ताना भगत आंदोलन (1914 से आगे)
1914 के धार्मिक पुनर्जागरण से भूमि–बेगार प्रतिरोध, गांधीवादी असहयोग और स्वतंत्र भारत की भूमि-वापसी तक
ताना भगत आंदोलन 1914 में जतरा भगत के धार्मिक–सामाजिक पुनर्जागरण से जन्मा, पर शीघ्र ही वह बेगार, लगान, औपनिवेशिक सत्ता और भूमि-बेदखली के विरुद्ध अनुशासित किसान–आदिवासी प्रतिरोध बना। गांधी से संपर्क से पहले ही इसमें मांस–मदिरा त्याग, सामुदायिक शुद्धि, कर-अस्वीकार और अहिंसक असहयोग के तत्व मौजूद थे। 1920 के बाद ताना भगतों ने असहयोग, सविनय अवज्ञा, रामगढ़ कांग्रेस और भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया। यह अध्ययन उनके स्वतंत्र वैचारिक उद्भव, गांधीवादी संगम, 1947 के भूमि-पुनर्स्थापन कानून और स्वतंत्र भारत में जीवित उरांव गांधीवादी समुदाय तक की यात्रा का संतुलित मूल्यांकन करता है।
छोटानागपुर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
उरांव समाज, भूमि व्यवस्था, खूंटकट्टी–भुईंहरी परंपराएं, जमींदार, महाजन और औपनिवेशिक हस्तक्षेप
ताना भगत आंदोलन अचानक 1914 में पैदा हुई कोई धार्मिक हलचल नहीं थी। उसके पीछे छोटानागपुर में भूमि, जंगल और ग्रामीण सत्ता को लेकर लगभग एक शताब्दी से जमा होता असंतोष था। इसे समझे बिना जतरा भगत के संदेश, उरांव किसानों के उसके पीछे खड़े होने और बाद में ताना भगतों के लगान तथा बेगार के विरोध को ठीक से नहीं समझा जा सकता।
1914 तक छोटानागपुर का आदिवासी किसान ऐसी व्यवस्था में पहुंच चुका था जिसमें जमीन पर उसका परंपरागत अधिकार कानूनी कागजों, लगान, जमींदारी दावों, कर्ज और औपनिवेशिक अदालतों से लगातार टकरा रहा था। इसीलिए ताना भगत आंदोलन की कहानी वास्तव में जतरा भगत से बहुत पहले भूमि से शुरू होती है।
छोटानागपुर : भूगोल ही नहीं, एक विशिष्ट सामाजिक संसार
ऐतिहासिक छोटानागपुर पठार आज के झारखंड के बड़े हिस्से के साथ आसपास के कुछ क्षेत्रों तक फैला हुआ था। रांची और लोहरदगा का क्षेत्र ताना भगत आंदोलन के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण था। यहां उरांव, मुंडा और अन्य आदिवासी समुदायों की बड़ी आबादी रहती थी।
इन समुदायों की आर्थिक व्यवस्था में कृषि केंद्रीय थी, लेकिन जंगल, चरागाह, जलस्रोत और सामुदायिक संसाधन उससे अलग नहीं थे। खेत केवल उत्पादन की इकाई नहीं था। भूमि पर अधिकार के साथ गांव में सदस्यता, पूर्वजों की स्मृति, धार्मिक स्थल और सामुदायिक प्रतिष्ठा भी जुड़ी हुई थी।
इसीलिए औपनिवेशिक शासन में भूमि संबंधों में हुआ परिवर्तन केवल आर्थिक परिवर्तन नहीं था। उसने आदिवासी समाज की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना को भी प्रभावित किया।
उरांव समाज को समझने के लिए शरत चंद्र राय की 1915 में प्रकाशित The Oraons of Chota Nagpur आरंभिक नृवंशशास्त्रीय स्रोतों में महत्वपूर्ण है; उसके प्रकाशन के तुरंत बाद भी इसे उरांवों के इतिहास, आर्थिक जीवन और सामाजिक संगठन के विस्तृत अध्ययन के रूप में देखा गया था।
उरांव समाज : गांव, परिवार और सामुदायिक संगठन
उरांव स्वयं को प्रायः कुड़ुख से भी पहचानते हैं। उनकी भाषा कुड़ुख द्रविड़ भाषा-परिवार से संबंधित है। औपनिवेशिक काल तक रांची–लोहरदगा क्षेत्र उरांव आबादी का प्रमुख केंद्र बन चुका था।
परंपरागत उरांव गांव केवल प्रशासनिक बस्ती नहीं था। गांव एक सामाजिक समुदाय था जिसमें भूमि, धार्मिक जीवन और स्थानीय नेतृत्व एक-दूसरे से जुड़े थे।
गांव में धार्मिक नेतृत्व से जुड़ा पाहन, तथा लौकिक/प्रशासनिक भूमिकाओं से जुड़े स्थानीय पद और व्यापक स्तर पर पड़हा व्यवस्था सामुदायिक संगठन के महत्वपूर्ण तत्व थे।
पड़हा कई गांवों को जोड़ने वाली व्यवस्था थी। सामाजिक विवाद, सामुदायिक अनुशासन और सामूहिक प्रश्न स्थानीय संस्थाओं के माध्यम से निपटाए जाते थे।
अर्थात औपनिवेशिक राज्य आने से पहले यहां कोई ‘व्यवस्थाहीन’ समाज नहीं था। उसकी अपनी संस्थाएं थीं।
ब्रिटिश शासन ने जब अदालत, थाना, राजस्व अधिकारी, जमींदार और लिखित भूमि-अभिलेख को निर्णायक बनाया तो सत्ता की एक नई संरचना गांव के ऊपर स्थापित हुई।
भूमि का अर्थ : निजी संपत्ति से कहीं अधिक
औपनिवेशिक कानून की भाषा में जमीन को मापने, वर्गीकृत करने, उसका मालिक निर्धारित करने और उस पर लगान तय करने की आवश्यकता थी।
लेकिन छोटानागपुर के अनेक आदिवासी समुदायों में भूमि-अधिकार का इतिहास इससे अधिक जटिल था।
किस परिवार या वंश ने जंगल काटकर गांव बसाया?
किस परिवार का उस भूमि से पीढ़ियों का संबंध है?
गांव के सामुदायिक संसाधनों पर किसका अधिकार है?
इन प्रश्नों से भूमि-अधिकार निर्धारित होते थे।
इसलिए भूमि का अधिकार केवल आधुनिक अर्थ में व्यक्तिगत ‘मालिकाना हक’ नहीं था। उसमें परिवार, वंश और गांव के ऐतिहासिक दावे सम्मिलित थे।
यहीं से औपनिवेशिक कानून और आदिवासी प्रथा के बीच मूलभूत तनाव पैदा हुआ।
खूंटकट्टी क्या थी?
छोटानागपुर की भूमि व्यवस्था के संदर्भ में खूंटकट्टी अत्यंत महत्वपूर्ण शब्द है।
सरल अर्थ में यह उस अधिकार-परंपरा से संबंधित थी जिसमें किसी गांव या भूमि को सबसे पहले बसाने और जंगल काटकर खेती योग्य बनाने वाले संस्थापक वंशों के अधिकार मान्य होते थे।
‘खूंट’ का संबंध वंश या परिवार से और ‘कट्टी’ का संबंध जंगल काटकर भूमि साफ करने की प्रक्रिया से जोड़ा जाता है।
इस व्यवस्था का सबसे विकसित रूप विशेष रूप से मुंडा क्षेत्रों से संबंधित था।
जिस वंश ने जंगल काटकर गांव बसाया, उस संस्थापक वंश का भूमि पर ऐतिहासिक-सामुदायिक अधिकार था।
यह अधिकार आधुनिक व्यक्तिगत भू-स्वामित्व जैसा नहीं था। गांव और संस्थापक वंश के बीच एक सामुदायिक संबंध मौजूद रहता था।
बाद में जब बाहर से आने वाले जमींदार, ठेकेदार, व्यापारी और महाजन भूमि पर अधिकार स्थापित करने लगे, तब यह पुरानी व्यवस्था कमजोर होने लगी।
यहीं से ‘दिकू’ के प्रश्न का आर्थिक आधार भी बनता है।
भुईंहरी परंपरा
उरांव बहुल क्षेत्रों को समझने में भुईंहरी अधिकार विशेष महत्व रखते हैं।
‘भुईंहर’ का सामान्य आशय उन आरंभिक भूमि-साफ करने वाले या बसाने वाले परिवारों से था जिनके भूमि पर परंपरागत अधिकार स्वीकार किए जाते थे।
खूंटकट्टी और भुईंहरी को पूरी तरह समान मानना उचित नहीं होगा। अलग क्षेत्रों और समुदायों में इनके स्वरूप तथा कानूनी विकास में अंतर था।
लेकिन दोनों के पीछे एक साझा सिद्धांत दिखाई देता है—
भूमि पर अधिकार केवल उस व्यक्ति का नहीं जो राज्य को राजस्व देता है; उस समुदाय और परिवार का भी है जिसने भूमि को बसाया और पीढ़ियों तक उसे कृषि योग्य बनाया।
बाद में औपनिवेशिक सरकार को भी इन विशेष अधिकारों को किसी न किसी रूप में स्वीकार करना पड़ा।
इसका प्रमाण 1908 का छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम है, जिसमें ‘भुईंहरी परिवार’ और ‘भुईंहरी टेन्योर’ को बाकायदा कानूनी श्रेणी के रूप में मान्यता दी गई और उनके हस्तांतरण तथा बिक्री पर विशेष प्रतिबंध लगाए गए।
औपनिवेशिक शासन और भूमि का नया अर्थ
ब्रिटिश शासन के लिए जमीन सबसे पहले राजस्व का स्रोत थी।
ईस्ट इंडिया कंपनी को 1765 में बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी मिलने के बाद पूर्वी भारत में राजस्व वसूली की नई व्यवस्था विकसित हुई। छोटानागपुर में यह प्रक्रिया मैदानों की तुलना में अलग गति और अलग रूप में चली, लेकिन अंततः यहां भी भूमि को राजस्व प्रशासन के भीतर लाने का दबाव बढ़ा।
मालिक और काश्तकार की कानूनी श्रेणियां,
लेकिन इसी प्रक्रिया ने पुराने सामुदायिक संबंधों को नई कानूनी श्रेणियों में बदलना शुरू किया।
आदिवासी कृषक जिसे अपना पैतृक अधिकार समझता था, औपनिवेशिक अभिलेख में वह कभी किरायेदार या रैयत की स्थिति में दिखाई पड़ सकता था।
राजा से जमींदार तक : सत्ता संबंधों का परिवर्तन
छोटानागपुर में स्थानीय राजसत्ता पहले से मौजूद थी। नागवंशी राजाओं का इतिहास ब्रिटिश शासन से बहुत पुराना था।
लेकिन औपनिवेशिक शासन ने स्थानीय राजाओं और जमींदारों को एक नई राजस्व संरचना के भीतर रख दिया।
राज्य की प्राथमिक चिंता यह थी कि निर्धारित राजस्व प्राप्त होता रहे।
इसके नीचे जमींदार, जागीरदार, ठेकेदार और मध्यस्थों की विभिन्न श्रेणियां विकसित हुईं या अधिक शक्तिशाली हुईं।
समस्या तब पैदा हुई जब भूमि से संबंध रखने वाले समुदाय और राजस्व वसूलने वाले मध्यस्थ के अधिकार को एक ही चीज समझ लिया गया।
जिस व्यक्ति या संस्था को राजस्व लेने का अधिकार मिला, वह कई बार स्वयं को जमीन का वास्तविक स्वामी मानने लगा।
इससे किसान के परंपरागत अधिकार कमजोर पड़े।
‘दिकू’ का प्रवेश और उसका वास्तविक अर्थ
छोटानागपुर के आदिवासी आंदोलनों में ‘दिकू’ एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है।
इसे केवल ‘गैर-आदिवासी’ का पर्याय मान लेना ऐतिहासिक रूप से अधूरा होगा।
आंदोलनकारी संदर्भ में दिकू मुख्यतः उस बाहरी शोषक व्यवस्था का प्रतीक बन गया जिसमें शामिल हो सकते थे—
और कभी-कभी औपनिवेशिक प्रशासन से जुड़े कर्मचारी।
इसलिए दिकू-विरोध मूलतः नस्ली या जातीय घृणा भर नहीं था। उसका गहरा आर्थिक और सत्ता-संबंधी आधार था।
समस्या ‘बाहर से आए व्यक्ति’ से अधिक उस नए संबंध की थी जिसमें किसान अपनी ही जमीन पर कमजोर पक्ष बनता जा रहा था।
महाजन और कर्ज का जाल
राजस्व अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ नकद की आवश्यकता बढ़ी।
आदिवासी कृषि काफी हद तक स्थानीय उपभोग और ग्रामीण विनिमय से जुड़ी थी। लेकिन लगान और अन्य देनदारियों के लिए नकद चाहिए था।
फसल खराब होने, बीमारी, विवाह, सामाजिक अनुष्ठान या लगान भुगतान के लिए किसान महाजन से कर्ज लेता।
किसान और महाजन के बीच विवाद अब केवल गांव की सामुदायिक व्यवस्था से तय नहीं होता था। लिखित दस्तावेज और औपनिवेशिक अदालतें निर्णायक बन सकती थीं।
अशिक्षित या कानूनी प्रक्रियाओं से अपरिचित किसान इस व्यवस्था में कमजोर स्थिति में था।
औपनिवेशिक भारत में रैयती भूमि के हस्तांतरण और जमींदार–काश्तकार संबंधों को नियंत्रित करने वाले कानून लगातार विकसित हुए; छोटानागपुर के लिए अंततः अलग कानूनी व्यवस्था बनाने की आवश्यकता स्वयं इस क्षेत्र की विशिष्ट भूमि समस्या का प्रमाण है।
बेगार : आर्थिक शोषण का दूसरा चेहरा
भूमि और लगान के साथ बेगार आदिवासी असंतोष का एक बड़ा कारण था।
किसानों से बिना उचित पारिश्रमिक श्रम लिया जा सकता था। जमींदारों या अधिकारियों के लिए सामान ढोना, घरेलू अथवा कृषि कार्य करना, परिवहन उपलब्ध कराना या अन्य सेवाएं देना ग्रामीण जीवन पर अतिरिक्त बोझ था।
किसान के लिए समस्या केवल यह नहीं थी कि उससे पैसा लिया जा रहा था।
उसका श्रम भी नियंत्रित किया जा रहा था।
इसीलिए बाद में ताना भगत आंदोलन में लगान-विरोध और बेगार-विरोध साथ दिखाई देते हैं।
अदालत और पुलिस : नया सत्ता-संसार
परंपरागत आदिवासी व्यवस्था में विवादों के निपटारे की अपनी संस्थाएं थीं।
औपनिवेशिक शासन ने इनके ऊपर एक नया तंत्र खड़ा किया—
किसान के लिए यह केवल प्रशासनिक आधुनिकीकरण नहीं था।
यह सत्ता की भाषा बदलने की प्रक्रिया थी।
अब जमीन पर आपका दावा इसलिए पर्याप्त नहीं था कि आपके पूर्वज पीढ़ियों से उस खेत को जोतते आए हैं। उसे सरकारी अभिलेख में प्रमाणित करना भी आवश्यक हो सकता था।
इस परिवर्तन ने सामाजिक असुरक्षा बढ़ाई।
उरांवों के बीच उन्नीसवीं सदी के पहले आधे में ही कृषि असंतोष के प्रमाण मिलते हैं; इस विषय पर इतिहासलेखन ने विशेष रूप से भूमि संबंधों और औपनिवेशिक हस्तक्षेप को उरांव प्रतिरोध की पृष्ठभूमि में रखा है।
जंगल पर नियंत्रण
आदिवासी अर्थव्यवस्था में जंगल खेत का विरोधी नहीं था।
औपनिवेशिक शासन में वन संसाधनों पर राज्य का नियंत्रण बढ़ने से समुदायों की परंपरागत पहुंच सीमित होने लगी।
इससे आर्थिक जीवन पर अतिरिक्त दबाव पड़ा।
भूमि और जंगल को अलग-अलग प्रशासनिक श्रेणियों में बांटना औपनिवेशिक शासन के लिए सुविधाजनक था, लेकिन आदिवासी जीवन में दोनों परस्पर जुड़े थे।
इसलिए भूमि-अधिकार का संघर्ष कई बार जंगल के अधिकार का संघर्ष भी था।
उन्नीसवीं सदी : विद्रोहों की भूमि
ताना भगत आंदोलन से पहले छोटानागपुर लंबे प्रतिरोधों का क्षेत्र रह चुका था।
कोल विद्रोह, 1831–32, इस इतिहास का बड़ा पड़ाव था।
इसके पीछे भूमि-अधिकार, बाहरी मध्यस्थों की बढ़ती भूमिका और प्रशासनिक हस्तक्षेप जैसे कारण थे।
उन्नीसवीं सदी में सरदारी संघर्ष विकसित हुआ। मुंडा कृषक अपने पारंपरिक भूमि-अधिकार की पुनर्स्थापना चाहते थे।
और इसी दीर्घ संकट की सबसे प्रसिद्ध अभिव्यक्ति बनी—
बिरसा मुंडा का उलगुलान, 1899–1900।
इसलिए ताना भगत आंदोलन को बिरसा आंदोलन से पूरी तरह अलग इतिहास मानना गलत होगा।
लेकिन उनकी जमीन में एक साझा प्रश्न था—
आदिवासी किसान और उसकी भूमि के बीच कौन खड़ा होगा?
औपनिवेशिक छोटानागपुर और संथाल परगना के आदिवासी किसान संघर्षों पर आधुनिक इतिहासलेखन भी भूमि-अधिकार और पहचान के इस अंतर्संबंध को रेखांकित करता है।
बिरसा के उलगुलान के बाद भी प्रश्न समाप्त क्यों नहीं हुआ?
1899–1900 का उलगुलान दबा दिया गया। बिरसा मुंडा की 1900 में जेल में मृत्यु हो गई।
लेकिन औपनिवेशिक सरकार के लिए यह स्पष्ट हो चुका था कि छोटानागपुर की भूमि समस्या को केवल पुलिस बल से नियंत्रित करना संभव नहीं है।
इसके बाद सर्वेक्षण, अधिकारों के अभिलेखीकरण और भूमि संबंधों को कानूनी रूप से व्यवस्थित करने की प्रक्रिया तेज हुई।
छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908
India Code के आधिकारिक अभिलेख के अनुसार Chota Nagpur Tenancy Act, 1908 (Act VI of 1908) 11 नवंबर 1908 को अधिनियमित हुआ।
इस कानून ने छोटानागपुर के विशेष भूमि संबंधों को कानूनी मान्यता देने और आदिवासी/रैयती भूमि के हस्तांतरण को नियंत्रित करने का महत्वपूर्ण ढांचा बनाया।
भुईंहरी अधिकारों को भी इसमें विशेष संरक्षण मिला। उदाहरणतः भुईंहरी परिवार के अधिकारों की न्यायालयी बिक्री पर प्रतिबंध जैसी व्यवस्थाएं कानून में दिखाई देती हैं।
यह औपनिवेशिक शासन द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से इस बात की स्वीकृति भी थी कि सामान्य बंगाली जमींदारी कानून छोटानागपुर की ऐतिहासिक भूमि संरचना के लिए पर्याप्त नहीं था।
फिर 1914 में विद्रोह क्यों?
यदि 1908 का कानून आदिवासी भूमि की रक्षा के लिए आ चुका था, तो केवल छह वर्ष बाद ताना भगत आंदोलन क्यों शुरू हुआ?
कानून बनने और ग्रामीण सत्ता-संबंध बदलने में बहुत अंतर था।
कानूनी संरक्षण के बावजूद किसान की रोजमर्रा की समस्याएं समाप्त नहीं हुई थीं।
और सबसे महत्वपूर्ण—आदिवासी किसान के मन में यह भावना बनी हुई थी कि उसके जीवन पर नियंत्रण किसी और का है।
इसलिए 1908 को संघर्ष का अंत नहीं, बल्कि औपनिवेशिक राज्य द्वारा संकट को नियंत्रित करने की एक महत्वपूर्ण कोशिश के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
आर्थिक संकट से नैतिक संकट तक
यहीं ताना भगत आंदोलन की विशिष्टता सामने आती है।
जतरा भगत ने समस्या को केवल आर्थिक भाषा में व्यक्त नहीं किया।
उन्होंने यह नहीं कहा कि सिर्फ लगान कम कर दो।
इस प्रकार आर्थिक शोषण का उत्तर नैतिक पुनर्निर्माण में खोजा गया।
यही वह बिंदु है जहां ताना भगत आंदोलन अपने पूर्ववर्ती कई आदिवासी विद्रोहों से अलग दिखाई पड़ता है।
उलगुलान से ताना भगत तक : निरंतरता और अंतर
बिरसा मुंडा और जतरा भगत के बीच सीधी समानता स्थापित करना भी उचित नहीं होगा।
बिरसा आंदोलन की अपनी धार्मिक-राजनीतिक संरचना और ऐतिहासिक परिस्थितियां थीं। ताना भगत आंदोलन उरांव समाज के भीतर विकसित हुआ और उसकी धार्मिक भाषा अलग थी।
फिर भी एक ऐतिहासिक निरंतरता स्पष्ट है।
बिरसा ने पूछा था—भूमि और राज किसका है?
ताना भगतों ने उसी संकट का एक अलग उत्तर दिया—
यदि अन्यायी सत्ता हमारे जीवन को नियंत्रित करती है, तो हम उसके आदेशों, करों और श्रम की मांगों को नैतिक वैधता क्यों दें?
प्रतिरोध की भाषा धीरे-धीरे हथियार से हटकर अनुशासित असहयोग की ओर बढ़ रही थी।
और यह प्रक्रिया गांधी के साथ ताना भगतों के व्यापक संपर्क से पहले शुरू हो चुकी थी।
1914 की दहलीज पर छोटानागपुर
1914 में जब प्रथम विश्वयुद्ध शुरू हुआ, उसी वर्ष उरांव क्षेत्र में जतरा भगत का आंदोलन उभरने लगा।
उस समय छोटानागपुर के ग्रामीण समाज की ऐतिहासिक स्मृति में कई परतें मौजूद थीं—
इसलिए 1914 में जतरा भगत का संदेश किसी खाली सामाजिक धरातल पर नहीं गिरा।
ताना भगत आंदोलन ने इस पुराने भूमि-संघर्ष में एक नया तत्व जोड़ा—
समेकित निष्कर्ष : जमीन से शुरू होती है ताना भगत की कहानी
ताना भगत आंदोलन की शुरुआत को केवल किसी धार्मिक अनुभव अथवा नए पंथ के जन्म से समझना भ्रामक होगा।
उसकी जड़ें छोटानागपुर की भूमि व्यवस्था में थीं।
परंपरागत आदिवासी समाज में भूमि परिवार, वंश और समुदाय के ऐतिहासिक अधिकार से जुड़ी थी। औपनिवेशिक शासन ने इसे राजस्व, कानूनी स्वामित्व, जमींदार–रैयत संबंध और लिखित अभिलेखों की नई व्यवस्था में बांधा। जमींदार, ठेकेदार और महाजन की शक्ति, नकद लगान, कर्ज, बेगार तथा अदालत–पुलिस की नई संरचना ने आदिवासी किसान के जीवन में गहरा हस्तक्षेप किया।
खूंटकट्टी और भुईंहरी जैसी व्यवस्थाएं केवल भूमि-प्रशासन की तकनीकी श्रेणियां नहीं थीं। वे उस ऐतिहासिक दावे की अभिव्यक्ति थीं कि—
जिस समुदाय ने जंगल साफ किया, गांव बसाया और भूमि को पीढ़ियों तक जीवित रखा, उसका उस भूमि पर विशेष अधिकार है।
1831–32 के कोल विद्रोह से सरदारी संघर्ष और 1899–1900 के बिरसा उलगुलान तक यही प्रश्न अलग-अलग रूपों में सामने आता रहा।
1908 का छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम इस दीर्घ संघर्ष की एक महत्वपूर्ण कानूनी परिणति था, पर उसने ग्रामीण जीवन के सारे अंतर्विरोध समाप्त नहीं किए।
इसलिए 1914 का ताना भगत आंदोलन इतिहास में अचानक आया मोड़ नहीं था।
वह छोटानागपुर के लगभग एक शताब्दी लंबे भूमि, श्रम और स्वायत्तता के संघर्ष की अगली अवस्था था।
अंतर यह था कि अब प्रतिरोध एक नई भाषा बोलने वाला था—
हथियार के स्थान पर संयम, प्रतिशोध के स्थान पर अहिंसा, व्यक्तिगत विद्रोह के स्थान पर सामूहिक अनुशासन, और शोषक व्यवस्था के सामने आज्ञाकारिता के स्थान पर असहयोग।
यहीं से जतरा भगत की ऐतिहासिक भूमिका शुरू होती है।
बिरसा उलगुलान के बाद छोटानागपुर, 1900–1914
CNT Act 1908, भूमि-सुधार की सीमाएं, जमींदारी–बेगार, मिशनरी प्रभाव और उरांव समाज में नए असंतोष का निर्माण
1899–1900 के बिरसा उलगुलान और 1914 में ताना भगत आंदोलन के उदय के बीच लगभग चौदह वर्षों का अंतर है। पहली नजर में यह छोटा-सा संक्रमणकाल दिखाई देता है, लेकिन ताना भगत आंदोलन को समझने के लिए यही अवधि सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में से एक है। इसी दौरान औपनिवेशिक सरकार ने छोटानागपुर की भूमि समस्या को कानून और बंदोबस्त के जरिए नियंत्रित करने का प्रयास किया; 1908 का छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम अस्तित्व में आया; भूमि-अधिकारों को अभिलेखबद्ध किया गया; मिशनरी गतिविधियों और शिक्षा का विस्तार हुआ; और साथ ही उरांव किसानों के बीच लगान, बेगार, कर्ज तथा बाहरी नियंत्रण को लेकर असंतोष बना रहा।
इस अवधि का सबसे बड़ा विरोधाभास यही था—
औपनिवेशिक राज्य ने भूमि-सुरक्षा के उपाय किए, लेकिन ग्रामीण सत्ता-संबंधों की मूल असमानता समाप्त नहीं हुई।
इसी विरोधाभास के भीतर 1914 का ताना भगत आंदोलन पैदा हुआ।
1900 : उलगुलान दब गया, प्रश्न जीवित रहे
बिरसा मुंडा के नेतृत्व में उलगुलान का निर्णायक चरण 1899 के अंत और 1900 के आरंभ में सामने आया। औपनिवेशिक सरकार ने सैन्य और पुलिस कार्रवाई के माध्यम से उसे दबा दिया। बिरसा गिरफ्तार हुए और 9 जून 1900 को रांची जेल में उनकी मृत्यु हो गई।
राज्य के लिए विद्रोह समाप्त हो गया था।
लेकिन जिन परिस्थितियों ने उसे जन्म दिया था, वे समाप्त नहीं हुई थीं।
भूमि पर परंपरागत अधिकार का प्रश्न था।
और सबसे बढ़कर यह प्रश्न था कि छोटानागपुर के आदिवासी किसान और उसकी जमीन के बीच कानूनी तथा राजनीतिक संबंध आखिर किस आधार पर निर्धारित होंगे।
उलगुलान ने औपनिवेशिक प्रशासन को यह स्पष्ट संकेत दिया कि छोटानागपुर को सामान्य बंगाल की भूमि व्यवस्था के ढांचे में रखकर स्थायी शांति स्थापित करना कठिन होगा।
दमन के साथ सुधार : औपनिवेशिक शासन की दोहरी रणनीति
आदिवासी विद्रोहों के प्रति ब्रिटिश शासन की नीति में बार-बार एक विशेष पैटर्न दिखाई देता है।
और अंततः इतना सुधार कि अगला विद्रोह रोका जा सके।
औपनिवेशिक अधिकारियों ने धीरे-धीरे स्वीकार किया कि भूमि संबंधों की अस्पष्टता, परंपरागत अधिकारों का क्षरण और जमींदार–रैयत विवाद अशांति के महत्वपूर्ण कारण हैं।
इसलिए प्रशासन ने भूमि का सर्वेक्षण और बंदोबस्त, अधिकारों का अभिलेखीकरण तथा अलग काश्तकारी कानून तैयार करने की दिशा में काम तेज किया।
यह किसान क्रांति की स्वीकृति नहीं थी।
यह औपनिवेशिक शासन को अधिक स्थिर बनाने का प्रयास था।
लेकिन इसके बावजूद इन सुधारों ने आदिवासी भूमि-अधिकारों को कानूनी संरक्षण देने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सर्वेक्षण और बंदोबस्त : किसकी जमीन, किसका अधिकार?
छोटानागपुर में भूमि विवाद का एक बड़ा कारण यह था कि परंपरागत अधिकारों और औपनिवेशिक कानूनी श्रेणियों में अंतर था।
किसी परिवार के लिए उसका दावा सरल हो सकता था—
“हमारे पूर्वजों ने यह जमीन बसाई है।”
इसीलिए सर्वेक्षण और अधिकार-अभिलेख तैयार करना महत्वपूर्ण बना।
औपनिवेशिक प्रशासन ने खेतों को मापा, भूमि की श्रेणियां निर्धारित कीं, किरायेदारी संबंधों का रिकॉर्ड बनाया और विभिन्न प्रकार के परंपरागत अधिकारों को कानूनी परिभाषाओं में बांधने की कोशिश की।
इस प्रक्रिया का लाभ भी था और सीमा भी।
लाभ यह कि किसान के कुछ परंपरागत अधिकार पहली बार सरकारी रिकॉर्ड में सुरक्षित हो सकते थे।
सीमा यह कि अत्यंत जटिल सामुदायिक भूमि संबंधों को लिखित कानूनी श्रेणियों में बदलना हमेशा संभव नहीं था।
छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908
इस पूरी प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम था—
Chota Nagpur Tenancy Act, 1908 — छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908।
यह अधिनियम छोटानागपुर के भूमि इतिहास में एक निर्णायक पड़ाव था।
इसने सामान्य जमींदार–रैयत संबंधों के साथ-साथ क्षेत्र की विशिष्ट परंपरागत भूमि श्रेणियों को कानूनी पहचान देने का प्रयास किया।
कानून में रैयतों की विभिन्न श्रेणियां, खूंटकट्टी अधिकार, भुईंहरी अधिकार, भूमि हस्तांतरण और लगान संबंधी प्रावधान शामिल किए गए।
इसका महत्व केवल इस बात में नहीं था कि एक नया कानून बना।
महत्वपूर्ण यह था कि औपनिवेशिक सरकार को स्वीकार करना पड़ा कि—
छोटानागपुर की भूमि व्यवस्था की अपनी ऐतिहासिक विशिष्टता है।
मुंडारी खूंटकट्टी अधिकारों की कानूनी मान्यता
CNT Act की महत्वपूर्ण विशेषताओं में मुंडारी खूंटकट्टीदारों के अधिकारों की पहचान थी।
इसका मूल आधार वही ऐतिहासिक सिद्धांत था कि जिन वंशों ने जंगल साफ करके गांव और कृषि भूमि विकसित की, उनके विशेष अधिकार हैं।
औपनिवेशिक कानून ने पहली बार इन अधिकारों को अधिक व्यवस्थित कानूनी भाषा में बांधने का प्रयास किया।
यह बिरसा आंदोलन सहित लंबे सरदारी संघर्ष की अप्रत्यक्ष उपलब्धि भी माना जा सकता है।
CNT Act को सीधे केवल बिरसा मुंडा के आंदोलन का परिणाम कहना इतिहास को अत्यधिक सरल बना देगा। इसके पीछे दशकों से चल रही प्रशासनिक जांच, भूमि-बंदोबस्त, सरदारी संघर्ष और अनेक आदिवासी प्रतिरोधों का संयुक्त दबाव था।
उलगुलान ने इस समस्या की राजनीतिक गंभीरता को अवश्य अत्यंत तीव्र रूप से सामने रखा।
भुईंहरी अधिकार और उरांव किसान
ताना भगत आंदोलन उरांव समाज में पैदा हुआ। इसलिए केवल खूंटकट्टी पर ध्यान केंद्रित करना पर्याप्त नहीं है।
उरांव क्षेत्रों में भुईंहरी अधिकार विशेष महत्व रखते थे।
भुईंहरी का संबंध उन परिवारों से था जिनका दावा भूमि को सबसे पहले साफ करने, बसाने और खेती योग्य बनाने की ऐतिहासिक प्रक्रिया से जुड़ा था।
CNT Act ने ऐसी विशिष्ट भूमि श्रेणियों को कानूनी संरक्षण दिया।
इसका अर्थ था कि अब भूमि केवल बाजार में स्वतंत्र रूप से खरीदी-बेची जाने वाली संपत्ति नहीं मानी जा सकती थी।
विशेषकर आदिवासी रैयतों की भूमि के हस्तांतरण पर प्रतिबंधों ने बाहरी लोगों द्वारा जमीन हासिल करने की प्रक्रिया पर नियंत्रण लगाने का प्रयास किया।
फिर भी जमीन बचाने का कानून और किसान को वास्तविक आर्थिक सुरक्षा देना एक ही बात नहीं थी।
कानून की सबसे बड़ी उपलब्धि : भूमि हस्तांतरण पर नियंत्रण
आदिवासी किसान की सबसे बड़ी आशंकाओं में से एक थी—
या दूसरे कानूनी उपायों के जरिए जमीन बाहरी हाथों में जा सकती थी।
CNT Act ने भूमि हस्तांतरण पर महत्वपूर्ण प्रतिबंध लगाए।
इससे छोटानागपुर में आदिवासी भूमि की रक्षा के लिए एक कानूनी दीवार खड़ी हुई।
दीर्घकाल में यह इतना महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ कि CNT Act झारखंड की भूमि राजनीति में बीसवीं और इक्कीसवीं सदी तक केंद्रीय संदर्भ बना रहा।
लेकिन 1908 के किसान के लिए प्रश्न था—
क्या कानून बनने के बाद उसके दैनिक जीवन में शोषण समाप्त हो गया?
CNT Act की पहली सीमा : जमीन बची, आर्थिक निर्भरता नहीं गई
मान लीजिए किसी किसान की भूमि कानून के कारण बाहरी व्यक्ति को आसानी से हस्तांतरित नहीं की जा सकती।
लेकिन किसान को हर वर्ष लगान देना है।
ऐसी स्थिति में कानूनी भूमि-सुरक्षा उसे पूर्ण आर्थिक स्वतंत्रता नहीं देती।
इसलिए भूमि के कानूनी संरक्षण के बावजूद किसान की आर्थिक निर्भरता समाप्त नहीं हुई।
दूसरी सीमा : कानून और गांव की वास्तविकता के बीच दूरी
कानून कागज पर जितना स्पष्ट दिखाई देता है, उसका ग्रामीण क्रियान्वयन उतना सरल नहीं होता।
किसान को अपने अधिकार की जानकारी होनी चाहिए।
विवाद होने पर उसे प्रशासन या अदालत तक पहुंचना चाहिए।
और स्थानीय सत्ता-संबंधों का सामना करना चाहिए।
अशिक्षा और गरीबी से ग्रस्त ग्रामीण समाज में यह आसान नहीं था।
इसलिए भूमि कानून मौजूद होने के बावजूद—
कानून ने संरचना बदली, लेकिन सत्ता का अनुभव तुरंत नहीं बदला।
जमींदार की शक्ति समाप्त नहीं हुई
CNT Act ने जमींदारी व्यवस्था समाप्त नहीं की थी।
इसलिए आदिवासी किसान के जीवन में जमींदार अब भी महत्वपूर्ण सत्ता था।
भूमि का अंतिम हस्तांतरण कठिन हो गया हो सकता था, लेकिन किसान और जमींदार के बीच रोजमर्रा के आर्थिक संबंध बने रहे।
यही कारण है कि बाद में ताना भगत आंदोलन में भूमि हस्तांतरण की तुलना में लगान न देने का प्रश्न अधिक प्रत्यक्ष राजनीतिक रूप ग्रहण करता है।
यदि जमीन हमारे पूर्वजों की है तो हम उस पर लगान क्यों दें?
यह कानूनी से अधिक नैतिक और राजनीतिक प्रश्न था।
बेगार : कानून से बाहर जीवित सामंती संबंध
जमींदारी सत्ता का एक अत्यंत अपमानजनक रूप था—
बेगार।
किसानों से बिना पर्याप्त भुगतान श्रम या सेवा लेने की विभिन्न प्रथाएं ग्रामीण जीवन में मौजूद थीं।
कहीं दूसरे प्रकार की अनिवार्य सेवाएं।
बेगार किसान को लगातार याद दिलाती थी कि वह स्वतंत्र व्यक्ति नहीं है।
उसके समय और श्रम पर भी किसी दूसरे का दावा है।
यही कारण है कि ताना भगत आंदोलन में बेगार-विरोध अत्यंत महत्वपूर्ण बना।
बेगार से इनकार वास्तव में अधीनता से इनकार था।
लगान और अतिरिक्त देनदारियां
ग्रामीण किसान की शिकायत केवल निर्धारित लगान तक सीमित नहीं रहती थी।
विभिन्न स्थानीय देनदारियां और प्रथागत मांगें किसान पर अतिरिक्त बोझ डाल सकती थीं।
ऐसी परिस्थितियों में किसान के लिए राज्य, जमींदार और स्थानीय मध्यस्थ अलग-अलग सत्ता नहीं लगते थे।
वे मिलकर उस व्यवस्था का हिस्सा दिखाई देते थे जो उसकी उपज से हिस्सा लेती थी और उसके श्रम पर दावा करती थी।
इसीलिए ताना भगत आंदोलन के आर्थिक प्रतिरोध को केवल ‘कर-विरोध’ कहना पर्याप्त नहीं है।
वह ग्रामीण सत्ता के पूरे ढांचे को चुनौती देने लगा था।
महाजन अभी भी क्यों आवश्यक था?
CNT Act भूमि हस्तांतरण नियंत्रित कर सकता था।
लेकिन वह ग्रामीण ऋण की आवश्यकता समाप्त नहीं कर सकता था।
संस्थागत बैंकिंग ग्रामीण आदिवासी किसान की पहुंच से बहुत दूर थी।
और जहां महाजन है, वहां कर्ज और निर्भरता का प्रश्न भी बना रहा।
भूमि हस्तांतरण पर कानूनी प्रतिबंधों के कारण शोषण के पुराने तरीके कुछ हद तक बदल सकते थे, लेकिन किसान की नकदी आवश्यकता ने आर्थिक असुरक्षा कायम रखी।
मिशनरियों का बढ़ता प्रभाव
उन्नीसवीं सदी से छोटानागपुर में ईसाई मिशनरी गतिविधियां बढ़ रही थीं।
जर्मन गोस्नर मिशन, रोमन कैथोलिक मिशन तथा अन्य ईसाई संस्थाओं ने क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपस्थिति बनाई।
उनकी भूमिका को केवल धर्मांतरण तक सीमित करके देखना अधूरा होगा।
कुछ मामलों में आदिवासी किसानों को कानूनी सहायता और संगठनात्मक सहारा दिया,
और बाहरी दुनिया से संपर्क के नए रास्ते बनाए।
इसका छोटानागपुर के सामाजिक जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा।
मिशनरी प्रभाव : संरक्षण भी, सांस्कृतिक तनाव भी
एक ओर कई आदिवासी किसानों को मिशन संस्थाओं में शिक्षा, सामाजिक संरक्षण और जमींदारी शोषण के विरुद्ध सहायता मिली।
दूसरी ओर धर्मांतरण ने परंपरागत धार्मिक-सामुदायिक व्यवस्था में नए विभाजन भी उत्पन्न किए।
एक ही गांव में अब अलग धार्मिक पहचान वाले समूह हो सकते थे।
पुराने अनुष्ठानों, पाहन की भूमिका, देवी-देवताओं, बलि, मद्यपान और सामुदायिक उत्सवों को लेकर नए प्रश्न उठे।
हम कौन हैं और हमारा सही जीवन-पथ क्या है?
ताना भगत आंदोलन इसी सांस्कृतिक प्रश्न का भी एक उत्तर बनने वाला था।
‘भगत’ परंपरा और आंतरिक सामाजिक सुधार
उरांव समाज के भीतर सुधार की आकांक्षा केवल ईसाई मिशनरियों से उत्पन्न नहीं हुई थी।
‘भगत’ प्रकार की धार्मिक-सुधार धाराएं भी विकसित हो रही थीं।
इनमें व्यक्तिगत शुद्धता, संयम, धार्मिक अनुशासन और कुछ परंपरागत प्रथाओं से दूरी महत्वपूर्ण हो सकती थी।
यहीं से ताना भगत आंदोलन की सामाजिक भूमि तैयार होती दिखाई देती है।
जतरा भगत का संदेश इसलिए प्रभावी हुआ क्योंकि उसने बाहर से थोपा गया सुधार प्रस्तुत नहीं किया।
हम स्वयं अपने जीवन को शुद्ध करेंगे।
यह स्व-सुधार धीरे-धीरे स्वाधीनता की भाषा बन गया।
शराब का प्रश्न : केवल धार्मिक निषेध नहीं
ताना भगत आंदोलन में बाद में शराब छोड़ना प्रमुख सामाजिक नियम बना।
इसे केवल धार्मिक शुद्धता के रूप में नहीं देखना चाहिए।
मद्यपान ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सामाजिक जीवन और राज्य के आबकारी हितों से भी जुड़ा था।
शराब छोड़ना इसलिए कई अर्थों में महत्वपूर्ण था—
और अंततः औपनिवेशिक राजस्व व्यवस्था से दूरी।
बाद में गांधीवादी शराबबंदी और ताना भगत अनुशासन के बीच स्वाभाविक समानता दिखाई देगी।
लेकिन महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ताना भगतों का अपना सुधारवादी अनुशासन गांधी के व्यापक प्रभाव से पहले आकार लेने लगा था।
परंपरा के भीतर विद्रोह
ताना भगत आंदोलन को ‘परंपरागत आदिवासी धर्म बनाम ईसाई मिशनरी धर्म’ की साधारण लड़ाई के रूप में नहीं समझा जा सकता।
क्योंकि ताना भगत स्वयं उरांव समाज की कुछ परंपरागत प्रथाओं को चुनौती दे रहे थे।
वे धार्मिक जीवन का पुनर्गठन चाहते थे।
इन सबने एक नए सामुदायिक आदर्श का निर्माण किया।
इसलिए यह आंदोलन एक साथ तीन दिशाओं में प्रतिक्रिया कर रहा था—
औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध, जमींदारी शोषण के विरुद्ध, और अपने समाज की उन प्रथाओं के विरुद्ध जिन्हें वह सुधारना चाहता था।
उरांव समाज में असंतोष का नया स्वरूप
1900 के बाद उरांव समाज के सामने केवल जमीन खोने का भय नहीं था।
कौन हमारा धार्मिक जीवन नियंत्रित करेगा?
हमारी सामाजिक बुराइयों को कौन सुधारेगा?
और क्या हमारी मुक्ति किसी बाहरी शक्ति से आएगी या हमारे अपने सामुदायिक पुनर्गठन से?
इन प्रश्नों ने ताना भगत आंदोलन के लिए वैचारिक भूमि तैयार की।
1914 और प्रथम विश्वयुद्ध
1914 केवल ताना भगत आंदोलन के आरंभ का वर्ष नहीं था।
उसी वर्ष यूरोप में प्रथम विश्वयुद्ध शुरू हुआ।
ब्रिटिश भारतीय राज्य पर युद्धकालीन वित्तीय और प्रशासनिक दबाव बढ़ने लगा। आने वाले वर्षों में कीमतें, कर-संबंधी दबाव, भर्ती और युद्धकालीन आर्थिक परिवर्तन भारतीय ग्रामीण समाज को प्रभावित करने वाले थे।
ताना भगत आंदोलन की मूल उत्पत्ति को प्रथम विश्वयुद्ध का परिणाम नहीं कहा जा सकता।
उसकी जड़ें उससे पहले तैयार हो चुकी थीं।
युद्ध ने बाद के चरण में असंतोष के वातावरण को प्रभावित किया, लेकिन आंदोलन का आरंभिक स्रोत छोटानागपुर के अपने सामाजिक, धार्मिक और कृषक अंतर्विरोधों में था।
बिरसा की स्मृति और जतरा का अलग रास्ता
बिरसा मुंडा की मृत्यु के केवल चौदह वर्ष बाद जतरा भगत का उदय हुआ।
भौगोलिक निकटता और ऐतिहासिक समयांतराल के कारण दोनों आंदोलनों की तुलना स्वाभाविक है।
दोनों में आदिवासी समाज का नैतिक पुनर्गठन था।
दोनों का संबंध भूमि और स्वायत्तता से था।
बिरसा आंदोलन के अंतिम चरण में सशस्त्र टकराव हुआ।
ताना भगत आंदोलन ने धीरे-धीरे हिंसा के निषेध और अनुशासित असहयोग की दिशा पकड़ी।
यही अंतर आगे चलकर निर्णायक सिद्ध हुआ।
गांधी से पहले गांधी जैसा क्या था?
ताना भगत इतिहास का सबसे आकर्षक प्रश्न यहीं पैदा होता है।
1914 में गांधी अभी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे भी नहीं थे; वे जनवरी 1915 में भारत आए।
फिर भी उरांव क्षेत्र में उभरते आंदोलन में ऐसी प्रवृत्तियां दिखाई देने लगीं जिन्हें बाद में गांधीवाद से जोड़ा जाएगा—
अन्यायपूर्ण सत्ता के आदेश से इनकार,
इसका अर्थ यह नहीं कि गांधीवाद ताना भगत आंदोलन से निकला।
और न यह कि ताना भगत आंदोलन पहले से पूर्ण गांधीवादी था।
सही ऐतिहासिक निष्कर्ष अधिक रोचक है—
दो अलग परंपराओं ने कुछ समान राजनीतिक और नैतिक औजार विकसित किए।
इसीलिए जब बाद में ताना भगतों का गांधी और कांग्रेस से संपर्क हुआ, गांधीवाद उन्हें पूरी तरह बाहरी विचारधारा नहीं लगा।
उसकी कई बातें उनके अपने अनुशासन से मेल खाती थीं।
1900–1914 : चौदह वर्षों का वास्तविक अर्थ
इस पूरे संक्रमणकाल को पांच समानांतर प्रक्रियाओं में समझा जा सकता है।
पहली—कानूनी सुधार। औपनिवेशिक राज्य ने सर्वेक्षण, बंदोबस्त और CNT Act के जरिए भूमि समस्या को नियंत्रित करने की कोशिश की।
दूसरी—आर्थिक निरंतरता। लगान, कर्ज, महाजन और ग्रामीण गरीबी समाप्त नहीं हुए।
तीसरी—सामंती अवशेष। जमींदारी सत्ता और बेगार जैसी प्रथाएं किसान की स्वतंत्रता को सीमित करती रहीं।
चौथी—धार्मिक परिवर्तन। ईसाई मिशन, शिक्षा और नए धार्मिक प्रभावों ने उरांव समाज में पहचान और परंपरा की बहस तेज की।
पांचवीं—आंतरिक सुधार। उरांव समाज के भीतर ही शुद्धता, संयम और नए धार्मिक अनुशासन की खोज विकसित हुई।
इन पांचों धाराओं का संगम 1914 में दिखाई पड़ता है।
CNT Act से ताना भगत तक : सबसे महत्वपूर्ण विरोधाभास
इस काल का केंद्रीय विरोधाभास एक वाक्य में समझा जा सकता है—
राज्य ने आदिवासी की जमीन को कुछ कानूनी सुरक्षा दी, लेकिन आदिवासी किसान को सत्ता से स्वतंत्र नहीं किया।
भूमि हस्तांतरण नियंत्रित था, लेकिन लगान समाप्त नहीं हुआ।
रैयती अधिकार मान्य हुए, लेकिन जमींदार मौजूद था।
परंपरागत अधिकार दर्ज हुए, लेकिन अदालत और प्रशासन बाहरी सत्ता ही रहे।
भूमि बच सकती थी, लेकिन बेगार जारी रह सकती थी।
कानून था, लेकिन महाजन की जरूरत भी थी।
किसान के जीवन का निर्णय अभी भी पूरी तरह उसके अपने समुदाय के हाथ में नहीं था।
ताना भगत आंदोलन इसी अधूरी मुक्ति की प्रतिक्रिया था।
समेकित निष्कर्ष : कानून के बाद भी आंदोलन क्यों हुआ?
1900 में बिरसा उलगुलान का दमन और 1908 में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम का निर्माण देखकर ऐसा लग सकता है कि 1914 तक छोटानागपुर की सबसे बड़ी समस्या हल हो चुकी थी।
CNT Act ने भूमि-सुरक्षा की दिशा में ऐतिहासिक काम किया। उसने छोटानागपुर की विशिष्ट काश्तकारी व्यवस्था को स्वीकार किया, आदिवासी और परंपरागत रैयती अधिकारों को कानूनी संरक्षण दिया तथा भूमि हस्तांतरण को नियंत्रित किया। इस अर्थ में वह उन्नीसवीं सदी के लंबे भूमि संघर्षों की महत्वपूर्ण उपलब्धि था।
लेकिन कानून ने सत्ता-संबंधों का पूर्ण लोकतंत्रीकरण नहीं किया।
बेगार और दूसरी प्रथागत सेवाओं का प्रश्न बना रहा।
औपनिवेशिक थाना, कचहरी और राजस्व प्रशासन बना रहा।
इसलिए 1914 तक असंतोष का चरित्र बदल चुका था।
“हम अपना जीवन किसके नियमों से जिएंगे?”
उरांव समाज और धार्मिक–सामाजिक संकट
सरना परंपरा, पाहन–पड़हा व्यवस्था, भगत धाराएं, मिशनरी प्रभाव, मद्यपान–बलि–अनुष्ठान और ‘शुद्ध जीवन’ की खोज
ताना भगत आंदोलन को केवल किसान असंतोष, लगान-विरोध या औपनिवेशिक सत्ता के प्रतिरोध से समझना पर्याप्त नहीं है। 1914 में जब जतरा उरांव ने अपने अनुयायियों को नया धार्मिक और नैतिक अनुशासन अपनाने का संदेश दिया, तब वे केवल जमींदार या सरकार के विरुद्ध नहीं बोल रहे थे। वे उरांव समाज के भीतर भी एक परिवर्तन चाहते थे।
कौन-सी धार्मिक प्रथाएं स्वीकार्य हैं?
क्या पशुबलि धर्म का अनिवार्य अंग है?
क्या भय, जादू-टोना और आत्माओं को प्रसन्न करने के लिए लगातार अनुष्ठान आवश्यक हैं?
और क्या किसी समुदाय की राजनीतिक मुक्ति उसके नैतिक पुनर्गठन के बिना संभव है?
यहीं से ताना भगत आंदोलन की एक विशिष्ट विशेषता सामने आती है—
‘सरना धर्म’ : आधुनिक नाम और ऐतिहासिक सावधानी
आज झारखंड और आसपास के आदिवासी समाजों की धार्मिक परंपराओं के संदर्भ में ‘सरना’ शब्द व्यापक रूप से प्रयुक्त होता है। लेकिन उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के आरंभिक उरांव धार्मिक जीवन को सीधे आज के संगठित ‘सरना धर्म’ की अवधारणा में रख देना ऐतिहासिक रूप से सावधानी मांगता है।
औपनिवेशिक नृवंशशास्त्रियों और मिशनरी लेखकों ने उरांव विश्वासों को कभी ‘आत्मवादी’, कभी ‘आदिम’, कभी ‘जनजातीय धर्म’ और कई बार अत्यंत पूर्वाग्रहपूर्ण श्रेणियों में वर्णित किया। आधुनिक इतिहासलेखन ने दिखाया है कि ऐसी श्रेणियां स्वयं औपनिवेशिक ज्ञान-निर्माण का हिस्सा थीं। उन्नीसवीं सदी के अंत तक मिशनरी और औपनिवेशिक लेखन में ‘उरांव’ को एक विशिष्ट ‘जनजाति’ और उसके विश्वासों को अलग धार्मिक संसार के रूप में वर्गीकृत किया जाने लगा।
इसलिए यहां ‘सरना परंपरा’ से आशय उस व्यापक धार्मिक-सांस्कृतिक संसार से है जिसमें—
धर्म और खेती अलग संसार नहीं थे
उरांव समाज में धार्मिक जीवन कृषि से गहरे जुड़ा था।
इसलिए पूजा केवल किसी मंदिर में होने वाली गतिविधि नहीं थी।
शरत चंद्र राय के विस्तृत अध्ययन में उरांव धार्मिक संसार में देवताओं, ग्राम-आत्माओं, पूर्वजों, उत्सवों, बलियों और धार्मिक विशेषज्ञों का विस्तृत वर्णन मिलता है। उनका Oraon Religion and Customs आज भी इस विषय का महत्वपूर्ण प्राथमिक नृवंशशास्त्रीय स्रोत है, हालांकि उसे औपनिवेशिक युग की सीमाओं को ध्यान में रखकर पढ़ना आवश्यक है।
धर्मेश : सर्वोच्च शक्ति की धारणा
उरांव धार्मिक परंपराओं में एक उच्चतर ईश्वरीय सत्ता की अवधारणा मिलती है, जिसे विभिन्न लेखनों में धर्मेश/धर्मेस आदि रूपों में दर्ज किया गया है।
लेकिन धार्मिक व्यवहार केवल इस सर्वोच्च सत्ता की उपासना तक सीमित नहीं था।
गांव और परिवार के दैनिक जीवन में विभिन्न स्थानीय शक्तियों, ग्राम-देवताओं, पूर्वजों और आत्माओं का महत्व था।
इस धार्मिक संसार की एक प्रमुख विशेषता थी—
ब्रह्मांडीय शक्ति और स्थानीय जीवन के बीच सीधा संबंध।
तो उसका कारण केवल प्राकृतिक नहीं माना जा सकता था।
धार्मिक अनुष्ठान सामुदायिक संकट से निपटने का एक माध्यम थे।
सरना : पवित्र उपवन
कई उरांव गांवों में एक पवित्र उपवन या वृक्ष-समूह धार्मिक जीवन का केंद्र था।
यही वह स्थल है जिसे व्यापक रूप से सरना कहा जाता है।
आमतौर पर साल वृक्षों से जुड़े इस पवित्र स्थल पर ग्राम-देवताओं और प्रकृति से संबंधित अनुष्ठान संपन्न होते थे।
शरत चंद्र राय के विवरणों पर आधारित बाद के अध्ययनों में प्रत्येक उरांव गांव में पवित्र साल-उपवन और उससे जुड़ी ग्राम-देवी/शक्ति का उल्लेख मिलता है।
वह गांव के सामूहिक अस्तित्व का प्रतीक था।
पाहन : गांव का धार्मिक पद
उरांव गांव के धार्मिक जीवन में पाहन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
वह आधुनिक अर्थ में केवल ‘पुजारी’ नहीं था।
वह गांव और अदृश्य धार्मिक शक्तियों के बीच सामुदायिक मध्यस्थ था।
कृषि और ऋतु से जुड़े प्रमुख अनुष्ठानों में उसकी केंद्रीय भूमिका होती थी।
और सामूहिक सुरक्षा से संबंधित पूजा-पद्धतियां उसके माध्यम से संपन्न हो सकती थीं।
आधुनिक अध्ययनों में भी पाहन को उरांव गांव के धार्मिक संगठन का केंद्रीय पात्र माना गया है।
धार्मिक सत्ता मूलतः समुदाय के भीतर स्थित थी।
पाहन और लौकिक नेतृत्व
उरांव गांव में धार्मिक और लौकिक भूमिकाएं हमेशा एक ही व्यक्ति में केंद्रित नहीं थीं।
पाहन धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़ा था, जबकि गांव के सामाजिक और प्रशासनिक मामलों में अन्य पदाधिकारी और बुजुर्ग भूमिका निभाते थे।
इससे गांव की सत्ता बहुस्तरीय बनती थी।
राज्य की तरह ऊपर से आदेश देने वाली एक अकेली संस्था के बजाय गांव की व्यवस्था कई भूमिकाओं और सामुदायिक सहमति पर आधारित थी।
यही व्यवस्था आगे औपनिवेशिक थाना, अदालत, राजस्व अधिकारी और जमींदार की केंद्रीकृत सत्ता से टकराती है।
पड़हा : गांव से ऊपर समुदाय
उरांव सामाजिक संगठन की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में पड़हा का उल्लेख मिलता है।
यह कई गांवों को जोड़ने वाली व्यापक सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था थी।
पड़हा के माध्यम से विवाह, सामाजिक अनुशासन, विवाद और विभिन्न सामुदायिक प्रश्नों पर सामूहिक स्तर पर निर्णय हो सकते थे।
अर्थात उरांव समाज की राजनीतिक कल्पना केवल एक गांव तक सीमित नहीं थी।
कई गांवों का एक व्यापक सामुदायिक तंत्र मौजूद था।
उरांव और मुंडा समाज की पारंपरिक राजनीति पर आधुनिक अध्ययनों में पड़हा, ग्राम पंचायत, धार्मिक पदों और वंश-आधारित संगठन के जटिल संबंधों को रेखांकित किया गया है।
अखड़ा, धुमकुड़िया और सामुदायिक जीवन
धार्मिक-सामाजिक जीवन केवल पाहन और पड़हा तक सीमित नहीं था।
गांव का अखड़ा सामुदायिक जीवन, नृत्य और सामाजिक मेल-जोल का महत्वपूर्ण स्थल था।
युवा संगठन और सामुदायिक प्रशिक्षण से जुड़ी धुमकुड़िया जैसी संस्थाओं ने भी सामाजिक संस्कार और सामूहिकता बनाए रखने में भूमिका निभाई।
इस प्रकार धर्म, संस्कृति और सामाजिक अनुशासन अलग-अलग संस्थाएं नहीं थे।
उरांव समाज में सामुदायिक जीवन स्वयं शिक्षा का माध्यम था।
युवा पीढ़ी उत्सव, श्रम, नृत्य, गीत और सामूहिक अनुष्ठानों से समाज के नियम सीखती थी।
सरहुल : प्रकृति और समुदाय का उत्सव
सरहुल छोटानागपुर के अनेक आदिवासी समुदायों का महत्वपूर्ण वसंतोत्सव है।
उरांव संदर्भ में यह साल वृक्ष, प्रकृति, कृषि चक्र और सामुदायिक पुनर्नवीकरण से जुड़ा है।
पाहन की भूमिका इसमें केंद्रीय होती है।
वर्तमान नृवंशशास्त्रीय विवरणों में सरहुल के अवसर पर पाहन द्वारा साल के फूलों का उपयोग, गांव के घरों से संपर्क और कृषि-प्रकृति संबंधों की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति दर्ज की गई है।
ऐसे उत्सव यह दिखाते हैं कि उरांव धर्म का केंद्रीय प्रश्न मुक्ति के बाद के किसी संसार से अधिक—
इस धरती पर समुदाय और प्रकृति के संतुलन से जुड़ा था।
कर्मा और कृषि-सांस्कृतिक चक्र
कर्मा जैसे त्योहार भी सामाजिक और धार्मिक जीवन के महत्वपूर्ण अंग थे।
इसलिए जब बाद के धार्मिक सुधारक कुछ पारंपरिक उत्सवों, नृत्यों या रीति-रिवाजों की आलोचना करते हैं, तो वे केवल धार्मिक व्यवहार नहीं बदल रहे होते।
वे समाज के सांस्कृतिक ढांचे को भी पुनर्परिभाषित कर रहे होते हैं।
ताना भगत आंदोलन के भीतर यही तनाव आगे दिखाई देगा।
हड़िया : केवल शराब नहीं
उरांव तथा छोटानागपुर के अन्य समुदायों के सामाजिक और धार्मिक जीवन में चावल से बना पेय हड़िया महत्वपूर्ण स्थान रखता था।
यह केवल नशे के लिए प्रयुक्त मदिरा नहीं था।
यही कारण है कि बाद में ताना भगतों का मद्यत्याग साधारण व्यक्तिगत परहेज नहीं था।
वे उस वस्तु से दूरी बना रहे थे जो पारंपरिक सामुदायिक जीवन के कई स्तरों में उपस्थित थी।
मद्यपान कब सामाजिक संकट बना?
