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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–018 · अध्याय 10

नेहरू–बोस पत्राचार — 20 अक्टूबर 1937 का वह पत्र जिसने कांग्रेस की दुविधा खोल दी

20 अक्टूबर 1937

इलाहाबाद

जवाहरलाल नेहरू से सुभाषचंद्र बोस

इस पत्र को केवल एक-दो पंक्तियों में उद्धृत करना पर्याप्त नहीं होगा।

इसके पूरे तर्क को समझना आवश्यक है।

क्योंकि इसी एक पत्र में कांग्रेस की तीन अलग चिंताएं एक साथ दिखाई देती हैं—

वंदे मातरम् की राष्ट्रीय विरासत, मुस्लिम धार्मिक शिकायत और मुस्लिम लीग की सांप्रदायिक राजनीति।

पृष्ठभूमि — बोस का 17 अक्टूबर का पत्र

नेहरू अपना पत्र इन शब्दों से शुरू करते हैं कि उन्हें बोस का 17 अक्टूबर का पत्र मिला है।

इससे एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट होता है—

मुस्लिम लीग के प्रस्ताव के आसपास ही कांग्रेस नेतृत्व के भीतर भी इस प्रश्न पर गंभीर विमर्श चल रहा था।

बोस ने सुझाव दिया था कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर से इस विषय पर बात की जाए।

नेहरू सहमत हुए।

उन्होंने लिखा कि वे टैगोर से वंदे मातरम् पर चर्चा करेंगे। (The Nehru Archive)

यह सुभाष बोस की भूमिका को महत्वपूर्ण बनाता है।

1937 के निर्णय को केवल “नेहरू बनाम वंदे मातरम्” के रूप में प्रस्तुत करना इसलिए ऐतिहासिक रूप से भ्रामक है।

नेहरू ने आनंदमठ मंगवाया

इसके बाद पत्र का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा आता है।

नेहरू बताते हैं कि उन्होंने आनंदमठ का अंग्रेजी अनुवाद हासिल किया है और गीत की पृष्ठभूमि समझने के लिए उसे पढ़ रहे हैं। (The Nehru Archive)

इसका अर्थ क्या है?

1 सितंबर को नेहरू कह रहे थे कि जनता गीत को उसके उपन्यास के संदर्भ से नहीं देखती और पूरा गीत उन्हें हानिरहित लगता है। (The Nehru Archive)

20 अक्टूबर तक वे स्वयं उपन्यास पढ़ रहे थे।

यानी कांग्रेस नेतृत्व ने आलोचना को खारिज करने के बजाय उसकी तथ्यात्मक जांच की।

पहला निष्कर्ष — पृष्ठभूमि मुसलमानों को परेशान कर सकती है

आनंदमठ पढ़ने के बाद नेहरू लिखते हैं कि इसकी पृष्ठभूमि मुसलमानों को परेशान कर सकती है। (The Nehru Archive)

यह उनके सितंबर वाले रुख से महत्वपूर्ण परिवर्तन है।

लेकिन इसे “नेहरू ने जिन्ना की बात मान ली” कहना फिर भी अधूरा होगा।

क्योंकि अगले ही वाक्य में उनका दूसरा निष्कर्ष आता है।

दूसरा निष्कर्ष — विरोध का बड़ा हिस्सा निर्मित है

नेहरू स्पष्ट लिखते हैं कि वंदे मातरम् के खिलाफ तत्कालीन शोर “to a large extent a manufactured one by the communalists” था।

अर्थात—

उनकी दृष्टि में विरोध का बड़ा हिस्सा सांप्रदायिक तत्वों द्वारा खड़ा किया गया था। (The Nehru Archive)

यह अत्यंत महत्वपूर्ण प्रमाण है।

नेहरू भोलेपन में यह नहीं मान रहे थे कि मुस्लिम लीग केवल धार्मिक संवेदनशीलता व्यक्त कर रही है।

वे उसमें राजनीतिक-सांप्रदायिक निर्माण भी देख रहे थे।

तीसरा निष्कर्ष — फिर भी शिकायत में कुछ वास्तविक आधार है

और यहीं नेहरू का तर्क तीसरा मोड़ लेता है।

वे लिखते हैं कि इसके बावजूद शिकायत में कुछ वास्तविक आधार दिखाई देता है।

फिर वे कांग्रेस की नीति का सिद्धांत बताते हैं—

सांप्रदायिक तत्वों की भावनाओं को खुश करने के लिए नहीं झुकना चाहिए, लेकिन जहां वास्तविक शिकायत हो, उसका समाधान किया जाना चाहिए। (The Nehru Archive)

