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OCN Research Dossier–020 · अध्याय 20

सिंधिया राजघराने से विजयाराजे, माधवराव, वसुंधरा राजे और ज्योतिरादित्य सिंधिया तक — राजशाही से लोकतांत्रिक वंशवाद की असाधारण यात्रा

भारतीय राजनीतिक वंशों में सिंधिया परिवार का मामला लगभग सभी दूसरे परिवारों से अलग है। नेहरू–गांधी, यादव, पवार, ठाकरे, चौटाला या भजनलाल परिवारों में पहली राजनीतिक पीढ़ी ने लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर अपनी राजनीतिक पूंजी अर्जित की। सिंधिया परिवार के पास लोकतंत्र आने से पहले ही एक दूसरी तरह की पूंजी मौजूद थी—

राजसत्ता, संपत्ति, सामाजिक प्रतिष्ठा, ऐतिहासिक स्मृति और ग्वालियर रियासत का व्यापक प्रभाव।

1947 के बाद राजशाही समाप्त हुई, रियासत भारतीय संघ में समाहित हुई और 1971 में पूर्व राजाओं के प्रिवी पर्स तथा संवैधानिक मान्यताएं भी समाप्त कर दी गईं। लेकिन सिंधिया परिवार सार्वजनिक जीवन से समाप्त नहीं हुआ। उसने स्वयं को लोकतांत्रिक राजनीति में पुनर्स्थापित कर लिया। और फिर एक असाधारण राजनीतिक संरचना बनी—

राजमाता विजयाराजे सिंधिया — जनसंघ/भाजपा की प्रमुख नेता।

पुत्र माधवराव सिंधिया — कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता।

पुत्री वसुंधरा राजे — भाजपा की राजस्थान की मुख्यमंत्री।

पुत्री यशोधरा राजे सिंधिया — भाजपा की मध्य प्रदेश की मंत्री।

पौत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया — पहले कांग्रेस के केंद्रीय मंत्री, फिर भाजपा के केंद्रीय मंत्री।

वसुंधरा के पुत्र दुष्यंत सिंह — भाजपा सांसद।

यानी एक ही राजपरिवार ने—

कांग्रेस, जनसंघ और भाजपा

तीनों प्रमुख राजनीतिक धाराओं में उच्च स्तर का प्रतिनिधित्व किया। इस परिवार का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रश्न इसलिए केवल वंशवाद नहीं है। प्रश्न अधिक गहरा है—

भारत ने राजशाही समाप्त कर दी, लेकिन क्या पुराने राजघरानों की सामाजिक–राजनीतिक पूंजी लोकतांत्रिक राजनीति में नए रूप में जीवित रह गई?

सिंधिया परिवार इसका शायद सबसे प्रभावशाली उदाहरण है।

21.1 सिंधिया कौन थे?

सिंधिया या शिंदे राजवंश का उदय अठारहवीं शताब्दी में मराठा शक्ति के विस्तार के साथ हुआ। राणोजी सिंधिया को इस राजवंश का संस्थापक माना जाता है। महादजी सिंधिया के समय ग्वालियर शक्ति उत्तर भारत की बड़ी राजनीतिक–सैन्य शक्तियों में बदल गई। मराठा संघ में सिंधिया घराना अत्यंत प्रभावशाली था। बाद में अंग्रेजों के उदय और आंग्ल–मराठा युद्धों के बाद ग्वालियर एक महत्वपूर्ण रियासत के रूप में ब्रिटिश भारतीय व्यवस्था का हिस्सा बना। इसलिए आधुनिक सिंधिया राजनीतिक परिवार की जड़ें किसी बीसवीं सदी की पार्टी में नहीं बल्कि—

अठारहवीं सदी की राजसत्ता

में हैं। 21.2 ग्वालियर रियासत ब्रिटिश भारत में ग्वालियर सबसे महत्वपूर्ण देशी रियासतों में थी। इसका क्षेत्र आज के मध्य प्रदेश के विभिन्न हिस्सों तक फैला था। ग्वालियर शहर राजनीतिक और प्रशासनिक केंद्र था। सिंधिया शासकों की ऐतिहासिक स्मृति विशेष रूप से— ग्वालियर, गुना, शिवपुरी, अशोकनगर और चंबल क्षेत्र में लंबे समय तक बनी रही। आगे यही भौगोलिक क्षेत्र परिवार की लोकतांत्रिक राजनीति का प्रमुख आधार बना। 21.3 जीवाजीराव सिंधिया — अंतिम शासक जीवाजीराव सिंधिया ग्वालियर रियासत के अंतिम शासक महाराजा थे। भारत की स्वतंत्रता के समय देशी रियासतों के भारतीय संघ में विलय की प्रक्रिया चली। ग्वालियर भी भारतीय संघ का हिस्सा बना।

ग्वालियर और अन्य रियासतों को मिलाकर मध्य भारत राज्य बनाया गया और जीवाजीराव उसके राजप्रमुख बने। 1956 के राज्यों के पुनर्गठन के बाद यह क्षेत्र मध्य प्रदेश में समाहित हो गया। राजसत्ता समाप्त हो चुकी थी। लेकिन परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा बनी रही। 21.4 विजयाराजे सिंधिया — राजमहल से चुनाव मैदान तक जीवाजीराव सिंधिया की पत्नी—

विजयाराजे सिंधिया

आगे भारतीय राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण महिला नेताओं में से एक बनीं। उनका जन्म राजपरिवार में हुआ था और विवाह के बाद वे ग्वालियर की महारानी बनीं। लेकिन स्वतंत्र भारत में उनकी पहचान केवल पूर्व महारानी की नहीं रही। वे स्वयं सक्रिय चुनावी नेता बनीं। और यही बिंदु सिंधिया परिवार को राजवंश से राजनीतिक वंश में बदलता है। 21.5 कांग्रेस से शुरुआत विजयाराजे ने अपने लोकतांत्रिक राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस से की। 1957 में वे गुना से लोकसभा पहुंचीं। इसके बाद 1962 में ग्वालियर से चुनाव जीता। अर्थात राजशाही समाप्त होने के बाद परिवार ने जनता से चुनावी वैधता प्राप्त करना शुरू किया। यह परिवर्तन महत्वपूर्ण था—

पहले सत्ता जन्म से मिलती थी। अब सत्ता के लिए मतदाता की स्वीकृति आवश्यक थी।

21.6 कांग्रेस से मोहभंग 1960 के दशक में विजयाराजे सिंधिया के कांग्रेस नेतृत्व से मतभेद बढ़े। मध्य प्रदेश में कांग्रेस की आंतरिक राजनीति और तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र से उनका संघर्ष विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा। 1967 में वे कांग्रेस से अलग हो गईं। और धीरे-धीरे भारतीय जनसंघ से जुड़ गईं। यहीं सिंधिया परिवार की राजनीति में पहली बड़ी वैचारिक दरार पैदा हुई। 21.7 जनसंघ की ‘राजमाता’ विजयाराजे भारतीय जनसंघ की प्रमुख नेताओं में शामिल हो गईं। उनकी पहचान बनी—

