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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–006 · भाग 09

1947–49 — कश्मीर संघर्ष और रियासतों का विलय

अखंड भारत के निर्माण में विलय-पत्र, पटेल–मेनन की रणनीति, जूनागढ़, हैदराबाद और पाकिस्तान-समर्थित कश्मीर आक्रमण का विस्तृत अध्ययन

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskसंस्करण 1.0 · 20 जुलाई 2026

स्वतंत्रता के साथ भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्ति तो मिली, लेकिन उसकी भौगोलिक एकता स्वतः सुनिश्चित नहीं थी। सैकड़ों रियासतों का भविष्य अनिश्चित था और जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान-समर्थित आक्रमण ने नवजात राष्ट्र को युद्ध में धकेल दिया। 1947 से 1949 के बीच हुए निर्णयों ने आधुनिक भारत का मानचित्र, संघीय ढाँचा और सुरक्षा-दृष्टि निर्मित की।

9.1 · ब्रिटिश सर्वोच्चता का अंत

दो तरह का भारत और रियासतों के भविष्य का प्रश्न

15 अगस्त 1947 से पहले उपमहाद्वीप का एक भाग ब्रिटिश सरकार के सीधे प्रशासन वाले प्रांतों में और दूसरा देशी रियासतों में बँटा था। रियासतों में राजा, महाराजा या नवाब शासन करते थे। वे आंतरिक मामलों में अलग-अलग सीमा तक स्वायत्त थे, किंतु रक्षा, विदेश संबंध और ब्रिटिश ताज से जुड़े विषयों में ब्रिटिश सर्वोच्चता स्वीकार करते थे। इसलिए उन्हें पूर्णतः स्वतंत्र आधुनिक राष्ट्र मानना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं है।

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के साथ ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त हो गई। लगभग 560 से अधिक रियासतों के सामने भारत या पाकिस्तान से जुड़ने का प्रश्न आया; कुछ शासकों ने स्वतंत्र रहने की संभावना भी टटोली। कानूनी कल्पना में यह तीसरा रास्ता दिखाई देता था, पर भूगोल, रेल, डाक, व्यापार, मुद्रा, संचार और सुरक्षा के कारण अधिकांश रियासतों के लिए व्यवहार में टिकाऊ नहीं था।

यदि ये क्षेत्र अलग-अलग संप्रभु इकाइयों में बदलते, तो स्वतंत्र भारत दर्जनों बड़े और सैकड़ों छोटे राजनीतिक टुकड़ों के बीच घिर सकता था। इसीलिए रियासतों का अधिमिलन केवल प्रशासनिक कार्य नहीं, भारत की भौगोलिक एकता और संप्रभुता की पहली परीक्षा था।

मुख्य तथ्य

ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त होने का अर्थ यह नहीं था कि प्रत्येक रियासत स्वतः एक सक्षम, पूर्ण स्वतंत्र राष्ट्र बन गई थी।

9.2 · एकीकरण की चुनौती

संभावित विखंडन से राष्ट्रीय संघ तक

अलग-अलग रियासतें बनी रहतीं तो देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा कमजोर होती। रेलमार्ग और डाक-तार अनेक सीमाओं से कटते, व्यापार और कर-व्यवस्था बिखरती, सेना तथा संचार का संचालन कठिन होता और विदेशी शक्तियों को हस्तक्षेप के अवसर मिलते। लोकतांत्रिक भारत के भीतर कई निरंकुश राजतंत्रों का बने रहना जनता के अधिकारों से भी टकराता।

एकीकरण का लक्ष्य केवल भारतीय मानचित्र का क्षेत्रफल बढ़ाना नहीं था। यह साझा रक्षा, अखिल भारतीय बाजार, प्रशासनिक निरंतरता और संविधान-आधारित नागरिकता स्थापित करने का कार्यक्रम था। इस प्रक्रिया में शासकों के विशेषाधिकार, प्रजामंडल आंदोलनों की लोकतांत्रिक माँगें, स्थानीय पहचान और केंद्रीय सुरक्षा—सभी को एक साथ साधना पड़ा।

अधिकांश रियासतों का अधिमिलन बातचीत से हुआ, किंतु सभी मामले एक जैसे नहीं थे। कहीं भूगोल और अर्थव्यवस्था निर्णायक बने, कहीं जनता का आंदोलन और राजनीतिक दबाव, और जूनागढ़, हैदराबाद तथा जम्मू-कश्मीर में संकट सैन्य तथा अंतरराष्ट्रीय आयाम तक पहुँचा।

