अठारहवीं–उन्नीसवीं सदी में राम जन्मभूमि विवाद के प्रारंभिक प्रमाण
आस्था, परंपरा और आरंभिक ऐतिहासिक प्रमाण
अयोध्या के इतिहास में अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी का महत्व असाधारण है, क्योंकि इसी काल में राम जन्मस्थान की धार्मिक स्मृति धीरे-धीरे अधिक स्पष्ट दस्तावेजी रूप ग्रहण करती है। सोलहवीं सदी के बाबरकालीन दावे मुख्यतः बाद की शिलालेखीय परंपरा और सीमित स्रोतों पर निर्भर हैं, लेकिन अठारहवीं सदी से हमारे पास बाहरी यात्रियों, औपनिवेशिक सर्वेक्षणों, फारसी प्रशासनिक दस्तावेजों, गजेटियरों और राजस्व रिकॉर्ड की बढ़ती हुई श्रृंखला मिलती है।
इसी कालखंड में एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन होता है। अयोध्या की धार्मिक स्मृति अब केवल तीर्थयात्रियों और स्थानीय साधु-संतों की परंपरा नहीं रहती; वह प्रशासनिक भाषा, न्यायिक रिकॉर्ड और सांप्रदायिक दावों का हिस्सा बनने लगती है।
लेकिन इस अध्याय में एक विशेष सावधानी आवश्यक है। 1855 का संघर्ष अक्सर राम जन्मभूमि के लिए पहली बड़ी लड़ाई के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। उपलब्ध समकालीन ब्रिटिश रिकॉर्ड बताते हैं कि 1855 की मुख्य हिंसक भिड़ंत वास्तव में हनुमानगढ़ी को लेकर हुई थी, न कि प्रत्यक्ष रूप से बाबरी मस्जिद/राम जन्मभूमि भूखंड के स्वामित्व पर। उस संघर्ष के दौरान बाबरी मस्जिद परिसर घटनाक्रम में जरूर आया, लेकिन दोनों को एक ही विवाद मान लेना ऐतिहासिक सरलीकरण होगा।
पिछले अध्याय में हमने जोसेफ टाइफेन्थालर का विवरण देखा। अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध तक उसके वर्णन से कम-से-कम तीन बातें सामने आती हैं—
एक, रामकोट नाम की स्थानीय स्मृति मौजूद थी।
दूसरी, तीन गुंबद वाली मुस्लिम संरचना मौजूद थी।
तीसरी, हिंदू उसी क्षेत्र को राम जन्म से जोड़कर पूजा और परिक्रमा करते थे।
यही उस युग की मूल ऐतिहासिक स्थिति है।
यानी मुस्लिम संरचना और हिंदू जन्मस्थान परंपरा एक ही भूगोल में सह-अस्तित्व में थीं।
आगे उन्नीसवीं सदी का विवाद इसी सह-अस्तित्व से विकसित हुआ।
अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध और उन्नीसवीं सदी के आरंभ में अयोध्या अवध राज्य का हिस्सा थी।
अवध के नवाबों का वास्तविक राजनीतिक केंद्र धीरे-धीरे फैजाबाद और फिर लखनऊ हो गया, जबकि अयोध्या मुख्यतः तीर्थनगर के रूप में प्रतिष्ठित रही।
इस विभाजन का सांस्कृतिक महत्व भी था।
फैजाबाद नवाबी प्रशासन और शहरी जीवन का बड़ा केंद्र बना।
अयोध्या धार्मिक नगर के रूप में अधिक स्पष्ट हुई।
उन्नीसवीं सदी के ब्रिटिश विवरणों में भी कभी-कभी अयोध्या को प्रमुखतः हिंदू तीर्थनगर और फैजाबाद को अधिक मुस्लिम-नवाबी चरित्र वाले नगर के रूप में वर्णित किया गया। रॉबर्ट मोंटगोमरी मार्टिन के 1838 के प्रकाशन में इसी प्रकार की वर्गीकरणात्मक भाषा दिखाई देती है।
हालांकि औपनिवेशिक लेखकों की ऐसी धार्मिक वर्गीकरण पद्धति को भी आलोचनात्मक दृष्टि से देखना चाहिए।
ईस्ट इंडिया कंपनी ने उन्नीसवीं सदी के आरंभ में विभिन्न क्षेत्रों का सांख्यिकीय और स्थलाकृतिक सर्वेक्षण कराया।
फ्रांसिस बुकानन-हैमिल्टन ने 1813–14 के आसपास इस क्षेत्र का सर्वेक्षण किया। उसके अप्रकाशित सर्वेक्षण में अयोध्या की मस्जिद से जुड़े अरबी-फारसी शिलालेखों की प्रतियां दर्ज की गईं। बाद के इतिहासकारों और औपनिवेशिक संकलनों ने इन्हीं नोट्स का उपयोग किया।
बुकानन का विवरण इसलिए महत्वपूर्ण है कि वह शिलालेखीय परंपरा को औपनिवेशिक अभिलेख में प्रवेश कराता है।
उसके पास उपलब्ध अनुवाद में मस्जिद को बाबर तथा मीर बाकी से जोड़ने वाला पाठ था।
लेकिन उसी सामग्री में तिथियों और नामों की असंगतियां भी थीं।
यानी 1813–14 तक बाबर-मीर बाकी परंपरा लिखित सर्वेक्षण का हिस्सा बन चुकी थी, लेकिन उसकी पाठ-समीक्षा सरल नहीं थी।
