पेप्सू मुजारा आंदोलन
बिस्वेदारी और बटाई से मुक्ति—किशनगढ़ संघर्ष, किसान संगठन और काश्तकार से भूमिधर बनने की ऐतिहासिक यात्रा
पेप्सू मुजारा आंदोलन स्वतंत्र भारत के उन आरंभिक किसान संघर्षों में है, जिनमें राजनीतिक आजादी के तुरंत बाद जमीन पर वास्तविक अधिकार का प्रश्न सामने आया। पटियाला रियासत की बिस्वेदारी व्यवस्था में पीढ़ियों से खेती करने वाले मुजारे फसल का हिस्सा देने, बेदखली और ग्रामीण प्रभुत्व के दबाव में थे। प्रजा मंडल, कीर्ति–कम्युनिस्ट धारा और गांव समितियों के बीच विकसित प्रतिरोध ने ‘जमीन उसकी जो जोते’ को प्रत्यक्ष कार्यक्रम बनाया। मार्च 1949 का किशनगढ़ संघर्ष इसकी त्रासदी और दृढ़ता का प्रतीक बना; 1953–55 के कानूनों ने अंततः अनेक काश्तकारों के मालिकाना अधिकार को मान्यता दी। यह अध्ययन आंदोलन की उपलब्धियों के साथ हिंसा, सामाजिक प्रतिनिधित्व और अधूरे भूमि-पुनर्वितरण की सीमाओं को भी दर्ज करता है।
भूमिका — स्वतंत्र भारत के किसान आंदोलनों में पेप्सू मुजारा आंदोलन का स्थान
भारत की स्वतंत्रता ने औपनिवेशिक शासन का अंत कर दिया, लेकिन गांवों में सदियों से कायम भूमि-संबंधों, जमींदारी-सामंती संरचनाओं और काश्तकारों की असुरक्षा का अंत उसी क्षण नहीं हुआ। 15 अगस्त 1947 के बाद भारतीय किसान के सामने प्रश्न बदल अवश्य गया था, समाप्त नहीं हुआ था। औपनिवेशिक काल में संघर्ष विदेशी शासन, अत्यधिक लगान, बेगार, जमींदारों और औपनिवेशिक राजस्व-व्यवस्था के विरुद्ध था; स्वतंत्रता के बाद सवाल यह बन गया कि राजनीतिक स्वतंत्रता को आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता में कैसे बदला जाए।
इसी संक्रमणकाल में पेप्सू मुजारा आंदोलन का विशेष ऐतिहासिक महत्व सामने आता है।
इस आंदोलन की जड़ें स्वतंत्रता से पहले पटियाला रियासत के गांवों में थीं। 1930 के दशक में ही भूमिहीन और असुरक्षित काश्तकारों—जिन्हें स्थानीय भाषा में मुजारा कहा जाता था—ने उन जमीनों पर मालिकाना अधिकार की मांग उठानी शुरू कर दी थी जिन्हें वे पीढ़ियों से जोतते आए थे। लेकिन स्वतंत्रता के बाद संघर्ष समाप्त होने के बजाय और तीखा हुआ। पटियाला तथा आसपास की रियासतों के विलय से बने पटियाला एंड ईस्ट पंजाब स्टेट्स यूनियन (पेप्सू) में भूमि संबंधों के पुनर्गठन का प्रश्न नई भारतीय राज्य-व्यवस्था के सामने आ खड़ा हुआ। आंदोलन 784 गांवों तक फैला बताया जाता है और इसका प्रभाव वर्तमान पंजाब के पटियाला, संगरूर, बरनाला, मानसा, बठिंडा, फरीदकोट, मोहाली और फतेहगढ़ साहिब से लेकर वर्तमान हरियाणा के जींद क्षेत्र तक दिखाई देता है।
इसलिए पेप्सू मुजारा आंदोलन को केवल पंजाब के क्षेत्रीय किसान संघर्ष के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह स्वतंत्र भारत के सामने उपस्थित उस बुनियादी प्रश्न की अभिव्यक्ति था कि जमीन का वास्तविक अधिकार किसका होना चाहिए—कानूनी स्वामी का या उस किसान का जो पीढ़ियों से उसे जोतता आया है?
राजनीतिक स्वतंत्रता बनाम भूमि की स्वतंत्रता
1947 में भारत स्वतंत्र हुआ तो ग्रामीण भारत की सामाजिक-आर्थिक संरचना अत्यंत विषम थी। अलग-अलग क्षेत्रों में जमींदारी, जागीरदारी, ताल्लुकेदारी, बिस्वेदारी और विभिन्न प्रकार की काश्तकारी व्यवस्थाएं मौजूद थीं। इनमें भूमि पर श्रम करने वाला व्यक्ति आवश्यक नहीं कि उसका मालिक भी हो।
पेप्सू क्षेत्र में यह अंतर्विरोध विशेष रूप से तीखा था।
यहां बड़ी संख्या में मुजारे भूमि की वास्तविक खेती करते थे, जबकि जमीन पर मालिकाना दावा बिस्वेदारों अथवा अन्य भू-स्वामियों का था। किसान उत्पादन करता था, लेकिन उसकी उपज का एक हिस्सा भूमि-स्वामी को देना पड़ता था। समकालीन स्मृतियों और बाद के विवरणों में बटाई की मात्रा अलग-अलग बताई गई है—कई क्षेत्रों में एक-तिहाई और कहीं इससे अधिक हिस्से तक का उल्लेख मिलता है।
यह केवल आर्थिक बोझ नहीं था। इसके पीछे सत्ता-संबंध छिपा हुआ था।
भूमि का स्वामित्व गांव में प्रतिष्ठा, सामाजिक वर्चस्व और राजनीतिक प्रभाव का आधार था। दूसरी ओर मुजारा खेती करते हुए भी असुरक्षा में जीता था। उसे यह भय बना रहता था कि मालिक उसके काश्तकारी अधिकार को चुनौती दे सकता है या उसे जमीन से बेदखल करने का प्रयास कर सकता है।
इसलिए पेप्सू का संघर्ष केवल कम लगान या कम बटाई का आंदोलन नहीं रहा। धीरे-धीरे उसका लक्ष्य स्वयं भूमि संबंधों को बदलना बन गया।
इसी बिंदु पर पेप्सू आंदोलन औपनिवेशिक काल के अनेक किसान संघर्षों से एक महत्वपूर्ण कदम आगे जाता दिखाई देता है।
‘मुजारा’ कौन था?
पेप्सू आंदोलन को समझने के लिए ‘मुजारा’ शब्द को समझना आवश्यक है।
सामान्य अर्थ में मुजारा उस काश्तकार को कहा जाता था जो ऐसी भूमि की खेती करता था जिसका कानूनी स्वामित्व किसी अन्य व्यक्ति के पास था। लेकिन पेप्सू की परिस्थितियों में यह केवल एक साधारण किरायेदार किसान की पहचान नहीं थी। कई परिवार लंबे समय से एक ही भूमि पर खेती कर रहे थे। जमीन से उनका आर्थिक और सामाजिक संबंध पीढ़ियों पुराना था, किंतु मालिकाना अधिकार उनके पास नहीं था।
बाद में बने कानूनों में भी काश्तकारों की विभिन्न श्रेणियों की जटिलता स्पष्ट दिखाई देती है। 1954 के पेप्सू स्थायी काश्तकार (मालिकाना अधिकार निहित होना) अधिनियम में पूर्व फरीदकोट राज्य की भूमि-अभिलेख श्रेणियों में Muzara-i-shartia, Chakotedar khas, Muzara bilatai-yun sifat, Muzara tabe marzi malik और Chakotedar nautor जैसी श्रेणियों का उल्लेख मिलता है। इससे पता चलता है कि ‘मुजारा प्रश्न’ कोई अस्पष्ट राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि काश्तकारी अधिकारों और भूमि-अभिलेखों से जुड़ी अत्यंत ठोस कानूनी समस्या थी।
इसीलिए आंदोलन की परिणति को केवल राजनीतिक समझौते से नहीं मापा जा सकता। उसकी वास्तविक सफलता तब मानी जानी थी जब जमीन जोतने वाले किसान और जमीन के मालिक के बीच कानूनी दूरी समाप्त हो।
आंदोलन की जड़ें स्वतंत्रता से पहले
यद्यपि इसे स्वतंत्र भारत के किसान आंदोलनों में रखा जाता है, इसकी शुरुआत 1947 के बाद नहीं हुई थी।
इसकी जड़ें पटियाला रियासत में 1930 के दशक तक जाती हैं। उस समय रियासती शासन के विरुद्ध राजनीतिक चेतना बढ़ रही थी और प्रजा मंडल जैसी संस्थाएं नागरिक और राजनीतिक अधिकारों की मांग उठा रही थीं। किसान प्रश्न धीरे-धीरे इस व्यापक रियासती विरोधी राजनीति से जुड़ गया।
रियासती प्रजा मंडल के नेताओं तथा बाद में किसान और वामपंथी संगठनों ने मुजारों को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उपलब्ध विवरणों के अनुसार किसानों द्वारा बटाई देने से इनकार जैसे प्रतिरोध 1930 के दशक में ही दिखाई देने लगे थे। 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना के बाद पंजाब के किसान संघर्षों और व्यापक किसान राजनीति के बीच संपर्क भी मजबूत हुआ।
इस प्रकार पेप्सू मुजारा आंदोलन के भीतर तीन धाराएं एक साथ विकसित होती दिखाई देती हैं—
रियासती निरंकुशता का विरोध, सामंती भूमि-संबंधों का विरोध और किसान को जमीन का अधिकार दिलाने की मांग।
यही तीनों धाराएं स्वतंत्रता के बाद एक नए ऐतिहासिक संदर्भ में प्रवेश करती हैं।
1947 : स्वतंत्रता मिली, लेकिन संघर्ष समाप्त नहीं हुआ
पेप्सू आंदोलन के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण विरोधाभास यही है।
किसानों ने ब्रिटिश सत्ता और रियासती-सामंती व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष किया था। उन्हें उम्मीद थी कि स्वतंत्र भारत में भूमि-संबंधों का पुनर्गठन तेजी से होगा। लेकिन सत्ता हस्तांतरण के बाद भी जमीन के वास्तविक स्वामित्व का प्रश्न तत्काल हल नहीं हुआ।
इससे किसान आंदोलन के सामने एक नई परिस्थिति पैदा हुई।
अब उसका संघर्ष औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध नहीं था। सामने एक स्वतंत्र भारतीय राजनीतिक व्यवस्था थी, लेकिन ग्रामीण समाज के भीतर पुरानी आर्थिक शक्तियां काफी हद तक कायम थीं।
यहीं पेप्सू मुजारा आंदोलन स्वतंत्र भारत के किसान इतिहास के अध्ययन में असाधारण महत्व प्राप्त करता है।
यह उस संक्रमण का आंदोलन था जिसमें किसान की भाषा ‘अंग्रेजों से आजादी’ से आगे बढ़कर ‘जमीन पर अधिकार’ की भाषा बन रही थी।
इसका अर्थ यह नहीं कि दोनों चरणों के बीच कोई कठोर विभाजन था। वास्तव में पेप्सू संघर्ष की शक्ति इसी निरंतरता से निकली—पूर्व-स्वतंत्रता काल में विकसित संगठन, नेतृत्व, प्रतिरोध की परंपरा और भूमि-अधिकार की चेतना स्वतंत्रता के बाद नए राजनीतिक संदर्भ में आगे बढ़ी।
पेप्सू का निर्माण और भूमि प्रश्न
इस समय भारत के सामने रियासतों के राजनीतिक एकीकरण के साथ-साथ उनके सामाजिक और आर्थिक ढांचे को लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप ढालने की चुनौती भी थी।
पेप्सू इसका उत्कृष्ट उदाहरण था।
पेप्सू क्या था? — पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ का निर्माण, आठ रियासतों का विलय, प्रशासनिक संरचना और मुजारा आंदोलन की राजनीतिक पृष्ठभूमि
पेप्सू मुजारा आंदोलन को समझने के लिए सबसे पहले उस राजनीतिक इकाई को समझना आवश्यक है जिसके नाम के साथ यह आंदोलन इतिहास में दर्ज हुआ—पेप्सू अर्थात पटियाला and पूर्वी पंजाब रियासतें संघ, हिंदी में पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ।
पेप्सू स्वतंत्र भारत के राजनीतिक मानचित्र पर बहुत लंबे समय तक अस्तित्व में नहीं रहा। उसका गठन 1948 में हुआ और 1956 में राज्यों के पुनर्गठन के साथ उसका अधिकांश क्षेत्र पंजाब में मिला दिया गया। लेकिन आठ वर्ष की इस छोटी अवधि में पेप्सू भूमि-सुधार, रियासती सत्ता से लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर संक्रमण, किसान आंदोलनों, राजनीतिक अस्थिरता और केंद्र-राज्य संबंधों की एक महत्वपूर्ण प्रयोगशाला बन गया।
मुजारा आंदोलन के संदर्भ में पेप्सू का महत्व और भी अधिक है। किसान संघर्ष की जड़ें पटियाला रियासत में पेप्सू बनने से काफी पहले मौजूद थीं। लेकिन जब रियासतों का विलय हुआ, तब पुराना भूमि प्रश्न एक नए राज्य की राजनीतिक समस्या बन गया। अब मुजारों का सामना केवल किसी महाराजा या स्थानीय बिस्वेदार से नहीं था; उनकी मांगें स्वतंत्र भारत की सरकार, पेप्सू प्रशासन और अंततः लोकतांत्रिक विधान-व्यवस्था के सामने थीं।
इस अर्थ में पेप्सू का निर्माण मुजारा आंदोलन की पृष्ठभूमि भर नहीं, बल्कि उसके चरित्र को बदल देने वाली ऐतिहासिक घटना था।
ब्रिटिश पंजाब और रियासती पंजाब — एक ही भूगोल में दो व्यवस्थाएं
1947 से पहले जिस भूभाग को हम सामान्यतः पंजाब कहते हैं, वह प्रशासनिक दृष्टि से एक इकाई नहीं था।
उसका बड़ा भाग सीधे ब्रिटिश शासन के अधीन पंजाब प्रांत था। इसके अतिरिक्त अनेक देशी रियासतें थीं जिनके शासकों ने ब्रिटिश सर्वोच्चता स्वीकार कर रखी थी, लेकिन आंतरिक शासन में उन्हें काफी स्वायत्तता प्राप्त थी।
इन रियासतों में पटियाला सबसे बड़ी और राजनीतिक रूप से सबसे प्रभावशाली थी।
इसके अलावा नाभा, जींद, फरीदकोट, कपूरथला, मलेरकोटला, नालागढ़ और कलसिया जैसी रियासतें थीं। इनकी प्रशासनिक प्रणालियां, भूमि-व्यवस्थाएं, राजस्व कानून और प्रजा के राजनीतिक अधिकार ब्रिटिश पंजाब से अलग थे।
यही अंतर आगे चलकर अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।
ब्रिटिश पंजाब में सीमित ही सही, लेकिन विधान परिषदों, चुनावों, राजनीतिक दलों और संवैधानिक सुधारों की प्रक्रिया विकसित हो चुकी थी। रियासतों में राजनीतिक अधिकार अपेक्षाकृत अधिक सीमित थे। वहां शासक और उसका प्रशासन राज्य-सत्ता का मुख्य केंद्र बने हुए थे।
इसलिए पंजाब में किसान प्रश्न भी दो अलग राजनीतिक परिस्थितियों में विकसित हुआ।
ब्रिटिश पंजाब का किसान औपनिवेशिक प्रशासन और स्थानीय भू-स्वामित्व व्यवस्था से जूझ रहा था, जबकि रियासती क्षेत्रों का किसान आर्थिक शोषण के साथ-साथ राजशाही और सीमित नागरिक अधिकारों की समस्या से भी सामना कर रहा था।
पेप्सू मुजारा आंदोलन इसी दूसरी दुनिया से निकला था।
स्वतंत्रता और रियासतों का प्रश्न
15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश शासन समाप्त होने के साथ भारतीय रियासतों के सामने भी नया संवैधानिक प्रश्न खड़ा हुआ।
ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त हो रही थी। भारत सरकार के सामने लगभग 565 देशी रियासतों को नए भारतीय संघ में समाहित करने की विशाल चुनौती थी।
इस प्रक्रिया में उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल तथा राज्य मंत्रालय के सचिव वी. पी. मेनन की भूमिका निर्णायक रही।
पंजाब की रियासतों का प्रश्न केवल प्रशासनिक नहीं था। विभाजन के कारण पंजाब अभूतपूर्व हिंसा, जनसंख्या-विनिमय और शरणार्थी संकट से गुजर रहा था। पश्चिमी पंजाब पाकिस्तान में चला गया था और पूर्वी पंजाब भारत का हिस्सा बना।
रियासतों की सीमाएं भी अनेक स्थानों पर ब्रिटिश पंजाब के जिलों के बीच बिखरी हुई थीं। छोटे-छोटे राज्यों के स्वतंत्र प्रशासन को बनाए रखना आर्थिक और प्रशासनिक दृष्टि से कठिन था।
इसलिए भारत सरकार ने कई छोटी और मध्यम रियासतों को मिलाकर बड़े संघ बनाने की नीति अपनाई।
इसी प्रक्रिया से राजस्थान, मध्य भारत, सौराष्ट्र और अन्य रियासती संघों की तरह पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ—पेप्सू का जन्म हुआ।
पेप्सू में शामिल आठ रियासतें
पेप्सू आठ देशी रियासतों को मिलाकर बनाया गया था—
1. पटियाला 2. नाभा 3. जींद 4. फरीदकोट 5. कपूरथला 6. मलेरकोटला 7. नालागढ़ 8. कलसिया
इनमें पटियाला सबसे बड़ी और शक्तिशाली रियासत थी। क्षेत्रफल, जनसंख्या, राजस्व और राजनीतिक प्रभाव की दृष्टि से उसकी प्रधानता स्वाभाविक थी।
यही कारण था कि नए संघ के नाम में भी पटियाला को स्पष्ट रूप से स्थान मिला—पटियाला and पूर्वी पंजाब रियासतें संघ।
लेकिन आठों रियासतों को एक प्रशासनिक इकाई में जोड़ना सरल प्रक्रिया नहीं थी।
हर रियासत के अपने कानून, राजस्व नियम, प्रशासनिक परंपराएं, भूमि अभिलेख, न्यायिक प्रणालियां और अधिकारियों का ढांचा था। किसी क्षेत्र में किसान की एक कानूनी श्रेणी थी तो दूसरी रियासत में उसी प्रकार के काश्तकार की स्थिति अलग हो सकती थी।
यही विविधता बाद में भूमि-सुधार कानून बनाते समय एक बड़ी चुनौती बनी।
5 मई 1948 का विलीनीकरण समझौता
पेप्सू की स्थापना की औपचारिक प्रक्रिया 1948 में आगे बढ़ी।
आठ रियासतों के शासकों ने 5 मई 1948 को एक Covenant अर्थात विलीनीकरण-संधि पर हस्ताक्षर किए। इसके माध्यम से उन्होंने अपने राज्यों को एक संयुक्त राजनीतिक इकाई में संगठित करने पर सहमति दी।
पटियाला and पूर्वी पंजाब रियासतें संघ।
यह केवल राज्यों के क्षेत्रीय विलय का समझौता नहीं था। इससे अलग-अलग शासकों की संप्रभु प्रशासनिक शक्तियों का बड़ा हिस्सा नए संघ की संस्थाओं को हस्तांतरित होना था।
रियासतों के एकीकरण की व्यापक भारतीय प्रक्रिया में यह महत्वपूर्ण कदम था। भारत सरकार की प्राथमिकता थी कि छोटी रियासतों को प्रशासनिक रूप से व्यवहार्य इकाइयों में संगठित किया जाए और धीरे-धीरे उन्हें भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में समाहित किया जाए।
15 जुलाई 1948 : पेप्सू का औपचारिक उद्घाटन
15 जुलाई 1948 को पेप्सू औपचारिक रूप से अस्तित्व में आया।
भारत सरकार की ओर से सरदार वल्लभभाई पटेल ने नए संघ का उद्घाटन किया। यह तारीख मुजारा आंदोलन के अध्ययन में भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी के बाद पटियाला रियासत का किसान प्रश्न औपचारिक रूप से पेप्सू सरकार का प्रश्न बन गया।
पेप्सू का क्षेत्रफल लगभग 26 हजार वर्ग किलोमीटर और जनसंख्या लगभग 34 लाख के आसपास थी। 1951 की जनगणना के समय इसकी जनसंख्या लगभग 34.9 लाख दर्ज हुई।
इसमें आज के पंजाब और हरियाणा के कई महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल थे।
पटियाला, संगरूर, बरनाला, बठिंडा, मानसा, कपूरथला और फरीदकोट क्षेत्र इसके ऐतिहासिक भूगोल से जुड़े थे, जबकि जींद और नारनौल जैसे कुछ क्षेत्र आज हरियाणा में हैं। नालागढ़ का क्षेत्र बाद में हिमाचल प्रदेश का हिस्सा बना।
इसलिए आज के राजनीतिक नक्शे को देखकर पेप्सू के किसान आंदोलन का भूगोल समझना भ्रामक हो सकता है। 1948–56 का पेप्सू वर्तमान पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में फैली एक अलग राजनीतिक इकाई था।
पटियाला की केंद्रीय भूमिका
पेप्सू में पटियाला का स्थान लगभग स्वाभाविक रूप से केंद्रीय था।
पटियाला सबसे बड़ी रियासत थी और उसके महाराजा यादविंद्र सिंह नए संघ के राजप्रमुख बनाए गए। कपूरथला के महाराजा जगतजीत सिंह उपराजप्रमुख बने।
राजप्रमुख का पद उस संक्रमणकालीन संवैधानिक व्यवस्था की विशेषता था जिसमें पूर्व रियासती शासकों को नए भारतीय संघीय ढांचे में एक सीमित संवैधानिक भूमिका प्रदान की गई।
यह व्यवस्था अपने आप में भारतीय राजनीतिक संक्रमण का रोचक उदाहरण थी।
लेकिन गांव में यही परिवर्तन इतनी तेजी से नहीं हुआ।
पटियाला रियासत की कृषि और भूमि व्यवस्था — भूमि स्वामित्व, जागीरदारी-बिस्वेदारी संरचना, काश्तकारी संबंध, राजस्व व्यवस्था और मुजारा प्रश्न की ऐतिहासिक जड़ें
पेप्सू मुजारा आंदोलन को यदि केवल 1930, 1940 अथवा 1950 के दशकों की घटनाओं से समझने की कोशिश की जाए तो उसका वास्तविक ऐतिहासिक अर्थ अधूरा रह जाएगा। आंदोलन के पीछे वह भूमि-संबंध था जिसका निर्माण कई दशकों में हुआ था। पटियाला रियासत में बहुत से किसान परिवार जिन खेतों को पीढ़ियों से जोतते और विकसित करते आए थे, धीरे-धीरे उन्हीं खेतों पर अपनी पुरानी स्वामित्व-सदृश स्थिति खोकर मुजारा अर्थात काश्तकार बन गए। उनके और भूमि के बीच एक नई प्रभुत्वशाली परत खड़ी हो गई—बिस्वेदार।
यहीं पेप्सू आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक विशेषता निहित है।
यह हर जगह उस पारंपरिक अर्थ में जमींदार और पुराने काश्तकार के बीच संघर्ष नहीं था जिसमें जमींदार का स्वामित्व कई पीढ़ियों से निर्विवाद माना जाता रहा हो। पटियाला के अनेक मुजारों की सामूहिक स्मृति में कहानी उलटी थी—उनका दावा था कि भूमि उनके पूर्वजों की थी, उन्होंने उसे बसाया, साफ किया और खेती योग्य बनाया, लेकिन रियासती नीतियों और प्रभावशाली मध्यस्थों के कारण मालिकाना अधिकार उनसे छीनकर बिस्वेदारों को दे दिया गया।
इतिहासकार बिपन चंद्र और उनके सहलेखकों द्वारा प्रस्तुत विश्लेषण में भी यही केंद्रीय तथ्य सामने आता है। उनके अनुसार पटियाला में बिस्वेदार मूलतः कई मामलों में राजस्व वसूली या माफी से जुड़े अधिकार रखते थे, लेकिन प्रशासन में बढ़ते प्रभाव के कारण उन्होंने मालिकाना हैसियत प्राप्त कर ली और लगभग 800 गांवों, जो राज्य के लगभग एक-छठे क्षेत्र के बराबर बताए गए हैं, के वास्तविक कृषकों को स्थायी काश्तकार और इच्छाधीन काश्तकार की स्थिति में धकेल दिया।
इस प्रकार मुजारा आंदोलन की जड़ केवल गरीबी में नहीं थी। उसके भीतर एक अधिक विस्फोटक भावना काम कर रही थी—
“हम गरीब किरायेदार नहीं हैं; हमें अपनी पुश्तैनी जमीन से बेदखल करके किरायेदार बनाया गया है।”
यही धारणा बाद में “जमीन उसकी जो जोते” की मांग को असाधारण शक्ति प्रदान करती है।
पटियाला : कृषि प्रधान रियासत
पटियाला पंजाब की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण रियासतों में थी। उसकी अर्थव्यवस्था का आधार कृषि था। मालवा क्षेत्र की विस्तृत ग्रामीण पट्टी में खेती, पशुपालन और उनसे जुड़ी ग्रामीण गतिविधियां अधिकांश आबादी की आजीविका का मुख्य साधन थीं।
खेती केवल आर्थिक गतिविधि नहीं थी। जमीन ही गांव में व्यक्ति और परिवार की सामाजिक स्थिति का सबसे महत्वपूर्ण निर्धारक थी।
जिसके पास भूमि का सुरक्षित अधिकार था, उसके पास उत्पादन का साधन, अनाज, पशुओं के लिए चारा, ऋण प्राप्त करने की क्षमता और स्थानीय समाज में प्रतिष्ठा थी। इसके विपरीत जिसे अपनी खेती वाली जमीन से बेदखल किए जाने का डर हो, उसकी आर्थिक ही नहीं बल्कि सामाजिक स्वतंत्रता भी सीमित रहती थी।
इसलिए पटियाला में भूमि स्वामित्व का प्रश्न गांव की सत्ता का प्रश्न भी था।
भूमि पर नियंत्रण का अर्थ था—
किसान के श्रम पर नियंत्रण, उपज के हिस्से पर दावा, स्थानीय प्रशासन पर प्रभाव, ऋण और निर्भरता के संबंधों में प्रभुत्व और कई परिस्थितियों में राजनीतिक प्रभाव।
यही कारण है कि आगे चलकर मुजारों की लड़ाई केवल आर्थिक सुधार की मांग न रहकर ग्रामीण सत्ता-संबंधों में परिवर्तन का संघर्ष बन गई।
# बिस्वेदारी व्यवस्था की ऐतिहासिक उत्पत्ति
पेप्सू मुजारा आंदोलन के अध्ययन में सबसे विवादित और महत्वपूर्ण प्रश्न है—बिस्वेदार कौन थे और उन्हें भूमि पर अधिकार कैसे मिला?
उपलब्ध शोध-साहित्य के अनुसार पटियाला में बिस्वेदारी व्यवस्था का संगठित विस्तार उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध, विशेष रूप से 1870 के दशक, से जोड़ा जाता है।
पंजाब विश्वविद्यालय के विद्वान रोंकी राम के अध्ययन के अनुसार पटियाला महाराजा द्वारा विकसित बिस्वेदारी व्यवस्था में अधिकतर बिस्वेदार शासक के रिश्तेदार, निकट सहयोगी अथवा प्रभावशाली व्यक्ति थे। उन्होंने बड़ी मात्रा में भूमि पर स्वामित्व स्थापित किया जबकि उन जमीनों को पीढ़ियों के श्रम से विकसित करने वाले कृषक मुजारों की स्थिति में पहुंच गए। इसी अध्ययन में 1872 की एक हिदायत का उल्लेख है जिसके तहत मुजारों को फसल का आधा हिस्सा बिस्वेदारों को बटाई के रूप में देने की व्यवस्था बताई गई है।
यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है। बिस्वेदारी पूरे पटियाला राज्य में एक ही ढंग से उत्पन्न हुई कोई सर्वथा एकरूप व्यवस्था नहीं थी। स्थानीय भूमि-अभिलेख, राजस्व अनुदान और अधिकार अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हो सकते थे। लेकिन मुजारा आंदोलन जिन गांवों में सबसे शक्तिशाली हुआ, वहां किसान राजनीतिक चेतना का आधार यही विश्वास था कि बिस्वेदारों ने प्रशासनिक संरक्षण के माध्यम से उनके पुराने अधिकारों पर कब्जा किया है।
‘बिस्वा’ और ‘बिस्वेदार’
‘बिस्वा’ उत्तर भारतीय भूमि-मापन की एक पारंपरिक इकाई रही है, हालांकि विभिन्न क्षेत्रों में उसका वास्तविक आकार अलग हो सकता था। लेकिन पटियाला के राजनीतिक इतिहास में ‘बिस्वेदार’ केवल भूमि की किसी निश्चित मात्रा वाले किसान का सामान्य नाम नहीं रह गया था।
यह उस प्रभुत्वशाली भू-अधिकार वर्ग का नाम बन गया जिसके पास भूमि पर श्रेष्ठ अथवा मालिकाना अधिकार और उससे बटाई अथवा अन्य देय वसूलने की क्षमता थी।
इसीलिए मुजारा साहित्य और आंदोलन की राजनीतिक भाषा में ‘बिस्वेदार’ अक्सर भूमि-मध्यस्थ और बड़े भू-स्वामी के पर्याय के रूप में आता है।
रोंकी राम के अध्ययन में उन्हें big भू-स्वामी/absentee भू-स्वामी कहा गया है।
लेकिन प्रत्येक बिस्वेदार समान आकार का बड़ा जमींदार रहा हो, ऐसा मानना भी उचित नहीं होगा। महत्वपूर्ण बात उसका आर्थिक आकार नहीं बल्कि मुजारे के ऊपर उसका श्रेष्ठ भूमि-अधिकार था।
# मालिक से मुजारा बनने की प्रक्रिया
पेप्सू आंदोलन की ऐतिहासिक स्मृति में सबसे गहरी शिकायत थी कि किसानों को उनकी भूमि पर पुराने अधिकारों से वंचित किया गया।
अनेक कृषक परिवारों का दावा था कि उनके पूर्वजों ने बंजर अथवा कम विकसित भूमि को कृषि योग्य बनाया था। वे केवल किसी दूर बैठे मालिक की जमीन जोतने आए मजदूर नहीं थे, बल्कि उस कृषि समाज के निर्माण में उनकी निर्णायक भूमिका थी।
समस्या तब उत्पन्न हुई जब राजस्व-संग्रह से जुड़े अधिकारियों और विशेषाधिकार प्राप्त लोगों ने धीरे-धीरे भूमि पर मजबूत कानूनी दावे स्थापित करने शुरू किए।
इतिहासकारों के वर्णन के अनुसार पहले राजस्व वसूली अथवा माफी से जुड़े सीमित अधिकार रखने वाले व्यक्तियों ने धीरे-धीरे मालिकाना status, अर्थात मालिकाना स्थिति, प्राप्त कर ली। इसके साथ वास्तविक कृषकों की कानूनी स्थिति नीचे खिसकती गई।
यह परिवर्तन केवल शब्दावली में नहीं था।
जिस किसान की भूमि पर पहले अपेक्षाकृत स्थायी अथवा पैतृक पकड़ थी, वह अब दूसरे व्यक्ति को बटाई देने वाला काश्तकार बन गया।
उसका संबंध भूमि से श्रम के आधार पर था, लेकिन स्वामित्व की कानूनी सत्ता किसी और के पास चली गई।
यही मुजारा प्रश्न का मूल था।
# काश्तकारों की अलग-अलग श्रेणियां
भूमि-संबंधों को केवल ‘जमींदार बनाम किसान’ में विभाजित करना ऐतिहासिक रूप से पर्याप्त नहीं है।
पटियाला और बाद के पेप्सू क्षेत्र में काश्तकारों की कानूनी स्थिति अलग-अलग थी। मोटे तौर पर दो श्रेणियों का विशेष महत्व था—
स्थायी अथवा स्थायी काश्तकार और इच्छाधीन अथवा इच्छाधीन काश्तकार।
# 1872 की हिदायत और आधी फसल का प्रश्न
लेकिन किसानों की समस्या प्रतिशत मात्र की नहीं थी।
बिस्वेदारी व्यवस्था का उद्भव और विस्तार — 1870 के दशक की रियासती नीतियां, बिस्वेदारों को अधिकार, भूमि बंदोबस्त, किसानों के पैतृक स्वामित्व का क्षरण और मुजारा वर्ग का निर्माण
पेप्सू मुजारा आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रश्न यह नहीं है कि किसानों ने 1930 या 1940 के दशक में विद्रोह क्यों किया। उससे भी पहले का प्रश्न है—वे किसान, जो पीढ़ियों से जमीन जोतते थे, आखिर मुजारा बने कैसे?
इसी प्रश्न का उत्तर हमें पटियाला रियासत की बिस्वेदारी व्यवस्था में मिलता है।
मुजारा आंदोलन के इतिहास में बिस्वेदारी केवल किसी बड़े भू-स्वामी द्वारा किरायेदारों से लगान लेने की साधारण व्यवस्था नहीं थी। किसानों की दृष्टि में यह एक ऐसी प्रक्रिया का परिणाम थी जिसमें खेती करने वाले पुराने कृषक समुदायों के अधिकार क्रमशः कमजोर हुए और राजस्व-वसूली, रियासती संरक्षण अथवा प्रशासनिक प्रभाव रखने वाले व्यक्तियों ने जमीन पर श्रेष्ठ तथा अंततः मालिकाना अधिकार हासिल कर लिए।
इसीलिए पेप्सू का संघर्ष सामान्य किरायेदारी सुधार से आगे चला गया। मुजारों की मूल शिकायत थी कि वे किसी प्राचीन और निर्विवाद जमींदार की जमीन पर बसे किरायेदार नहीं थे, बल्कि उनके अपने पैतृक अधिकारों वाली भूमि पर उन्हें किरायेदार की स्थिति में पहुंचा दिया गया था।
आधुनिक इतिहासकारों के एक महत्वपूर्ण अध्ययन के अनुसार पटियाला राज्य में बिस्वेदार शुरू में अनेक मामलों में केवल राजस्व वसूली अथवा राजस्व-माफी से संबंधित अधिकार रखते थे। प्रशासन में प्रभाव बढ़ने के साथ उन्होंने मालिकाना दर्जा प्राप्त किया और लगभग 800 गांवों, जिन्हें पटियाला राज्य के लगभग एक-छठे क्षेत्र के बराबर बताया गया है, के वास्तविक कृषकों को स्थायी काश्तकार और इच्छाधीन काश्तकार की स्थिति में धकेल दिया।
यहीं से उस ऐतिहासिक संघर्ष की जमीन तैयार हुई जो कई दशक बाद पेप्सू मुजारा आंदोलन के रूप में विस्फोटित हुआ।
बिस्वेदारी को समझने के लिए पहले भूमि-अधिकार को समझना होगा
किसी कृषि समाज में ‘जमीन का मालिक’ कौन है, यह प्रश्न हमेशा उतना सरल नहीं होता जितना आधुनिक भूमि-पंजीकरण व्यवस्था में दिखाई देता है।
परंपरागत ग्रामीण व्यवस्था में एक ही जमीन से कई प्रकार के अधिकार जुड़े हो सकते थे—
किसी समुदाय का उसे बसाने का अधिकार,
किसान का पीढ़ियों से खेती करने का अधिकार,
राज्य का राजस्व लेने का अधिकार,
किसी स्थानीय मुखिया अथवा मध्यस्थ का राजस्व संग्रह करने का अधिकार,
और किसी जागीरदार अथवा अनुदानधारी का राज्य से प्राप्त हिस्सा।
इन सभी अधिकारों को यदि धीरे-धीरे एक ही व्यक्ति के पूर्ण निजी स्वामित्व में बदल दिया जाए तो समाज में बहुत बड़ा परिवर्तन होता है।
पटियाला में यही परिवर्तन बिस्वेदारी के प्रश्न के केंद्र में था।
इतिहासकारों के अनुसार जिन व्यक्तियों के पास पहले केवल राजस्व संबंधी सीमित अधिकार थे, उनमें से अनेक ने समय के साथ जमीन पर स्वामित्व का दावा स्थापित कर लिया। इसके परिणामस्वरूप वास्तविक कृषक की स्थिति नीचे चली गई।
इसलिए बिस्वेदारी का इतिहास मूलतः अधिकारों के पुनर्वर्गीकरण का इतिहास है।
# 1870 का दशक : निर्णायक मोड़
पेप्सू मुजारा आंदोलन पर उपलब्ध आधुनिक शोध बिस्वेदारी व्यवस्था के व्यवस्थित विस्तार को मुख्यतः 1870 के दशक से जोड़ता है।
रोंकी राम के अध्ययन के अनुसार पटियाला महाराजा द्वारा विकसित इस व्यवस्था में बिस्वेदार वर्ग के बहुत से लोग शासक-परिवार के रिश्तेदार, निकट सहयोगी अथवा रियासती सत्ता से जुड़े प्रभावशाली व्यक्ति थे। उन्होंने विशाल भूमि पर श्रेष्ठ अधिकार स्थापित किए, जबकि लंबे समय से खेती करने वाले कृषक मुजारों में बदल गए।
बिस्वेदारी व्यवस्था किसी एक दिन जारी किए गए एक कानून से अचानक नहीं बनी। यह कई स्तरों पर विकसित हुई—
इसलिए ‘1870 में बिस्वेदारी शुरू हुई’ कहना अत्यधिक सरलीकरण होगा। अधिक उपयुक्त यह कहना है कि 1870 के दशक में वह प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित और प्रभावी रूप लेने लगी जिसके माध्यम से राजस्व-मध्यस्थों तथा प्रभावशाली व्यक्तियों की भूमि पर श्रेष्ठ स्थिति मजबूत हुई।
बिस्वेदारी व्यवस्था के इतिहास में 1872 की एक रियासती हिदायत विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है।
उपलब्ध शोध के अनुसार इस आदेश के तहत मुजारों से फसल का लगभग आधा हिस्सा बिस्वेदार को बटाई के रूप में देने की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है।
और इसके बाद उत्पादन का आधा हिस्सा दूसरे व्यक्ति को दे—
तो उसकी आर्थिक स्वतंत्रता अत्यंत सीमित हो जाती है।
हालांकि बाद के कुछ विवरणों में बिस्वेदार का हिस्सा एक-तिहाई भी बताया गया है। इसलिए पूरे पटियाला क्षेत्र और पूरे आंदोलनकाल में एक ही निश्चित बटाई-दर रही हो, ऐसा मानना उचित नहीं होगा। स्थानीय व्यवहार और समय के साथ दरों में अंतर संभव था। आधुनिक रिपोर्टिंग में अनेक किसानों की स्मृतियों में एक-तिहाई उपज देने का उल्लेख मिलता है।
लेकिन प्रतिशत से अधिक महत्वपूर्ण व्यवस्था का सिद्धांत था—
उत्पादन किसान करता था, परंतु उत्पादन पर श्रेष्ठ दावा बिस्वेदार का था।
‘बिस्वेदार’ शब्द को केवल ‘जमींदार’ का सीधा पर्याय मानना कुछ हद तक उपयोगी है, लेकिन पूर्णतः सटीक नहीं।
पटियाला के संदर्भ में यह उन भू-अधिकारियों के लिए प्रयुक्त हुआ जिनके पास किसी गांव अथवा भूमि के हिस्से पर श्रेष्ठ अधिकार था और जो वहां खेती करने वाले मुजारों से बटाई अथवा अन्य देय लेते थे।
इनमें से बहुत से स्वयं खेती नहीं करते थे।
इसीलिए आधुनिक इतिहासलेखन में उन्हें कई बार बड़े भू-स्वामी अथवा अनुपस्थित भू-स्वामी कहा गया है।
लेकिन सभी बिस्वेदार आकार और सामाजिक स्थिति में समान नहीं थे।
किसी के पास बहुत बड़ा क्षेत्र हो सकता था, किसी के पास अपेक्षाकृत कम। आंदोलन के लिए निर्णायक तथ्य यह था कि—
वह वास्तविक कृषक के ऊपर मालिकाना अथवा श्रेष्ठ भूमि-अधिकार रखता था।
# रियासती संरक्षण और नया भू-अभिजात वर्ग
पटियाला में बिस्वेदारी का विस्तार राज्य और ग्रामीण अभिजात वर्ग के संबंध से जुड़ा था।
रियासतों में राजा भूमि और राजस्व अधिकार बांटकर—
वफादारी सुनिश्चित कर सकता था,
अधिकारियों को पुरस्कृत कर सकता था,
राजपरिवार से जुड़े व्यक्तियों को आर्थिक आधार दे सकता था,
और स्थानीय प्रशासन के लिए समर्थक सामाजिक वर्ग तैयार कर सकता था।
इस संदर्भ में बिस्वेदार केवल आर्थिक वर्ग नहीं था।
वह कई बार राजनीतिक संरक्षण से निर्मित ग्रामीण प्रभुत्वशाली वर्ग भी था।
यही कारण है कि बाद में मुजारा किसान का संघर्ष केवल किसी व्यक्तिगत मालिक से नहीं रहा।
उसकी दृष्टि में मालिक के पीछे पूरी रियासती व्यवस्था खड़ी थी।
# ‘पैतृक कृषक’ से ‘मुजारा’ तक
मुजारा आंदोलन की सबसे शक्तिशाली ऐतिहासिक स्मृति यही थी कि किसानों के पूर्वज जमीन के वास्तविक स्वामी अथवा कम-से-कम स्थायी कृषक थे।
और गांव का कृषि-सामाजिक ढांचा बनाया।
लेकिन जब श्रेष्ठ राजस्व अधिकार किसी नए वर्ग को दिए गए और बाद में वही अधिकार मालिकाना रूप लेने लगे, तो कृषक का दर्जा बदल गया।
उसका परिवार उसी गांव में रहा।
लेकिन कागज पर उसका संबंध जमीन से बदल गया।
यही परिवर्तन पेप्सू संघर्ष की सबसे गहरी ऐतिहासिक पीड़ा का स्रोत था।
इतिहासकारों ने इस व्यवस्था के प्रभाव को लगभग 800 गांवों तक फैला हुआ बताया है।
एक महत्वपूर्ण अध्ययन के अनुसार ये गांव पटियाला राज्य के लगभग एक-छठे क्षेत्र के बराबर थे।
यह संख्या बताती है कि मुजारा समस्या कोई कुछ गांवों तक सीमित निजी भूमि-विवाद नहीं थी।
पांचवां—राजनीतिक संगठन की कमी।
मुजारा कौन था? — काश्तकार की सामाजिक और कानूनी स्थिति, स्थायी काश्तकार और इच्छाधीन काश्तकार का अंतर, पारिवारिक खेती, भूमि-असुरक्षा और ग्रामीण समाज में मुजारों का स्थान
पेप्सू मुजारा आंदोलन को समझने के लिए यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि मुजारा वास्तव में कौन था। केवल इतना कहना कि वह “किरायेदार किसान” था, उसकी वास्तविक सामाजिक और ऐतिहासिक स्थिति को बहुत छोटा कर देता है। पटियाला और बाद के पेप्सू क्षेत्र में मुजारा सामान्य अर्थ में ऐसा व्यक्ति भर नहीं था जो किसी दूसरे की जमीन कुछ वर्षों के लिए किराये पर लेकर खेती कर रहा हो। अनेक मामलों में उसका परिवार उसी भूमि पर पीढ़ियों से खेती कर रहा था। उसका श्रम, उसका परिवार, उसके पशु, उसकी कृषि परंपरा और उसके गांव की सामाजिक पहचान उस जमीन से स्थायी रूप से जुड़ी थी, जबकि कानूनी मालिकाना अधिकार किसी दूसरे व्यक्ति—प्रायः बिस्वेदार—के पास दर्ज था।
यही विसंगति मुजारा प्रश्न की मूल समस्या थी।
एक ओर वास्तविक खेती करने वाला कृषक था। दूसरी ओर अभिलेखीय स्वामी। इनके बीच का संबंध केवल आर्थिक अनुबंध नहीं था, बल्कि ग्रामीण सत्ता की संरचना का हिस्सा था।
इसलिए मुजारा को समझना वास्तव में तीन प्रश्नों को समझना है—
वह कानूनी रूप से कौन था? वह सामाजिक रूप से किस स्थिति में था? और वह स्वयं अपने भूमि-अधिकार को किस रूप में देखता था?
‘मुजारा’ शब्द का अर्थ
‘मुजारा’ शब्द का प्रयोग पंजाब और उत्तर-पश्चिम भारत के अनेक क्षेत्रों में ऐसे कृषक के लिए किया गया जो किसी अन्य व्यक्ति की भूमि पर खेती करता था और बदले में नकद किराया, उपज का हिस्सा अथवा अन्य देय देता था।
पंजाबी कृषि समाज में इसका निकटतम अर्थ काश्तकार कृषक, अर्थात काश्तकार कृषक, से है।
लेकिन पेप्सू के संदर्भ में मुजारा की राजनीतिक पहचान इससे अधिक गहरी थी।
वह केवल “किरायेदार” नहीं था।
अनेक आंदोलनकारी परिवारों का दावा था कि उनके पूर्वज स्वयं उस भूमि के मूल कृषक और पुराने अधिकारधारी थे। बाद की रियासती नीतियों, भूमि बंदोबस्त और बिस्वेदारी व्यवस्था ने उनके श्रेष्ठ अधिकार कम कर दिए और उन्हें काश्तकार की कानूनी श्रेणी में डाल दिया।
यही कारण है कि आंदोलन में मुजारा स्वयं को केवल बेहतर किरायेदारी मांगने वाला किसान नहीं मानता था। उसका दावा अधिक मूलभूत था—
“मैं जमीन का वास्तविक अधिकारी हूं।”
# मुजारा और खेत मजदूर में अंतर
मुजारा को खेत मजदूर से अलग समझना आवश्यक है।
खेत मजदूर सामान्यतः अपनी जमीन के बजाय दूसरे की जमीन पर मजदूरी करता है और उसे मजदूरी मिलती है।
मुजारा स्वयं कृषि उत्पादन का स्वतंत्र या अर्ध-स्वतंत्र संचालक था।
और अंततः तैयार फसल में से भूमि-मालिक को हिस्सा देता।
अर्थात वह मजदूर नहीं बल्कि कृषक था।
समस्या यह थी कि कृषक होने के बावजूद वह भूमि का मालिक नहीं था।
यही उसकी आर्थिक स्थिति का सबसे बड़ा अंतर्विरोध था।
# मुजारा और स्वामी-कृषक में अंतर
दूसरी ओर मुजारा उस किसान से भी अलग था जो अपनी ही जमीन पर खेती करता था।
स्वामी-कृषक के पास दो भूमिकाएं एक साथ होती थीं—
वह भूमि का मालिक भी था और उत्पादक भी।
मुजारे की स्थिति में ये दोनों भूमिकाएं अलग हो गई थीं।
उत्पादन मुजारा करता था। स्वामित्व बिस्वेदार का था।
इस विभाजन का सीधा परिणाम था कि मुजारे को अपने श्रम से उत्पन्न फसल का हिस्सा दूसरे को देना पड़ता था।
भूमि सुधार की भाषा में बाद में यही प्रश्न “कृषक और स्वामी के बीच की दूरी समाप्त करने” के रूप में सामने आया।
# मुजारा एक समान कानूनी श्रेणी नहीं था
सभी मुजारों की कानूनी स्थिति एक जैसी नहीं थी।
यही कारण है कि पेप्सू के भूमि कानूनों में काश्तकारों की कई श्रेणियों का उल्लेख मिलता है।
इच्छाधीन काश्तकार
इन दोनों के बीच का अंतर केवल कानूनी शब्दावली का नहीं था।
यह तय करता था कि किसान जमीन पर कितना सुरक्षित है।
स्थायी काश्तकार वह काश्तकार था जिसके पास भूमि पर अपेक्षाकृत मजबूत और लंबे समय से मान्य काश्तकारी अधिकार थे।
ऐसे अधिकार सामान्यतः दीर्घकालीन खेती, परंपरा, राजस्व अभिलेख अथवा विशेष कानूनी प्रावधान से उत्पन्न होते थे।
स्थायी काश्तकार को साधारण किरायेदार की तरह आसानी से हटाया नहीं जा सकता था।
उसका अधिकार कई मामलों में पैतृक रूप से आगे बढ़ सकता था।
यानी पिता के बाद पुत्र उसी भूमि पर खेती जारी रख सकता था।
वह भूमि का पूर्ण स्वामी नहीं था, लेकिन उसका संबंध जमीन से अपेक्षाकृत स्थायी था।
यही कारण है कि बाद के भूमि-सुधार कानूनों में स्थायी काश्तकार को मालिकाना अधिकार देने का प्रश्न विशेष रूप से महत्वपूर्ण बना।
इच्छाधीन काश्तकार की स्थिति कहीं अधिक असुरक्षित थी।
सरल भाषा में वह ऐसा काश्तकार था जिसकी भूमि पर पकड़ मालिक की इच्छा पर अधिक निर्भर थी।
उसके पास स्थायी काश्तकार जैसा स्थायी सुरक्षा कवच नहीं था।
भूमि-मालिक यदि चाहे तो निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के भीतर उसकी काश्तकारी समाप्त करने की कोशिश कर सकता था।
इसका अर्थ यह था कि इच्छाधीन काश्तकार को हर समय एक प्रकार की असुरक्षा घेरे रहती थी।
राजनीतिक सभा में हिस्सा लिया,
बिस्वेदार के खिलाफ शिकायत की,
या आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई,
तो उसके सामने जमीन गंवाने का खतरा खड़ा हो सकता था।
इसलिए इच्छाधीन काश्तकार की आर्थिक निर्भरता सीधे राजनीतिक आज्ञाकारिता में बदल सकती थी।
# कानूनी सुरक्षा और वास्तविक सुरक्षा में अंतर
यह भी आवश्यक है कि केवल कानूनी श्रेणियों से वास्तविक ग्रामीण जीवन का अनुमान न लगाया जाए।
किसी किसान को कागज पर स्थायी काश्तकारी अधिकार प्राप्त हो सकता था, लेकिन यदि स्थानीय प्रशासन, पुलिस, पटवारी और प्रभावशाली भू-स्वामी उसके विरोध में हों तो वह व्यवहार में कमजोर रह सकता था।
इसी तरह इच्छाधीन काश्तकार की स्थिति कानूनी रूप से कमजोर थी, लेकिन यदि पूरा गांव संगठित होकर बेदखली का विरोध करे तो उसकी वास्तविक सुरक्षा बढ़ सकती थी।
यही कारण है कि मुजारा आंदोलन में सामूहिक संगठन स्वयं सुरक्षा का विकल्प बन गया।
मुजारा कृषि का केंद्रीय आधार परिवार था।
खेती केवल व्यक्ति का काम नहीं थी।
पूरा परिवार उत्पादन प्रक्रिया में शामिल रहता था।
पुरुष सामान्यतः हल चलाने, सिंचाई, बाजार और बाहरी कृषि कार्यों में अधिक दिखाई देते थे।
और अनेक अन्य कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं।
बच्चे और बुजुर्ग भी पशुपालन तथा छोटे कृषि कार्यों में योगदान देते थे।
इसलिए मुजारा परिवार के लिए भूमि खोना केवल किसान की नौकरी समाप्त होना नहीं था।
पूरे परिवार की उत्पादन व्यवस्था का टूट जाना।
# परिवार और पैतृक भूमि का संबंध
यदि कोई परिवार कई पीढ़ियों से एक ही खेत पर खेती कर रहा हो तो जमीन उसके लिए बाजार की वस्तु मात्र नहीं रहती।
वह परिवार की स्मृति बन जाती है।
किस खेत में कौन-सा कुआं खोदा गया,
कौन-सी मेड़ किस पूर्वज ने बनाई,
किस हिस्से में कौन-सी फसल अच्छी होती है—
इन सबका ज्ञान पीढ़ियों से चलता है।
ऐसी भूमि से बेदखली आर्थिक नुकसान से कहीं अधिक गहरी सामाजिक क्षति होती है।
# मुजारे की आय कैसे बनती थी?
जैसे दीर्घकालीन निवेश क्यों करेगा?