एक था अनुष्ठानिक और सामुदायिक उपयोग।
दूसरा था अत्यधिक मद्यपान से उत्पन्न आर्थिक और सामाजिक समस्याएं।
गरीब कृषक परिवार में आय का एक हिस्सा शराब पर खर्च होना,
इन कारणों से मद्यपान सामाजिक सुधार का विषय बनने लगा।
विभिन्न धार्मिक सुधार धाराओं ने भी।
और बाद में ताना भगतों ने इसे अत्यंत कठोर नैतिक अनुशासन का प्रश्न बनाया।
बलि : धार्मिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग
पारंपरिक उरांव धार्मिक जीवन में पशु और पक्षी बलि का उल्लेख मिलता है।
ग्राम-देवताओं या अन्य धार्मिक शक्तियों को अर्पित किए जा सकते थे।
शरत चंद्र राय के अध्ययन में बलि और धार्मिक भोज उरांव धार्मिक जीवन की अनेक विधियों का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
यहां भी ताना भगत आंदोलन बड़ा परिवर्तन लाने वाला था।
उसने बलि को केवल खर्चीली प्रथा नहीं माना।
उसने इसे हिंसा और धार्मिक अशुद्धता के प्रश्न से जोड़ा।
आत्माएं, रोग और भय
बीमारी, अकाल, मृत्यु या दूसरी विपत्ति की व्याख्या कई बार आत्माओं और अदृश्य शक्तियों के संदर्भ में की जाती थी।
कुछ धार्मिक विशेषज्ञ ऐसे संकटों की पहचान और उपचार में भूमिका निभाते थे।
और विभिन्न अनुष्ठान शामिल हो सकते थे।
ऐसी व्यवस्था को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखकर केवल ‘अंधविश्वास’ कह देना इतिहास की दृष्टि से पर्याप्त नहीं होगा।
यह उस समाज की संकट-व्याख्या प्रणाली थी जहां आधुनिक चिकित्सा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और वैज्ञानिक संस्थाएं सीमित थीं।
लेकिन इसी व्यवस्था में भय और अनुष्ठानिक खर्च भी पैदा हो सकते थे।
यही वह क्षेत्र था जहां सुधारवादी भगत धाराएं वैकल्पिक धार्मिक अनुशासन प्रस्तुत करने लगीं।
जादू-टोना और सामाजिक तनाव
जादू-टोने की धारणा उरांव धार्मिक-सांस्कृतिक संसार के ऐतिहासिक विवरणों में भी मिलती है।
यदि बीमारी या मृत्यु के पीछे किसी व्यक्ति की अलौकिक शक्ति मानी जाए तो इसका सामाजिक प्रभाव गंभीर हो सकता था।
और कभी हिंसा तक की स्थिति बन सकती थी।
इसलिए धार्मिक सुधार का प्रश्न केवल ईश्वर की अवधारणा बदलने का प्रश्न नहीं था।
यह सामाजिक संबंधों में भय कम करने का भी प्रश्न था।
ताना भगत आंदोलन आगे इसी दिशा में एक कठोर नैतिक व्यवस्था प्रस्तुत करेगा।
धार्मिक अनुष्ठानों का आर्थिक बोझ
उत्सव और अनुष्ठान सामाजिक एकजुटता पैदा करते हैं।
लेकिन गरीब कृषक परिवार पर उनका आर्थिक बोझ भी पड़ सकता है।
यदि परिवार पहले से कर्ज में है तो धार्मिक-सामाजिक खर्च आर्थिक संकट को और बढ़ा सकता है।
यहीं धार्मिक सुधार और कृषक अर्थव्यवस्था एक-दूसरे से जुड़ते हैं।
धार्मिक शुद्धि परिवार की अर्थव्यवस्था को पुनर्गठित करने का माध्यम बन सकती थी।
क्या उरांव समाज स्थिर और अपरिवर्तनशील था?
औपनिवेशिक लेखन ने कई बार आदिवासी समुदायों को ऐसे प्रस्तुत किया मानो वे सदियों से अपरिवर्तित ‘आदिम समाज’ हों।
आधुनिक इतिहासलेखन इस दृष्टि की आलोचना करता है।
इसलिए 1914 का धार्मिक सुधार किसी ‘शुद्ध प्राचीन परंपरा’ की सरल वापसी नहीं था।
वह आधुनिक परिस्थितियों में परंपरा का पुनर्निर्माण था।
ईसाई मिशनों का प्रवेश
छोटानागपुर में उन्नीसवीं सदी के मध्य से ईसाई मिशनों की गतिविधियां तेजी से बढ़ीं।
1840 के दशक से गोस्नर मिशन की उपस्थिति महत्वपूर्ण हुई।
इसके बाद एंग्लिकन और रोमन कैथोलिक मिशनों का प्रभाव भी बढ़ा।
इन मिशनों के बीच कार्य-पद्धतियों में अंतर था।
आधुनिक शोध बताता है कि SPG का ध्यान शिक्षा और बाइबिल स्कूलों पर अधिक था, जबकि रोमन कैथोलिक और गोस्नर मिशन भूमि तथा किराए जैसे प्रश्नों से भी सक्रिय रूप से जुड़े।
इससे धार्मिक परिवर्तन ग्रामीण सामाजिक प्रश्नों से सीधे जुड़ गया।
मिशनरी और भूमि-अधिकार
कई आदिवासी किसानों के लिए मिशन केवल धर्म परिवर्तन का संस्थान नहीं था।
और भूमि विवादों में सलाह या सहायता दे सकते थे।
इसलिए जमींदार या महाजन से संघर्ष कर रहे किसान को मिशन संस्थाओं में व्यावहारिक संरक्षण भी दिखाई दे सकता था।
छोटानागपुर में मिशनों के भूमि और किराया विवादों से जुड़ाव का उल्लेख आधुनिक इतिहासलेखन में स्पष्ट रूप से मिलता है।
धर्मांतरण की प्रक्रिया को इसलिए केवल आध्यात्मिक आकर्षण से समझना अधूरा होगा।
उसमें सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा और सत्ता तक पहुंच जैसे तत्व भी शामिल थे।
शिक्षा का प्रभाव
मिशन स्कूलों ने आदिवासी समाज में पढ़ने-लिखने की नई संभावनाएं पैदा कीं।
इन सबके संसार में साक्षरता शक्ति बन सकती थी।
मिशनरियों ने उरांव/कुड़ुख भाषा का अध्ययन भी किया, व्याकरण और धार्मिक साहित्य तैयार किया। आधुनिक शोध ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया है कि भाषा के इस दस्तावेजीकरण ने एक ओर शिक्षा और लेखन को बढ़ावा दिया, तो दूसरी ओर औपनिवेशिक ज्ञान ने ‘उरांव’ पहचान को नई श्रेणियों में भी बांधा।
धर्मांतरण और समुदाय के भीतर विभाजन
ईसाई धर्म स्वीकार करने वाले परिवारों का पारंपरिक अनुष्ठानों से संबंध बदल सकता था।
क्या वे हड़िया के सामुदायिक उपयोग में शामिल होंगे?
गांव की धार्मिक एकता का स्वरूप क्या होगा?
इस तरह धार्मिक परिवर्तन केवल व्यक्ति की निजी आस्था नहीं था।
वह गांव की सामुदायिक संरचना को भी प्रभावित करता था।
मिशनरी दृष्टि की सीमा
मिशनरी स्रोत अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उन्हें आलोचनात्मक दृष्टि से पढ़ना आवश्यक है।
कई मिशनरी लेखकों ने स्थानीय धार्मिक विश्वासों को ‘मूर्तिपूजा’, ‘अंधविश्वास’ या ‘शैतानी’ जैसी ईसाई धर्मशास्त्रीय श्रेणियों में देखा।
आधुनिक शोध ने दिखाया है कि उरांव समाज के बारे में मिशनरी विवरणों ने समय के साथ ‘धर्म’, ‘जाति’, ‘नस्ल’ और ‘जनजाति’ जैसी औपनिवेशिक श्रेणियों का निर्माण भी किया।
इसलिए मिशनरी स्रोत हमें दो चीजें बताते हैं—
यूरोपीय मिशनरी उरांव समाज को कैसे देख रहे थे।
भगत परंपराएं : भीतर से सुधार की खोज
उरांव समाज में धार्मिक परिवर्तन का एक दूसरा रास्ता भी था—
भगत परंपरा।
‘भगत’ सामान्यतः ऐसे धार्मिक व्यक्ति या अनुयायी के लिए प्रयुक्त हो सकता था जो विशेष भक्ति, संयम या सुधारवादी अनुशासन अपनाता हो।
उरांव धार्मिक इतिहास में कबीरपंथी, हिंदू-भक्ति प्रभाव और विभिन्न स्थानीय भगत धाराओं के संपर्क के संकेत मिलते हैं। शरत चंद्र राय के 1928 के अध्ययन में ‘Bhagat’, ‘Kabirpanthi’, ‘bhajan’, ‘bhakti’ और ताना संबंधी प्रवृत्तियों का विस्तृत उल्लेख मिलता है।
इससे एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट होती है—
जतरा भगत से पहले भी उरांव धार्मिक संसार बाहरी और आंतरिक सुधारवादी प्रभावों से परिचित था।
‘भगत’ होना क्या बदलता था?
भगत पहचान केवल किसी नए देवता की पूजा नहीं थी।
उसका अर्थ जीवन-पद्धति बदलना भी हो सकता था।
ये प्रवृत्तियां विभिन्न सुधारवादी धाराओं में दिखाई देती हैं।
इसलिए ताना भगत आंदोलन ने पूरी तरह नया नैतिक शब्दकोश शून्य से नहीं बनाया।
उसने पहले से मौजूद सुधारवादी भाषा को अधिक संगठित, सामुदायिक और अंततः राजनीतिक रूप दिया।
तीन धार्मिक दबाव
1914 से पहले उरांव समाज पर मोटे तौर पर तीन धार्मिक-सांस्कृतिक दबाव एक साथ सक्रिय थे।
पहला—परंपरागत धार्मिक संसार, जिसमें पाहन, सरना, पूर्वज, ग्राम-देवता, बलि, हड़िया और सामुदायिक उत्सव शामिल थे।
दूसरा—ईसाई मिशनरी प्रभाव, जो नया धर्म, शिक्षा, चिकित्सा, साक्षरता और कई मामलों में सामाजिक-कानूनी संरक्षण प्रदान कर रहा था।
तीसरा—आंतरिक भगत एवं सुधारवादी प्रवृत्तियां, जो परंपरा को पूरी तरह छोड़ने के बजाय उसके भीतर से नया अनुशासन खोज रही थीं।
ताना भगत आंदोलन तीसरी दिशा की सबसे शक्तिशाली अभिव्यक्तियों में से एक बना।
धार्मिक संकट वास्तव में पहचान का संकट था
इस समय प्रश्न केवल यह नहीं था कि कौन-सा देवता सही है।
यदि मिशनरी परंपरागत पूजा को गलत बताते हैं,
यदि औपनिवेशिक अधिकारी समुदाय को ‘जनजाति’ की प्रशासनिक श्रेणी में रखते हैं,
यदि जमींदार भूमि पर अधिकार जताता है,
तो समुदाय अपनी पहचान कैसे परिभाषित करेगा?
ताना भगत आंदोलन ने इसका उत्तर धार्मिक भाषा में दिया—
हम अपने जीवन को स्वयं शुद्ध करेंगे।
इसलिए आत्मशुद्धि यहां आत्मनिर्णय से जुड़ जाती है।
मद्यत्याग : शरीर पर अपना राज
ताना भगतों के लिए मद्यत्याग बाद में आंदोलन का महत्वपूर्ण नियम बना।
चौथा—राज्य की आबकारी व्यवस्था से दूरी।
व्यक्ति अपने शरीर पर स्वयं शासन करेगा।
यह विचार आगे राजनीतिक अर्थ ग्रहण करता है।
जो व्यक्ति शराब और आदतों पर नियंत्रण कर सकता है, वह अन्यायी जमींदार या सरकार के आदेश से भी इंकार कर सकता है।
व्यक्तिगत अनुशासन और राजनीतिक असहयोग के बीच यही गहरा संबंध ताना भगत आंदोलन की पहचान बना।
बलि-विरोध : अहिंसा की प्रारंभिक दिशा
पशुबलि से दूरी भी केवल धार्मिक सुधार नहीं थी।
यह हिंसा के प्रति एक नई नैतिक दृष्टि की ओर संकेत करती थी।
बाद के ताना भगत अनुशासन में अहिंसा प्रमुख तत्व बनती है।
इसका गांधी से बाद का संबंध अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन इसकी शुरुआत को गांधी के प्रभाव से समझना गलत होगा।
ताना भगत आंदोलन का आरंभ 1914 में हुआ।
गांधी जनवरी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से स्थायी रूप से भारत लौटे।
इसलिए ताना भगतों की प्रारंभिक शुद्धतावादी और अहिंसक प्रवृत्तियां स्वदेशी उरांव धार्मिक-सुधार प्रक्रिया के भीतर विकसित हुई थीं।
बाद में गांधीवाद ने उन्हें नया राष्ट्रीय राजनीतिक संदर्भ दिया।
मांसाहार से दूरी
ताना भगतों ने मांसाहार छोड़ने को भी नैतिक अनुशासन से जोड़ा।
यह कदम पारंपरिक सामाजिक जीवन से एक स्पष्ट दूरी बना सकता था।
मांस और पशुबलि कई सामुदायिक अवसरों से जुड़े थे।
इसलिए मांसाहार त्यागना व्यक्तिगत खान-पान का निर्णय भर नहीं था।
नई धार्मिक पहचान पुराने सामुदायिक व्यवहार से अलग होगी।
इसी से ताना भगत समुदाय धीरे-धीरे एक विशिष्ट सामाजिक समूह की तरह पहचाना जाने लगा।
स्वच्छता और सफेद वस्त्र
ताना भगत पहचान में आगे चलकर स्वच्छता, सरल जीवन और विशिष्ट पहनावा महत्वपूर्ण बने।
सफेद वस्त्र और बाद में खादी के साथ उनका संबंध प्रसिद्ध हुआ।
लेकिन ‘शुद्ध’ शरीर और साफ जीवन की धारणा पहले से धार्मिक सुधार का हिस्सा थी।
स्वच्छता का संदेश तीन स्तरों पर काम करता था—
शुद्ध शरीर — शुद्ध आचरण — शुद्ध समाज।
क्या यह ‘संस्कृतीकरण’ था?
इसमें कुछ सांस्कृतिक समानताएं अवश्य दिखाई देती हैं।
गांधीवाद से मिलने की जमीन यहीं तैयार हुई
लेकिन कालक्रम को स्पष्ट रखना जरूरी है—
जतरा भगत का उदय और 1914 में ताना आंदोलन का जन्म
चिंगरी नवाटोली, आध्यात्मिक अनुभव, धर्मेश का संदेश, प्रारंभिक अनुयायी, ‘ताना’ नाम की व्याख्याएं और धार्मिक सुधार से सामूहिक आंदोलन तक की यात्रा
1914 में छोटानागपुर के उरांव समाज के भीतर जिस आंदोलन ने जन्म लिया, उसकी शुरुआत किसी राजनीतिक दल, किसान सभा या लिखित घोषणापत्र से नहीं हुई थी। उसके केंद्र में एक युवा उरांव किसान और धार्मिक सुधारक थे—जतरा उरांव, जिन्हें आगे चलकर जतरा भगत और फिर जतरा ताना भगत के नाम से जाना गया।
आंदोलन की शुरुआत धार्मिक थी। जतरा ने दावा किया कि उन्हें सर्वोच्च ईश्वरीय शक्ति धर्मेश से संदेश मिला है। संदेश का मूल अर्थ था—उरांव समाज अपने जीवन को शुद्ध करे, भूत-प्रेत और जादू-टोने के भय से मुक्त हो, पशुबलि और मद्यपान छोड़े, संयमित जीवन अपनाए और अंततः उस बाहरी सत्ता से अपने को मुक्त करे जो उसकी भूमि, श्रम और सामाजिक जीवन पर नियंत्रण स्थापित कर चुकी थी। अप्रैल 1914 में ऐसे दैवी संदेश की घोषणा का उल्लेख आंदोलन के प्रमुख विवरणों में मिलता है।
यहीं ताना भगत आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता दिखाई देती है—
जतरा भगत कौन थे?
जतरा भगत के जीवन के आरंभिक वर्षों के बारे में स्रोत सीमित और कई जगह परस्पर भिन्न हैं। यही कारण है कि उनके जीवन-वृत्तांत के संबंध में किंवदंती और सत्यापित इतिहास के बीच सावधानी आवश्यक है।
व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि जतरा उरांव का जन्म लगभग 1888 में तत्कालीन रांची जिले के उरांव बहुल क्षेत्र में हुआ। उनका गांव चिंगरी नवाटोली/चिंगरी बताया जाता है, जो आज झारखंड के गुमला जिले के बिशुनपुर क्षेत्र में स्थित है। आधुनिक सरकारी और स्थानीय स्मृति में भी चिंगरी नवाटोली को उनके जन्म और आंदोलन के उद्गम से जोड़ा जाता है।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि आज का गुमला जिला उस समय अलग प्रशासनिक जिला नहीं था। इसलिए आधुनिक विवरणों में ‘गुमला’ और औपनिवेशिक स्रोतों में ‘रांची’ दोनों नाम मिलने से भ्रम उत्पन्न हो सकता है।
जतरा किसी बड़े जमींदार, शिक्षित मध्यवर्ग या राजनीतिक अभिजात परिवार से नहीं आए थे।
उनका सामाजिक संसार वही था जिसमें उनके अनुयायी रहते थे—
उनके और उनके अनुयायियों के बीच कोई विशाल सामाजिक दूरी नहीं थी।
उम्र केवल लगभग पच्चीस वर्ष
ताना आंदोलन की शुरुआत के समय जतरा की उम्र लगभग पच्चीस–छब्बीस वर्ष रही होगी। Banglapedia का विस्तृत विवरण उन्हें 1914 में लगभग पच्चीस वर्षीय उरांव युवक के रूप में प्रस्तुत करता है।
इतने युवा व्यक्ति ने उरांव समाज की परंपरागत धार्मिक व्यवस्था को चुनौती दी।
उसने गांव के धार्मिक और सामाजिक नेतृत्व के सामने वैकल्पिक अनुशासन रखा।
उसने जमींदारों की आर्थिक मांगों को अस्वीकार करने की बात कही।
और कुछ ही समय में औपनिवेशिक प्रशासन को उसके आंदोलन में कानून-व्यवस्था के लिए खतरा दिखाई देने लगा।
इसलिए ताना आंदोलन का प्रारंभिक इतिहास युवा धार्मिक नेतृत्व के तेजी से राजनीतिक नेतृत्व में बदलने का इतिहास भी है।
चिंगरी नवाटोली : एक गांव से शुरुआत
आंदोलन का प्रारंभ जिस चिंगरी नवाटोली से हुआ, उसे केवल जन्मस्थल के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है।
ग्रामीण आंदोलन प्रायः एक सामाजिक नेटवर्क के माध्यम से फैलते हैं।
इनसे गांव एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं।
इसलिए किसी एक गांव में पैदा हुआ धार्मिक संदेश आसपास के गांवों तक बहुत तेजी से पहुंच सकता था।
जतरा का संदेश भी मौखिक माध्यम से फैलने लगा।
उनका धार्मिक अनुभव धीरे-धीरे व्यक्तिगत रहस्योद्घाटन न रहकर सामुदायिक घटना बन गया।
अप्रैल 1914 : दैवी अनुभव
आंदोलन के इतिहास में अप्रैल 1914 एक महत्वपूर्ण तिथि के रूप में सामने आती है।
प्रमुख विवरणों के अनुसार जतरा ने घोषणा की कि उन्हें धर्मेश से दैवी संदेश मिला है।
इस अनुभव का स्वरूप विभिन्न स्रोतों में अलग-अलग शब्दों में मिलता है।
इसलिए यह कहना अधिक सुरक्षित होगा कि—
जतरा ने स्वयं को धर्मेश द्वारा एक विशेष धार्मिक मिशन के लिए चुना हुआ बताया।
इतिहासकार के लिए यह प्रमाणित करना संभव नहीं कि अनुभव वस्तुतः कैसे घटित हुआ।
लेकिन ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जतरा और उनके अनुयायियों ने इसे सत्य माना।
और उसी विश्वास ने सामाजिक व्यवहार बदलना शुरू किया।
धर्मेश का संदेश क्या था?
विभिन्न विवरणों में शब्द अलग हैं, लेकिन संदेश का मूल ढांचा स्पष्ट दिखाई देता है।
जादू-टोना और झाड़-फूंक जैसी प्रथाओं से दूरी बनानी थी,
उरांव समाज को अपनी खोई हुई व्यवस्था और स्वाधीनता पुनः प्राप्त करनी चाहिए।
सरकारी प्रकाशन में प्रस्तुत लोकप्रिय पुनर्कथन भी जतरा के दर्शन को धर्मेश के ऐसे संदेश से जोड़ता है जिसमें व्यर्थ धार्मिक अनुष्ठान छोड़ने, भक्ति पर जोर देने और उरांव राज को पुनर्स्थापित करने की बात आती है।
लेकिन यहां यह भी स्पष्ट रखना चाहिए कि सरकारी स्मारक साहित्य इतिहासलेखन का स्थान नहीं ले सकता। वह आंदोलन की बाद की राष्ट्रवादी स्मृति को भी प्रतिबिंबित करता है।
‘उरांव राज’ का अर्थ क्या था?
यहां ‘राज’ शब्द का अर्थ आधुनिक राष्ट्र-राज्य की तरह लेना गलत होगा।
आदिवासी और कृषक आंदोलनों में ‘राज’ कई बार उस आदर्श व्यवस्था को व्यक्त करता है जिसमें—
बिरसा आंदोलन में भी इसी प्रकार वैकल्पिक सत्ता और न्यायपूर्ण व्यवस्था की कल्पना दिखाई देती है।
ताना आंदोलन में उरांव राज या धर्मराज की कल्पना धार्मिक मुक्ति और सामाजिक स्वायत्तता का सम्मिलित प्रतीक बनने लगी।
पहले समाज को शुद्ध करो
जतरा की प्रारंभिक रणनीति उल्लेखनीय थी।
उन्होंने आंदोलन की शुरुआत हथियार जुटाने से नहीं की।
तो उसकी सामाजिक निर्भरता भी कम होती है।
यहां धार्मिक सुधार एक राजनीतिक प्रशिक्षण जैसा काम करने लगा।
आत्मसंयम ने सामूहिक अनुशासन को जन्म दिया।
भूत-प्रेत और जादू-टोने का निषेध
ताना धार्मिक सुधार का एक महत्वपूर्ण तत्व था आत्माओं और भूत-प्रेत से संबंधित उन प्रथाओं का विरोध जिन्हें जतरा और उनके अनुयायी अनावश्यक या हानिकारक मानते थे।
संगीता दासगुप्ता के महत्वपूर्ण अध्ययन के अनुसार ताना आंदोलन ने उरांव धार्मिक संसार को पुनर्व्यवस्थित करने का प्रयास किया और आत्मा-पूजा तथा बलि जैसी प्रथाओं को अस्वीकार किया। उसने परंपरागत पाहन और महतो नेतृत्व को भी चुनौती दी।
यह केवल धर्मशास्त्रीय मतभेद नहीं था।
यदि समुदाय को बताया जाता है कि विपत्ति का कारण किसी भूत या जादूगर का कोप है, तो धार्मिक मध्यस्थ और अनुष्ठान आवश्यक हो जाते हैं।
इसलिए धार्मिक मुक्ति वास्तव में भय से मुक्ति थी।
पशुबलि का विरोध
पशुबलि परंपरागत धार्मिक जीवन में महत्वपूर्ण थी।
पहला—धार्मिक अनुष्ठानों का पुनर्गठन।
यहीं से ताना भगतों की विशिष्ट अहिंसक नैतिकता का प्रारंभिक आधार दिखाई देता है।
इसे सीधे गांधीवाद का परिणाम नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह प्रवृत्ति 1914 में विकसित हो रही थी—गांधी के भारत लौटने से पहले।
मद्यत्याग : क्रांति का घरेलू रूप
मद्यत्याग ताना आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक नियमों में था।
हड़िया और अन्य स्थानीय पेय उरांव सामुदायिक जीवन से जुड़े थे।
इसलिए पूर्ण त्याग आसान निर्णय नहीं था।
उसका अर्थ था कि आंदोलन अपने अनुयायियों से कह रहा है—
पुराने सामाजिक व्यवहार से अलग पहचान बनाओ।
शराब पर होने वाला खर्च कम करना कृषक परिवारों के लिए आर्थिक रूप से भी महत्वपूर्ण था।
यहीं धर्म और किसान प्रश्न फिर एक-दूसरे से जुड़ते हैं।
मांसाहार और संयम
जतरा ने मांसाहार छोड़ने और संयमित जीवन अपनाने पर जोर दिया। समकालीन तथा बाद के विवरण इस तत्व पर व्यापक रूप से सहमत हैं।
इसके साथ आंदोलन का अनुयायी केवल किसी विचार से सहमत व्यक्ति नहीं रहता था।
धार्मिक आंदोलन का संगठनात्मक लाभ यही था—
उसका सदस्य प्रतिदिन आंदोलन के नियम जीता था।
पाहन और महतो की सत्ता को चुनौती
ताना आंदोलन की क्रांतिकारी प्रकृति को केवल अंग्रेज-विरोध में देखना अधूरा होगा।
उसने उरांव समाज की अपनी परंपरागत नेतृत्व व्यवस्था को भी चुनौती दी।
संगीता दासगुप्ता के अध्ययन के अनुसार तानाओं ने पाहन, अर्थात धार्मिक पुरोहित, और महतो, अर्थात गांव के लौकिक प्रतिनिधि, दोनों के परंपरागत नेतृत्व से दूरी बनाई।
क्योंकि यदि नया धार्मिक मार्ग सीधे धर्मेश की आज्ञा से आया है, तो पुराने धार्मिक मध्यस्थ की आवश्यकता कम हो जाती है।
एक युवा धार्मिक सुधारक कह रहा था कि आध्यात्मिक वैधता अब परंपरा से नहीं, नए नैतिक अनुशासन से आएगी।
क्या यह नया पंथ था?
कई स्रोत ताना भगतों को एक नया sect, अर्थात धार्मिक संप्रदाय, बताते हैं।
यह व्याख्या उपयोगी है, लेकिन पर्याप्त नहीं।
प्रारंभिक अवस्था में निश्चित रूप से आंदोलन एक विशिष्ट धार्मिक समुदाय बना रहा था।
लेकिन वह शीघ्र ही केवल पूजा-पद्धति का नया संप्रदाय नहीं रहा।
इन प्रश्नों के साथ धार्मिक पंथ कृषक आंदोलन में परिवर्तित होने लगा।
‘ताना’ शब्द का अर्थ : स्रोत एकमत नहीं
आंदोलन के नाम को लेकर इतिहासलेखन में विशेष सावधानी जरूरी है।
‘ताना’ शब्द की कई व्याख्याएं मिलती हैं।
एक प्रचलित व्याख्या के अनुसार कुड़ुख/उरांव प्रयोग में इसका संबंध खींचने, तानने या अपनी ओर खींचने से है। कुछ अध्ययनों में इसे समाज को एक साथ ‘खींचकर’ सुधार की दिशा में ले जाने से जोड़ा गया है।
इसी आधार पर एक लोकप्रिय व्याख्या है—
जतरा उरांवों को एक नए धार्मिक अनुशासन में एक साथ खींच रहे थे, इसलिए अनुयायी ‘ताना भगत’ कहलाए।
लेकिन इसे निर्विवाद शब्द-व्युत्पत्ति मान लेना उचित नहीं होगा।
दूसरी व्याख्या : पुराने संसार से स्वयं को ‘खींच लेना’
इतिहासकारों ने ताना पहचान को एक ऐसे प्रयास के रूप में भी समझा है जिसमें अनुयायी अपने मौजूदा सामाजिक संसार से स्वयं को अलग करके नया संसार रच रहे थे।
इस अर्थ में ‘ताना’ केवल लोगों को एक साथ खींचना नहीं बल्कि—
पुरानी प्रथाओं से स्वयं को खींचकर बाहर निकालना,
संगीता दासगुप्ता ने पूरे आंदोलन को ही उरांव दुनिया को ‘reorder’—पुनर्व्यवस्थित करने की परियोजना के रूप में देखा है।
‘भगत’ का अर्थ
‘भगत’ उत्तर भारतीय धार्मिक शब्दावली में भक्ति और अनुशासित धार्मिक जीवन से जुड़ा शब्द है।
उरांव समाज में भी विभिन्न भगत धाराएं पहले से सक्रिय थीं।
इसलिए ‘ताना भगत’ नाम में दो सांस्कृतिक संसार दिखाई देते हैं—
और व्यापक भारतीय भक्ति परंपरा का ‘भगत’ शब्द।
यह ताना आंदोलन के सांस्कृतिक सम्मिश्रण को समझने में उपयोगी है।
वह न पूरी तरह बंद आदिवासी परंपरा था,
वह संपर्कों से निर्मित नया धार्मिक आंदोलन था।
प्रारंभिक अनुयायी कैसे बने?
जतरा के संदेश को स्वीकार करने वाले शुरुआती लोगों का कोई ऐसा पूर्ण सदस्य-रजिस्टर उपलब्ध नहीं है जिससे हम आंदोलन की पहली सभा या पहले दस अनुयायियों की निश्चित सूची बना सकें।
इसलिए आधुनिक लोकप्रिय लेखों में मिलने वाली अत्यधिक विशिष्ट सूचियों से सावधान रहना चाहिए।
इतिहास में अधिक विश्वसनीय रूप से इतना कहा जा सकता है कि—
जतरा के आसपास स्थानीय अनुयायियों का समूह बना,
और लोगों ने नए धार्मिक नियम अपनाने शुरू किए।
उनके दर्शन की खबर फैलने के साथ लोग उन्हें देखने और उनका संदेश सुनने आने लगे। एक विश्वविद्यालयीय अध्ययन में भी इस बात का उल्लेख मिलता है कि संदेश तेजी से फैला और दूर-दूर से लोग उनके दर्शन के लिए आने लगे।
व्यक्ति से ‘गुरु’ तक
उनके अनुयायी उन्हें धार्मिक मार्गदर्शक मानने लगे।
धार्मिक करिश्मा ने उन्हें परंपरागत पदाधिकारियों से अलग वैधता प्रदान की।
और यही सत्ता आगे राज्य के लिए चुनौती बनने वाली थी।
धार्मिक सभा राजनीतिक संगठन कैसे बनती है?
मान लीजिए सौ किसान एक जगह धार्मिक प्रार्थना के लिए एकत्र होते हैं।
वे शराब छोड़ने की प्रतिज्ञा करते हैं।
जमींदार के खेत में काम नहीं करेंगे,
तो धार्मिक सभा तुरंत किसान संगठन में बदल जाती है।
यहां कोई औपचारिक राजनीतिक पार्टी बनाने की आवश्यकता नहीं थी।
धार्मिक अनुशासन ने पहले ही सामाजिक नेटवर्क तैयार कर दिया था।
जमींदार के खेत में काम करने से इनकार
आंदोलन के प्रारंभिक राजनीतिक परिवर्तन का निर्णायक संकेत था—
Banglapedia के विवरण के अनुसार जतरा ने अनुयायियों से कहा कि वे जमींदारों के खेतों में हल न चलाएं और गैर-उरांवों अथवा सरकार के लिए मजदूरी या कुली का काम न करें।
यहां आंदोलन धार्मिक सुधार से सीधे उत्पादन संबंधों पर आ गया।
बेगार-विरोध
बेगार से इनकार ताना आंदोलन की आर्थिक और राजनीतिक प्रकृति समझने की कुंजी है।
बेगार का अर्थ था बिना स्वतंत्र श्रम-संबंध के किसी प्रभावशाली सत्ता के लिए सेवा देना।
यदि किसान बेगार से इंकार करता है तो वह केवल एक दिन का काम नहीं बचाता।
तुम्हारा मेरे श्रम पर स्वाभाविक अधिकार नहीं है।
यह सामंती अधीनता के विरुद्ध स्वतंत्र व्यक्ति की घोषणा थी।
लगान का प्रश्न सामने आता है
आंदोलन आगे बढ़ने के साथ कृषि प्रश्न और अधिक स्पष्ट हुआ।
प्रारंभिक धार्मिक आंदोलन नो-रेंट, अर्थात लगान न देने की मुहिम की ओर बढ़ा।
यदि भूमि धर्मेश ने उरांवों को दी है,
तो बाहरी जमींदार का उस पर लगान का अधिकार कैसे वैध है?
यहीं आध्यात्मिक अधिकार और भूमि-अधिकार एक हो गए।
‘भूमि हमारी है’ : आंदोलन का कृषक सिद्धांत
ताना आंदोलन के भीतर यह विचार विकसित हुआ कि उरांव भूमि के वास्तविक अधिकारी हैं।
इसलिए जमींदार या औपनिवेशिक राज्य को लगान देना उनके लिए अन्यायपूर्ण है।
यह आधुनिक संपत्ति कानून की तकनीकी दलील नहीं थी।
यह इतिहास, पूर्वज और धर्म पर आधारित वैधता का दावा था।
लेकिन हमारी भूमि पर हमारा अधिकार उससे पुराना है।
यही आदिवासी कृषक प्रतिरोध की दीर्घ परंपरा से ताना आंदोलन को जोड़ता है।
धार्मिक असहयोग से राजनीतिक असहयोग
अब आंदोलन के तीन स्तर स्पष्ट होने लगे—
पहला—धार्मिक असहयोग : पुरानी आत्मा-पूजा, बलि और अनुष्ठानों से इनकार।
दूसरा—सामाजिक असहयोग : मद्य, पुराने व्यवहार और कुछ परंपरागत नेतृत्व से दूरी।
तीसरा—आर्थिक-राजनीतिक असहयोग : बेगार, जमींदारी श्रम और अंततः लगान से इनकार।
यह परिवर्तन ताना भगत आंदोलन को असाधारण बनाता है।
उसकी राजनीतिक रणनीति उसके धार्मिक दर्शन से स्वाभाविक रूप से निकलती दिखाई देती है।
गांधी से पहले ‘असहयोग’
यहां फिर कालक्रम अत्यंत महत्वपूर्ण है।
उनका अखिल भारतीय असहयोग आंदोलन 1920 में शुरू हुआ।
इसलिए ताना भगतों द्वारा प्रारंभिक चरण में जमींदारों और सरकार के लिए काम करने से इनकार को गांधीवादी असहयोग की नकल नहीं कहा जा सकता।
रांची जिला जनगणना पुस्तिका भी 1914 में जतरा द्वारा आरंभ धार्मिक आंदोलन और उससे निकले ‘non-cooperation’ के तेजी से अन्य क्षेत्रों तक फैलने का उल्लेख करती है।
यह भारतीय प्रतिरोध इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है।
लेकिन इसे ‘पहला गांधीवादी आंदोलन’ भी न कहें
दूसरी ओर अतिरेक से बचना भी आवश्यक है।
ताना भगतों को ‘गांधी से पहले गांधीवादी’ कहना आकर्षक शीर्षक हो सकता है, लेकिन इतिहास में सावधानी चाहिए।
गांधी के राजनीतिक कार्यक्रम का अनुसरण नहीं कर रहे थे,
उनकी विचारधारा सत्याग्रह के सिद्धांतों से व्यवस्थित रूप से नहीं निकली थी,
और उनका धार्मिक संसार विशिष्ट उरांव संदर्भ में विकसित हुआ था।
आंदोलन से जमींदार क्यों भयभीत हुए?
मान लीजिए किसी जमींदार के क्षेत्र के किसान सामूहिक रूप से कहें—
तब समस्या केवल धार्मिक विचलन की नहीं रहती।
जमींदारी अर्थव्यवस्था का आधार कमजोर होने लगता है।
इसलिए ताना आंदोलन बहुत जल्दी स्थानीय सत्ता के लिए खतरा बन गया।
धर्म ने किसान को संगठित कर दिया था।
औपनिवेशिक सरकार क्यों चिंतित हुई?
ब्रिटिश प्रशासन धार्मिक सुधार को तब तक सहन कर सकता था जब तक वह कानून और राजस्व व्यवस्था को प्रभावित न करे।
और राजस्व संबंधों से इंकार करने लगे,
अब यह विश्वास का निजी प्रश्न नहीं था।
यह औपनिवेशिक शासन की आज्ञाकारिता की संरचना को चुनौती था।
गिरफ्तारी : तिथि को लेकर सावधानी
आंदोलन के आरंभिक दमन के बारे में स्रोतों में कुछ कालक्रमगत समस्याएं हैं।
Banglapedia का विवरण जतरा और प्रमुख अनुयायियों की गिरफ्तारी 23 अप्रैल 1914 बताता है और आरोप जमींदारों तथा सरकार के लिए काम करने से लोगों को रोकने तथा शांति भंग करने से जोड़ता है। वहीं अनेक अन्य विवरण अप्रैल 1914 को ही जतरा के रहस्योद्घाटन और आंदोलन के आरंभ का समय बताते हैं।
इन तिथियों की निकटता के कारण अत्यधिक निश्चित दिन-दर-दिन कथा बनाना उचित नहीं होगा जब तक मूल न्यायालयी अथवा जिला अभिलेखों से पुष्टि न हो।
लेकिन व्यापक घटनाक्रम निर्विवाद है—
आंदोलन शुरू हुआ, श्रम-अस्वीकार तेजी से उभरा और औपनिवेशिक प्रशासन ने जतरा तथा उनके साथियों के विरुद्ध कार्रवाई की।
जेल और धार्मिक करिश्मा
आंदोलनकारी नेता की गिरफ्तारी अक्सर दो विपरीत परिणाम उत्पन्न करती है।
राज्य समझता है कि नेतृत्व हट जाएगा।
लेकिन अनुयायियों के लिए गिरफ्तारी नेता की सत्यता का प्रमाण भी बन सकती है।
जेल ने आंदोलन को तुरंत समाप्त नहीं किया।
बल्कि ताना पहचान जतरा के व्यक्तिगत नेतृत्व से बाहर निकलने लगी।
यही किसी टिकाऊ सामाजिक आंदोलन की निशानी है—
उसकी विचारधारा संस्थापक से लंबी उम्र पाती है।
आंदोलन जतरा से बड़ा हो गया
ताना आंदोलन का अगला चरण यह स्पष्ट करेगा कि जतरा के बाद भी नेतृत्व समाप्त नहीं हुआ।
Banglapedia में लिथो उरांव, मंगर/मंगोर उरांव तथा आगे सिबू और माया उरांव जैसे नए नेतृत्व का उल्लेख मिलता है।
इससे एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है—
ताना आंदोलन केवल करिश्माई व्यक्ति का संप्रदाय नहीं था।
जतरा ने एक ऐसी सामाजिक भाषा पैदा कर दी थी जिसे दूसरे नेता आगे ले जा सकते थे।
आंदोलन का भूगोल फैलता है
प्रारंभिक केंद्र गुमला–बिशुनपुर क्षेत्र था।
धर्म से किसान विद्रोह तक
मालगुजारी न देने, बेगार और जमींदार के खेतों में काम से इनकार की राजनीति — ताना भगतों का आर्थिक असहयोग, भूमि पर नैतिक अधिकार और औपनिवेशिक राजस्व व्यवस्था से पहला सीधा टकराव
1914 में जतरा भगत के नेतृत्व में शुरू हुआ ताना आंदोलन यदि केवल मद्यत्याग, पशुबलि-विरोध, मांसाहार से परहेज और धार्मिक शुद्धि तक सीमित रहता, तो संभव है औपनिवेशिक प्रशासन उसे उरांव समाज के भीतर उभरे एक नए धार्मिक संप्रदाय के रूप में देखता। लेकिन आंदोलन बहुत जल्दी उस सीमा से बाहर निकल गया।
निर्णायक परिवर्तन तब आया जब धार्मिक आत्मशुद्धि का सिद्धांत श्रम, जमीन और लगान के प्रश्न पर लागू किया गया।
यदि हमारा शरीर हमारा है तो हमारा श्रम किसी जमींदार का कैसे हो सकता है?
यदि हमारे पूर्वजों ने जमीन बसाई है तो उसकी उपज पर पहला अधिकार किसका है?
यदि बेगार अन्याय है तो उसे धार्मिक कर्तव्य मानकर क्यों किया जाए?
और यदि किसी सत्ता का दावा अन्यायपूर्ण है तो उसे मालगुजारी देना नैतिक रूप से अनिवार्य क्यों माना जाए?
यहीं ताना आंदोलन धार्मिक सुधार से आगे बढ़कर किसान प्रतिरोध बन गया।
राजनीतिक घोषणापत्र के बिना किसान आंदोलन
ताना भगतों के पास आधुनिक अर्थ में कोई राजनीतिक घोषणापत्र नहीं था।
फिर भी उनकी मांगें अत्यंत राजनीतिक थीं।
और किसान आंदोलन में व्यवहार का सामूहिक परिवर्तन कई बार लिखित घोषणापत्र से अधिक शक्तिशाली होता है।
यदि एक किसान बेगार करने से मना करे तो उसे दंडित किया जा सकता है।
यदि पूरा गांव मना कर दे तो वह आंदोलन है।
यदि अनेक गांव लगान पर प्रश्न उठाने लगें तो वह राजस्व व्यवस्था के लिए चुनौती है।
धर्मेश की भूमि : नैतिक अधिकार की अवधारणा
ताना भगतों की भूमि-दृष्टि को आधुनिक कानूनी संपत्ति-अधिकार से अलग समझना होगा।
यदि उसी जमीन से समुदाय का जीवन चलता है,
और यदि धर्मेश ने धरती मनुष्य के जीवन के लिए दी है,
तो बाहर से आया राजस्व दावा नैतिक रूप से सर्वोच्च कैसे हो सकता है?
जमीन पर अधिकार और उरांव ऐतिहासिक स्मृति
उरांव किसान के लिए भूमि प्रश्न 1914 में अचानक उत्पन्न नहीं हुआ था।
उसके पीछे छोटानागपुर का लंबा इतिहास था—
और 1908 का छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम।
इसलिए जब ताना भगत जमीन पर नैतिक अधिकार की बात कर रहे थे, वे ऐसी सामुदायिक स्मृति को सक्रिय कर रहे थे जिसमें भूमि केवल बाजार में खरीदी-बेची जाने वाली वस्तु नहीं थी।
CNT Act के बाद भी मालगुजारी क्यों?
यहीं एक महत्वपूर्ण भ्रम दूर करना आवश्यक है।
1908 के छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम ने रैयती और आदिवासी भूमि-अधिकारों को महत्वपूर्ण संरक्षण दिया, लेकिन उसने जमींदारी व्यवस्था या लगान को समाप्त नहीं किया।
भूमि का हस्तांतरण सीमित हो सकता था,
लेकिन किसान को लगान देना पड़ सकता था।
ताना भगतों के लिए यही विरोधाभास था।
कानून कहता था कि किसान का विशेष काश्तकारी अधिकार है।
यदि मेरा अधिकार इतना पुराना है तो मेरे और मेरी जमीन के बीच जमींदार क्यों है?
यहां CNT Act की कानूनी उपलब्धि और ताना आंदोलन की राजनीतिक आकांक्षा के बीच अंतर दिखाई देता है।
‘मालगुजारी नहीं देंगे’
ताना आंदोलन के विकसित चरण की सबसे महत्वपूर्ण पहचान बनी—
मालगुजारी/लगान देने से इनकार।
प्रमुख ऐतिहासिक विवरण आंदोलन के प्रारंभिक विस्तार में no-rent campaign का उल्लेख करते हैं।
यह आर्थिक असहयोग का अत्यंत शक्तिशाली रूप था।
किसान जमींदार पर हमला नहीं कर रहा था।
वह उसकी संपत्ति नष्ट नहीं कर रहा था।
यह ‘न करना’ ही उसकी राजनीतिक कार्रवाई थी।
लगान-अस्वीकार क्यों क्रांतिकारी था?
औपनिवेशिक ग्रामीण व्यवस्था में लगान केवल जमींदार की निजी आय नहीं था।
उसके पीछे एक पूरी सत्ता-श्रृंखला थी।
राजस्व व्यवस्था राज्य को आय देती थी।
राज्य उस व्यवस्था को कानून, अदालत और पुलिस से संरक्षित करता था।
इसलिए लगान से इनकार अंततः राज्य की संरचना तक पहुंचता था।
किसान भले सीधे ब्रिटिश सम्राट को चुनौती देने की भाषा न बोले, लेकिन उसका आर्थिक व्यवहार औपनिवेशिक व्यवस्था को प्रभावित करता था।
बेगार : किसान की देह पर जमींदार का अधिकार
लगान से भी अधिक अपमानजनक अनुभव कई किसानों के लिए बेगार था।
बेगार केवल बिना मजदूरी काम करना नहीं थी।
उसमें अधीनता का सामाजिक संबंध निहित था।
जमींदार या प्रभावशाली व्यक्ति मान सकता था कि किसान—
उसकी यात्रा या दूसरे कार्य में श्रम उपलब्ध कराएगा।
ताना भगत आंदोलन ने इसी संबंध को चुनौती दी।
बेगार-विरोध का नैतिक आधार
ताना भगतों के लिए श्रम केवल आर्थिक वस्तु नहीं था।
शुद्ध जीवन का अर्थ था व्यक्ति स्वयं अपने आचरण को नियंत्रित करे।
यदि वह भूत-प्रेत के भय से मुक्त है,
तो वह जमींदार की जबरन श्रम-मांग से भी मुक्त हो सकता है।
इस तरह धार्मिक स्वतंत्रता और श्रम की स्वतंत्रता एक-दूसरे से जुड़ गईं।
यह आंदोलन का अत्यंत आधुनिक दिखाई देने वाला पक्ष है—
मनुष्य अपने श्रम पर स्वयं अधिकार रखता है।
जमींदार के खेत में हल चलाने से इनकार
आंदोलन का एक विशेष रूप था जमींदारों के खेतों में काम करने से इनकार।
प्रमुख विवरणों में जतरा द्वारा अनुयायियों को जमींदारों के खेतों में हल न चलाने तथा बाहरी लोगों या सरकार के लिए मजदूरी-कुली कार्य न करने की प्रेरणा देने का उल्लेख मिलता है।
इसका तत्काल आर्थिक प्रभाव पड़ सकता था।
यदि बड़ी संख्या में स्थानीय कृषक और मजदूर काम से इनकार करें तो जमींदार की खेती प्रभावित होती है।
यानी ताना भगतों ने बिना खेत जलाए और बिना जमींदार पर हमला किए उसकी आर्थिक शक्ति पर प्रहार किया।
‘काम बंद’ : हड़ताल का ग्रामीण रूप
आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था में मजदूर का प्रमुख हथियार हड़ताल है।
ताना भगतों के श्रम-अस्वीकार में कुछ हद तक इसी प्रकार का सिद्धांत दिखाई देता है।
हम उस व्यवस्था को अपना श्रम नहीं देंगे जिसे हम अन्यायी मानते हैं।
इसे आधुनिक ट्रेड यूनियन हड़ताल के बराबर मानना अनैतिहासिक होगा, लेकिन दोनों के पीछे शक्ति का समान बुनियादी सिद्धांत दिखाई देता है—
अपने खेत और जमींदार के खेत में अंतर
यह भी समझना आवश्यक है कि ताना भगत कृषि-विरोधी नहीं थे।
विरोध उस श्रम संबंध से था जिसमें किसान का श्रम किसी दूसरे के अधिकार में माना जाता था।
अपने परिवार और समुदाय की खेती करना तथा जमींदार के आदेश पर श्रम देना एक ही बात नहीं थी।
इस अंतर ने आंदोलन को किसान विद्रोह का स्पष्ट चरित्र दिया।
कुली और सरकारी श्रम से इनकार
ताना भगत आंदोलन का श्रम-अस्वीकार केवल जमींदार तक सीमित नहीं रहा।
प्रारंभिक विवरणों में सरकारी अथवा बाहरी लोगों के लिए कुली का काम न करने का संदेश भी मिलता है।
औपनिवेशिक प्रशासन को ग्रामीण क्षेत्रों में—
के लिए स्थानीय श्रम की आवश्यकता पड़ती थी।
यदि समुदाय सामूहिक रूप से सहयोग न करे तो शासन की स्थानीय पहुंच महंगी और कठिन हो जाती है।
असहयोग का मूल सिद्धांत
ताना भगत आंदोलन की राजनीति को एक सरल सूत्र में समझा जा सकता है—
अन्यायी सत्ता को हिंसा से नष्ट करने के बजाय उसे अपना सहयोग देना बंद कर दो।
यह सिद्धांत बाद में गांधीवादी असहयोग का केंद्रीय तत्व बनेगा।
लेकिन ताना भगत इसे अपने स्थानीय धार्मिक और कृषक संदर्भ में पहले से विकसित कर रहे थे।
यही कारण है कि भारतीय प्रतिरोध के इतिहास में यह आंदोलन विशेष स्थान रखता है।
क्या ताना भगतों ने खेती ही छोड़ दी थी?
कुछ औपनिवेशिक और बाद के विवरणों में आंदोलन के शुरुआती धार्मिक उत्साह के दौरान कृषि कार्य से दूरी या सामान्य आर्थिक गतिविधियों के बाधित होने का उल्लेख मिलता है।
धार्मिक पुनरुत्थानकारी आंदोलनों में कभी-कभी अनुयायी आसन्न दैवी परिवर्तन की अपेक्षा में सामान्य कामकाज की उपेक्षा कर सकते हैं।
लेकिन पूरे ताना आंदोलन को ‘खेती छोड़ने का आंदोलन’ कहना गलत होगा।
शोषक श्रम-संबंध और अन्यायी देनदारियों से मुक्ति।
जमींदार की प्रतिक्रिया
जमींदारों के लिए ताना आंदोलन केवल धार्मिक विचित्रता नहीं था।
और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करे—
तो जमींदारी अधिकार व्यवहार में कमजोर पड़ने लगता है।
इसलिए स्थानीय जमींदारों और उनके प्रतिनिधियों की शिकायतें प्रशासन तक पहुंचना स्वाभाविक था।
अब औपनिवेशिक राज्य को निर्णय करना था—
या कानून-व्यवस्था और राजस्व के लिए खतरा?
औपनिवेशिक राज्य की सीमा
ब्रिटिश शासन धार्मिक सुधार को एक सीमा तक सहन कर सकता था।
कोई समुदाय शराब छोड़ता है—राज्य चिंतित हो सकता था, विशेषकर आबकारी राजस्व के कारण, लेकिन इसे तुरंत विद्रोह नहीं कहा जाएगा।
कोई समुदाय बलि छोड़ता है—यह धार्मिक मामला है।
अब धार्मिक स्वतंत्रता राजकीय अधिकार से टकरा रही थी।
‘कानून-व्यवस्था’ की औपनिवेशिक भाषा
औपनिवेशिक प्रशासन अक्सर किसान और आदिवासी प्रतिरोधों को राजनीतिक न्याय के प्रश्न की बजाय ‘law and order’ की भाषा में दर्ज करता था।
इसका परिणाम यह होता है कि अभिलेखों में हमें ऐसे शब्द मिल सकते हैं—
इतिहासकार को इन शब्दों को शाब्दिक सत्य मानने के बजाय पूछना चाहिए—
जिसे प्रशासन ‘अशांति’ कह रहा था, किसान उसे क्या मान रहा था?
ताना भगत के लिए वह अन्याय से मुक्ति हो सकती थी।
जतरा भगत के विरुद्ध कार्रवाई
जतरा के नेतृत्व में अनुयायियों द्वारा जमींदारों और सरकार के लिए काम करने से इनकार ने प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया।
उन पर लोगों को काम छोड़ने के लिए प्रेरित करने और शांति भंग करने जैसे आरोप लगाए गए।
यहीं जतरा धार्मिक गुरु से औपनिवेशिक कानून की नजर में राजनीतिक समस्या बन गए।
उन्होंने कोई सरकारी भवन नहीं जलाया था।
क्योंकि उन्होंने आज्ञाकारिता रोकनी शुरू कर दी थी।
गिरफ्तारी के कालक्रम पर सावधानी
जैसा पिछले खंड में उल्लेख किया गया, जतरा की गिरफ्तारी और शुरुआती आंदोलन की सटीक तिथियों को लेकर द्वितीयक स्रोतों में असंगतियां हैं।
कुछ विवरण 1914 में ही गिरफ्तारी और मुकदमे की बात करते हैं; अन्य पुनर्कथनों में कालक्रम अलग मिलता है।
इसलिए बिना मूल जिला और न्यायालयी अभिलेख की पुष्टि के किसी एक दिन को पूर्ण निश्चितता से स्थापित करना उचित नहीं होगा।
धार्मिक प्रचार → श्रम-अस्वीकार → जमींदारी शिकायत → प्रशासनिक हस्तक्षेप → जतरा और सहयोगियों पर कार्रवाई।
सजा का उद्देश्य : व्यक्ति नहीं, उदाहरण
औपनिवेशिक ग्रामीण शासन में आंदोलनकारी नेता को दंडित करने का एक उद्देश्य यह भी था कि बाकी गांवों को संदेश मिले।
और राज्य कोई प्रतिक्रिया न दे, तो यह संदेश तेजी से फैल सकता था।
इसलिए दमन का लक्ष्य केवल जतरा नहीं था।
असहयोग को अनुकरणीय मॉडल बनने से रोकना।
लेकिन इतिहास में अक्सर दमन का उलटा परिणाम होता है।
नेता की गिरफ्तारी उसके अनुयायियों की दृष्टि में उसकी वैधता बढ़ा सकती है।
आंदोलन क्यों समाप्त नहीं हुआ?
यदि ताना आंदोलन केवल जतरा के व्यक्तिगत आध्यात्मिक करिश्मे पर निर्भर होता तो उनकी गिरफ्तारी के बाद समाप्त हो जाना चाहिए था।
इसका कारण था कि आंदोलन ने तब तक तीन टिकाऊ आधार बना लिए थे—
इन तीनों का मेल किसी एक नेता की अनुपस्थिति में भी आंदोलन को जीवित रख सकता था।
नए नेतृत्व का उदय
जतरा के बाद आंदोलन में दूसरे स्थानीय नेता और गुरु सामने आए।
अलग-अलग क्षेत्रों में नेतृत्व के नए केंद्र बने।
यही वह प्रक्रिया थी जिसके कारण ताना आंदोलन चिंगरी और बिशुनपुर की सीमाओं से बाहर निकल सका।
यहां आंदोलन का चरित्र भी बदलने लगा।
अब वह केवल ‘जतरा का संदेश’ नहीं था।
वह ताना समुदाय का कार्यक्रम बन रहा था।
आंदोलन का प्रसार और किसान नेटवर्क
ताना आंदोलन का प्रसार समझने के लिए आधुनिक संचार की कल्पना नहीं करनी चाहिए।
बड़े पैमाने पर छपा साहित्य भी नहीं।
पड़हा और दूसरे पारंपरिक संपर्कों से।
यही ग्रामीण नेटवर्क आंदोलन का संचार तंत्र था।
प्रार्थना सभा से किसान पंचायत तक
ताना भगतों की सामूहिक धार्मिक सभाओं का राजनीतिक महत्व बढ़ने लगा।
जब लोग एक जगह एकत्र होते हैं तो केवल प्रार्थना नहीं होती।
इस प्रकार धार्मिक सभा अनौपचारिक किसान पंचायत का काम करने लगती है।
यह किसी आंदोलन के संगठनात्मक विकास का निर्णायक चरण है।
व्यक्तिगत इनकार से सामूहिक प्रतिज्ञा
किसान अकेला लगान न दे तो उसकी जमीन कुर्क हो सकती है।
अकेला बेगार से मना करे तो उसे दंडित किया जा सकता है।
लेकिन यदि समुदाय सामूहिक निर्णय ले—
कोई नहीं देगा। कोई नहीं जाएगा। कोई काम नहीं करेगा।
ताना भगत आंदोलन ने धार्मिक अनुशासन के माध्यम से इसी सामूहिकता का निर्माण किया।
हिंसा का प्रश्न
यहां आंदोलन की एक बड़ी विशिष्टता सामने आती है।
छोटानागपुर के पूर्ववर्ती अनेक विद्रोहों में हिंसक टकराव हुआ था।
ताना भगत आंदोलन का मुख्य हथियार अलग था—
यह कहना उचित नहीं होगा कि आंदोलन के हर चरण और हर स्थानीय घटना में कभी कोई तनाव या हिंसा नहीं हुई।
लेकिन उसकी वैचारिक और संगठनात्मक दिशा हिंसक प्रतिशोध की तुलना में असहयोग और अहिंसक अनुशासन की ओर थी।
यही आगे गांधीवाद से उसके संबंध की आधारभूमि बनी।
क्या यह वर्ग संघर्ष था?
ताना आंदोलन में स्पष्ट आर्थिक विरोध मौजूद था—
श्रम देने वाला बनाम श्रम पर दावा करने वाला,
लगान देने वाला बनाम लगान लेने वाला।
इस अर्थ में उसमें वर्गीय तत्व स्पष्ट है।
लेकिन इसे केवल आधुनिक मार्क्सवादी अर्थ में वर्ग संघर्ष कहना अधूरा होगा।
क्योंकि आंदोलन की चेतना धार्मिक थी।
भूमि-अधिकार पूर्वजों और धर्मेश से जुड़ा था।
वर्ग, समुदाय, धर्म और औपनिवेशिक सत्ता
क्या यह केवल आदिवासी आंदोलन था?
इसका मूल सामाजिक आधार उरांव समुदाय था और इसकी धार्मिक भाषा विशिष्ट उरांव संदर्भ से निकली थी।
इसलिए उसकी आदिवासी पहचान को कम करके नहीं देखा जा सकता।
व्यापक भारतीय किसान प्रश्न से जुड़ती थीं।
यही कारण है कि ताना भगत आंदोलन भारतीय किसान आंदोलनों के इतिहास में भी स्थान रखता है।
वह एक साथ आदिवासी और कृषक आंदोलन था।
लगान न देना : राज्य को चुनौती कैसे?
औपनिवेशिक राज्य केवल सेना और पुलिस पर नहीं चलता।
और राजस्व व्यवस्था तभी चलती है जब नीचे के लोग भुगतान करें।
इसलिए सामूहिक कर-अस्वीकार का राजनीतिक अर्थ बहुत गहरा है।
किसान यह खोज रहा था कि सत्ता की शक्ति केवल बंदूक में नहीं होती—
उसकी शक्ति हमारी आज्ञाकारिता में भी होती है।
यदि आज्ञाकारिता वापस ले ली जाए तो सत्ता की लागत बढ़ती है।
यही सिद्धांत आगे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में असहयोग और सविनय अवज्ञा का केंद्रीय हथियार बनेगा।
ताना भगत और बाद का खेड़ा
1918 के खेड़ा सत्याग्रह में किसानों ने प्रतिकूल फसल परिस्थितियों में राजस्व न देने की सामूहिक रणनीति अपनाई।
ताना भगतों का आंदोलन उससे पहले शुरू हो चुका था।
खेड़ा में कानूनी राजस्व-छूट की मांग और गांधी–पटेल नेतृत्व का संगठित सत्याग्रह था।
ताना आंदोलन में धार्मिक-सामुदायिक भूमि-अधिकार और जमींदारी–औपनिवेशिक सत्ता की वैधता पर अधिक मूलभूत प्रश्न था।
इसलिए दोनों को एक जैसा नहीं कहा जा सकता।
लेकिन तुलना एक महत्वपूर्ण भारतीय परंपरा दिखाती है—
राजस्व-अस्वीकार किसान की राजनीतिक शक्ति का बड़ा साधन बन रहा था।
ताना भगत और बारदोली
1928 के बारदोली सत्याग्रह में भी किसानों ने बढ़े हुए भू-राजस्व का सामूहिक भुगतान रोक दिया।
वह अत्यंत व्यवस्थित, दस्तावेज-आधारित और राजनीतिक रूप से परिपक्व आंदोलन था।
ताना भगत उससे चौदह वर्ष पहले ग्रामीण असहयोग की एक अलग परंपरा विकसित कर चुके थे।
इसलिए भारतीय किसान प्रतिरोध के इतिहास में ताना आंदोलन को गांधीवादी आंदोलनों की केवल ‘स्थानीय शाखा’ मानना उलटा कालक्रम होगा।
उसकी अपनी पूर्व-गांधीवादी जड़ें थीं।
ताना भगत और बिरसा : हथियार बदल गया
बिरसा उलगुलान और ताना भगत आंदोलन दोनों में भूमि और बाहरी सत्ता का प्रश्न मौजूद था।
लेकिन संघर्ष-पद्धति में महत्वपूर्ण अंतर आया।
उलगुलान के अंतिम चरण में औपनिवेशिक सत्ता से सशस्त्र संघर्ष हुआ।
यह प्रतिरोध की तकनीक में बड़ा परिवर्तन था।
क्या ताना भगत सचमुच ‘कर नहीं देते थे’?