इस एक विचार में 1937 का पूरा समझौता छिपा है।

तीन स्तर

नेहरू के विश्लेषण को इस प्रकार समझा जा सकता है:

स्तर 1 — मुस्लिम लीग राजनीतिक रूप से विवाद बढ़ा रही है।

स्तर 2 — इसलिए उसकी प्रत्येक मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।

स्तर 3 — लेकिन यदि विवाद के भीतर कोई वास्तविक धार्मिक शिकायत है, तो केवल इसलिए उसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि मुस्लिम लीग उसका राजनीतिक इस्तेमाल कर रही है।

यही फर्क बाद में कांग्रेस के फैसले का आधार बना।

भाषा की समस्या

नेहरू एक और दिलचस्प आपत्ति उठाते हैं।

वंदे मातरम् की भाषा कठिन है।

वे स्वयं लिखते हैं कि बिना शब्दकोश के उसे पूरी तरह समझना उनके लिए भी कठिन है। (The Nehru Archive)

इसका अर्थ है कि उनके लिए प्रश्न केवल मुस्लिम धार्मिक आपत्ति का नहीं था।

वे यह भी पूछ रहे थे—

क्या ऐसा गीत अखिल भारतीय राष्ट्रीय गीत हो सकता है जिसकी भाषा देश की विशाल आबादी सहजता से नहीं समझती?

सितंबर के पत्र में भी वे इसी कारण वंदे मातरम् को आदर्श राष्ट्रगान मानने पर संदेह व्यक्त कर चुके थे और सरल भाषा में बेहतर राष्ट्रीय गीत की आवश्यकता की बात कही थी। (The Nehru Archive)

टैगोर से मिलने का निर्णय

नेहरू ने तय किया कि वे 25 अक्टूबर की सुबह कलकत्ता पहुंचेंगे ताकि कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक से पहले टैगोर और अन्य लोगों से बातचीत कर सकें। (The Nehru Archive)

यह कालक्रम बहुत महत्वपूर्ण है—

17 अक्टूबर: बोस का पत्र और मुस्लिम लीग का लखनऊ प्रस्ताव।

20 अक्टूबर: नेहरू का उत्तर।

25 अक्टूबर: नेहरू का कलकत्ता पहुंचने का कार्यक्रम।

26 अक्टूबर से: कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक।

अर्थात निर्णय से पहले एक व्यवस्थित परामर्श प्रक्रिया चल रही थी।

पत्र का वह हिस्सा जिसे अक्सर छोड़ दिया जाता है

20 अक्टूबर के पत्र का बाकी हिस्सा सीधे वंदे मातरम् पर नहीं है, लेकिन शोध की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी है।

नेहरू बंगाल में मुस्लिम राजनीति के विस्तार पर चिंता व्यक्त करते हैं।

वे कहते हैं कि अधिकाधिक मुसलमान राजनीतिक रूप से जागरूक हो रहे हैं। कांग्रेस के सामने प्रश्न है कि वह उन्हें अपने प्रभाव में ला पाएगी या वे सांप्रदायिक शक्तियों की ओर चले जाएंगे। (The Nehru Archive)

वे मुस्लिम लीग और फजलुल हक की राजनीति को तीव्र सांप्रदायिकता के रूप में देखते हैं।

लेकिन उसका उत्तर क्या सुझाते हैं?

मुस्लिम जनता के बीच व्यापक अपील।

उनका मानना था कि लीग को हराने का रास्ता मुस्लिम जनता को कांग्रेस से जोड़ना है। (The Nehru Archive)

यही संदर्भ बताता है कि वंदे मातरम् पर समझौते का प्रश्न केवल धार्मिक सद्भाव नहीं था।

इसके पीछे कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति भी थी।

क्या इसे तुष्टिकरण कहा जा सकता है?

