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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–006 · भाग 08

विभाजन के दंश, जख्म और पलायन की त्रासदी

स्वतंत्रता के उजाले के साथ हिंसा, विस्थापन, बिछोह और पुनर्वास की पीढ़ियों तक जीवित मानवीय कथा

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskसंस्करण 1.0 · 20 जुलाई 2026

15 अगस्त 1947 ने भारत को औपनिवेशिक शासन से मुक्ति दी, किंतु उसी ऐतिहासिक क्षण ने उपमहाद्वीप को विभाजन, रक्तपात और अभूतपूर्व जन-पलायन में धकेल दिया। यह अध्याय राजनीतिक निर्णयों से आगे बढ़कर उन मनुष्यों की कथा दर्ज करता है जिनका घर, नागरिकता, परिवार, स्मृति और भविष्य कुछ ही सप्ताह में बदल गया।

8.1 · स्वतंत्रता और विभाजन

एक नए राष्ट्र का जन्म, एक उपमहाद्वीप का विखंडन

15 अगस्त 1947 भारतीय इतिहास की सबसे गौरवपूर्ण और सबसे पीड़ादायक तिथियों में से एक है। इसी दिन भारत औपनिवेशिक शासन से मुक्त हुआ, लेकिन स्वतंत्रता का आगमन उपमहाद्वीप के विभाजन, असाधारण सांप्रदायिक हिंसा, करोड़ों लोगों के पलायन और असंख्य परिवारों के बिछड़ने के साथ हुआ। इसलिए 1947 केवल आजादी का वर्ष नहीं था; वह स्वाधीनता, विभाजन, विस्थापन और राष्ट्र-निर्माण का संयुक्त इतिहास था।

ब्रिटिश भारत के अंत के साथ भारत और पाकिस्तान नामक दो नए अधिराज्य बने। सीमा-निर्धारण इतनी जल्दबाजी में हुआ कि दोनों देशों की स्वतंत्रता के बाद 17 अगस्त 1947 को पंजाब और बंगाल की सीमाएँ सार्वजनिक की गईं। स्वतंत्रता का उत्सव मनाते समय भी अनेक लोगों को नहीं मालूम था कि उनका गाँव, शहर, खेत, घर या परिवार किस देश में होगा।

मुख्य तथ्य

राजनीतिक स्वतंत्रता और मानवीय विस्थापन एक ही समय घटित हुए; एक को दूसरे से अलग करके 1947 को नहीं समझा जा सकता।

8.2 · उत्सव और त्रासदी

नक्शे के साथ नागरिकता, घर और स्मृतियाँ भी बँटीं

स्वतंत्रता दशकों के संघर्ष का परिणाम थी। कांग्रेस, क्रांतिकारी संगठनों, किसानों, मजदूरों, विद्यार्थियों, महिलाओं, आदिवासी समूहों और स्थानीय आंदोलनों ने औपनिवेशिक शासन को चुनौती दी। गांधी के सत्याग्रह, नेहरू की आधुनिक राष्ट्र-राज्य की कल्पना, पटेल की संगठनात्मक भूमिका, सुभाष चंद्र बोस की सैन्य-राजनीतिक चुनौती और असंख्य अनाम बलिदानों ने स्वतंत्रता की चेतना को जन-जन तक पहुँचाया।

पाकिस्तान पश्चिमी और पूर्वी—दो भौगोलिक हिस्सों में बना; पूर्वी पाकिस्तान 1971 में बांग्लादेश बना। विभाजन केवल भूगोल का परिवर्तन नहीं था। उसके साथ नागरिकता, भूमि, भाषा, रिश्तेदारी, बाजार, धार्मिक पहचान, सांस्कृतिक संसार और सुरक्षा की भावना भी बँट गई। विभिन्न अध्ययनों में लगभग एक से दो करोड़ लोगों के विस्थापन और दो लाख से दस लाख या उससे अधिक मौतों के अनुमान मिलते हैं। कुछ आकलन मृतकों की संख्या बीस लाख तक बताते हैं; अभिलेखों की अपूर्णता के कारण किसी एक संख्या को निर्विवाद अंतिम आँकड़ा नहीं माना जा सकता।

