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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–019 · अध्याय 23

राज्य और राजनीतिक जवाबदेही का अंतिम मूल्यांकन

केंद्र सरकार, कांग्रेस नेतृत्व, दिल्ली प्रशासन, पुलिस, स्थानीय राजनीतिक नेताओं और संस्थागत विफलता—किस स्तर पर क्या तथ्य सिद्ध हैं और क्या आरोप/विवाद हैं

1984 के सिख-विरोधी नरसंहार की पूरी शोध-यात्रा हमें अंततः एक केंद्रीय प्रश्न पर वापस लाती है—

जिम्मेदार कौन था?

इस प्रश्न का उत्तर सरल राजनीतिक नारे में नहीं दिया जा सकता।

क्योंकि 1984 में जिम्मेदारी कई स्तरों पर बंटी हुई थी—

किसी ने भीड़ को उकसाया,

किसी ने हत्या की,

किसी ने पुलिस को निष्क्रिय रहने दिया,

किसी ने खतरे का गलत आकलन किया,

किसी ने सेना देर से बुलायी,

किसी ने FIR कमजोर की,

किसी ने मामला बंद कर दिया,

और किसी राजनीतिक व्यवस्था ने दशकों तक न्याय सुनिश्चित नहीं किया।

इसलिए अंतिम जवाबदेही का मूल्यांकन छह स्तरों पर किया जाना चाहिए—

केंद्र सरकार, प्रधानमंत्री और कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व, दिल्ली प्रशासन, दिल्ली पुलिस, स्थानीय राजनीतिक नेता और कार्यकर्ता, और बाद की जांच तथा न्याय व्यवस्था।

सबसे महत्वपूर्ण सावधानी यह है कि इन सभी स्तरों पर प्रमाण की प्रकृति समान नहीं है।

कहीं न्यायालय ने दोषसिद्धि की है।

कहीं न्यायिक आयोग ने प्रतिकूल निष्कर्ष दिया है।

कहीं प्रत्यक्षदर्शी गवाही है लेकिन अंतिम conviction नहीं।

और कहीं केवल राजनीतिक आरोप हैं।

इन श्रेणियों को अलग रखना ही इस अध्ययन की विश्वसनीयता की अंतिम कसौटी है।

1. सबसे पहले — क्या 1984 एक सिद्ध केंद्रीय सरकारी साजिश थी?

उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर इसका उत्तर है—

ऐसी कोई अंतिम न्यायिक या आयोगीय स्थापना नहीं है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी या कांग्रेस के केंद्रीय शीर्ष नेतृत्व ने दिल्ली और देशभर में सिखों की हत्या का केंद्रीय आदेश दिया था।

रंगनाथ मिश्र आयोग ने कांग्रेस(I) पार्टी या उसके शीर्ष नेताओं द्वारा पूरे हिंसक अभियान में भागीदारी को स्वीकार नहीं किया। उसने हालांकि यह पाया कि कांग्रेस से जुड़े कुछ व्यक्तियों ने अपने स्तर पर हिंसा में भाग लिया। नानावती आयोग ने बाद में मिश्र आयोग के इस मूल निष्कर्ष को दर्ज किया, लेकिन स्थानीय कांग्रेस नेताओं की भूमिका पर अधिक कठोर दृष्टि अपनाई।

इसलिए—

“पूरी कांग्रेस पार्टी ने ऊपर से नरसंहार का आदेश दिया”

एक स्थापित न्यायिक तथ्य नहीं है।

लेकिन इससे कांग्रेस सरकार और स्थानीय कांग्रेस नेताओं की जवाबदेही समाप्त नहीं होती।

2. केंद्रीय राजनीतिक उत्तरदायित्व फिर भी क्यों बनता है?

1984 में दिल्ली किसी विपक्षी राज्य सरकार के नियंत्रण में नहीं थी।

राजधानी केंद्र सरकार के प्रत्यक्ष प्रशासनिक नियंत्रण में थी।

केंद्रीय गृह मंत्रालय दिल्ली की कानून-व्यवस्था से सीधे जुड़ा था।

राजीव गांधी 31 अक्टूबर की शाम प्रधानमंत्री बने।

इसलिए यदि राजधानी में दो दिनों तक हजारों नागरिक धार्मिक पहचान के आधार पर मारे जा रहे हों तो केंद्र सरकार राजनीतिक उत्तरदायित्व से बच नहीं सकती।

यह उत्तरदायित्व दो प्रकार का है—

आपराधिक आदेश का प्रश्न

और

शासन-विफलता का प्रश्न।

पहले का निर्णायक प्रमाण शीर्ष नेतृत्व के विरुद्ध स्थापित नहीं हुआ।

दूसरा निर्विवाद रूप से गंभीर है।

3. पी.वी. नरसिंह राव और गृह मंत्रालय

तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री पी.वी. नरसिंह राव थे।

उनकी भूमिका पर दशकों से राजनीतिक आलोचना रही है।

पूर्व नेताओं और अधिकारियों के विवरणों में आरोप आए कि उन्हें स्थिति की गंभीरता बताई गई और सेना बुलाने की मांग की गई।

लेकिन नानावती आयोग ने उपलब्ध रिकॉर्ड देखने के बाद गृह मंत्री के विरुद्ध वैसा स्पष्ट व्यक्तिगत प्रशासनिक दोष नहीं लगाया जैसा दिल्ली के उपराज्यपाल और पुलिस आयुक्त के संबंध में किया।

इसलिए सही निष्कर्ष है—

गृह मंत्रालय उस राजनीतिक-प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा था जो हिंसा रोकने में विफल रही, लेकिन नानावती आयोग ने नरसिंह राव को नरसंहार का आयोजक या प्रत्यक्ष दोषी नहीं माना।

यही अंतर महत्वपूर्ण है।

4. राजीव गांधी की राजनीतिक जिम्मेदारी

राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री पद उस समय संभाला जब उनकी मां की हत्या हुई थी और राजधानी हिंसा की ओर बढ़ रही थी।

उनके सामने अत्यंत असाधारण संकट था।

लेकिन प्रधानमंत्री होने के कारण अंतिम राजनीतिक उत्तरदायित्व भी उन्हीं पर था।

सवाल हैं—

क्या पर्याप्त जल्दी राष्ट्रीय शांति अपील हुई?

