बजरंग दल का गठन और युवा लामबंदी : राम-जानकी यात्रा से कारसेवा तक
संगठित जनांदोलन का उदय
राम जन्मभूमि आंदोलन के आधुनिक इतिहास में 1984 केवल धर्म संसद, संत नेतृत्व और विश्व हिंदू परिषद की संगठनात्मक सक्रियता का वर्ष नहीं था। इसी वर्ष आंदोलन को एक ऐसी युवा शक्ति मिली जिसने आने वाले वर्षों में सड़क, यात्रा, जनसभा, शिलापूजन और कारसेवा के चरणों में अत्यंत दिखाई देने वाली भूमिका निभाई—बजरंग दल।
इसके गठन की कहानी राम-जानकी यात्रा से जुड़ी है। विश्व हिंदू परिषद का आधिकारिक विवरण इसकी स्थापना 8 अक्टूबर 1984 को अयोध्या में बताता है और कहता है कि राम-जानकी रथयात्रा की सुरक्षा के लिए युवाओं को संगठित किया गया था। दूसरी ओर, गृह मंत्रालय में उपलब्ध लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट 7 अक्टूबर 1984 को दिगंबर अखाड़े में बजरंग दल के गठन की तारीख दर्ज करती है और विनय कटियार को उसका अध्यक्ष बताती है। इसलिए इस शोध में सुरक्षित निष्कर्ष होगा कि 7–8 अक्टूबर 1984 के दौरान अयोध्या में बजरंग दल का संस्थागत उदय हुआ, जबकि विश्व हिंदू परिषद की आधिकारिक स्थापना-तिथि 8 अक्टूबर है।
बजरंग दल का महत्व केवल इस बात में नहीं था कि विश्व हिंदू परिषद को एक युवा शाखा मिल गई। उसका उदय आंदोलन की प्रकृति में बड़े परिवर्तन का संकेत था। संत धार्मिक वैधता दे सकते थे, विश्व हिंदू परिषद कार्यक्रम बना सकती थी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्यकर्ता-जाल व्यवस्था में मदद कर सकता था; लेकिन बढ़ते जनांदोलन के लिए ऐसी युवा शक्ति चाहिए थी जो तेजी से संगठित करना हो, यात्राओं की व्यवस्था संभाले, नारे और जुलूस चलाए और आंदोलन के प्रत्यक्ष संघर्षशील चेहरे के रूप में सामने आए।
1984 की धर्म संसद के बाद राम जन्मभूमि आंदोलन सम्मेलन से निकलकर यात्रा और सार्वजनिक जनसंपर्क की दिशा में बढ़ गया था। राम-जानकी यात्रा के लिए मार्ग-सुरक्षा, सभाओं की व्यवस्था, धार्मिक जुलूसों का प्रबंधन और बड़ी संख्या में स्थानीय युवाओं की भागीदारी आवश्यक थी।
विश्व हिंदू परिषद का अपना विवरण कहता है कि जब राम-जानकी यात्रा के लिए पर्याप्त सरकारी सुरक्षा उपलब्ध नहीं हुई, तब संतों के आह्वान पर वहां उपस्थित युवाओं को यात्रा की सुरक्षा का दायित्व दिया गया। भगवान राम के कार्य में हनुमान की भूमिका को प्रतीक बनाकर इस युवा समूह का नाम “बजरंग दल” रखा गया।
यह संगठनात्मक प्रतीक अत्यंत प्रभावी था—
राम जन्मभूमि आंदोलन का केंद्र राम।
राम के सबसे समर्पित सेवक हनुमान।
और युवा कार्यकर्ता “बजरंगी”।
इससे संगठन का नाम स्वयं उसकी भूमिका का धार्मिक अर्थ समझा देता था।
यह एक छोटी लेकिन शोध की दृष्टि से महत्वपूर्ण तारीख-विभिन्नता है।
विश्व हिंदू परिषद की वेबसाइट स्पष्ट रूप से लिखती है—
8 अक्टूबर 1984, अयोध्या।
आयोग ने दर्ज किया कि बजरंग दल का गठन 7 अक्टूबर 1984 को दिगंबर अखाड़े में हुआ और परमहंस रामचंद्र दास का आशीर्वाद प्राप्त था।
संभव है कि प्रारंभिक बैठक, संगठन की घोषणा और यात्रा-सम्बंधी औपचारिकता 7–8 अक्टूबर में लगातार हुई हों। बाद के संगठनात्मक इतिहासों में किसी एक तारीख को स्थापना-दिवस के रूप में चुना गया हो।
अतः हमारी समयरेखा में बेहतर पद्धति होगी—
7–8 अक्टूबर 1984 : अयोध्या में बजरंग दल का गठन; विश्व हिंदू परिषद की आधिकारिक तिथि 8 अक्टूबर।
भारतीय एक्सप्रेस ने बजरंग दल की संगठनात्मक उत्पत्ति की एक और महत्वपूर्ण परत दर्ज की है। उसके अनुसार अक्टूबर 1984 में लखनऊ की एक बैठक में अशोक सिंघल और विनय कटियार मौजूद थे। कटियार ने सुझाव दिया कि विश्व हिंदू परिषद को युवाओं में काम करने के लिए अलग संगठन चाहिए; इसके बाद “बजरंग दल” नाम पर सहमति बनी।
यह विवरण और अयोध्या गठन-तिथि एक-दूसरे को अनिवार्य रूप से काटते नहीं हैं।
संभव संगठनात्मक क्रम यह हो सकता है—
अयोध्या यात्रा के दौरान युवा समूह की व्यावहारिक आवश्यकता और आरंभ,
फिर लखनऊ बैठक में उसे अधिक स्थायी संगठनात्मक रूप।
अर्थात एक अस्थायी यात्रा-सुरक्षा समूह से स्थायी युवा संगठन तक संक्रमण।
बजरंग दल के शुरुआती इतिहास में विनय कटियार सबसे महत्वपूर्ण नाम हैं।
