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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–018 · अध्याय 04

मुगलकाल और बाबरी ढांचे के निर्माण से जुड़े ऐतिहासिक दावे

आस्था, परंपरा और आरंभिक ऐतिहासिक प्रमाण

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskविस्तृत हिंदी शोध संस्करण · सितंबर 2026

अयोध्या विवाद के सबसे संवेदनशील और सबसे अधिक राजनीतिक रूप से उद्धृत प्रश्नों में पहला है—विवादित ढांचा कब बना, किसने बनवाया और क्या उसके निर्माण से पहले वहां कोई हिंदू मंदिर था? लोकप्रिय कथन यह रहा कि मुगल सम्राट बाबर के सेनापति मीर बाकी ने 1528 में राम जन्मभूमि पर स्थित मंदिर को गिराकर मस्जिद बनवाई। यह कथन आधुनिक राम जन्मभूमि आंदोलन की केंद्रीय ऐतिहासिक धारणाओं में शामिल रहा। लेकिन शोध की दृष्टि से इसे तीन अलग प्रश्नों में विभाजित करना आवश्यक है।

पहला—क्या 1528–29 में वहां मस्जिद का निर्माण हुआ?

दूसरा—क्या उसका निर्माता मीर बाकी था और क्या वह बाबर के आदेश पर बनी?

तीसरा—क्या मस्जिद का निर्माण पहले से मौजूद हिंदू धार्मिक संरचना को ध्वस्त करके किया गया?

इन तीनों प्रश्नों के प्रमाण समान नहीं हैं। कुछ के पक्ष में अपेक्षाकृत मजबूत परंपरा और अभिलेख उपलब्ध हैं, जबकि कुछ पर स्रोतों में स्पष्ट अंतराल और विवाद मौजूद हैं। यही कारण है कि इस अध्याय में हम लोकप्रिय धारणा और ऐतिहासिक साक्ष्य को अलग-अलग रखकर देखेंगे।

जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर ने 1526 में पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहिम लोदी को पराजित कर दिल्ली और आगरा पर अधिकार स्थापित किया। इसके बाद उसे उत्तर भारत में विभिन्न अफगान और स्थानीय शक्तियों से संघर्ष करना पड़ा।

अवध और पूर्वी उत्तर भारत उस समय पूरी तरह स्थिर मुगल नियंत्रण में नहीं थे। बाबर को यहां विद्रोही सरदारों और अफगान शक्तियों से लगातार निपटना पड़ा।

इसी सैन्य-राजनीतिक संदर्भ में अयोध्या और अवध का क्षेत्र बाबर की गतिविधियों में आता है।

लेकिन यहां पहली सावधानी आवश्यक है—बाबर का अवध क्षेत्र में सैन्य अभियान होना और उसका व्यक्तिगत रूप से विवादित स्थल पर जाकर मंदिर तोड़ने का आदेश देना एक ही बात नहीं है।

दोनों के लिए अलग प्रमाण चाहिए।

बाबरी ढांचे के निर्माण का सबसे प्रचलित वर्ष 935 हिजरी, अर्थात लगभग 1528–29 ईस्वी, माना गया।

इस तिथि का आधार मुख्यतः बाद में दर्ज फारसी शिलालेखों की प्रतिलिपियां और औपनिवेशिक काल के विवरण रहे। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में प्रस्तुत सामग्री में ऐसे शिलालेख का पाठ उद्धृत किया गया जिसमें कहा गया कि बाबर के आदेश पर मीर बाकी ने निर्माण कराया और काल-संकेत से 935 हिजरी का वर्ष निकलता है।

यहीं से “1528 में बाबर ने बाबरी मस्जिद बनवाई” वाला प्रचलित ऐतिहासिक कथन विकसित हुआ।

लेकिन शिलालेखों की प्रमाणिकता, उनकी मूल स्थिति और बाद की प्रतिलिपियों को लेकर गंभीर विवाद भी हुआ। इसलिए 1528 को परंपरागत निर्माण-वर्ष कहा जा सकता है, लेकिन उसके साक्ष्य की प्रकृति को भी दर्ज करना आवश्यक है।

लोकप्रिय इतिहास में मीर बाकी को बाबर का सेनापति, सूबेदार अथवा अवध का गवर्नर कहा जाता है।

लेकिन बाबरनामा में “मीर बाकी” नाम ठीक इसी रूप में स्पष्ट रूप से नहीं मिलता। उसमें बाकी ताशकंदी, बाकी Shaghawal और बाकी Beg जैसे नाम आते हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की सुनवाई में इस बात पर लंबी बहस हुई कि क्या इनमें से किसी व्यक्ति को बाद के स्रोतों में “मीर बाकी” कहा गया।

यहीं ऐतिहासिक पहचान की समस्या उत्पन्न होती है।

कुछ इतिहासकार और पक्षकार बाकी ताशकंदी को वही व्यक्ति मानते हैं जिसे बाद में मीर बाकी कहा गया।

दूसरे इसे पर्याप्त प्रमाणित नहीं मानते।

इसलिए शोध में यह लिखना अधिक सटीक होगा कि बाद की परंपरा और शिलालेखीय दावों में मस्जिद का निर्माण मीर बाकी से जोड़ा गया, लेकिन बाबरनामा में इसी नाम और भूमिका की पहचान निर्विवाद नहीं है।

बाबरनामा बाबर का आत्मवृत्त है और उसके शासनकाल का सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत है।

इसी कारण सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है—यदि बाबर के आदेश से अयोध्या में इतना महत्वपूर्ण धार्मिक निर्माण हुआ, तो क्या बाबरनामा उसका उल्लेख करता है?

