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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–020 · अध्याय 17

चौधरी देवीलाल से ओमप्रकाश चौटाला, अजय–अभय और दुष्यंत चौटाला तक — हरियाणा की किसान राजनीति और चार पीढ़ियों का राजनीतिक वंश

भारतीय राजनीतिक वंशों में चौधरी देवीलाल–चौटाला परिवार का मामला विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यह केवल पिता से पुत्र और फिर पौत्र को चुनावी सीट मिलने की कहानी नहीं है। यहां एक ऐसे किसान नेता की राजनीतिक पूंजी दिखाई देती है, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन से शुरुआत की, संयुक्त पंजाब की राजनीति देखी, अलग हरियाणा के निर्माण के संघर्ष में भूमिका निभाई, दो बार मुख्यमंत्री बना और अंततः देश का उपप्रधानमंत्री बना। फिर उसी राजनीतिक विरासत पर परिवार की अगली तीन पीढ़ियां खड़ी हुईं। लेकिन इस वंश की कहानी सीधी रेखा में नहीं चलती। पहली पीढ़ी में देवीलाल ने राजनीतिक पूंजी अर्जित की।

दूसरी पीढ़ी में ओमप्रकाश चौटाला को उसका बड़ा हिस्सा विरासत में मिला, लेकिन उन्होंने अपनी स्वतंत्र सत्ता भी बनाई। तीसरी पीढ़ी में उत्तराधिकार दो शाखाओं में बंट गया— अजय सिंह चौटाला और अभय सिंह चौटाला। फिर चौथी पीढ़ी में अजय के पुत्र दुष्यंत चौटाला और दिग्विजय चौटाला, तथा अभय के पुत्र अर्जुन चौटाला सक्रिय राजनीति में आए। सबसे दिलचस्प यह है कि अंततः परिवार की राजनीतिक लड़ाई विरोधी दलों से अधिक परिवार के भीतर देवीलाल की विरासत पर अधिकार की लड़ाई बन गई। वंश-वृक्ष को सरल रूप में देखें— चौधरी देवीलालओमप्रकाश चौटालाअजय चौटाला — अभय चौटालादुष्यंत–दिग्विजय / अर्जुन और 2018 के बाद राजनीतिक वंश दो संगठनों में विभाजित हो गया—

INLD — अभय चौटाला की धारा

और

JJP — अजय–दुष्यंत चौटाला की धारा।

इसलिए इस अध्याय का केंद्रीय प्रश्न है—

जिस विशाल किसान राजनीति को देवीलाल ने स्वयं बनाया था, वह चार पीढ़ियों में आते-आते विचारधारा से अधिक पारिवारिक विरासत और फिर पारिवारिक प्रतिस्पर्धा में कैसे बदल गई?

18.1 शुरुआत — राजनीतिक विरासत नहीं, स्वतंत्रता आंदोलन

चौधरी देवीलाल का जन्म 25 सितंबर 1914 को तत्कालीन पंजाब के सिरसा क्षेत्र के तेजाखेड़ा में हुआ माना जाता है। जन्म-वर्ष को लेकर कुछ सरकारी/अन्य स्रोतों में 1914 और 1915 दोनों मिलते हैं; इसलिए शोध में इस विसंगति का उल्लेख आवश्यक है। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के डिजिटल अभिलेख के अनुसार वे गांधी से प्रभावित होकर स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए। 1930 में उन्हें एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा हुई। वे 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी गिरफ्तार हुए और लगभग दो वर्ष जेल में रहे। इसलिए देवीलाल का राजनीतिक प्रवेश किसी परिवार द्वारा उपलब्ध कराए गए टिकट या पद से नहीं हुआ। उनकी पहली राजनीतिक पूंजी थी—

आंदोलन, जेल और ग्रामीण समाज।

18.2 संयुक्त पंजाब की राजनीति आज का हरियाणा 1966 तक पंजाब का हिस्सा था। स्वतंत्रता के बाद देवीलाल संयुक्त पंजाब की राजनीति में सक्रिय हुए और 1952 में विधानसभा पहुंचे। आगे वे किसान और हिंदीभाषी हरियाणा क्षेत्र के महत्वपूर्ण नेताओं में विकसित हुए। यह वह दौर था जब हरियाणा की अलग राज्य की मांग धीरे-धीरे मजबूत हो रही थी। देवीलाल की राजनीतिक पहचान भी इसी क्षेत्रीय चेतना से जुड़ती गई। 18.3 अलग हरियाणा का प्रश्न 1 नवंबर 1966 को पंजाब के पुनर्गठन के बाद हरियाणा अलग राज्य बना। इस प्रक्रिया को किसी एक नेता की उपलब्धि मानना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा। अलग हरियाणा की मांग में विभिन्न नेताओं, संगठनों और सामाजिक धाराओं की भूमिका थी।

लेकिन देवीलाल उन प्रमुख नेताओं में थे जिन्होंने अलग हरियाणा की राजनीतिक मांग का समर्थन किया और बाद में नए राज्य की राजनीति के केंद्रीय व्यक्तित्व बने। यहीं से उनकी राजनीति तीन स्तंभों पर विकसित हुई—

हरियाणा की क्षेत्रीय अस्मिता, ग्रामीण समाज, किसान हित।

18.4 देवीलाल की किसान राजनीति देवीलाल की राजनीति को समझने के लिए उनकी तुलना पिछले अध्याय के चौधरी चरण सिंह से करना उपयोगी है। दोनों किसान नेता थे। लेकिन शैली अलग थी।

चरण सिंह — किसान राजनीति के बड़े वैचारिक लेखक और नीति-विचारक।

देवीलाल — किसान राजनीति के असाधारण जन-संगठक।

देवीलाल की शक्ति लंबी आर्थिक पुस्तकों से अधिक— चौपाल, गांव, पदयात्रा, किसान सभा, जनसभा और सीधे ग्रामीण संवाद से आती थी। इसीने उन्हें हरियाणा में लोकप्रिय संबोधन दिया—

'ताऊ देवीलाल'।

18.5 कांग्रेस से दूरी देवीलाल ने अपना शुरुआती राजनीतिक जीवन कांग्रेस के साथ बिताया। लेकिन समय के साथ कांग्रेस नेतृत्व से उनके मतभेद बढ़े। हरियाणा बनने के बाद राज्य की कांग्रेस राजनीति में— बंसीलाल, भगवत दयाल शर्मा, भजनलाल जैसे मजबूत नेता उभरे। देवीलाल ने अंततः अपनी पहचान गैर-कांग्रेसी किसान राजनीति में बनाई। 18.6 आपातकाल — राजनीतिक मोड़ 1975 में इंदिरा गांधी सरकार द्वारा लगाए गए आपातकाल का देवीलाल ने विरोध किया। वे जेल गए। 1977 में आपातकाल समाप्त होने के बाद देश में कांग्रेस-विरोधी लहर चली। जनता पार्टी सत्ता में आई। हरियाणा में भी सत्ता परिवर्तन हुआ। और पहली बार—