बटाई, लगान, बेगार और ग्रामीण शोषण — मुजारा किसान पर आर्थिक बोझ, कंकूत व्यवस्था, फसल-विभाजन, ऋणग्रस्तता, बेदखली और बिस्वेदार प्रभुत्व की रोजमर्रा की संरचना
पेप्सू मुजारा आंदोलन को केवल भूमि के मालिकाना अधिकार की लड़ाई मान लेना पर्याप्त नहीं होगा। मालिकाना अधिकार इस संघर्ष का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य अवश्य था, लेकिन उसके पीछे किसानों का एक लंबा रोजमर्रा का आर्थिक अनुभव था—बटाई देना, फसल का हिस्सा गंवाना, कंकूत के माध्यम से उपज का अनुमान स्वीकार करना, भूमि-राजस्व और अन्य देयों का दबाव झेलना, ऋण लेना, बेदखली का भय सहना और स्थानीय बिस्वेदार की सामाजिक-राजनीतिक शक्ति के सामने निर्भर बने रहना।
यही रोजमर्रा की संरचना आंदोलन की वास्तविक सामाजिक जमीन थी।
किसान जब “जमीन उसकी जो जोते” कहता था तो वह कोई अमूर्त भूमि-सुधार सिद्धांत नहीं दोहरा रहा था। उसके पीछे यह प्रत्यक्ष अनुभव था कि खेती का श्रम उसका है, जोखिम उसका है, उत्पादन उसका है, लेकिन फसल पर पहला दावा किसी ऐसे व्यक्ति का है जो खेत स्वयं नहीं जोतता।
पेप्सू मुजारा आंदोलन पर उपलब्ध अध्ययनों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि संघर्ष केवल भूमि-स्वामित्व के लिए नहीं, बल्कि बटाई की वसूली, अत्यधिक भूमि-राजस्व और बेदखली के विरुद्ध भी था। 1948–52 के निर्णायक चरण में आंदोलन की मुख्य रणनीति बटाई न देना, जमीन खाली करने से इनकार करना और भू-स्वामियों द्वारा बेदखली के प्रयासों का प्रतिरोध करना रही।
इसलिए पेप्सू का प्रश्न मूलतः यह था—
भूमि पर किसका अधिकार हो, फसल पर किसका अधिकार हो और गांव में सत्ता किसके हाथ में हो?
बिस्वेदारी व्यवस्था का आर्थिक आधार : बटाई
बिस्वेदारी व्यवस्था की सबसे प्रत्यक्ष आर्थिक अभिव्यक्ति थी—बटाई।
बटाई का अर्थ था कि वास्तविक कृषक अपनी उत्पादित फसल का एक निश्चित हिस्सा भूमि पर श्रेष्ठ अधिकार रखने वाले बिस्वेदार को दे।
उपलब्ध शोध के अनुसार 1872 की एक रियासती हिदायत में मुजारों से फसल का लगभग आधा हिस्सा बिस्वेदार को दिए जाने का उल्लेख मिलता है। बाद के काल और विभिन्न क्षेत्रों में व्यवहार भिन्न हो सकता था, लेकिन यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि बटाई का भार मुजारों की प्रमुख शिकायतों में था। आधुनिक शोध इसे आंदोलन के मूल आर्थिक कारणों में रखता है।
आधी फसल का अर्थ केवल एक संख्या नहीं था।
मान लीजिए किसी मुजारे के खेत में 100 मन अनाज पैदा हुआ।
यदि 50 मन बिस्वेदार को चला गया, तो किसान के पास शेष 50 मन रहे।
लेकिन वह शेष 50 मन उसका शुद्ध लाभ नहीं था।
और खराब मौसम की स्थिति के लिए अनाज
अर्थात उत्पादन का आधा हिस्सा देना किसान के जीवन में केवल “किराया” नहीं बल्कि उसके आर्थिक अधिशेष का बड़ा हिस्सा खो देना था।
# बटाई और नकद किराये में अंतर
बटाई व्यवस्था की एक विशेष कठिनाई यह थी कि किसान को कोई निश्चित नकद राशि नहीं देनी होती थी।
भूमि-मालिक का हिस्सा सीधे उत्पादन से जुड़ा था।
इससे दो प्रकार की समस्या उत्पन्न होती थीं।
फसल अच्छी हुई तो बिस्वेदार का हिस्सा बढ़ता।
फसल कितनी हुई, इस प्रश्न पर विवाद हो सकता था।
किसान के लिए वास्तविक उत्पादन महत्वपूर्ण था।
बिस्वेदार के लिए आकलित उत्पादन।
और राज्य अथवा स्थानीय राजस्व अधिकारी यदि उपज का अनुमान अधिक लगा दें तो किसान पर वास्तविक उत्पादन से अधिक अनुपात का भार पड़ सकता था।
यहीं कंकूत व्यवस्था का प्रश्न सामने आता है।
कंकूत अथवा कनकूत ऐसी व्यवस्था थी जिसमें फसल काटे जाने से पहले खड़ी फसल की पैमाइश अथवा अनुमान के आधार पर उत्पादन का मूल्यांकन किया जाता था।
इससे यह निर्धारित किया जा सकता था कि बिस्वेदार को कितना हिस्सा प्राप्त होगा।
सैद्धांतिक रूप से यह एक प्रशासनिक पद्धति थी।
लेकिन व्यवहार में मुजारों की शिकायत थी कि अनुमान अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर लगाया जाता था।
हाल के आर्थिक अध्ययन में भी कंकूत व्यवस्था को मुजारा संघर्ष की एक बड़ी शिकायत बताया गया है। अध्ययन के अनुसार खड़ी फसल की पैमाइश के आधार पर हिस्सेदारी निर्धारित होने से बिस्वेदारों द्वारा कृषि उत्पादन का असामान्य रूप से बड़ा हिस्सा दावा किए जाने की स्थिति बन सकती थी और किसानों को यह भी निश्चित नहीं रहता था कि कटाई के समय उनसे आखिर कितना लिया जाएगा।
यह अनिश्चितता स्वयं शोषण का एक रूप थी।
# “आधी फसल” भी कभी-कभी एक-चौथाई बचने तक क्यों पहुंची?
रोंकी राम और अन्य विद्वानों द्वारा उद्धृत शोध में एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है।
औपचारिक रूप से बटाई आधी फसल की हो सकती थी, लेकिन कंकूत के जरिए यदि कुल उत्पादन को वास्तविकता से अधिक आंका जाए तो मुजारे के पास वास्तव में उसकी उत्पादित फसल का केवल लगभग एक-चौथाई हिस्सा बचने की स्थिति उत्पन्न हो सकती थी।
इसे उदाहरण से समझना उपयोगी होगा।
मान लें वास्तविक उत्पादन 100 इकाई है।
लेकिन अधिकारी अनुमान 150 इकाई लगा देता है।
यदि बिस्वेदार का हिस्सा अनुमानित उत्पादन का आधा माना जाए तो उसकी मांग 75 इकाई होगी।
वास्तविक 100 में से किसान के पास केवल 25 बचेंगी।
यही कारण था कि कंकूत किसानों के लिए केवल तकनीकी फसल-मापन प्रणाली नहीं रही।
यह उनकी नजर में अन्यायपूर्ण बटाई की मशीनरी बन गई।
# फसल की गणना पर नियंत्रण का अर्थ सत्ता पर नियंत्रण
कृषि संबंधों में यह प्रश्न अक्सर अनदेखा रह जाता है कि उत्पादन की गणना कौन करता है।
यदि किसान और मालिक के बीच हिस्सेदारी है तो जो व्यक्ति कुल उत्पादन तय करता है, उसके हाथ में असाधारण शक्ति होती है।
यदि अंतिम निर्णय प्रशासनिक अधिकारी के हाथ में हो और किसान को उस अधिकारी की निष्पक्षता पर भरोसा न हो, तो व्यवस्था में संघर्ष अवश्य उत्पन्न होगा।
इसलिए पेप्सू मुजारा आंदोलन में तीन अलग अधिकार परस्पर जुड़े थे—
भूमि पर अधिकार, उत्पादन पर अधिकार, और उत्पादन की गणना पर अधिकार।
# लगान और भूमि-राजस्व का दबाव
मुजारों की शिकायत केवल बिस्वेदार की बटाई तक सीमित नहीं थी।
अध्ययनों में रियासती क्षेत्रों में अपेक्षाकृत ऊंचे भूमि-राजस्व को भी किसान असंतोष का महत्वपूर्ण कारण माना गया है।
पटियाला जैसी कृषि-प्रधान रियासतों के लिए भूमि-राजस्व राजकीय आय का महत्वपूर्ण स्रोत था।
लेकिन किसान के दृष्टिकोण से फर्क यह नहीं पड़ता था कि उसकी आय का हिस्सा किस शीर्षक से जा रहा है।
उसके लिए कुल बोझ महत्वपूर्ण था।
राजस्व अथवा उससे जुड़ी देयताएं,
चुकाने पड़ें तो कृषि से बचने वाला वास्तविक अधिशेष बहुत छोटा हो सकता था।
यही वजह थी कि भूमि-राजस्व में कमी और काश्तकारी सुधार की मांगें कई बार एक-दूसरे से जुड़ती रहीं।
# भूमि-राजस्व और बटाई में अंतर
यह अंतर स्पष्ट रखना आवश्यक है।
भूमि-राजस्व राज्य का दावा था।
बटाई भूमि पर श्रेष्ठ निजी अधिकार रखने वाले बिस्वेदार का दावा।
दोनों को एक ही कर मानना गलत होगा।
लेकिन किसान के अनुभव में दोनों एक ही उत्पादन से निकलते थे।
इसलिए आर्थिक दबाव संयुक्त था।
यदि फसल खराब हुई तो राजस्व और बटाई दोनों किसान के लिए कठिन हो सकते थे।
और यदि किसान ऋण लेकर देय चुकाए तो अगली फसल पहले से कर्जग्रस्त होकर शुरू होती थी।
आंदोलन की शुरुआती जड़ें — 1920 और 1930 के दशक में किसान असंतोष, प्रजा मंडल की राजनीति, शुरुआती बटाई-विरोध, ग्रामीण संगठन और मुजारा चेतना का विकास
पेप्सू मुजारा आंदोलन का इतिहास यदि केवल 1948 में पेप्सू के गठन, 1949 के किशनगढ़ संघर्ष या स्वतंत्रता के बाद बने भूमि-सुधार कानूनों से शुरू किया जाए तो आंदोलन की लगभग दो दशकों की राजनीतिक तैयारी अदृश्य हो जाएगी। इसका संगठित रूप स्वतंत्रता के आसपास अधिक तीखा हुआ, लेकिन इसकी महत्वपूर्ण जड़ें 1920 और 1930 के दशकों के पटियाला रियासत के ग्रामीण समाज में थीं।
यही वह समय था जब पुराना आर्थिक असंतोष आधुनिक राजनीतिक चेतना में बदलने लगा।
बिस्वेदारी व्यवस्था पहले से मौजूद थी। मुजारे बटाई देते थे। काश्तकारी असुरक्षा थी। भूमि-अभिलेखों में श्रेष्ठ स्वामित्व बिस्वेदारों के पास था। लेकिन शोषण का अस्तित्व और उसके विरुद्ध संगठित आंदोलन का अस्तित्व एक ही बात नहीं है।
आंदोलन के लिए किसान को पहले यह समझना था कि उसकी व्यक्तिगत कठिनाई वास्तव में एक सामूहिक संरचनात्मक समस्या है।
1920 और 1930 के दशकों में यही परिवर्तन हुआ।
गुरुद्वारा सुधार आंदोलन ने ग्रामीण पंजाब को सामूहिक संघर्ष का अनुभव दिया; प्रजा मंडल आंदोलन ने रियासती निरंकुशता को राजनीतिक चुनौती दी; गदर और कीर्ति परंपरा ने अधिक उग्र सामाजिक परिवर्तन की भाषा पहुंचाई; किसान संगठन गांवों तक पहुंचे; और अंततः मुजारों ने बटाई को केवल आर्थिक देय न मानकर बिस्वेदार के मालिकाना अधिकार के प्रतीक के रूप में देखना शुरू किया।
इसलिए इन दो दशकों का सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन था—
पीड़ित काश्तकार से संगठित मुजारा बनने की प्रक्रिया।
आर्थिक असंतोष राजनीतिक आंदोलन से पुराना था
पटियाला में मुजारों की शिकायतें 1920 के दशक में अचानक उत्पन्न नहीं हुई थीं।
पिछले अध्यायों में हमने देखा कि बिस्वेदारी व्यवस्था का संस्थानीकरण उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से होता गया था। भूमि बंदोबस्तों ने बिस्वेदारों की स्थिति मजबूत की और बड़ी कृषक आबादी काश्तकार की श्रेणी में चली गई।
इसलिए किसानों के बीच असंतोष पहले से मौजूद था।
आधुनिक शोध में यह उल्लेख मिलता है कि मुजारों ने अपने पुराने भूमि अधिकार प्राप्त करने के लिए अदालतों का सहारा लिया और अपनी शिकायतें उच्च प्रशासनिक स्तर तक पहुंचाने का प्रयास किया, लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिली। (giss.org)
किसान ने पहले व्यवस्था के भीतर न्याय खोजा।
जब वह रास्ता परिणाम नहीं देता, तभी व्यवस्था को बदलने की राजनीति अधिक आकर्षक बनती है।
# 1920 का दशक : पंजाब की राजनीति बदल रही थी
1920 का दशक पंजाब के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास में असाधारण महत्व रखता है।
प्रथम विश्वयुद्ध समाप्त हो चुका था।
जलियांवाला बाग की स्मृति ताजा थी।
असहयोग आंदोलन ने औपनिवेशिक सत्ता को व्यापक चुनौती दी।
गुरुद्वारा सुधार आंदोलन ने पंजाब के ग्रामीण सिख समाज को संगठित किया।
गदर आंदोलन की क्रांतिकारी विरासत मौजूद थी।
और किसान प्रश्न धीरे-धीरे व्यापक राजनीति में प्रवेश कर रहा था।
पटियाला जैसी रियासत इन परिवर्तनों से अलग नहीं रह सकती थी।
भले ही वहां ब्रिटिश पंजाब जैसी प्रत्यक्ष औपनिवेशिक प्रशासनिक व्यवस्था नहीं थी, लेकिन उसके किसान आसपास के पंजाब में चल रही राजनीतिक गतिविधियों से परिचित थे।
यही वातावरण आगे मुजारा चेतना के विकास के लिए निर्णायक बना।
# गुरुद्वारा सुधार आंदोलन : संगठन की पाठशाला
पेप्सू मुजारा आंदोलन की राजनीतिक पृष्ठभूमि में गुरुद्वारा सुधार अथवा अकाली आंदोलन का प्रभाव विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
1920 के दशक में गुरुद्वारों को महंतों के नियंत्रण से मुक्त कर प्रतिनिधि सिख प्रबंधन के अधीन लाने के आंदोलन ने हजारों ग्रामीणों को प्रत्यक्ष राजनीतिक कार्रवाई में शामिल किया।
इस आंदोलन से किसानों ने कई बातें सीखीं—
संगठित जत्था कैसे बनाया जाता है,
गिरफ्तारी का सामना कैसे किया जाता है,
अनुशासन कैसे बनाए रखा जाता है,
और सामूहिक दबाव से शक्तिशाली संस्थाओं को कैसे चुनौती दी जाती है।
यह राजनीतिक प्रशिक्षण बाद के ग्रामीण आंदोलनों में काम आया।
रोंकी राम के अध्ययन में भी पटियाला की प्रजा मंडल राजनीति और गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के बीच सामाजिक-राजनीतिक निरंतरता की ओर संकेत किया गया है। (giss.org)
# रियासत और ब्रिटिश पंजाब का अंतर
यहां एक महत्वपूर्ण राजनीतिक अंतर था।
ब्रिटिश पंजाब में किसान का प्रत्यक्ष सामना औपनिवेशिक सरकार से था।
पटियाला में किसान देशी महाराजा की प्रजा था।
इससे राष्ट्रीय आंदोलन की भाषा रियासतों में एक अलग प्रश्न पैदा करती थी—
यदि ब्रिटिश भारत में स्वराज चाहिए, तो रियासतों में जनता को उत्तरदायी शासन क्यों न मिले?
यही प्रश्न प्रजा मंडल आंदोलनों का आधार बना।
और पटियाला में उत्तरदायी शासन की मांग जल्दी ही भूमि और किसान अधिकारों से जुड़ गई।
देशी रियासतों में लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए विकसित संगठनों को सामान्यतः प्रजा मंडल कहा गया।
पटियाला क्षेत्र में यह आंदोलन किसानों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण मंच बना।
रोंकी राम के अध्ययन के अनुसार 17 जुलाई 1928 को मानसा में पंजाब रियासती प्रजा मंडल की स्थापना हुई। इसके पीछे गुरुद्वारा सुधार आंदोलन से निकले कार्यकर्ताओं और रियासती लोकतांत्रिक शक्तियों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। (giss.org)
यह तारीख पेप्सू मुजारा आंदोलन की राजनीतिक पूर्वपीठिका में महत्वपूर्ण है।
अब रियासती शासन की आलोचना के लिए संगठित मंच उपलब्ध था।
प्रजा मंडल की मांग केवल भूमि-सुधार नहीं थी।
रियासती निरंकुशता पर नियंत्रण,
और जनता की राजनीतिक भागीदारी।
लेकिन पटियाला की कृषि प्रधान सामाजिक संरचना के कारण इन लोकतांत्रिक मांगों का किसान प्रश्न से जुड़ना स्वाभाविक था।
किसान के लिए “उत्तरदायी सरकार” का अर्थ केवल राजधानी में मंत्रिमंडल नहीं था।
ऐसी सरकार जो बिस्वेदार के बजाय उसकी भी सुनती हो।
पटियाला के प्रजा मंडल आंदोलन में सेवा सिंह ठीकरीवाला का नाम केंद्रीय महत्व रखता है।
वे पटियाला रियासत में लोकतांत्रिक अधिकारों और उत्तरदायी शासन की मांग के प्रमुख नेताओं में थे।
उनका महत्व केवल राजनीतिक नेतृत्व में नहीं था।
उन्होंने रियासत की प्रजा को यह विश्वास दिलाने में भूमिका निभाई कि महाराजा की सत्ता असीम और प्रश्नातीत नहीं है।
यह विचार स्वयं क्रांतिकारी था।
यदि महाराजा की राजनीतिक सत्ता को चुनौती दी जा सकती है, तो उसके संरक्षण में विकसित भूमि संबंधों को भी चुनौती दी जा सकती है।
यहीं प्रजा मंडल राजनीति और मुजारा प्रश्न का बौद्धिक मिलन दिखाई देता है।
# स्वामी-कृषक और मुजारे की मांगों में अंतर
प्रजा मंडल के भीतर सभी किसानों की समस्याएं एक जैसी नहीं थीं।
जिन किसानों के पास अपनी भूमि थी, उनकी मांगें थीं—
शामलात और अन्य सामुदायिक अधिकार सुरक्षित हों।
लेकिन मुजारे की समस्या अधिक बुनियादी थी।
रोंकी राम ने इसी अंतर को महत्वपूर्ण माना है। उनके अनुसार प्रजा मंडल से जुड़े स्वामी-कृषकों की आर्थिक मांगें और मुजारों की पैतृक मालिकाना अधिकार वापस पाने की मांग अलग-अलग थीं, हालांकि दोनों रियासती सत्ता-विरोधी राजनीति में एक-दूसरे से जुड़ते गए। (giss.org)
1929 में शुरू हुई विश्वव्यापी महामंदी का प्रभाव कृषि अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा।
कृषि वस्तुओं के दाम गिरने से किसानों की आय प्रभावित हुई। लेकिन भूमि संबंधों में किसान की देयताएं उसी अनुपात में समाप्त नहीं हुईं।
यह समस्या विशेष रूप से काश्तकार किसान के लिए गंभीर थी।
उसे उत्पादन का हिस्सा बिस्वेदार को देना था।
# सामाजिक बहिष्कार भी हथियार
प्रजा मंडल, कीर्ति किसान आंदोलन और राजनीतिक चेतना — सेवा सिंह ठीकरीवाला, गदर–कीर्ति परंपरा, कम्युनिस्ट प्रभाव, किसान संगठनों का विस्तार और मुजारा संघर्ष का रियासत-विरोधी राजनीति से गठजोड़
पेप्सू मुजारा आंदोलन का विकास केवल आर्थिक असंतोष से नहीं हुआ। भूमि-असमानता, बटाई और बेदखली ने उसका सामाजिक आधार बनाया, लेकिन उसे संगठित राजनीतिक आंदोलन में बदलने का काम कई धाराओं ने मिलकर किया—प्रजा मंडल की लोकतांत्रिक राजनीति, गदर आंदोलन की क्रांतिकारी विरासत, कीर्ति समूह की वर्गीय चेतना, कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं की संगठन क्षमता और किसान सभा की ग्रामीण लामबंदी।
इन्हीं धाराओं के मेल ने पटियाला के मुजारा प्रश्न को स्थानीय भूमि-विवाद से उठाकर व्यापक राजनीतिक संघर्ष बना दिया।
इस अध्याय का केंद्रीय प्रश्न इसलिए यह है कि आखिर वह कौन-सी राजनीतिक प्रक्रिया थी जिसने एक बिस्वेदार से नाराज किसान को यह समझने पर मजबूर किया कि उसकी समस्या केवल किसी व्यक्ति से नहीं, बल्कि पूरी रियासती और भूमि-सत्ता संरचना से है।
प्रजा मंडल : राजनीतिक अधिकारों का द्वार
पटियाला रियासत में प्रजा मंडल की राजनीति का महत्व असाधारण था। यह केवल महाराजा-विरोधी संगठन नहीं था। उसने ग्रामीण समाज को पहली बार एक ऐसी भाषा दी जिसमें प्रजा स्वयं को अधिकार-संपन्न राजनीतिक समुदाय के रूप में देख सकती थी।
1928 में मानसा में पंजाब रियासती प्रजा मंडल के गठन के साथ यह राजनीति अधिक स्पष्ट रूप से संगठित हुई। उसका उद्देश्य था—
मनमानी रियासती सत्ता पर नियंत्रण,
और जनता की राजनीतिक भागीदारी।
यही मंच आगे किसान प्रश्न के लिए भी महत्वपूर्ण हुआ।
मुजारा आंदोलन के लिए इसका सबसे बड़ा योगदान यह था कि उसने किसान को यह समझाया कि भूमि का अन्याय केवल निजी समस्या नहीं है; यदि राज्य ऐसी व्यवस्था को संरक्षण देता है, तो भूमि-संघर्ष भी राजनीतिक संघर्ष बन जाता है।
सेवा सिंह ठीकरीवाला : प्रतिरोध का प्रतीक
प्रजा मंडल आंदोलन के प्रमुख नेताओं में सेवा सिंह ठीकरीवाला का नाम विशेष महत्व रखता है।
उनका व्यक्तित्व इस कारण महत्वपूर्ण है कि वे केवल संवैधानिक सुधार के पक्षधर नेता नहीं थे, बल्कि उन्होंने पटियाला की निरंकुश रियासती संरचना को खुली चुनौती दी। वे जनता के प्रतिनिधि शासन, नागरिक अधिकार और प्रशासनिक जवाबदेही की मांग के प्रमुख प्रतीक बने।
उनकी गिरफ्तारी और जेल में लंबी भूख हड़ताल के बाद 20 जनवरी 1935 को मृत्यु ने आंदोलन को गहरा नैतिक बल दिया।
ग्रामीण समाज में ऐसी मृत्यु केवल राजनीतिक घटना नहीं रहती। वह सामूहिक स्मृति बन जाती है।
ठीकरीवाला की शहादत ने किसानों को यह संदेश दिया कि अधिकार मांगना अपराध नहीं है और रियासती सत्ता को चुनौती देना वैध राजनीतिक कर्म हो सकता है।
इसी मानसिक परिवर्तन ने भूमि-अधिकार की राजनीति को भी मजबूती दी।
प्रजा मंडल और किसान प्रश्न का स्वाभाविक मिलन
प्रजा मंडल की राजनीति मूलतः लोकतांत्रिक थी, जबकि मुजारा संघर्ष मूलतः भूमि-अधिकार का प्रश्न था। फिर भी दोनों का सामाजिक आधार काफी हद तक एक-दूसरे से जुड़ गया।
जिस किसान से बेगार ली जाती थी, उसी पर भूमि-राजस्व का दबाव था।
जिस मुजारे से बटाई ली जाती थी, उसी को बेदखली का खतरा था।
जिस बिस्वेदार का आर्थिक प्रभुत्व था, उसका प्रशासनिक प्रभाव भी हो सकता था।
इसलिए किसान के लिए राजनीतिक और आर्थिक सत्ता अलग-अलग नहीं थीं।
यदि महाराजा की व्यवस्था बिस्वेदार के अधिकार की रक्षा करती है, तो महाराजा-विरोधी राजनीति और बिस्वेदारी-विरोध स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे से जुड़ते हैं।
गदर आंदोलन की विरासत
पंजाब की किसान राजनीति पर गदर आंदोलन की छाप गहरी थी।
1913 में विदेशों में संगठित गदर पार्टी ने ब्रिटिश राज के खिलाफ सशस्त्र क्रांति का आह्वान किया था। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान उसका विद्रोह असफल हुआ, लेकिन उसके कार्यकर्ता और विचार पंजाब लौटे और ग्रामीण समाज में प्रभाव छोड़ गए।
गदरियों की सबसे बड़ी वैचारिक विरासत थी—
औपनिवेशिक सत्ता के प्रति अस्वीकार,
यही विरासत बाद में कई किसान और वामपंथी संगठनों में रूपांतरित हुई।
मुजारा आंदोलन पर इसका प्रभाव प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों था। प्रत्यक्ष रूप से कई पूर्व गदरी और क्रांतिकारी कार्यकर्ता किसान राजनीति में आए। अप्रत्यक्ष रूप से गदर की स्मृति ने ग्रामीण पंजाब में यह मानसिकता पैदा की कि दमनकारी सत्ता को चुनौती देना संभव है।
गदर से कीर्ति तक
1920 के दशक में गदर की क्रांतिकारी परंपरा का एक महत्वपूर्ण रूपांतरण कीर्ति आंदोलन में हुआ।
‘कीर्ति’ पत्रिका और उससे जुड़े कार्यकर्ताओं ने पंजाब में मजदूर-किसान राजनीति, समाजवाद और वर्गीय विश्लेषण को लोकप्रिय बनाने में भूमिका निभाई।
कीर्ति समूह का महत्व इस बात में था कि उसने राष्ट्रीय स्वतंत्रता के प्रश्न को सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन से जोड़ा।
उसके लिए केवल अंग्रेजों का जाना पर्याप्त नहीं था।
उत्पादन पर किसका अधिकार होगा?
ग्रामीण समाज में वर्गीय प्रभुत्व कैसे समाप्त होगा?
यह वैचारिक भाषा मुजारा प्रश्न के लिए अत्यंत उपयुक्त थी।
कीर्ति किसान आंदोलन की वर्गीय दृष्टि
कीर्ति कार्यकर्ताओं ने किसान शोषण को नैतिक अन्याय भर नहीं माना।
उन्होंने उसका वर्गीय विश्लेषण किया।
उनकी दृष्टि में वास्तविक उत्पादक किसान और उससे उपज का हिस्सा लेने वाला गैर-कृषक भू-स्वामी दो अलग आर्थिक हितों का प्रतिनिधित्व करते थे।
यहां से मुजारा आंदोलन को नया वैचारिक आधार मिला।
“बिस्वेदार ज्यादा हिस्सा लेता है।”
“बिस्वेदार का यह अधिकार ही शोषणकारी है।”
यही वैचारिक परिवर्तन आंदोलन के उग्र होने की जमीन बना।
कम्युनिस्ट प्रभाव का विस्तार
1930 के दशक में कम्युनिस्ट विचारधारा पंजाब के किसान क्षेत्रों में धीरे-धीरे फैलने लगी।
कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने कई स्तरों पर काम किया—
कर्ज और भूमि प्रश्न पर प्रचार,
और ग्रामीण नेटवर्क का विस्तार।
उनका सबसे बड़ा योगदान आंदोलन को संगठनात्मक निरंतरता देना था।
आकस्मिक विरोध को स्थायी आंदोलन में बदलने के लिए संगठन जरूरी था।
यहीं कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं की भूमिका महत्वपूर्ण हुई।
क्या कम्युनिस्टों ने आंदोलन पैदा किया?
यह ऐतिहासिक रूप से गलत होगा कि मुजारा आंदोलन को केवल कम्युनिस्टों द्वारा उत्पन्न आंदोलन कहा जाए।
भूमि विवाद उनसे बहुत पुराना था।
बिस्वेदारी व्यवस्था उन्नीसवीं सदी से विकसित हो रही थी।
मुजारों का असंतोष और बटाई-विरोध भी कम्युनिस्ट संगठन के व्यापक प्रभाव से पहले मौजूद था।
कम्युनिस्टों ने आंदोलन को पैदा नहीं किया, बल्कि मौजूदा असंतोष को—
किसान सभा और अखिल भारतीय संदर्भ
1936 में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना ने किसान राजनीति को राष्ट्रीय स्तर पर नया मंच दिया।
अब भूमि, किराया, कर्ज, बेदखली और कृषि कर जैसे प्रश्न केवल स्थानीय संघर्ष नहीं रहे।
वे राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा बने।
पटियाला के मुजारों को इससे दो प्रकार का लाभ मिला।
उनकी समस्या को व्यापक किसान प्रश्न से जोड़ने की वैचारिक भाषा मिली।
स्थानीय आंदोलन को अखिल भारतीय किसान नेटवर्क से संपर्क मिला।
इससे आंदोलन का आत्मविश्वास बढ़ा।
मुजारा समितियों का महत्व
1930 के दशक के अंत तक गांवों में मुजारा समितियां अधिक महत्वपूर्ण हो चुकी थीं।
बटाई रोकने का सामूहिक निर्णय लेना,
प्रशासनिक कार्रवाई की सूचना देना,
गिरफ्तार कार्यकर्ताओं के परिवारों की सहायता करना,
और आसपास के गांवों से संपर्क बनाए रखना।
यही समितियां आगे आंदोलन की रीढ़ बनीं।
एक आंदोलन केवल नारों से नहीं चलता।
उसे गांव स्तर पर संगठन चाहिए।
मुजारा समितियों ने यही भूमिका निभाई।
बटाई-विरोध और राजनीतिक अवज्ञा
किसान आंदोलन की रणनीति में बटाई रोकना सबसे महत्वपूर्ण कदम था।
लेकिन अब इसका अर्थ केवल आर्थिक प्रतिरोध नहीं रहा।
प्रजा मंडल की राजनीति ने इसे रियासती सत्ता से जोड़ा।
कीर्ति और कम्युनिस्ट विचारधारा ने इसे वर्ग संघर्ष से जोड़ा।
इसलिए बटाई-विरोध तीन स्तरों पर अर्थपूर्ण हो गया—
आर्थिक स्तर पर बिस्वेदार की आय पर चोट,
कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं और किसान संगठनों का प्रवेश — पंजाब किसान सभा, कीर्ति–कम्युनिस्ट नेटवर्क, गांव समितियां, वर्गीय लामबंदी और मुजारा आंदोलन के संगठनात्मक ढांचे का निर्माण
पेप्सू मुजारा आंदोलन की ताकत केवल उसकी मांगों में नहीं थी, बल्कि उसके संगठनात्मक ढांचे में भी थी। किसी भी किसान संघर्ष के लिए यह पर्याप्त नहीं कि गांवों में असंतोष हो; उसे टिकाऊ राजनीतिक शक्ति में बदलने के लिए स्थानीय समितियां, संपर्क नेटवर्क, प्रचार, अनुशासन, सामूहिक निर्णय और नेतृत्व की आवश्यकता होती है। पटियाला और बाद के पेप्सू क्षेत्र में यह भूमिका मुख्यतः पंजाब किसान सभा, कीर्ति-परंपरा से निकले वामपंथी कार्यकर्ताओं, कम्युनिस्ट संगठनों और गांव-स्तरीय मुजारा समितियों ने निभाई।
यहीं से आंदोलन की प्रकृति निर्णायक रूप से बदली।
पहले किसान बिस्वेदार से व्यक्तिगत स्तर पर उलझ सकता था। बाद में गांव सामूहिक रूप से खड़ा होने लगा। फिर अनेक गांव परस्पर संपर्क में आए। इसके बाद स्थानीय संघर्ष एक व्यापक क्षेत्रीय आंदोलन में बदल गया।
इसलिए इस अध्याय का केंद्रीय प्रश्न है—
मुजारा असंतोष को संगठनात्मक शक्ति में किसने और कैसे बदला?
किसान आंदोलन की संगठित राजनीति का व्यापक संदर्भ
1930 के दशक तक भारत में किसान प्रश्न राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आने लगा था।
अप्रैल 1936 में लखनऊ में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण पड़ाव थी। भूमि-राजस्व, जमींदारी, काश्तकारी अधिकार, ऋणग्रस्तता और बेदखली जैसे प्रश्नों को अब अखिल भारतीय किसान राजनीति में संगठित ढंग से उठाया जाने लगा।
पंजाब में पहले से मौजूद गदर, कीर्ति और मजदूर-किसान धाराओं को इससे व्यापक मंच मिला।
पटियाला के मुजारों के लिए इसका महत्व यह था कि उनकी समस्या अब स्थानीय रियासती विवाद भर नहीं रही।
उनकी मांगें भारत के अन्य हिस्सों में उठ रहे प्रश्नों से मिलती-जुलती दिखाई देने लगीं—
आंध्र और तेलंगाना में भूमि प्रश्न,
और पंजाब में काश्तकारी तथा भू-स्वामित्व।
इससे मुजारा संघर्ष को एक व्यापक वैचारिक संदर्भ मिला।
पंजाब में किसान सभा की राजनीति का विकास एक ही संगठनात्मक रेखा में नहीं हुआ। उसमें वामपंथी, कम्युनिस्ट, कीर्ति और अन्य किसान कार्यकर्ताओं की विभिन्न धाराएं थीं।
फिर भी उसका साझा उद्देश्य था—
किसान को स्थानीय सामाजिक विभाजनों से ऊपर उठाकर कृषि हितों के आधार पर संगठित करना।
पंजाब किसान सभा के कार्यकर्ताओं ने किसानों के बीच—
पटियाला के मुजारों के लिए इनमें सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न था—
कीर्ति आंदोलन ने पंजाब में मजदूर-किसान राजनीति की वैचारिक जमीन पहले ही तैयार कर दी थी।
कीर्ति कार्यकर्ताओं का एक महत्वपूर्ण गुण था कि वे केवल शहरों में राजनीतिक बहस नहीं करते थे; उनका संपर्क ग्रामीण समाज और मेहनतकश वर्गों से था।
इन कार्यकर्ताओं ने किसानों को यह समझाने की कोशिश की कि—
यदि एक गांव में किसान बटाई देता है और दूसरे गांव में भी किसान उसी व्यवस्था से पीड़ित है, तो दोनों का हित समान है।
यहीं से वर्गीय लामबंदी की प्रक्रिया शुरू होती है।
# कम्युनिस्ट संगठन क्यों प्रभावी हुए?
कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं को मुजारा क्षेत्रों में प्रभाव बनाने में इसलिए सफलता मिली क्योंकि उनकी भाषा किसानों के वास्तविक अनुभव से जुड़ती थी।
जमीन जोतने वाला किसान उत्पादन करता है।
बिस्वेदार श्रम किए बिना हिस्सा लेता है।
राज्य इस संबंध को संरक्षण देता है।
इसलिए समस्या केवल बटाई की दर नहीं, बल्कि भूमि-संबंध है।
यह तर्क मुजारा किसान के जीवन से मेल खाता था।
उसे अलग से सिद्धांत समझाने की आवश्यकता कम थी; उसका अपना अनुभव उस सिद्धांत को सत्यापित करता था।
# गांव समिति : आंदोलन की वास्तविक इकाई
मुजारा आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण संगठनात्मक आधार था—
गांव समिति।
बड़े राजनीतिक नेता दिशा दे सकते थे, लेकिन आंदोलन का वास्तविक संचालन गांव स्तर पर होता था।
बेदखली की स्थिति में क्या करना है,
प्रशासन आने पर कौन बातचीत करेगा,
गिरफ्तार कार्यकर्ता के परिवार की सहायता कैसे होगी,
और दूसरे गांवों से संपर्क कौन रखेगा।
यही समितियां आंदोलन को दैनिक जीवन से जोड़ती थीं।
# समिति केवल संगठन नहीं, वैकल्पिक सुरक्षा थी
एक असुरक्षित काश्तकार के लिए गांव समिति केवल राजनीतिक मंच नहीं थी।
अकेला किसान बिस्वेदार के सामने कमजोर था।
किसी मुजारे को अकेले बेदखल नहीं होने देंगे,
इस प्रकार संगठन ने कानूनी कमजोरी को सामूहिक शक्ति से संतुलित किया।
यह पेप्सू आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक थी।
# बटाई-विरोध का सामूहिक अनुशासन
बटाई न देना आसान निर्णय नहीं था।
यदि कुछ किसान विरोध करें और बाकी भुगतान कर दें तो आंदोलन टूट सकता था।
इसलिए गांव समितियों का पहला काम था—
किसान सभा और वामपंथी कार्यकर्ता समझते थे कि आर्थिक अवज्ञा तभी सफल होगी जब बड़ी संख्या में किसान एक साथ रहें।
यही कारण है कि आंदोलन में “व्यक्तिगत समझौता” अक्सर संगठनात्मक कमजोरी माना जाता था।
आंदोलन के विस्तार के लिए गांवों के बीच संपर्क अत्यंत आवश्यक था।
उस समय आधुनिक संचार साधन उपलब्ध नहीं थे।
मेलों और मंडियों के माध्यम से,
गुरुद्वारों और सभाओं के जरिए,
कहां बिस्वेदार ने बल प्रयोग किया?
ऐसी खबरें तेजी से फैलती थीं।
यही नेटवर्क आंदोलन को क्षेत्रीय स्वरूप देता था।
राजनीतिक संगठन के लिए केवल सूचना नहीं, साझा भाषा भी जरूरी होती है।
मुजारा आंदोलन में धीरे-धीरे कुछ केंद्रीय विचार लोकप्रिय हुए—
जमीन जोतने वाले की होनी चाहिए।
यह भाषा सरल थी, लेकिन राजनीतिक रूप से शक्तिशाली।
उसमें जटिल मार्क्सवादी शब्दावली की जरूरत नहीं थी।
किसान अपने जीवन से उसका अर्थ समझ सकता था।
# मुजारा समितियों और किसान सभा का संबंध
गांव समितियां पूर्णतः एक ही केंद्रीय संगठन के नियंत्रण में हों, ऐसा मानना सही नहीं होगा।
विभिन्न क्षेत्रों में संगठनात्मक ढांचे और स्थानीय नेतृत्व अलग हो सकते थे।
लेकिन व्यापक स्तर पर किसान सभा, कीर्ति-परंपरा और कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने मुजारा समितियों को जोड़ने, दिशा देने और राजनीतिक नेटवर्क बनाने में भूमिका निभाई।
यही कारण है कि स्थानीय संघर्ष धीरे-धीरे अलग-थलग नहीं रहे।
वे एक व्यापक किसान आंदोलन में जुड़े।
‘वर्गीय लामबंदी’ का अर्थ केवल मजदूर-किसान भाषण देना नहीं था।
व्यावहारिक स्तर पर इसका अर्थ था—
किसान यह समझे कि उसका मुख्य साझा हित जमीन और उत्पादन से जुड़ा है।
के बावजूद मुजारों की समान समस्या है।
यदि किसान स्वयं को पहले केवल अपनी जाति या गांव का सदस्य समझे तो बड़े क्षेत्रीय आंदोलन का निर्माण कठिन है।
लेकिन यदि वह स्वयं को मुजारा वर्ग का सदस्य समझे तो संगठन की संभावना बढ़ती है।
# जाति और वर्ग का जटिल संबंध
यहां ऐतिहासिक सावधानी आवश्यक है।
किसान समाज जाति से मुक्त नहीं था।
पंजाब के ग्रामीण समाज में जाति, धर्म, बिरादरी और भूमि स्वामित्व परस्पर जुड़े हुए थे।
इसलिए वर्गीय राजनीति का अर्थ यह नहीं कि जातीय अंतर अचानक समाप्त हो गए।
कुछ किसान सामाजिक रूप से अधिक प्रभावशाली समुदायों से आते थे।
भूमिहीन मजदूरों की स्थिति अलग थी।
लेकिन मुजारा पहचान ने अनेक किसानों को एक साझा भूमि-संबंध के आधार पर जोड़ने की क्षमता पैदा की।
यही किसान संगठनों की उपलब्धि थी।
# भूमिहीन मजदूर और मुजारा आंदोलन
मुजारा और खेत मजदूर की स्थिति समान नहीं थी।
उसके पास खेती करने का अधिकार था, भले स्वामित्व न हो।
द्वितीय विश्वयुद्ध और ग्रामीण आर्थिक संकट — 1939–45 की महंगाई, खाद्यान्न दबाव, कृषि लागत, रियासती नीतियां, युद्धकालीन राजनीति और मुजारा आंदोलन के अधिक उग्र होने की परिस्थितियां
सितंबर 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हुआ तो पटियाला के मुजारों का संघर्ष नया नहीं था। बिस्वेदारी व्यवस्था के विरुद्ध असंतोष कई दशकों से मौजूद था; 1920 और 1930 के दशकों में प्रजा मंडल, किसान सभा और कीर्ति-परंपरा के प्रभाव से किसान संगठित भी होने लगे थे; बटाई न देने की कार्रवाइयां सामने आ चुकी थीं। युद्ध ने इसलिए आंदोलन को जन्म नहीं दिया। उसका ऐतिहासिक महत्व दूसरी जगह है—युद्ध ने पहले से मौजूद भूमि-संघर्ष पर महंगाई, वस्तु-अभाव, खाद्य संकट, सरकारी आर्थिक हस्तक्षेप और गहरी राजनीतिक अस्थिरता की नई परत चढ़ा दी।
1939 से 1945 के बीच भारत की अर्थव्यवस्था असाधारण युद्धकालीन दबाव में आई। सैन्य व्यय के विस्तार और मुद्रा-प्रसार ने तेज महंगाई पैदा की। आर्थिक इतिहासकार बी. आर. टॉमलिनसन ने युद्धकालीन भारतीय अर्थव्यवस्था की केंद्रीय समस्या को गंभीर मुद्रास्फीति बताया है, जबकि उनके कृषि इतिहास में 1939 के बाद ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महामंदी की मंदी की जगह युद्धकालीन मांग और तीव्र मौद्रिक विस्तार से पैदा तेज आर्थिक हलचल का उल्लेख मिलता है।
पंजाब भी इस प्रक्रिया से अछूता नहीं था। 1939 को आधार 100 मानने पर लाहौर का खुदरा मूल्य सूचकांक मार्च 1946 तक लगभग 398 तक पहुंच गया था। यह आंकड़ा पटियाला रियासत का प्रत्यक्ष मूल्य-सूचकांक नहीं है, इसलिए उसे पटियाला पर यांत्रिक ढंग से लागू नहीं किया जाना चाहिए; लेकिन यह उस व्यापक पंजाबी आर्थिक वातावरण की तीव्र महंगाई को दर्शाता है जिसमें पटियाला के किसान भी रह रहे थे।
मुजारे के लिए यह संकट और भी गंभीर था, क्योंकि वह बाजार में महंगी वस्तुएं खरीदने वाला उपभोक्ता तो था, लेकिन भूमि पर उसके अधिकार सुरक्षित नहीं थे और उसकी फसल में बिस्वेदार का दावा कायम था। यही युद्धकालीन विरोधाभास पुराने भूमि-संघर्ष को अधिक विस्फोटक बनाने लगा।
महामंदी से युद्धकालीन महंगाई तक
1930 का दशक किसानों के लिए कृषि कीमतों में गिरावट और महामंदी का दशक था। उत्पादन करने वाले किसान को अपनी उपज का कम बाजार मूल्य मिलता था, जबकि ऋण और भूमि से जुड़ी देयताएं बनी रहती थीं।
1939 के बाद स्थिति ने अचानक दूसरा रूप लिया।
अब समस्या केवल कम कीमत की नहीं थी।
युद्धकालीन सरकारी खर्च बढ़ा।
परिवहन और वितरण पर युद्ध का दबाव पड़ा।
कई आवश्यक वस्तुओं की कमी हुई।
और बाजार कीमतें तेजी से ऊपर गईं।
इस परिवर्तन का अर्थ यह नहीं था कि हर कृषक समृद्ध हो गया क्योंकि कृषि कीमतें भी बढ़ सकती थीं। कृषकों के बीच लाभ का वितरण असमान था। जिस स्वामी-कृषक के पास बाजार में बेचने लायक पर्याप्त अधिशेष था, वह ऊंची कीमतों से लाभ उठा सकता था। लेकिन छोटा या असुरक्षित मुजारा, जिसकी फसल का हिस्सा बिस्वेदार को जाता था और जिसे परिवार के लिए बाजार से वस्तुएं खरीदनी पड़ती थीं, उसी परिस्थिति में दबाव महसूस कर सकता था।
यानी युद्धकालीन महंगाई का प्रभाव भूमि-संबंध के अनुसार अलग-अलग था।
# महंगाई किसान के लिए एक जैसी नहीं थी
यहां एक महत्वपूर्ण आर्थिक अंतर समझना आवश्यक है।
किसान यदि गेहूं पैदा करता है और गेहूं का मूल्य बढ़ता है, तो पहली नजर में उसे लाभ होता दिखाई देता है।
लेकिन वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि—
उसमें से बिस्वेदार कितना लेता है,
कितना परिवार के उपभोग में जाता है,
कितना बाजार में बेच सकता है,
और दूसरी आवश्यक वस्तुओं की कीमत कितनी बढ़ी है।
यदि कपड़ा, तेल, नमक, धातु के औजार और अन्य आवश्यक वस्तुएं फसल की तुलना में तेजी से महंगी हों, तो किसान की वास्तविक क्रय-शक्ति गिर सकती है।
मुजारे की स्थिति में यह गणित और कठोर था क्योंकि वह अपनी पूरी फसल का स्वामी नहीं था।
# फसल की बढ़ी कीमत किसके लिए अवसर थी?
युद्धकालीन कृषि बाजार में बढ़ती कीमतें भू-स्वामी के लिए भी महत्वपूर्ण थीं।
यदि बटाई फसल के अनुपात में ली जाती है तो उत्पादन का हिस्सा भूमि-मालिक को सीधे मिलता है।
फसल महंगी होने पर उसी हिस्से का बाजार मूल्य भी बढ़ जाता है।
इसलिए बिस्वेदार के लिए अपनी बटाई बनाए रखना और भी आर्थिक महत्व का हो सकता था।
दूसरी ओर मुजारा सोच सकता था—
युद्ध के कारण वस्तुएं महंगी हैं,
मेरा परिवार महंगाई झेल रहा है,
लेकिन मेरी फसल का बड़ा हिस्सा अभी भी बिस्वेदार ले जाता है।
इस प्रकार मूल्य-वृद्धि ने बटाई-विरोध को समाप्त नहीं किया; कई परिस्थितियों में उसने उसकी राजनीतिक तीव्रता बढ़ाई।
# पंजाब की युद्धकालीन भूमिका
द्वितीय विश्वयुद्ध में पंजाब का महत्व केवल कृषि के कारण नहीं था।
ब्रिटिश भारतीय सेना की सैनिक भर्ती में पंजाब पहले से महत्वपूर्ण क्षेत्र था। कृषि और सैनिक अर्थव्यवस्था के बीच भी गहरे संबंध थे।
और बड़े पैमाने पर सरकारी खरीद।
भारत की कृषि और औद्योगिक सामग्री ने मित्र राष्ट्रों की युद्ध अर्थव्यवस्था को सहारा दिया। युद्ध से पैदा विशाल मांग ने भारतीय औद्योगिक उत्पादन और आपूर्ति प्रणाली को भी प्रभावित किया।
पंजाब जैसे कृषि क्षेत्र के लिए इसका अर्थ था कि गांव अब केवल स्थानीय कृषि बाजार का हिस्सा नहीं था।
वह युद्धकालीन आर्थिक व्यवस्था से जुड़ गया।
# पटियाला एक देशी रियासत था — इसलिए सावधानी आवश्यक
यहां ब्रिटिश पंजाब और पटियाला को एक मान लेना गलत होगा।
पटियाला ब्रिटिश पंजाब का जिला नहीं बल्कि देशी रियासत थी।
भूमि-राजस्व व्यवस्था अलग थी।
लेकिन वह ब्रिटिश साम्राज्य की व्यापक राजनीतिक-सैन्य संरचना से अलग भी नहीं था।
पटियाला के महाराजा और रियासती प्रशासन का ब्रिटिश युद्ध-प्रयास से सहयोग था। इस व्यापक गठबंधन का राजनीतिक अर्थ भी था—राजशाही और औपनिवेशिक सर्वोच्चता का पुराना संबंध युद्धकाल में कायम रहा।
मुजारा और प्रजा मंडल कार्यकर्ता इस संबंध को लोकतांत्रिक राजनीति की दृष्टि से देखते थे।
उनके लिए प्रश्न केवल युद्ध नहीं था—
क्या जनता की सहमति के बिना रियासत की आर्थिक और राजनीतिक शक्ति युद्ध के लिए इस्तेमाल की जाएगी?