ताना भगत इतिहास के अलग-अलग चरणों में लगान और कर-अस्वीकार के अलग रूप दिखाई देते हैं।
1914–19 के प्रारंभिक चरण को 1920 के दशक के गांधीवादी असहयोग और बाद की कर-अस्वीकार गतिविधियों के साथ मिला देना उचित नहीं है।
इसलिए प्रत्येक काल में हमें अलग देखना होगा—
कितने गांवों ने वास्तव में भुगतान रोका,
आगे की विस्तृत समयरेखा में इन स्तरों को अलग रखा जाएगा।
आंदोलन की सीमा : आर्थिक कीमत
जमींदार के खेत में काम न करने का अर्थ आय खोना भी हो सकता था।
लगान न देने पर कानूनी कार्रवाई का खतरा था।
बेगार से इनकार पर दबाव या दंड हो सकता था।
आर्थिक कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना।
यहीं धार्मिक अनुशासन की उपयोगिता सामने आई।
ताना भगतों की सामुदायिक आस्था उन्हें इस कीमत को सहने की मानसिक शक्ति देती थी।
धर्म आर्थिक प्रतिरोध की शक्ति कैसे बना?
सामान्य आर्थिक आंदोलन में किसान गणना कर सकता है—
लेकिन धार्मिक विश्वास आंदोलन को अलग प्रकार की दृढ़ता दे सकता है।
यदि अनुयायी मानता है कि उसका संघर्ष धर्मेश की इच्छा के अनुरूप है, तो आर्थिक दंड उसकी आस्था को तोड़ने के बजाय मजबूत भी कर सकता है।
यही कारण है कि औपनिवेशिक शासन के लिए धार्मिक-कृषक आंदोलनों को नियंत्रित करना कठिन था।
वैधता की दो प्रतिस्पर्धी व्यवस्थाएं
अब छोटानागपुर में दो प्रकार की वैधता आमने-सामने थीं।
औपनिवेशिक-जमींदारी व्यवस्था कहती थी—
इसलिए कानून और नैतिकता के बीच संघर्ष पैदा हुआ।
‘समानांतर सत्ता’ का बीज
ताना भगतों ने 1914 में कोई औपचारिक समानांतर सरकार स्थापित नहीं की थी।
इसलिए उन्हें तत्काल ‘समानांतर राज्य’ कहना अतिशयोक्ति होगी।
लेकिन समानांतर नैतिक सत्ता का बीज अवश्य मौजूद था।
परंपरागत धार्मिक अधिकारी कहता है—बलि दो।
इस ‘नहीं’ के पीछे अब एक वैकल्पिक अधिकार खड़ा था।
जतरा भगत की गिरफ्तारी, मुकदमा और आंदोलन का विकेंद्रीकरण
औपनिवेशिक दमन, जेल से वापसी, जतरा के अंतिम वर्षों का विवादित इतिहास और लिथो–मंगरा–सिबू–माया जैसे स्थानीय नेतृत्व के माध्यम से ताना आंदोलन का विस्तार
ताना भगत आंदोलन के इतिहास में 1914 से 1919 का काल केवल दमन की कहानी नहीं है। यह उस प्रक्रिया का इतिहास है जिसमें एक युवा धार्मिक सुधारक के करिश्मे पर आधारित आंदोलन उसके जेल जाने के बाद टूटने के बजाय बहु-केंद्रीय, गांव-आधारित और लगातार नए नेतृत्व पैदा करने वाला आंदोलन बन गया।
यही ताना आंदोलन की असाधारण शक्ति थी।
औपनिवेशिक प्रशासन जतरा भगत को गिरफ्तार कर सकता था।
लेकिन वह उस विचार को आसानी से समाप्त नहीं कर सकता था जो गांवों में फैल चुका था—
मद्यत्याग करो। अन्यायी बेगार मत करो। जमींदार के लिए जबरन श्रम मत दो। अपनी भूमि को ईश्वर और पूर्वजों की देन समझो। और अन्यायपूर्ण सत्ता की आज्ञाकारिता को धर्म मत मानो।
1914 से 1919 के बीच ताना भगत आंदोलन बार-बार दबाया गया, बार-बार उसका नेतृत्व बदला, उसकी शिक्षाएं भी बदलीं—लेकिन आंदोलन समाप्त नहीं हुआ। इतिहासकार संगीता दासगुप्ता इसी प्रवाह को रेखांकित करती हैं: नेता आते और हटते रहे, आंदोलन कभी तेज और कभी मंद हुआ, किंतु ताना समुदाय अपने सामाजिक संसार को पुनर्गठित करने का प्रयास जारी रखता रहा।
जतरा भगत की गिरफ्तारी : धर्म कब ‘अपराध’ बन गया?
ताना आंदोलन की शुरुआत धार्मिक सुधार से हुई थी।
लेकिन जैसे ही जतरा भगत ने अनुयायियों को—
बाहरी लोगों और सरकार के लिए कुली-मजदूरी न करने
और आगे लगान के अधिकार को चुनौती देने की दिशा में प्रेरित किया, औपनिवेशिक प्रशासन की दृष्टि बदल गई।
वे ग्रामीण श्रम व्यवस्था को बाधित करने वाले व्यक्ति माने जाने लगे।
यह बिंदु औपनिवेशिक सत्ता के स्वभाव को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
राज्य को जतरा की प्रार्थना से उतनी समस्या नहीं थी जितनी उनके अनुयायियों के आज्ञा न मानने से थी।
23 अप्रैल 1914 : एक महत्वपूर्ण किंतु विवाद-संभावित तिथि
एक प्रभावशाली द्वितीयक विवरण के अनुसार जतरा भगत और उनके प्रमुख अनुयायियों को 23 अप्रैल 1914 को गिरफ्तार किया गया। आरोप था कि वे आदिवासियों को जमींदारों और सरकार के लिए काम न करने के लिए प्रेरित कर रहे थे और इससे सार्वजनिक शांति को खतरा पैदा हो रहा था। मामला उपखंडीय न्यायालय में चला और उन्हें कारावास दिया गया।
लेकिन यहां सावधानी अत्यंत आवश्यक है।
इसी इतिहासलेखन में अप्रैल 1914 को जतरा के दैवी अनुभव और आंदोलन की शुरुआत का समय भी बताया जाता है।
और गिरफ्तारी भी 23 अप्रैल बताई जाए,
तो घटनाओं का विस्तार अत्यंत तीव्र रहा होगा।
यह असंभव नहीं है, लेकिन मूल जिला और न्यायालयी अभिलेखों की पुनः जांच के बिना दिन-प्रतिदिन की पूर्ण निश्चित समयरेखा बनाना सुरक्षित नहीं है।
इसलिए हमारी आगे की मास्टर समयरेखा में 23 अप्रैल 1914 को ‘प्रमुख द्वितीयक स्रोत में उल्लिखित गिरफ्तारी तिथि’ के रूप में दर्ज करना अधिक उचित होगा, न कि बिना टिप्पणी के अंतिम निर्विवाद तथ्य की तरह।
अदालत में वास्तविक प्रश्न क्या था?
औपनिवेशिक अदालत के लिए जतरा भगत की धार्मिक मान्यता केंद्रीय प्रश्न नहीं थी।
क्या उन्होंने लोगों को काम छोड़ने के लिए प्रेरित किया?
क्या इससे जमींदारों के आर्थिक हित प्रभावित हुए?
क्या उनका प्रचार सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा था?
यानी धार्मिक आंदोलन को कानून ने आर्थिक प्रभाव के आधार पर राजनीतिक रूप दिया।
यही लगभग हर कृषक प्रतिरोध में दिखाई देता है।
लेकिन जैसे ही विश्वास कर, श्रम या संपत्ति-संबंध बदलता है, राज्य हस्तक्षेप करता है।
ताना भगतों का अपराध : ‘सहयोग वापस लेना’
जतरा भगत पर आरोपों का सार यदि औपनिवेशिक कानूनी भाषा से बाहर निकालें तो वह बेहद सरल था—
उन्होंने किसानों से कहा था कि अन्यायी व्यवस्था को अपना श्रम मत दो।
यही ताना भगत आंदोलन की राजनीतिक मौलिकता थी।
क्योंकि साम्राज्य केवल हिंसा से नहीं चलता।
ताना भगतों ने इसी सामान्य सहयोग को रोकना शुरू किया।
गिरफ्तारी का सामाजिक संदेश
औपनिवेशिक दमन का लक्ष्य केवल अभियुक्त को जेल भेजना नहीं होता था।
जो व्यक्ति लोगों को लगान या श्रम से रोकता है, वह राज्य की शक्ति का सामना करेगा।
इस अर्थ में जतरा की गिरफ्तारी एक व्यक्ति की सजा से अधिक थी।
वह सामुदायिक अनुशासन तोड़ने की औपनिवेशिक कोशिश थी।
लेकिन उसका परिणाम उलटा भी हो सकता था।
अनुयायियों की दृष्टि में जेल जाना जतरा की नैतिक प्रतिष्ठा बढ़ा सकता था।
जो व्यक्ति अपने उपदेश के लिए दंड सहता है, उसका संदेश अधिक पवित्र प्रतीत हो सकता है।
जेल से रिहाई : 2 जून 1915
एक महत्वपूर्ण इतिहासलेखकीय परंपरा जतरा भगत की रिहाई की तिथि 2 जून 1915 बताती है। यह तिथि कई बाद के अध्ययनों में दोहराई गई है।
इसी विवरण के अनुसार रिहाई के बाद जतरा ने सक्रिय नेतृत्व छोड़ दिया।
यहीं से ताना भगत इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ शुरू होता है।
यदि आंदोलन केवल जतरा का व्यक्तिगत संप्रदाय होता तो 1915 में उसका पतन हो जाना चाहिए था।
और आंदोलन 1919 में फिर बड़ी शक्ति के साथ उभरा।
क्या जतरा ने वास्तव में आंदोलन छोड़ दिया था?
कुछ अकादमिक विवरण बताते हैं कि जेल से रिहाई के बाद जतरा का करिश्माई प्रभाव कमजोर पड़ा और उन्होंने नेतृत्व छोड़ दिया।
लेकिन आधुनिक स्मारक और लोकप्रिय साहित्य में एक अलग कथा मिलती है—
रिहाई के बाद शारीरिक रूप से टूट गए,
और थोड़े समय बाद उनकी मृत्यु हो गई।
भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के डिजिटल जिला भंडार में भी कहा गया है कि 1914 में उनकी गिरफ्तारी हुई और जेल से रिहा होने के बाद उनकी अचानक मृत्यु हो गई।
वहीं परीक्षा-तैयारी और लोकप्रिय झारखंडी साहित्य में कई बार गिरफ्तारी 1916, लगभग डेढ़ वर्ष की सजा, 1917 में रिहाई और कुछ ही महीनों बाद मृत्यु जैसी समयरेखा मिलती है।
समस्या यह है कि ये विवरण अकादमिक शोध में मिलने वाली 1914 की गिरफ्तारी और 2 जून 1915 की रिहाई से मेल नहीं खाते।
जतरा भगत की मृत्यु : विवाद क्यों महत्वपूर्ण है?
यह केवल तारीख का छोटा विवाद नहीं है।
यदि जतरा 1915 के बाद जीवित रहे और बाद में गांधीवादी आंदोलन से जुड़े, तो ताना इतिहास में उनकी भूमिका एक प्रकार की होगी।
यदि वे जेल से रिहाई के तुरंत बाद मर गए, तो गांधीवादी चरण में उनकी प्रत्यक्ष भूमिका संभव नहीं होगी।
कुछ द्वितीयक विवरण यह भी कहते हैं कि जतरा बाद में गांधी के संपर्क में आए और असहयोग आंदोलन में शामिल हुए।
लेकिन दूसरी परंपरा उन्हें 1916–17 तक मृत मानती है।
दोनों कथाएं एक साथ सत्य नहीं हो सकतीं।
इसलिए हमारे शोध में बाद में प्राथमिक अभिलेख—विशेषकर जिला प्रशासन, न्यायालय, मिशनरी रिकॉर्ड और संभव हो तो पारिवारिक/स्थानीय स्मृतियों—की सहायता से इस प्रश्न को अलग से जांचना आवश्यक होगा।
अभी सुरक्षित निष्कर्ष केवल इतना है—
1915 के बाद आंदोलन का प्रभावी नेतृत्व जतरा के हाथ में नहीं रहा।
इसके बाद ताना आंदोलन नए गुरुओं के हाथ में चला गया।
इतिहास और स्मृति के दो जतरा
जतरा भगत के बारे में वास्तव में दो समानांतर छवियां विकसित हुई हैं।
ऐतिहासिक जतरा, जिन्हें औपनिवेशिक अभिलेख और अकादमिक इतिहास एक धार्मिक सुधारक, श्रम-अस्वीकार के नेता और ताना संप्रदाय के संस्थापक के रूप में देखते हैं।
स्मृति के जतरा, जो झारखंड के स्वतंत्रता सेनानी, अहिंसा के अग्रदूत और ब्रिटिश-विरोधी आदिवासी नायक हैं।
लेकिन शोध में उन्हें मिला देना उचित नहीं होगा।
ताना भगत इतिहास की विशिष्टता को समझने के लिए किंवदंती का सम्मान करते हुए भी दस्तावेजी अंतर बनाए रखना चाहिए।
जतरा के हटने के बाद सबसे बड़ा प्रश्न
1915 के बाद आंदोलन के सामने मूल संकट था—
जतरा की सत्ता किसी संगठनात्मक संविधान से नहीं आई थी।
उनका अधिकार करिश्माई और धार्मिक था।
इसलिए उनके हटने के बाद किसी उपाध्यक्ष का स्वतः अध्यक्ष बन जाना संभव नहीं था।
लिथो उरांव : एक महिला नेतृत्व का उदय
जतरा के बाद आंदोलन की नेतृत्व-श्रृंखला में लिथो उरांव का नाम मिलता है।
यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि ताना धार्मिक करिश्मा केवल पुरुष नेतृत्व तक सीमित नहीं था।
प्रमुख विवरण के अनुसार लिथो उरांव ने स्वयं को देवी-सत्ता से संपन्न घोषित किया और जतरा जैसी धार्मिक शिक्षाओं का प्रचार किया। उन्हें भी गिरफ्तार किया गया और रिहाई के बाद उनका प्रभाव धीरे-धीरे कम हो गया।
यह प्रसंग ताना आंदोलन के इतिहास में महिला नेतृत्व की आरंभिक उपस्थिति को सामने लाता है।
लिथो को केवल ‘जतरा की उत्तराधिकारी’ क्यों न कहें?
लिथो की भूमिका को केवल इस वाक्य में समेटना कि ‘जतरा के बाद एक महिला गुरु आई’ पर्याप्त नहीं होगा।
उनका नेतृत्व आंदोलन के चरित्र की एक गहरी विशेषता दिखाता है—
धार्मिक वैधता पद से नहीं, दैवी दावे और अनुयायियों की स्वीकृति से आती थी।
इसलिए कोई स्त्री भी आंदोलन का केंद्रीय धार्मिक व्यक्तित्व बन सकती थी।
औपनिवेशिक ग्रामीण समाज की सामान्य पितृसत्तात्मक सत्ता-संरचनाओं के बीच यह उल्लेखनीय बात थी।
महिला नेतृत्व का सामाजिक अर्थ
यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि ताना आंदोलन ने लैंगिक समानता की आधुनिक राजनीतिक विचारधारा विकसित कर ली थी।
लेकिन महिला गुरु का स्वीकार होना स्वयं महत्वपूर्ण था।
धार्मिक आंदोलन कई बार ऐसी सामाजिक भूमिकाएं खोल देते हैं जो सामान्य सामाजिक संरचना में सीमित होती हैं।
यदि किसी महिला को ईश्वर का संदेश प्राप्त करने वाली माना जाए, तो उसकी धार्मिक वैधता पारंपरिक लैंगिक सीमाओं से ऊपर जा सकती है।
ताना भगत आंदोलन में यही संभावना दिखाई देती है।
लिथो की गिरफ्तारी : दमन का वही चक्र
जतरा के साथ जो हुआ, लिथो के साथ भी लगभग वही क्रम दोहराया गया—
औपनिवेशिक शासन की रणनीति स्पष्ट थी—
लेकिन इससे आंदोलन केवल नए नेतृत्व की ओर बढ़ता गया।
नवंबर 1915 : मंगर/मंगोर उरांव
लिथो के बाद मंगर या मंगोर उरांव का नाम सामने आता है।
नाम की वर्तनी स्रोतों में अलग-अलग मिलती है—Mangor, Mangar आदि।
एक प्रमुख विवरण नवंबर 1915 में उनके नेतृत्व संभालने का उल्लेख करता है।
मंगर ने भी आंदोलन को नया जीवन देने की कोशिश की।
लेकिन औपनिवेशिक हस्तक्षेप से वे भी नहीं बच सके।
उनकी गिरफ्तारी और प्रभाव के क्षय के साथ एक बार फिर ताना आंदोलन का केंद्रीय नेतृत्व कमजोर हुआ।
बार-बार गुरु क्यों बदल रहे थे?
पहली नजर में यह आंदोलन की कमजोरी लग सकती है।
लेकिन इसे दूसरे दृष्टिकोण से देखें तो यही उसकी शक्ति थी।
आंदोलन में कोई एक केंद्रीय संगठन नहीं था जिसे राज्य प्रतिबंधित कर समाप्त कर सके।
वह अनेक गांवों में धार्मिक विश्वास की तरह फैला था।
इसलिए हर दमन के बाद कोई नया व्यक्ति कह सकता था—
करिश्माई उत्तराधिकार की संरचना
ताना आंदोलन की प्रारंभिक राजनीति को समझने के लिए ‘उत्तराधिकार’ शब्द आधुनिक संगठनात्मक अर्थ में नहीं लेना चाहिए।
नया नेता अपने धार्मिक करिश्मे के आधार पर अनुयायी प्राप्त करता था।
इसलिए नेतृत्व प्रतिस्पर्धी, अस्थिर और बहु-केंद्रीय था।
लेकिन यही कारण था कि औपनिवेशिक शासन उसे सिर काटकर समाप्त नहीं कर सकता था।
विकेंद्रीकरण : आंदोलन की अनजानी सुरक्षा व्यवस्था
जतरा की गिरफ्तारी ने शायद अनजाने में आंदोलन को अधिक टिकाऊ बनाया।
यदि वे लंबे समय तक अकेले सर्वोच्च नेता बने रहते, तो आंदोलन उन्हीं पर निर्भर रह सकता था।
लेकिन जल्दी गिरफ्तारी ने अनुयायियों को स्वयं स्थानीय नेतृत्व विकसित करने के लिए मजबूर किया।
गांवों में स्थानीय प्रचारक पैदा हुए,
और आंदोलन की पहचान किसी एक व्यक्ति से अधिक महत्वपूर्ण बन गई।
संदेशवाहक और रात की सभाएं
आंदोलन के विस्तार में स्थानीय संदेशवाहकों की भूमिका महत्वपूर्ण थी।
बाद के शोध में रांची क्षेत्र से संदेशवाहकों के पालामू के उरांव गांवों में पहुंचने और रात में सभाएं आयोजित करने के उल्लेख मिलते हैं।
दिन का कृषि कार्य समाप्त होने के बाद लोग एकत्र हो सकते थे।
प्रशासन की निगरानी से कुछ दूरी मिलती थी।
गीत और धार्मिक संदेश सामूहिक भावना पैदा करते थे।
और एक गांव से दूसरे गांव तक समाचार पहुंचते थे।
आंदोलन का विस्तार रांची से बाहर
रांची जिला जनगणना पुस्तिका ताना भगत आंदोलन को 1914 में बिशुनपुर क्षेत्र से शुरू हुए धार्मिक आंदोलन के रूप में दर्ज करती है और बताती है कि उससे निकला असहयोग जल्द ही पालामू और हजारीबाग तक फैल गया।
यह भौगोलिक विस्तार अत्यंत महत्वपूर्ण था।
अब आंदोलन केवल जतरा के अपने सामाजिक परिवेश तक सीमित नहीं था।
वह छोटानागपुर के विभिन्न उरांव समूहों को जोड़ने लगा था।
यहीं से ‘ताना भगत’ एक क्षेत्रीय पहचान बनती है।
1916 तक चाय बागानों में ताना प्रभाव
आंदोलन का एक और उल्लेखनीय प्रसार उत्तर बंगाल के चाय बागानों में हुआ।
1916 तक जलपाईगुड़ी क्षेत्र के चाय बागानों में कार्यरत प्रवासी उरांव मजदूरों के बीच ताना विचार पहुंचने के उल्लेख मिलते हैं।
यह महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि अब आंदोलन कृषक गांव से निकलकर प्रवासी मजदूर संसार में प्रवेश कर रहा था।
उरांव श्रमिक छोटानागपुर से चाय बागानों में गए थे।
लेकिन उनके साथ गांव की धार्मिक-सामुदायिक स्मृति भी गई।
ताना संदेश ने इस प्रवासी नेटवर्क का उपयोग किया।
प्रवास आंदोलन को समाप्त नहीं करता, फैलाता है
आमतौर पर माना जा सकता है कि गांव छोड़कर मजदूरी के लिए दूर जाने वाला आदिवासी अपने पुराने सामाजिक आंदोलन से कट जाएगा।
एक मजदूर छोटानागपुर से चाय बागान गया।
गीत, धार्मिक कथाएं और आंदोलन की बातें फैलने लगीं।
इस तरह उपनिवेशवादी श्रम-प्रवास ने अनजाने में प्रतिरोध का नेटवर्क भी बनाया।
प्रथम विश्वयुद्ध और अफवाहों की दुनिया
1914–18 का काल प्रथम विश्वयुद्ध का था।
दूर यूरोप में ब्रिटेन जर्मनी से लड़ रहा था।
लेकिन युद्ध की खबरें छोटानागपुर तक पहुंच रही थीं।
ग्रामीण समाज में वे अखबारी राजनीतिक विश्लेषण के रूप में नहीं, बल्कि—
ताना गीतों और कल्पनाओं में ‘जर्मन बाबा’ या जर्मन सम्राट से जुड़ी उम्मीदों के उल्लेख भी मिलते हैं।
जर्मन विजय की कल्पना क्यों आकर्षक थी?
ताना भगतों का लक्ष्य जर्मन साम्राज्यवाद को राजनीतिक रूप से समर्थन देना नहीं था।
ग्रामीण कल्पना अधिक सरल हो सकती थी—
यदि अंग्रेजों का कोई शक्तिशाली शत्रु उन्हें हरा देगा, तो अंग्रेजी राज समाप्त हो सकता है।
और यदि अंग्रेजी राज समाप्त होगा तो शायद उरांव राज लौटेगा।
इस प्रकार विश्वयुद्ध स्थानीय सहस्राब्दीवादी कल्पना में प्रवेश कर गया।
यह हमें दिखाता है कि ग्रामीण समाज वैश्विक राजनीति से ‘कटा’ नहीं था।
औपनिवेशिक सरकार का संदेह
ब्रिटिश शासन के लिए यह विशेष रूप से चिंताजनक था।
प्रथम विश्वयुद्ध के समय जर्मन शत्रु था।
यदि किसी आदिवासी आंदोलन के गीतों या भविष्यवाणियों में जर्मन शक्ति का उल्लेख मिलता है, तो प्रशासन उसे केवल धार्मिक कल्पना नहीं मानेगा।
इस प्रकार स्थानीय धार्मिक आंदोलन वैश्विक युद्ध की सुरक्षा-राजनीति में फंस गया।
हर ताना घटना अहिंसक नहीं थी
ताना भगत आंदोलन की आज की स्मृति अत्यंत अहिंसक आंदोलन के रूप में है, और उसके मुख्य धार्मिक अनुशासन में अहिंसा का महत्वपूर्ण स्थान था।
लेकिन पूरे 1914–19 काल को बिना अपवाद पूर्णतः अहिंसक बताना इतिहास की जटिलता को मिटा देगा।
संगीता दासगुप्ता ने विशेष रूप से चेताया है कि आधुनिक राज्य-निर्मित कथा उन घटनाओं को पीछे धकेल देती है जो ताना भगतों को स्वाभाविक और लगातार अहिंसक आंदोलन के रूप में प्रस्तुत करने वाली कथा में फिट नहीं बैठतीं।
1918 में सरगुजा के जमीरापाट क्षेत्र में उरांव और किसान समुदायों की एक हिंसक घटना को औपनिवेशिक अधिकारियों ने ताना प्रभाव से जोड़ा। वहां भविष्यवाणी, सामूहिक जुटान और हिंसा के विवरण मिलते हैं।
यही इतिहासलेखन की चुनौती है
राष्ट्रवादी स्मृति सरल कथा चाहती है—
ताना भगत पहले दिन से गांधी जैसे अहिंसक स्वतंत्रता सेनानी थे।
औपनिवेशिक अभिलेख दूसरी सरल कथा बना सकते हैं—
वे अंधविश्वासी, अशांत और कानून तोड़ने वाले आदिवासी थे।
मिलेनरियन अर्थात आसन्न आदर्श-राज की अपेक्षा थी,
और कभी-कभी विरोधाभासी प्रवृत्तियां भी थीं।
यही जटिलता आंदोलन को अधिक महत्वपूर्ण बनाती है।
1918 तक आंदोलन क्यों जीवित रहा?
क्योंकि उसकी समस्याएं भी जीवित थीं।
जब संरचनात्मक कारण बने रहें तो केवल नेता को हटाने से आंदोलन समाप्त नहीं होता।
1919 : आंदोलन फिर उभरता है
1919 में ताना गतिविधियों में नया उभार आया।
सिबू उरांव।
कुछ स्रोत उन्हें शिबू/सिबू के रूप में लिखते हैं।
उनका नेतृत्व ताना इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने आंदोलन को केवल पुनर्जीवित नहीं किया—
उसकी धार्मिक और सामाजिक दिशा में भी बदलाव किया।
1919 में सिबू के नए नेतृत्व के उभरने का उल्लेख अनेक अध्ययनों में मिलता है।
सिबू का दैवी दावा
सिबू उरांव ने भी स्वयं को दैवी आदेश से प्रेरित नेता बताया।
उनका दावा था कि भगवान ने उन्हें घर और परिवार छोड़कर संसार में घूमने तथा उसे सुधारने का आदेश दिया है।
वे कहते थे कि उरांव राज शीघ्र लौटने वाला है।
भगवान स्वयं उन्हें निर्देश भेजेंगे।
इस प्रकार जतरा की धार्मिक करिश्माई परंपरा समाप्त नहीं हुई थी।
‘उरांव राज’ फिर केंद्रीय विचार बना
सिबू के चरण में ‘उरांव राज’ की कल्पना अधिक स्पष्ट सामाजिक-आर्थिक अर्थ ग्रहण करती दिखाई देती है।
जमींदारों के बारे में यह भाव था कि वे कभी बाहरी और निर्बल आए थे, लेकिन अब इतने शक्तिशाली हो गए हैं कि उरांव और मुंडाओं पर शासन और अत्याचार करते हैं।
इसके विपरीत नई धार्मिक कल्पना कहती थी—
गांधी से पहले की अहिंसा और ताना भगतों का असहयोग
1914–20 में हिंसा-विरोध, कर-अस्वीकार, श्रम-अस्वीकार और नैतिक प्रतिरोध की स्वदेशी परंपरा — क्या ताना भगत ‘गांधी से पहले गांधीवादी’ थे?
ताना भगत आंदोलन के इतिहास का शायद सबसे आकर्षक और साथ ही सबसे अधिक सावधानी मांगने वाला प्रश्न यह है—
क्या ताना भगत गांधी से पहले गांधीवादी थे?
ताना आंदोलन 1914 में शुरू हुआ। गांधी दक्षिण अफ्रीका से स्थायी रूप से भारत जनवरी 1915 में लौटे। ताना भगतों ने आरंभिक दौर में ही हिंसा से दूरी, मद्यत्याग, आत्मशुद्धि, बेगार-विरोध, जमींदारों के लिए श्रम से इनकार और लगान-अस्वीकार जैसी प्रवृत्तियां विकसित कर ली थीं। रांची जिला जनगणना पुस्तिका भी 1914 में जतरा उरांव के आंदोलन से निकले असहयोग के पालामू और हजारीबाग तक फैलने का उल्लेख करती है।
1914 के ताना भगत गांधी का राजनीतिक कार्यक्रम नहीं चला रहे थे। वे ‘सत्याग्रह’ शब्द का वही दार्शनिक अर्थ नहीं प्रयोग कर रहे थे जो गांधी ने विकसित किया। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कार्यक्रम के अंतर्गत संगठित नहीं थे। उनकी अहिंसा का स्रोत उरांव धार्मिक सुधार, शुद्धता, जीव-हत्या के निषेध और अपने संसार को नए सिरे से व्यवस्थित करने की आकांक्षा में था।
ताना भगत गांधी से पहले ‘गांधीवादी’ नहीं थे; उन्होंने गांधी से स्वतंत्र एक ऐसी स्वदेशी नैतिक-असहयोगी राजनीति विकसित की थी, जिसके कई तत्व बाद में गांधीवाद से असाधारण रूप से मेल खा गए।
यही अंतर इस आंदोलन को भारतीय प्रतिरोध के इतिहास में विशेष महत्व देता है।
1914 और कालक्रम की निर्णायक कसौटी
और हिंसा के बजाय धार्मिक अनुशासन से प्रतिरोध कर रहे थे,
तो इसे 1920 के गांधीवादी असहयोग से उत्पन्न नहीं माना जा सकता।
ताना आंदोलन की आरंभिक असहयोगी चेतना की स्वतंत्र ऐतिहासिक उत्पत्ति स्वीकार करनी होगी।
लेकिन ‘अहिंसा’ शब्द का अर्थ दोनों के लिए एक जैसा नहीं था
गांधी के लिए अहिंसा एक व्यापक नैतिक और राजनीतिक दर्शन थी।
सत्य के आधार पर अन्याय का प्रतिरोध।
प्रतिद्वंद्वी को नष्ट करने के बजाय उसका नैतिक परिवर्तन।
ताना भगतों के प्रारंभिक धार्मिक संसार में अहिंसा इस व्यवस्थित गांधीवादी दर्शन के रूप में नहीं मिलती।
और अन्यायी सामाजिक संबंधों से असहयोग।
इसलिए दोनों में व्यवहारगत समानता थी, लेकिन वैचारिक स्रोत अलग थे।
पशुबलि-विरोध से हिंसा-विरोध तक
जतरा भगत के धार्मिक सुधार की शुरुआत में पशुबलि का विरोध महत्वपूर्ण था।
यह बात राजनीतिक हिंसा से अलग क्षेत्र की लग सकती है।
लेकिन धार्मिक नैतिकता में दोनों के बीच संबंध विकसित हो सकता था।
यदि शुद्ध जीवन हिंसा से दूरी की मांग करता है,
तो मनुष्य के विरुद्ध हिंसा को भी नैतिक रूप से नियंत्रित करने की जमीन बनती है।
ताना भगतों की प्रारंभिक अहिंसा को इसलिए केवल औपनिवेशिक राज्य के विरुद्ध रणनीति नहीं समझना चाहिए।
गांधी की अहिंसा राजनीतिक थी; ताना अहिंसा पहले धार्मिक थी
गांधी ने अहिंसा को राजनीतिक संघर्ष का व्यवस्थित सिद्धांत बनाया।
ताना भगतों के यहां धार्मिक नैतिकता ने धीरे-धीरे राजनीतिक परिणाम उत्पन्न किए।
धर्म → नैतिकता → सामाजिक अनुशासन → आर्थिक असहयोग → राजनीति।
यही ताना आंदोलन की विशिष्ट विकास-रेखा है।
‘नहीं’ कहना हिंसा का विकल्प कैसे बना?
किसी अन्यायी सत्ता के विरुद्ध सामान्य विद्रोही विकल्प हो सकता है—
यह छोटा-सा ‘नहीं’ वास्तव में सत्ता की संरचना पर गहरा प्रहार था।
क्योंकि उसने हिंसा की जगह आज्ञाकारिता वापस लेने को राजनीतिक हथियार बनाया।
असहयोग का सिद्धांत सत्ता के बारे में क्या बताता है?
असहयोग के पीछे एक अत्यंत गहरा राजनीतिक सिद्धांत छिपा है—
शासक अकेले शासन नहीं करता; शासित भी अपने सहयोग से शासन को संभव बनाते हैं।
जमींदार की खेती तभी चलेगी जब श्रमिक काम करेगा।
प्रशासन तभी स्थानीय स्तर पर सुचारु चलेगा जब गांव आदेश मानेगा।
ताना भगतों ने संभवतः इसे किसी राजनीतिक ग्रंथ में नहीं पढ़ा था।
उन्होंने इसे अपने जीवन में अनुभव किया।
इसलिए उन्होंने शक्ति की उस नस को पकड़ा जहां किसान स्वयं महत्वपूर्ण था।
बेगार न करना : निष्क्रियता नहीं, राजनीतिक कार्रवाई
ताना भगतों के श्रम-अस्वीकार को कभी-कभी केवल धार्मिक सनक या काम छोड़ देने के रूप में देखा गया।
लेकिन उसका सामाजिक अर्थ अधिक बड़ा था।
बेगार ग्रामीण पदानुक्रम का प्रतीक थी।
मैं बिना अपनी इच्छा के तुम्हारा काम नहीं करूंगा,
तो वह अपने श्रम को स्वतंत्र घोषित कर रहा है।
यह हिंसा के बिना सत्ता संबंध बदलने का प्रयास था।
राज्य के लिए यही सबसे असुविधाजनक था।
जमींदार की जमीन पर हल न चलाना
जतरा के आरंभिक संदेश में जमींदारों के खेतों में काम से दूरी का उल्लेख महत्वपूर्ण है। संगीता दासगुप्ता द्वारा औपनिवेशिक तथा मिशनरी स्रोतों के आधार पर पुनर्निर्मित ताना अतीत में अनुयायियों को कुली-मजदूरी छोड़ने, हल तोड़ने और जमींदारों को लगान न देने जैसी बातें दर्ज हैं।
इसे शाब्दिक रूप से हर गांव में समान रूप से लागू हुआ आदेश मानना उचित नहीं होगा।
शोषक व्यवस्था से अपनी उत्पादक शक्ति वापस लो।
लगान न देना : हिंसा के बिना संपत्ति-सत्ता को चुनौती
लगान-अस्वीकार ताना राजनीतिक व्यवहार का सबसे शक्तिशाली पहलू था।
उसकी आर्थिक सत्ता को चुनौती दी जा सकती थी।
यही सिद्धांत बाद में कई किसान आंदोलनों में दिखाई देगा।
लेकिन ताना भगतों का रास्ता उनसे पहले और अपनी विशिष्ट सामाजिक परिस्थिति से निकला था।
क्या यह ‘सत्याग्रह’ था?
लोकप्रिय साहित्य अक्सर ताना भगत आंदोलन को गांधी से पहले सत्याग्रह कहता है। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय का आधुनिक स्मारक-विवरण भी आंदोलन की नींव को अहिंसक बताता है और जबरन श्रम तथा राजस्व से इनकार को उसकी मुख्य विशेषताओं में रखता है।
लेकिन ‘सत्याग्रह’ शब्द को 1914 के ताना आंदोलन पर सीधे लागू करने में सावधानी चाहिए।
गांधी के लिए सत्याग्रह एक विशिष्ट नैतिक-दार्शनिक अवधारणा थी।
ताना भगतों के पास उस समय उस नाम या दर्शन की व्यवस्थित संरचना नहीं थी।
अहिंसक असहयोग, नैतिक प्रतिरोध या कर-अस्वीकार।
बाद के गांधीवादी चरण में इसे सत्याग्रह की भाषा में समझना अधिक स्वाभाविक हो गया।
बाद की स्मृति ने पहले के आंदोलन को गांधीवादी बना दिया
इतिहास में अक्सर बाद की सफलता अतीत की स्मृति को बदल देती है।
1920 के बाद ताना भगत गांधी के समर्पित अनुयायी बने।
कांग्रेस के कार्यक्रमों में भाग लिया।
अहिंसा को अधिक स्पष्ट राष्ट्रीय राजनीतिक भाषा मिली।
इस बाद के चरण ने 1914 के आंदोलन की स्मृति को भी प्रभावित किया।
अब जतरा को पीछे मुड़कर ‘गांधी से पहले गांधीवादी’ के रूप में देखा जाने लगा।
संगीता दासगुप्ता ने इसी प्रकार की बाद की सरल कथा के प्रति सावधान किया है। उनके अनुसार राज्य और राष्ट्रवादी स्मृति ने तानाओं को मूलतः और निरंतर अहिंसक समुदाय के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि औपनिवेशिक अभिलेख, मिशनरी स्रोत और स्थानीय घटनाएं कहीं अधिक जटिल तस्वीर देते हैं।
हर ताना घटना अहिंसक नहीं थी
यही इस खंड का सबसे आवश्यक संशोधन है।
लेकिन दस्तावेजी इतिहास इतनी पूर्णता से यह दावा स्वीकार नहीं करता।
1914–19 के व्यापक ताना प्रभाव से जुड़ी कुछ घटनाओं में हिंसा के तत्व मिलते हैं।
विशेषकर सरगुजा–जमीरापाट से जुड़ी 1918 की घटना को औपनिवेशिक प्रशासन ने ताना प्रभाव के संदर्भ में देखा। संगीता दासगुप्ता ने ऐसी घटनाओं का उपयोग यह दिखाने के लिए किया है कि बाद की ‘अनिवार्य अहिंसा’ वाली कथा कई विरोधाभासी अनुभवों को बाहर कर देती है।
बिरसा से ताना तक : हिंसा का प्रश्न
ताना भगतों से केवल पंद्रह वर्ष पहले छोटानागपुर ने बिरसा उलगुलान का सशस्त्र चरण देखा था।
लेकिन 1899–1900 में हिंसक टकराव हुआ।
ताना आंदोलन ने समान सामाजिक तनावों के बीच मुख्यतः अलग रणनीतिक दिशा पकड़ी।
राजस्व कर्मचारी पर हमला करने के बजाय—
यह प्रतिरोध की तकनीक में महत्वपूर्ण ऐतिहासिक बदलाव था।
क्या बिरसा की पराजय की स्मृति ने अहिंसा को जन्म दिया?
यह एक आकर्षक परिकल्पना है, लेकिन इसे प्रमाणित तथ्य की तरह नहीं कहा जा सकता।
उरांव समाज के सामने बिरसा उलगुलान के दमन की स्मृति निश्चित रूप से मौजूद रही होगी।
औपनिवेशिक राज्य की सैन्य शक्ति भी सबके सामने थी।
संभव है कि हिंसक विद्रोह की सीमाओं का अनुभव व्यापक क्षेत्रीय स्मृति में मौजूद रहा हो।
लेकिन हमारे पास ऐसा स्पष्ट प्रमाण नहीं कि जतरा ने कहा—
“बिरसा का मार्ग विफल हुआ, इसलिए अहिंसा अपनाओ।”
इसलिए ताना अहिंसा को केवल रणनीतिक सीख नहीं मानना चाहिए।
उसकी सबसे स्पष्ट जड़ उनके अपने धार्मिक सुधार में थी।
रणनीति या आस्था?
यहीं ताना भगतों और आधुनिक राजनीतिक आंदोलन के बीच एक अंतर दिखाई देता है।
अभी हमारी शक्ति कम है, इसलिए अहिंसा रणनीतिक रूप से लाभदायक है।
ताना भगतों के लिए अहिंसा केवल रणनीति नहीं थी।
इसलिए अहिंसा उनके लिए अधिक टिकाऊ पहचान बन सकती थी।
आत्मशुद्धि : दोनों परंपराओं की पहली बड़ी समानता
गांधी और ताना भगतों के बीच सबसे गहरी समानताओं में से एक थी—
राजनीतिक परिवर्तन से पहले आत्मपरिवर्तन।
गांधी के लिए स्वराज केवल अंग्रेजों को हटाना नहीं था।
व्यक्ति को अपने ऊपर शासन करना सीखना था।
ताना भगतों की भाषा अलग थी, लेकिन क्रम मिलता-जुलता था—
दोनों परंपराओं में राजनीतिक शक्ति आत्मसंयम से निकलती है।
मद्यत्याग : दूसरी बड़ी समानता
गांधी भारतीय समाज में शराब को नैतिक, आर्थिक और सामाजिक बुराई मानते थे।
उनका मद्यत्याग गांधी से संपर्क का परिणाम नहीं था।
वह 1914 के धार्मिक सुधार का हिस्सा था।
इसीलिए बाद में कांग्रेस की शराब-विरोधी गतिविधियां ताना भगतों को स्वाभाविक लगीं।
वे नए अनुशासन में प्रवेश नहीं कर रहे थे।
वे अपने पुराने अनुशासन को व्यापक राष्ट्रीय संदर्भ में देख रहे थे।
शाकाहार और जीव-दया
ताना भगतों का मांसाहार से परहेज और पशुबलि-विरोध गांधी की जीव-दया तथा शाकाहार से एक और स्पष्ट समानता पैदा करता था।
दासगुप्ता के अध्ययन में यह बिंदु विशेष रूप से सामने आता है कि बाद में गांधी की अहिंसा ताना भगतों की पहले से मौजूद शाकाहारी और धार्मिक जीवन-पद्धति से सहज मेल खाती थी।
यह संबंध राजनीतिक प्रचार से कहीं गहरा था।
गांधी की बात उनके अपने जीवन से सत्यापित होती दिखाई देती थी।
सादगी : तीसरी समानता
गांधी की सार्वजनिक छवि भी धीरे-धीरे—
इसलिए जब गांधी ताना भगतों की चेतना में प्रवेश करते हैं, वे किसी विलासी राष्ट्रीय नेता की तरह नहीं दिखाई देते।
वे ऐसे नेता दिखाई देते हैं जिसकी जीवनशैली उनके अपने धार्मिक आदर्श से मेल खाती है।
कर-अस्वीकार : चौथी समानता
ताना भगतों ने जमींदारी लगान और अन्य देनदारियों की वैधता पर प्रश्न उठाया।
गांधीवादी राजनीति भी आगे कर-अस्वीकार को वैध प्रतिरोध के साधन के रूप में अपनाएगी।
लेकिन दोनों के तर्क अलग हो सकते थे।
भूमि पर पूर्वजों और धर्मेश का नैतिक अधिकार।
अन्यायी कानून या असहनीय राजस्व मांग का अहिंसक उल्लंघन।
श्रम-अस्वीकार : गांधीवादी असहयोग से पहले
रांची जिला जनगणना पुस्तिका ताना आंदोलन को धार्मिक आंदोलन बताते हुए साफ कहती है कि जतरा और उनके साथियों द्वारा शुरू असहयोग रांची से बाहर भी फैल गया।
इससे यह दावा मजबूत होता है कि ताना प्रतिरोध में non-cooperation का वास्तविक तत्व गांधी के अखिल भारतीय असहयोग आंदोलन से पहले मौजूद था।
औपनिवेशिक या बाद के अंग्रेजी लेखन में ‘non-cooperation’ शब्द का प्रयोग होने का अर्थ यह नहीं कि ताना लोग स्वयं 1914 में गांधीवादी राजनीतिक तकनीकी शब्दावली प्रयोग कर रहे थे।
हमें व्यवहार और नाम में अंतर रखना चाहिए।
अदालत का अस्वीकार
ताना भगतों की बाद की राजनीति में औपनिवेशिक अदालत को बाहरी नियंत्रण की संस्था के रूप में देखने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। दासगुप्ता के अध्ययन में 1921 के संदर्भ में अदालत, लगान और चौकीदारी कर के विरोध को उस पुराने ताना संसार से जोड़ा गया है जिसमें बाहरी नियंत्रण की संस्थाओं को वैध नहीं माना जाता था।
यह गांधीवादी असहयोग से जुड़ने का एक और रास्ता था।
अन्यायी शासन की संस्थाओं से सहयोग हटाओ।
इस बाहरी अदालत का हमारे जीवन पर नैतिक अधिकार क्यों?
हिंसा न करना और कानून न मानना एक साथ
औपनिवेशिक सत्ता प्रायः दो विकल्प चाहती थी—
यही स्थिति आधुनिक सविनय अवज्ञा के काफी निकट आती है।
हालांकि 1914 के ताना व्यवहार को उसी विकसित नाम से पुकारना सावधानी मांगता है।
दंड स्वीकार करने की प्रवृत्ति
गांधीवादी सत्याग्रह की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी—
कानून तोड़ो, लेकिन गिरफ्तारी से मत भागो; दंड सहो।
ताना भगतों की गिरफ्तारियों में भी यह तथ्य उल्लेखनीय है कि आंदोलन ने जवाब में संगठित सशस्त्र जेल-तोड़ अभियान नहीं चलाया।
यह दंड-सहन की संस्कृति गांधीवादी सत्याग्रह से कुछ समानता रखती है।
लेकिन यह स्पष्ट प्रमाण नहीं कि प्रारंभिक ताना दर्शन ने इसे ठीक गांधी की तरह सिद्धांतबद्ध किया था।
गांधीवाद का निर्णायक अंतर : विरोधी को भी नैतिक समुदाय में रखना
यह वह जगह है जहां ताना और गांधीवादी विचार में महत्वपूर्ण अंतर था।
प्रारंभिक ताना पहचान स्वयं को कई ‘बाहरी’ शक्तियों के विरोध में निर्मित कर रही थी।
दासगुप्ता के अनुसार जमींदार, बनिया, मिशनरी और ब्रिटिश राज्य आदि इस विरोधी संसार का हिस्सा बने।
गांधीवादी अहिंसा का आदर्श सिद्धांत विरोधी की मानवता को भी स्वीकार करता था।
इस अधिक सार्वभौमिक नैतिकता तक ताना आंदोलन का प्रारंभिक धार्मिक ढांचा स्वतः नहीं पहुंचता था।
ताना का ‘अपना समुदाय’ बनाम गांधी का ‘राष्ट्र’
ताना आंदोलन का पहला नैतिक समुदाय मुख्यतः उरांव था।
उसकी धार्मिक भाषा उरांव संसार से निकली।
उसकी मुक्ति की कल्पना ‘उरांव राज’ या नए धार्मिक संसार से जुड़ सकती थी।
उनका स्वराज विभिन्न धर्मों, जातियों और क्षेत्रों को समेटने का दावा करता था।
ताना भगतों का गांधीवाद से जुड़ना इसलिए केवल रणनीति बदलना नहीं था।
वह राजनीतिक समुदाय के विस्तार की प्रक्रिया थी—
‘उरांव राज’ से ‘गांधी राज’
ताना आंदोलन में जिस न्यायपूर्ण भविष्य को पहले स्थानीय धार्मिक भाषा में समझा जाता था, 1920 के आसपास वही कल्पना राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़ने लगी।
‘गांधी राज’ की धारणा ने एक संक्रमणकारी भूमिका निभाई।
ताना भगतों के लिए गांधी संभवतः केवल राजनीतिक नेता नहीं बने।
वे नैतिक-धार्मिक शक्ति वाले व्यक्ति की छवि ग्रहण कर सकते थे।
इसलिए गांधी का करिश्मा ताना धार्मिक संस्कृति में अनुवादित हो गया।
ताना कल्पना ने उन्हें लगभग धर्मराज के वाहक की तरह पढ़ लिया।
यहां कांग्रेस ने ताना भगतों को खोजा, केवल उलटा नहीं
राष्ट्रीय आंदोलन और ताना भगतों के संबंध को केवल इस तरह नहीं देखना चाहिए कि ‘आदिवासी गांधी के पास गए।’
कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए भी ताना भगत आकर्षक थे।
क्योंकि यहां पहले से एक अनुशासित ग्रामीण समुदाय मौजूद था—
और अन्यायी सत्ता से सहयोग रोकने का अनुभव रखने वाला।
इसलिए ताना भगत कांग्रेस के लिए तैयार सामाजिक आधार बन सकते थे।
1921 में औपनिवेशिक पुलिस ने भी परिवर्तन पहचाना
दासगुप्ता द्वारा उद्धृत औपनिवेशिक अभिलेखों में 1921 में रांची के पुलिस अधीक्षक ने माना कि असहयोग से इसे जोड़ने के प्रयासों ने ताना आंदोलन को नई जिंदगी दी।
ताना आंदोलन असहयोग से पहले मौजूद था।
राष्ट्रीय असहयोग ने उसे नया राजनीतिक विस्तार दिया।
पूर्व-मौजूद स्थानीय आंदोलन + राष्ट्रीय गांधीवादी भाषा = नया ताना चरण।
ताना भगतों ने गांधी को क्यों स्वीकार किया?
क्योंकि गांधी उन्हें पांच स्तरों पर परिचित लगे।
अहिंसा
जीव-हत्या और राजनीतिक हिंसा से दूरी।
राजनीतिक स्तर
ऐसी वैचारिक समानता किसी बाहरी नेता को बहुत तेजी से स्थानीय धार्मिक कल्पना का हिस्सा बना सकती थी।
लेकिन कांग्रेस से जुड़ने के बाद ‘ताना’ समाप्त नहीं हुआ
यदि गांधीवाद ने ताना आंदोलन को पूरी तरह समाहित कर लिया होता तो ताना पहचान समाप्त हो जानी चाहिए थी।
लेकिन उन्होंने स्वयं को ताना भगत कहना नहीं छोड़ा।
उनकी विशिष्ट धार्मिक-सामुदायिक पहचान बनी रही।
यह साबित करता है कि गांधीवाद ने उनके मूल आंदोलन को नष्ट नहीं किया।
उसने उसके ऊपर राष्ट्रीय राजनीतिक परत जोड़ी।
स्थानीय परंपरा और राष्ट्रीय विचारधारा का संगम
ताना–गांधी संबंध भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को समझने के लिए बड़ा उदाहरण है।
राष्ट्रीय आंदोलन हमेशा दिल्ली, कलकत्ता, बंबई या कांग्रेस अधिवेशन से गांव में एकतरफा नहीं पहुंचता।
कई बार गांव में पहले से प्रतिरोध की अपनी भाषा होती है।
राष्ट्रीय विचार तभी सफल होता है जब वह स्थानीय भाषा में अनुवादित हो सके।
स्वराज का अनुवाद हुआ स्थानीय न्यायपूर्ण राज में।
मद्यनिषेध का मेल हुआ ताना अनुशासन से।
असहयोग का मेल हुआ बेगार और लगान-अस्वीकार से।
यही कारण है कि गांधीवाद इतनी गहराई से बैठ सका।
‘गांधी से पहले गांधीवादी’ कहने के पक्ष में तर्क
यदि इस प्रसिद्ध वाक्य का बचाव करना हो तो उसके पक्ष में मजबूत प्रमाण हैं।
ताना भगतों ने गांधी के राष्ट्रीय नेतृत्व से पहले—
हिंसा से दूरी की नैतिकता विकसित की,
और सत्ता को अपना सहयोग वापस लेने की रणनीति अपनाई।
इस अर्थ में उन्होंने उन व्यवहारों का अभ्यास किया जिन्हें कुछ वर्ष बाद गांधीवादी आंदोलन में केंद्रीय स्थान मिलने वाला था।
इस वाक्य के विरोध में तर्क
लेकिन ‘गांधी से पहले गांधीवादी’ शब्दावली में तीन समस्याएं हैं।
पहली समस्या — कालक्रम को उलटा पढ़ना
हम बाद के गांधीवाद की श्रेणियां लेकर 1914 पर लगा रहे हैं।
दूसरी समस्या — उरांव मौलिकता मिटती है
ऐसा लगता है जैसे ताना भगतों का महत्व केवल इसलिए है कि वे गांधी जैसे थे।
जबकि उनका आंदोलन अपनी ऐतिहासिक परिस्थितियों में स्वयं महत्वपूर्ण था।
तीसरी समस्या — अंतर छिप जाते हैं
और बाहरी समूहों के प्रति ताना दृष्टि
इसलिए यह वाक्य लोकप्रिय उपमा के रूप में उपयोगी, लेकिन अकादमिक परिभाषा के रूप में अपर्याप्त है।
अधिक सटीक शब्द क्या हो सकता है?
ताना भगतों के 1914–20 चरण के लिए अधिक सटीक अभिव्यक्ति होगी—
‘स्वदेशी आदिवासी नैतिक-असहयोग की परंपरा।’
स्वदेशी — क्योंकि उसका स्रोत स्थानीय था।
आदिवासी — क्योंकि उसकी धार्मिक-सामाजिक संरचना उरांव संसार में निहित थी।
नैतिक-असहयोग — क्योंकि शुद्धता और सहयोग-वापसी दोनों उसके केंद्र में थे।
बाद में यही परंपरा गांधीवादी असहयोग के साथ जुड़ी।
क्या अहिंसा ने आंदोलन को अधिक टिकाऊ बनाया?
बिरसा उलगुलान जैसे सशस्त्र प्रतिरोध को औपनिवेशिक राज्य भारी सैन्य बल से अपेक्षाकृत जल्दी कुचल सकता था।
ताना आंदोलन को नियंत्रित करना अलग समस्या थी।
तो राज्य के लिए हर गतिविधि को सैन्य विद्रोह घोषित करना कठिन है।
इस अर्थ में अहिंसक सामाजिक प्रतिरोध ने ताना आंदोलन को दीर्घजीविता दी।
नेता गिरफ्तार हुए, समुदाय जीवित रहा।
लेकिन अहिंसा की आर्थिक कीमत थी
जमींदार के दमन का सामना कर सकता था।
इसलिए असहयोग को ‘निष्क्रिय प्रतिरोध’ कहना गलत होगा।
ताना भगत, गांधी और असहयोग आंदोलन, 1920–22
कांग्रेस से संपर्क, गांधी ‘महाराज’ की स्वीकृति, खादी–चरखा–तिरंगा, शराबबंदी, कर-अस्वीकार और स्थानीय ‘उरांव राज’ से राष्ट्रीय ‘स्वराज’ तक का रूपांतरण
1914 में चिंगरी नवाटोली से शुरू हुआ ताना भगत आंदोलन 1920–22 में अपने इतिहास के सबसे निर्णायक वैचारिक मोड़ पर पहुंचा। अब तक वह उरांव समाज के भीतर धार्मिक शुद्धि, जमींदारी शोषण के विरोध, बेगार-अस्वीकार, लगान-विरोध और न्यायपूर्ण नए ‘राज’ की आकांक्षा वाला आंदोलन था। किंतु गांधी के नेतृत्व में जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पूरे देश में असहयोग को राजनीतिक हथियार बनाया, तो ताना भगतों को राष्ट्रीय आंदोलन में आश्चर्यजनक रूप से परिचित भाषा सुनाई दी।
सत्य और आत्मसंयम से सत्ता का प्रतिरोध करो।
ताना भगत इनमें से अनेक बातें वर्षों से अपने स्थानीय धार्मिक संसार में व्यवहार में ला चुके थे।
इसलिए 1920–22 में जो हुआ उसे केवल इस वाक्य में समेटना गलत होगा कि “ताना भगत गांधी के अनुयायी बन गए।”
असल ऐतिहासिक प्रक्रिया कहीं अधिक गहरी थी—
ताना भगतों की स्थानीय आदिवासी–किसान असहयोग परंपरा और गांधी का अखिल भारतीय असहयोग आंदोलन एक-दूसरे से मिले।
इस संगम ने ताना भगत आंदोलन को नया राष्ट्रवादी अर्थ दिया और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को छोटानागपुर के भीतर एक असाधारण रूप से अनुशासित आदिवासी सामाजिक आधार।
1920 तक ताना भगत पहले से राजनीतिक थे
कांग्रेस से संपर्क से पहले ताना भगतों के पास लगभग छह वर्ष का आंदोलनकारी अनुभव था।
परंपरागत सत्ता को चुनौती दे चुके थे,
जमींदारों के लिए काम से इनकार कर चुके थे,
लगान के अधिकार को चुनौती दे चुके थे,
और बार-बार नेताओं की गिरफ्तारी के बाद भी समुदाय के रूप में जीवित रहे थे।
इसलिए उन्हें कांग्रेस ने ‘राजनीतिक’ नहीं बनाया।
राष्ट्रीय आंदोलन ने उनकी राजनीति की सीमा और भाषा बदल दी।
असहयोग आंदोलन ने ताना भगतों को क्यों आकर्षित किया?
1920 में गांधी के नेतृत्व में शुरू हुए असहयोग आंदोलन का मूल विचार था—
ब्रिटिश शासन भारतीयों के सहयोग पर निर्भर है।
और दूसरे औपनिवेशिक संस्थागत संबंधों से सहयोग वापस ले लें, तो राज नैतिक और राजनीतिक रूप से कमजोर होगा।
ताना भगत इस सिद्धांत को गांव की भाषा में पहले से अनुभव कर चुके थे।
जमींदार का खेत तभी चलेगा जब हम हल चलाएंगे।
इसलिए गांधी का ‘असहयोग’ उनके लिए पूर्णतः नया राजनीतिक विचार नहीं था।
औपनिवेशिक प्रशासन ने भी इस मेल को पहचान लिया
यह केवल बाद के इतिहासकारों की व्याख्या नहीं है।
रांची में 1921 के असहयोग आंदोलन पर उपलब्ध सरकारी विवरण बताता है कि ताना भगत कांग्रेस की बैठकों में भाग लेने लगे थे। 9 मार्च 1921 को रांची के उपायुक्त व्हिट्टी ने छोटानागपुर के कमिश्नर एफ. एफ. लायल को सूचना दी कि असहयोग आंदोलन के कार्यकर्ताओं द्वारा ताना भगत आंदोलन को राष्ट्रीय असहयोग से जोड़ने के प्रयास ने ताना आंदोलन को नई जिंदगी दे दी है।
यह अत्यंत महत्वपूर्ण प्रशासनिक टिप्पणी है।
1921 में दोनों को जोड़ने का संगठित प्रयास चल रहा था,
और औपनिवेशिक अधिकारी स्वयं उसके परिणाम को महत्वपूर्ण मान रहे थे।
कांग्रेस कार्यकर्ताओं का छोटानागपुर में प्रवेश
1920–21 में रांची और आसपास के क्षेत्रों में कांग्रेस तथा असहयोग कार्यकर्ताओं की गतिविधियां बढ़ीं।
स्थानीय नेताओं ने सभाएं आयोजित कीं।
राष्ट्रीय नेताओं और प्रचारकों ने क्षेत्र का दौरा किया।
सरकारी आबकारी व्यवस्था का विरोध हुआ।
21 मार्च 1921 को रांची में राजेंद्र प्रसाद और स्वामी विश्वानंद के भाषण का सरकारी इतिहास में उल्लेख मिलता है।
इस पूरे राजनीतिक वातावरण में ताना भगत एक ऐसा समुदाय थे जिसके साथ कांग्रेस का संवाद स्वाभाविक था।
शराबबंदी : पहली बड़ी वैचारिक समानता
रांची के असहयोग आंदोलन में शराब-विरोध महत्वपूर्ण था। मार्च 1921 में आबकारी दुकानों के बंदोबस्त के विरुद्ध हड़ताल तक आयोजित हुई।
ताना भगतों के लिए शराब-विरोध नया नहीं था।
जतरा भगत के समय से ही मद्यत्याग उनके धार्मिक अनुशासन का मूल हिस्सा था।
अर्थात कांग्रेस जिस कार्यक्रम को राजनीतिक और सामाजिक सुधार के रूप में चला रही थी, ताना भगत उसे अपनी धार्मिक पहचान के रूप में पहले से जी रहे थे।
इससे दोनों के बीच विश्वास की पहली मजबूत कड़ी बनी।
कांग्रेस को तैयार अनुशासित समुदाय मिला
कांग्रेस कार्यकर्ताओं को छोटानागपुर के गांवों में राजनीतिक संगठन बनाना था।
लेकिन ताना भगतों के बीच उन्हें पहले से एक ऐसा समुदाय मिला जो—
बाहरी आर्थिक सत्ता से असहयोग का अनुभव रखता था।
यानी कांग्रेस को यहां सामान्य ग्रामीण आबादी की तुलना में राजनीतिक लामबंदी के लिए अधिक अनुकूल सामाजिक आधार मिला।
ताना भगतों को कांग्रेस में क्या मिला?
