राजीव गांधी, ‘रामराज्य’ और 1989 का चुनावी संदर्भ : कांग्रेस की अयोध्या रणनीति का निर्णायक मोड़
रामशिला, राजनीति और निर्णायक लामबंदी
1989 का वर्ष अयोध्या आंदोलन और भारतीय चुनावी राजनीति के विलय का वर्ष था। उसी वर्ष भाजपा ने पालमपुर प्रस्ताव के माध्यम से राम जन्मभूमि को अपनी औपचारिक राजनीतिक प्रतिबद्धता बनाया, विहिप ने रामशिला अभियान चलाया, 9 नवंबर को शिलान्यास हुआ और कुछ ही सप्ताह बाद लोकसभा चुनाव हुए। इसी चुनावी संदर्भ में राजीव गांधी और कांग्रेस द्वारा “रामराज्य” की भाषा का उपयोग विशेष रूप से चर्चित हुआ।
बाद की राजनीतिक स्मृति में अक्सर यह कहा जाता है कि राजीव गांधी ने 1989 का चुनाव अभियान अयोध्या से शुरू किया और रामराज्य की स्थापना का आह्वान किया। इस कथन का मूल ऐतिहासिक आधार है, लेकिन इसकी भाषा और स्थान को लेकर सावधानी आवश्यक है। अनेक बाद के स्रोत “अयोध्या” कहते हैं, जबकि कुछ अधिक विशिष्ट विवरण “फैजाबाद” का उल्लेख करते हैं। तत्कालीन अयोध्या और फैजाबाद राजनीतिक-प्रशासनिक रूप से एक ही व्यापक निर्वाचन और जनसभा क्षेत्र से जुड़े थे। इसलिए शोध की अधिक सुरक्षित भाषा होगी—राजीव गांधी ने 1989 के चुनाव अभियान के आरंभिक चरण में फैजाबाद-अयोध्या क्षेत्र से एक महत्वपूर्ण सभा की, जिसमें ‘रामराज्य’ का संदर्भ दिया गया। बाद की संसदीय बहसों में भी यह तथ्य बार-बार विपक्ष द्वारा उठाया गया।
इस दावे की बाद के अनेक स्रोत पुष्टि करते हैं। *इंडिया टुडे* में मार्क टली ने लिखा कि राजीव गांधी ने 1989 के चुनाव अभियान की शुरुआत फैजाबाद से की और वहां रामराज्य की बात कही।
*इंडियन एक्सप्रेस* के एक बाद के विश्लेषण ने भी लिखा कि राजीव गांधी ने 1989 के चुनाव अभियान की शुरुआत अयोध्या से की।
1991 की लोकसभा बहस में भी यह आरोप सीधे सामने आया कि राजीव गांधी ने अयोध्या से चुनाव अभियान प्रारंभ कर “रामराज्य” का नारा दिया था। कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर ने जवाब दिया कि रामराज्य महात्मा गांधी की अवधारणा थी और उसे सांप्रदायिक नहीं माना जाना चाहिए।
इसलिए मूल घटना पर पर्याप्त सहमति है।
यह एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण तथ्यगत प्रश्न है।
1989 के समय प्रशासनिक नगर और धार्मिक नगर की पहचान अलग थी—
फैजाबाद जिला मुख्यालय और व्यापक राजनीतिक नगर था।
अयोध्या धार्मिक नगर।
दोनों एक-दूसरे से सटे थे और राष्ट्रीय राजनीति में अक्सर “अयोध्या” नाम व्यापक प्रतीक के रूप में उपयोग होता था।
इसीलिए बाद के स्रोत कभी “अयोध्या”, कभी “फैजाबाद” लिखते हैं।
शोध में अधिक सटीक वाक्य होगा—
इससे स्रोतों की भिन्नता भी समाहित हो जाती है।
“रामराज्य” केवल राम मंदिर आंदोलन की राजनीतिक भाषा नहीं थी।
महात्मा गांधी भी रामराज्य शब्द का उपयोग करते थे, लेकिन उसका अर्थ उनके लिए धार्मिक शासन नहीं, बल्कि—
न्याय,
नैतिक शासन,
गरीब की सुरक्षा,
समानता,
और लोककल्याण—
से था।
इसीलिए 1991 की संसदीय बहस में जब विपक्ष ने राजीव गांधी के रामराज्य नारे को सांप्रदायिक राजनीति से जोड़ा, तब मणिशंकर अय्यर ने कहा कि यह महात्मा गांधी की अवधारणा थी और इसे धार्मिक सांप्रदायिक नारे की तरह नहीं पढ़ा जाना चाहिए।
यानी कांग्रेस की अपनी व्याख्या थी—
रामराज्य = गांधीवादी सुशासन।
क्योंकि समय बदल चुका था।
यदि कांग्रेस 1970 के दशक में “रामराज्य” कहती, तो उसका अर्थ मुख्यतः गांधीवादी शासन माना जा सकता था।