‘राजमाता’।

यह संबोधन अपने आप में दिलचस्प था। भारत गणराज्य बन चुका था। राजशाही समाप्त थी। लेकिन लोकतांत्रिक राजनीति में भी पुराने राजकीय संबोधन की सामाजिक शक्ति बनी रही। यानी—

राजकीय प्रतीक लोकतांत्रिक राजनीतिक ब्रांड में बदल गया।

21.8 विजयाराजे की राजनीति केवल राजघराने के भरोसे नहीं रही उन्हें केवल पूर्व महारानी मानना गलत होगा। उन्होंने जनसंघ के संगठनात्मक विस्तार में सक्रिय भूमिका निभाई। मध्य प्रदेश में जनसंघ और बाद में भाजपा के विस्तार में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। वे चुनाव लड़ती रहीं, संसद पहुंचीं, पार्टी संगठन में सक्रिय रहीं और कांग्रेस-विरोधी राजनीति की प्रमुख महिला नेता बनीं। इसलिए उनका सटीक वर्गीकरण होगा—

राजकीय विरासत + स्वतंत्र लोकतांत्रिक राजनीतिक निर्माण।

21.9 आपातकाल और जेल 1975 में इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लगाए जाने के बाद विपक्ष के अनेक नेताओं के साथ विजयाराजे सिंधिया भी गिरफ्तार हुईं। उन्होंने आपातकाल का विरोध किया। इससे जनसंघ और कांग्रेस-विरोधी राजनीति में उनकी प्रतिष्ठा और मजबूत हुई। 1977 के बाद वे जनता पार्टी की राजनीति में भी सक्रिय रहीं। 21.10 भाजपा की स्थापना और विजयाराजे 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई। विजयाराजे सिंधिया भाजपा की संस्थापक पीढ़ी के महत्वपूर्ण नेताओं में थीं। आगे वे पार्टी की उपाध्यक्ष भी रहीं। इसलिए भाजपा के इतिहास में सिंधिया परिवार की उपस्थिति ज्योतिरादित्य के 2020 में भाजपा आने से शुरू नहीं होती। वास्तव में—

ज्योतिरादित्य की दादी भाजपा की संस्थापक पीढ़ी में थीं।

यह तथ्य 2020 के राजनीतिक घटनाक्रम को ऐतिहासिक रूप से विशेष बनाता है। 21.11 लेकिन पुत्र ने अलग रास्ता चुना विजयाराजे के पुत्र—

माधवराव सिंधिया

की राजनीति मां से बिल्कुल अलग दिशा में गई। माधवराव का जन्म 10 मार्च 1945 को हुआ। वे ग्वालियर राजघराने के उत्तराधिकारी थे। उनका राजनीतिक प्रवेश भी परिवार की स्थापित सामाजिक प्रतिष्ठा के बीच हुआ। 1971 में वे पहली बार लोकसभा पहुंचे। लेकिन आगे उन्होंने मां की जनसंघ राजनीति से दूरी बना ली। 21.12 मां जनसंघ में, पुत्र कांग्रेस की ओर यह भारतीय राजनीतिक वंशों में असाधारण स्थिति थी। एक तरफ—

विजयाराजे — जनसंघ/भाजपा।

दूसरी तरफ—

माधवराव — अंततः कांग्रेस।

परिवार एक था। राजनीतिक विचारधारा अलग। और कई अवसरों पर राजनीतिक संघर्ष भी खुला था। इसलिए सिंधिया वंश को किसी एक पार्टी का राजनीतिक परिवार नहीं कहा जा सकता। 21.13 माधवराव का स्वतंत्र राजनीतिक व्यक्तित्व माधवराव सिंधिया केवल राजमाता के पुत्र बनकर नहीं रहे। उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में स्वतंत्र पहचान बनाई। वे कई बार लोकसभा सदस्य चुने गए। कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए। केंद्र सरकार में— रेलवे, नागरिक उड्डयन, मानव संसाधन विकास जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों से जुड़े मंत्री पद संभाले। उनकी प्रशासनिक शैली और आधुनिकतावादी छवि ने उन्हें कांग्रेस के लोकप्रिय नेताओं में स्थान दिया। 21.14 रेलवे मंत्री के रूप में छवि राजीव गांधी सरकार में माधवराव सिंधिया रेल मंत्री रहे।

रेलवे के आधुनिकीकरण, आरक्षण व्यवस्था के कम्प्यूटरीकरण और यात्री सेवाओं में सुधार के दौर से उनका नाम जोड़ा जाता है। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां दूसरी पीढ़ी ने केवल पारिवारिक विरासत पर निर्भर रहने के बजाय—

शासन-प्रदर्शन की अपनी राजनीतिक पूंजी

बनानी शुरू की। 21.15 मां–पुत्र संबंधों का राजनीतिक तनाव विजयाराजे और माधवराव के राजनीतिक संबंध लंबे समय तक तनावपूर्ण रहे। विचारधारा, पारिवारिक संपत्ति, राजनीतिक निष्ठा और व्यक्तिगत संबंधों को लेकर विवाद सार्वजनिक हुए। यह सिंधिया परिवार का एक महत्वपूर्ण पहलू है—

वंशवाद हमेशा परिवार को राजनीतिक रूप से एकजुट नहीं करता।

कभी-कभी परिवार की राजनीतिक पूंजी स्वयं प्रतिस्पर्धी शाखाओं में विभाजित हो जाती है। 21.16 1984 — मां और पुत्र विपरीत राजनीतिक शिविरों में 1980 और 1990 के दशकों में स्थिति स्पष्ट थी। विजयाराजे भाजपा की प्रमुख नेता थीं। माधवराव कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता। इसलिए ग्वालियर राजघराने की राजनीतिक पूंजी एक ही समय पर—

सत्ता और विपक्ष दोनों

में मौजूद रह सकती थी। यह भारतीय वंशवाद का दुर्लभ मॉडल है। 21.17 1996 — माधवराव का कांग्रेस से अस्थायी अलगाव 1996 में हवाला मामले के राजनीतिक प्रभाव के बीच कांग्रेस ने माधवराव को टिकट नहीं दिया। उन्होंने कांग्रेस छोड़कर—

मध्य प्रदेश विकास कांग्रेस

बनाई। वे ग्वालियर से चुनाव जीते। बाद में उनकी पार्टी संयुक्त मोर्चा सरकार का हिस्सा बनी और अंततः वे कांग्रेस में वापस लौट आए। यह दिखाता है कि उनका व्यक्तिगत राजनीतिक आधार कांग्रेस संगठन से स्वतंत्र भी था। 2020 में ज्योतिरादित्य के कांग्रेस छोड़ने के समय इस पारिवारिक समानता की खूब चर्चा हुई। 21.18 30 सितंबर 2001 — माधवराव की मृत्यु 30 सितंबर 2001 को उत्तर प्रदेश में एक विमान दुर्घटना में माधवराव सिंधिया की मृत्यु हो गई। वे उस समय कांग्रेस के प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं में थे। उनकी असामयिक मृत्यु ने परिवार की राजनीति में अचानक रिक्तता पैदा कर दी। और यही वह क्षण था जिसने अगली पीढ़ी को सीधे राजनीति में पहुंचाया। 21.19 ज्योतिरादित्य सिंधिया का प्रवेश माधवराव के पुत्र—

ज्योतिरादित्य सिंधिया

ने पिता की मृत्यु के बाद सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। 2002 में गुना लोकसभा उपचुनाव हुआ। कांग्रेस ने ज्योतिरादित्य को उम्मीदवार बनाया। वे बड़े अंतर से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। यह हमारे वंशवाद अध्ययन की कसौटी पर अत्यंत स्पष्ट मामला है। 21.20 क्या ज्योतिरादित्य का प्रवेश वंशवादी था?

