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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–019 · अध्याय 12

दिल्ली पुलिस, गृह मंत्रालय और सेना — किस स्तर पर क्या विफल हुआ?

1984 के सिख-विरोधी नरसंहार को समझने के लिए केवल यह जानना पर्याप्त नहीं कि भीड़ ने क्या किया। उससे भी कठिन प्रश्न है—

राज्य ने क्या किया, क्या नहीं किया और किस स्तर पर उसकी प्रणाली विफल हुई?

31 अक्टूबर की दोपहर तक सिखों पर हमले शुरू हो चुके थे। शाम तक राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के काफिले पर पत्थरबाजी हो चुकी थी। 1 नवंबर को दिल्ली के अनेक हिस्सों में संगठित हत्या, आगजनी और लूट शुरू हो गई। 2 नवंबर शाम तक त्रिलोकपुरी जैसे क्षेत्र से पुलिस रिकॉर्ड स्वयं “नरसंहार” की सूचना दे रहा था। फिर भी सेना का प्रभाव व्यापक रूप से 3 नवंबर से दिखाई दिया।

इस क्रम के कारण 1984 का सबसे गंभीर प्रशासनिक प्रश्न पैदा होता है—

क्या दिल्ली में सुरक्षा बल उपलब्ध नहीं थे, या उपलब्ध राज्य-शक्ति को समय पर प्रयोग नहीं किया गया?

न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्र आयोग और बाद में न्यायमूर्ति जी.टी. नानावती आयोग ने इस प्रश्न पर महत्वपूर्ण निष्कर्ष दिए। नानावती आयोग ने मिश्र आयोग के इस निष्कर्ष से सहमति जताई कि दिल्ली प्रशासन—विशेष रूप से उपराज्यपाल और पुलिस आयुक्त—की ओर से सेना बुलाने में देरी हुई, जबकि लगभग 5,000 सैनिक 31 अक्टूबर की मध्यरात्रि तक उपलब्ध थे।

लेकिन प्रशासनिक जिम्मेदारी को केवल एक व्यक्ति पर डालना पर्याप्त नहीं है।

1984 की दिल्ली में कानून-व्यवस्था की कमांड श्रृंखला मोटे तौर पर इस प्रकार थी—

केंद्र सरकार / गृह मंत्रालय → दिल्ली के उपराज्यपाल → दिल्ली पुलिस आयुक्त → पुलिस जिलों के वरिष्ठ अधिकारी → थाने के SHO और स्थानीय पुलिस।

सेना इस सामान्य पुलिस कमांड के भीतर नहीं थी। उसे aid to civil power, अर्थात नागरिक प्रशासन की सहायता के लिए बुलाया जाना था।

यहीं पांच अलग-अलग स्तरों पर विफलता की जांच आवश्यक है।

1. 1984 में दिल्ली की प्रशासनिक संरचना क्या थी?

1984 में दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं थी।

वह केंद्रशासित प्रदेश थी और राष्ट्रपति की ओर से नियुक्त प्रशासक—उपराज्यपाल—के माध्यम से संचालित होती थी।

नानावती आयोग ने स्पष्ट किया कि दिल्ली में कानून-व्यवस्था और पुलिस संगठन की जिम्मेदारी उपराज्यपाल के अधीन थी, यद्यपि वह केंद्र सरकार के सामान्य नियंत्रण में कार्य करता था। उस समय पी.जी. गवई दिल्ली के उपराज्यपाल थे। दिल्ली पुलिस के प्रमुख एस.सी. टंडन थे। दिल्ली छह पुलिस जिलों/रेंज में विभाजित थी और कुल 63 पुलिस स्टेशन थे।

इसका महत्व बहुत बड़ा है।

दिल्ली में किसी अलग राज्य सरकार और केंद्र सरकार के बीच अधिकार विवाद नहीं था।

केंद्र सरकार राजधानी की कानून-व्यवस्था व्यवस्था से सीधे जुड़ी हुई थी।

इसलिए “अधिकार किसके पास था?” जैसा प्रश्न उतना अस्पष्ट नहीं था जितना किसी राज्य में हो सकता था।

2. केंद्रीय गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी

31 अक्टूबर 1984 को केंद्रीय गृह मंत्री पी.वी. नरसिंह राव थे।

राष्ट्रीय राजधानी की पुलिस व्यवस्था पर केंद्र सरकार का सामान्य नियंत्रण था और गृह मंत्रालय इस प्रणाली का प्रमुख मंत्रालय था।

नानावती आयोग ने कई गवाहियों की समीक्षा की जिनमें आरोप लगाया गया कि गृह मंत्रालय ने पर्याप्त तेजी नहीं दिखाई।

लेकिन आयोग का अंतिम मूल्यांकन इस बिंदु पर कुछ लोकप्रिय आरोपों से अलग था।

आयोग ने गृह मंत्री की कार्यशैली की आलोचना का उल्लेख किया, लेकिन अंततः कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर ऐसा प्रतीत होता है कि वे दिल्ली की घटनाओं से स्वयं को अवगत रखे हुए थे और आवश्यक निर्णय तथा निर्देश समय पर दे रहे थे। आयोग ने मुख्य प्रशासनिक जिम्मेदारी उपराज्यपाल और पुलिस आयुक्त के स्तर पर अधिक स्पष्ट रूप से निर्धारित की।

यह निष्कर्ष महत्वपूर्ण है।

इसका अर्थ यह नहीं कि केंद्र सरकार राजनीतिक उत्तरदायित्व से मुक्त हो जाती है।

लेकिन आयोग का संस्थागत निष्कर्ष और राजनीतिक उत्तरदायित्व अलग प्रश्न हैं।

3. राजनीतिक उत्तरदायित्व और प्रशासनिक दोष अलग हैं

प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 31 अक्टूबर की शाम पद संभाला।

केंद्रीय गृह मंत्री नरसिंह राव थे।

दिल्ली केंद्र के अधीन थी।

इसलिए नरसंहार रोकने की अंतिम राजनीतिक जिम्मेदारी केंद्र सरकार की थी।

लेकिन यदि पूछा जाए—

“किस अधिकारी को पुलिस बल तैनात करना था?”

“किसे कानून-व्यवस्था की स्थिति का मूल्यांकन करना था?”

“किसे सेना की सहायता मांगनी थी?”

