भील विद्रोह और भील–भगत आंदोलन (1818–1913)
खानदेश के पहाड़ी प्रतिरोध से खाज्या नायक, भीमा नायक, टंट्या मामा, गोविंद गुरु, सम्प सभा और मानगढ़ तक
भील प्रतिरोध को किसी एक विद्रोह या केवल 1913 के मानगढ़ तक सीमित नहीं किया जा सकता। खानदेश, निमाड़, डांग, राजपूताना और गुजरात की पहाड़ी–वनवासी दुनिया में भूमि, जंगल, स्थानीय स्वायत्तता, बेगार, साहूकारी और राज्य के विस्तार ने अलग-अलग समय पर प्रतिरोध को जन्म दिया। 1818 के सशस्त्र उभार, 1857–60 में खाज्या–भीमा नायक, टंट्या मामा की छापामार धारा और गोविंद गुरु के भगत आंदोलन के बीच पद्धति बदली, पर स्वाभिमान और अधिकार का प्रश्न बना रहा। यह अध्ययन उस पूरी शताब्दी को एक ऐतिहासिक निरंतरता में पढ़ता है।
भील भूगोल, समाज और औपनिवेशिक प्रवेश
भील भूगोल : औपनिवेशिक सीमाओं से पुराना एक संसार
भील समुदाय का ऐतिहासिक भूगोल आधुनिक राज्यों की सीमाओं से बहुत पुराना और व्यापक था। पश्चिमी भारत में अरावली से लेकर विंध्य और सतपुड़ा तक फैली पर्वतीय पट्टी में भील आबादी के अनेक समूह रहते थे। आज यह क्षेत्र मुख्यतः दक्षिणी राजस्थान, पूर्वी गुजरात, पश्चिमी मध्य प्रदेश और उत्तरी महाराष्ट्र में विभाजित है।
मेवाड़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, सिरोही, ईडर, पंचमहल, दाहोद, झाबुआ, अलीराजपुर, निमाड़, खानदेश और डांग जैसे क्षेत्रों को एक व्यापक भील सांस्कृतिक भूगोल के रूप में समझना अधिक उपयोगी है।
यह भूगोल जंगल, छोटी खेती, पशुपालन, शिकार, वन-उत्पाद और पहाड़ी रास्तों पर आधारित अर्थव्यवस्था का संसार था।
राज्य और भील समाज का संबंध भी केवल ‘शासक और प्रजा’ का नहीं था। अनेक क्षेत्रों में स्थानीय भील मुखिया रास्तों की सुरक्षा, चौकीदारी, सैन्य सहायता और स्थानीय नियंत्रण से जुड़े अधिकार रखते थे। कहीं वे राजपूत रियासतों से जुड़े थे, कहीं लगभग स्वायत्त पहाड़ी समुदायों के रूप में रहते थे।
औपनिवेशिक राज्य ने इस जटिल व्यवस्था को अपनी केंद्रीकृत प्रशासनिक दृष्टि से देखना शुरू किया। यहीं से संघर्ष की नई परिस्थितियाँ पैदा हुईं।
1818 : वह निर्णायक मोड़
1818 तीसरे आंग्ल–मराठा युद्ध और पेशवा सत्ता के पतन का वर्ष था। इसके बाद खानदेश सहित पश्चिमी भारत के बड़े भूभाग पर ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रत्यक्ष प्रभाव स्थापित हुआ।
खानदेश 1818 में ब्रिटिश क्षेत्र बना। औपनिवेशिक विवरण स्वयं स्वीकार करते हैं कि इस क्षेत्र में भीलों की उल्लेखनीय आबादी थी।
लेकिन अंग्रेजों को केवल भूमि नहीं मिली थी। उन्हें एक ऐसा पहाड़ी समाज भी मिला जिसकी सत्ता, अधिकार और अर्थव्यवस्था उनके राजस्व तथा पुलिस-प्रशासन के ढाँचे में आसानी से फिट नहीं होती थी।
राजस्व का अधिक व्यवस्थित संग्रह, पुलिस का विस्तार, सड़कों और रास्तों पर सरकारी नियंत्रण, स्थानीय मुखियाओं की शक्ति में कमी और हिंसा के वैध प्रयोग पर राज्य का एकाधिकार।
जो गतिविधियाँ पुराने राजनीतिक संसार में स्थानीय अधिकार या परंपरा का हिस्सा हो सकती थीं, औपनिवेशिक अभिलेखों में उनमें से अनेक को लूट, डकैती अथवा अपराध की श्रेणी में रखा गया।
यहीं इतिहासलेखन की पहली बड़ी समस्या उत्पन्न होती है।
क्या भील केवल ‘लुटेरे’ थे? औपनिवेशिक अभिलेखों की समस्या
उन्नीसवीं सदी के ब्रिटिश अभिलेखों में भीलों के लिए अक्सर ऐसे शब्द मिलते हैं जो उन्हें हिंसक, असभ्य, लुटेरा अथवा प्रशासन-विरोधी समुदाय के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
आधुनिक इतिहासकार को इन स्रोतों का सावधानी से उपयोग करना पड़ता है।
क्योंकि जिस अधिकारी का काम किसी क्षेत्र को ‘शांत’ करना था, वही उस क्षेत्र के लोगों के बारे में रिपोर्ट लिख रहा था।
इसलिए ‘शांतिपूर्णकरण’ का अर्थ प्रायः था
खानदेश पर आधुनिक शोध ने भी औपनिवेशिक ‘भील समस्या’ और उसके समाधान की इसी राजनीतिक प्रकृति की ओर ध्यान दिलाया है।
इसका अर्थ यह नहीं कि हर हमला राजनीतिक विद्रोह था या हर भील समूह अंग्रेज-विरोधी था। बल्कि आवश्यक अंतर यह है कि अपराध, जीविका-संकट, स्थानीय सत्ता-संघर्ष और औपनिवेशिक प्रतिरोध कई बार एक-दूसरे में गुंथे हुए थे।
1818 का भील विद्रोह : आरंभिक प्रतिरोध वास्तव में कितना व्यापक था?
1818 को केवल भील इतिहास की सुविधाजनक आरंभ-तिथि नहीं समझना चाहिए। यह पश्चिमी भारत की राजनीतिक व्यवस्था के विघटन का वर्ष था। तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद पेशवा की शक्ति समाप्त हुई और खानदेश पर ईस्ट इंडिया कंपनी का नियंत्रण स्थापित हुआ।
नई सत्ता के सामने समस्या केवल राजस्व वसूलने की नहीं थी। पहाड़ी इलाकों में ऐसे समुदाय थे जिनका राजनीतिक–आर्थिक जीवन पहले की सत्ता-व्यवस्था में स्थानीय समझौतों, परंपरागत अधिकारों और मुखियाओं के माध्यम से चलता था।
नए शोध से आरंभिक दमन की कठोरता का भी पता चलता है। 1818 में कंपनी द्वारा खानदेश पर अधिकार किए जाने के शुरुआती महीनों में 1,200 से अधिक भील पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को कथित सशस्त्र प्रतिरोध के सिलसिले में बंदी बनाया गया था। विरोध के बाद अधिकांश छोड़े गए, लेकिन 238 पुरुषों को अत्यंत खतरनाक मानकर हिरासत में रखा गया और दूर स्थानांतरित किया गया।
इससे 1818 का संघर्ष कुछ छोटे ‘लुटेरे गिरोहों’ की गतिविधि भर नहीं दिखाई देता। औपनिवेशिक सत्ता स्वयं इसे इतने बड़े पैमाने की सुरक्षा समस्या मान रही थी कि सामूहिक गिरफ्तारी का सहारा लिया गया।
औपनिवेशिक सत्ता ने ‘भील समस्या’ कैसे बनाई?
खानदेश पर अधिकार करने के बाद अंग्रेज अधिकारियों के सामने प्रश्न था कि उन भीलों को कैसे नियंत्रित किया जाए जिनकी जीवन-पद्धति स्थायी राजस्व गाँवों और नियमित पुलिस प्रशासन के अनुकूल नहीं थी।
खानदेश के भीलों पर ए. के. प्रसाद का विस्तृत अध्ययन बताता है कि 1818 के बाद कंपनी के सामने भीलों को नियंत्रित करना अत्यंत कठिन समस्या बन गया था। सैन्य अभियानों की सीमाओं के बाद कंपनी के निदेशक मंडल तक को अधिक समझौतावादी नीति पर विचार करना पड़ा।
यानी जिस समुदाय को नियंत्रित नहीं किया जा सकता, उसके एक हिस्से को राज्य की संरचना के भीतर शामिल कर लो।
यही खानदेश भील कोर की राजनीतिक पृष्ठभूमि थी।
आरंभिक भील नेतृत्व और नामों की समस्या
1818–30 के भील संघर्षों के साथ एक स्रोतगत समस्या है। बाद के बड़े आंदोलनों की तरह यहाँ हर विद्रोह का स्पष्ट संगठन, घोषणापत्र और केंद्रीय नेता उपलब्ध नहीं है।
औपनिवेशिक अभिलेख अलग-अलग नायकों, गिरोहों और मुखियाओं का उल्लेख करते हैं। लोकप्रिय इतिहास में सेवाराम/सेवराम जैसे नाम भी आरंभिक भील नेतृत्व के साथ आते हैं, लेकिन सभी विवरण समान रूप से प्रमाणित नहीं हैं।
इसलिए वेबसाइट पर सावधानी यह रखी जानी चाहिए कि किसी एक व्यक्ति को पूरे 1818 के भील विद्रोह का निर्विवाद सर्वोच्च नेता घोषित न किया जाए।
आरंभिक प्रतिरोध की वास्तविक प्रकृति थी
पेशवाई के अंत और भील असंतोष का संबंध
1818 के बाद की उथल-पुथल को केवल ‘ब्रिटिश बनाम भील’ के रूप में देखना भी अधूरा होगा।
मराठा राजनीतिक व्यवस्था टूट रही थी। पुराने सैन्य दल बिखर रहे थे। स्थानीय संरक्षक संबंध समाप्त हो रहे थे। रास्तों, चौकियों और स्थानीय कर-संग्रह की पुरानी व्यवस्थाएँ बदल रही थीं।
इससे वे समुदाय विशेष रूप से प्रभावित हुए जिनकी आजीविका पुराने राजनीतिक ढाँचे से जुड़ी हुई थी।
औपनिवेशिक सत्ता ने इसे ‘कानून-व्यवस्था की समस्या’ माना।
जीविका और अधिकार की व्यवस्था का विघटन
इसीलिए 1818 के बाद का विद्रोह केवल विदेशी शासन के प्रति वैचारिक राष्ट्रवादी प्रतिक्रिया नहीं था। वह राजनीतिक सत्ता परिवर्तन से पैदा हुई व्यापक सामाजिक–आर्थिक अस्थिरता का भी परिणाम था।
1818 का खानदेश प्रतिरोध और उसका विस्तार
1818 के बाद खानदेश में प्रतिरोध
अंग्रेजों के आगमन के बाद खानदेश की पहाड़ियों में शांति तुरंत स्थापित नहीं हुई। विभिन्न भील समूहों ने नई सत्ता का विरोध किया।
पहाड़ी भूगोल ने प्रतिरोध को विशेष सामरिक शक्ति दी।
छोटे दल अचानक मैदानों में उतर सकते थे, सरकारी चौकियों अथवा राजस्व व्यवस्था को चुनौती दे सकते थे और फिर जंगलों तथा पहाड़ों में लौट सकते थे।
औपनिवेशिक सेना के लिए समस्या यह थी कि नियमित सैन्य युद्ध के नियम यहाँ प्रभावी नहीं होते थे।
ब्रिटिश सरकार ने शीघ्र समझ लिया कि केवल सैन्य दमन से इस क्षेत्र को नियंत्रित करना कठिन होगा।
इसी अनुभव ने आगे एक नई नीति पैदा की
प्रतिरोध करने वाले समुदाय के एक हिस्से को औपनिवेशिक व्यवस्था के भीतर भर्ती करना।
1818 का भील विद्रोह : आरंभिक प्रतिरोध वास्तव में कितना व्यापक था?