9.3 · निर्णायक नेतृत्व

सरदार वल्लभभाई पटेल और वी. पी. मेनन

स्वतंत्र भारत के पहले उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल को रियासतों से जुड़े मामलों की प्रमुख जिम्मेदारी मिली। 5 जुलाई 1947 को स्थापित राज्य विभाग ने इस कार्य को संस्थागत रूप दिया। विभाग के सचिव वी. पी. मेनन संवैधानिक और प्रशासनिक समझ रखने वाले अधिकारी थे; उन्होंने वार्ताओं, दस्तावेजों और विलय की व्यावहारिक रूपरेखा तैयार करने में केंद्रीय भूमिका निभाई।

पटेल की नीति में केवल कठोरता नहीं थी। उन्होंने शासकों को भूगोल और आर्थिक निर्भरता समझाई, सम्मानजनक संक्रमण का आश्वासन दिया, आंतरिक स्वायत्तता की आरंभिक सीमा स्वीकार की और निजी कोष—अर्थात प्रिवी पर्स—की व्यवस्था द्वारा तत्काल सत्ता-त्याग को सुगम बनाया। आवश्यकता पड़ने पर राजनीतिक दबाव, जनमत और शक्ति-प्रयोग से भी परहेज नहीं किया गया।

पटेल ने राष्ट्रीय दिशा और राजनीतिक निर्णय दिए; मेनन ने उन्हें वैधानिक भाषा तथा प्रशासनिक प्रक्रिया में बदला। इस साझेदारी ने कुछ ही महीनों में उस विखंडन की आशंका को काफी हद तक समाप्त कर दिया जिसे ब्रिटिश सर्वोच्चता का अंत जन्म दे सकता था।

मुख्य तथ्य

पटेल की राजनीतिक दृढ़ता और मेनन की संवैधानिक-प्रशासनिक कुशलता परस्पर पूरक थीं।

9.4 · कानूनी माध्यम

विलय-पत्र और चरणबद्ध एकीकरण

रियासतों को भारतीय अधिराज्य से जोड़ने का प्रमुख दस्तावेज विलय-पत्र—इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन—था। इसे स्वीकार कर शासक रक्षा, विदेश मामले और संचार से जुड़े विषयों पर भारत की विधायी तथा कार्यकारी सत्ता मानता था। प्रारंभिक अधिमिलन से रियासत का पूरा आंतरिक प्रशासन तत्काल केंद्र को नहीं मिलता था।

इसके बाद विलय समझौतों, छोटी रियासतों के पड़ोसी प्रांतों में समावेश और अनेक रियासतों के संघ बनाकर प्रशासनिक एकीकरण आगे बढ़ा। सौराष्ट्र, राजस्थान, मध्य भारत, पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ तथा त्रावणकोर-कोचीन इसी क्रम में बने। 1949–50 तक संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं ने इन इकाइयों को भारतीय संघ के साझा ढाँचे से जोड़ा।

इस प्रकार प्रक्रिया के प्रमुख चरण थे—1947 का प्रारंभिक अधिमिलन, जूनागढ़-कश्मीर-हैदराबाद जैसे जटिल मामलों का समाधान, 1948–49 में प्रशासनिक विलय और संविधान लागू होने के साथ लोकतांत्रिक पुनर्गठन। इसे किसी एक दिन संपन्न हुई घटना कहना इसलिए भ्रामक होगा।

9.5 · व्यावहारिक वास्तविकताएँ

अधिकांश रियासतों ने भारत को क्यों चुना

अनेक रियासतें चारों ओर से भारतीय भूभाग से घिरी थीं। उनका व्यापार, रेल, बाजार, बंदरगाह, डाक, मुद्रा और बाहरी संपर्क आसपास के भारतीय प्रांतों पर निर्भर था। छोटी रियासतों के पास स्वतंत्र रक्षा, विदेश नीति, पर्याप्त राजस्व और आधुनिक प्रशासन चलाने की क्षमता भी नहीं थी।

रियासतों की जनता में उत्तरदायी शासन की माँग तेज हो रही थी। प्रजामंडल आंदोलनों ने शासक-केंद्रित व्यवस्था के विरुद्ध प्रतिनिधि संस्थाओं और नागरिक अधिकारों का प्रश्न उठाया। भारत में सम्मिलित होना अनेक क्षेत्रों के लिए आर्थिक स्थिरता के साथ लोकतांत्रिक परिवर्तन का रास्ता था।

