9 नवम्बर 2019 का सर्वोच्च न्यायालय निर्णय : आंदोलन से मंदिर-निर्माण की ओर निर्णायक संक्रमण
न्याय, निर्माण और प्राण-प्रतिष्ठा
45.1 प्रस्तावना
अयोध्या राम जन्मभूमि आंदोलन के लंबे इतिहास में 9 नवम्बर 2019 वह तारीख है, जहाँ जनांदोलन, धार्मिक आस्था, इतिहास, पुरातत्त्व, संपत्ति-विवाद और लगभग सात दशकों तक चली न्यायिक प्रक्रिया एक निर्णायक बिंदु पर पहुँची। इस दिन सर्वोच्च न्यायालय की पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से ऐसा निर्णय सुनाया, जिसने अयोध्या की विवादित भूमि पर चले मुकदमों का अंतिम न्यायिक निपटारा कर दिया।
यह निर्णय केवल इस प्रश्न का उत्तर नहीं था कि विवादित भूमि पर अधिकार किसका होगा। इसके साथ अनेक अन्य प्रश्न भी जुड़े थे—राम जन्मस्थान के प्रति हिंदू समाज की आस्था का न्यायिक महत्व क्या है? विवादित परिसर के भीतर और बाहर किस पक्ष की पूजा और कब्जे के प्रमाण अधिक मजबूत थे? भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण की खुदाई और पुरातात्त्विक निष्कर्षों का कितना महत्व था? 1949 में मूर्तियों की स्थापना और 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढाँचे के ध्वंस को न्यायालय किस दृष्टि से देखेगा? और सबसे बढ़कर, न्यायालय ऐसा समाधान कैसे देगा जो संपत्ति संबंधी विधिक अधिकारों का निर्णय भी करे और संविधान के धर्मनिरपेक्ष ढाँचे तथा सभी समुदायों के अधिकारों को भी ध्यान में रखे?
सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय इसी जटिल ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आया।
45.2 पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ
अयोध्या विवाद पर अंतिम निर्णय तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पाँच सदस्यीय संविधान पीठ ने सुनाया। पीठ में उनके अतिरिक्त न्यायमूर्ति एस. ए. बोबडे, डी. वाई. चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एस. अब्दुल नज़ीर शामिल थे।
निर्णय सर्वसम्मत था।
यह तथ्य अपने आप में महत्वपूर्ण था। इतने लंबे, संवेदनशील और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ में कोई मतभेदपूर्ण निर्णय सामने नहीं आया।
मुख्य निर्णय लगभग एक हजार से अधिक पृष्ठों का विस्तृत न्यायिक दस्तावेज था। न्यायालय ने इतिहास, यात्रावृत्तांत, राजस्व अभिलेख, पुरातात्त्विक सामग्री, मौखिक साक्ष्य, पूजा संबंधी प्रमाण और पूर्व न्यायिक कार्यवाही सहित व्यापक सामग्री का परीक्षण किया। सर्वोच्च न्यायालय के आधिकारिक निर्णय में हिंदुओं की इस आस्था को निर्विवाद माना गया कि भगवान राम का जन्म अयोध्या में हुआ था; साथ ही न्यायालय ने विवादित परिसर के ऐतिहासिक उपयोग और दोनों समुदायों के दावों का अलग-अलग परीक्षण किया।
45.3 इलाहाबाद उच्च न्यायालय से सर्वोच्च न्यायालय तक
30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने विवादित 2.77 एकड़ भूमि को तीन हिस्सों में बाँटने का निर्णय दिया था। एक हिस्सा रामलला विराजमान, एक निर्मोही अखाड़े और एक सुन्नी केंद्रीय वक्फ बोर्ड को देने की व्यवस्था की गई थी।
लेकिन किसी प्रमुख पक्ष ने इस व्यवस्था को अंतिम समाधान नहीं माना।
मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा।