लेकिन 1989 में—
राम जन्मभूमि आंदोलन चरम पर था।
रामशिला अभियान चल चुका था।
भाजपा पालमपुर प्रस्ताव पारित कर चुकी थी।
शिलान्यास होने वाला था।
विहिप “राम मंदिर” को जनांदोलन बना चुकी थी।
ऐसे समय राजीव गांधी द्वारा अयोध्या-फैजाबाद क्षेत्र से “रामराज्य” की भाषा अपनाना अनिवार्य रूप से एक नया राजनीतिक अर्थ ग्रहण करता था।
यही संदर्भ इसे विवादास्पद बनाता है।
नहीं।
कांग्रेस ने पालमपुर जैसा प्रस्ताव पारित नहीं किया था।
उसने यह नहीं कहा कि राम जन्मस्थान हिंदुओं को कानून बनाकर सौंप दिया जाए।
उसकी औपचारिक स्थिति अभी भी अधिक अस्पष्ट और संतुलनकारी थी—
न्यायिक प्रक्रिया,
धार्मिक भावना,
बातचीत,
और प्रशासनिक समझौते—
इन सबके बीच।
इसलिए “कांग्रेस 1989 में भाजपा बन गई थी” कहना गलत होगा।
लेकिन यह भी सही है कि उसने राम-संबंधी सांस्कृतिक भाषा से दूरी नहीं रखी।
9 नवंबर 1989 को शिलान्यास हुआ।
कुछ ही सप्ताह बाद 22 से 26 नवंबर के बीच लोकसभा चुनाव हुए। 1989 के चुनाव में लगभग 49.89 करोड़ मतदाता पात्र थे और मतदान लगभग 62 प्रतिशत हुआ। कांग्रेस 197 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी रही, लेकिन बहुमत से बहुत दूर चली गई; जनता दल 143 और भाजपा 85 सीटों पर पहुंची।
इसलिए शिलान्यास और चुनाव के बीच समयांतराल बेहद छोटा था।
ऐसी स्थिति में शिलान्यास को चुनावी राजनीति से पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता।
यह अभी भी व्याख्या का विषय है।
आलोचक कहते हैं—
राजीव सरकार बोफोर्स, भ्रष्टाचार-विरोधी लहर और भाजपा-विहिप के बढ़ते प्रभाव से दबाव में थी।
उसे भय था कि हिंदू धार्मिक मतदाता भाजपा की ओर जा सकते हैं।
इसलिए उसने शिलान्यास रोकने के बजाय नियंत्रित अनुमति दी।
समर्थक पक्ष कह सकता है—
सरकार ने अदालत के यथास्थिति आदेश का पालन करते हुए केवल उस स्थान पर धार्मिक अनुष्ठान की अनुमति दी जिसे प्रशासन ने विवादित क्षेत्र से बाहर माना।
दोनों दृष्टिकोण मौजूद हैं।
लेकिन यह निर्विवाद है कि शिलान्यास चुनाव से ठीक पहले हुआ और उसका राजनीतिक प्रभाव पड़ा।
कांग्रेस के सामने चार संकट एक साथ थे—
बोफोर्स से नैतिक विश्वसनीयता पर आघात।
वी. पी. सिंह भ्रष्टाचार-विरोधी चुनौती के केंद्रीय नेता बन चुके थे।
भाजपा हिंदू धार्मिक मुद्दे पर स्पष्ट हो रही थी।
शाहबानो के बाद कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप था।
ऐसे में कांग्रेस यह नहीं चाहती थी कि भाजपा यह दावा कर सके—
“राम पर केवल हम बोलते हैं; कांग्रेस राम-विरोधी है।”
रामराज्य की भाषा इसी राजनीतिक आवश्यकता में भी समझी जा सकती है।
कांग्रेस की पुरानी राजनीति धार्मिक प्रतीकों से पूर्ण दूरी की नहीं थी।
उसने लंबे समय तक—
गांधी का रामराज्य,
धार्मिक यात्राओं में भागीदारी,
संतों से संपर्क,
और धार्मिक बहुलता—
को राष्ट्रीय संस्कृति का हिस्सा माना।
1989 में उसका संकट यह था कि भाजपा इस सांस्कृतिक क्षेत्र को एक अधिक स्पष्ट राजनीतिक दिशा दे रही थी।
इसलिए कांग्रेस का प्रयास संभवतः यह था—
राम को भाजपा के एकाधिकार का प्रतीक न बनने दिया जाए।
क्योंकि भाजपा की स्थिति सरल थी—
राम जन्मभूमि हिंदुओं को दो।
मंदिर बनाओ।
कांग्रेस की स्थिति जटिल थी—
अदालत भी,
मुस्लिम पक्ष भी,
हिंदू भावना भी,
कानून-व्यवस्था भी,
चुनावी संतुलन भी।