क्या गृह मंत्रालय और दिल्ली प्रशासन पर पर्याप्त दबाव डाला गया?

क्या सेना का उपयोग पर्याप्त तेजी से हुआ?

क्या स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं को नियंत्रित करने के लिए निर्णायक संदेश दिया गया?

इन प्रश्नों पर आलोचना वैध है।

लेकिन—

राजीव गांधी द्वारा नरसंहार आयोजित करने का कोई अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं है।

यह सीमा स्पष्ट रहनी चाहिए।

5. “बड़ा पेड़ गिरता है...” बयान

19 नवंबर 1984 को राजीव गांधी का वह प्रसिद्ध बयान आया जिसमें उन्होंने कहा कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है।

यह बयान पीड़ित समुदाय में गहरे आक्रोश का कारण बना।

आलोचकों ने इसे हिंसा को लगभग स्वाभाविक प्रतिक्रिया बताने वाली भाषा माना।

यह बयान किसी आपराधिक conspiracy का प्रमाण नहीं।

लेकिन राजनीतिक और नैतिक दृष्टि से यह गंभीर था।

क्योंकि प्रधानमंत्री की भाषा का संदेश होना चाहिए था—

हत्या के आरोपी दो व्यक्ति हैं; किसी सिख नागरिक को प्रतिशोध का लक्ष्य नहीं बनाया जाएगा।

उसके बजाय ऐसा वाक्य पीड़ितों के लिए संवेदनहीन प्रतीत हुआ।

इसलिए इसे political insensitivity के प्रमाण के रूप में देखा जा सकता है, आपराधिक आदेश के प्रमाण के रूप में नहीं।

6. कांग्रेस संगठन — सामूहिक दोष बनाम स्थानीय भूमिका

1984 पर सबसे अधिक राजनीतिक विवाद कांग्रेस की भूमिका को लेकर है।

यहां दो चरम दावे गलत हैं।

पहला—

“कांग्रेस का कोई व्यक्ति शामिल नहीं था।”

यह अब उपलब्ध रिकॉर्ड से असंगत है।

दूसरा—

“पूरी कांग्रेस पार्टी की केंद्रीय command ने नरसंहार आयोजित किया।”

यह भी अंतिम न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं है।

सही स्थिति यह है—

नानावती आयोग के सामने सैकड़ों हलफनामों में कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं पर भागीदारी तथा उकसावे के आरोप आए। आयोग ने कुछ विशिष्ट नेताओं के खिलाफ गंभीर और विश्वसनीय सामग्री मानी।

और सज्जन कुमार के मामले में राजनीतिक नेता की आपराधिक भूमिका अदालत से सिद्ध भी हुई।

7. सज्जन कुमार — आरोप नहीं, न्यायिक दोषसिद्धि

सज्जन कुमार की स्थिति अन्य राजनीतिक नामों से अलग है।

उनके बारे में अब केवल आयोगीय आरोप या राजनीतिक विवाद नहीं है।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2018 में उन्हें दिल्ली कैंट मामले में दोषी ठहराया।

बाद में 2025 में एक अलग हत्या मामले में भी उन्हें आजीवन कारावास मिला।

इसलिए उनके संबंध में इतिहास लिखते समय यह कहना सही होगा—

एक प्रभावशाली कांग्रेस नेता की 1984 की हिंसा में आपराधिक भूमिका विशिष्ट मामलों में न्यायालय द्वारा सिद्ध हुई।

यह निष्कर्ष कांग्रेस के सभी नेताओं पर स्वतः लागू नहीं होता।

लेकिन यह उन पुराने दावों को अवश्य गलत सिद्ध करता है कि राजनीतिक नेतृत्व की किसी स्तर पर आपराधिक भूमिका कभी साबित नहीं हुई।

8. जगदीश टाइटलर — गंभीर मामला, लेकिन अंतिम दोषसिद्धि नहीं

जगदीश टाइटलर के खिलाफ पुल बंगश मामले में नानावती आयोग ने ऐसी सामग्री पाई जिसे उसने आगे जांच योग्य माना।

आयोगीय रिकॉर्ड में उनके विरुद्ध भीड़ को उकसाने से जुड़े गंभीर आरोप मौजूद हैं।

बाद में CBI ने आरोपपत्र दाखिल किया और अदालत ने हत्या सहित गंभीर आरोप तय किए।

लेकिन जब तक अंतिम judgment नहीं आता, उन्हें सज्जन कुमार के समान “दोषसिद्ध नेता” कहना अनुचित होगा।

सही श्रेणी है—

गंभीर आयोगीय निष्कर्ष + आपराधिक मुकदमा + आरोप तय, लेकिन अंतिम दोषसिद्धि लंबित।

9. एच.के.एल. भगत — गंभीर आरोप, लेकिन अंतिम conviction नहीं

एच.के.एल. भगत पर पूर्वी दिल्ली की हिंसा से जुड़े गंभीर आरोप आए।

उनके खिलाफ प्रत्यक्षदर्शी गवाही और आयोगीय सामग्री मौजूद रही।

लेकिन उन्हें 1984 नरसंहार में किसी अंतिम आपराधिक conviction के जरिए सज्जन कुमार जैसी कानूनी स्थिति में नहीं रखा जा सकता।

उनकी मृत्यु से पहले न्यायिक प्रक्रिया पूर्ण दोषसिद्धि तक नहीं पहुंची।

इसलिए इतिहास में सही wording होगी—

उन पर गंभीर और बहु-स्रोत आरोप थे, लेकिन अंतिम आपराधिक दोषसिद्धि नहीं हुई।

10. स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं की भूमिका

नानावती आयोग का महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही था कि कुछ क्षेत्रों में कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं की भागीदारी के विश्वसनीय संकेत थे।

इस भूमिका के संभावित रूप थे—

भीड़ इकट्ठी करना,

उकसावा,

सिख घरों की पहचान,

स्थानीय लोगों को निर्देश,

और दंगाइयों को राजनीतिक संरक्षण की भावना देना।

कुछ मामलों में यही भूमिका अदालत तक सिद्ध हुई।

इसलिए “राजनीतिक सहभागिता” 1984 के इतिहास में केवल विपक्षी आरोप नहीं है।

कम-से-कम कुछ विशिष्ट मामलों में यह आधिकारिक और न्यायिक तथ्य बन चुकी है।

11. लेकिन voter lists बांटने जैसे हर लोकप्रिय दावे की स्थिति क्या है?