उपलब्ध पाठ में बाबरी मस्जिद के निर्माण या राम मंदिर के विध्वंस का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के रिकॉर्ड में भी पक्षकारों ने इसी मौन पर जोर दिया।

यह तथ्य महत्वपूर्ण है।

लेकिन इसका अर्थ स्वतः यह नहीं कि निर्माण हुआ ही नहीं।

ऐतिहासिक स्रोतों में बहुत सी घटनाएं दर्ज नहीं होतीं।

साथ ही बाबरनामा के संबंधित कालखंड में कुछ पृष्ठों के अनुपलब्ध होने का प्रश्न भी उठाया गया है। आधुनिक पुरातत्वविद बी. आर. मणि ने भी इस अंतराल का उल्लेख करते हुए कहा कि बाबर की सेनाओं की अयोध्या गतिविधियों के सीधे विवरण का अभाव है।

इसलिए बाबरनामा का मौन संदेह पैदा करता है, पर निर्णायक निषेध नहीं।

यह भी विवादित प्रश्न है।

कुछ लोकप्रिय विवरण बाबर को सीधे अयोध्या पहुंचते और मंदिर ध्वस्त करने का आदेश देते दिखाते हैं।

लेकिन उपलब्ध प्राथमिक स्रोत इस कथा को स्पष्ट रूप से सिद्ध नहीं करते।

2019 में सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई के दौरान एक हिंदू पक्ष ने स्वयं यह तर्क दिया था कि बाबर अयोध्या नहीं गया और बाबरनामा में मंदिर ध्वंस अथवा मस्जिद निर्माण का कोई उल्लेख नहीं है।

इससे एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट होती है—मंदिर पक्ष के सभी इतिहासकार भी बाबर के व्यक्तिगत रूप से अयोध्या जाकर विध्वंस कराने की लोकप्रिय कथा से सहमत नहीं रहे।

अर्थात “मुगलकाल में निर्माण” और “बाबर स्वयं आया” दो अलग दावे हैं।

यदि बाबर स्वयं अयोध्या नहीं गया, तब भी यह संभव है कि उसके अधीन किसी अधिकारी ने उसके नाम पर निर्माण कराया हो।

मुगल प्रशासन में स्थानीय सैन्य अधिकारी और अमीर धार्मिक निर्माण करा सकते थे।

इसलिए व्यक्तिगत उपस्थिति का अभाव आदेश की असंभवता सिद्ध नहीं करता।

लेकिन फिर वही प्रश्न सामने आता है—ऐसा आदेश कहां दर्ज है?

उपलब्ध बाबरनामा में नहीं।

मुगल प्रशासनिक दस्तावेजों में भी अब तक कोई निर्विवाद समकालीन फरमान सामने नहीं आया।

इसीलिए बाबर के प्रत्यक्ष आदेश का सबसे मजबूत आधार बाद के शिलालेखीय पाठ और परंपरा ही हैं।

बाबरी ढांचे में फारसी शिलालेख होने के विवरण उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के स्रोतों में मिलते हैं।

एक प्रसिद्ध पाठ का अर्थ व्यापक रूप से यह बताया गया कि सम्राट बाबर के आदेश पर मीर बाकी ने यह धार्मिक भवन बनवाया और “बुवद खैर बाकी” जैसे काल-संकेत से 935 हिजरी की तिथि निकलती है।

इसी आधार पर 1528–29 निर्माण-वर्ष स्थापित हुआ।

लेकिन एक बड़ी समस्या है—

मूल शिलालेख सुरक्षित रूप में आज उपलब्ध नहीं हैं।

उनकी अलग-अलग प्रतिलिपियों में पाठ भिन्न मिलता है।

कुछ प्रतिलिपियों में “मीर खान”, अन्य में “मीर बाकी” है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इन अंतरों को विस्तार से दर्ज किया।

इससे शिलालेखीय प्रमाण की निश्चितता कम होती है।

कुछ विद्वानों ने शिलालेखों को प्रामाणिक मुगलकालीन माना।

दूसरों ने उनकी लिपि, शैली, पहली बार दर्ज होने की तारीख और अलग-अलग प्रतिलिपियों के अंतर पर प्रश्न उठाए।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय में इस पर अत्यंत विस्तृत बहस हुई। न्यायालय के सामने यह दलील भी आई कि शिलालेखों के आधार पर ही निर्माण-वर्ष और बाबर का नाम जोड़ा गया, जबकि बाबरनामा में उसका स्वतंत्र समर्थन नहीं है।

