1984 चुनाव के बाद भाजपा का वैचारिक पुनर्संयोजन : गांधीवादी समाजवाद से राम जन्मभूमि तक
संगठित जनांदोलन का उदय
राम जन्मभूमि आंदोलन के आधुनिक राजनीतिक इतिहास में 1984 से 1989 का काल निर्णायक है। 1984 तक विश्व हिंदू परिषद और संत समाज अयोध्या को राष्ट्रीय धार्मिक मुद्दे के रूप में पुनर्संगठित कर चुके थे, लेकिन भारतीय जनता पार्टी अभी इस आंदोलन की केंद्रीय राजनीतिक वाहक नहीं बनी थी। उसकी वैचारिक भाषा में “गांधीवादी समाजवाद”, सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता और मूल्य-आधारित राजनीति प्रमुख थे। 1984 के लोकसभा चुनाव में केवल दो सीटों पर सिमट जाने के बाद पार्टी के भीतर यह प्रश्न तीखा हुआ कि क्या उसका वर्तमान राजनीतिक स्वरूप पर्याप्त विशिष्ट और प्रभावी है।
अगले पांच वर्षों में भाजपा ने अचानक अपनी पुरानी भाषा पूरी तरह नहीं छोड़ी; बल्कि उसने दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, “सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता” और राम जन्मभूमि को अधिक स्पष्ट राजनीतिक पहचान के रूप में सामने लाना शुरू किया। 1986 में लालकृष्ण आडवाणी के अध्यक्ष बनने और जून 1989 के पालमपुर प्रस्ताव तक पहुंचते-पहुंचते यह पुनर्संयोजन स्पष्ट हो चुका था। स्वयं भाजपा के बाद के आधिकारिक दस्तावेज पालमपुर बैठक को वह बिंदु मानते हैं जहां पार्टी ने पहली बार औपचारिक राष्ट्रीय कार्यकारिणी प्रस्ताव के माध्यम से राम जन्मभूमि पर स्पष्ट समर्थन दिया।
भारतीय जनता पार्टी की स्थापना 6 अप्रैल 1980 को जनता पार्टी के विघटन के बाद हुई। उसके पीछे भारतीय जनसंघ की संगठनात्मक परंपरा थी, लेकिन नई पार्टी ने प्रारंभ में अपने आपको केवल पुराने जनसंघ की पुनरावृत्ति के रूप में प्रस्तुत नहीं किया।
अटल बिहारी वाजपेयी उसके पहले अध्यक्ष बने।
पार्टी ने ऐसी राजनीतिक भाषा अपनाई जिसमें—
राष्ट्रीयता,
लोकतंत्र,
गांधीवादी समाजवाद,
सर्वधर्म समभाव,
और मूल्य-आधारित राजनीति—
को एक साथ रखा गया।
भाजपा के अपने दस्तावेज इन “पांच प्रतिबद्धताओं” को प्रारंभिक पार्टी दर्शन का हिस्सा बताते हैं।
इसे कांग्रेस या मार्क्सवादी समाजवाद की प्रतिलिपि समझना गलत होगा।
भाजपा की शुरुआती व्याख्या में गांधीवादी समाजवाद का संबंध था—
विकेंद्रीकरण,
आर्थिक शक्ति के अत्यधिक केंद्रीकरण का विरोध,
ट्रस्टीशिप,
गरीबों के लिए सामाजिक न्याय,
और पूंजीवाद तथा साम्यवाद दोनों से अलग “तीसरे मार्ग” की खोज।
अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़े भाजपा अभिलेख इसे राज्य-एकाधिकार और निजी आर्थिक एकाधिकार—दोनों से दूरी रखने वाले विकेंद्रीकृत आर्थिक दृष्टिकोण के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
इसलिए 1980 की भाजपा को केवल “मंदिर पार्टी” के रूप में पढ़ना इतिहास को उलट देना होगा।
पार्टी ने अपने पांच मूल संकल्पों में सकारात्मक पंथनिरपेक्षता—सर्व धर्म Sambhava को भी शामिल किया था।
यह बाद के “छद्म धर्मनिरपेक्षता” विरोधी अभियान को समझने में महत्वपूर्ण है।
भाजपा स्वयं को धर्मनिरपेक्षता-विरोधी कहकर प्रस्तुत नहीं कर रही थी।
उसका दावा था कि—
राज्य सभी धर्मों से समान व्यवहार करे,
लेकिन अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के नाम पर अलग राजनीतिक मानदंड न अपनाए।
आगे शाहबानो और अयोध्या के प्रश्न ने इसी वैचारिक अंतर को अधिक आक्रामक राजनीतिक भाषा दी।
यह इस अध्याय की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक बात है।
1984 की धर्म संसद हो चुकी थी।
राम-जानकी यात्रा शुरू हो चुकी थी।
बजरंग दल का गठन हो चुका था।
फिर भी भाजपा का 1984 चुनाव घोषणापत्र राम जन्मभूमि को उस केंद्रीय रूप में नहीं रखता जो बाद में 1989–91 में दिखाई देता है। भाजपा केंद्रीय पुस्तकालय में 1984 का घोषणापत्र उपलब्ध है, जिससे पार्टी की उस समय की प्राथमिकताओं और भाषा का अलग अध्ययन संभव है।
अर्थात—
धार्मिक आंदोलन भाजपा से आगे चल रहा था।
1984 का चुनाव सामान्य राजनीतिक वातावरण में नहीं हुआ।
31 अक्टूबर को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हुई।
उसके बाद देश में तीव्र शोक और सहानुभूति की लहर बनी।
राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को असाधारण चुनावी समर्थन मिला।
इसलिए भाजपा की दो सीटों को केवल उसकी वैचारिक नीति पर जनमत-संग्रह मान लेना भी अनुचित होगा।
चुनाव असाधारण राष्ट्रीय परिस्थिति में हुआ था।
1984 में भाजपा ने केवल दो लोकसभा सीटें जीतीं—
हनमकोंडा, आंध्र प्रदेश — चंदूपतला जंगा रेड्डी।
मेहसाणा, गुजरात — डॉ. ए. के. पटेल।
भारतीय एक्सप्रेस की चुनावी पुनर्रचना इन दोनों सीटों और भाजपा की अत्यंत सीमित सफलता को स्पष्ट रूप से दर्ज करती है।
यह पार्टी के लिए मनोवैज्ञानिक आघात था।
अटल बिहारी वाजपेयी ग्वालियर में कांग्रेस के माधवराव सिंधिया से हार गए।
यह हार प्रतीकात्मक रूप से और बड़ी थी।
पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वयं संसद नहीं पहुंच सका।
इसलिए 1984 के बाद भाजपा के भीतर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक था—
हमारी राजनीतिक पहचान क्या है?