1984 पर वर्षों से यह दावा किया जाता रहा है कि हमलावरों को सिख घर पहचानने के लिए सरकारी या मतदाता सूचियां दी गईं।

कुछ survivor accounts और नागरिक रिपोर्टों में इस तरह के आरोप आए।

लेकिन पूरे दिल्ली स्तर पर कोई एक अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं है कि केंद्र सरकार ने आधिकारिक रूप से voter lists वितरित कर नरसंहार आयोजित किया।

इसलिए ऐसी बातों को शोध में—

“कई गवाहों/रिपोर्टों में आरोप”

के रूप में रखना चाहिए, न कि बिना qualification के सिद्ध तथ्य के रूप में।

12. दिल्ली प्रशासन — सबसे स्पष्ट आधिकारिक विफलता

राजनीतिक conspiracy पर विवाद हो सकता है।

दिल्ली प्रशासन की failure पर बहुत कम।

नानावती आयोग ने दिल्ली के प्रशासन और पुलिस leadership पर गंभीर प्रतिकूल निष्कर्ष दिए।

उसके रिकॉर्ड में रंगनाथ मिश्र आयोग का यह निष्कर्ष भी दर्ज है कि पुलिस—

उदासीन,

लापरवाह,

और कहीं-कहीं हिंसा में सहभागी अथवा मिली हुई—

दिखाई दी तथा उच्च अधिकारियों ने शहर में बन रही स्थिति का उचित आकलन नहीं किया।

यह संस्थागत failure का मजबूत आधिकारिक आधार है।

13. उपराज्यपाल पी.जी. गवई

दिल्ली के उपराज्यपाल पी.जी. गवई प्रशासनिक hierarchy के सर्वोच्च स्तर पर थे।

सेना बुलाने की प्रक्रिया और संकट प्रबंधन में उनकी भूमिका पर गंभीर प्रश्न उठे।

नानावती आयोग ने उनके स्पष्टीकरण को पूरी तरह संतोषजनक नहीं माना।

उन्होंने बाद में पद छोड़ा।

उनके संबंध में सबसे सुरक्षित निष्कर्ष है—

दिल्ली के सर्वोच्च प्रशासनिक नेतृत्व ने स्थिति की भयावहता के अनुरूप पर्याप्त तेज और निर्णायक हस्तक्षेप नहीं किया।

यह criminal conspiracy का आरोप नहीं, administrative accountability का निष्कर्ष है।

14. पुलिस आयुक्त एस.सी. टंडन

एस.सी. टंडन दिल्ली पुलिस के प्रमुख थे।

नानावती आयोग ने उनके संबंध में मूलतः यह निष्कर्ष दिया कि उन्होंने कानून-व्यवस्था की स्थिति को उसकी आवश्यक गंभीरता से नहीं लिया और वे दिल्ली में पुलिस failure की जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।

यह 1984 के सबसे मजबूत व्यक्तिगत प्रशासनिक निष्कर्षों में से एक है।

यदि किसी शहर में हजारों नागरिक मारे जाएं और पुलिस प्रमुख का threat assessment ही गलत हो, तो यह केवल tactical mistake नहीं।

यह command failure है।

15. “स्थिति खराब है लेकिन नियंत्रण में है”

31 अक्टूबर की रात सेना के दिल्ली क्षेत्र कमांडर और पुलिस आयुक्त के बीच हुई बातचीत के रिकॉर्ड में स्थिति को “बहुत खराब लेकिन नियंत्रण में” बताए जाने का विवरण आता है।

अगले ही दिन दिल्ली व्यापक हिंसा में डूब गई।

इसलिए यह phrase 1984 की प्रशासनिक विफलता का प्रतीक बन जाता है।

या तो—

जानकारी ऊपर नहीं पहुंच रही थी,

या पहुंचकर गलत समझी जा रही थी,

या खतरे को कम आंका जा रहा था।

तीनों ही स्थिति command system के लिए गंभीर हैं।

16. सेना उपलब्ध थी, फिर प्रभावी उपयोग देर से क्यों?

मिश्र और नानावती आयोगों के रिकॉर्ड में 31 अक्टूबर की मध्यरात्रि तक हजारों सैनिकों की उपलब्धता का उल्लेख है।

लेकिन सैनिक उपलब्ध होना और हिंसाग्रस्त गलियों में operational deployment होना अलग बातें हैं।

सेना को नागरिक प्रशासन की सहायता में बुलाना था।

प्रभावी शहरव्यापी तैनाती विकसित होने में समय लगा।

इसलिए सही निष्कर्ष है—

सेना की क्षमता मौजूद थी, लेकिन civil administration उसे पर्याप्त तेजी से हिंसा रोकने वाली शक्ति में नहीं बदल सका।

यह सेना की तुलना में दिल्ली प्रशासन और पुलिस command की failure अधिक थी।

17. क्या सेना स्वयं दोषी थी?