इसलिए इतिहास में सबसे सुरक्षित निष्कर्ष यह है—

935 हिजरी/1528–29 की तिथि एक महत्वपूर्ण और पुरानी शिलालेखीय परंपरा से आती है, लेकिन शिलालेख स्वयं विवादमुक्त प्राथमिक स्रोत नहीं हैं।

फ्रांसिस बुकानन ने उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में अवध क्षेत्र का सर्वेक्षण किया।

उसने मस्जिद में मौजूद बताए गए शिलालेखों की प्रतिलिपि और अनुवाद दर्ज कराया।

इसी प्रक्रिया ने बाबर और मीर बाकी से जुड़ी परंपरा को औपनिवेशिक अभिलेख में अधिक स्पष्ट रूप दिया।

यह ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि अब हमारे पास केवल मौखिक स्थानीय परंपरा नहीं, लिखित सर्वेक्षणीय दस्तावेज मिलने लगते हैं।

लेकिन यह फिर भी 1528 का समकालीन स्रोत नहीं है—बुकानन लगभग तीन शताब्दी बाद लिख रहा था।

अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न पर आएं।

यदि 1528–29 में मस्जिद बनी, तो उससे पहले वहां क्या था?

इस प्रश्न का उत्तर तीन प्रकार के प्रमाणों से खोजा गया—

स्थानीय धार्मिक परंपरा।

यात्रियों के विवरण।

पुरातात्त्विक अवशेष।

इनमें सबसे प्रत्यक्ष वैज्ञानिक सामग्री भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की 2003 खुदाई से सामने आई, जिस पर आगे अलग अध्याय होगा।

2019 के सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण रिपोर्ट के आधार पर माना कि मस्जिद के नीचे एक बड़ी पूर्ववर्ती संरचना थी और वह इस्लामी नहीं थी।

यह महत्वपूर्ण तथ्य है।

लेकिन यहां भी सावधानी आवश्यक है—

पूर्ववर्ती गैर-इस्लामी संरचना का अस्तित्व और उसी संरचना को मस्जिद बनाने के लिए जानबूझकर गिराया जाना दो अलग निष्कर्ष हैं।

यह अयोध्या विमर्श का अक्सर गलत उद्धृत भाग है।

सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण रिपोर्ट को स्वीकार किया कि नीचे एक बड़ी संरचना थी जो इस्लामी नहीं थी।

लेकिन न्यायालय ने यह नहीं कहा कि भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण ने सीधे सिद्ध कर दिया कि मस्जिद बनाने के लिए मंदिर को बाबर अथवा मीर बाकी ने गिराया था।

भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण पुरातत्त्व से नीचे की संरचना बता सकता था।

वह ऐतिहासिक आदेश या विध्वंसकर्ता की पहचान नहीं कर सकता था।

इसलिए “नीचे मंदिर-सदृश संरचना थी” और “बाबर ने मंदिर गिराकर मस्जिद बनवाई”—इन दोनों कथनों के प्रमाण-स्तर अलग हैं।

पुरातात्त्विक निष्कर्षों में स्तंभ-आधार, स्थापत्य अवयव, धार्मिक प्रतीकात्मक सामग्री और उत्तर भारतीय मंदिर वास्तुकला से संबंधित विशेषताओं की चर्चा हुई।

भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण से जुड़े पुरातत्वविद बी. आर. मणि ने बाद में कहा कि रिपोर्ट में उत्तर भारतीय नागर शैली के मंदिर के अस्तित्व का निष्कर्ष दिया गया था।

विरोधी विशेषज्ञों ने इन निष्कर्षों की व्याख्या और stratigraphy पर प्रश्न उठाए।

इसलिए आगे भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण अध्याय में हम यह अलग से देखेंगे कि “मंदिर” निष्कर्ष किस आधार पर बनाया गया और मुस्लिम पक्ष की आपत्तियां क्या थीं।

इस अध्याय के लिए इतना पर्याप्त है कि विवादित ढांचे से पहले एक विशाल गैर-इस्लामी संरचना होने का न्यायिक रूप से स्वीकार किया गया पुरातात्त्विक आधार मौजूद है।

अठारहवीं सदी के जोसेफ टाइफेन्थालर ने स्थानीय परंपरा दर्ज की कि रामकोट को ध्वस्त कर वहां तीन गुंबद वाली मस्जिद बनाई गई।

लेकिन उसने विध्वंस को लेकर दो अलग परंपराएँ सुनीं—कुछ इसे औरंगजेब से जोड़ते थे, कुछ बाबर से। सर्वोच्च न्यायालय ने उसके विवरण की यह विशेषता स्पष्ट रूप से दर्ज की।

यहीं से एक अत्यंत महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है—

अठारहवीं सदी तक “पूर्व हिंदू धार्मिक स्थल के विध्वंस और मुस्लिम संरचना निर्माण” की स्थानीय स्मृति मौजूद थी, लेकिन विध्वंसकर्ता की पहचान पर सहमति नहीं थी।

