प्राचीन और मध्यकालीन भारत
प्रागैतिहासिक मानव बसावट से दिल्ली सल्तनत के अंत तक भारतीय सभ्यता, राज्य, समाज, धर्म, अर्थव्यवस्था और संस्कृति का क्रमबद्ध इतिहास
खंड 01 · प्रागैतिहासिक भारत: मानव बसावट से सभ्यता की दहलीज तक
भारत का इतिहास लिखित अभिलेखों से बहुत पहले शुरू हो जाता है। मानव ने भारतीय उपमहाद्वीप में कब प्रवेश किया, वह किन क्षेत्रों में बसा, किस तरह पत्थर के औजार बनाए, शिकार और भोजन-संग्रह से खेती तक पहुँचा और फिर स्थायी बस्तियों की स्थापना की—इन प्रश्नों के उत्तर हमें ग्रंथों से नहीं, बल्कि पुरातात्विक अवशेषों से मिलते हैं।
इसी विशाल कालखंड को प्रागैतिहासिक काल कहा जाता है। यह वह समय था जब मानव ने अभी लेखन प्रणाली विकसित नहीं की थी या कम-से-कम ऐसी कोई लिखित सामग्री हमारे पास उपलब्ध नहीं है जिसे पढ़ा जा सके। इस काल का इतिहास पत्थर के औजारों, पशुओं की हड्डियों, शैलचित्रों, आवासों, कब्रों, अनाज के अवशेषों और मिट्टी के बर्तनों के आधार पर पुनर्निर्मित किया गया है।
भारतीय उपमहाद्वीप की विशेषता यह है कि यहाँ मानव जीवन के अत्यंत पुराने चरणों से लेकर कृषि आधारित स्थायी बस्तियों और आगे विकसित नगरीय सभ्यता तक की एक लंबी श्रृंखला दिखाई देती है।
प्रागैतिहासिक काल का विभाजन
पुरातत्त्वविद सामान्यतः प्रागैतिहासिक काल को औजारों, जीवन-पद्धति और तकनीकी विकास के आधार पर कई चरणों में विभाजित करते हैं। इनमें पुरापाषाण काल, मध्यपाषाण काल और नवपाषाण काल प्रमुख हैं। इनके बाद कुछ क्षेत्रों में ताम्रपाषाण संस्कृतियों का विकास हुआ, जिनमें पत्थर के साथ तांबे का भी प्रयोग होने लगा।
यह विभाजन पूरे भारत में एक ही समय पर लागू नहीं होता। अलग-अलग क्षेत्रों में जीवन-पद्धतियों और तकनीकी बदलावों का समय अलग रहा। कहीं शिकारी-संग्रहकर्ता जीवन अधिक समय तक जारी रहा, तो कहीं कृषि और पशुपालन पहले विकसित हो गए।
पुरापाषाण काल: भारत में प्रारंभिक मानव जीवन
पुरापाषाण काल प्रागैतिहासिक भारत का सबसे लंबा चरण है। इस समय मानव मुख्य रूप से शिकार, मृत पशुओं से मांस प्राप्त करने और जंगली फल, कंद-मूल तथा बीज इकट्ठा करने पर निर्भर था। स्थायी गाँव नहीं थे। छोटे समूह जल और भोजन की उपलब्धता के अनुसार स्थान बदलते रहते थे।
पत्थर के औजार इस काल की सबसे महत्वपूर्ण पहचान हैं। शुरुआती चरण में बड़े और अपेक्षाकृत भारी औजार बनाए गए। इनमें हस्तकुठार, काटने और खुरचने वाले औजार प्रमुख थे। धीरे-धीरे औजार बनाने की तकनीक अधिक परिष्कृत हुई और छोटे तथा अधिक उपयोगी पत्थर के उपकरण सामने आए।
भारतीय उपमहाद्वीप के अनेक हिस्सों से पुरापाषाणकालीन प्रमाण प्राप्त हुए हैं। नर्मदा घाटी, सोन और बेलन घाटियाँ, मध्य भारत, राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक और दक्षिण भारत के अन्य क्षेत्रों में प्राचीन औजार मिले हैं। इससे स्पष्ट होता है कि प्रारंभिक मानव समुदाय किसी एक छोटे भूभाग तक सीमित नहीं थे।
मध्य प्रदेश का भीमबेटका इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ के शैलाश्रय मानव और प्राकृतिक परिवेश के लंबे संबंध का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। भारतीय संस्कृति मंत्रालय भीमबेटका को भारतीय उपमहाद्वीप में मानव जीवन के अत्यंत प्राचीन पुरातात्विक प्रमाणों से जोड़ता है। (Indian Culture)
भीमबेटका: मानव जीवन और कला का अद्भुत साक्ष्य
मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित भीमबेटका के विशाल शैलाश्रय भारतीय प्रागैतिहासिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण धरोहरों में हैं। यहाँ मानव निवास, पत्थर के औजार और शैलचित्रों के प्रमाण मिलते हैं।
यूनेस्को के अनुसार भीमबेटका में प्राकृतिक शैलाश्रयों के पाँच प्रमुख समूह हैं और यहाँ की चित्रकला मध्यपाषाण काल से ऐतिहासिक काल तक चली आती दिखाई देती है। यह स्थल मानव समुदायों और प्राकृतिक परिवेश के दीर्घ संबंध को दर्शाता है। इसे 2003 में विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित किया गया। (UNESCO World Heritage Centre)
भीमबेटका के चित्रों में शिकार, पशु, समूह गतिविधियाँ और मानव जीवन के विभिन्न दृश्य दिखाई देते हैं। बाद के चित्रों में धनुष-बाण, घुड़सवार और अधिक विकसित सामाजिक गतिविधियों के संकेत भी मिलते हैं। इन चित्रों को केवल कला नहीं माना जा सकता; ये प्राचीन मानव जीवन के दृश्य दस्तावेज भी हैं।
मध्यपाषाण काल: बदलता जीवन
पुरापाषाण और नवपाषाण काल के बीच का चरण मध्यपाषाण काल कहलाता है। इस समय जलवायु और पर्यावरण में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। हिमयुग के अंत के बाद परिस्थितियाँ अपेक्षाकृत गर्म हुईं और वनस्पति तथा जीव-जगत में भी बदलाव आया।
इस काल की विशेष पहचान छोटे पत्थर के औजार हैं, जिन्हें सूक्ष्म पाषाण उपकरण कहा जाता है। इन्हें लकड़ी या हड्डी के साथ जोड़कर तीर, भाले या काटने वाले उपकरण बनाए जाते थे।
मध्यपाषाण समुदाय अभी भी शिकार और भोजन-संग्रह पर निर्भर थे, लेकिन उनके जीवन में विविधता बढ़ी। मछली पकड़ना, पक्षियों का शिकार और छोटे पशुओं को पकड़ना अधिक महत्वपूर्ण हुआ। राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान की सामग्री के अनुसार मध्यपाषाण संस्कृतियों के प्रमाण भारत के लगभग सभी बड़े क्षेत्रों में मिलते हैं। गुजरात का लंघनाज, मध्य प्रदेश का भीमबेटका, उत्तर प्रदेश की बेलन घाटी और दक्षिण भारत के अनेक स्थल इसके उदाहरण हैं। (NIOS Digital Resources)
इस समय मनुष्य के कुछ समूह अपेक्षाकृत लंबे समय तक एक स्थान पर रहने लगे। इससे स्थायी जीवन की दिशा में धीरे-धीरे परिवर्तन शुरू हुआ।
शैलचित्र और सामाजिक जीवन
मध्यपाषाण काल की सबसे आकर्षक विशेषताओं में शैलचित्र हैं। भीमबेटका सहित अनेक स्थलों पर शिकार, नृत्य, पशुओं और सामूहिक गतिविधियों के चित्र मिले हैं।
इन चित्रों से संकेत मिलता है कि मानव जीवन केवल भोजन की खोज तक सीमित नहीं था। समूहों में सामाजिक संबंध, सामूहिक शिकार और संभवतः अनुष्ठानों जैसी गतिविधियाँ भी थीं।
यह मनुष्य के मानसिक और सांस्कृतिक विकास का महत्वपूर्ण चरण था। उसने प्रकृति और आसपास की दुनिया को केवल उपयोग की वस्तु नहीं समझा, बल्कि उसे चित्रों और प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त भी करना शुरू किया।
नवपाषाण काल: मानव इतिहास का बड़ा परिवर्तन
प्रागैतिहासिक इतिहास का सबसे निर्णायक परिवर्तन नवपाषाण काल में दिखाई देता है। अब कुछ मानव समुदाय केवल प्रकृति से उपलब्ध भोजन पर निर्भर रहने के बजाय स्वयं अनाज पैदा करने और पशुओं को पालने लगे।
कृषि और पशुपालन ने मानव जीवन की पूरी संरचना बदल दी। खेती के लिए भूमि के पास अधिक समय तक रहना आवश्यक था। इससे स्थायी अथवा अर्ध-स्थायी बस्तियाँ बनीं। अनाज रखने, भोजन पकाने और वस्तुओं को सुरक्षित रखने की आवश्यकता ने मिट्टी के बर्तनों और भंडारण व्यवस्था को बढ़ावा दिया।
पत्थर के औजारों को घिसकर अधिक चिकना और उपयोगी बनाया जाने लगा। कुल्हाड़ियों और अन्य उपकरणों का प्रयोग पेड़ काटने और भूमि साफ करने जैसे कार्यों में हुआ।
इस परिवर्तन ने धीरे-धीरे ऐसे समाज को जन्म दिया जिसमें परिवार, बस्ती, कृषि भूमि और पशुधन की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होने लगी।
मेहरगढ़: खेती और पशुपालन की प्रारंभिक परंपरा
भारतीय उपमहाद्वीप के नवपाषाण इतिहास में मेहरगढ़ का विशेष महत्व है। यह स्थल वर्तमान पाकिस्तान के बलूचिस्तान में स्थित है और भारतीय उपमहाद्वीप के प्रारंभिक कृषक समुदायों को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
यहाँ गेहूँ और जौ की खेती तथा पशुओं के पालन के प्रमाण मिले हैं। पुरातात्विक अवशेष बताते हैं कि प्रारंभिक समुदाय मिट्टी की ईंटों से संरचनाएँ बनाते थे और धीरे-धीरे कृषि तथा पशुपालन आधारित जीवन विकसित कर रहे थे। बाद के चरणों में भंडारण से जुड़ी संरचनाएँ भी दिखाई देती हैं। (eGyankosh)
मेहरगढ़ का महत्व इस कारण भी है कि यह शिकारी-संग्रहकर्ता जीवन से कृषि आधारित स्थायी समाज की ओर संक्रमण को समझने में सहायता करता है।
कश्मीर का बुर्जहोम
कश्मीर घाटी का बुर्जहोम भारतीय नवपाषाण काल का एक विशिष्ट स्थल है। यहाँ शुरुआती आवास गड्ढों के रूप में बनाए जाते थे। माना जाता है कि ठंडे मौसम में ऐसे आवास लोगों को संरक्षण देते थे।
इन गड्ढेनुमा आवासों के आसपास खंभों के छेद मिले हैं, जिससे ऊपर किसी प्रकार की छत बनाए जाने की संभावना मानी जाती है। यहाँ पत्थर के साथ हड्डियों से बने औजार भी मिले हैं। बाद के चरण में मिट्टी या मिट्टी की ईंटों से बनी संरचनाएँ दिखाई देती हैं। (eGyankosh)
बुर्जहोम से मानव और पशु दफनाने के प्रमाण भी मिले हैं। कुछ कब्रों में कुत्तों के अवशेष भी पाए गए हैं। इससे उस समाज की मान्यताओं और मनुष्य-पशु संबंधों के बारे में महत्वपूर्ण संकेत मिलते हैं।
गंगा और विंध्य क्षेत्र में कृषि
कृषि का विकास केवल उत्तर-पश्चिमी भाग तक सीमित नहीं था। विंध्य और गंगा घाटी के क्षेत्रों में भी नवपाषाण बस्तियों के प्रमाण मिले हैं।
चोपनी मांडो, कोल्डिहवा, महगरा और लहुरादेवा जैसे स्थल इस क्षेत्र में प्रारंभिक कृषक समुदायों के अध्ययन में महत्वपूर्ण हैं। पुरातत्त्वविदों ने विंध्य-गंगा क्षेत्र में कई नवपाषाण बस्तियों की पहचान की है। (eGyankosh)
इन क्षेत्रों में मिले प्रमाण बताते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप में कृषि का विकास एक ही केंद्र से नहीं हुआ, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों में अलग परिस्थितियों के अनुसार कई प्रकार की कृषि परंपराएँ विकसित हुईं।
दक्षिण भारत का नवपाषाण जीवन
दक्षिण भारत में भी नवपाषाण संस्कृति का स्वतंत्र और महत्वपूर्ण विकास दिखाई देता है। कर्नाटक और आंध्र क्षेत्र में अनेक स्थलों से पशुपालन, कृषि और स्थायी बस्तियों के प्रमाण मिले हैं।
दक्षिण भारत की कुछ नवपाषाण बस्तियों में राख के बड़े टीले पाए गए हैं, जिन्हें पशुपालन से जुड़ी गतिविधियों से जोड़ा जाता है। कर्नाटक के बुदिहाल जैसे स्थलों से घरों, मानव दफन, पशुओं से संबंधित गतिविधियों और जल प्रबंधन के संकेत प्राप्त हुए हैं। (eGyankosh)
इस क्षेत्र में गाय-बैल आधारित पशुपालन का विशेष महत्व था। बाद में खेती और विभिन्न शिल्प गतिविधियाँ भी बढ़ती गईं।
मिट्टी के बर्तन और शिल्प
स्थायी बस्तियों के विकास के साथ घरेलू जीवन की आवश्यकताएँ भी बढ़ीं। अनाज रखने, पानी संग्रह करने और भोजन पकाने के लिए मिट्टी के बर्तन महत्वपूर्ण हो गए।
पत्थर के उपकरणों के अतिरिक्त हड्डी से बने उपकरण, मनके और सजावटी वस्तुएँ भी मिलने लगीं। कुछ क्षेत्रों में दूरस्थ स्थानों से प्राप्त सामग्री के प्रमाण यह संकेत देते हैं कि समुदायों के बीच वस्तुओं का आदान-प्रदान भी होने लगा था।
यहीं से उत्पादन, शिल्प और विनिमय की वह प्रक्रिया विकसित होने लगी, जो आगे चलकर अधिक जटिल अर्थव्यवस्था का आधार बनी।
मृतकों का संस्कार और प्रारंभिक मान्यताएँ
प्रागैतिहासिक स्थलों पर मिले समाधि और कब्र संबंधी प्रमाण मानव के मानसिक संसार को समझने में विशेष सहायता करते हैं।
कई स्थानों पर मृतकों के साथ वस्तुएँ रखी गईं। कुछ स्थानों पर पशुओं को भी मनुष्यों के साथ दफनाया गया। इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि इन समुदायों में मृत्यु के बाद जीवन या मृत व्यक्तियों से जुड़े किसी प्रकार के विश्वास रहे होंगे।
हालाँकि लिखित प्रमाणों के अभाव में उनकी धार्मिक मान्यताओं के बारे में निश्चित निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है। इसलिए पुरातात्विक साक्ष्यों की व्याख्या सावधानी से करनी चाहिए।
स्थायी बस्ती से समाज की नई संरचना
खेती और पशुपालन के साथ भोजन का उत्पादन बढ़ा। जहाँ पहले मानव समूह भोजन की तलाश में स्थान बदलते थे, वहीं अब वे एक क्षेत्र से अधिक गहराई से जुड़ने लगे।
घर बनने लगे, खेतों का उपयोग नियमित हुआ, पशुधन महत्त्वपूर्ण संपत्ति बना और अनाज का भंडारण संभव हुआ। इससे श्रम का विभाजन और सामाजिक भूमिकाओं में अंतर बढ़ने की परिस्थितियाँ बनीं।
कृषि की बढ़ती उत्पादकता ने यह संभावना भी पैदा की कि समुदाय का प्रत्येक व्यक्ति केवल भोजन जुटाने में न लगा रहे। कुछ लोग औजार निर्माण, मिट्टी के बर्तन, वस्त्र, व्यापार या अन्य कार्यों में विशेषज्ञ बन सकते थे।
आगे चलकर यही परिवर्तन बड़े गाँवों, व्यापारिक संबंधों और अंततः नगरों के उदय की आधारभूमि बने।
ताम्रपाषाण संस्कृतियों की ओर
नवपाषाण काल के बाद भारतीय उपमहाद्वीप के कई क्षेत्रों में ऐसी संस्कृतियाँ दिखाई देती हैं जिनमें पत्थर के साथ तांबे का भी उपयोग होता था। इन्हें ताम्रपाषाण संस्कृतियाँ कहा जाता है।
यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ। पत्थर के औजार लंबे समय तक उपयोग में बने रहे। तांबे की उपलब्धता सीमित थी और उसका उपयोग विशेष प्रकार की वस्तुओं और औजारों में होता था।
कृषि आधारित गाँवों, पशुपालन, बर्तनों, शिल्प और विनिमय की विकसित होती परंपराएँ धीरे-धीरे अधिक जटिल समाजों की ओर बढ़ीं।
सभ्यता की दहलीज
प्रागैतिहासिक भारत की सबसे बड़ी कहानी किसी एक शासक, युद्ध या साम्राज्य की नहीं है। यह मनुष्य के हजारों वर्षों में हुए परिवर्तन की कहानी है।
पत्थर उठाकर औजार बनाने वाले प्रारंभिक मानव से लेकर शिकार करने वाले समूहों, शैलचित्र बनाने वाले समुदायों, पशुपालकों और किसानों तक मानव जीवन लगातार बदलता रहा। उसने प्रकृति से केवल भोजन प्राप्त करना नहीं सीखा, बल्कि उसे नियंत्रित करने, भूमि पर खेती करने, पशुओं को पालने और स्थायी घर बनाने की क्षमता विकसित की।
छोटी बस्तियाँ धीरे-धीरे बड़े समुदायों में बदलीं। उत्पादन बढ़ा, शिल्प विकसित हुआ और वस्तुओं का विनिमय होने लगा। इसी लंबी प्रक्रिया ने भारतीय उपमहाद्वीप को उस ऐतिहासिक मोड़ तक पहुँचाया जहाँ बड़े नगर, संगठित अर्थव्यवस्था, व्यापार और विकसित सभ्यता का उदय संभव हुआ।
इसके बाद भारतीय इतिहास एक नए चरण में प्रवेश करता है—सिंधु–सरस्वती सभ्यता, जहाँ हमें योजनाबद्ध नगरों, विशाल निर्माण, विकसित शिल्प, दूरगामी व्यापार और एक ऐसी लिपि के प्रमाण मिलते हैं जिसे अभी तक निश्चित रूप से पढ़ा नहीं जा सका है।
प्रागैतिहासिक भारत इसलिए केवल इतिहास की भूमिका नहीं है। यही वह आधार था जिस पर आगे भारतीय सभ्यता की विशाल संरचना खड़ी हुई।
खंड 02 · सिंधु–सरस्वती सभ्यता: भारत की पहली महान नगरीय संस्कृति
भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में सिंधु–सरस्वती सभ्यता वह चरण है जहाँ मानव जीवन गाँवों और कृषि-बस्तियों से आगे बढ़कर सुव्यवस्थित नगरों, विकसित शिल्प, दूरगामी व्यापार और जटिल सामाजिक संगठन तक पहुँचता दिखाई देता है। इसे प्रायः हड़प्पा सभ्यता भी कहा जाता है, क्योंकि इस संस्कृति का पहला प्रमुख पुरातात्विक स्थल हड़प्पा था। पुरानी पुस्तकों में इसे व्यापक रूप से “सिंधु घाटी सभ्यता” कहा गया, लेकिन इसके अनेक स्थल सिंधु नदी-तंत्र से बाहर भी मिले हैं, विशेषकर घग्घर-हकरा क्षेत्र में। इसी कारण आधुनिक विमर्श में “सिंधु–सरस्वती सभ्यता” या “हड़प्पा सभ्यता” जैसे नाम भी प्रचलित हैं।
इस सभ्यता का परिपक्व नगरीय चरण सामान्यतः लगभग 2600 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व के बीच माना जाता है। इसके पहले प्रारंभिक हड़प्पा चरण और बाद में उत्तर हड़प्पा चरण भी रहे। धोलावीरा जैसे स्थलों पर बसावट की लंबी निरंतरता लगभग तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के आरंभ से दूसरी सहस्राब्दी के मध्य तक दिखाई देती है। (UNESCO World Heritage Centre)
खोज ने बदल दी भारतीय प्राचीन इतिहास की समझ
बीसवीं सदी के प्रारंभ तक भारतीय इतिहास की प्राचीनता को समझने का आधार मुख्यतः साहित्यिक स्रोत और बाद के पुरातात्विक अवशेष थे। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाइयों ने यह स्थापित किया कि भारतीय उपमहाद्वीप में तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में ही अत्यंत विकसित नगरीय सभ्यता मौजूद थी।
हड़प्पा वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र में और मोहनजोदड़ो सिंध क्षेत्र में स्थित है। बाद में भारत और पाकिस्तान में बड़ी संख्या में ऐसे स्थल मिले जिनसे स्पष्ट हुआ कि यह सभ्यता किसी एक नदी घाटी तक सीमित नहीं थी। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद के मानचित्रों में हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, राखीगढ़ी, कालीबंगा, धोलावीरा, लोथल, सुरकोटड़ा और चन्हुदड़ो जैसे प्रमुख केंद्रों को इस विस्तृत सांस्कृतिक क्षेत्र का हिस्सा दिखाया गया है। (NCERT)
सभ्यता का विशाल भूगोल
हड़प्पा सभ्यता का विस्तार अत्यंत व्यापक था। इसके अवशेष आज के पाकिस्तान के सिंध और पंजाब से लेकर भारत के हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक मिले हैं।
इसके प्रमुख स्थलों में—
हड़प्पा,
मोहनजोदड़ो,
राखीगढ़ी,
कालीबंगा,
धोलावीरा,
लोथल,
बनावली,
सुरकोटड़ा,
रोपड़ और
चन्हुदड़ो प्रमुख हैं।
यह भौगोलिक विस्तार महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पता चलता है कि हम किसी एक नगर या एक राज्य की नहीं, बल्कि विशाल सांस्कृतिक तंत्र की बात कर रहे हैं।
धोलावीरा के संबंध में यूनेस्को भी उल्लेख करता है कि यह हड़प्पा सभ्यता के एक हजार से अधिक ज्ञात स्थलों में से एक प्रमुख और अत्यंत सुरक्षित नगरीय केंद्र है। (UNESCO World Heritage Centre)
योजनाबद्ध नगर: सभ्यता की सबसे बड़ी पहचान
सिंधु–सरस्वती सभ्यता की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में उसकी नगर योजना थी।
मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, धोलावीरा और अन्य स्थलों पर सड़कों, आवासीय क्षेत्रों, नालियों और सार्वजनिक संरचनाओं का सुव्यवस्थित विन्यास दिखाई देता है। इससे स्पष्ट होता है कि नगर निर्माण आकस्मिक नहीं था।
कई नगरों में ऊँचे भाग और निचले आवासीय क्षेत्र अलग-अलग दिखाई देते हैं। पकी ईंटों का व्यापक उपयोग हुआ। अनेक स्थानों पर ईंटों के आकार में समान अनुपात दिखाई देता है, जो निर्माण संबंधी मानकों के अस्तित्व की ओर संकेत करता है।
धोलावीरा की योजना अन्य हड़प्पाई नगरों से कुछ भिन्न और अत्यंत विकसित थी। यहाँ दुर्गीकृत नगर, मध्य नगर, निचला नगर, समारोह स्थल तथा विशाल जलाशयों की व्यवस्था मिली है। यूनेस्को इसे नियोजित नगरीय संरचना और उन्नत जल प्रबंधन का असाधारण उदाहरण मानता है। (UNESCO World Heritage Centre)
जल निकासी की अद्भुत व्यवस्था
इस सभ्यता का जल निकासी तंत्र विशेष रूप से उल्लेखनीय था।
कई घरों से निकलने वाला पानी छोटी नालियों के माध्यम से बड़ी नालियों तक पहुँचता था। इन नालियों को कई स्थानों पर ढका गया था और सफाई के लिए व्यवस्था भी थी।
यह केवल तकनीकी कौशल का प्रमाण नहीं, बल्कि सामुदायिक जीवन के सुव्यवस्थित प्रबंधन का संकेत भी देता है।
आज से लगभग साढ़े चार हजार वर्ष पहले इतने बड़े नगरों में जल निकासी की ऐसी प्रणाली का होना इस सभ्यता की प्रशासनिक और अभियान्त्रिकी क्षमता को दर्शाता है।
धोलावीरा: पानी बचाने की असाधारण तकनीक
गुजरात के कच्छ क्षेत्र में स्थित धोलावीरा हड़प्पा सभ्यता की विशिष्ट प्रतिभा का उदाहरण है।
यह ऐसा क्षेत्र है जहाँ पानी की उपलब्धता सदैव चुनौतीपूर्ण रही है। इसके बावजूद यहाँ के निवासियों ने वर्षा और मौसमी जलधाराओं के पानी को संचित करने के लिए विशाल जलाशय बनाए।
नगर के विभिन्न हिस्सों में पानी पहुँचाने और उसे संग्रहित करने की सुव्यवस्थित व्यवस्था थी।
यूनेस्को के अनुसार धोलावीरा की जल-संचयन और जल-निकासी प्रणालियाँ उस समय के लोगों की तकनीकी दक्षता और कठिन प्राकृतिक परिस्थितियों में अनुकूलन क्षमता का उत्कृष्ट प्रमाण हैं। (UNESCO World Heritage Centre)
मोहनजोदड़ो का विशाल स्नानागार
मोहनजोदड़ो से प्राप्त विशाल स्नानागार इस सभ्यता की सबसे प्रसिद्ध संरचनाओं में है।
यह ईंटों से निर्मित एक बड़ा जलकुंड था जिसके चारों ओर कमरे और मार्ग बने थे। जलरोधक निर्माण तकनीक का उपयोग किया गया था।
यह संरचना किस उद्देश्य से बनाई गई थी, इस पर निश्चित निष्कर्ष नहीं है। बहुत से पुरातत्त्वविद मानते हैं कि इसका संबंध किसी सामुदायिक या धार्मिक स्नान से हो सकता है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सामान्य घरेलू स्नान क्षेत्र नहीं था। इसकी विशालता और निर्माण गुणवत्ता बताती है कि इसे किसी विशेष सार्वजनिक उद्देश्य के लिए बनाया गया था।
घर और दैनिक जीवन
हड़प्पाई नगरों में छोटे और बड़े दोनों प्रकार के मकान मिले हैं।
कई घरों में केंद्रीय आँगन था, जिसके चारों ओर कमरे बने थे। कुछ घरों में निजी कुएँ और स्नान क्षेत्र भी थे।
यह व्यवस्था घरेलू जीवन के सुव्यवस्थित स्वरूप की ओर संकेत करती है।
नगरों में अलग-अलग आकार के मकानों से सामाजिक और आर्थिक असमानता के संकेत मिलते हैं, लेकिन मिस्र की तरह विशाल राजमहल या राजाओं की भव्य कब्रें नहीं मिली हैं।
इसी कारण हड़प्पा सभ्यता की राजनीतिक संरचना आज भी एक बड़ा प्रश्न बनी हुई है।
कृषि और खाद्य उत्पादन
इस सभ्यता की आर्थिक नींव कृषि और पशुपालन पर आधारित थी।
गेहूँ और जौ प्रमुख फसलें थीं। विभिन्न क्षेत्रों में तिलहन, दालें और अन्य फसलों के भी प्रमाण मिले हैं। कपास की खेती भी महत्वपूर्ण थी।
कालीबंगा से खेत की जुताई से संबंधित पुरातात्विक संकेत प्राप्त हुए हैं, जो खेती की विकसित पद्धतियों की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं।
नदियों, मौसमी जलधाराओं और उपजाऊ मैदानों ने कृषि को सहारा दिया।
खेती के साथ गाय-बैल, भैंस, भेड़ और बकरी जैसे पशुओं का पालन भी होता था।
शिल्प और उद्योग
हड़प्पा सभ्यता के नगर केवल कृषि केंद्र नहीं थे। वे उत्पादन और शिल्प के भी बड़े केंद्र थे।
यहाँ से—
मिट्टी के बर्तन,
धातु की वस्तुएँ,
आभूषण,
मनके,
शंख से बनी वस्तुएँ,
मुद्राएँ,
मूर्तियाँ तथा
पत्थर और अर्धमूल्यवान रत्नों से बनी वस्तुएँ मिली हैं।
मोहनजोदड़ो से प्राप्त प्रसिद्ध कांस्य नर्तकी की प्रतिमा धातु ढलाई की उच्च तकनीक का प्रमाण है।
मनके बनाने की कला अत्यंत विकसित थी। धोलावीरा में मनका निर्माण कार्यशालाओं और तांबा, शंख, अर्धमूल्यवान पत्थर, सोना, हाथीदाँत और अन्य सामग्री के प्रमाण मिले हैं। (UNESCO World Heritage Centre)
मानकीकृत बाट और माप
व्यापारिक गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण प्रमाण मानकीकृत बाटों की व्यवस्था है।
विभिन्न हड़प्पाई स्थलों से समान अनुपात वाले पत्थर के बाट मिले हैं। इससे संकेत मिलता है कि वस्तुओं की तौल के लिए एक व्यापक रूप से स्वीकृत प्रणाली थी।
इतने बड़े भूभाग में समान माप और निर्माण परंपराओं का मिलना एक संगठित आर्थिक और सांस्कृतिक तंत्र की ओर संकेत करता है।
दूरगामी व्यापार
सिंधु–सरस्वती सभ्यता का व्यापार केवल स्थानीय नहीं था।
मेसोपोटामिया के स्रोतों में “मेलुह्हा” नामक क्षेत्र का उल्लेख मिलता है, जिसे अनेक विद्वान हड़प्पा क्षेत्र से जोड़ते हैं।
समुद्री और स्थल मार्गों से तांबा, कीमती पत्थर, मनके, शंख और अन्य वस्तुओं का आदान-प्रदान होता था।
गुजरात के तटीय क्षेत्र व्यापार में महत्वपूर्ण रहे होंगे। लोथल को लंबे समय से समुद्री व्यापार से जुड़े केंद्र के रूप में देखा जाता है।
धोलावीरा से भी मेसोपोटामिया और वर्तमान ओमान क्षेत्र के साथ व्यापारिक संबंधों के प्रमाण मिले हैं। (UNESCO World Heritage Centre)
लोथल और समुद्री संपर्क
गुजरात का लोथल हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख व्यापारिक स्थलों में था।
यहाँ मिली विशाल आयताकार संरचना को लंबे समय तक गोदी या बंदरगाह से संबंधित संरचना माना जाता रहा है। इसकी व्याख्या को लेकर पुरातात्विक बहस है, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि लोथल व्यापार और शिल्प का महत्वपूर्ण केंद्र था।
यहाँ मनका निर्माण और अन्य शिल्प गतिविधियों के प्रमाण मिले हैं।
अरब सागर के निकट होने के कारण लोथल का समुद्री व्यापार में महत्त्व रहा होगा।
हड़प्पाई मुहरें
इस सभ्यता की छोटी लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण वस्तुओं में मुहरें शामिल हैं।
इन मुहरों पर पशुओं और प्रतीकों के चित्र तथा छोटी-छोटी लिपियाँ दिखाई देती हैं। एक सींग वाला रहस्यमय पशु सबसे अधिक दिखाई देने वाले प्रतीकों में है।
बैल, हाथी, गैंडा और अन्य पशु भी मिलते हैं।
मुहरों का उपयोग संभवतः व्यापार, पहचान, संपत्ति अथवा प्रशासन से जुड़ी गतिविधियों में होता रहा होगा।
वह लिपि जिसे हम आज भी नहीं पढ़ सके
हड़प्पाई सभ्यता की सबसे बड़ी पहेलियों में उसकी लिपि है।
मुद्राओं, ताम्र-पत्रों, मिट्टी के बर्तनों और अन्य वस्तुओं पर छोटे लेख मिले हैं। अधिकांश लेख बहुत संक्षिप्त हैं।
आज तक इस लिपि को सर्वमान्य रूप से पढ़ा नहीं जा सका है।
यही कारण है कि हमें इस सभ्यता के लोगों के वास्तविक नाम, उनके शासकों, उनकी भाषा और उनकी धार्मिक मान्यताओं के बारे में प्रत्यक्ष लिखित जानकारी उपलब्ध नहीं है।
हड़प्पा सभ्यता इतिहास और प्रागैतिहासिक काल के बीच की ऐसी अवस्था है जहाँ लेखन के प्रमाण तो हैं, लेकिन वह हमारे लिए अभी अपठित है।
धर्म और आस्था: सावधानी आवश्यक
हड़प्पाई धर्म को समझने के प्रयासों में अनेक व्याख्याएँ की गई हैं।
कुछ मुहरों पर बैठी मानव आकृति को अतीत में “पशुपति” अथवा शिव के प्रारंभिक स्वरूप से जोड़ा गया। अनेक स्त्री-मूर्तियों को मातृदेवी से संबंधित माना गया। वृक्ष, पशुओं और कुछ प्रतीकों को धार्मिक महत्व दिया गया।
किन्तु इन व्याख्याओं को निश्चित सत्य नहीं माना जा सकता।
लिपि के न पढ़े जाने के कारण यह कहना कठिन है कि ये प्रतिमाएँ वास्तव में किन देवताओं या मान्यताओं का प्रतिनिधित्व करती थीं।
इसलिए हड़प्पाई धर्म और बाद की भारतीय धार्मिक परंपराओं के बीच संभावित समानताओं का अध्ययन किया जा सकता है, लेकिन सीधे और निश्चित संबंध घोषित करने में सावधानी आवश्यक है।
शासन व्यवस्था कैसी थी?
यह भी इस सभ्यता का रहस्य है।
मिस्र में फैरो और मेसोपोटामिया में राजवंशों के स्पष्ट प्रमाण हैं, लेकिन हड़प्पा नगरों में किसी विशाल राजमहल, सम्राट की समाधि या किसी ज्ञात राजा का अभिलेख नहीं मिला है।
फिर भी नगर योजना, बाट-माप, ईंटों के अनुपात और विशाल क्षेत्र में सांस्कृतिक समानता यह दर्शाती है कि किसी प्रकार की सुव्यवस्थित सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था अवश्य रही होगी।
क्या यह केंद्रीकृत राजसत्ता थी, नगर-राज्यों का जाल था, व्यापारिक अभिजात वर्ग का शासन था या किसी अन्य प्रकार का संगठन—इस प्रश्न पर अभी निश्चित उत्तर उपलब्ध नहीं है।
युद्ध के प्रमाण अपेक्षाकृत कम
हड़प्पा सभ्यता से हथियार मिले हैं, लेकिन उसका पुरातात्विक स्वरूप अत्यधिक सैनिक नहीं दिखाई देता।
विशाल युद्ध स्मारक, विजयों के अभिलेख या सेनाओं के चित्र नहीं मिले हैं।
इसका यह अर्थ नहीं कि युद्ध बिल्कुल नहीं होते थे। नगरों की दीवारें और दुर्गीकरण सुरक्षा की आवश्यकता की ओर संकेत करते हैं।
लेकिन उपलब्ध प्रमाणों में हड़प्पा सभ्यता की प्रमुख पहचान सैन्य विजय से अधिक नगर निर्माण, शिल्प, व्यापार और उत्पादन है।
क्या सरस्वती नदी से संबंध था?
इस प्रश्न पर इतिहास और भूगोल दोनों स्तरों पर लंबे समय से चर्चा होती रही है।
हरियाणा और राजस्थान में घग्घर तथा पाकिस्तान में हकरा के सूखे नदी क्षेत्र के आसपास बड़ी संख्या में हड़प्पाई स्थल पाए गए हैं।
कुछ शोधकर्ता इस प्राचीन नदी-प्रणाली को वैदिक साहित्य में वर्णित सरस्वती से जोड़ते हैं। अन्य विद्वान इस पहचान को पूरी तरह सिद्ध मानने से सावधान करते हैं।
भूवैज्ञानिक अध्ययनों से यह स्पष्ट है कि उत्तर-पश्चिम भारत की नदी प्रणालियों में प्राचीन काल में बड़े परिवर्तन हुए। लेकिन प्राचीन सरस्वती की पहचान, उसका वास्तविक प्रवाह और उसका हड़प्पा सभ्यता से संबंध आज भी शोध का विषय है।
इसी कारण “सिंधु–सरस्वती सभ्यता” नाम उपयोग में आता है, पर अकादमिक शोध में “हड़प्पा सभ्यता” सबसे तटस्थ और व्यापक नाम बना हुआ है।
सभ्यता का पतन या परिवर्तन?