1818 को केवल भील इतिहास की सुविधाजनक आरंभ-तिथि नहीं समझना चाहिए। यह पश्चिमी भारत की राजनीतिक व्यवस्था के विघटन का वर्ष था। तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद पेशवा की शक्ति समाप्त हुई और खानदेश पर ईस्ट इंडिया कंपनी का नियंत्रण स्थापित हुआ।
नई सत्ता के सामने समस्या केवल राजस्व वसूलने की नहीं थी। पहाड़ी इलाकों में ऐसे समुदाय थे जिनका राजनीतिक–आर्थिक जीवन पहले की सत्ता-व्यवस्था में स्थानीय समझौतों, परंपरागत अधिकारों और मुखियाओं के माध्यम से चलता था।
नए शोध से आरंभिक दमन की कठोरता का भी पता चलता है। 1818 में कंपनी द्वारा खानदेश पर अधिकार किए जाने के शुरुआती महीनों में 1,200 से अधिक भील पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को कथित सशस्त्र प्रतिरोध के सिलसिले में बंदी बनाया गया था। विरोध के बाद अधिकांश छोड़े गए, लेकिन 238 पुरुषों को अत्यंत खतरनाक मानकर हिरासत में रखा गया और दूर स्थानांतरित किया गया।
इससे 1818 का संघर्ष कुछ छोटे ‘लुटेरे गिरोहों’ की गतिविधि भर नहीं दिखाई देता। औपनिवेशिक सत्ता स्वयं इसे इतने बड़े पैमाने की सुरक्षा समस्या मान रही थी कि सामूहिक गिरफ्तारी का सहारा लिया गया।
आरंभिक भील नेतृत्व और नामों की समस्या
1818–30 के भील संघर्षों के साथ एक स्रोतगत समस्या है। बाद के बड़े आंदोलनों की तरह यहाँ हर विद्रोह का स्पष्ट संगठन, घोषणापत्र और केंद्रीय नेता उपलब्ध नहीं है।
औपनिवेशिक अभिलेख अलग-अलग नायकों, गिरोहों और मुखियाओं का उल्लेख करते हैं। लोकप्रिय इतिहास में सेवाराम/सेवराम जैसे नाम भी आरंभिक भील नेतृत्व के साथ आते हैं, लेकिन सभी विवरण समान रूप से प्रमाणित नहीं हैं।
इसलिए वेबसाइट पर सावधानी यह रखी जानी चाहिए कि किसी एक व्यक्ति को पूरे 1818 के भील विद्रोह का निर्विवाद सर्वोच्च नेता घोषित न किया जाए।
आरंभिक प्रतिरोध की वास्तविक प्रकृति थी
पेशवाई के अंत और भील असंतोष का संबंध
1818 के बाद की उथल-पुथल को केवल ‘ब्रिटिश बनाम भील’ के रूप में देखना भी अधूरा होगा।
मराठा राजनीतिक व्यवस्था टूट रही थी। पुराने सैन्य दल बिखर रहे थे। स्थानीय संरक्षक संबंध समाप्त हो रहे थे। रास्तों, चौकियों और स्थानीय कर-संग्रह की पुरानी व्यवस्थाएँ बदल रही थीं।
इससे वे समुदाय विशेष रूप से प्रभावित हुए जिनकी आजीविका पुराने राजनीतिक ढाँचे से जुड़ी हुई थी।
औपनिवेशिक सत्ता ने इसे ‘कानून-व्यवस्था की समस्या’ माना।
जीविका और अधिकार की व्यवस्था का विघटन
इसीलिए 1818 के बाद का विद्रोह केवल विदेशी शासन के प्रति वैचारिक राष्ट्रवादी प्रतिक्रिया नहीं था। वह राजनीतिक सत्ता परिवर्तन से पैदा हुई व्यापक सामाजिक–आर्थिक अस्थिरता का भी परिणाम था।
दमन, जेम्स आउट्रम और खानदेश भील कोर
दमन से सहयोजन तक : ब्रिटिश ‘भील नीति’
1820 के दशक में ब्रिटिश नीति ने दोहरा रूप ग्रहण किया।
एक ओर विद्रोही समूहों के विरुद्ध सैन्य अभियान चलाए गए।
दूसरी ओर आत्मसमर्पण करने वालों को खेती, जमीन, आर्थिक सहायता और सरकारी रोजगार देकर स्थायी प्रशासनिक ढाँचे में शामिल करने की कोशिश हुई।
यह औपनिवेशिक शासन की महत्वपूर्ण रणनीति थी
1825 में खानदेश में ‘भील एजेंसी’ की व्यवस्था विकसित हुई और जेम्स आउट्रम को भीलों की एक सैन्य टुकड़ी गठित करने की जिम्मेदारी मिली। उपलब्ध औपनिवेशिक विवरणों के अनुसार 1826 तक लगभग 300 भील इसमें भर्ती हो चुके थे और 1828 तक संख्या लगभग 600 पहुँच गई थी।
पहला—स्थानीय भूगोल जानने वाले सैनिक मिले।
दूसरा—प्रतिरोधी समाज का एक हिस्सा स्वयं औपनिवेशिक सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ गया।
खानदेश भील कोर : विद्रोही से औपनिवेशिक सैनिक
1825 में गठित Khandesh भील कोर—खानदेश भील कोर औपनिवेशिक सीमांत शासन का महत्वपूर्ण प्रयोग था। बाद के औपनिवेशिक नृवंशीय विवरण भी इसकी स्थापना को आउट्रम से जोड़ते हैं।
आत्मसमर्पण करने वालों को क्षमादान, खेती के लिए भूमि तथा बीज और बैलों के लिए सहायता देने जैसी व्यवस्थाओं का उल्लेख मिलता है।
इसे केवल ‘कल्याणकारी’ नीति मानना गलत होगा।
यह राजनीतिक नियंत्रण की रणनीति भी थी।
ब्रिटिश शासन ने पहाड़ों को केवल बाहर से जीतने के बजाय पहाड़ी समाज के भीतर से सुरक्षा-सहयोगी तैयार किए।
जिस भील धनुष का सामना अंग्रेज सैनिक कर रहा था, अब उसी समुदाय का एक दूसरा व्यक्ति ब्रिटिश वर्दी में खड़ा हो सकता था।
यहीं से भील समाज के भीतर औपनिवेशिक सत्ता के साथ सहयोग और प्रतिरोध—दोनों प्रवृत्तियाँ समानांतर दिखाई देती हैं।
1830 का डांग अभियान
खानदेश के पश्चिम में डांग का घना जंगल ब्रिटिश अधिकारियों के लिए लंबे समय तक चुनौती बना रहा।
1830 में आउट्रम के नेतृत्व में वहाँ अभियान चलाया गया। उपलब्ध विवरण बताते हैं कि इसमें नियमित सैनिकों के साथ बड़ी संख्या में भील सहायक भी शामिल थे।
यह घटना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
के सरल द्वंद्व में नहीं समझा जा सकता।
एक भील समूह दूसरे भील समूह के विरुद्ध औपनिवेशिक सैन्य अभियान का हिस्सा बन सकता था।
इससे स्पष्ट होता है कि ‘भील’ एक एकीकृत राजनीतिक इकाई नहीं थे। अलग-अलग नायक, मुखिया, इलाके और सत्ता-संबंध थे।
1830 के दशक : प्रतिरोध समाप्त नहीं हुआ
खानदेश में सैन्य भर्ती और समझौते के बावजूद आसपास के क्षेत्रों में प्रतिरोध समाप्त नहीं हुआ।
1833 में बड़वानी क्षेत्र के सतपुड़ा भीलों के विद्रोह और उसके विरुद्ध अभियान का उल्लेख औपनिवेशिक अभिलेखों में मिलता है। विद्रोही नेता हतनिया/हटनिया की गिरफ्तारी का भी विवरण मिलता है।
यह बताता है कि ‘शांतिपूर्णकरण’ एक बार की घटना नहीं थी।
राज्य किसी इलाके को नियंत्रित करता, फिर दूसरे क्षेत्र में प्रतिरोध उभरता।
इसलिए 1818–40 का काल पश्चिमी भारत में औपनिवेशिक सत्ता और पहाड़ी समुदायों के बीच नए संबंधों के निर्माण का लंबा संक्रमणकाल था।
जेम्स आउट्रम और ‘शांतिपूर्णकरण’ का प्रयोग
1820 के दशक में जेम्स आउट्रम भील नीति से प्रमुखता से जुड़े।
ब्रिटिश प्रशासन ने महसूस किया कि हर पहाड़ी बस्ती में नियमित सेना भेजना असंभव है।
इसलिए भीलों को स्वयं सुरक्षा व्यवस्था में भर्ती किया गया।
यहाँ औपनिवेशिक शासन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत दिखाई देता है
सीमांत समाज को केवल बाहर से नियंत्रित मत करो; उसके भीतर से राज्य के सहयोगी तैयार करो।
कुछ लोगों को कृषि की ओर प्रोत्साहित किया गया।
और विद्रोही समूहों को अलग-थलग करने की कोशिश हुई।
इस नीति ने खानदेश में औपनिवेशिक नियंत्रण को मजबूत किया, लेकिन भील असंतोष समाप्त नहीं किया। खानदेश के इतिहास पर आधुनिक अध्ययन भी सैन्य दमन से समझौतावादी नीति की इस यात्रा को महत्वपूर्ण मानता है।
1830–50 : इतिहास की ‘खाली जगह’ वास्तव में खाली नहीं थी
सामान्य इतिहास पुस्तकों में 1820 के दशक के बाद सीधे 1857 पर पहुँच जाने की प्रवृत्ति है।
इससे भ्रम होता है कि भील प्रतिरोध बीच में समाप्त हो गया था।
स्थानीय टकराव, पुलिस-विरोध, राजस्व विवाद और पहाड़ी इलाकों में राज्य नियंत्रण की समस्या बनी रही।
इस दौर का महत्व इसलिए भी है क्योंकि इसी समय औपनिवेशिक राज्य ने
इन सबको मिलाकर एक नई सीमांत प्रशासनिक व्यवस्था विकसित की।
1857 में जब व्यापक राजनीतिक संकट आया तो इसी व्यवस्था के भीतर से फिर विद्रोह फूटा।
और इस बार हमारे पास नेताओं के नाम कहीं अधिक स्पष्ट हैं।
भूमि, जंगल, अकाल और साहूकारी का संरचनात्मक संकट
प्रतिरोध के वास्तविक कारण : केवल राजनीतिक सत्ता नहीं
भील असंतोष की जड़ में कई परतें थीं।
सबसे महत्वपूर्ण था संसाधनों पर नियंत्रण।
पहाड़ और जंगल केवल निवास-स्थान नहीं थे। वे भोजन, ईंधन, चराई, शिकार, लकड़ी और सामाजिक अस्तित्व के स्रोत थे।
राज्य का विस्तार इन संसाधनों पर बाहरी नियंत्रण बढ़ाता गया।
स्थायी अथवा अधिक नियंत्रित कृषि व्यवस्था का विस्तार उन समुदायों को प्रभावित करता था जिनका जीवन खेती, जंगल और मौसमी गतिविधियों के मिश्रण पर आधारित था।
आदिवासी कृषक धीरे-धीरे मुद्रा आधारित अर्थव्यवस्था में अधिक गहरे फँसते गए। ऋण, ब्याज और भूमि पर कब्जे ने सामाजिक तनाव पैदा किया।
विशेषतः रियासती क्षेत्रों में बेगार आगे चलकर भगत आंदोलन के महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक बनी।
इसलिए भील प्रतिरोध मूलतः एक बहुस्तरीय संघर्ष था
जंगल + जमीन + जीविका + सम्मान + स्थानीय स्वायत्तता।
जंगल अब ‘सरकारी संपत्ति’ बन रहा था
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में वन कानूनों और औपनिवेशिक वन प्रशासन के विस्तार ने आदिवासी जीवन पर गहरा प्रभाव डाला।
लकड़ी, रेलवे स्लीपर, राजस्व और सामरिक संसाधन था।
यही अंतर आगे भारतीय आदिवासी प्रतिरोधों के केंद्रीय संघर्षों में से एक बना।
राज्य जिस चीज को ‘आरक्षित वन’ कहता था, स्थानीय समुदाय उसे अपनी पीढ़ियों पुरानी जीवन-भूमि मान सकता था।
1857 के बाद : वन, जमीन और साहूकारी की नई दुनिया
1857 के बाद ब्रिटिश राज्य अधिक शक्तिशाली हुआ।
लेकिन इसी काल में वन-संसाधनों पर राज्य का नियंत्रण भी बढ़ा।
वन कानूनों, भूमि सर्वेक्षण, राजस्व निर्धारण और बाजार के विस्तार ने भील अर्थव्यवस्था को बदल दिया।
साहूकार और व्यापारी आदिवासी क्षेत्रों में अधिक प्रभावशाली हुए।
कर्ज का अर्थ कई बार भूमि, फसल अथवा श्रम पर बाहरी नियंत्रण था।
इसलिए प्रतिरोध की अगली पीढ़ी को केवल अंग्रेज सैनिक से नहीं लड़ना था।
पुलिस + वन प्रशासन + साहूकार + मालगुजार + राजस्व तंत्र
इसी पृष्ठभूमि से टंट्या भील की कथा उभरती है।
1857 में खाज्या नायक, भीमा नायक और विद्रोही गठबंधन
1857 और भील क्षेत्र
1857 के विद्रोह ने मध्य और पश्चिमी भारत में भी राजनीतिक अस्थिरता पैदा की।
लेकिन यहाँ भी एक सरल निष्कर्ष खतरनाक होगा कि ‘सभी भील 1857 में अंग्रेजों के विरुद्ध थे।’
कुछ भील समूह औपनिवेशिक अथवा रियासती संरचनाओं से जुड़े हुए थे; दूसरे विद्रोही गतिविधियों में शामिल हुए।
नासिक–खानदेश क्षेत्र में भागोजी नायक जैसे नेताओं का प्रतिरोध उल्लेखनीय रहा। पश्चिमी भारत के 1857–59 के संघर्षों में स्थानीय आदिवासी और पहाड़ी लड़ाकों की भूमिका ने यह दिखाया कि 1818 के बाद पैदा हुआ असंतोष पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था।
1857 के बाद औपनिवेशिक सत्ता और अधिक केंद्रीकृत हुई।
परंतु इसी के साथ एक दूसरी प्रक्रिया भी बढ़ी
जंगल और भूमि पर प्रशासनिक हस्तक्षेप।
1857 : खाज्या नायक का असाधारण रूपांतरण
1857–58 के भील प्रतिरोध का सबसे रोचक चरित्र खाज्या नायक, जिन्हें अभिलेखों में Kajarsing/Kajising जैसे रूपों में भी लिखा गया, हैं।
उनकी कहानी औपनिवेशिक सत्ता और आदिवासी नेतृत्व के जटिल संबंध को उजागर करती है।
महाराष्ट्र सरकार के गजेटियर के अनुसार खाज्या पहले अंग्रेजी व्यवस्था में कार्य कर चुके थे और सिंधवा से शिरपुर के लगभग चालीस मील लंबे मार्ग की सुरक्षा से जुड़े थे। उन्होंने अन्य भीलों को नियंत्रित करने में भी ब्रिटिश अधिकारियों की सहायता की थी।
1857 का एक प्रमुख भील विद्रोही पहले औपनिवेशिक व्यवस्था का सहयोगी रह चुका था।
यही तथ्य ‘भील बनाम अंग्रेज’ की सरल व्याख्या को तोड़ देता है।
खाज्या नायक विद्रोही क्यों बने?