इसलिए टाइफेन्थालर मंदिर-विध्वंस की परंपरा का प्रमाण है; 1528 में बाबर द्वारा विध्वंस का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं।

भारत के अनेक मंदिर-विध्वंस प्रसंग औरंगजेब के शासन से जुड़े थे और उनके समकालीन अभिलेख भी उपलब्ध हैं।

इसी व्यापक ऐतिहासिक स्मृति के कारण कई स्थानीय धार्मिक स्थलों के विध्वंस को भी लोककथाओं में औरंगजेब से जोड़ दिया गया।

टाइफेन्थालर के समय तक अयोध्या में भी ऐसी परंपरा थी।

लेकिन यदि बाबरी संरचना के कथित शिलालेख वास्तव में 935 हिजरी के प्रामाणिक हों, तो उसका निर्माण औरंगजेब से एक शताब्दी से अधिक पहले हो चुका होगा।

इसलिए शिलालेखीय परंपरा और टाइफेन्थालर की एक स्थानीय कथा परस्पर तनाव में आती हैं।

ऐतिहासिक शोध इसी प्रकार के अंतर्विरोधों को दर्ज करता है, छिपाता नहीं।

गोस्वामी तुलसीदास सोलहवीं सदी में हुए और अयोध्या-राम परंपरा से गहरे जुड़े।

इस कारण अक्सर पूछा जाता है—यदि 1528 में राम जन्मभूमि मंदिर गिराया गया था, तो तुलसीदास ने उसका स्पष्ट उल्लेख क्यों नहीं किया?

रामचरितमानस में बाबरी मस्जिद या मंदिर-विध्वंस का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।

यह मौन आलोचकों के लिए महत्वपूर्ण तर्क रहा है।

दूसरी ओर समर्थक पक्ष कहता है कि रामचरितमानस राजनीतिक इतिहास नहीं, भक्तिकाव्य है; इसलिए किसी समकालीन राजनीतिक घटना का उल्लेख न होना उसके न घटने का प्रमाण नहीं।

दोनों तर्कों में कुछ वजन है।

अतः तुलसीदास का मौन प्रश्न उठाता है, निर्णायक निष्कर्ष नहीं देता।

समय-समय पर ऐसे पद अथवा दोहे प्रचारित किए गए जिनमें कथित रूप से तुलसीदास ने राम मंदिर ध्वंस का वर्णन किया।

लेकिन इन पाठों की प्रामाणिकता को मुख्यधारा पाठालोचना ने व्यापक रूप से स्वीकार नहीं किया है।

इसलिए उन्हें प्राथमिक प्रमाण के रूप में इस्तेमाल करना जोखिमपूर्ण है।

यदि किसी पाठ की पांडुलिपि-परंपरा और लेखकत्व ही विवादित हो, तो उससे सोलहवीं सदी की निर्णायक घटना सिद्ध नहीं की जा सकती।

हमारे शोध में ऐसे दावों को “लोकप्रिय किंतु विवादित स्रोत” की श्रेणी में रखना चाहिए।

अबुल फज़ल की आइन-ए-अकबरी अकबरकालीन प्रशासन और सांस्कृतिक भूगोल का विशाल ग्रंथ है।

उसमें अयोध्या को राम से जुड़ी पवित्र भूमि के रूप में मान्यता मिलती है, लेकिन बाबरी मस्जिद निर्माण अथवा राम मंदिर-विध्वंस का स्पष्ट विवरण नहीं मिलता।

यह तथ्य फिर वही प्रश्न उठाता है—

यदि बाबरकाल में कोई अत्यंत प्रसिद्ध धार्मिक संघर्ष हुआ था, तो अकबरकालीन अभिलेख में उसका उल्लेख क्यों नहीं?

फिर भी मौन को नकारात्मक प्रमाण की सीमा में ही पढ़ना चाहिए।

यह भी महत्वपूर्ण प्रश्न है।

प्रारंभिक स्रोतों में “बाबरी मस्जिद” नाम उसी रूप में लगातार मिलता नहीं।

उन्नीसवीं सदी के दस्तावेजों में “मस्जिद-ए-जन्मस्थान” जैसी अभिव्यक्तियां भी दिखाई देती हैं।

यह संकेत देता है कि भवन का स्थानीय नाम समय के साथ विकसित हुआ।

बाद में बाबर से संबद्ध शिलालेखीय परंपरा के आधार पर “बाबरी मस्जिद” नाम व्यापक हुआ।

इससे यह सिद्ध नहीं होता कि भवन नया था; केवल नामकरण की ऐतिहासिक प्रक्रिया जटिल थी।

विवादित संरचना तीन गुंबदों वाली मस्जिद थी।

उसकी स्थापत्य शैली पर भी बहस हुई कि उसमें पहले की किसी संरचना के तत्व पुनः प्रयुक्त थे या नहीं।

टाइफेन्थालर ने काले पत्थर के स्तंभों का उल्लेख किया और कहा कि वे पूर्ववर्ती संरचना से जुड़े माने जाते थे।