उपलब्ध मुख्य आयोगीय रिकॉर्ड सेना को नरसंहार में मिली हुई संस्था के रूप में प्रस्तुत नहीं करता।

इसके विपरीत, जहां सेना की प्रभावी उपस्थिति बनी वहां भीड़ पीछे हटी।

इसीलिए “सेना देर से आई” को अधिक सटीक रूप से लिखना चाहिए—

सेना की प्रभावी नागरिक तैनाती देर से हुई।

इसमें requisition, क्षेत्र आवंटन और police–army coordination मुख्य प्रश्न थे।

सेना द्वारा जानबूझकर सिखों को बचाने से इनकार करने का कोई व्यापक सिद्ध निष्कर्ष नहीं है।

18. थाना स्तर की पुलिस — सबसे बड़ा ground-level failure

सैकड़ों survivor testimonies में आरोप आए कि—

पुलिस नहीं आई,

भीड़ को नहीं रोका,

नाम नहीं लिखे,

FIR लेने से इनकार किया,

और कुछ जगह स्वयं सिखों को हथियार डालने को कहा।

रंगनाथ मिश्र आयोग की summary में भी पुलिस की indifferent/negligent conduct और कुछ स्थानों पर connivance/participation का उल्लेख है।

इसलिए local policing failure आधिकारिक रिकॉर्ड का स्थापित हिस्सा है।

लेकिन पूरी दिल्ली पुलिस को एक समान criminal conspirator कहना उचित नहीं।

19. पुलिस के भीतर व्यक्तिगत व्यवहार अलग-अलग था

कुछ पुलिस अधिकारियों ने गोली चलाकर भीड़ रोकी।

कुछ ने सिख परिवारों को बचाया।

कुछ निष्क्रिय रहे।

कुछ पर मिलीभगत के गंभीर आरोप लगे।

इसलिए सही institutional formulation है—

दिल्ली पुलिस ने एक संस्था के रूप में अपने संवैधानिक कर्तव्य में गंभीर विफलता दिखाई; उसके भीतर व्यक्तिगत अधिकारियों का आचरण एक समान नहीं था।

यही संतुलन न्यायपूर्ण है।

20. FIR और जांच — राज्य की दूसरी विफलता

यदि पहला failure था—

नागरिकों को न बचाना,

तो दूसरा था—

अपराध को ठीक से न जांचना।

दिल्ली कैंट से जुड़े रिकॉर्ड में एक FIR में अनेक शिकायतें और दर्जनों हत्याएं जोड़ दी गई थीं; अदालत ने बाद में यह भी दर्ज किया कि दिल्ली कैंट इलाके में 341 सिख मारे गए लेकिन केवल कुछ FIR सीधे हत्या से संबंधित थीं और शुरुआती पुलिस जांच अत्यंत कमजोर थी।

यह केवल administrative inefficiency नहीं।

इसका परिणाम था—

कमजोर prosecution,

acquittal,

और दशकों की impunity।

21. ‘Untraced’ मामलों का महत्व

दिल्ली उच्च न्यायालय के रिकॉर्ड में ऐसे मामले हैं जहां 1985 के affidavit पर 1992 में FIR दर्ज हुई और फिर दिल्ली पुलिस Riots Cell ने उसे “untraced” भेज दिया; मजिस्ट्रेट ने closure स्वीकार कर लिया। बाद में SIT को इन्हीं मामलों की पुनः जांच करनी पड़ी।

इससे सबसे कठिन प्रश्न उठता है—

यदि बाद में जांच की संभावना थी तो पहले closure क्यों?

हर closure भ्रष्ट नहीं था।

लेकिन इतने मामलों का दोबारा खुलना प्रारंभिक investigation की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्न स्थापित करता है।

22. क्या न्याय में देरी केवल पुलिस की गलती थी?

नहीं।

इसमें शामिल थे—

पुलिस,

अभियोजन,

राज्य सरकारें/केंद्र,

जांच आयोग,

राजनीतिक इच्छा,

और कभी-कभी अदालतों की धीमी प्रक्रिया।

लेकिन शुरुआती पुलिस failure सबसे महत्वपूर्ण था क्योंकि वही evidence chain तैयार करती है।

यदि पहला बयान खराब हो,

crime scene खो जाए,

आरोपी का नाम दर्ज न हो,

तो तीस वर्ष बाद अदालत उसे पैदा नहीं कर सकती।

23. आयोग पर आयोग क्यों बना?

गृह मंत्रालय आज भी आधिकारिक रूप से—

नानावती आयोग,

रंगनाथ मिश्र आयोग,

जी.पी. माथुर समिति,

और SIT—

के दस्तावेज उपलब्ध कराता है।

इतनी लंबी श्रृंखला स्वयं बताती है कि मूल जांच से मामला समाप्त नहीं हुआ।

राज्य को बार-बार अपने पुराने निर्णयों की समीक्षा करनी पड़ी।

यह institutional self-correction भी है।

और शुरुआती institutional failure का प्रमाण भी।

24. क्या बाद की सरकारों ने सुधार किया?

हां, कुछ मामलों में।

CBI जांच हुई।

SIT बनी।

बंद मामलों को फिर खोला गया।

सज्जन कुमार जैसे प्रभावशाली व्यक्ति अंततः दोषी ठहरे।

मुआवजा पैकेज बढ़े।

2005 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संसद में माफी मांगी।

इसलिए यह कहना कि भारतीय राज्य ने चार दशकों तक “कुछ भी नहीं किया” सही नहीं।

लेकिन यह भी सच है कि corrective action बहुत देर से हुआ।

25. कांग्रेस की राजनीतिक जवाबदेही कितनी व्यापक है?

यह तीन स्तरों पर है।

पहला — शासन की जिम्मेदारी

1984 में केंद्र में कांग्रेस सरकार थी।

दिल्ली उसी के प्रशासनिक नियंत्रण में थी।

इसलिए mass violence रोकने की राजनीतिक जिम्मेदारी उससे अलग नहीं की जा सकती।

दूसरा — स्थानीय नेताओं की भूमिका

कुछ कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ गंभीर आयोगीय निष्कर्ष और विशिष्ट मामलों में conviction सामने आए।

तीसरा — बाद की राजनीतिक handling

दशकों तक आरोपित नेताओं का पार्टी में प्रभाव बना रहना और जांच में देरी पीड़ित समुदाय के अविश्वास को बढ़ाती रही।

इन तीनों कारणों से कांग्रेस 1984 की राजनीतिक जवाबदेही से बच नहीं सकती।

लेकिन यह जवाबदेही—

पूरी पार्टी द्वारा सिद्ध central murder conspiracy

के बराबर नहीं है।

26. क्या कांग्रेस नेतृत्व ने दोषियों को बचाया?