गजेटियर विवरण के अनुसार 1851 में एक घटना के बाद खाज्या पर हत्या का मामला चला और उन्हें कैद किया गया। रिहाई के बाद उनकी स्थिति बदल चुकी थी।
1857 के राजनीतिक संकट ने उनके सामने नया अवसर प्रस्तुत किया।
यहाँ व्यक्तिगत अपमान, रोजगार का प्रश्न, औपनिवेशिक दंड और 1857 की व्यापक राजनीतिक परिस्थिति—सब एक साथ काम करते दिखाई देते हैं।
उन्होंने सिंधवा दर्रे पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया।
यह रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण था।
मध्य भारत और बंबई की दिशा में जाने वाले मार्ग पर दबाव।
भीमा नायक : 1857 के भील संघर्ष का दूसरा स्तंभ
खाज्या के साथ भीमा नायक भी प्रमुख नेता के रूप में उभरे।
महाराष्ट्र के गजेटियर में खाज्या, भीमा और मवासिया नायक के नाम साथ आते हैं। औपनिवेशिक अधिकारियों को विश्वास था कि उत्तर भारत और मध्य भारत की विद्रोही शक्तियों से इन नेताओं के संपर्क अथवा निर्देश का संबंध था।
भीमा नायक का प्रभाव सतपुड़ा और निमाड़ की दिशा में था।
उनके संघर्ष को केवल स्थानीय लूट के रूप में समझना कठिन है क्योंकि 1857 के राजनीतिक प्रतीकों का भी इस्तेमाल हुआ।
औपनिवेशिक दस्तावेज में भीमा नायक द्वारा स्वयं को दिल्ली के बादशाह का प्रतिनिधि बताने तक का उल्लेख मिलता है।
इसका अर्थ है कि स्थानीय भील संघर्ष स्वयं को 1857 की व्यापक सत्ता-चुनौती से जोड़ रहा था।
अक्टूबर 1857 : लगभग 1,500 भीलों की शक्ति
29 अक्टूबर 1857 की रात खाज्या, भीमा और अन्य भील नायकों के नेतृत्व में लगभग 1,500 भीलों द्वारा शिरपुर पर हमला किए जाने का विवरण सरकारी गजेटियर में मिलता है।
ब्रिटिश अधिकारी कैप्टन बर्च ने उनका पीछा किया, लेकिन तत्काल निर्णायक सफलता नहीं मिली।
इसके बाद आसपास के गाँवों और मार्गों पर गतिविधियाँ जारी रहीं।
17 नवंबर तक भील शक्ति लगभग 1,500 बताई गई और सिंधवा घाट से गुजर रहे भारी खजाने पर कब्जे का भी विवरण मिलता है।
इससे स्पष्ट है कि 1857 का भील प्रतिरोध छोटे स्तर की छापामार गतिविधि भर नहीं था।
वह प्रमुख व्यापारिक–सैन्य मार्गों और सरकारी संसाधनों को चुनौती देने की क्षमता रखता था।
भिलाला, मकरानी, अरब और विद्रोही गठबंधन
1857–58 के संघर्ष की एक और विशेषता उसकी सामाजिक संरचना थी।
खाज्या और भीमा के साथ केवल भील ही नहीं थे।
होलकर तथा अन्य सेनाओं से अलग हुए सैनिक, मकरानी लड़ाके और अरब भाड़े के सैनिक भी कुछ चरणों में उनसे जुड़े।
यानी यह संघर्ष एक व्यापक सीमांत विद्रोही गठबंधन में बदल रहा था।
इससे औपनिवेशिक प्रशासन की चिंता बढ़ी।
क्योंकि पहाड़ी भूगोल जानने वाले भील योद्धाओं को प्रशिक्षित अथवा अनुभवी सैनिक मिल जाएँ तो नियमित सेना के लिए चुनौती कई गुना बढ़ सकती थी।
भागोजी नायक, अंबापानी और औपनिवेशिक सैन्य न्याय
भागोजी नायक : नासिक–अहमदनगर की धारा
इसी समय भागोजी नायक नासिक–अहमदनगर–सतमाला क्षेत्र में सक्रिय थे।
खानदेश गजेटियर 1857 के दौरान सतमाला क्षेत्र में भागोजी और सतपुड़ा में खाज्या के नेतृत्व में भील अशांति का उल्लेख करता है। भागोजी का संघर्ष 1859 तक चला और चालीसगाँव की दिशा में उनके अभियान का भी उल्लेख मिलता है।
इसलिए 1857–59 के भील संघर्ष को केवल खाज्या–भीमा तक सीमित करना भी गलत होगा।
वास्तव में तीन भौगोलिक धाराएँ दिखाई देती हैं
और विभिन्न चरणों में इनके बीच संपर्क तथा सहयोग भी दिखाई देता है।
11 अप्रैल 1858 : अंबापानी का युद्ध
पूरे भील प्रतिरोध में अंबापानी का युद्ध विशेष स्थान रखता है।
11 अप्रैल 1858 को मेजर इवांस की सेना और खाज्या सिंह, भीमा, मवासिया, दौलत सिंह तथा कालू भावा से जुड़े विद्रोही समूहों के बीच अंबापानी की पहाड़ियों में बड़ा संघर्ष हुआ।
औपनिवेशिक सैन्य विवरण स्वीकार करता है कि विद्रोहियों ने पहाड़ी चोटी और चट्टानों का उपयोग कर दृढ़ प्रतिरोध किया।
सरकारी विवरण में विद्रोही हताहतों के अलग-अलग आँकड़े मिलते हैं; एक विस्तृत पत्र में कम-से-कम 150 के मारे जाने का अनुमान है।
लेकिन इसके बाद जो हुआ वह और भी उल्लेखनीय है।
‘ड्रमहेड’ सैन्य न्याय और 57 मृत्युदंड
अंबापानी के बाद पकड़े गए लोगों के साथ अत्यंत कठोर व्यवहार किया गया।
महाराष्ट्र सरकार के गजेटियर में उपलब्ध औपनिवेशिक पत्र के अनुसार 62 लोगों को बंदी बनाया गया और उनमें से 57 को तत्काल सैन्य न्यायालय के निर्णय से गोली मारने की सजा दी गई।
यह संख्या इस संघर्ष की गंभीरता को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
राज्य इसे विद्रोह मान रहा था और सैन्य न्याय लागू कर रहा था।
भील महिलाएं, तात्या टोपे और 1859–60 तक दमन
भील महिलाओं की भूमिका : भूला हुआ अध्याय
अंबापानी के बाद के विवरण में एक और अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य मिलता है।
लगभग 400 भील महिलाओं को गिरफ्तार किए जाने का उल्लेख है और गजेटियर स्पष्ट रूप से कहता है कि वे अपने पुरुषों की सहायता कर रही थीं।
यह तथ्य भारतीय आदिवासी प्रतिरोध के इतिहास में विशेष ध्यान योग्य है।
महिलाएँ केवल विद्रोहियों के परिवार के रूप में उपस्थित नहीं थीं।
वे प्रतिरोध की रसद, सामाजिक नेटवर्क और संभवतः युद्ध-सहयोग का सक्रिय हिस्सा थीं।
इसलिए 1857–58 का भील संघर्ष पुरुष नायकों की कहानी भर नहीं था।
तात्या टोपे और भील क्षेत्र
1858 के उत्तरार्ध में तात्या टोपे की गतिविधियों ने खानदेश प्रशासन की चिंता और बढ़ाई।
नवंबर 1858 में तात्या के नर्मदा पार कर खानदेश की दिशा में आने की सूचना मिलने पर ब्रिटिश सेना ने महत्वपूर्ण स्थानों पर सैनिक तैनात किए।
असीरगढ़, बुरहानपुर और आसपास के क्षेत्रों की सुरक्षा मजबूत की गई। स्वयं भील कोर भी ब्रिटिश पक्ष में तैनात थी।
दूसरी ओर अंग्रेजों के साथ लड़ रही भील कोर।
यानी 1857 में भील समाज स्वयं राजनीतिक रूप से विभाजित था।
1859–60 : विद्रोह का धीरे-धीरे दमन
भागोजी नायक की गतिविधियाँ 1859 तक जारी रहीं। शिरपुर, सुल्तानपुर, पाचोरा और यावल जैसे क्षेत्रों में टकराव जारी रहने का उल्लेख मिलता है।
खाज्या भी तत्काल नहीं पकड़े गए। पुराने गजेटियर के अनुसार वे लंबे समय तक पीछा करने वाली सेना से बचते रहे और अंततः विश्वासघात से मारे गए।
इस प्रकार 1857 की दिल्ली-केंद्रित मुख्य लड़ाई समाप्त हो जाने के बाद भी पश्चिमी भारत के पहाड़ों में प्रतिरोध चलता रहा।
यही कारण है कि भील इतिहास में 1857–60 को अलग क्षेत्रीय युद्ध-चरण के रूप में देखना अधिक उचित है।
निमाड़ और टंट्या भील का छापामार प्रतिरोध
निमाड़ : प्रतिरोध की दूसरी बड़ी धारा
मध्य भारत में नर्मदा और सतपुड़ा के आसपास का निमाड़ क्षेत्र भी भील इतिहास का महत्वपूर्ण केंद्र बना।
यहाँ औपनिवेशिक प्रशासन, रियासती सत्ता, मालगुजार, साहूकार और ग्रामीण समाज के बीच जटिल संबंध थे।
इसी भूगोल से उन्नीसवीं सदी के सबसे प्रसिद्ध भील लोकनायकों में से एक उभरा
टंट्या भील।
टंट्या भील : अपराधी या विद्रोही?
टंट्या भील के जीवन के बारे में लोकप्रिय स्मृति और औपनिवेशिक अभिलेखों में भारी अंतर है।
ब्रिटिश प्रशासन के लिए वे अपराधी और फरार व्यक्ति थे।
लोकस्मृति में वे गरीबों के रक्षक, अंग्रेजों और शोषकों को चुनौती देने वाले नायक बने।
सरकारी स्मरण में भी आज उन्हें औपनिवेशिक शासन को चुनौती देने वाले जननायक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
उनकी सक्रियता मुख्यतः 1870 और 1880 के दशकों में निमाड़ और आसपास के क्षेत्रों में दिखाई देती है।
पुलिस और प्रशासन के लिए उन्हें पकड़ना लंबे समय तक कठिन रहा।
‘टंट्या मामा’ की सामाजिक स्मृति
टंट्या की लोकप्रिय छवि भारतीय ‘रॉबिन हुड’ जैसी बनाई गई—धनवानों अथवा शोषकों से धन लेकर गरीबों की सहायता करने वाला व्यक्ति।
लेकिन इतिहासकार के लिए यहाँ सावधानी आवश्यक है।
लोककथा और दस्तावेजी इतिहास हमेशा समान नहीं होते।
टंट्या के बारे में बाद में विकसित कई कथाएँ स्थानीय स्मृति, राष्ट्रवादी आख्यान और ऐतिहासिक तथ्य का मिश्रण हैं।
इसलिए उनकी ऐतिहासिक महत्ता केवल इस प्रश्न से तय नहीं होती कि प्रत्येक लोकप्रिय कथा सत्य है या नहीं।
एक औपनिवेशिक ‘अपराधी’ आदिवासी समाज की स्मृति में ‘मामा’ और जननायक क्यों बना?
जिस व्यक्ति को राज्य अपने कानून का शत्रु समझता था, शोषित समाज उसे अपने न्याय का प्रतिनिधि समझ सकता था।
टंट्या की गिरफ्तारी और मृत्यु
टंट्या लंबे समय तक औपनिवेशिक पुलिस को चकमा देते रहे। अंततः 1889 में वे पकड़े गए।
उन पर मुकदमा चला और उसी वर्ष उन्हें फाँसी दी गई। उपलब्ध विवरण उनकी मृत्यु को 1889 में रखते हैं।
मध्य प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र में उनकी स्मृति आज भी अत्यंत प्रभावशाली है।
लेकिन टंट्या का संघर्ष कोई स्थायी संगठनात्मक आंदोलन नहीं बना।
यही वह बिंदु है जहाँ बीसवीं सदी के आरंभ का गोविंद गुरु–भगत आंदोलन पहले के सशस्त्र प्रतिरोधों से अलग दिखाई देता है।
टंट्या भील : जन्म-वर्ष और जन्मस्थान पर सावधानी
टंट्या भील के बारे में लोकप्रिय विवरणों में जन्म-वर्ष और जन्मस्थान को लेकर एकरूपता नहीं है।
भारत सरकार के एक आधिकारिक स्मरण में उनका जन्म 1842 में बड़ादा बताया गया है, जबकि अन्य आधुनिक विवरण 1840 तथा दूसरे स्थानीय रूप प्रस्तुत करते हैं।
इसलिए प्रकाशन में किसी एक विवादित तिथि को निर्विवाद तथ्य घोषित करने की बजाय लिखना बेहतर है कि
टंट्या का जन्म लगभग 1840 के आसपास निमाड़ क्षेत्र के एक भील परिवार में हुआ माना जाता है।
इस तरह लोकस्मृति और दस्तावेजी अनिश्चितता दोनों सुरक्षित रहती हैं।
टंट्या का संघर्ष कैसे शुरू हुआ?