हां—बहुत स्पष्ट रूप से।

उन्हें मिला— पिता का निर्वाचन क्षेत्र, कांग्रेस का टिकट, ग्वालियर राजघराने का नाम, दशकों पुराना कार्यकर्ता नेटवर्क, गुना–शिवपुरी क्षेत्र का सामाजिक प्रभाव, और पिता की मृत्यु से उत्पन्न सहानुभूति। इसलिए उनके राजनीतिक प्रवेश को स्वतंत्र शून्य-बिंदु से शुरू हुआ राजनीतिक जीवन नहीं कहा जा सकता। लेकिन आगे का प्रश्न अलग है—

क्या उन्होंने बाद में अपनी स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति बनाई?

उत्तर भी हां है। 21.21 लगातार चुनावी सफलता ज्योतिरादित्य ने 2002 के बाद गुना क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत की। वे 2004, 2009 और 2014 में लोकसभा चुनाव जीतते रहे। यूपीए सरकार में केंद्रीय मंत्री बने। उन्होंने संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी, वाणिज्य एवं उद्योग तथा ऊर्जा जैसे विभागों में राज्य मंत्री की जिम्मेदारियां संभालीं। इसलिए पिता की विरासत से प्रवेश के बाद उन्होंने स्वयं भी लंबा संसदीय रिकॉर्ड बनाया। 21.22 2019 — पहली बड़ी पराजय 2019 लोकसभा चुनाव में एक बड़ा राजनीतिक झटका लगा। ज्योतिरादित्य सिंधिया गुना से भाजपा के के.पी. यादव से चुनाव हार गए। यह परिणाम इसलिए चौंकाने वाला था क्योंकि गुना सिंधिया परिवार का मजबूत राजनीतिक क्षेत्र माना जाता था।

वंशवादी राजनीति के अध्ययन में इसका महत्व वही है जो हमने आदमपुर में भव्य बिश्नोई की 2024 की हार में देखा—

पारंपरिक सीट भी स्थायी पारिवारिक संपत्ति नहीं होती।

21.23 लेकिन 2018 में एक और कहानी शुरू हो चुकी थी 2018 मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 15 वर्षों बाद भाजपा को सत्ता से हटाया। कांग्रेस 114 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी। सरकार बनाने के लिए उसे निर्दलीय, बसपा और सपा विधायकों का समर्थन मिला। उस चुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के सबसे प्रमुख प्रचारकों में थे। उनका प्रभाव विशेष रूप से ग्वालियर–चंबल क्षेत्र में था। 21.24 मुख्यमंत्री कौन — कमलनाथ या सिंधिया? कांग्रेस की जीत के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए दो बड़े नाम सामने आए—

कमलनाथ

और

ज्योतिरादित्य सिंधिया।

अंततः कांग्रेस नेतृत्व ने कमलनाथ को मुख्यमंत्री चुना। सिंधिया समर्थकों में निराशा हुई। यहीं 2020 के संकट की प्रारंभिक राजनीतिक पृष्ठभूमि दिखाई देती है। लेकिन केवल मुख्यमंत्री पद न मिलना पूरे घटनाक्रम की पर्याप्त व्याख्या नहीं है। 21.25 संगठन का प्रश्न 2018 के बाद मध्य प्रदेश कांग्रेस में तीन बड़े शक्ति-केंद्र थे— कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, सिंधिया समर्थकों की शिकायत थी कि सरकार और संगठन में उनके लोगों को अपेक्षित महत्व नहीं मिल रहा। 2020 में इस्तीफा देने वाले अनेक विधायक ग्वालियर–चंबल क्षेत्र से थे और सिंधिया के प्रति व्यक्तिगत राजनीतिक निष्ठा रखते थे। यह तथ्य महत्वपूर्ण है। इससे पता चलता है कि ज्योतिरादित्य के पास केवल उपनाम नहीं, बल्कि अपना विधायक समूह भी था।

21.26 राज्यसभा भी विवाद का कारण 2020 में मध्य प्रदेश से राज्यसभा सीटों का चुनाव होना था। कांग्रेस में उम्मीदवारों को लेकर भी शक्ति संघर्ष था। ज्योतिरादित्य की राजनीतिक भूमिका और भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ रही थी। इसके साथ सरकार में हिस्सेदारी और संगठनात्मक प्रभाव के प्रश्न जुड़े। फिर मार्च 2020 में संकट अचानक विस्फोटक हो गया। 21.27 10 मार्च 2020 — सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ी ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को इस्तीफा भेजा। उन्होंने लिखा कि 18 वर्षों तक कांग्रेस सदस्य रहने के बाद अब आगे बढ़ने का समय है और वे कांग्रेस में रहते हुए राज्य तथा देश के लोगों की सेवा करने में स्वयं को असमर्थ पा रहे हैं।

यह दिन संयोग से उनके पिता माधवराव सिंधिया की 75वीं जयंती भी था। 21.28 अकेले नहीं गए यही घटना को ऐतिहासिक बनाता है। ज्योतिरादित्य के साथ—

22 कांग्रेस विधायकों

ने इस्तीफा दे दिया। इनमें छह मंत्री भी शामिल थे। अर्थात यह केवल एक बड़े नेता का पार्टी परिवर्तन नहीं था। इससे राज्य सरकार का बहुमत संकट में पड़ गया। 21.29 11 मार्च — भाजपा में प्रवेश अगले दिन ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा की उपस्थिति में उनका स्वागत हुआ। भाजपा ने उन्हें राज्यसभा उम्मीदवार भी बनाया। राजनीतिक प्रतीकवाद असाधारण था—

