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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–018 · अध्याय 20

19 अगस्त 2026 — कांग्रेस ने 1937 का फैसला फिर क्यों चुना?

यह वह बिंदु है जहां विवाद अतीत से वर्तमान में प्रवेश करता है।

19 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई।

वंदे मातरम् का प्रश्न उसके सामने था।

केंद्र छह-अंतरे वाला सरकारी प्रोटोकॉल लागू कर चुका था।

आकाशवाणी पूर्ण संस्करण पर जा चुका था।

संसद राष्ट्रीय सम्मान कानून में संशोधन पारित कर चुकी थी।

और देश वंदे मातरम् के 150वें वर्ष का समारोह मना रहा था।

कांग्रेस के पास अवसर था—

1937 के फैसले की पुनर्समीक्षा करने का।

उसने ऐसा नहीं किया।

CWC का फैसला

कांग्रेस कार्यसमिति ने तय किया कि पार्टी अपने कार्यक्रमों में पहले दो अंतरे ही गाने की पुरानी व्यवस्था पर कायम रहेगी। उसने इसे 1937 से चली आ रही अपनी ऐतिहासिक नीति से जोड़ा। (The Economic Times)

यानी 89 वर्ष बाद कांग्रेस ने 1937 को पुनः स्वीकार किया।

कांग्रेस का तर्क क्या है?

कांग्रेस की स्थिति को तीन स्तरों में समझा जा सकता है।

पहला—ऐतिहासिक निरंतरता।

पार्टी का कहना है कि यह कोई नया निर्णय नहीं है।

वह वही व्यवस्था चला रही है जो स्वतंत्रता आंदोलन के महान नेताओं के समय बनी थी।

दूसरा—राष्ट्रीयता पर भाजपा का एकाधिकार स्वीकार नहीं करना।

कांग्रेस की राजनीतिक दलील है कि जिन नेताओं ने स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया, उन्हीं ने दो-अंतरे वाला प्रारूप अपनाया था। इसलिए आज इसे राष्ट्रविरोधी कहना उन नेताओं के निर्णय पर भी प्रश्न उठाना होगा।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने इसी राजनीतिक तर्क को आक्रामक ढंग से आगे रखा और भाजपा को गांधी-नेहरू के ऐतिहासिक निर्णय को चुनौती देने की बात कही। (The Times of India)

तीसरा—धार्मिक समावेशिता की पुरानी व्याख्या।

कांग्रेस आज भी 1937 के निर्णय को सांप्रदायिक दबाव के सामने आत्मसमर्पण के बजाय समावेशी राष्ट्रवाद के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करती है।

लेकिन 2026 में समस्या अलग क्यों है?

यहीं विवाद का केंद्रीय प्रश्न फिर लौटता है।

1937 में—

भारत पर ब्रिटिश शासन था।

पृथक निर्वाचन था।

कांग्रेस और मुस्लिम लीग प्रतिनिधित्व की लड़ाई लड़ रहे थे।

देश का विभाजन नहीं हुआ था।

सांप्रदायिक संघर्ष लगातार बढ़ रहा था।

कांग्रेस अखिल भारतीय आंदोलन को एक साथ रखने की कोशिश कर रही थी।

लेकिन 2026 में—

भारत संप्रभु गणराज्य है।

संविधान लागू हुए 76 वर्ष हो चुके हैं।

मुस्लिम लीग की 1937 वाली राजनीतिक परिस्थिति नहीं है।

पाकिस्तान बन चुका है।

वंदे मातरम् को 1950 में राष्ट्रीय सम्मान मिला।

और संसद ने 2026 में उसकी कानूनी सुरक्षा भी बढ़ा दी।

इसलिए प्रश्न वैध है—

क्या 1937 की परिस्थिति-जन्य व्यवस्था 2026 में भी स्वतः उचित मानी जानी चाहिए?