हम कांग्रेस से कैसे अलग हैं?
हमारे प्राकृतिक समर्थक हमें क्यों नहीं चुन रहे?
नहीं।
यह एक लोकप्रिय राजनीतिक व्याख्या है, लेकिन अत्यधिक सरल है।
1984 की भाजपा की पराजय में—
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति लहर,
कांग्रेस का विशाल राष्ट्रीय प्रभुत्व,
भाजपा की नई संगठनात्मक पहचान,
जनता पार्टी विघटन के बाद विपक्ष का बिखराव,
और पार्टी की अस्पष्ट स्वतंत्र पहचान—
सभी कारक थे।
लेकिन पार्टी के भीतर वैचारिक समीक्षा में “गांधीवादी समाजवाद” की अस्पष्टता वास्तविक प्रश्न बनी। बाद के भाजपा दस्तावेज और पार्टी-समर्थक विश्लेषण दोनों बताते हैं कि 1984 की पराजय ने वैचारिक दिशा की समीक्षा को तेज किया।
यदि कांग्रेस भी—
समाजवाद,
धर्मनिरपेक्षता,
गरीबी हटाने,
और लोकतंत्र—
की भाषा बोल रही थी, तो भाजपा मतदाता को अपने लिए क्या विशिष्ट कारण दे रही थी?
जनसंघ की स्पष्ट सांस्कृतिक-राष्ट्रीय पहचान को नई भाजपा ने कुछ नरम कर दिया था।
कुछ कार्यकर्ताओं के लिए यह राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ाने का प्रयास था।
लेकिन दूसरे कार्यकर्ताओं को लगा कि इससे पार्टी की मूल पहचान धुंधली हो गई।
यही अंतर्विरोध 1984 के बाद खुलकर सामने आया।
भाजपा के कई कार्यकर्ताओं की राजनीतिक-सामाजिक प्रशिक्षण पृष्ठभूमि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जनसंघ से थी।
उनकी वैचारिक शब्दावली थी—
राष्ट्र,
संस्कृति,
राष्ट्रीय एकता,
एकात्म मानववाद।
“गांधीवादी समाजवाद” का प्रयोग सभी कार्यकर्ताओं को समान रूप से स्वाभाविक नहीं लगा। भारतीय एक्सप्रेस के एक हालिया ऐतिहासिक विश्लेषण ने भी इसे उस समय पार्टी कार्यकर्ता-तंत्र के लिए वैचारिक असहजता का स्रोत बताया है।
इसलिए 1984 के बाद प्रश्न केवल चुनावी रणनीति का नहीं, वैचारिक coherence का था।
1985 की भाजपा राष्ट्रीय परिषद का निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण है।
11 अक्टूबर 1985, गांधीनगर में राष्ट्रीय परिषद ने स्पष्ट रूप से प्रस्ताव पारित किया कि—
दीनदयाल उपाध्याय का “एकात्म मानववाद” पार्टी का मूल दर्शन होगा।
साथ ही पार्टी ने अपनी पांच प्रतिबद्धताएं भी दोहराईं—
राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय एकीकरण,
लोकतंत्र,
गांधीवादी समाजवाद,
सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता,
मूल्य-आधारित राजनीति।
यह तथ्य एक बड़ी गलतफहमी दूर करता है।
अक्सर कहा जाता है—
“1984 हारते ही भाजपा ने गांधीवादी समाजवाद फेंक दिया और हिंदुत्व अपना लिया।”
यह बहुत सरल आख्यान है।
1985 के आधिकारिक पार्टी प्रस्ताव में गांधीवादी समाजवाद अभी भी पांच प्रतिबद्धताएँ में मौजूद था।
परिवर्तन यह था कि—
एकात्म मानववाद को स्पष्ट मूल दर्शन बनाया गया।
यानी पार्टी ने अपनी वैचारिक वंशक्रम को फिर जनसंघ–दीनदयाल परंपरा से अधिक स्पष्ट रूप से जोड़ा।
एकात्म मानववाद की वापसी का अर्थ था—
भारतीय सांस्कृतिक परंपरा को राजनीतिक दर्शन का आधार,
पश्चिमी पूंजीवाद और मार्क्सवाद दोनों से दूरी,
समाज को मात्र आर्थिक वर्गों में न देखना,
और राष्ट्रीय संस्कृति को राजनीतिक पहचान का हिस्सा मानना।
इससे भाजपा की भाषा फिर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की दिशा में अधिक स्पष्ट होने लगी।
अयोध्या जैसे प्रश्न के साथ यही भाषा अधिक स्वाभाविक रूप से जुड़ सकती थी।
1986 में लालकृष्ण आडवाणी भाजपा के अध्यक्ष बने।