लगभग 1900 ईसा पूर्व के बाद बड़े हड़प्पाई नगरों का पतन प्रारंभ हुआ।
लेकिन यह कहना सही नहीं होगा कि पूरी सभ्यता अचानक समाप्त हो गई।
कई स्थानों पर आबादी छोटी बस्तियों में चली गई। नगरों का आकार घटा और मानकीकृत व्यवस्था कमजोर हुई। लंबी दूरी का व्यापार भी कम हुआ।
इसके पीछे कई कारणों की चर्चा होती है—
नदी प्रणालियों का परिवर्तन,
जलवायु में बढ़ती शुष्कता,
व्यापारिक तंत्र का कमजोर होना,
बाढ़,
कृषि संबंधी दबाव और
जनसंख्या का नए क्षेत्रों की ओर स्थानांतरण।
आज सामान्यतः किसी एक कारण को पूरे हड़प्पाई संसार के अंत का उत्तर नहीं माना जाता।
पुराने समय में प्रस्तुत “बाहरी आक्रमण से विनाश” के सरल सिद्धांत को भी अब पर्याप्त पुरातात्विक समर्थन नहीं मिलता।
अधिक उपयुक्त व्याख्या यह है कि लगभग दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के आरंभ में इस विशाल नगरीय तंत्र का क्रमिक पुनर्गठन हुआ।
नगर समाप्त हुए, लोग नहीं
हड़प्पा सभ्यता के अंत को उस क्षेत्र की आबादी के अंत के रूप में नहीं देखना चाहिए।
कई हड़प्पाई सांस्कृतिक तत्व बाद की क्षेत्रीय संस्कृतियों में परिवर्तित रूप में दिखाई देते हैं।
लोग नई बस्तियों में गए, कृषि पद्धतियाँ बदलीं, व्यापारिक नेटवर्क परिवर्तित हुए और स्थानीय संस्कृतियाँ विकसित हुईं।
इसलिए हड़प्पा से उत्तर हड़प्पा काल की यात्रा “सभ्यता के अचानक गायब हो जाने” की कहानी नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन की कहानी है।
भारतीय इतिहास में महत्व
सिंधु–सरस्वती या हड़प्पा सभ्यता भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में पहली विशाल नगरीय संस्कृति थी।
इसने लगभग पाँच हजार वर्ष पहले—
नगर नियोजन,
जल निकासी,
जल संचयन,
मानकीकृत निर्माण,
शिल्प उत्पादन,
व्यापार,
बाट-माप और
दूरस्थ सांस्कृतिक संपर्कों की विकसित व्यवस्था स्थापित की।
धोलावीरा जैसे स्थल आज भी इस उन्नत क्षमता का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। यूनेस्को ने इसकी नगर योजना, बहुस्तरीय दुर्गीकरण, जलाशयों, जल निकासी और निर्माण तकनीक को हड़प्पाई सभ्यता की असाधारण उपलब्धियों में गिना है। (UNESCO World Heritage Centre)
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भारतीय उपमहाद्वीप में नगरीय जीवन की परंपरा अत्यंत प्राचीन थी।
लेकिन इस महान सभ्यता की लिपि आज भी मौन है। जब तक वह पढ़ी नहीं जाती, इसके लोगों के राजनीतिक विचार, धर्म, भाषा और स्वयं अपने समाज के बारे में उनकी दृष्टि हमारे लिए पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सकती।
यही इस सभ्यता का आकर्षण भी है और इतिहास की सबसे बड़ी पहेलियों में से एक भी।
इसके बाद भारतीय इतिहास एक नए और अत्यंत महत्वपूर्ण चरण में प्रवेश करता है—वैदिक काल, जिसमें पुरातात्विक प्रमाणों के साथ विशाल वैदिक साहित्य भी हमारे सामने आता है।
खंड 03 · वैदिक काल: ऋग्वेद से जनपदों की ओर बढ़ता भारत
सिंधु–सरस्वती सभ्यता के नगरीय केंद्रों के क्रमिक परिवर्तन के बाद भारतीय इतिहास एक ऐसे चरण में प्रवेश करता है जिसमें पुरातात्विक प्रमाणों के साथ-साथ साहित्यिक स्रोत भी उपलब्ध होने लगते हैं। इस काल की सबसे महत्वपूर्ण धरोहर वेद हैं, और इसी कारण इसे वैदिक काल कहा जाता है।
वैदिक संस्कृति को समझने का प्रमुख आधार ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद, ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक और उपनिषद हैं। ये सभी ग्रंथ एक ही समय में रचित नहीं हुए। इनकी रचना और संकलन लंबी अवधि में हुआ तथा इनके भीतर भी विभिन्न ऐतिहासिक चरणों की झलक मिलती है। इतिहासकार इसलिए वैदिक काल को सामान्यतः प्रारंभिक या ऋग्वैदिक काल और उत्तरवैदिक काल में विभाजित करते हैं। (eGyankosh)
इस काल में भारतीय समाज पशुपालक और अर्ध-स्थायी जीवन से आगे बढ़कर कृषि आधारित स्थायी बस्तियों, विस्तृत जनसमूहों और फिर जनपदों की ओर बढ़ता दिखाई देता है। राजनीतिक संस्थाएँ बदलीं, वर्ण-व्यवस्था अधिक स्पष्ट हुई, कृषि का विस्तार हुआ और धार्मिक चिंतन यज्ञप्रधान परंपरा से आगे बढ़कर उपनिषदों के दार्शनिक प्रश्नों तक पहुँचा।
वैदिक काल के स्रोत
वैदिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसकी जानकारी केवल पुरातत्त्व से नहीं, बल्कि विशाल मौखिक साहित्यिक परंपरा से भी प्राप्त होती है।
चार वेद हैं—
ऋग्वेद,
सामवेद,
यजुर्वेद और
अथर्ववेद।
इनमें ऋग्वेद सबसे प्राचीन माना जाता है। इसमें विभिन्न देवताओं की स्तुतियों के रूप में संकलित मंत्र हैं। सामवेद का संबंध मुख्यतः गायन और यज्ञीय अनुष्ठानों से है। यजुर्वेद में यज्ञ से संबंधित विधियाँ और मंत्र हैं, जबकि अथर्ववेद में दैनिक जीवन, रोग, स्वास्थ्य, प्रार्थना और विविध सामाजिक विश्वासों की झलक मिलती है।
इसके बाद ब्राह्मण ग्रंथों में यज्ञों की व्याख्या, आरण्यकों में अनुष्ठान और चिंतन का संक्रमण तथा उपनिषदों में आत्मा, ब्रह्म, जीवन, मृत्यु और ज्ञान से जुड़े गहरे दार्शनिक प्रश्न सामने आते हैं।
इन ग्रंथों को इतिहास का सीधा विवरण नहीं माना जा सकता। वे धार्मिक और वैचारिक रचनाएँ हैं। फिर भी उनसे उस समय के समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था और जीवन-पद्धति के अनेक संकेत प्राप्त होते हैं। इतिहासकार साहित्यिक स्रोतों को पुरातात्विक प्रमाणों के साथ मिलाकर देखते हैं। (eGyankosh)
वैदिक काल की समय-सीमा
वैदिक काल की तिथियों को लेकर विद्वानों में कुछ मतभेद हैं। सामान्य शैक्षणिक विभाजन में प्रारंभिक वैदिक या ऋग्वैदिक चरण को लगभग दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के उत्तरार्ध से जोड़ा जाता है, जबकि उत्तरवैदिक चरण लगभग पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व के पूर्वार्ध तक विकसित होता दिखाई देता है।
लेकिन इन तिथियों को अत्यधिक कठोर सीमा नहीं माना जाना चाहिए। स्वयं वैदिक साहित्य का निर्माण और संकलन लंबी अवधि में हुआ। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के अध्ययन में भी यह सावधानी रेखांकित की गई है कि वैदिक ग्रंथों का निर्माण कई शताब्दियों में हुआ और उनमें भिन्न-भिन्न समय की सामाजिक परिस्थितियाँ प्रतिबिंबित हैं। (eGyankosh)
प्रारंभिक वैदिक भूगोल
ऋग्वेद में जिस भूभाग की सबसे स्पष्ट झलक मिलती है, वह भारतीय उपमहाद्वीप का उत्तर-पश्चिमी भाग है।
इसमें सिंधु और उसकी सहायक नदियों का उल्लेख मिलता है। सरस्वती का भी अनेक मंत्रों में उल्लेख है। विपाशा, शुतुद्री, परुष्णी और अन्य नदियों के नाम भी मिलते हैं।
प्रारंभिक वैदिक समाज का केंद्र पंजाब, उत्तर-पश्चिम भारत और उससे जुड़े क्षेत्रों में था। बाद के वैदिक ग्रंथों में भौगोलिक केंद्र धीरे-धीरे पूर्व की ओर गंगा-यमुना क्षेत्र में बढ़ता दिखाई देता है। (eGyankosh)
यह पूर्व की ओर विस्तार भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण था, क्योंकि आगे इसी भूभाग में कुरु, पांचाल, कोशल, विदेह और बाद में बड़े महाजनपद उभरे।
‘आर्य’ प्रश्न और इतिहासलेखन
वैदिक काल के अध्ययन का सबसे विवादित प्रश्न ‘आर्य’ शब्द और उससे जुड़ी उत्पत्ति का है।
ऋग्वेद में ‘आर्य’ शब्द मिलता है, लेकिन इसे आधुनिक अर्थों में किसी जैविक नस्ल का पर्याय मानना उचित नहीं है। उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में आर्यों के आक्रमण की धारणा व्यापक हुई, जिसके अनुसार मध्य एशिया से आए आक्रमणकारियों ने भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवेश किया और स्थानीय आबादी को पराजित किया।
बाद के पुरातात्विक, भाषावैज्ञानिक और आनुवंशिक शोधों ने इस प्रश्न को अधिक जटिल बनाया है। आज विद्वानों के बीच प्रवास, सांस्कृतिक संपर्क और भाषाओं के प्रसार को लेकर विस्तृत बहस है, लेकिन किसी एक सरल “एकबारगी आक्रमण” कथा से पूरे वैदिक समाज को समझना पर्याप्त नहीं माना जाता।
इसलिए वैदिक इतिहास में यह अंतर आवश्यक है कि भाषा, संस्कृति, जनसमूह और राजनीतिक संघर्षों को आधुनिक नस्ली श्रेणियों में न बाँधा जाए।
ऋग्वैदिक समाज: पशुधन का महत्व
प्रारंभिक वैदिक अर्थव्यवस्था में पशुपालन का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान था।
गाय संपत्ति और समृद्धि का प्रमुख प्रतीक थी। ऋग्वेद में गो-संपदा का बार-बार उल्लेख मिलता है। युद्ध और संघर्ष भी कभी-कभी पशुधन से जुड़े होते थे।
पशुपालन के साथ कृषि भी ज्ञात थी, लेकिन ऋग्वैदिक समाज में पशुधन का आर्थिक और सामाजिक महत्व अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।
घोड़े का भी विशेष महत्व था। वह युद्ध, प्रतिष्ठा और अनुष्ठानों से जुड़ा हुआ था।
समाज पूर्णतः खानाबदोश नहीं था। बस्तियाँ और कृषि मौजूद थीं, लेकिन बाद के उत्तरवैदिक काल की तुलना में राजनीतिक और कृषि आधारित स्थायित्व कम विकसित था। प्रारंभिक वैदिक समाज को पशुपालक और कृषि गतिविधियों के मिश्रित स्वरूप के रूप में समझना अधिक उपयुक्त है। (eGyankosh)
परिवार, कुल और जन
वैदिक समाज की मूल इकाई परिवार था।
कई परिवार मिलकर बड़े संबंध समूह बनाते थे और उनसे आगे जन या जनसमूह का निर्माण होता था। राजनीतिक पहचान अक्सर भूभाग से अधिक जन-समुदाय से जुड़ी थी।
ऋग्वेद में भरत, पुरु, यदु, तुर्वश और अन्य जनों का उल्लेख मिलता है।
आगे चलकर कई जनसमूह एक-दूसरे के निकट आए, उनमें संघर्ष और गठबंधन हुए और धीरे-धीरे भूभाग आधारित राजनीतिक इकाइयाँ उभरने लगीं।
यहीं से ‘जन’ से ‘जनपद’ की ओर बढ़ने वाली ऐतिहासिक प्रक्रिया की शुरुआत समझी जा सकती है।
राजा की स्थिति
प्रारंभिक वैदिक काल में राजा या ‘राजन्’ का उल्लेख मिलता है, लेकिन उसे बाद के साम्राज्यवादी सम्राट की तरह नहीं समझना चाहिए।
राजा मुख्यतः जनसमूह का नेता था। उससे युद्ध में नेतृत्व, पशुधन और समुदाय की रक्षा तथा धार्मिक अनुष्ठानों के संरक्षण की अपेक्षा की जाती थी।
राजसत्ता अभी पूर्ण केंद्रीकृत नहीं थी।
राजा के साथ पुरोहित और सेनानी जैसे पद भी महत्वपूर्ण थे।
पुरोहित धार्मिक अनुष्ठानों और वैचारिक वैधता से जुड़ा था, जबकि सेनानी सैन्य गतिविधियों में भूमिका निभाता था।
सभा और समिति
प्रारंभिक वैदिक राजनीतिक जीवन में सभा और समिति नामक संस्थाओं का उल्लेख विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
इनकी सटीक संरचना पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन माना जाता है कि इनमें समुदाय के प्रभावशाली लोग भाग लेते थे और सामाजिक अथवा राजनीतिक विषयों पर विचार होता था।
यह तथ्य बताता है कि प्रारंभिक वैदिक शासन केवल राजा के एकतरफा आदेश पर आधारित नहीं था।
राजा को जनसमूह और प्रभावशाली संस्थाओं के साथ संबंध बनाए रखने पड़ते थे।
उत्तरवैदिक काल में राजसत्ता मजबूत होने के साथ इन संस्थाओं का महत्व अपेक्षाकृत घटता दिखाई देता है।
दशराज्ञ युद्ध
ऋग्वेद में वर्णित प्रमुख राजनीतिक संघर्षों में दशराज्ञ युद्ध अर्थात दस राजाओं का युद्ध प्रसिद्ध है।
यह संघर्ष भरत जन के राजा सुदास और उसके विरोधी जनसमूहों के बीच हुआ बताया गया है। परुष्णी नदी के क्षेत्र में हुए इस संघर्ष में सुदास की विजय का उल्लेख मिलता है।
यह घटना बताती है कि ऋग्वैदिक काल में विभिन्न जनों के बीच क्षेत्र, संसाधनों और राजनीतिक प्रभुत्व को लेकर संघर्ष होते थे।
इसे आधुनिक राष्ट्रों के बीच युद्ध की तरह नहीं, बल्कि जनसमूहों और उनके नेतृत्व के बीच संघर्ष के रूप में समझना अधिक उचित है।
ऋग्वैदिक धर्म
प्रारंभिक वैदिक धर्म में प्रकृति और मानवीय जीवन से जुड़े अनेक देवताओं की स्तुति की गई।
इनमें इंद्र, अग्नि, वरुण, सोम, सूर्य, उषा, अश्विन और अन्य देवता प्रमुख थे।
इंद्र को युद्ध और शक्ति से, अग्नि को यज्ञ और मनुष्य तथा देवताओं के बीच माध्यम के रूप में, वरुण को ऋत अर्थात ब्रह्मांडीय व्यवस्था से और उषा को प्रभात से जोड़ा गया।
यज्ञ धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा था, लेकिन बाद के समय जैसी जटिल कर्मकांड व्यवस्था अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुई थी।
देवताओं को प्रसन्न करने के लिए स्तुति, आहुति और सोम से संबंधित अनुष्ठान किए जाते थे।
‘ऋत’ की अवधारणा
ऋग्वैदिक चिंतन की महत्वपूर्ण अवधारणाओं में ‘ऋत’ है।
यह केवल धार्मिक नियम नहीं था, बल्कि प्रकृति, समाज और ब्रह्मांड में व्यवस्था और संतुलन की व्यापक धारणा थी।
सूर्य का उदय, ऋतुओं का क्रम, नदियों का प्रवाह और सामाजिक सत्य—सब किसी व्यापक व्यवस्था से जुड़े माने जाते थे।
आगे भारतीय दार्शनिक परंपरा में धर्म और नैतिक व्यवस्था की जो अवधारणाएँ विकसित हुईं, उनके पूर्वरूप को कुछ विद्वान ऋत की धारणा से जोड़कर देखते हैं।
महिलाओं की स्थिति
ऋग्वैदिक साहित्य में महिलाओं की उपस्थिति स्पष्ट है।
घोषा, अपाला, लोपामुद्रा और विश्ववारा जैसी स्त्रियों को वैदिक ऋचाओं से जोड़ा जाता है। विवाह, परिवार और धार्मिक जीवन में महिलाओं की भूमिका थी।
फिर भी पूरे समाज को आधुनिक अर्थ में समानतावादी कहना उचित नहीं होगा। परिवार मुख्यतः पितृसत्तात्मक दिशा में संगठित था और पुत्र की इच्छा के प्रमाण भी मिलते हैं।
उत्तरवैदिक काल में सामाजिक और धार्मिक संरचनाएँ अधिक नियंत्रित और कर्मकांडप्रधान होने के साथ महिलाओं की स्वतंत्र सामाजिक भूमिका कुछ क्षेत्रों में सीमित होती दिखाई देती है।
वर्ण व्यवस्था का प्रारंभिक स्वरूप
ऋग्वेद के अधिकांश भाग में समाज कठोर चार-वर्ण व्यवस्था के रूप में दिखाई नहीं देता।
ब्राह्मण और क्षत्रिय जैसी सामाजिक भूमिकाओं के संकेत मिलते हैं। विश या सामान्य जन भी महत्वपूर्ण थे।
ऋग्वेद के अपेक्षाकृत बाद के माने जाने वाले पुरुष सूक्त में ब्राह्मण, राजन्य, वैश्य और शूद्र—चार वर्णों का उल्लेख मिलता है।
उत्तरवैदिक काल में यही विभाजन अधिक स्पष्ट और संस्थागत होता दिखाई देता है।
यहाँ एक महत्त्वपूर्ण अंतर समझना चाहिए—वर्ण व्यवस्था और बाद में विकसित अत्यंत जटिल जाति व्यवस्था एक ही चीज नहीं थीं। वर्ण एक व्यापक सामाजिक वैचारिक श्रेणी थी; भारतीय समाज में हजारों जातियों और उपजातियों की संरचना बहुत लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया में विकसित हुई।
उत्तरवैदिक काल: भूगोल का विस्तार
उत्तरवैदिक काल में वैदिक संस्कृति का केंद्र उत्तर-पश्चिम से आगे बढ़कर गंगा-यमुना के मैदानों की ओर आया।
कुरु और पांचाल क्षेत्र विशेष रूप से महत्वपूर्ण बने। बाद में कोशल और विदेह जैसे क्षेत्रों का भी महत्व बढ़ा।
इस बदलाव में कृषि का विस्तार निर्णायक था।
गंगा के मैदानों में घने वन थे। लौह उपकरणों के व्यापक प्रयोग ने भूमि साफ करने और कृषि विस्तार में सहायता की। हालांकि लौह तकनीक के प्रसार की प्रक्रिया अलग-अलग क्षेत्रों में अलग समय पर हुई, लेकिन पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व में उसका प्रभाव स्पष्ट होता है।
कृषि उत्पादन बढ़ने से बड़ी और स्थायी बस्तियों का विकास संभव हुआ। (eGyankosh)
पशुपालन से कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था की ओर
उत्तरवैदिक काल में कृषि का महत्व बहुत बढ़ गया।
हल से खेती, बैलों का उपयोग, विभिन्न अनाजों की खेती और कृषि से प्राप्त अधिशेष ने समाज की आर्थिक संरचना बदल दी।
भूमि धीरे-धीरे संपत्ति और राजनीतिक शक्ति का महत्वपूर्ण आधार बनने लगी।
अतिरिक्त उत्पादन से ऐसे वर्गों और व्यवसायों का विकास संभव हुआ जो प्रत्यक्ष रूप से खेती नहीं करते थे—जैसे पुरोहित, योद्धा और विभिन्न शिल्पकार।
यह परिवर्तन आगे नगरों और बड़े राज्यों के उदय के लिए निर्णायक सिद्ध हुआ।
जन से जनपद
प्रारंभिक वैदिक राजनीति में ‘जन’ महत्वपूर्ण था। उत्तरवैदिक काल में भूभाग की अवधारणा अधिक महत्वपूर्ण होती गई।
किसी जनसमूह के स्थायी रूप से एक क्षेत्र से जुड़ जाने पर ‘जनपद’ का विकास हुआ—अर्थात वह भूमि जहाँ कोई जन स्थापित था।
कुरु और पांचाल जैसे बड़े राजनीतिक संगठन इस परिवर्तन का संकेत देते हैं।
राजा अब केवल युद्ध के समय नेतृत्व करने वाला मुखिया नहीं रहा। उसके पद में वंशानुगत तत्व और धार्मिक प्रतिष्ठा बढ़ने लगी।
राजसूय, वाजपेय और अश्वमेध जैसे बड़े यज्ञ राजसत्ता और प्रतिष्ठा से जुड़े।
राजसत्ता का विस्तार
उत्तरवैदिक काल में राजाओं की शक्ति बढ़ी।
कर और उपहार जैसी व्यवस्थाएँ अधिक नियमित रूप लेने लगीं। स्थायी कृषि क्षेत्र पर नियंत्रण से शासक के संसाधन बढ़े।
बड़े यज्ञों के माध्यम से राजा अपनी राजनीतिक प्रतिष्ठा प्रदर्शित करता था।
राजसूय का संबंध राजकीय अभिषेक और प्रभुत्व से था, जबकि अश्वमेध व्यापक राजनीतिक शक्ति का प्रदर्शन बन गया।
इन अनुष्ठानों के कारण पुरोहित वर्ग का महत्व भी बढ़ा, क्योंकि जटिल यज्ञों के संचालन के लिए विशेषज्ञ ब्राह्मणों की आवश्यकता थी।
वर्ण व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण
उत्तरवैदिक समाज में चार वर्णों की व्यवस्था अधिक स्पष्ट होती गई—
ब्राह्मण,
क्षत्रिय,
वैश्य और
शूद्र।
ब्राह्मणों का संबंध धार्मिक ज्ञान और यज्ञ से, क्षत्रियों का शासन और युद्ध से, वैश्यों का कृषि, पशुपालन और व्यापार से तथा शूद्रों का विभिन्न सेवा और श्रम संबंधी भूमिकाओं से जोड़ा गया।
यह व्यवस्था सामाजिक पदानुक्रम को वैचारिक आधार देने लगी।
फिर भी वास्तविक समाज इससे कहीं अधिक जटिल था। विभिन्न समुदायों, व्यवसायों और स्थानीय समूहों को केवल चार श्रेणियों में समेटकर नहीं समझा जा सकता।
उत्तरवैदिक काल में सामाजिक विभाजन अधिक गहरा हुआ, परंतु बाद के समय की जाति व्यवस्था को ज्यों का त्यों इस काल पर आरोपित करना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं है। (eGyankosh)
आश्रम और जीवन की अवधारणा
बाद की वैदिक और उत्तरवैदिक परंपराओं में मानव जीवन को विभिन्न चरणों में समझने की धारणा विकसित हुई।
ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास की चार आश्रम व्यवस्था बाद में अधिक व्यवस्थित रूप ग्रहण करती है।
इसी प्रकार धर्म, कर्म और पुनर्जन्म से संबंधित विचार भी क्रमशः विकसित हुए।
यह वह समय था जब भारतीय चिंतन केवल देवताओं को प्रसन्न करने वाले अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मनुष्य के अस्तित्व और जीवन के उद्देश्य पर प्रश्न उठने लगे।
यज्ञ से दर्शन की ओर
उत्तरवैदिक धार्मिक जीवन में विशाल यज्ञों का महत्व बढ़ा।
यज्ञों की विधि अत्यंत जटिल हुई और ब्राह्मण ग्रंथों में उनके विस्तृत नियम दिए गए।
लेकिन इसी कर्मकांड प्रधान व्यवस्था के भीतर एक दूसरी बौद्धिक धारा भी विकसित हुई।
आरण्यक और उपनिषद बाहरी यज्ञ के अर्थ से आगे जाकर आत्मज्ञान और ब्रह्मांड के मूल तत्व की खोज करने लगे।
प्रश्न उठे—
मनुष्य कौन है?
जीवन का अंतिम सत्य क्या है?
मृत्यु के बाद क्या होता है?
आत्मा और ब्रह्म का क्या संबंध है?
इन प्रश्नों ने भारतीय दर्शन की दिशा बदल दी।
उपनिषद और नया दार्शनिक चिंतन
उपनिषद भारतीय बौद्धिक इतिहास की महान उपलब्धियों में हैं।
इनमें ब्रह्म को अंतिम सत्य और आत्मन् को व्यक्ति के अंतरतम अस्तित्व से जोड़कर देखा गया। विभिन्न उपनिषदों में इनके संबंध की अलग-अलग व्याख्याएँ हैं।
कर्म और पुनर्जन्म की अवधारणाएँ अधिक स्पष्ट होती गईं। जीवन-मृत्यु के चक्र से मुक्ति का प्रश्न भी महत्वपूर्ण हुआ।
ज्ञान को बाहरी कर्मकांड से अधिक ऊँचा स्थान देने वाली धाराएँ सामने आईं।
यही दार्शनिक भूमि आगे बौद्ध, जैन और अनेक भारतीय दार्शनिक परंपराओं के साथ संवाद का आधार बनी।
एनसीईआरटी भी प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा के स्रोतों में वेदों, ब्राह्मणों और उपनिषदों की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित करता है। (NCERT)
शिक्षा और मौखिक परंपरा
वैदिक साहित्य की एक असाधारण विशेषता उसका पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक संरक्षण है।
मंत्रों के उच्चारण, स्वर और क्रम को सुरक्षित रखने के लिए अत्यंत व्यवस्थित पद्धतियाँ विकसित हुईं।
गुरु और शिष्य के माध्यम से ज्ञान संचारित होता था। स्मरण और शुद्ध उच्चारण शिक्षा के प्रमुख आधार थे।
इसी मौखिक अनुशासन के कारण विशाल वैदिक साहित्य लंबे समय तक लिखित पांडुलिपियों पर निर्भर हुए बिना संरक्षित रहा।
भारतीय ज्ञान परंपरा में गुरु-शिष्य संबंध की जो लंबी परंपरा दिखाई देती है, उसकी प्राचीन जड़ों में वैदिक शिक्षा का महत्वपूर्ण स्थान है। (NCERT)
वैदिक काल और सिंधु सभ्यता का संबंध
हड़प्पा और वैदिक संस्कृतियों के संबंध को लेकर लंबे समय से बहस रही है।
कुछ सांस्कृतिक विशेषताओं में संभावित निरंतरताएँ खोजी गई हैं, जबकि भाषा, नगरीय जीवन और कुछ भौतिक संस्कृतियों में परिवर्तन भी स्पष्ट हैं।
हड़प्पा की विशाल नगरीय व्यवस्था लगभग 1900 ईसा पूर्व के बाद कमजोर हुई, जबकि वैदिक साहित्य मुख्यतः उत्तर-पश्चिमी और बाद में गंगा क्षेत्र के अलग सामाजिक संसार को दिखाता है।
इसलिए दोनों के बीच संबंध को या तो पूर्ण विच्छेद या पूर्ण समानता के रूप में देखना उचित नहीं है।
भारतीय उपमहाद्वीप में जनसमूहों, भाषाओं, तकनीकों और सांस्कृतिक परंपराओं का मेल-जोल लंबी अवधि में हुआ। इसी जटिल प्रक्रिया से आगे का भारतीय समाज विकसित हुआ।
वैदिक काल की ऐतिहासिक विरासत
वैदिक काल भारत के इतिहास में इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि केवल वेद इसी समय रचे गए। इसका महत्व उससे कहीं व्यापक है।
इस काल में—
जन से जनपद की ओर राजनीतिक परिवर्तन हुआ,
कृषि का विस्तार हुआ,
स्थायी बस्तियाँ बढ़ीं,
राजसत्ता अधिक संगठित हुई,
वर्ण व्यवस्था विकसित हुई,
यज्ञ परंपरा व्यापक हुई,
और दार्शनिक चिंतन ने आत्मा, ब्रह्म, कर्म और पुनर्जन्म जैसे प्रश्नों को जन्म दिया।
भारत की धार्मिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक शब्दावली का एक बड़ा हिस्सा इसी काल से आगे विकसित हुआ।
लेकिन वैदिक भारत स्थिर नहीं था। ऋग्वेद के पशुपालक और जन-केंद्रित समाज से उत्तरवैदिक कृषि प्रधान और क्षेत्रीय राजनीतिक समाज तक बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ।
इसी परिवर्तन ने आगे बड़े राज्यों के जन्म की भूमि तैयार की।
लगभग पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व के मध्य तक गंगा घाटी में कृषि, लौह तकनीक, व्यापार और राजनीतिक संगठन का विस्तार उस स्तर तक पहुँच चुका था जहाँ छोटे जनपदों से बड़े राज्यों का उदय संभव हुआ।
इसके बाद भारत के इतिहास में सोलह महाजनपदों, मगध के उदय तथा बौद्ध और जैन परंपराओं का युग आरंभ होता है।
खंड 04 · महाजनपद, मगध का उदय और बौद्ध–जैन परंपराएँ
उत्तरवैदिक काल के अंत तक भारतीय उपमहाद्वीप की राजनीतिक और सामाजिक संरचना तेजी से बदल रही थी। छोटे जनसमूह स्थायी भूभागों से जुड़ चुके थे, कृषि का विस्तार हो रहा था, लौह उपकरणों का प्रयोग बढ़ रहा था और व्यापारिक केंद्रों का विकास प्रारंभ हो चुका था। इसी प्रक्रिया ने छठी शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास बड़े राजनीतिक राज्यों और गणसंघों को जन्म दिया, जिन्हें महाजनपद कहा गया।
यह भारतीय इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण संक्रमणकाल था। इसी दौर में मगध एक शक्तिशाली राज्य के रूप में उभरा, नगरों का पुनरुत्थान हुआ, व्यापार और मुद्रा का प्रयोग बढ़ा और वैदिक कर्मकांड के समानांतर नए धार्मिक तथा दार्शनिक आंदोलन सामने आए। गौतम बुद्ध और महावीर इसी व्यापक सामाजिक परिवर्तन की पृष्ठभूमि में उभरे।
बौद्ध ग्रंथों में सोलह महाजनपदों का उल्लेख मिलता है। इनमें राजतंत्र और गणसंघ दोनों प्रकार की राजनीतिक व्यवस्थाएँ थीं। (eGyankosh)
जनपद से महाजनपद
वैदिक काल में राजनीतिक संगठन मुख्यतः जन या कबीलाई समूहों पर आधारित था। लेकिन जब ये समुदाय स्थायी भूभागों पर बसने लगे, कृषि भूमि पर नियंत्रण बढ़ा और प्रशासन अधिक संगठित हुआ, तब जनपदों का विकास हुआ।
धीरे-धीरे कुछ जनपद पड़ोसी क्षेत्रों को अपने अधीन करने लगे और बड़े राज्यों में बदल गए। इन्हीं शक्तिशाली राज्यों को महाजनपद कहा गया।
इस परिवर्तन के पीछे कई कारण थे। लोहे के औजारों से गंगा के मैदानों में वन साफ करना आसान हुआ। कृषि योग्य भूमि बढ़ी और उत्पादन में वृद्धि हुई। अतिरिक्त उपज ने शासकों को कर प्राप्त करने और बड़ी सेनाएँ बनाए रखने में सहायता की। नगरों, व्यापार और शिल्प ने भी राज्य की आर्थिक शक्ति बढ़ाई।
इस प्रकार जन आधारित राजनीति से भूभाग आधारित राज्य व्यवस्था की ओर संक्रमण हुआ।
सोलह महाजनपद
बौद्ध साहित्य में जिन सोलह महाजनपदों का उल्लेख मिलता है, वे थे—
अंग,
मगध,
काशी,
कोशल,
वज्जि,
मल्ल,
वत्स,
चेदि,
कुरु,
पांचाल,
मत्स्य,
शूरसेन,
अवन्ति,
गांधार,
कम्बोज और
अश्मक।
इनमें अधिकांश उत्तर भारत में स्थित थे, लेकिन अश्मक दक्कन क्षेत्र का प्रमुख महाजनपद था। गांधार और कम्बोज उत्तर-पश्चिम में थे, जबकि मगध, अंग और वज्जि पूर्वी भारत में स्थित थे। (eGyankosh)
सभी महाजनपद समान रूप से शक्तिशाली नहीं थे। समय के साथ कुछ राज्यों ने दूसरों को पीछे छोड़ दिया। काशी, कोशल, वत्स, अवन्ति और मगध विशेष रूप से प्रभावशाली बने। अंततः मगध ने अन्य सभी प्रतिस्पर्धियों पर बढ़त बनाई।
राजतंत्र और गणसंघ
इस युग की राजनीति की महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि सभी राज्यों में राजा नहीं होते थे।
मगध, कोशल और अवन्ति जैसे राज्यों में राजतंत्र था। दूसरी ओर वज्जि और मल्ल जैसे क्षेत्रों में गणसंघ अथवा गणराज्य जैसी राजनीतिक व्यवस्थाएँ थीं।
इन गणसंघों में सत्ता किसी एक राजा के हाथ में केंद्रित न होकर कुलीन परिवारों या प्रमुख कुलों के सदस्यों के बीच बंटी होती थी। वे सभाओं में निर्णय लेते थे।
आधुनिक लोकतंत्र से इनकी तुलना करना ठीक नहीं होगा, क्योंकि इनमें सामान्य जनता की समान भागीदारी नहीं थी। फिर भी ये प्राचीन भारत में राजतंत्र से भिन्न राजनीतिक संगठन का महत्वपूर्ण उदाहरण थे।
वज्जि संघ में लिच्छवि सहित कई समूह सम्मिलित थे और वैशाली उसका प्रमुख केंद्र था।
दूसरी नगरीय क्रांति
हड़प्पा सभ्यता के पतन के कई शताब्दियों बाद गंगा घाटी में नगरों का नया विकास हुआ। इतिहासकार इसे कभी-कभी भारत की “दूसरी नगरीय क्रांति” कहते हैं।
राजगृह, वैशाली, श्रावस्ती, कौशांबी, उज्जयिनी, वाराणसी और चम्पा जैसे नगर राजनीतिक और व्यापारिक केंद्र बने।
कृषि उत्पादन में वृद्धि और व्यापार के विस्तार ने नगरों को आर्थिक आधार दिया। कारीगरों, व्यापारियों और शिल्पकारों के नए समूह उभरे।
व्यापार मार्गों ने उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों को जोड़ा। उत्तर-पश्चिम से गंगा घाटी और आगे पूर्वी भारत तक भूमि मार्ग विकसित हुए।
इस परिवर्तन ने समाज को अधिक गतिशील बनाया।
मुद्रा और व्यापार
इसी काल में धातु की आहत मुद्राओं का प्रयोग दिखाई देता है। इन पर विभिन्न प्रतीक अंकित होते थे।
मुद्रा के प्रयोग ने व्यापारिक लेनदेन को सुविधाजनक बनाया, हालांकि वस्तु-विनिमय भी जारी रहा।
व्यापारी और शिल्पकार नगरों में संगठित समूहों में कार्य करते थे। आगे चलकर इन्हीं से श्रेणियों जैसी संस्थाओं का विकास हुआ।
व्यापारियों की बढ़ती आर्थिक शक्ति का प्रभाव धार्मिक आंदोलनों पर भी पड़ा। बौद्ध और जैन संघों को व्यापारी वर्ग से व्यापक संरक्षण मिला।
मगध का उदय
सोलह महाजनपदों में अंततः मगध सबसे शक्तिशाली बनकर उभरा।
मगध का प्रारंभिक केंद्र वर्तमान बिहार के दक्षिणी भाग में था। राजगृह इसकी शुरुआती राजधानी थी और बाद में पाटलिपुत्र राजनीतिक केंद्र बना।
मगध की सफलता के पीछे भौगोलिक, आर्थिक और राजनीतिक कई कारण थे।
उसके आसपास उपजाऊ भूमि थी। गंगा और उसकी सहायक नदियाँ कृषि, संचार और व्यापार के लिए उपयोगी थीं। दक्षिण बिहार में लौह-अयस्क के स्रोत उपलब्ध थे। हाथियों की उपलब्धता भी सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण थी।
इन प्राकृतिक लाभों के साथ महत्वाकांक्षी शासकों ने मगध को विस्तारवादी शक्ति बनाया।
बिम्बिसार
हर्यंक वंश का बिम्बिसार मगध के प्रारंभिक शक्तिशाली शासकों में था।
उसने वैवाहिक संबंधों और सैन्य अभियानों दोनों का उपयोग किया। अंग को जीतकर उसने मगध की शक्ति पूर्व की ओर बढ़ाई। अंग की राजधानी चम्पा व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण थी।
बिम्बिसार का संबंध गौतम बुद्ध और महावीर के समय से भी जोड़ा जाता है।
उसकी राजधानी राजगृह पहाड़ियों से घिरी हुई थी, जिससे उसे प्राकृतिक सुरक्षा मिलती थी।
बिम्बिसार के शासन में मगध एक क्षेत्रीय शक्ति से बड़े राज्य की दिशा में बढ़ा।
अजातशत्रु
बिम्बिसार के बाद अजातशत्रु ने मगध की विस्तार नीति को आगे बढ़ाया।
उसका सबसे महत्वपूर्ण संघर्ष वज्जि संघ से था। वैशाली केंद्रित वज्जि संघ राजनीतिक और सैन्य दृष्टि से मजबूत था।
लंबे संघर्ष के बाद मगध ने वज्जियों पर विजय प्राप्त की। इससे गंगा के उत्तर के क्षेत्रों पर मगध का प्रभाव बढ़ा।
अजातशत्रु के समय पाटलिग्राम का सामरिक महत्व बढ़ने लगा। यही स्थान आगे चलकर पाटलिपुत्र के रूप में विकसित हुआ।
पाटलिपुत्र का महत्व
गंगा और सोन जैसी नदियों के निकट स्थित पाटलिपुत्र की भौगोलिक स्थिति अत्यंत अनुकूल थी।
नदियाँ प्राकृतिक सुरक्षा देती थीं और साथ ही व्यापार तथा सैनिक आवागमन के मार्ग के रूप में काम करती थीं।
आगे चलकर पाटलिपुत्र नंद और मौर्य साम्राज्यों की राजधानी बना तथा प्राचीन भारत के सबसे महत्वपूर्ण नगरों में शामिल हुआ।
मगध का यही विस्तार आगे भारत के पहले विशाल साम्राज्य की पृष्ठभूमि बना। वर्तमान बिहार का मगध क्षेत्र बाद में मौर्य साम्राज्य का केंद्रीय आधार बना। (NCERT)
शिशुनाग और नंद
हर्यंक वंश के बाद शिशुनाग वंश सत्ता में आया।
इस काल में मगध ने अवन्ति जैसे प्रमुख प्रतिद्वंद्वी को समाप्त कर अपनी शक्ति मध्य भारत तक बढ़ाई।
इसके बाद नंद वंश का उदय हुआ। नंदों ने विशाल सेना और बड़ी आर्थिक शक्ति के आधार पर मगध साम्राज्य का विस्तार किया।
नंद शासकों के बारे में बौद्ध, जैन और बाद के साहित्यिक स्रोतों में अलग-अलग कथाएँ मिलती हैं। फिर भी इतना स्पष्ट है कि उनके शासन तक मगध उत्तर भारत की सबसे बड़ी शक्ति बन चुका था।
नंद साम्राज्य की इसी राजनीतिक संरचना को आगे चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने नियंत्रण में लेकर मौर्य साम्राज्य की नींव रखी।
धार्मिक और बौद्धिक हलचल
छठी शताब्दी ईसा पूर्व केवल राजनीतिक परिवर्तन का समय नहीं था। यह गहरे धार्मिक और दार्शनिक मंथन का भी युग था।
वैदिक परंपरा में यज्ञ और कर्मकांड का महत्व बढ़ चुका था। ब्राह्मण पुरोहितों की भूमिका मजबूत थी।
लेकिन नगरों, व्यापारियों और नए सामाजिक समूहों के उभार के साथ ऐसे धार्मिक विचारों की मांग भी बढ़ी जो जन्म और कर्मकांड से अलग व्यक्तिगत आचरण, तप, ज्ञान और मुक्ति पर जोर दें।
इसी वातावरण में अनेक श्रमण परंपराएँ विकसित हुईं।
बौद्ध और जैन धर्म इन आंदोलनों में सबसे प्रभावशाली बने, लेकिन इनके अलावा आजीवक और अन्य विचारधाराएँ भी सक्रिय थीं। इस काल की धार्मिक हलचल को केवल दो नए धर्मों के उदय तक सीमित नहीं करना चाहिए। (eGyankosh)
महावीर और जैन परंपरा
जैन परंपरा के अनुसार तीर्थंकरों की परंपरा महावीर से बहुत पुरानी है। महावीर 24वें तीर्थंकर माने जाते हैं और उनसे पहले पार्श्वनाथ 23वें तीर्थंकर थे।
वर्धमान महावीर का जन्म वैशाली क्षेत्र से जुड़े क्षत्रिय परिवार में माना जाता है। परंपरागत रूप से उनका जीवन छठी शताब्दी ईसा पूर्व में रखा जाता है, हालांकि उनकी तिथियों को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं।
महावीर ने गृहस्थ जीवन त्यागकर कठोर तपस्या का मार्ग अपनाया।
दीर्घ साधना के बाद उन्हें कैवल्य ज्ञान प्राप्त होने की जैन मान्यता है। इसके बाद उन्होंने अपना संदेश विभिन्न क्षेत्रों में दिया।
जैन धर्म के प्रमुख सिद्धांत
जैन दर्शन में अहिंसा का सर्वोच्च स्थान है।
केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि सभी जीवों को जीवन का अधिकार मानते हुए हिंसा से बचने पर जोर दिया गया।
जैन आचार के प्रमुख सिद्धांतों में—
अहिंसा,
सत्य,
अस्तेय अर्थात चोरी न करना,
अपरिग्रह अर्थात संग्रह से विरक्ति,
और ब्रह्मचर्य शामिल हैं।
महावीर ने तप, आत्मसंयम और कर्मबंधन से मुक्ति पर विशेष बल दिया।
जैन दर्शन में आत्मा को शाश्वत माना गया है। कर्म आत्मा को जन्म-मृत्यु के चक्र से बाँधते हैं। तप और संयम से कर्मबंधन समाप्त कर मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।
अनेकांतवाद
जैन दर्शन की विशिष्ट अवधारणाओं में अनेकांतवाद है।
इसका मूल विचार यह है कि वास्तविकता जटिल है और उसे केवल एक दृष्टिकोण से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।
इसी से स्याद्वाद की विचार परंपरा जुड़ती है, जिसमें किसी कथन को परिस्थिति और दृष्टिकोण के अनुसार समझने पर जोर दिया गया।
इस दार्शनिक दृष्टिकोण ने भारतीय तर्क और विचार परंपरा को महत्वपूर्ण योगदान दिया।
गौतम बुद्ध
बौद्ध परंपरा के संस्थापक सिद्धार्थ गौतम का जन्म शाक्य कुल में लुंबिनी क्षेत्र में हुआ माना जाता है।
उनके पिता शुद्धोधन शाक्य समुदाय से जुड़े प्रमुख व्यक्ति थे। सिद्धार्थ का प्रारंभिक जीवन अपेक्षाकृत संपन्न वातावरण में बीता।
परंपरा के अनुसार जीवन में वृद्धावस्था, बीमारी और मृत्यु की वास्तविकताओं से परिचय ने उन्हें गहरे प्रश्नों की ओर प्रेरित किया।
उन्होंने गृहत्याग किया और सत्य की खोज में विभिन्न आचार्यों तथा तपस्वियों के साथ रहे।
अत्यधिक तपस्या से संतोष न मिलने पर उन्होंने मध्यम मार्ग अपनाया।
बोधगया में ज्ञान प्राप्ति
सिद्धार्थ ने वर्तमान बिहार के बोधगया में पीपल वृक्ष के नीचे ध्यान किया और वहीं उन्हें बोध अर्थात ज्ञान प्राप्त हुआ।
इसके बाद वे बुद्ध—अर्थात जागृत व्यक्ति—कहलाए।
बिहार बुद्ध के जीवन से अत्यंत गहराई से जुड़ा रहा। बोधगया ज्ञान प्राप्ति का स्थल था और राजगृह उनके प्रमुख उपदेश केंद्रों में शामिल रहा। (NCERT)
बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद सारनाथ में अपना पहला उपदेश दिया। बौद्ध परंपरा इसे धर्मचक्र प्रवर्तन कहती है।
इसके बाद लगभग चार दशकों तक उन्होंने गंगा घाटी के विभिन्न क्षेत्रों में भ्रमण कर उपदेश दिए।
चार आर्य सत्य
बुद्ध के उपदेशों के केंद्र में चार आर्य सत्य हैं।
पहला—मानव जीवन में दुःख है।
दूसरा—दुःख का कारण तृष्णा अर्थात अत्यधिक इच्छा और आसक्ति है।
तीसरा—तृष्णा का अंत होने पर दुःख का अंत संभव है।
चौथा—दुःख समाप्त करने का मार्ग अष्टांगिक मार्ग है।
बुद्ध का उद्देश्य दार्शनिक कल्पना से अधिक मानव जीवन के दुःख और उससे मुक्ति के व्यावहारिक मार्ग पर केंद्रित था।
अष्टांगिक मार्ग
बुद्ध ने जिस मार्ग की शिक्षा दी उसमें—
सम्यक दृष्टि,
सम्यक संकल्प,
सम्यक वाणी,
सम्यक कर्म,
सम्यक आजीविका,
सम्यक प्रयास,
सम्यक स्मृति और
सम्यक समाधि शामिल हैं।
यह मार्ग नैतिक आचरण, मानसिक अनुशासन और ज्ञान को जोड़ता है।
बुद्ध ने एक ओर विलासपूर्ण जीवन और दूसरी ओर अत्यधिक कठोर तपस्या—दोनों से दूरी रखते हुए मध्यम मार्ग की शिक्षा दी।
कर्म और पुनर्जन्म
बौद्ध धर्म ने कर्म और पुनर्जन्म की उस समय प्रचलित अवधारणाओं को स्वीकार करते हुए उनकी नई व्याख्या की।
बुद्ध ने मनुष्य के नैतिक कर्म को महत्वपूर्ण माना।
किसी व्यक्ति की आध्यात्मिक प्रगति उसके जन्म से निर्धारित नहीं होती। कर्म, आचरण और ज्ञान महत्वपूर्ण हैं।
यह विचार जन्म आधारित सामाजिक श्रेष्ठता के दावों के लिए चुनौतीपूर्ण था।
संघ की स्थापना
बुद्ध ने अपने अनुयायियों के लिए संघ की स्थापना की।
भिक्षु और भिक्षुणियाँ गृहस्थ जीवन छोड़कर संघ में प्रवेश कर सकते थे। उनके लिए अनुशासन और आचार नियम बनाए गए।
साथ ही बड़ी संख्या में गृहस्थ अनुयायी भी बौद्ध धर्म से जुड़े।
व्यापारी वर्ग ने बौद्ध संघों को महत्वपूर्ण सहयोग दिया। व्यापार मार्गों के आसपास विहार बने और भिक्षुओं के भ्रमण से बौद्ध विचार तेजी से फैले।
स्थानीय भाषाओं का महत्व
बुद्ध और महावीर दोनों की शिक्षाओं की लोकप्रियता का एक कारण यह भी था कि उनकी परंपराएँ केवल कठिन वैदिक संस्कृत तक सीमित नहीं रहीं।
बौद्ध और जैन साहित्य में प्राकृत तथा पाली जैसी जनसुलभ भाषाओं का व्यापक प्रयोग हुआ।
इससे उनके विचार समाज के अधिक व्यापक वर्गों तक पहुँचे।
बाद में बौद्ध और जैन परंपराओं ने विशाल साहित्यिक परंपरा विकसित की।
बुद्ध और वर्ण व्यवस्था
बुद्ध ने समाज में मौजूद वर्ण व्यवस्था को तत्काल राजनीतिक रूप से समाप्त करने का कोई कार्यक्रम नहीं चलाया, लेकिन उन्होंने आध्यात्मिक श्रेष्ठता को जन्म से जोड़ने का विरोध किया।
उनके अनुसार व्यक्ति की श्रेष्ठता उसके आचरण से तय होती है।
संघ में विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों के व्यक्तियों के प्रवेश ने इस विचार को व्यावहारिक रूप भी दिया।
इस कारण बौद्ध धर्म व्यापारी, शिल्पकार और अनेक अन्य सामाजिक वर्गों में लोकप्रिय हुआ।
महिलाओं का संघ में प्रवेश
प्रारंभ में बुद्ध महिलाओं को संघ में प्रवेश देने को लेकर संकोच में थे, लेकिन बाद में भिक्षुणी संघ स्थापित हुआ।
महाप्रजापति गौतमी को प्रारंभिक भिक्षुणियों में प्रमुख माना जाता है।
इससे महिलाओं के लिए धार्मिक जीवन और आध्यात्मिक साधना का एक स्वतंत्र मार्ग खुला।
हालांकि भिक्षुणियों पर भिक्षुओं की तुलना में अधिक अनुशासनात्मक नियम लगाए गए थे, फिर भी प्राचीन भारतीय धार्मिक इतिहास में महिला संघ की स्थापना महत्वपूर्ण घटना थी।
बुद्ध का महापरिनिर्वाण
बुद्ध का अंतिम समय कुशीनगर में बीता, जहाँ उनका महापरिनिर्वाण हुआ।
उनकी मृत्यु के बाद उनके अवशेषों को विभिन्न समूहों में बाँटा गया और उन पर स्तूप बनाए गए।
आगे स्तूप बौद्ध धर्म की महत्वपूर्ण धार्मिक स्थापत्य परंपरा बने।
बुद्ध के जीवन से जुड़े लुंबिनी, बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर बाद में चार प्रमुख तीर्थस्थल बने।
बौद्ध परिषदें
बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनकी शिक्षाओं को सुरक्षित रखने और संघ के नियमों पर विचार करने के लिए परिषदों की परंपरा विकसित हुई।
बौद्ध परंपरा पहली परिषद को राजगृह और दूसरी परिषद को वैशाली से जोड़ती है।
इन परिषदों की ऐतिहासिक बारीकियों को लेकर अलग-अलग बौद्ध परंपराओं में भिन्न विवरण हैं। इसलिए उन्हें पूरी तरह एक समान कालक्रम में प्रस्तुत करना कठिन है।
फिर भी इतना स्पष्ट है कि बुद्ध की मृत्यु के बाद संघ ने शिक्षाओं और अनुशासन को व्यवस्थित करने का प्रयास किया।
बौद्ध और जैन धर्म क्यों फैले?