पटेल ने शासकों से कहा कि रक्षा, विदेश नीति और संचार पूरे उपमहाद्वीप की साझा व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा हैं। निजी संपत्ति और निश्चित वार्षिक भुगतान की गारंटी ने उनके भय कम किए। समझाइश, व्यावहारिक हित और स्वतंत्र भारत की राजनीतिक शक्ति ने मिलकर अधिकांश अधिमिलन संभव बनाए।

9.6 · तीन जटिल मामले

जूनागढ़, हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर

जूनागढ़ के मुस्लिम नवाब ने हिंदू-बहुल और भारत से स्थल-संबद्ध रियासत को पाकिस्तान से जोड़ने का निर्णय किया। हैदराबाद के मुस्लिम निजाम ने भारत के मध्य स्थित हिंदू-बहुल विशाल रियासत को स्वतंत्र रखने का प्रयास किया। जम्मू-कश्मीर के हिंदू महाराजा ने मुस्लिम-बहुल किंतु बहुक्षेत्रीय राज्य पर निर्णय टाला, जब तक पाकिस्तान-समर्थित कबायली आक्रमण ने संकट को युद्ध में नहीं बदल दिया।

इन मामलों पर कोई एक सरल सूत्र लागू नहीं किया जा सकता था। शासक की इच्छा, जनता का व्यापक स्वरूप, भौगोलिक जुड़ाव, सुरक्षा, जन-आंदोलन और सैन्य परिस्थिति प्रत्येक स्थान पर अलग थी। इसी कारण जूनागढ़ में प्रशासनिक हस्तक्षेप और जनमत-संग्रह, हैदराबाद में सैन्य कार्रवाई तथा कश्मीर में विधिक अधिमिलन के बाद युद्ध—तीन भिन्न रास्ते सामने आए।

9.7 · जूनागढ़

भूगोल, जनमत और नवाब का पाकिस्तान से अधिमिलन

काठियावाड़ प्रायद्वीप की जूनागढ़ रियासत की अधिकांश आबादी हिंदू थी और उसकी पाकिस्तान से कोई सीधी स्थलीय सीमा नहीं थी। इसके बावजूद नवाब महाबत खानजी ने सितंबर 1947 में पाकिस्तान से अधिमिलन किया, जिसे पाकिस्तान ने स्वीकार कर लिया। निर्णय ने रियासत के भीतर विरोध और भारत के लिए गंभीर भौगोलिक-सुरक्षा प्रश्न पैदा किया।

स्थानीय असंतोष, पड़ोसी रियासतों के विरोध, आर्थिक कठिनाई और प्रशासनिक संकट के बीच नवाब पाकिस्तान चले गए। नवंबर 1947 में भारत ने प्रशासन संभाला। 20 फरवरी 1948 के जनमत-संग्रह में मतदान करने वालों का अत्यधिक बहुमत भारत के पक्ष में रहा; प्रचलित आधिकारिक आँकड़ों में 1,90,779 मत भारत और 91 मत पाकिस्तान के पक्ष में दर्ज हैं। पाकिस्तान ने इस प्रक्रिया को स्वीकार नहीं किया।

जूनागढ़ ने दिखाया कि केवल शासक का निर्णय पर्याप्त राजनीतिक समाधान नहीं बन सकता था। भौगोलिक निरंतरता, जनता की इच्छा और राज्य की प्रशासनिक व्यवहार्यता भी उतने ही निर्णायक प्रश्न थे।

9.8 · हैदराबाद

भारत के मध्य स्वतंत्र रहने की निजाम की कोशिश

हैदराबाद ब्रिटिश भारत की सबसे बड़ी और संपन्न रियासतों में थी। वह चारों ओर से भारतीय भूभाग से घिरी थी। बहुसंख्यक जनता हिंदू थी, जबकि सत्ता निजाम मीर उस्मान अली खान और मुस्लिम अभिजात वर्ग के हाथ में केंद्रित थी। निजाम भारत या पाकिस्तान से तत्काल जुड़ने के बजाय स्वतंत्र स्थिति बनाए रखना चाहते थे।

भारत और हैदराबाद के बीच नवंबर 1947 में यथास्थिति समझौता हुआ, ताकि मौजूदा प्रशासनिक संबंध अस्थायी रूप से चलते रहें। लेकिन यह प्रबंध स्थिर नहीं हुआ। हैदराबाद राज्य कांग्रेस और अन्य संगठनों की उत्तरदायी शासन तथा भारत में विलय की माँग, तेलंगाना का किसान संघर्ष, सामंती दमन और निजाम समर्थक राजनीति—सभी ने संकट को जटिल बनाया।

मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के नेता कासिम रिजवी के प्रभाव में रजाकार नामक सशस्त्र स्वयंसेवी संगठन तेजी से बढ़ा। रजाकारों पर ग्रामीण क्षेत्रों में भय, हिंसा और दमन फैलाने के गंभीर आरोप लगे। निजाम की स्वतंत्रता-नीति के साथ यह सशस्त्र उभार भारत की आंतरिक सुरक्षा और हैदराबाद की जनता के जीवन के लिए अस्वीकार्य संकट बनता गया।

9.9 · ऑपरेशन पोलो

पाँच दिन की सैन्य कार्रवाई और हैदराबाद का एकीकरण

13 सितंबर 1948 को भारतीय सेना ने ऑपरेशन पोलो आरंभ किया, जिसे भारत सरकार ने पुलिस कार्रवाई कहा। इसका घोषित उद्देश्य रजाकार हिंसा, बिगड़ती कानून-व्यवस्था और भारत के मध्य स्वतंत्र सशस्त्र रियासत से पैदा हुए खतरे को समाप्त करना था। लगभग पाँच दिन बाद 17 सितंबर को निजाम की सेना ने आत्मसमर्पण किया और भारतीय नियंत्रण स्थापित हो गया।

इसके बाद हैदराबाद का भारतीय संघ में प्रशासनिक और संवैधानिक एकीकरण आगे बढ़ा। निजाम को कुछ समय के लिए राज्य का राजप्रमुख बनाए रखा गया। इससे संक्रमण को तत्काल राजवंशीय टकराव में बदलने के बजाय नई संघीय व्यवस्था में समाहित करने का रास्ता मिला।

कार्रवाई के दौरान और बाद में सांप्रदायिक हिंसा तथा नागरिक मौतों की घटनाएँ भी हुईं। सुंदरलाल समिति की अप्रकाशित रिपोर्ट और बाद के अध्ययनों में इनका उल्लेख है, यद्यपि संख्या पर मतभेद हैं। इन घटनाओं की पड़ताल आवश्यक है, पर इससे रजाकार आतंक, निजाम की अव्यावहारिक स्वतंत्रता-नीति और भारत की अखंडता के लिए कार्रवाई की आवश्यकता का तथ्य समाप्त नहीं होता।

मुख्य तथ्य

हैदराबाद का एकीकरण भारत की भौगोलिक निरंतरता और जनता को रजाकार हिंसा से मुक्त कराने के लिए निर्णायक था।

9.10 · जम्मू-कश्मीर

बहुक्षेत्रीय रियासत और असाधारण सामरिक महत्व

जम्मू-कश्मीर रियासत में जम्मू, कश्मीर घाटी, लद्दाख, गिलगित-बाल्टिस्तान और अन्य पर्वतीय क्षेत्र शामिल थे। हिंदू, मुस्लिम, बौद्ध, सिख और अनेक स्थानीय समुदायों वाला यह राज्य सामाजिक तथा भौगोलिक रूप से अत्यंत विविध था। महाराजा हरि सिंह हिंदू थे और कुल आबादी में मुसलमान बहुसंख्यक थे, किंतु अलग-अलग क्षेत्रों की जनसंरचना और राजनीतिक आकांक्षाएँ समान नहीं थीं।

रियासत की सीमाएँ भारत और पाकिस्तान के साथ-साथ अफगानिस्तान तथा चीन से लगे उच्च हिमालयी क्षेत्रों के निकट थीं। सड़क, दर्रे, नदियाँ और सीमांत भूगोल इसे असाधारण सामरिक महत्व देते थे। इसके भविष्य का निर्णय केवल धार्मिक बहुमत का प्रश्न नहीं, उपमहाद्वीप की सुरक्षा और हिमालयी सीमाओं का प्रश्न भी था।

महाराजा हरि सिंह तत्काल भारत या पाकिस्तान से जुड़ने के बजाय स्वतंत्र रहने का विकल्प तलाश रहे थे। उन्होंने दोनों नए अधिराज्यों को यथास्थिति समझौते का प्रस्ताव दिया। पाकिस्तान ने इसे स्वीकार किया; भारत ने विस्तृत बातचीत की आवश्यकता बताई। यह अनिर्णय अक्टूबर 1947 के आक्रमण के सामने टिक नहीं सका।