देवीलाल मुख्यमंत्री बने।

उनका पहला मुख्यमंत्री कार्यकाल 1977–79 रहा। 18.7 मुख्यमंत्री और किसान कल्याण देवीलाल ने अपनी राजनीति में ग्रामीण मतदाता को सीधे लाभ पहुंचाने वाली योजनाओं पर जोर दिया। किसान ऋण, ग्रामीण कल्याण, वृद्धावस्था सहायता और छोटे किसानों के प्रश्न उनकी राजनीति के प्रमुख हिस्से बने। बाद में उनके दूसरे मुख्यमंत्री कार्यकाल में वृद्धावस्था पेंशन जैसी योजनाओं ने उनकी 'ताऊ' छवि को और मजबूत किया। यह केवल कल्याणकारी नीति नहीं थी। इसने एक नया राजनीतिक मॉडल विकसित किया—

ग्रामीण सामाजिक सुरक्षा + किसान राजनीति + व्यक्तिगत जननेता।

18.8 पहली सरकार का अंत जनता पार्टी स्वयं अनेक राजनीतिक धाराओं का गठबंधन थी। हरियाणा में भी आंतरिक सत्ता संघर्ष हुआ। 1979 में देवीलाल मुख्यमंत्री पद से हटे। उनके बाद भजनलाल सत्ता के केंद्र में आए। 1980 के दशक में हरियाणा की राजनीति मुख्यतः तीन बड़े व्यक्तित्वों के आसपास घूमने लगी—

देवीलाल, बंसीलाल, भजनलाल।

तीनों अलग-अलग राजनीतिक शैली का प्रतिनिधित्व करते थे। 18.9 न्याय युद्ध 1980 के दशक के मध्य में देवीलाल ने हरियाणा में कांग्रेस सरकार के विरुद्ध व्यापक अभियान चलाया जिसे—

'न्याय युद्ध'

कहा गया। NCERT की लोकतांत्रिक राजनीति संबंधी सामग्री भी 1987 के हरियाणा चुनाव को समझाते हुए न्याय युद्ध और किसान–छोटे व्यापारियों के ऋण माफ करने के देवीलाल के वादे को प्रमुख कारणों में रखती है। इस आंदोलन ने उन्हें फिर हरियाणा के सबसे बड़े विपक्षी नेता के रूप में स्थापित कर दिया। 18.10 किसान ऋण माफी का बड़ा वादा 1987 के चुनाव अभियान में देवीलाल ने किसानों और छोटे व्यापारियों के ऋण माफ करने का वादा किया। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सीधा राजनीतिक हस्तक्षेप था। उस समय किसान कर्ज का प्रश्न गंभीर था। देवीलाल ने इसे केवल आर्थिक मुद्दा नहीं रहने दिया। उन्होंने इसे—

राजनीतिक न्याय

के प्रश्न में बदल दिया। यही 'न्याय युद्ध' की चुनावी शक्ति बनी। 18.11 1987 — ऐतिहासिक विजय 1987 हरियाणा विधानसभा चुनाव देवीलाल की राजनीतिक शक्ति का चरम था। लोकदल ने अकेले 60 सीटें जीतीं। भाजपा ने 16 सीटें जीतीं। कांग्रेस केवल 5 सीटों पर सिमट गई। अर्थात 90 सदस्यीय विधानसभा में लोकदल को स्वयं स्पष्ट बहुमत मिला और उसके सहयोगियों के साथ विपक्षी मोर्चे की विजय और बड़ी थी। यह हरियाणा के इतिहास की सबसे प्रभावशाली चुनावी जीतों में है। 18.12 देवीलाल की राजनीति का शिखर 1987 की जीत ने देवीलाल को केवल हरियाणा का मुख्यमंत्री नहीं बनाया। उसने उन्हें राष्ट्रीय विपक्ष का बड़ा नेता बना दिया।

राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस के विरुद्ध राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता विकसित हो रही थी। वी.पी. सिंह उसका नया चेहरा बने। देवीलाल ने अपनी किसान राजनीतिक शक्ति को राष्ट्रीय विपक्ष के साथ जोड़ा। 18.13 1989 — दिल्ली की ओर 1989 लोकसभा चुनाव के बाद जनता दल के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार बनी। वी.पी. सिंह प्रधानमंत्री बने। और देवीलाल—

भारत के उपप्रधानमंत्री।

उन्होंने बाद में चंद्रशेखर सरकार में भी उपप्रधानमंत्री पद संभाला। उनका राष्ट्रीय कार्यकाल 1989–91 की अवधि में फैला था। एक क्षेत्रीय किसान नेता का देश के दूसरे सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पद तक पहुंचना असाधारण उपलब्धि थी। 18.14 और यहीं वंशवाद का निर्णायक मोड़ आया देवीलाल राष्ट्रीय राजनीति में गए तो हरियाणा में उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी के चयन का प्रश्न उठा। लोकदल में अनेक वरिष्ठ नेता थे। लेकिन उत्तराधिकार अंततः परिवार के भीतर गया। देवीलाल के पुत्र—

ओमप्रकाश चौटाला

मुख्यमंत्री बने। यहीं हमारे अध्ययन का पहला स्पष्ट वंशवादी हस्तांतरण दिखाई देता है।

देवीलाल की सत्ता → पुत्र ओमप्रकाश चौटाला।

18.15 ओमप्रकाश को क्या विरासत में मिला? ओमप्रकाश चौटाला को केवल पिता का नाम नहीं मिला। उन्हें मिला— देवीलाल का विशाल ग्रामीण नेटवर्क, किसान वोट बैंक, लोकदल संगठन, हरियाणा में 'ताऊ' की लोकप्रियता, पार्टी कार्यकर्ताओं का स्थापित ढांचा, और सत्ता तक तत्काल पहुंच। इसलिए देवीलाल और ओमप्रकाश की राजनीतिक शुरुआत में मूलभूत अंतर है।

देवीलाल ने राजनीतिक पूंजी बनाई।

ओमप्रकाश ने उसका उत्तराधिकार पाया।

18.16 लेकिन ओमप्रकाश केवल 'पुत्र' बनकर नहीं रहे यह अंतर भी आवश्यक है। वंशवादी प्रवेश के बावजूद ओमप्रकाश चौटाला ने आगे लगभग तीन दशकों तक स्वतंत्र राजनीतिक भूमिका निभाई। वे कई बार हरियाणा के मुख्यमंत्री बने और अंततः 1999–2005 तक स्थिर सरकार भी चलाई। उनके राजनीतिक जीवन का लंबा दौर INLD के निर्माण और हरियाणा में कांग्रेस-विरोधी राजनीति से जुड़ा रहा। इसलिए उनका वर्गीकरण होगा—

वंशवादी उत्तराधिकार + बाद में स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति।