“गांधी और नेहरू ने ऐसा किया था” इसका ऐतिहासिक उत्तर हो सकता है।

लेकिन यह अपने आप वर्तमान नीति का पर्याप्त तर्क नहीं बनता।

भाजपा और अमित शाह की आपत्ति

गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी।

उन्होंने इसे तुष्टिकरण की उसी नीति की वापसी बताया और कांग्रेस के निर्णय को राष्ट्र-विरोधी करार दिया। उनका राजनीतिक आरोप है कि कांग्रेस आज भी उसी सांप्रदायिक दबाव की राजनीति को ढो रही है जिसने 1937 में संपूर्ण वंदे मातरम् के प्रयोग को सीमित कराया था। (The Times of India)

भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने इससे भी आगे जाकर कांग्रेस की तुलना “नई मुस्लिम लीग” से की। (The Times of India)

यह राजनीतिक भाषा है; इसे ऐतिहासिक निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।

लेकिन उसके पीछे एक वास्तविक ऐतिहासिक प्रश्न अवश्य है—

1937 के फैसले का कारण यदि उस समय की मुस्लिम आपत्ति थी, तो 2026 में वही सीमा बनाए रखने का स्वतंत्र समकालीन औचित्य क्या है?

यही प्रश्न कांग्रेस को केवल इतिहास का हवाला देकर पूरी तरह हल करना कठिन पड़ता है।

एक और अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न — क्या कांग्रेस संविधान का अपमान कर रही है?

इस विषय में भाषा बहुत सावधानी से चुननी होगी।

राजनीतिक आलोचना में कहा जा सकता है कि कांग्रेस 24 जनवरी 1950 की संविधान सभा की भावना के विपरीत चल रही है क्योंकि राजेंद्र प्रसाद ने पूरे “song Vande Mataram” को समान सम्मान और दर्जा देने की बात कही थी। (Constitution of India)

लेकिन कानूनी रूप से यह कहना कि—

“कांग्रेस दो अंतरे गाकर संविधान का उल्लंघन कर रही है”

अभी उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर उचित नहीं होगा।

कारण:

संविधान में छह अंतरे गाने का कोई अनुच्छेद नहीं है।

राजेंद्र प्रसाद के वक्तव्य में भी प्रत्येक नागरिक अथवा संस्था को छहों अंतरे गाने का आदेश नहीं है।

और 2026 का संशोधित राष्ट्रीय सम्मान कानून भी गायन में बाधा डालने को दंडित करता है; वह हर व्यक्ति को पूरा गीत गाने के लिए बाध्य नहीं करता। (PRS Legislative Research)

लेकिन राजनीतिक प्रश्न फिर भी बचा रहता है

और वह अधिक प्रभावी भी है—

जब संविधान सभा ने वंदे मातरम् को जन गण मन के समान सम्मान और दर्जा दिया, केंद्र ने उसके संपूर्ण स्वरूप को सरकारी प्रोटोकॉल में पुनर्स्थापित किया और संसद ने उसे अतिरिक्त कानूनी संरक्षण दिया—तब कांग्रेस 2026 में भी 1937 की परिस्थिति से पैदा हुई सीमा को क्यों बनाए रखना चाहती है?

यह प्रश्न तथ्यात्मक भी है और विश्लेषण की दृष्टि से अधिक मजबूत भी।

1937 बनाम 1950 बनाम 2026 — एक नजर में

प्रश्न

1937

1950

2026

राजनीतिक परिस्थिति

ब्रिटिश शासन, कांग्रेस-लीग संघर्ष

स्वतंत्र गणराज्य की स्थापना

स्थापित संवैधानिक गणराज्य

मुख्य प्रश्न

मुस्लिम आपत्ति का समाधान

राष्ट्रीय प्रतीकों का दर्जा

संपूर्ण गीत का राजकीय प्रयोग

फैसला/व्यवस्था

राष्ट्रीय कांग्रेस सभाओं में पहले दो अंतरे

वंदे मातरम् को जन गण मन के समान सम्मान व दर्जा

सरकारी प्रोटोकॉल में छह-अंतरे का संस्करण

निर्णयकर्ता

कांग्रेस कार्यसमिति

संविधान सभा अध्यक्ष का वक्तव्य

केंद्र सरकार/गृह मंत्रालय; विधिक सुरक्षा में संसद

पूरा गीत प्रतिबंधित?