इस पत्र के आधार पर अकेले ऐसा निर्णायक निष्कर्ष निकालना कठिन है।

क्योंकि नेहरू स्पष्ट रूप से सांप्रदायिक तत्वों को खुश करने का विरोध कर रहे हैं।

लेकिन उसी समय वे उस विवाद को शांत करना चाहते हैं जिसका इस्तेमाल मुस्लिम लीग मुस्लिम जनता को कांग्रेस से दूर करने के लिए कर सकती थी।

इसलिए अधिक सटीक निष्कर्ष होगा—

कांग्रेस का निर्णय धार्मिक समावेशिता और राजनीतिक रणनीति—दोनों से प्रभावित था।

तुष्टिकरण का प्रश्न तब अधिक गंभीर होगा यदि आगे यह दिखाई दे कि कांग्रेस द्वारा रियायत देने के बाद भी लीग ने मांगें बढ़ाईं और कांग्रेस बार-बार पीछे हटती रही।

वह परीक्षण आगे होगा।

नेहरू के रुख में बदलाव : मार्च से अक्टूबर 1937

समय

नेहरू की स्थिति

9 मार्च 1937

वंदे मातरम् बहुत लंबे समय से राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ा; इसे सांप्रदायिक अर्थ नहीं दिया जाना चाहिए

1 सितंबर 1937

जनता इसे देवी-पूजा नहीं मानती; पूरा गीत हानिरहित, लेकिन आदर्श राष्ट्रगान के लिए भाषा कठिन

17 अक्टूबर 1937

मुस्लिम लीग की सांप्रदायिक राजनीति पर तीखा हमला

20 अक्टूबर 1937

विरोध काफी हद तक सांप्रदायिक तत्वों द्वारा निर्मित, लेकिन कुछ शिकायत वास्तविक

20 अक्टूबर

आनंदमठ की पृष्ठभूमि मुस्लिम संवेदनशीलता को प्रभावित कर सकती है

25 अक्टूबर

टैगोर तथा अन्य लोगों से परामर्श के लिए कलकत्ता पहुंचने की योजना

26 अक्टूबर से

CWC में प्रश्न पर विचार

28–29 अक्टूबर

पहले दो अंतरों वाले समाधान की दिशा स्पष्ट

यह क्रम एक अत्यंत महत्वपूर्ण निष्कर्ष देता है:

कांग्रेस का फैसला किसी एक दिन में नहीं हुआ।

वह कम-से-कम मार्च से अक्टूबर 1937 तक चल रही बहस, मुस्लिम आपत्तियों, कांग्रेस के भीतर विमर्श, आनंदमठ की समीक्षा और टैगोर से परामर्श की प्रक्रिया का परिणाम था। (The Nehru Archive)

अध्याय 6–10 : विस्तृत समयरेखा

तिथि

घटना

महत्व

1905

बंग-भंग और स्वदेशी आंदोलन

वंदे मातरम् राष्ट्रीय प्रतिरोध का उद्घोष

अप्रैल 1906

बरिसाल में प्रतिबंध और पुलिस कार्रवाई

गीत से राजनीतिक प्रतिरोध का संबंध

1907–08

बंगाल से बाहर उद्घोष का विस्तार

अखिल भारतीय स्वरूप

9 मार्च 1937

नेहरू-मोहंता पत्र

नेहरू वंदे मातरम् को असांप्रदायिक राष्ट्रीय प्रतीक मानते हैं

14 अगस्त 1937

*The Statesman* में विवाद का उल्लेख

आनंदमठ और मूर्तिपूजा संबंधी मुस्लिम आपत्ति

1 सितंबर 1937

नेहरू-जाफरी पत्र

पूरा गीत हानिरहित मानने वाला नेहरू का प्रारंभिक रुख

15 अक्टूबर 1937

जिन्ना का लखनऊ अध्यक्षीय भाषण

मुस्लिम राजनीतिक संगठन और कांग्रेस सरकारों पर हमला

17 अक्टूबर 1937

मुस्लिम लीग प्रस्ताव

वंदे मातरम् औपचारिक राजनीतिक विवाद बना

17 अक्टूबर 1937

नेहरू की लीग पर प्रतिक्रिया

लीग को सांप्रदायिक राजनीति के रूप में चुनौती

17 अक्टूबर

बोस का नेहरू को पत्र

टैगोर से परामर्श का सुझाव

20 अक्टूबर

नेहरू-बोस पत्र

विवाद पर सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिक दस्तावेज

25 अक्टूबर

नेहरू का कलकत्ता पहुंचने का कार्यक्रम

टैगोर एवं अन्य लोगों से परामर्श

26 अक्टूबर–1 नवंबर

CWC बैठक

दो-अंतरे वाली नीति का निर्माण

खंड–2 : प्रमुख प्राथमिक दस्तावेजों की सूची

1. जवाहरलाल नेहरू से मोहन चंद्र मोहंता, 9 मार्च 1937

नेहरू का शुरुआती रुख समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण। इसमें वे वंदे मातरम् को लंबे राष्ट्रीय प्रयोग के कारण सांप्रदायिक अर्थ से अलग देखते हैं। (The Nehru Archive) मूल दस्तावेज — Nehru Archive