तो उत्तर प्रशासनिक कमांड संरचना के भीतर जाता है।

यहीं उपराज्यपाल और पुलिस आयुक्त की भूमिका केंद्रीय हो जाती है।

4. उपराज्यपाल पी.जी. गवई की जिम्मेदारी

पी.जी. गवई उस समय दिल्ली प्रशासन के प्रमुख थे।

कानून-व्यवस्था उनकी जिम्मेदारी थी।

नानावती आयोग ने उनके स्पष्टीकरण को संतोषजनक नहीं माना।

आयोग ने दर्ज किया कि गवई ने 31 अक्टूबर सुबह प्रधानमंत्री आवास पर गोलीबारी की सूचना प्राप्त की थी। बाद में उन्होंने दावा किया कि उन्होंने स्थिति को गंभीरता से लिया और सेना बुलाने की आवश्यकता बताई। लेकिन आयोग ने अंततः उनके इस दावे को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया कि उनके स्तर पर कोई चूक नहीं हुई।

गवई ने बाद में नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए इस्तीफा दिया।

3 नवंबर तक वे पद से हट गए।

यह स्वयं इस बात का राजनीतिक संकेत था कि दिल्ली प्रशासन की विफलता शीर्ष स्तर तक स्वीकार की जा रही थी।

5. 1 नवंबर सुबह 7:30 बजे — गवई ने सेना की बात उठाई

नानावती आयोग में दर्ज गवई के बयान के अनुसार 1 नवंबर की सुबह लगभग 7:30 बजे वे प्रधानमंत्री निवास पर गए।

उन्होंने पुलिस आयुक्त एस.सी. टंडन से कहा कि सेना बुलानी पड़ेगी।

इसी समय लगभग 40 लोगों की एक भीड़ प्रधानमंत्री निवास की ओर आती दिखाई दी जो प्रतिशोधपूर्ण नारे लगा रही थी।

गवई के अनुसार उन्होंने पुलिस आयुक्त को चेताया कि समस्या बड़ी आग की तरह फैल सकती है और पर्याप्त पुलिस बल तुरंत लगाया जाना चाहिए।

यदि यह विवरण स्वीकार किया जाए तो 1 नवंबर सुबह ही सर्वोच्च दिल्ली प्रशासन को स्पष्ट था कि परिस्थिति गंभीर सांप्रदायिक संकट है।

फिर सेना की प्रभावी तैनाती में इतनी देर क्यों लगी?

यही विवाद का केंद्र है।

6. एस.सी. टंडन — दिल्ली पुलिस के सर्वोच्च अधिकारी

दिल्ली पुलिस आयुक्त एस.सी. टंडन सीधे पुलिस संगठन के प्रमुख थे।

नानावती आयोग ने उनके बारे में अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

आयोग ने कहा कि भले यह न लगे कि उन्होंने आवश्यक आदेश देने में जानबूझकर विलंब किया, फिर भी उन्होंने दिल्ली की कानून-व्यवस्था की स्थिति को उस गंभीरता से नहीं लिया जिसकी परिस्थिति मांग करती थी।

और क्योंकि दिल्ली में कानून-व्यवस्था की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी उन्हीं पर थी, वे उसकी विफलता की जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।

यह आयोग की सबसे कठोर संस्थागत टिप्पणियों में से एक है।

7. पुलिस आयुक्त का शुरुआती आकलन गलत था?

सेना के दिल्ली क्षेत्र के जनरल ऑफिसर कमांडिंग मेजर जनरल जे.एस. जमवाल ने नानावती आयोग को बताया कि उन्होंने 31 अक्टूबर की शाम पुलिस आयुक्त से संपर्क करने का प्रयास किया।

उनके अनुसार बातचीत लगभग रात 11:30 बजे हो सकी।

टंडन ने उन्हें बताया कि स्थिति “बहुत खराब लेकिन नियंत्रण में” है।

यह आकलन महत्वपूर्ण है।

क्योंकि अगले कुछ घंटों में दिल्ली के कई इलाके हिंसा में डूब गए।

यदि 31 अक्टूबर रात 11:30 बजे पुलिस प्रमुख अभी भी मान रहे थे कि स्थिति नियंत्रण में है, तो तीन संभावनाएं थीं—

उन्हें पर्याप्त जानकारी नहीं मिल रही थी;

मिल रही जानकारी का गलत मूल्यांकन हुआ;

या पुलिस कमांड सिस्टम वास्तविक स्थिति को ऊपर तक पहुंचाने में विफल था।

तीनों ही प्रशासनिक विफलता हैं।

8. स्थानीय पुलिस से ऊपर सूचना क्यों नहीं पहुंची?

दिल्ली पुलिस के पास वायरलेस नेटवर्क था।

कंट्रोल रूम था।

थाने थे।

DCP, ACP और SHO की श्रृंखला थी।

31 अक्टूबर शाम से ही विभिन्न इलाकों से हमलों की सूचना आने लगी थी।

1 नवंबर तक तो अनेक स्थानों पर हिंसा खुलेआम हो रही थी।

नानावती आयोग ने दर्ज किया कि वायरलेस संदेशों के माध्यम से वरिष्ठ अधिकारियों को गुरुद्वारों और अन्य स्थानों की ओर बढ़ती भीड़ की जानकारी मिल रही थी। उदाहरण के लिए 1 नवंबर दोपहर लगभग 12:30 बजे गुरुद्वारा रकाबगंज की ओर बढ़ती भीड़ के बारे में वायरलेस संदेश प्रसारित हुआ और अतिरिक्त बल मांगा गया।

यानी सूचना प्रणाली पूरी तरह ठप नहीं थी।

समस्या सूचना प्राप्त होने के बाद कार्रवाई की थी।

9. पुलिस कंट्रोल रूम — सूचना थी, लेकिन प्रतिक्रिया असमान

राजधानी में दंगा नियंत्रण का तंत्र तभी प्रभावी होता है जब कंट्रोल रूम अलग-अलग घटनाओं को जोड़कर बड़े पैटर्न की पहचान करे।

यदि—

पूर्वी दिल्ली में सिख मारे जा रहे हों,

पश्चिम दिल्ली में गुरुद्वारे जल रहे हों,

दक्षिण दिल्ली में दुकानें लूटी जा रही हों,

और बाहरी दिल्ली में भीड़ इकट्ठी हो रही हो—

तो इसे चार अलग घटनाएं नहीं बल्कि शहरव्यापी सांप्रदायिक आपातस्थिति माना जाना चाहिए।

1984 में यही समेकित प्रतिक्रिया पर्याप्त तेजी से नहीं हुई।

10. जिला और थाना स्तर पर विफलता

सर्वोच्च कमांड की विफलता के नीचे थाना-स्तर की विफलताएं थीं।

अनेक पीड़ितों ने आरोप लगाया कि—

पुलिस सहायता मांगने पर नहीं आई;