लिब्रहान आयोग उन्हें गठन के समय संगठन का अध्यक्ष बताता है। आयोग के अनुसार उनके सामने घोषित उद्देश्यों में युवाओं को मंदिर निर्माण के समर्थन में संगठित करना, गो-रक्षा और धर्मांतरण-विरोध जैसे मुद्दे भी शामिल थे।
भारतीय एक्सप्रेस के अनुसार कटियार पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वाराणसी महानगर प्रचारक रह चुके थे और उन्हें शुरुआती उत्तर प्रदेश संगठन का नेतृत्व दिया गया; संगठन दूसरे राज्यों में फैला तो वे राष्ट्रीय संयोजक बने।
इसलिए उन्हें केवल बाद के भाजपा नेता के रूप में देखना कालक्रम को उलट देगा।
1984 में उनकी प्रमुख पहचान युवा राम जन्मभूमि संगठनकर्ता की थी; उनकी बड़ी संसदीय राजनीति बाद में आई।
यह तथ्य स्पष्ट रखना जरूरी है क्योंकि बाद की आयोगीय भाषा में उनके बाद के राजनीतिक पदों के संदर्भ मिश्रित दिखाई दे सकते हैं।
कटियार बाद में फैजाबाद से भाजपा सांसद बने और उत्तर प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष भी रहे। भारतीय एक्सप्रेस के अनुसार उन्होंने 1991, 1998 और 1999 में लोकसभा चुनाव जीते।
इसलिए 1984 की स्थापना-कथा में उन्हें उस समय के “सांसद” अथवा स्थापित भाजपा संसदीय नेता के रूप में प्रस्तुत करना कालक्रमगत रूप से गलत होगा।
इस प्रश्न पर भी विवाद रहा है।
विश्व हिंदू परिषद उसे स्पष्ट रूप से अपनी युवा इकाई के रूप में प्रस्तुत करती है।
लिब्रहान आयोग ने भी उसे विश्व हिंदू परिषद की युवा इकाई माना। आयोग ने यह तक कहा कि विनय कटियार द्वारा इसे स्वतंत्र संस्था की तरह पेश करने की कोशिश विश्वसनीय नहीं थी, क्योंकि विश्व हिंदू परिषद नेतृत्व और सार्वजनिक समझ दोनों इसे उसकी युवा शाखा मानते थे।
इसलिए शोध के स्तर पर सबसे सुरक्षित निष्कर्ष है—
बजरंग दल विश्व हिंदू परिषद के आंदोलनकारी पारिस्थितिकी तंत्र की युवा इकाई के रूप में विकसित हुआ, भले उसकी आंतरिक संरचना शुरुआती वर्षों में अपेक्षाकृत ढीली रही हो।
लिब्रहान आयोग के रिकॉर्ड में कटियार के बयान का उल्लेख है कि बजरंग दल की शुरुआती संरचना “लचीला” थी और कोई कठोर constitution नहीं था।
यह तथ्य बहुत महत्वपूर्ण है।
अर्थात बजरंग दल शुरू से किसी आधुनिक नौकरशाही सदस्यता संगठन की तरह नहीं बना था।
उसकी शुरुआती शक्ति थी—
तेजी से युवाओं को जोड़ना,
स्थानीय स्तर पर समूह बनाना,
सांकेतिक पहचान,
और तत्काल अभियान में उपयोग।
इससे संगठन आसानी से फैल सकता था, लेकिन नियंत्रण और जवाबदेही का प्रश्न भी जटिल बनता था।
“बजरंग” हनुमान का नाम है।
रामकथा में हनुमान—
शक्ति,
सेवा,
निष्ठा,
साहस,
और रामकार्य—
के प्रतीक हैं।
इसलिए संगठन का नाम युवाओं के लिए सीधी भूमिका तय करता था—
राम के कार्य में हनुमान-समान सेवक।
विश्व हिंदू परिषद की आधिकारिक स्थापना-कथा भी इसी धार्मिक प्रतीक को स्पष्ट रूप से उपयोग करती है।
बाद के संगठनात्मक विवरणों में तुलसीदास की पंक्ति से प्रेरित उद्घोष—
“राम काज कीन्हे बिनु मोहि कहाँ विश्राम”
—बजरंग दल की पहचान से जुड़ा। भारतीय एक्सप्रेस भी इसे संगठन के आरंभिक नारा के रूप में दर्ज करता है।
यह नारा संगठन की कार्य-संस्कृति को एक धार्मिक कर्तव्य में बदलता था।
मंदिर आंदोलन में भागीदारी केवल राजनीतिक सक्रियता नहीं, “रामकाज” कही जा सकती थी।
बजरंग दल की व्यापक संगठनात्मक पहचान बाद में सेवा, सुरक्षा और संस्कार जैसे सूत्र से जुड़ी। भारतीय एक्सप्रेस इसकी संगठनात्मक motto के रूप में चर्चा करता है।
यह भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संगठन स्वयं को केवल आंदोलनकारी सड़क बल के रूप में प्रस्तुत नहीं करता था।
उसकी self-definition में—
धार्मिक-सामाजिक सेवा,
समुदाय की सुरक्षा,
और हिंदू युवाओं के सांस्कृतिक संस्कार—
तीनों शामिल थे।
राम जन्मभूमि उसका तत्काल स्थापना संदर्भ था।
लेकिन लिब्रहान आयोग के अनुसार शुरुआती घोषित उद्देश्यों में—
राम मंदिर निर्माण के लिए समर्थन जुटाना,
युवाओं को संगठित करना,
गो-रक्षा,
धर्मांतरण-विरोध,
और पश्चिमी सांस्कृतिक प्रभाव के विरोध—
जैसे व्यापक हिंदू-सामाजिक मुद्दे भी शामिल थे।
अर्थात अयोध्या प्रवेश-द्वार था, लेकिन संगठन ने शीघ्र ही व्यापक हिंदू युवा सक्रियता का चरित्र ग्रहण किया।
यात्रा से संगठन की उत्पत्ति का अर्थ है कि उसका पहला काम सैद्धांतिक नहीं, व्यावहारिक था—