बुकानन से संबंधित सामग्री का एक रोचक पक्ष यह है कि स्थानीय हिंदू परंपरा में कई मंदिर-विध्वंस औरंगजेब से जोड़े जाते थे, जबकि मस्जिद पर बताए गए शिलालेख उसे बाबरकाल से जोड़ते थे।
इससे स्पष्ट होता है कि उन्नीसवीं सदी के आरंभ में भी स्थानीय स्मृति और शिलालेखीय दावा पूरी तरह एक जैसे नहीं थे।
यही बात इतिहासकार के लिए महत्वपूर्ण है।
लोकस्मृति अक्सर समय के साथ घटनाओं को उन शासकों से जोड़ती है जिनकी छवि पहले से धार्मिक विध्वंस से संबंधित हो।
इसलिए स्थानीय कथा और शिलालेख को स्वतंत्र स्रोत माना जाना चाहिए।
उन्नीसवीं सदी के प्रारंभिक दस्तावेजों में 1822 का एक फारसी विवरण विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।
फैजाबाद अदालत से जुड़े अधिकारी हाफिजुल्लाह ने एक रिपोर्ट में उस मस्जिद को बाबर द्वारा “जन्मस्थान”, अर्थात राम के जन्मस्थल, पर निर्मित बताया और उसे सीता की रसोई के निकट रखा। इस दस्तावेज का उल्लेख बाद के न्यायिक और ऐतिहासिक विमर्श में बार-बार हुआ है।
इस दस्तावेज का महत्व असाधारण है क्योंकि यह दो पहचान को एक साथ दर्ज करता है—
बाबर की मस्जिद।
और
राम का जन्मस्थान।
यह कोई बीसवीं सदी के राजनीतिक आंदोलन का दस्तावेज नहीं है। यह 1822 का प्रशासनिक संदर्भ है।
यहाँ फिर सावधानी आवश्यक है।
हाफिजुल्लाह का दस्तावेज यह सिद्ध करता है कि 1822 तक उस क्षेत्र को राम का जन्मस्थान मानने की धारणा प्रशासनिक संदर्भ में स्पष्ट रूप से दर्ज थी।
वह मस्जिद को बाबर से भी जोड़ता है।
लेकिन उपलब्ध उद्धरण में यह स्पष्ट दावा नहीं है कि बाबर ने किसी मंदिर को गिराकर ही मस्जिद बनाई थी।
इसलिए इस दस्तावेज से तीन निष्कर्ष अलग रखने चाहिए—
राम जन्मस्थान की पहचान — मजबूत।
बाबर से मस्जिद का संबंध — दर्ज।
मंदिर-विध्वंस की प्रत्यक्ष घटना — इस दस्तावेज में स्वतः सिद्ध नहीं।
अयोध्या विवाद पर अकादमिक मतभेद काफी तीखे हैं।
कुछ इतिहासकार विशिष्ट विवादित भूखंड को राम जन्मस्थान मानने का सबसे स्पष्ट प्रशासनिक प्रमाण 1822 से मानते हैं।
दूसरी ओर मंदिर पक्ष के शोधकर्ता टाइफेन्थालर और उससे पहले फिंच के विवरणों को इस पहचान की पुरानी परंपरा का प्रमाण मानते हैं।
वास्तव में दोनों कथन परस्पर विरोधी होना आवश्यक नहीं।
फिंच राम-संबद्ध पवित्र भूगोल दिखाता है।
टाइफेन्थालर जन्मस्थान की विशिष्ट धार्मिक परंपरा को अधिक स्पष्ट करता है।
1822 प्रशासनिक दस्तावेज उसी पहचान को सरकारी/न्यायिक भाषा में दर्ज करता है।
अर्थात प्रमाणों की प्रकृति समय के साथ मजबूत और अधिक औपचारिक होती जाती है।
यह परिवर्तन अत्यंत महत्वपूर्ण है।
किसी स्थानीय समुदाय का यह कहना कि “यह राम का जन्मस्थान है” एक धार्मिक दावा है।
लेकिन जब एक प्रशासनिक अधिकारी उसी स्थल को “जन्मस्थान” नाम से पहचानता है, तब वह स्थानीय भूगोल का औपचारिक नाम भी बनने लगता है।
यहीं धार्मिक स्मृति से प्रशासनिक स्थलनाम की यात्रा दिखाई देती है।
आगे “मस्जिद जन्मस्थान”, “राम चबूतरा” और “सीता रसोई” जैसे नाम अदालतों तथा राजस्व दस्तावेजों में आने लगते हैं।
रॉबर्ट मोंटगोमरी मार्टिन ने बुकानन की पुरानी सर्वेक्षण सामग्री का उपयोग करते हुए 1838 में पूर्वी भारत संबंधी विवरण प्रकाशित किए।
उसने अयोध्या और फैजाबाद के धार्मिक-सांस्कृतिक चरित्र को स्पष्ट रूप से अलग रूप में चित्रित किया।
ऐसे औपनिवेशिक विवरणों का उपयोग करते समय एक समस्या है।
ब्रिटिश लेखकों में भारतीय नगरों और समुदायों को धार्मिक श्रेणियों में बांटने की प्रवृत्ति थी।
कभी यह वास्तविक सामाजिक संरचना का प्रतिबिंब था।
कभी औपनिवेशिक प्रशासन की “समुदाय आधारित” समझ का परिणाम।
इसलिए उनके आंकड़ों को उपयोगी स्रोत तो माना जाना चाहिए, लेकिन औपनिवेशिक दृष्टिकोण से मुक्त अंतिम वर्णन नहीं।
