लोकसभा में 25 फरवरी को पेश किया। संसद का आधिकारिक रिकॉर्ड इसकी पुष्टि करता है।
विधेयक का उद्देश्य मुस्लिम तलाकशुदा महिलाओं के अधिकारों के लिए अलग वैधानिक ढाँचा बनाना था।
इसी बिंदु पर अरिफ मोहम्मद खान ने सरकार से दूरी बनाई।
शाहबानो निर्णय का संसद में बचाव करने वाले अरिफ मोहम्मद खान ने सरकार के नीति उलटाव का विरोध किया और मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
भारतीय एक्सप्रेस के उनके जीवनी-संदर्भ में इसे उनके राजनीतिक जीवन का निर्णायक क्षण बताया गया है।
इस इस्तीफे ने कांग्रेस पर यह आरोप और मजबूत किया कि—
सरकार आधुनिकतावादी और महिला-अधिकार समर्थक स्थिति से हटकर धार्मिक रूढ़िवाद के सामने झुक गई।
मुस्लिम महिलाएँ (संरक्षण का अधिकार पर तलाक) अधिनियम, 1986 — अधिनियम संख्या 25 का 1986 को 19 मई 1986 को अधिनियमित और लागू किया गया। भारत संहिता इसका आधिकारिक रिकॉर्ड देता है।
इस कानून ने तलाकशुदा मुस्लिम महिला के लिए—
मेहर,
विवाह के समय मिली संपत्ति,
“युक्तिसंगत और न्यायसंगत प्रावधान और रखरखाव”,
और आवश्यकता की स्थिति में रिश्तेदारों/वक्फ बोर्ड की जिम्मेदारी—
की अलग व्यवस्था बनाई।
धारा 5 ने दोनों पक्षों की सहमति से दंड प्रक्रिया संहिता 125–128 के अधीन जाने का विकल्प भी रखा।
राजनीतिक भाषा में इसे अक्सर “शाह बानो निर्णय overturned” कहा जाता है।
तत्काल प्रभाव में यह व्यापक रूप से सही राजनीतिक वर्णन है—सरकार ने ऐसा अलग वैधानिक ढाँचा बनाया जिसने धारा 125 की सामान्य व्यवस्था के सीधे आवेदन को बदल दिया।
लेकिन बाद का कानूनी इतिहास अधिक जटिल है।
2001 में दानियाल लतीफी मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इसी 1986 अधिनियम की ऐसी व्याख्या की जिससे पूर्व पति को इद्दत अवधि के भीतर महिला के भविष्य के लिए “युक्तिसंगत और न्यायसंगत प्रावधान” करना आवश्यक माना गया।
इसलिए 1986 कानून का अंतिम न्यायिक अर्थ केवल “इद्दत तक रखरखाव” पर स्थिर नहीं रहा।
हमारे 1985–86 राजनीतिक अध्याय के लिए मुख्य तथ्य यही है—
उस समय इसे शाहबानो फैसले के प्रभाव को बदलने वाली राजनीतिक वापसी के रूप में देखा गया।
उधर राम जन्मभूमि पर विश्व हिंदू परिषद और संतों का “ताला खोलो” अभियान 1984 से चल रहा था।
19 दिसंबर 1985 को बजरंग दल ने ताला खोलने की मांग पर बंद भी किया था।
इसलिए 1 फरवरी 1986 की घटना किसी शून्य में नहीं हुई।
इसके पीछे डेढ़ वर्ष का सार्वजनिक धार्मिक अभियान था।
लेकिन ताला खुलने का तात्कालिक रास्ता न्यायालय से आया।
सर्वोच्च न्यायालय की 2019 कालक्रम के अनुसार 25 जनवरी 1986 को एक आवेदन विचारण न्यायालय में दिया गया जिसमें grill-शिला दीवार पर लगे ताले खुलवाकर सामान्य भक्तों को भीतरी प्रांगण में जाकर दर्शन करने देने की मांग की गई।
निचली अदालत में तत्काल राहत न मिलने पर मामला अपील में जिला न्यायाधीश के सामने पहुंचा।
यही न्यायिक मार्ग 1 फरवरी के आदेश तक गया।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2010 के विस्तृत अभिलेख के अनुसार विचारण न्यायालय के 28 जनवरी के आदेश के विरुद्ध 31 जनवरी 1986 को विविध अपील संख्या 8 का 1986 जिला न्यायालय में दाखिल की गई।
अगले ही दिन उसका निर्णय हो गया।
यही असाधारण गति आगे विवाद का विषय बनी।
अयोध्या से जुड़े बाद के न्यायिक रिकॉर्ड 1 फरवरी 1986 का आदेश तत्कालीन फैजाबाद जिला न्यायाधीश के. एम. पांडेय से जोड़ते हैं। एक इलाहाबाद उच्च न्यायालय निर्णय भी स्पष्ट रूप से “श्री K.M. पांडेय” का नाम देता है।
कुछ प्रतिलिपियों/द्वितीयक reproductions में initials K.N. दिखाई देते हैं; इसलिए हमारे शोध में आधिकारिक बाद के उच्च न्यायालय संदर्भ के आधार पर K. M. पांडेय लिखना अधिक सुरक्षित है।
यह 1 फरवरी की सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक घटनाओं में है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2010 अभिलेख के अनुसार जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक दोनों अदालत में उपस्थित थे।
जिला न्यायाधीश ने उनसे पूछा—
यदि ताले खोल दिए जाएं तो क्या कानून-व्यवस्था समस्या होगी?