बाद में भी संरचना में ऐसे स्तंभों और स्थापत्य अवयवों पर ध्यान दिया गया।

“Spolia”—अर्थात पुरानी इमारत की निर्माण-सामग्री का नई इमारत में उपयोग—मध्यकालीन स्थापत्य में असामान्य नहीं था।

लेकिन केवल पुनः प्रयुक्त स्तंभ यह सिद्ध नहीं करते कि उसी स्थल का मंदिर उसी समय गिराया गया।

सामग्री अन्यत्र से भी लाई जा सकती थी।

इसलिए स्थापत्य प्रमाण उपयोगी है, लेकिन अकेला निर्णायक नहीं।

1934 के सांप्रदायिक दंगों में विवादित भवन को नुकसान पहुंचा।

बाद के विवरणों में शिलालेखों के क्षतिग्रस्त होने और उनकी प्रतिलिपियों की समस्या सामने आती है।

इस कारण बीसवीं सदी में जब अदालत ने शिलालेखीय साक्ष्य की समीक्षा की, तो अक्सर प्रत्यक्ष मूल पत्थर के बजाय पुराने प्रकाशनों, तस्वीरों और प्रतिलिपियों पर निर्भर करना पड़ा।

यही परिस्थितियां प्रमाण की निश्चितता कम करती हैं।

मुगलकालीन इतिहास को लेकर मोटे तौर पर दो प्रमुख व्याख्याएँ सामने आईं।

इस मत के अनुसार बाबरकाल में राम जन्मभूमि मंदिर मौजूद था; मीर बाकी ने 1528 में उसे गिराकर मस्जिद बनाई; शिलालेख, स्थानीय परंपरा और बाद का पुरातत्त्व इस क्रम का समर्थन करते हैं।

इस मत के अनुसार बाबरनामा, हुमायूननामा, आइन-ए-अकबरी और अन्य समकालीन मुगल स्रोत मंदिर-विध्वंस पर मौन हैं; कथित शिलालेखों की प्रमाणिकता विवादित है; इसलिए बाबर द्वारा मंदिर गिराए जाने को निश्चित इतिहास नहीं कहा जा सकता।

दोनों मतों में उपलब्ध स्रोतों का चयन और उनकी व्याख्या अलग है।

सर्वोच्च न्यायालय ने 2019 में इतिहास की हर बहस का अंतिम अकादमिक निर्णय देने की कोशिश नहीं की।

उसका मुख्य कार्य दीवानी स्वामित्व विवाद का निर्णय था।

इसलिए उसने भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण, यात्रियों के विवरण, राजस्व रिकॉर्ड, पूजा और कब्जे को एक साथ देखा।

न्यायालय ने इस बात को महत्व दिया कि विवादित ढांचे के नीचे गैर-इस्लामी संरचना मौजूद थी और हिंदू पक्ष की लंबे समय की पूजा-परंपरा के प्रमाण थे।

लेकिन उसने “बाबर ने अमुक दिन मंदिर गिराने का आदेश दिया” जैसी बात को अपने फैसले की आवश्यकता नहीं बनाया।

यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है।

यहीं एक आम भ्रांति दूर करनी आवश्यक है।

दीवानी भूमि-स्वामित्व मुकदमे में हिंदू पक्ष को यह सिद्ध करना आवश्यक नहीं था कि 1528 में बाबर ने मंदिर गिराया था।

उसे अपने कब्जा-संबंधी और धार्मिक अधिकारों तथा संबंधित साक्ष्यों के आधार पर बेहतर स्वामित्व-अधिकार स्थापित करना था।

इसलिए सर्वोच्च न्यायालय का फैसला “मंदिर-विध्वंस सिद्ध हो गया” पर निर्भर नहीं था।

उसका आधार व्यापक था।

यही कारण है कि इतिहास की कुछ अनिश्चितताएं अंतिम न्यायिक निर्णय के बावजूद बनी रह सकती हैं।

2003 से पहले मुगलकालीन बहस मुख्यतः ग्रंथ, शिलालेख और यात्रियों के वृत्तांत पर निर्भर थी।

भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण उत्खनन के बाद एक नया तत्व जुड़ा—

भौतिक पूर्ववर्ती संरचना।

इससे उन इतिहासकारों की स्थिति मजबूत हुई जो विवादित ढांचे से पहले बड़े हिंदू धार्मिक निर्माण की बात कहते थे।

लेकिन फिर भी “किसने गिराया?” का प्रश्न पुरातत्त्व के बाहर रहा।

अतः पुरातत्त्व ने संरचना की पूर्वता पर महत्वपूर्ण प्रकाश डाला, मगर राजनीतिक जिम्मेदारी का उत्तर नहीं दिया।

नहीं।

इतिहास में किसी पारंपरिक तिथि को केवल इसलिए त्याग नहीं दिया जाता कि उसके स्रोतों पर विवाद है।

बल्कि उसे सही भाषा में प्रस्तुत किया जाता है।

अधिक सटीक वाक्य होगा—

“बाबरी ढांचे के निर्माण को परंपरागत रूप से 935 हिजरी/1528–29 ईस्वी से जोड़ा गया है, मुख्यतः बाद में दर्ज फारसी शिलालेखों और औपनिवेशिक विवरणों के आधार पर; हालांकि इन शिलालेखों और निर्माता की पहचान पर विद्वानों तथा न्यायिक रिकॉर्ड में विवाद दर्ज है।”