इसे पार्टी के वैचारिक पुनर्संयोजन का महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत माना जाता है। भारतीय एक्सप्रेस के ऐतिहासिक विश्लेषण में भी 1986 में आडवाणी के अध्यक्ष बनने को पार्टी को अधिक स्पष्ट वैचारिक दिशा देने वाले परिवर्तन के रूप में रेखांकित किया गया है।
वाजपेयी और आडवाणी दोनों जनसंघ से आए थे।
लेकिन उनकी सार्वजनिक राजनीतिक शैली अलग थी।
लोकप्रिय पत्रकारिता में अक्सर ऐसा किया गया।
वास्तविकता अधिक जटिल थी।
दोनों—
जनसंघ,
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैचारिक दुनिया,
दीनदयाल उपाध्याय,
राष्ट्रीय एकता—
से जुड़े थे।
अंतर मुख्यतः राजनीतिक शैली, प्राथमिकताओं और लामबंदी की भाषा में था।
वाजपेयी व्यापक गठबंधन और संसदीय स्वीकार्यता पर अधिक बल देते दिखाई देते थे।
आडवाणी पार्टी की विशिष्ट वैचारिक पहचान को अधिक स्पष्ट रूप से सामने लाने के पक्षधर बने।
1 फरवरी 1986 को फैजाबाद जिला न्यायाधीश के आदेश से अयोध्या में ताला खुला।
यह भाजपा के लिए एक नया राजनीतिक अवसर भी था।
अब अयोध्या—
केवल विश्व हिंदू परिषद का अभियान नहीं,
राष्ट्रीय शीर्षक,
हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक प्रश्न,
और कांग्रेस सरकार की भूमिका पर विवाद—
बन चुकी थी।
भाजपा को तय करना था कि वह इस प्रश्न पर कहां खड़ी होगी।
1985 में सर्वोच्च न्यायालय का शाहबानो निर्णय आया।
1986 में राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम महिला (विवाह-विच्छेद पर अधिकार संरक्षण) कानून बनाकर उस निर्णय के प्रभाव को बदल दिया।
भाजपा और अन्य आलोचकों ने इसे मुस्लिम रूढ़िवादी नेतृत्व के सामने सरकार के झुकने के रूप में प्रस्तुत किया।
इस प्रकार लगभग समान समय में—
शाहबानो + अयोध्या ताला
ने कांग्रेस की धार्मिक राजनीति पर दो विपरीत आरोप पैदा किए।
एक ओर मुस्लिम तुष्टीकरण।
दूसरी ओर हिंदू भावना को संतुष्ट करने के लिए ताला खुलवाने का आरोप।
इन दोनों का विस्तृत अध्ययन अगले अध्याय में होगा।
भाजपा ने यह तर्क विकसित किया कि कांग्रेस की पंथनिरपेक्षता समान नागरिकता पर आधारित नहीं है, बल्कि अलग-अलग समुदायों के लिए अलग राजनीतिक व्यवहार पर आधारित है।
यहीं “सकारात्मक पंथनिरपेक्षता” बनाम “छद्म-पंथनिरपेक्षता” की अंतर अधिक तीखी होती गई।
अयोध्या का प्रश्न इस तर्क के लिए अत्यंत उपयोगी था—
भाजपा कह सकती थी कि हिंदू धार्मिक दावे को “सांप्रदायिक” कहा जाता है, लेकिन मुस्लिम धार्मिक नेतृत्व के दबाव को “धर्मनिरपेक्षता” के नाम पर स्वीकार किया जाता है।
यह राजनीतिक प्रस्तुतीकरण आगे अत्यंत प्रभावी हुई।
नहीं।
1986 और 1989 के बीच संक्रमण क्रमिक था।
विश्व हिंदू परिषद आंदोलन चला रही थी।
संत सक्रिय थे।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तंत्र था।
भाजपा अपनी राजनीतिक स्थिति-निर्धारण स्पष्ट कर रही थी।
पूर्ण औपचारिक मोड़ पालमपुर 1989 में दिखाई देता है।
इसलिए 1986 को संक्रमण का वर्ष कहना अधिक उचित है।
1980 के दशक में भाजपा का चुनावी समर्थन मुख्यतः कुछ शहरी, व्यापारिक और पूर्व जनसंघ क्षेत्रों तक सीमित माना जाता था।
यदि उसे राष्ट्रीय पार्टी बनना था तो—
उत्तर भारत के ग्रामीण समाज,
मध्यवर्ग,
नए पिछड़े समुदाय,
धार्मिक मतदाता,
और कांग्रेस-विरोधी समूह—
तक पहुंचना आवश्यक था।
राम जन्मभूमि जैसा भावनात्मक मुद्दा इस विस्तार के लिए एक संभावित सामान्य पहचान प्रदान करता था।
लेकिन इसे केवल cynical चुनावी आकलन कहना भी अधूरा होगा; दल कार्यकर्ता-तंत्र के लिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद वास्तविक वैचारिक प्रतिबद्धता था।