नहीं

नहीं

नहीं

छह अंतरे सबके लिए अनिवार्य?

नहीं

नहीं

नहीं

कानूनी सुरक्षा

औपनिवेशिक काल

अलग विशिष्ट दंडात्मक प्रावधान नहीं

राष्ट्रीय सम्मान कानून का संरक्षण विस्तारित

कांग्रेस की स्थिति

पहले दो अंतरे

दो-अंतरे की परंपरा जारी

पहले दो अंतरे ही

केंद्र की 2026 स्थिति

पूर्ण छह-अंतरे का आधिकारिक संस्करण

अध्याय 16–20 : विस्तृत समयरेखा

तिथि

घटना

महत्व

1937

CWC का दो-अंतरे वाला निर्णय

राष्ट्रीय सार्वजनिक गायन की परंपरा

15 अगस्त 1947 के बाद

आकाशवाणी में दो-अंतरे का संस्करण प्रचलित

1937 की परंपरा राजकीय व्यवहार में भी चली

24 जनवरी 1950

राजेंद्र प्रसाद का संविधान सभा वक्तव्य

वंदे मातरम् को जन गण मन के समान सम्मान और दर्जा

26 जनवरी 1950

संविधान लागू

गणराज्य की स्थापना

1971

राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण कानून

राष्ट्रगान को विशिष्ट दंडात्मक संरक्षण

1 अक्टूबर 2025

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 150-वर्षीय समारोह मंजूर किया

वंदे मातरम् पुनः राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में

7 नवंबर 2025

मोदी ने वर्षभर का समारोह शुरू किया

पूर्ण संस्करण का देशव्यापी सामूहिक गायन

28 जनवरी 2026

गृह मंत्रालय के नए दिशा-निर्देश

छह-अंतरे वाले संस्करण का नया सरकारी प्रोटोकॉल

26 मार्च 2026

आकाशवाणी ने पूर्ण संस्करण शुरू किया

65 सेकंड के दो-अंतरे से 3:10 मिनट के छह-अंतरे की ओर बदलाव

24 जुलाई 2026

संशोधन विधेयक राज्यसभा में

राष्ट्रीय गीत को कानूनी संरक्षण का प्रस्ताव

29 जुलाई

राज्यसभा से पारित

विधायी चरण

30 जुलाई

लोकसभा से पारित

संसद की स्वीकृति

19 अगस्त

कांग्रेस कार्यसमिति बैठक

1937 की दो-अंतरे की नीति पुनः स्वीकार

20 अगस्त

अमित शाह का हमला

विवाद राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में

(Press Information Bureau)

खंड–4 : प्रमुख प्राथमिक और आधिकारिक स्रोत

1. संविधान सभा कार्यवाही, 24 जनवरी 1950 — इस पूरे खंड का सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिक दस्तावेज। राजेंद्र प्रसाद का मूल वक्तव्य यहीं उपलब्ध है। (Constitution of India)

24 जनवरी 1950 की संविधान सभा की मूल कार्यवाही

2. भारतीय विधिक अभिलेख में वही संविधान सभा कार्यवाही — स्वतंत्र पुष्टि के लिए उपयोगी। (Indian Kanoon)

Constituent Assembly Debates — 24 January 1950

3. भारत सरकार — वंदे मातरम् के 150 वर्ष — 7 नवंबर 2025 से 7 नवंबर 2026 के वर्षभर के समारोह और पूर्ण संस्करण के सामूहिक गायन का आधिकारिक विवरण। (Press Information Bureau)