मुख्य तथ्य

यह बीसवीं सदी के सबसे बड़े और सबसे हिंसक जबरन जन-पलायनों में से एक था।

8.3 · औपनिवेशिक पृष्ठभूमि

पृथक निर्वाचन और समुदाय-आधारित राजनीति

ब्रिटिश शासन ने भारत को प्रशासनिक इकाई में बाँधा, किंतु जनगणना, पृथक निर्वाचन और समुदाय-आधारित प्रतिनिधित्व की नीतियों ने धार्मिक पहचानों को राजनीतिक वर्गों के रूप में अधिक महत्त्व दिया। 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम से मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन शुरू हुआ और बाद के संवैधानिक सुधारों ने इस व्यवस्था को आगे बढ़ाया। नागरिकता और समान अधिकार का प्रश्न धीरे-धीरे सामुदायिक संख्या तथा राजनीतिक हिस्सेदारी की प्रतिस्पर्धा में बदलने लगा।

विभाजन को केवल ब्रिटिश नीति का परिणाम कहना अधूरा होगा। भारतीय राजनीतिक नेतृत्व, कांग्रेस और मुस्लिम लीग की प्रतिस्पर्धा, सांप्रदायिक संगठन, प्रांतीय राजनीति, औपनिवेशिक प्रशासन और हिंसा के बढ़ते चक्र—सभी की भूमिका थी। फिर भी औपनिवेशिक राज्य ने ऐसी संस्थागत भूमि तैयार की जिसमें हिंदू, मुसलमान और सिख प्रायः अलग राजनीतिक समुदायों के रूप में देखे जाने लगे।

8.4 · प्रतिस्पर्धी राष्ट्रवाद

कांग्रेस, मुस्लिम लीग और पाकिस्तान की माँग

कांग्रेस स्वयं को सभी समुदायों का राष्ट्रीय प्रतिनिधि मानती थी और स्वतंत्र, लोकतांत्रिक तथा एकीकृत भारत की पक्षधर थी। जवाहरलाल नेहरू सहित उसका प्रमुख नेतृत्व धर्म-आधारित नागरिकता के बजाय समान नागरिकता तथा राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक योजना और प्रशासनिक एकता के लिए मजबूत केंद्र चाहता था।

1906 में स्थापित अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के नेता मुहम्मद अली जिन्ना ने तर्क दिया कि भारतीय मुसलमान केवल धार्मिक समुदाय नहीं, अलग राजनीतिक कौम हैं और उन्हें हिंदू-बहुल केंद्र के अधीन स्थायी असुरक्षा से बचाने वाली सत्ता-संरचना चाहिए। 1940 के लाहौर प्रस्ताव के बाद मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों के लिए अलग राजनीतिक व्यवस्था की माँग पाकिस्तान की माँग में बदलती गई।

दो-राष्ट्र सिद्धांत के अनुसार हिंदू और मुसलमान अलग राष्ट्र थे। कांग्रेस और अनेक राष्ट्रवादी नेताओं ने इसका विरोध करते हुए भारत के साझा इतिहास, मिश्रित आबादी और बहुभाषी संस्कृति को एक धार्मिक विभाजन में समेटने को अस्वीकार किया। 1947 ने दिखाया कि राजनीतिक सीमा उन करोड़ों लोगों की साझी सामाजिक दुनिया को बिना विनाश के अलग नहीं कर सकती थी।

8.5 · 1946 का निर्णायक मोड़

कैबिनेट मिशन की विफलता और प्रत्यक्ष कार्रवाई की हिंसा

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद कमजोर ब्रिटेन ने 1946 में कैबिनेट मिशन भेजा। योजना में रक्षा, विदेश नीति और संचार जैसे सीमित विषयों वाला केंद्र, शक्तिशाली प्रांत और प्रांतीय समूह प्रस्तावित थे। उद्देश्य सत्ता हस्तांतरण के साथ संयुक्त भारत को बचाना था, लेकिन कांग्रेस और मुस्लिम लीग योजना की बाध्यता, समूह-व्यवस्था और भविष्य के केंद्र को लेकर सहमत नहीं हो सकीं।

मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त 1946 को प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस का आह्वान किया। कलकत्ता में बड़े पैमाने की हिंसा भड़की, जिसके बाद नोआखाली, बिहार, पंजाब और अन्य क्षेत्रों में हिंसा तथा प्रतिहिंसा का चक्र बढ़ा। स्थानीय राजनीति, अफवाह, हथियारबंद समूह, संपत्ति पर कब्जे की आकांक्षा, बदले की भावना और प्रशासनिक निष्क्रियता या पक्षपात ने इसे अधिक घातक बनाया।

कांग्रेस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार में बाद में मुस्लिम लीग भी शामिल हुई, किंतु सत्ता-साझेदारी सफल नहीं हुई। केंद्र, संविधान सभा, प्रांतीय समूहों और पाकिस्तान की माँग पर गतिरोध ने ब्रिटिश सरकार को शीघ्र सत्ता हस्तांतरण की ओर धकेला।