सर्वोच्च न्यायालय ने मई 2011 में उच्च न्यायालय के भूमि-विभाजन संबंधी निर्णय पर रोक लगा दी। इसके बाद वर्षों तक अपीलें लंबित रहीं।
2017 से मामले की शीघ्र सुनवाई की माँग फिर तेज हुई। 2018 और 2019 में न्यायिक प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ी और अंततः मामला संविधान पीठ के समक्ष आया।
45.4 मध्यस्थता का प्रयास
सर्वोच्च न्यायालय ने अंतिम सुनवाई से पहले न्यायालय के बाहर आपसी सहमति से समाधान की संभावना भी तलाशने का प्रयास किया।
मार्च 2019 में एक तीन सदस्यीय मध्यस्थता समिति बनाई गई।
इसमें शामिल थे—
न्यायमूर्ति एफ. एम. आई. कलीफुल्ला
श्री श्री रविशंकर
वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीराम पंचू
समिति से अपेक्षा थी कि वह हिंदू और मुस्लिम पक्षों के बीच ऐसा समाधान खोज सके, जिसे दोनों समुदाय स्वीकार कर सकें।
कई दौर की बातचीत हुई।
लेकिन सर्वसम्मत समझौता नहीं हो सका।
यह प्रयास फिर भी ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था, क्योंकि न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इतने संवेदनशील धार्मिक विवाद का आपसी सहमति से समाधान न्यायिक निर्णय की तुलना में सामाजिक दृष्टि से अधिक सहज हो सकता है।
जब मध्यस्थता से निर्णायक समाधान नहीं निकला, तब सर्वोच्च न्यायालय ने प्रतिदिन सुनवाई शुरू की।
45.5 चालीस दिनों की ऐतिहासिक सुनवाई
6 अगस्त 2019 से संविधान पीठ ने नियमित और लगभग प्रतिदिन सुनवाई शुरू की।
यह सुनवाई लगातार 40 कार्यदिवसों तक चली।
16 अक्टूबर 2019 को सुनवाई पूरी हुई और निर्णय सुरक्षित रख लिया गया।
भारत के न्यायिक इतिहास में यह सबसे लंबी लगातार चली संवैधानिक सुनवाइयों में गिनी जाती है।
हिंदू पक्ष की ओर से अनेक वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने दलीलें दीं। रामलला विराजमान की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता के. परासरन की उपस्थिति विशेष रूप से चर्चित रही। मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने विस्तृत तर्क रखे।
न्यायालय के सामने मूलतः पाँच प्रमुख दीवानी मुकदमों से उत्पन्न दावे और अपीलें थीं।
45.6 रामलला विराजमान : न्यायिक व्यक्ति का प्रश्न
अयोध्या मुकदमे की सबसे विशिष्ट विधिक विशेषताओं में एक थी—
रामलला विराजमान स्वयं एक पक्षकार थे।
भारतीय हिंदू धार्मिक न्यास संबंधी विधि में किसी प्रतिष्ठित देवता को कुछ परिस्थितियों में न्यायिक व्यक्ति माना जा सकता है। अर्थात उसके नाम पर संपत्ति रखी जा सकती है और उसकी ओर से न्यायालय में मुकदमा लड़ा जा सकता है।
1989 में न्यायमूर्ति देवकी नंदन अग्रवाल ने रामलला विराजमान के 'अगले मित्र' के रूप में मुकदमा दायर किया था।
सर्वोच्च न्यायालय ने रामलला विराजमान के विधिक व्यक्तित्व को स्वीकार किया।
हालाँकि न्यायालय ने पूरे जन्मस्थान को अपने आप में पृथक न्यायिक व्यक्ति मानने के प्रश्न पर अधिक सावधानी बरती।
यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण था।
आस्था और संपत्ति कानून को एक-दूसरे में पूरी तरह मिला देने के बजाय न्यायालय ने दोनों के बीच विधिक सीमा बनाए रखने का प्रयास किया।
45.7 क्या न्यायालय ने केवल आस्था के आधार पर निर्णय दिया?