दोनों परंपराओं के प्रसार के पीछे कई कारण थे।
इनकी शिक्षाएँ अपेक्षाकृत सरल नैतिक सिद्धांतों पर आधारित थीं।
जन्म से अधिक कर्म और आचरण पर जोर था।
व्यापारियों और नगरवासियों ने इनका समर्थन किया।
भिक्षु और साधु विभिन्न स्थानों पर भ्रमण करते थे।
स्थानीय भाषाओं का उपयोग किया गया।
राजाओं और गणसंघों से भी संरक्षण मिला।
आगे मगध और विशेष रूप से मौर्य काल में बौद्ध धर्म को व्यापक राजकीय संरक्षण मिला, जबकि जैन धर्म भी भारत के अनेक क्षेत्रों में मजबूत परंपरा के रूप में विकसित हुआ।
सामाजिक परिवर्तन का दर्पण
महाजनपदों और श्रमण परंपराओं का उदय एक-दूसरे से पूरी तरह अलग घटनाएँ नहीं थीं।
कृषि के विस्तार ने अतिरिक्त उत्पादन पैदा किया।
अतिरिक्त उत्पादन से नगर और व्यापार बढ़े।
व्यापार से नए आर्थिक समूह मजबूत हुए।
राज्य बड़े हुए और कर प्रणाली विकसित हुई।
इन परिवर्तनों ने पुराने सामाजिक और धार्मिक ढाँचों को नए प्रश्नों के सामने खड़ा किया।
बुद्ध, महावीर और अन्य श्रमण विचारकों का उदय इसी व्यापक परिवर्तन का हिस्सा था।
भारतीय इतिहास का निर्णायक मोड़
छठी से चौथी शताब्दी ईसा पूर्व का भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा था जहाँ राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक परिवर्तन साथ-साथ हो रहे थे।
छोटे जनपद विशाल राज्यों में बदल रहे थे।
गणसंघ राजतंत्रों के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहे थे।
नगर और व्यापार बढ़ रहे थे।
मगध लगातार शक्तिशाली हो रहा था।
और इसी समय बौद्ध तथा जैन धर्म भारतीय चिंतन को नए मार्ग प्रदान कर रहे थे।
महाजनपदों के बीच संघर्ष अंततः मगध की विजय की दिशा में बढ़ा। नंदों तक आते-आते मगध के पास विशाल राज्य, बड़ी सेना और मजबूत आर्थिक संसाधन थे।
इसी राजनीतिक आधार पर कुछ ही समय बाद चंद्रगुप्त मौर्य एक ऐसे साम्राज्य की स्थापना करने वाला था जिसने भारतीय उपमहाद्वीप के बहुत बड़े हिस्से को पहली बार एक विशाल राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत जोड़ दिया।
खंड 05 · मौर्य साम्राज्य: चंद्रगुप्त से अशोक तक
भारतीय इतिहास में मौर्य साम्राज्य एक निर्णायक मोड़ का प्रतिनिधित्व करता है। पहली बार भारतीय उपमहाद्वीप का बहुत बड़ा भूभाग एक केंद्रीकृत राजनीतिक सत्ता के अधीन आया। मगध, जो महाजनपद काल में धीरे-धीरे सबसे शक्तिशाली राज्य बन चुका था, मौर्यों के समय एक विशाल साम्राज्य का केंद्र बना।
मौर्य साम्राज्य की स्थापना चंद्रगुप्त मौर्य ने चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के अंतिम दशकों में की। उसके बाद बिंदुसार और फिर अशोक ने इस साम्राज्य को आगे बढ़ाया। अशोक के समय मौर्य सत्ता अपने सबसे बड़े विस्तार पर पहुँची।
मौर्य इतिहास का महत्व केवल विशाल भूभाग पर शासन के कारण नहीं है। इसी काल में सुव्यवस्थित प्रशासन, विशाल सेना, कर व्यवस्था, सड़क और संचार तंत्र, राजकीय नियंत्रण तथा शिलालेखों के माध्यम से जनता तक सीधे संदेश पहुँचाने की परंपरा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। अशोक के अभिलेख भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष स्रोतों में हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण भी अशोक के अभिलेखों को उस विशिष्ट श्रेणी में रखता है जिनमें सम्राट ने प्रजा के लिए नैतिक और प्रशासनिक संदेश जारी किए थे। (ASI)
मौर्य इतिहास के प्रमुख स्रोत
मौर्य काल के बारे में जानकारी अनेक प्रकार के स्रोतों से प्राप्त होती है।
सबसे महत्वपूर्ण स्रोत अशोक के शिलालेख और स्तंभलेख हैं। इनके अतिरिक्त कौटिल्य से संबद्ध अर्थशास्त्र, यूनानी राजदूत मेगस्थनीज की इंडिका, बौद्ध और जैन साहित्य तथा बाद के संस्कृत ग्रंथ महत्वपूर्ण हैं।
मेगस्थनीज चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटर का राजदूत बनकर भारत आया था। उसकी मूल पुस्तक इंडिका उपलब्ध नहीं है, लेकिन बाद के यूनानी और रोमन लेखकों के उद्धरणों में उसके विवरण सुरक्षित हैं। इनमें मौर्य प्रशासन, समाज और आर्थिक गतिविधियों की जानकारी मिलती है। (NCERT)
अर्थशास्त्र राज्य, प्रशासन, कर, गुप्तचर, युद्ध, कृषि और अर्थव्यवस्था का विस्तृत विवेचन करता है। परंतु पूरे ग्रंथ को बिना सावधानी सीधे चंद्रगुप्त के शासन का सरकारी दस्तावेज मान लेना उचित नहीं है, क्योंकि इसके निर्माण और संपादन के काल को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं।
नंद साम्राज्य और मौर्य सत्ता का उदय
मौर्यों से पहले मगध पर नंद वंश का शासन था। नंदों ने विशाल सेना, कर व्यवस्था और व्यापक राजनीतिक नियंत्रण के आधार पर मगध को अत्यंत शक्तिशाली बना दिया था।
लेकिन चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के उत्तरार्ध में राजनीतिक परिस्थितियाँ तेजी से बदलीं।
उत्तर-पश्चिम भारत में सिकंदर का आक्रमण हो चुका था। 326 ईसा पूर्व में सिकंदर ने भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में प्रवेश किया और झेलम के निकट राजा पोरस से युद्ध किया।
सिकंदर की सेना आगे बढ़ने के बजाय वापस लौट गई। 323 ईसा पूर्व में उसकी मृत्यु के बाद उसके विशाल साम्राज्य के विभिन्न हिस्सों पर उसके सेनापतियों का नियंत्रण स्थापित हुआ।
इसी संक्रमणकाल में चंद्रगुप्त मौर्य का उदय हुआ।
चंद्रगुप्त मौर्य
चंद्रगुप्त मौर्य भारतीय इतिहास के महान साम्राज्य निर्माताओं में गिना जाता है।
उसके प्रारंभिक जीवन के बारे में बौद्ध, जैन और ब्राह्मण परंपराओं में भिन्न कथाएँ मिलती हैं। इसलिए उसके वंश और प्रारंभिक जीवन के प्रत्येक विवरण को समान रूप से ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना जा सकता।
लेकिन इतना स्पष्ट है कि उसने नंद सत्ता को पराजित कर मगध पर अधिकार किया और लगभग 321 ईसा पूर्व के आसपास मौर्य सत्ता की नींव रखी।
उसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी।
वर्तमान बिहार का मगध क्षेत्र इसी समय उस राजनीतिक शक्ति का केंद्र बना जिसने भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े हिस्से को एक शासन व्यवस्था के अंतर्गत जोड़ा। एनसीईआरटी भी मगध को मौर्य साम्राज्य का केंद्रीय आधार मानता है। (NCERT)
कौटिल्य या चाणक्य की भूमिका
चंद्रगुप्त के उदय के साथ चाणक्य या कौटिल्य का नाम अत्यंत प्रसिद्ध है।
बाद की परंपराओं में चाणक्य को वह विद्वान और रणनीतिकार बताया गया है जिसने नंदों के विरुद्ध चंद्रगुप्त का मार्गदर्शन किया और मौर्य सत्ता की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कौटिल्य को परंपरागत रूप से अर्थशास्त्र का रचयिता माना जाता है।
अर्थशास्त्र में राजा, मंत्री, प्रशासन, कर, राज्य की आय, व्यापार, कृषि, गुप्तचर, कूटनीति और युद्ध पर विस्तार से चर्चा है।
इस ग्रंथ में राज्य को अत्यंत व्यावहारिक दृष्टि से देखा गया है। राजा का प्रमुख दायित्व राज्य की सुरक्षा, आर्थिक समृद्धि और व्यवस्था बनाए रखना माना गया है।
हालांकि आधुनिक इतिहासलेखन इस बात पर सावधानी बरतता है कि अर्थशास्त्र के प्रत्येक नियम को मौर्यकालीन प्रशासन का प्रत्यक्ष विवरण मान लिया जाए।
चंद्रगुप्त और सेल्यूकस का संघर्ष
सिकंदर की मृत्यु के बाद उसके सेनापति सेल्यूकस निकेटर ने उसके पूर्वी प्रदेशों पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया।
लगभग 305 ईसा पूर्व के आसपास उसका चंद्रगुप्त मौर्य से संघर्ष हुआ।
इस संघर्ष का परिणाम चंद्रगुप्त के पक्ष में रहा। बाद में दोनों के बीच समझौता हुआ।
यूनानी स्रोतों से संकेत मिलता है कि सेल्यूकस ने अराकोसिया और आसपास के कुछ पूर्वी क्षेत्रों पर अपना दावा छोड़ा और चंद्रगुप्त ने उसे 500 युद्ध हाथी दिए।
इन हाथियों ने बाद में पश्चिम एशिया के युद्धों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस समझौते के बाद दोनों राज्यों के बीच राजनयिक संबंध स्थापित हुए। इसी पृष्ठभूमि में मेगस्थनीज मौर्य दरबार में आया।
साम्राज्य का विस्तार
चंद्रगुप्त के शासनकाल में मौर्य सत्ता उत्तर भारत के विशाल क्षेत्र तक फैल गई।
मगध से शुरू हुआ साम्राज्य उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ा और सिकंदर के उत्तराधिकारियों के नियंत्रण वाले कई क्षेत्रों तक पहुँचा।
पश्चिम भारत के कुछ हिस्से भी मौर्य सत्ता में सम्मिलित हुए।
दक्षिण भारत में मौर्य विस्तार की सीमा को लेकर कुछ प्रश्न हैं, लेकिन अशोक के अभिलेखों से यह स्पष्ट है कि उसके समय तक साम्राज्य दक्कन के बड़े हिस्से तक फैला हुआ था।
चंद्रगुप्त ने वह राजनीतिक ढाँचा तैयार किया जिसे उसके उत्तराधिकारियों ने और विस्तृत किया।
मेगस्थनीज की नजर में पाटलिपुत्र
मेगस्थनीज ने पाटलिपुत्र का उल्लेख एक विशाल और सुव्यवस्थित नगर के रूप में किया।
उसके विवरण से नगर प्रशासन, राजकीय व्यवस्था, सेना और समाज के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है।
हालांकि मेगस्थनीज के कई विवरणों को सावधानी से पढ़ना आवश्यक है। उसने भारतीय समाज को अपनी यूनानी दृष्टि से समझने का प्रयास किया और उसके कुछ विवरण अतिरंजित या अधूरे भी हो सकते हैं।
फिर भी वह मौर्यकालीन भारत का महत्वपूर्ण बाहरी साक्षी था। एनसीईआरटी के स्रोत-संकलन में भी इंडिका को मौर्य प्रशासन, सामाजिक संरचना और आर्थिक गतिविधियों के अध्ययन का प्रमुख स्रोत माना गया है। (NCERT)
मौर्य प्रशासन
इतने विशाल साम्राज्य को चलाने के लिए सुव्यवस्थित प्रशासन आवश्यक था।
सम्राट शासन के केंद्र में था। उसके साथ मंत्रियों और उच्च अधिकारियों की व्यवस्था थी।
साम्राज्य को बड़े प्रशासनिक क्षेत्रों में विभाजित किया गया था। कुछ प्रमुख प्रांतों के केंद्र तक्षशिला, उज्जयिनी, तोसली और सुवर्णगिरि जैसे स्थानों पर थे।
राजपरिवार के सदस्यों अथवा विश्वसनीय अधिकारियों को प्रांतीय प्रशासन की जिम्मेदारी दी जाती थी।
स्थानीय स्तर पर भी विभिन्न अधिकारी कर वसूली, कानून-व्यवस्था और प्रशासन से जुड़े कार्य करते थे।
अशोक के अभिलेखों में महामात्र नामक अधिकारियों का उल्लेख मिलता है।
कर और अर्थव्यवस्था
मौर्य साम्राज्य की आर्थिक शक्ति मुख्यतः कृषि पर आधारित थी।
भूमि से प्राप्त राजस्व राज्य की प्रमुख आय में शामिल था।
इसके अतिरिक्त व्यापार, वन, खनिज, पशुधन और विभिन्न आर्थिक गतिविधियों से भी राजस्व प्राप्त होता था।
अर्थशास्त्र में राज्य द्वारा कृषि, सिंचाई, खनन, वन, व्यापार और उत्पादन की निगरानी का विस्तृत वर्णन मिलता है।
राज्य की विशाल सेना और प्रशासन को बनाए रखने के लिए मजबूत राजस्व व्यवस्था आवश्यक थी।
सड़कें और संचार
मौर्य साम्राज्य विशाल था। इसलिए संचार व्यवस्था शासन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
उत्तर-पश्चिम से पाटलिपुत्र तक आने वाले प्राचीन मार्गों का उपयोग व्यापार और प्रशासन दोनों के लिए होता था।
राजकीय अधिकारियों, सैनिकों और संदेशवाहकों के आवागमन के लिए मार्गों का महत्व बढ़ा।
नदियाँ भी यातायात और व्यापार की महत्वपूर्ण धमनियाँ थीं।
गंगा नदी साम्राज्य के केंद्रीय क्षेत्रों को जोड़ने में विशेष रूप से उपयोगी थी।
विशाल सेना
यूनानी विवरणों में मौर्य सेना को अत्यंत विशाल बताया गया है।
सेना में पैदल सैनिक, घुड़सवार, रथ और हाथी शामिल थे।
विशेष रूप से युद्ध हाथियों की भूमिका महत्वपूर्ण थी।
सेल्यूकस के साथ हुए समझौते में हाथियों का उल्लेख बताता है कि मौर्य सेना में उनका सामरिक महत्व कितना था।
इतनी बड़ी सेना केवल सैन्य शक्ति का प्रतीक नहीं थी; उसे बनाए रखने के लिए विशाल आर्थिक संसाधन और प्रशासनिक तंत्र भी आवश्यक था।
चंद्रगुप्त के अंतिम वर्ष
जैन परंपरा चंद्रगुप्त के अंतिम जीवन को जैन धर्म से जोड़ती है।
परंपरा के अनुसार उसने राजपाट छोड़ दिया और जैन आचार्य भद्रबाहु के साथ दक्षिण भारत चला गया।
श्रवणबेलगोला में उसके तपस्या करने और अंततः संलेखना द्वारा जीवन समाप्त करने की कथा जैन परंपरा में प्रसिद्ध है।
इन घटनाओं के सभी विवरणों को स्वतंत्र समकालीन प्रमाणों से सत्यापित करना कठिन है, लेकिन दक्षिण भारत की जैन परंपरा में चंद्रगुप्त का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
बिंदुसार
चंद्रगुप्त के बाद उसका पुत्र बिंदुसार मौर्य सिंहासन पर बैठा।
बिंदुसार के शासन के बारे में चंद्रगुप्त और अशोक की तुलना में कम जानकारी उपलब्ध है।
यूनानी स्रोत उसे अमित्रोखेट्स जैसे नाम से उल्लेखित करते हैं, जिसे सामान्यतः संस्कृत ‘अमित्रघात’ से जोड़ा जाता है।
उसके शासन में साम्राज्य की एकता बनी रही और दक्षिण की दिशा में मौर्य प्रभाव बढ़ा।
यूनानी संसार के साथ राजनयिक संबंध भी जारी रहे।
बिंदुसार की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि संभवतः यही थी कि उसने चंद्रगुप्त द्वारा निर्मित विशाल साम्राज्य को स्थिर रखा और अशोक के लिए मजबूत राजनीतिक आधार छोड़ा।
अशोक का सिंहासनारोहण
बिंदुसार के बाद अशोक मौर्य शासक बना।
उसके सिंहासनारोहण की सटीक परिस्थितियों के बारे में बाद के बौद्ध ग्रंथों में अनेक कथाएँ मिलती हैं। इनमें उत्तराधिकार संघर्ष और भाइयों से टकराव का उल्लेख है, लेकिन सभी कथाओं को शाब्दिक इतिहास नहीं माना जा सकता।
सामान्यतः अशोक का शासन लगभग 268 ईसा पूर्व से 232 ईसा पूर्व के बीच माना जाता है।
उसके समय मौर्य साम्राज्य अपनी शक्ति और क्षेत्रीय विस्तार के चरम पर था।
कलिंग युद्ध
अशोक के शासन की सबसे प्रसिद्ध घटना कलिंग युद्ध है।
कलिंग वर्तमान ओडिशा और उससे जुड़े तटीय क्षेत्र में स्थित एक स्वतंत्र और समृद्ध राज्य था।
अशोक ने अपने शासन के लगभग आठवें वर्ष में कलिंग पर आक्रमण किया।
उसके तेरहवें प्रमुख शिलालेख में कलिंग युद्ध के परिणाम का उल्लेख है।
अशोक स्वयं लिखवाता है कि युद्ध में बड़ी संख्या में लोग मारे गए, निर्वासित किए गए और पीड़ा का शिकार हुए।
यह प्राचीन इतिहास में असाधारण उदाहरण है, क्योंकि विजेता सम्राट ने स्वयं युद्ध से उत्पन्न मानवीय पीड़ा पर पश्चात्ताप व्यक्त किया।
क्या अशोक ने युद्ध पूरी तरह त्याग दिया?
कलिंग युद्ध के बाद अशोक की नीति में बड़ा परिवर्तन हुआ।
उसने सैन्य विजय की तुलना में ‘धम्म विजय’ को श्रेष्ठ बताया।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मौर्य राज्य या उसकी सेना तत्काल समाप्त हो गई।
अशोक एक विशाल साम्राज्य का सम्राट बना रहा। सीमाओं की रक्षा, प्रशासन और कानून-व्यवस्था के लिए राज्य शक्ति कायम रही।
परिवर्तन मुख्यतः उसकी राजनीतिक और नैतिक प्राथमिकताओं में दिखाई देता है। वह विजय की प्रतिष्ठा से अधिक नैतिक शासन और प्रजा के कल्याण पर जोर देने लगा।
अशोक का धम्म
अशोक के शासन को समझने के लिए ‘धम्म’ शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है।
धम्म को सीधे आधुनिक अर्थ में कोई नया धर्म मानना उचित नहीं होगा।
अशोक स्वयं बौद्ध धर्म से प्रभावित था और उसके बौद्ध धर्म से जुड़े होने के स्पष्ट प्रमाण हैं, लेकिन उसके सार्वजनिक शिलालेखों में धम्म व्यापक नैतिक आचार के रूप में सामने आता है।
इसमें—
माता-पिता का सम्मान,
बड़ों का आदर,
सभी जीवों के प्रति दया,
अनावश्यक हिंसा से बचना,
सत्य और सदाचार,
सेवकों के प्रति उचित व्यवहार,
और विभिन्न धार्मिक परंपराओं के प्रति सम्मान पर जोर दिया गया।
धम्म का उद्देश्य विशाल और विविध साम्राज्य के भीतर नैतिक सामंजस्य स्थापित करना भी था।
धार्मिक सहिष्णुता
अशोक के अभिलेखों की महत्वपूर्ण विशेषता विभिन्न धार्मिक परंपराओं के प्रति सम्मान का आग्रह है।
उसने अपने संप्रदाय की अत्यधिक प्रशंसा और दूसरों की निंदा से बचने की सलाह दी।
उसकी दृष्टि में दूसरे मतों को सुनना और उनका सम्मान करना आवश्यक था।
यह नीति विशेष महत्व रखती है क्योंकि मौर्य साम्राज्य धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से अत्यंत विविध था।
अशोक का धम्म किसी एक पूजा-पद्धति को पूरे साम्राज्य पर थोपने का कार्यक्रम नहीं था।
धम्म महामात्र
अशोक ने धम्म से संबंधित कार्यों के लिए विशेष अधिकारियों की नियुक्ति की जिन्हें धम्म महामात्र कहा गया।
इनका कार्य विभिन्न सामाजिक समूहों के कल्याण और नैतिक नीति से जुड़ा था।
अशोक ने अधिकारियों को जनता के संपर्क में रहने और उसकी समस्याओं पर ध्यान देने की अपेक्षा की।
अपने अभिलेखों में वह कई बार स्वयं को ऐसी सत्ता के रूप में प्रस्तुत करता है जो प्रजा के कल्याण के प्रति उत्तरदायी है।
अशोक के शिलालेख
अशोक की सबसे स्थायी विरासत उसके अभिलेख हैं।
उसके संदेश चट्टानों, गुफाओं और विशाल पत्थर के स्तंभों पर अंकित कराए गए।
ये अभिलेख भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न क्षेत्रों में मिले हैं।
अधिकांश अभिलेख प्राकृत भाषा में ब्राह्मी लिपि में हैं। उत्तर-पश्चिम के कुछ अभिलेख खरोष्ठी में हैं। यूनानी और अरामाई भाषा में भी अशोक के अभिलेख मिले हैं।
यह भाषाई विविधता साम्राज्य की विशालता और प्रशासनिक व्यावहारिकता का संकेत है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के अशोक अभिलेख ब्राह्मी लिपि के व्यापक प्रयोग के सबसे प्रसिद्ध प्रमाणों में हैं। (ASI)
‘देवानांप्रिय प्रियदर्शी’
अशोक के अधिकांश अभिलेखों में उसका व्यक्तिगत नाम सीधे नहीं मिलता।
वह अपने लिए ‘देवानांप्रिय’ और ‘प्रियदर्शी’ जैसे संबोधन प्रयोग करता है।
बाद में अन्य अभिलेखीय प्रमाणों की सहायता से प्रियदर्शी की पहचान मौर्य सम्राट अशोक से स्पष्ट हुई।
इन शिलालेखों का उन्नीसवीं सदी में पढ़ा जाना भारतीय प्राचीन इतिहास के पुनर्निर्माण की महत्वपूर्ण उपलब्धि था।
एनसीईआरटी के उच्चतर माध्यमिक इतिहास पाठ्यक्रम में भी अशोक के अभिलेखों और लिपि के पढ़े जाने को प्राचीन भारतीय राजनीतिक और आर्थिक इतिहास समझने का केंद्रीय स्रोत माना गया है। (NCERT)
जनकल्याण की नीति
अशोक ने अपने अभिलेखों में मानव और पशुओं के कल्याण से संबंधित उपायों का उल्लेख कराया।
उसने औषधीय पौधों, कुओं, पेड़ों और यात्रियों के लिए सुविधाओं की बात कही।
पशुओं की अनावश्यक हत्या कम करने के प्रयास भी उसके संदेशों में दिखाई देते हैं।
इन घोषणाओं का वास्तविक क्रियान्वयन पूरे विशाल साम्राज्य में किस सीमा तक हुआ, इसका स्वतंत्र प्रमाण हर क्षेत्र के लिए उपलब्ध नहीं है।
फिर भी यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि किसी प्राचीन सम्राट ने सार्वजनिक अभिलेखों में राज्य की जिम्मेदारी को प्रजा के कल्याण से इस स्पष्टता से जोड़ा।
अशोक और बौद्ध धर्म
कलिंग युद्ध के बाद अशोक का बौद्ध धर्म से संबंध अधिक मजबूत हुआ।
बौद्ध परंपराओं में उसे धर्म का महान संरक्षक माना गया।
उसने बौद्ध संघ को संरक्षण दिया और बौद्ध तीर्थस्थलों से संबंध स्थापित किया।
सांची, सारनाथ और अन्य स्थानों पर बौद्ध स्थापत्य के विकास को मौर्य संरक्षण से जोड़ा जाता है।
बाद की बौद्ध परंपरा तीसरी बौद्ध परिषद और विदेशों में धर्म प्रचार को भी अशोक के शासन से जोड़ती है।
लेकिन परंपरागत कथाओं और प्रत्यक्ष अभिलेखीय प्रमाणों के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है।
श्रीलंका से संबंध
बौद्ध परंपरा के अनुसार अशोक के पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा ने श्रीलंका में बौद्ध धर्म के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
श्रीलंकाई बौद्ध ग्रंथ महावंश और दीपवंश इस परंपरा का विस्तृत वर्णन करते हैं।
परंपरा के अनुसार संघमित्रा बोधिवृक्ष की शाखा श्रीलंका ले गईं।
इन घटनाओं ने श्रीलंका और भारत के बीच धार्मिक तथा सांस्कृतिक संबंधों को दीर्घकालीन आधार दिया।
अशोक के स्तंभ
मौर्यकालीन स्थापत्य और शिल्प की सर्वोच्च उपलब्धियों में अशोक के पत्थर के स्तंभ हैं।
इनमें अत्यंत चिकनी पॉलिश, उत्कृष्ट शिल्प और पशु शीर्ष दिखाई देते हैं।
सारनाथ का सिंह शीर्ष सबसे प्रसिद्ध है।
चार सिंहों वाला यह शीर्ष स्वतंत्र भारत का राजचिह्न बना।
इसके नीचे स्थित धर्मचक्र भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के मध्य में स्थान पाता है।
इस प्रकार मौर्यकालीन प्रतीक आधुनिक भारतीय गणराज्य की राजकीय पहचान का हिस्सा बन चुके हैं।
मौर्य कला
मौर्य युग में पत्थर के निर्माण और मूर्तिकला में महत्वपूर्ण विकास हुआ।
अशोक स्तंभ, शिलालेख, बाराबर पहाड़ियों की गुफाएँ और आरंभिक स्तूप इस काल की प्रमुख उपलब्धियाँ हैं।
बाराबर की कुछ गुफाएँ आजीवक संप्रदाय को समर्पित की गई थीं। इससे अशोक और उसके उत्तराधिकारियों द्वारा बौद्धों के अतिरिक्त अन्य धार्मिक समुदायों को भी संरक्षण मिलने के प्रमाण मिलते हैं।
मौर्यकालीन पत्थर की चमकदार पॉलिश विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
क्या मौर्य साम्राज्य अत्यधिक केंद्रीकृत था?