मार्ग व्यवस्था।
सभा सुरक्षा।
युवाओं को एकत्र करना।
रथ की रक्षा।
स्थानीय संपर्क।
यात्रा का अनुशासन।
इससे बजरंग दल की संगठनात्मक संस्कृति शुरू से कार्रवाई-उन्मुख बनी।
संतों के नेतृत्व वाला आंदोलन तभी बड़े स्तर पर फैल सकता था जब उसे भारी संख्या में युवा उपलब्ध हों।
युवा—
लंबी यात्राएं कर सकते थे,
रात-दिन प्रचार कर सकते थे,
दीवार लेखन कर सकते थे,
जुलूस निकाल सकते थे,
जनसभा की व्यवस्था कर सकते थे,
और आवश्यकता पड़ने पर तत्काल अयोध्या पहुंच सकते थे।
इसीलिए युवा लामबंदी राम जन्मभूमि आंदोलन की अगली बड़ी संगठनात्मक आवश्यकता थी।
1984 तक आंदोलन में एक प्रभावी विभाजन विकसित हो रहा था—
संत — धार्मिक संकल्प।
विश्व हिंदू परिषद — केंद्रीय अभियान।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ — संगठनात्मक नेटवर्क।
बजरंग दल — युवा सक्रियता।
इससे धार्मिक प्राधिकरण और सड़क लामबंदी एक-दूसरे से जुड़ गए।
लिब्रहान आयोग की आधिकारिक रिपोर्ट में भी बजरंग दल को विश्व हिंदू परिषद के युवा अंग और मंदिर निर्माण को उसके प्रमुख उद्देश्यों में एक माना गया।
लिब्रहान आयोग ने विशेष रूप से दर्ज किया कि संगठन दिगंबर अखाड़े में परमहंस रामचंद्र दास के आशीर्वाद से बना।
यह प्रतीकात्मक संबंध महत्वपूर्ण था।
परमहंस 1950 से अयोध्या मुकदमे और मंदिर मांग की ऐतिहासिक धारा से जुड़े थे।
युवा संगठन को उनके आशीर्वाद से 1949–50 की पुरानी संत-परंपरा और 1984 की नई युवा लामबंदी के बीच सीधा सेतु मिला।
इसे इसी रूप में भी देखा जा सकता है—
1950 का नेतृत्व मुख्यतः महंत, साधु और वादकारी।
1984 में उनके साथ नई युवा पीढ़ी।
यह आंदोलन sustainability के लिए आवश्यक था।
यदि संघर्ष केवल बुजुर्ग संतों पर निर्भर रहता, तो राष्ट्रीय व्यापक जन अभियान कठिन होता।
बजरंग दल ने आंदोलन में generational भर्ती की व्यवस्था दी।
विश्व हिंदू परिषद की आधिकारिक बजरंग दल सामग्री के अनुसार 26 मार्च 1985 को राम जन्मभूमि के उद्देश्य के लिए “राम-भक्त बलिदानी” समूह बनाने की अपील की गई और संगठन का दावा है कि बड़ी संख्या में युवाओं ने नाम भेजे।
यह संख्या संगठन का self-reported दावा है; इसलिए उसे स्वतंत्र लेखा-परीक्षित statistic नहीं माना जाना चाहिए।
लेकिन इस कार्यक्रम का महत्व संख्या से अधिक भाषा में है—
आंदोलन में युवाओं से साधारण समर्थन नहीं, त्याग और संघर्ष की तत्परता मांगी जा रही थी।
यह लामबंदी की तीव्रता बढ़ने का संकेत है।
धार्मिक आंदोलनों में बलिदान की भाषा अत्यंत शक्तिशाली होती है।
वह कार्यकर्ता को यह संदेश देती है—
तुम किसी सामान्य राजनीतिक अभियान में नहीं,
एक पवित्र ऐतिहासिक कर्तव्य में हो।
यही भाषा आगे कारसेवा और 1990 के गोलीकांड के बाद और अधिक प्रभावी हुई।
कोठारी बंधुओं जैसे मृत कारसेवक आगे इसी “बलिदानी” स्मृति का हिस्सा बने।
लिब्रहान आयोग ने स्पष्ट दर्ज किया कि 19 दिसंबर 1985 को बजरंग दल ने अयोध्या के ताले खोलने की मांग के समर्थन में बंद कराया।
यह बजरंग दल की शुरुआती राजनीतिक-सामाजिक शक्ति का महत्वपूर्ण प्रमाण है।
अब संगठन केवल यात्रा सुरक्षा तक सीमित नहीं था।
वह—
बंद का आह्वान,
सड़क लामबंदी,
और सरकार पर दबाव—
का माध्यम बन चुका था।
केवल लगभग एक वर्ष में विकास देखिए—
अक्टूबर 1984 — यात्रा की सुरक्षा।
मार्च 1985 — बलिदानी युवा अभियान।
दिसंबर 1985 — बंद।
यानी बजरंग दल बहुत तेजी से अस्थायी गठन से संगठित दबाव समूह में बदल गया।
यही उसकी राम जन्मभूमि आंदोलन में स्थायी उपयोगिता बनी।
1 फरवरी 1986 को जिला न्यायाधीश के आदेश के बाद विवादित स्थल के बाहरी प्रवेश पर लगे ताले खोले गए।
इस घटना को बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद ने अपने “ताला खोलो” अभियान की सफलता के रूप में प्रस्तुत किया।
लेकिन न्यायिक रूप से फिर वही अंतर आवश्यक है—
ताला अदालत के आदेश से खुला।
बजरंग दल का आंदोलन उस निर्णय के आसपास का सामाजिक और राजनीतिक दबाव था; वह स्वयं न्यायिक आदेश नहीं था।
आंदोलनकारी संगठन के लिए धारणा बहुत महत्वपूर्ण होता है।
यदि एक बड़े अभियान के बाद उसकी मुख्य मांग पूरी हो जाए, तो समर्थकों को संदेश मिलता है—
लामबंदी works.