1854 के एडवर्ड थॉर्नटन गजेटियर में अयोध्या के “Fort का राम” और राम से जुड़े एक पवित्र स्थल का उल्लेख मिलता है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के रिकॉर्ड में इस गजेटियर की सामग्री का उद्धरण किया गया, जिसमें राम के पालने/जन्म से जुड़े स्थल और हिंदू तीर्थयात्रा का वर्णन था।
यह दस्तावेज इसलिए महत्वपूर्ण है कि 1855 के हिंसक संघर्ष से ठीक पहले ब्रिटिश गजेटियर में राम-संबद्ध पवित्र भूगोल दर्ज था।
अर्थात राम जन्मस्थान संबंधी धार्मिक पहचान 1855 के संघर्ष के बाद अचानक उत्पन्न हुई, ऐसा कहना कठिन है।
उन्नीसवीं सदी के मध्य में अवध में कई प्रकार के तनाव बढ़ रहे थे—
धार्मिक संस्थाओं के बीच प्रतिस्पर्धा।
अखाड़ों और बैरागियों की सैन्य-सामाजिक शक्ति।
सुन्नी-शिया मतभेद।
नवाबी सत्ता की कमजोरी।
ईस्ट इंडिया कंपनी का बढ़ता हस्तक्षेप।
धार्मिक स्थलों की संपत्ति और नियंत्रण।
इसी वातावरण में 1855 का हनुमानगढ़ी संघर्ष हुआ।
इसे केवल “हिंदू बनाम मुस्लिम” की सामान्य कथा में समेट देना उस समय की जटिल राजनीति को खो देना होगा।
हनुमानगढ़ी अयोध्या का शक्तिशाली वैष्णव धार्मिक केंद्र था।
वह केवल मंदिर नहीं, साधु-बैरागी शक्ति का संस्थागत केंद्र भी था।
कुछ मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने दावा किया कि हनुमानगढ़ी किसी पुरानी मस्जिद के स्थान पर बनी है।
यह दावा हिंसक संघर्ष का कारण बना।
ध्यान देने योग्य बात है—यह दावा बाबरी मस्जिद के स्थान पर नहीं, हनुमानगढ़ी के बारे में था।
इस अंतर को विशेष रूप से याद रखना चाहिए।
समकालीन अभिलेखों के आधार पर जुलाई 1855 में मौलवी गुलाम हुसैन और उनके समर्थकों ने हनुमानगढ़ी की ओर बढ़ने का प्रयास किया।
उनका मुकाबला बैरागियों और अन्य हिंदू समूहों से हुआ।
मुस्लिम पक्ष पीछे हटकर निकटवर्ती बाबरी मस्जिद में पहुंचा और इसके बाद संघर्ष उस क्षेत्र तक फैल गया। आधुनिक ऐतिहासिक संकलनों में ब्रिटिश पत्राचार के आधार पर यह विवरण विस्तार से प्रस्तुत किया गया है।
इस संघर्ष में बड़ी संख्या में लोग मारे गए।
ठीक संख्या पर स्रोतों में अंतर है।
उपलब्ध ब्रिटिश रिकॉर्ड के आधार पर इसे सीधे राम जन्मभूमि की लड़ाई कहना सावधानी मांगता है।
समकालीन दस्तावेजों में संघर्ष का मुख्य विवाद हनुमानगढ़ी पर कथित मस्जिद के अस्तित्व को लेकर था।
बाबरी मस्जिद घटनास्थल में इसलिए आई क्योंकि मुस्लिम लड़ाके वहां पीछे हटे।
इस तथ्य से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि राम जन्मस्थान की परंपरा तब थी ही नहीं—1822 और 1854 के दस्तावेज उसका प्रमाण देते हैं।
सही निष्कर्ष यह है—
राम जन्मस्थान की परंपरा मौजूद थी, लेकिन 1855 की मुख्य हिंसक लड़ाई किसी विशिष्ट राम जन्मभूमि दावे से आरंभ नहीं हुई थी।
क्योंकि लोकप्रिय आंदोलन-साहित्य में कभी-कभी 1855 को राम जन्मभूमि “मुक्ति संघर्ष” की सीधी कड़ी के रूप में दिखाया जाता है।
इतिहास में ऐसी परंपराओं को जस का तस स्वीकार करना उचित नहीं।
यदि समकालीन दस्तावेज कोई अलग कारण बताते हैं, तो उन्हें प्राथमिकता देनी चाहिए।
इससे राम जन्मभूमि के वास्तविक पुराने प्रमाण कमजोर नहीं होते।
उलटे, शोध अधिक विश्वसनीय बनता है।
1855 में अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह शासन कर रहे थे।
वे एक संवेदनशील स्थिति में थे।
एक ओर मुस्लिम धार्मिक नेतृत्व में आक्रोश था।
दूसरी ओर हनुमानगढ़ी के बैरागी और हिंदू राजे-जमींदार शक्तिशाली थे।
ब्रिटिश रेजिडेंट भी स्थिति पर नजर रख रहा था।
उपलब्ध पत्राचार से संकेत मिलता है कि वाजिद अली शाह धार्मिक संघर्ष को बढ़ने से रोकना चाहते थे और जांच/समझौते का रास्ता तलाश रहे थे।
यह अवध शासन की सीमाओं को भी उजागर करता है।
हनुमानगढ़ी विवाद की जांच के लिए एक समिति बनाई गई।
मुद्दा था—क्या हनुमानगढ़ी के भीतर कभी मस्जिद थी?