अयोध्या निर्णय के बारे में सबसे अधिक दोहराया जाने वाला प्रश्न यही रहा है।
उत्तर है—
नहीं।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संपत्ति का अधिकार केवल किसी समुदाय की धार्मिक आस्था के आधार पर निर्धारित नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने आस्था के अस्तित्व को एक तथ्य माना, लेकिन भूमि का अधिकार तय करते समय—
ऐतिहासिक उपयोग,
पूजा के प्रमाण,
कब्जा,
राजस्व अभिलेख,
यात्रियों के विवरण,
गवाहों के बयान,
पुरातात्त्विक सामग्री,
और दीवानी कानून के सिद्धांत
का परीक्षण किया।
यही कारण है कि निर्णय को केवल 'आस्था बनाम कानून' के रूप में समझना अधूरा होगा।
वास्तव में न्यायालय ने आस्था की उपस्थिति को स्वीकार करते हुए संपत्ति विवाद का फैसला उपलब्ध साक्ष्यों और दीवानी कानून के आधार पर करने का प्रयास किया।
45.8 बाहरी प्रांगण पर हिंदू पक्ष का दावा
विवादित परिसर दो प्रमुख हिस्सों में देखा जाता था—
बाहरी प्रांगण और भीतरी प्रांगण।
बाहरी प्रांगण में राम चबूतरा, सीता रसोई और अन्य पूजा-स्थल मौजूद थे।
न्यायालय ने पाया कि बाहरी प्रांगण में हिंदुओं की पूजा लंबे समय से चली आ रही थी और इस क्षेत्र पर उनका दावा अधिक स्पष्ट तथा मजबूत था।
ब्रिटिश शासन के दौरान 1850 के दशक में परिसर में रेलिंग लगाकर दोनों समुदायों के पूजा-स्थलों को अलग करने की व्यवस्था हुई थी।
इसके बाद भी हिंदू बाहरी प्रांगण में पूजा करते रहे।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर हिंदुओं द्वारा बाहरी प्रांगण के लंबे धार्मिक उपयोग को महत्वपूर्ण माना गया।
45.9 भीतरी प्रांगण का जटिल प्रश्न
सबसे कठिन प्रश्न भीतरी प्रांगण का था।
यही वह स्थान था जहाँ विवादित तीन गुंबदों वाला ढाँचा स्थित था।
मुस्लिम पक्ष का कहना था कि बाबरी मस्जिद में 1528 के बाद से नमाज पढ़ी जाती रही और यह वैध मस्जिद थी।
हिंदू पक्ष का कहना था कि यही भगवान राम का जन्मस्थान है और ढाँचा बनने के बाद भी हिंदू इसे राम जन्मभूमि मानते तथा पूजा करते रहे।
सर्वोच्च न्यायालय ने उपलब्ध दस्तावेजों और साक्ष्यों का परीक्षण करते हुए यह माना कि हिंदू समुदाय की जन्मस्थान संबंधी आस्था लंबे समय से विद्यमान थी। मुस्लिम और हिंदू दोनों पक्षों के गवाहों के विवरण में भी उस स्थल के धार्मिक महत्व से संबंधित अनेक बातें सामने आईं।
लेकिन न्यायालय ने यह भी स्वीकार किया कि मुसलमानों ने विवादित ढाँचे में नमाज अदा की थी।
इसलिए मामला ऐसा नहीं था कि किसी एक समुदाय की ऐतिहासिक उपस्थिति पूर्णतः अनुपस्थित थी।
45.10 भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण की खुदाई
अयोध्या विवाद के सबसे अधिक चर्चित पहलुओं में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण की 2003 की खुदाई थी।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश पर हुई खुदाई में विवादित ढाँचे के नीचे एक बड़ी पूर्ववर्ती संरचना के अवशेष मिलने की बात कही गई।
सर्वोच्च न्यायालय ने पुरातत्त्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट को पूरी तरह अस्वीकार नहीं किया।
न्यायालय ने माना कि उपलब्ध पुरातात्त्विक सामग्री यह संकेत देती है कि मस्जिद के नीचे मौजूद पूर्ववर्ती संरचना इस्लामी प्रकृति की नहीं थी।
लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है।
न्यायालय ने यह निष्कर्ष नहीं निकाला कि पुरातत्त्व सर्वेक्षण ने यह सिद्ध कर दिया कि किसी मंदिर को तोड़कर ही बाबरी मस्जिद बनाई गई थी।
दो बातें अलग थीं—
पहली, मस्जिद के नीचे गैर-इस्लामी बड़ी संरचना का अस्तित्व।
दूसरी, उस संरचना को ध्वस्त करके मस्जिद बनाए जाने का प्रत्यक्ष प्रमाण।
न्यायालय ने दोनों को एक नहीं माना।
यह अंतर शोध की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है।
45.11 22–23 दिसंबर 1949 की घटना पर न्यायालय की दृष्टि
दिसंबर 1949 की रात विवादित ढाँचे के भीतर रामलला की मूर्तियाँ प्रकट हुईं।
इसके बाद प्रशासन ने परिसर को विवादित घोषित कर बंद कर दिया, हालांकि पूजा की सीमित व्यवस्था जारी रही।
हिंदू पक्ष ने इसे रामलला का 'प्राकट्य' कहा।
मुस्लिम पक्ष ने इसे मूर्तियों को अवैध रूप से भीतर रखे जाने की घटना बताया।
सर्वोच्च न्यायालय ने विधिक दृष्टि से माना कि 1949 में मस्जिद के भीतर मूर्तियाँ रखा जाना मुसलमानों को उनके पूजा-स्थल से वंचित करने वाली अवैध कार्रवाई थी।
इस निष्कर्ष का महत्व इसलिए है क्योंकि अंतिम भूमि हिंदू पक्ष को देने के बावजूद न्यायालय ने 1949 की कार्रवाई को वैध नहीं ठहराया।
