1937 के प्रांतीय चुनाव — वंदे मातरम् विवाद के पीछे सत्ता और प्रतिनिधित्व का संघर्ष
यदि 1937 के चुनाव न हुए होते, तो संभव है कि वंदे मातरम् विवाद उसी तीव्रता से राष्ट्रीय राजनीतिक प्रश्न न बनता।
इसलिए चुनावी संदर्भ आवश्यक है।
भारत सरकार अधिनियम 1935 के अंतर्गत प्रांतीय स्वायत्तता की नई व्यवस्था बनी और 1937 में चुनाव हुए।
कांग्रेस ने उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की और कई प्रांतों में सरकारें बनाईं।
मुस्लिम लीग की स्थिति अधिक जटिल थी। वह मुस्लिम राजनीति की एकमात्र निर्विवाद प्रतिनिधि शक्ति अभी नहीं बनी थी। विभिन्न प्रांतों में क्षेत्रीय मुस्लिम दल और नेता भी मजबूत थे।
यही परिणाम जिन्ना की आगे की रणनीति समझने में महत्वपूर्ण है।
चुनाव के बाद जिन्ना की चुनौती
यदि कांग्रेस सरकारें सफल रहतीं और बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाता भी स्वयं को कांग्रेस की अखिल भारतीय राजनीति से जोड़ते, तो मुस्लिम लीग का यह दावा कमजोर पड़ सकता था कि मुसलमानों को अलग राजनीतिक प्रतिनिधित्व चाहिए।
दूसरी ओर यदि लीग यह स्थापित कर देती कि कांग्रेस सरकारों में—
मुस्लिम संस्कृति असुरक्षित है,
मुस्लिम पहचान दबाई जा रही है,
हिंदू प्रतीक राष्ट्रीय प्रतीकों के रूप में थोपे जा रहे हैं,
तो मुस्लिम राजनीतिक एकीकरण के लिए लीग को मजबूत आधार मिलता।
वंदे मातरम् इस संघर्ष में अत्यंत उपयोगी प्रतीक था।
नेहरू भी इस चुनौती को समझ रहे थे
20 अक्टूबर 1937 के पत्र में नेहरू बंगाल की स्थिति पर विस्तार से विचार करते हैं।
वे लिखते हैं कि बंगाल की राजनीति में मुस्लिम जनसमुदाय तेजी से राजनीतिक रूप से सक्रिय हो रहा है और कांग्रेस के सामने प्रश्न है कि वह उन्हें किस हद तक अपने साथ जोड़ सकेगी। यदि कांग्रेस ऐसा नहीं कर पाती, तो सांप्रदायिक शक्तियां मजबूत होंगी। (The Nehru Archive)
यह वाक्य केवल संगठनात्मक चिंता नहीं था।
यह 1937 की पूरी कांग्रेस रणनीति की कुंजी है।
नेहरू मुस्लिम लीग से समझौता करके उसके नेतृत्व को मजबूत नहीं करना चाहते थे।
लेकिन वे मुस्लिम जनता को लीग की ओर धकेलना भी नहीं चाहते थे।
यहीं “तुष्टिकरण” की बहस जटिल हो जाती है
यदि कांग्रेस ने गीत के दो अंतरे स्वीकार किए ताकि मुस्लिम लीग के राजनीतिक दबाव को शांत किया जा सके, तो आलोचक इसे तुष्टिकरण कह सकते हैं।
लेकिन यदि कांग्रेस का उद्देश्य मुस्लिम लीग को कमजोर करके सामान्य मुस्लिम जनता को कांग्रेस के अखिल भारतीय राष्ट्रवाद में बनाए रखना था, तो इसे एक प्रतिसांप्रदायिक राजनीतिक रणनीति भी कहा जा सकता है।
दोनों संभावनाओं के प्रमाण एक ही दस्तावेज में दिखाई देते हैं।
नेहरू लिखते हैं—
सांप्रदायिक तत्वों के आगे झुकना नहीं है।
लेकिन वास्तविक शिकायत दूर करनी है।
और कांग्रेस को मुस्लिम जनता तक व्यापक अपील करनी है। (The Nehru Archive)
अर्थात कांग्रेस की रणनीति थी—
मुस्लिम लीग के सांप्रदायिक नेतृत्व को चुनौती दो, लेकिन उस धार्मिक शिकायत को मत पकड़े रहने दो जिसके सहारे लीग मुस्लिम जनता को अपने पक्ष में संगठित कर सके।
यह 1937 के निर्णय की सबसे महत्वपूर्ण वैकल्पिक व्याख्या है।
कांग्रेस की राजनीतिक भूल की संभावना
लेकिन यहां आलोचना का आधार भी मौजूद है।
कांग्रेस यह मान रही थी कि यदि वास्तविक धार्मिक शिकायतों को दूर कर दिया जाए तो मुस्लिम लीग की सांप्रदायिक राजनीति का आधार कमजोर होगा।
आगे का इतिहास बताता है कि ऐसा नहीं हुआ।
लीग की मांगें और राजनीतिक प्रभाव दोनों बढ़े।
इसलिए बाद में आलोचकों ने प्रश्न उठाया—
क्या कांग्रेस ने सांप्रदायिक राजनीति को कमजोर किया या उसे यह संदेश दिया कि दबाव बढ़ाने पर राष्ट्रीय प्रतीकों में परिवर्तन संभव है?
इसका उत्तर 1937 की घटना से अकेले नहीं मिलेगा।
अध्याय 14 और 15 में हमें 1938–47 की राजनीति देखनी होगी।
लेकिन अभी एक निष्कर्ष स्पष्ट है
वंदे मातरम् विवाद सिर्फ धर्म का विवाद नहीं था।
वह 1937 के बाद उभरे तीन बड़े प्रश्नों से जुड़ा था—
भारत का प्रतिनिधि कौन?
मुसलमानों का प्रतिनिधि कौन?
भारतीय राष्ट्रवाद की सांस्कृतिक भाषा क्या होगी?
और इन तीनों प्रश्नों के बीच कांग्रेस और मुस्लिम लीग की प्रतिस्पर्धा वंदे मातरम् को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ले आई।