राजनीति में सरल संदेश अक्सर जटिल संतुलन पर भारी पड़ता है।
यही 1989 में कांग्रेस की बड़ी कमजोरी बनी।
भाजपा का तर्क था—
शाहबानो में कांग्रेस मुस्लिम धार्मिक नेतृत्व के दबाव में झुकी।
अयोध्या में हिंदू मतदाता के दबाव में रामराज्य और शिलान्यास की भाषा अपनाई।
1989 के बाद संसद में भाजपा नेताओं ने कांग्रेस पर यही आरोप लगाया कि वह हिंदुओं के सामने एक और मुसलमानों के सामने दूसरी भाषा बोलती है। दिसंबर 1989 की लोकसभा बहस में इसी प्रकार “दोहरी नीति” की आलोचना दर्ज है।
यही “छद्म धर्मनिरपेक्षता” की भाजपा की राजनीतिक भाषा को बल देता गया।
कांग्रेस का तर्क अलग था।
उसके लिए—
शाहबानो = व्यक्तिगत विधि का प्रश्न।
अयोध्या = न्यायालय, धार्मिक भावना और वार्ता का प्रश्न।
रामराज्य = गांधीवादी सुशासन।
इसलिए कांग्रेस कह सकती थी कि विपक्ष ने तीन अलग प्रश्नों को जोड़कर “तुष्टीकरण” की कहानी बनाई।
यह तर्क पूरी तरह आधारहीन नहीं था।
लेकिन जनधारणा में तीनों घटनाएं आपस में जुड़ चुकी थीं।
चुनाव में न्यायिक सूक्ष्मता नहीं, राजनीतिक छवि निर्णायक होती है।
मतदाता यह नहीं पढ़ रहा था कि—
7 नवंबर के उच्च न्यायालय आदेश की भूमि-सीमा क्या थी।
वह यह देख रहा था—
ताला कांग्रेस राज में खुला।
शिलान्यास कांग्रेस राज में हुआ।
राजीव रामराज्य बोल रहे हैं।
और भाजपा खुले तौर पर मंदिर के साथ खड़ी है।
इससे कांग्रेस की पहचान अस्पष्ट और भाजपा की स्पष्ट दिख सकती थी।
“मृदु हिंदुत्व” शब्द बाद की राजनीतिक भाषा है।
1989 पर इसे सीधे लागू करते समय सावधानी चाहिए।
लेकिन यदि इसका अर्थ लिया जाए—
हिंदू धार्मिक प्रतीकों को भाजपा के हवाले न छोड़ना और स्वयं भी सांस्कृतिक हिंदू भाषा का उपयोग करना—
तो राजीव काल की 1989 की रणनीति में इसके कुछ तत्व दिखाई देते हैं।
फिर भी कांग्रेस की घोषित विचारधारा हिंदुत्व नहीं थी।
इसलिए यह विश्लेषणात्मक शब्द है, आधिकारिक नीति नहीं।
यहां एक दिलचस्प वैचारिक परिवर्तन दिखता है।
गांधी के रामराज्य में—
नैतिक शासन प्रमुख था।
1989 के चुनावी वातावरण में—
राम नाम स्वयं अयोध्या विवाद से जुड़ चुका था।
इसलिए वही शब्द अब दो अर्थ वहन कर रहा था—
सुशासन और गांधीवादी आदर्श।
राम मंदिर राजनीति के प्रभाव में हिंदू मतदाता को आकर्षित करने का प्रयास।
यही दोहरा अर्थ इस शब्द की राजनीतिक शक्ति बन गया।
उपलब्ध प्रमुख स्रोतों से ऐसा स्पष्ट और निर्विवाद वाक्य सामने नहीं आता कि उन्होंने चुनावी सभा में कहा हो—
“हम विवादित भूमि पर राम मंदिर बनवाएंगे।”
बाद के संसदीय और पत्रकारिता स्रोत मुख्यतः “रामराज्य” के नारे और अभियान की शुरुआत को दर्ज करते हैं।
इसलिए रामराज्य को सीधे “मंदिर निर्माण की प्रतिज्ञा” में बदल देना तथ्य से आगे जाएगा।
यह प्रश्न अधिक जटिल है।
कांग्रेस सरकार ने कार्यक्रम रोका नहीं।
गृह मंत्री बूटा सिंह और उत्तर प्रदेश सरकार बातचीत में सक्रिय थे।
इससे कांग्रेस के पास यह कहने की राजनीतिक गुंजाइश थी कि उसने धार्मिक भावना का सम्मान किया।
लेकिन विहिप और भाजपा ने आंदोलन की वास्तविक सामाजिक और राजनीतिक ऊर्जा का श्रेय स्वयं लिया।
इसलिए शिलान्यास का राजनीतिक लाभ कांग्रेस के हाथ स्थायी रूप से नहीं आया।
1989 का कांग्रेस अभियान केवल राम या अयोध्या पर नहीं था।
*इंडिया टुडे* की तत्कालीन चुनावी रिपोर्ट के अनुसार राजीव गांधी स्वयं को राष्ट्रीय एकता और देश को विघटन से बचाने वाले नेतृत्व के रूप में प्रस्तुत कर रहे थे।