8.6 · 3 जून योजना

माउंटबेटन की समय-सारणी और विभाजन की स्वीकृति

लॉर्ड लुई माउंटबेटन मार्च 1947 में अंतिम वायसराय बनकर आए। ब्रिटिश सरकार ने पहले जून 1948 तक सत्ता हस्तांतरण का संकेत दिया था, लेकिन माउंटबेटन ने इसे अगस्त 1947 तक सीमित कर दिया। सेना, पुलिस, मंत्रालय, संपत्ति, संचार, रेल, सीमा और शरणार्थी प्रबंध जैसे विशाल कामों के लिए यह समय अत्यंत कम था।

3 जून 1947 की योजना ने भारत और पाकिस्तान के रूप में विभाजन स्वीकार किया। पंजाब और बंगाल की विधानसभाओं को विभाजन पर निर्णय करना था; दोनों प्रांतों के लिए सीमा आयोग बने; सिलहट और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत में जनमत-संग्रह की व्यवस्था हुई और सत्ता हस्तांतरण अगस्त में निश्चित किया गया।

कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने अंततः योजना स्वीकार की। कांग्रेस नेतृत्व ने इसे बढ़ती हिंसा, प्रशासनिक विघटन और अनिश्चितता के बीच अत्यंत पीड़ादायक किंतु व्यावहारिक निर्णय माना; मुस्लिम लीग के लिए यह पाकिस्तान की स्थापना की निर्णायक सफलता थी। विभाजन अपरिहार्य था या राजनीतिक भूलों और औपनिवेशिक जल्दबाजी का परिणाम—यह इतिहासलेखन का खुला प्रश्न बना रहा।

8.7 · कानूनी आधार

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम और दो अधिराज्यों का गठन

ब्रिटिश संसद ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 पारित किया और 18 जुलाई को शाही स्वीकृति मिली। अधिनियम ने 15 अगस्त 1947 से भारत और पाकिस्तान नामक दो स्वतंत्र अधिराज्यों की स्थापना, ब्रिटिश संसद की संप्रभु विधायी सत्ता की समाप्ति तथा पंजाब और बंगाल के विभाजन का कानूनी आधार बनाया।

भारत 1947 में तत्काल गणराज्य नहीं बना था। वह राष्ट्रमंडल के अंतर्गत स्वशासी अधिराज्य था; ब्रिटिश सम्राट औपचारिक राष्ट्राध्यक्ष और गवर्नर-जनरल उनका प्रतिनिधि था। लॉर्ड माउंटबेटन के बाद जून 1948 में सी. राजगोपालाचारी गवर्नर-जनरल बने। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने पर भारत संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य बना।

कानून राष्ट्र बना रहा था, पर जमीन पर लोगों को अपनी भावी नागरिकता और सीमा का ज्ञान नहीं था। गाँव, तहसील, नहर, रेलमार्ग, मंडी, धार्मिक स्थल और पारिवारिक संपत्ति सीमा आयोग के निर्णय पर निर्भर हो गए।

8.8 · सीमा-निर्धारण

रैडक्लिफ रेखा: पाँच सप्ताह में खींची गई सीमा

पंजाब और बंगाल के लिए अलग सीमा आयोगों की अध्यक्षता ब्रिटिश न्यायविद सर सिरिल रैडक्लिफ ने की, जिन्होंने इससे पहले भारत में काम नहीं किया था। उन्हें लगातार मुस्लिम और गैर-मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्रों के साथ नहर, रेल, व्यापार, प्रशासन, संचार और भूगोल जैसे अन्य कारकों पर विचार करना था।

भारत और पाकिस्तान क्रमशः 15 और 14 अगस्त को स्वतंत्र हुए, पर सीमा-निर्णय 17 अगस्त को सार्वजनिक हुआ। सीमावर्ती क्षेत्रों में भय और अफवाह पहले ही फैल चुकी थी। निर्णय आने पर अनेक लोगों को अचानक पता चला कि उनका घर, खेत या व्यापारिक केंद्र अपेक्षा से अलग देश में चला गया है।

पश्चिमी पंजाब पाकिस्तान और पूर्वी पंजाब भारत में आया। लाहौर पाकिस्तान में और अमृतसर भारत में रहा। पूर्वी बंगाल पाकिस्तान तथा पश्चिमी बंगाल भारत में गया; कलकत्ता भारत और ढाका पूर्वी पाकिस्तान का प्रमुख केंद्र बना। एक-दूसरे पर निर्भर सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों को राजनीतिक रेखा ने काट दिया।