क्योंकि विश्व हिंदू परिषद को चुनावी सावधानियां नहीं थीं।
वह कह सकती थी—
“राम जन्मभूमि मुक्त करो।”
भाजपा को देखना पड़ता था—
संवैधानिक भाषा,
मुस्लिम मतदाता,
गठबंधन,
राष्ट्रीय छवि,
और संसदीय रणनीति।
इसलिए राजनीतिक दल धार्मिक संगठन की तुलना में धीमी गति से आगे बढ़ा।
लेकिन एक बार पार्टी ने मुद्दा अपना लिया, आंदोलन को चुनावी प्रतिनिधित्व मिल गया।
1984 के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए भी भाजपा की दो सीटों वाली स्थिति चिंता का विषय रही होगी, लेकिन हमें undocumented आंतरिक उद्देश्य को तथ्य की तरह नहीं लिखना चाहिए।
इतना स्पष्ट है कि—
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के कार्यकर्ता-तंत्र संबंध मजबूत थे,
विश्व हिंदू परिषद के अयोध्या अभियान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नेटवर्क सक्रिय था,
और आडवाणी नेतृत्व में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की भाषा भारतीय जनता पार्टी में अधिक स्पष्ट हुई।
अर्थात धार्मिक लामबंदी और राजनीतिक पुनर्संयोजन समानांतर बढ़ रहे थे।
दूरदर्शन पर रामानंद सागर का रामायण प्रसारित हुआ।
यह भारतीय जनता पार्टी कार्यक्रम नहीं था।
न विश्व हिंदू परिषद द्वारा निर्मित आंदोलनकारी प्रचार फिल्म।
लेकिन उसके सामाजिक प्रभाव ने राम, अयोध्या और रामायण की कथा को करोड़ों परिवारों के साझा दृश्य अनुभव में बदल दिया।
इस सांस्कृतिक वातावरण ने राम मंदिर की राजनीतिक भाषा को समझने के लिए पाठक-वर्ग और अधिक तैयार की।
इसका विस्तार अध्याय 179 में होगा।
रामायण धारावाहिक के बाद राम केवल ग्रंथ या स्थानीय मंदिर के देवता के रूप में नहीं, राष्ट्रीय दूरदर्शन प्रतीक भी बन गए।
इसी समय विश्व हिंदू परिषद—
रामशिला,
रामध्वज,
रथ,
जय श्रीराम—
जैसे प्रतीकों का विस्तार कर रही थी।
भाजपा का राजनीतिक पुनर्संयोजन एक ऐसे सांस्कृतिक वातावरण में हो रहा था जहां राम की सार्वजनिक दृश्यता तेजी से बढ़ रही थी।
1988 तक विश्व हिंदू परिषद राम जन्मभूमि आंदोलन को अधिक आक्रामक जन-अभियान की दिशा में ले जा रही थी।
संत सम्मेलन,
धर्म संसद,
ताला खुलने के बाद मंदिर निर्माण की मांग,
और आगामी शिलापूजन—
सब तैयार हो रहे थे।
अब भाजपा के लिए निरपेक्षता क्रमशः difficult थी।
यदि वह मंदिर प्रश्न से दूरी रखती—
तो उसका स्वाभाविक हिंदू राष्ट्रवादी निर्वाचन क्षेत्र विश्व हिंदू परिषद आंदोलन की ओर जा सकता था।
यदि समर्थन करती—
तो उसकी अलग राजनीतिक पहचान मजबूत हो सकती थी।
1989 में कई धाराएं एक साथ मिलीं—
कांग्रेस सरकार बोफोर्स और अन्य राजनीतिक संकटों से कमजोर थी।
वी. पी. सिंह कांग्रेस-विरोधी केंद्र बन रहे थे।
विश्व हिंदू परिषद रामशिला और शिलान्यास की तैयारी कर रही थी।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संगठनात्मक समर्थन दे रहा था।
और भारतीय जनता पार्टी को अपनी राष्ट्रीय चुनावी रणनीति तय करनी थी।
यहीं पालमपुर का प्रस्ताव आता है।
भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक 9–11 जून 1989 को हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में हुई।
भाजपा के अपने आधिकारिक पार्टी दस्तावेज बाद में स्पष्ट रूप से लिखते हैं कि पार्टी ने राम जन्मभूमि पर पहली बार राष्ट्रीय कार्यकारिणी में प्रस्ताव इसी पालमपुर बैठक में पारित किया।
यह निर्धारण बहुत महत्वपूर्ण है।
यह साबित करता है कि—
1984 आंदोलन के पांच साल बाद,
भाजपा ने पहली बार institutionally स्पष्ट दल रुख लिया।
भाजपा ने राम जन्मभूमि हिंदुओं को मंदिर निर्माण के लिए सौंपे जाने की मांग का समर्थन किया।