उनके सामने—
पंजाब,
कश्मीर,
श्रीलंका,
भ्रष्टाचार,
विपक्षी गठबंधन—
जैसे बड़े मुद्दे भी थे।
इसलिए अयोध्या को पूरे कांग्रेस चुनाव अभियान का अकेला विषय कहना गलत होगा।
क्योंकि वह प्रतीकात्मक थी।
जब चुनाव अभियान की शुरुआत ही राम से जुड़े क्षेत्र में हो—
और उसी समय शिलान्यास हुआ हो—
तो यह घटना बाकी भाषणों से अधिक स्मृति में रहती है।
राजनीतिक इतिहास अक्सर ऐसे ही प्रतीकों को याद रखता है।
1984 में वे अभूतपूर्व बहुमत के साथ आए थे।
1989 तक वह चमक काफी घट चुकी थी।
*इंडिया टुडे* की नवंबर 1989 की तत्कालीन रिपोर्ट ने उन्हें पहले जैसा करिश्माई नेता न रहने और वी. पी. सिंह को अधिक प्रभावी प्रचारक के रूप में उभरते दिखाया।
यानी रामराज्य का संदर्भ ऐसे समय आया जब कांग्रेस अपने राजनीतिक आधार को बचाने के लिए कई दिशाओं में संघर्ष कर रही थी।
बोफोर्स केवल एक रक्षा खरीद विवाद नहीं रहा था।
वी. पी. सिंह ने इसे राजीव गांधी सरकार की विश्वसनीयता पर सीधा हमला बना दिया।
1989 के चुनाव में भ्रष्टाचार-विरोधी भावना एक प्रमुख कारक थी।
इसलिए केवल धार्मिक प्रतीकों के उपयोग से कांग्रेस के व्यापक राजनीतिक नुकसान की भरपाई संभव नहीं थी।
वी. पी. सिंह का मुख्य संदेश राम मंदिर नहीं था।
उनका सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार था—
भ्रष्टाचार-विरोध,
कांग्रेस-विरोध,
और विपक्षी एकता।
इससे 1989 चुनाव त्रिकोणीय बन गया—
कांग्रेस बनाम जनता दल और भाजपा का तेजी से बढ़ता स्वतंत्र वैचारिक आधार।
इसमें अयोध्या ने भाजपा को विशिष्ट पहचान दी।
1989 में भाजपा 2 से बढ़कर 85 सीटों पर पहुंची। जनता दल को 143 और कांग्रेस को 197 सीटें मिलीं।
यह भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति में निर्णायक छलांग थी।
लेकिन जैसा पिछले अध्याय में स्पष्ट किया गया—
इसका पूरा श्रेय अयोध्या को नहीं दिया जा सकता।
फिर भी अयोध्या ने भाजपा को वह वैचारिक पहचान दी जो जनता दल से उसे अलग करती थी।
1984 में कांग्रेस 414 सीटों पर थी।
1989 में वह 197 पर आ गई।
यह केवल अयोध्या की हार नहीं थी।
लेकिन परिणाम ने एक बात साफ कर दी—
रामराज्य की भाषा और शिलान्यास की अनुमति कांग्रेस को बहुमत बचाने में मदद नहीं कर सकी।
उसने पहली बार यह दिखाया कि—
हिंदू सांस्कृतिक प्रश्न,
राष्ट्रवाद,
कांग्रेस-विरोध,
और संगठनात्मक नेटवर्क—
को मिलाकर वह राष्ट्रीय शक्ति बन सकती है।
पालमपुर और रामशिला के बाद 85 सीटें यह संकेत थीं कि राम जन्मभूमि का मुद्दा केवल सामाजिक आंदोलन नहीं रहा।
अब उसका चुनावी प्रतिफल भी दिखाई देने लगा था।
अभी नहीं।
1991 में उत्तर प्रदेश और 1990 की रथयात्रा के बाद राम मुद्दा कहीं अधिक स्पष्ट चुनावी लहर का रूप लेगा।
1989 में चुनाव का चरित्र बहुआयामी था।
भ्रष्टाचार-विरोध,
कांग्रेस-विरोध,
विपक्षी गठबंधन,
अयोध्या—
सभी साथ थे।
इसलिए 1989 को “पहली बड़ी भाजपा छलांग” कहना सही है, “पूरी तरह राम लहर” कहना अतिशयोक्ति।
उन्होंने संभवतः सोचा होगा—
रामराज्य की भाषा से हिंदू मतदाता को संदेश जाएगा कि कांग्रेस राम-विरोधी नहीं।
शाहबानो कानून से मुस्लिम धार्मिक नेतृत्व को भरोसा रहेगा।
लेकिन दोनों तरफ परिणाम उलटे हो सकते थे—
हिंदू मतदाता पूछता—यदि राम इतने महत्वपूर्ण हैं तो मंदिर पर स्पष्ट नीति क्यों नहीं?
मुस्लिम मतदाता पूछता—यदि मस्जिद का मुकदमा लंबित है तो शिलान्यास क्यों?