मुख्य तथ्य

सीमा की घोषणा स्वतंत्रता के दो दिन बाद होना भय, अफवाह और प्रशासनिक संकट बढ़ाने वाला निर्णायक कारक बना।

8.9 · सामूहिक हिंसा

दंगे नहीं, अनेक क्षेत्रों में संगठित जन-संहार जैसा संकट

विभाजन की हिंसा को केवल हिंदू-मुस्लिम दंगे कहना उसके संगठित रूप, स्थानीय सत्ता-संघर्ष और राज्य की विफलता को छिपा देता है। अनेक स्थानों पर हिंदू, मुस्लिम और सिख समुदायों के लोग शिकार भी बने और हमलावर जत्थों में भी शामिल हुए। इसके साथ ऐसे असंख्य उदाहरण भी हैं जहाँ लोगों ने अपनी जान जोखिम में डालकर दूसरे समुदाय के पड़ोसियों को बचाया।

राजनीतिक अनिश्चितता, सीमा की घोषणा में देरी, बदले की भावना, अल्पसंख्यक होने का भय, हथियारबंद जत्थे, संपत्ति पर नियंत्रण की लालसा और टूटती पुलिस-प्रशासन व्यवस्था ने हिंसा को बढ़ाया। गाँवों तथा मोहल्लों पर हमले, लूट, आगजनी, सामूहिक हत्या, धार्मिक स्थलों का विनाश, काफिलों और रेलगाड़ियों पर हमले, अपहरण, यौन हिंसा, जबरन विवाह और धर्म परिवर्तन इसके प्रमुख रूप थे।

पंजाब हिंसा और तत्काल जन-विनिमय का सबसे बड़ा केंद्र बना। विभिन्न अध्ययनों में अकेले पंजाब में लगभग 1.2 करोड़ लोगों के विस्थापन का अनुमान मिलता है। पूरे उपमहाद्वीप की मौतों और विस्थापन का सटीक लेखा युद्ध-जैसी अराजकता, लापता लोगों और बीमारी या यात्रा में हुई मौतों के अधूरे अभिलेखों के कारण संभव नहीं है।

8.10 · घर से शरणार्थी तक

पैदल काफिले, रक्तरंजित रेलगाड़ियाँ और कभी न लौट पाने का भय

किसान, व्यापारी, शिक्षक, मजदूर, कारीगर, विद्यार्थी और गृहिणियाँ कुछ दिनों में शरणार्थी बन गए। उन्हें तय करना था कि घर छोड़ें या रुकें, किसे साथ लें, जमीन-पशु-दुकान का क्या करें, कौन-सा रास्ता सुरक्षित है और क्या कभी लौट पाएँगे। बहुत से लोगों ने सोचा था कि वे कुछ समय बाद वापस आएँगे; उनके लिए वह वापसी कभी संभव नहीं हुई।

हजारों लोगों वाले पैदल काफिलों में बच्चे, गर्भवती महिलाएँ, बुजुर्ग, बीमार, पशु और बैलगाड़ियाँ साथ चलती थीं। भोजन, पानी, बीमारी, मौसम और हमले का खतरा निरंतर था। वे मकान के साथ पूर्वजों की स्मृतियाँ, श्मशान या कब्रिस्तान, धार्मिक स्थल, विद्यालय, बाजार और रिश्ते भी पीछे छोड़ रहे थे।

रेल विभाजन की सबसे भयावह स्मृतियों में है। कुछ गाड़ियाँ लोगों को सुरक्षित ले गईं, जबकि अनेक गाड़ियों और स्टेशनों पर हमले हुए। मृतकों से भरी रेलगाड़ियों की खबरें प्रतिशोध की नई लहरें पैदा करती थीं। जो रेल उपमहाद्वीप को जोड़ती थी, वही 1947 में भय और मृत्यु का प्रतीक बन गई।

8.11 · स्त्रियों की त्रासदी

अपहरण, यौन हिंसा और ‘सम्मान’ के नाम पर दोहरा अन्याय

महिलाओं के विरुद्ध अपहरण, यौन हिंसा, जबरन विवाह और जबरन धर्म परिवर्तन की घटनाएँ हुईं। स्त्री के शरीर को सामुदायिक सम्मान का प्रतीक मानने वाली मानसिकता ने उसे दूसरे समुदाय को अपमानित करने का माध्यम बनाया। सामाजिक कलंक और पारिवारिक चुप्पी के कारण अनेक पीड़ाएँ दशकों तक सार्वजनिक अभिलेखों से बाहर रहीं।