दोनों ने कहा कि शांति-व्यवस्था संभाली जा सकती है और ताला खुलने से कोई ऐसी समस्या नहीं होगी जिसे प्रशासन नियंत्रित न कर सके।
इस उत्तर ने न्यायाधीश के निर्णय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जिला न्यायाधीश ने व्यापक रूप से यह माना कि जाली/रेलिंग के द्वारों पर लगे ताले भक्त और रामलला के बीच एक अनावश्यक कृत्रिम अवरोध बन गए थे।
उन्होंने द्वार “O” और “P” के ताले खोलने का निर्देश दिया और हिंदू भक्तों के दर्शन-पूजन में बाधा न डालने को कहा। बाद के इलाहाबाद उच्च न्यायालय अभिलेख में यही राहत स्पष्ट दर्ज है।
यह स्वामित्व-अधिकार निर्णय नहीं था।
अदालत ने 1986 में जमीन का स्वामित्व तय नहीं किया।
उसने प्रवेश व्यवस्था बदली।
बहुत जल्दी।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अभिलेख के अनुसार अंतिम आदेश लगभग 4:15 बजे दिया गया और कुछ ही मिनटों के भीतर ताले खोल दिए गए।
यही प्रशासनिक तत्परता सबसे बड़े राजनीतिक प्रश्नों में से एक बनी।
जो व्यवस्था दशकों से चल रही थी—
वह कुछ मिनटों में बदल गई।
यह भी भारी विवाद का विषय बना।
मोहम्मद हाशिम ने 1 फरवरी को अपील में पक्षकार बनाए जाने का आवेदन दिया, लेकिन जिला न्यायाधीश ने उसे खारिज कर दिया।
2010 में न्यायमूर्ति एस. यू. खान ने 1986 की प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्न उठाए—उन्होंने बाद के निर्णय में अपील की पोषणीयता, वास्तविक पक्षों की अनुपस्थिति और मुस्लिम पक्ष को सुने बिना इतनी शीघ्रता से आदेश होने पर आलोचनात्मक टिप्पणी की।
इसलिए ताला खुलना केवल राजनीतिक विवाद नहीं, प्रक्रियागत विवाद भी था।
ताला खुलने के आदेश को चुनौती दी गई।
सर्वोच्च न्यायालय की 2019 कालक्रम के अनुसार इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 3 फरवरी 1986 को अंतरिम आदेश दिया कि संपत्ति की प्रकृति आगे बदली न जाए।
लेकिन तब तक मुख्य व्यावहारिक परिवर्तन हो चुका था—
आम हिंदू श्रद्धालुओं के लिए भीतर जाकर निकट दर्शन का मार्ग खुल गया था।
नहीं।
यह हमारे पूरे शोध की महत्वपूर्ण सुधार है।
पूजा 1949 के बाद से जारी थी।
पुजारी भीतर जाते थे।
रामलला वहीं थे।
1986 ने पूजा शुरू नहीं की।
उसने सामान्य भक्तों के लिए अधिक निकट और व्यापक प्रवेश खोला।
राजनीतिक “ताला खुला” संक्षिप्त संकेत वास्तविक प्रशासनिक परिवर्तन को सरल रूप में व्यक्त करता है।
इसका कोई सार्वजनिक, निर्णायक लिखित आदेश उपलब्ध नहीं है।
न्यायिक अभिलेख में तत्काल औपचारिक कर्त्ता हैं—
आवेदक,
जिला न्यायालय,
जिला मजिस्ट्रेट,
पुलिस अधीक्षक,
और प्रशासन।
इसलिए यह लिखना कि—
“राजीव गांधी ने न्यायाधीश को ताला खोलने का आदेश दिया”—
असमर्थित होगा।
लेकिन राजनीतिक स्तर पर केंद्र और राज्य सरकार की भूमिका का प्रश्न यहीं समाप्त नहीं होता।
उस समय—
केंद्र में राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार थी।
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह की कांग्रेस सरकार थी।
जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक ने अदालत में ताला खोलने पर कानून-व्यवस्था की समस्या न होने की बात कही।
और आदेश के मिनटों के भीतर प्रशासन ने ताले खोल दिए।
इसलिए कांग्रेस सरकार यह नहीं कह सकती कि पूरा घटनाक्रम उसके प्रशासन से असंबद्ध था।
लेकिन “प्रशासनिक सुविधा” और “प्रधानमंत्री's प्रत्यक्ष कमान” अलग-अलग दावे हैं।
राजीव गांधी के चचेरे भाई और उस समय प्रभावशाली मंत्री अरुण नेहरू का नाम ताला खुलने की राजनीतिक योजना से बार-बार जोड़ा गया।
मणिशंकर अय्यर ने बाद में लिखा कि कांग्रेस की आंतरिक जांच में अरुण नेहरू की भूमिका सामने आई और एम. एल. फोतेदार को दोषमुक्त माना गया; उनके अनुसार राजीव गांधी को पहले नहीं बताया गया था।
यह महत्वपूर्ण भीतरी जानकार विवरण है।
लेकिन यह कोई सार्वजनिक न्यायिक निष्कर्ष नहीं।
इसलिए इसे इसी रूप में लिखा जाना चाहिए—
अय्यर का दावा/आंतरिक कांग्रेस जाँच का उनका विवरण।
इसके विपरीत कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेता कमलनाथ ने 2023 में सार्वजनिक रूप से कहा—