9.11 · अक्टूबर 1947

पाकिस्तान-समर्थित कबायली आक्रमण और बारामूला का संकट

22 अक्टूबर 1947 के आसपास उत्तर-पश्चिमी सीमांत से आए कबायली लड़ाकों ने जम्मू-कश्मीर पर आक्रमण किया। उन्हें पाकिस्तान के भीतर से मार्ग, हथियार, रसद और सहयोग मिला। मुजफ्फराबाद की दिशा से बढ़ते हमलावरों ने मार्ग के कस्बों को रौंदा और बारामूला तक पहुँच गए। लूट, हत्या और हिंसा ने स्थानीय आबादी में आतंक फैलाया तथा श्रीनगर को सीधा खतरा पैदा किया।

रियासत की सेना कमजोर पड़ी, प्रशासन बिखरने लगा और महाराजा श्रीनगर से जम्मू की ओर चले गए। यदि श्रीनगर हवाई अड्डा हाथ से निकल जाता, तो बाहरी सैन्य सहायता पहुँचना लगभग असंभव हो सकता था। महाराजा ने भारत से सैनिक सहायता माँगी। भारत सरकार ने स्पष्ट किया कि किसी विधिक संबंध के बिना वह दूसरे राज्य में सेना नहीं भेज सकती।

इस प्रकार कश्मीर संकट का निर्णायक कारण पहले से उपस्थित राजनीतिक मतभेद मात्र नहीं, पाकिस्तान की ओर से आए सशस्त्र कबायली आक्रमण से पैदा हुआ तत्काल अस्तित्वगत खतरा था। आक्रमण ने महाराजा के लंबित निर्णय को समाप्त कर दिया और भारत से औपचारिक अधिमिलन का मार्ग बनाया।

मुख्य तथ्य

भारतीय सेना के पहुँचने से पहले आक्रमण आरंभ हो चुका था; सैन्य सहायता की माँग उसी आक्रमण के बाद की गई।

9.12 · 26–27 अक्टूबर 1947

विलय-पत्र, भारत की स्वीकृति और श्रीनगर की रक्षा

महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को भारत के साथ विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए। गवर्नर-जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने 27 अक्टूबर को इसे स्वीकार किया। इसके बाद भारतीय सैनिकों को हवाई मार्ग से श्रीनगर पहुँचाया गया और उन्होंने हवाई अड्डे की रक्षा करते हुए कबायली हमले को रोकने का अभियान शुरू किया।

जम्मू-कश्मीर का विलय-पत्र उसी वैधानिक प्रारूप पर आधारित था जिसका उपयोग अन्य रियासतों ने किया था। उसमें रक्षा, विदेश मामले और संचार भारत को सौंपे गए। आक्रमण के बीच हस्ताक्षर होने से परिस्थितियाँ असाधारण थीं, किंतु इससे दस्तावेज की कानूनी प्रकृति स्वतः अस्थायी नहीं हो जाती। भारत का पक्ष इसी वैध अधिमिलन और राज्य की सहायता की औपचारिक पुकार पर आधारित रहा।

माउंटबेटन ने स्वीकृति के साथ अलग पत्र में कानून-व्यवस्था बहाल होने पर राज्य की जनता की इच्छा जानने की अपेक्षा व्यक्त की। यह राजनीतिक आश्वासन था; विलय-पत्र में समाप्ति की कोई स्वतः लागू समय-सीमा नहीं थी। बाद के वर्षों में यही अंतर—विधिक अधिमिलन और राजनीतिक आश्वासन—भारत-पाकिस्तान विमर्श का प्रमुख विवाद बना।

9.13 · प्रथम भारत-पाक युद्ध

रियासत की रक्षा से अंतरराज्यीय युद्ध तक

भारतीय सेना ने श्रीनगर को सुरक्षित किया और कबायली दलों को पीछे धकेला, किंतु संघर्ष शीघ्र व्यापक युद्ध बन गया। पाकिस्तान की नियमित सेना की भागीदारी बढ़ी और नियंत्रण अनेक मोर्चों पर बदलता रहा। भारतीय बलों ने घाटी, जम्मू और लद्दाख के महत्वपूर्ण क्षेत्रों की रक्षा की; पश्चिमी तथा उत्तरी भूभाग का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के नियंत्रण में रहा।

युद्ध केवल सेनाओं के बीच नहीं था। जम्मू, मीरपुर, पुंछ, मुजफ्फराबाद और अन्य क्षेत्रों में स्थानीय हिंसा, हत्या तथा विस्थापन हुआ। अलग-अलग समुदायों ने गंभीर क्षति झेली। राज्य का पुराना प्रशासनिक और सामाजिक भूगोल टूट गया और परिवार नई सैन्य रेखाओं के आर-पार बँट गए।