राजा मान सिंह सहित विभिन्न प्रतिनिधियों को जांच में शामिल किया गया।
समकालीन विवरण के अनुसार जांच में उस कथित मस्जिद के अस्तित्व के पर्याप्त प्रमाण नहीं मिले।
इससे कुछ मुस्लिम धार्मिक नेताओं में असंतोष और बढ़ा।
हनुमानगढ़ी के प्रश्न पर समझौता न होने के बाद मौलवी अमीर अली ने समर्थकों को संगठित किया।
नवंबर 1855 में वे अयोध्या की दिशा में बढ़े।
अवध सरकार ने उन्हें रोकने का निर्णय लिया।
7 नवंबर 1855 को सरकारी सैन्य बल से संघर्ष हुआ, जिसमें अमीर अली और उनके अनेक अनुयायी मारे गए। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के रिकॉर्ड में इस घटना का विवरण मिलता है।
यह बताता है कि उस समय अवध की मुस्लिम शासक सत्ता ने भी एक धार्मिक आंदोलन को रोकने के लिए बल प्रयोग किया था।
यह प्रसंग आधुनिक अयोध्या विमर्श के लिए अत्यंत रोचक है।
1990 में उत्तर प्रदेश सरकार ने हिंदू कारसेवकों को विवादित स्थल तक पहुंचने से रोकने के लिए बल प्रयोग किया।
1855 में अवध की मुस्लिम शासक सत्ता ने मुस्लिम धार्मिक समूह को हनुमानगढ़ी पर आक्रमण से रोकने के लिए सैन्य बल प्रयोग किया।
दोनों घटनाओं की ऐतिहासिक परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन वे राज्य की एक समान कठिनाई दिखाती हैं—
धार्मिक आस्था और कानून-व्यवस्था में टकराव होने पर शासन किसका संरक्षण करे?
1856 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अवध का विलय कर लिया।
वाजिद अली शाह की सत्ता समाप्त हुई।
इससे अयोध्या का प्रशासनिक ढांचा पूरी तरह बदल गया।
अब धार्मिक विवाद ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन के अधीन थे।
इसके केवल एक वर्ष बाद 1857 का विद्रोह हुआ।
अवध उस विद्रोह का प्रमुख क्षेत्र बना।
इन घटनाओं ने भूमि और धार्मिक संस्थाओं के प्रशासन को भी नया रूप दिया।
1857 के विद्रोह ने ब्रिटिश शासन को धार्मिक मामलों में अधिक सावधान बनाया।
ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हुआ और भारत सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन आया।
1858 की महारानी विक्टोरिया की घोषणा ने भारतीयों के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की नीति पर जोर दिया।
अयोध्या जैसे संवेदनशील स्थानों में ब्रिटिश प्रशासन का प्रमुख लक्ष्य धार्मिक सत्य तय करना नहीं, संघर्ष रोकना और यथास्थिति बनाए रखना बन गया।
आगे यही नीति परिसर के भौतिक विभाजन में दिखाई देती है।
1857 के बाद के शुरुआती औपनिवेशिक रिकॉर्ड में “मस्जिद जनम स्थान” अथवा “जनम अस्थान मस्जिद” जैसी शब्दावली दिखाई देती है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के रिकॉर्ड में 1860 के दशक के सरकारी आदेशों में भी “जनम स्थान मस्जिद” नाम का उपयोग दर्ज है।
यह स्थलनाम की निरंतरता का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रमाण है।
मस्जिद का प्रशासनिक नाम ही जन्मस्थान की स्थानीय पहचान को समाहित कर रहा था।
इसका अर्थ यह नहीं कि ब्रिटिश सरकार ने आधिकारिक रूप से घोषित कर दिया था कि मंदिर गिराकर मस्जिद बनाई गई।
लेकिन इससे यह मजबूत संकेत मिलता है कि क्षेत्र “जन्मस्थान” के नाम से इतना स्थापित था कि प्रशासनिक रिकॉर्ड में उसी शब्दावली का उपयोग हो रहा था।
इतिहास में स्थलनाम बहुत महत्वपूर्ण प्रमाण होते हैं।
वे किसी स्थान की सामाजिक स्मृति को संरक्षित रखते हैं।
1858 के आसपास विवादित परिसर में निहंग सिखों द्वारा धार्मिक चिह्न स्थापित करने और पूजा करने का एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक रिकॉर्ड मिलता है। बाद के न्यायिक इतिहास में इसका उल्लेख उस समय के हिंदू-सिख धार्मिक उपयोग के प्रमाण के रूप में हुआ।
इस घटना पर स्थानीय मुस्लिम अधिकारी की शिकायत के बाद प्रशासन ने हस्तक्षेप किया।
यह इसलिए महत्वपूर्ण है कि 1949 से लगभग नौ दशक पहले ही परिसर के भीतर धार्मिक कब्जे/पूजा को लेकर प्रशासनिक विवाद दर्ज था।
अर्थात आंतरिक परिसर के उपयोग को लेकर तनाव उन्नीसवीं सदी में ही स्पष्ट हो चुका था।
लोकप्रिय विवरणों में प्रायः कहा जाता है कि 1859 में ब्रिटिश प्रशासन ने विवादित परिसर में रेलिंग लगाकर हिंदू और मुस्लिम पूजा क्षेत्र अलग कर दिए।