18.17 बार-बार मुख्यमंत्री बनने का अस्थिर दौर 1989 से 1991 के बीच हरियाणा की राजनीति अत्यंत अस्थिर रही। ओमप्रकाश चौटाला अलग-अलग अवधियों में मुख्यमंत्री बने, लेकिन शुरुआती सरकारें बहुत अल्पजीवी रहीं। यही कारण है कि उन्हें आम तौर पर पांच बार मुख्यमंत्री कहा जाता है, हालांकि इन कार्यकालों में कई अत्यंत छोटे थे। यह तथ्य दिखाता है कि पिता की विरासत ने सत्ता तक पहुंच आसान बनाई, लेकिन स्थिर राजनीतिक नियंत्रण तुरंत नहीं मिला। 18.18 देवीलाल से INLD तक 1990 के दशक में देवीलाल की राजनीतिक धारा ने कई संगठनात्मक परिवर्तन देखे। 1996 में हरियाणा लोकदल (राष्ट्रीय) की स्थापना हुई, जो बाद में इंडियन नेशनल लोकदल—INLD के रूप में विकसित हुआ। देवीलाल उसके संस्थापक राजनीतिक प्रतीक थे।

इसके बाद पार्टी की वास्तविक कमान धीरे-धीरे ओमप्रकाश चौटाला के पास आई। अब किसान आंदोलन से निकली राजनीति एक अधिक स्पष्ट—

परिवार-नेतृत्व वाले क्षेत्रीय दल

में बदलने लगी। 18.19 1999 — सत्ता में मजबूत वापसी 1999 में राजनीतिक परिस्थितियों ने ओमप्रकाश चौटाला को फिर मुख्यमंत्री बनाया। 2000 विधानसभा चुनाव में INLD ने मजबूत प्रदर्शन किया और चौटाला ने पूर्ण कार्यकाल की सरकार चलाई। 1999–2005 का दौर उनके राजनीतिक जीवन का सबसे स्थिर सत्ता काल था। यही वह समय है जब चौटाला परिवार की दूसरी और तीसरी पीढ़ी राज्य की राजनीति में व्यापक रूप से स्थापित हुई। 18.20 परिवार का विस्तार ओमप्रकाश चौटाला के दो पुत्र विशेष रूप से सक्रिय हुए— दोनों ने चुनावी राजनीति में प्रवेश किया। अजय संसद और विधानसभा दोनों में पहुंचे। अभय ने राज्य की राजनीति में मजबूत आधार बनाया और विशेष रूप से ऐलनाबाद से अपनी पहचान विकसित की।

हरियाणा विधानसभा के आधिकारिक विवरण में अभय को ओमप्रकाश चौटाला का पुत्र दर्ज किया गया है। अब वंश तीसरी पीढ़ी में प्रवेश कर चुका था। 18.21 क्या पार्टी में परिवार के बाहर नेतृत्व था? हां। INLD में अनेक गैर-परिवार नेता रहे। लेकिन पार्टी की शीर्ष राजनीतिक सत्ता क्रमशः—

देवीलाल → ओमप्रकाश → अजय/अभय

के इर्द-गिर्द केंद्रित होती गई। यही वंशवादी संस्था की महत्वपूर्ण कसौटी है। समस्या यह नहीं कि परिवार के लोग राजनीति में आए। प्रश्न यह है—

क्या शीर्ष नेतृत्व के लिए परिवार से बाहर समान अवसर मौजूद था?

18.22 शिक्षक भर्ती घोटाला — वंश की सबसे बड़ी कानूनी चोट ओमप्रकाश चौटाला के राजनीतिक जीवन का सबसे गंभीर अध्याय JBT शिक्षक भर्ती घोटाला था। मामला हरियाणा में 3,206 जूनियर बेसिक ट्रेंड शिक्षकों की भर्ती से जुड़ा था। अभियोजन के अनुसार भर्ती प्रक्रिया में मेरिट सूचियों में अवैध हस्तक्षेप किया गया। दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय में दर्ज अभियोजन मामले के अनुसार 1999 में शिक्षक भर्ती को हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग से हटाकर प्राथमिक शिक्षा निदेशालय को दिया गया था। 18.23 पिता और पुत्र दोनों दोषी 2013 में ट्रायल कोर्ट ने ओमप्रकाश चौटाला, उनके पुत्र अजय चौटाला और अन्य आरोपियों को दोषी ठहराया। ओमप्रकाश और अजय को दस-दस वर्ष की सजा मिली।

2015 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने उनकी दोषसिद्धि और दस वर्ष की सजा बरकरार रखी। अदालत ने भर्ती प्रक्रिया में भ्रष्टाचार को सार्वजनिक व्यवस्था और योग्य अभ्यर्थियों के अधिकारों पर गंभीर प्रहार माना। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी हस्तक्षेप से इनकार किया। यह केवल आरोप नहीं रहा। यह न्यायिक रूप से स्थापित दोषसिद्धि थी। 18.24 राजनीतिक प्रभाव इस मामले का प्रभाव असाधारण था। पार्टी के दो शीर्ष नेता—

ओमप्रकाश चौटाला और अजय चौटाला

जेल चले गए। इससे नेतृत्व का खाली स्थान पैदा हुआ। और वही खाली स्थान परिवार के भीतर अगली उत्तराधिकार लड़ाई की पृष्ठभूमि बना। 18.25 अभय चौटाला का उभार ओमप्रकाश और अजय के जेल जाने के बाद अभय सिंह चौटाला INLD के प्रमुख सक्रिय चेहरों में बन गए। वे हरियाणा विधानसभा में विपक्ष के नेता भी रहे। उनकी राजनीति का आधार संगठन, ऐलनाबाद और पिता की राजनीतिक धारा से जुड़ा था। कुछ समय तक ऐसा लगा कि देवीलाल की राजनीतिक विरासत का स्वाभाविक अगला नेतृत्व अभय के पास जा सकता है। लेकिन अजय की अगली पीढ़ी तेजी से उभर रही थी। 18.26 चौथी पीढ़ी — दुष्यंत चौटाला अजय चौटाला के पुत्र दुष्यंत चौटाला का जन्म 1988 में हुआ। वे उच्च शिक्षा के बाद राजनीति में आए।

2014 लोकसभा चुनाव में हिसार से INLD उम्मीदवार बने। और जीत गए। 26 वर्ष की उम्र में लोकसभा पहुंचकर वे उस समय के सबसे युवा सांसदों में शामिल हुए। यह चौटाला परिवार की चौथी राजनीतिक पीढ़ी का औपचारिक प्रवेश था। 18.27 दुष्यंत को क्या मिला? दुष्यंत के पास शुरुआत से— देवीलाल का नाम, ओमप्रकाश का संगठन, अजय का राजनीतिक नेटवर्क, INLD का चुनाव चिह्न, जाट किसान आधार, और हिसार–सिरसा बेल्ट में परिवार की पहचान मौजूद थी। इसलिए उनका प्रवेश स्पष्ट रूप से वंशवादी था। लेकिन उनकी लोकप्रियता शीघ्र ही परिवार की अन्य शाखाओं से स्वतंत्र दिखाई देने लगी। यहीं आगे संघर्ष की जमीन तैयार हुई। 18.28 परिवार में उत्तराधिकार युद्ध मूल संघर्ष था—

ओमप्रकाश चौटाला के बाद INLD किसके नियंत्रण में जाएगा?