पार्टी के 2003 के आधिकारिक पश्चदृष्टि प्रस्ताव के अनुसार पालमपुर में भाजपा ने यह भी कहा था कि विवाद को—
दोनों समुदायों के बीच आपसी संवाद
या
अनुकूल/सक्षम कानून
के माध्यम से हल किया जाए।
यह महत्वपूर्ण सूक्ष्मता है।
पालमपुर केवल “मंदिर बनाओ” का नारा नहीं था।
उसमें समाधान की राजनीतिक-विधायी दिशा भी रखी गई।
पालमपुर प्रस्ताव से जुड़ी भाजपा की राजनीतिक धारणा यह थी कि अदालत के लिए कुछ ऐतिहासिक/आस्था संबंधी प्रश्नों का समाधान सीमित हो सकता है और सोमनाथ जैसी राजनीतिक-सामाजिक पहल से समाधान तलाशना चाहिए।
बाद के भारतीय जनता पार्टी दस्तावेज पालमपुर को सोमनाथ से तुलना करने वाले राजनीतिक विचार से जोड़ते हैं—स्वतंत्र भारत की सरकार ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण को जिस सकारात्मक दृष्टि से देखा, उसी प्रकार अयोध्या को देखने का आग्रह।
यही दल विमर्श आगे बहुत प्रभावशाली हुआ।
सोमनाथ के पुनर्निर्माण को मंदिर आंदोलन में एक नजीर की तरह प्रस्तुत किया गया—
ऐतिहासिक विध्वंस,
स्वतंत्र भारत,
सांस्कृतिक पुनर्स्थापन।
भाजपा का तर्क था कि अयोध्या को भी राष्ट्रीय सांस्कृतिक पुनर्स्थापन के रूप में देखा जा सकता है।
आलोचकों के लिए दोनों परिस्थितियां कानूनी रूप से समान नहीं थीं, क्योंकि अयोध्या में सक्रिय परस्पर विरोधी स्वामित्व-अधिकार मुकदमेबाजी था।
इसलिए सोमनाथ तुलना राजनीतिक रूपक था, स्वतः विधिक नजीर नहीं।
यहां विशेष सावधानी जरूरी है।
पालमपुर के बाद भारतीय जनता पार्टी और आंदोलनकारी circles में यह विचार अधिक मुखर हुआ कि राम जन्मस्थान की आस्था अदालत के न्यायनिर्णयन की सामान्य संपत्ति-सीमा से परे है।
लेकिन अंतिम 2019 सर्वोच्च न्यायालय निर्णय ने स्वामित्व-अधिकार को केवल आस्था पर तय नहीं किया।
उसने कब्जा, दस्तावेजी साक्ष्य, पुरातत्त्व और विधिक अधिकार को देखा।
इसलिए 1989 की दल स्थिति और 2019 का न्यायिक पद्धति अलग-अलग स्तर हैं।
इतिहास इससे अधिक जटिल है।
भारतीय जनता पार्टी की वैचारिक वंशक्रम जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से पहले ही जुड़ी थी।
इसलिए पालमपुर कोई शून्य से हिंदुत्व की खोज नहीं।
असली परिवर्तन था—
एक पुराने सांस्कृतिक-राष्ट्रीय आग्रह को पार्टी की तत्काल चुनावी-राजनीतिक कार्यसूची में स्पष्ट और केंद्रीय स्थान देना।
यही अंतर बड़ा था।
1984 में—
दो सीटें,
वाजपेयी नेतृत्व,
गांधीवादी समाजवाद की prominence,
अयोध्या पर अपेक्षाकृत दूरी।
1985—
एकात्म मानववाद को मूल दर्शन।
1986—
आडवाणी अध्यक्ष,
ताला खुलना,
शाहबानो विवाद।
1987–88—
हिंदुत्व और छद्म-पंथनिरपेक्षता पर अधिक स्पष्ट राजनीतिक भाषा।
1989—
पालमपुर,
राम जन्मभूमि का औपचारिक समर्थन।
यह क्रमिक वैचारिक repositioning था।
1984 में दो सीटों से भारतीय जनता पार्टी 1989 में 85 सीटों तक पहुंची।
यह असाधारण छलांग थी।
हालांकि इसका पूरा श्रेय राम मंदिर को नहीं दिया जा सकता।
बोफोर्स,
कांग्रेस-विरोध,
वी. पी. सिंह का उभार,
विपक्षी चुनावी समायोजन,
और अन्य राजनीतिक कारक भी महत्वपूर्ण थे।
फिर भी अयोध्या ने भारतीय जनता पार्टी को distinct वैचारिक पहचान और उत्तर भारत में व्यापक लामबंदी का नया आधार दिया।
नहीं।
कारणगत oversimplification से बचना चाहिए।
यदि केवल मंदिर ही कारण होता तो सभी क्षेत्रों में समान चुनावी प्रवृत्ति होना चाहिए था।
1989 में भाजपा ने—
anti-कांग्रेस राजनीति,
सीट समायोजन,
राम मंदिर,
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद,