यह प्रश्न case-specific है।

कई पीड़ित संगठनों और विपक्षी नेताओं ने वर्षों तक राजनीतिक संरक्षण का आरोप लगाया।

सज्जन कुमार जैसे व्यक्ति लंबे समय तक राजनीतिक रूप से प्रभावशाली रहे।

जगदीश टाइटलर के मामले में भी investigation और closure history विवादित रही।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2018 के सज्जन कुमार फैसले में mass crimes में राजनीतिक संरक्षण और law-enforcement failure की व्यापक समस्या पर कठोर टिप्पणी की।

इसलिए political patronage/impunity का प्रश्न न्यायिक विमर्श में वास्तविक है।

लेकिन प्रत्येक व्यक्तिगत “किस नेता को किसने बचाया” दावे के लिए अलग प्रमाण आवश्यक है।

27. राज्य की सबसे बड़ी तत्काल विफलता क्या थी?

यदि एक प्राथमिक failure चुनना हो तो वह था—

1 नवंबर की सुबह तक स्थिति की प्रकृति न पहचान पाना और तत्काल overwhelming force के साथ हिंसा को न रोकना।

31 अक्टूबर शाम तक चेतावनी संकेत थे।

1 नवंबर सुबह भीड़ संगठित थी।

दोपहर तक हत्या बड़े पैमाने पर चल रही थी।

यदि इसी समय—

कर्फ्यू कठोर होता,

भीड़ पर बल प्रयोग होता,

सेना व्यापक रूप से तैनात होती,

राजनीतिक कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया जाता—

तो मृत्यु संख्या संभवतः बहुत कम हो सकती थी।

इतिहास यह निश्चित नहीं कह सकता कि कितनी जान बचती।

लेकिन 3 नवंबर के बाद सुरक्षा बलों की प्रभावी मौजूदगी और हिंसा में गिरावट यह सिद्ध करती है कि हिंसा अपरिहार्य नहीं थी।

28. राज्य की सबसे बड़ी दीर्घकालीन विफलता?

न्याय में देरी।

किसी दंगे को राज्य ने नहीं रोका—यह पहली विफलता।

लेकिन उसके बाद अपराधी को तीन दशक तक दंड न मिले—यह दूसरी और अधिक स्थायी विफलता।

क्योंकि इससे पीड़ित समुदाय को संदेश मिलता है—

राज्य केवल तुम्हें बचाने में विफल नहीं हुआ,

वह बाद में न्याय देने में भी विफल है।

यही grievance पंजाब और diaspora politics में दशकों तक जीवित रहा।

29. क्या 1984 में संस्थागत collapse था?

पूर्ण collapse नहीं।

क्योंकि—

कुछ पुलिस इकाइयों ने काम किया,

सेना ने अंततः नियंत्रण स्थापित किया,

अस्पताल चले,

राहत बनी,

और प्रशासन वापस लौटा।

लेकिन 1–2 नवंबर के निर्णायक घंटों में selective institutional paralysis जैसी स्थिति दिखाई दी।

राज्य मौजूद था,

लेकिन नागरिक सुरक्षा उसकी क्षमता के अनुरूप नहीं थी।

यही 1984 को सामान्य spontaneous riot से अलग करने वाला महत्वपूर्ण तत्व है।

30. क्या पुलिस की निष्क्रियता अपने आप conspiracy सिद्ध करती है?

नहीं।

यदि पुलिस किसी दंगे में विफल हो तो उससे यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि केंद्र ने उसे निष्क्रिय रहने का आदेश दिया था।

Conspiracy के लिए अलग evidence चाहिए।

लेकिन systematic police passivity स्वयं गंभीर तथ्य है।

रंगनाथ मिश्र आयोग ने पुलिस की passivity, negligence और कुछ स्थानों पर connivance की बात दर्ज की थी।

इसलिए conspiracy सिद्ध न होने से police failure छोटा नहीं हो जाता।

31. स्थानीय political protection क्यों निर्णायक था?

सामान्य दंगाई पुलिस से डरता है।

यदि उसे यह लगे कि—

स्थानीय नेता साथ है,

पुलिस नहीं रोकेगी,

गिरफ्तारी नहीं होगी—

तो उसकी हिंसा की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है।

1984 में कई survivor testimonies इसी perceived impunity की ओर संकेत करती हैं।

यही कारण है कि राजनीतिक नेता का केवल physical presence भी mass violence में महत्वपूर्ण हो सकता है।

उसे स्वयं हत्या करना आवश्यक नहीं।

भीड़ को confidence देना भी अपराध को बढ़ा सकता है।

32. प्रशासनिक chain of failure

1984 की accountability को एक श्रृंखला में देखें—

हत्या की खबर

प्रारंभिक anti-Sikh attacks

खतरे का अपर्याप्त आकलन

कर्फ्यू का कमजोर enforcement

भीड़ का संगठित होना

पुलिस की असमान/निष्क्रिय प्रतिक्रिया

सेना की देर से effective deployment

हजारों मौतें

कमजोर FIR

closure/untraced cases

आयोग

reinvestigation

दशकों बाद convictions

यही पूरी institutional story है।

33. accountability का पहला स्तर — प्रत्यक्ष हत्यारे

यह सबसे स्पष्ट श्रेणी है।

जिन लोगों ने—

हत्या की,

जिंदा जलाया,

घर लूटा,

गुरुद्वारा जलाया—

वे प्रत्यक्ष आपराधिक जिम्मेदार हैं।

उनकी धार्मिक या राजनीतिक पहचान secondary है।

उनका अपराध व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों criminal law के तहत जांचा जाना था।

34. दूसरा स्तर — भीड़ का नेतृत्व और उकसावा

वे व्यक्ति जो स्वयं हत्या न करें लेकिन—

भीड़ को निर्देश दें,

नारे लगाकर उकसाएं,

targets बताएं,

या हिंसा को बढ़ाएं—

abetment, conspiracy और unlawful assembly जैसी जिम्मेदारी में आ सकते हैं।

सज्जन कुमार के मामलों ने इसी प्रकार की राजनीतिक आपराधिक भूमिका को न्यायिक रूप दिया।

35. तीसरा स्तर — स्थानीय पुलिस

जहां पुलिस सहायता के बावजूद नहीं पहुंची,

भीड़ नहीं रोकी,

या FIR में जानबूझकर omission किया—

वह administrative misconduct से लेकर संभावित criminal complicity तक जा सकता है।

हर अधिकारी की स्थिति अलग है।

लेकिन संस्था के स्तर पर failure स्थापित है।

36. चौथा स्तर — पुलिस और दिल्ली प्रशासन का शीर्ष नेतृत्व

यहां जिम्मेदारी सीधे हत्या की नहीं, command responsibility की राजनीतिक-प्रशासनिक अवधारणा से जुड़ती है।

क्या उन्होंने—

सही assessment किया?