एक ओर— अभय चौटाला। दूसरी ओर— अजय चौटाला के पुत्र दुष्यंत और दिग्विजय। 2018 तक यह संघर्ष खुलकर सामने आ गया। यह केवल व्यक्तिगत विवाद नहीं था। यह राजनीतिक उत्तराधिकार का संघर्ष था। 18.29 2018 — INLD टूट गई 2018 में पारिवारिक संघर्ष इतना बढ़ा कि दुष्यंत और दिग्विजय चौटाला को INLD से बाहर कर दिया गया। इसके बाद अजय–दुष्यंत धड़े ने अलग रास्ता अपनाया। 9 दिसंबर 2018 को नई पार्टी बनी—

जननायक जनता पार्टी — JJP।

'जननायक' शब्द स्वयं देवीलाल की राजनीतिक स्मृति का दावा था। पार्टी के गठन का मूल आधार INLD के विभाजन और चौटाला परिवार की आंतरिक लड़ाई थी। 18.30 अब एक विरासत, दो पार्टियां यह भारतीय वंशवादी राजनीति का अत्यंत रोचक उदाहरण है। दोनों पक्ष देवीलाल की विरासत का दावा कर रहे थे। INLD: ओमप्रकाश → अभय। JJP: अजय → दुष्यंत। दोनों की राजनीतिक भाषा में— देवीलाल, किसान, ग्रामीण हरियाणा, जाट आधार और 'जननायक' मौजूद रहे। अर्थात—

परिवार टूटा, लेकिन दोनों शाखाएं उसी पूर्वज की राजनीतिक पूंजी पर दावा करती रहीं।

18.31 2019 — दुष्यंत का बड़ा दांव 2019 हरियाणा विधानसभा चुनाव JJP की पहली बड़ी परीक्षा थी। पार्टी ने 10 सीटें जीत लीं। भाजपा 40 सीटों पर रह गई और पूर्ण बहुमत से छह सीट पीछे थी। कांग्रेस ने 31 सीटें जीतीं। अब दुष्यंत चौटाला के दस विधायक सरकार गठन में निर्णायक हो गए। कुछ ही महीनों पुरानी पार्टी अचानक—

किंगमेकर

बन गई। 18.32 भाजपा–JJP गठबंधन दुष्यंत ने भाजपा को समर्थन दिया। मनोहर लाल खट्टर दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। और दुष्यंत चौटाला—

हरियाणा के उपमुख्यमंत्री।

2019 से मार्च 2024 तक वे इस पद पर रहे। यह चौथी पीढ़ी का असाधारण उत्थान था। 31 वर्ष की उम्र में वे राज्य सत्ता के दूसरे सबसे बड़े पद पर पहुंच गए। 18.33 इतिहास का चक्र इसे वंश के क्रम में देखें—

देवीलाल — मुख्यमंत्री ↓ ओमप्रकाश — मुख्यमंत्री ↓ अजय — सांसद/विधायक ↓ दुष्यंत — उपमुख्यमंत्री

चार पीढ़ियों में राज्य सत्ता की निरंतर उपस्थिति अपने आप में भारतीय लोकतंत्र में वंशवादी राजनीतिक पूंजी की शक्ति दिखाती है। 18.34 लेकिन भाजपा से गठबंधन ने नई समस्या पैदा की JJP ने 2019 में भाजपा के विरुद्ध चुनाव लड़ा था। चुनाव के बाद उसी भाजपा के साथ सरकार बना ली। आलोचकों ने इसे अवसरवाद कहा। दुष्यंत का तर्क था कि स्थिर सरकार और JJP के चुनावी वादों को लागू करने के लिए गठबंधन आवश्यक था। शुरुआती दौर में यह व्यावहारिक रूप से सफल दिखा। लेकिन जल्द ही सबसे कठिन परीक्षा सामने आई—

किसान आंदोलन।

18.35 2020–21 किसान आंदोलन तीन केंद्रीय कृषि कानूनों के विरुद्ध पंजाब और हरियाणा में बड़ा आंदोलन हुआ। यह JJP के लिए वैचारिक संकट था। पार्टी स्वयं को—

देवीलाल की किसान विरासत

की उत्तराधिकारी बताती थी। लेकिन वह उसी केंद्र सरकार की सहयोगी थी जिसके कृषि कानूनों का किसान विरोध कर रहे थे। यहीं दुष्यंत की राजनीति का सबसे बड़ा अंतर्विरोध सामने आया। 18.36 किसान बनाम सत्ता हरियाणा के कई हिस्सों में JJP और भाजपा नेताओं को किसानों के विरोध का सामना करना पड़ा। दुष्यंत पर गठबंधन छोड़ने का दबाव बना। लेकिन JJP सरकार में बनी रही। यही निर्णय बाद में पार्टी के लिए अत्यंत महंगा साबित हुआ। किसान मतदाता के एक हिस्से में यह धारणा बनी कि—

देवीलाल की विरासत का दावा करने वाली पार्टी सत्ता को किसान आंदोलन से ऊपर रख रही है।

यह धारणा चुनावी रूप से विनाशकारी सिद्ध हुई। 18.37 अभय चौटाला ने अलग रास्ता चुना इसी किसान आंदोलन के दौरान अभय सिंह चौटाला ने कृषि कानूनों के विरोध में जनवरी 2021 में हरियाणा विधानसभा से इस्तीफा दिया। बाद में ऐलनाबाद उपचुनाव में वे फिर जीते। इससे INLD को राजनीतिक रूप से यह कहने का अवसर मिला कि—

किसान आंदोलन पर वास्तविक देवीलाल परंपरा उसने निभाई, JJP ने नहीं।

यही परिवार की दो शाखाओं के बीच किसान विरासत की प्रतिस्पर्धा का नया अध्याय था। 18.38 2024 — भाजपा–JJP गठबंधन टूटा 12 मार्च 2024 को हरियाणा में भाजपा–JJP गठबंधन समाप्त हो गया। मनोहर लाल खट्टर ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया। भाजपा ने नायब सिंह सैनी के नेतृत्व में नई सरकार बनाई। दुष्यंत चौटाला उपमुख्यमंत्री पद से बाहर हो गए। लगभग साढ़े चार वर्ष का सत्ता-साझेदारी प्रयोग समाप्त हो गया। 18.39 गठबंधन क्यों टूटा? इसके पीछे कई कारक थे— 2024 लोकसभा चुनाव की सीट साझेदारी, भाजपा की स्वतंत्र चुनावी रणनीति, JJP का कमजोर होता सामाजिक आधार, और दोनों दलों के बीच बढ़ती राजनीतिक दूरी। किसी एक कारण को निर्णायक बताना उचित नहीं होगा।