और संगठनात्मक विस्तार—
का संयुक्त लाभ लिया।
लेकिन यह निर्विवाद है कि राम जन्मभूमि ने पार्टी की राजनीतिक distinctiveness बढ़ा दी।
1989 के बाद भारतीय जनता पार्टी ने वी. पी. सिंह की राष्ट्रीय Front सरकार को बाहर से समर्थन दिया।
यही एक दिलचस्प राजनीतिक विरोधाभास था।
राम मंदिर का समर्थन करने वाली भारतीय जनता पार्टी ऐसी सरकार को समर्थन दे रही थी जिसमें व्यापक गैर-कांग्रेस गठबंधन के अनेक वैचारिक strands थे।
इससे पता चलता है कि पार्टी का राजनीतिक रणनीति केवल मंदिर तक सीमित नहीं था।
कांग्रेस को सत्ता से हटाना भी प्राथमिक उद्देश्य था।
1990 में आडवाणी रथयात्रा।
बिहार में उनकी गिरफ्तारी।
राम मंदिर पर टकराव।
और भारतीय जनता पार्टी द्वारा वी. पी. सिंह सरकार से समर्थन वापसी।
यानी 1989 तक जो मुद्दा पार्टी पहचान का एक बड़ा हिस्सा बना था, 1990 में वह केंद्र सरकार गिराने तक की राजनीतिक शक्ति प्राप्त कर चुका था।
पालमपुर इस तीव्रता का संस्थागत प्रारंभ था।
1989 के बाद भी वाजपेयी पार्टी में अत्यंत महत्वपूर्ण रहे।
यह धारणा गलत होगी कि पार्टी ने उन्हें त्याग दिया।
वास्तव में भारतीय जनता पार्टी की भविष्य की ताकत इसी dual नेतृत्व में रही—
आडवाणी व्यापक जन वैचारिक लामबंदी के प्रभावी नेता।
वाजपेयी व्यापक राजनीतिक acceptability और गठबंधन अपील के नेता।
आगे 1996–99 में यही विभाजन पार्टी को विस्तार देगा।
आडवाणी पहले से वरिष्ठ जनसंघ/भारतीय जनता पार्टी नेता थे।
इसलिए “दो सीटों की हार के बाद उन्हें खोजा गया” गलत है।
लेकिन 1984 की पराजय ने ऐसा राजनीतिक वातावरण अवश्य बनाया जिसमें उनकी अधिक स्पष्ट वैचारिक रेखा को पार्टी नेतृत्व में अधिक स्थान मिला।
1986 में अध्यक्ष बनना इसी restructuring का बड़ा पड़ाव था।
1980—
गांधीवादी समाजवाद।
1985—
एकात्म मानववाद को मूल दर्शन।
1986 के बाद—
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद।
सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता।
अल्पसंख्यकवाद/तुष्टीकरण की आलोचना।
1989—
राम जन्मभूमि।
यानी परिवर्तन किसी एक नारा replacement का नहीं, बल बदलाव का था।
1985 दस्तावेज इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि पार्टी ने उसे प्रतिबद्धताएँ से नहीं हटाया।
बाद के पार्टी दस्तावेजों में भी इसे एकात्म मानववाद के socio-economic व्याख्या से समायोजित करने की कोशिश दिखाई देती है।
इसलिए इतिहास में यह लिखना अधिक सही होगा—
भाजपा ने गांधीवादी समाजवाद को पूरी तरह त्यागने के बजाय सांस्कृतिक-राष्ट्रीय पहचान और एकात्म मानववाद को उसके ऊपर अधिक स्पष्ट केंद्रीयता दी।
तीन बड़ी चीजें।
कांग्रेस से स्पष्ट वैचारिक differentiation।
साधारण नीति बहस से कहीं अधिक mobilizing subject।
विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और संत आंदोलन के माध्यम से पहले से सक्रिय लाखों समर्थकों से संपर्क।
यही कारण है कि मंदिर आंदोलन दल-भवन में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुआ।
यह संबंध एकतरफा नहीं था।
भाजपा ने आंदोलन को दिया—
संसदीय मंच,
चुनावी वैधता,
राज्य और केंद्र की राजनीतिक शक्ति तक पहुंच,
राष्ट्रीय नेतृत्व,
और आगे सरकार बनने की संभावना।
विश्व हिंदू परिषद सड़क पर लाखों जुटा सकती थी।
लेकिन संसद में कानून केवल राजनीतिक दल ला सकता था।
इसीलिए पालमपुर के बाद आंदोलन एक नए स्तर पर पहुंचा।
1984 तक प्रश्न था—
जनसमर्थन कैसे बढ़े?
1989 के बाद नया प्रश्न जुड़ गया—
राज्य सत्ता प्राप्त करके समाधान कैसे निकले?