यह वाक्य शोध की दृष्टि से अधिक मजबूत है।

यह कहना भी अतिशयोक्ति होगा कि “मीर बाकी नाम का व्यक्ति था ही नहीं।”

बाबरनामा में बाकी नाम के कई अधिकारी मिलते हैं, जिनमें बाकी ताशकंदी आदि अवध से जुड़े दिखाई देते हैं। विवाद मुख्यतः यह है कि बाद के “मीर बाकी” को इनमें से किससे जोड़ा जाए।

इसलिए सही प्रश्न यह नहीं कि “मीर बाकी था या नहीं?”

बल्कि—

क्या बाबरी शिलालेख का मीर बाकी वही बाबरकालीन अधिकारी था जिसकी पहचान बाबरनामा में किसी अन्य रूप में मिलती है?

इसका उत्तर निर्विवाद नहीं है।

हाँ। भूमि-विवाद में मुस्लिम पक्ष की पारंपरिक दलील यही रही कि मस्जिद बाबर अथवा उसके अधिकारी द्वारा बनाई गई थी और वह वैध मस्जिद थी।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के रिकॉर्ड में मुस्लिम पक्ष ने बाबर और मस्जिद निर्माण के समर्थन में अनेक दस्तावेज प्रस्तुत किए।

इस दृष्टि से दिलचस्प तथ्य यह है कि “बाबर ने मस्जिद बनवाई” कथन केवल हिंदू आंदोलन की कथा नहीं था; मुस्लिम पक्ष भी अपनी संपत्ति और मस्जिद की प्राचीनता के दावे में इसे स्वीकार करता रहा।

विवाद मुख्यतः यह था कि उससे पहले मंदिर था और क्या उसे गिराकर मस्जिद बनाई गई?

उन्नीसवीं सदी के कुछ मुस्लिम लेखकों तथा स्थानीय दस्तावेजों में भी स्थल को राम जन्मस्थान से जोड़ा गया।

1822 के एक दस्तावेज में फैजाबाद अदालत से जुड़े हाफिजुल्लाह ने एक मस्जिद को बाबर द्वारा “जन्मस्थान” पर बनाई गई मस्जिद के रूप में संदर्भित किया—यह विवरण बाद के न्यायिक संकलनों में महत्वपूर्ण माना गया।

यह दस्तावेज 1528 का समकालीन प्रमाण नहीं है।

लेकिन यह दिखाता है कि उन्नीसवीं सदी की शुरुआत तक “बाबर की मस्जिद + राम जन्मस्थान” की संयुक्त स्थानीय पहचान प्रशासनिक वृत्त में मौजूद थी।

1858 और बाद के प्रशासनिक अभिलेखों में “मस्जिद-ए-जन्मस्थान” जैसी शब्दावली का उल्लेख मिलता है।

यह अत्यंत रोचक है।

मस्जिद का नाम स्वयं उस हिंदू धार्मिक स्थल-स्मृति को संरक्षित कर रहा था जिससे विवाद जुड़ा था।

यह सीधे मंदिर-विध्वंस सिद्ध नहीं करता।

लेकिन यह बताता है कि जन्मस्थान की पहचान मस्जिद के अस्तित्व के साथ-साथ बनी रही।

इसके पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं कि 1528 से प्रत्येक काल में स्थल पर लगातार हिंसक संघर्ष चलता रहा।

अठारहवीं सदी के यात्री हिंदू पूजा और मुस्लिम संरचना के सह-अस्तित्व जैसी स्थिति दर्ज करते हैं।

उन्नीसवीं सदी के मध्य तक संघर्ष अधिक स्पष्ट होता है।

इसलिए “1528 से लगातार युद्ध” जैसी लोकप्रिय भाषा ऐतिहासिक रूप से सावधानी मांगती है।

धार्मिक स्मृति लंबे समय तक रह सकती है बिना निरंतर हिंसक संघर्ष के।

क्योंकि आधुनिक आंदोलन के नैतिक तर्क का एक बड़ा हिस्सा ऐतिहासिक अन्याय की पुनर्स्थापना पर आधारित था।

यदि मंदिर गिराकर मस्जिद बनाई गई थी, तो आंदोलन स्वयं को केवल नया मंदिर बनाने की मांग नहीं, बल्कि इतिहास में हुए अन्याय को सुधारने की परियोजना के रूप में प्रस्तुत कर सकता था।

यहीं “मुक्ति” की भाषा आई—

राम जन्मभूमि “मुक्त” करानी है।

इसलिए इतिहास की व्याख्या आंदोलन की वैचारिक शक्ति का केंद्र बनी।

मुस्लिम पक्ष के लिए मंदिर-विध्वंस की व्यापक सिद्धांत-स्वीकृति का खतरा अलग था।

यदि मध्यकालीन मंदिर-विध्वंस के आधार पर आधुनिक मस्जिदों के स्वामित्व बदलने लगें, तो काशी, मथुरा और अनेक अन्य धार्मिक स्थलों पर दावे उठ सकते हैं।