पुराने इतिहासलेखन में मौर्य साम्राज्य को अक्सर एक अत्यंत केंद्रीकृत प्रशासनिक मशीन के रूप में प्रस्तुत किया गया।
लेकिन इतने विशाल भूभाग पर शासन के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार प्रशासन में भिन्नता होना स्वाभाविक था।
पाटलिपुत्र का नियंत्रण केंद्रीय क्षेत्रों में अधिक प्रत्यक्ष रहा होगा, जबकि दूरस्थ क्षेत्रों में स्थानीय शक्तियों और अधिकारियों की भूमिका अधिक रही होगी।
अशोक के अभिलेख भी विभिन्न क्षेत्रों में अलग भाषाओं और प्रशासनिक निर्देशों के माध्यम से यही संकेत देते हैं कि साम्राज्य विविध था।
इसलिए मौर्य शासन को मजबूत केंद्रीय सत्ता और क्षेत्रीय प्रशासन के संयोजन के रूप में समझना अधिक उपयुक्त है।
अशोक की मृत्यु और साम्राज्य का कमजोर होना
अशोक की मृत्यु लगभग 232 ईसा पूर्व में हुई।
उसके बाद मौर्य साम्राज्य लंबे समय तक अपनी पूर्व शक्ति बनाए नहीं रख सका।
उत्तराधिकारियों की शक्ति कमजोर थी और साम्राज्य के विभिन्न हिस्सों पर केंद्रीय नियंत्रण कम होता गया।
मौर्य पतन के पीछे किसी एक कारण को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता।
विशाल साम्राज्य का प्रशासनिक बोझ, उत्तराधिकार संबंधी समस्याएँ, प्रांतीय शक्तियों का बढ़ना, आर्थिक दबाव और सीमांत क्षेत्रों की चुनौतियाँ संभवतः साथ-साथ काम कर रही थीं।
यह धारणा कि अशोक की अहिंसा नीति ने अकेले ही मौर्य साम्राज्य को कमजोर कर दिया, अत्यधिक सरल व्याख्या है और इसके पर्याप्त प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं हैं।
अंतिम मौर्य शासक
मौर्य वंश का अंतिम शासक बृहद्रथ माना जाता है।
लगभग 185 ईसा पूर्व में उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने उसकी हत्या कर सत्ता पर अधिकार कर लिया।
इसके साथ मौर्य राजवंश का अंत हुआ और उत्तर भारत में शुंग सत्ता का उदय हुआ।
लेकिन मौर्य साम्राज्य के विघटन के बाद भारतीय राजनीतिक इतिहास फिर अनेक क्षेत्रीय शक्तियों में विभाजित हो गया।
मौर्य साम्राज्य की ऐतिहासिक विरासत
मौर्य साम्राज्य भारतीय इतिहास में कई कारणों से विशिष्ट है।
चंद्रगुप्त मौर्य ने मगध की शक्ति को विशाल साम्राज्य में बदल दिया।
बिंदुसार ने उस साम्राज्य की एकता बनाए रखी।
अशोक ने उसके भूगोल को लगभग चरम सीमा तक पहुँचाया और फिर शासन को एक नैतिक भाषा देने का प्रयास किया।
मौर्य काल में—
विशाल राजनीतिक एकीकरण हुआ,
राजकीय प्रशासन मजबूत हुआ,
कर और संचार व्यवस्था विकसित हुई,
दूर-दराज क्षेत्रों के बीच संपर्क बढ़ा,
पत्थर पर अभिलेखों के माध्यम से शासन का संदेश सीधे जनता तक पहुँचा,
और बौद्ध धर्म को अंतरराष्ट्रीय विस्तार का महत्वपूर्ण आधार मिला।
सबसे बढ़कर अशोक के अभिलेख हमें पहली बार किसी भारतीय सम्राट की अपनी आवाज के निकट ले जाते हैं।
हम केवल यह नहीं जानते कि अशोक ने क्या जीता; उसके अभिलेख हमें यह भी बताते हैं कि वह अपने शासन, युद्ध, प्रजा और नैतिक जिम्मेदारी को किस प्रकार प्रस्तुत करना चाहता था।
मौर्य साम्राज्य का अंत हुआ, लेकिन उसने भारतीय राजनीतिक कल्पना में विशाल राज्य, सुव्यवस्थित प्रशासन और उपमहाद्वीपीय एकीकरण का जो उदाहरण स्थापित किया, उसका प्रभाव बहुत दूर तक गया।
मौर्यों के पतन के बाद भारत में एक बार फिर अनेक क्षेत्रीय शक्तियाँ उभरीं। उत्तर-पश्चिम से यूनानी, शक और कुषाण आए, जबकि दक्कन में सातवाहन और उत्तर भारत में शुंग-कण्व जैसी शक्तियों का उदय हुआ।
यहीं से भारतीय इतिहास का अगला चरण आरंभ होता है—मौर्योत्तर भारत: शुंग, सातवाहन, इंडो-ग्रीक, शक और कुषाण।
इसमें एक बात विशेष रूप से संतुलित रखी गई है—अशोक के कलिंग युद्ध के बाद परिवर्तन को वास्तविक माना गया है, लेकिन यह दावा नहीं किया गया कि उसने सेना या राज्य शक्ति ही छोड़ दी थी। इसी तरह मौर्यों के पतन को केवल अशोक की अहिंसा से जोड़ने वाली पुरानी धारणा भी तथ्य की तरह नहीं रखी गई है।
खंड 06 · मौर्योत्तर भारत: शुंग, सातवाहन, इंडो-ग्रीक, शक और कुषाण
मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारतीय उपमहाद्वीप एक बार फिर अनेक राजनीतिक शक्तियों में विभाजित हो गया। लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से तीसरी शताब्दी ईस्वी तक का यह काल कभी-कभी राजनीतिक विखंडन का युग कहा जाता है, लेकिन केवल इसी दृष्टि से इसे देखना अधूरा होगा।
यही वह समय था जब उत्तर भारत में शुंग और कण्व, दक्कन में सातवाहन, उत्तर-पश्चिम में इंडो-ग्रीक, शक और बाद में कुषाण जैसी शक्तियाँ उभरीं। मध्य एशिया, ईरान, यूनानी संसार और भारत के बीच संपर्क बढ़े। स्थल और समुद्री व्यापार फला-फूला। बौद्ध धर्म का विस्तार हुआ, वैदिक और पौराणिक परंपराएँ विकसित होती रहीं और कला में गांधार तथा मथुरा जैसी महान शैलियाँ सामने आईं।
इसलिए मौर्योत्तर काल को संक्रमण, संपर्क और सांस्कृतिक समन्वय का युग कहना अधिक उचित है।
मौर्य साम्राज्य के बाद की स्थिति
अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य साम्राज्य तेजी से कमजोर हुआ। साम्राज्य के दूरस्थ क्षेत्रों पर केंद्रीय नियंत्रण कम होने लगा और क्षेत्रीय शासक अधिक स्वतंत्र होते गए।
लगभग 185 ईसा पूर्व में अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ की हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने की और शुंग वंश की स्थापना हुई।
मौर्य साम्राज्य जैसी एकीकृत राजनीतिक व्यवस्था टूट गई, लेकिन कृषि, व्यापार, नगर, धार्मिक संस्थाएँ और सांस्कृतिक संपर्क समाप्त नहीं हुए।
वास्तव में कई क्षेत्रों में आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधियाँ और बढ़ीं।
शुंग वंश का उदय
पुष्यमित्र शुंग मौर्य सेना का सेनापति था। उसने सत्ता ग्रहण कर शुंग राजवंश की स्थापना की।
शुंगों का प्रमुख क्षेत्र मध्य गंगा घाटी और मध्य भारत था। पाटलिपुत्र से उनका संबंध था, लेकिन विदिशा भी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में उभरा।
पुष्यमित्र के शासनकाल में उत्तर-पश्चिम से आने वाली शक्तियों के साथ संघर्ष के संकेत मिलते हैं। बाद के साहित्य में उसके अश्वमेध यज्ञ कराने का उल्लेख भी मिलता है।
शुंग शासन को कभी-कभी वैदिक परंपराओं के पुनरुत्थान से जोड़ा जाता है।
क्या पुष्यमित्र बौद्ध विरोधी था?
पुष्यमित्र शुंग को लेकर इतिहासलेखन में एक महत्वपूर्ण विवाद रहा है।
कुछ बाद के बौद्ध ग्रंथों में उस पर बौद्ध विहारों को नष्ट करने और भिक्षुओं पर अत्याचार करने के आरोप मिलते हैं।
लेकिन पुरातात्विक प्रमाण इस प्रश्न को अधिक जटिल बनाते हैं।
शुंग काल में सांची और भरहुत जैसे महत्वपूर्ण बौद्ध स्मारकों का विस्तार और अलंकरण हुआ। इससे कम-से-कम इतना स्पष्ट है कि इस काल में बौद्ध संस्थाएँ व्यापक रूप से सक्रिय और संरक्षित थीं।
इसलिए पूरे शुंग शासन को सरल रूप से “बौद्ध विरोधी शासन” कहना ऐतिहासिक रूप से सुरक्षित निष्कर्ष नहीं है। उपलब्ध स्रोतों को सावधानी से देखना आवश्यक है।
भरहुत और सांची
मौर्योत्तर काल में बौद्ध स्थापत्य ने उल्लेखनीय विकास किया।
मध्य प्रदेश के भरहुत स्तूप से प्राप्त रेलिंग, स्तंभ और उत्कीर्ण दृश्य प्रारंभिक बौद्ध कला के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
सांची स्तूप का मूल निर्माण मौर्यकाल से जुड़ा माना जाता है, लेकिन शुंग और बाद के काल में इसका विस्तार हुआ और उसके चारों ओर विशाल पत्थर की वेदिका तथा बाद में अलंकृत तोरण बने।
इस समय बुद्ध को प्रायः प्रत्यक्ष मानव रूप में न दिखाकर प्रतीकों के माध्यम से दर्शाया जाता था—जैसे धर्मचक्र, बोधिवृक्ष, पदचिह्न और खाली सिंहासन।
एनसीईआरटी भी भरहुत की दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व की लाल बलुआ पत्थर की मूर्तिकला और आगे विकसित गांधार व मथुरा शैलियों को भारतीय कला के महत्वपूर्ण चरणों के रूप में रेखांकित करता है। (NCERT)
कण्व वंश
शुंग वंश के बाद लगभग पहली शताब्दी ईसा पूर्व में कण्व वंश ने मगध क्षेत्र में सत्ता ग्रहण की।
कण्व शासन अपेक्षाकृत अल्पकालिक था और उसका प्रभाव सीमित क्षेत्र तक रहा।
इस समय तक उत्तर भारत में अनेक स्वतंत्र शक्तियाँ उभर चुकी थीं। उत्तर-पश्चिम में इंडो-ग्रीक और शक सक्रिय थे, जबकि दक्कन में सातवाहनों की शक्ति बढ़ रही थी।
इसलिए कण्व राजनीतिक इतिहास में महत्वपूर्ण अवश्य हैं, लेकिन मौर्यों जैसी व्यापक सत्ता स्थापित नहीं कर सके।
दक्कन में सातवाहनों का उदय
मौर्योत्तर भारत की सबसे महत्वपूर्ण स्वदेशी क्षेत्रीय शक्तियों में सातवाहन थे।
उनका प्रभाव दक्कन के बड़े भाग, विशेषकर वर्तमान महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और मध्य भारत के कुछ क्षेत्रों तक फैला।
सातवाहनों की तिथियों और प्रारंभिक शासकों को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं, लेकिन उनका राजनीतिक महत्व लगभग पहली शताब्दी ईसा पूर्व से दूसरी-तीसरी शताब्दी ईस्वी तक स्पष्ट दिखाई देता है।
पुराणों में उन्हें आंध्र नाम से भी जोड़ा गया है।
उनकी राजधानियों में प्रतिष्ठान, वर्तमान पैठण, विशेष रूप से महत्वपूर्ण था। पूर्वी दक्कन में भी सातवाहन प्रभाव मजबूत रहा।
सातवाहन शासन और सामाजिक संरचना
सातवाहन राजाओं के अभिलेख उनके शासन और समाज के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
उनके शासकों के नामों में कई बार माता के नाम का प्रयोग मिलता है—जैसे गौतमीपुत्र सातकर्णि और वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी।
इसे यह मान लेने का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए कि पूरा समाज मातृसत्तात्मक था, लेकिन राजवंशीय पहचान में मातृनाम का प्रयोग महत्वपूर्ण था।
सातवाहन शासक स्वयं को ब्राह्मण परंपरा से जोड़ते थे, लेकिन उन्होंने बौद्ध संस्थाओं को भी व्यापक दान दिया।
उनके शासन में धार्मिक संरक्षण एक ही परंपरा तक सीमित नहीं था।
गौतमीपुत्र सातकर्णि
सातवाहन वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक गौतमीपुत्र सातकर्णि था।
उसके बारे में महत्वपूर्ण जानकारी नासिक क्षेत्र के अभिलेखों से मिलती है।
उसने पश्चिमी भारत में शक क्षत्रप नहपान को पराजित कर सातवाहन शक्ति को पुनर्स्थापित किया।
उसके अभिलेखों में उसे शक, यवन और पहलव शक्तियों को परास्त करने वाला बताया गया है।
गौतमीपुत्र की विजय के बाद पश्चिमी दक्कन और व्यापारिक मार्गों पर सातवाहन नियंत्रण फिर मजबूत हुआ।
उसके बाद वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी सहित अन्य शासकों ने वंश को आगे बढ़ाया।
सातवाहन और शक संघर्ष
पश्चिमी भारत का नियंत्रण आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था।
अरब सागर के बंदरगाहों से रोमन संसार और पश्चिम एशिया के साथ व्यापार होता था। इसलिए सातवाहनों और पश्चिमी क्षत्रपों के बीच संघर्ष केवल क्षेत्रीय प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं था, बल्कि व्यापारिक मार्गों और आर्थिक संसाधनों पर नियंत्रण का भी था।
कभी सातवाहन आगे बढ़े, कभी शक क्षत्रप।
यह संघर्ष लंबे समय तक पश्चिमी और मध्य भारत की राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहा।
सातवाहन अर्थव्यवस्था और व्यापार
सातवाहन काल में कृषि के साथ लंबी दूरी का व्यापार बहुत महत्वपूर्ण था।
दक्कन से समुद्री तटों और उत्तरी भारत को जोड़ने वाले व्यापारिक मार्ग सक्रिय थे।
कपास, वस्त्र, मसाले, बहुमूल्य पत्थर, धातु और अन्य वस्तुओं का व्यापार होता था।
रोमन साम्राज्य के साथ भारत के व्यापार के प्रमाण पहली और दूसरी शताब्दी ईस्वी के यूनानी-रोमन स्रोतों में भी मिलते हैं। एनसीईआरटी के अनुसार इस काल के यूनानी और रोमन वृत्तांत भारतीय बंदरगाहों तथा भारत-रोम व्यापार की वस्तुओं का उल्लेख करते हैं। (NCERT)
भारत के विभिन्न हिस्सों से रोमन स्वर्ण और रजत मुद्राएँ भी मिली हैं।
बौद्ध गुफाएँ और व्यापारी संरक्षण
पश्चिमी दक्कन की पहाड़ियों में बनी बौद्ध गुफाएँ इस काल के व्यापार और धर्म के संबंध को स्पष्ट करती हैं।
कार्ले, भाजा, नासिक, जुन्नर और कन्हेरी जैसे केंद्र व्यापारिक मार्गों के पास स्थित थे।
व्यापारियों, शिल्पकारों, अधिकारियों और कभी-कभी राजपरिवार से जुड़े लोगों ने इन विहारों और चैत्यगृहों को दान दिया।
इससे स्पष्ट होता है कि बौद्ध मठ केवल धार्मिक केंद्र नहीं थे। वे यात्रियों, व्यापारिक मार्गों और शहरी जीवन से भी जुड़े हुए थे।
इंडो-ग्रीक कौन थे?
सिकंदर की मृत्यु के बाद उत्तर-पश्चिम भारत और मध्य एशिया के क्षेत्रों में यूनानी शासकीय परंपराएँ बनी रहीं।
बैक्ट्रिया क्षेत्र के कुछ यूनानी शासकों ने भारतीय उपमहाद्वीप की ओर विस्तार किया। इन्हें आधुनिक इतिहासलेखन में इंडो-ग्रीक कहा जाता है।
भारतीय स्रोतों में यूनानियों के लिए ‘यवन’ शब्द का प्रयोग मिलता है।
इंडो-ग्रीक शासकों ने मुख्यतः उत्तर-पश्चिम भारत, अफगानिस्तान और पंजाब के क्षेत्रों में शासन किया।
उनकी राजनीतिक सीमाएँ लगातार बदलती रहीं और अनेक छोटे राजवंश समान समय में अस्तित्व में रहे।
मेनांडर या मिलिंद
इंडो-ग्रीक शासकों में मेनांडर सबसे प्रसिद्ध है।
भारतीय बौद्ध परंपरा में उसे मिलिंद कहा गया है।
‘मिलिंदपन्हो’ नामक बौद्ध ग्रंथ में राजा मिलिंद और बौद्ध भिक्षु नागसेन के बीच दार्शनिक संवाद का वर्णन है।
इस ग्रंथ में आत्मा, पुनर्जन्म, कर्म और निर्वाण जैसे विषयों पर प्रश्नोत्तर हैं।
ऐतिहासिक मेनांडर और साहित्यिक मिलिंद के विवरण पूरी तरह समान मानना उचित नहीं है, लेकिन यह ग्रंथ यूनानी और भारतीय बौद्ध बौद्धिक परंपराओं के संपर्क का महत्वपूर्ण प्रमाण है।
इंडो-ग्रीक मुद्राएँ
इंडो-ग्रीक शासकों की मुद्राएँ इतिहास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
इन पर शासकों के चित्र और नाम अंकित हैं। कई सिक्कों पर यूनानी और खरोष्ठी दोनों लिपियों का उपयोग हुआ।
यह बहुभाषिकता उस क्षेत्र के सांस्कृतिक मिश्रण को दर्शाती है।
भारतीय मुद्रा इतिहास में स्पष्ट राजप्रतिमा और द्विभाषी अभिलेखों वाले सिक्कों की परंपरा को इंडो-ग्रीक शासकों ने नई दिशा दी।
हेलियोडोरस स्तंभ
मध्य प्रदेश के विदिशा के निकट बेसनगर में मिला हेलियोडोरस स्तंभ सांस्कृतिक संपर्क का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रमाण है।
यह स्तंभ एक यूनानी राजदूत हेलियोडोरस से जुड़ा है, जिसने स्वयं को भागवत परंपरा और वासुदेव का भक्त बताया।
यह प्रमाण दर्शाता है कि भारतीय धार्मिक परंपराएँ केवल स्थानीय समुदायों तक सीमित नहीं थीं और विदेशी मूल के लोग भी उनमें सम्मिलित हो सकते थे।
यह प्रारंभिक वैष्णव या भागवत परंपरा के अध्ययन के लिए भी महत्वपूर्ण अभिलेख है।
शक कौन थे?
इंडो-ग्रीक सत्ता के बाद उत्तर-पश्चिम और पश्चिम भारत में शक शक्तियाँ उभरीं।
शक मध्य एशिया से आए जनसमूहों से जुड़े थे। भारतीय स्रोतों में उन्हें शक कहा गया, जबकि पश्चिमी स्रोतों में उन्हें अक्सर स्किथियन समूहों से जोड़ा जाता है।
उन्होंने उत्तर-पश्चिम भारत से आगे बढ़कर गुजरात, मालवा और पश्चिमी भारत के बड़े क्षेत्रों में सत्ता स्थापित की।
शक शासकों में क्षत्रप और महाक्षत्रप जैसी उपाधियाँ प्रचलित हुईं।
पश्चिमी क्षत्रप
पश्चिमी भारत में शक शासकों की सबसे स्थायी शाखा पश्चिमी क्षत्रप थी।
नहपान इसका एक महत्वपूर्ण शासक था, जिसे गौतमीपुत्र सातकर्णि ने पराजित किया।
बाद में पश्चिमी क्षत्रपों ने फिर शक्ति प्राप्त की।
उनमें रुद्रदामन प्रथम विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
रुद्रदामन और जूनागढ़ अभिलेख
रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख भारतीय अभिलेखीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
यह संस्कृत के आरंभिक विस्तृत राजकीय अभिलेखों में गिना जाता है।
इसमें रुद्रदामन की सैन्य उपलब्धियों और सुदर्शन झील की मरम्मत का उल्लेख है।
सुदर्शन झील का निर्माण मूलतः मौर्यकालीन परंपरा से जुड़ा था और बाद में विभिन्न शासकों ने उसकी मरम्मत कराई।
यह उदाहरण बताता है कि शासन बदलने के बावजूद सिंचाई और सार्वजनिक संसाधनों का महत्व बना रहा।
विदेशी शासक और भारतीय समाज
इंडो-ग्रीक, शक और बाद में कुषाण मूलतः उत्तर-पश्चिम से आए राजनीतिक समूह थे, लेकिन भारत में स्थापित होने के बाद वे स्थानीय समाज और संस्कृति का हिस्सा बनते गए।
उनकी मुद्राओं, अभिलेखों, उपाधियों और धार्मिक दान में भारतीय तथा बाहरी परंपराओं का मिश्रण दिखाई देता है।
यही मौर्योत्तर काल की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक थी—राजनीतिक सीमाएँ बदलीं, लेकिन संपर्क ने नई मिश्रित सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ पैदा कीं।
कुषाणों का उदय
लगभग पहली शताब्दी ईस्वी में कुषाण शक्ति का उदय हुआ।
कुषाणों की जड़ें मध्य एशिया के यूएझी समूहों से जुड़ी मानी जाती हैं। धीरे-धीरे उन्होंने बैक्ट्रिया, अफगानिस्तान, गांधार और उत्तर-पश्चिम भारत पर नियंत्रण स्थापित किया।
कुजुल कडफिसेस प्रारंभिक महत्वपूर्ण कुषाण शासकों में था।
बाद के शासकों ने साम्राज्य का विस्तार उत्तर भारत तक किया।
कुषाण साम्राज्य की भौगोलिक स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण थी क्योंकि वह भारत, मध्य एशिया और पश्चिमी एशिया के बीच व्यापारिक मार्गों पर स्थित था।
कनिष्क
कुषाण शासकों में कनिष्क सबसे प्रसिद्ध है।
उसकी तिथि को लेकर लंबे समय तक विवाद रहा है, लेकिन सामान्यतः उसे दूसरी शताब्दी ईस्वी के प्रारंभिक भाग से जोड़ा जाता है।
उसका साम्राज्य उत्तर-पश्चिम भारत, गांधार और मध्य एशिया के महत्वपूर्ण क्षेत्रों तक फैला था।
पुरुषपुर, वर्तमान पेशावर, उसका प्रमुख केंद्र था और मथुरा भी कुषाण सत्ता का महत्वपूर्ण नगर बना।
कनिष्क का नाम विशेष रूप से बौद्ध धर्म के संरक्षण से जुड़ा है।
कनिष्क और बौद्ध धर्म
बौद्ध परंपरा कनिष्क को महान संरक्षक के रूप में स्मरण करती है।
उससे एक बौद्ध परिषद को भी जोड़ा जाता है, जिसे प्रायः कश्मीर क्षेत्र में आयोजित माना जाता है। हालांकि इस परिषद के विवरण विभिन्न परंपराओं में अलग हैं।
कुषाण काल में महायान बौद्ध धर्म का प्रभाव तेजी से बढ़ा।
बुद्ध को केवल ऐतिहासिक शिक्षक के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक आध्यात्मिक और लोकातीत स्वरूप में देखने की प्रवृत्ति मजबूत हुई।
बोधिसत्त्वों की उपासना का महत्व भी बढ़ा।
मध्य एशिया के व्यापारिक मार्गों से बौद्ध धर्म आगे चीन और पूर्वी एशिया तक फैलने लगा।
गांधार कला
कुषाण काल की सबसे प्रसिद्ध सांस्कृतिक उपलब्धियों में गांधार कला है।
गांधार क्षेत्र में भारतीय बौद्ध विषयों और यूनानी-रोमन कलात्मक तत्वों का विशेष समन्वय दिखाई देता है।
बुद्ध की मूर्तियों में घुँघराले बाल, वस्त्रों की गहरी सिलवटें और मानव शरीर का अपेक्षाकृत प्राकृतिक चित्रण जैसी विशेषताएँ दिखाई देती हैं।
एनसीईआरटी गांधार कला में यूनानी कला के स्पष्ट प्रभाव और स्थानीय बौद्ध मान्यताओं के मेल को रेखांकित करता है। इसी काल में बुद्ध को मानव रूप में प्रस्तुत करने की परंपरा व्यापक होती दिखाई देती है। (NCERT)
मथुरा कला
गांधार के साथ मथुरा भी कुषाण काल में एक प्रमुख कला केंद्र बना।
मथुरा की मूर्तियाँ स्थानीय लाल बलुआ पत्थर में बनाई जाती थीं।
यहाँ केवल बुद्ध और बोधिसत्त्व ही नहीं, बल्कि जैन तीर्थंकरों और ब्राह्मण परंपरा के विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ भी बनीं।
मथुरा कला की शैली गांधार से अलग थी और उसकी जड़ें भारतीय मूर्तिकला की स्थानीय परंपराओं में थीं।
एनसीईआरटी मथुरा को कुषाण युग का शक्तिशाली कला केंद्र मानता है। (NCERT)
बुद्ध की मानव प्रतिमा
प्रारंभिक बौद्ध कला में बुद्ध को अक्सर प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त किया जाता था।
कुषाण काल तक आते-आते बुद्ध की मानव आकृति वाली प्रतिमाएँ बड़ी संख्या में बनने लगीं।
गांधार और मथुरा दोनों इस परिवर्तन में महत्वपूर्ण थे।
यह प्रश्न कि बुद्ध की पहली मानवाकार प्रतिमा ठीक किस केंद्र में पहले विकसित हुई, इतिहासकारों में बहस का विषय रहा है।
अधिक सुरक्षित निष्कर्ष यह है कि कुषाण युग में दोनों केंद्रों ने बुद्ध प्रतिमा की विकसित परंपरा को निर्णायक रूप दिया।
कुषाण मुद्राएँ और धार्मिक विविधता
कुषाण सिक्के उस समय की धार्मिक विविधता का अनूठा प्रमाण हैं।
इन पर यूनानी, ईरानी और भारतीय देवी-देवताओं के चित्र मिलते हैं।
कुछ कुषाण मुद्राओं पर शिव से संबंधित प्रतिमाएँ भी पाई गई हैं।
यह बताता है कि कुषाण शासन किसी एक संकीर्ण धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं था।
उसका साम्राज्य विभिन्न संस्कृतियों और धार्मिक समुदायों का संगम था।
स्वर्ण मुद्राएँ और आर्थिक शक्ति
कुषाण शासकों ने बड़ी संख्या में स्वर्ण मुद्राएँ जारी कीं।
इन सिक्कों की गुणवत्ता और व्यापकता उनके व्यापारिक तथा आर्थिक संसाधनों का संकेत देती है।
भारत से मध्य एशिया और आगे रोमन संसार तक जाने वाले व्यापार मार्गों पर कुषाणों की स्थिति अत्यंत लाभकारी थी।
रेशम, मसाले, बहुमूल्य पत्थर, वस्त्र और अन्य वस्तुओं के व्यापार ने इस क्षेत्र को समृद्ध बनाया।
रेशम मार्ग और भारत
कुषाण साम्राज्य का एक बड़ा हिस्सा उन मार्गों से जुड़ा था जिन्हें बाद में सामूहिक रूप से रेशम मार्ग कहा गया।
ये मार्ग चीन, मध्य एशिया, भारत, ईरान और भूमध्यसागरीय संसार को जोड़ते थे।
इन मार्गों पर केवल वस्तुएँ ही नहीं चलती थीं।
भिक्षु, व्यापारी, कलाकार, भाषाएँ, धार्मिक विचार और तकनीकें भी एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक पहुँचती थीं।
बौद्ध धर्म के मध्य एशिया और चीन की दिशा में विस्तार में इन संपर्कों की बड़ी भूमिका थी।
नगर, व्यापारी और श्रेणियाँ
मौर्योत्तर भारत की अर्थव्यवस्था में नगर और व्यापारी वर्ग अत्यंत महत्वपूर्ण हो गए।
कारीगर विभिन्न व्यवसायों में संगठित थे। व्यापारिक तथा शिल्प समूहों के लिए श्रेणी जैसी संस्थाओं का उल्लेख मिलता है।
धार्मिक संस्थाओं को दिए गए अनेक दानों में व्यापारियों और कारीगरों के नाम दर्ज हैं।
यह बताता है कि आर्थिक संपन्नता केवल राजदरबार तक सीमित नहीं थी।
नगरों में ऐसे समूह विकसित हुए जिनकी अपनी आर्थिक और सामाजिक भूमिका थी।
धर्म का बदलता स्वरूप
इस काल में भारतीय धार्मिक परंपराओं में गहरे परिवर्तन हुए।
बौद्ध धर्म में महायान जैसी नई धाराएँ विकसित हुईं।
जैन धर्म भी पश्चिमी और दक्षिणी भारत में फैलता रहा।
वैदिक परंपरा में यज्ञ के साथ व्यक्तिगत भक्ति, देवमूर्ति और पौराणिक देवी-देवताओं की भूमिका बढ़ने लगी।
वासुदेव-कृष्ण और शिव से जुड़ी परंपराएँ अधिक स्पष्ट होने लगीं।
इसी काल में आगे चलकर विकसित होने वाले वैष्णव और शैव धर्म के कई महत्वपूर्ण तत्व आकार लेते दिखाई देते हैं।
संस्कृत का बढ़ता महत्व
मौर्य काल के अधिकांश राजकीय अभिलेख प्राकृत भाषाओं में थे।
मौर्योत्तर काल में संस्कृत का राजनीतिक और अभिलेखीय महत्व धीरे-धीरे बढ़ा।
रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख इस दिशा में महत्वपूर्ण पड़ाव था।
आगे कुषाण और गुप्त काल में संस्कृत शासन, साहित्य और अभिजात संस्कृति की प्रमुख भाषा के रूप में और अधिक प्रतिष्ठित हुई।
सांस्कृतिक समन्वय का युग
मौर्योत्तर भारत की सबसे बड़ी ऐतिहासिक विशेषता अलग-अलग परंपराओं का मेल था।
यूनानी शासक भारतीय उपाधियाँ और धार्मिक प्रतीक अपनाते हैं।
हेलियोडोरस वासुदेव की भक्ति से जुड़ता है।
शक शासक संस्कृत में अभिलेख जारी करते हैं।
कुषाण सिक्कों पर भारतीय, ईरानी और यूनानी धार्मिक प्रतीक एक साथ दिखाई देते हैं।
बौद्ध कला में यूनानी कलात्मक प्रभाव भारतीय धार्मिक कथाओं के साथ मिलता है।
यह प्रक्रिया बताती है कि प्राचीन भारत बाहरी संपर्कों से अलग-थलग सभ्यता नहीं था। वह मध्य एशिया, ईरान और भूमध्यसागरीय संसार से निरंतर जुड़ा हुआ था।
मौर्योत्तर काल का महत्व
मौर्य साम्राज्य के बाद राजनीतिक एकता टूट गई, लेकिन भारतीय सभ्यता का विकास नहीं रुका।
इसके विपरीत इस युग में—
क्षेत्रीय राज्यों का विकास हुआ,
दक्कन भारतीय राजनीति के केंद्र में आया,
भारत का मध्य एशिया और रोमन संसार से व्यापार बढ़ा,
स्वर्ण और अन्य मुद्राओं का प्रयोग विस्तृत हुआ,
बौद्ध धर्म अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैला,
वैष्णव और शैव परंपराएँ विकसित हुईं,
गांधार और मथुरा कला का उत्कर्ष हुआ,
और संस्कृत धीरे-धीरे राजकीय तथा सांस्कृतिक प्रतिष्ठा की भाषा बनी।
शुंगों ने मध्य भारत और गंगा घाटी में सत्ता स्थापित की। सातवाहनों ने दक्कन को एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और व्यापारिक क्षेत्र बनाया। इंडो-ग्रीक और शक शासक भारतीय समाज के साथ समाहित होते गए। कुषाणों ने भारत को मध्य एशिया के विशाल व्यापारिक और सांस्कृतिक तंत्र से जोड़ा।
लगभग तीसरी शताब्दी ईस्वी तक कुषाण और सातवाहन शक्ति कमजोर होने लगी और विभिन्न क्षेत्रीय राजवंश उभरे।
इसी बदलते राजनीतिक वातावरण से चौथी शताब्दी ईस्वी में उत्तर भारत में एक नई शक्ति उभरने वाली थी—गुप्त साम्राज्य, जिसका काल भारतीय इतिहास में राजनीतिक शक्ति, साहित्य, विज्ञान, गणित, कला और संस्कृति के एक महत्वपूर्ण उत्कर्ष के रूप में जाना गया।
खंड 07 · गुप्त साम्राज्य: राजनीतिक विस्तार, विज्ञान, साहित्य और सांस्कृतिक उत्कर्ष
मौर्योत्तर भारत में शुंग, सातवाहन, शक, कुषाण और अनेक क्षेत्रीय शक्तियों के बीच लंबे राजनीतिक परिवर्तन के बाद चौथी शताब्दी ईस्वी में उत्तर भारत में गुप्त वंश का उदय हुआ। गुप्त शासकों ने मगध और गंगा घाटी से अपनी शक्ति बढ़ाते हुए उत्तर भारत के बड़े भाग पर प्रभाव स्थापित किया।
गुप्त काल को भारतीय इतिहास में राजनीतिक स्थिरता, संस्कृत साहित्य, गणित, खगोल-विज्ञान, मूर्तिकला, मंदिर स्थापत्य और शिक्षा के महत्वपूर्ण विकास से जोड़ा जाता है। लेकिन इसे केवल “स्वर्ण युग” कहकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं है। इस काल में उपलब्धियाँ असाधारण थीं, पर सामाजिक असमानता, क्षेत्रीय विविधता और राजनीतिक सीमाएँ भी मौजूद थीं।
गुप्त साम्राज्य मौर्यों जितना विशाल और प्रत्यक्ष रूप से केंद्रीकृत नहीं था। फिर भी लगभग चौथी से छठी शताब्दी ईस्वी के बीच उसने उत्तर भारतीय राजनीति और संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया।
गुप्त वंश की शुरुआत
गुप्त वंश के प्रारंभिक इतिहास के बारे में जानकारी सीमित है।
अभिलेखों में श्रीगुप्त और घटोत्कच को प्रारंभिक शासकों के रूप में जाना जाता है। इनके राज्य का वास्तविक विस्तार स्पष्ट नहीं है।
गुप्त साम्राज्य के वास्तविक राजनीतिक उत्थान की शुरुआत चंद्रगुप्त प्रथम से हुई।
उसने लगभग चौथी शताब्दी ईस्वी के आरंभ में महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।
चंद्रगुप्त प्रथम का विवाह लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी से हुआ था। इस विवाह को गुप्त सत्ता के राजनीतिक विस्तार में महत्वपूर्ण माना जाता है। चंद्रगुप्त और कुमारदेवी के संयुक्त चित्र वाले सिक्के इस संबंध का महत्वपूर्ण प्रमाण हैं।
मगध और गंगा क्षेत्र का महत्व
गुप्त सत्ता का मूल क्षेत्र गंगा घाटी में था।
मगध और उसके आसपास के क्षेत्रों का राजनीतिक महत्व मौर्य काल से ही स्थापित हो चुका था। उपजाऊ कृषि भूमि, नदी मार्ग और पुराने नगर गुप्त शक्ति के लिए भी उपयोगी रहे।
चंद्रगुप्त प्रथम के बाद उसका पुत्र समुद्रगुप्त सत्ता में आया और गुप्त साम्राज्य को व्यापक सैन्य शक्ति में बदल दिया।
समुद्रगुप्त
समुद्रगुप्त गुप्त वंश के सबसे महत्वपूर्ण शासकों में था।
उसकी सैन्य उपलब्धियों के बारे में सबसे महत्वपूर्ण स्रोत प्रयाग प्रशस्ति है, जिसे उसके दरबारी कवि और अधिकारी हरिषेण ने संस्कृत में लिखा।
यह अभिलेख वर्तमान प्रयागराज में अशोक के प्राचीन स्तंभ पर अंकित है।
प्रशस्ति का उद्देश्य राजा की महिमा का वर्णन करना था, इसलिए उसमें दी गई विजयों को आलोचनात्मक दृष्टि से पढ़ना आवश्यक है। फिर भी यह चौथी शताब्दी के राजनीतिक इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत है।
समुद्रगुप्त की विजय नीति
समुद्रगुप्त ने अलग-अलग क्षेत्रों के साथ अलग राजनीतिक व्यवहार अपनाया।
गंगा घाटी और उत्तर भारत के कुछ शासकों को पराजित कर उनके क्षेत्रों को सीधे अपने राज्य में मिला लिया गया।
दक्षिण भारत के कई शासकों को युद्ध में पराजित किया गया, लेकिन उनके राज्य समाप्त नहीं किए गए। उन्हें पुनः शासन करने दिया गया, बशर्ते वे गुप्त सम्राट की श्रेष्ठता स्वीकार करें।
सीमावर्ती राज्यों और गणराज्यों ने कर, उपहार और अधीनता के माध्यम से गुप्त सत्ता को स्वीकार किया।
इस नीति से समुद्रगुप्त विशाल क्षेत्र पर बिना हर स्थान को सीधे प्रशासन में लिए राजनीतिक प्रभाव स्थापित कर सका।
दक्षिण अभियान
प्रयाग प्रशस्ति समुद्रगुप्त के दक्षिणापथ अभियान का उल्लेख करती है।
उसने दक्षिण भारत के अनेक राजाओं को पराजित किया, लेकिन वहाँ स्थायी प्रत्यक्ष शासन स्थापित करने का प्रयास नहीं किया।
यह एक व्यावहारिक रणनीति थी।
उत्तर भारत से दूर स्थित क्षेत्रों को सीधे नियंत्रित करने की तुलना में स्थानीय शासकों से अधीनता स्वीकार कराना अधिक सुविधाजनक था।
इससे गुप्त साम्राज्य की वास्तविक संरचना को समझने में सहायता मिलती है—उसका प्रभाव उसके प्रत्यक्ष प्रशासनिक क्षेत्र से कहीं अधिक व्यापक था।