यही आंदोलन और भारतीय जनता पार्टी का ऐतिहासिक संगम है।
धार्मिक लामबंदी अब चुनावी रणनीति से जुड़ गया।
आलोचकों के अनुसार भाजपा ने 1984 की पराजय के बाद चुनावी वसूली के लिए धार्मिक ध्रुवीकरण का रास्ता अपनाया।
इस व्याख्या में अयोध्या एक consciously chosen राजनीतिक साधन था।
यह दृष्टि भारतीय राजनीतिक विज्ञान और पंथनिरपेक्षता बहस में प्रभावशाली रही है।
लेकिन इसे अकेले व्याख्या के रूप में लेना पर्याप्त नहीं।
समर्थकों के अनुसार भारतीय जनता पार्टी ने 1984 के बाद अपने मूल वैचारिक स्वरूप को फिर पाया।
उनके अनुसार—
गांधीवादी समाजवाद की अस्पष्टता से निकलकर,
एकात्म मानववाद,
राष्ट्रीय संस्कृति,
और बहुसंख्यक धार्मिक दावों पर समानता—
को स्पष्टता मिली।
इस व्याख्या में अयोध्या चुनावी अवसरवाद नहीं, दबे हुए सभ्यतागत प्रश्न को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देना था।
दोनों प्रक्रियाएं एक साथ संभव हैं।
राजनीतिक दल वैचारिक दोषसिद्धि और चुनावी अवसर—दोनों से निर्णय लेते हैं।
भारतीय जनता पार्टी का जनसंघ/राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सांस्कृतिक-राष्ट्रीय पृष्ठभूमि वास्तविक था।
राम जन्मभूमि की मांग उससे पहले मौजूद थी।
1984 की चुनावी collapse भी वास्तविक थी।
विश्व हिंदू परिषद लामबंदी राजनीतिक अवसर भी उपलब्ध करा रही थी।
इसलिए ऐतिहासिक निर्धारण होना चाहिए—
वैचारिक पुनर्पहचान और चुनावी रणनीति एक-दूसरे को मजबूत कर रही थीं।
ऐसा बिल्कुल नहीं।
पार्टी और उससे जुड़े सामाजिक आधार में मंदिर समर्थक विचार पहले से मौजूद थे।
लेकिन संस्थागत दल प्रस्ताव अलग बात है।
भारतीय जनता पार्टी के अपने आधिकारिक पश्चदृष्टि दस्तावेज का महत्व यही है कि वह साफ कहता है—
पहली राष्ट्रीय कार्यपालिका प्रस्ताव पर श्री राम जन्मभूमि — पालमपुर, 9–11 जून 1989.
इसलिए व्यक्तिगत समर्थन और आधिकारिक दल स्थिति को अलग रखना चाहिए।
इसके बाद भारतीय जनता पार्टी के लिए अयोध्या से पीछे हटना राजनीतिक रूप से कठिन हो गया।
राम मंदिर अब—
विश्व हिंदू परिषद का मुद्दा नहीं,
संतों का संकल्प नहीं,
सिर्फ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सांस्कृतिक आग्रह नहीं,
बल्कि भारतीय जनता पार्टी की आधिकारिक राजनीतिक प्रतिबद्धता भी था।
यहीं वह निर्णायक संगम पूरा हुआ जिसकी शुरुआत 1984 से हुई थी।
क्योंकि 1990 में जब आडवाणी रथयात्रा पर निकले, वह किसी व्यक्तिगत प्रयोग पर नहीं जा रहे थे।
उसके पीछे था—
1984 धर्म संसद,
विश्व हिंदू परिषद तंत्र,
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संगठनात्मक आधारभूत संरचना,
1989 शिला पूजन,
भारतीय जनता पार्टी पालमपुर प्रस्ताव,
और पार्टी की नई वैचारिक पहचान।
अर्थात रथयात्रा पाँच वर्षों के राजनीतिक-संगठनात्मक पुनर्संयोजन का चरम रूप थी।
वर्ष — प्रमुख परिवर्तन
1980 — भारतीय जनता पार्टी की स्थापना; अटल बिहारी वाजपेयी अध्यक्ष; पांच प्रतिबद्धताओं में गांधीवादी समाजवाद और सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता
1984 — लोकसभा चुनाव में केवल 2 सीटें—हनमकोंडा और मेहसाणा
1985 — गांधीनगर राष्ट्रीय परिषद—एकात्म मानववाद पार्टी का मूल दर्शन; पांच प्रतिबद्धताएँ बरकरार
1986 — लालकृष्ण आडवाणी अध्यक्ष; अधिक स्पष्ट वैचारिक स्थिति-निर्धारण का चरण
1986 — शाहबानो विवाद और अयोध्या ताला खुलना—धर्मनिरपेक्षता/तुष्टीकरण बहस तीखी
1987–88 — सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और छद्म-पंथनिरपेक्षता विरोधी राजनीतिक भाषा अधिक प्रमुख
9–11 जून 1989 — पालमपुर राष्ट्रीय कार्यकारिणी—राम जन्मभूमि पर भारतीय जनता पार्टी का पहला औपचारिक प्रस्ताव
1989 चुनाव — भारतीय जनता पार्टी 2 से 85 लोकसभा सीटों तक
1990 — आडवाणी राम रथयात्रा—वैचारिक पुनर्संयोजन व्यापक जन चुनावी लामबंदी में परिवर्तित
गलत। प्रारंभिक भारतीय जनता पार्टी की घोषित भाषा गांधीवादी समाजवाद, लोकतंत्र, सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता और मूल्य-आधारित राजनीति पर आधारित थी।