विजयाराजे सिंधिया की भाजपा में उनका पौत्र लौट आया था।

लेकिन इस बार परिस्थितियां पूरी तरह अलग थीं। 21.30 कांग्रेस का आरोप कांग्रेस ने इस घटनाक्रम को— सत्ता के लिए दलबदल, जनादेश के साथ विश्वासघात, और भाजपा द्वारा निर्वाचित सरकार गिराने की कोशिश बताया। कमलनाथ ने बाद में भाजपा पर षड्यंत्र और विधायकों को प्रलोभन देने के आरोप लगाए। ये कांग्रेस के राजनीतिक आरोप थे; इन्हें स्थापित न्यायिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए। 21.31 सिंधिया का पक्ष सिंधिया ने कहा कि कांग्रेस पहले जैसी पार्टी नहीं रही और उसमें रहते हुए जनसेवा संभव नहीं रह गई थी।

उन्होंने मध्य प्रदेश सरकार के कामकाज और वादों को लेकर भी असंतोष व्यक्त किया। भाजपा में प्रवेश के समय उन्होंने कहा कि राजनीति उनके लिए जनसेवा का माध्यम है और कांग्रेस में वह उद्देश्य पूरा नहीं हो रहा था। इसलिए 2020 की घटना के दो प्रतिस्पर्धी राजनीतिक आख्यान बने— कांग्रेस: सत्ता के लिए दलबदल। सिंधिया/भाजपा: कांग्रेस से निराश होकर राजनीतिक पुनर्संरेखण। 21.32 विधायकों का बेंगलुरु जाना सिंधिया समर्थक विधायक मध्य प्रदेश से बाहर बेंगलुरु चले गए। इससे घटनाक्रम तथाकथित ‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’ का रूप ले गया। कांग्रेस उनसे संपर्क करने का प्रयास करती रही। विधायकों का कहना था कि उन्होंने स्वेच्छा से इस्तीफा दिया है। मामला विधानसभा अध्यक्ष और अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।

21.33 सुप्रीम कोर्ट और फ्लोर टेस्ट मध्य प्रदेश के राजनीतिक संकट में विधानसभा में बहुमत परीक्षण का प्रश्न सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। न्यायालय ने फ्लोर टेस्ट का रास्ता साफ किया। इससे कमलनाथ सरकार के सामने विधानसभा में बहुमत सिद्ध करने की स्थिति बनी। लेकिन फ्लोर टेस्ट होने से पहले ही राजनीतिक परिणाम स्पष्ट हो चुका था। 21.34 20 मार्च 2020 — कमलनाथ का इस्तीफा कमलनाथ ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उनकी सरकार लगभग 15 महीने चली थी। 22 कांग्रेस विधायकों के इस्तीफों के कारण विधानसभा का प्रभावी संख्याबल बदल गया था और सरकार बहुमत खो चुकी थी। इसके बाद शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा सरकार सत्ता में लौटी। 21.35 22 विधायक भाजपा में

कमलनाथ सरकार गिरने के अगले दिन 22 बागी कांग्रेस विधायक भाजपा में शामिल हो गए। इससे स्पष्ट हो गया कि यह केवल सरकार विरोधी विधायक विद्रोह नहीं था। यह व्यापक राजनीतिक पुनर्संरेखण था—

सिंधिया + समर्थक विधायक → भाजपा।

21.36 एक व्यक्ति की राजनीतिक पूंजी कितनी बड़ी थी? यहीं ज्योतिरादित्य का मामला सामान्य वंशवादी नेता से अलग होता है। यदि कोई नेता पार्टी छोड़ता है और उसके साथ— 22 विधायक, कई मंत्री, एक क्षेत्रीय संगठनात्मक नेटवर्क और बड़ी संख्या में कार्यकर्ता स्थानांतरित हो जाते हैं, तो उसके पास व्यक्तिगत राजनीतिक पूंजी वास्तविक है। 2020 ने सिद्ध किया कि सिंधिया केवल पिता की सीट के उत्तराधिकारी नहीं रह गए थे। वे स्वयं एक राजनीतिक शक्ति-केंद्र बन चुके थे। 21.37 उपचुनाव — लोकतांत्रिक परीक्षण इस्तीफा देने वाले विधायकों को बाद में उपचुनाव का सामना करना पड़ा। कुछ जीते। कुछ हारे।

इसलिए 2020 का राजनीतिक परिवर्तन केवल विधायी अंकगणित पर समाप्त नहीं हुआ; उसके बाद मतदाताओं ने भी अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में उन नेताओं का मूल्यांकन किया। यही लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण सुधारात्मक पक्ष है। 21.38 राज्यसभा और केंद्रीय मंत्रिमंडल भाजपा में शामिल होने के बाद ज्योतिरादित्य राज्यसभा पहुंचे। 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया। उन्हें—

नागरिक उड्डयन मंत्रालय

दिया गया। यह मंत्रालय उनके पिता माधवराव सिंधिया भी संभाल चुके थे। इसमें वंशवादी राजनीति का एक रोचक प्रतीकात्मक संयोग दिखाई दिया—

पिता और पुत्र, अलग समय पर, एक ही केंद्रीय मंत्रालय से जुड़े।

21.39 बाद की जिम्मेदारियां ज्योतिरादित्य को बाद में इस्पात मंत्रालय की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी मिली। 2024 के बाद उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में—

संचार मंत्रालय

पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय

की जिम्मेदारी मिली। इस प्रकार भाजपा में उनका प्रवेश केवल राज्यसभा सदस्यता तक सीमित नहीं रहा। वे पार्टी और सरकार के राष्ट्रीय नेतृत्व ढांचे का हिस्सा बन गए। 21.40 2024 — गुना वापसी 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा ने ज्योतिरादित्य को फिर गुना से मैदान में उतारा। 2019 में जिस सीट पर वे कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में हार गए थे, पांच वर्ष बाद उसी क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार के रूप में लौटे। और इस बार उन्होंने बड़ी जीत दर्ज की। यह राजनीतिक रूपांतरण अपने आप में उल्लेखनीय था—

2019 — कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में पराजय।

2024 — भाजपा उम्मीदवार के रूप में बड़ी वापसी।

21.41 क्या इससे सिद्ध हुआ कि वोट सिंधिया का था या पार्टी का? सीधा उत्तर संभव नहीं है। 2024 में ज्योतिरादित्य के पास दो शक्तियां एक साथ थीं—

सिंधिया परिवार का पुराना क्षेत्रीय आधार

भाजपा का शक्तिशाली संगठन तथा नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय राजनीतिक अपील।

इसलिए जीत को केवल ‘राजघराने’ या केवल ‘भाजपा’ के खाते में डालना विश्लेषण को कमजोर करेगा। यह दोनों राजनीतिक पूंजियों का संयोजन था। 21.42 अब वसुंधरा राजे की शाखा सिंधिया परिवार का राजनीतिक विस्तार केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं रहा। विजयाराजे की पुत्री—

वसुंधरा राजे

राजस्थान की राजनीति में चली गईं। विवाह के कारण उनका संबंध धौलपुर राजघराने से भी जुड़ा। इस प्रकार उनके पास दो राजपरंपराओं की सामाजिक प्रतिष्ठा का संगम था—