कुछ अध्ययनों में लगभग 50,000 महिलाओं के अपहरण का अनुमान है, किंतु संख्या पूर्ण नहीं है। भारत और पाकिस्तान ने सितंबर 1947 से खोज और वापसी के प्रयास शुरू किए। भारत ने 1949 में अपहृत व्यक्ति (पुनर्प्राप्ति और पुनर्स्थापना) अधिनियम बनाया। हजारों महिलाओं को खोजा गया, लेकिन कई के नए परिवार और बच्चे थे, कुछ लौटना नहीं चाहती थीं और कुछ को मूल परिवार द्वारा अस्वीकार किए जाने का भय था।

इसलिए ‘पुनर्प्राप्ति’ केवल बचाव की कहानी नहीं थी। उसमें स्त्री की इच्छा, राज्य, परिवार, धर्म, सामाजिक प्रतिष्ठा और नागरिकता के कठिन प्रश्न जुड़े थे। मौखिक इतिहास ने उन अनुभवों को सामने लाया जिन्हें सरकारी कागज दर्ज नहीं कर सके।

8.12 · सबसे असुरक्षित लोग

बच्चे, बुजुर्ग, गरीब और श्रमिक

हजारों बच्चे माता-पिता से बिछड़े, अनाथ हुए या दूसरे परिवारों में पहुँचे। कई बच्चों के नाम, धर्म, भाषा और पारिवारिक पहचान बदल गई। परिवारों ने वर्षों तक सरकारी कार्यालयों, राहत शिविरों और धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से खोए सदस्यों को खोजा।

बुजुर्गों के लिए पुरखों की भूमि और जीवनभर के सामाजिक संसार को छोड़ना विशेष रूप से कठिन था। गरीब किसान, भूमिहीन मजदूर, छोटे दुकानदार और कारीगर संसाधन तथा परिवहन के अभाव में सबसे अधिक असुरक्षित रहे। विभाजन ने पहले से विद्यमान सामाजिक असमानताओं को कई क्षेत्रों में और गहरा किया।

8.13 · पंजाब

मिश्रित समाज का सबसे तीव्र और रक्तरंजित विघटन

पंजाब में मुसलमान, हिंदू और सिख खेती, व्यापार, भाषाओं और साझा सांस्कृतिक संसार से जुड़े थे। राजनीतिक सीमा और अल्पसंख्यक बन जाने के भय ने इस मिश्रित जीवन को कुछ ही महीनों में तोड़ दिया। लाखों मुसलमान पूर्वी पंजाब से पश्चिम गए और लाखों हिंदू-सिख पश्चिमी पंजाब से भारत आए।

सिख समुदाय की बड़ी आबादी उन क्षेत्रों में थी जो पाकिस्तान में चले गए। गुरुद्वारे, गाँव, खेत और ऐतिहासिक स्मृतियाँ सीमा के दूसरी ओर रह गईं। अमृतसर भारत में रहा, लेकिन पश्चिमी पंजाब से जुड़ा उनका विशाल धार्मिक-सामाजिक संसार टूट गया। उसी प्रकार पूर्वी पंजाब से विस्थापित मुसलमानों ने अपना घर और स्थानीय संसार खोया।

पुलिस, सेना और प्रशासन स्वयं विभाजित हो रहे थे। अधिकारी और कर्मचारी नई सीमाओं के अनुसार स्थानांतरण की तैयारी में थे। अनेक जिलों में राज्य नियंत्रण टूट गया। राजनीतिक सीमा बनाने की जल्दबाजी के मुकाबले नागरिक सुरक्षा की तैयारी अत्यंत अपर्याप्त सिद्ध हुई।

8.14 · बंगाल, सिंध और अन्य क्षेत्र

धीमा, जटिल और दशकों तक चलता विस्थापन

बंगाल का अनुभव पंजाब से अलग था। पूर्वी बंगाल से हिंदुओं का पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, असम और भारत के अन्य भागों में आना वर्षों तक जारी रहा; पश्चिम बंगाल से मुसलमानों का पूर्वी पाकिस्तान जाना भी हुआ। दोनों ओर बड़ी अल्पसंख्यक आबादी बने रहने के कारण पलायन अनेक चरणों और दशकों में फैला।