ताला खुलने के बाद अगला उद्देश्य स्वाभाविक रूप से अधिक बड़ा हुआ—
अब केवल दर्शन नहीं,
मंदिर निर्माण।
इससे युवा संगठन के विस्तार को नई ऊर्जा मिली।
बजरंग दल उत्तर प्रदेश तक सीमित स्थानीय समूह नहीं रहा।
भारतीय एक्सप्रेस के अनुसार पहले विनय कटियार उत्तर प्रदेश के संयोजक बने और संगठन दूसरे राज्यों तक बढ़ने के बाद उन्हें राष्ट्रीय संयोजक की भूमिका मिली।
इससे स्पष्ट है कि 1984 का अयोध्या-आधारित गठन शीघ्र ही राष्ट्रीय युवा तंत्र बनने लगा।
तीन आधारभूत संरचना पहले से मौजूद थे—
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक नेटवर्क।
विश्व हिंदू परिषद की प्रांतीय संरचनाएं।
धार्मिक मठ-मंदिर नेटवर्क।
बजरंग दल को अलग से शून्य से पूरा संगठन खड़ा नहीं करना था।
वह इस विद्यमान समूचा तंत्र पर विस्तार कर सकता था।
यही संघ-परिवार आधारित संगठनात्मक scalability का एक और उदाहरण है।
बजरंग दल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा नहीं था।
वह विश्व हिंदू परिषद की युवा इकाई के रूप में विकसित हुआ।
लेकिन संस्थागत समूचा तंत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका स्पष्ट थी।
विनय कटियार स्वयं प्रचारक पृष्ठभूमि से आए थे।
इसलिए संगठनात्मक संस्कृति, कार्यकर्ता-तंत्र जुड़ाव और वैचारिक संबंध मजबूत होना स्वाभाविक था।
लेकिन कानूनी और संगठनात्मक पहचान अलग रखनी चाहिए।
1984 में बजरंग दल भाजपा का युवा इकाई नहीं था।
भाजपा की अपनी युवा इकाई—भारतीय जनता युवा मोर्चा—अलग थी।
बजरंग दल विश्व हिंदू परिषद से संबंधित था।
यह अंतर अत्यंत आवश्यक है।
बाद में विनय कटियार और अन्य नेता भारतीय जनता पार्टी राजनीति में आए, लेकिन उससे 1984 का संगठन पूर्वप्रभाव से भारतीय जनता पार्टी इकाई नहीं बन जाता।
फिर भी दोनों धाराओं का संगम महत्वपूर्ण था।
बजरंग दल जिन युवाओं को राम मंदिर के लिए संगठित करना कर रहा था, उनमें से बहुत बड़ी संख्या स्वाभाविक रूप से उस राजनीतिक दल के प्रति सहानुभूति रख सकती थी जिसने आगे मंदिर का समर्थन किया।
1989 के बाद भाजपा और राम मंदिर आंदोलन का संबंध मजबूत होने पर धार्मिक लामबंदी का चुनावी spillover बढ़ा।
इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक बजरंग दल कार्यकर्ता भाजपा सदस्य था।
लेकिन राजनीतिक निर्वाचन क्षेत्र दोहराव मजबूत हुआ।
1989 में आंदोलन ने देशव्यापी शिला पूजन शुरू किया।
लिब्रहान आयोग के अनुसार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, भारतीय जनता पार्टी और अन्य समर्थक संगठनों की लामबंदी ने आंदोलन को व्यापक जन व्यापकता दिया।
इस चरण में बजरंग दल जैसे युवा संगठन उपयोगी थे—
शिलायात्राएं,
स्थानीय जुलूस,
सभा व्यवस्था,
शिला संग्रह,
अयोध्या तक आवागमन,
और प्रचार।
अब उसका कार्य यात्रा सुरक्षा से बहुत आगे जा चुका था।
लिब्रहान आयोग के अनुसार बजरंग दल ने शिलान्यास स्थल से जुड़ी गतिविधियों में भी भाग लिया और उसने शिलान्यास rectangle पर अपना ध्वज लगाया था।
यह प्रतीकात्मक घटना संगठन की बढ़ी हुई दृश्यता दिखाती है।
1984 का नया युवा समूह 1989 तक राष्ट्रीय राम मंदिर अभियान का सार्वजनिक चेहरा बन चुका था।
“कारसेवा” में श्रमदान, धार्मिक सेवा और आंदोलनकारी भागीदारी तीनों का मेल था।
संत आह्वान कर सकते थे।
लेकिन हजारों-लाखों लोगों को अयोध्या तक लाना और विशेषकर बड़ी संख्या में युवाओं को सक्रिय रखना युवा लामबंदी के बिना कठिन था।
यहीं बजरंग दल की भूमिका आगे अधिक स्पष्ट हुई।
सितंबर 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की सोमनाथ–अयोध्या रथयात्रा भाजपा की राजनीतिक यात्रा थी।
लेकिन उसके स्वागत, सभा और आगे अयोध्या कारसेवा के लिए विभिन्न राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ–विश्व हिंदू परिषद–बजरंग दल तंत्र सक्रिय थे।
इस समय तक आंदोलन का संगठनात्मक ecology अत्यंत परिपक्व हो चुका था।
1984 की राम-जानकी यात्रा में जो मॉडल शुरू हुआ था, वह 1990 में कहीं विशाल रूप में दिखाई दिया।
नहीं।
यह भाजपा नेता की राजनीतिक रथयात्रा थी।