यही कारण है कि अयोध्या विवाद केवल एक भूखंड की लड़ाई नहीं रहा।

इसके संभावित नजीर ने उसे राष्ट्रीय धार्मिक अल्पसंख्यक सुरक्षा से भी जोड़ दिया।

1991 का पूजा स्थल अधिनियम इसी व्यापक चिंता की पृष्ठभूमि में अत्यंत महत्वपूर्ण बनता है।

किसी मध्यकालीन शासक द्वारा मंदिर गिराए जाने का ऐतिहासिक प्रमाण मिल भी जाए, तो आधुनिक गणराज्य उसका समाधान किस प्रकार करेगा?

क्या वर्तमान धार्मिक समुदाय उस ऐतिहासिक शासक की कार्रवाई के लिए जिम्मेदार है?

क्या आधुनिक संपत्ति अधिकार इतिहास के पांच सौ वर्ष पुराने अन्याय से स्वतः समाप्त हो जाएंगे?

ये प्रश्न अयोध्या से बाहर भी महत्वपूर्ण हैं।

अयोध्या का विशेष मामला इसलिए अलग था क्योंकि विवाद और मुकदमे स्वतंत्रता से पहले से चले आ रहे थे और पूजा स्थल अधिनियम ने इसे अलग अपवाद बनाया।

अब उपलब्ध प्रमाणों को स्तरों में रखें।

विवादित स्थल पर 1992 तक तीन गुंबद वाली मुस्लिम संरचना मौजूद थी।

अठारहवीं सदी तक उसके अस्तित्व और हिंदू जन्मस्थान परंपरा दोनों का बाहरी विवरण मिलता है।

मस्जिद के नीचे बड़ी गैर-इस्लामी पूर्ववर्ती संरचना थी—भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण निष्कर्ष को सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार किया।

मस्जिद को बाबरकाल और 1528–29 से जोड़ने वाली शिलालेखीय एवं स्थानीय परंपरा।

मीर बाकी को निर्माता मानने की परंपरा।

बाबर ने व्यक्तिगत रूप से मंदिर गिराने का आदेश दिया था।

मीर बाकी की बाबरनामा में सटीक पहचान।

मस्जिद बनाने के ठीक समय पूर्ववर्ती मंदिर को जानबूझकर ध्वस्त किया गया था।

इन प्रश्नों पर प्रत्यक्ष समकालीन लिखित साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।

यह कथन सही नहीं है।

सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसा निर्णायक ऐतिहासिक निष्कर्ष नहीं दिया।

उसने भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के आधार पर पूर्ववर्ती गैर-इस्लामी संरचना स्वीकार की।

उसने हिंदू पूजा-परंपरा और कब्जे के प्रमाणों का मूल्यांकन किया।

लेकिन उसका भूमि-स्वामित्व निर्णय बाबर द्वारा मंदिर-विध्वंस सिद्ध करने पर निर्भर नहीं था।

हमारे पूरे शोध में यह तथ्य स्पष्ट रहना चाहिए।

यह कथन भी 2019 के बाद टिकाऊ नहीं है।

सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण रिपोर्ट को वैज्ञानिक विशेषज्ञ संस्था की रिपोर्ट के रूप में स्वीकार किया और माना कि विवादित मस्जिद के नीचे एक विशाल संरचना थी जो इस्लामी नहीं थी।

उस संरचना की मंदिर-संबंधी विशेषताओं पर आगे विस्तार होगा।

इसलिए यह कहना कि “नीचे कुछ था ही नहीं” उपलब्ध न्यायिक-पुरातात्त्विक रिकॉर्ड से मेल नहीं खाता।

यह भी अधिक कठोर निष्कर्ष होगा।

1528–29 की तिथि शिलालेखीय परंपरा में लंबे समय से मौजूद है और औपनिवेशिक अभिलेखों में दर्ज हुई।

समस्या यह है कि हमारे पास उसका निर्विवाद रूप से सुरक्षित समकालीन मूल शिलालेख और स्वतंत्र बाबरकालीन अभिलेख नहीं है।

इसलिए तारीख परंपरागत और संभाव्य है, पूर्णतः असिद्ध कल्पना नहीं; लेकिन इसे शत-प्रतिशत निर्विवाद भी नहीं कहा जाना चाहिए।

अयोध्या पर गंभीर शोध में हमें इस प्रकार भाषा प्रयोग करनी चाहिए—

“परंपरा के अनुसार…”

“बाद के फारसी शिलालेखों में…”

“टाइफेन्थालर ने स्थानीय मान्यता दर्ज की…”

“भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण ने पूर्ववर्ती गैर-इस्लामी संरचना पाई…”

“सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्वीकार किया…”

“प्रत्यक्ष समकालीन मुगल अभिलेख उपलब्ध नहीं…”