यदि कांग्रेस को तैयार अनुशासित समुदाय मिला, तो ताना भगतों को भी कांग्रेस से कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण चीजें मिलीं।
औपनिवेशिक राज के विरुद्ध बड़ा संगठन।
खादी, चरखा और कांग्रेस ध्वज जैसे नए प्रतीक।
अपने स्थानीय संघर्ष को पूरे भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई का हिस्सा मानने की नई चेतना।
यही ताना आंदोलन के विस्तार का निर्णायक बिंदु था।
‘उरांव राज’ की सीमा
1914–19 में ताना भगतों की न्यायपूर्ण भविष्य व्यवस्था की कल्पना कई बार ‘उरांव राज’ के रूप में सामने आती थी।
यह स्थानीय ऐतिहासिक अनुभव से निकली भाषा थी।
यह मुख्यतः एक समुदाय की मुक्ति की कल्पना थी।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने इसके सामने बड़ा राजनीतिक क्षेत्र खोला—
‘उरांव राज’ से ‘स्वराज’
स्वराज की गांधीवादी कल्पना ताना भगतों के लिए इतनी प्रभावी इसलिए हुई क्योंकि वह उनके पुराने ‘नए राज’ के विचार से संवाद कर सकती थी।
अब अंग्रेजी राज का अंत केवल उरांव भूमि की मुक्ति नहीं था।
गांव → उरांव क्षेत्र → छोटानागपुर → भारत।
ताना भगत अब स्वयं को केवल अपने समुदाय के आंदोलनकारी नहीं, राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष के सहभागी के रूप में देखने लगे।
गांधी ‘राजनीतिक नेता’ से अधिक क्यों बने?
ताना भगत समाज की राजनीतिक संस्कृति करिश्माई धार्मिक नेतृत्व से परिचित थी।
इन नेताओं का अधिकार केवल प्रशासनिक पद से नहीं आता था।
उनके अनुयायी उनमें नैतिक या आध्यात्मिक शक्ति देखते थे।
सिर्फ राजनीतिज्ञ की तरह ग्रहण नहीं हुई।
उनके प्रति धार्मिक-नैतिक श्रद्धा विकसित होना स्वाभाविक था।
गांधी ‘महाराज’
ताना भगत स्मृति में गांधी के लिए ‘गांधी महाराज’ जैसी संबोधन-परंपरा का उल्लेख मिलता है।
‘महाराज’ को यहां राजसी उपाधि की तरह नहीं पढ़ना चाहिए।
भारतीय ग्रामीण धार्मिक भाषा में यह संत, गुरु अथवा उच्च नैतिक व्यक्तित्व के लिए सम्मानसूचक संबोधन भी हो सकता है।
इसलिए गांधी की स्वीकृति राष्ट्रीय नेता के साथ-साथ नैतिक गुरु के रूप में हुई।
ताना समाज ने गांधी को अपनी धार्मिक प्रतीक-व्यवस्था में अनुवादित कर लिया।
क्या गांधी ने स्वयं जतरा भगत को गांधीवादी बनाया था?
इस प्रश्न पर विशेष सावधानी आवश्यक है।
लोकप्रिय विवरणों में कभी-कभी गांधी और जतरा भगत की प्रत्यक्ष मुलाकात के दावे मिलते हैं।
लेकिन जतरा के अंतिम जीवन और मृत्यु की तिथि स्वयं विवादित है।
इसलिए बिना मजबूत प्राथमिक प्रमाण के यह नहीं कहना चाहिए कि गांधी ने व्यक्तिगत रूप से जतरा को अपने आंदोलन में शामिल किया।
अधिक सुरक्षित और इतिहाससम्मत निष्कर्ष है—
ताना समुदाय का गांधीवादी राष्ट्रीय आंदोलन से संगठित जुड़ाव मुख्यतः जतरा के प्रारंभिक नेतृत्व के बाद के चरण में विकसित हुआ।
यानी गांधी–ताना संबंध को जतरा–गांधी व्यक्तिगत मुलाकात पर निर्भर करना आवश्यक नहीं।
गांधी का रांची से पुराना संबंध
गांधी स्वयं छोटानागपुर के लिए पूरी तरह अज्ञात नाम नहीं थे।
वे चंपारण प्रश्न के सिलसिले में 4 जून और 22 सितंबर 1917 को रांची में बिहार एवं उड़ीसा के लेफ्टिनेंट गवर्नर एडवर्ड गेट से मिले थे। रांची जिला प्रशासन का इतिहास इन दोनों मुलाकातों का उल्लेख करता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि 1917 में ही ताना भगतों से उनका संगठित राजनीतिक गठबंधन बन गया था।
लेकिन 1920 तक गांधी का नाम क्षेत्र में अपरिचित नहीं था।
1920–21 : संपर्क से समावेशन तक
राष्ट्रीय असहयोग आंदोलन के शुरू होने के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने ताना भगतों को व्यापक अभियान से जोड़ने की कोशिश की।
1921 तक यह प्रक्रिया प्रशासन की नजर में साफ दिखाई देने लगी।
ताना भगत कांग्रेस की बैठकों में आने लगे।
राष्ट्रीय मुद्दों पर प्रतिक्रिया देने लगे।
और उनकी पुरानी असहयोगी गतिविधियों को अब अखिल भारतीय संघर्ष के अर्थ में पढ़ा जाने लगा।
यह किसी संगठन के दूसरे संगठन में औपचारिक विलय जैसा नहीं था।
ताना भगत अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखते हुए कांग्रेस आंदोलन से जुड़ रहे थे।
खादी का प्रवेश
गांधीवादी राजनीति का सबसे दृश्य प्रतीक था—
खादी।
ताना भगतों के लिए यह विशेष रूप से अनुकूल प्रतीक था।
खादी ने इन गुणों को राष्ट्रीय अर्थ दे दिया।
अब साधारण सफेद वस्त्र केवल धार्मिक शुद्धता का संकेत नहीं था।
वह ब्रिटिश आर्थिक व्यवस्था के विरोध और स्वदेशी का प्रतीक भी बन सकता था।
कपड़ा राजनीतिक कैसे हुआ?
विदेशी कपड़ा केवल पहनने की वस्तु नहीं था।
वह औपनिवेशिक आर्थिक संबंध का प्रतीक था।
गांधी ने इसी संबंध को चरखा और खादी के माध्यम से चुनौती दी।
ताना भगतों के लिए स्वावलंबन और सादा जीवन पहले से मूल्य थे।
इसलिए खादी की राजनीति उनके लिए सहज थी।
शुद्ध वस्त्र अब स्वदेशी वस्त्र बन गया।
चरखा : नई धार्मिक–राजनीतिक वस्तु
चरखा गांधीवादी आंदोलन में केवल उत्पादन उपकरण नहीं था।
ताना भगतों के धार्मिक संसार में प्रतीकों की बड़ी भूमिका थी।
इसलिए चरखा भी केवल आर्थिक कार्यक्रम नहीं रहा।
वह एक नैतिक अनुशासन का संकेत बन सकता था—
इस प्रकार गांधीवादी प्रतीक ताना धार्मिक भाषा में सहजता से प्रवेश करते गए।
तिरंगा या कांग्रेस ध्वज
ताना भगत पहचान का सबसे दृश्य राजनीतिक परिवर्तन कांग्रेस ध्वज को अपनाना था।
रांची जिला प्रशासन के इतिहास में स्पष्ट उल्लेख है कि बड़ी संख्या में ताना भगत आगे कांग्रेस अधिवेशनों में पहुंचे और कांग्रेस के झंडे हाथ में लेकर नंगे पांव लंबी दूरी तय करते हुए गांवों में स्वतंत्रता आंदोलन का संदेश ले गए।
यह केवल संगठन का झंडा उठाना नहीं था।
ध्वज ने उनके राजनीतिक समुदाय की सीमा बदल दी।
और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का स्वयंसेवक भी।
तिरंगा किस समय और किस रूप में? एक सावधानी
यहां शब्दावली में ऐतिहासिक सावधानी जरूरी है।
1920–22 के कांग्रेस ध्वज और 1947 में स्वीकृत भारत के वर्तमान राष्ट्रीय तिरंगे को हूबहू एक ही वस्तु नहीं मानना चाहिए।
कांग्रेस के झंडे के डिजाइन में समय के साथ बदलाव आए।
इसलिए इस चरण में अधिक सटीक भाषा होगी—
कांग्रेस ध्वज/राष्ट्रीय आंदोलन का झंडा, जिसे बाद की ताना स्मृति व्यापक रूप से तिरंगे से जोड़ती है।
आज ताना भगत पहचान और भारतीय तिरंगे का संबंध अत्यंत मजबूत है, लेकिन उसका पूरा प्रतीकात्मक विकास अलग समयरेखा मांगता है।
झंडा नया ‘पवित्र’ प्रतीक बनता है
ताना भगतों के लिए ध्वज का महत्व केवल राजनीतिक निष्ठा नहीं था।
धार्मिक-सामुदायिक आंदोलन में प्रतीक नैतिक शक्ति प्राप्त कर सकते हैं।
कांग्रेस ध्वज भी ताना भगत जीवन में उसी प्रकार एक सम्मानित वस्तु बनने लगा।
आगे दशकों तक ताना समुदाय के सार्वजनिक जीवन में—
यह ताना धार्मिक संस्कृति और भारतीय राष्ट्रवाद का विशिष्ट सम्मिश्रण था।
शराबबंदी में राष्ट्रीय राजनीति और स्थानीय धर्म का पूर्ण मेल
यदि कोई एक मुद्दा गांधी और ताना भगतों के बीच लगभग बिना वैचारिक अनुवाद के जुड़ सकता था तो वह शराब था।
धार्मिक शुद्धि के कारण शराब छोड़ते थे।
सामाजिक सुधार, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और औपनिवेशिक आबकारी नीति के विरोध में शराबबंदी का प्रचार करती थी।
मार्च 1921 का रांची आबकारी विरोध
22 मार्च 2023 को जारी संस्कृति मंत्रालय के जिला इतिहास विवरण में 1921 के रांची असहयोग आंदोलन के संदर्भ में बताया गया है कि आबकारी दुकानों के बंदोबस्त के विरोध में 16 मार्च को पूर्ण हड़ताल आयोजित हुई और आसपास भी ऐसा विरोध हुआ। ताना भगत इन असहयोग बैठकों में नियमित रूप से दिखाई देते थे।
इसलिए शराबबंदी कोई केवल नैतिक उपदेश नहीं थी।
वह सीधे औपनिवेशिक राजस्व नीति के विरुद्ध राजनीतिक कार्रवाई बन चुकी थी।
शराब छोड़ना अब साम्राज्य को आर्थिक ‘नहीं’ भी था
यहां ताना अनुशासन को नया अर्थ मिला।
शराब छोड़ना = शुद्ध जीवन + औपनिवेशिक आबकारी व्यवस्था से असहयोग।
एक ही व्यवहार को अब दो राजनीतिक अर्थ मिल गए।
इसी को हम ताना आंदोलन के राष्ट्रवादी पुनर्पाठ के रूप में समझ सकते हैं।
कर-अस्वीकार : सबसे जटिल संगम
ताना भगतों का लगान-विरोध गांधी के राष्ट्रीय असहयोग से पहले का था।
लेकिन 1920–22 में कर-अस्वीकार का प्रश्न सावधानी से समझना आवश्यक है।
गांधी ने असहयोग आंदोलन के प्रत्येक चरण में पूरे भारत को तत्काल सामान्य कर-बंदी का आदेश नहीं दिया था।
कर न देना अधिक उन्नत सविनय अवज्ञा की दिशा का कदम था और उसके प्रयोग को नेतृत्व नियंत्रित रखना चाहता था।
ताना भगतों के लिए यह अंतर इतना स्पष्ट नहीं था।
उनके अपने आंदोलन में लगान-अस्वीकार पहले से वैध धार्मिक–किसानी प्रतिरोध था।
यहीं स्थानीय आंदोलन और राष्ट्रीय रणनीति के बीच तनाव की संभावना पैदा हुई।
ताना भगत के लिए कर क्यों अलग प्रश्न था?
यह राजनीतिक रणनीति का प्रश्न है; कब कर रोकना है नेतृत्व तय करेगा।
यदि जमींदार का दावा ही नैतिक रूप से गलत है तो भुगतान क्यों करें?
इसलिए उनका लगान-विरोध गांधीवादी रणनीति से अधिक मूलभूत हो सकता था।
यही ताना भगतों की अपनी स्वायत्त किसान राजनीति का प्रमाण है।
गांधीवाद से जुड़ना आत्मसमर्पण नहीं था
इसीलिए यह कहना गलत होगा कि 1920 के बाद ताना भगतों ने अपनी पुरानी राजनीति छोड़कर कांग्रेस की हर बात मान ली।
उन्होंने गांधीवाद को अपने अनुभव के अनुरूप ग्रहण किया।
लेकिन भूमि और लगान के मामले में उनकी अपनी ऐतिहासिक चेतना बनी रही।
राष्ट्रीय आंदोलन ने किसान प्रश्न हल नहीं किया
कांग्रेस से जुड़ने के बाद भी ताना भगतों की जमीन वापस नहीं आ गई।
जिन परिवारों की जमीन बकाया लगान या नीलामी के कारण चली गई थी, उनका प्रश्न बना रहा।
इसलिए राष्ट्रीय स्वतंत्रता का लक्ष्य और स्थानीय भूमि-मुक्ति का लक्ष्य पूरी तरह एक नहीं हुए।
यह विरोधाभास आगे स्वतंत्रता के बाद भी दिखाई देगा।
‘गांधी राज’ की कल्पना
कई ग्रामीण समुदायों में गांधीवादी स्वराज को अत्यंत ठोस और तत्काल सामाजिक परिवर्तन की भाषा में समझा गया।
ताना भगतों के लिए यह विशेष रूप से स्वाभाविक था क्योंकि वे पहले से न्यायपूर्ण आगामी राज की धार्मिक कल्पना रखते थे।
‘गांधी राज’ का अर्थ उनकी चेतना में हो सकता था—
यह कांग्रेस नेतृत्व की संवैधानिक या राजनीतिक परिभाषा से कहीं अधिक व्यापक सामाजिक आशा थी।
गांधी का करिश्मा पुराने ताना करिश्मे की जगह नहीं, उसके ऊपर बैठा
जतरा और बाद के ताना गुरुओं ने समुदाय को करिश्माई धार्मिक नेतृत्व का अनुभव दिया था।
गांधी इस संरचना में सहजता से प्रवेश कर सकते थे।
ताना भगतों को पहली बार ऐसा नैतिक नेता मिला जिसकी सत्ता पूरे भारत में फैली हुई प्रतीत होती थी।
इससे उनके न्यायपूर्ण भविष्य का भूगोल विस्तृत हुआ।
गांधी को ‘मुक्तिदाता’ मानने की सीमा
राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े ग्रामीण समुदाय कई बार गांधी के प्रति ऐसी अपेक्षाएं विकसित करते थे जिन्हें स्वयं गांधी स्वीकार नहीं करते।
यह केवल ताना भगतों तक सीमित नहीं था।
ऐसी लोकप्रिय कल्पनाओं को गांधी की वास्तविक राजनीतिक घोषणाओं से अलग रखना आवश्यक है।
ताना भगतों ने भी गांधी को अपनी धार्मिक-सामुदायिक भाषा में समझा।
इसलिए ‘गांधी का ताना भगतों पर प्रभाव’ और ‘ताना भगतों की कल्पना में गांधी’—दो अलग विषय हैं।
गांधीवादी प्रतीकों का ‘ताना-करण’
ताना भगतों ने केवल गांधीवादी प्रतीक स्वीकार नहीं किए।
उन्होंने उन्हें अपने सामुदायिक जीवन के अनुरूप बदल दिया।
केवल कांग्रेस कार्यक्रम नहीं, शुद्ध-सादा ताना जीवन।
केवल राजनीतिक निशान नहीं, सम्मानित सामुदायिक प्रतीक।
केवल कांग्रेस नेता नहीं, ‘महाराज’ जैसे नैतिक व्यक्तित्व।
केवल संविधान या स्वशासन नहीं, न्यायपूर्ण सामाजिक संसार।
इसे हम गांधीवाद का ताना-करण कह सकते हैं।
कांग्रेस अधिवेशन और ताना भगत
इस राष्ट्रीय समावेशन का सबसे स्पष्ट प्रमाण कांग्रेस अधिवेशनों में उनकी उपस्थिति है।
विशेषकर दिसंबर 1922 के गया कांग्रेस अधिवेशन में बड़ी संख्या में ताना भगतों की उपस्थिति आधिकारिक रांची जिला इतिहास में दर्ज है। अधिवेशन की अध्यक्षता चित्तरंजन दास ने की थी। वहां से लौटकर ताना भगत नंगे पांव लंबी दूरी तय करते, कांग्रेस ध्वज लेकर अंदरूनी इलाकों में स्वतंत्रता आंदोलन का संदेश फैलाते थे।
यह ताना आंदोलन के राष्ट्रीयकरण का अत्यंत ठोस प्रमाण है।
गया 1922 को असहयोग की सीमा से बाहर क्यों भी देखना चाहिए
यहां कालक्रम की एक महत्वपूर्ण बात है।
गांधी ने चौरी चौरा की हिंसा के बाद फरवरी 1922 में असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया था।
इसलिए दिसंबर 1922 का गया अधिवेशन तकनीकी रूप से चल रहे जन-असहयोग अभियान का हिस्सा नहीं था।
फिर भी ताना भगतों की बड़ी उपस्थिति दिखाती है कि कांग्रेस से उनका संबंध आंदोलन स्थगित होते ही खत्म नहीं हुआ।
अब संबंध एक अभियान से आगे बढ़कर दीर्घकालीन राजनीतिक निष्ठा बन रहा था।
चौरी चौरा और ताना भगतों के लिए अहिंसा का प्रश्न
5 फरवरी 1922 की चौरी चौरा घटना में हिंसक भीड़ द्वारा पुलिसकर्मियों की हत्या के बाद गांधी ने आंदोलन वापस ले लिया।
राष्ट्रीय स्तर पर इस निर्णय को लेकर भारी विवाद हुआ।
लेकिन ताना भगतों के लिए गांधी का हिंसा के कारण आंदोलन रोक देना उनकी अपनी धार्मिक नैतिकता से समझा जा सकता था।
उनकी पहचान पहले से हिंसा-विरोधी थी।
इसलिए गांधी की कठोर अहिंसा उन्हें अन्य कई राजनीतिक कार्यकर्ताओं की तुलना में अधिक सहज लग सकती थी।
हालांकि ताना समुदाय की इस घटना पर प्रत्यक्ष प्रतिक्रियाओं के लिए विस्तृत स्थानीय अभिलेख आवश्यक हैं; इसे बिना स्रोत के सामूहिक प्रतिक्रिया मान लेना उचित नहीं होगा।
असहयोग समाप्त हुआ, गांधीवादी ताना नहीं
राष्ट्रीय असहयोग आंदोलन 1922 में स्थगित हो गया।
लेकिन ताना भगतों का गांधी और कांग्रेस से संबंध समाप्त नहीं हुआ।
ताना भगत और कांग्रेस का दीर्घ संबंध, 1922–30
गया कांग्रेस से खादी के रचनात्मक कार्यक्रम तक, गांधीवादी अनुशासन, कांग्रेस ध्वज, भूमि–लगान के अधूरे प्रश्न और सविनय अवज्ञा की ओर यात्रा
फरवरी 1922 में चौरी चौरा की हिंसा के बाद महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया। देश के अनेक क्षेत्रों में इससे निराशा फैली। प्रश्न उठा—अब आगे क्या? जेल, बहिष्कार, विदेशी वस्त्र-विरोध और राजनीतिक सभाओं से बनी उग्र ऊर्जा को किस दिशा में ले जाया जाए?
लेकिन ताना भगतों के लिए परिस्थिति कुछ अलग थी।
उनका आंदोलन असहयोग आंदोलन से पहले पैदा हुआ था। उनका अनुशासन कांग्रेस के आह्वान पर शुरू नहीं हुआ था। वे 1914 से ही मद्यत्याग, सादा जीवन, अहिंसा, जमींदारी श्रम से इनकार और लगान-विरोध जैसी परंपराएं विकसित कर चुके थे। इसलिए 1922 में गांधी द्वारा अखिल भारतीय असहयोग आंदोलन स्थगित कर देने से उनका अपना सामाजिक आंदोलन समाप्त होने का कोई कारण नहीं था।
बल्कि 1922–30 का समय ताना भगत इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण संक्रमण बना—
वे अस्थायी आंदोलनकारी सहयोगी से स्थायी गांधीवादी समुदाय बने।
इसी अवधि में खादी, चरखा, कांग्रेस ध्वज, गांधी की नैतिक प्रतिष्ठा और राष्ट्रीय स्वराज ताना पहचान के स्थायी अंग बने। साथ ही एक दूसरा प्रश्न भी कभी समाप्त नहीं हुआ—
जिस जमीन के लिए ताना किसान लगान देने से मना करते रहे, उसका क्या होगा?
यही राष्ट्रीय राजनीति और स्थानीय किसान प्रश्न के बीच इस दशक का सबसे बड़ा तनाव था।
असहयोग आंदोलन स्थगित हुआ—ताना आंदोलन नहीं
फरवरी 1922 के बाद कांग्रेस की तत्काल जन-आंदोलनकारी गतिविधियां धीमी हुईं। गांधी ने रचनात्मक कार्यक्रम पर जोर बढ़ाया।
लेकिन ताना भगतों के लिए राजनीतिक जीवन का आधार केवल कांग्रेस का कोई विशेष अभियान नहीं था।
इसलिए असहयोग आंदोलन स्थगित होने के बाद भी ताना समुदाय का दैनिक जीवन चलता रहा।
यही उसकी दीर्घजीविता की बड़ी वजह थी।
दिसंबर 1922 : गया कांग्रेस का महत्व
ताना भगत–कांग्रेस संबंध का सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक प्रमाण है—
दिसंबर 1922 का गया कांग्रेस अधिवेशन।
इस अधिवेशन की अध्यक्षता देशबंधु चित्तरंजन दास ने की।
रांची जिला प्रशासन के आधिकारिक इतिहास के अनुसार बड़ी संख्या में ताना भगत इस अधिवेशन में शामिल हुए। लौटने के बाद वे स्वतंत्रता आंदोलन के संदेश से अत्यंत प्रभावित थे और नंगे पांव लंबी दूरी तय करते हुए हाथों में कांग्रेस ध्वज लेकर अंदरूनी क्षेत्रों में राष्ट्रीय आंदोलन का संदेश पहुंचाते थे।
यह घटना ताना आंदोलन के राष्ट्रीयकरण की निर्णायक अभिव्यक्ति थी।
कितने ताना भगत गया पहुंचे?
यहां स्रोतों में दिलचस्प विवरण मिलता है।
संगीता दासगुप्ता ने समकालीन Searchlight समाचारपत्र और दूसरे स्रोतों के आधार पर लिखा है कि दिसंबर 1922 में छोटानागपुर से उरांव और मुंडा प्रतिनिधियों के जत्थे गया पहुंचे। एक विवरण लगभग 400 ताना भगतों के पूरी दूरी पैदल तय करके पहुंचने की बात करता है। कुछ अन्य लोग वाहन से भी पहुंचे।
संख्याओं को बिल्कुल अंतिम न मानते हुए भी मूल तथ्य स्पष्ट है—
उनकी उपस्थिति प्रतीकात्मक नहीं, उल्लेखनीय सामूहिक भागीदारी थी।
पैदल यात्रा स्वयं राजनीतिक वक्तव्य थी
कांग्रेस अधिवेशन में ट्रेन या साधारण परिवहन से पहुंचना एक बात है।
सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर जाना दूसरी।
ताना भगतों के लिए यात्रा में तीन तत्व एक हो गए—
नंगे पांव चलना उनके सादा जीवन से मेल खाता था।
कांग्रेस ध्वज लेकर चलना राष्ट्रीय राजनीतिक निष्ठा का सार्वजनिक प्रदर्शन था।
इसलिए उनकी यात्रा राजनीतिक जुलूस और धार्मिक तीर्थ—दोनों का मिश्रण जैसी दिखाई देती है।
गया से लौटने वाले केवल श्रोता नहीं, प्रचारक बने
रांची जिला प्रशासन का विवरण विशेष रूप से बताता है कि गया से लौटकर ताना भगत गांवों में स्वतंत्रता आंदोलन का संदेश फैलाते थे।
पहले कांग्रेस कार्यकर्ता ताना गांवों तक जा रहे थे।
अब ताना भगत स्वयं कांग्रेस का संदेश गांवों तक ले जा रहे थे।
राष्ट्रीय राजनीति के प्राप्तकर्ता से राष्ट्रीय राजनीति के प्रसारक बन गए।
कांग्रेस का झंडा गांव की राजनीति में उतरता है
झंडा आधुनिक राष्ट्रवाद के सबसे शक्तिशाली प्रतीकों में से एक है।
लेकिन ग्रामीण छोटानागपुर में उसकी शक्ति केवल राष्ट्र की अमूर्त अवधारणा से नहीं आई।
ताना भगत उसे अपने दैनिक धार्मिक और सामुदायिक अनुशासन से जोड़ने लगे।
हम एक बड़े राष्ट्रीय समुदाय का हिस्सा हैं।
इससे पहली बार स्थानीय उरांव किसान स्वयं को दृश्य रूप से अखिल भारतीय राष्ट्रवाद से जोड़ सकता था।
क्या उस समय का झंडा आज का तिरंगा था?
यहां फिर ऐतिहासिक सावधानी आवश्यक है।
1922 का कांग्रेस ध्वज 1947 में संविधान सभा द्वारा स्वीकार किए गए वर्तमान भारतीय राष्ट्रीय ध्वज से पूरी तरह समान नहीं था।
कांग्रेस ध्वज की आकृति और प्रतीक समय के साथ बदले।
ताना भगतों का वर्तमान तिरंगे से गहरा धार्मिक-सांस्कृतिक संबंध बाद के दशकों में विकसित होकर आज तक चला है।
1923 : गया के बाद भी राजनीतिक सक्रियता
1923 में भी ताना भगत राष्ट्रीय कार्यक्रमों से जुड़े रहे।
संगीता दासगुप्ता के अध्ययन में उनके National Week of 1923 में भाग लेने का उल्लेख मिलता है। उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन के लिए आर्थिक योगदान भी दिया।
यानी असहयोग आंदोलन समाप्त होने के बावजूद उनकी कांग्रेस निष्ठा कमजोर नहीं हुई।
नागपुर झंडा सत्याग्रह और ताना भगत
लोकप्रिय और आधुनिक स्मृति-स्रोत ताना भगतों की 1923 के नागपुर झंडा सत्याग्रह में भागीदारी का भी उल्लेख करते हैं।
हालांकि इस भागीदारी के पैमाने और व्यक्तिगत नामों की अधिक ठोस पुष्टि प्राथमिक अभिलेखों से करना उपयोगी होगा।
फिर भी यह दावा ताना भगतों की उस बढ़ती राजनीतिक संस्कृति से मेल खाता है जिसमें कांग्रेस ध्वज स्वयं आंदोलन का पवित्र प्रतीक बन चुका था।
झंडे के लिए सत्याग्रह उन्हें क्यों आकर्षित करता?
ताना भगतों की धार्मिक संस्कृति में प्रतीकों का महत्व पहले से था।
इसलिए यदि औपनिवेशिक सत्ता राष्ट्रीय झंडा फहराने के अधिकार को नियंत्रित करती है, तो उसके विरुद्ध सत्याग्रह ताना भगतों को गहरे स्तर पर आकर्षित कर सकता था।
यह राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ प्रतीकात्मक संप्रभुता का प्रश्न था।
गांधी की दृष्टि में ताना भगत
संगीता दासगुप्ता ने गांधी के 1925 के लेखन का संदर्भ देते हुए बताया है कि गांधी ने ताना भगतों को ऐसे समर्पित भक्तों के रूप में देखा जिन्होंने उनके सिद्धांतों का निष्ठापूर्वक पालन किया।
गांधी स्वयं देख रहे थे कि ताना भगतों का उनसे संबंध सामान्य राजनीतिक अनुयायी जैसा नहीं था।
उनकी निष्ठा धार्मिक भाव से जुड़ी थी।
यही ताना–गांधी संबंध की विशिष्टता थी।
गांधी अब बाहरी नेता नहीं रहे
1920 से पहले गांधी छोटानागपुर से बाहर उठी राष्ट्रीय शक्ति थे।
1920 के दशक के मध्य तक वे ताना भगत धार्मिक-सामुदायिक संसार में आ चुके थे।
उनका नाम प्रार्थना और स्मृति से जुड़ा।
उनके कार्यक्रम सामुदायिक नियम बन गए।
यही वह बिंदु है जहां गांधीवाद किसी बाहरी राजनीतिक विचारधारा के बजाय ताना पहचान का आंतरिक तत्व बनने लगता है।
कांग्रेस ने ‘भगत’ राजनीति को कैसे देखा?
ताना भगतों के साथ कांग्रेस का संबंध व्यापक छोटानागपुर धार्मिक आंदोलनों तक भी पहुंचा।
दासगुप्ता के अध्ययन में यह संकेत मिलता है कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने विभिन्न प्रकार के स्थानीय भगत समूहों को व्यापक ‘स्वराज भगत’ पहचान में जोड़ने की कोशिश की।
राष्ट्रीय राजनीति स्थानीय धार्मिक शब्दावली में अनुवादित हो रही थी।
यानी राष्ट्रीय राजनीति स्वयं धार्मिक-सामुदायिक भाषा ग्रहण कर रही थी।
मिशनरियों की बेचैनी
स्थानीय मिशनरी स्रोतों में इस परिवर्तन को लेकर आलोचना और बेचैनी भी दिखाई देती है।
दासगुप्ता द्वारा उद्धृत रोमन कैथोलिक मिशनरी स्रोत कांग्रेस और स्थानीय भगत धाराओं के इस मेल को संदेह की दृष्टि से देखते हैं।
ताना आंदोलन पहले ही मिशनरी प्रभाव के समानांतर उरांव समाज के भीतर एक स्वतंत्र धार्मिक सुधार का रास्ता बना चुका था।
अब उसमें भारतीय राष्ट्रवाद जुड़ गया था।
इससे ताना पहचान और मजबूत हो रही थी।
गांधी का रचनात्मक कार्यक्रम : आंदोलन की नई दिशा
असहयोग स्थगित करने के बाद गांधी ने जिस रचनात्मक कार्यक्रम पर जोर दिया, उसमें प्रमुख थे—
ताना भगतों के लिए इनमें से कई तत्व पहले से परिचित थे।
इसलिए जन-आंदोलन रुकने पर भी उनके पास राजनीतिक रूप से सक्रिय रहने की जगह थी।
5 अक्टूबर 1926 : रांची खादी प्रदर्शनी
इस अवधि की एक महत्वपूर्ण प्रमाणित घटना है—
5 अक्टूबर 1926 की रांची खादी प्रदर्शनी।
रांची जिला प्रशासन के अनुसार स्थानीय आर्य समाज हॉल में राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में खादी प्रदर्शनी खोली गई और ताना भगत भी उसमें शामिल हुए। प्रशासन इसे गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन स्थगित करने के बाद शुरू किए गए रचनात्मक कार्यक्रम का हिस्सा बताता है।
यह ताना–कांग्रेस संबंध की निरंतरता का मजबूत प्रमाण है।
चार वर्ष बाद भी संबंध क्यों टिके रहे?
1922 से 1926 तक राष्ट्रीय राजनीति कई उतार-चढ़ाव से गुजरी।
कांग्रेस के भीतर परिषद-प्रवेश के प्रश्न पर मतभेद हुआ।
राष्ट्रीय जन-आंदोलन की तीव्रता कम हुई।
फिर भी ताना भगत खादी कार्यक्रम में उपस्थित हैं।
इससे स्पष्ट होता है कि उनका कांग्रेस से संबंध किसी एक आंदोलन की उत्तेजना पर आधारित नहीं था।
वह अब वैचारिक और सांस्कृतिक संबंध बन चुका था।
खादी ताना भगतों के लिए इतनी महत्वपूर्ण क्यों बनी?
क्योंकि उसमें उनकी पुरानी धार्मिक नैतिकता के लगभग सभी तत्व आ सकते थे—
खादी केवल राष्ट्रवादी कपड़ा नहीं थी।
ताना भगत के लिए वह शुद्ध और स्वाधीन जीवन का वस्त्र बन सकती थी।
चरखा दैनिक राजनीति बन गया
यहीं गांधी के रचनात्मक कार्यक्रम की शक्ति थी।
ताना भगत धार्मिक आंदोलन भी यही सिद्धांत पहले से जानता था—
चरखा इस विचार को राष्ट्रीय आर्थिक रूप देता था।
जमींदारी-विरोध और खादी में अंतर
लेकिन यहां एक बड़ा अंतर ध्यान रखना चाहिए।
इसलिए गांधीवादी रचनात्मक कार्यक्रम ताना भगतों के नैतिक जीवन से मेल तो खाता था, लेकिन उनकी भूमि समस्या का सीधा समाधान नहीं था।
यही इस गठबंधन की सबसे महत्वपूर्ण सीमा थी।
भूमि का प्रश्न क्यों दबा नहीं?
ताना भगतों ने पिछले वर्षों में लगान का विरोध किया था।
कई परिवारों ने भुगतान रोकने की कीमत चुकाई।
जमीन की नीलामी और बेदखली की स्मृति समुदाय के भीतर जीवित रही।
ऐसे किसान के लिए यह कहना पर्याप्त नहीं था—
यही प्रश्न आगे स्वतंत्रता से पहले और बाद दोनों समय महत्वपूर्ण बना रहेगा।
राष्ट्रीय स्वराज और कृषक स्वराज एक नहीं थे
अंग्रेजी शासन समाप्त करना या राजनीतिक स्वशासन प्राप्त करना।
दोनों आपस में जुड़े थे, लेकिन समान नहीं।
ताना भगत इस अंतर को अपने अनुभव में लगातार महसूस कर रहे थे।
कांग्रेस ने उनकी भूमि की समस्या तत्काल क्यों नहीं सुलझाई?
कांग्रेस के पास औपनिवेशिक शासन के भीतर प्रत्यक्ष राज्यसत्ता नहीं थी।
वह जमींदारी व्यवस्था तुरंत समाप्त नहीं कर सकती थी।
दूसरे, कांग्रेस स्वयं व्यापक सामाजिक गठबंधन थी जिसमें किसान, जमींदार, व्यापारी, पेशेवर वर्ग और अन्य समूह मौजूद थे।
इसलिए किसी क्षेत्र की उग्र भूमि-मांग को राष्ट्रीय स्तर पर तत्काल कार्यक्रम बनाना राजनीतिक रूप से जटिल था।
यह केवल ताना भगतों की समस्या नहीं थी।
भारतीय किसान आंदोलनों और कांग्रेस के संबंध में बार-बार यही तनाव दिखाई देगा।
किसान आंदोलन की स्वायत्तता का प्रश्न
यहां ताना भगत अध्ययन भारतीय किसान राजनीति का बड़ा प्रश्न उठाता है—
जब कोई स्थानीय किसान आंदोलन राष्ट्रीय राजनीतिक दल से जुड़ता है तो क्या उसे अधिक शक्ति मिलती है, या उसकी विशिष्ट आर्थिक मांगें कमजोर पड़ती हैं?
कांग्रेस ने उन्हें राष्ट्रीय मंच दिया।
उनकी राजनीतिक सुरक्षा और प्रतिष्ठा बढ़ी।
लेकिन भूमि का उनका विशिष्ट प्रश्न राष्ट्रीय स्वराज के व्यापक नारे के पीछे पूरी तरह हल नहीं हुआ।
ताना भगत फिर भी कांग्रेस से क्यों जुड़े रहे?
क्योंकि उनके लिए स्वराज और भूमि न्याय परस्पर विरोधी नहीं थे।
तब अन्यायपूर्ण भूमि संबंध भी सुधरेंगे।
यही राष्ट्रीय आंदोलन की व्यापक आशा थी।
राजनीतिक स्वतंत्रता को सामाजिक न्याय की पूर्वशर्त माना गया।
गांधी पर असाधारण विश्वास
ताना भगतों का गांधी पर विश्वास सामान्य चुनावी निष्ठा जैसा नहीं था।
यही कारण है कि तत्काल भूमि लाभ न मिलने के बावजूद गांधीवादी संबंध बना रहा।
आर्थिक योगदान : केवल प्रतीकात्मक समर्थन नहीं
ताना भगतों ने राष्ट्रीय आंदोलन में केवल मार्च नहीं किया।
दासगुप्ता के अध्ययन में उनके तिलक स्वराज फंड में योगदान तथा बाद में लाजपत राय मेमोरियल फंड के लिए सदस्यता/चंदा जुटाने का उल्लेख मिलता है।
यह उल्लेखनीय है क्योंकि ताना भगत स्वयं समृद्ध कृषक समुदाय नहीं थे।
गरीब किसान का राजनीतिक चंदा केवल पैसा नहीं—
राष्ट्रीय आंदोलन में ‘गरीब दाता’ का अर्थ
जो समुदाय भूमि और लगान के प्रश्न से जूझ रहा हो और फिर भी राष्ट्रीय कोष में योगदान दे, वह राष्ट्रवाद को बाहरी अभिजात राजनीति नहीं मान रहा।
वह स्वयं को उसका भागीदार मान रहा है।
यह ताना भगतों में भारतीय राष्ट्रवाद के गहरे प्रवेश का प्रमाण है।
साइमन कमीशन : अगला राष्ट्रीय प्रश्न
1927 में ब्रिटिश सरकार ने संवैधानिक सुधारों की समीक्षा के लिए साइमन कमीशन नियुक्त किया।
रांची जिला प्रशासन का इतिहास बताता है कि 1927 में साइमन कमीशन का बहिष्कार हुआ।
दासगुप्ता के अध्ययन में ताना भगतों द्वारा साइमन-विरोधी प्रदर्शनों में काले झंडे दिखाने का विशेष उल्लेख है।
काला झंडा और कांग्रेस ध्वज : दो प्रतीक
अब ताना भगत दो अलग प्रतीकों का राजनीतिक अर्थ समझ चुके थे।
हम किस औपनिवेशिक नीति के विरोध में हैं।
यह प्रतीकात्मक राजनीतिक साक्षरता 1914 के धार्मिक आंदोलन से काफी आगे का चरण था।
ताना भगत अब राष्ट्रीय राजनीति की भाषा में दक्ष हो चुके थे।
1927 या 1928? एक तिथिगत सावधानी
रांची के सरकारी इतिहास में साइमन कमीशन के बहिष्कार के लिए 1927 लिखा गया है।
लेकिन साइमन कमीशन भारत फरवरी 1928 में पहुंचा और मुख्य व्यापक विरोध उसी समय हुआ।
अतः यहां सरकारी जिला इतिहास की तिथि को बिना जांच दोहराना उचित नहीं होगा।
कमीशन की 1927 में घोषणा/नियुक्ति के बाद बहिष्कार अभियान विकसित हुआ और 1928 में भारत आगमन पर देशव्यापी विरोध अपने चरम पर पहुंचा। ताना भगत भी इस विरोध से जुड़े।
औपनिवेशिक विरोध अब स्थानीय समस्या से बहुत आगे निकल गया
1914 में ताना भगत का प्रमुख प्रत्यक्ष अनुभव था—
अर्थात उनका राजनीतिक क्षितिज कितना बदल चुका था।
अब ब्रिटिश संसद की संवैधानिक नीति भी उनके आंदोलन का प्रश्न बन सकती थी।
यही राष्ट्रीयकरण का वास्तविक अर्थ है।
वे संविधान विशेषज्ञ नहीं थे—फिर विरोध क्यों?
ताना भगतों को साइमन कमीशन की प्रत्येक संवैधानिक धारा समझना आवश्यक नहीं था।
राष्ट्रवादी राजनीति ने प्रश्न को सरल नैतिक भाषा में रखा—
भारत का भविष्य तय करने वाले आयोग में भारतीय क्यों नहीं?
यह प्रश्न ताना भगतों की अपनी राजनीतिक संवेदना से मेल खाता था—
हमारे बारे में फैसला हमारे बिना क्यों?
यही उनके आदिवासी स्वायत्तता अनुभव और राष्ट्रवादी आत्मनिर्णय का एक और संगम था।
1920 के दशक में संगठन की प्रकृति
ताना भगतों ने कोई पृथक आधुनिक राजनीतिक पार्टी नहीं बनाई।
कांग्रेस कार्यक्रमों में सामूहिक भागीदारी।
यानी आधुनिक पार्टी संगठन और पारंपरिक सामुदायिक संगठन के बीच एक अनोखा संयोजन विकसित हुआ।
कांग्रेस सदस्यता से अधिक महत्वपूर्ण था व्यवहार
किस ताना भगत ने औपचारिक कांग्रेस सदस्यता ली, इसकी संपूर्ण सूची उपलब्ध नहीं है।
लेकिन ऐतिहासिक महत्व सदस्यता कार्ड से अधिक उनके व्यवहार में था—
इसी से उनकी राष्ट्रीय निष्ठा प्रकट होती है।
1920 के दशक में ताना पहचान का नया दृश्य रूप
इस समय तक एक ताना भगत को उसकी जीवन-पद्धति से पहचाना जा सकता था—
इसने समुदाय को सार्वजनिक राजनीति में अत्यंत दृश्य बना दिया।
सफेद रंग का अर्थ
सफेद वस्त्र पहले शुद्धता और धार्मिक अनुशासन से जुड़ा था।
खादी ने उसमें स्वदेशी का अर्थ जोड़ा।
यही प्रतीकों के राजनीतिक संलयन की शक्ति है।
क्या ताना भगतों ने अपनी धार्मिक पहचान खो दी?
लेकिन ताना सामुदायिक पहचान नहीं छोड़ी।
लेकिन इसे केवल आर्थिक आंदोलन नहीं माना।
इसलिए उनका राष्ट्रवाद धार्मिक पहचान के विलयन पर नहीं, संयोजन पर आधारित था।
भारतीय राष्ट्रवाद का स्थानीय रूप
ताना भगत यह दिखाते हैं कि भारतीय राष्ट्रवाद एक समान विचारधारा के रूप में गांवों पर आरोपित नहीं हुआ।
हर समुदाय ने उसे अपनी भाषा में ग्रहण किया।
यानी राष्ट्रीय विचार का स्थानीय अनुवाद हुआ।
1928–29 : राष्ट्रीय राजनीति में नई बेचैनी
1920 के दशक के उत्तरार्ध तक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन फिर निर्णायक संघर्ष की ओर बढ़ रहा था।
डोमिनियन स्टेटस बनाम पूर्ण स्वतंत्रता की बहस।
कांग्रेस के भीतर अधिक निर्णायक संघर्ष की मांग।
ताना भगतों ने पिछले दशक में कांग्रेस के साथ ऐसा स्थायी संबंध बना लिया था कि आने वाले आंदोलन से उनका जुड़ाव स्वाभाविक था।
दिसंबर 1929 : पूर्ण स्वराज
लाहौर कांग्रेस ने दिसंबर 1929 में पूर्ण स्वराज को कांग्रेस का लक्ष्य घोषित किया।
26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाने का आह्वान किया गया।
ताना भगतों के लिए ‘पूर्ण स्वराज’ केवल संवैधानिक घोषणा नहीं थी।
उनके आंदोलन की शुरुआत ही उस विचार से हुई थी कि—
अब वही विचार अखिल भारतीय कांग्रेस की आधिकारिक भाषा बन चुका था।
यह ऐतिहासिक संगम अत्यंत शक्तिशाली था।
‘उरांव राज’ और ‘पूर्ण स्वराज’ के बीच लंबी यात्रा
यह ताना भगत राजनीतिक चेतना का भूगोल बदलने की कहानी थी।
लेकिन शुरुआती भूमि प्रश्न अब भी भीतर मौजूद था।
इसलिए ‘पूर्ण स्वराज’ का अर्थ उनके लिए संभवतः राजनीतिक स्वतंत्रता से अधिक व्यापक सामाजिक न्याय की आशा रखता था।
1930 : सविनय अवज्ञा की दहलीज
1930 आते-आते राष्ट्रीय आंदोलन नए जन-संघर्ष के लिए तैयार था।
रांची जिला प्रशासन के अनुसार 4 अप्रैल 1930 को रांची के नगरपालिका पार्क में युवा संगठन ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने की अपील की, और गांधी द्वारा शुरू नमक सत्याग्रह को जिले में व्यापक प्रतिक्रिया मिली।
यानी वह राजनीतिक क्षेत्र तैयार था जिसमें ताना भगत फिर सक्रिय होने वाले थे।
असहयोग और सविनय अवज्ञा में अंतर
ताना भगतों के लिए यह अंतर भी महत्वपूर्ण था।
अन्यायी सत्ता की संस्थाओं से सहयोग वापस लो।
अन्यायी कानून का जानबूझकर उल्लंघन करो और दंड स्वीकार करो।
ताना भगत पहले से दोनों के बीच की सीमा के काफी निकट थे।
औपनिवेशिक अधिकार की वैधता पर प्रश्न उठा चुके थे।
नमक का प्रश्न छोटानागपुर में क्यों महत्वपूर्ण था?
लेकिन नमक सत्याग्रह का राजनीतिक अर्थ राष्ट्रीय था—
ताना भगत और सविनय अवज्ञा आंदोलन, 1930–34
नमक सत्याग्रह की राष्ट्रीय लहर, छोटानागपुर में कर और चौकीदारी-विरोध, कांग्रेस अभियानों में ताना भागीदारी, गिरफ्तारी–कुर्की और अहिंसक किसान प्रतिरोध का नया चरण
1930 में जब महात्मा गांधी ने नमक कानून तोड़कर सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की, तब ताना भगतों के लिए ‘अन्यायी कानून की अवज्ञा’ कोई बिल्कुल नई राजनीतिक अवधारणा नहीं थी। वे 1914 से ही अपने स्थानीय संसार में जमींदारी श्रम, बेगार, लगान और विभिन्न देनदारियों की वैधता पर प्रश्न उठा चुके थे। उनका संघर्ष धार्मिक आत्मशुद्धि से शुरू होकर आर्थिक असहयोग और फिर गांधीवादी राष्ट्रवाद से जुड़ चुका था।
इसलिए 1930–34 का दौर ताना भगत आंदोलन में एक और सरल ‘गांधीवादी मोड़’ नहीं था।
ताना भगतों की पुरानी कर-अस्वीकार परंपरा अब अखिल भारतीय सविनय अवज्ञा की वैध राजनीतिक भाषा से जुड़ गई।
इस चरण में नमक कानून से लेकर विदेशी वस्त्र-विरोध, शराब की दुकानों पर धरना, राष्ट्रीय ध्वज, कर न देना, चौकीदारी कर का विरोध, गिरफ्तारी और जमीन की कुर्की—ये सब एक साझा प्रतिरोध संसार का हिस्सा बनने लगे।
लेकिन यहां एक ऐतिहासिक सावधानी शुरू से जरूरी है।
रांची जिले में सविनय अवज्ञा का व्यापक आंदोलन और ताना भगतों की भागीदारी अच्छी तरह प्रमाणित है, लेकिन हर स्थानीय कर-अस्वीकार को सीधे कांग्रेस के औपचारिक निर्देश का परिणाम मानना गलत होगा। ताना भगतों का लगान और चौकीदारी कर-विरोध उनसे पहले से जुड़ा था। संगीता दासगुप्ता के शोध में मध्य रांची के ताना असंतोष की प्रमुख अभिव्यक्तियों में लगान, चौकीदारी कर और बेगार से इनकार स्पष्ट रूप से दर्ज हैं।
1930 : देश में नमक, छोटानागपुर में कानून की वैधता का प्रश्न
12 मार्च 1930 को गांधी साबरमती आश्रम से दांडी यात्रा पर निकले।
6 अप्रैल को उन्होंने नमक कानून तोड़ा।
नमक समुद्रतटीय भारत में प्रत्यक्ष रूप से बनाया जा सकता था, लेकिन गांधी की रणनीति का अर्थ उससे कहीं बड़ा था।
अन्यायी कानून को केवल गलत मत कहो; सार्वजनिक, अहिंसक और अनुशासित ढंग से उसका उल्लंघन करो और दंड स्वीकार करो।
इसलिए यहां आंदोलन की स्थानीय अभिव्यक्ति केवल दांडी की नकल नहीं हो सकती थी।
रांची जिले के आधिकारिक इतिहास में दर्ज है कि नमक सत्याग्रह को जिले में व्यापक प्रतिक्रिया मिली और 4 अप्रैल 1930 को रांची नगरपालिका पार्क में विद्यार्थियों की बड़ी सभा कर सविनय अवज्ञा आंदोलन में शामिल होने की अपील की गई।
छोटानागपुर में ‘नमक’ का स्थानीय अनुवाद
राष्ट्रीय आंदोलन की शक्ति इस बात में थी कि हर क्षेत्र ने सविनय अवज्ञा को अपनी परिस्थिति के अनुरूप रूप दिया।
शहरों में विदेशी वस्त्र और शराब की दुकानों का बहिष्कार।
छोटानागपुर में भी यह बहुस्तरीय प्रतिरोध दिखाई देता है।
रांची विश्वविद्यालय के Journal of Historical Research में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार रांची जिले में धरना और बहिष्कार रांची सदर, बुंडू, कुरू, बेरो, लोहरदगा, सिल्ली और मांडर जैसे क्षेत्रों तक फैला। जून–जुलाई 1930 में प्रमुख स्थानीय कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां हुईं और सितंबर में स्वदेशी सप्ताह के दौरान आदिवासी पुरुषों और महिलाओं ने चरखा तथा तकली प्रतियोगिताओं में उत्साह से भाग लिया।
यह उस दीर्घ प्रक्रिया का प्रमाण है जिसमें गांधीवादी राजनीति अब आदिवासी ग्रामीण समाज के दैनिक जीवन तक पहुंच चुकी थी।
ताना भगतों के लिए सविनय अवज्ञा पहले से परिचित क्यों थी?
क्योंकि उन्होंने अपने इतिहास में तीन काम पहले ही कर लिए थे—
गिरफ्तारी, मुकदमा, नीलामी और सामाजिक दबाव।
इसलिए गांधी का नया संदेश उनके लिए वैचारिक क्रांति से अधिक अपनी पुरानी राजनीति की राष्ट्रीय पुष्टि जैसा था।
अब वही काम जिसे औपनिवेशिक प्रशासन कभी ‘उपद्रव’ या ‘अवज्ञा’ कहता था, अखिल भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सविनय अवज्ञा कहलाने लगा।
असहयोग से सविनय अवज्ञा : एक महत्वपूर्ण अंतर
1920–22 का असहयोग मुख्यतः यह कहता था—
1930 का सविनय अवज्ञा चरण इससे आगे गया—
अन्यायी कानून को खुले रूप में तोड़ो।
ताना भगत इस सीमा को बहुत पहले छू चुके थे।
यह उस कानूनी अधिकार को ही अस्वीकार करना था जिसके आधार पर राज्य भुगतान मांग रहा था।
चौकीदारी कर क्या था?
औपनिवेशिक ग्रामीण शासन में गांवों के चौकीदारों की व्यवस्था स्थानीय सुरक्षा और प्रशासन का हिस्सा थी।
इसके खर्च के लिए ग्रामीणों पर चौकीदारी कर लगाया जा सकता था।
सामान्य प्रशासनिक दृष्टि से यह स्थानीय सेवा का कर था।
लेकिन किसान की नजर में उसका अर्थ अलग हो सकता था।
चौकीदार अक्सर राज्य की स्थानीय आंख और कान भी था।
वह पुलिस और प्रशासन तक सूचना पहुंचाता।
इसलिए चौकीदारी कर देना केवल सेवा का भुगतान नहीं, उस औपनिवेशिक निगरानी व्यवस्था को आर्थिक सहयोग देना भी प्रतीत हो सकता था।
ताना भगतों के लिए यह प्रश्न विशेष रूप से महत्वपूर्ण बन गया।
लगान और चौकीदारी कर में अंतर
लगान/मालगुजारी भूमि-संबंध से जुड़ी देनदारी थी।
चौकीदारी कर स्थानीय औपनिवेशिक प्रशासनिक ढांचे से जुड़ा कर था।
ताना भगतों ने दोनों का विरोध किया, लेकिन दोनों के पीछे तर्क अलग हो सकते थे।
भूमि पर हमारा पैतृक और नैतिक अधिकार।
हम उस शासन व्यवस्था को आर्थिक सहयोग क्यों दें जिसे अन्यायी मानते हैं?
इस तरह किसान प्रतिरोध अब भूमि से आगे औपनिवेशिक शासन की संस्थागत संरचना पर पहुंचता है।
ताना कर-अस्वीकार 1930 में पैदा नहीं हुआ था
यदि हम 1930 से कहानी शुरू करें तो ऐसा लगेगा कि गांधी ने कहा ‘कर मत दो’ और ताना भगतों ने पालन किया।
मध्य रांची क्षेत्र में ताना शिकायतों के बारे में उपलब्ध शोध पहले के वर्षों से ही rent और chaukidari tax के भुगतान से इनकार तथा begari न देने का उल्लेख करता है।
कांग्रेस और ताना राजनीति फिर एक-दूसरे के निकट आईं
1920 के दशक में कांग्रेस से ताना संबंध स्थायी हो चुका था।
अब 1930 में कांग्रेस फिर सक्रिय जन-आंदोलन के रूप में सामने आई।
इसलिए नई लामबंदी के लिए उन्हें शून्य से तैयार नहीं करना था।
रांची जिले में आंदोलन का प्रारंभिक वातावरण
4 अप्रैल 1930 को रांची नगरपालिका पार्क की सभा में छात्रों और युवाओं से सविनय अवज्ञा में भाग लेने की अपील की गई। बाद में जिले में नमक सत्याग्रह को उल्लेखनीय समर्थन मिला।
लेकिन उसका राजनीतिक प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचा।
इन सबके माध्यम से राष्ट्रीय आंदोलन गांवों में अनुवादित हुआ।
छोटानागपुर में नमक बनाना भी हुआ
कुछ क्षेत्रीय अध्ययनों में उल्लेख है कि रांची जिले में स्थानीय नमकीन मिट्टी—रेहर/रेह मिट्टी—से नमक तैयार कर नमक कानून के विरोध का प्रतीकात्मक प्रयास किया गया।
समुद्र न होने का अर्थ यह नहीं था कि दांडी का प्रतीक छोटानागपुर में अर्थहीन हो गया।
लोगों ने राष्ट्रीय कार्यक्रम का स्थानीय रूप खोज लिया।
लेकिन ताना भगतों की विशेष राजनीति की दृष्टि से नमक से भी अधिक स्वाभाविक क्षेत्र था—
शराब की दुकानों पर धरना
सविनय अवज्ञा के दौरान विदेशी वस्तुओं और शराब की दुकानों पर धरना महत्वपूर्ण कार्यक्रम बना।
ताना भगतों के लिए शराब-विरोध उनकी 1914 की पहचान का हिस्सा था।
इसलिए एक बार फिर राष्ट्रीय और स्थानीय कार्यक्रम लगभग पूरी तरह एक हो गए।
ताना भगत जब शराब की दुकान का विरोध करता था, तो वह एक साथ—
विदेशी वस्त्र-विरोध और खादी
1930 तक खादी ताना पहचान में काफी गहराई से समा चुकी थी।
इसलिए विदेशी वस्त्र का बहिष्कार उनके लिए राजनीतिक कार्यक्रम होने के साथ सामुदायिक जीवन का विस्तार था।
रांची जिले में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और पिकेटिंग के प्रमाण स्पष्ट हैं। 1930 में आंदोलन बढ़ने पर अनेक कार्यकर्ता गिरफ्तार हुए।
सफेद खादी पहनना स्वयं राजनीतिक वक्तव्य है।
चरखा फिर प्रतिरोध का प्रतीक
सितंबर 1930 के स्वदेशी सप्ताह में आदिवासी पुरुषों और महिलाओं द्वारा ‘चरखा’ और ‘तकली’ प्रतियोगिताओं में भाग लेने का उल्लेख रांची विश्वविद्यालय के अध्ययन में मिलता है।
यह तथ्य छोटा प्रतीत हो सकता है, लेकिन महत्वपूर्ण है।
आदिवासी भागीदारी केवल पुलिस से टकराव या जेल तक सीमित नहीं थी।
स्वदेशी अर्थव्यवस्था को प्रतीकात्मक और व्यावहारिक रूप में अपनाना भी आंदोलन था।
गिरफ्तारी : राज्य की पहली प्रतिक्रिया
सविनय अवज्ञा की शक्ति सार्वजनिक अवज्ञा में थी।
और औपनिवेशिक राज्य की स्वाभाविक प्रतिक्रिया गिरफ्तारी थी।
1930 के दौरान रांची जिले में प्रमुख स्थानीय नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं। जुलाई में राजेंद्र प्रसाद की गिरफ्तारी के विरोध में हड़ताल हुई।
ताना भगतों के लिए गिरफ्तारी नया अनुभव नहीं था।
उनकी आंदोलनकारी स्मृति जतरा भगत से ही जेल और दमन से जुड़ी थी।
इसलिए कारावास से आंदोलन की नैतिक शक्ति आवश्यक रूप से कम नहीं होती थी।
दंड सहना ताना और गांधीवादी राजनीति का साझा गुण
यहीं 1914 की ताना परंपरा और 1930 का गांधीवादी सत्याग्रह लगभग एक ही राजनीतिक व्यवहार में मिल जाते हैं।
इसका उद्देश्य राज्य को सैन्य रूप से हराना नहीं था।
उसकी नैतिक वैधता को चुनौती देना और दमन की कीमत सार्वजनिक करना।
लेकिन किसान के लिए कुर्की ‘प्रतीक’ नहीं थी
राष्ट्रीय आंदोलन के बड़े आख्यान में कुर्की को बलिदान के रूप में लिखा जा सकता है।
इसलिए कर-अस्वीकार की वास्तविक कीमत समझना आवश्यक है।
ताना भगतों ने इस कीमत को केवल 1930 में नहीं, पहले भी झेला था।
जमीन की नीलामी : आंदोलन की सबसे गहरी चोट
ताना भगतों के लिए भूमि जीवन का आधार थी।
फिर भी जब उन्होंने लगान या संबंधित देनदारियां देने से इनकार किया, तो यही भूमि राज्य और जमींदारी दमन का सबसे प्रभावी हथियार बन गई।
आगे 1947 में विशेष कानून बनाकर उन ताना भगत रैयतों की कृषि भूमि लौटाने की व्यवस्था करनी पड़ी जिनकी जोत लगान के बकाये की डिक्री के निष्पादन में बेची गई थी। इस बाद के कानून का अस्तित्व ही बताता है कि आंदोलनकालीन लगान-अस्वीकार और भूमि-हानि कितनी गंभीर विरासत बन चुके थे।
कर न देना नैतिक विजय हो सकती थी, लेकिन उसकी कीमत जमीन गंवाना भी थी।
1930 में ताना प्रतिरोध के दो लक्ष्य
ताना भगत अब दो स्तरों पर लड़ रहे थे।
स्थानीय लक्ष्य
भूमि, लगान और ग्रामीण शोषण से मुक्ति।
कांग्रेस ध्वज दोनों को एक मंच पर लाता था।
लेकिन दोनों की प्राथमिकताएं हमेशा पूरी तरह समान नहीं थीं।
क्या गांधी ने सामान्य ‘नो टैक्स’ आंदोलन घोषित किया था?
1930 का सविनय अवज्ञा आंदोलन केवल ‘हर कर देना बंद कर दो’ का अनियंत्रित आह्वान नहीं था।
गांधी और कांग्रेस नेतृत्व चाहते थे कि सविनय अवज्ञा अनुशासित और रणनीतिक हो।
अलग-अलग क्षेत्रों में कार्यक्रम अलग थे।
इसलिए ताना भगतों के पुराने व्यापक कर-अस्वीकार को सीधे गांधी का आदेश कहना गलत होगा।
उनकी अपनी राजनीतिक परंपरा अधिक पुरानी थी।
यही ताना आंदोलन की स्वायत्तता का प्रमाण है
गांधीवादी होने का अर्थ ताना भगतों ने यह नहीं माना कि वे अपने किसान प्रश्न छोड़ दें।
फिर भी भूमि और कर के बारे में उनके अपने धार्मिक-ऐतिहासिक विश्वास थे।
इसलिए उन्हें केवल कांग्रेस स्वयंसेवक के रूप में पढ़ना उनके आंदोलन का आधा इतिहास मिटा देगा।
1931 : गांधी–इरविन समझौते का अंतराल
मार्च 1931 में गांधी–इरविन समझौते के बाद सविनय अवज्ञा अस्थायी रूप से स्थगित हुआ।
गांधी गोलमेज सम्मेलन के लिए लंदन गए।
लेकिन किसानों के स्थानीय प्रश्न समाप्त नहीं हुए।
ये किसी राजनीतिक समझौते के साथ स्वतः गायब नहीं होते।
ताना भगतों के लिए यही राष्ट्रीय रणनीति और स्थानीय जीवन के बीच अंतर था।
क्या आंदोलन स्थगित करना कर-अस्वीकार रोकना था?