भारत का कानूनी तर्क था कि अधिमिलन के बाद वह अपने संघ का हिस्सा बने राज्य की रक्षा कर रहा था। पाकिस्तान ने मुस्लिम बहुमत और जनता की इच्छा का तर्क दिया, लेकिन आक्रमणकारियों की वापसी तथा अपने नियंत्रण वाले क्षेत्र से सैन्य हस्तक्षेप समाप्त करने की पूर्वशर्त पूरी नहीं की। यही विरोध आगे संयुक्त राष्ट्र प्रक्रिया में भी निर्णायक बना।

9.14 · संयुक्त राष्ट्र

प्रस्ताव 39 और 47: शर्तों का अधूरा क्रम

भारत ने 1 जनवरी 1948 को संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 35 के अंतर्गत पाकिस्तान से आए आक्रमण और जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा का मामला सुरक्षा परिषद में रखा। 20 जनवरी के प्रस्ताव 39 ने भारत-पाकिस्तान के लिए संयुक्त राष्ट्र आयोग की स्थापना का मार्ग बनाया। 21 अप्रैल 1948 के प्रस्ताव 47 ने युद्धविराम, सेना हटाने और बाद में जनमत-संग्रह की क्रमबद्ध रूपरेखा दी।

प्रस्ताव 47 को केवल जनमत-संग्रह की स्वतंत्र प्रतिज्ञा के रूप में उद्धृत करना अधूरा है। पहले पाकिस्तान को अपने कबायली लड़ाकों और लड़ाई के उद्देश्य से राज्य में प्रवेश कर चुके पाकिस्तानी नागरिकों की वापसी सुनिश्चित करनी थी। इसके बाद भारत को कानून-व्यवस्था के लिए आवश्यक न्यूनतम बल तक सेना घटानी थी। शांति, निष्पक्ष प्रशासन और सुरक्षा स्थापित होने के बाद जनमत-संग्रह की अवस्था आनी थी।

पहले चरण—पाकिस्तान पक्ष की पूर्ण वापसी—पर सहमति और क्रियान्वयन नहीं हुआ। सैनिक हटाने के क्रम, पाकिस्तानी नियंत्रण वाले क्षेत्र के प्रशासन, सुरक्षा तथा जनमत-संग्रह की शर्तों पर दोनों देश नहीं मिले। इसलिए प्रस्तावित प्रक्रिया कभी उस अंतिम चरण तक नहीं पहुँची जहाँ जनमत-संग्रह कराया जा सकता था।

मुख्य तथ्य

संयुक्त राष्ट्र की रूपरेखा क्रमबद्ध और शर्तयुक्त थी; आक्रमणकारी तथा पाकिस्तानी तत्वों की वापसी उसका पहला अनिवार्य चरण था।

9.15 · 1949 का युद्धविराम

युद्ध रुका, रियासत का भूभाग विभाजित रहा

संयुक्त राष्ट्र आयोग की मध्यस्थता के बाद 1 जनवरी 1949 से युद्धविराम प्रभावी हुआ। इससे बड़े सैन्य अभियान रुके, लेकिन जम्मू-कश्मीर की पूर्व रियासत दो वास्तविक नियंत्रण क्षेत्रों में बँटी रही। भारत के प्रशासन में जम्मू, कश्मीर घाटी और लद्दाख का प्रमुख भाग रहा; पाकिस्तान ने पश्चिमी और उत्तरी क्षेत्रों पर नियंत्रण बनाए रखा।

27 जुलाई 1949 के कराची समझौते ने युद्धविराम रेखा को मानचित्र पर अंकित किया और संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षकों की व्यवस्था की। 1972 के शिमला समझौते के बाद संशोधित रेखा को नियंत्रण रेखा कहा गया। नाम और स्वरूप बदले, पर 1947–49 में पैदा हुआ भौगोलिक विभाजन स्थायी सुरक्षा-विवाद बना रहा।

युद्धविराम ने रक्तपात रोका, राजनीतिक समाधान नहीं दिया। पाकिस्तान के नियंत्रण में रहा भूभाग मूल जम्मू-कश्मीर रियासत का हिस्सा था और भारत ने पूरे राज्य के वैधानिक अधिमिलन का दावा कायम रखा। यही अंतर आज तक दोनों देशों की आधिकारिक स्थितियों में केंद्रीय है।