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारत के विभिन्न हिस्सों में खाद्य उपलब्धता गंभीर समस्या बनी।
सबसे भयावह उदाहरण 1943 का बंगाल अकाल था, लेकिन खाद्य संकट केवल बंगाल तक सीमित नहीं था। आधुनिक शोध दिखाता है कि युद्ध के शुरुआती वर्षों में पंजाब के कुछ क्षेत्रों में भी खाद्य संकट और कुपोषण संबंधी चिंताएं मौजूद थीं।
पंजाब कुल मिलाकर महत्वपूर्ण कृषि उत्पादक क्षेत्र था, इसलिए बंगाल जैसी सर्वव्यापी स्थिति से तुलना करना अनुचित होगा।
फिर भी युद्धकाल में भोजन का प्रश्न तीन कारणों से महत्वपूर्ण बना—
अनाज पैदा होना और गरीब व्यक्ति को पर्याप्त भोजन उपलब्ध होना एक ही बात नहीं है।
यदि कीमत इतनी बढ़ जाए कि उपभोक्ता खरीद न सके, तो खाद्य उत्पादक क्षेत्र में भी खाद्य असुरक्षा संभव है।
1943 के बंगाल अकाल की मानवीय तबाही पूरे भारतीय राजनीतिक वातावरण पर गहरा प्रभाव डाल रही थी।
उसने युद्धकालीन खाद्य नीति, बाजार नियंत्रण, सरकारी प्राथमिकताओं और वितरण व्यवस्था पर बड़े प्रश्न खड़े किए।
पटियाला मुजारा संघर्ष का सीधा कारण बंगाल अकाल नहीं था।
लेकिन उसने एक व्यापक राजनीतिक संदेश दिया—
1945–47 में आंदोलन का तीव्र होना — मुजारा वार काउंसिल, बिस्वेदारी उन्मूलन की मांग, बटाई रोकने का व्यापक अभियान, बिस्वेदारों का प्रतिरोध, किसान आत्मरक्षा और स्वतंत्रता की पूर्वसंध्या पर पटियाला का भूमि-संकट
1945 से 1947 के बीच का समय पेप्सू मुजारा आंदोलन के इतिहास में निर्णायक संक्रमण का काल था। इससे पहले तक किसानों का संघर्ष बटाई कम कराने, बेदखली रोकने, काश्तकारी सुरक्षा और रियासती दमन का विरोध करने जैसे मुद्दों पर केंद्रित था। परंतु द्वितीय विश्वयुद्ध के अंत, ब्रिटिश सत्ता के क्षरण, रियासतों के भविष्य पर बढ़ती अनिश्चितता और किसान संगठनों की परिपक्वता ने आंदोलन को अधिक उग्र और स्पष्ट राजनीतिक दिशा दी।
अब मूल मांग केवल राहत नहीं थी।
बिस्वेदारी समाप्त होनी चाहिए।
यही वह चरण था जिसमें मुजारा आंदोलन ने भूमि-संबंध की मूल संरचना को चुनौती दी। 1945 में मुजारा वार काउंसिल के गठन, व्यापक बटाई-विरोध, गांव स्तर के संगठन और आत्मरक्षा के बढ़ते रूपों ने इस संघर्ष को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया।
1945 : युद्ध का अंत, लेकिन संघर्ष की शुरुआत नहीं
द्वितीय विश्वयुद्ध के समाप्त होते ही भारतीय राजनीति में यह स्पष्ट होने लगा था कि ब्रिटिश राज का अंत अब दूर नहीं है। यह केवल राष्ट्रीय राजनीति का प्रश्न नहीं था; रियासतों के भीतर भी इस परिवर्तन का गहरा प्रभाव पड़ा।
पटियाला के मुजारों के लिए यह समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण था।
उन्होंने दशकों से बिस्वेदारी का बोझ झेला था।
अब उन्हें लगा कि यदि अंग्रेजी सत्ता समाप्त हो सकती है तो रियासती भूमि-संबंध भी बदले जा सकते हैं।
इसलिए 1945 का वातावरण उम्मीद और अधैर्य, दोनों से भरा था।
मुजारा वार काउंसिल का गठन
1945 में मुजारा वार काउंसिल का गठन आंदोलन के संगठनात्मक इतिहास का महत्वपूर्ण पड़ाव था।
यह नाम अपने आप में आंदोलन के बदलते चरित्र का संकेत देता है। इसका अर्थ यह नहीं था कि 1945 से ही कोई व्यापक सैन्य विद्रोह शुरू हो गया था। अधिक सही अर्थ यह है कि किसानों को यह महसूस होने लगा था कि भूमि-संघर्ष को केवल याचिकाओं और शांतिपूर्ण निवेदन से आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
किसान प्रतिरोध का समन्वय करना,
बिस्वेदारों के दबाव का जवाब देना,
और आवश्यक होने पर आत्मरक्षा की तैयारी करना।
यह आंदोलन की सैन्य नहीं, बल्कि अधिक कठोर राजनीतिक संरचना थी।
बिस्वेदारी के पूर्ण उन्मूलन की मांग
1945 के बाद आंदोलन की भाषा में बड़ा परिवर्तन आया।
यही बदलाव आंदोलन की वैचारिक परिपक्वता को दर्शाता है।
यदि बटाई की दर घटा भी दी जाए, तो भूमि पर बिस्वेदार का मालिकाना अधिकार बना रहता।
यदि बेदखली रोक दी जाए, तो किसान सुरक्षित काश्तकार तो बन सकता था, मालिक नहीं।
इसलिए मुजारा नेतृत्व ने निष्कर्ष निकाला कि समस्या का स्थायी समाधान केवल एक है—
बिस्वेदारी व्यवस्था का अंत और किसान को मालिकाना अधिकार।
बटाई रोकने का व्यापक अभियान
युद्ध के अंतिम वर्षों और 1945 के बाद बटाई-विरोध अधिक संगठित होने लगा।
किसान समितियां गांव-गांव में यह समझाती थीं कि बटाई देना केवल आर्थिक देय नहीं है; वह बिस्वेदार के श्रेष्ठ भूमि-अधिकार को स्वीकार करना भी है।
इसलिए बटाई न देना एक राजनीतिक घोषणा बन गई।
कई क्षेत्रों में किसानों ने सामूहिक निर्णय किए—
और बिस्वेदार के दबाव में व्यक्तिगत समझौता नहीं करेंगे।
यही सामूहिक अनुशासन आंदोलन की वास्तविक शक्ति था।
आर्थिक अवज्ञा से स्वामित्व की चुनौती
बटाई-विरोध का अर्थ केवल भू-स्वामी की आय रोकना नहीं था।
यदि किसान कहता था कि वह फसल का हिस्सा नहीं देगा, तो वह वस्तुतः कह रहा था—
“तुम्हारा इस जमीन पर वह अधिकार स्वीकार नहीं जो तुम दावा करते हो।”
यही कारण है कि बटाई-विरोध धीरे-धीरे भूमि-स्वामित्व के प्रश्न में बदल गया।
इस चरण में आंदोलन की आर्थिक कार्रवाई और राजनीतिक मांग एक-दूसरे में विलीन होने लगीं।
बिस्वेदारों की प्रतिक्रिया
बिस्वेदार वर्ग इस परिवर्तन को निष्क्रिय होकर नहीं देख सकता था।
भूमि पर नियंत्रण कमजोर होना,
गांव में सामाजिक प्रतिष्ठा कम होना,
और अंततः संपत्ति खोने का खतरा।
इसलिए कई क्षेत्रों में बिस्वेदारों ने अपने अधिकार लागू कराने के लिए कठोर उपाय अपनाए।
उपलब्ध शोधों में सशस्त्र समूहों, बलपूर्वक बटाई वसूली और किसान प्रतिरोध को दबाने की कोशिशों का उल्लेख मिलता है।
यहीं से संघर्ष का हिंसक पक्ष अधिक स्पष्ट हुआ।
किसान आत्मरक्षा का विकास
बिस्वेदारों के दबाव और प्रशासनिक कार्रवाई के बीच किसान संगठनों ने आत्मरक्षा पर जोर बढ़ाया।
यह समझना आवश्यक है कि आंदोलन की सशस्त्र दिशा का घोषित औचित्य मुख्यतः रक्षात्मक था—
और भू-स्वामियों के सशस्त्र समूहों का मुकाबला करना।
आगे चलकर यह आत्मरक्षा अधिक संगठित रूप लेगी, विशेषकर 1948 के बाद।
लेकिन उसकी जड़ें 1945–47 में स्पष्ट होने लगी थीं।
गांव एक प्रतिरोध इकाई बना
इस चरण में गांव केवल खेती की जगह नहीं रहा।
वह राजनीतिक संगठन की इकाई बन गया।
किसे प्रशासन से बातचीत करनी है।
इससे किसान की व्यक्तिगत असुरक्षा सामूहिक शक्ति में बदलने लगी।
बिस्वेदार बनाम गांव
यह संघर्ष कई क्षेत्रों में अब व्यक्ति बनाम व्यक्ति नहीं रहा।
एक तरफ बिस्वेदार और उसका सामाजिक-प्रशासनिक प्रभाव था।
यह शक्ति-संतुलन का नया रूप था।
किसान आंदोलन की सबसे बड़ी सफलता यही थी कि उसने बिस्वेदार और काश्तकार के असमान निजी संबंध को सामूहिक राजनीतिक संबंध में बदल दिया।
भूमि पर प्रत्यक्ष कब्जे की राजनीति
इस चरण में कुछ क्षेत्रों में किसानों ने केवल बटाई रोकने से आगे जाकर भूमि पर अपने वास्तविक नियंत्रण को मजबूत करने का प्रयास किया।
यह आंदोलन की दिशा का महत्वपूर्ण संकेत था।
यदि किसान स्वयं को भूमि का वास्तविक अधिकारी मानता है, तो उसका अगला कदम हो सकता है—
भूमि पर प्रत्यक्ष कब्जा बनाए रखना।
आगे के उग्र चरण में यह प्रवृत्ति और स्पष्ट हुई।
प्रजा मंडल और उग्र किसान धारा
1945–47 में प्रजा मंडल और कम्युनिस्ट प्रभाव वाली किसान राजनीति के बीच सहयोग भी था और तनाव भी।
दोनों रियासती निरंकुशता के विरोधी थे।
लेकिन रणनीति पर अंतर बढ़ रहा था।
प्रजा मंडल अधिकतर उत्तरदायी शासन और संवैधानिक बदलाव की दिशा में था।
भूमि-संबंध में तत्काल और मूलभूत परिवर्तन।
यही अंतर आगे स्वतंत्रता के बाद और स्पष्ट होगा।
कांग्रेस और रियासतों की समस्या
1945 के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का ध्यान सत्ता हस्तांतरण और रियासतों के भारत में विलय की ओर तेजी से बढ़ा।
रियासतों की जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों के समर्थन का प्रश्न अब भारतीय संघ के निर्माण से जुड़ गया था।
पटियाला के मुजारों के लिए यह नई परिस्थिति थी।
वे समझ रहे थे कि राजनीतिक व्यवस्था बदल सकती है, लेकिन यह भी स्पष्ट था कि नई राष्ट्रीय सत्ता स्वतः उनकी जमीन का प्रश्न हल नहीं करेगी।
इसलिए आंदोलन का दबाव बनाए रखना जरूरी था।
ब्रिटिश सत्ता का क्षरण और किसान की अपेक्षा
जब कोई पुरानी सत्ता कमजोर होती है, तो नीचे दबे सामाजिक संघर्ष तेजी से ऊपर आते हैं।
ब्रिटिश साम्राज्य की शक्ति कम हो रही थी।
रियासतों की राजनीतिक वैधता पर प्रश्न था।
किसान संगठनों ने इसे ऐतिहासिक अवसर के रूप में देखा।
यदि राजनीतिक सत्ता का पुनर्गठन हो सकता है, तो भूमि-सत्ता का पुनर्गठन भी होना चाहिए।
1946 : किसान राजनीति का व्यापक उभार
1946 पूरे भारत में किसान आंदोलनों का महत्वपूर्ण वर्ष था।
बंगाल में तेभागा संघर्ष उभर रहा था।
हैदराबाद राज्य में तेलंगाना किसान विद्रोह तीखा हो रहा था।
पंजाब और पटियाला में मुजारा प्रश्न भी अधिक उग्र था।
इन आंदोलनों की सामाजिक संरचनाएं अलग थीं, लेकिन एक साझा तत्व था—
वास्तविक उत्पादक किसान अधिक भूमि और उत्पादन अधिकार चाहता था।
तेभागा और मुजारा संघर्ष में समानता
पटियाला का मुजारा धीरे-धीरे इससे भी आगे की मांग कर रहा था—
11 मार्च 1947 का शाही फरमान — पटियाला महाराजा का भूमि-सुधार प्रयास, फरमान की धाराएं, मुजारों को प्रस्तावित अधिकार, बिस्वेदारों के हित, मुआवजा, क्रियान्वयन और आंदोलन ने इसे अधूरा क्यों माना
पेप्सू मुजारा आंदोलन के इतिहास में 11 मार्च 1947 एक निर्णायक तारीख है। इस दिन पटियाला के महाराजा ने फरमान-ए-शाही संख्या 6 जारी किया। इसका मूल उद्देश्य उन भूमि-संबंधों को बदलना था जिनमें बिस्वेदार कानूनी भू-स्वामी और लंबे समय से जमीन जोत रहे मुजारे काश्तकार बने हुए थे।
यह फरमान कई दृष्टियों से असाधारण था।
पहली बार पटियाला राज्य ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि बिस्वेदार और कुछ श्रेणियों के मुजारों के बीच पुराना भू-स्वामी–काश्तकार संबंध उसी रूप में जारी नहीं रह सकता। सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था यह थी कि संबंधित स्थायी काश्तकार को उनकी काश्त वाली भूमि के दो-तिहाई हिस्से का मालिकाना अधिकार दिया जाए और शेष एक-तिहाई हिस्सा भू-स्वामी को मिले। दशकों बाद पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने भी एक मामले में फरमान की यही व्याख्या दर्ज की—स्थायी काश्तकार को 2/3 और भू-स्वामी को 1/3 भूमि।
फिर भी आंदोलन ने इसे अंतिम समाधान नहीं माना।
क्योंकि मुजारों की मांग दो-तिहाई जमीन की नहीं थी। उनका दावा था कि जिस जमीन को उनके परिवार पीढ़ियों से जोतते आए हैं, उस पर पूरा पैतृक मालिकाना अधिकार उनका है। आधुनिक शोध भी बताता है कि 11 मार्च 1947 की घोषणा से काश्तकार को भूमि के केवल एक हिस्से पर मालिकाना अधिकार मिला, इसलिए मुजारों ने प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया और अपनी पैतृक भूमि वापस लेने की मांग जारी रखी।
इस प्रकार शाही फरमान एक साथ दो बातें था—
पटियाला में भूमि-सुधार की ऐतिहासिक शुरुआत, और मुजारा आंदोलन के लिए अधूरा समझौता।
फरमान क्यों आवश्यक हुआ?
11 मार्च 1947 का फरमान अचानक महाराजा की व्यक्तिगत उदारता से पैदा हुआ निर्णय नहीं था।
उसके पीछे लगभग दो दशकों का संगठित किसान दबाव और उससे भी पुराना भूमि-विवाद था।
1930 के दशक में बटाई-विरोध शुरू हो चुका था।
प्रजा मंडल राजनीतिक अधिकारों की मांग उठा रहा था।
कीर्ति और कम्युनिस्ट कार्यकर्ता भूमि-संबंधों को वर्गीय शोषण के प्रश्न के रूप में प्रस्तुत कर रहे थे।
मुजारा समितियां गांवों में संगठित हो रही थीं।
1945 तक मुजारा वार काउंसिल सामने आ चुकी थी।
और 1945–47 में किसान केवल कम बटाई नहीं बल्कि बिस्वेदारी के उन्मूलन की मांग करने लगे थे।
इसलिए महाराजा के सामने प्रश्न केवल किसान कल्याण का नहीं था।
यह राजनीतिक स्थिरता का प्रश्न बन चुका था।
# मार्च 1947 : समय स्वयं महत्वपूर्ण था
फरमान की तारीख को तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों से अलग नहीं किया जा सकता।
मार्च 1947 तक ब्रिटिश भारत एक बड़े राजनीतिक संकट में प्रवेश कर चुका था।
ब्रिटिश सरकार सत्ता हस्तांतरण का निर्णय कर चुकी थी।
पंजाब में सांप्रदायिक तनाव भयावह रूप ले रहा था।
देशी रियासतों का भविष्य भी अनिश्चित था।
पटियाला जैसे शासकों को यह समझ आने लगा था कि पुरानी रियासती राजनीतिक संरचना स्थायी नहीं रहेगी।
ऐसे समय में दशकों पुराना किसान संघर्ष और अधिक गंभीर समस्या था।
यदि राज्य स्वयं नियंत्रित भूमि-सुधार नहीं करता, तो मुजारे नीचे से भूमि संबंध बदलने का प्रयास कर सकते थे।
इसलिए शाही फरमान को ऊपर से नियंत्रित सुधार द्वारा नीचे से उठ रही भूमि-क्रांति को संभालने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है।
बाद के पेप्सू भूमि-कानूनों और न्यायिक निर्णयों में इस आदेश का उल्लेख स्पष्ट रूप से—
शाही फरमान No. 6, dated 11 March 1947
के रूप में मिलता है। 1954 के पेप्सू स्थायी काश्तकार कानून ने भी अपनी परिभाषाओं में इस फरमान के अधीन चल रही partition proceedings को मान्यता दी।
फरमान कोई क्षणिक राजनीतिक घोषणा नहीं रहा।
उसने बाद के भूमि-कानूनों में भी कानूनी विरासत छोड़ी।
भू-स्वामी और स्थायी काश्तकार के पुराने संबंध को समाप्त करना और भूमि को उनके बीच स्वामित्व के रूप में विभाजित करना।
न्यायिक अभिलेख में दर्ज व्याख्या के अनुसार—
स्थायी काश्तकार को काश्त की भूमि का दो-तिहाई हिस्सा मालिकाना अधिकार के रूप में दिया जाना था,
भू-स्वामी को एक-तिहाई हिस्सा मालिकाना अधिकार के रूप में मिलना था।
इससे एक बड़ा सिद्धांत स्वीकार किया गया—
काश्तकार अब सदैव काश्तकार नहीं रहेगा।
यही पेप्सू भूमि-सुधार की दिशा में ऐतिहासिक छलांग थी।
मान लीजिए कोई स्थायी काश्तकार कुल 30 एकड़ भूमि लंबे समय से जोतता था।
फरमान के सिद्धांत के अनुसार भूमि का विभाजन लगभग इस प्रकार होता—
20 एकड़ — काश्तकार को मालिकाना अधिकार
इसके बाद काश्तकार और भू-स्वामी के बीच पहले जैसा बटाई संबंध समाप्त होना था।
दोनों अपने-अपने हिस्से के स्वतंत्र मालिक बन जाते।
यह एक साधारण किराया कटौती नहीं थी।
यह भूमि-स्वामित्व का वास्तविक पुनर्गठन था।
# बटाई संबंध समाप्त करने का प्रयास
फरमान की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यहीं थी।
यदि काश्तकार अपनी दो-तिहाई भूमि का मालिक बन जाए तो उस हिस्से पर उसे बिस्वेदार को बटाई देने की आवश्यकता नहीं रहती।
बेदखली की आशंका से अधिक सुरक्षित भूमिधर।
इस दृष्टि से शाही फरमान अपने समय के लिए काफी महत्वपूर्ण भूमि-सुधार कदम था।
# लेकिन एक-तिहाई जमीन किसकी?
जिस भूमि पर किसान दावा कर रहा था कि वह उसकी पैतृक जमीन है, उसका एक-तिहाई भाग बिस्वेदार को मालिकाना रूप में दिया जा रहा था।
मुजारा इसे न्याय नहीं मानता था।
उसकी दृष्टि में प्रश्न यह नहीं था—
“मुझे कितना प्रतिशत मिलेगा?”
“बिस्वेदार को हमारी पैतृक जमीन में कोई हिस्सा क्यों मिलेगा?”
यही अंतर सरकार और आंदोलन के समाधान में था।
# महाराजा का समाधान : समझौता
रियासती दृष्टि से फरमान एक समझौता था।
दोनों पक्षों के दावे स्वीकार किए गए।
इससे भू-स्वामी–काश्तकार संबंध समाप्त हो सकता था।
और बिस्वेदार को भी पूरी तरह संपत्ति-विहीन नहीं किया जाता।
राज्य की दृष्टि से यह सामाजिक संघर्ष को संतुलित ढंग से समाप्त करने का व्यावहारिक तरीका लग सकता था।
# मुजारा दृष्टि : समझौता क्यों स्वीकार करें?
लेकिन किसान का ऐतिहासिक दावा अलग था।
वह स्वयं को बिस्वेदार की जमीन पर आया किरायेदार नहीं मानता था।
यह जमीन हमारे पूर्वजों की थी।
बिस्वेदारी रियासती नीति से बाद में आई।
यदि ऐसा है तो बिस्वेदार को एक-तिहाई भूमि देना भी अन्याय है।
इसीलिए किसानों ने प्रश्न उठाया—
जिस अधिकार को हम मूलतः अवैध मानते हैं, उसे एक-तिहाई जमीन देकर वैध क्यों करें?
यही कारण था कि आंदोलन ने फरमान को स्वीकार नहीं किया।
# आंदोलन की बढ़ती शक्ति का संकेत
इतिहासकारों ने किसानों द्वारा इस प्रस्ताव को अस्वीकार करने को आंदोलन की बढ़ती राजनीतिक शक्ति का संकेत माना है।
रोंकी राम के अध्ययन में स्पष्ट लिखा है कि महाराजा ने 11 मार्च 1947 को काश्तकार को भूमि के एक हिस्से पर मालिकाना अधिकार देने का फरमान जारी किया, लेकिन काश्तकार ने इसे स्वीकार नहीं किया और अपनी पैतृक भूमि वापस पाने के संकल्प पर टिके रहे।
यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यदि किसान आंदोलन कमजोर होता, तो दो-तिहाई भूमि का स्वामित्व बहुत बड़ी रियायत माना जा सकता था।
लेकिन आंदोलन इतना आत्मविश्वासी हो चुका था कि उसने कहा—
और यही काम भूमि-अभिलेख करते थे।
विभाजन और स्वतंत्रता का मुजारा आंदोलन पर प्रभाव — 1947 की पंजाब हिंसा, जनसंख्या-विस्थापन, शरणार्थी और खाली भूमि का प्रश्न, पटियाला की बदलती राजनीति तथा स्वतंत्रता के बाद भी भूमि-संघर्ष क्यों जारी रहा
15 अगस्त 1947 भारत के राजनीतिक इतिहास में औपनिवेशिक शासन के अंत और स्वतंत्रता की शुरुआत का प्रतीक है, लेकिन पंजाब के ग्रामीण इतिहास में यह तारीख विजय और त्रासदी दोनों के बीच खड़ी दिखाई देती है। जिस समय भारत स्वतंत्र हो रहा था, उसी समय पंजाब विभाजन, सांप्रदायिक हिंसा, अभूतपूर्व जनसंख्या-विस्थापन और संपत्ति के विशाल पुनर्वितरण से गुजर रहा था। लाखों लोग अपने गांव, खेत, मकान और व्यवसाय छोड़कर सीमा के दोनों ओर जा रहे थे। प्रशासन के सामने राहत, सुरक्षा, शरणार्थी पुनर्वास और खाली छोड़ी गई संपत्तियों के प्रबंधन का ऐसा संकट था जिसका स्वतंत्र भारत ने पहले कभी सामना नहीं किया था।
पटियाला और आसपास की रियासतें भी इस उथल-पुथल से अलग नहीं थीं। बल्कि उनकी स्थिति और जटिल थी।
यहां पहले से एक बड़ा भूमि-संघर्ष चल रहा था। मुजारे बिस्वेदारी समाप्त कर अपनी जोती भूमि का मालिकाना अधिकार मांग रहे थे। 11 मार्च 1947 के शाही फरमान ने कुछ स्थायी काश्तकार के लिए भूमि के दो-तिहाई हिस्से पर मालिकाना अधिकार स्वीकार किया था, लेकिन आंदोलन ने इसे अधूरा माना था। कुछ ही महीनों बाद विभाजन ने पूरे पंजाब की भूमि और जनसंख्या संरचना को झकझोर दिया।
अब एक ही भूगोल में कई भूमि प्रश्न एक साथ उपस्थित थे—
पुराने मुजारों का मालिकाना दावा,
पाकिस्तान से आए विस्थापित कृषकों का पुनर्वास,
मुस्लिम प्रवासियों द्वारा छोड़ी गई इवैक्यूई भूमि और संपत्ति,
और पुरानी बिस्वेदारी व्यवस्था का भविष्य।
इसलिए 1947 पेप्सू मुजारा आंदोलन में विराम नहीं, बल्कि संघर्ष की प्रकृति बदलने वाला मोड़ था।
पंजाब का विभाजन : केवल सीमा नहीं, समाज का विखंडन
भारत का विभाजन पंजाब के लिए विशेष रूप से विनाशकारी सिद्ध हुआ।
ब्रिटिश पंजाब को भारत और पाकिस्तान के बीच बांट दिया गया। इसके साथ ही हिंदू, सिख और मुसलमान आबादी का अभूतपूर्व पैमाने पर विस्थापन हुआ। पश्चिमी पंजाब से हिंदू और सिख पूर्व की ओर आए, जबकि पूर्वी पंजाब और अनेक रियासती क्षेत्रों से मुसलमान पश्चिम की ओर चले गए।
यह कोई सुव्यवस्थित प्रशासनिक स्थानांतरण नहीं था।
महिलाओं के अपहरण और यौन हिंसा की भयावह घटनाएं हुईं।
लाखों परिवारों की संपत्ति पीछे छूट गई।
इतिहासकार इयान कॉपलैंड ने 1947 के वसंत, ग्रीष्म और शरद में पंजाब की स्थिति को विशाल मानवीय तबाही के रूप में वर्णित किया है और रियासती पंजाब, विशेषकर पटियाला जैसे सिख-शासित राज्यों की भूमिका को भी इस व्यापक हिंसा के अध्ययन में शामिल किया है।
इसलिए मुजारा आंदोलन का इतिहास 1947 के बाद पढ़ते समय विभाजन की हिंसा को केवल राष्ट्रीय पृष्ठभूमि मानना पर्याप्त नहीं होगा।
उसने गांवों की जनसांख्यिकी, जमीन की उपलब्धता, प्रशासनिक प्राथमिकताओं और राजनीतिक गठबंधनों तक को बदल दिया।
1947 की हिंसा के संबंध में किसी एक समुदाय को सामूहिक अपराधी और दूसरे को केवल पीड़ित के रूप में प्रस्तुत करना इतिहास को विकृत करेगा।
पूर्वी और पश्चिमी पंजाब दोनों में भयानक हिंसा हुई।
और कभी-कभी रियासती तंत्र के तत्व
अलग-अलग भूमिकाओं में सामने आए।
पटियाला और अन्य पूर्वी पंजाब रियासतों में मुस्लिम आबादी के पलायन और हिंसा पर भी अकादमिक शोध हुआ है। लेकिन प्रत्येक क्षेत्र की परिस्थिति अलग थी। मलेरकोटला जैसे राज्य का अनुभव पड़ोसी क्षेत्रों से भिन्न था, जिसे स्थानीय सत्ता-संरचना के महत्व के उदाहरण के रूप में इतिहासकारों ने रेखांकित किया है।
इसलिए मुजारा आंदोलन के अध्ययन में विभाजन को सांप्रदायिक आरोप-प्रत्यारोप में बदलने के बजाय भूमि और राज्य-संरचना पर उसके प्रभाव के संदर्भ में देखना अधिक उपयोगी है।
# पटियाला में शरणार्थियों का प्रवेश स्वतंत्रता से पहले ही शुरू हो गया था
पश्चिमी पंजाब में हिंसा बढ़ने के साथ पटियाला रियासत ने बड़ी संख्या में गैर-मुस्लिम विस्थापितों को आश्रय दिया।
पुनर्वास संबंधी एक अध्ययन के अनुसार महाराजा यादविंद्र सिंह द्वारा शरण देने की घोषणा के बाद मार्च से जुलाई 1947 के बीच लगभग 50,000 शरणार्थी पटियाला पहुंचे थे। इसी समय फरीदकोट ने भी बड़ी संख्या में शरणार्थियों को बसाने की पेशकश की और नाभा तथा कपूरथला जैसे राज्यों में राहत की व्यवस्थाएं की गईं।
अर्थात शरणार्थी समस्या 15 अगस्त के बाद अचानक शुरू नहीं हुई।
वह कई महीने पहले ही रियासती प्रशासन की प्राथमिकता बन चुकी थी।
# अगस्त 1947 के बाद विस्थापन का विस्फोट
विभाजन के बाद स्थिति कई गुना बढ़ गई।
पश्चिमी पंजाब से आने वाले कृषक परिवारों ने केवल घर नहीं खोए थे।
और कई पीढ़ियों की आर्थिक संपत्ति।
दूसरी ओर भारत वाले पंजाब और पेप्सू क्षेत्रों से पाकिस्तान जाने वाले मुसलमान भी अपने खेत और संपत्तियां छोड़ गए।
इससे पहली बार सरकार के सामने विशाल पैमाने पर छोड़ी गई कृषि भूमि का प्रशासनिक प्रश्न पैदा हुआ।
जो संपत्ति पाकिस्तान चले गए लोगों द्वारा भारत में छोड़ी गई, उसे बाद की कानूनी भाषा में evacuee संपत्ति, अर्थात इवैक्यूई संपत्ति कहा गया।
इसी तरह पाकिस्तान में हिंदू और सिख विस्थापित बड़ी कृषि संपत्ति पीछे छोड़ आए थे।
भारत सरकार और पंजाब प्रशासन के सामने प्रश्न था—
इन विस्थापित कृषकों को जीविका के लिए जमीन कहां दी जाए?
समस्या और कठिन इसलिए थी क्योंकि दोनों ओर छोड़ी गई कृषि भूमि की मात्रा समान नहीं थी।
1957 के सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय में दर्ज सरकारी आंकड़ों के अनुसार पश्चिमी पंजाब से भारत आए विस्थापित लोगों ने पाकिस्तान में लगभग 67 लाख एकड़ भूमि छोड़ी थी, जबकि पूर्वी पंजाब और पेप्सू से गए मुस्लिम evacuees ने लगभग 47 लाख एकड़ भूमि छोड़ी। इस तरह पुनर्वास के लिए लगभग 20 लाख एकड़ का अंतर था।
इस तथ्य का पंजाब की राजनीति पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा।
हर विस्थापित कृषक को पाकिस्तान में छोड़ी गई उतनी ही जमीन भारत में देना संभव नहीं था।
इसलिए पुनर्वास स्वयं भूमि-वितरण की विशाल प्रशासनिक परियोजना बन गया।
# सितंबर 1947 : खाली कृषि भूमि के अस्थायी आवंटन की शुरुआत
संकट इतना तीखा था कि सरकार ने शीघ्र कदम उठाए।
सर्वोच्च न्यायालय के रिकॉर्ड के अनुसार 15 सितंबर 1947 को पूर्वी पंजाब सरकार ने मुस्लिम evacuees द्वारा छोड़ी गई कृषि भूमि शरणार्थी किसानों को 1947–48 की खरीफ और रबी खेती के लिए आवंटित करने का निर्णय लिया।
इसके पीछे दो तत्काल उद्देश्य थे—
शरणार्थी कृषकों को आजीविका देना,
कृषि उत्पादन में भारी गिरावट रोकना।
यह नीति अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
विभाजन के तुरंत बाद जमीन केवल संपत्ति नहीं रही थी।
वह पुनर्वास और खाद्य सुरक्षा दोनों का साधन बन गई।
# पेप्सू बनने से पहले ही पुनर्वास का दबाव
1947 के अंत तक पटियाला, नाभा, फरीदकोट, कपूरथला और अन्य रियासतों के सामने शरणार्थी पुनर्वास विशाल प्रशासनिक कार्य बन चुका था।
3 दिसंबर 1947 को जालंधर में पूर्वी पंजाब और पूर्वी पंजाब की रियासतों के बीच समन्वय के लिए सम्मेलन भी आयोजित किया गया, जिसके बाद पुनर्वास संबंधी साझा संस्थागत व्यवस्था आगे बढ़ी।
यह तथ्य भविष्य के पेप्सू को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
विभाजन का विशाल पुनर्वास संकट।
# मुजारा प्रश्न के बीच नया दावेदार : विस्थापित कृषक
1948 में पेप्सू का निर्माण और किसान प्रश्न — आठ रियासतों का एकीकरण, नई सरकार के सामने विरासत में मिला मुजारा–बिस्वेदार विवाद, शरणार्थी पुनर्वास और भूमि-सुधार की चुनौती, प्रशासनिक संक्रमण तथा किसान आंदोलन का पटियाला से पेप्सू आंदोलन में रूपांतरण
15 जुलाई 1948 को पटियाला and पूर्वी पंजाब रियासतें संघ — पेप्सू के औपचारिक गठन के साथ पंजाब की रियासती राजनीति का एक नया अध्याय शुरू हुआ। पटियाला, नाभा, जींद, फरीदकोट, कपूरथला, मलेरकोटला, नालागढ़ और कलसिया—इन आठ रियासतों को मिलाकर बनी इस नई इकाई का उद्देश्य प्रशासनिक एकीकरण, राजनीतिक स्थिरता और स्वतंत्र भारत की संवैधानिक व्यवस्था की दिशा में संक्रमण था।
लेकिन पेप्सू को एक खाली राजनीतिक मैदान नहीं मिला।
रियासती प्रशासन की अलग-अलग परंपराएं,
विभाजन और शरणार्थी पुनर्वास का विशाल संकट,
मुजारा–बिस्वेदार भूमि-संघर्ष।
यही कारण है कि पेप्सू का निर्माण केवल प्रशासनिक पुनर्गठन नहीं था। किसान इतिहास की दृष्टि से उसका अर्थ था कि पटियाला रियासत का पुराना भूमि-विवाद अब एक नए भारतीय राज्य की राजनीतिक समस्या बन गया।
5 मई 1948 का Covenant और नई इकाई की दिशा
आठ रियासतों के शासकों ने 5 मई 1948 को विलय संबंधी Covenant पर हस्ताक्षर किए। इसके आधार पर अलग-अलग रियासतों को एक संघीय इकाई में संगठित किया गया।
इस प्रक्रिया का व्यापक राष्ट्रीय संदर्भ था।
स्वतंत्र भारत के सामने सैकड़ों देशी रियासतों को छोटे-छोटे राजनीतिक द्वीपों के रूप में बनाए रखना संभव नहीं था। इसलिए कई क्षेत्रों में रियासतों को मिलाकर बड़े और अधिक प्रशासनिक रूप से सक्षम संघ बनाए गए।
पेप्सू इसी नीति का परिणाम था।
15 जुलाई 1948 को इसे औपचारिक रूप से अस्तित्व में लाया गया। पटियाला के महाराजा यादविंद्र सिंह इसके राजप्रमुख बने और पटियाला इसकी राजधानी बनी।
इस राजनीतिक परिवर्तन का प्रतीकात्मक अर्थ गहरा था।
महाराजा अब पूर्ण रियासती शासक नहीं थे; वे भारतीय संघ के भीतर एक सीमित संवैधानिक पद की ओर बढ़ रहे थे।
लेकिन गांवों में भूमि-सत्ता का प्रश्न अभी खुला था।
# आठ रियासतें, आठ प्रशासनिक विरासतें
पेप्सू के सामने पहली चुनौती थी—
आठों रियासतों में भूमि और राजस्व व्यवस्था बिल्कुल एक जैसी नहीं थी।
अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हो सकते थे—
इसलिए नई सरकार के लिए भूमि-सुधार कानून बनाना साधारण कार्य नहीं था।
उसे पहले यह तय करना था कि एक राज्य में कई अलग कानूनी परंपराओं को कैसे समेटा जाए।
# पटियाला का मुजारा प्रश्न पेप्सू का प्रश्न कैसे बना?
पेप्सू बनने से पहले आंदोलन मुख्यतः पटियाला रियासत के संदर्भ में जाना जाता था।
लेकिन नई राजनीतिक इकाई बनने के बाद उसकी प्रकृति बदल गई।
अब भूमि-सुधार का प्रश्न केवल महाराजा के फरमान से हल नहीं होना था।
यहीं से पटियाला मुजारा आंदोलन, पेप्सू मुजारा आंदोलन में रूपांतरित होने लगा।
# नया राज्य, पुराना भूमि-संघर्ष
राजनीतिक सीमा बदलने से खेत पर मालिकाना अधिकार नहीं बदलता।
इसलिए पेप्सू बनने के बाद भी आंदोलन जारी रहा।
वास्तव में अब किसान का तर्क और मजबूत था—
यदि आठ रियासतों को एक नई लोकतांत्रिक इकाई में बदला जा सकता है, तो पुरानी भूमि व्यवस्था क्यों नहीं बदली जा सकती?
# 11 मार्च 1947 का फरमान नई सरकार की विरासत बना
पटियाला महाराजा का 11 मार्च 1947 का शाही फरमान पेप्सू सरकार के सामने मौजूद भूमि-सुधार का सबसे महत्वपूर्ण पूर्ववर्ती था।
उसमें कुछ स्थायी काश्तकार को उनकी जोती भूमि के दो-तिहाई हिस्से पर मालिकाना अधिकार देने का सिद्धांत स्वीकार किया गया था।
और आंदोलन पूरा मालिकाना अधिकार मांग रहा था।
इसलिए पेप्सू सरकार को उस फरमान का प्रशासनिक और कानूनी उत्तराधिकारी बनना पड़ा।
# पेप्सू सरकार के सामने किसान प्रश्न की चार परतें
नई सरकार के सामने भूमि-सुधार का प्रश्न कम-से-कम चार स्तरों पर था।
पहला — बिस्वेदारी
पुराने भू-स्वामी और मुजारों का संबंध।
दूसरा — स्थायी काश्तकार
किन काश्तकारों को स्थायी अधिकार प्राप्त थे?
तीसरा — इच्छाधीन काश्तकार
उनकी स्थिति अधिक असुरक्षित थी और वे भूमि-सुधार से बाहर छूट सकते थे।
चौथा — इवैक्यूई और शरणार्थी भूमि
विभाजन से पैदा नई भूमि-संरचना।
इन सभी को एक ही कानून से सरलता से नहीं सुलझाया जा सकता था।
# शरणार्थी पुनर्वास नई सरकार की विशाल चुनौती
पेप्सू का निर्माण विभाजन के केवल ग्यारह महीने बाद हुआ था।
इसलिए नई सरकार का बड़ा संसाधन शरणार्थी पुनर्वास में लगा हुआ था।
पाकिस्तान से आए विस्थापित परिवारों को चाहिए था—
इसी समय पुराने मुजारे मालिकाना अधिकार मांग रहे थे।
अर्थात सरकार पर दो दिशाओं से भूमि का दबाव था।
# दो अलग किसान, दो अलग अधिकार
पेप्सू ग्रामीण राजनीति में अब दो बड़ी कृषक श्रेणियां दिखाई देती थीं।
“मैं इस जमीन को पीढ़ियों से जोत रहा हूं।”
“मैं पाकिस्तान में अपनी जमीन खोकर आया हूं।”
दोनों के दावे न्यायसंगत हो सकते थे।
इसलिए पुनर्वास और भूमि-सुधार को अलग-अलग प्रशासनिक श्रेणियों में संभालना पड़ा।
# इवैक्यूई भूमि को अलग रखने की नीति
आगे 1952 की पेप्सू कृषि सुधार Committee ने भी यह माना कि evacuee भूमि को सामान्य काश्तकारी सुधार से अलग देखा जाना चाहिए।
कारण यह था कि उस भूमि पर पहले विस्थापित allottees के अधिकार स्थिर करने थे।
यानी सरकार मुजारा सुधार करते समय उस जमीन को सामान्य भू-स्वामी–काश्तकार विवाद की तरह नहीं देख सकती थी।
इससे पेप्सू की भूमि नीति की जटिलता स्पष्ट होती है।
# प्रशासनिक संक्रमण और कानून की समस्या
नई सरकार के सामने केवल नीति बनाना कठिन नहीं था।
उसे प्रशासनिक मशीनरी भी एकीकृत करनी थी।
आठ रियासतों के अधिकारियों की पद्धतियां अलग थीं।
भूमि-अभिलेखों के प्रारूप अलग हो सकते थे।
पुराने फरमान और अध्यादेश अलग थे।
राजस्व अधिकारियों की प्रशिक्षण-परंपरा अलग थी।
इसलिए भूमि-सुधार के लिए आवश्यक पहली शर्त थी—
यही प्रश्न बाद के लगभग हर भूमि-विवाद में केंद्रीय बने।
# पटवारी की भूमिका और भी बढ़ी
पेप्सू बनने के बाद भूमि-अभिलेख की प्रशासनिक शक्ति कम नहीं हुई; और बढ़ गई।
क्योंकि अब पुराने रियासती रिकॉर्ड को नई राज्य-व्यवस्था में समाहित करना था।
यदि किसान का नाम वास्तविक कृषक के रूप में दर्ज न हो तो वह अपने अधिकार से वंचित हो सकता था।
इसलिए गिरदावरी और जमाबंदी की प्रविष्टियां आंदोलन के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बनी रहीं।
# भूमि-सुधार बनाम कानून-व्यवस्था
पेप्सू सरकार के सामने एक और दुविधा थी।
यदि मुजारे बटाई देना बंद करें और जमीन न छोड़ें तो प्रशासन इसे भूमि-सुधार की मांग के रूप में देख सकता था।
लेकिन वही कार्रवाई तत्कालीन कानून के तहत मालिकाना अधिकार का उल्लंघन भी मानी जा सकती थी।
यानी सरकार के भीतर दो दृष्टियां टकराती थीं—
यही टकराव आगे पुलिस कार्रवाई और राजनीतिक समझौते दोनों में दिखाई देगा।
# किसान आंदोलन अब नई राज्य-सत्ता को परख रहा था
रियासतकाल में किसान का विरोध महाराजा और उसके प्रशासन से था।
नई पेप्सू सरकार किसके साथ खड़ी होगी?
यदि वह पुराने बिस्वेदार अधिकार लागू करती है तो मुजारे को क्या अंतर महसूस होगा?