45.12 6 दिसंबर 1992 : ध्वंस को भी न्यायालय ने गलत ठहराया
6 दिसंबर 1992 को विवादित ढाँचा कारसेवकों द्वारा गिरा दिया गया था।
राम जन्मभूमि आंदोलन के इतिहास में यह सबसे निर्णायक और विवादास्पद घटनाओं में से एक है।
सर्वोच्च न्यायालय ने इस घटना को कानून के शासन का उल्लंघन माना।
अर्थात अंतिम निर्णय हिंदू पक्ष के पक्ष में आने का अर्थ यह नहीं था कि न्यायालय ने 6 दिसंबर 1992 की कार्रवाई को उचित घोषित कर दिया।
यहाँ निर्णय की संरचना को समझना आवश्यक है—
भूमि-अधिकार संबंधी दीवानी दावा एक प्रश्न था; 1992 में ढाँचे का ध्वंस कानूनसम्मत था या नहीं, यह दूसरा प्रश्न।
न्यायालय ने दोनों को अलग रखा।
45.13 निर्मोही अखाड़े का दावा
निर्मोही अखाड़ा लंबे समय से विवादित स्थल की पूजा और व्यवस्था से जुड़ा पक्ष था।
उसने स्वयं को राम जन्मभूमि का सेवायत बताते हुए प्रबंधन का अधिकार माँगा था।
लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने उसका मुकदमा समय-सीमा से बाहर माना।
इसलिए उसे भूमि का एक-तिहाई हिस्सा देने वाला इलाहाबाद उच्च न्यायालय का आदेश कायम नहीं रहा।
फिर भी न्यायालय ने केंद्र सरकार से मंदिर संबंधी नई व्यवस्था बनाते समय निर्मोही अखाड़े को उपयुक्त प्रतिनिधित्व देने पर विचार करने को कहा।
इससे अखाड़े की ऐतिहासिक भूमिका को पूरी तरह नकारा नहीं गया।
45.14 सुन्नी वक्फ बोर्ड का दावा
सुन्नी केंद्रीय वक्फ बोर्ड ने विवादित भूमि पर मस्जिद और मुस्लिम समुदाय के स्वामित्व तथा कब्जे का दावा किया।
सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि मुस्लिम पक्ष मस्जिद में नमाज अदा किए जाने के प्रमाण प्रस्तुत करने में सफल रहा।
लेकिन दीवानी मुकदमे में केवल नमाज पढ़ने का तथ्य अपने आप पूर्ण और अनन्य कब्जे को सिद्ध नहीं करता था।
न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों को समग्र रूप से देखते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि विवादित सम्पूर्ण भूमि पर मुस्लिम पक्ष का ऐसा अनन्य कब्जा सिद्ध नहीं हुआ जो हिंदू पक्ष के दावे को निष्प्रभावी कर दे।
45.15 अंतिम निर्णय : पूरी विवादित भूमि रामलला को
9 नवंबर 2019 को सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि विवादित 2.77 एकड़ भूमि रामलला विराजमान के पक्ष में रहेगी।
केंद्र सरकार को निर्देश दिया गया कि वह तीन महीने के भीतर एक योजना बनाकर मंदिर निर्माण और परिसर के प्रबंधन के लिए न्यास स्थापित करे।
इस प्रकार इलाहाबाद उच्च न्यायालय की तीन हिस्सों में भूमि बाँटने की व्यवस्था समाप्त हो गई।
सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय द्वारा भूमि का त्रिभाजन किसी पक्ष की स्पष्ट माँग के आधार पर नहीं था और वह दीवानी मुकदमे के उपयुक्त निपटारे का तरीका नहीं था।
45.16 मुस्लिम पक्ष को पाँच एकड़ वैकल्पिक भूमि
सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 के अंतर्गत अपनी विशेष शक्ति का उपयोग करते हुए आदेश दिया कि मुस्लिम समुदाय को मस्जिद निर्माण के लिए अयोध्या में पाँच एकड़ उपयुक्त भूमि दी जाए।
यह भूमि केंद्र सरकार द्वारा अधिगृहीत क्षेत्र से अथवा उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा किसी प्रमुख स्थान पर दी जा सकती थी।
यह व्यवस्था विशेष महत्व रखती थी।
न्यायालय ने माना कि 1949 में मुसलमानों को मस्जिद से वंचित किया गया और 1992 में ढाँचा अवैध रूप से ध्वस्त किया गया।
इसलिए वैकल्पिक भूमि केवल राजनीतिक संतुलन की व्यवस्था नहीं थी; उसके पीछे न्यायिक प्रतिपूर्ति का तत्व भी था।
बाद में उत्तर प्रदेश सरकार ने अयोध्या जिले के धन्नीपुर में पाँच एकड़ भूमि उपलब्ध कराई।
45.17 निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत
अयोध्या निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि सर्वोच्च न्यायालय ने कहा—
कानून किसी समुदाय की आस्था का न्याय नहीं करता; लेकिन यह तय कर सकता है कि उस आस्था से जुड़े स्थल पर विधिक अधिकार किसके प्रमाणों से स्थापित होते हैं।
यही अंतर इस पूरे विवाद को समझने की कुंजी है।
न्यायालय ने यह नहीं पूछा कि भगवान राम वास्तव में ठीक किस स्थान पर जन्मे थे।
यह न्यायिक रूप से निर्धारित किया जाने वाला ऐतिहासिक तथ्य नहीं था।
न्यायालय ने पूछा—
क्या हिंदुओं की यह आस्था वास्तविक, निरंतर और ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित है कि यही राम जन्मभूमि है?