सिद्ध नहीं। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद असाधारण कांग्रेस सहानुभूति लहर सहित अनेक कारक थे।
गलत। 1985 के गांधीनगर प्रस्ताव में यह पांच प्रतिबद्धताएँ में बना रहा।
गलत। जनसंघ और दीनदयाल उपाध्याय की वैचारिक परंपरा पहले से थी। आडवाणी के दौर में उसका राजनीतिक जोर बढ़ा।
अधूरा। व्यक्तिगत और सामाजिक समर्थन मौजूद था; लेकिन पहला औपचारिक राष्ट्रीय कार्यपालिका प्रस्ताव 1989 पालमपुर में हुआ।
अतिशयोक्ति। अयोध्या महत्वपूर्ण थी, लेकिन कांग्रेस-विरोध, बोफोर्स, वी. पी. सिंह और चुनावी गठजोड़ भी महत्वपूर्ण थे।
1984 के बाद भाजपा ने कोई एक रात में वैचारिक U-turn नहीं लिया।
वास्तविक क्रम अधिक सूक्ष्म था।
1984 ने संकट पैदा किया।
1985 ने वैचारिक आधार को पुनर्परिभाषित किया।
1986 ने नेतृत्व और राजनीतिक भाषा बदली।
शाहबानो और अयोध्या ने नई वैचारिक विवाद दी।
1989 पालमपुर ने राम जन्मभूमि को आधिकारिक दल प्रतिबद्धता में बदल दिया।
यानी यह पांच वर्ष लंबा पुनर्संयोजन था।
1984 की दो सीटों वाली पराजय ने भाजपा को यह महसूस कराया कि केवल व्यापक, अपेक्षाकृत अस्पष्ट “middle-आधार” पहचान पर्याप्त नहीं है। लेकिन उसके बाद उसने गांधीवादी समाजवाद को बस मिटा नहीं दिया। 1985 के आधिकारिक प्रस्ताव में पार्टी ने एकात्म मानववाद को मूल दर्शन बनाते हुए गांधीवादी समाजवाद सहित पांच प्रतिबद्धताएँ को बरकरार रखा।
वास्तविक परिवर्तन बल में था।
पार्टी अधिक स्पष्ट रूप से अपनी जनसंघ–दीनदयाल–सांस्कृतिक राष्ट्रवादी वंशक्रम की ओर लौट रही थी।
लालकृष्ण आडवाणी का 1986 में नेतृत्व इसी बदलाव का राजनीतिक चेहरा बना।
और 1989 के पालमपुर प्रस्ताव ने उस प्रक्रिया को राम जन्मभूमि से औपचारिक रूप से जोड़ दिया। भारतीय जनता पार्टी के अपने अभिलेख स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं कि राम जन्मभूमि पर पार्टी का पहला राष्ट्रीय कार्यकारिणी प्रस्ताव वहीं पारित हुआ।
यही वह क्षण था जब—
विश्व हिंदू परिषद का धार्मिक आंदोलन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संगठनात्मक शक्ति, संतों की धार्मिक वैधता, और भारतीय जनता पार्टी की चुनावी राजनीति—
एक दूसरे के बहुत करीब आ गए।
1984 में भारतीय जनता पार्टी केवल दो लोकसभा सीटों वाली राष्ट्रीय पार्टी थी। उसके पास अटल बिहारी वाजपेयी जैसा बड़ा नेता था, जनसंघ का इतिहास था और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सामाजिक आधार था, लेकिन उसकी नई स्वतंत्र राजनीतिक पहचान अभी धुंधली थी।
पांच वर्ष बाद तस्वीर बदल चुकी थी।
एकात्म मानववाद फिर मूल दर्शन के केंद्र में था।
आडवाणी अध्यक्ष थे।
शाहबानो ने “अल्पसंख्यक तुष्टीकरण” की बहस को तीखा किया था।
अयोध्या का ताला खुल चुका था।
विश्व हिंदू परिषद गांव-गांव पहुंच रही थी।
रामशिला अभियान तैयार था।
और भाजपा ने पालमपुर में औपचारिक रूप से मंदिर आंदोलन का राजनीतिक समर्थन कर दिया था।
इस परिवर्तन ने केवल भाजपा को नहीं बदला।
इसने भारतीय राजनीति की मुख्य वैचारिक dividing रेखा बदलनी शुरू कर दी।
अब प्रश्न केवल कांग्रेस बनाम विपक्ष नहीं रहने वाला था।
नई बहस होगी—
धर्मनिरपेक्षता बनाम “छद्म धर्मनिरपेक्षता”, अल्पसंख्यक अधिकार बनाम समान नागरिकता, और शाहबानो के बाद मुस्लिम पर्सनल लॉ बनाम अयोध्या में हिंदू धार्मिक दावा।
यही कारण है कि अगला अध्याय अत्यंत महत्वपूर्ण है।
उसमें 1985 के सर्वोच्च न्यायालय फैसले, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और मौलाना नेतृत्व की प्रतिक्रिया, राजीव गांधी सरकार का 1986 कानून, उसी समय 1 फरवरी को अयोध्या का ताला खुलना, “मुस्लिम तुष्टीकरण की भरपाई के लिए हिंदू तुष्टीकरण” वाले प्रसिद्ध राजनीतिक आरोप की स्रोत-जांच, अरुण नेहरू–बूटा सिंह–राजीव गांधी से जुड़े दावों और भाजपा/विश्व हिंदू परिषद को इससे मिले राजनीतिक अवसर का अलग-अलग प्रमाण-स्तर पर परीक्षण किया जाएगा।