यदि वह भूमि-सुधार करती है तो उसका लोकतांत्रिक चरित्र मजबूत होगा।
इसलिए पेप्सू का किसान प्रश्न नई राज्य-व्यवस्था की वैधता की परीक्षा भी था।
पेप्सू तुरंत पूर्ण संसदीय लोकतंत्र नहीं बन गया।
भारतीय संविधान निर्माणाधीन था।
प्रतिनिधि संस्थाओं की मांग थी।
प्रजा मंडल और कांग्रेस राजनीति सक्रिय थी।
इसलिए किसान अब भविष्य के मतदाता के रूप में भी महत्वपूर्ण हो रहा था।
यही सत्ता-संतुलन का ऐतिहासिक परिवर्तन था।
लाल कम्युनिस्ट पार्टी हिंद यूनियन और तेजा सिंह स्वतंत्र — 1948 में संगठन का गठन, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से मतभेद, गदर–कीर्ति पृष्ठभूमि, मुजारा आंदोलन में भूमिका, सशस्त्र आत्मरक्षा की रणनीति और पेप्सू की किसान राजनीति पर प्रभाव
पेप्सू मुजारा आंदोलन के इतिहास में 1948 केवल पेप्सू राज्य के गठन का वर्ष नहीं था। इसी वर्ष पंजाब के वामपंथी आंदोलन में एक ऐसा संगठन सामने आया जिसने मुजारा संघर्ष के उग्र चरण को नई दिशा दी—लाल कम्युनिस्ट पार्टी हिंद यूनियन। इसके प्रमुख नेता थे तेजा सिंह स्वतंत्र।
मुजारा आंदोलन इस पार्टी से बहुत पुराना था। उसकी जड़ें बिस्वेदारी व्यवस्था, 1920–30 के दशक की प्रजा मंडल राजनीति, किसान सभा, कीर्ति आंदोलन और लंबे बटाई-विरोध में थीं। लेकिन लाल कम्युनिस्ट पार्टी के प्रवेश ने संघर्ष को अधिक संगठित, अधिक युद्धशील और कुछ क्षेत्रों में सशस्त्र आत्मरक्षा की दिशा में आगे बढ़ाया। आधुनिक शोध इसी कारण 1948 के बाद के चरण को आंदोलन की नई ऊंचाई मानता है।
इस संगठन का महत्व केवल इतना नहीं था कि उसने किसानों के लिए हथियारबंद जत्थे बनाए। उसकी वास्तविक ऐतिहासिक भूमिका तीन स्तरों पर थी—
गदर–कीर्ति की पुरानी क्रांतिकारी परंपरा को स्वतंत्र भारत की किसान राजनीति से जोड़ना, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अलग एक वैकल्पिक कम्युनिस्ट धारा खड़ी करना, और मुजारा आंदोलन में भूमि-अधिकार के प्रश्न को प्रत्यक्ष संघर्ष से जोड़ देना।
5 जनवरी 1948 : नकोदर में नई पार्टी
लाल कम्युनिस्ट पार्टी हिंद यूनियन की स्थापना 5 जनवरी 1948 को जालंधर जिले के नकोदर में हुई। उसका संस्थापक सम्मेलन 5 से 8 जनवरी तक चला।
उपलब्ध विवरणों के अनुसार सम्मेलन में लगभग 300 प्रतिनिधि शामिल हुए, जो करीब 1,500 सदस्यों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। यह संगठन भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के शुरुआती बड़े विभाजनों में से एक था।
यह संख्या अपने आप में महत्वपूर्ण थी।
यह कोई दो-चार असंतुष्ट नेताओं का छोटा गुट नहीं था। इसके पीछे पंजाब के पुराने कीर्ति और गदर-प्रभावित कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं का एक पर्याप्त संगठनात्मक आधार मौजूद था।
नकोदर सम्मेलन में केंद्रीय समिति गठित की गई।
उपलब्ध अकादमिक विवरण के अनुसार इसमें प्रमुख रूप से शामिल थे—
तेजा सिंह स्वतंत्र — महासचिव,
पंजाब राज्य समिति में चेन सिंह चेन सहित कई अन्य कार्यकर्ता शामिल थे।
पार्टी ने ‘लाल झंडा’ नाम से पाक्षिक पत्र भी निकाला, जो पंजाबी, हिंदी और अंग्रेजी में प्रकाशित होता था। तेजा सिंह स्वतंत्र इसके संपादक थे।
इससे स्पष्ट है कि पार्टी केवल भूमिगत लड़ाकू संरचना नहीं थी।
# तेजा सिंह स्वतंत्र कौन थे?
तेजा सिंह स्वतंत्र पंजाब की क्रांतिकारी और कम्युनिस्ट राजनीति के महत्वपूर्ण व्यक्तित्व थे।
उनकी राजनीतिक पहचान कई परंपराओं के मिलन से बनी—
गदर आंदोलन की क्रांतिकारी स्मृति,
कीर्ति आंदोलन की मजदूर-किसान राजनीति,
मार्क्सवादी वर्गीय विश्लेषण,
और पंजाब के ग्रामीण किसान संघर्ष।
उनकी राजनीति में केवल सैद्धांतिक साम्यवाद नहीं था; उसमें पंजाब की पुरानी क्रांतिकारी संस्कृति की स्पष्ट छाप थी।
इसी कारण ‘स्वतंत्र’ केवल उनका नाम नहीं बल्कि उनकी राजनीतिक छवि का हिस्सा बन गया।
लाल कम्युनिस्ट पार्टी को समझने के लिए गदर आंदोलन की विरासत विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
गदर आंदोलन की राजनीतिक संस्कृति में थे—
साम्राज्यवादी शासन का पूर्ण अस्वीकार,
कीर्ति आंदोलन ने बाद में इसी परंपरा को समाजवादी और वर्गीय राजनीति से जोड़ा।
लाल कम्युनिस्ट पार्टी के अनेक कार्यकर्ता इसी गदर–कीर्ति सामाजिक और राजनीतिक संसार से आए थे। समकालीन इतिहासलेखन भी उसे मुख्यतः ऐसे कीर्ति कम्युनिस्टों का संगठन बताता है जिनकी जड़ें गदर आंदोलन में थीं।
# कीर्ति और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का जटिल संबंध
कीर्ति कार्यकर्ता भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़े अवश्य, लेकिन उनका भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी नेतृत्व के साथ संबंध हमेशा सहज नहीं रहा।
उनकी राजनीतिक संस्कृति अधिक स्वायत्त, ग्रामीण और प्रत्यक्ष संघर्ष वाली थी।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व अखिल भारतीय रणनीति तय करता था, जबकि पंजाब के कई कीर्ति कार्यकर्ता स्थानीय परिस्थितियों, किसान आंदोलन और अपनी क्रांतिकारी परंपरा को अधिक महत्व देते थे।
यही तनाव 1948 के विभाजन की पृष्ठभूमि बना।
# भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से मतभेद किन प्रश्नों पर थे?
आधुनिक शोध लाल कम्युनिस्ट पार्टी के गठन के पीछे कई राजनीतिक मतभेदों की ओर संकेत करता है।
भारत के विभाजन के प्रश्न पर मतभेद,
किसान आंदोलन को समर्थन देने की रणनीति,
पार्टी नेतृत्व की केंद्रीय लाइन के प्रति कीर्ति कार्यकर्ताओं का असंतोष।
रोंकी राम के अध्ययन में लाल पार्टी को पूर्व गदरी और कीर्ति कम्युनिस्टों का ऐसा उग्र अलग समूह बताया गया है जो विभाजन और किसान संघर्ष को लेकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की आधिकारिक लाइन से सहमत नहीं था।
इसलिए विभाजन केवल संगठनात्मक अनुशासन का विवाद नहीं था।
उसके पीछे राजनीतिक रणनीति का प्रश्न था—
स्वतंत्र भारत की नई परिस्थितियों में क्रांति और किसान संघर्ष का रास्ता क्या हो?
# एक ऐतिहासिक सावधानी : भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी स्वयं भी 1948 में उग्र हो रही थी
यहां एक दिलचस्प ऐतिहासिक तथ्य ध्यान देने योग्य है।
1948 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी स्वयं भी बी. टी. रणदिवे के दौर में अधिक उग्र क्रांतिकारी रणनीति की ओर जा रही थी।
इसलिए लाल पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के बीच अंतर को केवल इस सरल सूत्र में नहीं रखा जा सकता कि—
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी शांतिपूर्ण थी और लाल पार्टी सशस्त्र।
वास्तविक मतभेद अधिक जटिल थे—
पंजाब की विशिष्ट कीर्ति परंपरा,
और केंद्रीय नेतृत्व से संबंध।
इतिहास की दृष्टि से यह अंतर बनाए रखना जरूरी है।
लाल कम्युनिस्ट पार्टी ने अधिक उग्र सामाजिक परिवर्तन की नीति अपनाई।
उसने पुराने कीर्ति नेटवर्क को सक्रिय किया और प्रत्यक्ष किसान संघर्ष का समर्थन किया। उपलब्ध विवरण उसे सशस्त्र क्रांति की पक्षधर पार्टी के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
लेकिन पेप्सू में उसकी राजनीतिक शक्ति का वास्तविक आधार किसी अमूर्त क्रांति की तैयारी से अधिक ठोस था—
यहीं उसे वह जनाधार मिला जो सामान्य राजनीतिक प्रचार से प्राप्त नहीं हो सकता था।
# पेप्सू क्यों बना लाल पार्टी का प्रमुख क्षेत्र?
लाल पार्टी पंजाब के सभी हिस्सों में समान रूप से शक्तिशाली नहीं थी।
उसकी विशेष ताकत पेप्सू के मुजारा क्षेत्रों में थी।
और सशस्त्र आत्मरक्षा की आवश्यकता
लाल पार्टी को आंदोलन खड़ा नहीं करना पड़ा।
उसे पहले से चल रहे आंदोलन को अधिक संगठित राजनीतिक और सैन्य दिशा देनी थी।
उपलब्ध विवरणों के अनुसार पंजाब में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की तुलना में लाल कम्युनिस्ट पार्टी का आधार गरीब किसानों के बीच अधिक मजबूत था।
पेप्सू के संदर्भ में यह तथ्य महत्वपूर्ण है।
क्योंकि मुजारा आंदोलन का मुख्य सामाजिक प्रश्न ही भूमि-अधिकार था।
जिस किसान के पास अपनी जमीन नहीं थी लेकिन वह पीढ़ियों से दूसरे के अभिलेखीय स्वामित्व वाली भूमि जोत रहा था, उसे लाल पार्टी की उग्र भूमि-राजनीति आकर्षक लग सकती थी।
# आंदोलन की मांग और लाल पार्टी की राजनीति का मेल
लाल पार्टी इसे वर्गीय आर्थिक प्रतिरोध के रूप में देखती थी।
लाल पार्टी उसे संगठित आत्मरक्षा का प्रश्न मानती थी।
इसलिए दोनों के बीच वैचारिक संपर्क स्वाभाविक था।
लाल पार्टी ने मुजारों को बड़े पैमाने पर संगठित सभाओं में लामबंद किया और किसानों को भू-स्वामी के साथ फसल बांटने से इनकार करने के लिए प्रेरित किया।
इस कार्रवाई का लक्ष्य दोहरा था।
आंदोलन का संगठन, नेतृत्व और ग्रामीण नेटवर्क — गांव मुजारा समितियां, क्षेत्रीय कमेटियां, किसान जत्थे, संदेश और रसद व्यवस्था, स्थानीय नेतृत्व, महिलाओं और परिवारों का सहयोग तथा सैकड़ों गांवों को जोड़ने वाली आंदोलनकारी संरचना
पेप्सू मुजारा आंदोलन की सबसे बड़ी शक्ति केवल उसकी मांगों में नहीं थी, बल्कि उस ग्रामीण संगठनात्मक ढांचे में थी जिसने बिखरे हुए काश्तकारों को एक दीर्घकालिक राजनीतिक शक्ति में बदल दिया। किसी भी किसान आंदोलन का वास्तविक आधार उसके बड़े नेता नहीं, बल्कि गांव स्तर पर बने छोटे-छोटे संगठन, संदेश तंत्र, संसाधन जुटाने की क्षमता, सामाजिक अनुशासन और स्थानीय नेतृत्व होते हैं। पेप्सू में भी यही हुआ।
मुजारा किसान शुरू में अपने बिस्वेदार के सामने एक अकेला काश्तकार था। उसका सबसे बड़ा भय था बेदखली। लेकिन जैसे-जैसे गांव समितियां बनीं, क्षेत्रीय संपर्क विकसित हुए और किसान जत्थों तथा वामपंथी संगठनों ने ग्रामीण नेटवर्क खड़ा किया, शक्ति-संतुलन बदलने लगा।
अब किसी एक किसान को हटाने की कोशिश पूरे गांव की समस्या बन सकती थी।
किसी एक गांव पर पुलिस कार्रवाई आसपास के गांवों को सक्रिय कर सकती थी।
किसी किसान नेता की गिरफ्तारी पर उसके परिवार की मदद दूसरे लोग कर सकते थे।
और बटाई न देने का निर्णय व्यक्तिगत जोखिम न रहकर सामूहिक रणनीति बन गया।
इसी संगठनात्मक क्षमता ने आंदोलन को सैकड़ों गांवों तक फैलने और वर्षों तक टिके रहने की शक्ति दी।
गांव समिति : आंदोलन की मूल इकाई
मुजारा आंदोलन की सबसे बुनियादी इकाई थी—
यह किसी आधुनिक राजनीतिक पार्टी की शाखा मात्र नहीं थी। उसका कार्य गांव के वास्तविक भूमि-संघर्ष को संभालना था।
कौन किसान किस बिस्वेदार की जमीन जोत रहा है,
किसे बेदखली का नोटिस मिला है,
और कौन समझौता करने की कोशिश कर रहा है।
इसलिए गांव समिति आंदोलन का प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों केंद्र थी।
# स्थानीय जानकारी ही आंदोलन की ताकत थी
बड़े नेता जमीन की समग्र नीति समझ सकते थे, लेकिन गांव का वास्तविक संघर्ष स्थानीय था।
किस खेत पर कौन खेती करता है?
किसने कितने वर्षों से कब्जा रखा है?
किस बिस्वेदार का प्रभाव किन अधिकारियों पर है?
इन सवालों का उत्तर स्थानीय नेता जानते थे।
इसलिए आंदोलन की जमीनी शक्ति का आधार था—
यही ज्ञान कानूनी संघर्ष, सामाजिक प्रतिरोध और सामूहिक लामबंदी तीनों में उपयोगी हुआ।
# सामूहिक निर्णय की संस्कृति
गांव समितियों ने किसान प्रतिरोध को व्यक्तिगत निर्णय से सामूहिक निर्णय में बदला।
यदि किसी एक किसान ने तय किया कि वह बटाई नहीं देगा, तो उस पर दबाव डालना आसान था।
लेकिन यदि पूरा गांव सामूहिक रूप से फैसला करे—
यही सामूहिकता आंदोलन की सबसे बड़ी रक्षा थी।
इसी प्रकार यह तय किया जा सकता था—
कोई किसान अकेले समझौता नहीं करेगा,
किसी बेदखल किसान की जमीन कोई दूसरा नहीं जोतेगा,
और प्रशासनिक कार्रवाई पर पूरा गांव खड़ा होगा।
आंदोलन को टिकाए रखने के लिए सामाजिक अनुशासन अत्यंत महत्वपूर्ण था।
बिस्वेदार अक्सर व्यक्तिगत किसान को अलग करके समझौता कराने की कोशिश कर सकता था।
यदि कुछ किसान बटाई दे दें और कुछ रोकें, तो सामूहिक प्रतिरोध टूट सकता था।
इसलिए गांव समितियों ने सामाजिक दबाव का उपयोग किया।
आंदोलन तोड़ने वाले किसान को समझाया जाता।
कुछ स्थानों पर बहिष्कार जैसी सामुदायिक रणनीतियां भी उपयोग में आती थीं।
व्यक्तिगत भय के ऊपर सामूहिक निर्णय को बनाए रखना।
जब कई गांवों में समितियां बन गईं तो अगली आवश्यकता थी—
यहीं क्षेत्रीय कमेटियों और कार्यकर्ता नेटवर्क का महत्व बढ़ा।
गांवों के बीच सूचना पहुंचाना,
बड़े आंदोलन की रणनीति तय करना,
किस क्षेत्र में सबसे अधिक दबाव है यह समझना,
जरूरत पड़ने पर दूसरे गांवों से सहायता भेजना,
और बड़े नेताओं तथा स्थानीय समितियों के बीच संपर्क बनाए रखना।
यही संरचना स्थानीय संघर्ष को क्षेत्रीय आंदोलन में बदलती है।
# आंदोलन एक गांव में बंद नहीं रह सकता था
यदि एक गांव बटाई रोकता और पड़ोसी गांव नहीं, तो बिस्वेदार और प्रशासन उस गांव पर अधिक दबाव डाल सकते थे।
लेकिन यदि आसपास के कई गांव एक साथ हों तो सरकार के लिए कार्रवाई कठिन हो जाती है।
एक गांव की जीत दूसरे गांव के लिए उदाहरण बनती।
एक गांव पर हमला दूसरे गांव के लिए चेतावनी बनता।
इसी तरह सैकड़ों गांव आपस में राजनीतिक रूप से जुड़ते गए।
आंदोलन के विकसित चरण में किसान जत्थों का महत्व बढ़ा।
इनका काम केवल प्रदर्शन करना नहीं था।
जत्थे कई प्रकार की जिम्मेदारियां निभा सकते थे—
बिस्वेदार के दबाव का सामना करना,
पंजाब की राजनीतिक संस्कृति में ‘जत्था’ की परंपरा पहले से मजबूत थी, विशेषकर गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के अनुभव से।
मुजारा आंदोलन ने उसी संगठनात्मक संस्कृति को भूमि-संघर्ष में उपयोग किया।
# गुरुद्वारा आंदोलन की संगठनात्मक विरासत
1920 के दशक के अकाली और गुरुद्वारा सुधार आंदोलन ने पंजाब के ग्रामीण समाज को सामूहिक जत्थों और अनुशासन की राजनीति से परिचित कराया था।
कैसे निर्धारित नेतृत्व के अधीन चलना है,
कैसे गिरफ्तारी का सामना करना है,
और कैसे सामूहिक भोजन तथा यात्रा की व्यवस्था करनी है।
यह अनुभव बाद के किसान आंदोलनों में उपयोगी हुआ।
मुजारा संघर्ष इस राजनीतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण उत्तराधिकारी था।
आज की तरह टेलीफोन, मोबाइल या सामाजिक माध्यम उपलब्ध नहीं थे।
फिर भी आंदोलन के पास प्रभावी संदेश तंत्र था।
साइकिल सवार कार्यकर्ताओं से,
और रिश्तेदारी तथा बिरादरी नेटवर्क से।
यह मौखिक संचार आश्चर्यजनक रूप से तेज हो सकता था।
यदि किसी गांव में पुलिस पहुंची, तो आसपास के गांवों को खबर जल्दी मिल सकती थी।
जब आंदोलन अधिक उग्र और भूमिगत हुआ, विशेष रूप से लाल कम्युनिस्ट पार्टी के प्रभाव वाले क्षेत्रों में, संदेश व्यवस्था में गोपनीयता का महत्व बढ़ा।
नेताओं की गिरफ्तारी का खतरा था।
पुलिस संगठन के संपर्कों की तलाश करती थी।
और सीमित जानकारी वाले नेटवर्क
ऐसी संरचना आधुनिक भूमिगत संगठन की तरह पूर्ण विकसित न भी रही हो, फिर भी आंदोलन के टिकने के लिए एक न्यूनतम गोपनीय नेटवर्क आवश्यक था।
# रसद : आंदोलन का अनदेखा पक्ष
राजनीतिक आंदोलनों के इतिहास में अक्सर नारे और नेता दिखाई देते हैं, लेकिन रसद की चर्चा कम होती है।
मुजारा आंदोलन लंबे समय तक चलना था तो कार्यकर्ताओं को चाहिए थे—
और भूमिगत होने की स्थिति में सुरक्षित आश्रय।
यही कारण है कि आंदोलन का आधार केवल राजनीतिक समर्थन नहीं बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सामाजिक सहयोग था।
किसान परिवार स्वयं गरीब हो सकते थे, लेकिन सामूहिकता संसाधन पैदा कर सकती थी।
ये सब मिलकर आंदोलन को चलाते थे।
बड़े संगठन के लिए यह मामूली सहायता नहीं थी।
यदि सैकड़ों गांव लगातार समर्थन दें, तो यही सामाजिक संसाधन लंबे राजनीतिक संघर्ष को संभव बनाते हैं।
# भूमिगत कार्यकर्ताओं को आश्रय
1948 के बाद लाल कम्युनिस्ट पार्टी और किसान आंदोलन के कई नेता भूमिगत हुए।
उन्हें पुलिस से बचने के लिए गांवों में सुरक्षित स्थानों की आवश्यकता थी।
किसान परिवारों ने ऐसे कार्यकर्ताओं को आश्रय देने में भूमिका निभाई।
यदि प्रशासन को पता चले तो परिवार को—
इसलिए भूमिगत कार्यकर्ता को घर में छिपाना आंदोलन के प्रति गहरी राजनीतिक निष्ठा का संकेत था।
# भोजन की व्यवस्था भी राजनीति थी
“जमीन उसकी जो जोते” — मुजारा आंदोलन की विचारधारा और प्रमुख मांगें, पैतृक स्वामित्व का दावा, बिस्वेदारी उन्मूलन, बटाई से मुक्ति, बेदखली-विरोध और भूमि पर पूर्ण मालिकाना अधिकार की राजनीतिक अवधारणा
पेप्सू मुजारा आंदोलन का सबसे शक्तिशाली राजनीतिक सूत्र था—“जमीन उसकी जो जोते।” यह केवल एक नारा नहीं था। इसके भीतर आंदोलन की पूरी वैचारिक संरचना समाहित थी। भूमि पर वास्तविक श्रम, पैतृक संबंध, बिस्वेदारी की वैधता, बटाई, बेदखली, सामाजिक सम्मान और आर्थिक स्वतंत्रता—इन सभी प्रश्नों का उत्तर इसी सूत्र में खोजा गया।
मुजारा किसान की दृष्टि से समस्या यह नहीं थी कि वह बहुत अधिक किराया दे रहा है। समस्या यह थी कि वह स्वयं खेती करता है, जोखिम उठाता है, परिवार का श्रम लगाता है, पीढ़ियों से जमीन से जुड़ा है, फिर भी मालिक कोई और है। इसीलिए आंदोलन धीरे-धीरे किरायेदारी सुधार से आगे बढ़कर मालिकाना अधिकार की मांग पर पहुंचा।
यही पेप्सू आंदोलन को उन किसान संघर्षों से अलग करता है जिनकी तत्काल मांग केवल लगान घटाना, बटाई का अनुपात बदलना या बेदखली रोकना थी। यहां अंतिम लक्ष्य भू-स्वामी–काश्तकार संबंध को बेहतर बनाना नहीं, उसे समाप्त करना था।
नारे का सामाजिक अर्थ
“जमीन उसकी जो जोते” का सबसे सीधा अर्थ था—
भूमि पर सर्वोच्च अधिकार उस व्यक्ति का होना चाहिए जो उसे वास्तव में खेती में लगाता है।
यह सिद्धांत पारंपरिक संपत्ति-अधिकार की अवधारणा को चुनौती देता था।
जिसका नाम भूमि-अभिलेख में मालिक के रूप में दर्ज है, जमीन उसकी है।
जिसका श्रम खेत में है, वास्तविक अधिकार उसका होना चाहिए।
यहीं दो अलग वैधताएं आमने-सामने थीं—
अभिलेखीय स्वामित्व और उत्पादक श्रम का अधिकार।
पेप्सू में इस नारे को एक अतिरिक्त ऐतिहासिक शक्ति मिली।
अनेक मुजारों का दावा था कि वे किसी पुराने जमींदार की भूमि पर बाद में आए किरायेदार नहीं थे। उनके परिवार उस जमीन पर पहले से बसे और खेती करते थे। बाद की रियासती व्यवस्थाओं और बिस्वेदारी के विस्तार ने उन्हें मालिक अथवा मजबूत कृषक-अधिकारधारी की स्थिति से काश्तकार बना दिया।
हम नई जमीन नहीं मांग रहे; अपनी जमीन वापस मांग रहे हैं।
यही पैतृक स्वामित्व का दावा मुजारा आंदोलन की नैतिक शक्ति का केंद्र था।
# भूमि-सुधार और भूमि-पुनर्प्राप्ति में अंतर
दोनों में महत्वपूर्ण अंतर है।
भूमि-सुधार मानता है कि वर्तमान स्वामित्व व्यवस्था वैध है, लेकिन उसे सामाजिक न्याय के अनुसार बदलना चाहिए।
भूमि-पुनर्प्राप्ति का दावा कहता है कि वर्तमान व्यवस्था की उत्पत्ति ही अन्यायपूर्ण है।
मुजारा आंदोलन में दूसरी धारणा बहुत मजबूत थी।
इसलिए केवल आंशिक सुधार उसे संतुष्ट नहीं कर सकता था।
# बिस्वेदारी उन्मूलन : आंदोलन की केंद्रीय मांग
यदि आंदोलन का अंतिम लक्ष्य वास्तविक कृषक को मालिक बनाना था, तो उसके रास्ते की पहली बाधा थी—
जब तक बिस्वेदार का श्रेष्ठ मालिकाना अधिकार बना रहता, मुजारा पूर्ण भूमिधर नहीं बन सकता था।
इसलिए मांग केवल यह नहीं थी कि बिस्वेदार कम बटाई ले।
बिस्वेदार और मुजारे के बीच मालिक–काश्तकार संबंध ही समाप्त हो।
यहीं “बिस्वेदारी उन्मूलन” आंदोलन की केंद्रीय राजनीतिक मांग बनता है।
# क्यों केवल बटाई कम करना पर्याप्त नहीं था?
मान लें बिस्वेदार आधी फसल की जगह एक-तिहाई लेने लगे।
किसान को तत्काल राहत मिल सकती थी।
लेकिन तीन मूल समस्याएं बनी रहतीं—
और सामाजिक रूप से काश्तकार की स्थिति।
इसलिए बटाई की दर घटाना संरचनात्मक समाधान नहीं था।
यदि वास्तविक कृषक मालिक बन जाए तो बटाई का प्रश्न स्वयं समाप्त हो जाएगा।
इसलिए बटाई-विरोध आंदोलन की आर्थिक रणनीति और वैचारिक मांग दोनों था।
जब किसान बटाई रोकता था, तो वह कह रहा था—
मैं अपनी फसल पर अपना अधिकार स्वीकार करता हूं।
लेकिन उससे भी आगे वह यह संकेत देता था—
मैं तुम्हारे मालिकाना अधिकार को स्वीकार नहीं करता।
इसलिए “नो बटाई” वास्तव में “नो बिस्वेदारी” की दिशा में कदम था।
मुजारा आंदोलन की दूसरी प्रमुख मांग थी—
यदि किसान जमीन जोतता है लेकिन मालिक उसे कभी भी हटाने की शक्ति रखता है, तो किसान की स्थिति राजनीतिक रूप से निर्भर बनी रहती है।
विशेषकर इच्छाधीन काश्तकार के लिए यह खतरा गंभीर था।
इसलिए किसान समितियों ने सामूहिक रूप से यह नीति अपनाई—
किसी को अकेले बेदखल नहीं होने देंगे।
बिस्वेदार का वैधानिक अधिकार सामूहिक प्रतिरोध से सीमित किया जाएगा।
# बेदखली केवल आर्थिक घटना नहीं थी
किसान की जमीन छिनना केवल रोजगार खोना नहीं था।
गांव में सामाजिक स्थिति का पतन,
और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा समाप्त होना।
इसलिए बेदखली-विरोध भूमि अधिकार की विचारधारा का अभिन्न हिस्सा था।
अंततः आंदोलन की मांग पहुंचती थी—
यहां ‘पूर्ण’ शब्द महत्वपूर्ण है।
11 मार्च 1947 के शाही फरमान ने कुछ स्थायी काश्तकार को जोती भूमि के दो-तिहाई हिस्से पर मालिकाना अधिकार देने का रास्ता स्वीकार किया था।
लेकिन आंदोलन के उग्र हिस्से ने इसे पर्याप्त नहीं माना।
यदि पूरी जमीन हमारी पैतृक है तो एक-तिहाई बिस्वेदार को क्यों?
इसीलिए “पूर्ण मालिकाना अधिकार” आंदोलन का अंतिम लक्ष्य बना।
भूमि का मालिक बनने से किसान को कई तत्काल लाभ मिलते।
दीर्घकालीन कृषि निवेश की सुरक्षा।
भूमि उत्तराधिकार में देने की क्षमता।
भूमि को आर्थिक संपत्ति के रूप में उपयोग करना।
इसलिए मालिकाना अधिकार केवल कानूनी दर्जा नहीं था।
वह किसान की पूरी आर्थिक स्थिति बदल सकता था।
ग्रामीण पंजाब में भूमि सामाजिक प्रतिष्ठा का भी आधार थी।
मालिक और काश्तकार की स्थिति समान नहीं थी।
भूमि स्वामित्व का प्रभाव पड़ सकता था—
इसलिए मुजारे से भूमिधर बनना सामाजिक दर्जे में भी परिवर्तन था।
# स्वामित्व का राजनीतिक अर्थ
लोकतंत्र में आर्थिक रूप से निर्भर किसान का मतदान अधिकार औपचारिक रूप से स्वतंत्र हो सकता है, लेकिन सामाजिक दबाव उसे प्रभावित कर सकता है।
यदि किसान किसी भू-स्वामी पर रोजगार और जमीन के लिए निर्भर है, तो उसकी राजनीतिक स्वायत्तता सीमित हो सकती है।
भूमि स्वामित्व इस निर्भरता को घटाता है।
इसलिए पेप्सू आंदोलन की दृष्टि में भूमि-सुधार ग्रामीण लोकतंत्र की भी शर्त था।
लेकिन नारे में एक महत्वपूर्ण प्रश्न छिपा है—
क्या केवल वह व्यक्ति जो स्वयं हल चलाता है?
क्या काश्तकार जो मजदूरों से खेती कराता है?
क्या खेत मजदूर जो वास्तविक श्रम करता है लेकिन काश्तकारी उसके नाम नहीं?
यही कारण है कि राजनीतिक नारा सरल होने के बावजूद उसका कानूनी क्रियान्वयन जटिल था।
भूमि कानून को स्पष्ट श्रेणियां बनानी पड़ती थीं।
यहां आंदोलन की एक सीमा दिखाई देती है।
मुजारा भूमि का स्वामी नहीं था, लेकिन वह काश्तकार था।
भूमिहीन खेत मजदूर उससे भी नीचे की स्थिति में हो सकता था।
यदि मुजारे को जमीन का मालिक बना दिया जाए, तो उसका शोषण घट सकता है; लेकिन खेत मजदूर का प्रश्न स्वतः हल नहीं होता।
इसलिए “जमीन उसकी जो जोते” का नारा व्यवहार में हर कृषि मजदूर तक समान रूप से नहीं पहुंचा।
यह मुख्यतः काश्तकार कृषक के मालिकाना अधिकार की मांग थी।
# क्या आंदोलन भूमि के समान वितरण की मांग कर रहा था?
पेप्सू मुजारा आंदोलन को सार्वभौमिक भूमि-समानता आंदोलन मानना उचित नहीं होगा।
जोत रहे मुजारे को जमीन का स्वामित्व।
इसका अर्थ जरूरी नहीं कि हर बड़ी जोत जब्त करके सभी भूमिहीनों में बराबर बांटी जाए।
बटाई न देने और बेदखली रोकने का अभियान — ‘नो बटाई’ रणनीति, फसल पर नियंत्रण, सामूहिक अवज्ञा, बिस्वेदारों की प्रतिक्रिया, जमीन खाली न करने का संकल्प और आर्थिक संघर्ष का प्रत्यक्ष भूमि-संघर्ष में रूपांतरण
पेप्सू मुजारा आंदोलन की सबसे निर्णायक रणनीतियों में एक थी—बटाई न देना और जमीन खाली न करना। यह रणनीति साधारण कर-विरोध या किराया-विरोध भर नहीं थी। इसके भीतर दो बहुत बड़े राजनीतिक दावे छिपे थे। पहला—किसान अपनी उपज पर पहला अधिकार स्वयं मानता है। दूसरा—वह बिस्वेदार के श्रेष्ठ मालिकाना अधिकार को मानने से इनकार करता है।
यही कारण है कि ‘नो बटाई’ आंदोलन धीरे-धीरे आर्थिक अवज्ञा से भूमि-अधिकार की प्रत्यक्ष लड़ाई में बदल गया।
यदि किसान बटाई देना बंद करता है लेकिन जमीन छोड़ देता है, तो वह उत्पादन तो बचा सकता है, भूमि नहीं। यदि वह जमीन पर बना रहता है लेकिन बटाई देता रहता है, तो बिस्वेदार का मालिकाना अधिकार व्यावहारिक रूप से कायम रहता है। इसलिए आंदोलन ने दोनों को जोड़ दिया—
बटाई नहीं देंगे। जमीन नहीं छोड़ेंगे।
यही दो वाक्य पेप्सू मुजारा आंदोलन के प्रत्यक्ष संघर्ष की पूरी राजनीतिक संरचना समझाते हैं।
बटाई व्यवस्था पर सीधा प्रहार
बिस्वेदारी की आर्थिक शक्ति का आधार था—मुजारे की उपज में हिस्सा।
बटाई बंद करने का अर्थ था कि बिस्वेदार की नियमित आय सीधे प्रभावित हो।
किसान आंदोलन ने इस कमजोर बिंदु को पहचाना।
जब तक किसान बटाई देता रहा, तब तक बिस्वेदारी केवल अभिलेखीय स्वामित्व नहीं थी; वह हर फसल के साथ आर्थिक रूप से पुनः स्थापित होती थी।
इसलिए बटाई रोकना मालिकाना अधिकार को रोजमर्रा के स्तर पर चुनौती देना था।
# ‘नो बटाई’ का राजनीतिक अर्थ
‘नो बटाई’ को केवल आर्थिक राहत की रणनीति मानना गलत होगा।
यदि जमीन पर वास्तविक श्रम मेरा है,
यदि बिस्वेदार स्वयं खेती नहीं करता,
इस प्रकार बटाई-विरोध ने भूमि-सुधार के सिद्धांत को व्यवहार में बदल दिया।
बटाई-विरोध तभी सफल हो सकता था जब किसान फसल पर वास्तविक नियंत्रण बनाए रखे।
बिस्वेदार या उसके लोगों द्वारा जबरन हिस्सा लेने का प्रतिरोध,
और आवश्यक होने पर दूसरे किसानों की सहायता।
यानी खेत की फसल अब केवल कृषि उत्पाद नहीं रही।
वह राजनीतिक संघर्ष की वस्तु बन गई।
# कटाई का मौसम संघर्ष का मौसम क्यों बनता था?
बटाई आधारित व्यवस्था में कटाई वह समय था जब मालिकाना अधिकार व्यावहारिक रूप से लागू होता था।
खड़ी फसल पर विवाद सैद्धांतिक था।
कटी हुई फसल का हिस्सा वास्तविक आर्थिक संपत्ति था।
इसलिए बटाई-विरोध का सबसे तनावपूर्ण समय अक्सर कटाई के आसपास हो सकता था।
बिस्वेदार अपना हिस्सा चाहता।
यहीं से भूमि-विवाद तत्काल कानून-व्यवस्था के संकट में बदलता।
व्यक्तिगत किसान का बटाई रोकना खतरनाक था।
इसलिए आंदोलन ने इसे सामूहिक अवज्ञा में बदला।
यदि गांव के अधिकांश मुजारे एक साथ बटाई न दें, तो बिस्वेदार के लिए एक-एक किसान पर कार्रवाई करना कठिन होता है।
यहीं सामूहिकता शक्ति बनती है।
इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण था।
सैकड़ों किसानों के बीच वही व्यक्ति साहस महसूस करता था।
# ‘कोई अकेला समझौता नहीं करेगा’
आंदोलन की सामूहिक रणनीति का एक महत्वपूर्ण तत्व था—
यदि कुछ किसान दबाव में बटाई दे दें, तो आंदोलन की सामूहिकता टूट सकती थी।
इसलिए गांव समितियां किसानों को समझाती थीं कि—
किसी एक की कमजोरी सबको प्रभावित करेगी।
इससे आंदोलन व्यक्तिगत सौदेबाजी से सामूहिक राजनीतिक अनुशासन की ओर बढ़ा।
# बेदखली रोकना क्यों जरूरी था?
बिस्वेदार के पास सबसे प्रभावी हथियार था—
यदि किसान बटाई नहीं देता, तो भू-स्वामी उसे हटाने की कोशिश कर सकता था।
इसलिए बटाई-विरोध तभी टिक सकता था जब बेदखली रोकी जाए।
यहीं से आंदोलन की दूसरी केंद्रीय रणनीति बनी—
# जमीन न छोड़ना : स्वामित्व का व्यावहारिक दावा
जब किसान कहता है कि वह जमीन नहीं छोड़ेगा, तो वह केवल काश्तकारी सुरक्षा नहीं मांग रहा।
वह भूमि पर अपना वास्तविक अधिकार स्थापित कर रहा है।
यह बहुत महत्वपूर्ण परिवर्तन था।
काश्तकार अनुबंध समाप्त हो गया।
मैं यहां से नहीं जाऊंगा क्योंकि जमीन पर मेरा ऐतिहासिक और श्रमाधारित अधिकार है।
यही प्रत्यक्ष भूमि-संघर्ष का रूप था।
# बेदखली के विरुद्ध सामूहिक रक्षा
यदि किसी एक मुजारे को हटाने की कोशिश होती, तो आसपास के किसान एकत्र हो सकते थे।
इससे बेदखली का प्रश्न व्यक्तिगत मुकदमे से सामूहिक संघर्ष में बदल जाता।
यहीं संघर्ष के हिंसक होने की संभावना बढ़ती।
# बिस्वेदारों की प्रतिक्रिया
बिस्वेदार वर्ग के लिए ‘नो बटाई’ अस्तित्व का प्रश्न था।
यदि किसान बटाई देना बंद कर दें, तो—
मालिकाना अधिकार व्यवहार में कमजोर होता,
और दूसरे गांवों में भी विद्रोह फैल सकता था।
इसलिए बिस्वेदारों ने कई क्षेत्रों में कठोर प्रतिक्रिया दी।
आधुनिक शोध में उल्लेख मिलता है कि कुछ बिस्वेदारों ने सशस्त्र समूहों का सहारा लिया और बटाई बलपूर्वक वसूलने का प्रयास किया।
यही ग्रामीण संघर्ष के सैन्यीकरण की प्रमुख वजहों में से एक था।
# आर्थिक संघर्ष से सत्ता संघर्ष
उत्पादन का कितना हिस्सा किसे मिलेगा?
लेकिन जब बटाई बंद हुई और जमीन छोड़ने से इनकार हुआ, तो प्रश्न बदल गया—
गांव में अंतिम सत्ता किसकी है?
यहीं आर्थिक संघर्ष सत्ता-संघर्ष बन गया।
बिस्वेदार यदि कानूनी स्वामी था, तो प्रशासन उसके अधिकार लागू कराने के लिए हस्तक्षेप कर सकता था।
किसान की दृष्टि में यही सबसे बड़ा विरोधाभास था।
वह स्वयं को न्याय के लिए लड़ता देखता था।
राज्य उसे अनुबंध या स्वामित्व उल्लंघन करने वाला मान सकता था।
इसलिए पुलिस और किसान के बीच टकराव अपरिहार्य रूप से बढ़ा।
# ‘कानून’ और ‘न्याय’ का टकराव
यह पेप्सू आंदोलन की केंद्रीय वैचारिक समस्या थी।
मालिकाना अधिकार ही अन्यायपूर्ण है।
हम अपनी पैतृक जमीन नहीं छोड़ेंगे।
यही वह बिंदु है जहां नागरिक अवज्ञा की राजनीति जन्म लेती है।
# ‘नो बटाई’ क्या कर-विरोध जैसा था?
कुछ हद तक तुलना की जा सकती है, लेकिन एक महत्वपूर्ण अंतर है।
खेड़ा या बारडोली जैसे आंदोलनों में राजस्व न देने का लक्ष्य राज्य पर दबाव डालना था।
पेप्सू में बटाई रोकने का लक्ष्य निजी भू-स्वामी के आर्थिक अधिकार और भूमि स्वामित्व दोनों को चुनौती देना था।
इसलिए यह सीधे ग्रामीण वर्ग-संबंध पर प्रहार था।
# आंदोलन का विस्तार क्यों तेज हुआ?
‘नो बटाई’ की रणनीति सरल और स्पष्ट थी।
किसान को लंबा कानूनी दस्तावेज समझने की जरूरत नहीं थी।
यह नारा गांव से गांव तेजी से फैल सकता था।
और जहां किसी गांव में किसान सफल हुए, वहां वह दूसरे गांवों के लिए प्रेरणा बना।
यही कारण था कि आंदोलन का प्रभाव सैकड़ों गांवों तक पहुंचा।
लेकिन ‘नो बटाई’ जोखिमहीन रणनीति नहीं थी।
किसान को सामना करना पड़ सकता था—
इसलिए आंदोलन में शामिल होना वास्तविक आर्थिक जोखिम स्वीकार करना था।
यही कारण है कि परिवार और गांव की सामूहिक सहायता आवश्यक थी।
यदि किसान ने बटाई रोक दी, लेकिन बिस्वेदार के लोग फसल उठा ले जाएं तो रणनीति विफल हो जाती।
इसलिए किसान जत्थों को फसल की रक्षा करनी पड़ सकती थी।
कुछ क्षेत्रों में कटाई के समय सामूहिक रूप से खेतों पर मौजूद रहना आवश्यक हुआ।
यहीं आत्मरक्षा की राजनीति सीधे आर्थिक संघर्ष से जुड़ती है।
# आत्मरक्षा और आक्रामक कार्रवाई
सशस्त्र आत्मरक्षा और ग्रामीण प्रतिरोध — बिस्वेदारों के हथियारबंद समूह, किसान स्वयंसेवी जत्थे, लाल कम्युनिस्ट पार्टी की रणनीति, हथियार और सुरक्षा नेटवर्क, आत्मरक्षा से प्रतिहिंसा तक की सीमा तथा आंदोलन के सैन्यीकरण का संतुलित मूल्यांकन
पेप्सू मुजारा आंदोलन के इतिहास का सबसे संवेदनशील और अक्सर सबसे अधिक सरलीकृत पक्ष उसका सशस्त्र चरण है। कुछ विवरण इसे लगभग गुरिल्ला किसान युद्ध के रूप में चित्रित करते हैं, जबकि दूसरी व्याख्या में हथियारबंद समूहों की भूमिका मुख्यतः किसानों को बिस्वेदारों के सशस्त्र दबाव से बचाने वाली सीमित आत्मरक्षा तक बताई जाती है। उपलब्ध शोध को साथ रखकर देखने पर अधिक संतुलित चित्र सामने आता है।
पेप्सू में एक व्यापक नियमित किसान सेना नहीं बनी थी। आंदोलन का सामाजिक आधार सैकड़ों गांवों में फैले सामान्य मुजारा परिवार, गांव समितियां, किसान सभा, प्रजा मंडल और विभिन्न राजनीतिक कार्यकर्ता थे। हथियारबंद स्वयंसेवकों का एक अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा इस व्यापक जन-आंदोलन के भीतर काम करता था। एक महत्वपूर्ण विवरण के अनुसार किसानों की संगठित हथियारबंद टुकड़ी की संख्या सामान्यतः 30–40 लोगों से अधिक नहीं थी, जबकि कुछ स्रोत अधिकतम लगभग 100 तक का अनुमान देते हैं। उसका शुरुआती उद्देश्य बिस्वेदारों के सशस्त्र गिरोहों से खतरे में पड़े मुजारों की सहायता करना था, न कि आधुनिक राज्य की सैन्य शक्ति के साथ खुला युद्ध छेड़ना।
फिर भी संघर्ष इसी सीमा के भीतर नहीं रहा। जैसे-जैसे भूमि पर कब्जे, बटाई, बेदखली और प्रतिरोध का प्रश्न तीखा हुआ, कुछ स्थानों पर आत्मरक्षा और आक्रामक हिंसा के बीच की सीमा धुंधली हुई। लाल कम्युनिस्ट पार्टी की व्यापक क्रांतिकारी राजनीति, कुछ भू-स्वामियों के विरुद्ध हिंसक कार्रवाइयां और मार्च 1949 में किशनगढ़ में पुलिस तथा किसानों का टकराव इस सैन्यीकरण के सबसे स्पष्ट रूप थे।
इसलिए पेप्सू के सशस्त्र चरण को समझने के लिए चार अलग स्तरों को स्पष्ट रखना आवश्यक है—
बिस्वेदारों की हथियारबंद शक्ति, किसान आत्मरक्षा, राजनीतिक संगठन का सैन्यीकरण और प्रतिहिंसात्मक हिंसा।
इन चारों को एक ही श्रेणी में रख देने से इतिहास का संतुलन बिगड़ जाता है।
हथियार क्यों आए?
मुजारा आंदोलन अपनी शुरुआत से सशस्त्र आंदोलन नहीं था।
उसकी प्रारंभिक रणनीतियां थीं—
इसलिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है—
हथियारों की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?
इसका उत्तर भूमि-संघर्ष के चरित्र में निहित है।
जब किसान बटाई देना बंद करता था, तो वह बिस्वेदार की नियमित आय रोक देता था।
जब वह जमीन खाली करने से इनकार करता था, तो वह बिस्वेदार के स्वामित्व को व्यवहार में चुनौती देता था।
और जब पूरा गांव इस नीति पर टिक जाता था, तो भू-स्वामी के पास केवल अदालत या राजस्व प्रशासन ही नहीं, प्रत्यक्ष बल प्रयोग का रास्ता भी बचता था।
उपलब्ध विवरणों में बिस्वेदारों द्वारा काश्तकार को डराने और बटाई वसूलने के लिए हथियारबंद गिरोह नियुक्त करने का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। इसी के जवाब में लाल कम्युनिस्ट पार्टी ने किसानों के लिए हथियारबंद रक्षात्मक इकाई खड़ी करने में भूमिका निभाई।
यानी सैन्यीकरण की पहली ठोस सामाजिक जड़ थी—
फसल और जमीन की रक्षा।
# बिस्वेदार के लिए संघर्ष अस्तित्व का प्रश्न
किसान की दृष्टि से बिस्वेदारी अन्यायपूर्ण व्यवस्था थी।
लेकिन बिस्वेदार की दृष्टि से वही भूमि उसकी कानूनी संपत्ति थी।
और मालिकाना अधिकार स्वयं दावा करे,
तो बिस्वेदार के सामने केवल आय में कमी नहीं होती थी।
और सामाजिक प्रतिष्ठा समाप्त होने का।
इसलिए बिस्वेदार वर्ग का कठोर प्रतिरोध समझ में आता है, भले किसान उसे अन्यायपूर्ण मानता रहा हो।
यही कारण था कि भूमि-विवाद इतनी आसानी से हिंसा में बदल सकता था।
# निजी हथियारबंद समूहों का प्रभाव
बिस्वेदार के पास स्वयं बड़ी सैन्य शक्ति आवश्यक नहीं थी।
कुछ हथियारबंद समर्थक भी किसान गांव में भय पैदा करने के लिए पर्याप्त हो सकते थे।
या आंदोलन के स्थानीय नेताओं को डराने
जब ऐसी घटनाओं की खबर आसपास के गांवों तक पहुंचती, तो आंदोलन में आत्मरक्षा की मांग स्वाभाविक रूप से बढ़ती।
यहीं किसान संगठन का चरित्र बदलना शुरू हुआ।
आंदोलन में पहले से किसान जत्थों की परंपरा मौजूद थी।
आसपास के गांवों की सहायता करते थे।
लेकिन 1948 के बाद कुछ जत्थों में हथियारबंद स्वयंसेवकों का तत्व अधिक स्पष्ट हुआ।
किसी गांव पर हमला हो तो तत्काल पहुंचना,
फसल और भूमि-कब्जे की सुरक्षा करना,
और बिस्वेदार के हथियारबंद समूह को यह संदेश देना कि हमला एकतरफा नहीं रहेगा।
यानी हथियार का पहला उपयोग deterrence, अर्थात भय-प्रतिरोध पैदा करना था।
# हथियारबंद दल कितना बड़ा था?
इस प्रश्न पर लोकप्रिय स्मृति और इतिहासलेखन में बड़ा अंतर दिखाई देता है।
बाद की आंदोलनकारी स्मृति कभी-कभी आंदोलन को विशाल सशस्त्र किसान सेना के रूप में प्रस्तुत करती है।
लेकिन बिपन चंद्र और अन्य इतिहासकारों द्वारा उद्धृत विवरण में कहा गया है कि संगठित हथियारबंद बल बहुत छोटा था—
लगभग 30–40 लोग, और सबसे बड़े अनुमान में करीब 100 तक।
वैश्विक अहिंसक कार्रवाई डेटाबेस भी लाल कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा बनाई गई रक्षात्मक सशस्त्र इकाई की संख्या 40 से अधिक न होने की बात करता है।
हथियारबंद कैडर और व्यापक मुजारा जन-आंदोलन एक ही चीज नहीं थे।
# सैकड़ों गांव और कुछ दर्जन हथियारबंद कार्यकर्ता
यदि आंदोलन 700 से अधिक गांवों तक प्रभावी था और हथियारबंद कोर कुछ दर्जन लोगों का था, तो अनुपात स्वयं बहुत कुछ बताता है।
आंदोलन की असली शक्ति बंदूक नहीं थी।
हथियारबंद दल उस सामाजिक शक्ति के ऊपर एक छोटा सुरक्षा आवरण था।
इसीलिए पेप्सू को तेलंगाना जैसे बड़े किसान गुरिल्ला युद्ध की प्रतिकृति मानना उचित नहीं होगा।
# लाल कम्युनिस्ट पार्टी की भूमिका
1948 में तेजा सिंह स्वतंत्र के नेतृत्व में बनी लाल कम्युनिस्ट पार्टी हिंद यूनियन ने इस आत्मरक्षात्मक ढांचे को अधिक संगठित राजनीतिक दिशा दी।
पार्टी की जड़ें गदर–कीर्ति क्रांतिकारी परंपरा में थीं और उसकी व्यापक राजनीति भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अधिक स्वायत्त तथा उग्र थी।
पार्टी नेतृत्व ने पेप्सू को अपने प्रमुख कृषि संघर्ष क्षेत्रों में चुना और बाबा बुझा सिंह जैसे कार्यकर्ताओं को वहां संगठन की जिम्मेदारी दी। उसने बड़े किसान सम्मेलन आयोजित किए, बटाई न देने का आह्वान किया और हथियारबंद इकाई खड़ी की।
लेकिन यहां एक अंतर बनाए रखना आवश्यक है।
पार्टी का व्यापक वैचारिक लक्ष्य और स्थानीय मुजारा किसान का उद्देश्य हमेशा पूरी तरह समान नहीं था।
सामान्य मुजारा किसान के लिए तत्काल प्रश्न था—
वह जरूरी नहीं कि पूरे भारतीय राज्य को सशस्त्र क्रांति से उखाड़ने के कार्यक्रम में समान रूप से रुचि रखता हो।
इसलिए किसान के हथियार और पार्टी के क्रांतिकारी सिद्धांत के बीच अंतर हो सकता था।
स्थानीय स्तर पर किसान कह सकता था—
हम अपनी जमीन बचाने के लिए हथियार रखते हैं।
पार्टी नेतृत्व उसी व्यवस्था को व्यापक वर्ग-संघर्ष का हिस्सा समझ सकता था।
इतिहास में दोनों स्तरों को अलग-अलग पहचानना जरूरी है।
यदि किसी किसान परिवार को वास्तविक हथियारबंद हमले का खतरा हो, तो आत्मरक्षा की राजनीतिक मांग समझ में आती है।
मुजारा आंदोलन के समर्थक इसी तर्क पर जोर देते थे।
राज्य उन्हें पर्याप्त सुरक्षा नहीं दे रहा,
बिस्वेदार निजी सशस्त्र समूहों का उपयोग कर रहे हैं,
इसलिए किसान स्वयं अपनी सुरक्षा करें।
इस दृष्टि से किसान स्वयंसेवी बल व्यवस्था-विरोधी सेना नहीं बल्कि सामुदायिक रक्षा संगठन था।
किशनगढ़ संघर्ष, मार्च 1949 — भूमि पर कब्जे का विवाद, 16–19 मार्च की घटनाएं, पुलिस–किसान टकराव, पुलिसकर्मी और मुजारा किसानों की मौतें, सेना–टैंकों की कार्रवाई, धर्म सिंह फक्कड़ और गिरफ्तारियां, मुकदमे तथा किशनगढ़ का आंदोलन के प्रतीक में रूपांतरण
पेप्सू मुजारा आंदोलन के लंबे इतिहास में किशनगढ़, मार्च 1949 वह निर्णायक मोड़ था जहां भूमि-अधिकार का विवाद, बटाई-विरोध, किसान संगठन, सशस्त्र आत्मरक्षा और नई भारतीय राज्य-सत्ता एक ही स्थान पर प्रत्यक्ष रूप से टकराए। आज पंजाब के मानसा जिले का किशनगढ़ गांव मुजारा आंदोलन की स्मृति में उसी तरह दर्ज है जैसे कुछ अन्य किसान आंदोलनों में गोलीकांड और शहादत के स्थल उनकी ऐतिहासिक पहचान बन गए।
लेकिन किशनगढ़ की घटनाओं का पुनर्निर्माण करते समय विशेष सावधानी आवश्यक है। उपलब्ध अकादमिक स्रोतों और बाद की स्थानीय स्मृतियों में तारीखों, मृतकों की संख्या और घटनाओं के क्रम में कुछ अंतर है। रोंकी राम का अकादमिक अध्ययन, जो पुराने शोध और दस्तावेजों पर आधारित है, मुख्य टकराव 16 और 18 मार्च 1949 को रखता है। बाद की स्थानीय स्मृति और समाचार विवरण 17 मार्च के पहले टकराव तथा 19 मार्च की निर्णायक कार्रवाई को प्रमुखता देते हैं। इसी कारण 19 मार्च आज स्मृति-दिवस के रूप में स्थापित है।
इस अध्याय में इन भिन्नताओं को छिपाने के बजाय स्पष्ट रखते हुए घटना का पुनर्निर्माण करना अधिक उचित होगा।
किशनगढ़ क्यों बना संघर्ष का केंद्र?