यही कांग्रेस की मध्य स्थिति का संकट था।
यह लोकप्रिय राजनीतिक भाषा है।
अधिक विश्लेषणात्मक शब्द होगा—
बहु-सामुदायिक गठबंधन को बनाए रखने की संतुलनकारी रणनीति।
कांग्रेस की ऐतिहासिक शक्ति ही यही थी कि वह अलग-अलग समुदायों को एक छतरी में रखती थी।
1980 के दशक के अंत में यही शक्ति उसकी कमजोरी बनने लगी।
क्योंकि समुदाय स्वतंत्र राजनीतिक संगठनों की ओर जा रहे थे।
विश्व हिंदू परिषद–राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ–भारतीय जनता पार्टी ने हिंदू धार्मिक मांग के लिए एक स्पष्ट संस्थागत ढांचा बना दिया था।
अब हिंदू मतदाता को कांग्रेस के भीतर अपनी धार्मिक अपेक्षा व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं थी।
उसके पास एक वैकल्पिक मंच था।
यही कांग्रेस के लिए दीर्घकालीन खतरा था।
दूसरी ओर बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी, मुस्लिम पर्सनल लॉ नेतृत्व और आगे क्षेत्रीय दलों के उभार ने मुस्लिम मतदाता को भी कांग्रेस से बाहर विकल्प दिए।
उत्तर प्रदेश में यही प्रक्रिया आगे समाजवादी राजनीति को लाभ देगी।
इस प्रकार अयोध्या ने कांग्रेस के दोनों प्रमुख सामाजिक आधारों को धीरे-धीरे वैकल्पिक दिशाओं में धकेला।
यह भी याद रखना चाहिए कि कांग्रेस का राम से संबंध 1989 में अचानक नहीं बना।
महात्मा गांधी की राजनीतिक-नैतिक भाषा में रामनाम और रामराज्य का विशेष स्थान था।
इसलिए कांग्रेस नेताओं के लिए रामराज्य शब्द वैचारिक रूप से बाहरी नहीं था।
लेकिन 1989 का संदर्भ उसे नया चुनावी अर्थ दे रहा था।
1991 में जब कांग्रेस पर आरोप लगा कि राजीव गांधी ने अयोध्या से रामराज्य का नारा देकर चुनावी सांप्रदायिकता की, तब मणिशंकर अय्यर ने कहा—
यह महात्मा गांधी का नारा था; एक धर्मनिरपेक्ष कथन को सांप्रदायिक क्यों बनाया जाए?
यह कांग्रेस की स्वयं की ऐतिहासिक व्याख्या का महत्वपूर्ण दस्तावेजी प्रमाण है।
क्योंकि विपक्ष शब्द नहीं, संदर्भ देख रहा था।
यदि राम जन्मभूमि आंदोलन न चल रहा होता—
तो गांधीवादी रामराज्य की व्याख्या अधिक स्वीकार्य होती।
लेकिन शिलान्यास और चुनावी अयोध्या के बीच उसी शब्द का उपयोग राजनीतिक रूप से तटस्थ नहीं रह सकता था।
यही बहस आज तक जारी है।
1980 के दशक के अंत में कांग्रेस ने धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों से पूर्ण दूरी नहीं रखी।
अयोध्या इसका सबसे चर्चित उदाहरण बन गया।
इससे कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता की उस शैली पर प्रश्न उठे जिसमें राज्य धार्मिक समुदायों से संवाद भी करता था और उनके प्रतीकों से कभी-कभी सार्वजनिक संबंध भी रखता था।
सभी धर्मों से समान सम्मान और संपर्क।
समान सम्मान के नाम पर अल्पसंख्यक तुष्टीकरण और बहुसंख्यक उपेक्षा।
1989 का रामराज्य विवाद इसी वैचारिक संघर्ष का हिस्सा था।
सिर्फ शब्द का उपयोग अपने-आप संवैधानिक उल्लंघन नहीं।
राजनीतिक नेता धार्मिक-सांस्कृतिक रूपकों का उपयोग कर सकते हैं।
सवाल तब उठता है जब—
राज्य नीति,
धार्मिक पक्षपात,
या चुनावी धर्म-आधारित अपील—
कानूनी सीमाओं से टकराए।
राजीव के 1989 भाषण को केवल “रामराज्य” शब्द के कारण स्वतः गैर-कानूनी कहना उचित नहीं।
भारत के चुनावी कानून में धर्म के आधार पर वोट मांगने पर प्रतिबंध हैं।
लेकिन किसी सांस्कृतिक या नैतिक रूपक का प्रयोग और सीधे धार्मिक पहचान पर वोट मांगना एक ही बात नहीं।
“रामराज्य” को गांधीवादी सुशासन के अर्थ में प्रस्तुत किया जाए तो उसका कानूनी चरित्र अलग होगा।
इसलिए बिना मूल भाषण के विस्तृत शब्दशः परीक्षण के चुनावी अपराध का निष्कर्ष देना अनुचित होगा।
यही इस विषय की एक शोध सीमा है।
बाद के पत्रकारिता और संसदीय स्रोत इस घटना का उल्लेख करते हैं, लेकिन 1989 की उस विशेष जनसभा का पूर्ण आधिकारिक भाषण-पाठ आसानी से उपलब्ध सार्वजनिक संसदीय अभिलेख का हिस्सा नहीं है, क्योंकि वह संसद का भाषण नहीं, चुनावी सभा थी।
इसलिए शब्दशः उद्धरणों के मामले में सावधानी आवश्यक है।
इतना सुरक्षित है—