लेकिन बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद कार्यकर्ता राम मंदिर आंदोलन के व्यापक लामबंदी में सक्रिय थे।
संस्थाओं को एक-दूसरे में मिलाना गलत होगा।
आयोजक कौन था और समर्थक/मोबिलाइज़र कौन—दोनों अलग प्रश्न हैं।
मुलायम सिंह यादव सरकार ने अयोध्या में कारसेवा रोकने के लिए कठोर सुरक्षा व्यवस्था की।
इसके बावजूद बड़ी संख्या में कारसेवक अयोध्या पहुंचे।
30 अक्टूबर और 2 नवंबर को टकराव और पुलिस फायरिंग हुई।
इन घटनाओं में बजरंग दल सहित विभिन्न आंदोलनकारी नेटवर्कों की लामबंदी महत्वपूर्ण थी, लेकिन कारसेवकों को केवल बजरंग दल सदस्य कहना तथ्यतः गलत होगा।
इस पूरे प्रकरण का विस्तृत अध्ययन अध्याय 49–53 में अलग होगा।
1990 की मौतों ने आंदोलन में martyrdom आख्यान को और मजबूत किया।
कारसेवकों की तस्वीरें,
अंतिम यात्राएं,
स्मृति सभाएं,
और “बलिदान” की भाषा—
युवा लामबंदी पर गहरा प्रभाव डाल सकती थीं।
1985 की “बलिदानी” भाषा अब वास्तविक मृतकों की स्मृति से जुड़ चुकी थी।
इससे आंदोलन भावनात्मक रूप से और तीखा हुआ।
1991 में विनय कटियार फैजाबाद से भाजपा के लोकसभा सदस्य बने। बाद में वे तीन बार लोकसभा और दो बार राज्यसभा में रहे तथा उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष भी बने।
उनकी राजनीतिक यात्रा एक बड़ी प्रक्रिया का प्रतीक है—
राम मंदिर आंदोलन का युवा संगठनकर्ता → भाजपा का प्रमुख राजनीतिक नेता।
यह आंदोलन और चुनावी राजनीति के बीच personnel-हस्तांतरण का स्पष्ट उदाहरण है।
ऐसा सीधा निष्कर्ष अत्यधिक सरल होगा।
संगठन का घोषित उद्देश्य भाजपा के लिए उम्मीदवार तैयार करना नहीं था।
लेकिन परस्पर दोहराते वैचारिक समूचा तंत्र के कारण कार्यकर्ता का चुनावी राजनीति में जाना स्वाभाविक था।
विनय कटियार इसका प्रसिद्ध उदाहरण हैं, पर इसे पूरे संगठन का एकमात्र उद्देश्य नहीं माना जा सकता।
शुरुआती लचीला संरचना संगठन की कमजोरी भी हो सकती थी, लेकिन लामबंदी में वह ताकत बन सकती थी।
कठोर bureaucracy के बिना—
नए युवक जल्दी जुड़ सकते थे,
स्थानीय इकाई तेजी से बन सकती थी,
और अभियान की तात्कालिकता में समय कम लगता था।
लेकिन इसी ढीली संरचना ने आगे जवाबदेही की समस्या भी पैदा की—
किस कार्रवाई को आधिकारिक संगठन की कार्रवाई माना जाए?
किसे स्थानीय पहल?
और किसे व्यक्ति misconduct?
यह प्रश्न बाद के विवादों में बार-बार उठे।
स्वतंत्र प्रतिवेदन अक्सर बजरंग दल को विश्व हिंदू परिषद के ऐसे युवा गठन के रूप में वर्णित करती है जिसने राम जन्मभूमि आंदोलन को “युवा रक्त” और सड़क पर दिखाई देने वाली ताकत दी। भारतीय एक्सप्रेस इसी संदर्भ में उसके 1984 गठन को आंदोलन में युवा संख्या और प्रत्यक्ष शक्ति जोड़ने से जोड़ता है।
यह बाहरी मूल्यांकन है।
विश्व हिंदू परिषद की self-description अधिक जोर—
सेवा,
सुरक्षा,
धार्मिक संस्कार—
पर देती है।
दोनों आख्यान को अलग-अलग दर्ज करना चाहिए।
समर्थकों के अनुसार बजरंग दल ने—
राम मंदिर आंदोलन में युवाओं को जोड़ा,
धार्मिक यात्राओं की सुरक्षा की,
हिंदू धार्मिक पहचान का संरक्षण किया,
और समाजसेवा के कार्य किए।
विश्व हिंदू परिषद की वेबसाइट आज भी सेवा, प्रशिक्षण, मंदिर-मेला व्यवस्था और सामाजिक कार्यक्रमों को उसके कार्यक्षेत्र में गिनाती है।
आलोचक और अनेक मीडिया रिपोर्टें बाद के दशकों में बजरंग दल को—
आक्रामक सड़क लामबंदी,
सांप्रदायिक टकराव,
नैतिक पुलिसिंग,
धर्मांतरण-विरोधी अभियानों,
और vigilante गतिविधियों—
से जोड़ती रही हैं। भारतीय एक्सप्रेस का संगठनात्मक इतिहास भी उसके खिलाफ हिंसक विरोध-प्रदर्शनों और अल्पसंख्यक समुदायों को लेकर आरोपों की लंबी पृष्ठभूमि दर्ज करता है।
लेकिन इन बाद के आरोपों को 1984 के स्थापना-क्षण पर पूर्वप्रभाव से लागू करना उचित नहीं होगा।
हमारा वर्तमान अध्याय विशेष रूप से राम जन्मभूमि आंदोलन में इसकी 1984–92 की भूमिका पर केंद्रित है।
लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट में बजरंग दल का नाम विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी और अन्य आंदोलनकारी संगठनों के साथ बार-बार आता है। आयोग ने कारसेवकों की लामबंदी और संगठनों के परस्पर संबंधों को अलग-अलग अध्यायों में जांचा। गृह मंत्रालय आज भी इन खंडों को आधिकारिक रूप से उपलब्ध कराता है।