कलकत्ता तथा आसपास के क्षेत्रों में शिविर, खाली भवन, विद्यालय और अनौपचारिक बस्तियाँ शरणस्थल बनीं। शरणार्थी कॉलोनियों ने पश्चिम बंगाल के शहरी भूगोल और राजनीति को बदल दिया। सिंध से आए हिंदू और सिख भारत के विभिन्न नगरों में बिखरे; उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत, असम, सिलहट और जम्मू-कश्मीर ने भी अपने विशिष्ट विस्थापन और सीमा-संघर्ष देखे।

भाषा, साहित्य, संगीत, भोजन और पारिवारिक स्मृति में खोया हुआ पूर्वी या पश्चिमी घर आज भी जीवित है। विभाजन एक दिन समाप्त हुई घटना नहीं, पीढ़ियों तक चलने वाली सामाजिक प्रक्रिया था।

8.15 · दिल्ली का परिवर्तन

राजधानी का शरणार्थी नगर और आर्थिक पुनर्निर्माण

पंजाब और उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों से बड़ी संख्या में हिंदू-सिख शरणार्थी दिल्ली आए, जबकि अनेक मुस्लिम परिवार पाकिस्तान गए या असुरक्षा में फँसे। पुराना किला, हुमायूँ का मकबरा और अन्य स्थान शिविर बने। बाद में लाजपत नगर, राजेंद्र नगर, पटेल नगर और तिलक नगर सहित अनेक बस्तियों का विकास पुनर्वास से जुड़ा।

शरणार्थी केवल सहायता पाने वाले लोग नहीं रहे। उन्होंने व्यापार, छोटे उद्योग, परिवहन, शिक्षा, बाजार और आवास निर्माण में बड़ा योगदान दिया। दिल्ली की भाषा, खान-पान, उद्यमशीलता और शहरी विस्तार पर उनका स्थायी प्रभाव पड़ा।

8.16 · गांधी के शांति-प्रयास

नोआखाली, कलकत्ता और दिल्ली में हिंसा रोकने की साधना

महात्मा गांधी सत्ता के उत्सव से दूर हिंसा-प्रभावित क्षेत्रों में शांति स्थापित करने में लगे थे। नोआखाली के गाँवों, कलकत्ता और बाद में दिल्ली में उन्होंने भय तथा प्रतिशोध छोड़ने, पड़ोसी समुदाय की रक्षा करने और किसी समुदाय के अपराध के लिए पूरे समुदाय को दोषी न मानने की अपील की।

अगस्त 1947 में कलकत्ता में उनकी उपस्थिति और उपवास को हिंसा रोकने वाले नैतिक हस्तक्षेप के रूप में याद किया जाता है। जनवरी 1948 में उन्होंने दिल्ली में सांप्रदायिक शांति और मुसलमानों की सुरक्षा के लिए उपवास रखा। 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे द्वारा उनकी हत्या ने स्वतंत्रता के तुरंत बाद उपस्थित सांप्रदायिक तनाव की भयावहता उजागर की।

8.17 · स्वतंत्र भारत की पहली परीक्षा

राहत, छोड़ी गई संपत्ति और पुनर्वास

नई सरकार को भोजन, वस्त्र, आश्रय, सुरक्षा और चिकित्सा की व्यवस्था करनी थी, जबकि सेना, पुलिस, रेल, डाक, वित्त और मंत्रालयों का विभाजन चल रहा था। सीमित संसाधनों के कारण राहत और पुनर्वास में अव्यवस्था, देरी, भ्रष्टाचार तथा असमानता की शिकायतें भी आईं।

भारत आए लोग पाकिस्तान में घर, भूमि, दुकान, बैंक खाते और पशु छोड़ आए थे; पाकिस्तान गए लोगों की संपत्ति भारत में छूटी। छोड़ी गई संपत्ति के स्वामित्व, दस्तावेज-विहीन दावों, भूमि और शहरी मकानों के वितरण तथा स्थानीय निवासियों के हितों से जुड़े प्रश्न वर्षों तक चले।

पुनर्वास केवल राहत नहीं, राष्ट्र-निर्माण था। नई बस्तियाँ, बाजार, विद्यालय और उद्योग बने। पंजाब, दिल्ली, राजस्थान और पश्चिम बंगाल का सामाजिक-आर्थिक भूगोल बदला, लेकिन खोए घर का दुख अनेक परिवारों में पीढ़ियों तक जीवित रहा।