और भूमि पर अलग-अलग पक्षों के उपयोग तथा कब्जे के प्रमाण क्या कहते हैं?
45.18 फैसले के दिन भारत की असाधारण शांति
अयोध्या निर्णय से पहले पूरे देश में सुरक्षा के व्यापक प्रबंध किए गए थे।
उत्तर प्रदेश विशेष रूप से सतर्क था।
अयोध्या में सुरक्षा बल तैनात किए गए।
इंटरनेट और सामाजिक माध्यमों पर अफवाहों को रोकने के उपाय किए गए।
कई स्थानों पर विद्यालय बंद रखे गए।
केंद्र और राज्य सरकारों ने सभी समुदायों से शांति बनाए रखने की अपील की।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी निर्णय को किसी की जीत या हार के रूप में न देखने की अपील की।
सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह रहा कि इतने संवेदनशील निर्णय के बाद देश में बड़े स्तर की सांप्रदायिक हिंसा नहीं हुई।
बाद में प्रधानमंत्री ने संसद में भी इसे भारतीय समाज के लोकतांत्रिक आचरण का उदाहरण बताया।
45.19 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रतिक्रिया
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने निर्णय का स्वागत किया।
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि इसे किसी की जीत या हार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
संघ के लिए यह निर्णय कई दशकों से चल रहे आंदोलन की सबसे बड़ी वैधानिक उपलब्धि था।
संघ परिवार ने इसके बाद आंदोलनकारी चरण से मंदिर-निर्माण और सामाजिक समरसता के संदेश की ओर भाषा बदलनी शुरू की।
यह परिवर्तन महत्वपूर्ण था।
1980 और 1990 के दशकों की भाषा मुख्यतः—
“मंदिर वहीं बनाएँगे”
की थी।
2019 के बाद प्रश्न बदल गया—
मंदिर कैसे बनेगा, कौन बनाएगा और उसकी व्यवस्था कैसी होगी?
45.20 विश्व हिंदू परिषद के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि
विश्व हिंदू परिषद ने 1980 के दशक से राम जन्मभूमि आंदोलन को संगठित जनांदोलन का रूप दिया था।
धर्म संसदें, शिला पूजन, रामशिला अभियान, कारसेवा और देशव्यापी धार्मिक जागरण उसी रणनीति के हिस्से थे।
9 नवंबर 2019 का निर्णय विहिप के लिए उस लंबे संघर्ष की न्यायिक परिणति था।
लेकिन अब विहिप की भूमिका भी बदलनी थी।
आंदोलन चलाने वाले संगठन को निर्माण प्रक्रिया में सीधे अंतिम प्रशासनिक अधिकार नहीं मिलना था।
मंदिर का निर्माण सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर बनने वाले स्वतंत्र न्यास के माध्यम से होना था।
यहीं आंदोलन और संस्थागत व्यवस्था के बीच महत्वपूर्ण अंतर पैदा हुआ।
45.21 भाजपा और राम मंदिर आंदोलन
भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति में उन्नति को राम मंदिर आंदोलन से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
1984 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के पास केवल दो सीटें थीं।
1989 के बाद उसका विस्तार तेजी से हुआ।
पालमपुर प्रस्ताव, आडवाणी की रथयात्रा, कारसेवा, उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह सरकार और 1992 के बाद की राजनीति—इन सबने राम मंदिर प्रश्न को भाजपा की राजनीतिक पहचान से जोड़ दिया।
लेकिन 2019 की स्थिति 1990 से बहुत अलग थी।
अब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली सरकार चला रही थी।
निर्णय किसी कानून बनाकर अथवा कार्यपालिका के आदेश से नहीं, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के सर्वसम्मत फैसले से आया।
इसने सरकार और भाजपा को यह कहने का आधार दिया कि मंदिर-निर्माण का मार्ग संवैधानिक और न्यायिक प्रक्रिया से प्रशस्त हुआ।
45.22 नरेंद्र मोदी की प्रतिक्रिया