समुद्रगुप्त: केवल योद्धा नहीं
समुद्रगुप्त के सिक्कों से उसके व्यक्तित्व का एक अलग पहलू भी दिखाई देता है।
कुछ स्वर्ण मुद्राओं पर उसे वीणा बजाते हुए दिखाया गया है।
इससे राजदरबार में संगीत और कला की प्रतिष्ठा का संकेत मिलता है।
उसने अश्वमेध यज्ञ भी कराया, जिसका उल्लेख उसकी मुद्राओं में मिलता है।
यह बताता है कि गुप्त शासक स्वयं को प्राचीन वैदिक राजकीय परंपराओं से जोड़ते थे।
चंद्रगुप्त द्वितीय
समुद्रगुप्त के बाद गुप्त राजवंश में चंद्रगुप्त द्वितीय सबसे प्रभावशाली शासकों में हुआ।
उसे विक्रमादित्य की उपाधि से भी जोड़ा जाता है।
उसके शासनकाल में गुप्त साम्राज्य पश्चिम की ओर विस्तृत हुआ।
उसकी सबसे महत्वपूर्ण सैन्य उपलब्धि पश्चिमी क्षत्रपों को पराजित करना थी।
गुजरात और मालवा क्षेत्र पर नियंत्रण मिलने से गुप्त साम्राज्य अरब सागर के महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों और बंदरगाहों के निकट पहुँच गया।
उज्जयिनी और पश्चिमी भारत
पश्चिमी क्षत्रपों की पराजय के बाद उज्जयिनी गुप्त साम्राज्य का महत्वपूर्ण राजनीतिक और व्यापारिक केंद्र बना।
यह उत्तर भारत, दक्कन और पश्चिमी समुद्री व्यापार मार्गों को जोड़ता था।
पश्चिमी भारत पर नियंत्रण से गुप्त अर्थव्यवस्था को लाभ मिला और साम्राज्य का प्रभाव मध्य भारत तक मजबूत हुआ।
चीनी यात्री फाह्यान
चंद्रगुप्त द्वितीय के समय चीनी बौद्ध यात्री फाह्यान भारत आया।
उसका उद्देश्य बौद्ध ग्रंथों और पवित्र स्थलों का अध्ययन करना था।
उसने उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों की यात्रा की और सामाजिक, धार्मिक तथा आर्थिक परिस्थितियों का वर्णन किया।
फाह्यान का विवरण महत्वपूर्ण है, लेकिन उसे पूरे गुप्त भारत का पूर्ण और निष्पक्ष सामाजिक सर्वेक्षण नहीं माना जा सकता। उसका मुख्य उद्देश्य बौद्ध धर्म से जुड़े स्थानों का अध्ययन था।
फिर भी उसके यात्रा-वृत्तांत से गुप्तकालीन भारत के जनजीवन के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। एनसीईआरटी भी फाह्यान को गुप्तकालीन समाज, धर्म और अर्थव्यवस्था के अध्ययन का महत्वपूर्ण बाहरी स्रोत मानता है। (NCERT)
कुमारगुप्त प्रथम
चंद्रगुप्त द्वितीय के बाद कुमारगुप्त प्रथम ने लंबे समय तक शासन किया।
उसके शासन में गुप्त साम्राज्य की राजनीतिक स्थिरता काफी हद तक बनी रही।
कुमारगुप्त के समय के सिक्के साम्राज्य की आर्थिक और राजकीय गतिविधियों का महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
नालंदा के प्रारंभिक विकास को भी अक्सर गुप्त काल से जोड़ा जाता है। पाँचवीं शताब्दी ईस्वी से नालंदा एक महत्वपूर्ण बौद्ध शिक्षा केंद्र के रूप में विकसित होता दिखाई देता है। आगे सातवीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग और इत्सिंग ने उसकी महान शैक्षिक प्रतिष्ठा का विस्तृत वर्णन किया। एनसीईआरटी के अनुसार नालंदा पाँचवीं से बारहवीं शताब्दी तक एक प्रमुख शिक्षा केंद्र रहा। (NCERT)
स्कंदगुप्त और हूणों का दबाव
कुमारगुप्त के बाद स्कंदगुप्त सत्ता में आया।
उसके शासनकाल में गुप्त साम्राज्य को बाहरी और आंतरिक दोनों चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
उत्तर-पश्चिम की ओर से हूण समूहों का दबाव बढ़ रहा था।
स्कंदगुप्त ने प्रारंभिक हूण आक्रमणों को रोकने में सफलता प्राप्त की, लेकिन लगातार युद्धों ने साम्राज्य के संसाधनों पर दबाव डाला।
उसके बाद गुप्त सत्ता की शक्ति धीरे-धीरे कम होने लगी।
गुप्त शासन व्यवस्था
गुप्त प्रशासन मौर्य शासन से कुछ अलग था।
सम्राट सर्वोच्च सत्ता का केंद्र था, लेकिन साम्राज्य के कई क्षेत्रों में स्थानीय राजाओं, सामंतों और अधिकारियों को पर्याप्त अधिकार प्राप्त थे।
प्रशासनिक क्षेत्रों को भुक्ति, विषय और अन्य इकाइयों में विभाजित किया गया।
प्रांतों और जिलों में अधिकारियों की नियुक्ति होती थी।
स्थानीय प्रशासन में नगरों, व्यापारिक संगठनों और प्रभावशाली भू-स्वामियों की भूमिका भी बढ़ी।
गुप्त काल में भूमि दान की प्रथा का विस्तार हुआ, जिसने आगे स्थानीय सत्ता संरचनाओं को प्रभावित किया।
भूमि दान
गुप्तकालीन अभिलेखों में ब्राह्मणों और धार्मिक संस्थाओं को भूमि दान के प्रमाण मिलते हैं।
दान की गई भूमि के साथ कई बार राजस्व अधिकार भी हस्तांतरित किए जाते थे।
इससे स्थानीय स्तर पर नए भू-अधिकारियों और धार्मिक केंद्रों की शक्ति बढ़ी।
कुछ इतिहासकार इसे आगे विकसित होने वाली सामंती प्रवृत्तियों से जोड़ते हैं, हालांकि “भारतीय सामंतवाद” की प्रकृति और सीमा को लेकर इतिहासकारों में लंबे समय से बहस रही है।
इतना स्पष्ट है कि गुप्त और उत्तरगुप्त काल में भूमि तथा उससे जुड़े राजस्व अधिकारों का राजनीतिक महत्व बढ़ रहा था।
कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था
गुप्त अर्थव्यवस्था का मूल आधार कृषि था।
राज्य को भूमि से राजस्व प्राप्त होता था।
गाँव आर्थिक व्यवस्था की प्रमुख इकाई थे।
गेहूँ, चावल, जौ और अन्य फसलें अलग-अलग क्षेत्रों में उगाई जाती थीं।
सिंचाई का भी महत्व था।
गुजरात के जूनागढ़ अभिलेख से पता चलता है कि स्कंदगुप्त के शासन में सुदर्शन झील की मरम्मत कराई गई थी। यह वही जलाशय था जिसकी परंपरा मौर्य और शक काल से चली आ रही थी।
व्यापार और मुद्रा
गुप्त शासकों की स्वर्ण मुद्राएँ भारतीय प्राचीन मुद्रा कला के सर्वोत्तम उदाहरणों में गिनी जाती हैं।
इन पर शासकों के विभिन्न रूप—युद्ध करते हुए, धनुष चलाते हुए, अश्वमेध से जुड़े दृश्य अथवा वीणा बजाते हुए—दिखाई देते हैं।
इन मुद्राओं से राजकीय प्रचार, धार्मिक प्रतीकों और आर्थिक गतिविधि की जानकारी मिलती है।
चंद्रगुप्त द्वितीय द्वारा पश्चिमी क्षत्रपों की विजय के बाद चाँदी के सिक्कों का प्रयोग भी बढ़ा।
हालांकि गुप्त काल के व्यापार को हर क्षेत्र में समान रूप से समृद्ध मानना उचित नहीं है। रोमन साम्राज्य के साथ पहले के प्रत्यक्ष व्यापार में परिवर्तन आया था और क्षेत्रीय आर्थिक परिस्थितियाँ भिन्न थीं।
समाज और वर्ण व्यवस्था
गुप्त काल में वर्ण और जाति संबंधी सामाजिक संरचनाएँ अधिक जटिल होती दिखाई देती हैं।
ब्राह्मणों की सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ी।
राजाओं द्वारा ब्राह्मणों को भूमि दान ने इस प्रतिष्ठा को आर्थिक आधार भी दिया।
धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में सामाजिक आचार, विवाह, उत्तराधिकार और वर्ण संबंधों के विस्तृत नियम मिलते हैं।
लेकिन वास्तविक समाज केवल धर्मशास्त्रों में लिखे नियमों के अनुसार नहीं चलता था।
व्यापारी, शिल्पकार, किसान, वनवासी समुदाय और विभिन्न स्थानीय समूह सामाजिक संरचना का हिस्सा थे।
महिलाओं की स्थिति
गुप्त काल में महिलाओं की स्थिति एकरूप नहीं थी।
राजपरिवार की प्रभावशाली महिलाओं के उदाहरण मिलते हैं। वाकाटक राज्य की प्रभावती गुप्ता इसका प्रमुख उदाहरण हैं, जिन्होंने अपने पुत्रों के अल्पवयस्क होने के समय शासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
लेकिन धर्मशास्त्रीय साहित्य में महिलाओं पर सामाजिक नियंत्रण अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।
विवाह, संपत्ति और पारिवारिक अधिकारों पर कई प्रतिबंध थे।
इसलिए केवल साहित्य और राजपरिवार की कुछ महिलाओं के उदाहरणों के आधार पर पूरे समाज की स्थिति का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
धर्म का स्वरूप
गुप्त शासक मुख्यतः वैष्णव परंपरा से जुड़े थे।
उनके सिक्कों और अभिलेखों में विष्णु तथा गरुड़ से जुड़े प्रतीक मिलते हैं।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि अन्य धर्मों पर प्रतिबंध था।
शैव, बौद्ध और जैन परंपराएँ भी सक्रिय थीं।
गुप्त काल में पौराणिक हिन्दू धर्म का स्वरूप अधिक स्पष्ट हुआ। विष्णु, शिव, देवी और उनके विभिन्न रूपों की उपासना बढ़ी।
मूर्ति पूजा और मंदिर आधारित धार्मिक जीवन का महत्व बढ़ा।
मंदिर स्थापत्य का विकास
गुप्त काल भारतीय मंदिर स्थापत्य के विकास में महत्वपूर्ण चरण था।
इससे पहले भी धार्मिक संरचनाएँ थीं, लेकिन गुप्त काल में पत्थर और ईंट से बने संरचनात्मक मंदिर अधिक स्पष्ट रूप में सामने आते हैं।
देवगढ़ का दशावतार मंदिर, तिगवा और भीतरगाँव जैसे मंदिर इस विकास के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
गर्भगृह, प्रवेशद्वार और ऊर्ध्व संरचना के जो प्रारंभिक रूप इस समय दिखाई देते हैं, वे आगे उत्तर भारतीय नागर मंदिर स्थापत्य के विकास की आधारभूमि बने।
मूर्तिकला
गुप्तकालीन मूर्तिकला अपनी संतुलित आकृति, शांत भाव और आध्यात्मिक अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध है।
सारनाथ और मथुरा प्रमुख कला केंद्र थे।
सारनाथ की बुद्ध प्रतिमाएँ विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। इनमें वस्त्र अत्यंत सूक्ष्म है और चेहरे पर शांत आध्यात्मिक भाव दिखाई देता है।
गुप्त कला ने कुषाणकालीन गांधार और मथुरा परंपराओं को आत्मसात करते हुए विशिष्ट भारतीय शैली विकसित की।
अजंता और वाकाटक
अजंता की प्रसिद्ध गुफाओं और भित्तिचित्रों के विकास का महत्वपूर्ण चरण गुप्त युग के लगभग समकालीन वाकाटक शासन में आया।
महाराष्ट्र में स्थित वाकाटक सत्ता का गुप्तों के साथ वैवाहिक संबंध भी था।
अजंता के चित्र बौद्ध जातक कथाओं, राजदरबार, यात्राओं और सामाजिक जीवन के अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करते हैं।
तकनीकी रूप से इन्हें सीधे “गुप्त साम्राज्य की कला” कहना सही नहीं होगा, क्योंकि उनका प्रमुख संरक्षण वाकाटक शासकों और स्थानीय संरक्षकों से जुड़ा था। लेकिन वे उसी व्यापक सांस्कृतिक युग की महत्वपूर्ण उपलब्धि हैं।
संस्कृत का उत्कर्ष
गुप्त काल में संस्कृत साहित्य ने असाधारण प्रतिष्ठा प्राप्त की।
राजकीय अभिलेखों में संस्कृत का प्रयोग व्यापक हुआ।
प्रयाग प्रशस्ति इसकी उत्कृष्ट उदाहरण है।
काव्य, नाटक और धार्मिक साहित्य का व्यापक विकास हुआ।
इसी काल से कालिदास का नाम विशेष रूप से जुड़ा है।
कालिदास
कालिदास संस्कृत साहित्य के महानतम कवियों और नाटककारों में गिने जाते हैं।
उनकी प्रमुख रचनाओं में—
अभिज्ञानशाकुंतलम्,
मेघदूत,
रघुवंश,
कुमारसंभव,
मालविकाग्निमित्र और
विक्रमोर्वशीय प्रमुख हैं।
कालिदास की निश्चित तिथि पर विद्वानों में पूर्ण सहमति नहीं है, लेकिन उन्हें सामान्यतः गुप्तकालीन सांस्कृतिक वातावरण से जोड़ा जाता है। एनसीईआरटी भी उन्हें चंद्रगुप्त द्वितीय के काल से जोड़ती है। (NCERT)
उनके साहित्य में प्रकृति, प्रेम, राजधर्म, पुराणिक कथाएँ और मानव भावनाओं का अत्यंत परिष्कृत चित्रण मिलता है।
अन्य साहित्यिक परंपराएँ
गुप्त काल और उसके आसपास संस्कृत के साथ-साथ प्राकृत तथा अन्य भाषाओं में भी साहित्यिक गतिविधियाँ जारी रहीं।
पुराणों के कई भागों का विकास और पुनर्संपादन भी लंबी अवधि में हुआ।
धर्मशास्त्र, स्मृतियाँ, नाटक, काव्य और वैज्ञानिक ग्रंथों का निर्माण हुआ।
यह भारतीय शास्त्रीय ज्ञान परंपरा के व्यवस्थित होने का महत्वपूर्ण समय था।
आर्यभट
गुप्त युग के महान वैज्ञानिकों में आर्यभट का स्थान सर्वोच्च है।
उनका जन्म 476 ईस्वी में माना जाता है।
उन्होंने 499 ईस्वी में ‘आर्यभटीय’ की रचना की।
इस ग्रंथ में गणित और खगोल-विज्ञान से संबंधित महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रस्तुत किए गए।
उन्होंने ग्रहों और आकाशीय पिंडों की गति का गणितीय अध्ययन किया और पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूमने की अवधारणा प्रस्तुत की।
उन्होंने ग्रहण की व्याख्या राहु-केतु जैसी पौराणिक अवधारणा से अलग खगोलीय छाया के आधार पर की।
यह प्राचीन भारतीय वैज्ञानिक चिंतन की अत्यंत महत्वपूर्ण उपलब्धि थी।
गणित का विकास
इस काल में भारतीय गणित में स्थान-मूल्य प्रणाली, गणना पद्धतियों और ज्यामितीय तथा बीजगणितीय समस्याओं पर महत्वपूर्ण प्रगति हुई।
दशमलव स्थान-मूल्य प्रणाली का पूर्ण विकास लंबी प्रक्रिया का परिणाम था।
शून्य की अवधारणा भी इसी व्यापक भारतीय गणितीय परंपरा में क्रमशः विकसित हुई।
यह सावधानी आवश्यक है कि शून्य का पूरा आविष्कार अकेले किसी एक गुप्तकालीन व्यक्ति को न सौंप दिया जाए। इसके अलग-अलग तत्वों का विकास कई शताब्दियों में हुआ।
आगे ब्रह्मगुप्त ने सातवीं शताब्दी में शून्य के साथ गणितीय संक्रियाओं के स्पष्ट नियम दिए।
खगोल-विज्ञान
आर्यभट के अतिरिक्त वराहमिहिर भी भारतीय खगोल-विज्ञान की महत्वपूर्ण हस्ती थे।
उनकी प्रमुख रचनाओं में बृहत्संहिता और पंचसिद्धांतिका हैं।
पंचसिद्धांतिका से ज्ञात होता है कि भारतीय खगोल-विज्ञान ने देशी परंपराओं के साथ यूनानी-रोमन ज्ञान से भी संपर्क किया था।
यह सांस्कृतिक संपर्क की उसी दीर्घ प्रक्रिया का हिस्सा था जिसकी शुरुआत मौर्योत्तर काल में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
चिकित्सा और ज्ञान परंपरा
चरक और सुश्रुत की मूल परंपराएँ गुप्त काल से पहले की हैं, लेकिन उनके चिकित्सा ग्रंथों का संरक्षण, संपादन और प्रसार आगे भी जारी रहा।
आयुर्वेदिक चिकित्सा में रोग, औषधि, आहार और शल्य चिकित्सा से संबंधित विकसित ज्ञान मौजूद था।
गुप्त और उत्तरगुप्त युग में भारतीय चिकित्सा, गणित और खगोल-विज्ञान की परंपराएँ आगे पश्चिम और मध्य एशिया तक पहुँचीं।
नालंदा का उदय
बिहार का नालंदा प्राचीन भारत के महानतम शिक्षा केंद्रों में विकसित हुआ।
इसके संस्थागत विकास का आरंभ पाँचवीं शताब्दी के आसपास माना जाता है।
बाद के शासकों—विशेष रूप से हर्ष और पाल राजाओं—के समय यह और विशाल हुआ।
यह केवल बौद्ध अध्ययन का केंद्र नहीं रहा। यहाँ दर्शन, व्याकरण, चिकित्सा, गणित, खगोल-विज्ञान और अन्य विषय भी पढ़ाए जाते थे।
एनसीईआरटी के अनुसार नालंदा पाँचवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक उच्च शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा और बाद में ह्वेनसांग तथा इत्सिंग जैसे चीनी विद्वान यहाँ अध्ययन के लिए आए। (NCERT)
क्या गुप्त काल वास्तव में “स्वर्ण युग” था?
गुप्त काल को लंबे समय से भारतीय इतिहास का “स्वर्ण युग” कहा जाता रहा है।
इस धारणा के पीछे ठोस कारण हैं—
साहित्य का उत्कर्ष,
विज्ञान और गणित की प्रगति,
स्वर्ण मुद्राएँ,
मूर्तिकला और स्थापत्य का विकास,
राजनीतिक स्थिरता
और संस्कृत संस्कृति का विस्तार।
लेकिन आधुनिक इतिहासलेखन इस शब्द का सावधानी से उपयोग करता है।
हर क्षेत्र गुप्त शासन के अधीन नहीं था। समाज के सभी वर्ग समान रूप से समृद्ध नहीं थे। जातिगत अंतर, सामाजिक असमानता और भूमि संबंधी परिवर्तन मौजूद थे।
इसलिए गुप्त काल को महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और बौद्धिक उत्कर्ष का युग कहना अधिक सटीक है, जबकि “स्वर्ण युग” को एक व्याख्यात्मक पद के रूप में समझना चाहिए।
हूण आक्रमण
पाँचवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मध्य एशिया से हूण समूहों का दबाव बढ़ा।
स्कंदगुप्त ने प्रारंभिक आक्रमणों को रोक लिया, लेकिन बाद में हूण उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत के कुछ हिस्सों में प्रवेश करने में सफल रहे।
तोरमाण और मिहिरकुल जैसे हूण शासकों ने भारत के कुछ क्षेत्रों में सत्ता स्थापित की।
इन आक्रमणों ने पहले से कमजोर होती गुप्त सत्ता पर अतिरिक्त दबाव डाला।
साम्राज्य का पतन
गुप्त साम्राज्य का पतन किसी एक युद्ध या घटना से नहीं हुआ।
कमजोर उत्तराधिकारी, उत्तराधिकार संघर्ष, प्रांतीय शक्तियों का बढ़ना, हूण आक्रमण, आर्थिक दबाव और प्रशासन का विकेंद्रीकरण—सभी ने भूमिका निभाई।
छठी शताब्दी तक गुप्त साम्राज्य की राजनीतिक एकता समाप्त हो चुकी थी।
भारत फिर अनेक क्षेत्रीय राज्यों में विभाजित हो गया।
लेकिन गुप्त वंश के पतन के बाद भी उसकी सांस्कृतिक विरासत समाप्त नहीं हुई।
गुप्त युग की विरासत
गुप्त काल ने भारतीय सभ्यता पर अत्यंत गहरा प्रभाव छोड़ा।
इस युग में संस्कृत साहित्य ने शास्त्रीय ऊँचाई प्राप्त की।
कालिदास जैसी महान साहित्यिक प्रतिभा सामने आई।
आर्यभट ने गणित और खगोल-विज्ञान में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
मंदिर स्थापत्य का ऐसा स्वरूप विकसित हुआ जिसने आगे भारतीय मंदिर परंपरा को दिशा दी।
सारनाथ और मथुरा की मूर्तिकला ने धार्मिक कला की नई शैली स्थापित की।
वैष्णव, शैव, शक्त और अन्य पौराणिक परंपराओं का विस्तार हुआ, जबकि बौद्ध और जैन परंपराएँ भी सक्रिय रहीं।
नालंदा जैसे शिक्षा केंद्रों के विकास की आधारभूमि तैयार हुई।
राजनीतिक रूप से गुप्त साम्राज्य मौर्यों जितना विशाल नहीं था, लेकिन सांस्कृतिक प्रभाव की दृष्टि से उसका महत्व अत्यंत व्यापक रहा।
छठी शताब्दी तक गुप्त सत्ता कमजोर हो चुकी थी। उत्तर भारत में मौखरी, वर्धन और अन्य क्षेत्रीय शक्तियाँ उभर रही थीं।
इसी राजनीतिक परिवर्तन से सातवीं शताब्दी में एक नया शक्तिशाली शासक सामने आया—हर्षवर्धन, जिसने उत्तर भारत के बड़े हिस्से को पुनः एक राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र में जोड़ने का प्रयास किया।
खंड 08 · हर्षवर्धन और प्रारंभिक मध्यकाल: उत्तर भारत में नई क्षेत्रीय शक्तियों का उदय
गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद उत्तर भारत की राजनीति फिर अनेक क्षेत्रीय शक्तियों में विभाजित हो गई। छठी और सातवीं शताब्दी ईस्वी के बीच मौखरी, वर्धन, गौड़ और अन्य राजवंश उभरे। इसी परिवर्तित राजनीतिक वातावरण में हर्षवर्धन का उदय हुआ, जिसने उत्तर भारत के बड़े हिस्से पर प्रभाव स्थापित किया।
हर्ष का शासन मौर्य या गुप्त साम्राज्य जैसी पूर्ण उपमहाद्वीपीय राजनीतिक एकता नहीं था, लेकिन उसने उत्तर भारत में एक व्यापक राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र खड़ा किया। उसके समय प्रशासन, धर्म, शिक्षा, साहित्य और अंतरराष्ट्रीय संपर्क महत्वपूर्ण स्तर पर विकसित हुए। चीनी यात्री ह्वेनसांग के विवरण और बाणभट्ट की रचनाएँ इस काल के प्रमुख स्रोत हैं।
हर्ष की मृत्यु के बाद उत्तर भारत फिर अनेक शक्तियों में विभाजित हो गया और प्रारंभिक मध्यकालीन भारत में क्षेत्रीय राज्यों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होती गई।
गुप्त साम्राज्य के बाद का उत्तर भारत
छठी शताब्दी तक गुप्त साम्राज्य की शक्ति समाप्त हो चुकी थी।
उत्तर भारत में अनेक स्वतंत्र राज्य उभर आए। इनमें कन्नौज के मौखरी, थानेश्वर के वर्धन, बंगाल के गौड़ और मध्य भारत की अन्य शक्तियाँ महत्वपूर्ण थीं।
कन्नौज का महत्व तेजी से बढ़ रहा था। गंगा के मैदानों, व्यापारिक मार्गों और राजनीतिक संपर्कों के कारण यह नगर आगे कई शताब्दियों तक उत्तर भारत की राजनीति का प्रमुख केंद्र बना रहा।
इसी काल में थानेश्वर के वर्धन वंश ने अपनी शक्ति बढ़ानी शुरू की।
वर्धन वंश
वर्धन वंश की प्रारंभिक राजधानी थानेश्वर थी, जो वर्तमान हरियाणा क्षेत्र में स्थित था।
प्रभाकरवर्धन इस वंश का शक्तिशाली शासक था। उसने आसपास की शक्तियों के विरुद्ध सैन्य गतिविधियों के माध्यम से वर्धन राज्य का विस्तार किया।
उसके पुत्र राज्यवर्धन और हर्षवर्धन थे तथा पुत्री राज्यश्री का विवाह कन्नौज के मौखरी शासक ग्रहवर्मन से हुआ था।
यह वैवाहिक संबंध आगे उत्तर भारत की राजनीति में निर्णायक सिद्ध हुआ।
संकट के बीच हर्ष का उदय
प्रभाकरवर्धन की मृत्यु के बाद राज्यवर्धन सत्ता में आया।
इसी समय कन्नौज पर आक्रमण हुआ और ग्रहवर्मन की हत्या कर दी गई। राज्यश्री को बंदी बना लिया गया।
राज्यवर्धन अपनी बहन और कन्नौज की सहायता के लिए निकला, लेकिन उसकी भी हत्या हो गई।
इन घटनाओं के बाद लगभग 606 ईस्वी में हर्षवर्धन ने बहुत कम आयु में सत्ता संभाली।
उसके सामने दो बड़ी चुनौतियाँ थीं—अपने परिवार और सहयोगी राज्यों की सुरक्षा तथा उत्तर भारत में राजनीतिक स्थिरता स्थापित करना।
हर्ष और कन्नौज
हर्ष ने धीरे-धीरे अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत की और कन्नौज को अपना प्रमुख सत्ता केंद्र बनाया।
कन्नौज की स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण थी। यह गंगा के मैदानों के मध्य में स्थित था और उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ता था।
हर्ष के बाद भी कन्नौज की प्रतिष्ठा बनी रही। आठवीं और नौवीं शताब्दी में पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूटों के बीच जिस त्रिपक्षीय संघर्ष का केंद्र कन्नौज बना, उसकी राजनीतिक प्रतिष्ठा का आधार इसी दौर में मजबूत हुआ।
हर्ष का साम्राज्य
हर्ष ने उत्तर भारत के बड़े हिस्से पर अपना प्रभाव स्थापित किया।
उसकी शक्ति पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार के बड़े हिस्सों तक फैली। कुछ पड़ोसी राज्यों ने उसकी श्रेष्ठता स्वीकार की और कुछ सहयोगी राजनीतिक संबंधों में रहे।
लेकिन पूरे उत्तर भारत पर प्रत्यक्ष प्रशासनिक नियंत्रण नहीं था।
कई क्षेत्रों में स्थानीय शासक अधीनता स्वीकार कर अपनी सत्ता बनाए रखते थे।
इसलिए हर्ष के राज्य को एक ऐसे व्यापक राजनीतिक संघ के रूप में समझना अधिक उचित है जिसमें प्रत्यक्ष शासन और अधीनस्थ राज्यों दोनों का मिश्रण था।
बंगाल का गौड़ राज्य
हर्ष के समय बंगाल और पूर्वी भारत में गौड़ राज्य एक महत्वपूर्ण शक्ति था।
गौड़ के शासक शशांक हर्ष के प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों में गिने जाते हैं।
शशांक ने बंगाल और आसपास के क्षेत्रों में मजबूत सत्ता स्थापित की थी।
बौद्ध परंपरा के कुछ स्रोतों में उस पर बौद्ध संस्थाओं के प्रति शत्रुता के आरोप मिलते हैं, लेकिन इन विवरणों को सावधानी से देखना आवश्यक है क्योंकि वे अक्सर विरोधी धार्मिक परंपराओं से आते हैं।
राजनीतिक रूप से इतना स्पष्ट है कि शशांक पूर्वी भारत की शक्तिशाली सत्ता था और हर्ष का प्रभाव तत्काल पूरे बंगाल पर स्थापित नहीं हुआ।
दक्षिण की ओर अभियान और पुलकेशिन द्वितीय
हर्ष की सैन्य शक्ति उत्तर भारत में प्रभावशाली थी, लेकिन दक्कन की दिशा में उसे सफलता नहीं मिली।
दक्षिण भारत में चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय उस समय एक शक्तिशाली राजा था।
हर्ष ने नर्मदा के पार दक्षिण की दिशा में विस्तार का प्रयास किया, लेकिन पुलकेशिन द्वितीय ने उसे रोक दिया।
इस संघर्ष का उल्लेख चालुक्य अभिलेखों में मिलता है।
इसके बाद नर्मदा नदी लगभग हर्ष के उत्तर भारतीय प्रभाव क्षेत्र और चालुक्य सत्ता के बीच राजनीतिक सीमा का प्रतीक बन गई।
यह घटना बताती है कि हर्ष पूरे भारत का सम्राट नहीं था। उसकी वास्तविक शक्ति मुख्यतः उत्तर भारत तक सीमित थी।
प्रशासन
हर्ष का शासन गुप्त प्रशासनिक परंपराओं से प्रभावित था।
राजा शासन का केंद्र था, लेकिन स्थानीय प्रशासन में प्रांतीय अधिकारियों, सामंतों और स्थानीय अभिजात वर्ग की भूमिका महत्वपूर्ण थी।
भूमि दान की परंपरा इस काल में भी जारी रही।
ब्राह्मणों, धार्मिक संस्थाओं और अधिकारियों को भूमि दी जाती थी। कई बार भूमि के साथ राजस्व संबंधी अधिकार भी हस्तांतरित होते थे।
इस प्रवृत्ति ने स्थानीय सत्ता केंद्रों को मजबूत किया।
यही प्रक्रिया आगे प्रारंभिक मध्यकालीन भारत में सामंतवादी राजनीतिक संरचनाओं के विकास से जुड़ी दिखाई देती है।
सामंत व्यवस्था का बढ़ता प्रभाव
गुप्तोत्तर काल में सामंत शब्द का प्रयोग अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
कुछ सामंत स्थानीय शासक थे जिन्होंने किसी बड़े राजा की अधीनता स्वीकार की थी।
वे अपने क्षेत्रों पर शासन करते, कर वसूलते और आवश्यकता पड़ने पर सैनिक सहायता देते थे।
समय के साथ ऐसे सामंत अत्यंत शक्तिशाली हो सकते थे और कमजोर केंद्रीय सत्ता की स्थिति में स्वतंत्र भी हो जाते थे।
इस व्यवस्था ने एक ओर बड़े राजाओं को विशाल भूभाग पर प्रभाव बनाए रखने में सहायता दी, लेकिन दूसरी ओर राजनीतिक विखंडन की संभावना भी बढ़ाई।
सेना और राजनीतिक शक्ति
हर्ष के पास बड़ी सेना थी।
घुड़सवार, पैदल सैनिक और हाथी सेना में शामिल थे।
लेकिन सेना का कुछ हिस्सा अधीनस्थ शासकों और सामंतों पर भी निर्भर रहा होगा।
इससे प्रारंभिक मध्यकालीन राजनीतिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण परिवर्तन स्पष्ट होता है—केंद्रीय सम्राट की शक्ति स्थानीय सैन्य अभिजात वर्ग के सहयोग पर अधिक निर्भर होती जा रही थी।
ह्वेनसांग की भारत यात्रा
हर्ष के शासनकाल का सबसे महत्वपूर्ण विदेशी स्रोत चीनी बौद्ध यात्री ह्वेनसांग है।
वह सातवीं शताब्दी में भारत आया और लगभग डेढ़ दशक तक भारतीय उपमहाद्वीप के अनेक हिस्सों में भ्रमण करता रहा।
उसका मुख्य उद्देश्य बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन और पवित्र स्थलों की यात्रा करना था।
उसने कन्नौज, नालंदा, बोधगया और अनेक अन्य क्षेत्रों का भ्रमण किया।
ह्वेनसांग ने हर्ष के शासन, नगरों, शिक्षा, धर्म और सामाजिक परिस्थितियों का विस्तृत वर्णन किया।
उसके विवरण अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उन्हें भी पूर्ण रूप से निष्पक्ष राजनीतिक अभिलेख नहीं माना जा सकता, क्योंकि उसकी दृष्टि मुख्यतः बौद्ध धार्मिक और शैक्षिक रुचियों से प्रभावित थी।
नालंदा की प्रतिष्ठा
हर्ष के समय नालंदा महाविहार प्राचीन भारत के प्रमुख शिक्षा केंद्रों में था।
यहाँ भारत के विभिन्न भागों के साथ-साथ चीन, कोरिया, मध्य एशिया और अन्य क्षेत्रों से भी विद्यार्थी और भिक्षु आते थे।
ह्वेनसांग ने यहाँ अध्ययन किया।
नालंदा में बौद्ध दर्शन के साथ व्याकरण, तर्कशास्त्र, चिकित्सा और अन्य विषयों का भी अध्ययन होता था।
राजाओं और दानदाताओं से उसे आर्थिक संरक्षण मिलता था।
हर्ष ने भी बौद्ध संस्थाओं और विद्वानों को संरक्षण दिया।
हर्ष और धर्म
हर्ष के धार्मिक जीवन को किसी एक स्थिर पहचान में बाँधना कठिन है।
उसके परिवार का संबंध शैव परंपरा से था और प्रारंभिक काल में वह शिव उपासना से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।
बाद में वह महायान बौद्ध धर्म से भी गहराई से प्रभावित हुआ।
फिर भी उसने ब्राह्मण, बौद्ध और अन्य धार्मिक परंपराओं को संरक्षण दिया।
उसकी धार्मिक नीति व्यापक सहिष्णुता पर आधारित दिखाई देती है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि बौद्ध धर्म से निकटता के बावजूद उसने स्वयं को केवल बौद्ध राजा के रूप में सीमित नहीं किया।
कन्नौज की धार्मिक सभा
ह्वेनसांग के विवरण में हर्ष द्वारा आयोजित एक विशाल धार्मिक सभा का उल्लेख मिलता है।
कन्नौज में आयोजित इस सभा में विभिन्न क्षेत्रों के विद्वानों, भिक्षुओं और धार्मिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
ह्वेनसांग को भी विशेष सम्मान दिया गया।
सभा में महायान बौद्ध विचारों को प्रमुखता मिली, लेकिन विभिन्न धार्मिक समुदायों की उपस्थिति भी थी।
यह आयोजन हर्ष की राजनीतिक प्रतिष्ठा और धार्मिक संरक्षण दोनों को प्रदर्शित करता था।
प्रयाग का महादान
हर्ष प्रत्येक पाँच वर्ष में प्रयाग में बड़े धार्मिक और दान संबंधी आयोजन करता था—ऐसी परंपरा ह्वेनसांग के विवरण में मिलती है।
इस अवसर पर वह बड़ी मात्रा में धन, वस्त्र और अन्य संपत्ति दान करता था।
बौद्ध भिक्षुओं, ब्राह्मणों, साधुओं और जरूरतमंदों को दान दिया जाता था।
यह आयोजन केवल धार्मिक दान नहीं था। यह राजा की उदारता, प्रतिष्ठा और सार्वभौमिक संरक्षण की राजनीतिक छवि भी निर्मित करता था।
बाणभट्ट
हर्ष के दरबार के महान साहित्यकार बाणभट्ट थे।
उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘हर्षचरित’ और ‘कादंबरी’ प्रसिद्ध हैं।
हर्षचरित हर्ष के जीवन और वंश का महत्वपूर्ण साहित्यिक स्रोत है।
लेकिन यह आधुनिक अर्थ में निष्पक्ष जीवनी नहीं है।
बाणभट्ट राजा का दरबारी लेखक था और उसका उद्देश्य हर्ष की महिमा प्रस्तुत करना भी था।
फिर भी इसमें उस काल की राजनीति, समाज, नगर, दरबार और संस्कृति के बारे में मूल्यवान जानकारी मिलती है।
हर्ष स्वयं भी लेखक
परंपरा में हर्ष को स्वयं भी संस्कृत नाटकों का रचयिता माना जाता है।
उससे तीन नाटक जुड़े हैं—
रत्नावली,
प्रियदर्शिका
और नागानंद।
इनकी वास्तविक लेखकीयता पर विद्वानों में कुछ चर्चा रही है, लेकिन लंबे समय से ये हर्ष के नाम से जुड़े हुए हैं।
इन रचनाओं से उस समय के राजदरबार में संस्कृत साहित्य की प्रतिष्ठा का पता चलता है।
समाज और अर्थव्यवस्था
हर्षकालीन अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर आधारित थी।
गाँव उत्पादन की मूल इकाइयाँ थे और भूमि राजस्व राज्य की महत्वपूर्ण आय थी।
नगर और व्यापार भी मौजूद थे, लेकिन विभिन्न क्षेत्रों में उनकी स्थिति समान नहीं थी।
गुप्तोत्तर काल में कुछ पुराने नगर कमजोर हुए, जबकि राजनीतिक और धार्मिक केंद्रों के रूप में नए नगर विकसित हुए।
व्यापारी और शिल्पकार आर्थिक जीवन में महत्वपूर्ण बने रहे।
भूमि दान और ग्रामीण समाज
इस समय भूमि दान की प्रथा के बढ़ते प्रमाण मिलते हैं।
ब्राह्मणों और धार्मिक संस्थाओं को करमुक्त भूमि दी जाती थी।
कभी-कभी किसानों से राजस्व प्राप्त करने के अधिकार भी दान पाने वाले व्यक्ति या संस्था को मिलते थे।
इसका ग्रामीण समाज पर दीर्घकालीन प्रभाव पड़ा।
राज्य और किसान के बीच नए मध्यस्थ वर्ग उभरे।
स्थानीय भू-स्वामियों और धार्मिक संस्थाओं की शक्ति बढ़ी।
जाति व्यवस्था का विस्तार
प्रारंभिक मध्यकाल में वर्ण और जाति व्यवस्था अधिक जटिल होती गई।