थाने ने शिकायत लिखने से इनकार किया;

नामित आरोपियों का नाम FIR में नहीं लिखा;

दंगाइयों को गिरफ्तार नहीं किया गया;

पुलिसकर्मी घटनास्थल पर मौजूद रहते हुए तमाशबीन बने रहे।

नानावती आयोग में एक गवाही में आरोप आया कि SHO लाउडस्पीकर से कर्फ्यू की घोषणा कर रहा था लेकिन सामने घूम रही भीड़ को तितर-बितर करने के लिए कोई कदम नहीं उठा रहा था।

यह कर्फ्यू की वास्तविक विफलता का सटीक उदाहरण है।

11. कर्फ्यू था — लेकिन सड़क पर भीड़ भी थी

कागज पर कर्फ्यू लगाना आसान है।

वास्तविक प्रश्न उसका enforcement है।

नानावती आयोग के सामने कई गवाहों ने कहा कि कर्फ्यू घोषित होने के बावजूद भीड़ खुलेआम घूमती रही और पुलिस प्रभावी कार्रवाई नहीं कर रही थी।

कुछ प्रत्यक्षदर्शियों ने पुलिस को केवल “spectators”—दर्शक—की तरह खड़ा बताया।

यानी प्रशासन ने कानूनी आदेश तो जारी किया लेकिन उसे लागू करने वाली coercive capacity पर्याप्त रूप से सक्रिय नहीं हुई।

12. फिर कुछ इलाकों में पुलिस सफल कैसे हुई?

यहीं दिल्ली पुलिस के बारे में blanket conclusion गलत हो जाता है।

कुछ जिलों में पुलिस ने भीड़ पर गोली चलाई।

गिरफ्तारियां कीं।

कर्फ्यू उल्लंघन पर कार्रवाई की।

दुकानों और नागरिकों की रक्षा की।

नानावती आयोग के रिकॉर्ड में कुछ इलाकों में पुलिस द्वारा दर्जनों से लेकर सैकड़ों राउंड तक firing करने और दंगाइयों को गिरफ्तार करने के विवरण हैं।

इससे एक निर्णायक निष्कर्ष निकलता है—

पुलिस के पास कानूनी अधिकार और साधन दोनों थे।

जहां कमांड दृढ़ था, कार्रवाई हुई।

जहां नहीं हुआ, वहां मौतें अधिक हुईं।

13. इसलिए ‘पूरी दिल्ली पुलिस मिली हुई थी’ कहना भी गलत

इतिहास की विश्वसनीयता के लिए इस अंतर को बनाए रखना आवश्यक है।

पूरी दिल्ली पुलिस को नरसंहार का सहभागी कहना उपलब्ध रिकॉर्ड से समर्थित नहीं है।

सही तस्वीर यह है—

कुछ पुलिसकर्मियों ने साहस दिखाया;

कुछ ने प्रभावी गोलीबारी कर भीड़ रोकी;

कई निष्क्रिय रहे;

कुछ अधिकारियों पर गंभीर मिलीभगत के आरोप लगे;

और समग्र कमांड संरचना हिंसा के पैमाने के अनुरूप प्रतिक्रिया देने में विफल रही।

यही institutional failure with uneven individual conduct था।

14. पुलिस की manpower समस्या

एस.सी. टंडन और अन्य पुलिस अधिकारियों ने बाद में बल की कमी का भी तर्क दिया।

दिल्ली का विस्तार तेजी से हुआ था।

झुग्गी और पुनर्वास कॉलोनियों की आबादी बढ़ी थी।

पुलिस की स्वीकृत संख्या शहर की जरूरतों की तुलना में कम थी।

यह तथ्य पूरी तरह निरर्थक नहीं है।

लेकिन नानावती आयोग ने स्पष्ट संकेत दिया कि बल की कमी किसी ऐसी परिस्थिति का पर्याप्त स्पष्टीकरण नहीं है जिसमें पुलिस प्रमुख स्थिति की गंभीरता का सही आकलन करने और उपलब्ध अतिरिक्त बल—जिसमें सेना शामिल थी—का समय पर उपयोग करने में विफल रहे।

15. सेना उपलब्ध कब थी?

यहीं 1984 प्रशासनिक विफलता का सबसे अधिक उद्धृत तथ्य आता है।

मिश्र आयोग ने पाया था कि 31 अक्टूबर की मध्यरात्रि तक लगभग 5,000 सैनिक दिल्ली में उपलब्ध थे।

नानावती आयोग ने इस निष्कर्ष से सहमति जताई और सेना बुलाने में विलंब की आलोचना को स्वीकार किया।

लेकिन “5,000 सैनिक उपलब्ध” का अर्थ यह नहीं कि 5,000 प्रशिक्षित दंगा-नियंत्रण सैनिक तत्काल दिल्ली की हर गली में जाने के लिए तैयार खड़े थे।

इस बारीकी को समझना जरूरी है।

16. सेना 31 अक्टूबर को क्या कर रही थी?

मेजर जनरल जे.एस. जमवाल के अनुसार उन्हें 31 अक्टूबर को alert रहने के लिए कहा गया था।

उन्होंने सैनिकों को दिल्ली की बाहरी सीमाओं के आसपास तैनात किया ताकि आवश्यकता होने पर वे तत्काल कार्रवाई कर सकें और उपद्रवी तत्वों की आवाजाही रोकी जा सके।

उनका कहना था कि उन्होंने शाम में पुलिस आयुक्त से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन बातचीत लगभग 11:30 बजे हुई।

यानी सेना पूरी तरह अनजान या निष्क्रिय नहीं थी।

वह stand-by पर थी।

नागरिक प्रशासन से औपचारिक और क्षेत्रवार उपयोग की मांग मुख्य प्रश्न था।

17. सेना स्वयं शहर में क्यों नहीं उतर सकती थी?