राजीव गांधी के समय ताला खुला और इस ऐतिहासिक भूमिका को भूलना नहीं चाहिए।
भारतीय एक्सप्रेस भी कांग्रेस शासन के ताला खुलना को राजीव काल का ऐसा कदम बताता है जिसे पार्टी लंबे समय तक खुलकर दावा नहीं करती रही।
इसलिए कांग्रेस की अपनी स्मृति एकरूप नहीं है—
कुछ नेता राजीव को श्रेय देते हैं।
कुछ उन्हें निर्णय से अलग बताते हैं।
बूटा सिंह राजीव गांधी काल में महत्वपूर्ण केंद्रीय नेता और बाद में गृह मंत्री रहे; अयोध्या वार्ताओं में आगे उनकी भूमिका भी आई।
लेकिन 1 फरवरी 1986 के ताला खोलने के प्रत्यक्ष आदेश में उनकी व्यक्तिगत निर्णायक भूमिका को सिद्ध करने वाला उतना स्पष्ट प्राथमिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है जितना जिला न्यायाधीश, जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक के बारे में है।
इसलिए बूटा सिंह को बिना प्रमाण “ताला खुलना संचालन का controller” लिखना उचित नहीं होगा।
उत्तर प्रदेश की कांग्रेस सरकार इस प्रक्रिया से स्वाभाविक रूप से अधिक सीधे जुड़ी थी।
मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह की सरकार के प्रशासनिक अधिकारियों ने अदालत में कोई कानून-व्यवस्था आपत्ति नहीं किया।
बाद की राजनीतिक आलोचनाओं में उन पर pro-हिंदू रेखा अपनाने के आरोप लगे, जिन्हें उन्होंने नकारा। भारतीय एक्सप्रेस की अभिलेखीय पुनर्निर्माण इन आरोपों और उस समय की सांप्रदायिक राजनीति को दर्ज करती है।
यानी उत्तर प्रदेश सरकार की भूमिका को केंद्र से अलग भी देखना चाहिए।
लोकप्रिय इतिहास में अक्सर कहा जाता है कि ताला खुलते समय दूरदर्शन कैमरा पहले से मौजूद था और इससे सरकारी पूर्व-योजना सिद्ध होती है।
यह दावा कई बाद के संस्मरणों और विवरणों में मिलता है, लेकिन इसे केवल कैमरा उपस्थिति के आधार पर केंद्रीय षड्यंत्र का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।
मीडिया को बड़ी अदालत-संबंधी घटना की सूचना मिलना भी संभव था।
हमारे शोध में यदि इस पहलू को आगे विस्तार से लिया जाए तो समकालीन दूरदर्शन log/अभिलेखीय scheduling को प्राथमिक प्रमाण बनाना होगा।
फिलहाल इसे “पूर्व-योजना सिद्ध” करने वाले स्वतंत्र तथ्य की तरह नहीं रखना चाहिए।
भारतीय राजनीतिक इतिहास में सबसे प्रचलित व्याख्या यही है—
राजीव गांधी ने शाहबानो पर मुस्लिम रूढ़िवाद को रियायत दिया।
उससे हिंदू समाज में तीखी प्रतिक्रिया हुआ।
सरकार ने अयोध्या का ताला खुलवाकर उसका संतुलन किया।
भारतीय एक्सप्रेस की कई ऐतिहासिक reconstructions इसी व्याख्या को प्रस्तुत करती हैं।
लेकिन शोध में हमें इसमें तीन corrections जोड़नी होंगी।
जैसा ऊपर देखा—
ताला : 1 फरवरी।
विधेयक : 25 फरवरी।
अधिनियम : 19 मई।
इसलिए “कानून के बाद क्षतिपूर्ति” कालक्रम गलत है।
अरिफ मोहम्मद खान के अनुसार सरकार ने जनवरी तक फैसला बदलने का निर्णय कर लिया था।
इसलिए “संतुलन” प्रतिपाद्य कालक्रमिक रूप से असंभव नहीं है।
लेकिन यह राजनीतिक प्रतिभागी व्याख्या है।
यह भी गलत होगा कि “सरकार ने बस ताला खुलवा दिया, अदालत बहाना थी।”
एक वास्तविक अपील दायर हुई।
जिला न्यायाधीश ने आदेश दिया।
जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक ने कथन दिए।
बाद में उच्च न्यायालय में चुनौती हुआ।
अर्थात न्यायिक प्रक्रिया वास्तविक थी—यहाँ तक कि यदि उसकी गति और आसपास राजनीतिक संदर्भ विवादास्पद रहे।
सबसे मजबूत निर्धारण यह होगा—
1986 का ताला खुलना एक वास्तविक न्यायिक आदेश से हुआ, लेकिन उसकी असाधारण गति, प्रशासनिक सहमति और राजीव गांधी सरकार के शाहबानो-संबंधित राजनीतिक संकट के कारण यह व्यापक रूप से एक राजनीतिक संतुलन कदम के रूप में देखा गया। प्रधानमंत्री के सीधे आदेश का निर्णायक प्राथमिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
यही तथ्य और व्याख्या के बीच उचित सीमा है।
कांग्रेस अब दो बिल्कुल विपरीत दबावों में थी।
व्यक्तिगत कानून में हस्तक्षेप मत करो।
राम जन्मभूमि पर दशकों से अन्याय क्यों?