8.18 · राष्ट्र-निर्माण

कानून-व्यवस्था, रियासतें, संविधान और नागरिकता

सरकार को सीमा की हिंसा, राजधानी के तनाव, काफिलों की सुरक्षा, राहत शिविरों और विभाजित सुरक्षा-तंत्र को एक साथ सँभालना था। इसके अतिरिक्त ब्रिटिश आधिपत्य समाप्त होने पर लगभग 565 रियासतों के भारत या पाकिस्तान से संबंध का प्रश्न खड़ा हुआ। पटेल और वी. पी. मेनन ने अधिकांश रियासतों के भारत में एकीकरण में केंद्रीय भूमिका निभाई; जूनागढ़, हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर जटिल प्रकरण बने।

विभाजन के बाद संविधान सभा को समान नागरिकता, मौलिक अधिकार, अल्पसंख्यक संरक्षण, संघवाद, भाषा और सामाजिक न्याय के प्रश्नों का समाधान करना था। जन्म, निवास और प्रवासन के आधार पर नागरिकता तय करना उन लोगों के लिए विशेष रूप से कठिन था जिनका परिवार, जन्मस्थान और संपत्ति दो देशों में बँट गए थे।

स्वतंत्र भारत ने धर्म को सामान्य नागरिकता की शर्त नहीं बनाया। विभाजन की पृष्ठभूमि ने संविधान निर्माताओं को समझाया कि लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं, कानून का शासन, समान अधिकार और असुरक्षित नागरिकों की रक्षा भी है।

8.19 · स्मृति और साहित्य

आँकड़ों के पीछे छिपे मनुष्य की आवाज

सरकारी दस्तावेज कानून, नीति और आँकड़े बताते हैं, लेकिन किसी परिवार के टूटने, बच्चे के खोने, स्त्री की चुप्पी या व्यक्ति द्वारा घर को आखिरी बार देखने की पीड़ा पूरी तरह दर्ज नहीं कर पाते। इसलिए अखबार, संस्मरण, पत्र, डायरी, चित्र, शरणार्थी पंजियाँ और मौखिक इतिहास विभाजन-अध्ययन के अनिवार्य स्रोत हैं।

भीष्म साहनी का ‘तमस’, सआदत हसन मंटो की कहानियाँ, खुशवंत सिंह की ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ और अमृता प्रीतम की रचनाएँ आँकड़ों के पीछे मनुष्य को सामने लाती हैं। साहित्य सरकारी अभिलेख का विकल्प नहीं, मानवीय अनुभव का विशिष्ट प्रमाण है।

विभाजन संग्रहालय और मौखिक इतिहास परियोजनाओं की गवाहियाँ बताती हैं कि लोग सीमा के साथ डर, बिछोह, अपराधबोध, साहस और जीवित बचने की स्मृति भी लेकर चले। स्मृति समय के साथ बदल सकती है, इसलिए उसे अन्य स्रोतों से मिलाकर पढ़ना चाहिए; फिर भी मौन और अनुभव भी इतिहास का हिस्सा हैं।

8.20 · इतिहासलेखन

नेताओं के निर्णय से सामान्य मनुष्य के अनुभव तक

राजनीतिक इतिहास कांग्रेस, मुस्लिम लीग, ब्रिटिश सरकार, गांधी, नेहरू, जिन्ना, पटेल और माउंटबेटन के निर्णयों तथा कैबिनेट मिशन की विफलता पर केंद्रित रहा। सामाजिक इतिहास ने पूछा कि हिंसा पड़ोस में कैसे फैली, संपत्ति और स्थानीय सत्ता ने उसे कैसे प्रभावित किया और शरणार्थियों ने नए समुदाय कैसे बनाए।

लैंगिक इतिहास ने अपहरण, यौन हिंसा, पुनर्प्राप्ति और स्त्री की इच्छा के प्रश्न उठाए। सीमा और प्रवास अध्ययन ने 1947 के बाद नागरिकता, संपत्ति, अल्पसंख्यक जीवन और लगातार चलते पलायन को सामने रखा। बिपन चंद्र, आयशा जलाल, यास्मीन खान, उर्वशी बुटालिया, रितु मेनन, कमला भसीन और ज्ञानेंद्र पांडे सहित अनेक विद्वानों ने इस बहुस्तरीय समझ को समृद्ध किया।

विभाजन और सांप्रदायिकता जुड़े हुए, पर समान नहीं हैं। सांप्रदायिकता धार्मिक समुदाय को राजनीतिक हित की मुख्य इकाई और दूसरे समुदाय को खतरे के रूप में प्रस्तुत करती है; विभाजन उसका राजनीतिक-भौगोलिक परिणाम था, जिसमें औपनिवेशिक नीति, संवैधानिक विफलता, नेतृत्वगत निर्णय और हिंसा भी शामिल थे।