राजीव गांधी ने 1989 के चुनाव अभियान के आरंभिक चरण में फैजाबाद-अयोध्या क्षेत्र में सभा की।
उससे “रामराज्य” का राजनीतिक संदर्भ जुड़ा।
बाद के संसदीय अभिलेखों और अनेक पत्रकारिता स्रोतों ने इस घटना को दर्ज किया।
यह शोध के लिए पर्याप्त ठोस आधार है।
जब तक पूर्ण मूल भाषण में ऐसा स्पष्ट वाक्य न मिले—
नहीं।
यह अत्यधिक विस्तार होगा।
रामराज्य और राम मंदिर एक ही बात नहीं।
इस भेद को बनाए रखना आवश्यक है।
इसे तीन स्तरों में समझा जा सकता है—
शिलान्यास को नियंत्रित अनुमति।
रामराज्य की भाषा।
हिंदू धार्मिक भावना से पूर्ण दूरी न बनाना।
इन तीनों ने मिलकर कांग्रेस की अयोध्या नीति की एक विशिष्ट छवि बनाई।
ऐसा कोई प्रमाणित दस्तावेज उपलब्ध नहीं जो बताए कि कांग्रेस ने 1989 में कोई लंबी अवधि की “राम रणनीति” बनाई थी।
अधिक संभव यह है कि पार्टी तत्काल राजनीतिक दबावों से निपट रही थी—
शाहबानो,
बोफोर्स,
विश्व हिंदू परिषद,
भारतीय जनता पार्टी,
मुस्लिम प्रतिक्रिया,
और चुनाव।
यानी नीति अधिक प्रतिक्रियात्मक दिखाई देती है, दीर्घकालीन वैचारिक परियोजना कम।
भाजपा 1989 में राम जन्मभूमि को अपनी वैचारिक दिशा से जोड़ रही थी।
कांग्रेस उसे तत्काल राजनीतिक संतुलन के रूप में संभाल रही थी।
दीर्घकाल में स्पष्ट वैचारिक स्थिति अक्सर तात्कालिक संतुलन से अधिक टिकाऊ होती है।
यही अयोध्या पर दोनों पार्टियों की राजनीतिक दिशा में बड़ा अंतर बना।
आलोचनात्मक विश्लेषण में यह कहा जाता है कि—
ताला खुलवाने,
शिलान्यास की अनुमति,
रामराज्य की भाषा—
ने राम मंदिर मुद्दे को मुख्यधारा की वैध राजनीति में जगह दी।
यदि कांग्रेस स्वयं धार्मिक प्रतीक को स्वीकार कर रही थी, तो भाजपा की भाषा पूरी तरह “हाशिये की” नहीं रह सकती थी।
यह तर्क महत्वपूर्ण है।
लेकिन आंदोलन 1984 से स्वतंत्र रूप से बढ़ रहा था, इसलिए सारी मुख्यधाराकरण का श्रेय कांग्रेस को देना भी गलत होगा।
विहिप के लिए कांग्रेस पूर्ण मित्र नहीं थी।
उसकी मांग केवल शिलान्यास नहीं—
पूरा मंदिर निर्माण था।
इसलिए कांग्रेस की सीमित अनुमति उसके लिए एक चरण हो सकती थी, अंतिम समाधान नहीं।
यही कारण है कि बाद में आंदोलन कांग्रेस के प्रति नरम नहीं हुआ।
भाजपा के लिए राजीव गांधी विरोधाभास का प्रतीक बने—
शाहबानो में एक दिशा,
अयोध्या में दूसरी।
इससे पार्टी ने “छद्म धर्मनिरपेक्षता” का अपना आक्रामक तर्क मजबूत किया।
1989 के बाद संसद में भी कांग्रेस की इस कथित दोहरी नीति पर बार-बार हमला हुआ।
मुस्लिम नेतृत्व के लिए 1989 शिलान्यास और कांग्रेस की राम-संबंधी भाषा चिंताजनक थी।
उनकी दृष्टि में—
मुकदमा अभी लंबित था।
फिर भी सरकार धार्मिक बहुसंख्यक दबाव को राजनीतिक स्थान दे रही थी।
इससे कांग्रेस पर उनका भरोसा भी कमजोर हो सकता था।
क्योंकि मध्यस्थ पार्टी तभी सफल होती है जब दोनों पक्ष उसे निष्पक्ष मानें।
1989 तक—
हिंदू आंदोलनकारी कांग्रेस को अधूरा और अवसरवादी मान सकते थे।
मुस्लिम नेतृत्व उसे अविश्वसनीय मान सकता था।
यानी कांग्रेस का व्यापक गठबंधन उसी विवाद में टूट रहा था जिसे वह संतुलित करना चाहती थी।
कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई।
भाजपा 85 सीटों पर पहुंची।
जनता दल ने सरकार बनाई।
इससे इतना तो स्पष्ट है कि रामराज्य और शिलान्यास की राजनीति कांग्रेस को चुनावी पुनर्जीवन नहीं दे सकी।
लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि इन्हीं के कारण वह हारी।
बोफोर्स और व्यापक कांग्रेस-विरोधी वातावरण बहुत बड़े कारण थे।
तात्कालिक राष्ट्रीय चुनावी स्तर पर उसे सत्ता नहीं बची।
इस अर्थ में लाभ सीमित रहा।
लेकिन उसने यह भी सुनिश्चित किया कि वह राम-विरोधी पार्टी के रूप में तत्काल स्वयं को बंद न कर दे।
समस्या यह थी कि भाजपा अधिक स्पष्टता से मंदिर समर्थन का राजनीतिक लाभ ले रही थी।
1989 में जो अस्पष्टता बनी—
वही आगे नरसिंह राव काल में भी कांग्रेस को परेशान करेगी।
1992 के विध्वंस के बाद पार्टी पर उल्टा आरोप होगा—
आपने 1986 में ताला खोला,
1989 में शिलान्यास कराया,
फिर 1992 को रोक क्यों नहीं पाए?