टंट्या के बारे में सरकारी और लोकप्रिय आख्यान बताते हैं कि भूमि, स्थानीय शोषण और औपनिवेशिक कानून से टकराव ने उन्हें अपराध घोषित व्यक्ति में बदल दिया।
1870 के दशक में उनकी गिरफ्तारियों के उल्लेख मिलते हैं।
एक विवरण उन्हें लगभग 1874 में पहली गिरफ्तारी से जोड़ता है और 1878 में दूसरी गिरफ्तारी तथा खंडवा जेल से भाग निकलने का उल्लेख करता है।
इसके बाद वे लंबे समय तक निमाड़ और आसपास के क्षेत्र में औपनिवेशिक पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बने रहे।
टंट्या की छापामार रणनीति
टंट्या की शक्ति किसी स्थायी सेना में नहीं थी।
सतपुड़ा–निमाड़ का भूगोल उनके लिए वही काम करता था जो पहले खानदेश के भील समूहों के लिए पहाड़ करते थे।
राज्य के लिए टंट्या ‘फरार अपराधी’ थे।
स्थानीय समाज के एक हिस्से के लिए वे
‘गरीबों का रॉबिन हुड’ : इतिहास और लोककथा
टंट्या के बारे में सबसे प्रसिद्ध कथा है कि वे अमीरों, सरकारी खजानों और अंग्रेज समर्थकों से धन लेकर गरीबों में बाँटते थे।
भारत सरकार के स्वतंत्रता सेनानी स्मरण में भी उनकी यही छवि प्रस्तुत की गई है।
लेकिन इतिहासकार को यहाँ अंतर रखना चाहिए।
यह प्रमाणित करना कठिन है कि हर छापे के बाद लूटा गया धन व्यवस्थित रूप से गरीबों में बाँटा गया।
पर इससे लोकस्मृति का महत्व समाप्त नहीं होता।
लोगों ने टंट्या को रॉबिन हुड जैसा क्यों याद किया?
क्योंकि औपनिवेशिक न्याय और स्थानीय सामाजिक न्याय की अवधारणाएँ अलग थीं।
बारह वर्ष की चुनौती
भारत सरकार का आधिकारिक विवरण टंट्या के सशस्त्र संघर्ष को लगभग बारह वर्ष लंबा बताता है।
इस लंबी अवधि का अर्थ है कि वे केवल कुछ सफल छापों के कारण प्रसिद्ध नहीं हुए।
उन्होंने औपनिवेशिक पुलिस की उस क्षमता को चुनौती दी जिसके आधार पर ब्रिटिश राज स्वयं को सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान बताता था।
जब कोई व्यक्ति वर्षों तक गिरफ्तारी से बचता है तो वह स्वयं एक राजनीतिक प्रतीक बन जाता है।
1889 : टंट्या की गिरफ्तारी
उनकी गिरफ्तारी इतनी उल्लेखनीय थी कि अमेरिकी प्रेस तक में इसकी खबर पहुँची। भारत सरकार के विवरण के अनुसार 10 नवंबर 1889 के New York Times में उन्हें भारत का ‘Robin Hood’ कहा गया था।
टंट्या की फाँसी : तारीख और स्मृति
आधुनिक सरकारी स्मरण और अन्य स्रोत 4 दिसंबर 1889 को उनकी फाँसी से जोड़ते हैं।
लेकिन उनके शव और पातालपानी से जुड़ी कथा का बड़ा हिस्सा लोकस्मृति में विकसित हुआ है।
इसे इतिहास में उसी रूप में रखना चाहिए
लोकस्मृति, न कि हर विवरण को निर्विवाद अभिलेखीय तथ्य मानकर।
टंट्या की मृत्यु के बाद उनका राजनीतिक संगठन समाप्त हो गया।
लेकिन ‘टंट्या मामा’ जन्म ले चुका था।
और लोकनायक अक्सर मृत नेता से अधिक शक्तिशाली होता है।
सशस्त्र प्रतिरोध से सामुदायिक पुनर्गठन तक
उन्नीसवीं सदी के अंत तक क्या बदल चुका था?
1818 का भील प्रतिरोध और 1900 के बाद का भील आंदोलन समान ऐतिहासिक परिस्थिति में नहीं थे।
लगभग एक शताब्दी में बहुत कुछ बदल चुका था।
औपनिवेशिक राज्य अधिक शक्तिशाली हो चुका था।
रियासतों की प्रशासनिक संरचना बदल चुकी थी।
बाजार और मुद्रा अर्थव्यवस्था गाँवों में अधिक गहराई तक पहुँच चुकी थी।
जंगलों पर राज्य नियंत्रण मजबूत हुआ था।
और भील समुदायों के भीतर सामाजिक सुधार की नई आकांक्षा जन्म ले रही थी।
अब प्रतिरोध केवल हथियार उठाने से नहीं होना था।
समाज को भीतर से संगठित करना भी राजनीतिक हथियार बन सकता था।
इसी संक्रमण से गोविंद गुरु का उदय हुआ।
टंट्या और गोविंद गुरु के बीच मूल अंतर
टंट्या और गोविंद गुरु दोनों भील इतिहास के महान प्रतीक हैं, लेकिन उनकी रणनीति बिल्कुल अलग थी।
टंट्या राज्य की पकड़ से बाहर रहने का प्रयास करते थे।
गोविंद गुरु समुदाय के भीतर एक वैकल्पिक अनुशासन बना रहे थे।
यही भील आंदोलन के इतिहास का बड़ा संक्रमण है।
गोविंद गुरु, भगत पंथ और सम्प सभा
गोविंद गुरु : एक नए प्रकार का नेतृत्व
गोविंद गुरु—जिन्हें गोविंदगिरी भी कहा गया—दक्षिणी राजस्थान और गुजरात की भील पट्टी में एक प्रभावशाली सामाजिक–धार्मिक सुधारक और नेता बने।
उनकी विशेषता यह थी कि उन्होंने प्रतिरोध को केवल किसी तत्काल कर या अधिकारी के विरुद्ध विद्रोह के रूप में नहीं रखा।
उन्होंने समुदाय के जीवन को बदलने का कार्यक्रम सामने रखा।
उनका आंदोलन सामाजिक सुधार, धार्मिक पुनर्गठन, सामुदायिक अनुशासन और आर्थिक–राजनीतिक असंतोष को एक साथ जोड़ने लगा।
‘भगत’ बनने का अर्थ
गोविंद गुरु का आंदोलन केवल धार्मिक उपदेश नहीं था।
भगत जीवन में संयम, स्वच्छता और नैतिक अनुशासन पर बल था।
विशेष रूप से शराब से दूरी आंदोलन की प्रमुख विशेषता बनी।
इसके सामाजिक अर्थ अत्यंत महत्वपूर्ण थे।
शराब केवल व्यक्तिगत व्यसन का प्रश्न नहीं थी। कई रियासतों में मदिरा से राजस्व मिलता था।
इसलिए जब हजारों लोग सामूहिक रूप से शराब छोड़ते हैं तो एक धार्मिक सुधार
राजस्व और सत्ता का प्रश्न भी बन सकता है।
सामाजिक सुधार से सामाजिक स्वाभिमान तक
भगत आंदोलन ने भीलों को यह संदेश दिया कि वे अपने समाज को स्वयं सुधार सकते हैं।
इससे समुदाय के भीतर आत्मसम्मान और सामूहिक पहचान मजबूत हुई।
मांसाहार, मद्यपान, सामाजिक आचरण, स्वच्छता और धार्मिक अनुष्ठानों के संबंध में नए नियम अपनाए गए।
धूनी और सामूहिक धार्मिक प्रतीक आंदोलन की पहचान बनने लगे।
लेकिन इन सुधारों का एक राजनीतिक प्रभाव था
व्यक्ति ‘प्रजा’ से पहले संगठित समुदाय का सदस्य बन रहा था।
और संगठित समुदाय सत्ता से प्रश्न पूछ सकता था।
सम्प सभा : संगठन की ओर कदम
गोविंद गुरु के आंदोलन से सम्प सभा जुड़ी।
‘सम्प’ में एकता, मेल और सामुदायिक संगठन की भावना निहित थी।
सभा ने बिखरे हुए भील समुदायों को धार्मिक-सामाजिक नेटवर्क के माध्यम से जोड़ने में सहायता की।
सभा और धार्मिक जमावड़े केवल पूजा के अवसर नहीं रहे।
यही वह परिवर्तन था जो भगत आंदोलन को केवल धार्मिक संप्रदाय बनने से रोकता है।
गोविंद गुरु : जन्म और सामाजिक पृष्ठभूमि
गोविंद गुरु, जिन्हें गोविंदगिरी भी कहा गया, का जन्म उन्नीसवीं सदी के मध्य में डूंगरपुर क्षेत्र के एक बंजारा परिवार में माना जाता है। एक सरकारी शैक्षिक स्रोत उनका जन्म 1858 के आसपास बताता है।
मानगढ़ से संबंधित हाल में सामने लाए गए मुकदमे के दस्तावेज में स्वयं गोविंदगिरि का बयान दर्ज है कि उनके पिता का नाम बेचा था, वे जाति से बंजारा, पेशे से कृषक और डूंगरपुर के बेरसा/बर्सा के निवासी थे।
यह प्राथमिक स्रोत विशेष महत्व रखता है क्योंकि यहाँ हम गोविंद गुरु के बारे में बाद की जीवनी नहीं बल्कि उनकी अपनी न्यायालयीन पहचान देखते हैं।
गोविंद गुरु का सामाजिक अनुभव
गोविंद गुरु का प्रभाव ऐसे क्षेत्र में विकसित हुआ जहाँ भील समाज अनेक प्रकार के दबावों से घिरा था
उनकी प्रतिभा यह थी कि उन्होंने इन समस्याओं को केवल ‘सरकार की बुराई’ कहकर नहीं छोड़ा।
हम स्वयं अपने जीवन में क्या बदल सकते हैं?
यहीं से भगत सुधार की शुरुआत होती है।
भगत कार्यक्रम : सामाजिक क्रांति की छोटी-छोटी इकाइयाँ
गोविंद गुरु के उपदेशों में संयम और नैतिक अनुशासन प्रमुख थे।
एक सरकारी अध्ययन उनके कार्यक्रम में मद्यत्याग, अपराध से दूरी, कृषि आधारित जीविका, भूमि-अधिकार और सामाजिक सुधार जैसे तत्वों का उल्लेख करता है।
ये देखने में व्यक्तिगत सुधार लगते हैं।
लेकिन जब हजारों लोग इन्हें एक साथ अपनाएँ तो यह सामाजिक शक्ति बन जाता है।
धूनी और निशान : संगठन के दृश्य प्रतीक
भगत अनुयायियों के बीच धूनी विशेष महत्व रखती थी।
पवित्र अग्नि धार्मिक विश्वास का केंद्र बनी।
इसी प्रकार निशान—ध्वज—सामुदायिक पहचान का दृश्य प्रतीक बना।
मानगढ़ के हाल में उपलब्ध कराए गए अभिलेखीय पुनर्पाठ में गोविंद गुरु की गवाही का केंद्रीय भाव यही मिलता है कि लोग युद्ध के लिए नहीं बल्कि पवित्र अग्नि के लिए एकत्र हुए थे।
यानी जिस सभा को प्रशासन सैन्य खतरे की तरह पढ़ रहा था, गोविंद गुरु उसे धार्मिक समुदाय की सभा के रूप में प्रस्तुत कर रहे थे।
यहीं मानगढ़ की व्याख्या का केंद्रीय विवाद है।
सम्प सभा कब बनी? तारीख पर स्रोतों का मतभेद
सम्प सभा की स्थापना-वर्ष पर स्रोत एकमत नहीं हैं।
भारत सरकार के एक जिला-इतिहास विवरण में गोविंदगिरि द्वारा 1883 में सम्प सभा स्थापित किए जाने का उल्लेख है।
दूसरे शैक्षिक स्रोत 1885 अथवा बाद के संगठनात्मक विकास की ओर संकेत करते हैं।
इसलिए वेबसाइट पर सबसे सुरक्षित भाषा होगी
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में गोविंद गुरु ने ‘सम्प सभा’ के माध्यम से भीलों को संगठित करना शुरू किया; इसकी स्थापना-वर्ष को लेकर विभिन्न स्रोत 1880 के दशक की अलग-अलग तिथियाँ देते हैं।
हम किसी विवादित तिथि को कृत्रिम रूप से निश्चित नहीं करेंगे।
‘सम्प’ का अर्थ : बिखरे समाज से समुदाय
सम्प सभा का मूल महत्व वर्ष में नहीं, उसके कार्य में था।
उसने विभिन्न क्षेत्रों के भगत अनुयायियों को एक साझा धार्मिक–सामाजिक नेटवर्क में जोड़ा।
और राजस्थान–गुजरात–मध्य भारत की सीमाओं तक।
आधुनिक राजनीतिक सीमाएँ जिस समाज को अलग-अलग प्रशासनिक इकाइयों में बाँटती थीं, सम्प आंदोलन उसे सांस्कृतिक रूप से जोड़ रहा था।
मद्यत्याग, बेगार और सामाजिक सुधार की राजनीति
बेगार : संघर्ष का केंद्रीय प्रश्न
रियासती क्षेत्रों में भीलों से ली जाने वाली बेगार असंतोष का बड़ा कारण थी।
राजकीय अथवा स्थानीय अधिकारियों के लिए बिना उचित मजदूरी श्रम देना आदिवासी समुदायों के लिए आर्थिक बोझ और अपमान दोनों था।
जब सामाजिक सुधार आंदोलन कहता है कि व्यक्ति को सम्मानपूर्वक जीवन जीना चाहिए, तब बेगार स्वाभाविक रूप से राजनीतिक मुद्दा बन जाती है।
इसी प्रकार लगान, स्थानीय अधिकारियों का व्यवहार और वन-संसाधनों तक पहुँच के प्रश्न आंदोलन को व्यापक बनाते गए।
यहाँ भगत आंदोलन की असली ऐतिहासिक शक्ति दिखाई देती है
धर्म ने आर्थिक शिकायतों को संगठन की भाषा दी।
रियासतें क्यों चिंतित हुईं?