बल पर्याप्त लगाया?

सेना समय पर मांगी?

कर्फ्यू enforce कराया?

असफल SHO/DCP हटाए?

इन कसौटियों पर गंभीर failure आधिकारिक आयोगों में दर्ज हुआ।

37. पांचवां स्तर — केंद्र सरकार

यह constitutional political responsibility है।

दिल्ली केंद्र के नियंत्रण में थी।

इसलिए राजधानी में नागरिक सुरक्षा की अंतिम जिम्मेदारी केंद्र की थी।

भले criminal command सिद्ध न हो, शासन की failure की जिम्मेदारी उससे अलग नहीं हो सकती।

यही कारण है कि बाद में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संसद में सरकार और राष्ट्र की ओर से माफी मांगी।

38. छठा स्तर — न्याय प्रणाली

यदि 1984 में अपराध हुआ और 2018 या 2025 में conviction आती है, तो बीच की 34–41 वर्ष की अवधि भी accountability का विषय है।

इसमें—

जांच एजेंसियां,

सरकारें,

prosecution,

और judicial delay—

सभी शामिल हैं।

यह केवल “पुराना मामला कठिन था” कहकर समाप्त नहीं किया जा सकता।

कुछ cases में re-investigation ने दिखाया कि evidence अभी भी उपलब्ध था।

39. किस बात को “सिद्ध” माना जा सकता है?

इस अध्ययन के आधार पर निम्न बातें मजबूत आधिकारिक/न्यायिक आधार पर स्थापित हैं—

1. सिखों को धार्मिक पहचान के आधार पर बड़े पैमाने पर लक्ष्य बनाया गया।

2. दिल्ली पुलिस कई क्षेत्रों में गंभीर रूप से विफल रही।

3. उच्च पुलिस नेतृत्व ने स्थिति का पर्याप्त सही आकलन नहीं किया।

4. सेना की effective deployment में विलंब हुआ।

5. कुछ स्थानीय कांग्रेस नेताओं/कार्यकर्ताओं की भूमिका के विश्वसनीय प्रमाण आयोगों के सामने आए।

6. सज्जन कुमार की आपराधिक भूमिका विशिष्ट मामलों में अदालत से सिद्ध हुई।

7. प्रारंभिक FIR और जांच प्रणाली व्यापक रूप से कमजोर रही।

8. कई बंद मामलों को दशकों बाद फिर खोलना पड़ा।

9. राज्य को राहत, जांच और न्याय में बार-बार corrective mechanisms बनाने पड़े।

40. किन बातों को “सिद्ध” नहीं कहना चाहिए?

निम्न दावों को qualification के बिना स्थापित तथ्य की तरह नहीं लिखना चाहिए—

1. राजीव गांधी ने नरसंहार का आदेश दिया।

2. केंद्रीय कांग्रेस नेतृत्व ने देशभर के हमलों की एक unified operational योजना बनाई।

3. पूरी दिल्ली पुलिस जानबूझकर सिख-विरोधी षड्यंत्र का हिस्सा थी।

4. प्रत्येक कांग्रेस नेता जिसके खिलाफ नाम आया वह अदालत से दोषी सिद्ध हुआ।

5. हर closure report राजनीतिक cover-up थी।

6. हर हिंदू हमलावर था या हिंदू समाज सामूहिक रूप से जिम्मेदार था।

इनमें से कुछ आरोप ऐतिहासिक बहस का हिस्सा हो सकते हैं।

लेकिन उपलब्ध न्यायिक निष्कर्ष उससे आगे नहीं जाने देते।

41. कौन-से प्रश्न अब भी विवादित हैं?

कुछ प्रश्न पूरी तरह समाप्त नहीं हुए—

क्या हिंसा की संगठनात्मक समानता किसी व्यापक coordination का परिणाम थी?

राजनीतिक संरक्षण किस स्तर तक ऊपर गया?

कितने पुलिस अधिकारियों ने जानबूझकर आरोपियों को बचाया?

स्थानीय राजनीतिक नेटवर्क को सामग्री और भीड़ जुटाने में किसने सहायता दी?

इन प्रश्नों पर गवाहियां और परिस्थितिजन्य सामग्री मौजूद है।

लेकिन सभी पर एक अंतिम समेकित judicial verdict नहीं है।

इसलिए इतिहास को यहां “संभावना/आरोप/आयोगीय निष्कर्ष” की भाषा रखनी चाहिए।

42. “State complicity” कहना कितना उचित है?

यह शब्द भी सावधानी मांगता है।

यदि उससे आशय हो—

भारत सरकार की एक सिद्ध केंद्रीय योजना—

तो उपलब्ध रिकॉर्ड पर्याप्त नहीं।

यदि उससे आशय हो—

राज्य के कुछ प्रतिनिधियों की निष्क्रियता, कुछ पुलिस की मिलीभगत, राजनीतिक संरक्षण और कानून लागू करने में systemic failure—

तो इसका पर्याप्त आधिकारिक आधार है।

इसलिए अधिक सटीक expression होगा—

“राज्य की व्यापक संरक्षण-विफलता और कुछ स्तरों पर मिलीभगत/राजनीतिक संरक्षण के प्रमाण।”

यह “central state conspiracy” से अलग है।

43. क्या इसे command responsibility का मामला कहा जा सकता है?

अंतरराष्ट्रीय criminal law में “command responsibility” एक विशिष्ट doctrine है।

1984 के भारतीय मुकदमों में इसे उस तकनीकी अंतरराष्ट्रीय अपराध doctrine के रूप में लागू नहीं किया गया।

लेकिन administrative accountability में अवधारणा उपयोगी है—

शीर्ष अधिकारी यह नहीं कह सकता कि उसने स्वयं हत्या नहीं की, इसलिए कोई जिम्मेदारी नहीं।

यदि वह जानता था या जानना चाहिए था कि अधीनस्थ व्यवस्था विफल है और उसने उचित कदम नहीं उठाए, तो शासन-स्तर की जिम्मेदारी उत्पन्न होती है।

यही दिल्ली प्रशासन और पुलिस नेतृत्व के मूल्यांकन का आधार है।

44. क्या बाद की कांग्रेस माफी पर्याप्त थी?