भारतीय संवैधानिक और प्रशासनिक व्यवस्था में सेना सामान्य कानून-व्यवस्था बल नहीं है।

दंगा नियंत्रण पुलिस और नागरिक प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है।

सेना को नागरिक सत्ता की सहायता में बुलाया जाता है।

इसलिए सेना का कमांडर स्वयं यह तय नहीं कर सकता कि वह किसी शहर की पुलिस व्यवस्था अपने हाथ में ले ले।

उसे civil authority से requisition या निर्देश चाहिए।

यही कारण है कि 1984 में सेना का प्रश्न अंततः दिल्ली प्रशासन की निर्णय-क्षमता से जुड़ता है।

18. 1 नवंबर सुबह — सेना बुलाने में निर्णायक देरी

कुसुमलता मित्तल समिति से जुड़े रिकॉर्ड में यह निष्कर्ष सामने आया कि 1 नवंबर सुबह लगभग 7 बजे उपराज्यपाल ने पुलिस आयुक्त को सेना बुलाने की सलाह दी।

लेकिन पुलिस आयुक्त ने पहले शहर का दौरा कर स्थिति का आकलन करने की बात कही।

लगभग सुबह 10 बजे उन्होंने अंततः सेना बुलाने की आवश्यकता स्वीकार की।

इस अवधि में शहर में हिंसा तेजी से फैल रही थी।

संकट प्रबंधन में तीन घंटे बहुत लंबे होते हैं।

19. प्रधानमंत्री स्तर पर निर्णय कब हुआ?

पी.सी. अलेक्जेंडर द्वारा नानावती आयोग को दिए गए विवरण के अनुसार प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 1 नवंबर दोपहर लगभग 1:30 बजे सेना बुलाने का निर्णय स्वीकार किया।

सेनाध्यक्ष और कैबिनेट सचिव पहले ही सेना को readiness में रखने के लिए कह चुके थे।

अलेक्जेंडर के अनुसार तीन मूर्ति के लिए सेना का एक दल लगभग 3 बजे पहुंच गया। पूर्वी और पश्चिमी दिल्ली में अन्य दलों के पहुंचने का निश्चित समय उन्हें ज्ञात नहीं था।

यह विवरण भी बताता है कि औपचारिक राजनीतिक निर्णय और जमीन पर प्रभावी तैनाती के बीच समय का अंतर था।

20. मेजर जनरल जमवाल का विवरण

मेजर जनरल जमवाल ने आयोग को बताया कि 1 नवंबर लगभग 11 बजे उन्हें सेनाध्यक्ष की ओर से संदेश मिला कि नागरिक प्रशासन की सहायता का अनुरोध आए तो तैयार रहें।

उन्होंने उपराज्यपाल से संपर्क किया।

लगभग 12:30 बजे उन्हें राजभवन पहुंचने का संदेश मिला।

1:30 बजे हुई चर्चा में उन्होंने प्रस्ताव दिया कि सेना दो सबसे कठिन जिलों की पूरी जिम्मेदारी ले सकती है।

उन्हें मध्य और दक्षिण दिल्ली के दो जिलों की जिम्मेदारी दी गई।

2:02 बजे उन्होंने अपने सैनिकों को उन क्षेत्रों में जाने का संदेश जारी किया।

इससे स्पष्ट है कि दोपहर तक सेना की वास्तविक operational deployment शुरू हो रही थी।

लेकिन दिल्ली के सबसे भयावह नरसंहारों में से कई पूर्वी और पश्चिमी दिल्ली में हो रहे थे।

21. सेना पहले किन क्षेत्रों में लगी?

जमवाल के अनुसार प्रारंभ में उपलब्ध इकाइयों की संख्या और व्यवस्था के कारण सेना सभी छह जिलों को एक साथ नहीं ले सकती थी।

उसे दो जिलों पर केंद्रित किया गया।

बाद में अतिरिक्त ब्रिगेड दिल्ली पहुंचीं।

2 नवंबर की शाम तक अधिक सेना उपलब्ध हो गई और सभी जिलों में सैनिक फैलाए गए।

यही कारण है कि पूर्वी दिल्ली के त्रिलोकपुरी या पश्चिमी दिल्ली के सुल्तानपुरी-मंगोलपुरी जैसे क्षेत्रों में तत्काल सैन्य प्रभाव न दिखाई देने का एक परिचालन स्पष्टीकरण मिलता है।

लेकिन फिर प्रश्न उठता है—

पहली प्राथमिकता उन क्षेत्रों को क्यों नहीं दी गई जहां सर्वाधिक नागरिक हत्याएं हो रही थीं?

22. सेना 2 नवंबर तक पूरी दिल्ली क्यों नहीं संभाल सकी?

मेजर जनरल जमवाल के अनुसार अतिरिक्त ब्रिगेड 2 नवंबर की शाम तक पहुंचीं और तब सभी जिलों को कवर करना संभव हुआ।

उन्होंने यह भी कहा कि सेना की तैनाती देर शाम 2 नवंबर तक विस्तृत हुई और कई क्षेत्रों में वह वास्तव में 3 नवंबर से प्रभावी हुई।

प्रशासनिक समयरेखा से स्पष्ट है—

31 अक्टूबर — हिंसा शुरू।

1 नवंबर — बड़े पैमाने की हत्या।

2 नवंबर — कई क्षेत्रों में नरसंहार जारी।

3 नवंबर — सेना की प्रभावी उपस्थिति और हिंसा में स्पष्ट गिरावट।

23. सेना के पास क्या अधिकार थे?

मेजर जनरल जमवाल ने बताया कि ब्रिगेड कमांडरों को निर्देश दिया गया था कि वे नागरिक प्रशासन की सहायता में हैं और सामान्यतः स्थानीय पुलिस के अनुरोध के अनुसार कार्रवाई करें।

लेकिन आवश्यकता होने पर कठोर कार्रवाई की अनुमति थी।

उन्हें आत्मरक्षा में गोली चलाने और अपनी मौजूदगी में हत्या होने पर उचित कार्रवाई करने का अधिकार था।

यह तथ्य महत्वपूर्ण है।

सेना को केवल “खड़े रहने” के लिए नहीं बुलाया गया था।

वह हिंसा रोकने के लिए वास्तविक coercive force प्रयोग कर सकती थी।

24. मजिस्ट्रेटों की अनुपस्थिति

नागरिक प्रशासन में सेना के उपयोग के साथ सामान्यतः मजिस्ट्रेटों की उपस्थिति उपयोगी होती है।

लेकिन जमवाल ने आयोग को बताया कि उनकी जानकारी में 1 और 2 नवंबर को सेना के साथ मजिस्ट्रेट संलग्न नहीं थे।

उन्होंने हालांकि यह भी कहा कि इससे सेना के काम पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं पड़ा।

इसलिए “मजिस्ट्रेट न मिलने के कारण सेना कुछ नहीं कर सकी” कहना उपलब्ध सैन्य गवाही से समर्थित नहीं है।

25. पुलिस–सेना संयुक्त नियंत्रण कक्ष क्यों महत्वपूर्ण था?