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने निर्णय के बाद राष्ट्र को संबोधित करते हुए इसे भारतीय लोकतंत्र, न्यायपालिका और सामाजिक सद्भाव की शक्ति से जोड़ा।
उनका प्रमुख आग्रह था कि इसे किसी पक्ष की जीत अथवा पराजय नहीं माना जाए।
यह राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण संदेश था।
यदि 1990 के दशक में राम मंदिर प्रश्न तीव्र राजनीतिक ध्रुवीकरण का कारण बना था, तो 2019 में सरकार के सामने चुनौती थी कि निर्णय को व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता के वातावरण में आगे बढ़ाया जाए।
इसी कारण निर्णय के बाद सरकारी भाषा में बार-बार—
शांति, सद्भाव, एकता और संविधान
पर बल दिखाई देता है।
45.23 मुस्लिम पक्ष की प्रतिक्रिया
मुस्लिम पक्ष के भीतर फैसले को लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया रही।
कुछ पक्षों ने निर्णय के कानूनी तर्कों पर असहमति जताई।
विशेष रूप से यह प्रश्न उठाया गया कि जब न्यायालय ने 1949 में मूर्तियों की स्थापना और 1992 के ध्वंस को कानून-विरुद्ध माना, तब विवादित भूमि अंततः हिंदू पक्ष को क्यों दी गई।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सहित कुछ संगठनों ने पुनर्विचार याचिका दायर करने का निर्णय किया।
दूसरी ओर सुन्नी केंद्रीय वक्फ बोर्ड ने निर्णय को स्वीकार करने और पुनर्विचार याचिका न दाखिल करने का रुख अपनाया।
इससे मुस्लिम समाज के भीतर भी रणनीतिक मतभेद स्पष्ट हुए।
45.24 पुनर्विचार याचिकाएँ
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद अनेक पुनर्विचार याचिकाएँ दाखिल की गईं।
लेकिन दिसंबर 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें खारिज कर दिया।
इसके साथ मुख्य भूमि विवाद की न्यायिक प्रक्रिया लगभग अंतिम रूप से समाप्त हो गई।
अब केंद्र सरकार के सामने न्यायालय के आदेश के अनुसार न्यास बनाने की संवैधानिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी थी।
45.25 5 फरवरी 2020 : संसद में न्यास की घोषणा
9 नवंबर 2019 के निर्णय के लगभग तीन महीने बाद 5 फरवरी 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में घोषणा की कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने—
नामक न्यास के गठन को मंजूरी दे दी है।
प्रधानमंत्री ने बताया कि न्यास मंदिर निर्माण संबंधी सभी निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होगा। केंद्र सरकार ने लगभग 67.703 एकड़ अधिगृहीत भूमि भी न्यास को हस्तांतरित करने का निर्णय किया। साथ ही सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के अनुरूप सुन्नी वक्फ बोर्ड को पाँच एकड़ भूमि दिए जाने की प्रक्रिया उत्तर प्रदेश सरकार ने स्वीकार की।
यही वह क्षण था जब राम मंदिर प्रश्न औपचारिक रूप से—
आंदोलन से निर्माण-व्यवस्था
में प्रवेश कर गया।
45.26 न्यास की संरचना
श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र को स्वतंत्र न्यास के रूप में बनाया गया।
सरकार ने घोषणा की कि इसमें 15 न्यासी होंगे और इनमें एक सदस्य अनुसूचित जाति समुदाय से होगा। गृह मंत्री अमित शाह ने उस समय यह जानकारी सार्वजनिक की थी।
इस व्यवस्था का उद्देश्य केवल मंदिर का निर्माण नहीं था।
न्यास को आगे—
मंदिर निर्माण,
धन-संग्रह,
भूमि और परिसर प्रबंधन,
धार्मिक व्यवस्था,
श्रद्धालुओं की सुविधाएँ,
निर्माण एजेंसियों से समन्वय,
तथा भविष्य में विशाल मंदिर परिसर के संचालन
की जिम्मेदारी संभालनी थी।
45.27 आंदोलन का संगठनात्मक स्वभाव क्यों बदल गया?