इससे कम-से-कम यह स्पष्ट है कि 1992 तक बजरंग दल राम जन्मभूमि आंदोलन की परिधीय इकाई नहीं रह गया था।
आयोग का आकलन कठोर था।
उसने विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बजरंग दल और भारतीय जनता पार्टी समेत व्यापक आंदोलनकारी तंत्र को परस्पर जुड़े ढांचे में देखा।
लेकिन हमें फिर वही कानूनी अंतर बनाए रखना होगा—
जांच आयोग का निष्कर्ष,
आपराधिक मुकदमे का फैसला,
और किसी व्यक्ति की दोषसिद्धि—
एक ही चीज नहीं।
1992 विध्वंस की आपराधिक उत्तरदायित्व का प्रश्न आगे अलग अध्यायों में आएगा।
ऐसा कहना तथ्यात्मक और कानूनी रूप से अनुचित होगा।
6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बड़ी और विविध कारसेवक भीड़ थी।
विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी से जुड़े लोग और बड़ी संख्या में गैर-संगठित श्रद्धालु उपस्थित थे।
किस संगठन की क्या विशिष्ट उत्तरदायित्व थी—यह बाद में लिब्रहान आयोग और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो मुकदमों का विषय बना।
इसलिए “बजरंग दल ने मस्जिद गिराई” जैसे एक-रेखीय वाक्य से जटिल घटना का निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए।
महत्व था—
युवा लामबंदी,
कारसेवा नेटवर्क,
सार्वजनिक आंदोलन,
और आंदोलन दृश्यता।
स्वतंत्र प्रतिवेदन भी 1992 तक बजरंग दल को राम मंदिर आंदोलन में प्रमुख mobilizing बल के रूप में देखती है।
लेकिन संगठन-स्तर लामबंदी और विध्वंस के लिए आपराधिक षड्यंत्र दो अलग प्रश्न हैं।
बजरंग दल की सफलता केवल संगठनात्मक नहीं थी।
उसने युवा कार्यकर्ता को पहचान दी—
वह “कार्यकर्ता” ही नहीं,
“बजरंगी” था।
उसका आदर्श हनुमान।
उसका कार्य रामकाज।
उसका आंदोलन जन्मभूमि।
इससे राजनीतिक भागीदारी धार्मिक self-conception में बदल सकती थी।
यह व्यापक जनलामबंदी की अत्यंत शक्तिशाली मनोवैज्ञानिक तकनीक है।
भगवा पट्टी,
भगवा ध्वज,
हनुमान-बजरंगबली,
जय श्रीराम,
और रथ—
इन दृश्य प्रतीक ने संगठन को तुरंत पहचाने जाने योग्य बनाया।
लिब्रहान आयोग के बजरंग दल वर्णन में भगवा पट्टी जैसी loose सदस्यता पहचान का भी उल्लेख आता है।
ऐसी सरल दृश्य पहचान बड़े विकेंद्रीकृत आंदोलन में उपयोगी होती है।
युवा लामबंदी में inherent तनाव था।
संगठन को energetic कार्यकर्ता-तंत्र चाहिए।
लेकिन वही ऊर्जा यदि नियंत्रण से बाहर जाए तो हिंसा और टकराव का जोखिम बढ़ता है।
बजरंग दल का बाद का इतिहास इसी तनाव से जुड़ा रहा—
समर्थक इसे साहसी धार्मिक सक्रियता कहते हैं,
आलोचक उग्र सड़क राजनीति।
राम जन्मभूमि आंदोलन में भी यही तनाव दिखाई देती है।
संत स्वयं हजारों युवाओं का आधार प्रबंधन नहीं कर सकते।
बजरंग दल—
सभा आयोजित कर सकता था,
रथ संभाल सकता था,
स्थानीय प्रचार कर सकता था,
और धर्म संसद के संदेश को सड़क कार्रवाई में बदल सकता था।
इसलिए वह धार्मिक कमान और व्यावहारिक क्रियान्वयन के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी बना।
विश्व हिंदू परिषद को एक ऐसा युवा बल मिला जो उसके धार्मिक अभियानों में तेजी से deploy किया जा सके।
इससे विश्व हिंदू परिषद केवल संत सम्मेलनों की संस्था नहीं रही।
उसके पास—
धर्म संसद,
राम जन्मभूमि समिति,
बजरंग दल,
और व्यापक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-linked कार्यकर्ता-तंत्र तंत्र—
जैसी अलग-अलग कार्यात्मक परतें बन गईं।
आंदोलन की संगठनात्मक परिष्कार लगातार बढ़ती गई।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्य स्वयंसेवक संगठन अधिक व्यापक सामाजिक लक्ष्य रखता था।
बजरंग दल विशेष रूप से राम जन्मभूमि और बाद के अन्य हिंदू लामबंदी मुद्दों पर अधिक प्रत्यक्ष तथा आंदोलनकारी शैली अपना सकता था।
इससे एक प्रकार का functional specialization संभव हुआ।
हालांकि सभी संस्थाओं की सीमाएँ व्यवहार में पूरी तरह कठोर नहीं थीं।
जब भाजपा ने 1989 से राम मंदिर को अधिक स्पष्ट राजनीतिक समर्थन दिया, तब उसे पहले से तैयार धार्मिक सामाजिक लामबंदी मिला।