इसलिए राजीव काल की घटनाएं कांग्रेस की दीर्घकालीन अयोध्या विरासत बन गईं।
अब अयोध्या केवल यह प्रश्न नहीं था—
मंदिर बनेगा या नहीं।
यह भी था—
कौन-सी पार्टी राम का वैध राजनीतिक प्रतिनिधित्व करती है?
कांग्रेस ने रामराज्य कहा।
भाजपा ने राम जन्मभूमि प्रस्ताव लिया।
विहिप ने शिलान्यास कराया।
यही तीनों परस्पर विरोधी दावा थे।
धार्मिक प्रतीक के चुनावी स्वामित्व की लड़ाई में भाजपा धीरे-धीरे आगे निकली।
क्योंकि उसका संदेश अधिक स्पष्ट था।
कांग्रेस का रामराज्य व्यापक गांधीवादी अर्थ रखता था।
भाजपा का राम जन्मभूमि प्रस्ताव स्पष्ट भौतिक लक्ष्य रखता था—
मंदिर।
चुनावी राजनीति में यह स्पष्टता निर्णायक बनी।
आगे भी अलग-अलग दल और नेता “रामराज्य” शब्द का उपयोग करते रहे।
इसलिए शब्द स्वयं किसी एक पार्टी की संपत्ति नहीं बना।
लेकिन अयोध्या आंदोलन के साथ उसका राजनीतिक अर्थ बदल चुका था।
अब इसे सुनते ही केवल गांधी नहीं, राम मंदिर भी स्मृति में आने लगा।
1989 इस परिवर्तन का महत्वपूर्ण वर्ष था।
पूरी तरह नहीं।
लेकिन उन्होंने राम-संबंधी भाषा को कांग्रेस की चुनावी शब्दावली में बनाए रखा।
इससे व्यापक राजनीतिक व्यवस्था में राम प्रतीक की वैधता और बढ़ी।
भाजपा इस व्यापक सांस्कृतिक वैधता को अधिक विशिष्ट मंदिर राजनीति में बदलने में सफल रही।
राजीव गांधी सामान्यतः—
कंप्यूटर,
दूरसंचार,
युवा नेतृत्व,
पंचायती राज,
बोफोर्स,
और श्रीलंका—
से जुड़े याद किए जाते हैं।
लेकिन 1986–89 की धार्मिक राजनीति भी उनकी विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
शाह बानो,
अयोध्या ताला खुलना,
शिलान्यास,
राम राज्य—
इन सबने आधुनिक भारतीय राजनीति पर दीर्घ प्रभाव डाला।
यह लोकप्रिय राजनीतिक भाषा है, लेकिन शोध के लिए बहुत सरल।
1986 में ताला जिला न्यायाधीश के आदेश से खुला।
1989 में शिलान्यास प्रशासनिक समझौते के तहत हुआ।
राजीव इन दोनों के समय प्रधानमंत्री थे।
लेकिन हर निर्णय का संस्थागत मार्ग अलग था।
इसलिए व्यक्तिगत श्रेय/दोष को सावधानी से लिखना चाहिए।
इतिहास के उपलब्ध तथ्यों से नहीं।
उन्होंने रामराज्य की भाषा अपनाई।
उनकी सरकार ने शिलान्यास पूरी तरह नहीं रोका।
इसलिए उन्हें सरल “राम विरोधी” श्रेणी में रखना तथ्यगत रूप से कठिन है।
विवाद उनकी नीति की निरंतरता और उद्देश्य को लेकर है।
यह भी अत्यधिक होगा।
उनकी सरकार ने हिंदुत्व को आधिकारिक विचारधारा नहीं बनाया।
कांग्रेस की संवैधानिक-राजनीतिक पहचान धर्मनिरपेक्ष रही।
राम-संबंधी प्रतीक का उपयोग हिंदुत्व विचारधारा स्वीकार करने के समान नहीं।
राजीव गांधी की 1989 अयोध्या नीति को इस प्रकार समझना अधिक उचित होगा—
यह न उन्हें आंदोलन का नेता बनाता है, न पूरी तरह बाहरी दर्शक।
जनवरी–फरवरी 1989 — प्रयाग धर्म संसद; मंदिर आंदोलन का नया चरण।
जून 1989 — भाजपा का पालमपुर प्रस्ताव।
सितंबर–अक्टूबर — रामशिला अभियान।
9 नवंबर — अयोध्या शिलान्यास।
चुनावी अभियान — राजीव गांधी द्वारा फैजाबाद-अयोध्या क्षेत्र से महत्वपूर्ण आरंभिक सभा; “रामराज्य” का संदर्भ बाद के संसदीय और पत्रकारिता स्रोतों में दर्ज।
22–26 नवंबर 1989 — लोकसभा मतदान।
परिणाम — कांग्रेस 197, जनता दल 143, भाजपा 85।
यह क्रम बताता है कि मंदिर और चुनाव कितने निकट आ चुके थे।
पूर्ण प्राथमिक पाठ के बिना यह दावा सिद्ध नहीं। मजबूत स्रोत “रामराज्य” के उल्लेख और फैजाबाद-अयोध्या से अभियान आरंभ को दर्ज करते हैं।