बांसवाड़ा, डूंगरपुर, संतरामपुर और आसपास के क्षेत्रों में गोविंद गुरु का बढ़ता प्रभाव स्थानीय शासकों और अधिकारियों के लिए चिंता का कारण बनने लगा।
क्योंकि हजारों आदिवासियों का किसी वैकल्पिक नेता के प्रति अनुशासित निष्ठावान होना स्वयं सत्ता के लिए चुनौती था।
यदि लोग शराब छोड़ें—राजस्व प्रभावित हो सकता था।
यदि बेगार से इनकार करें—रियासती अधिकार प्रभावित होता था।
यदि अन्यायपूर्ण वसूली का विरोध करें—स्थानीय प्रभुत्व प्रभावित होता था।
और यदि वे हजारों की संख्या में सभा करने लगें
तो सामाजिक सुधार और राजनीतिक लामबंदी के बीच की सीमा धुंधली हो जाती है।
क्या गोविंद गुरु ‘भील राज’ चाहते थे?
यह प्रश्न इतिहासलेखन में विवादित है।
औपनिवेशिक और रियासती अधिकारियों ने आंदोलन को कानून-व्यवस्था और राजनीतिक खतरे की दृष्टि से देखा।
कुछ व्याख्याओं में गोविंद गुरु के आंदोलन में स्वतंत्र भील सत्ता अथवा ‘भील राज’ की आकांक्षा देखी गई है।
दूसरी ओर इसे मूलतः सामाजिक–धार्मिक सुधार और शोषण-विरोधी आंदोलन मानने वाले इतिहासकार भी हैं।
दोनों के बीच अधिक संतुलित निष्कर्ष यह है कि आंदोलन की शुरुआत और उसका अंतिम राजनीतिक प्रभाव एक ही चीज नहीं थे।
कोई आंदोलन सामाजिक सुधार से शुरू होकर राजनीतिक चुनौती बन सकता है।
भगत आंदोलन के साथ काफी हद तक यही हुआ।
मद्यत्याग सत्ता के लिए खतरा क्यों बना?
भगत आंदोलन में शराब छोड़ना अत्यंत महत्वपूर्ण था।
इसे केवल नैतिक सुधार समझने से आधा इतिहास छूट जाता है।
मदिरा से रियासतों और ठेकेदारों का आर्थिक हित जुड़ा था।
इसलिए व्यक्ति की नैतिक मुक्ति राज्य की वित्तीय समस्या बन गई।
बेगार : आंदोलन का राजनीतिक विस्फोटक
भगत आंदोलन के राजनीतिकरण में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक था
बिना उचित पारिश्रमिक राज्य, जागीरदार अथवा अधिकारियों के लिए श्रम देना आदिवासी कृषक के लिए दोहरा बोझ था।
भारत सरकार की शहीद-संबंधी शोध सामग्री स्पष्ट रूप से बताती है कि गोविंदगिरि का सामाजिक–धार्मिक प्रयास आगे चलकर बेगार और रियासती अधिकारियों द्वारा भीलों के शोषण के विरुद्ध राजनीतिक–आर्थिक आंदोलन में बदल गया।
यहीं से भगत आंदोलन का चरित्र निर्णायक रूप से बदलता है।
सामाजिक सुधार से सत्ता-संबंध बदलने तक
जब वही समुदाय बेगार देने से प्रश्न करता है
और जब हजारों लोग अपने गुरु के नेतृत्व में संगठित होने लगते हैं
तो रियासत के सामने वैकल्पिक नैतिक प्राधिकार खड़ा हो जाता है।
यही गोविंद गुरु की वास्तविक राजनीतिक शक्ति थी।
फिर भी हजारों लोग उनका आदेश सुनते थे।
1907 और आंदोलन का स्पष्ट राजनीतिक–आर्थिक रूप
भारत सरकार द्वारा प्रकाशित शहीद कोश भगत भील आंदोलन के अधिक स्पष्ट चरण को 1907 से जोड़ता है और बताता है कि गोविंदगिरि द्वारा शुरू किया गया एकेश्वरवादी सामाजिक–धार्मिक प्रयास जल्द ही बेगार तथा शोषण-विरोधी राजनीतिक–आर्थिक आंदोलन में बदल गया।
इसलिए 1880 के दशक की सम्प सभा और 1907 के आसपास के अधिक सक्रिय भगत आंदोलन को एक ही तारीख में समेटना उचित नहीं है।
1880 का दशक : संगठन और सुधार की नींव
1900 का दशक : भगत नेटवर्क का विस्तार
1907–13 : आर्थिक–राजनीतिक संघर्ष का तीव्र चरण
रियासतों का भय
डूंगरपुर, बांसवाड़ा और सुंथ जैसी रियासतों की चिंता केवल यह नहीं थी कि गोविंद गुरु धर्म प्रचार कर रहे हैं।
यदि भील प्रजा राजा के अधिकारी की अपेक्षा गुरु की बात अधिक मानती है तो सत्ता किसकी है?
यदि वे बेगार पर प्रश्न करते हैं तो शासक का अधिकार कहाँ तक है?
यदि शराब नहीं खरीदते तो राजस्व कौन देगा?
यदि हजारों लोग स्वयं सभा कर सकते हैं तो उन्हें नियंत्रित कौन करेगा?
इस प्रकार गोविंद गुरु का आंदोलन औपचारिक राज्य बनाए बिना भी राजकीय प्रभुत्व की सीमा निर्धारित करने लगा था।
क्या ‘भील राज’ स्थापित होने वाला था?
औपनिवेशिक और रियासती दस्तावेजों में आंदोलन को संभावित विद्रोह के रूप में देखने की प्रवृत्ति बढ़ती गई।
लेकिन ‘भील राज’ के प्रश्न पर सावधानी आवश्यक है।
आंदोलन में स्वायत्तता, अन्यायपूर्ण करों का विरोध और रियासती दमन से मुक्ति की आकांक्षा स्पष्ट थी।
पर हर भगत अनुयायी एक सुव्यवस्थित स्वतंत्र भील राज्य की आधुनिक राजनीतिक योजना लेकर मानगढ़ पहुँचा था—ऐसा सिद्ध करना कठिन है।
आंदोलन में वैकल्पिक सामुदायिक सत्ता की संभावना थी, जिसे औपनिवेशिक–रियासती शासन ने अपने अधिकार के लिए खतरे के रूप में पढ़ा।
मानगढ़ का भूगोल और 1913 का बढ़ता संकट
मानगढ़ : भूगोल से प्रतीक तक
राजस्थान–गुजरात सीमा क्षेत्र की मानगढ़ पहाड़ी गोविंद गुरु और उनके अनुयायियों के लिए महत्वपूर्ण केंद्र बनी।
वह धीरे-धीरे सामुदायिक प्रतिरोध का प्रतीक बन गई।
1913 में बड़ी संख्या में भगत अनुयायी वहाँ एकत्र होने लगे।
रियासती और ब्रिटिश प्रशासन के लिए इतनी बड़ी संगठित भीड़ गंभीर चुनौती थी।
स्थिति बातचीत, चेतावनी और दबाव से आगे बढ़कर सैन्य टकराव की दिशा में चली गई।
1913 : संकट की ओर बढ़ते कदम
1913 के दौरान गोविंद गुरु और उनके अनुयायियों तथा स्थानीय रियासती व्यवस्थाओं के बीच तनाव बढ़ता गया।
मानगढ़ पर अनुयायियों का जमाव बढ़ने लगा।
प्रशासन इसे केवल धार्मिक सभा नहीं मान रहा था।
उसके सामने आशंका थी कि यह संगठित विद्रोह का केंद्र बन सकता है।
औपनिवेशिक शासन की सीमांत नीति में ऐसी स्थिति परिचित थी
फिर नेताओं से आत्मसमर्पण की माँग करो,
और असफल होने पर सैन्य बल का प्रयोग करो।
1913 : निर्णायक वर्ष
गोविंद गुरु को डूंगरपुर में बंदी बनाए जाने और फिर रिहा करके राज्य से बाहर किए जाने का विवरण मिलता है।
इसके बाद वे विभिन्न क्षेत्रों में घूमते रहे और स्थानीय सत्ता से उनका तनाव बढ़ा।
अक्टूबर 1913 तक मानगढ़ पहाड़ी भगतों के प्रमुख जमाव का केंद्र बन गई। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरण इस चरण में गोविंद गुरु और उनके अनुयायियों पर बढ़ते प्रशासनिक दबाव की ओर संकेत करते हैं।
अब प्रश्न धार्मिक सभा से आगे जा चुका था।
मानगढ़ क्यों चुना गया?
मानगढ़ राजस्थान और गुजरात की रियासती सीमाओं के निकट स्थित पहाड़ी क्षेत्र था।
पहाड़ी पर एकत्र समुदाय को प्राकृतिक सुरक्षा मिल सकती थी।
विभिन्न रियासतों से अनुयायियों का पहुँचना संभव था।
और वह भगत धार्मिक नेटवर्क का प्रतीकात्मक केंद्र बन चुका था।
तीर्थ भी था, सभा-स्थल भी और संकट की स्थिति में सुरक्षित सामुदायिक केंद्र भी।
यही बहुआयामी चरित्र आगे गलतफहमी और संघर्ष दोनों का कारण बना।
अक्टूबर–नवंबर 1913 : तनाव का विस्फोट
31 अक्टूबर को सुंथ राज्य के पुलिसकर्मियों से जुड़ी घटना और 1 नवंबर को परबतगढ़ किले की दिशा में भगत अनुयायियों की कार्रवाई का उल्लेख बाद के ऐतिहासिक विवरणों में मिलता है।
इन घटनाओं ने रियासतों की आशंका बढ़ा दी कि मानगढ़ केवल धार्मिक सभा नहीं रह गया है।
स्थानीय शासकों ने ब्रिटिश सहायता माँगी।
अब ब्रिटिश भारतीय सेना और रियासती सैन्य बलों की संयुक्त कार्रवाई की परिस्थिति बन गई।
सैन्य घेराबंदी : किन शक्तियों ने मानगढ़ को घेरा?
मानगढ़ के विरुद्ध कार्रवाई केवल किसी एक ब्रिटिश पुलिस दल की नहीं थी।
उपलब्ध विवरणों में ब्रिटिश भारतीय सेना के साथ मेवाड़ भील कोर तथा बांसवाड़ा, डूंगरपुर, सुंथ और बारिया जैसे रियासती बलों की भागीदारी का उल्लेख मिलता है।
यह तथ्य फिर उसी ऐतिहासिक विडंबना को सामने लाता है जो खानदेश में दिखी थी
औपनिवेशिक सहयोजन की लगभग नब्बे वर्ष पुरानी नीति मानगढ़ तक पहुँच चुकी थी।
मानगढ़ से पहले समझौता क्यों नहीं हुआ?
प्रशासन भगतों को पहाड़ी से हटाना चाहता था।
भगत समुदाय अपनी धार्मिक–सामुदायिक माँगों और सुरक्षा को लेकर आशंकित था।
अविश्वास इतना गहरा हो चुका था कि दोनों पक्ष एक-दूसरे की गतिविधि को अलग अर्थ दे रहे थे।
जब राज्य और समुदाय एक ही दृश्य को बिल्कुल अलग राजनीतिक अर्थ देते हैं तो हिंसा की संभावना तेजी से बढ़ती है।
17 नवंबर 1913 : सैन्य कार्रवाई, मृत्यु और स्मृति
17 नवंबर 1913 : मानगढ़ पर गोलियाँ
17 नवंबर 1913 को मानगढ़ पहाड़ी पर एकत्र भील–भगत समुदाय पर ब्रिटिश और संबद्ध रियासती बलों ने सैन्य कार्रवाई की।
मानगढ़ आदिवासी इतिहास के सबसे बड़े प्रतीकों में बदल गया।
लेकिन यहीं इतिहास का सबसे विवादास्पद प्रश्न आता है
कितने लोग मारे गए?
मानगढ़ में मृतकों की संख्या : तथ्य और स्मृति के बीच
मानगढ़ के बारे में आज व्यापक रूप से लगभग 1,500 आदिवासियों के मारे जाने का उल्लेख किया जाता है। भारत सरकार की एक आधिकारिक विज्ञप्ति भी लगभग 1,500 लोगों के मारे जाने की बात करती है।
आदिवासी मौखिक परंपरा में भी बड़ी संख्या में जनहानि की स्मृति सुरक्षित है।
लेकिन सभी ऐतिहासिक स्रोत एक संख्या नहीं देते। उपलब्ध इतिहासलेखन में मृतकों की संख्या को लेकर अत्यधिक अंतर पाया जाता है—कुछ औपनिवेशिक विवरण बहुत कम संख्या बताते हैं, जबकि मौखिक परंपरा लगभग 1,500 तक पहुँचती है।
मानगढ़ में बड़ी संख्या में भील–भगत मारे गए; लगभग 1,500 की संख्या आज व्यापक सार्वजनिक और आदिवासी स्मृति में स्थापित है, लेकिन सटीक संख्या ऐतिहासिक रूप से विवादित है।
क्योंकि राज्य की फाइल और पीड़ित समुदाय की स्मृति अक्सर एक ही हिंसा को अलग-अलग तरीके से दर्ज करती हैं।
क्या मानगढ़ ‘आदिवासी जलियांवाला बाग’ था?
आज मानगढ़ को प्रायः ‘आदिवासियों का जलियांवाला बाग’ कहा जाता है।
तुलना भावनात्मक और स्मारकीय दृष्टि से प्रभावी है।
दोनों घटनाओं में निहत्थे अथवा बड़े जनसमूह पर औपनिवेशिक सैन्य शक्ति के प्रयोग का तुलनात्मक तत्व है, लेकिन दोनों की राजनीतिक परिस्थितियाँ अलग थीं।
मानगढ़ मुख्यतः आदिवासी–रियासती सीमांत संघर्ष से उत्पन्न हुआ था; जलियांवाला बाग पंजाब में औपनिवेशिक दमन और राष्ट्रवादी राजनीतिक आंदोलन की अलग परिस्थिति का परिणाम था।
इसलिए तुलना उपयोगी है, पर दोनों को समान घटना मानना इतिहास को सरल बना देगा।
17 नवंबर 1913 : सैन्य कार्रवाई
17 नवंबर को संयुक्त बलों ने मानगढ़ पर कार्रवाई की।
गोलीबारी में बड़ी संख्या में लोग मारे गए।
भारत सरकार की आधिकारिक स्मृति में लगभग 1,500 आदिवासियों के शहीद होने का उल्लेख किया गया है।
लेकिन यहाँ एक अत्यंत आवश्यक इतिहासलेखन संबंधी सावधानी है।
मृतकों की संख्या पर सभी स्रोत सहमत नहीं हैं।
लगभग 1,500 की संख्या आज आधिकारिक भारतीय स्मरण और आदिवासी सार्वजनिक स्मृति में व्यापक रूप से स्वीकार की जाती है, लेकिन औपनिवेशिक अभिलेखों में संख्या कम अथवा अस्पष्ट दिखाई देती है।
क्या औपनिवेशिक अभिलेखों में मृतक संख्या दबाई गई?