किशनगढ़ उस समय पटियाला क्षेत्र के मानसा तहसील में था। यह उस व्यापक भूभाग का हिस्सा था जहां बिस्वेदारी और मुजारा प्रश्न लंबे समय से गंभीर था।
किसान पीढ़ियों से जमीन जोत रहे थे, लेकिन श्रेष्ठ मालिकाना अधिकार बिस्वेदारों के पास था। स्वतंत्रता और पेप्सू के गठन के बाद मुजारों की अपेक्षा थी कि नई राजनीतिक व्यवस्था उनके भूमि-अधिकार को मान्यता देगी।
इसके विपरीत कई क्षेत्रों में बेदखली का खतरा बना रहा।
यही संघर्ष किशनगढ़ में विस्फोटक हो गया।
प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 18 जून 1949 को राज्यों के मंत्रालय के लिए लिखे अपने नोट में स्वयं किशनगढ़ का उल्लेख किया। उन्होंने लिखा कि वहां कुछ ऐसे काश्तकार को हटाने की कोशिश हुई जिनके पास मालिकाना अथवा स्थायी काश्तकारी अधिकार बताए जा रहे थे और इसी दौरान गोलीबारी हुई।
यह समकालीन दस्तावेज किशनगढ़ को केवल बाद की किसान स्मृति का प्रसंग नहीं रहने देता। घटना स्वतंत्र भारत की केंद्र सरकार के सर्वोच्च स्तर तक पहुंच चुकी थी।
# विवाद केवल किराये का नहीं था
किशनगढ़ को समझने की पहली शर्त यह है कि इसे सामान्य भू-स्वामी–काश्तकार किराया विवाद न माना जाए।
भूमि का वास्तविक अधिकार किसका है?
बिस्वेदारों का दावा कानूनी स्वामित्व पर आधारित था।
हम पीढ़ियों से इस जमीन को जोत रहे हैं और इसे छोड़ेंगे नहीं।
यही पिछले अध्यायों में वर्णित नारा—
“जमीन उसकी जो जोते”
किशनगढ़ में व्यवहारिक प्रश्न बन गया।
# बिस्वेदारों द्वारा भूमि वापस लेने का प्रयास
1949 के शुरुआती महीनों में संघर्ष और तीखा हुआ। बाद की स्थानीय स्मृति के अनुसार मार्च में बिस्वेदारों ने मुजारों द्वारा जोती जा रही भूमि पर पुनः नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश की।
किशनगढ़ और आसपास के किसानों ने न केवल जमीन छोड़ने से इनकार किया बल्कि खेतों और फसल पर अपना नियंत्रण बनाए रखा। बाद के विवरण बताते हैं कि किसानों ने गन्ना काटकर गुड़ बनाया और उसे स्वयं अपने नियंत्रण में रखा। आसपास के गांवों से भी किसान किशनगढ़ पहुंचे।
यह प्रतीकात्मक रूप से बहुत महत्वपूर्ण था।
किसान केवल कह नहीं रहा था कि—
वह जमीन और उसकी उपज पर व्यावहारिक नियंत्रण स्थापित कर रहा था।
# संघर्ष की पृष्ठभूमि : बेदखली
किशनगढ़ की घटना को राष्ट्रीय संदर्भ में रखने वाला सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत नेहरू का 18 जून 1949 का नोट है।
नेहरू ने लिखा कि पूर्वी पंजाब और पेप्सू दोनों में बड़े पैमाने पर काश्तकार की बेदखली की खबरें आ रही थीं। उनके अनुसार पेप्सू में स्थिति और भी गंभीर थी और काश्तकार पर गोली चलने तथा मौतों की घटनाएं हुई थीं।
उनका निष्कर्ष महत्वपूर्ण था—
बेदखली से कृषि असंतोष कम नहीं होगा; उलटे ऐसी परिस्थितियां कम्युनिस्टों और अन्य उग्र शक्तियों के लिए अनुकूल जमीन तैयार करेंगी।
अर्थात केंद्र सरकार भी समस्या की सामाजिक जड़ पहचान रही थी।
# किशनगढ़ में प्रशासनिक निष्पक्षता पर प्रश्न
नेहरू के नोट में एक और अत्यंत महत्वपूर्ण बात है।
उन्हें सूचना मिली थी कि जिस भूमि को लेकर विवाद था, उसका मालिक स्वयं पुलिस अधीक्षक था और काश्तकार को हटाने की कार्रवाई भी उसी की देखरेख में हो रही थी।
नेहरू ने इस स्थिति को अनुचित माना—हालांकि उनकी भाषा सावधान थी और उन्होंने इसे प्राप्त सूचना के सत्य होने की शर्त के साथ लिखा।
यह सावधानी हमारे लिए भी जरूरी है।
इस तथ्य को बिना शर्त स्थापित घटना की तरह नहीं, बल्कि इस रूप में लिखना चाहिए—
नेहरू को ऐसी सूचना मिली थी और उन्होंने उसके सत्य होने पर गंभीर प्रशासनिक आपत्ति व्यक्त की थी।
यह अंतर इतिहासलेखन में महत्वपूर्ण है।
# किसानों की दृष्टि से इसका अर्थ
यदि पुलिस अधिकारी स्वयं विवादित भूमि का स्वामी हो और पुलिस बेदखली कराने पहुंचे, तो किसान प्रशासन को निष्पक्ष मध्यस्थ कैसे मानता?
मुजारा आंदोलन लंबे समय से आरोप लगाता था कि—
के हित कई जगह एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
किशनगढ़ की घटना ने इस धारणा को और मजबूत किया।
# मार्च 1949 : टकराव की शुरुआत
यहां से घटनाओं की तारीखों पर स्रोत-भेद शुरू होता है।
रोंकी राम के अध्ययन के अनुसार किशनगढ़ में निर्णायक टकराव 16 और 18 मार्च 1949 को हुआ। 16 मार्च को पुलिस के साथ संघर्ष में एक सब-इंस्पेक्टर मारा गया। एक दिन के अंतराल के बाद पुलिस सेना की टुकड़ी, टैंकों और बख्तरबंद वाहनों के साथ लौटी और गांव को घेर लिया।
दूसरी ओर बाद की स्थानीय स्मृति पर आधारित विवरण पहला पुलिस–किसान टकराव 17 मार्च को बताते हैं और निर्णायक सैन्य कार्रवाई 19 मार्च को रखते हैं।
अतः 16–19 मार्च को एक संघर्ष-क्रम के रूप में देखना अधिक सुरक्षित है।
सरकारी पक्ष के अनुसार उसका एक उद्देश्य वांछित अथवा फरार व्यक्तियों को पकड़ना भी बताया गया। नेहरू के नोट में इस दावे का उल्लेख है, लेकिन साथ ही वे भूमि-बेदखली के मूल प्रश्न को नजरअंदाज नहीं करते।
किसानों की ओर से प्रतिरोध हुआ।
और आंदोलन के किसान तथा सीमित लाल रक्षक।
अकादमिक विवरण के अनुसार पहले टकराव में एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर की मृत्यु हुई।
बाद के स्थानीय विवरण भी एक पुलिसकर्मी की मौत का उल्लेख करते हैं।
अब प्रशासन की दृष्टि में मामला केवल किसानों की अवज्ञा या भूमि कब्जे तक सीमित नहीं रहा।
एक पुलिस अधिकारी की मृत्यु के बाद यह गंभीर सशस्त्र कानून-व्यवस्था चुनौती बन गया।
राज्य की प्रतिक्रिया का स्तर इसी के बाद बहुत बढ़ गया।
# किसान नेतृत्व की रणनीतिक दुविधा
पिछले अध्याय में हमने देखा कि मुजारा आंदोलन के पास विशाल नियमित सशस्त्र सेना नहीं थी।
लाल रक्षक का छोटा समूह भू-स्वामियों के निजी हथियारबंद समूहों से किसानों की रक्षा कर सकता था।
लेकिन राज्य की नियमित पुलिस और सेना से युद्ध करना बिल्कुल अलग बात थी।
इसलिए किशनगढ़ में आंदोलन के सामने प्रश्न था—
किशनगढ़ के बाद राज्य-दमन और आंदोलन का भूमिगत चरण — पुलिस अभियान, गिरफ्तारियां और मुकदमे, गांवों की तलाशी, लाल कम्युनिस्ट पार्टी के भूमिगत नेटवर्क, किसान परिवारों पर दबाव, आंदोलन की निरंतरता तथा दमन से भूमि-सुधार की राजनीतिक आवश्यकता तक का संक्रमण
मार्च 1949 का किशनगढ़ संघर्ष पेप्सू मुजारा आंदोलन का निर्णायक मोड़ था। पुलिसकर्मी की मृत्यु, किसानों की शहादत, सेना और टैंकों की तैनाती, लाल रक्षक की गिरफ्तारियां और मुकदमों ने राज्य तथा आंदोलन दोनों को यह स्पष्ट कर दिया कि भूमि-विवाद अब स्थानीय प्रशासनिक स्तर से बहुत आगे जा चुका है। किशनगढ़ के बाद पेप्सू सरकार ने आंदोलन को केवल कृषि असंतोष के रूप में नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था और राज्य की प्रभुसत्ता की गंभीर चुनौती के रूप में देखना शुरू किया।
लेकिन यही वह समय भी था जब सरकार के उच्च स्तर पर यह समझ बनने लगी कि केवल दमन से समस्या समाप्त नहीं होगी। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 18 जून 1949 को पेप्सू और पूर्वी पंजाब के कृषि असंतोष पर लिखते हुए स्पष्ट चेतावनी दी थी कि काश्तकार की बेदखली से असंतोष कम नहीं होगा और ऐसी स्थितियां उग्र राजनीति को सामाजिक आधार देंगी। किशनगढ़ की घटनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने प्रशासनिक निष्पक्षता और काश्तकारी सुरक्षा दोनों पर चिंता जताई थी। (nehruarchive.in)
इसलिए 1949 के बाद की कहानी दो समानांतर प्रक्रियाओं की कहानी है—
एक ओर पुलिस-दमन, गिरफ्तारियां और भूमिगत राजनीति; दूसरी ओर भूमि-सुधार को टालना असंभव होने की बढ़ती राजनीतिक स्वीकृति।
किशनगढ़ के बाद राज्य की पहली प्राथमिकता : नियंत्रण बहाल करना
किशनगढ़ में एक पुलिस अधिकारी की मृत्यु और हथियारबंद प्रतिरोध के बाद पेप्सू प्रशासन के लिए यह आवश्यक हो गया कि वह प्रभावित गांवों में अपनी प्रत्यक्ष सत्ता पुनः स्थापित करे।
भूमि-सुधार पर बहस हो सकती है,
लेकिन कोई भी राजनीतिक संगठन अपनी समानांतर हथियारबंद व्यवस्था नहीं चला सकता।
इसलिए पुलिस अभियान का पहला उद्देश्य था—
वांछित कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी,
लाल रक्षक के नेटवर्क को तोड़ना,
और उन गांवों में प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित करना जहां किसान समितियां अत्यधिक प्रभावशाली हो चुकी थीं।
यही वह बिंदु था जहां भूमि-संघर्ष का सुरक्षा आयाम सबसे अधिक दिखाई देता है।
# गिरफ्तारियां : नेतृत्व पर सीधा प्रहार
किशनगढ़ के बाद धर्म सिंह फक्कड़ और लाल रक्षक सहित अनेक कार्यकर्ता गिरफ्तार हुए। अकादमिक विवरण विशेष रूप से 26 लाल रक्षक और धर्म सिंह फक्कड़ की गिरफ्तारी का उल्लेख करता है, जबकि बाद की स्थानीय स्मृति कुछ मामलों में इससे अधिक संख्या बताती है। (giss.org)
गिरफ्तारियां केवल अपराधियों को पकड़ने की कार्रवाई नहीं थीं।
वे संगठन की संरचना को कमजोर करने का भी साधन थीं।
यदि क्षेत्रीय नेता जेल में हों,
और सक्रिय जत्थों के सदस्य हिरासत में हों,
तो गांवों के बीच संपर्क स्वतः कमजोर पड़ सकता है।
यही राज्य-दमन का संगठनात्मक उद्देश्य था।
# मुकदमों की राजनीतिक भूमिका
गिरफ्तार कार्यकर्ताओं पर हत्या, दंगा और अन्य गंभीर आरोप लगाए गए।
इन मुकदमों का राजनीतिक अर्थ दोहरा था।
सरकार यह स्थापित करना चाहती थी कि—
हथियारबंद प्रतिरोध सामान्य किसान आंदोलन नहीं, बल्कि दंडनीय हिंसक गतिविधि है।
किसान भूमि और जीवन की रक्षा कर रहे थे तथा राज्य की कार्रवाई सामाजिक अन्याय को बल से लागू कर रही थी।
यहीं अदालत संघर्ष का नया मैदान बनी।
# अदालत में प्रजा मंडल का सहयोग
किशनगढ़ के गिरफ्तार कार्यकर्ताओं की कानूनी रक्षा में प्रजा मंडल से जुड़े वकीलों और नेताओं की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय थी। रोंकी राम के अध्ययन में बताया गया है कि उन्होंने अभियुक्तों का बिना शुल्क बचाव किया और अंततः आरोपी बरी हुए। (giss.org)
यह घटना आंदोलन की व्यापक राजनीतिक प्रकृति दिखाती है।
प्रजा मंडल और लाल कम्युनिस्ट पार्टी की रणनीतियां अलग थीं।
फिर भी भूमि-अधिकार के प्रश्न पर एक साझा सहानुभूति बनी हुई थी।
इसलिए दमन ने सभी गैर-सरकारी राजनीतिक धाराओं को स्वतः सरकार के पक्ष में नहीं कर दिया।
अभियुक्तों की रिहाई से किसानों में यह धारणा मजबूत हुई कि सरकार द्वारा लगाए गए कठोर आरोप अपने आप आंदोलन को आपराधिक सिद्ध नहीं करते।
लेकिन बरी होना हथियारबंद संघर्ष की राजनीतिक सफलता नहीं था।
यह न्यायिक स्तर पर अभियोजन की विफलता थी।
फिर भी आंदोलन के मनोबल पर इसका प्रभाव महत्वपूर्ण था।
लेकिन उसके हर आरोप को अदालत स्वतः स्वीकार नहीं करती।
यही स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक संस्थागत ढांचे की एक महत्वपूर्ण नई वास्तविकता थी।
किशनगढ़ जैसी घटना के बाद पुलिस का ध्यान केवल गिरफ्तार नेताओं पर नहीं रह सकता था।
भूमिगत संगठन को टिकाने के लिए गांवों में—
और हथियारों के छिपाने के स्थान
इसलिए प्रभावित क्षेत्रों में पुलिस तलाशी, पूछताछ और संदिग्ध व्यक्तियों की निगरानी राज्य की सामान्य रणनीति का हिस्सा बनी।
स्थानीय किसान स्मृतियों में इस दौर को दमन और पुलिस दबाव के समय के रूप में याद किया गया है।
हालांकि हर गांव में तलाशी का समान स्तर था, ऐसा सार्वभौमिक दावा करना उचित नहीं होगा।
पुलिस के लिए चुनौती यह थी कि आंदोलन का संगठन अत्यंत विकेंद्रित था।
कोई एक मुख्यालय बंद कर देने से संघर्ष समाप्त नहीं होता।
और किसान परिवारों का सामाजिक सहयोग अलग।
इसलिए पुलिस अभियान को नेटवर्क के कई स्तरों पर काम करना पड़ता था।
यही किसी ग्रामीण भूमिगत संगठन से निपटने की कठिनाई थी।
लाल कम्युनिस्ट पार्टी के कई प्रमुख कार्यकर्ता पहले से ही भूमिगत राजनीति का अनुभव रखते थे।
गदर और कीर्ति परंपरा से आए नेताओं के लिए गिरफ्तारी से बचना, छद्म पहचान, ग्रामीण आश्रय और गुप्त संपर्क नए अनुभव नहीं थे।
1948–49 के दमन के बाद यही कौशल फिर उपयोगी हुआ।
तेजा सिंह स्वतंत्र जैसे नेता लंबे समय तक गिरफ्तारी से बचते हुए राजनीतिक गतिविधियां चलाते रहे।
इससे पार्टी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
लेकिन भूमिगत होने की कीमत भी थी।
# भूमिगत आंदोलन की ताकत और कमजोरी
राज्य नेतृत्व को आसानी से गिरफ्तार नहीं कर सकता।
स्थानीय इकाइयों पर कम नियंत्रण,
और हथियारबंद छोटे समूहों के अधिक स्वतंत्र हो जाने का खतरा।
यही कारण है कि भूमिगत राजनीति जितनी सुरक्षा देती है, उतनी ही राजनीतिक अलगाव की संभावना भी पैदा करती है।
पेप्सू में यही द्वंद्व स्पष्ट हुआ।
भूमिगत कार्यकर्ता तभी टिक सकता था जब सामान्य किसान परिवार उसका सहयोग करे।
और एक गांव से दूसरे गांव जाने का सुरक्षित रास्ता।
इन सभी में स्थानीय परिवारों की भूमिका होती थी।
इसलिए सरकार का दमन केवल कार्यकर्ता को नहीं, उस सामाजिक नेटवर्क को भी निशाना बना सकता था जो उसे समर्थन देता था।
यदि किसी परिवार का सदस्य भूमिगत था, तो परिवार को कई प्रकार का दबाव झेलना पड़ सकता था—
स्थानीय अधिकारियों की निगरानी,
इससे महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता।
यही कारण है कि भूमिगत आंदोलन का वास्तविक सामाजिक मूल्य केवल गिरफ्तारियों की संख्या से नहीं मापा जा सकता।
# महिलाएं : दमन के बीच आंदोलन की अदृश्य रीढ़
जब पुरुष कार्यकर्ता जेल में या भूमिगत हों तो परिवार की महिलाएं—
पुरुष-केंद्रित राजनीतिक दस्तावेज इन भूमिकाओं को अक्सर दर्ज नहीं करते।
लेकिन एक लंबे ग्रामीण संघर्ष में यही श्रम संगठन की निरंतरता की बुनियाद होता है।
# आर्थिक दबाव भी दमन का साधन था
किसान आंदोलन के लिए सबसे संवेदनशील बिंदु था—
बिस्वेदारी उन्मूलन की दिशा में शुरुआती सरकारी कदम — 1949–52 में काश्तकारी सुरक्षा, बेदखली रोकने की कोशिशें, पेप्सू सरकार और केंद्र की भूमिका, कृषि सुधार जांच तथा व्यापक भूमि-सुधार कानून की तैयारी
मार्च 1949 के किशनगढ़ संघर्ष ने पेप्सू सरकार के सामने यह कठोर वास्तविकता रख दी थी कि मुजारा प्रश्न को केवल पुलिस, गिरफ्तारी और सैन्य कार्रवाई के सहारे नहीं सुलझाया जा सकता। बिस्वेदार और मुजारे के बीच विवाद की जड़ भूमि पर अधिकार में थी। जब तक यह तय नहीं होता कि जमीन का मालिक कौन होगा, काश्तकार को कितनी सुरक्षा मिलेगी और बेदखली किन परिस्थितियों में संभव होगी, तब तक प्रत्येक फसल और प्रत्येक भूमि-विवाद नए संघर्ष को जन्म दे सकता था।
इसीलिए 1949 से 1952 का काल पेप्सू मुजारा आंदोलन में एक महत्वपूर्ण संक्रमण है। यह प्रत्यक्ष किसान संघर्ष और व्यापक विधायी भूमि-सुधार के बीच की कड़ी था।
इस अवधि में एक ओर सरकार ने हथियारबंद आंदोलन को नियंत्रित किया, लेकिन दूसरी ओर उसने बिस्वेदारी और स्थायी काश्तकारी काश्तकारी के प्रश्न को कानून द्वारा पुनर्गठित करना शुरू किया। 15 अगस्त 1949 का पेप्सू उन्मूलन of Biswedari अध्यादेश, 1949–50 में उसके संशोधन, 1951 में कुछ स्थायी काश्तकार को पूर्ण मालिक मानने की प्रशासनिक कार्रवाई और 1952 की विस्तृत Report on कृषि सुधार in पेप्सू इसी क्रम के निर्णायक पड़ाव थे। बाद में 1953–55 के कानून इन्हीं प्रयासों को अधिक स्थायी कानूनी रूप देंगे।
एक तथ्य आरंभ में स्पष्ट कर देना आवश्यक है। बाद के पेप्सू इतिहास में कृषि काश्तकार (Temporary सुरक्षा and Disability) अधिनियम, 1954 नामक महत्वपूर्ण अस्थायी संरक्षण कानून आया, लेकिन वह 1949–52 की अवधि का कानून नहीं था। इसलिए 1949–52 को “अस्थायी संरक्षण कानूनों” का चरण कहते समय 1954 के अधिनियम को पीछे खींचकर इस अवधि में रखना कालक्रम की त्रुटि होगी। 1949–52 में सुरक्षा की दिशा मुख्यतः बिस्वेदारी उन्मूलन अध्यादेशों, प्रशासनिक कदमों, बेदखली के राजनीतिक प्रतिरोध और कृषि-सुधार की नीति-तैयारी से बनी; विधिवत Temporary सुरक्षा अधिनियम 1954 में आया।
किशनगढ़ के बाद मूल प्रश्न बदल गया
किशनगढ़ से पहले प्रशासन के लिए तत्काल सवाल हो सकता था—
लेकिन किशनगढ़ के बाद बड़ा सवाल सामने आया—
ऐसी परिस्थितियां पैदा ही क्यों हो रही हैं?
जून 1949 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की चिंता इसी दिशा में थी। उन्होंने पेप्सू और पूर्वी पंजाब में काश्तकार की बेदखली तथा कृषि असंतोष को गंभीरता से लिया और संकेत किया कि असुरक्षित काश्तकारी उग्र राजनीति के लिए सामाजिक आधार तैयार करती है।
इसका अर्थ था कि केंद्र सरकार किसान आंदोलन की हर कार्रवाई को सही नहीं मान रही थी, लेकिन वह यह भी समझ रही थी कि भूमि-संबंध में संरचनात्मक समस्या मौजूद है।
इस बिंदु से कानून-व्यवस्था और भूमि-सुधार को साथ-साथ देखना अपरिहार्य हो गया।
# 15 अगस्त 1949 : बिस्वेदारी उन्मूलन अध्यादेश
स्वतंत्रता की दूसरी वर्षगांठ, 15 अगस्त 1949, को पेप्सू में एक महत्वपूर्ण कानून लागू हुआ—बिस्वेदारी व्यवस्था और स्थायी काश्तकारी काश्तकारी स्थितियां से संबंधित नया अध्यादेश।
बाद के न्यायिक अभिलेख इसे पेप्सू उन्मूलन of स्थायी काश्तकारी काश्तकारी स्थितियां and बंदोबस्त of भूमि Disputes अध्यादेश, 2006 Bk. तथा इसके विकसित रूप को उन्मूलन of Biswedari अध्यादेश के रूप में दर्ज करते हैं। इसका उद्देश्य 11 मार्च 1947 के शाही फरमान में शुरू की गई प्रक्रिया को पेप्सू के नए राज्य ढांचे में अधिक व्यवस्थित करना था।
इस अध्यादेश का महत्व बहुत बड़ा था।
अब प्रश्न किसी रियासती महाराजा की व्यक्तिगत घोषणा का नहीं था।
नई पेप्सू राज्य-सत्ता बिस्वेदार और स्थायी काश्तकार के संबंध को कानूनी रूप से पुनर्गठित कर रही थी।
# शाही फरमान से राज्य कानून तक
11 मार्च 1947 के फरमान में पटियाला महाराजा ने स्थायी काश्तकार और भू-स्वामी के बीच जमीन बांटने का सिद्धांत स्वीकार किया था।
1949 के अध्यादेश ने उसी प्रक्रिया को नए राजनीतिक संदर्भ में आगे बढ़ाया।
उसकी प्रस्तावना में स्वयं कहा गया कि उद्देश्य था—
स्थायी काश्तकार और भू-स्वामी के विवादों के कारणों को दूर करना,
दोनों के पुराने संबंध का निपटारा करना,
और पेप्सू में स्थायी काश्तकारी काश्तकारी स्थितियां का उन्मूलन करना।
यानी राज्य की भाषा अब स्पष्ट थी—
पुरानी काश्तकारी संरचना को उसी रूप में बनाए रखना समाधान नहीं है।
1947 के शाही फरमान में विभिन्न प्रकार के स्थायी काश्तकारी अधिकार के अनुसार भूमि विभाजन का अनुपात अलग था।
1949 के अध्यादेश की प्रस्तावना में दर्ज है कि कुछ मामलों में भू-स्वामी और स्थायी काश्तकार के बीच भूमि एक-तिहाई : दो-तिहाई और अन्य मामलों में दो-पांचवां : तीन-पांचवां अनुपात में बांटने की व्यवस्था थी।
यह तथ्य पिछले अध्यायों के एक महत्वपूर्ण बिंदु को और स्पष्ट करता है—
हर स्थायी काश्तकारी काश्तकारी कानूनी रूप से एक जैसी नहीं थी।
इसलिए भूमि-सुधार को लागू करना प्रशासनिक रूप से जटिल था।
# सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन : पुराना भू-स्वामी–काश्तकार संबंध समाप्त करना
1949 के अध्यादेश की मूल दिशा केवल किराया कम करना नहीं थी।
स्थायी काश्तकार और भू-स्वामी के बीच पुराने संबंध को समाप्त करना।
बाद के न्यायिक निर्णय में अध्यादेश की व्यवस्था का सार इस प्रकार सामने आता है कि स्थायी काश्तकारी काश्तकारी के पुराने अधिकार समाप्त करके जोत को नए स्वामित्व संबंध में पुनर्गठित किया जाए।
किसान काश्तकार से भू-स्वामी की दिशा में बढ़ रहा था।
# जमीन बांटें या पूरी जमीन खरीदें?
1949–50 की विधायी प्रक्रिया में एक बहुत महत्वपूर्ण विकल्प विकसित हुआ।
बाद के न्यायिक विवरण के अनुसार स्थायी काश्तकार को यह विकल्प दिया गया कि वह भू-स्वामी के हिस्से को मुआवजा देकर खरीद ले। यदि काश्तकार ऐसा करता, तो पूरी जोत उसके पास जा सकती थी। यदि वह भू-स्वामी का हिस्सा खरीदने को तैयार नहीं होता, तो निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार भूमि का विभाजन कराया जाता।
यह पेप्सू भूमि-सुधार के विकास में निर्णायक कदम था।
राज्य किसान को संपूर्ण स्वामित्व तक पहुंचने का वैधानिक रास्ता दे रहा था।
# किसान आंदोलन की मांग से निकटता
यह व्यवस्था मुजारा आंदोलन की मूल मांग के अधिक करीब थी।
कानून और निर्धारित मुआवजे की प्रक्रिया से काश्तकार पूरी जोत प्राप्त कर सकता है।
आंदोलन ऐतिहासिक अधिकार के आधार पर पूरी जमीन चाहता था।
राज्य संपत्ति अधिकार और सामाजिक न्याय के बीच मुआवजे वाला समझौता कर रहा था।
लेकिन 1947 के दो-तिहाई समझौते की तुलना में यह स्पष्ट रूप से आगे का कदम था।
# 1949 का अध्यादेश क्यों आवश्यक हुआ?
किशनगढ़ ने तीन बातें स्पष्ट कर दी थीं।
बेदखली को बलपूर्वक लागू करना राजनीतिक रूप से विस्फोटक है।
मुजारे अब पुराने भू-स्वामी–काश्तकार संबंध को स्वीकार नहीं करेंगे।
राज्य को भूमि विवाद के लिए ऐसी वैधानिक व्यवस्था चाहिए जिसमें हर गांव में पुलिस भेजने की आवश्यकता न पड़े।
इसीलिए अध्यादेश को केवल भूमि-सुधार नहीं बल्कि राज्य-स्थिरीकरण का कानून भी माना जाना चाहिए।
1949 का पहला अध्यादेश अंतिम रूप नहीं था।
न्यायिक अभिलेख बताते हैं कि इसके बाद—
अध्यादेश No. XXXVI of 2006 Bk., जिसे 1 जनवरी 1950 को प्रकाशित किया गया,
और बाद में पेप्सू अधिनियम No. IV of 2007 Bk., प्रकाशित 17 सितंबर 1950,
के जरिए इस व्यवस्था में संशोधन हुए।
# कानून बार-बार क्यों बदलना पड़ा?
# एक महत्वपूर्ण कालक्रम-सुधार
1953 का राष्ट्रपति अधिनियम और स्थायी काश्तकार को मालिकाना अधिकार — पेप्सू में राष्ट्रपति शासन की पृष्ठभूमि, 1953 का राष्ट्रपति अधिनियम क्रमांक 3, बिस्वेदार के अधिकार का अंत, मुआवजा व्यवस्था और मुजारे से भूमिधर बनने का निर्णायक कानूनी मोड़
पेप्सू मुजारा आंदोलन की लंबी यात्रा में 1953 वह वर्ष था जब दशकों से उठाई जा रही एक बुनियादी मांग पहली बार निर्णायक वैधानिक रूप में सामने आई—स्थायी काश्तकार अब केवल काश्तकार नहीं रहेगा; जिस भूमि पर उसका स्थायी काश्तकारी अधिकार स्थापित है, उस पर भू-स्वामी के अधिकार समाप्त होकर स्वयं काश्तकार में निहित हो जाएंगे।
इसके लिए राष्ट्रपति शासन के दौरान बनाया गया कानून था—
पटियाला and पूर्वी पंजाब रियासतें संघ स्थायी काश्तकार (मालिकाना अधिकार निहित होना) अधिनियम, 1953 — 1953 का राष्ट्रपति अधिनियम क्रमांक 3
बाद में 1954 में पेप्सू विधानसभा ने इसी व्यवस्था को नए अधिनियम से प्रतिस्थापित किया। 1954 के कानून ने स्पष्ट रूप से 1953 का राष्ट्रपति अधिनियम क्रमांक 3 को अपना पूर्ववर्ती माना और उसके तहत की गई कार्रवाइयों को सुरक्षित रखा।
यह केवल काश्तकारी सुधार नहीं था।
यह स्वामित्व का हस्तांतरण था।
कानून की मूल अवधारणा में भू-स्वामी के भूमि-संबंधी अधिकार समाप्त होते थे और स्थायी काश्तकार उसी जमीन का भू-स्वामी बन जाता था। पुराने बिस्वेदार को किराया लेने का अधिकार समाप्त होता था; काश्तकार को अब सीधे सरकार को भूमि-राजस्व देना था; और भू-स्वामी को भूमि वापस देने के बजाय निर्धारित मुआवजा दिया जाना था।
इसीलिए 1953 का अधिनियम मुजारा आंदोलन में उस ऐतिहासिक क्षण का प्रतिनिधित्व करता है जब—
पहली बार बड़े पैमाने पर राजनीतिक नारे से आगे बढ़कर राज्य द्वारा मान्य मालिकाना अधिकार में बदलने लगा।
1952 के बाद पेप्सू की राजनीतिक अस्थिरता
1953 के कानून की पृष्ठभूमि समझने के लिए पेप्सू की तत्कालीन राजनीति को देखना आवश्यक है।
1951–52 के पहले आम चुनावों के बाद पेप्सू में स्थिर सरकार बनाना कठिन सिद्ध हुआ। प्रजा मंडल, कांग्रेस, अकाली, निर्दलीय और अन्य राजनीतिक शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा थी। गठबंधन अस्थिर रहे और भूमि-सुधार जैसे विवादास्पद प्रश्नों पर निर्णायक कानून बनाना कठिन होता गया।
यह स्थिति केवल मंत्रिमंडलीय अस्थिरता नहीं थी।
भूमि-सुधार के पीछे दो शक्तिशाली सामाजिक हित आमने-सामने थे—
एक तरफ पुराने भूमि-मालिक और बिस्वेदार,
दूसरी ओर मुजारे और अन्य काश्तकार कृषक।
जिस कानून से हजारों परिवारों की जमीन का स्वामित्व बदलना हो, वह स्वाभाविक रूप से राजनीतिक विवाद पैदा करता।
# राष्ट्रपति शासन की पृष्ठभूमि
राजनीतिक अस्थिरता के परिणामस्वरूप पेप्सू में राष्ट्रपति शासन लागू हुआ।
यहीं भूमि-सुधार की प्रक्रिया में केंद्र सरकार की भूमिका निर्णायक हो गई।
अब ऐसा कानून संभव हुआ जिसे कमजोर अथवा अस्थिर राज्य मंत्रिमंडल लंबे समय से अंतिम रूप नहीं दे पा रहा था।
राष्ट्रपति शासन के दौरान दो महत्वपूर्ण कृषि कानून सामने आए।
1953 का राष्ट्रपति अधिनियम क्रमांक 3 — स्थायी काश्तकार (मालिकाना अधिकार निहित होना)।
दूसरा व्यापक काश्तकारी और कृषि lands संबंधी President’s अधिनियम था, जिसकी संरचना आगे 1955 के पेप्सू काश्तकारी एवं कृषि भूमि अधिनियम में विकसित हुई।
इसलिए 1953 को भूमि-सुधार के निर्णायक विधायी वर्ष के रूप में देखना उचित है।
# 1953 का कानून किस समस्या का समाधान कर रहा था?
इसके केंद्र में स्थायी काश्तकार था।
स्थायी काश्तकार साधारण इच्छाधीन काश्तकार नहीं था।
उसके पास लंबे समय से स्थापित काश्तकारी अधिकार थे।
कई मामलों में उसका परिवार पीढ़ियों से जमीन जोत रहा था।
उसे आसानी से बेदखल नहीं किया जा सकता था।
भूमि-अभिलेख में उच्चाधिकारी स्वामित्व भू-स्वामी अथवा बिस्वेदार की थी।
किसान उसे किराया या बटाई देता था।
यानी वास्तविक कृषक और legal मालिक अलग-अलग व्यक्ति थे।
1953 का कानून इसी विभाजन को समाप्त करने की दिशा में था।
1954 के successor अधिनियम में सुरक्षित 1953 व्यवस्था का केंद्रीय सिद्धांत अत्यंत स्पष्ट है।
स्थायी काश्तकार द्वारा जोती भूमि में समाप्त हो जाते।
और वही अधिकार स्थायी काश्तकार में निहित हो जाते।
कानूनी भाषा में इसे कहा गया—
काश्तकार मालिक बन गया।
# अधिकार ‘खरीदने’ की बजाय ‘vest’ होना क्यों महत्वपूर्ण था?
यदि कानून केवल कहता कि काश्तकार जमीन खरीद सकता है, तो किसान को—
लेकिन स्थायी काश्तकार के मामले में कानून का सिद्धांत था कि भू-स्वामी का स्वामित्व interest कानून के प्रभाव से समाप्त होकर काश्तकार में निहित होगा।
इससे स्वामित्व हस्तांतरण को कहीं अधिक मजबूत कानूनी आधार मिला।
यही 1953–54 की स्थायी काश्तकारी सुधार और बाद के सामान्य काश्तकार के खरीद-अधिकार मॉडल के बीच महत्वपूर्ण अंतर है।
# भू-स्वामी का अधिकार किस स्तर तक समाप्त हुआ?
बाद के 1954 अधिनियम की धारा 3, जिसने 1953 के कानून की मूल संरचना को आगे बढ़ाया, कहती है कि भू-स्वामी के—
यहां तक कि कानून अथवा प्रथा से मान्य contingent interest
यानी कानून केवल लगान collection का अधिकार समाप्त नहीं कर रहा था।
वह उच्चाधिकारी मालिकाना estate ही समाप्त कर रहा था।
यह वास्तविक कृषि restructuring था।
# जमीन पर encumbrances का क्या हुआ?
एक और महत्वपूर्ण प्रावधान था।
भू-स्वामी द्वारा भूमि पर बनाए गए encumbrances—अर्थात कुछ प्रकार के बोझ अथवा दावे—के बावजूद मालिकाना अधिकार स्थायी काश्तकार में vest होने थे।
कानून का उद्देश्य काश्तकार को ऐसा स्वामित्व देना था जो भू-स्वामी की ओर से पैदा किए गए पूर्ववर्ती दावों से बाधित न हो।
इससे किसान का स्वामित्व title अधिक सुरक्षित हुआ।
# भू-स्वामी अब किराया नहीं ले सकता
स्वामित्व समाप्त होने का सबसे प्रत्यक्ष आर्थिक परिणाम था—
भू-स्वामी का लगान लेने का अधिकार समाप्त।
1954 के कानून में यह भी दर्ज है कि appointed day से भू-स्वामी स्थायी काश्तकारी भूमि के संबंध में लगान अथवा पूर्ववर्ती लगान arrears प्राप्त करने का अधिकारी नहीं रहेगा।
यह मुजारा आंदोलन की सबसे पुरानी मांगों में से एक की वास्तविक पूर्ति थी।
दशकों से संघर्ष का केंद्र था—
मालिकाना संबंध समाप्त होने के साथ भू-स्वामी का लगान claim भी समाप्त।
# किसान अब किसे भुगतान करेगा?
स्वामित्व हस्तांतरण का अर्थ यह नहीं था कि किसान राज्य से मुक्त हो गया।
भू-स्वामी को बटाई या किराया देने के बजाय,
सरकार को सीधे भूमि राजस्व देने का उत्तरदायी बना।
यह परिवर्तन अत्यंत प्रतीकात्मक था।
बीच का उच्चाधिकारी भू-स्वामी समाप्त हो गया।
यही intermediary उन्मूलन का वास्तविक अर्थ है।
# आंदोलन के लिए यह ऐतिहासिक जीत क्यों थी?
मुजारा आंदोलन दशकों से कह रहा था—
बिस्वेदार अनावश्यक मध्यस्थ है।
1953 के कानून में लगभग यही संरचना दिखाई देती है।
बिस्वेदार का श्रेष्ठ स्वामित्व समाप्त।
इसलिए इसे केवल प्रशासनिक काश्तकारी adjustment कहना आंदोलन के महत्व को कम करना होगा।
यह ग्रामीण सत्ता-संबंध का पुनर्गठन था।
लेकिन पेप्सू सरकार ने क्रांतिकारी confiscation का रास्ता नहीं चुना।
भू-स्वामी के अधिकार समाप्त किए गए, लेकिन उसे बिना किसी प्रतिफल के संपत्ति से वंचित नहीं किया गया।
कानून ने मुआवजे की व्यवस्था रखी।
बाद के 1954 कानून में भू-स्वामी को मुआवजा का स्पष्ट वैधानिक अधिकार दिया गया।
यहीं स्वतंत्र भारतीय राज्य की भूमि-सुधार नीति का विशिष्ट चरित्र दिखाई देता है।
# आंदोलन क्या चाहता था और राज्य ने क्या किया?
उग्र किसान दृष्टिकोण कह सकता था—
यदि बिस्वेदारी ऐतिहासिक अन्याय है तो भू-स्वामी को मुआवजा क्यों?
उसके पास कानून द्वारा मान्य स्वामित्व अधिकार रहा है।
सामाजिक न्याय के लिए यह अधिकार समाप्त किया जा सकता है,
लेकिन विधिसम्मत मुआवजा दिया जाएगा।
इस तरह राज्य ने दो सिद्धांतों के बीच मध्य मार्ग चुना—
प्रत्यक्ष भूमि-राजस्व payer,
1954 का पेप्सू स्थायी काश्तकार अधिनियम और 1955 का काश्तकारी एवं कृषि भूमि अधिनियम — 1953 की व्यवस्था का स्थायीकरण, इच्छाधीन काश्तकार की सुरक्षा, 30 मानक एकड़ की अनुमेय सीमा, जमीन खरीदकर मालिक बनने का अधिकार, मुआवजा, अधिशेष क्षेत्र और मुजारा आंदोलन की मांगों का व्यापक कानूनी संस्थानीकरण
1953 का राष्ट्रपति अधिनियम पेप्सू के स्थायी काश्तकार के लिए निर्णायक मोड़ था, लेकिन वह अंतिम समाधान नहीं था। उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी कि उसने अनेक स्थायी काश्तकार को उच्चाधिकारी भू-स्वामी से मुक्त कर मालिकाना अधिकार की दिशा दी। परंतु पेप्सू की कृषि संरचना उससे कहीं अधिक जटिल थी। बड़ी संख्या में किसान स्थायी काश्तकार नहीं, बल्कि इच्छाधीन काश्तकार थे; भू-स्वामियों के निजी खेती अधिकार का प्रश्न बाकी था; बड़ी जोतों की सीमा तय करनी थी; अधिशेष क्षेत्र के उपयोग का प्रश्न था; और भूमि-अधिकार के हस्तांतरण को स्थायी विधायी ढांचे में बदलना था।
इसीलिए 1954 और 1955 के दो कानून पेप्सू के भूमि-सुधार इतिहास में केंद्रीय स्थान रखते हैं।
पटियाला and पूर्वी पंजाब रियासतें संघ स्थायी काश्तकार (मालिकाना अधिकार निहित होना) अधिनियम, 1954.
पटियाला and पूर्वी पंजाब रियासतें संघ काश्तकारी एवं कृषि भूमि अधिनियम, 1955.
इन दोनों ने मिलकर मुजारा आंदोलन की कई मुख्य मांगों को स्थायी कानून में रूपांतरित किया।
1954 : राष्ट्रपति अधिनियम का स्थायीकरण
1953 में राष्ट्रपति शासन के दौरान स्थायी काश्तकार (मालिकाना अधिकार निहित होना) अधिनियम बनाया गया था। 1954 में पेप्सू की विधायिका ने इसी मूल ढांचे को अपने कानून के रूप में अपनाया।
1954 के अधिनियम ने 1953 के President’s अधिनियम को निरस्त अवश्य किया, लेकिन उसके तहत किए गए कार्यों और अर्जित अधिकारों को सुरक्षित रखा। इसका अर्थ था कि 1953 में शुरू हुई स्वामित्व vesting प्रक्रिया को वापस नहीं लिया गया; उसे स्थायी विधायी आधार दिया गया।
यह विधायी निरंतरता अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
राष्ट्रपति शासन की असाधारण परिस्थिति में शुरू हुआ सुधार अब सामान्य राज्य कानून का हिस्सा बन गया।
1954 का कानून स्पष्ट रूप से कहता था कि नियुक्त दिन से स्थायी काश्तकार द्वारा धारण भूमि में भू-स्वामी के—
समाप्त हो जाएंगे और वही अधिकार काश्तकार में निहित होंगे।
इसलिए 1954 का कानून केवल काश्तकार सुरक्षा नहीं था।
वह स्वामित्व हस्तांतरण law था।
यानी किसान को यह नहीं कहा गया कि—
तुम्हें कुछ वर्षों तक बेदखल नहीं किया जाएगा।
अब तुम ही भू-स्वामी हो।
# बिस्वेदार का उच्चाधिकारी title समाप्त
यह बिस्वेदारी व्यवस्था के लिए निर्णायक प्रहार था।
पुरानी संरचना में किसान भूमि जोतता था, लेकिन उच्चाधिकारी title किसी और का था।
अब वह श्रेष्ठ स्वामित्व समाप्त हो रहा था।
भू-स्वामी का अधिकार केवल सीमित नहीं हुआ—
वह स्थायी काश्तकारी भूमि पर मूलतः extinguish हो गया।
यही पेप्सू भूमि-सुधार की संरचनात्मक क्रांतिकारिता थी।
1954 के बाद स्थायी काश्तकार को अब पुराने भू-स्वामी को लगान अथवा बटाई देने की आवश्यकता नहीं थी।
वह सीधे राज्य के प्रति भूमि राजस्व का उत्तरदायी हुआ।
यह परिवर्तन आर्थिक से अधिक राजनीतिक था।
मध्यस्थ वर्ग का हटना ही बिस्वेदारी उन्मूलन का वास्तविक अर्थ था।
1954 के कानून में केवल व्यक्तिगत खेत का title ही नहीं बदला।
कुछ परिस्थितियों में भू-स्वामी के शमिलात में आनुपातिक अधिकार भी स्थायी काश्तकार के पक्ष में स्थानांतरित हुए।
इससे काश्तकार का गांव की साझा भूमि-व्यवस्था में भी स्थान मजबूत हुआ।
अर्थात वह केवल खेत का मालिक नहीं, ग्रामीण मालिकाना community का सदस्य भी बन सकता था।
राज्य ने पुराने भू-स्वामियों को बिना प्रतिफल पूरी तरह समाप्त करने का रास्ता नहीं अपनाया।
उनके अधिकार समाप्त होने के बदले statutory मुआवजा की व्यवस्था रखी गई।
यही स्वतंत्र भारत की भूमि-सुधार नीति का सामान्य चरित्र था—
भूमि वास्तविक कृषक के पास जाए,
लेकिन पुराना स्वामित्व interest कानूनी बंदोबस्त के बिना समाप्त न हो।
फिर भी समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
यह कानून मुख्यतः स्थायी काश्तकार के लिए था।
पेप्सू के बहुत से काश्तकार इच्छाधीन काश्तकार थे।
उनके पास लंबे स्थायी काश्तकारी अधिकार नहीं थे।
क्या केवल पुराने मजबूत काश्तकार को स्वामित्व मिलेगी?