9 नवंबर 2019 से पहले आंदोलन का मूल उद्देश्य था—
विवादित जन्मभूमि पर राम मंदिर निर्माण का अधिकार प्राप्त करना।
निर्णय के बाद वह लक्ष्य विधिक रूप से प्राप्त हो चुका था।
अब प्रश्न था—
मंदिर कैसा बनेगा?
कितने समय में बनेगा?
धन कहाँ से आएगा?
निर्माण किस संस्था के माध्यम से होगा?
धार्मिक परंपराओं और आधुनिक प्रशासन में संतुलन कैसे बनेगा?
इसलिए आंदोलन की प्रकृति अनिवार्य रूप से बदलनी थी।
जहाँ पहले—
सभा, यात्रा, धर्म संसद, शिलापूजन और कारसेवा
मुख्य साधन थे,
अब—
न्यास, वास्तु योजना, निर्माण अभियंत्रण, वित्तीय व्यवस्था और प्रशासन
केंद्र में आने लगे।
45.28 क्या 9 नवंबर 2019 को राम मंदिर आंदोलन समाप्त हो गया?
ऐतिहासिक दृष्टि से इसका उत्तर दो भागों में देना चाहिए।
जिस मूल उद्देश्य के लिए आधुनिक राम जन्मभूमि आंदोलन खड़ा हुआ था—विवादित जन्मस्थान पर मंदिर निर्माण—उसका न्यायिक मार्ग खुल गया था।
राम मंदिर आंदोलन ने भारतीय राजनीति, हिंदू धार्मिक संगठनों, चुनावी समीकरणों, राष्ट्रीय पहचान की बहस, धर्मनिरपेक्षता की व्याख्या और सांस्कृतिक राजनीति को जिस प्रकार प्रभावित किया, उसका प्रभाव निर्णय के बाद भी जारी रहा।
अर्थात—
आंदोलन समाप्त हुआ, उसकी विरासत नहीं।
45.29 आंदोलन से संस्था तक
राम मंदिर आंदोलन की लगभग चार दशक लंबी आधुनिक यात्रा को यदि कुछ चरणों में समझें तो वह इस प्रकार दिखाई देती है—
1980 का दशक — धार्मिक-सांस्कृतिक लामबंदी।
1989–1992 — व्यापक राजनीतिक जनांदोलन।
1992 के बाद — न्यायिक, राजनीतिक और वैचारिक संघर्ष।
2010 — इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय।
2011–2019 — सर्वोच्च न्यायालय में अंतिम न्यायिक संघर्ष।
9 नवंबर 2019 — भूमि विवाद का अंतिम निर्णय।
5 फरवरी 2020 — मंदिर निर्माण के लिए न्यास।
इसके बाद शुरू हुआ नया युग—
निर्माण, प्रबंधन और अयोध्या के पुनर्विकास का।
45.30 निर्णय का संवैधानिक महत्व
अयोध्या निर्णय का मूल्यांकन केवल धार्मिक विवाद के समाधान के रूप में करना पर्याप्त नहीं होगा।
इसने भारतीय संविधान के सामने उपस्थित कई कठिन प्रश्नों को छुआ।
पहला प्रश्न था—
क्या न्यायालय धार्मिक आस्था की सत्यता तय कर सकता है?
न्यायालय ने इससे दूरी रखी।
दूसरा—
क्या धार्मिक आस्था संपत्ति अधिकार का स्वतः प्रमाण है?
न्यायालय ने ऐसा नहीं माना।
तीसरा—
क्या ऐतिहासिक अन्याय का समाधान आधुनिक न्यायालय कर सकता है?
न्यायालय ने केवल उसके सामने मौजूद दीवानी मुकदमों और उपलब्ध विधिक अधिकारों का निर्णय करने का रास्ता अपनाया।
चौथा—
यदि किसी पक्ष के साथ गैरकानूनी कार्रवाई हुई हो, तो क्या न्यायालय प्रतिपूर्ति कर सकता है?
पाँच एकड़ वैकल्पिक भूमि की व्यवस्था इसी व्यापक सिद्धांत से जुड़ी दिखाई देती है।
45.31 फैसले की आलोचना
इतने बड़े निर्णय पर आलोचना होना स्वाभाविक था।
कुछ विधि विशेषज्ञों ने प्रश्न उठाया कि—
यदि 1949 और 1992 की कार्रवाइयों को कानून-विरुद्ध माना गया, तो भूमि रामलला को क्यों मिली?