हाल में आईसीएसएसआर समर्थित मानगढ़ अभिलेख परियोजना ने इस प्रश्न को फिर गंभीरता से उठाया है।
इस परियोजना ने राष्ट्रीय अभिलेखागार, महाराष्ट्र राज्य अभिलेखागार, बांसवाड़ा के दस्तावेजों और ब्रिटेन के संग्रहों में फैले पत्राचार को एकत्र किया है। परियोजना का निष्कर्ष है कि औपनिवेशिक रिकॉर्ड में जनहानि के वर्णन को क्रमशः नरम अथवा सीमित किया गया।
यह अभी भी ऐसा विषय है जिस पर आगे अकादमिक परीक्षण आवश्यक है।
लेकिन अब इतना स्पष्ट है कि मानगढ़ की जनहानि समझने के लिए केवल अंतिम सरकारी आँकड़ा पर्याप्त नहीं।
गोविंद गुरु की आवाज, पुंजा धीरजी और मुकदमा
गोविंद गुरु की गिरफ्तारी और मुकदमा
मानगढ़ कार्रवाई के बाद गोविंद गुरु और उनके प्रमुख सहयोगियों को गिरफ्तार किया गया।
गोविंद गुरु को कठोर दंड दिया गया; मृत्यु-दंड सुनाए जाने और बाद में उसे आजीवन कारावास में परिवर्तित किए जाने का उल्लेख मिलता है। अंततः दंड में और कमी आई और उन्हें रिहाई मिली।
लेकिन उनके पुराने प्रभाव-क्षेत्र में लौटने पर प्रतिबंध जैसी शर्तों ने आंदोलन के पुराने संगठनात्मक स्वरूप को पुनर्जीवित होने से रोका।
इस अर्थ में मानगढ़ केवल नरसंहार नहीं था।
वह भगत आंदोलन के राजनीतिक केंद्रीकरण को तोड़ने की कार्रवाई भी था।
गोविंद गुरु की अपनी आवाज क्या कहती है?
यहाँ नया अभिलेखीय काम अत्यंत मूल्यवान है।
मानगढ़ अभिलेखागार में उपलब्ध गोविंद गुरु की न्यायालयीन गवाही और पत्रों के अनुसार उनका पक्ष था कि वे धर्म के कार्य के लिए एकत्र हुए थे और उन्होंने लोगों को हथियार लाने का आदेश नहीं दिया था। उन्होंने यह भी कहा कि भीलों का सामान्यतः अपने हथियार साथ रखना असामान्य नहीं था।
इसी अभिलेखीय सामग्री में बेगार और कर के विरोध की भाषा भी दिखाई देती है।
इससे मानगढ़ की तस्वीर अधिक जटिल बनती है।
धर्म, अधिकार और सुरक्षा संकट एक ही स्थान पर मिल चुके थे।
पुंजा धीरजी/पुंजा पारगी : भूला हुआ सह-नेतृत्व
मानगढ़ की कहानी केवल गोविंद गुरु की कहानी नहीं है।
उनके प्रमुख सहयोगियों में पुंजा धीरजी, जिन्हें विभिन्न स्रोतों में पुंजा पारगी आदि रूपों में भी लिखा गया है, महत्वपूर्ण थे।
मानगढ़ के बाद गोविंद गुरु के साथ उन्हें भी गिरफ्तार किया गया।
विशेष न्यायाधिकरण में उन पर मुकदमा चला।
उपलब्ध विवरण के अनुसार पुंजा को आजीवन कारावास दिया गया।
इसलिए आंदोलन को केवल एक महान गुरु और अनाम अनुयायियों के रूप में नहीं देखना चाहिए।
उसका अपना दूसरे स्तर का नेतृत्व तंत्र था।
गोविंद गुरु का मुकदमा
मानगढ़ के बाद गिरफ्तार नेताओं पर विशेष न्यायिक प्रक्रिया चली।
उपलब्ध विवरणों में फरवरी 1914 में विशेष न्यायाधिकरण द्वारा गोविंद गुरु को प्रारंभ में मृत्युदंड दिए जाने का उल्लेख है।
अपील पर उनकी सजा आजीवन कारावास में बदली गई और बाद में इसमें और कमी आई।
राज्य ने पहले उन्हें अत्यंत गंभीर राजनीतिक अपराधी माना।
इससे संभवतः प्रशासन की यह चिंता भी दिखाई देती है कि गोविंद गुरु को मृत्युदंड देने से वे और बड़े शहीद-प्रतीक बन सकते थे।
गोविंद गुरु के मुकदमे की गवाही क्यों अमूल्य है?
अधिकांश आदिवासी विद्रोहों के इतिहास में हमारे पास नेता की अपनी आवाज बहुत कम है।
मानगढ़ के मामले में स्थिति कुछ बेहतर है।
हाल के अभिलेखीय संग्रह में न्यायालय द्वारा पूछे गए प्रश्न और गोविंद गुरु के उत्तर उपलब्ध कराए गए हैं।
उनका कथन था कि उन्होंने अनुयायियों को हथियार लाने का आदेश नहीं दिया।
यह भी कि वे धार्मिक आयोजन के लिए आए थे।
राज्य का अभियोग और आरोपी नेता की अपनी व्याख्या आमने-सामने पढ़ने का।
यही गंभीर इतिहासलेखन का आधार होना चाहिए।
मानगढ़ के बाद भगत आंदोलन और गोविंद गुरु का जीवन
क्या आंदोलन मानगढ़ के बाद समाप्त हो गया?
संगठित राजनीतिक चुनौती के रूप में उसकी शक्ति कमजोर हुई, लेकिन भगत पहचान समाप्त नहीं हुई।
धार्मिक–सामाजिक अनुशासन, गोविंद गुरु की स्मृति और मानगढ़ की शहादत भील समाज में जीवित रही।
यही कारण है कि मानगढ़ को केवल 1913 की एक घटना मानना गलत है।
समय के साथ राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश के आदिवासी समुदायों की साझा ऐतिहासिक चेतना में उसका महत्व बढ़ता गया।
आज मानगढ़ पहाड़ी भील समुदाय के ऐतिहासिक स्मरण का प्रमुख स्थल है। भारत सरकार ने भी इसके राष्ट्रीय महत्व को औपचारिक रूप से रेखांकित किया है।
मानगढ़ के बाद भगत आंदोलन का क्या हुआ?
मानगढ़ ने आंदोलन के केंद्रीकृत राजनीतिक रूप को गंभीर चोट पहुँचाई।
सैन्य शक्ति ने बड़े जमाव की संभावना तोड़ी।
रियासतों ने संगठन पर नियंत्रण बढ़ाया।
गोविंद गुरु के सामाजिक–धार्मिक उपदेश उनके अनुयायियों में जीवित रहे।
भारत सरकार के जिला-इतिहास विवरण के अनुसार उनकी सामाजिक–धार्मिक परंपरा उनकी मृत्यु के बाद भी शिष्यों द्वारा जारी रखी गई।
क्या आंदोलन की कुछ माँगें बाद में स्वीकार हुईं?
भगत आंदोलन की ऐतिहासिक उपलब्धि का मूल्यांकन करते समय केवल मानगढ़ की सैन्य हार नहीं देखनी चाहिए।
भारत सरकार के एक विवरण के अनुसार आंदोलन के दबाव और बाद के आदिवासी उभारों के संदर्भ में डूंगरपुर, बांसवाड़ा और सुंथ जैसी रियासतों में बेगार व्यवस्था पर नियंत्रण अथवा कुछ रूपों में समाप्ति की दिशा में परिवर्तन हुए।
इसलिए आंदोलन का प्रभाव प्रशासनिक व्यवहार पर भी पड़ा।
यह परिवर्तन तत्काल और पूर्ण सामाजिक मुक्ति नहीं था।
लेकिन राज्य अब भील शिकायतों को पूरी तरह अनदेखा भी नहीं कर सकता था।
गोविंद गुरु का बाद का जीवन
कारावास के बाद गोविंद गुरु की राजनीतिक गतिविधि पर प्रतिबंध और नियंत्रण रहे।
उनका पुराना मानगढ़-केंद्रित संगठन उसी रूप में वापस नहीं आया।
लेकिन वे एक सामाजिक–धार्मिक गुरु और आदिवासी स्वाभिमान के प्रतीक बने रहे।
उनकी मृत्यु 1931 में हुई मानी जाती है। भारत सरकार का आधिकारिक जिला-इतिहास भी 1931 के बाद उनके शिष्यों द्वारा आंदोलन की सामाजिक–धार्मिक परंपरा जारी रखने का उल्लेख करता है।
इस प्रकार उनका जीवन मानगढ़ पर समाप्त नहीं होता।
मानगढ़ से एकी आंदोलन तक : क्या सीधा संबंध था?
1913 के बाद दक्षिणी राजस्थान में भील असंतोष समाप्त नहीं हुआ।
1920 के दशक में मोतीलाल तेजावत का एकी आंदोलन उभरा।
उसके मुद्दों में लगान, बेगार, रियासती अत्याचार और कृषक–आदिवासी अधिकार प्रमुख थे।
लेकिन गोविंद गुरु के भगत आंदोलन और तेजावत के एकी आंदोलन को एक ही संगठन की निरंतरता नहीं मानना चाहिए।
लेकिन नेतृत्व, संगठन और राजनीतिक परिस्थिति अलग थी।
यानी मानगढ़ के बाद प्रतिरोध समाप्त नहीं हुआ
1818 से 1913 : प्रतिरोध के बदलते चरण
1818 और 1913 के बीच सबसे बड़ा परिवर्तन
1818 का प्रतिरोध
नेतृत्व स्थानीय मुखियाओं और लड़ाकू समूहों में बिखरा हुआ था।
टंट्या भील का दौर
व्यक्तिगत करिश्माई प्रतिरोध अधिक स्पष्ट हुआ।
औपनिवेशिक कानून के बाहर रहकर सत्ता को चुनौती दी गई।
गोविंद गुरु का दौर
सभाएँ और सामूहिक पहचान विकसित हुईं।
और अंततः मानगढ़ जैसा विशाल जमाव संभव हुआ।
यानी लगभग एक शताब्दी में भील प्रतिरोध
छापामार प्रतिरोध → लोकनायक आधारित विद्रोह → सामाजिक–धार्मिक संगठन → सामूहिक अधिकार आंदोलन
की दिशा में विकसित होता दिखाई देता है।
किसान आंदोलन या आदिवासी आंदोलन?
इसलिए आधुनिक अर्थ में ‘किसान’ और ‘आदिवासी’ को पूरी तरह अलग-अलग श्रेणियों में बाँटना इस इतिहास को विकृत कर सकता है।
जब भूमि, लगान, बेगार, साहूकारी और उत्पादन का प्रश्न उठता है तो आंदोलन का चरित्र कृषक है।
जब जंगल, सामुदायिक पहचान, परंपरागत अधिकार और सांस्कृतिक स्वायत्तता सामने आती है तो वह आदिवासी प्रतिरोध है।
और जब राज्य की वैधता को चुनौती मिलती है तो वह राजनीतिक आंदोलन है।
भील आंदोलन तीनों था—और यही उसकी विशिष्टता है।
धर्म और राजनीति का संबंध
भगत आंदोलन भारतीय आदिवासी इतिहास में एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है
धार्मिक सुधार कब राजनीतिक प्रतिरोध बन जाता है?
जब गोविंद गुरु शराब छोड़ने को कहते हैं, वह धार्मिक–नैतिक सुधार है।
लेकिन शराब से रियासत का राजस्व जुड़ा हो तो वही आर्थिक प्रश्न बन जाता है।
जब वे अनुशासित सामुदायिक जीवन की बात करते हैं, वह सामाजिक सुधार है।
लेकिन वही अनुशासित समुदाय बेगार से इनकार करने लगे तो राजनीतिक प्रश्न पैदा होता है।
जब हजारों अनुयायी धार्मिक सभा में आते हैं, वह आस्था है।
लेकिन राज्य उसी सभा को अपनी सत्ता के लिए खतरा मान ले तो आस्था और राजनीति की सीमा टूट जाती है।
यही भगत आंदोलन को असाधारण बनाता है।
ब्रिटिश नीति की सफलता और विफलता
1818 से 1913 की पूरी यात्रा में ब्रिटिश शासन ने भीलों के प्रति चार प्रमुख औजार अपनाए
सैन्य दमन, पुलिस नियंत्रण, सहयोजन और प्रशासनिक पुनर्गठन।
खानदेश भील कोर इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।
1825 में जिस समुदाय के विद्रोही समूहों को दबाया जा रहा था, उसी समुदाय के लोगों को औपनिवेशिक सैनिक बनाया गया। 1828 तक कोर की संख्या लगभग 600 तक पहुँचने का विवरण मिलता है।
यह रणनीति इतनी प्रभावी थी कि बाद में दूसरे सीमांत क्षेत्रों में भी औपनिवेशिक शासन ने स्थानीय समुदायों को पुलिस और सैन्य ढाँचे में शामिल करने की नीति अपनाई।
सैनिक भर्ती राजनीतिक नियंत्रण दे सकती थी
जब भूमि, जंगल, साहूकारी, बेगार और सम्मान के पुराने प्रश्न बने रहे, प्रतिरोध नए रूप में लौटता रहा।
औपनिवेशिक ‘अपराधी’ और आधुनिक ‘स्वतंत्रता सेनानी’
भील इतिहास हमें इतिहासलेखन की एक बुनियादी समस्या भी दिखाता है।
कहते थे, वही व्यक्ति बाद की आदिवासी स्मृति में
टंट्या इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण हैं।
इसलिए आधुनिक इतिहासकार को दोनों अतियों से बचना चाहिए।
औपनिवेशिक अभिलेख को पूर्ण सत्य मानना गलत है।
लेकिन हर लोककथा को दस्तावेजी तथ्य मान लेना भी गलत है।
फाइल यह क्यों कह रही है और समाज इसे अलग तरह से क्यों याद रखता है?