9.16 · दीर्घकालीन विवाद

कश्मीर प्रश्न समाप्त क्यों नहीं हुआ

भारत का दावा महाराजा के वैध विलय-पत्र पर आधारित है; पाकिस्तान धार्मिक बहुमत और आत्मनिर्णय के तर्क को सामने रखता रहा। किंतु पाकिस्तान-समर्थित आक्रमण, संयुक्त राष्ट्र की वापसी संबंधी पहली शर्त और अधिमिलन की कानूनी प्रकृति को अलग रखकर विवाद का इतिहास नहीं समझा जा सकता।

1949 के बाद क्षेत्र का विभाजित नियंत्रण अपने-आप एक नई राजनीतिक वास्तविकता बन गया। सैनिक तैनाती, सीमा-पार घुसपैठ, बाद के युद्ध और चीन के नियंत्रण तथा पाकिस्तान-चीन समझौतों से जुड़े भूभाग ने समस्या को और जटिल किया। सुरक्षा प्रश्न ने राजनीतिक संवाद को बार-बार पीछे धकेला।

जम्मू, कश्मीर घाटी, लद्दाख, गिलगित-बाल्टिस्तान और विस्थापित समुदायों की राजनीतिक आकांक्षाएँ एक जैसी नहीं रहीं। इसलिए कश्मीर को केवल भारत-पाकिस्तान विवाद या केवल एक घाटी की कहानी मानना भी अधूरा है। इसमें क्षेत्रीय पहचान, प्रतिनिधित्व, आतंकवाद, विकास, लोकतंत्र और नागरिक सुरक्षा के अलग-अलग अनुभव जुड़े हैं।

9.17 · नक्शे से आगे

राजशाही से लोकतंत्र और साझा अर्थव्यवस्था तक

रियासतों का विलय शासक के हस्ताक्षर पर समाप्त नहीं हुआ। अलग कानून, कर, न्यायालय, मुद्रा-संबंध, पुलिस और प्रशासन को भारतीय संविधान तथा संघीय ढाँचे से जोड़ना पड़ा। छोटी इकाइयों को बड़े प्रांतों या रियासती संघों में मिलाने के बाद चुनावी प्रतिनिधित्व और उत्तरदायी सरकार की संस्थाएँ विकसित हुईं।

रेल, सड़क, डाक, तार, सीमा शुल्क और बाजार का एकीकरण आर्थिक नियोजन के लिए अनिवार्य था। विभाजित अधिकार-क्षेत्रों को हटाए बिना देशव्यापी उद्योग, कृषि-विनिमय, सिंचाई, रक्षा और परिवहन नीति संभव नहीं थी। इस अर्थ में राजनीतिक एकीकरण ने भारत के आर्थिक राष्ट्र-निर्माण की भूमि तैयार की।

यह परिवर्तन हर जगह सरल नहीं था। प्रजामंडल आंदोलनों, किसान संघर्षों, भाषाई पहचानों, शासकों के हितों और केंद्र की प्राथमिकताओं में टकराव हुआ। फिर भी इसका व्यापक परिणाम राजवंशीय प्रजा को संविधान-प्रदत्त समान नागरिकता की ओर ले जाना था।

9.18 · संख्या और स्वैच्छिकता

560 से अधिक रियासतें और वास्तविक विकल्पों की सीमा

लोकप्रिय विवरणों में रियासतों की संख्या 562, 565 या लगभग 560 से अधिक मिलती है। अंतर इसलिए है कि छोटे जागीरदार क्षेत्र, सलामी राज्य, आश्रित इकाइयाँ और प्रशासनिक श्रेणियाँ अलग-अलग ढंग से गिनी गईं। शोध में सबसे सुरक्षित अभिव्यक्ति यही है कि ब्रिटिश सर्वोच्चता के अंत पर लगभग 560 से अधिक देशी रियासतों के भविष्य का प्रश्न उठा।

कानूनी रूप से शासकों के सामने विकल्प दिखाई देते थे, पर वास्तविक शक्ति-संतुलन और भौगोलिक निर्भरता ने स्वतंत्रता की संभावना सीमित कर दी थी। भारत से चारों ओर घिरी इकाई बाहरी रक्षा, व्यापार, मुद्रा और संचार बिना भारत की सहमति के कैसे चलाती—इसका व्यवहार्य उत्तर अधिकांश शासकों के पास नहीं था।

इसलिए सभी अधिमिलनों को एक ही शब्द में पूर्ण स्वैच्छिक या केवल बलपूर्वक कहना सही नहीं है। अधिकांश मामलों में सहमति, व्यावहारिक हित और समझौता प्रमुख थे; कुछ में जनता का दबाव, आर्थिक नाकेबंदी या सैन्य शक्ति निर्णायक बनी। अलग-अलग रियासतों का इतिहास उनके विशिष्ट प्रमाणों के आधार पर पढ़ा जाना चाहिए।