2. जवाहरलाल नेहरू से अली सरदार जाफरी, 1 सितंबर 1937

इसमें नेहरू ब्रिटिश दमन, वंदे मातरम् की राष्ट्रीय प्रतिष्ठा, देवी संबंधी व्याख्या और राष्ट्रगान के रूप में उसकी उपयुक्तता—सभी पर विचार करते हैं। (The Nehru Archive) मूल पत्र — Nehru Archive

3. मुस्लिम लीग, लखनऊ अधिवेशन, 15–17 अक्टूबर 1937

17 अक्टूबर के प्रस्ताव में कांग्रेस पर मुसलमानों की भावनाओं की उपेक्षा करके वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गान के रूप में थोपने का आरोप दर्ज है। (The Nehru Archive) समकालीन संदर्भ सहित अभिलेख

4. जवाहरलाल नेहरू से सुभाषचंद्र बोस, 20 अक्टूबर 1937

विवाद का केंद्रीय प्राथमिक स्रोत। आनंदमठ, टैगोर, सांप्रदायिक राजनीति, वास्तविक शिकायत और मुस्लिम जनता तक कांग्रेस की पहुंच—सब एक ही पत्र में मिलते हैं। (The Nehru Archive) मूल पत्र — Nehru Archive

5. 28 अक्टूबर 1937 का कांग्रेस कार्यसमिति वक्तव्य

उपलब्ध पुनर्प्रकाशित पाठ में CWC ने मुस्लिम मित्रों द्वारा गीत के कुछ हिस्सों पर उठाई गई आपत्ति की वैधता को एक सीमा तक स्वीकार किया और राष्ट्रीय सभाओं में पहले दो अंतरे गाने की सिफारिश की। साथ ही आजाद, नेहरू, बोस और नरेंद्र देव की उपसमिति राष्ट्रीय गीतों की समीक्षा के लिए बनाई गई। (Heritage Times)

इस खंड से निकलने वाले पांच महत्वपूर्ण निष्कर्ष

मुस्लिम आपत्ति 17 अक्टूबर 1937 को अचानक पैदा नहीं हुई। अगस्त तक सार्वजनिक बहस चल रही थी और मार्च में भी कांग्रेस के भीतर वंदे मातरम् के सांप्रदायिक अर्थ को लेकर चर्चा मौजूद थी। (The Nehru Archive)

मुस्लिम लीग ने 17 अक्टूबर को इसे औपचारिक राजनीतिक प्रश्न बना दिया। उसने इसे कांग्रेस सरकारों और मुस्लिम प्रतिनिधित्व के व्यापक विवाद से जोड़ा। (The Nehru Archive)

नेहरू ने लीग के विरोध को निष्पक्ष धार्मिक आंदोलन नहीं माना। 20 अक्टूबर को वे साफ लिख रहे थे कि उसका बड़ा हिस्सा सांप्रदायिक तत्वों द्वारा निर्मित था। (The Nehru Archive)

लेकिन नेहरू ने वास्तविक धार्मिक शिकायत की संभावना भी स्वीकार की। यही कारण था कि उन्होंने आनंदमठ पढ़ा और टैगोर से परामर्श स्वीकार किया। (The Nehru Archive)

इसलिए “जिन्ना ने कहा और कांग्रेस ने चार अंतरे हटा दिए” तथा “मुस्लिम लीग के दबाव का फैसले से कोई संबंध ही नहीं था”—दोनों अतिवादी व्याख्याएं उपलब्ध दस्तावेजों से पूरी तरह समर्थित नहीं होतीं। राजनीतिक दबाव मौजूद था, लेकिन कांग्रेस के भीतर स्वतंत्र समीक्षा और परामर्श की प्रक्रिया भी मौजूद थी।