ऐसे बड़े सांप्रदायिक संकट में पुलिस को स्थानीय जानकारी होती है और सेना के पास पर्याप्त बल।

दोनों के बीच Joint Control Room आदर्श व्यवस्था होती।

बाद की गवाहियों में यह प्रश्न उठा कि पुलिस और सेना के बीच संयुक्त समन्वय तत्काल क्यों नहीं स्थापित हुआ।

पूर्व सेना अधिकारियों और नागरिक नेताओं ने भी गृह मंत्री से शीघ्र संयुक्त नियंत्रण व्यवस्था बनाने की मांग की थी।

समस्या थी—

सेना को पता नहीं कि कौन-सी गली सबसे गंभीर है;

पुलिस के पास पर्याप्त बल नहीं;

और दोनों के बीच वास्तविक-समय समन्वय कमजोर।

यह संकट को लंबा कर सकता था।

26. वायरलेस संदेश और command failure

1984 में मोबाइल नेटवर्क नहीं थे, लेकिन पुलिस वायरलेस प्रणाली व्यापक थी।

वरिष्ठ अधिकारियों को लगातार घटनाओं के संदेश मिल सकते थे।

समस्या यह थी कि—

क्या संदेश प्राथमिकता के अनुसार वर्गीकृत हुए?

क्या एक स्थान की सूचना दूसरे स्थान की समान घटना से जोड़ी गई?

क्या तुरंत reinforcement भेजा गया?

क्या निर्देश नीचे तक पहुंचे?

कई मामलों में उत्तर नकारात्मक दिखाई देता है।

एक शहरव्यापी massacre को थाना-थाना अलग घटना की तरह संभालना स्वयं command failure था।

27. त्रिलोकपुरी — कमांड विफलता का सबसे स्पष्ट उदाहरण

त्रिलोकपुरी में 1 नवंबर दोपहर से FIR दर्ज हो रही थीं।

2 नवंबर शाम तक पुलिस कंट्रोल संदेश में अभी भी “massacre” चलने की बात थी।

इसका अर्थ यह है कि स्थानीय पुलिस, जिला पुलिस और शीर्ष कमांड के बीच किसी स्तर पर सूचना और प्रतिक्रिया की श्रृंखला विफल थी।

यदि स्थानीय SHO ने सही सूचना ऊपर नहीं भेजी तो स्थानीय विफलता।

यदि भेजी और DCP ने कार्रवाई नहीं की तो जिला विफलता।

यदि ऊपर पहुंची और पर्याप्त बल नहीं भेजा गया तो मुख्यालय विफलता।

यही reason-chain आयोगों के लिए केंद्रीय थी।

28. क्या पुलिस ने दंगाइयों के बजाय सिखों पर कार्रवाई की?

कई पीड़ित गवाहियों में आरोप आया कि पुलिस ने कुछ स्थानों पर आत्मरक्षा कर रहे सिखों को ही हथियार डालने के लिए कहा।

पटेल नगर जैसी घटनाओं में ऐसे मामले सामने आए जहां सिख परिवारों ने भीड़ पर आत्मरक्षा में गोली चलाई और पुलिस ने उन्हें हथियार डालने को कहा।

नानावती रिपोर्ट में एक ऐसे मामले का उल्लेख है जिसमें घर से की गई गोलीबारी से भीड़ के कई लोग मारे गए और बाद में पुलिस तथा सेना पहुंचने पर हथियार समर्पित कराए गए।

हर ऐसे मामले को “पुलिस ने जानबूझकर सिखों को दंगाइयों के हवाले किया” कहना सही नहीं होगा।

लेकिन उस समय आत्मरक्षा कर रहे पीड़ित और आक्रामक भीड़ के बीच पुलिस व्यवहार की समानता गंभीर विवाद का विषय बनी।

29. FIR प्रणाली क्यों टूट गई?

हिंसा रोकना पुलिस का पहला काम था।

अपराध दर्ज करना दूसरा।

दोनों में विफलता हुई।

अनेक मामलों में—

FIR देर से दर्ज हुई;

नामित आरोपी दर्ज नहीं किए गए;

कई अलग हत्याएं एक ही FIR में जोड़ दी गईं;

लाश और अपराध स्थल का संबंध ठीक से दर्ज नहीं हुआ;

और जांच अधिकारी ने प्रत्यक्षदर्शियों की तलाश नहीं की।

इससे बाद में अदालत के सामने prosecution case कमजोर हुआ।

अर्थात 1–3 नवंबर की पुलिस विफलता ने अगले तीन दशकों की न्यायिक विफलता पैदा की।

30. क्या पुलिस अधिकारियों के खिलाफ बाद में जांच हुई?

हां।

पुलिस की भूमिका की जांच के लिए अलग-अलग समितियां बनीं।

विशेष रूप से कपूर–मित्तल समिति ने पुलिस अधिकारियों के आचरण की जांच की।

कई अधिकारियों के खिलाफ लापरवाही और कदाचार से संबंधित निष्कर्ष दिए गए।

लेकिन अनुशासनात्मक और आपराधिक कार्रवाई का वास्तविक परिणाम सीमित रहा।

यही कारण है कि बाद में जी.पी. माथुर समिति और विशेष जांच दल को भी पुराने बंद मामलों की समीक्षा करनी पड़ी। गृह मंत्रालय आज भी इन आयोगों और समितियों की रिपोर्टें आधिकारिक रूप से उपलब्ध कराता है।

31. उपराज्यपाल बनाम पुलिस आयुक्त — कौन सेना बुलाता?