9.19 · प्रमुख कालक्रम

जुलाई 1947 से जुलाई 1949 तक निर्णायक मोड़

5 जुलाई 1947—राज्य विभाग की स्थापना। 15 अगस्त—ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त और अधिकांश रियासतों का अधिमिलन। सितंबर—जूनागढ़ ने पाकिस्तान से अधिमिलन किया। 22 अक्टूबर के आसपास—जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान-समर्थित कबायली आक्रमण। 26 अक्टूबर—महाराजा हरि सिंह ने भारत के विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए। 27 अक्टूबर—भारत ने विलय स्वीकार किया और भारतीय सैनिक श्रीनगर पहुँचे।

नवंबर 1947—भारत ने जूनागढ़ का प्रशासन संभाला। 1 जनवरी 1948—भारत ने कश्मीर मामला संयुक्त राष्ट्र में रखा। 20 जनवरी—सुरक्षा परिषद प्रस्ताव 39। 20 फरवरी—जूनागढ़ जनमत-संग्रह। 21 अप्रैल—सुरक्षा परिषद प्रस्ताव 47। 13 से 17 सितंबर—ऑपरेशन पोलो और हैदराबाद पर भारतीय नियंत्रण।

1 जनवरी 1949—जम्मू-कश्मीर में युद्धविराम लागू। 27 जुलाई 1949—कराची समझौते से युद्धविराम रेखा का निर्धारण। 1949–50—रियासती संघों और विलय समझौतों को संविधान-आधारित भारतीय संघ में समाहित करने का निर्णायक चरण।

9.20 · स्रोत-आधार

विलय-पत्र, श्वेतपत्र और संयुक्त राष्ट्र अभिलेख

इस अध्याय का प्रमुख आधार वी. पी. मेनन की द स्टोरी ऑफ द इंटीग्रेशन ऑफ द इंडियन स्टेट्स, भारत सरकार के राज्य मंत्रालय का व्हाइट पेपर ऑन इंडियन स्टेट्स, जम्मू-कश्मीर का मूल विलय-पत्र, समकालीन सरकारी पत्राचार और रियासतों के एकीकरण से जुड़े अभिलेख हैं। पटेल और मेनन की भूमिका का आकलन इन्हीं प्रशासनिक प्रक्रियाओं तथा दस्तावेजों के साथ किया गया है।

कश्मीर युद्ध और अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 39 और 47, भारत-पाकिस्तान के लिए संयुक्त राष्ट्र आयोग के अभिलेख तथा जुलाई 1949 का कराची समझौता केंद्रीय स्रोत हैं। हैदराबाद और जूनागढ़ पर सरकारी दस्तावेजों के साथ बाद के ऐतिहासिक अध्ययनों को रखा गया है।

जहाँ सरकारी दावे परस्पर विरोधी हैं, वहाँ कालक्रम, मूल दस्तावेज और लागू शर्तों को प्राथमिकता दी गई है। तथ्य और राजनीतिक व्याख्या का अंतर स्पष्ट रखकर ही रियासतों के विलय और कश्मीर संघर्ष का जिम्मेदार इतिहास लिखा जा सकता है।

OCN ऐतिहासिक आकलन

रियासतों का एकीकरण स्वतंत्र भारत की निर्णायक उपलब्धियों में है। सरदार वल्लभभाई पटेल की राजनीतिक दृढ़ता और वी. पी. मेनन की वैधानिक-प्रशासनिक कुशलता ने संभावित विखंडन को रोका। जूनागढ़ में भौगोलिक वास्तविकता और जनमत, हैदराबाद में रजाकार हिंसा तथा भारत के मध्य स्वतंत्र राज्य के खतरे, और जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान-समर्थित कबायली आक्रमण ने अलग-अलग समाधान माँगे। जम्मू-कश्मीर का भारत से अधिमिलन विधिक रूप से उसी मानक विलय-पत्र पर हुआ जिस पर अन्य रियासतें जुड़ीं। संयुक्त राष्ट्र की जनमत-संग्रह रूपरेखा पाकिस्तान पक्ष की वापसी से शुरू होने वाली शर्तयुक्त प्रक्रिया थी, जिसका पहला चरण ही लागू नहीं हुआ। 1949 का युद्धविराम युद्ध रोक सका, पर पाकिस्तान के नियंत्रण में रह गए भारतीय भूभाग और दोनों देशों के विरोधी दावों के कारण विवाद समाप्त नहीं हुआ।