ऐतिहासिक दस्तावेजों में व्यवस्था के वास्तविक क्रम और सटीक वर्ष पर कुछ जटिलता है, लेकिन उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध तक परिसर का व्यवहारिक विभाजन स्पष्ट रूप से स्थापित था।
मुस्लिम समुदाय अंदर के गुंबद वाले हिस्से में नमाज अदा करता था।
हिंदू बाहरी प्रांगण में राम चबूतरा और सीता रसोई क्षेत्र में पूजा करते थे।
2019 के सर्वोच्च न्यायालय के लिए भी यह आंतरिक-बाहरी प्रांगण विभाजन अत्यंत महत्वपूर्ण बना।
वास्तव में उन्होंने इसे स्थगित किया।
रेलिंग/अवरोध व्यवस्था ने तत्काल हिंसा को नियंत्रित किया।
लेकिन मूल प्रश्न अनसुलझा रहा—
हिंदू पक्ष का विश्वास केंद्रीय गुंबद के नीचे जन्मस्थान से जुड़ा था।
व्यवहार में उसकी पूजा बाहर तक सीमित थी।
मुस्लिम पक्ष अंदर नमाज पढ़ता था।
अर्थात एक ही परिसर में धार्मिक दावा और व्यवहारिक कब्जा अलग-अलग संरचना में जम गए।
यही आगे मुकदमे की जमीन बना।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के रिकॉर्ड में 1863–67 के कई दस्तावेज दर्ज हैं जिनमें “जनम स्थान मस्जिद” के समर्थन के लिए नकद अनुदान को राजस्व-मुक्त भूमि में परिवर्तित करने और मस्जिद के खतीब के लिए भूमि आवंटन जैसे प्रशासनिक मामलों का उल्लेख है।
यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
यह दिखाता है कि ब्रिटिश प्रशासन मस्जिद को धार्मिक संस्था के रूप में मान्यता देकर उसके रखरखाव से जुड़े मामलों को संचालित कर रहा था।
साथ ही उसी सरकारी भाषा में “जनम स्थान” नाम भी बना हुआ था।
दोनों वास्तविकताएं एक साथ मौजूद थीं।
अयोध्या विवाद की जटिलता यहीं सबसे स्पष्ट दिखती है।
यदि केवल मुस्लिम पक्ष के रिकॉर्ड देखें—
मस्जिद थी।
खतीब था।
सरकारी अनुदान था।
नमाज होती थी।
यदि केवल हिंदू पक्ष के रिकॉर्ड देखें—
जन्मस्थान की स्मृति थी।
राम चबूतरा था।
सीता रसोई थी।
तीर्थयात्री आते थे।
पूजा होती थी।
ऐतिहासिक सच यह है कि उन्नीसवीं सदी में दोनों प्रकार की धार्मिक गतिविधियां एक ही विवादित भूगोल में मौजूद थीं।
यही कारण है कि बाद में स्वामित्व तय करना इतना कठिन हुआ।
1877 के अवध गजेटियर में “जन्मस्थान” पर बाबर द्वारा मस्जिद निर्माण की परंपरा दर्ज की गई। यह सामग्री बाद में अयोध्या मुकदमों में प्रस्तुत दस्तावेजों का हिस्सा बनी।
गजेटियर इतिहास का समकालीन सोलहवीं सदी का प्रमाण नहीं था।
लेकिन वह यह दिखाता है कि उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध तक बाबर-जन्मस्थान कथा औपनिवेशिक प्रशासनिक इतिहासलेखन में स्थापित हो चुकी थी।
A. F. Millett के भूमि-राजस्व बंदोबस्त विवरण में भी जन्मस्थान और बाबर द्वारा वहां मस्जिद निर्माण की परंपरा दर्ज की गई। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के दस्तावेजों में इसका उल्लेख मिलता है।
समझौता Reports का महत्व इसलिए था कि वे भूमि, स्थानीय इतिहास और प्रशासनिक व्यवहार को एक साथ दर्ज करते थे।
लेकिन उनकी ऐतिहासिक कथाओं का स्रोत अक्सर पहले के गजेटियर, स्थानीय जानकारी और प्रशासनिक परंपरा होती थी।
इसलिए उन्हें स्वतंत्र 1528-कालीन प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।
औपनिवेशिक गजेटियर अयोध्या अध्ययन में उपयोगी हैं, किंतु उनके बारे में तीन सावधानियां जरूरी हैं।
पहली—वे कई शताब्दियों बाद लिखे गए।
दूसरी—वे स्थानीय परंपराओं को इतिहास की भाषा में लिख देते थे।
तीसरी—बाद के गजेटियर कभी-कभी पहले के विवरणों को दोहराते थे।
इसलिए यदि पांच गजेटियर एक ही कथा कहते हों तो आवश्यक नहीं कि वे पांच स्वतंत्र प्राचीन स्रोत हों।
वे एक ही पहले के स्रोत से निकले हो सकते हैं।
फिर भी वे यह सिद्ध करने में अत्यंत उपयोगी हैं कि उन्नीसवीं सदी में कौन-सी स्थानीय ऐतिहासिक धारणा प्रचलित थी।
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में बाहरी प्रांगण में स्थित राम चबूतरा हिंदू पूजा का प्रमुख केंद्र बन चुका था।
यह छोटा मंच आगे 1885 के महंत रघुबर दास मुकदमे का केंद्रीय विषय बना।
यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—
यदि हिंदू केंद्रीय गुंबद के नीचे जन्मस्थान मानते थे तो राम चबूतरे पर पूजा क्यों?