कांग्रेस दोनों निर्वाचन क्षेत्र को अपने व्यापक सामाजिक गठबंधन में रखना चाहती थी।
समस्या यह थी—
एक को दिया गया रियायत दूसरे के सामने राजनीतिक नजीर बन जाता।
1984 चुनाव में कांग्रेस को लोकसभा में ऐतिहासिक बहुमत मिला था।
सैद्धांतिक रूप से राजीव गांधी व्यक्तिगत-कानून सुधार पर दृढ़ रह सकते थे।
यही कारण है कि शाहबानो पीछे हटना की आलोचना अधिक तीखी हुई।
आलोचकों ने पूछा—
यदि इतनी बड़ी संसदीय बहुमत वाली सरकार भी धार्मिक दबाव के सामने पीछे हटेगी, तो सुधार कब होगा?
इससे राजीव की modernizer छवि को नुकसान पहुंचा।
अरिफ खान का इस्तीफा केवल व्यक्तिगत विद्रोह नहीं रहा।
वह एक वैकल्पिक मुस्लिम राजनीतिक आवाज का प्रतीक बना—
जो कहती थी कि मुस्लिम महिला अधिकार और इस्लाम परस्पर विरोधी नहीं हैं,
और राजनीतिक नेतृत्व को धर्मगुरु के दबाव पर समाज-सुधार नहीं रोकना चाहिए।
आगे भारतीय राजनीति में यह विवाद बार-बार लौटेगा।
भाजपा ने शाहबानो को अपने “छद्म-पंथनिरपेक्षता” तर्क का आदर्श उदाहरण बनाया।
उसकी राजनीतिक दलील थी—
कांग्रेस कानून और महिला अधिकार छोड़ सकती है यदि रूढ़िवादी अल्पसंख्यक नेतृत्व दबाव बनाए।
इसी के समानांतर अयोध्या में हिंदू दावा दशकों से लंबित है।
यह तुलना भाजपा की नई राजनीतिक भाषा में अत्यंत प्रभावशाली हुआ।
यदि कांग्रेस केवल “मुस्लिम तुष्टीकरण” कर रही थी, तो उसी सरकार के समय रामलला के ताले क्यों खुले?
यहीं भाजपा की आलोचना ने नया रूप लिया—
कांग्रेस सुसंगत पंथनिरपेक्ष नीति नहीं चला रही।
वह दोनों समुदायों के साथ मतदाता-समूह संतुलन कर रही है।
यानी आरोप “एकतरफा तुष्टीकरण” से आगे बढ़कर “सिद्धांत-less सांप्रदायिक संतुलन” बन गया।
इस पर मतभेद हो सकते हैं।
लेकिन व्यापक इतिहासलेखन में आलोचना यह है कि उसने दोनों प्रश्नों को संवैधानिक सिद्धांत के आधार पर स्थिर नीति से संभालने के बजाय तात्कालिक रणनीतिक राजनीतिक प्रबंधन से संभालने का आभास दिया।
शाहबानो पर—
पहले समर्थन, फिर वापसी।
अयोध्या पर—
दशकों का यथास्थिति, फिर एक दिन में जन प्रवेश का विस्तार।
इससे दोनों समुदायों में भरोसा मजबूत होने के बजाय संदेह बढ़ा।
मुस्लिम पक्ष के लिए 1 फरवरी 1986 बड़ी चोट थी।
उनका स्वामित्व वाद 1961 से लंबित था।
1949 के बाद वे नमाज से वंचित थे।
अब बिना स्वामित्व-अधिकार निर्धारण के हिंदू जन प्रवेश और व्यापक हो गया।
इससे मुस्लिम लामबंदी तेज होना लगभग निश्चित था।
अगले ही दिन की प्रतिक्रिया अत्यंत महत्वपूर्ण रही।
भारतीय एक्सप्रेस के अनुसार 2 फरवरी 1986 को लखनऊ के Latouche Road पर उत्तर प्रदेश के प्रमुख मुस्लिम नेताओं की बैठक हुई और बाबरी मस्जिद कार्य समिति (बाबरी मस्जिद कार्य समिति) का गठन किया गया। जफरयाब जिलानी और आजम खान convenors बने तथा पूर्व कांग्रेस सांसद सैयद मुजफ्फर हुसैन अध्यक्ष बने।
यानी ताला खुलना ने केवल हिंदू आंदोलन को उत्साहित नहीं किया।
उसने मुस्लिम प्रतिलामबंदी को भी संस्थागत रूप दे दिया।
1 फरवरी से पहले—
विश्व हिंदू परिषद सड़क पर सक्रिय थी,
मुस्लिम पक्ष मुख्यतः अदालत में।
2 फरवरी के बाद—
दोनों समुदायों के संगठित सार्वजनिक मंच मौजूद थे।
अब अयोध्या विवाद में symmetry आ गई—
हिंदू व्यापक जनलामबंदी बनाम मुस्लिम प्रतिलामबंदी।
यही स्थिति आगे समझौते को कहीं कठिन बनाएगी।
यहां एक रोचक राजनीतिक दोहराव था।
एक ओर मुस्लिम व्यक्तिगत कानून बोर्ड शाहबानो पर धार्मिक स्वायत्तता की रक्षा कर रहा था।
दूसरी ओर बाबरी मस्जिद कार्य समिति मस्जिद और स्वामित्व-अधिकार की रक्षा के लिए बनी।