नई जनजातियों, शिल्प समूहों और स्थानीय समुदायों को धीरे-धीरे सामाजिक संरचना में विभिन्न जातीय श्रेणियों में समाहित किया गया।
भूमि, व्यवसाय और सामाजिक प्रतिष्ठा के आधार पर अनेक नए समूह बने।
धर्मशास्त्र सामाजिक नियम निर्धारित करते रहे, लेकिन वास्तविक जीवन में स्थानीय परिस्थितियाँ अधिक जटिल थीं।
इसलिए इस काल के समाज को केवल चार वर्णों के ढाँचे से नहीं समझा जा सकता।
धार्मिक परिवर्तन
इस काल में पौराणिक हिन्दू परंपराओं का विस्तार जारी रहा।
शिव, विष्णु और देवी की उपासना के अनेक स्थानीय तथा क्षेत्रीय रूप विकसित हुए।
मंदिर धार्मिक जीवन के महत्वपूर्ण केंद्र बनने लगे।
मूर्ति प्रतिष्ठा, तीर्थ और मंदिर आधारित पूजा का विस्तार हुआ।
बौद्ध और जैन धर्म भी अनेक क्षेत्रों में प्रभावशाली बने रहे।
इस समय धर्म का स्वरूप अधिकाधिक मंदिर, मठ, तीर्थ और स्थानीय धार्मिक केंद्रों से जुड़ता दिखाई देता है।
भक्ति की बढ़ती परंपरा
दक्षिण भारत में इसी व्यापक काल के दौरान आलवार और नयनार संतों की भक्ति परंपराएँ विकसित होने लगी थीं।
उत्तर भारत में भी विष्णु, शिव और देवी की व्यक्तिगत भक्ति का महत्व बढ़ रहा था।
भक्ति का यह व्यापक विकास आगे मध्यकालीन भारतीय धार्मिक इतिहास की प्रमुख धारा बना।
हालाँकि इसे केवल हर्ष के शासन की घटना नहीं माना जाना चाहिए; यह कई शताब्दियों में विकसित हुई लंबी सामाजिक और धार्मिक प्रक्रिया थी।
हर्ष की मृत्यु
लगभग 647 ईस्वी के आसपास हर्ष की मृत्यु हुई।
उसका कोई शक्तिशाली उत्तराधिकारी सामने नहीं आया।
उसकी मृत्यु के बाद उसका व्यापक राजनीतिक प्रभाव तेजी से टूट गया।
कन्नौज और उत्तर भारत के अन्य क्षेत्रों पर विभिन्न स्थानीय शक्तियों ने नियंत्रण स्थापित किया।
हर्ष के बाद उत्तर भारत में फिर कोई ऐसा तत्काल शासक नहीं उभरा जिसने उसी स्तर का व्यापक राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित किया हो।
कन्नौज के लिए संघर्ष की पृष्ठभूमि
हर्ष के बाद भी कन्नौज का राजनीतिक महत्व कम नहीं हुआ।
गंगा के उपजाऊ मैदान और व्यापारिक मार्गों के कारण इस नगर पर नियंत्रण प्रतिष्ठा और आर्थिक शक्ति दोनों का प्रतीक बन गया।
आठवीं और नौवीं शताब्दी तक आते-आते कन्नौज पर अधिकार के लिए तीन बड़ी शक्तियाँ संघर्ष करने लगीं—
गुर्जर-प्रतिहार,
पाल
और राष्ट्रकूट।
यह संघर्ष भारतीय इतिहास में त्रिपक्षीय संघर्ष के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
पालों का उदय
आठवीं शताब्दी में बंगाल और बिहार में पाल वंश का उदय हुआ।
राजनीतिक अस्थिरता के बाद गोपाल को शासक चुने जाने का उल्लेख मिलता है।
उसके पुत्र धर्मपाल ने राज्य को विस्तृत किया और उत्तर भारत की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाई।
पाल शासक बौद्ध धर्म, विशेष रूप से महायान और वज्रयान परंपराओं के बड़े संरक्षक बने।
नालंदा, विक्रमशिला और अन्य बौद्ध शिक्षा केंद्रों को पाल संरक्षण मिला।
गुर्जर-प्रतिहार
पश्चिमी और उत्तर भारत में गुर्जर-प्रतिहार शक्ति उभरी।
नागभट्ट प्रथम ने अरब आक्रमणों के विरुद्ध प्रतिरोध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बाद में वत्सराज, नागभट्ट द्वितीय और मिहिर भोज जैसे शासकों ने प्रतिहार शक्ति का विस्तार किया।
कन्नौज अंततः प्रतिहार साम्राज्य का प्रमुख केंद्र बना।
प्रतिहारों ने कई शताब्दियों तक पश्चिम और उत्तर भारत की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
राष्ट्रकूटों का हस्तक्षेप
दक्कन के राष्ट्रकूट भी उत्तर भारत की राजनीति से अलग नहीं रहे।
उन्होंने समय-समय पर उत्तर की ओर अभियान किए और कन्नौज के संघर्ष में हस्तक्षेप किया।
इस प्रकार पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूटों के बीच लंबा संघर्ष चला।
कोई भी शक्ति पूरे उत्तर भारत पर स्थायी नियंत्रण स्थापित नहीं कर सकी।
फिर भी इन राजवंशों ने भारतीय कला, स्थापत्य, साहित्य और धर्म को महत्वपूर्ण संरक्षण दिया।
प्रारंभिक मध्यकाल की नई राजनीतिक संरचना
हर्ष के बाद का भारत केवल राजनीतिक विखंडन का क्षेत्र नहीं था।
नई क्षेत्रीय पहचानें मजबूत हो रही थीं।
बंगाल में पाल, पश्चिमी और उत्तर भारत में प्रतिहार, दक्कन में राष्ट्रकूट और दक्षिण में चालुक्य, पल्लव तथा आगे चोल जैसी शक्तियाँ विकसित हुईं।
राजनीति अब एक केंद्रीय साम्राज्य के बजाय कई क्षेत्रीय राज्यों पर आधारित होती जा रही थी।
इन राज्यों ने अपनी भाषाओं, मंदिर स्थापत्य, धार्मिक केंद्रों और सांस्कृतिक परंपराओं को बढ़ावा दिया।
भारतीय इतिहास में हर्ष का स्थान
हर्षवर्धन को अक्सर प्राचीन उत्तर भारत के अंतिम महान साम्राज्य निर्माताओं में गिना जाता है।
लेकिन उसका वास्तविक महत्व केवल सैन्य विस्तार में नहीं था।
उसके शासनकाल में कन्नौज एक प्रमुख राजनीतिक केंद्र बना।
नालंदा जैसी शिक्षा संस्थाओं को संरक्षण मिला।
भारत और चीन के बीच बौद्ध तथा सांस्कृतिक संपर्क मजबूत हुए।
संस्कृत साहित्य को राजकीय संरक्षण मिला।
विभिन्न धार्मिक परंपराओं के प्रति सहिष्णु नीति दिखाई दी।
हर्ष की मृत्यु के बाद उत्तर भारत में व्यापक राजनीतिक एकता समाप्त हुई, लेकिन इसी विखंडन से नए क्षेत्रीय राज्यों की शक्ति बढ़ी।
यहीं से भारतीय इतिहास का प्रारंभिक मध्यकाल पूर्ण रूप से आकार लेने लगता है—एक ऐसा काल जिसमें राजनीतिक शक्ति अनेक क्षेत्रों में बंटी थी, लेकिन सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक गतिविधियाँ अत्यंत जीवंत थीं।
इस दौर को समझे बिना आगे के भारत—राजपूत राज्यों, पाल-प्रतिहार संघर्ष, दक्षिण भारत की शक्तियों और बाद के तुर्क आक्रमणों—को समझना संभव नहीं है।
खंड 09 · दक्षिण भारत की महान शक्तियाँ: चालुक्य, पल्लव, राष्ट्रकूट और चोल
उत्तर भारत में गुप्तोत्तर और हर्षवर्धन के बाद अनेक क्षेत्रीय शक्तियाँ उभर रही थीं, वहीं दक्षिण भारत में भी लगभग छठी से तेरहवीं शताब्दी के बीच कई प्रभावशाली राजवंशों ने राजनीति, व्यापार, मंदिर स्थापत्य, प्रशासन और संस्कृति को नई दिशा दी। चालुक्य, पल्लव, राष्ट्रकूट और चोल इनमें सबसे महत्वपूर्ण थे।
इन राजवंशों का महत्व केवल सैन्य विस्तार तक सीमित नहीं था। इनके शासन में दक्षिण भारत के नगर, बंदरगाह, मंदिर, सिंचाई व्यवस्था, ग्राम प्रशासन, व्यापारिक संगठन और क्षेत्रीय भाषाएँ विकसित हुईं। दक्षिण भारत समुद्री व्यापार के माध्यम से श्रीलंका, दक्षिण-पूर्व एशिया, अरब जगत और चीन से भी गहराई से जुड़ा।
यह काल भारतीय इतिहास में क्षेत्रीय राज्यों के राजनीतिक उत्कर्ष और सांस्कृतिक परिपक्वता का महत्वपूर्ण चरण था।
बादामी के चालुक्य
छठी शताब्दी ईस्वी में दक्कन क्षेत्र में बादामी के चालुक्यों का उदय हुआ। उनकी राजधानी वातापी थी, जिसे आज बादामी के नाम से जाना जाता है।
चालुक्य वंश के प्रारंभिक शासकों में पुलकेशिन प्रथम का नाम महत्वपूर्ण है, लेकिन वंश का सबसे प्रसिद्ध राजा पुलकेशिन द्वितीय था।
उसके शासनकाल में चालुक्य साम्राज्य पश्चिमी दक्कन की प्रमुख शक्ति बन गया।
पुलकेशिन द्वितीय
पुलकेशिन द्वितीय ने लगभग सातवीं शताब्दी के प्रारंभ में चालुक्य सत्ता को व्यापक विस्तार दिया।
उसकी उपलब्धियों की जानकारी ऐहोल अभिलेख से मिलती है, जिसकी रचना रविकीर्ति ने की थी।
इस अभिलेख में पुलकेशिन की अनेक सैन्य सफलताओं का वर्णन है।
उसकी सबसे प्रसिद्ध उपलब्धि उत्तर भारत के शक्तिशाली शासक हर्षवर्धन की दक्षिण की ओर बढ़ती शक्ति को रोकना थी।
नर्मदा क्षेत्र के निकट हुए संघर्ष में हर्ष दक्षिण की ओर आगे नहीं बढ़ सका।
इससे चालुक्यों की प्रतिष्ठा पूरे भारत में बढ़ी।
पल्लवों से संघर्ष
दक्षिण भारत की राजनीति में चालुक्यों का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी पल्लव राज्य था।
पल्लवों की शक्ति मुख्यतः तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के दक्षिणी हिस्सों में केंद्रित थी और उनकी राजधानी कांचीपुरम थी।
पुलकेशिन द्वितीय ने पल्लव क्षेत्र पर अभियान किया, लेकिन यह संघर्ष लंबे समय तक चलता रहा।
बाद में पल्लव शासक नरसिंहवर्मन प्रथम ने पलटवार किया और वातापी पर अधिकार कर लिया।
इस विजय के बाद नरसिंहवर्मन ने ‘वातापीकोंड’ जैसी उपाधि धारण की, जिसका अर्थ था वातापी को जीतने वाला।
पल्लवों का उदय
पल्लवों ने लगभग चौथी से नौवीं शताब्दी तक दक्षिण भारत की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन उनका वास्तविक उत्कर्ष छठी से आठवीं शताब्दी के बीच हुआ।
कांचीपुरम उनकी राजधानी और बड़ा धार्मिक तथा शैक्षिक केंद्र था।
महेंद्रवर्मन प्रथम और नरसिंहवर्मन प्रथम जैसे शासकों ने पल्लव शक्ति को मजबूत किया।
पल्लवों का महत्व विशेष रूप से मंदिर स्थापत्य और शिल्पकला के विकास में है।
महाबलीपुरम
पल्लव कला का सबसे प्रसिद्ध केंद्र महाबलीपुरम या मामल्लपुरम है।
यहाँ शैल-कट मंदिर, रथ मंदिर और विशाल उत्कीर्ण शिल्प पल्लव कला की उत्कृष्ट उपलब्धियाँ हैं।
नरसिंहवर्मन प्रथम की उपाधि ‘मामल्ल’ से ही मामल्लपुरम नाम जुड़ा माना जाता है।
यहाँ स्थित पंच रथ अलग-अलग स्थापत्य प्रयोगों का उदाहरण हैं।
समुद्र तट पर स्थित शोर मंदिर पल्लव वास्तुकला के परवर्ती चरण का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
महाबलीपुरम के स्मारक समूह को यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है।
कैलासनाथ मंदिर
कांचीपुरम का कैलासनाथ मंदिर पल्लव स्थापत्य का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
यह संरचनात्मक मंदिरों के विकास की दिशा में एक बड़ा कदम था।
पल्लव काल में शैल-कट गुफा मंदिरों से पूर्ण संरचनात्मक पत्थर मंदिरों की ओर संक्रमण दिखाई देता है।
यह परिवर्तन आगे चोल और अन्य दक्षिण भारतीय राजवंशों की विशाल मंदिर परंपरा का आधार बना।
पल्लव और भक्ति आंदोलन
पल्लव काल में तमिल क्षेत्र में भक्ति आंदोलन का महत्वपूर्ण विकास हुआ।
आलवार संत विष्णु भक्ति से जुड़े थे, जबकि नयनार संत शिव भक्ति के प्रमुख प्रतिनिधि थे।
इन संतों ने स्थानीय भाषाओं में भक्ति गीतों की परंपरा विकसित की।
इससे धार्मिक जीवन केवल संस्कृत और वैदिक कर्मकांड तक सीमित नहीं रहा, बल्कि क्षेत्रीय भाषाओं और व्यक्तिगत भक्ति को नई शक्ति मिली।
आगे यही भक्ति परंपरा दक्षिण से उत्तर भारत तक भारतीय धार्मिक जीवन की महत्वपूर्ण धारा बनी।
बादामी चालुक्य स्थापत्य
चालुक्यों ने भी मंदिर स्थापत्य में महत्वपूर्ण प्रयोग किए।
बादामी की गुफाएँ, ऐहोल और पट्टदकल के मंदिर इस विकास के प्रमुख उदाहरण हैं।
यहाँ उत्तर भारतीय नागर और दक्षिण भारतीय द्रविड़ स्थापत्य तत्वों का मिश्रण मिलता है।
पट्टदकल विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ अलग-अलग स्थापत्य शैलियों के मंदिर एक ही परिसर में मिलते हैं।
दक्षिण भारत के मंदिर स्थापत्य के विकास को समझने में चालुक्य और पल्लव दोनों राजवंशों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
राष्ट्रकूटों का उदय
आठवीं शताब्दी में चालुक्य सत्ता के कमजोर होने के बाद दक्कन में राष्ट्रकूट वंश का उदय हुआ।
दंतिदुर्ग ने चालुक्यों को पराजित कर राष्ट्रकूट सत्ता की स्थापना की।
उनकी राजधानी मान्यखेट थी।
राष्ट्रकूटों ने लगभग आठवीं से दसवीं शताब्दी तक दक्कन की राजनीति पर प्रभुत्व बनाए रखा।
वे केवल दक्षिण भारत तक सीमित नहीं थे। उन्होंने उत्तर भारत की राजनीति में भी सक्रिय हस्तक्षेप किया।
कन्नौज का त्रिपक्षीय संघर्ष
राष्ट्रकूटों का नाम उत्तर भारत के प्रसिद्ध त्रिपक्षीय संघर्ष से जुड़ा है।
कन्नौज पर अधिकार के लिए तीन प्रमुख शक्तियाँ संघर्ष कर रही थीं—
गुर्जर-प्रतिहार,
पाल
और राष्ट्रकूट।
कन्नौज पर स्थायी नियंत्रण किसी एक शक्ति को लंबे समय तक नहीं मिल सका।
राष्ट्रकूट शासकों ने कई बार उत्तर भारत पर अभियान चलाए और प्रतिहार तथा पाल शक्तियों को चुनौती दी।
इससे स्पष्ट होता है कि दक्कन और उत्तर भारत की राजनीति एक-दूसरे से अलग नहीं थी।
गोविंद तृतीय और अमोघवर्ष
राष्ट्रकूट शासकों में गोविंद तृतीय एक शक्तिशाली विजेता था।
उसने उत्तर और दक्षिण दोनों दिशाओं में अभियान चलाए।
अमोघवर्ष प्रथम राष्ट्रकूट वंश का दूसरा महत्वपूर्ण शासक था।
उसका शासन लंबा और अपेक्षाकृत स्थिर था।
अमोघवर्ष को साहित्य और धर्म का संरक्षक माना जाता है। वह जैन परंपरा से भी प्रभावित था।
उससे ‘कविराजमार्ग’ नामक प्रारंभिक कन्नड़ साहित्यिक ग्रंथ को जोड़ा जाता है।
यह दक्षिण भारत में क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्यिक विकास की महत्वपूर्ण निशानी है।
एलोरा का कैलास मंदिर
राष्ट्रकूट कला की सर्वोच्च उपलब्धि एलोरा का कैलास मंदिर है।
यह मंदिर एक ही विशाल चट्टान को काटकर बनाया गया।
राजा कृष्ण प्रथम के समय इसका निर्माण प्रारंभ माना जाता है।
यह स्थापत्य तकनीक की दृष्टि से अद्भुत है।
मंदिर शिव को समर्पित है और इसमें रामायण, महाभारत तथा पौराणिक कथाओं से संबंधित मूर्तिकला भी मिलती है।
एलोरा के स्मारक भारतीय शैल-कट स्थापत्य की परंपरा का चरम उदाहरण हैं।
धार्मिक सहअस्तित्व
राष्ट्रकूट काल में शैव, वैष्णव और जैन परंपराएँ साथ-साथ विकसित हुईं।
एलोरा में बौद्ध, हिन्दू और जैन गुफाएँ एक ही क्षेत्र में मिलती हैं।
यह उस समय के धार्मिक और सांस्कृतिक सहअस्तित्व का महत्वपूर्ण प्रमाण है।
राजकीय संरक्षण भी अक्सर एक ही धर्म तक सीमित नहीं था।
चोलों का उदय
दक्षिण भारत की सबसे शक्तिशाली और दीर्घकालिक राजनीतिक शक्तियों में चोल साम्राज्य का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
चोलों का उल्लेख प्राचीन तमिल साहित्य और अशोक के अभिलेखों में भी मिलता है, लेकिन मध्यकालीन चोल साम्राज्य का वास्तविक उत्थान नौवीं शताब्दी में हुआ।
विजयालय चोल ने तंजावुर पर अधिकार कर चोल शक्ति की नई नींव रखी।
इसके बाद आदित्य प्रथम और परांतक प्रथम ने राज्य का विस्तार किया।
लेकिन चोल साम्राज्य अपने चरम पर राजराज प्रथम और राजेंद्र प्रथम के समय पहुँचा।
राजराज चोल प्रथम
राजराज प्रथम ने लगभग 985 से 1014 ईस्वी तक शासन किया।
उसने चोल साम्राज्य को दक्षिण भारत की सबसे शक्तिशाली सत्ता बना दिया।
उसने तमिल क्षेत्र को मजबूत करने के साथ श्रीलंका के उत्तरी हिस्से पर भी आक्रमण किया।
पश्चिमी तट और समुद्री मार्गों पर नियंत्रण बढ़ाया गया।
राजराज ने सेना के साथ-साथ शक्तिशाली नौसेना भी विकसित की।
उसके शासन में प्रशासनिक अभिलेखों की संख्या बढ़ी, जिनसे चोल राज्य की संरचना के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है।
बृहदेश्वर मंदिर
राजराज प्रथम की सबसे प्रसिद्ध स्थापत्य उपलब्धि तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर है।
यह शिव को समर्पित विशाल मंदिर है।
ग्रेनाइट से निर्मित इसका ऊँचा विमाना दक्षिण भारतीय मंदिर स्थापत्य की महान उपलब्धियों में गिना जाता है।
मंदिर केवल धार्मिक केंद्र नहीं था।
इसके पास भूमि, कर्मचारी, कलाकार, नर्तक, संगीतकार और आर्थिक संसाधन थे।
इस प्रकार बड़े चोल मंदिर धार्मिक संस्था के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक केंद्र भी थे।
राजेंद्र चोल प्रथम
राजराज के पुत्र राजेंद्र चोल प्रथम ने साम्राज्य को और विस्तार दिया।
उसने दक्षिण भारत और श्रीलंका में चोल शक्ति मजबूत की और पूर्वी भारत की दिशा में भी सैन्य अभियान चलाया।
गंगा क्षेत्र तक पहुँचने वाले अभियान के बाद उसने ‘गंगैकोंड चोल’ की उपाधि धारण की और नई राजधानी गंगैकोंडचोलपुरम स्थापित की।
यह विजय चोल साम्राज्य की राजनीतिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बनी।
दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर नौसैनिक अभियान
राजेंद्र चोल का सबसे चर्चित अभियान दक्षिण-पूर्व एशिया की दिशा में था।
ग्यारहवीं शताब्दी में चोल नौसेना ने श्रीविजय साम्राज्य से जुड़े कई केंद्रों पर आक्रमण किया।
श्रीविजय दक्षिण-पूर्व एशिया के समुद्री व्यापार मार्गों की महत्वपूर्ण शक्ति था।
इन अभियानों का उद्देश्य स्थायी उपनिवेश बनाना नहीं, बल्कि समुद्री व्यापारिक हितों और राजनीतिक प्रभाव को सुरक्षित करना अधिक प्रतीत होता है।
यह चोल नौसैनिक शक्ति की क्षमता का महत्वपूर्ण प्रमाण है।
समुद्री व्यापार
चोल काल में दक्षिण भारत हिंद महासागर व्यापार का महत्वपूर्ण हिस्सा था।
तमिल तट के बंदरगाह अरब जगत, श्रीलंका, दक्षिण-पूर्व एशिया और चीन से जुड़े थे।
वस्त्र, मसाले, बहुमूल्य पत्थर और अन्य वस्तुओं का व्यापार होता था।
व्यापारी संघों ने लंबी दूरी के व्यापार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ऐनूर्रुवर, मणिग्रामम और नानादेशी जैसे व्यापारिक संगठनों का उल्लेख अभिलेखों में मिलता है।
इन व्यापारिक नेटवर्कों ने दक्षिण भारत को अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था से जोड़ा।
चोल प्रशासन
चोल प्रशासन की प्रमुख विशेषताओं में स्थानीय संस्थाओं की सक्रिय भूमिका थी।
साम्राज्य को विभिन्न प्रशासनिक इकाइयों में बाँटा गया था।
मंडलम बड़े प्रांत थे। इनके नीचे वलनाडु, नाडु और ग्राम जैसी इकाइयाँ थीं।
केंद्रीय राजा शक्तिशाली था, लेकिन गाँवों और स्थानीय संस्थाओं को भी महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ दी गई थीं।
विशेष रूप से ब्राह्मण बस्तियों की सभाएँ और सामान्य गाँवों की स्थानीय संस्थाएँ कर, सिंचाई, भूमि और अन्य स्थानीय मामलों में भूमिका निभाती थीं।
उत्तरमेरूर अभिलेख
तमिलनाडु के उत्तरमेरूर अभिलेख चोलकालीन स्थानीय प्रशासन को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
इनमें ग्राम समितियों की संरचना, सदस्यों की योग्यता और चयन से संबंधित नियमों का उल्लेख मिलता है।
कुछ समितियों के सदस्य एक विशेष पद्धति से चुने जाते थे, जिसे कुदवोलै प्रणाली कहा जाता है।
इसे आधुनिक लोकतांत्रिक चुनाव के समान मानना उचित नहीं है, क्योंकि पात्रता संपत्ति, सामाजिक स्थिति और अन्य शर्तों पर आधारित थी।
फिर भी यह स्थानीय स्वशासन के सुव्यवस्थित रूप का महत्वपूर्ण प्रमाण है।
सिंचाई और कृषि
चोल अर्थव्यवस्था का आधार कृषि थी।
कावेरी नदी और उसकी शाखाओं ने तमिल क्षेत्र को अत्यंत उपजाऊ बनाया।
तालाब, नहर और जलाशय कृषि उत्पादन के लिए आवश्यक थे।
राज्य और स्थानीय संस्थाएँ सिंचाई व्यवस्था के रखरखाव में भूमिका निभाती थीं।
धान की खेती विशेष रूप से महत्वपूर्ण थी।
कृषि अधिशेष ने मंदिरों, नगरों, सेना और व्यापार को आर्थिक आधार दिया।
भूमि सर्वेक्षण और कर
चोल शासकों ने भूमि के मापन और राजस्व निर्धारण पर ध्यान दिया।
भूमि की गुणवत्ता, सिंचाई और उत्पादन क्षमता के आधार पर कर निर्धारित किए जाते थे।
अभिलेखों में भूमि दान, कर-मुक्त क्षेत्र और मंदिर संपत्ति का विस्तृत विवरण मिलता है।
चोल अभिलेख इतिहासकारों के लिए अत्यंत मूल्यवान हैं क्योंकि उनसे केवल राजाओं की विजय ही नहीं, बल्कि गाँव और आर्थिक जीवन की भी जानकारी मिलती है।
मंदिर: केवल पूजा स्थल नहीं
दक्षिण भारतीय राज्यों में मंदिर धीरे-धीरे विशाल सामाजिक संस्थाओं में बदल गए।
मंदिरों के पास भूमि होती थी।
वे किसानों, शिल्पकारों, नर्तकों, संगीतकारों, पुरोहितों और कर्मचारियों को रोजगार देते थे।
त्योहार स्थानीय अर्थव्यवस्था और व्यापार को सक्रिय करते थे।
मंदिर धन और अनाज जमा करते और कभी-कभी आर्थिक लेनदेन में भी भूमिका निभाते थे।
इसलिए मंदिर स्थापत्य का विकास केवल धार्मिक परिवर्तन नहीं था; वह राजनीतिक और आर्थिक संरचना से भी जुड़ा था।
चोल कांस्य मूर्तियाँ
चोल काल की कांस्य मूर्तिकला भारतीय कला की महान उपलब्धियों में गिनी जाती है।
इनमें शिव नटराज की प्रतिमा सबसे प्रसिद्ध है।
नटराज में शिव को ब्रह्मांडीय नृत्य करते हुए दिखाया गया है।
इस प्रतिमा में सृजन, संरक्षण और विनाश की दार्शनिक अवधारणाएँ कलात्मक रूप में व्यक्त होती हैं।
चोल कांस्य प्रतिमाएँ मंदिरों की शोभा तक सीमित नहीं थीं। अनेक मूर्तियाँ धार्मिक जुलूसों में भी निकाली जाती थीं।
तमिल साहित्य
दक्षिण भारत में क्षेत्रीय भाषाओं का विकास इस काल की महत्वपूर्ण विशेषता था।
तमिल में आलवार और नयनार संतों के भक्ति साहित्य का विशाल संग्रह विकसित हुआ।
शैव परंपरा में तेवारम् और वैष्णव परंपरा में नालायिर दिव्यप्रबंधम् का विशेष स्थान है।
चोल युग में तमिल साहित्य को राजकीय और धार्मिक संरक्षण मिला।
कंबन की तमिल रामायण बाद के चोल काल की महान साहित्यिक उपलब्धियों में गिनी जाती है।
संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाएँ
दक्षिण भारत का सांस्कृतिक विकास केवल तमिल या कन्नड़ तक सीमित नहीं था।
संस्कृत भी धार्मिक, अभिलेखीय और विद्वत भाषा के रूप में महत्वपूर्ण थी।
दरबारों और मंदिरों में संस्कृत तथा क्षेत्रीय भाषाओं दोनों का प्रयोग होता था।
राष्ट्रकूट काल में कन्नड़ साहित्य बढ़ा, जबकि चालुक्य और बाद के राजवंशों के समय तेलुगु और कन्नड़ साहित्यिक परंपराएँ भी मजबूत हुईं।
इस प्रकार प्रारंभिक मध्यकाल भारतीय भाषाओं के क्षेत्रीय विकास का महत्वपूर्ण युग बना।
दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया
भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच संबंध चोलों से बहुत पहले शुरू हो चुके थे।
व्यापारी, ब्राह्मण, बौद्ध भिक्षु और समुद्री यात्री लंबे समय से इन क्षेत्रों के बीच आते-जाते थे।
भारतीय लिपियों, संस्कृत शब्दावली, रामायण-महाभारत परंपराओं, बौद्ध और हिन्दू धार्मिक विचारों तथा मंदिर स्थापत्य का प्रभाव दक्षिण-पूर्व एशिया के कई क्षेत्रों में दिखाई देता है।
लेकिन इसे केवल सैन्य या राजनीतिक विस्तार के रूप में नहीं देखना चाहिए।
यह मुख्यतः व्यापार, धर्म और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की दीर्घकालिक प्रक्रिया थी।
चालुक्य और चोल संघर्ष
चोल साम्राज्य के विस्तार के दौरान पश्चिमी चालुक्यों के साथ लंबे संघर्ष हुए।
दक्कन और दक्षिण भारत के राजनीतिक नियंत्रण के लिए दोनों शक्तियाँ बार-बार टकराईं।
कभी चोल सेनाएँ दक्कन की ओर बढ़ीं, तो कभी चालुक्य दक्षिण की ओर।
इन युद्धों के बावजूद दोनों क्षेत्रों के बीच सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंध जारी रहे।
राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता ने दक्षिण भारत में अनेक शक्तिशाली क्षेत्रीय केंद्रों को जन्म दिया।
चोल साम्राज्य का पतन
बारहवीं और तेरहवीं शताब्दी तक चोल शक्ति धीरे-धीरे कमजोर होने लगी।
पांड्य शक्ति के पुनरुत्थान, होयसलों के उदय और क्षेत्रीय संघर्षों ने चोल साम्राज्य को कमजोर किया।
स्थानीय शक्तियाँ अधिक स्वतंत्र होती गईं।
तेरहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक चोल राजनीतिक प्रभुत्व समाप्त हो गया।
लेकिन उनकी प्रशासनिक, स्थापत्य और सांस्कृतिक विरासत कायम रही।
दक्षिण भारतीय शक्तियों की ऐतिहासिक विरासत
चालुक्य, पल्लव, राष्ट्रकूट और चोल भारतीय इतिहास में केवल क्षेत्रीय राजवंश नहीं थे।
इनके शासनकाल में—
दक्कन और दक्षिण भारत बड़े राजनीतिक केंद्र बने,
मंदिर स्थापत्य का अद्भुत विकास हुआ,
भक्ति आंदोलन को नई शक्ति मिली,
तमिल और कन्नड़ जैसी क्षेत्रीय भाषाओं का साहित्य विकसित हुआ,
ग्राम और स्थानीय प्रशासन की मजबूत संस्थाएँ सामने आईं,
सिंचाई और कृषि व्यवस्था का विस्तार हुआ,
समुद्री व्यापार बढ़ा,
और भारत के दक्षिण-पूर्व एशिया से संपर्क अधिक गहरे हुए।
पल्लवों ने शैल-कट और संरचनात्मक मंदिरों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
चालुक्यों ने उत्तर और दक्षिण की स्थापत्य परंपराओं के बीच प्रयोग किए।
राष्ट्रकूटों ने एलोरा के कैलास मंदिर जैसी अद्वितीय कृति निर्मित कराई और उत्तर-दक्षिण राजनीति को जोड़ा।
चोलों ने शक्तिशाली राज्य, समुद्री व्यापार, स्थानीय प्रशासन और विशाल मंदिर आधारित संस्कृति को चरम पर पहुँचाया।
इस काल की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि भारत की राजनीतिक शक्ति अब केवल गंगा घाटी में केंद्रित नहीं थी। दक्षिण भारत स्वयं एक बड़ा राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक केंद्र बन चुका था।
इसी समय उत्तर-पश्चिम भारत और गंगा क्षेत्र में भी नए राजवंश विकसित हो रहे थे। आगे राजपूत राज्यों का उदय हुआ और उत्तर-पश्चिमी सीमा पर अरब तथा तुर्क शक्तियों का दबाव बढ़ने लगा।
खंड 10 · राजपूत राज्यों का उदय और उत्तर भारत की क्षेत्रीय राजनीति
हर्षवर्धन के बाद उत्तर भारत में कोई एक ऐसी शक्ति लंबे समय तक स्थापित नहीं हो सकी जो पूरे क्षेत्र पर स्थायी प्रभुत्व बनाए रखे। आठवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच अनेक क्षेत्रीय राजवंश उभरे। इन्हीं में वे कुल और वंश शामिल थे जिन्हें आगे चलकर व्यापक रूप से राजपूत कहा गया।
राजपूत इतिहास को केवल युद्धों और वीरगाथाओं के आधार पर नहीं समझा जा सकता। यह काल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, सामंतवादी संबंधों, भूमि-अधिकार, क्षेत्रीय राज्यों, मंदिर निर्माण, संस्कृत और क्षेत्रीय साहित्य, व्यापारिक नगरों और बदलती सैन्य संरचना का भी समय था।
गुर्जर-प्रतिहार, चौहान, परमार, चंदेल, सोलंकी, गहड़वाल और अन्य राजवंशों ने उत्तर और पश्चिम भारत के बड़े हिस्सों में सत्ता स्थापित की। इन राज्यों के बीच निरंतर संघर्ष भी हुआ और गठबंधन भी। इसी राजनीतिक विखंडन की पृष्ठभूमि में उत्तर-पश्चिम से आने वाली तुर्क शक्तियों के साथ नए प्रकार के सैन्य संघर्ष शुरू हुए।
‘राजपूत’ शब्द का अर्थ
राजपूत शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के ‘राजपुत्र’ से मानी जाती है, जिसका अर्थ है राजा का पुत्र या राजवंश से जुड़ा व्यक्ति।
लेकिन प्रारंभिक मध्यकाल में ‘राजपूत’ कोई एक जातीय या नस्ली समूह नहीं था। समय के साथ अनेक शासक कुल, स्थानीय योद्धा समूह और सामंत स्वयं को प्रतिष्ठित क्षत्रिय वंशों से जोड़ने लगे।
इतिहासकार सामान्यतः मानते हैं कि राजपूत पहचान कई शताब्दियों में विकसित हुई।
विभिन्न कुलों ने अपने वंश को सूर्यवंश, चंद्रवंश या अग्निकुल जैसी परंपराओं से जोड़ा। इन दावों में इतिहास और वंश-प्रतिष्ठा दोनों का मिश्रण था।
इसलिए राजपूतों की उत्पत्ति को किसी एक घटना या एक स्रोत से समझना संभव नहीं है।
गुर्जर-प्रतिहार शक्ति
उत्तर भारत में प्रारंभिक मध्यकाल की सबसे महत्वपूर्ण शक्तियों में गुर्जर-प्रतिहार थे।
आठवीं शताब्दी में नागभट्ट प्रथम ने पश्चिमी भारत में अपनी शक्ति स्थापित की। अरब सेनाओं के पश्चिमी भारत की ओर बढ़ने के समय प्रतिहारों ने उनके विस्तार को रोकने में भूमिका निभाई।
बाद में वत्सराज, नागभट्ट द्वितीय और मिहिर भोज जैसे शासकों ने प्रतिहार साम्राज्य का विस्तार किया।
मिहिर भोज के समय प्रतिहार शक्ति अपने उत्कर्ष पर थी।
कन्नौज उनका प्रमुख राजनीतिक केंद्र बना।
कन्नौज की प्रतिष्ठा
हर्षवर्धन के बाद भी कन्नौज उत्तर भारत की राजनीतिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बना रहा।
आठवीं और नौवीं शताब्दी में कन्नौज पर नियंत्रण के लिए गुर्जर-प्रतिहार, पाल और राष्ट्रकूटों के बीच प्रसिद्ध त्रिपक्षीय संघर्ष हुआ।
कन्नौज पर अधिकार का अर्थ केवल एक नगर पर नियंत्रण नहीं था। गंगा के मैदानों, व्यापारिक मार्गों और उत्तर भारतीय राजनीतिक श्रेष्ठता पर दावा इससे जुड़ा था।
प्रतिहार अंततः कुछ समय के लिए कन्नौज पर स्थायी नियंत्रण स्थापित करने में सफल हुए।
प्रतिहार और अरब विस्तार
आठवीं शताब्दी में सिंध पर अरब सत्ता स्थापित हो चुकी थी।
अरब सेनाओं ने सिंध से आगे राजस्थान और गुजरात की दिशा में बढ़ने का प्रयास किया, लेकिन स्थानीय शक्तियों के प्रतिरोध के कारण वे उत्तर भारत के भीतर स्थायी विस्तार नहीं कर सकीं।
प्रतिहारों की भूमिका इस प्रतिरोध में महत्वपूर्ण थी।
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि अरब सेनाओं को रोकने का श्रेय किसी एक राजवंश को देना इतिहास को अत्यधिक सरल बनाना होगा। पश्चिमी भारत में चालुक्य और अन्य स्थानीय शक्तियाँ भी इस संघर्ष में सक्रिय थीं।
फिर भी प्रतिहारों की सैन्य शक्ति ने पश्चिमी उत्तर भारत की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाई।
सामंतवादी राजनीतिक संरचना
राजपूत राज्यों की राजनीतिक व्यवस्था में राजा के नीचे अनेक सामंत, ठाकुर और स्थानीय शासक होते थे।
वे अपने क्षेत्रों में भूमि और राजस्व पर अधिकार रखते थे तथा बड़े शासक को सैन्य सहायता देते थे।
राजा और सामंतों के संबंध हमेशा स्थिर नहीं रहते थे।
शक्तिशाली सामंत कभी स्वतंत्र होने का प्रयास करते थे और कमजोर राजा के समय राज्य टूट सकता था।
इस व्यवस्था का लाभ यह था कि बड़े क्षेत्र पर स्थानीय सहयोग से शासन संभव था।
लेकिन इसका नुकसान यह था कि व्यापक और स्थायी केंद्रीय एकता बनाए रखना कठिन रहता था।
परमार वंश
मध्य भारत के मालवा क्षेत्र में परमार वंश का उदय हुआ।
उनकी राजधानी धार थी।
परमार शासकों में राजा भोज सबसे प्रसिद्ध है।
उसका शासन ग्यारहवीं शताब्दी में था।
भोज केवल सैन्य शासक के रूप में ही नहीं, बल्कि विद्या और साहित्य के संरक्षक के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
उससे वास्तुकला, चिकित्सा, व्याकरण, दर्शन और अन्य विषयों से संबंधित कई ग्रंथों की परंपरा जुड़ी है।
सभी ग्रंथों का वास्तविक लेखक स्वयं भोज था या नहीं, इस पर विद्वानों में चर्चा है, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि उसका दरबार विद्वानों और शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र था।