समेकित मूल्यांकन : भील इतिहास के चार चरण
अब 1818–1913 की लगभग एक शताब्दी को चार स्पष्ट चरणों में समझा जा सकता है।
पहला चरण : 1818–40 — औपनिवेशिक प्रवेश के विरुद्ध पहाड़ी प्रतिरोध
दूसरा चरण : 1857–60 — स्थानीय प्रतिरोध का व्यापक राजनीतिक विद्रोह से संगम
यह भील इतिहास का सबसे स्पष्ट सैन्य–राजनीतिक चरण था।
तीसरा चरण : 1870–89 — टंट्या मामा और लोकनायक आधारित छापामार प्रतिरोध
चौथा चरण : 1880 का दशक–1913 — गोविंद गुरु और सामुदायिक पुनर्गठन
प्रमुख व्यक्तित्व और नेतृत्व की विविध धाराएं
प्रमुख व्यक्तित्व : त्वरित संदर्भ
जेम्स आउट्रम — 1825 से खानदेश में भीलों को औपनिवेशिक सैन्य व्यवस्था में शामिल करने की नीति का प्रमुख अधिकारी; खानदेश भील कोर से विशेष रूप से संबद्ध।
भागोजी नायक — 1857 के आसपास पश्चिमी भारत के आदिवासी–भील प्रतिरोध से जुड़े प्रमुख स्थानीय नेता।
टंट्या भील/टंट्या मामा — उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में निमाड़ के सबसे प्रसिद्ध भील प्रतिरोधी लोकनायक; 1889 में औपनिवेशिक सत्ता के हाथों मृत्यु।
गोविंद गुरु/गोविंदगिरी — भील भगत आंदोलन के केंद्रीय सामाजिक–धार्मिक नेता; सम्प सभा और मानगढ़ आंदोलन से जुड़े प्रमुख व्यक्तित्व।
इनके अतिरिक्त अनेक स्थानीय नायक थे जिनकी स्मृति राष्ट्रीय इतिहास की तुलना में क्षेत्रीय और मौखिक परंपराओं में अधिक सुरक्षित है।
1818–1913 की विस्तृत समयरेखा
संक्षिप्त समयरेखा : 1818–1913
| वर्ष/काल | प्रमुख घटनाक्रम | |---|---| | 1818 | पेशवा सत्ता के पतन के बाद खानदेश ब्रिटिश नियंत्रण में; नई औपनिवेशिक व्यवस्था के विरुद्ध भील प्रतिरोध | | 1818–20 के दशक | खानदेश और आसपास के पहाड़ी क्षेत्रों में विभिन्न भील समूहों की सशस्त्र गतिविधियाँ | | 1825 | भील एजेंसी/खानदेश में नई नियंत्रण व्यवस्था; जेम्स आउट्रम के अधीन भील सैन्य टुकड़ी का गठन | | 1826 | लगभग 300 भीलों के कोर में शामिल होने का विवरण | | 1828 | भील कोर लगभग 600 तक पहुँची | | 1830 | डांग क्षेत्र में ब्रिटिश अभियान; भील सैनिकों का भी प्रयोग | | 1833 | बड़वानी–सतपुड़ा क्षेत्र में भील विद्रोह और हतनिया की गिरफ्तारी | | 1857–59 | मध्य एवं पश्चिमी भारत में विद्रोह; कुछ क्षेत्रों में भील–आदिवासी प्रतिरोध | | 1870–80 के दशक | निमाड़ में टंट्या भील का उदय | | 1889 | टंट्या भील पकड़े गए और उनकी मृत्यु/फाँसी; विवरणों में कुछ अंतर | | उन्नीसवीं सदी का उत्तरार्ध | वन नियंत्रण, साहूकारी, बेगार और भूमि-संबंधी तनाव बढ़ते गए | | बीसवीं सदी का आरंभ | गोविंद गुरु का भील क्षेत्रों में प्रभाव बढ़ा | | 1900 के बाद | भगत सामाजिक–धार्मिक सुधार आंदोलन का विस्तार | | सम्प सभा काल | भील समुदायों में संगठन और सामूहिक चेतना का प्रसार | | 1913 | मानगढ़ पहाड़ी पर बड़े पैमाने पर भगत अनुयायियों का जमाव | | 17 नवंबर 1913 | मानगढ़ पर सैन्य कार्रवाई और बड़ी जनहानि | | 1913 के बाद | गोविंद गुरु की गिरफ्तारी और मुकदमा; आंदोलन का केंद्रीकृत राजनीतिक चरण कमजोर, लेकिन भगत परंपरा और मानगढ़ स्मृति जीवित |
1818–1913 : अब पूरी समयरेखा
1818 — खानदेश पर कंपनी नियंत्रण; व्यापक भील प्रतिरोध; बड़ी संख्या में गिरफ्तारियाँ।
1818–25 — सैन्य दमन और भील समुदाय को नियंत्रित करने के प्रयोग।
1825 के बाद — भील एजेंसी/भील कोर के माध्यम से सहयोजन की नीति मजबूत।
1830 का दशक — डांग, सतपुड़ा और आसपास स्थानीय प्रतिरोध तथा औपनिवेशिक अभियान।
1840–50 का दशक — राजस्व–पुलिस प्रशासन का विस्तार; स्थानीय तनाव जारी।
1857 — खाज्या नायक, भीमा नायक, मवासिया नायक और भागोजी नायक से जुड़ा व्यापक क्षेत्रीय प्रतिरोध।
29 अक्टूबर 1857 — लगभग 1,500 भीलों द्वारा शिरपुर पर हमला।
1857 के अंत — सिंधवा मार्ग और सरकारी खजाने पर विद्रोहियों का दबाव।
11 अप्रैल 1858 — अंबापानी का बड़ा युद्ध; भारी जनहानि और बाद में कठोर सैन्य दंड।
1858 — बड़ी संख्या में भील महिलाओं की गिरफ्तारी; तात्या टोपे के आगमन की आशंका।
1859–60 — भागोजी और अन्य समूहों की गतिविधियाँ; धीरे-धीरे दमन।
1870 का दशक — निमाड़ में टंट्या भील का उभार।
1878 के आसपास — गिरफ्तारी, फरारी और टंट्या के अधिक सक्रिय छापामार चरण की शुरुआत से जुड़े विवरण।
1878–89 — टंट्या की लंबी सशस्त्र चुनौती।
1880 का दशक — गोविंद गुरु के सामाजिक–धार्मिक संगठन की प्रारंभिक अवस्था; सम्प सभा की स्थापना की तारीख पर स्रोतगत मतभेद।
1889 — टंट्या की गिरफ्तारी, मुकदमा और फाँसी।
1900 का दशक — भगत आंदोलन का राजस्थान–गुजरात सीमांत में विस्तार।
1907 के आसपास — आंदोलन का अधिक स्पष्ट सामाजिक–आर्थिक–राजनीतिक चरण।
1907–13 — बेगार, कर, सामाजिक शोषण और सामुदायिक अधिकारों के प्रश्न तीव्र।
1913 — गोविंद गुरु और रियासती अधिकारियों के बीच बढ़ता टकराव।
अक्टूबर–नवंबर 1913 — मानगढ़ पर भगतों का बड़ा जमाव।
17 नवंबर 1913 — संयुक्त औपनिवेशिक–रियासती सैन्य कार्रवाई; बड़ी जनहानि; आज लगभग 1,500 शहीदों की संख्या व्यापक आधिकारिक भारतीय स्मरण में दर्ज।
1914 — गोविंद गुरु तथा अन्य नेताओं का मुकदमा और दंड।
बाद का काल — भगत सामाजिक–धार्मिक परंपरा जारी; गोविंद गुरु की सजा में कमी और बाद में रिहाई।
1931 — गोविंद गुरु की मृत्यु; अनुयायियों में भगत परंपरा जारी।
उपलब्धियां, सीमाएं और किसान–आदिवासी इतिहास में स्थान
उपलब्धियाँ
भील प्रतिरोध अंग्रेजी शासन को समाप्त नहीं कर पाया और न ही स्वतंत्र भील राज्य स्थापित कर सका।
फिर भी इसकी उपलब्धियों को केवल तत्काल राजनीतिक परिणाम से नहीं मापा जाना चाहिए।
1818 के बाद भीलों ने दिखाया कि पहाड़ी और वन समाज को बिना प्रतिरोध औपनिवेशिक प्रशासन में शामिल नहीं किया जा सकता।
औपनिवेशिक नीति को बदलने के लिए मजबूर करना।
खानदेश में केवल सैन्य दमन से हटकर भर्ती, भूमि सहायता और प्रशासनिक समझौते की नीति स्वयं प्रतिरोध की शक्ति का प्रमाण थी।
भगत आंदोलन ने भील समाज में अनुशासन, आत्मसम्मान और संगठन का नया आधार बनाया।
बेगार, कर, जंगल और सम्मान जैसे मुद्दों को सामूहिक अधिकार के प्रश्न में बदला गया।
मानगढ़ आज भी राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश की आदिवासी चेतना को जोड़ने वाला प्रतीक है।
सीमाएँ
भील प्रतिरोध की सबसे बड़ी कमजोरी उसका क्षेत्रीय विखंडन था।
खानदेश का प्रतिरोध, निमाड़ का टंट्या संघर्ष और दक्षिणी राजस्थान–गुजरात का भगत आंदोलन एक केंद्रीय संगठन के हिस्से नहीं थे।
भील समाज के भीतर स्वयं एकरूपता नहीं थी।
कुछ समूह अंग्रेजों के विरुद्ध थे; कुछ औपनिवेशिक सेना और पुलिस में शामिल हुए।
आधुनिक बंदूकों, सेना, संचार और प्रशासन से लैस औपनिवेशिक–रियासती गठबंधन के सामने पहाड़ी समुदायों की सैन्य क्षमता सीमित थी।
उनकी आवाज लिखित अभिलेखों में बहुत कम सुरक्षित हुई।
इतिहास का बड़ा हिस्सा उन्हीं अधिकारियों ने लिखा जो उन्हें नियंत्रित कर रहे थे।
इसीलिए आज भी इस इतिहास के पुनर्निर्माण में औपनिवेशिक दस्तावेजों के साथ मौखिक परंपरा पढ़ना आवश्यक है।
भारतीय किसान–आदिवासी आंदोलनों में भील प्रतिरोध का स्थान
भारतीय प्रतिरोध के व्यापक इतिहास में भील संघर्ष एक महत्वपूर्ण सेतु है।
एक ओर वह संथाल हूल, कोल विद्रोह और मुंडा उलगुलान जैसी आदिवासी प्रतिरोध-परंपरा से जुड़ता है।
दूसरी ओर भूमि, कर, बेगार और साहूकारी के कारण वह किसान आंदोलनों के इतिहास से भी जुड़ता है।
तीसरी ओर गोविंद गुरु का आंदोलन ताना भगत जैसे उन आंदोलनों के निकट दिखाई देता है जहाँ
धार्मिक पुनर्जागरण + सामाजिक सुधार + आर्थिक प्रतिरोध + राजनीतिक चेतना
इसीलिए भील इतिहास को केवल ‘जनजातीय विद्रोह’ के छोटे अध्याय में रखना उसके महत्व को कम करता है।
इतिहासलेखन, स्रोत और समेकित निष्कर्ष
इतिहासलेखन और अनिवार्य स्रोत
इस विषय के गंभीर अध्ययन में औपनिवेशिक अभिलेखों को आलोचनात्मक ढंग से पढ़ना आवश्यक है। जेम्स आउट्रम से संबंधित उन्नीसवीं सदी की जीवनियाँ और आधिकारिक विवरण खानदेश की घटनाओं, भील कोर तथा ब्रिटिश रणनीति के महत्वपूर्ण स्रोत हैं, लेकिन उनकी भाषा औपनिवेशिक दृष्टि से प्रभावित है।
खानदेश के आरंभिक भील इतिहास के लिए आधुनिक अकादमिक अध्ययन N. Benjamin और B. B. Mohanty का “Imperial Solution of a Colonial Problem: Bhils of Khandesh up to c. 1850” विशेष रूप से उपयोगी है। यह औपनिवेशिक शासन द्वारा ‘भील समस्या’ के निर्माण और समाधान को ऐतिहासिक संदर्भ में देखने में सहायता करता है।
गोविंद गुरु और मानगढ़ के लिए विजय कुमार वशिष्ठ का 1913 के भील विद्रोह पर शोध महत्वपूर्ण है। मानगढ़ की जनहानि के मामले में औपनिवेशिक अभिलेख, आधुनिक शोध और मौखिक परंपरा की अलग-अलग संख्याओं को साथ पढ़ना चाहिए।
हाल के वर्षों में मानगढ़ संबंधी पांडुलिपियों, तस्वीरों, मानचित्रों और मौखिक इतिहास को एकत्र करने का संस्थागत प्रयास भी हुआ है; आईसीएसएसआर समर्थित मानगढ़ विरासत अभिलेखागार इसका उदाहरण है।
निष्कर्ष : धनुष से धूनी तक—भील प्रतिरोध को कैसे समझें?