ग्वालियर सिंधिया परिवार + धौलपुर राजघराना।

21.43 भाजपा में वसुंधरा का उदय वसुंधरा राजे ने अपनी मां की राजनीतिक धारा अपनाई—

भाजपा।

वे लोकसभा सदस्य बनीं। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री रहीं। फिर राजस्थान भाजपा की राज्य राजनीति में भेजी गईं। 2003 में भाजपा ने उनके नेतृत्व में विधानसभा चुनाव लड़ा। पार्टी को बड़ी जीत मिली। और वसुंधरा बनीं—

राजस्थान की पहली महिला मुख्यमंत्री।

21.44 दो बार मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने दो अलग अवधियों में राजस्थान का नेतृत्व किया—

2003–2008

2013–2018।

उनके शासन में बुनियादी ढांचा, निवेश, सामाजिक योजनाएं, प्रशासनिक सुधार और शहरीकरण जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। उनके दूसरे कार्यकाल में मुख्यमंत्री जन आवास योजना जैसी नीतियां भी लागू हुईं; राजस्थान सरकार के आधिकारिक दस्तावेजों में 2015 की इस आवास नीति का विवरण उपलब्ध है। इसलिए वसुंधरा को केवल विजयाराजे की पुत्री कहकर समझना संभव नहीं। वे स्वयं दो बार मुख्यमंत्री बनीं और राजस्थान भाजपा की स्वतंत्र शक्ति-केंद्र रहीं। 21.45 वसुंधरा — वंशवादी प्रवेश, स्वतंत्र सत्ता हमारी कसौटी पर उनका वर्गीकरण होगा—

राजघराने और स्थापित राजनीतिक परिवार का स्पष्ट लाभ।

लेकिन आगे— कई लोकसभा चुनाव, केंद्रीय मंत्री पद, राजस्थान भाजपा का नेतृत्व, दो बार मुख्यमंत्री उनकी स्वतंत्र राजनीतिक उपलब्धियां हैं। इसलिए—

वंशवादी प्रवेश + अत्यंत मजबूत स्वतंत्र राजनीतिक निर्माण।

21.46 यशोधरा राजे सिंधिया विजयाराजे की दूसरी पुत्री—

यशोधरा राजे सिंधिया

ने भी भाजपा की राजनीति अपनाई। वे शिवपुरी से विधानसभा और लोकसभा दोनों पहुंचीं तथा मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री रहीं। मध्य प्रदेश विधानसभा के आधिकारिक परिचय में उनके 1998, 2003, 2013 और 2018 में विधायक चुने जाने, 2007 और 2009 में लोकसभा सदस्य बनने तथा विभिन्न मंत्री पदों का विवरण दर्ज है। इससे परिवार की राजनीतिक उपस्थिति और विस्तृत हो गई। 21.47 एक मां, तीन अलग राजनीतिक यात्राएं विजयाराजे के बच्चों की राजनीति देखें—

माधवराव — कांग्रेस।

वसुंधरा — भाजपा।

यशोधरा — भाजपा।

फिर माधवराव के पुत्र—

ज्योतिरादित्य — कांग्रेस → भाजपा।

इसलिए यह परिवार विचारधारात्मक रूप से एकरेखीय वंश नहीं है। इसमें परिवार की पहचान स्थायी रही, लेकिन पार्टी निष्ठा बदलती रही। 21.48 अगली पीढ़ी — दुष्यंत सिंह वसुंधरा राजे के पुत्र—

दुष्यंत सिंह

भी राजनीति में आए। वे राजस्थान की झालावाड़–बारां लोकसभा सीट से भाजपा के सांसद बने और लगातार चुनाव जीतते रहे। इससे सिंधिया–राजे राजनीतिक वंश एक और पीढ़ी आगे बढ़ा। यहां फिर वही पैटर्न दिखाई देता है— मां का स्थापित निर्वाचन क्षेत्र और संगठनात्मक नेटवर्क अगली पीढ़ी के लिए प्रवेश का मजबूत मंच बनता है। 21.49 सिंधिया परिवार कितनी पीढ़ियों तक फैला? राजकीय और लोकतांत्रिक दोनों क्रम जोड़ें तो तस्वीर बहुत लंबी है— जीवाजीराव सिंधियाविजयाराजे सिंधियामाधवराव / वसुंधरा / यशोधराज्योतिरादित्य / दुष्यंत सिंह ↓ और अब अगली पीढ़ी भी सार्वजनिक जीवन में दिखाई देने लगी है। यह भारत के सबसे दीर्घकालिक elite-family continuities में से एक है।

21.50 राजघराना और राजनीतिक वंश में अंतर दोनों अवधारणाओं को मिलाना नहीं चाहिए। राजघराना सत्ता की पूर्व-लोकतांत्रिक वंशानुगत संस्था है। राजनीतिक वंश लोकतंत्र में परिवार के सदस्यों द्वारा चुनाव, दल और सार्वजनिक पदों के माध्यम से राजनीतिक पूंजी का पीढ़ीगत हस्तांतरण है। सिंधिया परिवार में दोनों क्रम लगातार जुड़े हुए दिखाई देते हैं। यही इसे असाधारण बनाता है। 21.51 1971 — प्रिवी पर्स का अंत संविधान के 26वें संशोधन द्वारा 1971 में पूर्व रियासतों के शासकों की आधिकारिक मान्यता और प्रिवी पर्स समाप्त कर दिए गए। कानूनी रूप से— राजा, महाराजा, महारानी जैसी संवैधानिक मान्यताएं समाप्त हो गईं। लेकिन सामाजिक भाषा में— ‘महाराज’, ‘राजमाता’, ‘श्रीमंत’

जैसे संबोधन कई क्षेत्रों में चलते रहे। यह लोकतंत्र और सामंती सामाजिक स्मृति के बीच रोचक अंतर्विरोध है। 21.52 क्या मतदाता ‘महाराज’ को वोट देता है? इस प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है। सिंधिया परिवार के प्रभाव वाले क्षेत्रों में राजघराने की ऐतिहासिक प्रतिष्ठा निश्चित रूप से राजनीतिक पूंजी रही। लेकिन यदि केवल राजपरिवार होना पर्याप्त होता तो— ज्योतिरादित्य 2019 में नहीं हारते। और परिवार के सभी उम्मीदवार हमेशा नहीं जीतते। इसलिए राजकीय स्मृति—

राजनीतिक लाभ है, चुनावी गारंटी नहीं।

21.53 परिवार की सबसे बड़ी शक्ति — क्षेत्रीय नेटवर्क सिंधिया प्रभाव को केवल महल या उपाधि से समझना गलत होगा। दशकों में विकसित हुआ— कार्यकर्ता नेटवर्क, स्थानीय समर्थक परिवार, सामाजिक संस्थाएं, शिक्षण संस्थान, व्यक्तिगत संपर्क, ग्वालियर–चंबल की राजनीतिक स्मृति अधिक महत्वपूर्ण हैं। 2020 में 22 विधायकों में से बड़ी संख्या का सिंधिया के साथ जाना इस नेटवर्क की वास्तविक राजनीतिक शक्ति दिखाता है। 21.54 वंशवाद की एक अलग श्रेणी हमारे शोध में सिंधिया परिवार को सामान्य राजनीतिक परिवारों से अलग श्रेणी में रखना उपयोगी होगा—