दोनों संस्थाएं अलग मुद्दों से बनी थीं।
लेकिन 1986 का राजनीतिक वातावरण उन्हें व्यापक “मुस्लिम पहचान राजनीति” की सार्वजनिक छवि में जोड़ने लगा।
यह भी ध्रुवीकरण को बढ़ाने वाला कारक था।
विश्व हिंदू परिषद और संत नेतृत्व इसे बड़ी सफलता मान सकते थे।
1984 से मांग थी—
ताला खोलो।
1986 में ताला खुल गया।
इससे आंदोलनकारियों को यह मनोवैज्ञानिक संदेश मिला—
जनजागरण का परिणाम मिलता है।
अब अगली मांग छोटी नहीं हो सकती थी।
अब लक्ष्य था—
भव्य राम मंदिर।
1984–85:
“ताला खोलो।”
1986 के बाद:
“मंदिर बनाओ।”
यानी 1 फरवरी 1986 ने आंदोलन उद्देश्य को upgrade कर दिया।
प्रवेश की लड़ाई समाप्त हुई।
अब संरचना और भूमि नियंत्रण की लड़ाई अधिक केंद्रीय बनी।
विश्व हिंदू परिषद के लिए यह धार्मिक विजय थी।
भाजपा के लिए यह राजनीतिक अवसर।
शाहबानो ने उसे कांग्रेस पर अल्पसंख्यक तुष्टीकरण का हमला दिया।
अयोध्या ने बहुमत धार्मिक भावना का मुद्दा दिया।
दोनों घटनाओं का संयोजन भारतीय जनता पार्टी के वैचारिक पुनर्संयोजन के लिए अनुकूल था।
आडवाणी उसी वर्ष पार्टी अध्यक्ष बने।
नहीं।
उस समय केंद्र और उत्तर प्रदेश दोनों जगह कांग्रेस शासन था।
न्यायिक आदेश स्थानीय न्यायालय से आया।
इसलिए भारतीय जनता पार्टी को इस घटना का प्रशासनिक श्रेय देना तथ्यतः गलत होगा।
उसका राजनीतिक लाभ बाद में आया।
व्यापक ऐतिहासिक व्याख्या यही संकेत करती है।
ताला खुलना विश्व हिंदू परिषद की प्रमुख तत्काल मांग थी।
एक बार वह पूरी हो गई, आंदोलन का नैतिक विश्वास और दृश्यता बढ़ी।
भारतीय एक्सप्रेस का पश्चदृष्टि विश्लेषण भी ताला खुलना को वह घटना मानता है जिसके बाद संघ/विश्व हिंदू परिषद ने व्यापक जन-awakening अभियान तेज किया।
इसलिए कांग्रेस का तात्कालिक रणनीतिक कदम, यदि ऐसा था, दीर्घकाल में उसके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के लिए अधिक उपयोगी सिद्ध हुआ।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एस. यू. खान ने 2010 में 1 फरवरी 1986 की घटना पर पीछे मुड़कर अत्यंत कठोर टिप्पणी की।
उन्होंने कहा कि ताला खुलने ने विवाद को राष्ट्रीय—बल्कि अंतरराष्ट्रीय—स्तर पर पहुंचा दिया और एक श्रृंखला प्रतिक्रिया शुरू की जो 6 दिसंबर 1992 तक गई।
यह अंतिम आपराधिक-कारण-संबंध निष्कर्ष नहीं है।
लेकिन एक वरिष्ठ न्यायाधीश का पश्चदृष्टि ऐतिहासिक मूल्यांकन है कि 1986 एक निर्णायक निर्णायक बिंदु था।
इतिहास में ऐसा निश्चित वैकल्पिक-कल्पना सिद्ध नहीं किया जा सकता।
अयोध्या आंदोलन पहले से चल रहा था।
लेकिन इतना कहना उचित है—
ताला खुलने ने व्यापक जनलामबंदी की बाधा तोड़ी,
मुस्लिम प्रतिलामबंदी तेज की,
मीडिया दृश्यता बढ़ाई,
और कांग्रेस–भारतीय जनता पार्टी–विश्व हिंदू परिषद–मुस्लिम नेतृत्व सभी को खुली राजनीतिक विवाद में ला दिया।
इस अर्थ में 1986 ने तीव्रता की गति नाटकीय रूप से बढ़ाई।
शाहबानो के बाद कई आधुनिकतावादी, महिला अधिकार समर्थक और पंथनिरपेक्ष उदारवादी कांग्रेस से निराश हुए।
अयोध्या ताला खुलना के बाद मुस्लिम नेतृत्व के भीतर कांग्रेस के प्रति अविश्वास बढ़ा।
दूसरी ओर हिंदू राष्ट्रवादी निर्वाचन क्षेत्र का स्थायी राजनीतिक प्रतिनिधित्व कांग्रेस नहीं, धीरे-धीरे भारतीय जनता पार्टी बनने लगी।
अर्थात तात्कालिक रणनीतिक संतुलन ने कांग्रेस को दोनों निर्वाचन क्षेत्र पर स्थायी नियंत्रण नहीं दिया।
यहां हमें अत्यंत साफ निष्कर्ष रखना चाहिए।
तीन स्तर हैं—
राजीव प्रधानमंत्री थे; कांग्रेस केंद्र और उत्तर प्रदेश दोनों में सत्ता में थी; ताला न्यायिक आदेश और प्रशासनिक क्रियान्वयन से खुला।