लेकिन यह स्पष्ट था कि 2019 में भाजपा के लिए अनिवार्य JJP अब 2024 में अनिवार्य नहीं रह गई थी। 18.40 2024 लोकसभा चुनाव — चेतावनी JJP ने 2024 लोकसभा चुनाव में अलग चुनाव लड़ा। उसका प्रदर्शन अत्यंत कमजोर रहा। जिस पार्टी ने 2019 विधानसभा चुनाव में दस सीटें जीतकर सरकार की चाबी हासिल की थी, पांच वर्ष में उसका राजनीतिक आधार तेजी से क्षरित हो चुका था। यह आगामी विधानसभा चुनाव के लिए गंभीर चेतावनी थी। 18.41 2024 विधानसभा चुनाव — JJP का पतन अक्टूबर 2024 विधानसभा चुनाव में स्थिति और खराब हुई। JJP एक भी सीट नहीं जीत सकी। दुष्यंत चौटाला स्वयं उचाना कलां से बुरी तरह हार गए। पार्टी विधानसभा से पूरी तरह बाहर हो गई। 2019 के—

10 विधायक + उपमुख्यमंत्री

से 2024 में—

0 विधायक

तक पहुंचना हरियाणा की हालिया राजनीति के सबसे नाटकीय पतनों में है। 18.42 INLD की स्थिति भी बहुत मजबूत नहीं हुई JJP के पतन का अर्थ यह नहीं था कि पुरानी INLD अपने पुराने स्वरूप में वापस आ गई। INLD ने बसपा के साथ गठबंधन किया। पार्टी को सीमित सफलता मिली। डबवाली से आदित्य देवीलाल INLD के टिकट पर जीते। 2024 के आधिकारिक परिणाम-संकलनों में डबवाली की जीत INLD के खाते में दर्ज है। लेकिन अभय सिंह चौटाला स्वयं ऐलनाबाद से कांग्रेस के भरत सिंह बेनीवाल से हार गए। उन्हें 62,865 वोट मिले जबकि विजेता को 77,865। अर्थात दोनों प्रमुख चौटाला शाखाएं संकट में थीं। 18.43 एक और शाखा — रणजीत सिंह चौटाला चौटाला परिवार का राजनीतिक विस्तार केवल ओमप्रकाश की संतानों तक सीमित नहीं है।

देवीलाल के पुत्र रणजीत सिंह चौटाला भी हरियाणा की राजनीति में सक्रिय रहे। उन्होंने अलग राजनीतिक रास्ता अपनाया और विभिन्न समय पर कांग्रेस, निर्दलीय राजनीति तथा बाद में भाजपा से संबंध रखा। इससे स्पष्ट होता है कि देवीलाल परिवार केवल एक पार्टी में सीमित राजनीतिक वंश नहीं रहा। उसकी अलग-अलग शाखाएं अलग दलों तक फैलीं। 18.44 आदित्य देवीलाल — परिवार का एक और राजनीतिक चेहरा 2024 में डबवाली से जीतने वाले आदित्य देवीलाल भी इसी विस्तृत राजनीतिक परिवार से आते हैं। इससे एक दिलचस्प स्थिति बनी— अभय हारे, दुष्यंत हारे, लेकिन विस्तृत देवीलाल परिवार का एक अन्य सदस्य INLD से विधानसभा पहुंच गया। अर्थात राजनीतिक ब्रांड कमजोर हुआ है, समाप्त नहीं। 18.45 20 दिसंबर 2024 — ओमप्रकाश चौटाला का निधन

20 दिसंबर 2024 को ओमप्रकाश चौटाला का गुरुग्राम में निधन हो गया। वे 89 वर्ष के थे। उनकी मृत्यु के साथ हरियाणा की राजनीति का एक लंबा युग समाप्त हुआ। वे उस पीढ़ी के अंतिम बड़े नेताओं में थे जिसने— देवीलाल का उत्कर्ष, जनता दल का दौर, क्षेत्रीय दलों का उदय, गठबंधन राजनीति, INLD की सत्ता, फिर परिवार विभाजन सब देखा था। 18.46 उनकी विरासत विरोधाभासी क्यों है? ओमप्रकाश चौटाला का मूल्यांकन दो बिल्कुल अलग छवियों के बीच होता है। पांच बार मुख्यमंत्री, ग्रामीण हरियाणा में मजबूत जनसंपर्क, INLD संगठन, देवीलाल की किसान राजनीति का उत्तराधिकार। JBT भर्ती घोटाले में दोषसिद्धि और दस वर्ष की सजा। सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में दोषसिद्धि में हस्तक्षेप करने से इनकार किया था।

इसलिए उनकी विरासत को केवल जननेता या केवल भ्रष्टाचार के मामले से परिभाषित करना दोनों अधूरे निष्कर्ष होंगे। 18.47 परिवार की राजनीतिक संरचना इसे व्यवस्थित रूप में देखें—

पहली पीढ़ी चौधरी देवीलाल स्वतंत्रता सेनानी → किसान नेता → मुख्यमंत्री → उपप्रधानमंत्री

दूसरी पीढ़ी ओमप्रकाश चौटाला मुख्यमंत्री → INLD प्रमुख

तीसरी पीढ़ी अजय चौटाला सांसद/विधायक → JJP संरचना

अभय चौटाला विधायक → विपक्ष के नेता → INLD नेतृत्व

चौथी पीढ़ी दुष्यंत चौटाला सांसद → JJP नेता → उपमुख्यमंत्री

दिग्विजय चौटाला JJP संगठन अर्जुन चौटाला INLD की नई पीढ़ी और विस्तारित शाखाओं में रणजीत सिंह तथा आदित्य देवीलाल जैसे नाम। यह भारतीय राजनीति के सबसे विस्तृत बहु-पीढ़ी राजनीतिक परिवारों में से एक है। 18.48 देवीलाल और ओमप्रकाश में मूल अंतर हमारी वंशवाद कसौटी यहां बहुत स्पष्ट परिणाम देती है।

देवीलाल को तैयार राजनीतिक पूंजी नहीं मिली।

उन्होंने जेल यात्रा, संगठन, किसान आंदोलन और चुनावी संघर्ष से इसे बनाया। लेकिन ओमप्रकाश के प्रवेश के समय— पिता राष्ट्रीय नेता थे, पार्टी मौजूद थी, संगठन मौजूद था, वोट बैंक मौजूद था। इसलिए—

देवीलाल वंशवादी नेता नहीं; वंश-निर्माता थे।

ओमप्रकाश पहले बड़े वंशवादी लाभार्थी बने। 18.49 अजय बनाम अभय — वंशवाद की दूसरी समस्या वंशवाद केवल बाहरी नेताओं को अवसर से वंचित नहीं करता। कई बार वह स्वयं परिवार के भीतर उत्तराधिकार युद्ध पैदा करता है। चौटाला परिवार इसका आदर्श उदाहरण है। यदि पार्टी नेतृत्व की संस्थागत चुनाव प्रक्रिया मजबूत होती तो प्रश्न होता—

सबसे सक्षम नेता कौन?

लेकिन परिवार-केंद्रित संरचना में प्रश्न बन गया—

पिता/दादा की विरासत का वास्तविक उत्तराधिकारी कौन?