यही एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक विवाद बना।

नानावती रिकॉर्ड में अलग-अलग अधिकारियों ने एक-दूसरे की भूमिका के बारे में विभिन्न व्याख्याएं दीं।

पी.सी. अलेक्जेंडर का कहना था कि उपराज्यपाल को सेना बुलाने के लिए प्रधानमंत्री की अनुमति की आवश्यकता नहीं थी; वह स्वयं कार्रवाई कर सकते थे और कठिनाई होने पर गृह मंत्रालय से संपर्क कर सकते थे।

दूसरी ओर गवई ने कहा कि उन्होंने पुलिस आयुक्त को सेना बुलाने के लिए कहा था।

टंडन का रुख था कि उन्होंने आदेश मिलने पर कार्रवाई की।

यहीं जवाबदेही बिखरती दिखाई देती है।

जब कई अधिकारी बाद में कहते हैं—

“मैंने कहा था,”

“वह जिम्मेदार था,”

“मुझे सूचना नहीं मिली,”

तो यह स्वयं अस्पष्ट कमांड व्यवस्था का प्रमाण बन जाता है।

32. संकट में ‘किसे आदेश देना था’ अस्पष्ट नहीं होना चाहिए

एक सामान्य दिन में प्रशासनिक परंपरा और प्रोटोकॉल से व्यवस्था चल सकती है।

नरसंहार जैसी स्थिति में command clarity अनिवार्य होती है।

एक व्यक्ति को स्पष्ट रूप से overall commander होना चाहिए।

उसे पता होना चाहिए—

कहां कितने पुलिसकर्मी चाहिए,

कहां सेना भेजनी है,

कर्फ्यू कहां लागू करना है,

किस अधिकारी को हटाना है,

और किसे गोली चलाने की अनुमति है।

1984 में इस स्तर की unified command समय पर नहीं बनी।

33. गृह मंत्री की भूमिका पर विवाद क्यों बना रहा?

पी.वी. नरसिंह राव की भूमिका इसलिए विवादित रही क्योंकि दिल्ली केंद्र के अधीन थी।

कई राजनीतिक और नागरिक व्यक्तियों ने दावा किया कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से गृह मंत्री को स्थिति की भयावहता बताई और सेना शीघ्र बुलाने की मांग की।

पूर्व प्रधानमंत्री आई.के. गुजराल, लेफ्टिनेंट जनरल जे.एस. अरोड़ा और लेखक पटवंत सिंह से संबंधित गवाहियों में भी गृह मंत्री से मुलाकात और सेना की मांग का उल्लेख आया।

लेकिन नानावती आयोग ने उपलब्ध सभी सामग्री देखने के बाद गृह मंत्री के खिलाफ वैसा प्रत्यक्ष प्रशासनिक दोष नहीं लगाया जैसा उसने पुलिस आयुक्त और उपराज्यपाल के संबंध में किया।

इसलिए दोनों स्तरों को अलग रखना चाहिए—

राजनीतिक आलोचना व्यापक है; आयोग का अंतिम प्रतिकूल निष्कर्ष मुख्यतः दिल्ली प्रशासन और पुलिस नेतृत्व पर अधिक स्पष्ट है।

34. प्रधानमंत्री कार्यालय ने गृह मंत्रालय को bypass किया?

कुछ बाद के विवरणों में आरोप आया कि 31 अक्टूबर की शाम के बाद हिंसा संबंधी सूचनाओं को सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय भेजने की व्यवस्था की गई और इससे गृह मंत्री की भूमिका कमजोर हुई।

इस प्रकार के विवरण संस्मरण और बाद की पत्रकारिता में मिलते हैं।

लेकिन इसे स्थापित आधिकारिक निष्कर्ष की तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।

उपलब्ध नानावती निष्कर्ष इसे नरसंहार का निर्णायक कारण सिद्ध नहीं करते।

इसलिए यह विवादित दावा है, सिद्ध केंद्रीय प्रशासनिक तथ्य नहीं।

35. सेना देर से आई या देर से प्रभावी हुई?

इस अंतर को साफ करना जरूरी है।

सेना के सैनिक दिल्ली में पहले से थे।

कुछ इकाइयां 31 अक्टूबर से alert थीं।

1 नवंबर दोपहर से कुछ क्षेत्रों में उनकी तैनाती शुरू हुई।

2 नवंबर शाम तक अतिरिक्त ब्रिगेडों ने पूरी दिल्ली को कवर करना शुरू किया।

और स्वयं GOC के अनुसार कई क्षेत्रों में सेना 3 नवंबर से वास्तव में प्रभावी हुई।

इसलिए सबसे सटीक भाषा होगी—

सेना उपलब्ध पहले थी; नागरिक सहायता में आंशिक तैनाती 1 नवंबर से शुरू हुई; शहरव्यापी प्रभावी तैनाती 2 नवंबर देर शाम/3 नवंबर तक विकसित हुई।

36. यह अंतर क्यों महत्वपूर्ण है?

यदि कहा जाए कि “सेना 3 नवंबर को ही आई”, तो तथ्य अधूरा होगा।

यदि कहा जाए कि “सेना 31 अक्टूबर को ही पूरी तरह तैनात थी”, तो वह भी गलत होगा।

सही प्रशासनिक प्रश्न है—

उपलब्ध सैन्य संसाधन कितनी तेजी से हिंसाग्रस्त इलाकों में operational force में बदले?

इसी परिवर्तन में 24–48 निर्णायक घंटे खो गए।

37. क्या पुलिस को ‘shoot at sight’ आदेश मिले थे?

1984 के विवरणों में “shoot-at-sight” आदेश का उल्लेख बार-बार आता है।

लेकिन इस आदेश की घोषणा और वास्तविक उपयोग के बीच फर्क था।

गवई ने बाद में इस आरोप से इनकार किया कि ऐसे आदेश देने में उनके स्तर पर अनुचित देरी हुई।

लेकिन यदि आदेश जारी होने के बावजूद भीड़ खुलेआम चलती रही, तो उसकी operational value सीमित थी।

फिर वही अंतर सामने आता है—

order issued ≠ order enforced.

38. पुलिस नेतृत्व को कितनी जल्दी वास्तविकता समझनी चाहिए थी?

31 अक्टूबर शाम तक—

सिख यात्रियों पर हमले;

राष्ट्रपति के काफिले पर हमला;

वाहनों और दुकानों को निशाना बनाया जाना—

स्पष्ट था।

1 नवंबर सुबह—

बड़ी भीड़;

सिख-विरोधी नारे;

गुरुद्वारों पर हमले—

और स्पष्ट थे।

दोपहर तक—

हत्याएं और आगजनी व्यापक हो चुकी थीं।

इसलिए अधिकतम 1 नवंबर सुबह तक शहर को highest communal emergency घोषित किया जाना चाहिए था।

यही समय निर्णय का था।

39. पुलिस आयुक्त की सबसे बड़ी विफलता

एस.सी. टंडन की सबसे बड़ी समस्या संभवतः किसी विशिष्ट लिखित आदेश की नहीं बल्कि situation assessment की थी।