कांग्रेस संगठन के लिए हां—आंदोलन की रणनीति नेतृत्व तय करता था।
लेकिन ताना भगतों की धार्मिक-सामुदायिक राजनीति अधिक जटिल थी।
यदि कोई कर स्वयं उनके लिए नैतिक रूप से अवैध था, तो केवल कांग्रेस के राजनीतिक विराम से उसे वैध मान लेना आसान नहीं था।
यही कारण है कि ताना कर-अस्वीकार का इतिहास राष्ट्रीय आंदोलनों की शुरुआत और समाप्ति की तारीखों से आगे चलता है।
1932 : सविनय अवज्ञा की वापसी
दूसरे गोलमेज सम्मेलन से गांधी दिसंबर 1931 में भारत लौटे।
कांग्रेस और सरकार के बीच संबंध फिर बिगड़ गए।
कांग्रेस कार्यसमिति ने सविनय अवज्ञा पुनः शुरू करने का निर्णय लिया।
4 जनवरी 1932 को गांधी गिरफ्तार कर लिए गए।
रांची विश्वविद्यालय के अध्ययन में स्पष्ट है कि पुनः आरंभ आंदोलन में कर न देना भी शामिल था और सरकार ने कांग्रेस तथा अन्य राष्ट्रवादी संगठनों को अवैध घोषित कर व्यापक दमन शुरू किया।
अब ताना भगत फिर राष्ट्रीय दमन के सीधे घेरे में आए।
1932 : ताना भगतों का प्रत्यक्ष दस्तावेजी प्रमाण
1932 के रांची आंदोलन में ताना भगतों की भागीदारी का बहुत स्पष्ट विवरण उपलब्ध है।
रांची विश्वविद्यालय के Journal of Historical Research के अनुसार 23 जुलाई 1932 को दो ताना भगत कांग्रेस ध्वज लेकर अदालत परिसर और बाजार में घूमे।
यह घटना कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है।
ताना भगतों का वहां जाना अहिंसक राजनीतिक प्रदर्शन था।
अदालत परिसर में झंडा क्यों महत्वपूर्ण था?
ताना भगतों का औपनिवेशिक अदालत से संबंध पहले से तनावपूर्ण था।
उनके धार्मिक-किसानी संसार में अदालत उस बाहरी सत्ता का प्रतीक थी जो—
अब उसी अदालत परिसर में कांग्रेस ध्वज लेकर घूमना कानून की इमारत के भीतर नैतिक विरोध का प्रवेश था।
मांडर क्षेत्र में ताना जुटान
1932 में आंदोलन केवल शहर तक सीमित नहीं था।
रांची विश्वविद्यालय के शोध में दर्ज है कि मांडर थाना क्षेत्र के करकट गांव और आसपास के गांवों के ताना भगत कांग्रेस ध्वज लेकर करकट में एकत्र हुए और सभा करना चाहते थे। तीन प्रमुख ताना भगतों को गिरफ्तार कर मुकदमा चलाया गया।
यह ताना आंदोलन के ग्रामीण संगठन की निरंतरता का मजबूत प्रमाण है।
सभा करना स्वयं अपराध कैसे बन गया?
औपनिवेशिक दमन के तीव्र चरण में कांग्रेस तथा उससे जुड़े संगठन अवैध घोषित किए जा सकते थे।
साधारण राजनीतिक गतिविधियां नहीं रहतीं।
इसलिए ताना भगत की पुरानी ‘सभा संस्कृति’ अब सीधे सविनय अवज्ञा का रूप ले रही थी।
झंडा फिर आंदोलन का सबसे टिकाऊ प्रतीक
1932 में गिरफ्तारी के जोखिम के बावजूद ताना भगत कांग्रेस ध्वज लेकर सार्वजनिक रूप से निकल रहे थे।
इससे पता चलता है कि 1922 के गया कांग्रेस से शुरू हुई झंडा-निष्ठा दस वर्ष बाद और मजबूत हो चुकी थी।
अब झंडा महज कांग्रेस अधिवेशन की स्मृति नहीं था।
महिलाओं का प्रश्न
1930–32 के रांची आंदोलन में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी भी उल्लेखनीय थी।
रांची विश्वविद्यालय के अध्ययन में इंदिरा देवी, तारा और अन्य महिला कार्यकर्ताओं की विदेशी वस्तु तथा शराब-विरोधी धरने में भूमिका दर्ज है। इंदिरा देवी पर ताना भगत महिलाओं को सक्रिय करने का संदेह किया गया और उन्हें एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा हुई।
यह उल्लेख विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि प्रशासन ताना महिला समुदाय की संभावित लामबंदी को गंभीरता से देख रहा था।
ताना महिला केवल अनुयायी नहीं थी
ताना धार्मिक जीवन में लिथो और माया जैसी महिला नेतृत्व परंपरा पहले से मौजूद थी।
अब गांधीवादी आंदोलन ने महिलाओं की सार्वजनिक राजनीति के लिए नया मंच खोला।
इन गतिविधियों में ताना महिलाओं की संभावित भागीदारी उनके सामाजिक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
आगे महिला भूमिका को पृथक खंड में और विस्तार देना उचित होगा।
शराबबंदी और महिला राजनीति
शराब का प्रश्न महिलाओं से विशेष रूप से जुड़ सकता था।
इसलिए शराब-विरोध धार्मिक सुधार के साथ महिला सामाजिक हित का भी प्रश्न बन सकता था।
गांधीवादी धरना-पद्धति ने इसे सार्वजनिक राजनीतिक कार्रवाई का रूप दिया।
ताना भगत समाज में यह संबंध और मजबूत था क्योंकि मद्यत्याग उसकी मूल पहचान था।
1932 का दमन क्यों अधिक कठोर था?
सरकार 1930 के अनुभव से सीख चुकी थी।
इस बार उसने शुरुआत से ही कांग्रेस नेतृत्व को गिरफ्तार किया।
सभाओं और प्रचार पर नियंत्रण बढ़ाया।
रांची विश्वविद्यालय के अध्ययन के अनुसार जनवरी 1932 के बाद व्यापक अध्यादेश लागू हुए और राष्ट्रवादी संगठनों पर प्रतिबंध लगा।
इसलिए सामान्य राजनीतिक गतिविधि भी अपराध बन सकती थी।
ताना भगतों का खुलकर ध्वज लेकर निकलना इसी कारण अधिक महत्वपूर्ण है।
कर-अस्वीकार और पशु-कुर्की
ताना भगतों के लिए दमन केवल जेल नहीं था।
कर न देने पर पशु और संपत्ति कुर्क की जा सकती थी।
संगीता दासगुप्ता द्वारा उद्धृत एक मिशनरी स्रोत बाद के दशक के अनुभव के संदर्भ में ताना भगतों के मवेशियों की सार्वजनिक बिक्री और खेतों के बिकने का उल्लेख करता है क्योंकि उन्होंने चौकीदारी कर नहीं दिया था।
यह बताता है कि कर-अस्वीकार धार्मिक दृढ़ता का जितना प्रश्न था, उतना ही पारिवारिक आर्थिक संकट का भी।
बैल कुर्क हुआ तो किसान की शक्ति क्या बची?
कृषि अर्थव्यवस्था में बैल केवल संपत्ति नहीं था।
यदि कर के बदले बैल कुर्क कर लिया गया—
इसलिए औपनिवेशिक दमन किसान को शारीरिक हिंसा किए बिना भी आर्थिक रूप से तोड़ सकता था।
ताना भगतों की अहिंसा को इसी कठोर कीमत के संदर्भ में समझना चाहिए।
‘अहिंसक’ का अर्थ ‘कम पीड़ादायक’ नहीं
यह आंदोलन की बड़ी ऐतिहासिक शिक्षा है।
अहिंसक प्रतिरोध में कार्यकर्ता किसी पर हमला नहीं करता।
इसलिए अहिंसा प्रतिरोध की लागत समाप्त नहीं करती।
वह केवल संघर्ष का नैतिक और रणनीतिक रूप बदलती है।
ताना भगतों ने इस कीमत को लंबे समय तक झेला।
क्या ताना भगत हिंसा से पूरी तरह दूर रहे?
जैसा पहले स्पष्ट किया गया, 1914–19 के पूरे व्यापक ताना इतिहास को बिना अपवाद पूर्ण अहिंसक कहना उचित नहीं।
लेकिन 1920 के बाद के संगठित गांधीवादी ताना समुदाय में अहिंसा केंद्रीय पहचान बन चुकी थी।
1930–34 के उपलब्ध प्रमुख विवरणों में उनकी विशिष्ट भागीदारी—
मुख्यतः अहिंसक राजनीतिक व्यवहार के रूप में सामने आती है।
1930–34 में ‘किसान’ और ‘राष्ट्रवादी’ अलग नहीं रहे
ताना भगत के लिए अब यह विभाजन कृत्रिम था—
मैं किसान हूं या स्वतंत्रता सेनानी?
वह किसान आर्थिक प्रतिरोध कर रहा है।
वही कार्य ब्रिटिश राज के विरुद्ध राष्ट्रीय सविनय अवज्ञा भी है।
1934 से रामगढ़ कांग्रेस 1940 तक
ताना भगतों का गांधीवादी रचनात्मक कार्यक्रम, चौकीदारी कर-विरोध और भूमि-कुर्की, कांग्रेस से स्थायी निष्ठा तथा रामगढ़ अधिवेशन में आदिवासी–किसान राष्ट्रवाद का प्रदर्शन
1934 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के औपचारिक समापन के बाद भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन एक ऐसे चरण में प्रवेश करता है जिसे अक्सर ‘अंतराल’ मान लिया जाता है। लेकिन ताना भगतों के इतिहास में 1934 से 1940 का समय निष्क्रियता का नहीं, बल्कि राजनीतिक निष्ठा की परीक्षा और आंदोलन के सामुदायिक स्थायीकरण का दौर था।
गांधी का बड़ा जन-सत्याग्रह फिलहाल रुक गया था।
1937 में प्रांतीय चुनाव और कांग्रेस मंत्रिमंडल बने।
राष्ट्रीय राजनीति संसद, प्रांतीय सरकार और आगामी संघर्ष—तीनों दिशाओं में बंट रही थी।
लेकिन छोटानागपुर के ताना भगतों के लिए दैनिक प्रश्न लगभग वही थे—
यदि नहीं दिया तो जमीन और मवेशियों की कुर्की कैसे रोकी जाए?
और क्या आने वाला स्वराज उस जमीन को लौटाएगा जो संघर्ष के कारण हाथ से निकल गई?
यहीं 1934–40 का केंद्रीय विरोधाभास है—
1934 के बाद ‘आंदोलन खत्म’ क्यों नहीं हुआ?
सामान्य राजनीतिक संगठन के लिए आंदोलन का अर्थ होता है—
उनकी राजनीति किसी एक कांग्रेस प्रस्ताव पर निर्भर नहीं थी।
उन्होंने पहले ही अपने जीवन में गांधीवादी और ताना अनुशासन को मिला लिया था—
इसलिए गांधी राष्ट्रीय आंदोलन स्थगित कर सकते थे, लेकिन ताना भगत अपने जीवन से गांधीवाद कैसे स्थगित करते?
आंदोलन से ‘गांधीवादी समुदाय’ तक
1930 के दशक के मध्य तक ताना भगतों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे अब केवल किसी आंदोलन के कार्यकर्ता नहीं थे।
वे स्थायी गांधीवादी समुदाय बन चुके थे।
संगीता दासगुप्ता के विस्तृत अध्ययन में ताना भगतों और कांग्रेस के संबंध को केवल राजनीतिक गठबंधन नहीं, बल्कि गांधी, चरखा और स्वराज जैसे प्रतीकों के स्थानीय ताना अर्थों से जोड़कर देखा गया है। उनका निष्कर्ष है कि ताना नेतृत्व ने गांधीवादी संदेशों को अपने पुराने सांस्कृतिक संसार में समझा और कई बार पुराने प्रतिरोधों को गांधी के नाम की नई वैधता के साथ जारी रखा।
यही 1934 के बाद के इतिहास को समझने की कुंजी है।
गांधी का रचनात्मक कार्यक्रम ताना जीवन से क्यों मेल खाता था?
गांधी के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता केवल ब्रिटिश सत्ता से टकराव नहीं थी।
ताना भगतों की 1914 से विकसित संस्कृति में इनमें से कई तत्व पहले से मौजूद थे।
इसलिए सविनय अवज्ञा बंद होने के बाद भी वे राजनीतिक रूप से ‘बेरोजगार’ नहीं हुए।
उनकी पूरी जीवन-पद्धति रचनात्मक कार्यक्रम बन सकती थी।
चरखा : राजनीतिक गतिविधि का दैनिक रूप
चरखा यहां केवल गांधी का प्रतीक नहीं रहा।
इस प्रकार चरखा आंदोलन के बीच भी चलता था और आंदोलन के बाद भी।
यही गांधीवादी राजनीति की वह विशेषता थी जिसने ताना भगतों को उससे लंबे समय तक जोड़े रखा।
खादी : पहचान और राजनीति का स्थायी मिलन
खादी ताना भगत के लिए राष्ट्रीय आंदोलन का अस्थायी ‘वर्दी’ नहीं बनी।
वह धीरे-धीरे उसकी सामुदायिक पहचान का स्थायी अंग बनी।
सफेद वस्त्र पहले से शुद्धता और संयम से जुड़े थे।
और ब्रिटिश आर्थिक व्यवस्था से दूरी।
राष्ट्रीय ध्वज का धार्मिक-सामुदायिक रूपांतरण
इसी तरह कांग्रेस ध्वज ने भी ताना समाज में सामान्य राजनीतिक झंडे से आगे का अर्थ ग्रहण किया।
1922 के गया कांग्रेस से लेकर 1930–32 के सविनय अवज्ञा तक ताना भगत सार्वजनिक रूप से कांग्रेस ध्वज लेकर चलते रहे थे।
1930 के दशक में यह संबंध और स्थायी हुआ।
बाद की ताना परंपरा में राष्ट्रीय ध्वज का लगभग पवित्र स्थान बन जाना इसी दीर्घ प्रक्रिया का परिणाम था। आधुनिक विवरण बताते हैं कि आज भी ताना भगत समुदाय में तिरंगे का असाधारण धार्मिक-सामुदायिक सम्मान है और गांधी की स्मृति प्रार्थनाओं से जुड़ी हुई है।
लेकिन 1930 के दशक की बात करते समय फिर सावधानी जरूरी है—उस समय कांग्रेस ध्वज और आज के संवैधानिक राष्ट्रीय तिरंगे को हूबहू एक ही रूप में नहीं मानना चाहिए।
राजनीतिक अंतराल में असली परीक्षा : कर
1934 के बाद ताना भगतों की सबसे कठिन समस्या बनी—
चौकीदारी कर।
यदि राष्ट्रीय आंदोलन स्थगित है और गांधी सक्रिय कर-अस्वीकार का आह्वान नहीं कर रहे, तब ताना भगत क्या करे?
जो कर वह वर्षों से नैतिक रूप से गलत मानता है, क्या अब देना शुरू कर दे?
यहीं उनकी स्वायत्त राजनीतिक चेतना फिर सामने आती है।
चौकीदारी कर केवल रुपये का प्रश्न नहीं था
ताना भगत की दृष्टि में चौकीदारी कर का अर्थ था—
उस औपनिवेशिक गांव-प्रशासन को आर्थिक सहयोग देना जो स्वयं ब्रिटिश राज की निगरानी व्यवस्था का हिस्सा था।
यदि हम गांधी का स्वराज चाहते हैं तो उस शासन के चौकीदार को अपनी जेब से क्यों चलाएं?
यहीं कर-अस्वीकार को धार्मिक नैतिकता, गांधीवादी असहयोग और औपनिवेशिक प्रशासन-विरोध—तीनों अर्थ मिलते थे।
1939 का अत्यंत महत्वपूर्ण मिशनरी प्रमाण
इस दौर के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष विवरणों में से एक रोमन कैथोलिक मिशनरी फादर डिलेस का 1939 का लेखन है।
संगीता दासगुप्ता द्वारा उद्धृत उनके विवरण में कहा गया है कि ताना भगत इस बात से गहराई से निराश हुए जब चौकीदारी कर न देने के कारण—
उनके मवेशी जब्त कर सार्वजनिक रूप से बेचे गए,
और अधिक खेतों की बिक्री का खतरा था।
कुछ भगत जेल में रखे गए, जब तक वे ‘व्यवहार ठीक रखने’ और देनदारी देने पर सहमत नहीं हुए।
यह स्रोत 1934–40 की कहानी का केंद्र होना चाहिए।
क्योंकि वह दिखाता है कि गांधीवादी निष्ठा की वास्तविक कीमत कितनी कठोर थी।
‘जेल या कर’ : राज्य का दबाव
एक ताना भगत के सामने स्थिति ऐसी हो सकती थी—
यहां अहिंसा कोई सुरक्षित नैतिक मुद्रा नहीं थी।
यह आर्थिक और व्यक्तिगत जोखिम का चुनाव था।
यही कारण है कि ताना भगतों के गांधीवाद को केवल खादी और झंडे की सुंदर छवि में नहीं समेटना चाहिए।
मवेशी की नीलामी : किसान पर अप्रत्यक्ष दमन
यदि कर न देने के कारण बैल कुर्क हुआ तो किसान को केवल संपत्ति नहीं खोनी पड़ी।
इसलिए मवेशी की सार्वजनिक नीलामी आंदोलनकारी अनुशासन तोड़ने का शक्तिशाली तरीका था।
राज्य को किसान पर लाठी चलाने की आवश्यकता नहीं।
उसके हल की शक्ति छीन लेना भी पर्याप्त हो सकता था।
खेत बिकना : प्रतिरोध की चरम आर्थिक कीमत
फादर डिलेस के 1939 के विवरण में खेतों की बिक्री का उल्लेख और भी गंभीर है।
भूमि ताना भगत आंदोलन के जन्म से ही केंद्रीय प्रश्न थी।
यदि लगान और कर-अस्वीकार करते-करते वही भूमि नीलाम हो जाए तो आंदोलन एक भयावह विरोधाभास में फंस जाता है—
भूमि के अधिकार के लिए लड़ो और उसी संघर्ष में भूमि खो दो।
यही विरोधाभास आगे विशेष भूमि-पुनर्स्थापन कानून की आवश्यकता का कारण बना।
1935–36 के आंदोलन का न्यायालयी उल्लेख
बाद के एक न्यायिक निर्णय में भी यह दर्ज हुआ कि 1935–36 में ताना भगतों ने लगान न देने का आंदोलन किया था और संबंधित भूमि बाद में नीलामी-विवाद का विषय बनी।
इससे स्पष्ट होता है कि कर-अस्वीकार 1930–34 के सविनय अवज्ञा के साथ समाप्त नहीं हुआ।
1935–36 में भी ताना भगतों के भीतर ‘नो-रेंट’ चेतना सक्रिय थी।
इसलिए 1934 को अंतरेखा मानना गलत है
राष्ट्रीय आंदोलन की समयरेखा कह सकती है—
1939 में भी चौकीदारी कर के कारण मवेशी और खेत नीलाम।
यानी ताना इतिहास राष्ट्रीय आंदोलन की ‘ऑन–ऑफ’ समयरेखा से अलग चलता है।
यही उसकी स्वतंत्रता का सबसे ठोस प्रमाण है।
1935 का भारत शासन अधिनियम : नया राजनीतिक वातावरण
1935 का भारत शासन अधिनियम ब्रिटिश भारत के संवैधानिक इतिहास का बड़ा पड़ाव था।
उसने प्रांतीय स्वायत्तता का व्यापक ढांचा बनाया और 1937 के चुनावों का रास्ता खोला।
राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए अब प्रश्न था—
ब्रिटिश संवैधानिक ढांचे के भीतर चुनाव और मंत्रिमंडल चलाया जाए या केवल प्रतिरोध किया जाए?
ताना भगत के लिए राजनीतिक प्रश्न अधिक सरल और अधिक कठोर था—
क्या कांग्रेस सरकार आने से यह बदल जाएगा?
1937 के चुनाव : राष्ट्रीय राजनीति गांव के और करीब
1937 के प्रांतीय चुनावों ने कांग्रेस को पहली बार कई प्रांतों में शासन का व्यावहारिक अनुभव दिया।
बिहार में भी कांग्रेस मंत्रालय बना।
अंग्रेज सरकार है, कांग्रेस असहाय है।
यदि कांग्रेस मंत्रालय है तो हमारी जमीन और कर की समस्या क्यों नहीं सुलझती?
यहीं राष्ट्रीय निष्ठा और व्यावहारिक न्याय का तनाव बढ़ना स्वाभाविक था।
लेकिन औपनिवेशिक संरचना अभी समाप्त नहीं हुई थी
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि 1937 की प्रांतीय स्वायत्तता पूर्ण स्वराज नहीं थी।
राज्यपाल के पास व्यापक शक्तियां थीं।
भूमि और राजस्व की जटिल प्रशासनिक तथा कानूनी संरचनाएं बनी हुई थीं।
इसलिए कांग्रेस मंत्रालय के आने से ताना भगतों की दशकों पुरानी जमीन समस्या रातोंरात हल नहीं हो सकती थी।
लेकिन उनकी राजनीतिक उम्मीदें अब पहले से अधिक होना स्वाभाविक थीं।
भूमि-पुनर्स्थापन का प्रश्न राजनीतिक एजेंडा बनता है
1930 के दशक के अंत तक यह स्पष्ट हो चुका था कि ताना भगतों की कुछ भूमि आंदोलन में कर-अस्वीकार के कारण नीलाम हुई थी।
यह साधारण व्यक्तिगत ऋण विवाद नहीं रहा।
यह राजनीतिक बलिदान का प्रश्न बन चुका था।
यदि हमने राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए कर नहीं दिया और जमीन गई, तो राष्ट्रीय नेतृत्व उस जमीन को लौटाने की जिम्मेदारी क्यों न ले?
यह तर्क अंततः कानूनी रूप ग्रहण करेगा।
1947 का विशेष कानून इस पुराने संकट का प्रमाण है
Ranchi District Tana Bhagat Raiyats’ Agricultural Lands Restoration Act, 1947 ने उन ताना भगत रैयतों की कृषि भूमि लौटाने की व्यवस्था बनाई जिनकी होल्डिंग या भूमि विशेष परिस्थितियों में लगान के बकाये की डिक्री के निष्पादन में बेची गई थी। कानून में नीलामी-खरीदारों और बाद के हस्तांतरणों तक की जटिल स्थितियों के लिए व्यवस्था की गई।
इस कानून को केवल स्वतंत्रता-उपरांत कल्याणकारी कदम न समझें।
यह 1930 के दशक के किसान प्रतिरोध के आर्थिक घाव का कानूनी दस्तावेज है।
ताना भगत और ‘राज्य से पूर्ण दूरी’
ताना भगतों की राजनीति में इस दौर में एक मजबूत प्रवृत्ति थी—
अपना धार्मिक-सामुदायिक अनुशासन बनाए रखना।
यह स्थिति आधुनिक अर्थ में अलगाववाद नहीं थी।
क्योंकि वे कांग्रेस और भारतीय राष्ट्रवाद से जुड़े हुए थे।
ब्रिटिश राज्य को अस्वीकार, भारतीय स्वराज को स्वीकार।
गांधी के नाम पर पुराना प्रतिरोध जारी
संगीता दासगुप्ता का शोध एक अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु उठाता है—
ताना नेता गांधी और कांग्रेस के संदेश को कई अर्थों में ग्रहण करते थे, लेकिन अक्सर अपने पुराने प्रतिरोध-रूपों को ही गांधी के नाम से वैधता देते रहे।
गांधीवाद ने ताना राजनीति को पूरी तरह नियंत्रित नहीं किया।
ताना भगतों ने गांधीवाद का अपना संस्करण बनाया।
उनके लिए गांधी का नाम कभी-कभी उन स्थानीय मांगों के नैतिक समर्थन का प्रतीक बन गया जिन्हें कांग्रेस नेतृत्व ने औपचारिक रूप से उसी तरह स्वीकृत न भी किया हो।
‘गांधी बाबा’ : राजनीतिक निर्देश और लोकविश्वास
दासगुप्ता के अध्ययन में गांधी के आसपास विकसित स्थानीय मिथकों, अफवाहों और लोककथाओं की विशेष चर्चा है।
ताना भगतों के लिए गांधी दूर बैठे राजनीतिक रणनीतिकार भर नहीं थे।
उनकी छवि स्थानीय धार्मिक समझ में प्रवेश कर चुकी थी।
इससे एक महत्वपूर्ण स्थिति पैदा हुई—
कांग्रेस की आधिकारिक नीति और ‘गांधी बाबा क्या चाहते होंगे’—दो अलग चीजें हो सकती थीं।
ताना अनुयायी कभी दूसरे को अधिक महत्वपूर्ण मान सकता था।
गांधीवाद का स्थानीय अनुवाद फिर स्पष्ट होता है
अभी अमुक राजनीतिक कार्यक्रम अपनाना है।
ताना भगत अपनी सांस्कृतिक भाषा में उसे पढ़ सकता था—
गांधी चाहते हैं कि अंग्रेजी राज का अन्याय स्वीकार न करें।
यह अनुवाद हमेशा कांग्रेस की रणनीतिक सीमा से मेल खाए, जरूरी नहीं।
यही स्थानीय राष्ट्रवाद की स्वायत्तता है।
मिशनरी स्रोत हमें क्या बताते हैं?
फादर डिलेस जैसे मिशनरी स्रोत अत्यंत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे राज्य और कांग्रेस दोनों से बाहर की दृष्टि प्रदान करते हैं।
लेकिन उन्हें भी बिना आलोचना स्वीकार नहीं करना चाहिए।
मिशनरी और ताना भगतों के बीच धार्मिक प्रतिस्पर्धा का इतिहास था।
इसलिए मिशनरी भाषा में ताना जिद या निराशा को नकारात्मक ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है।
फिर भी संपत्ति जब्ती, मवेशियों की सार्वजनिक बिक्री और खेतों की नीलामी जैसे ठोस विवरण अत्यंत मूल्यवान हैं।
1939 : दुनिया फिर युद्ध की ओर
सितंबर 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हुआ।
ब्रिटिश सरकार ने भारतीय राजनीतिक नेतृत्व की सहमति के बिना भारत को युद्धरत घोषित कर दिया।
इससे कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार के संबंध फिर संकट में आए।
कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने 1939 में इस्तीफा दिया।
अब देश फिर सीधे संघर्ष की ओर बढ़ने लगा।
ताना भगतों के लिए भी नया राजनीतिक दौर आने वाला था।
युद्ध और ताना राजनीतिक चेतना
ताना आंदोलन ने पहले विश्वयुद्ध के दौरान भी वैश्विक राजनीति को अपने स्थानीय धार्मिक संसार में ग्रहण किया था।
अब दूसरे विश्वयुद्ध के समय उनकी राजनीतिक चेतना कहीं अधिक परिपक्व थी।
राष्ट्रीय स्वतंत्रता की भाषा अपना चुके थे।
इसलिए अब विश्वयुद्ध केवल ‘अंग्रेज किसी दूसरे देश से लड़ रहे हैं’ की अफवाह नहीं था।
भारत की सहमति के बिना अंग्रेज भारत को युद्ध में क्यों ले जाएं?
कांग्रेस मंत्रिमंडलों का इस्तीफा और आगामी संघर्ष
1939 के अंत तक कांग्रेस के प्रांतीय मंत्रालयों का इस्तीफा संकेत था कि ब्रिटिश सत्ता और कांग्रेस के बीच समझौते की सीमा समाप्त हो रही है।
क्या गांधी फिर संघर्ष की घोषणा करेंगे?
इसी राजनीतिक वातावरण में कांग्रेस ने 1940 का अधिवेशन छोटानागपुर क्षेत्र के रामगढ़ में आयोजित किया।
यह ताना भगतों के लिए ऐतिहासिक अवसर था।
राष्ट्रीय कांग्रेस अब उनके भूगोल में आ रही थी।
रामगढ़ क्यों महत्वपूर्ण था?
अब तक ताना भगत गया और दूसरे कांग्रेस आयोजनों तक पैदल गए थे।
1940 में कांग्रेस का राष्ट्रीय मंच स्वयं छोटानागपुर के निकट आया।
रामगढ़ का अधिवेशन केवल राष्ट्रीय राजनीति का आयोजन नहीं था।
यह स्थानीय आदिवासी और किसान समाज के लिए—
जैसे नेताओं को अपने भूगोल में देखने का अवसर था।
इससे राष्ट्रवाद का ‘दूर का भारत’ एकदम निकट हो गया।
रामगढ़ कांग्रेस : तिथि और अध्यक्ष
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 53वां अधिवेशन मार्च 1940 में रामगढ़ में हुआ और उसकी अध्यक्षता मौलाना अबुल कलाम आजाद ने की।
गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, सरोजिनी नायडू, खान अब्दुल गफ्फार खान और अन्य राष्ट्रीय नेता उपस्थित थे। गांधी ने खादी और ग्रामोद्योग प्रदर्शनी भी खोली।
इस अधिवेशन की राजनीतिक पृष्ठभूमि द्वितीय विश्वयुद्ध और ब्रिटिश सरकार से आसन्न बड़े टकराव की थी।
रामगढ़ में आदिवासी उपस्थिति
उपलब्ध ऐतिहासिक अध्ययनों के अनुसार रामगढ़ कांग्रेस में बड़ी संख्या में आदिवासी उपस्थित थे, जिनमें ताना भगत भी शामिल थे। कुछ आदिवासियों ने कांग्रेस स्वयंसेवक के रूप में भी काम किया। आयोजन के मुख्य द्वार को बिरसा मुंडा के नाम से जोड़ना और स्मारिका में बिरसा की कथा प्रकाशित करना कांग्रेस द्वारा क्षेत्रीय आदिवासी स्मृति से संवाद का संकेत था।
अब उनकी स्मृति राष्ट्रीय कांग्रेस के मंच पर सम्मानित हो रही थी।
बिरसा की स्मृति और ताना भगत—दो धाराओं का मिलन
रामगढ़ अधिवेशन का आदिवासी राजनीतिक अर्थ इसी में था।
राष्ट्रीय कांग्रेस इन दोनों परंपराओं को अपने व्यापक स्वतंत्रता आख्यान में समाहित कर रही थी।
इससे आदिवासी प्रतिरोध और भारतीय राष्ट्रवाद का संबंध अधिक सार्वजनिक हुआ।
पालामू से पैदल आए ताना भगत
रामगढ़ अधिवेशन के बारे में उपलब्ध विवरण एक विशेष ताना जत्थे का उल्लेख करते हैं जो पालामू से पैदल रामगढ़ पहुंचा।
इस जत्थे में लाला भगत, सोमा भगत, विश्वामित्र भगत और कबिया भगत जैसे नाम दिए जाते हैं।
यह यात्रा गया कांग्रेस के पुराने पैटर्न की याद दिलाती है—
ताना भगतों के लिए कांग्रेस अधिवेशन मानो राष्ट्रीय तीर्थ बन चुका था।
गांधी को 400 रुपये की थैली
रामगढ़ अधिवेशन से जुड़ी ताना भगत स्मृति की सबसे प्रसिद्ध घटना है—
गांधी को 400 रुपये की थैली भेंट करना।
उपलब्ध अधिवेशन-संबंधी विवरण बताते हैं कि ताना भगतों के एक समूह ने गांधी को 400 रुपये भेंट किए।
1940 में गरीब ग्रामीण कृषकों के लिए यह बड़ी रकम थी।
और इसलिए उसका राजनीतिक अर्थ रकम से कहीं अधिक था।
गरीब किसान गांधी को पैसा क्यों देता है?
यह प्रश्न ताना राष्ट्रवाद की गहराई समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
वही अपनी बचत राष्ट्रीय आंदोलन को देता है।
इसका अर्थ है कि वह कांग्रेस को बाहरी राजनीतिक संगठन नहीं मान रहा।
वह अपनी निजी गरीबी और राष्ट्रीय मुक्ति को एक ही संघर्ष में देख रहा है।
400 रुपये : ताना बलिदान का प्रतीक
इस भेंट को केवल ‘चंदा’ कहना पर्याप्त नहीं होगा।
राष्ट्रीय संघर्ष के साथ आर्थिक भागीदारी।
ताना भगतों का यह विश्वास कि भारत का स्वराज उनके अपने किसान न्याय का रास्ता है।
यानी उन्होंने केवल ध्वज नहीं उठाया।
क्या गांधी ने ताना भगतों के साथ तीन दिन बिताए?
कुछ आधुनिक विवरणों में यह दावा मिलता है कि रामगढ़ कांग्रेस के दौरान गांधी ने ताना भगतों के साथ लगभग तीन दिन बिताए। एक प्रकाशित पुनर्कथन ऐसा कहता है।
लेकिन इस दावे को अधिक मजबूत प्राथमिक सत्यापन की आवश्यकता है।
इसलिए इसे अभी निर्विवाद तथ्य के रूप में नहीं लिखना चाहिए।
ताना भगत रामगढ़ कांग्रेस में बड़ी संख्या में उपस्थित थे, गांधी से मिले और आर्थिक भेंट दी; उनके और गांधी के संबंध का यह अत्यंत महत्वपूर्ण सार्वजनिक क्षण था।
रामगढ़ में खादी प्रदर्शनी का विशेष अर्थ
गांधी द्वारा खादी और ग्रामोद्योग प्रदर्शनी का उद्घाटन ताना भगतों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा होगा।
क्योंकि खादी अब उनके लिए कोई नया प्रतीक नहीं थी।
जिस वस्त्र को वे गांव में रोज पहनते थे, वही राष्ट्रीय कांग्रेस के सर्वोच्च मंच पर स्वराज की अर्थव्यवस्था के रूप में प्रस्तुत हो रहा था।
यह उनकी अपनी जीवन-पद्धति की राष्ट्रीय पुष्टि जैसा था।
समेकित निष्कर्ष : सविनय अवज्ञा खत्म हुई, ताना भगतों की अवज्ञा नहीं
1935–36 में लगान-विरोध के प्रमाण हैं।
ताना भगत और भारत छोड़ो आंदोलन, 1942
‘करो या मरो’, राष्ट्रीय ध्वज, सरकारी संस्थानों का बहिष्कार, गिरफ्तारियां और जेल—अहिंसक ताना परंपरा ब्रिटिश राज के अंतिम निर्णायक संघर्ष में
अगस्त 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ तो ताना भगतों के लिए अंग्रेजी राज के विरुद्ध संघर्ष कोई नया अनुभव नहीं था। तब तक वे लगभग अट्ठाईस वर्षों से औपनिवेशिक सत्ता, जमींदारी संबंध, लगान, चौकीदारी कर और ग्रामीण प्रशासन के विभिन्न रूपों का प्रतिरोध कर रहे थे। 1920 के दशक से गांधी और कांग्रेस के साथ उनका संबंध गहरा हो चुका था, और 1940 के रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन तक वे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के एक विशिष्ट आदिवासी–किसान गांधीवादी समुदाय के रूप में स्थापित हो चुके थे।
लेकिन 1942 ने उनके सामने एक नई और कहीं अधिक कठिन परिस्थिति खड़ी की।
“करो या मरो।”
इसके तुरंत बाद कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व गिरफ्तार कर लिया गया।
देश के अनेक भागों में आंदोलन स्वतःस्फूर्त हो गया।
कई जगह समानांतर सत्ता स्थापित करने की कोशिश हुई।
क्या गांधी के प्रति उनकी अहिंसक निष्ठा इस विस्फोटक जनविद्रोह के बीच बनी रहेगी?
ताना भगतों की मुख्य परंपरा 1942 में भी गांधीवादी रही, लेकिन दस्तावेजी इतिहास एक महत्वपूर्ण अपवाद सामने रखता है—18 अगस्त 1942 को बिशुनपुर पुलिस स्टेशन को ताना भगतों के एक समूह द्वारा आग लगाए जाने का उल्लेख मिलता है। इस घटना के कारण 1942 का अध्याय ताना भगतों की ‘पूर्ण और अविच्छिन्न अहिंसा’ की सरल कथा को चुनौती देता है।
इसलिए भारत छोड़ो आंदोलन में ताना भगतों की भूमिका को न तो केवल अहिंसक संतों की कथा में बदलना चाहिए, न एक हिंसक विद्रोही समूह के रूप में।
वास्तविक इतिहास दोनों से अधिक जटिल है।
1942 तक ताना भगत कितनी दूर आ चुके थे?
और अंग्रेजों को भारत छोड़ने का राष्ट्रीय आह्वान।
इसलिए भारत छोड़ो आंदोलन में उनकी भागीदारी किसी अचानक राष्ट्रवादी उत्साह का परिणाम नहीं थी।
वह उनकी दीर्घ राजनीतिक यात्रा की परिणति थी।
रामगढ़ 1940 ने मनोवैज्ञानिक तैयारी कर दी थी
सिर्फ दो वर्ष पहले कांग्रेस का रामगढ़ अधिवेशन छोटानागपुर की धरती पर हुआ था।
ताना भगत वहां बड़ी संख्या में पहुंचे थे।
राष्ट्रीय नेताओं को निकट से देखा था।
इसलिए 1942 में ‘कांग्रेस’ या ‘गांधी’ उनके लिए दूर की संस्थाएं नहीं थीं।
वे उनके अपने राजनीतिक संसार का हिस्सा बन चुके थे।
जब गांधी ने अंग्रेजों से भारत छोड़ने को कहा, तो ताना भगतों ने इसे बाहरी राजनीतिक आदेश की तरह नहीं सुना।
यह उस नेता का आह्वान था जिसे वे दशकों से नैतिक गुरु की तरह मान रहे थे।
8 अगस्त 1942 : भारत छोड़ो प्रस्ताव
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने 8 अगस्त 1942 को बंबई में भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया।
गांधी ने उसी ऐतिहासिक सभा में ‘करो या मरो’ का संदेश दिया।
भारत अपनी स्वतंत्रता के लिए स्वयं जिम्मेदारी उठाए।
लेकिन ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को संगठित होने का अवसर देने के बजाय तुरंत नेतृत्व पर प्रहार किया।
9 अगस्त की सुबह गांधी, नेहरू, पटेल, मौलाना आजाद और अन्य शीर्ष नेता गिरफ्तार कर लिए गए।
इससे आंदोलन का नियंत्रण केंद्रीय नेतृत्व के हाथ से निकल गया।
नेतृत्वहीन जनविद्रोह
यही भारत छोड़ो आंदोलन को असहयोग और सविनय अवज्ञा से अलग बनाता है।
1920 में गांधी लगातार आंदोलन नियंत्रित कर रहे थे।
1930 में भी नमक सत्याग्रह योजनाबद्ध था।
1942 में शीर्ष नेतृत्व प्रारंभ में ही जेल चला गया।
इसके बाद स्थानीय लोगों ने स्वयं निर्णय लिए—
यहीं गांधी की अहिंसा और स्वतःस्फूर्त जनक्रोध के बीच दूरी बढ़ी।
छोटानागपुर में आंदोलन का प्रसार
रांची जिला प्रशासन के आधिकारिक इतिहास के अनुसार 1942 की क्रांति में राष्ट्रीय नेताओं की गिरफ्तारी के बाद जिले में—
और संचार लाइनों को बाधित करने की घटनाएं हुईं।
रांची जिला स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहा।
और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में भी राजनीतिक हलचल फैली।
यानी ताना भगतों के सामाजिक आधार वाले क्षेत्र सीधे आंदोलन की चपेट में थे।
राष्ट्रीय ध्वज फिर प्रतिरोध का केंद्र
ताना भगतों के लिए राष्ट्रीय ध्वज 1920 के दशक से महत्वपूर्ण था।
1942 में उसका अर्थ और अधिक स्पष्ट हो गया।
अब झंडा उठाना केवल कांग्रेस समर्थक होना नहीं था।
ब्रिटिश सरकार द्वारा कांग्रेस पर प्रतिबंध और नेताओं की गिरफ्तारी के बाद झंडा फहराना स्वयं औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती हो सकता था।
ताना भगतों के कई व्यक्तिगत जीवन-वृत्तांतों में 1942 के दौरान ध्वज फहराने का उल्लेख मिलता है।
उदाहरण के लिए तुलसी ताना भगत, जारिया–सिंहवा टोली, बेड़ो के निवासी, भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हुए, रांची जेल भेजे गए और वे बेड़ो ब्लॉक पर झंडा फहराने जाते थे। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने उनके जीवन-वृत्तांत में इसे दर्ज किया है।
तुलसी ताना भगत : व्यक्ति के माध्यम से आंदोलन को देखना
तुलसी ताना भगत का उदाहरण अत्यंत उपयोगी है।
और सरकारी भवन पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने की गतिविधि से जुड़े।
इस एक जीवन में ताना भगत आंदोलन के तीन आयाम मिल जाते हैं—
किसान।
यह दिखाता है कि 1942 तक ताना पहचान और राष्ट्रीय आंदोलन अलग-अलग संसार नहीं रह गए थे।
रति ताना भगत : लोहरदगा का उदाहरण
लोहरदगा जिले के साटो गांव के रति ताना भगत के बारे में भी भारत सरकार के अभिलेख बताते हैं कि उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया। वे गरीब किसान परिवार से थे और गांधीवादी जीवन से प्रभावित थे।
यह उल्लेख महत्वपूर्ण है क्योंकि ताना भागीदारी केवल रांची शहर या किसी एक गांव तक सीमित नहीं थी।
रांची–लोहरदगा–गुमला क्षेत्र की व्यापक ग्रामीण ताना दुनिया राष्ट्रीय संघर्ष में सक्रिय थी।
सोमरा ताना भगत : पटना और रांची जेल
भारत सरकार के डिजिटल जिला भंडार में सोमरा ताना भगत के बारे में लिखा है कि उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया और उन्हें पहले पटना जेल तथा फिर रांची जेल भेजा गया। उनके साथ जेल में यातना होने का भी उल्लेख मिलता है। बाद में उन्हें स्वतंत्रता सेनानी के रूप में सम्मानित किया गया और 1972 में ताम्रपत्र मिला।
यह विवरण एक महत्वपूर्ण बात दिखाता है—
ताना भगतों की भागीदारी इतनी गंभीर थी कि उन्हें केवल स्थानीय हिरासत में रखकर छोड़ नहीं दिया गया।
कई कार्यकर्ता दीर्घ कारावास और दमन के शिकार हुए।
लेकिन सोमरा की जीवनी पर भी स्रोत-समीक्षा जरूरी
सरकारी स्मारक जीवन-वृत्तांतों को उपयोगी मानते हुए भी पूरी तरह आलोचनारहित स्वीकार नहीं करना चाहिए।
उदाहरणतः वहां सोमरा को जतरा ताना भगत का पुत्र बताया गया है और जन्म 1927 दिया गया है। यदि उन्होंने 1942 में आंदोलन किया, तो उनकी आयु लगभग पंद्रह वर्ष रही होगी।
यह संभव है—भारत छोड़ो आंदोलन में किशोरों और विद्यार्थियों की व्यापक भागीदारी हुई थी।
लेकिन ऐसी प्रत्येक व्यक्तिगत पहचान के लिए मूल स्वतंत्रता सेनानी पेंशन फाइल और राज्य अभिलेख की जांच करना अधिक सुरक्षित होगा।
अतः नाम महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उन्हें अंतिम वंशावली प्रमाण की तरह नहीं लेना चाहिए।
जेल केवल दंड नहीं, आंदोलन का नया स्थल
ताना भगतों की राजनीतिक स्मृति में जेल नई चीज नहीं थी।
जतरा भगत से शुरू होकर कई नेता जेल गए थे।
लेकिन गांधीवादी आंदोलन में जेल जाना सम्मान का प्रतीक भी बन चुका था।
ताना भगतों के लिए यह धार्मिक तपस्या जैसी अर्थवत्ता भी ग्रहण कर सकता था।
जेल में मृत्यु : संघर्ष की वास्तविक कीमत
भारत सरकार से संबद्ध Dictionary of Martyrs में खेड़वा भगत, चेतर, थाना कुड़ू, जिला रांची, पुत्र लोड़ा ताना भगत, का उल्लेख मिलता है। उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया, गिरफ्तार हुए, पटना कैंप जेल भेजे गए और 1943 में वहीं उनकी मृत्यु हुई।
यह ताना आंदोलन के 1942 चरण का अत्यंत महत्वपूर्ण व्यक्तिगत प्रमाण है।
यह बताता है कि ‘जेल भरो’ का राजनीतिक नारा वास्तविक जीवन में कितनी बड़ी कीमत मांग सकता था।
रायरव/रायेरव भगत : जेल यातना से मृत्यु
उसी शहीद कोश में चेतर, रांची के रायरव भगत, पुत्र लोरला ताना भगत, के बारे में दर्ज है कि वे भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय थे, गिरफ्तार हुए और पटना कैंप जेल में यातनाएं झेलीं। उनकी 1943 में उन यातनाओं के परिणामस्वरूप मृत्यु हुई।
इस तरह चेतर–कुड़ू क्षेत्र ताना भगतों की सक्रियता और बलिदान का महत्वपूर्ण केंद्र दिखाई देता है।
ताना भगतों की शहादत केवल पुलिस गोली में नहीं हुई
स्वतंत्रता आंदोलन की शहादत को अक्सर गोलीकांड के दृश्य से जोड़ा जाता है।
लेकिन ताना भगतों के मामले में मृत्यु का दूसरा रूप दिखाई देता है—
यह कम नाटकीय दिखाई देता है, लेकिन औपनिवेशिक दमन की उतनी ही वास्तविक कीमत थी।
और भी ताना भगत जेलों में मरे
स्वतंत्रता सेनानी और शहीद संबंधी अभिलेखों में रांची क्षेत्र के कई ‘भगत’ या ताना भगत कार्यकर्ताओं की जेल मृत्यु के उल्लेख मिलते हैं।
हर ‘भगत’ उपनामधारी व्यक्ति को स्वतः ताना भगत मानना उचित नहीं होगा।
इसलिए अंतिम संदर्भ-सूची में हम केवल उन व्यक्तियों को निश्चित ताना भगत सूची में रखेंगे जिनके स्रोत में स्पष्ट रूप से ताना पहचान या पारिवारिक संबंध दर्ज है।
यह शोध की विश्वसनीयता के लिए आवश्यक है।
18 अगस्त 1942 : बिशुनपुर पुलिस स्टेशन
अब उस घटना पर आएं जो ताना भगत इतिहास की सबसे जटिल घटनाओं में से एक है।
कई झारखंड इतिहास विवरणों में दर्ज है कि—
18 अगस्त 1942 को ताना भगतों के एक समूह ने बिशुनपुर पुलिस स्टेशन में आग लगा दी।
यह घटना बी. विरोत्तम के झारखंड इतिहास संबंधी अध्ययन का हवाला देते हुए Indian Express ने भी दर्ज की है।
शैक्षणिक झारखंड इतिहास सामग्री भी 18 अगस्त को बिशुनपुर थाना जलाए जाने को ताना भगतों से जोड़ती है।
यह घटना हमारी अब तक की कथा के लिए असुविधाजनक है।
क्या इसका अर्थ है कि ताना भगतों ने अहिंसा छोड़ दी थी?
नहीं—इतना व्यापक निष्कर्ष भी गलत होगा।
एक स्थानीय समूह द्वारा किसी थाने को आग लगाना और पूरे ताना समुदाय का वैचारिक रूप से हिंसक हो जाना दो अलग बातें हैं।
पहला—ताना भगतों की दीर्घकालीन घोषित गांधीवादी पहचान।
दूसरा—1942 का नेतृत्वविहीन और उग्र राष्ट्रीय वातावरण।
तीसरा—बिशुनपुर की विशिष्ट स्थानीय घटना।
एक घटना पूरी परंपरा को निरस्त नहीं करती।
लेकिन वह हमें यह दावा करने से रोकती है कि 1942 में हर ताना भगत हर जगह बिना किसी अपवाद के शुद्ध गांधीवादी अनुशासन में रहा।
बिशुनपुर की घटना इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
क्योंकि बिशुनपुर वही व्यापक क्षेत्र था जहां 1914 में जतरा भगत का आंदोलन जन्मा था।
लगभग अट्ठाईस वर्ष बाद उसी क्षेत्र में पुलिस स्टेशन को आग लगाने का उल्लेख मिलता है।
यह प्रतीकात्मक रूप से बहुत बड़ा परिवर्तन है।
इसका अर्थ यह नहीं कि पूरी विचारधारा बदल गई।
लेकिन यह दिखाता है कि भारत छोड़ो आंदोलन की उग्रता ने ताना संसार के कुछ हिस्सों को भी प्रभावित किया।
क्या आगजनी को ‘अहिंसा’ कहा जा सकता है?
किसी सरकारी इमारत को जानबूझकर आग लगाना अहिंसक सत्याग्रह की गांधीवादी परिभाषा में नहीं आएगा।
भले ही किसी व्यक्ति की हत्या न हुई हो, संपत्ति-विनाश गांधी के अनुशासित अहिंसक कार्यक्रम का हिस्सा नहीं था।
इसलिए इतिहासलेखन में इसे ‘अहिंसक ताना विरोध का एक रूप’ बताना गलत होगा।
1942 के वातावरण ने ऐसा विचलन क्यों पैदा किया?
लोग मान रहे थे कि अंग्रेजी राज अंतिम चरण में है।
सरकारी संस्थाएं सीधे औपनिवेशिक सत्ता के प्रतीक बन गई थीं।
देश के अनेक हिस्सों में थाने, स्टेशन और सरकारी कार्यालय निशाने पर थे।
ऐसे वातावरण में दशकों से औपनिवेशिक पुलिस और कर-व्यवस्था से संघर्ष कर रहे ग्रामीण समूह का एक हिस्सा अधिक उग्र रास्ता पकड़ सकता था।
यह व्याख्या है—औचित्य सिद्ध करना नहीं।
पुलिस स्टेशन का प्रतीकात्मक अर्थ
ताना भगतों के अनुभव में थाना केवल कानून-व्यवस्था का निष्पक्ष कार्यालय नहीं था।
इसलिए 1942 की जनमानस में थाना ‘सरकार’ का स्थानीय चेहरा था।
उसे आग लगाना राज्य की संप्रभुता को चुनौती देने का प्रतीक था।
फिर भी अधिकांश ताना राजनीति का हथियार ध्वज और अवज्ञा रहा
बिशुनपुर जैसी घटना के बावजूद व्यक्तिगत स्वतंत्रता सेनानी अभिलेखों में ताना भगतों की सामान्य गतिविधियां—
इसलिए आंदोलन की मुख्य रेखा को अभी भी गांधीवादी माना जा सकता है—
सरकारी संस्थानों का बहिष्कार
ताना भगतों ने वर्षों से औपनिवेशिक राज्य के साथ अपने संबंध को न्यूनतम करने की कोशिश की थी।
1942 में यह व्यवहार भारत छोड़ो के बड़े राजनीतिक वातावरण में अधिक स्पष्ट अर्थ ग्रहण करता है।
सभी विदेशी राज के हिस्से माने जा सकते थे।
इसलिए बहिष्कार अब केवल किसी सेवा से दूरी नहीं था।
कर-अस्वीकार की पुरानी धारा 1942 में भी प्रासंगिक थी
ताना भगत भारत छोड़ो आंदोलन में प्रवेश करते समय अपनी पुरानी भूमि और कर-संबंधी शिकायतें नहीं भूले थे।
अब गांधी स्वयं अंग्रेजों को भारत छोड़ने को कह रहे थे।
यदि अंग्रेजों को देश छोड़ना ही है, तो उन्हें कर क्यों दें?
राष्ट्रीय क्रांति और स्थानीय कर-अस्वीकार फिर एक-दूसरे में जुड़ गए।
लेकिन राष्ट्रीय नेतृत्व कर-अस्वीकार नियंत्रित नहीं कर पा रहा था
गांधी प्रत्यक्ष निर्देश नहीं दे पा रहे थे।
इसलिए स्थानीय कार्यकर्ता स्वयं तय कर रहे थे कि ‘करो या मरो’ का अर्थ क्या है।
यही कारण है कि भारत छोड़ो आंदोलन भारत के सबसे विकेंद्रीकृत राष्ट्रीय आंदोलनों में से एक बना।
ताना भगत भी इसी विकेंद्रीकरण का हिस्सा थे।
झारखंड में संचार व्यवस्था पर हमले
रांची जिले में 1942 के दौरान संचार लाइनों को बाधित किए जाने की घटनाएं दर्ज हैं। आधिकारिक जिला इतिहास इस व्यापक पैटर्न का उल्लेख करता है।
अन्य क्षेत्रीय विवरणों में नामकुम–तातीसिलवे के बीच टेलीफोन–टेलीग्राफ व्यवस्था को नुकसान और इटकी–टांगरबसली के बीच रेल लाइन क्षति जैसी घटनाओं का उल्लेख मिलता है।
लेकिन इन सभी घटनाओं को स्वतः ताना भगतों के खाते में डालना उचित नहीं होगा।
1942 में अनेक प्रकार के कार्यकर्ता सक्रिय थे।
जहां स्रोत विशेष रूप से ताना पहचान नहीं देता, वहां सामान्य ‘भारत छोड़ो आंदोलनकारियों’ कहना अधिक सुरक्षित है।
तथ्य-समीक्षा क्यों जरूरी है?
लोकप्रिय झारखंड इतिहास सामग्री कई बार यह लिखती है कि—
मानो यह सब एक ही संगठित ताना कमान ने किया हो।
लेकिन उपलब्ध बेहतर स्रोत केवल कुछ घटनाओं में ताना पहचान स्पष्ट करते हैं।
इसलिए हमें आंदोलन के गौरव को बढ़ाने के लिए अप्रमाणित गतिविधियां जोड़ने की आवश्यकता नहीं।
उनकी प्रमाणित भूमिका स्वयं पर्याप्त महत्वपूर्ण है।
गिरफ्तारी का विस्तार
रांची और आसपास ब्रिटिश प्रशासन ने तेजी से दमन किया।
रांची क्षेत्र में कार्यकर्ताओं की बड़ी संख्या गिरफ्तार हुई।
क्षेत्रीय इतिहास सामग्री 30 नवंबर 1942 तक लगभग 199 आंदोलनकारियों की गिरफ्तारी का उल्लेख करती है, हालांकि यह संख्या पूरे स्थानीय आंदोलन की है, केवल ताना भगतों की नहीं।
इसे ‘199 ताना भगत गिरफ्तार’ कहना गलत होगा।
ताना भगत उस व्यापक दमन का हिस्सा थे, और व्यक्तिगत अभिलेख उनके कारावास की प्रत्यक्ष पुष्टि करते हैं।
पटना कैंप जेल का महत्व
कई छोटानागपुर आंदोलनकारियों को स्थानीय जेल से बाहर पटना कैंप जेल भेजा गया।
खेड़वा भगत और रायरव भगत जैसे ताना कार्यकर्ताओं की वहीं या उससे जुड़े कारावास में मृत्यु का उल्लेख मिलता है।
ब्रिटिश प्रशासन स्थानीय आंदोलनकारियों को उनके सामाजिक आधार से दूर रखकर आंदोलन की संगठनात्मक शक्ति तोड़ना चाहता था।
परिवार पर जेल का प्रभाव
किसान जेल गया तो केवल एक राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं गया।
कर और कर्ज का बोझ परिवार पर रह गया।
इसलिए कारावास की सामाजिक लागत भी समझनी होगी।
ताना भगत समुदाय की आपसी एकजुटता संभवतः ऐसे समय में महत्वपूर्ण सहारा बनी।
महिलाओं की भूमिका फिर दिखाई देती है
ताना भगतों के विस्तृत 1942 अभिलेख पुरुष स्वतंत्रता सेनानी नामों पर अधिक केंद्रित हैं।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि महिलाएं निष्क्रिय थीं।
ताना परिवारों में पुरुषों की गिरफ्तारी का अर्थ था—
और आंदोलनकारी नेटवर्क को जीवित रखना।
लिथो और माया जैसी पुरानी महिला नेतृत्व परंपरा हमें यह मानने का कारण देती है कि महिलाओं को केवल ‘कैदियों की पत्नी’ के रूप में पढ़ना उचित नहीं होगा।
फिर भी विशिष्ट 1942 महिला नामों की सूची प्राथमिक स्रोत मिलने पर ही बनानी चाहिए।
गांधी की गिरफ्तारी और ताना धार्मिक मनोविज्ञान
ताना भगत गांधी को सामान्य राजनीतिक नेता से अधिक मानते थे।
इसलिए गांधी की गिरफ्तारी उनके लिए केवल कांग्रेस अध्यक्ष या नेता की गिरफ्तारी जैसा राजनीतिक समाचार नहीं रही होगी।
यह उनके नैतिक गुरु पर हमला भी प्रतीत हो सकता था।
इससे प्रतिरोध की भावनात्मक तीव्रता बढ़ने की संभावना थी।
यही शायद समझने में मदद करता है कि अत्यंत अहिंसा-निष्ठ समुदाय के कुछ हिस्से 1942 में असामान्य उग्रता तक क्यों पहुंच सकते थे।
‘करो या मरो’ का स्थानीय अर्थ
स्वतंत्रता प्राप्त करो या उसके प्रयास में अपना जीवन लगा दो।
लेकिन नेतृत्वहीन ग्रामीण वातावरण में यह वाक्य कई अर्थ ग्रहण कर सकता था।
यह राष्ट्रीय नारे के स्थानीय अनुवाद की समस्या थी।
ताना अहिंसा की सबसे बड़ी परीक्षा
1942 में पहली बार वह ऐसे जनविद्रोह के बीच थी जिसमें व्यापक हिंसा और संपत्ति-विनाश हो रहा था।
कई ताना भगत जेल गए लेकिन गांधीवादी रास्ते पर रहे।
कुछ स्थानीय गतिविधियां, विशेष रूप से बिशुनपुर थाना आगजनी, उस अनुशासन से विचलन दिखाती हैं।
इसीलिए 1942 ताना अहिंसा का सबसे जटिल अध्याय है।
क्या बिशुनपुर के कारण पूरा ताना इतिहास बदल जाता है?
इतिहास का मूल्यांकन अनुपात और संरचना से होता है।
लगभग तीन दशकों की ताना राजनीति में—
एक या कुछ उग्र घटनाएं उस मुख्य परंपरा को नष्ट नहीं करतीं।
लेकिन वे उसे मानवीय और ऐतिहासिक रूप से अधिक वास्तविक बनाती हैं।
किसी समुदाय को पवित्र प्रतिमा बना देना भी इतिहास के साथ अन्याय है।
आदिवासी प्रतिरोध की दो परंपराएं 1942 में फिर मिलती हैं
छोटानागपुर के इतिहास में एक ओर सशस्त्र परंपरा थी—
बिरसा और जतरा की विरासत एक ही राष्ट्रीय संघर्ष में
लेकिन उनकी संघर्ष-पद्धतियां अलग थीं।
जमीन वापसी की लड़ाई और 1947 का विशेष कानून
लगान-अस्वीकार में नीलाम कृषि भूमि, Ranchi District Tana Bhagat Raiyats’ Agricultural Lands Restoration Act, 1947, किसे जमीन लौटनी थी, कानून की सीमाएं और स्वतंत्रता की पूर्वसंध्या पर किसान न्याय का अधूरा प्रश्न
ताना भगत आंदोलन की लगभग तीन दशक लंबी यात्रा में यदि किसी एक उपलब्धि को सबसे ठोस, मापने योग्य और कानूनी उपलब्धि कहा जाए तो वह थी—आंदोलन के दौरान लगान न देने के कारण नीलाम हुई कृषि भूमि को वापस दिलाने के लिए बनाया गया विशेष कानून।
यह केवल कोई सामान्य भूमि-सुधार कानून नहीं था।
न यह सभी किसानों के लिए बनाया गया सामान्य काश्तकारी संशोधन था।
इस कानून के पीछे एक अत्यंत विशिष्ट ऐतिहासिक स्वीकारोक्ति थी—
कुछ किसानों ने लगान इसलिए नहीं चुकाया क्योंकि वे गरीबी या साधारण आर्थिक अक्षमता के कारण ‘बकायेदार’ नहीं थे; उनका भुगतान न करना स्वतंत्रता आंदोलन और औपनिवेशिक-विरोधी असहयोग से जुड़ा था।
और यदि उसी राजनीतिक असहयोग के कारण उनकी कृषि भूमि नीलाम हो गई थी, तो स्वतंत्रता की ओर बढ़ते भारत को उस अन्याय को सुधारना चाहिए।
Ranchi District Tana Bhagat Raiyats’ Agricultural Lands Restoration Act, 1947
कानून का वर्तमान समेकित पाठ स्वयं अपने उद्देश्य में उन कृषि भूमियों की वापसी की बात करता है जो रांची जिले के ताना भगत रैयतों से स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लगान-बकाये की डिक्री के निष्पादन में बिक गई थीं। वर्तमान संशोधित पाठ आंदोलन-संबंधी चूक को 1913 से 1942 के बीच की अवधि से जोड़ता है।
इससे ताना भगत आंदोलन की पूरी राजनीतिक यात्रा का एक असाधारण कानूनी निष्कर्ष निकलता है—
औपनिवेशिक रिकॉर्ड में जो किसान ‘rent defaulter’ था, स्वतंत्रता की पूर्वसंध्या पर वही ‘freedom movement’ के कारण जमीन खोने वाला किसान माना जाने लगा।
यही इस कानून का वास्तविक ऐतिहासिक महत्व है।
जमीन क्यों गई थी?