अजय की शाखा या अभय की? यही संघर्ष अंततः पार्टी तोड़ गया। 18.50 दुष्यंत — सबसे सफल चौथी पीढ़ी दुष्यंत का राजनीतिक रिकॉर्ड परिवार की चौथी पीढ़ी में सबसे प्रभावशाली रहा है। उन्होंने— 26 वर्ष की उम्र में लोकसभा जीती, नई पार्टी बनाई, पहले ही विधानसभा चुनाव में 10 विधायक जिताए, 31 वर्ष की उम्र में उपमुख्यमंत्री बने। यह केवल उपनाम से संभव नहीं था। यह राजनीतिक संगठन क्षमता भी दर्शाता है। लेकिन— 2024 में उनकी पार्टी शून्य पर पहुंच गई। इससे वंशवाद का दूसरा सिद्धांत सामने आता है—

विरासत प्रवेश और प्रारंभिक नेटवर्क देती है; मतदाता स्थायी सत्ता की गारंटी नहीं देता।

18.51 क्या किसान आंदोलन JJP के पतन का मुख्य कारण था? यह एक प्रमुख कारण था, लेकिन अकेला नहीं। इसके साथ— सत्ता-विरोधी भावना, भाजपा के साथ गठबंधन की कीमत, संगठनात्मक कमजोरी, कांग्रेस की वापसी, जाट मतों का पुनर्संयोजन, और JJP के प्रति विश्वसनीयता संकट भी जुड़े थे। फिर भी किसान आंदोलन का प्रतीकात्मक महत्व बहुत बड़ा था। क्योंकि पार्टी किसी सामान्य क्षेत्रीय नेता की नहीं थी। वह स्वयं को—

'जननायक' देवीलाल

की उत्तराधिकारी कहती थी। 18.52 'जननायक' नाम स्वयं राजनीतिक दस्तावेज है JJP का पूरा नाम—

जननायक जनता पार्टी

है। 'जननायक' देवीलाल के लिए प्रयुक्त राजनीतिक संबोधन है। इसलिए पार्टी का नाम ही वंशवादी राजनीतिक पूंजी के संस्थाकरण का उदाहरण है। नई पार्टी बनी, लेकिन नया ऐतिहासिक प्रतीक नहीं बनाया गया। उसने पुराने परिवार-पुरुष की विरासत पर दावा किया। 18.53 INLD भी उसी विरासत पर दूसरी ओर INLD भी स्वयं को देवीलाल की वास्तविक राजनीतिक धारा मानती रही। इसलिए 2018 के बाद हरियाणा में विचित्र राजनीतिक स्थिति बनी—

एक ही पूर्वज, एक ही किसान विरासत, एक ही परिवार, लेकिन दो राजनीतिक दल।

यह भारतीय वंशवाद का शायद सबसे स्पष्ट उदाहरण है कि परिवारवाद कभी-कभी संगठन को मजबूत करने के बजाय संगठन को विभाजित भी कर देता है। 18.54 अभय का किसान आंदोलन वाला निर्णय अभय चौटाला द्वारा कृषि कानूनों के विरोध में विधानसभा सदस्यता छोड़ना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था। इसने उन्हें देवीलाल की किसान विरासत से स्वयं को जोड़ने का अवसर दिया। लेकिन 2024 में उनकी ऐलनाबाद हार ने दिखाया कि प्रतीकात्मक किसान राजनीति भी स्वतः स्थायी चुनावी आधार नहीं बनाती। मतदाता विरासत और व्यक्तिगत निर्णय दोनों का स्वतंत्र मूल्यांकन करता है। 18.55 अगस्त 2026 — कौन है देवीलाल का उत्तराधिकारी? आज इसका कोई सरल उत्तर नहीं है। वंशगत दृष्टि से सभी शाखाएं उत्तराधिकारी हैं।

INLD के संस्थागत दृष्टिकोण से अभय चौटाला की शाखा प्रमुख दावा करती है। JJP के दृष्टिकोण से अजय–दुष्यंत स्वयं को देवीलाल की जननायक राजनीति का आधुनिक उत्तराधिकारी प्रस्तुत करते हैं। लेकिन मतदाता की दृष्टि से किसी शाखा को अभी देवीलाल जैसी व्यापक स्वीकृति प्राप्त नहीं है। यही सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है। 18.56 देवीलाल का वोट बैंक परिवार में क्यों नहीं टिक पाया? क्योंकि देवीलाल की राजनीति केवल जाति पर आधारित नहीं थी। उनकी राजनीतिक छतरी में— ग्रामीण गरीब, जाट, अन्य कृषक समुदाय, छोटे व्यापारी, कांग्रेस-विरोधी मतदाता और व्यक्तिगत रूप से उनसे जुड़े ग्रामीण समूह शामिल थे। अगली पीढ़ियों में यह व्यापक सामाजिक गठबंधन सिकुड़ता गया।

वंश ने नाम विरासत में पाया, लेकिन पूरा सामाजिक गठबंधन नहीं। 18.57 जाट राजनीति का प्रश्न चौटाला परिवार को अक्सर जाट राजनीति से जोड़ा जाता है। इसमें पर्याप्त तथ्यात्मक आधार है—परिवार का प्रमुख सामाजिक आधार जाट समुदाय में रहा। लेकिन देवीलाल को केवल जाट नेता कहना उसी तरह अधूरा है जैसे चरण सिंह को केवल जाट नेता कहना। 1987 की 60 सीटों वाली जीत केवल एक जाति के वोट से संभव नहीं थी। उनकी राजनीति में व्यापक ग्रामीण और सत्ता-विरोधी गठबंधन था। बाद की पीढ़ियों में सामाजिक आधार अधिक संकुचित हुआ। 18.58 देवीलाल और चरण सिंह — समानता दोनों नेताओं में कई समानताएं थीं— किसान राजनीति, कांग्रेस से संघर्ष, लोकदल परंपरा, उत्तर भारतीय ग्रामीण समाज, गैर-कांग्रेसी गठबंधन,

राष्ट्रीय सत्ता तक पहुंच। दोनों की पहली पीढ़ी स्वनिर्मित थी। और दोनों के बाद राजनीतिक उत्तराधिकार परिवार में गया। 18.59 लेकिन महत्वपूर्ण अंतर चरण सिंह अधिक स्पष्ट आर्थिक–वैचारिक लेखक थे। देवीलाल अधिक शक्तिशाली जन-संगठक थे। चरण सिंह प्रधानमंत्री बने। देवीलाल उपप्रधानमंत्री बने। चरण सिंह की विरासत अंततः मुख्यतः RLD में केंद्रित हुई। देवीलाल की विरासत—

INLD और JJP में विभाजित हो गई।

इसलिए चौटाला वंश में परिवारवाद का संस्थागत संकट अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। 18.60 इतिहासलेखन — पहला दृष्टिकोण : किसान जननायक पहली व्याख्या देवीलाल को हरियाणा के ग्रामीण समाज की आवाज मानती है। इसमें प्रमुख तत्व हैं— स्वतंत्रता आंदोलन, किसान संघर्ष, आपातकाल विरोध, न्याय युद्ध, ऋण माफी, ग्रामीण वृद्धावस्था पेंशन, 1987 की ऐतिहासिक विजय, और राष्ट्रीय राजनीति में किसान शक्ति का प्रतिनिधित्व। उनकी 'ताऊ' छवि इसी इतिहासलेखन का हिस्सा है। 18.61 दूसरा दृष्टिकोण : लोकलुभावन किसान राजनीति आलोचनात्मक दृष्टिकोण उनकी राजनीति में— नकद/पेंशन सहायता, प्रत्यक्ष ग्रामीण लाभ और व्यक्तिगत नेतृत्व के मजबूत मिश्रण को रेखांकित करता है।