या व्यापक काश्तकारी वर्ग को भी सुरक्षा और मालिक बनने का रास्ता मिलेगा?
यहीं 1955 का कानून निर्णायक बना।
# 1955 का पेप्सू काश्तकारी एवं कृषि भूमि अधिनियम
पेप्सू काश्तकारी एवं कृषि भूमि अधिनियम, 1955 अधिक व्यापक भूमि-सुधार कानून था।
इसने केवल स्थायी काश्तकारी अधिकार को नहीं देखा।
भू-स्वामी की अनुमेय क्षेत्र,
और कुछ परिस्थितियों में काश्तकार द्वारा जमीन खरीदकर मालिक बनने की व्यवस्था।
यही वह कानून था जिसने मुजारा आंदोलन की मांगों को व्यापक कृषि नीति में बदल दिया।
# अनुमेय सीमा : 30 मानक एकड़
1955 कानून की सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं में से एक थी—
30 मानक एकड़ की अनुमेय सीमा.
यह साधारण 30 physical एकड़ नहीं था।
‘मानक एकड़’ भूमि की गुणवत्ता और उत्पादकता के आधार पर गणना की जाने वाली इकाई थी।
अर्थात अत्यंत उपजाऊ सिंचित भूमि और कम उपजाऊ भूमि को एक समान physical acreage के आधार पर नहीं मापा जाता था।
इसका उद्देश्य भूमि सीमा को कृषि क्षमता से जोड़ना था।
मान लें एक व्यक्ति के पास 30 एकड़ अत्यंत उपजाऊ नहरी भूमि है और दूसरे के पास 30 एकड़ कमजोर वर्षा-निर्भर भूमि।
दोनों की वास्तविक उत्पादन क्षमता बराबर नहीं होगी।
इसलिए मानक एकड़ व्यवस्था भूमि की गुणवत्ता और उत्पादन क्षमता को ध्यान में रखती थी।
यह स्वतंत्र भारत की भूमि अधिकतम सीमा नीतियों का महत्वपूर्ण तकनीकी उपकरण था।
# 30 मानक एकड़ का राजनीतिक अर्थ
सीमा निर्धारित करने का मतलब था—
भू-स्वामी की भूमि रखने की शक्ति अब पूर्ण नहीं रही।
वह अनिश्चित मात्रा में जमीन काश्तकार से वापस लेकर निजी खेती के नाम पर अपने पास नहीं रख सकता।
यह काश्तकार सुरक्षा की बुनियादी शर्त थी।
यदि भू-स्वामी के लिए कोई अधिकतम सीमा न हो, तो काश्तकारी सुधार को आसानी से निष्प्रभावी किया जा सकता था।
1955 के कानून में व्यक्तिगत खेती का प्रश्न भी महत्वपूर्ण था।
भू-स्वामी यह दावा कर सकता था कि वह स्वयं खेती करेगा।
लेकिन ‘निजी खेती’ का अर्थ केवल यह नहीं था कि मालिक का नाम रिकॉर्ड में है।
कानून ने वास्तविक कृषि भागीदारी और पर्यवेक्षण को महत्व दिया।
इससे absentee भू-स्वामी के लिए केवल कागजी दावा करना कठिन होना था।
# इच्छाधीन काश्तकार की सुरक्षा
1955 कानून का सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक प्रभाव उन काश्तकार पर पड़ा जो स्थायी काश्तकार नहीं थे।
इन किसानों के सामने सबसे बड़ा खतरा था—
कानून ने काश्तकार बेदखली को नियंत्रित किया और भूमि-मालिक के पुनर्ग्रहण अधिकार को सीमित किया।
इससे इच्छाधीन काश्तकार की स्थिति पहले से अधिक सुरक्षित हुई।
हालांकि उसे हर परिस्थिति में स्वतः मालिक नहीं बनाया गया, लेकिन काश्तकारी अब केवल भू-स्वामी की इच्छा पर निर्भर नहीं रहनी थी।
# protected काश्तकारी की दिशा
1952 की कृषि सुधार रिपोर्ट ने लंबे समय से जमीन जोत रहे इच्छाधीन काश्तकार को protected काश्तकार बनाने की सिफारिश की थी।
1955 की विधायी व्यवस्था इसी व्यापक सोच से प्रभावित थी—
जो किसान लंबे समय से जमीन जोतता है, उसकी सुरक्षा साधारण अस्थायी किरायेदार जैसी नहीं हो सकती।
इस सिद्धांत ने पेप्सू में काश्तकारी सुधार को केवल लगान control से ऊपर उठाया।
# किसान जमीन खरीदकर मालिक कैसे बन सकता था?
1955 कानून ने पात्र काश्तकार को निर्धारित प्रक्रिया से भूमि के मालिकाना अधिकार acquire करने का अधिकार दिया।
भूमि-सुधार का वास्तविक क्रियान्वयन और परिणाम — मालिकाना अधिकारों का हस्तांतरण, राजस्व अभिलेखों में परिवर्तन, कितने मुजारे भूमिधर बने, बिस्वेदारी का व्यावहारिक अंत, मुआवजा और मुकदमे, क्षेत्रीय अंतर तथा कानून और जमीन के बीच की दूरी
पेप्सू मुजारा आंदोलन की सफलता को केवल 1953, 1954 और 1955 के कानूनों को पढ़कर नहीं मापा जा सकता। वास्तविक प्रश्न यह है कि कानून बनने के बाद खेत पर क्या बदला? क्या जिस किसान ने पीढ़ियों तक बिस्वेदार को बटाई दी, वह वास्तव में भूमि-अभिलेख में मालिक बना? क्या बिस्वेदार का अधिकार केवल कानून की पुस्तक में समाप्त हुआ या गांव में भी? कितनी भूमि किसानों के पास गई? मुआवजा कैसे तय हुआ? किन किसानों को लाभ नहीं मिला? और क्या कानून ने उन सभी असमानताओं को समाप्त कर दिया जिनसे मुजारा आंदोलन पैदा हुआ था?
इन प्रश्नों के उत्तर हमें एक अधिक जटिल तस्वीर देते हैं।
पेप्सू के भूमि-सुधार वास्तविक और संरचनात्मक रूप से महत्वपूर्ण थे। स्थायी काश्तकार को मालिकाना अधिकार मिले, पुराने उच्चाधिकारी भू-स्वामी अधिकार समाप्त हुए और बिस्वेदारी की वह व्यवस्था, जिसके विरुद्ध आंदोलन चला था, टिकाऊ संस्था के रूप में समाप्त हो गई। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर मुजारा तत्काल भूमिधर बन गया, हर विवाद समाप्त हो गया या सारी surplus भूमि तत्काल भूमिहीनों में बंट गई।
कानून और जमीन के बीच एक लंबी प्रशासनिक यात्रा थी।
सुधार से पहले समस्या का वास्तविक पैमाना
1952 की आधिकारिक Report on कृषि सुधार in पेप्सू हमें भूमि-संबंधों के पैमाने का एक अत्यंत उपयोगी आधार देती है।
रिपोर्ट के अनुसार पेप्सू में लगभग—
• 40.29 लाख एकड़ क्षेत्र owners, including राज्य, के अधीन था;
• 6.37 लाख एकड़ स्थायी काश्तकार के अधीन;
• लगभग 10.47 लाख एकड़ इच्छाधीन काश्तकार के अधीन;
• इसके अतिरिक्त special काश्तकार, lessees और mortgagees की अलग-अलग श्रेणियां थीं।
इस आंकड़े का महत्व बहुत बड़ा है।
यह बताता है कि काश्तकारी कोई सीमांत समस्या नहीं थी।
लगभग 16.8 लाख एकड़ भूमि अकेले स्थायी काश्तकार और इच्छाधीन काश्तकार की दो बड़ी श्रेणियों के अधीन थी।
इसलिए भूमि-सुधार का प्रश्न लाखों एकड़ कृषि भूमि और विशाल ग्रामीण आबादी के सामाजिक भविष्य से जुड़ा था।
# सबसे पहले किसे वास्तविक लाभ मिला?
भूमि-सुधार का सबसे स्पष्ट और प्रत्यक्ष लाभ स्थायी काश्तकार को मिला।
1953 के राष्ट्रपति अधिनियम और फिर 1954 के पेप्सू स्थायी काश्तकार (मालिकाना अधिकार निहित होना) अधिनियम ने उनके लिए एक बहुत शक्तिशाली कानूनी सिद्धांत स्थापित किया—
जिस भूमि पर उनका मान्य स्थायी काश्तकारी अधिकार था, उसमें भू-स्वामी के मालिकाना अधिकार समाप्त होकर काश्तकार में निहित हो जाएंगे।
इसका अर्थ था कि स्वामित्व प्राप्त करने के लिए हर स्थायी काश्तकार को पहले भू-स्वामी से निजी सौदा करना आवश्यक नहीं था।
कानून स्वयं उसके पक्ष में title बदल रहा था।
# कागज पर अधिकार से खेत के मालिक तक
लेकिन “अधिकार vest हो गए” लिख देना प्रशासनिक प्रक्रिया का अंत नहीं था।
ग्रामीण भारत में वास्तविक स्वामित्व का सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण है—
यहीं कानून का वास्तविक क्रियान्वयन शुरू होता था।
# पटवारी की भूमिका क्यों निर्णायक थी?
1953 के नियम बताते हैं कि Special Officer द्वारा दिए गए प्रत्येक निर्णय की प्रतिलिपि संबंधित जिले के Collector के साथ-साथ उस estate के Patwari को भी भेजी जानी थी।
यह कोई मामूली प्रशासनिक औपचारिकता नहीं थी।
Patwari के पास गांव के भूमि-अभिलेख होते थे।
इसलिए निर्णय से राजस्व अभिलेख तक जाने वाली श्रृंखला आवश्यक थी।
लेकिन गांव की जमाबंदी में यदि पुराना नाम चलता रहे तो भविष्य में—
सभी में विवाद पैदा हो सकता था।
1953–54 की व्यवस्था में Special Officer महत्वपूर्ण संस्था था।
उसके सामने भू-स्वामी और काश्तकार के दावे आ सकते थे।
और मुआवजा अथवा संबंधित अधिकारों पर निर्णय देता।
1953 के नियमों में भू-स्वामी के आवेदन, स्थायी काश्तकार और भू-स्वामी को notices तथा निर्णय की प्रतियां Collector और Patwari को भेजने की स्पष्ट प्रक्रिया दी गई थी।
इससे पता चलता है कि स्वामित्व हस्तांतरण को प्रशासनिक रूप से दस्तावेजीकृत करने का व्यवस्थित प्रयास हुआ।
# कौन स्थायी काश्तकार माना गया?
यहीं क्रियान्वयन का सबसे कठिन प्रश्न सामने आता था।
कानून ने केवल उन लोगों को नहीं देखा जिनके सामने तत्कालीन जमाबंदी में “स्थायी काश्तकार” लिखा था।
1954 के अधिनियम की परिभाषा काफी व्यापक थी।
पूर्व फरीदकोट राज्य के Muzara-i-shartia, Chakotedar khas, Muzara bilatai-yun sifat, Muzara tabe marzi malik और Chakotedar nautor जैसी श्रेणियां,
पूर्व Malerkotla राज्य के dakhilkar और maurussi,
और कुछ ऐसे लोग भी शामिल किए गए जो 11 मार्च 1940 को स्थायी काश्तकार दर्ज थे लेकिन बाद में अधिकार से वंचित कर दिए गए थे।
यह प्रावधान अत्यंत महत्वपूर्ण था।
राज्य ने माना कि केवल वर्तमान रिकॉर्ड देखकर न्याय नहीं किया जा सकता।
# पुराने बेदखल किसान भी क्यों शामिल किए गए?
मुजारा आंदोलन की बड़ी शिकायतों में एक यह थी कि संघर्ष के दौरान अनेक किसानों के अधिकार कमजोर किए गए, कब्जा बदला अथवा पुराने काश्तकारी claims विवादित हुए।
इसलिए कानून ने कुछ मामलों में 11 मार्च 1940 के रिकॉर्ड तक पीछे जाकर अधिकार की जांच का रास्ता दिया।
यह मूलतः एक प्रकार का historical correction था।
अर्थात यदि किसी किसान का पुराना स्थायी काश्तकारी अधिकार बाद में समाप्त हो गया था, तो केवल वर्तमान कब्जे के आधार पर उसका दावा स्वतः समाप्त नहीं माना जाता था।
यहां मुजारा आंदोलन की ऐतिहासिक स्मृति कानून में प्रवेश करती दिखाई देती है।
हम पहले से इस भूमि के वास्तविक कृषक हैं।
बिस्वेदारी ने हमारे पैतृक अधिकार छीने।
कानून प्रत्येक पैतृक दावे को स्वतः स्वीकार नहीं करता था, लेकिन पुराने राजस्व अभिलेख को प्रासंगिक मानकर उसने कम-से-कम यह स्वीकार किया कि—
भूमि-अधिकार का इतिहास भी देखा जाना चाहिए।
# कितने मुजारे वास्तव में मालिक बने?
यह इस आंदोलन के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण और सबसे सावधानी से लिखा जाने वाला प्रश्न है।
कई लोकप्रिय विवरणों में लगभग तीन लाख मुजारों अथवा काश्तकारों को मालिकाना अधिकार मिलने का उल्लेख मिलता है। लेकिन उपलब्ध प्राथमिक ऑनलाइन कानूनी स्रोतों और 1952 की कृषि-सुधार रिपोर्ट से इस “तीन लाख” संख्या की स्पष्ट, अंतिम और समान रूप से परिभाषित आधिकारिक पुष्टि नहीं मिलती।
इसलिए इसे निश्चित सरकारी आंकड़ा मानकर लिखना उचित नहीं होगा।
हमारे पास अधिक ठोस आधिकारिक आधार भूमि क्षेत्रफल का है।
1952 की सरकारी रिपोर्ट में स्थायी काश्तकार के अधीन लगभग 6,37,331 एकड़, जिसमें लगभग 6,21,501 एकड़ cultivated क्षेत्र था।
इससे सुधार के संभावित क्षेत्रीय पैमाने का मजबूत अनुमान मिलता है, लेकिन लाभार्थी परिवारों की अंतिम संख्या नहीं।
# इसलिए “तीन लाख” को कैसे लिखा जाए?
वेबसाइट के शोध संस्करण में सबसे सुरक्षित भाषा होगी—
विभिन्न द्वितीयक विवरणों में लगभग तीन लाख काश्तकारों के लाभान्वित होने का अनुमान मिलता है, लेकिन उपलब्ध प्राथमिक सरकारी ऑनलाइन स्रोतों से इस संख्या की अंतिम स्वतंत्र पुष्टि नहीं होती। 1952 की आधिकारिक रिपोर्ट लगभग 6.37 लाख एकड़ भूमि स्थायी काश्तकार के अधीन दर्ज करती है।
इससे दावा भी दर्ज रहेगा और शोध की विश्वसनीयता भी बनी रहेगी।
# बिस्वेदारी का व्यावहारिक अंत
बिस्वेदारी व्यवस्था का अंत किसी एक दिन पूरे पेप्सू में एक समान नहीं हुआ।
मुजारा आंदोलन में महिलाओं की भूमिका — किसान परिवारों की आर्थिक रीढ़, बटाई-विरोध और फसल रक्षा, भूमिगत कार्यकर्ताओं को आश्रय और रसद, पुलिस-दमन का सामना, आंदोलन की महिला भागीदारी के उपलब्ध प्रमाण तथा इतिहासलेखन में उनकी उपेक्षा
पेप्सू मुजारा आंदोलन के इतिहास में महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण थी, लेकिन उपलब्ध दस्तावेजों और अधिकांश इतिहासलेखन में उनका उल्लेख अपेक्षाकृत कम मिलता है। आंदोलन के प्रमुख नेताओं, किसान समितियों, पुलिस कार्रवाइयों, भूमि कानूनों और राजनीतिक संगठनों पर पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है, लेकिन गांवों के भीतर महिलाओं ने संघर्ष को कैसे टिकाए रखा—इस पर स्रोत कहीं अधिक सीमित हैं।
इसलिए इस अध्याय में एक सावधानी आवश्यक है। जहां प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध हैं, वहां उन्हें स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाना चाहिए; जहां महिलाओं की भूमिका आंदोलन की सामाजिक संरचना से तार्किक रूप से समझी जा सकती है लेकिन व्यक्तिगत नाम या घटनाएं दर्ज नहीं हैं, वहां अनुमान को तथ्य की तरह प्रस्तुत नहीं करना चाहिए।
फिर भी इतना निर्विवाद है कि लंबे किसान आंदोलन की सामाजिक और आर्थिक रीढ़ परिवार होता है, और पेप्सू के ग्रामीण समाज में परिवार की कृषि तथा घरेलू अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका केंद्रीय थी। जब पुरुष किसान जेल गए, भूमिगत हुए, जत्थों में शामिल हुए या पुलिस कार्रवाई से बचते रहे, तब खेत, पशुधन, घर और बच्चों की जिम्मेदारी महिलाओं पर और अधिक बढ़ी। इसी श्रम ने आंदोलन को टिकाऊ बनाया।
आंदोलन की अदृश्य सामाजिक शक्ति
राजनीतिक इतिहास अक्सर उन्हीं व्यक्तियों को दर्ज करता है जो मंच पर भाषण देते हैं, गिरफ्तार होते हैं, किसी संगठन के पदाधिकारी होते हैं या किसी गोलीकांड में मारे जाते हैं। इस वजह से ग्रामीण महिलाओं की भूमिका कई बार इतिहास के बाहर चली जाती है।
लेकिन किसी भी दीर्घकालीन किसान संघर्ष में कुछ प्रश्न मूलभूत हैं—
किसान जेल गया तो खेत किसने संभाला?
उसके बच्चों को भोजन किसने दिया?
भूमिगत कार्यकर्ता को रात का खाना किसने बनाया?
पुलिस की तलाशी के बाद घर और पशु कौन संभालता रहा?
पुरुष नेतृत्व के पीछे यह पूरा सामाजिक श्रम मुख्यतः महिलाओं के कंधों पर था।
इसीलिए महिलाओं को केवल “सहयोगी” कहना उनके योगदान को कम करके देखना होगा।
किसान परिवार की आर्थिक रीढ़
पंजाब के किसान परिवार में महिला का श्रम केवल घर तक सीमित नहीं था।
वह कृषि उत्पादन की कई गतिविधियों में योगदान करती थी—
दूध और दुग्ध उत्पादों का प्रबंधन,
इन सभी गतिविधियों का आंदोलन से प्रत्यक्ष संबंध था।
यदि पुरुष राजनीतिक गतिविधि के कारण खेत से अनुपस्थित हो तो परिवार की कृषि उत्पादन क्षमता तभी बच सकती थी जब महिला अधिक श्रम करे।
इस अर्थ में किसान आंदोलन की राजनीतिक क्षमता का आधार महिलाओं का अतिरिक्त श्रम भी था।
बटाई-विरोध और परिवार की भागीदारी
‘नो बटाई’ अभियान केवल खेत में पुरुष किसान द्वारा लिया गया निर्णय नहीं था।
यदि परिवार बिस्वेदार को फसल का हिस्सा न देने का फैसला करता, तो पूरा घर जोखिम उठाता था।
बटाई रोकने से फायदा हो सकता था—
परिवार के पास अधिक अनाज रहना।
इन सभी जोखिमों का बोझ महिलाओं पर भी पड़ता था।
इसलिए बटाई-विरोध की सफलता के लिए परिवार की सहमति आवश्यक थी।
फसल की रक्षा
मुजारा आंदोलन के उग्र चरण में फसल स्वयं राजनीतिक संघर्ष का केंद्र बन गई।
किसान बटाई नहीं देना चाहता था।
बिस्वेदार अपना हिस्सा चाहता था।
ऐसे समय परिवारों को कटाई, भंडारण और अनाज की सुरक्षा में विशेष सावधानी रखनी पड़ती थी।
महिलाएं खेत और घर के बीच इस आर्थिक सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा थीं।
जहां पुरुष किसान जत्थों में बाहर हों, वहां घर में रखे अनाज, पशु और कृषि संसाधन महिलाओं की जिम्मेदारी बन जाते थे।
इसलिए फसल रक्षा को केवल हथियारबंद किसान जत्थों से नहीं समझना चाहिए; घरेलू स्तर पर भी यह प्रतिरोध था।
पुलिस-दमन के समय महिलाओं की स्थिति
किशनगढ़ के बाद और दूसरे संवेदनशील क्षेत्रों में पुलिस कार्रवाई, गिरफ्तारी और गांवों की तलाशी की स्थितियां बनीं।
ऐसे समय घर में पुरुष सदस्य न होने पर महिलाओं को सीधे प्रशासन से सामना करना पड़ सकता था।
इन सबका प्रभाव परिवार की महिलाओं पर भी पड़ता था।
दमन का इतिहास यदि केवल गिरफ्तार पुरुषों की सूची तक सीमित हो, तो पीड़ा का बड़ा हिस्सा अदृश्य रह जाता है।
भूमिगत कार्यकर्ताओं को आश्रय
1948–50 के उग्र चरण में लाल कम्युनिस्ट पार्टी और किसान संगठन के कुछ नेता भूमिगत रहे।
भूमिगत नेटवर्क चलाने के लिए गांवों में सुरक्षित घरों की आवश्यकता होती थी।
इस पूरे काम में घर की महिला की सहमति और सक्रिय सहयोग आवश्यक था।
भूमिगत कार्यकर्ता को घर में छिपाना बड़ा जोखिम था। यदि पुलिस को पता चलता तो पूरा परिवार दबाव में आ सकता था।
इसलिए आश्रय देना स्वयं राजनीतिक साहस का कार्य था।
भोजन और रसद : आंदोलन का अनदेखा मोर्चा
सशस्त्र या भूमिगत राजनीति का सबसे सरल लेकिन निर्णायक प्रश्न है—
किसान कार्यकर्ता गांव से गांव जा रहे हों तो भोजन की नियमित व्यवस्था चाहिए।
यह व्यवस्था स्थानीय परिवारों से आती थी।
ये सब आंदोलन की वास्तविक रसद थे।
इस श्रम का अधिकांश हिस्सा महिलाओं द्वारा किया जाता था।
इसलिए आंदोलन के संगठनात्मक इतिहास में रसोई भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी जितनी सभा।
संदेश पहुंचाने की संभावित भूमिका
ग्रामीण आंदोलनों में महिलाएं कई बार संदेश पहुंचाने और पुलिस की गतिविधियों की सूचना देने में भूमिका निभाती हैं क्योंकि उन पर पुरुष राजनीतिक कार्यकर्ताओं की तुलना में कम संदेह किया जा सकता है।
पेप्सू आंदोलन के प्रत्येक क्षेत्र के लिए इसके प्रत्यक्ष लिखित प्रमाण पर्याप्त नहीं हैं, इसलिए इसे सार्वभौमिक तथ्य की तरह प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
फिर भी उपलब्ध मौखिक इतिहास और भारतीय किसान आंदोलनों के तुलनात्मक अनुभव बताते हैं कि घर और गांव के बीच सूचना नेटवर्क में महिलाओं की भागीदारी एक महत्वपूर्ण संभावना थी।
जहां विशिष्ट नाम और घटनाएं भविष्य के अभिलेखीय या मौखिक शोध से मिलें, उन्हें अलग से दर्ज किया जाना चाहिए।
गिरफ्तार पुरुष और पीछे छूटा परिवार
किसान आंदोलन में गिरफ्तारी का वास्तविक प्रभाव जेल गए व्यक्ति से आगे जाता है।
मान लें परिवार का मुख्य पुरुष कृषक छह महीने जेल में है।
यदि परिवार इस दबाव में टूट जाए तो अगला किसान आंदोलन में भाग लेने से डरेगा।
इसलिए संगठनों द्वारा गिरफ्तार परिवारों की सहायता और महिलाओं का धैर्य आंदोलन की निरंतरता के लिए निर्णायक था।
भूमिगत राजनीति और स्त्री श्रम का विस्तार
पुरुष राजनीतिक कार्यकर्ता भूमिगत होता है तो उसकी राजनीतिक सक्रियता इतिहास में दर्ज हो सकती है।
लेकिन उसके भूमिगत होने की कीमत परिवार चुकाता है।
बच्चों की जिम्मेदारी बढ़ती है।
ऐसे में महिलाएं आंदोलन की राजनीतिक लागत का बड़ा हिस्सा वहन करती हैं।
इसीलिए किसी भी भूमिगत किसान संघर्ष का वास्तविक सामाजिक मूल्यांकन तभी पूरा होगा जब परिवार की इस भूमिका को शामिल किया जाए।
महिलाओं की प्रत्यक्ष भागीदारी
पंजाब की किसान राजनीतिक परंपरा में महिलाओं की प्रत्यक्ष भागीदारी नई नहीं थी। गुरुद्वारा सुधार आंदोलन, औपनिवेशिक विरोध और बाद के किसान आंदोलनों में महिलाएं सभाओं, विरोध, गिरफ्तारियों और सार्वजनिक लामबंदी में दिखती हैं।
पेप्सू मुजारा आंदोलन में भी स्थानीय स्तर पर महिलाओं की प्रत्यक्ष भागीदारी के संदर्भ मिलते हैं, लेकिन विस्तृत नामवार सूची उपलब्ध नहीं है।
यह स्रोतों की समस्या है, न कि यह प्रमाण कि महिलाएं अनुपस्थित थीं।
इतिहासलेखन में किसी समूह का कम उल्लेख उस समूह की कम भागीदारी का स्वतः प्रमाण नहीं होता।
पुरुष नेतृत्व-केंद्रित स्रोत
सरकारी दस्तावेज किसे दर्ज करते हैं?
आंदोलन की विजय और महिलाओं का बदलता जीवन
संपत्ति पर स्वतंत्र नियंत्रण,
दलित, भूमिहीन कृषि मजदूर और छोटे किसान — मुजारा आंदोलन का सामाजिक आधार, जाति और वर्ग का संबंध, भूमिहीनों की भागीदारी, काश्तकार से भूमिधर सुधार की सीमाएं, अधिशेष भूमि का प्रश्न और भूमि-सुधार के बाद भी बनी ग्रामीण असमानता
पेप्सू मुजारा आंदोलन को यदि केवल “किसान बनाम बिस्वेदार” के द्वंद्व के रूप में पढ़ा जाए तो उसकी सामाजिक संरचना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा छूट जाता है। गांव का समाज एक समान कृषक समुदाय नहीं था। उसमें अलग-अलग आर्थिक और सामाजिक श्रेणियां थीं—बिस्वेदार और बड़े भू-स्वामी, स्थायी काश्तकार, इच्छाधीन काश्तकार, छोटे स्वामी-किसान, भूमिहीन कृषि मजदूर, सेवा और शिल्प से जुड़े समुदाय तथा जाति-आधारित ग्रामीण श्रम समूह।
इसलिए आंदोलन की सफलता का मूल्यांकन करते समय केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं है कि कितने मुजारे मालिक बने। यह भी पूछना आवश्यक है—
भूमि-सुधार से कौन सबसे अधिक लाभान्वित हुआ?
किसके पास काश्तकारी claim ही नहीं था?
क्या खेत में श्रम करने वाला हर व्यक्ति “जमीन उसकी जो जोते” के सिद्धांत के भीतर आया?
और विशेष रूप से—भूमिहीन दलित कृषि मजदूर इस ऐतिहासिक परिवर्तन में कहां खड़े थे?
यहीं पेप्सू मुजारा आंदोलन की महान उपलब्धि और उसकी सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक सीमा दोनों दिखाई देती हैं।
मुजारा आंदोलन का मुख्य सामाजिक आधार कौन था?
आंदोलन का केंद्रीय सामाजिक आधार काश्तकार कृषक था।
वह भूमिधर नहीं था, लेकिन खेत पर उसका अपेक्षाकृत स्थायी काश्तकारी संबंध था। कई परिवार पीढ़ियों से एक ही भूमि जोत रहे थे और उनका दावा था कि बिस्वेदारी व्यवस्था ने उनके पैतृक भूमि-अधिकार को कमजोर कर उन्हें काश्तकार बना दिया।
रोंकी राम के अध्ययन में भी पेप्सू आंदोलन को उस दीर्घ संघर्ष की निरंतरता बताया गया है जिसमें वास्तविक कृषक को hereditary मालिकाना peasants से घटाकर muzaras बनाया गया था और बड़े अथवा absentee biswedars ने श्रेष्ठ मालिकाना अधिकार स्थापित कर लिए थे।
इसका अर्थ है कि आंदोलन के प्रमुख प्रतिभागी सामान्य अर्थ में “भूमिहीन मजदूर” नहीं थे।
उनके पास भूमि का काश्तकारी कब्जा था।
# भूमि-विहीन और भूमि-स्वामित्व-विहीन में अंतर
मुजारा को अक्सर सामान्य भाषा में “भूमिहीन काश्तकार farmer” कहा जाता है। आधुनिक समाचार विवरण भी ऐसा करते हैं।
लेकिन इसे सावधानी से समझना चाहिए।
लेकिन वह आवश्यक रूप से खेत से विहीन कृषि मजदूर नहीं था।
और कई मामलों में उसकी काश्तकारी लंबे समय से चली आ रही थी।
इसके विपरीत भूमिहीन खेत मजदूर के पास ऐसी काश्तकारी भी नहीं हो सकती थी।
यही कारण है कि काश्तकार से भूमिधर सुधार का लाभ पहले वर्ग को अधिक मिला।
# पेप्सू की कृषि संरचना स्वयं इस अंतर को दिखाती है
1952 की Report on कृषि सुधार in पेप्सू ने कृषि समाज को अलग-अलग tenure श्रेणियां में देखा।
यह महत्वपूर्ण है क्योंकि कानून उसी व्यक्ति के अधिकार को बदल सकता था जिसके पास पहले से कोई काश्तकारी संबंध था।
जिस व्यक्ति के पास काश्तकारी ही नहीं थी और वह केवल मजदूरी करता था, वह स्थायी काश्तकारी स्वामित्व हस्तांतरण के स्वतः लाभार्थी वर्ग में नहीं आता।
# जाति और वर्ग एक ही चीज नहीं थे
पेप्सू के ग्रामीण समाज को केवल वर्ग से समझना पर्याप्त नहीं, लेकिन केवल जाति से समझना भी गलत होगा।
एक Jat Sikh किसान स्वयं काश्तकार और शोषित मुजारा हो सकता था।
एक दलित व्यक्ति भूमिहीन कृषि मजदूर हो सकता था।
लेकिन हर काश्तकार एक ही जाति का नहीं था और हर दलित का अनुभव भी समान नहीं था।
इसलिए जाति और वर्ग परस्पर जुड़े हुए थे, लेकिन एक-दूसरे के पर्याय नहीं।
आंदोलन की राजनीति मुख्यतः भूमि-संबंध की वर्गीय भाषा में विकसित हुई—
इसी वजह से वह एक व्यापक काश्तकार आंदोलन बन सका।
# फिर दलित प्रश्न अलग क्यों दिखाई देता है?
क्योंकि पंजाब में दलित आबादी का बड़ा हिस्सा ऐतिहासिक रूप से भूमिहीन कृषि मजदूरी और गैर-कृषक ग्रामीण श्रम से जुड़ा रहा।
उनके लिए केंद्रीय समस्या यह नहीं थी कि—
“मैं इस खेत का काश्तकार हूं, मुझे स्वामित्व दो।”
“मेरे पास कोई भूमि-अधिकार ही नहीं है।”
यह दो बिल्कुल अलग सामाजिक परिस्थितियां हैं।
काश्तकार का संघर्ष स्वामित्व में परिवर्तन का था।
भूमिहीन labourer का संघर्ष भूमि तक प्रवेश का था।
यही कारण है कि पेप्सू भूमि-सुधार काश्तकार के लिए कहीं अधिक क्रांतिकारी सिद्ध हुआ।
# क्या दलित मुजारा आंदोलन से बाहर थे?
इस प्रश्न पर बहुत सावधानी आवश्यक है।
कुछ आधुनिक दलित भूमि-अधिकार अध्ययनों और अभियान-संबंधी रिपोर्टों में स्पष्ट दावा किया गया है कि ऐतिहासिक Muzara आंदोलन ने दलितों को शामिल नहीं किया या उसका मुख्य लाभ उनके पास नहीं पहुंचा। एक 2020 के दलित भूमि-अधिकार दस्तावेज में कहा गया है कि आंदोलन काश्तकार farmers के भूमि-अधिकार पर केंद्रित था, लेकिन Dalit भूमिहीन population उसकी मुख्य लाभार्थी नहीं बनी।
लेकिन इस कथन को शाब्दिक अर्थ में—
“एक भी दलित व्यक्ति आंदोलन में नहीं था”
के रूप में नहीं लिखना चाहिए।
उपलब्ध पेप्सू-विशिष्ट स्रोत व्यक्तिगत प्रतिभागियों की जातीय पहचान का ऐसा संपूर्ण census उपलब्ध नहीं कराते।
इसलिए अधिक सटीक निष्कर्ष है—
आंदोलन का संरचनात्मक केंद्र काश्तकार कृषक थे, न कि भूमिहीन दलित कृषि मजदूर; इस कारण दलित भूमिहीनता आंदोलन की केंद्रीय मांग नहीं बन सकी।
# जाति से अधिक काश्तकारी status क्यों निर्णायक था?
क्या आप स्थायी काश्तकार हैं?
क्या आपका नाम राजस्व अभिलेख में है?
क्या आप इच्छाधीन काश्तकार हैं?
क्या आप लंबे समय से जोत रहे हैं?
वह प्रारंभ में यह नहीं पूछता था—
इसलिए यदि किसी दलित परिवार के पास वैधानिक काश्तकारी claim होता तो सिद्धांततः वह संबंधित काश्तकार सुरक्षा के अंतर्गत आ सकता था।
लेकिन समस्या यह थी कि दलित ग्रामीण आबादी के बहुत बड़े हिस्से के पास ऐसी काश्तकारी थी ही नहीं।
इसलिए formal caste-neutral law के बावजूद social outcome असमान हो सकता था।
# कानून में समानता और सामाजिक प्रारंभिक स्थिति
यह भूमि-सुधार के अध्ययन का बहुत महत्वपूर्ण सिद्धांत है।
हर स्थायी काश्तकार मालिक बनेगा।
लेकिन यदि ऐतिहासिक रूप से एक सामाजिक समूह के पास काश्तकारी अधिकार अधिक हैं और दूसरे के पास लगभग नहीं, तो समान कानून के परिणाम असमान होंगे।
यही पेप्सू सुधार के साथ हुआ।
काश्तकार स्वामित्व मजबूत हुआ। भूमिहीन labourer स्वामित्व स्वतः पैदा नहीं हुई।
मुजारा आंदोलन और पेप्सू भूमि-सुधार में छोटे स्वामी-किसान एक तीसरी महत्वपूर्ण श्रेणी थे।
वे बिस्वेदार के muzaras नहीं भी हो सकते थे।
उनके पास अपनी छोटी जोतें थीं।
और बड़े किसानों की तुलना में सीमित आर्थिक शक्ति।
1955 के पेप्सू कानून की बाद की surplus-क्षेत्र व्यवस्था में छोटे भू-स्वामी और काश्तकार, जिनकी जोत पांच मानक एकड़ से कम थी, को अतिरिक्त भूमि देकर उनकी जोत पांच मानक एकड़ तक बढ़ाने का रास्ता बनाया गया।
इससे सरकार ने केवल काश्तकारी स्वामित्व ही नहीं, छोटी जोत की viability को भी नीति का प्रश्न माना।
पेप्सू काश्तकारी एवं कृषि भूमि अधिनियम के surplus-क्षेत्र प्रावधानों में सरकार को यह अधिकार दिया गया कि अधिशेष भूमि को ऐसे भू-स्वामी या काश्तकार को दिया जाए जिनके पास पांच मानक एकड़ से अधिक भूमि न हो, ताकि उनकी जोत पांच मानक एकड़ तक पहुंच सके।
यह महत्वपूर्ण सामाजिक सुधार था।
क्योंकि इससे भूमि नीति में पहली बार यह प्रश्न आता है—
# भूमिहीन कृषि मजदूर पहली बार स्पष्ट लाभार्थी
यहीं 1955 कानून की surplus-क्षेत्र व्यवस्था पेप्सू सुधार को काश्तकार से भूमिधर मॉडल से आगे ले जाती है।
काश्तकार willing to cultivate personally,
प्रजा मंडल, अकाली दल, कांग्रेस और कम्युनिस्टों की भूमिका — मुजारा आंदोलन पर विभिन्न राजनीतिक धाराओं का प्रभाव, सहयोग और संघर्ष, भूमि-सुधार पर उनके अलग दृष्टिकोण, चुनावी राजनीति में किसान प्रश्न तथा आंदोलन को किसी एक दल की उपलब्धि मानने की सीमा
पेप्सू मुजारा आंदोलन किसी एक राजनीतिक दल द्वारा शुरू, संचालित और समाप्त किया गया आंदोलन नहीं था। उसकी जड़ें रियासती भूमि व्यवस्था, बिस्वेदारी, पुरानी काश्तकारी असुरक्षा और किसान परिवारों के पैतृक भूमि-दावे में थीं। लेकिन आंदोलन के अलग-अलग चरणों में प्रजा मंडल, अकाली नेतृत्व, कांग्रेस, कम्युनिस्ट किसान संगठन और बाद में लाल कम्युनिस्ट पार्टी हिंद यूनियन ने अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं। कभी ये धाराएं साथ आईं, कभी रणनीति पर अलग हुईं, कभी चुनावी प्रतिद्वंद्वी बनीं और कभी भूमि-अधिकार के मुद्दे पर फिर सहयोग करती दिखाई दीं।
इसीलिए इस आंदोलन का राजनीतिक इतिहास किसी एक दल की विजय-कथा के रूप में लिखना तथ्यात्मक रूप से अधूरा होगा। आधुनिक शोध भी स्पष्ट करता है कि प्रजा मंडल नेताओं, अकालियों और कम्युनिस्ट-नेतृत्व वाली किसान यूनियनों—तीनों ने विभिन्न चरणों में मुजारों का साथ दिया।
इस आंदोलन की वास्तविक विशेषता थी—किसान प्रश्न ने दलों को प्रभावित किया; दलों ने किसान प्रश्न को पूरी तरह नियंत्रित नहीं किया।
प्रजा मंडल : सबसे पुरानी राजनीतिक धारा
मुजारा आंदोलन के राजनीतिक इतिहास में प्रजा मंडल का स्थान सबसे पुराना और केंद्रीय है। पंजाब की रियासतों में प्रजा मंडल राजनीति का मुख्य उद्देश्य था—
निरंकुश रियासती शासन का विरोध,
और जनता की राजनीतिक भागीदारी।
पटियाला में भूमि प्रश्न बहुत जल्दी इस लोकतांत्रिक राजनीति से जुड़ गया। सेवा सिंह ठीकरीवाला जैसे नेताओं ने बटाई-विरोध और किसान असंतोष को रियासत-विरोधी राजनीति से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में गांवों में काश्तकार और peasant committees ने प्रजा मंडल के सामाजिक आधार को और गहरा किया। आधुनिक विवरण सेवा सिंह ठीकरीवाला को मुजारों को बटाई न देने के लिए प्रेरित करने वाले प्रारंभिक प्रमुख नेताओं में रखते हैं।
इसलिए प्रजा मंडल का महत्व केवल इस बात में नहीं था कि उसने भूमि-सुधार का समर्थन किया।
उसने मुजारे को पहली बार एक बड़े राजनीतिक प्रश्न से जोड़ा—
भूमि का अन्याय रियासती सत्ता के लोकतांत्रिक अभाव से भी जुड़ा है।
# सेवा सिंह ठीकरीवाला की विरासत
ठीकरीवाला की गिरफ्तारी और जेल में मृत्यु ने प्रजा मंडल की राजनीति को शहादत और नैतिक वैधता दी। उनकी विरासत से मुजारा किसान के लिए यह संदेश बना कि भूमि प्रश्न केवल निजी भू-स्वामी से विवाद नहीं, बल्कि राज्य-सत्ता से अधिकार मांगने की राजनीति है।
यहीं प्रजा मंडल किसान आंदोलन और लोकतांत्रिक आंदोलन के बीच सेतु बनता है।
# प्रजा मंडल में विभिन्न धाराएं
प्रजा मंडल स्वयं एक स्थायी रूप से एकरूप संगठन नहीं रहा। स्वतंत्रता से पहले और बाद की राजनीति में इसके भीतर कांग्रेस समर्थक, कम्युनिस्ट और अकाली प्रभाव वाली धाराएं दिखाई दीं। बाद के संगठनात्मक विकास में यही विभाजन और स्पष्ट हुआ।
इसका अर्थ है कि “प्रजा मंडल” और “कम्युनिस्ट” को हर समय दो पूरी तरह अलग खेमों की तरह देखना गलत होगा।
प्रारंभिक दशकों में अनेक कार्यकर्ता दोनों राजनीतिक संसारों से प्रभावित थे।
# किसान समितियां : प्रजा मंडल से वर्गीय राजनीति की ओर
1930 और 1940 के दशक में जब गांवों में किसान और काश्तकार committees बनीं, तो प्रजा मंडल की लोकतांत्रिक भाषा के साथ वर्गीय कृषि राजनीति भी मजबूत हुई।
यहीं कम्युनिस्ट और कीर्ति कार्यकर्ताओं का प्रभाव बढ़ता गया।
इसलिए आंदोलन के भीतर एक क्रम दिखाई देता है—
रियासती अधिकार → किसान अधिकार → भूमि स्वामित्व।
प्रजा मंडल ने पहला दरवाजा खोला।
कम्युनिस्ट धाराओं ने तीसरे प्रश्न को सबसे तीखे रूप में उठाया।
# कम्युनिस्टों की प्रारंभिक भूमिका
कम्युनिस्ट प्रभाव मुजारा आंदोलन में 1948 से अचानक नहीं आया था।
उससे पहले ही कीर्ति आंदोलन, पंजाब किसान सभा और ग्रामीण कार्यकर्ताओं के माध्यम से वर्गीय राजनीति गांवों तक पहुंच चुकी थी।
कम्युनिस्ट कार्यकर्ता भूमि-संबंध को इस दृष्टि से देखते थे—
वास्तविक उत्पादन किसान करता है,
लेकिन कृषि अधिशेष उच्चाधिकारी भू-स्वामी लेता है।
इसलिए उनके लिए समाधान केवल लगान reduction नहीं बल्कि भूमि-संबंध का संरचनात्मक परिवर्तन था।
यही विचार बाद में “जमीन उसकी जो जोते” की सबसे स्पष्ट राजनीतिक व्याख्या बना।
# भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और किसान आंदोलन
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का पंजाब में किसान संगठन पर प्रभाव महत्वपूर्ण था, लेकिन पेप्सू में उसकी भूमिका सरल रेखीय नहीं थी।
1940 के दशक में राष्ट्रीय भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी रणनीति कई बार बदली।
और स्वतंत्रता के बाद क्रांति की रणनीति—
इन सभी पर पार्टी लाइन में परिवर्तन आए।
इसलिए स्थानीय किसान कार्यकर्ताओं और केंद्रीय भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी नेतृत्व के बीच तनाव भी मौजूद रहा।
इसी पृष्ठभूमि से 1948 में लाल कम्युनिस्ट पार्टी हिंद यूनियन का गठन हुआ।
# लाल कम्युनिस्ट पार्टी : आंदोलन के उग्र चरण की शक्ति
5 जनवरी 1948 के बाद तेजा सिंह स्वतंत्र के नेतृत्व वाली लाल कम्युनिस्ट पार्टी ने मुजारा आंदोलन के उग्र हिस्से को संगठित दिशा दी।
आधुनिक कृषि इतिहास के अध्ययन पेप्सू आंदोलन के “नई ऊंचाई” पर पहुंचने को लाल पार्टी के प्रवेश से जोड़ते हैं।
नो-बटाई को अधिक संगठित करना,
लेकिन आंदोलन लाल पार्टी से पुराना था।
तेजा सिंह स्वतंत्र ने पेप्सू मुजारा आंदोलन शुरू किया।
उन्होंने उसके पहले से मौजूद उग्र चरण को संगठित और तीखा किया।
# लाल पार्टी और सशस्त्र आत्मरक्षा
बिस्वेदारों के हथियारबंद समूहों के सामने लाल पार्टी ने सीमित किसान सशस्त्र force खड़ा किया। उपलब्ध इतिहासलेखन इसे लगभग 30–40 लोगों का छोटा दस्ता बताता है, सबसे बड़े अनुमान में लगभग 100। इसका प्रारंभिक उद्देश्य मुजारों पर सशस्त्र assault होने पर उनकी सहायता करना था।
इसलिए लाल पार्टी की भूमिका महत्वपूर्ण थी, लेकिन आंदोलन की पूरी सामाजिक शक्ति बंदूक नहीं थी।
उसका आधार हजारों सामान्य किसान और गांव समितियां थीं।
# भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और लाल पार्टी का बाद का पुनर्मिलन
1951–52 तक परिस्थिति बदलने लगी।
सशस्त्र रणनीति की सीमाएं सामने थीं।
भारत में चुनावी लोकतंत्र खुल रहा था।
भूमि-सुधार सरकारी एजेंडे पर था।
लाल पार्टी अंततः भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में विलीन हो गई।
इससे पेप्सू किसान राजनीति का एक बड़ा संक्रमण दिखाई देता है—
भूमिगत उग्र राजनीति से संसदीय वाम राजनीति की ओर।
अकाली राजनीति को मुजारा आंदोलन से पूरी तरह अलग रखना भी गलत होगा।
पंजाब की अकाली राजनीति का सामाजिक आधार व्यापक रूप से ग्रामीण था। रियासती क्षेत्रों और पेप्सू की राजनीति में अकाली नेतृत्व ने किसान तथा काश्तकार मुद्दों को समर्थन दिया। आधुनिक शोध स्पष्ट रूप से बताता है कि अकाली नेताओं ने भी मुजारों के बिस्वेदार-विरोधी संघर्ष का साथ दिया।
लेकिन अकाली राजनीति की प्राथमिकताएं केवल भूमि-सुधार तक सीमित नहीं थीं।
रियासतों का राजनीतिक पुनर्गठन,
और आगे पंजाबी भाषायी राज्य का प्रश्न।
यही कारण है कि किसान प्रश्न पर सहयोग के बावजूद प्रजा मंडल और अकाली दल के बीच व्यापक राजनीतिक मतभेद बने रहे।
# रियासतों के भविष्य पर प्रजा मंडल और अकाली मतभेद
पेप्सू के गठन के आसपास एक महत्वपूर्ण मतभेद था।
इससे स्पष्ट होता है कि भूमि प्रश्न पर साथ आने वाले दल दूसरे प्रश्नों पर प्रतिद्वंद्वी हो सकते थे।
# किसान प्रश्न ने अकाली दल को क्यों आकर्षित किया?
# आंदोलनकारी कांग्रेस और शासक कांग्रेस
पेप्सू मुजारा आंदोलन और भारतीय कम्युनिस्ट राजनीति — गदर–कीर्ति विरासत से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और लाल कम्युनिस्ट पार्टी तक, तेलंगाना–तेभागा से तुलना, 1948–51 की क्रांतिकारी लाइन, संसदीय राजनीति की ओर वापसी तथा पंजाब की बाद की वामपंथी और नक्सली राजनीति पर प्रभाव
पेप्सू मुजारा आंदोलन को भारतीय कम्युनिस्ट राजनीति से अलग करके समझना संभव नहीं है, लेकिन उसे केवल कम्युनिस्ट आंदोलन मान लेना भी उतना ही गलत होगा। इसका सामाजिक आधार स्थानीय था, इसकी ऐतिहासिक जड़ें पटियाला और आसपास की रियासती भूमि व्यवस्था में थीं, और इसकी प्रारंभिक राजनीतिक अभिव्यक्ति प्रजा मंडल, किसान सभा और कीर्ति परंपरा से विकसित हुई। कम्युनिस्ट राजनीति ने इस संघर्ष को वर्गीय भाषा, संगठनात्मक ढांचा और कुछ चरणों में सशस्त्र आत्मरक्षा की रणनीति दी, लेकिन आंदोलन उससे पहले का था और उससे व्यापक भी।
यही कारण है कि पेप्सू मुजारा आंदोलन भारतीय वामपंथ के इतिहास में एक विशेष स्थान रखता है। यह औपनिवेशिक दौर की गदर–कीर्ति क्रांतिकारी परंपरा, 1940 के दशक की किसान सभा राजनीति, 1948 के बाद की उग्र कम्युनिस्ट रणनीति और 1950 के दशक की संसदीय वाम राजनीति—इन सभी को जोड़ने वाली कड़ी है।
गदर से कीर्ति तक : राजनीतिक संस्कार की पहली परत
पंजाब की क्रांतिकारी राजनीति पर गदर आंदोलन की छाप गहरी थी। गदरियों की राजनीतिक संस्कृति में औपनिवेशिक सत्ता के प्रति तीखा प्रतिरोध, बलिदान, अंतरराष्ट्रीयतावाद और प्रत्यक्ष कार्रवाई का महत्व था। प्रथम विश्वयुद्ध और उसके बाद की विफलताओं के बावजूद यह परंपरा समाप्त नहीं हुई।
1920 के दशक में कीर्ति किसान राजनीति ने गदर की क्रांतिकारी विरासत को समाजवादी और वर्गीय राजनीति से जोड़ा। ‘कीर्ति’ पत्र और उससे जुड़े कार्यकर्ताओं ने मजदूर और किसान को राजनीतिक परिवर्तन की केंद्रीय शक्ति के रूप में देखना शुरू किया। यही नेटवर्क आगे पंजाब के कम्युनिस्ट आंदोलन और किसान संगठनों की रीढ़ बना।
पेप्सू मुजारा आंदोलन में यही ऐतिहासिक निरंतरता दिखाई देती है—गदर की क्रांतिकारी स्मृति, कीर्ति की वर्गीय भाषा और स्थानीय किसान असंतोष एक-दूसरे से मिलते हैं।
कीर्ति कार्यकर्ता और किसान प्रश्न
कीर्ति परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह था कि उसने भूमि-संबंध को केवल ग्रामीण शिकायत नहीं, वर्गीय प्रश्न के रूप में देखा। बिस्वेदार और मुजारा के बीच संबंध को वह ऐसे आर्थिक ढांचे के रूप में पढ़ती थी जिसमें वास्तविक उत्पादन किसान करता है लेकिन कृषि अधिशेष का हिस्सा उच्चाधिकारी भू-स्वामी लेता है।
इसीलिए कीर्ति और कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं के लिए बटाई-विरोध केवल कम लगान की मांग नहीं थी। उसका अंतिम राजनीतिक अर्थ था—intermediary landlordism का अंत।
यहीं “जमीन उसकी जो जोते” का विचार स्थानीय किसान अनुभव और मार्क्सवादी वर्गीय भाषा के बीच सेतु बनाता है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में समावेशन
1930 और 1940 के दशकों में पंजाब के अनेक कीर्ति कार्यकर्ता भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े। इससे पंजाब का किसान आंदोलन अखिल भारतीय कम्युनिस्ट राजनीति से अधिक संगठित रूप से जुड़ गया।
लेकिन यह संबंध सरल नहीं था। पंजाब के पुराने गदर–कीर्ति कार्यकर्ताओं की अपनी स्थानीय राजनीतिक संस्कृति थी, जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व अखिल भारतीय रणनीति तय करता था। विभाजन, युद्ध, किसान संघर्ष और स्वतंत्र भारत के प्रति नीति जैसे प्रश्नों पर दोनों के बीच मतभेद बने रहे।
यही तनाव 1948 के विभाजन में सामने आया।
1948 और लाल कम्युनिस्ट पार्टी हिंद यूनियन
5 जनवरी 1948 को नकोदर में लाल कम्युनिस्ट पार्टी हिंद यूनियन का गठन हुआ। इसका नेतृत्व तेजा सिंह स्वतंत्र और अन्य गदर–कीर्ति पृष्ठभूमि के कार्यकर्ताओं ने किया। पार्टी की स्थापना भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से मतभेदों के परिणामस्वरूप हुई थी, लेकिन उन मतभेदों को केवल “हिंसा बनाम अहिंसा” के रूप में देखना गलत होगा।
वास्तविक मतभेद अधिक जटिल थे—
पंजाब की स्वायत्त क्रांतिकारी परंपरा,
स्थानीय किसान संघर्षों को प्राथमिकता,
और स्वतंत्र भारत में क्रांतिकारी रणनीति।
इसीलिए लाल पार्टी को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अलग हुआ केवल सैन्य गुट नहीं, बल्कि पंजाब-विशिष्ट कम्युनिस्ट धारा मानना अधिक उचित है।
पेप्सू लाल पार्टी का सबसे महत्वपूर्ण किसान क्षेत्र क्यों बना?