ताना भगत आंदोलन की शुरुआत से ही लगान का प्रश्न केंद्रीय था।
जमींदारों के लिए काम से इनकार किया,
और औपनिवेशिक प्रशासन के साथ आर्थिक सहयोग सीमित करने की कोशिश की।
लेकिन किसी किसान के लिए कर-अस्वीकार केवल राजनीतिक नारा नहीं था।
इस प्रकार आंदोलन का सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आया—
कर-अस्वीकार की राजनीतिक कीमत
राष्ट्रीय आंदोलन की कथा में हम अक्सर कहते हैं—
लेकिन किसान के जीवन में ‘दंड स्वीकार करो’ का अर्थ क्या था?
इसलिए उनके कर-अस्वीकार की चर्चा केवल अहिंसक बहादुरी के रूप में करना अधूरा होगा।
उसकी पीढ़ियों तक चलने वाली आर्थिक कीमत थी।
औपनिवेशिक कानून की नजर में क्या हुआ था?
राजस्व कानून की दृष्टि अत्यंत सीधी हो सकती थी।
इस पूरी प्रक्रिया में अदालत को यह पूछना आवश्यक नहीं था कि—
यदि राजनीतिक आंदोलन के कारण नहीं दिया, तब भी राजस्व रिकॉर्ड में वह बकाया था।
यानी कानून किसान के राजनीतिक उद्देश्य को आर्थिक डिफॉल्ट में बदल देता था।
राष्ट्रीय दृष्टि ने उसी घटना को उलटकर देखा
1940 के दशक तक राजनीतिक नैतिकता बदल चुकी थी।
अब वही घटना इस तरह पढ़ी जा सकती थी—
किसान ने अंग्रेजी शासन या उससे जुड़े जमींदारी–राजस्व ढांचे के विरोध में लगान नहीं दिया।
वह राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय रहा।
तो क्या स्वतंत्र शासन उस नीलामी को हमेशा के लिए वैध मानता रहेगा?
यहीं भूमि-वापसी की मांग ने नैतिक शक्ति प्राप्त की।
The Ranchi District Tana Bhagat Raiyats’ Agricultural Lands Restoration Act, 1947
लेकिन इसकी प्रकाशन और अधिनियम-संख्या को लेकर ऑनलाइन कानूनी अभिलेखों में कुछ भ्रम दिखाई देता है।
India Code पर उपलब्ध पाठ बताता है कि इसे 30 दिसंबर 1947 को गवर्नर-जनरल की स्वीकृति मिली और बिहार गजट के असाधारण अंक में 23 जनवरी 1948 को प्रकाशित किया गया। कई विधिक पाठ इसे Bihar Act II of 1948 के रूप में उद्धृत करते हैं, जबकि India Code के अलग-अलग डेटाबेस रिकॉर्डों में Act I/Act II जैसी समानांतर प्रविष्टियां भी दिखाई देती हैं।
इसलिए वेबसाइट पर सबसे सुरक्षित तरीका होगा—
कानून का आधिकारिक शीर्षक ‘1947’ ही रखें, और नोट में लिखें कि इसे 30 दिसंबर 1947 को स्वीकृति तथा जनवरी 1948 में गजट प्रकाशन मिला।
यह कानून कितना असाधारण था?
क्योंकि उसने किसी सामान्य भूमि विवाद के बजाय एक विशिष्ट राजनीतिक कारण को कानूनी मान्यता दी।
वर्तमान समेकित कानून में ‘ताना भगत रैयत’ की परिभाषा ऐसे रैयत या अधीन-रैयत को समेटती है जिसने 1913–42 के बीच चले या चले माने गए किसी freedom movement के अनुसरण में लगान या उससे संबंधित डिक्री का भुगतान नहीं किया और जिसके कारण भूमि बेची गई।
यही शब्द आंदोलन को वैधानिक ऐतिहासिक मान्यता देता है।
‘Freedom Movement’ शब्द की ताकत
कानूनी भाषा में शब्द बहुत मायने रखते हैं।
‘लगान न देने वाले किसानों को राहत’,
लेकिन आंदोलन-संबंधी कर-अस्वीकार को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ना एक अलग घोषणा थी।
राज्य स्वीकार कर रहा था कि लगान-अस्वीकार में राजनीतिक उद्देश्य था।
इससे औपनिवेशिक प्रशासन की पुरानी भाषा उलट जाती है—
तब : बकायेदार। अब : स्वतंत्रता आंदोलनकारी रैयत।
1913 से 1942 : इस अवधि का क्या अर्थ है?
वर्तमान समेकित पाठ 1913 से 1942 की अवधि देता है।
यहां एक महत्वपूर्ण विधिक सावधानी जरूरी है।
आज उपलब्ध पाठ बाद के संशोधनों को समाहित करता है। 1951 और विशेष रूप से 1956 में कानून में परिवर्तन हुए। 1966 के Dasu Khan v. Mohan Bhagat मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने भी इन संशोधनों के इतिहास का उल्लेख किया—1951 में पात्रता की परिभाषा व्यापक की गई और 1956 में व्यवस्था में और परिवर्तन किए गए।
इसलिए वर्तमान कानून में दिखने वाली प्रत्येक शब्दावली को बिना जांच सीधे ‘1947 के मूल अधिनियम की बिल्कुल यही भाषा’ नहीं कहना चाहिए।
यह अंतर हमारी संदर्भ-सूची में स्पष्ट रखना चाहिए।
किस जमीन को लौटाया जा सकता था?
कानून का मूल लक्ष्य हर प्रकार से खोई हुई भूमि वापस करना नहीं था।
लगान-बकाये की डिक्री के निष्पादन में बेची गई हो,
और भुगतान में चूक आंदोलन-संबंधी हो।
अर्थात यदि भूमि किसी बिल्कुल दूसरे कारण से गई—
तो केवल ताना भगत होने के कारण कानून स्वतः लागू नहीं होता।
‘रैयत’ और ‘अधीन-रैयत’
कानून ने भूमि-अधिकार को छोटानागपुर की मौजूदा काश्तकारी संरचना से जोड़ा।
वर्तमान पाठ में ‘raiyat’ और ‘under-raiyat’ के अर्थ Chota Nagpur Tenancy Act, 1908 से लिए गए हैं।
यह महत्वपूर्ण ऐतिहासिक निरंतरता है।
आदिवासी और रैयती भूमि-अधिकार की सुरक्षा का व्यापक कानूनी ढांचा।
1947 का ताना भगत भूमि-पुनर्स्थापन कानून—
विशिष्ट राजनीतिक आंदोलन के कारण खोई भूमि की वापसी।
दोनों कानून छोटानागपुर के भूमि इतिहास की अलग लेकिन जुड़ी हुई अवस्थाएं हैं।
आवेदन कौन कर सकता था?
वर्तमान धारा 4 के अनुसार पुनर्स्थापन के लिए आवेदन कर सकता था—
यदि उसकी मृत्यु हो चुकी हो तो उसका कानूनी प्रतिनिधि,
क्योंकि 1914 से 1940 के दशक तक लंबा समय बीत चुका था।
यदि अधिकार केवल जीवित मूल रैयत तक सीमित रहता तो कानून का बड़ा हिस्सा व्यर्थ हो जाता।
वारिस को आवेदन का अधिकार देकर जमीन के संघर्ष को पीढ़ीगत अधिकार माना गया।
यानी जमीन केवल व्यक्ति की नहीं, परिवार की स्मृति भी थी
यहां कानून और ताना सामाजिक इतिहास एक-दूसरे से मिलते हैं।
जिस किसान ने 1920 या 1930 के दशक में लगान नहीं दिया—
लेकिन जमीन खोने का परिणाम उसके बच्चों ने भुगता।
स्वतंत्रता सेनानी के परिवार को पुनर्स्थापित करना भी था।
उपायुक्त की केंद्रीय भूमिका
पुनर्स्थापन की प्रशासनिक शक्ति रांची के Deputy Commissioner को दी गई।
वर्तमान कानून में उपायुक्त या विशेष रूप से अधिकृत कम-से-कम Sub-Deputy Collector स्तर का अधिकारी इन कार्यों को कर सकता था।
यह न्यायालय के बजाय राजस्व प्रशासन को केंद्रीय बनाता था।
इसका उद्देश्य संभवतः प्रक्रिया को सामान्य दीवानी मुकदमों की तुलना में अधिक विशेष और त्वरित बनाना था।
उपायुक्त को क्या तय करना था?
क्या उसकी भूमि वास्तव में लगान-बकाये की डिक्री में बेची गई?
क्या भुगतान न करना स्वतंत्रता आंदोलन के अनुसरण में था?
पुनर्स्थापन के बदले कितनी राशि जमा करानी होगी?
उसने प्रशासनिक जांच की विस्तृत प्रक्रिया बनाई।
1948 के नियम : गांव में जाकर जांच
कानून के तहत 27 जनवरी 1948 को Ranchi District Tana Bhagat Raiyats’ Agricultural Lands Restoration Rules, 1948 बनाए गए।
इन नियमों की सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि जांच केवल दफ्तर में कागज देखकर नहीं होनी थी।
उपायुक्त स्वयं या Sub-Deputy Collector से कम न होने वाला अधिकारी मौके पर जाकर जांच कर सकता था।
और बाद में हुए हस्तांतरण का विवरण दर्ज करता।
यह ग्रामीण भूमि विवाद के लिए महत्वपूर्ण प्रक्रिया थी।
मौके पर जांच क्यों जरूरी थी?
क्योंकि बीस–तीस साल पुराने ग्रामीण भूमि विवाद केवल अदालत की एक पुरानी फाइल से हमेशा स्पष्ट नहीं होते।
इन प्रश्नों का उत्तर खेत पर जाकर अधिक स्पष्ट हो सकता था।
इसलिए नियमों में स्थल-जांच का होना कानून की व्यावहारिक गंभीरता दिखाता है।
लेकिन जमीन मुफ्त वापस नहीं मिलती थी
यहीं कानून की सबसे महत्वपूर्ण और अक्सर छूट जाने वाली सीमा है।
पुनर्स्थापन का अर्थ यह नहीं था कि नीलामी-खरीदार से जमीन बिना किसी भुगतान के लेकर सीधे ताना भगत को दे दी जाए।
धारा 4 के अनुसार सफल दावेदार को उपायुक्त द्वारा निर्धारित राशि जमा करनी पड़ सकती थी।
बाद में वैध मूल्य पर हस्तांतरित हुई हो तो उसका मूल्य,
और वर्तमान धारक द्वारा भूमि में किए गए सुधारों का उचित मुआवजा।
गरीब ताना किसान के लिए यही बड़ी बाधा थी
किसान ने आंदोलन में लगान नहीं दिया।
कई वर्ष वह भूमिहीन या कम भूमि पर रहा।
लेकिन पुनर्स्थापन के लिए निर्धारित रकम जमा करो।
यहीं सिद्धांत और वास्तविक न्याय के बीच दूरी पैदा होती है।
नीलामी-खरीदार के अधिकार क्यों बचाए गए?
क्योंकि भूमि अब हमेशा मूल जमींदार के पास नहीं थी।
वह किसी नीलामी-खरीदार ने खरीदी हो सकती थी।
इन व्यक्तियों में से कुछ राजनीतिक दमन के सीधे सहभागी न होकर सद्भावना से भूमि खरीदने वाले तीसरे पक्ष भी हो सकते थे।
इसलिए कानून को दो न्यायों में संतुलन बनाना पड़ा—
और वर्तमान वैध धारक को पूरी तरह बिना प्रतिफल के वंचित न करना।
धारा 5 : कागजी आदेश नहीं, वास्तविक कब्जा
यह कानून की सबसे ताकतवर धाराओं में से एक थी।
यदि उपायुक्त जमीन वापस करने का आदेश देता और वर्तमान कब्जेदार निर्धारित तारीख तक भूमि खाली नहीं करता, तो उपायुक्त उसे बेदखल कर ताना भगत रैयत या उसके कानूनी प्रतिनिधि को वास्तविक कब्जा दिला सकता था। वर्तमान समेकित पाठ में आवश्यकता होने पर बल प्रयोग की शक्ति भी दिखाई देती है।
अर्थात पुनर्स्थापन केवल नया रिकॉर्ड बनाने तक सीमित नहीं था।
1948 के नियमों में कब्जा कैसे दिया जाता था?
राशि जमा होने और पुनर्स्थापन आदेश के बाद कब्जा देने के लिए औपचारिक आदेश जारी होना था।
नियमों के अनुसार मौके पर ढोल पिटवाकर कब्जा सौंपा जा सकता था और कब्जा लेने वाले से हस्ताक्षर अथवा अंगूठे का निशान लिया जाता था; संभव हो तो गांव के दो गवाहों और ढोल बजाने वाले की पुष्टि भी दर्ज होती थी।
यह औपनिवेशिक–उत्तरवर्ती ग्रामीण राजस्व प्रशासन की विशिष्ट प्रक्रिया थी।
और प्रतीकात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण—
जिस जमीन की नीलामी सार्वजनिक सत्ता ने की थी, उसकी वापसी भी गांव के सामने सार्वजनिक रूप से घोषित की जाती थी।
धारा 6 : मुआवजा किसे मिलता?
जो राशि ताना भगत आवेदक जमा करता, वह केवल सरकारी खजाने में नहीं रहनी थी।
यदि नीलामी-खरीदार अब भी कब्जे में था, तो उसे भुगतान किया जा सकता था।
यदि उसने भूमि आगे हस्तांतरित कर दी थी तो कानून इस बात के आधार पर अलग व्यवस्था करता था कि हस्तांतरण—
इससे स्पष्ट है कि विधायक पुराने नीलामी अधिकार को मिटाकर नई कानूनी अराजकता पैदा नहीं करना चाहता था।
खरीदार द्वारा किए गए ‘सुधार’ भी मायने रखते थे
मान लें किसी ने नीलामी में खेत खरीदा।
अब यदि मूल ताना रैयत वापस आए तो प्रश्न होगा—
कानून उपायुक्त को उचित और न्यायसंगत मुआवजा तय करते समय ऐसे improvements को ध्यान में रखने की अनुमति देता था।
लेकिन मूल किसान के लिए फिर वही कठिनाई—
जितने अधिक सुधार, उतनी संभावित अधिक जमा राशि।
कानून की पहली बड़ी सीमा : हर खोई जमीन नहीं
कानून केवल इसलिए लागू नहीं होता था कि व्यक्ति ताना भगत है और उसकी जमीन चली गई।
जमीन खोने और आंदोलन-संबंधी लगान-अस्वीकार के बीच कानूनी संबंध साबित करना पड़ता था।
ताना पहचान + भूमि-हानि पर्याप्त नहीं।
आंदोलन-संबंधी rent default और execution sale का संबंध भी आवश्यक था।
यह पात्रता कानून को लक्षित बनाती थी, लेकिन उसके दायरे को सीमित भी करती थी।
दूसरी सीमा : भूगोल
अर्थात उसका मूल क्षेत्रीय दायरा तत्कालीन रांची जिला था।
यह याद रखना आवश्यक है कि उस समय का रांची जिला आज के प्रशासनिक जिलों से भिन्न और बड़ा था।
फिर भी यह अखिल छोटानागपुर भूमि-पुनर्स्थापन कानून नहीं था।
इसलिए ताना आंदोलन के प्रभाव वाले प्रत्येक दूसरे क्षेत्र की समस्या स्वतः इसके अंतर्गत नहीं आती थी।
तीसरी सीमा : प्रमाण
आवेदक को अपनी पात्रता सिद्ध करनी थी।
दशकों पुरानी घटना में यह कठिन हो सकता था।
किस कारण भुगतान नहीं किया गया था, उसका प्रमाण क्या है?
क्या वह स्वतंत्रता आंदोलन था या साधारण आर्थिक चूक?
जिस गरीब और कम साक्षर किसान आंदोलन ने मौखिक नेटवर्क पर जीवन बिताया था, उसके लिए यही दस्तावेजी राज्य बड़ी चुनौती बन सकता था।
चौथी सीमा : पुनर्खरीद-सदृश आर्थिक बोझ
कानून का उद्देश्य पुनर्स्थापन था, लेकिन ताना भगत को निर्धारित राशि जमा करने का दायित्व कई मामलों में वास्तविक बाधा बन सकता था।
यह प्रश्न नैतिक रूप से महत्वपूर्ण है—
जिस किसान की जमीन राजनीतिक दमन से गई, उससे ही जमीन वापस पाने के लिए पैसा क्यों?
तीसरे पक्ष के संपत्ति अधिकार और किए गए सुधारों की रक्षा।
लेकिन किसान न्याय की दृष्टि से यह पूर्ण प्रतिपूर्ति नहीं थी।
इसलिए कानून restorative था, पूरी तरह reparative नहीं।
पांचवीं सीमा : प्रक्रिया स्वयं राज्य के हाथ में
ताना आंदोलन की शुरुआत उस अविश्वास से हुई थी जिसमें किसान कहता था—
अब उसकी जमीन वापस पाने के लिए फिर जाना था—
यानी जिस समुदाय की राजनीति लंबे समय तक औपनिवेशिक प्रशासन से दूरी की थी, उसे न्याय पाने के लिए फिर राज्य की नौकरशाही में प्रवेश करना पड़ा।
यह स्वतंत्रता की ओर संक्रमण का गहरा प्रतीक था।
लेकिन उपायुक्त को स्वतः कार्रवाई की शक्ति भी थी
वर्तमान समेकित धारा 4 में एक उल्लेखनीय प्रावधान यह भी है कि उपायुक्त केवल आवेदन की प्रतीक्षा करने के लिए बाध्य नहीं था।
यदि उसे जानकारी मिले या स्वयं पता चले कि पात्र ताना भगत की भूमि इस तरह बेची गई थी, तो वह स्वप्रेरणा से—suo motu—पुनर्स्थापन कार्यवाही शुरू कर सकता था।
यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण था क्योंकि हर गरीब रैयत औपचारिक आवेदन प्रक्रिया तक पहुंच पाए, यह मानना वास्तविक नहीं था।
इसका राजनीतिक अर्थ
यदि तुम्हें अन्याय की जानकारी है, तो तुम स्वयं कार्रवाई कर सकते हो।
इस अर्थ में यह केवल निजी भूमि-विवाद का कानून नहीं था।
उसमें राज्य द्वारा ऐतिहासिक सुधार की सक्रिय जिम्मेदारी का तत्व था।
लेकिन समय-सीमा भी थी
वर्तमान समेकित पाठ में कार्यवाही शुरू करने के लिए अंतिम सीमा 31 मार्च 1962 दिखाई देती है।
लेकिन इसे 1947 के मूल अधिनियम का अपरिवर्तित प्रावधान नहीं समझना चाहिए। कानून में बाद में संशोधन हुए और समय-सीमाएं बदली गईं। सर्वोच्च न्यायालय ने भी 1951 और 1956 के संशोधनों का इतिहास दर्ज किया है।
यह विधिक इतिहास बताता है कि शुरुआती कानून पर्याप्त साबित नहीं हुआ और विधायिका को बार-बार उसके दायरे और प्रक्रिया में परिवर्तन करना पड़ा।
1951 का संशोधन क्यों महत्वपूर्ण था?
1966 के Dasu Khan v. Mohan Bhagat निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने बताया कि 1951 के संशोधन ने ‘ताना भगत’ की परिभाषा का विस्तार किया और मूल कानून में मौजूद आदिवासी-विशेष संदर्भ को व्यापक बनाया। न्यायालय के अनुसार उद्देश्य ऐसे अन्य रैयतों को भी लाभ देने की दिशा में था जिनकी जमीन स्वतंत्रता आंदोलन से प्रेरित लगान-अस्वीकार के कारण गई थी।
यह अत्यंत महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन था।
ताना भगत संघर्ष एक विशिष्ट समुदाय से पैदा हुआ—
लेकिन उसकी न्याय की भाषा अधिक व्यापक किसान श्रेणी तक पहुंच सकती थी।
1956 का संशोधन : मूल कानून क्यों पर्याप्त नहीं रहा?
उसी सर्वोच्च न्यायालय निर्णय में 1956 के अधिक व्यापक संशोधन का उल्लेख है। उसने पात्रता और प्रशासनिक प्रक्रिया को फिर बदला तथा पहले की कुछ बाधाओं को हटाया।
लेकिन एक बार कानून बन जाने से जमीन-वापसी का प्रश्न समाप्त नहीं हुआ।
उसके क्रियान्वयन में व्यावहारिक और कानूनी समस्याएं थीं।
धारा 7 : अपील की व्यवस्था
कानून ने उपायुक्त का निर्णय बिल्कुल अंतिम नहीं रखा।
धारा 7 के तहत राजस्व प्रशासन की उच्चतर व्यवस्था में अपील का अधिकार मौजूद था। सर्वोच्च न्यायालय ने कानून की संरचना बताते हुए इसे विशेष रूप से उल्लेखित किया।
यह आवेदक और वर्तमान कब्जेदार—दोनों के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा थी।
क्योंकि इतने पुराने भूमि विवाद में गलत पहचान या गलत मूल्यांकन संभव था।
धारा 8 : सामान्य दीवानी मुकदमे से अलग विशेष व्यवस्था
कानून की संरचना में दीवानी अदालतों के क्षेत्राधिकार को सीमित करने का प्रावधान भी था। सर्वोच्च न्यायालय के विश्लेषण में धारा 8 को सामान्य दीवानी न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र को बाहर रखने वाला बताया गया है।
इसका उद्देश्य विशेष पुनर्स्थापन प्रक्रिया को अंतहीन सामान्य दीवानी मुकदमों में फंसने से बचाना था।
लेकिन यह भी दिखाता है कि भूमि-पुनर्स्थापन को सामान्य निजी संपत्ति विवाद नहीं माना गया था।
धारा 9 : आपात शक्ति
कानून ने उपायुक्त को कुछ परिस्थितियों में आपात हस्तक्षेप की शक्ति भी दी थी।
सर्वोच्च न्यायालय के कानून-सार में धारा 9 को उपायुक्त की emergency powers से संबंधित बताया गया है।
स्वतंत्र भारत में ताना भगत
1947 के बाद जमीन-वापसी, कर और राज्य से संबंध, गांधी की स्थायी स्मृति, तिरंगा–खादी की विशिष्ट संस्कृति और अधूरे भूमि-अधिकार का संघर्ष
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। ताना भगतों के लिए यह केवल ब्रिटिश शासन के अंत की तारीख नहीं थी। लगभग तीन दशक से वे जिस ‘अपने राज’, ‘स्वराज’ और फिर गांधी के नेतृत्व वाले स्वतंत्र भारत की प्रतीक्षा कर रहे थे, वह राजनीतिक रूप से वास्तविक हो चुका था।
लेकिन स्वतंत्रता ने तत्काल एक कठिन प्रश्न उनके सामने रख दिया—
अब जब राज अपना है, तो ताना भगत और राज्य का संबंध कैसा होगा?
जिस समुदाय ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध लगान और चौकीदारी कर नहीं दिया था, क्या वह अब स्वतंत्र भारतीय राज्य को कर देगा?
जिस किसान की जमीन औपनिवेशिक असहयोग के कारण नीलाम हुई थी, क्या वह जमीन स्वतः वापस मिलेगी?
गांधी और कांग्रेस के प्रति जिस असाधारण विश्वास ने ताना भगतों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा था, क्या नया प्रशासन उस विश्वास के अनुरूप व्यवहार करेगा?
क्या राजनीतिक स्वराज ताना भगत के लिए भूमि-स्वराज भी बनेगा?
स्वतंत्र भारत ने ताना भगतों के ऐतिहासिक त्याग को कानूनी मान्यता दी। विशेष भूमि-पुनर्स्थापन कानून बना रहा, उसमें बाद में संशोधन हुए, प्रशासन और अदालतों ने जमीन-वापसी के मामलों पर निर्णय दिए। लेकिन जमीन की वास्तविक वापसी धीमी, जटिल और कई मामलों में दशकों तक अधूरी रही। आज भी ताना भगत भूमि, जंगल, धार्मिक स्थलों और ग्राम-समुदाय के अधिकार को अपनी ऐतिहासिक पहचान से जोड़कर देखते हैं। 2026 में गुमला क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना के विरुद्ध उनका विरोध भी इसी लंबी परंपरा की नवीनतम अभिव्यक्तियों में से एक है।
इसलिए स्वतंत्रता के बाद ताना भगत आंदोलन समाप्त नहीं हुआ।
औपनिवेशिक राज्य से संघर्ष धीरे-धीरे लोकतांत्रिक भारतीय राज्य से अधिकार मांगने की राजनीति में बदल गया।
15 अगस्त 1947 : क्या ‘गांधी राज’ आ गया था?
ताना भगतों की राजनीतिक कल्पना में गांधी केवल कांग्रेस नेता नहीं थे।
इसलिए स्वतंत्रता उनके लिए संभवतः उस नैतिक व्यवस्था के आगमन की आशा भी लेकर आई जिसे वे लंबे समय से ‘गांधी राज’ के समान समझते रहे थे।
लेकिन गांधी का आदर्श स्वराज और वास्तविक स्वतंत्र भारतीय राज्य एक ही चीज नहीं थे।
यानी वे संस्थाएं पूरी तरह समाप्त नहीं हुईं जिन्हें ताना भगत लंबे समय से संदेह की नजर से देखते थे।
अंग्रेज गया, राज्य रह गया
यही स्वतंत्रता-उपरांत ताना इतिहास का सबसे बड़ा परिवर्तन है।
क्या उनकी अवज्ञा ब्रिटिश शासन के साथ समाप्त होती है?
या कुछ कर और भूमि संबंध स्वयं ऐसे हैं जिन्हें वे नैतिक रूप से अब भी स्वीकार नहीं कर सकते?
यहीं राष्ट्रीय निष्ठा और ताना स्वायत्तता के बीच नया संबंध बनता है।
पहली बड़ी उम्मीद : जमीन लौटेगी
स्वतंत्रता के बाद ताना भगतों की सबसे ठोस अपेक्षा थी—
आंदोलन में खोई जमीन की वापसी।
Ranchi District Tana Bhagat Raiyats’ Agricultural Lands Restoration Act, 1947।
India Code आज भी इसे झारखंड के लागू भूमि-कानूनों में सूचीबद्ध करता है और इसके साथ 27 जनवरी 1948 के पुनर्स्थापन नियम भी दर्ज हैं।
इससे नया राज्य सिद्धांततः स्वीकार कर चुका था कि ताना भगत भूमि-हानि साधारण राजस्व-बकाये का प्रश्न नहीं है।
कानून था—लेकिन खेत स्वतः वापस नहीं आया
यहीं सिद्धांत और व्यवहार का अंतर सामने आया।
कानून बनने का अर्थ यह नहीं था कि किसी सुबह प्रशासन ने पुराने अभिलेख खोले और सारी नीलाम भूमि मूल परिवारों को लौटा दी।
ताना भगत रैयत की पात्रता स्थापित करना,
इसलिए जो राजनीतिक प्रश्न अत्यंत सरल था—
वह प्रशासन में अत्यंत जटिल भूमि-मुकदमा बन सकता था।
1951 : कानून में बदलाव की आवश्यकता क्यों पड़ी?
मूल पुनर्स्थापन व्यवस्था जल्द ही पर्याप्त नहीं सिद्ध हुई।
बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने Dasu Khan v. Mohan Bhagat मामले में इस विधायी इतिहास का उल्लेख करते हुए बताया कि परिभाषाओं और लाभ के दायरे में विस्तार किया गया था।
यदि 1947 का मूल कानून सहजता से सभी समस्याएं हल कर देता, तो इतने जल्दी संशोधन की आवश्यकता नहीं पड़ती।
‘ताना भगत’ से व्यापक स्वतंत्रता आंदोलनकारी रैयत की ओर
संशोधनों का एक महत्वपूर्ण वैचारिक पहलू यह था कि पुनर्स्थापन की भाषा केवल कठोर संप्रदायगत पहचान तक सीमित न रहे।
बाद का समेकित पाठ ऐसे रैयत या अधीन-रैयत को परिभाषा के दायरे में लाता है जिसने 1913 से 1942 के बीच किसी freedom movement के अनुसरण में लगान नहीं दिया और उसकी जमीन बकाये की डिक्री में बिक गई।
ताना भगतों के संघर्ष से पैदा सिद्धांत धीरे-धीरे व्यापक राजनीतिक न्याय के सिद्धांत में बदल रहा था।
1956 : दूसरा महत्वपूर्ण संशोधन
1956 में फिर कानून में परिवर्तन किया गया।
सर्वोच्च न्यायालय ने बाद में इन संशोधनों को कानून के विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा माना।
यह बताता है कि जमीन-वापसी केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रश्न नहीं थी।
इसलिए न्याय को लगातार कानूनी रूप से पुनर्गठित करना पड़ा।
स्वतंत्रता के बाद जमीन-वापसी की सबसे बड़ी कठिनाई : समय
1948 में पुनर्स्थापन कानून लागू है।
अब मूल स्थिति बहाल करना सरल नहीं था।
समय स्वयं भूमि-विवाद की नई परतें पैदा करता है।
एक खेत पर कई न्याय
मेरे पिता ने इसे कानूनी नीलामी में खरीदा था।
अब स्वतंत्र राज्य के सामने प्रश्न था—
ऐतिहासिक न्याय किसे दिया जाए और वर्तमान कानूनी अधिकारों की रक्षा कैसे की जाए?
यही पुनर्स्थापन कानून की व्यावहारिक जटिलता थी।
सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा संघर्ष
ताना भूमि-पुनर्स्थापन से जुड़े प्रश्न अंततः सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचे।
Dasu Khan v. Mohan Bhagat (1966) विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने कानून, उसके संशोधनों और पुनर्स्थापन व्यवस्था की वैधानिक संरचना पर विचार किया।
1914 में जो विवाद गांव और जमींदार के बीच शुरू हुआ था—
आधी सदी बाद भारत के सर्वोच्च न्यायालय की विधिक व्याख्या का विषय बन चुका था।
किसान आंदोलन की अदालत तक यात्रा
यानी ताना भगत आंदोलन ने धार्मिक प्रतिरोध से भूमि-कानून और संवैधानिक न्याय तक की यात्रा की।
इससे स्वतंत्र भारत के किसान संघर्ष का नया चरित्र भी स्पष्ट होता है—
अब लड़ाई का एक बड़ा मैदान अदालत और प्रशासन था।
CNT Act और ताना पुनर्स्थापन कानून साथ-साथ
स्वतंत्र भारत में ताना भूमि अधिकार को दो प्रमुख कानूनी स्तंभों से अलग नहीं किया जा सकता—
CNT Act, 1908
आदिवासी और विशेष रैयती भूमि के हस्तांतरण पर सुरक्षा।
Tana Bhagat Restoration Act
राजनीतिक लगान-अस्वीकार से खोई विशिष्ट भूमि की वापसी।
झारखंड का भूमि प्रशासन आज भी दोनों को अपने महत्वपूर्ण भूमि-कानूनों में रखता है। LBSNAA के झारखंड भूमि कानून संकलन में भी CNT Act और Tana Bhagat Restoration Act दोनों शामिल हैं।
जमींदारी उन्मूलन : एक बड़ा परिवर्तन
स्वतंत्रता के बाद बिहार में जमींदारी उन्मूलन की दिशा में Bihar Land Reforms Act, 1950 महत्वपूर्ण था। India Code के झारखंड भूमि-कानून अभिलेख में यह कानून भी CNT Act और ताना पुनर्स्थापन कानून के साथ दर्ज है।
ताना भगतों के लिए यह ऐतिहासिक परिवर्तन था।
जिस जमींदारी सत्ता के विरुद्ध उनके आंदोलन ने संघर्ष किया था, स्वतंत्र भारत ने उस ढांचे को कानूनी रूप से खत्म करने की दिशा अपनाई।
जमींदार हटने का अर्थ सभी पुराने जमीन विवाद खत्म होना नहीं था।
जमींदारी गई, राजस्व संबंध नहीं
स्वतंत्र राज्य को भी भूमि-अभिलेख रखना था।
इसलिए ताना भगतों की समस्या का स्वरूप बदल गया।
जैसे प्रशासनिक अधिकार प्रश्नों से अधिक जुड़ता गया।
क्या ताना भगतों ने स्वतंत्र भारत में कर देना स्वीकार कर लिया?
इसका एक सरल सार्वभौमिक उत्तर नहीं है।
ताना भगत समुदाय के भीतर कर के प्रश्न पर लंबे समय तक विशिष्ट दृष्टि बनी रही। विभिन्न बाद के आंदोलनों में भू-लगान और सरकारी देनदारियों के प्रति प्रतिरोध की खबरें मिलती हैं।
कुछ आधुनिक विवरणों में झारखंड सरकार द्वारा ताना भगतों के भू-लगान/बकाये को राहत देने या माफ करने की दिशा में कदमों का उल्लेख भी है।
लेकिन हर काल और हर कर को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं।
औपनिवेशिक लगान-अस्वीकार और स्वतंत्र भारतीय राज्य के प्रति प्रशासनिक कर-विवाद अलग ऐतिहासिक संदर्भ हैं।
ताना भगत राज्य-विरोधी समुदाय नहीं बने
यदि वे भारतीय राज्य को ही अवैध मानते, तो—
उन्होंने भारतीय राष्ट्र को स्वीकार किया।
लेकिन राज्य से अपने ऐतिहासिक अधिकारों पर विशेष न्याय की अपेक्षा भी रखी।
तिरंगा : स्वतंत्र भारत में असाधारण ताना प्रतीक
ताना भगत और राष्ट्रीय ध्वज का संबंध स्वतंत्रता के बाद और अधिक गहरा हुआ।
जिस कांग्रेस ध्वज को उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में उठाया था, स्वतंत्रता के बाद भारतीय तिरंगा राष्ट्रीय संप्रभुता का प्रतीक बना।
ताना भगतों ने इस परिवर्तन को सहजता से स्वीकार किया।
उनकी सामुदायिक संस्कृति में तिरंगा केवल सरकारी झंडा नहीं रहा।
वह उनके अपने स्वतंत्रता संघर्ष की स्मृति बन गया।
झंडे की पूजा नहीं, झंडे का पवित्रीकरण
ताना भगतों के संदर्भ में कई लोकप्रिय विवरण ‘तिरंगे की पूजा’ जैसे शब्द प्रयोग करते हैं।
राष्ट्रीय ध्वज को असाधारण पवित्र–नैतिक सम्मान देना।
और अपने समुदाय की राष्ट्रीय भूमिका—
इसलिए राष्ट्रवाद यहां धार्मिक-सामुदायिक भाव ग्रहण करता है।
1914 का धर्मेश और स्वतंत्र भारत का तिरंगा
यह ताना इतिहास की अद्भुत प्रतीक यात्रा है।
इस यात्रा में पुराना धार्मिक संसार समाप्त नहीं हुआ।
बल्कि राष्ट्रीय प्रतीक उसके भीतर स्थान प्राप्त करता गया।
यही ताना भगतों की विशिष्ट भारतीय राष्ट्रवादी धार्मिकता है।
खादी स्वतंत्रता के बाद भी क्यों बनी रही?
सामान्य कांग्रेस कार्यकर्ता के लिए खादी स्वतंत्रता आंदोलन का वस्त्र हो सकती थी।
1947 के बाद पश्चिमी या मिल कपड़े अपनाना कोई राजनीतिक अपराध नहीं था।
लेकिन ताना भगतों ने खादी को आसानी से नहीं छोड़ा।
क्योंकि वह केवल ब्रिटिश कपड़े का बहिष्कार नहीं थी।
इसलिए राजनीतिक कारण बदल जाने के बाद भी सांस्कृतिक कारण जीवित रहे।
गांधी स्वतंत्रता के बाद भी क्यों केंद्रीय रहे?
लेकिन ताना भगतों के लिए गांधी की मृत्यु ने उनके महत्व को समाप्त नहीं किया।
उलटे गांधी की स्मृति और अधिक नैतिक बन गई।
शहीद महात्मा और ताना जीवन-आदर्श के स्थायी प्रतीक थे।
ताना भगतों का गांधीवाद इसलिए सत्ता में बैठी कांग्रेस से भी अलग हो सकता था।
और फिर भी गांधी के प्रति पूर्ण श्रद्धा रख सकते थे।
गांधी और कांग्रेस सरकार एक ही चीज नहीं
यही स्वतंत्रता-उपरांत ताना चेतना का महत्वपूर्ण परिवर्तन है।
1940 में गांधी और कांग्रेस एक ही राष्ट्रीय संघर्ष के प्रतीक दिख सकते थे।
लेकिन गांधी की नैतिक कसौटी सरकार से ऊपर रखी जा सकती है।
क्या सरकार सचमुच गांधी के रास्ते पर चल रही है?
यह प्रश्न लोकतांत्रिक आलोचना का नया स्रोत बन जाता है।
राज्य को गांधी की कसौटी पर परखना
ताना भगतों की राजनीति स्वतंत्रता के बाद भी इसलिए जीवित रह सकी क्योंकि उनके पास राज्य से बाहर एक नैतिक मानदंड था।
तो राज्य भले भारतीय हो, वह गांधीवादी न्याय की कसौटी पर अधूरा है।
इससे राष्ट्रीय निष्ठा अंधी राज्य-निष्ठा में नहीं बदलती।
स्वतंत्रता सेनानी की पहचान
स्वतंत्र भारत ने अनेक ताना भगत कार्यकर्ताओं को स्वतंत्रता सेनानी के रूप में मान्यता दी।
और सरकारी जीवन-वृत्तांतों के माध्यम से उनकी भागीदारी दर्ज की गई।
लेकिन जैसा पहले देखा गया, सभी आंदोलनकारियों को समान रूप से मान्यता नहीं मिली।
दस्तावेजों की कमी और ग्रामीण–आदिवासी स्रोत-समस्या ने कई परिवारों को औपचारिक सम्मान से दूर रखा।
यह स्वतंत्रता-उपरांत स्मृति का भी एक असमान पक्ष है।
सम्मान बनाम जमीन
ताना भगत के लिए यह प्रश्न स्वाभाविक था—
किसान आंदोलन के लिए स्मृति और भौतिक न्याय में अंतर होता है।
राष्ट्रीय समारोह में स्वतंत्रता सेनानी कहलाना महत्वपूर्ण है।
लेकिन यदि परिवार के पास आंदोलन में खोया खेत नहीं लौटा—
यही ताना भूमि प्रश्न को पीढ़ियों तक जीवित रखता है।
1966 का सर्वोच्च न्यायालय फैसला क्या बताता है?
दशकों बाद भी ताना पुनर्स्थापन कानून पर सर्वोच्च न्यायालय में विवाद पहुंचना इस बात का प्रमाण है कि भूमि-वापसी सहज प्रशासनिक अभियान नहीं थी।
Dasu Khan v. Mohan Bhagat में कानून की संरचना, संशोधनों और संपत्ति-अधिकार के प्रश्नों पर विचार हुआ।
उसका क्रियान्वयन विवादमुक्त नहीं था।
भूमि-अधिकार की दूसरी कानूनी धारा : CNT Act की धारा 71-A
स्वतंत्र भारत में आदिवासी भूमि-वापसी केवल विशेष ताना कानून तक सीमित नहीं रही।
CNT Act के तहत अवैध या अनुचित हस्तांतरण की जमीन वापस कराने की प्रक्रियाएं भी महत्वपूर्ण बनीं।
2025 के झारखंड उच्च न्यायालय के एक मामले में पुराने ताना भगत परिवार की भूमि पर CNT Act की धारा 71-A के तहत पुनर्स्थापन कार्यवाही और साथ ही विशेष ताना भगत Restoration Act के अंतर्गत कार्यवाही का उल्लेख मिलता है।
यह बताता है कि दोनों कानूनी रास्ते व्यवहार में कभी-कभी एक-दूसरे से जुड़ते रहे।
1970 के दशक तक भी पुराने दावे जीवित
उक्त न्यायिक विवाद में 1970 के दशक से शुरू हुई पुनर्स्थापन कार्यवाहियों और बाद के राजस्व अपील–पुनरीक्षण का उल्लेख मिलता है।
1947 के कानून के तीन दशक बाद भी कुछ ताना परिवारों की जमीन का प्रश्न प्रशासनिक और न्यायिक स्तर पर जीवित था।
इसलिए ‘1947 में जमीन वापस हो गई’ इतिहास नहीं—
पीढ़ी बदल गई, मुकदमा नहीं
एक ही खेत का विवाद तीन पीढ़ियां पार कर सकता है।
ताना भगतों का भूमि प्रश्न इस अर्थ में केवल स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास नहीं—
उत्तराधिकार में मिला न्याय-संघर्ष भी है।
2000 : झारखंड राज्य बनने का अर्थ
15 नवंबर 2000 को झारखंड अलग राज्य बना।
ताना भगतों के लिए इसका प्रतीकात्मक महत्व था।
अब वह क्षेत्र जहां उनका आंदोलन पैदा हुआ था—
नई राजनीतिक पहचान के केंद्र में आए।
क्या अलग राज्य जमीन के पुराने विवाद तुरंत सुलझा देगा?
झारखंड सरकार के अपने भूमि-कानून में ताना Act आज भी मौजूद
यह महत्वपूर्ण तथ्य है कि ताना भगत Restoration Act आज भी झारखंड के विधिक अभिलेखों में मौजूद है और राज्य का Revenue, Registration and Land Reforms Department भूमि प्रशासन का प्रमुख विभाग है।
अर्थात यह केवल मृत ऐतिहासिक कानून नहीं जिसे इतिहास की किताब में रखा गया हो।
उसकी विधिक विरासत वर्तमान भूमि व्यवस्था का हिस्सा बनी हुई है।
2009 : 114 परिवारों को जमीन-वापसी का उल्लेख
ताना भूमि संघर्ष की लंबी उम्र का एक उल्लेखनीय आधुनिक प्रसंग 2009 से जुड़ा है।
सूचना के अधिकार और पारदर्शिता पर प्रकाशित एक केस-स्टडी के अनुसार पूर्व विधायक गंगा ताना भगत और सहयोगियों ने भूमि-वापसी के लंबित प्रश्न को सूचना के अधिकार के माध्यम से उठाया। उसके बाद प्रशासनिक प्रक्रिया तेज हुई और 30 अगस्त 2009 को पहले 114 ताना भगत परिवारों के भूमि-अधिकार बहाल किए जाने का उल्लेख मिलता है। समुदाय इस दिन को ‘मुक्ति दिवस’ के रूप में याद करने लगा।
इस दावे को सरकारी राजस्व अभिलेखों से और पुष्ट करना उपयोगी होगा, लेकिन एक बात निर्विवाद रूप से स्पष्ट होती है—
1947 में शुरू हुआ जमीन-वापसी प्रश्न इक्कीसवीं सदी तक खिंचा।
यही स्वतंत्रता के अधूरे न्याय का सबसे कठोर प्रमाण है
इससे बेहतर उदाहरण क्या होगा कि कानून और न्याय में कितना अंतर हो सकता है?
ताना भगत आंदोलन का स्वतंत्रता-उपरांत इतिहास इसी अंतर को दर्ज करता है।
RTI : सत्याग्रह का नया लोकतांत्रिक रूप?
यह तुलना सावधानी से करनी चाहिए, लेकिन रोचक है।
उसे उसके अपने कानून के अनुसार जवाबदेह बनाना था।
यही लोकतांत्रिक आंदोलन का महत्वपूर्ण परिवर्तन है।
‘सरकार हमारी है, इसलिए उससे सवाल भी हमारा अधिकार है’
यही स्वतंत्र भारत की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक शिक्षा थी।
ब्रिटिश अधिकारी से ताना भगत नैतिक आज्ञाकारिता वापस लेता था।
तुम हमारे संविधान और कानून से बंधे हो।
जमीन अब भी ताना राजनीति का केंद्र क्यों है?
क्योंकि ताना धार्मिक और राजनीतिक चेतना की शुरुआत भूमि से हुई थी।
इसलिए आधुनिक विकास परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण भी ताना भगतों के लिए सामान्य मुआवजा-विवाद से अधिक संवेदनशील प्रश्न हो सकता है।
विकास बनाम पैतृक अधिकार : पुराना प्रश्न नए रूप में
औपनिवेशिक काल में बाहरी सत्ता कहती थी—
आज लोकतांत्रिक विकास-राज्य कह सकता है—
लेकिन ताना भगत की दृष्टि से मूल प्रश्न फिर उठता है—
हमारी भूमि के उपयोग का निर्णय हमारी सहमति के बिना कौन कर सकता है?
इसलिए पुराने आंदोलन की भाषा आधुनिक भूमि-अधिग्रहण विवादों में फिर दिखाई दे सकती है।
2026 : NH-43 के विस्तार के विरुद्ध विरोध
जून 2026 में गुमला के ताना भगतों और अन्य आदिवासी ग्रामीणों ने NH-43 को चौड़ा करने की परियोजना का विरोध किया। उनका दावा था कि प्रस्तावित परियोजना पैतृक जमीन, जंगल, धार्मिक स्थलों, कृषि आजीविका और सामुदायिक स्थानों को प्रभावित करेगी; उन्होंने क्षेत्र के संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आने का प्रश्न भी उठाया।
यह आंदोलन 1914 का पुनरावर्तन नहीं है।
भूमि केवल मुआवजे का प्रश्न नहीं; सामुदायिक अधिकार का प्रश्न है।
आज का राज्य अंग्रेजी राज्य नहीं है—यह अंतर अनिवार्य है
ऐतिहासिक तुलना करते समय अतिरेक से बचना आवश्यक है।
आज की सड़क परियोजना को औपनिवेशिक जमीन-जबरदस्ती के बराबर बताना तथ्यात्मक और संवैधानिक अंतर मिटा देगा।
इसलिए संघर्ष की प्रकृति बदल चुकी है।
लेकिन यही लोकतांत्रिक ढांचा ताना भगतों को अधिकार देता है कि वे भूमि-अधिग्रहण पर सवाल करें।
पांचवीं अनुसूची और ताना चेतना
झारखंड के अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी समुदायों के भूमि और प्रशासनिक हितों को संविधान में विशेष महत्व दिया गया है।
ताना भगतों का आधुनिक अधिकार-विमर्श इसी संवैधानिक भाषा से जुड़ सकता है।
भूमि पर सामुदायिक अधिकार का मूल प्रश्न बना रहा।
गांधी की स्मृति का आधुनिक राजनीतिक अर्थ
आज भी ताना भगतों की सार्वजनिक छवि गांधीवादी जीवन से जुड़ी है—
जब कोई समुदाय विरोध करते हुए स्वयं को गांधीवादी कहता है तो वह राज्य से कह रहा होता है—
हम उसी नैतिक परंपरा में न्याय मांग रहे हैं जिसे भारतीय राष्ट्र सम्मान देता है।
इससे गांधी की स्मृति आधुनिक राजनीतिक पूंजी बनती है।
गांधीवाद सत्ता के विरुद्ध नहीं, सत्ता की नैतिक परीक्षा
स्वतंत्र भारत में ताना गांधीवाद का शायद सबसे परिपक्व रूप यही है।
अब गांधी का उपयोग राज्य खत्म करने के लिए नहीं—
राज्य को उसके नैतिक वादे याद दिलाने के लिए होता है।
क्या विकास सबसे कमजोर की कीमत पर होगा?
क्या ग्राम समुदाय की सहमति महत्वपूर्ण है?
क्या स्वतंत्रता सेनानी समुदाय का ऐतिहासिक दावा सुना जाएगा?
सामाजिक आधार और समाज पर प्रभाव
उरांव किसान, गरीब रैयत, महिलाएं, गांव–पड़हा नेटवर्क, धार्मिक अनुशासन, शिक्षा–स्वच्छता, लैंगिक संबंध और क्या पूरा उरांव समाज कभी ‘ताना’ बना?
ताना भगत आंदोलन को यदि केवल जतरा भगत, गांधी, लगान-अस्वीकार और राष्ट्रीय आंदोलन की घटनाओं से समझें तो उसकी सामाजिक गहराई छूट जाती है। किसी भी आंदोलन की वास्तविक शक्ति इस बात में होती है कि उसमें कौन शामिल हुआ, कौन बाहर रहा, किस सामाजिक वर्ग को उससे सबसे अधिक आशा मिली और उसने समाज के भीतर सत्ता-संबंधों को कितना बदला।
ताना भगत आंदोलन इस दृष्टि से विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह पूरे उरांव समाज का स्वतःस्फूर्त एकजुट विद्रोह नहीं था।
वह उरांव समाज के भीतर पैदा हुआ एक सुधारवादी, अपेक्षाकृत वंचित और वैकल्पिक समुदाय था।
संगीता दासगुप्ता का महत्वपूर्ण इतिहासलेखन इसी बिंदु पर जोर देता है। उनके अनुसार ताना भगत आंदोलन को केवल ‘आदिवासी बनाम बाहरी’ संघर्ष के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं है; उरांव समाज स्वयं आंतरिक रूप से पदानुक्रमित था, और ताना भगत उस समाज के भीतर भी सत्ता और पहचान के पुराने ढांचों को चुनौती दे रहे थे।
सबसे पहले : पूरा उरांव समाज कभी ताना नहीं बना
यह बुनियादी तथ्य स्पष्ट रखना जरूरी है।
ताना भगत आंदोलन उरांव समाज से निकला।
उसका प्रारंभिक सामाजिक आधार मुख्यतः उरांव किसान थे।
उसकी धार्मिक भाषा उरांव संसार से आई।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सभी उरांव ताना भगत बन गए।
इसके विपरीत, आंदोलन ने उरांव समाज के भीतर एक नया संप्रदाय और अलग सामाजिक पहचान बनाई। दासगुप्ता ने आंदोलन को ऐसी पहचान-खोज के रूप में देखा है जिसमें ताना स्वयं को व्यापक उरांव समुदाय से अलग परिभाषित करते हुए उसके धार्मिक और सामाजिक क्रम को भी पुनर्गठित करना चाहते थे।
हर ताना भगत उरांव था, लेकिन हर उरांव ताना भगत नहीं।
यही अंतर आगे पूरे समाजशास्त्र को समझने की कुंजी है।
ताना पहचान बनने का अर्थ क्या था?
ताना बनना केवल जतरा भगत के किसी उपदेश से सहमत होना नहीं था।
पुराने धार्मिक अनुष्ठानों से दूरी बनाना,
कुछ पारंपरिक पदाधिकारियों की धार्मिक सत्ता न मानना,
नया सामुदायिक अनुशासन स्वीकार करना,
और धीरे-धीरे राजनीतिक असहयोग की नई संस्कृति में प्रवेश करना।
इसलिए ताना पहचान विचार से अधिक जीवन-पद्धति थी।
किसी गांव में ताना परिवार और गैर-ताना परिवार रोजमर्रा के व्यवहार से भी अलग पहचाने जा सकते थे।
आंदोलन का सामाजिक आधार : अपेक्षाकृत वंचित उरांव
आधुनिक इतिहासलेखन ने ताना भगत आंदोलन को उरांव समाज के अंदरूनी सामाजिक विभाजनों से जोड़कर देखा है।
संगीता दासगुप्ता विशेष रूप से ताना भगतों को उरांव समुदाय के एक marginalized—हाशिये पर स्थित हिस्से के रूप में रखती हैं। उनकी बाद की पुस्तक भी ताना भगतों को internally fractured, यानी आंतरिक रूप से विभाजित उरांव समाज के भीतर अपेक्षाकृत वंचित समूह की प्रतिक्रिया के रूप में पढ़ती है।
यह आंदोलन को समझने में बहुत महत्वपूर्ण बदलाव है।
यदि उरांव समाज पूरी तरह समान होता, तो आंदोलन का अर्थ मुख्यतः बाहरी शोषण के विरुद्ध संघर्ष होता।
में असमानता थी, तो ताना आंदोलन अंदर और बाहर—दोनों दिशाओं में विद्रोह था।
भुईंहर और अन्य रैयत : भूमि के भीतर भी पदानुक्रम
छोटानागपुर की भूमि व्यवस्था में सभी किसान समान स्थिति में नहीं थे।
कुछ परिवार पुराने बसाहटकर्ता और भुईंहर अधिकारधारी थे।
कुछ को विशिष्ट रैयती प्रतिष्ठा मिली हुई थी।
कुछ गांवों में परंपरागत नेतृत्व और भूमि-अधिकार एक-दूसरे से जुड़ सकते थे।
द्वितीयक अध्ययनों में यह तर्क मिलता है कि मूल reclaimers या भुईंहरों की अपेक्षाकृत विशेष स्थिति थी और वे पाहन तथा महतो जैसे गांव पदों पर भी प्रभाव रखते थे; ताना भगत चुनौती का एक हिस्सा इसी आंतरिक प्रभुत्व की ओर भी था।
इसलिए ‘उरांव किसान’ को एक समान आर्थिक वर्ग मानना गलत होगा।
गरीब रैयत आंदोलन की ओर क्यों आकर्षित हुआ?
ताना अनुशासन गरीब रैयत के लिए कई स्तरों पर अर्थपूर्ण हो सकता था।
अनुष्ठानों पर होने वाला खर्च कम करना।
महाजन या स्थानीय प्रभुत्वशाली व्यक्ति पर निर्भरता कम करना।
धार्मिक प्रतिष्ठा के पुराने पदानुक्रम के बाहर नया सम्मान प्राप्त करना।
अर्थात ताना भगत बनने से गरीब किसान को केवल नया देव-विश्वास नहीं मिलता था।
‘हम गरीब हैं’ से ‘हम शुद्ध हैं’ तक
यह परिवर्तन सामाजिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है।
एक गरीब किसान पुराने ग्रामीण समाज में—
ताना समुदाय ने सामाजिक प्रतिष्ठा की दूसरी कसौटी बनाई।
इससे आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति को नैतिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने का नया रास्ता मिला।
धार्मिक सुधार वास्तव में प्रतिष्ठा का पुनर्वितरण था
ताना आंदोलन द्वारा पाहन और महतो की परंपरागत सत्ता को चुनौती का यही गहरा सामाजिक अर्थ था।
दासगुप्ता के प्रारंभिक अध्ययन में ताना प्रयासों को पाहन—ग्राम पुरोहित—और महतो—लौकिक ग्राम प्रतिनिधि—के पारंपरिक नेतृत्व को चुनौती देने तथा आत्मा-पूजा और बलि को अस्वीकार करने से जोड़ा गया है।
यदि पुराने धार्मिक अनुष्ठान ही वैध नहीं हैं—
तो पुराने पुरोहित की आवश्यकता कितनी रह जाती है?
इससे ताना गुरु, स्थानीय प्रचारक और सामुदायिक सभा नए वैकल्पिक संस्थान बन सकते थे।
पाहन की सत्ता क्यों महत्वपूर्ण थी?
पाहन केवल पूजा कराने वाला व्यक्ति नहीं था।
वह गांव की धार्मिक वैधता का केंद्र था।
तो वे केवल धार्मिक सिद्धांत नहीं बदल रहे।
गांव में पवित्रता तय करने का अधिकार किसके पास है?
यही धार्मिक सत्ता का पुनर्वितरण है।
महतो को चुनौती क्यों?
महतो गांव के लौकिक मामलों और प्रशासनिक संपर्कों से जुड़ा पद था।
औपनिवेशिक राजस्व व्यवस्था के साथ पारंपरिक ग्राम नेतृत्व के संबंध कई बार ऐसे बन सकते थे जिनमें स्थानीय पदाधिकारी राज्य और किसान के बीच मध्यस्थ बन जाए।
ताना भगतों का पुराने नेतृत्व से विरोध इसलिए केवल धर्म तक सीमित नहीं था।
वह गांव में प्रतिनिधित्व और सत्ता का भी प्रश्न था।
इसका अर्थ यह नहीं कि हर पाहन शोषक था
किसी सामाजिक संस्था को चुनौती मिलने का अर्थ यह नहीं कि उसके हर पदाधिकारी को शोषक घोषित कर दिया जाए।
पाहन और महतो उरांव सामुदायिक व्यवस्था के आवश्यक हिस्से थे।
ताना आंदोलन उनके द्वारा प्रतिनिधित्व किए जाने वाले पुराने अधिकार ढांचे से दूरी बना रहा था।
यह व्यक्ति-विरोध से अधिक संस्थागत पुनर्गठन था।
पड़हा नेटवर्क : आंदोलन के प्रसार की सामाजिक भूमि
उरांव समाज की पड़हा व्यवस्था अनेक गांवों को सामाजिक संबंधों में जोड़ती थी।
ताना आंदोलन ने कोई औपचारिक आधुनिक संचार संगठन शुरू नहीं किया था।
उसके प्रसार में पुराने गांव-संबंध उपयोगी हो सकते थे—
इस अर्थ में ताना आंदोलन ने पुराने सामाजिक नेटवर्क को समाप्त नहीं किया।
उसने उन्हीं मार्गों का उपयोग नए विचार फैलाने के लिए किया।
गांवों के बीच रिश्तेदारी राजनीति बन गई
यदि एक गांव का युवक दूसरे गांव में विवाह करता है,
तो आंदोलन बिना छपे अखबार के भी फैल सकता है।
एक ताना परिवार दूसरे गांव के रिश्तेदार को नया अनुशासन बताता है।
इस प्रकार सामाजिक नेटवर्क राजनीतिक नेटवर्क बन जाता है।
यही कारण है कि आंदोलन संस्थापक की गिरफ्तारी के बाद भी फैलता रहा।
ताना समुदाय आधुनिक संगठन नहीं था—फिर भी अत्यंत संगठित था
किन सामाजिक प्रथाओं से दूरी रखनी है,
और राजनीतिक रूप से किस अन्याय का सहयोग नहीं करना है।
धार्मिक नियम सामाजिक पहचान को दृश्यमान बनाते हैं
कोई राजनीतिक विचार व्यक्ति के भीतर छिपा हो सकता है।
बाद में खादी और ध्वज उससे जुड़ते हैं।
इसलिए ताना भगत पहचान सामाजिक रूप से आसानी से पहचानने योग्य बनती गई।
अलग पहचान ने एकता भी पैदा की, दूरी भी
यही किसी कठोर सुधारवादी समुदाय की दोहरी प्रक्रिया है।
यदि गांव का एक हिस्सा हड़िया पीता है और दूसरा उसे अशुद्ध मानता है—
यदि एक पक्ष पारंपरिक बलि करता है और दूसरा विरोध—
यदि एक समूह पाहन की पूजा स्वीकार नहीं करता—
गांव की सामूहिक एकता प्रभावित हो सकती है।
इसलिए ताना आंदोलन ने केवल उरांव एकता नहीं बनाई।
क्या गैर-ताना उरांव ‘कम उरांव’ हो गए?
ताना सुधार की अपनी नैतिक भाषा कभी-कभी ऐसी स्थिति बना सकती थी जिसमें अनुयायी स्वयं को अधिक शुद्ध जीवन वाला मानें।
लेकिन इतिहासकार को इस नैतिक दावे को तथ्य की तरह स्वीकार नहीं करना चाहिए।
गैर-ताना उरांव भी अपने सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन को वैध मानते थे।
इसलिए आंदोलन के भीतर की ‘सुधार’ भाषा एक पक्ष की दृष्टि है।
सामाजिक सुधार और सांस्कृतिक क्षति का प्रश्न
यदि जादू-टोना के भय से मुक्ति मिली—
लेकिन यदि सामुदायिक नृत्य, उत्सव, भोजन और सांस्कृतिक साझा स्थानों से दूरी बढ़ी—
तो क्या कुछ सामुदायिक जीवन भी कमजोर हुआ?