गलत।
गलत। महात्मा गांधी लंबे समय से इसका उपयोग न्यायपूर्ण और नैतिक शासन के अर्थ में करते थे; कांग्रेस ने भी यही बचाव किया।
गलत। राष्ट्रीय एकता, भ्रष्टाचार, सुरक्षा और अन्य अनेक मुद्दे भी केंद्रीय थे।
गलत। वह सत्ता से बाहर हो गई और 197 सीटों पर सिमट गई।
अतिशयोक्ति। बोफोर्स, कांग्रेस-विरोध, वी. पी. सिंह और विपक्षी समन्वय भी बड़े कारक थे।
1989 का चुनावी प्रसंग यह सिद्ध करता है कि—
पहला, राम जन्मभूमि अब मुख्यधारा की राष्ट्रीय चुनावी राजनीति में प्रवेश कर चुकी थी।
दूसरा, कांग्रेस भी राम-संबंधी सांस्कृतिक भाषा से दूरी नहीं बना रही थी।
तीसरा, भाजपा की स्थिति अधिक स्पष्ट और मंदिर-केंद्रित थी।
चौथा, कांग्रेस की संतुलनकारी रणनीति उसे चुनावी बहुमत नहीं बचा सकी।
पांचवां, अयोध्या अब केवल विहिप का धार्मिक आंदोलन नहीं—पार्टी-राजनीति का केंद्रीय विभाजक प्रश्न बन चुका था।
यह प्रसंग यह सिद्ध नहीं करता कि—
राजीव गांधी स्वयं विहिप की विचारधारा स्वीकार कर चुके थे।
कांग्रेस ने पालमपुर जैसी मंदिर नीति अपना ली थी।
शिलान्यास केवल चुनावी षड्यंत्र था।
या कांग्रेस की 1989 हार केवल अयोध्या के कारण हुई।
इतिहास में कई कारण एक साथ काम कर रहे थे।
1989 में कांग्रेस ने अयोध्या से दूरी नहीं बनाई—लेकिन उसे अपनाने की वैसी स्पष्टता भी नहीं दिखाई जैसी भाजपा ने पालमपुर में दिखाई थी।
राजीव गांधी की “रामराज्य” भाषा इसी अंतर का प्रतीक है।
कांग्रेस कह सकती थी—
रामराज्य गांधीवादी सुशासन है।
भाजपा कह सकती थी—
रामराज्य तब तक अधूरा है जब तक राम जन्मभूमि पर मंदिर नहीं बनता।
दोनों राम का नाम ले रहे थे।
लेकिन राजनीतिक अर्थ अलग थे।
यही 1989 का निर्णायक परिवर्तन था—
1986 में कांग्रेस सरकार के समय ताला खुला।
1989 में उसके समय शिलान्यास हुआ।
और उसी चुनावी वर्ष राजीव गांधी ने फैजाबाद-अयोध्या क्षेत्र में रामराज्य की भाषा अपनाई। बाद की संसदीय बहसें और पत्रकारिता स्रोत इसे बार-बार दर्ज करते हैं।
लेकिन इस पूरी प्रक्रिया का चुनावी फल कांग्रेस को नहीं मिला।
1984 की 414 सीटों वाली कांग्रेस 1989 में 197 पर आ गई। भाजपा 2 से 85 पर पहुंची और जनता दल ने सत्ता का मार्ग बनाया।
इससे एक गहरी राजनीतिक सच्चाई सामने आई—
किसी प्रतीक को कभी-कभार अपनाना और उसे दीर्घकालीन वैचारिक पहचान बनाना अलग बातें हैं।
कांग्रेस राम से दूरी नहीं चाहती थी।
भाजपा राम जन्मभूमि को अपनी राजनीतिक पहचान का केंद्र बनाने लगी थी।
1989 ने इन दोनों रास्तों का अंतर स्पष्ट कर दिया।
और चुनाव के बाद जो सरकार बनी, उसके सामने अयोध्या से भी अधिक तत्काल राजनीतिक संकट आने वाला था—
वी. पी. सिंह को एक ओर भाजपा के समर्थन की आवश्यकता थी, दूसरी ओर बाबरी मस्जिद पक्ष और धर्मनिरपेक्ष सहयोगियों का दबाव था।
अब प्रश्न चुनाव का नहीं, समझौते का था।
अगला अध्याय 42 — “1989 लोकसभा चुनाव और भाजपा की बड़ी राजनीतिक छलांग” होगा, जिसमें राज्यवार उभार, 2 से 85 सीटों की यात्रा, उत्तर प्रदेश-बिहार-राजस्थान-मध्य प्रदेश-गुजरात में प्रदर्शन, जनता दल के साथ सीट-समझौते, राम मंदिर बनाम बोफोर्स का तुलनात्मक प्रभाव और यह प्रश्न कि 1989 की भाजपा सफलता में अयोध्या का वास्तविक योगदान कितना था—इनका प्रमाणाधारित विश्लेषण किया जाएगा।