शाह बानो तीखी प्रतिक्रिया के संदर्भ में हिंदू संतुलन की कोशिश हुई।
राजीव गांधी ने व्यक्तिगत रूप से पहले से आदेश देकर पूरी ताला खुलना प्रक्रिया संचालित कराई।
इस तीसरे दावे पर स्रोत विभाजित हैं।
मणिशंकर अय्यर का संस्करण है—
अरुण नेहरू ने उत्तर प्रदेश कांग्रेस/प्रशासन में अपना प्रभाव इस्तेमाल किया;
राजीव को पहले नहीं बताया;
बाद की आंतरिक जाँच में वही जिम्मेदार पाए गए।
यदि यह संस्करण सही है, तो ताला खुलना प्रधानमंत्री की पूर्व-स्वीकृत संतुलन नहीं, बल्कि उनके शक्तिशाली सहयोगी द्वारा पैदा घटित तथ्य पूर्ण थी।
लेकिन इस आंतरिक जाँच की पूरी मूल रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से हमारे सामने नहीं है।
इसलिए इसे अंतिम स्थापित तथ्य नहीं कहा जा सकता।
कमलनाथ का संस्करण कहीं सरल है—
राजीव के समय ताला खुला और उन्हें उसका श्रेय मिलना चाहिए।
यह कांग्रेस की एक दूसरी स्मृति है।
दिलचस्प यह है कि वही घटना, जिसे लंबे समय कांग्रेस असहज विरासत मानती रही, बाद के मंदिर-राजनीतिक दौर में कुछ नेता उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करने लगे।
इतिहास की राजनीतिक स्मृति भी समय के साथ बदलती है।
हमारे अंतिम शोध अध्याय में बेहतर वाक्य होगा—
“1 फरवरी 1986 को फैजाबाद जिला न्यायाधीश के आदेश से ताले खोले गए। कांग्रेस की केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकारों की प्रशासनिक भूमिका तथा तत्काल क्रियान्वयन निर्विवाद है, लेकिन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के प्रत्यक्ष पूर्व-निर्देश पर राजनीतिक स्रोत परस्पर विरोधी हैं।”
यह निर्धारण राजनीतिक संदर्भ को छिपाता नहीं और प्रमाण से आगे भी नहीं जाता।
यह न लिखें—
“राजीव ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला खत्म कर दिया।”
अधिक सटीक—
“राजीव सरकार ने 1986 में अलग कानून बनाकर शाहबानो निर्णय के तहत धारा 125 के सीधे आवेदन को बदलने की कोशिश की।”
क्योंकि बाद की दानियाल लतीफी व्याख्या ने 1986 अधिनियम को व्यापक महिला आर्थिक सुरक्षा की दिशा में पढ़ा।
ऐतिहासिक राजनीति और वर्तमान विधिक अर्थ को अलग रखना चाहिए।
एक ही सरकार कुछ महीनों में दो विपरीत संदेश देती दिखाई दी।
मुस्लिम धर्मगुरु को—
व्यक्तिगत कानून की स्वायत्तता।
हिंदू आंदोलन को—
रामलला तक व्यापक प्रवेश।
समर्थक इसे responsive democratic समायोजन कह सकते हैं।
आलोचक इसे सांप्रदायिक संतुलन।
यही अस्पष्टता राजीव गांधी काल की धार्मिक राजनीति की केंद्रीय विशेषता बन गई।
सैद्धांतिक रूप से था—
शाहबानो पर संवैधानिक सिद्धांत पर टिके रहना,
अयोध्या को transparent विधिक प्रक्रिया से चलाना,
और दोनों मामलों को मतदाता-समूह दृष्टि से अलग रखना।
लेकिन वास्तविक राजनीति में धार्मिक दबाव बहुत तीखा था।
विशाल संसदीय बहुमत होने के बावजूद कांग्रेस इस दबाव संरचना से बच नहीं सकी।
यही इस प्रकरण का बड़ा राजनीतिक पाठ है।
शाहबानो बहस की विडंबना यह थी कि सबसे मूल प्रश्न—
एक वृद्ध, तलाकशुदा महिला का आर्थिक अधिकार—
जल्दी ही पीछे चला गया।
मुख्य बहस बन गई—
इस्लाम खतरे में है या नहीं,
समान नागरिक संहिता,
कांग्रेस का मुस्लिम वोट,
हिंदू प्रतिक्रिया।
यानी महिला अधिकार सांप्रदायिक पहचान राजनीति के बीच दब गए।
यह भी 1985–86 के संकट का एक महत्वपूर्ण सामाजिक निष्कर्ष है।
इसी प्रकार अयोध्या में वास्तविक दीवानी प्रश्न था—
भूमि स्वामित्व-अधिकार किसका है?