8.21 · प्रमुख समयरेखा

मई 1946 से जनवरी 1950 तक

16 मई 1946—कैबिनेट मिशन योजना की घोषणा। 16 अगस्त 1946—मुस्लिम लीग का प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस और कलकत्ता में व्यापक हिंसा। मार्च 1947—लॉर्ड माउंटबेटन अंतिम वायसराय बने। 3 जून 1947—माउंटबेटन योजना की घोषणा। 18 जुलाई 1947—भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम को शाही स्वीकृति।

14 अगस्त 1947—पाकिस्तान का स्वतंत्रता समारोह। 15 अगस्त 1947—भारत स्वतंत्र हुआ। 17 अगस्त 1947—रैडक्लिफ सीमा-निर्णय सार्वजनिक। सितंबर 1947—अपहृत महिलाओं की खोज और वापसी पर भारत-पाक प्रयास तेज। 30 जनवरी 1948—महात्मा गांधी की हत्या। 26 जनवरी 1950—संविधान लागू और भारत गणराज्य बना।

8.22 · आवश्यक शब्दावली

सीमा, नागरिकता और पुनर्वास की भाषा

अधिराज्य—राष्ट्रमंडल के अंतर्गत स्वशासी राज्य; 1947 से 1950 के बीच भारत की संवैधानिक स्थिति। रैडक्लिफ रेखा—1947 में भारत और पाकिस्तान के बीच निर्धारित सीमा। शरणार्थी—हिंसा, भय या उत्पीड़न के कारण घर छोड़ने को विवश व्यक्ति। विस्थापन—व्यक्ति या समुदाय का मूल निवास से हट जाना।

पुनर्वास—विस्थापितों के लिए आवास, आजीविका, संपत्ति और सामाजिक जीवन की नई व्यवस्था। छोड़ी गई संपत्ति—पलायन करने वाले लोगों की पीछे छूटी भूमि, भवन या व्यापारिक संपत्ति। जनमत-संग्रह—मतदान द्वारा किसी क्षेत्र की राजनीतिक स्थिति तय करना। सीमा आयोग—नई अंतरराष्ट्रीय या प्रांतीय सीमाएँ निर्धारित करने वाला आयोग।

8.23 · स्रोत-आधार

अभिलेख, कानून, शोध और जीवित गवाहियाँ

इस अध्याय का स्रोत-आधार ब्रिटेन के राष्ट्रीय अभिलेखागार में संरक्षित विभाजन सामग्री, ब्रिटिश संसद के 3 जून 1947 के विवरण, भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, पंजाब और बंगाल सीमा आयोगों के रैडक्लिफ निर्णय, विभाजन संग्रहालय तथा 1947 विभाजन अभिलेखागार की मौखिक गवाहियाँ हैं।

जन-पलायन और मृत्यु के आँकड़ों के लिए जनसांख्यिकीय तथा ऐतिहासिक अध्ययनों की अनुमान-सीमा अपनाई गई है। महिलाओं के अनुभवों के लिए अपहरण, यौन हिंसा, पुनर्प्राप्ति कानून और मौखिक इतिहास पर केंद्रित शोधों का उपयोग किया गया है। जहाँ स्रोत अलग-अलग संख्या देते हैं, वहाँ अनुमान को अनुमान के रूप में ही रखा गया है।

मुख्य तथ्य

विस्थापन, मृत्यु और अपहृत महिलाओं की संख्या स्रोतों के अनुसार बदलती है; मानवीय त्रासदी को किसी एक विवादित आँकड़े तक सीमित नहीं किया गया है।

OCN ऐतिहासिक आकलन

विभाजन किसी एक दिन या सीमा-रेखा की घटना नहीं था। राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लंबे विवाद, मुस्लिम लीग की पाकिस्तान माँग, कांग्रेस की अखिल भारतीय राष्ट्र-कल्पना, औपनिवेशिक संस्थाएँ, विफल संवैधानिक समझौते, 1946–47 की हिंसा और जल्दबाजी में हुए सत्ता हस्तांतरण ने मिलकर इसे जन्म दिया। स्वतंत्रता की उपलब्धि असाधारण थी, पर उसकी मानवीय कीमत को छिपाना इतिहास से अन्याय होगा। विभाजन के दंश का सबसे सच्चा लेखा करोड़ों विस्थापितों, महिलाओं, बच्चों, शरणार्थियों और अपने खोए घर को पीढ़ियों तक याद रखने वाले परिवारों की स्मृतियों में मिलता है।