पूर्व-लोकतांत्रिक अभिजात पूंजी का लोकतांत्रिक रूपांतरण।

अर्थात राजनीतिक पूंजी का स्रोत केवल पूर्व सांसद या मुख्यमंत्री पिता नहीं है। उसकी जड़ें लोकतंत्र से भी पहले जाती हैं। यह विशिष्टता सिंधिया, पटियाला, कश्मीर के कुछ राजपरिवारों और राजस्थान के अनेक पूर्व शाही परिवारों में दिखाई देती है। 21.55 क्या विजयाराजे वंशवादी नेता थीं? यह एक सूक्ष्म प्रश्न है। वे राजघराने के कारण असाधारण सामाजिक प्रतिष्ठा लेकर राजनीति में आईं। इस अर्थ में उनका प्रवेश समान अवसर वाले सामान्य नागरिक जैसा नहीं था। लेकिन उनके पहले परिवार में आधुनिक लोकतांत्रिक चुनावी संगठन नहीं था। उन्होंने स्वयं— चुनाव लड़े, कांग्रेस छोड़ी, जनसंघ बनाया, जेल गईं, भाजपा संगठन खड़ा किया। इसलिए उन्हें केवल ‘वंशवादी राजनेता’ कहना अधूरा होगा। सटीक वर्गीकरण है—

राजकीय विशेषाधिकार से लोकतांत्रिक राजनीति में प्रवेश, फिर स्वतंत्र राजनीतिक निर्माण।

21.56 माधवराव की कसौटी माधवराव को निश्चित रूप से विशाल पारिवारिक लाभ मिला। लेकिन उन्होंने मां से अलग पार्टी चुनी। स्वतंत्र चुनावी आधार बनाया। केंद्रीय मंत्री बने। कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व तक पहुंचे। यह महत्वपूर्ण है। वंशवादी लाभ और राजनीतिक योग्यता परस्पर विरोधी अवधारणाएं नहीं हैं। कोई व्यक्ति—

विशेषाधिकार प्राप्त प्रवेश भी कर सकता है और बाद में सक्षम नेता भी सिद्ध हो सकता है।

सिंधिया परिवार इसका अच्छा उदाहरण है। 21.57 ज्योतिरादित्य की कसौटी ज्योतिरादित्य का प्रवेश सबसे स्पष्ट रूप से वंशवादी था— पिता की मृत्यु, पिता की सीट, पिता का नेटवर्क, कांग्रेस टिकट। लेकिन 2020 तक उन्होंने स्वयं इतना बड़ा राजनीतिक नेटवर्क बना लिया था कि उनके साथ 22 विधायक सत्ता समीकरण बदलने को तैयार थे। इसलिए उनका विकास इस प्रकार पढ़ा जा सकता है—

वंशवादी प्रवेश → स्वतंत्र शक्ति-केंद्र।

21.58 2020 — वंशवाद या गुटीय राजनीति? यह महत्वपूर्ण इतिहासलेखन प्रश्न है। एक व्याख्या कहती है— सिंधिया अपने परिवार की प्रतिष्ठा के कारण कांग्रेस में अपेक्षा से अधिक महत्व चाहते थे। दूसरी व्याख्या— कांग्रेस ने एक प्रभावशाली युवा नेता और उसके क्षेत्रीय आधार को पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं दिया। तीसरी— भाजपा ने अवसर पहचानकर कांग्रेस के भीतर मौजूद गुटीय असंतोष को सत्ता परिवर्तन में बदल दिया। वास्तविक इतिहास में इन तीनों तत्वों का कुछ न कुछ योगदान दिखाई देता है। 21.59 क्या कमलनाथ सरकार ‘गिराई’ गई या ‘बहुमत खो बैठी’? भाषा यहां महत्वपूर्ण है। राजनीतिक रूप से कांग्रेस कहती है कि भाजपा ने उसकी सरकार गिराई।

भाजपा कहती है कि कांग्रेस अपने ही नेताओं और विधायकों का विश्वास खो बैठी। संवैधानिक तथ्य यह है— 22 कांग्रेस विधायकों ने इस्तीफा दिया, विधानसभा का प्रभावी संख्याबल बदला, सुप्रीम कोर्ट ने फ्लोर टेस्ट का रास्ता साफ किया, और कमलनाथ ने मतदान से पहले इस्तीफा दे दिया। यही शोध के लिए सबसे सुरक्षित तथ्यात्मक प्रस्तुति है। 21.60 भाजपा के लिए सिंधिया का महत्व सिंधिया के आने से भाजपा को केवल एक केंद्रीय नेता नहीं मिला। उसे मिला— ग्वालियर–चंबल में प्रभाव, कांग्रेस के अनेक विधायक, एक ऐतिहासिक राजनीतिक परिवार, और मध्य प्रदेश में तत्काल सत्ता वापसी का रास्ता। इसलिए 2020 का सिंधिया प्रवेश आधुनिक भाजपा इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण विपक्षी-दल से हुए राजनीतिक अधिग्रहणों में गिना जा सकता है।

21.61 सिंधिया के लिए भाजपा का महत्व दूसरी तरफ भाजपा ने ज्योतिरादित्य को— राज्यसभा, केंद्रीय मंत्रिमंडल, राष्ट्रीय संगठनात्मक मंच, और 2024 में लोकसभा वापसी का अवसर दिया। इसलिए यह एकतरफा राजनीतिक समर्पण नहीं था। यह दो राजनीतिक पूंजियों का परस्पर विनिमय था—

भाजपा का संगठन + सिंधिया का क्षेत्रीय नेटवर्क।

21.62 दादी की पार्टी में पौत्र इस पूरे घटनाक्रम का सबसे रोचक ऐतिहासिक प्रतीक यही है। विजयाराजे सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ी और जनसंघ–भाजपा की प्रमुख नेता बनीं। उनका पुत्र माधवराव भाजपा की धारा से अलग होकर कांग्रेस में गया। माधवराव का पुत्र ज्योतिरादित्य लगभग दो दशक कांग्रेस में रहा। और 2020 में—