1818 में जब अंग्रेज खानदेश पहुँचे, उनके सामने पहाड़ों में रहने वाला ऐसा समाज था जिसे वे अपने राजस्व, कानून और पुलिस की व्यवस्था में बाँधना चाहते थे।
जमीन और उपज पर पहला अधिकार किसका है?
यही प्रश्न लगभग एक शताब्दी तक अलग-अलग रूपों में लौटता रहा।
आरंभ में उत्तर धनुष और तीर से दिया गया।
फिर उन्हीं भीलों में से सैनिक भर्ती किए।
वह निमाड़ में टंट्या मामा की कथा बनकर लौटा।
बीसवीं सदी के आरंभ में वह गोविंद गुरु की धूनी के आसपास फिर उपस्थित हुआ।
इस बार हथियार से पहले समाज को बदलने की कोशिश हुई।
यहीं धनुष से धूनी तक की यात्रा पूरी होती है।
17 नवंबर 1913 को गोलियाँ चलीं। मृतकों की वास्तविक संख्या पर इतिहास आज भी एकमत नहीं है; लगभग 1,500 की संख्या सार्वजनिक और आदिवासी स्मृति में व्यापक है, जबकि ऐतिहासिक स्रोतों में पर्याप्त अंतर मिलता है।
लेकिन मानगढ़ का ऐतिहासिक महत्व किसी एक संख्या पर निर्भर नहीं है।
उसका महत्व इस तथ्य में है कि जिस समुदाय को औपनिवेशिक अभिलेखों ने लगभग एक शताब्दी पहले ‘समस्या’ और ‘अशांत’ जनसंख्या के रूप में देखा था, वही समुदाय बीसवीं सदी के आरंभ तक सामाजिक अनुशासन, धार्मिक प्रतीकों और सामूहिक अधिकार की भाषा में संगठित राजनीतिक उपस्थिति दर्ज करा रहा था।
इसलिए भील विद्रोह और भील–भगत आंदोलन को 1818 से 1913 तक चलने वाला एक अकेला विद्रोह नहीं, बल्कि बदलते स्वरूप वाली प्रतिरोध-परंपरा के रूप में समझना चाहिए।
इसकी केंद्रीय धुरी अंग्रेज-विरोध मात्र नहीं थी।
और अंततः अपने जीवन पर स्वयं निर्णय लेने का अधिकार।
इस दृष्टि से 1818 का खानदेश, टंट्या मामा का निमाड़ और 1913 का मानगढ़ तीन अलग-अलग कहानियाँ होकर भी भारतीय इतिहास के एक ही बड़े प्रश्न से जुड़े हैं
राज्य जब जंगल और पहाड़ पर अपना अधिकार घोषित करता है, तब वहाँ सदियों से रहने वाले समुदाय के अधिकार का क्या होता है?
भील प्रतिरोध ने इस प्रश्न को उन्नीसवीं सदी के आरंभ में उठाया था। गोविंद गुरु और मानगढ़ ने बीसवीं सदी के आरंभ में उसे अधिक संगठित सामाजिक और राजनीतिक भाषा दी।
और यही कारण है कि मानगढ़ भील प्रतिरोध का अंत नहीं, उसकी एक शताब्दी लंबी यात्रा का सबसे शक्तिशाली ऐतिहासिक प्रतीक है।
स्रोतों की आलोचनात्मक श्रेणियाँ
इस अध्याय को वेबसाइट पर प्रकाशित करते समय स्रोतों को चार श्रेणियों में समझना सबसे सुरक्षित होगा।
पहली—औपनिवेशिक प्रशासनिक अभिलेख। इनमें राजनीतिक विभाग की फाइलें, सैन्य पत्राचार, जिला रिपोर्ट और गजेटियर शामिल हैं। इनसे तारीख, सैन्य इकाइयाँ, गिरफ्तारी और प्रशासनिक निर्णय जैसे तथ्य मिलते हैं; लेकिन ‘डकैत’, ‘अशांत’, ‘जंगली’ जैसी औपनिवेशिक शब्दावली को आलोचनात्मक दृष्टि से पढ़ना चाहिए।
दूसरी—न्यायिक दस्तावेज। मानगढ़ मामले में गोविंद गुरु की गवाही विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे नेता की अपनी आवाज सामने आती है।
तीसरी—आदिवासी मौखिक स्मृति। टंट्या मामा और मानगढ़ दोनों के इतिहास में यह अनिवार्य है। लेकिन लोककथा और सत्यापित तारीख के बीच अंतर स्पष्ट रखा जाना चाहिए।
चौथी—आधुनिक अकादमिक इतिहासलेखन। यह औपनिवेशिक फाइल और लोकस्मृति के बीच तुलनात्मक परीक्षण की अनुमति देता है।
अनिवार्य संदर्भ-सूची : आगे शोध के लिए
वेबसाइट अध्याय के पीछे शोधाधार के रूप में कम-से-कम इन स्रोत-समूहों को रखना उपयोगी होगा
A. K. Prasad, Bhils of Khandesh: Under the British ईस्ट इंडिया कंपनी, 1818–1858 — आरंभिक खानदेश इतिहास के लिए महत्वपूर्ण आधुनिक अध्ययन।
N. Benjamin एवं B. B. Mohanty, “Imperial Solution of a Colonial Problem: Bhils of Khandesh up to c. 1850” — औपनिवेशिक ‘भील समस्या’ और शांतिपूर्णकरण की आलोचनात्मक व्याख्या।
Bombay Presidency Gazetteer: Khandesh — 1857–59 के खाज्या, भीमा और भागोजी संबंधी मूल औपनिवेशिक विवरणों के लिए।
Maharashtra State Gazetteers: Jalgaon तथा Dhulia — खाज्या नायक, भीमा नायक, अंबापानी, 57 मृत्युदंड, महिलाओं की गिरफ्तारी और तात्या टोपे प्रसंग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण।
Vijay Kumar Vashishtha, Bhagat Movement: A Study of Cultural Transformation of the Bhils of Southern Rajasthan — गोविंदगिरि, भगत आंदोलन, मानगढ़ और उसके बाद की परिस्थितियों पर केंद्रित अध्ययन।
भारत सरकार, Dictionary of Martyrs / शहीद कोश — गोविंद गुरु के आंदोलन के 1907 के बाद राजनीतिक–आर्थिक रूप, बेगार और रियासती शोषण के लिए।
भारत सरकार, आजादी का अमृत महोत्सव—गोविंदगिरि — सम्प सभा, सामाजिक सुधार और बाद की विरासत के लिए; स्थापना-वर्ष संबंधी दावे को अन्य स्रोतों से मिलाकर पढ़ना चाहिए।
भारत सरकार—टंट्या भील स्मरण — टंट्या की आधुनिक राष्ट्रीय स्मृति और 1889 की गिरफ्तारी–मृत्यु के लिए; जीवनीगत तारीखों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
Mangarh Heritage Archive/ICSSR-supported research — गोविंद गुरु के मूल पत्र, न्यायालयीन बयान, 54-पृष्ठीय औपनिवेशिक पत्राचार, सैन्य आदेश और जनहानि-विवाद के लिए विशेष महत्व।
इनके अतिरिक्त शोधकर्ता को राजस्थान के बांसवाड़ा–डूंगरपुर जिला गजेटियर, तत्कालीन सुंथ/रेवाकांठा–माहीकांठा राजनीतिक अभिलेख, बॉम्बे सरकार के राजनीतिक विभाग की कार्यवाहियाँ, भारत सरकार के विदेश/राजनीतिक विभाग की फाइलें, राष्ट्रीय अभिलेखागार तथा राजस्थान राज्य अभिलेखागार की संबंधित फाइलें भी देखनी चाहिए।
अंतिम निष्कर्ष : भील प्रतिरोध की पूरी शताब्दी
अब इस पूरे इतिहास को एक वाक्य में ‘1818 का भील विद्रोह’ कहना संभव नहीं है।
यह एक शताब्दी लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया थी।
नई विदेशी सत्ता को कौन स्वीकार करेगा?
क्या उस सत्ता को उखाड़ा जा सकता है?
औपनिवेशिक कानून और स्थानीय शोषण के बाहर न्याय कैसे हासिल हो?
क्या भील समाज स्वयं को संगठित करके अपने श्रम, धर्म, संसाधनों और सम्मान पर अधिकार स्थापित कर सकता है?
और मानगढ़ में यही प्रश्न रक्तरंजित टकराव में बदल गया।
इस पूरी यात्रा में एक अद्भुत ऐतिहासिक निरंतरता दिखाई देती है।
1818 में अंग्रेजों ने भीलों को दबाने के लिए सेना भेजी।
फिर भीलों को अपनी सेना में भर्ती किया।
1857 में कुछ भील अंग्रेजों के साथ थे और कुछ अंग्रेजों के विरुद्ध।
खाज्या नायक स्वयं कभी औपनिवेशिक व्यवस्था का हिस्सा थे और फिर उसके विरुद्ध खड़े हुए।
अंबापानी में भीलों ने चट्टानों और पहाड़ियों से ब्रिटिश सेना का मुकाबला किया; 57 बंदियों को सैन्य न्याय के बाद मौत की सजा दी गई और सैकड़ों महिलाओं की गिरफ्तारी का विवरण मिलता है।
उन्होंने कहा कि समाज को केवल लड़ना नहीं है
और शायद यही इस पूरे इतिहास का सबसे बड़ा परिवर्तन था।
1818 का भील हथियार लेकर पहाड़ में गया था।
1913 का भगत धूनी के चारों ओर समुदाय बनाकर खड़ा था।
हमारे जीवन पर अंतिम अधिकार किसका है?
इसीलिए भील प्रतिरोध को भारतीय किसान–आदिवासी इतिहास में केवल ‘जनजातीय उपद्रव’ के रूप में पढ़ना औपनिवेशिक भाषा को दोहराना होगा।
यह साहूकारी और आर्थिक शोषण के विरुद्ध संघर्ष था।
और समय-समय पर यह राजनीतिक स्वायत्तता और सत्ता के अधिकार का संघर्ष भी बन गया।
इस अर्थ में खानदेश, अंबापानी, निमाड़ और मानगढ़ चार अलग घटनास्थल नहीं हैं। वे पश्चिमी और मध्य भारत के आदिवासी समाज के उस लंबे ऐतिहासिक प्रश्न के चार पड़ाव हैं जिसमें एक समुदाय आधुनिक राज्य से पूछ रहा था
जंगल तुम्हारे कानून में सरकारी हो सकता है, लेकिन हमारी स्मृति, जीविका और पीढ़ियों के अधिकार का क्या होगा?
मानगढ़ की गोलियाँ उस प्रश्न को समाप्त नहीं कर सकीं।
1913 के बाद एकी आंदोलन और आगे के आदिवासी अधिकार संघर्षों में वह फिर लौटा।
और इसीलिए भारतीय किसान–आदिवासी प्रतिरोध के इतिहास में 1818 से 1913 तक की भील यात्रा को ‘धनुष से धूनी और धूनी से मानगढ़’ तक की एक बदलती प्रतिरोध-परंपरा के रूप में पढ़ना सबसे अधिक इतिहाससम्मत है।
अब मूल 42 हिस्सों के साथ यह पूरक 43–100 जोड़ देने पर विषय की वे प्रमुख कमियाँ भी पूरी हो जाती हैं जिन्हें मैंने पिछले उत्तर में चिह्नित किया था। इसे अब वेबसाइट के लिए समेकित अध्याय माना जा सकता है। कुछ सूक्ष्म तिथियाँ—विशेषकर सम्प सभा की स्थापना और टंट्या के जन्म-विवरण—जानबूझकर निर्णायक रूप में नहीं लिखी गई हैं, क्योंकि उपलब्ध स्रोत स्वयं परस्पर असहमत हैं। यही प्रकाशन में अधिक सुरक्षित और इतिहाससम्मत तरीका है।
भील प्रतिरोध और भगत आंदोलन की संक्षिप्त समयरेखा
भील विद्रोह की शताब्दी धनुष-बाण से धूनी तक किसी सरल ‘हिंसा से सुधार’ की यात्रा नहीं थी। अलग क्षेत्रों और समयों में सशस्त्र प्रतिरोध, औपनिवेशिक सैन्य भर्ती, छापामार कार्रवाई, सामाजिक अनुशासन और धार्मिक–राजनीतिक संगठन साथ-साथ दिखाई देते हैं। मानगढ़ इस दीर्घ प्रक्रिया का निर्णायक प्रतीक है—जहाँ भील समाज की सामुदायिक एकता, बेगार-विरोध और नैतिक पुनर्गठन को औपनिवेशिक तथा रियासती सत्ता ने सुरक्षा-संकट मानकर सैन्य बल से कुचला। इस इतिहास की पूर्णता तभी बनती है जब अभिलेखों के ‘अपराधी’ और लोकस्मृति के ‘नायक’—दोनों को आलोचनात्मक दृष्टि से पढ़ा जाए।
प्राथमिक और प्रमुख द्वितीयक स्रोत
स्रोत-सावधानी: औपनिवेशिक अभिलेखों ने अनेक भील नेताओं और कार्रवाइयों को ‘डकैती’, ‘लूट’ या ‘अपराध’ की भाषा में दर्ज किया। दूसरी ओर आधुनिक स्मृति कभी-कभी नेतृत्व, तिथियों और मृत्यु-संख्या को प्रमाण से अधिक निश्चित रूप में प्रस्तुत करती है। विशेषतः मानगढ़ में मारे गए लोगों की संख्या, टंट्या भील के जन्म-विवरण और सम्प सभा की स्थापना-तिथि पर स्रोतगत मतभेद स्पष्ट रूप से दर्ज किए गए हैं।