मुजारा आंदोलन पहले से मौजूद था।
बटाई-विरोध का लंबा अनुभव था।
किसान बिस्वेदारी से असंतुष्ट थे।
प्रजा मंडल और किसान सभा पहले से ग्रामीण राजनीतिक चेतना बना चुके थे।
ऐसे सामाजिक आधार पर लाल पार्टी की उग्र भूमि-राजनीति को वास्तविक जनाधार मिला।
इसलिए पेप्सू पार्टी के लिए केवल प्रचार क्षेत्र नहीं, जीवंत class struggle का क्षेत्र था।
लाल पार्टी और “नो बटाई”
लाल पार्टी ने किसानों को केवल वैचारिक भाषण नहीं दिया। उसने व्यावहारिक कार्यक्रम को तेज किया—
और आवश्यकता पड़ने पर आत्मरक्षा करो।
यही कारण है कि पार्टी का प्रभाव गरीब और असुरक्षित किसानों में तेजी से बढ़ा।
लेकिन यहां फिर अंतर रखना होगा—आम किसान का लक्ष्य जरूरी नहीं कि संपूर्ण राज्य क्रांति हो; उसका तत्काल लक्ष्य जमीन था। पार्टी का व्यापक कार्यक्रम उससे अधिक क्रांतिकारी हो सकता था।
1948–51 की भारतीय कम्युनिस्ट क्रांतिकारी लाइन
1948 से भारतीय कम्युनिस्ट राजनीति स्वयं उग्र मोड़ पर थी। बी. टी. रणदिवे के नेतृत्व में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने स्वतंत्र भारत की नई सत्ता को गहरे संदेह की दृष्टि से देखा और अनेक क्षेत्रों में क्रांतिकारी संघर्ष की रणनीति अपनाई। हड़तालों, विद्रोही कार्रवाइयों और तेलंगाना के सशस्त्र संघर्ष के साथ पार्टी का टकराव राज्य से तीखा हुआ।
इसलिए पेप्सू की लाल पार्टी को उस व्यापक राष्ट्रीय संदर्भ से अलग नहीं देखा जा सकता।
1948–50 में भारतीय वाम राजनीति में यह प्रश्न केंद्रीय था—
क्या 1947 वास्तविक जनतांत्रिक स्वतंत्रता थी?
या सत्ता केवल औपनिवेशिक ढांचे से भारतीय बुर्जुआ-भूस्वामी वर्ग को हस्तांतरित हुई?
इसी बहस से क्रांतिकारी रणनीति निकली।
लेकिन पेप्सू और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उग्रता एक जैसी नहीं थी
पेप्सू में लाल पार्टी की स्थानीय सशस्त्र गतिविधि मुख्यतः भूमि-संघर्ष से जुड़ी थी।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय क्रांतिकारी लाइन व्यापक राजनीतिक सत्ता परिवर्तन से।
दोनों के बीच वैचारिक समानता हो सकती थी, लेकिन सामाजिक आधार और रणनीतिक लक्ष्य समान नहीं थे।
मुजारा किसान अपने खेत की रक्षा कर रहा था।
राष्ट्रीय कम्युनिस्ट नेतृत्व राज्य-सत्ता के चरित्र पर बहस कर रहा था।
यही अंतर पेप्सू को विशिष्ट बनाता है।
तेलंगाना से तुलना
तेलंगाना आंदोलन भारतीय कम्युनिस्ट इतिहास का सबसे बड़ा सशस्त्र किसान संघर्ष था। वहां गुरिल्ला दस्ते, गांव-स्तरीय वैकल्पिक सत्ता, भूमि पुनर्वितरण और व्यापक सैन्य संघर्ष का स्तर पेप्सू से कहीं अधिक था।
दोनों आंदोलनों में समानताएं थीं—
और कुछ क्षेत्रों में सशस्त्र प्रतिरोध।
लेकिन अंतर भी उतने ही महत्वपूर्ण थे।
पेप्सू में सशस्त्र कोर छोटा था।
राज्य से दीर्घ गुरिल्ला युद्ध नहीं चला।
किसान संगठन का मुख्य साधन बटाई-विरोध और कब्जे की रक्षा था।
अंततः समाधान जल्दी विधायी भूमि-सुधार की दिशा में गया।
इसलिए पेप्सू को तेलंगाना का छोटा संस्करण कहना गलत होगा।
तेभागा से तुलना
तेभागा आंदोलन का तत्काल प्रश्न था—sharecroppers को उपज का दो-तिहाई हिस्सा मिले और फसल पर अधिक नियंत्रण हो।
पेप्सू का आंदोलन बटाई से आगे बढ़कर मालिकाना अधिकार तक पहुंचा।
तेभागा का सामाजिक आधार bargadar था।
पेप्सू का केंद्रीय पात्र muzaras और स्थायी काश्तकार थे।
दोनों में कम्युनिस्ट संगठन की भूमिका महत्वपूर्ण थी, लेकिन पेप्सू में काश्तकार से भूमिधर transformation अधिक स्पष्ट अंतिम परिणाम बना।
इस दृष्टि से पेप्सू का संघर्ष कानूनी स्वामित्व परिवर्तन की दिशा में अधिक प्रत्यक्ष था।
तीन आंदोलनों में साझा सूत्र
तेभागा, तेलंगाना और पेप्सू को एक साथ देखें तो स्वतंत्रता के आसपास के भारतीय किसान आंदोलनों में एक व्यापक प्रश्न दिखाई देता है—
उत्पादन पर वास्तविक नियंत्रण किसका होगा?
तेभागा ने फसल हिस्सेदारी को चुनौती दी।
तेलंगाना ने सामंती भूमि सत्ता और ग्रामीण शासन को।
पेप्सू ने उच्चाधिकारी भू-स्वामी स्वामित्व को।
तीनों में वास्तविक कृषक की भूमिका केंद्र में आई।
बंदूक से मतपत्र
वामपंथी कार्यकर्ता चुनाव लड़ने लगे।
पेप्सू मुजारा आंदोलन की तुलना तेभागा, तेलंगाना, बकाश्त और वारली आंदोलनों से — भूमि-संबंध, सामाजिक आधार, नेतृत्व, हिंसा और अहिंसा, कम्युनिस्ट प्रभाव, राज्य की प्रतिक्रिया, कानूनी परिणाम तथा वास्तविक मालिकाना अधिकार का तुलनात्मक मूल्यांकन
पेप्सू मुजारा आंदोलन को उसके वास्तविक ऐतिहासिक स्थान पर समझने के लिए उसकी तुलना भारत के दूसरे बड़े किसान आंदोलनों से करना उपयोगी है। विशेष रूप से तेभागा, तेलंगाना, बकाश्त और वारली ऐसे आंदोलन हैं जिनमें भूमि-अधिकार, काश्तकारी, बटाई, बेदखली, किसान संगठन और वामपंथी राजनीति अलग-अलग अनुपात में मौजूद थे। लेकिन इन पांचों की संरचना एक जैसी नहीं थी और इनके परिणाम भी बहुत भिन्न रहे।
यदि एक ही प्रश्न पूछा जाए—किस आंदोलन ने वास्तविक कृषक को भूमि पर सबसे स्पष्ट कानूनी मालिकाना अधिकार दिलाने में सफलता पाई?—तो पेप्सू मुजारा आंदोलन की विशिष्टता बहुत स्पष्ट होकर सामने आती है। तेलंगाना में प्रत्यक्ष भूमि कब्जा और पुनर्वितरण अधिक क्रांतिकारी था, तेभागा ने बर्गादार का फसल-अधिकार और काश्तकारी सुरक्षा मजबूत की, बकाश्त ने बेदखल रैयत के पुराने खेत पर पुनः दावे को वैधता दी, वारली ने बंधुआ श्रम, काश्तकारी और आदिवासी भूमि-वंचना को चुनौती दी; लेकिन पेप्सू में लंबे संघर्ष का अंतिम वैधानिक परिणाम बड़े काश्तकारी वर्ग को काश्तकार से भू-स्वामी में बदलना था।
इसीलिए इन आंदोलनों की तुलना केवल उनकी उग्रता से नहीं, बल्कि किस सामाजिक संबंध को बदलने में वे सफल हुए—इस आधार पर करनी चाहिए।
पांच आंदोलनों का मूल भूमि-संबंध
सबसे पहले यह देखना आवश्यक है कि प्रत्येक आंदोलन किस प्रकार के कृषि संबंध से पैदा हुआ।
तेभागा में केंद्रीय पात्र था बर्गादार या अधियार, जो दूसरे की जमीन पर खेती करता और परंपरागत रूप से फसल का लगभग आधा हिस्सा जोतदार को देता था। आंदोलन की मुख्य मांग थी कि वास्तविक कृषक को उपज का दो-तिहाई हिस्सा मिले और फसल उसके खलिहान में रखी जाए। बाद में पश्चिम बंगाल के काश्तकारी सुधार और Operation Barga ने काश्तकारी को अधिक सुरक्षित और वंशानुगत बनाया तथा बर्गादार का हिस्सा कानूनी रूप से मजबूत किया।
तेलंगाना में प्रश्न कहीं अधिक व्यापक था। हैदराबाद राज्य की जागीरदारी, देशमुख-दोरा सत्ता, वेट्टी-बेगार, अवैध वसूली, बेदखली और विशाल भू-स्वामी जोतें के विरुद्ध संघर्ष धीरे-धीरे भूमि कब्जे और पुनर्वितरण तक पहुंचा। वहां किसान आंदोलन ने कुछ क्षेत्रों में वैकल्पिक ग्राम सत्ता और सशस्त्र गुरिल्ला संरचनाएं भी विकसित कीं।
बकाश्त आंदोलन में केंद्रीय प्रश्न था वह भूमि जिसे कभी रैयत जोतता था लेकिन लगान-बकाया, आर्थिक संकट या जमींदार की प्रक्रिया के कारण जमींदार के बकाश्त में चली गई थी। किसान का दावा था—पुरानी जोत वापस मिलनी चाहिए। इस आंदोलन ने “कानूनी स्वामित्व” के सामने “पुराने कब्जे और वास्तविक कृषि श्रम” के अधिकार को राजनीतिक वैधता दी।
वारली आंदोलन में भूमि प्रश्न के साथ श्रम-मुक्ति भी उतनी ही केंद्रीय थी। 1940 के दशक तक बड़ी संख्या में वारली आदिवासी या तो काश्तकार कृषक बन चुके थे या कृषि मजदूर; गैर-आदिवासी भू-स्वामी के नीचे काश्तकारी, कर्ज, बेगार और श्रम-निर्भरता की संरचना मजबूत थी।
और पेप्सू मुजारा आंदोलन में मुख्य प्रश्न था—पीढ़ियों से जमीन जोतने वाला काश्तकार और उच्चाधिकारी मालिकाना title रखने वाला बिस्वेदार। यहां आंदोलन अंततः भू-स्वामी–काश्तकार संबंध को ही समाप्त कर वास्तविक कृषक को भू-स्वामी बनाने की दिशा में गया।
यही पेप्सू की सबसे स्पष्ट विशिष्टता है।
# तेभागा बनाम पेप्सू : फसल-अधिकार और भूमि-स्वामित्व
तेभागा और पेप्सू की शुरुआत में एक स्पष्ट समानता है।
दोनों में कृषक दूसरे व्यक्ति के श्रेष्ठ भूमि-अधिकार के अधीन था।
दोनों में फसल-विभाजन महत्वपूर्ण था।
दोनों में कम्युनिस्ट किसान संगठन प्रभावशाली थे।
दोनों में राज्य और भू-स्वामी की प्रतिक्रिया हुई।
लेकिन दोनों की केंद्रीय मांग में बड़ा अंतर था।
तेभागा की तात्कालिक मांग थी—
फसल का दो-तिहाई हिस्सा बर्गादार का।
यानी तेभागा ने भू-स्वामी–sharecropper संबंध की शर्तें बदलने की कोशिश की।
पेप्सू ने उस संबंध को ही समाप्त करने की दिशा पकड़ी।
# क्या तेभागा मालिकाना आंदोलन नहीं था?
तेभागा के भीतर भूमि संबंध की व्यापक राजनीतिक चेतना अवश्य थी, लेकिन उसकी मुख्य संगठित मांग तत्काल पूर्ण मालिकाना स्वामित्व नहीं थी। इसलिए उसका सबसे स्थायी संस्थागत परिणाम काश्तकारी सुरक्षा और crop share सुरक्षा बना।
बाद में Operation Barga ने bargadars का registration, inheritable काश्तकारी और बेदखली सुरक्षा मजबूत किया, लेकिन उन्हें व्यापक रूप से भू-स्वामी में परिवर्तित नहीं किया।
इसलिए मालिकाना अधिकार के संदर्भ में पेप्सू आगे गया।
# लेकिन तेभागा की सामाजिक व्यापकता अलग थी
तेभागा का सामाजिक आधार अत्यंत गरीब sharecroppers, आदिवासी और ग्रामीण निम्न वर्गों में मजबूत था। महिलाओं की सार्वजनिक भूमिका भी उल्लेखनीय थी। आपके तेभागा शोध में भी यह स्पष्ट है कि बर्गादार के साथ आदिवासी, दलित और गरीब किसान आंदोलन के महत्वपूर्ण हिस्से थे।
पेप्सू का मूल लाभ काश्तकारी claim वाले कृषक को अधिक मिला।
किसने poorest rural groups को अधिक व्यापक रूप से राजनीतिक रूप से सक्रिय किया?
तो तेभागा की सामाजिक संरचना कई क्षेत्रों में अधिक व्यापक दिखाई देती है।
किसने काश्तकार को मालिक बनाया?
तो पेप्सू अधिक स्पष्ट सफल उदाहरण है।
# तेलंगाना बनाम पेप्सू : क्रांति की गहराई और कानून की स्थायित्व
तेलंगाना और पेप्सू दोनों पूर्व रियासती क्षेत्रों के संघर्ष थे।
और स्वतंत्रता के बाद भी जारी संघर्ष
लेकिन सैन्य और राजनीतिक पैमाना बिल्कुल अलग था।
तेलंगाना आधुनिक भारत के सबसे बड़े anti-feudal सशस्त्र struggles में था। अनेक क्षेत्रों में किसान संगठनों ने ग्राम सत्ता स्थापित की, भू-स्वामी की जमीन कब्जे में ली और बड़े पैमाने पर भूमि पुनर्वितरण किया।
पेप्सू में ऐसा व्यापक वैकल्पिक ग्रामीण शासन नहीं बना।
उसके सशस्त्र लाल रक्षक बहुत सीमित थे।
# भूमि कब्जे में तेलंगाना अधिक उग्र
यदि तुलना केवल प्रत्यक्ष भूमि-क्रांति से की जाए तो तेलंगाना पेप्सू से कहीं आगे था।
वहां किसान ने कई क्षेत्रों में भू-स्वामी power को जमीन पर व्यवहारिक रूप से उखाड़ दिया।
पेप्सू में भी कब्जा और पुनः प्राप्ति के उदाहरण थे, लेकिन व्यापक आंदोलन का मुख्य साधन रहा—
इसलिए क्रांतिकारी प्रत्यक्षता में तेलंगाना अधिक उग्र था।
# फिर पेप्सू की विशिष्टता क्या?
तेलंगाना में प्रत्यक्ष पुनर्वितरण का एक हिस्सा सशस्त्र संघर्ष की समाप्ति और राज्य पुनर्गठन के बाद स्थायी नहीं रह सका। फिर भी उसके दबाव ने जागीरदारी उन्मूलन, काश्तकारी सुधार और भूमि प्रश्न को सरकारी नीति में धकेला।
पेप्सू में प्रत्यक्ष सैन्य नियंत्रण कम था, लेकिन कानून के जरिए मालिकाना हस्तांतरण अधिक स्पष्ट हुआ।
तेलंगाना — अधिक क्रांतिकारी कब्जा।
पेप्सू — अधिक स्पष्ट statutory काश्तकार से भूमिधर conversion।
# राज्य से टकराव : तेलंगाना सबसे तीखा
तेलंगाना को पहले निजाम और रजाकारों से लड़ना पड़ा।
1948 के बाद भारतीय राज्य से भी संघर्ष जारी रहा।
सशस्त्र टकराव कई वर्षों तक चला।
पेप्सू में किशनगढ़ जैसी गंभीर घटना हुई, लेकिन राज्य से दीर्घकालीन गुरिल्ला युद्ध नहीं।
यही कारण है कि पेप्सू में कानून और चुनाव की ओर संक्रमण अपेक्षाकृत जल्दी संभव हुआ।
# बकाश्त बनाम पेप्सू : “जमीन वापस दो” की समानता
बकाश्त और पेप्सू के बीच वैचारिक समानता बहुत गहरी है।
हम किसी नई जमीन पर अधिकार नहीं मांग रहे।
यह जमीन हमारा पुराना काश्तकारी क्षेत्र है।
जमींदारी या बिस्वेदारी व्यवस्था ने हमारा अधिकार कमजोर किया है।
जमींदारी-विरोधी राजनीति को तेज करना।
पेप्सू का 1956 में पंजाब में विलय और मुजारा आंदोलन की राजनीतिक विरासत — राज्य पुनर्गठन, पेप्सू कानूनों की निरंतरता, नए पंजाब में भूमि-अधिकार, पूर्व मुजारा क्षेत्रों की राजनीति, किसान संगठनों का रूपांतरण और आंदोलन के बाद किसान एजेंडे का भूमि से कीमत–सिंचाई–कर्ज की ओर बदलाव
1 नवंबर 1956 को पटियाला and पूर्वी पंजाब रियासतें संघ — पेप्सू का स्वतंत्र राज्य के रूप में अस्तित्व समाप्त हो गया और उसका पंजाब में विलय कर दिया गया। यह परिवर्तन रियासतें Reorganisation अधिनियम, 1956 की व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा था। प्रशासनिक नक्शा बदल गया, लेकिन पेप्सू की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक विरासत—भूमि-सुधार, काश्तकारी अधिकार और मुजारा आंदोलन से निकले स्वामित्व परिवर्तन—एक दिन में समाप्त नहीं हुए। पूर्व पेप्सू क्षेत्र अपने साथ अलग भूमि कानून, अलग राजस्व परंपराएं और एक विशिष्ट किसान राजनीतिक स्मृति नए पंजाब में लेकर गया।
यहीं मुजारा आंदोलन का दूसरा जीवन शुरू होता है।
उसका मूल संघर्ष समाप्ति की ओर था, लेकिन उसकी राजनीतिक विरासत आगे बढ़ी। जिस किसान ने पहले पूछा था—“जमीन किसकी?”—वही आगे पूछने वाला था—“फसल की कीमत क्या मिलेगी, सिंचाई कौन देगा, कर्ज कैसे चुकाऊंगा और कृषि नीति मेरे पक्ष में है या नहीं?”
इस अर्थ में पेप्सू का पंजाब में विलय केवल एक राज्य का अंत नहीं था; वह किसान राजनीति के भूमि-अधिकार चरण से कृषक-अर्थव्यवस्था के चरण की ओर संक्रमण भी था।
1956 का राज्य पुनर्गठन
स्वतंत्रता के बाद भारत में प्रशासनिक सीमाओं के पुनर्गठन का प्रश्न तेजी से उठा। भाषा, प्रशासनिक सुविधा, आर्थिक क्षमता और ऐतिहासिक इकाइयों को ध्यान में रखते हुए राज्यों की सीमाएं बदली गईं।
रियासतें Reorganisation अधिनियम, 1956 के तहत पेप्सू को पंजाब में मिला दिया गया और यह विलय 1 नवंबर 1956 से प्रभावी हुआ।
इस प्रकार केवल आठ वर्ष पुराना पेप्सू राज्य समाप्त हो गया।
लेकिन उसकी संस्थाएं, कर्मचारी, भूमि-अभिलेख और कानून तत्काल शून्य नहीं हुए।
यही बात कृषि कानूनों के संदर्भ में विशेष रूप से महत्वपूर्ण थी।
# पेप्सू खत्म हुआ, पेप्सू के भूमि-अधिकार नहीं
राजनीतिक विलय का अर्थ यह नहीं था कि 1953, 1954 और 1955 में किसानों को प्राप्त मालिकाना अधिकार वापस हो गए।
जो स्थायी काश्तकार भू-स्वामी बन चुका था, उसका title नए पंजाब में भी कायम रहा।
जो नामांतरण हो चुका था, वह जारी रहा।
जो मुआवजा प्रक्रिया चल रही थी, वह आगे बढ़ी।
जो काश्तकारी अथवा surplus dispute अदालत में था, वह नए प्रशासनिक ढांचे में चला गया।
इसलिए पेप्सू का राज्य अस्तित्व समाप्त हुआ, लेकिन उसका कृषि legal order नए पंजाब की कानून व्यवस्था में समाहित हुआ।
# पूर्व पेप्सू क्षेत्र की अलग कानूनी पहचान
इसका सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण बाद के न्यायिक निर्णयों में दिखाई देता है।
पंजाब और बाद में हरियाणा की अदालतों में लंबे समय तक भूमि विवादों में यह पूछा जाता रहा—
यह भूमि पुराने पंजाब क्षेत्र में थी या former पेप्सू territory में?
क्योंकि दोनों क्षेत्रों में विभिन्न काश्तकारी और भूमि सुधार statutes लागू हो सकते थे।
इससे स्पष्ट है कि पेप्सू की कानूनी विरासत 1956 के बाद भी कई दशकों तक जीवित रही।
# दो पंजाब, दो भूमि-कानूनी परंपराएं
नए पंजाब के भीतर अब दो अलग ऐतिहासिक कृषि-कानूनी संसार मिल रहे थे।
पुराने पंजाब में पंजाब सुरक्षा of भूमि काश्तकारी स्थितियां अधिनियम, 1953 महत्वपूर्ण था।
पूर्व पेप्सू में पेप्सू काश्तकारी एवं कृषि भूमि अधिनियम, 1955।
दोनों का उद्देश्य काश्तकारी regulation और भूमि अधिकतम सीमा था, लेकिन उनकी परिभाषाएं, प्रक्रिया और कुछ अधिकार अलग थे।
इसलिए राज्य एक हुआ, लेकिन भूमि कानून तत्काल पूर्णतः एकीकृत नहीं हुए।
# 1955 का पेप्सू कानून क्यों जीवित रहा?
क्योंकि वह केवल पूर्व राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था नहीं था।
उसने वास्तविक संपत्ति अधिकार बनाए थे।
यदि विलय के दिन वह कानून बिना संरक्षण समाप्त कर दिया जाता, तो हजारों भूमि titles अस्थिर हो सकते थे।
यही विधिक सिद्धांत सामान्यतः राज्य पुनर्गठन में अपनाया जाता है—
क्षेत्र बदलता है, लेकिन existing अधिकार और लागू कानून तब तक जारी रहते हैं जब तक उन्हें विधिपूर्वक बदला या निरस्त न किया जाए।
# मुजारा से भू-स्वामी बने किसान पर इसका क्या प्रभाव पड़ा?
सैद्धांतिक रूप से उसके लिए बड़ा प्रश्न समाप्त हो चुका था।
वह अब किसी रियासती बिस्वेदार का काश्तकार नहीं था।
इसलिए पेप्सू के विलय से पुराने भू-स्वामी–काश्तकार संबंध पुनर्जीवित नहीं हुए।
यही आंदोलन की विजय की स्थायित्व परीक्षा थी—और वह काफी हद तक सफल रही।
# बिस्वेदारी की वापसी असंभव क्यों हुई?
क्योंकि भूमि-सुधार केवल राजनीतिक घोषणा नहीं था।
और न्यायिक अधिकार के रूप में।
जब सामाजिक परिवर्तन संपत्ति अभिलेख में उतर जाए, तो उसे पलटना कहीं अधिक कठिन हो जाता है।
इस अर्थ में मुजारा आंदोलन की सबसे बड़ी जीत 1956 के बाद दिखाई देती है—
राज्य चला गया, किसान का title नहीं गया।
# नए पंजाब में पूर्व मुजारा क्षेत्र
पूर्व पेप्सू के जिन क्षेत्रों में मुजारा आंदोलन मजबूत था, वे आगे पंजाब की किसान राजनीति में भी सक्रिय रहे।
बाद के किसान संगठनों, वामपंथी राजनीति और कृषि आंदोलनों का महत्वपूर्ण क्षेत्र बना।
यहां दशकों से गांव-स्तरीय संगठन, किसान सभा, भूमि संघर्ष और राजनीतिक लामबंदी की परंपरा मौजूद थी।
# राजनीतिक स्मृति एक संगठनात्मक संसाधन
एक आंदोलन समाप्त हो सकता है, लेकिन उसकी स्मृति गांवों में बनी रहती है।
ये सब स्थानीय राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बने।
जब बाद में किसान किसी नए मुद्दे पर संगठित हुए, तो उनके पास एक ऐतिहासिक उदाहरण पहले से था—
संगठन से सरकार को नीति बदलने पर मजबूर किया जा सकता है।
यही आंदोलन की दीर्घकालीन राजनीतिक पूंजी थी।
भूमि-सुधार के बाद किसान संगठन समाप्त नहीं हुए।
अर्थात किसान संगठन काश्तकारी आंदोलन से producer आंदोलन की दिशा में बढ़े।
# किसान की वर्गीय स्थिति भी बदली
यह परिवर्तन केवल मुद्दों का नहीं था।
अब वह small या middle भू-स्वामी हो सकता था।
इसलिए उसकी आर्थिक समस्या अब लगान extraction नहीं बल्कि—
भूमि-सुधार ने किसान आंदोलन का सामाजिक आधार ही बदल दिया।
# “भूमि दो” से “कृषि को लाभकारी बनाओ”
पेप्सू आंदोलन का पुराना नारा था—
भूमि मिलने के बाद नया प्रश्न बना—
यही भारतीय किसान राजनीति के आगे के विकास की सबसे महत्वपूर्ण दिशा है।
अब संघर्ष भू-स्वामी के साथ कम और—
# सिंचाई क्यों केंद्रीय मुद्दा बनी?
भूमि स्वामित्व तभी आर्थिक सुरक्षा देता है जब खेती उत्पादक हो।
पंजाब में नहर सिंचाई का विस्तार पहले से महत्वपूर्ण था, लेकिन स्वतंत्रता के बाद कृषि आधुनिकीकरण के लिए सिंचाई और अधिक निर्णायक बन गई।
सिंचाई का क्षेत्रीय वितरण न्यायपूर्ण है या नहीं?
इस तरह भूमि अधिकार के बाद water अधिकार किसान राजनीति में केंद्रीय होने लगे।
भूमि का मालिक बनने के बाद किसान की ऋण आवश्यकता बढ़ सकती थी।
यदि संस्थागत ऋण उपलब्ध न हो तो साहूकार निर्भरता जारी रह सकती थी।
इसलिए cooperative credit और rural banking किसान संगठनों की नई मांग बने।
भूमि-सुधार ने पुराने भू-स्वामी dependence को घटाया, लेकिन वित्तीय निर्भरता का प्रश्न अलग रहा।
# कृषि मूल्य का प्रश्न कैसे उभरा?
एक भू-स्वामी farmer उत्पादन बाजार में बेचता है।
उसे ऐसा मूल्य मिले जो लागत से अधिक हो।
इसलिए किसान राजनीति की अगली बड़ी मांग बनी—
पुराने आंदोलन में रणनीति थी—
पेप्सू मुजारा आंदोलन की उपलब्धियां और सीमाएं — बिस्वेदारी उन्मूलन, मुजारे से भूमिधर का परिवर्तन, भूमि-सुरक्षा और ग्रामीण लोकतंत्रीकरण की उपलब्धियां; भूमिहीनों, दलितों और महिलाओं की सीमित भागीदारी, अधूरा पुनर्वितरण, हिंसा और राजनीतिक विभाजन सहित आंदोलन का समेकित संतुलित मूल्यांकन
पेप्सू मुजारा आंदोलन का मूल्यांकन करते समय दो विपरीत अतियों से बचना आवश्यक है। पहली अतिशयोक्ति यह होगी कि इसे ऐसी पूर्ण किसान क्रांति मान लिया जाए जिसने पंजाब के ग्रामीण समाज की सारी असमानताएं समाप्त कर दीं। दूसरी भूल यह होगी कि इसे कुछ कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं, स्थानीय हिंसा और भूमि-विवादों तक सीमित कर दिया जाए। दोनों दृष्टियां इस आंदोलन की वास्तविक ऐतिहासिक उपलब्धि को समझने में असफल रहती हैं।
संतुलित निष्कर्ष कहीं अधिक स्पष्ट है।
पेप्सू मुजारा आंदोलन ने उस मुख्य भूमि-संबंध को निर्णायक रूप से बदल दिया जिसके विरुद्ध वह पैदा हुआ था। बिस्वेदार का उच्चाधिकारी मालिकाना अधिकार टूटा, स्थायी काश्तकार को मालिकाना अधिकार मिला, लगान और बटाई पर आधारित पुराना संबंध समाप्त हुआ, बेदखली के विरुद्ध कानूनी सुरक्षा मजबूत हुई और व्यापक काश्तकारी सुधार ने दूसरे काश्तकारों के लिए भी भूमि-अधिकार का रास्ता खोला। 1954 का पेप्सू स्थायी काश्तकार अधिनियम स्पष्ट रूप से भू-स्वामी के अधिकार, title और interest समाप्त कर उन्हें स्थायी काश्तकार में vest करता था; भू-स्वामी का लगान लेने का अधिकार समाप्त होता था और किसान सीधे राज्य को भूमि राजस्व देने वाला भू-स्वामी बनता था।
लेकिन इसी सफलता के नीचे एक दूसरा सत्य मौजूद था—भूमिहीन खेत मजदूर, दलित ग्रामीण आबादी और महिलाओं को उसी अनुपात में स्वतंत्र भूमि-अधिकार नहीं मिला। बड़े जोतें की अधिकतम सीमा और अधिशेष भूमि redistribution का सिद्धांत कानून में आया, यहां तक कि भूमिहीन कृषि workers को संभावित लाभार्थी बनाया गया, लेकिन काश्तकार से भूमिधर परिवर्तन जितना प्रत्यक्ष था, भूमिहीन को जमीन देने की प्रक्रिया उतनी सरल नहीं थी।
इसलिए पेप्सू की कहानी एक निर्णायक लेकिन अधूरी कृषि-सामाजिक क्रांति की कहानी है।
पहली और सबसे बड़ी उपलब्धि : बिस्वेदारी का संस्थागत अंत
आंदोलन का सबसे स्पष्ट लक्ष्य था—
इस कसौटी पर इसकी सफलता बहुत बड़ी थी।
बिस्वेदारी का अर्थ केवल इतना नहीं था कि कोई धनी व्यक्ति बड़ी जमीन का मालिक है। इसकी वास्तविक संरचना यह थी कि एक किसान जमीन जोतता था, लेकिन उसके ऊपर उच्चाधिकारी भू-स्वामी का वैधानिक अधिकार था। वह लगान अथवा बटाई प्राप्त करता था और किसान का भूमि पर संबंध अधीनस्थ था।
1950 के दशक के कानूनों ने इसी संबंध को तोड़ा।
1954 के कानून की धारा 3 का केंद्रीय सिद्धांत था कि स्थायी काश्तकार के अधीन भूमि में भू-स्वामी के सभी अधिकार, title और interest समाप्त होंगे और वही अधिकार काश्तकार में निहित होंगे। साथ ही भू-स्वामी का लगान claim समाप्त और काश्तकार का राज्य को सीधे भूमि राजस्व भुगतान शुरू होना था।
यह मामूली किरायेदारी सुधार नहीं था।
यह कृषि power structure का परिवर्तन था।
# मुजारे से भूमिधर : आंदोलन की सबसे ठोस विजय
किसान आंदोलन के इतिहास में ऐसी स्थितियां कम नहीं हैं जहां आंदोलन ने लगान घटाया, tax स्थगित कराया या बेदखली पर अस्थायी रोक लगवाई।
पेप्सू की विशिष्टता इससे आगे थी।
यहां मुख्य किसान वर्ग का दर्जा बदल गया—
यह परिवर्तन कानूनी भाषा से कहीं अधिक गहरा था।
अपनी भूमि का उत्तराधिकार कर सकता था,
उसमें दीर्घकालीन निवेश कर सकता था,
उसका title राजस्व अभिलेख में दर्ज हो सकता था,
और वह उच्चाधिकारी भू-स्वामी की इच्छा से भूमि पर निर्भर नहीं था।
इसीलिए मुजारा आंदोलन की सफलता का सबसे प्रामाणिक प्रमाण राजनीतिक भाषण नहीं बल्कि संपत्ति law में आया परिवर्तन है।
लेकिन जब स्वामित्व काश्तकार में vest हुई, तब बटाई न देना केवल आंदोलनकारी अवज्ञा नहीं रहा।
वह नए कानूनी संबंध का परिणाम बन गया।
भू-स्वामी के लगान लेने के अधिकार का वैधानिक अंत इस संघर्ष की सबसे पुरानी आर्थिक मांगों में से एक की पूर्ति थी।
इसका परिवार पर प्रत्यक्ष प्रभाव था।
जो कृषि अधिशेष पहले भू-स्वामी को जाता था, उसका बड़ा हिस्सा कृषक household के पास रह सकता था।
यानी भूमि-सुधार ने आय के वितरण को भी बदला।
मुजारा किसान की सबसे बड़ी असुरक्षा केवल बटाई नहीं थी।
यही कारण था कि पेप्सू आंदोलन में “जमीन नहीं छोड़ेंगे” उतना ही महत्वपूर्ण था जितना “बटाई नहीं देंगे।”
जब स्थायी काश्तकार भू-स्वामी बना, तो पुरानी काश्तकारी insecurity समाप्त होने लगी।
सामान्य काश्तकार के लिए भी 1955 का कानून बेदखली और अनुमेय क्षेत्र के प्रश्नों को नियंत्रित करने की दिशा में गया। इससे भू-स्वामी की मनमानी भूमि-वापसी की क्षमता सीमित हुई।
भूमि-सुरक्षा आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक उपलब्धियों में थी।
# भूमि सुरक्षा का मनोवैज्ञानिक प्रभाव
कानून की चर्चा अक्सर आर्थिक प्रभाव तक सीमित रहती है, लेकिन भूमि-सुरक्षा का मनोवैज्ञानिक महत्व भी बड़ा था।
किसान अब इस आशंका में खेती नहीं करता कि—
अगले वर्ष खेत उसके पास रहेगा या नहीं।
स्वामित्व ने उसे दीर्घकालीन भविष्य दिया।
भूमि अब केवल आज की जीविका नहीं बल्कि—
इससे मुजारा पहचान का सामाजिक अर्थ भी बदल गया।
# पैतृक दावे को राजनीतिक मान्यता
हम नई जमीन मांगने नहीं आए हैं;
हमारे पूर्वज इसी जमीन को जोतते थे।
बिस्वेदारी ने हमारे अधिकार कम किए।
कानून ने प्रत्येक पैतृक कथा को ऐतिहासिक रूप से सत्य घोषित नहीं किया, लेकिन उसका अंतिम परिणाम किसान की इसी मांग की दिशा में था।
पुराने काश्तकार की पहचान में पूर्व रिकॉर्ड और विशेष काश्तकार श्रेणियां को शामिल करना भी दिखाता है कि राज्य केवल वर्तमान possession नहीं बल्कि काश्तकारी इतिहास को महत्व दे रहा था।
इसलिए आंदोलन की ऐतिहासिक स्मृति और कानून के अंतिम परिणाम के बीच एक स्पष्ट संबंध बना।
# ग्रामीण सत्ता-संतुलन का परिवर्तन
किसान का मालिक बनना केवल खेत की स्थिति नहीं बदलता।
वह गांव की शक्ति-संरचना बदलता है।
पुराना बिस्वेदार प्रभाव रखता था—
जब उसका उच्चाधिकारी title समाप्त हुआ, तो इनमें से सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक आधार टूट गया।
अब किसान स्वयं संपत्ति holder था।
यह ग्रामीण लोकतंत्रीकरण की दिशा में बड़ा परिवर्तन था।
# राजनीतिक लोकतंत्र और भूमि-अधिकार का मेल
भारत में 1950 के दशक की शुरुआत में दो प्रक्रियाएं साथ चल रही थीं—
पेप्सू का मुजारा पहले रियासती प्रजा था।
फिर भारतीय नागरिक और मतदाता बना।
इस दोहरे परिवर्तन का महत्व अत्यंत बड़ा था।
एक economically dependent काश्तकार के वोट और एक independent peasant भू-स्वामी के वोट की संवैधानिक कीमत समान हो सकती है, लेकिन सामाजिक स्वतंत्रता समान नहीं होती।
भूमि स्वामित्व ने किसान की राजनीतिक स्वायत्तता को भी मजबूत किया।
मुजारा आंदोलन ने यह राजनीतिक संस्कृति भी विकसित की कि किसान केवल शासन का निष्क्रिय विषय नहीं है।
यह assertive कृषि citizenship स्वतंत्र भारत के लोकतंत्र की महत्वपूर्ण सामाजिक उपलब्धि थी।
# आंदोलन ने राज्य की सोच बदली
शुरुआती दौर में मुजारा संघर्ष प्रशासन के लिए law-and-order problem दिखाई दे सकता था।
लेकिन बाद में वही प्रश्न कृषि सुधार बन गया।
यह परिवर्तन अपने आप में बड़ी राजनीतिक सफलता थी।
हर गांव में पुलिस भेजकर काश्तकारी crisis समाप्त नहीं किया जा सकता।
अंततः भूमि संबंध बदलने होंगे।
1954 और 1955 की विधायी संरचना इस परिवर्तन का स्पष्ट प्रमाण है।
# दमन से कानून की ओर संक्रमण
कांग्रेस की किसान-समर्थक धाराएं
पेप्सू मुजारा आंदोलन का इतिहासलेखन और स्मृति — सरकारी अभिलेख, किसान और कम्युनिस्ट आख्यान, प्रजा मंडल–अकाली–कांग्रेस दृष्टियां, किशनगढ़ की स्थानीय स्मृति, लोकगीत और शहीद परंपरा, आधुनिक अकादमिक शोध तथा इतिहास में तथ्य, स्मृति और राजनीतिक दावों के बीच अंतर
पेप्सू मुजारा आंदोलन का इतिहास केवल सरकारी फाइलों, भूमि कानूनों और राजनीतिक दलों के दस्तावेजों में सुरक्षित नहीं है। इसका एक दूसरा इतिहास पंजाब के गांवों में है—परिवारों की स्मृतियों में, किशनगढ़ के स्मारक में, किसान सम्मेलनों में, कविताओं और साहित्य में, पुराने कार्यकर्ताओं की आत्मकथाओं में और उन राजनीतिक संगठनों के आख्यानों में जो आज भी इस आंदोलन को अपनी वैचारिक विरासत का हिस्सा मानते हैं।
यही इसकी इतिहासलेखन संबंधी सबसे बड़ी चुनौती है।
एक ही घटना को किसान परिवार बलिदान के रूप में याद कर सकता है, कम्युनिस्ट संगठन वर्ग-संघर्ष के रूप में, प्रजा मंडल रियासती निरंकुशता के विरुद्ध लोकतांत्रिक संघर्ष के रूप में, कांग्रेस भूमि-सुधार और संवैधानिक समाधान के रूप में और सरकारी दस्तावेज कानून-व्यवस्था तथा प्रशासनिक समस्या के रूप में दर्ज कर सकते हैं।
इनमें से कोई स्रोत अपने आप में पूर्ण इतिहास नहीं है।
पेप्सू मुजारा आंदोलन का गंभीर इतिहास इन सभी स्रोतों को एक-दूसरे के सामने रखकर पढ़ने से बनता है।
इतिहास और स्मृति में अंतर
सबसे पहले दो अवधारणाओं को अलग करना जरूरी है—
इतिहास प्रमाणों को जांचता है।
स्मृति अनुभव को सुरक्षित रखती है।
किस कानून की कौन-सी धारा लागू हुई?
किस व्यक्ति की भूमिका का समकालीन प्रमाण उपलब्ध है?
गांव ने घटना को कैसे याद रखा?
लेकिन दोनों को एक ही चीज मान लेना शोध की गंभीर भूल होगी।
# पेप्सू आंदोलन का इतिहास लिखना कठिन क्यों है?
इसका पहला कारण इसकी लंबी अवधि है।
आंदोलन अचानक 1948 में पैदा नहीं हुआ था। आधुनिक अध्ययनों में इसकी जड़ें उन्नीसवीं सदी के काश्तकारी arrangements से लेकर 1920 के दशक के प्रजा मंडल और आगे की कीर्ति किसान राजनीति तक खोजी गई हैं। 1940 के दशक और 1950 के शुरुआती वर्षों में यह चरम पर पहुंचा।
इसलिए अलग-अलग इतिहासकार इसकी शुरुआत अलग बिंदु से कर सकते हैं।
कोई 1939 के नो-बटाई अभियान से।
और कोई 1948 में पेप्सू बनने के बाद से।
इसका अर्थ यह नहीं कि हर तारीख समान रूप से सही है।
इसका अर्थ है कि हमें आंदोलन की ऐतिहासिक जड़ों, संगठित आंदोलन के आरंभ और उसके पेप्सू चरण को अलग-अलग परिभाषित करना चाहिए।
# स्रोतों की पहली श्रेणी : रियासती और सरकारी अभिलेख
इस आंदोलन के पुनर्निर्माण के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्रोतों में पटियाला रियासत और बाद की पेप्सू सरकार के प्रशासनिक अभिलेख आते हैं।
इनमें संभावित रूप से शामिल होते हैं—
गिरफ्तारियों और मुकदमों के दस्तावेज,
और भूमि-सुधार से संबंधित सरकारी पत्राचार।
इनका महत्व बहुत बड़ा है क्योंकि ये आंदोलन के समकालीन हैं।
लेकिन सरकारी स्रोत को “निष्पक्ष” मान लेना भी गलत होगा।
# सरकारी अभिलेख की अपनी भाषा
राज्य किसान को उस भाषा में नहीं देखता जिसमें किसान स्वयं को देखता है।
“हम अपनी पैतृक जमीन बचा रहे हैं।”
इसलिए सरकारी दस्तावेज तथ्य देते हैं, लेकिन उनकी administrative vocabulary स्वयं सत्ता-संबंध का हिस्सा होती है।
# राजस्व अभिलेख सबसे महत्वपूर्ण क्यों हैं?
मुजारा आंदोलन मूलतः भूमि-अधिकार का संघर्ष था।
इसलिए कई विवादों का अंतिम उत्तर राजनीतिक भाषण नहीं बल्कि भूमि अभिलेखों में मिलता है।
किसके नाम उच्चाधिकारी मालिकाना अधिकार था?
कितनी भूमि पर मुआवजा तय हुआ?
ये प्रश्न राजस्व अभिलेख से अधिक विश्वसनीय ढंग से जांचे जा सकते हैं।
इसीलिए भविष्य के गहरे पेप्सू शोध में गांववार राजस्व अभिलेख अत्यंत महत्वपूर्ण होंगे।
# 11 मार्च 1947 का शाही फरमान : इतिहासलेखन की कसौटी
पटियाला महाराजा की 11 मार्च 1947 की घोषणा आंदोलन के इतिहास में महत्वपूर्ण दस्तावेज है। आधुनिक अकादमिक अध्ययनों में भी दर्ज है कि आंदोलन के दबाव में महाराजा ने काश्तकार को सीमित proprietorship देने की घोषणा की, जिसे मुजारों ने अपर्याप्त मानकर स्वीकार नहीं किया।
यह दस्तावेज इतिहासलेखन के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे तीन बातें प्रमाणित होती हैं—
आंदोलन 1948 में अचानक शुरू नहीं हुआ;
भूमि-अधिकार प्रश्न स्वतंत्रता से पहले ही गंभीर राजनीतिक संकट बन चुका था;
और राज्य आंदोलन के दबाव में concessions पर विचार कर रहा था।
# कानून : सबसे मजबूत प्राथमिक स्रोतों में
1950 के दशक के पेप्सू भूमि कानून आंदोलन के परिणाम का मूल्यांकन करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
राजनीतिक संगठन दावा कर सकता है—
“हमने किसानों को जमीन दिलाई।”
कानून ने किस श्रेणी के काश्तकार को क्या अधिकार दिया?