इसका एक संभावित उत्तर व्यवहारिक व्यवस्था में है।
अंदरूनी हिस्से पर मुस्लिम नियंत्रण/उपयोग था।
बाहरी हिस्से में हिंदू पूजा कर सकते थे।
इसलिए चबूतरा जन्मस्थान विश्वास का वैकल्पिक सुलभ धार्मिक केंद्र बना।
आगे न्यायिक बहस में यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण हुआ कि हिंदू वास्तव में किस स्थान को जन्मस्थान मानते थे—
राम चबूतरा?
या मस्जिद के केंद्रीय गुंबद के नीचे की भूमि?
औपनिवेशिक रिकॉर्ड और बाद की गवाहियों से यह दिखाई देता है कि बाहरी चबूतरे पर खुली पूजा होती थी, लेकिन व्यापक धार्मिक विश्वास भीतर के स्थान से भी जुड़ा रहा।
यही फर्क 1885 के मुकदमे को समझने में अत्यंत आवश्यक है।
रघुबर दास ने पूरे मस्जिद भवन पर अधिकार नहीं मांगा था।
उन्होंने चबूतरे पर निर्माण की अनुमति मांगी।
ज़रूरी नहीं।
कानूनी मांग अक्सर उपलब्ध व्यावहारिक स्थिति के अनुरूप बनाई जाती है।
यदि कोई समुदाय किसी बड़े दावे की तत्काल सफलता की संभावना नहीं देखता, तो वह सीमित अधिकार के लिए मुकदमा कर सकता है।
इसलिए 1885 में केवल चबूतरे पर मंदिर मांगने से यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि अंदरूनी स्थल को जन्मस्थान माना ही नहीं जाता था।
लेकिन यह जरूर दिखाता है कि उस समय अदालत के सामने प्रस्तुत व्यावहारिक दावा सीमित था।
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में अयोध्या परिसर में जो व्यवस्था बनी, वह भारतीय धार्मिक इतिहास का अत्यंत असामान्य उदाहरण थी।
एक ही घेरे के भीतर—
मस्जिद।
हिंदू चबूतरा।
सीता रसोई।
तीर्थयात्री।
मुस्लिम नमाजी।
ब्रिटिश पुलिस/प्रशासन।
ये सब मौजूद थे।
संघर्ष की संभावना भी थी और व्यवहारिक सह-अस्तित्व भी।
यह स्थिति दशकों तक चली।
इसलिए अयोध्या का इतिहास केवल निरंतर युद्ध का इतिहास नहीं है; वह तनावपूर्ण सह-अस्तित्व का इतिहास भी है।
यह दावा भी सार्वजनिक विमर्श में मिलता है।
ब्रिटिश प्रशासन ने भारत में समुदाय आधारित वर्गीकरण और अलग राजनीतिक पहचान के विकास में निश्चित रूप से भूमिका निभाई।
लेकिन यह कहना कि राम जन्मस्थान विवाद उन्होंने पूरी तरह “बनाया” था, उपलब्ध पुराने स्रोतों से मेल नहीं खाता।
टाइफेन्थालर और 1822 के दस्तावेज ब्रिटिश औपचारिक शासन से पहले अथवा उसके शुरुआती विस्तार के दौर में ही स्थल-संबंधी धार्मिक स्मृति दिखाते हैं।
हाँ, ब्रिटिश प्रशासन ने उस विवाद को दस्तावेजीकृत, सीमांकित और कानूनीकृत जरूर किया।
यही अधिक सटीक निष्कर्ष है।
औपनिवेशिक शासन में पहली बार स्थानीय धार्मिक दावे आधुनिक प्रशासनिक श्रेणियों में बदलने लगे—
कौन मालिक?
कौन कब्जेदार?
कौन पूजा करेगा?
किसे अनुदान मिलेगा?
भूमि किस खाते में दर्ज है?
किस सीमा तक निर्माण किया जा सकता है?