नानावती आयोग ने मूलतः यही कहा—

उन्होंने स्थिति को उतनी गंभीरता नहीं दी जितनी आवश्यक थी।

शीर्ष पुलिस अधिकारी का काम केवल आदेश जारी करना नहीं होता।

उसका सबसे महत्वपूर्ण काम खतरे की प्रकृति को पहचानना है।

यदि threat assessment गलत हो, तो बाकी प्रशासनिक मशीनरी भी धीमी होती है।

40. उपराज्यपाल की सबसे बड़ी विफलता

पी.जी. गवई के पास दिल्ली के कानून-व्यवस्था तंत्र की सर्वोच्च प्रशासनिक जिम्मेदारी थी।

यदि पुलिस आयुक्त सेना बुलाने में हिचक रहे थे तो उपराज्यपाल सीधे कदम उठा सकते थे।

पी.सी. अलेक्जेंडर ने भी आयोग के सामने यही कहा कि इसके लिए प्रधानमंत्री की अनुमति आवश्यक नहीं थी।

इसलिए यदि गवई को स्थिति की गंभीरता ज्ञात थी, तो अधिक निर्णायक हस्तक्षेप अपेक्षित था।

नानावती आयोग ने उनके स्पष्टीकरण को संतोषजनक नहीं माना।

41. गृह मंत्रालय की सबसे बड़ी राजनीतिक विफलता

भले आयोग ने गृह मंत्री को सीधे प्रशासनिक दोषी न माना हो, केंद्र सरकार के लिए एक बड़ा राजनीतिक प्रश्न फिर भी रहता है—

क्यों राजधानी में दो दिनों तक नागरिकों की बड़े पैमाने पर हत्या हुई और शीर्ष स्तर से unified emergency command तत्काल स्थापित नहीं हुई?

सरकार के पास अधिकार था।

संसाधन थे।

सेना थी।

और स्थिति की जानकारी भी थी।

इसलिए प्रशासनिक दोष का वितरण राजनीतिक उत्तरदायित्व को समाप्त नहीं करता।

42. सेना की भूमिका पर निष्कर्ष

उपलब्ध रिकॉर्ड सेना को नरसंहार रोकने में जानबूझकर निष्क्रिय संस्था के रूप में प्रस्तुत नहीं करता।

इसके विपरीत सैन्य अधिकारियों की गवाही बताती है कि वे नागरिक प्रशासन की मांग की प्रतीक्षा कर रहे थे और धीरे-धीरे उन्हें क्षेत्र दिए गए।

जहां सेना प्रभावी हुई, वहां भीड़ पीछे हटी।

इसलिए सबसे मजबूत निष्कर्ष है—

सेना की उपलब्ध क्षमता का नागरिक प्रशासन ने समय पर अधिकतम उपयोग नहीं किया।

यह सेना की तुलना में civil command failure अधिक था।

43. नानावती आयोग का समग्र निष्कर्ष

नानावती आयोग ने लगभग दो दशक बाद पूरे प्रशासनिक रिकॉर्ड की समीक्षा करते हुए मिश्र आयोग के कई निष्कर्ष स्वीकार किए।

उसने माना—

सेना बुलाने में देरी हुई;

उपराज्यपाल का स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं था;

पुलिस आयुक्त ने स्थिति की गंभीरता को पर्याप्त महत्व नहीं दिया;

वह दिल्ली में कानून-व्यवस्था की विफलता की जिम्मेदारी से नहीं बच सकते;

और अनेक स्थानीय पुलिस अधिकारियों का आचरण भी गंभीर प्रश्नों के घेरे में था।

यह 1984 के प्रशासनिक इतिहास का सबसे ठोस आधिकारिक निष्कर्ष है।

44. दिल्ली उच्च न्यायालय ने दशकों बाद क्या कहा?

2018 में सज्जन कुमार को दोषी ठहराते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने 1984 की व्यापक पृष्ठभूमि पर टिप्पणी की।

अदालत ने कहा कि ऐसे सामूहिक अपराधों में अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण मिला और कानून लागू करने वाली एजेंसियों की उदासीनता के कारण उन्हें लंबे समय तक अभियोजन और दंड से बचने का अवसर मिला।

यह टिप्पणी केवल पुलिस की शुरुआती हिंसा-निरोधक विफलता नहीं बल्कि investigative impunity की ओर भी संकेत करती है।

अर्थात राज्य दो चरणों में विफल हुआ—

पहले नागरिकों को बचाने में,

फिर अपराधियों को समय पर दंडित करने में।

स्तर 1 — स्थानीय थाना और बीट पुलिस

मुख्य विफलताएं—

समय पर सहायता न पहुंचना;

भीड़ को न रोकना;

अपर्याप्त गिरफ्तारी;

कमजोर FIR;

कुछ क्षेत्रों में मिलीभगत के आरोप।

स्तर 2 — जिला और दिल्ली पुलिस कमांड

मुख्य विफलताएं—

स्थिति का गलत आकलन;

शहरव्यापी पैटर्न देर से पहचानना;

बल का खराब वितरण;

कर्फ्यू का कमजोर enforcement;

सेना की आवश्यकता देर से स्वीकार करना।

स्तर 3 — उपराज्यपाल और दिल्ली प्रशासन

मुख्य विफलताएं—

सेना बुलाने की प्रक्रिया में पर्याप्त दृढ़ता का अभाव;

पुलिस नेतृत्व पर समय पर निर्णायक नियंत्रण न स्थापित करना;

unified emergency command न बनाना।

स्तर 4 — केंद्रीय गृह मंत्रालय और राजनीतिक नेतृत्व

मुख्य प्रश्न—

दिल्ली केंद्र के प्रत्यक्ष नियंत्रण में होने के बावजूद तुरंत centralized command क्यों नहीं बनी;

सेना और पुलिस के समन्वय को तुरंत सर्वोच्च स्तर पर क्यों नहीं चलाया गया;

और शांति तथा कठोर कानून-व्यवस्था संदेश पर्याप्त तेजी से क्यों प्रभावी नहीं हुआ।

स्तर 5 — सेना

सेना का मुख्य प्रश्न उसकी उपलब्धता और प्रभावी उपयोग के बीच अंतर था।

उपलब्ध रिकॉर्ड जानबूझकर सैन्य निष्क्रियता की तुलना में नागरिक प्रशासन की विलंबित requisition और deployment को अधिक महत्वपूर्ण कारण बताता है।

46. प्रशासनिक समयरेखा

31 अक्टूबर सुबह 9:20 बजे — प्रधानमंत्री पर हमला।

31 अक्टूबर दोपहर — सिखों पर शुरुआती हमले।

31 अक्टूबर शाम — राष्ट्रपति के काफिले पर पथराव सहित गंभीर चेतावनी संकेत।

31 अक्टूबर रात लगभग 11:30 बजे — सेना के दिल्ली क्षेत्र कमांडर और पुलिस आयुक्त के बीच बातचीत; स्थिति “बहुत खराब लेकिन नियंत्रण में” बताई गई।