भोज और धार
धार राजा भोज की राजधानी थी।
उसके नाम से भोजपुर भी प्रसिद्ध है, जहाँ विशाल शिव मंदिर का निर्माण प्रारंभ कराया गया।
यह मंदिर पूर्ण नहीं हो सका, लेकिन उसकी विशाल स्थापत्य योजना परमार काल की महत्वाकांक्षा को दर्शाती है।
राजा भोज की स्मृति मध्य भारत की लोक परंपरा में अत्यंत गहरी रही।
बाद की अनेक कथाओं में उसे आदर्श विद्वान राजा के रूप में प्रस्तुत किया गया।
चंदेल वंश
बुंदेलखंड क्षेत्र में चंदेल वंश ने महत्वपूर्ण शक्ति स्थापित की।
उनका प्रभाव वर्तमान मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों तक था।
चंदेलों की सबसे प्रसिद्ध सांस्कृतिक उपलब्धि खजुराहो के मंदिर हैं।
इन मंदिरों का निर्माण मुख्यतः दसवीं और ग्यारहवीं शताब्दी के बीच हुआ।
खजुराहो के मंदिर
खजुराहो मंदिर समूह भारतीय मंदिर स्थापत्य की महान उपलब्धियों में गिना जाता है।
यहाँ शैव, वैष्णव और जैन परंपराओं के मंदिर हैं।
कंदरिया महादेव मंदिर सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में है।
इन मंदिरों की बाहरी दीवारों पर धार्मिक, सामाजिक, संगीत, नृत्य और दैनिक जीवन से जुड़े अनेक दृश्य उकेरे गए हैं।
खजुराहो को केवल कामकला संबंधी मूर्तियों के आधार पर समझना गलत होगा। ऐसी मूर्तियाँ पूरे शिल्प का छोटा हिस्सा हैं। मंदिरों का मुख्य स्वरूप धार्मिक और स्थापत्य है।
चंदेल और महमूद गजनवी
चंदेलों के समय उत्तर-पश्चिम से महमूद गजनवी के अभियान शुरू हो चुके थे।
चंदेल शासक विद्याधर का नाम महमूद गजनवी के साथ संघर्ष की पृष्ठभूमि में आता है।
महमूद ने उत्तर भारत में कई अभियान किए, लेकिन बुंदेलखंड पर स्थायी गजनवी शासन स्थापित नहीं हुआ।
यह इस बात का उदाहरण है कि उस समय भारत के विभिन्न क्षेत्रीय राज्य बाहरी आक्रमणों का अपने-अपने स्तर पर सामना कर रहे थे।
गुजरात के चालुक्य या सोलंकी
गुजरात में चालुक्य या सोलंकी वंश ने दसवीं से तेरहवीं शताब्दी तक महत्वपूर्ण सत्ता स्थापित की।
उनकी राजधानी अन्हिलवाड़ पाटन थी।
मूलराज को वंश का प्रारंभिक महत्वपूर्ण शासक माना जाता है।
सिद्धराज जयसिंह और कुमारपाल इसके प्रमुख शासकों में थे।
गुजरात उस समय समुद्री व्यापार, कृषि और नगरों के कारण आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र था।
सोमनाथ और पश्चिमी भारत
गुजरात का सोमनाथ मंदिर शैव धार्मिक परंपरा का प्रमुख तीर्थ था।
1025-26 ईस्वी में महमूद गजनवी ने सोमनाथ पर आक्रमण किया और मंदिर की संपत्ति लूटी।
इस घटना को बाद के इतिहास में अत्यंत प्रतीकात्मक महत्व मिला।
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि महमूद का अभियान स्थायी गुजरात शासन स्थापित करने के लिए नहीं था। उसका मुख्य उद्देश्य संपत्ति, राजनीतिक प्रतिष्ठा और सैन्य प्रभुत्व था।
सोमनाथ बाद में कई बार पुनर्निर्मित हुआ।
चौहान वंश
राजपूत इतिहास में चौहान या चाहमान वंश का विशेष स्थान है।
चौहानों की विभिन्न शाखाएँ राजस्थान और आसपास के क्षेत्रों में सक्रिय थीं।
शाकंभरी और अजमेर उनके प्रमुख केंद्र बने।
आगे दिल्ली पर भी उनका प्रभाव स्थापित हुआ।
चौहान वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक पृथ्वीराज तृतीय, जिसे पृथ्वीराज चौहान कहा जाता है, था।
अजमेर और दिल्ली
अजमेर चौहान शक्ति का महत्वपूर्ण केंद्र था।
दिल्ली के तोमर शासकों से जुड़े क्षेत्र पर भी चौहानों ने धीरे-धीरे प्रभाव स्थापित किया।
बारहवीं शताब्दी तक दिल्ली और अजमेर का संयुक्त राजनीतिक महत्व बढ़ गया।
यही क्षेत्र आगे तुर्क विजय के बाद दिल्ली सल्तनत के निर्माण का केंद्र बना।
पृथ्वीराज चौहान
पृथ्वीराज चौहान ने बारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में शासन किया।
उसका राज्य मुख्यतः राजस्थान, दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों तक फैला था।
वह अपनी सैन्य क्षमता और मोहम्मद गोरी के साथ हुए संघर्षों के कारण प्रसिद्ध है।
पृथ्वीराज के जीवन के बारे में अभिलेखीय स्रोतों के साथ बाद की वीरगाथाएँ भी उपलब्ध हैं।
‘पृथ्वीराज रासो’ लोकप्रिय परंपरा का महत्वपूर्ण ग्रंथ है, लेकिन इसके वर्तमान रूप का बड़ा हिस्सा पृथ्वीराज के समय से बहुत बाद में विकसित हुआ। इसलिए उसकी प्रत्येक कथा को प्रत्यक्ष इतिहास नहीं माना जा सकता।
गहड़वाल वंश
कन्नौज और वाराणसी क्षेत्र में गहड़वाल वंश का उदय हुआ।
गोविंदचंद्र इस वंश के शक्तिशाली शासकों में था।
बारहवीं शताब्दी के अंत में जयचंद्र गहड़वाल का नाम विशेष रूप से प्रसिद्ध हुआ।
लोकप्रिय कथाओं में पृथ्वीराज चौहान और जयचंद्र के बीच व्यक्तिगत शत्रुता को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया है।
ऐतिहासिक रूप से इतना स्पष्ट है कि दोनों अलग-अलग क्षेत्रीय शक्तियों के शासक थे और उनके राजनीतिक हित अलग थे।
लेकिन यह दावा कि जयचंद्र ने मोहम्मद गोरी को भारत बुलाया था, विश्वसनीय समकालीन प्रमाणों से सिद्ध नहीं है।
राजपूत राज्यों के आपसी संघर्ष
राजपूत राज्यों के बीच युद्ध सामान्य राजनीतिक वास्तविकता थे।
भूमि, नगर, व्यापारिक मार्ग, सामंतों की निष्ठा और राजकीय प्रतिष्ठा के लिए संघर्ष होते थे।
चौहान, चंदेल, परमार, सोलंकी, गहड़वाल और अन्य वंश समय-समय पर एक-दूसरे से लड़ते रहे।
यह स्थिति केवल राजपूतों की विशेषता नहीं थी। पूरे मध्यकालीन संसार में क्षेत्रीय राजवंशों के बीच संघर्ष सामान्य थे।
लेकिन उत्तर-पश्चिम से अधिक संगठित घुड़सवार सेनाओं के आने पर भारतीय राज्यों की आपसी प्रतिस्पर्धा एक गंभीर सामरिक कमजोरी बन सकती थी।
युद्ध प्रणाली
राजपूत सेनाओं में घुड़सवार, पैदल सैनिक और हाथी शामिल थे।
राजा और सामंत अपने-अपने सैनिक दस्तों के साथ युद्ध में उतरते थे।
व्यक्तिगत वीरता, कुल की प्रतिष्ठा और प्रत्यक्ष युद्ध का महत्व बहुत अधिक था।
लेकिन युद्ध केवल वीरता से नहीं जीते जाते।
सैन्य संगठन, घुड़सवार धनुर्धर, गति, खुफिया सूचना और रणनीतिक अनुशासन भी निर्णायक होते हैं।
तुर्क सेनाओं ने आगे इन क्षेत्रों में तेज घुड़सवारी और धनुर्विद्या का प्रभावी उपयोग किया।
दुर्ग और रक्षा
राजपूत राजनीतिक व्यवस्था में दुर्गों का विशेष महत्व था।
चित्तौड़, रणथंभौर, कालिंजर, ग्वालियर और अजमेर जैसे दुर्ग राजनीतिक तथा सैन्य शक्ति के केंद्र थे।
दुर्ग केवल युद्ध के समय रक्षा स्थल नहीं थे। उनमें राजमहल, मंदिर, जलाशय और प्रशासनिक संरचनाएँ भी होती थीं।
राजस्थान जैसे क्षेत्रों में मजबूत दुर्ग दीर्घकालीन प्रतिरोध का आधार बने।
जौहर और साका
राजपूत इतिहास के साथ जौहर और साका की परंपराएँ भी जुड़ी हैं।
जब किसी दुर्ग की पराजय निश्चित समझी जाती थी, तो कुछ परिस्थितियों में महिलाओं द्वारा सामूहिक अग्निप्रवेश को जौहर कहा गया और पुरुषों के अंतिम युद्ध को साका।
लेकिन इन घटनाओं से जुड़ी कई लोकप्रिय कथाएँ बाद के साहित्य और लोकस्मृति में विस्तृत हुईं।
इसलिए प्रत्येक जौहर कथा की तिथि और स्वरूप को उसके स्वतंत्र ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर देखना आवश्यक है।
आगे चित्तौड़ से जुड़ी कई प्रसिद्ध घटनाएँ सल्तनत और मुगल काल में सामने आईं।
भूमि और कृषि
राजपूत राज्यों की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर आधारित थी।
भूमि से प्राप्त कर राजकीय आय का प्रमुख स्रोत था।
राजा भूमि और राजस्व अधिकार सामंतों, मंदिरों और ब्राह्मणों को दे सकता था।
कृषि के विस्तार के साथ नए गाँव बसाए गए।
तालाब, बाँध और कुएँ सिंचाई के महत्वपूर्ण साधन थे।
राजस्थान और गुजरात में जल संचयन की विशेष स्थानीय तकनीकें विकसित हुईं।
नगर और व्यापार
राजपूत काल में नगर जीवन समाप्त नहीं हुआ था।
कन्नौज, अजमेर, दिल्ली, धार, उज्जैन, अन्हिलवाड़ पाटन और वाराणसी जैसे नगर व्यापार और धर्म के केंद्र थे।
गुजरात और पश्चिमी भारत के बंदरगाह अरब और फारस के व्यापारियों से जुड़े थे।
व्यापारी समुदायों और शिल्पकारों की महत्वपूर्ण आर्थिक भूमिका थी।
जैन व्यापारी समुदाय विशेष रूप से पश्चिमी भारत के व्यापार और धार्मिक संरक्षण से जुड़े दिखाई देते हैं।
मंदिर और राजनीतिक प्रतिष्ठा
प्रारंभिक मध्यकाल में मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं थे।
वे राजकीय प्रतिष्ठा, आर्थिक गतिविधि और सांस्कृतिक पहचान के केंद्र भी बन चुके थे।
राजा विशाल मंदिर बनवाकर अपनी शक्ति, धर्मनिष्ठा और संपन्नता का प्रदर्शन करते थे।
इसी कारण युद्धों में कभी-कभी प्रतिद्वंद्वी राजा के मंदिर या राजकीय प्रतीक पर आक्रमण राजनीतिक विजय का माध्यम भी बनते थे।
खजुराहो, मोढेरा, ओसियां और राजस्थान तथा गुजरात के अनेक मंदिर इस काल की स्थापत्य उपलब्धियाँ हैं।
संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाएँ
संस्कृत राजकीय प्रशस्तियों, धर्म और विद्वत साहित्य की महत्वपूर्ण भाषा बनी रही।
लेकिन क्षेत्रीय भाषाओं का विकास भी तेज हुआ।
अपभ्रंश, प्रारंभिक राजस्थानी, गुजराती और अन्य उत्तर भारतीय भाषाई रूप साहित्य में उभरने लगे।
दरबारों में कवियों और इतिहासकारों को संरक्षण मिला।
वीरगाथा साहित्य ने राजपूत शासकों की छवि को जनस्मृति में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
धर्म और समाज
राजपूत राज्यों में शैव, वैष्णव, शक्त और जैन परंपराएँ व्यापक थीं।
कई शासक किसी एक विशेष देवता के भक्त थे, लेकिन दूसरे धार्मिक समुदायों को भी संरक्षण दे सकते थे।
गुजरात और राजस्थान में जैन मंदिरों और व्यापारिक समुदायों का प्रभाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण था।
माउंट आबू के दिलवाड़ा जैन मंदिर बाद की शताब्दियों में इसी समृद्ध स्थापत्य परंपरा के उत्कृष्ट उदाहरण बने।
महिलाओं की भूमिका
राजपूत समाज पितृसत्तात्मक था, लेकिन राजघरानों की महिलाएँ राजनीतिक और धार्मिक संरक्षण में भूमिका निभा सकती थीं।
रानियाँ मंदिरों, तालाबों और अन्य सार्वजनिक निर्माणों को दान देती थीं।
वैवाहिक संबंध राज्यों के बीच राजनीतिक गठबंधनों का महत्वपूर्ण माध्यम थे।
लेकिन उच्च कुल की प्रतिष्ठा और विवाह संबंधी कठोर धारणाओं ने महिलाओं पर सामाजिक नियंत्रण भी बढ़ाया।
‘छत्तीस राजकुल’ की परंपरा
बाद के साहित्य में छत्तीस राजपूत कुलों का उल्लेख प्रसिद्ध हुआ।
लेकिन अलग-अलग स्रोतों में इन कुलों की सूची समान नहीं है।
इससे स्पष्ट है कि यह कोई एक निश्चित प्राचीन सूची नहीं थी, बल्कि समय के साथ विकसित हुई राजवंशीय प्रतिष्ठा की परंपरा थी।
चौहान, परमार, प्रतिहार, सोलंकी, गुहिल और अन्य प्रमुख वंश इन परंपराओं में शामिल किए गए।
उत्तर-पश्चिम की बदलती चुनौती
ग्यारहवीं शताब्दी से उत्तर-पश्चिम भारत की सामरिक परिस्थितियाँ बदलने लगीं।
मध्य एशिया और अफगानिस्तान में तुर्क सैन्य शक्तियों का उदय हुआ।
पहले गजनवी और बाद में गौर शक्ति भारतीय सीमा पर आई।
यह नई चुनौती केवल सीमावर्ती लूट तक सीमित नहीं रही।
बारहवीं शताब्दी के अंत तक तुर्क शासकों ने उत्तर भारत में स्थायी राज्य स्थापित करने का प्रयास शुरू किया।
क्या राजपूत केवल आपसी फूट के कारण हारे?
यह लोकप्रिय धारणा है कि राजपूतों की पराजय केवल आपसी फूट के कारण हुई।
राजनीतिक विखंडन निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण कारण था, लेकिन यही पूरा उत्तर नहीं है।
तुर्क सेनाओं की तेज घुड़सवारी, घुड़सवार धनुर्धरों का उपयोग, युद्धक्षेत्र में लचीली रणनीति, मध्य एशियाई सैन्य परंपराएँ और निरंतर अभियान क्षमता भी महत्वपूर्ण थीं।
भारतीय सेनाएँ कई अवसरों पर तुर्क सेनाओं को पराजित भी करती रहीं।
इसलिए उस परिवर्तन को केवल “एकता बनाम फूट” की सरल कथा में बाँधना इतिहास की जटिलता को कम कर देता है।
राजपूत प्रतिरोध समाप्त नहीं हुआ
तराइन के बाद भी राजपूत राजनीतिक शक्ति समाप्त नहीं हुई।
राजस्थान, बुंदेलखंड, गुजरात और मध्य भारत में अनेक राजपूत राज्य बने रहे।
दिल्ली सल्तनत को रणथंभौर, जालौर, मेवाड़ और अन्य क्षेत्रों में लगातार संघर्ष करना पड़ा।
आगे मेवाड़ के गुहिल-सिसोदिया शासक राजपूत प्रतिरोध की बड़ी शक्ति बने।
इसलिए 1192 को राजपूत इतिहास का अंत नहीं, बल्कि उत्तर भारतीय राजनीति के एक नए चरण की शुरुआत मानना चाहिए।
ऐतिहासिक विरासत
आठवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच विकसित राजपूत राज्यों ने उत्तर और पश्चिम भारत की राजनीति तथा संस्कृति पर गहरा प्रभाव डाला।
इस काल में—
अनेक क्षेत्रीय राजवंश उभरे,
कन्नौज राजनीतिक प्रतिष्ठा का केंद्र बना,
दुर्ग आधारित सैन्य व्यवस्था विकसित हुई,
मंदिर स्थापत्य का विस्तार हुआ,
क्षेत्रीय भाषाओं और वीरगाथा साहित्य को आधार मिला,
व्यापारी और शिल्पकार समुदाय मजबूत हुए,
और स्थानीय राजकीय पहचानें गहरी हुईं।
लेकिन राज्यों की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और सामंतवादी ढाँचा व्यापक केंद्रीय शक्ति के निर्माण में बाधा भी बना।
बारहवीं शताब्दी के अंत में तराइन और चंदावर जैसे युद्धों के बाद उत्तर भारत में शक्ति संतुलन तेजी से बदल गया।
दिल्ली और गंगा घाटी के कुछ हिस्सों पर तुर्क सेनापतियों का नियंत्रण स्थापित हुआ। मोहम्मद गोरी की मृत्यु के बाद उसके भारतीय क्षेत्रों की सत्ता उसके पूर्व दास और सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक के हाथों में आई।
खंड 11 · अरब और तुर्क आक्रमण से दिल्ली सल्तनत की स्थापना तक
आठवीं से तेरहवीं शताब्दी के बीच उत्तर-पश्चिम से आने वाली अरब और तुर्क शक्तियों ने भारतीय उपमहाद्वीप की राजनीति पर गहरा प्रभाव डाला। इन आक्रमणों और सैन्य अभियानों को एक ही प्रक्रिया मानना सही नहीं होगा। सिंध पर अरब विजय, महमूद गजनवी के अभियान, मोहम्मद गोरी की विस्तारवादी नीति और अंततः दिल्ली सल्तनत की स्थापना—इन सबकी प्रकृति और उद्देश्य अलग-अलग थे।
सबसे पहले अरब सेनाओं ने सिंध में स्थायी सत्ता स्थापित की। कई शताब्दियों बाद तुर्क शासकों ने पंजाब और फिर गंगा घाटी की ओर विस्तार किया। महमूद गजनवी के अभियानों का मुख्य उद्देश्य धन, राजनीतिक प्रतिष्ठा और सीमांत नियंत्रण था, जबकि मोहम्मद गोरी और उसके सेनापतियों ने उत्तर भारत में स्थायी शासन स्थापित करने की दिशा में काम किया।
यही प्रक्रिया अंततः 1206 ईस्वी में दिल्ली सल्तनत की स्थापना तक पहुँची।
अरब विस्तार की पृष्ठभूमि
सातवीं शताब्दी में इस्लाम के उदय के बाद अरब साम्राज्य बहुत तेजी से पश्चिम एशिया, मध्य एशिया और उत्तर अफ्रीका तक फैल गया।
ईरान पर सासानी सत्ता के पतन के बाद अरब सेनाएँ भारतीय उपमहाद्वीप की उत्तर-पश्चिमी सीमा के निकट पहुँच गईं।
भारत और अरब जगत के बीच व्यापारिक संबंध इससे बहुत पहले से मौजूद थे। अरब व्यापारी पश्चिमी भारतीय तट, विशेषकर गुजरात, कोंकण और मालाबार से संपर्क रखते थे।
इसलिए अरब-भारत संबंध केवल युद्ध से शुरू नहीं हुए थे। व्यापार, समुद्री यात्रा और सांस्कृतिक संपर्क पहले से चल रहे थे।
सिंध पर अरब आक्रमण
आठवीं शताब्दी के प्रारंभ में सिंध पर राजा दाहिर का शासन था।
711-712 ईस्वी में उमय्यद सत्ता के अधीन युवा सेनापति मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर आक्रमण किया।
अरबी स्रोत इस अभियान के पीछे समुद्री लूट, राजनीतिक टकराव और सीमांत सुरक्षा जैसे कारणों का उल्लेख करते हैं।
मुहम्मद बिन कासिम ने देबल, निरून, ब्राह्मणाबाद और मुल्तान जैसे महत्वपूर्ण केंद्रों पर अधिकार किया।
राजा दाहिर युद्ध में मारा गया और सिंध का बड़ा हिस्सा अरब शासन के अधीन आ गया।
सिंध की विजय का महत्व
सिंध पर अरब विजय भारतीय उपमहाद्वीप में मुस्लिम राजनीतिक सत्ता की पहली स्थायी स्थापना थी।
लेकिन यह विजय पूरे भारत की विजय नहीं थी।
अरब सत्ता मुख्यतः सिंध और मुल्तान तक सीमित रही। भारतीय उपमहाद्वीप के भीतर आगे बढ़ने के प्रयासों को अनेक स्थानीय शक्तियों ने रोक दिया।
राजस्थान, गुजरात और पश्चिमी भारत में गुर्जर-प्रतिहार, चालुक्य तथा अन्य राज्यों ने अरब विस्तार का विरोध किया।
इसलिए आठवीं शताब्दी में अरब सेनाएँ गंगा घाटी तक स्थायी रूप से नहीं पहुँच सकीं।
अरब शासन और स्थानीय समाज
सिंध में अरब शासन स्थापित होने के बाद स्थानीय प्रशासन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।
कई क्षेत्रों में स्थानीय जमींदार, अधिकारी और समुदाय अपनी भूमिका में बने रहे।
अरब शासकों ने कर वसूली और राजनीतिक अधीनता के बदले अनेक स्थानीय समूहों को धार्मिक और सामाजिक जीवन जारी रखने की अनुमति दी।
इस काल में सिंध अरब और भारतीय संसार के बीच संपर्क का महत्वपूर्ण क्षेत्र बना।
भारतीय गणित, खगोल-विज्ञान, चिकित्सा और दार्शनिक ज्ञान भी इसी व्यापक संपर्क के माध्यम से अरब जगत तक पहुँचा।
भारतीय ज्ञान का अरब जगत पर प्रभाव
अरब-भारत संबंधों का एक महत्वपूर्ण पक्ष ज्ञान का आदान-प्रदान था।
भारतीय गणित और खगोल-विज्ञान की रचनाओं का अरबी में अनुवाद हुआ।
भारतीय अंक-पद्धति ने आगे अरब विद्वानों के माध्यम से पश्चिमी संसार में प्रवेश किया।
ब्रह्मगुप्त और अन्य भारतीय गणितज्ञों के विचारों का प्रभाव इस्लामी खगोल-विज्ञान और गणित पर पड़ा।
इसलिए अरब संपर्क को केवल सैन्य संघर्ष के रूप में समझना अधूरा होगा।
अरब विस्तार क्यों रुक गया
सिंध विजय के बाद अरब सेनाओं ने पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी भारत में आगे बढ़ने का प्रयास किया।
लेकिन आठवीं शताब्दी में भारतीय शक्तियों के सैन्य प्रतिरोध ने उनके विस्तार को रोक दिया।
गुर्जर-प्रतिहार शासक नागभट्ट प्रथम और पश्चिमी भारत की अन्य शक्तियों ने अरब सेनाओं को चुनौती दी।
दक्कन और गुजरात क्षेत्र में भी स्थानीय राज्यों ने प्रतिरोध किया।
इस कारण सिंध और मुल्तान अरब सत्ता के प्रमुख भारतीय केंद्र बने रहे, लेकिन उत्तर भारत का अधिकांश हिस्सा स्वतंत्र रहा।
मध्य एशिया में तुर्क शक्तियों का उदय
अरब सत्ता के बाद मध्य एशिया और अफगानिस्तान की राजनीति में तुर्क मूल के सैन्य समूह तेजी से प्रभावशाली हुए।
समय के साथ कई तुर्क सेनापति स्वतंत्र शासक बन गए।
अफगानिस्तान का गजनी नगर इसी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक केंद्र बना।
दसवीं शताब्दी में गजनवी वंश का उदय हुआ और उसके सबसे प्रसिद्ध शासक महमूद गजनवी ने भारत की दिशा में अनेक सैन्य अभियान किए।
महमूद गजनवी
महमूद गजनवी ने 998 ईस्वी में गजनी की सत्ता संभाली।
उसकी महत्वाकांक्षा केवल भारत तक सीमित नहीं थी। उसने मध्य एशिया, ईरान और अफगानिस्तान के क्षेत्रों में भी युद्ध किए।
भारत उसके लिए आर्थिक संसाधन, राजनीतिक प्रतिष्ठा और सीमांत विस्तार का महत्वपूर्ण क्षेत्र था।
उसने ग्यारहवीं शताब्दी के पहले तीन दशकों में उत्तर-पश्चिम और उत्तर भारत पर अनेक अभियान किए।
हिंदू शाही राज्य से संघर्ष
महमूद के सामने भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर हिंदू शाही राजवंश था।
जयपाल और उसके बाद आनंदपाल ने गजनवी विस्तार का विरोध किया।
कई युद्धों के बाद गजनवियों ने हिंदू शाही सत्ता को पराजित किया और पंजाब के बड़े हिस्से पर नियंत्रण स्थापित किया।
यह घटना अत्यंत महत्वपूर्ण थी, क्योंकि इससे पहली बार तुर्क सत्ता को पंजाब में स्थायी आधार मिला।
आगे भारत की दिशा में होने वाले तुर्क अभियानों के लिए यही क्षेत्र प्रवेश-द्वार बना।
महमूद के भारत अभियान
महमूद ने भारत के अनेक नगरों और धार्मिक केंद्रों पर आक्रमण किए।
थानेसर, मथुरा, कन्नौज और सोमनाथ जैसे स्थान उसके अभियानों में शामिल रहे।
उसका उद्देश्य कई अभियानों में धन, मूल्यवान धातु, धार्मिक प्रतिष्ठा और राजनीतिक प्रभाव प्राप्त करना था।
समृद्ध मंदिर विशेष लक्ष्य बने क्योंकि उनमें भूमि, दान और धन संग्रहित रहता था।
धार्मिक वैचारिकता भी उसके अभियानों की भाषा का हिस्सा थी, लेकिन केवल धर्म के आधार पर सारे अभियानों को समझना पर्याप्त नहीं है। आर्थिक और राजनीतिक उद्देश्य भी अत्यंत महत्वपूर्ण थे।
सोमनाथ पर आक्रमण
1025-26 ईस्वी में महमूद ने गुजरात के प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया।
उसने मंदिर की संपत्ति लूटी और उसे क्षति पहुँचाई।
यह अभियान भारतीय और फारसी दोनों परंपराओं में अत्यधिक प्रसिद्ध हुआ।
महमूद इस विजय के बाद गजनी लौट गया और गुजरात में स्थायी शासन स्थापित नहीं किया।
सोमनाथ बाद में पुनर्निर्मित हुआ और भारतीय धार्मिक स्मृति में अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ बना रहा।
क्या महमूद भारत का शासक बनना चाहता था?
महमूद के अधिकांश भारतीय अभियान स्थायी गंगा घाटी साम्राज्य स्थापित करने के लिए नहीं थे।
लेकिन पंजाब और उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों पर उसका नियंत्रण स्थायी था।
इसलिए उसे केवल लुटेरा कहना भी अधूरा है और पूरे उत्तर भारत का विजेता कहना भी गलत है।
उसकी नीति में सीमांत राज्य विस्तार और धनी भारतीय केंद्रों पर बार-बार सैन्य अभियान—दोनों शामिल थे।
गजनवी सत्ता का पतन
महमूद की मृत्यु के बाद गजनवी शक्ति धीरे-धीरे कमजोर होने लगी।
मध्य एशिया में सेल्जुक और बाद में गौर शासकों का उदय हुआ।
गजनवी शासकों को अपना मुख्य राजनीतिक आधार गजनी से हटाकर लाहौर की ओर केंद्रित करना पड़ा।
बारहवीं शताब्दी तक गौर शक्ति ने गजनवियों को पीछे छोड़ दिया।
इसी गौर वंश से मोहम्मद गोरी का उदय हुआ।
गौर साम्राज्य और मोहम्मद गोरी
गौर क्षेत्र वर्तमान अफगानिस्तान में स्थित था।
बारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में शहाबुद्दीन मुहम्मद, जिसे भारत में सामान्यतः मोहम्मद गोरी कहा जाता है, ने भारतीय उपमहाद्वीप की दिशा में विस्तार शुरू किया।
उसकी रणनीति महमूद गजनवी से अलग थी।
मोहम्मद गोरी केवल लूटकर लौटने के बजाय जीते हुए क्षेत्रों में प्रशासन और सैन्य ठिकाने स्थापित करता गया।
यही नीति दिल्ली सल्तनत की स्थापना की आधारभूमि बनी।
मुल्तान और सिंध की दिशा
मोहम्मद गोरी ने सबसे पहले मुल्तान और सिंध क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत की।
इसके बाद उसने गुजरात की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास किया।
1178 ईस्वी में गुजरात के चालुक्य-सोलंकी राज्य के विरुद्ध उसका अभियान विफल हुआ।
कायडारा के निकट उसे पराजय का सामना करना पड़ा।
इसके बाद उसने अपनी रणनीति बदली और पंजाब के रास्ते उत्तर भारत में प्रवेश पर ध्यान केंद्रित किया।
लाहौर पर अधिकार
गजनवी वंश की शक्ति कमजोर हो चुकी थी।
मोहम्मद गोरी ने धीरे-धीरे पंजाब पर नियंत्रण बढ़ाया और 1186 ईस्वी में लाहौर पर अधिकार कर अंतिम गजनवी शासक खुसरो मलिक को हटाया।
इसके साथ पंजाब उसके लिए उत्तर भारत की ओर आगे बढ़ने का मजबूत आधार बन गया।
अब उसका सीधा सामना चौहान शक्ति से होना था।
पृथ्वीराज चौहान और पहला तराइन युद्ध
चौहान शासक पृथ्वीराज तृतीय दिल्ली और अजमेर क्षेत्र की प्रमुख शक्ति था।
1191 ईस्वी में तराइन के मैदान में मोहम्मद गोरी और पृथ्वीराज चौहान की सेनाएँ भिड़ीं।
इस प्रथम युद्ध में राजपूत सेना विजयी हुई।
मोहम्मद गोरी घायल हुआ और उसकी सेना को पीछे हटना पड़ा।
यह चौहान शक्ति की बड़ी विजय थी।
लेकिन गोरी ने हार स्वीकार कर भारतीय अभियान समाप्त नहीं किया।
तराइन का दूसरा युद्ध
1192 ईस्वी में मोहम्मद गोरी अधिक संगठित सैन्य तैयारी के साथ वापस आया।
दूसरे तराइन युद्ध में उसने तेज घुड़सवार दस्तों और लचीली युद्ध रणनीति का प्रभावी उपयोग किया।
पृथ्वीराज चौहान पराजित हुआ।
इस युद्ध ने दिल्ली और अजमेर क्षेत्र की राजनीतिक स्थिति बदल दी।
हालाँकि इसका अर्थ यह नहीं था कि उसी दिन पूरा उत्तर भारत तुर्क शासन के अधीन हो गया।
वास्तविक विजय और प्रशासनिक नियंत्रण कई वर्षों के अभियानों से स्थापित हुआ।
जयचंद्र और चंदावर का युद्ध
1194 ईस्वी में मोहम्मद गोरी ने गहड़वाल शासक जयचंद्र से चंदावर के निकट युद्ध किया।
जयचंद्र पराजित हुआ और युद्ध में मारा गया।
इस विजय के बाद गंगा घाटी के अनेक महत्वपूर्ण क्षेत्रों में तुर्क शक्ति के विस्तार का मार्ग खुला।
वाराणसी और आसपास के क्षेत्रों पर भी अभियान हुए।
फिर भी स्थानीय प्रतिरोध और क्षेत्रीय राज्य लंबे समय तक बने रहे।
कुतुबुद्दीन ऐबक की भूमिका
मोहम्मद गोरी के भारतीय अभियानों में उसके दास और सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
यहाँ ‘दास’ शब्द आधुनिक घरेलू दास की तरह नहीं समझना चाहिए। तुर्क सैन्य व्यवस्था में खरीदे गए और प्रशिक्षित दास सैनिक कई बार उच्च सेनापति और राज्याधिकारी बन जाते थे।
ऐबक ने दिल्ली, अजमेर और गंगा-यमुना क्षेत्र में तुर्क सत्ता को मजबूत किया।
मोहम्मद गोरी अक्सर अफगानिस्तान लौट जाता था, इसलिए भारत में वास्तविक प्रशासनिक विस्तार का बड़ा हिस्सा उसके सेनापतियों ने संभाला।
दिल्ली पर नियंत्रण
तराइन के बाद दिल्ली तुर्क सत्ता के महत्वपूर्ण केंद्रों में शामिल हुई।
अजमेर पर भी नियंत्रण स्थापित किया गया, हालांकि वहाँ स्थानीय विद्रोह और सत्ता परिवर्तन जारी रहे।
दिल्ली की भौगोलिक स्थिति अत्यंत अनुकूल थी।
यह पंजाब से गंगा घाटी जाने वाले मार्गों पर स्थित थी और उत्तर-पश्चिमी सीमा तथा उत्तर भारत के मैदानों दोनों से जुड़ती थी।
आगे यही नगर दिल्ली सल्तनत का प्रमुख राजनीतिक केंद्र बना।
मेरठ, कोइल और अन्य अभियान
ऐबक तथा अन्य तुर्क सेनापतियों ने गंगा-यमुना दोआब में अनेक सैन्य अभियान चलाए।
मेरठ, कोइल—वर्तमान अलीगढ़—और आसपास के क्षेत्रों पर नियंत्रण बढ़ाया गया।
स्थानीय राजाओं और सामंतों ने अनेक स्थानों पर प्रतिरोध किया।
इसलिए दिल्ली सल्तनत का निर्माण किसी एक निर्णायक युद्ध से नहीं हुआ, बल्कि सैन्य अभियानों, समझौतों और स्थानीय राजनीतिक पुनर्गठन की लंबी प्रक्रिया से हुआ।
बिहार और बंगाल की ओर विस्तार
तुर्क विस्तार केवल दिल्ली और दोआब तक सीमित नहीं रहा।
मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने बिहार और बंगाल की दिशा में अभियान चलाए।
बारहवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में उसने बिहार के कुछ प्रमुख बौद्ध केंद्रों और राजनीतिक क्षेत्रों पर आक्रमण किया।
नालंदा और विक्रमशिला जैसी महान बौद्ध शिक्षण संस्थाएँ इसी व्यापक उथल-पुथल के दौर में नष्ट और उजड़ीं।
इन संस्थाओं के पतन को केवल एक घटना से नहीं समझना चाहिए—राजकीय संरक्षण का कमजोर होना और राजनीतिक अस्थिरता भी पहले से मौजूद थी—लेकिन तुर्क सैन्य आक्रमणों ने उनके विनाश में निर्णायक भूमिका निभाई।
बंगाल में तुर्क सत्ता
बख्तियार खिलजी ने बंगाल के सेन शासकों को चुनौती दी।
नदिया पर उसके अचानक अभियान की कथा प्रसिद्ध है।
सेन शासक लक्ष्मणसेन पूर्वी बंगाल की ओर हट गया और बंगाल के पश्चिमी तथा उत्तरी क्षेत्रों में तुर्क सत्ता स्थापित होने लगी।
इससे दिल्ली-केंद्रित तुर्क सत्ता का प्रभाव पूर्वी भारत तक फैल गया, हालांकि बंगाल लंबे समय तक पूरी तरह केंद्रीय नियंत्रण में नहीं रहा।
सैन्य सफलता के कारण
तुर्क सेनाओं की सफलता के पीछे अनेक कारण थे।
उनकी घुड़सवार सेना तेज और गतिशील थी।
घुड़सवार धनुर्धरों का प्रभावी उपयोग होता था।
युद्धक्षेत्र में पीछे हटने का नाटक कर पुनः हमला करने जैसी मध्य एशियाई रणनीतियाँ उपयोग में लाई जाती थीं।
सैन्य नेतृत्व अधिक केंद्रीकृत था।
इसके मुकाबले भारतीय क्षेत्रीय राज्यों की सेनाएँ अक्सर सामंतों द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तों पर निर्भर थीं।
लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि भारतीय शासकों ने कई अवसरों पर तुर्क सेनाओं को हराया था। अतः विजय को किसी जातीय या सभ्यतागत श्रेष्ठता से जोड़ना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा।
मंदिरों पर आक्रमण
अरब और तुर्क अभियानों में कई मंदिरों को निशाना बनाया गया।
इसके पीछे धार्मिक प्रतीकवाद और आर्थिक दोनों कारण थे।
बड़े मंदिरों में धन, भूमि, दान और राजकीय प्रतिष्ठा केंद्रित होती थी।
किसी प्रसिद्ध मंदिर को नष्ट करना विरोधी राजा की राजनीतिक और धार्मिक प्रतिष्ठा पर प्रहार भी था।
कुछ इस्लामी दरबारी इतिहासकारों ने ऐसी कार्रवाइयों को धार्मिक विजय की भाषा में प्रस्तुत किया।
इसलिए मंदिर-विनाश के धार्मिक पक्ष को नकारना उचित नहीं है, लेकिन आर्थिक और राजनीतिक कारणों को भी साथ देखना आवश्यक है।
धार्मिक और सांस्कृतिक परिवर्तन
तुर्क सत्ता की स्थापना के साथ उत्तर भारत में नई धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थाएँ उभरीं।
मस्जिदें, मकबरे और मदरसे बनाए जाने लगे।
फारसी भाषा प्रशासन और दरबारी संस्कृति में महत्व प्राप्त करने लगी।
मध्य एशिया, ईरान और अफगानिस्तान से सैनिक, विद्वान, सूफी और व्यापारी भारत आए।
इसके साथ नए सांस्कृतिक संपर्क और संघर्ष दोनों पैदा हुए।
आगे कई शताब्दियों में भारतीय और इस्लामी स्थापत्य तथा कलात्मक परंपराओं के मेल से नई शैलियाँ विकसित हुईं।
मस्जिद निर्माण और पुरानी स्थापत्य सामग्री
दिल्ली और अजमेर में प्रारंभिक तुर्क काल की कुछ मस्जिदों के निर्माण में पहले से मौजूद मंदिरों की सामग्री का उपयोग किया गया।
दिल्ली की कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।
इसके शिलालेख और स्थापत्य अवशेष बताते हैं कि मंदिर संरचनाओं के स्तंभ और पत्थर पुनः प्रयुक्त किए गए।
यह उस सैन्य विजय और धार्मिक सत्ता परिवर्तन का प्रत्यक्ष पुरातात्विक प्रमाण है जो बारहवीं शताब्दी के अंत में दिल्ली क्षेत्र में हुआ।