उसे शून्य से युवा enthusiasm पैदा नहीं करना पड़ा।
इसका राजनीतिक लाभ स्पष्ट था—
मंदिर आंदोलन जनता को संगठित करना करता,
भारतीय जनता पार्टी उस व्यापक भावना का चुनावी प्रतिनिधि बन सकती थी।
लेकिन यह संबंध क्रमिक था, 1984 से fully formed नहीं।
यह बताता है कि 1984 तक आंदोलन ने अपनी संगठनात्मक जरूरतें पहचान ली थीं।
संत पर्याप्त नहीं।
विश्व हिंदू परिषद कार्यालय पर्याप्त नहीं।
स्थानीय मुकदमे पर्याप्त नहीं।
आवश्यक था—
युवा, गतिशील, सार्वजनिक और त्वरित लामबंदी।
बजरंग दल इसी आवश्यकता का उत्तर था।
1984 का बजरंग दल—
नया,
मुख्यतः उत्तर प्रदेश-केंद्रित,
यात्रा-सुरक्षा और ताला-खोलो अभियान से जुड़ा।
1990 तक—
राष्ट्रीय विस्तार,
कारसेवा लामबंदी,
बड़े धार्मिक-राजनीतिक आंदोलन का सक्रिय युवा अंग।
केवल छह वर्षों में यह परिवर्तन आंदोलन की गति बताता है।
राम-जानकी यात्रा; संगठन का जन्म।
युवा “बलिदानी” लामबंदी और ताला खोलो अभियान।
ताला खोलने की मांग पर बंद।
ताला खुलने के बाद मंदिर निर्माण की मांग केंद्रीय।
शिलापूजन, शिलान्यास और देशव्यापी लामबंदी में भूमिका; आयोग व्यापक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ–विश्व हिंदू परिषद–बजरंग दल लामबंदी दर्ज करता है।
रथयात्रा और कारसेवा के दौर में युवा लामबंदी।
कारसेवा और 6 दिसंबर की घटनाओं के व्यापक आंदोलनकारी परिदृश्य में प्रमुख संगठन।
किसी भी नए संगठन को एक ऐसा व्यक्ति चाहिए जो—
युवा भाषा बोल सके,
आंदोलनकारी शैली रखे,
संगठनात्मक पृष्ठभूमि हो,
और स्थानीय अयोध्या प्रश्न से जुड़ सके।
कटियार ने यह भूमिका निभाई।
बाद में उनका भाजपा में तेज राजनीतिक उदय दिखाता है कि राम जन्मभूमि आंदोलन ने एक नई राजनीतिक नेतृत्व पीढ़ी भी तैयार की।
अयोध्या आंदोलन केवल पुराने राष्ट्रीय नेताओं पर निर्भर नहीं था।
उसने स्वयं नेता पैदा किए—
विनय कटियार,
उमा भारती,
साध्वी ऋतंभरा,
और आगे अनेक स्थानीय आयोजक।
बजरंग दल का गठन इस नई पीढ़ी की संगठनात्मक nursery जैसा बना।
इस पर विस्तार अध्याय 167 में होगा।
उपलब्ध स्थापना दस्तावेज ऐसा नहीं कहते।
विश्व हिंदू परिषद का आधिकारिक विवरण यात्रा-सुरक्षा और हिंदू युवा जागरण की बात करता है।
लिब्रहान आयोग उसके घोषित उद्देश्यों में राम मंदिर, गो-रक्षा और धर्मांतरण-विरोध आदि दर्ज करता है।
अतः स्थापना को “हिंसा के लिए बना संगठन” कहना साक्ष्य से अधिक होगा।
लेकिन आगे उसकी सड़क लामबंदी शैली और विभिन्न हिंसक आरोप एक अलग ऐतिहासिक प्रश्न हैं।
नहीं।
वह स्थापना का तत्काल trigger हो सकता है।
लेकिन बहुत जल्दी उसका उद्देश्य व्यापक युवा लामबंदी बन गया।
दिसंबर 1985 का बंद इसका स्पष्ट प्रमाण है।
इसलिए—
“सुरक्षा से जन्म, आंदोलन में विस्तार”
उसकी शुरुआती यात्रा का अधिक सटीक वर्णन है।
दो परस्पर विरोधी descriptions आगे दिखाई देती हैं।
समर्थक कहते हैं—
युवा शक्ति,
धर्मरक्षा,
सेवा,
अनुशासन।
आलोचक कहते हैं—
संगठन-शक्ति सत्ता,
सड़क intimidation,
सांप्रदायिक लामबंदी।
भारतीय एक्सप्रेस का पश्चदृष्टि इतिहास भी गठन को राम मंदिर अभियान में “युवा रक्त” और अधिक प्रत्यक्ष युवा शक्ति जोड़ने से जोड़ता है।
शोध में दोनों दृष्टिकोण दर्ज करने चाहिए, लेकिन विशिष्ट आरोपों को विशिष्ट साक्ष्य से ही जोड़ना चाहिए।
यदि बाद के सारे विवाद अलग कर दें, तो 1984–92 में बजरंग दल के चार स्पष्ट योगदान दिखाई देते हैं—
युवा भर्ती।
यात्रा और जुलूस लामबंदी।
ताला खोलो, शिलापूजन और कारसेवा जैसे अभियानों में आधार भागीदारी।
आंदोलन को संघर्षशील और दृश्य सार्वजनिक चेहरा देना।
यही उसे आधुनिक अयोध्या आंदोलन के संगठनात्मक इतिहास में अनिवार्य बनाता है।
प्रश्न — विश्व हिंदू परिषद का रिकॉर्ड — लिब्रहान आयोग — स्वतंत्र मीडिया
स्थापना — 8 अक्टूबर 1984 — 7 अक्टूबर 1984 — अक्टूबर 1984
स्थान — अयोध्या — दिगंबर अखाड़ा, अयोध्या — अयोध्या/लखनऊ में संगठनात्मक समेकन
तत्काल संदर्भ — राम-जानकी यात्रा की सुरक्षा — विश्व हिंदू परिषद युवा इकाई, मंदिर लामबंदी — राम मंदिर आंदोलन में युवाओं को जोड़ना