इस दृष्टिकोण में देवीलाल ने हरियाणा में उस competitive populism को मजबूत किया जिसमें चुनावी राजनीति प्रत्यक्ष लाभों और सामाजिक समूहों को आकर्षित करने वाली घोषणाओं पर निर्भर होने लगी। लेकिन इसे केवल लोकलुभावनवाद कहना भी अधूरा है क्योंकि इसके पीछे वास्तविक ग्रामीण आर्थिक संकट मौजूद था। 18.62 तीसरा दृष्टिकोण : आंदोलन से परिवार तक वंशवाद के अध्ययन में सबसे महत्वपूर्ण व्याख्या यह है—

स्वतंत्रता आंदोलन → किसान आंदोलन → देवीलाल का व्यक्तिगत जनाधार → क्षेत्रीय पार्टी → पुत्र को सत्ता → पौत्रों को संगठन → परपौत्रों को राजनीतिक ब्रांड।

यह दिखाता है कि लोकतांत्रिक जन-आंदोलन से अर्जित राजनीतिक पूंजी कैसे कुछ दशकों में पारिवारिक संपत्ति जैसी प्रतीत होने लग सकती है। 18.63 चौथा दृष्टिकोण : वंशवाद ने पार्टी को तोड़ा यह बादल या यादव परिवारों से महत्वपूर्ण अंतर है। कई वंशवादी पार्टियों में परिवार नेतृत्व संगठन को एकजुट रखता है। चौटाला परिवार में अंततः विपरीत हुआ। उत्तराधिकार विवाद ने—

INLD को तोड़ दिया।

JJP बनी। वोट बंटा। कार्यकर्ता बंटे। देवीलाल की विरासत बंटी। और अंततः दोनों शाखाएं कमजोर हुईं। यह परिवारवाद की संस्थागत लागत का अत्यंत स्पष्ट उदाहरण है। 18.64 पांचवां दृष्टिकोण : भ्रष्टाचार और वंशवाद का मेल JBT भर्ती प्रकरण का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि इसमें पिता और पुत्र दोनों दोषी ठहराए गए। ओमप्रकाश और अजय चौटाला की दस वर्ष की सजा को दिल्ली उच्च न्यायालय ने बरकरार रखा और सुप्रीम कोर्ट ने अपील में हस्तक्षेप नहीं किया। यहां परिवारवादी सत्ता का प्रश्न केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं रहा। यह सार्वजनिक नियुक्तियों की निष्पक्षता और राज्य संस्थाओं के उपयोग से जुड़ गया। इसलिए यह मामला इस वंश के इतिहास का अनिवार्य हिस्सा है।

18.65 छठा दृष्टिकोण : लोकतंत्र ने वंश को नियंत्रित किया इसके विपरीत भारतीय लोकतंत्र की शक्ति भी इसी परिवार के इतिहास में दिखाई देती है। परिवार का नाम बहुत बड़ा था। फिर भी— INLD सत्ता से बाहर हुई। ओमप्रकाश को अदालत ने सजा दी। JJP 10 से शून्य सीट पर पहुंची। दुष्यंत चुनाव हारे। अभय चुनाव हारे। इसलिए वंशवादी पूंजी शक्तिशाली है, लेकिन असीमित नहीं।

मतदाता और न्यायपालिका दोनों उसके ऊपर संस्थागत नियंत्रण लगा सकते हैं।

18.66 चार पीढ़ियों की तुलना | कसौटी | देवीलाल | ओमप्रकाश | अजय/अभय | दुष्यंत | |---|---|---|---|---| | राजनीतिक विरासत | नहीं | बहुत अधिक | बहुत अधिक | अत्यधिक | | आधार निर्माण | स्वयं | विरासत + स्वयं | मुख्यतः विरासत | विरासत + नया संगठन | | मुख्यमंत्री | 2 बार | 5 कार्यकाल | नहीं | नहीं | | राष्ट्रीय पद | उपप्रधानमंत्री | — | सांसद आदि | सांसद | | राज्य का बड़ा पद | मुख्यमंत्री | मुख्यमंत्री | विपक्ष नेतृत्व आदि | उपमुख्यमंत्री | | स्वतंत्र संगठन क्षमता | अत्यधिक | अत्यधिक | मध्यम/महत्वपूर्ण | महत्वपूर्ण | | वंशवादी लाभ | नहीं | उच्च | बहुत उच्च | बहुत उच्च | | प्रमुख संकट | सत्ता संघर्ष | भर्ती घोटाला | परिवार विभाजन | 2024 चुनावी पतन | 18.67 प्रमुख दस्तावेज और स्रोत

इस वंश के गंभीर शोध के लिए निम्न दस्तावेज विशेष महत्वपूर्ण हैं— स्वतंत्रता आंदोलन संबंधी देवीलाल के कारावास अभिलेख, जिनका सरकारी डिजिटल जिला रिपॉजिटरी में भी विवरण उपलब्ध है।

1952 से संयुक्त पंजाब के निर्वाचन अभिलेख।

Punjab Reorganisation Act, 1966।

1977 और 1987 हरियाणा विधानसभा चुनाव के निर्वाचन आयोग के सांख्यिकीय रिकॉर्ड।

1987 में लोकदल की 60 सीटों और 38.58 प्रतिशत मतों का चुनावी रिकॉर्ड विशेष महत्वपूर्ण है।

न्याय युद्ध संबंधी राजनीतिक दस्तावेज और चुनाव घोषणाएं।

1989 राष्ट्रीय मोर्चा और जनता दल के दस्तावेज।

INLD की स्थापना और संगठनात्मक दस्तावेज।

JBT शिक्षक भर्ती मामले का ट्रायल कोर्ट निर्णय।

दिल्ली उच्च न्यायालय का 5 मार्च 2015 का निर्णय।

सुप्रीम कोर्ट की 2015 की कार्यवाही।

2018 INLD विभाजन संबंधी दस्तावेज।

JJP के स्थापना दस्तावेज।

2019 हरियाणा विधानसभा चुनाव परिणाम और BJP–JJP गठबंधन दस्तावेज।

2020–21 किसान आंदोलन और हरियाणा विधानसभा की कार्यवाही।

12 मार्च 2024 BJP–JJP गठबंधन टूटने और सरकार पुनर्गठन का रिकॉर्ड।

2024 हरियाणा विधानसभा चुनाव के निर्वाचन परिणाम।

इन दस्तावेजों को साथ पढ़ने पर परिवार की कहानी राजनीतिक संस्मरण के बजाय संस्थागत इतिहास में बदलती है। 18.68 चार चरणों में चौटाला वंश पूरे इतिहास को चार चरणों में बांटना उपयोगी है— | काल | प्रमुख प्रवृत्ति | |---|---| | 1930–1989 | देवीलाल का स्वनिर्मित आंदोलनकारी और किसान नेतृत्व | | 1989–2005 | ओमप्रकाश चौटाला को उत्तराधिकार और सत्ता का संस्थाकरण | | 2005–2018 | विपक्ष, कानूनी संकट और अगली पीढ़ी का उदय | | 2018–2026 | परिवार विभाजन, INLD बनाम JJP और देवीलाल विरासत की प्रतिस्पर्धा | यानी यह केवल चार पीढ़ियों का वंश नहीं है। यह चार अलग-अलग राजनीतिक युगों की कहानी है। 18.69 सबसे बड़ा विरोधाभास

देवीलाल की राजनीतिक शक्ति गांवों और किसानों को संगठित करने से बनी थी। वे किसी पिता की सीट पर बैठकर नेता नहीं बने। लेकिन अंततः उनकी राजनीतिक विरासत का प्रश्न इस रूप में बदल गया—

ओमप्रकाश के बाद कौन?