कुतुब परिसर
कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली में कुतुब मीनार का निर्माण प्रारंभ कराया।
इल्तुतमिश ने बाद में इसके निर्माण को आगे बढ़ाया।
कुतुब परिसर प्रारंभिक दिल्ली सल्तनत की स्थापत्य और राजनीतिक शक्ति का प्रतीक बना।
यहाँ भारतीय शिल्पकारों की तकनीक और इस्लामी स्थापत्य अवधारणाओं का प्रारंभिक मेल दिखाई देता है।
आगे सल्तनत काल में मेहराब, गुम्बद और विशाल मस्जिद निर्माण की तकनीक अधिक परिपक्व हुई।
मोहम्मद गोरी की मृत्यु
1206 ईस्वी में मोहम्मद गोरी की हत्या हो गई।
उसका कोई प्रत्यक्ष पुत्र उत्तराधिकारी नहीं था।
उसके विशाल क्षेत्रों पर उसके विश्वस्त तुर्क सैन्य अधिकारियों ने अलग-अलग सत्ता स्थापित करनी शुरू की।
भारत में उसका सबसे महत्वपूर्ण सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक था।
गोरी की मृत्यु के बाद ऐबक ने स्वतंत्र शासक के रूप में अपनी स्थिति स्थापित की।
दिल्ली सल्तनत की स्थापना
1206 ईस्वी को सामान्यतः दिल्ली सल्तनत की स्थापना का प्रारंभिक वर्ष माना जाता है।
कुतुबुद्दीन ऐबक ने उत्तर भारत में स्वतंत्र सत्ता स्थापित की।
उसके साथ जिस राजवंश की शुरुआत हुई उसे सामान्यतः गुलाम या ममलूक वंश कहा जाता है।
दिल्ली सल्तनत आगे लगभग तीन शताब्दियों तक अलग-अलग राजवंशों के अधीन रही—
ममलूक,
खिलजी,
तुगलक,
सैयद
और लोदी।
इन वंशों ने उत्तर भारत की राजनीति, प्रशासन, अर्थव्यवस्था, धर्म और संस्कृति पर गहरा प्रभाव डाला।
एक लंबे संक्रमण का परिणाम
सिंध में मुहम्मद बिन कासिम की विजय से लेकर दिल्ली में ऐबक की स्वतंत्र सत्ता तक लगभग पाँच शताब्दियों का अंतर था।
इसलिए अरब आक्रमण से दिल्ली सल्तनत तक की पूरी प्रक्रिया को एक सीधी निरंतर विजय के रूप में नहीं देखना चाहिए।
आठवीं शताब्दी में अरब सिंध तक सीमित रहे।
ग्यारहवीं शताब्दी में गजनवियों ने पंजाब में स्थायी आधार बनाया और उत्तर भारत में बार-बार अभियान किए।
बारहवीं शताब्दी के अंत में गौर शासकों ने पंजाब से आगे बढ़कर दिल्ली और गंगा घाटी में स्थायी राजनीतिक नियंत्रण स्थापित करना शुरू किया।
और 1206 में यही सत्ता दिल्ली सल्तनत में बदल गई।
ऐतिहासिक महत्व
इस काल ने उत्तर भारत की राजनीतिक संरचना को गहराई से बदल दिया।
उत्तर-पश्चिमी सीमा अब मध्य एशियाई शक्तियों के साथ स्थायी राजनीतिक संपर्क का क्षेत्र बन गई।
दिल्ली एक बड़े राजनीतिक केंद्र के रूप में उभरी।
फारसी प्रशासनिक संस्कृति भारत में स्थापित हुई।
नई सैन्य तकनीक और घुड़सवार युद्ध प्रणाली का प्रभाव बढ़ा।
मंदिरों और राजकीय केंद्रों पर हमलों ने कई क्षेत्रों की पुरानी सत्ता संरचना को नष्ट किया।
साथ ही व्यापार, भाषा, स्थापत्य और धार्मिक जीवन में नए संपर्क भी बने।
सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन यह था कि उत्तर भारत में पहली बार एक ऐसी तुर्क-इस्लामी सत्ता स्थापित हुई जो छापामार अभियानों तक सीमित नहीं थी, बल्कि भूमि, कर, सेना और प्रशासन पर स्थायी नियंत्रण स्थापित करना चाहती थी।
खंड 12 · दिल्ली सल्तनत: ममलूक से लोदी वंश तक
1206 ईस्वी में कुतुबुद्दीन ऐबक के स्वतंत्र शासक बनने से दिल्ली सल्तनत का प्रारंभ माना जाता है। अगले लगभग तीन शताब्दियों तक दिल्ली केंद्रित सत्ता पाँच प्रमुख वंशों—ममलूक या गुलाम, खिलजी, तुगलक, सैयद और लोदी—के हाथों में रही। इन राजवंशों ने उत्तर भारत की राजनीति, कर व्यवस्था, सैन्य संगठन, शहरी जीवन, स्थापत्य और प्रशासनिक संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया। एनसीईआरटी भी दिल्ली सल्तनत के राजनीतिक क्रम को प्रारंभिक तुर्क शासकों से लेकर खिलजी, तुगलक, सैयद और लोदी वंश तक इसी क्रम में प्रस्तुत करता है।
सल्तनत का इतिहास केवल लगातार राजवंश-परिवर्तन की कहानी नहीं है। यह उस संघर्ष की भी कहानी है जिसमें दिल्ली के सुल्तान एक विशाल और विविध भूभाग पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास करते रहे, जबकि राजपूत, स्थानीय सरदार, प्रांतीय गवर्नर और दक्षिण भारत की शक्तियाँ लगातार उनकी सत्ता को चुनौती देती रहीं।
ममलूक या गुलाम वंश
1206 में मोहम्मद गोरी की मृत्यु के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने भारत में स्वतंत्र सत्ता स्थापित की।
तुर्क परंपरा में ममलूक ऐसे सैन्य दास होते थे जिन्हें कम उम्र में खरीदा, प्रशिक्षित और आगे उच्च सैनिक तथा प्रशासनिक पदों तक पहुँचाया जाता था। इसलिए ‘गुलाम वंश’ शब्द को आधुनिक घरेलू दासता के अर्थ में नहीं समझना चाहिए।
कुतुबुद्दीन ऐबक स्वयं मोहम्मद गोरी का विश्वस्त सेनापति था।
उसने दिल्ली और लाहौर को अपने सत्ता क्षेत्र के प्रमुख केंद्र बनाया।
कुतुबुद्दीन ऐबक
ऐबक का शासन केवल चार वर्ष रहा।
उसने दिल्ली में कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद का निर्माण प्रारंभ कराया और कुतुब मीनार का निर्माण भी उसी के समय शुरू हुआ।
कुतुब मीनार को बाद में इल्तुतमिश और फिर फिरोज शाह तुगलक ने पूरा तथा मरम्मत कराया।
ऐबक की मृत्यु 1210 में लाहौर में चौगान खेलते समय हुई।
उसकी मृत्यु के बाद सल्तनत में उत्तराधिकार संकट पैदा हुआ।
इल्तुतमिश: सल्तनत का वास्तविक संगठक
शम्सुद्दीन इल्तुतमिश ने 1211 के आसपास सत्ता संभाली और दिल्ली सल्तनत की नींव को वास्तव में मजबूत किया।
उसने प्रतिद्वंद्वी तुर्क सरदारों को नियंत्रित किया, बंगाल और सिंध से संबंधों को व्यवस्थित किया और दिल्ली को सत्ता का मुख्य केंद्र बनाया।
उसके शासनकाल में सल्तनत को एक संगठित प्रशासनिक स्वरूप मिला।
इल्तुतमिश ने खलीफा से औपचारिक मान्यता प्राप्त कर अपनी सत्ता की वैधता भी बढ़ाई।
इक्ता व्यवस्था
सल्तनत प्रशासन की प्रमुख संस्थाओं में इक्ता व्यवस्था थी।
सुल्तान अधिकारियों या सैन्य सरदारों को किसी क्षेत्र से राजस्व वसूलने का अधिकार देता था। उस क्षेत्र को इक्ता कहा जाता था और उसके अधिकारी को मुक्ती या इक्तादार।
इक्तादार भूमि का निजी स्वामी नहीं होता था। उसे उस क्षेत्र से राजस्व लेकर अपने प्रशासनिक और सैन्य दायित्व पूरे करने होते थे।
सुल्तान आवश्यकता पड़ने पर उसका स्थानांतरण कर सकता था।
इस व्यवस्था से सल्तनत को बड़ी सेना और प्रशासन बनाए रखने में सहायता मिली।
चहलगानी
इल्तुतमिश ने विश्वस्त तुर्क अमीरों का एक समूह विकसित किया जिसे बाद में ‘चहलगानी’ या चालीस तुर्क अमीरों के समूह के रूप में जाना गया।
उसकी मृत्यु के बाद यही शक्तिशाली कुलीन वर्ग उत्तराधिकार की राजनीति में हस्तक्षेप करने लगा।
सुल्तान और अमीरों के बीच शक्ति-संघर्ष ममलूक काल की प्रमुख समस्या बना।
रजिया सुल्तान
इल्तुतमिश ने अपनी पुत्री रजिया को शासन के योग्य माना।
1236 ईस्वी में रजिया दिल्ली की सत्ता पर बैठी।
वह दिल्ली सल्तनत की पहली और एकमात्र ऐसी महिला शासक थी जिसने सुल्तान के रूप में शासन किया।
उसने केवल पर्दे के पीछे की रानी बनने के बजाय स्वयं राजकीय अधिकार प्रयोग करने का प्रयास किया।
यह तुर्क अमीरों के एक वर्ग को स्वीकार नहीं था।
रजिया का संघर्ष
रजिया ने पुराने तुर्क कुलीन वर्ग की शक्ति सीमित करने और अन्य समूहों को प्रशासन में स्थान देने का प्रयास किया।
उसका संघर्ष राजनीतिक भी था और उस समय की पितृसत्तात्मक सत्ता संरचना से भी जुड़ा था।
विद्रोहों और दरबारी संघर्षों के कारण उसका शासन अल्पकालिक रहा।
1240 ईस्वी में उसकी सत्ता समाप्त हो गई और उसी वर्ष उसकी मृत्यु हुई।
रजिया की विफलता उसकी प्रशासनिक क्षमता की कमी से अधिक सल्तनत के शक्तिशाली तुर्क कुलीनों और सत्ता-संघर्ष से जुड़ी थी।
बलबन
ममलूक वंश के अंतिम महान शासकों में गयासुद्दीन बलबन था।
वह पहले नासिरुद्दीन महमूद के शासनकाल में शक्तिशाली मंत्री था और 1266 में स्वयं सुल्तान बना।
बलबन का मुख्य उद्देश्य केंद्रीय राजसत्ता की प्रतिष्ठा और शक्ति पुनः स्थापित करना था।
उसने विद्रोही सामंतों और सीमांत क्षेत्रों पर कठोर कार्रवाई की।
राजसत्ता की कठोर अवधारणा
बलबन ने सुल्तान की प्रतिष्ठा को अत्यंत ऊँचा स्थान दिया।
दरबार में कठोर अनुशासन लागू किया गया।
उसने कुलीनों को यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि सुल्तान केवल उनके बीच प्रथम व्यक्ति नहीं, बल्कि उनसे ऊपर सर्वोच्च शासक है।
दरबार में फारसी राजकीय रीति-रिवाजों को बढ़ावा दिया गया।
बलबन की नीति मजबूत केंद्रीकृत राजसत्ता पर आधारित थी।
मंगोल चुनौती
तेरहवीं शताब्दी में मंगोल साम्राज्य मध्य और पश्चिम एशिया में विशाल शक्ति बन चुका था।
चंगेज खान की सेनाएँ सिंधु तक पहुँच चुकी थीं।
दिल्ली सल्तनत के लिए उत्तर-पश्चिमी सीमा की रक्षा एक स्थायी चुनौती बन गई।
इल्तुतमिश ने आरंभिक चरण में सावधानीपूर्ण नीति अपनाई, जबकि बलबन ने सीमांत सुरक्षा के लिए दुर्ग, सैन्य चौकियाँ और सेनाएँ मजबूत कीं।
आगे खिलजी काल में मंगोल आक्रमण और भी गंभीर हुए।
खिलजी वंश का उदय
1290 ईस्वी में ममलूक सत्ता समाप्त हुई और जलालुद्दीन फिरोज खिलजी ने नया वंश स्थापित किया।
इस परिवर्तन का महत्व केवल एक राजवंश बदलने तक सीमित नहीं था।
पुराने तुर्क कुलीनों का यह दावा कमजोर हुआ कि केवल विशिष्ट तुर्क परिवार ही दिल्ली पर शासन कर सकते हैं।
जलालुद्दीन का शासन अपेक्षाकृत उदार माना जाता है, लेकिन उसका भतीजा और दामाद अलाउद्दीन खिलजी अधिक महत्वाकांक्षी था।
1296 में अलाउद्दीन ने जलालुद्दीन की हत्या कर सत्ता ग्रहण की।
अलाउद्दीन खिलजी
अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली सल्तनत के सबसे शक्तिशाली शासकों में था।
उसके शासनकाल में सल्तनत का विस्तार उत्तर भारत से बहुत आगे दक्षिण तक हुआ।
उसने गुजरात, रणथंभौर, चित्तौड़ और मालवा की दिशा में सैन्य अभियान चलाए।
इसके बाद उसके सेनापति मलिक काफूर ने दक्कन और दक्षिण भारत में अभियान किए।
गुजरात विजय
1299 ईस्वी में गुजरात पर खिलजी सेना का अभियान हुआ।
गुजरात व्यापार और समुद्री संपर्क की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था।
इस विजय से सल्तनत को पश्चिमी समुद्री व्यापार से जुड़े धनी क्षेत्रों तक पहुँच मिली।
इसी अभियान के दौरान मलिक काफूर दिल्ली सत्ता से जुड़ा, जो बाद में दक्षिणी अभियानों का प्रमुख सेनापति बना।
रणथंभौर और चित्तौड़
अलाउद्दीन ने राजस्थान के मजबूत दुर्गों पर अभियान चलाए।
1301 में रणथंभौर पर विजय प्राप्त की गई।
1303 में चित्तौड़ पर आक्रमण हुआ और लंबे संघर्ष के बाद दुर्ग सल्तनत के अधीन आया।
चित्तौड़ की घेराबंदी के साथ बाद की साहित्यिक परंपरा में रानी पद्मिनी की कथा जुड़ी, लेकिन इसका प्रसिद्ध रूप मलिक मुहम्मद जायसी के ‘पद्मावत’ में 1540 के आसपास सामने आया—घटना के दो शताब्दी से अधिक बाद। इसलिए पद्मिनी कथा को समकालीन प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है।
मंगोलों के विरुद्ध अलाउद्दीन
अलाउद्दीन के शासन में मंगोलों ने दिल्ली सल्तनत पर कई बड़े आक्रमण किए।
कई बार मंगोल सेना दिल्ली के निकट तक पहुँची।
अलाउद्दीन ने सेना की संख्या बढ़ाई, सीमांत सुरक्षा मजबूत की और दिल्ली के आसपास किलेबंदी की।
सीरी नगर का निर्माण भी इसी व्यापक सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ा था।
उसकी सेनाओं ने कई मंगोल हमलों को विफल किया।
यह उसकी सबसे महत्वपूर्ण सैन्य उपलब्धियों में थी।
बाजार नियंत्रण नीति
अलाउद्दीन खिलजी की सबसे प्रसिद्ध नीतियों में बाजार नियंत्रण था।
उसने अनाज, वस्त्र, घोड़े, पशु और दैनिक वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रित किया।
दिल्ली में अलग-अलग बाजार बनाए गए और उनकी निगरानी के लिए अधिकारी नियुक्त किए गए।
व्यापारियों का पंजीकरण किया गया तथा जमाखोरी और निर्धारित मूल्य से अधिक लेने पर कठोर दंड था।
इस नीति का प्रमुख उद्देश्य बड़ी स्थायी सेना को कम वेतन में भी जीवन-यापन योग्य बनाना था।
राजस्व नीति
अलाउद्दीन ने दोआब क्षेत्र में भूमि कर बढ़ाया और राजस्व वसूली पर राज्य का प्रत्यक्ष नियंत्रण मजबूत किया।
उसने स्थानीय मुखियाओं और ग्रामीण अभिजात वर्ग की आर्थिक शक्ति कम करने की कोशिश की।
जमीन से उपज का बड़ा हिस्सा कर के रूप में लिया गया।
इन नीतियों से सल्तनत की आय बढ़ी, लेकिन किसानों पर भारी दबाव भी पड़ा।
दक्षिण भारत में अभियान
अलाउद्दीन ने दक्षिण भारत पर पूर्ण प्रत्यक्ष शासन स्थापित नहीं किया।
उसके सेनापति मलिक काफूर ने देवगिरि, वारंगल, द्वारसमुद्र और मदुरै की दिशा में अभियान चलाए।
इन राज्यों से धन, उपहार और कर स्वीकार कराया गया।
दक्षिण भारत से प्राप्त विशाल धन ने दिल्ली सल्तनत की आर्थिक शक्ति बढ़ाई।
लेकिन दक्षिणी राज्यों में स्थायी नियंत्रण बाद के तुगलक काल में भी एक कठिन चुनौती बना रहा।
खिलजी सत्ता का अंत
अलाउद्दीन की मृत्यु 1316 में हुई।
उसके बाद दरबार में सत्ता संघर्ष शुरू हो गया।
मलिक काफूर और राजपरिवार के विभिन्न समूहों के बीच संघर्ष हुआ।
कुछ ही वर्षों में खिलजी सत्ता कमजोर हो गई।
1320 ईस्वी में गयासुद्दीन तुगलक ने खिलजी वंश का अंत कर तुगलक वंश स्थापित किया।
तुगलक वंश
तुगलक काल दिल्ली सल्तनत के सबसे व्यापक राजनीतिक विस्तार और साथ ही गंभीर प्रशासनिक प्रयोगों का समय था।
गयासुद्दीन तुगलक ने सत्ता संभालकर प्रशासन में स्थिरता लाने का प्रयास किया।
उसने तुगलकाबाद किले का निर्माण कराया।
लेकिन उसका शासन केवल कुछ वर्ष चला।
1325 में उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र मुहम्मद बिन तुगलक सत्ता में आया।
मुहम्मद बिन तुगलक
मुहम्मद बिन तुगलक मध्यकालीन भारतीय इतिहास के सबसे चर्चित शासकों में है।
वह अत्यंत शिक्षित और महत्वाकांक्षी था।
उसने साम्राज्य को अधिक संगठित और व्यापक बनाने के लिए कई योजनाएँ लागू कीं।
इनमें से कुछ विचार अपने समय से आगे दिखाई देते हैं, लेकिन उनके क्रियान्वयन में गंभीर समस्याएँ पैदा हुईं।
दिल्ली से दौलताबाद
मुहम्मद बिन तुगलक ने दिल्ली से देवगिरि, जिसका नाम दौलताबाद रखा गया, की ओर राजधानी स्थानांतरित करने का प्रयास किया।
दौलताबाद साम्राज्य के अपेक्षाकृत मध्य में था और दक्षिण के क्षेत्रों पर नियंत्रण के लिए उपयोगी हो सकता था।
लेकिन दिल्ली की बड़ी आबादी को स्थानांतरित करने की नीति से भारी कठिनाइयाँ पैदा हुईं।
अंततः उसे राजधानी फिर दिल्ली ले जानी पड़ी।
सांकेतिक मुद्रा
मुहम्मद बिन तुगलक ने तांबे और पीतल की सांकेतिक मुद्रा चलाने का प्रयास किया, जिसका मूल्य चाँदी के सिक्कों के बराबर निर्धारित किया गया।
विचार अपने आप में महत्वपूर्ण था, लेकिन राज्य नकली सिक्कों के निर्माण को नियंत्रित नहीं कर सका।
बड़ी मात्रा में नकली मुद्रा प्रचलन में आ गई।
अंततः सरकार को यह प्रयोग वापस लेना पड़ा और तांबे के सिक्कों के बदले चाँदी देना पड़ा।
इससे राजकोष पर भारी बोझ पड़ा।
दोआब की कर नीति
गंगा-यमुना दोआब में मुहम्मद बिन तुगलक ने कर बढ़ाया।
इसी समय क्षेत्र में अकाल और कृषि संकट की स्थितियाँ भी पैदा हुईं।
कठोर कर वसूली के कारण किसानों की स्थिति खराब हुई और विद्रोह हुए।
बाद में सरकार को राहत उपाय करने पड़े।
यह उदाहरण उसकी नीतियों में उद्देश्य और वास्तविक परिस्थितियों के बीच अंतर को दिखाता है।
साम्राज्य का विशाल विस्तार और विद्रोह
मुहम्मद बिन तुगलक के समय दिल्ली सल्तनत का क्षेत्रीय विस्तार अपने चरम पर पहुँचा।
लेकिन इतने विशाल क्षेत्र पर स्थायी नियंत्रण बनाए रखना संभव नहीं हुआ।
दक्कन और दक्षिण भारत में विद्रोह शुरू हुए।
1336 में विजयनगर साम्राज्य उभरा और 1347 में बहमनी सल्तनत स्थापित हुई।
बंगाल भी स्वतंत्र हो गया।
इस प्रकार उसके शासन के अंतिम वर्षों में सल्तनत का बड़ा हिस्सा दिल्ली के नियंत्रण से बाहर हो गया।
फिरोज शाह तुगलक
1351 में फिरोज शाह तुगलक सत्ता में आया।
उसने अपने पूर्ववर्ती की कठोर और प्रयोगवादी नीतियों के बजाय अपेक्षाकृत स्थिर प्रशासनिक नीति अपनाई।
उसने नहरों, बागों, नगरों, सरायों और सार्वजनिक निर्माणों पर ध्यान दिया।
फिरोजाबाद सहित कई नगरों का निर्माण कराया गया।
उसने पुराने स्मारकों की मरम्मत भी कराई।
सिंचाई और सार्वजनिक निर्माण
फिरोज शाह ने कृषि बढ़ाने के लिए नहरों का निर्माण कराया।
यमुना और सतलुज से जुड़े क्षेत्रों में सिंचाई परियोजनाएँ शुरू की गईं।
इससे कुछ क्षेत्रों में कृषि भूमि बढ़ी।
उसने अस्पताल, मदरसे और अन्य सार्वजनिक संस्थाएँ भी स्थापित कराईं।
राजस्व नीति में उसने अनेक धार्मिक करों और इस्लामी कानून पर अधिक जोर दिया।
जज़िया
गैर-मुस्लिम प्रजा पर जज़िया पहले से सल्तनत व्यवस्था का हिस्सा था, लेकिन फिरोज शाह तुगलक के समय इसे अधिक व्यवस्थित और कठोर रूप से लागू किया गया।
ब्राह्मणों को भी इसके दायरे में लाने का उल्लेख मिलता है।
फिरोज का शासन धार्मिक नीति में अपने कई पूर्ववर्तियों की तुलना में अधिक रूढ़िवादी था।
उसके अपने विवरण और समकालीन स्रोत मंदिरों के विनाश तथा धर्मांतरण से जुड़ी कार्रवाइयों का भी उल्लेख करते हैं।
इसलिए उसके शासन के सार्वजनिक निर्माण और धार्मिक कठोरता—दोनों पक्षों को साथ देखना आवश्यक है।
दासों की बड़ी व्यवस्था
फिरोज शाह ने बड़ी संख्या में दास रखे और उनके प्रबंधन के लिए अलग विभाग बनाया।
इनमें कई लोग राजकीय निर्माण, कार्यशालाओं और अन्य कार्यों में लगाए जाते थे।
उसने वंशानुगत पदों को भी बढ़ावा दिया।
इससे तत्काल राजनीतिक स्थिरता कुछ बढ़ी, लेकिन प्रशासनिक पदों पर केंद्रीय नियंत्रण कमजोर हुआ।
तुगलक सत्ता का विघटन
फिरोज शाह की मृत्यु 1388 के बाद तुगलक वंश तेजी से कमजोर होने लगा।
उत्तराधिकार संघर्ष, प्रांतीय विद्रोह और अमीरों की बढ़ती स्वतंत्रता ने दिल्ली की शक्ति घटा दी।
सल्तनत कई हिस्सों में बँट गई।
इसी कमजोर स्थिति में 1398 में मध्य एशियाई विजेता तैमूर ने भारत पर आक्रमण किया।
तैमूर का दिल्ली आक्रमण
1398 ईस्वी में तैमूर की सेना उत्तर-पश्चिम भारत से आगे बढ़ती हुई दिल्ली पहुँची।
दिल्ली की तुगलक सेना पराजित हुई।
इसके बाद शहर में बड़े पैमाने पर लूट, हत्या और विनाश हुआ।
तैमूर का उद्देश्य भारत में स्थायी साम्राज्य स्थापित करना नहीं था। वह भारी धन और बंदी लेकर वापस मध्य एशिया चला गया।
लेकिन उसके आक्रमण ने पहले से कमजोर दिल्ली सल्तनत को लगभग ध्वस्त कर दिया।
दिल्ली की आर्थिक और राजनीतिक प्रतिष्ठा को गंभीर आघात पहुँचा।
सैयद वंश
तुगलक सत्ता के पतन के बाद 1414 ईस्वी में खिज्र खान ने दिल्ली पर अधिकार किया और सैयद वंश की स्थापना की।
सैयद शासकों की वास्तविक शक्ति सीमित थी।
उनका नियंत्रण मुख्यतः दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों तक था।
खिज्र खान ने स्वयं को स्वतंत्र सम्राट जैसी पूर्ण उपाधि देने के बजाय तैमूरी सत्ता से संबंध बनाए रखा।
उसके बाद मुबारक शाह और अन्य सैयद शासक आए।
कमजोर केंद्रीय सत्ता
सैयद काल में दिल्ली की शक्ति अपने पुराने स्तर पर नहीं लौट सकी।
राजस्थान, गुजरात, मालवा, जौनपुर, बंगाल और दक्कन में स्वतंत्र राज्य मजबूत हो चुके थे।
दिल्ली स्वयं क्षेत्रीय सत्ता बनकर रह गई।
1451 में अंतिम सैयद शासक आलम शाह ने सत्ता बहलोल लोदी को सौंप दी।
इसके साथ लोदी वंश का आरंभ हुआ।
लोदी वंश
लोदी दिल्ली सल्तनत का पहला अफगान मूल का राजवंश था।
बहलोल लोदी ने 1451 में सत्ता संभाली।
उसने धीरे-धीरे आसपास के क्षेत्रों पर दिल्ली की शक्ति पुनः स्थापित की।
जौनपुर के शर्की राज्य को अपने अधीन करना उसकी प्रमुख उपलब्धियों में था।
उसकी राजनीतिक शैली तुर्क सुल्तानों की तुलना में अफगान सरदारों के साथ अधिक साझेदारी पर आधारित थी।
सिकंदर लोदी
बहलोल के बाद सिकंदर लोदी 1489 में सत्ता में आया।
वह लोदी वंश का सबसे सक्षम शासक माना जाता है।
उसने राज्य का विस्तार किया और प्रशासन मजबूत किया।
1504 में उसने आगरा नगर को विकसित कर महत्वपूर्ण राजनीतिक केंद्र बनाया।
आगे मुगल काल में आगरा साम्राज्य की प्रमुख राजधानियों में से एक बना।
सिकंदर लोदी की धार्मिक नीति
सिकंदर लोदी प्रशासनिक रूप से सक्षम था, लेकिन उसकी धार्मिक नीति कई मामलों में कठोर थी।
कुछ स्रोत मंदिरों के विनाश और गैर-इस्लामी धार्मिक गतिविधियों पर नियंत्रण की कार्रवाइयों का उल्लेख करते हैं।
वहीं उसने विद्वानों और फारसी साहित्य को संरक्षण भी दिया।
इसलिए उसकी छवि एक मजबूत प्रशासक और धार्मिक रूप से अधिक रूढ़िवादी शासक—दोनों रूपों में सामने आती है।
इब्राहिम लोदी
1517 में इब्राहिम लोदी सत्ता में आया।
उसके सामने सबसे बड़ी समस्या अफगान अमीरों के साथ संबंधों की थी।
अफगान राजनीतिक परंपरा में सरदार स्वयं को सुल्तान के सहयोगी अभिजात वर्ग के रूप में देखते थे, जबकि इब्राहिम अधिक केंद्रीकृत राजसत्ता स्थापित करना चाहता था।
इससे विद्रोह और असंतोष बढ़ा।
पंजाब के दौलत खान लोदी और इब्राहिम के चाचा आलम खान जैसे विरोधियों ने मध्य एशिया के शासक बाबर से संपर्क किया।
बाबर का आगमन
बाबर काबुल का तैमूरी शासक था और लंबे समय से पंजाब तथा उत्तर भारत पर निगाह रखे हुए था।
उसने इससे पहले भी भारत की दिशा में अभियान किए थे।
लोदी सत्ता के आंतरिक संघर्ष ने उसे बड़ा अवसर दिया।
1526 में बाबर और इब्राहिम लोदी की सेनाएँ पानीपत के मैदान में आमने-सामने हुईं।
पानीपत का प्रथम युद्ध
21 अप्रैल 1526 को पानीपत का प्रथम युद्ध हुआ।
इब्राहिम लोदी के पास बड़ी सेना और युद्ध हाथी थे।
बाबर की सेना संख्या में कम थी, लेकिन उसके पास बेहतर संगठित घुड़सवार सेना और बारूद आधारित तोपखाना था।
उसने गाड़ियों और तोपों का रक्षात्मक संयोजन तथा घुड़सवार घेराबंदी की रणनीति अपनाई।
इब्राहिम लोदी युद्ध में मारा गया।
इस विजय के साथ दिल्ली सल्तनत के लोदी शासन का अंत हो गया।
एनसीईआरटी भी 1526 में बाबर द्वारा इब्राहिम लोदी को पानीपत में पराजित करने को मुगल साम्राज्य की शुरुआत का निर्णायक बिंदु मानता है।
सल्तनत काल का प्रशासन
लगभग तीन शताब्दियों में प्रशासन में कई बदलाव हुए, लेकिन कुछ मूल संस्थाएँ बनी रहीं।
सुल्तान सर्वोच्च सत्ता का केंद्र था।
वजीर वित्त और प्रशासन में महत्वपूर्ण पद था।
दीवान-ए-वजारत वित्त से, दीवान-ए-अर्ज सेना से और अन्य विभाग विभिन्न राजकीय कार्यों से जुड़े थे।
इक्ता व्यवस्था साम्राज्य के वित्त और सैन्य प्रशासन की रीढ़ बनी रही।
शासन का वास्तविक नियंत्रण सुल्तान की व्यक्तिगत शक्ति और अमीरों पर उसकी पकड़ पर निर्भर करता था।
सेना
दिल्ली सल्तनत की शक्ति का प्रमुख आधार सेना थी।
घुड़सवार सैनिक विशेष महत्व रखते थे।
मध्य एशियाई युद्ध परंपरा और उत्तम घोड़ों की उपलब्धता ने सल्तनत सेना को प्रारंभिक चरण में महत्वपूर्ण लाभ दिया।
अलाउद्दीन खिलजी ने सेना के घोड़ों पर दाग लगाने और सैनिकों का विवरण दर्ज करने जैसी व्यवस्थाएँ लागू कीं ताकि भ्रष्टाचार कम हो।
बारूद और तोपखाना सल्तनत के अंतिम चरण में अधिक महत्वपूर्ण होने लगा, लेकिन इसका निर्णायक प्रभाव बाबर के समय दिखाई दिया।
नगरों का विस्तार
दिल्ली सल्तनत काल में अनेक नगरों का विस्तार हुआ।
दिल्ली स्वयं कई अलग-अलग शहरी केंद्रों—किला राय पिथौरा, सीरी, तुगलकाबाद, जहांपनाह और फिरोजाबाद—के रूप में विकसित हुई।
लाहौर, मुल्तान, बदायूँ, आगरा, जौनपुर और दौलताबाद जैसे नगर भी महत्वपूर्ण रहे।
नगर प्रशासन, व्यापार, सैनिक आवश्यकताओं और शिल्प उत्पादन के केंद्र बने।
शिल्प और व्यापार
सल्तनत काल में कपड़ा, धातु, कागज, चमड़ा और विभिन्न हस्तशिल्पों का उत्पादन बढ़ा।
घोड़ों का आयात महत्वपूर्ण था।
भारत का व्यापार अरब सागर और हिंद महासागर के माध्यम से पश्चिम एशिया तथा दक्षिण-पूर्व एशिया से जुड़ा रहा।
गुजरात और बंगाल के बंदरगाह विशेष रूप से समृद्ध हुए।
सुल्तानों की राजनीतिक अस्थिरता के बावजूद व्यापारिक गतिविधियाँ कई क्षेत्रों में बनी रहीं।
फारसी भाषा और साहित्य
सल्तनत शासन में फारसी प्रशासन और दरबार की प्रमुख भाषा बनी।
फारसी इतिहास-लेखन की समृद्ध परंपरा विकसित हुई।
मिनहाज-उस-सिराज, जियाउद्दीन बरनी और अमीर खुसरो जैसे लेखकों की रचनाएँ इस युग की प्रमुख ऐतिहासिक सामग्री हैं।
लेकिन इन ग्रंथों को भी सावधानी से पढ़ना पड़ता है क्योंकि लेखक अक्सर दरबार, धार्मिक विचार और अपने राजनीतिक दृष्टिकोण से प्रभावित थे।
अमीर खुसरो
अमीर खुसरो सल्तनत काल की सबसे प्रसिद्ध सांस्कृतिक हस्तियों में थे।
उन्होंने कई सुल्तानों का दौर देखा।
वे फारसी के महान कवि, संगीत और भारतीय सांस्कृतिक जीवन से गहराई से जुड़े साहित्यकार थे।
उनकी रचनाओं में भारत के समाज, राजनीति और प्रकृति के अनेक उल्लेख मिलते हैं।
वे उस सांस्कृतिक प्रक्रिया के प्रतीक हैं जिसमें फारसी और भारतीय परंपराओं का परस्पर संपर्क बढ़ रहा था।
सूफी परंपरा
सल्तनत काल में सूफी सिलसिलों का भारत में विस्तार हुआ।
चिश्ती सिलसिले का विशेष प्रभाव पड़ा।
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का अजमेर और निजामुद्दीन औलिया का दिल्ली से गहरा संबंध है।
सूफी खानकाहें आध्यात्मिक, सामाजिक और कभी-कभी सहायता केंद्र के रूप में विकसित हुईं।
कई सूफी शासकीय सत्ता से दूरी बनाए रखने पर जोर देते थे, हालांकि सभी सिलसिलों की नीति समान नहीं थी।
भक्ति परंपरा का विस्तार
इसी काल में भारत के विभिन्न हिस्सों में भक्ति परंपराएँ भी मजबूत हो रही थीं।
दक्षिण भारत की आलवार और नयनार परंपराओं के बाद महाराष्ट्र, उत्तर भारत और अन्य क्षेत्रों में व्यक्तिगत भक्ति पर जोर बढ़ा।
आगे रामानंद, कबीर, रविदास, गुरु नानक और अन्य संत इसी व्यापक सामाजिक-धार्मिक वातावरण में सामने आए।
भक्ति और सूफी परंपराओं में कई बुनियादी धार्मिक अंतर थे, लेकिन दोनों ने सामान्य जन की भाषाओं और व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभव को महत्व दिया।
स्थापत्य
दिल्ली सल्तनत ने भारतीय स्थापत्य में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए।
मस्जिद, मकबरा, मीनार, मदरसा और किले नई राजनीतिक सत्ता की पहचान बने।
प्रारंभिक भवनों में स्थानीय मंदिरों और अन्य संरचनाओं से प्राप्त सामग्री का पुनः उपयोग भी हुआ।
धीरे-धीरे भारतीय शिल्पकारों और पश्चिम तथा मध्य एशियाई स्थापत्य परंपराओं के मेल से एक विशिष्ट शैली विकसित हुई।
कुतुब मीनार, अलाई दरवाजा, तुगलकाबाद और लोदी मकबरे इस विकास के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
मंदिर-विनाश का प्रश्न
सल्तनत काल में मंदिरों के विनाश के अनेक प्रमाण उपलब्ध हैं, विशेष रूप से सैन्य विजय के दौरान।
कई सुल्तानों और सेनापतियों ने पराजित शासकों के मंदिरों को नष्ट किया, उनकी संपत्ति ली या उनके स्थान पर इस्लामी धार्मिक संरचनाएँ बनाईं।
कुछ समकालीन फारसी लेखकों ने इन कार्रवाइयों को धार्मिक विजय के रूप में गर्व से दर्ज किया।
साथ ही राजनीतिक कारण भी महत्वपूर्ण थे, क्योंकि बड़े मंदिर राजकीय सत्ता, धन और स्थानीय पहचान के केंद्र थे।
इसलिए मंदिर-विनाश को न तो पूरी तरह केवल आर्थिक घटना कहना सही है, न प्रत्येक घटना को एक समान परिस्थिति में रखना। अलग शासकों, युद्धों और क्षेत्रों के प्रमाणों को अलग-अलग देखना आवश्यक है।
हिन्दू सरदार और सल्तनत
लगातार युद्धों के बावजूद सल्तनत प्रशासन और क्षेत्रीय राजनीति में हिन्दू जमींदारों, स्थानीय सरदारों और राजाओं की भूमिका बनी रही।
कई क्षेत्रों में सुल्तानों ने स्थानीय राजाओं से कर स्वीकार कर उन्हें शासन जारी रखने दिया।
राजस्व व्यवस्था में स्थानीय मुखियाओं और किसानों के बिना शासन संभव नहीं था।
इससे सल्तनत का प्रशासन विजेता और पराजित समुदायों की सीधी दो-ध्रुवीय संरचना से कहीं अधिक जटिल था।
सल्तनत की सीमाएँ
दिल्ली सल्तनत के नक्शे में विशाल क्षेत्र दिख सकता है, लेकिन हर समय उन सभी प्रदेशों पर दिल्ली का समान नियंत्रण नहीं था।
बंगाल कई बार स्वतंत्र हुआ।
दक्कन में बहमनी और विजयनगर जैसी शक्तियाँ उभरीं।
राजस्थान में विभिन्न राजपूत राज्यों ने प्रतिरोध जारी रखा।
गुजरात, मालवा और जौनपुर भी स्वतंत्र सल्तनतें बने।
इसलिए दिल्ली सल्तनत को लगातार तीन शताब्दियों तक एक समान केंद्रीकृत साम्राज्य मानना गलत होगा।
ऐतिहासिक विरासत
1206 से 1526 तक दिल्ली सल्तनत ने उत्तर भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी।
इस काल में—
दिल्ली स्थायी साम्राज्यिक राजधानी के रूप में उभरी,
इक्ता आधारित प्रशासन विकसित हुआ,
मजबूत घुड़सवार सेना राजनीतिक शक्ति का आधार बनी,
फारसी राजकीय संस्कृति का विस्तार हुआ,
नए नगर और स्थापत्य रूप विकसित हुए,
भारत के मध्य और पश्चिम एशिया से संबंध गहरे हुए,
सूफी परंपराओं का विस्तार हुआ,
और उत्तर भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना में बड़े परिवर्तन आए।
साथ ही यह लगातार सैन्य संघर्ष, मंदिर-विनाश, भारी कर व्यवस्था, विद्रोह, धार्मिक तनाव और प्रादेशिक सत्ता-संघर्ष का भी काल था।
ममलूक शासकों ने सल्तनत को स्थापित और संगठित किया।
खिलजियों ने उसे दक्षिण तक विस्तृत किया।
तुगलकों ने उसकी सीमाएँ सबसे अधिक बढ़ाईं लेकिन उसी दौर में व्यापक विघटन भी शुरू हुआ।
सैयद काल में दिल्ली की शक्ति अत्यंत सीमित हो गई।
लोदियों ने कुछ हद तक उसे पुनर्जीवित किया, लेकिन अफगान अमीरों के संघर्ष और इब्राहिम लोदी की नीतियों ने राज्य को कमजोर कर दिया।
1526 में पानीपत के मैदान में इब्राहिम लोदी की मृत्यु के साथ दिल्ली सल्तनत का युग समाप्त हुआ और बाबर के नेतृत्व में एक नई सत्ता स्थापित हुई।