2005 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की माफी ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण थी।

लेकिन पीड़ितों के लिए माफी और prosecution अलग बातें हैं।

माफी—

नैतिक स्वीकारोक्ति।

Conviction—

कानूनी जवाबदेही।

Compensation—

आर्थिक पुनर्वास।

तीनों आवश्यक हैं।

किसी एक से बाकी दो समाप्त नहीं होते।

इसलिए माफी ने reconciliation में भूमिका निभाई, लेकिन वह 1984 accountability का अंतिम उत्तर नहीं थी।

45. क्या भाजपा या अन्य दलों का बाद का राजनीतिक उपयोग इस जिम्मेदारी को बदलता है?

नहीं।

1984 बाद की चुनावी राजनीति में लगातार इस्तेमाल हुआ।

अलग-अलग दलों ने कांग्रेस को घेरा।

अकाली दल ने न्याय को केंद्रीय राजनीतिक मुद्दा बनाया।

लेकिन किसी घटना का बाद में चुनावी उपयोग उसके मूल दस्तावेजी तथ्यों को न तो सिद्ध करता है, न असिद्ध।

हमारा शोध इसलिए पार्टी-दर-पार्टी राजनीतिक आरोपों के विस्तार में नहीं जाएगा।

यहां केवल वही जिम्मेदारी दर्ज है जो—

आयोग,

अदालत,

सरकारी रिकॉर्ड,

और विश्वसनीय प्रत्यक्षदर्शी सामग्री—

से समर्थित है।

46. सबसे बड़ी नैतिक जिम्मेदारी किसकी?

आपराधिक जिम्मेदारी व्यक्तियों की होती है।

लेकिन नैतिक जिम्मेदारी राज्य की व्यापक होती है।

एक लोकतांत्रिक राज्य अपने नागरिक से वादा करता है—

तुम्हारा धर्म चाहे जो हो, हम तुम्हारी रक्षा करेंगे।

1984 में यह वादा हजारों सिख नागरिकों के लिए टूट गया।

इसलिए राज्य का सबसे बड़ा अपराध केवल यह नहीं था कि कुछ अधिकारी विफल हुए।

सबसे बड़ा नैतिक failure था—

नागरिक का राज्य पर विश्वास टूटना।

47. सबसे बड़ी राजनीतिक जिम्मेदारी किसकी?

तत्कालीन केंद्र सरकार और कांग्रेस नेतृत्व से राजनीतिक responsibility अलग नहीं की जा सकती क्योंकि—

वह सत्ता में थी;

दिल्ली उसके प्रशासनिक नियंत्रण में थी;

कुछ स्थानीय कांग्रेस नेताओं के खिलाफ गंभीर प्रमाण सामने आए;

और प्रभावशाली आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई में अत्यधिक देरी हुई।

लेकिन राजनीतिक responsibility को criminal conspiracy में बदलना तभी उचित होगा जब उसका प्रमाण उपलब्ध हो।

यही इस अंतिम मूल्यांकन की सीमा है।

48. सबसे बड़ी संस्थागत जिम्मेदारी किसकी?

यदि institution-specific उत्तर दिया जाए तो—

दिल्ली पुलिस और दिल्ली प्रशासन।

क्योंकि वही नागरिक सुरक्षा का operational machinery थे।

उनके पास—

जानकारी,

कर्फ्यू,

बल,

वायरलेस,

थाने,

और सेना सहायता की मांग—

के साधन थे।

फिर भी हिंसा नहीं रोकी गई।

रंगनाथ मिश्र और नानावती आयोगों के findings इसी institutional failure को सबसे स्पष्ट रूप से दस्तावेजीकृत करते हैं।

49. सबसे बड़ी न्यायिक विफलता क्या थी?

प्रारंभिक investigation।

क्योंकि बाद की अदालत उसी सामग्री पर निर्भर थी।

दिल्ली कैंट के 1984 मामलों के न्यायिक रिकॉर्ड में dozens of complaints और murders को एक FIR में जोड़ने तथा पुलिस द्वारा शुरुआती मामलों की बेहद कमजोर जांच का विवरण अदालत तक आया।

बाद में SIT को उन्हीं पुराने closed cases पर वापस जाना पड़ा।

यह criminal-justice system के लिए एक गंभीर indictment है।

प्रत्यक्ष हत्यारे और दंगाई

स्थिति: आपराधिक जिम्मेदारी; कई मामलों में conviction।

स्थानीय राजनीतिक उकसाने वाले

स्थिति: कई गंभीर आरोप; कुछ आयोगीय निष्कर्ष; सज्जन कुमार सहित विशिष्ट मामलों में conviction।

जगदीश टाइटलर

स्थिति: गंभीर आयोगीय/CBI मामला; अंतिम दोषसिद्धि नहीं।

एच.के.एल. भगत

स्थिति: गंभीर आरोप/गवाहियां; अंतिम conviction नहीं।

दिल्ली पुलिस का स्थानीय ढांचा

स्थिति: व्यापक विफलता आधिकारिक आयोगों में स्थापित; कुछ अधिकारियों पर मिलीभगत आरोप।

पुलिस आयुक्त/शीर्ष पुलिस नेतृत्व

स्थिति: स्थिति के अपर्याप्त आकलन और law-and-order failure पर प्रतिकूल आयोगीय निष्कर्ष।

उपराज्यपाल/दिल्ली प्रशासन

स्थिति: सेना बुलाने और crisis response में गंभीर administrative failure।

गृह मंत्रालय

स्थिति: राजधानी की सुरक्षा का केंद्रीय राजनीतिक-प्रशासनिक दायित्व; व्यक्तिगत criminal conspiracy स्थापित नहीं।

राजीव गांधी

स्थिति: प्रधानमंत्री के रूप में अंतिम राजनीतिक जिम्मेदारी; केंद्रीय नरसंहार आदेश का निर्णायक प्रमाण नहीं।