लेकिन 1986 के बाद जन बहस होने लगी—
ताला,
हिंदू अस्मिता,
मस्जिद रक्षा,
कांग्रेस की भूमिका।
इस तरह दोनों मामलों में जटिल कानून पीछे और पहचान राजनीति आगे आ गई।
यही दोनों घटनाओं का गहरा संरचनात्मक similarity है।
शाहबानो में प्रश्न था—
कानून बनाम धार्मिक समुदाय की पहचान।
अयोध्या में प्रश्न बना—
कानूनी स्वामित्व-अधिकार बनाम धार्मिक आस्था की व्यापक जनलामबंदी।
कांग्रेस दोनों जगह कानून और समुदाय राजनीति के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही थी।
और दोनों में उसकी नीति विवादित रही।
इसी स्थिति ने भाजपा को एक सरल आख्यान दिया—
एक देश, एक कानून, समान नागरिकता; और हिंदू धार्मिक मांग को भी समान सम्मान।
वास्तविक नीतिगत जटिलताएं इससे बड़ी थीं, लेकिन चुनावी संदेश अत्यंत प्रभावी था।
यही वह समय है जब “सकारात्मक पंथनिरपेक्षता” और “न्याय for all, तुष्टीकरण का कोई नहीं” जैसी भारतीय जनता पार्टी राजनीति का सामाजिक आधार बढ़ने लगा।
विश्व हिंदू परिषद कह सकती थी—
हमने ताला खोलने की मांग उठाई,
ताला खुल गया,
अब मंदिर की बारी है।
इससे आंदोलन की विश्वसनीयता बढ़ी।
1986 के बाद विश्व हिंदू परिषद को जनता को convince नहीं करना था कि अयोध्या बदल सकती है—
उसने परिवर्तन होते देख लिया था।
बाबरी मस्जिद कार्य समिति बनने के बाद मुस्लिम पक्ष भी सड़क राजनीति में संगठित हुआ।
अब सभाएँ,
विरोध-प्रदर्शन,
बैठकें,
और राष्ट्रीय मुस्लिम नेतृत्व—
अयोध्या पर सक्रिय हो सकते थे।
यह पारस्परिक लामबंदी आगे सांप्रदायिक तनाव का बड़ा स्रोत बनी।
1986 का ताला खुलना सीधे कई अगले अध्यायों की भूमिका बनता है—
बाबरी मस्जिद कार्य समिति का गठन।
1986–88 विश्व हिंदू परिषद विस्तार।
रामशिला अभियान।
1989 शिलान्यास।
भारतीय जनता पार्टी पालमपुर।
1990 रथयात्रा।
अर्थात यह केवल एक ताला का प्रशासनिक परिवर्तन नहीं था।
यह आंदोलन वास्तुकला का निर्णायक reset था।
23 अप्रैल 1985 — सुप्रीम कोर्ट का शाहबानो फैसला; धारा 125 की सुरक्षा मुस्लिम तलाकशुदा महिला तक लागू मानी गई।
1985 — मुस्लिम व्यक्तिगत कानून और दंड प्रक्रिया संहिता संशोधन पर संसद में विरोध और private-member विधायी initiatives।
दिसंबर 1985 — ताला खोलने का विश्व हिंदू परिषद–बजरंग दल अभियान तीखा।
जनवरी 1986 — अरिफ मोहम्मद खान के बाद के दावे के अनुसार सरकार शाहबानो निर्णय को बदलने की नीति पर आगे बढ़ चुकी थी।
25 जनवरी 1986 — अयोध्या में ताले खुलवाकर जन दर्शन की मांग वाला आवेदन।
31 जनवरी — जिला न्यायालय में अपील।
1 फरवरी 1986 — फैजाबाद जिला न्यायाधीश का ताले खोलने का आदेश; जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक ने कानून-व्यवस्था समस्या न होने की बात कही; कुछ ही मिनटों में ताले खुले।
2 फरवरी — लखनऊ में बाबरी मस्जिद कार्य समिति का गठन।
3 फरवरी — इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने संपत्ति की प्रकृति न बदलने का अंतरिम आदेश दिया।
21 फरवरी — संसद में मुस्लिम महिलाएँ विधेयक से संबंधित बहस/submissions दर्ज।
25 फरवरी 1986 — मुस्लिम महिलाएँ (संरक्षण का अधिकार पर तलाक) विधेयक लोकसभा में पेश।
5 मई — लोकसभा में विस्तृत विचार।
8 मई — राज्यसभा में विधेयक पर विचार और पारित करने की बहस।
19 मई 1986 — अधिनियम संख्या 25 का 1986 लागू।
कालक्रमगत रूप से गलत। ताला 1 फरवरी को खुला; विधेयक 25 फरवरी को पेश और अधिनियम 19 मई को बना।
इतना निश्चित भी नहीं कहा जा सकता। अरिफ मोहम्मद खान सहित अनेक राजनीतिक प्रतिभागियों ने स्पष्ट संतुलन व्याख्या दी।
सार्वजनिक प्राथमिक प्रमाण से सिद्ध नहीं।
अधूरा। कांग्रेस-शासित प्रशासन के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक ने reopening पर कानून-व्यवस्था आपत्ति नहीं किया और आदेश तुरंत लागू हुआ।
गलत। पूजा 1949 से जारी थी; 1986 ने जन प्रवेश व्यापक किया।