फिर—

अजय या अभय?

और उसके बाद—

दुष्यंत या अभय की धारा?

अर्थात जन-आंदोलन से उत्पन्न राजनीतिक पूंजी धीरे-धीरे परिवार के भीतर उत्तराधिकार विवाद में बदल गई। यही इस अध्याय का केंद्रीय विरोधाभास है। 18.70 क्या दुष्यंत देवीलाल की राजनीति को पुनर्जीवित कर सकते हैं? 2019 में ऐसा संभव दिखाई दिया था। नई पार्टी। युवा नेतृत्व। दस विधायक। उपमुख्यमंत्री पद। लेकिन किसान आंदोलन और 2024 के चुनाव ने समीकरण बदल दिया। अब दुष्यंत के सामने चुनौती केवल JJP को चुनाव जिताने की नहीं है। उन्हें सिद्ध करना होगा कि पार्टी—

केवल चौटाला परिवार की एक अलग शाखा नहीं, बल्कि स्वतंत्र सामाजिक आधार वाली राजनीतिक संस्था है।

यही उसकी दीर्घकालीन परीक्षा है। 18.71 और अभय की चुनौती? अभय सिंह चौटाला की चुनौती अलग है। उनके पास पुरानी पार्टी—

INLD

का संस्थागत दावा है। किसान आंदोलन में इस्तीफे जैसी राजनीतिक पूंजी है। लेकिन 2024 में अपनी पारंपरिक ऐलनाबाद सीट की हार ने उनकी सीमा दिखा दी। इसलिए केवल 'मूल पार्टी' का दावा भी पर्याप्त नहीं है। उन्हें नया सामाजिक गठबंधन बनाना होगा। 18.72 क्या दोनों शाखाएं कभी फिर मिल सकती हैं? राजनीतिक परिवारों में विभाजन स्थायी भी होते हैं और परिस्थितिजन्य भी। चौटाला परिवार के मामले में समय-समय पर पुनर्मिलन की अटकलें लगती रही हैं। लेकिन अगस्त 2026 तक INLD और JJP अलग राजनीतिक संस्थाएं हैं। इसलिए संभावित भविष्य को तथ्य के रूप में नहीं लिखा जा सकता। इतिहासकार के लिए महत्वपूर्ण तथ्य इतना है—

देवीलाल की विरासत फिलहाल संस्थागत रूप से विभाजित है।

18.73 अंतिम मूल्यांकन चौधरी देवीलाल–चौटाला परिवार भारतीय राजनीतिक वंशवाद के अध्ययन में शायद सबसे उपयोगी केस स्टडी में से एक है। क्योंकि इसमें वंशवाद के लगभग सभी चरण दिखाई देते हैं— पहली पीढ़ी का संघर्ष, जनाधार का निर्माण, सत्ता प्राप्ति, पुत्र को उत्तराधिकार, परिवार का पार्टी पर प्रभुत्व, तीसरी और चौथी पीढ़ी का प्रवेश, परिवार के भीतर उत्तराधिकार संघर्ष, पार्टी विभाजन, नई पारिवारिक पार्टी का जन्म, और अंततः दोनों शाखाओं का चुनावी संकट। देवीलाल की राजनीतिक वैधता मुख्यतः अर्जित थी। वे स्वतंत्रता आंदोलन से निकले। किसान आंदोलन बनाए। 1987 में लोकदल को 60 विधानसभा सीटों तक पहुंचाया। फिर देश के उपप्रधानमंत्री बने। इसलिए उन्हें वंशवादी नेता कहना इतिहास को उल्टा पढ़ना होगा।

वे वंश-निर्माता थे। लेकिन ओमप्रकाश चौटाला की सत्ता तक पहुंच में पिता की राजनीतिक शक्ति निर्णायक थी। अगली पीढ़ी में अजय और अभय दोनों को यही पूंजी मिली। चौथी पीढ़ी में दुष्यंत को भी वही ब्रांड मिला—और उन्होंने उसके आधार पर नई पार्टी खड़ी करके उल्लेखनीय प्रारंभिक सफलता हासिल की। लेकिन यहीं भारतीय लोकतंत्र ने इस वंश की सीमा भी दिखा दी। नाम होने के बावजूद दुष्यंत 2024 में हार गए। JJP शून्य पर पहुंच गई। अभय अपनी ऐलनाबाद सीट हार गए। इसलिए चौटाला परिवार से निकलने वाला सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष है—

राजनीतिक विरासत संगठन, पहचान, संसाधन और प्रारंभिक मतदाता विश्वास दे सकती है; लेकिन वह सामाजिक गठबंधन को पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्वतः हस्तांतरित नहीं कर सकती।

देवीलाल ने जिस किसान राजनीति को जन-आंदोलन से बनाया था, उनकी अगली पीढ़ियों ने उसका नाम तो विरासत में पाया, लेकिन उसकी व्यापक सामाजिक शक्ति को स्थायी रूप से सुरक्षित नहीं रख सकीं। और परिवारवाद की सबसे बड़ी संस्थागत कीमत भी यहीं सामने आती है।

उत्तराधिकारी चुनने की लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर हो तो संघर्ष पार्टी के भीतर नेता बनाम नेता नहीं रहता—भाई बनाम भाई और चाचा बनाम भतीजा बन जाता है।

INLD का विभाजन इसी प्रक्रिया का परिणाम था। इसलिए इस वंश का राजनीतिक सूत्र होगा—

स्वतंत्रता सेनानी → किसान जननायक → पुत्र को सत्ता → परिवार-केंद्रित क्षेत्रीय दल → तीसरी पीढ़ी का उत्तराधिकार संघर्ष → चौथी पीढ़ी की अलग पार्टी → सत्ता में तेज उभार → किसान आधार का संकट → दो शाखाओं में बंटी राजनीतिक विरासत।

अगस्त 2026 में देवीलाल का नाम अभी भी हरियाणा की राजनीति की बड़ी राजनीतिक पूंजी है। लेकिन उनके बाद की चार पीढ़ियों की कहानी एक कठोर लोकतांत्रिक सत्य भी स्थापित करती है—

विरासत में नेता का नाम मिल सकता है; उसका जनाधार नहीं।