सुधार आंदोलन हमेशा केवल ‘बेहतर’ समाज नहीं बनाते।
वे यह भी तय करते हैं कि कौन-सी परंपरा बचनी चाहिए और कौन-सी त्यागी जानी चाहिए।
अखड़ा और ताना अनुशासन
कठोर धार्मिक सुधारवादी धारा के लिए ऐसे कुछ सांस्कृतिक व्यवहार संदेह का विषय बन सकते थे, विशेषकर यदि वे मद्य, नृत्य या ऐसे उत्सव से जुड़े हों जिन्हें आंदोलन पुरानी ‘अशुद्ध’ परंपरा का हिस्सा मानता था।
इसलिए ताना आंदोलन ने सामाजिक आनंद और नैतिक संयम के बीच नई रेखा खींची।
यह परिवर्तन सबको स्वीकार्य होना जरूरी नहीं था।
धुमकुड़िया और युवा पीढ़ी
पारंपरिक उरांव युवा-संस्था धुमकुड़िया सामाजिक प्रशिक्षण की जगह थी।
ताना धार्मिक समुदाय ने धीरे-धीरे युवा सामाजिककरण के लिए एक अलग नैतिक दुनिया प्रस्तुत की।
अब युवा केवल पारंपरिक गीत, नृत्य और रीति से समाज नहीं सीखता—
इस प्रकार आंदोलन ने पीढ़ीगत सामाजिक शिक्षा में परिवर्तन किया।
महिलाएं : इतिहास में दिखाई कम क्यों देती हैं?
ताना आंदोलन के प्रमुख प्रकाशित इतिहासों में पुरुष नाम अधिक दिखाई देते हैं।
इससे भ्रम हो सकता है कि आंदोलन पुरुषों का था।
लेकिन ऐसा निष्कर्ष स्रोतों की प्रकृति से पैदा हो सकता है।
औपनिवेशिक रिकॉर्ड मुख्यतः उन्हीं लोगों को दर्ज करता है जो—
घरेलू और सामुदायिक परिवर्तन में महिलाओं की भूमिका ऐसी फाइलों में कम दिखाई देती है।
लिथो उरांव का नेतृत्व इस भ्रम को तोड़ता है
जतरा के बाद लिथो उरांव जैसे महिला नेतृत्व का उभरना अपने आप में महत्वपूर्ण है।
यह बताता है कि ताना धार्मिक करिश्मा केवल पुरुषों के लिए आरक्षित नहीं था।
यदि एक महिला नए धार्मिक संदेश की वैध वाहक बन सकती थी, तो आंदोलन ने कम-से-कम कुछ स्तरों पर स्त्रियों के लिए सार्वजनिक आध्यात्मिक नेतृत्व की जगह खोली।
इसे आधुनिक नारीवादी समानता के बराबर नहीं मानना चाहिए।
लेकिन पितृसत्तात्मक ग्रामीण समाज में यह महत्वपूर्ण परिवर्तन था।
माया उरांव : दूसरी महिला राजनीतिक उपस्थिति
1919 के उभार में माया उरांव का नाम सिबू के साथ आता है।
इससे पता चलता है कि महिला भागीदारी एक अकेला अपवाद नहीं थी।
ताना आंदोलन के करिश्माई और राजनीतिक नेतृत्व संसार में महिलाओं की जगह मौजूद थी।
फिर भी उनके जीवन के बारे में स्रोत पुरुष नेताओं की तुलना में बहुत कम बताते हैं।
यही इतिहासलेखन की लैंगिक असमानता है।
महिला का सबसे बड़ा परिवर्तन घर के भीतर भी था
ताना सुधार के सबसे बड़े नियमों में था—
यदि पुरुष शराब कम करता या छोड़ता है—
इसी तरह अनुष्ठानिक खर्च घटने से परिवार की आर्थिक स्थिति बदल सकती है।
इसलिए भले महिला किसी सार्वजनिक सभा में न दिखे—
ताना अनुशासन उसके दैनिक जीवन पर सीधा प्रभाव डाल सकता था।
भोजन की राजनीति और महिला श्रम
खान-पान बदलने का सबसे अधिक दैनिक श्रम प्रायः घर की महिलाओं पर आता है।
विशिष्ट भोजन-पद्धति विकसित करता है—
इसलिए ताना धार्मिक सुधार को महिलाओं के श्रम से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
लेकिन दुर्भाग्य से स्रोत इस सूक्ष्म सामाजिक इतिहास पर बहुत कम रोशनी डालते हैं।
मद्यत्याग में महिलाओं का संभावित हित
जहां अत्यधिक मद्यपान परिवार की आय और घरेलू संबंधों को प्रभावित करता है, वहां महिला के लिए मद्यत्याग केवल धार्मिक आदेश नहीं हो सकता।
इसलिए ताना सुधार में महिलाओं की सहमति को केवल पुरुष गुरु की आज्ञा मानना पर्याप्त नहीं।
उसमें उनके अपने सामाजिक हित भी हो सकते थे।
क्या ताना आंदोलन ने स्त्री–पुरुष समानता स्थापित की?
हमें ऐसी कोई व्यापक सामाजिक क्रांति नहीं दिखती जिसमें—
ताना कार्यक्रम का घोषित उद्देश्य बन गया हो।
विवाह और ताना पहचान
जब कोई धार्मिक सुधार समुदाय कठोर भोजन और धार्मिक नियम अपनाता है, तो विवाह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।
क्या ताना परिवार गैर-ताना परिवार से विवाह करेगा?
क्या विवाह में पुराने अनुष्ठान होंगे?
ऐसे प्रश्न धीरे-धीरे ताना पहचान की सामाजिक सीमा को मजबूत कर सकते थे।
इससे समुदाय के भीतर अंतर्विवाह की प्रवृत्ति बढ़ने की संभावना स्वाभाविक थी।
लेकिन किसी निश्चित विवाह-संहिता या सार्वभौमिक नियम का दावा प्राथमिक प्रमाण के बिना नहीं करना चाहिए।
धर्मांतरण और ताना आंदोलन
ताना आंदोलन उस समय आया जब ईसाई मिशनरी प्रभाव उरांव समाज में महत्वपूर्ण था।
कुछ उरांव मिशन शिक्षा और संरक्षण से जुड़े।
इससे उरांव समाज एकाधिक धार्मिक पहचान वाला समाज बनता गया।
ताना आंदोलन इसी धार्मिक बहुलता के भीतर अपनी विशिष्ट जगह बना रहा था।
ताना पहचान मिशनरी धर्म का विकल्प भी थी
यह गरीब उरांव के लिए महत्वपूर्ण था।
यदि वह पुराने धर्म की कुछ प्रथाओं से असंतुष्ट है—
तो क्या सुधार का एकमात्र रास्ता ईसाई धर्म अपनाना है?
हम अपनी परंपरा के भीतर नया धर्म-सामाजिक अनुशासन बना सकते हैं।
इस अर्थ में ताना आंदोलन सांस्कृतिक आत्मनिर्णय की परियोजना भी था।
शिक्षा का प्रश्न
ताना आंदोलन के पास प्रारंभ में वैसी औपचारिक शिक्षा संरचना नहीं थी।
कानून, नौकरी और आधुनिक प्रशासन तक पहुंच बढ़ा सकते थे।
ताना भगत मुख्यतः धार्मिक और नैतिक अनुशासन पर निर्भर थे।
इसलिए आधुनिक शिक्षा की दृष्टि से मिशनरी समुदायों और ताना समुदाय के बीच विकास की गति अलग हो सकती थी।
फिर गांधीवादी चरण ने शिक्षा का नया अर्थ दिया
कांग्रेस और गांधी से जुड़ने के बाद ताना भगत व्यापक राष्ट्रीय राजनीतिक शिक्षा से जुड़े।
इन सबने एक प्रकार की राजनीतिक साक्षरता पैदा की।
व्यक्ति पढ़ा-लिखा न हो, फिर भी उसे पता हो सकता था—
अंग्रेजी राज्य क्यों चुनौती योग्य है,
कानूनी साक्षरता फिर भी कमजोर रही
भूमि-पुनर्स्थापन के स्वतंत्रता-उपरांत संघर्ष से यह स्पष्ट है कि कानून की जटिल प्रक्रियाएं ताना परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बनीं।
यदि आंदोलन में आधुनिक औपचारिक शिक्षा का मजबूत नेटवर्क पहले विकसित होता, तो संभवतः—
यह एक प्रतिकल्पना है, निश्चित तथ्य नहीं।
लेकिन ताना आंदोलन की सामाजिक सीमाओं का मूल्यांकन करते समय शिक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
स्वच्छता का अनुशासन
ताना भगतों की पहचान में स्वच्छता महत्वपूर्ण बनी।
यह केवल शरीर साफ रखने का नियम नहीं था।
बाद में सफेद खादी ने इसे और दृश्य बना दिया।
इस प्रकार शरीर स्वयं धार्मिक और राजनीतिक पहचान का माध्यम बन गया।
स्वच्छता : आत्मसम्मान की भाषा भी
जिस समाज को औपनिवेशिक नृवंशशास्त्र कई बार ‘असभ्य’, ‘आदिम’ या ‘गंदा’ जैसी अपमानजनक श्रेणियों में रखता था, उसके भीतर यदि कोई समुदाय कठोर स्वच्छता, सफेद वस्त्र और संयमित जीवन को अपनी पहचान बनाता है—
तो उसका राजनीतिक अर्थ भी हो सकता है।
हम अपने बारे में आपकी परिभाषा स्वीकार नहीं करते।
इस तरह शारीरिक अनुशासन आत्मसम्मान का वक्तव्य भी बन सकता था।
ताना शरीर एक राजनीतिक शरीर बन गया
इस दृश्य पहचान ने ताना भगत को स्वयं चलता-फिरता राजनीतिक संदेश बना दिया।
सामूहिक प्रार्थना : संगठन की रीढ़
धार्मिक समुदाय की सबसे बड़ी संगठनात्मक ताकत होती है—
यदि लोग केवल आंदोलन के समय मिलें, तो आंदोलन समाप्त होने पर नेटवर्क टूट सकता है।
यदि वे धार्मिक कारण से नियमित मिलते रहें—
ताना सामूहिक प्रार्थना और धार्मिक अनुशासन ने इसी निरंतरता को संभव बनाया।
यही कारण है कि कांग्रेस आंदोलन स्थगित होने पर भी समुदाय जीवित रहा।
गीत और मौखिक स्मृति
कम साक्षर ग्रामीण समाज में गीत इतिहास का माध्यम बन सकते हैं।
इनकी स्मृति गीत और कथाओं के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चल सकती थी।
संगीता दासगुप्ता का बाद का इतिहासलेखन विशेष रूप से इस बात पर जोर देता है कि ताना अतीत को केवल औपनिवेशिक अभिलेखों से नहीं, बल्कि ताना याचिकाओं, पर्चों और पीढ़ीगत स्मृतियों से भी समझना चाहिए।
इससे ताना सामाजिक इतिहास अभिलेख और स्मृति—दोनों में मौजूद है।
मौखिक स्मृति इतिहास को बदलती भी है
पीढ़ियों से चलती कथा बिल्कुल स्थिर नहीं रहती।
बाद का गांधीवादी चरण 1914 की स्मृति को भी गांधीवादी रंग दे सकता है।
स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रीय गौरव पुराने स्थानीय संघर्ष को ‘स्वतंत्रता संग्राम’ की नई भाषा में रख सकता है।
इसलिए ताना समाज की अपनी स्मृति अत्यंत मूल्यवान है—
लेकिन उसे भी आलोचनात्मक रूप से पढ़ना होगा।
पूरा उरांव समाज ताना क्यों नहीं बना?
सभी लोग पुराने धार्मिक अनुष्ठान छोड़ना नहीं चाहते थे।
हड़िया और उत्सव सामुदायिक संस्कृति के महत्वपूर्ण हिस्से थे।
पाहन और महतो की व्यवस्था सबके लिए केवल शोषण नहीं थी।
लगान न देने का आर्थिक जोखिम बहुत बड़ा था।
मिशनरी धर्म और अन्य सुधार धाराएं वैकल्पिक रास्ते थे।
कठोर ताना अनुशासन हर व्यक्ति को आकर्षित नहीं कर सकता था।
इसलिए आंदोलन व्यापक प्रभावशाली हुआ—
आर्थिक जोखिम ने सदस्यता सीमित की
ताना भगत बनना केवल शराब छोड़ना नहीं था।
राजनीतिक चरण में इसका अर्थ हो सकता था—
हर गरीब किसान इतनी कीमत उठाने की स्थिति में नहीं था।
कभी-कभी सबसे गरीब व्यक्ति आंदोलन की मांग से सहमत होते हुए भी आर्थिक रूप से खुला प्रतिरोध करने में असमर्थ हो सकता है।
यही किसान आंदोलनों का सामान्य विरोधाभास है।
सबसे गरीब हमेशा सबसे क्रांतिकारी नहीं
इतिहास में यह मान लेना गलत है कि जिस पर सबसे अधिक शोषण है वही सबसे पहले विद्रोह करेगा।
अत्यधिक गरीब व्यक्ति के पास जोखिम उठाने की क्षमता भी सबसे कम हो सकती है।
इसलिए ताना आंदोलन के सामाजिक आधार को ‘सबसे गरीबों का विद्रोह’ जैसे सरल वाक्य में नहीं बांधना चाहिए।
स्मृति, संस्कृति और इतिहासलेखन
लोकगीत–मौखिक परंपरा, जतरा भगत की बदलती छवि, गांधी–तिरंगा प्रतीक, औपनिवेशिक अभिलेख बनाम समुदाय की स्मृति और इतिहासकारों के बीच प्रमुख बहसें
ताना भगत आंदोलन का इतिहास लिखते समय सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि घटनाएं कम हैं। चुनौती यह है कि एक ही आंदोलन की कई अलग-अलग स्मृतियां और इतिहास मौजूद हैं।
औपनिवेशिक अधिकारी ने उसे एक प्रकार से देखा।
प्रारंभिक मानवशास्त्री ने चौथे रूप में।
कांग्रेस और राष्ट्रवादी इतिहास ने उसे स्वतंत्रता संघर्ष की अलग भाषा में रखा।
और स्वयं ताना भगत समुदाय ने एक सदी में अपने अतीत को गीतों, कथाओं, प्रार्थनाओं, याचिकाओं, गांधी की स्मृति, राष्ट्रीय ध्वज और जतरा भगत की सामुदायिक पूजा के माध्यम से लगातार पुनर्गठित किया।
इसीलिए आधुनिक इतिहासकार संगीता दासगुप्ता ने इस आंदोलन के लिए अत्यंत उपयोगी अभिव्यक्ति प्रयोग की—
“Many narratives of Tana pasts” — ताना अतीत की अनेक कथाएं।
उनका तर्क है कि ताना भगत इतिहास को केवल औपनिवेशिक अभिलेख से नहीं पढ़ा जा सकता; ताना पर्चों, याचिकाओं, सामुदायिक स्मृतियों और बाद के राजनीतिक दावों को भी साथ रखना होगा। अलग स्रोत अलग ‘अतीत’ बनाते हैं।
इसी बिंदु से ताना भगत आंदोलन का इतिहासलेखन शुरू होना चाहिए।
घटना और स्मृति एक ही चीज नहीं
किसी ऐतिहासिक घटना के साथ दो प्रक्रियाएं चलती हैं।
बाद की पीढ़ियों ने उसे कैसे याद किया?
1914 का ताना आंदोलन जिन सामाजिक परिस्थितियों में शुरू हुआ था, उसके तत्कालीन अनुयायियों की राजनीतिक भाषा 1947 के बाद की राष्ट्रवादी भाषा से अलग थी।
बाद की स्मृति में अधिक दिखाई देते हैं—
लेकिन दोनों एक ही समय के सत्य नहीं हैं।
इतिहास को पीछे से पढ़ने का खतरा
यदि हम 1942 या 1947 की ताना पहचान लेकर 1914 पर रख दें तो कहानी सरल हो जाएगी—
जतरा भगत ने अंग्रेजों को भगाने के लिए गांधीवादी स्वतंत्रता आंदोलन शुरू किया।
1914 में गांधी अभी भारत लौटे भी नहीं थे।
कांग्रेस ताना आंदोलन की जननी नहीं थी।
राष्ट्रीय तिरंगा तब उनकी पहचान नहीं था।
इसलिए बाद की राष्ट्रवादी स्मृति ने जो तत्व जोड़े, उन्हें प्रारंभिक आंदोलन पर आरोपित नहीं करना चाहिए।
यही इतिहास और स्मृति के बीच पहला अनुशासन है।
औपनिवेशिक अभिलेख हमें क्या बताते हैं?
ताना भगत आंदोलन के प्रारंभिक वर्षों के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्रोतों में हैं—
इस अर्थ में औपनिवेशिक अभिलेख अनिवार्य हैं।
राज्य की नजर में ताना भगत कौन था?
क्या लोग काम करने से इनकार कर रहे हैं?
क्या कोई नया गुरु भीड़ जुटा रहा है?
यानी किसान के धर्म, नैतिकता और न्याय की अपेक्षा प्रशासन की प्राथमिक चिंता थी—
इसलिए अभिलेख में ‘अशांति’ दिखाई देती है।
लेकिन वही घटना ताना भगत के लिए हो सकती थी—
‘उपद्रव’ किसका शब्द है?
इन शब्दों में सत्ता बोल रही है या समाज?
उदाहरणतः ‘काम करने से इनकार’ प्रशासन के लिए अव्यवस्था था।
इसलिए औपनिवेशिक रिकॉर्ड तथ्य देता है—
लेकिन उसका अर्थ हमेशा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
फिर भी औपनिवेशिक अभिलेख को खारिज करना भी गलत
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर सरकारी रिकॉर्ड झूठा है।
इसके बिना हमें कई महत्वपूर्ण बातें पता ही न चलें—
अभिलेख को पढ़ो, लेकिन उसकी दृष्टि को भी पढ़ो।
और वह जिस चीज को ‘अपराध’ कह रहा है, उसका सामाजिक अर्थ क्या था?
मिशनरी स्रोत : दूसरा बाहरी दर्पण
उरांव समाज पर ईसाई मिशनों का व्यापक दस्तावेजी लेखन उपलब्ध है।
संगीता दासगुप्ता के 1999 के अध्ययन में मिशनरी पत्रिकाओं और विवरणों का व्यापक उपयोग किया गया है।
इन स्रोतों की ताकत यह है कि मिशनरी अक्सर गांव के सामाजिक जीवन के निकट थे।
मिशनरी ताना भगतों को कैसे देख सकते थे?
ताना आंदोलन स्वयं एक वैकल्पिक धार्मिक सुधार प्रस्तुत कर रहा था।
इसलिए वह मिशनरियों के लिए केवल राजनीतिक आंदोलन नहीं था।
हम उरांव समाज को सुधारने के लिए ईसाई धर्म अपनाए बिना भी नया नैतिक जीवन बना सकते हैं।
इस पूर्वाग्रह को ध्यान में रखकर ही स्रोत पढ़ना होगा।
फिर मिशनरी स्रोत उपयोगी क्यों हैं?
क्योंकि वे कई ऐसी सामाजिक बातों को दर्ज करते हैं जिनकी पुलिस को चिंता नहीं होती।
इसलिए प्रशासनिक स्रोत और मिशनरी स्रोत को साथ पढ़ने से अधिक समृद्ध तस्वीर बनती है।
ताना भगत दोनों से अलग अपने अनुभव जीता है।
शरत चंद्र राय : प्रारंभिक नृवंशशास्त्रीय दृष्टि
उरांव समाज के अध्ययन में शरत चंद्र राय का नाम अत्यंत महत्वपूर्ण है।
उनकी पुस्तक Oraon Religion and Customs 1928 में प्रकाशित हुई।
ताना भगतों पर उनके विवरण ने बाद के इतिहासकारों को महत्वपूर्ण आधार दिया।
संगीता दासगुप्ता बताती हैं कि राय का ताना संबंधी विवरण एक सरकारी रिपोर्ट—‘Oraon Unrest’—पर भी आधारित था, जिसकी प्रति उनके निजी कागजात में मिली।
राय का मानवशास्त्रीय विवरण पूरी तरह ‘स्थानीय मौखिक इतिहास’ नहीं था।
उसके पीछे औपनिवेशिक प्रशासनिक ज्ञान भी काम कर रहा था।
शरत चंद्र राय की ताकत
उन्होंने ऐसे समय उरांव समाज का दस्तावेजीकरण किया जब कई परंपराएं जीवित थीं और औपनिवेशिक परिवर्तन जारी था।
इसलिए ताना आंदोलन को व्यापक उरांव धर्म और सामाजिक संरचना से जोड़ने में उनका काम अत्यंत उपयोगी है।
लेकिन आधुनिक इतिहासकार उनसे आगे जाते हैं।
क्या ‘उरांव धर्म’ स्वयं एक स्थिर इकाई थी?
क्या समुदाय के भीतर वर्ग और प्रतिष्ठा के विभाजन को पर्याप्त रूप से देखा गया?
क्या ताना भगत केवल धार्मिक विचलन थे, या सामाजिक सत्ता का पुनर्गठन भी?
के. एस. सिंह : मिलेनरियनवाद, किसान राजनीति और राष्ट्रवाद
आधुनिक ताना इतिहासलेखन में कुमार सुरेश सिंह—K. S. Singh का लेख अत्यंत प्रभावशाली रहा—
“Tribal Peasantry, Millenarianism, Anarchism and Nationalism: A Case Study of the Tana Bhagats in Chotanagpur, 1914–25.”
संगीता दासगुप्ता के 1999 के लेख में इसे ताना भगत अध्ययन की प्रमुख पूर्ववर्ती व्याख्याओं में रखा गया है।
सिंह ने ताना भगत आंदोलन में कई तत्व एक साथ देखे—
सहस्राब्दीवादी—मिलेनरियन—नए राज की आशा,
और बाद में भारतीय राष्ट्रवाद में प्रवेश।
यह व्याख्या कई दशकों तक अत्यंत प्रभावशाली रही।
के. एस. सिंह की बड़ी उपलब्धि
उन्होंने ताना भगतों को ‘अंधविश्वासी जनजातीय उपद्रव’ के औपनिवेशिक ढांचे से बाहर निकाला।
यह भारतीय आदिवासी इतिहासलेखन में महत्वपूर्ण बदलाव था।
आदिवासी अब केवल प्रशासन के ‘tribal problem’ नहीं रहे।
वे इतिहास के सक्रिय राजनीतिक कर्ता बने।
लेकिन आधुनिक इतिहासलेखन ने सिंह को भी चुनौती दी
संगीता दासगुप्ता ने विशेष रूप से उस सरल कथा पर प्रश्न उठाया जिसमें माना गया कि 1921–22 तक ताना भगतों का कांग्रेस विचारधारा में लगभग पूर्ण विलय हो गया था।
उनके 2016 के अध्ययन में वे के. एस. सिंह की उस व्याख्या का उल्लेख करती हैं जिसमें तानाओं को 1921–22 तक कांग्रेस विचारधारा के प्रति ‘whole-hearted’ प्रतिबद्ध और छोटानागपुर में कांग्रेस का मजबूत आधार माना गया।
क्या वास्तव में विलय इतना पूर्ण था?
या ताना भगत गांधी और कांग्रेस को अपनी पुरानी स्थानीय राजनीतिक भाषा में पुनर्व्याख्यायित कर रहे थे?
यहीं इतिहासलेखन का बड़ा मोड़ आता है।
क्या ताना भगत कांग्रेस में ‘विलीन’ हो गए थे?
और उनकी पूर्व राजनीति राष्ट्रीय आंदोलन में समाहित हो गई।
लेकिन दासगुप्ता का तर्क अधिक जटिल है।
ताना भगतों ने गांधी को स्वीकार किया—
लेकिन अपनी पुरानी भूमि और कर-संबंधी चेतना नहीं छोड़ी।
फिर भी स्थानीय मांगें अलग रख सकते थे।
वे गांधी को अपने धार्मिक संसार में ‘महात्मा’ से अधिक स्थानीय नैतिक अर्थ दे सकते थे।
‘गांधी का प्रभाव’ बनाम ‘ताना की कल्पना में गांधी’
राष्ट्रीय नेता ‘स्वराज’ कह सकता है।
यही स्थानीय राजनीति की सक्रियता है।
शाहिद अमीन से मिलने वाली बड़ी इतिहासलेखकीय सीख
ताना इतिहास के संदर्भ में दासगुप्ता ने शाहिद अमीन के प्रसिद्ध अध्ययन “Gandhi as Mahatma” का भी उपयोग किया है। उनके संदर्भ-सूची में यह कार्य प्रमुख है।
अमीन ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में दिखाया कि ग्रामीण समाज ने गांधी की अपनी छवि बनाई—
ताना भगतों में भी यही प्रश्न लागू होता है—
ऐतिहासिक गांधी और लोक-स्मृति के गांधी में कितना अंतर था?
ताना भगतों का गांधी ‘कांग्रेस अध्यक्ष’ नहीं था
अर्थात गांधी की लोकप्रिय छवि उस पूर्ववर्ती ताना धार्मिक संस्कृति में सहज प्रवेश कर सकती थी जिसमें जतरा और दूसरे गुरुओं की करिश्माई वैधता पहले से परिचित थी।
इसलिए गांधी का ‘महात्मा’ होना महज उपाधि नहीं था।
वह ताना धार्मिक कल्पना के लिए समझने योग्य श्रेणी थी।
‘गांधी राज’ इतिहास था या आशा?
ताना स्मृति में ‘गांधी राज’ को देखते समय सावधानी आवश्यक है।
यह कोई आधिकारिक कांग्रेस संवैधानिक संज्ञा नहीं थी।
इसलिए ‘गांधी राज’ इतिहास की घटना नहीं—
लोकगीत इतिहास का स्रोत कैसे बनते हैं?
ऐसे समुदाय में जहां व्यापक मुद्रित अभिलेख सीमित हों, गीत—
लेकिन लोकगीत का उपयोग करते समय इतिहासकार को एक बुनियादी प्रश्न पूछना होता है—
यदि 1950 का गीत 1914 की घटना सुनाता है तो?
वह 1914 की सीधी रिकॉर्डिंग नहीं है।
इसमें बाद के अनुभव प्रवेश कर चुके होंगे—
इसलिए मौखिक इतिहास को ‘गलत’ नहीं कहना चाहिए।
लेकिन उसे स्तरीकृत स्मृति की तरह पढ़ना चाहिए।
समुदाय बाद में अपने अतीत को किस अर्थ में समझने लगा।
मौखिक स्मृति की ताकत
औपनिवेशिक अधिकारी ने कभी यह नहीं लिखा होगा कि किसान गिरफ्तारी के समय भीतर से क्या महसूस कर रहा था।
परिवार ने जमीन खोने को कैसे याद रखा?
जतरा के किस उपदेश को पीढ़ियां सबसे अधिक महत्व देती हैं?
इसलिए आदिवासी इतिहास में मौखिक परंपरा विलासिता नहीं—
लेकिन स्मृति चयन करती है
समाज हर बात समान रूप से याद नहीं रखता।
ताना भगतों के मामले में आज सबसे मजबूत पहचान है—
इसलिए प्रारंभिक आंदोलन के ऐसे पहलू जो इस नैतिक पहचान से मेल नहीं खाते—
सामुदायिक और राष्ट्रीय स्मृति में कमजोर पड़ सकते हैं।
‘पूर्ण अहिंसा’ की कथा कैसे बनी?
ताना भगतों की मुख्य दीर्घकालीन पहचान वास्तव में अहिंसक रही।
1914–19 में ताना प्रभाव से जुड़ी कुछ हिंसक घटनाएं दर्ज हैं।
1942 में बिशुनपुर पुलिस स्टेशन की आगजनी जैसी घटना भी सरल ‘सदैव अहिंसक’ कथा को चुनौती देती है।
फिर भी स्वतंत्र भारत में ताना भगतों की पहचान लगभग आदर्श गांधीवादी समुदाय के रूप में बनी।
उनकी दीर्घकालीन मुख्य धारा अहिंसक थी,
गांधीवादी राष्ट्रवाद ने राष्ट्रीय प्रतिष्ठा दी,
और स्वतंत्र भारत ने उनकी स्मृति को उसी रूप में अधिक सहजता से स्वीकार किया।
राष्ट्र को किस तरह का आदिवासी नायक सुविधाजनक लगता है?
यह आलोचनात्मक प्रश्न पूछा जा सकता है।
राज्य के लिए असुविधाजनक स्मृति हो सकता है।
राष्ट्रीय स्मृति में अधिक सहजता से समाहित हो सकता है।
इसलिए ताना भगतों की राष्ट्रीय छवि में उनके गांधीवादी पक्ष को विशेष महत्व मिला।
लेकिन इससे उनके भूमि-संघर्ष, आंतरिक उरांव असहमति और शुरुआती धार्मिक जटिलता को दबाना नहीं चाहिए।
स्मृति हमेशा सत्ता द्वारा ही नहीं बनती
ताना भगतों ने स्वयं भी गांधीवादी पहचान को सक्रिय रूप से अपनाया।
यह राज्य द्वारा ऊपर से थोपी गई छवि नहीं थी।
इसलिए गांधीवादी ताना स्मृति वास्तविक ऐतिहासिक अनुभव पर आधारित है।
जतरा भगत की छवि कैसे बदली?
यह ताना स्मृति का सबसे रोचक उदाहरण है।
एक युवा स्थानीय उरांव धार्मिक सुधारक थे।
बेगार और जमींदारी संबंधों पर प्रश्न।
झारखंड के महान स्वतंत्रता सेनानी तथा गांधीवादी आदिवासी नायक।
यह परिवर्तन स्वयं इतिहास का विषय है।
क्या जतरा की कोई प्रमाणित तस्वीर उपलब्ध है?
यहीं स्मृति और दृश्य इतिहास का अत्यंत रोचक प्रसंग मिलता है।
संगीता दासगुप्ता के 2016 के अध्ययन में बताया गया है कि 1980 के दशक के अंत में सामाजिक कार्यकर्ता अशोक भगत ने जतरा भगत की स्मृति को सार्वजनिक रूप देने का प्रयास किया।
अभिलेख में जतरा की पर्याप्त सूचना नहीं थी।
और कोई प्रमाणित तस्वीर उपलब्ध नहीं थी।
फिर जो मूर्ति बनाई गई, उसका चेहरा जतरा के पोते देशवा ताना भगत के आधार पर गढ़ा गया—एक जीवित वंशगत कड़ी के रूप में।
यह स्मृति-निर्माण का अद्भुत उदाहरण है।
यानी आज जिस चेहरे को जतरा समझते हैं—वह?
जतरा भगत की आधुनिक प्रतिमा प्रमाणित फोटोग्राफ का त्रि-आयामी रूप नहीं है।
दासगुप्ता के अनुसार प्रतिमा का चेहरा उनके पोते को आधार बनाकर बनाया गया था, क्योंकि जतरा की फोटो उपलब्ध नहीं थी।
इस तथ्य का अर्थ यह नहीं कि प्रतिमा ‘गलत’ है।
प्रतिमा इतिहास नहीं—लेकिन इतिहास का हिस्सा है
मूर्ति हमें यह नहीं बताती कि जतरा वास्तव में कैसे दिखते थे।
लेकिन वह एक दूसरी महत्वपूर्ण बात बताती है—
1980 के दशक तक समुदाय और सामाजिक कार्यकर्ता उन्हें किस तरह सार्वजनिक स्मृति में पुनर्स्थापित करना चाहते थे।
यानी स्मारक अतीत का निष्पक्ष दर्पण नहीं।
वह वर्तमान द्वारा अतीत पर लिखा गया वक्तव्य है।
अक्टूबर में जतरा और अगले दिन गांधी
दासगुप्ता ने एक अत्यंत अर्थपूर्ण आधुनिक स्मृति-परंपरा का उल्लेख किया है।
जतरा की प्रतिमा के पास ताना भगत अक्टूबर में एकत्र होकर जतरा की स्मृति/पूजा करते हैं और उसके अगले दिन गांधी जन्मदिवस मनाते हैं।
यह दो दिनों का क्रम ताना इतिहास का दृश्य सार है—
जतरा और गांधी अब प्रतिस्पर्धी नहीं।
एक ही स्मृति-संसार के दो नैतिक केंद्र हैं।
यही स्थानीय और राष्ट्रीय इतिहास का संगम है
ताना भगतों की सामुदायिक स्मृति ने राष्ट्रीय इतिहास को इस तरह आत्मसात किया कि—
हमारी राष्ट्रीयता हमारी स्थानीय ऐतिहासिक स्मृति को नष्ट नहीं करती।
और हमारी स्थानीय पहचान भारतीय राष्ट्रवाद के विरुद्ध नहीं।
यह आधुनिक भारतीय बहुस्तरीय पहचान का शक्तिशाली उदाहरण है।
तिरंगा स्मृति का सबसे शक्तिशाली दृश्य प्रतीक कैसे बना?
राष्ट्रीय ध्वज ताना भगतों के साथ 1920 के दशक से जुड़ता है।
इन दशकों के बाद तिरंगा उनके लिए केवल संविधान द्वारा स्वीकृत राष्ट्रीय ध्वज नहीं रहा।
वह उनके परिवारों की आंदोलनकारी स्मृति का प्रतीक बना।
इसीलिए आज ताना भगत सार्वजनिक आयोजनों में तिरंगे के साथ विशिष्ट रूप से पहचाने जाते हैं।
ध्वज के अर्थ की तीन परतें
ताना भगतों के लिए राष्ट्रीय ध्वज को तीन स्तरों पर पढ़ा जा सकता है।
दूसरा — ऐतिहासिक
हमारे पूर्वज इस स्वतंत्रता संघर्ष में शामिल थे।
तीसरा — नैतिक
राष्ट्र को गांधी के न्याय और अहिंसा के आदर्श पर चलना चाहिए।
सरकार से विरोध करते हुए तिरंगा क्यों?
ताना भगत यदि किसी सरकारी भूमि नीति का विरोध करते हुए तिरंगा उठाते हैं तो इसमें विरोधाभास नहीं।
हम राज्य से वही न्याय मांग रहे हैं जिसके लिए यह ध्वज खड़ा है।
यह ताना राजनीतिक संस्कृति की अत्यंत महत्वपूर्ण विशेषता है।
खादी भी स्मृति है
आज ताना भगतों की सफेद खादी को केवल पहनावा मानना पर्याप्त नहीं।
और स्वतंत्रता के बाद की सामुदायिक पहचान।
यानी कपड़ा इतिहास का संग्रहालय बन गया।
और एक सदी का आंदोलन उसके शरीर पर दिखाई देता है।
शरीर इतिहास का दस्तावेज बन सकता है
सब मिलकर एक दृश्य इतिहास बनाते हैं।
जो व्यक्ति कोई किताब न पढ़े, वह भी पूछ सकता है—
और उत्तर में आंदोलन की कहानी खुलती है।
इस अर्थ में समुदाय स्वयं चलता-फिरता स्मारक है।
1953 की याचिका : स्मृति को लिखित राजनीति में बदलना
दासगुप्ता के 2016 के अध्ययन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत है—
11 नवंबर 1953 का अभिनंदन-पत्र, जो छोटानागपुर आदिवासी ताना भगतों ने राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के लिए तैयार किया था। SAGE के लेख की संदर्भ-सूची में यह दस्तावेज स्पष्ट रूप से दर्ज है।
यह दस्तावेज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें समुदाय अपनी कहानी स्वयं राज्य के सामने रख रहा था।
अब इतिहास केवल अंग्रेज अधिकारी नहीं लिख रहा।
1953 में लगभग पचास ताना दिल्ली क्यों गए?
दासगुप्ता के अध्ययन के अनुसार लगभग पचास ताना भगत, राम भगत और ताना सरदार बिस्मित्र के नेतृत्व में 1953 में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से मिलने दिल्ली गए। उनका विश्वास था कि स्वतंत्र राष्ट्र ताना भगतों की सेवा और बलिदान का ऋणी है।
यह यात्रा स्मृति की राजनीति का बड़ा क्षण थी।
इसलिए हमारा भूमि और अधिकार प्रश्न राष्ट्रीय जिम्मेदारी है।
‘हमने हजारों प्रार्थना-पत्र भेजे’
1953 के अभिनंदन-पत्र में समुदाय की पीड़ा स्पष्ट थी—स्वतंत्रता के वर्षों बाद भी उनकी मांगें सुनी नहीं जा रही थीं; वे बार-बार निवेदन करने की बात कहते हैं। दासगुप्ता इस पत्र को उत्तर-औपनिवेशिक ताना स्मृति के महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में पढ़ती हैं।
याचिका स्वयं इतिहासलेखन क्यों है?
क्योंकि उसमें समुदाय अपने अतीत का चयन करता है।
यानी याचिका केवल प्रशासनिक मांग नहीं।
इसलिए ताना पर्चे और याचिकाएं आधुनिक इतिहासकारों के लिए विशेष महत्व रखते हैं।
दासगुप्ता का बड़ा हस्तक्षेप : अभिलेख बनाम ताना दस्तावेज
2016 का Mapping Histories लेख इसी पद्धति पर आधारित है—
औपनिवेशिक अभिलेखों को ताना भगतों की अपनी याचिकाओं और पर्चों के सामने रखना।
उनका उद्देश्य यह दिखाना है कि एक ही आंदोलन के अलग-अलग इतिहास बनते हैं—
यहीं से इतिहासकार निष्पक्ष निर्णायक की तरह नहीं बल्कि स्रोतों के बीच संवाद कराने वाले की तरह काम करता है।
क्या समुदाय की अपनी कथा अधिक ‘सच्ची’ है?
सत्ता के अभिलेख में पक्षपात हो सकता है।
और बाद के मूल्यों को पुराने समय पर आरोपित कर सकती है।
इसलिए ‘औपनिवेशिक स्रोत गलत, मौखिक स्मृति सही’ जैसी सरल पद्धति भी गलत है।
इतिहासकार की जिम्मेदारी क्या है?
उसे यह नहीं तय करना कि किसकी कथा ‘सुंदर’ है।
और अन्य स्वतंत्र स्रोत क्या कहते हैं?
ताना भगतों की संख्या : स्मृति और वास्तविकता
दासगुप्ता ने 2016 में समुदाय को लगभग दस हजार लोगों का, घटता हुआ लेकिन स्पष्ट रूप से दिखाई देने वाला समुदाय बताया था; साथ ही लिखा कि वह अंदर से विभाजित है और अलग-अलग समूह अपनी शिकायतों तथा आंदोलन की रणनीतियां अलग ढंग से व्यक्त करते हैं।
यह तथ्य एक और लोकप्रिय मिथक तोड़ता है—
ताना भगत आज एक पूरी तरह एकजुट, एक नेता के अधीन स्थिर समुदाय नहीं हैं।
आंतरिक विभाजन स्मृति को भी प्रभावित करते हैं
तो सभी जतरा की विरासत को एक ही तरह नहीं पढ़ेंगे।
भूमि संबंधी मांगें अलग हो सकती हैं।
यही कारण है कि ‘ताना भगत समुदाय की राय है’ जैसा वाक्य सावधानी से इस्तेमाल करना चाहिए।
‘एक आंदोलन, एक कथा’ क्यों गलत है?
जैसे अलग नेतृत्व और अलग धार्मिक संदेश दिखाई देते हैं।
इतने लंबे इतिहास को एक समान विचारधारा में बांधना संभव नहीं।
ताना आंदोलन की एकता उसकी पूर्ण वैचारिक समानता में नहीं—
आंदोलन को ‘आदिवासी विद्रोह’ कह देना पर्याप्त है?
‘आदिवासी विद्रोह’ बहुत व्यापक श्रेणी है।
वह ताना आंदोलन की आंतरिक जटिलता छिपा सकती है।
तीसरी श्रेणी — आधुनिक अकादमिक इतिहास
और संबंधित आदिवासी–किसान इतिहासलेखन।
उपलब्धियां, सीमाएं और तुलनात्मक मूल्यांकन
बिरसा उलगुलान, संथाल हूल, फराजी–पागलपंथी, चंपारण, खेड़ा और गांधीवादी किसान आंदोलनों के बीच ताना भगतों का विशिष्ट स्थान
ताना भगत आंदोलन को भारतीय किसान–आदिवासी प्रतिरोध के इतिहास में कहां रखा जाए?
क्या वह बिरसा उलगुलान की अहिंसक उत्तरकथा था?
क्या वह संथाल हूल जैसी आदिवासी स्वराज की आकांक्षा का दूसरा रूप था?
क्या उसकी धार्मिक–कृषक राजनीति फराजी और पागलपंथी आंदोलनों से अधिक मिलती थी?
या 1914 में शुरू हुआ यह आंदोलन वास्तव में चंपारण और खेड़ा से पहले उभर चुकी ऐसी स्थानीय असहयोग परंपरा थी, जो बाद में गांधीवाद में स्वाभाविक रूप से समा गई?
इनमें से प्रत्येक तुलना कुछ बताती है—लेकिन कोई एक तुलना ताना भगत आंदोलन को पूरी तरह नहीं समझाती।
आधुनिक इतिहासलेखन की यही सबसे महत्वपूर्ण सीख है। के. एस. सिंह ने ताना भगतों को आदिवासी किसान समाज, मिलेनरियनवाद, सत्ता-विरोध और राष्ट्रवाद की परस्पर जुड़ी प्रक्रिया में रखा; संगीता दासगुप्ता ने आगे दिखाया कि इसे उरांव समाज के भीतर पहचान और सत्ता-संबंधों के पुनर्गठन के रूप में भी पढ़ना होगा।
इसलिए ताना भगतों की विशिष्टता किसी एक उपलब्धि में नहीं थी।
धार्मिक सुधार + किसान प्रतिरोध + अहिंसक आर्थिक असहयोग + आदिवासी स्वायत्तता + गांधीवादी राष्ट्रवाद + स्वतंत्रता के बाद विशेष भूमि-पुनर्स्थापन कानून।
भारतीय इतिहास में बहुत कम आंदोलनों ने इतनी लंबी यात्रा पूरी की।
तुलनात्मक मूल्यांकन की पहली कसौटी : आंदोलन किस समस्या से जन्मा?
संथाल हूल, बिरसा उलगुलान, फराजी, पागलपंथी और ताना भगत—सभी आंदोलनों के पीछे भूमि और ग्रामीण सत्ता का संकट था।
संथाल हूल
दामिन-इ-कोह में औपनिवेशिक कृषि विस्तार के बाद महाजन, जमींदार, साहूकार और राजस्व राज्य के बढ़ते दबाव ने संथाल समाज में विस्फोट पैदा किया। 1855 में सिद्धू–कान्हू के नेतृत्व में संघर्ष खुले सशस्त्र विद्रोह में बदल गया। विद्रोहियों ने बाहरी शोषक और कंपनी-राज दोनों को चुनौती दी और अपने शासन की कल्पना भी विकसित की।
बिरसा उलगुलान
भूमि-अधिकार, खूंटकट्टी व्यवस्था पर अतिक्रमण, दिकू प्रभुत्व, बेगार और औपनिवेशिक प्रशासन के विरुद्ध संघर्ष। उलगुलान के बाद औपनिवेशिक सरकार को भूमि-संबंधी प्रश्नों पर पुनर्विचार करना पड़ा और 1908 का छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम इसी लंबे कृषि-संघर्ष की पृष्ठभूमि में आया।
ताना भगत
इसी छोटानागपुरी संकट का उत्तर, लेकिन अलग सामाजिक आधार और अलग संघर्ष-पद्धति के साथ।
यहीं वह बिरसा और संथाल हूल से अलग हो जाता है।
बिरसा और जतरा : समान भूगोल, अलग सामाजिक आधार
बिरसा और जतरा लगभग उसी व्यापक छोटानागपुरी भूगोल की उपज थे।
दोनों आंदोलनों के बीच समयांतर भी बहुत बड़ा नहीं—
फिर भी दोनों को सीधे एक-दूसरे की निरंतरता कहना इतिहास को सरल बना देगा।
बिरसा की मुख्य सामाजिक भूमि मुंडा खूंटकट्टी व्यवस्था थी।
जतरा का आंदोलन मुख्यतः उरांव रैयत समाज से निकला।
दोनों भूमि और सत्ता की बात करते हैं।
दोनों में करिश्माई धार्मिक नेतृत्व
उनके अनुयायी उनमें धार्मिक–दैवी शक्ति देखते थे।
जतरा भी चुनाव द्वारा चुने गए किसान सभा अध्यक्ष नहीं थे।
उनकी वैधता धार्मिक अनुभव और धर्मेश के संदेश से आई।
दोनों आंदोलनों में इसलिए राजनीति और धर्म को अलग करना संभव नहीं।
यह समानता हमें बताती है कि छोटानागपुर के आदिवासी समाज में औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध आधुनिक राजनीतिक चेतना हमेशा आधुनिक पार्टी-भाषा में ही प्रकट नहीं हुई।
लेकिन बिरसा का ‘उलगुलान’ और ताना का ‘असहयोग’ अलग रास्ते
बिरसा आंदोलन का अंतिम चरण सशस्त्र टकराव तक पहुंचा।
ताना भगत आंदोलन की केंद्रीय दिशा बनी—
इसलिए दोनों ने लगभग समान सत्ता-संकट के सामने अलग उत्तर दिए—
ताना
यही ताना भगतों की पहली बड़ी ऐतिहासिक विशिष्टता है।
क्या ताना भगत बिरसा की ‘पराजय’ से सीखे?
बिरसा का सशस्त्र विद्रोह दमन से कुचल दिया गया, इसलिए उरांवों ने अहिंसा चुनी।
लेकिन इसके लिए स्पष्ट प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं।
ताना अहिंसा की सबसे मजबूत जड़ उनकी अपनी धार्मिक शुद्धि और जीव-हत्या-विरोध में दिखाई देती है।
बिरसा की स्मृति और औपनिवेशिक सैन्य शक्ति का अनुभव क्षेत्र में मौजूद था; लेकिन ताना अहिंसा को केवल रणनीतिक प्रतिक्रिया मानना पर्याप्त नहीं।
बिरसा आंदोलन की कानूनी विरासत बनाम ताना की कानूनी विरासत
यह तुलना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
बिरसा उलगुलान और उससे पहले के छोटानागपुर भूमि-संघर्षों की पृष्ठभूमि में भूमि-प्रशासन में सुधार का दबाव बढ़ा और अंततः 1908 का CNT Act बना, जिसने खूंटकट्टी सहित कुछ परंपरागत भूमि-अधिकारों को अधिक संरक्षण देने की दिशा अपनाई।
ताना भगतों के मामले में विरासत और भी विशिष्ट हुई—
Ranchi District Tana Bhagat Raiyats’ Agricultural Lands Restoration Act, 1947
बनाया गया। India Code आज भी इसे स्वतंत्र राज्य के भूमि कानून के रूप में सूचीबद्ध करता है।
बिरसा की विरासत
भूमि-प्रणाली में व्यापक संरक्षणात्मक सुधार।
ताना की विरासत
आंदोलन के कारण खोई विशिष्ट भूमि की पुनर्वापसी का विशेष कानून।
संथाल हूल और ताना भगत : ‘अपना राज’ की समानता
1855 के संथाल हूल में सिद्धू–कान्हू और उनके अनुयायी केवल अत्याचार कम कराने की मांग नहीं कर रहे थे।
विद्रोह ने बाहरी जमींदार–महाजन–कंपनी सत्ता के स्थान पर संथाल नियंत्रण और वैकल्पिक शासन की कल्पना प्रस्तुत की। उपलब्ध विवरण सिद्धू–कान्हू द्वारा बड़ी लामबंदी, राजस्व-सत्ता को चुनौती और अपने प्रशासनिक दावे की ओर संकेत करते हैं।
दोनों आंदोलनों में इसलिए संघर्ष केवल आर्थिक शिकायत नहीं।
लेकिन संथाल हूल का उत्तर हथियार था
संथाल हूल बड़े पैमाने पर सशस्त्र विद्रोह बना।
राजस्व और औपनिवेशिक संस्थाएं प्रत्यक्ष निशाना बनीं।
विद्रोह को कुचलने के लिए सैन्य दमन हुआ।
ताना आंदोलन ने मुख्यतः उलटा हथियार चुना—
ताना
दोनों औपनिवेशिक राज्य को चुनौती देते हैं—
संथाल हूल अधिक व्यापक और विस्फोटक था
ताना भगत आंदोलन सामाजिक रूप से सीमित समुदाय रहा।
संथाल हूल विशाल क्षेत्रीय जनविद्रोह था और हजारों लोगों को युद्ध-सदृश परिस्थितियों में ले गया।
संथाल हूल अधिक विशाल और तत्काल विस्फोटक।
ताना भगत अधिक छोटा लेकिन दीर्घजीवी।
यही तुलनात्मक अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।
दूसरा समुदाय के रूप में एक सदी जीवित रहा।
कौन अधिक ‘सफल’ था? प्रश्न ही गलत हो सकता है
आदिवासी प्रतिरोध को राष्ट्रीय स्मृति में विशाल प्रतीक मिला?
इसलिए ऐतिहासिक सफलता एक संख्या नहीं।
फराजी और ताना भगत : शायद सबसे निकट धार्मिक–कृषक तुलना
उन्नीसवीं सदी के पूर्वी बंगाल का फराजी आंदोलन और ताना भगत आंदोलन कई स्तरों पर आश्चर्यजनक समानता रखते हैं।
फराजी आंदोलन की शुरुआत हाजी शरीअतुल्लाह के धार्मिक सुधार से हुई।
बाद में दूदू मियां के नेतृत्व में उसने गरीब किसानों, जमींदारी अत्याचार और नीलहों के खिलाफ स्पष्ट कृषि चरित्र ग्रहण किया। आधुनिक अकादमिक अध्ययन इसी क्रम—धार्मिक सुधार से किसान प्रतिरोध—को फराजी आंदोलन की केंद्रीय विशेषता मानते हैं।
दोनों में धर्म आर्थिक संघर्ष की भाषा बना
फराजियों के लिए धर्म केवल मस्जिद या अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहा।
जमींदारी और अवैध देनदारियों की वैधता को धार्मिक नैतिकता से चुनौती मिली।
दोनों आंदोलनों में इसलिए यह सूत्र मिलता है—
धर्म → समुदाय → आर्थिक अनुशासन → किसान प्रतिरोध।
यह भारतीय किसान आंदोलनों की एक महत्वपूर्ण पूर्व-आधुनिक/औपनिवेशिक राजनीतिक परंपरा थी।
फराजी संगठन ताना से अधिक औपचारिक था
दूदू मियां के दौर में फराजी आंदोलन ने गांव-स्तरीय नेतृत्व और अधिक संगठित नेटवर्क विकसित किए। उपलब्ध अध्ययन उसे व्यापक पूर्वी बंगाल किसान आधार और स्थानीय संगठन से जोड़ते हैं।
लेकिन आधुनिक या अर्ध-प्रशासनिक समानांतर संगठन अपेक्षाकृत कम औपचारिक था।
ताना
अधिक सामुदायिक–धार्मिक विकेंद्रीकरण।
दूदू मियां और जतरा की समानता
दोनों की वैधता धार्मिक समाज के भीतर पैदा हुई।
दोनों आंदोलनों ने गरीब किसान को यह विश्वास दिया कि—
जमींदार की हर मांग नैतिक रूप से वैध नहीं।
लेकिन दूदू मियां का राजनीतिक नेतृत्व अधिक दीर्घ और संगठित रहा।
जतरा के बाद आंदोलन लगातार नए गुरुओं में विभाजित हुआ।
यही कारण है कि ताना आंदोलन नेता-निर्भरता से जल्दी समुदाय-निर्भरता की ओर चला गया।
हिंसा के प्रश्न पर फराजी और ताना अलग
फराजी आंदोलन के विभिन्न चरणों में जमींदारों और नीलहों से हिंसक टकराव भी हुए। उपलब्ध अकादमिक साहित्य उसके अधिक उग्र कृषक रूप को स्वीकार करता है।
ताना भगतों की दीर्घकालीन केंद्रीय पहचान अहिंसक बनी।
यह फिर ताना की विशिष्टता को उभारता है।
पागलपंथी और ताना : धर्म, किसान और वैकल्पिक राज
पागलपंथी आंदोलन भी सामाजिक–धार्मिक समुदाय से किसान प्रतिरोध की ओर बढ़ा।
करम शाह की धार्मिक परंपरा के बाद टीपू शाह के नेतृत्व में जमींदारी कर और औपनिवेशिक सत्ता का विरोध अधिक स्पष्ट हुआ।
उपलब्ध विवरणों में भूमि पर मनुष्य के समान नैतिक अधिकार तथा अत्याचारी कर और शासन की वैधता पर प्रश्न दिखाई देते हैं।
यहीं ताना भगतों से एक असाधारण समानता उभरती है—
धरती पर अंतिम अधिकार किसी जमींदार का कैसे हो सकता है?
पागलपंथी–ताना समानता : ‘ईश्वर की धरती’
पागलपंथी विचार में भूमि को ईश्वर-प्रदत्त साझा अधिकार की भाषा में समझा गया।
ताना भगतों के सिबू चरण में भी लगभग ऐसी ही नैतिक कल्पना मिलती है—
उस पर बाहरी जमींदार का पूर्ण नैतिक स्वामित्व कैसे?
यह समानता यह साबित नहीं करती कि एक आंदोलन ने दूसरे से विचार लिया।
बल्कि यह बताती है कि अलग-अलग ग्रामीण धार्मिक आंदोलनों ने भूमि-संपत्ति की औपनिवेशिक संरचना को दैवी न्याय की भाषा से चुनौती दी।
लेकिन पागलपंथी आंदोलन सशस्त्र हुआ
टीपू शाह के दौर में पागलपंथी प्रतिरोध अधिक प्रत्यक्ष और सशस्त्र संघर्ष की ओर गया।
इसलिए फराजी–पागलपंथी–ताना को एक ही धार्मिक किसान परंपरा में रखा जा सकता है—
लेकिन ताना उसमें अहिंसक धारा का विशिष्ट उदाहरण है।
चंपारण और ताना : कौन पहले?
इसलिए ताना असहयोग को चंपारण से निकला गांधीवादी प्रभाव नहीं माना जा सकता।
यही कारण है कि उन्हें भारतीय गांधीवादी किसान इतिहास के साथ रखते समय यह कहना जरूरी है—
चंपारण की समस्या अधिक विशिष्ट थी
नील की तिनकठिया व्यवस्था और यूरोपीय बागान मालिकों का कृषि नियंत्रण।
और अंततः संस्थागत सुधार की ओर बढ़े।
ताना भगत आंदोलन की शिकायत अधिक व्यापक थी—
इसलिए चंपारण एक विशिष्ट कृषि अन्याय के सुधार का आंदोलन था।
ताना एक सामाजिक संसार के पुनर्गठन का।
नेतृत्व में निर्णायक अंतर
चंपारण में गांधी बाहर से आए नेता थे।
उनके साथ शिक्षित वकील और स्थानीय मध्यस्थ थे।
चंपारण
स्थानीय शिकायत + बाहरी राष्ट्रीय नेतृत्व।
ताना
स्थानीय शिकायत + स्थानीय धार्मिक नेतृत्व → बाद में राष्ट्रीय नेतृत्व से संगम।
ताना इसलिए स्थानीय राजनीतिक स्वायत्तता का अधिक स्पष्ट उदाहरण है।
चंपारण की सफलता अधिक त्वरित थी
चंपारण आंदोलन ने अपेक्षाकृत कम अवधि में तिनकठिया संबंधी सुधार और कानून की दिशा पैदा की।
ताना भगतों की मांगें कहीं अधिक व्यापक और दीर्घ थीं।
कर-अस्वीकार की कीमत जमीन-नीलामी तक गई।
इसलिए ताना आंदोलन ने अधिक लंबा संघर्ष किया—
लेकिन तत्काल प्रशासनिक सफलता कम थी।
खेड़ा और ताना : कर-अस्वीकार की सबसे महत्वपूर्ण तुलना
1918 का खेड़ा सत्याग्रह कर-अस्वीकार के संदर्भ में ताना भगतों का सबसे स्वाभाविक गांधीवादी तुलनात्मक आंदोलन है।
फसल की खराब स्थिति में भूमि-राजस्व वसूली उचित है या नहीं?
गांधी और स्थानीय नेतृत्व ने किसानों से सामूहिक रूप से भुगतान रोकने को कहा जब तक राहत न मिले।
ताना भगतों ने इससे पहले ही लगान और कुछ देनदारियों पर व्यापक असहयोग शुरू कर दिया था।
खेड़ा का तर्क कानून के भीतर था; ताना का तर्क वैधता पर
वर्तमान परिस्थिति में राजस्व स्थगित करने का कानूनी/प्रशासनिक आधार है।
ताना भगत का प्रश्न कहीं अधिक मौलिक हो सकता था—
जमींदार को हमारी भूमि पर यह अधिकार मिला ही कैसे?
औपनिवेशिक शासन की देनदारी नैतिक रूप से क्यों मानें?
ताना
वसूली के अधिकार की नैतिक जड़ पर प्रश्न।
खेड़ा अधिक नियंत्रित, ताना अधिक विकेंद्रीकृत
खेड़ा सत्याग्रह में गांधी, वल्लभभाई पटेल और स्थानीय संगठन का अनुशासन महत्वपूर्ण था।
लेकिन उसका स्रोत धार्मिक समुदाय था।
केंद्रीय नेतृत्व बार-बार गिरफ्तार हुआ।
बारदोली को भी तुलना में रखना आवश्यक है
यद्यपि शीर्षक में बारदोली नहीं है, ताना की कर-अस्वीकार राजनीति की पूर्ण तुलना उसके बिना अधूरी रहेगी।
वह बारदोली जैसा प्रशासनिक आंदोलन तंत्र नहीं बना पाया।
लेकिन बारदोली के समाप्त होने के बाद ‘बारदोली सत्याग्रही’ अलग धार्मिक समुदाय बनकर नहीं रहे।
यहीं ताना की दीर्घजीविता असाधारण है।
गांधीवादी किसान आंदोलनों में ताना का स्थान
यदि गांधीवादी किसान राजनीति की एक श्रृंखला बनाएं—
तो ताना भगत उसमें थोड़ा असहज बैठते हैं।
क्योंकि उनका जन्म गांधी से पहले हुआ।
इसलिए उनका सही स्थान श्रृंखला के भीतर नहीं—
उसके समानांतर शुरू होकर बाद में उससे मिलने वाली धारा है।
कौन किससे प्रभावित हुआ?
इसका कोई प्रमाण नहीं कि गांधी ने अपना असहयोग सिद्धांत ताना भगतों से लिया।
इसलिए इस दिशा में अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए।
उतना ही गलत होगा यह कहना कि ताना भगतों ने असहयोग गांधी से सीखा।
दो अलग ऐतिहासिक प्रक्रियाएं विकसित हुईं।
प्रत्यक्ष बौद्धिक उधार का प्रमाण नहीं।
धर्म की कसौटी : कौन-सा आंदोलन सबसे निकट?
ताना की निकटतम तुलना फराजी और पागलपंथी से है।
ताना की निकटतम तुलना गांधीवादी आंदोलनों से।
यानी ताना भगत आंदोलन कई परंपराओं के संगम-बिंदु पर खड़ा है।
यही उसे किसी एक श्रेणी में रखना कठिन बनाता है।
संथाल हूल
सिद्धू–कान्हू और उनके भाइयों का केंद्रीय विद्रोही नेतृत्व।
बिरसा उलगुलान
अत्यंत शक्तिशाली एकल करिश्माई नेता।
फराजी
शरीअतुल्लाह से दूदू मियां—वंशगत/धार्मिक उत्तराधिकार और संगठित नेतृत्व।
ताना
जतरा के बाद लिथो, मंगर, सिबू, माया और अनेक स्थानीय नेतृत्व—तेजी से विकेंद्रीकृत।
चंपारण–खेड़ा
गांधी और प्रशिक्षित राजनीतिक नेतृत्व।
विकेंद्रीकरण : ताकत और कमजोरी दोनों
राज्य एक नेता गिरफ्तार कर आंदोलन खत्म नहीं कर सकता।
एक समान रणनीति नियंत्रित करना कठिन।
मिलेनरियन भविष्यवाणियां बदल सकती हैं।
स्थानीय समूह अलग व्यवहार कर सकते हैं।
इसलिए ताना आंदोलन की लंबी उम्र और वैचारिक असमानता—
संगठन की कसौटी
संथाल हूल और बिरसा आंदोलन के पास विद्रोही सैन्य संगठन के तत्व थे।
फराजियों ने अधिक स्थायी ग्रामीण नेटवर्क विकसित किया।
गांधीवादी आंदोलनों में कांग्रेस और स्वयंसेवक ढांचे थे।
यही कारण है कि कोई मुख्यालय बंद करके इसे खत्म नहीं किया जा सकता था।
मुख्यतः अहिंसक किसान प्रतिरोध
ताना यहां गांधीवादी समूह के निकट आता है।
उसकी अहिंसा गांधीवादी राजनीतिक सिद्धांत से पहले धार्मिक–सामाजिक अनुशासन के रूप में उभरी।
इसलिए ताना अहिंसा का स्थान खास है
चंपारण और खेड़ा में अहिंसा का संगठनात्मक सिद्धांत गांधी से आता है।
फिर गांधी उसे राष्ट्रीय राजनीतिक भाषा देते हैं।
इसलिए भारतीय अहिंसक किसान प्रतिरोध के इतिहास में ताना भगतों का स्थान स्वतंत्र स्थानीय पूर्व-इतिहास के रूप में महत्वपूर्ण है।
उन्हें गांधीवादी प्रयोग की शाखा भर कहना गलत होगा।
फिर 1918 और 1942 की हिंसक घटनाओं का क्या?