इसी प्रक्रिया को हम धार्मिक स्थान का कानूनीकरण कह सकते हैं।
आगे राम जन्मभूमि आंदोलन का पूरा न्यायिक इतिहास इसी औपनिवेशिक ढांचे पर खड़ा हुआ।
अब तक प्राप्त मुख्य प्रमाणों को क्रम में रखें—
1813–14 — बुकानन का सर्वेक्षण; मस्जिद के शिलालेखों और बाबर-मीर बाकी परंपरा का रिकॉर्ड।
1822 — हाफिजुल्लाह का फारसी दस्तावेज; बाबर की मस्जिद को राम के जन्मस्थान पर स्थित बताता है।
1838 — मोंटगोमरी मार्टिन का विवरण; अयोध्या के धार्मिक चरित्र का औपनिवेशिक वर्णन।
1854 — थॉर्नटन गजेटियर में रामकोट/राम जन्म से जुड़े पवित्र स्थल का वर्णन।
1855 — हनुमानगढ़ी संघर्ष; बाबरी मस्जिद घटनास्थल में आती है, लेकिन मुख्य विवाद हनुमानगढ़ी का था।
1858 से आगे — “जनम स्थान मस्जिद” जैसी प्रशासनिक शब्दावली और परिसर उपयोग के विवाद।
1863–67 — मस्जिद जन्मस्थान से जुड़े अनुदान/भूमि संबंधी सरकारी रिकॉर्ड।
1877 — अवध गजेटियर में जन्मस्थान और बाबर-मस्जिद परंपरा।
1880 — फैजाबाद समझौता प्रतिवेदन में वही ऐतिहासिक-स्थानीय परंपरा।
1885 — विवाद पहली बार प्रसिद्ध औपचारिक दीवानी मुकदमे में पहुंचता है।
सबसे पहले यह कि राम जन्मस्थान की विशिष्ट पहचान बीसवीं सदी की रचना नहीं थी।
दूसरा, उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ तक बाबर की मस्जिद और राम जन्मस्थान दोनों को एक ही स्थल से जोड़ने वाली भाषा लिखित प्रशासनिक सामग्री में आ चुकी थी।
तीसरा, उन्नीसवीं सदी के मध्य तक धार्मिक तनाव वास्तविक था।
चौथा, 1855 की हिंसा को सीधे राम जन्मभूमि युद्ध कहना गलत सरलीकरण होगा।
पांचवां, ब्रिटिश शासन ने मूल विवाद हल करने के बजाय उपयोग और कब्जे की अलग-अलग व्यवस्थाओं से उसे नियंत्रित किया।
इतिहास की समग्रता के लिए यह तथ्य बराबर दर्ज करना आवश्यक है कि उन्नीसवीं सदी के ब्रिटिश रिकॉर्ड मस्जिद के मुस्लिम धार्मिक उपयोग को भी स्वीकार करते हैं।
खतीब की व्यवस्था।
अनुदान।
मस्जिद के लिए भूमि।
अंदर नमाज।
इसलिए यह कथा नहीं बनाई जा सकती कि उन्नीसवीं सदी में मुसलमानों का वहां कोई वास्तविक धार्मिक संबंध था ही नहीं।
बाद के न्यायालयों के लिए यही दोहरी वास्तविकता जटिलता बनी—
हिंदू जन्मस्थान विश्वास अत्यंत पुराना और सक्रिय।
मुस्लिम मस्जिद-उपयोग भी दस्तावेजीकृत।
इसी अवधि में बाहरी प्रांगण में हिंदू पूजा भी निर्विवाद रूप से अधिक स्पष्ट होती गई।
राम चबूतरा।
सीता रसोई।
परिक्रमा।
तीर्थ।
रामनवमी।
ये सभी आगे हिंदू पक्ष के दीवानी दावे में महत्वपूर्ण साक्ष्य बने।
2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने अंततः बाहरी प्रांगण पर हिंदुओं की पूजा और कब्जे के प्रमाणों को अत्यंत मजबूत माना।
अर्थात उन्नीसवीं सदी केवल विवाद की शुरुआत नहीं; अंतिम न्यायिक निर्णय के लिए साक्ष्य-संग्रह का भी प्रमुख काल था।
दोनों कालों में अयोध्या धार्मिक जनसमूह, प्रशासन और बल प्रयोग का केंद्र बनी।
लेकिन अंतर महत्वपूर्ण है।
1855 में मुख्य झगड़ा हनुमानगढ़ी की कथित मस्जिद को लेकर था।
1990 में संघर्ष सीधे राम जन्मभूमि कारसेवा को लेकर था।
यदि दोनों को समान आंदोलन की सीधी श्रृंखला माना जाए तो इतिहास की प्रकृति विकृत होगी।
लेकिन दोनों यह अवश्य दिखाते हैं कि अयोध्या का धार्मिक भूगोल राज्य के लिए लंबे समय से संवेदनशील रहा।
समय के साथ हनुमानगढ़ी संघर्ष और राम जन्मभूमि विवाद की स्मृतियां आपस में मिलने लगीं।
यह ऐतिहासिक स्मृति में सामान्य प्रक्रिया है।
एक ही नगर।
एक ही काल।
हिंदू-मुस्लिम संघर्ष।
बाबरी मस्जिद घटनास्थल का हिस्सा।
आगे राम जन्मभूमि बड़ा राष्ट्रीय विवाद।
इन कारणों से 1855 की लड़ाई बाद की लोकप्रिय कथा में जन्मभूमि संघर्ष के रूप में पुनर्व्याख्यायित हुई।
शोध में इस प्रकार की स्मृति विलय को पहचानना आवश्यक है।
क्योंकि वह तीन कारणों से निर्णायक है।
पहला—अयोध्या में बड़े धार्मिक हिंसक टकराव की वास्तविकता।