कितनी अनुमेय क्षेत्र रखी गई?
किसे अधिशेष भूमि मिल सकती थी?
इसलिए आंदोलन के अंतिम परिणाम की जांच legislative text से करनी चाहिए।
स्मृति हमें बताती है कि किसानों ने इसे विजय माना।
कानून बताता है कि विजय का वास्तविक कानूनी स्वरूप क्या था।
किशनगढ़ जैसी घटना के पुनर्निर्माण में पुलिस और प्रशासनिक दस्तावेज अनिवार्य हैं।
लेकिन इन्हें अकेले नहीं पढ़ा जाना चाहिए।
क्योंकि टकराव की स्थिति में राज्य के पास अपनी कार्रवाई को वैध ठहराने का संस्थागत कारण होता है।
इसलिए पुलिस रिपोर्ट को मिलाना चाहिए—
यही source triangulation इतिहासलेखन की सही पद्धति है।
दूसरी बड़ी स्रोत परंपरा स्वयं मुजारा किसानों की है।
पुराने कार्यकर्ताओं की स्मृतियां,
किसान संगठन के स्मारक प्रकाशन,
और आंदोलन से जुड़े लोक-सांस्कृतिक आख्यान।
इनका महत्व इसलिए असाधारण है क्योंकि सरकारी रिकॉर्ड अक्सर यह नहीं बताता कि आंदोलन सामान्य किसान के लिए क्या अर्थ रखता था।
सरकारी भाषा में यह “मालिकाना अधिकार” था।
किसान के लिए आंदोलन केवल कानूनी title नहीं था।
बिस्वेदार के सामने सिर न झुकाना,
और बच्चों को सुरक्षित भविष्य देना।
इसलिए मौखिक इतिहास हमें आंदोलन का वह भावनात्मक संसार देता है जो सरकारी फाइल नहीं दे सकती।
लेकिन स्मृति समय के साथ बदलती है।
1949 की घटना को 1970 में याद करने वाला व्यक्ति एक तरह से बताएगा।
2020 में उसका पोता दूसरी तरह।
मूल स्मृति को प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए oral testimony मूल्यवान है, लेकिन उसे स्वतः literal fact नहीं माना जाना चाहिए।
पेप्सू आंदोलन पर सबसे मजबूत और व्यवस्थित स्मृति-परंपराओं में कम्युनिस्ट आख्यान है।
लाल कम्युनिस्ट पार्टी हिंद यूनियन,
और अन्य वाम कार्यकर्ताओं की आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका थी।
आधुनिक अकादमिक शोध भी लाल कम्युनिस्ट पार्टी के 5 जनवरी 1948 के गठन और उसके बाद आंदोलन के उग्र होने को महत्वपूर्ण मोड़ मानता है।
# कम्युनिस्ट आख्यान की केंद्रीय संरचना
वामपंथी व्याख्या में आंदोलन सामान्यतः इस प्रकार पढ़ा जाता है—
सामंती बिस्वेदार ↓ शोषित मुजारा ↓ वर्गीय चेतना ↓ किसान संगठन ↓ नो-बटाई ↓ सशस्त्र आत्मरक्षा ↓ राज्य-दमन ↓ शहादत ↓ भूमि-सुधार।
यह व्याख्या आंदोलन की वास्तविक संरचना का बड़ा हिस्सा पकड़ती है।
# कम्युनिस्ट आख्यान की संभावित सीमा
यदि इतिहास केवल लाल पार्टी के दृष्टिकोण से लिखा जाए तो तीन समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
आंदोलन की प्रजा मंडल और उससे भी पुरानी जड़ों को कम महत्व मिल सकता है।
अकाली और कांग्रेस समर्थक किसान नेताओं की भूमिका पीछे चली सकती है।
सशस्त्र आत्मरक्षा आंदोलन की वास्तविक जन-रणनीति से अधिक केंद्रीय दिखाई दे सकती है।
# लाल पार्टी का योगदान फिर भी निर्णायक
# प्रजा मंडल आख्यान का महत्व
पेप्सू मुजारा आंदोलन की विस्तृत समयरेखा — 1868 और 1870 के दशक की भूमि-व्यवस्था से प्रजा मंडल और कीर्ति किसान राजनीति, 1930–40 के दशक के बटाई-विरोध, 1947 के शाही फरमान, 1948 में पेप्सू और लाल कम्युनिस्ट पार्टी के गठन, मार्च 1949 के किशनगढ़ संघर्ष, 1952 के चुनाव, 1953–55 के भूमि-सुधार कानून और 1956 में पेप्सू के पंजाब में विलय तक क्रमबद्ध कालक्रम
पेप्सू मुजारा आंदोलन को केवल 1948 से 1953 के बीच चला किसान संघर्ष मानना उसके इतिहास को बहुत छोटा कर देना होगा। इसकी गहरी जड़ें उन्नीसवीं सदी की पटियाला रियासत की भूमि-व्यवस्था में थीं। 1860 के दशक से काश्तकार अधिकारों की अस्पष्टता, 1870 के दशक में बिस्वेदारी संबंधों का विस्तार, बीसवीं सदी की शुरुआत में भूमि-बंदोबस्त, 1920–30 के दशकों में प्रजा मंडल और कीर्ति किसान राजनीति, 1939 के संगठित बटाई-विरोध, 1947 का शाही समझौता, 1948 के बाद लाल कम्युनिस्ट पार्टी का हस्तक्षेप, 1949 का किशनगढ़ संघर्ष और अंततः 1953–55 के भूमि कानून—इन सभी को एक निरंतर ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में देखना चाहिए।
आधुनिक शोध आंदोलन की दूरस्थ जड़ों को पंजाब काश्तकारी अधिनियम, 1868 और उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में विकसित बिस्वेदारी संरचना तक ले जाता है; एक अन्य अध्ययन पटियाला के 1861–62 के प्रथम बंदोबस्त को भी उस असंतोष की प्रारंभिक प्रशासनिक पृष्ठभूमि मानता है जिसमें विभिन्न कृषक वर्गों के अधिकार स्पष्ट रूप से व्यवस्थित नहीं थे।
नीचे दी गई समयरेखा इसलिए केवल घटनाओं की सूची नहीं है। प्रत्येक चरण यह बताता है कि मुजारा प्रश्न कैसे किरायेदारी-विवाद से मालिकाना अधिकार की लड़ाई और फिर राज्य की भूमि-सुधार नीति में बदला।
1861–62 : पटियाला राज्य का प्रारंभिक भूमि बंदोबस्त
पटियाला रियासत में 1861–62 के प्रथम बंदोबस्त के समय कृषि अधिकारों और विभिन्न काश्तकारी श्रेणियों के दायित्व पूरी तरह स्पष्ट नहीं थे। बाद के अध्ययन इसी दौर को उस संरचनात्मक असंतोष की शुरुआत से जोड़ते हैं जिससे आगे मुजारा प्रश्न विकसित हुआ।
इस समय अभी संगठित मुजारा आंदोलन नहीं था।
लेकिन वह भूमि-संबंध बन रहे थे जो आगे किसान और उच्चाधिकारी भू-स्वामी के बीच विवाद की बुनियाद बने।
# 1868 : पंजाब काश्तकारी अधिनियम और काश्तकारी अधिकारों की व्यापक कानूनी पृष्ठभूमि
आधुनिक पेप्सू इतिहासलेखन आंदोलन की ऐतिहासिक जड़ों में पंजाब काश्तकारी अधिनियम, 1868 का उल्लेख करता है। यद्यपि पटियाला ब्रिटिश पंजाब की सामान्य प्रशासनिक इकाई नहीं था, ब्रिटिश पंजाब में विकसित काश्तकारी श्रेणियां और मालिकाना अवधारणाओं का प्रभाव आसपास की रियासती भूमि-व्यवस्थाओं पर भी पड़ा।
यही वह व्यापक कानूनी वातावरण था जिसमें यह प्रश्न अधिक स्पष्ट हुआ—
और लंबे समय से जमीन जोतने वाले किसान का अधिकार कितना मजबूत है?
# 1870 का दशक : बिस्वेदारी व्यवस्था का विस्तार
आधुनिक कृषि इतिहास में पटियाला की बिस्वेदारी व्यवस्था के निर्णायक विस्तार को 1870 के दशक से जोड़ा जाता है। बिस्वेदारों—जिनमें रियासती दरबार से निकट संबंध रखने वाले प्रभावशाली लोग भी थे—को बड़े भू-भाग पर श्रेष्ठ स्वामित्व प्रदान किया गया, जबकि उस भूमि को पीढ़ियों से विकसित और जोत रहे अनेक कृषक मालिकाना स्थिति से घटकर मुजारा बने।
यही आंदोलन की सबसे गहरी ऐतिहासिक शिकायत बनी—
किसान का दावा था कि वह किसी दूसरे की जमीन पर बाद में आया काश्तकार नहीं, बल्कि उसी भूमि का पुराना वास्तविक कृषक था।
# 1872 : बटाई संबंध को कठोर करने वाली हिदायत
1872 में जारी एक रियासती हिदायत के बारे में आधुनिक शोध बताता है कि मुजारों को फसल का लगभग आधा भाग बिस्वेदार को बटाई के रूप में देना पड़ता था। इसके साथ ‘कंकूत’ जैसी उपज-अनुमान पद्धतियां किसान पर वास्तविक बोझ और बढ़ा सकती थीं।
यहीं भूमि-अधिकार के साथ आर्थिक शोषण का प्रश्न जुड़ गया।
आगे आंदोलन का प्रमुख नारा बना—
# उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों में : कानूनी प्रतिरोध की शुरुआत
बिस्वेदारी संबंध मजबूत होने के बाद कृषकों ने अदालत और रियासती प्रशासन के जरिए पुराने अधिकार पुनः प्राप्त करने की कोशिशें कीं। कुछ विवरण किसानों द्वारा उच्च प्रशासन और शिमला तक शिकायतें ले जाने का उल्लेख करते हैं।
प्रतिरोध था, लेकिन संगठित जन आंदोलन अभी नहीं।
किसान मुख्यतः याचिका और कानूनी रास्ते पर निर्भर था।
# 1900 : Popham Young Commission
पटियाला राज्य ने भूमि व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित करने के लिए Popham Young Commission नियुक्त किया। किसानों को उम्मीद थी कि इससे उनकी काश्तकारी और मालिकाना claims स्पष्ट होंगे।
लेकिन बाद के शोध में इस बंदोबस्त process को मुजारा समस्या हल करने के बजाय कई विवादों को और संस्थागत कर देने वाला बताया गया है।
# 1902–04 : Permanent भूमि Bandobast
पटियाला में 1902–04 के स्थायी बंदोबस्त ने बिस्वेदारी संबंधों को अधिक औपचारिक रूप दिया। आधुनिक शोध इसे उस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण चरण मानता है जिसमें उच्चाधिकारी मालिकाना अधिकार और कृषक काश्तकारी के बीच अंतर संस्थागत हुआ।
इससे किसान के लिए संघर्ष और कठिन हुआ।
अब बिस्वेदार का दावा केवल सामाजिक प्रभाव पर नहीं, राजस्व अभिलेख पर भी टिकने लगा।
# 1908–09 : First Regular बंदोबस्त of पटियाला
1908–09 के पहले नियमित बंदोबस्त ने भूमि-अधिकारों को और औपचारिक बनाया। आधुनिक इतिहासकार इसे भी बिस्वेदारी प्रणाली के स्थायीकरण से जोड़ते हैं।
यही कारण है कि आगे आंदोलन का एक महत्वपूर्ण मोर्चा बना—
किसान को केवल खेत पर कब्जा नहीं, रिकॉर्ड में अपना अधिकार चाहिए था।
# 1920 का दशक : रियासती लोकतांत्रिक आंदोलन और किसान चेतना
गुरुद्वारा सुधार आंदोलन और अकाली राजनीतिक लामबंदी ने पंजाब के ग्रामीण समाज में जत्था, सभा, गिरफ्तारी और संगठित प्रतिरोध की नई राजनीतिक संस्कृति पैदा की।
इसी वातावरण में पंजाब की रियासतों में रियासती प्रजा मंडल की राजनीति विकसित हुई।
मुजारा प्रश्न अब केवल भू-स्वामी–काश्तकार विवाद नहीं रहा।
वह रियासती शासन और नागरिक अधिकारों से जुड़ने लगा।
# 1928 के आसपास : पंजाब रियासती प्रजा मंडल की सक्रियता
सेवा सिंह ठीकरीवाला जैसे नेताओं ने रियासती प्रजा मंडल आंदोलन को ग्रामीण इलाकों तक पहुंचाया। बाद के अध्ययनों में 1928–38 के दौर में आंदोलन के शुरुआती नेतृत्व में उन ग्रामीण अकाली नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका बताई गई है जो पहले गुरुद्वारा सुधार आंदोलन से जुड़े थे।
इस दौर का केंद्रीय प्रश्न था—
और किसानों के साथ हो रहा रियासती अन्याय।
# 1930–31 : किसान और मुजारा राजनीति का अधिक स्पष्ट होना
पटियाला राज्य की CID-संबंधी सामग्री पर आधारित एक ऐतिहासिक विवरण 1930–31 तक अलग-अलग राजनीतिक रूपों—प्रजा मंडल, किसान आंदोलन, मुजारा आंदोलन और समाजवादी धाराओं—के अधिक स्पष्ट होने का उल्लेख करता है। ‘मजदूर किसान’ जैसे प्रकाशनों पर भी राज्य की नजर थी।
इससे पता चलता है कि किसान प्रश्न अब राजनीतिक संगठन का रूप लेने लगा था।
# 1935 तक : आंदोलन का असमान और अपेक्षाकृत धीमा चरण
रियासती निगरानी और दमन के कारण किसान राजनीति हर समय समान तीव्रता से सक्रिय नहीं रही।
1930 के शुरुआती वर्षों के बाद कुछ समय आंदोलन अपेक्षाकृत शांत दिखता है।
लेकिन सामाजिक शिकायत समाप्त नहीं हुई।
# 7–8 नवंबर 1936 : लोंगोवाल किसान सम्मेलन की कोशिश
लोंगोवाल क्षेत्र में किसान सम्मेलन की घोषणा हुई जिसमें ग्रामीण आर्थिक शोषण, साहूकार और प्रशासन की आलोचना जैसे प्रश्न उठाए जाने थे। रियासती प्रशासन ने इसे चिंताजनक राजनीतिक गतिविधि के रूप में देखा।
यह किसान असंतोष के फिर सार्वजनिक होने का संकेत था।
# 1938 : कम्युनिस्ट-समर्थित पंजाब किसान समिति का प्रभाव बढ़ना
किसान और बिस्वेदार के हित परस्पर विरोधी हैं।
पेप्सू मुजारा आंदोलन के प्रमुख प्राथमिक स्रोत और दस्तावेज — पटियाला दरबार के भूमि-बंदोबस्त और राजस्व अभिलेख, 11 मार्च 1947 का शाही फरमान, 1949 के बिस्वेदारी अध्यादेश, पुलिस–किशनगढ़ रिकॉर्ड, नेहरू पत्राचार, 1952 कृषि सुधार रिपोर्ट, 1953–55 के मूल भूमि कानून, किसान सभा–लाल कम्युनिस्ट पार्टी दस्तावेज तथा समकालीन समाचार-पत्र
पेप्सू मुजारा आंदोलन का इतिहास केवल बाद में लिखी गई पुस्तकों और संस्मरणों के आधार पर नहीं लिखा जा सकता। यह मूलतः भूमि-अधिकार, राजस्व रिकॉर्ड, प्रशासनिक निर्णय, पुलिस कार्रवाई और कानून से संबंधित आंदोलन था; इसलिए इसके सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण तत्कालीन सरकारी और आंदोलनकारी दस्तावेजों में छिपे हैं।
इस आंदोलन के मामले में प्राथमिक स्रोतों का महत्व और बढ़ जाता है क्योंकि कई महत्वपूर्ण तथ्यों—जैसे आंदोलन की शुरुआत, कितने गांवों में उसका प्रभाव था, किशनगढ़ की घटनाओं की तारीख और हताहत, कितने किसानों को वास्तव में मालिकाना अधिकार मिला और कितनी भूमि हस्तांतरित हुई—के बारे में बाद के विवरणों में अंतर मिलता है।
इसलिए पेप्सू पर गंभीर शोध की आदर्श पद्धति होगी—
भूमि-अभिलेख + रियासती आदेश + पुलिस/न्यायालय दस्तावेज + केंद्र और पेप्सू सरकार का पत्राचार + मूल कानून + किसान संगठन के दस्तावेज + समकालीन प्रेस + मौखिक इतिहास।
इन स्रोतों को एक-दूसरे से मिलाने पर ही आंदोलन की अधिक विश्वसनीय तस्वीर बनती है।
1. पटियाला रियासत के भूमि-बंदोबस्त अभिलेख : आंदोलन की जड़ों का सबसे मूल स्रोत
मुजारा प्रश्न का इतिहास समझने के लिए सबसे पहले उन अभिलेखों तक जाना होगा जिनमें उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के प्रारंभ में पटियाला की भूमि व्यवस्था दर्ज की गई थी।
1861–62 का प्रारंभिक बंदोबस्त,
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध के बंदोबस्त अभिलेख,
Popham Young Commission से संबंधित सामग्री,
1908–09 का regular बंदोबस्त,
इनसे यह पता लगाया जा सकता है कि—
किस गांव में कौन-सी भूमि किसके नाम दर्ज हुई,
बिस्वेदार कब और किन प्रशासनिक आदेशों से उच्चाधिकारी भू-स्वामी बना,
और वही भूमि जोतने वाले किसान की कानूनी स्थिति क्या लिखी गई।
मुजारा आंदोलन के सबसे बड़े ऐतिहासिक दावे—
“हम पहले मालिक थे, बाद में मुजारा बनाए गए”
की वास्तविक जांच ऐसे अभिलेखों से ही संभव है।
# जमाबंदी : गांव स्तर पर स्वामित्व की रीढ़
किसी विशेष गांव के इतिहास के लिए जमाबंदी सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिक स्रोतों में है।
इसमें सामान्यतः दर्ज होते हैं—
और समय के साथ अधिकार में परिवर्तन।
यदि हमें यह जानना हो कि किशनगढ़ या किसी दूसरे मुजारा गांव में 1900, 1930, 1940 और 1955 में जमीन किसके नाम थी, तो राजनीतिक साहित्य से अधिक उपयोगी होगा—
लगातार कई जमाबंदियों की तुलना।
यहीं से वास्तविक स्वामित्व transformation दिखाई देगा।
जमाबंदी स्वामित्व और काश्तकारी संबंध देती है।
लेकिन खसरा गिरदावरी बताती है कि किसी विशेष मौसम में जमीन वास्तव में कौन जोत रहा था।
यह पेप्सू आंदोलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकती है।
क्योंकि बिस्वेदार कह सकता था—
गिरदावरी कई मामलों में वास्तविक कृषक पहचानने में मदद कर सकती है।
भूमि-सुधार के बाद आंदोलन की सफलता मापने के लिए इंतकाल अथवा नामांतरण registers अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
किस तारीख को उच्चाधिकारी भू-स्वामी का नाम हटा,
किस काश्तकार के नाम मालिकाना अधिकार दर्ज हुए,
और किस कानून अथवा सरकारी आदेश के आधार पर नामांतरण किया गया।
यदि भविष्य में पेप्सू आंदोलन के वास्तविक लाभार्थियों का वैज्ञानिक आंकड़ा निकालना हो तो गांववार नामांतरण अभिलेख सबसे उपयोगी स्रोतों में होंगे।
# मिसल हकियत और अभिलेख-of-अधिकार
पुराने रियासती क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के अभिलेख-of-अधिकार भी महत्वपूर्ण हैं।
1954 के पेप्सू स्थायी काश्तकार अधिनियम में स्वयं फरीदकोट और Malerkotla की अलग-अलग काश्तकारी श्रेणियां को राजस्व अभिलेख से पहचानने की व्यवस्था की गई थी। इनमें Muzara-i-shartia, Chakotedar khas, dakhilkar और maurussi जैसी श्रेणियां शामिल थीं। कानून ने 11 मार्च 1940 के रिकॉर्ड में स्थायी काश्तकार दर्ज कुछ किसानों को भी बाद की राहत के लिए पहचानने का रास्ता दिया।
इससे स्वयं सिद्ध होता है कि राजस्व अभिलेख केवल प्रशासनिक कागज नहीं था—
वह किसान के भविष्य के स्वामित्व claim का कानूनी आधार था।
# 2. 11 मार्च 1947 का शाही फरमान No. 6
पेप्सू मुजारा आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक कानूनी दस्तावेज है—
शाही फरमान No. 6, dated 11 March 1947
पटियाला महाराजा द्वारा जारी इस फरमान का उद्देश्य भू-स्वामी और स्थायी काश्तकार के बिगड़ते संबंधों को नियंत्रित करना और भूमि-विवाद का समझौता करना था।
1952 की आधिकारिक कृषि सुधार रिपोर्ट में इस फरमान का सार मूल विधायी पृष्ठभूमि के साथ दिया गया है। उसके अनुसार विभिन्न प्रकार के स्थायी काश्तकारी अधिकार में भू-स्वामी और काश्तकार के बीच भूमि का विभाजन लगभग एक-तिहाई : दो-तिहाई तथा दो-पांचवां : तीन-पांचवां रखने की व्यवस्था थी।
यह दस्तावेज कई कारणों से निर्णायक है।
1947 से पहले ही राज्य भूमि-संघर्ष की गंभीरता स्वीकार कर चुका था।
मुजारे को मालिकाना share देने का सिद्धांत पहली बार स्पष्ट हुआ।
आगे के पेप्सू कानूनों ने इसे प्रारंभिक कानूनी आधार माना।
# शाही फरमान की मूल प्रति क्यों खोजी जानी चाहिए?
बाद के कानून और न्यायालय निर्णय फरमान को उद्धृत करते हैं।
लेकिन शोध की दृष्टि से आदर्श स्रोत होगा—
पटियाला राज्य Gazette अथवा दरबार के मूल आदेश की प्रमाणित प्रति।
बाद के न्यायिक रिकॉर्ड में शाही फरमान No. 6 और कुछ जगह No. 11 जैसे उल्लेख भी मिलते हैं; इसलिए मूल Gazette copy ऐसे numbering discrepancies को साफ करने में विशेष रूप से उपयोगी होगी। उदाहरण के लिए Pirthi Singh v. राज्य of पेप्सू में 11 मार्च 1947 के फरमान और उसके बाद के संशोधनों का विस्तृत संदर्भ मिलता है।
Pirthi Singh मामले में एक महत्वपूर्ण आदेश का उल्लेख मिलता है जिसके अनुसार 20 जुलाई 1948 को महाराजा ने पूर्व फरमान में संशोधन करते हुए उन स्थायी काश्तकार को पूर्ण मालिक मानने की दिशा में कदम उठाया जो भू-स्वामी को भूमि राजस्व और cesses के अतिरिक्त लगान नहीं देते थे।
यह महत्वपूर्ण प्राथमिक-स्रोत संकेत है।
इस आदेश की मूल रियासती file आगे शोध के लिए अत्यंत मूल्यवान होगी, क्योंकि इससे 1947 के compromise से 1948 के full स्वामित्व की दिशा में नीति परिवर्तन को समझा जा सकता है।
# 3. 1949 का पेप्सू उन्मूलन of Biswedari अध्यादेश
15 अगस्त 1949 को प्रकाशित पटियाला and पूर्वी पंजाब रियासतें संघ उन्मूलन of Biswedari अध्यादेश, 2006 Bk., अध्यादेश No. XXIII मुजारा आंदोलन के विधायी इतिहास का अगला बड़ा दस्तावेज है।
इसका मूल पाठ 1952 की सरकारी कृषि सुधार रिपोर्ट के Appendix में उपलब्ध है। अध्यादेश की प्रस्तावना स्वयं कहती है कि इसका उद्देश्य 11 मार्च 1947 के शाही फरमान में शुरू की गई प्रक्रिया को संशोधित और समेकित करना तथा स्थायी काश्तकारी काश्तकारी स्थितियां का उन्मूलन करना था।
यह प्राथमिक स्रोत विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें आंदोलन के राजनीतिक दबाव को प्रशासनिक भाषा में पढ़ा जा सकता है—
“peace and good government” के लिए पुरानी tenure व्यवस्था समाप्त करना आवश्यक माना गया।
# 1949 अध्यादेश का महत्वपूर्ण कानूनी परिवर्तन
बाद के पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के विवरण के अनुसार 1949 के कानून ने स्थायी काश्तकार और भू-स्वामी का पुराना संबंध समाप्त करने और जोत का बंदोबस्त करने की व्यवस्था बनाई। किसान को भू-स्वामी का हिस्सा मुआवजा देकर प्राप्त करने का विकल्प भी आगे इसी विधायी श्रृंखला में दिया गया।
यानी यह दस्तावेज उस संक्रमण का प्रमाण है जिसमें सरकार—
काश्तकार द्वारा पूरी जोत लेने
पेप्सू मुजारा आंदोलन के प्रमुख द्वितीयक स्रोत और संदर्भ ग्रंथ — मानक इतिहास, पंजाब के कृषि और रियासती इतिहास पर पुस्तकें, मुजारा आंदोलन के विशेष अध्ययन, कम्युनिस्ट–प्रजा मंडल इतिहास, आधुनिक अकादमिक शोध-पत्र, शोध-प्रबंध, साहित्यिक अध्ययन और उपयोगी डिजिटल अभिलेखों की आलोचनात्मक संदर्भ-सूची
पेप्सू मुजारा आंदोलन पर उपलब्ध साहित्य का स्वरूप असमान है। तेलंगाना और तेभागा की तुलना में इस आंदोलन पर अखिल भारतीय स्तर पर कम लेखन हुआ, लेकिन पंजाब के इतिहास, प्रजा मंडल आंदोलन, कम्युनिस्ट राजनीति, किसान संघर्ष और भूमि-सुधार से जुड़ी कई महत्वपूर्ण पुस्तकों तथा शोध-पत्रों में इसका विस्तृत अध्ययन मिलता है। हाल के वर्षों में, विशेष रूप से 2020–21 के किसान आंदोलन के बाद, पेप्सू मुजारा संघर्ष पर अकादमिक और सार्वजनिक रुचि फिर बढ़ी है। आधुनिक शोध इसे पंजाब के सबसे महत्वपूर्ण pre-Green Revolution किसान संघर्षों में रखता है और स्पष्ट रूप से इसे लंबे बिस्वेदार-विरोधी संघर्ष की परिणति मानता है।
इस विषय पर सामग्री को छह मुख्य श्रेणियों में विभाजित करना उपयोगी है—
मानक इतिहास और व्यापक किसान-अध्ययन, प्रजा मंडल तथा रियासती राजनीति, कम्युनिस्ट और लाल पार्टी इतिहास, विशेष पेप्सू अध्ययन, आधुनिक अकादमिक शोध, और साहित्यिक-सांस्कृतिक अध्ययन।
किसी एक पुस्तक को अंतिम सत्य मानने के बजाय इन सभी को एक-दूसरे के साथ पढ़ना अधिक विश्वसनीय पद्धति होगी।
1. मृदुला मुखर्जी : Peasants in India’s Non-Violent Revolution: Practice and Theory (2004)
पेप्सू मुजारा आंदोलन के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानक अंग्रेजी ग्रंथों में मृदुला मुखर्जी की यह पुस्तक है। इसे SAGE ने 2004 में प्रकाशित किया। पुस्तक में पंजाब के किसान आंदोलनों का व्यापक अध्ययन है और एक पूरा अध्याय “Peasant Protest in a Non-Hegemonic राज्य: The Princely राज्य of पटियाला 1930–53” पर केंद्रित है।
यह पेप्सू शोध की अनिवार्य पुस्तक है।
इसका महत्व तीन कारणों से है।
पहला, यह आंदोलन को 1948 से शुरू नहीं करती बल्कि पटियाला रियासत की पूर्ववर्ती किसान राजनीति और प्रजा मंडल संदर्भ में रखती है।
दूसरा, यह किसान संघर्ष को राष्ट्रवादी, वर्गीय और रियासती राजनीतिक प्रक्रियाओं के बीच समझती है।
तीसरा, बाद के लगभग सभी प्रमुख आधुनिक शोध पेप्सू के लिए मृदुला मुखर्जी के पृष्ठों का सहारा लेते हैं। Ronki Ram का अध्ययन भी 1947 के शाही फरमान, 1952 की भूमि-सुधार प्रक्रिया और 1953 के स्वामित्व बंदोबस्त के संदर्भ में मुखर्जी को प्रमुख स्रोत मानता है।
उपयोग
यदि पेप्सू मुजारा आंदोलन पर केवल एक आधुनिक मानक पुस्तक चुननी हो तो इसे सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
सीमा
पुस्तक का व्यापक उद्देश्य भारतीय किसान राजनीति और non-violent revolutionary practice का विश्लेषण है। इसलिए पेप्सू के प्रत्येक गांव, महिला भागीदारी, दलित भूमिहीनता या क्रियान्वयन statistics का सूक्ष्म अध्ययन इसका मुख्य उद्देश्य नहीं है।
# 2. Ramesh Walia : Praja Mandal आंदोलन in पूर्वी पंजाब रियासतें (1972)
रमेश वालिया की 1972 में Punjabi University, पटियाला के Department of पंजाब Historical Studies से प्रकाशित पुस्तक प्रजा मंडल आंदोलन समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। पुस्तक 230 पृष्ठों की है और पूर्वी पंजाब की रियासतों में popular government के लिए चले Praja Mandal आंदोलन पर केंद्रित है।
पेप्सू मुजारा आंदोलन के लिए इसकी विशेष उपयोगिता यह है कि यह—
को किसान प्रश्न की व्यापक राजनीतिक पृष्ठभूमि में रखती है।
आधुनिक शोध पेप्सू में 1948–51 के दौरान सरकारों के तेजी से बदलने और भूमि-सुधार के आगे बढ़ने के संदर्भ में वालिया का व्यापक उपयोग करता है।
उपयोग
1920–40 के दशक के प्रजा मंडल और किसान संघर्ष की संस्थागत राजनीति समझने के लिए अनिवार्य।
विशेष ताकत
पुस्तक में पटियाला राज्य अभिलेख, फरीदकोट राज्य अभिलेख, Ministry अभिलेख, personal interviews और पंजाब राज्य Archives जैसी archival सामग्री का उपयोग दिखाई देता है।
सीमा
मुख्य विषय प्रजा मंडल है, इसलिए लाल कम्युनिस्ट पार्टी और किसान आंदोलन का बाद का सशस्त्र चरण पुस्तक का केंद्रीय फोकस नहीं।
# 3. Gurharpal Singh : Communism in पंजाब: A Study of the आंदोलन Up to 1967 (1994)
पंजाब के कम्युनिस्ट आंदोलन पर सबसे उपयोगी मानक पुस्तकों में गुरहरपाल सिंह की 1994 की यह पुस्तक है। इसमें एक पूरा अध्याय Lal Communist Party, 1948–52 पर है।
पुस्तक लाल पार्टी को गदर–कीर्ति परंपरा की उस धारा के रूप में पढ़ती है जिसने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी नेतृत्व की नीति के विरुद्ध स्वतंत्र संगठन बनाया और पेप्सू काश्तकार revolt में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उपलब्ध अध्याय-सार में पेप्सू के काश्तकार revolt और राज्य द्वारा टैंकों के उपयोग तक का उल्लेख है।
उपयोग
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी–लाल पार्टी मतभेद,
और 1952 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में पुनर्विलय
समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण।
विशेषता
यह पुस्तक कम्युनिस्ट आंदोलन को केवल hero narrative की तरह नहीं बल्कि factional, ideological और organisational इतिहास के रूप में पढ़ती है।
सीमा
भूमि-सुधार का तकनीकी विधायी विश्लेषण इसका मुख्य विषय नहीं है।
# 4. B. Alaxai : पेप्सू di Muzara Lehar: Sangharsh da Etehas (2013)
पंजाबी में पेप्सू मुजारा आंदोलन पर विशिष्ट पुस्तकों में डॉ. B. Alaxai की पेप्सू di Muzara Lehar: Sangharsh da Etehas, Sangam Publications, Samana, 2013 अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका bibliographic उल्लेख आधुनिक शोधग्रंथों में मिलता है।
यह विशेष रूप से स्थानीय और आंदोलन-केंद्रित अध्ययन है।
आलोचनात्मक उपयोग
ऐसी आंदोलन-विशिष्ट पंजाबी पुस्तकों में स्थानीय oral memory और participant traditions का मूल्य बहुत अधिक होता है। लेकिन संख्यात्मक दावों, casualty, acreage और chronology को सरकारी तथा स्वतंत्र स्रोतों से मिलाना आवश्यक है।
# 5. B. Alaxai : Muzara Lehar de Mahan Aagu: Comrade Dharam Singh Fakker (2013)
इसी लेखक की धर्म सिंह फक्कड़ पर केंद्रित पुस्तक भी उपयोगी है। आधुनिक शोध लेख की bibliography इसे Sahibdeep Parkashan, Bhikhi, 2013 के प्रकाशन के रूप में दर्ज करती है।
उपयोग
और धर्म सिंह फक्कड़ के राजनीतिक जीवन
सीमा
नेता-केंद्रित जीवनी आंदोलन की व्यापक सामाजिक संरचना को स्वाभाविक रूप से पीछे कर सकती है। इसलिए इसे police, trial और broader कृषि sources के साथ पढ़ना चाहिए।
# 6. Chhajju Mal Vaid : पेप्सू Muzara Ghol
पेप्सू मुजारा संघर्ष पर सबसे महत्वपूर्ण participant-oriented पंजाबी स्रोतों में चज्जू मल वैद की पेप्सू Muzara Ghol है। एक अकादमिक अध्ययन इसकी 1988 की पंजाब Book Center, Chandigarh edition का उपयोग करता है।
यह ग्रंथ आंदोलन के अंदर से लिखी गई दृष्टि के कारण विशेष महत्व रखता है।
उपयोग
और आंदोलन की self-perception
वर्गीकरण
इसे सामान्य द्वितीयक स्रोत के बजाय participant इतिहास या memoir-इतिहास के रूप में पढ़ना अधिक उपयुक्त होगा।
सीमा
जहां लेखक स्वयं आंदोलनकारी परंपरा का हिस्सा है, वहां तथ्य और राजनीतिक व्याख्या आपस में मिल सकते हैं।
# 7. Karanbir Singh Mann : “Origin of the Muzara आंदोलन in पटियाला राज्य — A Study of Causes”
Karanbir Singh Mann का शोध-पत्र Punjabi University की पंजाब इतिहास Conference की 15वीं session proceedings से संबंधित है। आधुनिक पेप्सू शोध इसकी citation देता है और इसे आंदोलन की ऐतिहासिक उत्पत्ति के लिए उपयोग करता है।
उपयोग
और आंदोलन के structural causes
यह विशेष रूप से हमारे अध्याय 3–7 के लिए महत्वपूर्ण reference है।
# 8. J. S. Rekhi : “Genesis of Praja Mandal आंदोलन in पटियाला राज्य”
पंजाब इतिहास Conference की 18वीं session proceedings में प्रकाशित J. S. Rekhi का यह शोध प्रजा मंडल की उत्पत्ति समझने के लिए महत्वपूर्ण है। इसका bibliographic उल्लेख आधुनिक अध्ययन में उपलब्ध है।
उपयोग
मुजारा आंदोलन के पूर्ववर्ती लोकतांत्रिक और प्रजा मंडल चरण को समझने में।
ताकत
और communist-led kisan unions
निष्कर्ष — पेप्सू मुजारा आंदोलन को कैसे समझें? उन्नीसवीं सदी की बिस्वेदारी से 1950 के दशक के भूमि-सुधार तक, बटाई और बेदखली से मालिकाना अधिकार, प्रजा मंडल से लाल कम्युनिस्ट पार्टी और लोकतांत्रिक कानून तक, उपलब्धियां–सीमाएं तथा स्वतंत्र भारत के किसान इतिहास में आंदोलन का समेकित स्थान
पेप्सू मुजारा आंदोलन को समझने का सबसे सही तरीका यह है कि उसे केवल 1948–49 की हिंसक घटनाओं, लाल कम्युनिस्ट पार्टी की सक्रियता या 1950 के दशक के भूमि-सुधार कानूनों तक सीमित न किया जाए। यह लगभग एक शताब्दी में विकसित हुआ वह संघर्ष था जिसमें भूमि के वास्तविक कृषक और उच्चाधिकारी मालिकाना अधिकार रखने वाले बिस्वेदार के बीच संबंध धीरे-धीरे असहनीय हुआ, किसान ने पहले याचिका, फिर संगठन, फिर बटाई-विरोध, फिर बेदखली के प्रतिरोध और सीमित सशस्त्र आत्मरक्षा का रास्ता अपनाया, और अंततः स्वतंत्र भारतीय राज्य को ऐसा कानून बनाना पड़ा जिसने established स्थायी काश्तकार को भू-स्वामी के अधीन काश्तकार से स्वतंत्र भू-स्वामी में बदल दिया।
इसीलिए पेप्सू मुजारा आंदोलन का मूल प्रश्न किसी एक विचारधारा या राजनीतिक दल का नहीं था। उसका केंद्रीय प्रश्न था—
जमीन पर अंतिम अधिकार किसका होगा—उसे जो कानूनी रूप से उच्चाधिकारी मालिक कहलाता है, या उसे जो पीढ़ियों से उसे जोतता है?
1950 के दशक के कानूनों ने इस प्रश्न का उत्तर बड़े पैमाने पर कृषक के पक्ष में दिया। 1954 के पेप्सू स्थायी काश्तकार अधिनियम की धारा 3 ने भू-स्वामी के अधिकार, title और interest समाप्त कर स्थायी काश्तकार में vest कर दिए; भू-स्वामी का लगान लेने का अधिकार समाप्त हुआ और काश्तकार सीधे सरकार को भूमि राजस्व देने वाला भू-स्वामी बना।
यही इस आंदोलन की सबसे ठोस और ऐतिहासिक उपलब्धि थी।
बिस्वेदारी से शुरू हुआ प्रश्न
पेप्सू आंदोलन की गहरी जड़ें पटियाला रियासत की उस भूमि-संरचना में थीं जिसमें वास्तविक कृषक और कानूनी उच्चाधिकारी भू-स्वामी अलग-अलग व्यक्ति हो गए थे। यही व्यवस्था आगे बिस्वेदार–मुजारा संबंध के रूप में विकसित हुई।
किसान की शिकायत केवल यह नहीं थी कि उससे अधिक बटाई ली जाती है।
जिस भूमि पर मेरा परिवार पीढ़ियों से खेती करता है, मैं उस पर अधीन काश्तकार क्यों हूं?
यहीं पेप्सू संघर्ष दूसरे सामान्य लगान-reduction आंदोलनों से अलग होने लगता है।
लेकिन उसके नीचे स्वामित्व का प्रश्न था।
# मुजारा प्रश्न का केंद्रीय विरोधाभास
पुरानी व्यवस्था में दो वास्तविकताएं एक साथ मौजूद थीं।
जब तक कृषि संबंध स्थिर थे, यह विरोधाभास चलता रहा।
लेकिन जैसे-जैसे राजनीतिक चेतना बढ़ी, किसान ने पूछा—
कानूनी title इतना महत्वपूर्ण क्यों है कि वास्तविक कृषक उसके नीचे बना रहे?
यही सवाल आगे “जमीन उसकी जो जोते” की राजनीति में बदल गया।
# प्रजा मंडल : भूमि प्रश्न को राजनीति देना
आंदोलन की दूसरी बड़ी ऐतिहासिक अवस्था प्रजा मंडल थी।
प्रजा मंडल ने किसान को यह समझ दी कि उसका आर्थिक अन्याय केवल निजी भू-स्वामी का मामला नहीं, रियासती शासन और राजनीतिक अधिकार का भी प्रश्न है।
आधुनिक शोध स्पष्ट करता है कि Praja Mandal leaders, Akalis और Communist-led Kisan Sabhas—तीनों विभिन्न चरणों में मुजारों के साथ खड़े हुए।
इसलिए आंदोलन की genealogy लाल कम्युनिस्ट पार्टी से बहुत पहले शुरू होती है।
प्रजा मंडल के बिना पेप्सू आंदोलन का लोकतांत्रिक राजनीतिक आधार समझ में नहीं आता।
# कीर्ति और कम्युनिस्ट राजनीति : वर्गीय भाषा
कीर्ति किसान और कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने इस आंदोलन में एक नया विश्लेषण जोड़ा।
उनके लिए किसान और बिस्वेदार के बीच संबंध केवल अन्याय नहीं—
अधिशेष उच्चाधिकारी भू-स्वामी लेता है।
इसलिए समस्या का समाधान केवल लगान कम करना नहीं, भू-स्वामी–काश्तकार संबंध समाप्त करना है।
यही वह वैचारिक परिवर्तन था जिसने आंदोलन को मालिकाना अधिकार की मांग की ओर तेज किया।
# मुजारा War Council और संगठित प्रतिरोध
आधुनिक शोध 1929 में Muzara Committee और 1938–39 में Muzara War Council के गठन का उल्लेख करता है; 1945 में 21 सदस्यीय नई War Council के गठन के बाद संघर्ष और अधिक उग्र हुआ।
यह क्रम बताता है कि पेप्सू आंदोलन spontaneous revolt नहीं था।
स्थानीय committees विकसित कीं।
और गांवों के बीच नेटवर्क तैयार किया।
यही जनाधार आगे लाल पार्टी के उग्र चरण की वास्तविक शक्ति बना।
# बटाई न देना : आर्थिक अवज्ञा से राजनीतिक चुनौती
नो-बटाई अभियान इस आंदोलन की निर्णायक रणनीतियों में था।
जब किसान लगान अथवा crop share देना बंद करता है तो वह भू-स्वामी की आय पर सीधा प्रहार करता है।
लेकिन पेप्सू में यह केवल आर्थिक boycott नहीं था।
मैं तुम्हारा काश्तकार होने का दावा ही चुनौती दे रहा हूं।
इसलिए नो-बटाई धीरे-धीरे स्वामित्व struggle में बदल गई।
# 11 मार्च 1947 : रियासती सत्ता की पहली बड़ी स्वीकारोक्ति
पटियाला महाराजा का 11 मार्च 1947 का शाही फरमान इस संघर्ष की पहली बड़ी संस्थागत स्वीकारोक्ति था।
राज्य ने मान लिया कि पुराने भू-स्वामी–काश्तकार संबंध को जस का तस बनाए रखना संभव नहीं।
लेकिन किसान ने इसे अधूरा माना क्योंकि समाधान भूमि-विभाजन पर आधारित था, पूर्ण मालिकाना अधिकार पर नहीं।
यहीं आंदोलन और राज्य के बीच मूल अंतर साफ हुआ—
# स्वतंत्रता आई, भूमि प्रश्न नहीं गया
15 अगस्त 1947 ने राजनीतिक सत्ता बदल दी।
लेकिन पेप्सू मुजारा आंदोलन यह दिखाता है कि स्वतंत्रता और सामाजिक-आर्थिक मुक्ति एक ही चीज नहीं थीं।
रियासतों का एकीकरण शुरू हुआ।
लेकिन खेत पर उच्चाधिकारी भू-स्वामी बना रहा।
इसलिए किसान ने संघर्ष समाप्त नहीं किया।
यही पेप्सू की स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से है—
यह संघर्ष स्वतंत्रता के बाद भी इसलिए जारी रहा क्योंकि राजनीतिक स्वतंत्रता ने भूमि-अधिकार स्वतः नहीं बदले।
# 1948 : पेप्सू और लाल कम्युनिस्ट पार्टी
1948 में दो समानांतर घटनाएं हुईं।
एक तरफ आठ रियासतों को मिलाकर पेप्सू बना।
दूसरी तरफ लाल कम्युनिस्ट पार्टी हिंद यूनियन का गठन हुआ।
नई पार्टी को ऐसा क्षेत्र मिला जहां किसान संघर्ष पहले से विकसित था।
इसलिए उसने आंदोलन पैदा नहीं किया—
उसने पहले से मौजूद संघर्ष को अधिक उग्र संगठनात्मक दिशा दी।
# तेजा सिंह स्वतंत्र और लाल पार्टी की भूमिका
इस भूमिका को कम करके देखना इतिहास की भूल होगी।
लेकिन आंदोलन का पूरा श्रेय लाल पार्टी को देना भी उतना ही गलत होगा।
क्योंकि प्रजा मंडल, अकाली और दूसरे किसान संगठन उसके पहले और साथ मौजूद थे।
# सशस्त्र आत्मरक्षा : शक्ति और सीमा
पेप्सू आंदोलन का सशस्त्र component महत्वपूर्ण था, लेकिन वह उसकी पूरी प्रकृति नहीं था।
किसान स्वयंसेवी समूह और लाल रक्षक बिस्वेदारों के सशस्त्र groups तथा पुलिस कार्रवाई के संदर्भ में विकसित हुए।
लेकिन इस रणनीति की सीमा किशनगढ़ में साफ हुई।
कुछ दर्जन सशस्त्र activists उसका सैन्य विकल्प नहीं हो सकते थे।
यहीं आंदोलन ने देखा कि दीर्घकालीन समाधान बंदूक से नहीं आएगा।
# किशनगढ़ : आंदोलन का निर्णायक प्रतीक
मार्च 1949 का किशनगढ़ संघर्ष आंदोलन के इतिहास में उस बिंदु का प्रतीक है जहां भूमि-विवाद राज्य-सत्ता से सीधे टकराव में बदल गया।
राज्य ने कठोर बल प्रयोग किया।
आंदोलन का एक हिस्सा भूमिगत हुआ।
लेकिन राजनीतिक परिणाम उलटा भी पड़ा—
भूमि-सुधार अब टाला नहीं जा सकता था।
किशनगढ़ के बाद यह स्पष्ट हुआ कि यदि भूमि-संबंध वही रहे तो प्रत्येक फसल चक्र नया संघर्ष पैदा कर सकता है।
यहीं राज्य की सोच law-and-order से कृषि सुधार की ओर बदलती दिखाई देती है।
1949 के बाद बिस्वेदारी उन्मूलन की कानूनी प्रक्रिया तेज हुई।
1952 तक कृषि सुधार सरकारी policy framework बन चुका था।
और 1953–55 में भूमि कानून निर्णायक रूप लेने लगे।
व्यापक काश्तकारी regulation,
पेप्सू मुजारा आंदोलन की संक्षिप्त समयरेखा
पेप्सू मुजारा आंदोलन का ऐतिहासिक महत्व केवल बटाई घटाने या बेदखली रोकने में नहीं, वास्तविक जोतने वाले को भूमिधर बनाने की दिशा में है। आंदोलन ने रियासती विरासत, किसान संगठन, कम्युनिस्ट आत्मरक्षा और लोकतांत्रिक कानून—चारों को एक जटिल संक्रमण में जोड़ा। सशस्त्र टकराव और दमन ने भारी मानवीय कीमत वसूली, पर किसान दबाव ने भूमि प्रश्न को टालना असंभव कर दिया। कानूनों से अनेक मुजारों को स्वामित्व मिला, फिर भी भूमिहीन मजदूरों, दलित परिवारों और महिलाओं के स्वतंत्र अधिकार का प्रश्न पूरा हल नहीं हुआ। इसलिए इसकी विरासत एक महत्वपूर्ण सफलता और अधूरे ग्रामीण लोकतंत्रीकरण—दोनों की कहानी है।
प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक स्रोत
स्रोत-सावधानी: सरकारी अभिलेख आंदोलन को कानून-व्यवस्था की दृष्टि से और सहभागी किसान–कम्युनिस्ट आख्यान उसे भूमि-मुक्ति की दृष्टि से प्रस्तुत करते हैं। किशनगढ़ की घटनाओं, मौतों, प्रभावित गांवों और लाभार्थियों की संख्याओं में स्रोतांतर मिलने पर इस अध्ययन ने बहु-स्रोत तथा स्रोत-सापेक्ष भाषा अपनाई है।