वे हमें पूर्ण आदर्शीकरण से रोकती हैं।
ताना प्रभाव से जुड़ी कुछ स्थानीय हिंसक घटनाएं और 1942 की बिशुनपुर थाना आगजनी जैसी घटनाएं बताती हैं कि ‘ताना = हर समय पूर्ण अहिंसा’ समीकरण इतिहासतः बहुत कठोर है।
ताना आंदोलन की केंद्रीय रणनीतिक–नैतिक दिशा अहिंसक थी, किन्तु उसका इतिहास अपवादविहीन नहीं।
भूमि की कसौटी
अब देखें कि किस आंदोलन ने भूमि प्रश्न को कितना केंद्र दिया।
संथाल हूल
भूमि, साहूकारी और बाहरी नियंत्रण—केंद्रीय।
बिरसा
खूंटकट्टी और भूमि-अधिकार—अत्यंत केंद्रीय।
फराजी
किराया, जमींदारी और किसान अधिकार—महत्वपूर्ण।
चंपारण
भूमि से अधिक विशेष बागान/नील संबंध।
ताना
भूमि + लगान + बेगार + बाद में जमीन-वापसी।
भूमि प्रश्न आंदोलन से शुरू होकर स्वतंत्रता के बाद भी उसी समुदाय की केंद्रीय राजनीति बना रहा।
कानूनी परिणाम की तुलना
यहां ताना अत्यंत मजबूत दिखाई देता है।
संथाल हूल के बाद प्रशासनिक पुनर्गठन हुआ।
बिरसा और अन्य छोटानागपुर भूमि-संघर्षों की व्यापक पृष्ठभूमि CNT Act तक पहुंची।
चंपारण में विशेष कृषि संबंधी सुधार हुए।
खेड़ा में राजस्व राहत संघर्ष की उपलब्धि थी।
लेकिन ताना भगतों के लिए उनके नाम वाला अलग भूमि-पुनर्स्थापन अधिनियम आज तक विधिक रिकॉर्ड में मौजूद है।
यह भारतीय किसान इतिहास में अत्यंत दुर्लभ उपलब्धि है।
लेकिन कानून के आधार पर ताना को ‘सबसे सफल’ न कहें
कुछ दावे स्वतंत्रता के बहुत बाद तक रहे।
इसलिए विशेष कानून उनकी ऐतिहासिक मान्यता की बड़ी उपलब्धि है—
कर-अस्वीकार की तुलना
ताना भगतों के लिए कर-अस्वीकार किसी एक अभियान का कार्यक्रम नहीं था।
वह लगभग स्थायी नैतिक राजनीति बन गया।
फराजियों और पागलपंथियों में भी कर/किराया-विरोध महत्वपूर्ण था। फराजी अध्ययन दिखाता है कि धार्मिक सुधार से निकला आंदोलन धीरे-धीरे जमींदारों की अवैध वसूली और किसान शोषण के विरुद्ध खड़ा हुआ।
खेड़ा और बारदोली में कर-अस्वीकार सीमित लक्ष्य और रणनीतिक समयावधि वाला था।
खेड़ा/बारदोली
मांग पूरी/समझौता → भुगतान राजनीति सामान्य।
ताना
कर का नैतिक प्रश्न समुदाय की पहचान में बना रहा।
यही कारण है कि जमीन की नीलामी की कीमत भी अधिक लंबी चली।
वैकल्पिक सत्ता की तुलना
स्थानीय समानांतर धार्मिक–किसानी व्यवस्था के तत्व।
टीपू शाह की वैकल्पिक सत्ता की कल्पना।
उरांव राज, फिर गांधी राज, फिर स्वराज।
उसकी ‘राज’ की कल्पना स्थिर नहीं रही।
स्थानीय जातीय–धार्मिक राज → राष्ट्रीय स्वराज।
यह रूपांतरण उसे अन्य कई पूर्व-गांधी आंदोलनों से अलग बनाता है।
राष्ट्रीय आंदोलन से संबंध : सबसे बड़ा विभाजन
आधुनिक कांग्रेस-राष्ट्रवाद से बहुत पहले।
फराजी–पागलपंथी भी उन्नीसवीं सदी के आंदोलनों की दुनिया से थे।
बिरसा का उलगुलान कांग्रेस की राजनीति के समानांतर लेकिन उससे स्वतंत्र था।
ताना भगतों को ऐतिहासिक रूप से अनूठा अवसर मिला—
उनका आंदोलन 1914 में स्थानीय रूप से पैदा हुआ,
और 1920 के बाद जीवित रहते हुए गांधीवादी राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ गया।
इसलिए वह पूर्व-राष्ट्रीय स्थानीय प्रतिरोध और जन-राष्ट्रीय आंदोलन के बीच जीवित पुल बन गया।
यह ‘पुल’ क्यों महत्वपूर्ण है?
क्योंकि इतिहास में प्रायः दो कथाएं अलग लिखी जाती हैं—
यानी आदिवासी आंदोलन को राष्ट्रीय राजनीति ने बाद में केवल स्मृति में नहीं अपनाया।
वास्तविक समुदाय स्वयं उस राष्ट्रीय संघर्ष में प्रवेश किया।
बिरसा इस अर्थ में अलग
बिरसा 1900 में मृत्यु को प्राप्त हुए।
उनका आंदोलन गांधी युग तक जीवित संगठित समुदाय के रूप में नहीं पहुंचा जो कांग्रेस में प्रवेश करता।
बिरसा की स्मृति बाद में राष्ट्रवादी और झारखंडी राजनीति में गई।
ताना भगतों का जीवित समुदाय स्वयं गया।
यही दोनों के बीच एक बहुत बड़ा फर्क है।
स्मृति बनाम संगठनात्मक निरंतरता
लेकिन हूल के 1855 के विद्रोही संगठन या बिरसा की 1900 की संगठनात्मक संरचना उसी रूप में दशकों तक नहीं चली।
इसलिए 1914 का संगठनात्मक–सांस्कृतिक सूत्र आज भी पहचाना जा सकता है।
यह उसकी सबसे बड़ी दीर्घकालीन उपलब्धि है।
दीर्घजीविता की कसौटी पर ताना शायद सबसे विशिष्ट
कौन-सा किसान आंदोलन स्वयं स्थायी सामाजिक पहचान बन गया?
ताना भगतों का उदाहरण अत्यंत दुर्लभ है।
लेकिन यही उनकी सीमा भी बनी
तो उसकी विस्तार क्षमता सीमित हो सकती है।
हर किसान ताना अनुशासन नहीं अपनाएगा।
विस्तृत समयरेखा, प्रमुख व्यक्तित्व और आलोचनात्मक संदर्भ-सूची
1900 के बाद छोटानागपुर से 1914 के जतरा उदय, 1920 के गांधीवादी संगम, 1942 भारत छोड़ो, 1947 भूमि-पुनर्स्थापन कानून और स्वतंत्र भारत तक एकीकृत त्वरित संदर्भ-खंड
ताना भगत आंदोलन का इतिहास एक ही तारीख, एक ही नेता या एक ही राजनीतिक चरण में बंद नहीं किया जा सकता। यह लगभग एक शताब्दी से अधिक समय में फैली ऐसी यात्रा है जिसमें छोटानागपुर की भूमि-व्यवस्था, उरांव समाज का धार्मिक पुनर्गठन, किसान असहयोग, गांधीवादी राष्ट्रवाद, स्वतंत्रता संग्राम, भूमि-पुनर्स्थापन कानून और स्वतंत्र भारत में अधिकार-राजनीति—सभी एक-दूसरे से जुड़े हैं।
इसलिए इस पूरे शोध के अंत में एक ऐसा संदर्भ-खंड आवश्यक है जिसमें तीन चीजें एक साथ उपलब्ध हों—
पहली—समेकित समयरेखा। दूसरी—प्रमुख व्यक्तित्व और उनकी वास्तविक भूमिका। तीसरी—प्राथमिक और द्वितीयक स्रोतों की आलोचनात्मक सूची।
साथ ही कुछ तिथियों और प्रसंगों के बारे में स्रोतों में मतभेद हैं। विशेषकर जतरा भगत के जीवन-वृत्तांत, ‘ताना’ शब्द की व्युत्पत्ति, प्रारंभिक गुरु-श्रृंखला और कुछ घटनाओं की तारीखों पर अत्यधिक निश्चितता से बचना चाहिए। आधुनिक शोध का सबसे मजबूत निष्कर्ष यही है कि ताना भगत इतिहास एकल, सीधी और निर्विवाद कथा नहीं, बल्कि अनेक अभिलेखीय और सामुदायिक स्मृतियों से निर्मित इतिहास है। संगीता दासगुप्ता ने औपनिवेशिक अभिलेखों को ताना पर्चों और याचिकाओं के सामने रखकर इसी बहुस्तरीय अतीत पर जोर दिया है।
1899–1900 — बिरसा उलगुलान का अंतिम चरण
ताना भगत आंदोलन से लगभग चौदह वर्ष पहले छोटानागपुर बिरसा मुंडा के उलगुलान का अनुभव कर चुका था।
ये प्रश्न क्षेत्रीय राजनीतिक स्मृति में मौजूद रहे।
ताना आंदोलन बिरसा आंदोलन की सीधी शाखा नहीं था, लेकिन वह उसी व्यापक औपनिवेशिक भूमि-संकट वाले भूगोल में पैदा हुआ।
1902–08 — छोटानागपुर में सर्वे, बंदोबस्त और भूमि प्रश्न
बिरसा उलगुलान के बाद औपनिवेशिक शासन ने छोटानागपुर के काश्तकारी संबंधों और customary rights को अधिक व्यवस्थित ढंग से दर्ज करने की दिशा अपनाई।
यह प्रक्रिया अंततः Chota Nagpur Tenancy Act, 1908 तक पहुंची। India Code वर्तमान झारखंड विधिक संग्रह में इस कानून की अधिनियमन तिथि 11 नवंबर 1908 दर्ज करता है।
और ग्रामीण सत्ता के सभी प्रश्न समाप्त नहीं किए।
यही वह अधूरा सुधार संसार था जिसमें ताना आंदोलन जन्मा।
1913–14 — उरांव समाज में धार्मिक असंतोष और भगत धाराएं
औपनिवेशिक एवं मिशनरी हस्तक्षेप, पारंपरिक धार्मिक संस्थाओं, मद्य, बलि, आर्थिक दबाव और सामाजिक पदानुक्रम के बीच उरांव समाज में वैकल्पिक धार्मिक धाराएं विकसित हो रही थीं।
वर्तमान समेकित ताना भूमि-पुनर्स्थापन कानून बाद में ‘freedom movement’ से संबंधित कर-अस्वीकार के लिए 1913–42 की अवधि का प्रयोग करता है; लेकिन इसे सीधे यह प्रमाण नहीं मानना चाहिए कि औपचारिक ताना आंदोलन 1913 में ही शुरू हो गया था। यह बाद की संशोधित वैधानिक पात्रता की भाषा है।
1914 — जतरा भगत और ताना आंदोलन का जन्म
यही सामान्यतः आंदोलन का आरंभिक वर्ष माना जाता है।
जतरा उरांव/जतरा भगत ने वर्तमान गुमला क्षेत्र के चिंगरी नवाटोली के आसपास धार्मिक अनुभव और धर्मेश के संदेश से प्रेरित सुधार आंदोलन शुरू किया।
प्रारंभिक संदेश में प्रमुख तत्व थे—
अंधविश्वास माने गए कुछ अनुष्ठानों का त्याग,
लेकिन यह बहुत जल्दी धार्मिक सुधार से आगे जाने लगा।
1914–15 — धर्म से आर्थिक असहयोग की ओर
यहीं आंदोलन किसान राजनीति का स्वरूप ग्रहण करता है।
संगीता दासगुप्ता का आधुनिक अध्ययन ताना भगतों को उरांव समाज के भीतर एक अपेक्षाकृत हाशिये पर स्थित समूह के रूप में पढ़ता है, जो गैर-आदिवासी प्रभुत्व के साथ-साथ उरांव समाज के आंतरिक भूमि और धार्मिक पदानुक्रम को भी चुनौती दे रहा था।
1914–15 — जतरा भगत की गिरफ्तारी
जतरा भगत की गतिविधियां प्रशासन की नजर में आईं।
उनकी गिरफ्तारी, मुकदमे और कारावास के विवरण विभिन्न स्रोतों में मिलते हैं, लेकिन तारीख और सजा की अवधि को लेकर लोकप्रिय विवरणों में अंतर है।
इसलिए इस शोध का सुरक्षित निष्कर्ष है—
जतरा का प्रारंभिक सक्रिय नेतृत्व शीघ्र औपनिवेशिक दमन के घेरे में आया और आंदोलन उनके व्यक्तिगत नेतृत्व से आगे निकल गया।
1915–17 — आंदोलन का विकेंद्रीकरण
जतरा के हटने के बाद आंदोलन समाप्त नहीं हुआ।
इसी चरण में यह स्पष्ट हुआ कि ताना भगत आंदोलन किसी एक नेता पर निर्भर नहीं रह जाएगा।
यही विकेंद्रीकरण उसकी दीर्घजीविता की पहली बड़ी वजह बना।
1917 — गांधी का छोटानागपुर से संपर्क, लेकिन ताना गठबंधन अभी नहीं
गांधी चंपारण प्रश्न के संदर्भ में रांची आए थे।
लेकिन 1917 को ताना भगतों और गांधी के संगठित राजनीतिक गठबंधन की शुरुआत मानना उचित नहीं।
ताना आंदोलन उस समय तक अपनी स्वतंत्र धार्मिक–किसानी दिशा में विकसित हो चुका था।
इसीलिए उसके 1914–20 चरण को बाद के गांधीवाद से पीछे की ओर पढ़ना गलत होगा।
1918–19 — आंदोलन के नए स्थानीय रूप
प्रथम विश्वयुद्ध के अंतिम वर्षों और उसके बाद ताना प्रभाव अलग-अलग क्षेत्रों में फैलता गया।
कुछ प्रसंगों में मिलेनरियन अपेक्षाएं और नए राज की भविष्यवाणी अधिक मजबूत हुई।
यहीं यह सावधानी भी जरूरी है कि इस पूरे दौर को ‘पूर्णतः और हर जगह अहिंसक’ न कहा जाए।
ताना आंदोलन की मुख्य नैतिक दिशा अहिंसा की ओर थी, लेकिन कुछ स्थानीय हिंसक घटनाओं और बाद की स्मृतियों के बीच अंतर बना रहा।
1919 — सिबू–माया और ‘उरांव राज’ की कल्पना
आंदोलन के कुछ स्थानीय चरणों में यह विश्वास दिखाई देता है कि एक नया न्यायपूर्ण उरांव राज आने वाला है।
अन्यायी बाहरी सत्ता का अधिकार वैध नहीं,
ऐसे विचार धार्मिक मिलेनरियनवाद और किसान राजनीति को जोड़ते हैं।
के. एस. सिंह की प्रभावशाली व्याख्या ने ताना आंदोलन को इसी प्रकार tribal peasantry, millenarianism और nationalism की विकसित होती प्रक्रिया में रखा। दासगुप्ता का बाद का अध्ययन इस रैखिकता को अधिक जटिल बनाता है।
1920 — गांधीवादी असहयोग का राष्ट्रीय आरंभ
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन शुरू किया।
ताना भगतों ने अब पहली बार ऐसी राष्ट्रीय भाषा सुनी जो उनके अपने व्यवहार से गहराई से मेल खाती थी—
लेकिन उन्हें ‘गांधी ने असहयोग सिखाया’ कहना गलत होगा।
उनकी अपनी असहयोगी राजनीति पहले से मौजूद थी।
1920–21 — कांग्रेस से संगठित संपर्क
कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने छोटानागपुर में ताना भगतों से संपर्क बढ़ाया।
गांधी की छवि स्थानीय धार्मिक–नैतिक अर्थ ग्रहण करने लगी।
बाद में दासगुप्ता का शोध यह दिखाता है कि कांग्रेस संदेश स्थानीय परिस्थितियों में पुनःव्याख्यायित हुआ और ताना नेता गांधी के नाम पर भी कई बार अपने पुराने विरोध-रूपों को जारी रखते रहे।
ताना + गांधीवाद → नया स्थानीय राष्ट्रवाद।
1921–22 — खादी, चरखा, कांग्रेस ध्वज और स्वराज
ताना भगतों ने गांधीवादी प्रतीकों को तेजी से अपनाया।
खादी उनके पहले से मौजूद सादगी और शुद्धता के अनुशासन से मेल खाती थी।
कांग्रेस का ध्वज स्थानीय ताना समुदाय को राष्ट्रीय राजनीति से जोड़ने लगा।
‘उरांव राज’ की पुरानी कल्पना धीरे-धीरे व्यापक ‘स्वराज’ से जुड़ती गई।
फरवरी 1922 — असहयोग आंदोलन स्थगित
चौरी चौरा की हिंसा के बाद गांधी ने असहयोग आंदोलन स्थगित किया।
ताना भगतों का कांग्रेस से संबंध समाप्त नहीं हुआ।
यहीं यह प्रमाणित होता है कि गांधीवाद अब उनके लिए एक अभियान नहीं—
सामुदायिक जीवन का हिस्सा बनने लगा था।
दिसंबर 1922 — गया कांग्रेस
ताना भगत बड़ी संख्या में गया कांग्रेस अधिवेशन पहुंचे।
बाद की शोध-स्मृति में उनके पैदल जत्थों और कांग्रेस ध्वज लेकर लौटने का विशेष महत्व है।
यह घटना ताना आंदोलन के राष्ट्रीयकरण का प्रमुख प्रतीक बनी।
1923–26 — आंदोलन से स्थायी गांधीवादी समुदाय तक
असहयोग समाप्त होने के बाद भी ताना भगत—
और कांग्रेस की गतिविधियों से जुड़े रहे।
इस अवधि ने साबित किया कि उनकी गांधीवादी निष्ठा किसी तात्कालिक राजनीतिक लहर पर निर्भर नहीं थी।
1926 — खादी कार्यक्रमों में निरंतर भागीदारी
ताना भगतों की खादी और गांधीवादी रचनात्मक कार्यक्रम में भागीदारी ने उनकी नई पहचान को स्थायी बनाया।
अब सफेद खादी केवल विदेशी कपड़ा-विरोध नहीं—
ताना धार्मिक–राष्ट्रीय पहचान बन रही थी।
1927–28 — साइमन कमीशन-विरोध
ताना भगतों का राजनीतिक क्षितिज अब स्थानीय लगान प्रश्न से बहुत आगे बढ़ चुका था।
वे राष्ट्रीय संवैधानिक मुद्दों से भी जुड़ने लगे।
दिसंबर 1929 — पूर्ण स्वराज
लाहौर कांग्रेस द्वारा पूर्ण स्वराज को लक्ष्य बनाए जाने के बाद ताना भगतों की पुरानी ‘अपने राज’ की आकांक्षा को राष्ट्रीय राजनीतिक रूप मिला।
स्थानीय उरांव राज → गांधी राज → पूर्ण स्वराज।
यह परिवर्तन ताना राजनीतिक भाषा की सबसे महत्वपूर्ण यात्राओं में से एक है।
1930 — सविनय अवज्ञा
दांडी मार्च और नमक सत्याग्रह के साथ राष्ट्रीय सविनय अवज्ञा शुरू हुई।
छोटानागपुर में उसका अर्थ केवल नमक नहीं था।
ताना भगतों के लिए अधिक स्वाभाविक प्रश्न थे—
अर्थात गांधीवादी सविनय अवज्ञा और ताना की पुरानी कर-अस्वीकार परंपरा फिर एक-दूसरे से जुड़ीं।
1930–32 — गिरफ्तारी, झंडा और ग्रामीण सभाएं
ताना भगत कांग्रेस ध्वज के साथ सार्वजनिक गतिविधियों में दिखाई देते हैं।
कुछ ग्रामीण समूहों की सभा और गिरफ्तारी के विवरण इस बात का प्रमाण हैं कि अब उनकी स्थानीय धार्मिक सभा स्वयं औपनिवेशिक कानून के तहत राजनीतिक अवज्ञा बन सकती थी।
1932 — दमन का दूसरा चरण
गांधी की पुनः गिरफ्तारी और कांग्रेस पर प्रतिबंध के बाद राष्ट्रवादी गतिविधियों पर कठोर कार्रवाई हुई।
ताना भगतों के लिए झंडा लेकर चलना, सभा करना और कर का विरोध राजनीतिक जोखिमपूर्ण बन गया।
1934 — सविनय अवज्ञा का अंत, लेकिन ताना कर-विरोध जारी
यही एक महत्वपूर्ण कालक्रमिक भेद है।
लेकिन ताना भगतों का भूमि और कर प्रश्न समाप्त नहीं।
इसलिए ताना इतिहास राष्ट्रीय आंदोलनों की ‘आरंभ–समाप्ति’ तारीखों में बंद नहीं किया जा सकता।
1935–36 — लगान-अस्वीकार की निरंतरता
बाद के न्यायिक अभिलेख इस अवधि में ताना भगतों के rent refusal से जुड़े मामलों का संकेत देते हैं।
यही वह चरण है जब आंदोलन की आर्थिक कीमत गंभीर रूप से सामने आती है—
1937 — कांग्रेस प्रांतीय राजनीति और बढ़ती अपेक्षाएं
बिहार में कांग्रेस शासन के चरण ने ताना भगतों के सामने नया प्रश्न रखा—
यदि कांग्रेस अब शासन में भाग ले रही है तो हमारी जमीन और कर की शिकायत का समाधान क्यों नहीं?
यहीं राष्ट्रीय निष्ठा और स्थानीय किसान न्याय के बीच तनाव अधिक स्पष्ट हुआ।
1939 — चौकीदारी कर, मवेशी और खेत की नीलामी
मिशनरी स्रोतों में ताना भगतों द्वारा चौकीदारी कर न देने और उसके कारण मवेशियों तथा खेतों की बिक्री के प्रसंग मिलते हैं।
यह दिखाता है कि ताना अहिंसा की कीमत केवल जेल नहीं थी।
1939 — द्वितीय विश्वयुद्ध
ब्रिटेन द्वारा भारत को युद्ध में शामिल करने से कांग्रेस और ब्रिटिश शासन का संघर्ष फिर तेज हुआ।
ताना भगत राष्ट्रीय राजनीति से अब पर्याप्त रूप से जुड़े थे कि यह केवल बाहरी युद्ध नहीं रहा।
मार्च 1940 — रामगढ़ कांग्रेस
रामगढ़ कांग्रेस ताना भगतों के राष्ट्रीय इतिहास का प्रतीकात्मक शिखर था।
अब कांग्रेस छोटानागपुर के भूगोल में थी।
ताना भगत बड़ी संख्या में उपस्थित हुए।
उनकी सामुदायिक स्मृति में गांधी से मिलना, खादी और राष्ट्रीय योगदान का यह चरण विशेष स्थान रखता है।
यह वह समय था जब स्थानीय उरांव किसान समुदाय राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष में अपनी जगह स्पष्ट रूप से देख चुका था।
8–9 अगस्त 1942 — भारत छोड़ो आंदोलन
शीर्ष कांग्रेस नेतृत्व की तुरंत गिरफ्तारी।
ताना भगतों ने स्वतंत्रता संघर्ष के इस अंतिम महान जन-चरण में भी भाग लिया।
18 अगस्त 1942 — बिशुनपुर थाना प्रसंग
कुछ इतिहास स्रोत ताना भगतों के एक समूह को बिशुनपुर थाना आगजनी से जोड़ते हैं।
यह तथ्य ताना इतिहास की पूर्ण और अपवादहीन अहिंसा वाली कथा को जटिल बनाता है।
इसे न छिपाना चाहिए और न पूरे आंदोलन की केंद्रीय दिशा मान लेना चाहिए।
1942 के नेतृत्वविहीन उग्र वातावरण में ताना मुख्यधारा की गांधीवादी अहिंसा के भीतर कुछ स्थानीय विचलन भी संभव हुए।
1942–43 — गिरफ्तारी, जेल और मृत्यु
ताना भगत स्वतंत्रता सेनानियों के व्यक्तिगत अभिलेख दिखाते हैं कि कई कार्यकर्ता गिरफ्तार हुए, रांची या पटना कैंप जेल गए और कुछ की कारावास में मृत्यु हुई।
इस चरण ने ताना समुदाय के राष्ट्रीय बलिदान को अधिक स्पष्ट वैधता दी।
अब उन्हें केवल ‘लगान न देने वाला रैयत’ कहना कठिन था।
वे प्रमाणित स्वतंत्रता सेनानी भी थे।
1946–47 — भूमि-वापसी की मांग निर्णायक होती है
स्वतंत्रता निकट आने के साथ ताना भगतों की सबसे ठोस मांग सामने थी—
आंदोलन के दौरान लगान न देने के कारण जो भूमि नीलाम हुई—
1947–48 — Ranchi District Tana Bhagat Raiyats’ Agricultural Lands Restoration Act
यहीं विधिक तारीखों पर विशेष सावधानी आवश्यक है।
कानून का Short Title ‘...Restoration Act, 1947’ है, लेकिन India Code के वर्तमान रिकॉर्ड में अलग प्रशासनिक प्रविष्टियों में 23 जनवरी 1948 और Act No. 1/2 जैसी समानांतर रिकॉर्डिंग मिलती है। इसलिए वेबसाइट पर कानून का आधिकारिक नाम 1947 ही रखा जाना चाहिए, जबकि गजट/अधिनियम प्रविष्टि के लिए 1948 के रिकॉर्ड का उल्लेख अलग नोट में हो।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस कानून का उद्देश्य आंदोलन-संबंधी लगान-बकाये के निष्पादन में बेची गई कुछ कृषि भूमि का पुनर्स्थापन था। आज भी India Code इसे झारखंड के लागू राज्य कानूनों में सूचीबद्ध करता है।
27 जनवरी 1948 — Restoration Rules
India Code ताना भगत भूमि-पुनर्स्थापन नियमों को 27 जनवरी 1948 से दर्ज करता है।
जैसी प्रक्रिया को व्यावहारिक रूप दिया।
1950 — बिहार भूमि सुधार कानून
जमींदारी उन्मूलन की दिशा में बड़ा परिवर्तन।
India Code वर्तमान झारखंड विधिक संग्रह में Bihar Land Reforms Act, 1950 को 25 सितंबर 1950 की प्रविष्टि के साथ सूचीबद्ध करता है।
लेकिन जमींदारी उन्मूलन और ताना भगतों की विशिष्ट पुरानी भूमि-वापसी एक ही प्रश्न नहीं थे।
1951 — ताना भूमि कानून में संशोधन
मूल कानून की पात्रता और प्रक्रिया पर्याप्त नहीं रही।
बाद के संशोधनों ने उसके दायरे को बदला और व्यापक किया।
यह स्वयं प्रमाण है कि भूमि-पुनर्स्थापन का प्रश्न कानून बनते ही हल नहीं हुआ।
1953 — ताना भगतों की राष्ट्रपति से याचिका
11 नवंबर 1953 का Abhinandan Patra आधुनिक ताना इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण सामुदायिक दस्तावेजों में है।
दासगुप्ता के अध्ययन में इसे ताना भगतों की स्वयं-लिखित उत्तर-औपनिवेशिक स्मृति और राज्य से न्याय-दावे के स्रोत के रूप में उपयोग किया गया है।
लेकिन समुदाय मानता था कि उसका न्याय अभी पूरा नहीं हुआ।
1956 — दूसरा महत्वपूर्ण संशोधन
भूमि-पुनर्स्थापन कानून में आगे परिवर्तन।
ऐतिहासिक न्याय केवल 1947 की घोषणा नहीं था।
उसे बदलती प्रशासनिक और संपत्ति परिस्थितियों के अनुसार संशोधित करना पड़ा।
1960 का दशक — भूमि-विवाद उच्च न्यायपालिका तक
ताना भगत पुनर्स्थापन से जुड़े विवाद अंततः उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचे।
इससे स्पष्ट है कि एक आंदोलन जो 1914 में गांव और जमींदार के बीच शुरू हुआ था—
आधी सदी बाद स्वतंत्र भारत की न्यायिक व्यवस्था का प्रश्न बन चुका था।
स्वतंत्रता के बाद — गांधी, खादी और तिरंगे की स्थायी पहचान
ताना भगतों ने गांधीवादी जीवन-पद्धति नहीं छोड़ी।
सामुदायिक पहचान के केंद्रीय तत्व बने रहे।
दासगुप्ता की 2022 की पुस्तक इस दीर्घ यात्रा को औपनिवेशिक प्रतिनिधित्व, आंतरिक उरांव समाज, कांग्रेस संबंध और वर्तमान स्मृति तक एक साथ रखती है।
2000 — झारखंड राज्य की स्थापना
झारखंड के गठन के बाद ताना भगत उस राज्य का हिस्सा बने जिसकी सार्वजनिक राजनीतिक पहचान स्वयं आदिवासी इतिहास और भूमि-अधिकार की स्मृतियों से गहराई से जुड़ी है।
लेकिन अलग राज्य बनने से भी सभी पुराने भूमि विवाद स्वतः समाप्त नहीं हुए।
इक्कीसवीं सदी — भूमि, विकास और ऐतिहासिक अधिकार
ताना भगत आंदोलन किसी ‘समाप्त स्वतंत्रता संग्राम’ की स्मृति भर नहीं।
जतरा भगत / जतरा उरांव
भूमिका : आंदोलन के संस्थापक और प्रारंभिक धार्मिक सुधारक।
उनका महत्व इस बात में नहीं कि वे ‘गांधी से पहले गांधी’ थे।
उनकी मौलिकता यह थी कि उन्होंने उरांव धार्मिक संसार के भीतर—
की नई भाषा पैदा की, जो बहुत जल्दी किसान असहयोग से जुड़ गई।
स्रोत-सावधानी
इसलिए वेबसाइट के अंतिम संस्करण में केवल मजबूत प्रमाणित तिथियों को कठोर रूप में देना चाहिए।
लिथो उरांव
ताना आंदोलन के प्रारंभिक विकेंद्रीकृत नेतृत्व में महत्वपूर्ण महिला व्यक्तित्व।
उनकी भूमिका यह साबित करती है कि ताना धार्मिक करिश्मा केवल पुरुषों तक सीमित नहीं था।
उनके जीवन का विस्तृत अभिलेख अभी कमजोर है—
इसीलिए वे भविष्य के शोध की प्रमुख पात्र हैं।
मंगर भगत
जतरा के बाद स्थानीय ताना नेतृत्व के विस्तार का महत्वपूर्ण नाम।
वे उस प्रक्रिया का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसमें आंदोलन किसी एक संस्थापक से निकलकर स्थानीय गुरु-जाल में बदल गया।
सिबू भगत
1919 के आसपास आंदोलन के अधिक मिलेनरियन और ‘नए राज’ वाले चरण से जुड़े महत्वपूर्ण नेता।
उनके दौर में भूमि, ईश्वरीय न्याय और उरांव राज की कल्पना अधिक स्पष्ट दिखाई देती है।
ताना आंदोलन को केवल गांधीवादी कथा में पढ़ने से सिबू जैसे नेतृत्व की वैचारिक विशिष्टता छूट जाती है।
माया उरांव
प्रारंभिक महिला नेतृत्व का दूसरा महत्वपूर्ण नाम।
उनकी उपस्थिति ताना भगत आंदोलन की लैंगिक संरचना के बारे में महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है—
विशेषकर धार्मिक नेतृत्व और सार्वजनिक ग्रामीण राजनीति में महिलाओं के प्रवेश को लेकर।
महात्मा गांधी
बल्कि उसके दूसरे महान वैचारिक चरण के केंद्रीय राष्ट्रीय व्यक्तित्व।
गांधी के साथ ताना मेल इसलिए मजबूत हुआ क्योंकि—
ताना अनुशासन से पहले से संवाद कर सकते थे।
दासगुप्ता का विशेष अध्याय दिखाता है कि गांधी, चरखा और स्वराज ताना समाज में स्थानीय अर्थ ग्रहण करते गए; कांग्रेस प्रचार एकतरफा हस्तांतरण नहीं था।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद
बिहार–झारखंड क्षेत्र में कांग्रेस और गांधीवादी राजनीति के महत्वपूर्ण सेतु।
स्वतंत्र भारत में राष्ट्रपति बनने के बाद भी ताना भगतों ने उन्हीं के सामने अपने ऐतिहासिक न्याय के दावे रखे।
1953 का अभिनंदन-पत्र इस संबंध की विशेष ऐतिहासिक कड़ी है।
मौलाना अबुल कलाम आजाद
1940 के रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष।
उनकी भूमिका ताना आंदोलन के प्रत्यक्ष नेतृत्व में नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय राजनीतिक क्षण में महत्वपूर्ण है जब कांग्रेस स्वयं छोटानागपुर के भूगोल में आई।
तुलसी ताना भगत
1942 भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़े स्थानीय ताना स्वतंत्रता सेनानी के रूप में महत्वपूर्ण।
ऐसे व्यक्तिगत नाम आंदोलन की सामूहिक कथा को ठोस मानवीय रूप देते हैं।
सोमरा ताना भगत
उनके संबंध में प्रकाशित सरकारी जीवन-वृत्तांत उपयोगी हैं—
निष्कर्ष : ताना भगत आंदोलन को कैसे समझें?
1914 के धार्मिक पुनर्जागरण से भूमि–बेगार प्रतिरोध, गांधीवादी असहयोग, राष्ट्रीय स्वराज, 1942, भूमि-पुनर्स्थापन और आज तक जीवित उरांव गांधीवादी समुदाय का समेकित ऐतिहासिक मूल्यांकन
ताना भगत आंदोलन को भारतीय इतिहास की किसी एक परिचित श्रेणी में रख देना आसान है, लेकिन ऐसा करना उसके वास्तविक चरित्र को छोटा कर देता है। उसे केवल आदिवासी विद्रोह कहेंगे तो उसका धार्मिक पुनर्गठन और गांधीवादी रूपांतरण छूट जाएगा। केवल किसान आंदोलन कहेंगे तो धर्मेश, शुद्ध जीवन और उरांव सामाजिक संसार की केंद्रीयता गायब हो जाएगी। केवल धार्मिक संप्रदाय कहेंगे तो लगान, बेगार, भूमि और औपनिवेशिक सत्ता से उसका टकराव समझ में नहीं आएगा। और केवल गांधीवादी स्वतंत्रता आंदोलन कहेंगे तो यह तथ्य मिट जाएगा कि उसका जन्म गांधी के राष्ट्रीय असहयोग से छह वर्ष पहले, 1914 में हो चुका था।
ताना भगत आंदोलन की ऐतिहासिक विशिष्टता इसी में है कि वह इन सभी धाराओं से होकर गुजरा और फिर भी अपनी अलग पहचान बनाए रहा।
उसकी लगभग पूरी यात्रा को पांच बड़े रूपांतरणों में समझा जा सकता है—
धार्मिक शुद्धि → सामाजिक सुधार → किसान असहयोग → गांधीवादी राष्ट्रवाद → स्वतंत्र भारत में भूमि-अधिकार और सामुदायिक स्मृति।
इनमें से कोई चरण पिछले चरण को पूरी तरह समाप्त नहीं करता। प्रत्येक अगला चरण पुराने अर्थों को अपने भीतर लेकर आगे बढ़ता है।
यही ताना भगत आंदोलन की सबसे बड़ी ऐतिहासिक विशेषता है।
आंदोलन की शुरुआत राजनीति से नहीं, समाज को भीतर से बदलने की आकांक्षा से हुई
1914 के ताना आंदोलन को समझने की पहली शर्त है कि हम उसके आरंभ को बाद के गांधीवाद की रोशनी में न पढ़ें।
जतरा भगत जब उरांव समाज में उभरे, तब उनका पहला प्रश्न भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति नहीं था। उनके सामने अपना सामाजिक और धार्मिक संसार था।
भूत-प्रेत और महंगे अनुष्ठानों का बोझ क्यों?
ऐसी प्रथाओं पर परिवार का धन क्यों खर्च हो?
मनुष्य शुद्ध और अनुशासित जीवन क्यों न जिए?
धर्मेश से सीधा संबंध क्यों न स्थापित करे?
इसलिए ताना आंदोलन का पहला विद्रोह ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध नहीं बल्कि अपने समाज के भीतर जीवन की एक वैकल्पिक नैतिक व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास था।
आदिवासी आंदोलनों को केवल बाहरी शोषक बनाम आदिवासी समुदाय के द्वंद्व में देखने पर समुदाय के भीतर चल रहे परिवर्तन अदृश्य हो जाते हैं। ताना भगतों ने बाहरी सत्ता को चुनौती देने से पहले अपने समाज में यह तय करने की कोशिश की कि अच्छा जीवन क्या है, उचित धर्म क्या है और समुदाय को किस अनुशासन में रहना चाहिए।
इस अर्थ में आंदोलन का पहला क्षेत्र मनुष्य स्वयं था।
धर्म से भूमि तक की यात्रा इतनी तेजी से क्यों हुई?
यह ताना इतिहास का निर्णायक प्रश्न है।
यदि आंदोलन धार्मिक सुधार था तो वह इतनी जल्दी लगान, बेगार और जमींदारों से संघर्ष तक कैसे पहुंच गया?
उत्तर छोटानागपुर की सामाजिक संरचना में है।
उरांव किसान का धार्मिक संसार और आर्थिक संसार अलग-अलग खानों में नहीं बंटे थे। गांव, भूमि, पूर्वज, देवता, कृषि और सामुदायिक संबंध एक-दूसरे से जुड़े थे।
जब नया धार्मिक अनुशासन कहता था कि अन्यायपूर्ण प्रथा स्वीकार नहीं करनी चाहिए, तो प्रश्न स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ा—
अन्यायपूर्ण श्रम क्यों स्वीकार किया जाए?
जमींदार के खेत में बिना न्यायपूर्ण प्रतिफल के क्यों काम करें?
यहीं ताना आंदोलन धार्मिक सुधार से किसान असहयोग बन गया।
इस परिवर्तन को आधुनिक राजनीतिक भाषा में देखकर यह मान लेना भी गलत होगा कि धर्म केवल किसानों को संगठित करने का आवरण था।
लेकिन उसी धर्म ने किसान को यह नैतिक विश्वास दिया कि अन्याय का पालन करना भी गलत है।
इसलिए ताना भगत आंदोलन में धर्म और अर्थव्यवस्था को अलग नहीं किया जा सकता।
भूमि ताना संघर्ष के केंद्र में क्यों थी?
छोटानागपुर का इतिहास भूमि के बिना समझा ही नहीं जा सकता।
औपनिवेशिक शासन ने भूमि को राजस्व, अभिलेख, स्वामित्व और प्रशासन की आधुनिक श्रेणियों में व्यवस्थित करने का प्रयास किया। दूसरी ओर आदिवासी समाज में भूमि केवल बाजार में खरीदी-बेची जाने वाली संपत्ति नहीं थी।
बिरसा उलगुलान के बाद छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 जैसे कानूनी उपाय हुए, लेकिन कानून बनने से ग्रामीण सत्ता-संबंध समाप्त नहीं हुए। जमींदार, महाजन, लगान, बेगार और प्रशासनिक दबाव विभिन्न रूपों में मौजूद रहे।
ताना भगतों का भूमि प्रश्न इसलिए किसी सामान्य कर-विवाद से बड़ा था।
भूमि पर अंतिम नैतिक अधिकार किसका है?
या उस किसान समुदाय का जो पीढ़ियों से उसे जोतता आया है?
यहीं ताना संघर्ष भारतीय किसान इतिहास के एक बहुत पुराने प्रश्न से जुड़ जाता है।
कर-अस्वीकार : सबसे शक्तिशाली और सबसे महंगा हथियार
ताना भगतों ने जिस रणनीति को अपनाया, उसमें एक गहरा विरोधाभास था।
लेकिन सत्ता की आर्थिक नींव को स्वीकार भी नहीं करना चाहते थे।
इसलिए उनका सबसे प्रभावी हथियार बना—
भुगतान मत करो।
लगान-अस्वीकार देखने में निष्क्रिय कार्रवाई लग सकती है, लेकिन औपनिवेशिक राजस्व राज्य में यह अत्यंत गंभीर राजनीतिक चुनौती थी।
अन्यायी सत्ता को भुगतान नहीं करेंगे।
इस टकराव में बंदूक चलना आवश्यक नहीं था।
इसलिए ताना भगत अहिंसा की वास्तविक कीमत को केवल जेल में नहीं मापा जाना चाहिए।
उसकी कीमत जमीन में चुकाई गई।
और इसी तथ्य से 1947 के विशेष भूमि-पुनर्स्थापन कानून का अर्थ समझ में आता है।
क्या ताना भगत ‘गांधी से पहले गांधीवादी’ थे?
लोकप्रिय इतिहास में यह वाक्य आकर्षक है—
“ताना भगत गांधी से पहले गांधीवादी थे।”
इसमें आधा सत्य है और आधा इतिहासलेखन का खतरा।
यह सब 1920 के गांधीवादी असहयोग से पहले था।
लेकिन उन्हें ‘गांधीवादी’ कहना कालक्रम को उलट देता है।
1914 का जतरा भगत गांधी की राजनीतिक प्रति नहीं था।
उसकी वैचारिक जड़ें उरांव समाज, धर्मेश, स्थानीय धार्मिक सुधार और छोटानागपुर की कृषि व्यवस्था में थीं।
ताना भगतों ने गांधी से स्वतंत्र एक अहिंसक–नैतिक असहयोग परंपरा विकसित की; बाद में गांधीवाद में उन्हें अपनी पहले से निर्मित प्रतिरोध-पद्धति का व्यापक राष्ट्रीय समकक्ष दिखाई दिया।
यही कारण है कि गांधी और ताना का मिलन इतना सहज और स्थायी हुआ।
गांधी ने ताना भगतों को बदला—लेकिन ताना भगतों ने भी गांधीवाद को अपने अर्थ में बदला
1920 के बाद आंदोलन में बड़ा परिवर्तन आया।
गांधी उनके लिए केवल कांग्रेस नेता नहीं रहे।
लेकिन इसे एकतरफा ‘कांग्रेस ने आदिवासियों को राष्ट्रवादी बना दिया’ वाली कथा में नहीं बदलना चाहिए।
ताना भगतों ने गांधीवादी प्रतीकों को अपनी सांस्कृतिक भाषा में पुनःव्याख्यायित किया।
खादी केवल विदेशी कपड़े का बहिष्कार नहीं रही—
वह शुद्धता और सादगी का ताना वस्त्र भी बनी।
मद्यनिषेध केवल कांग्रेस का रचनात्मक कार्यक्रम नहीं था—
वह पहले से ताना धार्मिक अनुशासन था।
कर-अस्वीकार केवल राष्ट्रीय सविनय अवज्ञा नहीं था—
और गांधी की ‘स्वराज’ की भाषा उनकी अपनी न्यायपूर्ण राज की कल्पनाओं से संवाद करने लगी।
इसलिए ताना–गांधी संबंध को समर्पण नहीं बल्कि संगम कहना अधिक उचित है।
‘उरांव राज’ से ‘स्वराज’ तक
ताना आंदोलन के वैचारिक विकास की सबसे महत्वपूर्ण यात्रा शायद यही है।
प्रारंभिक आंदोलन में न्यायपूर्ण नई व्यवस्था की कल्पना स्थानीय थी।
वर्तमान अन्यायपूर्ण संसार समाप्त होगा।
यह मिलेनरियन कल्पना धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीतिक भाषा से जुड़ी।
अब नया राज केवल उरांवों का न्यायपूर्ण संसार नहीं था।
इस परिवर्तन ने ताना भगतों की स्थानीय पहचान समाप्त नहीं की।
बल्कि पहली बार उनकी स्थानीय शिकायत को अखिल भारतीय राजनीतिक परियोजना से जोड़ा।
अब जमींदार और पुलिस से संघर्ष ब्रिटिश राज के व्यापक प्रश्न का हिस्सा बन सकता था।
तिरंगा : शायद ताना इतिहास का सबसे असाधारण प्रतीक
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में लाखों लोगों ने राष्ट्रीय ध्वज उठाया।
लेकिन बहुत कम समुदायों ने स्वतंत्रता के बाद भी उसे अपनी विशिष्ट सामुदायिक पहचान का इतना स्थायी हिस्सा बनाया जितना ताना भगतों ने।
ताना भगतों के लिए तिरंगा केवल राज्य का झंडा नहीं रहा।
इसीलिए स्वतंत्र भारत में भी ताना भगत की पहचान खादी और तिरंगे से इतनी सहजता से जुड़ी दिखाई देती है।
यह राष्ट्रवाद ऊपर से थोपी गई पहचान नहीं रह गया था।
वह सामुदायिक परंपरा में समा चुका था।
1922 के बाद आंदोलन खत्म क्यों नहीं हुआ?
यह प्रश्न ताना भगतों को सामान्य गांधीवादी आंदोलनों से अलग करता है।
इसका कारण यह था कि ताना भगत होना किसी आंदोलन की सदस्यता भर नहीं था।
ताना आंदोलन संगठन से समुदाय में रूपांतरित हो चुका था।
यही उसकी असाधारण दीर्घजीविता का रहस्य है।
1930–34 : राष्ट्रीय सविनय अवज्ञा और पुराने किसान प्रश्न का पुनर्मिलन
जब गांधी ने नमक कानून तोड़ा, छोटानागपुर के ताना किसान के लिए औपनिवेशिक अन्याय का सबसे निकट अनुभव समुद्री नमक नहीं था।
इसलिए सविनय अवज्ञा ने स्थानीय संघर्ष को राष्ट्रीय वैधता दी, लेकिन स्थानीय प्राथमिकताएं बनी रहीं।
यह भारतीय राष्ट्रवाद की महत्वपूर्ण विशेषता भी दिखाता है।
दिल्ली, बंबई या इलाहाबाद में एक आंदोलन का अर्थ जो था, जरूरी नहीं कि छोटानागपुर के गांव में भी वही हो।
राष्ट्रीय आंदोलन सफल इसलिए हुआ क्योंकि स्थानीय समाजों ने उसे अपनी शिकायतों की भाषा में अनुवाद किया।
रामगढ़ 1940 : आदिवासी किसान का राष्ट्र से प्रत्यक्ष मिलन
रामगढ़ कांग्रेस का ताना स्मृति में विशेष महत्व आकस्मिक नहीं है।
अब राष्ट्रीय कांग्रेस उनके क्षेत्र में थी।
गांधी, कांग्रेस और राष्ट्रीय स्वतंत्रता की वह राजनीति, जिसे उन्होंने वर्षों से प्रतीकों और कार्यक्रमों के माध्यम से अपनाया था, उनके अपने भूगोल में उपस्थित थी।
यहां ताना भगत किसी दूरस्थ ‘जनजातीय आंदोलन’ के प्रतिनिधि नहीं थे।
वे राष्ट्रीय आंदोलन के प्रतिभागी थे।
1942 : ताना अहिंसा की सबसे कठिन परीक्षा
भारत छोड़ो आंदोलन का वातावरण 1920 के असहयोग से अलग था।
स्थानीय आंदोलनों में कई स्थानों पर हिंसा हुई।
रेल, तार, थाना और सरकारी संस्थान निशाने पर आए।
ताना भगतों ने भी 1942 के संघर्ष में भाग लिया।
और कुछ स्थानीय प्रसंग आंदोलन की पूर्ण अहिंसा की आदर्शीकृत छवि को जटिल भी बनाते हैं।
किसी समुदाय की स्मृति का सम्मान करना और साथ ही असुविधाजनक प्रमाणों को न छिपाना।
ताना भगतों की दीर्घकालीन मुख्य धारा अहिंसक रही।
लेकिन इतिहास को “कभी कोई अपवाद नहीं हुआ” जैसी पवित्र कथा में बदलना आवश्यक नहीं।
उनकी अहिंसा का महत्व अपवाद छिपाने से नहीं, बल्कि उसकी असाधारण निरंतरता से स्थापित होता है।
1947 : स्वतंत्रता मिली, लेकिन जमीन?
यह ताना भगत इतिहास का सबसे मार्मिक मोड़ है।
जिस राज्य को हटाने के लिए उन्होंने कर देने से इनकार किया—
जिस राष्ट्रीय ध्वज को उन्होंने उठाया—
जिस गांधी को उन्होंने स्वीकार किया—
वे राष्ट्रपिता के नैतिक प्रतीक बने।
लेकिन जिन किसानों ने आंदोलन में लगान न देकर अपनी भूमि गंवाई थी, उनका प्रश्न बचा रहा—
हमारी जमीन का क्या होगा?
यहीं स्वतंत्रता की राजनीतिक उपलब्धि और किसान के भौतिक न्याय के बीच अंतर दिखाई देता है।
और इसी अंतर से विशेष भूमि-पुनर्स्थापन कानून पैदा हुआ।
1947 का भूमि-पुनर्स्थापन कानून : आंदोलन की उपलब्धि का असाधारण प्रमाण
Ranchi District Tana Bhagat Raiyats’ Agricultural Lands Restoration Act, 1947 भारतीय किसान आंदोलनों के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
क्योंकि राज्य ने एक विशिष्ट ऐतिहासिक समुदाय की ऐसी कृषि भूमि के पुनर्स्थापन के लिए विशेष कानूनी व्यवस्था बनाई जो उसके आंदोलन-संबंधी लगान-अस्वीकार और नीलामी से जुड़ी थी।
यह एक प्रकार से ऐतिहासिक राजनीतिक क्षति को भूमि-अधिकार के माध्यम से सुधारने का प्रयास था।
लेकिन कानून और न्याय समानार्थी नहीं होते।
इसलिए कानून को न तो विफलता कहना उचित है, न पूर्ण समाधान।
स्वतंत्र भारत ने औपनिवेशिक अन्याय को पूरी तरह क्यों नहीं मिटाया?
ताना भगतों का स्वतंत्रता-उपरांत इतिहास भारतीय लोकतंत्र के एक बड़े प्रश्न को सामने रखता है।
राजनीतिक सत्ता बदलने से पुराने संपत्ति संबंध स्वतः समाप्त नहीं होते।
यदि किसी किसान की भूमि 1930 के दशक में नीलाम होकर किसी अन्य व्यक्ति के स्वामित्व में चली गई, तो स्वतंत्र भारत में समस्या केवल नैतिक नहीं रही।
इसलिए जो प्रश्न आंदोलन के समय सीधा था—
वह स्वतंत्र भारत में जटिल विधिक प्रश्न बन गया।
यही वजह है कि 1947 के कानून के बाद भी संशोधन, दावे और विवाद चलते रहे।
क्या पूरा उरांव समाज ताना बन गया था?
और इस तथ्य को स्पष्ट रखना आवश्यक है।
ताना भगत आंदोलन उरांव समाज के भीतर पैदा हुआ, लेकिन पूरा उरांव समाज कभी ताना नहीं बना।
और विभिन्न स्थानीय धार्मिक–सामाजिक धाराएं—
ताना सुधारों ने पारंपरिक धार्मिक प्रथाओं को भी चुनौती दी।
इसलिए उनके विरोधी केवल अंग्रेज, जमींदार या महाजन नहीं हो सकते थे।
यही आधुनिक इतिहासलेखन का महत्वपूर्ण सुधार है।
‘आदिवासी समाज’ कोई एकरूप राजनीतिक इकाई नहीं था।
उसमें वर्ग, भूमि, धर्म, प्रतिष्ठा और स्थानीय सत्ता के अंतर मौजूद थे।
महिलाओं की उपस्थिति : महत्वपूर्ण, लेकिन इतिहास में अपर्याप्त रूप से दर्ज
लिथो और माया जैसे नाम ताना इतिहास के लिए इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे उस सरल धारणा को तोड़ते हैं कि धार्मिक और किसान नेतृत्व केवल पुरुषों के हाथ में था।
को टिकाऊ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
फिर भी औपनिवेशिक अभिलेखों और बाद के इतिहासलेखन में उनकी आवाज बहुत कम दर्ज है।
यह ताना शोध की एक बड़ी सीमा भी है और भविष्य के मौखिक इतिहास के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र भी।
ताना भगत बनाम बिरसा उलगुलान : समान जमीन, अलग रणनीति
दोनों आंदोलनों के बीच समानताएं स्पष्ट हैं।
दोनों छोटानागपुर के आदिवासी समाज से निकले।
दोनों ने अन्यायी सत्ता को चुनौती दी।
दोनों में न्यायपूर्ण वैकल्पिक राज की कल्पना दिखाई देती है।
बिरसा उलगुलान का अंतिम चरण सशस्त्र टकराव तक पहुंचा।
ताना भगतों ने मुख्यतः आर्थिक और नैतिक असहयोग का रास्ता अपनाया।
बिरसा आंदोलन पर औपनिवेशिक दमन ने अपेक्षाकृत शीघ्र निर्णायक प्रहार किया।
ताना भगत आंदोलन नेतृत्व के विकेंद्रीकरण और बाद में गांधीवाद से संगम के कारण एक सदी से अधिक जीवित सामुदायिक परंपरा में बदल गया।
इसलिए ताना को बिरसा का ‘दूसरा संस्करण’ कहना गलत होगा।
संथाल हूल से ताना भगत तक : प्रतिरोध की बदलती तकनीक
1855–56 के संथाल हूल में औपनिवेशिक राज्य के साथ व्यापक सशस्त्र टकराव हुआ।
1914 के ताना आंदोलन में मुख्य हथियार बदल चुका था।
राज्य को चुनौती देने के लिए हमेशा राज्य जैसी हिंसा आवश्यक नहीं—
ताना भगतों का इतिहास इस विचार का महत्वपूर्ण भारतीय उदाहरण है।
फराजी और पागलपंथी आंदोलनों से गहरी संरचनात्मक समानता
ताना आंदोलन की तुलना केवल आदिवासी विद्रोहों से करना पर्याप्त नहीं।
फराजी और पागलपंथी जैसे आंदोलनों में भी—
इन सभी मामलों में आधुनिक इतिहासकार के सामने एक समान समस्या आती है—
धर्म कहां समाप्त होता है और राजनीति कहां शुरू होती है?
ग्रामीण समाज में अक्सर ऐसी स्पष्ट सीमा थी ही नहीं।
यही कारण है कि ताना भगत आंदोलन भारतीय किसान प्रतिरोध की लंबी परंपरा का भी हिस्सा है।
चंपारण और खेड़ा से अंतर
चंपारण 1917 और खेड़ा 1918 के गांधीवादी किसान संघर्षों से तुलना करने पर ताना भगतों की मौलिकता और स्पष्ट होती है।
चंपारण और खेड़ा में गांधी बाहरी/राष्ट्रीय राजनीतिक नेतृत्व के रूप में संघर्ष में प्रवेश करते हैं।
वह स्थानीय उरांव समाज के भीतर स्वतंत्र रूप से पैदा हुआ।
इसलिए ताना भगतों को गांधीवादी किसान आंदोलनों की सामान्य सूची में रख देना पर्याप्त नहीं।
आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धियां
ताना भगतों की उपलब्धि केवल यह नहीं कि उन्होंने ब्रिटिश शासन का विरोध किया।
धार्मिक स्तर पर उन्होंने उरांव समाज के भीतर वैकल्पिक सुधार परंपरा स्थापित की।
सामाजिक स्तर पर मद्यत्याग, अनुशासन, स्वच्छता और सादगी पर आधारित विशिष्ट सामुदायिक संस्कृति विकसित की।
आर्थिक स्तर पर बेगार, अन्यायपूर्ण श्रम और लगान को नैतिक–राजनीतिक प्रश्न बनाया।
राजनीतिक स्तर पर स्थानीय आदिवासी किसान प्रतिरोध को राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ा।
रणनीतिक स्तर पर लंबे समय तक अहिंसक असहयोग को टिकाए रखा।
राष्ट्रीय स्तर पर गांधीवाद को छोटानागपुर के गांवों में विशिष्ट स्थानीय अर्थ दिया।
विधिक स्तर पर भूमि-पुनर्स्थापन के लिए विशेष कानून प्राप्त किया।
सांस्कृतिक स्तर पर उन्होंने आंदोलन को एक जीवित समुदाय में बदल दिया।
किसान आंदोलन सामान्यतः मांग पूरी होने, नेतृत्व टूटने या राजनीतिक परिस्थितियां बदलने के बाद समाप्त हो जाते हैं।
ताना भगत आंदोलन के साथ ऐसा नहीं हुआ।
आंदोलन की सीमाएं
इतिहास का मूल्यांकन केवल उपलब्धियों से नहीं होगा।
ताना भगतों की पहली सीमा उनका सीमित सामाजिक विस्तार था।
उनका आर्थिक असहयोग अत्यंत महंगा सिद्ध हुआ।
कर न देने की नैतिक विजय कई परिवारों के लिए भूमि-हानि में बदल सकती थी।
गांधी और कांग्रेस से गहरी निष्ठा हमेशा भूमि समस्या का समान अनुपात में समाधान नहीं करा सकी।
स्वतंत्रता के बाद विशेष कानून के बावजूद सभी भूमि दावे सरलता से हल नहीं हुए।
आंदोलन व्यापक छोटानागपुर किसान समाज को स्थायी वर्गीय संगठन में परिवर्तित नहीं कर पाया।
उसकी मजबूत धार्मिक–सामुदायिक पहचान उसकी शक्ति थी, लेकिन व्यापक विस्तार की सीमा भी बन सकती थी।
महिलाओं तथा सामान्य गरीब अनुयायियों की आवाज अभिलेखीय इतिहास में नेतृत्व की तुलना में बहुत कम सुनाई देती है।
सबसे बड़ी सफलता क्या थी—स्वतंत्रता, जमीन या पहचान?
यदि ताना भगत आंदोलन की सफलता को केवल उसकी तत्काल मांगों से मापा जाए तो उत्तर मिश्रित होगा।
क्या बेगार और पुरानी औपनिवेशिक व्यवस्था समाप्त हुई?
बड़े संरचनात्मक अर्थ में हां, लेकिन सामाजिक शोषण के सभी रूप नहीं।
कुछ मामलों में विधिक रास्ता बना, लेकिन प्रश्न पूर्णतः समाप्त नहीं हुआ।
क्या ताना भगतों की विशिष्ट पहचान बची?
यहीं उनकी सबसे बड़ी सफलता दिखाई देती है।
उन्होंने प्रतिरोध को केवल घटना नहीं रहने दिया।
उसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली नैतिक स्मृति में बदल दिया।
इतिहासलेखन हमें क्या सिखाता है?
प्रारंभिक मानवशास्त्र ने उरांव धर्म और रीति को दर्ज किया।
ताना भगत आंदोलन की संक्षिप्त समयरेखा
ताना भगत आंदोलन की विशिष्टता धार्मिक सुधार, किसान न्याय, आदिवासी अस्मिता और भारतीय राष्ट्रवाद के दीर्घ संगम में है। उसे केवल गांधी का अनुयायी आंदोलन कहना उसके 1914–20 के स्वतंत्र उद्भव और पूर्व-गांधी अहिंसा को मिटा देता है; वहीं गांधीवादी संबंध को गौण करना उसके राष्ट्रीय विस्तार को अधूरा समझना होगा। आंदोलन ने भूमि और बेगार के प्रश्नों को नैतिक अनुशासन तथा अहिंसक असहयोग से जोड़ा। 1947 का विशेष कानून बड़ी उपलब्धि था, पर भूमि-वापसी का अपूर्ण क्रियान्वयन उसकी विरासत में आज भी न्याय का अधूरा प्रश्न बनाए रखता है।
प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक स्रोत
स्रोत-सावधानी: ताना भगत आंदोलन की लिखित सामग्री औपनिवेशिक प्रशासन, मिशनरी–नृवंशविज्ञान, कांग्रेस अभिलेख और बाद की सामुदायिक स्मृतियों में बिखरी है। जतरा भगत के जीवन, आरंभिक संगठन और कुछ गिरफ्तारियों की तिथियों में मतभेद हैं; इसलिए सरकारी रिपोर्ट, गांधीवादी स्रोत, मौखिक परंपरा और आधुनिक शोध को परस्पर मिलाकर पढ़ा गया है।