31 अक्टूबर मध्यरात्रि तक — लगभग 5,000 सैन्यकर्मी उपलब्ध होने का मिश्र आयोग का निष्कर्ष।

1 नवंबर सुबह लगभग 7:30 बजे — उपराज्यपाल गवई द्वारा पुलिस आयुक्त के सामने सेना बुलाने की आवश्यकता उठाए जाने का विवरण।

लगभग 10 बजे — पुलिस आयुक्त द्वारा सेना की आवश्यकता स्वीकार किए जाने का बाद की समिति में उल्लेख।

लगभग 11 बजे — सेना मुख्यालय से दिल्ली क्षेत्र कमांड को नागरिक सहायता के अनुरोध के लिए तैयार रहने का संदेश।

लगभग 12:30 बजे — GOC को राजभवन बुलाया गया।

लगभग 1:30 बजे — सेना की तैनाती पर चर्चा/राजनीतिक स्वीकृति।

2:02 बजे — GOC द्वारा मध्य और दक्षिण दिल्ली के लिए सैनिकों को आगे बढ़ने का संदेश।

1 नवंबर दोपहर बाद — कुछ सैन्य इकाइयों की तैनाती।

2 नवंबर — अतिरिक्त ब्रिगेड दिल्ली पहुंचती रहीं।

2 नवंबर देर शाम — सेना सभी जिलों में फैलने लगी।

3 नवंबर — GOC के अनुसार कई क्षेत्रों में सेना की तैनाती वास्तव में प्रभावी हुई।

यह समयरेखा स्वयं देरी का पैमाना दिखाती है।

47. क्या यह केवल ‘प्रशासनिक गड़बड़ी’ थी?

यदि कोई पुलिस ऑपरेशन कुछ घंटे देर से हो तो उसे प्रशासनिक गड़बड़ी कहा जा सकता है।

लेकिन जब परिणाम हजारों नागरिकों की हत्या हो, तो शब्द बदल जाता है।

यह—

command failure,

intelligence-to-action failure,

deployment failure,

law-enforcement failure,

और अंततः state protection failure

बन जाता है।

यही 1984 की प्रशासनिक विरासत है।

48. क्या राज्य की विफलता नरसंहार की साजिश सिद्ध करती है?

नहीं।

यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी और ऐतिहासिक अंतर है।

राज्य की गंभीर विफलता यह स्वतः सिद्ध नहीं करती कि शीर्ष सरकार ने नरसंहार आयोजित किया।

इसके लिए अलग प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य प्रमाण चाहिए।

नानावती आयोग ने शीर्ष केंद्रीय नेतृत्व द्वारा पूरे हमले के संगठन का निर्णायक प्रमाण नहीं पाया।

लेकिन—

सेना बुलाने में देरी,

पुलिस निष्क्रियता,

स्थानीय राजनीतिक भागीदारी,

कमजोर FIR,

और दशकों की दंडमुक्ति—

ये अपने आप में गंभीर और दस्तावेजीकृत तथ्य हैं।

इतिहास को अधिक विश्वसनीय बनाने के लिए साजिश सिद्ध न होने पर भी विफलता को कम करके दिखाने की आवश्यकता नहीं है।

निष्कर्ष — राज्य के पास साधन थे, लेकिन वे समय पर नागरिक तक नहीं पहुंचे

1984 की दिल्ली में राज्य अनुपस्थित नहीं था।

उसके पास—

गृह मंत्रालय था,

उपराज्यपाल था,

पुलिस आयुक्त था,

छह पुलिस जिले थे,

63 पुलिस स्टेशन थे,

अर्धसैनिक बल थे,

वायरलेस नेटवर्क था,

कर्फ्यू लगाने का अधिकार था,

और हजारों सैनिक उपलब्ध थे।

फिर भी हजारों सिख नागरिक सुरक्षित नहीं रहे।

यही प्रशासनिक विफलता का मूल है।

समस्या साधनों की पूर्ण अनुपस्थिति नहीं थी।

समस्या थी—

खतरे का देर से आकलन,

कमांड की अस्पष्टता,

स्थानीय पुलिस की असमान प्रतिक्रिया,

कर्फ्यू का कमजोर प्रवर्तन,

सेना बुलाने और फैलाने में देरी,

पुलिस–सेना समन्वय की कमी,

और राजनीतिक-प्रशासनिक नेतृत्व द्वारा समय पर unified emergency response स्थापित न कर पाना।

नानावती आयोग का निष्कर्ष विशेष रूप से कठोर था कि पुलिस आयुक्त एस.सी. टंडन दिल्ली की कानून-व्यवस्था की विफलता की जिम्मेदारी से बच नहीं सकते और उपराज्यपाल पी.जी. गवई का स्पष्टीकरण भी संतोषजनक नहीं था।

सेना का मामला अलग था।

वह उपलब्ध थी।

उसे alert किया गया था।

लेकिन नागरिक प्रशासन की सहायता में उसका प्रभावी शहरव्यापी उपयोग धीरे-धीरे हुआ और स्वयं दिल्ली क्षेत्र के सैन्य कमांडर के अनुसार कई इलाकों में वह 3 नवंबर से वास्तविक रूप से प्रभावी हुई।

यही दो दिनों का अंतर 1984 की त्रासदी में निर्णायक बन गया।

इसलिए 1984 पर सबसे सटीक प्रशासनिक निष्कर्ष शायद यह है—

भीड़ ने नागरिकों की हत्या की, स्थानीय राजनीतिक तत्वों ने कई स्थानों पर हिंसा को बढ़ाया, लेकिन राज्य की देरी और निष्क्रियता ने उस हिंसा को वह समय और स्थान दिया जिसमें वह नरसंहार बन सकी।

और राज्य की विफलता यहीं समाप्त नहीं हुई।

हिंसा रुकने के बाद नया प्रश्न सामने आया—

पुलिस किन लोगों को गिरफ्तार करेगी?

किसके खिलाफ FIR दर्ज होगी?

राजनीतिक नेताओं पर लगे आरोपों की जांच कौन करेगा?

क्या गवाह सुरक्षित रहेंगे?

और क्या प्रभावशाली आरोपी न्यायालय तक पहुंचेंगे?

इन प्रश्नों का उत्तर अगले चार दशकों की न्यायिक यात्रा में मिलेगा।