ऐसी भाषा शोध को कमजोर नहीं करती।

उलटे वह उसे राजनीतिक प्रचार से अलग कर विश्वसनीय बनाती है।

मुगलकाल में उपलब्ध प्रत्यक्ष स्रोत सीमित हैं।

अठारहवीं सदी में हमें टाइफेन्थालर जैसे बाहरी पर्यवेक्षक से स्पष्ट स्थानीय परंपरा मिलती है।

उन्नीसवीं सदी में बुकानन, राजस्व दस्तावेज और अदालत के रिकॉर्ड आते हैं।

इस प्रकार प्रमाण-श्रृंखला समय के साथ घनी होती जाती है।

यह ऐतिहासिक अनुसंधान का स्वाभाविक स्वरूप है।

जितना आधुनिक काल, उतना अधिक दस्तावेज।

इसलिए सोलहवीं सदी के दावे पर उन्नीसवीं सदी जितनी दस्तावेजी निश्चितता अपेक्षित करना हमेशा संभव नहीं।

इतिहास की उपलब्ध सामग्री से तीन बातों को अलग-अलग स्तर पर समझना चाहिए।

पहली: विवादित ढांचे को बाबरकाल, लगभग 1528–29, और मीर बाकी से जोड़ने वाली एक पुरानी और महत्वपूर्ण परंपरा मौजूद है, जिसका आधार कथित फारसी शिलालेख और बाद के अभिलेख हैं।

दूसरी: बाबरनामा तथा अन्य समकालीन मुगल स्रोतों में राम मंदिर-विध्वंस और बाबरी मस्जिद निर्माण का स्पष्ट विवरण उपलब्ध नहीं है।

तीसरी: बाद के बाहरी यात्रियों और पुरातात्त्विक सामग्री से यह मजबूत होता है कि स्थल हिंदू धार्मिक स्मृति से जुड़ा था और मस्जिद के नीचे बड़ी गैर-इस्लामी पूर्ववर्ती संरचना थी; लेकिन उस संरचना को ठीक किसने, कब और किस आदेश से ध्वस्त किया—यह प्रश्न प्रत्यक्ष समकालीन लिखित साक्ष्य से पूर्णतः निर्णीत नहीं है।

यही सबसे संतुलित और साक्ष्य-सम्मत निष्कर्ष है।

बाबरी ढांचे के मुगलकालीन इतिहास पर सार्वजनिक विमर्श अक्सर दो बिल्कुल विपरीत कथाओं में विभाजित रहा।

एक कथा कहती है—1528 में बाबर ने राम मंदिर गिराया और मीर बाकी से मस्जिद बनवाई; इसमें कोई संदेह नहीं।

दूसरी कहती है—बाबर, मीर बाकी और मंदिर-विध्वंस की पूरी कथा बाद की कल्पना है।

उपलब्ध प्रमाण इन दोनों सरल ध्रुवों से अधिक जटिल तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।

1528–29 और मीर बाकी का संबंध शिलालेखीय तथा स्थानीय परंपरा में गहराई से मौजूद है, लेकिन उसके समकालीन अभिलेखीय समर्थन की सीमाएँ हैं। बाबरनामा का मौन महत्वपूर्ण है, किंतु अकेला निर्णायक नहीं। दूसरी ओर पूर्ववर्ती हिंदू धार्मिक संरचना और जन्मस्थान की ऐतिहासिक स्मृति को पूरी तरह नकारना भी उपलब्ध यात्रावृत्त और 2003 के पुरातात्त्विक निष्कर्षों के बाद कठिन है।

इसलिए शोध की दृष्टि से सबसे मजबूत स्थिति यह है—

विवादित स्थल पर बाबरी ढांचे से पहले एक महत्वपूर्ण गैर-इस्लामी संरचना थी; स्थल की राम जन्मस्थान के रूप में हिंदू धार्मिक स्मृति कम-से-कम अठारहवीं सदी तक स्पष्ट रूप से दर्ज है; बाबरी ढांचे को 1528–29 में मीर बाकी द्वारा बाबरकाल में बनवाए जाने की पुरानी परंपरा है; किंतु बाबर द्वारा मंदिर ध्वस्त करने के स्पष्ट आदेश या विध्वंस की घटना का निर्विवाद समकालीन लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

यही अंतर आगे के अध्यायों को अधिक अर्थपूर्ण बनाता है। क्योंकि अब हमारी कहानी सोलहवीं सदी के आंशिक और विवादित स्रोतों से निकलकर ऐसे काल में प्रवेश करती है जहां प्रमाण तेजी से अधिक ठोस होते जाते हैं।

अगला अध्याय 5 — “अठारहवीं–उन्नीसवीं सदी में राम जन्मभूमि विवाद के प्रारंभिक प्रमाण” होगा। इसमें हम टाइफेन्थालर के बाद के स्थानीय और मुस्लिम स्रोत, अवध नवाबी काल, बुकानन, 1822 का हाफिजुल्लाह दस्तावेज, स्थल के बदलते नाम और 1850 के दशक के संघर्ष तक की पूरी प्रमाण-श्रृंखला को विस्तार से लेंगे।