कांग्रेस पार्टी

स्थिति: शासन की राजनीतिक जिम्मेदारी; कुछ स्थानीय नेताओं की स्थापित/गंभीर भूमिका; party-wide central criminal conspiracy सिद्ध नहीं।

बाद की सरकारें/न्याय व्यवस्था

स्थिति: corrective action हुआ, लेकिन अत्यधिक विलंब ने accountability कमजोर की।

51. सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष

1984 की पूरी जिम्मेदारी को केवल दो वाक्यों में समेटना गलत होगा—

“भीड़ पागल हो गई थी।”

या

“सरकार ने सब करवाया।”

पहला राज्य और राजनीतिक विफलता छिपाता है।

दूसरा उपलब्ध प्रमाण से आगे जाता है।

अधिक सटीक निष्कर्ष है—

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पैदा हुए प्रारंभिक आक्रोश को स्थानीय राजनीतिक तत्वों, संगठित भीड़ और पुलिस की व्यापक निष्क्रियता ने लक्षित सिख-विरोधी सामूहिक हिंसा में बदलने दिया। दिल्ली प्रशासन और पुलिस नेतृत्व उसे समय रहते रोकने में विफल रहे। कुछ प्रभावशाली राजनीतिक नेताओं की आपराधिक भूमिका मामलों में सिद्ध हुई, जबकि शीर्ष केंद्रीय नेतृत्व द्वारा पूरे नरसंहार का आदेश देने का निर्णायक न्यायिक प्रमाण स्थापित नहीं हुआ। इसके बाद कमजोर जांच और राजनीतिक-प्रशासनिक विलंब ने व्यापक दंडमुक्ति पैदा की।

यही उपलब्ध दस्तावेजों का सबसे संतुलित synthesis है।

निष्कर्ष — 1984 की अंतिम जिम्मेदारी व्यक्तियों से अधिक एक विफल राज्य-श्रृंखला की कहानी है

1984 का नरसंहार केवल हिंसक भीड़ का इतिहास नहीं है।

यदि भीड़ अकेली होती और राज्य दृढ़ होता तो उसका पैमाना अलग हो सकता था।

यह राजनीतिक हत्या से शुरू हुआ संकट था जिसे—

अपर्याप्त threat assessment,

स्थानीय राजनीतिक उकसावे,

पुलिस निष्क्रियता,

कमजोर command,

सेना की देर से effective deployment,

और दंडमुक्ति की भावना—

ने सामूहिक नरसंहार में बदलने दिया।

रंगनाथ मिश्र आयोग ने पुलिस की indifference, negligence और कुछ स्थानों पर connivance/participation तक दर्ज की। उसने यह भी माना कि कुछ कांग्रेस-संबद्ध व्यक्तियों ने अपने स्तर पर हिंसा में भाग लिया, हालांकि कांग्रेस पार्टी की केंद्रीय भागीदारी को स्वीकार नहीं किया।

नानावती आयोग ने बाद में हजारों affidavits, पुराने आयोगों और सरकारी रिकॉर्ड की समीक्षा की; स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व पर आरोपों को अधिक गंभीरता से लिया और कुछ व्यक्तियों के खिलाफ आगे कार्रवाई के लिए आधार बनाया।

न्यायालयों ने अंततः एक महत्वपूर्ण रेखा स्थापित की—

राजनीतिक प्रभाव criminal liability से सुरक्षा नहीं देता।

सज्जन कुमार की दोषसिद्धियां इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण बनीं।

दूसरी ओर न्यायपालिका ने यह भी दिखाया कि प्रत्येक आरोप अपने स्वतंत्र प्रमाण पर खड़ा होना चाहिए—इसीलिए अलग मामलों में acquittal भी संभव हुआ।

यही rule of law है।

1984 के संबंध में कांग्रेस की राजनीतिक जिम्मेदारी गंभीर है क्योंकि वह केंद्र में सत्ता में थी, दिल्ली उसके प्रशासनिक नियंत्रण में थी और उसके कुछ प्रभावशाली नेताओं के खिलाफ गंभीर तथा कुछ मामलों में सिद्ध आपराधिक भूमिका सामने आई।

लेकिन यह कहना कि पूरी कांग्रेस पार्टी या राजीव गांधी द्वारा नरसंहार का केंद्रीय आदेश न्यायिक रूप से सिद्ध हो चुका है—उपलब्ध प्रमाण से आगे जाना होगा।

उसी प्रकार दिल्ली पुलिस को पूरी तरह criminal conspiracy का हिस्सा कहना भी अनुचित होगा।

लेकिन institution के रूप में उसकी व्यापक विफलता से इनकार करना अब संभव नहीं।

और शायद इसी बिंदु पर 1984 का सबसे कठिन नैतिक निष्कर्ष निकलता है—

राज्य के भीतर हर व्यक्ति अपराधी नहीं था, लेकिन राज्य अपनी मूल जिम्मेदारी में विफल हुआ।

उसकी पहली जिम्मेदारी थी—

नागरिक को बचाना।

वह विफल रही।

दूसरी जिम्मेदारी थी—

अपराधी को शीघ्र न्याय के सामने लाना।

वह भी बड़े हिस्से में विफल रही।

फिर आयोग,

CBI,

SIT,

उच्च न्यायालय,

मुआवजा,

और माफी—

के जरिए उस विफलता को दशकों में आंशिक रूप से सुधारा गया।

लेकिन इतिहास में corrective justice और timely justice समान नहीं होते।

1984 इसलिए भारतीय लोकतंत्र के लिए केवल अतीत की सांप्रदायिक त्रासदी नहीं है।

यह राज्य-व्यवस्था की एक स्थायी चेतावनी है—

जब राजनीतिक संकट में प्रशासन अपनी निष्पक्ष coercive authority समय पर प्रयोग नहीं करता, जब पुलिस नागरिक की पहचान देखकर कानून लागू करती है, और जब प्रभावशाली आरोपी दशकों तक न्याय से बचते हैं, तब लोकतांत्रिक राज्य स्वयं उस हिंसा का विस्तारक बन सकता है जिसे रोकना उसका पहला संवैधानिक कर्तव्य था।