गलत। मुख्य प्रश्न दंड प्रक्रिया संहिता धारा 125 के सामाजिक-सुरक्षा दायित्व का था।
गलत। मुस्लिम समाज के भीतर भी स्पष्ट मतभेद थे; अरिफ मोहम्मद खान इसका प्रमुख उदाहरण थे।
प्रश्न — शाहबानो — अयोध्या
मूल कानूनी प्रश्न — तलाकशुदा महिला का रखरखाव — धार्मिक स्थल का प्रवेश/स्वामित्व-अधिकार
प्रमुख न्यायिक घटना — SC निर्णय, 23 अप्रैल 1985 — जिला न्यायाधीश आदेश, 1 फरवरी 1986
दबाव किस ओर से — मुस्लिम व्यक्तिगत-कानून नेतृत्व — विश्व हिंदू परिषद-संत हिंदू आंदोलन
कांग्रेस की प्रतिक्रिया — अलग 1986 कानून — ताला खुलना आदेश का तत्काल प्रशासनिक क्रियान्वयन
विरोधी आरोप — मुस्लिम तुष्टीकरण — हिंदू संतुलन / तुष्टीकरण
भारतीय जनता पार्टी को लाभ — छद्म-पंथनिरपेक्षता तर्क — राम मंदिर निर्वाचन क्षेत्र
सामाजिक परिणाम — व्यक्तिगत कानून ध्रुवीकरण — हिंदू-मुस्लिम व्यापक जन प्रतिलामबंदी
शाहबानो और अयोध्या को यांत्रिक रूप से एक deal के दो हिस्से मानना उतना ही गलत है जितना उन्हें पूरी तरह असंबद्ध मानना।
कानूनी रूप से वे अलग घटनाएं थीं।
शाहबानो सर्वोच्च न्यायालय और संसद के बीच व्यक्तिगत-कानून/सामाजिक न्याय का प्रश्न था।
अयोध्या जिला न्यायालय और धार्मिक स्थल के जन प्रवेश का प्रश्न।
लेकिन राजनीतिक रूप से दोनों 1986 में एक ही संकट में मिल गईं—
कांग्रेस अलग-अलग धार्मिक निर्वाचन क्षेत्र को कैसे संभाले?
और यहीं राजीव गांधी सरकार की सबसे बड़ी समस्या बनी।
सरकार ने शाहबानो पर अपनी शुरुआती reformist स्थिति बदली।
उसी राजनीतिक तनाव के बीच अयोध्या का ताला असाधारण तेजी से खुला।
इससे यह धारणा जड़ पकड़ गई कि कांग्रेस संवैधानिक सिद्धांत के बजाय सांप्रदायिक संतुलन कर रही है।
इस धारणा को भाजपा और विश्व हिंदू परिषद ने अत्यंत प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया।
1985 में शाहबानो का मुकदमा एक महिला के रखरखाव से शुरू हुआ था।
1986 आते-आते वह भारतीय धर्मनिरपेक्षता की परीक्षा बन चुका था।
अयोध्या का ताला मूलतः दशकों पुरानी प्रवेश व्यवस्था का प्रश्न था।
लेकिन 1 फरवरी 1986 के बाद वह राष्ट्रीय धार्मिक लामबंदी का विस्फोटक प्रतीक बन गया।
राजीव गांधी सरकार इन दोनों मामलों के बीच फंस गई।
यदि वह शाहबानो फैसले पर कायम रहती तो मुस्लिम धार्मिक नेतृत्व से टकराव होता।
वह पीछे हटी तो “तुष्टीकरण” का आरोप लगा।
यदि अयोध्या का यथास्थिति रखती तो विश्व हिंदू परिषद का हिंदू लामबंदी बढ़ता।
ताला खुला तो मुस्लिम समुदाय में यह संदेश गया कि सरकार दूसरे समुदाय के दबाव के सामने भी राजनीतिक रियायत दे रही है।
परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस की दोनों दिशाओं में विश्वास-संकट बढ़ा।
सबसे महत्वपूर्ण कालक्रम भी स्मरण रखनी होगी—
1 फरवरी का ताला, 25 फरवरी का विधेयक और 19 मई का अधिनियम।
इसलिए “शाहबानो कानून के बाद ताला खोलकर भरपाई” एक सुविधाजनक राजनीतिक संक्षिप्त संकेत है, पूर्ण इतिहास नहीं। अधिक सटीक निष्कर्ष है कि शाहबानो पर सरकार के पहले से चल रहे नीति उलटाव और राजनीतिक तीखी प्रतिक्रिया के बीच अयोध्या ताला खुलना हुआ और तत्काल ही उसे संतुलन राजनीति के रूप में पढ़ा गया।
और ताला खुलना का सबसे सीधा परिणाम अगले ही दिन सामने आया—
मुस्लिम पक्ष भी अब केवल अदालत में रहने वाला नहीं था।
बाबरी मस्जिद कार्य समिति बन चुकी थी।
दोनों ओर व्यापक जनलामबंदी तैयार थी।
अब अयोध्या विवाद एक नए और कहीं अधिक टकरावपूर्ण चरण में प्रवेश करता है।
उसमें हम केवल ताला खुलना पर केंद्रित होकर 25 जनवरी के आवेदन से 1 फरवरी की सुनवाई तक, आवेदक उमेश चंद्र पांडेय, निचली अदालत की प्रक्रिया, Misc. अपील संख्या 8/1986, जिला न्यायाधीश K. M. पांडेय, मोहम्मद हाशिम की पक्षकार बनाए जाने आवेदन, जिलाधिकारी–पुलिस अधीक्षक के बयान, 4:15 बजे के आदेश, मिनटों में ताला खुलने, उच्च न्यायालय चुनौती और प्रशासनिक/राजनीतिक विवाद की घंटे-दर-घंटे तथा दस्तावेज-दर-दस्तावेज जांच करेंगे।