150 Years of Vande Mataram — भारत सरकार

4. आकाशवाणी, 25 मार्च 2026 — अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज क्योंकि सरकार स्वयं स्वीकार करती है कि स्वतंत्रता के बाद से दो-अंतरे का 65 सेकंड संस्करण प्रसारित होता रहा और 26 मार्च 2026 से छह-अंतरे वाला 3:10 मिनट संस्करण शुरू हुआ। (Press Information Bureau)

आकाशवाणी का छह-अंतरे वाले संस्करण संबंधी आधिकारिक वक्तव्य

5. राष्ट्रीय सम्मान संशोधन विधेयक, 2026 — राष्ट्रीय गीत को राष्ट्रगान के गायन में बाधा संबंधी दंडात्मक प्रावधान के दायरे में लाने का विधायी रिकॉर्ड। (PRS Legislative Research)

PRS — National Honour Amendment Bill 2026

6. कांग्रेस कार्यसमिति, 19 अगस्त 2026 — कांग्रेस ने पार्टी कार्यक्रमों में केवल पहले दो अंतरे गाने की 1937 की नीति पर कायम रहने का निर्णय किया। (The Economic Times)

7. अमित शाह की प्रतिक्रिया, 20 अगस्त 2026 — शाह ने इसे तुष्टिकरण की पुरानी नीति की निरंतरता और राष्ट्र-विरोधी निर्णय कहा। (The Times of India)

खंड–4 से निकलने वाले सात महत्वपूर्ण शोध-निष्कर्ष

पहला: 1937 का दो-अंतरे वाला फैसला और 1950 का संवैधानिक-ऐतिहासिक दर्जा एक ही निर्णय नहीं हैं।

दूसरा: 24 जनवरी 1950 को राजेंद्र प्रसाद ने “वंदे मातरम् के पहले दो अंतरे” नहीं कहा। मूल कार्यवाही में “the song Vande Mataram” कहा गया और उसे जन गण मन के समान सम्मान तथा दर्जा देने की घोषणा हुई। (Constitution of India)

तीसरा: इससे यह निष्कर्ष भी नहीं निकलता कि संविधान सभा ने प्रत्येक नागरिक को छहों अंतरे गाने का संवैधानिक आदेश दिया। ऐसा कोई आदेश मूल कार्यवाही में नहीं है।

चौथा: इसके बावजूद स्वतंत्र भारत में दो-अंतरे की प्रशासनिक/प्रसारण परंपरा लंबे समय तक चली। इसका अत्यंत मजबूत प्रमाण स्वयं आकाशवाणी का 2026 का सरकारी वक्तव्य है। (Press Information Bureau)

पांचवां: मोदी सरकार ने 2025–26 में पहली बार व्यवस्थित ढंग से संपूर्ण छह-अंतरे वाले संस्करण को सरकारी प्रोटोकॉल के केंद्र में वापस लाया। (New India Samachar)

छठा: 2026 में संसद द्वारा राष्ट्रीय सम्मान कानून का संरक्षण वंदे मातरम् तक बढ़ाना महत्वपूर्ण विधिक परिवर्तन है, लेकिन इससे छहों अंतरे प्रत्येक व्यक्ति के लिए गाना अनिवार्य नहीं हो जाता। (PRS Legislative Research)

सातवां और सबसे महत्वपूर्ण: कांग्रेस के सामने 2026 में प्रश्न अब केवल धार्मिक संवेदनशीलता का नहीं है। उसे यह स्पष्ट करना पड़ता है कि 1937 की विशिष्ट औपनिवेशिक और सांप्रदायिक राजनीतिक परिस्थिति में बनाया गया समझौता स्वतंत्र भारत में 89 वर्ष बाद भी अपरिवर्तनीय क्यों रहना चाहिए।