दूसरी ओर निर्णय के समर्थकों ने कहा कि भूमि का स्वामित्व उन घटनाओं के पुरस्कार के रूप में नहीं दिया गया, बल्कि दीवानी मुकदमे में उपलब्ध समस्त साक्ष्यों की तुलनात्मक शक्ति के आधार पर तय किया गया।
यही अंतर महत्वपूर्ण है।
न्यायालय ने 1992 के ध्वंस को भूमि अधिकार का आधार नहीं बनाया।
उसने उससे स्वतंत्र रूप से—
ऐतिहासिक कब्जे, पूजा और साक्ष्यों
का परीक्षण किया।
45.32 इतिहास और न्यायालय की सीमाएँ
अयोध्या निर्णय ने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न सामने रखा—
क्या न्यायालय इतिहास लिख सकता है?
उत्तर है—न्यायालय इतिहासकार का स्थान नहीं लेता।
इतिहासकार का उद्देश्य अतीत की यथासंभव व्यापक व्याख्या करना है।
न्यायालय का उद्देश्य उसके सामने उपस्थित पक्षों के विधिक अधिकार तय करना है।
इसलिए अयोध्या निर्णय को इतिहास की अंतिम पुस्तक नहीं माना जाना चाहिए।
यह अयोध्या की अंतिम न्यायिक व्यवस्था है।
इतिहास संबंधी विमर्श इससे कहीं बड़ा है और आगे भी चलता रहेगा।
45.33 राम मंदिर आंदोलन के लिए निर्णय का वास्तविक अर्थ
राम मंदिर आंदोलन ने चार दशकों तक जिस एक वाक्य को अपना केंद्रीय लक्ष्य बनाया था—
9 नवंबर 2019 के बाद उसमें मूल परिवर्तन आ गया।
अब प्रश्न यह नहीं रह गया था कि—
मंदिर वहीं बनेगा या नहीं।
न्यायालय ने उसका उत्तर दे दिया था।
अब प्रश्न था—
यहीं से राम जन्मभूमि आंदोलन के इतिहास का आंदोलनकारी अध्याय समाप्त होकर निर्माण का अध्याय आरंभ होता है।
45.34 9 नवंबर 2019 का ऐतिहासिक स्थान
1850 के दशक के संघर्ष,
1885 के मुकदमे,
1934 के दंगे,
1949 में रामलला की मूर्तियों की स्थापना,
1950 के मुकदमे,
1959 में निर्मोही अखाड़े का दावा,
1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड का मुकदमा,
1986 में ताला खुलना,
1989 में शिलान्यास,
1990 की रथयात्रा और कारसेवा,
6 दिसंबर 1992 का ध्वंस,
2003 की पुरातात्त्विक खुदाई,
2010 का इलाहाबाद उच्च न्यायालय निर्णय—
इन सभी घटनाओं की लंबी श्रृंखला अंततः 9 नवंबर 2019 तक पहुँची।
इसी कारण यह तिथि राम जन्मभूमि आंदोलन के इतिहास में केवल एक न्यायिक फैसला नहीं—
सवा सौ वर्ष से अधिक पुराने भूमि-विवाद के न्यायिक समापन और आधुनिक राम मंदिर आंदोलन के मूल लक्ष्य की सिद्धि का निर्णायक दिन बन गई।
45.35 निष्कर्ष
अयोध्या का संघर्ष कई पीढ़ियों तक चला।
कभी वह स्थानीय पूजा-अधिकार का विवाद था।
कभी दीवानी मुकदमा।
कभी धार्मिक आंदोलन।
कभी राष्ट्रीय राजनीतिक प्रश्न।
कभी सड़क पर जनांदोलन।
कभी संसद और चुनाव का मुद्दा।
और अंततः वह सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ के सामने एक जटिल संपत्ति-विवाद के रूप में पहुँचा।
9 नवंबर 2019 के निर्णय ने इस लंबे संघर्ष की दिशा बदल दी।
न्यायालय ने विवादित भूमि रामलला विराजमान को दी, मुस्लिम समुदाय के लिए पाँच एकड़ वैकल्पिक भूमि सुनिश्चित की और केंद्र सरकार को मंदिर निर्माण के लिए न्यास गठित करने का आदेश दिया।
5 फरवरी 2020 को श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र की स्थापना की घोषणा ने उस आदेश को संस्थागत रूप दिया। न्यास को मंदिर निर्माण संबंधी निर्णय लेने की स्वतंत्रता और लगभग 67.703 एकड़ अधिगृहीत भूमि हस्तांतरित करने का निर्णय हुआ।
इसी बिंदु पर अयोध्या के इतिहास में एक युग समाप्त हुआ और दूसरा प्रारंभ हुआ।
पहले प्रश्न था—जन्मभूमि किसे मिलेगी?
अब प्रश्न था—उस जन्मभूमि पर नया राम मंदिर किस प्रकार आकार लेगा?
यहीं से अगला चरण शुरू होता है—