ज्योतिरादित्य उसी भाजपा में पहुंच गए जिसकी संस्थापक पीढ़ी में उनकी दादी थीं।

इतिहास मानो एक पूरा चक्र काटकर लौट आया। 21.63 लेकिन विचारधारा का प्रश्न समाप्त नहीं होता इस घटनाक्रम पर आलोचना यह हुई कि यदि परिवार की विभिन्न पीढ़ियां आसानी से विपरीत दलों में जा सकती हैं तो क्या राजनीतिक विचारधारा परिवार की तुलना में गौण है? सिंधिया परिवार इसका सरल उत्तर नहीं देता। विजयाराजे की जनसंघ राजनीति स्पष्ट वैचारिक प्रतिबद्धता वाली थी। माधवराव की कांग्रेस राजनीति भी लंबी और स्थायी रही। ज्योतिरादित्य ने 18 वर्ष कांग्रेस में बिताए और फिर भाजपा में गए। इसलिए हर पीढ़ी को अलग संदर्भ में पढ़ना होगा। 21.64 इतिहासलेखन — पहला दृष्टिकोण : राजसत्ता का लोकतांत्रिक अनुकूलन

पहली व्याख्या कहती है कि सिंधिया परिवार ने भारतीय लोकतंत्र को स्वीकार किया और स्वयं को उसके नियमों के अनुसार ढाला। वे अब शासन जन्मसिद्ध अधिकार से नहीं करते। चुनाव लड़ना, पार्टी टिकट लेना, मतदाताओं से वोट मांगना, हार स्वीकार करना पड़ता है। इस दृष्टिकोण से यह लोकतंत्र की सफलता है—

राजा भी नागरिक-राजनेता बन गया।

21.65 दूसरा दृष्टिकोण : सामंती पूंजी का संरक्षण आलोचनात्मक व्याख्या कहती है— राजशाही कानूनी रूप से समाप्त हुई लेकिन— संपत्ति, सामाजिक प्रतिष्ठा, नाम, नेटवर्क, ‘महाराज’ संस्कृति, और स्थानीय प्रभाव लोकतांत्रिक राजनीति में हस्तांतरित हो गए। अर्थात औपचारिक सत्ता समाप्त हुई, लेकिन elite advantage बचा रहा। इस दृष्टिकोण से सिंधिया परिवार लोकतंत्र के भीतर पुराने सामाजिक विशेषाधिकार की निरंतरता है। 21.66 तीसरा दृष्टिकोण : मतदाता की स्वायत्तता इसके विपरीत चुनाव परिणाम दिखाते हैं कि मतदाता राजघराने के आदेश से नहीं चलता। ज्योतिरादित्य 2019 में गुना से हार गए। राजघराने का नाम उन्हें पराजय से नहीं बचा सका। इसलिए आधुनिक सिंधिया राजनीति को सामंती नियंत्रण कहना भी अतिशयोक्ति होगी।

मतदाता प्रभावित हो सकता है; बंधा हुआ नहीं है।

21.67 चौथा दृष्टिकोण : परिवार पार्टी से बड़ा सिंधिया परिवार का राजनीतिक इतिहास पार्टी-सीमाओं को पार करता है। एक समय— मां भाजपा में, पुत्र कांग्रेस में, बेटियां भाजपा में, पौत्र कांग्रेस में। फिर पौत्र भाजपा में। इससे वही प्रश्न उठता है जो हरियाणा के राजनीतिक परिवारों में दिखा था—

क्या राजनीतिक परिवार कभी-कभी पार्टी से अधिक स्थायी संस्था बन जाता है?

सिंधिया उदाहरण में उत्तर काफी हद तक हां है। 21.68 पांचवां दृष्टिकोण : महिलाएं केवल सहायक पात्र नहीं इस वंश में महिलाओं की भूमिका केंद्रीय है। विजयाराजे स्वयं राष्ट्रीय नेता थीं। वसुंधरा दो बार मुख्यमंत्री बनीं। यशोधरा कई बार विधायक, सांसद और मंत्री रहीं। इसलिए यह ऐसा वंश नहीं जिसमें राजनीतिक सत्ता केवल पिता से पुत्र को गई। कई चरणों में परिवार की महिला शाखाएं पुरुष शाखा से अधिक शक्तिशाली रहीं। 21.69 छठा दृष्टिकोण : वंशवाद और क्षमता साथ-साथ सिंधिया परिवार वंशवाद पर होने वाली बहस की एक महत्वपूर्ण जटिलता सामने लाता है। वंशवाद की आलोचना यह नहीं कहती कि राजनीतिक परिवार से आने वाला प्रत्येक व्यक्ति अयोग्य होता है। वास्तविक प्रश्न है—

क्या उसे प्रवेश और अवसर दूसरों की तुलना में असमान रूप से आसान मिला?

माधवराव, वसुंधरा, ज्योतिरादित्य सभी को पारिवारिक लाभ मिला। लेकिन सभी ने बाद में स्वतंत्र चुनावी और प्रशासनिक रिकॉर्ड भी बनाया। दोनों तथ्य एक साथ सही हो सकते हैं। 21.70 प्रमुख दस्तावेज सिंधिया परिवार के गंभीर अध्ययन के लिए निम्न दस्तावेज महत्वपूर्ण हैं—

ग्वालियर रियासत के विलय संबंधी Instrument of Accession और Covenant।

मध्य भारत राज्य गठन संबंधी दस्तावेज।

संविधान का 26वां संशोधन, 1971, जिसने पूर्व शासकों की मान्यता और प्रिवी पर्स समाप्त किए। 1957 और 1962 लोकसभा चुनावों के निर्वाचन आयोग रिकॉर्ड, जिनसे विजयाराजे की प्रारंभिक कांग्रेस राजनीति समझी जा सकती है।

1967 मध्य प्रदेश राजनीतिक संकट और कांग्रेस विभाजन से संबंधित विधानसभा रिकॉर्ड।

जनसंघ और भाजपा के संगठनात्मक दस्तावेज, जिनमें विजयाराजे की भूमिका का अध्ययन किया जा सकता है।

आपातकाल के गिरफ्तारी अभिलेख।

माधवराव सिंधिया के संसदीय और केंद्रीय मंत्रिमंडलीय रिकॉर्ड।

1996 मध्य प्रदेश विकास कांग्रेस संबंधी निर्वाचन दस्तावेज।

2002 गुना उपचुनाव परिणाम।

2004–2014 गुना लोकसभा परिणाम।

2018 मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव परिणाम।

और विशेष रूप से— ज्योतिरादित्य सिंधिया का 9 मार्च 2020 का कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को इस्तीफा-पत्र, जिसे उन्होंने 10 मार्च को सार्वजनिक किया। इसके बाद— 22 कांग्रेस विधायकों के इस्तीफे,

मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष की कार्यवाही,

सुप्रीम कोर्ट की फ्लोर टेस्ट संबंधी कार्यवाही, 20 मार्च 2020 कमलनाथ इस्तीफा,

22 पूर्व कांग्रेस विधायकों का भाजपा प्रवेश

2020 के सत्ता परिवर्तन के सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिक/समकालीन स्रोत हैं। 21.71 प्रमुख पात्र इस पूरे राजनीतिक वंश को समझने के लिए मुख्य पात्रों को अलग-अलग भूमिकाओं में रखना उपयोगी है— | व्यक्ति | राजनीतिक पहचान | प्रमुख दल | |---|---|---| | जीवाजीराव सिंधिया | ग्वालियर के अंतिम शासक | — | | विजयाराजे सिंधिया | राजमाता, जनसंघ/भाजपा नेता | कांग्रेस → जनसंघ → भाजपा | | माधवराव सिंधिया | केंद्रीय मंत्री, कांग्रेस नेता | जनसंघ पृष्ठभूमि → कांग्रेस | | वसुंधरा राजे | दो बार राजस्थान मुख्यमंत्री | भाजपा | | यशोधरा राजे | सांसद/मध्य प्रदेश मंत्री | भाजपा | | ज्योतिरादित्य सिंधिया | केंद्रीय मंत्री | कांग्रेस → भाजपा | | दुष्यंत सिंह | लोकसभा सांसद | भाजपा |

इस तालिका से परिवार का सबसे असाधारण गुण तुरंत स्पष्ट हो जाता है—

वंश एक, राजनीतिक रास्ते अनेक।

21.72 राजनीतिक पूंजी की चार परतें सिंधिया परिवार की शक्ति को चार स्तरों पर समझना चाहिए।

पहली — ऐतिहासिक पूंजी

ग्वालियर राजघराना।

दूसरी — सामाजिक पूंजी

क्षेत्र में परिवार की दीर्घकालीन प्रतिष्ठा और नेटवर्क।

तीसरी — लोकतांत्रिक पूंजी

विजयाराजे, माधवराव और बाद की पीढ़ियों द्वारा लगातार जीते गए चुनाव।

चौथी — संगठनात्मक पूंजी

कांग्रेस और भाजपा दोनों में अलग-अलग पीढ़ियों द्वारा बनाया गया पार्टी नेटवर्क। इन्हीं चारों का संयोजन परिवार को दीर्घजीवी बनाता है। 21.73 क्या इसे केवल ‘राजघराने की राजनीति’ कहना उचित है? नहीं। यदि ऐसा होता तो स्वतंत्रता के बाद भारत के सैकड़ों पूर्व राजघराने समान राजनीतिक शक्ति बनाए रखते। ऐसा नहीं हुआ। अनेक राजपरिवार राजनीति से लगभग गायब हो गए। सिंधिया परिवार इसलिए बचा क्योंकि उसकी अलग-अलग पीढ़ियों ने— संगठन बनाए, हार झेली, दल बदले, मंत्री पद संभाले और नए राजनीतिक वातावरण के अनुरूप स्वयं को ढाला। इसलिए राजकीय विरासत प्रारंभिक पूंजी थी; राजनीतिक निरंतरता के लिए लोकतांत्रिक अनुकूलन भी आवश्यक था। 21.74 वंशवाद की लोकतांत्रिक सीमा

सिंधिया परिवार का इतिहास एक महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित करता है। राजघराने का नाम— टिकट दिला सकता है। मीडिया का ध्यान दिला सकता है। कार्यकर्ताओं का प्रारंभिक नेटवर्क दे सकता है। मतदाताओं में पहचान पैदा कर सकता है। लेकिन—

2019 का गुना परिणाम बताता है कि वह हार रोक नहीं सकता।

यानी लोकतंत्र पुराने विशेषाधिकार को समाप्त भले न करे, उसे चुनावी परीक्षा के अधीन अवश्य कर देता है। 21.75 अंतिम मूल्यांकन सिंधिया परिवार भारतीय राजनीतिक वंशवाद का शायद सबसे विशिष्ट उदाहरण है क्योंकि यहां राजनीतिक विरासत की शुरुआत लोकतंत्र से पहले होती है। इसका पहला चरण था—

राजशाही।

दूसरा—

राजघराने का लोकतंत्र में प्रवेश।

तीसरा—

विजयाराजे द्वारा स्वतंत्र जनसंघ–भाजपा राजनीतिक पूंजी का निर्माण।

चौथा—

माधवराव द्वारा उसी परिवार की कांग्रेस राजनीति का निर्माण।

पांचवां—

वसुंधरा और यशोधरा द्वारा भाजपा में स्वतंत्र सत्ता-केंद्र बनना।

छठा—

ज्योतिरादित्य का पिता की सीट से कांग्रेस में प्रवेश और राष्ट्रीय नेता बनना।

और सातवां—

2020 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाना तथा अपने साथ 22 विधायकों के इस्तीफों के माध्यम से मध्य प्रदेश की सत्ता का समीकरण बदल देना।

इस पूरे इतिहास को केवल ‘महाराजा की राजनीति’ कह देना उतना ही गलत होगा जितना परिवार की असाधारण प्रारंभिक राजनीतिक पूंजी को नकार देना। विजयाराजे को राजघराने की प्रतिष्ठा मिली, लेकिन उन्होंने दशकों तक संगठनात्मक राजनीति की। माधवराव को परिवार का नाम मिला, लेकिन उन्होंने मां से अलग राजनीतिक रास्ता बनाकर राष्ट्रीय पहचान हासिल की। वसुंधरा को वंशगत लाभ मिला, लेकिन राजस्थान जैसे बड़े राज्य में दो बार मुख्यमंत्री बनने के लिए उन्हें स्वतंत्र राजनीतिक संगठन और जनाधार बनाना पड़ा। ज्योतिरादित्य को पिता की सीट और नेटवर्क मिला, लेकिन 2020 तक उनके पास अपना इतना मजबूत गुट था कि 22 विधायकों का इस्तीफा मध्य प्रदेश की सरकार बदलने में निर्णायक बन गया। इसलिए सिंधिया वंश का राजनीतिक सूत्र है—

राजसत्ता → भारतीय संघ में विलय → राजमाता का लोकतांत्रिक प्रवेश → जनसंघ बनाम कांग्रेस में पारिवारिक विभाजन → पुत्र और पुत्रियों के स्वतंत्र सत्ता-केंद्र → तीसरी राजनीतिक पीढ़ी → कांग्रेस से भाजपा का पुनर्संरेखण → राजकीय स्मृति और आधुनिक पार्टी संगठन का सम्मिश्रण।

और इससे भारतीय वंशवाद पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है—

लोकतंत्र पुराने अभिजात वर्ग की सामाजिक पूंजी को स्वतः नष्ट नहीं करता; वह उसे नए नियमों के अधीन कर देता है। वंश नाम और नेटवर्क दे सकता है, लेकिन हर पीढ़ी को अंततः चुनाव, संगठन और जनस्वीकृति की परीक्षा देनी पड़ती है।

सिंधिया परिवार ने राजसत्ता खो दी। लेकिन राजनीतिक प्रभाव नहीं। उस प्रभाव को बनाए रखने के लिए उसने स्वयं को बार-बार बदला—

महाराजा से सांसद, राजमाता से पार्टी नेता, राजकुमार से केंद्रीय मंत्री, और राजपरिवार से आधुनिक चुनावी राजनीतिक वंश तक।

यही सिंधिया परिवार को भारत के राजनीतिक वंशों में एक अलग श्रेणी में रखता है।