दूसरा—मठों और मुस्लिम धार्मिक नेतृत्व की संगठित सामाजिक शक्ति।
तीसरा—सरकार द्वारा धार्मिक स्थलों के विवाद में हस्तक्षेप की आवश्यकता।
इसके बाद ब्रिटिश प्रशासन परिसर को अधिक स्पष्ट रूप से नियंत्रित और विभाजित करता दिखाई देता है।
इस अर्थ में 1855 राम जन्मभूमि विवाद का प्रत्यक्ष आरंभ न होते हुए भी उसके प्रशासनिक इतिहास का महत्वपूर्ण मोड़ है।
1880 के दशक तक स्थिति इस प्रकार थी—
राम जन्मस्थान की स्थानीय पहचान स्थापित।
मस्जिद का अस्तित्व और मुस्लिम पूजा स्थापित।
बाहरी प्रांगण में हिंदू पूजा स्थापित।
ब्रिटिश प्रशासन दोनों को अलग रखकर शांति बनाए रखने की कोशिश कर रहा था।
गजेटियरों में बाबर और जन्मस्थान की कथा दर्ज थी।
राम चबूतरे पर हिंदू पूजा हो रही थी।
लेकिन वहां स्थायी मंदिर निर्माण की अनुमति नहीं थी।
यहीं से महंत रघुबर दास अदालत पहुंचे।
अठारहवीं से उन्नीसवीं सदी की यात्रा राम जन्मभूमि इतिहास के लिए इसलिए निर्णायक है क्योंकि यही वह काल है जिसमें परंपरा क्रमशः दस्तावेज बनती है।
टाइफेन्थालर स्थानीय विश्वास दर्ज करता है।
बुकानन शिलालेख रिकॉर्ड करता है।
हाफिजुल्लाह 1822 में बाबर की मस्जिद और राम जन्मस्थान को एक ही भूगोल में लिखता है।
ब्रिटिश गजेटियर उस परंपरा को प्रशासनिक इतिहास में शामिल करते हैं।
सरकारी रिकॉर्ड “जनम स्थान मस्जिद” की भाषा इस्तेमाल करते हैं।
साथ ही हनुमानगढ़ी संघर्ष यह दिखाता है कि धार्मिक स्थलों की प्रतिस्पर्धा हिंसक रूप ले सकती थी—हालांकि उस घटना को राम जन्मभूमि की सीधी लड़ाई कहना उपलब्ध समकालीन रिकॉर्ड से समर्थित नहीं है।
इस पूरे काल का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है—
उन्नीसवीं सदी के मध्य तक अयोध्या में राम जन्मस्थान की पहचान, बाबरी मस्जिद का मुस्लिम धार्मिक उपयोग और बाहरी क्षेत्र में हिंदू पूजा—तीनों वास्तविकताएं एक साथ मौजूद थीं।
यही त्रिकोण आगे पूरे विवाद की संरचना बना।
यदि केवल जन्मस्थान की परंपरा होती और मस्जिद का धार्मिक उपयोग न होता, विवाद सरल होता।
यदि केवल मस्जिद होती और हिंदू पूजा की कोई पुरानी परंपरा न होती, विवाद भी सरल होता।
लेकिन यहां दोनों समुदायों की सक्रिय धार्मिक उपस्थिति थी और उनके दावे एक ही छोटे भूगोल पर आकर ओवरलैप करते थे।
ब्रिटिश प्रशासन ने इसका स्थायी समाधान नहीं खोजा।
उसने एक व्यवहारिक विभाजन बनाया।
और यही विभाजन 1885 में पहली बड़ी न्यायिक चुनौती का सामना करने वाला था।
अयोध्या विवाद की आधुनिक दस्तावेजी जड़ें उन्नीसवीं सदी में अत्यंत स्पष्ट हो जाती हैं।
1822 तक “बाबर की मस्जिद” और “राम जन्मस्थान” एक ही प्रशासनिक विवरण में साथ आ चुके थे।
1850 के दशक तक अयोध्या का धार्मिक वातावरण इतना संवेदनशील था कि हनुमानगढ़ी को लेकर खूनी संघर्ष हुआ। लेकिन इस संघर्ष की वास्तविक प्रकृति को बाद की राम जन्मभूमि कथा से अलग पहचानना आवश्यक है।
1857 के बाद ब्रिटिश प्रशासन ने धार्मिक यथास्थिति और उपयोग-विभाजन को प्राथमिकता दी। 1860 के दशक के रिकॉर्ड मस्जिद को “जनम स्थान मस्जिद” नाम से पहचानते हुए उसके धार्मिक प्रशासन को भी मान्यता देते हैं।
उधर हिंदू पूजा राम चबूतरा और सीता रसोई जैसे बाहरी स्थलों पर जारी रही।
अर्थात 1885 आते-आते विवाद की लगभग पूरी मूल संरचना तैयार थी—
जन्मस्थान की आस्था। मस्जिद का अस्तित्व। दो समुदायों का धार्मिक उपयोग। ब्रिटिश यथास्थिति। और निर्माण-अधिकार पर रोक।
अब धार्मिक स्मृति अदालत के सामने प्रत्यक्ष दावा बनने वाली थी।
अगला अध्याय 6 — “1850 के दशक के संघर्ष और ब्रिटिश प्रशासन की भूमिका” होगा। उसमें 1855 के हनुमानगढ़ी संघर्ष को और गहराई से—वाजिद अली शाह, गुलाम हुसैन, अमीर अली, राजा मान सिंह, ब्रिटिश रेजिडेंट जेम्स आउट्रम, जांच समिति, सैन्य कार्रवाई और 1857 के बाद बनी प्रशासनिक नीति—के साथ अलग से विश्लेषित करेंगे।