प्रमुख नेता — युवाओं को विश्व हिंदू परिषद ने संगठित किया — विनय कटियार अध्यक्ष — कटियार संस्थापक नेता/संयोजक
संस्थागत स्थिति — विश्व हिंदू परिषद युवा इकाई — विश्व हिंदू परिषद युवा इकाई — विश्व हिंदू परिषद युवा outfit
गलत। इसका गठन 1984 के राम जन्मभूमि अभियान में हुआ।
गलत। यह विश्व हिंदू परिषद की युवा इकाई थी; भाजपा की युवा शाखा अलग है।
असमर्थित और कालक्रमगत रूप से गलत प्रस्तुतीकरण। स्थापना संदर्भ राम-जानकी यात्रा की सुरक्षा और राम मंदिर समर्थन में युवा लामबंदी था।
गलत। उनका संसदीय उदय बाद में हुआ; 1984 में वे आंदोलनकारी-संगठनकर्ता थे।
सिद्ध नहीं। कारसेवक अनेक संगठनों और गैर-संगठित धार्मिक समूहों से आए थे।
गलत। 1985 के बंद से लेकर आगे के लामबंदी तक उसकी विशिष्ट युवा आंदोलनकारी भूमिका स्पष्ट थी।
राम जन्मभूमि आंदोलन की 1984 के बाद की संरचना को इस प्रकार समझा जा सकता है—
संत समाज ↓ धार्मिक वैधता
विश्व हिंदू परिषद ↓ अभियान और समन्वय
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नेटवर्क ↓ संगठनात्मक विस्तार
बजरंग दल ↓ युवा और सड़क-स्तरीय लामबंदी
बाद में भारतीय जनता पार्टी ↓ चुनावी राजनीतिक प्रतिनिधित्व
यह कठोर कमान-श्रृंखला नहीं थी, बल्कि परस्पर दोहराते संगठनात्मक समूचा तंत्र था। लिब्रहान आयोग ने इन्हीं संगठनों के परस्पर संबंधों और कारसेवक लामबंदी को अलग विषयों के रूप में जांचा।
बजरंग दल का गठन राम जन्मभूमि आंदोलन के एक महत्वपूर्ण संक्रमण का सूचक था।
अप्रैल 1984 तक आंदोलन संतों की धर्म संसद में राष्ट्रीय संकल्प बन चुका था।
सितंबर–अक्टूबर में वह यात्रा पर निकला।
और यात्रा ने एक नई समस्या सामने रखी—
इतने बड़े आंदोलन को चलाने के लिए युवा कार्यकर्ता-तंत्र कहां से आएगा?
उत्तर था—बजरंग दल।
शुरुआत यात्रा सुरक्षा से हुई।
लेकिन एक वर्ष में संगठन ताला खोलने के समर्थन में बंद कराने लगा।
आगे वह शिलापूजन, कारसेवा और राम मंदिर आन्दोलन की युवा लामबंदी का प्रमुख अंग बन गया। लिब्रहान आयोग ने 1989 के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और भारतीय जनता पार्टी सहित विभिन्न संगठनों की systematic लामबंदी को व्यापक जन आंदोलन के निर्माण में महत्वपूर्ण माना।
अर्थात बजरंग दल की ऐतिहासिक भूमिका का सबसे सटीक परिचय होगा—
“राम जन्मभूमि आंदोलन की धार्मिक मांग को युवा, गतिशील और सड़क-स्तरीय जनक्रिया में बदलने वाली प्रमुख संगठनात्मक इकाई।”
7–8 अक्टूबर 1984 का बजरंग दल 1990 के दशक के विशाल आंदोलनकारी संगठन जैसा नहीं था।
वह छोटा, ढीला और तत्कालीन राम-जानकी यात्रा की आवश्यकता से पैदा हुआ समूह था।
लेकिन उसके भीतर एक बड़ी संभावना थी।
उसके पास—
हनुमान का शक्तिशाली धार्मिक प्रतीक,
राम मंदिर का स्पष्ट उद्देश्य,
विनय कटियार जैसा युवा संगठनकर्ता,
विश्व हिंदू परिषद का संस्थागत संरक्षण,
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा व्यापक कार्यकर्ता-पर्यावरण,
और संतों का आशीर्वाद—
था।
इसी कारण वह तेजी से बढ़ा।
1985 में बंद।
1986 के बाद मंदिर निर्माण।
1989 में शिला अभियान।
1990 में कारसेवा।
और 1992 तक वह राम जन्मभूमि आंदोलन के सबसे दृश्यमान युवा संगठनों में शामिल हो चुका था।
लेकिन आंदोलन का अगला बड़ा परिवर्तन किसी युवा संगठन के भीतर नहीं, एक राजनीतिक दल के भीतर होने वाला था।
1984 के लोकसभा चुनाव में केवल दो सीटों पर सिमटी भारतीय जनता पार्टी को यह तय करना था कि वह अपनी प्रारंभिक “गांधीवादी समाजवाद” वाली राजनीतिक दिशा पर चलेगी या हिंदुत्व और राम जन्मभूमि जैसे मुद्दों को अधिक स्पष्ट रूप से अपनाएगी।
यहीं से आंदोलन और चुनावी राजनीति का वह संगम शुरू होगा जिसने भारत की पार्टी-व्यवस्था बदल दी।
इसमें भाजपा की 1980 में स्थापना, गांधीवादी समाजवाद, 1984 की दो सीटों वाली पराजय, वाजपेयी के नेतृत्व पर आंतरिक समीक्षा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ–भारतीय जनता पार्टी संबंध, 1986–89 में हिंदुत्व की ओर स्पष्ट झुकाव, आडवाणी का अध्यक्ष बनना और अंततः 1989 के पालमपुर प्रस्ताव तक की पूरी राजनीतिक यात्रा ली जाएगी।